दुःख का अनुभव सब करते हैं, पर उसका वास्तविक कारण जानने की इच्छा किसी किसी को ही होती हैं। दुखी होने से −चिन्तित और निराश रहने से-दुःख की निवृत्ति नहीं हो सकती। वह तो तभी संभव है जब उसके मूल कारण को जान कर उसके निवारण का प्रयत्न किया जाय। यह संसार दुःख रूप ही हैं। इसमें जितनी भी वस्तुएँ हैं वे सब क्षणिक और अस्थिर हैं। क्षण क्षण में उनका रूप बदलता हैं। जो वस्तु अभी प्रिय दीखती हैं, कुछ कारण उत्पन्न होने पर थोड़ी ही देर में वह अप्रिय बन जाती हैं। कामनाओं और वासनाओं का भी यही हाल हैं। एक तृप्त नहीं हो पाई कि दूसरी नई उपज पड़ी। तृष्णाओं का कहीं अन्त नहीं, वासनाओं की कोई सीमा नहीं। भोग से-संग्रह से-उन्हें किसने शान्त कर पाया हैं? घी डाल कर किसने आग बुझाई हैं? बहुमुखी जीवन से मुख मोड़कर अन्तर्मुखी दृष्टि अपनाये बिना आज तक किसी को शान्ति नहीं मिली। हमारे लिए भी इसके अतिरिक्त और कोई उपाय या मार्ग नहीं हैं।
भगवान बुद्ध
वर्ष 22 - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 10
(श्रीमती विद्यावती मिश्र)
जो कुछ भी थोड़ा सुख तेरे पास उसे भी त्याग।
जब तक शेष रहेगा तब तक नहीं मिलेगी शान्ति।
दूर न हो पायेगी तब तक तेरे मन की भ्रान्ति।
प्राप्त न होगा भाव-कुसुम को पावन तुष्टि-पराग
जो कुछ भी थोड़ा सुख तेरे पास उसे भी त्याग।
यह सुख का ही त्याग कहाया गीता में निष्काम।
उर का अन्तर्द्वन्द्व स्वयं की कुरुक्षेत्र संग्राम।
विष न मिलेगा, कभी किसी से मत तू अमृत माँग।
जो कुछ थोड़ा सुख तेरे पास उसे भी त्याग॥
पग को बाँधे मोह स्वप्न का और सत्य की प्यास।
मधुर प्राप्ति लिप्सा को तपकर ले ले तू संन्यास।
वही कृष्ण बन सका कि जिसने पाया पूर्ण पराग।
जा कुछ भी थोड़ा मुख तेरे पास उसे भी त्याग॥
हमें शरीर को प्राप्त होने वाले सुख साधनों का निरन्तर ध्यान रहता हैं, उन्हीं प्रयत्नों में सारा समय लगता हैं, पर जिस आत्मा का यह शरीर एक तुच्छ सा वाहन मात्र हैं, उसके कल्याण एवं सुख का तनिक भी ध्यान नहीं रखा जाता हैं, यह कैसे दुःख और आश्चर्य की बात हैं। पौष्टिक भोजन में कंजूसी के कारण शरीर दुबला और पीला पड़कर मरणासन्न स्थित को पहुँचता जाय और कपड़े जेवरों पर प्रचुर धन खर्च किया जाय तो इसे कोई बुद्धिमानी का कार्य न माना जायेगा। हमारी गति-विधि आज ऐसी ही अबुद्धिमत्तापूर्ण बनी हुई हैं।
आज हमारी चतुरता इस बात में लगी हुई हैं कि कितना धन, मान और विलास उपलब्ध कर लिया जाय, पर चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करके लाखों करोड़ों वर्ष बाद मनुष्य शरीर प्राप्त करने का जो अलभ्य अवसर प्राप्त हुआ हैं उसका सदुपयोग कैसे किया जाय इस प्रश्न को सुलझने में सारी चतुरता धूमिल पड़ जाती हैं।
बुद्धिमत्ता की कसौटी
हम बुद्धिमान हैं या मूर्ख इसका पता उस दिन लगता हैं जब जीव इस शरीर को छोड़ कर आकाश में उड़ रहा होता हैं। उसे आगे फिर चौरासी लाख योनियों के दुखदायी शरीर सामने उपस्थित दीखते हैं जिनमें उसे करोड़ों वर्ष ज्ञान रहना पड़ेगा,तब कहीं फिर मनुष्य जन्म का वह अवसर आयेगा जो अभी तुच्छ बातों में गँवा दिया। जीव को अपनी इस मूर्खता पर भारी पश्चात्ताप होता हैं कि यह सुरदुर्लभ मानव-जीवन व्यर्थ गँवा दिया गया, वरन् शरीर के मोह में पड़कर अनेक दुष्कर्म भी कर लिये जिनके लिए नारकीय यंत्रणाओं चिरकाल तक सहनी पड़ेगी। पाप कर्मों के सुख क्षणिक थे पर उनका दंड तो दीर्घकाल तक सहना पड़ेगा।
पश्चात्ताप की अग्नि में इस प्रकार जलने से पूर्व ही यदि थोड़ी समझदारी उत्पन्न हो जाय तो उसे एक सौभाग्य ही समझना चाहिए। आध्यात्मिक प्रवृत्तियों में मन का लगने लगना वस्तुतः एक महान् सौभाग्य ही हैं जिसके लिए आज भले ही उपहास सहना पड़े पर अन्ततः उसका परिणाम श्रेयस्कर ही होता हैं। शरीर सुख की मृग तृष्णा में सदा के लिये भविष्य को अन्धकार मय क्यों बनाया जाय।
मृगतृष्णा में भटकना
लोग शौक, मौज चाहते हैं पर चाहने पर भी कितनों को वह मिल पाती हैं। अधिकांश को तो उस मृगतृष्णा के पीछे भटकने पर भी निराश और असफल ही रहना पड़ता हैं। फिर यदि इस छोटी-सी जिन्दगी में कुछ दिन वासना और तृष्णा की अग्नि को विलास और संग्रह के ईधन से शान्त भी क्या है? बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता की कसौटी तो एक ही है कि हम अपने स्थिर स्वार्थ को समझे शाश्वत शान्ति के लिए प्रयत्न करें और आत्म कल्याण की साधना में श्रद्धापूर्वक लग जाय। इस मार्ग पर चलते हुए लोक और परलोक दोनों बनते हैं। पारलौकिक शान्ति तो मिलती ही हैं लौकिक सुखों का अभाव भी नहीं रहता। आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास का मार्ग-दर्शन अखण्ड-ज्योति अपने जीवन के गत 23 वर्षों से सतत करती रही हैं। सद्विचारों को अपनाने, सद्-भावनाओं को विकसित करने और उपासनात्मक साधना का अवलम्बन करने का अपना एक सुनिश्चित मिशन इस लम्बे समय से चल रहा है। प्रसन्नता की जाता है कि परिवार के अगणित सदस्यों ने इससे समुचित लाभ भी उठाया हैं।
गायत्री की सर्वोपरि महत्व
उपासना क्षेत्र में गायत्री का महत्व सर्वोपरि है। प्राचीनकाल के समस्त ऋषियों ने गायत्री के आधार पर अपनी योग साधनाएँ की थी। भगवान के 24 अवतार हुए हैं उनने भी अपनी उपासना में गायत्री की प्रमुखता रखी है। बाल्मीकि रामायण साक्षी हैं कि भगवान राम गायत्री की उपासना करते थे। श्रीमद्भागवत से स्पष्ट है कि श्रीकृष्णचन्द्र की उपासना का आधार गायत्री था। यज्ञोपवीत धारण के समय प्रत्येक द्विज को गुरु मन्त्र के रूप में केवल गायत्री की ही दीक्षा देने का धर्मग्रन्थों में विधान हैं। भारतीय संस्कृति की इस आधार भित्ति गायत्री महामंत्र की जानकारी सर्व साधारण तक पहुँचानी आवश्यक थी। महाभारत के बाद आये हुए अज्ञानान्धकार युग में जो नाना मतमतान्तरों और सम्प्रदाय बरसाती मेंढकों की तरह उपज पड़े थे उनने उपासना के मूल आधार को हटाकर अपना-अपना ही सिक्का जमा लिया था और गायत्री को शाप लगी हुई, केवल ब्राह्मणों की, गुपचुप कान में कहने की,सतयुग में जपने की आदि आशंका एवं उपेक्षा पैदा करने वाली बातें कहकर एक प्रकार से बहिष्कृत ही कर दिया था। प्रसन्नता की बात है कि भ्रम का वह अन्धकार अब हट गया हैं अखण्ड-ज्योति ने इस दिशा में समुचित प्रकाश प्रदान किया हैं।
अगला कदम
प्रारम्भिक उपासना के रूप में गायत्री जप का सामान्य विधान अब तक सुविस्तृत किया जाता रहा। पर उतने से ही पूर्णता के लक्ष तक नहीं पहुँचा जा सकता। जप से मनोभूमि की शुद्धि होती है। जमीन को जोतने का जो कार्य हल बैल द्वारा सम्पन्न होता हैं वही कार्य मनोभूमि की शुद्धि के लिए माला द्वारा गायत्री के जप से होता हैं भूमि की जुताई हो जाने पर उसमें (1) बीज बोना, (2) सींचना (3) खाद देना, (4) निराई गुड़ाई करना, (5) रखवाली आदि की आवश्यकता पड़ती हैं, इसी प्रकार जप द्वारा परिमार्जित की हुई मनोभूमि में पाँच संस्कारों की आवश्यकता होती हैं। इसे ही पंचकोशी या पंचमुखी साधना कहते हैं । कितने ही चित्रों में गायत्री को पाँच मुख वाली दिखाया गया है। गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ के तृतीय भाग में इन पाँच मुखों की विस्तृत विवेचना की जा चुकी हैं। आत्मा पर चढ़े हुए पाँच आवरण ही गायत्री के पाँच मुख हैं। जैसे शरीर पर बनियान, कुर्ता, जाकेट, कोट और ओवरकोट एक के ऊपर एक पहन लेते हैं वैसे ही आत्मा की पाँच आवरण धारण किये हुए हैं, जिन्हें (1) अन्नमय कोश (2) मनोमय कोश (3) प्राणमय कोश (4) विज्ञानमय कोश (5) आनन्दमय कोश, कहते हैं। इन आवरणों को हटाते हुए आत्मा का-परमात्मा का-साक्षात्कार कराना ही योग साधना का लक्ष हैं। जप के बाद अगली भूमिका में प्रत्येक साधक को प्रवेश करना पड़ता हैं तब उसके लिए यह पंचकोशी साधना-पंचमुखी गायत्री की उपासना-आवश्यक होती हैं−
पंचकोशों का विकास
विगत वर्षों में सामान्य रूप से हम सब गायत्री जप करते रहे हैं। अब समय आ गया है कि हम अगली ऊँची कक्षा में प्रवेश करते हुए पंच-सूत्री साधना का श्रीगणेश करें। प्रस्तुत अंक में उसी का प्रारम्भिक विधान हैं। यह सर्व साधारण के लिए बाल, वृद्ध-नर-नारी गृही, विरागी, सभी के लिए अति सरल और सर्वथा हानि रहित है। एक दो घंटा समय लगा सकने वाला कोई भी व्यक्ति इसे बड़ी सरलता पूर्वक अपना सकता हैं। इस मार्ग पर अग्रसर होते हुए सामान्य स्थिति का व्यक्ति भी अन्ततः उस स्थिति को पहुँच जाएगा जहाँ से आत्मसाक्षात्कार की स्थिति बिलकुल निकट आ जाती हैं। इस पंचकोशी साधना क्रम को दश भागों में विभाजित किया गया हैं। इन्हें दश कक्षाएँ मानना चाहिए। एक वर्ष में एक कक्षा पूर्ण करने की आशा की गई हैं, पर धीमे चलने वाले साधकों को इससे अधिक समय भी लग सकता हैं। जिस प्रकार एक कक्षा उत्तीर्ण करके दूसरी में प्रवेश करने पर पुरानी पाठ्य पुस्तकें बदल जाती हैं और नये पाठ्यक्रम का अभ्यास करना होता हैं उसी प्रकार सफल साधकों को प्रतिवर्ष अगला साधना क्रम अपनाना होगा। दस वर्ष तक यदि कोई व्यक्ति इसे अपनाये रह सके तो यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता हैं कि वह व्यक्ति बाहर से साधारण गृहस्थ जीवन में रहने वाला, सामान्य व्यवसाय करने वाला, औसत दर्जे का भले ही दिखाई दे, पर आन्तरिक दृष्टि से वह निश्चित रूप से महामानव होगा। अपनी आत्मा में स्वर्गीय शान्ति अनुभव करेगा और अपने समीपवर्ती लोगों के अपनी विशेषताओं से पुलकित, प्रफुलित किये रहेगा जीवन लक्ष प्राप्त करने में भी उसे कुछ विशेष बाधा न रह जाएगी।।
पाठक इस अंक को बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ें और मनन करें। इसमें वर्णित साधनाएँ उपयोगी दिखें तो उनकी महत्ता को परखने के लिए परीक्षा की तरह एक वर्ष के लिए इन्हें अपनाकर देखें। यदि पाँचों साधनायें न बन पड़े तो इनमें से कुछ को भी अपनाया जा सकता हैं। उतने अंश से भी लाभ ही होने वाला हैं।
पृथ्वी के उत्तर और दक्षिण में दो ध्रुव हैं। दोनों को ही पृथ्वी की धुरी कहा जाता हैं और दोनों में ही असाधारण शक्ति केन्द्रीभूत मानी जाती हैं। इसी प्रकार चेतन तत्त्व के भी दो ध्रुव हैं जिन्हें माया और ब्रह्म कहा जाता हैं। जीव इन्हीं दोनों के बीच कभी इधर कभी उधर कभी उधर खिंचता रहता हैं। यह दो दिशाएँ एक दूसरे के प्रतिकूल पड़ती हैं। इसलिए परस्पर विरोध दीखता है। खुदा और शैतान एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी चित्रित किये गये हैं। देवता और असुर भी एक दूसरे से टकराते हैं। देवासुर की कथाओं पुराणों के पन्ने-पन्ने पर भरी पड़ी हैं। श्रेय मार्ग और प्रेय मार्ग दोनों एक दूसरे से विपरीत माने जाते हैं। भोग और त्याग का मार्ग पृथक् 2 दिशाओं को चला गया हैं। यद्यपि इन दोनों का एक स्थान पर समन्वय भी हो जाता है और उस समन्वय की स्थिति को ही पूर्णता की स्थिति कहा जा सकता हैं। पर प्रारंभ में यह दोनों मार्ग निश्चित रूप से भिन्न हैं और उनमें से एक को ही प्रधानता देनी पड़ती हैं दूसरे को गौण मानना पड़ता हैं
दो मार्ग में से एक का चुनाव
मायावी असुरता का पक्ष ‘प्रेय’ मार्ग कहलाता हैं। इस पर चलने वाले मनुष्य का दृष्टिकोण यह होता हैं कि जिसके मन और इन्द्रियों को जो कुछ प्रिय लगे उसे ही अपनाये, भले ही उसका परिणाम पीछे कितना ही अहितकर क्यों न होता हो। आज अधिकांश व्यक्ति इसी मार्ग पर चलते दिखाई पड़ते हैं। इन्द्रियों को जो प्रिय हैं उसी को असीम मात्रा में पाने और भोगने के लिए हर कोई उतावला हो रहा हैं। जीभ की खुजली तरह-तरह के स्वादिष्ट पदार्थ खाने से मिटती हैं तो हमारा प्रयत्न यही रहता हैं कि एक-से −एक बढ़िया, एक-से-एक चटपटे, मीठे, खट्टे, पकवान, मिष्ठान, चाट पकौड़ी खाने को मिलें । फिर जब यह पदार्थ सामने आते हैं तो यह होश नहीं रहता कि क्या खा रहे हैं कितना खा रहे हैं, पेट के लिए इनकी कुछ उपयोगिता या आवश्यकता भी है कि नहीं। चटोरा आदमी केवल स्वाद देखता है और हकीम दुकान के शब्दों में जीभ से अपनी कब्र खोदता हैं।
अधिकांश रोग पेट की खराबी से होते हैं। यदि पेट ठीक रहे तो निरोगिता सुरक्षित रहेगी, पर देखा जाता है कि लोगों की जीभ काबू में नहीं होती। गरीब, अमीर सभी अपने भोजन को मिर्च मसाले और गुड़-शक्कर के आधार पर स्वादिष्ट बना लेते हैं और फिर उसे पेट की आवश्यकता से अधिक मात्रा में खा जाते हैं। परिमाण स्पष्ट हैं, पाचन क्रिया खराब होती है, अशुद्ध रक्त बनने लगता है और मद अथवा तीव्र रोगों का अंगार शरीर में जमता है। अन्ततः मौत-बुढ़ापे के दिन तेजी से निकट आ जाते हैं। प्रेय मार्ग का यही परिणाम है। इन्द्रियों को जो चीज प्रिय लगती है मन उसके पीछे तेज से, उतावली से बेतहाशा भागता हैं, आगा पीछा सूझना नहीं क्षणिक प्रसन्नता के लिए स्थायी स्वार्थों की भयंकर क्षति कर बैठता हैं।
असंयम का दुष्परिणाम
ब्रह्मचर्य को स्वास्थ्य का मेरुदंड माना गया हैं। जिसने अपने शरीर में वीर्य और ओज का जितना संचय किया है उसका मस्तिष्क उतना ही प्रबुद्ध और शरीर उतना ही सतेज रहेगा। कुछ महान् कार्य सम्पादन करा सकने वाली जीवनी शक्ति का कोष जमा होना ब्रह्मचर्य पालन पर ही निर्भर हैं। यह जानते हुये भी कितने ही लोग कुछ क्षणों की एक तुच्छ-सी खुजली को मिटाने के लिए शरीर का अमृत-तत्त्व अनुचित मात्रा में निचोड़ते रहते हैं। इन्द्रिय आवेश में उन्हें यह सब बहुत ही आनन्ददायक, सुखकर, एक बड़ी प्रसन्नता और सफलता जैसा लाभ लगता हैं। उस समय कुछ क्षण स्वर्ग सुख जैसे लगते हैं, जिनके सम्मोहः में आगामी हानि आँखों के आगे से ओझल हो जाती हैं। कालान्तर में उसका प्रतिफल जब स्वास्थ्य के खोखलेपन के रूप में दुर्बलता, बीमारी, अल्पायु में बुढ़ापा एवं अकाल मृत्यु के रूप में सामने आता हैं तो पता चलता हैं कि भूल बहुत भारी हुई। काम सेवन के क्षणिक सुख के बदले शारीरिक और मानसिक स्थिरता गवाँ दी गई। काँच बदले हीरा बेच दिया गया। यही प्रेय मार्ग हैं जिसमें आगा पीछा नहीं सूझता केवल वर्तमान की,अभी की, बात याद रहती है। आज की मौज से बदले भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाले खेल का नाम प्रेय हैं हम सब इसी भोंडे खेल में अज्ञानी बालकों की तरह लगे हुए हैं। जीवन धारण के लिए आवश्यक उपकरण प्राप्त होने तक कौन सन्तुष्ट रहता हैं? हर किसी को प्रचुर धन, सम्पत्ति का स्वामी बनने और अनन्त ऐश्वर्य का उपभोग करने की तृष्णा सताती रहती हैं। किसे कितना मिल सका, यह प्रश्न सर्वथा भिन्न हैं, क्योंकि उसके साथ प्रारब्ध, पुरुषार्थ, योग्यता और परिस्थितियों, का झंझट भी जुड़ा हुआ हैं। भले ही असफलता हाथ लगे पर प्रयत्न हर घड़ी इस तृष्णा की पूर्ति के लिए ही रहता है। इसी गोरख-धंधे में मानव जीवन जैसी बहुमूल्य वस्तु नष्ट हो जाती हैं। कोई महत्त्वपूर्ण कार्य उसमें नहीं हो पाता और मौत की घड़ी सामने आ खड़ी होती हैं। जो धन कमाया था वह भी दूसरों के लिए छोड़कर खाली हाथ प्रस्थान करना पड़ता हैं। तब आँखें खुलती हैं और तब पश्चात्ताप ही हाथ रह जाता हैं। प्रेय मार्ग ऐसा ही दुखदायी हैं। इसमें आरम्भ भले ही सुखकर लगे अन्त सर्वथा दुखदायी होता हैं।
सत्यानाश का बीहड़ पथ
प्रेय मार्ग में एक भारी दोष यह है कि सीमित मात्रा में उपभोग प्राप्त होने से सन्तोष नहीं होता वरन् जितना-जितना उपभोग मिलता हैं उतनी ही तृष्णा बढ़ती जाती है। क्या इन्द्रिय सुख, क्या धन दौलत, क्या मान-सम्मान क्या सत्ता अधिकार किसी में कितनी ही सफलता क्यों न मिले, सब कुछ स्वल्प ही दीखता है और वर्तमान उपलब्धि की अपेक्षा अनेक गुनी सफलता समृद्धि के लिए मन ललचाता हैं। यह लालच मन को हर घड़ी अशान्त बनाये रहता है और बहुधा वह अशान्ति इतनी उतावली का रूप धारण कर लेती है कि सब प्रकार की मर्यादाओं का परित्याग कर जैसे भी बने, वैसे उपभोग प्राप्त करने में मनुष्य जुट पड़ता हैं। चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, छल, कपट, हत्या, शोषण, अपहरण, बलात्कार, व्यभिचार आदि अनेकों दुष्कर्म का एक ही कारण है-उपभोग की आकांक्षा का असीम हो जाना, अनियंत्रित हो जाना प्रेय मार्ग पर चलते-चलते मनुष्य ऐसे ही निविड़ बीहड़ में जा भटकता है।
तप-त्याग की दूरदर्शिता
जीवन का दूसरा ध्रुव है-श्रेय मार्ग। इसमें हमें आज की अपेक्षा कल को महत्व देना और भविष्य के सुख के लिए आज संयम का अपनाना पड़ता है। किसान अपनी फसल प्राप्त करने के लिए अपने घर में रखा हुआ अन्न खेत में बखेर देता हैं। वह बीज आगे चल कर अनेक गुना होकर प्राप्त तो होता हैं पर आज तो घर में रखी हुई बोरी खाली हो गई। विद्यार्थी दिन-रात पढ़ता हैं पूरी नींद सो भी नहीं पाता, खेलने और मस्ती करने की मौज छोड़कर किताब के नीरस पन्नों में सिर खपाता रहता है। घर से फीस लेकर जाता है। किताब कापियों में पैसे खर्च होते हैं, मास्टर की फटकार सुननी पड़ती हैं। इतना झंझट उठाने वाला विद्यार्थी जानता है कि अनन्त इसका परिणाम अच्छा ही होगा। जब शिक्षा पूर्ण करके अपनी बढ़ी हुई योग्यता का समुचित लाभ उठाऊंगा तब आज की परेशानी की पूरी तरह भर पाई हो जाएगी । श्रेय मार्ग ऐसा ही हैं इसमें आज को कष्टमय बनाकर कल के लिए आशा के अंकुर उगाने पड़ते हैं। पहलवानी सीखने वाला रोज अखाड़े जाता है, घण्टों दण्ड, बैठक लगाकर अपनी देह को कुचलता हैं। व्यायाम में इतनी मेहनत करता हैं जितनी एक मजूर या कैदी को भी नहीं करनी पड़ती । लंगोटी बाँधकर ब्रह्मचर्य से रहता है। तेल मालिश, पौष्टिक खुराक सभी तो खर्चीली बातें हैं। उद्योग धन्धा भी वह कुछ कर नहीं पाता क्योंकि अधिकांश समय पहलवानी की आवश्यकताएँ पूरी करने में लग जाता हैं। इतनी कठिनाइयाँ उठाकर भी जब वह हजारों आदमियों के सामने दंगल में कुश्ती पछाड़ना हैं और ‘हीरो’ बन कर पुरस्कार प्राप्त करता है तो उस सफलता में वह पिछली कष्ट साध्य साधना वसूल हो जाती हैं। वैज्ञानिक अन्वेषणकर्ता सारी जिंदगी प्रकृति के किन्हीं सूक्ष्म रहस्यों का एकाग्र भाव से एकान्त शोध कार्य में लगने पर कई आविष्कार होता हैं तो उसका लाभ सारे संसार को मिलता है। नेता, लोक-सेवक बलिदान, त्यागी, तपस्वी अपने आपको विश्व मानव के हित में होम देते हैं तब उस त्याग का लाभ सारे जगत को मिलता हैं। बीज अपनी हस्ती को गलाकर विशाल वृक्ष के रूप में परिणत होता हैं। नींव में पड़े हुए पत्थरों की छाती पर विशाल भवनों का निर्माण हुआ हैं। माता अपने रक्त और माँस का दान कर गर्भ में बालक का शरीर बनाती है और उसे अपनी छाती का रस दूध पिलाकर पालती हैं तब कहीं पुत्रवती कहलाने का श्रेय उसे मिलता हैं। यही श्रेय मार्ग हैं।
सन्मार्ग घाटे का सौदा नहीं
श्रेयमार्ग का पथिक आरम्भ में घाटे में रहता दीखता हैं और प्रेय मार्ग पर चलने वाला तुरन्त लाभान्वित होता हैं । इस गोरखधन्धों को सुलझाने में बाल-बुद्धि के लोग बहुधा विचलित हो जाते हैं। श्रेय मार्ग पर चलने वाले का उपहास होता हैं उसे मूर्ख समझा जाता हैं और प्रेय मार्ग वाले मूँछों पर ताव देकर अपनी शेखी बघारते हैं। पर यही स्थान दूरदर्शिता एवं बुद्धिमत्ता की परीक्षा का भी हैं। जो यहाँ चूक गया वह अनन्त काल तक पछताता रहता हैं। जिसने साहस और विवेक का सहारा लेकर भविष्य-निर्माण की आशा में आज का कष्ट सहन स्वीकार कर लिया, वह मोती ढूँढ़ने वाले गोताखोर की तरह अन्त में निहाल ही हो जाता है। श्रेय पथ पर चलते हुए जो कष्ट सहन किया जाता हैं तप कहते हैं। तप को समस्त सुखों का जनक माना जाता हैं। तपस्वी लोग आरंभ में कष्ट सहन करते हैं पर अन्त में वह तप फलित होता है और वह तपस्वी अपना तथा अन्य अनेकों का भारी कल्याण करने में समर्थ होता हैं। निम्न मनोभूमि के लोगों में प्रेय के प्रति अत्यधिक आकर्षण होता हैं। वे सदा उसी की आकांक्षा एवं चेष्टा करते रहते हैं। उन्हें यह ध्यान भी नहीं रहता कि उतने मोह ग्रस्त होने से उनका भविष्य अन्धकारमय बनने जा रहा है। इस विमूढ़ स्थिति से उबरने और उबारने में ही आत्मा की भलाई हैं। इसलिए विवेकशील लोग इस बढ़ी हुई प्रेय प्रवृत्ति को रोकने में संयम साधना का आश्रय लेते हैं। अनेक व्रत उपवास, संयम नियम, त्याग, तप, तितीक्षा इसी उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं। सदा ऐश आराम और सुख सुविधा की जिन्दगी काटते रहने से श्रेय की ओर अभिमुख होने और प्रेय को त्यागने की इच्छा ही नहीं होती। इसलिए कल्याण के अभिलाषी साधकों के लिए कुछ न कुछ ऐसी साधनाएँ करना अभीष्ट होता हैं जिससे सुख की आसक्ति घटे और तप में प्रवृत्ति बढ़े। इस दिशा में जितनी ही प्रगति होती जाती हैं उतना ही आत्मिक स्तर ऊँचा होता जाता हैं।
