भवसागर को तैर कर पार करते हुए चिन्ता किस बात की! देखो पार तो वह कटि पर हाथ धरे खड़े हैं। जो कुछ चाहते हो उसके वही तो दाता हैं। उनके चरणों में जाकर लिपट जाओ। वह जगत स्वामी तुमसे कोई मोल न लेंगे। केवल तुम्हारी श्रद्धा भक्ति से ही तुम्हें अपने कंधे पर उठा ले जायेंगे। जहाँ भगवान शक्त हैं वहाँ भक्ति और मुक्ति की चिन्ता क्या, वहाँ दैन्य और दरिद्रता कहाँ! वही भवरोग की औषधि है। जन्म, जरा और सब व्याधि इससे दूर हो जाती हैं। परमात्मा की शरण में जाओ उन्हीं के बनो। उनके स्मरण में मग्न हो जाओ। इस देह से ही मुक्ति प्राप्त करो! उठो आँखें खोलो! यह नर तनु बड़ी भारी निधि हैं। ईश्वर लाभ कर इसे सार्थक करो।
जीवन का लक्ष हैं प्रभु की प्राप्ति। इसके लिए मनुष्य शरीर ही एक मात्र साधन हैं। इस साधन को प्राप्त करके सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता की बात यही हो सकती हैं कि भगवान को प्राप्त कर हम अपने जीवन को सफल बनाने के लिए सच्चे मन से संलग्न हों।
-सन्त तुकाराम
छिपा हैं दुःख-रजनी के बीच, मधुर चिर सुख का स्वर्ण विहान!
अरे, तू क्यों जाता हैं भूल, विसर्जन में उसका आवाहन!
मृत्यु उड़ जाती पंख पसार-रम्य नव जीवन तट की ओर।
भटकती पाने अपना नीड़-सिंधु से उस अनन्त की ओर॥
चाहती वह किसका आधार, खोजते किसे थके यह प्राण!
जानकर भी अपना वह रूप, बनी फिरती हैं क्यों अनजान!!
कली क्यों पाती यहाँ उभार-जलधि में होती सरिता लीन।
छेड़ती क्यों शाश्वत संगीत-किसी की नश्वर जर्जर बीन!!
अन्त ही बन जाता क्यों आदि, यहाँ विस्मृति बनती पहिचान!
किसी का बन्धन बनती मुक्ति, भावना बन जाती भगवान!!
हंसो, तुम जग में बनकर फूल-बिखर जाओ निज सुरभि प्रसार।
इसी में निहित सृष्टि का सत्य-विश्व हैं क्षण भंगुर, निःसार॥
भयंकर तूफानों के बीच, अधर पर हो मधुमय मुसकान!
शाप स्वयं बनेगी साध्य, शाप बन जायेगा वरदान!!
- रामस्वरूप खरे “साहित्यरत्न”
हमारा जीवन आत्मा के लिए या शरीर के लिए-इन दोनों बातों में से किसको प्रधानता देती इसका निर्माण हमें अब कर ही लेना चाहिए। सुर दुर्लभ मानव जीवन का अमूल्य अवसर एक-एक दिन करके यों ही बीतता जा रहा है और मृत्यु की बड़ी तेजी के साथ निकट दौड़ती चली आ रही हैं। कभी समय हैं कि हम कुछ सोच सकते हैं और कुछ कर सकते हैं। समय जीतने जाने पर एक दिन पैसा या जाएगा कि न कुछ सोचना बन पड़ेगा और न कुछ करना। तब केवल पश्चाताप ही हाथ पड़ेगा और न कुछ करना। तब केवल पश्चाताप ही हाथ रहेगा और बातों करोड़ों वर्ष का चौरासी लाख भ्रमण का अन्धकारमय भविष्य ही सामने उपस्थित होगा।
आज की सामयिक चेतावनी यही हैं कि हम समुचित रहते आगे और जो अवसर बाकी हैं उसका सदुपयोग कर लें। हो सकता हैं कि आज हम इन बातों का महत्व न समझें, उपेक्षा और उपहास के साथ उन्हें व्यर्थ मानें। पर यह आज की लापरवाही एक दिन हमें बहुत दुःख देगी। कीट पतंगों की तरह पेट पालने और बच्चे पैदा करने की तुच्छ प्रकृति को पूरा करते रहने के लिए यह मनुष्य शरीर नहीं मिला हैं, इसका उद्देश्य कुछ ऊँचा होगा, उस ऊँचाई को प्राप्त करने की बात यदि हमारी समझ में नहीं आती तो एक दिन यही ना-समझी हमारे लिए आत्महत्या जैसी दुःखदायक सिद्ध होगी। बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी बात यही हो सकती हैं कि हम जीवन लक्ष को समझें और उसे पूरा करने का प्रयत्न करें।
शरीर को सर्वस्व मानने वालों को आत्मा की अपेक्षा करनी पड़ती है? क्योंकि भौतिक जीवन में प्रत्यक्षवाद का आकर्षण बहुत हैं। आत्मिक लाभ समय बाध्य हैं। बालबुद्धि में प्रतीक्षा के लिए गुँजाइश नहीं रहती, बच्चों को धैर्य कहाँ होता हैं। वे आम की गुठली बोते है और क्षण भर बाद उसमें से पौधा उगने की आशा में उलट पलट करते हैं। दो चार घंटे बीत जाने पर भी जब उनके सपने का आम्र वृक्ष नहीं उगता तो वे निराश हो जाते हैं और गुठली को उखाड़ कर फेंक देते हैं। यदि यही दृष्टिकोण आत्मिक जीवन के बारे में भी रहा तो मनुष्य भौतिक लाभों को ही सब कुछ मान लेता हैं क्योंकि वे प्रत्यक्ष हैं। इन्द्रिय सुखों की वासना और धन, सत्ता एवं वैभव की तृष्णा की पूर्ति के लिए किये प्रयत्नों का फल इतना आकर्षण होता हैं कि वह छोड़ते नहीं बनता ।इस आकर्षण के मिठास में चाशनी चाटने वाली मक्खी की तरह जीव के पंख ऐसे चिपक जाते हैं कि फड़फड़ा ने पर भी उससे छुटकारे का कोई मार्ग नहीं मिलता।
आत्मिक मार्ग की विभूतियाँ महान् हैं। शरीर को सुख देने वाले भौतिक लाभ उन आत्मिक लाभों की तुलना में अत्यन्त ही तुच्छ और अस्थिर हैं। पर आत्मिक लाभों की महानता और श्रेष्ठता की परख केवल विवेक की कसौटी पर हो सकती हैं। अविवेक पूर्ण स्थूल दृष्टि में तो वह घाटे का मैदा ही प्रतीत होता हैं। क्योंकि मौज मजा छोड़ कर, स्वार्थ और कमाई को घटाकर इसमें तप, त्याग, संयम की प्रक्रिया करके मनोनिग्रह का रूखा मार्ग अपनाना पड़ता हैं। ऐसे नीरस देखने वाले और हानिकर लगने वाले मार्ग पर मोटी बुद्धि के लोग चलने को तैयार नहीं होते। यही कारण हैं कि इस संसार के अधिकांश मनुष्य भौतिक दृष्टिकोण के होते हैं। शरीर को, शरीर के लाभों को ही वे सब कुछ समझते है। आत्मा उनके लिए एक उपेक्षित वस्तु हैं। उसके लिए भी कुछ करना चाहिए ऐसा कभी कभी कुछ सोचते तो हैं, कुछ करने की इच्छा भी करते हैं, पर बन कुछ नहीं पड़ता। क्योंकि लक्ष शरीर सुख जो हैं। तृष्णा और वासना की पूर्ति में ही अपनी हित दिखता हैं। ऐसी दशा में शारीरिक प्रवृत्तियों के घेरे में अपनी सारी विचारधारा और कार्य पद्धति भ्रमण करती रहे तो उसमें आश्चर्य को क्या बात हैं?
वस्तुस्थिति इससे सर्वथा भिन्न हैं। आत्मिक क्षेत्र में जो लाभ, सुख एवं आनन्द हैं उसका मूल्य और मूल्य, वासना एवं तृष्णा के थोड़े, अनिश्चित, अस्थिर तथा जीवन को निस्तेज, निष्प्रभ, निरर्थक बना देने वाले तुच्छ सुखों की अपेक्षा अत्यधिक हैं। पर उसका मूल्यांकन करने के लिए थोड़ी उच्चकोटि की दूरदर्शिता पूर्ण विवेक बुद्धि की आवश्यकता होती हैं। यदि उसका अभाव रहा तो घटिया दृष्टि से सोचने और घटिया काम करने की बार क्रोध में हो बहुमूल्य जाहन की समाप्ति होगी। पर यदि विवेकशीलता जागृत हो गई और सारी वस्तु स्थिति पर विचार करके जीवन यापन जैसे महत्त्वपूर्ण विषय पर कुछ सारगर्भित निर्णय करने की आकांक्षा जगी तो वह विचारधारा धीरे धीरे हमें वहीं पहुँचा देगी जहाँ संसार के सभी महापुरुष पहुँचे हैं।
जब हमारा बच्चा खेलकूद में मस्त रहकर पढ़ना लिखना छोड़ने लगता हैं तब हम उसे डाँटते और रोकते हैं। उसे पढ़ाई के लाभ और मनोरंजन की व्यर्थता समझाते हैं। पर खेद की बात है कि हम अपने ऊपर उस सिद्धान्त को लागू नहीं करते। वासना और तृष्णा ही हमारे लिए सब कुछ बनी हुई हैं। आत्मा की प्रगति से उपलब्ध होने वाले लाभों की हमें चिन्ता ही नहीं हैं। क्या यह उपेक्षा उस बालक की मूर्खता से कम हैं जो खेलकूद के लिए पढ़ाई छोड़ बैठता है?
हम शरीर नहीं आत्मा हैं। शरीर कल नहीं तो परसों नष्ट होने वाला हैं। वह हमें एक साधन, औजार, उपकरण एवं वाहन के रूप में मिला हैं। क्या इस वाहन के लिए ही अपनी सारी शक्ति लगा दी जाय और अपना गन्तव्य लक्ष भुला दिया जाय? यह विचारणीय प्रश्न हैं, और इस पर विचार किया ही जाना चाहिए। शरीर की सुरक्षा रखी जानी उचित हैं। उससे सम्बन्धित आजीविका उपार्जन, परिवार का पोषण, एवं लौकिक कर्तव्यों का पालन भी उचित है। आजीविका उपार्जन, परिवार का पोषण, एवं लौकिक कर्तव्यों का पालन भी उचित हैं। अपने घोड़े को कौन भूखा मार डालता हैं? कौन उसकी सार संभाल नहीं करता? पर इसी प्रक्रिया में अपनी सारी शक्ति नहीं लगनी चाहिए। घोड़ा जिस यात्रा के लिए खरीदा गया था उस मंजिल का स्मरण ही भुला देना कहाँ की बुद्धिमानी हैं?
आत्मा का जीवन चिरस्थायी हैं। शरीर उसका एक वस्त्र मात्र हैं। वस्त्र को रंगीन बनाने के लिए अपना रक्त निकाल कर उसकी रंगाई कौन करेगा? पर हम हैं जो इसी खिलवाड़ में लगे हुए हैं। कुछ दिन के मनोरंजन में व्यस्त रहकर आत्मा के भविष्य को लाखों-लाख करोड़ों वर्ष के लिए अन्धकारमय बना रहे हैं।
अपनी आज की मनोदशा पर हमें विचार करना हैं। अपनी अब तक की गतिविधि पर हमें शान्त चित्त से ध्यान देना हैं। क्या हमारे कदम सही दिशा में चल रहे हैं? यदि नहीं तो क्या यह उचित न होगा कि हम ठहरे, रुक, सोचें, और यदि रास्ता भूल गये हैं तो, पीछे लौटकर सही रास्ते पर चले। इस विचार मंथन की बेला में आज हमें यही करना चाहिए। यहाँ सामयिक चेतावनी और विवेकपूर्ण दूरदर्शिता का तकाजा हैं।
साधना के विभिन्न मार्ग हैं और उनका विकास क्रम एक दूसरे से मिलता जुलता होने पर भी पृथक् हैं। इस योग की साधना में षट् चक्रों का वेधन करते हुए कुण्डलिनी जागरण की अन्तिम स्थिति प्राप्त होती हैं। राजयोग में यम नियम आदि अष्ट सूत्री साधना करते हुए अन्त में समाधि स्थिति प्राप्त होती है। कर्म योग की अन्तिम अवस्था स्थिति प्रज्ञा हैं। ध्यान योग का साधन अन्त में परमहंस गति पर जा पहुँचता है। नाद योग का साधक अनहद नाद में अपने आप को लय कर लेता हैं। तन्त्र का अन्तिम लक्ष महासिद्ध पद तक पहुँचना हैं। कामलिक योग की साधना करते करते वही स्थिति प्राप्त होती हैं। भक्ति योग में इष्ट देव के दर्शन मिलते हैं। प्राण योग का साधक ब्रह्मभाव में प्रवेश करके सहस्रार कमल का मधुपान करता हैं। इस प्रकार विभिन्न मार्गों पर चलते हुए साधक अन्तिम लक्ष तक पहुँचते हैं। इनमें कोई मार्ग कठिन, कोई सरल हैं पर रुचि भिन्नता एवं मार्ग में आने वाले नाना प्रकार के अनुभवों में जिसकी जैसी रुचि हैं वह उसी प्रकार के साधना मार्ग को अपना लेता हे गुरु परंपरा से ही कई साधना पद्धतियाँ चलती रहती हैं।
गायत्री योग सर्वांगपूर्ण योग हैं। इसमें इस प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं हैं कि अमुक स्थिति का साधक ही इसमें प्रवेश कर सकेगा। इस योग को बाल-वृद्ध गृही रिक्त, नर-नारी निरोग रोगी सभी अपना सकते हैं। पर यह बात अन्य योगों के संबंध में नहीं है। हठ योग का साधक यदि ब्रह्मचारी नहीं हैं तो उसकी साधना उसके लिये हानिकारक सिद्ध होगा। तब योग को दुर्बल हृदय लोग नहीं कर सकते क्योंकि भयजनक स्थिति आने पर उसका अनिष्ट हो सकता है। गायत्री योग सनातन हैं।
सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माजी पर यह महाशक्ति अवतरित हुई और उनने वेदों के माध्यम से इस विद्या को मानव प्राणी के लिए सुव्यवस्थित रीति से प्रस्तुत कर दिया। प्राचीन काल में प्रत्येक ऋषि की साधना का माध्यम गायत्री ही रही हैं। सभी अवतारों का उपास्य यही महामन्त्र रहा हैं। महाभारत के बाद जब तक इस देश ने अज्ञ अन्धकार के युग में प्रवेश नहीं किया था तब तक एक सर्वमान्य सर्वोपयोगी, सर्वांगपूर्ण उपासना के रूप में गायत्री साधना का ही सर्वोपरि स्थान रहा। साधारण गृहस्थ उसे नित्यकर्म के रूप में अपनाये रहते और वानप्रस्थ संन्यासी एवं विशेष स्थिति के व्यक्ति इसकी विशेष साधनाएँ करके जीवन लक्ष की पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते। इस प्रकार अनादि काल से भारतीय धर्मानुयायी इस उपासना के आधार पर अपना आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास करते हुए आत्म साक्षात्कार की ब्राह्मी स्थिति प्राप्त करते रहे।
गायत्री योग में पंच कोशों का अनावरण करना पड़ता हैं। हठ योग में जिस प्रकार षट् चक्रों का वेधन करते हुए कुण्डलिनी से अन्दर की शक्ति जागते हे वैसे ही गायत्री योग में आत्म के ऊपर चढ़ हुए पाँच आवरणों के अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश के पाँचों पर्दे उघाड़ने के बाद आत्म साक्षात्कार होता हैं। भक्ति योग में जिस प्रकार अमुक रूप वाले इष्ट देव का दर्शन होता हैं उसी प्रकार गायत्री योग में आत्म साक्षात्कार दिव्य ज्योति के रूप में होता है। उपनिषदों में आत्मा को ज्योति स्वरूप माना हैं, ‘तमसो या ज्योतिर्गमय’ की प्रार्थना हैं। इस महाप्रकाश की अखण्ड ज्योति का दिव्य दर्शन करने की आकांक्षा की गई हैं। यही ब्रह्म का शाश्वत स्वरूप हैं। शरीर धारी इष्ट देवों के रूप साधक की कल्पना के अनुरूप बनते और बदलते हैं पर ब्रह्म का शुद्ध स्वरूप सदा अपरिवर्तित एवं शाश्वत हैं ज्योतिर्मय ही हैं। गायत्री का ध्यान ‘सूर्य मण्डल मध्यस्थ के रूप में ही किया जाता हैं। आत्म साक्षात्कार के समय ही यह दिव्य तेज साधक के सामने उपस्थित होता हैं और वह उसी में लय होकर अपने समस्त आवरणों को जला डालता हैं। अग्नि में तपाए हुए सोने की तरह आत्मा भी इस ब्रह्मतेज के सान्निध्य में पहुँच कर अपनी सब उपाधियों को भस्मीभूत करके शुद्ध ब्रह्म की स्थिति में जा पहुँचती हैं।
पंचमुखी गायत्री के चित्र इन पाँच आवरणों के पाँच कोशों का ही संकेत करते हैं। जैसे अन्न पहले मुख में प्रवेश करता हैं फिर पेट में पहुँच कर पाचन क्रिया द्वारा रक्त बन जाता हैं, उसी प्रकार साधक अपने आपको अन्न के रूप में माता के मुख में प्रवेश कराता हैं और उसमें तल्लीन होकर तत्सम बन जाता हैं। गायत्री योग का यही साधना क्रम हैं। नित्यकर्म की दैनिक उपासना के रूप में जप हवन पर्याप्त है। यह प्रत्येक हिन्दू का अनिवार्य धर्म कर्तव्य है। शास्त्रों में लिखा हैं कि जो नित्य गायत्री जप नहीं करता वह चाण्डाल के समान है तात्पर्य यह है कि दैनिक उपासना का अमल तथ्य तो अपनी बुद्धि को कुमार्ग पर जाने से बचाये रहने और संसारी कुसंस्कारों के जो मैल नित्य ही मन पर जमते हैं उन्हें माँजने के लिए आवश्यक ही हैं। इसमें अपनी स्वाभाविक स्थिति के बने रहने, पतन के गर्त में गिरने से बचे रहने का ही लाभ है। विशेष प्रगति के लिए ऊँची कक्षा में प्रवेश करना पड़ता हैं और वह कक्षा पाँच कोशों के अनावरण वाले साधना क्रम से आरम्भ होती हैं।
आत्मा अनन्त शक्तियों का केन्द्र हैं। ईश्वर का अंश होने के कारण उसमें अपने पिता के सभी गुण पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। परमात्मा में जो शक्ति हैं सूक्ष्म रूप से वही सामर्थ्य आत्मा में भी मौजूद हैं। पर उस पर पाँच कोशों की पाँच परतें जमी हुई हैं जिसके कारण सब कुछ ढका पड़ा हैं, सब कुछ छिपा हुआ है। इस ढके हुए को, छिपे हुए को उघाड़ना ही गायत्री की पंचकोशी या पंचसूत्री साधना का उद्देश्य है। इस मार्ग पर जितनी प्रगति होती जाती हैं आत्मा अपनी महान् महत्ता को प्रकट करता चला गया है। आत्मानन्द और ब्रह्मानन्द की मधुरता का आस्वादन करते हुए उसका अन्तः प्रदेश निरन्तर आनन्द मग्न रहता है। साथ ही उसका बाह्य जीवन भी इतना मधुर बन जाता हैं कि सब ओर से उसे सहयोग सराहना एवं सम्मान की स्थिति दृष्टिगोचर होने लगती है। आत्मा के भंडार में बहुत सब कुछ है। उसे ढूँढ़ने और प्राप्त करने का प्रयत्न ही पंचकोशों की अनावरण साधना है।यह साधन सरल होते हुए भी अत्यन्त महान है। अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अब समय आ गया है कि हम आगे बढे़ और मानव जीवन का समुचित लाभ उठाने के लिए आत्मिक सफलताओं के लिए भी कुछ करें। पंच सूत्री साधना क्रम इसी दिशा में उठाया हुआ एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।
