मेरी नाव के सँग विरुद भी तुम्हारा,
सँभालो नहीं डूबने जा रहा है।
न फिर दोष देना कि—मैं क्षीरनिधि की,
सजल क्रोड़ में कुछ अलस सो रहा था।
प्रणय−पाश में या कि पद्मा प्रिया के,
पड़ा मैं हृदय की व्यथा धो रहा था।
न फिर दोष देना कि कातर स्वरों में,
व्यथित हो, पतित ने, पुकारा नहीं था।
अभय−बाँह वाली मधुर मूर्ति को,
अर्चना−अश्रुओं से पखारा नहीं था।
धधकते हुए वेदना के प्रभंजन,
चले आ रहे हैं लिए अग्निमय खन
विकल श्वाँस की गति शिथिल पड़ चली है,
नयन से सतत ढल रहे अश्रु के कन॥
मेरी श्वाँस के सँग सुयश भी तुम्हारा,
सँभालो नहीं टूटने जा रहा है।
मेरी नाव के सँग विरुद भी तुम्हारा,
सँभालो नहीं डूबने जा रहा है।
(डा. राजकुमार पाण्डेय ‘कुमार’)
हम आत्मकल्याण और युग निर्माण के दो महान उद्देश्यों को लेकर अग्रसर होते हैं। यद्यपि यह दो भिन्न बातें मालूम पड़ती हैं, पर वस्तुतः एक ही चीज के दो पहलू मात्र हैं। आत्मकल्याण का यदि हमें ध्यान न होगा, ईश्वर, आत्मा, परलोक, कर्मफल, धर्म एवं कर्त्तव्य के प्रति हमारी गहरी आस्था न होगी, तो बाह्य उन्नति के नाम पर हम देर तक सही मार्ग पर नहीं चल सकेंगे। पग−पग पर आने वाले आकर्षण, प्रलोभन एवं भय विचलित कर देंगे। पथभ्रष्ट हो जाने के लिए अनेकों कारण इस संसार में मौजूद हैं। उनसे बचना केवल आध्यात्मिक आधार पर ही संभव है।
आत्मा की अदम्य पिपासा
आत्मा की एकमात्र प्यास भी परमात्मा-सा बनने की है। वह अणु से विभु, लघु से महान, बिंदु से सिंधु बनने के लिए निरंतर व्याकुल रहती है। इस अशांति को मिटाना और जीवनोद्देश्य का पूरा होना भी आध्यात्मिक विचारधारा को अपनाने से ही संभव है। आत्मकल्याण के लिए हमें उपासना का मार्ग अपनाना पड़ेगा। स्वाध्याय, सत्संग, मनन और चिंतन द्वारा आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्मविकास का आधार ग्रहण करना होगा। अंतःकरण की पवित्रता और पुष्टि के लिए इस अवलंबन को मजबूती से पकड़े रहना आवश्यक है। इसके बिना लौकिक-प्रगति भी संभव नहीं। धर्म और नीति का आधार अध्यात्म है, उसे छोड़ देने पर चतुरता और कूटनीति ही मनुष्य के पल्ले पड़ती है। उससे तात्कालिक लाभ तो हो जाता है, पर अंत बहुत ही दुःखद होता है। व्यक्तिगत कमाई करने वाले अनीति और बेईमानी पर उतर आते हैं। सार्वजनिक काम करने वालों को भी मद, मोह एवं लोभ कम नहीं सताते।
संस्थाओं एवं लोकसेवकों में जो भारी फूट एवं अनैतिकता दीख पड़ रही है, उसका एकमात्र कारण उनकी आत्मिक दुर्बलता ही है, अन्यथा सेवा का व्रतधारण करने वाले लोग अपने लक्ष्य की महानता को भूलकर छोटे प्रलोभनों में इतनी बुरी तरह क्यों उलझते?
सुस्थिरता का एकमात्र अवलंबन
आध्यात्मिकता मानव जीवन की रीढ़ है। रीढ़ की हड्डी टूट जाए तो फिर जिंदगी बेकार हो जाती है। इसी प्रकार जिसमें आध्यात्मिक आस्था न रहेगी, वह व्यक्ति अन्य किसी आधार पर इस प्रलोभन भरी दुनियाँ में धर्मकर्त्तव्य पर टिका न रह सकेगा। वह गड़बड़ में पड़ेगा और गड़बड़ियाँ करेगा। सच्चाई, नीति और भलाई की नीति चिरकाल तक अपनाए रहना केवल उसी के लिए संभव हो सकता है, जो ईश्वर की सर्वज्ञता और न्यायशीलता पर विश्वास करता है। गांधीजी कहा करते थे— ‛प्रार्थना जीवन का ध्रुवतारा है।’ रात्रि के गहन अंधकार में ध्रुवतारे का अवलंबन छोड़ देने वाला भटकता ही फिरेगा। आज हमने आस्तिकता और उपासना का मार्ग छोड़ दिया है और सचमुच हम बुरी तरह बीहड़ बन में भटकते रहे हैं। भटकते−भटकते वहाँ आ पहुँचे हैं, जहाँ से सर्वनाश अत्यन्त समीप दीखने लगा है। हमें पीछे लौटना होगा। जीवन के ध्रुवतारे की ओर दृष्टि डालनी होगी। आस्तिकता और उपासना का जनजीवन में कोई स्थान होना ही चाहिए। ‘अखण्ड ज्योति’ का पहला कार्यक्रम यही है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति आस्तिक एवं उपासक बने, गायत्री आंदोलन के पीछे यही भावना सन्निहित है। भारतीय धर्म की सबसे प्राचीन, सबसे श्रेष्ठ, सबसे वैज्ञानिक, सबसे महत्त्वपूर्ण उपासना ‘गायत्री’ ही मानी गई है। ऋषियों और शास्त्रों ने जैसा कि इसे अत्याधिक आवश्यक एवं अनिवार्य माना है, वैसा ही हम भी मानते हैं और प्रत्येक विचारशील को इसे अपनाने के लिए प्रेरणा देते हैं।
संतुलित जीवन-व्यवस्था
पिछले अंक में बताया जा चुका है कि आस्तिकता एवं उपासना की प्रवृत्ति निर्बाध गति से अग्रसर हो सके, इसके लिए हमारे जीवन में शांति और सुव्यवस्था रहनी आवश्यक है। अशांत और अव्यवस्थित परिस्थितियों में आत्मिक उन्नति तो दूर सामान्य शरीरयात्रा एवं जिंदगी के दिन पूरे करने की प्रक्रिया भी कठिन हो जाती है; इसलिए जीवन के तीनों प्रमुख आधारों को ठीक रखने के लिए भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। इसी प्रयत्न का नाम ‘युगनिर्माण योजना’ है। इसकी एक मोटी रूपरेखा गत अंक में पाठक पढ़ चुके हैं। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज का लक्ष्य जितना पूरा हो सकेगा, उतनी ही जीवन-व्यवस्था संतुलित होती जाएगी और उसी आधार पर आत्मिक प्रगति की संभावनाएँ बढ़ती जाएँगी। आत्मकल्याण और युग निर्माण दोनों बातें एकदूसरे से इतनी अधिक संबद्ध हैं कि एक की उपेक्षा करके दूसरे की उपलब्धि हो नहीं सकती; इसलिए प्रगति की गाड़ी को गतिशील रखने के लिए उस के दोनों पहियों पर ध्यान रखा जाना आवश्यक समझा गया है। दोनों ही कार्यक्रमों को लेकर हम आगे बढ़ते हैं।
सर्वतोमुखी प्रगति
