हे जन विराट जागो! (कविता)

(श्रीनिधि द्विवेदी)

जागो जागो हे जन विराट! जागो।

छलना छाया निद्रा आलस त्यागो॥

फिर कोटि-कोटि पग नव पथ का निर्माण करें।

हर ओर सुमति शाश्वत स्वतंत्रता हो सबकी।

उस कोटि-कोटि कर व्यथित विश्व का त्राण करें॥

छल की सत्ता हो क्षीण मित्रता हो सबकी॥

भय, भ्रांति, कलह, ईर्ष्या, अशांति को दूर करो।

जन-गण-मन में दैवी संपद् सद्भाव भरो।

हर क्षुधा, अलक्ष्मी, धरती में धन धान्य भरो॥

हर पाप ताप सत् चित् का पुण्य प्रभाव भरो॥

जग को बदलो भय से न कहीं भागो।

जागो जागो हे जन विराट ! जागो॥

संदेहों पर जय हो विकसित विश्वासों की।

सुप्रभ रवि शशि हों सोने के प्रातः सायं।

आँधियाँ रुकें आशंकाओं उच्छवासों की॥

जल और अग्नि ज्वालाएँ अपनाएँ संयम॥

नित शीतल मंद सुगंध समीरण बहता हो।

हो शस्य श्यामला फल-फूलों से हरी भरी।

संदेश शांति का राष्ट्र राष्ट्र से कहता हो॥

अवनी अंबर की श्री हो नित्य नई निखरी॥

वसुधा को प्रेम सुधा से फिर पागो।

जागो जागो हे जन विराट! जागो॥

—(‘धर्मयुग’ से)


सक्रिय अध्यात्मवाद की ओर

अखण्ड ज्योति विगत 24 वर्षों से इस उद्देश्य से निकाली जा रही है कि जनमानस में धर्मनिष्ठा की प्रकृति एवं प्रगति हो। यह उद्देश्य किस सीमा तक सफल हो रहा है, इसकी कसौटी एक ही हो सकती है कि प्रस्तुत विचारों का हमने कितना आदर किया, उनका महत्त्व कितना माना और कितना उन पर विश्वास किया? यदि सचमुच प्रस्तुत आध्यात्मिक विचारधारा को उपयोगी, उचित एवं आवश्यक माना गया है तो उसका क्षेत्र मस्तिष्क में सीमित न रहकर हृदय तक होना चाहिए और इन विचारों से हमारे जीवन की गतिविधियों को प्रभावित होना चाहिए। अब समय आ पहुँचा कि इस कसौटी पर अपने को कसा जाए और देखा जाए कि आध्यात्मिक विचारधारा को हम केवल मनोविनोद के लिए ही पढ़ते-सुनते हैं या उस पर श्रद्धा रखकर जीवन में उतारने का भी प्रयत्न करते हैं। यदि इन विचारों का प्रभाव केवल पसंदगी तक ही हुआ है, हमें यह सब पढ़ना−सुनना रुचिकर लगने लगा है तो एक प्रकार अच्छा तो इसे भी माना जाएगा, भविष्य के लिए कुछ आशा भी की जा सकेगी, पर उस उद्देश्य में प्रगति हुई न मानी जाएगी जिसके लिए कि यह प्रयत्न किया जा रहा है।

विचारों की कार्य रूप में परिणति

किसी विचारधारा का परिणाम तभी प्राप्त हो सकता है, जब वह कार्यरूप में परिणत हो। मानसिक व्यसन के रूप में कुछ पढ़ते−सुनते और सोचते रहें, कार्यरूप में उसे परिणत न करें तो उस विचार-विलासमात्र से कितना उद्देश्य पूर्ण हो सकेगा? फुरसत का समय काटने के लिए, शरीर की बेकारी दूर करने के लिए लोग ताश, शतरंज, चौपड़, कैरम आदि के खेल ले बैठते हैं और देर तक उसमें उलझे रहते हैं। खेल खत्म होने पर उन्हें एक हलका-सा मनोरंजन हो जाने और कुछ वक्त कट जाने के अतिरिक्त और कोई लाभ, उतना लंबा कीमती वक्त गंवा देने पर भी नहीं दीखता। इसी प्रकार आध्यात्मिक विचारधारा का लंबा स्वाध्याय, मन पर एक हलकी−सी सतोगुणी छाप तो छोड़ता है, पर जब तक क्रिया में वे विचार न उतरें, तब तक यह स्वाध्याय भी एक विनोद व्यसन ही बना रहता है। जो कुछ थोड़ा−सा लाभ मिलता है, उसकी तुलना ताश खेलने के मनोविनोद से की जा सकती है।

धर्म और अध्यात्म के बारे में आज एक भ्रान्ति चल पड़ी है कि यह पूजा-पाठ की बातें हैं, उन्हें व्यावहारिक जीवन में उतारने की आवश्यकता नहीं है। लोग रामायण, गीता का पाठ-परायण तो घंटों करते हैं, पर उनमें सन्निहित आदर्शों एवं शिक्षाओं को अपने जीवनक्रम से सर्वथा बहिष्कृत रखे रहते हैं। रामायण मुद्दतों पढ़ते रहने पर भी भगवान राम के चरित्रों, आदर्शों एवं अभिवचनों को अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न जब तक न किया जाएगा, तब तक रामायण पढ़ने का पुण्यफल कैसे प्राप्त हो जाएगा? गीता में जिन दैवी−संपदा को कमाने का, कर्मयोगी बनने का, स्थिर प्रज्ञा रखने का उपदेश है, यदि उसे अपने स्वभाव में न उतारा जाए तो उन श्लोकों के बार−बार पाठ करते रहने पर भी गीतापाठ का पुण्यफल क्योंकर मिल सकेगा? पर आज समझा यही जाता है कि इन ग्रंथों के कुछ पृष्ठों का रोज−रोज पाठ करते रहा जाए तो उस पढ़ने मात्र से ही पुण्यफल मिल जाएगा। इस मान्यता के रहते, उनमें लिखी बातों को जीवन में उतारने का झंझटभरा प्रयास भला कौन करेगा? क्यों करेगा?

साधना का उद्देश्य

जप, तप, हवन, कीर्त्तन, पूजा, अर्चा, दान, पुण्य आदि आध्यात्मिक क्रियाएँ भी एक विशेष समय पर पूरी करते रहने वाले अनेकों व्यक्ति होते हैं, उनका विश्वास होता है कि एक नियत समय इन कार्यों के लिए लगा देने मात्र से आत्मकल्याण एवं पारलौकिक उद्देश्य की पूर्ति हो जाएगी। भगवान की भक्ति उनके पूजाकाल में ही पूरी हो जाती है, पर विचारणीय बात यह है कि जिन आदर्शों को जीवन में ओत-प्रोत करने के लिए यह सारा कर्मकाण्ड बनाया गया है, वे सिद्धांत यदि हमारे दैनिक जीवन में प्रवेश न कर सके, स्वभाव में सम्मिलित न हो सके तो क्या आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा हो जाएगा?

उपासना का सारा विधान ‘साधन’ कहा जाता है— साध्य नहीं। साधन का उद्देश्य साध्य को प्राप्त करना है। साध्य है आत्मिक पवित्रता। अंतःकरण पर चढ़े हुए मल-विक्षेपों को हटाने के लिए साधन किया जाता है। आत्मिक स्वच्छता जितनी स्पष्ट होती जाती है उतनी ही समीपता हमें अपने भगवान की अनुभव होने लगती है। पूर्ण आत्मिक स्वच्छता ही पूर्ण आत्मसाक्षात्कार का लक्ष्य पूरा कर सकती है। मन की मलीनता रहते वह उद्देश्य कहाँ पूर्ण हो सकेगा? हमें इस तथ्य को हृदयंगम कर ही लेना चाहिए। भ्रम की स्थिति में देर तक पड़े रहना उचित नहीं। हम जीवन को अस्त−व्यस्त, अव्यवस्थित, अनैतिक, अनुपयुक्त रीति से व्यतीत करें और एक नियत समय थोड़ा-सा विधान पूर्ण करके यह आशा करें कि हमें पारमार्थिक लक्ष्य प्राप्त हो जाएगा तो यह एक क्लिष्ट कल्पना ही होगी।

जीवन की पवित्रता

पूजा-आराधना का उद्देश्य जीवनक्रम में पवित्रता भर देने के उपयुक्त मनोभूमि तैयार कर देना है। यदि मनोभूमि की मलीनता ज्यों की त्यों बनी रही, दृष्टिकोण और कार्यक्रम में अनुपयुक्त अनैतिक तत्त्व ही समाए रहे तो यह विचार करना ही पड़ेगा कि हमारी पूजा का उद्देश्य क्यों पूरा नहीं हुआ? पूजा सफल हो रही है या नहीं, इसकी एक ही प्रत्यक्ष कसौटी है कि हमारे जीवन की गतिविधियाँ मोड़ ले रही हैं या नहीं? यदि हमारी स्वार्थपरता, असावधानी, वासना, तृष्णा, ज्यों की त्यों हैं, पारमार्थिक गतिविधियों के लिए हमारे गुण, कर्म, स्वभाव में स्थान नहीं मिल रहा है तो यही मानना पड़ेगा कि हम किसी नकली अध्यात्म के फेर में हैं। असली अध्यात्म, नकद धर्म है। उसका प्रभाव इस हाथ ले, उस हाथ दे के समान तुरंत परिलक्षित होता है।

ईश्वर−उपासना का प्रतिफल

ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी, समदर्शी मानने वाला व्यक्ति उसके कठोर दंड-विधान से क्यों न डरेगा? हर घड़ी जिसे न्यायकारी ईश्वर सामने खड़ा दीखता है, वह कुविचारों और कुकर्मों को अपनाकर उसे क्रुद्ध करने की चेष्टा क्यों करेगा? मन को पाप में डुबाए रहना और जीभ से क्षमा माँगते रहना, यह बहकावा सांसारिक लोगों के लिए भी सफल नहीं होता फिर घट-घटवासी परमेश्वर को इतने मात्र से बहकाया कैसे जा सकेगा? ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए पूजा−उपासना जितनी आवश्यक है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि अपने सद्विचारों और सत्कर्मों से उस अंतर्यामी को संतुष्ट किया जाए। हमें अब बार−बार इस तथ्य पर विचार करना होगा और कुछ देर पूजा करने के बाद चाहे जो उचित-अनुचित करते रहने की मान्यता को छोड़ना पड़ेगा। ईश्वर चौकी पर बिठाकर भोग लगा देने मात्र से प्रसन्न नहीं हो सकता, इस पूजन के साथ−साथ अपनी आंतरिक उत्कृष्टता का नैवेद्य भी प्रभु के चरणों पर प्रस्तुत करना पड़ेगा, उसी से तो वे पसीजते और पिघलते हैं। भक्त को भगवान पर सच्ची अनुकंपा केवल इसी प्रकार से प्राप्त हो सकती है। आज हमें देर तक बार−बार यही सोचना होगा। यही चिंतन और मनन करना होगा और यदि आध्यात्मिकता पर, उपासना पर वस्तुतः हम विश्वास करते हैं तो नियत समय पर पूजा−पाठ निपटने तक सीमित न रहकर ईश्वर को अपना जीवनसंगी बनाना पड़ेगा, हर घड़ी उसकी उपस्थिति अपने साथ अनुभव करने और अपने सद्विचारों एवं सत्कर्मों से उन्हें प्रसन्न करने का प्रयत्न करना होगा।

अध्यात्मवाद का प्रवेशद्वार

स्वाध्याय एवं सत्संग को अध्यात्म का प्रवेशद्वार माना गया है। आस्तिकता एवं उपासना में निष्ठा उत्पन्न करना स्वाध्याय एवं सत्संग का काम है। जीव की पतनोन्मुख पाशविक वृत्तियाँ उसे वासना और तृष्णा के प्रलोभनों की ओर आकर्षित करती रहती हैं। फलस्वरूप उसकी प्रवृत्तियाँ और गतिविधियाँ इंद्रियों की वासनाएँ पूरी करने में एवं मन की— संग्रह, प्रभुता, प्रशंसा, ममता आदि तृष्णाएँ पूरी करने में लगी रहती हैं। जीव की सारी शक्तियाँ, क्षमता, योग्यता, इसी दिशा में लगी रहती हैं और 84 लाख योनियों के बाद, करोड़ों वर्ष बाद प्राप्त हुआ यह सुरदुर्लभ मानव जीवन, केवल शरीर की क्षणिक प्रसन्नताएँ प्रस्तुत करते रहने में समाप्त हो जाता है। इस घातक भूल के लिए जीव को फिर 84 लाख योनियों में भ्रमण करने का भारी पश्चात्ताप भरा संकट उठाना पड़ता है। स्वाध्याय और सत्संग का उद्देश्य जीव को इस खतरे से सजग करना है। सत् शिक्षण का प्रयोजन यही है कि जीव अपने लक्ष्य को समझे, शरीर को ही सब कुछ न मान बैठे, उसी की चिंताओं में दिन-रात न डूबा रहे, कुछ उस लक्ष्य की ओर भी विचार करे, जिसके लिए कि यह बहुमूल्य मानव जीवन प्राप्त हुआ है।

उपासना का व्यावहारिक रूप

यदि हम इस तथ्य की ओर ध्यान देने लगें और अपनी कार्यविधि में आवश्यक हेर−फेर करके लौकिक समस्याओं को सुलझाने की तरह पारलौकिक समस्याओं को सुलझाने में भी समय देने लगें तो समझना चाहिए कि स्वाध्याय का उद्देश्य पूरा हो रहा है। यदि ऐसा न हो और कोई पुस्तक पढ़कर, कोई वचन सुनकर अपने कर्त्तव्य का अंत मान लिया जाए तो समझना चाहिए कि छोटे बच्चों की तरह गुड़ियों का खेल ही खेला जा रहा है। सत्यनारायण की कथा हम सुनें, उसे सुनकर सत्यरूप नारायण को अपने व्यवहार में सच्चाई से सम्मिलित करने का व्रत लें तो समझना चाहिए कि कथा सुनने का उद्देश्य पूरा हो गया; किंतु यदि लीलावती-कलावती की कथा सुनकर, पंडित जी को दक्षिणा देकर और प्रसाद ग्रहण करके कर्त्तव्य की समाप्ति मान ली गई और उतने से ही सत्यनारायण भगवान को प्रसन्न हुआ मान लिया गया तो यह एक भूल ही होगी। हम सत्यनारायण की कथा सुनने की अपनी अभिरुचि को बढ़ावें, जल्दी−जल्दी कथाएँ कहें और सुनें, पर यह भी ध्यान रखें कि कथा में प्रस्तुत सत्य की साधना को कहने−सुनने मात्र से काम चलने वाला नहीं है, उसे जीवन में उतारना ही पड़ेगा, तभी भगवान की प्रसन्नता का पुण्यफल प्राप्त हो सकना संभव होगा।

रामायण, गीता, भागवत का नित्य पाठ करने वाले अनेक व्यक्ति होते हैं, पर उस पाठ का सच्चा लाभ केवल उन्हें ही मिलता है, जो इन सद्ग्रंथों में सन्निहित शिक्षाओं पर विचार करते हैं, उनके महत्त्व को स्वीकार करते हैं और यह विश्वास करते हैं कि इन्हें निष्ठापूर्वक हृदयंगम करके जीवनक्रम में ओत−प्रोत किया ही जाना चाहिए। ऐसे कितने ही पोथी−पाँडे मौजूद हैं जो घंटों पाठ करते हैं, पर जिनके जीवन छल और पाखंड से परिपूर्ण हैं। क्या ऐसे लोगों की वह पाठ-प्रक्रिया ‘तोता रटंत’ से कुछ अधिक मानी जा सकेगी? ऐसे कितने ही भजनानंदी हैं जो घंटों माला जपते हैं, पर उनके स्वभाव में संकीर्णता, दंभ और स्वार्थपरता कूट−कूटकर भरे हुए हैं। क्या ऐसे लोग उस ईश्वर की प्रसन्नता एवं निकटता प्राप्त कर सकते हैं?

साधन साध्य नहीं?

हमें यह बार−बार कहना और सुनना चाहिए कि साधना आत्मिक पवित्रता प्राप्त करने का साधन है— लक्ष्य नहीं, साध्य नहीं। लक्ष्य की पूर्ति के लिए उसके उपायरूप में साधना का उपयोग करना है। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आत्मिक पवित्रता बढ़ नहीं रही है, पारमार्थिक विधियों को जीवन में स्थान नहीं मिल पा रहा है तो हमारा पूजा और पाठ कहीं-न-कहीं अपूर्ण है —वह एकांगी एवं अपूर्ण ही बना हुआ है, अन्यथा अन्य सभी सच्चे तथ्यों की तरह अध्यात्म भी प्रत्यक्ष है। अध्यात्मवादी का जीवन उत्कृष्टता से विभूषित होना ही चाहिए। उसमें मानवता को शोभायमान करने वाले गुण, कर्म, स्वभाव का प्रत्यक्ष दिग्दर्शन होना ही चाहिए। नशा पीकर तुरंत मस्ती आती है, आध्यात्मिकता का नशा इस धरती का सबसे बड़ा नशा है, उसकी दो बूँदें भी जिसके अंतःकरण तक जा पहुँचेंगी, उत्कृष्टता की मस्ती में लहराए बिना रह नहीं सकते। बीन को सुनकर साँप जिस तरह लहराता है, आध्यात्मिक भावनाओं का रसास्वादन करके आत्मा भी लहराती है और वह उस मस्ती में लहराने लगती है, जिसमें अनादिकाल से लेकर अब तक के महापुरुष लहराए हैं और अपने जीवन का ऐसा उपयोग कर सकने में समर्थ हुए हैं, जिससे उनका नाम इतिहास में अमर रहा, जीवन-लक्ष्य पूर्ण हुआ और असंख्य मानसों को उत्साहवर्द्धक प्रकाशपूर्ण मार्गदर्शन मिला।

अध्यात्म का व्यावहारिक प्रयोग

आत्मकल्याण का लोक-शिक्षण गत 24 वर्षों से अखण्ड ज्योति कर रही है। उसका उपयोग यदि पाठकों के मनोरंजन तक ही हुआ हो तो यही कहना होगा कि यह इतना लंबा प्रयत्न निष्फल चला गया; क्योंकि उच्च आदर्शों का कोई मूल्य तभी है, जब वे व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित हों, उनके आधार पर अपनी गतिविधियाँ संचालित हों। अब हमें यह निर्णय करना है कि अध्यात्मवाद को एक मनोविनोद का साधनमात्र बनाए रखा जाए या वस्तुतः उसका कुछ प्रयोग किया जाए? यदि अध्यात्म के प्रति अपनी निष्ठा हो तो उसका प्रयोग जीवन-क्षेत्र में करने के लिए हमें कटिबद्ध होना ही चाहिए और इस ‘नकद धर्म’ के लाभों से लाभान्वित होने के लिए व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध कदम उठाना ही चाहिए।


एक लक्ष्य के दो कार्यक्रम

आत्मकल्याण और युग निर्माण के जिन दो कार्यक्रमों को लेकर हम लोग अग्रसर हुए हैं, वे देखने से दो प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः एक ही हैं। आत्मकल्याण का कार्यक्रम ऐसा है, जिसमें न केवल अपनी आत्मिक प्रगति होती है, न केवल बंधनमुक्ति से सद्गति की समस्या हल होती है, वरन उससे यह लौकिक जीवन भी सुख-शांति से, समृद्धि से, संतोष और सम्मान से परिपूर्ण होता है। चूँकि हर व्यक्ति दूसरे अनेकों के साथ सामाजिक, आर्थिक, आत्मिक कारणों से संबंधित होता है, इसलिए उसकी हर भली-बुरी प्रक्रिया का असर भी अन्य अनेकों पर पड़ता है। एक व्यक्ति यदि आतंकवादी, आततायी उपद्रव कर बैठे तो उससे उस अकेले की ही नहीं, उस घटना से संबंधित अन्य अनेकों व्यक्तियों की शांति नष्ट होती है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति यदि अपने जीवन को धार्मिक, आदर्शवादी, सन्मार्गगामी, श्रेष्ठ एवं उत्कृष्ट बना लेता है तो उसका प्रत्यक्ष एवं परोक्ष प्रभाव दूसरे अनेकों पर पड़ता है। इस प्रकार आत्मनिर्माण के साथ−साथ युग निर्माण का कार्य भी अपने आप चल पड़ता है।

दुनियाँ कैसे बदलेगी?

हम दुनियाँ को बदलने की बात सोचते रहते हैं, चाहते हैं कि संसार में से बुराई घटे और अच्छाई फैले। इस कार्य की पूर्ति के लिए आमतौर से सभा-सम्मेलन करने की, प्रवचन-व्याख्यान करने की, लेख लिखने और अखबार छापने की बात सोची जाती है, कुछ प्रचारात्मक, प्रदर्शनात्मक कार्यक्रम भी बनते हैं, प्रतियोगिताएँ, जुलूस, प्रदर्शिनी आदि के आयोजन होते हैं और बात इतने तक ही समाप्त हो जाती है। यह कार्यक्रम बहुत दिन से चलते आ रहे हैं, इनका थोड़ा−सा असर भी होता है, पर चिर-प्रयत्नों के बावजूद वह लक्ष्य अभी भी बहुत दूर दिखाई पड़ता है, जिसके लिए यह सब किया गया होता है। कारण एक ही है कि लोगों की पैनी दृष्टि इन सुधारात्मक काम करने वालों के व्यक्तिगत जीवन पर जा टिकती है। वे यह जानना चाहते हैं कि यदि यह प्रचार वस्तुतः अच्छा और सच्चा है तो इसके संयोजकों ने, प्रचारकों ने अपने जीवन में उतारा ही होगा। लाभदायक उत्तम बात का लाभ कोई स्वयं ही अपनाने के लाभ से वंचित क्यों रहेगा? जनता की यह कसौटी सर्वथा उचित भी है। धर्म और सत्य के मार्ग पर चलना कष्टसाध्य है, उसमें लाभ तो है, पर तुरंत नहीं, विलंब से वह मिलता है। इसके विपरीत अनैतिक कार्यों का अंतिम परिणाम दुःखद भले ही हो, तुरंत तो लाभ रहता ही है। इस तुरंत के लाभ को छोड़कर तुरंत कष्टसाध्य प्रक्रिया में पड़ने के लिए लोग तभी तैयार हो सकते हैं, जब उन्हें यह विश्वास हो जाए कि धर्मप्रचारक लोग उन्हें बहका तो नहीं रहे हैं। यदि उन्हें संदेह हो गया कि धर्मप्रचार का आडंबर सस्ती वाहवाही लूटने और किसी स्वार्थ-साधन के लिए किया जा रहा है तो लोग धर्म-कर्म की बातों को सुन तो लेते हैं, पर उन्हें अपनाने के लिए तैयार नहीं होते। प्रचार की बड़ी−बड़ी स्कीमें इसी चट्टान से टकराकर टूट जाती हैं। आज अगणित सुधारवादी संस्थाऐं प्रचुर जनशक्ति और धनशक्ति लगाकर मनुष्य को अच्छा मनुष्य बनाने का आंदोलन कर रही हैं, पर हम देखते हैं कि वह सब निष्फल ही जा रहा है, स्थिति बद से बदतर होती चली जा रही है।

सक्रिय शिक्षा की सार्थकता

बुराइयाँ दिन−दिन बढ़ती चली जा रही हैं। इसका कारण एक ही है कि बुरे लोग अपने व्यावहारिक जीवन में उन बुराइयों को धारण कर लोगों पर यह प्रभाव डालते हैं कि इन कार्यों में उनकी पूरी और पक्की निष्ठा है। निष्ठा की भावना ही दूसरों को प्रभावित करती है। बुराइयाँ प्रचार की, विस्तार की, शिक्षण की, आंदोलन की कोई योजना कहीं से भी प्रसारित नहीं हो रही है, न उनके संवर्द्धन के लिए कोई संस्था-संगठन ही काम करता है, फिर भी पाप−प्रचार का इतनी तीव्रता से बढ़ने का कारण जहाँ मनुष्य की पतनोन्मुख स्वतः प्रवृत्ति है, वहाँ आस−पास के वातावरण में लोगों को वही सब करते हुए उसका प्रभाव भी एक बड़ा महत्त्वपूर्ण कारण है। डडडड को बढ़ाने के लिए दुहरा प्रयत्न आवश्यक है और मन की पतनोन्मुख पशु-प्रवृत्ति को आत्मोत्कर्ष की ओर अभिमुख करने के लिए स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था रहनी चाहिए, दूसरी ओर ऐसे अनुकरणीय आदर्श भी सामने रहने चाहिए, जिन्हें देखकर लोग प्रकाश ग्रहण करें और उनके पदचिह्नों पर चलते हुए अपना लक्ष्य एवं कार्यक्रम निर्धारित करें।

अध्यात्म के चार आधार

आत्मकल्याण का लक्ष्य पूरा करने के लिए आत्मनिर्माण का कार्यक्रम बनाना होगा; इसलिए भजन आवश्यक है। उपासना को पूरा स्थान देना होगा, पर केवल उसी तक सीमित रह जाने से लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो सकती। (1) साधना (2) स्वाध्याय (3) संयम (4) सेवा, यह चार कार्य मिलने से एक सर्वतोमुखी सर्वांगपूर्ण अध्यात्मवाद बनता है। जिस प्रकार दोनों हाथ और दोनों पैर ठीक होने से हमारी शारीरिक क्षमता ठीक कार्य करती है, उसी प्रकार इन चारों साधनों की समस्वरता से ही कोई व्यक्ति स्वस्थ अध्यात्मवादी बन सकता है। जिस व्यक्ति के दो हाथ और दो पैर के चार अंगों में से यदि एक या दो ही अवयव काम करें, शेष अपंग या नष्ट हो जाएँ तो वह अपने जीवन को सक्षम कैसे बनाएँ रख सकेगा? जिनका अध्यात्मवाद केवल थोड़े से भजन तक सीमित रह गया है, स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए उनके जीवन में कोई स्थान नहीं, वे वैसे ही अपंग हैं जैसे केवल एक हाथ या केवल एक पैर वाला व्यक्ति होता है।

जीवन को बदला और ढाला जाए?

