जब बाढ़ आती है तो वह तालाब, पोखर आदि को भर कर सबको समुद्र का सा रूप दे देती है। उस समय कही तालाब, पोखर का चिह्न भी नहीं जान पड़ता सर्वत्र जलमयी हो जाता है। पर वर्षा का जल सामान्य नालों के द्वारा ही बह जाता है। इसी प्रकार जब किसी महापुरुष का आविर्भाव होता है तो उनकी कृपा से अनेक भव सागर के पार हो जाती है। साधना द्वारा सिद्धि प्राप्त कर के एक व्यक्ति बड़ी कठिनाई से अपना ही उद्धार करने में समर्थ होता है, पर दूसरों का उद्धार करने की सामर्थ्य महापुरुषों में ही होती है। नदी या समुद्र में तैरते हुये लकड़ी के बड़े लट्ठे का आश्रय लेकर कितने ही मनुष्य किनारे लग जाते है, पर जल में बहने वाली छोटी डाली पर एक कौआ भी बैठ जाय तो डूब जाता है। इसी प्रकार अवतार या महापुरुषों का आश्रय लेकर कितने ही मनुष्य संसार सागर के पार पहुँच जाते है, पर भजन साधन करने वाले स्वयं ही बड़ा उद्योग करके मुक्ति तक पहुँचते है।
-रामकृष्ण परमहंस
डूब नहीं सकती अब नौका झंझा या मझधार हो।
भय क्या मुझे, व्यग्र क्यों होऊँ? तुम जब खेवनहार हो॥
यौवन की मादक वीणा क्यों झंकृत सहसा हो उठी।
आँखों में सावन-भादो-सी क्यों यह वर्षा हो उठी॥
श्वाँस श्वाँस में किसकी संस्मृति आज व्याप्त सी हो उठी।
उर मन्दिर में किसकी प्रतिमा, सहसा जागृत हो उठी॥
पूजा व्यर्थ नहीं जाती है, निर्गुण या साकार हो॥
ढह कैसे प्रासाद सकेगा जिसका दृढ़ आधार हो।
किसमें लय होने को चल दी सरिता इठलाती हुई॥
अपना सब अस्तित्व गँवाकर, हँसकर बलखाती हुई।
सुनता ध्वनि खोने में मिलता अन्तर से आती हुई॥
बन जाता है गीत पीर जब आती मुसकाती हुई।
श्रद्धा व्यर्थ नहीं जाती है, चाहे कुछ आधार हो॥
कैसे नहीं मिलेगा प्रियतम, जब कि हृदय में प्यार हो॥
-रामस्वरूप खरे साहित्य रत्न
(श्रीराम शर्मा आचार्य)
सृष्टि में अनेकों प्रकार के आनन्ददायक पदार्थ है, पर वे जड़ होने के कारण स्वयं किसी को किसी प्रकार का सुख दुःख नहीं दे सकते। आत्मा की चेतना ही उन पदार्थों के साथ जब घुलती तब पदार्थ में रस उत्पन्न होता है और तभी वे सुखदायक लगने लगते है। यदि आत्मा की अनुभूति उनके प्रतिकूल हुई तो वे ही दुःखदायक बन जाते है। इस संसार में पदार्थ कोई भी ऐसा नहीं है जो अपने आप किसी को सुख या दुःख दे सके।
संसार में अनेकों सुन्दर दृश्य, पदार्थ मौजूद है पर यदि अपनी आंखें जाती रहे, दिखाई न पड़े तो सृष्टि के सभी पदार्थ अदृश्य हो जावेंगे, सर्वत्र अन्धकार ही छाया देखेगा दृश्य पदार्थों की सारी सुन्दरता नष्ट हो जायगी। संसार में बहुत बहुत मधुर शब्दों की ध्वनि होती है। पक्षियों का कलरव, मेघ गर्जन, मधुर भाषण, प्रेमालाप, बालकों की तोतली बोली गायन, वाद्य, प्रवचन आदि बहुत कुछ सुनने योग्य इस संसार में मौजूद है, पर यह सब है तभी तक जब तक अपने कानों में चैतन्यतत्व जागृत है। यदि कान की सजावटता जाती रहे तो यह सारी शब्द धारा समाप्त हो जायेगी तब सर्वत्र नीरवता का साम्राज्य ही दीखेगा।
जिव्हा में कोई रोग हो जाय, मुँह में छाले भर जाय या स्वाद अनुभूति की इन्द्रिय में कोई विकार आ जाय तो फिर संसार के सुस्वादु पदार्थों में क्या विशेषता रह जाएगी? उत्तम से उत्तम भोजन भी मिट्ठी जैसे स्वादहीन लगेंगे। नपुंसकता या कोई और मूत्रेन्द्रिय का रोग हो जाय तो काम सेवन की सुविधाएँ रहते हुए भी उस संबंध में कोई आनंद शेष न रहेगा। पेट का पाचन क्रिया काम न करे तो पौष्टिक पदार्थों का सेवन भी भला शरीर का क्या पोषण कर सकेगा? यदि मस्तिष्क की सजीवता कुण्ठित हो जाय, मूढ़ता, स्मरण शक्ति का लोप, उन्माद आदि कोई रोग घेर ले तो फिर ज्ञान सम्पादन के अगणित साधन होते हुए भी अपना क्या लाभ होगा? तब विद्यालयों, ग्रन्थों, शिक्षकों एवं अन्यान्य ज्ञानवर्धक सुविधाओं से भी क्या प्रयोजन सिद्ध होगा?
आत्मा की सूक्ष्म चेतना सारे शरीर का नियन्त्रण ओर संचालन करता है। उस व्यवस्था में रत्ती भर भी अन्तर आ जाय तो यह सुन्दर, सुगठित, स्वस्थ और सूक्ष्म लगने वाला शरीर भी भार रूप हो जाता है। साधारण सा रोग उठ खड़ा होने पर और परेशानी का ठिकाना नहीं रहता। फिर कोढ़, क्षय, उपदंश, हैजा, प्लेग, जैसा कोई संक्रामक रोग हो जाय तब तो दूसरे लोगों का सहयोग भी कठिनता से मिलता है। लोग छूत से बचने के लिए दूर दूर रहते है और स्वजन सम्बन्धी भी परिचर्या से कतराते है। इस प्रकार का कोई विकार खड़ा होने पर पहले जो लोग अपने ऊपर जान देते थे वे ही दूर रहने और अपना पिण्ड छुड़ाने का प्रयत्न करते है।
अपनी निज की विशेषताओं के कारण जो लोग प्रिय पात्र थे वे ही उन विशेषताओं के समाप्त हो जाने पर उपेक्षा करने लगते है। शत्रु बन जाते है। जिस वेश्या पर यौवनकाल में प्रेमाजन चाल कौओं की तरह मंडराते रहते थे वृद्धा होने पर उसके पास कोई दुःख दर्द की भी सुधि लेने नहीं आता। माता से जब तक बालक दूध तथा जीवन धारण करने की सुविधा को प्राप्त करने के लिए उस पर निर्भर रहता है तब तक उससे अत्यधिक प्रेम करता है। माता जरा देर के लिए भी बच्चे को छोड़ कर कही चली जाय तो वह रोने लगता है। उसी को गोदी में चिपके रहने की इच्छा करता है। पर जब वही माता बूढ़ी हो जाती है, जवान बच्चों के लिए कुछ लाभदायक नहीं रहती तब बेटे का व्यवहार बदल जाता है। वह उपेक्षा ही नहीं करता तिरस्कृत भी करने लगता है।
यह परिस्थितियाँ बताती है कि आत्मा की सजीवता, सूक्ष्मता ओर सुदृढ़ स्थिति ही एक मात्र वह तथ्य है जिसके कारण पदार्थों और व्यक्तियों का सहयोग, सुख और स्नेह प्राप्त होता है। इसमें कमी आने पर व्यवहार ही बदल जाता है। अपने पराये हो जाते है मित्र शत्रु में बदल जाते है। अपने पास धन बहुत हो पर उसकी रखवाली के लायक शक्ति शेष न रहे तो वह धन ही प्राण का ग्राहक बन जाता है स्वजन सम्बन्धी भी मरने की प्रतीक्षा देखते है और चोर डाकुओं का लालच बड़ जाता है। वे किसी बलवान और सुरक्षा सम्पन्न के ऊपर आक्रमण करने की अपेक्षा दुर्बलों को ही अपना शिकार बनाते है। अशक्त व्यक्ति के लिए धन उसकी जान का ग्राहक है। रूपवती स्त्री भी उसके लिए विपत्ति ही है। कारोबार व्यापार आदि में अनेक प्रतिद्वंद्वी खड़े हो जाते है। अपनी मनमानी करने में जिसको भी वह कमजोर व्यक्ति कुछ बाधक लगता है यही उसे काटा समझ कर रास्ते में से हटाने की कोशिश करता है। दुर्बल काया पर अगणित रोगी का आक्रमण होता है। बीमारियाँ उसे अपना घर बना लेती है। मरने पर तो इस देह को जल्दी से जल्दी घर से निकाल बाहर करने और उसे नष्ट करने की व्यवस्था करनी पड़ती है।
यह सब बातें अचरज की भरी, स्वाभाविक है। रोज ही आँखों के सामने इस प्रकार की घटनायें घटित होती रहती है संस्कृत में एक उक्ति है जिसका अर्थ है दैव भा दुर्बल के लिए घातक सिद्ध होना है। जितना बल है, जीवन है, प्राण है उसके उतने ही सहायक और प्रशंसक रहते है। जब इनमें कमी आरम्भ हुई कि अपने बिराने बनने लगते है और मित्र शत्रु का रूप धारण करने लगते है। दुर्बलता को देख कर अकिंचन जाय भी आक्रमण करने और आधिपत्य जमाने की चेष्टा करते है। युद्ध क्षेत्र में घायल और ड़ ड़ ड़ और सियार उनका पेट चीर कर आते खींचते फिरते है। यदि हव सैनिक इस दशा में न होता, स्वस्थ और जीवित होता तो इन कौए और सियारों की हिम्मत पास आने को भी न पड़ती वरन् उससे डर कर अपने प्राण बचाने के लिए भागते फिरते। जीवित मनुष्य जिन चींटियों को पैरों से कुचलता रहता है मृत होने पर वे ही चींटियाँ उस शरीर को नोंच नोंच कर खाने लगती है। गुलाब सा सुन्दर शरीर वृद्ध या रोगी होने पर घृणास्पद बन जाता है।
यह सब बातें बताती है कि जब तक जीवनतत्व की प्रचुरता है तभी तक इस संसार के पदार्थ उपयोगी अनुकूल एवं सहायक सिद्ध होते है। जब प्राण घटा तभी स्थिति बदलने लगता है और शक्ति के क्षीण होते ही सब कुछ प्रतिकूल हो जाता है। जो अग्नि मनुष्य की जीवन भर सेवा सहायता करती रही, भोजन पकाने, सर्दी मिटाने, प्रकाश देने आदि कितने ही प्रयोजनों से जीवन संयोगिनी की तरह सहायक रही वह अग्नि शरीर के मृतक हो जाने पर उसे जला डालने के लिए चिता की ज्वालाओं के रूप में धू-धू करती है। नौकर के बूढ़े होने पर उसे नौकरी से हटा दिया जाता है। भेड़ कसाई के यहाँ अपनी गर्दन कटाने को विवश होता है, रूप और यौवन के लोभी भौंरी जवानी ढलते ही पुष्प पर मँडराना छोड़ देते है, निर्धन का कौन मित्र बनता है? दुर्बल की कौन प्रशंसा करता है? अशक्त को किस का आश्रय मिलता है?
जितना ही गम्भीरता पूर्वक सोचा जाय उतना ही यह तथ्य स्पष्ट होता है कि अपनी आन्तरिक जीवनी शक्ति ही विभिन्न पदार्थों के ऊपर प्रभाव डाल कर उन्हें चमकीला बनाती है अन्यथा वे सब स्वभावतः कुरूप है। कोयला काला कुरूप और निस्तेज है पर जब अग्नि के सम्पर्क में आग है वो भी तेज ओर उष्णता से भरपूर अग्नि जैसा दिखने लगता है। आत्मा ही अग्नि है। वह जिस पदार्थ के साथ जितने अंशों में घुली मिली रहती है वह उतना ही प्रियपात्र एवं हितकारी बन जाता है। आत्मा का सम्बन्ध जिस पदार्थ में जितना ही शिथिल होता जायेगा वह उतना ही व्यर्थ, अप्रिय व अनुपयोगी लगने लगेगा।
जिस मकान, जायदाद, कोठी, मोटर, धन जेवर, घोड़ा, गाय के प्रति अपनी ममता है, मोह है, स्वामित्व की अनुभूति है, वह बहुत ही प्रिय लगते है, उनकी सुरक्षा, एवं सुन्दरता के लिए निरन्तर ध्यान रहता है। उन पर गर्व भी होता है। पर यदि वह वस्तुएँ बिकजाये, पराई हो जाय तो उसकी ओर से उपेक्षा हो जाती है। किसी दूसरे के अधिकार में जाने के बाद वे भले ही आँखों के सामने बनी रहे पर उनके प्रति कुछ भी आकर्षण न रहेगा। ऐसा क्यों हुआ? यदि वस्तुओं से प्रेम रहा होता तो वे पराई होने पर भी पहले की भाँति प्रिय लगती रही होती। इस प्रेम और उपेक्षा में केवल आत्म भाव का ही अन्तर होता है। आत्मा अपने आपको प्यार करता है, जिस चीज में आत्मा का प्रकाश झलकता है, अपनापन अनुभव होता है केवल वही प्रिय लगती है।
पड़ोसी के सुन्दर बच्चे भी अपने लिये कोई मूल्य नहीं रखते, पर अपने कुरूप बालक भी प्राणप्रिय लगते है। पड़ोसी के बच्चे बीमार पड़े या मर जाये तो भी अपने को कुछ भी कष्ट नहीं होता पर यदि अपने बालक को थोड़ा भी कष्ट हो तो भारी चिंता हो जाती है। और उसे निरोग बनाने के लिए भारी दौड़ धूप एवं बहुत धन खर्च करने में भी संकोच नहीं होता। अपने परिवार के प्रति जो ममता रहती है वह पड़ोसियों के प्रति अजनबियों के प्रति कहाँ दृष्टि गोचर होती है? अपने गुणहीन स्वजन भी विराने गुणवान् व्यक्तियों से अधिक महत्त्वपूर्ण एवं मूल्यवान लगते है। क्या पदार्थ, क्या व्यक्ति सभी का प्रिय अप्रिय लगना उनकी विशेषताओं पर नहीं अपनी ममता और आत्मीयता पर निर्भर है। जिसकी जैसी अभिरुचि है उसे वैसा ही दृष्टि पदार्थ या व्यक्ति पसन्द आते है। संसार में सभी कुछ होता रहता है, सभी कुछ मौजूद है पर अपने को अच्छा वही लगेगा जिसमें अपनी अभिरुचि होगी। सुखानुभूति का अभिरुचि से पसन्दगी से संबंध है। एक आदमी को दूध पसन्द है तो दूसरे को शराब प्रिय लगती है। यहाँ दूध और शराब के गुण दोषों का प्रश्न नहिं, प्रश्न केवल अभिरुचि का हैं। जिसके कारण बुरी वस्तुएँ भी अच्छी लगने लगती है और अच्छी चीज बुरी प्रतीत होती है।
इस संसार में वस्तुतः कोई भी वस्तु न तो आकर्षक है और न सुन्दर। यहाँ सब कुछ जड़ तत्व का परायण हैं जो सर्वथा निर्जीव, निष्ठुर और निस्सार है। प्रिय केवल आत्मा है। आत्मा की आभा ही अपना विस्तार जहाँ जड़ा करती है वही प्रियता मधुरता, सुन्दरता, सरसता का अनुभव होता है। आत्मा जितना बलवान है उसी अनुपात से दूसरे पदार्थ या प्राणी अपने लिए उपयोगी एवं सहायक रहते है। यह तथ्य सत्य से नितान्त परिपूर्ण है। मोटे रूप से इसे हर कोई जानता भी है किन्तु कैसा आश्चर्य है कि जानते हुए भी हम सब अनजान बने हुए है। आत्मा के महत्व को भुलाए बैठे है और पदार्थों के पीछे पागल बने फिरते है।
वस्तुओं की, व्यक्तियों की, साधनों की परिस्थितियाँ अपने सुख दुःख का कारण मानी जाती है। उन्हें ही बदलने या सुधारने के लिए प्रयत्न किया जाता है। पर क्या कभी यह भी सोचा है कि अपनी आन्तरिक स्थिति में हेर फेर किये बिना क्या बाह्य परिवर्तन हमारे लिए अभीष्ट परिणाम उपस्थित कर सकेंगे?
इस कुरूप संसार में सुन्दरता कहा यदि सौंदर्य का अजस्र दर्शन करना हो तो अपनी अन्तरात्मा में सौंदर्यानुभूति का विकास करना होगा, इस परिवर्तन के साथ ही हर वस्तु सुन्दर दिखने लगेगी। इस निर्जीव, निष्प्राण, निष्ठुर दुनिया में प्रेम कहाँ? यदि प्रेम की प्यास है तो अपनी आत्मा में भरे हुए प्रेम के अमृत को चारों ओर बिखेरना पड़ेगा उसके छींटे जहाँ जहाँ भी पड़ेंगे वहाँ सब कुछ प्रेमास्पद ही दिखने लगेगा। इस दुःख रूप जड़ जगत में भोगने योग्य क्या है? सब कुछ स्वाद रहित है। स्वाद तो अपनी इन्द्रियों में बसी हुई रसना में है। रसना नष्ट होने पर यहाँ स्वादिष्ट रह ही क्या जायेगा? यदि स्वाद की लालसा हो तो अपनी शुद्ध रसना को जागृत करे हर पदार्थ रसमय लगने।
हम निर्धन क्यों रहे? अपने सीमित धन को ही अपना मानने की अपेक्षा इस धरती की सारी संपदा को अपने बाप (परमात्मा) की ही जायदाद क्यों न माने? हम मित्रो का, पुत्रों का, स्वजनों का अभाव क्यों अनुभव करे? इस सारी वसुधा को ही कुटुम्ब क्यों न माने? हम असहाय एवं दुर्बल क्यों रहे? अपने आत्म से भरे हुए अनन्त बने को ही विस्तृत एवं विकसित क्यों न करे? यह विकास जितना ही अग्रगामी होगा उतने अनुपात से संसार हमारे लिए सहायक एवं उपयोग प्रतीत होने लगेगा।
अपने अन्दर बहुत कुछ है। बहुत कुछ ही नहीं सब कुछ भी है। बाहर तो केवल भीतर की छाया मात्र है। इस अन्दर के बहुत कुछ को, सब कुछ को ढूँढ़ना, समझना, सुधारना, बनाना और बढ़ाना यही अध्यात्म है। अध्यात्म का महत्व अनन्त है। जो कुछ इस संसार में सुख, सौंदर्य, सहयोग, प्रिय, मधुर, लाभ, सन्तोष, आनन्द एवं उल्लास दिखाई देता है वह सब अपने भीतरी तत्व की ही छाया दर्शन है। छाया के पीछे न भाग कर हम उद्गम का आश्रय ग्रहण करे यही अध्याय है, यही अध्यात्म का सन्देश है।
अनेकों गुत्थियों और समस्याओं के साथ मनुष्य का जीवन उलझा हुआ है। उन्हें वह सुलझाना चाहता है और शान्ति पूर्वक रहना चाहता है पर वे सुलझ नहीं पाती। कारण यह है कि समस्याओं का वास्तविक स्वरूप एवं उन्हें सुलझाने का सही तरीका मालूम न होने से इस प्रकार के प्रयत्न किये जाते रहते है जो जड़ की उपेक्षा करके पत्तों को सींचने के समान हास्यास्पद सिद्ध होते है।
परमात्मा सब का पिता है। उसे अपने सभी पुत्र समान रूप से प्यारे है वह सब का हित और कल्याण चाहता है और सभी के लिए समान स्नेह से सुख साधन एवं सुविधाएँ प्रदान करता है। किन्तु देखा जाता है कि कितने ही व्यक्ति दुखी और कितने ही सुखी है। इस भिन्नता का कारण कोई बाहरी व्यक्ति, परिस्थिति, ग्रह नक्षत्र, या देव दानव नहीं वरन वह स्वयं ही है। प्रारब्ध और आकस्मिक हानि लाभ जो कि दैवी अनुग्रह था कोप समझे जाते है वस्तुतः हमारी अपनी निज की कृति ही है। भूतकाल में हमने जो कुछ शुभ अशुभ कर्म किया है वे ही आज प्रारब्ध बन कर सामने खड़े होते है। पूर्व कृत शुभ कर्मों का जब सुखद परिपाक सामने आता है तब वह दैवी कृपा जैसा लगता और जब अशुभ कर्मों का दुखदायी परिणाम सामने आता है तो वह ईश्वरीय कोप या भाग्य हीनता जैसा प्रतीत होता है। वस्तुतः अपनी प्रत्येक भली बुरी परिस्थिति का उत्तर दायित्व स्वयं अपने ऊपर ही होना है। सुख और दुःख देने की शक्ति बाहर की अन्य किसी सत्ता में नहीं, वह तो व्यक्ति स्वयं ही है जो अपने लिए शुभ अशुभ परिस्थितियों का निर्माण किया करता है। मकड़ी अपना जाला स्वयं बुनती है और उसमें स्वयं ही उलझी रहती है। मनुष्य ने भी अपनी परिस्थितियों का जाला स्वयं ही बुना होता है और वह स्वयं ही उसमें फँसता निकलता रहता है।
इस तथ्य को हम जितना ही अधिक हृदयंगम करते है, उतना ही यह निश्चय होता है कि अध्यात्म ही इस संसार का सबसे बड़ा, सबसे महत्त्वपूर्ण तत्वज्ञान है। यही सबसे बड़ी शिक्षा और यही सबसे बड़ा बुद्धिमत्ता है। जिस आधार पर हमारे सुख दुःख की, उत्थान पतन की, सन्तोष सन्ताप की धुरी घूमती है उस पर ही सब से अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। जड़ को सींचने से ही जब पत्ते हरे हों तो हर कुम्हलाने हुए पत्ते का अलग अलग सींचने या उन पर हरा रंग पोतने का श्रम करने से क्या लाभ? अनेकों प्रकार की गुत्थियाँ और परेशानियाँ हमारे सामने रहती है। यदि उनका उलझना और सुलझना हमारी आन्तरिक स्थिति पर ही निर्भर है तो बाह्य उपचार की अपेक्षा अपने आन्तरिक स्तर का सुधार करने का ही प्रयत्न क्यों न किया जाय?
