जीवितां ज्योतिरभ्येहि - अथर्व 8।2।2
जीवित लोग प्रकाश की ओर चलते हैं
जो अन्धकार की ओर जा रहे हैं उन्हें मृतक ही समझना चाहिए।
सम्पादक विभाग-ब्रह्मवर्चस् शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार
प्रभु! समर्पण हैं तुम्हें ये भावना के फूल।
भेंट क्या दूँ सोचता था,
आ गया है आज सम्मुख,
अब सभी कुछ है तुम्हारा,
-त्रिलोकीनाथ ब्रजवाल
मन एक देवता है। इसे ही शास्त्रों में प्रजापति कहा गया है। वेदान्त में बताया गया है कि हर व्यक्ति की एक स्वतंत्र दुनिया है और वह उसके मन के द्वारा सृजन की हुई है। मनुष्य की मान्यता, भावना, निष्ठा और रुचि एवं आकांक्षा के अनुरूप ही उसे सारा विश्व दिखाई पड़ता है। यह दृष्टिकोण बदल जाय तो मनुष्य का जीवन भी उसी आधार पर परिवर्तित हो जाता है। इस मन देवता की सेवा पूजा का एक ही प्रकार है, मन को समझा बुझाकर उसे सन्मार्ग पर लगाना। सही दृष्टिकोण अपनाने के लिए सहमत करना। यदि यह सेवा कर ली जाय तो सामान्य व्यक्ति भी महापुरुष बन सकता है। उसके वरदान का चमत्कार प्रत्यक्ष देख सकता है।
इस तथ्य की सुनिश्चितता में रत्ती भर भी सन्देह की गुंजाइश के लिए स्थान नहीं है कि “जो हम सोचते है सो करते है, और जो करते है सो भुगतते है।” मन ही हमारा मार्गदर्शक है, वह जिधर ले चलता है शरीर उधर ही जाता है। यह मार्गदर्शक यदि कुमार्गगामी है तो विपत्तियों और वेदनाओं के जंगल में फँसा देगा और यदि सुमार्ग पर चल रहा है तो शान्ति और समृद्धि के सत्परिणाम उपलब्ध होना सुनिश्चित है। ऐसे अपने इस भाग्य विधाता की ही सेवा हम क्यों न करें? इस मार्ग दर्शक को ही क्यों न पूजें? गौ और ब्राह्मण की सेवा से यदि पुण्य फल मिल सकता है तो उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण इस मन देवता की सेवा से पुण्य फल क्यों न प्राप्त होगा? निश्चय ही सबसे अधिक पूजनीय, वन्दनीय और सेवनीय यह मन का देवता ही है।
सच्चे ब्राह्मणों, देवताओं और सन्तों के आशीर्वाद से बहुत सुख मिलता सुना गया है, पर मन देवता का आशीर्वाद फलित होते हुए हम में से हर कोई आसानी से चाहे जब देख सकता है। यदि सेवा पूजा करके मन देवता को इस बात के लिए मना लें कि वह सच्ची भूख लगने पर पेट की आवश्यकता से केवल उपयोगी पदार्थों को ही मुख में जाने दिया करे,
चटोरेपन की आदत को सर्वथा छोड़ दे तो इतने मान लेने से आपकी बिगड़ी हुई पाचन क्रिया ठीक हो सकती है, शुद्ध रक्त बनना आरम्भ हो सकता है और जो कमजोरी तथा बीमारी निरन्तर घेरे रहती हैं उनसे बहुत ही आसानी से छुटकारा मिल सकता है। शरीर स्वस्थ, सबल और सतेज हो सकता है और जिस स्वास्थ्य के लिए तरसते रहना पड़ता है वह चिरस्थायी हो सकता है।
यदि मन का देवता यह मान ले कि सृष्टि के समस्त जीव जिस प्रकार काम सेवन के संबंध में प्रकृति की मर्यादा का पालन करते हैं उसी प्रकार वह भी करे, तो इतनी मात्र उसकी स्वीकृति से आपका मुरझाया हुआ चेहरा कमल के फूल की तरह खिल उठेगा। जीवन रस बुरी तरह निचुड़ते रहने से पौरुष खोखला होता चला जाता है, उस बर्बादी को न करने के लिए यदि मन सहमत हो जाय तो आपके मस्तिष्क, शरीर स्वभाव और कार्य
कलापों में से ओज टपकने लगेगा। जैसे सिंह की हर क्रिया, हर चेष्टा उसके गौरव के अनुरूप होती है वैसे ही ब्रह्मचर्य पालन करने से वह बर्बादी से बचाया हुआ ब्रह्मतेज आपकी प्रत्येक चेष्टा में से प्रस्फुटित होने लगेगा। तब आप खोखले कागज के खिलौने नहीं, एक लौह पुरुष सिद्ध होंगे जिसकी आँखों में तेज, बुद्धि में प्रौढ़ता और क्रिया में प्रामाणिकता की छाप होगी। यह लाभ आपको बड़ी आसानी से मिल सकते हैं यदि आप मन के देवता को इन्द्रियों का दुरुपयोग न करके आहार विहार को प्राकृतिक और नियमित रखने की एक छोटी सी बात पर सहमत कर लें। सेवा में बड़ी शक्ति है, उससे भगवान भी वश में हो सकते हैं फिर मन देवता द्रवित क्यों न होंगे ?
हर आदमी को लगता है कि वह काम में बहुत व्यस्त रहता है। उस पर जिम्मेदारियों का तथा परिश्रम का बहुत बोझ रहता है। पर सही बात ऐसी नहीं है। उसका कार्यक्रम अनियंत्रित, बेसिलसिले, अस्त-व्यस्त ढंग का होता है इसलिए थोड़ा काम भी बहुत भार डालता है, यदि हर काम समय विभाजन के अनुसार सिलसिले से ढंग और व्यवस्था के आधार पर बनाया जाय तो सब काम भी आसानी से हो सकते है, मानसिक भार से भी बचा जा सकता है, और समय का एक बहुत बड़ा भाग उपयोगी कार्यों के लिए खाली भी मिल सकता है। हमारे अविकसित देश में तो लोग पढ़ने में ध्यान देना तो दूर उसका महत्व समझने तक में असमर्थ हो गये हैं पर जिनकी विवेक की आँखें खुली हुई हैं वे जानते हैं कि इस संसार की प्रधान शक्ति ज्ञान है। आर वह ज्ञान कर बहुमूल्य रत्न भंडार पुस्तकों की तिजोरियों में भरा पड़ा है। इन तिजोरियों की उपेक्षा करके कोई व्यक्ति अपने अन्तः प्रदेश को न तो विकसित कर सकता है और न उसे महान बना सकता है। अध्ययन एक वैसी ही आत्मिक आवश्यकता है जैसी शरीर के लिए भोजन। इसलिए मन देवता को राजी करना होगा कि दैनिक कार्यक्रम की व्यवस्था बनाकर वे कुछ समय बनावें और उसे अध्ययन के लिए नियत कर दें।
नित्य का अध्ययन वैसा ही अनिवार्य बना दें जैसा कि शौच, स्नान, भोजन और शयन आवश्यक होता है।
स्वास्थ्य और ज्ञान के बाद तीसरी विभूति है- स्वभाव। इन तीन को मिलाकर ही पूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण होता है। अपने सब कार्यों में व्यवस्था, नियमितता, सुन्दरता, मनोयोग तथा जिम्मेदारी का रहना स्वभाव का प्रथम अंग है। दूसरा अंग है दूसरों के साथ नम्रता, मधुरता, सज्जनता, उदारता एवं सहृदयता का व्यवहार करना। तीसरा अंग है धैर्य, अनुद्वेग, साहस, प्रसन्नता, दृढ़ता और समता की सन्तुलित स्थिति बनाये रहना। यह तीनों ही अंग जब यथोचित रूप से विकसित होते हैं तो उसे स्वस्थ स्वभाव कहा जाता है। यह तीनों बातें भी मन की स्थिति पर ही निर्भर रहती है।
आमतौर से लोग किसी काम को आरम्भ करते है, अगर उसे बिना पूरी तरह समाप्त किये ही अधूरा छोड़ देते है। पुस्तक पढ़ेंगे तो उसे समाप्त करके यथास्थान रखने की अपेक्षा जहाँ की तहाँ पड़ी छोड़कर चल देंगे। कपड़े उतारेंगे तो उन्हें झाड़कर तह बनाकर यथास्थान रखने की बजाय चाहे जहाँ उतार कर फेंक देंगे, पानी पियेंगे तो खाली गिलास को उसके नियत स्थान पर रख कर तब अन्य काम करने की बजाय उसे जहाँ का तहाँ पटक कर और काम में लग जायेंगे। काम को पूरी तरह समाप्त किये बिना उसे अधूरा छोड़कर चला देना, स्वभाव का एक बड़ा भारी दोष है। इसका प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र पर पड़ता है और उनके सभी कार्य प्रायः अधूरे पड़े रहते है। व्यवस्था के साथ सफलता का अटूट संबंध है। इस बात को मन महोदय मान ले तो समझना चाहिए कि हारी बाजी जीत ली अपनी प्रत्येक वस्तु को सुन्दर, कलात्मक, सुव्यवस्थित रखने के लिए मन की सौन्दर्य भावना विकसित होनी चाहिए। उसी सौन्दर्य में किसी व्यक्तित्व सम्मान छिपा हुआ है।
मधुरता, नम्रता और उदारता किसी व्यक्ति की महानता का अधिकृत चिन्ह है। जिसके हृदय में दूसरों के प्रति आदर प्रेम और सद्भाव है वह निश्चय ही उनके साथ सज्जनता का व्यवहार करेगा। इसमें यदि थोड़ा समय लगता हो या खर्च बढ़ता हो तो भी वह उसे प्रसन्नतापूर्वक सहन करेगा। बहुत करके तो विनम्र मुस्कुराहट के साथ मधुर शब्दों में वार्तालाप करने से काम चल जाता है। शिष्टाचार का ध्यान रखना, अपने कार्य दूसरों से कराने की अपेक्षा औरों के ही छोटे मोटे काम कर देना यह मामूली-सी बात है पर इससे हमारी सज्जनता की छाप दूसरों पर पड़ता है। दूसरों की कड़वी बात को भी सह लेना, दूसरों के अनुदार व्यवहार को भी पचा जाना और बदले में अपनी ओर से सज्जनता का ही परिचय देना, अपनी वाणी या व्यवहार में अहंकार या उच्छृंखलता की दुर्गन्ध न आने देना सत्पुरुषों का मान्य लक्षण है। अपना स्वभाव ऐसा ही बनाने के लिए यदि मन को साध लिया जाय तो मनुष्य अजातशत्रु बन सकता है। इस प्यार की मार से उसके सभी शत्रु मूर्छित और मृतक हो सकते है। मित्र तो उसके चारों ओर इसी प्रकार घिरे रह सकते है जैसे खिले हुए कमल के आस पास भौंरे मँडराते रहते है। यह सिद्धि जीवन की सफलता के लिए कम महत्वपूर्ण नहीं है, पर मिलती उसे ही है जिसने मन के देवता को इसके लिए तैयार कर लिया है।
जीवन में बहुधा अप्रिय प्रसंग आते रहते है। यह जरूरी नहीं, कि हमेशा प्रिय परिस्थितियाँ तथा अनुकूल व्यवहार ही उपलब्ध हो। हानि, घाटा, रोग, शोक, विछोह, अपमान, असफलता, आक्रमण आपत्ति आदि की विपन्न स्थितियाँ भी सुख सम्पत्ति की भाँति आती रहती है। इनका आना अनिवार्य है। कोई भी इन विविधताओं से बच नहीं पाता। इस उभय पक्षीय क्रम को सहन करने योग्य मनोभूमि बनाये रखना हर विवेकशील का कर्तव्य है। प्रतिकूलताऐं आने पर जो घबराते है, अधीर होते है। किंकर्तव्यविमूढ़ बनते है वे अपनी इस दुर्बलता को भी एक नई विपत्ति के रूप में ओढ़ते हैं और उनका कष्ट दूना हो जाता है। इसके विपरीत साहसी और धैर्यशील लोग कठिन से कठिन समय को भी अपने साहस के बल पर काट देते हैं और निराशा को चीर कर आशा का वातावरण बनाने के लिए प्रयत्न करके फिर काम चलाऊ स्थिति उत्पन्न कर लेते है। जरा भी बात पर घबरा जाना, चिन्तित हो जाना, रोना, पीटना, निराश हो बैठना, उत्तेजित हो जाना, क्रोधातुर होकर न कहने योग्य कहने लगना और न करने योग्य कर बैठना यह सब मनुष्य की क्षुद्रता और नास्तिकता के चिन्ह है। जिसका हृदय विशाल है, कलेजा चौड़ा है, दृष्टिकोण दूरदर्शी है, वह आपत्तियों और प्रतिकूलताओं को कुछ क्षण ठहरने वाली प्रकृति की एक लहर मात्र मानता है और उसे हँसते हुए उपेक्षा की दृष्टि रखते हुए सरलतापूर्वक पार कर लेता है। पर यह सम्भव तभी है जब मन के देवता हमारी सेवा से प्रसन्न होकर अपने आपको इस संतुलित स्थिति में रखने के लिए तैयार हो जायें। वे अपने सहयोगी बन जाये, विरोध करना और सताना छोड़ दें तो अच्छा स्वभाव बनने में देर ही कितनी लगेगी? और अच्छा स्वभाव बन जाना इस संसार की एक बहुमूल्य सम्पत्ति प्राप्त करके भारी अमीरी भोगने के आनन्द से भी बढ़कर है।
मन के देवता प्रसन्न होकर भौतिक जीवन को आनन्दमय और सुसम्पन्न बनाने के लिए हमें स्वास्थ्य, ज्ञान और स्वभाव की उत्कृष्टता प्रदान करते है। इन वरदानों को पाकर हमारे साँसारिक जीवन में धन, यश, प्रसन्नता, प्रफुल्लता, सन्तोष उल्लास, प्रेम, सहयोग सभी कुछ मिलने लगता है। सफलता के द्वार हर दिशा में खुल जाते उपलब्धि उन्नति एवं जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी मन के सधने पर ही अवलम्बित है।
सेवा का पुण्य फल प्राप्त करने के लिए हमें अवश्य ही प्रयत्नशील होना चाहिए, पर सेवा करें किसकी? सबसे प्रथम सेवा का अधिकारी सबसे अधिक सत्पात्र, सबसे अधिक समीपवर्ती, सम्बद्ध एवं विश्वस्त अपना मन ही है। हमें इसी को ओर सबसे पहले, अधिक ध्यान देना चाहिये।
(श्री जान्हवीचरण ब्रह्मचारी)
प्रत्येक प्राणी के हृदय में एक आकाँक्षा यह पाई जाती है कि वह दुःख और मृत्यु से बचा रहे। अगर विचारपूर्वक देखा जाय तो आज तक मनुष्य ने जितने प्रयत्न किये है उन सबका उद्देश्य इन्हीं दो बातों की पूर्ति करना था। मनुष्य ने समाज की रचना ही इस लिये की कि एक दूसरे के सहयोग से उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति अधिक उत्तम ढंग से होने लगे और बड़े समुदाय बनाकर रहने से आपत्तियाँ ओर संकटों का सामना अच्छी तरह किया जा सकें। नगर ओर ग्रामों का निर्माण, शासन व्यवस्था की स्थापना, फौज और पुलिस का संगठन, चिकित्सालय, न्यायालय, आदि का कायम करना सभी कार्यों का उद्देश्य यही होता है कि मनुष्यों के कष्टों, अभावों को दूर किया जा सकें। पर यह सब होने पर भी आज हम देख रहे है कि मनुष्यों के दुःखों और मृत्यु में विशेष अन्तर नहीं पड़ा है। इसी लक्ष्य को सामने रखकर वेद में कहा गया है।
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्य वर्ण तमसस्पुरतात्। तमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्थः विद्यतेऽयनाय॥
इसका आशय यह कि “मनुष्य को उचित है कि वह उस महान ज्योतिस्वरूप तथा अन्धकार रहित ईश्वर का ज्ञान प्राप्त करे, जिसके जानते से ही वह मृत्यु से बच सकता है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय इससे बचने का नहीं है।” इस पर बहुत से लोग यह तर्क हम ईश्वर को जानने की कोशिश क्यों करे? क्या उसके बिना हमारा जीवन सुखी नहीं बन सकता? क्या जो लोग ईश्वर को नहीं मानते वे आनन्द के साथ नहीं रहते? हमको तो दुनियाँ में प्रायः यह दिखलाई पड़ता है कि गुण्डे बदमाश इच्छानुकूल ढंग से पापकर्म करते हुए मस्त रहते है, मृत्यु की भी बहुत कम परवा करते है और पापी से डरते वाले प्रायः गरीबी और अभावों में ही जीवन बिताते है। इस प्रकार की शंकायें उठाकर ये लोग यह निष्कर्ष निकालते है कि मनुष्य को यथा सम्भव इसी प्रश्न पर विचार करना चाहिये कि हम क्या करें, कैसे करें? इसके बजाय जो लोग विचार करते है कि “मैं कौन हूँ” “ईश्वर क्या है, कहाँ है, कैसा है?” वे अपना समय व्यर्थ गँवाते हैं।
पर जब हम गम्भीरता पूर्वक विचार करते है तो हमको स्पष्ट मालूम होता है कि जब तक हम इस प्रश्न को न समझ लेंगे कि “हम कौन हैं” तब तक दूसरे प्रश्न का कि “हमको क्या करना चाहिये” समाधान हो ही नहीं सकता। मनुष्य ने अपने सुख के लिए जो विभिन्न व्यवस्थायें बनाई है वे ठीक भी हो तो भी जब तक हम आस्तिक बन कर और ईश्वर में विश्वास रखकर कार्य न करे तब तक न तो दुःखों से छुटकारा मिल सकता है, न शान्ति प्राप्त हो ही सकती है। इस सम्बन्ध में आस्तिकता की विवेचना करते हुए एक विद्वान ने लिखा है।
“ईश्वर का विश्वास मनुष्य को उस समय सत्य मार्ग पर दृढ़ होने के लिए बल देता है जब संसार के अनेक प्रलोभन और भय उसे झूठ बोलने की प्रेरणा करते है। ईश्वर विश्वासी मनुष्य फाँसी पाने से भी नहीं डरता और हर्ष पूर्वक अपने कर्तव्य का पालन करता है, क्योंकि वह समझता है कि मृत्यु के समय भी ईश्वर का करुणामय हाथ उसके ऊपर रहेगा। ईश्वर विश्वास मनुष्य को सच्ची क्षमा सिखाता है। ईश्वर विश्वास मनुष्य को दम, शम तथा इन्द्रिय निग्रह के अभ्यास में सहायता देता है। ईश्वर विश्वास उसे पापाचरण से रोकता है। वस्तुतः यदि विचार किया जाय तो ईश्वर विश्वास एक ऐसा पारसमणि है जिसको छूने से मनुष्य का जीवन कुछ का कुछ बन जाता है।
“लोग कहेंगे कि क्या बिना ईश्वर विश्वास के हम इन गुणों को धारण नहीं कर सकते? मैं कहता हूँ नहीं कदापि नहीं। हमको इतिहास और जीवन चरित्रों का जो ज्ञान है उससे यह बात सिद्ध नहीं होती। सच्ची बात यह है कि सृष्टि के आदि से अब तक ईश्वर विश्वास किसी न किसी रूप में प्रचलित रहा है। इसी के आधार पर लोगों ने आचार शास्त्र की नींव रखी है। और इसी के आश्रय से वे नियम संसार के वायु मंडल में व्याप्त हो रहे है। उनका येन केन प्रकारेण प्रत्येक मनुष्य के ऊपर प्रभाव है। इस लिए यदि कोई मनुष्य ईश्वर पर विश्वास नहीं भी करता, तो भी ये नियम उसे एक सीमा तक सदाचार के नियमों का उल्लंघन नहीं करने देते और इस प्रकार पाप एक सीमा से बाहर जाने नहीं पाते। अब यदि नास्तिक लोग ऐसे स्थान पर पहुँच सकें जहाँ ईश्वर विश्वास का क्लेश भी नहीं है और वह अपने पुराने संस्कारों को पूरी तरह से धो डाले, तब शायद इस बात का अनुमान किया जा सकता है कि ईश्वर विश्वास के बिना मनुष्य सदाचारी रह सकता है या नहीं? परन्तु यह कैसे होगा?