हमें यह भली−भाँति समझ लेना चाहिए कि जीवन का उद्देश्य जीवन की सारी प्रक्रिया को अध्यात्मवाद के अनुरूप ढाल लेने की प्रेरणा को प्राप्त करना है। यदि वह प्रेरणा प्राप्त नहीं हो सकी हो तो समझना चाहिए कि भजन में कहीं कमी है। मिर्च खाते ही जीभ में तीखापन लगता है, आग को छूते ही गरमी अनुभव होती है, नशा करते ही खुमारी आती है, फिर भजन, यदि सच्चा है तो उसकी प्रेरणा जीवन को आदर्शवाद बनाने के लिए क्यों सामने उपस्थित न होगी? भजन वह है जो तुरंत उच्चकोटि की विचारधारा में रमण करने की छटपटाहट अनुभव कराता है। स्वाध्याय और सत्संग की भूख जिसे जगी नहीं तो समझना चाहिए कि इसे अभी सच्चा भजन करने का अवसर नहीं मिला। इसी प्रकार जो स्वाध्याय करने लगा हो ,उसे अपनी वासनाओं और तृष्णाओं पर संयम करने की लगन लगेगी ही। वह अपने जीवन को अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित, अनुपयुक्त रीति से व्यतीत नहीं कर सकता। शरीर की आवश्यकताएँ पूरी करने की तरह उसे आत्मा की आवश्यकताएँ पूर्ण करने का महत्त्व समझ पड़ेगा और वह अपना सर्वस्व लौकिक लाभों के लिए ही उत्सर्ग न कर सकेगा, वरन पारलौकिक हित-साधन के लिए अपनी शक्ति का एक अच्छा भाग लगाना आरंभ करेगा। जिसकी बुद्धि शरीर को ही सब कुछ नहीं मान बैठी है, जिसने आत्मा के अस्तित्व और उसके हित को भी समझना आरंभ कर दिया है, वह स्वार्थ-साधन में ही कैसे लगा रहेगा? सेवा के लिए उसके जीवन में कुछ भी स्थान न हो, ऐसा कैसे बन पड़ेगा?

भजन शब्द संस्कृत की ‘भज’ धातु से बनता है, जिसका अर्थ होता है ‘सेवा’। जिसने भजन का मार्ग अपनाया, उसके हर कदम पर सेवा की प्रक्रिया सामने आवेगी। स्वाध्याय और संयम के परिणामस्वरूप अंतःकरण का जिस प्रकार परिपाक होना है, उसमें ‘सेवा’ अनिवार्य है। हर सच्चा अध्यात्मवादी सेवाभावी अवश्य होगा। जिसे सेवा में रुचि नहीं, वह भजनानंदी हो सकता है, अध्यात्मवादी नहीं। आज एकांगी संकुचित दृष्टि वाले, भजनानंदी बहुत हैं, पर सर्वांगपूर्ण अध्यात्मवादी बनने का प्रयत्न कोई विरले ही करते हैं। यह मार्ग कष्टसाध्य है। लोग सस्ते नुस्खे ढूँढने लगे हैं। उनको यह भ्रम हो गया है कि घंटा-आधा घंटा कुछ भजन पूजन करने मात्र से भगवान प्रसन्न होकर हमारा लोक-परलोक संभाल देगा। यदि इतना ही सस्ता जीवन-लक्ष्य रहा होता तो प्राचीनकाल में किसी ऋषि-मुनि ने, महात्मा-धर्मात्मा ने त्याग और तप का कष्टसाध्य मार्ग न अपनाया होता। वे हम से कम चतुर न थे। यदि सस्ते नुस्खे जीवनमुक्ति की, आत्मकल्याण की समस्या को हल करने में सफल रहे होते तो कोई भी समझदार आदमी आध्यात्मिक आदर्शों का जीवन बनाने की कष्टसाध्य प्रक्रिया को अपनाने के लिए कदापि तैयार न हुआ होता।

एक ही सुनिश्चित मार्ग

आत्मकल्याण का उद्देश्य केवल वे ही पूर्ण कर सकते हैं, जो अपने जीवन में अध्यात्मवाद की स्थापना करने के लिए उसी ढाँचे में अपने को ढालने के लिए तैयार हैं। इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग न प्राचीनकाल में था, न अब है, न आगे होगा। सस्ते नुस्खे अपनाकर जो चुटकी बजाते मुक्ति मिलने, सद्गति होने एवं परमात्मा के मिलने की आशा लगाए बैठे हैं, उन्हें कल्पना-जगत में नीचे उतरकर वास्तविकता को सुनना-समझना पड़ेगा और सत्य और तथ्य को हृदयंगम करते हुए भजन को जीवन के कण−कण में ओत−प्रोत कर लेने का प्रयत्न करना होगा। हम देर तक धर्मविनोद के खेल खेलते नहीं रह सकते। जीवन का अंत निकट आता जा रहा है, यदि कुछ वास्तविक आध्यात्मिक कार्य हम से न बन पड़ा तो फिर कुछ सत्परिणाम भी कहाँ से हाथ लगेगा?

हम अपने जीवन को आध्यात्मिक आदर्शों के अनुकूल ढालने का प्रयत्न करें। हमारे विचारों और कार्यों में एक सुव्यवस्थित हेर−फेर होना चाहिए, तभी तो अध्यात्म का सत्परिणाम सामने प्रस्तुत होगा। अपने को सुधारने और बनाने का कार्य हम जितनी तत्परता से करेंगे, उसी के अनुकूल निकटवर्त्ती वातावरण में सुधार एवं निर्माण का कार्य आरंभ हो जावेगा। प्रवचनों और लेखों की सीमित शक्ति से युग निर्माण का कार्य संपन्न हो सकना संभव नहीं, वह तो तभी होगा, जब हम अपना निज का जीवन एक विशेष ढाँचे में ढालकर लोगों को दिखाएँगे। प्राचीनकाल के सभी धर्मोपदेशकों ने यहीं किया था। उनने अपने तप और त्याग का अनुपम आदर्श उपस्थित करके लाखों-करोड़ों अंतःकरणों को झकझोर डाला था और लोगों को अपने पीछे−पीछे अनेक कष्ट उठाते हुए भी चले आने के लिए तत्पर कर लिया था। बुद्ध, महावीर, दयानंद, गांधी, ईसा, सुकरात, अरस्तू आदि महापुरुषों के प्रवचन नहीं उनके कार्य महत्त्वपूर्ण थे। जनता ने प्रकाश उनकी वाणी से नहीं, कृतियों से ग्रहण किया था।

अपने सुधार में सबका सुधार

अपने सुधार में सबका सुधार समाया है, आत्मनिर्माण ही युग निर्माण है। संसार को बनाने का कार्य अपने को बनाने से आरंभ करना होगा। जमाना तब बदलेगा जब हम स्वयं बदलेंगे। युगनिर्माण योजना का आरंभ दूसरों को उपदेश देने से नहीं, वरन अपने मन को समझाने से शुरू होगा। यदि हमारा अपना मन, हमारी बात मानने को तैयार नहीं हो सकता, तो दूसरा कौन सुनेगा? कौन मानेगा? जीभ की नोंक से निकले हुए लच्छेदार प्रवचन दूसरों के कानों को प्रिय लग सकते हैं, वे उसकी प्रशंसा भी कर सकते हैं, पर प्रभाव तो आत्मा का आत्मा पर पड़ता है, यदि हमारी आत्मा खोखली है तो उसका कोई प्रभाव किसी पर न पड़ेगा; इसलिए आत्मकल्याण की दृष्टि से भी और युग निर्माण की दृष्टि से भी हमें एक ही कार्य करना है— आत्मसुधार, आत्मनिर्माण, आत्मविकास। इस कार्यक्रम को पूर्ण करने में ही उन सेवाकार्यों का भी स्वतः समावेश हो जावेगा, जिनके द्वारा जमाने को पलट देना युग को बदल डालना संभव है। इसी में स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय भी है।


दो में से एक का चुनाव

अध्यात्मवाद को व्यावहारिक जीवन में धारण करने के लिए हमें अपने दैनिक जीवन में कुछ समय इस कार्य के लिए भी लगाने को तत्पर होना पड़ेगा। आमतौर से हमारे दिन−रात के 24 घंटे शरीर तथा उससे संबंधित भौतिक समस्याओं को सुलझाने तथा उसकी आवश्यकताओं को पूरा करने में लगते हैं। कुछ समय सोने, खाने, नहाने, मल-मूत्र त्यागने में लगता है, कुछ रोजी-रोटी कमाने में बीतता है, कुछ आराम, मनोरंजन गपशप में, कुछ उलझनों को सुलझाने में लग जाता है। यह कार्य इतने अधिक और इतने उलझे हुए होते हैं कि 24 घंटे का समय भी इनके लिए कम पड़ता है। यदि यह घंटे 2—4 की मात्रा में और भी बढ़ गए होते— एक दिन 24 घंटे की अपेक्षा 26 या 28 घंटे का होता, तो भी कम ही सिद्ध होते। इंद्रियों की वासनाएँ, तृप्त करने के समय बड़ी प्रिय लगती हैं, पर उस भोग के जो दूरवर्त्ती परिणाम होते हैं, वे इतनी उलझनें पैदा करते हैं कि मनुष्य के लिए वह सब एक भारी बंधन बन जाता है।

वासना की ठंडी आग

जिह्वा इंद्रिय विविध−विधि स्वादिष्ट भोजन, जल्दी−जल्दी अधिक मात्रा में खाने को लालायित रहती है। उसकी तृप्ति लोग करते भी हैं। पर इस असंयम के कारण जब पेट खराब होता है, तथा मन दूषित बनता है, नाना प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं, तब उस देह दुर्बलता की समस्या, शारीरिक कष्ट ही नहीं, आर्थिक कठिनाई, कार्यों में असफलता आदि की अगणित समस्याएँ पैदा कर देती है। जिह्वा इंद्रिय पर काबू प्राप्त करके जिसने अपने स्वास्थ्य को संभालकर रखा है, उसकी तुलना में, असंयमी की समस्याओं में जमीन-आसमान का अंतर होता है। इसी प्रकार कमेंद्रिय की वासना से प्रेरित होकर लोग अपने जीवनरस को इतना निचोड़ डालते हैं कि जवानी में ही बुढ़ापा आ घेरता है और मृत्यु का दिन— कालमृत्यु बनकर, छलांग मारकर सामने आ खड़ा होता है। जितने बच्चों का उत्तरदायित्व नहीं उठ सकता, उतने बच्चे उत्पन्न हो जाते हैं। फिर उनकी रोटी, बीमारी, पढ़ाई, शादी की समस्याएँ सामने आती हैं। कोई बच्चा अयोग्य, कोई कुपात्र निकला तो और नई उलझनें सामने आती हैं। पत्नी यदि सहचरी न हुई, दुर्गुणी निकली, तो वह भी रोज एक नई समस्या उत्पन्न कर देती है। शरीर की वासनाएँ यों अपने योग्य समय पर बड़ी प्रिय लगती हैं, पर उनका परिपाक इतना विषम होता है कि संभाले नहीं संभलता।

मृगतृष्णा में भटकना

तृष्णाओं से उत्पन्न समस्याओं का परिवार इससे भी बड़ा है। धन को ही लीजिए उसकी आवश्यकता इसलिए है कि अपनी तथा अपने आश्रित परिवार गुजर−बसर ठीक तरह होती चले। जिसे इतना प्राप्त होता रहता हो उसे संतोष करके उतने से काम चलाना चाहिए और शेष बचीं हुई शक्तियों को आत्मकल्याण में, परमार्थ के कार्यों में, लगाना चाहिए। पर ऐसा करता कौन है? हर किसी की हविस हजार से लाख की ओर, लाख से करोड़ की ओर दौड़ती है। जमा करना, जोड़ना और फूँकना−उड़ाना इतना प्रिय एवं स्वाभाविक लगता है कि इसकी पूर्ति के लिए निरंतर बेचैनी बनी रहती है। उस बेचैनी की पूर्ति के लिए नाना प्रकार के व्यापार आरंभ किए जाते हैं और फिर उनका जंजाल इतना बढ़ जाता है कि सोने और खाने की भी फुरसत नहीं मिलती। वाहवाही और नामबरी की भी एक ऐसी ही हविस है, जो आदमी को ऐसे ही उड़ाए फिरती है, जैसे आँधी के झोंके पत्तों को उड़ाए फिरते हैं। चुनावों में खड़े उम्मीदवारों में से अधिकांश इसी तृष्णा के बीमार होते हैं। विवाह शादियों में पैसे की होली फूँकी जाती है, इसमें बात बड़ी होने की तृष्णा काम करती रहती है। फैशन और ठाट−बाट पर लोग कितना अधिक खरच करते हैं। यह वाहवाही की तृष्णा का ही परिणाम है। जिनके संतान नहीं है, पुत्र नहीं है, वे कितने बिलखते हैं, यह देखकर आश्चर्य होता है। आज जनसंख्या वृद्धि की समस्या जितनी विषम है, उसे देखते हुए संतान न उत्पन्न करना एक बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य है, पर कितने ही व्यक्ति संतान न होने की चिंता में ही डूबे रहते हैं। इस प्रकार अगणित तृष्णाएँ मनुष्य के प्राण खाती रहती हैं और उनकी पूर्ति के लिए इतने विशाल ताने−बाने बुनने पड़ते हैं कि जाले में फँसी हुई मकड़ी की तरह, जाल में जकड़े हुए पक्षी की तरह अपने को हम सब प्रकार विवश पाते हैं।

सीमित स्वाभाविक आवश्यकताएँ

आवश्यक वासनाओं और तृष्णाओं से भी पहले शारीरिक स्वाभाविक आवश्यकताएँ हैं। नित्यकर्म, आहार−विहार, रोजी−रोटी, परिवार−पोषण जैसे आवश्यक कार्यों की पूर्ति इस जमाने में इतनी विषम हो रही है कि उनकी पूर्ति में भी बहुत समय लगता है। फिर शत्रुओं द्वारा, मित्रों द्वारा कोई न कोई परेशानी भी समय−समय पर उत्पन्न की जाती रहती है। सामाजिक रीति-रिवाजों का बोझा रहता है और यदाकदा आकस्मिक आपत्तियाँ भी सामने आ खड़ी होती हैं। इनमें समय लगाना पड़ता है। अधिकांश लोग सचमुच ही बहुत व्यस्त रहते हैं, उनके पास समय का वास्तव में ही अभाव रहता है। आत्मकल्याण कार्यों के लिए जब वे यह कहते हैं कि “क्या करें हमें फुरसत नहीं मिलती” तो उनकी सच्चाई पर अविश्वास नहीं होता। वस्तुतः हमारी आज की समस्याओं का जो रूप बन गया है, वह ऐसा ही पेचीदा है कि उससे किसी मनुष्य का आध्यात्मिक कार्यों के लिए समय निकाल सकना असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य है।

क्षणभंगुर जीवन की घड़ियाँ

इतना होते हुए भी एक बात अत्यंत गंभीरता के साथ विचार करने की है कि यदि आज ही हमारा जीवन समाप्त हो जाए और मृत्यु सामने आ खड़ी हो तो फिर वे समस्याएँ, आकांक्षाएँ और चिंताएँ किस प्रकार सुलझेंगी, जो हमें अब निरंतर परेशान करती रहती हैं। जीवन को पानी के बुलबुले की तरह क्षणिक कहा गया है, सो असत्य नहीं है। भरी जवानी में, उठती उम्र के नौजवानों की लाशें रोज ही आँखों के आगे से गुजरती हैं, फूल से कोमल बच्चे देखते−देखते मुरझा जाते हैं, फिर हमारे ही बारे में क्या निश्चय है कि सौ वर्ष की आयु तक जीवित रहने का अवसर मिलेगा ही। दिन जिस तेजी में गुजरते हैं, उसे देखते हुए सौ वर्ष भी कुछ ही दिनों में बीत सकते हैं। हम लोग इतनी आयु पूरी कर चुके ,लगता है अभी कल-परसों तक बचपन के खेल खेलते थे, पर आज अधेड़ हो चले। यही क्रम कुछ दिन चलते रहने पर बुढ़ापा भी सामने आ पहुँचा और मृत्यु भी दूर नहीं है। जिस दिन इस शरीर को त्यागकर हमारा प्राण आकाश में विचरण कर रहा होगा, वह दिन अब बहुत दूर नहीं है। सोचने की बात है कि यदि वह दुःखद घड़ी कल ही सामने उपस्थित हो जाए तो जिन व्यस्तताओं में से घड़ी भर भी हमें परमार्थ के लिए समय नहीं मिलता, वे सुलझ जावेंगी या उलझी ही पड़ी रहेंगी?

शरीर और आत्मा के स्वार्थ

जीवन का वास्तविक स्वरूप न समझने के कारण ही हम इतनी परेशानियों में फँसते और समस्याओं में उलझते हैं। यह शरीर हमें एक औजार की और एक वाहन की तरह उपयोग करने के लिए मिला हुआ है। घोड़ा जिसके पास होता है, वह मालिक अपने इस वाहन की आवश्यक देखभाल और व्यवस्था तो करता है, पर उस घोड़े को सजाने संभालने में ही चौबीसों घंटे नहीं लगा रहता। उसे उस मंजिल का भी ध्यान रखना होता है, जिसके लिए यह घोड़ा खरीदा गया है। यदि कोई व्यक्ति अपनी मंजिल की बात भूल जाए और घोड़ा किस काम के लिए खरीदा गया है, यह सोचना छोड़कर दिन-रात उस जानवर की साज-संभाल में ही लगा रहे तो उसे उपहास का पात्र बनना पड़ेगा, मूर्ख कहलाना पड़ेगा और घोड़ा खरीदने की उसकी मूल योजना का उद्देश्य ही खटाई में पड़ जाएगा। हम सब आज ऐसे ही मूर्ख घुड़सवार का अभिनय कर रहे हैं। क्या हमारे लिए यही उचित है?

शरीर की उचित आवश्यकताएँ आसानी से पूरी हो सकती हैं। पेट भरने को रोटी, तन ढ़कने को कपड़ा तथा परिवार के उचित पोषण की सीमा तक जिसकी महत्वकांक्षाएँ सीमित हो जाएँ, उसे परमार्थ साधना के लिए पर्याप्त समय मिल सकता है। वासनाओं और तृष्णाओं पर यदि नियंत्रण प्राप्त कर लिया जाए, तो मस्तिष्क को काफी अवकाश आत्मचिंतन के लिए मिल सकता है। वासनाओं की,तृष्णाओं की महत्वकांक्षाएँ ही मनुष्य का सारा समय, सारा मस्तिष्क, सारा ओज जोंकों की तरह चूसती रहती हैं। यदि इन नागिनों से छुटकारा पाया जा सके तो फिर आदमी के पास आत्मकल्याण के लिए कुछ सोचने और कुछ करने को इतनी बड़ी मात्रा में समय बच सकता है कि वह अपना लक्ष्य पूर्ण कर ले। 84 लाख योनियों में लाखों वर्षों तक भ्रमण कराने वाली पीड़ाओं से छूट जाए और इस सुरदुर्लभ मानव शरीर का सदुपयोग करके भावी पीढ़ी के लिए प्रकाश दीप की तरह युगयुगांतरों तक यशस्वी बने रहने के लिए अमरता प्राप्त कर ले।

तुलनात्मक विचार करें

यदि शरीर की अमिट वासनाओं और मन की अनंत तृष्णाओं को एक स्वल्प मात्रा में एक लघु क्षण के लिए तृप्त करने में सारा जीवन लगा दिया जाए और फिर आग में घी डालते रहने पर न बुझने वाली ज्वाला की तरह अशांति ही हाथ लगी तो इस गोरखधंधे में उलझा रहना क्या बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य माना जाएगा? इसके स्थान पर यदि जीवनयात्रा के आवश्यक और उचित साधन जुटाने में सामान्य श्रम, समय और मनोबल लगाया गया होता और बचे हुए पुरुषार्थ को आत्मकल्याण एवं परमार्थ में लगाया गया होता तो उससे अनंतकाल तक मिलने वाला आनंद प्राप्त हुआ होता और इस धरती पर असंख्य प्राणियों ने उस जीवन में लाभ उठाया होता।

जीवन के यह दो ही उपयोग हो सकते हैं। एक तृष्णा और वासनाओं के जंजाल में जकड़ा हुआ इतना व्यस्त जीवन जिसमें आत्मकल्याण की साधना के लिए न इच्छा जगे और न अवकाश मिले। दूसरा वह जिसमें सीमित आकांक्षाओं के साथ संतोषपूर्वक समय गुजारते हुए कर्मयोगी की तरह संसार के प्रस्तुत उत्तरदायित्वों को शांतिपूर्वक निवाहते हुए परमार्थ का भी संपादन कर लिया जाए। निश्चित रूप से दूसरा जीवनक्रम अधिक दूरदर्शितापूर्ण एवं अधिक लाभदायक है। किंतु आश्चर्य और खेद की बात है कि आज हम सब उस जीवनक्रम को अपनाए हुए हैं, जिसमें अशांति, बर्बादी और पश्चात्ताप के अतिरिक्त और कुछ मिलने वाला नहीं है। तुलनात्मक दृष्टि से इन दोनों प्रकार के जीवनक्रमों पर विचार किया जाना चाहिए और सोचा जाना चाहिए कि लाखों-करोड़ों वर्ष बाद मिले हुए मानव जीवन का सदुपयोग करने की समस्या का हल करना आवश्यक है या नहीं? अन्य अनेक साधारण समस्याओं को हल करने में कितना सोच−विचार किया जाता है और उसका कारगर हल ढूँढ निकाला जाता है। कितने खेद की बात है कि करोड़ों-करोड़ रुपयों से अधिक मूल्यवान इस सुरदुर्लभ मानव जीवन के सदुपयोग का प्रश्न हम उपेक्षा के कूड़े में ही पटके रहते हैं। यह उपेक्षा एक दिन कितनी कष्टकारक,कितनी पश्चात्ताप भरी वेदना उत्पन्न करती है, इसका अनुमान यदि आज लगाया जाना संभव हो सके तो निश्चय ही इस भूल को आज ही सुधार लिया जाए।

फुरसत का अभाव कब तक?