जीवनोद्देश्य का निर्धारण
आत्मिक प्रगति का पहला कदम यही हो सकता है कि हम अपना जीवनोद्देश्य निश्चित करें, लक्ष को स्थिर करें। यह लक्ष प्रेय नहीं श्रेय ही हो सकता हैं। प्रेय पथ पर सरपट तेजी से दौड़ती हुई जीवन की गति-विधि को मोड़ कर श्रेय पर चलाना है तो उसे मोड़ देते समय कुछ अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता हैं। भोग के स्थान पर संयम और विलास के स्थान पर तप की स्थापना करने से ही इस प्रकार का मोड़ दिया जा सकना संभव है। शरीर को अन्नमय कोश कहते हैं। इसमें अत्यधिक आसक्ति का होना, इसी के सुख, भोग, लाभ और ऐश्वर्य में ही अपनी अभिरुचि केन्द्रित कर लेना अन्नमय कोश में आबद्ध होना हैं। पाँचों बंधन काटने का श्रीगणेश यही से आरम्भ करना होगा। सबसे पहला प्रयत्न हमें यह करना है कि आत्मा के सुख को, लाभ को अपना वास्तविक लाभ मानते हुए उसे ही प्राथमिकता दें। इसके लिए यदि शरीर सुख में कोई कमी आती हो तो उसे खुशी-खुशी स्वीकार करने को तत्पर हों। इस मान्यता को विचारों तक ही सीमित न रखकर व्यवहार में उतारने की प्रक्रिया का नाम ‘तप’ हैं। साधना पथ का पहला चरण तप ही हैं। अन्नमय कोश की-शरीर-भाव की आसक्ति घटाने का प्राथमिक उपाय तप ही हैं। संचित कुसंस्कार तप की अग्नि में तपाये बिना जल नहीं सकते। इसलिए किसी न किसी रूप में आध्यात्म मार्ग के पथिक को ‘तप’ को अपने कार्य-क्रम में स्थान देना ही पड़ता हैं। हमें भी उसके लिए कटिबद्ध होना ही होगा।
यह संसार परिश्रम तथा प्रयत्न का स्थान है यहाँ जो आनन्द हमें प्राप्त होता है, वह इसलिए मिलता है कि हम किसी आगामी परिश्रम के लिये और भी दृढ़ हो जायें।
वासना और तृष्णा की सत्यानाशी सड़क पर दौड़ते हुए मन की लगाम को खींचना आवश्यक है। यदि उस पर अंकुश न लगाया जा सका और जिधर भी वह जा रहा है उधर ही जाने दिया गया तो फिर विनाश के अतिरिक्त ओर कोई परिणाम निकलने वाला नहीं हैं। अध्यात्म से विमुख होकर भौतिकवादी दृष्टिकोण में प्रवृत्त प्रेय मार्ग इतना आसक्त हो जाता हैं कि आटे के साथ काँटा निगलने वाली मछली की तरह उसे दीन दुनिया की कुछ खबर नहीं रहती कि आगे हमारा क्या होने वाला है। इस प्रिय लगने वाली किंतु पतनोन्मुख प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना प्रत्येक आत्मवादी के लिये आवश्यक होता है। तपश्चर्या इस दृष्टि से अनिवार्य मानी गई हैं। जंगली हाथी को पालतू बनाने में जितना झंझट करना पड़ता, शेर को सरकस दिखाने के उपयुक्त बनाने में जितना श्रम, चातुर्य खर्च करना पड़ता हैं, उतना ही मन को कुमार्ग से लौटकर सन्मार्ग पर चलने का अभ्यासी बनाने में लगता हैं। इसी कठिन कार्य को साधना कहते हैं। यही तपश्चर्या भी हैं। यदि प्रयत्न पूर्वक मन को साध लिया गया तो वह वश में हुआ मन देवता के समान प्रतिज्ञ कर देने वाला बन जाता हैं। ऐसा सुसंयत मन जिसके पास हैं उसे इस संसार में किसी वस्तु की कमी नहीं रहती, उसे विश्वविजयी ही माना जाता हैं।
इन्द्रिय-निग्रह की उपयोगिता।
आत्म संयम की साधना का प्रारंभिक कदम ‘इन्द्रिय निग्रह’ हैं । यों ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच मानी जाती हैं पर उनमें दो ही प्रधान हैं। (1) स्वादेन्द्रिय (2) कामेन्द्रिय । इनमें से स्वादेन्द्रिय प्रधान हैं, उसके वश में आने से कामेन्द्रिय भी वश में आ जाती हैं। जीभ का स्वाद जिसने जीता वह विषय वासना पर भी अंकुश रख सकेगा। चटोरा आदमी ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकता, उसे सभी इन्द्रियाँ परेशान करती हैं। विशेष रूप से काम वासना तो काबू में आती ही नहीं। इसलिए इन्द्रिय निग्रह की तपश्चर्या स्वाद को-जीभ को वश में करने से आरंभ की जाती हैं।
अन्न, शाक और दूध में उतना नमक और उतनी शक्कर मौजूद है जितनी स्वास्थ्य-रक्षा के लिए उपयुक्त एवं आवश्यकता हैं। सृष्टि के सभी प्राणी स्वाभाविक आहार में से ही अपनी नमक, शक्कर की आवश्यकता पूरा करते हैं कोई भी जीव-जन्तु ऐसा नहीं हैं जो अलग से इन चीजों को अपने स्वाभाविक भोजन में सम्मिलित करता हो। मनुष्य ही एक ऐसा विलक्षण जीव हैं जिसने प्रकृति प्रदत्त स्वाभाविक भोजन को नमक और शक्कर से चटपटा करके ऐसा बना दिया है जिससे न तो भोजन की उपयुक्तता का पता चलता हैं और न मात्रा का । स्वाद ही स्वाद में जीभ धोखा खाती रहती है। अखाद्य पदार्थों को अनावश्यक मात्रा में उदस्य करती रहती हैं। फलस्वरूप हमें अपने आरोग्य और दीर्घजीवन की वलि इस चटोरेपन की वेदी पर चढ़ानी पड़ती है। यदि भोजन में नमक और शक्कर न मिलाया जाय, मसाले न डाले जायें तो वह अपने स्वाभाविक रूप में रहेगा । फिर यह पहचानना सरल होगा कि कौन भोजन उपयुक्त हैं, कौन अनुपयुक्त? अभी तो पाक −कला के आधार पर माँस जैसे घृणित, दुर्गन्धित और सर्वथा हानिकारक पदार्थ तक को मिर्च मसालों के बल पर स्वादिष्ट बना लिया जाता है और बेचारा मुख यह परीक्षा भी नहीं कर पाता कि यह खाद्य है या अखाद्य । यदि मसाले न पड़ें तो जीभ उसके वास्तविक गुण दोषों को जान लेगी और तब मास को गले से नीचे उतार सकना कठिन होगा। इसी प्रकार पेट भर जाने पर भी स्वाद ही स्वाद में जो ठूँसा ठाँसी होती हैं वह भी रुक जाएगी और आरोग्य के मार्ग में खड़ी हुई एक सबसे बड़ी बाधा दूर हो जाएगी।।
अस्वाद व्रत का महत्व
आरोग्य ही नहीं, मन को वासना सक्त होने से रोकने की दृष्टि से भी यह आवश्यक हैं कि स्वादेन्द्रिय पर अंकुश लगाया जाय। इस दृष्टि से नमक और मीठा दोनों को ही छोड़ देना अच्छा रहता हैं। यह निराधार भय है कि इससे स्वास्थ्य खराब हो जाएगा । सत्य तो यह है कि इस संयम से पाचन क्रिया ठीक होती हैं, रक्त शुद्ध होता हैं, इन्द्रियाँ सशक्त रहती हैं, तेज बढ़ता हैं और जीवन-काल बढ़ जाता हैं। इनसे भी बढ़ा लाभ यह है कि मन काबू में आता हैं। चटोरेपन को रोक देने से वासना पर जो नियंत्रण होता है वह धीरे-धीरे सभी इन्द्रियों को वश में करने वाला सिद्ध होता हैं। जिस प्रकार पाँचों ज्ञानेन्द्रियों में स्वादेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय ही प्रबल हैं, उसी प्रकार स्वाद के षट् रसों में नमक और मीठा ही प्रधान हैं। चटपटा, खट्टा, कसैला आदि तो उनके सहायक रस मात्र हैं। इन दो प्रधान रसों पर संयम प्राप्त करना षट् रसों को त्यागने के बराबर ही हैं। जिसने स्वाद और काम-प्रवृत्ति को जीता उसकी सभी इन्द्रियाँ वश में हो गई । जिसने नमक, मीठा छोड़ा, उसने छहों रसों को त्याग दिया, ऐसा ही समझना चाहिए। मन को वश में करने के लिए यह संयम-साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी ही होती हैं।
हमें भी इस दिशा में एक कदम उठाना ही चाहिए। आरम्भ में वह छोटा हो तो भी हर्ज नहीं। सप्ताह में एक दिन अस्वाद व्रत रखना किसी के लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए। रविवार या गुरुवार के दिन इसके लिए अधिक उपयुक्त हैं। उस दिन जो भी भोजन किया जाय उसमें नमक मीठा मिला हुआ न हो। उबले हुए आलू, टमाटर, दही, दूध उबले हुए अन्य शाक, बिना नमक, मसाले की अलौनी दाल आदि क साथ रोटी खा लेना बिलकुल साधारण सी बात हैं। दो चार बार चटोरापन की पुरानी आदत के अनुसार अखरेगा तो सही पर सन्तोष और धैर्य पूर्वक उस भोजन को भूख बुझाने जितनी मात्रा में आसानी से खाया जा सकेगा। दो चार बार के अभ्यास से तो वह अलौना भोजन ही स्वादिष्ट लगने लगेगा। अलौनेपन का अपना एक अलग ही स्वाद है और वह जिन्हें पसन्द आ जाता है उन्हें दूसरे स्वाद रचते ही नहीं।
आत्मिक और लौकिक दोनों ही लाभ
अस्वाद-व्रत अपने आप में एक महान् व्रत हैं। महात्मा गाँधी ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की हैं और अपने सप्त महाव्रतों में इसे प्रमुख स्थान दिया हैं। सप्ताह में एक दिन भी इसे पालन किया जाय तो मन की संयम शक्ति और दृढ़ता बढ़ती हैं। यह बढ़ोत्तरी धीरे-धीरे मनुष्य में उन गुणों का भी विकास कर देती हैं जो महान् पुरुषों में होने ही चाहिये। अस्वाद-व्रत के दिन यदि एक ही समय भोजन किया जाय तो और भी उत्तम हैं। इससे पेट को विश्राम मिलेगा और राष्ट्र की खाद्य समस्या सुलझाने के लिए अन्न की मितव्ययिता का देशभक्ति पूर्ण सत्कर्म भी सहज ही बन पड़ेगा। दोपहर को भोजन लिया जाय, इसके अतिरिक्त सवेरे या रात को भूख लगे तो दूध, छाछ आदि कोई पतली चीज ली जा सकती हैं। दोपहर के भोजन में भी अनेक कटोरियाँ सजाने की अपेक्षा यदि रोटी के साथ शाक, दाल, दही , आदि में से कोई एक ही वस्तु लगा कर खाने के लिए रखी जाय तो और भी उत्तम हैं ।एक साथ अनेक प्रकार की चीजें खानें से पाचन क्रिया बिगड़ती हैं, यह सर्वविदित तथ्य हैं । स्वाद के लिए ही लोग नाना प्रकार के व्यंजन बनाते और थाल सजाते हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से तो जितनी कम चीजें एक साथ खाई जाय उतना ही पाचन ठीक होता हैं। इसलिए स्वास्थ्य की दृष्टि से भी और समय की दृष्टि से भी रोटी के साथ एक ही वस्तु लगाने के लिए रखी जाय तो अधिक उपयुक्त हैं।
विवेकपूर्ण उपवास
यह अस्वाद-व्रत जिसमें एक समय, एक ही लगावन के साथ रोटी खाई जाय उस रुढ़िमात्र के उपवास से हजार गुना उत्तम है जिसमें केवल अन्न छोड़ा जाता है और नाना प्रकार के मिष्ठान, कूटू सिंघाड़ा आदि के पकवान, चाट पकौड़ी, सेंधा नमक और काली मिर्च से भरपूर बनाकर साधारण दिन से भी अधिक मात्रा में उदरस्थ किये जाते हैं। कुछ लोग अन्नाहार त्याग कर अरबी, शकरकंद, खीरा, सड़े या कच्चे सस्ते फल आदि पेट में गड़बड़ी उत्पन्न करने वाली सस्ती चीजें उपवास में खा जाते हैं इससे उन्हें उलटी हानि उठानी पड़ती हैं ।उपवास ही करना हो तो उसके लिए दूध या छाछ पर रहना चाहिए। फल लेना हो तो सुपाच्य और ठीक प्रकार पके हुए देख परख कर ही उन्हें लेना चाहिए। अविवेकपूर्ण फलाहार से उपवास का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता, करना हो तो उसे विचार पूर्वक ही करना चाहिये। अन्यथा एक समय भोजन का उपयुक्त विधि से किया हुआ अस्वाद व्रत भी एक प्रकार का उपवास ही हैं। उपवास किसी भी प्रकार का क्यों न हो उसमें अस्वाद व्रत का समावेश अवश्य होना चाहिए।
पाप-प्रायश्चित्त के तप-व्रत
हम इस वर्ष साप्ताहिक अस्वाद-व्रत से अपनी संयम-साधना आरंभ करें। आगे क्रमशः इसका विकास करते हुए अन्य इन्द्रियों को तथा मन का वशवर्ती बनावें। यह संयम-साधना किसी समय चांद्रायण आदि व्रतों के उपयुक्त भी हमारी मनोभूमि को बना सकती हैं, जिसके आधार पर इस जन्म के किये हुए सब पापों का प्रायश्चित्त करके अगले जन्म के लिए कोई बुरा प्रारब्ध योग शेष न रहने देने का भी महान् पुरुषार्थ कर सकते हैं। इस जन्म में हमें पिछले प्रारब्ध भुगतने पड़ रहे हैं। पिछले सब प्रारब्ध इस जन्म में भुगत जावे इसी हिसाब से यह जन्म मिलता हैं। यदि हम पिछले प्रारब्ध भुगत लें और अगले जन्म के लिए नये प्रारब्ध बनने न दें तो सब बन्धनों से सहज ही छुटकारा मिल सकता हैं। अस्वाद व्रत को आरम्भ करके परिपुष्ट हुई मनोभूमि कभी इस योग्य भी हो सकती हैं कि कष्टसाध्य प्रायश्चितों के द्वारा इस जन्म क प्रारब्धों को भी इसी जन्म में भुगत लेने का साहस उत्पन्न हो जावे। यदि इस सरल और शुभ आरंभ को श्रद्धा पूर्वक आगे बढ़ाया जा सका तो स्वजनों को भव बन्धनों से पार होने की प्रायश्चित्त साधना भी घर में रह कर ही बन सकेगी और तब जीवन लक्ष प्राप्त कर सकना कुछ भी कठिन न होगा। अन्नमय-कोश को शुद्ध करने एवं जीतने के लिए अन्न की शुद्धि आवश्यक है। इस संबंध में धीरे 2 अभ्यास डालते हुए अन्न शुद्धि की उस महान् प्रक्रिया को भी पूर्ण किया जा सकेगा जिस पर मन की शुद्धि निर्भर है। अभी पहला कदम तो हमें साप्ताहिक अस्वाद व्रत के सरल आधार पर ही उठाना चाहिए।
महत्व की बात यह नहीं हैं कि हमने कितने लोगों की सेवा की। निरहंकार सेवा हुई या नहीं, सेवा का मूल्य इसी से आँका जाता है। संख्या अल्प होते हुए भी अगर उसका छेद शून्य हो तो उसका मूल्य अनन्त हो जाता हैं। उसी प्रकार अल्प सेवा को भी निरहंकारिता का छेद प्राप्त होने से उस मूल्य अनन्त हो जाता है। यथार्थ सेवा से सन्तोष की मात्रा बढ़ती हैं। उस संतोष से, सेवा वास्तविक है या आभासात्मक, यह जाना जा सकता है-विनोबा
हाड़, माँस के शरीर की दृष्टि से मनुष्य अत्यन्त ही तुच्छ हैं। उसके सुन्दर जो कुछ विशेषता है वह उसकी आन्तरिक चेतना ही है। विचार और विवेक का पूँजी के बल पर ही उसे सृष्टि का सर्वोत्तम जीव कहलाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस पूँजी को जिसने जितनी अधिक मात्रा में एकत्रित कर लिया वह उतना ही अधिक मात्रा में महानता उपलब्ध करता है । विचारों के अभाव में अविकसित मस्तिष्क के लोग निम्न-स्तर का जीवन-यापन करते हैं। अनेक व्यक्ति पशुओं की तरह दीन-हीन स्थिति में पड़े हुए मौत के दिन पूरे करते रहते हैं। पशुओं जैसा कोई ढर्रा उनके जीवन का भी चल पड़ता है और वे उसी चरखी को चलाते 2 किसी प्रकार जिन्दगी काट लेते हैं। गिरी हुई स्थिति के लोगों को यदि ध्यानपूर्वक विश्लेषण किया जाय तो उनमें प्रगतिशील मनुष्यों की अपेक्षा शारीरिक दृष्टि से कोई विशेष अन्तर नहीं होता, बहुत बार तो उनकी देह उच्चस्तर के लोगों की अपेक्षा भी अधिक सुदृढ़ और सक्षम होती है। पर वे मानसिक विकास अभाव में उस देह का पशुओं जैसा परिश्रम करते रहने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं उठा पाते।
विचार-धन का अक्षय कोष
कई लोगों में मानसिक प्रतिभा जन्मजात भी होती है, पर अधिकांश में उसका विकास अपने प्रयत्नों पर ही निर्भर हैं। जो लोग आज उच्च कोटि की शिक्षा प्राप्त करके उच्च स्थानों पर बैठे हुए हैं− निर्माण, शासन, नेतृत्व, अन्वेषण, शिक्षण, चिकित्सा आदि महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं, वे जन्म से ही ऐसे पैदा नहीं हुए वरन् उनने अपनी प्रतिभा का क्रमिक विकास किया है। आरंभ में उनका बौद्धिक-स्तर भी सामान्य बालकों जैसा ही था, पर निरन्तर शिक्षा प्राप्त करने का कार्यक्रम बनाकर वे दिन-दिन अधिक बुद्धिमान बनते गये और आज अपने उस बुद्धि, बल का समुचित लाभ उठा रहे हैं। दूसरी ओर वे लोग हैं जिनने इस दिशा में कुछ भी प्रयत्न नहीं किया जहाँ थे वही बने रहे। बौद्धिक विकास का न उनने महत्व समझा और न उसके लिए प्रयत्न किया। यदि उनकी आकांक्षा इस दिशा में जगती तो निश्चय ही रास्ता भी मिलता, साधन भी जुटते और सहायक भी मिल जाते, पर जब इच्छा ही जागृत नहीं हुई, बुद्धिबल का महात्म्य ही समझ में न आया तो यह सब संभव भी कैसे होता। धनी और अमीरों तक के अनेक बालक उजड्ड हैं पर बौद्धिक विकास का महत्व उनकी समझ में नहीं आता, फलस्वरूप वे शौक-मौज में, क्रीड़ा विनोद में, आलस्य-प्रमाद में लगे रहते हैं। शिक्षा की प्रचुर सुविधा होते हुए भी वे उससे लाभ नहीं उठाते और गँवार के गँवार रह जाते हैं । इसके विपरीत अत्यन्त निर्धन स्थिति में उत्पन्न हुए बालक भी अपनी आकांक्षा को पूरा करने के लिए कुछ प्रयत्न करते हैं तो उन्हें उन्नति के साधन भी मिल जाते हैं और कष्टसाध्य परिस्थितियों को पार करते हुए धीरे-धीरे वे उन्नति के उच्च शिखर तक भी जा पहुँचते हैं।
बौद्धिक पूँजी की श्रेष्ठता
हममें से हर एक को यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि मानव-जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा उसकी बौद्धिक पूँजी ही हैं। रुपया-पैसा सोना-चाँदी जमीन-जायदाद व्यापार-उद्योग आदि सभी बड़े दुर्बल साधन हैं। इनसे रोटी की समस्या भले ही हल हो जाया पर और कोई महत्व इनसे मिलने वाला नहीं हैं। फिर इनका आर्थिक स्थायित्व भी तो बहुत स्वल्प हैं। कोई मूर्ख उत्तराधिकारी अपने पूर्वजों की संचित विशाल सम्पत्ति को भी थोड़े दिन की बेवकूफी यों में ही स्वाहा कर सकता है। फिर कोई दैवी प्रकोप या आकस्मिक दुर्घटना भी उस सबको एक-दो झटकों में ही समाप्त कर सकती हैं। दौलत को चंचलता कहते हैं, आज है तो कल भी बनी ही रहेगी इसका कोई निश्चय नहीं। स्थिर वस्तु को बौद्धिक पूँजी ही है जो इस जन्म में भी उन्नति के उच्च-शिखर तक ले जाती हैं और संस्कार रूप से जीव के साथ अगले जन्म में भी जाती हैं जिसके बल पर वह आसानी से वहाँ भी पर्याप्त बुद्धिबल प्राप्त कर लेता हैं। लौकिक जीवन में सुख-सम्पत्ति उपलब्ध करने के लिए समृद्धि और सफलता प्राप्त करने के लिए शिक्षा का महत्व एक स्वर से स्वीकार किया जाता है। कोई भी महत्त्वपूर्ण कार्य उन्हीं के कन्धों पर आता हैं जो सुशिक्षित हैं। बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े हुए, अशिक्षित लोग, शारीरिक श्रम के सहारे ही पेट पालने और अपनी स्थिति बनाये रखने में समर्थ होते हैं इसलिए कोई भी विचारशील व्यक्ति जब लौकिक जीवन को सुसम्पन्न बनाने की बात सोचता है तब उसे शिक्षा की आवश्यकता अनिवार्यतः प्रतीत होती हैं। चाहे स्कूली शिक्षा हो, चाहे शिल्प व्यापार आदि की, उसकी हर हालत में आवश्यकता होती ही है। बिना ज्ञान वृद्धि किये भला कोई किस प्रकार कुछ उन्नति कर सकेगा।
स्वाध्याय और सत्संग
अध्यात्म मार्ग में भी बिलकुल यही समस्या रहती हैं। स्वाध्याय और सत्संग, चिंतन और मनन, इन चार आधारों पर मानसिक दुर्बलता को हटाना और आत्मबल बढ़ाना निर्भर रहता हैं। इसके बिना न मन की जड़ता जाती हैं और न संकीर्णता, गंदगी मूढ़ता, विषयासक्ति आदि से छुटकारा मिलता है। शास्त्रों में सत्संग की बड़ी महिमा गाई गई हैं। उसकी तुलना पारस मणि से हुई है। स्वाध्याय को एक अनिवार्य दैनिक धर्म, कर्तव्य माना गया है और लिखा है कि जिस दिन स्वाध्याय नहीं किया जाता उस दिन मनुष्य चाण्डाल तुल्य अपवित्र हो जाता है। चिन्तन और मनन को तो एक प्रकार से योग साधना में ही सम्मिलित कर लिया गया हैं। कहा गया है कि-मनन और चिन्तन के बिना न आत्म साक्षात्कार होता हैं और न ईश्वर ही मिलता हैं। ठीक भी हैं, उसकी मनोभूमि उड़ता से जकड़ी हुई हैं उसमें आत्मा और परमात्मा का चैतन्य-तत्त्व प्रवेश भी कैसे करेगा? आत्म कल्याण के लिए भजन, ध्यान, जप, तप, कथा-कीर्तन व्रत, दान, तीर्थ, पूजा, पाठ आदि की आवश्यकता मानी जाती हैं। इन्हीं के आधार, पर लोग स्वर्ग और मुक्ति की आशा करते हैं। पर इनमें सबसे अधिक महत्व की साधना आत्म-शिक्षण की हैं। उसके अभाव में सारे धर्म-कृत्य एक रूढ़ि मात्र रह जाते हैं और उनका फल आशा की अपेक्षा बहुत ही स्वल्प मात्रा में उपलब्ध होता हैं। यह एक सुनिश्चित तथ्य हैं कि मनुष्य जिस प्रकार के विचारों में डूबा रहता हैं उसी ढाँचे में उसकी चेतना ढलने लगती हैं। यदि विचारधारा पलट जाय तो मनुष्य की जीवन-दिशा भी पलट जाती हैं । कोई भी सत्कर्म या दुष्कर्म शरीर द्वारा अनायास ही नहीं बन पड़ता, वरन् उस प्रकार के विचार बहुत पहले से मस्तिष्क में घूमते रहते हैं और जब वे पूर्णतः परिपुष्ट हो जाते हैं तभी वह स्थिति आती हैं जिसमें कोई भला बुरा काम बन पड़े। जिसे अपने जीवन को आध्यात्मिक बनाना हो उसे सबसे पहले अपने मस्तिष्क में काफी गहराई तक उसी प्रकार के विचारों की जड़े जमानी पड़ती हैं। धर्म और अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप इस दृष्टि से स्वाध्याय और सत्संग प्रत्येक श्रेयार्थी के लिए अनिवार्य माना गया हैं, सत्संग की समस्या आज कल बड़ी विकट हैं ।धर्म और अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप आज लगभग लुप्त हो चुका हैं। पुरुषार्थहीन, कर्तव्यघाती, भाग्यवादी, आलसी बनाने वाली शिक्षा ही आज धर्म और अध्यात्म के नाम पर जहाँ तहाँ दी जाती हैं । ऐसे ही सत्संगों की दुकानें जहाँ-तहाँ लगी दीखती हैं, जहाँ किसी न किसी बहाने लोगों की जेबें तो खाली करा ली जाती है पर बदले में ऐसे रद्दी विचार गले मढ़ दिये जाते है जिन्हें अपनाने से उलझने सुलझने की अपेक्षा और अधिक बढ़ जाती हैं। उत्थान के स्थान पर पतन पल्ले पड़ता हैं। ऐसे सत्संग लाभ की अपेक्षा हानिकर ही अधिक सिद्ध होते हैं। उनमें जाना समय गँवाना ही नहीं, सड़े गले विषैले भोजन की तरह एक निकम्मी चीज अपने पल्ले बाँध लेना भी हैं।