हर कोई सुखी रहना चाहता है। प्रचुर मात्रा में वैभव और ऐश्वर्य प्राप्त करना चाहता है। पर यह भूल जाता है कि इन्हें प्राप्त करने का स्वस्थ आधार पुण्य ही है। अतीत के शुभ कर्म ही कालान्तर में ऐश्वर्य और वैभव बनकर सामने आते है। किसी समय जिनने शुभ कर्मों पर, पुण्य परमार्थ पर अधिक श्रम किया था वे आज उसका प्रतिफल सुख सामग्री के रूप में उपलब्ध कर रहे है। कई व्यक्ति अनीति से भी धन कमाते या बड़े बनते देखे जाते है पर यह दृष्टि भ्रम ही है।
अनीति का परिणाम तो राजदंड, ईश्वरीय दंड, अपयश और दुःख ही हो सकता है। इसके विपरीत जिन्हें इससे लाभ मिल रहा है उनके बारे में यह विचित्र संयोग ही बना पड़ा है कि एक और वे पाप कर्म करके अपने भविष्य को बिगाड़ने में लगे हुए है और दूसरी ओर पूर्व संचित शुभ कर्मों का उदय होने से सुख सफलता भी मिल रही है। एक ओर पाप कर्मों का करना, दूसरी ओर पूर्व कृत शुभ कर्मों का सत्परिणामों का उदय होना यह एक विचित्र संयोग है कि मनुष्य भ्रम में जाता है और समझने लगता है कि पाप कर्मों से ही यह लाभ कमा लिया गया। यदि वस्तुतः ऐसा ही होता तो सभी दुष्ट कर्म करने वाले फलते फूलते और सुख सौभाग्य प्राप्त करते। पापियों में से कुछ थोड़ा हो ऐसे होते है जो लाभदायक स्थिति में रहते है, अधिकांश तो दुःख दरिद्र में ही पड़े रहते है।
यह एक बहुत बड़ा और नितान्त भ्रम ही है कि पाप कर्मों द्वारा सुख साधन जुटाये जा सकते है। संयोगवश यदि पूर्वकृत सुकृतों का फल पाप कर्म करने के साथ ही मिलने भी लगे तो भी उन दुष्कृतों के कारण मन में इतनी अधिक जलन होती कि उस लाभ से होने वाली प्रसन्नता उसके सामने बहुत ही तुच्छ सिद्ध होती है। ऐसे लोग कुछ कमाई कर लेन पर भी पश्चाताप और सन्ताप की आग में ही जलते रहते है।
सुख सम्पत्ति का, श्री समृद्धि का, वैभव ऐश्वर्य का, एक मात्र आधार पुण्य है। जिन्हें सुख साधनों की इच्छा हो सत्कर्म करने चाहिए। यह सत्कर्म करने की प्रवृत्ति केवल मन्त्र अध्यात्म विचार धारा से ही उत्पन्न होती है और किसी प्रकार नहीं इसलिए यह सुनिश्चित तथ्य मान ही लेना होगा कि यदि किसी को वस्तुतः सुखी रहने की आकांक्षा हो, यदि कोई इसका ठोस और वास्तविक आधार प्राप्त करना चाहता हो तो उसे सन्मार्ग ही अपनाना होगा, सद्भावों को ही धारण करना होगा, सत्कर्मों को ही करना होगा और यह तभी संभव है जब मन क्षेत्र में अध्यात्म विचारधारा की सुदृढ़ स्थापना हो। विचारों से ही क्रिया उत्पन्न होता है। प्रेरणा से ही प्रवाह बनता है। पुण्य परमार्थ की दिशा में विचार और प्रेरणा देने का कार्य आध्यात्मिकता पर ही निर्भर है। यही सुख की एक मात्र कुञ्जी है। जिसने इसे जाना और माना उसका सुख सुरक्षित है उसके लिए दुःख दैन्य का कोई कारण शेष नहीं रह जाता।
देखते हैं कि आज सभ्य कहे जाने वाले वर्ग में अध्यात्म के प्रति उपेक्षा ही नहीं तिरस्कार भी है। जो व्यक्ति अध्यात्म की लोक परलोक की, ईश्वर आत्मा की, भजन पूजन की बात करता है वह मूर्ख समझा जाता है। उसका मखौल बनाया जाता है। इस खेद जनक स्थिति का एक मात्र कारण यही है कि अध्यात्म का शुद्ध स्वरूप आज हमारी आँखों के आगे नहीं है। जिस तत्वज्ञान का अवलम्बन करके प्राचीन काल में इस देश का प्रत्येक व्यक्ति नर रत्न, महामानव, पुरुषार्थ कर्मी, सद्गुणी, मनस्वी, दीर्घजीवी, निरोग, सम्पन्न, सुखी समृद्ध एवं सभी दिशाओं में सफल होता था, राजा अपने राजकुमारों को, श्रीमन्त अपने लाडलों को, ऋषियों के आश्रमों में जिस अध्यात्म की शिक्षा प्राप्त करने भेजते थे और जिसे ड़ड़ड़ड़ वे पृथ्वी के देवता बनकर लौटते थे, वह अध्यात्म आज वहाँ है? यदि अपना वह प्राचीन काल वाली उपयोगिता अध्यात्मिकता ने आज भी उपस्थित की होती तो निश्चय ही उसका गौरव और सम्मान अक्षुण्ण रहा होना। जिस प्रकार भौतिक विज्ञान का आज कोई तिरस्कार नहीं कर सकता उसकी उपयोगिता और वास्तविकता के आगे सभी को सिर झुकाने के लिए विवश होना पड़ता है वैसे ही यदि अध्यात्म विज्ञान भी अपने शुद्ध स्वरूप को कायम रख सका होता तो घर घर में उस महाविज्ञान का सम्मान होता। प्रेरक व्यक्ति अपने आपको अध्यात्मवादी होने से गर्व अनुभव करता।
परन्तु आज तो स्थिति ही दूसरी है। जैसे हर चीज की नकल चल पड़ी है, असली का स्थान हर क्षेत्र में नकली को मिलता जा रहा है उसी प्रकार नकली अध्यात्म का भी झंडा चारों ओर फहरा रहा है। निकम्मे, निठल्ले, हरामखोर, आलसी, दुर्गुणी, व्यसनी लोग बिना किसी श्रम, पुरुषार्थ, गुण एवं महानता के केवल रामनामी दुपट्टा ओढ़कर सन, महात्मा, सिद्ध, ज्ञानी, और गुरु बन जाते है। वे कुछ राम नाम लेते है। इतनी मात्र विशेषता बनाकर वे जनता से अपने लिए अमीरों जैसा बढ़िया किस्म का निर्वाह, ऐश आराम और पैर पुजाने का सम्मान प्राप्त करते है। दूसरी और उनकी शिक्षा को मानने वाले अपने परिवार को, समाज को, धर्मकर्तव्यों को, जिम्मेदारियों को तिलाञ्जलि देकर संसार को मिथ्या बताने, भाग्य पर निर्भर रहने की विडम्बना में पड़ जाते है। ऐसे लोग सभी दिशाओं में असफल आलसी, प्रमादी और आजीविका की दृष्टि से भी पराश्रित होते देखे गये है। दुनियाँ हर चीज का मूल्य उसके प्रत्यक्ष स्वरूप को देखकर आँकती है। छप्पन लाख अध्यात्मवादियों की यूनिफार्म धारी रजिस्टर्ड सेना तथा घर बाजारों में रहने वाली अन्ध भक्तों को उससे भी बड़ी मलेशिया सेना के गुण, कार्य और महत्व को देखकर हर विचारशील को बड़ी निराशा होती है। हर समझदार आदमी अपने को तथा बच्चों को उससे छूत की बीमारी की तरह बचने की कोशिश करता है ताकि उसी प्रकार का घटिया जीवन उनके पल्ले भी न बँध जाय।
आज के नकली अध्यात्म का तिरस्कार होना उचित ही है। भजन तक ही वह सीमित नहीं है। उस का वास्तविक उद्देश्य है आत्मा का सर्वांगीण विकास ईश्वर का भजन इसमें एक बड़ा आधार है। पर आत्मसुधार, आत्मनिर्माण, आत्मविकास के सुव्यवस्थित आत्म विज्ञान को अनावश्यक तुच्छ एवं उपेक्षणीय मान कर केवल मात्र भजन करते रहने से भी कुछ विशेष लाभ सम्भव नहीं ऐसे अगणित व्यक्ति देखे जाते है जो भजन सारे दिन करते है, पूजा पाठ में बहुत मन लगाते है, पर काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद मत्सर की दृष्टि से वे सामान्य श्रेणी के लोगों से भी गये बीते है। इस का कारण यही है कि उनकी साधना एकांगी रहा, भजन को ही उनने सब कुछ माना और आत्म निरीक्षण, आत्म चिन्तन, आत्म शोधन, आत्म परिष्कार आत्म दर्शन एवं आत्म कल्याण के महा कार्य को हाथ में ही नहीं लिया। ऐसी अव्यवस्थित साधना के परिणामों से वैसी ही आशा की जा सकती है जैसी कि आज दृष्टिगोचर हो रही है।
अध्यात्म वस्तुतः एक महान् विज्ञान है। इसे जीवन विद्या या संजीवन विद्या कह सकते है। जीवन जैसे महान् कार्य का सही उपयोग करना इसी ज्ञान के आधार पर संभव होता है। किसी बड़ी जागीर मिल, फैक्टरी, फार्म, संस्था उद्योग या विशालकाय मशीन को चलाने, सुधारने और लाभ दायक स्थिति में रखने के लिए प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। यदि अनाड़ी हाथों में ऐसे बड़े काम सौंप दिये जाय तो अनर्थ की ही सम्भावना रहेगी। मानव जीवन भी ऐसी ही एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। चौरासी लाख योनियों के बाद प्राप्त हुआ, सृष्टि का सर्वोपरि उपहार, यह सुर दुर्लभ मनुष्य शरीर है। इसको ठीक प्रकार से जीने की भी एक सर्वांगीण विद्या है उसे ही अध्यात्म कहते है। जिसमें अध्यात्म का शुद्ध स्वरूप जान लिया और उसे अपना लिया उसके लिए यह मानव शरीर ऋषि सिद्धियों का भण्डार है। सुख शान्ति का रत्न कोष है। आनन्द और उल्लास का खजाना है। ऐश्वर्य और वैभव का कल्पवृक्ष है अध्यात्म युक्त जीवन ही वह जीवन ही वह है जिसे प्राप्ति कर मनुष्य अपने आपको देवता की स्थिति में पहुँचा हुआ, अनुभव करता है।
लौकिक जीवन में जितने भी सुख साधन एवं प्रसन्नता दायक है उनका मूल अध्यात्म ही हैं। यदि इस विचारधारा का प्रभाव मन पर न हो तो पुण्य कर्म किस प्रकार बन पड़ेंगे? और उनके बिना सुख साधनों से परिपूर्ण प्रारब्ध कैसे बनेगा। स्त्री पुत्रों का स्वजनों परिजनों का सज्जन और सद्भाव सम्पन्न होना एक बहुत बड़ा सुख है। पर यह सुख उसे ही मिलता है जिसने अपने स्वभाव और चरित्र को आदर्श बनाकर अपने निकटवर्ती लोगों को प्रभावित कर लिया है। दूसरों को सज्जन बनाने के लिए अपना सज्जन होना आवश्यक है। ड़़ड़ड़ड़ नाम के बेटे अवज्ञाकारी ही हो सकते है। ड़ड़ड़ड़ बालक के स्वभाव का बहुत कुछ निर्माण उसके ड़ड़ड़ड़ पूर्व हो जाता है। माता पिता के रजवीर्य से बच्चे का शरीर बनता है और उनके स्वभाव एवं चरित्र से उसका मन विनिर्मित होता है। अच्छी सन्तान पैदा करने के इच्छुक माता पिता को इसके लिए वर्ष पूर्व आत्म निर्माण की साधना करनी पड़ती है। अपना चेहरा कुरूप हो तो फोटो भी कुरूप ही खिंचेगा माता पिता का स्वभाव अव्यवस्थित हो तो उनके बालक कैसे सज्जन और सद्भावी होंगे? बच्चों को पौष्टिक भोजन कराके सद्भावी होंगे? बच्चों को पौष्टिक भोजन कराके उन्हें स्वस्थ और कपड़े जेवर आदि से सजा कर सुन्दर बनाया जा सकता है पर उनके स्वभाव में श्रेष्ठता तो तभी आयेगी जब माता पिता अपनी श्रेष्ठता का प्रभाव प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से उन पर डाले।
यह कार्य आध्यात्मिक विचार धारा से ओतप्रोत दम्पत्ति ही कर सकते है। इसलिए उत्कृष्ट प्रकार की संतान प्राप्त करना भी उन्हीं के लिए संभव होता है। कभी कभी सज्जनों के घर में भी कुसंस्कारी बालक जन्मने के अपवाद होते तो है पर मोटा नियम यही है कि जैसे भावना प्रवाह में बालक पलता है वैसे ही संस्कार उसके बनते है और धीरे धीरे वह उसी ढाँचे में ढल जाता है। उपदेशों से नहीं, बालक संस्कारों से ढलते है और श्रेष्ठ ढालने का साँचा एक मात्र अध्यात्म ही है।
यही बात परिवार के अन्य सदस्यों के ऊपर लागू होती है। पति पत्नी में से एक भी उत्कृष्ट स्वभाव का हो तो दूसरे की अपूर्णता को बहुत हद तक दूर करके सभी की बहुत ड़ड़ड़ड़ कूल बना सकता है। व्यवहार की सज्जनता से परिवार के अन्य सदस्य भी अपने अनुकूल बन जाते है। मित्रो और संबंधित व्यक्तियों पर भी ये बात बहुत हद तक लागू होता है।
संबंधित व्यक्ति अपने अनुकूल स्वभाव और आचरण रखे, अपने प्रति सद्भाव रखे तो उनके सान्निध्य में रहने से स्वर्ग जैसा सुख मिल सकता है। जिसके निकटवर्ती परिजन विरोधी दुर्भाव रखते है उसके लिए प्रत्यक्ष नरक ही है। भौतिक जीवन के इस स्वर्गं को ड़ड़ड़ड़ स्वर्गं बदल देना हमारे अपने दृष्टिकोण एवं स्वभाव की उत्कृष्टता एवं निकृष्टता पर बहुत कुछ निर्भर है। अध्यात्म की ओर अभिमुख होकर यदि कोई व्यक्ति अपने परिजनो को स्नेही एवं सहयोगी बना लेता है तो क्या यह कुछ कम लाभ है? धनी होना उतना सुखकर नहीं जितना स्नेही परिवार प्राप्त करना। यह दोनों ही सुखा प्रदान करने का अनन्त क्षमता अध्यात्म विद्या में सन्निहित है। ऐसी महान् विद्या की उपेक्षा करना निश्चित रूप से कोई समझदारी की बात नहीं है।
बहुत आमदनी होने पर तो कोई भी सुख साधन इकट्ठे कर सकता है पर अध्यात्मवादी के लिए कम आमदनी में भी धनियों की अपेक्षा अधिक सुखपूर्वक जीवन यापन करना संभव है। आमदनी की मर्यादा में ही अपना बजट चलाना, फिजूल खचिँयों को त्याग देना, मितव्ययिता और विवेकपूर्ण एक एक पाई का खर्च करना, शौकीनों और विलासिता से घृणा करते हुए सादगी को अपनाना, खर्च में दूसरों की होड़ न करके अपनी ही परिस्थितियों में सन्तोष रखना, आदि अनेक सद्गुण आध्यात्मिकता की ही देन है, जो गरीबी में भी अमीरी का आनन्द उपलब्ध करा सकते है। इन गुणों के होने पर गरीबी गरीबी नहीं लगती और इनके अभाव में अमीरी भी रूखी, फीकी, असन्तोष जनक एवं अपर्याप्त लगती है।
स्वास्थ्य की समस्या का सम्बन्ध लोग पौष्टिक आहार से जोड़ते रहते है। सोचते है कि बढ़िया खाना मिले तो तन्दुरुस्तता बढ़े। पर वास्तविकता यह है कि मानसिक स्थिति पर ही आरोग्य निर्भर रहता है। हँसमुख, चिन्ता रहित, सरल स्वभाव, निष्कपट, सदाचारी व्यक्ति आमतौर से स्वस्थ रहते है क्योंकि उनका अन्तः करण उस आग में नहीं जलता रहता जो स्वास्थ्य को चौपट करने में सबसे बड़ा कारण सिद्ध होती है। असंयम भी स्वास्थ्य की बर्बादी का एक महत्त्वपूर्ण कारण है, जिव्हा का चटोरापन, अटशंट चीजें अनावश्यक मात्रा में पेट में ठूँसते रहने के फलस्वरूप और खराब होती है, रक्त दूषित होता है और नाना प्रकार की बीमारियाँ जड़ जमाती है। ब्रह्मचर्य सम्बन्धी असंयम शरीर को खोखला कर देता है और युवावस्था में ही बुढ़ापा लाकर अल्पायु में मरने के लिए विवश करता है। इससे शरीर का हर अंग क्षीण और दुर्बल होने लगता है और बीमारियाँ घेरती है।
लौकिक जीवन में आरोग्य, धन, स्नेह, सौजन्य यह तीन ही सबसे बड़ी विभूतियाँ मानी गई है। इन्हीं से मनुष्य अपने को सुखी अनुभव करता है। यह तीनों ही विभूतियाँ अध्यात्म के छोटे से उपहार है उन्हें सच्चे अध्यात्मवाद का कोई भी उपासक निश्चित रूप से प्राप्त कर सकता है। आन्तरिक जीवन की वह सुख समृद्धि तो इन लाभों के अतिरिक्त ही है जिन्हें प्राप्त करने वाला अपने को सब प्रकार धन्य और कृतकृत्य अनुभव करता है।
किन्हीं आध्यात्मिक व्यक्तियों में कुछ अलौकिक चमत्कारी शक्ति देखी जाती है वे कई बार ऐसे आश्चर्य जनक कार्य करते है जिन्हें देखकर उनकी विशेषता स्वीकार करनी पड़ती है। कई आध्यात्मिक शक्तियों के आशीर्वाद से दूसरों का भला और शाप से अहित होता देखा जाता है। पुराण इतिहास में ऋषि तपस्वियों के जीवन के अगणित अलौकिक कार्यों का विवरण मिलता है।
योग की सिद्धियाँ और विभूतियाँ प्रसिद्ध है। योग शास्त्र के दक्षिणमार्गी और वाममार्गी ग्रन्थों में इस प्रकार की विभूतियों के कारण और विधानों को विस्तार पूर्वक बताया गया है। जिन लोगों ने उस मार्ग पर चलते हुए जितनी मंजिल पार की है उनमें उस साधना विज्ञान से संलग्न अनेकों साधक अपने में कुछ विशेष प्रकार की सूक्ष्म शक्ति संग्रह करने में समर्थ होते है और उसका लाभ स्वयं उठाते अथवा दूसरों को देते रहते है। यह प्रत्यक्ष तथ्य है। प्राचीन काल में ऐसे अगणित साधक सर्वत्र दृष्टि गोचर होते थे। यह ऋषियों का देश ही था। यह अध्यात्म विद्या का गौरव सभी को विदित था और सभी उसके साथ अपने को किसी न किसी रूप में संबद्ध रखने का प्रयत्न करते थे। प्रातः और साय सन्ध्या वन्दन की साधना तो सभी के लिए अनिवार्य थी जो उसकी उपेक्षा करता था उसे पतित माना जाता था। इसी अपराध के अपराधी समाज बहिष्कार का दण्ड पाते थे और शूद्र, अन्त्यज,चाण्डाल आदि नामों से पुकारे जाते थे।
आज तो दुर्भाग्य से इन नामों की जातियाँ ही बन गई है। कैदियों की कालान्तर में कोई जाति ही बन जाय तो इसे उचित नहीं कहा जायेगा इसी प्रकार आज अन्त्यज चाण्डाल आदि जो जातियाँ देखी जाती है, वस्तुतः उनका आरम्भ साधना की उपेक्षा करने से दंड स्वरूप हुआ था। यह कभी नहीं सोचा गया था कि आगे चलकर यह वशं परम्परा ही चल पड़ेगी। आज तो आत्म कल्याण की आध्यात्मिक साधनाओं से विमुख हममें से अधिकांश लोग चाण्डाल अन्त्यज कहे जाने के ही अधिकारी है।
हमारे पूर्वज जानते थे कि मनुष्य बड़ा, आलसी और स्वार्थी है। उसकी दृष्टि चिरस्थायी किन्तु दूर वर्ती लाभों को देखने में चूक करती है और तुरन्त के छोटे से सुख के लिए वह भविष्य को अन्धकारमय बना लेने का प्रमाद बहुधा करता रहता है। इसी की रोकथाम के लिए इस प्रकार के बन्धन लगाये गये थे, दण्ड विधान बने थे, ताकि आत्म साधना की उपेक्षा करके कोई व्यक्ति उन लाभों से वंचित न रहे जो मानव जीवन की सफलता के लिए नितान्त आवश्यक है।
ऋषि मुनि प्रचण्ड साधनाएँ करके असाधारण और अलौकिक आत्मबल सम्पादन करते थे और अपने लोक परलोक को शानदार बनाते थे। पर इतना आत्मबल तो सभी के लिए आवश्यक समझा जाता था जिससे वह सुखी सन्तुष्ट और शान्ति पूर्ण जीवन यापन कर सकें। साधना और स्वाध्याय की अनिवार्यता पर धर्म शास्त्रों में अत्यधिक जोर दिया गया है क्योंकि आन्तरिक स्थिति की स्वस्थता के लिए यह दोनों ही बातें आवश्यक है। आन्तरिक स्वास्थ्य के बिना बाह्य जीवन नितान्त असफल एवं संतापयुक्त ही रहता है चाहे उसमें भौतिक सम्पदाएँ कितनी ही अधिक क्यों न हो।