युग निर्माण के तीन आधारों का महत्त्व भी ईश्वर का स्मरण, ध्यान, पूजन करने जैसा ही है। सच्ची उपासना से आत्मा में तुरंत बल, आनंद एवं प्रकाश का अनुभव होता है। उसी प्रकार स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य−समाज के लिए किया हुआ प्रयत्न भी हमारे व्यक्तिगत जीवन में सर्वतोमुखी प्रगति, शांति एवं महानता के अवसर प्रस्तुत करता है। सामूहिक रूप से— सामाजिक एवं राष्ट्रीय दृष्टि से तो उसका लाभ अनिर्वचनीय है। राष्ट्रीय और सामाजिक प्रगति का— विश्वमानव के सर्वतोमुखी आनंद का आधार भी इन तीन बातों पर ही पूर्णतया निर्भर रहता है। जहाँ इनके स्त्रोत सूखे, वहाँ प्रत्येक समाज दुर्बलता एवं दुर्दशा में डूबता जाता है। इस दिशा में बरती गई उपेक्षा ही वर्त्तमान कुसमय का कारण है। इस ओर जितना हमारा ध्यान जाएगा, उतनी ही प्रगति का प्रत्यक्ष अनुभव होने लगेगा।
अविवेक का अवरोध
जिस प्रकार आत्मकल्याण और युग निर्माण के दोनों कार्यक्रम परस्पर इतने संबद्ध हैं कि एक को छोड़कर दूसरे की उपलब्धि नहीं हो सकती, उसी प्रकार युग निर्माण के तीन आधार भी एकदूसरे से जुड़े हुए है। शरीर को रोगी, मन को मलीन और समाज को कुसंस्कारी होने का एक ही कारण है— ‛अविवेक’। यों हम स्कूली शिक्षा ऊँचे दर्जे तक प्राप्त किए रहते हैं और अपने ढंग की चतुरता भी खूब होती है, पर जीवन की मूलभूत समस्याओं को गहराई तक समझने में प्रायः असमर्थ ही रहते हैं। बाहरी बातों पर खूब बहस करते और सोचते-समझते हैं, पर जिस आधार पर हमारा जीवनोद्देश्य निर्भर है, उसकी ओर थोड़ा भी ध्यान नहीं देते। इसी का नाम है— ‛अविवेक’। विचारशीलता का, विवेकशीलता का यदि अभाव न हो और गुण−दोष की दृष्टि से अपनी व्यक्तिगत और सामूहिक समस्याओं पर सोचना-समझना आरंभ करें, तो प्रतीत होगा कि बुद्धिमत्ता का दावा करते हुए भी हम कितनी अधिक मूर्खता में ग्रसित हो रहें हैं। सीधी−सादी विचारधारा को अपनाकर मनुष्य अपनी सर्वतोमुखी सुख-शांति को सुरक्षित रख सकता था और इस पृथ्वी पर स्वर्ग का आनंद उपलब्ध कर सकता था, पर औंधी, टेढ़ी, अनुचित, अनुपयुक्त इच्छा-आकांक्षाएँ एवं आदतें अपनाकर उसने अपना सर्वनाश कर लिया।
अपनी गुत्थी आप सुलझावें
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। जिस प्रकार वह अनुपयुक्त विचारों एवं आदतों का गुलाम बनकर अपनी स्थिति दयनीय बनाता है, उसी प्रकार यदि वह चाहे तो विवेक को अपनाकर अपनी गतिविधियों को बदल एवं सुधार भी सकता है और उसके फलस्वरूप नरक के दृश्य को देखते−देखते स्वर्ग में परिणत कर सकता है। यह मानसिक परिवर्तन ही युगनिर्माण योजना का प्रधान आधार है। इसे मोटे रूप से ‘विचार-क्रांति’ भी कह सकते हैं। हमारे सामने अगणित कठिनाइयाँ, गुत्थियाँ, कमियाँ और परेशानियाँ आज उपस्थित हैं। उनका कारण एक ही है— ‛अविवेक’ और उनके समाधान का उपाय भी एक ही है— 'विवेक।, जिस प्रकार सूर्य का उदय होने पर अंधकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार जिस दिन हमारे अंतः करण में विवेक का उदय होगा, उस दिन न तो व्यक्तिगत कठिनाइयाँ रहेंगी और न सामूहिक समस्याएँ उलझी दिखाई देंगी। मकड़ी अपना जाला आप बुनती है और उसी में फँसी बैठी रहती है, पर जब उसके मन में तरंग आती है तो उस सारे जाले को निगलकर पूर्ण स्वतंत्रता भी अनुभव करने लगती है। हमारी सभी समस्याएँ और सभी कठिनाइयाँ हमारी स्वयं की बनाई हुई हैं, बुनी हुई हैं। इन्हें सुलझा देना बाँए हाथ का काम है। आज गाँठ खुल नहीं रही है, पर जब विवेक का दीपक जलेगा और रस्सी के मोड़−तोड़ साफ दीखने लगेंगे तो गाँठ खुलने में कितनी देर लगेगी?
आत्मनियंत्रण की आवश्यकता
असंयम को अपनाकर हमने अपना स्वास्थ्य खोया है। चटोरेपन और काम-वासना पर नियंत्रण करने का जिस दिन निश्चय कर लिया, उसी दिन बिगड़ी बनने लगेगी। आहार और विहार का संयम रखकर जब सृष्टि के एकोएक प्राणी गेंद की तरह उछलते-कूदते, निरोगिता और दीर्घजीवन का लाभ उठाते हैं तो हम क्यों न उठा सकेंगे? बंदरिया मरे बच्चे को जैसे छाती से चिपटाए फिरती है, उसी प्रकार असंयम की भुजाओं में कसकर हम भी अस्वस्थता को छाती से चिपटाए फिर रहे हैं। जहाँ यह कसकर पकड़ने की प्रक्रिया ढीली हुई नहीं कि अस्वस्थता और अकालमृत्यु से पीछा छूटा नहीं।
तुच्छ स्वार्थों की संकीर्णता ने हमारे मनःक्षेत्र को गंदा कर रखा है। उदार और विशाल दृष्टि से न सोचकर हर बात को हम अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति की दृष्टि से सोचते हैं, अपना लाभ ही हमें लाभ प्रतीत होता है। दूसरों का लाभ, दूसरों का हित, दूसरों का दृष्टिकोण, दूसरों का स्वार्थ भी यदि ध्यान में रखा जा सके, अपने स्वार्थ में दूसरों का स्वार्थ भी जोड़कर सोचा जा सके, अपने सुख-दुःख में दूसरों का सुख-दुःख भी सम्मिलित किया जा सके, तो निश्चय ही विशाल और उदार दृष्टिकोण हमें प्राप्त होगा और फिर उसके आधार पर जो कुछ सोचा या किया जाएगा, सब कुछ पुण्य और परमार्थ ही होगा। वासना और तृष्णा ने हमें अंधा बना दिया है, संयम और सेवा की रोशनी यदि अपनी आँखों में चमकने लगे तो पिछले क्षण तक जो सर्वत्र नरक जैसा अंधकार फैला दीखता था, वह स्वर्गीय प्रकाश में परिवर्तित हो सकता है। तुच्छता को महानता में, स्वार्थ को परमार्थ में, संकीर्णता को उदारता में परिणत करते ही मनुष्य तुच्छ प्राणी न रहकर महामानव बन जाता है— देवताओं की श्रेणी में जा पहुँचता है। मन स्फटिक मणि के समान स्वच्छ है। हमारा अविवेक ही उसे मलीन बनाए हुए हैं। दृष्टिकोण का परिवर्तन होते ही उसकी मलीनता दूर हो जाती है और स्वाभाविक स्वच्छता निखर पड़ती है। स्वच्छ मन वाला व्यक्ति आनंद की प्रतिमूर्ति ही तो है। वह अपने आपको तो हर घड़ी आनंद में सराबोर रखता ही है, उसके समीपवर्त्ती लोग भी चंदन के वृक्ष के समीप रहने वालों की तरह सुवासित होते रहते हैं। अपने मन का, अपने दृष्टिकोण का परिवर्तन भी क्या हमारे लिए कठिन है? दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, पर आपको क्यों नहीं सुधारा जा सकेगा? विचारों की पूँजी का अभाव ही सारी मानसिक कठिनाइयों का कारण है। विवेकशीलता का अंतःकरण में प्रादुर्भाव होते ही कुविचार कहाँ टिकेंगे? और कुविचारों के हटते ही अपना पशु−जीवन देव−जीवन में परिवर्तित क्यों न हो जायेगा?
