क्या असम्भव है धरा पर,
कल्पना को यदि मिले श्रम।
कर रहे दिन−रात चिन्तन, मिल तुरत जाये अमिय कन॥
पर भला सामर्थ्य किसकी? जो करे नव सिन्धु मंथन,।
क्या कठिन सागर न देवे रत्न, कमला, अश्व, अमृत,।
कौन पर साधक यहाँ जो ले सके विषपान का व्रत॥
सफलता तो चरण चूमे—
साधना को यदि मिले श्रम।
है सरल हर राह इतनी, सोच भी सकते न जितनी।
पर उसी को जो चला है भूल कर उर−पीर अपनी॥
कष्ट, बाधा, शूल, पीड़ा है क्षणिक सब, हैं बहुत पर।
हर पथिक को ये मिले हैं व्यर्थ करना फिर यहाँ डर॥
साध्य तो साकार आये
भावना से यदि मिटे भ्रम।
क्या असम्भव है .............
—त्रिलोकी नाथ व्रजवाल
रोग निवारण के लिए अनेकों चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलित हैं। एलोपैथी, होम्योपैथी, बायोकैमिक, आयुर्वेद, यूनानी आदि पद्धतियाँ तो भारत में ही बहुत प्रसिद्ध हैं। संसार के अन्य देशों में इनके अतिरिक्त भी अनेकों पद्धतियाँ प्रचलित हैं। उन सब का उद्देश्य रोग कष्ट से रोगी को बचा देना मात्र है। इन सब में ऐसी मारक गुण वाली औषधियों के प्रयोग की व्यवस्था है जिनके द्वारा कष्ट देने वाले विजातीय द्रव्य का मारण किया जाता है। पर चूँकि वह विष द्रव्य कहीं अलग नहीं रखा रहता, रक्त माँस आदि में ही घुला रहता है इसलिए उसके मारण के साथ स्वस्थ जीवनी शक्ति का भी मरण होता ही है। फिर इस मारण क्रिया से रोगों का रक्त −बीज पूर्णता नष्ट नहीं होता वरन् अर्धमृत एवं मूर्छित होकर शरीर के भीतर ही पड़ा रहता है। अवसर मिलते ही वह पुनः सजीव हो जाता है और उसी या किसी अन्य रोग का रूप धारण करके वह विष−द्रव्य रक्त बीज की नाई पुनः प्रकट होता है। इस प्रकार औषधि चिकित्सा करते रहने पर रोग दबते उछलते रहते हैं। एक तो रोगों के आक्रमण के कारण दूसरे दवाओं के मारक प्रभाव द्वारा रोगी की जीवनीशक्ति दिन−दिन क्षीण होती चलती है। कुछ दिन इस प्रकार गाड़ी घिसटती तो है पर अन्ततः जीवन तत्वों के चुक जाने पर अकाल मृत्यु की घड़ी सामने ही आ उपस्थित होती है।
तुलनात्मक दृष्टि
तात्कालिक कष्ट निवारण की दृष्टि से औषधि चिकित्सा का कोई महत्व हो सकता है पर जहाँ तक शरीर में भरे विजातीय विष तत्वों की सफाई का संबंध है वहाँ तक उसे असफल ही माना जायेगा। कई बार तो तीव्र औषधियाँ स्वयं ही एक रोग तत्व का रूप धारण कर लेती हैं और उससे अधिक कष्ट देती हैं जितना बेचारी बीमारी दे सकती थी। रोग के ऊपर औषधि, औषधि के बाद रोग का कुचक्र ऐसी बुरी तरह घूमता है कि इस जंजाल में फँसा हुआ मनुष्य धीरे−धीरे उस जीवनीशक्ति से वंचित ही होता जाता है जिसके कारण शारीरिक और मानसिक बल की जड़ जमी रहती है और देह तथा मन के रोगों एवं आघातों का मुकाबला कर सकना सम्भव होता है। जीवन तत्व के निरन्तर क्षीण होते रहने से मनुष्य की आत्मिक स्थिति इतनी दुर्बल हो जाती है कि वह मानवता के आवश्यक गुणों से भी धीरे−धीरे वंचित होने लगता है। क्रोध, चिड़चिड़ापन, दोषारोपण, निराशा, आवेश, चंचलता, भय, चिन्ता, अनुत्साह आलस्य, वासना, कायरता, दीनता, चोरी आदि की कितनी ही दुष्प्रवृत्तियाँ अशक्त मनुष्य में पनपती हैं। फलस्वरूप वह मानव−जीवन के महान गौरव के अनुरूप अपना जीवन निर्माण कर सकने में असमर्थ हो जाता है।
निर्दोष चिकित्सा पद्धति
चिकित्सा का उद्देश्य रोगों के विष का शरीर से निष्कासन कर देना ही नहीं, बीमारी की जड़ को काट देना भी होना चाहिए। जीवनीशक्ति को बढ़ाकर आत्मिक स्थिति में सुदृढ़ता उत्पन्न करना भी होना चाहिए। इस दृष्टि से विचार करने पर प्रचलित चिकित्सा पद्धतियाँ एकाँगी ही नहीं दोषपूर्ण भी दिखाई पड़ती हैं। इस समस्या पर विचारकों और तत्त्वदर्शियों का ध्यान गया है और जा रहा है। निर्दोष चिकित्सा पद्धतियों की खोज करने के सिलसिले में आदि काल से लेकर अब तक जो प्रयत्न किये गये हैं उन सब का निष्कर्ष एक ही निकला है—‛प्राकृतिक चिकित्सा’ हमें यह नाम भी अपूर्ण लगता है। वस्तुतः इस विज्ञान को कहना चाहिए—प्राकृतिक जीवन−यापन करने की विद्या। इसके आधार पर रोग की तात्कालिक चिकित्सा ही नहीं होती वरन् उस जीवनीशक्ति की अभिवृद्धि भी होती है जो दीर्घ−जीवन और प्रफुल्लित मनः स्थिति का मूल आधार है। शरीर ही नहीं मन पर भी इसका भारी प्रभाव पड़ता है और रोग से विवश होकर ही सही जो इस प्रणाली के सम्पर्क में आता है निश्चित रूप से संयम, साहस और अगणित मानसिक श्रेष्ठताओं को अनायास ही उपलब्ध कर लेता है।
हमारा झुकाव क्यों?
हमारे कार्यक्रम में प्राकृतिक चिकित्सा को सक्रिय एवं प्रसारात्मक कार्यक्रम में इसीलिए स्थान मिला है। हमारी अभिरुचि का विषय सदा से अध्यात्म रहा है। हम मानव के महामानव बनने में नर देह की सफलता अनुभव करते रहे हैं और इस आत्म विकास के एक मात्र उपाय अध्यात्म को सर्वतोभावेन आत्मसात् करते रहे हैं। अपना निज का सारा कार्यक्रम इसी दृष्टि से बनता है। प्रचार और सेवा का भी यही क्षेत्र है। प्राकृतिक चिकित्सा को भी हमने विशुद्ध आध्यात्मिक आवश्यकता के रूप में ही जाना है और इसी दृष्टि से उसे अपने कार्यक्रम में सम्मिलित रखा है। स्वतन्त्रता प्राप्त करने के बाद गान्धी जी भी यही सोचते थे कि भारत की मानसिक स्थिति का उत्कर्ष करने के लिए शारीरिक विकास का सही और उचित आधार अपनाया जाना आवश्यक है। उनने उरुली काँचन (पूना) में स्वयं एक प्राकृतिक चिकित्सालय स्थापित कराया था और वे सोचते थे कि अपने समय का एक चौथाई भाग इस राष्ट्र की महती आवश्यकता की पूर्ति में दिया करेंगे। हमारा दुर्भाग्य ही है कि स्वराज्य के बाद अनेकों विषम परिस्थितियाँ देश के सामने आईं और वे उन्हें सुलझाने में ऐसे लगे कि उन्हीं में उन्हें खप जाना पड़ा। यदि बापू आज जीवित रहे होते तो निश्चय ही खादी और चरखे की तरह उन्होंने प्राकृतिक चिकित्सा को भी घर−घर पहुँचा दिया होता। बापू भले ही आज हमारे बीच न हों पर उनका सोचा हुआ निदान और उपाय आज भी उतना ही सत्य और उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उनके सामने था। हम इस ओर यदि उपेक्षा करेंगे तो राष्ट्रीय स्वास्थ्य की समस्या का हल हो नहीं सकेगा। इतना ही नहीं अस्वस्थ शरीरों में रहने वाला अस्वस्थ मन भी राष्ट्र के पुनर्निर्माण में सहायक नहीं, बाधक ही सिद्ध होगा।
अध्यात्म का स्थूल प्रयोग
प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली को हमने अध्यात्म ज्ञान के शारीरिक क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रयोग की दृष्टि से ही जाना और माना है और उसी मान्यता के आधार पर इसे अग्रगामी बनाने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। इसका पहिला आधार शरीर शुद्धि है, जो आत्म शुद्धि का ही एक स्थूल रूप है। इस प्रणाली के अनुसार चिकित्सा कराने वाले के लिए आत्म संयम का अपनाना, इन्द्रियों पर काबू रखना मन को मारना नितान्त आवश्यक है इसके बिना यह चिकित्सा प्रणाली एक कदम भी आगे नहीं बढ़ती। उपवास को प्राकृतिक चिकित्सा का प्राण कहा जाता है। आहार में ऋषि मुनियों जैसी सात्विकता अपनानी पड़ती है। शाक, फल, छाछ, दूध को बिना मसाले और बिना शक्कर के लेना जिह्वा इन्द्रिय की एक कड़ी तितीक्षा और तपश्चर्या है। आज जब कि हर आदमी चटोरेपन की आदतों से बुरी तरह ग्रसित है, उपवास के नाम पर लोग जो मखौल बनाते हैं उसमें भी हलुआ, मिठाई, मैदा, नमक, कालीमिर्च आदि का पूरा सरंजाम ऐसा इकट्ठा कर लेते हैं जिसमें चटोरेपन को पूरी छूट रहती है। इसके मुकाबले में प्राकृतिक चिकित्सा का रोगी कहीं अधिक कठोर उपवास करता है। उसे मिठाई, मसाले सभी कुछ छोड़ने पड़ते हैं। आरम्भ में निराहार उपवास करने पड़ते हैं और पीछे बहुत दिनों तक शाक,फल, छाछ जैसे परम सात्विक आहार को बहुत स्वल्प मात्रा में लेकर काम चलाना पड़ता है। ठूँस−ठूँस कर चटपटे पदार्थ खाते रहने वाले जिह्वालोलुप व्यक्तियों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा उतनी ही कठिन है जितना दुष्ट दुराचारियों के लिए भगवान में एक क्षण के लिए भी मन लगा सकना।
उपवास की महत्ता
उपवास को शास्त्रों में पापों का एक श्रेष्ठ प्रायश्चित बताया है। एकादशी, रविवार एवं व्रत पर्वों के दिनों लोग बड़ी श्रद्धा और भावनापूर्वक उपवास करके आत्म शुद्धि का आयोजन करते हैं। चान्द्रायण व्रत में एक महीने का उपवास करना पड़ता है और अनेक पापों का प्रायश्चित होने की आशा रखी जाती है। यह धार्मिक उपवास अब रूढ़ि बन जाने से उनमें बहुत प्रकार का बहुत कुछ खाते रहने की तरकीबें निकाल ली गई हैं। पर प्राकृतिक चिकित्सा में अनिवार्य रूप से कराये जाने वाले उपवास एवं सात्विक आहार पर जमाई हुई श्रद्धा में उपवास का वास्तविक एवं वैज्ञानिक तत्व भरा रहता है। उससे रोग निवारण के रूप में शारीरिक पापों का प्रायश्चित तो प्रत्यक्ष ही हो जाता है। मानसिक पापों की शुद्धि भी होनी निश्चित है। गीता में उपवास को विषय वासनाओं से निवृत्त कराने वाला बताया गया है। ‘प्रायश्चित निर्णय’ ग्रन्थ में हर पाप के प्रायश्चित में उपवास तो अनिवार्य ही माना है। एकादशी महात्म की वह कथा प्रसिद्ध है जिसमें अनजाने लड़ाई झगड़े के कारण एकादशी के दिन एक धोबिन के कुछ न खाने पर इतना पुण्य मिल गया था कि उसके स्पर्श से देवताओं का टूटा हुआ विमान भी आकाश में उड़ जाने योग्य बना था। फिर प्राकृतिक चिकित्सा से कराये जाने वाले उपवास मानसिक स्थिति में सात्विकता लाने वाले क्यों सिद्ध न होंगे? इस कठोर आत्म नियंत्रण और इन्द्रिय निग्रह का चिकित्सार्थी की मनोदशा पर प्रभाव क्यों न पड़ेगा?
अन्य चिकित्सा प्रणालियों में एक मिनट में दवा देकर डाक्टर अपने रोगी से अलग हो जाता है, उसे कोई जरूरत नहीं कि अपनी औषधि का सारा विज्ञान समझावे अथवा रोग की उत्पत्ति के हेतु एवं भविष्य में उससे बचे रहने के तत्व ज्ञान को रोगी के सामने रखे। पर प्राकृतिक चिकित्सक को मिट्टी पानी जैसे बिना मूल्य के तुच्छ समझे जाने वाले पदार्थों की महत्ता को,अपनी अजनबी चिकित्सा प्रणाली की विशेषता को समझाना पड़ता है। समझाये बिना रोगी के कौतूहल एवं अविश्वास का समाधान नहीं हो सकता। प्राकृतिक विज्ञान को भली प्रकार समझ लेने पर रोगी भविष्य में उन नियमों पर चलने के लिए निष्ठावान हो जाता है फलस्वरूप सदा के लिए न केवल उसका दवादारू से पिण्ड छूटता है वरन् सात्विक गतिविधियों को अपनाने से शरीर को स्वस्थ रखने के साथ−साथ मनोबल भी प्रचुर मात्रा में बढ़ने लगता है। जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए यह मनोबल देह की जीवनीशक्ति से किसी भी प्रकार कम मूल्यवान् नहीं है।
धैर्य और विवेक का अभ्यास
प्राकृतिक चिकित्सा में एक रोग का तात्कालिक समाधान नहीं होता वरन् शरीर की पूरी शुद्धि और सफाई करनी पड़ती है। इसमें कुछ तो समय लग ही जाता है। आज इसकी, कल उसकी दवा कराने वाला अधीर रोगी जब धैर्यवान् बनता है तभी वह चिकित्सा का लाभ उठा पाता है। चिकित्सा के दिनों में उसे जिह्वा इन्द्रिय पर कठोर संयम करने के साथ−साथ धैर्य और विवेक की भी साधना करनी पड़ती है। अन्यथा जन्म भर से पड़ी चली आ रही चटोरेपन की आदत को कैसे काबू में रखा जा सकेगा? क्षण−क्षण में रोग मुक्ति के लिए उतावला मृगतृष्णा में व्यथित, कस्तूरी के हिरन की तरह उछलते फिरने वाला एक−एक दिन एक−एक डाक्टर की आजमायश करने वाला रोगी क्यों कर देर तक शरीर की शुद्धि में स्थिर मति से लगा रह सकेगा? रोग के दिनों की विपन्न स्थिति में भी जिसने धैर्य और विवेक की परीक्षा में उत्तीर्णता प्राप्त करने का निश्चय किया हुआ है वह व्यक्ति भावी जीवन में अवश्य ही धैर्यवान और विवेकशील बनेगा। इन महान् सद्गुणों की अभिवृद्धि आत्मिक लाभ की दृष्टि से इतनी महत्वपूर्ण है कि शारीरिक स्वास्थ्य लाभ तो उसकी तुलना में बहुत ही तुच्छ श्रेणी का लाभ रह जाता है। इन दोनों गुणों का बढ़ना मानव को महामानव बना सकने में बड़ा उपयोगी सिद्ध होता है।
मृग मरीचिका से छुटकारा
कृत्रिमता के दुष्परिणाम और प्रकृति प्रदत्त प्रेरणाओं का महत्व समझना ही प्राकृतिक चिकित्सा का आधार है। यह विश्वास जिसका जम गया वह विलासिता, दिखावट, ढोंग और अंधी दुनिया के पीछे भागने की अपेक्षा प्रकृति और ईश्वर से प्रेरणा प्राप्त करेगा। मिट्टी, पानी, हवा, आग और आकाश के पंचतत्वों से यह शरीर बना है तो उन्हीं के उपचार से वह निरोग हो सकेगा यह मान्यता बन जाने के बाद यह मान्यता बनना भी स्वाभाविक है कि आत्मा को शान्ति और स्थिरता उसके सजातीय अध्यात्म, धर्म और ईश्वर से ही मिलने वाली है। यह प्रपंच की कृत्रिमता माया मरीचिका के समान है जो तृष्णा की आग भड़काती, अगणित दुष्प्रवृत्तियों को जन्म देकर पाप पंक में धकेल देती है। जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य रक्षा के लिए इन्द्रिय संयम और नियमितता का अवलम्बन आवश्यक है उसी प्रकार आत्मिक स्वास्थ्य के लिए तृष्णा और वासना का परित्याग अनिवार्य है। यह भावना अन्तःकरण में उत्पन्न होने पर शरीर स्वास्थ्य से भी अधिक उपयोगी आत्मिक स्वास्थ्य की ओर मनुष्य का ध्यान जाना स्वाभाविक है। जो शरीर को सात्विक ढाँचे में ढाल सकता है वह मन को भी धर्म और सदाचार के बंधनों में बाँध सकता है। आत्म कल्याण की साधना के लिए लोग अनेक प्रकार के कर्मकाण्डों को अपनाते हैं उनमें से कई सार्थक कई निरर्थक होते हैं। इन कर्मकाण्डों में प्राकृतिक जीवन की पद्धति के अनुसार अपनी दिनचर्या को ढाल लेना आत्मिक साधना का एक अत्यन्त उपयोगी एवं सार्थक प्रकार हो सकता है। धर्म और अध्यात्म पूजाघर तक सीमित रहने की नहीं जीवन में ओतप्रोत हो जाने की वस्तु हैं। संयम और नियमितता शरीर का धर्म एवं अध्यात्म है जो इसे पालन करने लगा उसकी प्रवृत्ति आन्तरिक अध्यात्म को व्यवहारिक जीवन में उतारने के लिए अवश्य अग्रसर होगा। उच्च सिद्धान्तों को कार्य रूप में परिणत करने का व्यवहारिक अभ्यास आगे बढ़ेगा ही और उसका सत्परिणाम अध्यात्मिक जीवन में प्रत्यक्ष परिलक्षित होगा ही।
गत मई के अंक में पाठक स्वास्थ्य रक्षा के आवश्यक सिद्धान्त पढ़ चुके हैं। इस अंक में उपचार पद्धति का विवरण भी पढ़ेंगे। तपोभूमि में इस विज्ञान के अनुसार शिक्षण देने एवं चिकित्सा करने की भी व्यवस्था की गई है। इस सब के मूल में हमारी एक ही भावना है—अध्यात्म के आदर्शों का व्यवहारिक जीवन में प्रयोग होना। इसी प्रेरणा से प्रेरित होकर यह प्रक्रिया अपनाई और बढ़ाई जा रही है।
प्राकृतिक−चिकित्सा−प्रणाली का अर्थ है प्राकृतिक पदार्थों विशेषतः प्रकृति के पाँच मूल तत्वों द्वारा स्वास्थ्य−रक्षा और रोग निवारण का उपाय करना। विचारपूर्वक देखा जाय तो यह कोई गुह्य विषय नहीं है और जब तक मनुष्य स्वाभाविक और सीधा−सादा जीवन व्यतीत करता रहता है तब तक वह बिना अधिक सोचे−विचारे भी प्रकृति की इन शक्तियों का प्रयोग करके लाभान्वित होता रहता है। पर जब मनुष्य स्वाभाविकता को त्याग कर कृत्रिमता की ओर बढ़ता है, अपने रहन−सहन तथा खान−पान को अधिक आकर्षक और दिखावटी बनाने के लिये प्रकृति के सरल मार्ग से हटता जाता है तो उसकी स्वास्थ्य−सम्बन्धी उलझनें बढ़ने लगती हैं और समय−समय पर उसके शरीर में कष्टदायक प्रक्रियाएँ होने लगती हैं, जिनको ‘रोग’ कहा जाता है। इन रोगों को दूर करने के लिये अनेक प्रकार की चिकित्सा−प्रणालियाँ आजकल प्रचलित हो गई हैं जिनमें हजारों तरह की औषधियों, विशेषतः तीव्र विषात्मक द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। इन तीव्र दवाओं से जहाँ कुछ रोग अच्छे होते हैं वहाँ उन्हीं की प्रतिक्रिया से कुछ अन्य व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और संसार में रोगों के घटने के बजाय नित्य नवीन रोगों की वृद्धि होती जाती है। इस अवस्था को देख कर पिछले सौ−डेढ़−सौ वर्षों के भीतर योरोप अमरीका के अनेक विचारशील सज्जनों का ध्यान प्राकृतिक तत्वों की उपयोगिता की तरफ गया और उन्होंने मिट्टी, जल, वायु, सूर्य−प्रकाश आदि के विधिवत् प्रयोग द्वारा शारीरिक कष्टों, रोगों को दूर करने की एक प्रणाली का प्रचार किया। वही इस समय प्राकृतिक चिकित्सा या ‘नेचर क्योर’ के नाम से प्रसिद्ध है।
पर यह समझना कि प्राकृतिक−चिकित्सा प्रणाली का आविष्कार इन्हीं सौ−दो−सौ वर्षों के भीतर हुआ है, ठीक न होगा। हमारे देश में अति प्राचीन काल से प्राकृतिक पंच−तत्वों की चमत्कारी शक्तियों का ज्ञान था और उनका विधिवत् प्रयोग भी किया जाता था। और तो क्या हमारे वेदों में भी, जिनको अति प्राचीनता के कारण अनादि माना जाता है और जिनका उद्भव वास्तव में वर्तमान मानव सभ्यता के आदि काल में हुआ था प्राकृतिक चिकित्सा के मुख्य−सिद्धान्तों का उल्लेख है। ऋग्वेद का एक मंत्र देखिये—
आपः इद्वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः।आपः सर्वस्य भेषजीस्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम्॥ (10−137−6)
“जल औषधि रूप है, यह सभी रोगों को दूर करने वाली महान औषधि के तुल्य गुणकारी है। यह जल तुमको औषधियों के समस्त गुण (लाभ) प्राप्त करावे।”
इस तरह के वचन ऋग्वेद और अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। साथ ही सूर्य−प्रकाश तथा वायु के आरोग्यप्रदायक गुणों का भी उल्लेख मिलता है। तामिल भाषा में वेदों के समान ही पूजनीय माना जाने वाले ‘कुरल’ नामक ग्रन्थ में प्राकृतिक चिकित्सा की विधियों की बड़े उत्तम ढंग से शिक्षा दी गई हैं। यह ग्रन्थ दो हजार वर्ष से अधिक पुराना है। इसी प्रकार योरोप के सर्वप्रथम चिकित्साशास्त्री माने जाने वाले ‘हिप्पोक्रेट्स’ ने मनुष्यों को स्वास्थ्य विषयक उपदेश देते हुये स्पष्ट लिखा है “तेरा आहार ही तेरी औषधि हो और तेरी औषधि तेरा आहार हो।” आजकल भी प्राकृतिक चिकित्सकों का एक बहुत बड़ा सिद्धांत यही है कि आहार ही ऐसा दिया जाय जो औषधि का काम दे और जिससे शरीर के विकार स्वयं दूर हो जायें। हिप्पोक्रेट्स का सिद्धान्त पूर्णतया भारतीय विद्वानों के मत से मिलता हुआ है, और उसे भारतवर्ष की विद्याओं का ज्ञान हो तो कोई आश्चर्य भी नहीं। क्योंकि उस ढाई हजार पुराने युग में भारत की सभ्यता और संस्कृति का संसार के सभी भागों में प्रचार हो चुका था।
इस प्रकार जब तक मनुष्य प्रकृति की गोद में पलते−खेलते थे, उनका रहन−सहन भी प्राकृतिक नियमों के अनुकूल था तो वे अपनी सभी आवश्यकताओं की पूर्ति प्राकृतिक ढंग से ही करते थे। पर मध्यकाल में जब बड़े−बड़े राज्यों और साम्राज्यों की स्थापना हो गई तो बड़े आदमियों के रहन−सहन में भोग विलास की अधिकता होने लगी और उसकी पूर्ति के लिये भाँति−भाँति के कृत्रिम उपायों का प्रयोग भी बढ़ने लगा। साधारण लोग भी उनकी नकल करके नकली चीजों को अधिक सुन्दर और आकर्षक समझने लगे, जिसके फल से लोगों का स्वास्थ्य निर्बल पड़ने लगा, तभी तरह−तरह के रोगों की वृद्धि होने लगी। जब काल क्रम से यह अवस्था बहुत बिगड़ गई और संसार की जनसंख्या तरह−तरह के भयानक तथा गन्दे रोगों के पंजे में फँस गई तो विचारशील लोगों का ध्यान इसके मूल कारण की तरफ गया और उन्होंने कृत्रिम आहार−बिहार की हानियों को समझ कर “प्रकृति की ओर लौटो” (बैक टू नेचर) का नारा लगाया।
यदि हम भारतीय धर्म और संस्कृति की दृष्टि से इस चिकित्सा−प्रणाली की व्याख्या करें तो हम कह सकते हैं कि मनुष्य के स्वास्थ्य और रोगों के भीतर भगवान की दैवी शक्ति ही काम कर रही है। व्यवहारिक क्षेत्र में यह रोगों और व्याधियों के निवारण के लिये केवल उन्हीं आहारों तथा पञ्च तत्वों का औषधि रूप में प्रयोग करना बतलाती है जो सर्वथा प्रकृति के अनुकूल हैं। इस प्रकार इस चिकित्सा के छह विभाग हो जाते हैं−मानसिक चिकित्सा, उपवास, सूर्य−प्रकाश−चिकित्सा, वायु चिकित्सा, जल चिकित्सा, आहार अथवा मिट्टी चिकित्सा।