अध्यात्म के सत्परिणाम प्रसिद्ध है। उसके आधार पर लौकिक और पारलौकिक दोनों ही प्रकार की सुख शान्ति उपलब्ध होती है, शान्ति, संतोष प्रसन्नता निर्भरता और स्वतंत्रता के पाँच प्रतिफल इस अंक के विगत पृष्ठों में बताये जा चुके है। जब यह लाभ प्राप्त होते है तो उनके स्थूल साधन भी साथ ही जुड़े रहेंगे। संतोषजनक धन, स्त्री, पुत्र, परिवार स्वास्थ्य, पद, यश, विद्या, चतुरता, मैत्री आदि जो साधन इस लोक की सुख सम्पत्ति के रूप में पुकार आत्मिक स्थिति जितनी ही विकसित होती चलेगी उतनी ही यह साधन सामग्री भी अपने आस पास एकत्रित होती चली जायगी।
आत्मिक सिद्धियों से सम्पन्न जो तपस्वी एवं सिद्ध पुरुष देखे जाते है उनका अपने अस्थिर शरीर और मन पर नियंत्रण होते ही प्रकृति पर भी एक सीमा तक अधिकार हो जाता है। सूक्ष्म जगत में जो कुछ हो रहा है, या होने जा रहा है, उसे वे वैसे ही देख सकने में समर्थ होते है जैसे हम चर्म चक्षुओं से साधारण दृश्यों को देखते है। प्रकृति के साधारण नियमों का उल्लंघन किसी बात में नहीं है, जीव की कुछ अपूर्णताएं ही उसे सीमित रखती है। पक्षी आकाश में उड़ सकते है, मछली दिन रात पानी में डूबी रह सकती है, हंस पानी पर चलते रहते है, अनेकों सूक्ष्म कीड़े हवा और पानी में घूमते रहते हैं पर हमें दीखते नहीं। यही बातें यदि मनुष्य करने लगें तो वे बातें सिद्धियाँ लगती है। आत्म शक्ति संपन्न व्यक्ति अपनी अपूर्णताएं दूर कर सकता है और अन्य अनेक प्राणियों की तरह विशिष्ट शक्तियों से संपन्न हो सकता है। यह लाभ यों सामान्य ही हैं पर उनसे मानव जीवन को और भी सर्वांगीण बनाने में सहायता मिलती है।
वैज्ञानिक जानते हैं कि एक विशाल ग्रह में जो शक्तियाँ और क्षमताएँ होती हैं वे सभी बीज रूप से एक परमाणु में मौजूद रहती हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड का ढाँचा पिण्ड के अन्दर मौजूद है। आत्मा आखिर परमात्मा का ही अंश तो है, जीव में ईश्वर के सभी गुण विद्यमान् हैं। पर वे सभी प्रस्तुत अवस्था में पड़े हैं। साधना द्वारा उनका जागरण किया जाता है। वैज्ञानिक एक छोटे से अणु की छिपी शक्ति का जब ठीक उपयोग कर लेने में समर्थ हो जाते हैं तो विनाश कारी, एटम बम बनकर तैयार हो जाता है। मनुष्य यों एक परमाणु के समान ही तुच्छ प्रतीत होता है पर साधना के द्वारा जब उसकी प्रसुप्त शक्तियों का जागरण किया जाता है तो वह अत्यंत शक्तिशाली और महान् बन जाता है। स्वयं ही वह सुसम्पन्न नहीं होता वर और भी अनेकों को सुसम्पन्न बना देने की क्षमता उसमें प्रस्फुटित हो जाती है। कुण्डलिनी जागरण, ब्रह्म समाधि आदि ऐसे ही अवस्थाएँ है जिनमें सामान्य शरीर रहते हुए भी जीवन वस्तुतः अत्यन्त उच्च भूमिका में जा पहुँचता है और प्रकृति के सूक्ष्म रहस्यों का इसी प्रकार साक्षात्कार करता है जैसे हम सामान्य वस्तुओं को चर्म चक्षुओं से देखते है। ऐसे सिद्ध पुरुष अपने आत्मिक प्रभाव का उपयोग करके किन्हीं परिस्थितियों को बदल भी सकते है। व्यक्तियों और वस्तुओं में भी उनके द्वारा परिवर्तन होता जाता है। ईश्वर की कार्य प्रणाली में वे भी एक तरह से भागीदार बन जाते है और एक नियत सीमा तक वे ईश्वरीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए सृष्टि व्यवस्था का संचालन भी कर सकते है।
आत्मिक क्षेत्र का विस्तार और महत्व अत्यन्त विशाल है। उसकी सफलताएँ इतनी महान् है कि विवेकवान् व्यक्ति भौतिक जीवन में बड़े से बड़े कष्ट सहकर भी, बड़े से बड़े त्याग करके भी उस क्षेत्र में प्रवेश करते है। ऋषि मुनि, त्यागी तपस्वी मूर्ख नहीं थे। वे सच्चे व्यवहारवादी थे। बड़े लाभ के लिए छोटे लाभ का त्याग करने की व्यवहारिक नीति का ही उनने पालन किया है। मिट्टी में बीज बखेरते समय किसान भी तो यही करता है। साधना की प्रक्रिया देखने में घाटे का काम, समय की बर्बादी भले ही लगे पर वस्तुतः वह वैसी बात नहीं है। उसमें बहुत कुछ तथ्य है, बहुत कुछ सार है।
देव-देवताओं के अनुग्रह और उनके सत्परिणामों पर आमतौर से धार्मिक लोग विश्वास करते है। उनकी पूजा उपासना के अनेकों विधि विधान, भजन पूजन होते रहते है और भक्ति भावना से उनके लाभ भी मिलते है। पुराणों में देवताओं की शक्ति और कृपा के अनेकों उपाख्यान मौजूद है। वे असत्य नहीं है। यदि असत्य होते तो अतीत काल से अब तक वह श्रद्धा भक्ति और पुण्य परम्परा यथावत चलती न आती। असत्य कमजोर होता है इसलिए वह काम समय तक ठहरता है। केवल सत्य में ही वह क्षमता है कि देर तक ठहरे और बराबर बढ़ता एवं फलता फूलता रहे।
साधना किन्हीं देवी देवताओं की भी की जाती है। कुछ यन्त्र, मन्त्र, तन्त्र भी ऐसे है जो किन्हीं कर्मकाण्डों एवं अनुष्ठानों के साथ सिद्ध किये जाते है। इस प्रकार की सभी साधनाएँ साधक की आत्मिक स्थिति के अनुसार ही सफल होती है। श्रद्धा और विश्वास, साहस और धैर्य, एकाग्रता और स्थिरता, दृढ़ता और संकल्प ही वे तत्व है जिनके आधार पर यह साधनाएँ सफल होती है। यदि साधक पर यह साधनाएँ सफल होती है। यदि साधक का संकल्प दुर्बल हो श्रद्धा और विश्वास ढीले हो, चित्त अस्थिर एवं अधीर रहे तो विधि विधान सही होते हुए भी वैसा परिणाम न मिलेगा जैसा मिलना चाहिए। अदृश्य जगत में जो महान् देव शक्तियाँ अवस्थित है उनको अपनी ओर आकर्षित कर सकना निश्चित रूप से अपनी आत्मिक स्थिति पर निर्भर है। जो लोग साधना रत रहते है पर अपनी मनोदशा को परिष्कृत नहीं करते वे उन लाभों से वंचित रह जाते है जो दूसरे अन्य साधक उसी मार्ग पर चलते हुए बहुत कुछ प्राप्त कर लेते है।
सच तो यह है कि आत्मा के अन्तरंग प्रदेश में ही उन अदृश्य देव शक्तियों का निवास होता है जो हमें कही बाहर रहती दिखती है। साधनों के द्वारा हमारे गुप्त चक्रों, संस्थानों, आन्तरिक ग्रन्थियों का जागरण होता है और वे ही हमारे विश्वास के अनुरूप देवता का रूप धारण करके सामने आ उपस्थित होती है। जैसे चतुर माली अपने परिश्रम से किसी पौधे को भली प्रकार विकसित कर लेता है उसी प्रकार श्रद्धावान् साधक भी अपने अन्तः प्रदेश में रहने वाली किन्हीं देव शक्तियों को अपनी श्रद्धा और साधना की सुनिश्चितता के आधार पर सफल एवं सत्परिणाम दायिनी बना लेता है। आलसी और अनाड़ी माली वैसा ही खेत, वैसी ही पौधा वैसी ही उपकरण होते हुए भी अपनी पौधे को निष्प्राण बना देता है। देवताओं के लिए सभी समान है। सभी प्रिय है। पर वे किसी पर कृपा किसी पर उपेक्षा करते देखे जाते है तो इसके मूल में साधक की आत्मिक स्थिति ही काम करती है। किन्हीं की उत्कृष्ट भावनाएँ स्वल्प काल में ही देव शक्तियों को द्रवित कर लेने में सफल होती है पर किन्हीं की अश्रद्धा उन्हें कुछ भी प्राप्त न होने की स्थिति में ही रखे रहती है।
किसी भौतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए सकाम उपासना करने वाले लोगों की मनोभूमि सांसारिक स्तर पर निम्न श्रेणी की ही होती है, इसलिए वे मंत्र शक्ति से अपना कोई प्रयोजन भले ही सफल करले पर सच्ची देव कृपा से वंचित ही रहते है। इसके विपरीत जिनकी आत्मा में सच्ची श्रद्धा भक्ति होती है, जिनका मन निस्वार्थ और निष्काम होना है उन्हें उच्च कोटी के दैवी अनुग्रह प्राप्त होते है। उनको लोक और परलोक दोनों ही सार्थक होते है। इस तथ्य पर विचार करने से भी यही स्पष्ट होता है कि उच्च स्तर की आत्मिक भूमिका ही देव कृपा उपलब्ध होने का प्रधान कारण है।
ईश्वर को भक्त के वश में कहा जाता है। गोपी बालाएँ प्रेम के बल पर ही उसे अपने आँगन में नाच नचा सकी, मीरा ने प्रेम की मजूरी देकर ही उसे चाकर रखा था। सूरदास की लकड़ी पकड़ कर चलने और द्रौपदी के लाज रखने के लिए नंगे पैर दौड़ने के लिए उसे विवश होना पड़ा था। और अधूरे और नीरस मन किए हुए बड़े बड़े पूजा
(श्री अगरचन्द नाहटा)
प्रत्येक प्राणी उन्नति का इच्छुक है। पर उन्नति का सही मार्ग समझना कठिन है और उससे भी कठिन है उसको आचरण में लाना। कोई व्यक्ति कही जाना जाता है या कुछ प्राप्त करना चाहता है तो उसके मार्ग एवं साधना को जानना आवश्यक होता है पर केवल जान लेने से ही काम नहीं चलेगा। हमें कलकत्ते जाना है, उसका मार्ग भी मालूम हो गया, पर जब तक उस मार्ग पर चलेंगे नहीं, हम कलकत्ता नहीं पहुँच सकते। उसी प्रकार आत्मा के सच्चिदानन्द स्वरूप का ज्ञान एवं स्वरूप प्रति के साधन जानकर उनको अपनाने व आचरति करने की परमावश्यकता है।
उपचार भी निरर्थक होते है दूसरी ओर वह सच्चे भक्तों के पीछे पीछे फिरता देखा जाता है। इस प्रकार में भी एक ही निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर को प्रसन्न करना, उसके अनुग्रह से सद्गति सुख शान्ति, स्वर्गं, मुक्ति प्राप्त करना केवल आन्तरिक स्थिति की उत्कृष्टता पर ही निर्भर है।
आत्मा ही ज्ञान विज्ञान का केन्द्र है। सुख, शान्ति का मूल आधार वही है। उन्नति और समृद्धि के बीज उसी में छिपे है। स्वर्गं और मुक्ति का आधार वही है। कल्पवृक्ष बाहर कही नहीं अपने भीतर ही है। अगणित कामनाओं की तृप्ति आत्मज्ञान से ही सम्भव हो सकती हो सकती है। आत्मा ही पारस मणि है जिसे छूकर लोहे जैसा काला कलूटा मानव जीवन देवत्व में परिणाम होता है। यही वह अमृत है जिसे पीकर युग युग की अतृप्त तृष्णा का समाधान होता है। आत्मा अपने आप में पूर्ण है जिसमें उसे देख लिया वही सच्चा दृष्टा है, जिसने उसे प्राप्त कर लिया उसके लिए और कुछ प्राप्त करना शेष नहीं रह जाता।
एक ही जगह पहुँचने के लिये मार्ग अनेक होते है, जिनके लिए जो मार्ग सुविधाजनक हो वह उसी का अनुसरण कर साध्य को प्राप्त कर सकता है। जो साधना की विविधता, अनेकता के लिए झगड़ा करते है, वे नासमझ है। वास्तव में योग्यता एवं परिस्थिति की विषमता के कारण कोई समग्र मार्ग वो अपना लेता है, कोई दुर्गम से जान को तैयार हो जाता है। इससे पहुँचने में देर सवेर, आगे पीछे हो सकता है, पर मार्ग सही है, लक्ष्य ठीक है और गति हो रही है तो पहुँच अवश्य जावेगा। यही बात लौकिक एवं लोकोत्तर कार्यरूप आत्मोन्नति के लिये समान रूप से लागू होती है। वैसे आत्मोन्नति के साधन अनेक हो सकते है, पर मुझे जितना विशेष रूप से अनुभव हुआ है उन्हीं साधन लक्ष्यों पर प्रस्तुत लेख में विचार किया जा रहा है वे है। (1) सरलता (2)समभाव (3) सन्तोष (4) सत्संग और (5) गुण ग्राहकता
सरलता निर्मल और गरलता हृदय को कलुषित करती है। अतः आध्यात्मिक गुणों के लिए पहले भूमि शुद्धि की यानी सरलता की आवश्यकता है कोई भी चित्रकार जब चित्र अंकन करने बैठता है तो पहले जिस भीत या जिस दीवार, कपड़े या कागज पर चित्र करता है उसे शुद्ध, धब्बा खुरदरे पर से रहित, साफ-सुथरा व पालिशदार बना लेता है। उसी प्रकार आत्मदेव की झाँकी पाने के लिए सरलता रूपी चित शुद्धि की सर्व प्रथम परमावश्यकता होती है। बाँकी टेड़ी भूमि पर चित्रों का चित्रांकन ठीक नहीं हो सकता। सरलता का वास्तविक अर्थ है जो चीज जिस रूप में है उसे उसी रूप में प्रकट करना। सत्य एवं सरलता की सीमा बहुत कुछ मिलती जुलती है। हमारे में जो गुण दोष है जो विचार है, जो करने का इरादा है, उसे उसी रूप में प्रकट करना सरलता व सत्य है। दिखावे के लिए, दूसरों भ्रम पैदा करने के लिये, भीतर कुछ है पर बाहर कुछ और है, जैसा दिखने का प्रयत्न ही आज अधिक किया जा रहा है। ऐसी कपट बुद्धि जहाँ वहाँ आध्यात्मिकता का पौधा पनप ही नहीं सकता। बाहर भीतर एक बनो। जैसा कुछ हो, जो कुछ जानते हो, उसको अन्यथा रूप में दिखाने का प्रयत्न नहीं करे। व्यवहार में हो सकता है इससे कुछ नुकसान प्रतीत हो, पर वास्तव में जो पराये को धोखा देता है वह अपने को पहिले धोखा देता है। जहाँ निर्मलता नहीं कलुषता है, वहाँ अन्य सद्गुणों का आगमन एवं विकास असंभव ही समझिये दिखावे एवं ढोंगरूप कोई भी काम न कर, जो कुछ किया जाय वह अतः प्रेरणा से हो। दुराव, छिपाव न हों।
दूसरे गुण समभाव की आवश्यकता है। समभाव का वास्तविक अर्थ है राग द्वेष का परिहार। जहाँ क्रोध एवं द्वेष की ज्वाला धधक रही है वहाँ आध्यात्मिक शान्ति आयेगी ही कैसे? जहाँ तक विषयाभिलाषा, धन, पुत्र, स्त्री, परिवार आदि में मोह है, वहाँ मन की वृत्ति बहिर्मुखी रहती है। अन्तर्मुखी बनने के लिए बाहर का आकर्षण, अच्छे एवं बुरे दोनों, कम करने होंगे हटाने होंगे। विश्व में अच्छे बुरे अनेक प्रकार क प्राणी है। भली बुरी अनेक प्रकार के प्राणी है। भली बुरी अनेक वस्तुएँ है। उनके विचार वैषम्य में समभाव के बिना वास्तविक साध्य तक पहुँचना कठिन है।
तीसरा साधन है संतोष। मनुष्य को कर्तव्य पथ से डिगाने, अन्याय में प्रवृत्ति कराने वाली वृत्ति लोभ की है। लोभ अनेक प्रकार का होता है। जहाँ तक धन, पुत्र, स्त्री या किसी भी प्रकार की तृष्णा कमजोर नहीं हो जाती, आध्यात्मिक सुख जाग्रत हो ही नहीं सकता। हमारे विचार एवं प्रयत्न जिन जिन वस्तुओं की आकांक्षा है, उन्हीं की प्राप्ति की उधेड़ बुन में चलते रहते है। लोभ की कोई सीमा भी तो नहीं एक मिला तो दूसरी आशा जाग उठी। इसलिए महापुरुषों ने कहा है कि संतोष के बिना सुख कहाँ है? लोभ, पाप का बाप कहा गया है। जीवन निर्वाह के लिए धनोपार्जन, प्रतिष्ठा व अन्य पारिवारिक जनों के लिए वस्तुओं का संग्रह करना पड़ता है पर उसी में रम मत जाइये। लोभ को पहले सीमित बनाइए एवं धीरे धीरे फलाशा रहित कर्तव्य बुद्धि से प्रवृत्ति करने के आदेशरूप गीता के वाक्यों परिस्थिति है उसमें असंतोष मत रखिये उच्च स्थानों की प्राप्ति का प्रयत्न करिये, पर विवेक के साथ संतोष के बिना आध्यात्मिक उन्नति नहीं हो सकती।
इसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति के लिए सत्संग भी परमावश्यक है। सत्पुरुषों का सम्पर्क ही मानव को ऊँचा उठाने की प्रेरणा देता है, क्योंकि वे पथ प्रदर्शक होते है। असत् प्रवृत्तियों से दूर कर सही रास्ता दिखा देते है। असत् प्रवृत्तियों से दूर कर सही रास्ता दिखा देते है। अनुभवी होने से, जहाँ भी अपनी कमजोरी विदित हुई, वे सावधान कर देंगे। जहाँ मार्ग अवरुद्ध नजर आयेगा, वे अपने अनुभव प्रकाश से हमारा पथ आलोकित कर देंगे। अतः उपयुक्त साधन सत्संग को अपना कर आध्यात्मिक उन्नति करे।
पाँचवाँ साधन है गुण ग्राहकता। हमारी अव गुणग्राही वृत्ति ने हमें दोषों का खजाना बना दिया है। जैसा देखेंगे तदनुसार संस्कार दृढ़ होकर हम वैसे ही बन जायेंगे अवगुणग्राही दृष्टि से हमें दोष ही नजर आयेंगे और गुणग्राही की दृष्टि हो तो सर्वत्र से कोई लाभ नहीं, अपितु हानि ही हानि है और गुण ग्राहकता की वृत्ति से लाभ ही लाभ है। गुणी का अपनाना सीखे, दोष तो अपने में ही बहुत है, उन्हें ही दूर करने का प्रयत्न करे। दूसरे के तो गुण ही देखे। इससे आपका गुणों के प्रति आकर्षण बढ़ेगा और अच्छे गुणों का विकास होने लगेगा। उन्नति का सच्चा व सीधा यही मार्ग है।
बाल भगवान
महाप्रलय के समय अग्नि की ज्वाला में सब कुछ नष्ट हो गया। केवल जल ही जल सब ओर दिखाई पड़ता था, तब भी मारकण्डेय मुनि जीवित रह गये। वे भटकते हुए फिर रहे थे तो उन्हें बालक के रूप में भगवान दिखाई दिये। प्रलय की भय दूरता से घबराए हुए मुनि को व्याकुल देखकर उस बालरूपमयी परब्रह्म ने कहा-मुनिवर आप बहुत थके मालूम पड़ते है इस विपत्ति से बचने के लिए मेरी शरण में आओ और मेरी शरीर में प्रवेश कर जाओ।
बालक भगवान की ही रूप है। मनुष्य बालक के समान निर्मल मन बनाले तो भगवान ही बन सकता है।
दमन, दान, दया एक बार ब्रह्मा जी के पास देवता, मनुष्य और असुर तीनों पहुँचे और उनने अपने अपने कल्याण का उपाय पूछा। ब्रह्मा जी ने उत्तर में एक ही शब्द ‘द’ वह और समझाया कि वे अपनी बुद्धि से इसकी व्याख्या करले।
उनने जब विचार कर लिया तब ब्रह्मा जी ने तीनों को अलग अलग बुलाकर पूछा कि उनके संकेत सूत्र की क्या क्या व्याख्या की? तो देवताओं ने कहा-द का अर्थ है दमन। हम लोग असंयमी है जब मन और इन्द्रियों का दमन करेंगे तभी हमारा कल्याण होगा। ब्रह्माजी ने कहा ठीक है। तुम्हारे लिए यही व्याख्या ठीक है।