समाज सुधार का आधार
व्यक्तियों के समूह का नाम ही तो समाज है। हम सब अपने आपको सुधारें तो समाज का सुधार हुआ ही रखा है। कुछ मूढ़ताएँ, अंधपरंपराएँ, अनैतिकताएँ, संकीर्णताएँ, हमारे सामूहिक जीवन में प्रवेश पा गई हैं। दुर्बल मन से सोचने पर वे बड़ी कठिन, बड़ी दुस्तर, बड़ी गहरी जमी हुई दीखती हैं, पर वस्तुतः वे कागज के बने रावण की तरह डरावनी दीखते हुए भी भीतर-ही-भीतर खोखली हैं। हर विचारशील उनसे घृणा करता है, पर अपने को एकाकी अनुभव करके आस−पास घिरे लोगों की भावुकता से डरकर कुछ कर नहीं पाता। कठिनाई इतनी-सी है। इसे कुछ ही थोड़े-से विवेकशील लोग, यदि संगठित होकर उठ खड़े हों और जमकर विरोध करने लगें तो उन कुरीतियों को मामूली से संघर्ष के बाद चकनाचूर कर सकते हैं, तोड़-मरोड़कर फेंक सकते हैं। गोवा की जनता ने जिस प्रकार भारतीय फौजों का स्वागत किया, वैसा ही स्वागत इन कुरीतियों से सताई हुई जनता उनका करे, जो इन अंधपरंपराओं को तोड़−मरोड़कर रख देने के लिए कटिबद्ध सैनिकों की तरह मार्च करते हुए आगे बढ़ेंगे।
हत्यारा दहेज कागज के रावण की तरह बड़ा वीभत्स−नृशंस एवं डरावना लगता है। हर कोई भीतर-ही-भीतर उससे घृणा करता है, पर पास जाने से डरता है। कुछ साहसी लोग उसमें पलीता लगाने को दौड़ पड़ें तो उसका जड़-मूल से उन्मूलन होने में देर न लगेगी। दासप्रथा, देवदासी प्रथा, वेश्या नृत्य, बहुविवाह, जन्मते ही कन्यावध, भूत पूजा, पशुबलि आदि अनेक सामाजिक कुरीतियाँ किसी समय बड़ी प्रबल लगती थीं, अब देखते−देखते उनका नाम-निशान मिटता चला जा रहा है। आज जो कुरीतियाँ, अनैतिकताएँ एवं संकीर्णताएँ मजबूती से जड़ जमाए दीखती हैं, विवेकशीलों के संगठित प्रतिरोध के सामने देर तक न ठहर सकेंगी। बालू की दीवार की तरह वे एक ही धक्के में भरभरा का गिर पड़ेंगी। विचारों की क्रांति का एक ही तूफान इस तिनकों के ढेर को उड़ाकर बात की बात में छितरा देगा। जिस नए समाज की रचना आज स्वप्न-सी लगती है, विचारशीलता के जाग्रत होते ही वह मूर्तिमान होकर सामने खड़ी दीखेगी।
विचार-क्रान्ति का सुसंबद्ध प्रयास
यों अखण्ड ज्योति का अब तक का सारा जीवन ही धर्म और अध्यात्म की विचारधारा प्रवाहित करने में व्यतीत हुआ है, पर अब इस वसंत पंचमी से— अष्टग्रही योग के पुण्यपर्व के साथ उसका विचार-क्रांति अभियान, पूर्ण तत्परता एवं सुव्यवस्थित योजना के साथ आरंभ होता है। युग निर्माण के लिए हमें पहले जनमानस को बदलना होगा, कार्यों में परिवर्तन तो उसके बाद ही संभव होगा। जैसे−जैसे हमारी विचारधारा प्रबुद्ध होगी, विवेकशीलता जगेगी, वैसे ही वैसे अनुपयुक्त को त्याग और उपयुक्त को ग्रहण करने की प्रवृत्ति सक्रिय होती जाएगी। अब आस्तिकता और धार्मिकता की, संयम और सेवा की, प्रेम और पवित्रता की, विवेकशीलता और दूरदर्शिता की भावनाएँ हमें जनमानस में सजीव करनी हैं, आत्मकल्याण और युग निर्माण का लक्ष्य तभी तो पूरा होगा।
अन्तर्राष्ट्रीय वर्ष 31 दिसम्बर को समाप्त हुआ। इस दिन गत वर्ष की प्रगति एवं स्थिति पर एकबार दृष्टिपात करने की इच्छा हुई। जिस दुनियाँ में हम रहते हैं, जीते, बैठते, गिरते और मरते हैं वह एक प्रकार से अपना घर या देह ही है। उसके सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी का होना उचित भी है और आवश्यक भी। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, उसका अलग से कोई अस्तित्व नहीं। अपनी आवश्यकताएँ पशु, पक्षी तो अपने आप पूरी कर सकते हैं पर मनुष्य के लिए यह कठिन है। कोई चाहे गुफा में रहे या बाजार में दूसरों की सहायता एवं सेवा की उसे किसी न किसी रूप में जरूरत पड़ती ही है इसलिए उसे समाज के साथ अनिवार्यतः सम्बद्ध रहना पड़ता है। संबंध का प्रभाव पड़ना भी निश्चित है इसलिए जिस प्रकार हमें अपने शरीर और घर की समस्याओं की जानकारी रखनी पड़ती है वैसे ही समाज की गतिविधियों से परिचित रहना और उनके सम्बन्ध में विचार करना आवश्यक होता है।
इन आवश्कताओं को ध्यान में रखते हुए पिछले वर्ष की प्रमुख घटनाओं पर एक बार दृष्टिपात करना उचित प्रतीत हुआ। दिल्ली से निकलने वाले दैनिक हिन्दुस्तान एवं नवभारत टाइम्स दो पत्रों की फाइल मंगाकर उसे पलटना आरंभ कर दिया। अज्ञातवास की अवधि में भी हमें यदाकदा ही अखबार मिल सके इसलिए एक वर्ष की बजाय डेढ़ वर्ष के पत्रों पर दृष्टिपात करना ठीक था। जून 60 से लेकर दिसम्बर 61 तक के डेढ़ वर्ष के इन दोनों पत्रों के पृष्ठों पर हमने सरसरी दृष्टि डाली। जो समाचार हमारी दृष्टि में कुछ अधिक महत्वपूर्ण जँचे उन पर निशान लगाये। ऐसे निशान लगे हुए समाचार कई दिन तक हमें निरन्तर विचारमग्न बनाये रहे और मन में बहुत उथल−पुथल मचाते रहे। उचित लगा कि इस चिन्तन में अखण्ड ज्योति के पाठकों को भी सम्मिलित कर लिया जाय। यह अंक इसी संदर्भ में प्रस्तुत किया जा रहा है।