आजकल जिस डाक्टरी चिकित्सा−पद्धति का विशेष प्रचलन है उसका उद्देश्य किसी भी उपाय से रोग में तत्काल लाभ दिखला देना होता है, फिर चाहे वह लाभ क्षण स्थायी−धोखे की टट्टी ही क्यों न हो। हम देखते हैं कि अस्पतालों में एक−एक रोगी को महीनों तक प्रतिदिन तीव्र इंजेक्शन लगते रहते हैं, पर एक शिकायत ठीक होती है तो दूसरी उत्पन्न हो जाती है। पर पीड़ा के कुछ अंशों में मिटते रहने के कारण लोग इस बाह्य चिह्नों की चिकित्सा के फेर में पड़े रहते हैं। इसके विपरीत प्राकृतिक चिकित्सा में रोगों के विभिन्न नामों तथा रूपों की चिन्ता न करके उनके मूल कारण पर ही ध्यान दिया जाता है और उसी को निर्मूल करने का प्रयत्न किया जाता है। इतना ही नहीं इस चिकित्सा का वास्तविक लक्ष्य केवल शारीरिक ही नहीं वरन् मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य प्राप्त कराना भी माना गया है, क्योंकि मानसिक तथा आध्यात्मिक सुधार के बिना शारीरिक स्वास्थ्य स्थायी नहीं हो सकता। इसलिये भारतीय चिकित्सा प्रणाली में जहाँ शुद्ध आहार−बिहार का विधान है वहाँ उच्च और पवित्र जीवन व्यतीत करने पर भी जोर दिया गया है। प्राकृतिक चिकित्सा के तत्व का यथार्थ रूप में हृदयंगम करने वाला व्यक्ति गीता के “कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” वाले वाक्य पर पूर्ण श्रद्धा रखकर ‘सत्य−आचरण’ को ध्यान रखता है और फल को भगवान के ऊपर छोड़ देता है। सत्य−आचरण वाला व्यक्ति प्रथम तो रोगी ही नहीं होगा और यदि किसी गलती या दुर्घटना से हो भी गया तो उसी आचरण के प्रभाव से रोग का निवारण शीघ्र ही हो जायेगा। रोग की अवस्था में यह ‘सत्य−आचरण’ उपवास शुद्ध वायु, प्रकाश, जल स्नान तथा औषधि रूप आहार का प्रयोग करना ही हो सकता है, इन साधनों से हम सब प्रकार के रोगों की सफलतापूर्वक चिकित्सा करने में सक्षम हो सकते हैं।
आगे चलकर जब रोगों के कारण और स्वरूप पर विचार करते हैं तो मालूम होता है कि रोग जीवित शरीर में ही उत्पन्न हो सकता है। जीवित शरीर एक मशीन या यंत्र की तरह है जिसका संचालन एक सूक्ष्मशक्ति (प्राण) द्वारा होता है। यही शक्ति भौतिक पदार्थों का सार ग्रहण करके उससे शरीर का निर्माण कार्य करती रहती है और दूसरी ओर इसी के द्वारा सब प्रकार के आहार से बचे हुये निस्सार मल रूप अंश का निष्कासन किया जाता है। ये दोनों क्रियाऐं एक दूसरे से सम्बन्धित हैं और इन दोनों के बिना ठीक तरह सञ्चालित हुये न तो जीवन और न स्वास्थ्य स्थिर रह सकता है। पर हम देखते हैं कि अधिकाँश लोग ग्रहण करने की—भोजन की क्रिया के महत्व को तो कुछ अंशों में समझते हैं और अपनी बुद्धि तथा सामर्थ्य के अनुसार पौष्टिक, शक्ति प्रदायक, ताजा, रुचिकारक भोजन की व्यवस्था करते हैं, पर निष्कासन की क्रिया के महत्व को समझने वाले और उस पर ध्यान देने वाले व्यक्तियों की संख्या अत्यन्त न्यून है। लोग समझते हैं कि उत्तम भोजन को पेट में डाल लिया जायेगा तो वह लाभ ही करेगा। पर यह भोजन यदि नियमानुसार परिमित मात्रा में पथ्य−अपथ्य का ध्यान रख कर न किया जायेगा तो निष्कासन की क्रिया का बिगड़ जाना अवश्यम्भावी है। उसके परिणामस्वरूप शरीर के भीतर मल और विकार जमा होने लगते हैं और स्वास्थ्य का संतुलन नष्ट हो जाता है।
यह विकार या विजातीय द्रव्य शरीर के स्वाभाविक तत्वों के साथ मिल नहीं पाता और एक प्रकार का संघर्ष अथवा अशान्ति उत्पन्न कर देता है। हमारी जीवनी−शक्ति यह कदापि पसन्द नहीं करती कि उस पर विजातीय द्रव्य का भार लादकर उसके स्वाभाविक देह−रक्षा के कामों में बाधा उपस्थित की जाय। वह हर उपाय से उसे शीघ्र से शीघ्र बाहर निकालने का प्रयत्न करती है। यदि वह उसे पूर्ण रूप से निकाल नहीं पाती तो ऐसे अंगों में डाल देने का प्रयत्न करती है जो सबसे कम उपयोग में आते हैं और जहाँ वह कम हानि पहुँचा कर पड़ा रह सकता है। इस प्रकार जब तक जीवनी−शक्ति विजातीय द्रव्य के कुप्रभाव को मिटाती रहती है तब तक हमें किसी रोग के दर्शन नहीं होते। पर जब हम बराबर गलत मार्ग पर चलते रहते हैं और विजातीय द्रव्य का परिमाण बढ़ता ही जाता है, तो लाचार होकर जीवनी शक्ति को उसे स्वाभाविक मार्गों के बजाय अन्य मार्गों से निकालना पड़ता है। चूँकि यह कार्य नवीन होता है, हमारे नियमित अभ्यास और आदतों के विरुद्ध होता है, इस लिये उससे हमको असुविधा, कष्ट, पीड़ा का अनुभव होता है और हम उसे ‘रोग’ या बीमारी का नाम देते हैं। पर वास्तविक रोग तो वह विजातीय द्रव्य या विकार होता है जिसे हम अनुचित आहार−विहार द्वारा शरीर के भीतर जमा कर देते हैं। ये कष्ट और पीड़ा के ऊपरी चिह्न तो हमारी शारीरिक प्रकृति अथवा जीवनीशक्ति द्वारा उस रोग को मिटाने का उपाय होते हैं। अगर हम इस तथ्य को समझ कर तथा कष्ट और पीड़ा को प्रकृति की चेतावनी के रूप में ग्रहण करके सावधान हो जायें तो रोग हमारा कुछ भी अनिष्ट नहीं कर सकता। उस समय हमारा कर्तव्य यही होना चाहिये कि हम प्रकृति के काम में किसी तरह का विघ्न बाधा न डालें वरन् अपने गलत रहन−सहन को बदलकर प्राकृतिक−जीवन के नियमों का पालन करने लगें। इससे विजातीय द्रव्य के बाहर निकालने के कार्य में सुविधा होगी और हम बिना किसी खतरे के अपेक्षाकृत थोड़े समय में रोग−मुक्त हो जायेंगे। संक्षेप में यही प्राकृतिक चिकित्सा का मूल रूप है, जिसको उपवास, मिट्टी और जल के प्रयोग, धूप−स्नान आदि कितने ही विभागों में बाँट कर सर्वसाधारण को बोधगम्य बनाने का प्रयत्न किया गया है।
रोग की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्राकृतिक चिकित्सा में जो कारण बतलाया गया है, उसका प्रबल विरोध एलोपैथीक चिकित्सा का कीटाणु सिद्धान्त करता है। इन लोगों की मान्यता है कि प्रायः सभी रोगों की उत्पत्ति के मूल कारण वे अत्यन्त छोटे और हमारे नेत्रों से अदृश्य कीटाणु होते हैं जो जल में, वायु में, समस्त खाद्य पदार्थों में पाये जाते हैं और सदैव मुख, नासिका, चर्म आदि के द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करते रहते हैं। जब इन कीटाणुओं की संख्या अधिक हो जाती है तभी ये हमको दबा लेते हैं और जिस रोग से वे संबंधित होते हैं वही हमारे शरीर में उत्पन्न कर देते हैं। अगर इस सम्बन्ध में डाक्टरों के कथनों पर पूरा विश्वास किया जाय तो वास्तव में एक दिन भी इस संसार में मनुष्य का रहना दुर्लभ हो जाय। वे लोग इनको महाभयंकर सर्प से बढ़ कर घातक बतलाते हैं। एक डाक्टर ने लिखा है कि यदि इन कीटाणुओं को दवाओं द्वारा नष्ट न किया जाय तो अनुकूल जलवायु पाने पर वे तीन दिन में एक से बढ़कर तीस खरब तक हो सकते हैं।
पर जब इस मत पर तर्क की दृष्टि से विचार किया जाता है, तो इसकी निस्सारता बहुत शीघ्र प्रकट हो जाती है। यह कीटाणु−सिद्धान्त अब से सौ वर्ष पहले फ्राँस के पास्चर नामक डाक्टर ने प्रचारित किया है। उसके पहले इसकी न तो कहीं चर्चा थी और न किसी को इसका कुछ भी ज्ञान था। उस समय तक किसी ने कीटाणु−नाशक दवाओं का आविष्कार या प्रयोग न किया था। पर यह एक प्रकट बात है कि उस समय के व्यक्तियों का स्वास्थ्य आजकल की अपेक्षा अधिक मजबूत तथा स्थायी होता था और शारीरिक दृष्टि से वे अधिक शक्तिशाली होते थे। यदि कीटाणुओं की सेना ऐसी ही भयंकर होती तो अब तक मनुष्यों का नाम निशान बच सकना भी कठिन था।
वास्तविक बात यह है कि रोगों के कीटाणु होते अवश्य हैं, पर वे कहीं बाहर से आकर हमारे शरीर में प्रवेश नहीं करते और न उनके कारण रोगों की उत्पत्ति होती है। वरन् जब मल के विकार से हमारे शरीर में गन्दगी बढ़ती है और रोग पैदा होता है तो उसके साथ में कीटाणु भी पैदा हो जाते हैं। कनाडा के डाक्टर फ्रेजर ने बार−बार परीक्षा करके यह सिद्ध किया है कि रोग की उत्पत्ति होने के पश्चात् ही कीटाणु दिखाई पड़ते हैं। इस प्रकार रोग कारण हैं और कीटाणु उसके कार्य या फल हैं। कार्य का कारण से पहले हो सकना असम्भव है।
कीटाणुओं के सिद्धान्त को असत्य सिद्ध करने वाला दूसरा प्रमाण यह भी है कि अनेक व्यक्तियों के शरीर की परीक्षा करने पर उसमें अनेक रोगों के कीटाणु पाये जाते हैं, पर वे लोग उन रोगों के बीमार नहीं होते, वरन् साधारण रूप में उनको स्वस्थ ही माना जाता है। प्राकृतिक चिकित्सकों ने तो दावे के साथ यह कहा है कि जिस व्यक्ति का शरीर सर्वथा स्वस्थ होगा अर्थात् जिसके भीतर विजातीय द्रव्य जमा न होंगे उसका ये कीटाणु कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इसको प्रमाणित करने के लिये जर्मनी के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रोफेसर पैर्टन कोफर ने तो सैकड़ों विद्यार्थियों के सम्मुख शीशी में भरे हैजे के कीटाणुओं को पी लिया था, पर उनको कुछ हानि नहीं हुई। वैसे डाक्टरों के मतानुसार उन कीटाणुओं की तादाद इतनी थी कि वे एक पूरी फौज को मार सकते थे। प्रोफेसर ने पहले ही कह दिया था कि मेरे शरीर में गन्दगी नहीं है इसलिये वहाँ ये कीटाणु पनप ही नहीं सकते।
डाक्टर लोग जो चेचक आदि का टीका लगाते हैं और उसके प्रभाव से लोगों को जो ज्वर हो जाता है या साधारण चेचक निकल आती है उसका कारण भी कीटाणु नहीं होते, वरन् डाक्टरी इंजेक्शन में जो मल का अंश होता है वही ये सब दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। मल ही विषैले प्रभाव वाला पदार्थ है, वह शरीर में जिस किसी भी रीति से प्रवेश करेगा अपना कुप्रभाव अवश्य दिखलायेगा। इसीलिये जिन लोगों के शरीर में आहार−विहार सम्बन्धी गलतियों के कारण पहले से मल जमा होता है और उसके कारण जिनका रक्त दूषित पड़ गया होता है, उन पर ही रोगों के कीटाणु प्रभाव डालते हैं। अगर मल का परिमाण अधिक होगा तो कीटाणुओं का प्रभाव भी ज्यादा होगा और मल कम हुआ तो उनका साधारण असर ही पड़ेगा।
टोरण्टो (कनाडा) में कुछ समय पहले एक संस्था की स्थापना की गई थी जिसका उद्देश्य कीटाणुओं के सिद्धान्त की छानबीन करना था। उसमें अनेकों प्रसिद्ध वैज्ञानिक तथा डाक्टर भी सम्मिलित थे तथा जनसाधारण में से भी जिनको इस विषय से अनुराग था उसमें भाग लेते थे। उन लोगों ने जाँच करके यही परिणाम निकाला कि मानव शरीर में कीटाणुओं का प्रकट होना रोगोत्पत्ति के पश्चात ही होता है इसलिये कीटाणु रोगों के कारण नहीं हो सकते, वरन् रोगों का कारण भिन्न ही होता है। इस सिद्धान्त का प्रत्यक्ष प्रमाण देने के लिये कुछ लोगों ने अपने को स्वयं सेवक के रूप में उपस्थित किया। डाक्टरों ने उनको भोजन तथा जल के साथ मिलाकर डिपथीरिया, निमोनिया, टाइफ़ाइड ज्वर (मोतीझरा) और गर्दन तोड़ बुखार आदि के ताजे और स्वस्थ कीटाणु दिये, पर उनके शरीर में उनके कारण कोई भी विकार या रोग उत्पन्न न हो सका और वे कीटाणु साधारण रीति से मल के साथ बाहर निकल गये। इसी प्रकार अमरीका के डाक्टर ऐडरमण्ड ने चेचक के टीके की असत्यता सिद्ध करने के लिये अपने समस्त शरीर में चेचक का बहुत सा मवाद मल लिया। वहाँ के कानून के अनुसार उनको रोगी मानकर कारंटाइन (रोगियों का निरोध−गृह) में बन्द कर दिया, पर कई दिन बीत जाने पर भी जब उन पर उसका कोई प्रभाव न पड़ा तब उन्हें छोड़ दिया गया।
हम फिर यह बतला देना चाहते हैं कि हमारा उद्देश्य कीटाणुओं के अस्तित्व से इनकार करना नहीं है और न हम उनको निष्प्रयोजन बतलाते हैं। ये कीटाणु प्रकृति के एक बड़े साधन के रूप में हैं जिनके द्वारा वह निर्माण और विनाश दोनों कार्यों को सम्पन्न करती है। एक प्रकार के कीटाणुओं द्वारा प्रकृति जीवन की उत्पत्ति और वृद्धि करती है और दूसरे प्रकार के कीटाणु चारों तरफ पैदा होने वाली गन्दगी और मल की सफाई करते हैं। अगर ये कीटाणु न होते तो यह संसार मुर्दा और सड़ी गली चीजों से भर जाता और उसमें स्वस्थ जीवन के विकास के लिये स्थान ही न रहता। इसलिये प्रकृति कीटाणुओं द्वारा ही मुर्दा और रोगी प्राणियों, पौधों और वनस्पतियों को नष्ट कराके नई वस्तुओं का निर्माण किया करती है। इस दृष्टि से कीटाणुओं को दोष देना या उनको भयंकर बतलाना निरर्थक है। उसके कारण ही हमारे शरीर में तरह−तरह के विकार उत्पन्न होते हैं जो अन्त में रोगों के रूप में प्रकट होते हैं। कीटाणु वास्तव में उस गन्दगी को मिटाने को आते हैं और इस प्रकार वे हमारे शत्रु नहीं मित्र ही समझे जाने चाहिये। यह दूसरी बात है कि हम अपनी अज्ञानता से या स्वार्थपर चिकित्सकों के उपदेशों से भ्रम में पड़कर उस समय उल्टा सीधा काम करने लगें और अपने ही हाथ से रोग को गम्भीर या घातक बना दें। कीटाणुओं को इसके लिये दोषी नहीं बताया जा सकता।
वास्तव में हमारे रोगों का सर्वप्रधान कारण हमारा आहार है। हम जैसा आहार करेंगे वैसा ही हमारा शरीर बनेगा, और वैसा ही आस−पास के वातावरण का उस पर प्रभाव पड़ेगा। आजकल लोगों ने आहार सम्बन्धी नियमों और संयम का अधिकाँश में त्याग कर दिया है और वे जिह्वा के स्वाद के लिये और आहार−तत्व को न समझने के कारण प्रायः आवश्यकता से बहुत अधिक खाया करते हैं या ऐसे पदार्थ खाते हैं जो हमारी शारीरिक प्रकृति के अनुकूल नहीं होते और भीतर पहुँच कर विकारों को उत्पन्न करते हैं। जब ऐसे पदार्थ कब्ज पैदा करके भीतर ही पड़े रहते हैं तो उनमें सड़न पैदा होती है और विषाक्त रस तथा गैसों की उत्पत्ति होकर रक्त दूषित होने लगता है। यह दूषित रक्त ही समस्त रोगों की जड़ है, क्योंकि रक्त शरीर में नख से शिख तक प्रत्येक अंग में बराबर दौरा करता रहता है और उसमें जो विषाक्त द्रव्य मिल जाता है उसे वह समस्त शरीर में फैलाता जाता है। उस अवसर पर हमारा जो अंग सबसे अधिक निर्बल अवस्था में और असुरक्षित होता है, उसी पर रोग का आक्रमण हो जाता है। यही रोगों का सच्चा कारण है, कीटाणुओं को इसके लिये दोषी बनाना व्यर्थ है।
रोगों का मुख्य कारण शारीरिक मल ही माना गया है। जब हम प्रकृति के नियमों के विरुद्धाचरण करके अपना आहार−विहार दूषित बना लेते हैं और जिह्वा तथा भोगेन्द्रिय की तृप्ति के लिये आवश्यकता से अधिक भोग्य−पदार्थों का प्रयोग करने लगते हैं, तो हमारे शारीरिक अंगों पर अधिक भार पड़ता है और वे अपना काम ठीक ढंग से नहीं कर पाते। इन अंगों में मुख्य आमाशय भी माना गया है जो सब प्रकार के आहार को पचाकर उसके रस से देह की पुष्टि करता है। जब उसका कार्यभार बढ़ जाता है तो वह खाये हुये भोजन का रस पूर्ण रूप से नहीं निकाल पाता और अर्द्धमुक्त आहार ही हमारे मलाशय में पहुँच जाता है। ऐसा आधा पचा आहार मलाशय में पहुँच कर शीघ्र ही सड़ने लग जाता है और उसमें से गंदगी मिश्रित रस निकलकर रक्त में मिल जाता है। यह दूषित रक्त ही रोगों का मूल कारण है, क्योंकि वह रक्तवाहिनी नसों द्वारा समस्त शरीर में संचरण करता रहता है और अपनी उस गंदगी को जगह−जगह छोड़कर अस्वास्थ्यकर अवस्था उत्पन्न करता है।
पर यह समझना कि मल केवल प्रति दिन खाये जाने वाले भोजन से ही निकलता है, पूर्णतः ठीक नहीं है। भोजन से काफी मल अवश्य निकलता है, पर आँतों से छनकर जो मल निकलता है वह भी परिणाम में कम नहीं होता। यही कारण है कि कई दिन तक उपवास करने की दशा में भी प्रतिदिन कुछ मल निकलता ही रहता है।
शरीर के जीवकोष (सेल) हमेशा टूटते−फूटते रहते हैं। अगर वे ठीक समय से शरीर के बाहर न निकाल दिये जायँ तो वे भी मल की तरह विकार उत्पन्न करते हैं। इसी प्रकार शरीर के विभिन्न अंग, यकृत, गुर्दा, आमाशय, फेफड़ा आदि जो कार्य करते रहते हैं, उनकी कार्यप्रणाली से भी कार्बोनिक एसिड, यूरिक एसिड, फास्फरिक एसिड आदि कई विषाक्त द्रव्य उत्पन्न होते हैं, उनको भी बाहर निकालना आवश्यक होता है। चौथे नम्बर पर शरीर के दोषयुक्त अंग खराब टानसिल, कमजोर दाँत, प्रदाहयुक्त श्वास नली से भी विष उत्पन्न होते हैं। शरीर पूर्ण स्वस्थ न हो तो शरीर के भीतर रहने वाले विभिन्न प्रकार के कीटाणु भी विष के परिमाण को बढ़ाते हैं।
यह समस्त विष या मल शरीर के लिये विजातीय ही होता है और हमारे स्वास्थ्य का आधार इसी पर है कि यह शीघ्र से शीघ्र मलद्वार, मूत्र नाली, फेफड़े, चर्म आदि के द्वारा निकलता चला जाय। यदि ये मल निकालने के मार्ग साफ और खुले हुये रहते हैं और मल को आसानी से बाहर निकालते रहते हैं तो हमको कोई रोग होने की संभावना नहीं होती। पर यदि किसी कारणवश इन में कुछ खराबी आ जाती है, ये अपना कार्य ठीक ढंग से नहीं कर सकते तो शरीर के भीतर विजातीय द्रव्य की वृद्धि होने लगती है, और जब वह एक नियत सीमा को पार कर जाती है, तो रोग प्रकट होने लगते हैं। इसी तथ्य को दृष्टि में रखकर सुप्रसिद्ध चिकित्साविज्ञान के ज्ञाता डा. सर विलियम आरबूथनट ने कहा है कि “चाहे रोगों का कितना ही विस्तार क्यों न किया जाय पर वास्तव में रोग एक ही है अर्थात् शरीर की ठीक तरह से सफाई न हो सकना।”
यह विजातीय द्रव्य शरीर में किस प्रकार जमा होकर वृद्धि को प्राप्त होता है और क्रमशः स्वास्थ्य को नष्ट करके मनुष्य को रोगी बना देता है इसका विशद वर्णन जल−चिकित्सा के आचार्य डा. लुई कूने ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “एम आई वैल और सिक” (मैं तन्दुरुस्त हूँ या बीमार)में किया है। वे कहते हैं—
“शरीर में बहुत दिन तक अप्राकृतिक भोजन तथा अपचे भोजन को निकालते रहने की ताकत नहीं रह जाती। तब शरीर में विजातीय द्रव्य जमा होने लगता है। आरम्भ में विजातीय द्रव्य पेडू के पास मल−मूत्र त्याग के स्थानों के पास इकट्ठा होता है। फिर उसमें नित्य नया विजातीय द्रव्य मिल कर उसकी मात्रा बढ़ती रहती है और शीघ्र ही अन्दर−ही−अन्दर उसमें एक परिवर्तन होने लगता है। उसके रेशे बिखरने लगते हैं और एक प्रकार का प्रकोप या सड़न पैदा हो जाता है। विजातीय द्रव्य घुल कर शरीर के ऊपर तथा नीचे के हिस्सों में फैलता है और धीरे−धीरे शरीर के भिन्न−भिन्न हिस्सों में जमा हो जाता है। यह द्रव्य ऊपर मस्तक तक तथा नीचे पाँव और हाथ की सीमा तक पहुँचे बिना नहीं रुकता। उस समय शरीर इसे हर कोशिश से बाहर निकालना चाहता है, पर अधिक काल तक वह इस क्रिया में समर्थ नहीं होता। इस कोशिश में शरीर पर बहुत ज्यादा पसीना आता है, फोड़े फुन्सियाँ आदि अन्य क्रियाएँ होती हैं। पाँव का पसीना, जिसके सम्बन्ध में इतना अधिक मतभेद है, वास्तव में यह रोग का लक्षण है। इसे कृत्रिम उपायों से रोकने का फल केवल यह होगा कि शरीर में अव्यवस्था बढ़ेगी। शरीर को उत्तेजित करने वाली घटनाएँ जैसे आकस्मिक ठंड, बाहरी चोट, प्रबल मनोविकार इत्यादि का नतीजा प्रायः यह होता है कि अंगों के सिरों पर जमा हुये विजातीय द्रव्य को शरीर उसके उत्पत्तिस्थान की ओर वापस भेजने लगता है। उस समय वह द्रव्य प्रायः जोड़ों के पास आकर रुक जाता है। यह सूजन का कारण होता है, जो उपर्युक्त कारणों से सदा जोड़ों के नीचे की ओर ही प्रकट होती है। हम गठिया के किसी भी रोगी में यह दशा देख सकते हैं।
“जिन अंगों में विजातीय द्रव्य जमा रहता है वे अपना स्वाभाविक कार्य उचित रूप से पूरा नहीं कर सकते। वहाँ रक्त −प्रवाह में रुकावट होने लगती है और इससे शरीर का पूरा पोषण नहीं हो पाता। जहाँ विजातीय द्रव्य बहुत अधिक जमा हो जाता है, वहाँ अंग छूने पर ठंडे जान पड़ते हैं। उनमें गरमी लाना बहुत मुश्किल हो जाता है। पहले पहले शरीर के अग्रभाग—हाथ−पैर ठंडे जान पड़ने लगते हैं, पर जल्दी ही दूसरे अंगों के हिस्सों में भी इसका असर होने लगता है।”
जब इस प्रकार शरीर में मल या विजातीय द्रव्य की वृद्धि होती है तो उसका कुपरिणाम भी कुछ समय में प्रकट होने लगता है। जब खाया हुआ भोजन अधपचे रूप में छोटी और बड़ी आँत में चला जाता है तो वह नियमित मल की तरह बाहर नहीं निकल जाता, वरन् प्रायः बीच में ही रुक कर सड़ने लग जाता है। उसका कुछ अंश गैस रूप होकर ऊपर के अंग में चढ़ने लगता है। अगर उसके मार्ग में कोई भी बाधा न हो तो वह सहज ही में मस्तक तक पहुँच सकता है। पर बीच में जो शारीरिक अवयव हैं वे उसको रोकने की चेष्टा करते हैं। इन क्षेत्रों के पारस्परिक संघर्ष के कारण सिर गर्म हो उठता है और अगर मल अधिक होता है तो उसकी गर्मी से बुखार भी हो जाता है। यह बुखार शारीरिक अवयवों द्वारा उसी विजातीय द्रव्य के बाहर निकालने की चेष्टा का परिणाम होता है। आरंभ में जब यह मल कम होता है तो दस्त और पसीना के रूप में निकल जाता है। पर जितना मल निकलता है उससे अधिक यदि हम अनुचित खान−पान द्वारा शरीर के भीतर डालते रहते हैं, तो यह समस्त शरीर में बिखर कर जहाँ सुविधा होती है अपना स्थान बना लेता है। शारीरिक अस्वस्थता के अतिरिक्त ऐसे मलभारयुक्त लोगों की आकृति भी बिगड़ने लगती है। मुखाकृति खराब होकर मस्तक भी बेडौल हो जाता है। गर्दन जैसी होनी चाहिये उसकी अपेक्षा छोटी या बहुत लम्बी दिखलाई पड़ने लगती है। अनेक लोगों का मुँह फूला हुआ जान पड़ता है। ऐसे फूले शरीर को बहुत से लोग पुष्टता या शक्ति का चिन्ह समझते हैं, परन्तु उनका यह विचार सर्वथा भ्रमपूर्ण होता है। यह लक्षण शक्ति की वृद्धि के न होकर मल भर जाने के होते हैं। छाती ऊँची−नीची हो जाती है, पेट आगे को लटकने लगता है, टाँगें खम्भे के समान दिखाई देने लगती हैं। कुछ लोगों के शरीर में मैल अधिकाँश में भीतरी भागों में ही रहता है, इसलिये उनके शरीर में ऐसे चिन्ह तो नहीं दिखलाई पड़ते पर उनके शरीर में झुर्रियाँ पड़ जाती हैं और खाल लटक जाती है। गर्दन को इधर−उधर फेरने से खाल तनने लगती है। मुख का रंग फीका, पीला अथवा बहुत लाल हो जाता है। शरीर का रंग यदि बहुत चमकने लगे तो यह भी विजातीय द्रव्य इकट्ठा होने का लक्षण है।