अब मनुष्यों को बुलाया गया। उनने अपनी व्याख्या बताते हुए कहा ‘द’ का अर्थ है दान। हम लोग कंजूस हो गये है, स्वार्थ में बुरी तरह फँसे है। दान और परोपकार से ही हमारा कल्याण होगा। ब्रह्माजी ने का यही तुम्हारे लिए उचित है।
अन्त में असुर आये। उनने कहा द का अर्थ है दया। हम लोग निष्ठुर हृदय और क्रूरकर्मा बने हुए है। दया और प्रेम के बिना हमारा उद्धार भला और कैसे हो सकता है? ब्रह्मा जी ने कहा- तुम्हारे लिए यही आवश्यक है।
प्रत्येक स्थिति के मनुष्य से दोष हो सकते है और सभी अपने दोषों को ढूँढ़कर उनका निराकरण करना चाहिए।
सत्पात्र की परीक्षा एक दिन भारी वर्षा हो रही थी। महर्षि अयोद धौम्य ने अपने शिष्य आरुणी से कहा-बेटा खेत पर जाकर देखो कहीं पानी मेंड़ तोड़कर निकल न रहा हो। बालक तुरन्त चल दिया। खेत पर जाकर देखा तो पानी मेंड़ तोड़ कर निकल रहा था। उसने रोकने की बहुत कोशिश की पर पानी रुका नहीं। अब उसने ऐसा किया कि जहाँ से पानी निकल रहा था वहाँ खुद ही लेट गया। रात भर कड़ाके की ठंड में वह इसी प्रकार पड़ा रहा। प्रातः सब बच्चों की देख भाल हुई तब आरुणी को न पाकर चिन्ता हुई। महर्षि उसे ढूँढ़ते हुए खेत की ओर गये तो उसे मेंड़ के सहारे लेटा पाया। ठंड से उसका शरीर थर-थर काँप रहा था तो भी वह गुरु के खेत की रक्षा के लिए कष्ट सहते हुए प्रसन्नता अनुभव कर रहा था। गुरु ने उसे उठाकर छाती से लगा लिया और पूरे मनोयोग से उसे विद्या पढ़ाई।
विद्या सत्पात्र के पास जाकर दी उसकी श्रेष्ठता को निखारती है, कुपात्र के पास जाकर तो वह सर्प के मुँह में गये हुए दूध की तरह विष बढ़ाती है। इस लिए विद्या देने के साथ ही छात्र में मानवीय स् गुणों के विकास का प्रयत्न भी किया जाना चाहिये। जैसा कि प्राचीन गुरुकुलों में किया जाता था।
पतिव्रता का तप तेज गान्धारी ने अन्धे पति के अनुसरण में अपनी आँखों से पट्टी बाँधे रहने का जो व्रत लिया था, उस तप के प्रभाव से उनके नेत्रों में दिव्य शक्ति उत्पन्न हो गई थी। युद्ध में जाने से पूर्व दुर्योधन को नंगे शरीर सामने खड़े करके उस पर दृष्टिपात किया था फलस्वरूप उसका शरीर वज्र जैसा हो गया था उस पर कोई शस्त्र चोट नहीं करता था। दुर्योधन माता के सामने बिलकुल नंगा आने से सकुचाया, कटिप्रदेश पर एक वस्त्र डाल रखा था। दृष्टि न पड़ने से वही स्थान बचा रह गया और मल्लयुद्ध के समय श्री कृष्ण जी के इशारे पर भीम ने उस स्थान पर ही गदा प्रहार करके दुर्योधन को मारा।
इसी प्रकार एक बार युधिष्ठिर गान्धारी के पास गये। गान्धारी क्रोध में बैठी थी। उसकी थोड़ी सी दृष्टि आँख की पट्टी में नीचे होकर युधिष्ठिर के पैरों के नाखून पर जा पड़ी तो वे नाखून जल कर लाल के स्थान पर काले हो गये।
पतिव्रत एक महान् तप है उसकी साधना से नारी महान् दिव्य शक्ति उपलब्ध कर सकती है।
गौ की महिमा अयोध्या के राजा दिलीप को कोई सन्तान न थी। इस प्रारब्ध भोग की शान्ति के लिए उन्होंने गुरु वशिष्ठ के आश्रम में जाकर तप करने का निश्चय किया। गुरु ने गौ चराने गौओं की सेवा करने, गौ दुग्ध पीने का आदेश दिया। दिलीप वही करने लगे। एक दिन उनकी निष्ठा की परीक्षा के लिए गुरु ने माया निर्मित सिंह भेजा। उसने गाय को दबाया दिलीप तीर चलाना चाहते थे पर हाथ ने काम न दिया। अब वे चिन्ता में पड़े कि गुरु की अमानत तथा गौ माता की रक्षा कैसे हो? सिंह को कहा यदि तुम बदले में अपना शरीर खाने को दे दो तो मैं गाय को छोड़ सकता हूँ। राजा इसके लिए प्रसन्नता पूर्वक तैयार हो गये। कर्तव्य पालन में असफल रहने की निन्दा सुनने की अपेक्षा उन्हें मृत्यु कही अधिक श्रेयस्कर लगी।
जब वे खरी कसौटी पर कस लिए गए तो सिंह ने भी उन्हें छोड़ दिया।
गौ के शरीर में दैवी तत्व की प्रचुर मात्रा होती ही है श्रद्धापूर्वक गौ सेवा करने से शरीर और मन का पोषण होता है, बन्धुत्व आदि रोग दूर होते है और सतोगुणी भावनाएँ बढ़ती है। दिलीप ने गौर सेवा में यह सब पाया।
माता उर्वशी एक बार अर्जुन कहीं बन में थे। अप्सरा उर्वशी उस पर मोहित होकर अर्जुन के रास्ते में बड़ी दुखी मुद्रा बना कर बैठ गई। एक नारी को इस प्रकार दुखी देखकर अर्जुन ने इसका कारण पूछा। उसने कहा मुझे एक बड़ा मानसिक कष्ट है उसे आप चाहें तो आसानी से दूर कर सकते है। अर्जुन ने कहा देवि मैं आपकी जो सहायता कर सकता हूँगा अवश्य करूँगा आप निस्संकोच कहिए। उर्वशी ने काम प्रस्ताव करते हुए कहा- मैं आपके द्वारा आप जैसा ही एक पुत्र चाहती हूँ। मेरी इच्छा पूरी कीजिए।
अर्जुन सन्न रह गये। उनने उत्तर दिया, देवि एक तो मैं पत्नी व्रती हूँ। दूसरी नारी को माता समान मानता हूँ। दूसरे काम प्रस्ताव स्वीकार करने पर भी यह निश्चय नहीं कि पुत्र ही हो और कन्या न हो। फिर पुत्र भी हो तो यह भी आवश्यक नहीं कि उसमें मेरे जैसे ही गुण हों। फिर उसे पेट में रखने और पालन करने में तथा मेरे समान होने तक प्रतीक्षा करने में बहुत कष्ट होगा। इसलिए एक सबसे उत्तम उपाय यह है कि आप मुझे आज ही अपना पुत्र मान ले। इससे आपको मुझे आज ही अपना पुत्र मान ले। इससे आपको मुझ जैसा पुत्र प्राप्ति का लाभ तुरन्त ही मिल जायेगा। मैं भी सदा आपको कुन्ती के समान माता ही मानता रहूँगा।
पर नारी को मातृबुद्धि से देखना यही भारतीय आदर्श रहा है।
द्वेष रहित हा ब्रह्मर्षि है विश्वमित्र तपस्वी तो थे पर वे बड़े अहंकार थे। वे ब्रह्मर्षि बनना चाहते थे। पर अहंकार की प्रचुरता के कारण वे उस पद तक न पहुँच सके। अपने मार्ग में उनने वशिष्ठ जी को बाधक माना और उनके सौ पुत्र मार डाले। वशिष्ठ जी इस कुकृत्य से दुखी तो अवश्य थे पर उनने अपना विवेक नहीं खोया।
एक रात को छिपा कर विश्वमित्र वशिष्ठ जी को मारने के लिए पहुँचे और उनकी कुटिया के पीछे अवसर की ताक में छिप रहे। रात को वशिष्ठ और उनकी पत्नी अरुन्धती आपस में बातें कर रहे थे। अरुन्धती ने पूछा विश्वमित्र अभी तक ब्रह्मर्षि क्यों नहीं बन पाये? वशिष्ठ जी ने उत्तर दिया उनका तप असाधारण है, त्याग भी महान् है, उनकी निष्ठा की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है। पर केवल अहंकार ही उनका पिण्ड नहीं छोड़ रहा है। जिस दिन वह दुष्ट उनका पीछा छोड़ देगा जैसे तपस्वी आज इस पृथ्वी पर बहुत थोड़े है।
वशिष्ठ जी की द्वेष रहित और उदार भावनाओं का परिचय पाकर विश्वमित्र को अपने कुकृत्यों पर बड़ी ग्लानि हुई। उनने प्रकट होकर वशिष्ठ जी के चरण पकड़ लिये। विश्वमित्र का अहंकार गलिन हुआ देखकर वशिष्ठ जी ने उन्हें छाती से लगा लिया और कहा आज सच्चे अर्थों में ब्रह्मर्षि हो गये, उस दिन से वे ब्रह्मर्षि हो गये। उस दिन से वे ब्रह्मर्षि कहाने लगे।
युधिष्ठिर की उदार बुद्धि उन दिनों पाण्डव वनवास गये थे। एकबार जंगल में घूमते फिरते उन्हें प्यास लगी। पास के तालाब में नकुल पानी पीने गये तो वहाँ रहने वाले यक्ष ने कहा-मेरे प्रश्नों का उत्तर देकर तब खाना पीना। नकुल ने उसकी वान न सुनि और पानी पीने गये तो यक्ष की माया से प्रभावित होकर मूर्छित होकर गिर पड़े। इसी प्रकार अन्य तीनों भई भी तालाब पर गये और यक्ष के प्रश्नों का उत्तर दिए बिना पानी पीने के प्रयत्न में मूर्छित होकर गिर पड़े। अन्त में युधिष्ठिर पहुँचे। उनने यक्ष के प्रश्नों का उत्तर दिया और उसे संतुष्ट किया।
प्रसन्न होकर यक्ष ने उन्हें पानी पीने दिया और कहा मूर्छित पड़े भाइयों में से किसी एक को जिसे आप कहे उस जीवित कर दूँ युधिष्ठिर ने कहा-नकुल को जीवित कर दीजिए। मैं कुन्ती का हूँ माद्री के पुत्रों में से भी एक का जीवित रहना उचित है। यद्यपि बलशाली अर्जुन और भीम है पर न्याय की दृष्टि से मैं नकुल को ही जीवित करने के लिए कहता हूँ यक्ष ने उनकी उदारता कस प्रभावित होकर चारों को ही जीवित कर दिया।
विषयों को जीतने का स्वर्ग नियम राम नाम अथवा ऐसी ही कोई अन्य पात्र होता है। अपनी अपनी भावना के अनुसार किसी भी मंत्र का जप किया जा सकता है। मुझे लड़कपन से रामनाम सिखाया गया और मुझे बराबर उसका सहारा मिलता रहा। पर जिस किसी मंत्र को हम जपें, उसे हमें तल्लीन हो जाना चाहिये। मंत्र जपते समय दूसरे विचार आवे, तो परवाह नहीं। यदि हम श्रद्धा रखकर मंत्र का जप करते रहेंगे तो अन्त में सफलता अवश्य प्राप्त करेंगे, मुझ इसमें रत्ती भर भी शक नहीं यह मंत्र हमारी जीवन डोर होगी और हमको तमाम संकटों से बतायेगा ऐसे पवित्र मंत्र का उपयोग किसी आर्थिक लाभ के लिए हरगिज न करना चाहिए। यह भी याद रखना चाहिए कि तोते की तरह इस मंत्र को न पढ़ें। इसमें अपनी आत्मा पूरी तरह से लगा देनी चाहिए। तोता यत्र की तरह मंत्र की पड़ते है, हमको उसे ज्ञानपूर्वक पढ़ना चाहिए।
-महात्मा गाँधी
(श्री विद्या वागीश ब्रह्मचारी )
अमेरिका के सुप्रसिद्ध धन कुबेर-जिनकी संपत्ति अरबों खरबों रुपया है-हेनरी फोर्ड ने एकबार कहा था-धन कुबेर होने पर भी मुझे जीवन में सुख नहीं है। जब मैं अपने लम्बे चौड़े कारखाने में बेचारे गरीब मजदूरों को रूखा-सुखा और बिना स्वाद का भोजन बड़ी उत्सुकता और प्रसन्नता के साथ करते हुये देखता हूँ तो उन पर मुझे ईर्ष्या होती है। तब मेरा जी चाहता है कि काश, मैं धन कुबेर होने की अपेक्षा एक साधारण मजदूर होता।”
मोटे तौर पर यह बात अतिशयोक्ति पूर्ण प्रतीत होती है कि एक असीम सम्पत्ति का स्वामी, जिसके यहाँ सभी प्रकार के ऐश आराम के साधन प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं एक मजदूर के भाग्य पर ईर्ष्या करता है? क्या वह सचमुच मजदूर की अपेक्षा अधिक अभावग्रस्त है? इतना धन होते हुये भी वह क्यों मजदूर के भाग्य पर ईर्ष्या करते हैं ?
विवेकपूर्वक विचार करने पर पता चलता है कि केवल धन मात्र ही ऐसी वस्तु नहीं है कि जिससे मनुष्य सुखी रह सके। बात यह है कि भोग्य पदार्थ उसी को आनन्द दे सकते हैं जिसमें उपभोग की शक्ति हो। उसके क्षीण या नष्ट तो जाने पर भोग्य संपदा कुछ भी सुख नहीं दे सकती। जिसकी पाचन शक्ति नष्ट हो गई है वह दाल दलिये का पथ्य ही ले सकता हैं। छत्तीस प्रकार के व्यंजनों से सजा हुआ थाल उसके लिये विष तुल्य हैं। उस भोजन का आनन्द तो वह उठा सकता है जिसकी पाचन शक्ति तीव्र है। आँखों की ज्योति चले जाने पर अनेक प्रकार के सुरम्य दृश्य, चित्र, खेल तमाशे आदि दर्शनीय पदार्थों का कोई मूल्य नहीं। नाक ठाक काम न करती हो तो बढ़िया इत्र और साधारण तेल एक समान है। काम सेवन की शक्ति नष्ट हो जाय,
नपुंसकता आ घेरे तो रूप यौवन सम्पन्न रमणियाँ किसी सुख का रसास्वादन नहीं करा सकती। उपभोग की सामर्थ्य न होने पर भोग्य सामग्री निरर्थक एवं निरुपयोगी हो जाती है इतना ही नहीं उस सामग्री का होना उलटा खतरनाक हो जाता हैं। नपुंसक पति की नवयौवना पत्नी उसके लिये एक खतरा है। बीमार आदमी के समीप सुस्वादु भोजनों का जमाव उसके लिये दुर्घटना उपस्थित कर सकता हैं । इस दृष्टि से हेनरी फोर्ड का कथन सत्य था। उन्होंने पैसा कमाने की धुन में अपने पेट को खराब कर दिया था। एकाध बिस्किट, छटाँक दो छटाँक फलों का रस वे पचा पाते थे। फोर्ड महोदय जब अपनी फैक्टरी के मजदूरों को मोटे-मोटे अनाज की रोटियाँ भर पेट खाते हुये देखते थे तो उन्हें उन मजदूरों के भाग्य पर ईर्ष्या होती थी ओर कहते थे-काश में धन कुबेर होने की अपेक्षा कुछ साधारण मजदूर होता।’ स्वस्थता कमाना, उसकी रक्षा करना, अन्य सभी सम्पत्तियों के उपासन और रक्षा से मूल्यवान हैं। कई व्यक्ति बुद्धिमान बनते हैं पर उसे प्राप्त करने में इतनी जल्दबाजी करते हैं कि स्वास्थ्य चौपट हो जाता है। कई व्यक्ति धनी बनते हैं पर उस प्रयास में इतने तल्लीन हो जाते हैं कि शक्तियों के अपव्यय के कारण तन्दुरुस्ती खराब हो जाती हैं। स्वास्थ्य नष्ट हो जाने पर वह विद्या, सम्पत्ति उन्हें कुछ भी सुख नहीं दे पाती, कमजोरी ओर बीमारी से वे आये दिन ग्रस्त रहते है। तब फोर्ड की भाँति वे सोचते हैं कि भोग्य आदमियों का संचय करने में हमने उपयोग शक्ति ड़ड़डड़ करके बड़ी भारी भूल की। इस भूल का पश्चाताप उन्हें शेष जीवन के दिन रो-रो कर बिताते करना होता हैं।
अनेक दृष्टियों से समृद्ध होना, भौतिक सम्पदाओं से सुसज्जित होना, हर उचित तथा आवश्यक भी है। परन्तु इस उपार्जन की भी सीमा है। स्वास्थ्य की स्थिरता एवं सुरक्षा का ध्यान रखते हुये ही सब प्रकार की सम्पत्तियाँ उपार्जित करने का प्रयत्न करना चाहिये। जब कार्यक्रम इस मर्यादा को उल्लंघन कर रहा हो और स्वास्थ्य पर उस मर्यादा को परिश्रम का बुरा असर पड़ रहा हो तो तुरन्त ही सावधान होने की आवश्यकता है। स्वस्थता में जो सुख है वह हैनरी फोर्ड की जितनी सम्पत्ति के बदले में भी प्राप्त नहीं हो सकता।
उपयोग सामग्री का संयम पूर्वक उपभोग करने से शक्तियाँ ठीक प्रकार काम करती है। अति रसास्वादन का असंयम उस उपभोग शक्ति को ही नष्ट कर देता। अति काम सेवन से नपुंसकता प्रमेह आदि रोग उत्पन्न होते हैं और दण्ड स्वरूप उस शक्ति से सदा के लिये हाथ धोना पड़ता है। इसी प्रकार चटोरे व्यक्ति अपना पाचन शक्ति को बिगाड़ लेते हैं। और कड़ाके की भूख में भोजन करने के आनन्द से सदा के लिये वंचित हो जाते हैं। यही बात अन्य इन्द्रियों के बारे में भी हैं। इसी लिये शास्त्र कारों ने इन्द्रिय संयम पर विशेष जोर दिया हैं। इन्द्रिय संयम एक वैज्ञानिक विधान है जिसके द्वारा मनुष्य जीवन भर उपभोग शक्ति को कायम रख सकता है। ब्रह्मचर्य व्रत, उपवास, मौन आदि अनेक विधि विधानों का उद्देश्य उन भोग शक्तियों को स्थिर रखना भी है जिनके द्वारा भोग्य पदार्थों के आनन्द का रसास्वादन किया जा सके।
संसार में जिन्हें जीवन के अनेक आनन्दों का उपभोग करने की इच्छा है उन्हें शक्तियों के अनुचित अपव्यय से बचने का प्रयत्न करना चाहिये। किसी प्रलोभन के आकर्षण में पड़ कर जो लोग अपनी शारीरिक मानसिक शक्तियों को अपव्यय करके गवा देते है वे अन्त में बुरी तरह पछताते हैं। तब सारी सम्पत्तियाँ मिलाकर भी उन्हें वह आनन्द नहीं दे सकती जो स्वस्थता रहने पर अनायास ही मिल सकता है।
पूजा की थाली
ऊँचे पर्वतों पर एक मंदिर था। तीर्थ यात्री लम्बी यात्राएँ करके उसके दर्शन को आते और बड़ी श्रद्धा के साथ अपना मस्तक उसके दरवाजे पर धरते हुए श्रद्धा भरी पूजा की थाली अर्पित करते। मूर्ति ने वह सब देखा तो उसके अहंकार का ठिकाना न रहा। उसने मन ही मन कहा मेरे बिना इन मनुष्यों का उद्धार नहीं, वे मूर्ख जो मुझे पत्थर माना करते हैं, यहाँ आकर मेरे गौरव को देखें कि मैं कितनी महान् हूँ।
मंदिर के गुम्बज में से कोई अदृश्य सत्ता हंस पड़ी। उसने कहा-री मूर्ख ! तू रही पत्थर की पत्थर ही। मनुष्य तुझे पूजने नहीं आते वे तो अपने अन्तर के सत्य के आगे मस्तक झुकाने आते है। निकटतम सत्य को दूर जाकर पूजने की तो इनकी पुरानी आदत हैं। --दार्शनिक वल्लातोल
जहाँ शक्ति का भण्डार न्यून पड़ जाता है वह सस्ती साधुता अकस्मात् आ जाती है। इसके विपरीत जिस मनुष्य में शक्ति पूर्ण भंडार है उसे ललकार स्वीकार करने में प्रसन्नता होती है वह शक्ति युक्त जीवन व्यतीत करता है।
--रवीन्द्रनाथ ठाकुर
अगर तुम्हारा हृदय पवित्र है तो तुम्हारा आचरण भी सुन्दर होगा, अगर तुम्हारा आचरण सुन्दर है तो तुम्हारे परिवार में शान्ति रहेगी ओर परिवार की शान्ति से समस्त राष्ट्र और विश्व में शान्ति का साम्राज्य स्थापित हो सकेगा।
--कन्फ्युशश
प्रत्यक्ष दुर्गा लक्ष्मीबाई।
रानी लक्ष्मीबाई घोड़े पर सवार अंग्रेजों से लड़ रही थी। उसका मुकाबला करते हुए उनके छक्के छूट रहे थे। एक अंग्रेज घुड़सवार ने छिपकर पीछे से तलवार का वार किया, जिससे रानी के सिर का दाहिना भाग कट कर लटक गया और दाहिनी आँख निकल गई। इस पर भी रानी लड़ती रही। उसने इस बार करने वाले अंग्रेज पर इस कटी हुई स्थिति में भी मुड़कर ऐसा वार किया कि वह वहीं धराशाई हो गया।
भारत की कितनी ही दुर्गाऐं जो लक्ष्मीबाई की तरह अपने पराक्रम से राष्ट्र की महान् सेवाएँ कर सकती थीं आज पर्दे के जेलखाने में अबला बनी कैदी की तरह कराह रही है। देश को राजनैतिक आधीनता मिल गई पर इन लक्ष्मीबाईयों के बन्धन न जाने कब ढीले होंगे?