“दो मनुष्य ईश्वर को प्रसन्न करते हैं-एक तो वह जो सच्चे हृदय से उसकी सेवा करता हैं, क्योंकि वह उसे जानता हैं, दूसरा वह जो निष्कपट भाव से उसे ढूँढ़ता हैं क्योंकि वह उसे नहीं जानता।”
“हमें ईश्वर का सच्चा साक्षात्कार तभी होता हैं, जब हम उसके सामने अपनी याचनाएँ न लेकर, किन्तु अपनी भेंटें लेकर जाते हैं।”
“यदि कोई चाहे कि वह दुनियाँ में अपना स्वार्थ साधन भी करे और ईश्वर को भी प्राप्त कर ले, तो यह असम्भव है।”
संसार भर के श्रेष्ठ आत्मज्ञानी और तत्त्वदर्शियों ने अपने व्यक्तित्व जीवन के निष्कर्षों एवं अनुभवों का निचोड़ यही बताया हैं कि सत्य पर प्रारुढ़ रहा जाय। ईश्वरीय अभिवचनों, धर्मग्रन्थों, इस पुरुषों के सन्देश इसी तथ्य की ओर निर्देश करता हैं कि मनुष्य सत्य पर आरूढ़ रहे। यह देश काल पात्र के कारण प्रभावित नहीं होता। सृष्टि के आदि में सत्य की जैसी महत्ता और श्रेष्ठता थी आज भी वैसी ही हैं। इसका अनेकों ने अनुसंधान किया हैं और अनन्तः उसी परिणाम पर पहुँचना पड़ा हैं जहाँ अनादिकाल से प्राप्त पुरुष पहुँचे थे।
महात्मा इमर्सन की अनुभूति हैं कि- जिस सुन्दरतम और श्रेष्ठतम आधार पर मनुष्य को अपना जीवन अवस्थित करना चाहिए वह हैं- सत्य। सत्य के विरुद्ध किया हुआ प्रत्येक आचरण मानव समाज के स्वस्थ शरीर में छुरी भौंकने के समान निन्दनीय है।
दार्शनिक प्लेटो ने कहा-सत्य को ईश्वर और उसके प्रतिबिम्ब को प्रकाश कहते हैं।” महात्मा शेखसादी की उक्ति हैं-ईश्वर को प्राप्त करने का एक मात्र मार्ग सत्य को अपनाना हैं। जो सचाई के मार्ग पर चलता हैं वह कभी भटकता नहीं।” सुकरात का वचन हैं-मनुष्य को वैसा ही बनना चाहिए जैसा वह अपने को दिखाता हैं। मनुष्यता का गौरव इसी में हैं कि हम अपनी अन्तरात्मा के सामने सच्चे और ईमानदार सिद्ध हों। हमारा ध्येय सत्य होना चाहिए न कि सुख।” कन्फ्यूशियस कहा करते थे- “जो सच्चा होगा वह कर्मठ भी रहेगा। आलस्य और विलासिता असत्य की देन हैं। सचाई की राह सादगी से भरी हुई हैं उस पर चलने वाले न तो घमण्डी हो सकते हैं और न ढोंगी। मनीषा कान्ट का कथन हैं-सचाई की वह तत्त्व हैं जिसे अपने ने पर मनुष्य भले और बुरे की परख कर सकता हैं। हृदय गत सभी सद्गुणों के विकास की कुँजी मनुष्य की सत्यनिष्ठा में सन्निहित हैं।”
तत्वदर्शी अरस्तु ने कहा हैं-सत्य को सुनने और बोलने के समान और कोई आनन्ददायक वस्तु इस संसार में नहीं हैं।” विद्वान् ऐनोन कहा करती था।-” यह मत देखो कि कौन कह रहा हैं वरन् यह देखो कि सत्य कहाँ से कहाँ जा रहा हैं।” होरेसमन ने कहा हैं-यह जरूरी नहीं कि बिना पात्र कुपात्र का ख्याल किये हर सच्ची बात पूरी की पूरी हर किसी से कह दी जाय। परन्तु इतना अवश्य ध्यान रखा जाय कि जिससे जितना कहा जाय हैं सत्य ही होना चाहिए।” कडवर्थ ने बताया हैं कि-विश्व की सबसे बलवान शक्तियाँ दो हैं एक सत्य दूसरी प्रेम। जब यह दोनों एक साथ मिल जाती हैं तब इनका वेग इतना प्रबल होता हैं कि उसे कोई रोक नहीं सकता।” दार्शनिक भीनायस ने कहा हैं-सत्य का मार्ग एक चौड़ी आम सड़क को भाँति हैं जिसे जनना किसी के लिए भी कठिन नहीं हैं। कमी सिर्फ इतनी हैं कि लोग उसकी खोज नहीं करते और न उस पर चलने की इच्छा करते हैं।”
पाइथागोरस का कथन हैं-सत्य इतनी महान् पूर्णता हैं कि यदि कभी ईश्वर मनुष्य के सामने प्रकट होना चाहेगा तो वह प्रकाश को अपना शरीर बनाएगा और सत्य को अपनी आत्मा।” रोशियो का कहना हैं- “सत्य समस्त आशीर्वाद से अधिक मूल्यवान हैं। वह बुद्धि का नेत्र हैं इसके बिना मनुष्य अन्धा हैं। सन्त सिल्वियो पैलिको ने कहा हैं-’ सत्य के प्रति प्रेम उसमें विश्वास और दृढ़ता समस्त कर्तव्यों में प्रथम और उत्तम कर्तव्य हैं। ईश्वर से प्रेम करना और सत्य से प्रेम करना एक ही बात है।” डीमेस्थेन्स का मत हैं- “भगवान का प्रतिबिम्ब यदि मनुष्य की अन्तरात्मा में चमकता हैं तो उसका रूप सत्य प्रेम और न्याय से संमिश्रित होता हैं।” पालसन की उक्ति हैं-सत्य में दो विशेषताएँ रहती हैं एक यह कि वह मनुष्य को ऐसा दिव्य सौंदर्य प्रदान करता हैं जिससे वह संसार का प्रियपात्र बने और दूसरा यह कि वह सत्य प्रेमी को ऐसा पवित्र तेज प्रदान करता हैं जिससे वह अगणित प्राणियों द्वारा पूज्य बने। इसी प्रकार असत्य की भी दो विशेषताएँ हैं-एक दुष्टता जो मनुष्य को वीभत्स बनाती हैं और दूसरी धृष्टता जो उसे हास्यास्पद बनाती हैं।”
मनीषी काटन कहता हैं-सत्यवादी से यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह दुनियादारी की कुटिल नीतियों और कपटपूर्ण फरयो से सौदा पटाकर, तालमेल मिलाकर चलेगा। सत्य तो प्रकाश किरणों के समान एक सीधी रेखा पर चलता हैं जिसमें ओछे तिरछे घूमने या मुड़ने की गुँजाइश नहीं हैं।” जोसफ पार्कर ने बताया हैं कि- “असत्य उतावला होता हैं। उसे कभी भी पहचाना और दंडित किया जा सकता हैं। सत्य शान्त और गम्भीर होता हैं। उसे ईश्वर का उच्च न्यायालय भी केवल सम्मानित ही कर सकता हैं।”
मानव जीवन एक बहुत बड़ा सत्य हैं, उसकी आधार शिला सत्य पर ही रखी गई हैं। उसका अक्ष सत्य हैं इसीलिए उसकी जीवन नीति भी सत्य पर ही आधारित होनी चाहिए हमारा मन, वचन और काम एक होना चाहिये। जो मन में हो वही वाणी से कहें और जो कहें वही करें भी। पाप दूत्तियाँ यदि मन में आती हों तो अपनी दुर्बलताओं को सज्जनों के समक्ष उपस्थित कर दें ताकि वे उनको पनपने न देने और उनका निवारण करने का उपाय बता सकें। यदि कोई पाप बन पड़े हैं तो सदा उन्हें इज्जत आबरू में बट्टा लगने के डर से छिपाये ही न रहें वरन् सर्व साधारण के सामने न सही तो गुरुजनों के सामने तो अवश्य ही प्रकट कर दें। ताकि दुराव का भार मन पर से हलका हो जाय। हो सके तो विगत भूलों का, असत्य अनुचित आचरण का प्रायश्चित्त भी करने का प्रयत्न करें।
झूठ बोलने की एक प्रकार से नशेबाजी की तरह ही आदत पड़ जाती हैं, जिससे प्रेरित होकर मनुष्य अकारण बेकार की गप्पें लड़ाया करता हैं और झूठ बोला करता हैं। इस आदत को तुरंत छोड़ना चाहिए। शास्त्रों में कहा गया हैं कि-” शब्दों को ब्रह्म” अर्थात् वाणी ईश्वर का रूप हैं? इसे शारदा भी कहते हैं। अतएव इस महान् तत्त्व का हमें सम्मान और सदुपयोग ही करना चाहिये। प्रत्येक शब्द को नाप तौलकर बोले, सोच समझ कर बोले, उतना बोले जितना आवश्यक हो। जीभ को कतरनी की तरह हर घड़ी चलाते रहने वाले को अनायास ही बहुत सा झूठ बोलना पड़ता हैं, इसलिए कम बोलने की आदत डालनी चाहिए। अभ्यास के लिए कभी कभी मौन व्रत भी लेना चाहिए। महात्मा गाँधी सप्ताह में एक दिन मौन रहते थे। मौन के जहाँ अन्य अनेक आध्यात्मिक लाभ हैं वहाँ उससे वाणी का संयम भी होता हैं और अनावश्यक एवं असत्य भाषण करने की आदत पर अंकुश लगता हैं।
हमें सत्य ही बोलना चाहिए। सत्य के अनुकूल ही सोचना चाहिए। सत्य से शोधित कर्म ही करना चाहिए सत्य परायण होकर ही हम सत्य स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति कर सकेंगे। महापुरुषों ने अपने निज के अनुभव में सत्य यो ही सार पाया हैं और उसी का आचरण करने का हमें निर्देश किया हैं।
यदि पूर्ण सत्य निष्ठ होना कठिन मालूम पड़े तो जितना बन पड़े अधिकाधिक मात्रा में उस मार्ग पर चलने का प्रयत्न करना चाहिए। एक प्राप्त वचन हैं-
अतुगन्तु सतं कर्म कृरनं यदि न शक्यते। सल्पमप्यनुगन्तव्यं भार्गस्थो नावसीदति॥
“यदि सत्पुरुषों के मार्ग पर पूरी तरह चल सकना न बन पड़े तो थोड़ थोड़ा ही चलें। क्योंकि आगे बढ़ते रहने वाला कभी न कभी मंजिल पर पहुँच ही जाता हैं।”
मध्यकाल में यह मान्यता चल पड़ी कि गृहस्थ त्यागे बिना, संन्यास धारण किये बिना आत्मिक स्पष्टता नहीं हो सकती। बौद्ध और जैन धर्मों ने इस विचारधारा का प्रसार किया। बुद्ध ने राजपरिवार में जन्म लेकर स्त्री बच्चों को त्यागकर युवावस्था में संन्यास ग्रहण किया था। उनका प्रभाव जिन पर पड़ा उनने भी उनका अनुकरण किया और लाखों नर-नारियों ने पारिवारिक जीवन को तिलाञ्जलि देकर भगवा वस्त्र धारण कर लिए। भारत में सहस्रों मठ जगह जगह पर बन गये जिनमें भारी संख्या में भिक्षु भिक्षुणी रहने लगे।
चूँकि यह गृहत्याग आवेश में होता था, अनुकरण ही उनका प्रधान आधार था। संन्यास के लिए जिस पूर्व भूमिका की आवश्यकता होती हैं वह उन अनजानों में होती न थी। फलस्वरूप कुछ ही समय में बौद्ध मठ दुराचार के केन्द्र बन गये। वज्रयान हीनयान जैसी तान्त्रिक प्रक्रियाएँ उनमें से फूट पड़ी, भैरवी चक्रों में व्यभिचार व्याप्त हो गया। बिना पूर्व तैयारी के संन्यास गृहत्याग जैसे अत्यन्त कठिन कार्य को कन्धे पर उठ लेने के जैसे परिणाम होने चाहिए थे वैसे ही हुए।
प्राचीन काल में ऐसी पद्धति न थी। संन्यास कोई ब्रह्मचार्य न था वरन् एक मानसिक स्थिति मात्र थी। जिस प्रकार ब्रह्मचर्य पूर्ण होकर गृहस्थ धर्म अपनाने पर साधारण और स्वाभाविक मानसिक एवं रहन सहन सम्बन्धी परिवर्तन अपने आप हो जाता हैं वैसे ही गृहस्थ से वानप्रस्थ और वानप्रस्थ से संन्यास की मनोभूमि में प्रवेश करते समय बाह्य जीवन में कोई भारी परिवर्तन नहीं करना पड़ता था।
ऋषि युग के सभी ऋषि मुनि गृहस्थ थे। उन सब के स्त्रियाँ तथा बच्चे थे। उनमें से कुछ परिव्राजक बनकर भ्रमण का कार्यक्रम अपनाते थे या सदा ब्रह्मचारी रहना चाहते थे वे विवाह नहीं भी करते थे पर ऐसे ऋषियों की संख्या उँगलियों पर गिनते लायक ही थी। अधिकांश तो पारिवारिक जीवन के साथ ज्ञान, धर्म तथा आत्म कल्याण की साधना में संलग्न रहते थे।
योग के आदि प्रणेता भगवान शंकर स्वयं विवाहित थे। उनके दो विवाह हुए थे, सती और पार्वती उनकी दो स्त्रियाँ हुई। दो बच्चे थे कार्तिकेय और गणेश। भगवान कृष्ण योगेश्वर माने जाते हैं। गीता का महान् ज्ञान उन्हीं के द्वारा निःसृत हुआ हैं, वे भी गृहस्थ ही थे। पौराणिक गाथाओं के अनुसार तो उनकी अनेक स्त्रियाँ तथा बहुत संख्या में बालक थे। सृष्टि के आदि निर्माता ब्रह्मा की भी दो पत्नी थी सावित्री और गायत्री। उनके दस पुत्र उत्पन्न हुए। मानव जाति के आदि संस्कार कर्ता मनु के शतरूपा के साथ बहुसंख्यक संतान उत्पन्न कीं।
सप्त ऋषियों में से सातों ही गृहस्थ थे। कश्यप की पत्नी अदिति, वशिष्ठ की अरुन्धती, अत्रि की अनसूया, गौतम की अहिल्या, जमदग्नि की रेणुका, भारद्वाज की पैठिनसी, विश्वामित्र की हेमवती थी। इन सभी की सन्तानें थी। भृगु, अंगिरा, कृतु पुलह, प्रचेता, मरीचि पुलस्त, उछालक, कन्ध, याज्ञवल्क्य, पिप्पलाद दधीचि श्रंगी, धौम्य, उत्तंग, आदि सभी ऋषियों के सपलीक तथा सन्तानयुक्त होने का पुराणों में विस्तार पूर्वक वर्णन हैं।
उस जमाने में वन अधिक थे। रहन सहन की पद्धति उस युग के अनुसार ही थी। बड़े नगर न थे। नदी सरोवरों के तट पर जल की सुविधा की दृष्टि से छोटे छोटे आश्रम बनाकर रहने की एक सरल पद्धति सभी लोग अपनाते थे। औद्योगिक या यातायात सम्बन्धी सुविधाएँ न होने से समीप में ही उपलब्ध वस्तुओं से लोग चलाते थे। मिट्टी के पात्र नारियल या लौकी के कमण्डलु, मृगचर्म या वल्कल वसन, उस समय सुविधा से उपलब्ध थे। घने जंगलों में जो वृक्ष गिर पड़ते थे वे रास्ता रोकते थे, भूमि घेरते थे। उसको साफ करने तथा अहिंसक पशुओं को अग्नि का डर दिखाकर आश्रमों की रक्षा करने के लिये धूनी जलती रहती थी। उसे समय की यह स्वाभाविक प्रक्रिया थी। उच्चकोटि के विद्वान्, दार्शनिक वैज्ञानिक, शिल्पी, चिकित्सक, शिक्षक, अन्वेषक, इसी प्रकार का जीवन यापन करते थे। ईश्वर उपासना के साथ उनके आश्रमों में बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाएँ, शिक्षण संस्थाएँ, चिकित्सालय, साहित्य सृजन आदि के कार्यक्रम भी चलते थे। चरक, सुश्रत, विश्वकर्मा, चाणक्य व्यारा, पाणिनि, आर्यभट्ट, नागार्जुन आदि ऋषियों की महत्ता विश्वभर में विख्यात था। तक्षशिला और नालन्दा के गुरुकुल इसने विशाल थे कि उनमें संसार के कोने कोने से सहस्रों छात्र आकर अध्ययन करते थे। इन गुरुकुलों को चलाने वाले ऋषि गृहस्थ ही थे।
इतिहास और पुराणों का पन्ना पन्ना साक्षी हैं कि भारत में उच्च कोटि के युग निर्माता ऋषि गृहस्थ ही थे। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास की मनोभूमि में वे परिवर्तन करते रहते थे पर इसके लिए उन्हें सम्बन्धियों तथा निवास स्थानों को छोड़ने की आवश्यकता न पड़ती थी।
महाभारत के बाद जब सब ओर केवल अज्ञान का अन्धकार ही अन्धकार फैला हुआ था, तब उस समय की अत्यन्त भ्रष्ट जीवन पद्धति से दुःखी होकर बौद्ध और जैन तीर्थंकरों ने गृहत्याग की, संन्यास की दीक्षा जन साधारण को दी हो तो संभव हैं उनका उद्देश्य कुछ एक लोगों को व्यक्तिगत जीवन में आदर्शवादी रहकर भ्रष्ट चरित्र लोगों का मार्ग दर्शन करना रहा हो, और संभव हैं इसे उस समय कुछ प्रयोजन भी सिद्ध हुआ हो। पर सदा के लिए जन साधारण के लिए गृहत्याग या संन्यास कोई अनुकरणीय प्रक्रिया नहीं हो सकता।
आज 56 लाख से अधिक व्यक्ति साधु संन्यासी का वेश बनाये फिरते हैं। संसार के त्याग का यह लोग नारा लगाते हैं। स्त्री बच्चों को त्याग देते हैं, लोगों से कुछ मतलब नहीं रखते, एकान्त सेवन में शान्ति प्राप्त करने और भजन करके भगवान को प्राप्त करने का इनका कार्य क्रम होता है। आजीविका के लिए भिक्षा वृत्ति को अपनाते हैं और वेष भूषा को प्राचीन काल के ऋषियों से मिलती जुलती बनाने का प्रयत्न करते हैं।
विचारणीय प्रश्न हैं कि क्या इन साधु कहलाने वालों का कार्यक्रम ऋषि परम्परा के अनुकूल हैं? स्त्री बच्चों को अभाव की स्थिति में छोड़ देना क्या उनके साथ विश्वासघात नहीं हैं? स्वयं उपार्जन न करके दूसरों की कमाई खाने से क्या उनका ऋण अगले जन्म में चुकाना न पड़ेगा? दूसरों का दिया हुआ दान यदि पाप उपार्जित हैं तो खाकर क्या अपनी बुद्धि भी भ्रष्ट न होगी? जीवन धारण करने के लिए आवश्यक वस्तुएँ जब तक चाहिए तब तक संसार से कोई संबंध न रखने की बात कैसे बन रहा जाय यह बात तो समझ में आती हैं पर सारा समय एकान्त में बिता कर दूसरों पर छोड़ने की प्रक्रिया को ताड़ देना क्या मानव जीवन का सदुपयोग कहा जा सकता हैं? जिस समाज का अगणित ऋण अपने ऊपर हैं उसका ऋण न चुका कर एकान्त में छिप बैठना क्या ऋण मार बैठने के समान अनैतिक नहीं है? अनुत्पादक जीवन क्या समाज और राष्ट्र के लिए भारभूत एवं कष्टदायक नहीं है? आलस्य में बैठे बैठे फालतू समय बिताने से क्या कुविचार मन में नहीं आवेंगे और खाली दिमाग शैतान की दुकान” वाली उक्ति चरितार्थ होगी? लकड़ियों का अभाव होने और अहिंसक जन्तुओं का भय न रहने पर भी धूनी जलाना क्या राष्ट्रीय अपव्यय नहीं है? आज जब कि सस्ते और धुल सकने वाले वस्त्र आसानी से उपलब्ध हो सकते है, और मृग भी अपनी मौत मरने की बधिक द्वारा माँस तथा चमड़े के लोभ से मारे जाते है तब भी मृग चर्म पहने फिरना क्या ऋषियों की भावना के प्रतिकूल उनका असामयिक अन्धानुकरण नहीं है? जब दो रुपये में लोटा मिल सकता है तो बीस रुपये में मिलने वाले नारियल के कमण्डल की क्या उपयोगिता है?
इस प्रकार के कितने ही प्रश्न ऐसे हैं जिन पर विचार करने से यह गुत्थी सुलझती नहीं कि घर त्यागकर संन्यासी बन जाने और आज जिस प्रकार का जीवन हजारों साधु-संन्यासी जी रहे है इससे उनको स्वयं का तथा जन समाज का, जिसके सम्मिलित उत्तर दायित्व से किसी को छुटकारा नहीं मिल सकता, भला किस प्रकार हित साधन हो सकता है?