आवश्यक कार्यों से सदा फुरसत मिल जाती है। जो काम कम महत्त्व के होते हैं, उन्हें पीछे के लिए छोड़कर मनुष्य आवश्यक कार्यों को हाथ में लिया करता है। यदि स्त्री या बच्चा सख्त बीमार हो तो कितने ही लाभ के काम को छोड़कर उनकी चिकित्सा तथा परिचर्या में लगना पड़ता है। व्यस्त आदमियों को भी अपने स्वजनों की जीवन-रक्षा के लिए बहुत समय लगाने में कुछ कठिनाई नहीं होती। जिस कार्य को मनुष्य आवश्यक और उपयोगी समझता है, उसके लिए व्यस्तता के अगणित कामों को पीछे के लिए धकेलकर उस महत्त्वपूर्ण समझे जाने वाले कार्य के लिए समय निकालता है। आत्मकल्याण के लिए यदि फुरसत नहीं मिलती तो इसका अर्थ केवल इतना ही है कि इस कार्य को सबसे व्यर्थ सबसे कम उपयोगी माना गया है और उपेक्षा के कूड़ा खाने में पटक दिया गया है। महत्त्वपूर्ण समझे जाने वाले कार्य सदा प्राथमिकता प्राप्त करते हैं, उनके लिए तुरंत समय निकालता है। समय का अभाव आमतौर से उन्हीं बातों के लिए रहता है, जिन्हें हम महत्त्वहीन,अनुपयोगी,बेकार की बात समझते है।

आत्मकल्याण को इतना उपेक्षणीय मानना, फुरसत न रहना और शरीर, मन को प्रसन्न करने के लिए चौबीसों घंटे लगे रहना, क्या यही नीति हमारे लिए उचित है? क्या इसी से हमारा जीवन-लक्ष्य सफल हो सकेगा? यह विचारणीय प्रश्न है। इसको सुलझाने में हम जितनी शीघ्रता करें, जितना सही निष्कर्ष निकाल लें, उतनी ही हमारी भलाई है।


साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा

पिछले तीन लेखों में यह विचार किया गया है कि मानव जीवन एक अलभ्य अवसर एवं सुरदुर्लभ अवसर है। इसको तुच्छ बातों में बर्बाद न करके ऐसा सदुपयोग करना चाहिए, जिससे जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति हो, आनंद, उल्लास और संतोष के साथ जिया जाए तथा संसार को अच्छा संसार बनाने में सहायता मिले। यदि यह निष्कर्ष सच्चे मन से निकाला गया हो, तो निस्संदेह उसकी पूर्ति होना, व्यवस्था बनना कुछ भी कठिन नहीं है। कठिनता उन्हीं के लिए है, जो शेखचिल्ली की जैसी कल्पनाएँ तो बड़ी−बड़ी करते हैं, पर जब काम करने की,कुछ व्यवस्था बनाने की घड़ी आती है तो दाँत निकाल देते हैं।

अध्यात्म के चार आधार

साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चार भागों में अध्यात्म विभक्त है। चारों को मिलाकर ही आत्मकल्याण की कोई सर्वांगपूर्ण व्यवस्था बन सकती है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि हम विश्वासपूर्वक इस आदर्श पर निष्ठा रखें कि अन्य आवश्यक कार्यों की तरह आत्मकल्याण का कार्यक्रम भी उपेक्षणीय नहीं, वरन अन्य साधारण कार्यों की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है और महत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए सोच-विचार करते रहना पड़ता है। यह तीनों ही साधन जब तक आत्मकल्याण योजना में न लगेंगे, तब तक उसकी पूर्ति किसी भी प्रकार संभव न होगी। हमें अपने मस्तिष्क में आत्मकल्याण की आवश्यकता और योजना को अधिकाधिक स्थान देते चलना होगा और उसके लिए समय मिलते ही गहराई से सोच-विचार करते रहना होगा। दिन में ऐसा बहुत-सा समय ऐसा होता है, जब शरीर आराम कर रहा होता है और मन खाली रहता है। ऐसा जितना भी समय मिले, उसे आत्मकल्याण संबंधी समस्याओं को समझने और सुलझाने में लगाए रहना चाहिए।

ईश्वर की उपासना

इसके अतिरिक्त कुछ समय भी नियमित रूप से आत्मकल्याण के कार्यों के लिए हमें लगाना चाहिए। प्रातःकाल आँख खुलने से लेकर चारपाई छोड़ने में हर मनुष्य को थोड़ा बहुत समय लगता है। आँख खुलते ही कोई चारपाई छोड़कर उठ खड़ा नहीं होता, वरन कुछ समय चेतना प्राप्त करने, खुमारी दूर करने में हर किसी को लगाना पड़ता है। जाड़े के दिनों में तथा बुढ़ापे की अवस्था में तो यह चारपाई पर पड़े रहने का समय बहुत लंबा होता है। इस कार्य को आत्मकल्याण की साधना में लगाते हुए किसी को कोई अड़चन न होनी चाहिए। यह समय भगवान के स्मरण में लगाना चाहिए। (1) भगवान के हमारे ऊपर किए उपकार, उनकी दी हुई अनेक सुविधाओं का बाहुल्य, अनेक कठिनाइयों में उपलब्ध होती रहने वाली उनकी अदृश्य सहायताओं का बार-बार चिंतन करना चाहिए। अपनी व्यक्तिगत शक्ति स्वल्प है, जो सफलताएँ मिली हैं, उसमें अपना श्रेय न मानकर ईश्वर की ही अनुकंपा माननी चाहिए और अहंकार को तनिक भी न पनपने देना चाहिए। सफलताओं का श्रेय अपने ऊपर लेने वाले मनुष्य वास्तव में नास्तिक होते हैं। अहंकार नास्तिकता का प्रधान चिह्न है। प्रार्थना द्वारा हम इस अहंकार को ही गलाते हैं। ईश्वर के उपकारों के साथ-साथ उन सत्पुरुषों के, स्वजनों के अनंत उपकारों का भी स्मरण करना चाहिए, जिनकी कृपा से समय-समय पर अनेकों कठिनाइयाँ हल होती रहीं तथा सुविधा सफलता प्राप्त करने का अवसर मिला।

(1) ईश्वर के समदर्शी, न्यायकारी घट-घटवासी स्वरूप का हमें बारंबार स्मरण करना चाहिए और यह विश्वास गहराई तक जमा लेना चाहिए कि वह हमारी प्रत्येक भावना को बहुत ध्यानपूर्वक देखता है और उनकी पवित्रता अपवित्रता देखकर ही वह प्रसन्न अप्रसन्न होता है। भगवान की सच्ची पूजा सत्कर्मों से ही हो सकती है। कलुषित भावनाओं से भरा रहने वाला कुकर्मरत मनुष्य बाह्य पूजा उपकरणों से परमात्मा को कदापि प्रसन्न नहीं कर सकता। यह बात जितनी अच्छी तरह समझ ली जाए उतनी ही हमारी ईश्वरभक्ति सच्ची होगी। प्रातःकाल भगवान के उपकारों का ध्यान, उनके प्रति कृतज्ञता भरी श्रद्धाञ्जलि का मानसिक समर्पण, उनके सर्वांतर्यामी, और न्यायकारी स्वरूप का ध्यान करते रहने में यह समय लगाना चाहिए और जी खोलकर प्रार्थना करनी चाहिए कि प्रभु वह शक्ति प्रदान करे, जिससे मानव जीवन को सफल बनाने लायक, कठिनाइयों से संघर्ष कर सकने लायक आत्मबल विकसित हो सके। प्रातःकाल की प्रार्थना के साथ-साथ युग-निर्माण का संकल्प भी नित्य पढ़ा जाना चाहिए। यह संकल्प मार्च के अंक के प्रथम पृष्ठ पर छप चुका है।

स्वाध्याय कैसे करें?

(2) शौच, स्नान आदि से निवृत्त होकर कुछ समय नियमित गायत्री जप हर एक को करना चाहिए। एक माला जपने में कुल मिलाकर दस मिनट का समय लगता है। इतना तो हर एक को अनिवार्यतः करना ही चाहिए। अधिक अवकाश तथा अभिरुचि जिन्हें हो, वे गायत्री उपासना के अधिक संख्या में अधिक विधि-विधानपूर्वक जप कर सकते हैं। उसके परिणाम भी उन्हें अधिक प्राप्त होंगे। एक व्यस्त-से-व्यस्त व्यक्ति को भी 108 मंत्र तो जप ही लेने चाहिए। किसी और देवता या मंत्र के जो उपासक हों, वे उसे भी करें, पर गायत्री उपासना को भारतीय संस्कृति के अनुयायी होने का एक अनिवार्य कर्त्तव्य मानकर इसे दैनिक जीवन में स्थान दिया ही जाना चाहिए।

(3) यदि अपना लौकिक कार्यक्रम प्रातःकाल से ही आरंभ होता है, तो नित्यकर्म के बाद उस पर चले जाना चाहिए और सायंकाल तक बीच में जो भी अवकाश का समय मिलता हो, उसमें स्वाध्याय के लिए कम-से-कम आधा घंटा समय निकाल लेना चाहिए। स्वाध्याय के लिए केवल वही साहित्य काम में लेना चाहिए जो जीवन की वास्तविक समस्याओं पर व्यावहारिक मार्गदर्शन प्रस्तुत करता हो। हमें आज की अपेक्षा कल अधिक उत्कृष्ट कैसे बनना चाहिए, इस प्रश्न का उत्तर जिस भी पुस्तक में सरलतापूर्वक समझाया गया हो, वही स्वाध्याय में प्रयुक्त हो सकती है। प्राचीन ग्रंथों के मोह में किन्हीं कथा-पुराणों का एवं अत्यंत दुरुह आध्यात्मिक ग्रंथों पर पाठ करते रहना स्वाध्याय की चिह्नपूजामात्र है। उनसे स्वाध्याय की आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो सकती।

अपने स्वजनों की स्वाध्याय आवश्यकता की पूर्ति की पूरी जिम्मेदारी ‘अखण्ड ज्योति’ ने अपने कंधों पर ली है। जैसे मधुमक्खी दूर−दूर से पुष्पों का पराग एकत्रित करती है और उसे मधुर रस देकर गुणवान शहद के रूप में प्रस्तुत करती है, उसी प्रकार हम अपने पाठकों की दैनिक स्वाध्याय की आवश्यकता को पूर्ण करते रहने के लिए ‘अखण्ड ज्योति’ के पृष्ठों पर अत्यंत सारगर्भित पुण्य-सामग्री प्रस्तुत करते रहेंगे। अब सरसरी दृष्टि से अखण्ड ज्योति न पढ़ी जानी चाहिए, वरन प्रतिदिन आधा घंटा यह सोचकर उसे पढ़ना चाहिए कि इन पृष्ठों के लेखक को समीप बैठा मानकर उसके साथ सत्संग करते हुए अनेक धर्मग्रंथों का सार मधुर मधु के रूप में प्राप्त किया जा रहा है।

जिनका दैनिक कार्यक्रम देर से आरंभ होता है और प्रातःकाल कुछ समय खाली रहता है, वे साधना के बाद तुरंत स्वाध्याय आरंभ कर सकते हैं। अन्य धर्मग्रंथ पढ़ने हों तो उन्हें भी प्रसन्नतापूर्वक पढ़ा जाए। जिस प्रकार गायत्री उपासना के साथ−साथ अन्य मंत्र या देवता की उपासना करने की छूट है, उसी प्रकार जीवन में व्यावहारिक अध्यात्म की सामयिक प्रेरणा देने वाले अखण्ड ज्योति के पृष्ठ आधा घंटा तक पढ़ते रहने के अतिरिक्त अन्य ग्रंथ भी पढ़े जा सकते हैं, पर स्वाध्याय का जो एक व्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जा रहा है, वह अखण्ड ज्योति के पृष्ठों से प्राप्त करते रहना ही चाहिए।

संयम कैसे साधा जाए?

(4) संयम की योजना रात को सोते समय बनानी चाहिए। चारपाई पर पड़ते ही तुरंत नींद किसी को नहीं आ जाती। कुछ समय सोने में जरूर लगता है। इस समय को संयम योजना बनाने में लगाना चाहिए। अपनी शारीरिक, मानसिक शक्तियों और संपदाओं का अनावश्यक रूप से जहाँ अपव्यय हो रहा हो, वहाँ से उसे रोककर आत्मिक प्रयोजनों में लगाना संयम का उद्देश्य है। सोते समय दिन भर के कार्यक्रमों पर विचार करना चाहिए कि आज हमारा कितना शरीरबल, कितना बुद्धिबल, कितना धनव्यय जीवन-निर्वाह के लौकिक कार्यों में लगा? क्या इसमें से कुछ समय, श्रम और धन बचाया जा सकता था? यदि बचत हो सकती थी और अधिक व्यय कर डाला गया तो उसे असंयम का एक चिह्न मानना चाहिए और अगले दिन के लिए ऐसा उपाय सोचना चाहिए कि वह अपव्यय कम होता चले। पूर्ण रूप से विविध असंयमों को तुरंत छोड़ सकना संभव न हो तो उन्हें घटाते अवश्य चलना चाहिए। आज की अपेक्षा कल असंयम घटे ही, बढ़े नहीं।

आहार में अनेक प्रकार के अनेक स्वाद के व्यंजन न हों, नियत समय के अतिरिक्त अन्य समय न खाया जाए। विवाहित जीवन में कामसेवन की अवधि और मर्यादा रहे और वह मर्यादा लंबी ही होती चले, छोटी नहीं। विलासिता की चीजें घटें, सादगी बढ़े। सिनेमा, ताश, बीड़ी आदि का शौक लग गया हो और यदि वह तुरंत न छूटता हो तो उनकी संख्या एवं अवधि तो दिन−दिन घटाई ही जा सकती है। अपने ऊपर होने वाला खरच क्रमशः घटाना चाहिए और उपयोग की वस्तुएँ जितनी कम की जा सकें, उतनी कम करते जाना चाहिए। धन, संतान, वाहवाही आदि की तुच्छ आकांक्षाओं को बहुत सीमित करते चलना और दांपत्य जीवन में अपनी नियत सामाजिक मर्यादा में पूर्ण संतुष्ट होकर पराई पत्तल चाटने के लिए ललचाते हुए मन को निग्रहपूर्वक रोकना चाहिए। आवेश, उत्तेजना, शोक, चिंता, भय, क्रोध, लोभ जैसे पतन के गर्त्त में धकेलने वाले असंयमों को सायंकाल के आत्मनिरीक्षणकाल में भली प्रकार परखना चाहिए कि आज किस−किस शत्रु का कितना बाहुल्य रहा और कल उनको नियन्त्रण में रखने के लिए क्या−क्या सावधानी बरती जाए? यह सोचना चाहिए।

संयम का तात्पर्य यह है कि बची हुई शक्तियों को शारीरिक कार्यों से समेटकर आध्यात्मिक कार्यों में लगाया जाए। जो समय, जो धन, बुद्धि, संयम के द्वारा बचाया गया है, उसे सत्कार्य में, परमार्थ में लगाया जाय,  तो ही उससे अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है। रात्रि को सोते समय संयम की योजना बनानी चाहिए और दिन में उसे कार्यान्वित करना चाहिए।

आत्मोत्कर्ष की सेवा साधना

(5) सेवा का अर्थ है— किसी आत्मा का स्तर ऊँचा उठाना। किसी कष्टपीड़ित को पैसा या सामान देने से सामयिक सहायता हो सकती है, पर आत्मा का कल्याण ज्ञान देकर उनके स्तर को ऊँचा उठाने में ही हो सकता है, इसलिए सेवा को ही ज्ञानयज्ञ कहा जाता है। हम अपने लिए जिस प्रकार स्वाध्याय और सत्संग का साधन जुटाते हैं, उसी प्रकार दूसरों के लिए यह उपकार करने की कुछ-न-कुछ योजना नित्य बनानी चाहिए। इससे बड़ा पुण्य-परमार्थ इस संसार में और कुछ नहीं हो सकता।

यह कार्य अपने परिवार से ही आरंभ करना चाहिए। कोई सुविधा का ऐसा समय ढूँढना चाहिए, जिसमें घर के अधिकांश व्यक्ति इकट्ठे हो सकें। इस समय एक पारिवारिक सत्संग प्रतिदिन चलाया जाए। 24 गायत्री मंत्रों का सब लोग मिलकर जप करें, माता के चित्र का धूप-दीप से पूजन करें, युग निर्माण संकल्प को एक पढ़े, दूसरे दुहरावें,कोई भजन गाया जाए, फिर किसी उत्तम पुस्तक का अंश अथवा अखण्ड ज्योति का पृष्ठ पढ़कर सब को सुनाया जाए। परिवार में प्रतिदिन उत्पन्न होने वाली समस्याओं पर भी इस सत्संग में विचार−विनिमय किया जाए। इस प्रकार सामूहिक उपासना एवं विचारगोष्ठी के रूप में यह सत्संग नियमित रूप से चला करे तो उसका प्रभाव सब लोगों के जीवन पर अवश्य पड़ेगा और घर में सद्भाव, सद्विचार ,सत्कर्म एवं सज्जनता की धर्मपरंपरा बनी रहेगी। सद्विचारों के अभाव में ही कुबुद्धि उपजती और पनपती है। यदि उसका उन्मूलन करने के लिए पारिवारिक सत्संग चलते रहें तो हर घर में धार्मिक वातावरण बना रहेगा और स्वर्गीय वातावरण दिखाई पड़ता रहेगा।

धर्ममैत्री का विस्तार

परिवार के क्षेत्र से बाहर भी यह सेवा कार्य बढ़ाया जाना चाहिए। घर से बाहर कम-से-कम 10 व्यक्ति ऐसे तलाश करने चाहिए, जो अपने परिचित होने के साथ−साथ धार्मिक मनोवृत्ति के भी हों। इनसे धर्ममैत्री बढ़ानी चाहिए। धर्ममैत्री का अर्थ है— धर्म वृद्धि के उद्देश्य से स्थापित की हुई मित्रता। जिस प्रकार सामान्य लोग अपने किसी लाभ या स्वार्थ के लिए मित्र बनाते या बढ़ाते हैं, उसी प्रकार हमें सदुद्देश्य के लिए धर्मभावनाओं की वृद्धि के लिए निःस्वार्थ मित्रता बढ़ानी चाहिए। यह कार्य अपनी अखण्ड ज्योति पढ़ाने के लिए किसी के घर देने जाने और फिर उसे वापिस लेने के लिए जाने के कार्यक्रम के साथ आरंभ करना चाहिए। एक महीने में दो बार इस बहाने जिनके घर जाया जाएगा, उनसे उस अंक में प्रकाशित किसी विशेष लेख के बारे में चर्चा भी होगी ही। इस प्रकार दस व्यक्तियों से बीस दिन धर्मचर्चा करने का अपने को अवसर मिलेगा और जो लोग अखण्ड ज्योति नियमित रूप से पढ़ते रहेंगे, उनकी विचारधारा में कुछ-न-कुछ परिवर्तन भी निश्चित रूप से होगा ही। जिन्हें अखण्ड ज्योति के स्वाध्याय और आपका सत्संग करने का अवसर हर महीने मिलता रहेगा, वे अवश्य ही कुछ-न-कुछ प्रभाव ग्रहण करते चलेंगे और उनके जीवन में निश्चित रूप से कुछ-न-कुछ परिवर्तन होता चलेगा। आगे चलकर जब छोटे−छोटे ट्रैक्ट प्रकाशित होंगे, तब उनके माध्यम से एक विचार विद्यालय भी बन सकेगा, जिसकी चर्चा जनवरी अंक के अंतिम लेख में की गई है। यह धर्ममैत्री विकसित होते-होते एक विशाल धर्मसंगठन के रूप में भी परिणत हो सकेगी। अखण्ड ज्योति परिवार के हजारों सदस्य अपने धर्म परिवार के साथ लाखों की संख्या में होंगे और फिर उनका विस्तार चक्रवृद्धि क्रम से होने लगा, तो देश के कोने−कोने में प्रत्येक भारतीय तक यह युग निर्माण विचारधारा पहुँचेगी और लाखों-करोड़ों व्यक्ति उस ढाँचे में ढलेंगे, जिसे लक्ष्य बनाकर हम लोग सांस्कृतिक एवं नैतिक पुनरुत्थान के महान अभियान में संलग्न हो रहे हैं।

रचनात्मक कार्यक्रम की प्रतिष्ठा

हम में से प्रत्येक व्यक्ति अब अपने जीवन को एक पारमार्थिक संस्था के रूप में ढालने का प्रयत्न करे। स्वयं उत्कृष्ट बनने और दूसरों को श्रेष्ठ बनाने का कार्य आत्मकल्याण का एकमात्र उपाय है। अब सभा सम्मेलनों का, मीटिंग-प्रस्तावों का जमाना चला गया, वह चीजें पुरानी और निकम्मी बन चुकी हैं। अब रचनात्मक कार्यों द्वारा ही किसी ठोस परिणाम की आशा की जा सकती है। सभ्य समाज की इमारत खड़ी करने के लिए स्वच्छ मन और स्वस्थ शरीर का ईंट-चूना चाहिए। युग निर्माण के यही आधार हैं।

अखण्ड ज्योति हम वर्षों से पढ़ते रहे हैं, अब उस पठन को कार्यरूप में परिणत होना चाहिए। हमारा कुछ समय उन कार्यों में लगना चाहिए, जो किसी सच्चे आध्यात्मवादी के लिए आवश्यक है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों कार्यक्रम हमारे जीवन में यदि स्थान प्राप्त करने लगें— यदि अखण्ड ज्योति परिवार के बीस हजार सदस्य अपने कार्यक्रम में इस प्रस्तुत योजना को स्थान देने लगें तो उसका परिणाम बहुत ही दूरगामी होगा और युग निर्माण का वह स्वप्न जो आज एक कल्पना जैसा दीखता है, निकट भविष्य में साकार होकर रहेगा। हम अपनी आँखों से सभ्य समाज का सुखद स्वर्गीय वातावरण देखकर शांति और संतोष प्राप्त कर सकेंगे।


विश्वमानव की अखंड अंतरात्मा

विश्वमानव की आत्मा एक और अखंड है। समस्त जड़-चेतन उसी के अंतर्गत अवस्थित हैं। इस आत्मा में अपनी एक दिव्य आत्मा, स्वर्गीय ज्योति जगमगाती है। अनेक मल आवरणों ने उसे ढक रखा है। यदि वह ज्योति इन आवरणों को चीरकर अपने शुद्ध स्वरूप में जगमगाने लगे तो उसका आलोक जहाँ भी पड़े, वहीं आनंद का परम आह्लादकारी दृश्य दिखाई दे सकता है। इस प्रकार की सीमा में आने वाली हर वस्तु स्वर्गीय बन सकती है। ऐसी बहुमूल्य ज्योति हमारे अंदर मौजूद है। स्वर्ग की सारी साज-सज्जा हमारे भीतर प्रस्तुत है, पर अविद्या के प्रतिरोधी तत्त्वों ने उसे भीतर ही अवरुद्ध कर रखा है। फलस्वरूप मानव प्राणी स्वयं नारकीय स्थिति में पड़ा हुआ है और वैसा ही नरकतुल्य वातावरण अपने चारों और बनाए बैठा है।

आत्मा स्वार्थ की संकुचित सीमा में अवरुद्ध होकर आज खंडित हो रही है। हर व्यक्ति अपने को दूसरों से अलग खंडित देखता है, फलस्वरूप चारों ओर संघर्ष और कलह का वातावरण उत्पन्न होता है।

वस्तुतः हम सब एक है, अखंड हैं, सब एकदूसरे से जुड़े हुए हैं, एक का सुख−दुःख दूसरे का सुख−दुःख हैं। उठना है तो सबको एक साथ उठना होगा ,सुख ढूँढना है तो सबको उसे बाँटना होगा। खंडित व्यक्ति स्वार्थ की संकुचित सीमा में रहकर अपने शरीर के लिए कुछ भी—कितना ही इकट्ठा क्यों न कर ले,पर इससे उसे कोई चैन न मिलेगा। जब तक हम 'अपने को सब में और सबको अपने में” न देखने लगेंगे, तब तक मानव अपनी महानता से— मानवता से वंचित ही बना रहेगा।

एकदूसरे के प्रति प्रेम, आत्मीयता, ममता, स्नेह, उदारता, क्षमा, करुणा की दृष्टि से देखें और जो कुछ अपने पास है, उसका लाभ दूसरों को देने के लिए प्रस्तुत रहें, तभी मनुष्य की मनुष्यता सार्थक हो सकती है। आध्यात्मिकता का संदेश है कि हम में से हर कोई अपने भीतर दृष्टि डाले, अंतर्मुखी होकर देखे कि उसके भीतर कितनी प्रचुर मात्रा में दैवी संपत्ति भरी पड़ी है। यदि वह उसे जान ले, देख ले और उसका सदुपयोग करने लगे तो मरने के बाद नहीं— इसी जीवन में— आज ही स्वर्ग का आनंद ले सकता है। यह कथा कल्पना नहीं, वरन सुनिश्चित तथ्य है कि अपने आपको जान लेने पर मनुष्य सब कुछ जान सकता है। अपने आपको सुधार लेने पर संसार की हर बुराई सुधर सकती है। अपने को बना लेने पर बाहर के जगत में सब कुछ बन सकता है, अपने को विकसित कर लेने पर बाहर की सारी गिरावट उत्कृष्टता में परिणत हो सकती है। व्यक्ति महान बने, तथा सारी वसुधा महानता से ओत−प्रोत हो, यह मिशन लेकर अखण्ड ज्योति जन्मी है। जब तक वह जलेगी, तब तक इसी प्रयत्न में लगी रहेगी।

दूसरे हमसे भिन्न नहीं, हम दूसरों से भिन्न नहीं, इसी मान्यता में अध्यात्मवाद का सारा रहस्य सन्निहित है। दूसरों की पीड़ा जब पीड़ा लगने लगे, दूसरों को दुखी देखकर जब अपने अंदर करुणा उपजे, दूसरों को सुखी और समृद्ध देखकर जब अपने भीतर संतोष और हर्ष की लहर लहराए, तब समझना चाहिए कि हम आध्यात्मिकता के वास्तविक स्वरूप को पहचानने और ग्रहण करने की स्थिति में पहुँच रहे हैं। जब तब व्यक्ति अपने को समाज से भिन्न समझता है, लोकहित से अपने व्यक्तिगत स्वार्थ को अधिक महत्त्व देता है, तब तक वह मानवीय आदर्शों से पतित ही माना जाएगा।

आत्मा अखंड है। हम सब एक ही नाव के यात्री, एक ही मंजिल के राही हैं, एक ही डाल पर रहने वाले पक्षी, एक ही बिल में रहने वाले चींटी-चींटे, परस्पर एक ही सूत्र में बँधे हुए हैं। सबका सुख−दुःख एक है। यदि संसार में पाप बढ़ेगा, तो उसके बुरे प्रतिफलों से पुण्यात्माओं को भी कष्ट सहना पड़ेगा। पेड़ गिर पड़े तो उस पर रहने वाले सभी पक्षी आश्रयविहीन होंगे, बिल में पानी भर जावे तो उसमें रहने वाले सभी कीड़े संकट में पड़ेंगे। मानव जाति का भाग्य एक ही लिपि में लिखा गया है। यदि उत्थान होना है, सुख मिलना है तो वह सामूहिक ही हो सकता है। चार लोग अमीर रहना चाहें और सब गरीबी भुगतें, यह स्थिति देर तक नहीं रह सकती । चाहे साम्यवाद हो, चाहे अध्यात्मवाद, दोनों ही दृष्टिकोणों से यह गर्हित माना जाएगा और इसे बदलने का प्रयत्न किया जाएगा।

आत्मा एक व्यापक तत्त्व है, वह अनंत और अखंड है। पानी की हर लहर पर एक अलग सूरज चमकता दीखता है, पर वस्तुतः असंख्य सूर्य कहाँ होते हैं? एक ही सूर्य की आभा तो अगणित लहरों पर स्वतंत्र प्रतिबिंब जैसी दीखती है। आत्मा भी एक है, उसकी अखंड ज्योति एक है। अखंड ज्योति एक है। हम लहरों पर चमकने वाले प्रतिबिंबों की भाँति अलग भले ही दिखाई दें, पर वस्तुतः हम सब एक हैं। एक ही ज्वाला की अगणित चिनगारियाँ विभिन्न शरीरों में जलती दीखती हैं, एक ही बिजलीघर की प्रचंड धारा अनेक बल्बों में चमकती है, पर धारा का उद्गम एक है।

इस एकता को जितनी जल्दी हम समझ लें, उतना ही उत्तम है। वेदांत का अद्वैत सिद्धांत ही सत्य है। द्वैत मिथ्या है। द्वैत को मिटाकर अद्वैत की प्राप्ति के लिए ही अध्यात्म शास्त्र और साधना विज्ञान का आविर्भाव हुआ है। जीव जब अपनी सत्ता को भुलाकर के ईश्वर में लीन हो जाता है, तब समाधि का, मुक्ति का सुख मिलता है। लौकिक जीवन में भी सुख-शांति का यही मार्ग है। व्यक्ति अपने संकुचित स्वार्थों की शैली में सोचना छोड़कर समाज की, समूह की बात सोचने लगे तो सर्वांगीण मुक्ति का वातावरण विनिर्मित हो सकता है। राजनैतिक स्वतंत्रता, आर्थिक स्वतंत्रता, सामाजिक स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता आदि स्वतंत्रता के विविध आंदोलन चलते रहते हैं। आत्मा स्वतंत्र है, वह बंधन में नहीं रहना चाहती। जब छोटी−सी चिड़िया तक पिंजड़े में बंद रहने की पराधीनता स्वीकार नहीं करती और अवसर मिलते ही उन्मुक्त आकाश में उड़ जाती है तो आत्मा ही क्यों पराधीन रहे? स्वाधीनता की उसकी भूख स्वाभाविक है। यह भूख आत्मिक स्वतंत्रता में ही जाकर पूर्ण होती है। व्यक्ति छोटे-से शरीर के लिए, छोटे-से कुटुंब के लिए ही सब कुछ सोचे और सारे संसार की कठिनाई की ओर से आँखें बंद कर ले, तो यह संकीर्णता, सीमाबद्धता, स्वार्थपरता ही कही जाएगी। इसी भवबंधन में बंधा हुआ तो प्राणी जन्म-मरण की फाँसी में झूलता रहता है।

संकुचित स्वार्थों की सीमा में अवरुद्ध व्यक्ति तुच्छ है। जो अपनी ही बात सोचता है, अपने ही दुःख से दुखी और अपने ही सुख से सुखी है, वह अभागा प्राणी पानी की एक बूँद की तरह है, जिसका अस्तित्व उपहासास्पद ही रहता है। समुद्र भी महान है और उसकी हर बूँद भी धन्य है। सूर्य अपनी ज्योति को अपने घर में ही प्रकाशित नहीं रहने देता, वरन उसकी किरणें लोक-लोकांतरों तक निस्वार्थ भाव से बिखरी रहती हैं। इसी से सविता को देवता कहते हैं। वे मनुष्य भी देवता ही हैं, जो ससीमता के बंधन तोड़कर असीम बनने जा रहे हैं, जिनने स्वार्थ का परमार्थ में परिपात करने का निश्चय कर लिया है।

इस संसार का भाग्य और भविष्य एक ही नाव में रखा हुआ है। विज्ञान की प्रगति ने इस एकता को और भी अधिक घनिष्ठ कर दिया है; इसलिए हमें सुख और दुःख की, लाभ और हानि की, उत्थान और पतन की, जीवन और मरण की समस्या पर व्यक्ति की दृष्टि से नहीं, समूह की, समाज की, संसार की दृष्टि से विचार करना चाहिए। जिसमें सबकी भलाई है, उसी में अपनी भलाई हो सकती है, जिससे सबका सुख और संतोष है, उसी में हमें भी सुख-शांति मिल सकती है। अपने को सुखी बनाने की इच्छा करने वाले प्रत्येक को विस्तृत दृष्टि से देखना चाहिए और आत्मा की अखंड ज्योति को एक सीमित क्षेत्र तक संकुचित न रखकर विस्तृत-विशाल क्षेत्र में फैलने देना चाहिए। सबके सुख में ही हमारा सुख सन्निहित है।


हम भी सत्य को ही क्यों न अपनाएँ?