आदर्श स्वामीभक्ति। चित्तौड़ की गाड़ी पर छः वर्ष का बालक उदयसिंह बैठा था। उसकी माता भी मर चुकी थी। पन्ना नामक एक धाय उसका पालन करती थी। राज्य का संचालन दासी पुत्र वनवीर कर रहा था।
वनवीर के मन में लोभ आया कि उदयसिंह तथा उनके भाई विक्रम को मार मैं ही सदा के लिए राजा बन बैठूँ। उसने विक्रम को मार दिया। उदयसिंह को मारने नंगी तलवार लिये जा रहा था तो पन्ना धाय को मालूम हो गया। उसने इस आड़े वक्त में अपनी वफादारी की परीक्षा में उत्तीर्ण होने का नियम किया। उसने अपने बच्चे को उदयसिंह के स्थान पर और उदयसिंह को अपने बच्चे के स्थान पर सुला दिया। वनवीर आया ओर उसने एक ही हाथ में बालक का सिर काट दिया। पन्ना अपनी आँखों के आगे अपने बालक का वध होते देखती रही। भेद न खुलने देने के लिये उसने छाती कड़ी करके आँखों में से आँसू न आने दिये। वनवीर चला गया तब वह उदयसिंह को लेकर देवरा ठिकाने में चली गई ओर वहीं रहकर उसने उदयसिंह को पाला। बड़ा होने पर वही चित्तौड़ की गद्दी पर बैठा। उदय सिंह पन्ना धाय को सदा अपनी माता के समान मानता रहा।
स्वामी के साथ आपत्ति के समय सेवक कितना बड़ा आत्मत्याग कर सकता है इसका आदर्श उपस्थित करने वाली पन्ना धाय भारतीय इतिहास में सदा अमर रहेगा।
पति के सुधारने वाली नारी । आर्य समाज के प्रसिद्ध नेता स्व0 स्वामी श्रद्धानंद युवावस्था में कुमार्गगामी भी रहे हैं। तब वे एक कोतवाल के कुसंग ग्रसित पुत्र थे। उन्हें मद्य, माँस, जुआ का चस्का लगा हुआ था। एक दिन वे शराब के नशे में वेश्या के यहाँ भी गये। बहुत रात बीतने पर आये तो उलटी होने लगी।
उनकी पत्नी आदर्शनारी थी। उसने उन्हें कुल्ला कराया, उलटी से सने हुए कपड़े बदले और पलंग पर लिटा कर सिर दबाने लगी। नींद आई और वे सो गये । जब नींद खुली और पानी माँगा तो वह देवी उठी और मिश्री डालकर दूध ले आई। पीकर होश हुआ तो पूछा-देवी तुम अब तक जागती रही, भोजन तक नहीं किया। अब भोजन करो देवी ने उत्तर दिया, आपको भोजन कराये बिना में कैसे खाती?
उस पन्द्रह वर्ष की छोटी आयु की देवी की इतनी उदारता और श्रद्धा देखकर पति का हृदय भर आया। वे अपने कृत्यों पर क्षमा माँगने लगे तो ड़ड़डड़़ ने कहा-आप मेरे स्वामी हो, ऐसा कह कर ड़ड़ड़ड़ पर पाप क्यों चढ़ाते हो। मैंने तो आपको परमेश्वर मान कर आपकी सेवा करने को ही अपना आदर्श माना है।” उसी रात से उनका जीवन बदल गया। स्वामी श्रद्धानन्द ने अपनी आत्मकथा में इस घटना को अपने जीवन की दिशा बदलने वाली घटना बताया
पत्नी ना काहाऊ चित्तौड़ की राजपूत बालिका विद्युल्लता की सगाई सरदारसिंह नामक एक सेनापति से हुई थी। विवाह की तैयारियाँ ही हो रही थीं कि अलाउद्दीन ने चित्तोड़ पर चढ़ाई कर दी। राजपूत सेना को हारती देखकर सरदार सिंह के मन में यह लोभ आया कि क्यों न वह बादशाह से मिल जाय, जिससे उसकी जीवन रक्षा भी हो जाय और बहुत-सा धन भी मिलें। वह विद्युल्लता के सौंदर्य पर मुग्ध था और विलासिता के लोभ में मरने से दूर भाग रहा था। एक दिन वह अपनी मनकी बात विद्युल्ला से कहने आया तो उसने बुरी तरह धिक्कारा और कहा-देशद्रोही बनकर जीवित रहने से मरना अच्छा।’ पर उसका मन नहीं माना ओर दुश्मन से जा मिला। अलाउद्दीन ने चित्तौड़ जीत ली और सरदार सिंह को बहुत-सा पुरस्कार दिया। वह अपनी सफलता पर गर्व करता हुआ जब विद्युल्लता को लिवाने आया तो वह सिंहनी उसकी नीचता को सहन न कर सकी और राजपूती पर कलंक लगाने वाले उस देशद्रोही को धिक्कारते हुये अपनी छाती में कटार मारली ताकि ऐसा पतित व्यक्ति उसके शरीर को स्पर्श न कर सके।
देशद्रोही पति का मुँह न देखूँगी देवगिरि के राजा रामदेव पर अलाउद्दीन ने चढ़ाई की पर वह जीत न सका। हार कर लौट रहा था कि उसे एक देशद्रोही मिल गया। एक सरदार कृष्णराव के साथ राजकुमारी वीरमती की शादी होने को थी। उसे सेना का सब भेद मालूम था।
अलाउद्दीन ने उसे अपनी और यह लोभ देकर मिला लिया कि किला फतेह होने पर उसे ही राजा बना देगा।
अलाउद्दीन ने दुबारा देवगिरि पर चढ़ाई कर दी। सब सैनिक युद्ध की तैयारी में लगे पर कृष्णराव ड़ड़डड़़ छुरी भौंक दी। मरते वक्त कृष्णराव ने कहा-मैं देशद्रोही तो था ही, तुम्हारा तो पति था।’ वीरमती ने कहा-सो मैं अपने उस कर्तव्य को भी जानती हूँ। मैंने अभी देशभक्ति निबाही, अब पति भक्ति भी निभाती हूँ।’ यह कह कर उसने स्वयं आत्म-हत्या करली और एक सती का आदर्श उपस्थित किया।
हवलदार पद्या। ग्वालियर की फौज में एक पद्या नामक औरत भी हवलदार हो गई हैं। उसका भाई जोरावर साहूकारों के कर्ज में जेल चला गया था। घर की हालत बहुत दयनीय थी। गरीबों से तंग आकर पद्या ने पुरुष का वेष बनाया और फौज में भर्ती हो गई। बहुत दिन वह साधारण सिपाही के रूप में रही, फिर अपनी विशेषताओं के कारण हवलदार बन गई और धीरे-धीरे अपने भाई का कर्ज चुकाने लगी।
किसी प्रकार नहाते धोते उसे किसी ने
देख लिया ओर बात खुल गई। मामला राजा तक पहुँचा। उसने हवलदार को बुलाकर
पूछ-ताछ की तो पद्या ने सारी बात कह सुनाई। सिन्विया उसकी वीरता से बड़े प्रभावित हुए। उसके भाई का सारा कर्ज खजाने से चुका दिया गया ओर पद्या का विवाह फौज के एक ऊँचे अफसर के साथ हो गया।
नारी में सभी गुण प्रचुर मात्रा में भरे पड़े है। वे वीरता में भी किसी से पीछे नहीं रहीं।
( श्री0 कल्याणचन्द्र )
महात्मा गोरखनाथ अपने समय के एक बहुत प्रसिद्ध योगी हो गये हैं। वैसे योनाभ्यास करने वालों की भारतवर्ष में कभी कमी नहीं रही, अब भी हजारों योगविद्या के जानकर और अभ्यासी इस देश में मिल सकते हैं, पर गोरखनाथ योगविद्या के बहुत बड़े आचार्य और सिद्ध थे और अपनी शक्ति द्वारा बड़े-बड़े असंभव समझे जाने वाले कामों को भी कर सकते थे।
गोरखनाथ का समय खोज करने वाले विद्वानों के-विक्रम संवत् 1100 के लगभग माना है। कहा जाता है कि एक बार उनके भावी गुरु मत्स्येन्द्रनाथ फिरते-फिरते अयोध्या के पास “जयश्री” नाम के नगर में पहुँचे। वहाँ एक ब्राह्मणी के घर जाकर भिक्षा माँगी ओर उसने बड़े आदर सम्मान से उनको भिक्षा दी। ब्राह्मणी का भक्तिभाव देखकर मत्स्येन्द्र नाथ बड़े प्रसन्न हुये और उसके चेहरे पर उदासीनता का चिह्न देखकर कारण पूछने लगे। ब्राह्मणी ने बतलाया कि उसके कोई सन्तान नहीं है, इसी से वह उदासीन रहती हैं। यह सुन योगीराज ने अपनी झोली से जरा-सी भभूत निकाली और उसे देकर कहा कि “इसको खा लेना, तेरे पुत्र हो जायेगा।" उनके चले जाने पर उसने इस बात की चर्चा एक पड़ोसिन से कीं। पड़ोसिन ने कहा “कहीं इसके खाने से कोई नुकसान न हो जाय?" इस बात से डरकर भभूत नहीं खाई ओर गोओं के बाँधने के स्थान के निकट एक गोबर के गड्ढे में उसे फेंक दिया।
इस बात को बारह वर्ष बीत गए ओर एक दिन मत्स्येन्द्रनाथ फेरी लगाते उस ब्राह्मणी के यहाँ पहुँचे। उन्होंने उसके द्वार पर ‘अलख’ जगाया। जब ब्राह्मणी बाहर आई तो उन्होंने पूछा-अब तो तेरा पुत्र 12 वर्ष का हो गया होगा, देखूँ तो वह कैसा हे यह सुनकर वह स्त्री घबड़ा गई और डर कर उसने समस्त घटना उनको सुना दी। मत्स्येन्द्रनाथ ने भभूत को फेंकने का स्थान पूछा ओर वहाँ जाकर “अलख” की ध्वनि की। उसे सुनते ही एक बारह वर्ष का तेजपुत्र बालक बाहर निकल आया ओर उसने योगीराज के चरणों में मस्तक नवाया। यही बालक आगे चलकर “गोरखनाथ” के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मत्स्येन्द्रनाथ ने उसे शिष्य बना कर योग की पूरी शिक्षा दी। गोरखनाथ ने गुरु की शिक्षा से और स्वानुभव से भी योग-मार्ग में बहुत अधिक उन्नति की और उसमें हर प्रकार से पारंगत हो गए। लोगों की तो धारणा है कि योग की सिद्धि के प्रभाव से उन्होंने “अमर स्थिति” प्राप्त की थी और आज भी वे कभी किसी भाग्यशाली को दर्शन दे जाते हैं। अनेक विद्वानों का मत है कि गोरखनाथ ने भारतीय संस्कृति के संरक्षण में बहुत अधिक सहयोग दिया है और शंकराचार्य और तुलसीदास के मध्यकाल में इतना प्रभावशाली और महिमान्वित व्यक्ति भारत वर्ष में, कोई नहीं हुआ था। उनके विषय में गोरक्ष-विजय ग्रन्थ में लिखा है-
ए बलिया जतिनाथ आसन वरिल।
लंग महालंग दुई संहति लाईल ॥
आसन करिया नाथ शून्ये केल भरा
साचन उड़अ जेन गगन ऊपर आडे-आडे चहे नाथ शून्धे भर करि।
“गोरखनाथ योगासन लगाकर आकाश मार्ग में पहुँच गए और बाज़ की तरह उड़ते हुए एक देश से दूसरे देश को जाने लगे।”
बंगाल के राजा गोपीचन्द की माता मथनावती गोरखनाथ की शिष्या थी और योग साधन तथा तपस्या द्वारा महान् ज्ञान की अधिकारिणी बन गई थी। उसने अपनी विद्या के बल से देखा कि उसके पुत्र के भाग्य में थोड़ी ही अवस्था लिखी है और वह उन्नीस वर्ष की अवस्था में ही मर जायेगा। इससे बचने का एक मात्र उपाय है कि वह किसी महान् योगी से दीक्षा लेकर योग साधन करके मृत्यु पर विजय प्राप्त करे। इस लिये उसने जालंघरनाथ से गोपी चन्द को योग-मार्ग का शिक्षा दिला कर इसे उस कोटि का योगी बनाया।
गोरखनाथ योग-विद्या के आचार्य थे। वर्तमान समय में जो हठ योग विशेष रूप से प्रचलित है उसका उन्होंने अपने अनुयायियों में बहुत प्रचार किया और उनके लिए गुप्त शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का मार्ग खोल दिया। इस सम्बन्ध में उन्होंने गोरख-संहिता “गोरख विजय “ अम-राधे शासन” “ काया बोध” आदि बहुत से ग्रंथ रचे थे जिनमें से कुछ अब भी प्राप्त है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि अगर तुम शरीर ओर मन पर अधिकार प्राप्त करना चाहते हो तो इसका एक मात्र यही मार्ग हैं। यदि मनुष्य सोचे कि वह धन सम्पत्ति द्वारा समस्त अभिलाषाओं को पूरा कर लेगा अथवा जड़ी-बूटी रसायनों की सहायता से शरीर को सुरक्षित रख सकेगा तो यह उसका भ्रम है-
सोनै रुपै सीझै काल।
तौ कत राजा छाँड़े राज-जड़ी-बूटी भूले मत कोई।
पहली राँड वैद की होई॥
अमर होने का उपायनों योग का पंथ ही है जिसमें अमृत प्राप्त करने का मार्ग बतलाया गया है-
गगन मंडल में औंधा कुँवा,
तहाँ अमृत का वासा।
सगुरा होइ सुभर-भर पीया,
निगुरा जाय पियासा॥
शून्य गगन अथवा मनुष्य के ब्रह्म रंध्र में औंधे मुँह का अमृत कूप है, जिसमें से बराबर अमृत निकलता रहता है। जो व्यक्ति सतगुरु के उपदेश से इस अमृत का उपयोग करना जान लेता है वह अक्षरामर हो जाता है, और जो बिना गुरु से विधि सीखे केवल मन के लड्डू खाया करता है, उसका अमृत सूर्य तत्व द्वारा सोख लिया जाता है और वह साधारण मनुष्य की तरह आधि-व्याधि का ही शिकार बना रहता है। योग द्वारा इस अमृत को प्राप्त करने का सर्व प्रथम उपाय ब्रह्मचर्य-साधन या वीर्य-रक्षा (बिन्दु की साधना) है -
व्यंदहि जोग, व्यंद ही भोग।
व्यंदहि हरै जे चौंसठि रोग॥
या व्यंद का कोई जाणै भेव।
से आपै करता आपै देव॥
बिन्दु (वीर्य) का रहस्य समझकर उसकी पूर्ण रूप से रक्षा करने पर मनुष्य सर्व शक्तिशाली और देव स्वरूप बन जाता है। इस प्रकार का साधन कर लेने से मनुष्य स्वयं शक्ति और शिव स्वरूप हो जाता है, और उसे तीनों लोक का ज्ञान प्राप्त हो जाता है-
यहु मन सकती यहु मन सीव।
यहु मन पंच तत्व का क्षीव॥
यहु मन लै जो उन्मन रहै।
तौ तीनों लोक की बाथैं कहै॥
गोरखनाथ का मत समन्वयवादी है। वे स्वयं बाल योगी थे और यह भी कहते थे कि जो वास्तव में योग में सिद्धि प्राप्त करना चाहता है उसे युवावस्था में ही कामदेव को वश करना चाहिये। पर वह अन्य कितने साधना-मार्गों की तरह शरीर को अनावश्यक कष्ट देने, दिखावटी तपस्या करने के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था-
देव-कला ते संजाम रहिबा-भूत-काल आहार।
मन पवन ले उनमन धरिया।
ते जोगी ततसारं॥
“साधक को देव-कला (आध्यात्मिक मार्ग) पर चल कर आत्म शक्ति प्राप्त करनी चाहिये और भूत-कला पार्थिव-विधि से आहार की व्यवस्था करनी चाहिये ऐसा करने पर ही वह योगाभ्यास में सफलता प्राप्त कर सकेगा।” इस प्रकार साधना मार्ग में अग्रसर होते रहने पर अंग में साधक “निष्पत्ति” अवस्था में पहुँच जाता है, जिससे उसकी समदृष्टि की जाती है, राग द्वेष का अन्त हो जाता है, साँसारिक माया-मोह सर्वथा नष्ट हो जाते हैं और वह काल से भी छूट कर जीवनमुक्त हो जाता है-
निसपति जोगी जाणिवा कैसा।
अगनी पाणी लोहा जैसा॥
राजा परजा सम कर देख।
तब जानिवा जोगी निसपति का भैख॥
गोरखनाथ की अध्यात्म ज्ञान सम्बन्धी अनेक बाते प्राप्त होती हैं जिनकी भाषा काल-के साथ बहुत बदल गई है। उनमें से कुछ कबीर की उलटवांसियों की तरह हैं। यहाँ पर उनमें से कुछ ही नमूने के तौर पर दी जा रही हैं।
वाणी वाणी रे मेरे सत गुरु की वाणी,
जोती परणवी बापे मुआ घर आनी॥1॥
खीला दूझे रे मारे भैस विलौवै।
सासुजी परण श्री बहु झुलावै॥2॥
खेत पक्यौ तो रखवाण कूँ बाँधौ॥3॥
नीचे हाँड़ी ऊपर चूल्हौ चढियों।
जल में की मछली बगुलाकू निगालियो॥4॥
आभ परसे रे जीम बरसे।
नेवानाँ नीर मोभेज चड़शे॥5॥
बाबा बोल्या रे मछन्दर को पूत।
छाँड़ी ममता औ भयो अवधूत॥6॥
अर्थात् “सतगुरु कहते हैं कि गोरखनाथ जब माया रूपिणी नारी के संपर्क में आया तब वह जीवित थी, पर उसने माया को वशीभूत करके उसे मृत (नष्ट) कर दिया॥ 2॥ पहले तो माया रूपी भैंस संसारी सुख रूप दूध देती थी, जिससे उसका मान होता था। पर जब साधना द्वारा उसका आवरण अलग कर दिया तो उलटी स्थिति हो गई । तब भैंस को बाँध रखने वाला खोला (खूँटा) तो अपार्थिव आनन्द रूपी दूध देने लगा और माया रूपी भैंस ज्ञान की दासी बनकर उस दूध को बिलोने लगी जिसके द्वारा ब्रह्मानन्द रूपी मक्खन प्राप्त हुआ। माया सास है और मानवीय इच्छा बहु है। यही इच्छा माया का पालन करती है (अर्थात् उसे पालने में झुलाती है)॥ 2॥ मनुष्य के काया रूपी खेत में साधन रूपी खेती की जाती है और परिवक हो जाती है तब वह अहंकार को खा जाती है (नष्ट कर देती है)। इसी प्रकार काम-क्रोध रूपी पारधी (शिकारी) पहले मन शिकार करता रहता है अर्थात् उससे इच्छानुसार अनुचित कार्य कराता है। पर जब मन जागृत हो जाता है, साधना में सफलता प्राप्त कर लेता वह उल्टा इस शिकारी को ही बाँध लेता है॥ 3॥ पहले कुंडलिनी शक्ति रूप हाँडी नीचे (नाभिकमल) में सुप्त अवस्था में पड़ी थी, पर जब वह जागृत होकर चैतन्य हो गई तो ऊपर चढ़ती गई। पहले मन रूपी मछली को माया रूपी बगला खाता रहता था, जब मन अपने स्वरूप को समझ कर सावधान हो गया तो वह उल्टा माया को ही निगलने लग गया॥4॥ आरम्भ में मिथ्या जगत रूपी आकाश क्षणिक आनन्द की वर्षा करता था, पर जब (परब्रह्म का) ज्ञान हृदय रूपी धरती पर जागृत हुआ तो भूमि तो वर्षा करने लगी और आत्मा स्पर्श करने लगा, इस प्रकार यह जल ऊपर की तरफ चढ़ने लगा। इसका आशय यह कि पहले माया का प्रभाव अधोगामी था पर कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने से साधना उध्र्वगामी होने लग गई॥5॥ मत्स्येन्द्रनाथ नाथ का पुत्र (शिष्य) गोरखनाथ कहता है कि अब में ममता माया-मोह को त्याग कर अवधूत हो गया हूँ ॥6॥”