मल के इकट्ठे होने की पहिचान यह भी है कि उससे शरीर की फुर्ती जाती रहती है और उसका स्थान आलस्य ग्रहण कर लेता है। ऐसा व्यक्ति सदैव निकम्मा बनकर पड़ा रहना चाहता है और अपना कोई काम स्वयं करना पसन्द नहीं करता। उसे सब प्रकार का परिश्रम, चलना, फिरना, खेलना, कूदना बहुत बुरा जान पड़ता है।
मनुष्य यद्यपि अपनी लापरवाही और चटोरेपन के कारण शरीर को अनावश्यक खाद्य पदार्थों और उसके फलस्वरूप मल से भरता रहता है, पर प्रकृति जहाँ तक संभव होता है उसको किसी न किसी मार्ग से निकाल शरीर को रोग से बचाने की चेष्टा करती ही रहती है। वह मलाशय से बचे हुये काम को पेशाब, पसीना और श्वास द्वारा पूरा कराने का प्रयत्न करती है। इस विधि से चर्म का काम गुर्दे से और गुर्दे का काम चर्म से लेकर प्रकृति किसी प्रकार शारीरिक व्यवस्था का ठीक बनाये रखने की चेष्टा करती है। पर यदि मनुष्य इतने पर भी नहीं चेतता और अपने प्रकृति विरुद्ध तथा अनियमित रहन−सहन में सुधार नहीं करता, अति भोजन, तम्बाकू, मद्य, नशा, असमय की निद्रा, बन्द स्थान में सोना आदि कुटेवों द्वारा मल को बढ़ाकर शारीरिक व्यवस्था विश्रृंखलित कर देता है, तो शारीरिक अवयव शरीर को साफ रखने में असमर्थ हो जाते हैं और वह मल शरीर के भीतर ही जमा होकर हानिकारक विकार उत्पन्न करने लगता है। ऐसी अवस्था आ जाने पर प्रकृति भी अपना रूप बदल देती है और सहज उपायों को छोड़ कर कठोर उपायों से काम लेने लगती है। इन मलों को भस्म करने के लिये ही वह अक्सर ताप (ज्वर) को उत्पन्न करती है, जिसकी गर्मी से, मल घुल कर विभिन्न रास्तों से बाहर निकल जाय। जब कभी मल भिन्न प्रकार का होता है तो प्रकृति पेचिश और आँव के दस्त पैदा कर देती है। यदि मल श्वास नली द्वारा निकलने लायक हुआ तो प्रकृति खाँसी जुकाम उत्पन्न करके मल को कफ़ के रूप में निकालने की कोशिश करती है। जब वह दोषों को चर्म द्वारा निकालने का प्रयत्न करती है तो उनका स्वरूप फोड़ा, फुन्सी, खाज आदि का हो जाता है।
इसी सिद्धान्त की पुष्टि करते हुये इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध डाक्टर टामस सिडेनहम ने अपने ग्रन्थ में कहा है कि “प्रत्येक रोग रोगी के शरीर में स्वास्थ्य को वापस लाने की प्राकृतिक चेष्टा के अतिरिक्त और कुछ उपाय नहीं होता।” इसी प्रकार योरोपीय चिकित्सा के आदि गुरु हिप्पोक्रेटस ने लिखा है—“प्रत्येक रोग एक प्राकृतिक क्रिया है और उसमें जो रोग के लक्षण उत्पन्न होते हैं वे शरीर की प्रतिक्रिया से ही उत्पन्न होते हैं। इसलिये रोग की अवस्था में चिकित्सक का एक मात्र कर्तव्य यही है कि वह जैसे संभव हो प्रकृति की सहायता करे।”
पर आजकल हम उलटी गति देख रहे हैं। प्रकृति को सहायता देकर रोग के मूल कारण विजातीय द्रव्य को बाहर निकाल देने के बजाय अधिकाँश डाक्टर तीव्र दवाओं के इंजेक्शन, गोलियों या कैप्सूल देकर उसे दबा देने की चेष्टा करते हैं। इसका परिणाम यह होता है वह विष रूप विजातीय द्रव्य शरीर के अन्दर ही दबा पड़ा रह जाता है, वहीं धीरे−धीरे बढ़ता रहता है और कुछ समय पश्चात् जीर्ण रोग के रूप में प्रकट होता है।
इस प्रकार हम स्वयं ही अपनी भूल से शरीर के भीतर विजातीय द्रव्य को उत्पन्न करके निरन्तर उसकी वृद्धि करते रहते हैं और जब प्रकृति रोग के रूप में उसे बाहर निकाल देने की चेष्टा करती है तब भी शान्त रह कर उस प्रक्रिया को पूर्ण हो जाने देने की बजाय तरह−तरह की हानिकर दवाओं से उसके कार्य में बाधा डालते हैं। इस प्रकार यदि कहा जाय कि हम स्वयं अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारते हैं तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं। यदि हम इस विपत्ति से परित्राण पाना चाहते हैं तो प्राकृतिक उपायों से विजातीय द्रव्य को बाहर निकाल कर शरीर को सदैव स्वच्छ और निर्मल रखने का प्रयत्न करना चाहिये। यही स्वास्थ्य प्राप्ति का सच्चा मार्ग है।
पिछले लेखों में यह बतलाया जा चुका है कि इस संसार में मनुष्य की उत्पत्ति में प्रकृति के विशेष नियम या दैवी−विधान का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है। जो व्यक्ति इन नियमों और सिद्धान्तों को समझ कर अपना रहन−सहन तदनुकूल रखते हैं वे सदैव स्वास्थ्ययुक्त और सुखी जीवन व्यतीत करते हैं। अस्वस्थता तथा रोग हमारे अनियमित अथवा विपरीत रहन−सहन के ही परिणाम होते हैं। अप्राकृतिक अथवा अति मात्रा में किये गये आहार−विहार के परिणाम से शरीर में मल की वृद्धि होने लगती है, विषाक्त विजातीय द्रव्य उत्पन्न होकर विभिन्न अवयवों में जमा होने लगते हैं, रक्त संचार में बाधा पड़कर मल का बाहर निकलना कम होने लगता है और अन्त में जब यह विजातीय द्रव्य शरीर की सहन शक्ति से अधिक बढ़ जाता है तो वह ज्वर, दस्त, खाँसी आदि रोग उत्पन्न कर देता है। पर ये रोग भी आरम्भिक दशा में मनुष्य के हित के लिए ही होते हैं, उनके द्वारा प्रकृति शरीर के संचित मल को निकालकर शुद्ध और निर्मल बनाने का प्रयत्न करती है। पर अधिकाँश मनुष्य इस बात के रहस्य को न समझकर रोग को पीड़ा का कारण और एक आकस्मिक दुर्घटना के समान मान कर उसे दवा या अन्य अप्राकृतिक उपायों से मिटाने की, दबा देने की कोशिश करते हैं जिसका परिणाम और भी बुरा होता है और सरल रोग, जटिल रोग का रूप धारण कर लेता है।
ऐसी स्थिति में हमारा क्या कर्तव्य है? जो मनुष्य इस प्रश्न को एक सच्चे जिज्ञासु के रूप में पूछता है उसे हमारा उत्तर यही है कि अगर तुम अपना जीवन सुख और शान्ति से व्यतीत करने की अभिलाषा रखते हो तो प्रथम तो प्रकृति के अनुसार ही अपना रहन−सहन रखो। और यदि अनजाने में या लापरवाही से प्रकृति विरुद्ध चल कर तुमने अपने शरीर में विजातीय द्रव्य और रोग को उत्पन्न कर लिया तब भी फिर पीछे की तरफ लौटो, अर्थात् अप्राकृतिक आदतों और कार्यों को त्याग कर शुद्ध प्राकृतिक मार्ग पर चलने लगो। यह बात तो हम सभी जानते हैं कि हमारा शरीर प्रकृति के पंचतत्वों—आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी से मिलकर बना है, इन्हीं के द्वारा हमारे देखते−देखते यह हाथ भर के बालक से बढ़कर साढ़े तीन हाथ का युवक बन जाता है, इसलिये इससे सम्बन्ध रखने वाली जो भी समस्या उत्पन्न हो, जो भी आवश्यकता आन पड़े उसके लिये पंचतत्वों की ही सहायता लेनी चाहिये। इन पंचतत्वों का परिणाम और क्रम ठीक रहने से ही स्वस्थ अवस्था कायम रहती है और इनमें गड़बड़ी हो जाने से, परिमाण घट बढ़ जाने से रोग पैदा हो जाता है। जाँच करने से ज्ञात होता है कि वायु तत्व की मात्रा घट−बढ़ जाने से गठिया, लकवा, दर्द, कम्प, अकड़न, गुल्म, हड़फूटन, नाड़ी विक्षोभ आदि उत्पन्न होते हैं। अग्नि तत्व में अन्तर पड़ने से फोड़े, फुन्सी, रक्त पित्त, हैजा, दस्त, क्षय, श्वास, उपदंश, दाह, खून फिसाद आदि की वृद्धि होती है। जल तत्व की गड़बड़ी से जलोदर, पेचिश, संग्रहणी, बहुमूत्र, प्रमेह, स्वप्नदोष, सोमप्रदर, जुकाम, खाँसी जैसे रोग प्रकट होते हैं। पृथ्वी तत्व बढ़ जाने से फीलपाँव, तिल्ली, जिगर, रसौली, मेद वृद्धि, मोटापा आदि रोग होते हैं। आकाश तत्व के विकार से मूर्छा, मृगी, उन्माद, पागलपन, सनक, अनिद्रा, ब्रह्म शक, घबराहट, दुःस्वप्न, गूँगापन, बहरापन, विस्मृति आदि शिकायतें पैदा होती हैं। दो−तीन या अधिक विकारों के मिश्रण से अन्य पचासों तरह के रोग उत्पन्न होते हैं।
जिस कारण से कोई विकार पैदा हुआ हो उस कारण को दूर कर देने से वह दूर भी हो जाता है। जब हम यह जान लेते हैं कि अमुकरोग अमुक तत्व की कमी या अधिकता से पैदा होता है तो उसी तत्व का प्रयोग करके उसका निवारण करना सहज हो जाता है।
मिट्टी—मिट्टी में विष या विकारों को खींचने की अद्भुत शक्ति पाई जाती है। शरीर के जिस अंग पर मिट्टी का लेप किया जायेगा और जिस अंग को मिट्टी में डाला जायेगा उसी का विकारयुक्त अंश खिंचकर मिट्टी में आ जायेगा। इसके साथ ही मिट्टी में पोषण देने की भी अपूर्व क्षमता है। जैसे फल, फूल आदि से एक प्रकार की गन्ध निकलती है, जो वास्तव में एक तरह की वाष्प या गैस होती है, उसी प्रकार पृथ्वी या मिट्टी से भी एक विशेष गैस निकलती है। जो बड़े अमूल्य गुणों से युक्त होती है। पृथ्वी में बड़े अमूल्य रासायनिक तत्व भरे पड़े हैं। सब प्रकार की धातुऐं, वनस्पतियाँ, औषधियाँ तथा समस्त खाद्य पदार्थ पृथ्वी से ही प्रकट होते हैं। पृथ्वी का रासायनिक द्रव्य ही इन सब वस्तुओं के रूप में परिवर्तित होकर प्रस्तुत होता है। यही रासायनिक तत्व वाष्प के साथ बाहर भी आता है। पृथ्वी के समीप शरीर रहने से वह गैस स्वास्थ्य पर बहुत हितकारी प्रभाव डालती है। प्राचीन समय के ऋषि मुनि प्रायः कच्ची झोंपड़ियों या खोदी हुई गुफाओं में रहते थे जहाँ उनका सम्पर्क सदैव पृथ्वी तत्व से रहता था। इससे उनका स्वास्थ्य सुदृढ़ रहता था और पूर्ण पोषण भी मिलता था। इसका परिणाम यह होता था कि नाममात्र के आहार को लेकर ही वे दीर्घजीवी होते थे। इसी प्रकार छोटे बालक जो प्रायः धूल मिट्टी में खेलते लेटते रहते हैं उनकी शारीरिक वृद्धि बड़ी शीघ्रता से होती है और उनकी बड़ी से बड़ी चोट ही भी शीघ्र ठीक हो जाती है।
जल—मनुष्य के शरीर में जल का अंश 90 प्रतिशत बतलाया जाता है। इसी से जल की सर्वाधिक आवश्यकता प्रतीत होती है। जल की कमी से देह सूखने लगती है, नाड़ियाँ जकड़ती हैं, हड्डियाँ निकल आती हैं, खून गाढ़ा हो जाता है तथा दाह, प्यास आदि अनेक प्रकार के उपद्रव होने लगते हैं।
जल हमारे शरीर को सींचता है, इसलिये मनुष्य को प्रतिदिन कई सेर पानी पीना आवश्यक होता है। ताजा जल में ऐसे कितने ही रासायनिक तत्व पाये जाते हैं जिनसे शरीर को पर्याप्त पोषण मिलता है। शरीर के भीतर के अनेक विकार इस पानी के साथ ही पसीना और मूत्र के रूप में बाहर निकल जाते हैं। पर्याप्त मात्रा में उचित विधि से यदि अंग प्रत्यंगों को जल प्राप्त होता रहे तो शारीरिक स्वास्थ्य के सुदृढ़ रहने में बड़ी सहायता मिलती है।
हिन्दू धर्म−शास्त्रों में जगह−जगह जल का महत्व बतलाया गया है और लिखा है—‟अद्भिर्गात्राणि शुद्ध्यन्ति” अर्थात् शरीर की शुद्धि जल से ही होती है। देह में जो विकार, दोष, मल भरे हैं उनको दूर करके शरीर को शुद्ध बनाना है तो जल का यथोचित उपयोग अनिवार्य है। अभी तक योरोप के लोग ठंड के कारण अधिक स्नान नहीं करते थे और इसलिए इसके लाभों से भी अपरिचित थे। पर अब वहाँ के अनेक अन्वेषकों ने जाँच करके स्नान के महत्वपूर्ण गुणों का पता लगाकर सर्वसाधारण को बतलाया तो वहाँ इसका खूब प्रचार हो गया है और तरह−तरह के स्नानों के द्वारा सब प्रकार के रोगों की सफलतापूर्वक चिकित्सा की जाती है।
हमारे देश में तो प्राचीन काल से ही स्नान को इतना महत्व दिया गया है कि हर एक श्रेष्ठ कर्म या धार्मिक कृत्य के पहले स्नान का विधान है। नित्य स्नान से लेकर तीर्थ−स्नान, माघ−स्नान, बैसाख−स्नान, कार्तिक−स्नान, पर्व−स्नान आदि अनेक विधियों से लोगों को स्नान करने की प्रेरणा की गई है, जिससे वे मूलतत्त्व न भी समझें तो भी धर्म का ख्याल करके ही नियमित स्नान करके लाभ उठाते रहें। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिये जल का विधि पूर्वक काफी मात्रा में प्रयोग करना अत्यावश्यक है।
अग्नि—अग्नि तत्व जीवन का उत्पादक है। संसार में जितने जीव−जन्तु, पौधे, वनस्पति आदि पैदा होते हैं और बढ़ते हैं, उनके मूल में गर्मी अवश्य रहती है। जहाँ कहीं चैतन्यता दिखाई देती है वहाँ गर्मी अवश्य पाई जाती है। शरीर में से गर्मी का अन्त हो जाय तो जीवन का अन्त हो जाना भी अवश्यम्भावी है। वेद में भी सर्व प्रथम ‘अग्नि मीले पुरोहितम’ कहकर सब तत्वों में अग्नि के महत्व को प्रकट किया है।
सूर्य अग्नि तत्व का ही प्रतीक है अथवा यों कहिये कि अग्नि सूर्य की ही प्रतिनिधि है। इस कारण शास्त्रों में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। यह बात सदा देखने में आती है कि जिन पौधों, पेड़ों को ठीक धूप लगती है वे शीघ्र बढ़ते हैं और खूब फलते फूलते हैं। पर जो अँधेरे छाया के स्थानों में रखे जाते हैं वे पीले और मुरझाये से ही बने रहते हैं।
हमारे देश और धर्म में इस तत्व को समझकर सदा से सूर्य की उपासना को प्रधान धर्म−कार्य स्वीकार किया है। अब पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी सूर्य की अद्भुत शक्ति और गुणों का पता लगाया है और वहाँ सूर्य किरणों के प्रयोग से रोग निवारण की नई ही चिकित्सा प्रणाली का प्रचार किया गया है। वहाँ मशीनों द्वारा सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों को पृथक करके सैकड़ों कठिन रोगों को सहज में ठीक किया जा रहा है। कितने ही बड़े−बड़े अस्पताल केवल सूर्य किरणों द्वारा चिकित्सा करते हैं। साथ ही सात तरह के रंगीन काँचों और बोतलों में भरे पानी द्वारा भी रोगों का निवारण किया जाता है। रोग के कीटाणुओं को नष्ट करने की जितनी क्षमता सूर्य की किरणों में है उतनी और किसी चीज में नहीं है। इसलिये रोगियों के लिये धूप का सेवन अनिवार्य माना गया है।
वायु—समस्त तत्वों में वायु बहुत सूक्ष्म है। और इसलिये उसका प्रभाव भी शीघ्र होता है। अन्न और जल के बिना मनुष्य काफी समय तक जीवित रहे हैं, पर वायु के बिना किसी सामान्य मनुष्य का दस−पाँच मिनट भी काम नहीं चल सकता। जिस प्रकार इसके गुण और लाभ अधिक हैं, उसी प्रकार इस के गलत प्रयोग से हानियाँ भी अधिक होती हैं और जिस अंग की वायु विकृत हो जाती है उसमें तुरन्त ही असह्य वेदना होने लगती है अथवा वह पक्षाघात जैसी स्थिति में होकर सर्वथा बेकार ही हो जाता है। वायु को प्राण माना गया है और इसीलिये जीवन की निर्भरता प्राण वायु पर मानी गई है। साँस रुक जाने पर मृत्यु में कुछ देर नहीं लगती। हवा के खराब हो जाने से ही तरह−तरह की महामारियाँ, छूत के रोग आदि फैलते हैं। इसलिये बुद्धिमान लोग सदा स्वच्छ वायु के स्थान में निवास करना ही पसन्द करते हैं।
चिकित्सा जितनी स्थूल होती है उतना ही उसका प्रभाव देर से होता है। चूर्ण, चटनी, अवलेह आदि के रूप में ली गई दवा पहले पेट में जाकर पचती है, फिर रस और रक्त के रूप में परिवर्तित होकर कुछ असर दिखाती है। यदि पाचन क्रिया ठीक नहीं होती तो वह दवा बिना कुछ असर किये मल के साथ बाहर निकल जाती है। इसलिये चिकित्सक प्रायः तरल दवा देते हैं जिससे वह शरीर में जल्दी मिल सके। वायु इन दोनों से शीघ्र असर करती है। इसका उदाहरण क्लोरोफार्म है जिसे सूँघते ही बेहोशी आ जाती है, खाने की किसी दवा से इतनी जल्दी बेहोशी नहीं आ सकती।
वायु के इस गुण को ध्यान में रखकर ही भारतीय ऋषियों ने यज्ञ−हवन की प्रभावशाली वैज्ञानिक विधि का आविष्कार किया था। हवन में जिन औषधियों का प्रयोग किया जाता है वे वायु में मिल कर सूक्ष्म रूप ग्रहण कर लेती हैं और मस्तिष्क तथा समस्त शरीर पर तुरन्त प्रभाव डालती हैं। फ्राँस के एक वैज्ञानिक टिलवर्ट ने परीक्षणों द्वारा सिद्ध किया है कि शक्कर के जलाने से जो गैस उत्पन्न होती है उससे हैजा, तपेदिक, चेचक आदि रोगों का विष दूर होता है। डाक्टर हैफकिन ने बतलाया है कि घी के जलने से उत्पन्न होने वाली गैस चर्मरोग, रक्त विकार, शुष्कता, दाह और आँत्र रोग के विकारों को नष्ट करती है। डाक्टर टाटलिक ने दाख के धुँये को टाइफ़ाइड और निमोनिया ज्वर की उत्तम औषधि बताया है।
इस प्रकार हवन द्वारा वायु तत्व शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्रदान करने वाला बन जाता है। आजकल डाक्टर भी कई रोगों का इलाज केवल सूँघने वाली दवाओं से करते हैं। वैद्यक में अनेक रोगों के लिये धूनी देने और धूम्रपान करने का उपचार बतलाया गया है।
आकाश—आकाश तत्व इतना अधिक सूक्ष्म है कि उसका अनुभव साधारण रीति से तो क्या बड़े−बड़े यंत्रों द्वारा भी भली प्रकार नहीं हो सकता। पर कार्य रूप से उसका परिचय मिलता है। वह प्रत्येक पोले स्थान में पाया जाता है और वैज्ञानिकों ने उसका ‘ईथर’ का नाम दिया है। इसका प्रधान गुण शब्द है। हम जितने भी शब्द सुनते हैं वे आकाश तत्व के द्वारा ही हमारे पास पहुँचते हैं। यदि यह तत्व न होता तो हम बाजा, घण्टा, तोप, बन्दूक, मोटर आदि किसी की आवाज जरा भी नहीं सुन सकते थे। और तो क्या उस अवस्था में किसी बात को सुनना भी असम्भव होता। पर आकाश तत्व ऐसा है कि जिसको कोई किसी प्रकार पृथक नहीं कर सकता। वही सदा प्रत्येक स्थान में व्याप्त रहकर पदार्थों के अस्तित्व को कायम रखता है।
आकाश जिस प्र्कार स्थूल शब्द को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाता है उसी प्रकार वह विचारों को भी गति प्रदान करता है। हम जैसे भी विचार करते हैं वे आकाश तत्व द्वारा चारों तरफ बिखर जाते हैं और आकाश में बादलों की तरह इधर−उधर मँडराते रहते हैं। हम अगर उन पर नियंत्रण रखने की विधि जान लें तो उनको किसी भी व्यक्ति के पास पहुँचा कर उसके मन पर इच्छानुसार प्रभाव डाल सकते हैं। इसी प्रकार हम अभ्यास द्वारा आकाश में व्याप्त श्रेष्ठ विचारों को अपनी विचार शक्ति द्वारा आकर्षित करके तरह−तरह के लाभ भी उठा सकते हैं।
इस सिद्धान्त की विवेचना करते हुये मनोविज्ञान के आचार्य ने बतलाया है कि जो लोग बीमारी की कल्पना किया करते हैं, उससे भयभीत रहते हैं, उसकी चिन्ता करते रहते हैं वे वास्तव में अधिक बीमार पड़ते हैं। इसके विपरीत जो लोग साहसी, प्रसन्न चित्त, निर्भय, निश्चित स्वभाव के होते हैं उनके पास बीमारी कदाचित ही फटकती है। स्वास्थ्य का आधा भाग उचित आहार−विहार पर और आधा भाग उपयुक्त मानसिक स्थिति पर निर्भर है।
जो निरोग रहना चाहते हैं, स्वास्थ्य को कायम रखने और बीमारी को दूर करने के अभिलाषी हैं, उन्हें अपने विचारों को सदा ऊँचा उठाकर रखना चाहिये। पाप की वासना, गन्दगी, निराशा ईर्ष्या द्वेष चिन्ता आदि के हीन विचारों को त्याग कर आशा, उत्साह पुरुषार्थ, साहस, दृढ़ता, प्रेम, पवित्रता के विचारों से अपने मन को ओतप्रोत रखे। अगर कभी किसी रोग का आक्रमण हो जाय तो उससे तनिक भी न घबड़ा कर इस बात का दृढ़ विश्वास रखे कि हम इसको बहुत शीघ्र मार भगावेंगे। स्वस्थ रहने की अवस्था में यही विश्वास रखें कि हम कभी बीमार नहीं हो सकते। इस प्रकार के विचार शरीर को स्वस्थ रखने में बड़ी सहायता करते हैं। इसी प्रकार जिस चिकित्सा को किया जाय उस पर हृदय से विश्वास करने से ही वह पूरा लाभ पहुँचा सकती है। यदि आपको चिकित्सक और उसके द्वारा बतलाये उपचार पर पूरा विश्वास नहीं है तो उससे नाम मात्र का ही फायदा हो सकता है।
इस प्रकार हमारे शरीर और मल का निर्माण तथा सञ्चालन पञ्च तत्वों द्वारा ही होता है। अगर उनके उचित परिमाण तथा क्रम में अन्तर पड़ जायेगा तो निःसन्देह हमारा स्वास्थ्य खराब हो जायेगा और कोई न कोई रोग हमारा पीछा करने लगेगा। इसलिये निरोग जीवन की कामना रखने वाले व्यक्तियों को इन पाँचों तत्वों का उचित समन्वय करके आरोग्यता प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये और कभी भूल या दुर्घटनावश रोगी हो जायें तो कृत्रिम औषधियों के फेर में न पड़कर इन्हीं तत्वों द्वारा पुनः स्वास्थ्य प्राप्त करने का उद्योग करना चाहिये।
पिछले लेख में जिस पंचतत्व−चिकित्सा का जिक्र किया गया है उसमें सर्वप्रथम स्थान उपवास का माना जाता है। शरीर में कोई भी रोग हो और उसकी कैसी भी चिकित्सा करनी हो पर सबसे पहले दो−चार दिन का उपवास कर लेना अनिवार्य है। जिस प्रकार धर्म कार्यों में सबसे पहले गणेश जी की पूजा अनिवार्य मानी जाती है उसी प्रकार प्राकृतिक चिकित्सा के प्रत्येक उपचार में सर्वप्रथम उपवास कर लेना परमावश्यक है। कारण यही है कि प्रत्येक रोग शरीर में विजातीय द्रव्य या मल की वृद्धि का परिणाम होता है। इसलिये रोग मिटाने का उपाय यही है कि उस मल को बाहर निकाल कर शरीर की शुद्धि की जाये, और शुद्धि का पहला उपाय उपवास ही है। उपवास का अर्थ है सब प्रकार का भोजन बिल्कुल बन्द कर देना। जब हम भोजन बन्द कर देते हैं तो दस पाँच घण्टे में हमारा आमाशय बिलकुल खाली हो जाता है और शरीर की जो प्राण−शक्ति भोजन को पचा कर रस−रक्त बनाने में लगी रहती थी वह उस कार्य से छुट्टी पा जाती है और शरीर की सफाई करने के काम में लग जाती है। यदि हम खाना बन्द नहीं करेंगे और प्राण−शक्ति का अधिकाँश भोजन को पचाने के कार्य में ही लगा रहेगा तो शरीर की सफाई, मल के बाहर निकलने, रोग के घटने आदि में से कोई बात पूरी न हो सकेगी। इसीलिये हम किसी भी शारीरिक कष्ट को मिटाने के लिये जल, मिट्टी, सूर्य ताप, वायुस्नान आदि कुछ भी उपचार करें उसमें तब तक पूर्ण सफलता नहीं मिल सकती जब तक उपवास द्वारा देह की शुद्धि न कर ली जाय।