इस अंक में कुछ थोड़े से समाचारों को लेकर वर्तमान परिस्थितियों पर विचार करने की चेष्टा की गई है। जिन भले या बुरे समाचारों का उल्लेख किया गया है वैसा ही हमारा सारा समाज नहीं है। इस संसार में, विशेषतया भारत भूमि में बुराई की अपेक्षा अच्छाई अधिक है अन्यथा आत्मा को इस लोक में रहना ही क्यों प्रिय होता? फिर भी कुछ विशेष घटनाऐं हमारे मानसिक झुकाव एवं बढ़ते कदमों को कुछ संकेत करती ही हैं। बुराई चाहे थोड़ी ही क्यों न हो, चिन्ता की बात है। रोग छोटा हो तो भी उससे सतर्क रहना आवश्यक है। छोटे शत्रु से भी बेखबर नहीं रहना चाहिए। इसी प्रकार अच्छाई का एक छोटा अंकुर उगा हो तो उसकी भी सुरक्षा और सिंचाई का ध्यान रखा जाना चाहिए। इन समाचारों में जो हमारी दुर्बलताओं पर प्रकाश डालने वाले हैं उन्हें पढ़कर हमारी सतर्कता बढ़नी चाहिए। हताश होने की कोई बात नहीं है। युग निर्माण की सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं वे ऐसी विकृतियों को चुनौती के रूप में ही मानेंगी और उनका उन्मूलन करके रहेंगी।
हमारा अतीत गौरवमय था और भविष्य भी सब प्रकार उज्ज्वल है। विचारणीय केवल वर्तमान है। वर्तमान में जहाँ−जहाँ छिद्र हैं उन्हें ढूँढ़ निकालना, उन्हें बन्द करना कर्तव्य है ताकि प्रगति के पथ में पड़े हुए रोड़े हट सकें। आज जो कुछ उदीयमान दिखाई पड़ता है वह भले ही छोटा हो पर है महत्वपूर्ण। भलाई की शक्ति बुराई की अपेक्षा असंख्य गुनी प्रबल होती है। भलाई को बढ़ाने के लिए उसे प्रोत्साहित करने के लिए हम प्रयत्नशील रहें तो भविष्य की आशा भी अतीत के गौरव से कम नहीं है।
इस अंक में उद्धृत समाचारों की तारीखों का उल्लेख जगह−जगह नहीं किया गया है। पाठक उन्हें गत डेढ़ वर्ष की अवधि में दिल्ली के उपरोक्त दो दैनिक हिन्दी समाचार पत्रों में प्रकाशित समझें।
अभी इसी दिसम्बर 61 में ही उत्तर−प्रदेश और बिहार में शीत की लहर आई उसमें समाचार पत्रों में प्रकाशित सूचना के अनुसार लगभग हजार मनुष्य मर गये। सोचता रहा ऐसा क्यों हुआ। ठंड तो जरूर पड़ी थी पर इतनी नहीं थी की इतने अधिक व्यक्ति यों ही बैठे−बैठे लुढ़क जाएँ। मरने वालों की जो संख्या छपी है वस्तुतः वह कम ही होगी क्योंकि छपने लायक सूचनाऐं तो शहर या कस्बों से ही प्राप्त होती हैं। बेचारे अशिक्षित देहाती जो अखबारों की पहुँच से बहुत दूर हैं, ठंड से मरने जैसी मामूली बात को छपने क्यों भेजेंगे। शहर में सम्पन्नता और साधन सामग्री भी अधिक है देहात में गरीबी के साथ−साथ चिकित्सा आदि के साधनों का भी अभाव है ऐसी दशा में उन क्षेत्रों में छपी रिपोर्टों से कहीं अधिक व्यक्ति और भी मरने की संभावना है। इतने हजार व्यक्ति बात की बात में चार−पाँच दिन की ठंड में ठिठुर कर मर गये। इस समाचार से किसी भी विचारशील व्यक्ति को धक्का लगना स्वाभाविक है।
संसार के अत्यन्त ठंडे हिमाच्छादित प्रदेशों में मनुष्य रहते हैं और हँसते−खेलते जीवन धारण किये रहते हैं। उत्तरी ध्रुव सदा बर्फ में ढका रहता है, वहाँ बर्फीली आँधियाँ चलती रहती हैं फिर भी वहाँ के निवासी ‘एक्सिमो’ आनन्दपूर्वक जीवन यापन करते हैं। यूरोप के अनेकों देशों में ठंड बहुत रहती है। रूस का साइबेरिया कितना ठंडा है इसे सब जानते हैं। हिमालय में गंगा के उद्गम गंगोत्री जैसे प्रदेश में तेरह फुट तक बर्फ पड़ जाने पर भी कितने ही व्यक्ति वहाँ निवास करते रहते हैं। फिर ऐसा क्या हुआ कि जरा सी शीत की लहर इतने लोगों को इस प्रकार लुढ़का गई जिस प्रकार फूँक से दीपक बुझ जाता है? चवालीस करोड़ की आबादी के देश में दस हजार मनुष्यों का मरना यों जनसंख्या की दृष्टि से कुछ महत्व नहीं रखता। पर ऐसे मच्छरों की तरह मर जाना तो हमारी शारीरिक दुर्बलता का ही परिचायक है। हमारा सामूहिक स्वास्थ्य कितना दुर्बल हो चला है इसका कुछ पता इस शीत से मरने वालों की घटना को देखकर लगता है। जब इतने मरे हैं तो शीत से बीमार पड़कर अच्छे होने वाले भी इससे कई गुने होंगे। जरा सी ठंड इतने अधिक लोगों को इतना प्रभावित कर सकती है इसमें दोष शीत का नहीं हमारे शारीरिक खोखलेपन का है जिसमें प्रतिकूल परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए आवश्यक जीवनी शक्ति का भंडार शेष नहीं रह गया है।
समाचारों पर इस दृष्टि में सिंहावलोकन करते हुए स्थिति का और भी अधिक स्पष्टीकरण होता है। सितम्बर 60 से करीब सवा साल पहले उत्तर−प्रदेश में हैजा की एक लहर आई थी जिसके कुछ समाचार आँखों के आगे हैं। उझानी की रिपोर्ट है कि सरकारी सूचना के अनुसार अकेले बदायूँ जिले में 797 व्यक्ति हैजा से मरे तथा 1700 से अधिक रुग्ण हुए। इन्हीं दिनों फैले अंत्रशोध रोग के संबन्ध में मरण का एक समाचार है कि इस रोग से 2200 व्यक्ति रोगी हुए और 855 मर गये। स्मरण रहे यह अंत्रशोध रोग अन्य जिलों में भी फैला था और वहाँ भी अनेकों मृत्यु हुई होंगी। इलाहाबाद का एक समाचार है कि इस वर्ष उत्तर−प्रदेश में मोतीझरा रोग काफी फैला हुआ है, कोई डाक्टर ऐसा नहीं जिसके यहाँ इस रोग के रोगियों की भीड़ न हो।