इस प्रकार गोरखनाथजी ने एक अगम-अगोचर परमात्मा की अनुभूति का मार्ग दिखलाकर लोगों में फैले अनेक भ्रांत मतों का निराकरण किया और साधना की एक ऐसी स्पष्ट विधि बतलाई जिससे साधारण जन भी आत्मोन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं।
आदर्श देशभक्ति।
युद्ध के दिनों में एक समय जापान की भोजन-समस्या बहुत विकट हो गई थी। खाद्य सामग्री पर नियंत्रण था, हर व्यक्ति को नपातुला राशन मिलता था। फौज के रिटायर्ड अक्सर जनरल यामानुची यद्यपि बुड्ढ़े हो गये थे तो भी उसकी खुराक बहुत थी। जितनी सरकारी राशन मिलता था वह उनके लिये एक चौथाई भी न था। फिर भी राष्ट्रिय संकट के समय उनने इतने से ही चलाना उचित समझा और दिन-दिन भोजन के अभाव में दुर्बल होने लगे।
जब उनकी कमजोरी बहुत बढ़ गई तो उनके मित्रों ने अधिक भोजन प्राप्त करने के लिये कई उपाय सुझाये। एक मित्र ने
कहा-आप सरकार से प्रार्थना करें तो आपका राशन बढ़ सकता हैं। उनने उत्तर दिया, जब राष्ट्र के पास खाद्य सामग्री कम है तो में दूसरे उपयोगी नागरिकों के हिस्से में से अपने लिये अधिक लेकर उन्हें क्यों भूखा रखूँ ? मैं तो दो चार वर्ष में वैसे भी मर जाऊँगा पर उन लोगों का ग्राम क्यों छीनूँ जिन्हें अधिक जीना है और काम करना है। उनके अन्य मित्रों ने अपनी-अपनी खुराक में से थोड़ा-थोड़ा भाग उन्हें देने का प्रस्ताव रखा तो यह भी उसने अस्वीकार का दिया और अन्ततः वे कम-ड़ड़ड़ड़ कुछ ही दिनों में मर गये।
पहिले अपनी हानि तब दूसरों की जर्मनी का जब पिछला युद्ध चल रहा था तब उधर से गुजरती हुई सेना को घोड़ों के लिये चारे की जरूरत पड़ी। सेनापति ने एक किसान को बुलाया और काहा -किसके खेत का चारा अच्छा है हमें बताओ वह किसान सेनापति को बहुत अच्छा चारा दिलाने के लिये काफी दूर ले गया और एक मामूली से चारे के खेत में खड़ा करके कहा-इस खेत का चारा बहुत अच्छा है। जितनी जरूरत हो इसमें से काटा जा सकता है।
इस पर सेनापति ने कहा-यह खेत दूर भी बहुत है और चारा भी पीछे के खेतों से अच्छा नहीं है। फिर तुमने पीछे के खेतों को क्यों नहीं बताया और यहाँ इतनी दूर लाये ? किसान ने उत्तर दिया, यह मेरा खेत है। जब तक मेरा खेत मौजूद है तब तक दूसरों का नुकसान कराने का मुझे क्या अधिकार हैं। पहले मेरा खेत काटिए तब दूसरों के खेत में जाइए।
सद्भावना का कोप एक बार फारस के राजा साइरस के यहाँ उससे बड़ा अपार धनवान् राजा क्रोसियस मिलने आया। उसकी राज्य व्यवस्था की क्रोसियस ने बड़ी प्रशंसा सुनी थी कि वहाँ की प्रजा बहुत सुखी और संतुष्ट है। क्रोसियस से घूम घूम कर सारी राज्य व्यवस्था देखी, प्रजा तो सुखी थी, पर राज्य कोप खाली था। क्रोसियस ने पूछा-प्रजा की भलाई में तो आपने इतना खर्च किया पर अपने लिये कुछ भी बचा कर न रखा। यदि अपने लिये भी बचाते तो बहुत धन आपके पास जमा होता। साइरस ने कहा-अब भी मेरे पास बहुत धन है उसे मैं दे दूँगा।
दूसरे दिन साइरस ने नगर में घोषणा कराई कि मुझे एक आवश्यक कार्य के लिये धन की जरूरत है। प्रजा मुझे सहायता करे। घोषणा सुनते ही प्रजाजन उमड़ पड़े और जिसके पास जो कुछ था उसे लेकर राजा के सामने रखना शुरू कर दिया। देखते-देखते अपार धन जमा हो गया।
क्रोसियस ने कहा-आपका कहना सर्वथा सत्य था। आपके पास राजकोष खाली होते हुए भी प्रजा की जो सद्भावना थी वह अपार धन राशि से कम मूल्य की नहीं है।
सैनिकों का आत्मत्याग जापान और रूस में युद्ध चल रहा था। जापानी सैनिक एक किले पर हमला कर रहे थे। किले की खाई चौड़ी थी और पानी भरी हुई थी उसे कैसे पार किया जाय यह एक कठिन प्रश्न था। निदान एक उपाय सूझा कि सैनिक आगे बढ़ते हुए चले जावे ड़ड़ड़ड़ खाई में गिर कर उसे पीट दें। उनकी लाशों के ऊपर से पीछे के सिपाही निकलें और किले को फतह करें। यही किया गया और किला फतह हो गया।
आकर्षण से बचकर अध्ययन। नेपोलियन जब उच्च शिक्षा प्राप्त करने के अध्ययन में संलग्न था, तब पड़ोस की एक स्त्री उस पर बेतरह मुग्ध थी। वह उसे अपनी और आकर्षित करने के लिये तरह तरह की छेड़खानी करती। पर नैपोलियन टस से मस न हुआ, वह अपने अध्ययन में दत्तचित्त हो कर लगा रहा।
बहुत दिन बाद जब नेपोलियन अपने देश का प्रधान सेनापति बन गया तब वह छुट्टियों में अपने पूर्व परिचितों से मिलने गया। वह उस स्त्री के यहाँ भी पहुँचा। उसने कहा-आपको याद होगा यहाँ इस कालेज में एक नेपोलियन नामक लड़का पढ़ा करता था। उस स्त्री ने बात काटते हुए कहा-हाँ-हाँ एक रूखा नीरस और किताबों का कीड़ा लड़का, उसकी मुझे याद है, ऐसे बेकार आदमी की मुझसे चर्चा भी मत कीजिए महोदय!
नेपोलियन ने हँसकर कहा-देवि मैं ही वह नीरस किताबों का कीड़ा नेपोलियन हूँ। आज का प्रवीण सेनापति। यदि उन दिनों में रसिक रहा होता तो आह सेनापति बन सकना मेरे लिए संभव न होता।
शरणार्थी को क्षमादान। स्पेन में एक किसान अपने बगीचे में काम कर रहा था कि एक व्यक्ति बुरी तरह हाँकता हुआ उधर दौड़ा आया। किसान से उसने छिपने की जगह माँगी और कहा-मेरे शत्रु मेरा पीछा कर रहें हैं वे मुझे मार ही डालेंगे। कृपया मुझे कहीं जल्दी ही छिपा दीजिए।’ किसान को दया आई, उसने एक कूड़े की कोठी में उसे छिपा दिया।
थोड़ी देर में पीछा करने वाले लोग भी आ पहुँचे। उनने कहा-एक लुटेरे ने एक निर्दोष लड़के के जेवर लूटे और उसे मार डाला। हमने उसे देखा, लाश तो वहाँ पड़ी है ओर हम लोग उसे लुटेरे का पीछे कर रहें है। किसान की समझ में सब बात आगई पर वह उसे शरण दे चुका था इसलिये चुप रहा।
थोड़ी देर में लाश पहचानी गई। वह उसी किसान के लड़के की थी। किसान ने अपने इकलौते बच्चे को दफनाया और अँधेरा होते ही उस डाकू से कहा- “अभागे, भाग यहाँ से। तूने मेरे ही लड़के को मारा। जा तुझसे बदला नहीं लेता।
राष्ट्रीय चरित्र सन् 48 की बात है। लन्दन में एक बार राष्ट्र मण्डल के श्रम मंत्रियों के सम्मेलन में भाग लेने भारतीय मंत्रीमंडल के सदस्य चौ. जगजीवनराम गये। जब वे इंग्लैण्ड के श्रम मंत्री से मिले तो उन्होंने सिगरेट पेश की दोनों ने उसे पिया। यह सिगरेट उस कम्पनी की थी जो इंग्लैण्ड और भारत में एक ही नाम की सिगरेट बनाती है। दूसरे दिन मंत्री लोग फिर मिले तो इंग्लैण्ड के श्रममंत्री ने भी चौ. जगजीवनराम को सिगरेट पेश की। उसे भी पी लिया गया। पर कल की और आज की सिगरेट में बहुत अन्तर था। सिगरेट एक ही लेबल की और स्वाद में इतना अन्तर। भारत में बनी सिगरेट का तम्बाकू बहुत बढ़िया था जब कि इंग्लैण्ड में बनी का घटिया।
इस पर चौधरी साहब को बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने यह बात इंग्लैण्ड के श्रम मंत्री को भी कही। इस अन्तर को उन्होंने स्वीकार किया ओर बताया कि-युद्ध में हमारी तमाकू की खेती बुरी तरह नष्ट हो गई। अब हमारे यहाँ बढ़िया तमाकू बहुत कम पैदा होती हैं । इसलिये हम लोग बढ़िया तमाकू विदेशों को भेजते हैं ताकि वहाँ हमारी प्रतिष्ठा कायम रहे और घटिया पीकर हम लोग गुजारा करते हैं।
ईमानदार गरीब सीलौन में एक जड़ी बूटी बेचकर गुजारा करने वाला व्यक्ति रहता था। नाम था उसका महताशैसा। उसके घर की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब थी। कई कई दिन भूखा रहना पड़ता। उनका माता चक्की पीसने की मजदूरी करती, बहिन फूल बेचती तब कहीं गुजारा हो पाता। ऐसी गरीबी में भी उनकी ड़ड़ड़ड सावधान थी।
महता एक दिन एक बगीचे में जड़ी बूटी खोद रहे थे कि उन्हें कई घड़े भरी हुई अशर्फियाँ गढ़ी हुई दिखाई दीं। उनके मन में दूसरे की चीज पर जरा भी लालच न आया और मिट्टी से ज्यों का ज्यों ढक कर बगीचे के मालिक के पास पहुँचे ओर उसे अशर्फियाँ गढ़े होने की सूचना दी।
बगीचे के मालिक लखेटा की आर्थिक स्थिति भी बहुत खराब हो चली थी। कर्जदार उसे तंग किया करते थे। इतना धन पाकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। सूचना देने वाले शसा का उसने चार सौ अशर्फियाँ पुरस्कार में देनी चाही। पर उसने उन्हें ड़ड़ड़ड़ दिया ओर कहा- इसमें पुरस्कार लेने जैसी कोई बात नहीं, मैंने तो अपना कर्तव्य मात्र पूरा किया है।
बहुत दिन बाद लखेटा ने अपनी बहिन की शादी शैसा के साथ कर दी ओर दहेज में कुछ धन देना चाहा। शैसा ने वह भी न लिया ओर अपने हाथ पैर की मजदूरी करके दिन गुजारे।
राष्ट्र के लिये निजी स्वार्थों का त्याग रूस में जब क्रान्ति होकर चुकी तो नव निर्माण के लिये मशीनों की जरूरत पड़ी। मशीनें विदेशों से खरीदनी थीं। इसके लिए बदले में रूसियों को अपने यहाँ का कच्चा माल देना था। उन दिनों पशु और उनसे उत्पन्न होने वाली चीजें ही रूस के पास थीं जो बाहर भेजी जा सकती थीं। निदान उस देशवासियों ने स्वयं उनके बिना काम चलाने और दूध, मक्खन, माँस, खल, ऊन आदि चीजें बाहर भेजने का निश्चय किया। वह सब बाहर भेजा गया और मशीनें आईं। दस साल तक रूसियों ने बिना इन चीजों के काम चलाया। रूस भोजन और मोटे कपड़े पर गुजारा किया। यह बड़ाई ड़ड़डड़़ प्रिंस क्रोपाटकिन को भी दूध उपलब्ध न हो सका।
अंग्रेजी सेना जुडेफन के मैदान में लड़ रही थीं। सेनापति फिलिप सिडनी की जाँघ में गोली लगी। वे घायल होकर गिर पड़े। प्यास से उनका गला सुख रहा था। पानी की बोतल निकाल कर वे पीने ही वाले थे कि पास में पड़े एक दूसरे सैनिक को देखा जो उन्हीं की तरह घायल पड़ा था और बहुत खून निकलने से मरणासन्न दशा का पहुँच गया था। देखने से मालूम पड़ता था कि प्यासा वह भी बहुत है। फिलिप ने खिसक कर अपने हाथ की बोतल उसके मुँह में उड़ेल दी और कहा-मेरी अपेक्षा पानी की तुम्हें आवश्यकता अधिक हैं।
सुकरात को जब विष पिलाने की तैयारी हो रही थी तब उसे अपने एक कर्जदार का स्मरण आया जिससे एक मुर्गा उसने उधार लिया था। उसने अपने उत्तराधिकारियों को कहा-उस कर्जदार का कर्ज जरूर चुका देना। मैं ऋणी होकर नहीं मरना चाहता।
अरुन्तुदं परुषं रुक्ष वाचं
वाक्कंट कैर्वितुदन्तं मनुष्यान्
विद्यादलक्ष्मी कतमं जनाना
मुखेनिकवद्धां निव्जृ तिंवैवहन्तम्
विदुरनीति 4। 8
जिसकी वाणी रूखी और स्वभाव कठोर है, जो मर्मभेदी वाक् बाणों से दूसरों को पीड़ा पहुँचाता है, उसे मनुष्यों में महा दरिद्र ही मानना चाहिए ऐसा मूर्ख अपने मुख में दरिद्रता और मौत बाँधे फिरता है।
सहजान्धदृशः स्वदुर्नयें, परदोषो क्षणादिव्य चक्षुषः
स्वगुणोड़ड़ड़गरो मुनिव्रताः परवर्णप्व साधवः॥
दुर्जन लोग अपने दोषों की ओर से आँखों पर पट्टी बाँध लेते हैं, दूसरे के दोष देखने में दिव्य नेत्र धारण करते हैं। अपने गुणों को गला फाड़-फाड़ कर गाते हैं और दूसरों की प्रशंसा का अवसर आने पर मौन धारण कर लेते हैं।
दुरेअपि परस्यागसि पटुर्जनानात्यन समीपैअपि।
स्वंब्रणमक्षिम प्श्यनि शशिनि कलंकं निरुपयति॥
दूर होने पर भी लोग दूसरों के दोष ढूँढ़ने में निपुण होते है पर समीप होने पर भी अपने दोष नहीं देखते। आँख अपना घाव नहीं देखती, चन्द्रमा के कलंक को निहारती हैं।
वरममी तरवो वन गोचराः
शकुनिसार्थ विलुप्त फलश्रियः।
न तू धनाढ्य गृहाः कृपणाः फणाः
निहित रत्न भुजगंमवृत्तयः॥
सर्प के समान फन में मणिधर रखने वाले इन धनी कंजूसों से तो वन के वृक्ष ही अच्छे जिनके फल श्री का लाभ पक्षीगण उठाते हैं।
मोध मत्रं विन्देते अप्र्रचेताः सत्यं व्रवीमि व्रध इत स तस्य। नार्यमणं पुप्यति नो सखायं केवलाधो भवति केवलादी।
ऋग्वेद 10। 117।6
कंजूस को धन प्राप्त होना व्यर्थ हैं। यह एक प्रकार से उसकी मृत्यु ही है। वह न तो धर्म करता है और न साथियों का पोषण करता है। जो अकेला खाता है सो पाप ही खाता हैं।
सुखं दुःखातमोलस्यं दाक्ष्यं दुःखं सुखोदयं।
कीर्तिर्दक्षे भूतिः श्री हृीधृतिं: वसति नालसे॥
महा0 शान्ति0 17।
आलस्य सभी दुखों की जड़ हैं। श्री,ह्रीं धृति, कीर्ति तथा भूति का वास दक्ष पुरुषार्थी प्राणी में ही होता है आलस्य सभी में नहीं ।
निद्रा तंद्रा भयं क्रोधो आलस्य दीर्घ सूत्रता ।
षडदोषा पुरुपेंणेह हानव्याभूति मिच्छता॥
हितोपदेश
निद्रा, तंद्रा, भय, क्रोध, आलस्य और दीर्घसूत्रता यह छः दोष ऐश्वर्य चाहने वाले को त्याग ही देने चाहिए।
कृपणेन समो दाता न भूतो न भविष्यति।
अस्पृशन्नेव वित्तानि यः परेभ्यः प्रयच्छति॥
कंजूस के समान दाता भला ओर कौन होगा? जो अपने काम के लिए धन का कुछ भी उपयोग न करके दूसरों के लिए उसे छोड़ जाता है।
जावर्त्यथ दरिद्रोअपि धी दरिद्रो न जावति
धन का दरिद्री तो जीवित रहता है, पर बुद्धि का दरिद्री नहीं जीता।
अथवाभिनिविष्ट बुद्धिपु व्रजति र्व्यथकताँ सुभाषितमः
दुराग्रह ठाणे हुए लोगों के लिए उपदेश करना व्यर्थ ही जाता है।
अन्ध परम्परा
एक बार एक विवाह के समय जब वहाँ बहुत मिष्ठान पकवान बन रहे थे, तब घर की पालतू बिल्ली ने बहुत ऊधम मचाया। हर चीज में मुँह डाल देती और झूठा कर देती। की मालकिन ने उसे पकड़ कर नाँद के नीचे बन्द कर दिया। फिर वह काम में लग गई। कई कई रोज काम में व्यस्त रहने के कारण उसे बिल्ली को निकालने की बात याद न रही और वह उसी में दब कर मर गई।
बारात जब लौट कर आई और बहू ने घर में प्रवेश किया उस समय घर-मालकिन को बिल्ली की याद आई। उसे निकाला गया को मरी मिली। उसे फिकवाया गया। नई बहू यह सब देख रही थी। उसने समझ लिया कि इस घर की यही परम्परा है। बाद में जब उसके बच्चा हुआ और उसके बड़े होने पर जब बरात गई और नई बहु आई तो उसने भी एक बिल्ली पकड़ कर नाँद के नीचे बन्द की और जब वह मर गई तो ठीक उसी समय जब नई वधू ने घर में प्रवेश किया- उस बिल्ली को बाहर फिकवाया। जो उसने देखा था। उसे कुल परम्परा समझा और उसी का पालन करने में अपना धर्म या कल्याण समझा।
आजकल ऐसी ही अनेक अन्ध परम्पराएँ चल रही हैं। इन्हें ही “सनातनधर्म” मानने लगे हैं।
सत्य का प्रभाव
एक लड़का जंगल के मार्ग से कही दूर देश जा रहा था। रास्ते में उसे चोर मिले। चोरों ने उसे पकड़ लिया, उसकी तलाशी ली, पर उसके पास कुछ भी न निकला। जब उसे चोर छोड़ रहे थे तब उनने कहा तेरे पास कुछ हो बता। लड़के ने कहा मेरे पास बीस रुपये हैं। चोरों ने तलाशी ली पर कुछ न मिला। उसने समझा लड़का ठिठोली कर रहा है, झूठ बोल रहा है, वे उसे बुरा भला कहने लगे।