जब उपवास द्वारा प्राण−शक्ति को छुट्टी मिलती है तो वह तुरन्त शरीर के सुधार और निर्माण के काम में जुट जाती है। उपवास के समय केवल गुदा मार्ग से ही मल नहीं निकलता वरन् आँख, कान, नाक से भी मैल निकलने लगता है। जीभ और दाँतों के ऊपर भी मैल की तह जम जाती है। चर्म के रोम कूपों द्वारा मल का कुछ अंश निकलने से पसीना भी बदबूदार हो जाता है। पेशाब में पीलापन बढ़ जाता है,और उसमें कड़वापन आ जाता है। और तो क्या साँस में भी स्पष्ट रूप से बदबू जान पड़ती है। इस प्रकार जरा फुर्सत पाते ही शरीर के सभी अंग सफाई के काम में जुट जाते हैं। इस कारण इन दिनों त्वचा और इन्द्रियों को जल्दी−जल्दी साफ करते रहना आवश्यक होता है।
उपवास करने में दूसरे अथवा तीसरे दिन कुछ अधिक कष्ट जान पड़ता है। किसी किसी को उबकाई (मतली) आती जान पड़ती है। पर यह कोई हानि की बात नहीं, दो−एक दिन में स्वयं ही मिट जाती है। जो लोग शारीरिक या मानसिक दृष्टि से निर्बल हैं उन्हें एक−दो दिन के उपवास के बाद ही जब इच्छा हो तब फलों का रस लेना आरम्भ कर देना चाहिये। यह रसाहार कहलाता है और इससे भी उपवास का उद्देश्य पूरा हो जाता है, यद्यपि उसमें समय कुछ अधिक लगता है। संतरा, मौसमी, मीठा नींबू, अँगूर, अनार आदि का एक−दो छटाँक रस दिन में 4−5 बार ले सकते हैं। यदि ये फल अधिक महँगे हों अथवा मिलते न हों तो टमाटर और अन्य तरकारियों का रस भी लिया जा सकता है। जो तरकारियाँ कच्ची खाई जा सकती हैं उनका रस कच्ची अवस्था में ही निकाल लिया जाय और जो पकाकर खाई जाती हैं उनको उबाल कर रस निकाल लें। पर इस बात का ध्यान रखें कि रस में ठोस भाग जरा भी न आने पावे। खूब अच्छी तरह से छना हुआ पानी के जैसा रस मात्र ही हो । तरबूज का रस या नारियल का पानी भी लाभदायक रहता है। अगर इनमें से कुछ भी न मिल सके या कोई अन्य कठिनाई जान पड़े तो मठा का प्रयोग कर सकते हैं। नमक, चीनी और मिर्च मसालों का इस रसाहार के साथ प्रयोग न करना चाहिये। यदि शाकों का रस बहुत अस्वादिष्ट जान पड़े तो उसमें थोड़ा नमक मिलाया जा सकता है। साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यह रसाहार भी परिमित मात्रा में किया जाय। बहुत अधिक पेट भर लेने से उपवास का उद्देश्य नष्ट हो जाता है। इस लिये “थोड़ी मात्रा और अधिक देर में” इन दो सिद्धान्तों के अनुसार ही काम चलाना चाहिये।
थोड़े दिन के उपवास में किसी तरह के भय या खतरे की बात नहीं है। जो लोग समझते हैं कि हम दो चार दिन भोजन न करेंगे तो दुबले हो जायेंगे उनका ख्याल ठीक नहीं है। उपवास के बाद पथ्याहार लेने से शरीर की इतनी शीघ्रता से उन्नति होती है कि भूखे रहने के दिनों में जितनी कमी पड़ी थी उससे अधिक वृद्धि हो जाती है। पाठकों ने देखा होगा कि जब बीमारी के कारण दस−पाँच दिन का लंघन करना पड़ता है तो उसके बाद बड़े कड़ाके की भूख लगती है और शरीर में जितनी निर्बलता आती है वह ठीक आहार मिलने पर शीघ्र ही पूरी हो जाती है। इसका कारण यही होता है कि उपवास के कारण शरीर की सफाई हो जाती है भीतरी अंगों को एक प्रकार की नई शक्ति भी प्राप्त हो जाती है, इसलिये वे रस और रक्त बनाने का कार्य पहले की अपेक्षा कहीं अधिक उत्तमता से करते हैं। उपवास के समय मनुष्य का भार जरूर कम हो जाता है और कमजोरी भी आती है, पर शरीर की शुद्धि हो जाने से उसका परिणाम बहुत लाभजनक निकलता है।
किसी समय फ्राँस देश का एक छोटा स्टीमर समुद्र में तूफान के कारण रास्ते से भटक गया। उसमें भोजन सामग्री थोड़ी ही थी, जो यात्रियों की संख्या को देखते हुये छः दिन से अधिक काम नहीं दे सकती थी। यह देखकर कप्तान ने सब सामग्री लोगों में बराबर बाँट दी और कहा कि अभी हमको किनारे तक पहुँचने में लगभग एक महीना लग जायेगा, इस सामग्री को इस प्रकार खर्च करो जिससे उस समय तक काम चल जाय। यात्रियों ने ऐसा ही किया और एक महीना बाद जब वे किनारे पर जाकर लगे तो सब को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उनके स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो गया था। उनमें से कितने ही व्यक्तियों को जो रक्त विकार, श्वास, बहुमूत्र आदि की शिकायतें थी वे दूर हो गई थीं। वे सभी कुछ कमजोर पर स्वस्थ जान पड़ते थे। ऐसा ही एक उदाहरण जर्मनी का है। वहाँ किसी खान के बैठ जाने से एक मजदूर उसमें बन्द हो गया। वह स्थान छत नुमा था और वह उसमें साधारण रूप से रह सकता था। उसके पास किसी अन्न के लगभग पाव भर दाने थे। जब उसे बहुत अधिक भूख लगती तो उन्हीं में से कुछ दाने मुँह में डाल लेता। कड़े होने के कारण वह उनको तुरन्त नहीं चबा सकता था इसलिये काफी देर तक मुँह में रखकर उनको नर्म कर लेता तब चबाकर खाता था। लगभग बीस दिन के बाद जब खान दुबारा खोदी जा सकी, उसे निकाला गया। सब लोगों को और स्वयं उसे भी यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतने दिनों तक बन्द रहने के कारण उसकी कोई क्षति नहीं हुई थी वरन् उसकी कई शारीरिक शिकायतें दूर होकर स्वास्थ्य में बहुत सुधार हो गया था।
साधारण रीति से स्वास्थ्य−प्राप्ति के लिए उपवास का अभ्यास धीरे−धीरे बढ़ाना ठीक रहता है। दो−तीन दिन का पूरा उपवास करके फिर चार−पाँच दिन फलाहार पर रहना चाहिये और उसके बाद अन्नाहार शुरू करके एक सप्ताह में उसे पूर्ण मात्रा तक पहुँचाना चाहिये। जैसे चान्द्रायण व्रत में एक−एक ग्रास बढ़ाकर 15 दिन में पूरा भोजन करने लगते हैं वैसी ही विधि से उपवास में भी काम लेना चाहिये।
वास्तविक खतरा उपवास करने में नहीं होता वरन् उसे छोड़ने में होता है। इसलिये अधिक लम्बा उपवास तो किसी आरोग्यशास्त्री की देख रेख में किसी चिकित्सालय या स्वास्थ्य−आश्रम में करना चाहिये। उपवास के बाद यदि भारी, स्थूल, कब्ज करने वाली खुराक अधिक मात्रा में ले ली जायगी तो उससे बड़ी हानि की संभावना है। इसलिये उपवास को धीरे−धीरे तोड़ना और खुराक को क्रमशः बढ़ाना चाहिये। पहले दिन केवल फलों का रस लें, दूसरे दिन रस की मात्रा कुछ बढ़ा दें। तीसरे दिन गूदेदार फल लेवें। चौथे दिन खजूर, खरबूजा, टमाटर,गाजर आदि ले सकते हैं। पाँचवें दिन उबाली हुई तरकारियाँ और छठे दिन दलिया आदि खाना ठीक रहता है। इस प्रकार सप्ताह में साधारण भोजन तक पहुँचना निरापद रहता है। जिन लोगों को माफिक हो वे इस सप्ताह में दूध भी ले सकते हैं। ताजा धारोष्ण दूध सबसे अच्छा माना गया है। यदि ज्यादा देर का दूध हो तो उसे गरम कर लेना चाहिये। ज्यादा देर तक खौलाने से दूध के पौष्टिक तत्व नष्ट हो जाते हैं। दूध में मीठा मिलाना ठीक नहीं। इसी प्रकार एकबार के भोजन में अनेक प्रकार के खाद्य पदार्थ खाना भी हानिकर है। कई दाल, कई शाक, मिठाई, चटनी, आचार, फल, खीर, दही, रोटी,चावल आदि बहुत सी चीजें एक ही साथ खा लेने से न तो भोजन ठीक तरह से पचता है और न उससे अच्छा रक्त ही बनता है। इसलिये एकबार के भोजन में रोटी शाक, रोटी−दाल, चावल−दाल,दलिया−दाल आदि कोई भी दो चीजें लेना ठीक रहता है।
उपवास के सम्बन्ध में लोगों में कितनी ही तरह की भ्रांतियाँ देखने में आती हैं कुछ लोग उपवास को एक प्रकार का भूखों मरना मानते हैं वे भोजन को शरीर का स्वाभाविक धर्म मानते हैं और कहते हैं कि शरीर को भोजन न देना प्रकृति विरुद्ध है। पर वे इस बात को भूल जाते हैं कि स्वस्थ रहना भी मनुष्य के लिये स्वाभाविक है। जब वह अपनी गलती से या जिव्हा के चटोरेपन से अनुचित और अनियमित रीति से आहार करके स्वास्थ्य को बिगाड़ कर बीमार हो जाता है तभी उस गलती को ठीक करने के लिये उपवास जैसे पीछे लौटने वाले उपाय की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए यद्यपि ऊपर से देखने पर उपवास और भुखमरी में एक समानता जरूर दिखलाई पड़ती है कि दोनों अवस्थाओं में मनुष्य भोजन से वंचित हो जाता है, पर तो भी इन दोनों अवस्थाओं में जमीन आसमान का अन्तर है। उपवास तब किया जाता है जब कि शरीर को भोजन की आवश्यकता नहीं होती, उसके भीतर पहले से ही अधपचा, सड़ा, भोजन मल रूप में भर जाता है। पर भुखमरी उस हालत को कहा जाता है जब कि शरीर को भोजन की बहुत आवश्यकता हो फिर भी मनुष्य न खाये। इस दृष्टि से उपवास प्राण रक्षक है और भुखमरी प्राणों को नष्ट करने वाली है। उपवास से हमारी शारीरिक या मानसिक किसी प्रकार की हानि नहीं होती, पर भुखमरी से हमारी सभी शक्तियाँ क्षीण होती हैं और हम मृत्यु के निकट ढकेले जाते हैं। इसलिये हम यह कह सकते हैं कि जहाँ उपवास का अन्त होता है वहीं से भुखमरी का आरम्भ होता है। इस लिए उपवास करने वाले को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिये कि वह कभी आवश्यकता से अधिक उपवास न करे। जब वास्तविक उपवास पूरा हो जाता है तब थकावट, या क्लान्ति के बजाय मन में एक प्रकार की ताजगी और प्रसन्नता का भाव उदय होता है और ऐसी स्वाभाविक भूख लगती है जिस का अनुभव हमको पहले जीवन में कदाचित ही हुआ होता है। बस उसी समय उपवास को तोड़ देना और क्रमशः अल्प भोजन से पूर्ण भोजन तक बढ़ कर स्वाभाविक भोजन पर आ जाना मनुष्य का कर्तव्य है।
अगर कोई इस बात की विशेष जानकारी प्राप्त करना चाहे कि उपवास पूरे हो जाने की ठीक पहिचान कैसे की जा सकती है, तो उसे अपनी सभी शारीरिक क्रियाओं का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करना पड़ेगा, क्योंकि उपवास का प्रभाव शरीर के प्रत्येक अंग पर पड़ता है। उपवास काल में वे सभी अपने भीतर जमा हो गये मैल को निकाल कर शुद्ध कर देते हैं और तभी पूर्ण रूप से स्वच्छ दिखाई पड़ते हैं जब कि उपवास का उद्देश्य पूरा हो जाता है।
जीभ— जैसे ही उपवास शुरू किया जाता है कि तुरन्त ही जीभ पर मैल जमना आरम्भ हो जाता है और जैसे−जैसे उपवास बढ़ता जाता है इस मैल का परिमाण और बदबू बढ़ती जाती है। जब तक विजातीय द्रव्य निकलता रहेगा तब तक जबान पर मल जमता रहेगा, पर जब मल समाप्त हो जायेगा तब जीभ का रंग साफ होकर गुलाबी हो जायेगा, जैसा कि साधारणतः कभी देखने में नहीं आता। यह जीभ का परिवर्तन उसी समय होता है जब उपवास पूरा होकर ठीक भूख लगने लगती है। यह जीभ का मैल एक ऐसा चिन्ह है कि जिससे रोगी की अवस्था का ठीक पता सहज में लग जाता है।
साँस— उपवास आरम्भ के बाद ही साँस में भी अन्तर पड़ जाता है और उसमें एक प्रकार की खराब गन्ध आने लगती है जो उपवास भर जारी रहती है। जीभ के मैल और साँस की बदबू में सदैव सम्बन्ध रहता है। मैल की तह जितनी ही मोटी साँस की बदबू भी उसी हिसाब से अधिक होगी। इससे यह प्रकट होता है कि हमारे फेफड़े भी भीतर से मैल को अधिकाधिक परिमाण में बाहर फेंकने का प्रयत्न कर रहे हैं। इस तरह हमारे फेफड़े दिन−रात गन्दी हवा को निकालकर बहुत अधिक मैल को प्रतिदिन बाहर निकाल देते हैं। जैसे−जैसे उपवास के दिन बढ़ते जाते हैं। वैसे−वैसे ही साँस की बदबू भी बढ़ती जाती है और कभी−कभी तो वह बहुत ही तीव्र और असहनीय हो जाती है। यह साँस कुछ मीठी−मीठी जान पड़ती है, पर उसमें स्वास्थ्य की ताजगी का मीठापन नहीं होता, वह क्लोरोफार्म की तरह मीठी−सी जान पड़ती है।
तापमान−उपवास का प्रभाव तापमान पर दो तरह का पड़ता है। अगर वह सामान्य (नार्मल) से अधिक होता है। तो उपवास के साथ−साथ कम होता जाता है,और यदि तापमान सामान्य से कम होता है तो वह उपवास के प्रभाव से बढ़ जाता है। जैसे उपवास के आरम्भ करने के समय रोगी का तापमान 64 डिग्री हो तो वह क्रमशः बढ़कर 68 डिग्री तक पहुँच जायेगा। यह बात कुछ आश्चर्यजनक जान पड़ती है कि जब जरा भी भोजन ग्रहण नहीं किया जा रहा है और माँस घटता जाता है, फिर भी तापमान कैसे बढ़ जाता है? इसका कारण यह होता है कि तापमान का कम होना जीवनी शक्ति की कमी का चिन्ह होता है और यह कमी रक्त वाहिनी नाड़ियों के मल से भर जाने के कारण उत्पन्न होती है। उपवास के फलस्वरूप जैसे−जैसे मल का शोधन होकर नाड़ियाँ खुलती जाती हैं वैसे−वैसे ही रक्त−संचरण में वृद्धि होती है और परिणामतः तापमान बढ़ जाता है।
वजन का घटना−बढ़ना—इसमें सन्देह नहीं कि उपवास के फलस्वरूप माँस की क्षति होती है। आरम्भ में यह कमी बहुत अधिक जान पड़ती है पर जैसे−जैसे उपवास बढ़ता जाटा है कमी का परिमाण कम होता जाता है। यह बात स्वाभाविक भी है, क्योंकि आरम्भ में शरीर की चर्बी तेजी से घटती है, पर उसके बाद प्रकृति अन्य दूषित तत्वों को धीरे−धीरे निकालती है और घटने का परिमाण कम हो जाता है। अनेक बार ऐसा देखने में आता है कि उपवास के अन्तिम दिनों में वजन का घटना बिल्कुल बन्द हो जाता है।
बहुत से लोगों की यही धारणा है कि उपवास से चाहे अन्य लाभ भले ही होते हों पर उससे वजन अवश्य घटता है। इसलिए जो पहले से ही दुबले−पतले हैं उनके लिए उपवास लाभदायक नहीं हो सकता। पर यह धारणा वास्तव में सत्य नहीं है। अगर कोई व्यक्ति अपनी शारीरिक स्थिति से उचित अनुपात की अपेक्षा अधिक दुबला है तो उसका कारण यही है कि उसकी पाचन−क्रिया दोषपूर्ण है और उसे उचित पोषण प्राप्त नहीं होता। जब उपवास द्वारा आमाशय की शुद्धि होकर भोजन का ठीक ढंग से परिपाक होने लगेगा तो रस, रक्त भी अधिक बनेगा और दुबलापन अवश्य मिट जायेगा। इस बात की परीक्षा अनेक रोगियों के सम्बन्ध में की जा चुकी है और इसलिए उपवास के कारण दुबलापन उत्पन्न होने का भय निराधार है।
इस तरह यदि उपवास और एनीमा आदि के द्वारा शरीर की सफाई वर्ष में एक बार भी कर ली जाए और आहार−विहार में प्रकृति के अनुकूल चलने का अधिकाधिक ध्यान रखा जाय तो खोया हुआ स्वास्थ्य निस्सन्देह प्राप्त किया जा सकता है और आगे के लिए रोगों से मुक्त रहकर निरोग और सुखी जीवन बिताया जा सकता है। इस दिशा में जितनी ही सफलता प्राप्त की जा सकेगी उतनी ही आरोग्यता की वृद्धि होगी। उत्तम स्वास्थ्य दवाओं से नहीं प्राकृतिक नियमों के अनुसार जीवन−यापन करने से ही प्राप्त हो सकता है।
एनीमा के सम्बन्ध में कुछ बातें उपवास द्वारा स्वास्थ्यरक्षा के लिए विवेचन में लिखी जा चुकी हैं, पर यह विषय इतना अधिक महत्वपूर्ण और प्राकृतिक चिकित्सा के आधार स्वरूप है कि इसका स्वतंत्र रूप से भली प्रकार परिचय देना आवश्यक है। उपवास अवश्य ही सर्वप्रथम कदम है पर उसके साथ एनीमा का सहयोग अनिवार्य है। उपवास शरीर के भीतर के मल को कोने−कोने से निकालकर मलाशय की तरफ धकेलता है, पर वह सब कचरा अपने आप शरीर के बाहर नहीं निकल सकता। कारण यह है कि उस समय भोजन न करने के कारण आमायश और आँतें बहुत कुछ सिकुड़ जाती हैं और इनमें इतना स्फुरण नहीं होता कि वह अधिक−मल को बाहर फेंक सकें। इसके लिए किसी बाहरी उपचार की आवश्यकता होती है जिससे प्रकृति को अपने कार्य में सहायता मिले। वही उपाय एनीमा है।
जो लोग अभी तक सफाई का अर्थ नहाना, धोना आदि बाहरी सफाई ही समझते हैं वे बड़े भ्रम में हैं। शरीर के ऊपर का मैल तो हमको दिखाई ही पड़ता है और इसलिए हमारा ध्यान बार−बार उसकी ओर जाता रहता है और हम उसे साफ कर ही डालते हैं। पर भीतरी गन्दगी आँखों से दिखाई नहीं देती उसे केवल अनुभव से या लक्षणों से जाना जाता है। इसलिए अनेक लोगों का ध्यान उस तरफ नहीं जाता। पर कुछ भी हो वह गन्दगी अधिक हानि पहुँचाने वाली होती है और धीरे−धीरे हमारे समस्त शरीर को मल से भर देती है। यही मल सब प्रकार के रोगों तथा अस्वस्थता का कारण होता है और जो लोग बीमारी और कमजोरी को दूर करना चाहते हैं उनका सबसे पहला कर्तव्य इस मल की सफाई कर डालना ही है। शरीर की इस अवस्था की तुलना हम उस नाली के साथ कर सकते हैं जो कीचड़ रुक जाने से सड़ रही हो और दुर्गन्ध फैला रही हो। बहुत से लोग ऐसी नाली में फिनाइल आदि डालकर उसकी बदबू को रोकने की कोशिश करते हैं पर यह उपाय टिकाऊ नहीं होता। दूसरे ही दिन फिर पहले से अधिक बदबू आने लगती है। तब अन्त में यही करना पड़ता है कि एक बार नाली में जमें हुए कीचड़ को पूरी तरह निकाल दिया जाय और फिर उसे साफ पानी से धो डाला जाये । ठीक इसी प्रकार छोटी और बड़ी आँतों में इकट्ठा होकर हमारे जो मल शरीर को अस्वस्थ बनाता है जब तक एक बार उसकी पूरी सफाई नहीं की जायेगी तब तक रोग की जड़ कटना सम्भव नहीं है।
जुलाब की हानियाँ
अनेक व्यक्ति इस मल को निकालने के लिये जुलाब या दस्तावर दवाओं का सहारा लेते हैं। पर सड़ा हुआ मल, गाँठें, सुद्दे, कृमि, विकृत वायु आदि जो तरह−तरह के विकार बड़ी आँत में जमा रहते हैं वे इन दस्तों की औषधियों से बहुत कम निकल पाते हैं। दस्तावर औषधियाँ जब पेट में पहुँचती हैं तो तीक्ष्णता के कारण आमाशय में पाचन रसों का स्राव होने लगता है। इस रस के साथ आधा पचा हुआ भोजन बह कर नीचे की तरफ चला जाता है। औषधि की बहुत शक्ति तो इस आमाशय में ही खर्च हो जाती है, जो थोड़ी बहुत बचती है उसके द्वारा छोटी आँतों से रस निचुड़ता है। इस प्रकार कच्चा मल पतला होकर दस्त के रूप में निकल जाता है। दस्तावर दवा का असर छोटी आँतों में खत्म हो जाता है और बड़ी आँत में उपस्थित विकार ज्यों के त्यों बने रहते हैं। पुराने दोष जो बड़ी आँतों में थे वे जैसे के तैसे रहे केवल आमाशय और छोटी आँतों का कच्चा मल निकल गया। ऐसे दस्तों से सफाई का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता। इसके अतिरिक्त दवा की गर्मी, जलन तथा आमाशय के कीमती रस के दस्त के साथ बहने से पेट में कमजोरी आ जाती है ये दोनों ही बातें स्वास्थ्य की दृष्टि से हानिकर हैं, और इसलिए इस जुलाब की प्रणाली में लाभ की अपेक्षा हानि अधिक है। दस्तावर दवाएँ प्रायः अत्यन्त उष्ण और विषाक्त भी होती हैं, वे यदि दस्त लाने के बजाय शरीर में पच जायँ तो खून खराबी, कोढ़ भयंकर व्रण आदि उत्पन्न कर देती हैं। यही कारण है कि कभी−कभी जुलाब के बाद बहुत दिन तक बड़ी गर्मी और बेचैनी का अनुभव होता रहता है, और कई छोटे−बड़े रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
एनीमा कैसे लिया जाय
इस दृष्टि से मलाशय को साफ करने के लिये एनीमा का प्रयोग सबसे अच्छा है। एनीमा का साधारण सा यंत्र हर नगर के बाजार में मिल सकता है। चीनी के लम्बे से डिब्बे में 4-5 फीट लम्बी रबड़ की नली लगी रहती है जिसके दूसरे सिरे पर प्लास्टिक की एक टोंटी फिट कर दी जाती है। डिब्बे में सेर−डेढ़ सेर मामूली ठंडा या जरा गुन−गुना पानी जिसका तापक्रम शरीर के समान हो, भर दिया जाता है। जब टोंटी को खोला जाता है तो पानी नल की तरह बाहर निकलने लगता है। पानी सादा होना ही ठीक है। अगर मिल सके तो उसमें एक नींबू का रस मिला दिया जाय जिससे उसका असर कुछ बढ़ जाता है। विशेष अवस्थाओं में थोड़ा नमक या नीम का पानी या प्याज का रस आदि भी निकाला जाता है।
एनीमा लेते समय जमीन पर चटाई बिछाकर दाँयी करवट लेट जाना चाहिये। एनीमा के बर्तन को बगल में लगभग तीन फीट की ऊँचाई पर टाँग देना चाहिये। टोंटी के सिरे पर जरा सा−तेल मलकर गुदा−मार्ग में एक इंच प्रवेश कर लीजिये और टोंटी को खोल दीजिये। धीरे−धीरे समस्त पानी मलाशय में चला जायेगा। इस समय पेट को धीरे−धीरे मलते भी रहिये जिससे मल के छूटने में सहायता मिले। आरंभ में पानी जाने पर पेट में दर्द−सा जान पड़ता है और तुरन्त ही टट्टी की इच्छा होती है। अगर ये बातें साधारण हों तो सहन करके पानी लेते जाना चाहिये और यदि ज्यादा दर्द जान पड़े तो टोंटी बन्द करके पानी चढ़ना रोक देना चाहिये। कुछ देर बाद जब दर्द बन्द हो जाय तो फिर टोंटी खोलकर पानी चढ़ाना चाहिये। अगर इस प्रकार कई बार पानी बन्द करना पड़े तो कोई हर्ज की बात नहीं है। अगर पानी जाना शुरू होने के थोड़ी देर बाद ही मल त्याग की अत्यन्त तीव्र इच्छा हो तो उसी समय उठकर मल त्याग करना चाहिये और दस−पाँच मिनट बाद फिर पूरा जल भर कर एनीमा लेना चाहिये। जब पूरा पानी चला जाय तो टोंटी को बाहर निकाल कर 15-20 मिनट तक सीधे और दाँयी−बाँयी करवट से लेटना चाहिये और पेट को थोड़ा-थोड़ा फुलाते और सिकोड़ते रहना चाहिए जिससे पानी हिलकर मल को घुला सके। जब मल त्याग की इच्छा काफी तीव्र हो तो मल−त्याग को चले जायें। इसलिये एनीमा का प्रयोग शौचस्थान के समीप ही करना उचित होता है।
एनीमा लेने की एक दूसरी विधि भी है। बजाय चटाई पर करवट से लेटने के औंधा पेट के बल लेटा जाय और दोनों घुटनों को सिकोड़ कर ऊँट की तरह हो जाया जाय। इस तरह करने से पेट कुछ नीचा हो जायेगा और चूतड़ ऊपर की तरफ उठ जायेंगी। इस विधि में यह लाभ बतलाया जाता है कि पेट ढीला रहने से पानी आसानी से ज्यादा दूर तक चला जाता है। करवट लेकर एनीमा लेने से पानी का भार एक तरफ कम और दूसरी तरफ ज्यादा रहता है। पर इस दूसरी विधि में दोनों तरफ समान भार रहता है।
ये दोनों ही तरीके ठीक हैं, जिसको जिसमें सुविधा जान पड़े वह उससे काम ले सकता है। इसके लिये सुबह या शाम का समय अधिक ठीक रहता है। एनीमा लेने के लिये पहले मामूली ढंग से शौच हो आना उचित है।