जिन्होंने जीवन में आध्यात्मिक प्रगति की है, उनने सत्य का सहारा लिया है। सत्य की उपेक्षा करके कोई आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सका। इस पथ के पथिकों ने अपनी यात्रा में सत्य की प्रमुखता को ही सफलता का कारण बताया है।

सत्य से भरी हुई वाणी ही अमृतवाणी है। सत्य बोलना ही सनातन धर्म है। संतजन सत्य पर सदा दृढ़ रहते हैं। कोई साधक अन्य समस्त साधनाओं को छोड़ दे और केवल एक सत्य को ही पकड़े रहे तो वह संसारसागर से पार हो सकता है।

कोई शत्रु अपनी जितनी हानि कर सकता है, उससे कहीं अधिक हानि असत्य मार्ग का अवलंबन करने वाला मन अपनी हानि कर लेता है। जो असत्य बोलता है, वह कौन-सा पाप नहीं कर सकता।

नरकगामी वे होते हैं, जो झूठ बोलते हैं और वे भी जो वचन देकर विश्वासघात करते हैं। जिसने झूठ नहीं छोड़ा, उसने कोई पाप नहीं छोड़ा। असत्यवादी की साधुता उलटे रखे हुए घड़े के समान है, जिस पर ज्ञान और प्रेम की वर्षा का पानी एक बूँद भी नहीं ठहरता।

जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर का कथन है—“सदा सावधान और प्रमादरहित होकर सत्य का पालन करें। संसार के सभी सत्पुरुषों ने असत्य को निंदित ठहराया है। क्रोध में, भय में, हास्य-विनोद में भी असत्य भरे पापवचन न बोलें। खूब सोच-विचारकर परिमित ही बोलना चाहिये ताकि असत्य का उच्चारण न हो। आत्मकल्याण के इच्छुक साधक को परिमित, असंदिग्ध, परिपूर्ण, स्पष्ट, वाचालतारहित और किसी को पीड़ा न पहुँचने वाली सत्य से युक्त मधुर वाणी ही बोलनी चाहिए।”

श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे—“कलियुग की तपस्या सत्य भाषण है। सत्य के बल से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है। असत्य को अपनाने वाले मनुष्य का धीरे−धीरे सर्वनाश ही हो जाता है।”

स्वामी रामतीर्थ का वचन है:—‘चाहे सारी दुनियाँ भी तुम्हारे विरुद्ध होती हो, तो भी तुम सत्य पर आरुढ़ रहो। सत्य बहुत ही मूल्यवान है, उसे प्राप्त कर सको तो ब्रह्म की प्राप्ति सहज है। सत्य के लिए यदि अभावग्रस्त जीवन अपनाना पड़े, सांसारिक कामनाओं और महत्वाकांक्षाओं से विमुख होना पड़े, कुटुंबी और रिश्तेदारों को नमस्कार करना पड़े, यहाँ तक कि चिरपोषित अंधविश्वासों को भी छोड़ना पड़े, तो उन्हें छोड़ देना ही उचित है। यह सत्य के साक्षात्कार का मूल्य है। जब तक उस मूल्य को न चुकाया जाएगा, सत्य की उपलब्धि न हो सकेगी।’

योगी अरविंद की अनुमति है—“सच्चाई समस्त सच्ची प्राप्तियों का मूल आधार है। यही साधन, मार्ग और लक्ष्य है। सच्चे बनने पर तुम दिव्य जीवन से संबंधित हो सकोगे।”

युगपुरुष महात्मा गांधी ने कहा है—“परमेश्वर का सच्चा नाम ‘सत्’ अर्थात् सत्य है; इसलिए परमेश्वर सत्य है, यह कहने की अपेक्षा सत्य ही परमेश्वर है, यह कहना अधिक अच्छा है। सत्य की आराधना के लिए ही हमारा अस्तित्व है, इसी के लिए हमारी प्रत्येक प्रवृत्ति और इसी के लिए हमारा श्वासोच्छास होना चाहिए। साधारणतया सत्य का अर्थ सच बोलना मात्र समझा जाता है, परंतु विचार में, वाणी में और आचार में सत्य का होना ही सत्य है। इस सत्य को पूर्णतया समझने वाले के लिए जगत में और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। सत्य को परमेश्वर मानना मेरे लिए अमूल्य धन रहा है। मैं चाहता हूँ कि यही हम में से सबके लिए हो।”

आर्य समाज के संस्थापक श्री स्वामी दयानंद सरस्वती ने लिखा है—“सत्य के ग्रहण और असत्य के त्याग के लिए सर्वदा उद्यत रहना चाहिए। सब काम धर्मानुसार अर्थात सत्य और असत्य को विचारकर करने चाहिए। जो भक्त उपासना का अभ्यास करना चाहे, उसके लिए उचित है कि वह किसी से वैर न रखे। सबसे प्रीति करे। सत्य बोले। मिथ्या कभी न बोले। चोरी न करे। सत्य का व्यवहार करे। जितेंद्रिय हो, लंपट न हो। निरभिमान हो, राग−द्वेष छोड़ भीतर-बाहर से पवित्र रहे।”

भक्त-संतों ने भी ईश्वर उपासना में सत्य को ही प्रारंभिक एवं आवश्यक साधन माना है।

कबीर कहते हैं—

साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।

जाके हृदय साँच है, ताके हृदय आप।

हरि का मिलन सहज है, जो दिल साँचा होय।

साँई के दरबार की, राह न रोके कोय॥

संत दादू दयाल का वचन है—

सीधा मारग साँच का, साँचा होय सो जाए।

झूठे को कुछ ना मिले, दादू दिया बताए॥

दया धर्म का रुखड़ा, सत से बढ़ता जाए।

संतों को फूलै-फलै, वही अमर फल खाए॥

भक्त पलटूदास की उक्ति है—

पलटू पकड़े साँच को, झूँठे से रह दूर।

दिल में आवे साँच तो, साहब हाल हजूर॥

रामायण में सत्य की महत्ता प्रकट करने वाली अनेक चौपाइयाँ हैं—

(1) सत्य मूल सब सुकृत सुहाए।

वेद-पुराण विदित मनु गाए॥

(2) नहिं असत्य सम पातक पुंजा।

गिरि सम होंहि कि कोटिक गुंजा॥

(3) तनु तिय तनय धामु धनु, धरनी।

सत्यसंथ कहुँ तृन सम बरनी॥

यदि अपने पैर सत्य को अपनाने में लड़खड़ाते हों, साहस न होता हो, आंतरिक दुर्बलताएँ हताश करती हों, तो भी निराश नहीं होना चाहिए। समस्त बलों के केंद्र उस परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह सत्य का व्रतपालन करने से हमें साहस, बल, धैर्य, निष्ठा और इस मार्ग में जो कष्ट आवें, उन्हें सहन करने की क्षमता प्रदान करे। वेद में एक ऐसी ही प्रार्थना आती है—

अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयम्।

तन्मे राध्यतां इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि॥

—यजु. 1/5

हे व्रतपति परमेश्वर, मैं व्रत का पालन करने की अभिलाषा करता हूँ। मुझे वह शक्ति दो, जिससे व्रत को निभा सकूँ। मैं असत्य से सत्य की ओर बढ़ना चाहता हूँ।

सच्चे मन से सदुद्देश्य के लिए की गई प्रार्थना को प्रभु सुनते हैं और तदनुकूल बल और प्रकाश भी प्रदान करते हैं। यदि हमारी निष्ठा सच्ची होगी तो परमेश्वर वह बल हमें भी अवश्य प्रदान करेंगे।


निष्काम भक्ति में दुहरा लाभ

इस विश्व में सबसे बड़ा रस प्रेम का है। इसकी एक−एक बूँद के लिए आत्मा तरसती रहती है और जहाँ कहीं उसे इस मधुर मधु की एक बूँद भी उपलब्ध हो जाती है, वहीं वह उसकी बड़ी-से-बड़ी कीमत चुकाने को तैयार हो जाती है। बालक में प्रेमभाव की मान्यता करके माता उस पर अपना सब कुछ न्यौछावर करती है और कुरूप एवं गुणरहित होते हुए भी उसे सुंदर एवं गुणवान मानती है। पतिव्रता को अपना पति प्राणप्रिय होता है और पत्नीव्रती पति अपनी धर्मपत्नी पर प्राण न्यौछावर करता है। हो सकता है कि इसमें स्वार्थ का भी कुछ अंश मिला हुआ हो, पर प्रधानता प्रेम की ही होती है। प्रेमरहित स्वार्थ के लिए एक सीमा तक ही मनुष्य त्याग कर सकता है। पर सच्चा प्रेम जहाँ है, वहाँ प्रेमी की आत्मा उसका महान मूल्य स्वयमेव जान लेती है और उसके लिए बड़े-से-बड़ा बलिदान करना भी सहज हो जाता है।

सुख और शांति के स्थल तलाश करने के लिए लोग जगह−जगह भटकते रहते हैं। कोई एकांत में कोई नदी-पहाड़ों के प्राकृतिक दृश्यों में; कोई तीर्थ-पुरियों में प्रसन्नता एवं शांति प्रदान करने वाली परिस्थितियाँ ढूँढते हैं, पर वस्तुतः आनंद का स्थान वही है, जहाँ प्रेमीजन बसते हैं। अपने से प्रेम करने वाले, सहानुभूति रखने वाले, सान्निध्य से प्रसन्नता अनुभव करने वाले स्वजन जहाँ रहते हैं, वहाँ मनुष्य दौड़−दौड़कर जाता है। परदेश में प्रचुर जीविका एवं सुख-सुविधा होते हुए भी कितने ही व्यवसायी अपनी जन्मभूमि के छोटे-से गाँव में पहुँचने को लालायित रहते हैं। अपने प्रियजन जहाँ रहते हैं, वस्तुतः वह स्थान स्वर्ग के समान ही आनंददायक लगता है। जननी जन्मभूमि को स्वर्गादपि गरीयसी कहा गया है। इस आस्था में प्रेमभावना ही एकमात्र आधार है।

आत्मा की सबसे बड़ी श्रेष्ठता प्रेमभावना है। उच्चस्तर पर जिनका अंतःकरण पहुँच चुका है, उन्हें सभी के प्रति ममता एवं आत्मीयता होती है। सभी के प्रति प्यार उमड़ता है। सेवा, दया, करुणा, सहायता, सहयोग, क्षमा, उदारता, दानशीलता जैसी अगणित सत्प्रवृत्तियाँ प्रेमभावना की छायामात्र हैं। जिस अंतःकरण में दूसरों के प्रति प्रेम उमंगेगा, जिसे दूसरे लोग भी अपने आत्मीय लगेंगे, वही तो किसी के साथ उपकार जैसा आचरण कर सकेगा, प्रेम के अभाव में दिखाऊ उदारता या तो किसी को ठगने के लिए होती है या यश प्राप्त करने के लिए। यह दोनों प्रयोजन जहाँ पूरे न होते होंगे, वहाँ झूँठा प्रेम तुरंत बदल जाएगा, किंतु जहाँ प्रेम का निवास ही है, उस अंतःकरण में से सौजन्य की सुगंधि निरंतर स्वयमेव उड़ती रहेगी।

महान व्यक्ति केवल प्रेमी ही हो सकता है। उसी में उच्च गुणों का सुस्थिर स्थायित्व रह सकता है। दूसरे लोग शिष्टाचार की सज्जनता से, मोर जैसी मधुरता से दूसरों को मोहित कर सकते हैं, पर परीक्षा की घड़ियों में उनकी कलई तुरंत खुल जाती है। कठिन अवसरों पर मनुष्य के पैरों को डगमगाने से बचाने और उच्च आदर्शों पर जमाए रखने की शक्ति केवल प्रेम में है। आदर्शों के प्रति, मानवता के प्रति, धर्म के प्रति, प्राणिमात्र के प्रति प्रेम करने वाला ही अपने आपको खतरे में डालकर अपनी मूल्यवान प्रेमभावनाओं को सुरक्षित रख सकता है। नीरस, रूखे और स्वार्थी व्यक्ति दूसरों की पीर क्या जान सकते हैं? और किसी के कष्ट में आँसू बहाने लायक तरलता उनके कठोर मानस में कहाँ से आ सकती है?

उपनिषदों ने इस विश्व में प्रेम के रूप में परमात्मा के दर्शन किए हैं। 'रसों वै स' की घोषणा करते हुए शास्त्र ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रेम ही परमात्मा है। परमात्मा का सजीव मूर्तिमान निवास यदि कहीं देखना हो तो प्रेमी का हृदय ही इसका उपयुक्त स्थान हो सकता है। आत्मा का कायाकल्प प्रेमभावनाओं की रसायनसेवन करने से ही होता है। वह इसे ही पी−पीकर परमात्मा बन जाता है। स्वाति की बूँद सीप के गर्भ में जाकर मोती बन जाती है, आत्मारूपी सीप में जब प्रेम की स्वाति बूँद प्रवेश करती है, तो वहाँ थोड़े ही समय में परमात्मारूपी मोती का दर्शन होता है। धूप की गरमी पाते ही कली खिलकर फूल के रूप में परिणत हो जाती है। आत्मा पर प्रेम का प्रकाश पड़ने से वह परमात्मा के रूप में, महात्मा के रूप में, विश्वात्मा के रूप में विकसित हुई दृष्टिगोचर होने लगती है। आत्मविकास का आधार आखिर प्रेम ही तो है।

परमात्मा को पकड़ने का, वश में करने का, प्रेम के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। भक्ति का अर्थ है— प्रेम। भक्त और प्रेमी दोनों शब्दों का तात्पर्य एक ही है। इस संसार का यह प्रकट रहस्य है कि जिस वस्तु को हम प्रेम करते हैं, वह मिल जाती है। विद्या, धन, स्वास्थ्य, कीर्ति, वासना, विलासिता आदि जो कुछ हमें प्यारा है, उसके लिए प्रयत्न किए जाते हैं और उन प्रयत्नों के पीछे जितना उत्साह, विवेक, श्रम एवं मनोयोग लगता है, उतनी उसमें सफलता भी मिलती है। अध्यात्म जगत में ही यही नियम काम करता है। आत्मकल्याण में, परमात्मा की प्राप्ति में यदि हमारी प्रीति और प्रतीति सच्ची होगी तो उस लक्ष्य की प्राप्ति भी सुनिश्चित ही हो जाएगी।

सकाम उपासना से लाभ नहीं होता, ऐसी बात नहीं है। जब सभी को मजदूरी मिलती है, तो भगवान किसी भजन करने वाले की मजदूरी क्यों न देंगे? जब भौतिक पुरुषार्थों का लाभ मिलता है, तो आध्यात्मिक पुरुषार्थ क्यों निष्फल जाएगा? जितना हमारा भजन होगा, जिस श्रेणी का हमारा भाव होगा, उसके अनुरूप हिसाब चुकाने में भगवान के यहाँ अन्याय नहीं होता; पर यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि व्यापार बुद्धि से किया हुआ भजन, अपने अनुपात से ही लाभ उत्पन्न कर सकता है।

निष्काम भाव से आत्मदान करने वाली पत्नी विवाह के बाद ही पति की विशाल संपत्ति की अधिकारिणी बन जाती है, पर वेश्या को यह लाभ कहाँ मिलता है? वह अपने शरीर का, इतने समय का इतना मूल्य ठहरा लेती है, फिर उसे उतना ही मिलता है। सारे जीवन अनेक पुरुषों को शरीर बेचते रहने पर भी वह उतना नहीं कमा सकती, जितना धर्मपत्नी का एक दिन में ही पति के कमाए हुए पर उत्तराधिकार मिल जाता है। फिर वेश्या का आदर भी किसी की दृष्टि में क्या है? पत्नी के बीमार होने पर पति उसकी चिकित्सा पर अपनी सारी कमाई खरच कर सकता है, अपना रक्त भी दे सकता है, पर वेश्या के बीमार होने पर कौन व्यभिचारी उसके लिए कुछ भी त्याग करने को इच्छुक होगा? भक्ति का वेश्यावृत्ति की तरह नहीं, पतिव्रता की तरह प्रयोग करना चाहिए। भक्तिभावना का, ईश्वर उपासना का मुख्य लाभ भौतिक संपदाएँ जुटाना नहीं, आत्मकल्याण ही है। भक्ति का उद्देश्य मानव अंतःकरण में प्रेमभावना की अभिवृद्धि करना है, जिससे वह महान मानव बनकर अपने चारों ओर सत्यं शिवं सुन्दरं से परिपूर्ण एक दिव्य वातावरण उत्पन्न कर सके।

निष्काम उपासना में दुहरा लाभ है। घट−घटवासी सर्वव्यापी भगवान यह भली प्रकार जानते हैं कि मेरे किस पुत्र को क्या कष्ट है। वे करुणा के सागर अनंत वात्सल्य से ओत-प्रोत हैं, प्राणिमात्र का निरंतर हित-साधन करते हैं, तो फिर अपने भक्तों का क्यों न करेंगे? हम स्वयं नहीं जानते कि हमारा हित किस में और अनहित किस में है? रोगी को क्या पता है कि उसके लिए क्या आहार पथ्य और क्या कुपथ्य है? इसे वैद्य ही जानता है। जो कुछ हमारे लिए आवश्यक है, वह मिलने ही वाला है। उस उपलब्धि को हम परमात्मा पर ही क्यों न छोड़ दें। अपना कर्त्तव्यपालन करने की जिम्मेदारी निबाहते हुए फल का निर्णय उस करुणानिधान पर ही क्यों न छोड़ दें, जो अपनी सहज उदारता से हमें निरंतर बहुत कुछ देता ही रहता है।

सच्चा प्रेम निष्काम भावना की अपेक्षा करता है। स्वार्थपूर्ण प्रेम न संसार में सफल होता है और न आत्मिक क्षेत्र में। उससे न कोई मनुष्य अपना बनता और न परमात्मा। प्रेम का स्वरूप ही निस्वार्थ है। परमात्मा से स्वार्थपूर्ण कामना, मिश्रित नकली प्रेम कहाँ तक निभ सकेगा? जैसे मतलब की दोस्ती जरा−सी बात पर टूट जाती है, वैसे ही सकाम कामना वाली भक्ति में भी स्थायित्व कहाँ होता है? मतलब सिद्ध हो गया तो फिर भक्ति से क्या प्रयोजन? और मतलब न निकला तो फिर पूजा-पाठ में सिर मारने से क्या लाभ? इस प्रकार दोनों ही स्थितियों में स्वार्थपूर्ण भक्ति टूटती है। उसका अंत असफलता में ही होता है।

हमारी साधना आत्मकल्याण के लिए निष्काम और निस्वार्थ भाव से होनी चाहिए। सच्चे प्रेम की सच्ची भक्ति का विकास ही साधना का लक्ष्य है, इससे आत्मकल्याण और लौकिक सुख−शांति का दुहरा लाभ है। हमारे लिए यही श्रेष्ठ एवं श्रेयस्कर है।


गुत्थियों का हल अपने भीतर है।

मनुष्य की आत्मा में एक ऐसा दिव्य प्रकाश मौजूद है, जो यदि आलोकित होने लगे तो वह अपने प्रकाश-क्षेत्र को स्वर्गीय बना सकता है। स्वर्ग और नरक कोई स्थान नहीं, वरन दृष्टिकोण हैं। जब मनुष्य तमोगुणी, तुच्छ, हीन, पतित, पापदृष्टि अपनाकर अपने सोचने और काम करने का ढंग दूषित कर लेता है, तो उसे अपने भीतर जलती हुई चिता जैसी जलन अनुभव होती है और बाहरी जगत में संघर्ष, क्लेश, द्वेष की— रोग, शोक, दारिद्रय, चिंता, भय, पीड़ा, त्रास की    परिस्थितियाँ बिखरी हुई दृष्टिगोचर होती हैं; किंतु यदि दृष्टिकोण उच्चस्तरीय हो, उसमें सात्विकता, प्रेम, दया, करुणा, मैत्री, सेवा, उदारता, क्षमा, आत्मीयता जैसे आदर्शों का समन्वय हो, तो व्यक्ति का अंतःकरण हर घड़ी संतोष, उल्लास, सुख एवं शांति से भरा रहता है। ऐसे व्यक्ति को अपने बाहरी जीवन में भी सर्वत्र सौजन्य, स्नेह, सद्भाव, सहयोग एवं सत्कर्मों का वातावरण ही फैला दीखता है। यों यह दुनियाँ तीन गुणों से बनी है। इसमें भला-बुरा सभी कुछ है। पाप और पुण्य का, देवत्व और असुरता का, दुःख- सुख का, उचित और अनुचित का अस्तित्व यही है, फिर भी व्यक्ति अपने दृष्टिकोण के अनुरूप ही परिस्थितियाँ प्राप्त कर लेता है। भौंरे के लिए इस बगीचे में फूलों की और गुबरीले कीडे़ को गोबर की प्राप्ति हो ही जाती है। संसार बुरा भी है और भला भी। यहाँ न दुष्टों की कमी है और न सज्जनों की, पर यह सब होते हुए भी हमारे दृष्टिकोण का चुंबकत्व अपने आप में एक ऐसा शक्तिशाली तत्त्व है, जो अपने आकर्षण से अपनी जाति की वस्तुओं, आत्माओं एवं परिस्थितियों को खींचकर समीप जमा कर लेता है।

मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसी में फँसी पड़ी रहती है। हम भी अपनी परिस्थितियों की सृष्टि आप करते हैं और उसी में सुख-दुःख अनुभव करते हुए जीवन को हँसते-रोते व्यतीत करते रहते हैं। आमतौर से ऐसा समझा जाता है कि हमारी वर्त्तमान परिस्थितियों के निर्माता कोई और हैं। जब विपरीत या कष्टकारक कोई अवसर सामने आते हैं और उनके निदान की— कारण की ढूँढ-खोज करनी आवश्यक होती है, तब हम यह खोज-बीन अपने भीतर न करके, अपने दोषों पर विचार न करके बाहरी कारणों पर दोषारोपण करते हैं और यह प्रयत्न करते हैं कि दोषी कोई और सिद्ध हो जाए और हम अपने आपको निर्दोष मानकर संतोष कर लेने का कोई बहाना ढूँढ निकालें। हम में से अधिकांश के प्रयत्न ऐसे ही होते हैं, मानवीय बुद्धि भी जादू की पिटारी है, इसे जिधर को लगा दिया जाए, उधर ही अपनी मान्यता के समर्थन में कुछ-कुछ तर्क, प्रमाण, कारण गढ़कर सामने प्रस्तुत कर देती है। फूँस का भेड़िया बनाकर खड़ा कर देने की विद्या में यह जादूगरनी परम प्रवीण है। भीतरी मन जिस बात की आकांक्षा करे, उसके समर्थन में वह कल्पना का एक पूरा महल नहीं, नगर नहीं, संसार ही गढ़ सकती है और छोटे बच्चे की तरह मन को इस प्रकार झुठला सकती है, मानो चंदा मामा को आकाश से उतारकर हथेली पर ही रख दिया हो।