ईश्वर को प्राप्त करने में केवल मनोदशा बाधक हैं, स्त्री बच्चे नहीं? वैराग्य मोह जनित दृष्टिकोण के त्यागने को कहते हैं, लोग और ममता तो साधु को अपनी कुटी और लंगोटी में रह सकती है और वह भी उतनी ही बन्धन रूप हो सकती हैं जितना विशाल वैभव। आत्म कल्याण के लिए अमुक प्रकार का वेश या अमुक स्थान आवश्यक नहीं, इसके लिए तो आन्तरिक दुर्बलताओं को जीतना पड़ता है। यह कार्य घर के त्याग या संन्यासी का वेष बना लेने से अवश्य ही हो जायेगा इसका कुछ भी निष्प्रय नहीं। क्योंकि देखा जाता है कि अधिकांश साधु वेशभूषाधारी चरित्र और मानसिक स्तर को दृष्टि से साधारण श्रेणी के लोगों से भी गये बीते होते है। यदि वेश बदलने से ही आत्म उन्नति होती तो इन इतने बहु संख्यक साधुओं की क्यों नहीं होती? इसके अतिरिक्त यदि गृहस्थ परमार्थ साधन में बाधक ही है तो फिर एक एक देवता सप्त्नीक क्यों है? प्राचीन काल के सभी ऋषि इसे क्यों स्वीकार करते रहे? अगणित महापुरुष और तत्त्वदर्शी गृहस्थ में रहते हुए किस प्रकार परमगति प्राप्त करने के अधिकारी हो सके।
जो लोग सोचते हैं कि परमार्थ साधन के लिए ग्रह त्याग आवश्यक है, या वेश बदले बिना काम न चलेगा, उन्हें भारतीय ऋषि परम्परा और अध्यात्म विद्या के मूल दर्शन पर गम्भीरता से विचार करना होगा। जितना-जितना वे गहराई में उतरेंगे उतना ही निश्चय होता जाएगा कि वेष बदलने से काम न चलेगा। आत्म कल्याण के लिए जिस वस्तु के बदलने की आवश्यकता हैं वह है आन्तरिक दृष्टिकोण और यह परिवर्तन गृहस्थ में रहकर भी हो सकता है। फिर वेष बदलने की उस अण्ड-चण्ड प्रक्रिया को क्यों अपनाया जाय, जो आज की परिस्थितियों में अनावश्यक ही नहीं अवांछनीय भी है।
“समय का सदुपयोग न करने से मनुष्य दीन और दुनिया दोनों में कंगाल हो जाता है, इसलिये समय को व्यर्थ मत जाने दो।”
“जहाँ आवश्यकता समाप्त होती है, वहीं से इच्छा और ड़ड़ड़ड़ हमारी प्रकृति को ज्यों ही अपनी आवश्यकता की प्रत्येक वस्तु मिल जाती है, त्यों-ही हम बैठ कर बनावटी अभिलाषाएँ गढ़ने लगते है।”
बृहत् जीवन की श्रेष्ठ इच्छा का नाम ही संकल्प है।”
इस संसार में रहते हुये विपरीत परिस्थितियाँ या दुखों का आना स्वाभाविक है। विशेष कर यदि हम कोई महत्त्वपूर्ण कार्य करना चाहते हैं तो उसमें अनेक आपत्तियों का मुकाबला करने के लिए हमें तैयार ही रहना चाहिए। अनेक व्यक्ति इसी डर के मारे भारी काम में हाथ नहीं डालते। सम्भव है वे इस जीवन में दुखों से बच जायें। पर वे किसी प्रकार की प्रगति, उन्नति भी नहीं कर सकते। उनका जीवन कीड़े, मकोड़ों से बढ़कर नहीं होता।
जिसने शरीर धारण किया है उसको सुख-दुःख दोनों का ही अनुभव करना होगा। शरीरधारियों को केवल सुख ही सुख या केवल दुःख ही दुःख कभी भी प्राप्त नहीं हो सकता। जब यही बात हैं, शरीर धारण करने पर दुःख सुख दोनों का ही भोग करना हैं, तो फिर दुःख में अधिक उद्विग्न क्यों हुआ जाय? दुःख सुख तो शरीर के साथ लगे रहते है। हम धैर्य धारण करके उनकी प्रगति को ही क्यों न देखते रहें। जिन्होंने इस रहस्य को समझ कर धैर्य का आश्रय ग्रहण किया है, संसार में वे ही सुखी समझे जाते है।
धैर्य की परीक्षा सुख की अपेक्षा दुःख में ही अधिक होती है। दुखों की भयंकरता को देख कर विचलित होना प्राणियों का स्वभाव है। किन्तु जो ऐसे समय में भी विचलित नहीं होता वही “पुरुषसिंह” धैर्यवान् कहलाता है। आखिर हम ड़ड़ड़ड़ होते क्यों है? इसका कारण हमारे हृदय की कमजोरी के सिवा और कुछ भी नहीं है। इस बात को सब कोई जानते हैं कि आज तक संसार में ब्रह्मा से लेकर कीड़े, मकोड़ों तक सम्पूर्ण रूप से सुखी कोई नहीं हुआ है। सभी को कुछ न कुछ दुःख अवश्य हुये है। फिर भी मनुष्य दुखों के आगमन से व्याकुल होता है, तो उसकी कमजोरी ही कही जा सकती है।
महापुरुषों की यही विशेषता होती है कि दुखों के आने पर वे हमारी तरह अधीर नहीं हो जाते। उन्हें प्रारब्ध कर्मों का योग समझ कर वे प्रसन्नता पूर्वक सहन करते है। पाण्डव दुखों से कातर होकर अपने भाइयों के दास बन गये होते, मोरध्वज पुत्र शोक से दुखी होकर मर गये होते, हरिश्चन्द्र राज्य लोभ से अपने वचनों से फिर गये होते, राजा शिवि ने यदि शरीर के कटने के दुखों से कातर होकर कबूतर को बाज़ के लिये दे दिया होता, तो इनका नाम अब तक कौन जानता? ये भी असंख्य नरपतियों की भाँति काल के गाल में चले गये होते। किन्तु इनका नाम अभी तक ज्यों का त्यों जीवित है, इसका एक मात्र कारण उनका धैर्य ही है।
अपने प्रियजन के वियोग से हम अधीर हो जाते है। क्योंकि वह हमें छोड़ कर चल दिया। इस विषय में अधीर होने से क्या काम चलेगा? क्या वह हमारी अधीरता को देखकर लौट आयेगा ? यदि नहीं, तो हमारा अधीर होना व्यर्थ है। फिर हमारे अधीर होने का कोई समुचित कारण भी वो नहीं, क्योंकि जिसने जीवन धारण किया है, उसे मरना तो एक दिन है ही। जन्मा है वह मरेगा भी। सम्पूर्ण सृष्टि के पितामह ब्रह्मा है। चराचर सृष्टि उन्हीं से उत्पन्न हुई है। अपनी आयु समाप्त होने पर वे भी नहीं रहते। क्योंकि वे भी भगवान विष्णु की नाभि कमल से पैदा हुए है। अतः महा प्रलय ने कभी विष्णु के शरीर में विलीन हो जाते है। जब यह अटल सिद्धान्त है कि जायमान वस्तु का नाश होगा ही तो फिर हम उस अपने प्रिय का शोक क्यों करें ? उसे तो मरना ही था, आज नहीं तो कल और कल नहीं तो परसों। सदा कोई जीवित रहा भी है जो वह रहता ? जो जहाँ से आया था, चला गया। एक दिन हमें भी जाना है। इसलिए जो दिन शेष हैं उन्हें धैर्य के साथ उस परम पिता परमात्मा के गुणों के चिन्तन में लगावें।
शरीर को व्याधि होते ही हम विकल हो जाते है। विकल होने से आज तक कोई रोगमुक्त हुआ है ? यह शरीर तो व्याधियों का घर है। जाति, आयु, भोग के साथ लेकर ही तो यह शरीर उत्पन्न हुआ है। पूर्व जन्म के जो भोग हैं, वे तो भोगने ही पड़ेंगे। डडडड पुण्य, जप, तप और औषधि-उपचार करें अवश्य। लेकिन उनसे आराम न होने पर हम अधीर न हो जायें। क्योंकि भोग के आधार पर ही, दान, पुण्य और औषधि का कारण बन जाता है बिना कारण के कार्य नहीं होता, हमको क्या पता कि व्याधि के नाश में क्या कारण बनेगा ? इसलिए महा पुरुषों ने शास्त्र में जो उपाय बताये हैं उन्हीं को करें। साथ ही धैर्य भी धारण किये रहे। धैर्य से हम अनेक व्याधियों के चक्कर से सुखपूर्वक छूट सकते है।
जीवन की आवश्यक वस्तुएँ जब नहीं प्राप्त होती हैं तो हम अधीर हो जाते है। छोटी मोटी कठिनाइयाँ सामने आने पर हम अपना मानसिक संतुलन खो बैठते है। अभाव को दूर करने एवं कठिनाई को पार करने का रास्ता ढूँढ़ने की अपेक्षा इस अपना समय और शक्ति घबराने में खर्च करते है। क्या करें ? कहाँ जाऊँ? ऐसे अधीरता के विचारों में विकल हुए रोया करते है और हमारी आँखें सूज जाती है। ऐसा करने से भी अभावों और आपत्तियों में कोई कमी नहीं आती। सोचना चाहिए हमारे ही ऊपर ऐसी विपत्तियाँ है सो नहीं। विपत्तियों का शिकार किसे नहीं बनना पड़ा। वेघराज इन्द्र ब्रह्मा हत्या के भय से वर्षों घोर अन्धकार में पड़े रहे। चक्रवर्ती महाराज हरिश्चन्द्र डोम के घर जाकर नौकरी करते रहे। उनकी स्त्री अपने ड़ड़ड़ड़ बच्चे को जलाने के लिए कफ़न तक नहीं प्राप्त कर सकी। शरीरधारी ऐसा कोई भी नहीं है जिसने ड़ड़ड़ड़ पत्तियों के कड़ुवे फलों का स्वाद न चखा हो। सभी उन अवश्य प्राप्त होने वाले कर्मों के स्वाद से परिचित है। फिर हम अधीर क्यों हो? हमारे अधीर होने से हमारे आश्रित भी दुखी होंगे, इसलिये हम धैर्य धारण करके क्यों नहीं उन्हें समझावें? और क्यों न आपत्तियों को पार करने में अपनी समझ तथा शक्ति का सदुपयोग करें? बस, विवेकी और अविवेकी में यही अन्तर है। जरा, मृत्यु और व्याधियों दोनों को ही होती है। किन्तु ज्ञानवान उनको कर्म का भोग समझ कर धैर्य के साथ सहन करता है और मूर्ख विकल होकर विपत्तियों को और बढ़ा लेता है।
“यदि तुम भलाई को अनुकरण करने में कष्ट-सहन करो तो कुछ समय पश्चात् कष्ट तो चला जाता है, पर भलाई बनी रहती है। पर यदि तुम बुराई का अनुकरण करके सुखोपभोग करो तो समय आने पर सुख तो चला जायेगा और बुराई रहेगी
“तुम्हारे छोटे कार्य ऐसी वस्तु नहीं है जो सबके सब नाशवान् और तुच्छ हो और न तुम्हारे बड़े से बड़े हो और काम भी अत्यन्त छोटे कार्यों की अपेक्षा तनिक भी बड़े हो सकते हैं। वास्तविक बात यह हैं कि जिस भावना से तुम कार्य करते हो उसी का कुछ मूल्य और स्थापित होता है।”
“उत्तम अभिप्राय के होते हुए भी हम बहुधा बुराई कर बैठते हैं, फिर भला बुरे अभिप्रायों को लेकर हम भलाई किस प्रकार कर सकते हैं।
मनुष्य जीवन में शक्ति का बहुत बड़ा हाथ रहा है। शक्ति के बिना वह एक पग भी नहीं चल सकता, बसे अपने हर कार्य में शक्ति से काम लेना पड़ता है। यदि शक्ति उसका साथ छोड़ दे तो वह किसी काम का नहीं रहता। बलवान व्यक्ति भी शक्ति का उपासक हैं और निर्बल भी।
मनुष्य की वह शक्ति कौन सी है? इसे जानने के लिए यह समझना होगा कि मनुष्य जीवन का उद्देश्य कर्म है। कर्म के बिना वह निरर्थक है। परन्तु इच्छा के बिना कर्म की उत्पत्ति नहीं हो सकती। मनुष्य का मन चाहे तभी उसमें कार्य की प्रवृत्ति होती है, इसलिए मनीषियों ने इच्छा अथवा मन को कर्म की शक्ति माना है।
जिस व्यक्ति में इच्छा शक्ति की जितनी प्रबलता हैं, वह उतना ही अधिक कार्यक्षम होता है। वरना देह कर इच्छा शक्ति का ही शासन है क्योंकि इच्छा द्वारा ही सब इन्द्रियाँ अपने कार्या में लगती है। अत्यन्त निर्बल मनुष्य भी इसके बल से बलवान बन जाते हैं।
यह अपने अधिकार की बात है कि हम इस शक्ति को अच्छे कार्य में लगाते है अथवा बुरे में। संसार में जितनी भी बुरे कार्य होते हैं वे सब इसी के द्वारा। रक्तपात, अपहरण, चोरी, द्यूत आदि सभी कर्म इच्छा शक्ति के गलत प्रयोग का ही परिणाम है। इसके बल पर श्रेष्ठ कार्य भी होते हैं, जिनमें सत्यवादिता, परोपकार, और भगवत्प्राप्ति के विभिन्न साधन भी सम्मिलित हैं।
बड़े- बड़े तपस्वियों की साधनाओं में इच्छाशक्ति का ही हाथ था। बड़े-बड़े संग्राम में विजयश्री प्राप्त कराने का श्रेय भी इच्छाशक्ति को ही रहा हैं। बड़े बड़े हत्याकांडों में जो वीभत्सता उत्पन्न हुई वह सब इच्छाशक्ति के कारण ही हुई। आप इसे कार्य में लगावेंगे, वह उसी में लग जायेगी। उसी को पूर्ण करने का प्रयत्न करेगी।
अग्नि में जो दाहक शक्ति है उसका उपयोग जन-कल्याण के लिए भी हो सकता है और विनाश के लिए भी। यज्ञों द्वारा अग्नि की उपयोगिता जन-कल्याण में सहायक होती है। अग्नि के द्वारा ही हम परिपक्व एवं स्वादिष्ट भोजन प्राप्त करते है। अग्नि ही हमें प्रकाश दिखाती है। परन्तु इसके विपरीत वही अग्नि एटम आदि विभिन्न कर्मों के द्वारा भीषण जन-संहार करने में भी समर्थ है। चोर, डाकुओं ने भी अब तक अनेक गाँवों को उसी अग्नि की दाहक शक्ति से जला ढाला। जैसे अग्नि का प्रयोग अच्छे और सुनियोजित के लिए हो सकता हैं। वैसे ही इच्छाशक्ति का प्रयोग भी दोनों प्रकार से हो सकता है।
इच्छा शक्ति के बल पर मनुष्य में बड़े बड़े आश्चर्यजनक कार्य कर डाले। अनेक सतियों ने चिता आरोहण द्वारा अपने प्राण दे डाले, राजपूतों की वीर महिलाओं ने जौहर द्वारा हँसते हँसते अपने को बलिदान कर दिया। यह सब इच्छाशक्ति के ही बल पर संभव हुआ।
आप किसी प्रतिज्ञा की पूर्ति में कटिबद्ध हो जाय तो यह भी आपकी इच्छा शक्ति की ही प्रेरणा होगी। इसी के बल पर निर्धन ब्राह्मण चाणक्य ने भगधाधिपति महानन्द का राज्य उलट दिया, इसी के द्वारा परशुराम ने इस पृथिवी को इक्कीस बार अन्यायी राजाओं से विहीन कर डाला और इसी के प्रभाव से रावण ने सीता हरण किया, यद्यपि उसके गलत प्रयोग के कारण वह स्वयं ही नष्ट हो गया। इस प्रकार के अन्य अनगिनत उदाहरण प्राचीन और नवीन इतिहास में प्राप्त हो सकते हैं।
इच्छा शक्ति की दृढ़ता से ही शिवाजी ने औरंगजेब को छकाया। इच्छाशक्ति ने ही भगतसिंह को क्रान्तिकारी की उपाधि से विभूषित कराया और इसी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम का सफलता पूर्वक संचालन किया। लोकमान्य तिलक और गोखले आदि ने जो काम किए उससे भी अधिक गाँधीजी की इच्छाशक्ति ने कर दिखाया। लोग स्वराज्य को उस कल्पना मात्र समझते थे, परन्तु एक दिन वह बिना किसी प्रकार का रक्तपात किये ही सुलभ हो गया। जो कार्य तलवार नहीं कर सकी, उसे इच्छा ने पूरा कर दिया।
धार्मिक दृष्टिकोण वाले अनेक तपस्वी मोक्ष की कामना से शारीरिक कष्ट उठाते है। मोक्ष की इच्छा से ही जाने कितने साधु संन्यासी एकान्त स्थानों में न बैठकर घोर तप कर रहे हैं। यह सब मनोबल की प्रमुखता के कारण ही हो पाता है।
अपने अभीष्ट की सिद्धि के लिये यदि मनुष्य दृढ़ प्रतिज्ञ हो जाय तो उसके कार्य में कोई बाधा उत्पन्न नहीं हो सकती। जैसे पहाड़ी झरना मार्ग में पड़ने वाले शिलाखण्डों को तोड़ फोड़कर स्वयं मार्ग बना लेता है, वैसे ही इच्छा शक्ति भी अपने कार्यों में उपस्थित होने वाले विघ्नों को स्वयं दृढ़ता देती है।
जो व्यक्ति अपने सामर्थ्य की परवाह किये बिना भी केवल उसकी पूर्ति का विश्वास लेकर कार्यारम्भ कर देते हैं, उन्हें साहसी कहा जाता है। परन्तु साहस भी दृढ़ इच्छाशक्ति के बिना उत्पन्न नहीं हो सकता। आप किसी भी मनुष्य में किसी कार्य के पूर्ण हो जाने का विश्वास मात्र जगा दीजिये, बस वह अपने कार्यक्षेत्र में बढ़ता चला जाएगा
इसके लिए अनेक वीरों, साधकों, गृहस्थों के उदाहरण दिये जा सकते है, जिन्होंने लोक कल्याण के हित में ऐसे अनेक कार्य कर डाले जो केवल उनके शारीरिक बल द्वारा किसी प्रकार संभव नहीं थे। अनेक निर्बल तपस्वियों के संबंध में यह कहा जाता है कि बहुत बार सिंह उन की धूनी के पास आकर बैठ जाता है और जब वे हुंकार मात्र कर देते है तब कुत्ते के समान चुपचाप चला जाता है। हिमालय की कन्दराओं में ऐसे कई साधु के संबंध में प्रत्यक्षदर्शी द्वारा ऐसी बातें बताई गई हैं। यह भी कहा जाता है कि उन संतों के पास दर्शनार्थ आने वाले भक्त भी सिंह को वहाँ बैठा देखकर नहीं डरते। यह उन संतों के मनोबल का प्रभाव ही तो माना जा सकता है।
अनेक व्यक्ति अपने विश्वास पर ही बहुत से कार्यों को पूरा कर लेते हैं। असंभव दिखने वाले कार्यों को वे पूरा करते हैं। अभावग्रस्त होते हुए भी वे अपने प्रयत्न से एक दिन बड़े-बड़े साधन जुटा लेने में समर्थ होते हैं और अनेकों विघ्न-बाधाओं से लड़ते हुए सफलता के शिखर पर जा पहुँचते है।
ऐसे व्यक्तियों की इच्छाशक्ति दृढ़ होती है। वे सदा अच्छे कार्यों में लगे रहते है। परमार्थ भावना का कभी त्याग नहीं करते। स्वयं हानि उठा कर भी दूसरों का लाभ होता हो तो उसे करने में कभी हिचकते नहीं।
मनुष्य करना चाहे तो अत्यन्त कठिन प्रतीत होने वाले कार्यों को भी कर सकता है। बड़े बड़े बाँध, जहाज, रेल और कल कारखाने सभी के निर्माण में दृढ़ इच्छाशक्ति का प्राबल्य रहा है। मनुष्य को अशक्त कहने वाले मूर्ख हैं, वह तो सचमुच ही शक्ति की साक्षात् प्रतिमा है।
इच्छा शक्ति की सफलता में भी एक और दैवी शक्ति कार्य करती है, वह हैं संसार की विलक्षण निर्माण शक्ति। श्रेष्ठ कार्यों में उसके सहयोग से मनुष्य को अद्भुत सफलता मिलती है, परन्तु यह शक्ति विध्वंस के कार्यों में सहयोग नहीं देती, उसके लिए संहार शक्ति का सहयोग प्राप्त करना होता है।
दृढ़ इच्छाशक्ति, सदुद्देश्य और परमात्मा के भरोसे पर मनुष्य के सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। इसके बिना कोई भी अपने संकल्प में स्थायी सफलता प्राप्त नहीं करता। जो मनुष्य अपने जीवन में सफल होने की इच्छा करता है, वह अपनी इसी शक्ति को चैतन्य करने की चेष्टा करे, और उसे सन्मार्ग में लगाये तो निःसंदेह अपने लक्ष्य में सिद्धि प्राप्त कर सकेगा।
जिन लोगों को अपने कार्यों में असफलता के चिन्ह दिखाई पड़ते हैं, उनमें अन्य कारण चाहे कोई भी हों, परन्तु एक कारण इच्छाशक्ति की निर्बलता भी है। परन्तु यदि मनोयोग पूर्वक कार्य किया जाय तो वह निर्बलता शीघ्र देर हो सकती है।
यदि जीवन में सफलता प्राप्त करनी है तो इच्छा शक्ति को दृढ़ करिये। इसके दृढ़ होने पर कोई कार्य अधूरा नहीं रहेगा। परन्तु, कार्य में विघ्न आना भी स्वाभाविक है, उनसे घबराना नहीं चाहिए। मनुष्य जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ है और वे कठिनाइयाँ भी प्रयत्नपूर्वक ही दूर हो पाती हैं।
कुछ भाग्यवादी लोग भी अपने उद्देश्यों में सफल नहीं हो पाते। उनका विचार है कि सफलता भाग्य पर निर्भर है। परन्तु यह दलील भ्रम पूर्ण तो हे ही, मनुष्य को सादा के लिए बेकार कर देने वाली है। आपको भूख लगी है, भोजन सामने रखा है, परन्तु हाथ न लगाएँगे तो मुख में किस प्रकार पहुँचेगा।
यदि आपके मन में निराशा का संचार है तो आपकी सफलता भी कोसों दूर है। आप किसी प्रतिस्पर्द्धा में बैठे और मन में यह विचार उत्पन्न हो जाय कि अमुक व्यक्ति के सामने में कैसे जीत पाएँगे तो आपका वही विचार आपको डुबा देगा। आप अपनी ही कमजोरी के कारण असफल रह जायेंगे।
जहाँ आत्मोन्नति का भाव है, जहाँ अपनी सफलता की पूर्ण आशा है, वहाँ बिगड़ते हुए कार्य भी आसानी से बन जाते हैं। मन में सद्गुण का रहना आवश्यक है, जहाँ सात्विक भावनाएँ नहीं, हैं वहाँ जीवन भी नहीं रह सकता।
उदास मन और निराशा से परिपूर्ण विचार वाले व्यक्तियों का जीवन यथार्थ में ही प्राणहीन लाश के समान है। मनुष्य तो वह है जो अपनी कार्य-सिद्धि के लिए प्राप्त विपत्तियों से कभी नहीं घबराता और जिस कार्य को हाथ में लिया है, उसकी उपयोगिता को समझ कर कर्तव्य से पराणामुख नहीं होता बल्कि वह उसमें इतना तल्लीन हो जाता है कि चाहे प्राण चले जाय, परन्तु कार्य अवश्य हो-ऐसा निश्चय कर लेता है।
इसमें संदेह नहीं कि सच्चे कर्मनिष्ठा को संसार में अनेक प्रतिकूल परिस्थितियों से टक्कर लेनी पड़ती है। संसार में आज तक जितने सुधारक महापुरुष हुए हैं, उनके नवीन विचारों तक एक बार तो घोर विरोध हुआ है। परन्तु वे अपने निश्चय पर दृढ़ रहे इसलिए उन्हें सफलताएँ मिलती चली गई।
दृढ़ इच्छा शक्ति के बिना तो वह व्यक्ति अपने कार्यों में सफल नहीं हो पाते, जिनके सम्बन्ध में संसार की धारणा होती है कि यह व्यक्ति तो स्वभाव से ही श्रेष्ठ कर्मी और दिव्य गुण युक्त है। होनहार प्रतीत होने वाले अनेकों व्यक्तित्व जब समाज के समक्ष मैदान में आए तब उनकी मानसिक दुर्बलता का ज्ञान लोगों को हुआ और उनको जितनी आशा हुई थी, वह सब निराशा में बदल गई।
कुछ व्यक्ति ऐसे भी देखे गए हैं जिनके सम्बन्ध में समझा गया कि यह निकम्मे निकलेंगे और अयोग्य होने के कारण कोई काम न कर सकेंगे परन्तु यह धारण नितान्त भ्रम पूर्ण सिद्ध हुई और उन्होंने जिन कामों में हाथ डाला, उन्हीं में सफलता प्राप्त हुई। इसलिए केवल आकृति देखकर मनुष्य की योग्यता का निर्णय नहीं होता। इच्छा शक्ति को बढ़ाकर दुर्बल, मंद बुद्धि, साधन, हीन और गिरी हुई परिस्थितियों में पड़े हुए व्यक्ति भी उन्नति की इस स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं जो दूर से देखने वालों को चमत्कार जैसी प्रतीत होती है।
अन्नमय कोश की-स्थूल शरीर की शुद्धि के लिए गत अंक में अस्वाद व्रत का साधना क्रम इस वर्ष के लिए प्रस्तुत किया गया है। शरीर का निर्माण अन्न से होता है। जो हम खाते हैं उसी से रक्त माँस आदि सात धातुएँ बनती हैं। यह प्रक्रिया यहीं तक समाप्त नहीं वरन् हमारे चेतना क्षेत्र तक चली जाती है। रस, रक्त, माँस मज्जा, अस्थि, भेद, वीर्य इस सात स्थूल धातुओं के बनने के बाद इसी संदर्भ में ओज नामक सूक्ष्म तत्त्व बनता है और उसके बाद उसी से मन बुद्धि, चित्त अहंकार का अन्तः- करण चतुष्टव बनता है। इस प्रकार स्थूल शरीर की उन्नति- अवनति ही नहीं सूक्ष्म शरीर की- अर्न्त जगत की स्थिति भी अन्न पर ही अवलम्बित रहती हैं। जैसा खाये अन्न वैसा बने मन, वाली उक्ति अक्षरशः सत्य है। अभक्ष्य खाने वालों की मनोभूमि कभी भी उच्चकोटि की नहीं बन सकती। शरीर और मन जिस वस्तु से बनता है वह अन्न यदि निकृष्ट श्रेणी का है उसमें निकृष्ट कोटि के संस्कार समन्वित है तो यह आशा नहीं की जा सकती है कि हमारी चेतना उत्कृष्ट कोटि की होगी।
इसलिए साधना क्षेत्र में प्रवेश करते हुए आहार की शुद्धि पर अत्यधिक ध्यान देना पड़ता है। चौका चूल्हे की छूत की प्रथा आज भी अपने भौंड़े रूप में प्रचलित है। उसका वर्तमान स्वरूप तो जाति पाति पर आधारित होकर उपहासास्पद एवं रूढ़ि मात्र ही रह गया है। कुसंस्कारी और सुसंस्कारी व्यक्ति तो हर जाति में हो सकते हैं। जिस आधार को लेकर वह प्रथा आरंभ हुई थी वह आधार अभी भी यथावत् बना हुआ है। भोजन निर्माण में सुसंस्कारी व्यक्तियों का ही हाथ होना चाहिए।
कुसंस्कारी व्यक्तियों के हाथ का बना हुआ भोजन अपने साथ कुसंस्कार ही धारण किये रहता है। उसे खाने पर मन में कुसंस्कार ही बढ़ सकते हैं। कोढ़ी के पीव टपकते हाथों से बनाया हुआ भोजन करने में हमें घृणा होती है क्योंकि उसका पीव भोजन में मिलकर हमारे शरीर में जाएगा तो हमें भी रोगी बना देगी। ठीक यही बात कुसंस्कारी लोगों के ऊपर लागू होती है। उनके संस्कार भी निश्चित रूप से उनके द्वारा बनाये हुए भोजन में रहते हैं और वे हमारी बुद्धि में भी वैसे ही हलचल पैदा करते हैं जैसे कोढ़ी का पीव मिला हुआ आहार हमारे शरीर में विकार उत्पन्न करता है।
वासी, सड़े, बुझे, झूठे गंदे भोजन से हमें घृणा उत्पन्न होती है। वह स्वादिष्ट या कीमती हो तो भी उसे त्याज्य माना जाता है। अरुचिकर और बुरे स्वाद का भोजन भी नहीं खाया जाता। यही दृष्टि कुछ गहराई तक उतरे तो कुसंस्कारी भोजन को भी त्यागना पड़ेगा। बाजारों में होटलों में अच्छी प्लेटो में सजे हुए, तरह तरह के स्वाद वाले भोजन करते समय लोग प्रसन्न होते और गर्व करते हैं पर यह नहीं देखते कि इनके बनाने वाले कौन है? कैसी उनकी मनोवृत्ति है। कैसे संस्कार उनके भीतर पड़े हैं? यदि यह विचार नहीं किया गया है और केवल स्वाद एवं सजावट को ही पसंद कर लिया गया है तो यह एक भारी भूल है। मानसिक दृष्टि से अहित ही इससे होगा। ऐसा आहार खाने वाले के विचार अधोगामी ही होंगे। बेचारी थोड़ी सी साधना भी उस विकार का कहाँ तक शमन करेगी?