एनीमा विधि की प्राचीनता
एनीमा की यह प्रणाली कोई नई बात नहीं है। हमारे यहाँ के अति प्राचीन ऋषि मुनि और योगी लोग भी इसी प्रकार की “वस्ति−क्रिया” से गुदा−मार्ग में पानी चढाकर मलाशय की सफाई किया करते थे। वे जल में बैठकर पेट की नसों को चला कर पिचकारी की तरह पानी खींच लेते थे। यह विधि अधिक लाभदायक और दोष रहित है और अब भी योगाभ्यासी इस तरह पानी चढ़ाया करते हैं। पर साधारण लोगों के लिये इसका अभ्यास कर सकना कठिन है। वह कार्य एनीमा द्वारा सहज में हो जाता है। इसमें कोई कठिनाई या खतरा नहीं है और हर एक मामूली समझ का आदमी इसे कर सकता है। यह क्रिया हर एक मौसम में और अस्वस्थ तथा स्वस्थ दशा में बिना किसी आशंका के प्रयोग में लाई जा सकती है।
केवल एक दिन एनीमा लेने से सफाई नहीं हो सकती। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये इसे एक सप्ताह तक तो नियमित रूप से लगाना ही चाहिए। फिर सप्ताह में तीन बार और फिर दो बार लगाकर छोड़ा जा सकता है। कठिन और पुराने रोगों में महीने, दो महीने तक भी लगातार एनीमा लगानी पड़ती है। पेट में जमा हुआ, आँतों में चिपका हुआ, सूखा, सड़ा मल, मल की गाँठें सुद्दे धीरे−धीरे निकलते हैं। नींबू का पानी उन्हें फुलाता है, छुड़ाता है, खुरचता है, कुरेदता है तब कहीं उनका निकलना आरम्भ होता है। देखने में आता है कि जब दो चार दिन एनीमा ले चुके होते हैं तब काला−काला बदबूदार मल बाहर निकलता है। साधारण अवस्था में भी पेट की ठीक तरह से सफाई होने में कम से कम एक सप्ताह तो लगता ही है। जब तक खराब, पुराना मल निकलता रहे तब तक एनीमा लेना जारी रखना आवश्यक है।
एनीमा द्वारा शरीर की सफाई का कार्य तब तक ठीक तरह पूरा नहीं होता जब तक साथ में कुछ उपवास भी न किया जाय। दो−तीन दिन का उपवास तो सभी को करना चाहिये। उपवास के समय पानी खूब पीना चाहिये और दिन में दो−चार बार पानी, शहद तथा नींबू मिलाकर भी पानी चाहिए। इन दिनों साधारण परिश्रम करना, कुछ टहलना तो आवश्यक है पर अधिक परिश्रम का कोई काम करना न चाहिए। ज्यादा काम करने से शरीर की शक्ति उसमें लग जाती है और सफाई के काम में कमी पड़ जाती है। इसलिये उस समय शरीर की पूरी शक्ति को जहाँ तक सम्भव हो मल के निकालने और अंगों को ठीक करने में ही लगाना चाहिये।
जैसा पहले बतलाया जा चुका है मनुष्य−शरीर तीन चौथाई भाग से अधिक जल से ही बना है। हमारे रक्त , माँस, मज्जा में जो आद्रता या नमी का अंश है वह पानी के कारण ही है। मल, मूत्र, पसीना और तरह−तरह के रस, सब पानी के ही रूपान्तर होते हैं। यदि शरीर में पानी की कमी हो जाती है तो तरह−तरह के रोग उठ खड़े होते हैं पानी की कमी से ही गर्मी में अनेक लोग लू लगकर मर जाते हैं। जुकाम में पानी की भाप लेने से बहुत लाभ होता है। इसी प्रकार सिर दर्द और गठिया के दर्द में भी इस उपचार से निरोगता प्राप्त होती है, शरीर में जब फोड़े फुँसी अधिक निकलने लगते हैं और मल्हम आदि से कोई लाभ नहीं होता तो जलोपचार उनको चमत्कारी ढंग से ठीक कर देता है।
पेट−दर्द होने पर प्राकृतिक चिकित्सक ही नहीं एलोपैथिक डाक्टर भी रबड़ की थैली या बोतल में गर्म पानी भर कर सेक करवाते हैं। कब्ज के रोग में गर्म पानी पीना बड़ा लाभकारी होता है और जो नित्य प्रति सुबह गर्म पानी नियम से पीते रहते हैं उनका कब्ज धीरे-धीरे अवश्य ठीक हो जाता है।
रोगों और शारीरिक पीड़ा के निवारण के लिये गर्म पानी का प्रयोग तो साधारण गृहस्थों के यहाँ भी सदा से होता आया है, पर ठंडे पानी के लाभों को थोड़े ही लोग समझते हैं, यद्यपि ठंडा पानी गर्म पानी की अपेक्षा अधिक रोग निवारक सिद्ध हुआ है। ज्वर, चर्म, रोग में ठंडे पानी से भीगी हुई चादर को पूरी तरह लपेटे रहने से आश्चर्यजनक लाभ पहुँचता है। उन्माद तथा सन्निपात के रोगियों के सिर पर खूब ठण्डे जल में भीगा हुआ कपड़ा लपेट देने से शान्ति मिलती है। शरीर के किसी भी भाग में चोट लगकर खून बह रहा हो बर्फ के जल में भीगा हुआ कपड़ा लगाने से खून बहना रुक जाता है। नाक से खून का बहना भी पानी से सिर को धोने तथा मिट्टी के सूँघने, लपेटने से ठीक होता है। इसी प्रकार अन्य अंगों के विकार भी जल के प्रयोग से सहज में दूर हो जाते हैं। जर्मनी के डाक्टर लुई कूने ने अपने ग्रंथ में बहुत स्पष्ट रूप से यह समझा दिया है कि जल−चिकित्सा ही सर्वोत्तम है। उसमें किसी प्रकार का खर्च नहीं है और सादा जल का प्रयोग करने से शरीर में कोई नया विकार भी उत्पन्न होना संभव नहीं है।
स्नान की वैज्ञानिक विधि
जल−चिकित्सा की मुख्य क्रिया स्नान ही है। उसी को विभिन्न रूपों और विधियों से काम में लाकर सब रोगों को ठीक किया जा सकता है। स्नान का उद्देश्य शरीर की सब तरह की अशुद्धता, मल, गन्दगी को दूर करना और देह को आवश्यक तरी, पोषण पहुँचाना होना चाहिये। स्नान के लिये बहता हुआ साफ पानी सबसे अच्छा होता है। वह न मिल सके तो कुँआ, तालाब आदि का ताजा पानी भी काम दे सकता है। बहते हुये और ताजा पानी में जो प्राण तत्व पाया जाता है वह बर्तनों में कई घंटों तक रखे पानी में नहीं रहता। इसलिये अगर रखे हुये पानी से ही काम लेना पड़े तो उसे एक बर्तन से दूसरे बर्तन में बार−बार कुछ ऊँचाई से डालने से उसमें प्राण−शक्ति का संचार हो जाता है। स्नान का पानी सदैव ठण्डा ही होना चाहिये, हाँ उसका तापक्रम ऋतु के अनुसार इतना रखा जा सकता है जिसे अपना शरीर सहज में सहन कर सके। अपनी शक्ति से अधिक ठण्डे पानी, से स्नान करना जिससे मन प्रसन्न होने के बजाय संकुचित हो, लाभदायक नहीं होता। इसी प्रकार गर्म पानी से स्नान करना भी हानिकारक है, सिवाय किसी विशेष बीमारी की अवस्था के जिसमें इस प्रकार के स्नान का विधान हो। पानी अधिक ठण्डा जान पड़े तो उसे धूप में रख कर या गर्म पानी मिला कर सहने योग्य बनाया जा सकता है। बहुत ठण्डे पानी में अधिक देर तक स्नान करने से रक्त −संचारण क्रिया में बाधा पड़ती है।
स्नान करते समय शरीर को खूब मलना आवश्यक है जिससे मैल छूट कर देह के भीतर की गर्मी को उत्तेजना मिले और रक्त−संचरण ठीक ढंग से होने लगे। इसके लिये शरीर को किसी मोटे और खुरदरे तौलिये से रगड़ना ठीक रहता है। इससे शरीर के रोम कूप भली प्रकार खुल जाते हैं और भीतर का मैल पसीने के रूप में आसानी से निकल सकता है। पीठ, रीढ़ की हड्डी, चूतड़, लिंगेन्द्रिय, आदि की सफाई करने का बहुत से लोग ध्यान नहीं रखते। पर इन स्थानों की सफाई की और भी अधिक आवश्यकता होती है। इसलिये आधुनिक सिद्धान्तानुसार एकान्त कमरे में नंगे होकर स्नान करने को अधिक लाभदायक बतलाया गया है। कुछ भी हो स्नान में जल्दबाजी न करके समस्त अंगों को भली प्रकार रगड़ना और साफ करना आवश्यक है।
स्नान के लाभ
गर्म जल से स्नान भी अगर विधिपूर्वक किया जाय तो विशेष लाभदायक हो सकता है। गर्म जल से शरीर के रोमकूप विकसित होकर फैलते हैं, उनसे मलयुक्त पसीना सहज में निकलने लगता है और भीतर का रक्त ऊपर की तरफ दौड़ने लगता है। इससे शरीर की गर्मी बाहर निकलने लगती है और यही कारण है कि गर्म पानी से स्नान करने के थोड़ी देर बाद अधिक ठण्ड का अनुभव होने लगता है। इसलिये गर्म जल से स्नान करने के बाद तुरन्त ही ठण्डे जल से स्नान करना अनिवार्य है, ताकि ऊपर को दौड़ने वाला रक्त फिर भीतर वापस चला जाय और उसकी गर्मी अधिक मात्रा में बाहर न निकल जाय। इसके लिये फुहारा स्नान (शावर बाथ) सबसे अच्छा रहता है। यदि शावर की व्यवस्थान हो तो उसकी तरह जल छिड़क कर और छींटे मार कर स्नान किया जा सकता है।
उचित रीति से स्नान करने से शारीरिक स्वास्थ्य की वृद्धि होती है और रोगों के आक्रमण का भय बहुत कम हो जाता है। अनेक साधारण रोग तो नियमित स्नान करने से अपने आप मिट जाते हैं। फुहारे के नीचे बैठ कर स्नान करना अधिक सुविधाजनक और शीतल करने वाला होता है। नदी या तालाब में तैर कर स्नान करने से व्यायाम का भी लाभ मिल जाता है और शारीरिक अंग प्रत्यंगों का विकास होता है। वर्षा में मेह के जल से स्नान करने से फुहारा स्नान का−सा आनन्द मिलता है और जल में जो अत्यधिक प्राण−शक्ति होती है उससे बहुत लाभ भी उठाया जा सकता है। पर ऐसा स्नान अपने स्वास्थ्य और शक्ति के अनुसार थोड़े समय तक ही करना चाहिये। कमजोर या अधिक वृद्ध लोगों के लिये मेह में अधिक देर तक भीगना ठीक नहीं होता। बीमारों के लिये नित्य स्नान करना आवश्यक है, पर वह बहुत सम्भल कर होना चाहिये। पानी का तापमान ऐसा हो जिससे शरीर पर किसी तरह का खराब असर न पड़े। यदि स्नान की सुविधा न हो तो कपड़े या तौलिया को मामूली पानी में भिगोकर उससे समस्त शरीर को भली प्रकार रगड़ कर पोंछ देना भी काफी लाभदायक होता है। इससे शरीर की गन्दगी दूर हो जाती है और तबियत में ताजगी तथा प्रसन्नता का भाव आ जाता है।
स्नान का एक खास उद्देश्य शरीर को ठण्डा करना भी होता है क्योंकि शरीर के अन्दर जो विजातीय द्रव्य एकत्रित हो जाता है वह गर्मी उत्पन्न करता है। यह विजातीय द्रव्य अधिकाँश में नीचे के भाग में ही एकत्रित होता है इसलिए वैज्ञानिक विधि के अनुसार पहले नीचे के भागों को ही धोना और ठण्डा करना चाहिये। इसके लिए किसी ऐसी टब या नाँद में बैठाकर स्नान किया जाय जिसमें तीन चार इंच पानी भरा हो। इसमें बैठकर पेडू पर खूब छपके मारें और उसे हथेली से रगड़ कर जल को सुखाएं। इसके बाद लोटा−लोटा पानी ऊपर डालकर स्नान करें। यदि नदी तालाब आदि पर स्नान करना हो तो वहाँ डुबकी लेकर स्नान करें। स्नान के पश्चात् बदन को तौलिये से पोंछने के बजाय हथेलियों से पोंछकर ही सुखा दें तो ज्यादा लाभदायक होता है और आनन्द भी मिलता है।
इस तरह के प्राकृतिक स्नान से अनेक प्रकार के शारीरिक लाभ प्राप्त होते हैं और रोगों का भय जाता रहता है। स्त्रियों के लिये ऐसा स्नान उनकी अनेक जननेन्द्रिय सम्बन्धी बीमारियों को दूर करने वाला सिद्ध हुआ है। पुरुषों के भी प्रमेह, स्वप्नदोष, कब्ज, अजीर्ण जैसे रोगों में इसमें धीरे−धीरे बड़ी कमी हो जाती है। इस प्रकार प्राकृतिक स्नान प्रत्येक व्यक्ति के लिए हितकारी है। यों तो इसके सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा जा सकता है, पर सबका साराँश यही है हमारे शरीर में जमा होने वाला विजातीय द्रव्य नीचे के भाग में ज्यादा असर करता है। उसकी हानिकारक गर्मी को शान्त करने के लिए इस प्रकार का स्नान बड़ा लाभकारी सिद्ध होता है। इस चिकित्सा प्रणाली के आचार्य एडाल्फ जुस्ट ने बतलाया है कि जंगली पशुओं के स्वस्थ रहने का एक कारण यह भी है कि वे अपने पेडू और जननेन्द्रिय वाले हिस्से को कीचड़ और पानी में रखकर ठण्डा कर लेते हैं।
रोग−निवारण के लिए विशेष स्नान
इस सामान्य स्नान के अतिरिक्त बीमारों और कमजोर स्वास्थ्य वाले व्यक्तियों के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के कई अन्य स्नान भी बड़े महत्वपूर्ण हैं, जिनसे शीघ्र प्रभाव पड़ता है और बड़े−बड़े रोग थोड़े ही समय में ठीक हो जाते हैं। उनका संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जाता है।
कटि स्नान या हिपबाथ
इस स्नान के लिये एक विशेष बनावट की टब बाजार में बिकती है जिसका पिछला भाग कुर्सी की तरह सहारा लेने के लिये उठा रहता है। इसमें रोगी को बिल्कुल नंगा होकर बैठना पड़ता है। दोनों पैर बाहर निकले रहते हैं और सूखे रहते हैं। टब में इतना पानी भरा जाता है कि नाभि के जरा नीचे तक आ जाय। इस प्रकार बैठकर पेडू, जाँघ और जननेन्द्रिय के आस−पास के स्थानों को हथेली से या कपड़े से मलना चाहिये। आरम्भ में पाँच से दस मिनट तक स्नान करना काफी होता है बाद में इस समय को आधा घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। पानी इतना ठंडा होना चाहिए जितना आसानी से सहन कर लिया जाय। यदि रोगी कमजोर हो और मौसम ठण्ड का हो तो उसे ऊपर से कम्बल आदि से ढक सकते हैं।
मेहन स्नान या सिजबाथ
इसमें केवल जननेन्द्रिय के सबसे आगे के चर्म को ही धोया जाता है। टब के किनारे एक लकड़ी की चौकी पर बैठ जाएँ और इतना पानी भर लें कि वह जननेन्द्रिय के पास तक पहुँच जाय। फिर किसी नर्म कपड़े को पानी में बार−बार भिगोकर चमड़े के अग्रभाग को सामने की तरफ खींच कर धोएं और इस बात का ध्यान रखें कि भीतर के मूत्र निकलने के मार्ग को बिल्कुल न रगड़ा जाय। स्त्रियाँ भी अपनी जननेन्द्रियों के बाहरी हिस्से को इसी प्रकार धो सकती हैं।
मेरु दण्ड स्नान
इसके लिये नल के नीचे बैठकर रीढ़ की हड्डी के ऊपर पानी की धार गिराना चाहिए। अथवा तौलिया को पानी में भिगो कर उससे रीढ़ की हड्डी को रगड़ना चाहिए।
इन स्नानों के बाद भीगे शरीर को अच्छी तरह पोंछकर देह में गर्मी लाने के लिये थोड़े समय तक टहलना चाहिए, या हल्का व्यायाम करना चाहिए अथवा ऋतु के अनुकूल हो तो थोड़ी देर तक धूप में रहना चाहिये। स्नान के दो घण्टे पहले और एक घण्टे बाद तक खाना मना है।
गीली चादर लपेटना
ज्वर की अवस्था में अथवा समस्त शरीर में विजातीय द्रव्य के अधिकता होने पर गीली चादर का प्रयोग बहुत लाभदायक होता है। पहले एक कम्बल को नीचे बिछाकर उस पर एक भीगा और निचोड़ा हुआ साफ चादर फैला दिया जाता है। उस पर रोगी को लिटाकर उसे पूरी तरह उसमें लपेट दिया जाता है, जिससे किसी तरफ होकर बाहरी हवा का आवागमन न हो सके। गर्दन से ऊपर सिर को खुला रखा जाता है। उसके पश्चात् कम्बल को भी ऊपर से उसी प्रकार लपेट दिया जाता है। इस प्रकार पन्द्रह बीस मिनट तक पड़े रहने से पसीना आ जाता है और देह की अतिरिक्त गर्मी निकलकर स्वस्थता का अनुभव होने लगता है।
गीले कपड़े की पट्टी
जब पूरे शरीर के बजाय किसी खास अंग की ही चिकित्सा करने की आवश्यकता होती है तो कपड़े के एक टुकड़े की कई तह करके ठण्डे पानी से भिगोकर उस स्थान पर रख दिया जाता है। जब पट्टी गरम हो जाय तो उसको हटाकर फिर से ठण्डा करके रखा जा सकता है।
ठण्डे पानी की प्रतिक्रिया
इन सब विधियों से जो लाभ होता है उसका मूल कारण ठण्डे पानी की प्रतिक्रिया ही होती है। जिस प्रकार नंगे बदन पर ठंडे पानी के छींटे मारने से फुरफुरी सी आती है और रोंये खड़े हो जाते हैं और उसी के फल से बाद में रक्त संचार की गति तेज हो जाती है। इसी प्रकार उक्त स्नानों और पट्टियों के प्रयोग में जहाँ शीतल पानी का स्पर्श होता है वहाँ पहले तो गर्मी की कमी हो जाती है, पर बाद में उस कमी की पूर्ति के लिए भीतर का रक्त वहाँ खिंच आता है। इस प्रकार जब रक्त की गति तेज होती है तो उसके साथ दूषित विजातीय द्रव्य भी बहकर मलाशय की तरफ ढकेले जाते हैं। इस प्रकार जल के प्रभाव से रोगों का निवारण होता है और सुस्त तथा निर्बल अंगों को नवीन चेतना प्राप्त होती है।
अधिकाँश रोगों की जड़ पेट सम्बन्धी खराबी अथवा कब्ज ही होती है। उसका दूषित विकार नीचे के हिस्से में ही रहता है। कटिस्नान द्वारा इसी भाग को चैतन्य किया जाता है। इससे पुराने और सड़े मल के निकलने में सहायता मिलती है। कठिन अवस्था में कटिस्नान और एनीमा दोनों का एक साथ प्रयोग किया जाता है जिससे शरीर की शुद्धि शीघ्रतापूर्वक होती है। पुरुष और स्त्रियों के प्रजनन अंगों का अग्रभाग समस्त स्नायविक नाड़ी−जालवा केन्द्र माना गया है। उसे शीतलता पहुँचाकर वहाँ की हानिकारक गर्मी को निकाल देने से समस्त शरीर को नव−जीवन और स्फूर्ति की प्राप्ति होती है। रीढ़ के बीच होकर ही ज्ञान तंतुओं का मुख्य संस्थान है, इसलिए रीढ़ को जलधारा द्वारा अथवा कपड़े की पट्टी द्वारा ठण्डक पहुँचाने से मस्तिष्क की निर्बलता दूर होती है। गीली चादर लपेटने का असर समस्त देह पर पड़ता है और ज्वर, चेचक, रक्त , जिगर, दमा, क्षय, शोथ, खुजली जैसे शरीरव्यापी रोगों पर उसका बहुत हितकारी प्रभाव पड़ता है।
भाप−स्नान
जिस प्रकार ठण्डे और गर्म पानी के प्रयोग से अनेक रोग दूर होते हैं उसी प्रकार भाप के प्रयोग से भी अनेक प्रकार की शारीरिक पीड़ाओं से छुटकारा मिलता है। अगर समस्त शरीर का कोई रोग हो तो उसके लिए किसी लोहे की जाली के पलंग या छिरछिरी बुनी हुई चारपाई पर रोगी को लिटाकर उसके नीचे खौलते हुए पानी के तीन बर्तन रख देने चाहिये और सबके ऊपर से एक बड़ा कम्बल इस प्रकार डाल देना चाहिये कि वह पूर्ण चारपाई को ढ़ककर जमीन को छूता रहे जिससे भाप बाहर न निकल सके। ऐसा करने से थोड़ी देर में खूब पसीना निकलने लगता है जिसके साथ शरीर के बहुत से विकार भी निकल जाते हैं और शरीरव्यापी समस्त दोषों की शुद्धि हो जाती है।
अगर किसी खास अंग पर ही भाप देनी हो तो उसी अंग को भाप निकलते हुए बर्तन के ऊपर रखना चाहिये और ऊपर से किसी कपड़े से इस प्रकार ढक देना चाहिये कि वह अंग तथा बर्तन दोनों उससे ढक जाएँ। यदि ऐसा न हो सके तो खूब गरम पानी में ऊनी कपड़े के दो टुकड़े डाल देने चाहिएं। जिस अंग पर सेंक करना हो उस पर एक मोटा सूती कपड़ा डाल लेना चाहिये। तब पहले एक ऊनी कपड़े को निकाल कर निचोड़ कर दर्द के स्थान पर रख दें। जब वह ठण्डा होने लगे तो उसे हटाकर दूसरे टुकड़े को उसी प्रकार रख दे। सूती कपड़ा डालने का उद्देश्य यह होता है कि सेंक होते समय उस अंग को ठण्डी हवा का झोंका न लगे और दूसरे यदि ऊनी कपड़ा ज्यादा गर्म हो जाय तो उसका असर एकदम त्वचा पर न पड़े।
इन विधियों से या जैसी परिस्थिति हो उसके अनुकूल इनमें कुछ परिवर्तन करके पीड़ित अंगों को भाप से सेंकने से बहुत शीघ्र लाभ होता है। गर्म स्नान या भाप के उपचार के बाद ठण्डे पानी से नहाने या धोने का भी नियम है जिससे रक्त संचरण की गति ठीक हो जाय।
सर्वाधारे सर्व बीजे सर्व शक्ति समन्विते। सर्व कामप्रदे देवि सर्वेष्टं दोहिमे धरे॥ (ब्रह्मवैवर्त पुराण)
“हे पृथ्वी देवी तू सबकी आधार, सबकी बीजरूप, सब प्रकार की शक्ति से युक्त तथा समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाली है, मेरा कल्याण कर।”
मिट्टी एक अत्यन्त साधारण वस्तु समझी जाती है और इसी कारण उसे विशेष महत्व नहीं दिया जाता। इस दृष्टि से तो उसे बहुत घटिया, निकृष्ट दर्जे की चीज माना गया है और जो आदमी बिल्कुल निकम्मा होता है उसे मिट्टी की उपमा दी जाती है। पर इसी रद्दी और निकम्मी समझी जाने वाली मिट्टी में बड़े−बड़े अनमोल गुण भरे हुए हैं। यह मिट्टी संसार की कारणभूत तो है ही और मनुष्य−जीवन का आधार भी है। साथ ही यह मानव स्वास्थ्य की रक्षक और समस्त रोगों की निवारक भी है। इसमें सर्दी और गर्मी दोनों को रोक सकने की अद्भुत शक्ति होती है। किसी भी प्रकार की चोट लगने, तेज हथियार से कट जाने, आग से जल जाने, बन्दूक की गोली लगने, फोड़े−फुन्सियाँ होने, दाद−खाज, खारिश (एक्जिमा) होने, रोग विष के कारण किसी स्थान के सूज जाने, बिच्छू, ततैया, साँप के काट लेने, हड्डी के टूट जाने आदि बीसियों रोगों तथा दुर्घटनाओं में तत्काल गीली मिट्टी लगा लेने से जादू का सा प्रभाव दिखाई देता है।
मिट्टी की सोखने की शक्ति
मिट्टी की इस आश्चर्यजनक शक्ति का कारण उसकी विजातीय विषों तथा कीटाणु जनित विकारों को सोख लेने की शक्ति होती है। पीड़ा के स्थान पर लगाते ही मिट्टी अपना काम करने लगती है और कभी−कभी जब कि रोग का विकार तीव्र होता है दस−पाँच मिनट में ही गर्म हो जाती है जिससे उसे हटाकर दूसरी मिट्टी रखना आवश्यक होता है। मिट्टी की पट्टी प्रायः हर बीमारी में फायदा पहुँचाती है। अन्दरूनी गहरे विकार जहाँ तक दवाओं का असर ठीक तरह नहीं पहुँचता मिट्टी के प्रभाव से आराम हो जाते हैं। गुर्दे की खराबी, मूत्राशय के रोग, पेट के भीतरी फोड़े, गर्भाशय के विकार, दिल की धड़कन, जिगर की सूजन आदि प्राणघातक रोग भी निरन्तर मिट्टी की पट्टी का प्रयोग करते रहने से अच्छे हो जाते हैं। पेट का दर्द, कब्ज, आँतों का दाह, संग्रहणी, पेचिश, पाण्डुरोग आदि में भी पेट पर मिट्टी की पट्टी बाँधने से बहुत लाभ होता है।
मिट्टी के अनेक प्रयोग
महात्मा गाँधी मिट्टी के उपचार में बहुत अधिक विश्वास रखते थे और उन्होंने बड़े−बड़े रोगों को मिट्टी के प्रयोग से ठीक किया था। एक स्थान पर उन्होंने लिखा है कि “पेट, सिर और आँख के दर्द एवं चोट की सूजन मिट्टी की पुल्टिस से दो−तीन दिन में आराम हो जाता है। मैं पहले पेट की खराबी के कारण ‘एनोज फ्रूट साल्ट’ के बिना कभी निरोग नहीं रह सकता था, लेकिन सन् 1904 में जब मुझे मिट्टी की उपयोगिता मालूम हुई तब मैंने उसका आश्रय लिया और तब से आज तक कोई ऐसा अवसर नहीं आया जब कि मुझे ‘फ्रूट साल्ट’ का प्रयोग करना पड़ा हो। कड़े से कड़े ज्वर में इसकी पट्टी सिर पर और पेडू पर बाँधने से एक−दो घण्टे में ज्वर कम हो जाता है। चर्म रोग जैसे खुजली, दाह और फोड़े इसके उपचार से शीघ्र आराम होते हैं। जले हुए स्थान पर इसका लेप करने से जलन कम हो जाती है और वहाँ फफोला नहीं पड़ता। गर्मी का रोग भी इससे अच्छा हो सकता है। पाले से जब हाथ पैर लाल पड़ जाते हैं और सूज जाते हैं तब इसका प्रयोग बहुत लाभ पहुँचाता है। हड्डियों के जोड़ का दर्द भी इससे ठीक होता है। इन अनुभवों से मैं इसी परिणाम पर पहुँचा हूँ कि इसका उपचार घरेलू ढंग पर बहुत लाभदायक सिद्ध होता है।”