उत्तर−प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री श्री हुकमसिंह ने बताया कि इस बीमारी से प्रान्त में डेढ़ महीने के अन्दर 6498 व्यक्ति मरे और 17753 बीमार पड़े। राज्य के 54 जिलों में से 49 जिलों में से व्याधि से ग्रस्त हुए। विधान परिषद के समाजवादी नेता डा. फरीदी ने आरोप लगाते हुए कहा—सरकार हैजे की घटनाओं को छिपाना चाहती है। इस वर्ष 7 अगस्त तक 22500 व्यक्तियों को हैजा हुआ जिसमें से 7250 मर गये। उत्तर−प्रदेश के चिकित्सा तथा स्वास्थ्य रक्षा सेवाओं के निदेशक डा. कृष्ण मुरारीलाल ने लखनऊ में हुए जिला स्वास्थ्य अधिकारियों के एक सम्मेलन में कहा कि—‟लखनऊ जिले के ग्रामीण क्षेत्रों के निवासियों में 50 से 60 प्रतिशत तक लोगों के पेट में केंचुऐ पैदा हो गये हैं और पूर्वी जिलों में विशेष कर आजमगढ़ जिले में लगभग 42 प्रतिशत ग्रामीणों के पेट में गोलाकार कीड़े हैं। यह बात इन क्षेत्रों में किये गये सर्वेक्षण से प्रकट हुई है। इन कीड़ों के पैदा होने से वहाँ के निवासियों की कार्यकुशलता पर जबरदस्त असर पड़ा है।”
यह दो−तीन समाचार उत्तर−प्रदेश के हैं। अन्य प्रान्तों के समाचार पत्र हमारे सामने नहीं है इसलिए उनकी स्थिति ठीक तरह सामने नहीं है। पर अनुमान किया जाता है अन्य प्रान्त भी अछूते न होंगे। उत्तर−प्रदेश भारत के अन्य प्रान्तों की तुलना में कम साधन सम्पन्न नहीं है। यहाँ यह स्थिति है तो अन्य प्रान्तों में इससे अच्छी क्या होगी?
स्वास्थ्य की दुर्दशा का देशव्यापी चित्रण कुछ और समाचारों से भी सामने आता है—कलकत्ता का समाचार है कि—‛पश्चिम बंगाल में तपेदिक के रोगियों की संख्या आज 1943 से तिगुनी हो गई है।’ यह सूचना राज्यपाल कुमारी पद्मजा नायडू ने राज्य भवन में हुई प. बंगाल तपेदिक संघ की वार्षिक बैठक में दी। संघ के महामंत्री डा. के. एन. डे के अनुसार प. बंगाल में लगभग 8 लाख तपैदिक के रोगी हैं।
दिल्ली नगर निगम के कमिश्नर ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि दिल्ली में लगभग 20 हजार व्यक्ति तपैदिक से पीड़ित हैं। उसका प्रसार 2.7 प्रति हजार से बढ़कर 4.7 हो गया है। टी. बी. तकनीकों में दर्ज शुदा मरीजों की संख्या 13799 है। तपैदिक केन्द्र की पड़ताल के अनुसार राजधानी में लगभग 30 हजार रोगी हैं। 23 हजार व्यक्तियों के एक्सरे परीक्षण से पता चला कि एक हजार पुरुषों में से 24.5 पर और एक हजार स्त्रियों में से 15.6 पर तपैदिक का काफी प्रभाव था। प्रकाशित समाचार में कहा गया है कि—देश भर में करीब 50 लाख लोग फेफड़े की तपैदिक से पीड़ित हैं यह संख्या देश की जनसंख्या का 1.3 प्रतिशत है। भोपाल में एक तपैदिक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री श्री करमकर ने कहा—‟तपैदिक के कारण इस समय भारत में प्रतिवर्ष पाँच लाख व्यक्ति मरते हैं।”
तपैदिक की तरह ही कुछ और प्रसिद्ध रोग धीरे−धीरे अपनी जड़ जमाते जा रहे हैं। चंडीगढ़ में पंजाब के मुख्य मंत्री सरदार प्रतापसिंह कैरों ने कहा—‟राज्य में कोढ़ के रजिस्टर्ड रोगियों की संख्या 1778 है। यह भारत के नाम पर एक बड़ा धब्बा है कि संसार भर में कोढ़ के कुल रोगियों में 20 प्रतिशत रोगी भारत के हैं। भारत में इस से पीड़ित रोगियों की संख्या 20 लाख है।”
दिल्ली के नैतिक तथा सामाजिक स्वास्थ्य संघ के तत्वावधान में आयोजित एक गोष्ठी का उद्घाटन करते हुए स्वास्थ्य मंत्री श्री करमकर ने कहा—‛देश में यौन सम्बन्धी संक्रामक रोग बढ़ते जा रहे हैं।’ डा. सुशीला नायर तथा कर्नल अमीरचन्द ने यह विचार प्रकट किया कि तरुणावस्था में लड़के लड़कियों के एक दूसरे के सम्पर्क में आने की परिस्थितियाँ बढ़ जाने तथा नैतिक मापदंड बदलने से इन रोगों का अत्यन्त प्रसार हुआ है।
स्वास्थ्य की इस गिरती हुई स्थिति क लिए सरकार को दोष देना बेकार है। बेचारी सरकार अस्पताल खोल सकती है, टीका लगा सकती है या ऐसे ही कुछ और छोटे मोटे उपचार कर सकती है पर इससे क्या बनने वाला है। अपने स्वास्थ्य की जड़े खोखली करने वाले हम स्वयं हैं। आहार विहार का असंयम ही वह कुदाली है जिससे हम अपने लिए कब्र खोदते रहते हैं । ब्रह्मचर्य का अभाव, जिह्वा का असंयम, नशेबाजी, मानसिक उद्वेग आदि कारण ही हमें दिन−दिन खोखला बनाये चले जा रहे हैं। दरिद्रता एवं पौष्टिक भोजन का अभाव भी एक छोटा कारण है पर है वह छोटा ही, क्योंकि सघन वनों में रहने वाले भील, कोल आदि बहुत ही दरिद्रता का जीवनयापन करते हैं और पौष्टिक भोजन भी प्राप्त नहीं करते, गरीब मजदूर भी कम आमदनी और कई बाल बच्चों के कारण कुछ अच्छी चीजें नहीं खा पाते, फिर भी वे स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हुए स्वास्थ्य को सुरक्षित रख पाते हैं। स्वास्थ्य के बिगड़ने का कारण अपनी बिगड़ी हुई आदतें ही हैं। इन्हें यदि न सुधारा गया तो शरीर की जीवनी शक्ति घटती जायगी और हम भीतर ही भीतर खोखले होते जावेंगे। खोखले शरीर पर मामूली से मामूली विपरीत परिस्थिति भी घातक प्रभाव डाल सकती है और हमें मक्खी मच्छरों की तरह मरने एवं रोग से ग्रसित होकर कराहते हुए मौत के दिन पूरे करने पड़ सकता है।