लड़के ने कहा मैं कभी झूठ नहीं बोलता। मेरी माता ने सिखाया था कि कितनी ही विपत्ति आने पर भी झूठ न बोलना। मेरे कोट के अस्तर में बीस रुपये सिले हुए हैं। लड़के ने अस्तर उधेड़ा और रुपये चोरों के आगे रख दिये। उनने अपने को धिक्कारा और उसी दिन से चोरी करना छोड़ कर वे भी सचाई का जीवन बिताने लगे।
सत्यवक्ता बालक का भी उतना प्रभाव पड़ना है जितना असत्यवादी बड़े-बड़े प्रवचनकर्ता भी उत्पन्न नहीं कर सकने।
धन का नहीं त्याग का मान है
एक धनी व्यक्ति बड़ा कंजूस था। अपने लिये तो बहुत खर्च करता पर किसी शुभ कार्य में कभी एक पैसा भी न देता था। इसलिये सब लोग उनका निरादर करते थे। कही उन्हें आदर ने मिलता था एक दिन उनने यह दुःख अपनी स्त्री से कहा। स्त्री बहुत समझदार थी। उस दिन पोटली उन्हें दी और कहा इसे कथा पर चढ़ा देना, आज ही आपकी आदर मिलेगा। यह आदर की पोटली है।
वे कथा में गये और पोटली वहाँ चढ़ा दी। उसमें सौ रुपये थे। लालाजी की उदारता को देख कर सब लोग आश्चर्य में पड़ गये। उनको खूब प्रशंसा हुई। वे पीछे बैठे हुये थे सो वहाँ से उठाकर आगे अच्छा आसन पर बिठाया। वे बहुत प्रसन्न हुए और घर आकर कहने लगे-इसीलिए मैं धन संग्रह किया करता हूँ। स्त्री ने बात काटकर कहा-यह धन का नहीं त्याग का आदर था। धन तो आपके पास पहले भी था पर कभी आदर न मिला। पर आज जब कुछ त्याग किया तो इतना सम्मान मिला। यश और आदर प्राप्त करने के लिए त्याग की आवश्यकता होती है।
मान धनी होने से से नहीं कुछ त्याग करने से मिलता है।
ईश्वर हृदय परखता है
हजरत मूसा ने एक दिन ग्रीष्म ऋतु में एक बूढ़े गड़रिये को ईश्वर की प्रार्थना करते देखा-वह कह रहा था-हे परमात्मन्, मैं आपको ढूँढ़ पाता तो आपकी वैसी अच्छी सेवा करता। आपके बालों में कंघी करता, आपके जूते साफ करता, आपके कमरे में झाडू लगाता और नित्य अपनी बकरियों का दूध शहद डालकर पिलाता।”
यह सुनकर मूसा को बड़ा क्रोध आया और बड़े कटु शब्दों में उसकी भर्त्सना करते हुए कहा-मूर्ख जवान को बन्द कर, अल्लाह निराकार है उसकी शान में ऐसी बातें न कह जैसी इनसानों के लिए कहा जाता है।”
बेचारे गड़रिये की किस्मत टूट गई। उसका धर्मावेश नष्ट हो गया। अपनी अल्यक्षता पर उसने सिर धुन डाला और हतोत्साह होकर घर चला गया।
इस पर अल्लाह न मूसा से कहा-तूने मेरी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के बहाने मेरे एक उपासक को दुखी कर क्यों भगा दिया? ऐ जल्दवाज! मैंने तुझे शिक्षा देने भेजा था। मुझे जो सबसे अधिक नापसन्द है वह है-बिलगाव और परित्याग। सबसे बुरी बात है किसी को बलपूर्वक किसी मार्ग पर चलवाना। मैंने सृष्टि इसलिए पैदा नहीं की कि उनसे अपनी प्रशंसा या प्रार्थना कराऊँ। वरन सृष्टि का उद्देश्य यह था कि जीव मुझसे मिलने की महत्ता को समझ सके। यदि कोई उपासक बचपन की ड़ड़ड़ड़ से प्रार्थना करे तो इसमें क्या हर्ज है? मैं तो केवल हृदय परखता हूँ कि उसमें कितना सच्चा प्रेम है।
यमराज की चार सूचनाएँ
एक मनुष्य की यमराज से दोस्ती हो गई। उसने कहा-मेरी मृत्यु तो अवश्य होगी पर आप कृपा कर मुझे समय से पहले सूचना दे देना ताकि आने से पूर्व घर के सब कामों को निपटा लूँ। यम न कहा-मैं एक नहीं चार बार सूचना दूँगा पर वह इशारों से ही होगा। मैं बातचीत कह कर सूचना नहीं दे सकता। उस मनुष्य ने कहा-अच्छा इशारों से ही सही।
एक दिन यमदूत उसे लेने आ पहुँचे। चलना पड़ा। जाकर यमराज से उसने शिकायत की कि आपने वचन दिया था कि पूर्व सूचना देंगे। फिर आपने उसे पालन क्यों नहीं किया?
यमराज ने कहा-हमने चार बार सन्देश भेजा। एक बार तब जब तुम्हारे बाल काले से सफेद हुए। दूसरी बार तब जब दाँत उखड़े। तीसरी बार तब जब-आँखों की ज्योति क्षीण हुई। चौथी बार तब जब बीमारियों ने घेरा। तुम चार सूचनाओं का तात्पर्य न समझ कर उन पर लीपा पोती करते रहे। बालों पर खिजाव लगाया। मुँह में नकली दाँत लगवाए, आँखों पर चश्मा चढ़ाया और दवादारू लेकर बीमारी को झुठलाते रहे। पर यह सब कब तक चलता! मेरी चारों चेतावनी समय पर पहुँची। तुमने ध्यान ही नहीं दिया, इसका मैं क्या करू ।
वृद्धावस्था आने पर परलोक की तेयारी में लगना ही बुद्धिमत्ता हैं।
(श्री0 अविनाशचनद्र चट्टोपाध्याय)
अशान्ति और शान्ति की मनोदशा का जीवों पर क्या प्रभाव पड़ता है इसके अनेकों परीक्षण पाश्चात्य देशों में हुए है। कैन्सास यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक कक्ष में चूहों को निर्भय और निर्द्वन्द्व वातावरण में सामान्य भोजन देकर रखा गया तो वे बहुत स्वस्थ, फुर्तीले और दीर्घजीवी रहें। किन्तु चूहों के दूसरे दल को ऐसी जगह रखा गया जहाँ बिल्ली का पिंजड़ा सामने रखा था तथा और भी डर तथा प्रशान्ति की परिस्थितियाँ थीं। यह चूहे अपेक्षाकृत कहीं अच्छा भोजन पात थे, फिर भी वे बीमार हो गये, दुबले रहे ओर कम समय तक जिन्दा रह सके। मानसिक अशान्ति से स्नायु समूह पर भारी दबाव पड़ता है जिससे शरीर को विश्राम का लाभ मिलना बन्द हो जाता है। ऐसे लोगों को नींद भी अधूरी आती है और जब वे सोकर उठते हैं तो अपने में ताजगी नहीं, थकान ही देखते हैं।
मानसिक शान्ति ऐसी बहुमूल्य खुराक है जिसे प्राप्त करने पर गरीब आदमी भी बड़े आनन्द और प्रसन्नता पूर्वक जीवन यापन करते हैं। श्रम अधिक करना पड़े, भोजन घटिया मिले या अन्य शारीरिक असुविधाएँ रहें तो भी मानसिक शान्ति मिलने की दशा में मनुष्य सुखी ही रहेगा। पर सब सुख साधन रहते हुए भी यदि आन्तरिक चिंता और परेशानी से मन व्यथित रहता है तो वह अपने को नरक में पड़ा हुआ ही अनुभव करेगा। इसलिए जीवन का आनन्द लाभ करने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को यह प्रयत्न करना चाहिए कि वह अपना मानसिक अशान्ति के कारणों की तलाश करे और उनसे छुटकारा पाने के लिए जितनी जल्दी संभव हो सके कदम उठावें। अन्य अभावों और कठिनाइयों के रहने से कुछ विशेष हानि नहीं है पर चित्त का उद्विग्न रहना एक भारी विपत्ति है। इससे जीवन का सारा आनन्द ही नष्ट हो जाता है।
यदि अशान्ति का कारण कोई परिस्थितियाँ हैं तो बदलना चाहिए और यदि अपनी आदत ही ऐसी बन गई है कि जरा-सी बात पर जी घबराने लगे, भय का पहाड़ सामने उपस्थित दिखाई दे तो इस दुर्बलता को भी परास्त करना पड़ेगा। उपाय जो मन भी करना पड़े परिणाम यही प्राप्त करना चाहिए कि मन की अशान्ति दूर हो, चित्त में बेचैनी न रहे। जीवन क्रम को और अधिक समृद्ध उन्नतिशील बनाया जा सकता हो तो ठीक है वैसा करना चाहिए पर इसके लिए भी उद्विग्न और अशान्त रहने का मूल्य चुकाना बहुत महंगा पड़ेगा। कोई सफलता इतनी कीमती नहीं है कि उससे आन्तरिक अशान्ति के द्वारा होने वाली क्षति की पूर्ति की जा सके।
किसी कठिनाई से परेशान होकर लोग बहुत अशान्त रहते देखे गये हैं। उनकी चिन्ता का उद्देश्य कठिनाई से छुटकारा पाना होता है पर परिणाम उलटा निकलता हैं। चिन्तित व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो बैठता है और उसकी वह सूझबूझ घट जाती है जिसके आधार पर सामने उपस्थित कठिनाइयों से छुटकारा पाया जाना संभव हैं।
अशान्ति स्वयं अपने आपमें एक विपत्ति है, वह कठिनाइयों को घटाती नहीं बढ़ाती हैं। इसके अतिरिक्त शरीर और मन इतना अधिक ह्रास उस उद्विग्नता के कारण होता है जितने का सही उपयोग करने से उस जंजाल से छुटकारा मिल सकता था, जो परेशानी का प्रमुख कारण बना हुआ है।
जीवन में कठिनाइयों का एक स्थान है। वे आती हैं, उनसे सर्वथा बचा रहना किसी के लिए भी संभव नहीं। पर उनके कारण उत्पन्न होने वाली मानसिक अशान्ति से आत्म नियंत्रण करके हम बचे रह सकते हैं और इस प्रकार अपनी शक्तियों के अनावश्यक क्षीण होने एवं कठिनाइयों को देर तक ठहरे रहने की क्षति से अपने को बहुत अंशों में बचा सकते है।
दीर्घ जीवन एवं निरोगिता का कारण केवल खान-विहार ही नहीं वरन मनोदशा भी है। कुविचारों में निरत रहने वाले व्यक्ति कितना ही ड़ड़ड़ड़ अपनी दुविधाओं और दुर्भावनाओं के कारण स्वास्थ्य को खो बैठते हैं और आन्तरिक आग में झुँझलाते हुए नारकीय जीवन जीते हैं। इसके विचार भूमिका उच्चकोटि की है वे साधारण विहार रखते हुए भर शान्तिपूर्ण जीवन यापन करते हैं।
कागभुसुणिड़जी अमर और दीर्घजीवी माने जाते है। एक दिन महर्षि वशिष्ठ जी ने कागभुशुणिडजी से उनके दीर्घजीवन का कारण पूछा तो उनने बताया कि -
माषार्माषयमयीं चिन्ता मीहतानीहितान्विताम
विमृश्यात्मनि तिष्ठामि चिरंजाव्यम्यनामयः
प्रशान्तं चापलं वीतशोकं स्वस्थं समाहितम्।
मनो मम सने शान्तं तेन जीवाम्यनामयः।
किमद्य मम सम्पत्रं प्रातर्वा भविता पुनः।
इति चिन्ताज्वरो नास्तितेन जीवाम्यनामयः।
जरामरण दुःखेपु राज्य लाभ सुखेपुच।
न विभेमि न हृप्यामि तेन जावाभ्यनामयः॥
अयं बन्धुः परश्चायं ममायमयमन्यतः।
इति ब्रह्यत्र जानामि तेन जीवाम्यनामयः॥
आहारन्विहरन्तिष्ठन्नुत्तिष्ठत्रच्त्रछ्र-सन्खपन्-देहोहमिति नो विझि तेनासिम चिरजीवित
अपरिचलया शक्त्या सुहशास्निग्धमुग्ध्या।
ऋजु पश्यामि सर्वत्र तेन जीवाम्यनामय।
करोमाशोऽपि नाकान्ति परिवाषे न खेदवान्।
दरिद्रोऽपि न वान्छामि तेन जावाम्यनामय।
करोमाशोऽस्मि सुखापन्ने दुखितो दुखितेजन।
सर्वग्य प्रिय मित्रं च तेन जा भ्यनामय।
आपद्यचल धीरोऽस्मि जगन्मित्रं च संपदि।
भावाभावेपु नेवास्मि तेन जीवाम्यनामय।
-योग वशिष्ठ 6।26।10-35
‘मेरे पास यह है यह नहीं है इस प्रकार की चिंता मैं ड़ड़ड़ड़ मेरा मन शान्त, अचंचल, शोक रहित और सम्मोहित रहता है इसलिए निरोग दीर्घजीवन जाता हूँ। आज मैंने कितना कमा लिया कल कितना कमाऊँगा ऐसा तृष्णा ज्वर मुझ पर नहीं चढ़ा रहता इसलिए मैं निरोग दीर्घजीवन जीता हूँ। न तो मैं मौत, बुढ़ापे से डरता हूँ और न राज्य जैसे बड़े लाभ मिलने पर भी मुझे हर्ष होता है, इसलिए मैं निरोग दीर्घजीवन जीता हूँ। यह मेरा भाई है, यह शत्रु है, यह अपना है यह पराया ऐसा भेद भाव मेरे मन में नहीं आता इसलिए निरोग दीर्घजीवन जीता हूँ। आहार में, विहार में, सोने जागने में, उठने बैठने में किसी भी समय में ब्रह्मभाव छोड़ देहभाव में नहीं भ्रमता इसलिए निरोग दीर्घजीवन जीता हूँ। अपने स्वरूप में अविचल भाव से स्थित रहता हूँ ओर आत्मशक्ति बनाये रखता हूँ, मधुर-प्रेम भरी दृष्टि से सबको समान दृष्टि से देखता हूँ। सर्वत्र मण्डल ही देखता हूँ, इसलिए निरोग दीर्घजीवन जीता हूँ। समर्थ होने पर भी किसी को सताता नहीं, दूसरों के द्वारा अनिष्ट किये जाने पर क्षुब्ध नहीं होता, निर्धन होने पर किसी से आकांक्षा नहीं करता, इसलिए दीर्घजीवन जीता हूँ। दूसरों को सुखी देखकर सुखी होता हूँ, दुखियों को देखकर करुणा करता हूँ। सबको अपना प्रिय मित्र मानता हूँ इसलिए निरोग दीर्घजीवन जीता हूँ कि आपत्ति आने पर विचलित नहीं होता, धैर्य को कभी भी नहीं छोड़ता, सुख के समय सबसे उदार व्यवहार करता हूँ, भाव और अभाव में एक सा रहता हूँ। इसलिए निरोग दीर्घजीवन जीता हूँ।’
(श्रीराम शर्मा आचार्य)
आगामी भाघ वदी अमावस्या ता0 5 फरवरी 62 में अष्टग्रही योग आने वाला है। इसकी चर्चा अखण्ड-ज्योति में समय-समय पर होती रही है। यह समय अब निकट ही आने वाला है।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार एक राशि पर चार या उससे अधिक ग्रहों का होना अशुभ माना जाता है। विगत महाभारत के समय एक राशि पर सात ग्रह आये थे उसके फल स्वरूप वह विश्व युद्ध हुआ था और संसार पर भारी विपत्ति आई थी। अब इसका फल और भी अधिक अशुभ होना चाहिए।
दैवज्ञ इस योग को कालकूट नाम देते हैं। जैसे सब विषों में कालकूट प्रमुख विष है, उसी प्रकार अशुभ योगों में यह अष्टग्रही योग भी कालकूट के समान भयंकर है। किन्हीं ग्रन्थों में इसे प्रव्रज्या योग नाम अशुभ अनिष्ट का ही संकेत करते हैं।
6,7,8 ग्रहों के एकत्रित होने से विभिन्न कुयोग बनते हैं। ता0 19 जनवरी से 12 फरवरी तक 25 दिन का षड््र् ग्रह योग है। इसी बीच में 24 जनवरी से 9 फरवरी तक सप्तग्रही योग है। अष्टग्रही योग ड़ड़डड़़ 2 फरवरी से 5 तक है। माघ वदी अमावस्या (ड़ड़ड़ड़ मावस) इसका मध्य बिन्दु है। इसी दिन सूर्य ग्रहण भी है, जो यद्यपि भारतवर्ष में दिखाई नहीं पड़ेगा पर उसका फल भी विश्व के अन्य भागों पर होगा ही।
‘व्योतिष्मती’ पत्रिका के ग्रीष्मागूँ में इस योग के संबंध में कई दैवज्ञों ने प्रकाश डाला है। श्राकालदास पोष का कथन है कि इस योग का प्रभाव सन् 1994 को रहेगा। रेल, ड़ड़ड़ड़ परिवाहनों की दुर्घटना होंगी। आधुनिक सभ्यता के मलबे से नवीन रत्त-ड़ड़डड़़ उत्पन्न होगा। मेष लग्न पर मंगल उच्च है और शनि स्वग्रही हैं इस अवस्था में इसके सिवाय और कोई विकल्प दिखाई नहीं देता है कि युद्ध का देवना मंगल विश्वव्यापी युद्ध करेगा। ज्योतिर्विद् श्रीचेलाम राजू गोपाल कृष्ण मूर्ति का कथन है-सूर्य के साथ मंगल का होना युद्ध का सूचक है। प्रायः सभी देशों के शासकों की रातें जागने गुजरेगा। भूमि पर भारी रक्त पात होगा। विश्वशान्ति भंग होगी, प्रत्येक देश में युद्ध का शंखनाद सुनाई देगा। सीमा विवाद चलेंगे बड़े पुरुषों की सीख न रहेगी। फसल नष्ट होगी। अकाल ओर बेकारी बढ़ेगी। तूफान, आधा नाव दुर्घटना, युद्ध, मुद्र-प्रवमूल्यन संक्रामक रोग आदि घटित होंगे।
रमेशचन्द्र शास्त्री ने लिखा है-इस योग के प्रभाव से आगामी विश्वयुद्ध की नींव जरूर इस वर्ष पड़ जायगी, पर वह होगा सन् 1964 में। ड़ड़ड़ड़ पत्रिका के सम्पादक ज्योतिषाचार्य पं0 हरदेव शर्मा त्रिवेदी ने लिखा है-जलीय उत्पात, भयानक बाढ़ ओर भूकम्प से विशेष हानि होगी। खाद्य समस्या समाधानपरक नहीं होगी। दुर्भिक्ष महामारी आदि से भी विनाश होगा। सन् 1962 में 141 वर्ष बाद क्षय मास आ रहा है अतः सन् 62 से 72 तक आगामी दश वर्ष में बड़ी भारी राजक्रान्तियाँ और प्रकृति प्रकोप सम्भव होगा। तृतीय विश्वयुद्ध इसी अवधि में होकर जन धन का भीषण रूप से विनाश करेगा।
इसी प्रकार के फलादेश पहले भी कई बार प्रकाश में आ चुके हैं। उनमें अशुभ अनिष्ट की ही संभावना प्रकट की गई है। हमारा निज का अभिमत भी ऐसा ही है कि इस कुयोग से मानव जाति को विशेष कष्ट सहने पड़ेंगे। यद्यपि ऐसी आशंका कतई नहीं है कि योग के दिनों में प्रलय हो जायगी या उसी समय एटम बम चलेंगे। कई व्यक्ति ऐसी आशंका करके भयभीत रहते हे। उन्हें जान लेना चाहिए कि उन दिनों भी ऐसी ही स्थिति रहेगी जैसी कि यह पंक्तियाँ पढ़ने वाले दिन का है। योग के ड़ड़ड़ड़ दिनों में कोई आश्चर्यजनक घटना न घटेगी, साधारण दिनों की भाँति ही वे दिन भी शान्ति से बीतेंगे। पर सूक्ष्म जगत में ग्रह योग की जो प्रतिकृपा होगी उसके फल स्वरूप संसार के प्रत्येक भाग में और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कठिनाइयाँ बढ़ने का वातावरण बनना प्रारम्भ हो जायेगा। जैसे-जैसे समय बीतता जायेगा वे कठिनाइयाँ सामने आती जायेगी और वे आगामी दस वर्षों तक बनी रहेगी।