हम में से अधिकांश को इसी भ्रम में भटकना पड़ता है। अपनी गुत्थियों के समाधान का हल खोजते हैं, पर वह मिले कैसे? भूलभुलैया में भटकने वाले दिग्भ्रांत मनुष्य की तरह हम वस्तुस्थिति को समझ कहाँ पाते हैं? जो अपनी कठिनाइयों के कारण को समझें और उसका सही उपाय जानकर उसी के लिए सचेष्ट हों। हमारी मान्यता यह होती है कि हम स्वयं निर्दोष हैं, हम न तो गलती करते हैं और न गलत सोचते हैं, न हमारे अंदर दोष है, न दुर्गुण, न हमें अपने को सुधारने की आवश्यकता है, न संभालने की। जो कुछ खराबी है, सब बाहर वालों में है। वे ही प्रत्येक कठिनाई के जिम्मेदार हो सकते हैं। इस मान्यता के स्थिर होते ही, कुशाग्र बुद्धि वाले वकील की तरह मन अपना काम करना आरंभ कर देता है और मुकदमा चाहे झूठा ही क्यों न हो, उसे जिताने के लिए आकाश-पाताल के कुलावे मिलाना आरंभ कर देता है। देखते-देखते इतने तर्क, इतने प्रमाण, इतने कारण सामने प्रस्तुत हो जाते हैं कि मनुष्य उन्हें ही सत्य मानने लगता है। किसी प्रकार अपनी निर्दोषिता पर आत्मसंतोष करता हुआ थोड़ा चैन पा लेता है।

अनेकों व्यक्ति सोचते हैं कि उन्हें सताया गया है। सताने वाले जो व्यक्ति समझ में आते हैं, उनके प्रति क्रोध, द्वेष और प्रतिहिंसा के भाव उठना स्वाभाविक ही है। यह एक नई जलन अपने कष्टों के साथ और जुड़ जाती है और जले पर नमक छिड़कने की तरह और दुःख देती है। कई बार और भी सरल तरीका समझ में आ जाता है। व्यक्तियों को दोषी न समझकर भाग्य, प्रारब्ध, विधाता, ईश्वर, ग्रह, नक्षत्र, भूत, पलीत आदि को कारण मानकर संतोष कर लेने की भी पद्धति का बहुत प्रचार हो चला है। कारण यह है कि इन विश्वासों के आधार पर मनुष्य को अपनी विवशता स्वीकार करने और द्वेष एवं प्रतिहिंसा से बचने का भी अवसर मिल जाता है। दैव से, भाग्य से, ग्रह-नक्षत्रों से द्वेष करने से भला क्या लाभ? यह सोचकर दुर्बल मानस वाले व्यक्ति भी अपना गम गलत कर सकते हैं।

वस्तुस्थिति सर्वथा भिन्न है। मनुष्य का आंतरिक प्रदेश जिस घटिया या बढ़िया स्तर का होता है, उसे अपने अनुरूप व्यक्तियों, वस्तुओं एवं परिस्थितियों को प्राप्त करने में देर नहीं लगती। भीतरी प्रतिभा जब विकसित होती है, तो उसके प्रकाश से बाहर का सब कुछ जगमगाने लगता है। इतिहास के पृष्ठों पर दृष्टिपात करने पर पता चलता है कि अधिकांश महापुरुष ऐसी अभावग्रस्त एवं हीन परिस्थितियों में उत्पन्न हुए थे, जहाँ स्वाभाविक विकास की गुंजाइश बहुत ही कम थी। यदि उनकी अंतरात्मा प्रबल मनस्वी न रही होती तो उन्हें भी इस संसार के अनेक दीन−हीन व्यक्तियों की तरह भाग्य का रोना रोते हुए जिंदगी के दिन पूरे करने पड़ते, पर हुआ इससे सर्वथा विपरीत। उनने अपनी आंतरिक प्रतिभा के बल पर आगे को कदम बढ़ाए। बढ़ते हुए कदमों को प्रोत्साहित करने वाला दैवी नियम इस संसार के आदि से ही बना हुआ है। कहते हैं कि, 'ईश्वर उनकी सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं।' पुरुषार्थी के आत्मविश्वासी कदम जिस राह पर बढ़ते हैं, उसके रोड़े हटते ही हैं। हिमालय से निकली हुई गंगा की समुद्र से मिलने की प्रदीप्त भावना को हजारों मील भूमि पर बिखरे हुए असंख्य अवरोध कहाँ रोक सके? गंगा की धड़धड़ाती हुई धारा समस्त प्रतिरोधों को कुचलकर समुद्र तक जा ही पहुँचती है। प्रगति के पथ पर बढ़ती हुई आत्मा भी क्योंकर रुकेगी। उसे कौन रोकेगा? हिमालय जैसा उच्च आंतरिक स्तर जिसका होगा और समुद्र जैसे विशाल लक्ष्य की आकांक्षा होगी, उसका मार्ग गंगा की तरह ही प्रशस्त है। उसकी लक्ष्यपूर्ति सर्वथा सुनिश्चित है।

इस संसार में कोई बुराई नहीं है, कोई प्रतिकूलता नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा रहा है और न यही प्रेरणा दी जा रही है कि बाह्य जगत में जो बुराइयाँ एवं त्रुटियाँ हैं, उन्हें सुधारा या बदला न जाए। यह तो करना ही चाहिए, पर साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि सारे संसार को सुधार लेना या इच्छानुकूल बना लेना संभव नहीं है। सारी पृथ्वी पर फैले हुए काँटे नहीं बीने जा सकते, पर अपने पैरों में जूते पहने जा सकते हैं, जिससे काँटों का प्रभाव समाप्त हो जाए। अपना सुधार करना, अपने दृष्टिकोण को परिमार्जित करना जूते पहनकर काँटों से निश्चिंत होने के समान ही है। बाह्य जगत की बुराइयों को सुधारने के लिए भी अपनी उत्कृष्टता आवश्यक है। गरम लोहे को गरम लोहे से नहीं, ठंडे लोहे से ही काटा जा सकता है। कीचड़ को कीचड़ से नहीं, शुद्ध जल से ही धोया जा सकता है। क्रोध को क्रोध से नहीं, शांति से परास्त किया जा सकता है। यदि हम स्वयं मलीन होंगे, बुराइयों से सने होंगे, तो दूसरों का सुधार कैसे कर सकेंगे? यदि हमारी भीतरी उलझनों का जाला तना है, तो बाहर की गुत्थियों को सुलझाया जा सकना किस प्रकार संभव होगा?

इस संसार में अगणित कठिनाइयाँ मौजूद हैं। इस मानव जीवन की अगणित गुत्थियाँ उलझी पड़ी हैं, उनका सुलझाया जाना नितांत आवश्यक है। उलझनों के बीच कठिनाइयों के बीच चैन किसे मिल सकता है? पर इन पहेलियों को सुलझाते हुए हम यह न भूलें कि अधिकांश समस्याओं की जड़ हमारे भीतर है, उनका समाधान भी हमारे अपने ही अंदर मौजूद है। अपने को सुधारना, अपने को बनाना, अपने को बढ़ाना ही वह उपाय है, जिससे दुनियाँ सुधर सकती है। अपनी आकांक्षाओं की दुनियाँ साकार हो सकती है और उन्नति के उस उच्च शिखर पर पहुँचा जा सकता है, जहाँ पूर्णता-ही-पूर्णता है; जहाँ अभाव का, शोक का, भय का, दुःख का एक कण भी शेष नहीं रहता।


विश्वव्यापी विचार−क्रांति के देवदूत

सत्यनिष्ठ सुकरात

सुकरात अत्यंत कुरूप थे। गंजा सिर, चपटी नाक, गोल चेहरा, घुटने तक लटकता हुआ विलक्षण कुरता। इन चिह्नों के आधार पर उन्हें एथेंस की सड़कों पर घूमते हुए आसानी से पहचाना जा सकता था। वे प्रकांड विद्वान और दार्शनिक थे। मानव जीवन की विविध समस्याओं का समाधान पूछने के लिए अनेक शिष्य उसके पीछे−पीछे फिरा करते थे, उनके शिष्यों में से कई बहुत प्रतिभावान भी थे। उन्हीं में से एक प्लेटो भी थे ,जो आगे चलकर विश्वविख्यात हुए।

सुकरात बड़े विनम्र स्वभाव के थे। उन्हें अहंकार छू भी नहीं गया था। उनका जितना आदर उनके ज्ञान के कारण था, उससे अधिक उनकी पत्नी बड़ी कर्कशा थी। उसके कठोर वाक्यबाण सदा ही उन्हें सहने पड़ते थे। फिर भी सुकरात के विनम्र व्यवहार के कारण उनका दाम्पत्य प्रेम शिथिल न होने पाया।

सुकरात ने आत्मज्ञान पर बहुत जोर दिया है। वे कहते थे— अपने को जानो। यदि मनुष्य अपना और धर्म का वास्तविक स्वरूप जान ले, तो अवश्य ही धर्मनिष्ठ बनने की चेष्टा करेगा। सत्य का ज्ञान ही पुण्य और उसका ज्ञान न होना ही पाप है।

उनके स्वतंत्र विचारों ने उस युग की जनता को बहुत प्रभावित किया। समाज के विभिन्न भागों में व्याप्त कलुष-कल्मषों पर उनने प्रहार किया और ऐसी चेतना पैदा की, जिससे निहित स्वार्थों के लोगों में हलचल मच गई। वे उन्हें सताने के षड़यंत्र करने लगे।

उन्हें गिरफ्तार किया गया। मुकदमा चला। उसमें दो अभियोग उन पर लगाए गए। एक यह कि वे देवताओं की अलौकिक शक्ति में विश्वास नहीं करते, दूसरा यह कि उनने तर्क−वितर्क करना सिखाकर युवकों को पथभ्रष्ट किया है। न्यायसभा ने बहुमत से उन्हें अपराधी पाया और मृत्युदंड दिया।

उनने न्यायसभा के सम्मुख स्पष्ट कहा— "मैं मृत्यु के डर से सत्यान्वेषण छोड़ नहीं सकता। मैं अपनी अंतरात्मा और ईश्वर के आदेश का पालन करूँगा। यदि आप इस शर्त पर मुझे छोड़ना चाहते हो कि मैं भविष्य में सत्य का प्रचार न करूँ, तो मुझे यही कहना है कि सत्य को त्यागने की अपेक्षा और उसे प्रकट करने से रुकने की अपेक्षा मुझे शरीर को त्यागना अधिक पसंद है।"

क्रीटो ने उन्हें जेल से भगाने का सारा प्रबंध कर रखा था। उसने अपने गुरु को भाग चलने के लिए अनुरोध किया, तो उनने इनकार कर दिया कि "मुझे राज्य-कानून की अवज्ञा करके एक प्रजाजन के उचित कर्त्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए। इस कीमत पर जीवित रहने की मुझे कोई इच्छा नहीं है।"

मृत्यु का समय निकट आ पहुँचा तो उन्होंने पैरों में पड़ी बेड़ियों के दुखते हुए स्थान को थोड़ा−सा सहलाया और आत्मा के अनश्वर होने की चर्चा आरंभ कर दी। नियत समय पर विष का प्याला सामने आया तो उनने बड़े प्रेम से उसे पिया और रोती हुई शिष्यमंडली को धैर्य का उपदेश करते हुए कहा—‛मैंने जीवन भर आप लोगों को धैर्य रखने और विवेक न खोने के लिए समझाया था। आप उस शिक्षा को क्या मेरे सामने ही भुला देंगे? मनुष्य को धैर्यवान होना चाहिए और शांति के साथ ही मृत्यु का भी आलिंगन करना चाहिए।”

दार्शनिक— कनफ्यूशियस

चीन के महान दार्शनिक कनफ्यूशियस का जन्म ईसा से 550 वर्ष पूर्व हुआ। उनके पिता ने 70 वर्ष की आयु में पुनर्विवाह किया था। उसी की पहली संतान कनफ्यूशियस थे।

शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत 22 वर्ष की आयु में उनने शिक्षक कार्य आरंभ किया। लिखना-पढ़ना सिखाने के लिए तो और भी कितने ही स्कूल थे, पर कनफ्यूशियस तो मनुष्य को मानव जीवन के रहस्य और मर्म समझाने वाला ज्ञान देने के इच्छुक थे। इसी उद्देश्य के लिए उनने अपनी शिक्षण संस्था चलाई। वे अपने शिष्यों को साथ लेकर ज्ञानार्जन के लिए भ्रमण पर भी जाया करते थे और मार्ग में उपस्थित दृश्यों और घटनाओं की व्याख्या करते हुए जीवन के मर्म को समझाया करते थे।

वे मध्यम−मार्ग पर चलने की शिक्षा लोगों को देते थे। वे ‛अति सर्वत्र वर्जयेत्’ सिद्धांत के समर्थक थे। उनका कहना था कि अति की सीमा पर पहुँचकर उत्तम वस्तुएँ भी विकृत हो जाती हैं। सीमा से बाहर हुई श्रद्धा आडंबर के रूप में, सतर्कता भीरुता के रूप में, शक्ति उद्दंडता के रूप में और सरलता मूर्खता के रूप में परिणत हो जाती है। किसी भी विषय में जब मनुष्य संतुलित मात्रा से आगे बढ़ जाता है, तब वह सामंजस्य खो बैठता है और उसके कार्य बेढंगे, हानिकारक तथा दुःखदायक बन जाते हैं, इसलिए मध्यमवृत्ति का जीवनयापन ही सर्वसाधारण के लिए उपयुक्त है।’

वे कहा करते थे— ‟मनुष्य को सत्यनिष्ठ होना चाहिए। सत्य केवल बुद्धि का विषय नहीं, उसे जानने से ही काम न चलेगा, वरन उसकी उपयोगिता तभी है, जब उसे जीवन में व्यवहार किया जाए। निश्चलता और आत्मविश्वास मानव जीवन की सफलता के दो प्रधान सोपान हैं। इनमें कमी आने से ही मनुष्य का अधःपतन होता है। प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि आत्मनिरीक्षण करता रहे और जब भी अपने अंदर त्रुटियाँ दिखाई पड़ें, उनमें बिना संकोच के सुधार करे।” अपने दोषों को ढूँढना और उन्हें निकाल देना, सच्ची वीरता का चिह्न है।

परिपूर्ण जीवन की व्याख्या करते हुए उनने लिखा है कि, "इंद्रियों की तृप्ति और व्यक्तिगत महत्त्वकांक्षा की पूर्ति से नहीं, वरन मानव जीवन की सफलता इस बात में है कि वह अपनी मानसिक और नैतिक दुर्बलताओं पर विचार करे। जिसने अपने जीवन को अनुशासित और संयमित बनाया, उसी का जीवन धन्य है। दुःख और सुख में, सफलता−असफलता में, विपन्नता और संपन्नता में धैर्य, साहस और विवेक से काम लेकर मन की साम्यावस्था को बनाए रहना ही बुद्धिमानी का चिह्न है।"

कनफ्यूशियस धर्मनिष्ठ तो थे, पर अपने आपको धर्मगुरुओं की श्रेणी में कभी सम्मिलित नहीं होने दिया। उनने अपने संबंध में विचार प्रकट करते हुए लिखा है— श्रेष्ठ मनुष्य वह है, जो जैसा कहे, वैसा ही आचरण करे। मैंने जीवन भर यही प्रयत्न किया है कि, "मैं सद्गुण संपन्न एक पूर्ण मनुष्य बनूँ और इसी को मैंने धर्माचरण माना है और इसी के लिए दूसरों को भी शिक्षा दी है।"

उन दिनों साधु संस्थाओं में भ्रष्टाचार फैला हुआ था। वे ब्रह्मचर्य का ढोंग करते थे, पर इंद्रिय संयम रख नहीं पाते थे। इनने इसको व्यर्थ बताया और विवाहित जीवन व्यतीत करते हुए धर्मकार्य करने पर जोर दिया।

वे चाहते थे कि कोई बुद्धिमान शासक उनकी सलाह से राज−काज चलाए, पर जीवन के अंत तक ऐसा कोई शासक उन्हें मिला नहीं। जीवन के अंतिम दिन उन्होंने ग्रंथ लिखने और शिष्यों को पढ़ाने में लगाए। उनका ‘चन चिउ किंग’ ग्रंथ प्रसिद्ध है।

कई राजाओं ने आश्रयवृत्ति देने का प्रस्ताव रखा, पर उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया और गरीबी में दिन काटते रहे। उनके शिष्य जब इस गरीबी से दुखी होते और सहायता का प्रस्ताव करते तो वे कहते—‟उत्कृष्ट पुरुषों को कष्टसाध्य जीवनयापन करने के लिए तैयार रहना चाहिए। निकृष्ट पुरुष इन अवस्थाओं में टिक नहीं पाते और वे शीघ्र ही महापुरुषों के उपयुक्त गरीबी को छोड़कर चले जाते हैं। मुझे अल्पाहार, भूमिशयन और जीर्ण वस्त्रों पर संतोष है। यह पाप की कमाई से प्राप्त हुई विलासिता और धूम−धाम की वाहवाही की अपेक्षा मेरे लिए कहीं उत्तम है।”

चीन के एक अत्याचारी शासक ने कनफ्यूशियस की मृत्यु के दो सौ वर्ष बाद ही उनकी लिखी सब पुस्तकों को जलवा दिया और उनके अनुयायी विद्वानों को फाँसी पर लटकवा दिया, फिर भी उनके सिद्धांत आज भी चीन ही नहीं, सारे संसार में आदर की दृष्टि से देखे जाते हैं।

महान शिक्षक— अरस्तू

मेसीडोन के राजा फिलिप अपने पुत्र को कुछ बनाना चाहते थे। इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की थी कि योग्य गुरु मिले। बहुत तलाश के बाद दार्शनिक अरस्तू इस योग्य दिखाई दिए कि वे किसी बच्चे का निर्माण कर सकते हैं। फिलिप विद्वान और व्यक्तिनिर्माता गुरु का मूल्य समझते थे। उनने अरस्तू के पास अपना संदेशवाहक पत्र लेकर भेजा और लिखा—‟भगवान ने मुझे एक पुत्र दिया है, उसकी मुझे खुशी है, पर उससे अधिक खुशी इस बात की है कि वह इस जमाने में पैदा हुआ, जबकि आप जैसे व्यक्तिनिर्माता दार्शनिक मौजूद हैं। इसे मैं आपके द्वारा ऐसा शिक्षित और सुसंस्कृत बना हुआ देखना चाहता हूँ, जो हमारे कुल को प्रकाशित करे।” अरस्तू ने इसे स्वीकार कर लिया और एक साधारण से राजकुमार को महान सिकंदर बना दिया, जिसका नाम पराक्रमी योद्धाओं के इतिहास में सदा अमर रहेगा।

सघन वृक्षों की छाया में पत्थर की शिला पर बैठाकर अरस्तू शिक्षा दिया करता था, शिष्य चारों ओर उसे घेरकर बैठ जाते थे और जीवन के गूढ़ विषयों पर अनुसंधान चलता रहता था। गुरु अपने शिष्यों को लेकर कभी−कभी घने वृक्ष-कुंजो में, वन-पर्वतों में चले जाते थे और वहाँ नदी-सरोवरों के तट पर बैठकर शिक्षणक्रम चला करता था।

सिकंदर जब शिक्षा प्राप्त करके लौटा तो उसका पिता फिलिप अपने पुत्र के गुणों को देखकर मुग्ध हो गया। उसने अरस्तू के प्रति सच्चे हृदय से कृतज्ञता प्रकट करते हुए सिकंदर से कहा—‟तुम्हारे गुरु का हम अभी तक समुचित सम्मान नहीं कर सके। वे वस्तुतः उच्चतम सम्मान के पात्र हैं। तुम्हारे निर्माण का सारा श्रेय उन्हीं को है।" सिकंदर ने भी एक प्रसंग में अपने उद्गार प्रकट करते हुए कहा—‟पिता से तो मैंने शरीरमात्र प्राप्त किया है। वस्तुतः मेरे पिता तो अरस्तू हैं, जिनने मुझे अनुपम ज्ञान देकर कुछ से कुछ बना दिया।”

सिकंदर ने जो गुण, स्वभाव और चरित्र गुरु के समीप रहकर प्राप्त किया था, उसी के बल पर उसने अनेकों देशों को जीता, विशाल साम्राज्य बनाया और बड़ी−बड़ी सफलताएँ प्राप्त कीं।

शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत सिकंदर ने आजकल के विद्यार्थियों की तरह गुरु की ओर से अपना मुँह नहीं मोड़ लिया, वरन उनके कार्य को प्रगति देने के लिए भरपूर सहायता की। अरस्तू ने एथेंस नगर में लीसियम नामक एक विशाल सांस्कृतिक विद्यालय की स्थापना की, जिसमें हजारों की संख्या में छात्र विद्याध्ययन करते थे। न केवल यूनान में, वरन सारे संसार में वह ज्ञानपीठ एक-से-एक योग्य शिष्य निकाल सकने के कारण प्रख्यात हो गई।

इस लीसियम विद्यापीठ को सिकंदर की सहायता प्राप्त थी। अरस्तू अपने शोधकार्य में लगे थे। वे विभिन्न जीव-जंतुओं की जीवन-प्रणाली के संबंध में खोज कर रहे थे। इस कार्य के लिए अपेक्षित सामग्री तथा कार्यकर्त्ता जुटाने का व्ययभार भी सिकंदर ने अपने ही ऊपर लिया था। अरस्तू का जन्म स्टेगिर नामक गाँव में हुआ था। किसी अत्याचारी शासन ने उसे क्रुद्ध होकर उजाड़ दिया था। वहाँ के निवासी अन्यत्र भाग गए थे। गुरु के सम्मान में सिकंदर ने उस नगर को फिर से बसाया और जो लोग बाहर भाग गए थे, उन्हें सब प्रकार की सहायता देकर वापिस उस नगरी में बसाया। शिष्य अपने गुरु की नगरी को उजड़ी हुई नहीं देख सकता था।

इटली के प्रसिद्ध कवि दांते ने अरस्तू को विद्वानों का अग्रतम नेता कहा। वह अपने समय का विचार सम्राट था। उसके शब्दों के साथ उसका चरित्र भी बोलता था। लगभग सवा दो हजार वर्ष उसके समय को बीते हो गए। फिर भी वह आज तक मानव जीवन के विभिन्न विचार-क्षेत्रों को प्रभावित करता है।

अरस्तु अपने शिष्यों के चरित्रगठन के लिए बहुत जोर देकर आदेश दिया करते थे। एक बार सिकंदर का किसी स्त्री से अनुचित संबंध हो गया। अरस्तू उसे झिड़कते थे, पर वह मानता न था। उस स्त्री को पता चला कि अरस्तू उसके मार्ग में काँटा है, इसलिए उसे बदनाम करके सिकंदर से शत्रुता करा देनी चाहिए। वह स्त्री एक दिन अरस्तू के पास पहुँची और एकांत में मिलने के लिए प्रस्ताव किया। अरस्तू ने स्वीकार कर लिया और जिस उद्यान में उन्हें बुलाया गया था, वहाँ नियत समय पर जा पहुँचा।

अरस्तू ने अपने शिष्यों के द्वारा सिकंदर तक भी यह सूचना पहुँचा दी थी, पर सूचना अरस्तू ने कहलवाई है, यह न बताने का आदेश कर दिया था। सिकंदर छिपा हुआ टोह में बैठा ही था। वह तरुणा आई। उसने अरस्तू के गले में हस्तपाश डाले और कहा— क्या हो, अच्छा हो कुछ देर खेलें। अरस्तू ने स्वीकृति दे दी। युवती ने उन्हें घोड़ा बनाया और खुद उनकी पीठ पर बैठकर चलाने लगी। बूढ़ा घोड़ा लड़की को पीठ पर बिठाकर घुटनों के बल चल रहा था कि सिकंदर सामने आ पहुँचा। उसने क्रोध में आकर कहा— गुरुजी यह क्या?