शीत की लहर, अंत्र शोथ, हैजा, पेट के कीड़े, तपैदिक, कोढ़, यौन रोगों की बढ़ोतरी के समाचार सामने खुले पड़े हैं। इस विभीषिका के पीछे एक ही कारण दीख पड़ता है—स्वास्थ्य का खोखलापन और उसका कारण प्रतीत होता है—अपनी आहार−विहार सम्बन्धी बिगड़ी हुई आदतें। यदि यह न बदली जा सकी तो मौत और बीमारी की सुरसा अपना मुँह फाड़ती ही जायगी। सम्पन्नता बढ़े और पौष्टिक भोजन मिले, सरकार चिकित्सा का प्रबन्ध करे यह भी उचित है, पर काम इतने से ही चलने वाला नहीं है। बुरी आदतें ही जो हमें दिन रात घुन की तरह खोखला बनाती रहती हैं यदि न छोड़ी जा सकीं तो पाचन क्रिया बिगड़ेगी और इस बिगाड़ के बाद पौष्टिक भोजन भी लाभ पहुँचाने की अपेक्षा उलटा अपच पैदा करेंगे। जीवनी शक्ति घट जाने पर शीत की मामूली सी लहर भी हममें से हजारों को लुढ़काती हुई चली जायगी, इसमें बेचारे डाक्टर और अस्पताल हमारी कितनी सहायता कर सकेंगे? यह विचारणीय प्रश्न है।
फ्राँस की साइंस एकेडेमी के मनीषी प्रोफेसर डी. मोस्तोक ने एक बार अपने छात्रों को यह समझाया कि शरीर के भीतर जीवनी−शक्ति पर्याप्त हो, रक्त शुद्ध हो और सजीवता की कमी न पड़े तो बाहर की छूत, रोग कीटाणु या विपरीत परिस्थितियाँ भी मनुष्य का कुछ बिगाड़ नहीं सकती। उन्होंने हैजे के कीटाणुओं से भरी एक शीशी को सब के सामने पिया और दिखाया कि उनके शरीर पर उतनी अधिक मात्रा में कीटाणु विष पीने का भी असर नहीं हुआ। मोस्तोक महोदय सदा इस बात पर जोर देते थे कि आहार−विहार के नियमों पर पूरा ध्यान देकर अपनी पाचन−क्रिया को सक्षम रखा जाय, शक्तियों का अनावश्यक क्षरण न किया जाय, परिश्रम से जी न चुराया जाय और व्यसनों से बच जाय तो कोई गरीब आदमी मामूली−सा आहार लेकर भी शक्ति मान बना रह सकता है; मौत और बीमारी से करारी टक्कर ले सकता है।
स्वास्थ्य की सुरक्षा के सम्बन्ध में सबसे बड़ी सचाई यही है। आरोग्यशास्त्र का सारा रहस्य उपरोक्त सिद्धान्तों में सन्निहित है, पर कैसा दुर्भाग्य है कि हम इस ओर से आँखें बन्द करके दवादारु के द्वारा निरोगता प्राप्त करने की मृगतृष्णा में भटकते रहते हैं। अपने स्वास्थ्य का सत्यानाश करने वाली बुरी आदतें जब तक न छूटेंगी तब तक स्वास्थ्य को चौपट करने वाली परिस्थितियों से कैसे छुटकारा मिलेगा यह समझ में नहीं आता।
धूम्रपान के दुष्परिणाम
नशेबाजी को ही लीजिए—बीड़ी, पान, तमाकू, चाय, अफीम, गाँजा, भाँग, शराब आदि की खर्चीली और सत्यानाशी आदतें डाकिन की तरह हमें अपने चंगुल में बुरी तरह जकड़े हुए हैं और चुपके−चुपके हमारा सत निचोड़ कर जोंक की तरह सब कुछ चूसती रहती हैं।
लन्दन 15 जून का समाचार है कि फेफड़े के कैन्सर का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि—”सिगरेट के धुँए में 15 प्रतिशत अंश ‘फैनालिक इरिटेंट’ होता है जो कैन्सर पैदा करता है।” केनबरा 20 जुलाई का समाचार है कि—आस्ट्रेलिया की वायु सेना के निदेशालय ने चेतावनी दी है कि—‟सिगरेट पीने से उसका धुआँ रक्त की नालियों में मिल जाता है। उसके परिणामस्वरूप रक्त में आक्सीजन लेने की क्षमता कम होकर आँखों की रोशनी 20 प्रतिशत तक गिर जाती है।” न्यूयार्क 8 फरवरी का समाचार है कि—‟विश्व विख्यात नेत्र चिकित्सक डा. एच. एम. हैजस ने “वर्जिनिया मेडिकल मन्थली” में लिखा है कि—‟धूम्रपान से आँखें कमजोर हो जाती हैं। उठने−बैठते अन्धेरा सा छाने लगता है। ऐसे रोगी धूम्रपान छोड़े बिना बीमारी में छुटकारा नहीं पा सकते।’ विद्वानों का यह कथन सत्य ही है कि “पहले मनुष्य नशा पीता है फिर नशा मनुष्य को पी जाता है।”
जिन्दगी के साथ खिलवाड़
टोंरटो 22 मार्च का समाचार है कि—‟एक प्रसिद्ध अमरीका के वैज्ञानिक ने बताया है कि—प्रतिदिन एक पैकिट सिगरेट पीने वाला व्यक्ति अपनी आयु आठ वर्ष कम कर लेता है। और दो पैकिट रोज पीने वालों की आयु 18 वर्ष घट जाती है। नोबल पुरस्कार प्राप्त डा. पौलिंग ने यहाँ कहा कि सामान्यतः धूम्रपान करने वाला व्यक्ति जितना समय धूम्रपान में व्यय करता है उससे तीन गुना समय उसकी आयु में और कम हो जाता है।
मादक पदार्थों का शरीर और मन पर कितना बुरा प्रभाव पड़ता है यह कोई अप्रकट बात नहीं है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ और नीतिवान लोग एक स्वर से इस बात का समर्थन करते हैं कि नशेबाजी शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन को बुरी तरह नष्ट करती है। आये दिन अनेकों दुर्घटनाऐं भी नशे से होती रहती हैं। गंगापुर (राजस्थान) का समाचार है कि खाजन्ना डूँगर पुलिस स्टेशन के दो सिपाही शराब पीकर एक−दूसरे से भिड़ पड़े। एक ने दूसरे को मार कर खुद ही अपने को गोली मार ली। कानपुर में होली के अवसर पर रेलवे क्वार्टर, जुही का एक रेलवे कर्मचारी शराब पीकर बुरी तरह लड़खड़ाकर गिर पड़ा और नाक तथा माथे पर चोट आने से थोड़ी ही देर में मर गया। मेरठ केण्ट का एक युवक मेहतर वेतन मिलते ही केसर गंज के सामने वाले ताड़ीखाने में पहुँचा और अपना सारा वेतन शराब में ही खर्च कर दिया। घर पहुँचते−पहुँचते उसकी मृत्यु हो गई। गुड़गाँवा (पंजाब) में हरिसिंह तथा करतारसिंह नामक दो युवकों की मृत्यु भाँग, शराब तथा गाँजा के अधिक सेवन करने से दिवाली के दिन हो गई।
प्राणघातक बुरी लत