आहार बनाने वाले के कुसंस्कार जैसे अन्न पर पड़ते हैं वैसे ही उसके उपार्जन की स्थिति का भी प्रभाव पड़ता है। चोरी, बेईमानी, रिश्वत, छल, से कमाया हुआ पैसा जब खाया जाता है तो उस आहार पर भी उस उपार्जन की छाया रहती है। बिना मेहनत का , बाप दादों की कमाई का, उचक्केपन से प्राप्त हुआ धन जब हमारे पेट में जाता है तो यह आशा नहीं करना चाहिए कि इस खाने पर भी हमारी बुद्धि सात्विक रह रहेगी।
चटोरेपन के वशीभूत होकर युरिष्ठ,कुपाच्य निर्जीव, जीभ जलाने वाले, चटपटे पदार्थ पेट की सामर्थ्य से अधिक मात्रा में खाने पर हमारा स्वास्थ्य नष्ट होता है। पाचनक्रिया खराब होने से दूषित रक्त बनता है। इससे नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते है और वे अकाल मृत्यु का ग्रास बनाने के लिए हमें घसीट ले जाते हैं। इसी प्रकार यदि आहार मूल में अनीति की कमाई का है अथवा कुसंस्कारी व्यक्तियों के द्वारा उसे पकाने और परोसने की क्रिया सम्पन्न हुई होगी तो उसका दूषित प्रभाव भी हमारे मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट किये बिना न रहेगा।
अन्नमय कोश का अनावरण करने के लिए हमें इस प्रश्ण पर गंभीरता पूर्वक विचार करते रहना होगा। इस वर्ष अस्वाद व्रत सप्ताह में एक दिन करने का नियम हम लोग अपनावें। प्रारम्भ में इतना भी कम नहीं है पर आगे और भी अधिक सोचने और करने की आवश्यकता अनुभव होगी। तब सात्विक कमाई और सुसंस्कारित रसोई के प्रश्र पर भी कड़ाई बरतने एवं उसकी व्यवस्था बनाने के लिए प्रयत्न करना पड़ेगा। आरम्भ में कुछ कठिनाई इसमें प्रतीत हो सकती है, पर अभ्यास और मनोबल की दृढ़ता से हर कठिन काम सरल हो सकता है। हर कठिनाई का रास्ता निकल सकता है।
प्राचीन काल में संत और सत्पुरुष अपना आहार आप उपजाते और अपने श्रम से उसे सींचते काटते थे। अन्न के उत्पादन काल में जैसे संस्कार उस पर डाले जाते हैं उसकी प्रकृति वैसी ही बन जाती है। यज्ञ कार्य में प्रयुक्त होने वाले अन्न तथा औषधियों को विशेष विधि विधान के साथ बोने, उगाने, सींचने, काटने एवं शोधने का विधान है ताकि वह संस्कारवान् द्रव्य, पदार्थ अपनी क्रिया शक्ति से जन मानस में कल्याणकारक प्रभाव उत्पन्न कर सकें और उस रहस्यमय आध्यात्मिक विशेषता से देवताओं को भी प्रसन्न एवं आकर्षित कर सकें। हमारा शरीर भी एक यज्ञ है। जठराग्नि ही यज्ञाग्नि है, भोजन ही आहुति है इसके लिए भी यदि अन्न का उपार्जन विशेष शुद्धता पूर्वक गायत्री का मानसिक जप करते हुए किया जाय तो उसका प्रभाव और भी महत्त्वपूर्ण हो सकता है। जिसके पास थोड़ी सी जमीन है वे साधक आसानी से अपने लिए ऐसा अन्न उत्पन्न कर सकते है। शाक, फल के उपार्जन एवं दूध देने वाली गायों की उचित सेवा तथा परिचर्या करके उन्हें भी संस्कारित किया जा सकता है। यदि ऐसा आहार किन्हीं को प्राप्त हो सके तो उस साधक की साधना बहुत ही तीव्रता से फलित होगी। आज की स्थिति में सब के लिए इस सीमा तक व्यवस्था कर सकना सम्भव नहीं है पर जितना कुछ बन पड़े उतना अधिकाधिक सावधानी हमें इस दिशा में रखनी ही चाहिए। अस्वाद व्रत का साप्ताहिक व्रत लेने के बाद अब हमारी विचार धारा का प्रवाह इसी दिशा में चलना चाहिए।
आहार की शुद्धि अपने आपमें एक साधना है। प्राचीनकाल में आत्मकल्याण पथ के श्रेयार्थी पथिक इस ओर पूरा-पूरा ध्यान रखते थे। खेतों में काटते समय गिरे हुए कण बीनकर उस अन्न से जीवन यापन करने वाले कणादि ऋषि, पीपल के फलों पर निर्वाह करने वाले “पिप्पलाद ऋषि” ने अपनी साधना में आहार शुद्ध को प्रधान माध्यम बनाया था। राजा जनक अपने खेत में स्वयं हल जोत कर अपने भोजन के लायक अन्न स्वयं उपजाते थे। हल जोतते समय ही तो उन्हें सीताजी प्राप्त हुई थी।
यदि हम चाहते हैं कि मन कुमार्गगामी न हो, यत्र तत्र न भटके, साधना में लगे तो उसके मूल आधार को सुधारना पड़ेगा, आहार शुद्धि पर ध्यान देना पड़ेगा।
शरीर का विकास बहुत अन्न पर निर्भर है। जैसा आहार मिलता है उसी के अनुसार शरीर की उन्नति एवं अवनति होने लगती है। अभक्ष्य, गन्दे भोजन से बीमारियाँ होने लगती है। घृणित वस्तु पेट में चले जाने से उल्टी एवं दस्त होने लगते है। कोई विषैला पदार्थ पेट में पहुँच जाय तब तो जीवन ही संकट में पड़ जाता है। इसलिए शरीर की सुव्यवस्था एवं सुरक्षा का जिन्हें ध्यान है वे आहार के बारे में सतर्क रहते है। अभक्ष्य से बचने एवं पौष्टिक सुपाच्य आहार ग्रहण करने की ही उनकी सदा चेष्टा रहती है।
मन का विकास बहुत कुछ विचारों पर निर्भर है। जैसे विचार मस्तिष्क में घूमते रहते है। मन का स्वभाव उसी प्रकार का बन जाता है और फिर वही बातें कार्य रूप में परिणत होने लगती है। मनुष्य का अन्तःकरण गीली मिट्टी के समान है उसे जिस साँचे में ढाला जाय उसी में ढल जाता है। कुम्हार मिट्टी को लेकर विभिन्न साँचों की सहायता से विभिन्न आकृतियों के खिलौने बना देता है। विचारों का प्रवाह मनुष्य की जीवन दिशा को मोड़ता है और उसी के आधार पर कुम्हार के खिलौनों की तरह व्यक्ति का स्वभाव ढल जाता है।
शरीर स्थूल और मन सूक्ष्म है। स्थूल से सूक्ष्म की शक्ति अनेक गुनी अधिक होती है। शरीर से मन की सामर्थ्य भी अनन्त गुनी अधिक है। शरीर के स्वस्थ होते हुए भी मन के दुर्बल होने पर कोई व्यक्ति आशाजनक प्रगति नहीं कर सकता पर मनस्वी व्यक्ति दुर्बल शरीर होने पर भी गाड़ी खींच ले जाता है और उन्नति केक उच्च शिखर पर जा पहुँचता है। महात्मा गाँधी, महामना मालवीय जी आदि के उदाहरण सामने हैं । वे शरीर की दृष्टि से दुर्बल ही थे पर मानसिक सुदृढ़ता के कारण ड़ड़ड़ड़ उतना काम सके जो सैकड़ों पहलवान मिलकर भी नहीं कर सकते मानव प्राणी की सारी भौतिक विशेषता सफलता एवं प्रगति उसकी मानसिक योग्यता पर निर्भर करती है। पारलौकिक उन्नति का भी एकमात्र साधन मन ही है। गीताकार ने मन को ही बन्धन और मोक्ष का कारण माना है।
मन को स्वस्थ एवं सूक्ष्म बनाने के लिए उच्च कोटि के विचारों का आहार चाहिए। शरीर के लिए जिस प्रकार अच्छे भोजन की आवश्यकता है उसी प्रकार मन को प्रेरणाप्रद विचारों का आहार चाहिए इसके अभाव में मानसिक विकास की प्रक्रिया रुकी ही पड़ी रहेगी। स्कूली शिक्षा से मस्तिष्क विकसित होता है। भूगोल, गणित, इतिहास आदि की जानकारी से कुशलता एवं उपार्जन क्षमता बढ़ती है, मानसिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिए इतने से काम नहीं चल सकता। उसके लिए उत्कृष्ट प्रकार की विचारधारा का मनः क्षेत्र में प्रवेश होते रहना आवश्यक है। ऐसी ही आत्मिक उत्थान करने वाली विचारधारा को ‘विधा ‘ कहा गया है और उपनिषदों में विधा को ही बन्धन-मुक्ति का एकमात्र माध्यम माना गया है।
अन्न पेट में पैदा नहीं होता। उसे बाहर से लाकर मुख द्वारा पेट में पहुँचाया जाता है तब भूख बुझती है। कोई व्यक्ति बाहर से अन्न लाने की उपेक्षा करे, और यह सोचे कि जब भूख पेट में लगती है तो आहर भी पेट में ही उपजेगा तो उस व्यक्ति की मूर्ख माना जाएगा।। मानसिक आहार बिहार की आवश्यकता पूर्ति के सम्बन्ध में कितने ही लोग इसी प्रकार की मूर्खतापूर्ण बात सोचते है। उनका ख्याल होता है कि जब भगवान की कृपा हो जायेगी तब अपने भीतर से ही अच्छे विचार उग आवेंगे अथवा भजन करते रहने से सद्विचारों की आवश्यकता अपने आप पूरी हो जाएगी। ऐसे लोगों को थोड़ा समझ से काम लेना चाहिए। जब भजन करते हुए भोजन की आवश्यकता पेट के भीतर ही अन्न उपजकर पूर्ण नहीं हो पाती इसके लिए उन्हें भिक्षा या आजीविका का कोई लौकिक प्रबन्ध करना पड़ता है तो फिर भजन करने वाले की मानसिक आहार-सद्विचार की आवश्यकता अपने आप ही कैसे पूरी हो जाएगी उनके लिए बाह्य प्रयत्न की आवश्यकता क्यो न रहेगी?
आत्मकल्याण की गुत्थी को सुलझाने का एक मात्र माध्यम ‘मन’ है। योगाभ्यास की सारी प्रकृति का उद्देश्य मन को वश में करना है । मन हीं हमारा मित्र और मन हीं शत्रु है। अनियंत्रित मन हमें पतन और नरक के गर्त में पटकने के लिए ले दौड़ता हैं और मन हीं उत्कर्ष के उस शिखर पर ले जाकर प्रतिष्ठित कर देता है। उसी के सध जाने पर जीव जीवन मुक्त स्थिति को प्राप्त कर इस धरती पर ही स्वर्ग जैसे आनन्द का अनुभव करता है और परलोक की शाश्वत शान्ति का अधिकारी बनता है। जीवन का सफल और निष्फल होना निश्चित रूप से मानसिक स्थिति के ऊपर आधारित रहता है। भजन में भी सुसंस्कृत मन हीं लगता है और उस लगन पर ही आत्म-साक्षात्कार की सफलता निर्भर है।
मन की चंचलता को रोकने के लिए कई प्रकार के ध्यान प्राणायाम एवं अभ्यास किये जाते है पर यह सब तो पीछे की बातें है। कुसंस्कारी मन यदि रोक भी लिया गया तो रुकने पर उसकी दुष्टता केन्द्रीभूत होकर और भी अधिक उपद्रव उत्पन्न करेगी। रोकने से पहले तो उसे सुसंस्कारी बनाने की आवश्यकता है। आयुर्वेद के ज्ञाता अनेक रसायन बनाते है, उनमें विष और धातुओं का प्रयोग किया जाता है, पर पहले इनके विषैले अंश का शोधन कर लेते है। यदि अशुद्ध विषों को लेकर औषधियों बनानी आरंभ कर दी जाये तो उससे लाभ तो दूर उलटी हानि होने लगेगी। मन का निग्रह उचित है पर उससे भी पहले उसे सुसंस्कारी बनाना आवश्यक है। जैसे गोमूत्र में पड़ा रखकर भिलावा शोधा जाता है वैसे ही उच्चकोटि के विचारों में निमग्न रखकर मन को सुसंस्कारी बनाया जाता है।
संसार में जो कुछ वैभव और विभूति का दर्शन होता है उस सब के पीछे मानव मन की प्रचंड शक्ति की महत्ता आसानी से देखी और समझी जा सकती है। इस ऊबड़-खाबड़ दुनिया का चित्र भी सुन्दर बनाने में प्रकृति की रहस्यमयी शक्तियों को विज्ञान के माध्यम से वशवर्ती करने में अगणित प्रकार की सुख सुविधा उत्पन्न करने में मानव मन की शक्ति ही काम करती रही है। उसका प्रवाह यदि पतन की दिशा में बहने लगे तो सारी दुनियाँ जलते हुए अँगारे के समान अशान्ति का केन्द्र बन सकती है। क्लेश, कलह, द्वेष, दुर्भाव, रोना, शोक, दन्य, दरिद्र, उत्पीड़न, शोषण जो कुछ नरक में होता है। आँखों के सामने उपस्थित हो सकता है। और यदि यह प्रवाह उलट कर उत्कृष्टता की और अग्रसर होने लगे तो स्वर्गादपि गरीयसी इस धरती माता पर सब लोग देव दुर्लभ आनन्द का रसास्वादन कर सकते है।
खाद्य समस्या की सबको चिन्ता रहती है। अपने घरों में हम सबसे पहले खाद्य पदार्थों की चिन्ता करते है। सरकार भी खाद्य उत्पादन के लिए यथाशक्ति प्रयत्न करती है। ठीक भी है तरीकों को यदि ठीक स्थिति में रखना है तो अन्न की और समुचित ध्यान दिया ही जाना चाहिए। पर साथ ही यह न भुला देना चाहिए कि शरीर से भी अधिक महत्व मन का है और मन को सद्विचारों का आहार जुटाने में लापरवाही न की जाय। मन को यदि उसका आहार नहीं मिला तो वह न तो स्वस्थ रह सकेगा और न सूक्ष्म।
कुविचारों के, कुकर्मों के दृश्य और उदाहरण हमारे चारों और प्रचुर मात्रा में फैले पड़े है, जब उचित आहार न मिलेगा तो मन उस अनुचित आहार को ही ग्रहण करने लगेगा। भूखा अभक्ष्य को भी खाने लगता है। मन के सामने यदि सुसंस्कारित विचारधारा प्रस्तुत न होगी तो कुसंस्कारों को ही यह अपने चारों तरफ से समेट लेगा। दर्पण के सामने जो कुछ आ जाता है उसी की छाया उसमें दीखने लगती है। कुरूप दृश्य सामने उपस्थित नहीं है तो दर्पण को यह दोष देना उचित नहीं कि उसमें कुरूप दृश्य दिखाई देते है। मन तो बेचारा दर्पण मात्र है जैसे विचारों से उसे घिरा रखा जाय वह वैसा ही तो बनेगा, वैसा ही तो बनेगा ,वैसा ही तो दीखेगा।
मन को सुसंस्कृत बनाने की समस्या हमारे जीवन की सर्वोपरि समस्या है। जीवन का उत्थान पतन सभी कुछ इस पर निर्भर है। और यह कार्य तभी सम्पन्न हो सकता है जब सद्विचारों का संग्रह उचित मात्रा में मन के सामने प्रस्तुत रखा जाय। स्वाध्याय और सत्संग का यही उद्देश्य है। प्राचीनकाल में प्रेस का माध्यम न होने से पुस्तकें दुर्लभ थी। सज्जनों का बाहुल्य सर्वत्र होने से सत्संग सुलभ था। इसलिए उस जमाने में सत्संग की ओर अधिक ध्यान दिया जाता था। आज स्थिति उलटी है। सत्संग का आयोजन करने वालों के पास न तो नेकनीयत है और न युग के अनुरूप विचारधारा, इसलिए आज के सत्संग खतरे से भरे हुए है। फिर आज की व्यस्त परिस्थितियों में वह सब के लिए सुगम भी नहीं रहा। दूसरी और प्रेस की सुविधा ने श्रेष्ठतम व्यक्तियों का सत्संग पुस्तकों के माध्यम से सरल भी बना दिया है और सस्ता भी। इसलिए आज की स्थिति में मानसिक विकास के लिए स्वाध्याय ही एक प्रमुख माध्यम रह जाता है।
स्वाध्याय के नाम पर प्राचीन ग्रन्थ कथा पुराण स्तोत्र आदि का पाठ करने से काम नहीं चल सकता। जीवन की अत्यन्त समस्याओं को आज की परिस्थितियों में हल करने का मार्ग-दर्शन करने वाले साहित्य से ही स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी होती है। जो हमारे विचारों को उच्चस्तरीय भूमिका में विकसित करे, दुष्प्रवृत्तियों से दुर्भाव और दुष्कर्मों से बचाते उसे ही स्वाध्याय साहित्य कह सकते है। हमारे नित्य के जीवन में स्वाध्याय के लिए समुचित स्थान होना चाहिए। सद्विचारों का आहार मानसिक भूख को बुझाने के लिए प्रस्तुत करना हमारी एक प्रमुख आवश्यकता है। इसकी ओर से मुँह मोड़कर उपेक्षा वृत्ति अपना कर कोई भी आत्म-विकास नहीं कर सकता है चाहे वह कितना ही भजन रोज करना हो।
लोहे को लोहे से काटा जाता है विचारों का समाधान विचारों से होता है। बन्धनों में बँधने वाले विचारों का शमन उन्मुक्त विचारधारा ही कर सकती है। शरीर और मन को शुद्ध आहार देना आत्मिक प्रगति के लिए अत्यन्त आवश्यक कार्य है। अन्नमय और मनोमय-कोश के अनावरण के लिए आहार शुद्धि और विचार शुद्धि नितान्त आवश्यक हैं। हम उनकी उपेक्षा न करे।
किसी मनुष्य महानता परीक्षा यह है कि वह ड़ड़ड़ड को देख सकता है ओर उसे बदल सकता है ।
“यदि सब लोग मुझ से खुश रहते हे, तो या में बड़ा महात्मा हूँ या पक्का धूर्त।”
“परार्थ ही को जिस मनुष्य ने अपना स्वार्थ बना लिया है ड़ड़ड़ड
राजा बड़ा या संत
एक दिन एक राजा और महात्मा में भेंट हुई। दोनों अपने-अपने क्षेत्रों की प्रशंसा करने लगें। महात्मा ने आत्मा की महत्ता बताई, राजा ने अपने राज की। महात्मा ने कहा-राज आत्मा से बड़ा नहीं हो सकता। उनने राजा से पूछा-यदि तुम रेगिस्तान में घिर जाओ और प्यास से प्राण निकलें और उस समय कोई पानी के बदले आधा राज्य माँगें तो दोगे या नहीं ? राजा ने कहा-दूँगा फिर महात्मा ने पूछा-यदि तुम बीमार हो जाओ और रोग इतना बढ़े कि बचने की कोई आशा न रहे ऐसी दशा में यदि कोई वैध शर्त के साथ इलाज करे और अच्छा करने की कीमत आधा राज माँगे तो दोगे या नहीं ? राजा ने कहा-दूँगा
महात्मा जी खिलखिला कर हँस पड़े उनने कहा-जो राज एक लोटा पानी और एक शीशी दवा के बदले दिया जा सकता है उसका महत्व आत्मा से बढ़ कर किस प्रकार हो सकता है? जिस जीवन की रक्षा के लिए जब मनुष्य बड़े से बड़ा काम कर सकता है तो उस जीवन के उत्कर्ष के लिए तो उसे राज पीट से भी बड़ी चीज का त्याग करने को उद्धत होना चाहिए।