अरस्तू ने अविचल भाव से धैर्यपूर्वक कहा— बेटा पहले ही मैं कहा करता था। देखते नहीं, मुझ जैसे विद्वान और बूढ़े को जो माया इस तरह घुटनों के बल चलने को विवश कर सकती है, वह तुम जैसे अपरिपक्व बुद्धि के नौजवानों को तो पेट के बल रेंगाकर और नाक रगड़ाकर ही दम लेगी। यदि तुम इस मार्ग से मुँह न मोड़ोगे तो इतिहास में नाम अंकित न करा सकोगे। अरस्तू के इस शिक्षण ने सिकंदर पर भारी प्रभाव डाला और तब से उसने उस ओर से मुँह ही मोड़ लिया।

कुछ विद्वानों का कथन है कि अरस्तू ने चार सौ ग्रंथ लिखे। कोई−कोई उनकी संख्या एक हजार बताते हैं। उसके सभी ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं, पर जो उपलब्ध हैं, उनसे पता चलता है कि उसे तर्कशास्त्र, खगोल विद्या, भौतिकी, विकास, कामशास्त्र, वायु विज्ञान, प्रकृति विद्या, जंतुशास्त्र, काव्य, अलंकार, मनोविज्ञान, राजनीति, आचारशास्त्र, दर्शन, अध्यात्म आदि अनेक विषयों का अगाध ज्ञान था।

अरस्तू आत्मोन्नति के लिए सामाजिक और सामूहिक जीवन को आवश्यक मानता था और एकाकी जीवन या एकांतवास के विरुद्ध था। उसने लिखा है— एकाकी जीवन व्यतीत करने के लिए या तो मनुष्य को पशु बनना पड़ेगा या देवता।

बौद्धिक क्रांति का अग्रदूत— रूसो

जीन मैक्यूस रूसो बंदूक चलाना नहीं जानता था, पर उसने लेखनी पकड़कर वह काम कर दिखाया, जो बंदूकों और तोपों से भी हो सकना कठिन है। रूसो का बाप मामूली-सा घड़ीसाज था। जून 1712 में वह जेनेवा में जन्मा। जन्म के साथ ही उसकी माँ मर गई। बाप शोकसंतप्त होकर घर-गाँव ही छोड़ गया। उसके चाचा ने किसी तरह पाला। प्रकृति से लड़ता हुआ बालक किसी प्रकार बड़ा हुआ। अनेक कठिनाइयों से लड़ता हुआ, अनेकों चारित्रिक दुर्बलताओं के चंगुल में उलझता−सुलझता यह बालक लेखक बना। उसने गणराज्य के सिद्धांत का प्रतिपादन किया। आज संसार में अधिकांश देश प्रजातंत्र के सिद्धांत को अपनाकर राज−काज चला रहे हैं। इस आदर्श का आविष्कर्त्ता होने का श्रेय रूसो को ही मिला है।

सर्वप्रथम उसी ने ‘जनता के प्रभुत्व’ सिद्धांत की घोषणा की। “राजा तो प्रजा का सेवक है, स्वामी नहीं, जनता की इच्छा के विरुद्ध किसी को उस पर शासन करने का अधिकार नहीं है। जैसे कोई मालिक अपने अयोग्य और दुष्ट नौकर को बदल देता है, उसी प्रकार प्रजा को अधिकार है कि अयोग्य या अत्याचारी शासक को बदल दे। प्रजा ही राष्ट्र का देवता है, उसकी आवाज ईश्वर की आवाज है। उसे दबाने वाले शासक को कठोर दंड मिलना चाहिए।” इन सिद्धांतों के पक्ष में अनेक ग्रंथ लिखे और जनता के मस्तिष्क को, इन विचारों को हृदयंगम करने के लिए तैयार किया।

इस विचार-क्रांति का ही परिणाम था कि अनेक देशों की प्रजाओं ने अपने अत्याचारी राजाओं के विरुद्ध बगावत कर दी। फ्रांस के राजा लुई को उसके सारे परिवार के साथ फाँसी पर लटका दिया गया और प्रजातंत्र की स्थापना हुई। फ्रांस की राजक्रांति का असर इंग्लैंड पर पड़ा। वहाँ के राजा के सारे अधिकार छीन लिए गए। आज इंग्लैंड का राजा नाममात्र का ही राजा होता है। फ्रांस की क्रांति से कुछ समय पूर्व अमेरिका की क्रांति हो चुकी थी, पर उसका नया संविधान बना तो उस पर रूसो के सिद्धांतों की ही छाप थी। वहाँ भी प्रजातंत्र ही स्थापित हुआ। आयरलैंड का स्वाधीनता संग्राम इन्हीं विचारों की देन था। संसार के अनेकों देशों ने उसके सिद्धांतों से प्रेरणा ली और कहीं हिंसात्मक, कहीं अहिंसात्मक क्रांतियाँ करके उन शासकों को हटाया, जो प्रजा को अपनी संपत्ति मानकर उस पर मनमाने अत्याचार करते थे। भारत में हम जिस प्रजातंत्र का सुख भोग रहे हैं, वह यद्यपि प्राचीनकाल में भी किसी रूप में मौजूद था, पर इस युग में उसका स्पष्ट रूप बड़े आकर्षक और प्रभावशाली ढंग से उपस्थित करने का श्रेय रूसो को ही है। उसने अपनी कलम के जादू से ही लाखों-करोड़ों मनुष्यों के मस्तिष्क बदल दिए और जो स्वप्न उसने देखे थे, उन्हें साकार बना दिया। उसकी लेखनी बड़े−बड़े दिग्विजयी चक्रवर्ती सम्राटों की तलवार से भी अधिक बलवान सिद्ध हुई।

बेचारा रूसो व्यक्तिगत जीवन की समस्याओं को सुलझाने के लिए जीवन भर संघर्ष करता रहा, पर वह उसमें सफल न हो सका। मृत्यु के समय उसकी पत्नी भी उसे छोड़कर चली गई थी। निराशा और अंधकार की घड़ियों में उसने प्राण त्यागे। संसार में उसका कोई अपना सिद्ध न हुआ। वह दुखी मरा। वह अपने व्यक्तिगत जीवन को असफल बताया करता था, फिर भी उसकी लेखनी ने करोड़ों प्राणियों को मानवोचित शासन प्राप्त करने के लिए जो प्रेरणा दी, उसके लिए मानव जाति उसकी सदा कृतज्ञ रहेगी और उसका जीवन सफल ही माना जाता रहेगा।


समय का सदुपयोग

जीवन का महल समय की— घंटे-मिनटों की ईंटों से चुना गया है। यदि हमें जीवन से प्रेम है तो यही उचित है कि समय को व्यर्थ नष्ट न करें। मरते समय एक विचारशील व्यक्ति ने अपने जीवन के व्यर्थ ही चले जाने पर अफसोस प्रकट करते हुए कहा— 'मैंने समय को नष्ट किया, अब समय मुझे नष्ट कर रहा है।'

खोई हुई दौलत फिर कमाई जा सकती है। भूली हुई विद्या फिर याद की जा सकती है। खोया हुआ स्वास्थ्य चिकित्सा द्वारा लौटाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय किसी प्रकार नहीं लौट सकता, उसके लिए केवल पश्चात्ताप ही शेष रह जाता है।

जिस प्रकार धन के बदले में अभीष्ट वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं, उसी प्रकार समय के बदले में भी विद्या, बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, आरोग्य, सुख, शांति, मुक्ति आदि जो भी वस्तु रुचिकर हो, खरीदी जा सकती है। ईश्वर ने समयरूपी प्रचुर धन देकर मनुष्य को पृथ्वी पर भेजा है और निर्देश किया है कि इसके बदले में संसार की जो भी वस्तु रुचिकर समझे खरीद ले; किंतु कितने व्यक्ति हैं, जो समय का मूल्य समझते और उसका सदुपयोग करते हैं? अधिकांश लोग आलस्य और प्रमाद में पड़े हुए जीवन के बहुमूल्य क्षणों को यों ही बर्बाद करते रहे हैं। एक−एक दिन करके सारी आयु व्यतीत हो जाती है और अंतिम समय वे देखते हैं कि उन्होंने कुछ भी प्राप्त नहीं किया, जिंदगी के दिन यों ही बिता दिए। इसके विपरीत जो जानते हैं कि समय का नाम ही जीवन है, वे एक−एक क्षण को कीमती मोती की तरह खरच करते हैं और उसके बदले में बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं। हर बुद्धिमान व्यक्ति ने बुद्धिमत्ता का सबसे बड़ा परिचय यही दिया है कि उसने जीवन के क्षणों को व्यर्थ बर्बाद नहीं होने दिया। अपनी समझ के अनुसार जो अच्छे-से-अच्छा उपयोग हो सकता था, उसी में उसने समय को लगाया। उसका यही कार्यक्रम अंततः उसे इस स्थिति तक पहुँचा सका, जिस पर उसकी आत्मा संतोष का अनुभव करे।

प्रतिदिन एक घंटा समय यदि मनुष्य नित्य लगाया करे, तो उतने छोटे समय से भी वह कुछ ही दिनों में बड़े महत्त्वपूर्ण कार्यं पूरे कर सकता है। एक घंटे में चालीस पृष्ठ पढ़ने से महीने में बारह सौ पृष्ठ और साल में करीब पंद्रह हजार पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं, यह क्रम दस वर्ष जारी रहे, तो डेढ़ लाख पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं। इतने पृष्ठों में कई सौ ग्रंथ हो सकते हैं। यदि वे एक ही किसी विषय के हों तो वह व्यक्ति उस विषय का विशेषज्ञ बन सकता है। एक घंटा प्रतिदिन कोई व्यक्ति विदेशी भाषाएँ सीखने में लगावे तो वह तीस वर्ष में संसार की सब भाषाओं का ज्ञाता बन सकता है। एक घंटा प्रतिदिन व्यायाम में कोई व्यक्ति लगाया करे तो अपनी आयु को पंद्रह वर्ष बढ़ा सकता है।

संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के प्रख्यात गणित आचार्य चार्ल्स फास्ट ने प्रतिदिन एक घंटा गणित सीखने का नियम बनाया था और उस नियम पर अंत तक डटे रहकर ही इतनी प्रवीणता प्राप्त की।

ईश्वरचंद विद्यासागर समय के बड़े पाबंद थे। जब वे कालेज जाते तब रास्ते के दुकानदार अपनी घड़ियाँ उन्हें देखकर ठीक करते थे। वे जानते थे कि विद्यासागर कभी एक मिनट भी आगे पीछे नहीं चलते।

एक विद्वान ने अपने दरवाजे पर लिख रखा था। “कृपया बेकार मत बैठिए। यहाँ पधारने की कृपा की है तो मेरे काम में कुछ मदद भी कीजिए।” साधारण मनुष्य जिस समय को बेकार की बातों में खरच करते रहते हैं, उसे विवेकशील लोग किसी उपयोगी कार्य में लगाते हैं। यही आदत है, जो सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों को भी सफलता के उच्च शिखर पर पहुँचा देती है। माजार्ट ने हर घड़ी उपयोगी कार्य में लगे रहना अपने जीवन का आदर्श बना लिया था। वह मृत्यु शय्या पर पड़ा−पड़ा भी कुछ करता रहा। रैक्यूयम नामक प्रसिद्ध ग्रंथ उसने मौत से लड़ते−लड़ते पूरा किया।

ब्रिटिश कामनवेल्थ और प्रोटेक्टरेट के मंत्री का अत्यधिक व्यस्त उत्तरदायित्व वहन करते हुए मिल्टन ने पैराडाइज लाॅस्ट की रचना की। राज-काज से उसे बहुत कम समय मिल पाता था, तो भी जितने कुछ मिनट वह बचा पाता, उसी में उस काव्य की रचना कर लेता। ईस्ट इंडिया हाउस की क्लर्की करते हुए जान स्टुअर्ट मिल ने अपने सर्वोत्तम ग्रंथो की रचना की। गैलीलियो दवादारू बेचने का धंधा करता था तो भी उसने थोड़ा−थोड़ा समय बचाकर विज्ञान के महत्त्वपूर्ण आविष्कार कर डाले।

हेनरी किरक व्हाइट को समय का बड़ा अभाव रहता था, पर घर से दफ्तर तक पैदल आने और जाने के समय का सदुपयोग करके उसने ग्रीक भाषा सीखी। फौजी डाॅक्टर बरने का अधिकतर समय घोड़े की पीठ पर बीतता था। उसने उस समय को भी व्यर्थ न जाने दिया और रास्ता पार करने के साथ−साथ उसने इटेलियन और फ्रेंच भाषाएँ भी पढ़ लीं। यह याद रखने की बात है कि— परमात्मा एक समय में एक ही क्षण हमें देता है और दूसरा क्षण देने से पूर्व उस पहले वाले क्षण को छीन लेता है। यदि वर्त्तमानकाल में उपलब्ध क्षणों का हम सदुपयोग नहीं करते तो वे एक−एक करके हमसे छिनते चले जाएँगे और अंत में खाली हाथ ही रहना पड़ेगा।

एडवर्ड बटलर लिटन ने अपने एक मित्र को कहा था— लोग आश्चर्य करते हैं कि मैं राजनीति तथा पार्लियामेंट के कार्यक्रमों में व्यस्त रहते हुए भी इतना साहित्य कार्य कैसे कर लेता हूँ? साठ ग्रंथों की रचना मैंने कैसे कर ली? पर इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। यह नियमित दिनचर्या का चमत्कार है। मैंने प्रतिदिन तीन घंटे का समय पढ़ने और लिखने के लिए नियत किया हुआ है। इतना समय मैं नित्य ही किसी-न-किसी प्रकार अपने साहित्यिक कार्यों के लिए निकाल लेता हूँ। बस इस थोड़े से नियमित समय ने ही मुझे हजारों पुस्तकें पढ़ डालने और साठ ग्रंथों के प्रणयन का अवसर ला दिया।

घर-गृहस्थी की अनेकों झंझटों और बाल-बच्चों की साज-सँभाल में दिन भर लगी रहने वाली महिला हेरेट वीवर स्टोव ने गुलाम प्रथा के विरुद्ध आग उगलने वाली वह पुस्तक ‘टाम काका की कुटियाँ’ लिखकर तैयार कर दी, जिसकी प्रशंसा आज भी बेजोड़ रचनाओं में की जाती है।

चाय बनाने के लिए पानी उबालने में जितना समय लगता है, उसमें व्यर्थ बैठे रहने की बजाय लाँग फैलो ने ‘इनफरलो’ नामक ग्रंथ का अनुवाद करना शुरू किया और नित्य इतने छोटे समय का उपयोग इस कार्य के लिए करते रहने से उसने कुछ ही दिन में वह अनुवाद पूरा कर लिया।

इस प्रकार के अगणित उदाहरण हमें अपने चारों ओर बिखरे हुए मिल सकते हैं। हर उन्नतिशील और बुद्धिमान मनुष्य की मूलभूत विशेषताओं में एक विशेषता अवश्य मिलेगी— समय का सदुपयोग। जिसने इस तथ्य को समझा और कार्यरूप से उतारा, उसने ही यहाँ आकर कुछ प्राप्त किया है। अन्यथा तुच्छ कार्यों में आलस्य और उपेक्षा के साथ दिन काटने वाले लोग किसी प्रकार साँसें तो पूरी कर लेते हैं, पर उस लाभ से वंचित ही रह जाते हैं, जो मानव जीवन जैसी बहुमूल्य वस्तु प्राप्त होने पर उपलब्ध होना चाहिए, या हो सकता था।


सिख धर्म के गृहस्थ गुरु

किसी व्यक्ति के उच्च आध्यात्मिक भूमिका तक पहुँचने में, जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने में गृहस्थ धर्म बाधक नहीं है। गृही और विरक्त दोनों ही स्थिति में रहकर ईश्वर उपासना और आध्यात्मिक साधना की जा सकती है। इन दोनों मार्गों में से जिसे जो अनुकूल जँचा है, उसे उसने स्वीकार किया है। प्राचीनकाल में अनेकों ऋषि गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए साधनासंलग्न रहे और बहुतों ने एकाकी जीवन को सुविधाजनक समझकर ब्रह्मचारी या संन्यासी रहकर आत्मिक प्रगति की।

आंतरिक विकास का संबंध भावना की उत्कृष्टता से है। सत्यनिष्ठा, सदाचार, दया, निष्पृहता, अनासक्ति, निरहंकारिता, ईश्वर-उपासना, परमार्थ भावना आदि सद्वृत्तियों को अपनाने से किसी भी वर्ण आश्रम में रहते हुए मनुष्य लक्ष्य तक पहुँच सकता है। इनके अभाव में वेश धारण कर लेने या घर त्याग देने, अविवाहित रहने जैसी बाह्य-प्रक्रियाओं के ही आधार पर कोई लक्ष्य प्राप्त करना चाहें तो संभव नहीं।

संतों के कई संप्रदाय ऐसे हैं, जिनमें पत्नी न रखने का विधान है, पर कई संप्रदाय ऐसे भी हैं, जिनमें गृहस्थ जीवन पर कोई प्रतिबंध नहीं है। सिख धर्म भी उन्हीं सम्प्रदायों में से एक है। जिसके गुरुओं और संतों ने गृहस्थ धर्म में रहकर आत्मकल्याण और लोकसेवा का महत्त्वपूर्ण उदाहरण उपस्थित किया है।

सिख धर्म के संस्थापक और आदिगुरु नानक का विवाह 19 वर्ष की आयु में हुआ। गृहस्थ होने पर भी वे विरक्त की भाँति भावनाएँ रखे रहे। उनके दो पुत्र हुए। प्रथम उदासोमत के प्रवर्त्तक श्री चंद जी और दूसरे लक्ष्मी दास।

दूसरे गुरु अंगद देव भी गृहस्थ थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम जीवी था। जिससे चार संतान हुई, दो पुत्र तथा दो कन्याएँ।

तीसरे गुरु अमर दास जी हुए हैं, उनकी धर्मपत्नी का नाम राम कुँवर था। उनकी भी चार संतानें थीं। दो कन्याएँ, दो पुत्र।

चौथे गुरु राम दास जी का विवाह गुरु अमर दास जी की कन्या भानी कुँवर से हुआ। उनके तीन पुत्र हुए, पृथ्वी चंद्र, महादेव और अर्जुन देव। सबसे छोटे पुत्र अर्जुन देव को उन्होंने अपनी गद्दी सौंपी।

पाँचवें गुरु अर्जुन देव जी के दो विवाह हुए। पहला मोड़ गाँव के चंदन दास खत्री की कन्या राम देवी जी के साथ, दूसरा कृष्णा चंद की पुत्री गंगा देवी के साथ। प्रथम स्त्री से कोई संतान नहीं थी। दूसरी से भी कई वर्षों तक संतान नहीं हुई। अंत में गंगा देवी के गर्भ से एक बालक जन्मा— हरगोविंद सिंह, सिख धर्म के वे ही छठवे गुरु बने।

छठवे गुरु हरगोविंद जी के तीन विवाह हुए। पहला उल्ले गाँव में नारायण दास की पुत्री दामोदरी के साथ। दूसरा अमृतसर निवासी हरि चंद की पुत्री नानकी के साथ। तीसरा मंदियाली के दयाराम की पुत्री महादेवी के साथ। प्रथम पत्नी से पुत्र गुरुदित्ता और कन्या बीवी वीरोजीथी। द्वितिय पत्नी से तेग बहादुर और तीसरी पत्नी से तीन पुत्र सूरज मल, हरराम और अटल जी जन्मे। इस प्रकार गुरु हरगोविंद जी की तीन पत्नियों से पाँच पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। इसके साथ ही गुरुजी के एक और विवाह का भी पता लगता है। एक मुसलमान काजी की कन्या कौल्ला उनके पास किसी प्रकार आ गई। वह बड़ी रूपवती और बुद्धिमती थी। गुरु साहब उस पर बहुत अनुराग रखते थे। गुरु साहब ने उसके नाम पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास एक सरोवर बनवा दिया और उसका नाम कौलसर रखा। गुरु हरगोविंद जी अपने पौत्र— गुरुदत्त के पुत्र हरराय से विशेष प्रेम रखते थे। अंततः उन्होंने उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी बनाया।

सातवें गुरु हरराय का विवाह सं॰ 1704 में दयाराम की पुत्री कृष्ण कौर से हुआ। उससे दो पुत्र हुए, रामराय और हरकिशन। अपने छोटे पुत्र हरकिशन को उन्होंने अपना उत्तराधिकारी घोषित किया। तब वे केवल पाँच वर्ष के थे। गुरुगद्दी प्राप्त करने के तीन वर्ष बाद ही आठ वर्ष की आयु में वे स्वर्गवासी हो गए; इसलिये उनका विवाह न हो सका। इस प्रकार आठवें गुरु हरकिशन जी अविवाहित ही स्वर्गवासी हुए।

नौवें गुरु तेगबहादुर जी का विवाह सं॰ 1686 में लाल चंद की पुत्री गुजरी जी से हुआ। उनके पुत्र गुरु गोविंद सिंह सं॰ 1713 में जन्मे।

दसवें गुरु गोविंद सिंह की दो पत्नियाँ थीं। उनका बड़ा पुत्र अजीत सिंह मुसलमान आक्रमणकारियों के साथ लड़ता हुआ वीरगति को प्राप्त हुआ। दूसरे पुत्र जुझार सिंह ने भी इसी प्रकार वीरगति प्राप्त की। दो छोटे पुत्र जोरावर सिंह और फतेह सिंह मुसलमानों द्वारा पकड़े गए और उन्हें जीवित ही दीवार में चिनवाकर मारा गया। इस प्रकार दसवें गुरु गोविंद सिंह जी के चारों पुत्र धर्म के लिए बलिदान हो गए।

इस प्रकार दसों गुरुओं की परंपरा गृहस्थ धर्म की है। यह उचित एवं युगधर्म के सर्वथा अनुकूल भी है। विरक्त जीवन जनसमाज से सर्वथा दूर जंगलों में एकाकी रहने वाले महात्माओं के लिए अनुकूल हो सकता है, पर यदि वे जनसंपर्क में आते हैं, तो उनके चारित्रिक पतन की भारी संभावना रहती है, जैसी कि आजकल आमतौर से देखी जाती है। आत्मकल्याण के जो पथिक जनसंपर्क से दूर नहीं रह सकते हैं, उनके लिए गृहस्थ धर्म ही उपयुक्त है। इस दृष्टि से सिख गुरुओं ने एक अनुकरणीय परंपरा की स्थापना की है।


जीवन की सर्वश्रेष्ठ विभूति— ज्ञान

ज्ञान को आत्मा का नेत्र कहा गया है। नेत्रविहीन व्यक्ति के लिए सारा संसार अंधकारमय है। इसी प्रकार ज्ञानविहीन व्यक्ति के लिए इस संसार में जो कुछ उत्कृष्ट है, उसे देख सकना असंभव है। ज्ञान के आधार पर ही धर्म का, कर्त्तव्य का, शुभ-अशुभ का, उचित-अनुचित का विवेक होता है और पाप-प्रलोभनों, के आकर्षणों के पार यह देख सकना संभव होता है कि अंततः दूरवर्त्ती हित किसमें है। अज्ञानी व्यक्ति यह सब जान नहीं पाते। इंद्रियों की वासना और प्रलोभनों की तृष्णा जीव को मनमाना नाच नचाती रहती हैं और अंत में उसे पतन के गहरे गर्त्त में धकेल देती है। इस दुर्दशा से बचाव तभी हो सकता है, जब ज्ञानदीपक का प्रकाश हो रहा हो और विवेक के नेत्र खुले हुए हों।

भौतिक जीवन की सफलता और आत्मिक जीवन की पूर्णता के लिए सबसे प्रथम सोपान ज्ञान की प्राप्ति है। स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन के आधार पर जीवन की गुत्थियों को समझना और उन्हें सुलझाने का मार्ग खोजना संभव होता है; इसलिए मनीषियों ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि मनुष्य को ज्ञानवान बनना चाहिए। अत्यंत आवश्यक कार्यक्रमों में एक कार्यक्रम ज्ञान-संपादन का भी रहना चाहिए।

स्कूली शिक्षा ‘ज्ञान’ की श्रेणी में नहीं आती। वह ज्ञानप्राप्ति के लिए एक साधनमात्र है, क्योंकि भाषाज्ञान के बिना शास्त्रों का स्वाध्याय नहीं हो सकता। कठिन अभिव्यक्तियों को समझा नहीं जा सकता; इसलिए शिक्षा की भी आवश्यकता एवं उपयोगिता माननी ही पड़ेगी। ज्ञान का स्तर इससे ऊपर है। स्वाध्याय, सत्संग यह दो ज्ञानप्राप्ति के बाह्य उपाय हैं और चिंतन-मनन यह आंतरिक उपाय हैं। इन चारों चरणों से मिलकर सर्वांगपूर्ण ज्ञान साधना बनती है और उसी के आधार पर जीव अपने लक्ष्य-मार्ग की ओर गतिशील होता है।

भगवान राम ने जब गुरु वाशिष्ठ जी से सांसारिक क्लेशों के भवबंधन से छुटकारे का उपाय पूछा, तो उन्होंने यही कहा कि ,"यह सब बिना ‘ज्ञानप्राप्ति' के संभव नहीं। यदि भवसागर से पार होने की इच्छा है, तो सबसे प्रथम ज्ञानसंचय का प्रयत्न करो। योगवाशिष्ठ में इस संबंध में बहुत बल दिया गया है।

ज्ञानान्निर्दुःखतामेति ज्ञानादज्ञान संक्षयः।

ज्ञानादेवपरासिद्धिर्नान्यस्माद्राम वस्तुतः॥

योगवाशिष्ठ 5।88। 12

हे राम, ज्ञान से ही दुःख दूर होते हैं, ज्ञान से अज्ञान का निवारण होता है, ज्ञान से ही परम सिद्धि प्राप्त होती है और किसी उपाय से नहीं।

ज्ञानावानेव सुखवान् ज्ञानवानेव जीवति।

ज्ञानवानेव बलवास्तस्माज्ज्ञान भयोभव॥

योगवाशिष्ठ 5।92।49

ज्ञानी ही सुखी है, ज्ञानी ही जीवित है, ज्ञानी ही बलवान है, इसलिए ज्ञानी बनना चाहिए।

यथा दीपः प्रकाशात्मा स्वल्पोवा यदि वा महान्।

ज्ञानात्मानं तथा विद्यादात्मानं सर्व जन्तुषु॥

जैसे छोटा या बड़ा दीपक प्रकाशवान ही होता है, वैसे ही सब छोटे-बड़े प्राणियों की आत्मा भी ज्ञान रूप ही है।

ज्ञानमेव परं ब्रह्मज्ञानं वन्घाय चेष्यते।

ज्ञानात्मकमिदं विश्वं न ज्ञानाद्विद्यते परम्।

ज्ञान से ही ब्रह्म प्राप्ति होती है, विपरीत ज्ञान से ही बंधन बँधाते हैं, इस संसार में जो कुछ है, ज्ञानात्मक ही है। ज्ञान से परे कुछ भी नहीं है।