इससे किसी को भयभीत या निराश नहीं होना चाहिये। विनाश की शक्तियों की भाँति ही रक्षा की शक्तियाँ भी सक्रिय हैं वे चिरपोषित मानव संस्कृति को नष्ट न होने देंगी। हमें आगामी समय के लिए अधिक साहस, अधिक धैर्य और अधिक विवेक का सम्पादन करना चाहिए ताकि संभावित कठिनाई का भली प्रकार मुकाबला किया जा सके।
पिछले अज्ञात वास में हमें उच्च कोटि के तत्त्वदर्शियों का सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर मिला है। इनके व्यक्तिगत निष्कर्ष यह है कि इस योग के फलस्वरूप जहाँ एक ओर विनाश की विभीषिका सामने आयेगी वहाँ युग निर्माण के उपयोग तत्त्वों का इसी अवधि में तीव्र गति से अवतरण और विकास भी होगा। ज्ञान और विज्ञान दोनों की उन्नति ऊँचे स्तर तक बढ़ेगा निर्माण ओर उत्पादन के कार्य भी बड़े विशाल परिमाण में होंगे। इस विनाश का उद्देश्य अनंत विश्व में स्थिर शक्ति की सहायता ही हैं। इसलिए समय पर तत्सम्बन्धी आवश्यक साधनों का उपलब्धि के लिए निर्माण एवं उत्पादन कार्य भी साथ ही साथ आरम्भ होगा।
इस दश वर्षीय विनाश चक्र का प्रभाव संसार के विभिन्न भागो पर बहुत पड़ेगा, पर भारत को कम से कम हानि सहनी पड़ेगी। भारत धीरे-धीरे प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति करता जायेगा और सन् 94 के उपरांत उस की स्थिति संसार में सर्वश्रेष्ठ होगा। ज्ञान ओर विज्ञान, धन और सत्ता, नीति और ड़ड़डड दृष्टि से वह विश्व का सर्वोपरि राष्ट्र होगा। उसकी संस्कृति सम्पूर्ण विश्व में अपनाई जायगी ओर प्राचीन काल की भाँति उसे सारे भूमण्डल को अपना नेतृत्व देना होगा। जिस प्रकार आज अमेरिका और रूस अपना प्रभाव संसार के विभिन्न क्षेत्रों पर बनाये हुए है उसी प्रकार सन् 94 के बाद अकेला भारत संसार के नेतृत्व की बागडोर अपने हाथ में लेगा और चिरकाल तक सर्वत्र सच्ची सुख शांति स्थापित किये रहने में सफल होगा। उस महान् जिम्मेदारी को अपने कन्धों पर उठाने के लिये इन्हीं दिनों भारत भूमि पर अत्यन्त उच्च कोटि की जीवन-मुक्त आत्माएँ जन्म लेंगी।
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिनकी कुण्डली में एक स्थान पर छः, सात, या आठ ग्रह होते है। वह बालक दरिद्र, मूर्ख और नीचवृत्ति, धनहीन अधर्मी और महा दुष्ट होते हैं। किन्तु आचार्य वराहमिहिर के अनुसार ऐसे बालक निश्चय ही बहुत बड़े महात्मा होते है। यद्यपि दोनों मत एक दूसरे के प्रतिकूल हैं तो भी उनमें एक बात पर मतैक्य है कि ऐसे समय में उत्पन्न बालक “असाधारण” होते हैं, परिस्थितियाँ उन्हें चाहे महादुष्ट बना दें चाहे महासंत, पर क्षमता, उनके अन्दर निश्चित रूप से बहुत रहेगी। ग्रहों का यह प्रभाव अष्टग्रही योग के तीन दिन या षड्रग्रही योग के 25 दिनों तक ही न चलेगा, वरन् उसका प्रभाव आगामी तीन वर्ष तक रहेगा।
ग्रहयोग के 25 दिनों में उत्पन्न हुए बालकों की शिक्षा-दीक्षा यदि उनके अभिभावक अच्छी तरह कर सके तो वे आगे चलकर बहुत ही श्रेष्ठ प्रकार के नर रत्न सिद्ध हो सकते हैं। इसके उपरांत आगामी तीन वर्ष तक भी यह क्रम जारी रहेगा और धर्म शिक्षा, संस्कृति, विज्ञान, शिल्प, रसायन, चिकित्सा उद्योग आदि विभिन्न क्षेत्रों में सारे विश्व का नेतृत्व वाली आत्माएँ यहाँ जन्म लेती रहेंगी। भारतीय स्वतंत्रता का उद्देश्य पूर्ण करने के लिए 30 उच्चकोटि की आत्माएँ अवतरित हुई थीं, उनका चिर संचित आत्मबल इतने बड़े कार्य के लिए आवश्यक वातावरण उत्पन्न करने में समर्थ हुआ। अब सारे विश्व की राजनैतिक आर्थिक सामाजिक, आत्मिक स्वतंत्रता की दिशा में नेतृत्व करने का कार्य भारत के कंधों पर आने वाला है। इस कार्य के लिए उच्च लोकों से जीवनमुक्त आत्माएँ भारत भूमि पर जन्म लेने आ रही है। इस दृष्टि से सन 62 जहाँ दुर्भाग्य पूर्ण है वहाँ साथ ही आशा की स्वर्णिम किरणें भी साथ चल रही है।
इस संदर्भ में अखण्ड ज्योति परिवार के धर्मप्रेमी स्वजनों के लिए भी कुछ कर्तव्य बनते है। हम सब को उस पर ध्यान देना चाहिए और उसके लिए निम्न प्रकार सप्तसूत्र तैयार करनी चाहिए।
(1) जिस प्रकार चन्द्र ग्रहण, सूर्य ग्रहण का सूतक कुछ घण्टे पहले लग जाता है उसी प्रकार माघ वदी अमावस्या को आने वाले इस कुयोग का सूतक चार मास पूर्व आश्विन वदी अमावस्या से प्रारम्भ होगा। इन चार महीनों में कुछ न कुछ धर्म आयोजन करने का प्रयत्न हममें से हर एक को करना चाहिए।
(2) व्यक्तिगत साधना जिसकी चल रही है उसे इन चार महीनों के लिए कम से कम सवाई कर दे। एक चौथाई और बढ़ादे और इस चार मास की साधना को विश्वकल्याणार्थ, समर्पण कर दें।
(3) आश्विन की नवरात्रि में हर जगह कुछ न कुछ सामूहिक धर्म अनुष्ठान किये जाँय। इस बार आश्विन की नवरात्रि ता0 11 अक्टूबर मंगलवार को आरम्भ होकर ता0 18 अक्टूबर बुधवार को समाप्त होगी।
(4) कुयोग के दिनों में भी एक दिन का आयोजन इसी प्रकार से किया जाय। माघ वदी 11 गुरु बसंत पंचमी शुक्रवार ता0 9 फरवरी को इसे पूर्ण किया जाय। इस अवसर पर भी आश्विन नवरात्रियों की भाँति ही सामूहिक धर्मानुष्ठान किये जाय। व्यक्ति गत साधना भी इन दोनों अवसरों पर कुछ विशेष की जाय।
(5) जनता में किसी प्रकार का भय उत्पन्न न होने दिया जाय। वरन आगामी समय का महत्व बताते हुए उसके लिए आवश्यक आत्मबल, धैर्य साहस और विवेक एकत्रित करने की सबको सलाह दी जाय।
(6) जिनकी निज की निष्ठा गायत्री उपासना में दृढ़ हो चुकी है वे अपनी धर्म पत्नियों को भी प्रेरणा देकर इस मार्ग पर अग्रसर पर आर कम से कम इन चार महीनों में तो ब्रह्मचर्य से रहने की प्रतिज्ञा कर हो। ऐसे श्रद्धावान दम्पत्ति किन्हीं महान् उच्च आत्माओं को अपने यहाँ जन्म लेने के लिए आकर्षित कर सकते है।
(7) धार्मिक एवं आस्तिकता के विचार जन साधारण के मनो में से तीव्रगति से घटते जा रहे है इसे रोकने और सन्मार्ग की ओर जनमानस को प्रेरणा देने के लिए जन संपर्क स्थापित करे और सद् विचारों का प्रसार करने के लिए कुछ समय लगाते जांयें।
“शान्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए और युद्ध करके भी उसे प्राप्त करना चाहिए, और कभी कभी बल प्रयोग से भी उसे स्थापित करना चाहिये। यह बात एक बार और एक राष्ट्र दोनों ही के लिए लागू है।”
परमपूज्य आचार्य जी के अज्ञातवास काल में मुझे अखण्ड ज्योति का सम्पादन कार्य अपने दुर्बल कन्धों पर वहन करना पड़ा। उस अवधि में जो त्रुटियाँ रही होगी पाठक ने उन्हें उदारतापूर्वक सहन किया है। इसे मैं स्वजनों की आत्मीयता उदारता एवं अथवा सौभाग्य ही मानती हूँ।
अज्ञातवास से पूर्व आचार्य जी की भावनाएँ स्थायी रूप से किसी निविड़ वन में एकान्त साधना करने की थी, वे अपने लौटने का स्वल्प सा ही आश्वासन हमें देकर गये थे और अधिक संभावना अपने न लौटने की ही बनाकर गये थे। पर उनकी मार्ग दर्शक शक्ति ने भी दस वर्ष तक और भी कुछ महत्त्वपूर्ण सेवाएँ उन्हें सौंप दी है और तब तक मथुरा रहकर ही शेष साधना करने का आदेश दिया है। तदनुसार उन्हें अब इधर ही रहना है यह समाचार हम सबके लिए बड़ा प्रसन्नता की है कि उनके प्रत्यक्ष सान्निध्य के लाभ से वंचित न रहना पड़ेगा।
सदा की भाँति व अखंड ज्योति का कार्य भार भी अगले महीने से स्वयं ही सभी लोग यद्यपि पिछले दिनों भी उनके विचारों भावनाओं की प्रति ध्वनि ही पत्रिका के पृष्ठ पर गूँजती रही है पर आग तो वे स्वयं ही इस पुनीत माध्यम से हम सबका मार्ग दर्शन करेंगे
अब तक अखण्ड ज्योति साधारण पत्र पत्रिकाओं के ढंग से सम्पादित ही तो रही है उसमें विभिन्न विषयों पर विभिन्न लेख छपते रहे है। अब आगे उसमें वही सब छपेगा जो आचार्यजी अपने परिजनो को सिखाना उचित समझेंगे। अखण्ड ज्योति अब श्रम विकास के व्यवहारिक मार्ग दर्शन की पत्रिका रहेगी और उसमें प्राय सभी लेख आचार्यजी द्वारा लिखित एवं संगृहीत होंगे। अज्ञातवास से लौटने पर पत्रिका ने कुछ इसी प्रकार की मोड़ भी लिया है।
आत्म सुधार, आत्म निर्माण आत्म-विकास का कुछ चर्चा गत अंक में हुई है। अब इसका व्यवहारिक मार्ग दर्शन आगे होगा। इस मार्ग पर जिनके भी कदम उठेंगे वे आज की अपेक्षा कल निश्चित रूप से बाह्य और आन्तरिक जीवन को अधिक प्रगति शील एवं सुख शान्तिमय अनुभव करेंगे, यह निश्चित है। जब कि व्यायाम करने वाले स्वास्थ्य का, स्कूल जाने वाले विद्वता का लाभ प्राप्त करते है, तो साधना करने वालों को जीवन के सर्वांगीण विकास का लाभ भी मिलना ही चाहिए।
आगामी अंक से इसी प्रकार का शिक्षण अखंड ज्योति करेगी। दस वर्षीय एक शिक्षण योजना पूज्य आचार्यजी ने बनाई है। प्रथम वर्ष में हम सबको क्या साधना करनी चाहिए, इसका सविस्तार शिक्षण अक्टूबर अंक में होगा। प्रतिवर्ष इसी महीने आगामी वर्ष की शिक्षा कक्षा बदली जाया करेगी। जिनने गत वर्ष के शिक्षण को सफलता पूर्वक पूर्ण किया है व आग की साधना को पूरा करने तक उसमें संलग्न रहेंगे। आशा यह की जाती है कि प्रस्तुत दश वर्षीय साधना क्रम यदि कोई श्रद्धा आर निष्ठा पूर्वक अपनाये रहता है तो वह पूर्णता के निकट ही जो पहुँचेगा।
अब तक पाठक अखण्ड ज्योति को हलकी दृष्टि से पढ़ते रहे है। उन्हें अब पत्रिका की एक एक पंक्ति ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए। अपनी स्त्री, बच्चों और कुटुम्बियों को पढ़ाने या सुनाने की व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे वे भी उसका लाभ ले सके। साधना जप तप मात्र की ही नहीं कहते वरन स्वाध्याय और सत्संग भी उसके प्रधान अंग है। अखंड ज्योति को स्मृति रूप से पढ़ना इस अंग की एक अनिवार्य आवश्यकता है। जिन लोगों की आचार्यजी के प्रति व उनके मिशन के प्रति कुछ भी आस्था है उन्हें ड़ड़ड़़ड़ उस आस्था का परिचय अखंड ज्योति नियमित रूप से पढ़ते रहकर देना चाहिए।
कुछ बातें पाठको से और भी कहनी है। (1) महीन में अखंड ज्योति प्रत्येक सदस्य के लिए दो बार जाँचकर भेजी जाती है। कोई अंग न मिले तो डाकखाने की गड़बड़ी समझकर उसी महीने खबर चाहिए ताकि दूसरी प्रति भेजी जा सके। कई दिन बाद अंक न मिलने की सूचना मिलने पर उसे भेजने में कठिनाई होती है 2- पता बदलवाना हो तो (1) पुराना पूरा पता दे (2) नया पूरा पता और (3) ग्राहक नम्बर पर ही बातें लिखनी चाहिए। ग्राहक संख्या बहुत से केवल नया पता लिख देने मात्र से पता बदलना संभव नहीं होता।
(3) चन्दा समाप्त होने पर मनी-आर्डर से 3) भेज देने चाहिए। वी० पी० बिना मंगाये नहीं भेजी जाती। इससे अधिक देने पड़ते है। जो बिलकुल ही व्यर्थ का अपव्यय है।
(4) हर पत्र में अपना पूरा पता शुद्ध अक्षरों में लिखना चाहिये तथा व्यक्तिगत पत्र व्यवहार में जवाबी पत्र भेजने चाहिए। इन मोटी चार बातों का ध्यान रखा जाय तो जो व्यवस्था संबंधी शिकायतें होती है उनमें से अधिकांश का सहज समाधान हो जायेगा।
पूज्य गुरुदेव के अज्ञातवास काल में सम्पादन तथा व्यवस्था सम्बन्धी जो त्रुटियाँ रही है उनके लिए स्वजनों से एक बार पुनः क्षमा प्रार्थना करते हुए विदा लेती हूँ।
-भगवती देवी शर्मा
चारों वेदों का सरल हिन्दी भाष्य
वेद, ज्ञान और विज्ञान का अनादि भण्डार है। सृष्टि के आदि काल में मानव प्राणी को लौकिक पारलौकिक सुख शान्ति के लिए जो ईश्वरीय मार्ग दर्शन प्राप्त हुआ, वह बीज रूप से वेदों में सन्निहित इस ज्ञान को अपनाकर हम अपने जीवन को सच्चे अर्थों में सफल बना सकते है। वेद हिन्दू धर्म का मूल ग्रन्थ है।
आज सर्वत्र इस बात की बड़ी आवश्यकता अनुभव की जा रही थी कि चारों वेदों का ऐसा सरल उपलब्ध हो जो प्राचीन भाष्यों के आधार पर होने के साथ साथ सस्ता भी हो। इस आवश्यकता को पूरी करने के लिए गायत्री तपोभूमि द्वारा चारों वेदों का अत्यन्त सस्ता बढ़िया प्लेन कागज पर, नये टाइपों में की ड़ड़ड़ड़ मजबूत जिल्दों में सुसज्जित संस्करण प्रकाशित किया गया है। पूज्य पं० श्रीराम शर्मा आचार्य प्राचीन सायणाभाज्य के आधार पर यह हिन्दी संस्करण सम्पादित हुआ है। मूल वेद मन्त्रों के साथ सरल हिन्दी अनुवाद बड़े सुयोग्य ढंग से प्रस्तुत किया गया है जिसे साधारण पढ़े लिखे लोग भी इसे समझ सकते है।
ऋग्वेद की तीन जिल्दें है। प्रत्येक जिल्द का मूल्य7) -7) होने से पूरे ऋग्वेद का मूल्य 21) होगा वेद की 2 जिल्दें है प्रत्येक का मूल्य2) -6) होने से दोनों का मूल्य 12) है। यजुर्वेद एक जिल्द में छापा है मूल्य 6)। सामवेद भी एक जिल्द में है मूल्य 5)। चारों वेदों का कुल मूल्य 44) होता है। अखंड ज्योति के ग्राहकों को 35) में ही दिया जायेगा। डाक से मंगाने पर 5) और रेल से मंगाने पर भाड़ा इसके अतिरिक्त लगेगा। आर्डर के साथ 5) पेशगी भेजना आवश्यक है।
पता-अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा।
मानव के हित जग-उपवन के दोनों ही उपहार !
तुम फूलों को गले लगा लो शूलों को दुत्कार !!
तुम्हारा यह अनुचित व्यवहार !
जिस पथ पर है धूप उसी पर छाया की ड़ड़ड़ड़,
यह संयोग कि कुछ दूरी पर मिली, मिली कुछ पास,
भेद बरतने वाले राही पा न सके हैं लक्ष्य-धूप छाँह मिलकर लिखती है मंजिल का इतिहास,
यह दोनों पूरक हैं इसको समझो भली प्रकार ्!
तुम्हारा यह अनुचित व्यवहार !!
पाप-पुण्य के बीच नहीं है कोई लक्ष्मण-रेख
दृष्टि पड़ गयी जैसी उसने लिया उसी विधि देख,
इन दोनों के अक्षर प्रायः हैं परिवर्तनशील-अर्थ योजना, माध्यम द्वारा बदला सारा लेख,
यह असत्य मझधार एक है और दूसरा पार !
तुम्हारा यह अनुचित व्यवहार !!
अभिशापों की विफल नीति से ही प्रकटे वरदान-काव्य-कला को इष्ट रही है आँसू की मुस्कान,
दूर क्षितिज पर नभ-अवनी का सबने देखा मेल-निर्झरिणी का स्त्रोत किसी गिरि का निर्मम पाषाण,
रूप बदल जाता जब बनता निराकार साकार,
तुम्हारा यह अनुचित व्यवहार !!
घृणा-प्रेम के बीच अवध्ोि की छोटी-सी दीवार,
हार जीत है एक, जरा बस बदल गया शृंगार,
कोन भला समझा पाया क्या ज्ञान और विज्ञान-नहीं मुक्ति से रहा अपरिचित बंदी कारागार,
धन्य हुए जो दोनों को ही करते अंगीकार !
तुम्हारा यह अनुचित व्यवहार !!
*समाप्त*
श्रीमती-विद्यावती मिश्र)