शराब, अफीम, गाँजा, भाँग तो आगे की चीज हैं कईबार बीड़ी जैसा छोटा नशा भी प्राणघातक बन जाता है। भण्डारा में 8 जून को एक साहूकार के दो छोटे बच्चों ने एक कमरे में जाकर चुपके−चुपके बीड़ी पीने का प्रयास किया। बीड़ी के कारण वहाँ पड़ी−सूखी घास में आग लग गई। उसी में घुटकर दोनों बालक मर गये। भोपाल 2 जून का समाचार है कि—खराब तम्बाकू की बीड़ी पीने से तीन आदमी तुरन्त मर गये और बहुत से बेहोश हो गये। पुलिस ने 40 हजार बीड़ियों पर कब्जा कर लिया। दुर्घटना को सुनकर भोपाल के आसपास के शहरों के लोग बीड़ी पीना छोड़ने लगे हैं। कानपुर का समाचार है कि कल्याणपुर निवासी चाँद खाँ रात को लेटा हुआ बीड़ी पी रहा था कि अचानक झपकी लग गई। बीड़ी बिस्तरे पर गिरी तो आग की लपटों में बेचारा बुरी तरह जल गया। अस्पताल पहुँचते−पहुँचते उसकी मृत्यु हो गई। ऐसी दुर्घटनाऐं भी आये दिन सामने आती ही रहती हैं।
बढ़ती हुई दुष्प्रवृत्ति
इतना होते हुए भी कितना दुर्भाग्य है कि हम गरीब भारतवासी दिन−दिन नशेबाजी की आदत को और तेजी से अपनाते जा रहे हैं। सिनोही नगर की दो दुकानों का ठेका गत वर्ष 51 हजार में उठा था पर अब 1 लाख में उठा। हरद्वार का समाचार है कि—धनौरी गाँव का शराब ठेका गतवर्ष 222000 का था अब वही दुकान 45 हजार में नीलाम हुई है। रुड़की का ठेका जो 53 हजार का गतवर्ष था इस साल 1 लाख 20 हजार का हो गया। भगवानपुर में 12700 की जगह इस साल 25 हजार में नीलाम हुआ है। मेरठ का समाचार है कि जिले में देशी शराब और भाँग के ठेके से सरकार को 10 लाख रुपये से अधिक की आय हुई है। जिले में अवैध रुप से शराब भी खूब तैयार होती और खपती है। एक रिपोर्ट के अनुसार सुपरिन्टेन्डेण्ट पुलिस ने अवैध शराब बनाने वालों के पचास से अधिक चालान किये हैं। जिले में कुछ गाँव तो इसके लिए काफी बदनाम हैं।
जयपुर का समाचार है कि—स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा प्राप्त आँकड़ों के आधार पर इस वर्ष जनवरी से दिसम्बर तक अकेले जयपुर नगर में 412 आदमी फेफड़ों के रोगों से मरे हैं। गतवर्ष इस रोग से मरने वालों की संख्या नहीं के बराबर थी। उपरोक्त मृत्यु संख्या में क्षय रोगों से मरने वाले सम्मिलित नहीं हैं। फेफड़ों के रोग की वृद्धि का कारण शहर में शराब का अवैध व्यापार बताया जाता है। अवैध शराब तैयार करने वाले ‘डिनेचर स्प्रिट’ को छानकर उससे शराब तैयार करते हैं।
नशे का प्रसार और प्रचार किस प्रकार बढ़ रहा है इसका कुछ परिचय ऊपर के समाचारों से मिल सकता है। दुकानों के ठेके कई−कई गुनी कीमत पर नीलाम होने का अर्थ है कि ठेकेदारों का लाभ बढ़ता जाता है। और यह बढ़ोतरी तभी संभव है जब बिक्री अधिक हो। मादक द्रव्यों की अधिक बिक्री होना यह बताता है कि हम स्वास्थ्य को चौपट करने की सत्यानाशी सड़क पर किस तेजी से सरपट दौड़े जा रहे हैं। मनुष्य का मन जब दुष्प्रवृत्तियों के लिए उतारू हो जाता है तो वह कानूनी प्रतिबन्धों की भी परवाह कहाँ करता है। अवैध रुप से शराब का उत्पादन और अन्य नशों का व्यापार जिस तेजी से बड़ रहा है वह भी कम चिन्ता का विषय नहीं है।
अवैध व्यापार
एक जाँच समिति ने उत्तर−प्रदेश के बदायूँ और एटा जिलों में भ्रमण करके पाया कि अवैध शराब बनाने का काम इन जिलों में एक कुटीर उद्योग बना हुआ और वह दिन−प्रतिदिन उन्नति कर रहा है। दिल्ली नगर में यहाँ सन् 56 में पुलिस ने अवैध शराब बनाने की 40 भट्टियाँ पकड़ी थीं और 1269 व्यक्ति पकड़े थे अब गत वर्ष पकड़ी हुई भट्टियों की संख्या 208 और गिरफ्तार व्यक्तियों की संख्या 2045 पहुँच गई। यही प्रगति अन्यत्र भी रही होगी। अपराधियों में से पुलिस की पकड़ में बहुत थोड़े ही तो आ पाते हैं। नशेबाजी की बढ़ती हुई दुष्प्रवृत्ति के कारण इन चीजों का तस्कर व्यापार भी खूब पनपता है।
फारबिस गंज (बिहार) में आबकारी विभाग ने छह बैल गाड़ियों पर 36 बोरों में भर कर ले जाया जा रहा अवैध गाँजा रामपुर गाँव के पास पकड़ा। गाँजे की कीमत 70 हजार आँकी गई है। पटियाला पुलिस ने तीन मकानों की तलाशी ले कर 2 मन 32 सेर अफीम पकड़ी जिसकी कीमत एक लाख रुपया है। रामपुर (मध्य प्रदेश) में राजनांद गाँव में 3 मन 36 सेर अफीम पकड़ी। फिल्लोर (पंजाब) पुलिस ने रुड़का कलाँ के सरकारी ठेके पर छापा मारकर 65 बोरों में अफीम के 180 मन बीज पकड़े। इलाहाबाद पुलिस ने एक ठेकेदार के घर पर छापा मारकर 2.5 मन गाँजा पकड़ा जिसकी कीमत 17 हजार से अधिक है। लखीमपुर नेपाल की सीमा पर 30 हजार का अवैध गाँजा पकड़ा गया। लखनऊ पुलिस ने रेलवे पार्सल से जाता हुआ 20 हजार कीमत का 24 सेर चरस पकड़ा। इसी प्रकार बवीना स्टेशन पर 14 हजार का चरस पकड़ा गया। नीमच−इन्दौर बस में यात्रा करता हुआ एक यात्री टिफिन कैरियर में रखी रोटियों के बीच छह सेर अफीम छिपाये हुए पकड़ा गया। जयपुर पुलिस ने स्प्रिट से शराब बनाने का एक बड़ा कारखाना पकड़ा जिसमें 250 बोतल तैयार शराब और इतना सामान पकड़ा जिससे एक ट्रक भरा जा सकता था। बताया जाता है कि इस प्रकार तैयार की हुई शराब में डिनेचर स्प्रिट में पेवेडीन, केशेडीन, जला हुआ रबड़, हड्डी का कोयला आदि रासायनिक विषों का उपयोग होता है जिससे उसे पीने वाले गठिया, अन्धापन आदि रोगों के शिकार होकर बहुत जल्दी मर जाते हैं।
यह धन पौष्टिक भोजन में लगे तो?