महात्मा जी मिट्टी−चिकित्सा के कितने अधिक भक्त थे और किस प्रकार उसे एक ईश्वरीय चमत्कार मानते थे इसका वर्णन करते हुए श्री प्रभुदयाल विद्यार्थी ने अपने एक लेख में बताया है कि “योरोप के लोग जब गाँधी जी को सिर या पेट पर मिट्टी की पट्टी रखे हुये देखकर आश्चर्य करने लगते तो वे हँसते हुये कहते—‟मुझे डाक्टरी इलाज में उतना विश्वास नहीं जितना इस मिट्टी में है।” शरीर में कोई भी गड़बड़ी होने पर बापू मिट्टी का ही प्रयोग करते थे। पेट में कुछ खराबी है तो मिट्टी का प्रयोग, सिर में दर्द है तो मिट्टी का प्रयोग, चेचक है तो मिट्टी और ज्वर है तो भी मिट्टी। खून का दबाव (ब्लड प्रेशर) बढ़ता तो भी मिट्टी का ही प्रयोग करते थे। अधिक गर्मी पड़ती तो भी बापू मिट्टी की गीली पट्टी का प्रयोग करके खस की टट्टी की तरह उसके असर को मिटा देते थे। बरसाती रोगों से बचने के लिये भी मिट्टी की पट्टी से ही कुनैन का काम लेते थे।”
इंग्लैण्ड के एक प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक डा. पिट कैरन नोल्स ने अपने एक लेख में मिट्टी के गुणों पर पूर्णतः प्रकाश डाला है। उनका कथन है कि “रासायनिक प्रभाव के अतिरिक्त गीली मिट्टी की पट्टी लगाने पर जो आद्र उष्णता उत्पन्न होती है तथा जो मिट्टी के शरीर से चिपकने की क्रिया होती है, इन क्रियाओं के प्रभाव रोगों को उखाड़ने में बड़े काम के सिद्ध होते हैं।
“मिट्टी मिले हुये गाढ़े जल से स्नान करने से ‘साइटिका’ रोग अच्छा हो जाता है और पैर को कीचड़ स्नान कराने से पैर के सारे रोग दूर हो जाते हैं। हाथ के जलने पर या उँगली के कुचल जाने पर फौरन तमाम बाँह पर मिट्टी का लेप बारम्बार करना जादू का सा असर करता है।”
“बहुत से लोग कब्ज दूर करने के लिये भोजन के ऊपर थोड़ी−सी बलुआ मिट्टी खा लेते हैं जिससे पाचन में मदद मिलती है और आँतें आसानी से शुद्ध और साफ हो जाती हैं। इससे और भी अनेक भीतरी रोगों को लाभ पहुँचता है और कोष्ठबद्धता तो निश्चय रूप से दूर हो जाती है।”
विभिन्न रोगों का इलाज
इतना ही नहीं मिट्टी द्वारा विधिपूर्वक चिकित्सा करने से सभी रोग स्थायी रूप से आराम होते हैं, क्योंकि इससे उनका विकार बाहर निकल जाता है और बाद में अपना आहार−विहार प्रकृति के अनुकूल रखने से दुबारा उस रोग के प्रकट होने की कोई सम्भावना नहीं रहती। विभिन्न रोगों में मिट्टी का प्रयोग किस विधि से किया जाता है इस विषय को एक अनुभवी चिकित्सक के शब्दों में यहाँ देते हैं—
कब्ज—कब्ज सब रोगों की जड़ है और इसकी अचूक चिकित्सा मिट्टी की पट्टी लगाना है। आरम्भ में ठंडी के बजाय गर्म मिट्टी की पट्टी अधिक लाभ करती है। जब कब्ज सख्त हो तो पट्टी के बाद एनीमा भी लेना चाहिये और अन्नाहार को त्याग कर फल और शाक का ही सेवन करना चाहिये।
चाहे जिस प्रकार का ज्वर हो, यदि उसमें सब प्रकार का भोजन त्याग कर मिट्टी की पट्टी तथा एनीमा का प्रयोग करके पेट को साफ कर दिया जायेगा तो वह शीघ्र ही अच्छा हो जायेगा। दिन में दो बार, सुबह और शाम मिट्टी की पट्टी बाँधना और उसके बाद एनीमा देना चाहिये। अगर बुखार तेज हो तो दिन रात में 5−6 बार भी मिट्टी की पट्टी लगाई जा सकती है, पर एनीमा दो बार से अधिक देने की आवश्यकता नहीं। जब ज्वर की अधिकता से रोगी की तबियत घबड़ाने लगती है तो 5−5 मिनट पर मिट्टी की पट्टी बदली जाती है और सिर पर भी मिट्टी की पट्टी लगानी पड़ती है। इससे ज्वर की गर्मी और घबराहट कम हो जाती है।
सब प्रकार के फोड़े—फुंसियो पर दो−दो घंटा पर मिट्टी की गरम पट्टी रखनी चाहिए और उसे आधा घंटा तक लगाये रखना चाहिये। पर उसे सूखने के पहले जरूर हटा देना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर उल्टी हानि होती है। फोड़े पर दिन में एक बार भाप भी लगानी चाहिये और मिट्टी की गरम ठण्डी दोनों पट्टी भी देनी चाहिये, जिससे शीघ्र आराम होगा। इस प्रकार उपचार करने से फोड़ा या तो बैठ जायेगा या पक कर स्वयं फूट जायेगा। यदि फोड़ा फूट कर घाव हो गया हो तो भी मिट्टी लगाने में किसी प्रकार का भय नहीं करना चाहिये।
चर्म रोग—जैसे खाज, खुजली, सूजन, दाद, सफेद दाग, उपदंश के घाव आदि—इन पर गरम मिट्टी की पट्टी लगाने से सदैव लाभ होता है। साथ ही पेडू पर भी पट्टी लगानी चाहिए और एनीमा द्वारा पेट की सफाई का भी पूरा ध्यान रखना चाहिये उपवास, फलाहार आदि के प्रयोग द्वारा भी पेट की सफाई करनी चाहिए। खाज में रोग के स्थान पर भाप देना भी लाभदायक होता है। इसमें मिट्टी की पट्टी को बहुत जल्दी−जल्दी बदलना चाहिए।
पेचिश और पेट के अन्य रोग—इन सब रोगों में गर्म मिट्टी की पट्टी बहुत लाभ पहुँचाती है। सुबह शाम दो बार आध−आध घण्टे तक पट्टी लगाएँ। यदि रोग तेज हो तो कई बार भी लगाई जा सकती है। पेचिश में पेडू पर गरम पानी की बोतल और गर्म कपड़े से भी सेंक करना चाहिए।
जहरीले जंतुओं और पागल कुत्ता आदि का काटना—काटने अथवा डंक मारने के स्थान पर बहुत जल्दी−जल्दी 5−5 या 10-10 मिनट पर मिट्टी की पट्टी लगाते रहना चाहिए। क्योंकि विष के प्रभाव से वह शीघ्र ही गर्म हो जाती है। इस प्रकार के उपचार से थोड़ी ही देर में डंक की जलन और सूजन जाती रहती है। साँप के काटे मनुष्य की हालत अगर खतरनाक जान पड़े तो उसे पूरी लंबाई का गड्ढा खोदकर उसमें गाढ़ देना चाहिए। केवल सर बाहर रहे। इस विधि से भीतर ही भीतर बड़ी गर्मी पैदा होती है और चारों तरफ की मिट्टी जहर को सोख लेती है जिससे पीड़ित मनुष्य 24 घंटे में ही निरोगी हो जाता है।
इसके अतिरिक्त कान, दाँत, आँख के दर्द, प्रसव पीड़ा, गर्भ में बच्चे का मर जाना, प्रदर आदि साथ ही स्त्री रोगों, दमा, गठिया, स्वप्नदोष, पागलपन जैसे पुराने रोगों, आग से जलना, भाले का घाव, बन्दूक, छुरी आदि की चोटें सब में मिट्टी अन्य उपायों से अधिक कारगर और शीघ्र फल देने वाली होती है। इन रोगों या दुर्घटनाओं में पीड़ित स्थान पर मिट्टी की पट्टी बार−बार लगानी चाहिये।
अन्य साधारण रोगों का उपचार
चूल्हे की जली मिट्टी से दाँतों में मंजन करने से वे अच्छी तरह साफ हो जाते हैं और नीरोग रहते हैं, पायरिया की शिकायत जाती रहती है। पीली मिट्टी के डेले पर पानी डाल कर सूँघने से नकसीर, जुकाम आदि अच्छे हो जाते हैं। लू लग जाने पर पैरों और सिर पर मिट्टी थोप देने से दाह शान्त होकर ठण्डक आ जाती है। सेर भर पानी में छटाँक भर मिट्टी घोलकर उसे थोड़ी देर रख दे। जब मिट्टी नीचे बैठ जाय तो पानी को निथार कर पीने से ज्वर, तृषा, दाह, जलन, निद्रानाश आदि गर्मी के उपद्रव शान्त होते हैं। इन सब उपचारों का प्रचार हमारे घरों में पुराने समय से है और स्त्रियाँ स्वयं उन्हें करती रहती हैं।
धातु के बर्तन के बजाय मिट्टी की हाँड़ी में भोजन पकाना, मिट्टी के तवे पर रोटी बनाना, मिट्टी के कुल्हड़ में पानी या दूध पीना हमारे देश में लाभदायक माना गया है। इससे भोजन में कोई विकार उत्पन्न होने की आशंका नहीं रहती और उसका स्वाद भी अधिक हो जाता है। अगर कढ़ाई और मिट्टी की हाँड़ी में दूध को अलग−अलग औटा कर पिया जाय तो उनके स्वादों में अन्तर जान पड़ेगा। इन बातों से भी मिट्टी की उपयोगिता और उसके लाभों का पता चलता है।
एक बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि मिट्टी बिल्कुल साफ और शुद्ध हो। वैसे तो जहाँ जैसी मिट्टी मिले उसी से काम चलाना पड़ता है पर बालू मिली काली या चिकनी मिट्टी सर्वोत्तम होती है। यदि नदी किनारे की ऐसी बलुआ मिट्टी न मिले तो चिकनी मिट्टी में ऊपर से बालू मिला देने से भी पट्टी के लायक लाभदायक मिट्टी तैयार हो जाती है। यह देख लेना चाहिए कि उसमें गोबर, लीद, खाद आदि कोई हानिकारक चीज न मिली हो। उसे भली प्रकार कूटकर चलनी से छान लेना चाहिये और पानी डालकर आटे की तरह गूँथकर काम में लाना चाहिये। जहाँ तक संभव हो मिट्टी चार−छः घण्टे पहले की भीगी हो तो अच्छा रहता है। एक बार की लगाई मिट्टी दुबारा काम में नहीं लाई जा सकती, क्योंकि उसमें देह के विकार खिंचकर आ जाते हैं। हर एक गृहस्थी में ऐसी छनी हुई मिट्टी का एक बड़ा डिब्बा भरकर तैयार रखना चाहिये। जिससे आवश्यकता पड़ने पर उसका तुरन्त उपयोग किया जा सके। क्योंकि दुर्घटनाओं में मिट्टी का प्रयोग शीघ्र से शीघ्र करना ही आवश्यक और लाभदायक होता है।
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्षं सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुपश्च
—ऋग्वेद 1-1 15-1
“देवगण का अद्भुत मुखरूप तथा मित्र, वरुण (जल), अग्नि का नेत्र रूप सूर्य उदय हो गया। जो सूर्य समस्त स्थावर तथा जंगम सृष्टि का प्राणस्वरूप है उसने आकाश, पृथ्वी और अन्तरिक्ष को सब ओर से प्रकाशित कर दिया।”
संसार में हमको जितनी प्रकार की शक्तियाँ दिखाई पड़ती हैं उन सबका मूल सूर्य में ही है। जल का बहना, वायु का चलना, अग्नि का जलना, पृथ्वी का भाँति−भाँति की वनस्पतियों को उत्पन्न करना आदि सबका आधार सूर्य ही है। वास्तविक बात तो यह है कि हमारी पृथ्वी, ग्रह, उपग्रह सब सूर्य से ही उत्पन्न हुए हैं और उसी के द्वारा पाले जा रहे हैं। इसलिए पंचतत्वों से उत्पन्न कोई भी पदार्थ या प्राणी सूर्य की शक्ति के द्वारा ही अपने अस्तित्व को स्थिर रखता है, वृद्धि को प्राप्त होता है और समयानुसार परिवर्तित रूप को ग्रहण करता है। साधारणतः लोग सूर्य को प्रकाश तथा उष्णता का साधन मानते हैं और उससे रोगों के निवारण का कार्य भी लेते हैं। पर सूर्य का महत्व इससे कहीं अधिक है और वह मनुष्य के लिए भोजन या आहार का काम भी देता है। अगर सूर्य का प्रकाश ठीक ढंग से न मिले या उससे बिल्कुल ही वंचित रहना पड़े तो मनुष्य थोड़े समय में अवश्य ही निर्बल और अस्वस्थ हो जायेगा।
मानव−शरीर में जो अनेक रासायनिक तत्व पाये जाते हैं उनमें फास्फोरस और कैल्शियम की गणना प्रधान द्रव्यों में की जाती है। हमारी हड्डियों और दाँतों का निर्माण विशेषतः इन्हीं से होता है। सूर्य की धूप जब हमारे चर्म पर लगती है तो उससे रक्त में उष्णता आती है और रक्त संचार की गति बढ़ने लगती है जिससे नया रक्त ऊपर आने लगता है। इस रक्त में “अर्गोसटेरोल” नामक पदार्थ होता है जो सूर्य की धूप के संयोग से ‘विटामिन डी’ में बदल जाता है। यह विटामिन डी आँतों में एसिड (अम्ल) और अल्कली (क्षार) के परिमाण को नियंत्रित करता है और भोजन में से कैल्शियम (चूना) और फास्फोरस को ग्रहण करने में सहायता पहुँचाता है। इसलिये यदि मनुष्य को सूर्य प्रकाश प्राप्त न हो तो वह इन दो प्रधान तत्वों को भोजन में से प्राप्त करके शरीर में सम्मिलित नहीं कर सकता। ऐसी अवस्था में हड्डियों का निर्माण ठीक ढंग से नहीं हो पाता और बहुसंख्यक बालकों को ‘रिकेट’ (सूखा) रोग लग जाता है।
प्राकृतिक−चिकित्सा में बिना पकाये भोजन का बहुत अधिक महत्व बतलाया गया है। उससे खाद्य पदार्थ के समस्त स्वाभाविक तत्व शरीर को प्राप्त हो जाते हैं। खास कर भोजन में पाये जाने वाले कई प्रकार के विटामिन, जिनको नवजीवनदाता कहा जाता है, आग पर पकाने से अधिकाँश त: नष्ट हो जाते हैं। इसलिये सब देशों के प्राकृतिक चिकित्सक रोगियों और स्वास्थ्यभिलाषियों को ताजा फल, तरकारी, शाक आदि कम से कम परिवर्तन किये बिना भोजन के रूप में ग्रहण करने की सलाह दिया करते हैं। बहुत से लोग ऐसे भोजन को ‘कच्चा भोजन’ या ‘बिना पकाया भोजन’ के नाम से पुकारते हैं, पर वास्तव में वह भोजन सूर्य द्वारा पेड़ के ऊपर ही पकाया जाता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि ऐसा सूर्य द्वारा पकाया भोजन स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त लाभदायक होता है और उससे शरीर को ऐसे अमूल्य तत्व प्राप्त होते हैं जो और किसी उपाय से मिलने सम्भव नहीं होते। डा. सर राबर्ट मैकरीसन ने एक लेख में बतलाया है कि “भोजन की ताजगी और बढ़ियापन में एक ऐसा तत्व होता है जिसको आधुनिक आहार−वैज्ञानिकों ने, जिन्होंने कि प्रोटीन, वसा, कार्बोहाइड्रैट्स, खनिज लवण और विटामिन जैसे महत्वपूर्णों तत्वों का पता लगाया है, अभी तक उस तत्व का पता उनको भी नही लग सका है। कहना नहीं होगा कि वह तत्व ‘प्राण’ अथवा जीवन है, जो वनस्पतियों में सूर्य के प्रकाश में रहने से ही उत्पन्न होता है। पर यह तत्व फल तरकारी आदि में तभी तक रहता है जब तक वे ताजा रहती हैं। जैसे−जैसे ताजगी कम होती जाती है वह तत्व भी कम पड़ता जाता है। इसलिये यदि हम खाद्य पदार्थ की प्राण शक्ति से लाभ उठाना चाहते हैं तो हमें उसे यथा सम्भव ताजा से ताजा अवस्था में ही काम में लाना चाहिये।
चालीस−पचास वर्ष पहले की बात है कि जर्मनी के एक ऐलोपैथिक डाक्टर मि. बैनर को एक रोगी का इलाज करना पड़ा जिसे बदहजमी की बीमारी थी। डा. बैनर ने उसका अच्छे से अच्छा इलाज किया और बहुत बढ़िया दवाएँ खिलाईं पर कोई लाभ न जान पड़ा। अन्त में डाक्टर ने अपनी असफलता स्वीकार कर ली और रोगी को अन्य इलाज करने की अनुमति दे दी। उस रोगी ने किसी प्राकृतिक चिकित्सक की सलाह से केवल कच्ची वनस्पति खाना आरम्भ किया जिससे उसकी बीमारी थोड़े समय में पूर्णतया ठीक हो गई। यह देखकर डा. बैनर को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने इस सम्बन्ध में खोज करना आरंभ किया और सूर्य−किरणों की पौष्टिकता प्रदान करने वाली शक्ति का सिद्धान्त सर्वसाधारण के सामने रखा। उन्होंने अपनी प्रभावशाली शैली में इसका विवरण करते हुये लिखा—
“हमारे ऊपर आकाश में दिन का जोरदार तारा (सूर्य) दमकता है। अपने प्रकाश की धारा के साथ वह दिन रात बहुत अधिक शक्ति भी निकालता रहता है। पर उस शक्ति का बहुत थोड़ा अंश पृथ्वी तक पहुँच पाता है। फिर भी वह शक्ति इतने परिमाण में होती है कि हम उसकी कल्पना नहीं कर सकते। यह सौर−शक्ति की धारा पृथ्वी को जिस स्थान पर स्पर्श करती है वहीं सब तरह की हरियाली, वनस्पतियाँ, फूल, पत्ते आदि विकसित हो उठते हैं। विचारशील व्यक्ति प्राचीन काल से इस शक्ति का अनुभव करते आये हैं और उनके मतानुसार यह शक्ति यद्यपि गुह्य (सूक्ष्म) है पर उसके अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता। जब यह शक्ति पौधों, वनस्पतियों तथा फलों को स्पर्श करती है तो यह परिवर्तित होकर अन्य रूप में उनके भीतर समाविष्ट हो जाती है।”
जिस प्रकार यह शक्ति वनस्पति−जगत पर प्रभाव डालती है उसी प्रकार अन्य प्राणियों तथा मनुष्यों पर इसका प्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ता है। गायों के दूध की परीक्षा करके मालूम किया गया है कि जिन गायों को घरों के भीतर ही बाँधकर रखा जाता है उनके दूध में विटामिन डी का अभाव होता है और उसके द्वारा शरीर को यथेष्ट लाभ नहीं पहुँचता। पर जो गायें दिन भर मैदानों में घूमती हुई चरती रहती हैं, उनका दूध चाहे हल्का जान पड़े पर उसमें विटामिन की मात्रा पर्याप्त होती है। मनुष्य शरीर पर सूर्य की किरणों का प्रभाव बड़ा हितकारी होता है। ये किरणें शरीर में काफी गहराई तक प्रवेश करती हैं और शरीर के समस्त कोषों और तन्तुओं को उद्दीपित करती हैं। इन किरणों को नियमित रूप से सेवन करने से रक्त के अन्दर लाल और सफेद कणों की संख्या बढ़ जाती है और हानिकारक कीटाणुओं को नष्ट करने की शक्ति की भी वृद्धि होती है। इसके प्रभाव से शरीर के स्नायु सतेज हो जाते हैं जिससे सम्पूर्ण शरीर की क्रियाऐं अधिक उत्तमता से होने लगती हैं। इतना ही नहीं मानसिक अस्वस्थता पर भी सूर्य−प्रकाश का कल्याणकारी प्रभाव पड़ता है और मानसिक कार्य की क्षमता की वृद्धि होती है।
सूर्य−प्रकाश में सात रंग पाये जाते हैं जो किसी तीन पहल के काँच में होकर देखने में इस क्रम से दिखाई पड़ते हैं—(1) लाल (2) नारंगी (3) पीला (4) हरा (5) आसमानी (6) नीला (7) बैंगनी। इन्हीं सातों रंगों के मिल जाने से सूर्य का श्वेत रंग दिखाई देता है। सूर्य की ये सातों किरणें तो आँखों से दिखाई देती हैं और इनका वर्णन वेदों से लेकर पुराणों तक में पाया जाता है। आजकल वैज्ञानिकों ने दो तरह की किरणों का पता और लगाया है, जिनको ‘अल्ट्रा रेड’ और अल्ट्रा वायलेट’ कहते हैं। ये दोनों अदृश्य होती हैं, पर इनका प्रभाव समस्त प्राणियों पर पड़ता है। इनमें ‘अल्ट्रा वायलेट’ किरणें विशेष महत्वपूर्ण होती हैं और आजकल उन्होंने चिकित्सा विज्ञान में एक क्राँति सी उत्पन्न कर दी है। संसार भर के छोटे−बड़े अस्पतालों में तथा डाक्टरों के यहाँ भी ‘अल्ट्रा−वायलेट’ किरणों से चिकित्सा की व्यवस्था पाई जाती है और अनेक रोग जो औषधियों से ठीक नहीं हो पाते इन्हीं किरणों द्वारा मिटाये जाते हैं। वैसे तो ये सर्वोत्तम रूप में सूर्य की धूप में रहने से ही प्राप्त होती हैं, पर अब ऐसे कई प्रकार के बिजली के लैम्प बनाये गये हैं जिनसे इस रंग की किरणें मनुष्य के किसी भी अंग पर डाली जा सकती हैं। इन किरणों में कीटाणुओं को नष्ट करने की अपूर्व शक्ति पाई जाती है और इन्हीं से विटामिन डी की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार ये मानव शरीर को दोष रहित बनाकर उसे रोगोत्पत्ति करने वाले कीटाणुओं का मुकाबला करने योग्य बनाती हैं। चर्म के रोग, गठिया आदि, संधि स्थानों के रोग, गन्दे घाव और फोड़े रिकेट अर्थात् हड्डी की कमजोरी के रोग आदि में धूप स्नान बहुत लाभदायक सिद्ध हो चुका है।
रोगों को दूर करने के लिए धूप स्नान एक विशेष विधि से लिया जाता है। चाहे जैसे धूप में घूमते रहने से अधिक लाभ नहीं हो सकता। खासकर भारतवर्ष जैसे ग्रीष्म−प्रधान देश में, जहाँ गर्मी का तापमान काफी ऊँचा जाता है और धूप में लोग व्याकुल हो जाते हैं इस क्रिया को बहुत संभालकर और क्रमशः करना पड़ता है। गर्मी की ऋतु में केवल सुबह के समय ही धूप स्नान लिया जाता है। दुर्बल रोगियों को एक साथ अधिक देर तक धूप में बैठा देना हानिकारक सिद्ध होता है। पहले केवल उनके पैरों को पाँच−सात मिनट तक धूप में रखा जाता है। फिर दोनों हाथों को रखा जाता है। तत्पश्चात गले तक समस्त देह को धूप में रखना उचित होता। धूप लेने का समय क्रमशः आधा घंटा तक बढ़ाया जा सकता है। जाड़े के दिनों में एक घंटा या अधिक समय तक भी धूप सहन कर सकते हैं।
धूप−चिकित्सा से लाभ उठाने का एक तरीका रंगीन बोतलों में पानी, दूध, तेल, शक्कर मिसरी आदि भर कर और उन्हें नियत समय तक धूप में रख कर काम में लाना भी है। रंगीन काँचों द्वारा तो धूप का लाभ दिन के समय ही लिया जा सकता है, और जब आकाश में बादल आदि हों तब भी वह उपाय बेकार हो जाता है। पर रंगीन बोतलों की विधि द्वारा हर समय सूर्य चिकित्सा से लाभ उठा सकना संभव है। इसके लिए नीली, लाल, बैंगनी, नारंगी आदि रंगों की बोतलें एक लकड़ी के तख्ते के ऊपर धूप में ऐसे स्थान पर रखनी चाहिये कि उन पर किसी भी प्रकार की छाया न पड़े। इतना ही नहीं इस बात का भी ध्यान रखना चाहिये कि बोतलों की छाया भी एक दूसरे पर न पड़ सके। पानी की बोतलों को आठ घण्टे धूप में रखना चाहिये और सूर्यास्त से पहले ही उठा लेना चाहिये मकान में लाने पर भी उन पर किसी प्रकार का दीपक आदि का प्रकाश न पड़े ऐसी व्यवस्था होनी उचित है। तेल तैयार करना हो तो उसे उपरोक्त विधि से 10 दिन तक , घी को 6 दिन तक तथा शक्कर और मिसरी को एक सप्ताह तक धूप में रखना पड़ता है।
सूर्य प्रकाश से तैयार पानी तीन दिन तक काम दे सकता है, फिर बेकार हो जाता है। अन्य वस्तुएँ दो−चार महीने तक भी गुणकारी रहती हैं। यह ख्याल करना कि पानी, शक्कर आदि जैसी साधारण खाने की वस्तुओं से रोग क्या दूर हो सकते हैं, ठीक नहीं। अगर इस चिकित्सा को ठीक विधि से किया जाता है तो इससे जादू का−सा असर दिखाई पड़ता है और भयंकर रोग देखते−देखते ठीक हो जाते हैं। यह चिकित्सा−प्रणाली सर्वथा निर्दोष है। इसमें मनुष्य के शरीर में किसी प्रकार की विषाक्त या अस्वाभाविक वस्तु का प्रवेश नहीं कराया जाता। इसलिये सूर्य−चिकित्सा से जो रोग मिटता है वह स्थायी रूप से दूर होता है और किसी अन्य प्रकार का कुफल नहीं होता।
जैसा बतलाया जा चुका है स्वस्थ−जीवन के लिये शुद्ध वायु परमावश्यक है और जो लोग गन्दे स्थानों में रहते हैं, जहाँ की वायु अशुद्ध, बदबू, सील आदि से भरी होती है, वे प्रायः बीमार रहते हैं। आजकल बड़े नगरों में जहाँ मकानों की बहुत कमी है, लाखों मजदूर श्रेणी वालों को तंग गलियों या ऊँचे मकानों की सब से नीची मंजिलों की अँधेरी, वायु के आवागमन रहित कोठरियों में रहना पड़ता है। ऐसे लोग यद्यपि साधारणतः अच्छा वेतन पाते हैं और मध्यम श्रेणी वालों के समान भोज्य−सामग्री भी पा जाते हैं, पर तब भी शुद्ध वायु के अभाव से वे निस्तेज, पीले और निर्बल दिखाई पड़ते हैं। बन्द हवा में रहने के फलस्वरूप प्रथम तो रक्त की सफाई ठीक तरह से नहीं हो पाती और दूसरे शरीर की गर्मी के ठीक ढंग से न निकल सकने के कारण थकावट का अनुभव होता रहता है। जिस प्रकार मुँह द्वारा बुरा भोजन भीतर जाने से स्वास्थ्य की हानि होती है उसी प्रकार नाक द्वारा दूषित वायु भीतर जाने से भी शरीर में खराबी पैदा होती है।
विषाक्त गैस और गर्मी से हानि
हम लोग जब बाहर की वायु को भीतर खींचते हैं तो उसमें ‘कार्बन−डाई−आक्साइड’ गैस का अंश सौ में .04 होता है, पर जब वही साँस बाहर निकलती है तो उसका परिमाण बढ़ कर 4.41 हो जाता है। अर्थात् वह सौ गुने से अधिक बढ़ जाता है। यह ‘कार्बन−डाई−आक्साइड’ अधिक मात्रा में मनुष्य के लिये विष का काम करता है। बहुत छोटे जीव तो इसके प्रभाव से तुरन्त मर जाते हैं। जब मनुष्य बन्द स्थान में रहता है या जाड़े में कम्बल रजाई आदि से मुँह ढक कर सोता है तो यही विषाक्त गैस बार−बार उसके भीतर जाती है और इसके फल से उसका रक्त अवश्य ही खराब होता रहता है।
मनुष्य की देह में रक्त के दौड़ने और विभिन्न अंगों में चलने से हमेशा गर्मी उत्पन्न होती रहती है, जिसका बाहर निकलते रहना आवश्यक है। यह तभी निकलती है जब शरीर से ठंडी, शुष्क और चलती हुई वायु लगती रहे। यही कारण है कि वर्षा आरम्भ होने के कुछ दिन पहले जब हवा गर्म, भाप से भरी और रुकी हुई रहती है तो मनुष्य को अत्यन्त कष्ट जान पड़ता है। ऐसी अवस्था को लोग भस्का अथवा सड़ी हुई गर्मी कहते हैं और बड़ी व्याकुलता अनुभव करते हैं। जो लोग बन्द और वायु के आवागमन के लिये खिड़की और जंगलों से रहित कोठे, कोठरियों में रहते हैं, जिन के निवास स्थान के आस−पास ही छोटी−बड़ी गन्दी नालियाँ, संडास, कूड़ा डालने के स्थान रहते हैं उनको सदा ही ऐसी गन्दी वायु में साँस लेना पड़ता है, और फलस्वरूप वे कभी सुदृढ़, सबल, सतेज स्वास्थ्य का अनुभव नहीं कर पाते।
इसलिये प्राकृतिक चिकित्सा में जहाँ सादा और ताजा भोजन करने, काफी परिमाण में शुद्ध ठण्डा जल पीने का विधान है, वहीं खुली वायु में बदन को खोलकर रहने, गहरी साँस लेने, नगर के बाहर मैदान में टहलने का भी निर्देश किया गया है। वैसे तो मनुष्य का निवास स्थान ही ऐसी जगह होना चाहिये जहाँ शुद्ध वायु सदैव मिलती रहे पर यदि किसी को परिस्थिति वश ऐसे स्थान में रहना पड़े जहाँ की वायु थोड़े या अधिक अंशों में बन्द रहती हो तो उसे सुबह के वक्त तो अपना दो−एक घंटे का समय खुले स्थान में अवश्य व्यतीत करना चाहिये और खुले बदन से वायु स्नान करना चाहिये। जिनको पूरी तरह बदन खोलने की सुविधा न हो उनको ऐसा पतला और छिरछिरा कपड़ा पहिनना चाहिये जिसमें होकर हवा भीतर जा सके। इस प्रकार के ‘वायु−स्नान’ से भूख और पाचन शक्ति बढ़ती है। शरीर के चर्म पर भी इस का बड़ा हितकारी प्रभाव पड़ता है और भीतरी विकारों के रोमकूपों द्वारा निकलने में सहायता मिलती है।
वायु−स्नान में सावधानी
वायु−स्नान में ऋतु और देश का ध्यान रखना भी आवश्यक है। ठण्डी वायु में खुले बदन रहते समय इस बात का ध्यान रखना जरूरी है कि शरीर गर्म रहे। यदि उस समय बदन ठण्डा हो या ठण्ड लगती हो तो फौरन शरीर को हाथ से रगड़कर गरम कर लेना चाहिये। इस प्रकार ठण्डी हवा भी कुछ हानि नहीं करेगी। इसे चर्म−घर्षण व्यायाम कहते हैं। गर्म देशों में तो वायु−स्नान का कोई खास समय रखना निरर्थक है, क्योंकि वहाँ सदा ही बदन के ऊपर का हिस्सा नंगा रखा जा सकता है। इस दृष्टि से कमरों में सोने की बजाय खुले बरामदे में सोना सदैव लाभदायक होता है।
रोग की अवस्था में खुली हवा में रहना और शक्ति के अनुसार वायु−स्नान भी करना रोग−निवारण के लिये आवश्यक है। पर इसमें सावधानी की आवश्यकता रहती है। नये रोग में रोगी को जब खुले स्थान में रखा जाय तो सर को छोड़कर उसका समस्त बदन ढका रहना जरूरी है। गर्मी के दिनों में जितना सहन हो सके या रोगी को पसन्द हो उतना ही शरीर का भाग ढकना चाहिए। बहुत से लोग ठंड के डर से रोगी को सदा ढका हुआ रखते हैं। पर यह अनुचित है, अनेक बार गर्मी की अधिकता से ही रोगी की मृत्यु हो जाती है। इसलिये जब रोगी ओढ़ना नापसन्द करे तो समझ लेना चाहिये कि उसके भीतर गर्मी की अधिकता है, जिसका बाहर निकलना आवश्यक है, उस समय उसे उढ़ाकर नहीं रखना चाहिए। रोगी को जितने समय तक बाहर रहना अच्छा लगे तभी तक उसे बाहर रखना चाहिए। यदि उसे किसी प्रकार की अस्वस्थता का अनुभव न हो तो समस्त दिन और रात्रि बाहर रखा जा सकता है। पर जब बादल हो रहे हों या ठंड ज्यादा हो तो उसे कमरे में ऐसे स्थान में रखना चाहिये कि जहाँ ताजा हवा तो मिलती रहे पर हवा का झोंका न लगे।
गहरी साँस और प्राणायाम
ताजा और शुद्ध हवा में रहने पर भी श्वास लेने की क्रिया का जो एक विशेष नियम है उसका ध्यान रखना भी आवश्यक है। उसे हम दीर्घ श्वास अथवा प्राणायाम कह सकते हैं। इसकी आवश्यकता इसलिये पड़ती है कि अस्वास्थ्यकर अवस्था में बन्द स्थानों में रहकर, फैशन के ख्याल से चुस्त अथवा कसे हुये वस्त्र पहनकर तथा आलस्यवश व्यायाम से दूर रहकर अधिकाँश मनुष्य गहरी साँस लेना भूल जाते हैं जिससे उनके फेफड़े पूरी तरह से काम करना छोड़ देते हैं। फेफड़े में करोड़ों की संख्या में अत्यन्त सूक्ष्म वायु कोष्ठ होते हैं जो साँस भीतर लेते समय फूल जाते हैं और साँस को बाहर फेंकने पर पिचक जाते हैं। उनकी इस फूलने और पिचकने की क्रिया से ही रक्त की शुद्धि का कार्य होता है और उसमें मिला हुआ दूषित मलाँश वायु के साथ मिलकर बाहर निकल जाता है। इसलिये यदि हम अपने रक्त को शुद्ध और स्वास्थ्य को सबल रखना चाहें तो उसके लिए गहरी साँस लेना अत्यावश्यक है जिससे काफी परिमाण में वायु भीतर जाय और रक्त के मलाँश को बाहर लाने में समर्थ हो।
टहलने के लाभ
वायु से लाभ उठाने की सबसे सरल और स्वाभाविक विधि तो टहलना है। खुले मैदान या साफ सड़क पर तेजी से दो−चार मील चलने से स्वयं ही स्वच्छ वायु भीतर जाती है और वहाँ की गंदगी को लेकर बाहर निकलती रहती है। चलते समय छाती को कुछ उठी हुई रखना चाहिए जिस से काफी वायु भीतर जा सके। जिन लोगों की छाती गलती से झुकी हुई, दबी हुई रहती है वे थोड़ी ही वायु भीतर ले सकते हैं। अगर पूर्व रहन−सहन के कारण ऐसा हानिकारक अभ्यास किसी को हो गया हो तो उसका कर्तव्य है कि वह प्राणायाम के अभ्यास द्वारा उसका सुधार कर ले। पर यहाँ प्राणायाम से हमारा आशय योग के प्राणायाम से नहीं है जिसके लिए आसन लगाकर एकांत स्थान में घण्टा−दो−घण्टा बैठना आवश्यक होता है। पर टहलने के समय और साधारण उठते−बैठते हुये उसका ध्यान रखा जाय तो श्वास क्रिया का सुधार होकर फेफड़ों का कार्य ठीक हो सकता है।
रेचक, पूरक और कुम्भक
श्वास क्रिया के तीन भाग माने गये हैं। पहला रेचक होता है जिसका अर्थ है फेफड़ों के भीतर की मलयुक्त वायु को बाहर निकालना। स्वास्थ्य की दृष्टि से यह क्रिया विशेष महत्व की है, क्योंकि यदि भीतर की वायु को ठीक ढंग से पूरी तरह बाहर निकाला जायेगा तो फिर पूरक में अर्थात् श्वास खींचने में वायु अधिक मात्रा में भीतर जायगी ही।
रेचक और पूरक के बीच फेफड़े को किंचित आराम देने के लिए कुछ सेकिण्ड तक श्वास न लेना चाहिए। इसको बाह्य−कुँभक कह सकते हैं। इससे फेफड़ों की शक्ति बढ़ती है और वे अधिक कार्यक्षम होते हैं। इसी प्रकार श्वास को भीतर ले जाने अर्थात् पूरक और श्वास को बाहर निकालने के बीच में भी वायु को कुछ सेकिण्ड तक भीतर रोके रखना चाहिए। यह अन्तः कुम्भक कहा जाता है। इससे प्राण−वायु (ऑक्सीजन) को रक्त के मैल की भस्म करने तथा बाहर निकालने में सुविधा मिलती है।
इस क्रिया के अभ्यास का सरल नियम रेचक की क्रिया का ध्यान रखना और सुधार करना ही है। उसके ठीक होने पर पूरक और कुम्भक स्वयं ही बहुत कुछ ठीक होने लग जाते हैं। आगे चल कर जब प्राकृतिक−जीवन का अभ्यास होने से आमाशय शुद्ध होकर स्वाभाविक अवस्था पर आ जायेगा तब पूरक और कुम्भक का ठीक करना सरलतापूर्वक संभव हो जाता है। इस प्रकार रेचक, पूरक और कुम्भक का नियमपूर्वक स्वाभाविक ढंग से होने लगना ही प्राणायाम है जिससे शरीर में हल्कापन आता है, सुस्ती दूर होकर कार्य की क्षमता बढ़ती है और अनिद्रा जैसी शिकायतें दूर हो जाती हैं। इसके लिये ऊपर बतलाया अभ्यास कुछ महीने तक नियमपूर्वक करके गहरी साँस लेने और उसे कुछ देर तक भीतर रोकने का अभ्यास कर लेना चाहिये।
असंशयं महावाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण चगृह्यते॥ (भगवत् गीता)
“निस्सन्देह यह मन बड़ा चंचल है जिससे इसे वश में रख सकना बड़ा कठिन होता है। फिर भी अभ्यास और वैराग्य द्वारा इसको वश में किया जा सकता है।”
गत शताब्दी में ‘मनोविज्ञान’ की अभूतपूर्व उन्नति हुई है और जिस मन को एक अज्ञेय, वश के बाहर का और परम गूढ़ विषय समझा जाता था उसे ऐसा सुलझा हुआ और क्रमबद्ध बना दिया गया है कि मानसिक शिक्षा भी मानव जीवन का एक आवश्यक अंग हो गया है। प्रकट में तो हमारे सब काम शरीर द्वारा ही संचालित होते हैं और शरीर ही उनका भला या बुरा परिणाम भोगता है, पर इस सब का वास्तविक कर्ता तो अदृश्य मन ही होता है। हमारे स्वास्थ्य और रोग का आधार भी बहुत कुछ मन पर होता है और कितने ही रोग तो ऐसे होते हैं जो बिना मानसोपचार के पूर्णतः ठीक हो ही नहीं सकते। इस सम्बन्ध में प्राकृतिक जगत में प्रसिद्ध डा. कीलाग का मत है कि “इसमें कुछ भी सन्देह नहीं कि यदि चिकित्सा का प्रयोग दिमाग पर अधिक किया जाय और पेट पर कम तो चिकित्सक को कहीं अधिक सफलता प्राप्त हो सकती है।”
इसमें तनिक भी सन्देह नहीं और बहुसंख्यक लोगों को इसका प्रत्यक्ष अनुभव भी है कि जिस रोगी के मन में चिकित्सक और औषधि के प्रति पूर्ण श्रद्धा होती है उस पर चिकित्सा का प्रभाव बहुत शीघ्र और फलदायक होता है। इसके विपरीत जो लोग शक्की मिज़ाज के होते हैं और हर एक चिकित्सक के दोष या त्रुटियों को ही ढूँढ़ा करते हैं वे बढ़िया से बढ़िया इलाज होने पर भी नीचे की ओर खिसकते चले जाते हैं। किसी रोगी का किस्सा है कि उसे पेट में दर्द होने पर डाक्टर ने एक नुस्खा लिख दिया और कहा ‘इसे ले लेना’। रोगी बड़ा सीधा सादा और अनजान था और उसने दवा खरीद कर खाने के बजाय उस कागज के पुर्जे को ही निगल लिया और थोड़ी देर में उसका दर्द भी जाता रहा। यह किस्सा सच हो या काल्पनिक पर तातार देश के अनेक हकीम अब भी इस तरकीब से काम लेते हैं। जब उनके पास कोई दवा तैयार नहीं होती तो वे उसका नाम कागज पर लिख कर और उसकी गोली बना कर रोगी को निगलने को कह देते हैं और सचमुच बहुत से व्यक्तियों की पीड़ा इसी से जाती रहती है। जर्मनी के उस डाक्टर का उदाहरण भी बड़ा प्रामाणिक है जो रोगियों को अधिक दवा देने के पक्ष में नहीं था, पर जब रोगी लोग अपनी आदत के माफिक बार−बार दवा देने की जिद्द करते तो वह रोटियों की गोली और पानी में कोई महक की चीज मिला कर मिक्श्चर बना कर दे देता था और अनेक व्यक्ति उन्हीं से रोग मुक्त हो कर कहने लगते थे कि ‘ऐसी दवा तो हमको जीवन में कभी मिली ही न थी।’
जब इस प्रकार के साधारण तरीके से भी मनुष्य मानसिक श्रद्धा और विश्वास के आधार पर निरोगिता प्राप्त करने में समर्थ हो सकता है तो मनसोपचार की प्रणाली से विधिवत् प्रभावित किये जाने पर वह रोगमुक्त न हो सके ऐसी बात नहीं है। आजकल मानसिक चिकित्सा के लिये विशेष संस्थाऐं स्थापित हो गई हैं और उनमें शिक्षा पा कर अनेक उच्चशिक्षित तथा बुद्धिमान व्यक्ति सफलतापूर्वक चिकित्सक का कार्य कर रहे हैं। नीचे हम मानसिक−चिकित्सा की विभिन्न प्रणालियों का संक्षेप में परिचय देते हैं—
(1)मानसोपचार—जो चिकित्सा−प्रणाली दिमाग द्वारा प्रयुक्त की जाती है उसको साइकोथैरेपी या मानसोपचार कहते हैं। यह विशेष रूप से दिमाग के छोटे−बड़े रोगों को ठीक करने के काम में लाई जाती है। पर इसके साथ शारीरिक इलाज करना भी आवश्यक होता है, जिससे शिकायत पूर्णतः दूर हो सके।
(2) संकल्प−चिकित्सा—इसका उद्देश्य स्वयं अपने ऊपर प्रभाव डालना होता है और यह उन रोगों में सफलतापूर्वक प्रयुक्त की जा सकती है जो वास्तव में नहीं होते पर रोगी अपनी कल्पना से ही जिनकी सृष्टि कर लेता है। ऐसे रोगी को अपने विचारों को बदलने की प्रेरणा की जाती है जिससे वह अपने को रोगी समझना छोड़ दे।
(3) सम्मोहन विद्या—इस बात के कितने ही प्रमाण दिये जा सकते हैं कि शरीर के अनेक कार्यों और परिवर्तनों पर विचारों तथा कल्पनाओं का बड़ा प्रभाव पड़ता है। किसी भयंकर घटना से शरीर का काँपने लगना, भय के कारण दिल की धड़कन का बढ़ जाना, लज्जा के मारे मुँह का रंग लाल हो जाना इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। यह भी सिद्ध हो चुका है कि रक्त के संचरण और साँस के आने जाने पर भी मानसिक व्यापारों का बहुत प्रभाव पड़ता है। जब हम गम में होते हैं तो भोजन की पाचन क्रिया मन्द हो जाती है और खुशी की हालत में यह तीव्रता से होने लग जाती है। हम कभी−कभी सुनते हैं कि अमुक व्यक्ति की भय के कारण दस्त होकर धोती खराब हो गई। इसका कारण यही होता है कि भय की उत्तेजना के कारण पाचक रस की ग्रंथि एक साथ अधिक रस निकाल देती है जिसके फल से शीघ्र ही दस्त हो जाता है।
(4) आकर्षण−चिकित्सा — इसी को मैस्मरेजम भी कहते हैं। यह आकर्षण शक्ति प्रत्येक प्राणी में थोड़ी बहुत पाई जाती है। कुछ मनुष्यों में यह स्वभावतः ही अधिक परिमाण में होती है और वे चाहें तो इसके द्वारा दूसरों की बहुत कुछ भलाई कर सकते हैं। वे अपनी इस शक्ति को छूकर या बिना छुये हुये भी दूसरों में प्रविष्ट करा सकते हैं और उनके दोष, दुर्गुणों तथा रोगों को अपने नियंत्रण में ला सकते हैं। पर इस कार्य के लिए उस व्यक्ति का स्वयं शुद्ध, पवित्र, उदार, परोपकारी स्वभाव का होना आवश्यक है। अन्यथा स्वार्थी अथवा दुष्टप्रकृति के व्यक्ति तो इस शक्ति को भी बुरे उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त करते हैं।
(5) नाद−चिकित्सा—इसका अर्थ है संगीत के द्वारा रोगों का निवारण करना। चूँकि संगीत से ज्ञान तन्तुओं को शाँति अथवा उत्तेजना मिलती है, वह भावनाओं को प्रभावित करता है और वृत्तियों को चैतन्य करता है इसलिए उसका प्रभाव शरीर के समस्त मुख्य कर्मों पर पड़ता है। संगीत तीन प्रकार से शरीर पर प्रभाव डालता है। प्रथम तो अकेले या समूह में गाने से छाती और फेफड़ों का व्यायाम होता है। जोरदार लय का गाना—जैसे सेना का गाना कार्य की प्रेरणा देता है और कर्तृत्व शक्ति को बढ़ाता है। संगीत केवल कानों में सुमधुर ध्वनि जाने को ही नहीं कहते वरन् उससे वायुमण्डल में कुछ ऐसे कम्पन भी पैदा होते हैं जिनका विद्युत का सा प्रभाव पड़ता है। जिन लोगों ने इस विषय का अध्ययन किया है उनका कहना है कि ज्ञान−तन्तुओं की खराबी से उत्पन्न रोगों पर संगीत का विशेष प्रभाव पड़ता है और दमा, बधिरता, अजीर्ण, अनिद्रा में भी वह लाभदायक है।
मालिश करने की प्रथा बहुत प्राचीन है। मिश्र, चीन, यूनान, रोम आदि प्राचीन देशों में स्वास्थ्य वृद्धि और पीड़ा निवारण के लिये मालिश के उपयोग का उल्लेख मिलता है। इतिहास बतलाता है कि रोम का प्रसिद्ध सम्राट जुलियस सीजर, जो अब से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व हुआ था, शरीर के दर्द को मिटाने के लिये नित्य मालिश कराता था। भारतवर्ष की प्राचीन कथाओं तथा अन्य प्रसिद्ध ग्रन्थों में मालिश का वर्णन पाया जाता है। मुसलमानी शासन काल में बड़े लोग विलासिता के भाव से प्रायः मालिश कराया करते थे और उस समय दिल्ली, लखनऊ, आगरा जैसी राजधानियों में निपुण मालिश करने वालों का एक समुदाय ही बन गया था।
अब आधुनिक युग में अन्य विषयों की भाँति चिकित्सा−विज्ञान के ज्ञाताओं ने मालिश के सम्बन्ध में भी खोजबीन की है और उसके सम्बन्ध में ऐसे अनेक रोग निवारक तथ्यों को खोज निकाला है जिन पर पहले जमाने में कदाचित ही ध्यान दिया जाता था। अब मालिश का उपयोग विशेषतः शरीर के रक्त −संचरण को ठीक करने की दृष्टि से किया जाता है। साथ ही उसके द्वारा शरीर के किसी खास अंग या भाग में एकत्रित विजातीय द्रव्य फैलकर हट जाता है और क्रमशः बाहर निकल जाता है। अच्छी मालिश के जरिये शरीर के महत्वपूर्ण यंत्र सजीव हो जाते हैं, उनमें चैतन्यता की वृद्धि हो जाती है।
मालिश के चार विभाग
मालिश को चार भागों में बाँटा गया है—रचनात्मक, ध्वंसात्मक, शान्तिदायक और उत्तेजनात्मक। रचनात्मक मालिश का उद्देश्य नये कोषों के निर्माण कार्य का प्रोत्साहित करना और निर्बल माँस−पेशियों को पुष्ट करना होता है। इससे रक्त संचार सुधरता है और शरीर निर्माण के कार्य में सहायता मिलती है। ध्वंसात्मक मालिश का प्रयोग शरीर के भीतर अस्वाभाविक गाँठ, सूजन, कड़ापन आदि को मिटाने के लिये किया जाता है। शान्तिदायक मालिश अंगों की पीड़ा या दर्द को मिटाने के लिये की जाती है। जब नसों या पुट्ठों में किसी तरह के तनाव के कारण पीड़ा जान पड़ती हो तो उसे मिटाने के लिये हलके ढंग से मालिश की आवश्यकता होती है। इसके लिये धीरे−धीरे थपकी देना, मलना, कम्पन देना आदि क्रियाएँ की जाती हैं। उत्तेजनात्मक मालिश की आवश्यकता उस समय होती है जब गठिया या कि ऐसी अन्य व्याधि के कारण किसी अंग की नसें या माँस पेशियाँ न्यूनाधिक निष्क्रिय होने लगी हों। इसके लिये पोले हाथ से थपकी मारना, ठोंकना, पीटना, हिलाना आदि क्रियाएँ की जाती हैं। यदि मालिश करने वाला इनको नियमानुसार करना जानता हो तो अंगों में चैतन्यता का संचार होने लगता है।
कुछ अन्य लेखकों ने मालिश के विभाग अन्य दृष्टि से किये हैं और उनके नाम (1) घर्षण (2) दलन (3) कम्पन (4) थपकी (5) संधिचालन निर्धारित किये हैं। यद्यपि इन सभी विधियों का आवश्यकतानुसार प्रयोग किया जाता है, पर ज्यादा प्रयोग घर्षण का ही करना पड़ता है। इसके लिये चर्म को कुछ दबाते हुये और हाथ को घुमाते हुये मालिश करनी चाहिये। यह मालिश सदैव नीचे से ऊपर की ओर की जाती है अर्थात् खून को ठेलकर हृदय की तरफ ले जाया जाता है। घर्षण में ज्यादा जोर लगाना आवश्यक नहीं होता, केवल जब हाथ अन्तिम स्थान तक पहुँचे तो थोड़ा जोर बढ़ा देना चाहिये। बीच में हड्डियों के आने पर हाथ को हलका कर देना चाहिये।
दलन में शरीर की माँस पेशियों को पकड़ कर दबाया जाता है। जोरदार दलन में माँस पेशियों को मुट्ठी में भर कर खींचा और दबाया जाता है। हाथ−पाँव दबाने में दलन− क्रिया से ही काम लिया जाता है। मरोड़ कर दबाना भी दलन क्रिया के अन्तर्गत ही आता है।
कम्पन द्वारा मालिश विशेष अभ्यास द्वारा ही सीखी जाती है। शरीर के विभिन्न स्थानों में उँगलियाँ या पूरी हथेली द्वारा कम्पन उत्पन्न किया जाता है। इससे स्नायुओं के उत्तेजित होने में सहायता मिलती है। शरीर के भीतरी यंत्र भी इसके प्रयोग से उद्दीप्त होते हैं। पेट, आमाशय, यकृत आदि पर इसका प्रभाव बहुत लाभदायक होता है।
थपकी की विधि से मालिश करना विशेष आरामप्रद और प्रभावशाली होता है। हाथ को फैलाकर और कड़ा करके माँसल अंगों पर थपथपाने से उस स्थान में शीघ्र ही गर्मी आ जाती है। दूसरी विधि यह है कि दोनों हथेलियों को खड़ा करके बगल से थपथपाया जाता है। इसका प्रयोग हड्डी के ऊपर करना वर्जित है। तीसरी विधि यह है कि हथेली को कटोरी की तरह पोली बना कर किसी अंग पर थपथपाते हैं। इसमें दोनों हाथ एक साथ चलते हैं। एक गिरता है तो दूसरा उठता है। यह प्रयोग अजीर्ण की अवस्था में पेट के ऊपर अत्यन्त लाभदायक सिद्ध होता है। इसी प्रकार हाथ को पंजे की तरह बना कर केवल उँगलियों के सिरे से किसी स्थान को ठोका जाता है अथवा दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बाँधकर किसी अंग पर धीरे−धीरे मुक्की मारी जाती है। इन कई प्रकार की थपकियों के प्रयोग से पीलिया, स्नायु शूल, आमाशय की कमजोरी, कोष्ठबद्धता, स्त्रियों के मासिक की रुकावट, मूत्राशय की निर्बलता आदि शिकायतों में बहुत लाभ होता है।
संधि−संचालन या जोड़ों का घुमाना, एक विशेष प्रकार की मालिश है, जिससे घुटने, कन्धे आदि के जोड़ों में तकलीफ हो जाने से शीघ्र लाभ हो सकता है। इसमें पहले जोड़ों को घुमा फिराकर फिर खींचा जाता है। यदि रोगी ज्यादा निर्बल न हो तो खींचते समय उसे भी अपनी तरफ खींचना चाहिये। इस मालिश से बात रोग, गठिया आदि की दशा में विशेष लाभ होता है।
जब पूरे शरीर की मालिश करनी हो तो पहले हाथों की हथेलियों से ही आरम्भ करना चाहिये। फिर कन्धे तक की बाँह को नीचे से ऊपर कई बार रगड़ना चाहिये। हाथों के बाद पैरों की मालिश की जाय। फिर क्रम से छाती , पेट, चूतड़ और पीठ को मला जाय। इन सब में जो अंग जैसा हो वहाँ वैसी ही घर्षण, दलन और संधि संचालन की विधि से मालिश की जाती है। जिन लोगों ने इस कला का वैज्ञानिक ढंग से अध्ययन और अभ्यास किया है वे अनेक कठिन रोगों को केवल मालिश द्वारा ही दूर कर देते हैं।
प्राकृतिक−चिकित्सा के मुख्य साधन मिट्टी, जल,धूप, वायु आदि माने गये हैं। इनका उपचार प्रायः बाह्य रूप से किया जाता है। इनके असर से शरीर के भीतर का दूषित मल और विजातीय द्रव्य घुल कर या द्रव बनकर मलाशय, गुर्दा या चर्म द्वारा बाहर निकल जाते हैं। पर अनेक व्यक्तियों की प्रकृति ऐसी होती है कि उन पर इनका असर बड़ी देर से होता है और तब तक वे घबड़ाकर प्राकृतिक उपचार को त्याग देते हैं। ऐसे लोगों के लिये अनुभवी चिकित्सक पुराने समय से काम में लाई जाने वाली उन जड़ी बूटियों और खाद्य पदार्थों को काम में लाते हैं जिनकी रोगनाशक शक्ति प्रसिद्ध है और जो किसी तरह की हानि नहीं पहुँचाते। इस प्रकार की चिकित्सा करने वालों में जर्मनी का फादर नीप बहुत प्रसिद्ध है। वह जल−चिकित्सा का एक बहुत बड़ा ज्ञाता और प्रचारक था और उसने इसके द्वारा अगणित कठिन रोगियों को चंगा करके सर्वत्र इसका डंका बजा दिया था।
फादर नीप अपनी चिकित्सा पद्धति में जलोपचार के साथ अनुभूत जड़ी बूटियों का भी प्रयोग करता था। अनेक कट्टर विचारों के प्राकृतिक चिकित्सक उसके इस कार्य के विरुद्ध थे और तरह−तरह के आक्षेप करते थे। उनका आशय यह था कि चाहे ये जड़ी बूटियाँ पुराने जमाने से जनता में प्रचलित रही हैं, पर प्राकृतिक चिकित्सकों द्वारा इनका उपयोग औषधियों के प्रति लोगों के विश्वास को सुदृढ़ ही बनायेगा और अन्त में वे वैद्यों और अत्तारों के पास ही पहुँच जायेंगे। दूसरे पक्ष वालों का कहना था कि जिन साधारण जड़ी− बूटियों को हम अपने दैनिक जीवन में काम में लाते रहते हैं, अगर उनमें शक्तिशाली स्वास्थ्य प्रदायक तत्व पाये जाते हों तो प्राकृतिक उपचारों के साथ उनका प्रयोग करना अनुचित नहीं है। इस तरह हम केवल एक बार में किसी एक ही बूटी का और वह भी उसके प्राकृतिक रूप में ज्यों का त्यों उपयोग करते हैं तो उसको औषधि− चिकित्सा नहीं कह सकते हैं। औषधि वही है जिसे तरह− तरह की प्रक्रियाओं से बहुत कुछ बदल दिया गया हो और जो मुख्यतः ऐसे विषाक्त या तीव्र द्रव्यों से बनी हो जिनको हम साधारण अवस्था में स्वास्थ्य के लिये हानिकारक मानते हैं। इस बाद विवाद के सम्बन्ध में स्वयं फादर नीप ने जो विचार प्रकट किये थे वे पाठकों को विशेष महत्वपूर्ण जान पड़ेंगे। उनका एक अंश यहाँ दिया जाता है।
“मैंने अपनी जल−चिकित्सा में जड़ी−बूटियों का प्रयोग सम्मिलित करने के विषय में पहले ही काफी सोचा, समझा और विचार किया था। मैं जानता था कि ये दवायें यद्यपि भीतर पहुँच कर रोग को मिटाने में काफी सहायता देंगी, पर उनको प्रयोग करने से लोग यह समझेंगे कि हमको अपनी जल−चिकित्सा पर पूरा विश्वास नहीं है। पर वास्तविक बात यह थी कि कितने ही रोगियों को जलोपचार से बहुत भय रहता है और वे अधिक समय तक इलाज में लगे रहने में समर्थ नहीं होते। मैंने ऐसे बीमारों की सुविधा के लिये यह निश्चय किया कि उनकी बीमारी को दूर करने में जलोपचार के साथ जड़ी− बूटियों का प्रयोग भी किया जाय जिससे रोगमुक्ति शीघ्र हो सकना संभव है।”
जड़ी बूटियों के तीन उद्देश्य
‟जो लोग मेरी जड़ी बूटियों का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करेंगे वे तुरन्त यह अनुभव कर लेंगे कि जलोपचार की तरह उनके भी वे ही तीन उद्देश्य हैं। प्रथम शरीर के भीतर जमा दूषित तत्व को घुला देना, उसको बाहर निकालना और अंग−प्रत्यंगों को सशक्त बनाना। इस सम्बन्ध में मेरा विश्वास है कि जल का बाह्य उपचार और जड़ी−बूटी का भीतरी उपचार एक दूसरे के सहायक हैं और मिलकर आरोग्यता प्रदान करते हैं।”
“जो लोग इस भ्रम में हैं कि जल के उपचार बड़ी कठोरता और कट्टरता से किये जायें वे गलती कर रहे हैं। इसी प्रकार जो यह विचार करते हैं कि जड़ी− बूटियाँ लगातार और अधिक परिणाम में ली जाय वे भी भूल में पड़े हैं। सदैव समस्त अवस्थाओं में इस सुनहरी नियम को दृष्टिगोचर रखना चाहिये कि उपचार चाहे बाहरी हो अथवा भीतरी उसका अत्यन्त सौम्यता के साथ प्रयोग करना ही हितकारी होता है।”
“बहुत से रोगी ऐसे होते हैं जिनको थोड़ी दवा से संतोष नहीं होता, जितनी अधिक दवाएँ, गोलियाँ आदि उनको दी जायें उतना ही ज्यादा वे संतुष्ट होते हैं। मैं एक बहुत अच्छे चिकित्सक को जानता हूँ जो रोगी को कम से कम दवा देता था। इस कारण रोगी उससे बार−बार शिकायत करते और दवाऐं माँग− माँग कर तंग करते थे। उसने कहा कि जब मेरा ऐसे मूर्ख व्यक्तियों से पाला पड़ता है तब मैं उनको आटे की बनी गोलियाँ दे देता हूँ जिसमें से दवा की सी महक आती है, पर पानी के सिवाय कुछ नहीं होता। वे इन गोलियों को खुशी से ले जाते हैं और बाद में जब मैं पता लगाता हूँ तो उन्हीं से उनकी बीमारी ठीक हो जाती है और वे कहते हैं कि ऐसी दवा तो हमको जीवन में कभी मिली ही नहीं।”
प्लेटन का मत
एक दूसरे बड़े चिकित्सक प्लेटन ने लिखा है कि जलोपचार के साथ अनुभव में आई हुई प्रभावशाली किन्तु निर्दोष वनस्पतियों जड़ी− बूटियों का सेवन करने से बहुत सहायता मिलती है और जमा हुआ मल अपेक्षाकृत शीघ्र घुल−मिलकर निकल जाता है। यह अवश्य देख लेना चाहिये कि ऐसी जड़ी− बूटियों से बाद में कोई हानिकारक प्रतिक्रिया न होती हो। मैं नहीं समझता कि इस प्रकार जड़ी−बूटियों के प्रयोग में कोई हानि है। उन कट्टर और हठधर्मी लोगों से जो कैसी भी लाभदायक जड़ी-बूटी का तनिक भी प्रयोग करना नहीं चाहते मैं यह प्रश्न करता हूँ कि क्या वे अपने मरीजों को भोजन सम्बन्धी नुस्खे नहीं बतलाते? क्या वे उनको सलाद, पालक, सिलारी, प्याज, लहसुन, अदरक आदि का आवश्यकतानुसार प्रयोग करने की सलाह नहीं देते? वे जानते हैं कि ये और कितने अन्य पौधे नित्यप्रति हमारे रसोईघरों में काम में लाये जाते है। उनमें निश्चित रूप से दवा का गुण होता है और यही कारण है कि वे हमारे भोजन में एक महत्वपूर्ण अंग माने जाते हैं हम ऐसे बहुत से लोगों को जानते हैं जिनको प्राकृतिक उपचारों से प्राप्त होने वाले लाभ पर पूरा विश्वास है, पर जिनमें दवाओं का विश्वास भी ऐसी मजबूती के साथ जमा हुआ है कि वे दवा की बोतल का त्याग बड़ी अनिच्छापूर्वक करते हैं। यदि ऐसे लोगों को अगणित बार की आजमाई हुई एकाध जड़ी बूटी का उपयोग करना बतला दिया जाय तो उनको बड़ा संतोष हो जाता है, और किसी तरह की हानि की तो कोई संभावना रहती ही नहीं।
इसी प्रकार अमरीका के प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक डा. वेनेडिक्ट लस्ट ने लिखा है कि—वनस्पतियों और जड़ी−बूटियों के रसों के महान रोग निवारक गुण अति प्राचीनकाल से समस्त संसार के लोगों द्वारा जाने और माने गये हैं। केवल पिछले सत्तर अस्सी वर्षों के भीतर जब कि एलोपैथी चिकित्सा ने कृत्रिम रूप से बनाई गई रासायनिक औषधियों का प्रयोग करना आरम्भ किया है और उनके लिये विज्ञापनों द्वारा बेहद शोर मचाया गया है, लोगों का ध्यान इन जड़ी−बूटियों की तरफ से हटने लगा है। आधुनिक चिकित्सा− विज्ञान कुछ समय के लिये तो इन शीघ्र फलदायक औषधियों द्वारा लोगों को भुलावे में डालने में सफल हो गया, पर जब उनके पीछे होने वाले दुष्परिणाम दृष्टिगोचर हुये तो लोगों का ध्यान फिर जड़ी−बूटियों की तरफ गया और फादर नीप जैसे सुयोग्य चिकित्सकों ने उनकी श्रेष्ठता और उपयोगिता को असंदिग्ध रूप से सिद्ध करके दिखला दिया।
आयुर्वेद का एकौषधि−विधान
यद्यपि फादर नीप ने अपने समय की परिस्थिति के अनुसार जड़ी−बूटियों को केवल उनके स्वाभाविक रूप में ही सेवन करने का प्रचार नहीं किया वरन् उनका सत, काढ़ा चूर्ण और तेल बनाकर काम में लाने का परामर्श दिया, पर अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं, इसलिए यदि हम औषधियों का इतना विस्तार न भी करें तो भी किसी एक जड़ी बूटी को उसके प्राकृतिक रूप में प्रयोग करने में कोई हानि नहीं बतलाई जा सकती। केवल औषधि का नाम लेकर दोषारोपण करने से कोई लाभ नहीं। प्राकृतिक चिकित्सा भी इन पचास वर्षों के भीतर बहुत कुछ बदली है और उसमें सीधे−सादे स्नानों और पट्टियों के बजाय बहुमूल्य मशीनों द्वारा इलाज करने, बिजली और सूर्य−चिकित्सा के लिये बड़े−बड़े यंत्र और विशेष मकान,कमरे आदि बनाने का भी समावेश हो गया है। इसके अतिरिक्त हमारी प्राचीन विधियों का ध्यान रखा गया है। आयुर्वेद के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ‛चरक−संहिता’ में काष्ठौषधि और वनस्पतियों को ही प्रधानता दी गई है। भस्मों का प्रयोग बाद के कुछ चिकित्सकों ने ही अधिक फैलाया है। इसलिये यदि हम आयुर्वेद में प्रयुक्त आमतौर से मिलने वाली कुछ जड़ी−बूटियों का प्रयोग करके रोगों का निवारण शीघ्रतापूर्वक कर सकते हैं, तो इसमें एतराज अथवा हानि की कोई बात नहीं।
एक प्रमुख भारतीय प्राकृतिक चिकित्सक ने जड़ी−बूटियों का समर्थन करते हुये एक बहुत बड़ा निबन्ध लिखा है। उसमें उन्होंने जिन वनस्पतियों, बूटियों तथा अन्य पौधों से प्राप्त वस्तुओं का वर्णन किया है उनमें से कुछ के नाम यहाँ दिये जाते हैं— हींग, रसौत, पतन, सुपाड़ी, काली मिर्च, अतीस, बाँस, बरगद, कपूर, काला जीरा, बड़ी इलायची, चाकसू, कोयला, दालचीनी, धनिया,जीरा, सीतल−चीनी, वायविडेंग सौंफ, बबूल, मेंहदी, तुलसी, ईसबगोल, अलसी, पीपल, अडूसा, गेंदा, नीम, माजूफल,अजवायन, पिपरमिंट, खसखस, कलौंजी, गुलाब, केसर, चन्दन का तेल−हल्दी, वनफशा, असगग्ध आदि। इस सूची को देखकर हम कह सकते हैं कि इनमें से अधिकाँश वस्तुओं का उपयोग हम साधारण अवस्था में भी मसालों अथवा अन्य रूप में करते रहते हैं और इनमें कोई भी चीज ऐसी नहीं है कि जिसको विषाक्त या विजातीय कहा जा सके। इनमें से कितनी ही चीजें तो भोजन के रूप में ही शरीर के भीतर जाती हैं और अपना प्रभाव डाल कर साधारण रूप में मल के साथ वहिर्गत हो जाती हैं। तेज इंजेक्शनों की तरह वे हमारी रक्त −प्रणाली में सम्मिलित होकर किसी खास स्थान पर विजातीय पदार्थ के रूप में जमा नहीं हो जातीं। ऐसी साधारण जड़ी−बूटियों का प्रयोग स्वास्थ्य−रक्षा और रोग निवारण के लिये हर प्रकार से हितकारी ही कहा जा सकता है।
आयुर्वेद शास्त्र में आयु की अधिकता अथवा रहन−सहन के दोषों से उत्पन्न समस्त शरीर−व्यापी निर्बलता,अशक्तता का निवारण करने के लिये अति प्राचीनकाल से कल्प−चिकित्सा की योजना की गई है। इसका आशय यह है कि रोगी की प्रकृति और रोग की दशा के अनुसार किसी एक ही द्रव्य अथवा जड़ी−बूटी का प्रयोग करके स्वास्थ्य का सुधार किया जाय। वर्तमान समय में प्राकृतिक चिकित्सा भी अधिकाँश में इसी मार्ग का अनुसरण करती है। उसमें भी अनेक द्रव्यों को मिलाकर और उनमें तरह−तरह से परिवर्तन करके जो औषधियाँ बनाई जाती हैं उनका बहिष्कार करके फल, शाक, दूध, मठा, जड़ी आदि किसी एक ही पदार्थ का प्रयोग करके रोग को मिटाने और स्वास्थ्य को प्राप्त करने की विधि निकाली गई है। इन दोनों विधियों की तुलना करने पर आयुर्वेदिक विधि की विशेषता यह जान पड़ती है कि उसमें रोगी के ऊपर बहुत कठोर संयम का भार नहीं डाला जाता,बहुत सा काम औषधि की शक्ति और विधि से भी हो जाता है।
ऐसी शरीर का नव निर्माण करने वाली और शक्तिवर्धक चिकित्सा के लिये आयुर्वेद में सबसे पहले शरीर−शोधन का कार्यक्रम रखा है, क्योंकि वे जानते थे कि जब तक शरीर में दूषित मल भरे हुए हैं तब तक ऐसी शक्तिवर्धक दवाओं का प्रभाव ठीक तौर से प्रकट ही नहीं हो सकता। वर्तमान समय के प्राकृतिक चिकित्सक भी फल चिकित्सा, आहार−चिकित्सा, दुग्ध−चिकित्सा द्वारा शरीर को नीरोग और शक्तिशाली बनाने के पहले उपवास और एनीमा द्वारा शरीर के मल को निकाल कर उसे पूरी तरह शुद्ध करते हैं। इन दोनों विधियों से मलाशय और अन्य अंगों के मल तो अवश्य निकलते हैं, पर समस्त शरीर में व्याप्त,रक्त में मिले, मज्जा और हड्डी में समाये मल सहज में दूर नहीं हो पाते। फिर मलों को पूरी तरह निकालने के लिये लम्बा उपवास करने में लाभ के साथ खतरा भी रहता है और थोड़ी−सी भूल हो जाने पर लेने के देने पड़ जाते हैं। पर आयुर्वेदीय पंच−कर्म में शरीर−शोधन का कार्य सामान्य पर प्रभावशाली द्रव्यों से किया जाता है जिसमें थोड़े समय में ही पूरी शुद्धि हो जाती है और शरीर औषधि के प्रभाव को अविलम्ब ग्रहण करने को स्थिति में आ जाता है। इन पंच− कर्मों के नाम (1)स्नेहन, (2)स्वेदन, (3)वमन, (4)विरेचन, (5)वस्ति हैं।
शरीर का मल निकालने के प्रत्यक्ष साधन यद्यपि वमन, विरेचन और वस्ति ही हैं जिनसे मलाशय, छोटी आँत, आमाशय और फेफड़ों का दूषित मल गुदा मुख और नाक के द्वारा निकल जाता है। पर इन कर्मों को सहज में निर्विघ्न रूप से सम्पन्न करने के लिये सर्वप्रथम स्नेहन और स्वेदन की व्यवस्था की गई है जिससे शारीरिक अंग के भीतर घुसा, चिकटा और ल्हिसा हुआ मल नर्म और ढीला होकर सुगमतापूर्वक निकल जाय और उसके निकालने में उन अंगों को किसी प्रकार क्षति न पहुँचे।
(1) स्नेहन—शरीर के भीतरी मलों को बाहर निकलने योग्य अवस्था में लाने के लिये सबसे पहले स्नेहन की आवश्यकता पड़ती है। जिस तरह किसी पुरानी मशीन में लगे मुरचा को छुड़ाने के लिए सबसे पहले उसे तेल से भली प्रकार भिगो दिया जाता है उसी प्रकार शरीर में जगह−जगह जमे और चिकटे मल को फुलाने, नम करने के लिये शरीर में भी घी या तेल की चिकनाई दी जाती है। भीतरी अंगों पर असर डालने के लिये इस चिकनाई को विशेष रूप से तो पीना ही पड़ता है पर सब अंगों में शीघ्र असर हो जाय इसके लिये वस्ति, शिरोवस्ति,उत्तरवस्ति,नस्य, कर्णपूरण और मालिश द्वारा भी चिकनाई को शरीर के कोने−कोने में पहुँचाने का प्रयत्न किया जाता है। स्नेहन के लिए अन्यदेशीय व्यक्ति विभिन्न पदार्थों का प्रयोग करते हैं पर हमारे यहाँ घी और तिल का तेल ही सर्वोत्तम माना गया है। इसी को एक पाव, सवा पाव की मात्रा दो−तीन दिन पीने और शरीर में सर्वत्र लगाने से वह रोम−रोम में भिदकर मल को नर्म कर देता है।
(2) स्वेदन—स्नेहन से नर्म पड़े मल को किसी प्रकार की गर्मी देकर पिघलाने और अपने स्थान से हटाकर आमाशय और मलाशय में पहुँचाने के लिये स्वेदन क्रिया की जाती है। इसके लिये रोगी को झिरझिरी बुनी चारपाई पर लिटा कर नीचे गर्म पानी के भाप निकलते हुए दो−चार बर्तन रख दिये जाते हैं और ऊपर से कम्बल उढ़ा दिया जाता है। इससे खूब पसीना निकलता है और शरीर के भीतर गर्मी पहुँच कर वहाँ के मल भी पिघल कर इधर−उधर जाने लगते हैं। वात और कफ़ के रोगों में तो इस प्रकार का स्वेदन परमावश्यक बतलाया गया है। औषधियों की गरम पोटली से शरीर को सेंक कर भी मलों को ढीला किया जाता है।
(3) वमन—जब इस प्रकार उपरोक्त दो क्रियाओं से शरीर के विभिन्न अंगों का मल आमाशय में इकट्ठा हो जाता है तो उसको बाहर निकालने के लिये वमन और विरेचन के प्रयोग किये जाते हैं। वमन द्वारा विशेष रूप से दूषित श्लेष्मा को ही बाहर निकाला जाता है। इसके लिये गर्म पानी में नमक या मैनफल जैसी कोई औषधि मिला कर काफी परिमाण में पिलाई जाती है और फिर हलक में उँगली डालकर उल्टी कर दी जाती है। पर वह कर्म सावधानी का है इसलिये किसी सुयोग्य चिकित्सक की देख−रेख में ही कराना चाहिये। वमन यदि अधूरा रह जाय तो उससे लाभ के स्थान में अनेक प्रकार से हानियाँ हो सकती हैं।
(4) विरेचन—आमाशय और छोटी आँतों की शुद्धि के लिए विरेचन की आवश्यकता होती है। वस्ति या एनीमा का मल बड़ी आँत में प्रवेश करता है और उससे वहीं के मल की शुद्धि होती है। पर छोटी आँत भी लगभग 24 फीट लम्बी होती है और जिसमें समस्त भोजन का रस निकलता है और वह बिना विरेचन के मल रहित नहीं हो सकती। पर विरेचन की औषधि रोगी की प्रकृति के अनुसार दी जानी चाहिए। जिसका कोठा पित्त के प्रभाव से मृदु हो उसे हलकी दवा दी जानी चाहिये और कफ़ से जिसका कोठा कठिन हो रहा है उसको तेज दवा की आवश्यकता होती है। विरेचन के पहले तिक्त घृत पिलाना उचित है, अन्यथा इस बात की आशंका रहती है कि दस्त लाने वाली दवा मल के साथ शुद्ध पित्त और अन्य रसों को भी बहा ले जायगी।
(5) वस्ति—विरेचन आदि द्वारा आमाशय और अन्य अंगों का मल निकल जाने पर भी बड़ी आँत और उसके आस−पास के अंगों में नया और पुराना बहुत −सा मल जमा रहता ही है जो इनमें से किसी उपाय से नहीं निकलता और उसे ठीक करने का एक मात्र उपाय वस्ति−क्रिया ही है। प्राचीन ग्रंथों में इसकी बड़ी प्रशंसा की है और इसे समस्त चिकित्सा का आधा−भाग (चिकित्सार्ध) बतलाया है। इससे शरीर के दोष निकलकर हल्कापन आ जाता है।
पंच−कर्म के इस संक्षिप्त विवरण से पाठक समझ सकते हैं कि प्राचीन आयुर्वेद के आचार्यों ने शरीर शोधन में ऐसी सावधानी से काम लिया है कि शरीर के किसी अंग को जरा भी हानि न पहुँचे, न कोई उपयोगी तत्व नष्ट हो , और शरीर सिर से पैर तक पूरी तरह शुद्ध हो जाय। इस तरह शरीर की सफाई हो जाने पर ही अन्य औषधियों का प्रभाव शरीर पर शीघ्र पड़ता है और वे अपना कार्य ठीक ढंग से कर सकती हैं। खेद का विषय है कि इधर बहुत समय से वैद्यों ने अध्ययन,अनुभव और साधनों के अभाव से पंच−कर्म चिकित्सा को छोड़ दिया था, अथवा यह भी कह सकते हैं कि वे इसको भूल गये थे। अब युग−परिवर्तन के प्रभाव से कुछ वैद्यों का ध्यान इस तरफ गया है और उनको इससे जो अनुभव प्राप्त हुआ है उसके आधार पर उनका कहना है कि केवल पंच−कर्म से ही शरीर बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है और प्रायः सभी रोगों की जड़ कट जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि लोग इस चिकित्सा को अपनाकर इससे लाभ उठाये।
हजारों ग्रंथों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
1—गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग) मू. 10॥)
प्रथम भाग—गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज−मन्त्रों का साधना विधान, आत्म साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3॥)
द्वितीय भाग—गायत्री द्वारा वाममार्गी तांत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पंजर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह। मूल्य 3॥)
2—गायत्री यज्ञ विधान (दोनों भाग) मू. 4)
प्रथम भाग—गायत्री यज्ञ का विज्ञान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्र एवं साइन्स के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण, खोजपूर्ण वर्णन। मूल्य 2)
द्वितीय भाग—गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया, जलयात्रा, मंडप प्रवेश, वेदी पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति मंत्र, पूर्णाहुति, वसोधरा, घृत अवघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि विधान, जिसे समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मू. 2)
3—गायत्री चित्रावली (दोनों भाग) मू. 3॥)
प्रथम भाग-विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू. 1)
द्वितीय भाग—व्याहृति समेत गायत्री के 26 अक्षरों में सन्निहित 26 महान् आदर्शों को 26 श्लोक, 26 लेख एवं 26 आर्ट पेपर पर छपे तिरंगे चित्रों द्वारा समझाया गया है। मू. 2)
4—गायत्री का मन्त्रार्थ मू. 1॥)
अनेक ग्रन्थों में, अनेकों ऋषियों द्वारा गायत्री महामंत्र के अनेक प्रकार के किए हुए अर्थों का संग्रह, राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है।
5—गायत्री ज्ञान मंदिर सैट 52 पुस्तकें मू. 13)
अपने घर में छोटा गायत्री पुस्तकालय स्थापित करके अपने सारे परिवार को, स्वजन सम्बन्धियों तथा मित्रों को पढ़ाने योग्य चार-चार आना मूल्य की अत्यंत सुन्दर, सस्ती, बढ़िया ग्लेज कागज पर तिरंगे सुन्दर टाइटिलों की 52 पुस्तकें छापी गई हैं। गायत्री महाविद्या की अत्यंत महत्वपूर्ण साधना से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराने तथा इस महामंत्र के एक-एक अक्षर में सन्निहित नैतिकता, मानवता, धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता की शिक्षाओं का विचार करने के लिए यह सैट बहुत ही उपयोगी है। प्रत्येक गायत्री प्रेमी अपने घर में इस सैट की स्थापना करके गायत्री पुस्तकालय चलाने का श्रेय लाभ कर सकता है।
पता - अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा।
*समाप्त*