अस्य देवाधि देवस्य परमात्मनः।

ज्ञानादेव परा सिद्धिर्नत्वनुष्ठान दुःखतः॥

योगवाशिष्ठ 3। 6।1

उस परमदेव परमात्मा को ज्ञान द्वारा ही प्राप्त किया जाता है और किसी अनुष्ठान से उसकी प्राप्ति संभव नहीं।

एकेनैवाऽमृतेनैव बोधेन स्वेन पूज्यते।

एतदेव परंध्यानं पूजैषैव परा स्मृता॥

योगवाशिष्ठ 6।38।25

उस आत्मा की एक ही प्रकार से ज्ञान द्वारा पूजा की जाती है। ध्यान ही उस आत्म देवता का सबसे बड़ा पूजन है।

अत्रज्ञानमनुष्ठानं न त्वन्यदुप युज्यतो।

योगवाशिष्ठ 3।6। 2

मुक्ति प्राप्त करने के लिए ज्ञान ही एकमात्र उपाय है। दूसरा और कोई नहीं।

ज्ञानादेव परासिद्धिर्नत्वनुष्ठान दुःखतः।

योगवाशिष्ठ 3।6।1

परम सिद्धि ज्ञान से ही प्राप्त होती है और किसी अनुष्ठान से नहीं।

ज्ञानावादुनिता नन्दो न क्वचित्परिमज्जति।

योगवाशिष्ठ 5। 93।24

ज्ञानी ही परम आनंद प्राप्त करता है, वही पार होता है।

ततो वच्मि महावाहो यथाज्ञानेतरा गतिः।

नास्ति संसार तरणे पाशबन्धनस्य चेतसः॥

योगवाशिष्ठ 5। 67।2

बंधन में पड़े हुए तन को मुक्त करने और संसार सागर से तरने के लिए ज्ञान के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।

ज्ञानयुक्ति प्लवेनैव संसाराब्धिं सुदुस्तरम्।

महाधियः समुत्तीर्णा निमेषण रघूद्वह॥

योगवाशिष्ठ 2।11। 36

संसाररूपी समुद्र को बुद्धिमान लोग ज्ञानरूपी नौका पर सवार होकर आसानी से पार कर जाते हैं।

संसारोत्तरणे जन्तो रुपायो ज्ञानमेवहि।

तपो दानं तथा तीर्थमनुपायाः प्रकीर्तिताः॥

—योगवाशिष्ठ

संसार से पार होने का एकमात्र उपाय ज्ञान ही है। तप, दान,तीर्थ आदि उपाय नहीं।

दुरुत्तरा याविपदो दुःख कल्लोह संकुलाः।

तीर्यते प्रज्ञया ताभ्योनानाऽपद्भयो महामते॥

योगवाशिष्ठ 5।12।20

विभिन्न प्रकार की कठिन विपत्तियों के समुद्र को ज्ञान द्वारा ही तरा जाता है।

कलना सर्व जन्तूनां विज्ञाने न शमेन च।

प्रबुद्धा ब्रह्म तामेति भ्रमतीतरथा जगत्॥

योगवाशिष्ठ 5।13।59

ज्ञान और शम के द्वारा ही प्राणी ब्रह्मरूप हो जाता है। इनके अभाव से वह संसार में भटकता ही रहता है।


विचारणीय और मननीय

कर्म करो तभी मिलेगा।

कौरवों की राजसभा लगी हुई है। एक ओर कोने में पांडव भी बैठे हैं। दुर्योधन की आज्ञा पाकर दुःशासन उठता है और द्रौपदी को घसीटता हुआ राजसभा में ला रहा है। आज दुष्टों के हाथ उस अबला की लाज लूटी जाने वाली है। उसे सभा में नग्न किया जाएगा। वचनबद्ध पांडव सिर नीचा किए बैठे हैं।

द्रौपदी अपने साथ होने वाले अपमान से दुखी हो उठी। उधर सामने दुष्ट दुःशासन आ खड़ा हुआ। द्रौपदी ने सभा में उपस्थित सभी राजों-महाराजों, पितामहों को रक्षा के लिए पुकारा, किंतु दुर्योधन के भय से और उसका नमक खाकर जीने वाले कैसे उठ सकते थे। द्रौपदी ने भगवान को पुकारा अन्तर्यामी घट−घटवासी कृष्ण दौड़े आए कि आज भक्त पर भीर पड़ी है। द्रौपदी को दर्शन दिया और पूछा किसी को वस्त्र दिया हो तो याद करो? द्रौपदी को एक बात याद आई और बोली—‟भगवान् एक बार पानी भरने गई थी तो तपस्या करते हुए ऋषि की लंगोटी नदी में बह गई, तब उसे धोती में से आधी फाड़कर दी थी। कृष्ण भगवान ने कहा— 'द्रौपदी अब चिंता मत करो। तुम्हारी रक्षा हो जाएगी और जितनी साड़ी दुःशासन खींचता गया, उतनी ही बढ़ती गई। दुःशासन हारकर बैठ गया, किंतु साड़ी का ओर-छोर ही नहीं आया।

यदि मनुष्य का स्वयं का कुछ किया हुआ न हो तो स्वयं विधाता भी उसकी सहायता नहीं कर सकता; क्योंकि सृष्टि का विधान अटल है। जिस प्रकार विधान बनाने वाले विधायकों को स्वयं उसका पालन करना पड़ता है, वैसे ही ईश्वरीय अवतार महापुरुष स्वयं भगवान भी अपने बनाए विधानों का उल्लंघन नहीं कर सकते। इससे तो उनका सृष्टि संचालन ही अस्त−व्यस्त हो जाएगा।

इस संबंध में उन लोगों को सचेत होकर अपना कर्म करना चाहिए, जो सोचते हैं कि भगवान सब कर देंगे और स्वयं हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। जीवन में जो कुछ मिलता है, अपने पूर्व या वर्त्तमान कर्मों के फल के अनुसार। बैंक बैलेंस में यदि रकम नहीं हो तो खातेदार को खाली हाथ लौटना पड़ता है। मनुष्य के कर्मों के खाते में यदि जमा में कुछ नहीं हो तो कुछ नहीं मिलने का। कर्म की पूँजी जब इकट्ठी करेंगे, तभी कुछ मिलना संभव है। भगवान और देवता क्या करेंगे?

पाप का भागी कौन— पाप किसने किया

एक ब्राह्मण ने बगीचा लगाया। उसे बड़े मनोयोगपूर्वक सम्हालता, पेड़ लगाता, पानी देता। एक दिन गाय चरती हुई बाग में आ गई और लगाए हुए कुछ पेड़ चरने लगी। ब्राह्मण का ध्यान उस ओर गया तो उसे बड़ा क्रोध आया। उसने एक लठ्ठ लेकर उसे जोर से मारा। कोई चोट उस गाय पर इतने जोर से पड़ी कि वह वहीं मर गई। गाय को मरा जानकर ब्राह्मण बड़ा पछताया। कोई देख न ले, इससे गाय को घसीटके पास ही बाग के बाहर डाल दिया, किंतु पाप तो मनुष्य की आत्मा को कोंचता रहता है न। उसे संतोष नहीं हुआ और गौहत्या के पाप की चिंता ब्राह्मण पर सवार हो गई।

बचपन में कुछ संस्कृत ब्राह्मण ने पढ़ी थी। उसी समय एक श्लोक उसमें पढ़ा, जिसका आशय था कि हाथ इंद्र की शक्ति-प्रेरणा से काम करते हैं, अमुक अंग अमुक देवता से। अब तो उसने सोचा कि हाथ सारे काम इन्द्रशक्ति से करता है तो इन हाथों ने गाय को मारा है, इसलिए इंद्र ही गौहत्या का पापी है, मैं नहीं?

मनुष्य की बुद्धि की कैसी विचित्रता है, जब मन जैसा चाहता है, वैसे ही हाँककर बुद्धि से अपने अनुकूल विचार का निर्णय करा लेता है। अपने पापकर्मों पर भी मिथ्या विचार करके अनुकूल निर्णय की चासनी चढ़ाकर कुछ समय के लिए कुनैन जैसे कडुए पाप से संतोष पा लेता है।

कुछ दिनों बाद गौहत्या का पाप आकर ब्राह्मण से बोला— 'मैं गौहत्या का पाप हूँ, तुम्हारा विनाश करने आया हूँ।'

ब्राह्मण ने कहा— 'गौहत्या मैंने नहीं की, इंद्र ने की है।' पाप बेचारा इंद्र के पास गया और वैसा ही कहा। इंद्र अचंभे में पड़ गए। सोच-विचारकर कहा—‛अभी मैं आता हूँ।’ और वे उस ब्राह्मण के बाग के पास में बूढ़े ब्राह्मण का वेश बनाकर गए और तरह−तरह की बातें कहते करते हुए जोर−जोर से बाग और उसके लगाने वाले की प्रशंसा करने लगे। प्रशंसा सुनकर ब्राह्मण भी वहाँ आ गया और अपने बाग लगाने के काम और गुणों का बखान करने लगा। “देखो मैंने ही यह बाग लगाया है। अपने हाथों पेड़ लगाए हैं, अपने हाथों से सींचता हूँ। सब काम बाग का अपने हाथों से करता हूँ। इस प्रकार बातें करते−करते इंद्र ब्राह्मण को उस तरफ ले गए, जहाँ गाय मरी पड़ी थी। अचानक उसे देखते हुए इंद्र ने कहा— 'यह गाय कैसे मर गई।' ब्राह्मण बोला— 'इंद्र ने इसे मारा है।'

इंद्र अपने निज स्वरूप में प्रकट हुआ और बोला— ‟जिसके हाथों ने यह बाग लगाया है, ये पेड़ लगाए हैं, जो अपने हाथों से इसे सींचता है, उसके हाथों ने यह गाय मारी है, इंद्र ने नहीं। यह तुम्हारा पाप लो।” यह कहकर इंद्र चले गए। गौ हत्या का पाप विकराल रूप में ब्राह्मण के सामने आ खड़ा हुआ।

भले ही मनुष्य अपने पापों को किसी भी तरह अनेक तर्क, युक्तियाँ लगाकर टालता रहे, किंतु अंत में समय आने पर उसे ही पाप का फल भोगना पड़ता है। पाप जिसने किया है, उसी को भोगना पड़ता, दूसरे को नहीं। यह मनुष्य की भूल है कि वह तरह−तरह की युक्तियों से, पाप से बचना चाहता है। अतः जो किया उसका आरोप दूसरे पर न करते हुए स्वयं को भोगने के लिए तैयार रहना चाहिए।

परदोष दर्शन भी एक बड़ा पाप है

गाँव के बीच शिव मंदिर में एक संन्यासी रहा करते थे। मंदिर के ठीक सामने ही एक वेश्या का मकान था। वेश्या के यहाँ रात−दिन लोग आते−जाते रहते थे। यह देखकर संन्यासी मन-ही-मन कुड़−कुड़ाया करता। एक दिन वह अपने को नहीं रोक सका और उस वेश्या को बुला भेजा। उसके आते ही फटकारते हुए कहा—‟तुझे शरम नहीं आती पापिन, दिन-रात पाप करती रहती है। मरने पर तेरी क्या गति होगी?”

संन्यासी की बात सुनकर वेश्या को बड़ा दुःख हुआ। वह मन-ही-मन पश्चाताप करती भगवान से प्रार्थना करती, अपने पापकर्मों के लिए क्षमायाचना करती।

बेचारी कुछ जानती नहीं थी। बेबस उसे पेट के लिए वेश्यावृत्ति करनी पड़ती, किंतु दिन-रात पश्चाताप और ईश्वर से क्षमायाचना करती रहती।

उस संन्यासी ने यह हिसाब लगाने के लिए कि उसके यहाँ कितने लोग आते हैं, एक−एक पत्थर गिनकर रखने शुरू कर दिए। जब कोई आता एक पत्थर उठाकर रख देता। इस प्रकार पत्थरों का बड़ा भारी ढेर लग गया तो संन्यासी ने एक दिन फिर उस वेश्या को बुलाया और कहा— “पापिन! देख तेरे पापों का ढेर, यमराज के यहाँ तेरी क्या गति होगी? अब तो पाप छोड़।”

पत्थरों का ढेर देखकर अब तो वेश्या काँप गई और भगवान से क्षमा माँगते हुए रोने लगी। अपनी मुक्ति के लिए उसने वह पापकर्म छोड़ दिया। कुछ जानती नहीं थी, न किसी तरह से कमा सकती थी। कुछ दिनों में भूखी रहते हुए कष्ट झेलते हुए वह मर गई।

उधर वह संन्यासी भी उसी समय मरा। यमदूत उस संन्यासी को लेने आए और वेश्या को विष्णुदूत। तब संन्यासी ने बिगड़कर कहा— “तुम कैसे भूलते हो। जानते नहीं हो, मुझे विष्णुदूत लेने आए हैं और इस पापिन को यमदूत। मैंने कितनी तपस्या की है, भजन किया है, जानते नहीं हो।”

यमदूत बोले “हम भूलते नहीं, सही है। वह वेश्या पापिन नहीं है, पापी तुम हो। उसने तो अपने पाप का बोध होते ही पश्चाताप करके सच्चे हृदय से भगवान से क्षमायाचना करके अपने पाप धो डाले। अब वह मुक्ति की अधिकारिणी है और तुमने सारा जीवन दूसरे के पापों का हिसाब लगाने की पापवृत्ति में, पापभावना में जप-तप छोड़-छाड़ दिए और पापों का अर्जन किया। भगवान के यहाँ मनुष्य की भावना के अनुसार न्याय होता है। बाहरी बाने या दूसरों को उपदेश देने से नहीं। परनिंदा, छिद्रान्वेषण, दूसरे के पापों को देखना, उनका हिसाब करना, दोषदृष्टि रखना अपने मन को मलीन बनाना ही तो है। संसार में पाप बहुत है, पर पुण्य भी क्या कम हैं। हम अपनी भावनाएँ पाप, घृणा और निंदा में डुबाए रखने की अपेक्षा सद्विचारों में ही क्यों न लगावें?

संसार और स्वप्न

एक किसान था। उसके एक लड़का था। और कोई संतान न थी। वह लड़के को बड़ा प्यार करता था और खूब लाड़ से पालन-पोषण करता। एक दिन वह खेत पर काम कर रहा था तो उसे लोगों ने खबर दी कि तुम्हारा लड़का बड़ा बीमार है। उसकी हालत बहुत खराब है। किसान घर पर पहुँचा तो देखा लड़का मर चुका है। घर में स्त्रियाँ रोने लगी, पड़ोसिनें भी उस होनहार लड़के के लिए रोती हुई आईं, किंतु किसान न रोया, न दुःखी हुआ। वह शांतचित्त से उसके अंतिम संस्कार की व्यवस्था करने लगा। स्त्री कहने लगी “कैसा पत्थर का कलेजा है आपका, एकमात्र बच्चा था, वह मर जाने से भी आपका दिल नहीं दुखा? थोड़ी देर बाद में किसान ने स्त्री को बुलाकर कहा— "देखो रात को मैंने एक स्वप्न देखा था। उसमें मैं राजा बन गया। मेरे सात राजकुमार थे, जो बड़े ही सुंदर और वीर थे। प्रचुर धन-संपत्ति थी। सुबह आँखें खुलते ही देखा तो सब नष्ट। अब तुम ही बताओ कि उन सात पुत्रों के लिए रोऊं या इसके लिए।" यह कहते हुए अपनी स्त्री को भी समझाया।

ज्ञानियों के लिए जैसा स्वप्न है, वैसा ही यह दृश्य जगत। यह भी स्वप्नवत है, यह जानकर ज्ञानी लोग इसके हानि-लाभ से प्रभावित नहीं होते और अपनी सदा एकरस, सत्य-नित्य रहने वाली आत्मस्थिति में स्थिर रहते हैं।

सिद्धांतों और व्यवहारकुशलता में सामंजस्य हो

एक जंगल में एक महात्मा रहा करते थे। वे नित्य अपने शिष्यों को उपदेश दिया करते थे। एक दिन उन्होंने अपने शिष्यों को उपदेश दिया कि सर्वप्राणियों में परमात्मा का निवास है। अतः सभी का सम्मान करो और नमन करो। एक दिन उनका एक शिष्य वन में लकड़ियाँ लेने गया। उस दिन वहाँ यह शोर मचा हुआ था कि जंगल में एक पागल हाथी घूम रहा है। उससे बचने के लिए भागो। शिष्य ने सोचा कि हाथी में भी तो परमात्मा का निवास है, मुझे क्यों भागना चाहिए। वह वहाँ ही खड़ा रहा। हाथी उसी की ओर चला आ रहा था। लोगों ने उसे भागने को कहा, किंतु वह टस से मस नहीं हुआ। इतने में हाथी पास में आया और उसे सूँड़ से पकड़कर दूर फेंक दिया। शिष्य चोट खाकर बेहोश हो गया। यह खबर गुरु को लगी तो वे उसे तलाश करते हुए जंगल में पहुँचे। कई शिष्यों ने उसे उठाया और आश्रम में ले आए और आवश्यक चिकित्सा की, तब कहीं शिष्य होश में आया। एक शिष्य ने कुछ समय बाद उससे पूछा— “क्यों भाई जब पागल हाथी तुम्हारी ओर आ रहा था तो तुम वहाँ से भागे क्यों नहीं?” उसने कहा— “गुरुजी ने कहा था कि सब भूतों में नारायण का वास है, यही सोचकर मैं भागा नहीं, वरन खड़ा रहा।” गुरुजी ने कहा— “बेटा हाथी नारायण आ रहे थे, यह ठीक है, किंतु अन्य लोगों ने जो भी नारायण ही थे, तुम्हें भागने को कहा तो क्यों नहीं भागे?”

सब भूतों में परमात्मा का वास है, यह तो ठीक है, किंतु मेल−मिलाप भले और अच्छे आदमियों से ही करना चाहिए। व्यावहारिक जगत में साधु−असाधु, भक्त −अभक्त , सज्जन-दुर्जनों का ध्यान रखकर व्यवहार व संबंध रखना चाहिए। जैसे किसी जल से भगवान की पूजा होती है, किसी से नहा सकते हैं, किसी से कपड़ा धोने एवं बर्तन माँजने का ही काम चलाते हैं। किसी जल को व्यवहार में ही नहीं लाते। वैसे जल देवता एक ही है। इसी प्रकार संसार में भी व्यवहार करना चाहिए।

अपनी स्थिति पर विचार करें?

एक सेठ बड़ा धनवान था। उसे अपने ऐश्वर्य, धन-संपत्ति का बड़ा अभिमान था। अपने को बड़ा दानी धर्मात्मा सिद्ध करने के लिए घर पर नित्य एक साधु को भोजन कराता था। एक दिन एक ज्ञानी महात्मा आए, उसके यहाँ भोजन करने को। सेठजी ने उनकी सेवा-पूजा करने का तो ध्यान नहीं रखा और उनसे अपने अभिमान की बातें करने लगा “देखो महाराज वहाँ से लेकर इधर तक यह अपनी बड़ी कोठी है, पीछे भी इतना ही बड़ा बगीचा है। पास ही दो बड़ी मिलें हैं। अमुक−अमुक शहर में भी मिलें हैं। इतनी धर्मशालाएँ, कुँए बनाए हुए हैं। दो लड़के विलायत पढ़ने जा रहे हैं, आप जैसे साधु-संन्यासियों के पेटपालन के लिए यह रोजाना का सदावर्त्त लगा रखा है।” सेठ अपनी बातें कहता ही जा रहा था। महात्मा जी ने सोचा इसको अभिमान हो गया है, इसलिए इसका अभिमान दूर करना चाहिए। बीच में रोककर सेठ जी से कहा आपके यहाँ दुनियाँ का नक्शा है। सेठ ने कहा— 'महाराज बहुत बड़ा नक्शा है।' महात्मा जी ने नक्शा मंगाया। उसमें सेठ से पूछा 'इस दुनियाँ के नक्शे में भारत कहाँ है।' सेठ ने बताया। 'अच्छा इसमें बंबई कहाँ है' सेठ ने हाथ रखकर बताया। महात्मा जी ने फिर पूछा “अच्छा इसमें तुम्हारी कोठी, बगीचे, मिलें बताओ कहाँ हैं।” सेठ बोला महाराज दुनियाँ के नक्शे में इतनी छोटी चीजें कहाँ से आई। महात्मा ने कहा “सेठ जी अब इस दुनियाँ के नक्शे में तुम्हारी कोठी, बगीचे, महल का कोई पता नहीं, तो विश्वब्रह्मांड जो भगवान के लीलाऐश्वर्य का एक खेलमात्र है, उनके यहाँ तुम्हारे ऐश्वर्य का क्या स्थान होगा?” सेठ समझ गया और उसका अभिमान नष्ट हुआ। वह साधु के चरणों में गिरकर क्षमायाचना करने लगा।

थोड़ी−सी समृद्धि ऐश्वर्य पाकर मनुष्य इतना अभिमानी और अहंकारी बन जाता है। यदि वह अपनी स्थिति की तुलना अन्य लोगों से, फिर भगवान के अनंत ऐश्वर्य से करे तो उसे अपनी स्थिति का पता चले। धन-संपत्ति-ऐश्वर्य का अभिमान वृथा है। मूर्खता ही है। प्रथम तो यहाँ की संपदा पर मनुष्य का अपना अधिकार जताना अज्ञान है, क्योंकि यह सदा यहीं की धरोहर है और यहीं रहती है। यह भगवान की संपदाएँ हैं, कोई भी व्यक्ति इन्हें नहीं ले जा सकता। तिस पर भी अपनापन मानकर थोड़े-से धन-ऐश्वर्य पर बौरा जाना पागलपन, अज्ञान ही है।

सुनिए ही नहीं, समझिए भी

एक पंडित किसी को भागवत की कथा सुनाने जाया करते थे। वे बड़े प्रकांड विद्वान थे। शास्त्रज्ञ थे। राजा भी बड़ा भक्त और निष्ठावान था। पंडित कथा सुनाते हुए बीच−बीच में राजा से पूछ लिया करते, यह जानने के लिए कि राजा का ध्यान कथा में है या नहीं। 'राजा कुछ समझ रहे हो?' तब राजा ने कहा 'महाराज! पहले आप समझिये।' पंडित जी राजा का यह उत्तर सुनकर आश्चर्यचकित हो गए। वे राजा के मन की बात नहीं जान पाए।

एक दिन फिर पंडित जी ने राजा से पूछा— 'राजा कुछ समझ रहे हो?'  'महाराज पहले आप समझें' राजा ने उतर दिया। पंडित जी असमंजस में थे कि आखिर इस भागवत में क्या है, जो मेरी समझ से बाहर है। जब−जब पंडित जी पूछते, राजा उसी प्रकार कहता।

एक दिन पंडित जी घर पर भागवत की पुस्तक लेकर एकाग्रचित्त हो पढ़ने लगे। आज पंडित जी को बड़ा आनंद आ रहा था कथा में। पंडित जी ने समझा कि राजा ठीक कहता है। वे मनोयोगपूर्वक कथा पढ़ने लगे। खाना, पीना, सोना, नहाना सब भूल गए। कथा में ही मस्त हो गए। पंडित जी की आँखों से अश्रु बहने लगे। कई दिन बीत गए, पंडित जी राजा को कथा सुनाने नहीं पहुँचे। वे वहीं पर कथा पढ़ते रहते। बहुत दिन हुए। राजा ने सोचा पंडित जी नहीं आ रहे। उसे संदेह हुआ। वेश बदलकर राजा पंडित जी के घर पहुँचे और जहाँ कथा पढ़ रहे थे, वहाँ बैठकर कथा सुनने लगे। राजा के मन में पंडित जी का भाव देखकर भक्तिभावना प्रबल हो गई। पंडित जी पाठ पूरा करके उठे तो राजा को पहचान लिया। राजा ने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। पंडित ने कहा— “राजन! आपने तो मुझे मार्गदर्शन देकर कृतार्थ किया।”

ईश्वर विषयक चर्चा, कथाएँ केवल तोतारटंत की तरह पढ़ लेने या सुन लेने से कुछ नहीं होता। समझने, मनन करने और जीवन में उतारने से ही कोई ज्ञान अथवा सत्परिणाम उत्पन्न कर सकता है।

बुराई नहीं, अच्छाई देखो

एक महात्मा नदी में स्नान करने को गए थे। वहाँ जाकर देखा एकांत में दो स्त्री−पुरुष बैठे हैं। उनके पास एक बोतल भी पड़ी है, जिसमें कुछ रस भरा है। उन्हें देखकर महात्मा को संदेह हो गया कि ये दोनों पापकर्म के लिए यहाँ एकांत में बैठे हैं। उस आदमी ने महात्मा के भावों को ताड़ लिया। इतने में ही एक नाव नदी में डूब गई, जिसके साथ सात आदमी भी डूबने लगे। वह आदमी नदी में कूदा और एक−एक करके छः आदमियों को तट पर ले आया। सातवें के लिए उसने महात्मा जी से कहा—‟महात्मा जी यदि कुछ परोपकार करते हो तो इस व्यक्ति को बाहर निकाल लाओ।” महात्मा जी की हिम्मत नहीं हुई। वह व्यक्ति उसे भी निकाल लाया और बाहर आकर महात्मा जी से कहा—‟महाराज अपने दृष्टिकोण को सदैव पवित्र रखना चाहिए। दूसरे के लिए पाप की बात सोचने में पहले स्वयं को ही पाप का भागी बनना पड़ता है। देखो वह स्त्री मेरी बहन है। दूर जाना है, इसलिए सुस्ताने के लिए यहाँ छाया में बैठ गए हैं और इस बोतल में पानी भरा है, जो मार्ग में पीने के लिए भर लिया गया है।”