संसार में ऐसी आत्माएँ भी हैं जिनके सान्निध्य से, सत्संग से अपना बहुत भला हो सकता हैं । पर ऐसे लोग अपने पास ही हों यह आवश्यक नहीं। फिर व्यवस्थित व्यक्तियों के पास समय का अभाव भी रहता है। रोज ही घंटों अपने विचार हमें हमारी सुविधा के समय और स्थान पर सुनाने आ सकें यह भी संभव नहीं। फिर उनका अपने यहाँ आना, तथा अपना उनके दूरस्थ स्थानों पर नित्य जाना भी कठिन हैं इसलिए चुने हुए सुलझे हुए व्यक्तियों का सत्संग कभी यदा कदा ही मिल जाय तो उसे पर्याप्त मान का स्वाध्याय को ही सत्संग भी मान लेना चाहिए और उसी को सुव्यवस्थित बनाना चाहिए।
मानसिक शुद्धता का आधार
पूजा, स्नान और भोजन आदि की तरह स्वाध्याय भी हमारा नित्य कर्म होना चाहिए। अपने चारों ओर फैले हुए विषाक्त वातावरण का दूषित प्रभाव रोज ही हमारे मन पर पड़ता है। उसकी सफाई करने के लिए नित्य ही स्वाध्याय आवश्यक हैं। वर्तन अपने आप ही धूलि, हवा और ऋतु के प्रभाव से मैले होते रहते हैं, उन्हें रोज ही माँजना पड़ता हैं। कमरे में रोज ही धूलि जम जाती हैं से रोज ही बुहारना पड़ता हैं। दाँत रोज मैले होते हैं सो रोज ही मंजन की जरूरत होती हैं। त्वचा से पसीना निकलकर रोज ही शरीर तथा कपड़ों में मलीनता उत्पन्न करता हैं सो रोज ही उन्हें धोया जाता हैं। यह सब काम रोज करने के हैं। जितने दिन इन्हें न किया जायेगा उतनी ही गन्दगी बढ़ती जाएगी । मन का भी यही हाल हैं। उसे स्वाध्याय द्वारा रोज ही न माँजा धोया गया तो वह दिन दिन अधिक गन्दा और मलीन होता जाएगा । और अन्त में वह इतना दूषित हो जाएगा कि थोड़ा सा पूजा भजन भी वहाँ कुछ शुद्ध वातावरण पैदा न कर सकेगा। इसलिए स्वाध्याय की उपेक्षा कदापि न की जानी चाहिए। दैनिक नित्य कर्म में उसके लिए अनिवार्य रूप से स्थान रखना चाहिए।
मनोभूमि का सुधार और विकास
स्वाध्याय और उद्देश्य हमारी मानसिक स्थिति का सुधार, निर्माण और विकास करना है। इसके लिए ऐसा साहित्य चाहिए जो उपर्युक्त आवश्यकता को भली प्रकार पूर्ण कर सके। इसके लिए ऐसे साहित्य का चुनाव करना नितान्त आवश्यक हैं जिसमें हमारी आत्मिक समस्याओं का आज की स्थिति को ध्यान में रखते हुए सही सुलझाव प्रस्तुत किया गया हो। स्वाध्याय सत्संग के नाम पर कोई भी प्राचीन काल में लिखी हुई मोटी किताब तोता रटंत की तरह रोज रोज पाठ करते रहने से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। कई लोग स्वाध्याय का अर्थ यही समझने हैं कि संस्कृत भाषा की या किसी संत महात्मा की लिखी हुई प्राचीन पुस्तक पढ़ लेने मात्र से पाठ या स्वाध्याय का पुण्य मिल जाएगा । यह मान्यता भ्रम मात्र है। तोता रटंत जैसे पाठ मात्र से स्वाध्याय का उद्देश्य किसी भी प्रकार पूर्ण नहीं होता। इसके लिए वही चुनी हुई पुस्तकें चाहिए जो हमारी जीवन की विविध समस्याओं को आध्यात्मिक दृष्टि से सुलझाने में व्यवहारिक मार्ग दर्शन करें और हमारी सर्वांगीण प्रगति को उचित प्रेरणा देकर अग्रगामी बनावें। आत्मिक-विकास के लिए आत्म-शिक्षण आवश्यक हैं। इसके लिये स्वाध्याय और सत्संग ही दो मार्ग हैं। इनमें से आज की परिस्थितियों में हमारे लिए स्वाध्याय ही सरल और सम्भव हैं। उसी के द्वारा दूरस्थ, स्वर्गवासी या दुर्लभ महा पुरुषों का सत्संग किसी भी स्थान पर कितनी ही देर तक और अपनी सुविधा के किसी भी समय प्राप्त किया जा सकता हैं। उच्च कोटि के विचारों की पूँजी अधिकाधिक मात्रा में जमा जिये बिना हम न ता अन्तःकरण को शुद्ध कर सकते हैं और न उच्च-मार्ग पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए इसे साधना का एक अनिवार्य अंग मानकर स्वाध्याय को अपने है
मनोमय कोश का परिष्कार
अन्नमयकोश के बाद आत्मा का दूसरा आवरण मनोमय कोश हैं। मन को शुद्ध बनाने के लिए सद्विचारों की नियमित धारणा ही एकमात्र उपाय हैं। इसे शिक्षित लोग पुस्तकें पढ़कर और अशिक्षित लोग दूसरों से सुनकर पूरा कर सकते हैं। जिस प्रकार शरीर की शुद्धि स्नान से होती हैं उसी प्रकार मन की शुद्धि सद्विचारों में निमग्न रहने से होती हैं। यह स्थिति अशिक्षित लोगों को सत्संग से और शिक्षितों को स्वाध्याय से-पढ़ने से-आसानी से प्राप्त हो सकती हैं। पढ़कर या सुनकर, नेत्र मार्ग से या कान मार्ग से जैसे भी बन पड़े सद्विचारों को अपनी मनोभूमि में प्रवेश करते रहने का नियमित कार्य-क्रम बनाना ही चाहिए। आत्मोन्नति के मार्ग में यह आत्मशिक्षण का-मानसिक परिष्कार का स्वाध्याय साधन नितान्त आवश्यक हैं। मनोमय कोश का प्रधान आधार यही हैं। गुरु की शरण में इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए जाने का विधान शास्त्रकारों ने किया हैं। भौतिक विचारों ने हमारे मस्तिष्क में बुरी तरह अंगा जमाया हुआ होता हैं। सारी विचार धारा प्रायः उन्हीं के कब्जे में रहती हैं। मन में जब भी कुछ विचार उठें उनमें भौतिक आकांक्षाएँ एवं योजनाएँ ही भरी मिलेंगी। शरीर मन का दास है ।मन जैसा कुछ सोचेगा शरीर वैसा ही करेगा यदि हमारा शरीर निरंतर भौतिक कार्यों में ही लगा रहता है आध्यात्मिक कार्यों में रुचि नहीं लेता या अवकाश नहीं पाता तो उसका ही कारण है कि मन में अध्यात्म भावना को बहुत ही स्वल्प स्थान मिला हैं ।यदि मस्तिष्क में भौतिक समस्याओं की भाँति, आध्यात्मिक समस्याओं को भी स्थान और महत्व मिला होता तो निश्चय ही हमारी क्रियाऐं और चेष्टाएँ भी आध्यात्मिक दिशा में प्रभावपूर्ण मात्रा में रही होती और हम जहाँ हैं उसकी अपेक्षा कहीं अधिक ऊँचे आध्यात्मिक स्तर पर पहुँच चुके होते है।
ऊर्ध्व-गमन का सत्प्रयत्न
आज मन पर पूरी भौतिक आकांक्षाओं का अधिकार हैं। उस कम करना है और वहाँ आध्यात्मिक अभिरुचि को भी स्थान दिलाना हैं। तभी तो शरीर और बुद्धि की चेष्टाएँ आत्मोन्नति की ओर झुकेंगी। भौतिक विचार धाराएँ तो संसार में सर्वत्र भरी पड़ी हैं, हमारे सब संगी साथी भी उसी में आकंठ डूबे पड़े हैं, इन्द्रियाँ भी उसी में रुचि लेती हैं, इसलिए उस दिशा में मन तो स्वतः ही खिंचा रहता हैं । नीचे की दिशा में तो पानी अपने आप ही बिना किसी चेष्टा के बहने लगता है, कठिनाई उसे ऊपर पहुँचाने में होती है। मन का स्तर ऊर्ध्वगामी हो इसके लिए जिन विचार धाराओं की आवश्यकता है वे संसार में स्वाभाविक रूप से सरलता पूर्वक नहीं मिलती वरन् उन्हें प्राप्त करने के लिए दो विशेष प्रयत्न करने होते हैं। वे प्रयत्न हैं स्वाध्याय और सत्संग। शिक्षा और कुछ आर्थिक दृष्टि से जिन्हें थोड़ी अनुकूलता प्राप्त हैं वे स्वाध्याय आसानी से कर सकते हैं। अच्छा साहित्य वे पुस्तकालयों से लेकर था खरीद कर अपनी इस आध्यात्मिक आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं। पर अशिक्षित लोगों के लिए, स्त्री बच्चों के लिए वह कठिन हैं और उनके लिए भी कठिन हैं जिनका मन पढ़ने में लगता ही नहीं। ऐसे लोगों के लिये सत्संग ही एक मात्र उपाय रह जाता हैं। पर भारी कठिनाई यह है कि आज सर्वत्र नकली अध्यात्म का बोल वाला है। उसी के सत्संग भी जहाँ तहाँ देखे सुने जाते हैं। उनसे मनुष्य की कर्तव्यनिष्ठा घटती और मूढ़ता बढ़ती है। इसलिए असली अध्यात्म के सत्संग का अभाव दूर करना उन लोगों का परम पवित्र कर्तव्य हैं जिन्हें सत्य की शिक्षा में उन्मुख होने असली अध्यात्म को समझने में अवसर मिला हैं। उस लाभ से उन लोगों को लाभान्वित करना जो स्वाध्याय का लाभ नहीं उठा पाते एक अत्यन्त ही उच्चकोटि का पुण्य हैं। इस ज्ञानयज्ञ की बराबर शुभ कार्य इस संसार में और कुछ हो नहीं सकता।
ज्ञान-मन्दिर-एक पुनीत सेवा-केन्द्र
एक छोटा आध्यात्मिक पुस्तकालय ज्ञान मंदिर हममें से हर एक बड़ी आसानी से अपने घर में चला सकता हैं। हमें स्वाध्याय के लिए कुछ साहित्य इकट्ठा करना ही पड़ेगा। उसे ही व्यवस्थित एवं सुसज्जित पुस्तकालय का रूप देकर घर की एक आलमारी में रखा जा सकता है और कम से कम पाँच व्यक्ति ऐसे आसानी से तलाश किया जा सकते हैं जो उस पुस्तकालय के निःशुल्क सदस्य हों। आप प्रयत्न पूर्वक उन्हें पढ़ने की प्रेरणा दें। कभी-कभी उनके घर जाकर अपनी पुस्तकें पढ़ने के लिए देने और यदि वे वापिस न लायें तो ने के लिए भी उनके घर पर जाया करें। साथ ही उस पुस्तक को आधार मानकर कुछ ज्ञान चर्चा भी छेड़ दिया करें। इस प्रकार एक छोटा स्वाध्याय मंडल बनाकर थोड़े ही प्रयत्न में नन्हा-सा किन्तु बहुत ही महत्त्वपूर्ण ज्ञानयज्ञ चलाया जा सकता हैं।
गायत्री परिवार की शाखाओं के लिए साप्ताहिक सत्संग चलाना एक आवश्यक कर्तव्य बताया गया था। क्योंकि विचारों का विस्तार एवं पोषण इसी आधार पर संभव हो सकता हैं। जो शाखाएँ साप्ताहिक हवन करने का प्रबंध नहीं कर सकती वे दीपक, धूपबत्ती को यज्ञ का प्रतीक मानकर कीर्तन और भजन से शुभारम्भ करके सत्संग चला सकती हैं। ऐसी व्यवस्थायें सामूहिक रूप से जहाँ हो रही हैं वहाँ हममें से प्रत्येक को उसमें भाग लेकर तथा अन्य लोगों को उनमें बुलाकर ले जाने की चेष्टा से उस व्यवस्था को बढ़ाना चाहिए। जहाँ ऐसी पूर्व उस व्यवस्था को बढ़ाना चाहिए। जहाँ ऐसी पूर्व व्यवस्था नहीं चल रही वहाँ रामायण कथा आदि का नियमित कार्य-क्रम चला कर उसके माध्यम से ज्ञान चर्चा या सत्संग का आयोजन हममें से कोई भी कर सकता हैं। कुछ सुनने वाले तो आने ही लगेंगे। प्रयत्न करने से उनकी संख्या बढ़ती भी रह सकती हैं। अपने घर के सदस्यों को रात के समय इकट्ठे करके कथा कहानी सुनाने के माध्यम से उन्हें रुचिकर सत्संग का लाभ दिया जा सकता हैं, अखंड ज्योति में इस दृष्टि से संक्षिप्त कथा प्रसंग अब छपते भी हैं। उन्हें रोचक ढंग से बढ़ाकर घर के लोगों को रोज एक-दो कथा सुनाने का क्रम बना लिया जाय तो वह अपने परिवार के लिए एक अच्छा सत्संग आयोजन हो सकता हैं और उसका प्रभाव दूसरों को उच्च मार्ग में प्रेरणा देने की दृष्टि से अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण सिद्ध हो सकता हैं। थोड़ा सा आलस त्याग कर यदि हम प्रयत्न करे तो अपने एक छोटे से क्षेत्र में ज्ञान का आयोजन कर सकते हैं। स्वाध्याय और सत्संग का लाभ दूसरों को दे सकते हैं।
छोटा किन्तु महान् कदम
पंच कोशी साधना क्रम में आत्म शिक्षण की महत्त्वपूर्ण स्थिति हैं। अन्नमय कोश की शुद्धि के साथ साथ मनोमय कोश का भी उत्कर्ष करना हैं उसके लिए मनोमय कोश का भी उत्कर्ष करना हैं। उसके लिए मन में से भौतिकवादी विचार धारा कम करने और आध्यात्मिक भावनाएँ भरने का ही एक मात्र उपाय बताया गया हैं। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग दो प्रमुख आधार हैं। उपरोक्त योजना के अनुसार हम अपने लिए इस आवश्यकता की पूर्ति करें और दूसरों के लिए उच्च कोटि की सेवा के रूप में भी इसे अपनाये। इसमें स्वार्थ और परमार्थ दोनों का महत्त्वपूर्ण समन्वय हैं। अन्नदान से ब्रह्मदान का पुण्य सौ गुना अधिक माना गया हैं। किसी को धन देकर उसकी उतनी भलाई नहीं की जा सकती जितनी उसे सन्मार्ग पर चला देने से होती है। अपने आपको और दूसरों को सन्मार्ग पर चला सकने के लिए आवश्यक ज्ञान साधन प्रस्तुत करना निश्चित रूप में ब्रह्म कर्म हैं। इस ब्रह्मकर्म में सम्पूर्ण जीवन रहने के कारण प्राचीन काल में ब्राह्मण पूज्य और श्रेष्ठ माने जाते थे। भौतिकवादी शिक्षा के लिए राजकीय प्रयत्न विशाल पैमाने पर चल रहे हैं। आध्यात्मिक शिक्षा का ब्रह्मकर्म हमें स्वयं ही आयोजित करना होगा। इसकी उपेक्षा करने से न व्यक्ति का कल्याण होगा न राष्ट्र का। इसलिए भले ही छोटे पैमाने पर ही, पर ज्ञान की मशाल जलाने के लिए हमें भी एक कदम आगे उठाना ही पड़ेगा।
स्वाध्याय के लिए ऐसा साहित्य चुना जाना चाहिए जो हमारी आध्यात्मिक प्रगति के लिए बुद्धिसंगत एवं व्यवहारिक सुझाव उपस्थिति करता हो। ऐसा साहित्य चाहे आधुनिक लेखकों का लिखा हुआ हो चाहे प्राचीन लेखकों का। पुस्तक कब लिखी गई थी? इस प्रश्न का उसकी उपयोगिता से कोई संबंध नहीं हैं। प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में भी बहुत-सा अनुपयुक्त और अवांछनीय साहित्य में भी बहुत-सा अनुपयुक्त और अवांछनीय तत्त्व मौजूद हैं और आधुनिक हिन्दी साहित्य में भी अत्यन्त उच्चकोटि का वांग्मय उपलब्ध हैं। कोई कथा पुराण बार बार पढ़ते रहने से भी स्वाध्याय का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। देवताओं और अवतारों की लीलाओं के ग्रन्थ पढ़ने से यदि हमारी आज की समस्याओं को सुलझाने और अन्तःकरण को ऊर्ध्वगामी बनाने में कोई विशेष सहायता नहीं मिलती हो तो उसे स्वाध्याय के लिए चुनना उपयुक्त न होगा। प्रेरणा प्राप्त करने के लिए ही स्वाध्याय किया जाता हैं। जो पढ़ा जाय वह ऐसा हो जो हमारे हृदय और मस्तिष्क का मंथन कर सके, पतन के पथ पर बढ़ते हुए पैरों को बलपूर्वक रोक कर उत्थान की ओर हमारा मुँह मरोड़ कर मोड़ सके। ऐसा प्राणवान सजीव साहित्य पढ़ने से किसी को आत्मोन्नति का लक्ष प्राप्त करने में सहायता मिल सकती हैं।
सत्साहित्य का अभाव
आज ऐसे साहित्य का अभाव हैं। किताबों की दुकानों में वासना भड़काने वाला, किताबों की दुकानों में वासना भड़काने वाला, कुरुचि को उत्तेजना देने वाला साहित्य भरा पढ़ा हैं। बिकता भी वही हैं। धर्म पुण्य के नाम पर कुछ क्या पुराणों की पोथियाँ इसलिए बिकती है कि लोक उनका पाठ मात्र कर लेने से सीधे स्वर्ग जाने की-अक्षय पुण्य के भागी होने की-बात सोचते हैं। बहुत प्रयत्न करने पर ही सन्मार्ग की ओर प्रेरणा देने वाला विचारपूर्ण साहित्य कहीं-कहीं मिलता हैं लोगों की रुचि इधर नहीं हैं इसलिए लेखकों, प्रकाशकों और विक्रेताओं को इधर आकर्षण भी नहीं है।। जो ऐसी चीजों को प्रस्तुत करें । फिर भी सर्वथा अभाव नहीं हैं। प्रयत्न करने पर जीवन निर्माण करने वाला साहित्य भी कहीं न कहीं मिल जाता हैं। उसे ढूँढ़ना और प्राप्त करना चाहिए तथा स्वाध्याय उसी का करना चाहिए।
अखण्ड ज्योति को माध्यम से
इस दिशा में परिजनों को अधिक परेशानी न हो इसलिए अब अखण्ड ज्योति भी दैनिक स्वाध्याय के उद्देश्य को पूरा करने जा रही हैं भविष्य में उसकी एक-एक पंक्ति इसी उद्देश्य को ध्यान रखते हुए लिखी जाया करेंगी। अब तक उसमें यदा-कदा अन्य प्रकार के लेख भी छपा करते थे पर अब आत्मोन्नति की दिशा में जनसाधारण का मार्गदर्शन करना ही एकमात्र लक्ष होगा। आत्म-सुधार आत्म-निर्माण आत्म-विकास से सम्बन्धित तथ्यों को ही पत्रिका के पृष्ठों पर स्थान दिया जाया करेगा। स्वाध्याय के लिए उसे निस्संकोच चुना जा सकता हैं। सरसरी नजर से बहुत तेजी से के साथ एक सपाटे में बहुत कुछ पढ़ डालना वर्र्र्र्यर्थ हैं। किस्से कहानियों की किताबें इस दृष्टि में पढ़ी जा सकती हैं कथानक का घटनाक्रम जल्दी ही जान लेने की उत्सुकता में लोग बड़ी तेजी से कहानियाँ तथा उपन्यास पढ़ते हैं। वहाँ यह बात भले ही ठीक हो पर आत्म-निर्माण के लिए स्वाध्याय करना हो तो इस प्रकार कभी नहीं करना चाहिए। उससे हाथ कुछ नहीं पड़ता, लाभ कुछ नहीं होता। केवल इतना मात्र सन्तोष हो जाता हैं कि इतने पृष्ठ हमने पढ़ लिए। पर यदि थोड़ी देर बाद ही उनसे पूछा जाय कि आपने क्या पढ़ा तो शायद उन्हें कुछ भी याद न मिलेगा । ऐसे पढ़ने से क्या लाभ?
स्वाध्याय की साधना का अंग
जप, ध्यान पूजा, अर्चा की ही तरह स्वाध्याय भी साधना का एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण एवं प्रधान अंग हैं । उसके लिए भी नियत समय पर स्वस्थ चित्त होकर शान्तिमय स्थान पर बैठना चाहिए और धीरे-धीरे समझ-समझकर एक-एक पेराग्राफ पढ़ना चाहिये । हो सके तो उस पेराग्राफ को एकबार और दुहरा लिया जाय तब फिर दूसरा पेराग्राफ पढ़ना आरंभ किया जाय। लाल पेन्सिल पास में रखी जाय। जो विचार महत्त्वपूर्ण जचें उन पर निशान लगा लेने चाहिए। जिससे उन पर पुनर्विचार भी किया जाता रहे। कोई दूसरा व्यक्ति उप पुस्तक को पढ़े तो वह भी उस निशान लगी हुई पंक्तियों को अनेक ध्यान से पढ़ सकेगा। यदि पुस्तक अपनी निज की हो तब तो अवश्य ही इस प्रकार निशान लगाने चाहिए। पुस्तकालय या दूसरों की माँगी पुस्तकों पर ऐसा न किया जाय। पुस्तक का एक अध्याय या पत्रिका एक लेख ही एक दिन में पढ़ना चाहिये। जितना पढ़ा गया हैं उस पर मनन और चिन्तन अधिक किया जाय। लेख में प्रस्तुत किये हुए तथ्य कहाँ तक उचित हैं यह विवेकपूर्वक सोचना चाहिए। उस पर तर्क विश्लेषण और विचार करके यह देखा जाय कि बात कहाँ तक ठीक हैं। यह आवश्यक नहीं कि पढ़ी हुई पंक्तियों से पाठक पूर्णतया सहमत ही हैं। जो बात अनुपयुक्त लगे उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए और जो उपयोगी लगे उसकी महत्ता पर बारबार अनेक दृष्टियों से सोच विचार किया जाय। मनन का तात्पर्य यह है कि सामने उपस्थित तथ्य की उपयोगिता अनुपयोगिता पर पक्ष-विपक्ष के विचार से आवश्यक काट-छाँट करते हुए, वस्तु स्थिति को समझने का प्रयत्न किया जाय। इस प्रकार के मनन से ही मनुष्य किसी निष्कर्ष पर पहुँचता हैं। ऐसा निष्कर्ष ही मनोभूमि में गहराई तक उतरता हैं। जहाँ बन्द करके हर बात को ठीक मान लेने की प्रवृत्ति मानसिक दुर्बलता का चिह्न हैं। इस दृष्टि से जो पढ़ा सुना जाएगा वह बहुत ही उथला रहेगा, जड़ न पकड़ेगा और कुछ ही समय में उसका प्रभाव चला जाएगा। इसलिए जो भी पढ़ा जाय उसका मनन किया जाय।
मनन और चिन्तन भी किया जाय
गाय, बैल घास खाकर पेट पूरा भर लेते हैं तो शान्तिपूर्वक बैठ जाते हैं और उस खाये हुए को फिर से चबाने के लिए ‘जुगाली’ करते रहते हैं। इससे जल्दी में खाया हुआ उनका भोजन ठीक तरह पच जाता हैं। स्वाध्याय की जुगाली मनन हैं । जो पढ़ा गया हो उस पर बारबार विचार करना चाहिए। अनेक दृष्टिकोणों से उस बात को सोचना चाहिए और तर्क-वितर्क के बाद यदि वह बात उचित प्रतीत हो तो सच्चे मन से उसे हृदयंगम कर लेना चाहिए। चिन्तन इससे आगे का कदम हैं। प्रस्तुत स्वाध्याय में से जो बात हृदयंगम की गई हो उसे अपने जीवन में कैसे ढाला जाय इसकी योजना बनाना चिन्तन हैं। सद्गुणों, सद्विचारों, सत्कर्मों के बारे में मढ़ लेना या उनकी उपयोगिता स्वीकार कर लेना ही पर्याप्त न होगा वरन् यह भी विचार करना पड़ेगा कि इन उपयोगिता बातों को हमारे जीवन में व्यवहारिक रूप से स्थान कैसे मिले? यह ठीक है कि आज ही सारे कुविचार और कुसंस्कार नहीं छूट सकते और सारी उत्तम योजनाएँ आज ही पूरी तरह जीवन में उतार लेना संभव नहीं हो सकता, पर आखिर उस संबन्ध में सोचना विचारना तो आवश्यक ही हैं इससे मनोभूमि तो तैयार होगी, रुचि तो बढ़ेगी, दृष्टिकोण तो बनेगा। फिर धीरे-धीरे उस दिशा में कदम भी बढ़ने लगेंगे। आज न सही तो कल, मनुष्य के सपने साकार होते ही हैं। यदि गंभीरतापूर्वक आध्यात्मिकता और धार्मिकता की उपयोगिता स्वीकार की गई हैं तो जीवन का ढाँचा उसी प्रकार ढलना भी शुरू होगा ही। प्रगति धीमी रहते हुए भी देर सवेर में यात्री अपना लक्ष प्राप्त कर ही लेता हैं। मनन और चिन्तन से अपने उज्ज्वल भविष्य की जो कामना जागृत की गई हैं उसे सींचते रहा जाय तो एक दिन उसका पल्लवित होना भी सुनिश्चित हैं।
आत्म-निरीक्षण की प्रवृत्ति
स्वाध्याय से आत्म-निरीक्षण की प्रवृत्ति जागृत होती है। सद्ग्रन्थों में उपस्थित आदर्श से जब मनुष्य अपनी तुलना करता है तभी वह समझ पाता है कि मानवता के मापदण्ड से अभी वह कितना पीछे हैं। उसके अन्दर कितनी मात्रा में क्या-क्या दोष-दुर्गुण भरे पड़े हैं। उन्नतिशील बनने के लिए जिन आवश्यक गुणों की कमी जब अपने में दिखाई पड़ने लगती हैं तभी वह उसकी पूर्ति की बात सोचता हैं। यही उन्नतिशील होने की प्रक्रिया है। जब तक मनुष्य अपनी त्रुटियाँ न देख पावेगा और उन्हें छोड़कर सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए तत्पर न होगा तब तक उसकी वर्तमान हीन अवस्था में कोई परिवर्तन भी सम्भव न होगा। प्रगति तभी होती है जब मनुष्य कुछ भूलता और कुछ सीखता है, कुछ छोड़ता और कुछ ग्रहण करता है। साधारण मनुष्य अपने को निर्दोष मानते हैं और अपनी कठिनाइयाँ का दोष दूसरों पर मढ़ते रहते हैं पर जब जीवन-तथ्यों का मनन और चिन्तन करने पर अपने सुधार और प्रतिक्षण की बात समझ में आ जाती है तो आधी समस्या हल हो जाती हैं। आज तक संसार में जितने किसी भी दिशा में प्रगति की है उन्हें यही मार्ग अपनाना पड़ा हैं।
मनोमय कोश कैसे खुले?
स्वाध्याय और सत्संग से, मनन और चिन्तन से आत्म-निरीक्षण की प्रवृत्ति पैदा होती हैं। मन का स्तर हीनता से उठकर उच्चता की ओर अग्रसर होता हैं। मनोमय कोश का आवरण सद्विचारों से ही खुलता हैं। जिसके मस्तिष्क में प्रगतिशील और प्रकाशवान् विचारों का नया जल नहीं पहुँचता, उसका अन्तः प्रदेश सड़े, गले, गन्दे नाले की तरह अवरुद्ध पड़ा हुआ दिन-दिन अधिक दुर्गन्धित बनता जाता हैं। मन की शक्ति विचारों पर ही अवलम्बित हैं। जिसके जितने उच्चकोटि के विचार होंगे वह उतना ही महान् हैं उतना ही उसे आत्मिक दृष्टि से समुन्नत माना जायेगा । कोई जप तप कितना ही क्यों न करे पर यदि उसका मन संकीर्णता, अनुदारता, स्वार्थपरता आदि तुच्छताओं से भरा हुआ हैं तो वह आत्मिक प्रगति का दृष्टि से पिछड़ा हुआ ही माना जायेगा । प्रगति के दूसरे द्वार मनोमय कोश का परिष्कार बहुत कुछ हमारे स्वाध्याय और सत्संग पर-मनन और चिन्तन पर निर्भर रहता हैं।
जिस प्रकार भजन के लिए दैनिक जीवन में कोई समय नियमित रूप से निकालना पड़ता हैं उसी प्रकार स्वाध्याय के लिए कोई समय नियत रहना चाहिए। केवल माला जप का ही नाम भजन नहीं, स्वाध्याय भी भजन का ही एक अंग हैं। शरीर के केवल एक ही अंग को पुष्ट करने से काम नहीं चलता वरन् सभी अंगों का ध्यान रखना पड़ता हैं । साधना भी एकांगी नहीं सर्वांगीण हैं। शरीर का कोई एक ही अंग पुष्ट हो और बाकी सब दुर्बल हो तो इससे अच्छे स्वास्थ्य काक प्रयोजन सिद्ध न होगा। कोई मनुष्य केवल घी ही खाये और अन्न, शाक आदि को त्याग दे तो घी पौष्टिक और प्रशंसनीय होते हुए भी स्वास्थ्य को स्थिर न रख सकेगा। भजन यदि अकेला ही रहे, स्वाध्याय सत्संग का खाद पानी न मिले तो वह भजन का बीज भी फलने-फलने की स्थिति तक न पहुँच सकेगा। इसलिए हमारे दैनिक जीवन में स्वाध्याय और सत्संग के लिए किसी न किसी रूप में नियमित अवसर होना ही चाहिए।
स्वाध्याय का व्रत
हमें स्वाध्याय का व्रत लेना चाहिये। अभी अखंड-ज्योति का एक लेख प्रतिदिन उपयुक्त विधि से पढ़ना आरंभ करें। महीने भर में नया अंक आने तक उन लेखों को दो या तीन बार दुहा सकते हैं। उन्हें मनोयोग पूर्वक पढ़ा जाय तो प्रत्येक बार उनमें कुछ नई बात मिलेगी और पहली बार की अपेक्षा दूसरी बार और भी अधिक रस आयेगा । अन्य सत्साहित्य भी इसके लिए चुना जा सकता हैं पर उसका विषय आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास ही होना चाहिए। इन्हीं विषयों को पढ़ना स्वाध्याय के उद्देश्य को पूरा कर सकेगा। यह स्वाध्याय ही हमारी साधना का दूसरा कार्यक्रम हैं।
पशुओं में शरीर बल काम करता है किन्तु मनुष्य का प्रधान बल उसका मनोबल ही हैं। शरीर उसका साधारण-सा है पर यदि मनोबल पर्याप्त हुआ तो साधारण शरीर होते हुए भी वह महान् कार्य सम्पादन कर सकता है। इसके विपरीत देह से हट्टा-कट्टे होते हुए भी कितने ही व्यक्ति मनोबल की दृष्टि से दुर्बल होने के कारण बड़े दीन-हीन देखे जाते हैं। महात्मा गाँधी ठिगने और दुर्बल-पतले आदमी थे, उनका वजन कुछ 96 पौंड अर्थात् 47 सेर के करीब था फिर भी वे अपने अपार मनोबल के सहारे उस बृटिश सिंह से लड़ पड़े जिसके राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था और जिसके पास हर किसी को कुचल डालने लायक पर्याप्त शक्ति मौजूद थी। साहस के बल पर लोगों ने बड़े-बड़े कठिन कार्य पूरे किये हैं। असहाय फरहाद अपनी प्रेमिका शीरी की खातिर एक बड़े पर्वत को काटकर लम्बी नहर खोद लाने में सफल हुआ था। उसके पास एकमात्र बल-मनोबल ही था । संसार में अगणित ऐसे नर-रत्न हैं जिनने अभावग्रस्त परिस्थितियों में रहते हुए अपने साहस के बलबूते किन्हीं असंभव-दीखने वाले महान् कार्यों की ओर कदम बढ़ाये और भारी संघर्ष में उलझते हुए अन्त में सफलता के शिखर तक जा पहुँचे। इसके विपरीत सब प्रकार की सुविधाओं से सम्पन्न होते हुए भी अनेक व्यक्ति असफल और हताश रहते देखे जाते हैं। इसका कारण बहुधा उनके मनोबल की दुर्बलता ही होती हैं।
मनोबल की न्यूनता
इच्छा-शक्ति और संकल्प −बल की कमी का नाम ही कायरता है। कायर व्यक्ति हर घड़ी डरते रहते हैं, उन्हें अपने चारों ओर आशंका अविश्वास और असफलता के चिन्ह ही दीखते रहते हैं । थोड़ी-सी कठिनाई को देखकर वे बहुत घबराते हैं। और जरा सी विपत्ति आने से किंकर्तव्य विमूढ होकर पागलों जैसी चेष्टा करने लगते हैं। आत्महत्या ऐसे ही उद्विग्न लोग कर बैठते हैं। हर समय चिन्ता, शोक, भय, आशंका में डूबे रह कर अपनी नींद हराम कर लेते हैं। कायर व्यक्ति निरन्तर परेशान बने रहते हैं। कोई न कोई छोटा-मोटा कारण उन्हें डराने और चिंतित करने के लिए पैदा होता ही रहता हैं। इसके विपरीत जिनमें साहस है, मनोबल हैं वे मौत के साथ जूझते हुए भी हँसते देखे गये हैं। युद्ध के मोर्चे पर, जहाँ दोनों ओर से गोलियाँ सनसनाती रहती हैं, उस मौत के साये में भी वीर-योद्धा हँसते, विनोद करते और नींद आने पर खर्राटे की गहरी नींद सोते रहते हैं। बड़ी से बड़ी आपत्ति में वे अपने धैर्य, साहस और विवेक को स्थिर रखते हैं तथा कठिन परिस्थिति आने पर दूने उत्साह से उसे पार करने का प्रयत्न करते हैं। डरते वे किसी भी नहीं। अपने पर और अपने भगवान पर जिसे भरोसा है वह क्यों किसी से डरेगा? क्यों निराश एवं हतोत्साह होगा? साँसारिक सभी कार्यों को सफलतापूर्वक सुसम्पन्न करने के लिए मनोबल की आवश्यकता होती हैं। इसी के आधार पर दुर्बल शरीर प्रचुर पराक्रम दिखा देता हैं और उसी के आधार पर साधारण मस्तिष्क महत्त्वपूर्ण निर्णय करते हैं। इसलिए जीवन की महत्त्वपूर्ण सम्पदाओं में मनोबल का होना एक बड़ी विभूति मानी जाती हैं। जिसके पास यह है उसके पास कुछ न होते हुए भी बहुत कुछ हैं। वह अपना तो रास्ता बनाता ही हैं। अन्य अनेकों का भी नेतृत्व करता हैं।
संकल्प शक्ति की दुर्बलता
आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी इस मनोबल की नितान्त आवश्यकता हैं। इसके अभाव में कोई व्यक्ति न तो वासना पर नियन्त्रण कर सकता हैं और तृष्णा के बन्धनों से छूट सकता है। बार-बार वह किन्हीं दुर्गुणों को त्यागने की इच्छा करता हैं, उनके परित्याग का संकल्प भी करता हैं पर आन्तरिक दुर्बलता के कारण वह बात निभती नहीं। मनोवेगों का उफान जब आता हैं तो उस परित्याग के दुर्बल निश्चय को बात की बात में उखाड़ आदि करने का कार्यक्रम बनता हैं। थोड़े दिनों में वह जोश ठंडा होते ही आलस आ घेरता है और बनाया हुआ कार्यक्रम छूट जाता है। कई-बार इस प्रकार आत्मोन्नति के प्रयत्न असफल हो जाने पर फिर हिम्मत ही नहीं रहती । मनुष्य सोच लेता हैं कि यह सब हमारे वश का नहीं। हमसे यह सब नहीं निभेगा। भगवान् की इच्छा हमारा कल्याण करने की नहीं दीखती।
लौकिक और पारलौकिक पुरुषार्थों की सफलता का प्रमुख आधार मनोबल है। साहस और धैर्य के बिना किसी को इस संसार में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिली। इसलिए मानव-जीवन का पूरा लाभ उठाने के इच्छुक सदा से अपने मनोबल को बढ़ाने का प्रयत्न करते रहे हैं। जिसे यह तत्त्व जितनी अधिक मात्रा में उपलब्ध हो गया वह उतना ही सफल मनोरथ होता देखा गया हैं।
आन्तरिक सामर्थ्य की प्रधानता
यह इतना उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण पदार्थ मनोबल आखिर है क्या? आइए पर इस विचार करें। मनोबल को शरीरबल या बुद्धिबल नहीं कहा जा सकता क्योंकि देह के दुर्बल होते हुए भी कितने ही व्यक्तियों में भारी मनोबल पाया जाता हैं। कुख्यात ‘ताँलिया’ डाकू बहुत दुबला था। उसका असली नाम कुछ और था पर शरीर रुई धुनने की ताँत-सा पतला देखकर लोगों ने उसका नाम ताँलिया रख दिया था। इसी प्रकार शिक्षा या मस्तिष्क की उर्वरता से भी मनोबल का कोई संबंध नहीं हैं। पंजाब-केशरी रणजीतसिंह,बादशाह अकबर और संत कबीर शिक्षा की दृष्टि से अशिक्षितों में गिने जाते हैं पर उनका मनोबल प्रचंड था। तेज दिमाग वाले अनेक वकील अदालतों के आगे धरना दिये बैठे रहते हैं। उनमें से कितने हैं तो अपने मनोबल के आधार पर कोई महान् पुरुषार्थ कर सकने में सफल हुए हों? शरीर और मस्तिष्क के बल भी उपयोगी एवं आवश्यक है पर मनोबल उन दोनों में भिन्न हैं। वस्तुतः इस महान् तत्त्व की अपनी एक स्वतंत्र सत्ता है जिसका असली नाम प्राणतत्त्व हैं। प्राण ही जीवन है ।।भीष्म पितामह के शरीर में यह प्राण ही प्रचुर मात्रा में था जिसके बल पर वे छह महीने शरशय्या पर पड़े हुए अपना जीवन धारण किये रहे। जन्मजात रूप से यह प्राण किसी को कुछ अधिक मात्रा में मिलता हैं, कोई इसे अपने प्रयत्नों से बढ़ाते हैं, पर जिनके पास भी इसकी समुचित मात्रा होगी वह वीर पुरुषों की भाँति जियेगा। उसके प्रत्येक कार्य में से पराक्रम और पुरुषार्थ छलक रहा होगा। साहस और धैर्य उसमें भरे होंगे और निराशा एवं अधीरता उससे कोसों दूर रह रही होगी। उत्तेजना के अवसर आने पर भी वह आत्म-नियंत्रण रख सका होगा, विपत्ति में भी उसे मुसकराता हुआ देखा जा सकता हैं।
प्राणशक्ति की महिमा
रोगी में यदि प्राणतत्त्व की समुचित मात्रा रही हो तो वह देर तक बीमारी से मुकाबला कर सकता हैं और असाध्य लगने वाले रोगों को भी परास्त कर सकता है। प्राणायाम द्वारा योगी लोग इसी प्राणतत्त्व का संग्रह करते हैं और इच्छित समय तक जीवित रह सकने की सिद्धि प्राप्त करते हैं। प्राण की प्रचुरता होने पर अपनी कितनी ही समस्याओं को हल कर लेना, दूसरों को प्रभावित करना, उन्हें आवश्यक शक्ति प्रदान कर सकना दूसरों के शारीरिक-मानसिक रोगों को निवारण कर सकना कैसे संभव हो सकता हैं, इसकी चर्चा हम अपनी ‘प्राण चिकित्सा विज्ञान’ परकाया प्रवेश’ और मानवीय विद्युत के चमत्कार पुस्तकों में लिख चुके हैं। तन बल, धनबल, बुद्धिबल आदि से जितने प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं प्राणबल के द्वारा उससे अनेक गुनी महत्त्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त कर सकना संभव हो सकता हैं। ‘प्राण’ भी हवा , गर्मी (बिजली) आकाश (ईथर) आदि की तरह एक तत्त्व हैं, जो इस निखिल विश्व में संव्याप्त ही रहता हैं। परमाणुओं से यह विश्व भरा पड़ा हैं, परमाणु शक्ति से ही संसार का सारा व्यापार चल रहा हैं पर अपने प्रयोजनों के लिए अणु शक्ति को काम में लेना एक विशेष विद्या हैं। जो उस विद्या को जानते हैं वे ही अणु शक्ति चालित यन्त्रों का निर्माण एवं अणुबम का उत्पादन कर सकते हैं। प्राणविद्या के सम्बन्ध में भी यही बात हैं। एटम जड़ है इसलिए उसकी शक्ति सीमित हैं। प्राचीन काल के अध्यात्म विज्ञानवेत्ता अणु शक्ति को तुच्छ और प्राणशक्ति को महान् मानते थे, इसलिए उनने अध्यात्म विज्ञान में प्राण विद्या को प्रमुख स्थान दिया था, प्राणायाम को आत्मोत्थान का प्रधान साधन माना था।
गायत्री की प्राण-विद्या
गायत्री प्राण-विद्या ही है। गाय का अर्थ हैं प्राण, ‘त्री’ का अर्थ हैं त्राण करने वाली। प्राण-शक्ति की मानव जीवन में सुरक्षा एवं अभिवृद्धि करने वाली विद्या गायत्री ही हैं। गायत्री का देवता ‘सविता’ माना गया हैं। सविता का मोटा अर्थ सर्व होता हैं, पर उसका वास्तविक अर्थ प्राण ही हैं। प्राण की गायत्री का देवता है इस रहस्य पर अखण्ड ज्योति के हाल के अंक में गायत्री का देवता सविता लेख में कुछ प्रकाश डाला भी जा चुका हैं। गायत्री उपासना की द्वितीय भूमिका में प्रवेश करने वाला साधक अपने को जिन शक्तियों तथा सिद्धियों से ओतप्रोत पाता हैं वस्तुतः वह प्राण शक्ति का ही प्रसाद एवं चमत्कार होता हैं।
आत्म-उत्कर्ष-मार्ग के पथिकों का कार्य प्राण साधना के बिना नहीं चल सकता। इस तत्त्व का संग्रह किये बिना उनका मनोबल दुर्बल रहेगा। संकल्प बीच में ही टूट जायेंगे और लक्ष की ओर चलते हुए थोड़ी ही दूर पर पैर लड़खड़ाने लगेंगे। साधना का पहिया निर्जीव यंत्र की तरह घूमता तो रहेगा पर उसमें कुछ चमत्कार उत्पन्न न होगा। प्राण को मनोबल नहीं, आत्मबल का प्रतीक मानना चाहिए। हमारी प्राण-साधना जितनी ही प्रबल होगी उतने ही मनोबल से-आत्मबल से हम सम्पन्न जायेंगे।
शरीर, विज्ञान के ज्ञाता प्राणायाम को फेफड़ों की कसरत मानते हैं और उसके लाभ, श्वास तथा क्षय सरीखे रोगों से छुटकारा मिलना समझते हैं। सीने की चौड़ाई बढ़ने और श्वास-प्रश्वास क्रिया में तीव्रता आने से हृदय तथा मस्तिष्क को बल मिलने एवं आयुष्य बढ़ने की बात भी डाक्टरों द्वारा स्वीकार की गई हैं। कितने ही चिकित्सक प्राणायाम की विभिन्न विधियों द्वारा नाना प्रकार के रोगों की चिकित्सा भी करने लगे हैं और उसके परिणाम भी आशाजनक हुए हैं। शारीरिक दृष्टि से प्राणायाम का बहुत महत्व हैं पर आध्यात्मिक दृष्टि से उसकी महत्ता अत्यधिक हैं। मन की चंचलता दूर करके उसमें एकाग्रता उत्पन्न करने के लिए प्राणायाम को एक अमोघ अस्त्र माना जाता हैं । योग का आधार ही चित्त वृत्तियों का निरोध अथवा एकाग्रता हैं। जिसका चित्त चंचलता को छोड़कर एक बिंदु पर एकाग्र हो गया उसे तुरन्त समाधि की स्थिति प्राप्त होती है और तत्क्षण आत्मा का दर्शन होने लगता है।
सूक्ष्म शक्तियों के गुप्त केन्द्र
मनुष्य के भीतर असीम सूक्ष्म शक्तियों के गुप्त-केन्द्र भरे पड़े हैं। इन्हें चक्र, ग्रन्थि एवं उपत्यिकाओं के नाम से पुकारा जाता हैं । प्राणशक्ति के प्रहार से ही इनमें भीतर सोई हुई सिद्धियाँ जाग्रत होती हैं। कुण्डलिनी जागरण से मनुष्य इसी शरीर में देवताओं जैसी सामर्थ्य का अनुभव करने लगता हैं। यह कुण्डलिनी जागरण प्राणायाम की सहायता से ही किया जाता हैं जिसने अपने बिखरे हुए प्राण को एकत्र कर लिया उस योगी के लिए कुछ भी असंभव नहीं है। जिसका प्राणतत्त्व पर जितना आधिपत्य है वह प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियों को भी उतनी ही मात्रा में अपने वशवर्ती कर सकेगा। इन्द्रियों का नियंत्रण भी प्राण निरोध के साथ सम्बन्धित है दुष्प्रवृत्तियाँ भी इस प्राणग्निहोत्र ही अग्नि में जल कर भस्म होती हैं। प्राण-विद्या अध्यात्म क्षेत्र में एक स्वतन्त्र विद्या मानी जाती हैं। उसके अंतर्गत अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक साधनाएँ की जाती हैं। 84 आसनों की तरह प्राणायाम भी 84 प्रकार के हैं। उनके उद्देश्य, प्रयोग, लाभ तथा उपयोग भी भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं। उन सबका वर्णन इस लेख में करना अभीष्ट नहीं हैं। वह सब तो समयानुसार होगा। इस समय तो प्राणमय-कोश की साधना के लिए प्रथम वर्ष की प्राण प्रक्रिया का ही उल्लेख करना है। इसे बच्चे से लेकर बूढ़े तक सभी रोगी-निरोग नर-नारी बड़ी आसानी से कर सकते हैं। इसमें किसी को किसी प्रकार की हानि की आशंका नहीं हैं । सबको लाभ ही होगा।
प्राणाकर्षण प्राणायाम
(1) प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख, पालती मार कर आसन पर बैठिए । दोनों हाथों को घुटनों पर रखिए। मेरुदण्ड, सीधा रखिए। नेत्र बन्द कर लीजिए। ध्यान कीजिए कि अखिल आकाश में तेज और शक्ति से ओत-प्रोत प्राण-तत्त्व व्याप्त हो रहा हैं। गरम भाप के, सूर्य प्रकाश में चमकते हुए, बादलों जैसी शकल के प्राण का उफन हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है। और उस प्राण-उफन के बीच हम निश्चिन्त, शान्तचित्त एवं प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए हैं।
(2)नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे-धीरे साँस खींचना आरंभ कीजिए और भावना कीजिए कि प्राणतत्त्व के उफनते हुए बादलों को हम अपनी साँस द्वारा भीतर खींच रहे हैं। जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसले में, साँप अपने बिल में प्रवेश करता हैं उसी प्रकार वह अपने चारों ओर बिखरा हुआ प्राण-प्रवाह हमारी नासिका द्वारा साँस के साथ शरीर के भीतर प्रवेश करता हैं और मस्तिष्क छाती, हृदय, पेट, आँतों से लेकर समस्त अंगों में प्रवेश कर जाता हैं।
(3)जब साँस पूरी खिंच जाय तो उसे भीतर रोकिए और भावना कीजिए कि −जो प्राणतत्त्व खींचा गया हैं उसे हमारे भीतरी अंग प्रत्यंग सोख रहे हैं। जिस प्रकार मिट्टी पर पानी डाला जाय तो वह उसे सोख जाता है, उसी प्रकार अपने अंग सूखी मिट्टी के समान हैं और जल रूप इस खींचे हुए प्राण को सोख कर अपने अन्दर सदा के लिए धारण कर रहें हैं। साथ ही प्राणतत्त्व में संमिश्रित चैतन्य, तेज, बल, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम, सरीखे अनेक तत्त्व हमारे अंग-अंग में स्थिर हो रहे हैं।
(4) जितनी देर साँस आसानी से रोकी जा सके उतनी देर रोकने के बाद धीरे-धीरे साँस बाहर निकालिए। साथ ही भावना कीजिए कि प्राण वायु का सारतत्त्व हमारे अंग-प्रत्यंगों के द्वारा खींच लिए जाने के बाद अब वैसा ही निकम्पा वायु बाहर निकाला जा रहा है जैसा कि मक्खन निकाल लेने के बाद निस्सार दूध हटा दिया जाता है। शरीर और मन में जो विकार थे वे सब इस निकलती हुई साँस के साथ घुल गये हैं और काले धुँऐ के समान अनेक दोषों को लेकर वह बाहर निकल रहे हैं।
(5) पूरी साँस बाहर निकल जाने के बाद कुछ देर साँस रोकिए अर्थात् बिना साँस के रहिए और भावना कीजिए कि अन्दर के दोष बाहर निकाले गये थे उनको वापिस न लौटने देने की दृष्टि से दरवाजा बन्द कर दिया गया है और वे बहिष्कृत होकर हमसे बहुत दूर उड़ें जा रहे हैं। इस प्रकार पाँच अंगों में विभाजित इस प्राणाकर्षण प्राणायाम को नित्य ही जप से पूर्व करना चाहिए। आरंभ 5 प्राणायामों से किया जाय । अर्थात् उपरोक्त क्रिया पाँच बार दुहराई जाय। इसके बाद हर महीने एक प्राणायाम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक वर्ष में आधा घंटा तक पहुँचा देनी चाहिए। प्रातःकाल जप से पर्व तो यह प्राणाकर्षण प्राणायाम करना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त भी कोई सुविधा का शान्त, एकान्त अवसर मिलता हो तो उस में भी इसे किया जा सकता हैं।
प्राण-विद्या की विशिष्ट साधनाएँ
प्राण विद्या के अंतर्गत अनेकों साधनाएँ हैं। तीन बन्ध,सात मुद्रायें एवं नौ प्राणायाम प्रमुख माने गये हैं। वैसे बंधों की संख्या 40, मुद्राओं की संख्या 64 और प्राणायामों की संख्या 54, योग ग्रन्थों में उपलब्ध होती हैं। उनमें से आज की परिस्थितियों में सभी तो आवश्यक नहीं हैं, पर उनमें से जो अधिक सरल, हानि रहित एवं उपयोगी हैं उन्हें अगले दश वर्ष में बताया जाता रहेगा। हठ योग के कई प्राणायाम ऐसे भी हैं जो अधिक शक्तिशाली तो है पर उनमें थोड़ी भूल होने से खतरा भी बहुत हैं। ऐसे विधानों को विशेष अधिकारी लोग ही अनुभवी गुरु की पास रहकर सीख सकते हैं । अपने परिवार के उन स्वजनों के लिए जो दूर रहने के कारण केवल अखंड-ज्योति द्वारा ही मार्ग-दर्शन प्राप्त करते हैं केवल ऐसी ही साधनाएँ उपयोगी हो सकती हैं जिनमें कोई भूल होने पर भी किसी प्रकार की हानि की संभावना न हो, किन्तु लाभ समुचित मात्रा में प्राप्त होता रहे। ऐसे चुने हुए प्राणायामों में से ही यह उपरोक्त प्राणाकर्षण प्रक्रिया हैं। इससे प्राण तत्त्व की मात्रा साधक में बढ़ेगी और वह शरीर एवं मन दोनों ही क्षेत्रों में अधिक वीर, बलिष्ठ, पराक्रमी एवं तेजस्वी बनेगा।
दृढ़ निश्चय और धैर्य
प्राणमय कोश के विकास के लिए प्राणायाम के साथ ही संकल्प साधना भी आवश्यक हैं। दृढ़ निश्चय और धैर्य के अभाव में हमारे कितने ही कार्य आज आरंभ होते और कल समाप्त हो जाते हैं,। जोश में आकर कोई काम आरंभ किया, जब तक जोश रहा तब तक बड़े उत्साह से वह काम किया गया, पर कुछ दिन में वह आवेश समाप्त हुआ तो मानसिक आलस्य ने आ घेरा और किसी छोटे-मोटे कारण के बहाने वह कार्य भी समाप्त हो गया। बहुधा लोग ऐसी ही बाल क्रीड़ाऐं करते रहते हैं। अध्यात्म मार्ग से तत्काल प्रत्यक्ष लाभ दिखाई नहीं पड़ता उसके सत्परिणाम तो देर में प्राप्त होने वाले तथा दूरवर्ती हैं। तब तक ठहरने लायक धैर्य और संकल्प बल होता नहीं इसलिए आध्यात्मिक योजनाएँ तो और भी जल्दी समाप्त हो जाती हैं। इस कठिनाई से छुटकारा पाने के लिए हमें संकल्प शक्ति का विकास करना आवश्यक हैं। जो कार्य करना हो उसकी उपयोगिता अनुपयोगिता पर गंभीरतापूर्वक विचार करें। ऐसा निर्णय किसी आवेश में आकर तत्क्षण न करें वरन् देर तक उसे अनेक दृष्टिकोणों से परखें। मार्ग में आने वाली कठिनाइयों को सोचें और उनका जो हल निकल सकता हो उसे पर सोचें। अन्त में बहुत सावधानी से ही यह निर्णय करें कि यह कार्य आरंभ करना या नहीं। यदि करने के पथ में मन झुक रहा हो तो उसे यह भी समझाना चाहिए कि बात को अन्त तक निबाहना पड़ेगा। कार्य को आरंभ करना और जरा-सा आलस या असुविधा आने पर उसे छोड़ बैठना विशुद्ध रूप से छिछोरापन हैं। हमें छिछोरा नहीं बनना हैं ।वीर पुरुष एक बार निश्चय करते हैं और जो कर लेते हैं उसे अन्त तक निबाहते हैं। अध्यात्म मार्ग वीर पुरुषों का मार्ग है। इस पर चलना हो तो वीर पुरुषों की भाँति, धुन के धनी महापुरुषों की भाँति की बढ़ना चाहिए। छिछोरपन की उपहासास्पद स्थिति बनने देना किसी भी भद्रपुरुष के लिए लज्जा और कलंक की बात ही हो सकती हैं।
प्रतिज्ञा का प्राणपण से पालन
जो निश्चय करना उसे निबाहना इसे नीति का, अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेना चाहिए और यह मानकर कदम उठाना चाहिए कि हर कीमत पर इसे पूरा करना हैं। आलस्य और बहानेबाज़ी को अपने दृढ़ निश्चय के मार्ग में आड़े नहीं आने देना हैं। निश्चय करना हो कि एक या आधा घंटा रोज साधना में लगावेंगे तो फिर उसे उतना ही आवश्यक मान लेना चाहिए जितना कि शौच, स्नान, भोजन, नींद आदि नित्य कर्मों को आवश्यक माना जाता हैं कोई भी कठिनाई क्यों न आवें, कितना ही आलस क्यों न घेरे हम उपरोक्त नित्य कर्मों को कर ही लेते हैं, उनके लिए समय निकल ही
आता है फिर साधना के लिए ही दुनियाँ भर की बहानेबाज़ी प्रस्तुत कर दी जाय, इसमें क्या तुक हैं। जो कार्य आवश्यक और उपयोगी जँचता है उसे मनुष्य प्राथमिकता देता हैं और उसके लिए न फ रता का बहाना करना पड़ता हैं और न समय का अभाव रहता हैं। साधनात्मक आध्यात्मिक कार्यक्रमों को भी उपयोगी और आवश्यक नित्य कर्म मानकर ही हमें इस दिशा में कोई कदम उठाना चाहिए। मनोबल की कमी के खतरे के कारण कार्यक्रम टूट न जाय इस खतरे को ध्यान में रखते हुए पहले से ही उसे किसी नित्य कर्म के साथ नत्थी कर देना चाहिए। जैसे जब तक साधना न कर लेंगे तब तक भोजन न करेंगे या सोयेंगे नहीं। भोजन या सोने में थोड़ा विलम्ब हो जाय तो उससे कोई विपत्ति नहीं आती। मान लीजिए आज बहुत व्यस्तता रही और साधना के लिए समय न मिल सका तो फिर भोजन को ही साधना से अधिक महत्व क्यों दिया जाय? उसे भी क्यों न स्थगित रखा जाए? दिन भर व्यस्त रहे तो रात को सोने के घंटों में आधा घंटे की कमी करके साधना को सोने से पूर्व पूरा किया जा सकता हैं। प्रतिज्ञा तोड़ने का दंड यदि भोजन न करना और न सोना निश्चित कर लिया जाय तो फिर आलस्य और बहानेबाज़ी की दाल न गलेगी। उन्हें परास्त होना पड़ता और संकल्प-बल दिन-दिन पुष्ट होता जाएगा ।
संकल्प-पूर्ति के लिए व्रत धारण
कई व्यक्ति किन्हीं विशेष कार्यों की संकल्प-पूर्ति तक कुछ शारीरिक असुविधाओं का वरण कर लेते हैं, जैसे बाल न बनाना, जमीन पर सोना, ब्रह्मचर्य से रहना, नमक छोड़ देना, थाली के स्थान पर पत्तों पर भोजन करना आदि । इस प्रकार के व्रत लेने से अमुक कार्य को पूरा करने के लिए आकांक्षा प्रदीप्त रहती हैं, संकल्प याद रहता हैं और शिथिलता नहीं आने पाती। किसी संकल्प की पूर्ति में मानसिक शिथिलता ही प्रधान कारण होती हैं। उस पर नियन्त्रण करने के लिए इस प्रकार के व्रतों का कारण किया जा सकता हैं। एक के बाद एक संकल्प पूर्ण होते रहने से मनुष्य का साहस बढ़ता है और वह बड़े-बड़े कठिन काम दृढ़ता पूर्वक पूरा कर सकने वाले महापुरुषों की श्रेणी में जा पहुँचता हैं। इस पंचकोशी, साधना का कार्यक्रम जब तक ठीक प्रकार न चलने लगे तब तक भोजन में से नमक छोड़ देने या बाल न बनाने जैसी कोई प्रतिज्ञा हम भी ले सकते हैं और तब क्रम यथावत् एक महीने चलने लगे तो उस व्रत को पूर्ण मानकर समाप्त कर सकते हैं। पर नित्य कर्म को तो सदा के लिए ही भोजन या शयन के साथ जोड़ रखना चाहिए। ताकि वह सदैव नियमित रूप से ठीक प्रकार चलता रहे। मनोमयकोश का विकास मनोबल के साथ सुसम्बद्ध हैं। संकल्प साधना के आधार पर उसे बढ़ाया जाना चाहिए। हमें प्राणायाम के साथ-साथ संकल्प भी सक्रिय रखना है। इसी प्रकार हमारा मानसिक स्तर परिपुष्ट एवं विकसित होगा।
एक बलवान और बुद्धिमान मनुष्य को बल इसलिए मिलता हैं कि वह दुर्बलों को कुचले नहीं, किन्तु उनकी सहायता करे, उनका मार्ग-दर्शन करे।
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शक्ति का जन्म सुख में नहीं होता, वह तो चिरकाल के कष्ट-सहन के सन्नाटे की गहराइयों में पैदा होती है।
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संसार को आँसुओं से भरने की अपेक्षा उसे हँसकर उड़ा देना सचमुच अधिक अच्छा है। वास्तव में संसार चक्र के चलने का यही एक मार्ग है।
अखिल आकाश में संव्याप्त प्राणतत्त्व को कोई भी भावनाशील साधक अपनी श्रद्धा और निष्ठा के अनुरूप मात्रा में अपने में धारण कर सकता है। और ऐसा भी हो सकता है कि प्राणवान् व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को अपने संग्रही प्राण में से कुछ अंश देकर उसे अधिक तीव्रगति से आत्मिक प्रगति कर सकने की क्षमता प्रदान करे। गुरु और शिष्य का रिश्ता प्रधानतया इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। साधारण शिक्षा तो कोई भी अध्यापक या उपदेशक दे सकता है। पुस्तकें पढ़कर भी बहुत-सी जानकारी प्राप्त की जा सकती हैं। इतनी-सी बात के लिए गुरु की इतनी महिमा नहीं मानी जा सकती जितनी कि शास्त्रों के पन्ने-पन्ने पर भरी पड़ी हैं।
मार्ग दर्शक की आवश्यकता
आध्यात्म मार्ग पर वास्तविक प्रगति करने के इच्छुक को किसी सत्पात्र मार्ग-दर्शक की तलाश करनी पड़ती हैं। इसके बिना उसका मार्ग रुका ही पड़ा रहता हैं। जब साधारण-सी स्कूली शिक्षा में अध्यापक की आवश्यकता रहती हैं, साइंस, रसायन, शिल्प, शल्यक्रिया, यंत्र-विद्या आदि सीखने के लिए किन्हीं अनुभवियों का सक्रिय मार्ग दर्शन आवश्यक होता है तो आत्म विज्ञान के छात्रों को शिक्षण की आवश्यकता क्यों ने होगी? पर खेद की बात यह है कि जैसे सच्ची लगन और श्रद्धा वाले साधक दिखाई नहीं पड़ते वैसे ही सत्पात्र गुरु भी अलभ्य हैं। उतावले शिष्य और ढोंगी गुरुओं की हर जगह भरमार है पर उनसे प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं होता। ठोस प्रगति के लिए आधार भी ठोस ही होना चाहिए। जिन्हें सत्पात्र मार्ग-दर्शक मिल गये उनकी आयी पार हो गई ऐसा ही समझना चाहिये। गुरु अपने शिष्यों को शिक्षा तो देते ही हैं साथ ही अपने तप, पुण्य और प्राण में से भी अंश उसे प्रदान करते हैं। जैसे पिता अपनी कमाई का उत्तराधिकार पुत्र को छोड़ जाता है वैसे ही गुरु भी अपनी उपार्जित आत्म-सम्पदा का एक बड़ा भाग अपने शिष्यों को प्रदान करता है। इसी कारण गुरु को धर्म-पिता का स्थान दिया जाता हैं। जिस प्रकार पिता से पुत्र का गोत्र या वंश बनता है उसी प्रकार प्राचीन काल में गुरु से भी शिष्य का गोत्र बनता था, यही कारण हैं कि एक ही ऋषि के गोत्र विभिन्न वर्णों में पाये जाते हैं। यदि शिक्षा देना मात्र ही गुरु का काम रहा होता तो कदापि उन्हें इतनी महत्ता प्रदान न की जाती। पिता अपना वीर्य, पोषण स्नेह और उत्तराधिकार देकर ही पुत्र की श्रद्धा का भाजन बन पाता हैं । धर्म पिता-गुरु को इससे भी अधिक देना पड़ता है। वह अपनी आत्मा को शिष्य की आत्मा में और अपने प्राण को शिष्य के प्राण में ओत-प्रोत करता हैं। केवल साधना का मार्ग ही नहीं बताता वरन् आवश्यक शक्ति भी प्रदान करता हैं जिसके बल पर वह आत्मोन्नति के कठिन मार्ग पर सफलता पूर्वक अग्रसर हो सके। जिन्हें इस प्रकार की सहायता से वंचित रहना पड़ा उनमें से कोई विरले ही साधक सफलता प्राप्त कर सके अन्यथा आधार दृढ़ होते हुए भी उन्हें बीच में ही लड़खड़ा जाना पड़ा।
शक्तिपात के सत्पात्र
योग शास्त्रों में शक्तिपात की चर्चा बहुत हैं समर्थ गुरु शक्तिपात के द्वारा अपने शिष्यों को स्वल्प काल में आशाजनक सामर्थ्य प्रदान कर देते हैं। सिद्ध योगी तोतापुरी जी महाराज ने श्रीराम कृष्ण परमहंस को शक्तिपात करके थोड़े ही समय में समाधि अवस्था तक पहुँचा दिया था। श्रीपरमहंसजी ने अपने शिष्य विवेकानन्द को शक्तिपात द्वारा ही आत्मसाक्षात्कार कराया या और वे क्षण भर में नास्तिक से आस्तिक बन गये थे। योगी मछीन्द्रनाथ ने गुरु गोरखनाथ को अपनी व्यक्ति गत शक्ति देकर ही स्वल्प काल में उच्चकोटि योगी बना दिया था। योग और अध्यात्मार्ग में ऐसे अगणित उदाहरण मौजूद हैं जिनमें समर्थ गुरुओं के अनुग्रह से सत्पात्र शिष्यों ने बहुत कुछ पाया हैं शिष्यों द्वारा सेवा के अनेकों कष्टसाध्य उदाहरण धर्म पुराणों में भरे पड़े हैं। इस प्रक्रिया के पीछे एक बहुत बड़ा रहस्य छिपा पड़ा हैं। शिष्य की श्रद्धा, कर्तव्य बुद्धि, कष्ट सहिष्णुता, उदारता एवं धैर्य की परीक्षा इससे हो जाती है और पात्र-कुपात्र का पता चल जाता हैं। जब धन दान के लिए सत्पात्र याचक तलाश किये जाते हैं तो प्राण-दान जैसा महान् दान कुपात्रों को क्यों दिया जाय? सत्पात्र ही किसी महत्त्वपूर्ण वस्तु का सदुपयोग कर सकते हैं। कुपात्र उच्च तत्त्व का न तो महत्व समझते हैं और न उन्हें ग्रहण करने में समुचित रुचि ही लेते हैं। ठेल ठाले कर कोई कुछ दे भी दे तो उसका स्वल्प काल में ही अपव्यय कर डालते हैं इसलिए अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति करने के लिए जहाँ समर्थ गुरु की नितान्त आवश्यकता रहती हैं वहाँ शिष्य की श्रद्धा एवं सत्पात्रता भी अभीष्ट हैं। दोनों ही पक्ष स्वस्थ हों तो प्रगति पथ की एक बड़ी समस्या हल हो जाती हैं।
गुरु का योगदान
अच्छी जमीन में भी पौधे तब उगते और बढ़ते हैं जब बीच, खाद और पानी की बाहर से व्यवस्था की जाती हैं। गुरु का कर्तव्य बीज, खाद और पानी की समुचित व्यवस्था करके शिष्य की मनोभूमि को हरी भरी बनाना होता हैं। माली जो प्रयत्न अपने बगीचे को हरा भरा बनाने के लिए करता है वही कार्य एक कर्तव्यनिष्ठ गुरु को भी अपने शिष्यों के लिए करना पड़ता हैं। आज गुरु शिष्य परम्परा एक विडंबना मात्र रह गई हैं। लकीर पीटने की तरह जहाँ तहाँ शिष्य-गुरु के अत्यंत दुर्बल आधार पर टिकी हुई परम्परा चिन्ह पूजा जैसी दिखाई पड़ती हैं। पर पात्रता के अभाव में उसका परिणाम कुछ भी नहीं निकलता और एक व्यर्थ की सी चीज बन कर रह जाती है। सत्पात्र शिष्य समर्थ गुरु की सहायता से जो लाभ उठा सकते हैं वैसा आज कितनों को मिलता हैं? कितना मिलता हैं? गाय अपना दूध बछड़ों के लिए निचोड़ देती है उसी प्रकार गुरु भी शिष्य की श्रद्धा से द्रवित होकर अपना संग्रही प्राण उसके लिए निचोड़ देता हैं। गुरु शिष्य का पास-पास रहना इस दृष्टि से आवश्यक माना गया हैं। प्राचीन काल में साधारण ब्रह्मचारी गुरुकुलों में रहकर विद्याध्ययन करते थे और साथ ही गुरु का स्नेह एवं प्राण तत्त्व निरन्तर उपलब्ध करते रह कर अपनी आत्मा को सब प्रकार परिपुष्ट बनाते थे । समीपता का प्रभाव पड़ता ही है। प्रबल व्यक्तित्व और श्रेष्ठ वातावरण के सान्निध्य में रहने मात्र से जितना लाभ होता हैं उतना अस्त-व्यस्त स्थिति में रहने वाला व्यक्ति बहुत साधन अध्ययन और प्रयत्न करने पर भी प्राप्त नहीं कर सकता।
शक्तिपात का क्रमिक पद्धति।
क्षण भर में अपनी सारी शक्ति शिष्य को प्रदान कर देने वाले सब मेघ यज्ञ जैसे शक्तिपात कहीं-कहीं ही और कभी-कभी ही होते हैं। उसके लिए विशेष भूमिका वाले गुरुओं की और वैसे ही उच्च स्तर के शिष्यों की आवश्यकता होती हैं। यह कठिन हैं। वैसे सौभाग्य पूर्ण सुअवसर किन्हीं विरलों को ही मिलते हैं पर क्रमिक शक्तिपात उतना कठिन नहीं हैं । गुरु शिष्य के बीच में यदि सच्ची आत्मीयता और श्रद्धा हो, दोनों प्रयत्न करें तो विकसित प्राण वाले गुरु की शक्ति एक नियत गति से स्वल्प प्राण वाले शिष्य की आत्मा में संचारित होती रह सकती है। अधिक जल वाले तालाब का पानी पास के कम पानी वाले तालाब में एक छोटी नाली खोदकर कर पहुँचाया जा सकता हैं। सद्गुरु भी अपनी आत्मा के प्रकाश से शिष्य का अन्तःकरण प्रकाशित कर सकते हैं। यह आवश्यक नहीं कि प्राण-संचार पास-पास रहने पर ही हो, दूरस्थ व्यक्ति भी परस्पर एक दूसरे में प्राण प्रवाह संचारित कर सकते हैं। मादा कछुआ अपने अंडे बालू में देती हैं और अपनी संकल्प शक्ति प्रेरित करके उन्हें पकाती रहती हैं। यही किसी कारणवश वह मादा कछुआ मर जाय तो फिर अंडे भी सड़ जाते हैं उनमें से बच्चे नहीं निकल सकते। कछुए की भाँति प्राण शक्ति सम्पन्न गुरु भी अपने दूरस्थ शिष्यों में शक्ति संचार कर सकता हैं। प्राण संचालन विद्या के आधार पर दूरस्थ रोगियों की चिकित्सा कैसे की जा सकती हैं और किन्हीं के कुविचारों को हटाकर उनके स्थान पर सद्भावनाओं की स्थापना कैसे की जा सकती हैं इसका वर्णन विचार संचालन विद्या पुस्तक में पाठक पढ़ चुके होंगे। प्राण-संचालन के माध्यम से रेडियो ब्राडकास्ट की तरह एक आत्मा की शक्ति दूसरी आत्मा तक पहुँच सकती हैं। मूलबन्ध, प्राणायाम और शाँभवी मुद्रा की घर्षण क्रिया से उदान प्राण को क्षुभित किया जाता हैं और जब वह उत्तेजित होकर लोभ विलोम गति से संचरण करने लगे तो इसे सूर्य-चक्र में आबद्ध कर लिया जाता हैं। यहाँ से उस प्राण को किन्हीं व्यक्तियों के लिए रेडियो ब्राडकास्ट की तरह ईथर तत्त्व के माध्यम से प्रेषित किया जा सकता हैं। जिसके लिए यह प्राण प्रेषण किया जाय वह नियत निर्धारित समय ध्यान मग्न होकर बैठता है और उस प्रेषित शक्ति का आवाहन एवं अवधारण करता रहता हैं । इस प्रकार प्राण संचार की व्यक्ति भी किसी प्राणवान मार्ग दर्शक का ओजस् अपने लिए प्राप्त कर सकते हैं।
प्राण-प्रवाह का प्रत्यक्ष अनुभव
इस प्रकार संचार का अनुभव शिष्य को प्रत्यक्ष जैसा ही होता हैं। अपने चारों ओर से उसे पीत आभा वाला, शुभ्र वर्ण, भाप के बादलों जैसा प्राण प्रवाह उड़ता दिखाई पड़ता हैं। धुनी हुई रुई या हलकी बरफ जैसी कोई वस्तु उसे अपने चारों ओर उफनते हुए दूध के झागों की तरह चलती फिरती दीखती हैं। अवधारण करने में वह प्रवाह साधक के इन्द्रिय-छिद्रों तथा राम कूपों द्वारा प्रवेश करता हैं । इस प्राण संचार के साथ ही उसे अपने में अनेकों उच्च कोटि की अध्यात्म भावनाएँ भी प्रविष्ट एवं प्रतिष्ठित होती दीखती हैं। प्राण संचार का यह क्रमिक शक्तिपात किन्हीं को सुलभ हो सके तो उनका अधिक सुविधा होती हैं और लक्ष की प्राप्ति अधिक सफल एवं सुनिश्चित बन जाती हैं
आत्मा ईश्वर का अंश होने से उन सभी महानताओं से सम्पन्न है जो परमात्मा में होती हैं। अनेक महापुरुषों, ऋषियों सन्तों और परमात्माओं के द्वारा ऐसे पुरुषार्थ किये गये हैं, जिन्हें देखकर लगता हैं कि सामान्य मनुष्य ऐसा नहीं कर सकता, उसके पीछे कोई दैवी शक्ति काम कर रही होगी। वह दैवी शक्ति मनुष्य की आत्मा ही है। परमात्मा के बाद दूसरी सत्ता आत्मा की हैं। देव दानवों में भी जो असाधारण बल देखा सुना जाता हैं वह आत्मा का ही बल हैं। आत्मा की शक्ति अनन्त हैं। प्रकृति पर उसी का स्वामित्व है। मनुष्य के विचारों और कार्यों के अनुरूप प्रकृति भी अपने को बदलती रहती हैं जब संसार में मनुष्य की पाप-वृत्ति बढ़ती हैं तो प्रकृति बेचारी भी असंतुलित होकर दुर्भिक्ष, भूकम्प, बाढ़, वर्षा, बीमारी आदि अनेकों आपत्तियों से ग्रस्त होकर प्राणियों के लिए चिन्ता का विषय बन जाती है। जब मनुष्यों के मन में सुकृत बढ़ता हैं तो पृथ्वी धन-धान्य के स्त्रोत खोल देती हैं, प्रकृति में सब प्रकार की शान्तिदायक परिस्थितियाँ उमड़ पड़ती है और सतयुग का स्वर्गीय वातावरण परिलक्षित होने लगता हैं। किसी भू-भाग में जब न्यायी शासक, धर्मात्मा विद्वान् और ब्रह्मनिष्ठ तपस्वी बढ़ते हैं तो वहाँ तुरन्त ही प्रकृति में परिवर्तन आता है और नाना प्रकार से दैव की अनुकूलता सामने आती हुई दिखाई देने लगती हैं
मल-विक्षेप का परिष्कार
व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन में भी यही बात हैं। आन्तरिक स्थिति के अनुरूप ही व्यक्ति का स्वास्थ्य, यश, ज्ञान, धन, परिवार बिगड़ता हैं। दूसरे लोगों का सहयोग-असहयोग प्रेम विरोध भी किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के अनुरूप ही उपलब्ध होता हैं, प्रकृति या परिस्थिति की शिकायत करने, या उसका दुःखों का कारण मानकर खिन्न रहने की अपेक्षा यही उत्तम है कि हम अपने व्यक्तित्व का निर्माण करें। उस पर जो अनेकों मल-आवरण चढ़ गये हैं उन्हें हटाये ।
अंगार पर राख का परत जम जाने से उसका प्रकाश और ताप लुप्त हुआ जैसा दीखता है, पर जब वह राख हटा कर भीतर की अग्नि प्रत्यक्ष कर ली जाती है तो उसका स्वाभाविक रूप प्रकाश और तापयुक्त बन जाता हैं। आत्मा के ऊपर चढ़े हुए मैल भी जैसे-जैसे हटते जाते हैं, आत्मबल का प्रकाश भी वैसे ही वैसे स्पष्ट होता जाता हैं और उसी के अनुसार अपने तथा अपने साथियों के जीवन में सुख-शान्तिमय परिस्थितियाँ तेजी से बढ़ती दिखाई देने लगती हैं। आत्म-शोधन का कार्य अत्यन्त आवश्यक और महत्त्वपूर्ण । इसकी उपेक्षा करके कोई व्यक्ति स्थायी शान्ति एवं उन्नति का अधिकारी नहीं बन सकता। लौकिक और पारलौकिक सभी सफलताएँ इस एक बात पर ही निर्भर है कि कोई व्यक्ति अपना सुधार, निर्माण और विकास किस सीमा तक कर सकने में समर्थ होता हैं
आत्म-निरीक्षण की उपेक्षा
इस दिशा में एक भारी मनोवैज्ञानिक कठिनाई यह है कि हर व्यक्ति अपने आपको निर्दोष मानता है। अपने अन्दर जो बुराइयाँ है वे उसे न तो दिखाई देती है और न समझ में आती हैं। निष्पक्ष आत्म-निरीक्षण और कठोर आत्म-समीक्षा से ही बहुत अभ्यास के बाद यह वृत्ति विकसित होती हैं ।सामान्य श्रेणी के लोग तो अपने में किसी प्रकार की कोई कमी या बुराई समझ ही नहीं पाते। अपने कष्टों का कारण वे दूसरों को समझते रहते हैं और किसी न किसी पर दोषारोपण करके अपने को दूध का धुला सिद्ध करने की चेष्टा करते रहते है। कोई उनकी त्रुटि बताने तो उसे लाँछन, द्वेष या अपमान मानकर उलटा उस बताने वाले पर ही क्रुद्ध होते हैं। अपने दोष स्वयं तो समझ में न आवें, कोई दूसरा बताये तो उस पर क्रोध आवे, तो फिर आत्म-सुधार की गाड़ी आगे कैसे बढ़े? और आन्तरिक प्रगति का पहिया कैसे घूमे? यदि इस दिशा में कुछ न किया जाय, आत्म-सुधार की उपेक्षा की जाय तो फिर यह निश्चित है कि अन्य कोई भला-बुरा प्रयत्न हमारी समस्याओं को हल न कर सकेगा। आत्मबल, आत्म-सुधार के बिना और किसी प्रकार प्राप्त नहीं हो सकता। भजन-पूजन भी आत्म-शुद्धि के बिना एक आडम्बर मात्र ही बने रहते हैं और उनका भी कोई आशाजनक परिणाम नहीं निकलता । इसलिए आत्मिक प्रगति की आकांक्षा रखने वाले किसी भी व्यक्ति को आत्म-सुधार के लिए प्रयत्न करना ही पड़ता हैं। इस ओर से आँखें बन्द कर लेने से आत्मिक प्रगति का मार्ग ही अवरुद्ध हो जाता हैं।
आत्म-सुधार की साधना
हमें आत्म-सुधार की साधना सुव्यवस्थित रूप से आरम्भ करनी चाहिए और जीवन भर क्रमिक विकास करते हुए सब बराबर प्रयत्नशील रहना चाहिए जब तक कि आत्मा पूर्ण रूप से निर्मल होकर परमात्मा स्वरूप न बन जाय। जीवन का लक्ष भी यही हैं। लक्ष की दिशा में कदम बढ़ाने से ही तो मंजिल पर होगी। उचित यही हैं कि हम प्रगति की इस अनिवार्य आवश्यकता को भली प्रकार समझें और उसकी पूर्ति के लिए मजबूती के साथ कदम बढ़ायें ।निश्चय ही हमारे गुण, कर्म स्वभाव में अनेकों बुराइयाँ भरी हुई हैं। भले ही हमें अपनी मोटी और पक्षपात भी बुद्धि के कारण वे आज न दिखें, पर जब सूक्ष्म दृष्टि से निष्पक्षता और कठोरता पूर्वक अपने आपको वैसे ही परखें जैसे किसी शत्रु को परखते हैं तो अपने अनेकों छोटे-बड़े दोष प्रत्यक्ष दीखने लगते हैं। तब आत्मग्लानि भी होती हैं और उन्हें छोड़ने की इच्छा भी जागृत होती हैं। पर एक कठिनाई यह भी रहती हैं कि वे दुर्गुण आदत में इतनी गहराई तक शामिल हो जाते हैं कि छुड़ायें नहीं छूटते । छोड़ने की इच्छा करने और अपनी त्रुटि स्वीकार करने से सुधार की आशा बंध जाती हैं। पर इतने मात्र से ही काम नहीं चल सकता क्योंकि बुरी आदतें बड़ी दुष्ट एवं ठीक होती हैं, वे आसानी से नहीं बदलती। पुराना अभ्यास पड़ा हुआ हैं वह एक ढर्रा बन जाता हैं और जीवन जिस ढर्रे पर चल पड़ा हैं उसे बदलना साधारण काम नहीं होता। उसके लिए वैसे ही प्रयत्न करना पड़ता हैं जैसे पुराने रोग की चिकित्सा करने के लिए चिरकाल तक औषधि, पथ्य और परहेज का नियमित रूप से ध्यान रखा जाता हैं।
एक-एक करके सुधार में सरलता
हमारे अन्दर अनेकों दोष भरे पड़े हैं। वे सभी एक साथ नहीं छूट सकते। पैर में कई काँटे लग जाय तो सब एक साथ नहीं निकल सकते। एक-एक करके ही उन्हें निकालना पड़ता हैं। जो काँटा अधिक कष्टकारक हो और जिसे निकालना अधिक आसान हो पहले उसे ही निकालने का प्रयत्न करना बुद्धिमानी मानी जाएगी । आत्म-सुधार के लिए भी यही नीति अपनानी पड़ेगी। जो अधिक कष्टकारक दुर्गुण हैं पर जिन्हें अधिक आसानी से निकाला जा सकता हैं पहले उन्हें ही हाथ में लेना उचित हैं। हम ऐसे ही व्यवहारिक कदम उठाते हुए आत्म-सुधार की मंजिल पार करें तो सफलता की सम्भावना सुनिश्चित हो जायेगी । अन्नमय मनोमय और प्राणमय-कोश के बाद आत्मा का चौथा परिधान विज्ञानमय-कोश हैं। ज्ञानमय-कोश मस्तिष्क में और विज्ञानमय-कोश हृदय में अवस्थित हैं। मस्तिष्क में बुद्धि रहती है और हृदय में भावना। भावनाओं कोमल बनाना, हृदय को करुणा, दया, स्नेह, उदारता सेवा, सद्भावना से ओत-प्रोत करना विज्ञानमय कोश के विकास की साधना है। इस साधना से हमारी अनुदारता, संकीर्णता, निष्ठुरता, निर्दयता, स्वार्थपरता पर अंकुश लगता हैं। दूसरों के सुख दुःख परिलक्षित होने लगते हैं। दूसरों के सुख-दुःख परिलक्षित होने लगते हैं। भावनाओं में ही भगवान का निवास होता हैं। जिसकी भावनाएँ जितनी ही निष्ठुर हैं वह उतना ही पतित हैं और जिस का हृदय जितना कोमल, स्नेहपूर्ण एवं उदार हैं उसे उतना ही उच्च भूमिका में अवस्थित एवं भगवान के निकट पहुँचा हुआ माना जाता हैं।
कृतघ्नता सबसे भयंकर
मनुष्य में जो पैशाचिकता प्रवृत्तियाँ भरी रहती हैं उनमें कृतघ्नता सबसे भयंकर हैं। इसके उन्मूलन का कार्यक्रम हमें अपने साधना कार्यक्रम में प्रथम वर्ष ही सम्मिलित करना हैं। अन्य पाप
वृत्तियों को भी धीरे-धीरे छोड़ना ही होगा और एक सत्यनिष्ठ सदाचारी सज्जन जैसा जीवन बिताते हुए सच्ची आध्यात्मिकता का व्यवहारिक रूप ग्रहण करना होगा, पर एक साथ उतना सब वन पड़ना कठिन हैं। इसलिए इस एक वर्ष में अपना सारा ध्यान कृतघ्नता के परित्याग पर ही लगाना चाहिए। आत्मा पर चढ़े हुए मल विक्षेपों में से यह एक बहुत मोटा एवं बहुत ही निकृष्ट श्रेणी का आवरण है। इसे हटा देने में सफलता मिल सकी तो अन्य आवरण सहज ही हटने लगते हैं। दोष दृष्टि की प्रधानता से हमें अपने चारों ओर शत्रु और दुष्ट ही भरे दिखाई पड़ते थे, वे कृतज्ञता की उपकार बुद्धि जागृत होने पर मित्र स्वजन और स्नेही प्रतीत होने लगते हैं। निन्दक ऐसे लगते हैं मानों वे हमारी दुर्बलताओं की घटाने के चौकीदार हों और अपकारी ऐसे लगते हैं मानों हमारी सज्जनता को परखने के लिए परीक्षक नियुक्त किये गये हों। बैर का बदला बैर से और क्रोध का बदला क्रोध से चुकाने से संसार और सदाशयता से ही परस्पर सद्भाव और ऐक्य बढ़ता है। हम अपने हृदय क्षेत्र का-भावना स्तर का-विकास करके अपने व्यक्तिगत जीवन को ही सुखी नहीं बनाते वरन् अपने चारों आरे भी प्रसन्नता और सद्भावना का वातावरण उत्पन्न करते हैं। आत्मिक प्रगति के पथ पर कृतघ्नता एक बहुत बड़ी चट्टान हैं, इसे तोड़ने की साधना में हमें प्रकृत होना ही चाहिए जिससे आगे का मार्ग प्रशस्त हो। पति पत्नी में, सास बहू में, पिता पुत्र में, भाई-भाई में, मित्र-मित्र में, मालिक नौकर में जो संघर्ष देखा जाता है उसके मूल में कृतघ्नता की वृत्ति ही प्रधान रूप में काम कर रही होती है। एक दूसरे के अगणित उपकारों को भूल जाते हैं और किसी तुच्छ-सी बुराई को भूल जाते हैं और किसी तुच्छ-सी बुराई को याद रखकर उसे ही महत्व देते रहते हैं । फलस्वरूप इन पुण्य संबंधों शत्रुता और दुर्भावना का विष पनपते लगता हैं। यदि सोचने का तरीका सज्जनता पूर्ण हो एक दूसरे के उपकारों को ही महत्व दें, छोटी-मोटी बुराई को मानवीय दुर्बलता की एक छोटी-सी घटना मानकर उसकी उपेक्षा करें तो यह प्रेम सम्बन्ध अटूट रह सकते हैं। कोई वास्तविक गुत्थी हो भी तो वह सद्भावना के वातावरण में बड़ी आसानी से सुलझ सकती है । इस प्रकार हमारे पारिवारिक स्नेह सम्बन्ध अक्षुण्ण रह सकते हैं। सामाजिक सम्बन्धों के बारे में भी यही बात है। नम्रता, सज्जनता भलमनसाहत, शिष्टाचार आर्थिक प्रगति हो सकती हैं, राष्ट्रीय एकता कायम रह सकती है और अन्तर्राष्ट्रीय समस्याएँ सुलझ सकती हैं। इसके बिना प्रत्येक क्षेत्र में संघर्ष क्लेश और द्वेष ही बढ़ेगा। फलस्वरूप लाभ किसी का नहीं होगा हानि सबको उठानी पड़ेगी। इस प्रकार लौकिक और पारलौकिक दोनों ही क्षेत्रों में सज्जनता अभीष्ट हैं। मानव-जाति की यही सबसे बड़ी विशेषता भी हैं। इसके बिना मनुष्य शरीर धारण करने वाला पशु, मानवता से दूर ही माना जायेगा । पशुता का परित्याग और मानवता का वरण करने के लिए हमें सबसे प्रथम कृतघ्नता को छोड़ना पड़ेगा और कृतज्ञता की भावनाओं से अपना अन्तःकरण ओत-प्रोत करना पड़ेगा ।
मनुष्य जहाँ महापुरुषों को देखता हैं वहीं उसे अपने बड़े होने का ज्ञान आ जाता हैं, और जितना ही सच्चा इस महानता का वर्णन होता है उतना ही निश्चित उसका महान् बन जाना होता हैं।
महान् मन वाले लोग विचारों पर विवाद करते हैं, मध्यम मन वाले वस्तुओं पर तथा क्षुद्र मन वाले व्यक्तियों पर बहस करते हैं।
यों पाप अनेकों की संख्या में हैं। जुआ, चोरी, झूठ, छल, व्यभिचार, हिंसा आदि सभी पाप हैं। पर सबसे बड़ा पाप कृतघ्नता हैं जिसे सब पापों की जननी कहा जा सकता हैं। इसी के कारण मनुष्य स्वार्थी निष्ठुर, पतित और कुकर्मी बनता हैं । इसलिए आत्मसुधार के इच्छुकों को सर्वप्रथम कृतघ्नता के पाप से मुक्त होने का प्रयत्न करना चाहिए । दूसरों के अनेकों उपकार हमारे ऊपर हैं। ईमानदारी और सहृदयता के साथ जिधर भी दृष्टि उठाकर देखा जाय उधर से अपने ऊपर उपकारों की वर्षा ही होती रही हैं ऐसा प्रतीत होता हैं । मनुष्य इतना दुर्बल प्राणी है कि वह दूसरों की सेवा सहायता और उदारता प्राप्त किये बिना समुन्नत होना तो दूर जीवित भी नहीं रह सकता। अन्य जीव-जन्तुओं के बच्चे जन्म लेने के बाद बहुत थोड़े समय तक माता-पिता की सेवा लेते हैं और जल्दी की आत्मनिर्भर हो जाते हैं। कीड़े-मकोड़ों को तो जन्मने के बाद माता की कोई सहायता अपेक्षित ही नहीं रहती, पशु-पक्षियों के बच्चे भी माता से दूध या आहार प्राप्त करने की बुद्धि स्वयं ही धारण किये रहते हैं। बछड़ा जन्मते ही अपने आप गया के थन ढूँढ़ लेता हैं और अपने आप दूध पीने लगता हैं। पर मनुष्य के बच्चे में इतनी भी समझ नहीं होती। माता यदि नवजात शिशु के मुख में स्वयं ही स्तन न दे तो उसके लिए दूध पीना भी संभव न हो सकेगा। मनुष्य का बालक बहुत वर्षों तक अपनी जीवन रक्षा और उन्नति के लिए अभिभावकों पर निर्भर रहता हैं। यदि वे उसे भोजन, वस्त्र, शिक्षा, सफाई, चिकित्सा आदि की असुविधा प्रदान न करें तो शायद ही कोई बालक अपना जीवन धारण और विकास कर सकने में समर्थ हो सके।
मनुष्य की एकमात्र विशेषता
मनुष्य जहाँ सृष्टि का सर्वोच्च प्राणी हैं, वहाँ इस दृष्टि से सबसे पिछड़ा हुआ भी हैं कि वह बिना दूसरों की सहायता के अपना कुछ भी विकास करने और कुछ भी सुख सुविधाएँ उपार्जित कर सकने में असमर्थ हैं । उन्नति और सुविधा के जितने भी साधन हमें प्राप्त होते हैं उसमें अगणित लोगों का योगदान जुड़ा रहता हैं। नाना प्रकार के सुन्दर भोजन जो हम नित्य खाते हैं क्या यह सब हमारे स्वयं के द्वारा उपार्जित किये हुए हैं? माना कि उन्हें पैसे देकर खरीदा गया है पर यदि उत्पादक लोग उन्हें अपना श्रम और बुद्धिबल लगाकर उत्पन्न न करें तो पैसे के बल पर क्या उन्हें प्राप्त किया जा सकेगा? आज टेलीफोन की, रेल की हवाई जहाज की सुविधाएँ प्राप्त हैं, यह सब आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व कोई हजारों रुपया पास होने पर भी प्राप्त नहीं कर सकता था। पैसा नहीं, लोगों का श्रम सहयोग ही प्रधान है। पैसे के बल पर माता का वात्सल्य,पिता का स्नेह,पत्नी का आत्म-समर्पण पुत्र की श्रद्धा, मित्र का सौहार्द्र भला कौन प्राप्त कर सका हैं ? स्वास्थ्य, शिक्षा, सद्गुण, सम्मान आदि भी पैसे के बल पर कहाँ प्राप्त होते हैं? पैसे में कुछ शक्ति है तो अवश्य, उससे सुविधा भी मिलती हैं पर वह शक्ति है सीमित ही। मनुष्य केवल उसी के बल पर अपने जीवन को सुसम्पन्न और शान्ति मय नहीं बना सकता ।
सहयोग पर निर्भर प्राणी
मनुष्य एक प्रकार भिखारी है। उसके पास जो कुछ हैं उसमें से अधिकांश दूसरों का प्रदत्त है। कपड़े जो हम पहने हैं− बैल किसान, लुहार, यंत्र निर्माता, धुनियाँ, कातने वाले, बुनकर बजाज, दर्जी, घोषी आदि अनेकों के सहयोग से ही तैयार हुए हैं। वह शिक्षा जिसके बल पर हम आज सभ्य कहे जाते है और सुविधापूर्वक आजीविका कमाते हैं क्या हमने अपने आप ही पैदा कर ली है? नहीं, इसमें भाषा विज्ञान के आदि के आविष्कारों से लेकर, कागज निर्माता, प्रेस वाले पुस्तक-लेखक स्याही और कलम उत्पादक, शिक्षक, विद्यालय निर्माता आदि अगणित लोगों का सहयोग सम्मिलित हैं। यदि यह न मिला होता हो यह कैसे सम्भव होता कि आज हम शिक्षित कहला सकते? एक बार एक मादा भेड़िया मनुष्य के छोटे बच्चे को उठा ले गई। उसने उसे खाने की बजाय अपना दूध पिलाकर पाल लिया। बड़ा होने पर वह बालक शिकायतों द्वारा पकड़ा गया तो उसका खाना, सोचना, चलना, स्वभाव सभी कुछ भेड़ियों जैसा था। मनुष्य कच्ची मिट्टी के समान है वह वैसा ही ढल जाता है जैसे साँचे में ढाला जाता है। हम आज अपनी शिक्षा और संस्कृति पर गर्व कर सकते हैं पर वह हमारी निज की उपार्जित नहीं, अनेक सज्जनों के द्वारा उदारतापूर्वक दी गई भिक्षा हैं।
ऋणों से उऋण
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य दूसरों का ऋणी है। इसलिए उसे सबके प्रति कृतज्ञता की भावनाएँ मन में धारण किये रहना चाहिये । दूसरों के उपकारों को स्मरण रखना सज्जनता का प्रथम चिन्ह हैं। जिसने इस भावना का त्याग कर कृतघ्नता धारण कर ली, समझना चाहिए कि वह मनुष्यता से पतित हो गया। हमारे ऊपर पिता, माता, गुरु का सबसे बड़ा उपकार है। इसलिए उन्हें देवताओं के समान पूज्य माना गया हैं। माता की ब्रह्मा, पिता की विष्णु और गुरु की शंकर से उपमा दी गई हैं। क्योंकि उनके उपकार असाधारण हैं। उनके उपकारों का बदला चुकाने का प्रयत्न करना हममें से हर एक का कर्तव्य हैं। अपनी परिस्थिति के अनुसार यह सब करना चाहिए पर कम से कम कृतज्ञता की भावनायें तो सदा धारण किये ही रहना चाहिये। उपकार तो उनका मानना ही चाहिये और प्रयत्न यह करना चाहिए कि उनके सम्मान की पूरी तरह रक्षा की जाय। कोई कटु वचन या अशिष्ट व्यवहार उनके साथ व्यवहृत न हो।
चरण स्पर्श की पुण्य प्रक्रिया
गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का एक पुण्य प्रतीक चरण-स्पर्श हैं। यह भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड है। पिता,चाचा, ताऊ, बाबा, माता चाची, ताई, दादी, भुआ, बड़े भाई, भतीजा आदि अपने से जो भी बड़े हो उनके चरण-स्पर्श नित्य किये जाने चाहिये । जिस प्रकार प्रातःकाल उठकर शौच, स्नान आदि नित्य कर्तव्यों से निवृत्त होना आवश्यक होता है उसी प्रकार नित्य प्रातःकाल गुरुजनों का चरण स्पर्श करना भी एक अनिवार्य कर्तव्य होना चाहिये। स्त्रियाँ अपने पति, सास, ससुर, जेठ, जिठानी, बड़ी ननद आदि का नित्य चरण स्पर्श करें। पितर एवं गुरुजनों के असीम उपकारों का बदला चुकाने का यह न्यूनतम प्रयत्न हैं इसमें किसी को कंजूसी नहीं करनी चाहिए। पिछली आदत न होने से कई व्यक्ति इस प्रकार एक नया कार्य आरम्भ करते हुए झिझक अनुभव करते हैं । यह एक मानसिक दुर्बलता मात्र हैं । शुभ कार्य जब से आरम्भ किया जा सके तभी से ठीक हैं। आश्विन सुदी 1 ता॰ 10 अक्टूबर से इस बार की नवरात्र प्रारम्भ होती है। उसी शुभ दिन से हमें यह पुण्य प्रयत्न प्रारम्भ कर देना चाहिए। सबसे पहले हम स्वयं अपने से बड़ों के चरण स्पर्श करने की साधना आरम्भ करें और साथ ही धीरे-धीरे यह प्रयत्न भी करते रहें कि परिवार के अन्य सदस्य भी इस प्रक्रिया को अपनावें। छोटे बच्चों पर जोर देकर ऐसी आदत सिखाई जा सकती हैं। वे भूलें तो रोज स्मरण कराया जा सकता हैं। थोड़े दिनों में उन्हें आदत पड़ जाएगी । आरम्भ में कुछ दिन परिवार के अन्य लोग इसे एक मखौल समझ सकते हैं, कुछ दिन उपहास भी हो सकता हैं, पर यदि अपनी निष्ठा स्थिर रही तो हँसी उड़ाने वाले लोग अन्ततः प्रशंसक ही बनेंगे और कुछ दिन में प्रभावित होकर स्वयं की अनुकरण करने लगेंगे। गुरुजनों के चरण स्पर्श की इस साधना को आरम्भ करने वाला अपने आपको भारतीय संस्कृति का एक प्रामाणिक अनुयायी मान सकता है। क्योंकि कृतज्ञता की धर्म-धारणा का एक स्पष्ट कदम उसने आगे बढ़ाया है। अपना आदर्श उपस्थित करके ही दूसरों को सच्ची शिक्षा दी जा सकती है। सबसे पहले हमें स्वयं यही यह व्रत धारण करना चाहिए और आजीवन उसे निबाहना चाहिए। इस निष्ठा का प्रभाव दूसरों पर भी पड़ेगा और समाज में एक श्रेष्ठ परम्परा चल पड़ेगी।
उपकारों का स्मरण
रात जब हम सोये तो दिन भर में जिनकी सहायता से हमें जीवन-यापन में लाभ अथवा प्रगति में सुविधा प्राप्त हुई उन सबके प्रति मन ही मन उपकार मानना चाहिए, कृतज्ञ होना चाहिए और अभिनन्दन करना चाहिए। सोने से पूर्व इस कृत्य को अवश्य पूरा कर लेना चाहिए। प्रातःकाल जब हम उठे तो अब तक के जीवन में जिन व्यक्तियों से हमें विविध प्रकार के स्नेह सहयोग प्राप्त हुए हैं उनमें से जितनों को स्मरण कर सकें उन्हें स्मृतिपटल पर लायें और उन-उन व्यक्तियों की जीवित करने के बाद ही हम चारपाई से नीचे पैर रखें। आज हम जो कुछ हैं उसका अधिकांश श्रेय हमारे सहयोगियों और उदार उपकारक को ही है। यदि वह सहायताएँ प्राप्त न होती तो हमारी कितनी दुर्गति रही होती, कितने निम्न स्तर पर रहना पड़ता इस अन्धेर पहलू का भी हमें बार-बार अपने मन पर चित्र बनाना चाहिए। हमारे अभिभावक, पूर्वज, गुरुजन, मित्र, शिक्षक, मार्गदर्शक, कर्मचारी, परिजन, पत्नी, पुत्र, भाई, स्वजन, सम्बन्धी, ग्राहक, स्वामी, चिकित्सक, जीवनोपयोगी वस्तुओं के आविष्कारक, उत्पादक, व्यवसायी आदि के उपकार यदि हमें प्राप्त न हुए होते तो इस स्थिति में सम्भव है हम जीवित भी न रहते और रहते भी तो निश्चय ही किसी दान-हीन दशा में पड़े दिन काट रहे होते, इस तथ्य पर जितना ही अधिक विचार किया जाय, जितना ही अधिक कल्पना चित्र स्पष्ट किया जाय उतना ही दूसरों के उपकारों का महत्व प्रतीत होता हैं और इन उपकारियों की चरण मस्तक पर रखने की भावना उमड़ती है। यह भावना जितनी ही तीव्रता से उमड़ेगी उतनी ही मात्रा में मनुष्यता हमें प्राप्त होती जाएगी । कृतघ्न तो प्रत्यक्ष पशु हैं ।जो दूसरों के उपकारों का स्मरण नहीं रखता केवल उनकी छोटी-मोटी भूलों को ही बढ़ा-चढ़ाकर देखता रहता है वह नर पशु ही कहा जायेगा । ऐसी मनोभूमि के व्यक्ति वस्तुतः मानवता को कलंकित ही करते हैं।
कृतज्ञता में मानवता
भारतीय संस्कृति में विभिन्न धर्म आयोजनों के समय, चूल्हा, चक्की, ऊखल, मूसल, कुँआ, तालाब, वृक्ष, घूरे आदि पूजने का विधान है। यह कहा जा सकता है कि यह जड़ पदार्थ है, से हमारी पूजा को क्या समझेंगे? तथ्य यह हैं कि अपनी कृतज्ञता भावना के प्रकटीकरण के लिए यह पूजा अर्चा की जाती है। जिन व्यक्तियों या वस्तुओं से हमें लाभ पहुँचा है उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट किये बिना हम मानव धर्म से च्युत हो जाते हैं। इसलिए उपकारी पदार्थ चाहे निर्जीव ही क्यों न हों उनके प्रति हमें श्रद्धा व्यक्त करनी चाहिए । जो उपकारी व्यक्ति स्वर्गवासी हो गये हों उनके प्रति भी श्राद्ध तर्पण आदि द्वारा अपनी कृतज्ञता प्रकट करना चाहिए। स्वर्गीय आत्मा या पूजी हुई वस्तु को हमारी इस क्रिया से लाभ है या नहीं, यह विवादास्पद बात हो सकती है पर यह निर्विवाद है कि इससे हम श्रद्धा व्यक्त करने वालों का लाभ अवश्य है। हम अपने अन्दर के माननीय तत्त्व को इस प्रकार की अभिव्यक्ति द्वारा परिपुष्ट ही करते हैं। स्वर्गीय आत्माओं के उपकारों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने के लिए उनके चित्रों को प्रतीक मानकर मनन करने की प्रथा भी इसी दृष्टि से उपयुक्त ही है। उनके स्वर्गवासी की निधन तिथि या जयन्ती भी इसी उद्देश्य से मनाई जाती है। कृतज्ञता का गुण हमें अपने अन्तःकरण से अधिकाधिक बढ़ाना चाहिए। इस अभिवृद्धि के साथ हमारा मनुष्यत्व बढ़ेगा और देवत्व निकट आवेग ।
आत्मा का चौथा आवरण आनन्दमय कोश है। इस अन्तिम द्वार के खुलते ही आत्म-दर्शन का अलौकिक आनन्द अनुमय होने लगता है। शरीर को इन्द्रिय सुखों में और मन को तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में आनन्द आता है। इनका परिणाम एवं स्तर जितना ऊँचा होगा। सुख भी उतना ही अधिक मिलेगा। पर आत्मा को इन दोनों बातों से कोई सन्तोष नहीं होता उसके आनन्द का केन्द्र तो प्रेम ही है । प्रेम तत्त्व का जिसे जितना रसास्वादन उपलब्ध हुआ, उसकी आत्मा उतनी ही आनन्द विभोर रहने लगती हैं। पति-पत्नी के बीच काम-क्रीड़ा का, रूप शृंगार का, उपयोगिता और लाभ का भी एक आकर्षण रहता है पर इतना मात्र ही आधार दोनों के बीच रहे तो उसमें अलौकिक अनुभूति नहीं रहती । इन आधारों के शिथिल होते ही वे बन्धन ढीले पड़ने लगते हैं और उपेक्षा, मन मुटाव, परित्याग एवं शत्रुता क अवसर भी आ जाते हैं। किन्तु यदि दोनों के बीच प्रेम का आधार हो तो अनेक त्रुटियों और कर्मियों के रहते हुए भी एक दूसरे पर जान देते हैं और दो शरीर एक प्राण रहकर स्वर्गीय सन्तोष का अनुभव करते रहते है। इस प्रेम का एक ही आनन्द उन्हें इतना अधिक रहता है कि गरीबी आदि के अनेक अभावों के रहते हुए भी उन्हें अमीरी जैसा भान होता रहता हैं।
प्रेम की निर्झरिणी
माता और बच्चे के बीच प्रेम की जो निर्झर बहती रहती हैं। उसके आनन्द में माता विभोर हो जाती है और अपने को सर्व सुख सम्पन्न अनुभव करती है। बच्चे को उदर में रखने, अपने रक्त, माँस में से उसका देह बनाने, प्रसव-कष्ट सहने, लालन-पालन करने और अपनी छाती का रम्र निचोड़कर पिलाने से उसे निरन्तर क्षति एवं परेशानी ही उठानी पड़ती है। फिर भी बच्चे के माध्यम से अपना प्रेम प्रस्फुटित करने में जो आनन्द उसे आता है उसकी तुलना से वह कष्ट सहन तुच्छ ही लगता है। प्रेम प्रकट करने का अवसर न पाने के कारण ही सन्तान हीन नर-नारी असन्तुष्ट देखे जाते हैं। वैसे लौकिक दृष्टि से देखा जाय तो सन्तान के कारण माता-पिता को परेशानी के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नहीं होता। पर प्रेम का लाभ भी कोई सामान्य लाभ नहीं हैं। उसके बदलें में मनुष्य बड़ी से बड़ी कुर्बानी कर सकता है। बच्चों के प्रेम से पुलकित माता-पिता अपनी जीवन भर की वह कमाई बच्चे को बड़ी प्रसन्नतापूर्वक दे जाते हैं जिसमें से यदि कोई थोड़ी भी झपटना चाहता तो उन्हें भारी दुःख होता। पशु-पक्षी तक अपने बच्चों के प्रेम में अपने आपको प्राण संकट में डालते देखे गये हैं। भाई भाई के, मित्र मित्र के बीच जहाँ सच्चा प्रेम होता है वहाँ के अपने को असाधारण बलशाली ग्यारह बन जाते हैं। दो व्यक्तियों को हार्दिक प्रेम और सहयोग जब कभी भी पूरी तरह मिल जाता है तो उनके आनन्द और बल का ठिकाना नहीं रहता।
प्रेम विहीन तो पशु भी नहीं।
प्रेम की मात्रा पशुओं में भी पाई जाती है। दूध पिलाने का समय होते ही गाय जंगल में अपना चरना छोड़कर घर बँधे हुए बछड़े के पास लौट आती हैं। एक साथ दो पशु रहते हैं उनमें से एक मर जाय या कहीं चला जाय तो दूसरा उसकी याद करके कई दिन तक बेचैन रहता है। छोटे बछड़े को कहीं ले जाया जाय तो गाय भी उसके पीछे चल देती हैं। शेर, भेड़िये आदि पति-पत्नी की भाँति जोड़ा बनाकर रहते हैं। एक बिछुड़ जाय तो दूसरा उद्विग्न हो जाता हैं। सारस, बतख, तोता, गौरैया आदि पक्षी भी दाम्पत्य जीवन व्यतीत करते हैं और जब मादा अण्डे देती हैं और उन्हीं पर बैठी रहती है तो नर पक्षी उसके लिये भोजन-सामग्री जुटाता रहता है। अंडे में से निकले हुए बच्चे जब तक उड़ने नहीं लगते तब तक चिड़िया ही अपनी चोंच में भोजन लाकर घोंसले में बैठे हुए बच्चे के मुँह में डाल देती हैं। हाथी अपने झुंड के एक सदस्य पर मुसीबत आते ही उसकी सहायता के लिए एकत्रित हो जाते हैं। बन्दरों में भी परस्पर ऐसी ही सहयोग भावना देखी गई है। एक कसे छोड़ने ने सभी बदला लेने आते हैं। चरवाहा पर कोई भेड़िया या चीता आक्रमण करे तो गाय का झुंड उसे अपने बीच में ले लेता हैं और स्वयं ग्वाले के चारों ओर इकट्ठी होकर सींगों से उस हिंसक पशु पर आक्रमण करती हैं । किसी भी पशु-पक्षी के लिये अपने को जोखिम में डालकर लड़ने आती हैं। साँप के जोड़े में से एक को मार दिया जाय तो दूसरा इसका बदला लेता देखा गया हैं।
भूलोक का अमृत
प्रेम इस लोक का अमृत है। थोड़ी भी चेतना जिनमें जागृत हो चुकी हैं ऐसे पशु-पक्षी तक प्रेम का रस जानते हैं। चींटी, मधुमक्खी, तितली, पतंग और भौंरे जैसे कीड़े भी यह जानते हैं कि प्रेम का रस कितना मधुर है। फिर मनुष्य के लिये तो वह अमृत ही हैं। प्यार की प्यास प्रत्येक हृदय की अध्यात्म प्यास है उसे जो प्राप्त कर सका वह धन्य हो गया। जिसे प्यार नहीं मिला उस अभागे मनुष्य ने भले ही धन-दौलत पाई हो, पर वस्तुतः वह दीन-दरिद्री और दयनीय ही कहा जायेगा । जिनके माता-पिता बचपन में ही मर जाते हैं और जिन्हें दूसरों के यहाँ उपेक्षा एवं अपमान के दिन काटने पड़े के यहाँ उपेक्षा एवं अपमान के दिन काटने पड़े वे बालक सारे जीवन मर अशान्त ही रहते हैं। दाम्पत्य जीवन की सफलता प्रेम में सन्निहित हैं। किसी परिवार का विनाश और उत्थान पारस्परिक प्रेम भावनाओं पर निर्भर हैं। कोई देश समाज या संगठन अपने सदस्यों की श्रद्धा भक्ति ही पनपता हैं। जहाँ इसका अभाव रहा वहाँ पतन, विसंगत और नाश ही निश्चित हैं। अध्यात्म विज्ञान में मोह की निन्दा और प्रेम की प्रशंसा की गई हैं। मोह में स्वार्थ और लोभ छिपा रहता हैं। प्रेम में त्याग और उदारता की भावना रहती हैं। मोह में पतन हो सकता हैं पर त्याग पूर्ण निस्वार्थ प्रेम से तो आत्मा का उत्थान एवं विकास ही सम्भव हैं। इस क्लेश पूर्ण संसार में यदि कोई रस हैं, सार है, तथ्य है तो वह केवल प्रेम में ही हैं, जिसके हृदय में प्रेम-भावनाएँ उफनती रहती हैं वही करुणा, दया, सेवा और उदारता का मूर्तिमान् देवता हैं। जिसका हृदय निष्ठुर हैं, किसी को सुखी बनाने के लिए जिसे कुछ त्याग करने की इच्छा नहीं होती उस निष्ठुर व्यक्ति को निश्चय ही पशु कह सकते हैं। मानवता को कलंकित करने वाले ऐसे व्याघ्र अपना कोई स्वार्थ भले ही कर लें, आत्मिक दृष्टि से पतित ही गिने जाएँगे ।
और उनकी दुर्गति भी निश्चित हैं। ऐसे लोगों का अशान्त अन्तःकरण जीवन में चैन तो क्षण भर के लिए भी कभी पा नहीं सकता।
भक्ति भगवान की प्राप्ति
भक्ति को अध्यात्म साधना का प्रधान अंग माना गया है। भक्ति का अर्थ है-प्रेम भगवान प्रेम के वश में रहते है-प्रेम । भगवान प्रेम के वश में रहते हैं। गोपबालाऐं प्रेम की रस्सी से ही बाँधकर उन्हें अपने आँगन में नचाती थीं। मीरा ने इसी प्रेम की नौकरी देकर अपने साँवरिया को चाकर रखा था। भगवान को कर्मकाण्ड से नहीं भक्ति के प्राप्त किया जाता है। भक्ति भावनाओं के विकास में कर्मकाण्ड सहायक है पर बिना भक्ति भावना की पूजा निर्जीव ही रहती है। भक्त का प्रेमी होना आवश्यक है। प्रेम साधना के अभाव में अन्य साधना अधूरी ही है। साधना के साथ भावना का समावेश आवश्यक है। भगवान के लिए किया हुआ सच्चा प्रेम, निरन्तर व्यापक होता जाता है। इष्टदेव के प्रति किया हुआ प्रेम ध्यान या कल्पना क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह सकता। वह भगवान क्षेत्र तक ही सीमित नहीं रह सकता। वह भगवान की संतान के प्रति-समस्त प्राणधारी के प्रति भी विकसित होता है। उसे सभी अपने लगते हैं। सब में अपना ही आत्मा बिखरा दीखता है। सभी के प्रति अपार करुणा और ममता उसके मन में छलकती रहती है। उदारता और सेवा उसकी एक स्वाभाविक नीति बन जाती है। ऐसे प्रेमीजन का प्रत्येक विचार और प्रत्येक कार्य पुण्य एवं परमार्थ से ही परिपूर्ण रहता है।
करुणा और आत्मीयता
जिसके हृदय में आत्मीयता और करुणा की प्रेम-भावना उमड़ने लगी उसने भगवान को प्राप्त करने की मंजिल पूरी कर ली। उसने अपने लिए इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग अवतरित कर लिया। जिसे अपने चारों ओर प्रेम-पात्र ही दीखते हैं उन्हें देव लोक की तलाश अभीष्ट नहीं, उसे तो अपने चारों ओर देवता ही देवता बैठे दीखते हैं। हो सकता है कि दगाबाजी दुनियाँ उनकी सज्जनता का शोषण करे, ठगे। पर कितना ही ठगा जाने पर भी वे नफे में रहते हैं। दानी कर्ण, सत्यवादी-हरिश्चन्द्र त्यागी दधीचि, भक्त मोरध्वज दूसरों के द्वारा भले ही ठगे गये हों पर वे अनेकों ‘कमाऊ पूतो’ से नफे में रहे। जितना खोया उससे अधिक ही उनने पाया है।
आत्मिक प्रगति प्रेम-भावनाओं के विकास के साथ-साथ आगे बढ़ती है। हमें प्रेमी बनना होगा सम्बन्धित व्यक्तियों के प्रति प्रेम का दृष्टिकोण विकसित करना पड़ेगा। शरीर से नहीं, आत्मा से प्रेम करने की लगन लगानी होगी। अपने इष्टदेव से प्रेम करना सीखना होगा, इसी में आनन्द है आनन्दमय कोश का चौथा आवरण प्रेमीजन है खोज पाते है। उन्हें ही ब्रह्मानन्द और सच्चिदानन्द की प्राप्ति होती है।
आमतौर से उपासना करने वालों को यह शिकायत रहती कि भजन करते समय उनका मन स्थिर नहीं रहता, अनेक जगह भागता रहता है। साधना में मन न लगे, चित्त कहीं का मारा कहीं भागा फिरे तो उसमें यह आनन्द नहीं आता जो आना चाहिए। इस कठिनाई का उपाय सोचने से पूर्व विचार करना होगा कि मन क्यों भागता है? भागकर कहाँ जाता है? हमें जानना चाहिए कि प्रेम का गुलाम है। जहाँ भी जिस वस्तु में प्रेम मिलेगा वही मन उसी प्रकार दौड़ जाय जैसे फल पर भौंरा जा पहुँचता है। साधारण लोगों का प्रेम अपने स्त्री, पुत्र, मित्र, धन, व्यवसाय, यश, मनोरंजन आदि में होता है। इन्हीं प्रिय वस्तुओं में मन दौड़-दौड़कर जाता है। भजन को हम एक चिन्ह पूजा की तरह पूरा तो करते हैं पर उसमें सच्चा-प्रेम नहीं होता। इष्टदेव का भी हम कोई बहुत दूर का-अपने से सर्वथा भिन्न तत्त्व मानते हैं, उससे कुछ चाहते तो हैं पर अपने तथा उसके बीच में कोई प्रेम और आत्मीयता का सम्बन्ध सूत्र नहीं देखते । राजा और भिखारी के बीच जो अन्तर होता है वही हमें अपने और इष्टदेव के भीतर लगता रहता है। ऐसी दशा में मन यदि भजन में न लगे और अपने प्रिय विषयों में भागे तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं यह स्वाभाविक ही है।
बल पूर्वक नहीं
भजन में मन लगे इसके लिये बल पूर्वक मन को रोकने का यह प्रयत्न निष्फल ही रहता है। यह एक तथ्य है कि मन प्रेम का गुलाम है। वह वहीं टिकेगा जहाँ प्रेम होगा। यदि भजन के साथ प्रेम-भावना का समावेश कर लिया जाय तो निश्चित रूप से मन उसमें उसी प्रकार लगा रहेगा जैसा संसारी मनुष्यों का अपने स्त्री-पुत्र धन आदि में लगा रहता है।
नाम, रूप का जोड़ा
जप के साथ ध्यान का अनन्य सम्बन्ध है। नाम और रूप का जोड़ा है। दोनों को साथ-साथ लेकर ही चलना पड़ता है। अर्थ चिन्तन एक स्वतंत्र साधन है। गायत्री के एक एक शब्द में सन्निहित अर्थ और भाव पर पाँव-पाँच मिनट भी विचार किया जाय तो एक बार पूरा एक गायत्री मंत्र करने में कम से कम आधा या एक घण्टा लगना चाहिये। अधिक तन्मयता से वह अर्थ चिन्तन किया जाय तो पूरे एक मंत्र की भावनाएँ हृदयंगम करने में कई घंटे लग सकते हैं। मंत्र जप उच्चारण कितनी जल्दी से हो जाता है उतनी जल्दी उसके शब्दों का अर्थ ध्यान में नहीं लाया जा सकता। इसलिए जप के साथ अर्थ चिन्तन की बात सर्वथा अव्यावहारिक है। अर्थ चिन्तन तो एक स्वतंत्र-साधना है जिसे जप के समय नहीं वरन् कोई अतिरिक्त समय निकाल कर करना चाहिए। जप, योग-साधना का एक अंग है। योग चित्तवृत्तियों के निरोध को कहते हैं। जप के समय चित्त एक लक्ष्य में लगा रहना चाहिए। यह कार्य ध्यान द्वारा ही सम्भव है, इसलिए विज्ञ, उपासक जप के साथ ध्यान किया करते हैं। नाम के साथ रूप की संगति मिलाया करते हैं। यह तरीका सही भी है।
निराकार की उच्च-कक्षा
साधन की आरम्भिक कक्षा साकार उपासना से शुरू होती है और धीरे-धीरे विकसित होकर वह निराकार तक जा पहुँचती है। मन किसी रूप पर ही जमता है, निराकार का ध्यान पूर्ण परिपक्व मन ही कर सकता है, आरम्भिक अभ्यास के लिए वह सर्वथा कठिन है। इसलिए साधना का आरम्भ साकार उपासना से और अन्त निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासना की दो कक्षाएँ है। आरम्भिक बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है वही विद्यार्थी कालान्तर में कागज, स्याही और फाउन्टेन पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर तो है पर इसमें कोई विरोध नहीं है जो लोग निराकार और साकार का झगड़ा उत्पन्न करते हैं वे ऐसे ही है जैसे पट्टी खड़िया और कागज स्याही को एक दूसरे का विरोधी बताने वाले। जब तक मन स्थिर न हो तब तक साकार उपासना करना उचित है। गायत्री जप के साथ माता का एक सुन्दर नारी के रूप में ध्यान करना चाहिए। माता के चित्र अखण्ड ज्योति कार्यालय से छपे हैं । पर यदि उनसे भी सुन्दर चित्र किसी चित्रकार की सहायता से बनाये जा सकें तो उत्तम हो। सुन्दर से सुन्दर आकृति की कल्पना करके उसे अपनी सगी माता मानकर जप करते समय अपने ध्यान क्षेत्र में प्रतिष्ठित करना चाहिए। अपने आपको एक साल के छोटे बच्चे की स्थिति में अनुभव करना चाहिए। छोटे बालक का हृदय सर्वथा शुद्ध निर्मल और निश्चिन्त होता है वैसा ही अपने बारे में भी सोचना चाहिए। कामना, वासना, भय, लोभ, चिन्ता, शोक, द्वेष आदि से अपने को सर्वथा मुक्त और सन्तोष, उल्लास एवं आनन्द में ओत-प्रोत स्थिति में अनुभव करना चाहिए । साधक का अन्तःकरण साधना काल में बालक के समान शुद्ध एवं निश्छल रहने लगे तो प्रगति तीव्र गति से होती है। भजन में मन लगता है और यह निर्मल स्थिति व्यवहारिक जीवन में भी बढ़ती जाती है।
एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ध्यान
माता और बालक परस्पर जैसे अत्यन्त आत्मीयता और अभिन्न ममता के साथ सुसम्बद्ध रहते हैं हिल-मिलकर प्रेम का आदान-प्रदान करते हैं वैसा ही साधक का भी ध्यान होना चाहिए। हम एक वर्ष के अबोध बालक के रूप में माता की गोदी में पड़े हैं और उसका अमृत सदृश दूध पी रहे हैं। माता बड़े प्यार से अपनी छाती खोल कर उल्लास पूर्वक अपना दूध हमें पिला रही है। वह दूध रक्त बन कर हमारी नस-नाड़ियों में घूम रहा है और अपने सात्विक तत्वों से हमारे अंग-प्रत्यंगों को परिपूर्ण कर रहा है। यह ध्यान बहुत ही सुखद है। छोटा बच्चा अपने नन्हे-नन्हे हाथ पसार कर कभी माता के बाल पकड़ता है कभी नाक-कान आदि में उँगलियाँ डालता है कभी अन्य प्रकार अटपटी क्रियाऐं माता के साथ करता है वैसा ही कुछ अपने द्वारा किया जा रहा है ऐसी भावना करनी चाहिए। माता भी जब वात्सल्य प्रेम से ओत-प्रोत होती है, तब बच्चे को छाती से लगाती है, उसके शिर पर हाथ फिराती है, पीठ खुजलाती है, थपकी देती है, पुचकारती है, उछालती तथा गुदगुदाती है, हँसती और हँसाती है वैसा ही क्रियाऐं गायत्री माता के द्वारा अपने साथ हो रही हैं यह ध्यान करना चाहिए। इस समस्त विश्व में माता और पुत्र केवल मात्र दो ही है और कहीं कुछ नहीं है। कोई समस्या, चिन्ता, भय, लोभ आदि उत्पन्न करने वाला कोई कारण और पदार्थ इस संसार में नहीं केवल माता और पुत्र दो ही इस शून्य नील आकाश में अवस्थित होकर अनन्त प्रेम का आदान-प्रदान करते हुए कृत-कृत्य हो रहे हैं।
भावना की अभिवृद्धि
जप के समय आरम्भिक साधक के लिए यही ध्यान सर्वोत्तम है। इससे मन को एक सुन्दर भावना में लगे रहने का अवसर मिलता है और उसकी भाग-दौड़ बन्द हो जाती है। प्रेम-भावना की अभिवृद्धि में भी यह ध्यान बहुत सहायक होता है। मीरा, शबरी, चैतन्य महाप्रभु, सूरदास, रामकृष्ण परमहंस आदि सभी भक्तों ने अपनी प्रेम भावना के बल पर भगवान को प्राप्त किया था। प्रेम ही वह अमृत है जिसके द्वारा सींचे जाने पर आत्मा की सच्चे अर्थों में परिपुष्टि होती है और वह भगवान को अपने में और अपने को भगवान में प्रतिष्ठित कर सकने में समर्थ बनती है। यह ध्यान इस आवश्यकता की पूर्ति करता है।
उपरोक्त ध्यान गायत्री उपासना की प्रथम भूमिका में आवश्यक है। भजन के साथ भाव की मात्रा भी पर्याप्त होनी चाहिए। इस ध्यान को कल्पना न समझा जाय वरन् साधक अपने को वस्तुतः उसी स्थिति में अनुभव करे और माता के प्रति अनन्य प्रेम-भाव के साथ तन्मयता अनुभव करे। इस अनुभूति की प्रगाढ़ता में अलौकिक आनन्द का रसास्वादन होता है और मन निरन्तर इसी में लगे रहने की इच्छा करता है। इस प्रकार मन को वश में करने और एक ही लक्ष्य में लगे रहने की एक बड़ी आवश्यकता सहज ही पूरी हो जाती है।
आगे की अन्य भूमिकाएँ
साधना की दूसरी भूमिका तब प्रारम्भ होती है जब मन की भाग-दौड़ बन्द हो जाती है और चित्त जप के साथ ध्यान में संलग्न रहने लगता है। इस स्थिति को प्राप्त कर लेने पर चित्त को एक सीमित केन्द्र पर एकाग्र करने की ओर कदम बढ़ाना पड़ता है। उपरोक्त ध्यान के स्थान पर दूसरी भूमिका में साधक सूर्य मंडल के प्रकाश तेज में गायत्री माता के सुन्दर मुख में झाँकी करता है। उसे समस्त विश्व में केवल मात्र एक पीतवर्ण सूर्य ही दीखता है और उसके मध्य में गायत्री माता का मुख हँसता मुस्कराता हुआ दृष्टिगोचर होता है। साधक भावना-पूर्वक उस मुख मंडल को ध्यानावस्था में देखता है उसे माता के अधरों से, नेत्रों से, कपोलों की रेखाओं से, एक अत्यन्त मधुर स्नेह, वात्सल्य, आश्वासन, सान्त्वना एवं आत्मीयता की झाँकी होती है। वह उस झाँकी को आनन्दविभोर होकर देखता रहता है और सुध-बुध भुलाकर चन्द्र-चकोर की भाँति उसी में तन्मय होती है।
इस दूसरी भूमिका की साधना में ध्यान की सीमा सीमित हो गई। पहली भूमिका में माता-पुत्र दोनों का क्रीड़ा विनोद काफी विस्तृत था। मन को भागने-दौड़ने के लिये उस ध्यान में बहुत बड़ा क्षेत्र पड़ा था। दूसरी भूमिका में वह संकुचित हो गया । सूर्य मंडल के मध्य माता की भाव पूर्ण मुखाकृति पहले ध्यान की अपेक्षा काफी सीमित है। मन को एकाग्र करने की परिधि को आत्मिक विकास के साथ-साथ क्रमशः सीमित ही करते जाना होता है। तीसरी सर्वोच्च भूमिका में गायत्री माता के दाहिने नेत्र की पुतली ही ध्यान का केन्द्र बिन्दु है जिसे तिल कहते हैं उसका ज्योति में साधक अपनी आत्मा को उसी प्रकार होमता है जैसे जलती हुई अग्नि में लकड़ी को डालने से उसे भी अग्नि की समरूपता मिलती है। माता की ज्योति में अपने आपका आत्म-समर्पण करने से लय योग की सिद्धि होती है। उसी स्थिति में अद्वैत अनुभव होता है। आत्मा और परमात्मा एक हुये परिलक्षित होते हैं।
यह दूसरी और तीसरी ध्यान भूमिका अगले वर्षों में समयानुसार ही प्रयोग करने की हैं। गायत्री उपासक इस वर्ष प्रथम भूमिका का ही ध्यान करके अपने मन को एकाग्र करने की सफलता प्राप्त करें। इस वर्ष तो बालक के रूप में अपने को माता के साथ पायदान और क्रीड़ा कल्लोल करने की साधना ही उपयुक्त है। अगली ध्यान कक्षाओं को पार करते हुए मनोमय की प्रेम-समाधि जैसी स्थिति आ पहुँचती है और उसमें आत्म-साक्षात्कार का अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है।
आध्यात्मिक विचारों को व्यवहारिक रूप में परिणत करने का नाम साधना है। आत्मिक स्तर को सभी दिशाओं से विकसित करने के लिये यह सर्वतोमुखी पंचसूत्री साधना पिछले पृष्ठों पर प्रस्तुत की गई है। यह शास्त्रोक्त है। तैत्तरीयोपनिषद् की तृतीय बल्ली (भृगु बल्ली) में पिता वरुण और पुत्र भृगु के संवाद रूप में इसका विवेचन हुआ है। पुत्र भृगु ब्रह्म को जानने की इच्छा करता है पिता वरण उसे तप करने का आदेश देते हैं। जब तप करने से उसकी आत्मा शुद्ध हो जाती है
मय कोशों की चर्चा करते हैं और उनके अनावरण द्वारा वे अनन्त आनन्ददायी ब्रह्म साक्षात्कार का होना संभव बताते हैं। साधना की यही परम्परा योग शास्त्र में अपना स्थायी स्थायित्व अनन्त काल से बनाये हुए है।
सर्वसुलभ साधना
यह साधना वनवासी योगियों के लिए भी संभव है और गृहस्थ कार्य में व्यस्त लोगों के लिए भी सरल है। योगी लोग अपनी विशेष परिस्थितियों में पूरा समय इसी साधना में लगाये रहने से ऋद्धि-सिद्धियों के अधिकारी बन सकते है और प्रकृति के अगणित रहस्यों को जानकर सूक्ष्म जगत पर अपना नियंत्रण स्थापित कर सकते है। गृहस्थों के लिए उतना संभव नहीं, वे थोड़ा समय और हलका सा श्रम ही इसमें लगा सकते है। फलस्वरूप चमत्कारी सिद्धियाँ से तो उन्हें वंचित रहना पड़ा है पर आत्म कल्याण का मार्ग योगीजन की भाँति ही खुला रहता है और वे उस साधारण श्रम की साधना का सहारा लेकर भी पूर्णता का लक्ष प्राप्त कर सकते हैं। इस अंक में प्रस्तुत साधना इसी प्रकार की है।
अन्नमय-कोश
अन्नमय-कोश की साधना में अपना लक्ष एवं दृष्टिकोण भौतिकवादी ही न रखकर आध्यात्मिक बनाने का प्रयत्न करना पड़ता है। इस मोड़ को देने के लिए तपश्चर्या आवश्यक मानी गई है। तप का अर्थ है इन्द्रिय संयम के लिए कष्ट सहना। इस उद्देश्य के लिए अस्वाद व्रत को साधना इस वर्ष बताई गई है। सप्ताह में एक दिन बिना नमक और बिना शक्कर का भोजन करना किसी के लिए भी कष्टकर नहीं हो सकता।
मनोमय-कोश
मनोमय-कोश की साधना में मन से कुविचारों को हटा कर उनका स्थान सद्विचारों को दिलाना पड़ना है। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग दो ही उपाय हैं। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग दो ही उपाय हैं। इसके लिए एक घण्टा या आधा घण्टा समय नियत कर लिया जाना चाहिए । जीवन को समुन्नत बनाने की प्रेरणा देने एवं उनका उपाय बताने वाला साहित्य ही स्वाध्याय क लिए चुना जाय। धीरे-धीरे समझ-समझ कर उसे पढ़े और उस पर मनन एवं चिन्तन करें तो ही स्वाध्याय की प्रेरणा अन्तःकरण में गहराई तक उतर सकेगी। इस प्रयोजन के लिए अभी अखण्ड-ज्योति से भी काम चल सकता है। उसका एक-एक लेख नित्य इसी दृष्टि से पढ़ा जाय। महीने में दो तीन बार भी उन लेखों को दुहराया जा सकता है। अब अखण्ड-ज्योति दैनिक स्वाध्याय के उपयुक्त ही पाठ्य सामग्री प्रस्तुत किया करेगी।
उपयुक्त सत्संग का आज कल सर्वथा अभाव ही दीखता है। इसलिए इस प्रक्रिया को हमें स्वयं आरंभ करना पड़ेगा। संगठित रूप से गायत्री परिवार की शाखाएँ साप्ताहिक सत्संग का आयोजन करती हैं। जहाँ वह क्रम चलता ही वहाँ उसे सक्षम बनाने में पूरा सहयोग करना चाहिए। जहाँ न चलता हो वहाँ आरम्भ करना चाहिए। कुछ भी न बन पड़े तो अपने घर के बच्चों को रात को सोते समय इकट्ठा कर लिया जाय और उन्हें रोचक ढंग से कथा कहानियाँ सुनाई जाय कहने की शैली अच्छी हुई तो उसे सुनने के लिए घर की स्त्रियाँ भी इकट्ठी हो जाया करेगी । कथा प्रसंगों के बीच-बीच में उपदेशात्मक शिक्षा भी देते चलना चाहिए। इस शैली का सत्संग हम में से हर व्यक्ति चला सकता है और उससे अपने सुसंस्कारों की परिपुष्ट के साथ-साथ दूसरों को भी सन्मार्ग की प्रेरणा दे सकता है। एक छोटा पुस्तकालय हम में से हर एक को चलाना चाहिए। अपनी अब तक की श्रेष्ठ पुस्तकों को जिल्द बाँधकर सुसज्जित रूप से अल्मारी में लगा लिया जाय और कम से कम पाँच सदस्य ऐसे बनाये जाय जिन्हें स्वाध्याय में रुचि उत्पन्न हो जाय। ऐसी रुचि उत्पन्न करना आज के समय को देखते हुए कुछ कठिन है। पर प्रयत्न करने से वह भी असंभव न रहेगा। लोगों के घरों पर अपनी पुस्तकें पढ़ने देने तथा फिर वापिस लेने जाने का कार्य कुछ अटपटा सा, तौहीन जैसा लगने वाला तो है पर इसमें अत्याधिक उच्चकोटि की आध्यात्मिक सेवा सन्निहित है। ब्रह्मदान का पुण्य और सत्परिणाम असाधारण है। इसलिए इस छोटे दीखने वाले किन्तु असाधारण महत्व के कार्य को हमें आरम्भ कर ही देना चाहिये । इससे अपना ही नहीं दूसरों का भी मनोमय-कोश विकसित हो सकने की व्यवस्था बनेगी।
प्राणमय कोश
प्राणमय-कोश की साधना के लिए प्राणाकर्षण प्राणात्मक की प्रक्रिया इस वर्ष के लिए है। पाँच प्राणायामों में 15-20 मिनट समय लगता है। प्रातः काल इसे आत्मिक व्यायाम के रूप में नियमित रूप से करना चाहिए। मनोबल, संकल्प शक्ति एवं आत्म तेज बढ़ाने के लिए यह सरल प्राणायाम बहुत प्रभावशाली सिद्धि होता है। प्राण संचार एवं क्रमिक शक्तिपात का लाभ प्राप्त करना हर किसी के लिए संभव नहीं क्योंकि उसमें किसी अत्यन्त प्राणवान् व्यक्ति के अनुग्रह सहयोग एवं दान की आवश्यकता पड़ती है। ढोंगी बहुत हैं पर वस्तुतः जिनमें प्राणवान करके किसी में शक्ति संचार की क्षमता हो और उसे निस्वार्थ भाव से देने की उदारता भी हो ऐसे गुरुजन आज कहाँ मिलते हैं? जिनके पास ऐसी शक्ति होती भी है वे वे अपनी सीमित सामर्थ्य से कुछ थोड़े ही सत्पात्रों का भला कर पाते हैं। सब की सहायता तो वे भी नहीं कर सकते। इस कठिनाई को देखते हुए उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा में ही हमें संतोष पूर्वक बैठना होगा और अपनी पवित्रता बढ़ानी पड़ेगी । पवित्रता बढ़ने पर भगवान ऐसे लाभ का कोई संयोग उपस्थित कर देते हैं।
विज्ञानमय-कोश
विज्ञानमय-कोश की साधना में भावना का परिष्कार प्रधान तत्त्व है। कृतघ्नता के घृणित पातक से अपनी मनोभूमि को इस वर्ष उबारे तो यह एक बहुत बड़ी बात होगी। अगले वर्षों में एक-एक करके भी इन प्रमुख पातकों को हटाया जाता रहा तो दश वर्ष में हमारी मनोभूमि पूर्ण पवित्र बन जायेगी । रात को सोते समय दिन भर के उपकारियों का स्मरण करना और प्रातःकाल चारपाई पर से उठते ही लोगों के अब तक के प्रमुख उपकारों का स्मरण करना और उन सब के लिए मन ही मन हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते हुए अभिवन्दन करना हमारा नित्य कर्म होना चाहिए। गुरुजनों के नित्य चरण स्पर्श करना भारतीय संस्कृति का एक अत्यन्त ही महत्त्वपूर्ण अंग है। इसे आरम्भ करना ही चाहिये। प्रातःकाल के नित्य कर्म में इस धर्म-कर्तव्य का भी स्थान रखा जाय।
आनन्दमय-कोश
आनन्दमय-कोश की साधना का उद्देश्य अपनी प्रेम भावना का बढ़ाना अपने चारों ओर प्रेम पूर्ण वातावरण उत्पन्न करना है। इसके लिये गायत्री जप करते हुये अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में और गायत्री माता को अपनी सगी जननी मानकर उसके साथ क्रीड़ा करने, स्नेह पाने की ध्यान धारण बहुत ही उपयुक्त हैं। इससे भजन में मन ही नहीं लगता वरन् लगता वरन् प्रेम का मुरझाया हुआ अंकुर भी अंकुरित, पल्लवित और विकसित होकर चारों ओर अपनी दिव्य सुगन्धि से परम आनन्दमय वातावरण उत्पन्न कर देता है । मानव-जीवन में यदि कोई रस है, यदि कोई सार है तो वह प्रेम ही है। इसे ही परमात्मा भी कहा जाता है। भगवान को वश में करने का भक्ति-भावना ही एकमात्र उपाय है। यह शक्ति ओर कुछ नहीं व्यक्तिगत प्रेम का ही एक व्यापक स्वरूप है। इसी से अद्वैत ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
साधना की दिनचर्या
प्रातःकाल सोकर उठते ही उपकारियों के उपकारों का स्मरण करना गुरुजनों के चरण स्पर्श करना, फिर नित्यकर्म से निवृत्त होकर 5 प्राणायाम, तत्पश्चात् मातृ-प्रेम की ध्यान धारण के साथ गायत्री का जप करना, इतने कार्यों के साथ प्रातःकाल का कार्यक्रम पूर्ण तो जाता है। प्राणायाम और जप में एक घण्टा लगाना चाहिए। जिन्हें कम समय हो वे इसमें भी कमी कर सकते है। स्वाध्याय के लिए दिन में कोई भी सुविधा का समय नियत किया जा सकता है। अपना पुस्तकालय, ज्ञान मन्दिर चलाने के लिए तथा उसके सदस्यों के गले पड़ कर सत्साहित्य पढ़ाने के लिए नित्य कुछ समय देना चाहिए। यह ज्ञान-सेवा छोटी दीखते हुए भी अत्यन्त उच्चकोटि की है। सत्संग की व्यवस्था अपनी ओर से करने का कोई प्रबन्ध बन सके तो उत्तम है अन्यथा घर में कथा-कहानियाँ कहने या कोई पुस्तकें पढ़कर दूसरों को सुनाने का कोई क्रम बन सकता है। आरंभिक झिझक को जीत लिया गया तो यह कार्यक्रम अपने लिए बड़ा मनोरंजक तथा आनन्ददायक प्रतीत होने लगेगा। रात को सोते समय पुनः दिन भर के उपकारियों का स्मरण करते हुए भगवान का ध्यान और धन्यवाद करते हुए सो जाना चाहिए। सप्ताह में एक दिन अस्वाद-व्रत रखना चाहिए। उस दिन सामूहिक सत्संग का कोई क्रम बन पड़े तो और भी उत्तम है। पुस्तकालय चलाने के लिए जिन्हें रोज समय न मिलता हो वे इस दिन अपने 5 सदस्यों से मिलें और पिछले सप्ताह दी हुई पुस्तकें वापिस लेकर अगले सप्ताह के लिए एक-एक पुस्तकें दे दे। इसी प्रकार से उन पाँचों से कुछ ज्ञान चर्चा भी करें।
अत्यन्त सरल किन्तु महान् प्रभावोत्पादक
इस प्रकार यह पंच-कोशी साधना क्रम बिना कोई विशेष अतिरिक्त समय खर्च कराये तथा बिना कोई विशेष कष्ट दिये एक-दो घण्टा समय ही नित्य लगाते रहने से बड़ी आसानी से चलता रह सकता है। यों यह साधारण सी साधना है पर इसका अन्त और परिणाम असाधारण है। यह आरंभिक कदम है। प्रगति पथ पर बढ़ते रहे तो यही कदम हमें लक्ष तक पहुँचा देंगे और हम वह सब कुछ प्राप्त कर सकेंगे जिसमें इस सुरदुर्लभ मानव-जीवन की सार्थकता सन्निहित है।
प्रस्तुत पंचकोशी साधना
(1) इस अंक में प्रस्तुत पंचसूत्री साधना के पाँचों अंगों की साधना जो न कर सके वे कुछ कम अंग लेकर आरम्भ कर सकते हैं। जिनने इस दश वर्षीय योजना के अंतर्गत पंचकोशी साधना आरम्भ की हो वे अपने निश्चय की सूचना मथुरा दे दें। उनके मार्ग को सरल बनाने के लिए सूक्ष्म सहयोग यहाँ से मिलता रहेगा।
(2)कुछ सत्पात्रों के लिए प्राण संचार और शक्तिपात शीर्ष लेख में वर्णित प्रक्रिया के अनुसार विशेष सेवा करने का भी विचार है। इस सम्बन्ध में जिन्हें अभिरुचि हो पत्र द्वारा परामर्श कर लें।
(3)पंचकोशी साधना क्रम दश वर्ष तक चलेगा। अगले वर्ष की साधना का पाठ्यक्रम बताने के लिए हर साल अक्टूबर मास में इसी प्रकार अखण्ड ज्योति का एक छोटा साधना अंक निकलता रहेगा।
गायत्री तपोभूमि में−
(1)गायत्री तपोभूमि का निर्माण इस उद्देश्य से हुआ था कि यहाँ के वातावरण में रह कर साधक अपनी साधना को अधिक सरलता पूर्वक सफल बना सकें। इस भूमि पर पूर्वकाल में कितने ही ऋषियों ने तप किया है, यह स्थान अनेक युगों से तपोभूमि रहा है। उस पूर्व विशेषता को पुनः सजीव करने के लिये इस भूमि पर 108 कुण्डों का यज्ञ किया जाय, अखंड अग्नि एवं नित्य यज्ञ की व्यवस्था की गई, 240 करोड़ हस्तलिखित गायत्री मन्त्रों की स्थापना की गई एवं 2400 तीर्थों का जल-रत्न स्थापित किया गया। नवरात्रियों तथा नित्य नैमित्तिक जपो के निरन्तर होते रहने से गायत्री उपासना के लिये यह भूमि एक प्रकार से सिद्ध पीठ ही हैं। जिन्हें जय कभी, जितने दिन के लिए भी अवकाश मिले यहाँ रहकर अपनी साधना करें। व्यवहारिक मार्ग दर्शन, शान्तिमय वातावरण निवास की सब प्रकार की सुविधा, स्वास्थ्यकर जलवायु आदि कारणों से यहाँ रह कर गायत्री साधना करना अन्य स्थानों की अपेक्षा निश्चित रूप में अधिक फलप्रद हो सकता है।
(2) जो लोग गृहस्थ की जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके हैं, वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहते हैं या शेष जीवन साधना में लगाने के इच्छुक हैं, उनके लिये गायत्री तपोभूमि में निवास के लिये हवादार स्वच्छ कमरे, नल, बिजली की सुविधा स्वाध्याय के लिये हजारों आध्यात्मिक पुस्तकों एवं सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं का सर्वांगपूर्ण पुस्तकालय, अस्वस्थ होने पर आश्रम के चिकित्सालय में औषधि की व्यवस्था, पुष्प पल्लवों से हरा-भरा नयनाभिराम प्रांगण, परमार्थ प्रेमी सत्पुरुषों का सान्निध्य आदि सभी बातें ऐसी है जिनसे अस्थिर मन भी स्थिरता एवं शान्ति लाभकर सकता है। अपने हाथ से भोजन बनाने के सभी साधन यहाँ मौजूद है। 10-15 रुपये मासिक में यहाँ की सस्ती परिस्थितियों में किफायत से चलने वाले अपनी गुजर कर सकते हैं।
(3)तपोभूमि में निवास करने वाले साधकों के लिए क्रमबद्ध शिक्षण व्यवस्था चलेगी। सभी को साधना के अतिरिक्त नियमित अध्ययन भी करना होगा। संस्कृत का सामान्य ज्ञान कराया जाएगा और नित्य के शिक्षा क्लास में क्रमशः गीता, रामायण, योगवाशिष्ठ, उपनिषद्, योग दर्शन एवं चारों वेदों का सार भाग पढ़ाया जाया करेगा। विचार विनिमय, सत्संग, शंका समाधान एवं प्रश्नोत्तर की विधि से साधकों के अध्यात्म ज्ञान में निरन्तर वृद्धि की जाती रहेगी।
(4) अभी ऐसे ही साधक रखे जावेंगे जो अपना भोजन व्यय स्वयं उठा सकें। शरीर से स्वस्थ, अनुशासन में रहने वाले, मधुरभाषी, सेवाभावी, साक्षर, सदाचारी एवं बीड़ी, तमाकू न पीने वाले साधकों को ही स्वीकृति मिलेगी। जिन्हें आना हो वे अपना पूरा परिचय लिखकर तपोभूमि में निवास करने की पूर्ण स्वीकृति प्राप्त करके तब आवें।
आगामी माघ वदी अमावस्या ता॰ 5 फरवरी 52 में अष्टग्रही योग आने वाला है। इसकी चर्चा अखण्ड-ज्योति में समय-समय पर होती रही है। यह समय अब टिकट ही आने वाला है। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक राशि पर चार या उससे अधिक ग्रहों का होना अशुभ माना जाता है। विगत महाभारत के समय राशि पर सात ग्रह आये थे उसके फलस्वरूप वह विश्व युद्ध हुआ था और संसार पर भारी विपत्ति आई थी। अब की बार आठ ग्रह एक राशि पर एकत्रित होते हैं। इसका फल और भी अधिक अशुभ होना चाहिये। दैवज्ञ इस योग को कालकूट नाम देते हैं। जैसे सब विषों में कालकूट प्रमुख विष है, उसी प्रकार अशुभ योगों में यह अष्टग्रही योग भी कालकूट के समान भयंकर है। किन्हीं ग्रन्थों में इसे प्रव्रज्या योग गोल योग, अथवा महागोल योग कहा गया है । यह नाम अशुभ अनिष्ट का ही संकेत करते हैं। 6,7,8 ग्रहों के एकत्रित होने से विभिन्न कुयोग बनते हैं। ता॰ 19 जनवरी से 12 फरवरी तक 25 दिन का षड्ग्रही योग है। इसी बीच में 24 जनवरी से 9 फरवरी तक सप्तग्रही योग है। अष्टग्रही योग 2 फरवरी से 5 फरवरी तक है । माघ वदी अमावस्या (मौनी मावस) इसका मध्य बिन्दु हैं। इसी दिन सूर्य ग्रहण भी है, जो यद्यपि भारतवर्ष में दिखाई नहीं पड़ेगा पर उसका फल भी विश्व के अन्य भागों पर होगा ही।
ज्योतिष्मती पत्रिका के ग्रीष्मांक में इस योग के संबंध में कई दैवज्ञों ने प्रकाश डाला है। श्रीकालीदास घोष का कथन है कि इस योग का प्रभाव सन् 1964 तक रहेगा। रेल, इंजन, परिवहनों की दुर्घटना होंगी। आधुनिक सभ्यता के मलवे से नवीन रक्त-बीज उत्पन्न होगा। मेष लग्न पर मंगल उच्च है और शनि स्वग्रही है इस अवस्था में इसके सिवाय और कोई विकल्प दिखाई नहीं देता है कि युद्ध का देवता मंगल विश्वव्यापी युद्ध करेगा। ज्योतिर्विद् श्रीचैलाम राजू गोपाल कृष्ण मूर्ति का कथन है। सूर्य के साथ मंगल का होना युद्ध का सूचक है। प्रायः सभी देशों के शासकों की रातें जागते गुजरेंगी । भूमि पर भारी रक्तपात होगा। विश्वशान्ति भंग होगी, प्रत्येक देश में युद्ध का शंखनाद सुनाई देगा। सीमा विवाद चलेंगे। बड़े पुरुषों की साख न रहेगी। फसल नष्ट होगी। अकाल और बेकारी बढ़ेगी। तूफान, आँधी नाव दुर्घटना, युद्ध मुद्रा, अवमूल्यन, संक्रामक रोग आदि घटित होंगे। रमेशचन्द्र शास्त्री ने लिखा है-इस योग के प्रभाव के आगामी विश्वयुद्ध की नींव जरूर इस वर्ष पड़ जायेगी, पर वह होगा सन् 1964 में। उपरोक्त पत्रिका के सम्पादक ज्योतिषाचार्य पं॰ हरदेव शर्मा त्रिवेदी ने लिखा है-जलीय उत्पात, भयानक बाढ़ और भूकम्प से विशेष हानि होगी। खाद्य समस्या समाधान कारक नहीं होगी। दुर्भिक्ष महामारी आदि से भी विनाश होगा। सन् 1963 में 141 वर्ष बाद क्षय मास आ रहा है अतः सन् 62 से 72 तक आगामी दश वर्ष में बड़ी भारी राज्य क्रान्तियाँ और प्रकृति प्रकोप सम्भव होगा। तृतीय विश्वयुद्ध इसी अवधि में होकर जन धन का भीषण रूप से विनाश करेगा। इसी प्रकार के फलादेश पहले भी कई बार प्रकाश में आ चुके हैं। उनमें अशुभ अनिष्टकी ही संभावना प्रकट की गई है। हमारा निज का अभिमत भी ऐसा ही है कि इस कुयोग से मानव जाति को विशेष कष्ट सहने पड़ेंगे। यद्यपि ऐसी आशंका कतई नहीं है कि योग के दिनों में प्रलय हो जायगी या उसी समय एटम चलेंगे। कई व्यक्ति ऐसी आशंका करके भयभीत रहते हैं। उन्हें जान लेना चाहिये कि उन दिनों भी ऐसी ही स्थिति रहेगी जैसी कि यह पंक्तियाँ पढ़ने वाले दिन को है। योग के 25 दिनों में कोई आश्चर्यजनक घटना न घटेगी, साधारण दिनों की भाँति ही वे दिन भी शान्ति से बीतेंगे। पर सूक्ष्म जगत में ग्रह योग की जो प्रतिक्रिया होगी उसके फ ल स्वरूप संसार के प्रत्येक भाग में और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कठिनाइयाँ बढ़ने का वातावरण बनना प्रारम्भ हो जायगा। जैसे-जैसे समय बीतता जायगा वे कठिनाईयाँ सामने आती जायेंगी और वे आगामी दस वर्षों तक बनी रहेंगी। इससे किसी को भयभीत या निराश नहीं होना चाहिए। विकास की शक्तियों की भाँति ही रक्षा की शक्तियाँ भी सक्रिय हैं, वे चिरपोषित मानव संस्कृतियों नष्ट न होने देंगी। हमें आगामी समय के लिए अधिक साहस, अधिक धैर्य और अधिक विवेक का सम्पादन करना चाहिए ताकि संभावित कठिनाई का भली प्रकार मुकाबला किया जा सके। पिछले अज्ञात वास में हमें उच्च कोटि के तत्वदर्शियों का सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर मिला है। उनके व्यक्तिगत निष्कर्ष यह हैं कि इस योग के फलस्वरूप जहाँ एक ओर विनाश की विभीषिका सामने आवेगी वहाँ युग निर्माण के उपयोगी तत्वों का इसी अवधि में तीव्र गति से अवतरण और विकास भी होगा। ज्ञान और विज्ञान दोनों की उन्नति ऊँचे स्तर तक बढ़ेगी । निर्माण और उत्पादन के कार्य भी बड़े विशाल परिमाण में होंगे। इस विनाश का उद्देश्य अन्ततः विश्व में स्थिर शक्ति की सहायता ही है । इसलिए समय पर तत्संबन्धी आवश्यक साधनों की उपलब्धि के लिए निर्माण एवं उत्पादन कार्य भी साथ ही साथ प्रारम्भ होगा। इस दश वर्षीय विनाश चक्र का प्रभाव संसार के विभिन्न भागों पर बहुत पड़ेगा, पर भारत को कम से कम हानि सहनी पड़ेगी। भारत धीरे-धीरे प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति करता जाएगा और सन् 64 के उपराँत उसकी स्थिति संसार में सर्वश्रेष्ठ होगी। ज्ञान और विज्ञान, धन और सत्ता, नीति और सदाचार की दृष्टि से वह विश्व का सर्वोपरि राष्ट्र होगा। उसकी संस्कृति सम्पूर्ण विश्व में अपनाई जायगी और प्राचीन काल की भाँति उसे सारे भूमण्डल को अपना नेतृत्व देना होगा। जिस प्रकार आज अमेरिका और रूप अपना प्रभाव संसार के विभिन्न क्षेत्रों पर बनाये हुए हैं उसी प्रकार सन् 64 के बाद अकेला भारत संसार के नेतृत्व की बागडोर अपने हाथ में लेगा और चिरकाल तक सर्वत्र सच्ची सुख शाँति स्थापित किये रहने में सफल होगा। उस महान जिम्मेदारी को अपने कन्धों पर उठाने के लिये इन्हीं दिनों भारत भूमि पर अत्यन्त उच्च कोटि की जीवन मुक्त आत्माऐं जन्म लेंगी। ज्योतिषशास्त्र के मानसागरी ग्रन्थ के अनुसार जिनकी कुण्डली में एक स्थान पर छै, सात, या आठ ग्रह होते हैं वह बालक दरिद्र, मूर्ख और नीच वृत्ति, धनहीन अधर्मी और महा दुष्ट होते हैं। किन्तु आचार्य बराहमिहर के अनुसार ऐसे बालक निश्चय ही बहुत बड़े महात्मा होते हैं। यद्यपि दोनों मत एक दूसरे के प्रतिकूल हैं तो भी उनमें एक बात पर मतैक्य है कि ऐसे समय में उत्पन्न बालक असाधारण होते हैं, परिस्थितियों उन्हें चाहे महादुष्ट बना दे चाहे महासंत, पर क्षमता, उनके अन्दर निश्चित रूप से बहुत रहेगी। ग्रहों का यह प्रभाव अष्ट ग्रही योग के तीन या षड्ग्रही योग के 25 दिनों तक ही न चलेगा, वरन् उसका प्रभाव आगामी तीन वर्षों तक रहेगी। ग्रहयोग के 25 दिनों में उत्पन्न हुए बालकों की शिक्षा दीक्षा यदि उनके अभिभावक अच्छी तरह कर सके तो वे आगे चलकर बहुत ही श्रेष्ठ प्रकार के नर रत्न सिद्ध हो सकते हैं। इसके उपरान्त आगामी तीन वर्ष तक भी यह क्रम जारी रहेगा और धर्म शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान, शिल्प, रसायन, चिकित्सा उद्योग आदि विभिन्न क्षेत्रों में सारे विश्व का नेतृत्व करने वाली आत्माएँ यहाँ जन्म लेती रहेंगी। भारतीय स्वतंत्रता का उद्देश्य पूर्ण करने के लिए 30 उच्चकोटि की आत्माएँ अवतरित हुई थी, उनका चिर संचित आत्मबल इतने बड़े कार्य के लिए आवश्यक वातावरण उत्पन्न करने में समर्थ हुआ। अब सारे विश्व की राजनैतिक आर्थिक सामाजिक, आत्मिक स्वतंत्रता की दिशा में नेतृत्व करने का कार्य भारत के कंधों पर आने वाला है। इस कार्य के लिए उच्च लोकों जीवन मुक्त आत्माएँ भारत भूमि पर जन्म लेने आ रही हैं। इसी दृष्टि से सन् 62 जहाँ दुर्भाग्य-पूर्ण है वहाँ साथ ही आशा की स्वर्णिम किरणें भी साथ चल रही हैं। इस संदर्भ में अखण्ड-ज्योति परिवार के धर्म प्रेमी स्वजनों के लिए भी कुछ कर्तव्य बनते हैं । हम सबको उस पर ध्यान देना चाहिये।
(1) जिस प्रकार चन्द्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण का सूतक कुछ घण्टे पहले लग जाता है उसी प्रकार माघ वदी अमावस्या को आने वाले इस कुयोग सूतक चार मास पूर्व आश्विन वदी अमावस्या से प्रारम्भ होगा। इन चार महीनों में कुछ न कुछ धर्म आयोजन करने का प्रयत्न हममें से हर एक को करना चाहिए।
(2) व्यक्तिगत साधना जिसकी जो रही है उसे इन चार महीनों के लिए कम से कम सवाई कर दें। एक चौथाई और बढ़ा दें और इस चार मास की साधना को विश्वकल्याणार्थ, समर्पण कर दें। (3) कुयोग के दिनों में भी 9 दिन का एक आयोजन इसी प्रकार से किया जाय। माघ वदी 11 गुरु बार आरम्भ करके माघ सुदी वसंत ता॰ 9 फरवरी को इसे पूर्ण किया जाय। इस अवसर पर भी आश्विन नवरात्रियों की भाँति ही सामूहिक धर्मानुष्ठान किये जाय । व्यक्ति गत साधना भी इन दोनों अवसरों पर कुछ विशेष की जाय।
(4) जनता में किसी प्रकार का भय उत्पन्न न होने जाय। वरन आगामी समय का महत्व बताते हुए उसके लिए आवश्यक आत्मबल, धैर्य साहस और विवेक एकत्रित करने की उसको सलाह ही जाय।
(5) जिनकी निजी निष्ठा गायत्री उपासना में दृढ़ हो चुकी है वे अपनी धर्म पत्नियों को भी प्रेरणा देकर इस मार्ग पर अग्रसर करें और कम से कम इन चार महीनों में तो ब्रह्मचर्य से रहने की प्रतिज्ञा कर ही लें। ऐसे श्रद्धावान दाम्पत्य किन्हीं महान् उच्च आत्माओं को अपने यहाँ जन्म लेने के लिए आकर्षित कर सकते हैं।
गायत्री विद्या के अमूल्य ग्रन्थ रत्न
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रंथों की एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई हैं। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
गायत्री विद्या के ग्रन्थ रत्नर
1-गायत्री महाविज्ञान (प्रथम भाग) मूल्य 3॥)
2-गायत्री महाविज्ञान (द्वितीय भाग) 3॥)
3-गायत्री महाविज्ञान (तृतीय भाग) मूल्य 3॥)
4-गायत्री यज्ञ विज्ञान 2)
5-गायत्री यज्ञ विज्ञान 2)
6-गायत्री चित्रावली 1॥)
7-सचित्र गायत्री शिक्षा 2)
8-गायत्री का मंत्रार्थ 1॥)
गायत्री ज्ञान मंदिर सैट, 52 पुस्तकें मू॰ 13)
अपने घर में छोटा गायत्री पुस्तकालय स्थापित करके अपने सारे परिवार को, स्वजन सम्बन्धियों तथा मित्रों को पढ़ाने योग्य चार-चार आना मूल्य की अत्यंत सुन्दर, मस्ती, बढ़िया ग्लेज कागज पर तिरंगे सुन्दर टाइटिलों की 52 पुस्तकें छापी गई हैं। गायत्री महाविद्या की अत्यंत महत्त्वपूर्ण साधना से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराने तथा इस महामंत्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता, धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की शिक्षाओं का विचार करने के लिए यह सैट बहुत ही उपयोगी है। प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट बहुत ही उपयोगी स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।
गायत्री साधना विषयक 26 पुस्तकें।
1−गायत्री महात्म्य 2-गायत्री की दिव्य शक्ति 3-गायत्री द्वारा भौतिक सफलतायें 6- गायत्री से व्याधि नाश 7-गायत्री से संकट निवारण 8-गायत्री साधना के चमत्कार 9- गायत्री से ब्रह्म साक्षात्कार 10-गायत्री की सुलभ साधना 11-स्त्रियों का गायत्री अधिकार 12-शिक्षाएं 14-गोपनीय गायत्री तंत्र 15-गायत्री यज्ञ का महत्व 16-यज्ञ और भारतीय संस्कृति 17-गायत्री हवन पद्धति 18-सामूहिक यज्ञ योजना 19-गायत्री के जगमगाते हीरे 20-गायत्री उपासना 21-अनादि गुरुमंत्र गायत्री 22 गायत्री से योग साधना 23-सचित्र गायत्री 24- गायत्री सहस्रनाम 25-मनुष्य जीवन की सार्थकता 26-विश्वव्यापी संकट का गायत्री से समाधान।
गायत्री के एक-एक अक्षर की व्याख्या पर 26 पुस्तकें 1−ईश्वर का विराट् रूप 2- ब्रह्म ज्ञान का प्रकाश 3-शक्ति की -उपयोगिता 4-धन का सदुपयोग 5-आपत्तियों में धैर्य 6-नारी को महानता 7-गृहलक्ष्मी की प्रतिष्ठा 8-प्रकृति का अनुसरण 9-मानसिक सन्तुलन 10-सहयोग और सहिष्णुता 11-इन्द्रिय संयम 12-पवित्र जीवन 13-परमार्थ और स्वार्थ 14-सर्वतोमुखी उन्नति 15−ईश्वरीय न्याय 16-विवेक की कसौटी 17-जीवन और मृत्यु 18-धर्म की सुदृढ़ धारणा 19-प्राणघातक व्यसन 20-सावधानी और सुरक्षा 21-उदारता और दूरदर्शिता 23−स्वाध्याय और सत्संग 23-आत्म कल्याण का मार्ग 24-समाज के प्रति कर्तव्य 25-शिष्टाचार और सहयोग 26-साँस्कृतिक पुनरुत्थान
गायत्री का छोटा सैट
गायत्री विद्या से अपरिमित व्यक्तियों को इस महान् ज्ञान का प्रारम्भिक परिचय कराने के लिए 24-24 पृष्ठ की तिरंगा टाइटिल पृष्ठ लगाकर दो दो आना मूल्य की अत्यन्त सुन्दर सस्ती एक आकर्षण 10 पुस्तकों का एक छोटा सैट छापा गया है। पूरे सैट का मूल्य 1।) है यह सैट यज्ञानुष्ठान के अवसर पर वितरण करने तथा दक्षिणा भेंट एवं उपहार में देने के सर्वथा उपयुक्त हैं। दस पुस्तकों के नाम यह है (1) गायत्री की गुप्त शक्ति (2) गायत्री की महान् महिमा । (3) पापनाशिनी गायत्री (4) गायत्री की दैनिक साधनाएँ (5) नारियों की गायत्री उपासना (6) गायत्री की विशिष्ट साधनाएँ (7) गायत्री गीता (8) सचित्र गायत्री (9) गायत्री परिवार का लक्ष (10) गायत्री यज्ञ का महत्व
कुछ विशिष्ट पुस्तकें
1-सूक्त संहिता 1॥) 2-संस्कार पद्धति 2॥) 3-भारतीय संस्कृति की रूप रेखा 2) 4-व्रत और त्यौहार) 5-प्रेरणाप्रद दृष्टान्त 2) 6-सरल चिकित्सा विज्ञान 2) 7-कल्प चिकित्सा 2) 8-गायत्री यज्ञों की रूप रेखा 1) 9-समाज सेवा के रचनात्मक कार्य क्रम 2) 1-पशुबलि हिन्दू धर्म पर कलंक है ) 11-संक्षिप्त गायत्री हवन विधि )
अत्यन्त सस्ते मूल्य में चारों वेद
चारों वेदों की प्राचीन संस्कृत टीका सायण भाष्य के आधार पर हिन्दी टीका आचार्य जी द्वारा सम्पादित की गई हैं। ऊपर मूल मन्त्र तथा नीचे हिन्दी टीका समे, कपड़े की सुन्दर जिल्द में, बढ़िया कागज पर छपा है। चारों वेद सात जिल्दों में छपे हैं। ऋग्वेद की 3 जिल्दें हैं प्रत्येक का मूल्य 7)-7) है, अथर्व वेद की 2 जिन्दे हैं प्रत्येक का मूल्य 6) -6) है यजुर्वेद की एक जिल्द है मूल्य 6) है, सामवेद की की जिल्द मूल्य 5) है। चारों वेदों की 7 जिल्दों का कुल मूल्य 44) होता है। पर अखण्ड ज्योति के ग्राहकों को यह 35) में ही दिया जाता है। रेलवे से माँगने में लगभग 2) तथा डाक से मंगाने से लगभग 5) खर्चा अलग देना पड़ता है। आर्डर के साथ 5) भेजना आवश्यक है।
स्वास्थ्य और दीर्घजीवन संबंधी 26 पुस्तकें
मूल्य प्रत्येक का छः-छः आना है
1-स्वस्थ बनने की विद्या 2-बिना औषधि के कायाकल्प 3-दीर्घ जीवन के रहस्य 4-उन्नति का मूलमंत्र ब्रह्मचर्य 5-जिन्दगी कैसे जिए 6-आसन और प्राणायाम 7-बुद्धि बढ़ाने के उपाय 8-क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें? 9- दूध की आश्चर्य जनक शक्ति 10-तुलसी के अमृतोपम गुण 11-यौवन चिरस्थायी कैसे हो? 12- सौंदर्य बढ़ाने के ठोस उपाय 13-पंचतत्वों से सम्पूर्ण रोग का निवारण 14-उपवास के चमत्कार 15-कब्ज की सरल चिकित्सा 16-स्त्री रोगों की चिकित्सा 17-बाल रोगों की चिकित्सा 18-नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा 9-घरेलू चिकित्सा विज्ञान 20-सूर्य चिकित्सा विज्ञान 21-प्राण चिकित्सा विज्ञान 22-स्वप्नदोष की चिकित्सा 23-भोग में योग 24-पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि 25-मनचाही सन्तान 26-मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार
समृद्धि
प्रत्येक का छः-छः आना।
1-मैं क्या हूँ 2-परकाया प्रवेश 3-मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा 4-स्वर योग से दिव्य ज्ञान 5-ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, 6-वशीकरण की सच्ची सिद्धि 7-जीव जन्तुओं की भाषा 8- ईश्वर कौन है? कैसा है? 9-क्या धर्म क्या अधर्म ? 10-गृहस्थ योग 11-हस्तरेखा विज्ञान 12-हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं? 13-मरने के बाद हमारा क्या होता है 14-आकृति देखकर मनुष्य की पहिचान 15-अमृत, पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति 16-धनवान् बनने के गुप्त रहस्य 17-मित्रभाव बढ़ाने की कला 18-चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग 19-दाम्पत्य जीवन का स्वर्ग 20-जीवन का महान् जागरण 21-तुम तुच्छ नहीं-महान् हो 22-हमारी पारिवारिक समस्यायें कैसे की कला 25-हिन्दू धर्म का प्रधान आधार यज्ञोपवीत 26-वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ।
*समाप्त*