ईश्वर के प्रियपात्र
खलीफा उमर एक बार अपने धर्म स्थान पर बैठे हुए थे। उन्हें स्वर्ग में एक फरिश्ता उड़ता हुआ दिखाई दिया , उसके कन्धे पर बहुत मोटी पुस्तक लदी हुई थी। खलीफा ने उसे पुकारा वह नीचे उतरा तो उनने उस पुस्तक के बारे में पूछा कि इसमें क्या है? फरिश्ते ने कहा-इसमें उन लोगों के नाम लिखे है जो खुदा की इबादत करते है। इन्होंने अपना नाम तलाश कराया तो फरिश्ते ने सारी पुस्तक ढूँढ़ डाली पर उनका नाम कही न मिला। इस पर खलीफा बहुत दुखी हुए कि हमारा इतना परिश्रम बेकार ही चला गया।
कुछ दिन बाद एक और फरिश्ता छोटी सी किताब लिए उधर से गुजरा। खलीफा ने उसे भी बुलाया और उस पुस्तक में क्या है, यह पूछा उसने उत्तर दिया-इसमें उन लोगों के नाम है जिनकी कि इबादत, खुदाबन्द करीम खुद करते है। इस पुस्तक का पन्ना खोला गया तो उसमें खलीफा का नाम मोटे अक्षरों में लिखा हुआ था। फरिश्ते ने यह भी बताया कि जो लोग खुदा के आदेशों का पालन करते है, उन पर दुनिया को चलाने की कोशिश करते है उन्हें खुदा बहुत आदर की दृष्टि से देखते है अगर उनकी इबादत वे खुद करते है।
भगवान सब को देखता है।
एक बार एक भला आदमी बेकारी से दुखी था। उसकी यह दशा देखकर एक चोर को सहानुभूति उपजी। उसने कहा-मेरे साथ चला करो ‘चोरी में बहुत धन मिला करेगा। ‘वह बेकार आदमी तैयार हो गया। पर उसे चोरी आती न थी। उसने साथी से कहा मुझे चोरी आती तो है नहीं करूँगा कैसे? चोर ने कहा इसकी चिन्ता न करो मैं सब सिखा लूँगा। पहले हलका काम कराऊँगा फिर कठिनाई के मौके पर चलना। वह तैयार हो गया।
चोर एक किसान का पका हुआ खेत काटने गया। वह खेत गाँव से कुछ दूर जंगल में था। वैसे तो रात में उधर कोई रखवाली नहीं थी। तो भी चोर ने उस नये साथी को खेत के मेंड़ पर खड़ा कर दिया कि वह निगरानी करता रहे कि कही कोई देखता तो नहीं है। वह खुद खेत काटने लग गया।
नये चोर ने थोड़ी ही देर में आवाज लगाई कि -भाई जल्दी उठों ,यहाँ से भाग चलें ,खेत का मालिक पास ही खड़ा देख रहा है, मैं तो भागता हूँ।, चोर काटना छोड़ कर उठ खड़ा हुआ ओर वह भी भागने लगा। कुछ दूर जाकर दोनों खड़े हुए तो चोर ने साथी से पूछा-मालिक कहाँ था? कैसे देख रहा था? उसने कहा- ईश्वर सब का मालिक है। इस संसार में जो कुछ है, उसी का है। वह हर जगह मौजूद है और सब कुछ देखता है। मेरी आत्मा ने कहा-ईश्वर यहाँ भी मौजूद है और हमारी चोरी को देख रहा है। ऐसी दशा में हमारा भागना ही उचित था।
भगवान सब जगह है और सब को देख रहा है। उसके न्याय और दंड से कोई बच नहीं सकता। यह विश्वास करने वाला मनुष्य ही पापों से बच सकता है।
पीड़ितों का हक
यूनान में एक युवक के पास बड़ा सुन्दर घोड़ा था। उसका एक शत्रु उसे किसी भी प्रकार लेना चाहता था। और तरकीब उसे नहीं सूझी तो चालाकी से काम लेने की ठानी। वह युवक रोज शाम को अपने घोड़े पर सवार होकर सैर के लिए जाया करता था। शत्रु ने उसी समय बीमार अपंग का रूप बनाया और रास्ते के किनारे पड़कर कराहने लगा।
युवक बड़ा उदार था। जब घोड़े पर सवार होकर वह उधर से निकल रहा था तो उसकी निगाह बीमार व्यक्ति पर पड़ी। उसने उसे उठाकर घोड़े पर बिठा दिया और खुद पैदल चलने लगा। बस उस शत्रु को मौका हाथ लग गया। वह घोड़े में ड़ड़ड़ड़ उसे भगा ले चला।
उदार युवक ने उसे धूर्त को आवाज देकर रोका और कहा-घोड़ा भले ही ले जाओ पर एक बड़ी महत्त्वपूर्ण बात है, उसे सुनते जाओ। शत्रु ने घोड़ा रोक लिया और कहा जा कुछ कहना हो जल्दी कहो। युवक ने कहा-बस इतना ही कहना है कि जिस प्रकार तुमने घोड़ा लिया उसकी चर्चा किसी से न करना नहीं तो कोई वास्तविक बीमार होगा तो भी लोग उसकी सहायता न किया करेंगे।। इस प्रकार बेचारे बेबस लोगों का एक बहुत बड़ा हक मारा जाएगा।
संगति का फल
एक व्यक्ति के पास दो तोते थे, वह कई वर्ष के लिए घर छोड़ परदेश जाने लगा तो उन तोता को पड़ोसियों को दे दिये। एक तोता ब्राह्मण ने ले लिया दूसरा खटीक को दे दिया। दोनों ने वे तोते पाल लिये, वे वहाँ के कार्यों को देखकर कुछ बोलना भी सीख गये।
कई वर्ष बाद वह व्यक्ति जब लौट कर आया और यह देखने गया कि उसके तोते कैसे है तो ब्राह्मण बोले तोते को उसने कहते सुना, दान ड़ड़ड़ड़ और साधना “वह बहुत प्रसन्न हुआ कि तोते ने अच्छी शिक्षा सीखती। फिर वह खटीक के यहाँ गया जहाँ बकरे कटते थे और माँस बिकता था ,तो वहाँ पहुँचा हुअमा तोता कह रहा था। “घर पटकना-काटना “यह बुरी बात तोते को बोलना सुनकर उसे दुःख हुआ। तब एक समझदार व्यक्ति ने कहा इसमें इन तोतों का कोई दोष नहीं। यह तो संगति का फल है। जो जहाँ रहना है वहाँ के वातावरण का प्रभाव उस पर पड़ता है और वह वैसा ही बनने, वैसा ही ढलने लगता है।
संगति के प्रभाव को देखते हुए यह आवश्यक है कि बुरी संगति से बचा जाय और सज्जनों के निकट संपर्क में रहा जाय।
उपयोग में आने वाला धन
एक राजा ने एक, साधु को अपना, राजकोष दिखाया। उसमें ढेरों रत्न भरे पड़े थे ड़ड़ड़ड़। पूछा इन पत्थरों से आपका क्या प्रयोजन सिद्ध होता है? उनने कहा-इनमें लाभ होना तो दूर उलटे सुरक्षा के लिए चौकीदारी का खर्च उठाना पड़ता है।
फिर वह साधु एक विधवा के यहाँ गया जो चक्की पीस कर अपना तथा अपने छोटे बच्चों का गुजारा करती थी। उसने राजा से कहा तुम्हारे खजाने में भरे पत्थरों से तो यह चक्की का पत्थर उत्तम है जिसके सहारे एक कुटुम्ब का भरण-पोषण होता है।
जो जीवन की समस्याओं को सुलझाने तथा उत्कर्ष में सहायक हो वही ड़ड़ड़ड़ है। इसके अतिरिक्त जो जमा कर रखा गया है वह तो भाररूप है। उस से लाभ तो दूर उलटी हानि होती है।
संकल्पों का कल्पवृक्ष
एक व्यक्ति कही जा रहा था, रास्ते में उसे कल्पवृक्ष की छाया में बैठने का संयोग मिला। कल्पवृक्ष में यह गुण होता है कि उसके नीचे बैठकर जो कुछ कामना की जाय वह पूरी हो जाती है। पथिक को यह मालूम न था कि यह कल्पवृक्ष है, पर इससे क्या वह तो अपना प्रभाव दिखता ही है।
पथिक प्यासा था उसने कामना की कि मुझे ठंडा जल मिलता तो कैसा अच्छा होता। कामना करने की देर थी कि शीतल जल सामने उपस्थित हो गया। फिर उसे ड़ड़ड़ड़ लगा। भोजन की ड़ड़ड़ड़ तो थाल मौजूद था उससे उसने खूब तृप्ति प्राप्त की। अब उसे नींद आई और पलंग की इच्छा हुई। बस मसहरीदार पलंग हाजिर था। थका हुआ था नींद आई और सो गया।
शाम को नींद खुली तो देखा कि अँधेरा होता आ रहा है। मंजिल दूर है। उसे डर लगा कि कही ऐसा न हो कि शेर आ जाय और खा जाय। कल्पवृक्ष का तो काम ही यह था कि जो कामना हो उसे पूरा करे। बस दहाड़ता हुआ शेर सामने आ खड़ा हुआ और उसे फाड़कर कर खा गया।।
मनुष्य का संकल्प बल ही कल्पवृक्ष है। उत्तम संकल्प करने से उत्तम परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है और शुभ कार्य बन पड़ते है किन्तु मन में कुविचार भरे रहने से पतन और पाप के ही साधन बन जाते है। इसलिए मनोभावों को कल्पवृक्ष मान कर उनका सदुपयोग ही करना चाहिए।
प्राप्त धन का वितरण
एक अन्धा भीख माँगा करता था। जो पाई पैसे मिल जाते उसी से अपनी गुजर करता एक दिन एक धनी उधर से निकला। उसे अन्धे के फटे हाल पर बहुत दया आई और उसने पाँच रुपये का नोट उसके हाथ पर रखकर आगे की राहली।
उन दिनों नोटों का चलन शुरू ही हुआ था। अन्धे को उसके सम्बन्ध में जानकारी न थी। उसने कागज को टटोल-टटोल कर देखा ओर समझा कि किसी ने ठिठोली की है और उस नोट को खिन्न मन से जमीन पर फेंक दिया।
एक सज्जन पुरुष यह सब देख रहे थे उनने नोट को उठाकर अन्धे को दिया ओर बताया यह तो पाँच रुपये का है। तब वह प्रसन्न हुआ और उस से भोजन, वस्त्र खरीद कर अपनी आवश्यकताएँ पूरी की।
ज्ञान चक्षु के अभाव में हम भी परमात्मा के अपार दान को देख और समझ नहीं पाने ओर सदा यही कहते रहते है कि हमारे पास कुछ नहीं।। हमें कुछ नहीं मिला, हम साधन हीन है। पर यदि हमें इसे नहीं मिला ।है उसकी शिकायत करना छोड़ की, जो मिला है उसी की महत्ता को समझे तो मालूम पड़ेगा कि जो कुछ मिला हुआ है वह भी कम नहीं है।
“जो अपनी उच्च वृत्तियों की ओर ध्यान देता है वह ऊँचा हो जाता है, जो सदा अपनी छोटी वृत्तियों की ओर ही आकृष्ट होता है, वह वास्तव में छोटा रह जाता है।”
“नीच विचार हमारे सुख में भी हमें डंक मारते है और सद्विचार हमें कष्टों में भी सान्त्वना देते रहते है।
नरक पीड़ितों को पुराण का दान
धर्मराज युधिष्ठिर का वैसे तो सारा जीवन ड़ड़ड़ड़ एक बार उन्होंने अश्वत्थामा के ड़ड़ड़ड़ में आधा झूठ बोला था । इसके दंड स्वरूप ड़ड़ड़ड़ कुछ समय नरक में भी जाना था। युधिष्ठिर को पहले नरक में ले जाया गया ताकि उसे प्राप्त कर वे शेष समय स्वर्ग में रहें। जब वे नरक में पहुँचें तो अनेकों प्राणियों को दुःख दर्द से कराहते देखा । उनका हृदय दया से भर गया और इन्हीं पीड़ितों की सेवा करने के लिये सदा यही निवास करने की उन्होंने इच्छा प्रकट की । देवदूतों ने कहा-ये पापी लोग है इन्हें नरक भुगतना पड़ेगा। आप पुण्यात्मा है इसलिए स्वर्ग जायेंगे।। यहाँ आपका रहना संभव नहीं । तब युधिष्ठिर ने कहा-तो इन्हें भी स्वर्ग ले चलें। देवदूतों ने कहा-यदि आप अपना पुण्य इन्हें दे दे तो ये स्वर्ग जा सकते है। युधिष्ठिर ने खुशी खुशी अपना सारा पुण्य उन दुखियों को दान कर दिया ओर स्वयं सदा नरक में रहना स्वीकार किया।
स्वर्ग के स्वामी इन्द्र उन अकेले नरक में पड़ें हुए युधिष्ठिर के पास आये और कहा-आपने अपना पुण्य दान कर दिया ,उस दान का जो नया पुण्य आपने कमाया है उसके फलस्वरूप अब आप फिर स्वर्ग के अधिकारी हो गये।
उदार हृदय व्यक्ति किसी भी स्थिति में होने पर अपना उदारता का परिचय देते रहते है। उनकी परमार्थ बुद्धि अन्ततः उनके लिए कल्याणकारी होती है।
लोकहित के लिए अस्थि दान
वृत्र सुर ने देवताओं को परास्त कर दिया। तब वे प्राण बचाने जहाँ-तहाँ फिरने लगे। ब्रह्माजी से इस दुर्दशा से त्राण का उपाय पूछा तो उनने कहा-महातपस्वी दधीचि ऋषि की हड्डियों का वस्त्र बने तब असुर का वध हो सकना संभव है। देवता ऋषि के पास पहुँचें। वे संकोच वशं कुछ कह तो न सके पर दधिची ने सब कुछ समझ लिया और वत्व की रक्षाआ के लिए खुशी-खुशी अपनी हडडियाँ निकाल कर देवताओं को दे दी। उनसे वज्र बना, तब इन्द्र ने उसके द्वारा वृत्रासुर को मारा।
महापुरुष लोक हित के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करने को भी उद्धत रहते है।
महानतम यज्ञ
महाभारत के बाद पाँडवों का विशाल राजसूय यज्ञ सानन्द पूर्ण हो गया तो एक दिन उस यज्ञ की कीच में लोटने वाला न्यौला निराश होकर रोते हुए देखा गया। लोगों ने इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि एक यज्ञ की कीच से लोटने से मेरा आधा शरीर सोने का हो गया था, उठा तब तक कीच सूख गई, इसलिए शरीर का दूसरा भाग सुनहरा न हो सका। मैं इस तलाश में था कि और कोई बड़ा यज्ञ हो तो उसकी कीच में लोट कर शेष शरीर को भी सुनहरा करूं । इसी आशा से इस सर्वविख्यात यज्ञ में लोटने बहुत दूर की कष्ट यात्रा करता हुआ मैं आया था। पर यहाँ कुछ भी फल न मिलने से मैं दुखी हो रहा हूँ।
लोगों ने पूछा इस अत्यन्त विशाल यज्ञ से भी बड़ा यज्ञ और कौन सा हुआ था उसका विवरण बताओ। तब न्यौले ने कहा-एक बार बड़ा दुर्भिक्ष पड़ा। अन्न दुर्लभ हो गया। एक भिक्षा जीवी ब्राह्मण को सात दिन बाद चार रोटी का अन्न मिला। ब्राह्मण, उसकी स्त्री, लड़के तथा लड़की चारों के लिए एक एक रोटी बनी। पर पहले अपने से भी अधिक जरूरत मदं को देकर तब खाना यह धर्म मर्यादा है। इस लिए ब्राह्मण ने छत पर चढ़कर पुकारा कि हमसे अधिक भूखा का इस भोजन में हिस्सा है कोई वैसा हो तो आधे भोजन करे। इतने में एक चाँडाल, जो कठगतं प्राण हो रहा था, आया और उसने अपनी आवश्यकता बताई। ब्राह्मण ने अपनी रोटी दी पर उससे उसकी तृप्ति न हुई। तब ब्राह्मणी,पुत्र तथा कन्या ने भी क्रमशः उस अपना रोटियाँ दे दी। उन्हें खाकर पानी पीने के पश्चात् उस चाँडाल ने जिस जमीन पर कुल्ला किया उस गाली जमीन में मैं कुछ देर पड़ा रहा था। उठा तो अपना गीला आधा शरीर सुनहरा देखा। इसका कारण मालूम करने पर पता चला कि ब्राह्मण का चार रोटी देना एक विशाल यज्ञ के समान पुण्य कार्य था।
अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं की परवा न करके भी जो दूसरों का उपकार करते है उनका भावना के अनुरूप ही पुण्य भी महान् होता है, कार्य चाहे छोटा ही क्या न हो।
क्रोध का प्रतिफल
महर्षि वशिष्ठ के बड़े पुत्र प्रचेता बढ़ें क्रोधी थे। एक दिन वे रास्ते में जा रहे थे कि रास्ता कौन छोड़े, इस विवाद में वे सामने से आने वाले कल्याणप्रद नामक व्यक्ति पर क्रुद्ध हो गये। रास्ता छोटा था-प्रचेता चाहते थे कि सामने वाला व्यक्ति एक ओर हट कर मुझे रास्ता दे। वह सामने वाला भी बड़ा हठी था। मैं ही क्यों हटूँ -आप क्यों न हटे? इस जिद पर वह भी अड़ गया।
बात बढ़, ऋषि को क्रोध भी गया। उसने कल्याणप्रद को शाप दिया-जा तू राक्षस होगा।। शाप के अनुसार वह राक्षस हो गया और अपने स्वभाव के अनुसार उत्पात करने लगा। उसने प्रचेता को भी धर पटका और उन्हें मारकर खा गया।
क्रोधी का क्रोध अन्तः उसके लिए हो घातक बनता है।
जहाँ धर्म वहाँ जीत
गान्धारी ने अनीति के लिए संग्राम करते हुए पुत्र दुर्योधन का भी समर्थन नहीं किया। जब दुर्योधन युद्ध में जाने लगा और माता से आशीर्वाद लेने आया तो उनने उस आशीर्वाद नहीं दिया, वरन् यही कहा -पुत्र ,जहाँ धर्म है वहा जात है यदि विजय चाहते हो तो अनीति को त्याग कर नीति का आश्रय लो ।
विधा का अहंकार
ब्रह्मचारी श्रेतकेतु जब बारह वर्ष गुरुकुल में छै ड़ड़ड़ड़ समेत चारों वेदों को पढ़कर घर लौटा तो उसमें अपनी विद्या का अहंकार आ गया। घर आकर वह बिना पिता को प्रणाम किये ही उनके समीप बैठ गया। तब उसके पिता महर्षि आरुणी ने पूछा तू ऐसा क्या पढ़ आया है जिसके कारण इतना अभिमानी पुरुष के हृदय से तो सारे गुण दूर चले जाते है। और समस्त दोष उसमें अपने आप आ जाते है।
श्रेतकेतु ने अपनी भूल स्वीकार की ओर विधा के अहंकार को भी त्याग दिया।
स्पष्टवादी सत्यकाम
बालक सत्यकाम महर्षि गौतम के गुरुकुल में पहुँचा। आचार्य को अभिवन्दन करके उसने विधा प्राप्त करने की अभिलाषा प्रकट की। महर्षि ने पूछा तुम्हारा वर्ण गोत्र क्या है? उसने बताया-मेरी विधवा माता को गुजारे के लिए अपनी युवावस्था में अनेक पुरुषों की सेवा करनी पड़ी। उसी समय मेरी जन्म हुआ। इसलिए जाति कुल अज्ञात है।
गौतम ने उठाकर बालक को छाती से लगा लिया और कहा-अपनी हानि और निंदा की परवा न करते हुए जो निर्भयता पूर्वक सत्य को कह सकता है वह ब्राह्मण ही है फिर भले ही वह किसी रज वीर्य से पैदा हुआ हो। सौम्य! मैं तुम्हें ब्राह्मण मानकर उपनयन करूँगा और प्रेम पूर्वक शिक्षा दूँगा, चलो मेरे गुरुकुल में प्रवेश करो
सबसे बड़ा कोन?