सदाचार का अर्थ प्रायः यही लिया जाता है कि मनुष्य झूठ न बोले किसी को कष्ट न दे चोरी न करे आदि। थोड़ी देर के लिए हम यह मान भी ले कि केवल सामाजिक आवश्यकताओं से मनुष्य को इन नियमों के पालने की प्रेरणा मिल सकती है। परन्तु वह प्रेरणा आयेगी तो बाहर से ही। और इस सदाचार की एक सीमा भी होगी जो अधिक विस्तृत नहीं हो सकती। पर यदि सदाचार के लिये आत्मशक्ति भी आवश्यक है तो उसकी प्राप्ति ऊपर बातों से न होगी। जिसे हम परमसुख या परमानन्द कहते है उससे मनुष्य उस समय तक वंचित ही रहेगा, जब तक अपने भीतर एक महती सत्ता का प्रकाश नहीं देखता। चेतन मनुष्य जड़ वस्तुओं द्वारा केवल शारीरिक दुःखों से बच सकता है और शारीरिक सुखों की ही प्राप्ति कर सकता है। परन्तु हम भली प्रकार जानते है कि शारीरिक सुख कितने क्षण भंगुर हैं। अधिकांश भोगो के विषय में तो यह दिखलाई पड़ता है कि उनसे हमारी तृप्ति होने के बजाय उनकी अग्नि दिन पर दिन प्रचण्ड होती जाती है और जिसे मनुष्य सुख समझ कर करता है वही दो दिन बाद जी का जंजाल बन जाता है। वास्तव में देखा जाय तो बाहरी सुख हमारी साधारण शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए है। भूख लगे तो खाना खा लो, जिससे शरीर काम करने योग्य बना रहें। परन्तु जिस मनुष्य ने खाने को ही जीवन का मुख्य सुख और उद्देश्य बना लिया हो तो उसे खाने से बहुत जल्दी रोगी बनकर कष्ट भोगना पड़ता है।
सारांश यही है कि जिन लोगों ने कभी आत्मा की तरफ ध्यान नहीं दिया और शरीर को ही सब कुछ समझ कर इसी के पालन पोषण में लगे रहे, वे ईश्वर की बात को नहीं समझ पाते और न उनको ईश्वर के मानने में किसी प्रकार का लाभ दिखलाई पड़ता है। पर सच पूछा जाय तो उनका जीवन पशुओं से कुछ भी अच्छा नहीं कहा जा सकता। खाना, पीना, विषय भोग के लिये पशु भी प्रयत्नशील रहते है और अनेकों अमीरों के यहाँ पाले हुये पशुओं को मनुष्यों की अपेक्षा भी उत्तम भोज्य सामग्री प्राप्त हो जाती है। राजा, रईसों के प्रिय घोड़ों को दूध, मलाई, मक्खन जलेबी आदि नित्य खिलाये जाते है। विलायती कुत्तों को गर्मी से बचने के लिए बिजली के पंखे लगाये जाते है। पर इन बातों के आधार पर उनको सुखी या श्रेष्ठ नहीं माना जा सकता। श्रेष्ठता का चिन्ह तो ज्ञान ही है और उसी को कहा जा सकता है जिसके द्वारा मनुष्य अपने सच्चे स्वरूप और कर्तव्य को पहिचाने। पर यह बात तभी हो सकती है जब मनुष्य इस विश्व के मूल स्त्रोत परमात्मा की तरफ ध्यान दे। इसी से मानव जीवन की सफलता ही प्राप्ति हो सकती है।
(श्री भगवानसहाय वाशिष्ठ )
मानव जाति की रक्षा, धारण, पोषण, व्यवस्था, समाज में सत्व संशुद्धि अर्थात् सद्गुणों की वृद्धि , शुद्धि के लिए धर्म व्यवस्था की अत्यन्त आवश्यकता है। इसके बिना समाज का ढाँचा सुव्यवस्थित एवं सुस्थिर रहना सम्भव नहीं है।
मानव धर्म के मूल स्त्रोत मुख्यतया तीन है। इन तीनों पर ही विभिन्न धर्मों में एक स्वर से जोर दिया गया है। समुदाय एवं मानवजाति का सुव्यवस्था एवं रक्षा आदि के लिए आवश्यक है कि हमारा दृष्टिकोण चिन्तन मनन को केन्द्र एकदेशीय अथवा व्यक्तिगत न होकर विश्वगत हो, समष्टिमय हो। हर व्यक्ति अपने आपकी स्वतन्त्र सत्ता न समझे वरन, उसका सम्बन्ध अखिल विश्वभुवन स्वतः चेतन जगत से है। धर्म का दूसरा आधार है मानव जीवन का स्वस्थ निर्माण। धर्म का तीसरा आदर्श है अपने जीवन को स्वस्थ एवं सशक्त सबल बनाते हुए उसे मानव जाति के हित में अर्पण कर दे, परमार्थमय बना दे। जीवन के सारे क्रिया कलाप समुदाय के लिए हो। जिनके साथ अखण्ड एक्य सम्बन्ध स्थापित है उसी के लिए इसका विसर्जन हो। स्वार्थ के लिए नहीं। सभी धर्मों का मूलाधार यह तीन तथ्य हैं।
धर्म का पहला आदेश चिन्तन ओर दृष्टि कोण की व्यापकता के लिये है। मानव मात्र प्रयोजन विशेष से पढ़ाई लिखाई, काला, रोग, धनी, गरीब, मोटा, दुबला, स्वभाव एवं योग्यता क आधार पर एक दूसरे से काफी भिन्न है। वहाँ वह अपना अलग अलग व्यक्तित्व भी रखता है। किन्तु इन सबके मूल में जहाँ हमारे अस्तित्व को मूल आत्मा का निवास है हम सबमें कोई विशेष भिन्नता नहीं है। हम सब एक ही आत्मसत्ता में स्थित है जो एक देशीय नहीं सार्वभौमिक है। इस प्रकार व्यक्ति और समुदाय में पृथकत्व और समग्रता में एकत्व स्थापित करना धर्म की पहली शर्त है। समस्त जगत का एक अखण्डत्व, यही मानव धर्म का मूल आधार है।
आस्तिकता का उद्देश्य जहाँ आत्मकल्याण है वहाँ यह भी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने आपको सर्वव्यापक आत्मसत्ता का एक अंश माने और दूसरों का अपने साथ आत्मीयता एवं एकता के सुदृढ़ सूत्र में आबद्ध अनुभव करे। महापुरुषों ने ईश्वरीय सत्ता के बारे में विभिन्न अनुभूतियाँ प्राप्त की, जिनका निष्कर्ष है कि ईश्वर अर्थात् सृष्टि की स्थिति लयकारिणी शक्ति में ही यह जगत भासमान है। भिन्न भिन्न हो सकती है, कोई साकार रूप में, तो कोई निराकार रूप में, साथ ही रूप भी अपनी कल्पनानुसार ही दिए जाते हैं। फिर भी उन सबमें सब जीवों में ईश्वर की विद्यमानता और उनकी मूलभूत आत्मीयता की मान्यता एक सी है।
मानव धर्म की उच्च भूमिका यही है। जहाँ मनुष्य अपनी पृथकता और समग्र में एक्य स्थापित करता है और अपने अस्तित्व की मूल आत्म सत्ता में स्थित होता है, जहाँ कोई भिन्नता नहीं, संकीर्णता नहीं, वहाँ सर्वत्र एकत्व के ही दर्शन होते है। अतः धर्म को यदि सम्पूर्ण जीवन का लक्ष्य निर्धारित करना है उसकी उच्च भूमिका में पहुँच कर
विराट विश्व चेतना से एकत्व कायम करना है तो उसे अधिकाधिक आन्तरिक और विश्व-व्यापी बनाना होगा जो हमारे और संसार के अन्धकार का उन्मूलन कर दें। मनुष्य जीवन में जब यह धर्म क्रिया व्यवहार के रूप में व्यक्त होने लगेगी तब सब प्रकार के भेद विभेद, सीमायें एवं परस्पर विभाजन करने वाली बाधाएँ छिन्न भिन्न हो जायेंगी। तब मानव जाति विश्वैक्य के उस पावन मन्दिर का निर्माण कर सकने में समर्थ होगी, जहाँ मानवता और मानवादर के प्रतीक के रूप में ईश्वर का पूजन किया जायेगा।
इसके लिए सोचना होगा कि हमारा चिन्तन कहाँ तक ठीक है? कितना व्यापक और विशाल दृष्टिकोण है? कितना कितना व्यापक और विशाल दृष्टिकोण है? हमारा चिन्तन और दृष्टिकोण आकाश जैसा विशाल होना चाहिए। अपनी समस्त संकीर्ण धारणाओं का त्याग आवश्यक है। हमें नित्य ही धारण करनी चाहिए, मनन और निदिध्यासन के द्वारा अपनी अनुभूति को बढ़ाना चाहिए कि मैं संकीर्ण क्षुद्र व्यष्टि नहीं हूँ मैं समष्टि स्वरूप हूँ मेरा सत्य रूप उस विश्वगत चेतन सत्ता से सम्बन्धित है। मैं उसी श्रृंखला की एक कड़ी मात्र हूँ। जिस चेतन सत्ता में अतीत काल से बुद्ध ईसा, राम, कृष्ण, गाँधी, मुहम्मद की आत्मायें निवास करती हैं, उसी में मेरा भी धारणा पोषण, लय स्थित है, मैं सब का आत्म स्वरूप हूँ। इस समय जगत के साथ मैं अभिन्न हूँ। इन धारणाओं के माध्यम से अपने भेदविभेद रूपी अवधारणा को छिन्न भिन्न करके समस्त जगत का अखण्डत्व, एकत्व देश नहीं धर्म की प्रमुख बुनियाद है।
यह हो सकता है कि सबके सोचने का मार्ग भिन्न हो । एक ही गन्तव्य पर पहुँचने के लिए अलग-अलग कई मार्ग हो सकते हैं। यह सदैव रहा है और रहेगा।
उपनिषदकार ने कहा है--
“एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति”
सत्य एक ही है उसे बुद्धिमान लोग कई नामों से पुकारते हैं। मानव धर्म-सत्य धर्म-एक ही है। परन्तु उपासना के माध्यम अलग-अलग हो सकते हैं, उसी प्रकार जैसे एक नदी में उतरने के लिए विभिन्न घाट।
कालान्तर में मानव जाति के व्यापक हो जाने एवं बढ़ जाने से विभिन्न धर्म नाम, समुदाय, शाखा प्रशाखायें भी बहुत बढ़ गई हैं किन्तु यह बुरा नहीं है स्वाभाविक ही है। धर्म स्वतः आकाश जितना विशाल और अनन्त है, रुचि, कल्पना चिन्तन के आधार पर विभिन्न समुदायों का भिन्न धर्म होना कोई बुरी बात नहीं है किन्तु यदि इनका अर्थ गलत लगाकर अथवा एक देशीय और संकीर्ण रूप देकर एकांगी बना लिया जाय तो वे धर्म मनुष्य का हित साधन नहीं कर सकते। इन सब का आधार मानव धर्म होना चाहिए जो भिन्नता को एकत्व की ओर अग्रसर करता है। जहाँ स्वयं में ही भेदविभेद की संकीर्ण सीमायें कायम होंगी उससे विश्व एकता, मानव एकता की कैसे आशा की जा सकती है? मार्ग अलग-अलग हों किन्तु हमारे विचार और भावनाओं का व्यापक और सीमातीत होना आवश्यक है। मानव धर्म की इस बुनियाद को भुला देने पर तो धर्म नाम की वास्तविकता ही समाप्त हो जाती है।
अब बुद्धिवाद का युग है। विज्ञान के कदम बड़ी तेजी से बढ़ रहे हैं इसके साथ-साथ हमें अपने चिन्तन और धार्मिक दृष्टिकोण को भी अग्रगामी बनाना होगा। अपनी संकीर्णताओं को त्याग कर अपने लिये विशाल एवं उदार दृष्टिकोण अपनाना होगा। आलोचना प्रत्यालोचना और शास्त्रार्थ के द्वारा हार-जीत करने का जमाना चला गया। आज के युग की माँग है-मानवता का गठन और उसका एक्य। तीखी समालोचना और कट्टरता के माध्यम से मानवजाति अपना बहुत अहित कर चुकी अब उसकी पुनरावृत्ति नहीं की जानी चाहिए। आज मानव-धर्म के मूल सिद्धान्तों का अवलम्बन करना ही उचित और सही मार्ग होगा।
(सन्त बिनोवा)
हमारे देश में ऋषि, सन्त, योद्धा, वैज्ञानिक, महापुरुष और अवतारी व्यक्ति अगणित हुए हैं। उनके चरित्रों का श्रवण मनन और पठन-पाठन करना उचित है। उसके लिए अनेक पुराण इतिहास उपलब्ध है। उन महापुरुषों का नाम स्मरण करना, उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने वाले आयोजन भी समय-समय पर करते रहना चाहिए जिससे वीर पूजा की परम्परा जारी रहे और वर्तमान पीढ़ी के लोगों को भी वीर एवं महान बनने की प्रेरणा मिले।
आज यह सब होता भी है। हम अपने अतीत को स्मरण करने के लिए जितने धार्मिक और साँस्कृतिक आयोजन करते हैं उतने दुनिया भर में और कहीं नहीं होते। इतने पर भी हममें उन प्राचीन महापुरुषों की महानता का आविर्भाव नहीं होता, यह एक विचारणीय एवं चिन्ताजनक बात है। हम भागवत पढ़ें और सुनें पर कृष्ण बनने की आकाँक्षा उत्पन्न न हो; रामायण के अखण्ड पाठ हों और कथा प्रवचन हों पर किसी में राम बनने का उत्साह न आये, ऐसा क्यों? रासलीला और रामलीला हम इतनी श्रद्धापूर्वक करते और देखते हैं फिर उन महापुरुषों का अनुकरण करने की भावना मन में क्यों नहीं उत्पन्न होती?
बात यह है कि हम उनके स्थूल कार्यों को देखते हैं और उन्हीं की नकल करते हैं, उनके गुणों पर न तो मनन करते हैं और न उन्हें अपने अन्तःकरण में उतारने के लिए सचेष्ट होते हैं। इस स्थूल स्मरण और अनुकरण से कुछ विशेष आयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है।
एक उदाहरण लीजिए। छत्रपति शिवाजी ने अपने काल में कई किले बनाये और उनसे राष्ट्र रक्षा का बहुत प्रयोजन सिद्ध हुआ। यदि हम आज शिवाजी के प्रशंसक होने के नाते उसी प्रकार के ऊँचे-ऊँचे किले जहाँ तहाँ बनाना आरम्भ कर दें और इसे शिवाजी का अनुकरण कहें तो यह कोई बुद्धिमत्ता पूर्ण बात न होगी। ऐसा करने से धन का ही अपव्यय न होगा यदि कभी शत्रु से मुकाबला हो जाय तो उन किलों में रहने वालों पर बमबारी आसानी से हो सकती है।
महापुरुषों की जीवन गाथाओं में से उनके स्थूल चरित्रों का अनुकरण करना आवश्यक नहीं वरन् उनके गुणों और आदर्शों को अपने अन्दर धारण करना चाहिए। हमारा हृदय भूतकाल के प्रति श्रद्धा रखे यह ठीक है पर हमारे मस्तिष्क को वर्तमान के साथ चलना चाहिए। यदि दिल और दिमाग दोनों ही भूतकाल में रहें तो हम एक खंडहर मात्र रह जावेंगे।
अब पौधों में कलम लगाने की उपयोगिता सिद्ध हो रही है। कलमी आम कितने बड़े और स्वादिष्ट होते हैं। कलमी आम कितने बड़े और स्वादिष्ट होते हैं। कलमी गुलाब का फूल कैसे सोहता है। अब तो बाँस और गन्ने के संयोग से जो पौधा पैदा होगा वह बहुत विशाल और बहुत मधुर पेड़ बनेगा। ऐसा ही प्रयोग हमारे बौद्धिक क्षेत्र में भी होना चाहिए। प्राचीन काल का दिल और अर्वाचीन काल का दिमाग इन दोनों का जोड़ देने से मानव के अन्दर एक महती विचार शक्ति उत्पन्न हो सकती है और उसके द्वारा सुख शान्ति भरे युग का आविर्भाव हो सकता है।
(श्री शान्तिप्रिय वानप्रस्थी)
तैत्तिरीय उपनिषद् वल्ली 3 के द्वितीय अनुवाद में एक प्रसंग आता है कि भृगु ने अपने पिता वरुण से ब्रह्म विवाह की जिज्ञासा प्रकट करते हुए कहा - “अधीहि भगवो ब्रह्मेति।” भगवन् मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिए।
त हो वाच। तपसा ब्रह्म विजिन्तासस्व। उद्यौ ब्रह्मेति। यतपोऽतप्यत। सतपस्तप्त्वा आनंदो ब्रर्ह्मोति व्यजानात्।
तब वरुण ने कहा-तप से ब्रह्म को जानने की इच्छा कर। तप ही ब्रह्म है। तब उसने पिता की आज्ञा पाकर तप द्वारा अपने को तपाया और जाना कि ब्रह्म आनन्दमय है।
मुण्डक उपनिषद् 1/1/8 में भी परमात्मा की प्राप्ति का उपाय तप को ही बताया गया है।
‘तपसा वीयते ब्रह्म’
अर्थात् तप से ही ब्रह्म को जाना जाता है। तप की महिमा असाधारण है। स्वयं ब्रह्म ने जब एक से अनेक होने की इच्छा की तो उस इच्छा की पूर्ति के लिए जिस शक्ति और साधन सामग्री की आवश्यकता पड़ी, उसका जुटाया जाना तप के द्वारा ही संभव हो सका। सृष्टि के आदि में ब्रह्म ने स्वयं तप किया और उसके द्वारा उपलब्ध बल से अखिल ब्रह्माण्ड के रूप में अपना विस्तार किया। ब्रह्म के तप बल से ही इस सृष्टि की संचालन क्रिया भी व्यवस्थित है।
वर्णन आता है-
सोऽकामयत। बहुस्यां प्रजायेयेति। सतपोऽतप्यत। स तपस्तप्त्वा इद सर्वमसृजत यदिदं किं च। तत्सृष्ट्वा तदेवानु प्राविशत्। तदनुप्रविश्च सच्चत्यच्चाभवत्।
-तैत्तिरीय 2/6/
उस परमात्मा ने इच्छा की कि मैं प्रकट हो जाऊँ, एक से बहुत हो जाऊँ। इसके लिए उसने सत्य तप किया। तप से अपने को तपाया और इस जगत की रचना की। इसे रचकर वह उसी में प्रविष्ट हो गया।
परमात्मा की प्राप्ति के साधनों में तप का प्रमुख स्थान है। क्योंकि ब्रह्म स्वयं तप रूप है। आत्मा की शुद्धि ही ब्रह्म प्राप्ति का प्रधान आधार है और यह तभी संभव ह जब तप की अग्नि में अपने अन्तःकरण को तप के द्वारा स्वर्ण के समान उसके मल जलाने के लिए तपाया जाय।
कहा भी है :-
सत्येन लभ्य स्तपसा ह्मेष आत्मासम्यग् ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्।
अन्तः शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रोयं पश्यन्ति यतयः क्षीण दोषाः।
-मुण्डक 3/1/5
परमात्मा इस शरीर के भीतर ही शुभ्र ज्योति के रूप में विद्यमान है। वह सत्य,तप, ब्रह्मचर्य और विवेक द्वारा ही प्राप्त होता है। जिनने अपने दोषों को दूर कर लिया है वे प्रयत्नशील साधक ही उसका दर्शन करते हैं।
ब्रह्म लोक में प्रवेश के लिए सत्य ब्रह्मचर्य आदि अन्य गुणों की भी आवश्यकता है पर साधक का तपस्वी होना तो अनिवार्य ही है।
शास्त्र कहता है -
तेषमेवैष ब्रह्मलोको येषां तपोब्रह्मचर्य येषु सत्यं प्रतिष्ठितम्।
यह जो ब्रह्मलोक है वह उन्हीं का है जिनके पास तप है, ब्रह्मचर्य है और सत्य है।
ऐसा ही एक अभिवचन केन उपनिषद् में भी आता है -
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वंगानि सत्य मायतनम्। -केन 4।8
जिस रहस्यमयी ब्रह्म विद्या का वेद वेदाँगों में विस्तारपूर्वक वर्णन है तथा उस सत्य स्वरूप परमात्मा को जिसके द्वारा जाना जाता है उसके तीन ही आधार हैं-(1) तप (2) मनोनिग्रह (3) कर्तव्य पालन।
प्रश्नोपनिषद् में एक कथा आती है जिसमें जिज्ञासा की प्रारम्भिक सभ्यता तप साधना में प्रवृत्ति निर्देशिका की गई है। सच्ची ब्रह्म जिज्ञासा का लक्षण ऋषि ने यही माना है कि इसमें लक्ष्य प्राप्ति के लिए कष्ट उठाने-तप करने की क्षमता है या नहीं। यदि यह क्षमता न हो तो उसे अनधिकारी ही माना जाना निश्चित है। अनधिकारी लोग ब्रह्म की चर्चा भले ही करते रहें पर उसे प्राप्त नहीं कर सकते। इस तथ्य का उद्घोषणा उपनिषद् कर्ता ने इस प्रकार किया है :-
सुकेशा च भारद्वाजः शैव्यश्र सत्यकामः सौर्यायणी च गम्यं कौसल्यश्रश्रृलायनों भार्गवो वैदर्भिः कवन्धी कात्यायनस्ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठः परं ब्रह्मान्वेषमाणा एष हवै तत्सर्वे वक्ष्यतीति तेह समित्याणयो भगवन्त पिप्पलादमुपसन्नाः।
-प्रश्नोपनिषद् 1/1
भारद्वाज के पुत्र सुकेश, शिवि के पुत्र सत्यकाम, गर्ग गोत्री सार्यायणी, कोशल देशीय आश्वलायन, विदर्भ निवासी भार्गत्र, कत्य ऋषि के पौत्र कबन्धी, ये छै: वेद परायण ऋषि परमात्मा की खोज करते हुए, हाथ में सामघा लेकर भगवान पिप्पलाद ऋषि के पास इस आशा से गये कि वे ब्रह्म का व्याख्यान करेंगे।
तान्ह स ऋषिरुवाच भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्वभा संवत्सरं सवत्स्यथ यथा कामं प्रश्नान्पृच्छेत यदि वित्तास्यामः सर्वह वो वक्ष्याम इति।
प्रश्नोपनिषद्1/2
उन सुकेशा आदि ऋषियों से पिप्पलाद ने कहा- आप लोग श्रद्धा ब्रह्मचर्य और तप के साथ एक वर्ष तक यहाँ सज्जनों की तरह निवास करें। इसके बाद अपने-अपने प्रश्न पूछें। यदि मैं जानता होऊँगा तो निश्चय ही वे सब बातें आप लोगों को बताऊँगा।
ऋषियों ने महर्षि पिप्पलाद के आदेशानुसार उनके आश्रम में रहकर एक वर्ष तक तप किया। इस प्रकार जब उनने अपनी प्रारम्भिक परीक्षा दे दी तब महर्षि ने उन्हें ब्रह्म का उपदेश देकर समाधान किया।
भगवान बुद्ध जब आत्म शान्ति की खोज में गृह त्याग कर निकलते हैं, और आत्मा की प्राप्ति का मार्ग विभिन्न गुरुजनों से पूछते हैं तो उनका समाधान नहीं होता। अनेक प्रकार के मार्ग,अनेक विधान अनेक सिद्धान्त उन्हें विचलित कर देते हैं। ऐसी दशा में उनकी अन्तरात्मा एक ही उपाय सुझाती है कि तप करना चाहिए। तप के द्वारा ही अपने भीतर वह प्रकाश उत्पन्न होगा जिससे वस्तु स्थिति का स्पष्ट निरूपण हो सके।
अश्वधधि कृत बुद्ध चरित्रम में यह वर्णन इस प्रकार आता है :-
इहास्ति नास्तीति य ऐषं संशयः-
परसय वास्यैर्नम मात्र निश्रयः।
अवेत्य तत्वं तपसा शमेन च-
स्वयं ग्रीष्यामि यदत्र निश्चयम्।
-बुद्ध चरितम् 9/73
क्या है, क्या नहीं है, इस सम्बन्ध में जो संशय है उसका समाधान मुझे दूसरों के वचनों से न होगा। तप और शम से मैं स्वयं ही तत्व को जानूँगा और उसे ही ग्रहण करूँगा।
बुद्ध तप करने के लिए हिमालय की ओर चलते हैं। उन्हें वह स्थान बढ़ा उपयुक्त जँचता है। क्योंकि अनेक तपस्वियों की तप साधना जिस स्थान पर हो रही है या होती रही है वहाँ की भूमि में कुछ दिव्य विशेषता होनी ही चाहिए। इस पुण्य भूमि में भगवान् बुद्ध को बड़ी शान्ति मिलती है।
ब्रह्मर्षि राजर्षि सुरर्षि जुष्टःपुण्यः समीपेहिमिवान शैलःके?
तपाँसि तान्येव तपोध्नानाँयत्संनिकर्षाद्वहुली भवन्ति।
-बुद्धचरितम् 7/36
ब्रह्मर्षियों, राजर्षियों और देवर्षियों से सेवित परम पवित्र हिमालय पर्वत समीप ही है। इस समीपता के कारा तपस्वियों के तपस्या का प्रभाव और भी अधिक बढ़ जाता है।
(श्री. सत्यभक्त जी)
अब हमारा देश स्वतन्त्र हो चुका है तथा पुराकालीन ऋषि-मुनियों तथा आधुनिक देशभक्तों के त्याग-तपस्या की बदौलत इस थोड़े से समय में उसने विश्व की राष्ट्रमण्डली में उच्च-सम्मानीय पद भी प्राप्त कर लिया है। जब हम इस समय की अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थिति पर गम्भीर पूर्वक विचार करते हैं तो यही जान पड़ता है कि इस समय दो-चार राष्ट्र ही भारत से अधिक प्रभावशाली माने जा सकते हैं, अन्यथा राजनीति, विज्ञान, उद्योग धन्धे, सैन्य शक्ति आदि सभी क्षेत्रों में वह अन्य बहुसंख्यक देशों की की अपेक्षा उल्लेखनीय प्रगति कर रहा है, और संसार के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ, शासक और प्रसिद्ध व्यक्ति उसके महत्व को स्वीकार कर रहे है।
पर जब हम स्वयं अपने घर के भीतर झाँक कर देखते हैं आत्म निरीक्षण करने बैठते हैं तो अपने लिये गौरव का भाव उत्पन्न होने की अपेक्षा ग्लानि का ही विशेष रूप से उद्रेक होते हैं। हम यह नहीं कहते हैं कि अनैतिकता, चरित्रहीनता, स्वार्थ परता, धोखाधड़ी आदि दोष संसार के अन्य उन्नतिशील कहलाने वाले देशों में नहीं पाये जाते। ये बातें आज कल की भौतिकवादी सभ्यता के फलस्वरूप सभी जगह पर्याप्त परिमाण में देखने को मिलती है। पश्चिम के देशों ने एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों के निवासियों के साथ जैसा क्रूरतापूर्ण अमानवीय और धूर्तता का व्यवहार किया है वह सर्वविदित है। वहाँ की बहुसंख्यक चरित्रहीन नारियों की विलासलीलायें और तलाक काण्ड भी प्रसिद्ध ही हैं। इस दृष्टि से अपने देश की हालत को कुछ गनीमत समझ सकते हैं। पर जब यहाँ के निवासियों के व्यक्तिगत जीवन पर विचार करते हैं और समाज के प्रति उनके कर्तव्य सम्बन्धी अज्ञान तथा उपेक्षा को देखते हैं तो बड़ी निराशा होती है। वे लोक, परलोक, मुक्ति, आत्मा की अमरता की बातें तो कर सकते हैं, पर अपने मोहल्ले अथवा गली की सफाई की समस्या की तरफ कभी उनका ध्यान नहीं जाता। व्यक्तिगत रूप से वे पूजा, पाठ, भजन, देव-दर्शन आदि को नियमित रूप से करते हैं, पर किसी सार्वजनिक समारोह में ठीक समय पर पहुँचकर भाग ले सकना उनके लिये बड़ा कठिन होता है। इसी प्रकार की अनेक साधारण बातों में अन्य व्यक्तियों की सुविधा और असुविधा का ध्यान न रखने का नतीजा यह होता है कि हम सभी को समय-समय पर ऐसी कठिनाइयाँ और आपत्तियों का सामना करते रहना पड़ता है जो थोड़ी सी सावधानी रखने से ही दूर की जा सकती है। जब इस प्रकार की कठिनाई स्वयं हमको उठानी पड़ती है तो उसके लिये दूसरों को बुरा भला कहते हैं और उपदेश भी देने लगते हैं, पर व्यवहार में उस प्रकार का कार्य स्वयं करने में हम किसी प्रकार का संकोच नहीं करते। इस सम्बन्ध में एक विद्वान लेखक के निम्न विचार हम सबके लिये ध्यान देने योग्य हैं-
“क्या हमारे पाठकों ने केले और नारंगी के छिलके चारों तरफ पड़े हुये नहीं देखे हैं? क्या ऐसा भी कभी नहीं हुआ है कि जरूरी काम से जब वे सड़क पर चले जा रहे हों या जल्दी में रेल पर चढ़ने के लिए प्लेटफार्म पर दौड़े हों तो इन पर फिसल कर गिर पड़े हों? अगर उनका ऐसा अनुभव है तो क्या उन्होंने स्वयं छिलके ऐसी जगहों पर न फेंके हैं जहाँ फेंके नहीं जाने चाहिए थे। क्या उन्होंने सदा इस बात का विचार रखा हैं कि घरों में इन्हें अलग टोकरी में रखें, सड़कों पर इन्हें कूड़े के डिब्बों में डालें और रेल में खिड़की के बाहर फेंक? क्या ऐसा कभी नहीं हुआ हैं कि जब वे रेल पर चढ़े हों तो वहाँ पर व्यर्थ का कूड़ा करकट पाकर मुसाफिरों को मन ही मन खूब कोसा हो जो उस डिब्बे में पहले चढ़े थे और जिन चीजों का बाहर फेंक देना चाहिये था, उन्हें डिब्बे में ही छोड़कर चल दिए थे? पर क्या उन्होंने खुद इस बात का विचार रखा कि इस प्रकार के कूड़े को कम करें या उसकी वृद्धि न करें? आप यह सदा स्मरण रखें कि अपने स्थान पर हर एक चीज ठीक हैं, और गलत स्थान पर वही गन्दी है। हमें वही मिलेगा जिसके हम योग्य हैं और सार्वजनिक अधिकारियों की तरफ से भी सफाई आदि का उन्हीं स्थानों में अधिक प्रबन्ध रखा जायेगा जहाँ क रहने वाले उस पर जोर देते हैं और स्वयं भी साफ रहते हैं। जिन्हें गन्दगी, गंदगी नहीं मालूम होती, जो खुद साफ नहीं रहते, उनके यहाँ कोई सफाई नहीं करता।
इस प्रकार की लापरवाही और दूसरों की सुविधा के प्रति उपेक्षा की भावना रखने का नतीजा यह होता है कि हम जल्दी ही किसी बात पर विश्राम नहीं कर पाते और इस कारण हमको समय-समय पर बहुत कुछ तकलीफ या हानि भी उठानी पड़ती है। रास्ते में चलते हुए तरह-तरह की गन्दी चीजों के पड़े रहने अथवा रास्ते के बीच में ही खड़े होकर बातचीत या हंसो मजाक करने वाले लोगों से जब हमको रुकना पड़ता है तो क्या वह हमको बुरा नहीं जान पड़ता? अनेक लोग तो छिपे तौर पर घरों से निकलने वाले बेकार ईंट, पत्थर, मिट्टी आदि के ढेर बची सड़क पर लगा देते हैं कि जिससे अनजान व्यक्ति को चोट खा जाने या किसी गाड़ी या सवारी के गिर जाने का पूरा अन्देशा रहता है। कितने ही लोग ऊपर की छतों की मोरी से बीच बाज़ार में गन्दा पानी छोड़ देते हैं, जिसके छींटे राह चलतों पर पड़ते हैं और कभी-कभी जिसके ऊपर बड़ी लड़ाई भी हो जाती है। इस प्रकार के कामों का कोई अच्छा नहीं कहता और समय-समय पर सभी को उनके कारण तकलीफ उठानी पड़ती है पर नागरिकता की शिक्षा के अभाव से प्रायः सभी लोग उनको करते रहते हैं।
नागरिकता की शिक्षा के अभाव का एक परिणाम यह भी हुआ है कि हम लोगों के पारिवारिक सम्बन्धों में विश्वास का अभाव हो गया है, जिसके कारण सबको अनिश्चित अवस्था में रहकर बड़ी परेशानी उठानी पड़ती है। जिस प्रकार हम सार्वजनिक जीवन में लापरवाही और दूसरों के प्रति उपेक्षा का व्यवहार करते हैं, वहीं हमारे व्यक्तिगत सम्बन्धों पर भी प्रभाव डालता है, और हम अपने लिये जिन बातों की इच्छा रखते हैं, दूसरों के साथ प्रायः उसके विपरीत ही व्यवहार करते हैं। हम चाहते हैं कि अन्य लोग हमारे साथ जो वायदा करते हैं उसे उचित रूप में और यथा समय पूरा करें, जिससे हमको कठिनाई न उठानी पड़े, पर हम स्वयं दूसरों के साथ किये हुए वायदे को ठीक ढंग से पूरा करने का ख्याल नहीं रखते। इस प्रकार की परिस्थिति का हमारे नित्य के जीवन पर क्या प्रभाव पड़ता है यह आप एक अनुभवी लेखक के शब्दों में सुनिये-
“जब हम मोची, दर्जी, धोबी आदि को कोई काम देते हैं तो हमें यह विश्वास नहीं रहता कि वह समय से काम कर देगा। न उसे श्वांस रहता ह कि हम समय पर उसे दाम दे देंगे। इसी कारण परस्पर तकाजे पर तकाजा करते रहना पड़ता है। ऐसी दशा में समाज कैसे ठीक प्रकार से चल सकता है?हालत यहाँ तक पहुँचा है कि यदि आप किसी को भोजन का निमन्त्रण दें और उन्होंने उसे स्वीकार भी कर लिया हो, तो न आपको यह विश्वास रहता है कि वे समय पर आ जायेंगे, और न उन्हें यह विश्वास रहता है कि यदि जायेंगे तो तो समय पर भोजन मिल ही जायेगा। यदि कोई हमसे कोई चीज माँगकर ले जाय तो इस बात का भरोसा नहीं रहता कि वह उसको नियत समय पर और वैसी ही अच्छी हालत में लौटा देगा जैसी हालत में दी थी। जब समाज की ऐसी दशा है, जब किसी काम के लिये हम किसी दूसरे पर विश्वास नहीं कर सकते, तब क्या समाज का संगठन हो सकता है और क्या समाज की प्रगति संभव है?
देश की उन्नति कुछ, लोगों के बड़े, विद्वान और प्रसिद्ध होने से नहीं हो सकता। पहले समय में हमारे यहाँ बाल्मीकि, व्यास, कालिदास जैसे विद्वान हो गये; वर्तमान समय में भी तिलक, गाँधी, मालवीय जी, रवीन्द्रनाथ जैसे जगत को चमत्कृत कर देने वाले नेता और विद्वान उत्पन्न हो गये, पर इतने से ही समस्त देश बड़ा नहीं हो सकता। जब तक देश के साधारण निवासी अपने कर्तव्य और अधिकारों को ठीक-ठीक समझ कर उनका पालन नहीं करते जब तक वास्तविक उन्नति नहीं हो सकती। बहुत बड़ी-बड़ी बातों को छोड़ भी दें तो अभी हम यह देखते हैं कि अधिकांश लोग खाने-पीन सोने-उठने शौच-स्नान आदि कार्यों को भी समय पर नहीं करते। अनेक घरों में स्त्रियाँ खाना तैयार करके घंटों तक मर्दों की राह देखती रहती हैं, पर वे कभी ठीक समय पर खाने को नहीं आते। इसके फल से अन्य काम भी अस्त-व्यस्त हो जाते हैं और सभी कार्यक्रम असमय में करने पड़ते हैं। इस प्रकार घरों के भीतर भी अविश्वास की सृष्टि होती है और व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन भी नष्ट हो जाता है। जब कोई विदेशी इस देश के लोगों की आलोचना करता है तो वह प्रायः यही कहता है कि “भारतवासी बड़े आलसी हैं।” इसका अर्थ यह नहीं कि यहाँ के लोग परिश्रमी नहीं हैं, वरन् समय-समय पर अमरीका आदि देशों में यहाँ के लोगों को परिश्रम के लिये विशेष रूप से पसन्द किया गया है। तो भी निजी कार्यों में वे समय के पाबन्द नहीं होते और दूसरों की सुविधा असुविधा का ध्यान न रखकर मनमौजीपन से कार्य करते हैं इसमें सन्देह नहीं। हमारे यहाँ महान पुरुषों का बहुत अधिक आदर-सम्मान किया जाता है, यहाँ तक कि उनको देवता मानकर पूजा भी जाता है, पर जिन सद्गुणों के कारण वे इतने महान हो सकें उनका अनुकरण करने का प्रयत्न नहीं किया जाता। पर यदि हम इन बड़े व्यक्तियों की जय-जयकार करने के बजाय उनके आदेशों पर ध्यान दें उनका पालन करें तो हमारा वास्तविक कल्याण हो सकता है। यह कोई आवश्यक बात नहीं कि हम उनके समान राज्य, धर्म, समाज आदि के संचालन के बड़े-बड़े काम ही करें। वरन् हमको यह समझ लेना चाहिए कि कैसा भी छोटा बड़ा काम क्यों न हो, वह सभी देशों के लिये महत्वपूर्ण और प्रशंसनीय है। जरा विचार करके देखे कि धोबी, चमार, मेहतर आदि सबसे निम्न समझे जाने वाले लोग भी यदि अपना काम समय पर नहीं करते अथवा ठीक ढंग से नहीं करते तो समस्त समाज को कैसी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसलिये देश के वास्तविक उत्थान का मार्ग यही है कि लोग छोटे-बड़े का ख्याल छोड़कर अपने-अपने काम को समाज के लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण समझ कर पूर्ण मनोयोग से ठीक समय पर उचित रूप में पूरा करें। यदि ऐसा होने लगे तो विना ज्यादा उपदेश और लैक्चरों के देश का सुधार हो सकता है और वह सब तरह से प्रगतिशील, शक्तिशाली बन सकता है। महान पुरुष हमारा मार्ग दर्शन ही कर सकते हैं, पर देश के लिये आवश्यक समस्त कार्यों की पूर्ति उनसे नहीं हो सकती। उसके लिये तो साधारण नागरिकों को ही अपना कर्तव्य पालन करना पड़ेगा।
आत्मा का हित चलते रहने में है। एक स्थान पर डेरा डाल देना उसके स्वभाव के प्रतिकूल है। भोग और विषय दुर्गन्ध से भरे हुए हैं। उसके मध्य में तृप्ति मान लेने वाले को असली माधुर्य का पता ही नहीं लगा। सब विद्याओं में बड़ी मधु-विद्या है, जो आत्मज्ञान या आध्यात्मिक विद्या का ही दूसरा नाम है।
-मनुष्य में दृढ़ संकल्प शक्ति ही दिव्य कौस्तुभ मणि है, जो हृदय का अलंकार है। जिस हृदय में कौस्तुभ नहीं वह विहीन है। संकल्प की वीर्यवती शक्ति ही मनुष्य को देव बनाती है।
आत्मोपदेश सरल है
दूसरों को उपदेश देने के लिए बहुत ज्ञान की, विद्या की आवश्यकता पड़ती है, परन्तु आत्मोपदेश के लिए थोड़े से ज्ञान से भी काम चल सकता है। दूसरों के मारने के लिए तीर तलवारों को जमा करने और उनका चलाना सीखने की आवश्यकता होती है, पर आत्महत्या के लिए एक छोटी सी रस्सी से गले में फाँसी लग सकती है जरा से चाकू से नस काटकर प्राण गँवाया जा सकता है। आत्म-कल्याण का मार्ग इतना सीधा और सरल है कि उस पर चलने के लिए साधारण बुद्धि भी पर्याप्त है। यहाँ तक कि अशिक्षित व्यक्ति भी उस पर उसी तरह चल सकते हैं जैसे राजकीय सड़क पर हर कोई बिना किसी योग्यता या प्रमाण-पत्र के भी प्रसन्नता पूर्वक चल सकता है।
सज्जनता का सौन्दर्य
चेहरे के सौन्दर्य को देखकर अनेक लोग प्रभावित होते हैं। पर नम्रता भी सौन्दर्य से किसी प्रकार कम आकर्षक और प्रभावोत्पादक नहीं है। नम्रता और सज्जनता के गुण जिसमें हैं, जो सदा मुस्कराता रहता है वह जहाँ कहीं जायेगा अपने लिए स्थान बना लेगा। इस चिन्ता और परेशानी से भरी हुई दुनियाँ में ऐसे लोगों की हर जगह माँग है जो अपने उत्तम स्वभाव के कारण दूसरों की व्यथा में थोड़ी कमी कर सकें, उन्हें अपनी प्रसन्नता और सज्जनता से कुछ मानसिक शान्ति प्रदान कर सकें।
कुरूपता कोई दोष नहीं है। नम्र और हँसमुख रहने से कुरूपता का दोष दूर किया जा सकता है। घमंडी चिड़चिड़ा स्वार्थी और कटुवादी कोई स्त्री या पुरुष चाहे कितना ही सुन्दर क्यों न हो कुछ ही देर में घृणास्पद बन जायेगा-चाहे वह कितना ही सुन्दर क्यों न दिखता हो। इसके विपरीत कुरूप व्यक्ति में भी यदि सौजन्य की समुचित मात्रा मौजूद है तो वह अपने लिए आदर और बड़प्पन प्राप्त करके रहेगा। कहते हैं कि द्रौपदी स्याह काली थी। इसी से उसे ‘कृष्ण’ भी कहते थे जिसका अर्थ है-कलूटी फिर भी उसके गुणों पर मुग्ध होकर पाण्डव उसका भारी आदर करते थे और राजमहल की बहुत सी व्यवस्था वही संभालती थी।
हमारी अपनी जिम्मेदारी
दुनियाँ को चलाने और सुधारने की हमारी जिम्मेदारी नहीं है। पर अपने लिए जो कर्तव्य सामने आते हैं उन्हें पूरा करने में सच्चे मन से लगना और उन्हें बढ़िया ढंग से करके दिखाना निश्चय ही हमारी जिम्मेदारी है। अपने आपको व्यवस्थित करके हम दुनियाँ के संचालन और सुधार में सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण योग दे सकते है। अधूरे और भद्दे काम करना अपने आप को कलंकित करना है। परमात्मा ने हमारी रचना अपूर्ण नहीं सर्वांग और उच्चकोटि की सामग्री से की है। उसने हमें सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। फिर हमीं अपने गौरव को मलीन क्यों न होने दें। हमें जैसा अच्छा बनाया गया है उसी के अनुरूप हमारे काम भी गौरवपूर्ण होने चाहिए।
आत्म-भाव का विस्तार
इस संसार का अणु-अणु एक दूसरे से संबंधित है। एक दूसरे को पकड़े हुए है। यह कण यदि आपस में बँधे न रहें सहयोग न करें। परस्पर बँधे रहने की प्रक्रिया से मुँह मोड़ ले तो सृष्टि क्रम ही बिखर जायेगा, प्रत्येक पदार्थ के भीतर विघटन आरम्भ हो जायेगा और वह अपने अस्तित्व को ही खो बैठेगा। एकता के बंधनों का ऐसा ही महत्व है। जड़ जगत में ही नहीं सब चैतन्य प्राणियों विशेषतया मानव-समाज में यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि एकता, प्रेम और आत्मीयता के आधार पर उनका बल तथा विस्तार सुदृढ़ होता है। जो जितना ही आत्मीयता की भावनाओं से ओतप्रोत है वह उतना ही विकसित कहा जा सकता है। उदारमना महापुरुष-वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्श को अपनाते हैं, उन्हें सभी अपने ही दिखाई पड़ते हैं। जिसका स्वार्थ-आत्मभाव जितना छोटा है, जितना संकीर्ण है उस व्यक्ति को उतना ही तुच्छ माना जायेगा।
आत्म विश्वास का शास्त्र
जीवन संग्राम का सबसे बड़ा शस्त्र आत्मविश्वास है। जिसे अपने ऊपर-अपने संकल्प बल और पुरुषार्थ के ऊपर भरोसा है वही सफलता के लिये अन्य साधनों को जुटा सकता है। आत्म संयम भी उसी के लिये सम्भव है जिसे अपने ऊपर भरोसा है। जिसने अपने गौरव को भुला दिया, जिसे अपने में कोई शक्ति दिखाई नहीं पड़ती जिसे अपने में केवल दीनता, अयोग्यता, एवं दुर्बलता ही दिखाई पड़ती है। ह किस बलबूते पर आगे बढ़ सकेगा? और कैसे इस संघर्ष भरी दुनियाँ में अपना अस्तित्व यम रख सकेगा। बहती धार में जिसके पैर उखड़ गया, उसे पानी बहा ले जाता है पर जो अपना हर कदम मजबूती से रखता है वह धीरे-धीरे तेज धार को भी पार कर लेता है।
हमें परमात्मा ने उतनी ही शक्ति दी है जितना कि किसी अन्य मनुष्य को। जिस मंजिल को दूसरे पार कर चुके हैं उसे हम क्यों पार नहीं कर सकते? फौज के प्रत्येक सैनिक को एक सी बन्दूक दी जाती है। निशाना लगाना हर सिपाही की अपनी सूझबूझ और योग्यता का काम है। सभी व्यक्ति अनन्त सामर्थ्य लेकर इस भूतल पर अवतीर्ण हुए हैं। प्रश्न केवल पहचानने, भरोसा करने और उसके सदुपयोग का है। जिन्हें अपने ऊपर भरोसा है वे अपनी उपलब्ध सामर्थ्य का सदुपयोग करके कठिन से कठिन मंजिल को पार कर सकते हैं।
दोष तो अपने ही ढूँढ़ें
दोष दृष्टि रखने से हमें हर वस्तु दोषयुक्त दीख पड़ती है। उससे डर लगता है, घृणा होती है। जिससे घृणा होती है, उसके प्रति मन सदा शंकाशील रहता है, साथ ही अनुदारता के भाव भी पैदा होते हैं। ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति या वस्तु से न तो प्रेम रह सकता है और न उसके गुणों के प्रति आकर्षण उत्पन्न होना ही सम्भव रहता है।
दोष दृष्टि रखने वाले व्यक्ति को धीरे-धीरे हर वस्तु बुरी, हानिकारक और त्रासदायक दीखने लगती है। उसकी दुनियाँ में सभी विराने, सभी शत्रु और सभी दुष्ट होते है। ऐसे व्यक्ति को कहीं शान्ति नहीं मिलती।
दूसरों की बुराइयों को ढूँढ़ने में, चर्चा करने में जिन्हें प्रसन्नता होती है वे वही लोग होते हैं जिन्हें अपने दोषों का पता नहीं है। अपनी ओर दृष्टिपात किया जाय तो हम स्वयं उनसे अधिक बुरे सिद्ध होंगे, जिनकी बुराइयों की चर्चा करते हुये हमें प्रसन्नता होती है। दूसरों के दोषों को जिस पैनी दृष्टि से देखा जाता है। यदि अपने दोषों का उसी बारीकी से पता लगाया जाय तो लज्जा से अपना सिर झुके बिना न रहेगा और किसी दूसरे का छिद्रान्वेषण करने की हिम्मत न पड़ेगी
कर्ण की उदारता
भगवान कृष्ण एक दिन कर्ण की उदारता की चर्चा कर रहे थे। अर्जुन ने कहा-युधिष्ठिर से बढ़कर वह क्या उदार होगा? कृष्ण ने कहा-अच्छा परीक्षा करेंगे? एक दिन वे ब्राह्मण का वेश बनाकर युधिष्ठिर के पास आये और कहा-एक आवश्यक यज्ञ के लिए एक मन सूखे चंदन की आवश्यकता है। युधिष्ठिर ने नौकर लाने को भेजे। पर वर्षा की झड़ी लग रही थी इसलिए सूखा चन्दन नहीं मिल रहा था जो कट कर आता वह पानी में भीग कर गीला हो जाता। युधिष्ठिर सेर, दो सेर चन्दन दे सके, अधिक के लिए उसने अपनी असमर्थता प्रकट कर दी।
अब वे कर्ण के पास पहुँचे और वही एक मन सूखे चन्दन का सवाल किया। वह जानता था कि वर्षा में सूखा चन्दन न मिलेगा। इसलिए उसने अपने घर के किवाड़ चौखट उतार कर फाड़ डाले और ब्राह्मण को सूखा चन्दन दे दिया।
तब श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन से कहा-देखो युधिष्ठिर उतना दान करते हैं जितने से उनकी अपनी कुछ हानि न हो। कर्ण अपने को कष्ट में डालकर भी दान करता है, उसकी उदारता अधिक बड़ी है।
प्रतिहिंसा का अन्त नहीं युधिष्ठिर ने ‘नरो वा कुंजरो वा’ का भ्रमपूर्ण वक्तव्य देकर द्रोणाचार्य को शोक संतप्त कर दिया और उस खिन्न अवस्था से लाभ उठा कर जब उनको मारा गया तो इस अनीतिपूर्ण कार्य से द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को बड़ा क्रोध आया। वह प्रतिशोध लेने के लिए क्रोधान्ध होकर कुछ भी करने के लिए उतारू हो गया। उसने द्रौपदी के सोते हुए पाँचों पुत्रों की हत्या कर डाली और उत्तरा के गर्भ पर भी आक्रमण किया ताकि पाण्डवों का वंश नाश ही हो जाय। यह प्रतिहिंसा यहीं समाप्त नहीं हुई। पाण्डवों को अपने पुत्रों मरने का दुःख हुआ और उनने भी अश्वत्थामा से बदला लेने की ठानी। युद्ध में जीत कर अर्जुन ने उसे बाँध कर द्रौपदी के सामने उपस्थित किया ताकि उसकी इच्छानुसार दण्ड दिया जा सके। द्रौपदी ने दूरदर्शिता और उदारता से काम लिया। हिंसा और प्रतिहिंसा का कुचक्र तोड़े बिना काम नहीं चलता। इससे तो आगे भी सर्वनाश ही होता चलता है। द्रौपदी ने अर्जुन से कहा-छोड़ दो छोड़ दो। यह ब्राह्मण हमसे श्रेष्ठ है। जिन गुरु द्रोणाचार्य ने तुम्हें धनुर्विद्या सिखाई, यह उन्हीं का पुत्र है। उनके उपकारों को कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करो और इसे छोड़ दो। ब्राह्मण पूजा के योग्य हैं वध के योग्य नहीं। मैं अपने पुत्रों की मृत्यु से दुखी होकर जिस प्रकार रो रही हूँ उसी प्रकार इसकी माता गौतमी को भी मेरे समान ही न रोना पड़े इसलिए इसे छोड़ देना ही उचित है।
त्याग और प्रेम एक दिन नारद जी भगवान के लोक को जा रहे थे। रास्ते में एक संतानहीन दुखी मनुष्य मिला। उसने कहा-नाराज मुझे आशीर्वाद दे दो तो मेरे सन्तान हो जाय। नारद जी ने कहा-भगवान के पास जा रहा हूँ। उनकी जैसी इच्छा होगी लौटते हुए बताऊँगा।
नारद ने भगवान से उस संतानहीन व्यक्ति की बात पूछी तो उनने उत्तर दिया कि उसके पूर्व कर्म ऐसे हैं कि अभी सात जन्म उसके सन्तान और भी नहीं होगी। नारद जी चुप हो गये।
इतने में एक दूसरे महात्मा उधर से निकले, उस व्यक्ति ने उनसे भी प्रार्थना की। उनने आशीर्वाद दिया और दसवें महीने उसके पुत्र उत्पन्न हो गया।
एक दो साल बाद जब नारद जी उधर से लौटे तो उनने कहा-भगवान ने कहा है-तुम्हारे अभी सात जन्म संतान होने का योग नहीं है।
इस पर वह व्यक्ति हँस पड़ा। उसने अपने पुत्र को बुलाकर नारद जी के चरणों में डाला और कहा-एक महात्मा के आशीर्वाद से यह पुत्र उत्पन्न हुआ है।
नारद को भगवान पर बड़ा क्रोध आया कि व्यर्थ ही वे झूठ बोले। मुझे आशीर्वाद देने की आज्ञा कर देते तो मेरी प्रशंसा हो जाती सो तो किया नहीं, उलटे मुझे झूठा और उस दूसरे महात्मा से भी तुच्छ सिद्ध कराया। नारद कुपित होते हुए विष्णु लोक में पहुँचे और कटु शब्दों में भगवान की भर्त्सना की।
भगवान ने नारद को सान्त्वना दी और इसका उत्तर कुछ दिन में देने का वायदा किया। नारद वहीं ठहर गये। एक दिन भगवान ने कहा-नारद लक्ष्मी बीमार हैं-उसकी दवा के लिए किसी भक्त का कलेजा चाहिए। तुम जाकर माँग लाओ। नारद कटोरा लिये जगह-जगह घूमते फिरे पर किसी ने न दिया। अन्त में उस महात्मा के पास पहुँचे जिसके आशीर्वाद से पुत्र उत्पन्न हुआ था। उसने भगवान की आवश्यकता सुनते ही तुरन्त अपना कलेजा निकालकर दे किया। नारद ने उसे ले जाकर भगवान के सामने रख दिया।
भगवान ने उत्तर दिया-नारद ! यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। जो भक्त मेरे लिए कलेजा दे सकता है उसके लिए मैं भी अपना विधान बदल सकता हूँ। तुम्हारी अपेक्षा उसे श्रेय देने का भी क्या कारण है सो तुम समझो। जब कलेजे की जरूरत पड़ी तब तुमसे यह न बन पड़ा कि अपना ही कलेजा निकाल कर दे देते। तुम भी तो भक्त थे। तुम दूसरों से माँगते फिरे और उसने बिना आगा पीछे सोचे तुरन्त अपना कलेजा दे दिया। त्याग और प्रेम के आधार पर ही मैं अपने भक्तों पर कृपा करता हूँ और उसी अनुपात से उन्हें श्रेय देता हूँ।” नारद चुपचाप सुनते रहे। उनका क्रोध शान्त हो गया और लज्जा से सिर झुका लिया।
आपत्ति धर्म एक बार उषस्ति ऋषि को कई दिन तक भोजन नहीं मिला। भूख की पीड़ा से उनके प्राण निकलने लगे। तब वे एक शूद्र के यहाँ पहुँचे और कुछ खाने को माँगा। उसके पास कुछ झूठे उड़द पड़े थे। ऋषि ने उन्हें ही स्वीकार कर लिया और खाने लगे। जब खा चुके तो उसने पानी दिया वह भी झूठा था। उषस्ति ने उसे लेने से इंकार कर दिया। और कहा-दुर्भिक्ष के कारण अन्न उपलब्ध न था इसलिए जूठे उड़द खाकर मैंने अपने प्राण बचाये। पर जल तो अन्यत्र भी मिल सकता है फिर मैं क्यों झूठा पानी पीऊँ?
प्राण संकट जैसी कोई महान आपत्ति उपस्थित होने पर सामाजिक एवं शारीरिक नियम मर्यादाओं में अन्तर किया जा सकता है। यह आपत्ति धर्म कहलाता है। वैसा संकट न रहने पर फिर उन नियम मर्यादाओं का पालन आरंभ कर देना चाहिए। नैतिक धर्म का पालन तो प्राणों की परवाह न करके भी करना चाहिए।
तप-तेज के नाश का कारण सतयुग के आदि में जंभ नामक एक बड़ा प्रबल दैत्य था। उसने प्रचण्ड तप करके ऐसी शक्ति प्राप्त की थी जिसके बल से उसने सभी देवताओं को परास्त किया।
एक दिन बालखिल्य ऋषियों के आश्रम में लक्ष्मी जी बैठी हुई थीं। संयोगवश जंभ दैत्य भी उधर से आ निकला। वह लक्ष्मी की सुन्दरता पर मुग्ध हो गया और उन्हें जबरदस्ती अपने रथ में बिठाकर हरण कर ले चला।
देव गुरु बृहस्पति यह सब देख रहे थे। उनने देवताओं से कहा-बस अब प्रयोजन सिद्ध हो गया। अब इस पर आक्रमण करो, यह अवश्य मारा जायेगा। देवताओं ने पूछा-इसका क्या कारण है? देव गुरू ने कहा- पर नारी की ओर कुदृष्टि से देखने के कारण अब इसका पूर्व संचित तप नष्ट हो गया। अब इसे हरा देना कुछ कठिन नहीं है। देवताओं ने उस पर आक्रमण किया और प्रतापी जंभ दैत्य को आसानी से मार गिराया।
इस पर वह व्यक्ति हँस पड़ा। उसने अपने पुत्र को बुलाकर नारदजी के चरणों में डाला और कहा एक महात्मा के आशीर्वाद से यह पुत्र उत्पन्न हुआ है।
नारद को भगवान पर बड़ा क्रोध आया कि व्यर्थ ही वे झूठ बोले। मुझे आशीर्वाद देने की आज्ञा कर देते तो मेरी प्रशंसा हो जाती सो तो किया नहीं, उलटे मुझे झूँठा और उस दूसरे सहात्मा से भी तुच्छ सिद्ध कराया। नारद कुपित होते हुए विष्णुलोक में पहुँचे और कटुशब्दों में भगवान की भर्त्सना की।
भगवान ने नारद को सान्त्वना दी और इसका उत्तम कुछ दिन में देने का वायदा किया। नारद वही ठहर गये। एक दिन भगवान ने कहा-नारद लक्ष्मी बीमार है- उसकी दवा के लिए किसी भक्त का कलेजा चाहिए। तुम जाकर माँग लाओ। नारद कटोरा लिये जगह जगह घूमते फिरे पर किसी ने न दिया। अन्त में उस महात्मा के पास पहुँचे जिसके आशीर्वाद से पुत्र उत्पन्न हुआ था। उसने भगवान की आवश्यकता सुनते ही तुरन्त अपना कलेजा निकालकर दे दिया। नारद ने उसे ले जाकर भगवान के सामने रख दिया।
भगवान ने उत्तर दिया नारद! यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर है। जो भक्त मेरे लिए कलेजा दे सकता है उसके लिए मैं भी अपना विधान बदल सकता हूँ। तुम्हारी अपेक्षा उसे श्रेय देने का भी क्या कारण है सो तुम समझो। जब कलेजे की जरूरत पड़ी तब तुमसे यह न बन पड़ा कि अपना ही कलेजा निकाल कर दे देते। तुम भी तो भक्त थे। तुम दूसरों से मांगते फिरे और उसने बिना आगा पीछे सोचे तुरन्त अपना कलेजा दे दिया। त्याग और प्रेम के आधार पर ही मैं अपने भक्तों पर कृपा करता हूँ और उसी अनुपात से उन्हें श्रेय देता हूँ। नारद चुपचाप सुनते रहे। उनका क्रोध शान्त हो गया और लज्जा से शिर झुका लिया।
(डा. रामचरण महेन्द्र एम. ए. डी. लिट् )
श्री हेनरी हैरिसन ब्राउन ने मनोविज्ञान के दो संकेतों का विस्तृत विश्लेषण किया है और उनका विचार है कि इन दोनों की शक्तियों को सही रूप में समझने वाला व्यक्ति ही संसार में विजयी हो सकता है। वे मनुष्य की समस्त मानसिक शक्तियों को इन दो संकेतों के पीछे पीछे आना मानते है।
1-मैं कर सकता हूँ (सफलता और विजय का मूलमंत्र )
2-मैं नहीं कर सकूँगा (मँझधार में ड्डबो देने वाला संकेत)
जब हम इन दोनों संकेतों में से किसी एक का उच्चारण करते हैं अथवा हमारा गुप्त मन इनमें से किसी को दृढ़ता से स्वीकार कर लेता है, तो हमारी मानसिक और शारीरिक शक्तियाँ भी उसी के इर्द गिर्द इकट्ठी होने लगती है। वे हमें वैसा ही उत्तर या सहयोग देती है।
मान लीजिए आप यह मानते है कि मैं यह कार्य कर सकता हूँ, तो इस संकेत के कारण आपके शरीर, मन, और आत्मा की सब उत्पादक शक्तियाँ एकत्रित होकर लक्ष्यपूर्ति के लिए तैयार हो जाती हैं। आप मन में एक गुप्त शक्ति का अनुभव करते हैं और आपकी शक्ति और सामर्थ्य बढ़ते जाते हैं। नए साहस और नए उत्साह से आप इच्छा पूर्ति के लिए अग्रसर होते हैं। इसी विश्वास के कारण आपके मार्ग से विघ्न बाधाएँ दूर होते जाते हैं।
दूसरी ओर यदि आप भूल से यह मान बैठे हैं कि मैं यह कार्य नहीं कर सकता तो इस गलत संकेत के कारण आप अन्दर ही अन्दर एक प्रकार की कमजोरी का अनुभव करेंगे शरीर ढीला पड़ जाएगा, इन्द्रियाँ जवाब देने लगेगी। कंधे झुक जायेंगे, कमर में दर्द मालूम होगा, सारी शक्तियाँ क्षय हो जायेंगी। आपके अन्दर ही अन्दर ऐसा लगेगा कि न जाने क्यों शरीर और मन गिरागिरा-सा लग रह है। काम में तबियत नहीं है।
पहला संकेत ‘‘मैं कर सकता हूँ’’ मनुष्य के आत्म-विश्वास को पुष्ट करता है, शक्तियों को जगाता है, उसे अपनी सिद्धि और सफलता पर विश्वास हो जाता है। इस सृजनात्मक विचार का शक्तिवर्धक प्रभाव हमारे शरीर के संगठन पर पड़ता है। इन निश्चित दृढ़ और आशा भरे विचारों से हमारा मुख मण्डल दमकता हुआ मालूम पड़ता है और हमारे सम्पूर्ण कार्य सजीव मालूम पड़ते हैं।
दूसरे संकेत ‘‘मैं कुछ नहीं कर सकूँगा’’ से निराशा के विचार हमारे गुप्त मन में छा जाते हैं, मुख मलीन हो उठता है और शरीर तथा मस्तिष्क की शक्तियों का ह्रास होने लगता है। इस तथ्य को प्रमाणित किया जा चुका है कि निराशा, अविश्वास, चिन्ता, और शोक इत्यादि हमारी अवांछनीय और दुर्बलता पैदा करने वाली मनः स्थितियाँ है। अपने प्रति अविश्वास का एक विषैला शब्द या वाक्य मानसिक संस्थान में ही गड़बड़ नहीं मचाता, बल्कि पूरे शरीर पर और विशेषतः हमारे हृदय पर दूषित प्रभाव डाल कर उसे कमजोर बना देता है। अनेक कच्चे मन वालों व्यक्ति को काल्पनिक बीमारियों से व्यर्थ ही परेशान रहा करते है। अपने प्रति कमजोर भावनाएँ रख कर रक्त के प्रवाह में रुकावट पैदा कर लेते है। रुधिर में विकार उत्पन्न हो जाता है और उससे उसकी पोषण शक्ति में भी विकार पैदा हो जाता है। मैं कमजोर हूँ, रोगी हूँ ऐसा कहने से तन्तुजाल में भी गड़बड़ी पैदा हो जाती है और इनसे शरीर के समस्त कार्यों में आँशिक शिथिलता आ जाती है।
दूसरी ओर ‘‘मैं इस कार्य को अवश्य कर सकता हूँ’’ ऐसा कहने और मानने से मन में आशा और विश्वास, शक्ति और साहस, पैदा होते हैं। मन में गुप्त ताकत आती है। रुधिर प्रवाह भी ठीक होकर समस्त शरीर को पुष्ट करता है, जिससे मन प्रसन्न तथा शरीर हृदय पुष्ट रहता है। अड़चने और विरोध स्वतः दूर होते जाते हैं। ऐसे व्यक्ति कभी निरुत्साहित नहीं होते। भय आदि दूषित विकारों का कोई प्रभाव नहीं होता। यह संकेत दृढ़ संकल्प पैदा करता है जो सफलता की कुंजी है। जो यह मान लेता है कि मुझमें अपने आदर्श तक पहुँचने की शक्ति और सामर्थ्य है वह अन्त में एक दिन अपनी इष्ट सिद्धि कर ही लेता है। जो यह सोचता रहता है कि मैं यह कार्य कर सकूँगा या नहीं वह संशय वृत्ति के कारण कुछ भी नहीं कर पाता।
कहाँ चींटी, कहाँ पक्षियों में सब से तेज उड़ने वाला पक्षी गरुड़। यदि चींटी गरुड़ की तेज रफ्तार को सोच सोचकर स्वयं अपनी धीमी गति से भी काम करना छोड़ दे,तो क्या वह कुछ कर सकती है? नहीं, चींटी स्वयं अपने पक्के निश्चय से ही जो कुछ बन पड़ता है, उतनी ही मात्रा में अपना कार्य करती जाती है, दूसरों से निरुत्साहित नहीं होती, फिर अपने लक्ष्य पर भी पहुँच ही जाती है। उसी प्रकार मनुष्य को अपनी छोटी शक्तियों को देखकर निरुत्साहित नहीं होना चाहिए। अपनी छोटी शक्ति से ही कार्य प्रारम्भ कर उसे पूर्ण करने का सतत उद्योग करना चाहिए।
इन्हीं दोनों संकेतों को सामने रख कर हम समग्र मनुष्य जाति को दो बड़े भागो में विभाजित कर सकते हैं? 1- वे जो कार्य को कर सकने में आत्मविश्वास रखते हैं। इन्हें हम मिस्टर कैन (अर्थात् कर सकने वाला) तथा 2- वे व्यक्ति जो सदा अपनी कमजोरी तथा असफलता के विचारों में डूबे रहते हैं, इन्हें हम मिस्टर कान्ट (न कर सकने वाला व्यक्ति) कह सकते हैं।
मिस्टर कैन उद्देश्यपूर्ति में अपनी गुप्त शक्तियों, सामर्थ्य और मनोबल का पूरा पूरा उपयोग करते हैं, असंख्य विघ्न बाधाओं के बावजूद अपने मार्ग से विचलित नहीं होते और अन्ततः कार्य को पूरा करके ही दम लेते हैं।
इसके विपरीत मिस्टर कान्ट प्रत्येक निश्चय में ढीले ढाले अधमन से कार्यों में हाथ डालने वाले शक्की मिज़ाज होते हैं। वे किसी बड़े कार्य को पूर्ण करने के लिए बाहरी शक्तियों का इन्तजार किया करते हैं। भाग्य को दोष देते रहते हैं। ज्योतिषियों से भाग्य पलटने की तिथियों और उपाय पूछते रहते हैं। अवसर की प्रतीक्षा में टकटकी लगाये रहते हैं।
हम पूछते हैं कि आप मिस्टर कैन है, या मिस्टर कान्ट? तनिक अपने गत जीवन पर तीव्र दृष्टि डालिये और निर्णय कीजिए कि आप किस वर्ग के व्यक्ति है।
क्या आप मिस्टर कैन हैं जो उच्च पद, प्रतिष्ठा नेतृत्व, बड़ा लाभ, सामर्थ्य और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए उत्साह से कार्य करते हैं, नए नए प्रयत्न करते हैं। उत्साह और शक्ति विकसित करते हैं, और विपरीत परिस्थितियों से परास्त नहीं होते, पराजय जैसी निकृष्ट मनः स्थिति को जानते तक नहीं। सम्पद और विपद में समान भाव से अग्रसर होते है।
यदि आप मिस्टर कान्ट हैं, तो इसके दोषी आप स्वयं ही हैं। इसमें स्वयं आपकी गुप्त पराजय की ग्रन्थि (हीनत्व की भावना) ही कसूरवार है। अपने विषय में दीनहीन सोच विचार करते करते ही आपने अपने आपको गिरा लिया है। विघ्न बाधाओं, हानियों, विरोधों के भय से भयभीत होकर आपने कायरता को अपने अन्तःकरण में प्रविष्ट करा दिया है। इसी क्षण मन की इस दुर्बलता को जड़ मूल को उखाड़ फेंकिये। आपकी अश्रद्धा और अपनी शक्तियों के प्रति अविश्वास ही आपके दुर्भाग्य की जननी है। अपनी शक्तियों पर पूरा-पूरा ज्वलन्त आत्म-विश्वास कीजिए। अपनी श्रेष्ठता, अच्छाई, ताकत की बात अपने अन्तःकरण में जमा लीजिए। दृढ़ निश्चय, तीव्र इच्छा और प्रबल के द्वारा अपने गुप्त सामर्थ्य को प्रकट कीजिए। फिर देखिए आपका कैसा भाग्योदय होता है। आप में अपना ईश्वरत्व प्रकट करने की पूरी सामर्थ्य है। फिर क्यों दुःख असफलता और चिन्ता में जीवन नष्ट कर रहे हैं।
निश्चय जानिए आप मिस्टर कैन हैं। आपकी इच्छाशक्ति दृढ़ है। आपकी संकल्प शक्ति अज्ञेय है। आप जिस कार्य को हाथ में लेंगे, उसे पूर्ण कर देने की आपमें गुप्त आत्मिक शक्ति छिपी हुई हैं।
आप शक्ति के साक्षात केन्द्र है। आप अपने आन्तरिक आत्मबल पर पूर्ण विश्वास रखते है। प्रत्येक कार्य आपकी इच्छा के अनुसार ही होता है। आत्मबल के अनन्त भण्डार से आप सब अभिलाषित कार्यों में सिद्धि पाते हैं। आप प्रबल इच्छाशक्ति से इच्छित वस्तुओं को प्राप्त करते हैं। आपकी इच्छाशक्ति बड़ी प्रबल है।
(श्री विजय बल्लभ शान्ताराम पटेल)
बाहर की परिस्थितियों में अपने अपने दृष्टिकोण के कारण भिन्न भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती है। एक भिखारी को देखकर किसी के मन में दया उपजती है और उसकी यथाशक्ति सहायता करता है। किन्तु दूसरा उसे निकम्मा और आलसी मानकर घृणा करता है। सहायता करना उसके निकम्मेपन को बढ़ाने वाला मानकर अनुचित समझता है। कोई दूसरा उसे दे रहा हो तो उसे भी रोकता है। यह भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ भिन्न दृष्टिकोणों के कारण ही है। बुद्धि बेचारी तो खरीदे हुए गुलाम की तरह है, उसे भावनाओं की हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है। भाग्य के की हाँ में हाँ मिलानी पड़ती है। भाग्य के सताये हुए भिक्षुक की सहायता करना सहृदय और मानवता की पुकार है, इस आदर्श के पक्ष में बुद्धि के द्वारा बहुत कुछ कहा जा सकता है। इसी प्रकार निकम्मे लोगों की गति विधियों पर अंकुश लगाने के लिए उन्हें अपनी गतिविधियाँ छोड़ने के लिए बाध्य करने के पक्ष में भी बहुत कुछ मसाला बुद्धि के पास निकल आयेगा। अन्तिम निर्णय कैसे हो, दोनों से कौन सा पक्ष सही है, इसका निष्कर्ष निकालना सरल नहीं है। वह भिखारी वस्तुतः भीख माँगने के लिए मजबूर था या निकम्मा था? दूसरा निर्णय क्षण भर में उसकी शक्ल देखने मात्र से नहीं हो सकता। इसके लिए उनकी परिस्थितियों को समझने के लिए गहराई तक जाना होगा और बहुत खोज बीन करनी पड़ेगी। इतना अवकाश न होने पर वास्तविकता तक पहुँचना कठिन है।
वास्तविकता के समुचित जानकर न होते हुए भी एक भिखारी के सम्बन्ध में दो मनुष्यों ने दो अलग अलग प्रकार के जो निष्कर्ष निकाले और अलग अलग प्रकार के व्यवहार किये उसमें उनकी मान्यता और भावना ही प्रधान कारण थी। आमतौर से होता यही है कि अपने दृष्टिकोण के अनुसार ही संसार के पदार्थों की, परिस्थितियों की तथा व्यक्तियों की परख की जाती है और उसी के आधार पर उन्हें भला या बुरा माना जाता है। यों हर वस्तु में गुण और अवगुण, भलाई और बुराई, उपयोगिता और अनुपयोगिता को न्यूनाधिक मात्रा मौजूद है और उसका विश्लेषण तार्किक बुद्धि से हो भी सकता है, पर आम तौर से दूसरों के विषय में जो अभिमत प्रकट किए जाते है उनमें अपना दृष्टिकोण ही प्रधान कारण होता है। उसी के आधार पर हम दूसरों को भला या बुरा समझते है और तदनुसार ही घृणा, उपेक्षा, सहानुभूति या प्रेम का व्यवहार करते है।
जो भी करो आदर्श करो।
एक व्यक्ति कबीर के पास गया और बोला- मेरी शिक्षा तो समाप्त हो गई। अब मेरे मन में दो बातें आती हैं, एक यह कि विवाह करके गृहस्थ जीवन यापन करूँ या संन्यास धारण करूँ? इन दोनों में से मेरे लिए क्या अच्छा रहेगा यह बताइए?
कबीर ने कहा -दोनों ही बातें अच्छी है जो भी करना हो वह उच्चकोटि का करना चाहिए। उस व्यक्ति ने पूछा उच्चकोटि का करना चाहिए।” उस व्यक्ति ने पूछा-उच्चकोटि का कैसे है? कबीर ने कहा- किसी दिन प्रत्यक्ष देखकर बतायेंगे वह व्यक्ति रोज उत्तर प्रतीक्षा में कबीर के पास आने लगा।
एक दिन कबीर दिन के बारह बजे सूत बुन रहे थे। खुली जगह में प्रकाश काफी था फिर भी कबीर ने अपनी धर्म पत्नी को दीपक लाने का आदेश दिया। वह तुरन्त जलाकर लाई और उनके पास रख गई। दीपक जलता रहा वे सूत बुनते रहे।
सायंकाल को उस व्यक्ति को लेकर कबीर एक पहाड़ी पर गए। जहाँ काफी ऊँचाई पर एक बहुत वृद्ध साधु कुटी बनाकर रहते थे। कबीर ने साधु को आवाज दी। महाराज आपसे कुछ जरूरी काम है कृपया नीचे आइए। बूढ़ा बीमार साधु मुश्किल से इतनी ऊँचाई से उतर कर नीचे आया। कबीर ने पूछा आपकी आयु कितनी है यह जानने के लिए नीचे बुलाया है। साधु ने कहा अस्सी बरस। यह कह कर वह फिर से ऊपर चढ़ा। बड़ी कठिनाई से कुटी में पहुँचा। कबीर ने फिर आवाज दी और नीचे बुलाया। साधु फिर आया। उससे पूछा-आप यहाँ पर कितने दिन से निवास करते है? उनने बताया चालीस वर्ष से। फिर जब वह कुटी में पहुँचे तो तीसरी बार फिर उन्हें इसी प्रकार बुलाया और पूछा-आपके सब दाँत उखड़ गए या नहीं? उसने उत्तर दिया। आधे उखड़ गए। तीसरी बार उत्तर देकर वह ऊपर जाने लगा तब इतने चढ़ने उतरने से साधु की साँस फूलने लगी, पाँव काँपने लगे। वह बहुत अधिक थक गया था फिर भी उसे क्रोध तनिक भी न था।
अब कबीर अपने साथी समेत घर लौटे तो साथी ने अपने प्रश्न का उत्तर पूछा। उनने कहा तुम्हारे प्रश्न के उत्तर में यह दोनों घटनायें उपस्थित है। यदि गृहस्थ बनाना हो तो ऐसा बनाना चाहिये जैसे मैं पत्नी को मैंने अपने स्नेह और सद्व्यवहार से ऐसा आज्ञाकारी बनाया है कि उसे दिन में भी दीपक जलाने की मेरी आज्ञा अनुचित नहीं मालूम पड़ती और साधु बनना हो तो ऐसा बनना चाहिए कि कोई कितना ही परेशान करे क्रोध का नाम भी न आवे।
अहंकार सत्कर्म का भी बुरा एक बार एक स्त्री पहाड़ पर धान काट रही थी। इतने में एक दुष्ट मनुष्य उधर आया और उसके साथ दुष्टता करने पर उतारू हो गया। पहले तो स्त्री ने आत्मा रक्षा के लिए लड़ाई झगड़ा किया पर शरीर से दुर्बल होने के कारण जब उसे विपत्ति आती दिखी तो पहाड़ से नीचे कूद पड़ी। ईश्वर ने उसकी रक्षा की। उसे जरा भी चोट न लगी और प्रसन्नता पूर्वक घर चली गई।
अब उसे अपने पतिव्रत का अभिमान हो गया। हर किसी से शेखी मारती कि मैं ऐसी सतवन्ती हूँ कि पहाड़ से गिरने पर भी मेरे चोट नहीं लगती। पड़ोसी इस बात पर अविश्वास करने लगे और कहा ऐसा ही है तो चल हमें आँखों के सामने पहाड़ पर से कूद कर दिखा। दूसरे दिन उस स्त्री ने सारे नगर में मुनादी करा दी कि आज मैं पहाड़ पर से कूदकर अपने सतवन्ती होने को परिचय दूँगी। सभी गाँव इकट्ठा हो गया और उसके साथ चल पड़ा। वह पहाड़ पर से कूदी तो उसकी एक टाँग टूट गई। मरते मरते मुश्किल से बची।
उस असफलता पर उसे बड़ा दुःख हुआ। और दिन रात खिन्न रहने लगी। उधर से एक ज्ञानी पुरुष निकले तो स्त्री ने अपनी इस असफलता का कारण पूछा। उन्होंने बताया कि पहली बार तू धर्म की रक्षा के लिए कूदी थी, इसलिए धर्म ने तेरी रक्षा की। दूसरी बार तू अपनी प्रशंसा दिखाने और अभिमान प्रकट करने के उद्देश्य से कूदी तो उस यश कामना और अभिमान ने तेरा पैर तोड़ दिया।
स्त्री की अपनी भूल मालूम हुई और उसने पश्चाताप करके अपनी मानसिक दुर्बलता को छोड़ दिया।
धर्मात्मा की परख एक बार बड़ा भयानक दुर्भिक्ष पड़ा। लोग भूखों मरने लगे। मुसीबत के समय भी किसी का धर्म टिका हुआ है क्या, यह जाँचने के लिए स्वर्ग से तीन देवदूत पृथ्वी पर आए। उनने आपत्ति में धर्म को न त्यागने वाले सत्पुरुषों को ढूँढ़ना शुरू किया। अपनी यात्रा पूरी करके तीनों देवदूत एक स्थान पर मिले और उनने अपने अनुभव में आए धर्मात्माओं की चर्चा शुरू की। एक देवदूत ने कहा मैंने एक सेठ देखा जिसने भूखों के लिए सदावर्त लगा दिया है। हजारों व्यक्ति बिना मूल्य भोजन करते हैं। दूसरे देवदूत ने कहा मैंने इससे भी बड़े एक धर्मात्मा को देखा जिसने अपने गुजारे भर को रखकर, उसके पास जो धन दौलत थी वह सभी भूखों के लिए अर्पित कर दी। तीसरे ने कहा यह क्या है, मेरा देखा हुआ धर्मात्मा आप दोनों के अनुभवों से बड़ा है। वह व्यक्ति बहुत ही भूखा था। कई दिन से अन्न न मिलने के कारण बहुत दुर्बल हो रहा था। उसे किसी उदार मनुष्य ने दो रोटी खाने को दी। पर खाने से पहल उसे ध्यान आया कि कही मुझसे भी अधिक भूखा कोई और तो नहीं है, उसने देखा तो पास ही एक ऐसा कुत्ता पड़ा था जिसके भूख से प्राण निकल रहे थे और वह उन दो रोटियाँ की और कातरता भरी दृष्टि से देख रहा था। उस भूखे मनुष्य के हृदय में करुणा जागी। उसने अपनी दोनों रोटियाँ उस कुत्ते को दे दी और खुद भूखा का भूखा ही रह गया।
तीनों देव दूत जब अपनी कथा सुना रहे थे तो दुर्भिक्ष का राक्षस चुपचाप छिपा खड़ा उनकी बातें सुन रहा था। कुत्ते की भूख मिटाने के लिए भूखा रहने वाले धर्मात्मा की कथा सुनकर उसका भी दिल पिघल गया। उसने कहा जब ऐसे धर्मात्मा इस देश में मौजूद है तो फिर यहाँ अब मेरा रहना नहीं तो सकता। दुर्भिक्ष चला गया और प्रजा के कष्ट दूर हुए।
श्रेष्ठ भावनाओं के सामने विपत्तियाँ देर तक नहीं ठहर सकती।
अपकारों का विस्मरण। महाभारत युद्ध समाप्त होने पर जब कौरव मारे गये और पाण्डवों ने विजय प्राप्त कर ली तो धृतराष्ट्र और गान्धारी उन्हीं के पास रहने लगे। पाण्डव उनका आदर पिता तुल्य ही करते थे। सारा राज काज उन्हीं से पूछकर चलाते थे और कितनी ही व्यग्रता रहने पर स्वयं उनकी सेवा सुश्रूषा करते थे ताकि वे पुत्रों के शोक को भूल जायें। कुन्ती और द्रौपदी भी गान्धारी की सेवा में लगी रहती थी। अन्तः में जब धृतराष्ट्र और गान्धारी ने शेष जीवन बन में बिताने का निश्चय किया तो कुन्ती भी अपने जेठ जिठानी की सेवा करने के लिए उनके साथ हो गई। वन जाने से पूर्व धृतराष्ट्र ने अपने पुत्रों और संबंधियों का श्राद्ध करने की इच्छा प्रकट की तो पाण्डवों से इसके लिए खजाने की इच्छा प्रकट की तो पाण्डवों ने इसके लिए खजाने का मुँह खोल दिया। धृतराष्ट्र ने जितना खर्च करना चाहा उन्हें मुक्तहस्त से करने दिया। पाण्डवों ने युद्ध काल से पूर्व की धृतराष्ट्र तथा उनके पुत्रों की दुष्टताओं की चर्चा करना तो दूर, उनका स्थान भी मन में न आने दिया।
किसी के लिए अपकारों को भूल जाना ही सज्जनता है।
जीव धारियों के शरीर में दो वस्तु रहती है, एक पदार्थ दूसरा जीवन। हाड़, माँस, हाथ पैर शिर आदि पदार्थ है। यह स्थूल प्रकृति के प्रतीक है। विचार इच्छा भावना, प्राण, अन्तःकरण आदि जीवन है यह सूक्ष्म प्रकृति है। सूक्ष्म प्रकृति के अनुरूप स्थूल प्रकृति चलती है। भावनाओं के अनुरूप शरीर काम करता है। प्राण निकलते ही शरीर का सड़ना गलना आरम्भ हो जाता है।
यह चेतन सूक्ष्म प्रकृति जिसका स्थूल प्रकृति पर नियन्त्रण है उसे गायत्री कहते है। गायत्री एक विश्व व्यापी महान शक्ति है। ईश्वर की सृष्टि उत्पन्न करने की इच्छा ही शक्ति रूप धारण करके इस विश्व में व्याप्त हुई और उसी का नाम गायत्री पड़ा। यों गायत्री एक मंत्र भी है। जिसके चार चरणों से चारों वेद बने हैं। इस गायत्री मंत्र में वह आकर्षण भरा हुआ है कि उसके द्वारा उपासना करने से साधक उस महान विश्वव्यापी गायत्री शक्ति का एक महत्वपूर्ण अंश अपनी ओर आकर्षित करके अपने में धारण कर सकता है। जिस प्रकार जल से भरे हुए सभी गड्ढे चाहे वो समुद्र हों, चाहे छोटे पोखर, सभी जलाशय कहलाते है, इसी प्रकार विश्वव्यापी गायत्री शक्ति के सजातीय होने के कारण, घनिष्ठ संबंध रखने के कारण यह चौबीस अक्षरों वाला प्रसिद्ध वेदमंत्र भी गायत्री ही कहलाता है।
गायत्री शक्ति का दूसरा नाम है प्राणतत्व। प्राण अर्थात् जीवन। इस सृष्टि में जीवन सम्बन्धी जितना कुछ विज्ञान, रहस्य एवं विस्तार है सब प्राणतत्व से ही संबंधित है। गायत्री इस प्राणतत्व की ही एक प्रत्यक्ष प्रक्रिया है। गायत्री शब्द का अर्थ ही प्राण का उद्धार करने वाली है। गाय कहते है प्राण को, त्री कहते है त्राण करने वाली को, जिसको गाने से प्राणों का त्राण होता है वही गायत्री है। यह नामकरण इस महामंत्र के गुण और कार्य के अनुरूप ही किया गया है।
गायत्री मंत्र के द्वारा जब प्राणायाम किया जाता है तब सात व्याहृतियों का प्रयोग होता है। भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम्। यह सातों विशेषताएँ प्राण की है। उन्हें ही लौकिक भाषा में इच्छा, प्रज्ञा, प्रेरणा, विकास, सत्, स्नेह और आनन्द कहते हैं। प्राणों के सप्त विभेदों का नामकरण भी इसी आधार पर किया गया है।
गायत्री की आरंभिक साधना अर्थ का चिन्तन एवं जप है। इस महामंत्र के 24 अक्षरों में ईश्वर के उत्तम गुणों का चिन्तन करते हुए उन्हें अपने अन्तः करण में धारण करने एवं बुद्धि को कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग में लगाने का विधान है। इस चिन्तन के करने से मनोभूमि में दिव्य सद्गुणों का और अभिनव विवेक का जागरण होता है। साथ ही यह भी विश्वास जमता है कि इस जीवन में सबसे बहुमूल्य वरदान सद्बुद्धि है। यही सबसे बड़ी सम्पदा है उसे प्राप्त करने के लिए हमें प्राण पण से प्रयत्नशील होना चाहिए। चिन्तन का यही तात्पर्य है। गायत्री मंत्र का अर्थ समझने और उसके अनुसार मनोभूमि को ढालने से असत् और उसके अनुसार मनोभूमि को ढालने से असत् को, अनुचित को छोड़ कर सत् एवं उचित को धारण करने की आकाँक्षा जागृत होती है। नैतिकता का, मानवता का एवं समाज की सुस्थिरता का आधार भी है।
अर्थ चिन्तन के पश्चात जप का विधान है। आधार पर गायत्री में सन्निहित भावनाओं का अन्तःकरण में स्वयमेव विकास होना आरम्भ होता है। कुमार्ग से घृणा और सन्मार्ग के लिए अभिलाषा की जागृति होती है। गुण, कर्म, स्वभाव में परिवर्तन आता है। फलस्वरूप अनेकों ऐसी साँसारिक कठिनाइयाँ सरल हो जाती है जो अपने ही दोषयुक्त गुण कर्म स्वभाव के कारण उत्पन्न होती होती तथा बढ़ती थी।
जप के द्वारा एक सीमित मात्रा में प्राण भी अपने अंदर प्रतिष्ठित होता है, जिसके बल से कितनी ही आपत्तियों को परास्त करने का लाभ मिलता है। चौबीस हजार के लघु अनुष्ठान, सवालक्ष के मध्य अनुष्ठान और चौबीस लक्ष के पूर्ण पुरश्चरण इसी उद्देश्य के लिए होते हैं। उन्हें जितने कठोर नियम प्रतिबंधों की तपश्चर्या के साथ एवं जितनी श्रद्धा विश्वासयुक्त भावना के साथ, आवश्यक विधि विधान के साथ किया जाता है उतना ही लाभ भी होता है। गायत्री साधना के उपात्मक अनेक सकाम निष्काम विधान है, साधक की श्रद्धा के अनुरूप उनके परिणाम भी उपलब्ध होते है। ऐसे विधि विधानों का वर्णन गायत्री महाविज्ञान में विस्तारपूर्वक किया गया है। वह प्रथम कक्षा की प्रक्रिया है।
इससे ऊपर की दो कक्षाऐं और रहती है। एक प्राण प्रक्रिया दूसरी ध्यान धारणा। प्राण प्रक्रिया के अंतर्गत वह साधनाएँ आती हैं जिससे जीवन का अल्प प्राण विश्व व्यापी महाप्राण से संबंधित होकर एक महान शक्ति से ऐक्य का लाभ प्राप्त करता है। जीव एक सीमित दायरे में घिरा हुआ है, उसके हिस्से में साधारणतः थोड़ा सा प्राण आया है, उसी की शक्ति से वह जीवित रहता है और अपनी अभीष्ट आकाँक्षाओं की पूर्ति के साधन जुटाता है। जिसमें जितना प्राण है उसी के आधार पर उसकी प्रगति होती है और उतनी ही सीमित सफलता उपलब्ध होती है। पर जब उसका संबंध जैसे जैसे जितना जितना महाप्राण के साथ होने लगता है तो वह सीमितता भी विस्तृत एवं विकसित होने लगती है।
ध्यान धारण का स्तर सबसे ऊपर है। गायत्री की वह सर्वोच्च साधना है। उस तीसरी भूमिका में आत्म साक्षात्कार, ब्रह्म निर्वाण, सच्चिदानन्द सुख प्राप्त होता है। समाधि अथवा निर्विकल्प मुक्ति भी उसी स्थिति के परिपाक होने पर प्राप्त होती है। प्राण लोक में प्रवेश करके इसकी स्थिति और शक्ति सके लाभान्वित होना तो प्राण प्रक्रिया द्वारा संभव है पर भूलोक से पूर्ण बन्धनमुक्त होकर ब्रह्मलोक का अधिकारी बनना ध्यान धारण की साधना से ही संभव है। जीवन मुक्त आत्मायें प्राण लोक में विचरण करती है पर उनकी मूल स्थिति ब्रह्मलोक में ही होती हैं। उस तीसरी सर्वोच्च भूमिका का प्राप्त करने के लिए अर्थ चिन्तन और जप की पहली तथा प्राण प्रक्रिया की दूसरी भूमिका में प्रवेश करना पड़ता है। प्रस्तुत लेख में प्राण प्रक्रिया की ही चर्चा की जा रही है। ध्यान धारण का विवेचन भी समयानुसार किया जावेगा।
शास्त्रों में प्राण को ईश्वर का ही स्वरूप माना गया है। शरीर में जो ईश्वर की स्थिति मानी गई है वह प्राण के रूप में ही है। आत्मा का स्वरूप भी वही है। इसलिए हमें जानना चाहिए कि प्राण तत्व कोई साधारण वस्तु नहीं वरन वह है जिसकी महिमा महान से महान बताई गई है। उपनिषद्कार का यही अभिमत है-
प्राणोबा ज्येष्ठः भष्ठश्च-
-छाँदोग्य
प्राण ही बड़ा है। प्राण ही श्रेष्ठता है।
कतम एको देव इति। प्राण इति स ब्रह्म तदित्याचक्षेते।
-वृहदारण्यक
वह एक देव कौन सा है? वह प्राण है। उसे ही ब्रह्म कहा जाता है।
‘प्राणो ब्रह्म इति ह स्माह कौषीतकिः
प्राण ही ब्रह्म है। ऐसा कौषीतकि ऋषि ने व्यक्त किया।
‘प्राणो ब्रह्म’ इति ह स्माहपैड ग्यः
पैडम्य ऋषि ने कहा- प्राण ही ब्रह्म वेदों में प्राणतत्व की महिमा का गान करते हुए उसे इस विश्व की सर्वोपरि शक्ति माना है।
प्राणों ह सूर्यश्चन्द्रमाः प्राण माहुः प्रजापतिम्।
-अथर्व
प्राण विराट है, सब का प्रेरक है। इसी से सब उसकी उपासना करते हैं। प्राण ही सूर्य, चन्द्र और प्रजापति हैं।
प्राणाय नमो यस्य सर्व मिदं वशे।
-अथर्व
जिसके आधीन यह सारा जगत है, उस प्राण को नमस्कार है। वही सब का स्वामी है, उसी में यह सारा जगत प्रतिष्ठित है।
ब्राह्मण ग्रन्थों और आरण्यकों में भी प्राण की महत्ता का गान एक स्वर से किया गया है-उसे ही विश्व का आदि निर्माण, सबमें व्यापक और पोषक माना है। जो कुछ भी हलचल इस जगत में दृष्टि गोचर होती है उसका मूल हेतु प्राण ही है। देखिएः-
सोहयमाकाशः प्राणेन वृहत्याविष्टव्धः तद्यथा यमाकाशः प्राणेन वृहत्या विष्टव्ध एवं सर्वाणि भूतानि आपि पीलिकाभ्यः प्राणेन वृहत्या
-एतरेय 2। 1। 6
प्राण ही इस विश्व को धारण करने वाला है। प्राण की शक्ति से ही यह ब्रह्माण्ड अपने स्थान पर टिका हुआ है। चींटी से लेकर हाथी तक सब प्राणी इस प्राण के ही आश्रित हैं। यदि प्राण न होता तो जो कुछ हम देखते हैं कुछ भी न दीखता।
प्राणेन सृष्टावन्तरिक्ष च वायुश्च।
-एतरेय
प्राण से अन्तरिक्ष और वायु की सृष्टि हुई। अन्तरिक्ष के कारण ही प्राणी चलते और सुनते हैं।
वायु में इसी की गन्ध है। अन्तरिक्ष और वायु अपने पिता प्राण की परिचर्या में ही लगे रहते हैं।
सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव
-एतरेय 2। 2। 10
जितनी ऋचाऐं हैं, जितने वेद हैं, जितने घोष हैं वे सब प्राण रूप हैं। उन्हें प्राण रूप समझ कर उसी की उपासना करनी चाहिए।
प्राण एत्र प्रज्ञात्मा। इदं शरीरं परिगृह्मं उत्थापयति।
-शाखायन आरण्यक 5। 3
इस समस्त संसार में तथा इस शरीर में जो कुछ प्रज्ञा है वह प्राण ही है। जो प्राण है वही प्राण है जो प्रज्ञा है वही प्राण है।
बालमात्रादु हेमे प्राणा असम्भिन्नस्ते
-शतपथ 8। 3। 4। 1
प्राण ही देव हैं। प्राण ही बालखिल्य हैं। क्योंकि प्राणों की सन्तान में बालमात्र का भी अन्तर नहीं है।
प्राण एव स पुरिशेते। तं पुरि शते इति पुरिशयं सन्तं प्राणं पुरुष इत्या चक्षते।
-गोपथ पू0 1। 39
शरीर रूपी पुरी में निवास करने से उसका स्वामी होने के कारण प्राण ही पुरुष कहा जाता हैं ।
शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है किः-
प्राणोहि प्रजापतिः 4। 5। 5। 13
प्राण उ वै प्रजापतिः 8। 4। 1। 4
प्राणः प्रजापतिः 6। 3। 1। 9
अर्थात्-प्राण ही प्रजापति परमेश्वर हैं।
सर्व हीदं प्राणेनावृतम् -एतरेय
यह सारा जगत प्राण से आदृत हैं।
प्रश्नोपनिषद में प्राणतत्व का अधिक विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है-स प्राणमसृजन प्राणाच्छद्धाँ ख वायुर्ज्योर्तिरापः
थिवीन्द्रियं मनोअन्नाद्वीर्य तपोमंत्राः
-प्रश्नोपनिषद् 6। 4
परमात्मा ने सबसे प्रथम प्राण की रचना की। इसके बाद श्रद्धा उत्पन्न की । तब आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी यह पाँच तत्व बनाये। इसके उपरान्त क्रमशः मन, इन्द्रिय, समूह, अन्न वीर्य, तप, मन्त्र और कर्मों का निर्माण हुआ। तदनन्तर विभिन्न लोक बने।
अरा इव रथ नामौ प्राणे सर्व प्रतिष्ठितम्।
प्रजापतिश्चरसि गर्भे त्वमेव प्रतिजायसे।
प्रतिष्ठिसि॥ 7॥
देवानामसिवाहतमः पितृणाँ प्रथमः स्वधा।
इन्द्रस्वत्वं प्राण तेजसा रुद्रोअसि परि रक्षिता।
यदा त्वमभिवर्षस्यथेमाः प्राण ते प्रजाः।
व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षिरत्त विश्स्य सत्पतिः।
या ते तनूर्वाचि प्रतिष्ठिता या श्रोत्रेयाच चक्षुषि।
प्राणस्येद वशेसवं त्रिदेव यत्प्रतिष्ठितम।
-प्रश्नोपनिषद्-2
रथ के पहिये की नाभि में पैसे अरे लगे रहते है उसी प्रकार चारों वेद, यज्ञ, ज्ञान, बल ये सब प्राण में लगे है॥ 6॥ हे प्राण आप ही प्रजापति है आप ही गर्भ में विचरते हैं। जन्म लेते हैं। प्राणी तुझमें ही मिल जाते है तुम्हारे ही साथ स्थित रहते है॥7॥
हे प्राण आप ही देवताओं को हवि पहुँचाने वाली अग्नि है। ऋषियों द्वारा अनुभूत सत्य आप ही है ॥ 8॥ हे प्राण, आप ही सर्वशक्ति सम्पन्न इन्द्र है। आप ही प्रलय काल में रुद्र रूप होकर सबका संहार करते है। आप ही सबकी रक्षा करते है। वायु, अग्नि, चन्द्र, नक्षत्र तथा सूर्य आप ही हैं॥9॥ हे प्राण आप ही मेघ बनकर वर्षा करते है। उसी में प्राणियों के जीवन निर्वाह करने वाला अग्नि पैदा होता है। उसी से प्रजा प्रसन्न होती है॥ 10॥ हे प्राण आप ही संस्कार रहित शुद्ध, सबको पवित्र करने वाले, सर्वश्रेष्ठ ऋषि है। आप ही सारे हमारे पिता है, आपसे ही हम पैदा हुए ॥11॥ हे प्राण आप ही वाणी, श्रोत्र, चक्षु, मन, अन्तःकरण आदि सबमें व्यक्त है। आप ही इन्हें कल्याण बनाइए। हमें सावधान और शान्त रखिए। हमारे शरीर से बाहर न जाइए॥ 12॥ इस संसार में तथा स्वर्ग में जो कुछ है वह सब प्राण के ही आधीन है जिस प्रकार माता अपने पुत्रों की रक्षा करती है आप हमारी रक्षा कीजिए। हमें श्री, क्रान्ति, शक्ति और प्रज्ञा प्रदान कीजिए। 13
गायत्री विद्या की दूसरी भूमिका प्राण प्रक्रिया है। उसे भली प्रकार जान लेने से संसार में जो कुछ जानने योग्य है वह सभी जान लिया जाता है और जो कुछ प्राप्त होने योग्य है सब कुछ प्राप्त हो जाता है।
उत्पत्तिमायतिं स्थानं विभुत्व चैवपचधा।
-भृग तन्त्र
प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है? कहाँ से शरीर में आता है? कहाँ रहता है? किस प्रकार व्यापक है? उसका अध्यात्म क्या है? जो इन पाँचों बातों को जान लेता है उसकी मोक्ष हो जाती है।
इन प्रश्नों का विवेचन क्रमशः अगले अंकों में करेंगे
दुखियों के लिए आत्म दान
बहुत प्राचीन काल की घटना है कि एक बार मिथिला नरेश ने कौशल राज्य के ऊपर चढ़ाई की? कौशल में सेना थोड़ी थी, राजा हार गया और वह किले को छोड़कर भाग निकला, उसे पकड़ने के लिए मिथिला नरेश ने एक हजार स्वर्ण मुद्राओं की घोषणा की।
कौशल नरेश इधर-उधर जंगलों में अपनी जान बचाकर छिपते फिरते थे। एक दिन वे ऐसे नगर में पहुँचे जहाँ के सभी युवक उनकी फौज में भर्ती होकर अपने प्राण गँवा चुके थे। केवल स्त्रियाँ तथा छोटे बच्चे उस नगर में शेष थे। उनकी खेती भी इस वर्ष नष्ट हो गई थी, इसलिए गाँव आपत्ति ग्रस्त हो रहा था। कितने ही बाल वृद्ध बीमार पड़े थे और कितने ही भूख से प्राण गवाँ चुके थे। उन लोगों की ऐसी दुर्दशा देखकर राजा की आँखों में आँसू आ गये इन लोगों को आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी पर वे तो स्वयं ही छिपते फिरते थे, किसी को क्या देते?
अन्त में एक उपाय उन्हें सूझा। वे उस गाँव के कुछ वृद्ध पुरुषों को साथ लेकर मिथिला नरेश के यहाँ पहुँचे और कहा-मैं कौशल नरेश हूँ। मेरे पकड़ने के लिए एक हजार स्वर्ण मुद्राएँ देने की जो घोषणा आपने की थी सो इन वृद्ध पुरुषों को दे दी जायें।
सब लोग आश्चर्यचकित रह गये कि अपनी इस प्रकार जान जोखिम में डालकर इनने क्यों आत्म समर्पण किया? जब सारी बात मालूम हुई कि इन भूखे मरते लोगों की सहायता के लिए अपना सर्वस्व दे रहे हैं तो उनकी उदारता देखकर श्रद्धा से सबका मस्तक नीचा हो गया। मिथिला नरेश ने उन्हें गले कर या कि ऐसे उदार हृदय सत्पुरुष का राज लेकर अपने को कलंकित नहीं करना चाहता।
उदार हृदय व्यक्ति दूसरों को दुःख से बचाने के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं करते।
विश्वासघात से प्राण जाना अच्छा।
महाराणा प्रताप के सदस्यों में एक बड़ा पराक्रमी योद्धा रघुपति सिंह था। वह छिपकर छापे मारने में बड़ा कुशल था। अकबर उससे बड़ा परेशान रहता। उसे पकड़ने के लिए एक बड़े इनाम की घोषणा की हुई थी।
एक बार रघुपति सिंह का लड़का बीमार पड़ा। वह उसे देखने के लिए वेष बदल कर घर को चला। चित्तौड़ के सभी दरवाजों पर पहरेदार बैठे थे। घर पहुँचने का कोई रास्ता न था। आखिर उसने पकड़े जाने का खतरा उठा कर भी मरणासन्न लड़के का मुँह देखने की ठानी। रघुपति सिंह ने एक पहरेदार के पास जाकर कहा-मेरा नाम रघुपति सिंह है। मैं अपने मरणासन्न बेटे को देखने आया हूँ। इस समय तुम मुझे पकड़ो मत, मैं घर जाकर वापिस तुम्हारे पास आ जाऊँगा तब तुम गिरफ्तार कर लेना। पहरेदार उसकी सच्चाई से बड़ा प्रभावित हुआ। उसने घर जाने की इजाजत दे दी। अपने वचनानुसार रघुपति सिंह लौटा और उसी पहरेदार के पास आकर अपने को गिरफ्तार करा दिया। पहरेदार उसे अकबर के पास ले गया। जिस खूँखार योद्धा को पकड़ने के लिए इतने दिन से इतने प्रयत्न हो रहे थे और इतना इनाम घोषित था उसे हाथ पकड़कर एक साधारण पहरेदार लिए आ रहा है और वह चुपचाप चला आ रहा है, इस दृश्य को देखकर अकबर स्तब्ध रह गये। उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ। उन्होंने पहरेदार से इस अनहोनी बात का कारण पूछा तो उसने सच-सच सब ताब कह सुनाई।
अकबर ने पूछा-तुम जब घर चले गये थे तो फिर छिपकर क्यों न भाग गये। पहरेदार के पास आकर अपनी जान जोखिम में क्यों डाली?
रघुपति सिंह ने कहा-राजपूत अपने वचन पर दृढ़ रहते हैं, वे किसी के साथ विश्वासघात करने की अपेक्षा मरना अधिक अच्छा समझते हैं।
विश्वासघात मनुष्य का सबसे बड़ा अपराध है। सच्चे लोग कितनी ही बड़ी यहाँ तक कि प्राणों की हानि उठाकर भी शत्रु तक के साथ विश्वासघात नहीं करते।
धन का सदुपयोग। राणाप्रताप ने बहुत दिन तक पर्वतों में छिपते हुए अकबर की सेना से मोर्चा लिया पर जब उनके साधन समाप्त हो गये तो निराश और दुखी होकर लड़ाई समाप्त करने की बात सोचने लगे। भामाशाह नामक एक धनी व्यक्ति ने जब यह सुना तो उसकी भावनाएँ उभर आईं। मेरे पास धन है, यदि वह देश जाति के काम न आया तो मेरा धनी रहना व्यर्थ है। वह दौड़ा हुआ राणा के पास गया और उन्हें धैर्य बँधाते हुए कहा-मेरे पास जो कुछ है उसे आप ले लें और युद्ध जारी रखें। राणा ने भामाशाह को छाती से लगा लिया और कहा-तुम्हारे जैसे उदार व्यक्ति जिस भूमि में मौजूद हैं वह कभी गुलाम नहीं बन सकती। वह धन बहुत था उसे लेकर राणा ने नई फौज का संगठन किया और फिर लड़ाई आरम्भ कर दी।
धन की सार्थकता इसी में है कि वह धर्म की रक्षा में व्यय हो। जो कंजूस समाज की अत्यन्त आवश्यक समस्याओं की ओर से मुँह मोड़कर अपने ही बेटे जाती के लिए धन जोड़ते रहते हैं उन मूर्खों के लिए भामाशाह अपना नाम अजर अमर करते हुए एक आदर्श उदाहरण छोड़ गये हैं।
स्वामी के लिए शरीर तक काटा
महोबे के राज परमाल और दिल्ली के राजा पृथ्वीराज में युद्ध हुआ। दोनों ओर के सैनिक भारी संख्या में मारे गए और घायल हुए। घायलों में पृथ्वीराज मूर्छित थे। सियार और गिद्ध घायलों और मृतकों की लाशें नोंच नोंच कर खा रहे थे। गिद्धों का एक बड़ा झुण्ड पृथ्वीराज को घेर कर बैठ गया। वे इतने असक्त थे कि गिद्धों को भगाना उनके वश की बात न थी। लगता था कि गिद्ध कुछ ही देर में उनकी आँतें उधेड़ लेंगे। यह दृश्य संयमराय कुछ दूर पर पड़ा देख रहा था। वह सच्चा वफादार सेवक तथा मित्र था। उसने अपने प्राण रहते पृथ्वीराज को न मरने देने का निश्चय किया। उसके पैर घायल थे इसलिए चल तो नहीं सकता था पर हाथ कुछ काम करते थे। संयमराय ने अपने शरीर का माँस काट काटकर गिद्धों के आगे फेंकना शुरू किया जिससे वे पृथ्वीराज की ओर से हटकर उस माँस को खाने लगे। इस प्रकार बहुत देर तक उसने गिद्धों को उलझाये रखा। इतने में पृथ्वीराज की भी मूर्च्छा जागी और तलाश करते हुए सिपाही भी आ गये जो उन्हें उठाकर ले गये। पर संयमराय अपना बहुत सा माँस काट देने के कारण जीवित न रह सका, वह एक आदर्श को जीवित करके स्वयं मर गया।
जिसका नमक खाना उसके लिए प्राण तक देने को तत्पर रहना यह इस देश का एक महान आदर्श रहा है।
नारी मात्र में मातृ बुद्धि।
मुसलमान हिन्दू लड़कियों को उड़ा ले जाते थे और उनका सतीत्व नष्ट करते थे। इस दुष्टता से खिन्न होकर आवजी सोनदेव ने जब कल्याण का किला लूटा तो उसके मुसलमान शासक की परम सुन्दर जवान लड़की को भी लूट लिया और उसे शिवाजी के सामने पेश किया। सोनदेव का अनुमान था कि जैसे को तैसा की नीति के अनुसार शिवाजी उसे अपने महल में रख लेंगे। पर अनुमान मिथ्या निकला। थोड़ी देर तक वे उसके रूप को देख प्रसन्न हुए और सम्मान सहित उसके पिता के पास भेज दिया। दरबारियों से उनने कहा-इस लड़की जैसी सुन्दर मेरी माँ होती तो मैं भी ऐसा ही सुन्दर जन्म लेता।
पराई बहिन बेटियों को अपनी बहिन बेटी मानना भारतीय धर्म का सदा से आदर्श रहा है। शत्रुओं से लड़ते हुए भी उनके स्त्री बच्चों का सदा सम्मान ही किया जाता रहा है। शिवाजी की उपरोक्त घटना उसका एक नमूना मात्र है।
मरने को अकेले उपस्थित चम्पारन जिले में नील की खेती करने वाले गोरे वहाँ के किसानों को बहुत सताते थे। पीड़ित लोगों का कष्ट दूर करने के लिये वहाँ सत्याग्रह आरम्भ हुआ और उसका संचालन करने गाँधी जी वहाँ पहुँचे। सत्याग्रह से अपने स्वार्थों में बाधा पड़ते देख कर गोरे आग बबूला हो गये और गाँधी जी को मार डालने का षड्यन्त्र करने लगे। इसकी खबर जब उन्हें लगी तो गाँधी जी सीधे उस गोरे की कोठी पर रात के दस बजे अकेले बिलकुल निहत्थे जा पहुँचे और कहा-आने मुझे मारने की योजना बनाई है। इसलिए मैं आपके पास आया कि आपका काम सरल हो जाय। गोरा सन्न रह गया। उसने क्षमा माँगते हुए गाँधी जी को विदा किया। मौत से न डरने वाला ऐसा आदमी उसने अब तक कोई नहीं देखा।
जिसका मार्ग सच्चा है उसे मृत्यु से भी डरने की आवश्यकता नहीं है। डरते तो अपराधी भावना वाले तथा कायर मनुष्य ही हैं। सन्मार्ग के पथिक को किसका डर?
“धरती उनको भी आश्रय देती है जो उसे खोदते हैं। तुम भी उनकी बातें सहन करो तो तुम्हें सताते हैं और अपमान करते हैं, क्योंकि महानता इसी में निहित है।”
-तिरुवल्लुवर
“ऐसा कोई वास्तव में महान पुरुष नहीं हुआ जो वास्तव में सदाचारी न रहा हो।”
-फ्रेंकलिन
(श्री भारतीय योगी)
अँगरेजी राज्य की स्थापना के पश्चात भारतीय और पाश्चात्य आदर्शों में एक जोरदार टक्कर हुई। इस समय देश कई सौ वर्ष की परतंत्रता के कारण दबा हुआ था, उसका मनोबल हीनावस्था को प्राप्त हो चुका था, इस लिये शीघ्र ही पश्चिमीय आदर्शों से प्रभावित होकर भारतीय संस्कृति और आदर्शों की उपेक्षा करने लगें। उस समय उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में यह एक फैशन हो गया था कि भारत की सभ्यता को दकियानूसी बतलाकर यूरोपियन सभ्यता की नकल करें। इसका एक परिणाम यह भी हुआ कि अनेक नवशिक्षित लोगों ने अपना धर्म खुल्लमखुल्ला त्याग करके ईसाई धर्म ग्रहण कर लिया। यह देखकर हिन्दू धर्म के हितैषियों की चिन्ता हुई और देश में ऐसी विभूतियों का आविर्भाव होने लगा जिन्होंने भारतीय धर्म के विशुद्ध और उच्च रूप को लोगों के सामने रखा और बतलाया कि भौतिकता पर आधार रखने वाली पाश्चात्य सभ्यता भारत की आध्यात्मिक संस्कृति की तुलना में नगण्य और क्षणस्थायी है।
महायोगी अरविन्द का जन्म ऐसे ही संक्रान्ति काल में हुआ था। उनके पिता डॉ. कृष्णघन घोष बड़े सज्जन और उदार विचारों के व्यक्ति थे, पर विदेशी शिक्षा के प्रभाव से अंगरेजी सभ्यता के अन्यतम पुजारी बन गये थे। भारतीयता के प्रति उनकी विरक्ति इतनी बड़ गई थी कि उन्होंने अपने पुत्रों को मातृभाषा को एक शब्द भी नहीं सीखने दिया और बहुत छोटी अवस्था में ही उनको विदेशी बालकों के साथ विदेशी शिक्षकों की संरक्षकता में रख दिया। इसी कारण से अरविन्द घोष को सात वर्ष की आयु में ही सात समुन्दर पार इंग्लैण्ड में जाकर एक अंगरेज के घर में रहना पड़ा। उनके पिता की तो इच्छा यह थी कि उनका पुत्र भारतीयता से सर्वथा शून्य रहकर पूरा अंगरेज बनकर ब्रिटिश गवर्नमेंट का एक बहुत उच्च पदाधिकारी बने, पर होनहार को कुछ और ही स्वीकार था। अरविन्द ने इंग्लैण्ड की ऊँची से ऊँची शिक्षा प्राप्त करके अंगरेजी शासन तंत्र का एक पुर्जा बनने के बजाय, सर्वथा विपरीत मार्ग का अवलम्बन किया। समय आने पर वे अंगरेजी सत्ता को उखाड़ने वाले क्रांतिकारियों के एक प्रमुख नेता ही नहीं बने, वरन उन्होंने भारत की आध्यात्मिक संस्कृति को भी ऐसे प्रभावशाली रूप में विकसित किया कि संसार में उसकी प्रतिष्ठा और भी अधिक बड़ गई।
अपनी शिक्षा समाप्त करके और यूरोपियन साहित्य तथा वहाँ की कई भाषाओं के विद्वान बनकर श्री अरविन्द 22 वर्ष की अवस्था में सन् 1893 में भारतवर्ष वापस आये। विलायत में ही उनकी भेंट बड़ौदा के महाराज सयाजीराव से हो गई थी और उन्होंने उनसे अपनी रियासत में काम करने का आग्रह किया था। इसलिए वे विदेश से लौट कर सीधे बड़ौदा पहुँचे और वहाँ लगभग 13 वर्ष तक विभिन्न सरकारी पदों पर कार्य करते रहे, पर विशेष रूप से उन्होंने वहाँ के कालेज में अध्यापक का कार्य किया। जब सन् 1906 में उन्होंने राजनीतिक कार्य में पूर्णतः संलग्न होने के लिए बड़ौदा को छोड़ा उस समय वे 750 रुपए मासिक पर कालेज के वाइस प्रिंसिपल थे।
पर यह नौकरी उनके लिए कोई महत्व की बात नहीं थी। इसको वे मुख्यतः इसीलिये करते थे कि इसकी आय से अपने साँस्कृतिक और राजनीतिक कार्यक्रमों को पूरा कर सकें। उस बड़े पर पर कार्य करते हुये भी उनका जीवन नितान्त सादा था, वे प्रायः लोहे की साधारण चारपाई पर बिना अधिक बिस्तर और ओढ़ने के ही सोते थे, और साधुओं की तरह बिल्कुल मामूली आहार करते थे। उनका अधिक व्यय धार्मिक और दार्शनिक नई और पुरानी पुस्तकें खरीदने तथा क्रांतिकारी संगठन के कार्य में ही होता था। उनकी ऐसी निष्काम और उदार प्रवृत्ति को देखकर बंगला भाषा के एक प्रसिद्ध लेखक श्री दीनेन्द्र कुमार ने, जो उनके पास 1898 से 99 तक रहे थे। लिखा था-अरविन्द कोई सांसारिक जीव नहीं थे। वे तो कोई देवता थे जो भटक कर भूमण्डल पर आ गये थे। उनके बाल लम्बे थे और आँखें नींद की भाती सी लगती थी। फैशनेबल कपड़े न पहिन कर वे देशी कपड़े की एक मिरजई पहनते थे। उनको कोई आकाँक्षा नहीं थी। वे ख्याति से बचते थे, बातचीत बहुत कम करते थे, आत्मसंयम के साथ रहते थे और केवल अध्ययन ही उनका मुख्य कार्य था।’’
आध्यात्मिकता और योग की प्रेरणा उनको स्वामी विवेकानन्द की रचनाओं और श्रीरामकृष्ण परमहंस के उपदेशों से मिली थी। आध्यात्मिक क्षेत्र में वे बुद्धि, पांडित्य और विद्वता को अधिक महत्व नहीं देते थे। क्योंकि परमहंस जी के उदाहरण से उन्होंने स्पष्ट देख लिया था कि विद्वता से रहित होने पर भी उनमें आध्यात्मिकता का पूर्ण विकास हुआ था। इस विषय में उन्होंने एकबार लिखा था कि-श्रीरामकृष्ण स्वयं ऐसा जीवन व्यतीत करते थे, जिससे बहुत से लोग तो उनको पागल ही कहेंगे। उन्हें बौद्धिक शिक्षण नहीं मिला था, सभ्यता और संस्कृति के बाहरी चिन्ह उनमें दिखाई नहीं देते थे, वे दूसरों के दान पर जीवन बिताते थे। ऐसे व्यक्ति को अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीय आमतौर से समाज के लिये नाशकारी नहीं तो बेकार जरूर कहेंगे। पर भगवान की लीला देखिये कि उन्होंने उसे दक्षिणेश्वर के मन्दिर में ला बिठाया ओर आधुनिक शिक्षा के गौरव स्वरूप समझे जाने वाले बड़े-बड़े विद्वान इस तपस्वी के की मुक्ति का कार्य आरम्भ हो गया।”
श्री अरविन्द के जीवन का उद्देश्य भी भारत की मुक्ति ही था। पर श्रीरामकृष्ण के विपरीत वे विद्या ओर शास्त्रीय ज्ञान के भण्डार थे इसलिये उन्होंने अपना कार्य मुख्यतः लेखनी और साधना द्वारा किया। भारत में स्वराज्य-आन्दोलन आरम्भ होने पर उन्होंने ‘वन्दे मातरम्’ पत्र द्वारा शिक्षित जनता में अपने मर्म स्पर्शी लेखों द्वारा अपूर्व चेतना और जागृति उत्पन्न कर दी थी। नवयुवकों पर उनके लेखों से जादू का सा प्रभाव होता था और दल के दल युवक राजनीतिक आन्दोलन में कूदकर अपने प्राणों की आहुति देने को प्रस्तुत हो गये। उनके इस अलौकिक प्रभाव को देखकर अंग्रेजी सरकार भयभीत हो गई और शीघ्र ही अवसर मिलने पर उसने उनको षड्यंत्र केस में फँसाकर जेल में बन्द कर दिया। श्री अरविन्द ने इस घटना का उपयोग भी आध्यात्मिक शक्ति के उच्च धरातल पर पहुँचने के लिये किया। मुकदमे के फलस्वरूप फाँसी या काला पानी के दण्ड की चिन्ता छोड़कर वे जेल में योग-साधन में संलग्न हो गये और एक वर्ष तक वहाँ रहते हुये ही उन्होंने उल्लेखनीय शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ प्राप्त कर लीं। अब उनको प्रत्येक घटना और कार्य में लीलामय भगवान के ही दर्शन होने लगे वे अपने अणु-अणु में भगवान की शक्ति का अनुभव करने लगे।
षड्यंत्र के मुकदमे से बरी हो जाने पर अरविन्द ने देखा कि यहाँ राजनीतिक हलचल के कारण आध्यात्मिक साधना के कार्य में सदैव व्याघात आते रहेंगे, इसलिये कुछ ही महीने बाद वे मद्रास के निकट पाण्डिचेरी में चले गये, जो कि फ्रांस के आधीन एक छोटा सा नगर है। वहाँ उन्होंने अपने योगाश्रम की स्थापना की, जो कुछ वर्षों में इतना प्रसिद्ध हो गया कि भारत ही नहीं, विदेशों के अध्यात्म जिज्ञासु भी वहाँ शिक्षा प्राप्त करने के लिये आने लगे। फ्राँस के सुप्रसिद्ध दार्शनिक पॉल रिचर्ड ने पाण्डिचेरी आकर उनके कार्य में सहयोग देना आरम्भ किया और भारतीय संस्कृति तथा अध्यात्म विद्या के प्रचार के लिये ‘आर्य’ नाम का मासिक-पत्र अरविन्द के सम्पादकत्व में प्रकाशित कराया। पाल रिचर्ड की पत्नी मीरा रिचर्ड ने आश्रम की व्यवस्था का भार ग्रहण किया और आज तक वे ही ‘माताजी’ के नाम से उसका संचालन कर रही हैं।
श्री अरविन्द उन सच्चे आत्मज्ञानी साधकों में से थे जो साँसारिक सफलताओं से दूर रहकर विश्व हित पर ही दृष्टि रखते हैं। यद्यपि आरम्भ में कई वर्ष तक राजनैतिक क्षेत्र में कार्य करते रहने से देश और विदेशों में भी उनकी ख्याति हो गई थी और पाण्डिचेरी में एकान्तवास करने के पश्चात् भी लाल लाजपतराय, श्री पुरुषोत्तम टण्डन, डॉ. मुंजे आदि अनेक राजनैतिक नेता उनसे मिलकर सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य करने का आग्रह करते हरे, पर उन्होंने अध्यात्म द्वारा ही विश्व की समस्याओं का समाधान करना अधिक उपयुक्त समझा। इसके लिये वे तीस वर्ष से भी अधिक समय तक एकान्त में रहकर स्वयं साधना करते रहे ओर अपने अनुयायियों का भी उसी प्रकार मूक भाव से विश्वहित करने का आदेश देते रहे । अन्त में भारत को स्वराज्य प्राप्त होने नर 15 अगस्त जिसमें अपने कार्यक्रम का परिचय देते हुये बतलाया था-
आज के दिन मैं लगभग समस्त संसार के उन आन्दोलनों का देख रहा हूँ जिन्हें मैं अपने जीवनकाल में सफलीभूत देखने की आशा करता था। यद्यपि उस समय वे ऐसे थे कि उनकी सफलता स्वप्न सी जान पड़ती थी, पर अब वे सफल होने के निकट पहुँच चुके हैं, या सफलता के मार्ग पर हैं।............भारत की स्वाधीनता के अतिरिक्त मेरा एक स्वप्न एशिया वासियों के पुनरुत्थान और मुक्ति का भी था, जिससे वह मानव-सभ्यता की प्रगति में अपना महान योग दे सके। तीसरा स्वप्न था सारे संसार का एक संघ स्थापित होने का जिसका बाह्य आधार मानव मात्र का अधिक उत्तम, समुज्ज्वल और शिष्ट जीवन हो । ये तीनों बातें अब निकट आती जा रही हैं । जो कुछ प्रयत्न किये जा रहे हैं, उनके मार्ग में आपत्तियाँ आ सकती हैं, उन प्रयत्नों को नष्ट कर सकती है, फिर भी अन्तिम परिणाम निश्चित हैं। कारण यह है कि एकीकरण ही प्रकृति की आवश्यकता है, यही उसकी अनिवार्य गति है। समस्त देशों के लिये इस बात की स्पष्ट रूप से आवश्यकता है। जब तक एकीकरण नहीं होगा तब तक छोटे राष्ट्रों का जीवन भी अरक्षित हो सकता हैं । ऐसी दशा में एकीकरण में सभी का हित हैं, और केवल मानव की जड़ता तथा मूर्खतापूर्ण स्वार्थ भाव ही उसमें बाधक बन सकता हैं। पर प्रकृति की आवश्यकता और देवी इच्छा के सम्मुख ये चीजें सदैव टिकी नहीं रह सकती। मेरा विश्वास है कि मनुष्य विकास-मार्ग में एक नया कदम अवश्य रखेगा और वर्तमान की अपेक्षा उच्च और विशाल चेतना की ओर अग्रसर होगा। इस कार्य का आरम्भ आत्मा की अन्तश्चेतना द्वारा इस देश में ही हो सकता है। यद्यपि इसका लक्ष्य सार्वभौम होगा, पर इसका केन्द्र भारत में रह सकता हैं।”
इस प्रकार लगभग आधी शताब्दी तक भारत की आध्यात्मिक शक्तियों को नवीन प्रेरणा देकर महायोगी अरविन्द निर्वाण अवस्था का प्राप्त हुये। पर उनके स्वप्न अब भी साकार होते जा रहे हैं। ओर इस बात की सम्भावना प्रतिदिन स्पष्ट होती जीती है कि अब यह संसार टुकड़ों में बँटा न रहकर समस्त मानव परिवार की एक इकाई के रूप में आध्यात्मिकता के मार्ग पर अग्रसर होगा।
अपनी लाइन बड़ी करो।
स्वामी रामतीर्थ जब प्रोफेसर थे तब उनने बोर्ड पर एक लाइन खींचकर विद्यार्थियों से कहा-इसे बिना मिटाये छोटा करके दिखाओ। एक चतुर विद्यार्थी उठा, उसने उसकी बराबर ही एक लाइन कुछ बड़ी खींच दी। रामतीर्थ बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने कहा-छात्रों यही क्रम जीवन में भी हैं। यदि तुम दूसरों से बड़े होना चाहते हो तो किसी का पीछे धकेलने या उससे ईर्ष्या करने की जरूरत नहीं है। अपने गुणों और कार्यों को उससे अच्छा बनाओ, तुम स्वयं उनसे बड़े हो जाओगे।
महानता का मापदण्ड चौदहवें लुई का दाँत हालैंड को हड़पने पर था। उसने अपने मंत्री कालवर्ट ने कहा-छोटे से देश हालैंड को अब तक क्यों नहीं जीता जा सका ? कालवर्ट ने नम्रता पूर्वक कहा-श्रीमान किसी देश की महानता उसके विस्तार या क्षेत्र पर नहीं वरन् वहाँ के निवासियों के चरित्र पर निर्भर रहती है।
माँ! नीति की ही शिक्षा दो।
गाँधीजी को बचपन में उसके बड़े भाई ने मारा। वे रोते हुए माँ के पास शिकायत करने गये। माँ ने प्यार से कहा-मैं क्या करूँ, तू भी उसे मार। इस पर गाँधीजी ने कहा-नहीं माँ मैं बड़े भाई को नहीं मारूँगा। तू मारने वाले को
तो रोकती नहीं उलटा मुझे ही बड़े भाई को मारना सिखाती हैं। माँ लज्जित हो गई।
शर्म या मौत।
पराजित सम्राट कीशूट को जब यह कहा गया कि वह मुसलमान धर्म ग्रहण करने पर ही जीवन का संरक्षण और आश्रय प्राप्त कर सकता है तो उसने बहुत गंभीर होकर कहा-शर्म और मौत इन दोनों में से यदि एक को ही मुझे चुनना पड़ रहा है तो मौत को ही पसन्द करूँगा परमात्मा की मर्जी पूरी होने दो। मैं मरने को तैयार हूँ । आज मेरे हाथ लाली हैं पर इन पर कलंक की कोई कालिमा नहीं है।
सदा अच्छा काम किया। इंग्लैण्ड के कॉमन्स सभा के बाद विवाद में एक सदस्य ने अपने विरोधी से कहा-उन दिनों को भूल गये जब आप जूतों पर पालिश करने का काम करते थे । उस सदस्य ने उत्तर दिया-महोदय मैंने सदा अच्छी पालिश की, कभी किसी ग्राहक को असंतुष्ट नहीं होने दिया।
क्या गधे को लात मारें? कवि मिर्जा की निन्दा में मौलवी अमीमुद्दीन ने एक किताब लिखी। उसे मिर्जा ने पढ़ा पर कोई प्रतिवाद न किया। लोगों ने
इसका कारण पूछा-तो उनने कहा-कोई गधा आपमें लात मारे तो क्या आप भी उसमें लात मारेंगे ?
बच्चे का शिक्षा काल। एक महिला शिकागो के प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री फ्राँसिस वेलैण्ड पार्कर से यह पूछने गई कि वह अपने बच्चों की शिक्षा कब से प्रारम्भ करे ? पार्कर ने पूछा-आपका बच्चा कब जन्म लेगा महिला ने कहा-वह तो पाँच वर्ष का हो गया। इस पर पार्कर ने कहा-मैडम अब पूछने से क्या फायदा शिक्षा का सर्वोत्तम समय तो पाँच वर्ष तक ही होता है सो अपने यों ही गँवा दिया।
पूर्वजों की कीर्ति के बल पर। पाण्डिचेरी अरविन्दाश्रम के प्रसिद्ध संगीतज्ञ श्री दिलीपराय एक बार इंग्लैण्ड गये और वहाँ के प्रसिद्ध दार्शनिक बर्ट्रेण्ड रसेल से मिले। दिलीपराय ने अपना परिचय देते हुए अपनी कई पीढ़ियों का बड़प्पन भरा इतिहास सुनाया। यह बात रसेल को अच्छी न लगी उनने कहा-पूर्वजों की बड़ाई एक सीमा तक ही ठीक है। यदि इसी और आगे बढ़ता चला जाय तो अन्त में वहाँ पहुँचेंगे जहाँ हमारे पूर्वज बन्दर थे।
पूर्वजों की कीर्ति के आधार पर कोई बड़ा नहीं कहला सकता। बड़प्पन के लिए व्यक्तिगत गुणों की आवश्यकता हैं ।
धर्म का प्रचार। कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘धर्म का आदर्श’ प्रतिपादन करते हुए लिखा है-क्षण क्षण में हमारे भीतर से उत्साह जागता रहता है कि ‘प्रचार करना चाहिये।’ सहसा अनुताप होने लगता है कि ‘हम कुछ नहीं रहे हैं।’ मानों कुछ करना ही सर्व प्रधान हो। और क्या करना है ? किसे करना है, ये सब बातें विचारने की ही नहीं। किन्तु यह बात सदा ध्यान रखने की है कि धर्म प्रचार के काम में ‘धर्म’ पहले है ‘प्रचार’ उसके बाद ऐसी बात नहीं कि-प्रचार करने से ही धर्म की रक्षा होगी। असल बात यह है कि धर्म की रक्षा करने से ही धर्म का प्रचार स्वतः होगा। जो लोग धर्म की पूर्ण उपलब्धि किये बिना ही धर्म प्रचार करने की चेष्टा करते हैं वे क्रमशः धर्म को जीवन से दूर धकेलते रहते हैं।
निन्दा की चिन्ता। एक बार एक व्यक्ति ने स्वामी दयानन्द से पूछा कि-बहुत से व्यक्ति आपकी निन्दा करते हैं, इन्हें कैसे रोका जाय ?
स्वामी जी ने कहा-निन्दा से तो ईश्वर भी नहीं बच सका, फिर हमारी तो बात ही क्या है ? यदि मनुष्य अपनी आत्मा के सामने सच्चा है तो उसे सारी दुनियाँ की भी परवा न करनी चाहिए।
पीछे वालों के लिए।
एक बूढ़ा माली अपने बगीचे में अख़रोट का पेड़ लगा रहा था। बादशाह नौशेरवाँ उधर से गुजरे तो उनने पूछा-अखरोट का पेड़ बीस साल बाद फल देगा। तब तक तुम जीवित न रहोगे फिर क्यों इसके लिए मेहनत करते हो? माली ने उत्तर दिया-जहाँपनाह मेरे बाप दादों ने जो पेड़ लगाये थे उनके फल मैंने खाये। अब मैं यह पेड़ इसलिये लगा रहा हूँ कि मुझसे पीछे वाले दूसरे लोग इसके फल खायें।
उपेक्षा से दरिद्रता।
भारत के प्रसिद्ध इंजीनियर डॉ. विश्वेश्वरय्या अपनी अमेरिका यात्रा के समय वहाँ के तत्कालीन प्रेसीडेन्ट हर्बर्ट हुवर से मिले। अन्य विषयों की चर्चा के बाद विश्वेश्वरय्या ने उनसे पूछा-भारत की आर्थिक उन्नति में सबसे बड़ी लाइन आप क्या समझते हैं ? प्रेसीडेन्ट ने कहा-यहाँ के भारतीयों में इसके किए आतुरता बिलकुल भी नहीं हैं।
गर्दन काटने से मित्र बनाना अच्छा।
अब्राहम लिंकन से उनके मंत्रियों ने कहा-आप शत्रुओं के साथ नरमी का व्यवहार क्यों करते हैं इनका तो सफाया ही कर देना चाहिये। लिंकन ने कहा-मैं इनका सफाया ही कर रहा हूँ। सिर्फ मेरे और आपके तरीके सम्बन्धी दृष्टिकोण में अन्तर है। मैं इनकी गरदन काटने की अपेक्षा इनको मित्र बनाकर इनका स्वरूप ही बदले दे रहा हूँ।
क्या गंगा कभी अशुद्ध होती है ? माता शारदामणि के सत्संग में एक महिला आती थी जिसका चरित्र अच्छा न था। इस पर अन्य भक्तों ने आपत्ति की कि इसे सत्संग में नहीं आने देना चाहिये। माताजी ने कहा-पुत्रों क्या गंगा किसी से यह कहती है कि तुम बहुत मैले कुचैले हो मेरे जल में प्रवेश न करो ? अपने को किसी से अधिक पवित्र मानना मुझे तो दंभ ही लगता हैं । आत्मिक भावनाओं से ही मनुष्य का कल्याण और अधःपतन होता है।
( श्री ज्ञानानंद बाजपेयी )
वासना उस बाघिन के समान है जिस पर या तो हम विजय प्राप्त करें नहीं तो वह हमारे ऊपर सवार हो जायेगी। इन्द्रियों का प्रत्येक गोलक एक महत्वपूर्ण संस्थान हैं । उनके सदुपयोग से आशाजनक भौतिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। पर यदि उन्हें यों ही अनियंत्रित छोड़ रखा जाय तो वे कुमार्ग पर चलने लगेंगी और फिर उस आदत के वशीभूत होकर काम करते रहने से वे इन्द्रियाँ स्वयं भी जल्दी ही शक्तिहीन हो जाती है ओर जीवन की प्रगति में भी भारी हानि पहुँचाती हैं।
जीभ पर यदि काबू रहे तो वह केवल उपयोगी खाद्य पदार्थों को
कामेन्द्रिय को लीजिए। यदि काम विकार से मन हटा कर ब्रह्मचर्य का महत्व समझ लिया गया है और विषय विकारों से बचकर रहने की आदत डाल ली गई है तो स्वास्थ्य ठीक रहेगा। चेहरे पर तेज बढ़ेगा, मस्तिष्क सशक्त रहेगा। मनोबल विकसित होगा, सन्तान स्वस्थ पैदा होगी आध्यात्मिक गुण बढ़ेंगे तथा समाज में विश्वास समझा जायेगा पर यदि इस और असंयम है तो शरीर की मूल्यवान धातु व्यर्थ ही निचुड़ती रहेगी, शरीर खोखला हो जायेगा, मस्तिष्क और हृदय अपना काम ठीक तरह न कर सकेंगे, प्रमेह, स्वप्नदोष आदि रोग घेर लेंगे। सन्तान दुर्बल होगी, स्त्री का स्वास्थ्य खराब होगा, कुमार्ग पर कदम रखा तो सर्वत्र निन्दा होगी, व्यक्तित्व गिरेगा, मानसिक दुर्बलता रहने से भय और चिन्ता सताती रहेगी और जीवनी शक्ति के अभाव में मामूली-सा रोग भी प्राणघातक रूप धारण कर लेगा। ऐसी परिस्थितियों में आध्यात्मिक गुणों का विकसित होना और कोई महान पुरुषार्थ कर सकना तो बहुत ही कठिन है। असंयमी व्यक्ति के काम संस्थान भी रुग्ण ही रहते हैं। नपुंसकता, ध्वजभग बहुमूत्र, जलन, फुंसी आदि के स्थानीय कष्ट भी बने रहते हैं।
पेट को कब्रिस्तान क्यों बनाऊँ ? वश में की हुई और स्वतंत्र रखी हुई कामेन्द्रिय में इतना ही अन्तर हे जितना गाय और बाघिन में। एक हमारा हित साधन करती है दूसरी प्राण घातक संकट उपस्थित कर देती है।
हजारों ग्रंथों की खोज,अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरू के समान पथ प्रदर्शन करता है ।इस विषय की सभी जिज्ञासाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
1॰ गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग)म.1011)
प्रथम भाग-गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार,गुप्त शक्तियों का रहस्य नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाने जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों को विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुधार ढ़ड़ से प्रतिपादन मूल्य 2”‘)
द्वितीय भाग-गायत्री द्वारा वाम मार्गी तांत्रिक विधान के अनुसार मारणा, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गन्यत्र गीन गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता गायत्री उपनिषद्, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का समग्र 21)
तृतीय भाग-गायत्री महामंत्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का सवना विधार जव-योग ऋजु-योग प्राण-योग शब्द -योग, नष्ट-याग हठ-योग कुण्डलिनी -योग, शब्द-योग षट्चक्र वेधन का साधनाओं तथा अन्नमय कोष, आनन्दमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग दिग्दर्शन ! म03)
2’ गायत्री यज्ञ विधान (दोनों भाग)म 04)
प्रथम भाग-गायत्री यज्ञ का विज्ञान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शस्त्र एवं साइन्स के आधार पर बहुत ही खोजपर्णा वर्णान मूल्य 2,
द्वितीय भाग-गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रोत्तों विधि, प्रक्रिया, जलयात्रा, मंडप प्रवेश, वेदी पूजन, कुशकंडिका, अग्निनस्थपन, आहुति मन्त्र, पूर्णाहुति वसोधरा, घृत अवघ्राण, किया जा सकता है। मू”2)
3”गायत्री चित्रावली (दोनों भाग) म॰ 3!!)
प्रथम भाग-विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे महत्व प्रतिपादन मू. 01!!)
द्वितीय भाग-व्याहति समेत गायत्री के 26 श्रेक , 26 लेख एवं 26 आर्ट पेपर पर छपे तिरंगे चित्र, द्वारा समझाया गया है। मू”2)
4 “ गायत्री का मन्त्रार्थ मू. 1!!)
अनेकों ग्रन्थों ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेक प्रकार से किये हुए अर्थों का किया हुआ अर्थ भी इसमें है।
5” गायत्री ज्ञान मंदिर सैट 52 पुस्तकें मू. 13
अपने घर में छोटा गायत्री पुस्तकालय स्थापित करके अपने सारे परिवार को स्वजन सम्बन्धियों तथा मित्रों को पढ़ाने योग्य चार-चार आना मूल्य की अत्यन्त सुन्दर, सस्ती, बढ़िया ग्लेज कागज पर तिरड़ सुन्दर टाइटिलों की 52 पुस्तकों छापी गई है। गायत्री महाविद्या की अत्यन साधना ,से अधिकाधिक लोग को परिचित कराने तथा इस महामन्त्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता , का विचार करने के लिये यह सेट बहुत ही उपयोगी है प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट की स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।
*उद्बोधन*
क्यों पडा़ धूल से सिसक रहा
तू अन्धकार में मुँह ढककर
ले कलश सुधा का हाथों में,
ले जीवन के अपने दो पल।
जगती के आँगन में बिखेर,
हँस- हँस कर प्राणों का परिमल।।
भरदे जगती तल में प्रकाश
तू अक्षय ज्योति- शिखा बनकर
काँपती धरा, काँपता गगन-
जब चण्डी- सी करती गर्जन।
अवरुद्ध रख सके क्षणभर कब,
बिजली को मेधों के बन्धन।।
उठ, ले सम्भाल यह पुष्प- थाल,
क्यों आज बद्ध हैं तेरे स्वर।
इन अश्रुकणों की धारा में,
मिटता जाता तेरा जीवन,
फूँकता निरंकुश तृष्णा की,
ज्वाला में क्यों तू अपनापन
चल, मिटें भाल के ये कुअक्ड्,
तेरे प्रवाह में गल- गल कर
क्यों पडा़ धूल में सिसक रहा
तू अन्धकार में मुँह ढककर।।
महाबीर प्रसाद विद्यार्थी, एम॰ ए॰ साहित्यरत्न,