महात्मा जी यह जानकर हक्के−बक्के रह गए और अपने विचारों पर पश्चाताप करने लगे। परदोष दर्शन से मनुष्य का स्वयं का ही अहित होता है। दूसरे में भले ही दोष हो या न हो, किंतु इन दोनों अवस्थाओं में ही देखने वाले को, परदोष विचार करने वाले को, पहले दोष का, पाप का भागी बनना पड़ेगा।

पराए धन की तृष्णा सब स्वाहा कर जाती है

एक नाई जंगल में होकर जा रहा था। अचानक उसे आवाज सुनाई दी 'सात घड़ा धन लोगे?' उसने चारों तरफ देखा, किंतु कुछ भी दिखाई नहीं दिया। उसे लालच हो गया और कहा 'लूँगा'। तुरंत आवाज आई “सातों घड़ा धन तुम्हारे घर पहुँच जाएगा, जाकर सम्हाल लो”। नाई ने घर आकर देखा तो सात घड़े धन रखा था। उनमें 6 घड़े तो भरे थे, किंतु सातवाँ थोड़ा खाली था। लोभ, लालच बढ़ा। नाई ने सोचा सातवाँ घड़ा भरने पर मैं सात घड़ा धन का मालिक बन जाऊँगा। यह सोचकर उसने घर का सारा धन-जेवर उसमें डाल दिया, किंतु वह भरा नहीं। वह दिन-रात मेहनत-मजदूरी करने लगा, घर का खरचा कम करके धन बचाता और उसमें भरता, किंतु घड़ा नहीं भरा। वह राजा की नौकरी करता था तो राजा से कहा— 'महाराज मेरी तनख्वाह बढ़ाओ, खरच नहीं चलता।' तनख्वाह दूनी कर दी गई, फिर भी नाई कंगाल की तरह रहता। भीख माँगकर घर का काम चलाने लगा और धन कमाकर उस घड़े में भरने लगा। एक दिन राजा ने उसे देखकर पूछा “क्यों भाई तू जब कम तनख्वाह पाता था तो मजे में रहता था, अब तो तेरी तनख्वाह भी दूनी हो गई, और भी आमदनी होती है, फिर भी इस तरह दरिद्री क्यों? क्या तुझे सात घड़ा धन तो नहीं मिला।” नाई ने आश्चर्य से राजा की बात सुनकर उनको सारा हाल कहा। तब राजा ने कहा “वह यक्ष का धन है। उसने एक रात मुझसे भी कहा था, किंतु मैंने इंकार कर दिया। अब तू उसे लौटा दे।” नाई उसी स्थान पर गया और कहा 'अपना सात घड़ा धन ले जाओ।' तो घर से सातों घड़ा धन गायब। नाई का जो कुछ कमाया हुआ था, वह भी चला गया।

पराए धन के प्रति लोभ-तृष्णा पैदा करना अपनी हानि करना है। पराया धन मिल तो जाता है, किंतु उसके साथ जो लोभ-तृष्णारूपी सातवाँ घड़ा और आ जाता है, तो वह जीवन के लक्ष्य, जीवन के आनंद, शांति, प्रसन्नता सबको काफूर कर देता है। मनुष्य दरिद्री की तरह जीवन बिताने लगता है और अंत में वह मुफ्त में आया धन घर के कमाए- कजाए धन के साथ यक्ष के सातों घड़ों की तरह कुछ ही दिनों में नष्ट हो जाता है, चला जाता है। भूलकर भी पराए धन में तृष्णा, लोभ पैदा नहीं करना चाहिए। अपने श्रम से जो रूखा−सूखा मिले, उसे खाकर प्रसन्न रहते हुए भगवान का स्मरण करते रहना चाहिए।

आत्मज्ञान और भेदभाव

एक बार जगद्गुरु शंकराचार्य काशी में गंगास्नान करके सीढ़ियों पर चढ़ रहे थे कि अचानक एक चांडाल से वे छू गए। तब उन्होंने आवेश में आकर कहा—“अरे? क्या तूने मुझे छू लिया, जानता नहीं मैं गंगास्नान करके आ रहा हूँ।” चांडाल ने कहा— “महाराज! न मैंने आपको छुआ, न आपने मुझे। सभी में वह अंतर्यामी निर्लिप्त आत्मा निवास करता है। गंगाजल में पड़ा हुआ सूर्य का प्रतिबिंब, क्या शराब में पड़े प्रतिबिंब से अलग होता है?”

शंकराचार्य जी को आत्मज्ञान हुआ और उन्होंने तभी से सब में आत्मतत्त्व के दर्शन किए, बाह्य भेद-विभेद भूलकर परमात्म तत्त्व को जाना।

आत्मज्ञान होने पर भेद−विभेद नहीं रहते। सूक्ष्मदृष्टि हो जाने पर स्थूल जगत के भेद−भाव नहीं रह जाते। वे एक ही समुद्र की लहरों से निर्मित बबूले नजर आते हैं।


सामयिक जानकारी एवं सूचनाऐं

इस बार चैत्र नवरात्रि ता. 5 अप्रैल गुरुवार से आरंभ होकर ता. 13 अप्रैल शुक्रवार को समाप्त होगी। नवरात्रि में साधनात्मक तपश्चर्या करने का सर्वश्रेष्ठ समय है। जिस प्रकार प्रातः और सायंकाल दिन और रात्रि की मिलन वेला—संध्या—उपासना के लिए उत्तम मानी जाती है उसी प्रकार सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन आश्विन और चैत्र में होता है। इन महीनों के शुक्ल पक्ष में प्रतिपदा से नवमी तक की 9−9 दिन की दो ऋतु संधि बेलाऐं आती हैं जिन्हें नवरात्रि कहते हैं। जिस प्रकार नारी के शरीर में ऋतुकाल की उपयोगिता गर्भ धारण की दृष्टि से है वैसे ही वर्ष−शरीर में नवरात्रि का महत्व आध्यात्मिक उपासनाओं की सफलता की दृष्टि से है। इस अलभ्य अवसर को हमें व्यर्थ न जाने देना चाहिए और जिनसे जितनी अधिक बन पड़े उन्हें उतनी साधना करनी चाहिए।

नये उपासकों के लिए

गायत्री उपासना नवरात्रि में सर्वोत्तम है। जो पाठक नियमित उपासना कुछ भी नहीं करते, जिनकी अभिरुचि इस ओर नहीं रहती और अवकाश भी नहीं मिलता उन्हें भी एक प्रयोग एवं परीक्षण के रूप में इन 9 दिनों में कुछ न कुछ समय निकाल ही लेना चाहिए। एक घंटा समय नित्य 9 दिन तक निकालते रहना कुछ कठिन बात नहीं है। प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर गायत्री माता का आवाहन, ध्यान, प्रणाम, पूजन करके जप आरंभ करना चाहिए। माला मिले तो ठीक नहीं तो उंगलियों के आधार पर गणना करके 10 माला अथवा 1100 मंत्र जप लेने चाहिए। एक घंटे में प्रायः इतना जप आसानी से हो जाता है। जिन्हें गणना में असुविधा होवे घड़ी सामने रखकर एक घंटा जप कर सकते हैं। जल का एक पात्र पूजा में रख लिया जाय और धूपबत्ती जलती रहे। गायत्री जप में जल और अग्नि को साक्षी रखने का विधान है। जप पूरा होने पर गायत्री माता को विदाई प्रणाम करके जल पात्र को सूर्य भगवान के संमुख अर्घ रूप में चढ़ा देना चाहिए।

यह क्रम नित्य प्रति चले। ब्रह्मचर्य से रहा जाय। जिनसे नमक छोड़ सकना संभव हो वे 9 दिन तक बिना नमक शक्कर का अलौना आहार करें। यह अस्वाद व्रत उपवास के समान ही उपयोगी है। जो इस व्रत का पालन न कर सकें वे 9 दिन तक एक ही अन्न की रोटी एवं एक ही भाजी लेने का आसान नियम बना सकते हैं। दूध, छाछ आदि का प्रतिबंध नहीं है। फल भी लिये जा सकते हैं। नवरात्रि की यह सरल उपासना उन लोगों के लिए है जो अब तक नियमित गायत्री जप नहीं करते या व्यस्तता के कारण एक दो माला ही अनियमित रूप से कर पाते हैं। नवरात्रि में यदि ऐसे लोग एक घंटा प्रतिदिन की उपासना भी 9 दिन तक कर लें तो उनके यह 9 घंटे उनके आत्मिक विकास में तथा किन्हीं उलझी हुई गुत्थियों को सुलझाने में बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होंगे।

नैष्ठिक उपासकों का अनुष्ठान

जिन लोगों की गायत्री उपासना नियमित रूप से चल रही है उन्हें नवरात्रि में 24 हजार अनुष्ठान करना चाहिए। 27 माला प्रतिदिन के हिसाब से 9 दिन में अनुष्ठान पूरा हो जाता है। इसमें प्रातः 211−3 घंटे लगते हैं। जिन्हें एक ही समय इतना समय न मिल सके वे प्रातः सायं दो बार में अपना जप पूरा कर सकते हैं। जिनका अनियमित जीवन क्रम है वे 2400 मंत्र लेखन या 240 गायत्री चालीसा पाठ का नियम बिना किसी नियम प्रतिबन्ध के पूरा कर सकते हैं। अनुष्ठान काल में (1) ब्रह्मचर्य (2) अस्वाद व्रत या उपवास (3) हजामत, कपड़े धोना आदि अपनी शरीर सेवाऐं स्वयं ही करना (4) भूमि या तख्त पर सोना (5) चमड़े की वस्तुओं का त्याग यह तपश्चर्याऐं अनुष्ठान काल में उपयोगी हैं। इनमें से ब्रह्मचर्य तो अनिवार्य है शेष 4 ऐच्छिक हैं।

अनुष्ठान के अन्त में 240 आहुतियों का हवन करना चाहिए। इसमें प्रायः 211 रु. खर्च हो जाते हैं। गायत्री हवन विधि की पुस्तक के आधार पर यह हवन करना कुछ कठिन नहीं होता। हो सके तो कुछ कुमारी कन्याओं को भोजन कराया जा सकता है। प्रसाद वितरण के रूप में गायत्री साहित्य की छोटी बड़ी पुस्तकें वितरण करनी चाहिए। अनुष्ठान काल में कोई विघ्न न आवे एवं किसी प्रकार की त्रुटि रहे तो उसका दोष परिमार्जन होता रहे ऐसी व्यवस्था गायत्री तपोभूमि में होती रह सकती है। जो अपने अनुष्ठान की सूचना दे देंगे उनका संरक्षण एवं दोष परिमार्जन यहाँ किया जाता रहेगा। जो अपना हवन न कर सकते हों उनका हवन भी यहाँ किया जा सकता है। आत्मबल की वृद्धि मानसिक शान्ति, एवं जीवन की लौकिक समस्याओं को सुलझाने के लिए नवरात्रि के 24 हजार के अनुष्ठान बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते हैं। जिनसे बन पड़े उन्हें इसके लिए अवश्य ही प्रयत्न करना चाहिए।

साधना की उच्च भूमिका

गायत्री उपासना की प्रथम भूमिका जप हवन है। यह कार्यक्रम शरीर द्वारा चलाया जाता है। जिनकी उपासना इस प्रकार नियमित रूप से पाँच वर्ष तक चल चुकी हो उन्हें द्वितीय उच्च स्तरीय भूमिका में प्रवेश करना चाहिए। इसके लिए मन के द्वारा ध्यान प्रधान साधनाऐं अपनानी पड़ती हैं। शरीर की साधना से मन शुद्ध होता है और मन के द्वारा आत्मा की प्राप्ति होती है। शुद्ध आत्मा का तादात्म्य परमात्मा में हो जाता है। यही सनातन आत्म−विकास का क्रम चला आ रहा है। जिनकी उपासनाऐं पाँच से नियमित चल रही हैं उन्हें अब शरीर के द्वारा हो सकने वाली साधनाओं तक ही सीमित न रहकर मन द्वारा की जाने वाली ध्यानपरक उच्चस्तरीय साधना के क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिए। नवीन संवत्सर के समय इस चैत्र की नवरात्रि से यह उच्च स्तर प्रवेश का शुभारंभ कर देना चाहिए। अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश के अनावरण की साधना अखण्ड−ज्योति के अक्टूबर 61 के अंक में विस्तारपूर्वक बताई जा चुकी हैं। कितने ही नैष्ठिक उपासक उसे अपना भी चुके हैं। जिनने अभी तक उसे अपनाया न हो वे उपरोक्त अंक को पढ़ लें और इसी चैत्र की नवरात्रि से वह साधना प्रारंभ कर दें। इससे उन्हें आशाजनक आत्मिक प्रगति का प्रत्यक्ष अनुभव होगा।

पंचकोशों के अनावरण की उच्चस्तरीय उपासना में संलग्न साधकों के लिए रविवार को प्रातःकाल सूर्य उदय होने से 1 घंटा पूर्व से लेकर सूर्योदय तक की अवधि में प्रति सप्ताह आत्मिक सम्पर्क स्थापित करने का एक विशेष प्रयोग हम लोग चलाते हैं। इस साधना के आधार पर पाठक मथुरा से दूर रहते हुए भी उन क्षणों में दूरी को भुलाकर समीपता अनुभव करते हैं और परस्पर विचार विनिमय का सुखद आनन्द अनुभव होता है। प्रेरणा, प्रकाश, उत्साह एवं बल भी मिलता है। जो नैष्ठिक उपासक इस प्राण संचार साधना क्रम को चला रहे हैं वे 1 अप्रैल से 1 जून तक अपना साधना समय 411 से 511 तक का कर लें। जिन्होंने आरम्भ नहीं किया है वे इस चैत्र की नवरात्रि से आरम्भ कर दें और इस सूक्ष्म सम्पर्क, प्राण संचार विधान की पीली पुस्तिका बिना मूल्य मंगालें।

कल्प चिकित्सा शिविरों का आरम्भ

गायत्री तपोभूमि में 1 अप्रैल से कल्प−चिकित्सा शिविर आरम्भ हो रहा है। आरम्भ में कब्ज के रोगी लिये गये हैं। भोजन ठीक तरह हजम न होना, दस्त साफ न होना, पेट में भारीपन एवं दर्द रहना, भूख न लगना जैसा साधारण रोग ही आगे चलकर 90 प्रतिशत भयानक रोगों का कारण बन जाता है। अभी भी जो लोग अगणित प्रकार की शारीरिक व्यथाओं में घिरे हुए हैं उनके मूल में भी कब्ज का विकार ही होता है। यदि पेट ठीक काम करने लगे तो लगभग सभी रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है और भविष्य के लिए आरोग्य एवं दीर्घजीवन की सुरक्षा हो सकती है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कब्ज की चिकित्सा पर ही सारा ध्यान केन्द्रित किया गया है। अन्य छोटे−मोटे रोग तो इस सफलता के साथ−साथ अपने आप अच्छे होने लगते हैं। एक समय में 16 आरोग्याकाँक्षी रखने का प्रबंध हुआ है। पूरा ध्यान देकर भली प्रकार चिकित्सा कर सकना थोड़े व्यक्तियों को ही संभव है। इसलिए कम व्यक्ति ही लिये जाते हैं। प्रार्थना−पत्र अधिक और स्थान कम होने से स्वीकृति प्राप्त करके ही आने का प्रतिबंध रखा गया है। जिन्हें इस चिकित्सा का लाभ उठाने के लिए मथुरा आना हो वे नियमावली मंगाकर ध्यानपूर्वक पढ़ लें और पूर्व स्वीकृति प्राप्त किये बिना न आवें।

दूध, छाछ एवं शाक तथा फलों के रस का 40 दिन का कल्प रोगी की शारीरिक स्थिति को ध्यान में रख कर कराया जाता है। यह उपवास शरीर के भीतरी कल पुर्जों की जहाँ एकबार परिपूर्ण सफाई कर देता है वहाँ आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। चान्द्रायण व्रत एक महीने का होता है। यह कल्प−उपवास उससे भी 10 दिन अधिक का तथा अनेक दृष्टियों से अधिक वैज्ञानिक एवं उपयोगी होने से लाभदायक भी अधिक है। इसका प्रभाव शरीर पर ही नहीं मन एवं आत्मा की स्थिति पर भी आश्चर्यजनक रूप से पड़ता है। इसलिए यह चिकित्सा ही न होकर एक प्रकार से तपस्या भी है। दिनचर्या का जो क्रम यहाँ रहता है तथा दैनिक सत्संग एवं प्रवचनों की जो क्रमबद्ध शिक्षण−शृंखला चलेगी उसका भावी जीवन की गतिविधियों को मोड़ देने की दृष्टि से भी भारी महत्व है। अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होने जैसी यह व्यवस्था नहीं रहती वरन् जीवनक्रम में कायाकल्प प्रस्तुत करने वाला जीवन की प्रगति का यह एक महत्वपूर्ण क कार्यक्रम है। अपने निज के स्वास्थ्य को सँभाले रहने तथा दूसरों की आरोग्य रक्षा एवं चिकित्सा का समुचित ज्ञान इस दो महीने की अवधि में हो जाता है। अपनी रोग निवृत्ति के साथ−साथ दूसरों की अत्यन्त महत्वपूर्ण जीवन दान जैसी सेवा कर सकने की योग्यता भी इन दो महीनों में प्राप्त हो जाती है। इस दृष्टि से इन दो−दो महीनों के स्वास्थ्य सत्रों को आरोग्य शिक्षा शिविर ही कहा जा सकता है। 1 अप्रैल से छोटे रूप में ही इसका उद्घाटन हो रहा है पर शारीरिक और मानसिक दृष्टि से इस कार्यक्रम के व्यापक विकास की भारी संभावना है।

अखण्ड ज्योति के अगले अंक

अखण्ड ज्योति के अगले तीन अंक युग−निर्माण कार्यक्रम को पाठकों के सम्मुख भली प्रकार प्रस्तुत करने के लिए छोटे−छोटे विशेषांकों की तरह निकाले जा रहे हैं। 1 मई का अंक ‘स्वस्थ शरीर अंक’ 1 जून का ‘स्वच्छ मन अंक’ और 1 जुलाई का ‘सभ्य समाज अंक’ होगा। पृष्ठ संख्या साधारण अंकों से प्रायः ड्यौढ़ी रहेगी। पाठक इन अंकों को ध्यानपूर्वक पढ़ें और अपने परिचित क्षेत्र में इन्हें पढ़ाने के लिए उन लोगों की एक लिस्ट बनालें जो अपने विचारों से सहानुभूति रखते हों। प्रत्येक परिजन का यह कर्तव्य है कि इन तीन अंकों को वह न केवल स्वयं पढ़ें, वरन् अपने सम्पर्क के 10 व्यक्तियों को पढ़ाने या सुनाने की तैयारी अभी से कर लें। अधिक लोग इन विचारों के सम्पर्क में आवें इसी एक आधार पर युग−निर्माण योजना की सफलता निर्भर है। अखण्ड−ज्योति के ग्राहक बढ़ाना हमारे जीवन मिशन में सक्रिय सहयोग देता है। जिन्हें हमारे विचारों के प्रति श्रद्धा एवं सहानुभूति है वे ही वस्तुतः हमारे आध्यात्मिक स्वजन हो सकते हैं।

जून में एक विशेष स्वास्थ्य−सत्र

जून का महीना अधिकतर लोगों के लिए सुविधा एवं अवकाश का समय रहता है। इस बार इस एक महीने गायत्री तपोभूमि में स्वास्थ्य शिक्षण शिविर रखा जायेगा। कमजोर, दुर्बल, बालक, वृद्ध सभी के लिये उपयोगी शरीर विज्ञान व्यायाम, आहार, रहन−सहन, रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा का आवश्यक शिक्षण दिया जायेगा। इस शिक्षण के लिए बाहर से भी कई सुप्रसिद्ध आरोग्यशास्त्री आवेंगे। इस शिविर में आने वाले स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को सुलझाने में कुशल बन सकेंगे ऐसी आशा है। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज का त्रिविध कार्यक्रम ही हमारे सर्वांगीण विकास का माध्यम हो सकता है। इस सर्वांगीण स्वास्थ्य का समुचित शिक्षण प्रबन्ध इस विशेष सत्र में रहेगा। इस शिविर में सम्मिलित होने के लिए भी अपना पूरा परिचय लिखते हुए पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना आवश्यक है।

कृपया जवाबी पत्र भेजें

व्यक्तिगत पत्र−व्यवहार के लिए जवाबी पत्र भेजने की बात पाठकों को समय−समय पर स्मरण कराई जाती रही है। अब उसके लिए प्रत्येक पाठक का ध्यान आकर्षित करना अधिक आवश्यक हो गया है। प्रतिदिन कितने ही पत्र ऐसे आते हैं जिनका उत्तर तथा डाक व्यय यहाँ से लगाना पड़ता है। जो रोज ही कई रुपये का हो जाता है। अखण्ड ज्योति की लागत इस वर्ष तीन रुपये की अपेक्षा चार रुपये के करीब होते दिखाई पड़ रही है। उसमें स्पष्ट घाटा है। पुस्तक प्रकाशन का कार्य अब बन्द जैसा ही पड़ा है। ऐसी दशा में यहीं की आर्थिक कठिनाइयाँ स्वतः ही चिन्ताजनक हैं। इस पर भी यदि कई रुपये रोज का डाकव्यय बढ़े तो उसका दबाव सीधा हमारे चौके चूल्हे पर ही पड़ता है। पाठक अपने कर्तव्य का थोड़ा ध्यान रखें और जवाबी पत्र भेजा करें तो उस कठिनाई से हमें बचा सकते हैं।

स्मरण रखने योग्य सूचना

हर पत्र में अपना पूरा पता स्पष्ट अक्षरों में लिखना न भूलना चाहिए। अधूरे और अस्पष्ट अक्षरों में लिखे हुए पतों पर उत्तर देना कठिन होता है। अखण्ड ज्योति का चंदा भेजते समय मनीआर्डर कूपन पर घसीट में अधूरा पता लिख देने से यहाँ रजिस्टरों में गलत पता दर्ज हो जाता है और पत्रिका ठीक स्थान तक न पहुँच कर बीच में ही गुम होने लगती है। पाठक अपने पत्रिका के पते को ध्यान से पढ़लें और यदि उसमें कुछ गलती रहती हो तो उसकी सूचना दे दें ताकि आवश्यक सुधार कर लिया जाय। ग्राहक नम्बर पते के पास ही लिखा रहता है। उसे डायरी में नोट करके रखना चाहिए और पता बदलने, अंक न पहुँचने की सूचना देते समय उस ग्राहक नम्बर का उल्लेख अवश्य करना चाहिए। यहाँ से हर महीने दो बार जाँच कर पत्रिका भेजी जाती है। यदि ता. 15 तक न पहुँचे तो डाक की गड़बड़ी में अंक गुम हुआ समझना चाहिए और उसी महीने सूचना देकर दूसरा अंक और मंगा लेना चाहिए।

पुस्तकें मँगाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि छह रुपये से कम मूल्य की वी.पी. नहीं भेजी जाती। यदि इससे कम मूल्य की चीजें मंगानी हों तो उनका मूल्य तथा 1 रु. डाकव्यय मनीआर्डर से पेशगी भेजना चाहिए। डाकखर्च अपना लगा देने का नियम 6 रु. से अधिक की पुस्तकों पर ही लागू होता है।


हमारा महत्वपूर्ण एवं उपयोगी प्रकाशन

स्वास्थ्य,सौंदर्य, दीर्घजीवन और आनन्द की पथ प्रदर्शक पुस्तकें:−

1 स्वस्थ बनने की विद्या

2 बिना औषधि के कायाकल्प

3 दीर्घ जीवन के रहस्य

4 उन्नति का मूलमंत्र ब्रह्मचर्य

5 जिन्दगी कैसे जियें?

6 आसन और प्राणायाम

7 बुद्धि बढ़ाने के उपाय

> 8 क्या खायें? क्यों खायें? कैसे खायें?

9 दूध की आश्चर्यजनक शक्ति

10 तुलसी के अमृतोपम गुण

11 यौवन चिरस्थायी कैसे हो?

12 सौर्न्दय बढ़ाने के ठोस उपाय

13 पंचतत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण

14 उपवास के चमत्कार

15 कब्ज की सरल चिकित्सा

16 स्त्री रोगों की चिकित्सा

17 बाल रोगों की चिकित्सा

18 नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा

19 घरेलू चिकित्सा विज्ञान

20 सूर्य चिकित्सा विज्ञान

21 प्राण चिकित्सा विज्ञान

22 स्वप्न दोष की चिकित्सा

23 भोग में योग

24 पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि

25 मनचाही संतान

26 मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार श्री,समृद्धि, सफलता और सिद्धिदायक अलभ्य साहित्य:−

1 मैं क्या हूँ?

2 परकाया प्रवेश

3 मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा

4 स्वर−योग से दिव्य ज्ञान

5 ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग

6 वशीकरण की सच्ची सिद्धि

7 जीव जन्तुओं की भाषा

8 ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

9 क्या धर्म? क्या अधर्म?

10 गृहस्थ योग

11 हस्त रेखा विज्ञान

12 हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं?

13 मरने के बाद हमारा क्या होता है?

14 आकृति देखकर मनुष्य की पहिचान

15 अमृत, पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति

16 धनवान बनने के गुप्त रहस्य

17 मित्रभाव बढ़ाने की कला

18 चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग

19 दाम्पत्ति जीवन का स्वर्ग

20 जीवन का महान जागरण

21 सफलता के तीन साधन

22 हमारी पारिवारिक समस्यायें कैसे सुलझें

23 हम वक्ता कैसे बनें?

24 लेखक बनने की कला

25 हिन्दू धर्म का प्रधान आधार यज्ञोपवीत

26 वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ

6 रु. से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।

इससे कम की पुस्तकें मंगानी हों तो पुस्तकों का मूल्य तथा 1 रु. डाकखर्च मनीआर्डर से पेशगी भेजना चाहिये।

पता—अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा।