मानव जीवन की सार्थकता

जीव के लिये मनुष्य शरीर एक अलभ्य अवसर है! इस का सदुपयोग करने से वह जीवन लक्ष्य को प्राप्त करता हुआ परम शान्ति का अधिकारी बन सकता है। किन्तु यदि वह इस अवसर का व्यर्थ गँवाता है अथवा दुरुपयोग करता है तो फिर नरक की यातनायें तैयार हैं और चौरासी लाख निकृष्ट योनियों में भ्रमण करने की विवशता सामने है। इन्द्रिय तृप्ति तो जीव अन्य योनियों में भी कर सकता है पर परम पद की प्राप्ति कर सकना केवल मनुष्य शरीर में ही सम्भव है। चिरकाल के पश्चात ही सुर दुर्लभ मानव जीवन प्राप्त होता है, इसे निरर्थक न गँवाना चाहिये।

स्वयं शान्ति से रहना और दूसरों को शान्ति से रहने देना यही जीवन जीने की सर्वोत्तम नीति है। दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें जो हमें अपने लिये पसंद नहीं। सत्य ही बोलना चाहिये। सभी से प्रेम करना चाहिये और अन्याय के मार्ग पर एक कदम भी नहीं धरना चाहिये। श्रेष्ठ,सदाचारी और परमार्थ युक्त जीवन ही मनुष्य की उपयुक्त बुद्धिमत्ता कही जा सकती है।

—महामना मदन मोहन मालवीय

वर्ष-23 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-12


सत्−संकल्पमयी प्रार्थना

(श्री. लक्ष्मीनारायण ‘कमलेश’)


सत्−संकल्पमयी प्रार्थना (kavita)

दयामय! हममें वह बल हो! कि जिससे धन्य धरातल हो! !

हमारे मन में भी बल हो, हमारे तन में भी बल हो; हमारे धन में भी बल हो; हमारे प्रण में भी बल हो, हमारा उर अति निर्मल हो! दयामय! हममें वह बल हो!! कि जिससे—

न हममें मान−मोह−भय हो, न हममें राग−द्वेष−भय हो; न हममें स्वार्थपूर्ण लय हो, न हममें रंचक अविनय हो; न हममें कभी कपट−छल हो! दयामय! हममें वह बल हो!! कि जिससे—

प्रेममय सारा जीवन हो, परम उत्साह भरा मन हो; हर्ष से विकसित आनन हो, सदा परहित में रत तन हो; न अपना लक्ष्य चलाचल हो! दयामय! हममें वह बल हो!! कि जिससे—

सुमति का संचित सागर हो, भक्ति का उदय सुधाकर हो; कष्ट से हृदय न कातर हो, सभी में प्रेम बराबर हो; हमारा उन्नतिमय फल हो! दयामय! हममें वह बल हो!! कि जिससे—


असुरता से देवत्व की ओर!

असुर, मनुष्य और देवता देखने में एक ही आकृति के होते हैं, अन्तर उनकी प्रकृति में होता है। असुर वे हैं जो अपना छोटा स्वार्थ साधने के लिए दूसरों का बड़े से बड़ा अहित कर सकते हैं। मनुष्य वे हैं जो अपना स्वार्थ तो साधते हैं पर उचित−अनुचित का ध्यान रखते हैं, पाप से डरते और अपनी नियत मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते। देवता वे हैं जो अपने अधिकारों को भूलकर कर्तव्य पालन का ही स्मरण रखते हैं। अपनी शक्तियों को परमार्थ और परोपकार में अधिक व्यय करते हैं और इसी में अपना सच्चा साधन मानते हैं। असुरों के दृष्टिकोण में दुष्टता, मनुष्यों के में मर्यादा एवं देवताओं में उदारता भरी रहती हैं। दृष्टिकोण के इस अन्तर के कारण ही उनके बुरे-भले कार्यों की शृंखला सामने आती है और इसी आधार पर वे निन्दा−प्रशंसा के पात्र बनते हैं। सद्गति और दुर्गति भी इन्हीं आधारों पर होती है।

असुरता का साम्राज्य

आज असुरता का साम्राज्य चारों ओर फैला है। सोचने का आम तरीका यह बनता जाता है कि अपना लाभ बढ़ाने के लिए दूसरों का कितना ही बड़ा अहित क्यों न होता हो उसकी परवा न करनी चाहिए, और जैसे भी बने वैसे अपना स्वार्थ साध लेना चाहिए। असुर होने का यही लक्षण है। लम्बे सींग, बड़े दाँत और काले चेहरे वाले राक्षस चित्रकारों की कल्पना का आलंकारिक चमत्कार मात्र है, वस्तुतः शकल-सूरत में असुर भी मानव प्राणियों के से ही होते हैं और उनकी शकल−सूरत भी हम से मिलती जुलती ही होती है। अविचारपूर्वक स्वार्थ साधने की पशुता के प्रतीक रूप में पर-पीड़न की बुराई के रूप में सींग लगाये गये हैं। अपना पेट भरने के लिए बहुत जल्दी बहुत कुछ उदरस्थ कर जाने को तृष्णा और लालसा के प्रतीक बड़े−बड़े दाँत हिंसक पशुओं जैसे बनाये गये हैं। और चूँकि आसुरी प्रवृत्ति वालों का जीवन कलंक-कालिमा से कलुषित बना होता है इसलिए उनका चेहरा काला चित्रित किया जाता है। यह चित्रण उनकी आन्तरिक स्थिति का आलंकारिक प्रदर्शन मात्र है। कलेवर तो सभी मनुष्यों का एक सा होता है। कई बार असुर लोग रंग रूप में और भी सुन्दर लगते हैं। व्यभिचारी और व्याभिचारिणी नर-नारी सदाचारी लोगों की अपेक्षा प्रायः अधिक रूपवान देखे जाते हैं। ठगों की वेशभूषा सज्जनों से बढ़कर होती है। धूर्तों के भाषण में अधिक मिठास रहती है। बाह्य आवरण की दृष्टि से असुर अधिक भी दीख पड़ सकते हैं। चित्रकार ने वह भयंकर रूप उनकी आन्तरिक स्थिति के दिग्दर्शन के रूप में ही किया है।

बढ़ती हुई अनीति

असुरता के लक्षण विशाल परिमाण में बढ़ते और पनपते देखे जा सकते हैं। माँसाहार की प्रवृत्ति दिन−दिन बढ़ रही है। पहले जितनी घृणा इस संबंध में लोगों को थी अब उतनी कहाँ है? जो नहीं खाते वे भी उससे घृणा नहीं करते। मछली का तेल तथा पशु−पक्षियों के अंग−प्रत्यंग चीर फाड़कर बनाई हुई औषधियों का आज डाक्टरों की दुकान में बाहुल्य है। लोग बिना संकोच उन्हें खाते−पीते हैं। इन वस्तुओं को प्राप्त करने में दूसरे प्राणियों को कितनी मर्मान्तक पीड़ा सहन करनी पड़ी है, इसका विचार भी लोगों को नहीं आता। हमारी स्वयं की हत्या इसी प्रकार इन्हीं प्रयोजनों के लिए कदाचित् दूसरे प्राणी करने लगते तो हम पर कैसी बीतती? इसका ध्यान तक लोगों को नहीं आता, निर्दयता और निष्ठुरता की पाषाण मूर्ति बन कर दूसरों का माँस खाते−पीते जिन्हें झिझक नहीं होती उनकी प्रवृत्तियों को किस संज्ञा में गिना जा सकता है?

जालसाजी और ठगविद्या एक प्रकार से चतुरता और बुद्धिमता का अंग बनती चली जा रही है। व्यापार में धोखेबाजी का समन्वय अब एक आम बात बन रहा है। कहना कुछ, दिखाना कुछ, देना कुछ, यह तीन तरह का व्यवहार करना दुकानदारों की एक आम नीति है। खाद्य पदार्थों और औषधियों तक में जो घृणित प्रकार की मिलावटें होती हैं उससे उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य चौपट होता है तो इसकी परवा किये बिना व्यापारी निधड़क अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। न्याय की रक्षा के लिए बने हुए न्यायालयों के कर्मचारी किस प्रकार रिश्वत में अन्याय को प्रश्रय दिए हुए हैं, यह किससे छिपा है। पुलिस, रेलवे, कन्ट्रोल आदि विभिन्न सरकारी विभागों में कितनी रिश्वत चलती है, उसकी चर्चा करने से कुछ लाभ नहीं।

टूटे हुए पारस्परिक संबंध

नौकर और मालिक के बीच पिता−पुत्र का संबंध आज कहाँ है? मजदूर की दृष्टि कम से कम काम करने और अधिक कमाने और जहाँ घात लगे चोरी करने पर रहती है। मालिक का रिश्ता मजदूर से किसी मशीन के समान काम ले लेने मात्र का रहता है। उसके दुख-दर्द में हिस्सेदार बनने की, अपनी प्रगति और मुनाफा में उन्हें भागीदार बनाने की इच्छा उन्हें नहीं होती। मित्र−मित्र के बीच स्वार्थ साधन की शतरंज−चाल चली जाती रहती है। शत्रु और उदासीन को ठगना कठिन होता है, मित्र बनकर आसानी से विश्वासघात किया जा सकता है। इस दृष्टि से अब मित्रता भी विश्वासघात और धूर्तों की एक चाल बनती चली जा रही है। तोते की तरह लोग तभी तक मित्रता रखते हैं जब तक स्वार्थ सधता है, उसमें कमी आते ही आँखें बदल जाती है और जब दीखता है कि मित्र तंगी में आया और कुछ सहायता करनी पड़ सकती है तो लोग तुरन्त आँखें फेर लेते हैं। घर परिवार में भी यही नीति बरती जाती है। पिता−माता तभी तक अच्छे लगते हैं जब तक वे कमाते खिलाते हैं, जब वे अशक्त हो जाते हैं तो भार रूप लगते हैं। उनके मरने की, खर्च घटने की मनौती मानी जाती है।

दूसरों का धन, दूसरों का शील, सतीत्व हरण करने के लिए घात लगाये बैठे रहते हैं और जब जिसे जहाँ अवसर मिलता है अपना दाव चलाने में चूकता नहीं। दूसरे की कठिनाइयों और परिस्थितियों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की क्षमता घटती जा रही है। यह सोचना लोग छोड़ते चले जा रहे हैं कि दूसरों की परिस्थितियों में हम रहे होते तो क्या सोचा और क्या किया जाता। ऐसी परिस्थितियों में निष्ठुरता पनपे और मनुष्य पापी अपराधी एवं दुष्ट बनता चला जाय तो आश्चर्य की क्या बात है।

बढ़ती हुई विभीषिका

व्यापक बुराइयों की अधिक चर्चा करने से कुछ लाभ नहीं, वस्तुस्थिति को हम सब जानते भी हैं। इस चर्चा से चित्त में क्षोभ और सन्ताप ही उत्पन्न होता है। यों भले मनुष्यों का भी अभाव नहीं है वे प्रत्येक क्षेत्र में, बदनाम क्षेत्रों में भी मौजूद रहते हैं पर उनकी संख्या नगण्य है। असुरता का व्यापक विस्तार अपने कैसे कडुए और विषैले प्रतिफल उत्पन्न कर रहा है सो सामने प्रस्तुत ही है। सर्वत्र अशाँति, असंतोष, विक्षोभ, सन्ताप, द्वेष, क्लेश, रोग, शोक, दैन्य, अभाव एवं संघर्ष का उद्वेग भरा वातावरण मौजूद है। कहीं भी शाँति नहीं, किधर भी चैन नहीं, जो प्रगति हम करते जाते हैं वही विपत्ति बन कर गले में फाँसी के फन्दे की तरह जकड़ती चली जाती है। विज्ञान की उन्नति ने एटम युग में लाकर हमें खड़ा कर दिया है वहाँ मानव सभ्यता सर्वनाश के आधार पर खड़ी−खड़ी त्राहि−त्राहि पुकार रही है।

प्रश्न यह है कि क्या इस बढ़ती हुई असुरता को इसी रूप में बढ़ने दिया जाय, और सर्वनाश की घड़ी के लिये निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करते रहा जाय? अथवा स्थिति को सुधारने के लिए कुछ प्रयत्न किया जाय? विवेक, कर्तव्य−धर्म और पुरुषार्थ की चुनौती यह है कि निष्क्रियता उचित नहीं। शान्ति का सन्तुलन बनाये रखने के लिए, धर्म और कल्याण की रक्षा के लिए, मानवीय महत्ता को नष्ट न होने देने के लिए हमें कुछ करना ही चाहिए। जिस दिशा में अपने कदम अब तक तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं उसी सर्वनाश की ओर अब इस दौड़ को बन्द किया ही जाना चाहिए। असुरता के विरुद्ध विवेक की इसी प्रतिक्रिया का नाम है, “युग निर्माण योजना।”

प्रतिरोध और उन्मूलन के लिए

प्रस्तुत योजना के अन्तर्गत हमें मानव जीवन का उद्देश्य, आदर्श, तत्वज्ञान और व्यवहार सीखना पड़ेगा। फूहड़पन से जिन्दगी जीना कोई बुद्धिमान की बात नहीं। चौरासी लाख योनियों में करोड़ों वर्षों बाद मिले हुए इस अलभ्य अवसर को यों ही गन्दे-सन्दे ढंग से जी डालना, यह भी कोई समझदारी की बात है? जब थोड़ी भी उपयोगी और कीमती चीजों को सँभाल कर रखने और ठीक उपयोग करने की बात सोची जाती है तो मानव जीवन जैसे सुरदुर्लभ अवसर को ऐसी उपेक्षा और अस्त-व्यस्तता के साथ क्यों जिया जाना चाहिए? उचित यही है कि हम जीवन विद्या को सीखें और जिन्दगी का स्वरूप समझने और उसके सदुपयोग का प्रयत्न करें।

असुरता का व्यापक साम्राज्यवाद अब हटना ही चाहिए। देवत्व की ओर बढ़ने के लिये हमें मानवता को तो अपनाना ही पड़ेगा। दृष्टिकोण में इतना परिवर्तन होना तो आवश्यक ही है कि हमारे स्वार्थों की सीमा अत्यन्त संकुचित न रह कर उनका क्षेत्र कुछ बढ़े और विस्तृत हो। हम तृष्णा और वासना के, लोभ और मोह के, काम और क्रोध के ही बन्धनों में जकड़े न पड़े रहें वरन् धर्म और कर्तव्य का, आध्यात्मिक स्वतन्त्रता का भी कुछ आस्वादन करें। बन्धन से मुक्ति की ओर बढ़ने का एक ही मार्ग तो है कि संकुचित स्वार्थों की संकीर्णता की कीचड़ से अपने आपको निकालने का प्रयत्न करें। मानवता की निर्मल सुरसरी में अपने मल आवरण और विक्षेपों को धोवें और उस दिशा में कदम बढ़ायें जिधर देवत्व का मंगलमयी मलय मारुत प्रवाहित होता है। असुरता से मानवीय चेतन को विमुख करके देवत्व की ओर उन्मुख करना यही युग निर्माण योजना है, इसी को जीवन विद्या या संजीवन विद्या कह सकते हैं।

परिवर्तन का केन्द्र बिन्दु

दृष्टिकोण का परिवर्तन ही व्यक्ति परिवर्तन कहा जाता है। बाहरी कामों, व्यवस्थाओं, गतिविधियों को, परिस्थितियों को तो बलपूर्वक भी बदला जा सकता है। भय, दण्ड, या प्रलोभन के वशीभूत होकर लोग वह कार्य करते हैं जो वस्तुतः उन्हें करने नहीं होते। दिखावट, ढोंग, लोक-लाज या दबाव से कितने ही कार्य इस संसार में अनिच्छापूर्वक भी होते रहते हैं पर उनमें कोई स्थायित्व नहीं होता। सरकारी कानून, सामाजिक प्रतिबन्धों या भावुकता को उभार कर, जोश आवेश में बुराइयों की रोकथाम की जा सकती है किन्तु होती वह अस्थायी ही है। बाहरी दबाव जैसे ही कम हुआ वे दुष्प्रवृत्तियाँ उसी या वैसे ही अन्य किसी रूप में पुनः उभर आती हैं। वास्तविक उन्मूलन तो तभी संभव है जब अन्तःकरण बदलें, हृदय परिवर्तन हो और दृष्टिकोण सुधार हो। इसी में स्थिरता भी सान्निहित है और वास्तविकता भी।

आत्मा शुद्ध स्फटिक मणि के समान है, दर्पण के सामने जो भी वस्तु आती है उसमें वैसी ही छाया दीखने लगती है। स्फटिक मणि के सामने जिस रंग की वस्तुएँ रखी होंगी वह उसी रंग की दीखने लगेंगी। आज असुरता की परिस्थितियाँ फल−फूल रही हैं तो मानव का स्वरूप दुष्ट, दुराचारी, अज्ञानी और असुर जैसा दीख रहा है। पर जैसे ही स्थिति में परिवर्तन होगा परिस्थितियाँ मानवता, नैतिकता, धार्मिकता एवं सज्जनता के अनुकूल बनती जायेंगी, दुष्कर्म का स्थान सत्कर्म ग्रहण करेंगे, दुर्घटनाओं के स्थान पर सद्भावनाओं की स्थिति दिखाई देगी। ऐसी परिस्थितियों में वही मानव प्राणी जो आज असुर दिखाई देता है मानवता के उच्च आदर्शों में ओत-प्रोत होकर देवत्व की ओर तेजी से बढ़ता हुआ दिखाई देगा।

संकीर्णता से महानता की ओर

दृष्टिकोण का परिवर्तन ही सबसे बड़ा परिवर्तन है। अपने सीमा के संकीर्ण दायरे को बढ़ाकर विशाल क्षेत्र तक विकसित करने का नाम ही विकास है। वासना और तृष्णा की क्षुद्रता की मोह निद्रा की उपेक्षा करते हुए कर्तव्य का पालन और परमार्थ की आकांक्षाएँ जागृत करना यही जागरण है। कुविचारों और दुर्भावनाओं के, काम, क्रोध, लोभ, मोह के बन्धनों को तोड़ डालना इसी का नाम मुक्ति है। सन्तोष, संयम और सचाई, सज्जनता और शाँति की सन्तुलित मनोभूमि बनाये रखना यही स्वर्ग है। यह अपनी धरती स्वर्ग से श्रेष्ठ है, यह अपना मानव शरीर देवताओं से उत्तम है। यह मनुष्य जन्म ईश्वर का हमें सबसे बड़ा अनुग्रह और वरदान है। इस अलभ्य अवसर का, इस परम सौभाग्य का समुचित सदुपयोग करते हुए वह करना चाहिए जो करने योग्य है, वह सोचना चाहिए जो सोचने योग्य है, वह चाहना चाहिए जो चाहने योग्य है। उस मार्ग पर चलना चाहिए जो चलने योग्य है।

हमें अपनी असुरता को देवत्व में परिणित करने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि नारकीय अन्तःद्वन्दों और शोक-संतापों से छुटकारा पाकर शान्ति एवं सन्तोष का स्वर्गोपम सुख निरन्तर उपलब्ध करते रह सकना संभव हो सके। दृष्टिकोण बदलने से जीवन बदल जाता है, संसार बदल जाता और युग बदल जाता है। असुरता देवत्व में बदल सकती है, नरक को स्वर्ग में परिणत किया जा सकता है यदि हमारा दृष्टिकोण बदले। इस बदलने की विशाल कार्य पद्धति को लेकर आध्यात्मिक, बौद्धिक एवं नैतिक क्रान्ति का बिगुल बजाते हुए हम युग निर्माण के लिए अग्रसर होते हैं। आज हम थोड़े लोग इधर बढ़ें तो कल इन्हीं पद चिन्हों पर सभी दुनियाँ को चलना पड़ेगा।


परमात्मा की अनन्त अनुकम्पा और उसके दर्शन

भगवान् सदा सभी के साथ हैं, वह घट−घट वासी और सर्वव्यापक होने के कारण जहाँ भी हम रहते हैं वहाँ हमारे साथ ओत−प्रोत रहा हुआ होता है। इस विश्व में तिल−भर भी ऐसा नहीं जहाँ भगवान न हों। हमारी हर साँस के साथ वह भीतर जाता और बाहर निकलता है। रक्त की हर तरंग के साथ वह अंग−प्रत्यंगों पर प्रतिक्षण दौड़ता है, हृदय की हर धड़कन के साथ उसका ताल−वाद्य बजता रहता है। जब हम सो जाते हैं तब भी हमारी चौकसी के लिए जागता रहता है। माता की गोदी की तरह निद्रा की चादर से ढक कर वह हमें अपनी छाती से चिपका कर सुलाया करता है। जब सब ओर से जीव अशान्त और क्लान्त होकर थका हुआ चकनाचूर होता है तो निद्रा के रूप में परमात्मा की गोदी ही उसे विश्रान्ति प्रदान करती है। असमर्थ जीव को चिरनिद्रा में सुला कर क्लोरोफार्म देकर आपरेशन करने वाले और सड़ा अंग काटकर उसकी जगह नया अंग लगा देने वाले कुशल डाक्टर की तरह वही पुनर्जन्म की व्यवस्था करता है। मृत्यु और कुछ नहीं एक गहरी चिरनिद्रा मात्र होती है।

प्रभु का असीम अनुदान

प्रभु की अनन्त अनुकम्पा को हर घड़ी अनुभव किया जा सकता है। उसके इतने अनन्त अनुदान अपने को प्राप्त हैं कि एक−एक पर विचार करने से ऐसा लगता है मानो सृष्टि की सारी विभूति उसने अपने ही लिए बनाकर रख दी है और हर वस्तु का मनमाना उपभोग करने की पूरी−पूरी छूट दी हुई है। इठला कर बहती हुई नदियाँ, शान्ति के किलकते हुए सरोवर, मधुर मुसकाते हुए पुष्प, चहकते हुए पक्षी, उमड़−घुमड़कर गरजते-बरसते बादल, लहलहाती हरियाली, आकाश चूमने वाले पर्वत, जिधर भी दृष्टि डाली जाय उधर ही प्रकृति का अनन्त सौन्दर्य बिखरा पड़ा है और हर कोई मनचाही मात्रा में उसका पूरा−पूरा निर्बाध रसास्वादन करने में स्वतंत्र है।

जो शरीर हमें मिला है उसका एक−एक कल पुर्जा ऐसा कीमती है कि विज्ञान की उन्नति के इस युग में भी वैज्ञानिक लोग करोड़ों रुपया खर्च करके भी ऐसे कल पुर्जे नहीं बना सकते हैं वैसे इस देह में लगे हैं। आँखें जैसा स्पष्ट देखती है वैसा कैमरा कोई अब तक नहीं बना सका। मस्तिष्क की रचना ऐसी विलक्षण है कि उसके सूक्ष्म विद्युत संस्थान की छोटी−छोटी गतिविधियों को समझने का प्रयत्न करने मात्र में मानव बुद्धि थक जाती है। हाथ, पाँव, पाचन संस्थान, श्वाँस संस्थान, रक्त संस्थान, मल विसर्जन संस्थान की रचना और उपयोगिता ऐसी आश्चर्यजनक है कि उस वैज्ञानिक की, उस कलाकार की कृति को निहारते−निहारते यही लगता है कि इस रचनाकार की मानव शरीर में हुई अद्भुत रचना प्रक्रिया को समझ सकना भी कठिन है। समझने की आवश्यकता भी नहीं है।

मानव जीवन की सुख-सुविधाऐं

इस मानव शरीर में जो सुख-सुविधाएँ प्राप्त हैं उन्हीं का विश्लेषण करें और अन्य जीव−जन्तुओं की तुलना में उनकी श्रेष्ठता का अनुभव करें तो हृदय कृतज्ञता से भर जाता है। परमात्मा का अनन्त अनुदान इतना बड़ा है कि एक−एक उपलब्धि का वह अनुभव करे, उस पर सन्तोष व्यक्त करे और प्रभु का आभार माने तो यह सारा जीवन इस एक कार्य को पूरा करने में भी पर्याप्त नहीं हो सकता। बाह्य जीवन में जो उपलब्धियाँ हमें प्राप्त हैं वे अद्भुत हैं। बोलने की, लिखने की, पढ़ने की, सोचने की जो विशेषता जितनी मात्रा में किसी भी जीव को नहीं मिल सकी वह हमें प्राप्त है। परिवार की रचना उसकी कैसी मंगलमय व्यवस्था है कि उसके सहारे हँसते-खेलते जिन्दगी कट जाती है और जो पुण्य−परमार्थ प्राप्त करना लक्ष था वह भी उस छोटी बगीची के सींचने में पूरा हो जाता है। आनन्द और उल्लास का कितना श्रेष्ठ समन्वय परिवार रचना के साथ संबन्धित है उस पर विचार करते हैं तो लगता है पूरी आनन्दानुभूति का एक बहुत ही मनोरम व्यवस्थाक्रम बनाकर हमारे साथ जोड़ दिया गया है। मनोरंजन की परिपूर्ण व्यवस्था रख दी गई है और कर्तव्य पालन एवं आत्म विकास का भरपूर अवसर उसमें मौजूद है।

संसार की बाह्य परिस्थितियों में भगवान का कैसा कडुआ-मीठा स्वाद सन्निहित किया हुआ है कि एक के संबंध से दूसरे की महत्ता बढ़ती है। रात का अंधकार दिन के प्रकाश का महत्व बढ़ाता है और दिन का प्रकाश रात्रि के अन्धकार को श्रेय प्रदान करता है। गरीबी की उपस्थिति से अमीरी का गौरव टिका हुआ है और अमीरी से खिन्न हुए लोग गरीबी—संन्यास की शरण में शाँति खोजते हैं। रोग से आरोग्य का महत्व समझ में आता है, पाप को देखकर पुण्य की प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। दुरात्माओं की उपस्थिति से महात्माओं का सम्मान होता है। यदि सब कुछ एक सा ही रहा होता—व्यक्तियों और परिस्थितियों में अन्तर न रहता तो मनुष्य की सूझ-बूझ का ही कोई महत्व न रहता? वह कुंठित पड़ी रहती और जो हलचल चारों ओर दिखाई पड़ती है उसके स्थान पर सन्नाटा छाया होता। जिन बातों को हम परमात्मा की भूल, अकृपा एवं अव्यवस्था समझते हैं उसमें वस्तुतः उसकी सुव्यवस्था सन्निहित रहती है।

सत्प्रयत्न और सदुद्देश्य

जो परिस्थितियाँ हमें अपने लिए प्रतिकूल, अप्रिय, अखरने वाली, कष्टकारक लगती हैं उनमें भी परमात्मा का सत्प्रयत्न और सदुद्देश्य छिपा रहता है, पढ़ने के लिए ताड़ना करने वाला अध्यापक, सड़े अंग का आपरेशन करने वाला डाक्टर, उद्दण्डता के लिए क्रोध प्रकट करने वाला पिता, अपराध के लिए दण्ड देने वाला न्यायाधीश उन्हें बुरे लगते हैं जिन्हें उनके व्यवहार से कष्ट पहुँचता है। पर कष्ट पहुँचाना सदा अकृपा में ही नहीं होता। माता को प्रजनन का कष्ट भुगतना पड़ता है पर क्या यह किसी के क्रोध या दुर्भाव का प्रतिफल होता है? ईश्वर का प्रेम और अनुग्रह कई बार माता के दूध पिलाने की तरह मधुर और कई बार कान ऐंठने की तरह कडुआ होता है। बालक नहीं माता ही जानती है कि इन दोनों में केवल बालक के कल्याण और सुख का ही ध्यान रखा गया है।

वह परमात्मा हमारे प्रतिक्षण साथ रहता है पर उसकी उपस्थिति से जो लाभ मिलना चाहिए उसे कोई विरले ही उठा पाते हैं। घर की जमीन में गड़ा धन, यदि अपनी जानकारी में न हो तो उससे क्या लाभ मिलेगा? गले में पड़े हुए हीरे के कण्ठा को यदि हमने काँच जितना ही समझ लिया हो तो उससे क्या लाभ अपने को प्राप्त होगा? परमात्मा की अपार और अत्यन्त शक्ति एवं अनुकम्पा हर घड़ी अपने साथ है पर उसका परिपूर्ण लाभ उठा सकना अनजानों के लिए कठिन है। जिस जानकारी के आधार पर परमात्मा के सहचर होने का समुचित सत्परिणाम प्राप्त किया जा सकता है उसे ही सद्ज्ञान या अध्यात्म कहते हैं।

अज्ञान का आवरण

कपड़े के झीने पर्दे की आड़ में बैठे हुए दो व्यक्ति एक दूसरे को देख नहीं सकते यद्यपि यह अनुभव करते हैं कि कोई पर्दे के उधर बैठा है। हम यह तो जानते हैं कि परमात्मा हमारे समीप है, भीतर ही है पर उसकी उपस्थिति से वह आनन्द और लाभ नहीं उठा पाते जो सान्निध्य सहचरत्व से मिलना चाहिए। राजा, रईस, अमीर, अधिकारी, योद्धा, विद्वान कलाकार आदि श्रेष्ठ लोगों की मित्रता और समीपता से जब लोग बहुत लाभ उठा लेते हैं तो इतने उदार और अनुग्रही परमात्मा के निरन्तर साथ रहते हुए भी कुछ लाभ न उठा सकें तो यह अपना दुर्भाग्य ही कहा जायेगा।

अज्ञान का आवरण उस पर्दे के समान है जो पास बैठे हुए व्यक्तियों को भी दूरस्थ जैसी स्थिति में बनाए रहता है। जमीन में गड़ा धन और गले में पड़ा कंठा अज्ञान के कारण ही उपयोग में नहीं आता। अज्ञान इस संसार का एक बड़ा अभाव और दुर्भाग्य है, उसे हटाने के लिए समुचित प्रयत्न किया ही जाना चाहिए।

प्रभु से प्रतिकूलता

तृष्णा और वासना के वशीभूत होकर मनुष्य परमात्मा की आज्ञाओं, मर्यादाओं और इच्छाओं का उल्लंघन करता है और सोचता है कि इस प्रकार वह अधिक जल्दी, अधिक मात्रा में सुख साधन प्राप्त कर लेगा। अज्ञान का यह सब से बड़ा लक्षण है। सुख का एकमात्र उपाय है पुण्य, दुःख का एकमात्र कारण है पाप। पापों के प्रतिफल से परमात्मा ही दुख और पुण्य के फलस्वरूप सुख की व्यवस्था करता है। जो महत्वपूर्ण उपकरण सर्वसाधारण को मिले हैं वे इतने पर्याप्त हैं कि उनके आधार पर आनन्दमय जीवन व्यतीत किया जा सकता है। हमें क्या सोचना और क्या करना चाहिए इसकी सुनिश्चित धर्म-मर्यादाऐं बनी हुई हैं। सद्विचार और सत्आचरण का पालन करते हुए परमात्मा के अनुग्रह को अधिकाधिक अनुभव किया जा सकता है। प्रभु की समीपता का श्रेष्ठ उपाय यह है कि उसे सर्वव्यापक मानकर अपने विचारों और आचरणों को इस योग्य बनावें कि प्रभु की प्रसन्नता और अनुकम्पा निर्बाध गति से प्राप्त होने लगे। सूर्य की धूप, गर्मी और रोशनी उन्हें प्राप्त होती है जो खुले आकाश के नीचे बैठते हैं। छाया में बैठने वाले को धूप से वंचित रहना पड़ता है। पाप और कुविचारों की छाया में बैठा हुआ मनुष्य भी दिन में सूर्य की धूप से वंचित रहने वाले की तरह परमात्मा की उस विशेष कृपा से वंचित रह जाता है जिसे आत्मिक प्रगति, श्रेष्ठता, देवत्व, जीवन मुक्ति और ब्रह्मानन्द का महान लाभ कहते हैं। पाप, स्वार्थ और संकीर्णता का आवरण हमें निकटवर्ती परमात्मा से दूरवर्ती बनाए रहता है।

आवश्यकता बनाम तृष्णा

जीवन की वास्तविक आवश्यकताऐं वस्तुतः इतनी कम हैं कि कम बुद्धि और स्वल्प योग्यता वाले व्यक्ति भी अपना निर्वाह बड़े सन्तोष और आनन्द−पूर्वक कर सकते हैं। मनुष्य की अपेक्षा कई गुना आहार करने वाले और बुद्धि एवं क्षमता में, साधन और सुविधा में बहुत पिछड़े होने पर भी जब पशुओं तक को अपने निर्वाह में कुछ असुविधा नहीं होती तो मनुष्य को जरा−सा आहार, जरा−सा निवास जरा−सा कपड़ा चाहिए, वह कहाँ कम पड़ने वाला है? तृष्णा और वासनाओं की हविस ही उसे न जाने कितना जोड़ने, न जाने कितना भोगने की लिप्सा उत्पन्न करती है और उसी अतृप्ति में भटकता हुआ लोभ-मोह में ग्रस्त प्राणी उतावली में अकर्म करने पर उतारू हो जाता है। यह स्थिति परमात्मा से विमुख करने वाली है। परमात्मा की इच्छा और आज्ञा की अवज्ञा करते रहना और पूजा के नाम पर चावल (अक्षत) छोड़ते रहना, विडम्बना मात्र ही है।

उपासना की निस्संदेह बड़ी आवश्यकता है। उसकी उपयोगिता, महत्ता, शक्ति और संभावना बहुत है पर उस मार्ग में सफलता केवल उन्हें ही मिलती है जो परमात्मा से विमुख नहीं है, उसके बताये हुए मार्ग का उल्लंघन नहीं करते। गुलाब के बगीचे के पास रहने वाले सुगंधित वायु का रसास्वादन करते हैं और दुर्गन्धित गंदे नाले की समीपता से बदबू और बीमारी के शिकार होते हैं। वायु एक ही है पर वह सुगंधित और दुर्गन्धित पदार्थों के संसर्ग से हमारे लिए लाभदायक और हानिकारक बनती है। सद्−विचारों और सत्कर्मों को छूकर परमात्मा की जो कृपा वायु हमारे समीप आती है उसमें सुख−शान्ति का भण्डार भरा होता है, किन्तु हमारे पाप और दुर्भावों को छूकर प्रभू की दृष्टि टेढ़ी दुर्गन्धपूर्ण बन जाती है, उसमें अभिशाप, क्रोध और नरक का प्रत्यक्ष दर्शन होता है। शीतल वायु के समान परमात्मा की निरन्तर बरसती रहने वाली स्वास्थ्यवर्द्धक शीत कृपा भी हमारे पाप और अज्ञान के कारण विकारों निमोनिया, कफ, खाँसी आदि के समान कष्टकर प्रतिक्रिया उपस्थित करने लगती है।

परमात्मा का सान्निध्य और साक्षात्कार

परमात्मा को हम अपने समीप देखें तो वह हमारे बिलकुल पास, रोम−रोम में ओत−प्रोत दीखेगा जिधर भी दृष्टि दौड़ाई जाय उधर ही उसका महान दान बिखरा पड़ा दृष्टिगोचर होगा। पर जब हम उसकी ओर से विमुख होकर तृष्णा और वासना के पीछे, माया के पीछे, दौड़ने लगते हैं तो लगता है कि परमात्मा सोगया, कुपित है, अन्याय कर रहा है, सुनता नहीं, निष्ठुर है। जब अपनी चाल सीधी हो जाती है तो प्रस्तुत कठिनाइयों के पीछे भी आशाजनक भविष्य निर्माण की मंगलमयी व्यवस्था दीखती है और वर्तमान कष्ट प्रसव−वेदना के समान अगले ही क्षण मंगलमय परिणाम प्रस्तुत करने वाले लगते हैं।

प्रेम और विश्वास के आधार पर प्रभु को प्राप्त कर सकना हर किसी के लिए सरल है। वे सच्ची भावना से की गई थोड़ी उपासना से भी प्रसन्न हो जाते हैं जब कि आडम्बर की तरह बहुत तोता रटंत का भी कोई विशेष परिणाम नहीं निकलता। हमारी भक्ति भावना पूर्ण होनी चाहिए। भजन के साथ आत्मशोधन की प्रक्रिया भी सम्मिलित रहे। आरती के साथ अन्तर्दीप्ति भी प्रकाशित हो। नैवेद्य (प्रसाद) चढ़ाने के साथ यह भी ध्यान रहे कि मानव जीवन की सार्थकता परमार्थ में है। व्रत के साथ इन्द्रिय संयम का होना जरूरी है। भक्ति का, पूजा का बाह्य कलेवर भावनापूर्ण हो पर साथ ही भीतरी शुद्धता की प्रक्रिया चलती रहे। अज्ञान और पाप का पर्दा जितना ही फटता जायेगा परमात्मा का दर्शन और उनका अनुग्रह उतना ही सरल होता जायेगा।


सद्गुण भी हमारे ध्यान में रहें

हमारा ध्यान जिस वस्तु पर अधिक जाता है वह प्रमुखता प्राप्त कर लेती है और जिस ओर उपेक्षा बरती जाती है वह बात गौण एवं महत्वहीन बन जाती है। जिधर अपनी अभिरुचि मुड़ती है, जो प्रिय लगता है, जिसे प्राप्त करने की इच्छा रहती है वह सब कितना ही महत्वहीन क्यों न हो पर प्रमुखता प्राप्त कर लेता है और मस्तिष्क का अधिकाँश भाग उसी विचार धारा में निमग्न रहता है। जिस दिशा में विचार चलेंगे वैसे ही काम होंगे और धीरे−धीरे सारा जीवन उसी ढाँचे में ढल जायेगा। जिनने अपने जीवन को स्थायी दिशा में विकसित किया है उधर उनका पूरा−पूरा ध्यान रहा है। उपेक्षित मार्ग में भी कभी कोई प्रगति कर सका हो, ऐसा देखने-सुनने में नहीं आता।

सबसे बड़ी सम्पत्ति

मनुष्य के पास सबसे बड़ी पूँजी सद्गुणों की है। जिसके पास जितने सद्गुण हैं वह उतना ही बड़ा अमीर है। रुपया के बदले बाजार में हर चीज से किसी भी दिशा में अभीष्ट प्रगति की जा सकती है। गुणहीन व्यक्ति अपनी व्यर्थता, निरर्थकता के कारण सब की दृष्टि में हीन और हेय बने रहते है, कोई उनकी पूछ नहीं करता, उसकी ओर ध्यान नहीं देता बेचारे अपनी जिंदगी जीते और अपनी मौत मरते रहते हैं। ऐसे लोगों के लिए किसी प्रकार जिन्दगी के दिन काट लेना ही पर्याप्त होता है। ये लोगों की दृष्टि में उपहास या दया के पात्र बने रहते हैं। किसी महत्व के कार्य में उनकी कोई पूछ नहीं होती, सदा पीछे ही धकेले जाते रहते हैं।

दुर्गुणी व्यक्ति बहुधा स्वार्थी होते हैं। वे दूसरों से चाहते तो बहुत हैं पर बदले में देने के लिए उनके पास कुछ नहीं होता। इसलिए वे डरा धमका कर अपना प्रयोजन सिद्ध करने की कोशिश करते हैं। गुण्डे, उद्दण्ड उच्छृंखल, चोर, डाकू, लुटेरे, झगड़ालू प्रकृति के लोग अपनी हानि पहुँचाने की क्षमता का प्रदर्शन करके दुर्बल मन वालों को आतंकित कर लेते हैं और फिर उनसे अपना स्वार्थ साधने की चेष्टा करते हैं। पर काठ की हाँड़ी देर तक नहीं चलती। सभी लोग उनके विरोधी होते हैं और घृणा के भाव रखते हैं। जब भी अवसर मिलता है प्रतिशोध ले लिया जाता है। यदि ये दुर्गुणी लोग किसी मुसीबत में फँस जाय तब तो हर कोई घी के दीपक जलाता है और यह प्रयत्न करता है कि इसे अधिक से अधिक मुसीबत उठानी पड़ें। दुर्गुणी का कभी कोई सच्चा मित्र नहीं हो सकता। क्योंकि किसी के मन में उस के प्रति श्रद्धा या सद्भावना नहीं होती, इसके बिना मैत्री की जड़ कभी नहीं हो सकती है।

प्रगति अपने बलबूते पर होती है। सच्ची मैत्री और सहानुभूति तो सद्गुणों में मिलती है दुर्गुणी तो वह सब कुछ खो बैठता है। डरा-धमकाकर एक बार किसी से कुछ काम करा भी लिया जाय तो भी वह निरन्तर कैसे संभव हो सकता है? दूसरों की सहानुभूति और सहायता से वंचित रहने के कारण ये लोग किसी महत्वपूर्ण सफलता के अधिकारी नहीं बन पाते। सब ओर से घृणा की वर्षा होने के कारण उनकी आत्मा भीतर ही भीतर दबा हुआ−से, मरा हुआ−सा, चोर की तरह भय और लज्जा से घिरा हुआ−सा बना रहता है। जिसका अतः करण लज्जा और संकोच के भार से दब गया है उसके लिए प्रगति के सभी द्वार अवरुद्ध हो जाते हैं।

दुर्गुणों का दुष्परिणाम

अपनी ही बुराइयों के कारण दुर्गुणी व्यक्ति अपना सर्वनाश करता रहता है। अपव्ययी अपनी ही बुरी आदतों में अपनी सम्पत्ति गंवा बैठता है, और फिर दर−दर का भिखारी बना ठोकरें खाता फिरता है। व्यसनी अपना सारा समय निरर्थक के शौक पूरे करने में बर्बाद करता रहता है, जिस बहुमूल्य समय में वह कुछ कहने लायक काम कर सकता था वह तो व्यसन पूरे करने में ही चला जाता है। समय के अभाव में कोई महत्वपूर्ण कार्य उससे बन कब पड़ता है?

चटोरे, जिह्वा लोलुप लोग स्वाद के पीछे पागल बने दिन भर सटर−पटर खाते रहते हैं और फिर बेमौत मरते हैं। बीमारियाँ घेरती चली जाती है, दवाओं से उन्हें मिटाने की कोशिश में पैसा तो गँवाते हैं पर अपनी आदतों पर काबू नहीं नहीं करते। ऐसी दशा में इलाज में पैसे लगा कर भी उन्हें अस्वस्थता से छुटकारा नहीं मिलता। काम वासना में अपना शरीर, स्वास्थ और सौन्दर्य खो बैठने वालों की एक बड़ी संख्या चाहे जहाँ देखी जा सकती है। वे भोगों को भोग कर मौज-मजा लूटना चाहते है, पर गरीब स्वयं ही लुट जाते हैं। पाते तो कुछ नहीं, खो सब कुछ बैठते हैं। क्रोधी भी क्या कुछ लाभ में रहता है? उत्तेजना और आवेश में अपना खून जलाता है, न कहने योग्य कह बैठने से अपनों को पराया बना लेता है और घृणा द्वेष की कँटीली दीवारें अपने लिये चारों ओर खड़ी करता है।

ईर्ष्यालु, निन्दक, चुगलखोर सब की आँखों में अपना सम्मान खो बैठते हैं। उन्हें अविश्वास, अप्रमाणिक और ओछी तबियत का समझा जाता है। कोई उनसे घुलता-मिलता नहीं सभी सशंक बने रहते हैं। ऐसे लोग भीतर ही भीतर अपनी स्थिति पर असंतुष्ट, उद्विग्न और खिन्न भी रहते हैं। उनका शरीर और मन अधःपतन की दिशा में ही गिरता चला जाता है। दुर्गुणों की वृद्धि होना मानव जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। वस्तुतः यही सबसे बुरी किस्म की कुरुपता है जिसे देखकर हर ओर घृणा और तिरस्कार का वातावरण उठ खड़ा होता है।

सच्ची दौलत और अमीरी

धन को धन नहीं मानना चाहिए। वह तो आता और चला जाता है। परिस्थितियों के झटके बड़े−बड़े धनी मानियों को नीचा करवा देते हैं। गरीब के अमीर बनने में देर लग सकती है पर लगातार के दो चार थपेड़े लगने मात्र से अमीर की स्थिति गरीब से भी दयनीय हो जाती है। व्यापार में हानि, चैन, दुर्घटना, कुसमय मुकदमा, बीमारी, फूट आदि कितने ही ऐसे कारण हैं जो अच्छी आर्थिक स्थिति को उलट−पलट कर रख देते हैं। ऐसी दशा में गुण−हीन व्यक्ति निर्धन हो जाने पर पुनः उठ खड़ा होने में असमर्थ ही रहता है। पर जिसके भीतर सद्गुणों की पूँजी भरी पड़ी है वह पुनः अपना खोया हुआ वैभव प्राप्त कर लेता है। आत्मबल और आत्म−विश्वास उसे दैवी सहायता की तरह सदा प्रगति का मार्ग दिखाते हैं। अपने मधुर स्वभाव के कारण वह जहाँ भी जाता है वहीं अपना स्थान बना लेता है। अपनी विशेषताओं से वह सभी को प्रभावित करता है और सभी की सहानुभूति पाता है। दूसरों को प्रभावित करने की ओर उसकी सफलता का प्रधान कारण तो अपने सद्गुण ही होते हैं। जिसके पास यह विशेषता होगी उसके लिए पराये अपने बन जायेंगे और शत्रुओं के मित्र बनने में देर न लगेगी।

जीवन के आधार स्तम्भ सद्गुण हैं। अपने गुण कर्म, स्वभाव को श्रेष्ठ बना लेना, अपनी आदतों को श्रेष्ठ सज्जनों की तरह ढाल लेना वस्तुतः ऐसी बड़ी सफलता है जिसकी तुलना किसी भी अन्य साँसारिक लाभ से नहीं की जा सकती। इसलिए सब से अधिक ध्यान हमें इस बात पर देना चाहिए कि हम गुणहीन ही न बने रहें, सद्गुणों की शक्ति और विशेषताओं से अपने को सुसज्जित करने का निरन्तर प्रयत्न करें। दुर्गुणों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर खोजें और उन्हें खटमलों की तरह अपने सम्पर्क से दूर हटाने की सदैव चेष्टा करते रहें।

पढ़ें, सुनें, कहें और सोचें

सद्गुणों के विकास का उचित मार्ग यह है कि उन्हीं के संबंध में विशेष रूप से विचार किया करें, वैसा ही पढ़े, वैसा ही सुनें, वैसा ही कहें, वैसा ही सोचें जो सद्गुणों के बढ़ाने में, सत्प्रवृत्तियों को ऊँचा उठाने में सहायक हो। सद्गुणों को अपनाने से अपने उत्थान और आनन्द का मार्ग कितना प्रशस्त हो सकता है, इसका चिन्तन और मनन निरन्तर करना चाहिए। किसी वस्तु के लाभ सोचने से उसे प्राप्त करने की इच्छा होती है और यदि उसी से जो हानि हो सकती है उसका विचार आरंभ कर दिया जाय तो वही बहुत बुरी और त्याज्य प्रतीत होने लगेगी। किसी व्यक्ति की अच्छाइयों पर यदि विचार करें तो वही देवता दिखाई देगा, पर यदि उसकी बुराइयाँ ढूँढ़ने लगें तो वह भी इतनी अधिक मिल जावेंगी कि साक्षात् शैतान की तरह वह दीखने लगेगा।

विवेकशीलता के आधार पर जिसे भी हम उपयोगी पावें, जिसे प्राप्त करना आवश्यक समझें, उसकी उपयोगिता का अधिकाधिक चिन्तन करें। महात्म्यों का वर्णन इसीलिए किया जाता है कि किसी कार्य के अच्छे पहलू अपनी समझ में आवें और अभिरुचि उत्पन्न हो। कथावार्ता का सारा आधार यही तो होता है कि आध्यात्मिक विषयों की उपयोगिता और उनसे प्राप्त होने वाले लाभों को समझने से प्रवृत्तियाँ उस ओर झुकें। जहाँ भी मनुष्य लाभ देखता है, जिधर भी उसे आकर्षण दीखता है, उधर ही मन झुकने लगता है। सद्गुणों के महात्म्य को हम जितनी गंभीरता से सोचेंगे, उनके सत्परिणामों पर जितना अधिक विचार करेंगे, उतना ही उन्हें प्राप्त करने की आकाँक्षा प्रबल होगी। इस प्रबलता को प्रकान्तर से आत्मकल्याण की, जीवन विकास की, प्रेरणा भी कह सकते हैं। इसी पर हमारे भविष्य की उज्ज्वलता बहुत कुछ निर्भर रहती है।

बीजांकुरों को खोजें और सींचें

अपने अन्दर सद्गुणों के जितने बीजांकुर दिखाई पड़े, जो अच्छाइयाँ और सत्प्रवृत्तियाँ दिखाई पड़ें, उन्हें खोजते रहना चाहिए। जो मिलें उन पर प्रसन्न होना चाहिए, और उन्हें सींचने-बढ़ाने में लग जाना चाहिए। घास−पात के बीच यदि कोई अच्छा पेड़ पौधा उगा होता है, तो उसे देखकर चतुर किसान प्रसन्न होता है, और उसकी सुरक्षा तथा अभिवृद्धि की व्यवस्था जुटाता है, ताकि इस छोटे पौधे के विशाल वृक्ष बन जाने से उपलब्ध होने वाले लाभों से वह लाभान्वित हो सके। हमें भी अपने सद्गुणों को इसी प्रकार खोजना चाहिए। जो अंकुर उगा हुआ है यदि उसकी आवश्यक देख−भाल की जाती रहे तो वह जरूर बढ़ेगा, और एक दिन पुष्प−पल्लवों से हरा−भरा होकर चित्त में आह्लाद उत्पन्न करेगा।

सदा अपने दोष दुर्गुण ही ढूँढ़ते रहना बहुत बुरी बात है। ठीक है कि अपनी त्रुटियों से बेखबर न रहें, उन्हें खोजें और निकाल बाहर करें। पर निरन्तर केवल उसी दिशा में मस्तिष्क को लगाये रहा जायेगा तो अगणित बुराइयाँ ही बुराइयाँ अपने अन्दर सूझ पड़ती रहेंगी। तब चित्त में निराशा उपजेगी और अपने को दुष्ट−दुराचारी मान बैठने की भावना जड़ पकड़ेगी। जिस प्रकार अपने आपको शिवोऽहम्, सच्चिदानन्दोऽहम्, सोऽहम् आदि की उच्च ब्रह्म−भावना करने से आत्मा स्वसंकेतों के आधार पर ब्राह्मी स्थिति में अवस्थित होकर अपने आपको निरन्तर पापी, दुष्ट, दुराचारी मानते रहने से उसी के प्रमाण खोज−खोज कर अपनी निकृष्टता की ओर दृष्टि करते रहने से आत्मिक स्तर गिरता है। जैसा हम सोचते हैं वैसे ही बनते और ढलते हैं यदि अपनी बुराइयों को ही सोचते रहा जायेगा तो धीरे−धीरे अपना रूप वैसा ही बनता जायेगा।

सावधानी की आवश्यकता

आत्म शोधन का कार्य बड़ी सावधानी और सन्तुलित मनःस्थिति से ही किया जाना चाहिए। एकांगी आलोचना उचित नहीं। न केवल दोष ही देखें और न केवल गुणों का ही विचार करें। वरन् दृष्टि यह रखें कि जो बुराइयाँ दीखें उनके लिए अपनी ताड़ना करें और जो अच्छाइयाँ सूझ पड़े, उनसे प्रसन्नता अनुभव करें —प्रोत्साहन प्राप्त करें और संतोष व्यक्त करें। अच्छाइयों के बढ़ाते चलने से बुराई स्वतः घटती है। केवल बुराई को छोड़ने भर की बात सोची जाय और अच्छाई बढ़ाने की ओर ध्यान न हो तो प्रयोजन सिद्ध न होगा। पानी से भरे बर्तन में यदि कंकड़ पत्थर डाल दिये जायें तो उतना ही पानी बर्तन से बाहर निकल जायेगा। मन रूपी बर्तन में सद्गुणों की जितनी प्रतिष्ठापना होती चलेगी उतने ही दोष दुर्गुण अपने आप समाप्त होते चलेंगे।

व्यभिचार छोड़ेंगे यह सोचने की अपेक्षा यह कहना अच्छा है कि ब्रह्मचर्य पालन करेंगे। चोरी छोड़ेंगे यह कहने के अपेक्षा यों सोचना चाहिए कि ईमानदारी का पवित्र जीवन बितायेंगे। आलस में न पड़े रहेंगे यों न कह कर यों कहना चाहिए कि स्फूर्ति और श्रमशीलता का वरण करेंगे। बात एक ही है पर निषेधात्मक पक्ष को मनःक्षेत्र में स्थान देने की अपेक्षा यह उत्तम है कि रचनात्मक पक्ष की विचारधारा से मस्तिष्क को प्रभावित किया जाय। दुष्टता का उन्मूलन करेंगे, यों सोचने के उन्मूलन के लिए जिस क्रोध, विनाश, विध्वंस की आवश्यकता है, उसकी तैयारी में मन लगेगा। पर यदि सज्जनता का प्रसार करेंगे, यह अपना लक्ष हो तो सज्जनता के उपयुक्त , शिष्टाचार, प्रेम उदारता, मधुरता, त्याग, सहिष्णुता आदि के भाव मन में भ्रमण करेंगे। एक ही बात के भले और बुरे दो पहलू होते हैं। उन दोनों में से हमें बुरा नहीं, भला पहलू ही अपने लिए चुनने का प्रयत्न करना चाहिए।

श्रेष्ठताओं को बढ़ाया जाय

हम सज्जन बनेंगे, श्रेष्ठतायें बढ़ावेंगे, सद्गुणों का विकास करेंगे यही अपनी आकांक्षायें रहनी चाहिएं। सद्गुण यदि थोड़ी मात्रा में भी अपने अन्दर मौजूद हैं तो भविष्य में उनका विकास होने पर अपना भाग्य और भविष्य बहुत ही उज्ज्वल होने की कोशिश सहज ही की जा सकती है। माना कि आज अपने अन्दर सद्गुण कम हैं, छोटे हैं, दुर्बल हैं पर यही क्या कम है कि वे मौजूद हैं और यह क्या कम है कि हम उन्हें बढ़ाने की बात सोचते हैं। पौधा नन्हा सही पर चतुर माली यदि तत्परतापूर्वक उसकी सेवा करेगा तो वह आज न सही कल सही विशाल वृक्ष बनने ही वाला है। संसार में कोई विभूति ऐसी नहीं जो तीव्र आकाँक्षा और प्रबल पुरुषार्थ के आधार पर प्राप्त न की जा सकती हो। सद्गुणों की बहुमूल्य सम्पत्ति मानव जीवन की सब से बड़ी विभूति मानी जाती है। उसे प्राप्त करना कठिन तो है पर कठिनाई उन्हीं के लिए है जो उधर ध्यान नहीं देते। जिसने अपने मन और मस्तिष्क को श्रेष्ठता का महत्व समझने और उसे प्राप्त करने के लिए अभिमुख कर रखा है उन्हें उनका लक्ष प्राप्त होगा ही। वे श्रेष्ठ सज्जन बन कर अपने को परम सौभाग्यशाली अनुभव करेंगे ही।


कुसंग से आत्मरक्षा की आवश्यकता

पौधे खाद और पानी देने से बढ़ते हैं। प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलने से वे पनपती हैं। भली और बुरी दोनों ही प्रकार की प्रवृत्तियाँ अपने भीतर रहती हैं उनमें से जिन्हें विकसित होने का अवसर मिलता है वह बढ़ती और फलती−फूलती हैं। जिन्हें ऐसा अवसर नहीं मिलता वह मुरझाई रहती हैं और धीरे−धीरे मृतप्रायः अवस्था में जा पहुँचती हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि जिन प्रवृत्तियों को हम उपयोगी एवं आवश्यक समझते हैं उनके प्रोत्साहन की व्यवस्था करें।

सम्पर्क का प्रभाव

दृढ़ निश्चयी और आत्म−विश्वासी कोई बिरले ही होते हैं। अधिकाँश मनुष्य ऐसे होते हैं जो निकटवर्ती व्यक्तियों और परिस्थितियों के आकर्षण एवं प्रोत्साहन से प्रभावित होकर अपनी गतिविधियाँ प्रस्तुत करते हैं। देखा गया है कि संगति का बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है उनके गुण-दोषों के प्रति भी सहानुभूति उत्पन्न होती है और उनका अनुकरण करने की इच्छा उठने लगती है। बुरे लोगों के सम्पर्क में आकर अनेकों भोले−भाले व्यक्ति अनेकों बुराइयाँ सीख लेते हैं और कुमार्ग पर चलने लगते हैं। नशेबाजी का आरंभ प्रायः ऐसे ही होता है। नशीली चीजें न तो स्वादिष्ट होती हैं और न उपयोगी। उनका जायका भी बुरा होता है और पैसा भी खर्च करना पड़ता है। किसी उपयोगिता के कारण लोग नशा पीना आरम्भ नहीं करते वरन् सौ में से निन्यानवे बार यार-दोस्तों के आग्रह से या उनकी देखा−देखी यह बुरी लत आरम्भ होती है और धीरे−धीरे वह आदत में इतनी गहराई तक उतर जाती है कि फिर छुड़ाये नहीं छूटती।

दुष्प्रवृत्तियों की छाया

जुआ खेलना, गाली देना, आलस में पड़े रहना, ताश, शतरंज, चौपड़, कैरम आदि में वक्त बर्बाद करना, बढ़−चढ़कर शेखी मारना, फैशन बनाना आदि कितनी ही बातें ऐसी हैं जो यार-दोस्तों के द्वारा ही उपहार में मिलती हैं। जिनके साथ दोस्ती होती है उनकी आदतों के साथ भी दोस्ती बढ़ने लगती है। उनकी इच्छा, अनुरोध एवं प्रवृत्ति के साथ−साथ चलने से दोस्ती पक्की होती दीखती है इसलिए प्रभावशाली व्यक्ति के सम्पर्क में आने वाले उसके गुण-दोषों को भी सीख लेते हैं।

व्यभिचार आमतौर से ऐसे ही पनपता है। आरंभिक जीवन में हर कोई सदाचारी होता है। पाप से विशेषतया व्यभिचार सम्बन्धी पाप से हर किसी को बहुत डर लगता है क्योंकि हमारी धार्मिक और सामाजिक मान्यताऐं इसका बहुत विरोध करती हैं। आन्तरिक और सामाजिक दोनों ही प्रकार के भय, संकोच एवं लज्जा के कारण मनोविकार रहते हुए भी इस कुमार्ग पर सहसा कदम उठा सकना कठिन होता है। पर कुसंग में वह झिझक छूट जाती है। प्रारंभ वार्ता में अश्लील बातों में रस लेने से होता है और अन्त पतन के गहन गर्त में गिरने के साथ होते देखा गया है। कुसंगति में ही यह पतन पनपता है। भोले बच्चे और बच्चियाँ दुष्ट दुराचारी लोगों के सम्पर्क में आकर अपना भविष्य अन्धकारमय बनाते हैं और छूत की बीमारी की तरह यह लत एक से दूसरे को लगती चली जाती है।

सत्संगति का सत्परिणाम

अच्छी संगति का भी प्रभाव होता ही है। प्रभावशाली व्यक्तित्व अपने समीपवर्ती लोगों पर असर जरूर छोड़ते हैं। ऋषियों के आश्रमों में सिंह व गाय एक घाट पानी पिया करते थे इसका कारण यही था कि प्रेम, अहिंसा और सद्भावना से भरा हुआ जो प्रबल भावना प्रवाह वहाँ बहता था। उससे हिंस्र पशु भी प्रभावित हुए बिना न रहते थे। चंदन के समीपवर्ती छोटे−बड़े अन्य पेड़ पौधे भी सुगन्धित हो जाते हैं। फूल टूट− टूटकर जिस भूमि पर गिरते रहते हैं उस मिट्टी में भी खुशबू आने लगती है, फिर सद्गुणी और सज्जनों के सम्पर्क में आने वालों पर वैसा ही प्रभाव क्यों न पड़ेगा? सुसंगति को पारस की उपमा दी गई है। लोहा पारस मणि को छूकर सोना हो जाता है, सज्जनों के सम्पर्क में साधारण व्यक्ति भी महत्ता को प्राप्त करते देखे गये हैं। सत्पुरुषों के सम्पर्क -------से मनुष्य की सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं। सूर्यमुखी का फूल उधर ही मुड़ता रहता है जिधर सूरज घूमता है। प्रभात होते ही कमल की कली का मुख खुल जाता है। श्रेष्ठ व्यक्तियों का प्रभाव पड़ते ही मनुष्य की अन्तरात्मा में छिपी हुई सत्प्रवृत्तियाँ भी उसी प्रकार खिलने और विकसित होने लगती हैं।

बुरे वातावरण से दूर रहें

व्यक्तियों के द्वारा व्यक्तियों पर पड़ने वाले प्रभाव की महत्ता को समझते हुए हमें निरन्तर ध्यान रखना चाहिए कि अपना सम्पर्क बुरी आदत वाले लोगों के साथ न रखें। वे प्रत्यक्ष कुछ भी न कहें पर परोक्ष रूप से उनका प्रभाव अपने ऊपर पड़ता है। कम से कम जो बुराई उनमें हैं उनसे घृणा तो तुरन्त ही घट जाती है। शराब से अभी अपने को घोर घृणा है पर यदि अपने दो घनिष्ठ मित्र शराब के आदी और उनकी वह आदत अपने सामने ही चरितार्थ होती रहेगी तो अपने मन में जो घोर घृणा थी वह थोड़े ही दिनों में समाप्त हो जायगी। इतना ही नहीं शराब को उठाने, धरने, खरीदने लाने की भी झिझक जाती रहेगी और एक दिन उसे पीने लगने का भी अवसर आ सकता है। भले ही वे दोस्त उसके लिए कुछ भी आग्रह न करें पर दोस्ती और सम्पर्क के फलस्वरूप इतना प्रभाव तो अपने आप ही पड़ता है।

अच्छे व्यक्ति चाहे कुछ भी न कहें, कोई शिक्षा या आदेश भी न दें, पर उनके जीवन की स्वच्छता, शान्ति, पवित्रता एवं महत्ता स्वयमेव समीपवर्ती लोगों को यह सिखाती है कि इस मार्ग पर चलते हुए आदर्श एवं श्रेष्ठ जीवन व्यतीत किया जा सकता है। अच्छे लोगों के निकट का जो उत्कृष्ट वातावरण रहता है उसमें अच्छाइयाँ पनपती हैं। श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की और बुराइयाँ छोड़ देने की इच्छायें स्वयमेव उठने लगती हैं। कितने ही दोष-दुर्गुण तो उस उत्तम वातावरण के कारण अपने आप ही छूट जाते हैं, उसके कारण अपने को स्वयं ही लज्जा और ग्लानि होने लगती है, जिससे उन्हें छोड़ देने के लिए ही अग्रसर होना पड़ता है।

तीर्थ यात्रा का उद्देश्य

प्राचीनकाल में तीर्थ यात्रा का एक प्रमुख उद्देश्य यह था कि उत्कृष्ट चरित्र के, आदर्श जीवन व्यतीत करने वाले महापुरुष, ऋषि, तपस्वी जहाँ रहते हैं, वहाँ चलकर उनके सान्निध्य में श्रेष्ठ वातावरण का लाभ उठाया जाय। तीर्थ वह स्थान थे जहाँ महा−मानव निवास करते थे और आगन्तुकों को उत्कृष्ट जीवन की प्रेरणा प्रदान किया करते थे। इसी लाभ की आशा से सुदूर प्रदेशों की कठिन यात्रा करके लोग उन तीर्थों में पहुँचते थे और वहाँ के नदी सरोवरों में स्नान, देवालयों के दर्शन करने के अतिरिक्त देवत्व की सजीव प्रतिमाओं का ज्ञान गंगा में अन्तःकरण को नहलाने का भी लाभ प्राप्त करते थे। आज वह परिस्थितियाँ नहीं रहीं। तीर्थ केवल जलाशयों और देवालयों के बाह्य उपकरणों तक सीमित रह गये। फिर भी लोग बड़ी संख्या में अभी भी वहाँ पहुँचते हैं, इससे प्रतीत होता है कि सत्संग की पुण्य परम्परा को किसी समय कितना अधिक महत्व मिला हुआ था जिसकी रूढ़ि भी आज इतने समय पश्चात् भी, इतने विशाल परिमाण में विद्यमान है।

आत्म रक्षा के लिए उपेक्षा

हर साल रावण का पुतला जलाने और रामचंद्र जी को गद्दी पर बिठाने की रामलीला जगह−जगह होती है। इसका तात्पर्य यह है कि बुरे व्यक्तियों से दूर रहने और अच्छों के सम्पर्क में आने की हमारी प्रवृत्ति निरन्तर बढ़ती रहे। सम्पर्क बढ़ाते समय हमें सदा ही यह स्मरण रखना चाहिए कि यह व्यक्ति गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से किस श्रेणी का है। यदि उसमें बुराइयाँ अधिक और अच्छाइयाँ कम दिखाई दें तो अच्छा यही है कि उससे घनिष्ठता न बढ़ने दें। स्त्री−बच्चों को तो विशेषतया उनके सम्पर्क में आने से रोकें। क्योंकि वे बहुत भावुक एवं भोले होते हैं। चतुर, चालाक व्यक्ति आसानी से उन्हें बहका सकते हैं और उनमें अपनी बुरी आदतें प्रविष्ट कर सकते हैं। शिष्टाचार निबाहना बात दूसरी है। जरूरत पड़ने पर काम की बात भलमनसाहत के साथ हर किसी से करनी चाहिए। यह तो शिष्टाचार की माँग है। पर इतने से अधिक आगे यदि घनिष्ठता की ओर कदम बढ़ाते हैं तो सौ बार सोचना चाहिए कि वह व्यक्ति इसके उपयुक्त भी है या नहीं। अकेले बैठे रहना अच्छा है, समय को अच्छी पुस्तकें पढ़ कर या हरे जंगलों में घूम कर निकाल लेना अच्छा है, पर निकम्मे लोगों के साथ हा-हा, हू-हू करते हुए चाण्डाल चौकड़ी जमाना ठीक नहीं हैं। बुराई से बचने के लिए यह जरूरी है कि हम बुरे लोगों से बचे रहें।

स्त्री−बच्चों को सुरक्षा

आज की एक अत्यन्त विषम समस्या यह है कि हम बुरे लोगों के द्वारा निरन्तर फेंके जाने वाले दुष्प्रभाव से अपनी और अपने बच्चों की रक्षा कैसे करें? वयस्क व्यक्ति तो समझदार भी होते हैं, अपना भला बुरा सोच भी सकते हैं, पर स्त्री-बच्चों में यह बुद्धि भी ठीक तरह विकसित नहीं हो पाती, उनके लिए कुसंग विष की तरह घातक सिद्ध होता है। सभ्य घरानों के अनेकों बच्चे कुसंग में बिगड़ते हैं और वे ऐसे बिगड़ते है कि अपना और अपने परिवार का सर्वनाश ही कर बैठते हैं। घर से पैसे चुराकर मटरगश्ती के लिए दोस्तों के साथ भाग खड़े होने को अगणित घटनाऐं आये दिन सुनने में आती रहती हैं। घर में छोटी-मोटी कहा सुनी हो जाने पर भाग खड़े होना तो एक बहाना होता है, वस्तुतः पहले से ही दोस्त लोग स्वेच्छाचार की शिक्षा उन्हें देते रहते हैं और कोई छोटी-मोटी नाराजी का कारण प्रस्तुत होते ही वह शिक्षा सार्थक हो जाती है। कितने ही लड़के घर रहते हुए भी आवारागर्दी में दिन बिताते हैं। दूसरे आवारा लड़कों का साथ ही इसका प्रमुख कारण होता है। स्त्रियों का सम्पर्क यदि ऐसी नीच औरतों में रहे तो वे घर में ईर्ष्या द्वेष के बीज बोती रहती हैं। असंतोष उत्पन्न करने वालों, कलह भड़काने वालों, निराशा एवं खिन्नता उत्पन्न करने वालों के तौर तरीके ऐसे होते हैं जिनके कारण बने घर बिगड़ते देखे गये हैं। बिच्छू और काँतर से जिस प्रकार सावधान रहा जाता है उसी प्रकार कुसंग से भी बचाव रखा जाना चाहिए।

अखरने वाला सूनापन

साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह सदा अकेला नहीं रह सकता। उसे जन-सम्पर्क से ही सुख मिलता है और सूनापन अखरता है इसलिए अन्य जीवनोपयोगी आवश्यक साधन जुटाने के समान ही सुसंगति का भी आयोजन करना चाहिए। व्यस्त जीवन वाले व्यक्तियों ने इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए क्लबों की पद्धति निकाली है। समान विचारों और समान स्तर के लोग अपना एक संघ एवं क्लब बनाते हैं। नियत समय पर सब लोग इकट्ठे होकर मनोरंजन एवं ज्ञान वर्धन करते हैं। इस प्रकार सूनापन भी नहीं अखरता और संगति का लाभ भी मिलता रहता है। धार्मिक दृष्टि से जहाँ−तहाँ सत्संगों का आयोजन रहता है। प्राचीन काल में गुरु और शिष्य सत्संग भी करते थे। गुरुकुलों में केवल पढ़ना−लिखना ही नहीं सिखाया जाता था वरन् जीवनोपयोगी महत्वपूर्ण विषयों पर मार्मिक विचार−विनिमय भी होता था। शिक्षा के साथ सत्संग का समावेश होने से प्राचीन काल की शिक्षा प्रणाली सफल होती थी। अब केवल मात्र पढ़ने की व्यवस्था विद्यालयों से रह जाने से बालकों के आन्तरिक विकास की एक भारी कमी रह ही जाती है।

व्यस्तता आज हर आदमी को परेशान रखे हुए है। समय का सभी को अभाव है। दुर्गुणी लोग तो निठल्ले रह भी सकते हैं पर सद्गुणी लोग तो एक−एक क्षण को बहुमूल्य समझ कर निरन्तर कार्य व्यस्त रहते हैं। इसलिए कुसंग की अपेक्षा सत्संग प्राप्त करना आज अत्यधिक कठिन हो रहा है फिर भी इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए और जब भी जितना भी अवसर मिल सकता हो श्रेष्ठ पुरुषों की संगति का लाभ उठाना चाहिए। सभा सम्मेलनों के माध्यम से यदा-कदा सद्-विचारों की प्राप्ति होती रहती है। यद्यपि उतने मात्र से वक्ताओं से व्यक्तिगत सम्पर्क में आकर उनका चारित्रिक प्रभाव ग्रहण करने का अवसर नहीं मिल पाता तो भी विचारों का कुछ लाभ तो मिलता ही है। जिन सभा सम्मेलनों में जीवन विकास का उपयोगी शिक्षण प्राप्त होने की संभावना हो उनमें सम्मिलित होने का भी प्रयत्न करते रहने चाहिए।

सज्जनता से सम्पर्क बढ़े

यह एक तथ्य है कि कुसंग से बचना और सत्संग का लाभ उठाना दुष्प्रवृत्तियों के शमन और सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होता है। इस ओर उपेक्षा तनिक भी नहीं करनी चाहिए। यदि अपना सम्पर्क दुष्ट दुराचारी लोगों के साथ बन गया है तो उसे शिथिल करते चलना चाहिए और यदि सत्पुरुषों से अपना थोड़ा भी परिचय है तो उसे घनिष्ठता की दिशा में विकसित करना चाहिए। सम्पर्क से उत्पन्न होने वाले प्रभाव से हम अपरिचित न रहें, आज की परिस्थितियों में जबकि दोष−दुर्गुणों का ही चारों ओर साम्राज्य छाया हुआ है इस सम्बन्ध में सतर्क रहने की आवश्यकता है।

आत्म विश्वास और दृढ़ चरित्र की ऐसी मजबूत नींव अपनी मनोभूमि में जमानी चाहिए कि बुरे लोगों की बुराई उससे टकरा कर उसी प्रकार विफल हो जाय जैसे गैंडे की खाल से बनी ढाल से टकरा कर तलवार का वार विफल हो जाता है। विवेकशीलता और आत्मगौरव का ध्यान न रखते हुए सभी दुष्प्रभावों को निरस्त करते रहना चाहिए जो चारों ओर से निरन्तर अपने ऊपर हमला करते रहते हैं। उनकी ओर घृणा और तुच्छता के भाव रखकर हेय व्यक्तियों के दुष्कर्मों का हमें तिरस्कार करते रहना चाहिए। कभी भी उनके सामने आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। पाप के प्रति घृणा और पुण्य के प्रति श्रद्धा रखकर हम अपनी सत्प्रवृत्तियाँ को विकसित करते रह सकते हैं और साथ ही दुष्प्रवृत्तियों से आत्मरक्षा कर सकने में समर्थ भी हो सकते हैं।


प्रशंसा और प्रोत्साहन का महत्व

जिस प्रकार दूसरों को अपना समय, धन या सलाह देकर उनका कुछ न कुछ भला हम कर सकते हैं उसी प्रकार प्रोत्साहन देकर भी अनेकों की भलाई कर सकना संभव हो सकता है।

मनुष्य का मन सदा द्विविधा में डूबा रहता है। आशा-निराशा के झूले में झूलता हुआ वह आगे-पीछे होता रहता है। पाप और पुण्य की प्रवृत्तियाँ भी धूप छाँह की तरह उस पर काली-सफेद छाया डालती रहती हैं। सद्गुणों और दुर्गुणों के ज्वार भाटे भी आते रहते हैं। इन परस्पर, विरोधी वृत्तियों में जिसे आश्रय मिल जाता है वही जड़ पकड़ लेती है और जिसकी उपेक्षा होती है वह शान्त और समाप्त होने लगती है।

प्रोत्साहन की उपयोगिता

इन कोमल भावनाओं का विकास और विनाश दूसरों के प्रोत्साहन अथवा विरोध से बहुत कुछ संबंधित रहता है। साधारणतः लोग अपने बारे में कुछ ठीक विश्लेषण नहीं कर पाते। इसके लिए वे दूसरों की सम्मति पर अवलंबित रहते हैं। जब दूसरे लोग अपनी प्रशंसा करते हैं तो मन प्रफुल्लित होता है, गर्व अनुभव होता है और लगता है कि हम वस्तुतः प्रशंसनीय कार्य कर रहे हैं। पर जब औरों के मुँह से अपनी निन्दा, असफलता और तुच्छता की बात सुनते हैं तो दुःख होता है, मन टूटता है, निराशा आती है। प्रशंसा करने वाले के प्रति कृतज्ञता इसलिए मन में उठती है क्योंकि उसने हमारे सद्गुणों की चर्चा करके मानसिक उत्थान में भारी योग दिया है। वह हमें मित्र और प्रिय लगता है। पर जो लोग अपनी निन्दा करते हैं, वे शत्रु दीखते हैं, बुरे लगते हैं, क्योंकि उनने अपना बुरा पहलू सामने प्रस्तुत करके मन में निराशा और खिन्नता उत्पन्न कर दी। आत्म निरीक्षण की दृष्टि से अपने दोष, दुर्गुणों को ढूँढ़ना उचित है। किन्हीं घनिष्ठ मित्र को एकान्त में उनकी अनुपयुक्त गतिविधियों को सुधारने के लिए परामर्श देना भी उचित है। ऐसा करते समय हर हालत में यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि व्यक्तित्व का निराशात्मक चित्रण न किया जाय। किसी को भी लगातार खराब, अयोग्य, पापी, दुर्गुणी, दुष्ट, मूर्ख कहा जाता रहेगा तो उसका अन्तर्मन धीरे−धीरे उन कहे जाने वालो बातों को सत्य स्वीकार करने लगेगा। यदि यह मान लिया जाय कि हम वस्तुतः अयोग्य हैं, बुरे हैं तो फिर मनोभूमि ऐसी ढलने लग जायगी कि जिसमें हिम्मत टूट जाती है, निराशा घेर लेती है, और कोई काम करते हुए मन भीतर ही भीतर सकपकाता रहता है कि कहीं काम बिगड़ न जाय और मूर्ख न बनना पड़े। इस सकपकाहट में हाथ-पैर फूल जाते हैं और बने काम भी बिगड़ने लगते हैं।

प्रेरणा का प्रभाव

कहते हैं कि एक बार कुछ चालाक लड़कों ने छुट्टी पाने के लिए षडयन्त्र रचा कि मास्टर को बीमार बनाया जाय और छुट्टी होने पर मस्ती की जाय। उनमें से एक ने मास्टर के पास जाकर गम्भीरता से कहा−‛गुरुजी आप बीमार मालूम पड़ते हैं।’ मास्टर ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। कुछ देर बाद दूसरे लड़के ने उनके पास जाकर चिन्ता व्यक्त की—‛आज तो आपका चेहरा बहुत उदास है, आँखें लाल हो रही हैं और बीमारी जैसे लक्षण प्रतीत होते हैं।’ इसी प्रकार एक−एक करके और लड़के भी आये और उनने भी वही बात दुहराई। बेचारे मास्टर के मन पर उनकी छाप पड़ी और वह सचमुच ही अपने आपको बीमार अनुभव करने लगा। और स्कूल की छुट्टी करके घर चला गया। लड़कों ने अपनी चालाकी से मनोरथ पूरा कर लिया।

विश्वास की शक्ति

जर्मनी के एक वैज्ञानिक ने दूसरों की बात का मनुष्य के मन पर किस हद तक बुरा प्रभाव पड़ सकता है इसका परीक्षण करने के लिए एक मृत्यु दण्ड वाले कैदी को प्राप्त किया और उसे विश्वास की शक्ति द्वारा मार डालने का प्रयोग किया। कैदी को एक मेज पर लिटा दिया गया। आँखों पर पट्टी बाँध दी गई। गले के पास एक जरा सी पिन चुभो दी गई। पानी की एक हलकी धारा गले को छूती हुई बहती रहे ऐसी नली सटा दी गई। नीचे टपकने वाले पानी को इकट्ठा करने के लिए एक बाल्टी रखी गई। कैदी को कहा गया कि उसके रक्त की एक आवश्यक कार्य के लिए जरूरत है, इसलिए मृत्यु दण्ड की यह व्यवस्था की गई है कि कष्ट भी कम हो, सारा रक्त निकल जाने से मृत्यु भी हो जाय और आवश्यक कार्य के लिए रक्त भी प्राप्त हो जाय। इसलिए वह चुपचाप लेटा रहे कुछ ही देर में उसकी मृत्यु शान्तिपूर्वक हो जायगी।

कैदी ने वैज्ञानिक की बात पर विश्वास कर लिया। गले के पास से नली द्वारा बहते हुए और नीचे बाल्टी में टपकते हुए पानी को वह अपना रक्त समझने लगा। डाक्टर लोग बार-बार उसकी नाड़ी देखते और झूठ-मूठ यह कहते कि इसका रक्त निकल चुका अब इतना और रहा है, इतनी देर में बेहोशी आने वाली है और इतनी देर में मृत्यु हो जायगी। कैदी डाक्टरों के कथन पर विश्वास करता गया अतः ठीक समय पर उसकी मृत्यु हो गई। तब वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि विश्वास के आधार पर किसी व्यक्ति को इतना प्रभावित किया जा सकता है कि उसकी मृत्यु तक हो जाय।

ठगी का षडयन्त्र

पंचतंत्र में एक कथा आती है कि एक व्यक्ति अपने कंधे पर बकरी लादे कहीं जा रहा था। ठगों ने उसे बहका कर बकरी प्राप्त करने का षडयंत्र बनाया। रास्ते में सब ठग दूर−दूर बिखर गये। एक ठग रास्ते में उस व्यक्ति को मिला, उसने कहा, “कंधे पर कुत्ता रख कर कहाँ लिये जा रहे हो?” पथिक ने उत्तर दिया, ‛यह तो बकरी है।’ ठग ने कहा−किसी जादूगर ने तुम्हें भ्रमित करके बकरी के बदले कुत्ता दे दिया मालूम पड़ता है। यदि तुम्हें संदेह हो तो आगे रास्ते में मिलने वाले यात्रियों से पूछना। पथिक के मन में संदेह उत्पन्न हो गया। उसने कुछ दूर पर मिले यात्री से पूछा। मेरे कंधे पर क्या है? उस यात्री वेशी ठग ने पूर्व निश्चित षडयंत्र के अनुसार उत्तर दिया−कुत्ता। अब तो उसका संदेह और भी बढ़ा और सोचने लगा सचमुच मुझे जादू से भ्रमित करके बकरी के बदले कुत्ता दे दिया गया है। आगे कुछ−कुछ दूरी पर दूसरे और दो ठग मिले। उनसे पूछा तो उनने भी बकरी को कुत्ता बताया। अन्त में पथिक को विश्वास हो गया कि यह बकरी नहीं कुत्ता है। अन्ततः वह उसे रास्ते में ही छोड़कर चल दिया। ठगों ने वह छोड़ी हुई बकरी प्राप्त कर ली और अपनी मनोवैज्ञानिक चतुरता का लाभ उठाया।

मान्यताओं का प्रभाव

भेड़ों के झुण्ड में पले हुए सिंह शावक की कथा प्रसिद्ध है जो अपने को भेड़ ही समझता था और घास खाता था। दूसरे सिंह द्वारा उद्बोधन करने पर ही उसे आत्मज्ञान हुआ था और तब वह पुनः अपने को सिंह समझने और वैसा ही आचरण करने में समर्थ हुआ था। हम सब इसी प्रकार की भेड़ें बने हुए हैं। जैसा हमने अपने को समझा है, दूसरों ने जैसा कुछ हमें हमारा स्वरूप समझाया है वैसे ही तो हम बने और ढले हैं। करोड़ों अछूत अपने से उच्च वर्ण वालों को छूने और उनके साथ बैठने में संकोच करते हैं, लोगों द्वारा उन्हें अछूत कहे जाने पर वे सचमुच अपने को वैसा ही समझने भी लगते हैं। भूत का भय ऐसी ही भ्रान्तियों पर निर्भर है। दूसरों से भूतों की कहानियाँ सुनते−सुनते लोग उस बात पर विश्वास करने लगते हैं। छोटी−मोटी बीमारी को भूत की करतूत मान लेते हैं और फिर स्याने ओझा जब भूत बाधा की पुष्टि करते हैं तो वह बात और भी गहराई तक मन में बैठ जाती है। फिर वह भूत प्राण लेकर ही पीछा छोड़ता है। विश्वास की शक्ति अपार है। दूसरों के कहने का मनुष्य पर यह प्रभाव पड़ता है कि वह अपने को सचमुच की वैसा मानने लगता है सूने मकानों में चूहों की खटपट में और सुनसान रात में झाड़ी की छाया में भूत नाचते दीखते हैं। उनसे डर कर कई तो बीमार होते और मरते तक देखे गये हैं। डर अपने आप में एक तथ्य है जो विष से कम नहीं अधिक ही घातक सिद्ध होता है।

बालकों की मनोदिशा

व्यक्ति अपने बारे में जैसी ही निन्दा−प्रशंसा की, छोटे या बड़े होने की, नर या नारी होने की बातें सुनता रहता है तो उसकी मान्यता अपने बारे में वैसी ही बन जाती है। बच्चे जन्म से यह नहीं जानते कि यह लड़की है या लड़का। पर जब घर वाले लड़की-लड़कों के बीच भिन्न प्रकार के वस्त्र व्यवहार एवं भाषा में बात करते हैं तब वे अपनी भिन्नता पर विश्वास कर लेते हैं। यदि उनके साथ यह भेद न बरता जाय और उन्हें अन्तर समझने का अवसर न मिले तो वे सब प्रकार समता का आचरण करने लगेंगे। अति प्यार और अति प्रशंसा से बालक जहाँ जिद्दी और अहंकारी बनते है वहाँ वे बार−बार निन्दा एवं तिरस्कार से अपनी दीनता और तुच्छता भी अनुभव करने लगते हैं। जिन बच्चों को आरंभिक जीवन में बार−बार बेवकूफ, नालायक, बदमाश आदि कहा जाता रहा है उनका व्यक्तित्व जीवन में प्रभावशाली बन न सकेगा। जिन बच्चों को बचपन में स्नेह और सम्मान नहीं मिल पाता वे बड़े होने पर निष्कृष्ट प्रवृत्तियों से ग्रसित बन जाते हैं। बच्चों के लिए जहाँ अच्छे लालन−पालन की, अच्छे आहार−विहार की आवश्यकता रहती है वहीं यह भी नितान्त आवश्यक होता है कि उन्हें स्नेह और सम्मान की मात्रा प्राप्त होती रहे। व्यक्तित्व का विकास और निखार प्रोत्साहन और प्रशंसा के आधार पर होता है। अन्न और जल जिस प्रकार शारीरिक विकास के लिए आवश्यक हैं उसी प्रकार मानसिक विकास के लिए प्रशंसा और प्रोत्साहन की उपयोगिता मानी गई है।

बच्चे हों या बड़े यह आवश्यकता सभी में समान रूप से बनी रहती है। ऐसे मनस्वी तो कोई−कोई ही देखे जाते हैं जो दूसरों की प्रशंसा का ध्यान न करके अपने प्रबल आत्मविश्वास के आधार पर अपना उत्कर्ष स्वयं करते हैं और विपन्न परिस्थितियों में भी साहस को बनाये रहते हैं। साधारणतः तो यही परम्परा चलती है कि प्रेरणा और प्रशंसा से प्रोत्साहित होकर लोग अपने मन को बढ़ाते और घटाते रहते हैं।

अच्छाइयाँ ढूँढ़ें प्रशंसा करें

हमें अपने सभी स्वजन संबंधियों की, परिचित− अपरिचितों की सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते रहना चाहिए। ढूँढ़ने पर हर किसी में कुछ गुण मिलते हैं, अच्छाइयों से रहित इस धरती पर कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ। जिसमें जो सद्गुण दीख पड़े उनकी चर्चा उस व्यक्ति के सामने की जाय कि वह इन गुणों को बढ़ाते हुए एक दिन बहुत उन्नतिशील बन सकता है, तो निश्चय ही इस प्रशंसा का प्रभाव उस पर पड़े बिना न रहेगा। प्रशंसक बनकर हम हर व्यक्ति के मित्र बन सकते हैं। उसे समझाने और सुधारने में भी सफल हो सकते हैं। पर यदि निन्दा और भर्त्सना करना ही हमने सीखा है तो सब कोई अपने शत्रु बनते जायेंगे और अपनी सीख को भी दुर्भावना मान कर उसके प्रतिकूल आचरण करेंगे। सुधार की दृष्टि से कभी−कभी मधुर शब्दों में दोषों को बहुत ही आत्मीयता से एकांत में बता देना भी उन्हें सुधारने की बात की जा सकती है और यह सब बहुत ही सावधानी से आत्मीयता और सौजन्य के वातावरण में कहा जान चाहिये और समझाने के बाद अन्त में फिर एक बार अपनी सद्भावना और आत्मीयता की सफाई दे देनी चाहिए कारण यह है कि कोई व्यक्ति यह मान ले कि अमुक व्यक्ति मुझसे घृणा करता है तो फिर वह उसके प्रति शत्रुता जैसी दुर्भावना रखने लगता है। तब उसकी सलाह को भी वह दो कौड़ी का महत्व देता है। इसलिए सुधारात्मक, आलोचनात्मक चर्चा बहुत ही सावधानी से, नपे तुले और स्नेह शिष्टाचार मिश्रित मधुर शब्दों में ही करनी चाहिए और ऐसे अवसर कभी−कभी ही आने देने चाहिए।

हम निन्दक नहीं, प्रशंसक बनें

आमतौर से हमें प्रशंसक की ही भूमिका प्रस्तुत करते रहना चाहिये जिससे उनके सद्गुण बढ़ें। साहस और आत्मविश्वास बढ़ा कर ही किसी को श्रेष्ठता के कठिन सन्मार्ग पर चलाया जाना संभव हो सकता है। दमन और दंड से, निन्दा और तिरस्कार से कोई दुर्गुण दब तो जाते हैं पर अवसर मिलने पर वे प्रतिहिंसा के साथ और भी भयंकर रूप में प्रकट होते हैं। दोषों का उन्मूलन तो गुणों की वृद्धि से ही संभव है। गुणों को बढ़ाने में प्रोत्साहन और प्रशंसा का मार्ग सर्वश्रेष्ठ है। स्वच्छ वायु फेफड़ों में भरने से पुरानी गंदी वायु को बाहर निकालना ही पड़ता है। सद्भावनाएँ बढ़ने से दुर्भावनाएँ घटती ही हैं। सुधार का यही मार्ग अधिक प्रामाणिक और सुनिश्चित सिद्ध होता है।

शत्रुओं की संख्या घटाने और मित्रों की संख्या बढ़ाने का सबसे सरल और सबसे प्रभावशाली तरीका यह है कि हम दूसरों के गुणों को देखें, अच्छाइयों की चर्चा करें और अपनी प्रसन्नता एवं भविष्य में और प्रगति की आशा व्यक्त करें। यह स्वभाव बना लेने पर हम दूसरों को अच्छाई के मार्ग पर बहुत आगे बढ़ा सकते हैं, बहुत सुधार सकते हैं और उनके मनोबल में भारी अभिवृद्धि कर सकते हैं। बिना कौड़ी, छदाम खर्च किये दूसरों का भारी उपकार कर सकने का यह गुण यदि अपने में विकसित हो जाय तो परमार्थ का बहुत पुण्य प्राप्त हो, साथ ही अपने मित्रों की संख्या अत्यधिक हो जाने से उन्नति, प्रगति, सहयोग और सम्मान का मार्ग भी प्रशस्त बने। अपने स्वभाव, दृष्टिकोण और संभाषण में हमें इतना सुधार तो कर ही लेना चाहिए। जीवन विद्या के इस अत्यधिक महत्वपूर्ण तथ्य को हमें हृदयंगम कर ही लेना चाहिए।

शत्रुता की मित्रता में परिणित

कथा है कि विश्वामित्र ने वशिष्ठ के पुत्रों को मार डाला और वे छिपकर यह सुनने लगे कि देखें वशिष्ठ मेरे बारे में क्या कहते हैं। वशिष्ठ जी अपनी धर्मपत्नी के शोक को शान्त करते हुए यही समझा रहे थे कि ‘विश्वामित्र बड़े तपस्वी हैं। यह दुष्कर्म तो वे किसी आवेश में कर बैठे हैं। हमें उनसे प्रतिशोध नहीं लेना चाहिए। उनकी श्रेष्ठता कभी−न−कभी निखरेगी और उससे संसार का बड़ा हित साधन होगा। राज्य त्याग कर तपस्या में प्रवृत्त होने वाले विश्वामित्र स्वभावतः दुष्ट नहीं हो सकते। यह दुष्कर्म तो उनसे भूल में ही बना होगा।” कुटिया के पीछे छिपे विश्वामित्र ने जब वशिष्ठ के मुँह से अपनी प्रशंसा सुनी तो वे पानी−पानी हो गये और वशिष्ठ के चरणों पर गिर कर अपनी भूल के लिए फूट−फूट कर रोने लगे। सुधार का यही सबसे प्रभावशाली तरीका है।

अपने घर के स्त्री, बच्चों में, भाई-भतीजों में जो भी सद्गुण हमें दीखें उनकी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करनी चाहिए। प्रोत्साहन और प्रशंसा करने में जिसकी जीभ रुकती है वह सबसे निकृष्ट कोटि का कंजूस है। जेब से पैसा खर्च नहीं कर सकते, समय लगा कर सेवा नहीं कर सकते तो जबान हिला कर अच्छी, उत्साह भरी, चित्त को सान्त्वना और साहस प्रदान करने वाली बातें तो कह ही सकते हैं। हमारा यही रवैया होना चाहिए। गुण देखें, गुणों की चर्चा करें, गुणवानों को प्रोत्साहित करें तो अपना यह स्वभाव दूसरों के लिए ही नहीं अपने लिए भी परम मंगलमय सिद्ध हो सकता है।


आलस में समय न गवावें

हीरा मूल्यवान होते हुए भी उसकी ठीक कीमत जौहरी की दुकान पर ही प्राप्त होती है। बच्चों के खेल-खिलौनों में वह काँच के एक टुकड़े की तरह पड़ा रह सकता है पर उसका कोई गौरव और महत्व वहाँ प्रकट नहीं होता। मनुष्य का जीवन मूल्यवान होते हुए भी उसकी कदर तब खुलती है जब उसका मूल्यांकन किये हुए कार्यों के आधार पर किया जाता है। किसी प्रकार दिन काट लेना और साँसें पूरी कर लेना एक बात है, यदि जीवन का पूरा लाभ उठा लें तो दूसरी। जिसे अपना जीवन व्यर्थ नहीं गवाँना है, भार की तरह जिन्दगी का बोझ किसी प्रकार ढोते ही रहना नहीं है, उसे यह प्रयत्न करना होता है कि मानव जीवन के बहुमूल्य क्षणों का समुचित सदुपयोग कर लिया जाय।

तेजी और चमक का माध्यम

हथियारों की धार तब तेज होती है जब शान के पत्थर पर घिस कर उन पर धार धरी जाती है। रगड़ के बिना चमक नहीं आती। मैले कुचैले बर्तनों को मिट्टी से माँजकर स्वच्छ और चमकदार बनाया जाता है। मनुष्य का जीवन भी परिश्रम की धार धरने से ही चमकदार बनता है। लोहे के मामूली टुकड़े खराद पर खरादे जाने से बहुमूल्य उपयोग पुर्जे बन जाते हैं जो किसी मशीन के अंग बन कर बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं। मनुष्य जीवन लोहे का टुकड़ा कहा जाय तो परिश्रम को खराद मानना पड़ता है। जो जितना परिश्रमी है वह उतना ही अपने जीवन को सार्थक बना लेता है।

तामसिक प्रकृति का प्रधान लक्षण क्रोध नहीं आलस है। क्रोध को तमोगुणी कहते हैं। पर गहराई से विचार किया जाय तो क्रोध की अपेक्षा आलस की हानि अधिक है। क्रोध से रक्त सूखता है, द्वेष बढ़ता है, अस्त-व्यस्तता उत्पन्न होती है आदि अनेकों हानियाँ हैं, पर सजीवता बने रहने का एक उपयोग तो उसमें भी है। किन्तु आलस में तो वह भी नहीं है। जिसे श्रम से अरुचि है वह तो एक प्रकार का मुर्दा ही कहा जायेगा। जीवन के चिह्न है प्रेरणा, स्फूर्ति, उत्साह, लगन, प्रसन्नता आदि। जिसमें से यह तत्व घट गये हैं, काम करने की बात सुनकर जिसका जी दुखी होता है, जिसे पड़े रहना और किसी प्रकार वक्त गुजारते रहना प्रिय है उस आलसी को जीवितमृत ही कहा जायेगा।

समय काटा न जाय

यों समय काटने के लिए निकम्मे और निठल्ले आदमी भी कुछ न कुछ काम निकालते हैं। गप्पें हाँकने, मटरगश्ती करने, ताश खेलने, सिनेमा देखने, बेकार काम में चौधरी बनने, दूसरों के कामों में अकारण टाँग अड़ाने की, यारबाजी की आदत आलसी लोगों में पाई जाती है। उन्हीं के जैसे अन्य निठल्ले लोग चौकड़ी जमाकर बैठ जाते हैं और यारबाजी के शुगल चलने लगते हैं। उस चौकड़ी में प्रेम, सिद्धान्त, कार्यक्रम एवं कारण का कोई आधार तो होता नहीं, समय काटने के लिए ही इकट्ठे होते हैं। बेकार की बातों में, व्यसनों में इस सम्मिलिन से वृद्धि ही होती है। इस प्रकार की चौकड़ी जमना इन निठल्लों के दोष और दुर्गुणों को बढ़ाने में ही सहायक होता है।

बेकारी अर्थात् बर्बादी

कहावत है—‟खाली दिमाग शैतान की दुकान।” जो बेकार रहेगा उसे शैतानी सूझेगी। कुछ दिन पहले इस देश में राजा, रईस, अमीर, उमराव, जमींदार साहूकार, महंत, मठाधीश बहुत थे। उनके पास आमदनी बहुत थी और नौकर चाकरों के बलबूते पर उनका व्यापार चलता रहता था। इस बचे हुए समय का उपयोग आमतौर से खुराफातों में होता था। बहुत कम लोग इन वर्गों में ऐसे थे जो अपने समय को किसी मूल्यवान कार्य में लगाते थे। अब यह वर्ग घट रहे हैं। परिस्थितियों ने उन्हें श्रम करने और सुधरने के लिए विवश किया है। यह विवशता उपयोगी भी है और आवश्यक भी। बेकारी की समस्या इसीलिए खतरनाक नहीं मानी जाती कि उन दिनों आदमी कमाता नहीं वरन् मुख्यतया इसलिए उसे भयंकर मानते हैं कि बेकार आदमी को उत्पात ही सूझेंगे। बुरे विचार उसके मस्तिष्क में उठेंगे और बुरे कामों की ओर अग्रसर होगा। बुराई का आज चारों ओर बाहुल्य है। उसी का प्रसार एवं आकर्षण भी प्रबल है, बेकार आदमी सहज ही उस ओर आकर्षित होते हैं। कार्यव्यस्त व्यक्ति फुरसत न मिलने के कारण बुराइयों से बचा रहता है। पर बेकार आदमी के लिए तो सर्वनाश का द्वार खुला पड़ा रहता है।

आलस से विनाश

बेकारी का कारण सदा काम का अभाव ही नहीं, बहुधा आलस भी होता है। नौकरी के लिए दर−दर ठोकरें खाते फिरने वालों में से अधिकाँश वे होते हैं जो ऊँची आमदनी की, कुर्सी पंखे की, बिना मेहनत की नौकरी चाहते हैं, श्रम करने में जिनका जी दुखता है, मेहनत मजूरी से जिन्हें अपनी शान और इज्जत घटती मालूम पड़ती है। उनके लिए बाबूगीरी की नौकरियाँ मिलना मुश्किल हो सकती हैं, पर परिश्रम करने वाले के लिए काम की कहीं कमी नहीं है। ज्यादा पैसे का नहीं, बड़ा न सही हर आदमी को हर जगह काम मिल सकता है। और बहुत न सही थोड़ा तो वह कमा ही सकता है। थोड़ी भी कमाई न हो तो समय की बेकारी तो किसी काम में लगे रहने से बच ही जाती है। खुराफात में मन दौड़ने का अवसर नहीं मिलता, यह भी क्या कुछ कम लाभ है। पुरानी कहावत है कि —‟कुछ न कुछ किया कर। कुछ न हो तो पाजामा उधेड़ कर सिया कर।” बेकारी का वक्त बेकार बातों में गँवाने की अपेक्षा यह अच्छा है कि पाजामा उधेड़ने और सीने की कला का अभ्यास होता रहे और उस कार्य में हाथ सध जायँ।

पाकिस्तान के बटवारे के समय लाखों पंजाबी, सिन्धी बे-घरबार हुए। वे देश के विभिन्न भागों में फैले और बसे। उनके पास तत्काल कोई काम न था। पर उन्होंने अपनी सूझ-बूझ और उद्योगशीलता के आधार पर हर जगह काम प्राप्त कर लिया। आरम्भ छोटे से किया, पीछे अपनी मेहनत और बुद्धिमता के आधार पर अच्छी स्थिति प्राप्त कर ली। न तो उन्होंने किसी के आगे हाथ पसारा और न कहीं नौकरी के लिए ठोकरें खाई। कारीगरों की हर क्षेत्र में आवश्यकता है। देश में उद्योग धंधे बढ़ रहे हैं, उनके लिए कुशल कारीगरों की भारी कमी रहती है। उन्हें आजीविका भी अच्छी मिलती है और स्वास्थ भी ठीक रहता है। बाबूगीरी की अपेक्षा लोग मेहनतकश बनने को तैयार हों तो उनकी शान शेखी में ही थोड़ी कमी हो सकती है पर लाभ उन्हें भी होगा और सारे समाज को भी।

अनुत्साह और अरुचि

आलस में हमारा आधे से अधिक समय बर्बाद होता है। अनुत्साह और अरुचिपूर्वक किया हुआ कोई भी काम दूना समय लेता है और परिणाम में आधा पूरा हो पाता है। जेल के कैदी की मनोवृत्ति से किया हुआ काम कुछ−कुछ तभी अच्छा रह सकता है जब उस पर दण्ड की कठोर व्यवस्था रहे। अन्यथा वह सब कार्य ढीला पोला और काना कुबड़ा ही बन सकेगा। शारीरिक आलस, वस्तुतः मानसिक आलस की उपज होता है। जो लोग खिच−खिच−खिच−खिच करते तो सारे दिन हैं पर कार्य का परिमाण जरा सा दिखाई देता है उन्हें अनुत्साही और आलसी ही कहा जायेगा। कितने ही लोग बहुत काम होने और फुरसत न मिलने का रोना रोया करते हैं। वस्तुतः उन्हें काम की ठीक व्यवस्था नहीं आती। यदि समय का ठीक विभाग करके, उचित समय में उचित कार्य किया जाय तो अब की अपेक्षा हम दूना-चौगुना काम कर सकते हैं। विश्व के श्रम संगठन की रिपोर्ट है कि भारतीय मजदूर की अपेक्षा अमरीकी मजदूर प्रायः साढ़े तीन गुना अधिक काम करता है। पूरे परिश्रम से काम करने पर परिणाम भी अधिक होता है और उसका लाभ श्रमिक तथा कराने वाले दोनों को ही मिलता है। काम की गति मंद कर देने में दोनों को ही हानि होती है।

जड़ता की ओर न बढ़ें

सरकारी दफ्तरों में काम की गति मंद कर देने का इन दिनों एक नया फैशन चला है। बाबू लोग इस कोशिश में रहते हैं कि उन्हें कम से कम काम करना पड़े। जानकारों का कथन है कि बीस वर्ष पूर्व जितना काम एक बाबू निबटाता था अब दो भी उतना नहीं करते। इस प्रकार जड़ता की ओर अन्य वर्ग भी चल रहे हैं। इसका परिणाम न व्यक्ति के लिए श्रेयस्कर है न राष्ट्र के लिए। पारिश्रमिक अधिक लिया या दिया जाना चाहिए पर श्रम में जड़ता उत्पन्न करना प्रत्येक दृष्टि से अनुपयुक्त है।

जिन लोगों ने जीवन में कोई महत्वपूर्ण कार्य किये हैं उनने समय और श्रम का महत्व पहचाना है। एक क्षण भी बिना बेकार गँवाये वे पुरुषार्थ में संलग्न रहे हैं। यह सोचना गलत है कि पड़े रहने से स्वास्थ्य बनता और श्रम करने से बिगड़ता है। सही बात इससे बिलकुल उलटी है। परिश्रमी ज्यादा दिन जीते हैं अधिक निरोग रहते हैं जब कि आलसी के अंग-प्रत्यंगों में जड़ता का प्रवेश हो जाने से जीवनीशक्ति घटती और दुर्बलता, बीमारी और अकाल मृत्यु की संभावना तेजी से बढ़ती है। स्त्रियों में जब तक चक्की पीसने, पानी खींचने, गोबर थापने आदि का परिश्रम करने की आदत बनी रही तब तक उनका स्वास्थ्य काफी अच्छा रहता था और प्रसव हँसते खेलते हो जाता था। अब जब कि उन कामों को महिलायें अपनी शान के खिलाफ समझती हैं तो बीमारियों की शिकार बनी रहती हैं, प्रसव बहुत ही कष्टदायक और कई बार तो प्राणघातक होते हैं। इस प्रकार आलस का उन्हें महँगा मूल्य चुकाना पड़ रहा है। हर काम के लिए कुली और हर कदम के लिए सवारी ढूँढ़ने वाले “बड़े आदमी” भी इसी प्रकार अपने स्वास्थ्य को बुरी तरह नष्ट करते चले जा रहे हैं।

बुढ़ापा अकर्मण्यता के लिए नहीं

बुढ़ापे का बहाना लेकर काम से जी चुराना यह बुरी और भोंड़ी आदत है। बुढ़ापे में कठोर काम करने में बेशक कठिनाई होती है पर हलके काम तो मरते दम तक करते रहा जा सकता है। गाँधी जी की मृत्यु 80 वर्ष की आयु में हुई है, वे उन दिनों भी पूरे समय काम करते थे। विनोबा की आयु इस समय 70 वर्ष की है वे देश के कोने−कोने में नैतिक क्रान्ति का सन्देश लिए घूम रहे हैं। राजगोपालाचार्य 80 वर्ष के हैं वे काँग्रेस को पलटाने का हौंसला दिखा रहे हैं। पंडित नेहरू 72 वर्ष की आयु में नौजवानों की तरह अठारह घण्टा अभी भी काम कर रहे हैं। संसार में सभी विचारशील व्यक्ति जिन्हें जीवन का मूल्य और महत्व मालूम है बिना जवानी-बुढ़ापे का ख्याल किये निरन्तर कार्य संलग्न रहते हैं। श्रम किस प्रकार का हो यह शारीरिक और मानसिक स्थिति को देखते हुए बदला जा सकता है पर नियमित रूप से कुछ उपयोगी काम तो मरते समय तक करते ही रहना चाहिए। बेकारी से बड़ी विपत्ति दूसरी नहीं है। यह सोचना नितान्त मूर्खता है कि जो बैठे रहते हैं, जिनके दिन आराम से कटते हैं, वे भाग्यवान हैं। वस्तुतः उन्हें अभागे ही कहना चाहिए क्योंकि समय और सामर्थ्य रहते हुए भी वे श्रम जैसे मित्र का तिरस्कार करके जीवन के बहुमूल्य क्षणों को व्यर्थ गँवा रहे हैं, उनका कोई भी लाभ नहीं उठा पा रहे हैं।

आमतौर से हमें जितना काम करना पड़ता है यदि उसे उत्साह और व्यवस्था के वातावरण में किया जाय तो वह अब की अपेक्षा आधे समय में पूरा हो सकता है। उत्साह और मनोयोग के साथ जो कार्य किया जाता है वह मनोरंजन ही बन जाता है और उसमें थकान नहीं आती। खिलाड़ी लोग गेंद खेलने में कितनी भाग−दौड़ करते हैं पर उन्हें थकान नहीं आती। जो भी काम भार समझ कर न किया जायेगा, मनोरंजन की तरह निपटाया जायेगा वह आनंद प्रदान करेगा और उत्साह भी, थकान तो उससे आवेगी ही नहीं। यदि मनोरंजन के लिए, खेल-कूद के लिए कोई समय निकालना हो तो वह भी निर्धारित और निश्चित होना चाहिए। थोड़े समय का मनोरंजन लाभदायक हो सकता है, पर खेल-कूद और मनोरंजन की बात ही सदा सोचते रहना और शरीर एवं मस्तिष्क को परिश्रम से बचाये फिरना अबुद्धिमत्तापूर्ण ही कहा जायेगा।

जीवन का सदुपयोग

आजीविका उपार्जन के लिए नियमित समय के अतिरिक्त हर आदमी के पास काफी समय बचता है। उसे अध्ययन में, अपनी योग्यता बढ़ाने में, व्यवस्था में, सफाई में, सेवा कार्यों में परमार्थ में या ऐसे ही अन्य उपयोगी कार्यों में लगाया जा सकता है। एकमात्र आजीविका कमाना ही समय का सदुपयोग नहीं है। अपने में वे अन्य विशेषताऐं भी उत्पन्न करनी चाहिएं जो आत्मिक दृष्टि से हमें उच्च कोटि के सत्पुरुषों की श्रेणी में पहुँचाती हैं। अगले जन्म के लिए श्रेष्ठ संस्कार धारण करके जाने से ही अपने उत्कर्ष की प्रक्रिया आगे चलती रह सकती है। इसकी तैयारी श्रेष्ठ कर्मों को अपनाये रहने से ही होती है। निरालस्य होकर हमें उस प्रकार के कार्यों में भी अपना समय लगाते रहना चाहिए। समय ही मानव जीवन की सच्ची सम्पत्ति है। जिस प्रकार हम अपना एक आना भी व्यर्थ नहीं खोते उसी प्रकार समय की भी पूरी सँभाल रखनी चाहिए और हर क्षण का उचित लाभ उठाने के लिए उसे श्रम के साथ संलग्न रखे रहना चाहिये।


मितव्ययिता और आर्थिक सन्तुलन

जीवनोपयोगी वस्तुओं को प्राप्त करने एवं विकास, मनोरंजन के साधन जुटाने के लिए धन की आवश्यकता पड़ती है। मानव−समाज जैसे−जैसे संबद्ध, व्यस्त, दुर्बल, विलासी और विज्ञान पर निर्भर होता चला जा रहा है वैसे−वैसे उसे धन की आवश्यकता और अधिक अनुभव होती जाती है। आर्थिक गोरखधन्धे ने महँगाई बुरी तरह बढ़ा दी है। साधारण जीवनयापन भी अब बहुत महँगा हो गया है। ऐसी दशा में अधिक धन की आवश्यकता हर किसी को अनुभव होती है। जिसके पास प्रचुरता है उसे अधिक सुविधा रहती है और जिसके पास कमी है वह अभाव एवं कठिनाई अनुभव करता है। सभी यह चाहते हैं कि आर्थिक स्थिति ठीक रहे, गरीबी और तंगी का कष्ट न भोगना पड़े। तृष्णा से प्रेरित होकर अनावश्यक धन जमा करते जाना और महल, जायदाद बढ़ाते चलना अर्थ−विषमता एवं समाज संकट पैदा करने वाला कहा जा सकता है, पर जीवनोपयोगी कार्यों के लिए उचित मात्रा में धन की आवश्यकता तो विरक्त महात्माओं से लेकर अशक्त अपंगों तक और गृहस्थों से लेकर बालकों तक सभी को बनी रहती है। अर्थ समस्या का समाधान होने से एक बड़ी चिन्ता दूर हो जाती है।

सन्तुलन बिगड़ने न दिया जाय

इस समस्या का हल दो प्रकार से सम्भव है- एक आमदनी बढ़ना, दूसरा खर्च घटना। दोनों का सन्तुलन ठीक रखने से यह चिंता सहज ही दूर हो जाती है। यदि इन दोनों में असंतुलन बना रहे तो गड़बड़ी उत्पन्न होती रहेगी। यदि आमदनी बहुत हो और खर्च कम हो तो धन जमा होता चला जायेगा। इस संग्रह के फलस्वरूप उत्तराधिकारियों में लालच, चोर, डाकू, उधार के नाम पर हड़पने के आकांक्षी, शत्रु, ईर्ष्यालु बहुत बढ़ेंगे और अपने में भी कंजूसी, तृष्णा, व्यसन, व्यभिचार, अहंकार आदि कितने ही दोष-दुर्गुण पैदा होंगे। इसके विपरीत यदि खर्च बढ़ा हुआ रहेगा तो सदा अभावग्रस्तता, गरीबी, कठिनाई अनुभव होती रहेगी और कर्जदारी का कलंक सिर पर चढ़ने लगेगा। इसलिए यह नितान्त आवश्यक है कि अर्थ समस्या सुलझी रखने के लिए आमदनी और खर्च का संतुलन ठीक रखा जाय।

आमदनी बढ़ाने के लिए स्वभावतः हर व्यक्ति इच्छुक और चिन्तित रहता है। इसके लिए उसे जो सूझ पड़ता है, वह करता भी है। आज का राजनैतिक और आर्थिक ढाँचा ऐसा है जिसमें अमीरों को अधिक अमीर और गरीबों को अधिक गरीब बनने की सम्भावना अधिक है। फिर भी अपनी बुद्धि, सुविधा और परिस्थिति के अनुसार हर आदमी आमदनी बढ़ाने की चेष्टा करता रहता है। कौन व्यक्ति, किस स्थान पर, क्या करके, कितना धन कमा सकता है इसका कोई ठीक मार्गदर्शन किया जाना सम्भव नहीं। परिस्थितियाँ भी बदलती रहती हैं, और सूझ−बूझ भी सदा बिलकुल ठीक ही उतरे ऐसा भी नहीं होता। ऐसी दशा में व्यापार या कारोबार संबन्धी सुझाव देना तो सामयिक, स्थानीय एवं व्यक्तिगत परिस्थितियों पर विचार करने से ही संभव हो सकता है, पर मोटे तौर से इतना कहा जा सकता है कि ईमानदारी, सज्जनता, श्रम शीलता, सावधानी और सूझबूझ से काम लेने पर वह बाधाएँ हट जाती हैं जिनके कारण परिस्थितियों के अनुरूप लाभ उठाने में भी बाधा पड़ती है।

दुर्गुणों के कारण दरिद्रता

बेईमान, अशिष्ट, अयोग्य, आलसी, लापरवाह और मन्दबुद्धि व्यक्ति अच्छी परिस्थितियाँ रहते हुए भी घाटे में रहते और तंगी भुगतते हैं। उनके सहयोगी घट जाते हैं और विरोधी बढ़ जाते हैं, फलस्वरूप क्षेत्र छोटा होते जाने से आमदनी भी सिकुड़ती है। जिसका व्यक्तित्व जितना विकसित होगा, जिसके परिचित मित्र और प्रशंसक जितने बढ़ेंगे किसी न किसी प्रकार उसकी आमदनी भी बढ़ेगी। आजकल लोग इस दृष्टि से भी अपने को लोकसेवी बनाने का आवरण चढ़ाते हैं, ताकि उनके प्रशंसक और परिचित बढ़ें और उसका प्रभाव आमदनी पर भी पड़े।

सार्वजनिक संस्थाओं में बहुधा वकीलों, डाक्टरों तथा ऐसे ही अन्य लोगों की संख्या बहुत देखने में आती है। इनमें से सभी लोकसेवी एवं परमार्थी नहीं होते। उनमें से कितने ही अपना व्यक्तित्व दूसरों की आँखों में अच्छा प्रदर्शित करने और फलस्वरूप अधिक ग्राहक प्राप्त करने का उद्देश्य भी लिये होते हैं। इसमें उन्हें सफलता भी मिलती है। जबकि दिखावटी सदाचार एवं परमार्थ से लोग लाभ उठा लेते हैं तो वास्तविकता होने पर तो वह लाभ और भी स्थायी एवं विस्तृत हो सकता है। जिनने अपनी ईमानदारी और सचाई की छाप दूसरों के मन पर डाल ली उनको उपयुक्त सहायक मिलते रहते हैं और फिर अन्य समस्याओं के साथ−साथ जन सहयोग के कारण आर्थिक तंगी का भी समाधान होता रहता है।

सद्गुण और सम्पन्नता

मेहनती, अध्यवसायी, ईमानदार, पूरी दिलचस्पी से काम करने वाले, स्वच्छता रखने वाले, मधुर बोलने और शिष्टता बरतने वाले लोग कदाचित कभी−कभी ही दुर्भाग्यवश असफल होते हैं अन्यथा दूसरों की तुलना में उनका पलड़ा सदा भारी रहता है। उनका काम और व्यवहार सन्तोषजनक होने से जो एक बार सम्पर्क में आता है सदा के लिये स्थायी ग्राहक बन जाता है। वफादार और खरा काम करने वाले कर्मचारी अपने मालिकों की लिए कुछ उठा नहीं रखते। आर्थिक तंगी के कारण से जहाँ परिस्थितियाँ, दूसरे व्यक्ति या कारण बाधक होते हैं वहाँ सबसे बड़ी बाधा अपने अपने संकीर्ण, उद्धत और आलसी स्वभाव की होती है। बाहरी परिस्थितियों या व्यक्तियों को अपने अनुकूल बना लेना कठिन होता है पर अपनी आदतों में हेर-फेर तो थोड़े ही प्रयत्न से हो सकता है और उस परिवर्तन के साथ−साथ वह आधार बनना तुरन्त आरम्भ हो जाता है जिस पर आर्थिक उन्नति बहुत कुछ निर्भर रहती है।

यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त है कि आमदनी से खर्च कम रखा जाय। आमदनी बढ़ाना सदा अपने हाथ में नहीं रहता। जितनी अपनी इच्छा या आवश्यकता है उतनी कमाई हो ही जायगी इसका कुछ निश्चय नहीं। ईमानदार आदमियों को आरंभ में तो बेईमानों के अपेक्षा कुछ तंगी होती रहती है। ईमानदारी बरगद के पेड़ के समान है जो देर में बढ़ती किन्तु चिरस्थायी रहती है। बेईमानी कागज की नाव की तरह है जो आरम्भ में बहुत सुन्दर, बहुत हलकी और बहुत तेज दौड़ने वाली दीखती है पर कुछ ही देर में उसका वह चमत्कार जड़मूल से नष्ट हो जाता है। कागज गलते ही नाव डूबती है और फिर उसका कुछ अता−पता नहीं मिलता। काठ की हाँडी बारबार कहाँ चढ़ती है, पर धातु के बर्तन मुद्दतों काम देते हैं। ईमानदारी के फल तो मधुर भी, बड़े भी, बहुमूल्य भी होते हैं पर पकते देर में हैं। उतावले लोग अ‍धीर होकर उसे छोड़ बैठते हैं। जो नहीं भी छोड़ बैठते उन्हें आरम्भिक दिनों में चालाक लोगों की तुलना में कुछ तंगी का ही सामना करना पड़ता है।

खर्च बढ़ने न दिया जाय

इन परिस्थितियों में खर्च पर संतुलन रखना ही एकमात्र ऐसा उपाय रह जाता है जिससे तंगी की समस्या हल हो सके। यह सोचना ठीक नहीं कि अमुक प्रकार का हमारा ‘स्टेंडर्ड’ बन गया है अब इसमें कटौती नहीं हो सकती। इस भ्रम को छोड़ देना चाहिये और देखना चाहिये कि इस संसार में सभी प्रकार के आर्थिक भार वाले लोग रहते हैं और अपनी हैसियत, औकात एवं परिस्थिति के अनुरूप खर्च का बजट बनाते हैं। फिर हम भी वैसा ही क्यों न करें।

कम आमदनी वाले लोग सस्ते उपकरणों से अपना काम चलाते हैं, अत्यन्त आवश्यक वस्तुओं से ही गुजर करते हैं। दूसरों से काम कराने की अपेक्षा बहुत कुछ अपने हाथ से ही कर लेते हैं। इस प्रकार उनका पहिया आनन्दपूर्वक लुढ़कता रहता है और गरीबी, गरीबी नहीं लगती। कम पैसे में भी कितने ही लोग अमीरी का आनन्द उठाते देखे गये हैं। यह वे लोग हैं जिन्होंने अपनी आमदनी के अनुरूप स्तर बनाया हुआ है। स्तर के अनुरूप आमदनी चाहने वालों को चिन्ता सताती रह सकती है पर जिनने आमदनी के अनुरूप स्तर बनाना सीख लिया उन्हें क्यों आर्थिक तंगी देखनी पड़ेगी?

मितव्ययिता सरल है

संसार में जौ−बाजरा खाने वाले, मोटा−झोटा कपड़ा पहनने वाले, थोड़े से सस्ते उपकरणों से काम चलाने वाले, सिलाई-धुलाई, हजामत, मकान की सफाई, सफेदी, वस्तुओं की मरम्मत करके अनावश्यक खर्च बचा लेने वाले असंख्य लोग मौजूद हैं, फिर हमारे लिये ही यह सब बातें क्यों कठिन प्रतीत होनी चाहिएं? स्त्रियाँ एक घण्टा सबेरे जल्दी उठकर चक्की पीस लिया करें, तीसरे पहर एक घण्टा चरखा कात लिया करें या फटे पुराने या नये कपड़ों की मरम्मत कर लिया करें तो इस एक−दो घण्टे के श्रम से पैसा भी बचे, स्वास्थ्य भी ठीक रहे, आलस्य भी दूर हो और कलात्मक प्रतिभा का विकास भी हो। इसमें झिझक और संकोच करने की क्या बात है?

दूसरे अमीर लोग ऐसे छोटे काम नहीं करते इसलिए हम करेंगे तो गरीब समझे जायेंगे? यह झिझक अनेकों को मार डालती है। इस झूठे भ्रम को छोड़ देना चाहिए। कल नहीं तो परसों वह वक्त आने वाला है जब अमीरी, फिजूलखर्ची और आरामतलबी एक सामाजिक अपराध की तरह घृणित मानी जायेगी और ईमानदार, मेहनतकश लोग पूरा−पूरा सामाजिक सम्मान प्राप्त करेंगे। गरीब होना कोई बुरी बात नहीं। बुरी बात है फिजूलखर्ची, विलासिता, हरामखोरी। यदि आज लोगों की आँखें गलत देख रही हैं, यदि लोगों के दिमाग आज गलत सोच रहे हैं तो हमें इसकी रत्ती भर भी परवाह न करनी चाहिए। ईमानदार और नेक व्यक्तित्व का विकास करने के लिये हमें मितव्ययिता को अपनाना ही होगा।

फिजूलखर्ची और दुश्चरित्रता

फिजूलखर्ची तो दुश्चरित्रता की सगी बहिन है। बढ़े हुए खर्चे पूरे करने के लिए आदमी को बेईमानी का रास्ता अपनाने के लिए विवश होना ही पड़ता है। जिनके खर्च आमदनी की तुलना में घटे हुए नहीं रह सकते उन्हें स्मरण रखना चाहिये कि उनकी यह बढ़ोतरी उनके धर्म ईमान और व्यक्तित्व की श्रेष्ठता को नष्ट करके ही पूरी हो सकेगी। जिन्हें अपनी आत्मा को बेचकर फिजूलखर्ची को अपनाये रहना मंजूर है वे चाहे जो करें, उन्हें रोकने वाला कौन है? दण्ड तो समयानुसार ही मिलता है, आज तो छूट का लाभ वे उठा ही सकते हैं।

कटौती की दृष्टि से सर्वेक्षण किया जाय तो हमें अपने कितने ही खर्चे ऐसे दीख पड़ेंगे जिनमें तुरन्त बिना किसी कठिनाई के कमी की जा सकती है। चाय, पान, तमाखू का खर्चा हर घर में पाया जाता है। यह निरर्थक ही नहीं शरीर और मन को खराब करने वाला भी है। इनसे बीमारियाँ पैदा होती हैं और आयु घटती है, साथ ही पैसा भी बर्बाद होता है। इन मूर्खतापूर्ण आदतों को क्यों अपनाये रहा जाय? नशा छोड़ने में दो−चार दिन हुड़क उठती है। उसे ही कमजोर तबियत वाले लोग कब्ज, सुस्ती आदि न जाने क्या−क्या नाम दे देते हैं। लाखों मनुष्यों से नशा छुड़ाने का हमारा अनुभव है। इस आधार पर हम पूरे विश्वास के साथ कहते हैं कि दो−चार दिन की थोड़ी मानसिक परेशानी के अतिरिक्त नशा छोड़ने में किसी को कोई हानि नहीं होती। यह छोटी दीखने वाली नशेबाजी की रकम यदि बचत में जमा करते रहा जाय तो कुछ ही वर्षों में उसका घर की आर्थिक स्थिति पर बहुत अच्छा एवं अनुकूल प्रभाव दृष्टिगोचर हो सकता है।

खर्चे में कटौती

भोजनालय में पूड़ी-पकवान, अचार-मुरब्बे, चटनी आदि कई तरह की चीजें बनाने में जो खर्च होता है उसमें काफी कटौती की गुंजाइश रहती है। सादा सीधा भोजन सस्ता भी होता है और पचता जल्दी है। सात्विकता तो उसमें रहती ही है जिससे विचारों और भावनाओं में सतोगुण बढ़ने से जीवनक्रम का पहिया शान्ति और सदाचार की ओर घूमने लगता है।

जेवर और कपड़ों में कितना पैसा नष्ट होता है यह विचारणीय प्रश्न है। नाक, कान जैसे कोमल अंगों को छेद कर उनकी स्वच्छता को स्पष्ट आघात पहुँचाना भला यह भी कोई फैशन है। शरीर में सुई से गोदने गुदा कर उसमें रंग भर देना किसी जमाने में सौंदर्य का चिह्न समझा जाता होगा पर अब तो वह सब उपहास और आश्चर्य की बातें ही रह गई हैं। नाक, कान के छिद्रों में स्वच्छ वायु को प्रवेश रोकने वाले, उनमें गन्दगी जमा करने वाले, जेवर आज न सही कल उपहासास्पद बनेंगे। इन्हें आगे भी मनुष्य जाति छोड़ेगी ही, हम अभी से छोड़ दें तो क्या हर्ज है? उँगलियों की सक्रियता में बाधा पहुँचाने वाली, नसों पर दबाव डालकर रक्त−संचार घटाने वाली अँगूठियों की क्या उपयोगिता हो सकती है, यह विचारणीय प्रश्न है। जेवरों के नीचे जो अंग ढके रहते हैं उनकी सफाई नहीं हो पाती, वहाँ पसीना भरता है, रोम छिद्र बन्द होने लगते हैं तथा अनावश्यक दबाव पड़ने से रक्त−संचार में स्वास्थ्य बिगाड़ने वाली गड़बड़ी उत्पन्न होती है। पैसा उपयोगी कामों में न लग कर अवरुद्ध होता है और टाँके, बट्टे, पालिश, गढ़ाई, खोट, मिलावट, टूट−फूट आदि का जो नुकसान होता है उससे आर्थिक हानि−ही हानि है। जेवरों पर होने वाला खर्चा यदि फिजूलखर्ची न कही जाय तो फिर उसे और क्या कहें?

उद्धतता का भोंड़ा प्रदर्शन

कपड़े शरीर ढकने के लिए, सर्दी-गर्मी से बचने के लिए आवश्यक हैं। वे सीधे−सादे और साधारण मूल्य के बनाये जा सकते हैं। सादगी सब में बड़ा फैशन है, स्वच्छता का समन्वय होने से तो वह पूरी तरह चमक उठती है। सादा सफेद कपड़ा धुला हुआ करीने से सिला और पहना गया हो तो पहनने वाले की सज्जनता और शालीनता प्रकट करता है। रंग−बिरंगे, चमक−दमक भरे, रेशमी, कीमती, बेढंगे फैशन के सिले कपड़े पहनने वाले का ओछापन, बचपन और बालकपन प्रकट करते हैं। चंचल, अस्थिर, विलासी, उद्धत और घटिया मानसिक स्तर के लोग दूसरों पर अपने बड़प्पन की छाप डालने के लिए वेश-विन्यास और उद्धत शृंगार बना कर सजधज कर ‘जोकर’ के समान लगते हैं। विचारवान लोगों की दृष्टि में यह न तो कोई फैशन है और न बड़प्पन, इसे विशुद्ध रूप में ओछापन कहा जायेगा। आज कितने ही नर नारी ऐसा ही ओछा शृंगार और वेश-विन्यास बनाये अपने उच्छृंखल व्यक्तित्व की घोषणा करते फिरते हैं।

मुँह−हाथ, पैर, होठ, नाखून रंगे हुए व्यक्ति तो बहुत ही विलक्षण लगते हैं। यह अपने स्वाभाविक स्वरूप को छिपा कर नकली चीज लोगों को दिखाते फिरने की प्रवंचना है। रामलीला में कागज के चेहरे मुँह पर बाँध कर बन्दर, राक्षस आदि का स्वाँग किया जाता है। रंगों से चेहरा होठ और नाखून पोतना लगभग कागज का चेहरा बाँधने के समान है। जिसे हर कोई ताड़ ले वह क्या धोखेबाजी? वह तो फूहड़पन ही कहा जायेगा। अपने को अधिक सुन्दर दिखाने के लिए यह बनाई हुई बनावटों की कलई जब देखने वाले को आँखों में खुल ही गई लोगों ने उन अंगों को सचमुच ही सुन्दर नहीं माना तो फिर “गुनाह बेलज्जत” करने से लाभ क्या? पैसा भी गया, मूर्ख भी बने, दुहरी हानि क्यों उठाई जाय?

नकलची न बनें

विचार करने पर ऐसी−ऐसी अनेकों छोटी−बड़ी बातें दृष्टिगोचर हो सकती हैं जो सर्वथा अपव्यय ही हैं। अमीरों की नकल करना व्यर्थ है। इस संसार में इतने बड़े अमीर पड़े हैं कि उनके कुत्तों की बराबरी में भी हम शौक मौज नहीं कर सकते। ऊपर को देखने की अपेक्षा हमें नीचे को क्यों न देखना चाहिए? यदि तुलना ही करनी हो तो अपने से गरीबों के साथ तुलना क्यों न करें? जो हमसे कम आमदनी होने पर भी मितव्ययिता के साथ आनन्द और सन्तोष का जीवन व्यतीत करते हैं। दृष्टिकोण में थोड़ा हेर−फेर कर लेने पर, मितव्ययिता को जीवन का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तथ्य स्वीकार कर लेने पर आर्थिक तंगी की समस्या बहुत हद तक हल हो जाती है।

कर्ज का विषपान

कर्ज लेना विष खाने के समान है। आकस्मिक आपत्ति के समय या व्यापारिक उद्देश्य के लिए उधार लेकर काम चलाया जाय यह बात दूसरी है। पर दैनिक खर्चों के असंतुलन को पूरा करने के लिए कर्ज लेना, दुकानदारों के यहाँ उधार खाते खोलना अपनी आर्थिक बर्बादी का चिन्ह है। उधार लेने की आदत से वे अनावश्यक चीजें अधिक मात्रा में खरीद ली जाती हैं जो यदि नकद खर्च करना पड़ता तो शायद न खरीदी जातीं। कर्ज लेना दूसरों के सामने अपने स्वाभिमान को बेचने के समान, दूसरों की तुलना में अपने को दीन−हीन घोषित करने के समान है। जिसे अपना भविष्य अन्धकारमय बनाना हो, दूसरों की आँखों में जलील, बेईमान और अविश्वासी बनना हो उन्हें छोड़कर और सब को कर्ज से बचना चाहिए। यदि कारणवश ले ही लिया गया हो तो उसे घी, दूध, तरकारी छोड़कर, नमक रोटी खाते हुए ,नये कपड़े छोड़ कर फटे पुराने चिथड़ों से काम चलाते हुए जल्दी से जल्दी चुकाने का प्रयत्न करना चाहिए। जो लोग जुआ, मनोरंजन, दावत, सैर−सपाटा आदि के लिए कर्ज लेते हैं उन्हें तो एक प्रकार से निर्लज्ज ही कहना चाहिए, जो अपनी जेब में पैसा न होते हुए भी दूसरों के आगे अपना सम्मान बेचकर तुच्छ कामों के लिए हाथ पसारने की जलीलता सिर पर ओढ़ने में संकोच नहीं करते।

अपनी सौड़ जितनी लम्बी हो उतने पैर पसारने चाहिए। आमदनी से बाहर तभी खर्च करना चाहिए जब कोई आकस्मिक आपत्ति ही सिर पर आ जाय। ऐसे अवसरों के लिए भी हर विचारशील व्यक्ति को कुछ बचत करते चलना चाहिये जो अपनी या दूसरों की आवश्यकता के समय काम आ सके।

खर्च करने की बुद्धिमानी

जिन्दगी जीने की कला का एक महत्वपूर्ण अंग है आर्थिक संतुलन। अपने साधन और सद्गुण बढ़ाते हुए आर्थिक उन्नति करने के लिए प्रयत्न करना उचित है और आवश्यक भी। पर उससे भी अधिक आवश्यकता इस बात की है कि अपने खर्चे आमदनी से अधिक बढ़े हुए न हों। किसी आदमी की बुद्धिमत्ता उसकी कमाई से नहीं खर्च करने की पद्धति से परखी जा सकती है। आमदनी तो अनायास भी हो सकती है। उत्तराधिकार में किसी को बड़ी सम्पत्ति भी मिल सकती है पर खर्च को उचित रीति से उचित मात्रा में कर सकना केवल बुद्धिमानों और दूरदर्शियों के लिए ही संभव हो सकता है। जो पैसा उड़ाता है उसे मूर्ख ही कहेंगे। मितव्ययिता और पैसे का श्रेष्ठतम सदुपयोग जिसे आता है वस्तुतः वही अपना और अपने परिवार का जीवन सुख शान्तिपूर्वक बिता सकता है। समाज की सुस्थिरता भी मितव्ययिता पर निर्भर रहती है। सरकारों और संस्थाओं के लिए भी यही मार्ग उचित है। सार्वजनिक कार्यों में तो इस प्रकार की सावधानी अधिकाधिक बरती जानी चाहिए।


यह सत्यानाशी सामाजिक कुरीतियाँ

मनुष्य अपनी भीतरी दुर्बलताओं के कारण ही चिन्तित, परेशान और दुखी रहता है। बाह्य जीवन की किस समस्या को कितना महत्व दिया जाय, उसे किस दृष्टिकोण से देखा जाय, और कैसे सुलझाया जाय, इसका उचित मार्ग न मिलने से साधारण−सी बातें बहुत बढ़ी−चढ़ी दीखती हैं, और उनके सुलझाने का ठीक तरीका मालूम न होने से उलटी उलझती चली जाती हैं। प्रसन्न और भार−विहीन जीवन बिताने के लिये जीवन−विद्या के आवश्यक तथ्यों से हमें परिचित रहना ही चाहिए।

बढ़ा चढ़ा सिर दर्द

हिन्दू समाज में एक बड़ा सिर दर्द सामाजिक कुरीतियों के कारण उत्पन्न हो गया है। कितनी ही प्रथाऐं ऐसी चल पड़ी हैं जो बहुत धन खर्च करने की माँग प्रस्तुत करती हैं। मध्यम श्रेणी का व्यक्ति ईमानदारी से उतना ही मुश्किल से कमा सकता है, जिसमें उसके परिवार का गुजारा किसी प्रकार हो सकता है। इस महँगाई के जमाने में लम्बी चौड़ी बचत कर सकना सर्वसाधारण के लिए संभव नहीं। आये दिन बहुत धन खर्च कराने की माँग करने वाली कुरीतियों का भी यदि मुँह भरना है तो कोई बेईमानी के तरीके अपनाये बिना और रास्ता नहीं मिलता। एक रास्ता यह भी है कि पेट पर पट्टी बाँध कर, साग सत्तू से गुजारा करते हुए, बच्चों के मुँह में जाने वाली दूध की बूँदें बचा कर कौड़ी−कौड़ी धन जोड़ा जाय और इन कुरीतियों की पिशाचिनी को तृप्त किया जाय। तीसरा तरीका है कि घर के बर्तन, किवाड़ बेच कर, मित्र रिश्तेदारों से कर्ज लेकर तत्काल का काम तो चला लिया जाय पर पीछे भारी अभाव और तिरस्कार का जीवन बिताया जाय। कर्ज का ब्याज सिर पर चढ़कर दौड़ता है। सीमित आमदनी में वह चुक नहीं पाती तो जलील होना पड़ता है और परेशानी भी उठानी होती है।

बेईमानी की विवशता

यह परिस्थितियाँ मनुष्य को इस बात के लिए विवश करती हैं कि वह किसी भी प्रकार, कहीं से भी धन कमाये और जो कुरीतियाँ गले में फाँसी के फन्दे की तरह जकड़ी हुई हैं उनकी आवश्यकता पूरी करे। बेईमानी करने का हुनर, चातुर्य और अवसर भी सब किसी को नहीं होता। कुछ लोग चाहते हुए भी वैसा नहीं जुटा पाते तो चिन्ता की आग में घुल−घुल कर अप्रत्यक्ष आत्महत्या करने के लिये मन्द गति से अकाल मृत्यु की ओर चलते रहते हैं। इतना सब होते हुए भी हमारी मानसिक दुर्बलता यह सोचने नहीं देती कि क्या यह सामाजिक कुरीतियाँ आवश्यक ही हैं? क्या इन्हें सुधारा और बदला नहीं जा सकता?

विवाह-शादी का ही प्रश्न लीजिये। उसमें कितना पैसा खर्च होता है? धूमधाम, गाने, बजाने, आतिशबाजी, बरात, दावत, दहेज, जेवर आदि के लिये लोग इतना धन खर्च करते हैं जो उनकी हैसियत और औकात से बाहर होता है। तीन दिन के धूम−धमाके में जितने धन की होली जल जाती है, उतने धन को यदि लड़के-लड़की के स्वास्थ्य, शिक्षा, व्यवसाय या बचत पूँजी के लिए सम्भाल कर रखा गया होता तो उसका कैसा अच्छा उपयोग होता, कितना काम चलता। कुरीतियों की होली में जो गाढ़ी कमाई स्वाहा हो गई वह तो किसी के भी काम न आई फिर इस मूर्खतापूर्ण विडम्बना को खड़ा करने से क्या प्रयोजन सिद्ध हुआ? यह विचारणीय बात है।

पैसे की होली फूँकना

यह धूम धमाके उन लोगों के यहाँ होते थे जिनके पास अनाप−शनाप पैसा भरा पड़ा था। कुछ दिन पहले जमींदारों, साहूकारों, राजा रईसों का बोलबाला था, वे अपने सामन्तवादी तरीकों से अशक्त और असंगठित जनता को आतंकित कर सहज ही अन्धा−धुन्ध धन एकत्रित कर लेते थे। इतना उदार हृदय था नहीं जो उस एकत्रित धन को किसी मानव सेवा में लगा दें। ऐसी बुद्धि होती तो वह धन एकत्रित ही कैसे हो पाता? इस एकत्रित पैसे का क्या उपयोग हो सकता था? दो ही मार्ग थे खाना और खुन्दरना। खाने के नाम पर हर प्रकार की ऐयाशी और खुन्दरना के नाम पर बिखेरना, होली जलाना। अपने बाल-बच्चों की विवाह-शादी के अवसरों पर यह लोग अन्धे होकर खर्च करते थे। रुपये पैसों को ठीकरी की तरह बखेरते भी थे। अब तो रिवाज कम हो गया है पर किसी जमाने में रुपये पैसों की बखेर भी विवाह-शादियों में खूब हुआ करती थी। लक्ष्मी का इस प्रकार तिरस्कार करने का उद्देश्य यही हो सकता था कि लोग यह अनुभव करें कि बखेर करने वाला इतना धनी है कि वह व्यर्थ पैसे को बखेरते फिरने में भी संकोच नहीं करता।

जिनके पास फालतू पैसा है वे जो चाहें वही कर सकते हैं। आज भी उनकी सामन्तवादी गतिविधियाँ चल रही हैं। उनकी रंग-रेलियाँ, चोचले और खूराफातें पहले भी चलती थीं और आगे भी चलेंगी। उन्हें कौन रोके? धन के समान वितरण और उपार्जन की समान सुविधा प्रस्तुत करने वाली कोई अर्थ-व्यवस्था बन सकी, तभी उन पर नियंत्रण होगा। पर जब तक ऐसा नहीं है तब तक भी इस बात की क्या जरूरत है कि हम गरीब लोग, उन अमीरों की नकल बनावें जिनके पास अनाप−शनाप लुटाने योग्य पैसा भरा पड़ा है।

अन्धानुकरण क्यों करें?

गरीब लोग जिनके पास गुजारे के लिये आवश्यक साधन नहीं, अमीरों की नकल करके उन्हीं का स्वाँग बनावें तो यह उनकी मानसिक दुर्बलता ही कही जायगी। इस दुर्बलता से पिण्ड छूटना कठिन है और जब तक यह कुरीतियाँ नष्ट न होंगी हमारी जीवन व्यवस्था अशान्ति में ही डूबी पड़ी रहेगी। बच्चे-बच्चियाँ हर गृहस्थ के घर में पैदा होने ही वाले हैं। जब पैदा होंगे तो उनका विवाह भी होगा। विवाह होगा तो धन चाहिये ही। धन चाहिये तो उसकी चिन्ता में निमग्न रहकर अनावश्यक बचत और अनुचित उपार्जन का मार्ग ग्रहण करना ही होगा। यदि इसमें भी सफलता न मिली और उपयुक्त साधन न जूट सके तो सारी आन्तरिक शान्ति खोकर दिन−रात चिन्ता में जलते−जलते, अप्रत्यक्ष आत्महत्या करनी ही होगी। कितना बड़ा कुचक्र है यह। इस कुचक्र में बँधा हुआ भारतीय जीवन किस प्रकार अस्त−व्यस्त हो रहा है यह विचार करते ही कलेजा टूटने लगता है और हृदय में एक हूक उठती है। हाय री, मानसिक दुर्बलता, काश हम तुझे छोड़ सके होते और यह विचार कर सके होते कि यदि यह कुरीतियाँ आवश्यक और उपयोगी नहीं, तो इन्हें छोड़ क्यों न दिया जाय, तो कितना अच्छा होता।

यह पिशाचिनी पूतना

द्वापर युग में एक पूतना नाम की पिशाचिनी हुई थी। भागवत पुराण में वर्णन है कि वह बड़ी भयंकर और विकराल थी पर बाहर से बड़ा सुन्दर मायावी रूप बनाये फिरती थी। उसका काम था बालकों की हत्या करना, इसी में उसे आनन्द आता था, आखिर पिशाचिनी ही जो ठहरी। अन्त में उसका दमन कृष्ण भगवान ने किया और लोगों के सामने उसके विकराल भयंकर रूप का भंडाफोड़ किया। आज सामाजिक कुरीतियों की अनेक पिशाचिनी चौंसठ मसानियों की तरह खूनी खप्पर भर−भर कर नाच रही हैं। इन सब में प्रमुख है ‟विवाहोन्माद डाकिनी” यह देखने में बड़ी सुन्दर लगती है। शादी-विवाहों के दिनों बड़ी रौनक और धूम-धाम होती है। पर अन्त में जो दुष्परिणाम भुगतना पड़ता है उसे हममें से प्रत्येक जानता है। वह जिस घर में घुसती है उसकी अर्थ-व्यवस्था का सारा रक्त पी जाती है।

दहेज की असमर्थता के कारण अगणित बच्चियों को कुमारी रहना पड़ता है, बूढ़े या अयोग्यों के गले बँधना पड़ता है, वैधव्य भोगना पड़ता है, आत्महत्या करनी होती है, जीवन भर जलते रहना पड़ता है और भी न जाने क्या−क्या करना पड़ता है। बच्चों को पत्थर पर पटक−पटक यह पिशाचिनी भले ही न मारती हो पर उनका भविष्य अन्धकारमय जरूर बना देती है। बच्चों को ही नहीं, बच्चों के अभिभावकों को भी यह एक दो दिन नहीं वर्षों तक चिन्ता और व्यग्रता के एकान्त में आँसू बहाते रहने के लिए विवश करती रहती है। दुख इसी बात का है कि इन पूतनाओं का छद्म वेश अभी हमारी समझ में नहीं आता, इन्हें अभी भी हम सुन्दर और ग्राह्य माने बैठे हैं।

दुख इस बात का भी है कि कोई ऐसा कृष्ण उत्पन्न नहीं होता जो पूतना−वध का वास्तविक अभिनय करे। यों रास लीलाओं में तो पूतना मरते हम रोज ही देखते हैं और कथा वार्ताओं में पूतना वध का प्रसंग सुनकर प्रसन्न भी होते हैं। पर असली पूतना तो हमारे चारों ओर नग्न नृत्य कर रही है। बालिकाओं की छाती उस वीभत्स नृत्य को देख−देख कर दिन रात सूखती, सकपकाती रहती है। न जाने यह हत्यारी कब मरेगी? न जाने इसे मारने वाला कब तक पैदा होगा? यही प्रश्न भारत की आत्मा हर घड़ी पूछती है पर अन्तरिक्ष से उत्तर कुछ नहीं मिलता।

अपडर से न डरें

विवाहों में होने वाला अपव्यय, मृत्यु भोज में बाप-दादों के नाम पर लम्बी-चौड़ी दावतों का आयोजन, तीज-त्यौहारों पर रिश्तेदारी में भेजे जाने वाले अलन−चलन कितने खर्चीले सिद्ध होते हैं, इसे हर कोई जानता है। जनेऊ, मुण्डन, दस्टौन आदि के नाम पर लोग लम्बी-चौड़ी दावतें देने और उपहार बाँटने में अपनी सामर्थ्य से बाहर शेखीखोरी दिखाते हैं। वातावरण कुछ ऐसा बन गया है कि न किया जाय तो यह डर लगता है कि दूसरे लोग हमें गरीब या कन्जूस मानेंगे। यह अपडर सर्वथा निरर्थक और भ्रमपूर्ण है। आज परिस्थिति यह है कि हर कोई इन बुराइयों से परेशान है और चाहता है कि ये जितनी जल्दी मिटें उतना ही अच्छा है। पर आश्चर्य तो यह है कि वह ऐसा सोचता है कि मैं अकेला ही इसके विरुद्ध हूँ अन्य लोग पक्ष में हैं। जबकि सही बात इससे उलटी है। हर आदमी इन्हें समाप्त करने की इच्छा रखते हुए भी स्वयं पहल नहीं करना चाहता। इसमें उसे लगता है कि उसी को निन्दा और विरोध का पात्र बनना पड़ेगा। वास्तविकता यह है कि जो अपने विरोध को चरितार्थ करेगा उसे आज नहीं तो कल समाज का उद्धारक, त्राता और मार्ग−दर्शक माना जायेगा। प्रश्न पहल करने का है। पीप से भरा हुआ फोड़ा पूरी तरह पीला पड़ गया है और पिलपिला रहा है, अब जरा सा छेद करना बाकी हैं। उसी में झिझक हो रही है। कोई साहसी आगे बढ़कर पहल करने लगे तो यह सारी सड़न भरी पीप निकल बाहर हो और हमारा सामाजिक शरीर शुद्ध और स्वच्छ बन जाय।

विभिन्न प्रथा परम्पराएँ

धर्म और परम्परा की दुहाई देना बेकार है। हिन्दू समाज में आज भी इतनी परस्पर विरोधी प्रथाएँ चल रही हैं जिनको देखते हुए इन रीति-रिवाजों को केवल क्षेत्रीय रस्म-रिवाज और भेड़िया−धसान मात्र कहा जा सकता है। राजस्थान के राजपूतों तथा उत्तर प्रदेश तथा मध्यप्रदेश के कुछ रईस किस्म के लोगों में आज भी लम्बा घूँघट काड़ने और पर्दे में स्त्रियों को बन्द रखने की प्रथा मौजूद है पर पंजाब, गुजरात महाराष्ट्र, बंगाल, दक्षिण भारत में पर्दा का कहीं नाम निशान भी नहीं है। हिन्दू सभी हैं हिन्दू धर्म सभी मानते हैं। फिर पर्दा हिन्दू धर्म का अंग कैसे कहा जायेगा? मध्यप्रदेश तथा राजस्थान की मीना आदि अविकसित जातियों में अभी भी चार−चार, छः−छः वर्ष के बच्चों के विवाह होते हैं जबकि पंजाब और महाराष्ट्र में आमतौर से वयस्क होने पर ही विवाह होते हैं। बाल विवाह या वयस्क विवाह को धर्म-अधर्म की परिधि में नहीं बाँधा जा सकता।

उत्तर प्रदेश, बंगाल आदि में दहेज का लेन−देन बहुत है। लड़की का विवाह बिना बहुत दहेज दिये अच्छे घरों में नहीं हो सकता। पर राजस्थान की कई जातियों में तथा पंजाब में जहाँ लड़कियों की कमी है बदले में लड़की देकर परस्पर विवाहों की व्यवस्था बनती है। गोंड, भीलों और भ्रमणशील जन-जातियों में लड़कियों का मूल्य लड़के वाले को देना पड़ता है। हिमालय की तराई में लड़कों को लड़की का इतना अधिक मूल्य कर्ज लेकर चुकाना पड़ता है कि प्रायः सारे जीवन उन्हें उस कर्ज में ही मजदूरी करनी पड़ती है। ऐसी दशा में यह कैसे माना जाय कि दहेज सनातन है, धर्मसम्मत है। यह तो प्रथा परम्परा मात्र हैं जो जहाँ जिस प्रकार चल पड़ीं चलने लगीं। इन्हें तोड़ते हुए सामाजिक विरोध का डर लोगों को लगा रहता है। यह डर निकल जाय और विवेक एवं उपयोगिता के आधार पर प्रथा परम्पराओं का मानना छोड़ा जाने लगे तो हमारी आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं का एक अत्यन्त सुखद हल निकल सकता है। लोकमत से डरना पाप और दुष्कर्म के लिए तो ठीक है पर अज्ञान और अविवेक की बातों का तो निराकरण ही वीरता है।

कन्या और पुत्र का अन्तर

कन्या और पुत्र में अन्तर किये जाने, लड़कियों को व्यर्थ और लड़कों को उपयोगी माना जाने की घृणित एवं पक्षपातपूर्ण मान्यता भी दहेज जन्य कठिनाई का एक कारण हो सकती है। लड़कों की कमाई खाने की मृगतृष्णा भी कई बार पुत्र को अधिक महत्व देती है। पिण्ड-तर्पण मिलने, वंश चलने जैसी बेकार बातें तो अब कोई−कोई ही मानते हैं पर लड़की से लड़के को श्रेष्ठ मानने की अन्याय दृष्टि अभी भी अपनी जड़ जमाये हुए है। शिक्षा, खानपान, जेबखर्च, वस्त्र आदि सभी में लड़कियों के साथ अन्यायपूर्ण दृष्टिकोण रखा जाता है। जबकि वस्तुतः दोनों का महत्व समान है, दोनों का विकास समान रूप से आवश्यक है, दोनों की समान प्रसन्नता हमें होनी चाहिए। पर लड़का के होने से प्रसन्न होना या लड़की का जन्म दुर्भाग्य माना जाना ऐसा गलत विचार है जिसके कारण नारी का विकास बुरी तरह रुका हुआ है और हमारा आधा समाज पर्दे के भीतर कैदियों−सा, अविकसित, अशिक्षित एवं अपंग जीवन व्यतीत करने के लिए विवश हो रहा है। विवाह-शादियों पर होने वाला खर्च यदि लड़कियों की शिक्षा एवं विकास में लगाया जाय तो वे ही लड़कियाँ भी लड़कों के समान ही उपयोगी और महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती हैं।

जीवन को सुविकसित और शान्तिमय बनाने के लिए हमें सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध भी लोहा लेना होगा। इनके रहते हम न तो चिंतामुक्त हो सकते हैं और न ईमानदार रह सकते हैं। अनावश्यक कार्यों में विपुल धन खर्च करना पड़े तो उसे जुटाने में सारी प्रतिभा और सारी मानसिक शक्ति खर्च करनी पड़ेगी, ईमानदारी भी खोनी पड़ेगी। ऐसी दशा में वह श्रेष्ठ जीवन कैसे प्राप्त हो सकेगा जो शान्ति और प्रगति के लिए आवश्यक है?

व्यवस्थित जीवन की माँग

जीवन−विद्या की आरंभिक शिक्षा यह है कि हम पेट पालने और गृहस्थ चलाने के कार्यक्रम से कुछ समय, मन और धन बचा कर उन कार्यों में लगायें जो बौद्धिक विकास के लिए, आत्मिक प्रगति के लिए, लोकहित के लिए आवश्यक हैं। शिक्षा, स्वाध्याय, सत्संग, कला-कौशल, सामूहिक विकास, परमार्थ एवं सत्कर्मों के लिए हमारी शक्तियाँ लगें और हमारी कमाई का एक अंश इन कार्यों के लिए भी सुनिश्चित रहे। पर सामाजिक कुरीतियों का भार इतना अधिक हो जाता है कि उसे वहन करने में ही सारी शक्ति समाप्त हो जाती है । इस अपव्यय को रोकना होगा। हमारी अर्थ-व्यवस्था को नष्ट−भ्रष्ट करने का भारी उत्तरदायित्व इन खर्चीली कुरीतियों को है। अर्थ संतुलन जीवन का एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। इसे हल करने के लिए जहाँ व्यक्ति गत रूप से आमदनी बढ़ाना और खर्च घटाना आवश्यक है वहाँ यह भी अनिवार्य है कि इन खर्चीली, मूर्खतापूर्ण, हानिकारक, विडम्बनामयी, बेकार सामाजिक कुरीतियों को ठोकर मार−मार कर दूर हटा दिया जाय। इसके बिना शान्तिमय जीवन की आकाँक्षा एक कल्पना मात्र ही बनी रहेगी।


पारिवारिक जीवन की समस्याएँ

मनुष्य स्वभावतः सामाजिक प्राणी है। उसे मिलजुल कर साथ−साथ रहने में ही सुविधा होती है और इसी में वह प्रसन्नता अनुभव करता है। जिनने परमात्मा को अपना जीवन सहचर और विश्व के प्रत्येक चर−अचर को अपना कुटुम्बी, आत्मीय मान लिया है उनका सूक्ष्म परिवार अत्यन्त विशाल हो जाता है। उन विरक्त, संत महात्माओं को बाह्य परिवार की आवश्यकता भले ही प्रतीत न हो पर सर्वसाधारण के लिए तो वह स्वाभाविक ही है और आवश्यक भी। विरक्त लोग भी अपने जैसे अन्य विरक्तों से ताल−मेल बिठाने और अखरने वाले सूनेपन को हटाने का प्रयत्न करते रहते हैं। सामान्य मनुष्यों के लिए तो इसके बिना जीवनयापन कर सकना ही कठिन हो जाता है।

आत्मविकास का राजमार्ग

आध्यात्मिक विकास, कर्तव्य पालन, त्याग, परमार्थ, स्नेह, कृतज्ञता, संयम आदि की वृत्तियों का जितना विकास सम्मिलित कुटुम्ब में होता है उतना पृथक रहने में संभव नहीं। घर में कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जो स्वयं उपार्जन नहीं कर सकते, जिन्हें परावलम्बी रहना होता है। ऐसे लोगों की सुव्यवस्था सम्मिलित कुटुम्ब में ही संभव है। बूढ़े पिता−माता, छोटे बहिन-भाई, विधवाऐं, उनके बच्चे आदि कई ऐसे लोग भी प्रत्येक घर में होते हैं जिनकी उपार्जन क्षमता या तो अभी विकसित नहीं हुई है या समाप्त हो चुकी है। हमारा दुर्भाग्य ही है कि रूढ़ियों ने नारी को अशक्त, अपंग और बन्दी बनाकर इस स्थिति में पटक दिया है कि वे उपार्जन की दृष्टि से स्वावलम्बी नहीं बन पातीं। ऐसी दशा में यदि कमाऊ लोग, अपनी पत्नी को लेकर अलग रहने लगें तो इन बिना कमाऊ लोगों की भारी दुर्गति होती है। अपने आत्मीय जनों को कठिनाई में पड़ा छोड़कर जो लोग पति−पत्नी समेत मौज उड़ाने के लिए अलग हो जाते हैं उन्हें स्वार्थी और हृदयहीन ही कहा जायेगा।

सभ्य समाज के निर्माण का आधार यह है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता, कुशलता, शक्ति, ज्ञान और साधन सामग्री का लाभ अपने से पिछड़े हुए—जरूरतमंद दूसरे लोगों को प्रदान करे। इसी को पुण्य−परमार्थ, त्याग, दान, उदारता, सहृदयता, मानवता आदि श्रेष्ठ सम्मानित नामों से पुकारते हैं और ऐसे ही कार्यों की प्रशंसा की जाती है। सम्मिलित कुटुम्ब में कमाऊ व्यक्ति को अपने सारे परिवार के लिए त्याग और तप करना पड़ता है जिससे वह प्रशंसा, पुण्य, संतोष और गौरव सभी कुछ प्राप्त करता है। उसके प्रतिदान का सहारा पाकर अविकसित बच्चे विकसित होते हैं और न कमा सकने वाले सुविधापूर्वक जिन्दगी काट लेते हैं। दूसरों का सहारा बन कर जीना वस्तुतः एक बड़ी प्रशंसा की बात है और प्रसन्नता की भी। इसके विपरीत जो संकीर्ण स्वार्थ और सामयिक सुविधाओं से मनमाना लाभ उठाने के लिए पृथक रहने लगे हैं उन्हें वैसे ही घृणित लोगों की श्रेणी में गिना जायेगा जो अपने लाभ के आगे दूसरे किसी की सुविधा-असुविधा की बात नहीं सोचते। यह पशु प्रवृत्ति ही मनुष्य के आवरण में भी रहे तो फिर उसका कोई नैतिक आदर्श क्या माना जायेगा? अपना पेट पालने, अपना स्वार्थ साधन में तो सियार, बन्दर भी चतुर होते हैं। वही आदर्श यदि मनुष्य ने भी अपनाया तो फिर उसकी विशेषता ही क्या रह जायगी?

समाज सेवा का शुभारंभ

जिस प्रकार ब्रह्माण्ड का छोटा स्वरूप पिण्ड (शरीर) होता है उसी प्रकार विस्तृत समाज का छोटा स्वरूप अपना परिवार है। परिवार को समुन्नत और सुसंस्कृत बनाना सारे समाज का उत्थान करने की एक छोटी प्रक्रिया है। उसको क्रियात्मक रूप देने की प्रयोगशाला परिवार है। सारा समाज हमारे नियंत्रण या अधिकार में नहीं है। उस पर अपना दबाव और प्रभाव भी नहीं रहता है पर कुटुम्ब के लोगों के साथ आत्मभाव का तारतम्य इतना गहरा होता है कि परिजनों के उत्थान और विकास के लिए, सुख और समृद्धि के लिए शिक्षा और दीक्षा के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। समाज सेवा का परिपूर्ण अवसर इस छोटे क्षेत्र में हर व्यक्ति को प्राप्त है। उसे अपने कौशल, ज्ञान और क्षमता का पूरा लाभ देकर समाज सेवा के अपने उत्तरदायित्व को हर व्यक्ति पूरा करता चले तो सहज ही सभ्य समाज की रचना का उद्देश्य पूरा हो सकता है।

अनेक दृष्टियों से विश्लेषण

अर्थ विज्ञान के सिद्धान्तों ने भी अध्यात्म विज्ञान की मान्यताओं को ही पुष्ट किया है। व्यक्तिवाद को, अलगाव की प्रवृत्ति को, स्वार्थपरता को आर्थिक आदर्शों के विपरीत बताया जा रहा है और एक विस्तृत दर्शन शास्त्र के द्वारा यह समझाया जा रहा है कि मिलजुल कर रहने, काम करने, श्रम, पुरुषार्थ करने और बाँट कर खाने में ही समाज की प्रगति सम्भव है। इसी दर्शनशास्त्र का नाम समाजवाद है। सहकारिता आन्दोलन को महत्व इसी दृष्टि से दिया जा रहा है। सामूहिक और सम्मिलित प्रयत्नों के लिए ही संस्थाऐं बनती हैं। प्रजातन्त्र का ढाँचा ही सामूहिकता और सहकारिता पर खड़ा होता है। इसी आधार पर सरकार बनती और राजकाजी चुने जाते हैं। अमीरों पर अधिकाधिक टैक्स लगते जाना और गरीबों को अधिकाधिक सुविधा प्रदान करना सरकारी नीति होती है। सम्मिलित परिवार ऐसा ही प्रजातन्त्र है, जिसमें अधिक कमाने वाले को टैक्स के रूप में न कमाने वालों के लिए अपनी कमाई छोड़नी पड़ती है।

आर्थिक दृष्टि से भी लाभ इसी में है। दस व्यक्ति इकट्ठे रहें तो उन पर जितना खर्च आता है उसकी अपेक्षा दसों के अलग−अलग रहने पर कहीं अधिक खर्च आवेगा। सम्मिलित कुटुम्ब में हारी−बीमारी तथा सुविधा-असुविधा में परस्पर सेवा सहायता का काम तथा उत्तरदायित्व बाँट लेने की जो सुविधा रहती है वह अलग रहने पर कैसे सम्भव हो सकती है? बहुएँ जब तीन−चार छोटे−छोटे बच्चों की माता बन जाती हैं तो अलग घर बसाने पर नये प्रसव के समय कितनी असुविधा होती है यह वे ही जानती हैं। सम्मिलित कुटुम्ब में बच्चों का भार माता पर बहुत ही कम आता है। भरे−पूरे कुटुम्ब में वे ऐसे ही साथ−साथ खाते-खेलते-बढ़ते और पलते रहते हैं जब कि अलग घर में बहु को उन बच्चे से ही किसी प्रकार फुरसत नहीं मिलती। हारी−बीमारी के दिनों में सम्मिलित कुटुम्ब का जो सुख है वह अकेलेपन में कहाँ है? हँसते−बोलते साथ−साथ सामूहिक जीवन में जिन्दगी देखते−देखते बीत जाती है। पर अकेलेपन में एक−एक दिन भारी पड़ता है।

स्वेच्छाचार पर नियन्त्रण

आत्म-संयम और इन्द्रिय निग्रह का जितना अवसर सम्मिलित कुटुम्ब में रहता है उतना अकेले रहने में कहाँ है? सबकी रुचि में अपनी रुचि मिलाकर आहार−विहार का कार्यक्रम, दिनचर्या की व्यवस्था बनानी पड़ती है। उच्छृंखलता और स्वेच्छाचार पर वहाँ पूरा नियन्त्रण रहता है। ऐसे वातावरण में युवावस्था वाली बुरी संगति से सहज ही बच जाते हैं। अकर्म करने का अवसर ही जब न मिलेगा तब पतन की गुंजाइश ही कहाँ रहेगी? भरे−पूरे घरों की लड़कियों और लड़कों को शिष्टाचार बरतना सीखना पड़ता है। बड़ा परिवार सदा से प्रतिष्ठा का सूचक माना जाता है। अभिभावकों के न रहने पर भी विधवाऐं तथा बच्चे अपने को अनाथ अनुभव नहीं करते।

भारत कृषि प्रधान देश है। यहाँ का प्रमुख उद्योग कृषि है। उस धन्धे में कई व्यक्ति घर के हों और सब मिलकर काम करें तो ही लाभ हो सकता है। बँटवारा करके छोटी−छोटी जोत, छोटे−छोटे परिवारों द्वारा कमाई जायँ तो उनमें क्या लाभ रहेगा? अन्य व्यापारों में भी ऐसा ही है कि घर के कई आदमी सच्चे मन से मिल-जुलकर काम करें तो उसे जो लाभ होगा वह नौकर रखकर या अकेले−अकेले में नहीं हो सकता। बच्चों में शिक्षा, संस्कृति, सभ्यता एवं मिलजुल कर काम करने की जो महत्वपूर्ण प्रवृत्ति विकसित होती है वह अकेलेपन में रहते हुए सम्भव नहीं होती।

कर्तव्य−पालन के अवसर

पिता−माता की सेवा करके उनका आशीर्वाद लेने का, भाई बहिनों की सेवा सहायता करने का, बच्चों के साथ खेलने-खिलाने का, मिलजुलकर खाने-बैठने का, एक दूसरे के प्रेम और विश्वास का जो लाभ इकट्ठे रहने में मिलता है वह अकेले रहने वाले को कहाँ मिलेगा? मरघट के पीपल की तरह वह बेखटक खड़ा तो रहता है पर सूनेपन में उसे मानसिक दृष्टि से भारी अभाव ही बना रहता है। उलझनों और जिम्मेदारियों का बोझ भी अकेले रहने वाले को अकेले ही भुगतना पड़ता है, जो कई बार अलग जीवन की सुविधा की अपेक्षा बहुत अधिक चिन्ता और कष्ट का कारण बनता है।

आचार संहिता की आवश्यकता

कई लोग जहाँ इकट्ठे रहेंगे वहाँ कई तरह की समस्याऐं उत्पन्न होती रहेंगी। उन्हें आगे बढ़ने से पूर्व ही सुलझाते रहा जाय तो हमारे परिवार सच्चे प्रजातन्त्र बने रह सकते हैं और उनके स्वास्थ्य विकास से सभ्य समाज का निर्माण होने में भारी योगदान मिल सकता है। परिवारों को सुव्यवस्थित बनाया जाय, उनकी एक व्यवस्थित आचार संहिता रहे जिसका सब लोग पालन करें। जिस प्रकार सरकार चलाने के लिये विधान और कानून बने हुए हैं, पंचायतों की व्यवस्था पंचायत एक्ट के मुताबिक चलती है, उसी प्रकार भारतीय परिवारों की भी एक आचार संहिता रहनी चाहिए। उसके अनुसार कार्य करते हुए प्रत्येक अपने कर्तव्यों का पालन और अधिकारों का उपयोग करता रहे तो हमारे घर स्वर्गीय वातावरण से ओत−प्रोत हो सकते हैं। पारिवारिक आचार संहिता की रूपरेखा पाठक ‘अखण्ड ज्योति’ के अगले अंकों में पढ़ेंगे।

गृहिणी और गृह−व्यवस्था

परिवार का मेरुदण्ड पत्नी होती है। पुरुष दिन भर घर से बाहर रहता है। जितनी देर घर पर रहता है उसमें भी अधिकाँश समय शौच, स्नान, भोजन, निद्रा आदि नित्य कर्मों में लग जाता है। प्रायः सारा दिन स्त्री को घर पर रहना होता है। उसका ही सीधा सम्बन्ध परिवार के छोटे बड़े सब से रहता है। घर की अन्य स्त्रियाँ तथा बच्चे तो दिन भर घर ही रहते हैं, उनके साथ पूरा व्यवहार-क्रम पत्नी को ही चलाना पड़ता है। पुरुष जब घर आते हैं तो उनकी व्यवस्था भी उसी को करनी पड़ती है। इसलिए घर का व्यावहारिक संतुलन बनाये रखना प्रायः स्त्री के हाथ रहता है। पुरुष आर्थिक समस्याऐं हल कर सकते हैं, सुख−सुविधा के साधन जुटा सकते हैं पर दिन भर की पारिवारिक व्यवस्था का नियमित और परिपूर्ण संचालन वे नहीं कर सकते, यह कार्य स्त्री को ही करना होता है। स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कृति एवं भावना की परिपूर्ण व्यवस्था रखनी चाहिये। कुछ दोष दुर्गुण सब में होते हैं हम में से किसी की भी पत्नी ऐसी नहीं होती जो पूर्णतया सब प्रकार उपयुक्त हो। माँ−बाप के घर से कुछ शिक्षा लेकर स्त्रियाँ आती हैं कुछ बातें उन में जन्मजात भी होती हैं, पर सबसे अधिक निर्माण कार्य ससुराल में होता है। ससुराल में भी पति करता है। पति यदि सुयोग्य हो तो फूहड़ से फूहड़ पत्नी को सद्गुणों की खान और उन विशेषताओं से सम्पन्न बना सकता है जो पारिवारिक जीवन को सुसंचालित रखने के लिए आवश्यक हैं।

नारी की कामना और आकाँक्षा

अपने पिता का भरा-पूरा घर, अपने जन्म परिवार का स्नेह सौजन्य को छोड़कर जब नारी ससुराल आती है तो उसे इस जीवन क्रान्ति में एकमात्र प्रकाश स्तंभ पति का प्रेम ही दीखता है। यों ससुराल में सभी से उसे सद्व्यवहार की आशा होती है पर सबसे अधिक आकाँक्षा पति की गहन आत्मीयता की होती है। वह अपने बिछुड़े हुए पितृ परिवार की सारी ममता और आत्मीयता की क्षतिपूर्ति पति के प्रेम प्रतिदान द्वारा पूर्ण करना चाहती है। यदि वह मिल गया तो विपुल वर्षा होने पर उर्वर भूमि में उगने वाली वनस्पति की तरह उसका व्यक्तित्व अनेक सद्गुणों की हरियाली से लहलहाने लगता है। यदि यह प्राप्त न हुआ तो जिस प्रकार सूखा पड़ जाने या तुषारपात होने पर हरी−भरी फसल भी नष्ट हो जाती है उसी प्रकार नारी के संचित सद्गुण भी असंतोष की आग में जल−भुन कर समाप्त हो जाते हैं। नारी की स्वाभाविक आकाँक्षा आत्मीयता को दिये बिना कोई पति उसका सच्चा प्रेम और सहयोग प्राप्त कर नहीं सकता।

हिस्टेरिया, मृगी, चिड़चिड़ापन, दुस्वप्न, अनिद्रा, दिल की धड़कन मासिक धर्म की खराबी, सिर दर्द, कमर दुखना आदि अनेक शारीरिक रोगों की जड़ स्त्रियों के आन्तरिक असंतोष में रहती है। वे स्वाभाविक लज्जावश अपनी वेदना किसी से कह तो नहीं पाती, कहें भी तो अनुकूलता उत्पन्न करने का कोई उपाय उनके पास नहीं होता। ऐसी दशा में वे चुपचाप सहती तो रहती हैं पर आन्तरिक असन्तोष उनके अनेकों सद्गुणों को जलाता भूनता रहता है। उनका कोमल मस्तिष्क एक प्रकार से विक्षिप्त रहने लगता है, फलस्वरूप शारीरिक स्वास्थ्य ही खोखला नहीं होता जाता वरन् वे मानसिक विशेषताएँ भी नष्ट होने लगती हैं जो पारिवारिक सुव्यवस्था एवं विकास के लिए अत्यन्त आवश्यक होती हैं।

संतोष और समृद्धि

मनु भगवान की उक्ति है कि “जहाँ नारी संतुष्ट है उस घर में समृद्धि की वर्षा होगी और जहाँ उसे असंतोष रहेगा वहाँ सब कुछ नष्ट हो जायेगा।” असंतोष के छोटे−मोटे कारण व्यवस्था श्रम संबंधी असुविधा, जीवनोपयोगी वस्तुओं के अभाव, तात्कालिक घटनाएँ एवं दूसरे लोगों का असद्व्यवहार आदि कारण भी होते हैं, पर उनका प्रभाव बहुत गहरा नहीं होता। उनमें सुधार भी हो सकता है, भुलाया भी जा सकता है और संतोष भी किया जा सकता है। पर जो कमी और किसी प्रकार पूरी नहीं हो सकती वह पति के प्रेम की कमी है। उपेक्षिता नारी विधवा से भी अधिक दुखी रहती है। विधवा अपने दुर्भाग्य को अटल मानकर संतोष कर लेती हैं पर सुहागिन को तो अपनी स्थिति पर आँसू ही बहाते रहने पड़ते हैं।

असंतुष्ट नारी के गर्भ से कभी सद्गुणी सन्तान उत्पन्न नहीं हो सकती। अवैध संतान के गर्भ काल में माता अनेकों चिन्ताओं, विक्षोभों और भय, लज्जा, दुर्भाव आदि में ग्रस्त रहती हैं इसलिए आमतौर से ऐसे बच्चे उद्दण्ड और दुर्गुणी निकलते हैं। इसी प्रकार पति के प्रेम के अभाव या अन्य किन्हीं कारणों से यदि नारी असंतुष्ट और विक्षुब्ध बनी रहती है तो उसका प्रभाव गर्भस्थ संतति पर निश्चित रूप से पड़ने वाला है। ऐसे बालकों को उच्च शिक्षा भी उनके मानसिक एवं आत्मिक दुर्गुणों से रहित नहीं बना सकती। इसलिए संतान को सुयोग्य और प्रबुद्ध बनाने की भूमिका के रूप में पत्नी के संतुष्ट सुखी और निश्चिन्त बनाने की व्यवस्था के लिए तो यह कार्य अनिवार्य ही है क्योंकि बाहर से स्वस्थ दीखने पर भी जो भीतर से विक्षुब्ध रहती है उस नारी के आचरण में व्यवस्था, शिष्टता आदि की कमी बनी ही रहेगी। वह सुयोग्य गृहिणी नहीं बन सकेगी। अविचल विश्वास और परिपूर्ण प्रेम पाकर नारी परम संतुष्ट रह सकती है। जहाँ उसे स्नेह और सम्मान मिलता है, सहानुभूति और कृतज्ञता से देखा जाता है वहाँ वह आत्मसमर्पण करके सब कुछ होम देने को तैयार हो जाती है। नारी का रंग-रूप, वेश-विन्यास, बनाव-शृंगार देखना निरर्थक है। यह चीजें बहुत ही तुच्छ और क्षणिक हैं। आन्तरिक सौन्दर्य काले, कुरूप, अशिक्षित और अस्वस्थ शरीर में भी हो सकता है। उस सच्चे सौन्दर्य का पुष्प भावनाओं की टहनी पर खिलता है। इस आन्तरिक सौन्दर्य का रसास्वादन पति−पत्नी जहाँ आपस में किया करते हैं वहाँ स्वर्ग ही विराजमान रहता है। जिस पति−पत्नी ने अपनी अन्तरात्मा को एक करके एकता और आत्मीयता की, प्रेम और विश्वास की गंगा प्रवाहित कर ली, उनके परिवार में सदा मंगल ही मंगल रहेगा। एकता वहाँ की नष्ट न होगी, लक्ष्मी वहाँ से टाले न टलेगी। उस घर के हर व्यक्ति का भविष्य आशा और उत्साह की दिशा में ही अग्रसर होगा।


हम अशान्त और आतंकित न हों

कितना ही प्रयत्न करने पर भी, कितनी ही सावधानी बरतने पर भी, ऐसा सम्भव नहीं कि मनुष्य के जीवन में अप्रिय परिस्थितियाँ प्रस्तुत न हों। यहाँ सीधा और सरल जीवन किसी का भी नहीं हैं। अपनी तरफ से मनुष्य शान्त, सन्तोषी और संयमी रहे, किसी से कुछ न कहे, कुछ न चाहे तो भी दूसरे लोग उसे शान्तिपूर्वक समय काट ही लेने देंगे इसका कोई निश्चय नहीं। कई बार तो सीधे और सरल व्यक्तियों से अधिक लाभ उठाने के लिए दुष्ट दुर्जनों की लालसा और भी तीव्र हो उठती है। कठिन प्रतिरोध की सम्भावना न देखकर सरल व्यक्तियों को सताने में दुर्जन कुछ न कुछ लाभ ही सोचते हैं। सताने पर कुछ न कुछ वस्तुऐं मिल जाती हैं और दूसरों को आतंकित करने, डराने का एक उदाहरण उनके हाथ लग जाता है।

अन्यान्य कठिनाइयाँ

हम सब के शरीर अब जैसे कुछ बन गये हैं उनमें पग−पग पर कोई बीमारी उठ खड़ी होने की आशंका रहती है। प्रकृति का संतुलन एटम बमों के परीक्षण से, वृक्ष वनस्पतियाँ कम हो जाने से, कारखानों के धुँए से हवा गन्दी होते रहने से, बिगड़ता चला जा रहा है उसके कारण दैवी विपत्ति की तरह कई बार बीमारियाँ फूट पड़ती हैं और संयमी लोग भी अपना स्वास्थ्य खो बैठते हैं। खाद्य पदार्थों का अशुद्ध स्वरूप में प्राप्त होना, उनमें पोषक तत्व घटते जाना, आहार−विहार की अप्राकृतिक परम्परा के साथ घिसटते चलने की विवशता आदि कितने ही कारण ऐसे हैं जो संयमी लोगों को भी बीमारी की ओर घसीट ले जाते हैं।

कौन ऐसा है जिसे प्रियजनों की मृत्यु का शोक सहन नहीं करना पड़ता। इस नाशवान दुनियाँ में सभी तो मरणधर्मा होकर जन्मे हैं। मरघटों की चिताऐं सुलगती ही रहती हैं। जन्म की भाँति मृत्यु भी इस संसार की एक सुनिश्चित सचाई है। अपने घर के, अपने परिवार के, अपने प्रिय समाज के कोई न कोई स्वजन, स्नेही मरेंगे ही और मरने पर शोक सन्ताप होगा ही। माताओं को अपनी गोदी के खेलते हुए प्राण प्रिय बच्चों का शोक सहना पड़ता है। पत्नियाँ अपने जीवनाधार पतियों को अर्थी पर कसा जाना देखती हैं। मित्र, मित्र से बिछुड़ते हैं। भाई बहिन, साले बहनोई, दामाद, पिता, माता, बेटे पोते आगे पीछे समय−असमय मरते ही रहते हैं। जिनके ऊपर बीतती है वे उसे वज्रपात जैसा समझते हैं बाकी लोग उसे एक बहुत छोटी−सी नगण्य घटना, क्षणिक कौतूहल मात्र मान कर दिखावटी सहानुभूति प्रकट करते हुए, उपेक्षा करते रहते हैं। यह क्रम संसार में अनादि काल से चला आ रहा है।

परिवर्तित परिस्थितियाँ

परिस्थितियाँ मनुष्यों को स्थान परिवर्तन करने के लिए भी विवश करती रहती हैं। नौकरी पेशा वालों की बदली होती है। व्यापार, शिक्षा या अन्य कार्यों के कारण पति−पत्नी को अलग−अलग रहना पड़ता है। हवा के झोंके में उड़ते हुए सूखे पत्तों की तरह परम स्नेही मनुष्य भी कई बार यहाँ से वहाँ चले जाते हैं और उनका बिछोह करकता रहता है। आर्थिक हानियों के अवसर बुद्धिमानों के सामने भी आते रहते हैं। चतुर व्यापारी कई बार ऐसे उतार चढ़ावों के बीच फँस जाते हैं कि उन्हें अपनी आजीविका और प्रतिष्ठा दोनों से ही हाथ धोना पड़ता है। दैवी प्रकोप से, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुर्भिक्ष, भूकम्प, बाढ़, अग्निकाण्ड, चोरी, डकैती, कमाऊ व्यक्ति की मृत्यु, प्रतिस्पर्धा, भावों को तेजी मंदी, विश्वासघात, ठगी आदि कितने ही आकस्मिक कारण ऐसे हो सकते हैं जिनके कारण अनायास ही बहुत बड़ा आर्थिक आघात लगे और उसके फलस्वरूप भारी हानि उठानी पड़े, चलती हुई गाड़ी पटरी पर से उतर जाय और अप्रत्याशित परिस्थितियों का सामना करना पड़े।

परीक्षा की तैयारी में लगे हुए छात्रों में से 35 प्रतिशत उत्तीर्ण और 65 प्रतिशत अनुत्तीर्ण होते हैं। नौकरी के लिए खाली जगहों में एक स्थान के पीछे 100 अर्जी पहुँचती हैं। स्थान तो एक को मिलता है बाकी 99 को निराश रहना पड़ता है। कितने ही प्रेम अभिनयों का दुखद अन्त होता है। सुनहरे सपने परिस्थितियों की ठोकर खाकर चूर−चूर हो जाते हैं। इस प्रकार असफलता, निराशा, हानि, चिन्ता, प्रतिकूलता और परेशानी के अवसर हर मनुष्य के सामने छोटे या बड़े रूप में आते ही रहते हैं। उनसे पूर्णतया सुरक्षित रहना किसी के लिए भी संभव नहीं। इच्छा या अनिच्छा से प्रतिकूलताओं का सामना करना ही पड़ता है। रोकर या हँसकर उन्हें भुगतना ही पड़ता है।

भावावेश और मानसिक दुर्बलता

मानसिक दृष्टि से दुर्बल और भावावेश में बहने वाले व्यक्ति इन छोटी−छोटी प्रतिकूलताओं में अपना संतुलन खो बैठते हैं और परेशानी में ऐसे बौखला जाते हैं कि उनका मस्तिष्क विक्षिप्त एवं उद्विग्न होकर ऐसी विपन्न स्थिति में जा पहुँचता है कि क्या करना, क्या न करना यह वे बिलकुल भी नहीं सोच पाते। ऐसी स्थिति में ये जो भी कदम उठाते हैं वह प्रायः गलत ही होता है। विक्षोभ की स्थिति में किये हुए निर्णय आमतौर से ऐसे होते हैं जिनसे विपत्ति से निकलने का मार्ग नहीं मिलता वरन् उलटे कठिनाइयों के और अधिक गहरे दलदल में फँस जाने का खतरा सामने आ खड़ा होता है। कई बार लोग घर छोड़ कर भाग निकलने, आत्महत्या कर लेने, कपड़े रंगा कर बाबाजी हो जाने आदि की ऐसी गलतियाँ कर बैठते हैं जिन पर पीछे केवल पश्चाताप ही करना शेष रह जाता है। कई बार उद्विग्न लोग उन पर बरस पड़ते हैं वे जिन्हें आग प्रतिकूलता का कारण समझते हैं। गाली गलौज, मार−पीट, फौजदारी, कत्ल, हत्या आदि की दुर्घटनाएँ प्रायः आवेश की स्थिति में ही की जाती हैं और पीछे इनकी प्रतिक्रिया में इतनी हानि उठानी पड़ती है जो उस कारण से भी अधिक महँगी पड़ती है जिसके लिए यह सब किया गया था। कहते हैं कि “विपत्ति अकेली नहीं आती, वह अपने साथ और भी अनेकों मुसीबतें लिए आती है। “कारण स्पष्ट है कि प्रतिकूलता से घबराया हुआ मनुष्य यह सोच नहीं पाता कि अब उसे क्या करना चाहिए। साधारण कठिनाइयों से पार होने में ही काफी धैर्य सूझ−बूझ और दूरदर्शिता की आवश्यकता पड़ती है, फिर कुछ अधिक मानसिक संतुलन अभीष्ट होता है। यह न रहे तो विपत्तिग्रस्त मनुष्य किंकर्तव्य विमूढ़ होकर प्रायः वह करने लगता है जो न करना चाहिए था। फलस्वरूप विपत्ति की नई शाखाएँ फूट पड़ती हैं और कठिनाई का नया दौर आरंभ हो जाता है। जब कभी ठंडे मस्तिष्क से विचार करने का अवसर आता है तब मनुष्य पछताता है और सोचता है कि आगत विपत्ति नहीं टल सकती थी तो कोई बात न थी। अपने मानसिक संतुलन को तो विवेक द्वारा बचाया ही जा सकता था और जो परेशानियाँ अपनी भूलों के कारण सिर पर ओढ़ ली गईं उनसे तो बचा ही जा सकता था।

शोक संताप के अवसर

घर में किसी की मृत्यु हो गई, एक प्रिय पात्र चला गया, उसके जाने से हानि भी हुई, धक्का भी लगा और शोक के कारण रुलाई भी आई। पर यदि लगातार रोते ही रहा जाय, भोजन त्याग दिया जाय, मूर्छित पड़े रहा जाय, उस शोक को ही स्मरण रखा जाय तो परिणाम एक ही होता है कि रहे−सहे स्वास्थ्य का नाश और उस गड़बड़ी में साधारण कार्यक्रमों के नष्ट होने से दूनी विपत्ति का उद्भव। कमजोर आँखों वाले अधिक रोते रहें तो उनकी आँखों की रोशनी चली जाती है। दिल की धड़कन, ब्लडप्रेशर, अनिद्रा, उन्माद, मूर्च्छा, अपच, उलटी, सिर दर्द आदि अनेकों नये रोग उठ खड़े होते हैं। दूसरे लोग उस शोक संतप्त को समझाने बुझाने या उसकी सहानुभूति में लगे रहते हैं और साधारण व्यवस्था को भूल जाते हैं तो दूसरी ओर से भी काम बिगड़ते हैं। दुधारू पशु समय पर न दुहे जाने, चारा पानी ठीक प्रकार न मिलने से दूध देना बन्द कर देते हैं, बिना देख भाल के खेती या व्यापार खराब होता है। बच्चे परेशान होते हैं। चोरों की ऐसे ही मौके पर घात लगती है। दुश्मनों को हँसने का मौका मिलता है। उस मृत्यु के कारण उत्पन्न हुए नये कामों और उत्तरदायित्वों के निबाहने के लिए जो महत्वपूर्ण हेर फेर करने आवश्यक होते हैं वह भी नहीं सूझ पड़ते। इस प्रकार वह मृत्यु−शोक अपने साथ अनेकों नई विपत्तियाँ उत्पन्न करने वाला सिद्ध होता है।

यदि दूरदर्शिता के साथ यह सोच लिया गया होता कि घटित हुई घटना अब लौट नहीं सकती, गया व्यक्ति आ नहीं सकता, अन्ततः शोक को समाप्त करके साधारण क्रम अपनाना ही पड़ेगा, तो उस कार्य को बिना अधिक क्षति उठाये और बिना अधिक समय गँवाये ही पूरा क्यों न कर लिया जाय। इस प्रकार सोचने वाले अपना मन संभालते हैं, धैर्य विवेक संतोष और दूरदर्शिता से काम लेते हैं। शोक घटा कर संतुलन ठीक करते और स्वाभाविक जीवन की व्यवस्था जल्दी ही बना लेते हैं। ऐसे लोग अनावश्यक रूप में स्वयं उत्पन्न की गई विपत्ति से बच जाते हैं।

असफलता और निराशा

असफलता के समय दिल छोटा करने और निराश होने की क्या बात है। प्रथम प्रयास अवश्य ही सफल होना चाहिए यह कोई जरूरी नहीं। संसार में प्रयत्नशील व्यक्ति भी दो तिहाई असफलता और एक तिहाई सफलता का अनुमान लगा कर काम करते हैं। उसी पर संतोष करते हैं और उतना ही पर्याप्त भी मानते हैं। एक परीक्षा में एक बार फेल हो जाना कोई ऐसी विपत्ति नहीं है जिसके लिए अत्यधिक चिन्तित और निराश हुआ जाय। अबकी बार फेल होने पर दो वर्ष की तैयारी में अच्छा डिवीजन मिल सकता है और आगे की नींव पक्की हो सकती है। जिन्दगी इतनी लम्बी हैं कि उसमें दो−चार असफलताओं के लिए भी जगह रखनी पड़ती है।

हर काम में सदा सफलता ही मिलती रहे तब तो मनुष्य, मनुष्य न रह कर देवताओं की श्रेणी में गिना जाने लगे। यह सोचकर परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले अपना साहस समेटे रह सकते हैं और उस खिन्नता को भुलाकर दूने उत्साह से अगली तैयारी में लग सकते हैं। इस बार नौकरी न मिली, इस जगह पर नियुक्ति न हुई, तरक्की का अबकी बार अवसर न मिला तो आगे मिलेगा। इसमें हतोत्साह होने की कौन सी बात है? उन्नति के लिए प्रयत्न करना चाहिए पर जो परिणाम सामने आवें उसे संतोष और धैर्य पूर्वक हँसते मुस्कराते हुए शिरोधार्य ही करना चाहिए।

घाटा और तंगी

आर्थिक घाटा लग गया तो हैरानी की क्या बात है? अपने पास यदि क्षमता, प्रतिभा, साहस पुरुषार्थ और कौशल मौजूद है तो आज न सही चार दिन बाद फिर आवश्यक साधन जुट जायेंगे। न भी जुट जायँ तो थोड़ा “स्टेंडर्ड” (स्तर) घटाकर कम खर्च में भी अच्छा खासा जीवन जिया जा सकता है। गरीब लोग भी तो आनन्द और उल्लास की जिन्दगी जीते हैं फिर हम भी वैसा क्यों न कर सकेंगे। खर्चों में कमी कर डालने से गरीबी अखरने वाली नहीं रहती। समय ने हमारी आमदनी पर कुल्हाड़ा चलाया तो हम अपने खर्चों में काट छाँटकर आसानी से उस सन्तुलन पूरा कर सकते हैं। समय के अनुरूप अपने स्तर को घटा लेने का साहस जिसमें मौजूद हैं, जिसे हल्के दर्जे की मजूरी में अपना गौरव नष्ट होते नहीं दीखता उसके लिए घाटे की स्थिति में भी परेशानी का कोई कारण नहीं।

परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढाल लेने का जीवन विज्ञान जिनने सीखा है उनके लिए अमीरी की तरह गरीबी में भी हँसने और प्रसन्न रहने का कारण मौजूद है। जिन्हें श्रम करने में शर्म नहीं आती, जिनने प्रयत्न पुरुषार्थ, साहस और उल्लास को नहीं खोया है वे आजीविका का उपयुक्त मार्ग आज नहीं तो कल प्राप्त कर लेंगे। कल पंजाब में सब कुछ खोकर आये हुए और आज ठीक प्रकार जीवनयापन करने वाले शरणार्थी भाइयों को उदाहरण हमारे सामने है। अधीरता तो कायर का चिन्ह है। मुफ्त की मौज उड़ाने वाले हरामखोर हानि का रोना रोवें तो बात समझ में आती है पर जिनकी नसों में पुरुषार्थ मौजूद है वह तो जमीन में लात मारकर कहीं से भी पानी निकाल लेगा। वह क्यों निराश होगा, वह क्यों सिर धुनेगा? लक्ष्मी पुरुषार्थ की चेरी है। जिसके पास पुरुषार्थ है उसे लक्ष्मी के चले जाने की चिन्ता क्यों करनी चाहिए?

मतभेदों को सुलझाना

मतभेद के, लड़ाई झगड़े के कई कारण हो सकते हैं। ठंडे मस्तिष्क से, शान्त चित्त से विचार विनियम कर लें तो हम उनमें से कितनों को ही चुटकी बजाते सुलझा सकते हैं। उत्तेजित दिमाग तिल को ताड़ बना देता है और राई को पर्वत बनाता है। संशय, अविश्वास और विक्षोभ से भरा हुआ मन दूसरों में अगणित प्रकार के दुर्भावों की कल्पना किया करता है। उन्हें दूसरे सभी दुष्ट, दुर्जन, द्वेष रखने वाले, स्वार्थी आक्रमणकारी दीखते रहते हैं। पर यदि चढ़े हुए दिमाग का पारा नीचे उतार लिया जाय तो लगेगा कि मतभेद के कारण बहुत ही छोटे थे। कुछ अपने को सुधार कर कुछ उन्हें समझा बुझाकर ठीक रास्ता आसानी से निकल सकता है। समझौता करके मिलजुल कर समन्वय और सहिष्णुता की—सहअस्तित्व की नीति पर चलते हुए मतभेद रखने वाले लोगों के साथ भी गुजारा करने का रास्ता निकल सकता है।

आवेश में और उत्तेजना में कहे हुए कोई कटु शब्द हमें भुला ही देने चाहिए। जूड़ी, सन्निपात में बकझक करने वाले रोगी की बातें कौन स्मरण रखता है? किसी नासमझी या गलत−फहमी के कारण यदि कभी कुछ कटु वचन किसी ने कह दिया तो उसे स्मरण रखे रहने से कुछ लाभ नहीं। स्वाभाविक स्थिति प्रेम−सहयोग और सहिष्णुता की ही है। वही हमें अपने प्रियजनों के बीच बनाये रहनी चाहिए और वही नीति सम्बन्धित सर्वसाधारण के साथ बरतनी चाहिये। अपनी ओर से मीठे और सज्जनता पूर्वक वचन बोलते रहने और शिष्ट व्यवहार करते रहने से लड़ाई-झगड़े का बहुत सा आधार नष्ट हो जाता है।

चिन्ता और निराशा की व्यर्थता

भविष्य की आशंकाओं से चिन्तित और आतंकित कभी नहीं होना चाहिए। आज की अपेक्षा कल और भी अच्छी परिस्थितियों की आशा करना, यही वह सम्बल है जिसके आधार पर प्रगति के पथ पर मनुष्य सीधा चलता रह सकता है। जो निराश हो गया, जिसकी हिम्मत टूट गई, जिसकी आशा का दीपक बुझ गया, जिसे अपना भविष्य अन्धकारमय दीखता रहता है, वह तो मृतक समान है। जिन्दगी उसके लिए भार बन जावेगी और वह काटे नहीं, न कटेगी। यह दुनियाँ कायरों और डरपोकों के लिए नहीं साहसी और शूरवीरों के लिए बनी है। हमें साहसी और निर्भीक होकर ही जीना चाहिये।

प्रतिकूलताओं से लड़ने का साहस रखना और जब वे सामने आ जावें तो हिम्मत वाले पहलवान के समान उनको परास्त करने के लिए जुट जाना यही बहादुरी का काम है। बहादुर को देखकर आधी विपत्ति अपने आप भाग जाती है। मनुष्य प्रयत्न करके प्रतिकूलताओं को निश्चय ही परास्त कर सकता है। अन्धकार के बाद प्रकाश का आना जब निश्चित है तो विपत्ति ही सदा कैसे टिकी रह सकती है? हम हिम्मत बाँधें तो ईश्वर की मदद जरूर मिलेगी। परमात्मा सदा से प्रयत्नशीलों की, साहसी, विवेकवान और बहादुरों की सहायता करता रहा है फिर हमारी ही क्यों न करेगा? शान्ति के बाद यदि अशान्ति की परिस्थिति आ धमकी तो परिवर्तनचक्र इन्हें सदा थोड़े ही बना रहने देगा। अशान्ति के बाद शान्ति के क्षणों का, विपत्ति के बाद सम्पत्ति का आना भी उतना ही निश्चित है जितना रात के बाद दिन का आना है। फिर हमें निराशा क्यों हो? हम अशान्त और आतंकित क्यों बनें?


यह करने के लिए हम कटिबद्ध हो जायँ

युग निर्माण योजना कागजी या कल्पनात्मक जल्पना नहीं है। वह समय की पुकार, जन मानस की गुहार और दैवी इच्छा की प्रत्यक्ष प्रक्रिया है। इसे साकार होना ही है। इसको आरम्भ करने का श्रेय ‘अखण्ड−ज्योति’ परिवार को मिल रहा है तो इस सौभाग्य के लिए हममें से प्रत्येक को प्रसन्न होना चाहिये और गर्व अनुभव करना चाहिये। योजना का स्वरूप इस वर्ष के अंकों में पाठकों के सामने भली प्रकार प्रस्तुत किया जा चुका है, अब उसको व्यावहारिक स्वरूप दिया जाना है। उसे प्रत्यक्ष कर दिखाया जाना है। इसके लिए बिना समय नष्ट किये हमें अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व की पूर्ति के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिये। आलस्य और उपेक्षा करने वालों को पश्चाताप ही हाथ रह जायेगा।

अखण्ड ज्योति परिवार का प्रारम्भिक संगठन कार्य सन् 62 में पूरा हो जाना चाहिए। पत्रिका के जो ग्राहक इन दिनों हैं उन्हें संगठन सूत्र में जल्दी ही आबद्ध हो जाना चाहिए। सितम्बर अंक में जो फार्म लगा था वह अभी तक जिनने भरकर नहीं भेजा है उन्हें उसे तुरन्त ही भरकर मथुरा भेज देना चाहिये। इस कार्य में विलम्ब लगाना, आलस या उपेक्षा करना अनुचित है। जिन्हें शाखा संचालक नियुक्त कर दिया है, वे अपने सम्बद्ध दस व्यक्तियों को प्रेरणा देते रहने का उत्तरदायित्व उत्साहपूर्वक निबाहें। धर्मफेरी, धर्म चर्चा एवं विचार गोष्ठियों का कार्यक्रम चलाने लगें। जिनके सम्बद्ध दस सदस्य पूरे नहीं हो पाये वे उस संख्या को जल्दी ही पूरा कर लें। जिन संचालकों के संबद्ध सदस्यों में से कुछ दूर रहते हैं वे उन्हें पत्र व्यवहार द्वारा आवश्यक प्रेरणाऐं देते रहें।

अपने तक ही सीमित न रहें

युग निर्माण योजना की पृष्ठभूमि तथा भावनाओं से अधिकाधिक लोगों का परिचित कराया जाना आवश्यक है। विचार ही बीज है। मस्तिष्क में जब वह ठीक तरह बोया जाता है तो उसके अंकुर उगते और पौधे के रूप में उगकर विशाल वृक्ष बनते हैं। विचारों से ही परिपक्वरूप कार्य बनता है। यदि हम संसार में सत्कर्मों की फसल फली-फूली देखना चाहते हैं तो इसका एक ही उपाय है कि सद्विचारों का क्षेत्र अधिकाधिक विस्तृत हो। इस पुनीत प्रक्रिया में हम सबको पूरी शक्ति और तत्परता के साथ लग जाना चाहिये।

‘अखण्ड ज्योति’ जिनके भी पास पहुँचती हो वे उसे पत्रिका मात्र न समझें वरन् आदि से अन्त तक दो बार पढ़ें। सरसरी नजर से एक बार पन्ने उलटकर पत्रिका को एक तरफ रख देने से काम न चलेगा। हमारी चिट्ठी, वाणी, प्रेरणा, भावना और आकाँक्षा का मूर्तरूप ‘अखण्ड ज्योति’ ही है। इसे भावना और ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिये और इन पत्रों के साथ लिपटी हुई प्रेरणाओं को मनन और चिन्तनपूर्वक हृदयंगम करना चाहिये। हमारी आत्मा से अपनी आत्मा को जोड़ने और भावना के साथ भावना का स्पर्श करने का यही तरीका है। हमारे सान्निध्य और सत्संग की जिन्हें उपयोगिता प्रतीत होती हो उन्हें आदि से अन्त तक ‘अखण्ड ज्योति’ पढ़ते रहना चाहिये। एक महीने में हमने जो कुछ सोचा, विचारा, पढ़ा, मनन किया, समझा और चाहा है, उसका साराँश पत्रिका की पंक्तियों में मिल जायेगा। इस सत्संग की उपेक्षा को हम अपनी उपेक्षा ही समझते हैं और प्रत्येक प्रेमी से यह आशा करते हैं कि वह हमें, हमारी भावना, आकाँक्षा और गतिविधियों को समझने के लिये पत्रिका को उसी मनोयोग से पढ़ें जैसे हमारे पास बैठकर हमारी बातों को सुना जाता है।

परिवार सबसे पहले

अपने घर का कोई शिक्षित व्यक्ति ऐसा न बचे जो घर में आने वाली पत्रिका को पढ़ता न हो। स्वयं पड़ लेना पर्याप्त नहीं। वरन् घर के प्रत्येक सदस्य को इन विचारों के सम्पर्क में लाना परिवार निर्माण की दृष्टि से नितान्त आवश्यक है। ऐसे साहित्य को पढ़ने में आमतौर से रुचि नहीं होती, यह रुचि पैदा करनी पड़ेगी। यह कार्य अपने घर से ही होना चाहिये। अपने भाई, भतीजे, बच्चे, बुजुर्ग जो भी पढ़ना जानते हों उन्हें आग्रहपूर्वक पत्रिका पढ़ानी चाहिये। जो पढ़े न हों उन्हें सप्ताह में एक दिन एक डेढ़ घण्टे का सत्संग लगाकर ‘अखण्ड ज्योति’ के लेखों को सुनाना चाहिए। चार से लेकर छह घण्टे में पत्रिका पूरी पढ़कर सुनाई जा सकती है। सप्ताह में एक दिन अवकाश का रखकर उस दिन परिवार के सब लोग इकट्ठे किये जायँ और उन्हें एक डेढ़ घण्टे का यह लाभ दिया जाय। इस प्रकार महीने के चार सत्संगों में पूरी पत्रिका सुनाई जा सकती है। इसी सत्संग में थोड़ा भजन कीर्तन, जप, पाठ, हवन आदि भी करते जाना चाहिये। इन प्रकार के पारिवारिक सत्संग हर घर में चलने चाहियें।

एक से दस बनें

‛एक से दस’ की नीति अपनाकर ही हम युग निर्माण योजना को विश्वव्यापी बना सकेंगे। अपने पास प्रचार के वे साधन नहीं हैं जिनके द्वारा दूर−दूर तक अगणित लोगों को अपनी विचारधारा से परिचित कराया जाना सम्भव होता है। जिन संस्थाओं के पास बहुत धन साधन हैं वे अपने विचार थोड़े ही समय में व्यापक क्षेत्र में फैला सकती हैं। पर अपने साधन अत्यन्त स्वल्प होने के कारण “एक से दस” की नीति द्वारा ही अपना प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। हममें से प्रत्येक को यह प्रयत्न करना चाहिये कि अपने घर से बाहर कम से कम 10 व्यक्तियों को इस विचारधारा से परिचित कराया जाता रहे। इस कार्य के लिए नित्य एक घण्टा समय निकालना चाहिये। जिन लोगों में थोड़ी धर्म रुचि और विचारशीलता के अंकुर मौजूद हों ऐसे अपने प्रियजनों, मित्रों, परिचितों के नाम नोट कर लेने चाहिए। धर्म-फेरी के लिए नियत किया हुआ एक घण्टा उनके घर जाकर योजना सम्बन्धी चर्चा करने तथा अपनी पत्रिका उन्हें देकर पढ़ने की प्रेरणा देने में लगाना चाहिए। एक दिन में एक व्यक्ति से मिलने का कार्यक्रम बनाया जाय तो महीने में तीस व्यक्तियों से मिलने और धर्म चर्चा करने वाली बात आसानी से बन सकती है। इतना न हो सकता हो तो भी दस व्यक्तियों से हर महीने मिलने−जुलने और “अखण्ड ज्योति” पढ़ने तथा निर्धारित विषयों पर धर्म चर्चा करने का कार्य तो बहुत ही सरलतापूर्वक किया ही जा सकता है।

सप्ताह में एक दिन की छुट्टी का समय मिलता है, उसी में से कुछ घण्टे धर्म-फेरी के लिए रख लिए जायँ और प्रति सप्ताह दो तीन व्यक्तियों से मिलते रहा जाय तो भी दस व्यक्तियों से मिलने का लक्ष पूरा होता रह सकता है।

ज्ञान गोष्ठियों का विस्तार

अपने सम्पर्क के इन दस व्यक्ति यो को सप्ताह में एक दिन कहीं इकट्ठा भी करना चाहिए। क्रमशः एक−एक के यहाँ इकट्ठे होकर सत्संग करते रहें तो यह दस व्यक्तियों का सत्संग दस सप्ताह तक तो नय- नये घरों में होता रहेगा। वर्ष में 5 बार हर सदस्य के घर यह ज्ञान गोष्ठी होती रहे तो इन दस व्यक्तियों में परस्पर परिचय और प्रेम भाव भी बढ़ेगा और संगठन सुदृढ़ होने से योजना के कार्यान्वित होने में भी सरलता होगी। यह विचार−गोष्ठी−सत्संग—जहाँ हो वहाँ दसों व्यक्ति यह प्रयत्न करें कि कुछ नये व्यक्ति भी उसमें सम्मिलित हों, जिसके घर पर हो वह तो अपने पड़ौसियों और घर वालों को आसानी से इकट्ठे कर सकते हैं। इन सत्संगों में युग निर्माण विचारधारा के विभिन्न पहलुओं पर भाषण, प्रवचन, शंका समाधान, विचार−विनिमय हों और साथ ही भजन, कीर्तन, जप, पूजा, हवन आदि का भी थोड़ा कार्यक्रम रहे। जिन नगरों में ऐसी कई शाखाऐं हों, उन सबको महीने में एक बार सबका सम्मिलित सत्संग करना चाहिए। इस प्रकार संगठन और विचार विस्तार का महत्वपूर्ण कार्यक्रम उत्साह−पूर्वक प्रगति करता रह सकता है।

सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर सन् 62 के चारों अंक युग निर्माण योजना एवं पंचकोशी साधना की दृष्टि से अत्यन्त ही महत्वपूर्ण हैं। इन्हें अतिरिक्त संख्या में भी छपा लिया गया है। प्रयत्न यह करना चाहिए कि यह चार अंकों का सैट एक रुपया मूल्य लेकर विचारशील व्यक्तियों में बेचा जाय, ज्ञानदान के रूप में उपहार दिया जाय। अथवा इन अंकों के कुछ सैट अपने पास रखकर उन्हें दूसरों को पढ़ाते रहने के काम में लाया जाय। चार अंकों का यह सैट अपनी योजना एवं भावनाओं की ठीक अभिव्यक्ति कर सकता है। इसलिए इसके प्रसार में उदारता और तत्परतापूर्वक प्रयत्न किया जाय। योजना का स्वरूप सर्व साधारण को समझाने के लिए इन चार अंकों को अधिकाधिक जनता पढ़े ऐसा प्रयत्न करना आवश्यक है।


नई प्रबुद्ध पीढ़ी का अवतरण

युग निर्माण के लिए ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो जन्मजात रूप से आवश्यक आत्मबल लेकर आये हों। शिक्षा और उपदेशों से सुधार तो होता है पर यदि व्यक्ति जन्मजात रूप से हीन संस्कार अपने साथ लाया है तो उस पर सुधार, शिक्षा का बहुत थोड़ा असर होगा।

प्रबुद्ध व्यक्तियों का निर्माण माता−पिता के सुसंस्कारों से होता है। अर्जुन और द्रौपदी के उच्च गुणों से तथा गर्भकाल में समुचित शिक्षण प्राप्त करने से अभिमन्यु ऐसे संस्कार लेकर जन्मा था कि सोलह वर्ष की आयु में ही चक्र-व्यूह बेधन जैसे कठिन कार्य के लिए कटिबद्ध हो सका। प्राचीन काल में गर्भाधान को एक परम पवित्र संस्कार माना जाता था। उसकी तैयारी के लिए युवक-युवती चिरकाली शिक्षा, साधना करके अपने को इस योग्य बनाते थे कि उनके संयुक्त प्रयत्न से सुसंस्कारी संतति का अवतरण हो सके। इसी आधार पर यह देश नर रत्नों की खान था, इसी कारण यहाँ घर−घर में महापुरुष पैदा होते थे। खेद की बात है कि आज यह प्रक्रिया बन्द हो गई। अविचारी माता-पिता कुत्सित वासना से प्रेरित होकर इन्द्रिय तृप्ति के लिए मिलते हैं तो उसी लक्ष के अनुरूप निम्न स्तर की मनोभूमि लेकर संतान उत्पन्न होती है, जिसका सुधार शिक्षा, उपदेशों से भी उतना नहीं हो पाता जितना होना चाहिए। आज का जन समाज प्रायः इसी प्रकार का हीन संस्कारी उत्पादन है। युग निर्माण के लिए इससे काम न चलेगा। वह उद्देश्य सुसंस्कारी प्रबुद्ध नई पीढ़ी से संभव होगा।

युग निर्माण योजना का प्रसार किशोर और किशोरियों में अधिकाधिक किया जाना चाहिए ताकि वे एक ही लक्ष, आदर्श और सिद्धान्तों को हृदयंगम किये हुए बनें। आत्मसुधार, आत्मविकास और आत्म कल्याण में लगे हुए किशोर-किशोरी कई वर्षों तक अपना जीवन साधनामय बना कर जब विवाह बन्धन में बन्धेंगे और प्रबुद्ध नई पीढ़ी के उत्पादन का ध्यान रखेंगे तो अर्जुन द्रौपदी के सम्पर्क से उत्पन्न अभिमन्यु की तरह घर−घर में सुसंस्कारी महापुरुष जन्मेंगे। उनके जन्मजात सुसंस्कार थोड़े−से शिक्षण से ही खराद किये हुए हीरे की तरह दमकने लगेंगे।

युग निर्माण विचारधारा के युवक−युवतियों को विवाह सूत्र में बँधवाने की हमारी विशेष अभिरुचि है। यह युग निर्माण योजना का एक महत्वपूर्ण अंग है। इस में दहेज विरोधी आन्दोलन भी सन्निहित है। भाषणों, लेखों और प्रस्तावों की मार खाकर भी दहेज का असुर मरता नहीं है। रक्त बीज की तरह वह चोट खाकर और भी अधिक विकराल बनता चला जा रहा है। इसका अन्त ऐसे होगा कि युग निर्माण योजना के सदस्य बच्चे यह प्रतिज्ञा करेंगे कि वे विचारशील साथी से ही विवाह करेंगे। दहेज और विवाहोन्माद में होने वाले भारी अपव्यय को हटाकर सरल और बिना खर्च की विधि से विवाह करेंगे। यदि अभिभावक इस निश्चय को मान्यता न देंगे तो वे आजीवन कुमार या कुमारी ही रहकर पवित्र जीवन व्यतीत करेंगे।

उपजातियाँ अच्छे वरों को अच्छी कन्याऐं और अच्छी कन्याओं को अच्छे वर मिलने में भारी बाधा उत्पन्न करती हैं। उतने सीमित क्षेत्र में ढूँढ़ खोज का उचित अवसर नहीं मिल पाता इसलिए सनातन शास्त्र मर्यादा के अनुसार मुख्य जातियों को ही मान्यता मिले। उपजातियों की उपेक्षा की जाय। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, इन चार ही वर्णों की चर्चा धर्म ग्रन्थों में है। इन चार वर्ण के अन्तर्गत उपजातियों की परवा किये बिना यदि विवाह-शादी होने लगें तो उसमें धर्म एवं शास्त्र की मर्यादाओं का तो रत्ती भर भी उल्लंघन नहीं होता पर सुविधा बहुत बढ़ जाती है। दहेज एवं विवाह की धूम-धाम का त्याग करने के साथ ही यदि उपजातियों का जंजाल हटा दिया जायेगा तो उचित जोड़े ढूँढ़ने की समस्या बहुत ही सरल हो जायगी और ऐसे दाम्पत्य जीवनों का आविर्भाव होगा जो अपने परिवारों को स्वर्गीय सुख-शान्ति से ओत-प्रोत करते हुए संस्कारवान सुसंतति को जन्म देंगे, जिससे युग निर्माण का उद्देश्य पूर्ण हो सके। समाज सुधार और आत्म कल्याण के दोनों ही उद्देश्य इस योजना से पूरे हो सकेंगे।

ऐसे संस्कारवान बालकों की शिक्षा के लिए नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों की आवश्यकता होगी जहाँ का प्रत्येक पाठ, प्रत्येक आचरण, प्रत्येक शिक्षण महामानव बनाने वाला हो। ऐसे विश्वविद्यालय बनाने और चलाने के लिए संभवतः हम इस शरीर से जिन्दा न रहेंगे पर उसकी योजना तो स्वजनों के मस्तिष्क में छोड़ ही जानी होगी। युग निर्माण कार्य महान है उसके लिए महान योजनाऐं प्रस्तुत करनी होंगी। नई पीढ़ी का रचना कार्य प्रबुद्ध युवकों के धर्म विवाहों से आरम्भ होगा। इसे एक प्रचंड आन्दोलन का रूप हमें शीघ्र ही देना होगा।

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युग निर्माण केन्द्र और उनका बीस सूत्री कार्यक्रम

जहाँ ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ की युग−निर्माण योजना का कार्य आरम्भ हो चुका है, जहाँ दस सदस्य बन चुके हैं, वहाँ योजना का एक कार्यालय भी नियत हो जाना चाहिए। इसके लिए अपना निज का भवन बनाने या किराये पर मकान लेने की आवश्यकता नहीं, वरन् किसी उदार सज्जन का एक कमरा इस कार्य के लिए प्राप्त कर लेना चाहिए। बड़े नगरों में जहाँ कई शाखा संचालक नियुक्त किये गए हैं वहाँ भी एक ही केन्द्रीय कार्यालय रहे। शाखा संचालकों की गतिविधियों का विवरण रखने तथा संगठन का संचालन करने को एक केन्द्र पर्याप्त होगा। इन कार्यालयों का नाम ‘युग निर्माण केन्द्र’ रखा जाय।

इन केन्द्रों में समय−समय पर सदस्यगण एकत्रित होते रहा करें। महीने में एक सम्मेलन तो अवश्य ही हो जाया करे। पूर्णिमा या महीने का कोई एक दिन जिसमें सबको सुविधा रहे, नियत कर लेना चाहिए और वहाँ सबको उस दिन आवश्यक रूप से एकत्रित होकर स्थानीय कार्यक्रम के बारे में विचार-विनिमय करते रहना चाहिए। चुनाव व पदाधिकारी वाला झंझट हटा दिया गया है। एक व्यक्ति केन्द्र व्यवस्थापक रहना पर्याप्त है। सदस्यगण अपना परामर्श मथुरा भेजकर उसकी नियुक्ति भी करा लिया करें।

संगठन की महत्ता युग निर्माण की दृष्टि से सर्वोपरि है और संगठन कार्य परस्पर मिलते-जुलते रहने या सम्बन्ध बनाए रहने से ही संभव है। इसलिए युग निर्माण योजना के सदस्यों को परस्पर मिलते−जुलते रहने का कोई न कोई निमित्त ढूँढ़ ही लेना चाहिए। शाखा संचालक अपने संबद्ध सदस्यों के यहाँ जाकर उनसे अपनी घनिष्ठता तो बनाए ही रहेंगे। साथ ही सदस्यों का भी कर्तव्य है कि वे अपने विचार−बन्धुओं से प्रेम सम्बन्ध बढ़ाने की आवश्यकता समझें। निर्धारित गोष्ठियों में तो सम्मिलित होना ही चाहिए, साथ ही यह भी प्रयत्न रहे कि युग निर्माण केन्द्र सदस्यों के लिए एक उत्साह एवं आनन्दवर्धक मिलन स्थान भी रहे। क्लबों की रचना इसी उद्देश्य से की जाती है। विदेशों में जहाँ इकट्ठे होकर लोग अपना मनोरंजन करते हैं। उच्च-स्तरीय मनोरंजन के लिए युग निर्माण केन्द्र भी क्लबों का रूप धारण करें और वहाँ ऐसी गतिविधियाँ रहें जहाँ लोगों को आने बैठने और समय बिताने की स्वयं ही उत्कण्ठा रहने लगे।

इन केन्द्रों द्वारा स्थानीय आवश्यकता, स्थिति, सुविधा एवं साधनों के अनुरूप निम्न प्रकार के कार्यक्रम चलाये जा सकते हैं। इनमें से जो कार्य सबसे सरल प्रतीत हो पहले उन्हें आरम्भ किया जाय, पीछे जैसी सुविधा बन पड़े, वैसी योजना बनाते चलना चाहिये। केन्द्रों के द्वारा जो कार्यक्रम चलाए जाने चाहिएं उनमें से कुछ इस प्रकार हो सकते हैं :—

1. केन्द्र में सदस्यों की सूची का एक रजिस्टर रहे। एक रजिस्टर कार्यवाही लिखने तथा एक हिसाब का रहना जरूरी है। यह स्थान साफ सुथरा प्रेरणाप्रद वाक्यों और चित्रों से सुसज्जित हो। दस-बीस व्यक्ति सुविधापूर्वक बैठकर वार्तालाप कर सकें ऐसे हवादार तथा उत्तम स्थान में यह केन्द्र करने में असुविधा न हो। कार्यालय पर ‘युग निर्माण केन्द्र’ का एक बोर्ड भी लगा देना चाहिए। कार्यालयों की स्थापना प्रथम आवश्यक कार्य है।

2. केन्द्र में एक पुस्तकालय का होना आवश्यक है, जहाँ केवल मात्र योजना के अनुरूप चुनी हुई पुस्तकें ही रहें। संख्या बढ़ाने के लिए निकम्मी किताबें की भरती बिलकुल भी न की जाय। सदस्यगण इन पुस्तकों का लाभ निरन्तर उठाते रहें ऐसा प्रयत्न करना चाहिये। दैनिक पत्र यहाँ अवश्य आने चाहिएं। आवश्यक खर्चे के लिए सदस्यगण परस्पर मिलजुलकर कुछ चंदा इकट्ठा कर लिया करें।

3. साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक नियत सत्संगों के अतिरिक्त समय−समय पर कुछ विशेष उत्सव आयोजन भी करते रहने चाहिए। ये उत्सव केन्द्र के स्थान पर ही हों यह आवश्यक नहीं। नगर में अन्यत्र जहाँ सुविधा हो ऐसे आयोजनों का प्रबन्ध किया जा सकता है। प्रतियोगिताऐं, खेलकूद अभियान, कवि सम्मेलन, अन्ताक्षरी, प्रदर्शनी आदि की व्यवस्था जहाँ बन पड़े उसका प्रबन्ध किया जाय।

(1) श्रावणी, (2) कृष्ण जन्माष्टमी, (3) विजया दशमी, (4) दिवाली, (5) वसन्त पंचमी, (6) शिवरात्रि, (7) होली, (8) रामनवमी, (9) गायत्री जयन्ती, (10) गुरुपूर्णिमा। यह दस त्यौहार एक आदर्श सामूहिक आयोजन के रूप में मनाए जाया करें। प्रभात फेरी और जुलूसों की व्यवस्था किया करें। इनके मनाने की पद्धति एवं उपयोगिता के सम्बन्ध में ‘अखण्ड ज्योति’ के अगले अंकों में प्रकाश डालेंगे।

4. आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में सामूहिक साधना समारोह मनाये जाया करें। अन्तिम दिन सार्वजनिक हवन समारोह हुआ करें। प्रत्येक समारोह के बाद युग निर्माण संकल्प को एक पढ़े सब दुहरावें वाला कार्यक्रम अवश्य चलना चाहिए।

5. केन्द्र द्वारा शिक्षा की कोई न कोई व्यवस्थाऐं चलानी चाहिये। रात्रि पाठशाला, प्रौढ़ पाठशाला, संगीत शिक्षा, बच्चों की अतिरिक्त शिक्षा स्वास्थ्य−शिक्षा, आसन, प्राणायाम, व्यायाम, संध्या प्रार्थना का शिक्षण, धार्मिक परीक्षाओं की तैयारी महिलाओं की विद्यापीठ की परीक्षाओं की तैयारी, हिन्दी साहित्य सम्मेलन की परीक्षाऐं कलाकौशल, सिलाई आदि का शिक्षण आदि का कोई भी प्रबंध बन पड़े तो कुछ घण्टे की एक पाठशाला चल सकती है। पढ़ाने का कार्य सुशिक्षित सदस्य अवैतनिक रूप से किया करें। निःशुल्क चिकित्सालय भी जहाँ संभव हों केन्द्रों में रक्खे जाने चाहिए। शिक्षा के लिए आने वाले व्यक्तियों को युग निर्माण योजना की विचारधारा मिले इसका पूरा ध्यान रखा जाय।

6. सदस्यगण अपने नगर तथा आस-पास के नगरों में, आम रास्तों, सड़कों के किनारे बने मकानों की दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखने का कार्य भी करें।

7. ऐसी प्रार्थनाऐं, कविताऐं तथा गायन प्रसारित किये जायँ। स्कूलों में प्रार्थना के समय महिलाओं द्वारा विवाह आदि उत्सवों के समय, नित्य की प्रार्थनाओं में, वैयक्तिक रूप से गुनगुनाने में, सामूहिक आयोजनों में, कीर्तनों में गाये जा सकें। इन गायनों में युग निर्माण की भावनाऐं भरी हुई हों। हो सके तो ऐसे ग्रामोफोन रिकार्ड भी बनें जो उत्सवों में लाउडस्पीकरों पर बजा करें।

8. जिन लोगों ने कोई त्यागपूर्ण आदर्श एवं मानवता की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाले सत्कर्म किये हों, उनका सार्वजनिक अभिनन्दन किया जाय। उन्हें मानपत्र, सम्मान, वस्त्र अथवा पदक प्रदान किए जायँ। इन अभिनंदनों में अधिकाधिक जनता इकट्ठी की जाय ताकि उस तरह के सत्कर्म करने का दूसरों को भी प्रोत्साहन मिले।

9. यदि ऐसे आदर्श, सत्कर्म करने वाले लोग अपने नगर से दूर रहते हों तो अपने संगठन की ओर से डाक द्वारा उनके लिए धन्यवाद, अभिनन्दन, एवं पदक आदि भेजकर प्रोत्साहन दिया जाय।

10. वयस्कों का भी जन्म दिन मनाने की प्रथा चलाई जाय। सदस्यों में से जिसका जन्मदिन जब हो तब अन्य सदस्य उसे पुष्पाञ्जलि भेंट करें और शुभ कामना सद्भावना प्रकट करते हुए आगे का जीवन अधिक महत्वपूर्ण बनाने की प्रेरणा करें।

11. संस्कार मनाने की विधि सदस्यगण सीख लें और प्रत्येक सदस्य के घर निम्न संस्कार समय−समय पर मनाये जाया करें। (1) पुँसवन (2) नामकरण (3) अन्न प्राशन (4) मुंडन (5) विद्यारम्भ (6) यज्ञोपवीत (7) विवाह (8) वानप्रस्थ (9) अन्त्येष्टि—इन नौ संस्कारों के कराये जाने की विधि-व्यवस्था इस प्रकार करनी चाहिए ताकि खर्च कम से कम पड़े और किसी को भार प्रतीत न हो।

12. केन्द्र में ऐसी वस्तुओं की विक्रय व्यवस्था भी रहे जो पूजा उपासना, गृह सज्जा, पठन-पाठन, प्रचार-प्रसार आदि के लिए आवश्यक है।

13. घरों में तुलसी के विरवा लगाने तथा जहाँ जगह हो वहाँ फूल लगाने का आन्दोलन चलाया जाय। महिलाओं को चक्की चलाने तथा भाप से भोजन पकाने की प्रेरणा दी जाय।

14. अपने बड़ों के पैर छूकर नित्य प्रणाम करने की प्रथा चलाई जाय। महिलाऐं अपने पति, सास, ससुर, जेठ, जिठानी आदि के पैर छूआ करें। पुरुष अपने माता−पिता, बड़े भाई, भावज, बहिन, बुआ, आदि के नित्य प्रातः चरण स्पर्श किया करें। बराबर वालों से हाथ जोड़कर अभिवादन करने की परम्परा चले।

15. गाली का पूर्ण बहिष्कार हो। छोटों को भी तू न कह कर तुम या आप कहा जाय, यह प्रथा चले।

16. नशेबाजी, माँसाहार, जुआ, व्यभिचार, बेईमानी, अशिष्टता, उच्छृंखलता, गन्दगी, आलस्य आदि बुराइयों की हानियाँ लोगों को समझाई जायँ और स्वार्थी, संकीर्ण दृष्टिकोण बदलकर उदार विशाल और विवेकपूर्ण भावनाएँ जन मानस में प्रवेश कराई जायँ।

17. फिजूलखर्ची, फैशनपरस्ती, अनमेल विवाह, बाल विवाह, दहेज, मृत्युभोज, अश्लील साहित्य चित्र एवं गायन, थाली में जूँठन छोड़ना जैसी सामाजिक बुराइयों के उन्मूलन का शक्तिभर प्रयत्न किया जाय।

18. दहेज तथा विवाहों में होने वाली फिजूलखर्ची की हानियाँ समझाकर अभिभावकों तथा अविवाहित लड़के−लड़कियों से इस बुराई के उन्मूलन की प्रतिज्ञाएँ कराई जायँ। ऐसे प्रतिज्ञा पत्र और भी सभी बुराइयों के विरुद्ध केन्द्र में रहें और उनको लेकर टोलियाँ हस्ताक्षर आन्दोलन के लिए निकला करें।

19. पर्चे, पोस्टर, ट्रैक्ट, पैम्पलेट आदि के सहारे युग निर्माण योजना के अनुरूप जनमानस तैयार किया जाय। जब संगठित शक्ति पर्याप्त हो जाय तो अनैतिक एवं अवाँछनीय बुराइयों के विरुद्ध संघर्षात्मक एवं आन्दोलनात्मक मोर्चा भी खोल दिया जाय।

20. नित्य-नियमित उपासना करने तथा सितम्बर 62 की अखंड ज्योति में निर्धारित दस सूत्री कार्यक्रम को अपनाने के लिए प्रत्येक सदस्य पूरा−पूरा प्रयत्न करें इस ओर सबसे अधिक ध्यान दिया जाय।

यह बीस सूत्री कार्यक्रम युग निर्माण केन्द्रों के लिए है। उपरोक्त सभी बातें यहाँ संक्षिप्त सूत्र रूप में लिखी गई हैं। अगले अंकों में उन पर विस्तृत प्रकाश डाला जाता रहेगा।

शरीर रक्षा, आजीविका उपार्जन, मनोरंजन एवं आपत्तियों का निवारण करने के लिए जिस प्रकार दैनिक जीवन में हम प्रयत्न करते हैं, समय लगाते हैं, उसी युग निर्माण कार्यक्रम को भी जीवन की सार्थकता का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व समझें और उसके लिए नियमित रूप से कुछ समय निकालें तो कोई कारण नहीं कि आज सपने जैसी दीखने वाली युग निर्माण योजना कल साकार रूप धारण न कर ले। हम में से प्रत्येक को इसके लिए समय दान देना चाहिए। यह योजना धन दान पर नहीं समय दान पर निर्भर है। हमारी उदारता और महानता अब इसी कसौटी पर कसी जायगी।


अग्नि परीक्षा की घड़ी में हमारा कर्तव्य

चीन के दुष्टतापूर्ण आक्रमण के कारण प्रत्येक न्यायप्रिय व्यक्ति में क्षोभ और रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई है। यह हमारी जातीय सजीवता का चिह्न है। जो आन्तरिक दृष्टि से सजीव होते हैं उन्हें बाहर की कोई शक्ति मार नहीं सकती।

असत्य सदा हारता है। अन्याय की अन्त में पराजय ही होती है। इतिहास साक्षी है कि अनेकों नृशंस आततायी अपने−अपने समय में कुछ दिनों के लिए आतंक उत्पन्न कर सके हैं पर अन्त में उनका पाप और अन्याय उन्हें ही खा गया है। दूसरे देशों पर आधिपत्य जमाने और शोषण करने की साम्राज्यवादी नीति में चीन सफल न हो सकेगा। हिटलर, सिकन्दर, नेपोलियन आदि ही कहाँ सफल हुए थे?

अन्याय और असत्य के विरुद्ध रोष उत्पन्न होना और उसके प्रतिरोध के लिए जूझ जाने की जो भावना राष्ट्र में उत्पन्न हुई है, उसे विरोधी की निन्दा करने या अपनों की गलतियाँ ढूँढ़ते रहने या आलोचना प्रत्यालोचना में समाप्त नहीं करना चाहिए वरन् इसका उपयोग रचनात्मक दिशा में किया जाना चाहिए। प्राचीन काल में युद्ध केवल मोर्चे पर गये हुए सैनिक लड़ते थे आज प्रत्येक नागरिक को लड़ना पड़ता है। प्रत्येक देश भक्त भारतीय को आज अपने को सैनिक समझना चाहिए और उन मोर्चों पर लड़ना चाहिए जो उसके सामने ही खुले पड़े हैं।

युद्ध मोर्चे पर हर आदमी नहीं लड़ सकता पर सुरक्षा के आन्तरिक मोर्चों पर लड़ने के लिए हर नागरिक को अवसर प्राप्त है। जो अपने को जिस मोर्चे के उपयुक्त समझे वह उसी पर देशभक्ति, त्याग, बलिदान, दृढ़ता और साहस के साथ लड़े जिस प्रकार कि कठिन मोर्चे पर जान हथेली पर रखे हुए सैनिक लड़ रहे हैं।

एकता किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होती है। सब प्रकार के मतभेदों को इस समय उठा कर ताक पर रख देना चाहिए और राष्ट्र रक्षा के कार्यों में हममें से हर एक को एक मन होकर जुट जाना चाहिए। परस्पर विरोध उत्पन्न करने वाली चर्चाऐं इस समय बन्द रहनी चाहिएं।

युवा पुरुषों को सेना में भर्ती होना चाहिए। मोर्चे पर जाने वाली सेना की तरह ही नागरिक रक्षा के लिए बन रही आन्तरिक रक्षा सेना की भी आवश्यकता है। सैनिक शिक्षण की सुविधाऐं जिन्हें प्राप्त हो सकें उसे सीखना चाहिए और व्यक्ति गत आवश्यक कार्यों की तरह राष्ट्र रक्षा के लिए भी तत्पर रहना चाहिए।

रक्षा कोष में उदारता पूर्वक दान देना चाहिए। सरकारी और अर्धसरकारी प्रयत्न जहाँ चल रहे हैं वहाँ उनमें सहयोग दिया जाय। अन्यथा मनीआर्डर से “राष्ट्र रक्षा कोष दिल्ली” के पते पर अपनी सहायता भेज देनी चाहिए। ऐसे दान पर मनीआर्डर फीस भी नहीं देनी पड़ती। ‘अखण्ड ज्योति’ या ‛गायत्री परिवारों’ के नाम पर अलग से इस प्रकार का संग्रह कार्य कहीं भी न किया जाय। अपने परिवार का प्रत्येक व्यक्ति सप्ताह में एक दिन उपवास रखा करे और उस अन्न की बचत जब तक युद्ध चलता रहे तब तक रक्षा कोष में भेजा करे। इससे अन्न की कमी पूरी होने में भी सुविधा होगी और राष्ट्र को एक बड़ी कठिनाई के हल करने में सहायता मिलेगी।

जेवर पहनना हर दृष्टि से अहितकर है। सोने से नहीं प्रतिभा और चरित्र से व्यक्तित्व शोभायमान होते हैं। आज हथियारों और मशीनों के लिए विदेशों को लोभ और मोह न करके जिनके पास वह मौजूद है वे राष्ट्र रक्षा के लिए सरकारी कोष में जमा करें।

जिनके शरीर स्वस्थ हैं वे मोर्चे पर घायल सैनिकों के लिए अपना रक्त दें। इस प्रकार थोड़ा रक्त देने में स्वास्थ्य की हानि नहीं होती।

सब लोग अपने−अपने कामों में अधिक श्रम करे और उत्पादन बढ़ावें। किसान अन्न और शाक की पैदावार बढ़ाने को बन्दूक बनाने के समान ही महत्वपूर्ण समझें। जो वस्तुऐं विदेशों से मंगानी पड़ती हैं उनके लिए देश जल्दी स्वावलम्बी हो जाय इसके लिए श्रमिकों दूने उत्साह से काम करना चाहिए। अपने−अपने उत्पादन कार्यों में सभी को तेजी लानी चाहिए और आराम छोड़कर अधिक श्रम करने की नीति अपनानी चाहिए।

अपराधी और असामाजिक तत्व ऐसे संकट काल में आमतौर से सक्रिय होते हैं। उन्हें दबाने के लिए पूरी सावधानी बरती जाय। चोर, लुटेरे, मुनाफाखोर, सट्टेबाज, जासूस, गुण्डे जैसे लोगों को सिर उठाने न देने में सरकार का सहयोग लेना और देना चाहिए। ऐसे लोगों के लिए एक विशेष अध्यादेश भी बन चुका है।

फिजूलखर्ची बिलकुल न की जाय। बचत बढ़ानी चाहिए और संचित पैसा बैंक में जमा करना चाहिए ताकि उस पैसे से ब्याज के लाभ के अतिरिक्त राष्ट्र की आर्थिक उन्नति में भी सहायता मिले।

हममें से प्रत्येक को गायत्री महामंत्र की एक माला इस धर्म युद्ध की सफलता के लिए नियत साधना से अतिरिक्त जपते रहना चाहिए। सामूहिक आर्थिक आयोजनों और सत्संगों में पाँच मिनट मौन रहकर विजय के लिए ईश्वर प्रार्थना की जाया करे। इस उद्देश्य के लिए सामूहिक अनुष्ठान यज्ञ आदि भी किये जा सकते हैं। इनमें मितव्ययिता का पूरा ध्यान रखा जाय।

हमला उग्र रूप से ता. 20 अक्टूबर को हुआ था। इसलिए हर महीने की ता. 20 को रक्षा दिवस मनाया जाय। उस दिन सामूहिक आयोजनों के द्वारा जनता की कर्तव्य भावनाएँ जागृत की जायँ और प्रार्थना का भी कार्यक्रम रहा करे।


प्रयाण− पीत


प्रयाण− पीत (kavita)

सावधान होशियार! सावधान, होशियार! हाथ में उठा मशाल, युग रहा तुझे पुकार।

शान्त वायु में सुनी स्वतंत्रता की लोरियाँ, स्वप्न लोक में विलीन तू तुरन्त सो गया, दस्यु द्वार तोड़ पा गये प्रवेश गेह में, जाग आग्व ग्वोल,देख सर्वनाश हो गया।

नींद त्याग, शस्त्र हाथ में उठा, सचेत हो, शत्रु को निकाल देश से, प्रचंड कर प्रहार! सावधान! होशियार!! सावधान ! होशियार !!

अकस्मात आ गई है यह विपत्ति की घड़ी, आज स्वाभिमान−प्राण दाँव पर लगा हुआ! बार बार शत्रु दे रहा तुझे चुनौतियाँ, मित्र हो रहे तटस्थ, तू खड़ा ठगा हुआ।

हंस रहे पड़ोस के, कि दे रहे नसीहतें, कुछ खड़े हैं ताक में कि आबरू को लें उतार! सावधान! होशियार!! सावधान! होशियार!!

शाँति के प्रसार को, स्वतंत्रता के मूल्य में, क्रान्ति की पुकार आज युद्ध−आग माँगती। निज समस्त साधनों को राष्ट्र−हेतु होम दे, क्योंकि मातृ भूमि आज पूर्ण त्याग माँगती।

भूतकाल भूल, वर्तमान को सुधार ले, आज के प्रयत्न पर टिकी हुई है जीत−हार। सावधान! होशियार !! सावधान ! होशियार !!

विश्व में जहाँ कहीं कभी असभ्यता बढ़ी, तू वहीं सदैव न्याय−पक्ष के लिये लड़ा ! आज वही असभ्य, धूर्त शत्रु, शीश पर चढ़ा, धर्म युद्ध में अधर्म के विरुद्ध हो खड़ा!

राष्ट्र के महान यज्ञ में तुरंत योग दे, पुण्य−पूर्ण यह सुयोग आयगा न बार−बार! सावधान ! होशियार !! सावधान ! होश्यार !!

—राजेश, एम. ए.

*समाप्त*