एक बार सब देवताओं में यह प्रतिस्पर्धा हुई कि हम में से कौन बड़ा है। सभी अपने को बड़ा बताते थे। आखिर मामला ब्रह्माजी तक पहुँचा। उनने सब देवताओं को बुलाया ओर कहा जो कोई सारी पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले लगाये उसी को बड़ा माना जाएगा। सब देवता अपनी-अपनी सवारियों पर बैठ कर चल दिये। बालक गणेश ने सोचा-पिता माता का गौरव सारी पृथ्वी से भी अधिक है। इसलिए क्यों न उन्हीं की परिक्रमा करी जाय? उन्होंने शंकर और पार्वती की परिक्रमा बड़ी श्रद्धा से की और सबसे पहले ब्रह्माजी के पास पहुँच गये। माता-पिता के प्रति उनकी इतनी अगाध श्रद्धा देखकर ब्रह्माजी ने उन्हें ही सबसे बड़ा माना। शुभ कार्या में पहले गणेश का ही पूजन होता है।
मात-पिता और गुरु क्रमशः इस पृथ्वी के सजीव ब्रह्मा,विष्णु,महेश है। इनके प्रति देवभाव ही रखना चाहिये।
दानी रन्तिदेव
राजा रन्तिदेव की कथा प्रसिद्ध है। वे अपने दरवाजे पर आये हुये किसी सत्पात्र अतिथि को खाली हाथ नहीं जाने देते थे। दान करते करते जब राज्य कोप खाली हो गया तो वे जंगल में जाकर तप करने लगे। वहाँ जो कुछ कन्दमूल फल मिल जाते उसी पर गुजारा करते। अतिथि वहाँ भी खाद पदार्थों का अभाव हो गया। बहुत दिन भूखे रहने के बाद एक दिन जब रन्तिदेव को कुछ आहार प्राप्त हुआ तो वे पहिले अतिथि को ढूँढ़ने लगे। इतने में एक ब्राह्मण, एक चाँडाल तथा कई कुत्ते भूख से पीड़ित सामने आ गये। रन्तिदेव ने अपना तथा स्त्री बच्चों का भोजन इन अतिथियों को देकर स्वयं फिर भूखा रह जाना स्वीकार किया।
दानशीलता उनके लिये उच्चकोटि की तप, साधना बनी और इसी के आधार पर रन्तिदेव ने जीवन लक्ष प्राप्त किया। दान स्वयं एक महान् तप है।
एकाग्रता से सफलता
द्रोणाचार्य अपने शिष्यों को बाण विधा सिखा रहे थे। उनने एक लकड़ी की चिड़ियाँ पेड़ पर टाँग दी और कहा कि इसकी गरदन पर निशा लगाओ । बारी बारी से शिष्यों को बुलाते और निशाना लगाते समय पूछते तुम्हें क्या दिखाई दे रहा है? शिष्य बताते कि पेड़, उसकी डाली, पत्ते ,चिड़ियाँ से बँधी हुई रस्सी आदि सभी दीखती है। उन्हें अनुत्तीर्ण घोषित करके गुरु बिना निशाना लगाये ही लौटा देते अन्त में अर्जुन आये ओर उनसे वही प्रश्न पूछा गया तो उनने कहा-मुझे केवल चिड़िया की गर्दन दीखती है, इसके अतिरिक्त ओर कुछ नहीं।। तो द्रोणाचार्य ने उन्हें तीर चलाने की आज्ञा दे दी। निशाना ठीक जगह पर लगा।
एकाग्रता ही समस्त सिद्धियों की आधार शिला है। पूरा मन लगाकर जो कार्य किया जाता है उसमें समस्त शक्तियाँ केन्द्रित हो जाती है ओर सफलता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
शिष्टाचार की रक्षा
महाभारत युद्ध में जब दोनों पक्ष की सेनाएँ लड़ने खड़ी थी शत्रुता अपने पूर्ण वेग पर थी ,तब भी युधिष्ठिर ने शिष्टाचार को नहीं भुलाया। वे आचार्य द्रोण, कृपाचार्य ,भीष्म पितामह ओर मामा शकुनि के चरणों में प्रणाम करने ओर उनसे आशीर्वाद माँगने गये।
जिस प्रकार आग में घी डालने से वह ओर भी जोर से जलने लगती है वैसे ही भोग उपभोगों के द्वारा कामना बढ़ती ही जाती है कभी घटती नहीं ।
“भोग -विलास और सैर ,तमाशे से आत्मा उसी भाँति सन्तुष्ट नहीं होती जैसे कोई चटनी और आचार खाकर अपनी अक्ष्1धाँ को शांत नहीं कर सकता
वर्ण-व्यवस्था की स्थापना किसी समय समाज को सुसंगठित बनाये रखने और उसकी आवश्यकताओं की उचित रूप से पूर्ति होते रहने के उद्देश्य से की गई थी। उसमें ब्राह्मण को सर्वोच्च पद दिया गया था और साथ ही उनके कर्तव्य भी उतने ही कठिन रखे गये थे । त्यागमय जीवन बिताना और समाज की अधिक से अधिक सेवा करना ब्राह्मणत्व का आदर्श बतलाया गया था । जिन्होंने इसके अनुसार आचरण किया उनके नाम हजारों वर्ष बीत जाने पर आज भी आदर के साथ लिये जाते है। समय के परिवर्तन से इस प्रकार के ब्राह्मणों की संख्या मध्यकाल में बहुत घट गई और अधिकांश ब्राह्मण कर्तव्य को भूल कर केवल अपने विशेष अधिकारों के लिये ही सचेष्ट रहने लगे। ऐसे समय में महाराष्ट्र प्रांत में श्री एकनाथ महाराज ने व्यवहारिक रूप से ब्राह्मणत्व के उदाहरण को उपस्थित करके देश और जाति की उन्नति में विशेष रूप से योग दिया।
एकनाथ महाराज का आविर्भाव अब से लगभग सवा चार सौ वर्ष पूर्व पैठण में हुआ था । यह नगर उस समय में विधा ओर शास्त्रों के अध्ययन का बहुत बड़ा केन्द्र माना जाता था। दूर दूर के मनुष्य यहाँ के पंडितों से धार्मिक प्रश्नों पर व्यवस्था लेने आते थे। एकनाथ भी बाल्यावस्था से धर्म में अभिरुचि रखने वाले ओर बड़े प्रतिभाशाली तथा मेधावी थे। छोटी अवस्था में ही उन्होंने संस्कृत में बातचीत करने की योग्यता प्राप्त कर ली थी। बारह वर्ष की अवस्था तक उन्होंने रामायण, महाभारत, भागवत्, के अनेक अंश और कितनी ही पौराणिक कथाओं का अध्ययन कर लिया। इससे उनका ध्यान ईश्वर की तरफ जाने लगा और उनमें आध्यात्मिक ज्ञान की अभिलाषा उत्पन्न होने लगी। एक दिन अन्त प्रेरणा से वे घर से निकल पड़े ओर देवगढ़ जाकर जनार्दन स्वामी के शिष्य बन गये। ये जनार्दन स्वामी अपने उच्चकोटि के आध्यात्मिक ज्ञान के कारण ‘स्वामी ‘नाम से प्रसिद्ध थे। वैसे वे चालीस गाँव नामक स्थान के प्रधान अधिकारी थे। उनका विश्वास था कि मनुष्य घर रहकर ही जितनी चाहे आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है और इस बात को उन्होंने प्रत्यक्ष रूप से पूरा करके भी दिखा दिया था।
जनार्दन स्वामी के पास रहकर एकनाथ छः वर्ष तक आध्यात्मिक विषयों का ज्ञान प्राप्त करके अभ्यास करते रहे। इसके बाद कितने ही मास तक उन्होंने शूलभंज नामक पर्वत पर जाकर एकान्त में तपस्या की। जब गुरु उनको सब प्रकार से योग्य देख लिया तो तीर्थ-भ्रमण के लिये जाने की आज्ञा दी जिससे संसार का व्यवहारिक अनुभव प्राप्त कर सके, भिन्न-भिन्न स्थानों पर सन्तों ओर विद्वानों के सत्संग में रहकर अपने अनुभव ओर ज्ञान की वृद्धि कर सके ओर समाज की परिस्थिति को देखकर अपने कर्तव्य का निर्णय कर सके। उन्होंने दो-तीन वर्ष में भारत के प्रायः सभी तीर्थों की यात्रा की और अन्त में अपने गाँव में पहुँच कर की गृहस्थ आश्रम में रहना स्वीकार कर लिया।
एकनाथ के जीवन कीक अनेक ऐसी घटनाएँ प्रसिद्ध है। जिनसे मालूम पड़ता है कि वे एक महान् आत्मज्ञानी और विद्वान् होने के साथ ही सहिष्णुता और सेवाभावी के मूर्तिमान् अवतार भी थे। कहते है कि जिस मार्ग से वे नित्य गोदावरी में स्नान करने जाया करते थे उस पर एक मुसलमान का घर था जो स्वभाव से बड़ा दुष्ट था। वह जब इनको स्नान से लौटते देखता तो जानबूझ कर ऊपर से कुल्ला कर देता जिससे इनको पुनः स्नान करने जाना पड़ता। एक दिन उसने हद कर दी और एक सौ आठ बार कुल्ला किया। पर धन्य है एकनाथ की सहिष्णुता कि उस पर जरा भी क्रोध किये बिना ये बार बार स्नान करते रहे। अन्त में जब वही थक गया, तो इन्होंने उसे धन्यवाद दिया कि आज तुम्हारे कारण मुझे 108 दफा पवित्र गोदावरी का स्नान करने का पुण्य प्राप्त हो सका। इसके उपलक्ष में इन्होंने उसे अपने घर बुलाकर उत्तम भोजन भी कराया। इससे वह अत्यन्त लज्जित हुआ और फिर शिष्य की तरह इनका आदर समान करने लगा।
इस प्रकार एक बार कुछ शरारती लोगों ने एक ब्राह्मण को दो सौ रुपये का लालच देकर इनके पास भेजा कि वह किसी तरह इनको क्रोधित कर दे। जब वह इनके स्थान पर पहुँचा तो ये मन्दिर में पूजा कर रहे थे। वह आकर अचानक इनकी पीठ पर बैठ गया। पर क्रोधित होने के बजाय ये उससे कहने लगे कि वाह भाई मेरे पास इतने व्यक्ति आते है,पर तुम्हारा जैसा प्रेमी कोई नहीं आया जो आते ही लिपट जाय। कुछ देर बाद वह इनके साथ भोजन करने बैठा तो अचानक उछल कर ।भोजन परोसते हुई इनकी पत्नी गिरिजाबाई की पीठ पर बैठ गया। यह देखकर ये हँसने लगे और कहा-देखना यह बड़ा बालक पीठ से गिरकर चोट न लगा ले। “गिरिजाबाई ने भी हँसकर उत्तर दिया कि मुझे बच्चे को पीठ पर लेकर काम करने का अभ्यास है, इससे मैं इसे गिरने न दूँगी। ‘अन्त में अत्यन्त लज्जित होकर उसने पैरों पर गिर कर इनसे क्षमा माँगी, ओर कहा कि मैंने आवश्यकता वश कुछ लोगों के कहने से ऐसा अनुचित व्यवहार किया। एकनाथजी ने स्वयं ही उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर दी
भारतवर्ष में अछूत जाति वालों की दशा आज कल भी बड़ी हीन है। कुछ सौ वर्ष पूर्व महाराष्ट्र समाज में उनकी स्थिति और भी शोचनीय था। पर एकनाथ जी उच्चकुल के ब्राह्मण होते हुये भी किसी से घृणा या भद्दा सा व्यवहार नहीं करते थे, वरन सब के साथ आत्मवत सर्वभूतेषु के सिद्धांत का ही पालन करते थे। एक दिन उनके पूर्वजों का श्राद्ध था और इस लिये गिरिजाबाई ब्राह्मण भोजन के लिये उत्तम पकवान बना रही थी। उसी समय कुछ अछूत जाति के व्यक्ति उनके घर की बगल से होकर निकले और पकवानों की खुशबू आने से आपस में चर्चा करने लगे कि ‘हम लोगों का ऐसा भाग्य कहाँ जो ऐसे पकवान पा सके। संयोगवश यह बात घर के एक कमरे में बैठे एकनाथजी के कानों में सुनाई दे गई। उन्हें इन लोगों की दुर्दशा पर बड़ी दया आई और उनको घर में बुलाकर अच्छी तरह भोजन करा दिया। इसके पश्चात् रसोई घर और समस्त बर्तनों को फिर खूब अच्छी तरह साफ करके ब्राह्मणों के लिये दुबारा रसोई बनाई पर उनके लिए बनाया गया भोजन अछूतों को खिला देने की बात सुनकर वे ऐसे नाराज हुये कि उन्होंने खाने से इनकार ही कर दिया। एकनाथजी के बार बार आग्रह करने पर भी वे राजी नहीं हुये तो उन्होंने अपनी लाचारी बताकर पितरों का आवाहन किया। उनकी हार्दिक भावना को देखकर पितर सशरीर वहाँ उपस्थित हो गये और उन्होंने भोजन को ग्रहण किया। यह देखकर हठवादी ब्राह्मण बहुत पछताये और क्षमा प्रार्थना करने लगे।
इसी प्रकार एक बार रान्या नामक अछूत ने एकनाथ को अपने घर भोजन करने की निमंत्रण दिया। उसने कीर्तन करते हुए एकनाथजी को यह उपदेश करते सुना कि प्राणी मात्र में एक ही परमेश्वर का निवास है। “इस पर उसने सोचा कि यदि हम में भी वास्तव में परमेश्वर का निवास है तो एकनाथजी हमारे हाथ का भोजन ग्रहण क्यों न करेंगे ? वैसे भी वह रान्या बहुत ही धर्मनिष्ठ और सदाचारी था तथा कभी मद-मास को छूता भी नहीं था ।एकनाथ ने उसका निमंत्रण निस्संकोच भाव से स्वीकार कर लिया और अन्य ब्राह्मणों के बहुत कुछ बुरा भला कहने पर भी उसके यहाँ जाकर भोजन किया। इसके लिये कट्टरपंथी उनकी बहुत समय तक निन्दा करते रहे, पर उन्होंने इसकी कुछ भी परवाह न की।
इसी प्रकार पैठण में रहने वाली एक वेश्या इनके घर कभी कभी कथा सुनने आ जाया करती थी। एक दिन उसने इनके मुख से भागवत् में वर्णित पिगलाँ नाम की वेश्या का व्याख्यान सुना ,जिससे उसको वैराग्य हो गया। वह बार बार यही विचार करने लगी कि मैं कैसी पापिनी-अभागिनी हूँ जो जीवन भर इन रक्त, मांस, विष्ठा, मूत्र के पिण्ड पर पुरुषों को आलिंगन करने में ही लगी रही और कभी अन्तरात्मा में रहने वाले भगवान का ध्यान भी नहीं किया। इस प्रकार रोती और पश्चाताप करती वह घर में ही पड़ी रही। वह एकनाथजी का स्मरण करने लगी और विचार करने लगी कि क्या वे मुझ जैसी पापिनी को अपनी चरण रज प्रदान करेंगे? एक दिन जब वह इस प्रकार विचार कर रही थी तो उसने उसी समय एकनाथजी को गोदावरी में स्नान करके अपने घर के पास से जाते हुए देखा। वह दौड़ती हुई आई और कहने लगी-महाराज क्या आप इस पापिनी के घर को अपना चरण रज से पवित्र कर सकते है? एकनाथजी ने सहज भाव से कहा-इसमें कौन सी कठिनाई है! “ वे घर के भीतर गये और उनके पहुँचते ही वहाँ का पाप पूर्ण वातावरण नष्ट होकर सात्त्विकी भाव का अनुभव होने लगा। वेश्या ने उनसे राम कृष्णा हरि का मन्त्र ग्रहण किया ओर फिर जीवन के अन्त तक भगवान के ध्यान और पुण्य कार्यों में ही समय लगाती रही।
इस प्रकार एकनाथ जी ने अपने उदाहरण द्वारा अपने समकालीन लोगों को सच्चे ब्राह्मणत्व का आदर्श दिखलाया कि केवल ब्राह्मण शुद्धता और पूजा पाठ से ही मनुष्य ब्राह्मण नहीं बन सकता ,वरन उसका असली कर्तव्य तो नीची दशा में पड़े हुये प्राणियों को ऊँचा उठाकर पुण्य-मार्ग पर चलने की प्रेरणा करना है। जो व्यक्ति समझता है कि नीच या पतित लोगों के साथ संसर्ग में आने से हम भ्रष्ट हो जायेंगे अथवा हमको पाप लगेगा, वे शुद्धता और ज्ञान का ढोंग ही करते है। जो निष्काम भाव से किसी जीव के उद्धार के लिये किसी अवसर पर अशुद्ध अथवा पापयुक्त वातावरण में भी जाता है ,तो उसका उससे कुछ बिगाड़ नहीं हो सकता। किसी गिरते पड़ते को बचाने में थोड़ी देर के लिये हमारे हाथ गन्दे भी हो जाये तो उससे हमारी आत्मा दूषित नहीं हो सकती। एकनाथ महाराज ने आजीवन इसी प्रकार के सत्य-धर्म के पालन का उपदेश देकर अन्त में यह कहते हुये संसार से विदा ली कि-भगवद् भक्तों मेरे चले जाने के बाद तुम भागवत् धर्म का प्रचार जारी रखना और लोगों के विरोध ,निन्दा आदि की परवाह न करके इस पवित्र कार्य के लिये प्राण देने को भी तैयार रहना।”
वह मित्र नहीं कि जिसके क्रोध से भय हो, और जिसके व्यवहार में सन्देह हो। किन्तु जिस मित्र पर पिता का सदद विश्वास हो उसे ही सच्चा मित्र जानों। अन्य तो केवल मिलने-जुलने ड़ड़ड़ड़ साध्य मित्र है।”
जो कोई अकारण (निःस्वार्थ भाव से) मित्रता का व्यवहार करे वही बन्धु, मित्र, अवलम्बन, आश्रय रूप है। अकारण मित्रता करने वाले मित्र नहीं होते।”
“चंचल वृति वाले, वृद्धों में न उठने बैठने वाले, डाँवाडोल मन वाले पुरुषों की मित्रता सर्वथा अनिश्चित है । “
“धन हो अथवा न हो मित्रों का उचित सत्कार करना ही चाहिये। इसके बिना मित्रों की मित्रता का पता नहीं लग सकता।”
-विदुर नीति
संसार में जो कुछ आश्चर्यजनक दीख रहा है वह सब मनुष्य के परिश्रम का फल है। आदिम युग में सब कुछ ऊबड़-खाबड़ था। इसे सुव्यवस्थित मनुष्य के परिश्रम ने ही किया है। पर्वतों को काट-काटकर रास्ते बनाये गये है। नदियों का मुँह छोड़कर सिंचाई के साधन जुटाये गये है। जमीन की छाती चीर कर अन्त और धातुओं का भण्डार उपलब्ध किया गया है। समुद्र के गर्भ में से मोती ढूँढ़ें गये है। आकाश में उड़ने,हवा की गति से दौड़ने के और पानी पर उतरने के यंत्र बना कर जल थल तक पर आवागमन सुलभ किया गया है। विज्ञान के इतने आश्चर्यजनक आविष्कार हुए है । कटीली झाड़ियों को काटकर शहर बनाये गये है और इस भद्दी और कुरूप दुनियाँ को एक रंगीन चित्र जैसा सुन्दर सुसज्जित बनाया गया। यह सब मनुष्य के परिश्रम का ही फल है। दूसरे प्राणियों की तुलना में उसने जो प्रचुर सुख साधन एकत्रित किये है वह कहीं आकाश से नहीं टपकते है। सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक निरन्तर घोर परिश्रम और अध्यवसाय के सहारे ही इन सब सुविधाओं को उपलब्ध कर सकना संभव हुआ है ।
संसार में ऐसे अगणित मनुष्य हुए है जो आरम्भ में साधारण अथवा गिरी हुई स्थिति में थे। बुद्धि बल, धनबल, उनके पास न थे। परिस्थितियाँ भी ऐसी थी जिनमें साधारण स्थिति के व्यक्ति के लिए आगे बढ़ सकना संभव न होता पर उन मनस्वी व्यक्तियों ने इसकी परवा न की और जिस परिस्थिति में भी वे थे उसी में से धीरे-धीरे आगे बढ़ने के लिए कटिबद्ध हो गये ओर अन्त में वे उस मंजिल तक चढ़ सके जिसकी तुलना यदि उनकी पूर्व स्थिति से की जाय तो आश्रय जैसी बात ही प्रतीत होती है। कई लोग इसे भाग्य भी कह सकते है पर भाग्य और कुछ नहीं मनुष्य के प्रबल पुरुषार्थ और आत्म-निर्माण का ही दूसरा नाम है।
कालीदास युवावस्था तक निरन्तर ही नहीं मूर्ख स्वभाव के भी थे। एक परम विदुषी महिला विद्योत्तमा जब धाँखे उनके साथ विवाह करा दिया गया। जब विद्योत्तमा पितृगृह आई तब उसे पता चला कि उसके साथ धोखा किया गया है। जो होना था सो हो चुका था। उसने धैर्य से काम लिया और अपने निरन्तर पति को विधा पढ़ाना तथा स्वभाव को सुधारना आरम्भ कर दिया। काम कठिन था तो भी उसने निरन्तर प्रयत्नशील रहकर उसे पूरा ही किया और कालीदास संस्कृत भाषा के विद्वान् एवं कवि के रूप में प्रख्यात हुए।
महात्मा गाँधी ने अपने बचपन के संस्मरणों में लिखा है-पाठशाला में बिठाया गया। मुश्किल से पहाड़े सीखे। बाकी समय लड़कों के साथ गुरुजी को गाली देना सीखने के अलावा और कुछ सीखा हो यह याद नहीं आता । इससे यह अनुमान करता हूँ कि मेरी बुद्धि मन्द और स्मरण शक्ति ड़ड़ड़ड़ रही होगी।”
मैं बहुत संकोची लड़का था, मदरसे में अपने काम से काम रखता। घंटी बजते-बजते पहुँच जाता और स्कूल बन्द होते ही घर भाग आता। क्योंकि मुझे किसी के साथ बातें करना नहीं रुचता था। मुझे यह भी डर बना रहता था कि कही कोई मेरा मजाक न उड़ायेंगे ।
यदि एक कमजोर ओर दब्बू स्वभाव का लड़का आगे चलकर अपने व्यवसाय के बल पर महात्मा गाँधी-संसार का महान् व्यक्ति बन सकता है तो दूसरे उनका अनुकरण कर वैसा क्यों नहीं कर सकते?
संसार के महान् वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन ने एक बालक के पत्र के उत्तर में महान् बनने का मंत्र बताते हुए लिखा-हिम्मत न हारो पीठ पर काठ का उल्लू लिख दिया करते थे। प्रश्नों का सही उत्तर न दे सकने के कारण स्कूल में प्रायः रोज ही मुझे सजा मिलती थी। अध्यापक कहा करते थे कि मैं सात जन्म में भी गणित में पास न हो सकूँगा । इतने पर भी मैंने हिम्मत न हारी। लगातार असफलताओं का मुकाबला करते हुए मैं विद्याध्ययन में लगा रहा और उसी का फल है जैसा कि तुम मुझे देखते हो। मैंने हिम्मत नहीं हारी और अपना रास्ता बनाया ।तुम भी यदि महान् बनाना चाहते हो तो हिम्मत न हारो’।
सेनापति वेलिगटन जिसने 46 वर्ष की आयु में आश्चर्यजनक विजय प्राप्त की, बचपन में ड़ड़ड़ड़ माना जाता था। इंटर स्कूल में जब वह पढ़ता था तो उसकी गणना आलसी और नासमझ लड़कों में होती थी। सरवाल्टर स्काट को उसके अध्यापकों ने मूढ’ की उपाधि दे रखी थी। गोल्ड स्मिथ का बचपन ऐसा अव्यवस्थित था कि उसे साथी लोग लकड़ी का चमचा कह कर चिढ़ाते थे।
विश्व विख्यात लेखक एचजीवेल्स जीवन के आरम्भिक दिनों में एक बहुत छोटा कर्की करते थे। परिवार का खर्च चलाने के लिए उन्हें कुल मिलाकर चौदह घंटे मजदूरी करनी पड़ती थी। काम के इतने दबाव से उनकी नस-नस टूटने लगी। एक दिन वह नौकरी छोड़कर भाग निकला और अपनी माता के अंचल में मुँह छुपाकर बच्चों की तरह रोने लगा। इतना परिश्रम करने से तो आत्महत्या कर लेना भला है।
माता ने उसे सांत्वना दी और कहा-हिम्मत हारने की कोई बात नहीं जो परिस्थिति आज है वह सदा न बनी रहेगी। युवक ने निराशा को छोड़ आशा को अपनाया और नया काम तलाश करने लगा। यही लड़का आगे चलकर 77 महान् ग्रन्थों का लेखक हुआ और प्रचुर धन तथा यश कमाया। आज एच जी वेल्स के नाम संसार के सभी सुशिक्षित लोग भली प्रकार परिचित है।
एक शराबी मोची का छोटा बालक पढ़ने के लिए आग्रह कर रहा था। बाप कह रहा था पेट भरने को तो है ही नहीं शिक्षा का खर्च कहाँ से आयेगा? लड़के ने कहा -पिताजी इसकी चिन्ता आप न करे। मैंने सुना है कि जंगलों में एक गोंद होता है। जंगली लोग उसे खाकर बहुत दिनों भूखे रह जाते है। मैं उसे ढूँढ़कर लाऊँगा और बिना खाये रहा करूँगा। आप मुझे पढ़ने की इजाजत भर दें। बाप ने झुँझलाते इजाजत दे दी। लड़का पढ़ने लगा। गोंद तो वह नहीं ला सका पर बाज़ार में फेरी लगाकर वह कुछ चीजें बेचता और उसी से अपना खर्च चलाता है अन्त में वह बालक कैलीफोर्निया का विख्यात दार्शनिक और प्रभावशाली नेता बना। नाम था उसका-एचिनेवेल्डे
एक नहीं अगणित ऐसे उदाहरण संसार में सर्वत्र उपलब्ध हो सकते है जिनसे स्पष्ट है कि मनुष्य परिस्थितियों का गुलाम नहीं अपने भाग्य का निर्माता और विधाता है। जिसने अपनी महत्ता और शक्ति को समझ कर ऊँचे उठने का प्रयत्न किया, कठिनाइयाँ उसके मार्ग को रोक न सकी। पर जो हतप्रभ एवं किंकर्तव्य विमूढ होकर बैठा रहा वह नीचे ही गिरता गया दूसरों का सहयोग भी उसे आगे न बढ़ा सका।
समय का मूल्य संसार की प्रत्येक कीमती चीज से अधिक है। हर खोई हुई चीज मिल सकती है पर समय गवाँ देने के बाद उसका लौटना किसी भी प्रकार संभव नहीं। जो अवसर चूक गया उसके लिए पछताने और हाथ मलने के लिए सिवाय और कुछ शेष नहीं रहता है वे न तो आलस के गुलाम बनते है और न प्रसाद में अपना समय गुजारते है।
आज का काम आज,अब का काम अब करने की आदत ही किसी मनुष्य को उसके ईश्वर प्रदत्त सुख सौभाग्य से लाभान्वित कर सकती है। आलसी और लापरवाह लोग एक प्रकार के भाग्यहीन ही है जो ईश्वर के द्वारा प्रतिक्षण बरसने वाली कृपा को समेटने में हिचकिचाते रहते है। आलस का अर्थ है अपने भाग्य का तिरस्कार करना। लापरवाही का अर्थ है ईश्वर प्रदत्त स्वर्ण सुयोग्यों को ठुकराना। समय को टालने की आदत एक अभिशाप ही है जिसका परिणाम अन्ततः बहुत ही दुःखद होता है।
कर्नल राहल ताश खेल रहा था। सन्देश वाहम ने वाशिंगटन की सेना रवाना होने का पत्र लाकर दिया पर वह खेल में इतना तल्लीन था कि पत्र को बिना पढ़े ही जेब में रख लिया और ताश खेलता रहा। खेल समाप्त होने पर पत्र पढ़ा और लड़ाई की तैयारी की। कीमती वक्त गुजर चुका था। दुश्मन की सेना पास आ गई। वे कैद कर लिये गये और मौत के घाट उतार दिये गये। कुछ मिनटों का ही अवसर जान ही नहीं देश की स्वाधीनता और शान भी गँवानी पड़ी।
पुराने समय में हलकारे ही डाक ले जाते थे। उन दिनों रेल तार तो थे नहीं। डाक की सारी व्यवस्था इन हलकारों पर ही निर्भर रहती थी। उन्हें ठीक समय पर चलने और नियत समय पर पहुँचने का कड़ा आदेश रहता था। इसमें चूक करने पर उन्हें कठोर दंड यहाँ तक कि प्राण दण्ड तक मिलता था। डाक में कोई ऐसे पत्र हो सकते थे। जिनका थोड़े भी विलम्ब से पहुँचना किसी के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हो, इसलिए हलकारे को समय की पाबन्दी की शिक्षा बड़ी कड़ाई के साथ पालन करनी पड़ती थी।
नेपोलियन ने समय का सदा ध्यान रखा। उसकी विजय में समय का समुचित ध्यान रखना एक महत्त्वपूर्ण कारण था। इसमें जब-जब चूक हुई तब उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। ड़ड़ड़ड़ समय पर नहीं पहुँचा। नेपोलियन को उसकी प्रतीक्षा में ठहरना पड़ा। बस इतनी सी चूक में नेपोलियन कैद कर लिया गया और उसे अपनी मौत के दिन सेन्ट हैलेना के बंदीगृह में पूरे करने पड़े।
एक देर से सो कर उठने वाला व्यक्ति अपनी विद्या-बुद्धि की बहुत शेखी मार रहा था। और अपनी चतुरता का वर्णन करते हुए उपस्थित मित्र के मुँह से अपनी प्रशंसा सुनना चाहता था। पर मित्र ने कहा-दोस्त मैं तुम से चार घंटे आगे हूँ। तुम आठ बजे सौ कर उठते हो जब कि मैं चार बजे ही उठकर अपने आवश्यक कामों में लग जाता हूँ। तुम बहुत चतुर होने पर भी जितना काम नहीं कर पाते उससे अधिक मैं समय का सदुपयोग करके पूरा कर लेता हूँ, यद्यपि मैं विधा बुद्धि में तुम्हारे समान होने का दावा नहीं करता।
पीटर दी ग्रेट रूस का सम्राट प्रातःकाल बहुत जल्दी सो कर उठता था और अपने कार्यों में लग जाता था। वह कहा करता था कि मैं अधिक जीवन चाहता हूँ। जीवन को लम्बा बनाना चाहता हूँ इसलिए जल्दी उठता हूँ।
इंग्लैण्ड के उपन्यास सम्राट सरवाल्टर स्काट बड़े तड़के उठते थे और सवेरे का वक्त होने तक उस दिन का प्रायः सारा काम निपटा लेते है।
राष्ट्रपति वाशिंगटन के भोजन का समय संध्याकाल चार बजे था। एकबार उन्होंने भोज दिया और मित्रों को बुलाया। मित्र देर से आये तो वाशिंगटन ने ठीक समय पर भोजन करना आरम्भ कर दिया। मित्र जब पीछे आये तो उनने नम्रता पूर्वक कहा- महाशय मेरा रसोइया नियत समय पर ही भोजन करने को बाध्य करता है वह मेहमानों की प्रतीक्षा में समय नहीं गँवाता।। एकबार उनका सेक्रेटरी देर से पहुँचा। पूछने पर उसने घड़ी का सुस्त होना कारण बताया। वाशिंगटन ने कहा- या तो घड़ी बदलिये या मुझे सेक्रेटरी बदलना पड़ेगा।
लार्डमिन्टो को एक सभा में एड्रेस (मान पत्र) दिया जाना था। सभा का समय एक घंटा रखा गया था। उसी समय में लार्डमिन्टो का भाषण भी होने वाला था। पूर्व वक्ताओं ने उनकी प्रशंसा के पुल बाँधते हुए बहुत सा समय ले लिया। एक घंटा में कुछ ही मिनट शेष था । तब लार्डमिन्टो को भाषण के लिए कहा गया। वे खड़े हुए ओर अपने लिखित भाषण को जेब में रखते हुए कहा-सज्जनों एक घंटा पूरा हो गया। मुझे एड्रेस देने के लिए बुलाया गया था। सो मैं उस काम को पूरा करते हुए विदा होता हूँ। मेरा एड्रेस (पता 49 हार्नव स्ट्रीट है।
अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में एकबार संगीत आयोजन हुआ। उसमें तत्कालीन वायसराय लार्ड कर्जन आमंत्रित किये गये थे। सम्मेलन बीस मिनट का रखा गया था। कर्जन ठीक समय पर आ गये और सम्मेलन आरंभ हुआ। पर संगीत कारों ने वह बीस मिनट अपने बाजों की खूटिया ऐंठने और स्वर मिलाने में ही लगा दिये। समय पूरा हो गया। बायसराय महोदय ने समझा भारतीय संगीत इसी प्रकार खटी ऐंठने को ही कहते होंगे। वे बीस मिनट पूरे होते ही उठ खड़ी हुए और भारतीय संगीत की प्रशंसा में जो शब्द लिखकर लाये थे उन्हें कहकर चले गये।
बुद्धिमानी लोग यह जानते हैं कि जीवन का कितना महत्व और समय का कितना महत्व और समय का कितना मूल्य है। जिस प्रकार समझदार व्यक्ति अपने पैसे को सुरक्षा, मितव्ययिता, सदुपयोग और समाज सम्भाल का समुचित ध्यान रखता है उसी प्रकार जीवन को प्यार करने वाला व्यक्ति भी अपनी आयुष्य का एक एक क्षण सम्भाल कर व्यय करता है।
लापरवाही एक प्रकार का अपराध है। यह एक प्रकार की आत्म हत्या ही है। अपने आपको अपने धन या शरीर को आलस के तेजाब में गला देना लगभग वैसा ही है जैसा कोई मन्द विष खाकर अपनी अंतड़ियों को गला देना। दूसरों के प्रति धोखा, आक्रमण, हिंसा, दुर्व्यवहार, द्वेष आदि अनेक प्रकार के अपराध लोग करते हैं। अपने आपके प्रति वैसा ही अपराध लापरवाही और आलस है। इससे अपना जीवन नष्ट होता है, भविष्य की सभी उज्ज्वल संभावनाएँ समाप्त होती हैं ओर वह दिन तेजी से निकट खिंचता चला आता है जिसे दुर्भाग्य और पतन का दिन कहकर पश्चाताप किया जाता है।
थामस एल्वा एडीसन उस वैज्ञानिक का नाम है जिसने वैज्ञानिक जगत में क्रान्ति उपस्थित कर दी। उनके लिये हुए अनेकों आविष्कारों से आज सारा संसार लाभ उठा रहा है। आजकल सड़कों पर मोटर दौड़ती दिखाई पड़ती हैं उनकी प्रारम्भिक उपज एडीसन ने ही की थी। बैटरी का उपयोग करने से इस स्वसंचालित वाहन के द्वारा मनुष्य को सुख सुविधा पहुँचाने के लिए उनने जो तोड़ प्रयत्न किया जिसका लाभ आज संसार भर में सर्वत्र उठाया जा रहा है। यह बिलकुल नई चीज उनके मस्तिष्क से निकली। इससे पहले कोई इसकी कल्पना भी न करता था। चलती फिरती तस्वीरें दिखाने वाला सिनेमा जो पीछे बोलने भी लगा- एडीसन के दिमाग की ही उपज है। सिनेमा के आविष्कार की बात सूझने से पहले वे फोटोग्राफी बिलकुल भी न जानते थे।। उसने उसके रहस्यों और सिद्धान्तों को सीखा और आखिर सिनेमा यंत्र बनाकर ही चैन लिया। टेलीफोन को पेटेण्ट कराने का श्रेय दो घंटे पूर्व अर्जी दे देने के कारण अलेक्जेन्डर ग्राहम बेल को मिला। भले ही एडीसन की अजी दो घंटे पीछे पहुँची पर इस दिशा में अत्यधिक श्रम और अनुसंधान उन्हीं का था। टेलीग्राफ के एक ही तार पर एक ही समय में विपरीत दिशाओं में चार टेलीग्राम एक साथ भेजे सकने का विचित्र लगने वाला आविष्कार भी उन्हीं का है। इसके अतिरिक्त भी उनने और कई महत्त्वपूर्ण आविष्कार किये और संसार के प्रमुख वैज्ञानिकों में अपना स्थान बनाया।
इतना बड़ा कार्य कर सकने वाला एडीसन किसी धनी मानी का बेटा न था और न आगे बढ़ने लायक कोई सहायता ही उसे कहीं से प्राप्त हुई वरन् इसके विपरीत दुर्भाग्य ही सदा उसका पीछा करता रहा और वह उसकी चोटों को सहते सहते हँसता हँसता आगे बढ़ा और चौरासी वर्ष की आयु तक एक कर्मठ सैनिक की तरह अथक परिश्रम करता रहा।
एडीसन में जन्म जात कोई प्रतिभा न थी, उस ने प्रतिभा को अपने परिश्रम और अध्यवसाय से पैदा किया था। उसने अपने जीवन वृतान्त में लिखा है-मैं अपने स्कूल का फिसड्डी लड़का था, सबके नीचे मेरा ही नम्बर रहता। अध्यापक मुझसे कुढ़ते थे, पिता ने मूर्ख घोषित कर रखा था। एक दिन मेरे अध्यापक ने इंस्पेक्टर को कहा ऐसे ‘खर दिमाग’ लड़के से स्कूल की जगह घेरना बेकार है। इसे निकाल देना ही उचित है। मैं अपने दुर्भाग्य पर रो पड़ा। घर आकर माता के अंचल में मुँह छिपा कर रोने लगा। इस संसार में केवल एक ही प्राणी ऐसा था जिसकी मुझ से सहानुभूति थी, वह थी मेरी माँ। उसने मुझे दिलासा दिया और पढ़ने का दूसरा प्रबन्ध कर दिया। किन्तु थोड़े ही दिनों में माता भी चल बसी। नौ से बारह वर्ष की आयु तक केवल तीन वर्ष स्कूल का मुँह देखा इसके बाद पढ़ाई समाप्त।”
इन परिस्थितियों में दूसरा कोई लड़का होता तो कुली मजूरी करके दिन गुजारता और उन्नति कर सकने की बात सोचता भी नहीं। पर एडीसन ऐसी कच्ची मिट्टी का बना हुआ न था, उसने आत्म विश्वास नहीं खाया और न पुरुषार्थ के महत्व को कम माना। लोग हँसी उड़ाते, मूर्ख कहें इससे क्या? अपना प्रयत्नइ न सबसे ऊपर है, जो लोग आज हँसी उड़ाते हैं कल प्रशंसा भी कर सकते हैं, उनकी बातों को ममत्व देना बेकार है। एडीसन के सोचने का तरीका यही था। उसने हिम्मत नहीं हारी। स्कूल छूट गया तो क्या, उसने अपनी शिक्षा स्वयं जारी रखी। जहाँ तहाँ से पुस्तकें प्राप्त करके स्वयं पढ़ना और अपनी ज्ञानवृद्धि करता।
पर साथ ही पेट की समस्या भी थी। उसने अख़बार बेचने का काम शुरू किया। आवाज लगा कर गलियों में अख़बार बेचता और अपना गुजारा चलाता। खिलौने, मीठी गोलियाँ, मूँगफली बेचने का काम भी उसने बहुत दिनों किया। बेचारा फटे टूटे कपड़े पहने रहता। बालों में कंघी और जूतों पर पालिश करने का सौभाग्य उसे सारे बचपन में मिला ही नहीं।
इन्हीं परिस्थितियों में उसने ज्ञान वृद्धि जारी रखी। जो कुछ कमाता उसमें से मितव्ययिता पूर्वक काम चलाना और थोड़ा बचा कर रखता। एक दिन उसने किसी छापाखाने का रही टाइप और छापने की छोटी सी एक टूटी मशीन खरीद ली। उसे ही जोड़ तोड़ कर एक पन्ने का अख़बार निकालने लगा। स्वयं ही उसे बेचने जाता। आठ आने मासिक के दो सौ ग्राहक स्थायी बन गये और रेल पर आकर दो सौ कापी वह फुटकर भी बेच लेता ।इस प्रकार उसका काम चलने लेगा। जो बचता वह बूढ़े बाप को गुजारे के लिए दे देता।
इन्हीं दिनों उसे वैज्ञानिक अन्वेषण का शौक लगा। उसने विज्ञान की सैकड़ों पुस्तकें पढ़ीं और जहाँ-तहाँ जाकर प्रयोगशालाएँ देखी। घर पर उसने एक बेकार रहने वाले गाड़ी के डिब्बे में प्रयोगशाला बनाई।। दुर्भाग्य से एक दिन प्रयोग की कुछ शीशियाँ फैल गई और उस लकड़ी की कोठरी में आग लग गई। आग तो बुझ गई पर मालिक उस पर बहुत नाराज हुआ ।।कान पर कसकर मुक्का मारा और सब सामान निकाल कर सड़क पर फेंक दिया। मुक्का ऐसे जोर से लगा कि एडीसन का एक कान सदा के लिए बहरा हो गया।
दुर्भाग्य ने कस-कसकर उनकी दृढ़ता को परखा पर वे हर बार खरे उतरे। अख़बार में किसी व्यक्ति की निंदा छपी तो वह बहुत रुष्ट हुआ। एक दिन वह रास्ते में मिल गया तो उसने एडीसन को पकड़ कर सेन्टक्लेयर नदी में फेंक दिया। बेचारे मरते मरते बचे। घर के बाहर टेलीग्राफ की शोध के लिए कुछ तार लगा रखे थे। एक दिन पड़ोस की गाय उनमें उलझ गई। इस पर उन्हें कड़ी फटकार सहनी पड़ी और तार उखाड़ कर समेट लेने पड़े।
इन विषम परिस्थितियों से लड़ते हुए वे अपने ज्ञान और प्रयत्न में निरन्तर वृद्धि करने में संलग्न थे साथ ही मानवता की सेवा का कभी कोई अवसर सामने आता तो उसे भी हाथ से जाने न देते। किसी का एक छोटा बच्चा दौड़ती हुई रेल के आगे आ गया। एडीसन से बड़े सपाटे से उसे उठाया फिर भी उनको पैर की एड़ी पहियों के नीचे आ गई। चोट तो अधिक नहीं लगी, बच्चा तथा वे दोनों ही बच गये। बालक के पिता को जब पता लगा तो वह उनके इस त्याग के लिए बहुत कृतज्ञ हुआ। अधिक परिचय बढ़ने पर उसने उन्हें स्टेशन पर टेलीग्राफ आपरेटर का काम सीखने की व्यवस्था करा दी। उसमें वे सफल हुए और नौकरी लग गई। प्रयोग उनके वहाँ भी जारी रहते। एक दिन वे नौकरी के स्थान पर ही प्रयोग कर रहे थे कि तेजाब का बर्तन उलट गया। वह बहता हुआ मैनेजर के कमरे तक चला गया और मैनेजर की मेज़ तथा दरी जला दीं। इस पर उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। उन्हें फिर पेट के लाले पड़ गये। प्रयोग जारी थे। बारह सौ रुपया कर्ज चढ़ गया। आमदनी कुछ भी नहीं, तीन सप्ताह आधे पेट कुछ खाकर उन्हें दिन काटने पड़े।
इतने पर भी वह निराश न था। जैसे भी हो प्रयत्न जारी रखने की अपनी लगन पर वह अड़ा रहा। गुजारे के लिए एक नौकरी भी मिल गई और उसके प्रयत्न अधिक तेजी से चलने लगे। वेतन के पैसों में से बहुत थोड़े में गुजारा करते और शेष को अन्वेषण कार्य तथा पुस्तकों में खर्च करते। उन्हें अपने प्रयोगों में सफलता मिलती गई। मिलती भी क्यों नहीं- उनने अपने को अपने कार्य में तन्मय जो कर दिया था। दिन रात वे काम करते रहते।
काम की इतनी लगन थी कि जन्म दिन के उत्सव पर भी वे काम छोड़ने में अनमने होकर ही भोजन करने उठते। अपने नियमित और संयमित जीवन क्रम के आधार पर उन्होंने लम्बी आयु पाई। चौरासी साल तक वे जिये और अन्त समय तक काम करते रहे।
एडीसन की वैज्ञानिक सफलताओं का इतना मूल्य नहीं है जितना कि उनके आत्म विश्वास का। ऐसी सफलताएँ तो और लोग भी प्राप्त कर लेते है। पर जितनी निराशा जनक परिस्थितियों से उसने लोहा लिया और कभी हारने की बात सोची भी नहीं, वह विशेषता ही उनकी महानता है। जिन व्यक्तियों का मानसिक स्तर इतना मजबूत हो उनके लिए अभीष्ट सफलताओं का मिलना कुछ विशेष कठिन नहीं होता।
साहसी स्कंदगुप्त
मगध के राजा कुमारगुप्त का पुत्र स्कंदगुप्त जब किशोर ही था तब उसने मालूम किया कि हूणा लोग बराबर भारत पर हमला करते हैं और युद्ध नियमों के विपरीत धूर्ततापूर्ण छल बल से भारी हानि पहुँचाते हैं। स्कंदगुप्त से अपने देश का यह अपमान न देखा गया, उसने पिता से आग्रह किया कि घृणों के देश में जाकर उन्हें दंड देने के लिए उसे आज्ञा दी जाय। पिता बड़े असमंजस में थे क्योंकि एक तो स्कंदगुप्त अभी किशोर ही था, शरीर बल और युद्ध कौशल की दृष्टि से उसे अभी कच्चा ही कहा जा सकता था। दूसरे हुणों का देश बहुत दूर था। हिमाच्छादित पहाड़ों की चोटियाँ पार करके वहाँ जाना होता था। ऐसे दुर्गम मार्ग को पार करना सेना के लिए भी कठिन था। फिर हुण युद्ध में छल-बल से ही प्रधान रूप से काम लेते थे। ऐसी स्थिति में उसे आक्रमण की आज्ञा कैसी दी जाय यह समस्या कुमारगुप्त के आगे थी।
पुत्र की देशभक्ति एवं उच्च आदर्श के प्रति अनन्य निष्ठा को देखकर कुमारगुप्त को झुकना पड़ा। चढ़ाई की आज्ञा मिल गई। स्कंदगुप्त मगध से दो लाख सैनिक लेकर चल पड़ा। पंजाब से आगे बढ़कर हिमाच्छादित चोटियों को पार करती हुई सेना हूण प्रदेश में पहुँची और इस वीरता के साथ लड़ी कि शत्रुओं के छक्के छूट गये। उन्हें परास्त ही होना पड़ा। आज के ईरान और अफगानिस्तान तक उसने अपना राज्य कायम किया। इस विजय को करते हुए जब स्कंद गुप्त भारत लौटे तो उनके स्वागत में मगध से पाँच कोश तक मार्ग सजाए गये और पूरे देश में विजयोत्सव मनाया गया।
पराक्रम के लिए आयु एवं शरीर बल का नहीं मनोबल और साहस का महत्व है।
बारह वर्षीय वीर बादल
दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ के राणा भीमसिंह की रानी पहानी को अपहरण की योजना बनाई। दर्पण में मुख देखकर लौट जाने की शर्त पूरी होने पर भी जब वह न माना और राणा को कैद कर लिया तो युद्ध की विस्तृत योजना बनाने के लिए राणा को छुड़ाना आवश्यक था। इसके लिए एक चाल चली गई। बादशाह को कहला भेजा कि पहानी का डोला आ रहा है। राणा छोड़ दिये गये। पहिनी की तथाकथित पालकी में एक लड़का बैठा था- बादल। बादल भी जान की बाजी लगा कर ही पालकी में बैठा था। वहाँ पहुँचने पर उसने पालकी में से निकल कर तलवार संभाली। एक दूसरे लड़के गोरा के नेतृत्व में पालकियों कहार बने हुए राजपूत भी निकल पड़े और युद्ध करते हुए वीर गति को प्राप्त हुए। बारह वर्षीय बादल ने तो और भी कौशल दिखाया। वह लड़ता मरता किले में आवश्यक सूचनाओं को पहुँचाने में भी सफल हुआ और अन्त में अपने भी प्राण विभाजित करके धन्य बना।
आततायी को सलाम नहीं
शिवाजी के पिता शाहजी बीजापुर नवाब के दरबार में कर्मचारी थे। वे आठ वर्ष के शिवाजी को दरबार में ले गये और कहा- बेटा बादशाह को सलाम करो। शिवाजी ने दो टूक मना कर दिया कि मैं मुसलमान के आगे सिर नहीं झुका सकता। नवाब की त्यौरी बदल गई पर शिवाजी विचलित न हुए, वे उलटे पैर लौट आये पर झुके नहीं।
अतिथि तथा ग्रन्थों की रक्षा के लिए
दो हजार वर्ष पूर्व चीन का एक विद्वान् ‘हुए न साँग’ भारतीय दर्शन शास्त्र पढ़ने नालिन्दा विश्व विद्यालय में आया। कितने ही वर्ष पढ़ने के बाद वह चीन लौटने को तैयार हुआ। उसने यहाँ के कितने ही धर्म ग्रन्थ भी साथ लिये। उसे सिंधु नदी के मुहाने तक पहुँचाने के लिए कुछ छात्र साथ गये। रास्ते में तूफान आया और नाव में पानी भरने लगा। अब क्या किया जाय? धर्म ग्रन्थों को और चीनी यात्री को सकुशल पार करने का एक ही उपाय था कि कुछ छात्र पानी में कूदें। नाव हल्की हो तब वह पार लगे। भारतीय विद्यार्थी खुशी खुशी नदी में कूद पड़े। उनने अपनी जान दे दी और अतिथि आगन्तुक की तथा ग्रन्थों की रक्षा करके अपनी महानता का परिचय दिया।
साहसी पटेल
एक ग्रामीण बालक को एक बड़ा फोड़ा निकला। उन दिनों देहातों में डाक्टरी इलाज का चलन न हुआ था। मामूली जानकार लोग ही इलाज कर लेते थे। फोड़ों का इलाज उसे लोहे की गर्म सलाख से दाग कर किया जाता था। बालक के इस फोड़े का इलाज भी देहाती वैद्य ने लोहे की सलाखों से जलाना ही बताया।
सलाखें आग से लाल हो गई पर दागते वक्त देहाती वैद्य रुक गया कि बालक बहुत छोटा है। डरने से कुछ बुरी बात न हो जाय। वैद्य असम जस में ही था कि बालक ने वैद्य को कहा लोहा ठंडा हुआ जा रहा है-आपको डर लगता हो तो मुझे आज्ञा दो मैं अपने आप अपना फोड़ा जला लूँगा। देखने वाले दंग रह गये। बालक का फोड़ा कई जगह से जलाया गया पर उसके चेहरे पर शिकन तक न आई। यह बालक आगे चल कर देश का प्रमुख नेता हुआ, काँग्रेस का प्रधान और भारत का गृहमंत्री भी। इसका नाम था-सरदार वल्लभ भाई पटेल।
मैं झूठा नहीं हूँ
एक बार गाँधी जी स्कूल देर में पहुँचे। बादल छाये रहने और वर्षा होने के कारण उन्हें समय का ठीक पता न चला। स्कूल में अध्यापक ने उनसे देर में आने का कारण पूछा- तो उन्होंने सच बात बतायी। पर इससे अध्यापक को संतोष न हुआ। इसे उसने बहाना समझा और एक आना जुर्माना कर दिया।
गाँधी जी रोने लगे। साथियों ने कहा- एक आना के लिए क्यों रोते हो। आपके पिता तो अमीर हैं, एक आना कौन बड़ी बात है। गाँधीजी ने कहा- मैं एक आना के लिए नहीं वरन् इसलिए रोता हूँ कि मुझे झूठा समझा गया।
दयालुता और सहृदयता
एक लड़का दौड़ता हुआ डाक्टर के पास पहुँचा और उनसे अत्यधिक आग्रह करके एक रोगी को दिखाने ले गया। डाक्टर ने देखा- सड़क पर एक कुत्ता घायल पड़ा है उसी के इलाज के लिए उसे लाया गया है। इस पर डाक्टर बहुत झल्लाया।।। पर लड़का भी अपनी आन का पूरा था। उसने कहा-मनुष्य के समान ही कुत्ते को भी कष्ट होता है। हम मनुष्यों का ही दुःख दूर करें और दूसरे प्राणियों का नहीं क्या यह उचित है। डाक्टर झेंपा उसने कुत्ते को दवा लगाई। कुछ दिन में वह कुत्ता अच्छा भी हो गया। इस सहृदय बालक का नाम था- महामना मदनमोहन मालवीय।
बिना सुँघाये आपरेशन
कम्पाउण्डर क्लोरोफार्म सुँघाने लाया कि अंगूठे की खाल कड़ी है और वहाँ जो आपरेशन करना है वह भी बड़ा हैं तनिक से हिल जाने से नस कट सकती हैं और खतरा पैदा हो सकता है, इस लिए बेहोश करके आपरेशन करने की ही डाक्टर की राय है।
रोगी ने कहा इसकी कुछ भी जरूरत नहीं है। डाक्टर बिना डरे अपना काम करें, हिलने के कारण कोई खतरा होने की नौबत न आयेगी।
अन्त में आपरेशन बिना सुँघाये ही हुआ। रोगी शांत भाव से बैठा रहा। उसने उफ तक न की। डाक्टर चकित थे कि इतने बड़े आपरेशन में भी रोगी कैसे इतना धैर्य रख सका।
इस धैर्यवान् रोगी का नाम था-चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, जो आगे चलकर भारत के प्रथम गवर्नर जनरल बने।
गोखले की सच्चाई
गोपाल कृष्ण गोखले जब स्कूल में पढ़ते थे तब एक दिन एक लड़के की मदद से गणित का प्रश्नपत्र हल किया। उत्तर ठीक बन पड़े तो उन्हें अध्यापक ने इनाम दिया। बालक इनाम लेने में प्रसन्न होने की अपेक्षा रोने लगा। अध्यापक ने इसका कारण पूछा तो उसने सच बात यह दी कि प्रश्नपत्र मैंने दूसरों से पूछकर हल किया है। ऐसी दशा में मुझे सजा मिलनी चाहिए न कि इनाम।
अध्यापक उनकी सच्चाई से बहुत प्रभावित हुए। उसने बच्चे को बहुत प्यार किया और वह इनाम देते हुए कहा यह प्रश्नपत्र हल करने का नहीं तुम्हारी सच्चाई का इनाम है।
बर्तन माँजने वाला शिष्य
आश्रम में एक नया शिष्य आया। गुरु ने उसकी निष्ठा परखने के लिए उसे बर्तन माँजने का काम दे दिया। शिष्य खुशी-खुशी बर्तन माँजता और इसी प्रकार के झाडू लगाने आदि के अन्य मोटे काम करता। साथ ही कान लगा कर गुरु के उपदेशों को सुनता रहा। अपनी कर्तव्य परायणता के कारण वह गुरु का परमप्रिय शिष्य हो गया और वही अन्त में उनका उत्तराधिकारी हुआ। इस शिष्य का नाम था-सिक्ख सम्प्रदाय का महान् धर्मगुरु अर्जुन देव।
मंद बुद्धि लड़का
एक लड़का बहुत ही मन्द बुद्धि था। उसे पढ़ना-लिखना कुछ न आता था। बहुत दिन पाठशाला में रहते हुए भी उसे कुछ न आया तो लड़कों ने उसकी मूर्खता के अनुरूप उसे बरधराज अर्थात् बैलों का राजा कहना शुरू कर दिया। घर बाहर सब जगह उसका अपमान ही होता।
एक दिन वह लड़का बहुत दुखी होकर पाठशाला से चल दिया और इधर-उधर मारा-मारा फिरने लगा। वह एक कुँए के पास पहुँचा और देखा कि किनारे पर रखे हुये जगत के पत्थर पर रस्सी खिंचने की रगड़ से निशान बन गये है। लड़के को सूझा कि जब इतना कठोर पत्थर रस्सी की लगातार रगड़ से घिस सकता है तो क्या मेरी मोटी बुद्धि लगातार परिश्रम करने से न घिसेगी। वह फिर पाठशाला लौट आया और पूरी तत्परता और उत्साह के साथ पढ़ना आरम्भ कर दिया, उसे सफलता मिली। व्याकरण शास्त्र का वह उद्भट विद्वान् हुआ। लघु सिद्धान्त कौमुदी नामक ग्रन्थ की उसने रचना की। उसके नाम में थोड़ा सुधार किया गया-बरधराज की जगह फिर उसे वरदराज कहा जाने लगा।
माता के लिए प्राण देने वाला बालक
बच्चों के लिए प्राण देने वाली माताओं के अनेक उदाहरण इस संसार में मौजूद है। पर ऐसे उदाहरण भी हैं जिनमें बच्चों ने अपनी माता के लिए प्राण दिये है। उन्नीसवीं शताब्दी में भारत दर्पण में लाखों मनुष्यों को भूख से तड़प-तड़प कर प्राण देने पड़े थे। सन् 1880 की घटना है। उड़ीसा में भारी अकाल पड़ा। नीलगिरी में एक किसान परिवार के सभी लोग भूखे मर गये। केवल एक स्त्री और उसका दस वर्षीय लड़का सतीश बचा। उनकी दशा भी दयनीय हो गई। स्त्री बीमार पड़ गई। बच्चा भीख माँगने निकलता। कहीं जूठन था और कुछ मिल जाता उसी को लाकर अपनी माँ को खिलाता और तब खुद खाता। एक दिन लड़के की दशा भी बहुत शोचनीय थी वह उठा, कुछ खाने कहीं से प्राप्त किया और उसे अपना माँ को खिलाने ले चला। भूख उसे भी इतनी लगी थी कि चला नहीं जा रहा था फिर भी उसने यहीं उचित समझा कि पहले माँ को खिलाकर तभी कुछ मुँह में डालना चाहिए। वह मुश्किल से घर तक आ गया और उस भोजन को माँ के हाथ पर रखते-रखते प्राण छोड़ दिये।
इसी प्रकार की कितनी ही घटनायें उन दिनों घटित हुई थीं। सनातन नामक एक ग्यारह वर्षीय बालक की भी एक घटना उड़ीसा में प्रसिद्ध है, जिसने अपने छोटे भाइयों तथा माता को बिना खिलाये कुछ न खाने का प्रण किया था और वह उस प्रण को निभाता हुआ अपने परिवार में सबसे पहले भूख की ज्वाला में जल कर मरा।
ब्राह्मणः समदृक् शान्तो दीनानाँ सम्पेक्षकः।
स्रबते ब्रह्म तस्वामि मित्र भाण्डात् पयो यथा॥
दीन दुर्बलों का अनुचित रीति से सताया जाना जो ब्राह्मण अपने को समदर्शी और शान्त कहकर अपने आराम के लिए उपेक्षा पूर्वक देखता रहता है उसका मिथ्या ब्रह्मज्ञान फूटे हुए बर्तन में से पानी जैसा चू जाता है।
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना।
अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदाहरिः॥
तृण से भी छोटा बने, वृक्षों से भी अधिक सहिष्णु बने, मद और मान को छोड़ दे। ऐसा बनकर हरि का भजन करें।
तप्यन्ते लोक तापेन साधवः प्रायशो जनाः।
परम सघनंतद्धि पुरुषस्या खिलात्मनः।
-श्रीमद्भागवत 8/7/444
सत्पुरुष दूसरों के दुःख से द्रवित हो जाते है। यही उनकी सर्वोच्च ईश्वर भक्ति है।
न काभयेअहं गति मीश्वरात् परा,
मष्टद्धि युक्ताम पुनर्भवं वा।
आतिं प्रपक्षेअग्बिल देहभाक्षा,
भन्तः स्थितो येन भवन्त्य दुःखाः॥
-श्रीमद्भागवत 9/21/12
रन्ति देव ने कहा-मैं परमात्मा से अष्ट सिद्धियाँ या परमगति नहीं चाहता। मैं तो चाहता हूँ कि सभी प्राणियों के दुःख मेरे ऊपर आ पड़े और वे सब दुःख रहित हो जाय।
कथंचिदुपकारेण कृतेनेकेन मुद्यति।
न स्यरत्यपवाराणाँ शतमत्यात्म वत्तया।
-बाल्मीकिव अयोध्या 4
रामचन्द्रजी किसी के एक ही उपकार को जन्म भर याद रखते थे पर उसके सैकड़ों उपकारों को भी तत्काल भूल जाते थे।
अलंकाल संगेन क्रियताँ बुद्धि निश्चयः।
-बाल्मीकि
बस और समय मत चाहो, जो कुछ करना है अब निश्चय ही कर लो।
श्वः कार्यमद्य कुवीत पूर्णहें त्तपराह्रिक्रम्।
नहि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्यन का कुदम्॥
कल का काम आज और शाम का सवेरे ही कर डालो। मृत्यु प्रतीक्षा नहीं करती कि तुमने क्या कर लिया और क्या शेष रह गया ?
ये युध्यन्ति प्रधनेषु शरासो ये तनृज्यजः।
ये वा सहस्त्रदक्षिणास्ताँश्चि देवापि गच्छतात्॥
-वेद
संग्राम में लड़ने वाले वीरों की भाँति आदर्श के लिए प्राण त्यागने वाले, अनेक प्रकार के त्याग और दान करने वाले सज्जनों की गति को तू प्राप्त कर।
व भार राज्यं सहि पुत्र हेतोः,
पुत्रं कुलार्थ यशशे कुलं तु।
स्वर्गाय शब्दं दिवभात्म हेतो,
धर्मार्थमात्मा स्थितिमाचकाँक्ष॥
-बुद्धचरितम् 2/56
उसने राज्य का पुत्र के लिए, पुत्र का कुल के लिए, कुल का यश के लिए पालन किया और यश की स्वर्ग के लिए, स्वर्ग की आत्मा के लिए, और आत्म जीवन की धर्म के लिए आकांक्षा की।
श्रुति कहती हैः-
उद्याने ते पुरुष नाव यानं जीवातुँ ते दक्षता तुँ कृणोभि।
तू ऊँचा उठ, नीचे मत गिरे। ऊपर उठने योग्य तुझे अनेक शक्तियों से सुसम्पन्न बनाया गया है।
एवं सर्वमिदं कृत्वा यन्मया सदितं शुभम्।
तेनस्याँ सर्वसत्वानाँ सर्व दुःख प्रशान्ति कृत।
मैंने जो कुछ भी पुण्य किया हो, उसके शुभ फल में सब प्राणियों के दुःख मिटें।
सर्व त्यागश्च निर्वाणं निर्वार्णार्थ च में मनः।
त्यक्तव्यं चेन्मना सर्व वरं सत्वेणु दीयताम्।
-बोधिधर्मावतारः
मेरा मन मोक्ष चाहता है। मोक्ष क्या है ? सर्वस्व का त्याग ही मोक्ष है। हे मन! यदि एक दिन सबको छोड़ कर ही जाना है तो जो कुछ है उसे विश्वकल्याण ही क्यों न दे दिया जाय ? जिससे सहज ही मोक्ष भी मिल जाय ?
उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूति कर्मसु।
भविप्यती त्यंव मनः कृत्वा सततमव्ययैः॥
-श्रुति
उठो, जागो, अच्छे कर्मों में लगो। मन को दृढ़ रखो, इसी से कल्याण होगा।
विश्व तद्भद्रं यदवन्ति देवाः।
-ऋग्वेद 1/164/46
इस विश्व में जो कुछ श्रेष्ठ है उसकी देवता रक्षा करते है।
भूत्यैजागरणम। अभूत्यै स्वपनम्।
यजु 30/17
जगने में वैभव और सोने में दारिद्र मिलता है।
दक्षिणावन्तो अमृतंभजन्ते। दक्षिणावन्तः प्रति रन्त आयुः।
-ऋग्वेद 1/112/6
दक्षिणा देने वाले दानी अमृत पद पाते है। वे ही दीर्घायु होते है।
न श्वः श्वमुपासीत। को हि मनुष्य स्यश्वोवेद।
-शतपथ 2/1/3/9
कल के भरोसे मत बैठे रहो। कल किसने देखा है?
डतोरयिः पृणतो नोप दस्यत्युता पृणन् मर्डितारं न विन्दते।
-ऋग्वेद 10/117/1
दानियों का धन क्षीण नहीं होता। कंजूसों को क्षमा नहीं किया जाता।
गायत्री तपोभूमि द्वारा प्रसारित नैतिक एवं साँस्कृतिक योजना के अंतर्गत देश भर में बहुत काम हो रहा है। अनेक आश्रम एवं केन्द्र उस कार्यक्रम में संलग्न है। अष्टग्रही योग की शान्ति के लिये जगह-जगह धर्मानुष्ठानों का आयोजन उत्साहपूर्वक किया जा रहा है। उनमें से कुछ का विवरण इस प्रकार है।
(1) कोटा (राजस्थान) में भी शंभूसिंहजी कौशिक द्वारा साधनाश्रम की स्थापना की गई है। इसके लिए एक बड़ी जमीन तथा बगीचा खरीदा गया है। आश्रम का उद्घाटन ता0 19 अक्टूबर को आचार्य जी द्वारा हुआ जिसमें उस क्षेत्र के कार्यकर्ता बड़ी संख्या में उपस्थित थे। 24 करोड़ जप तथा 24 लाख आहुतियों के संकल्प की पूर्ति के साथ आगामी 7, 8, 9 फरवरी 62 को 108 कुण्डों का यज्ञ इस आश्रम में होगा। पत्र व्यवहार का पता यह है-श्री शंभूसिंह कौशिक, साधनाश्रम (कोटा सिटी स्टेशन के पास) पो बोरखेड़ा (कोटा राजस्थान)
(2) मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ प्रान्त में गायत्री प्रचार केन्द्र बिलासपुर द्वारा धर्म प्रेरणा देने का कार्य उत्साह पूर्वक चल रहा है। एक बड़ा गायत्री मन्दिर तथा आश्रम बनाया जा रहा है। श्री गिरजा सहाय व्यास ने उस क्षेत्र में 108 यज्ञ कराने का निश्चय किया है। उन्होंने युग निर्माण प्रेस की भी स्थापना की है। श्री गिरजा सहाय व्यास का पता-गायत्री प्रचार केन्द्र, दयालवन्द बिलासपुर (मध्य प्रदेश) है।
(3) बरेली (उ.प्र.) में डा: चमनलाल गौतम ने भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठता एवं महत्ता से जन साधारण को परिचित कराने के लिये संस्कृति संस्थान की स्थापना की है, जिसकी ओर से अनेक साँस्कृतिक पुस्तकें छपेंगी। इन दिनों आचार्य जी द्वारा अनुवादित “108 उपनिषद् छपाई जा रही है। उस क्षेत्र में कुछ साँस्कृतिक आयोजनों की योजना भी बनाई गई है। पता यह है- डा चमनलाल गौतम संस्कृति संस्थान (निकट पो आ॰ ख्वाजा कुतुब) बरेली (उ.प्र.)
(4) गायत्री प्रचार केन्द्र का कार्य बहरायच क्षेत्र में दिन-दिन बढ़ रहा है। गायत्री प्रेस, नानपारा से प्रकाशित ब्रह्मास्त्र मासिक पत्र सफलता पूर्वक चल रहा है। कई उपयोगी पुस्तिकाएँ भी छपी है। बहरायच में 17, 18, 19, 20 अक्टूबर 62 को 108 कुण्डों का एक विशाल गायत्री यज्ञ होने जा रहा है। आगे प्रचार कार्य के लिये केन्द्र की एक विस्तृत योजना है।
(5) गोंडा में गायत्री परिवार का कार्य केन्द्र गौशाला में है। गौ सेवा, संस्कृत पाठशाला, यज्ञ एवं अन्य उपयोगी कार्य इस केन्द्र से चल रहे है।
(6) आगरा क्षेत्र में गायत्री आश्रम एवं मन्दिर का निर्माण कार्य तेजी से चल रहा है। दिसम्बर में माता की प्रतिमा की स्थापना, उपासक सम्मेलन एवं विशाल यज्ञ का आयोजन होगा।
(7) महासमुन्दर रायपुर (म.प्र.) में गायत्री साधना एवं ज्ञान प्रसार के लिये एक सुन्द आश्रम बनाने की योजना कार्यान्वित होन जा रही है। भूमि प्राप्त हो गई है। इस नवरात्रि में वहाँ एक साधना शिविर भी सम्पन्न हुआ।
(8) नवरात्र में सामूहिक आयोजन देश भर में प्रायः प्रत्येक शाखा ने मनाया। सहस्रों स्थानों पर सामूहिक यज्ञानुष्ठान, जप, कीर्तन, प्रवचन जुलूस आदि के आयोजन बड़े उत्साह पूर्वक सम्पन्न हुए।
(9) भिण्ड क्षेत्रीय गायत्री परिवार की 30 शाखाओं का सम्मेलन भिण्ड में हुआ। जिसमें आगामी कार्यक्रम के सम्बन्ध में उत्साहवर्धक निर्णय लिये गये। भिण्ड में 1 करोड़ जप तथा 1 लाख आहुतियों का कार्यक्रम आरम्भ हो गया है इसकी पूर्णाहुति एक विशाल यज्ञ के साथ सम्पन्न होगी।
(10) जावरा (म.प्र.) में अष्टग्रही योग की शान्ति के लिये 1 करोड़ जप का कार्यक्रम श्रद्धापूर्वक चल रहा है। यज्ञ आयोजन का अन्तिम निश्चय अगले मास हो जाएगा ।
(श्री0 लक्ष्मीनारायण ‘कमलेश’)
क्यों रुके हो? साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ो!
क्यों प्रगति-पथ में तुम्हारे, हो रहा उत्पन्न भय?
श्रम बिना ही चाहते ही क्यों सफलता पर विजय?
सोचते हो क्या? गिने क्षण ही तुम्हारे पास हैं-
हाथ में आया हुआ क्यों खो रहे हो अब समय?
बढ़ चलो निर्द्वंद्व, कोरी कल्पनाएँ मत गढ़ो!
क्यों रुके हो?......
दूर जाना था, अचानक रुक गये तुम तो यहीं,
इस शिथिलता से तुम्हारा कार्य कुछ होगा नहीं,
गिर पड़े हो, तो सम्भल जाओ, उठो, हिम्मत करो,
कठिनाइयों के पंक में अब फिर न फँस जाना कहीं,
हीनता का दोष अपने शीश पर तुम मत गढ़ो!
क्यों रुके हो?......
कुछ नहीं बिगड़ा, अभी सब कुछ तुम्हारे साथ है,
भाग्य के निर्माण का अवसर तुम्हारे हाथ है,
मुश्किलों को पार कर जो बढ़ गये निज लक्ष्य तक-
विजयी वही हैं, विश्व में ऊँचा उन्हीं का माथा है,
मन रहो आश्रित, स्वयं अपनी कलाओं में गढ़ो!
क्यों रुके हो?......
आपदाएँ आये यदि राह में, परवाह क्या?
ध्येय हो अपना अटल, फिर चोट क्या हैं? आह क्या?
मध्य में ही टूट जाये-वह प्रबल-उत्साह क्या?
वह सके धारा न जिसको-वह अखण्ड-प्रवाह क्या?
नीचे गिरो मत, हर घड़ी ऊँचे उठो, ऊँचे चढ़ो!
क्यों रुके हो?......
रिक्त लौटा है न कोई साधना के द्वार से,
सब समय, सब कुछ मिला, सबको इसी भंडार से,
साम्राज्य सारी सिद्धियों का है सुरक्षित सर्वथा-
फिर तुम्हीं वंचित रहो क्यों दिव्य निज-अधिकार से,
छोड़ो अतीत, भविष्य का इतिहास अब आगे पढ़ो!
क्यों रुके हो?......
*समाप्त*