धूम्रपान का प्रचलन हमारे गरीब देश की स्थिति को देखते हुए आश्चर्यजनक है। बताया जाता है कि प्रतिदिन दो करोड़ रुपये की अर्थात् साल में 720 करोड़ की तम्बाकू हम पी जाते हैं। यदि इतना रुपया बचाकर हम पौष्टिक खाद्य पदार्थों पर खर्च करें तो उससे राष्ट्रीय स्वास्थ्य की भारी सुरक्षा हो सकती है। एक ओर जहाँ हमारा नशेबाजी का खर्च बढ़ रहा है वहाँ दूसरी ओर पौष्टिक पदार्थों के सेवन की क्षमता गिरे हुए स्तर पर ही पड़ी है। इस दृष्टि से हम संसार के सबसे पिछड़े देशों में हैं। संयुक्त राष्ट्र संघ की खाद्य एवं कृषि संस्था की जाँच द्वारा उपलब्ध आँकड़ों द्वारा पता चलता है कि पोषक तत्वों की दृष्टि से भारतीयों का भोजन सबसे घटिया है। आयरलैण्ड निवासियों के भोजन में प्रतिदिन 3500 (कैलोरी) मात्रा में पोषक तत्व रहते हैं। न्यूजीलैण्ड में 3430, डेनमार्क में 3350, इंग्लैण्ड में 3260 आस्ट्रेलिया में 3200 स्वीटजरलैण्ड में 3110, अमेरिका में 3100, तुर्की में 2890, फारमोसा में 2830, जापान में 2200, पाकिस्तान में 2000 और भारत में वह मात्रा केवल 1800 है।
स्वास्थ्य समस्या जीवन की सब से प्रथम, सब से आवश्यक समस्या है उसके साथ खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। नशेबाजी, माँसाहार, अभक्ष भोजन, शाक, फल एवं दूध जैसे पौष्टिक आहार की उपेक्षा, समय, कुसमय का ध्यान न रखा जाना, संयम का अभाव, श्रमशीलता में व्यतिरेक, चिन्ताऐं आदि अनेक कारण ऐसे हैं जिन्हें यदि दूर किया जा सके तो वर्तमान आर्थिक स्थिति की दुर्बलता होते हुए भी इस अपने स्वास्थ्य को इस योग्य रख सकते हैं कि शीत की लहर जैसे मामूली झटकों को सहन करने लायक हमारे शरीर की स्थिति बनी रहे। यदि हमें देर तक और आदमियों की तरह जीना है तो इन बातों पर विचार करने और गलती को सुधारने के लिए तैयार होना ही पड़ेगा।
अष्टग्रही योग चाहे चिन्ता का विषय न हो पर मानव जाति और विश्व के भविष्य के सम्बन्ध में संसार के उच्चकोटि के विचारकों और वैज्ञानिकों ने जो भविष्यवाणियाँ की हैं वे हमारे लिए बार−बार विचारणीय और मननीय हैं।
बढ़ती हुई आबादी का संकट
लन्दन 6 मई का समाचार है कि—स्वास्थ्य विज्ञान के विश्व विख्यात विशेषज्ञ प्राध्यापक हुर्मेन बेटी ने ब्लैकपूल में स्वास्थ्य काँग्रेस की रायल सोसाइटी में एक खोजपूर्ण निबन्ध पढ़ते हुए यह मत प्रतिपादित किया कि—‟आगामी सन 2050 में अर्थात् आज से 60 साल बाद संसार की हालत महाप्रलय से भी खराब हो जायगी। उस समय दुनियाँ की आबादी करीब 6 अरब हो जायगी और तब धरती पर इतने लोगों के लिए न खाना मिल सकेगा, न शुद्ध वायु, न पानी, न बिजली। लोगों के रहने के लिए जो मकान होंगे उनमें केवल खड़े होने भर की जगह मिल सकेगी। जानवरों का नाम निशान तब इस दुनियाँ में से मिट जायेगा क्योंकि जब मनुष्यों के रहने और खाने के लिए धरती की शक्ति पर्याप्त न रहेगी तो पशुओं को उसमें से हिस्सा कौन बटाने देगा? लोग उन्हें मार काट कर बहुत पहले ही चटकर जायेंगे।”
“कोयला, तेल और प्राकृतिक गैस के बारे में उनसे कहा है कि—आगामी सौ सालों में प्रकृति का सारा संचित भंडार समाप्त हो जायेगा। प्रकृति को जितना ईंधन पैदा करने में 25 करोड़ साल लगे हैं, बढ़ती हुई आबादी और उसकी वर्तमान आवश्यकताऐं उसे 250 वर्ष के भीतर ही खतम कर लेंगी। अणुशक्ति के उत्पादन की बात सोची जा रही है पर उसे उत्पन्न करने के साधन भी तो पृथ्वी पर सीमित ही हैं और वे भी कुछ ही दिन में समाप्त हो जावेंगे। धातुओं का भण्डार भी तब तक चुक जायेगा और अनेक स्थान तो ऐसे हो जायेंगे जहाँ एक−एक बूँद पानी के लिए लोगों को तरसना पड़ेगा।”
“ईसा से 10 हजार साल पहले दुनियाँ की आबादी केवल 10 लाख थी। पर वही बढ़ कर आज 2 अरब 60 करोड़ हो चुकी है। इस हिसाब से सन् 2150 में जब दुनियाँ की आबादी 9 अरब हो जायगी तो प्रति व्यक्ति को केवल 1 वर्ग मीटर जमीन हिस्से में आयेगी।”
65 वर्ष बाद
ऐलीनाय विश्वविद्यालय के भौतिक शास्त्री प्रो. हीजवान फोस्टेर का कथन है कि—”मानव जाति का अन्त शुक्रवार 13 नवम्बर सन् 2023 को अर्थात् अब से 64 साल बाद हो जायेगा। उस दिन एक तरह से जनसंख्या का विस्फोट हो जायेगा। जनसंख्या इतनी बढ़ जायगी कि वह स्वयं ही अपने आपको नष्ट कर लेगी।”
जैसे−जैसे जनसंख्या बढ़ती है वैसे ही वैसे अस्तित्व रक्षा के लिए प्रजनन की मानव क्षमता भी बढ़ेगी। इस सिद्धान्त पर ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि—”यह धारण कि मानव की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विज्ञान प्रगति कर लेगा केवल तीन पीढ़ियों तक ही सही हो सकती है। जनसंख्या की वृद्धि से प्राकृतिक साधन तेजी से समाप्त होते जा रहे हैं और पृथ्वी के जीवन योग्य क्षेत्र दूषित होते चले जा रहे हैं। आबादी की बढ़ोतरी इस तेजी से हो रही है कि सन् 2023 तक वह अनियंत्रित हो जायगी। हमारे नाती−पोते भुखमरी के ही शिकार नहीं होंगे वरन् स्थान की कमी के कारण भी वे मर जाएँगे।” कैलिफोर्नियाँ औद्योगिकय संस्था के डा. जेम्स वोनर ने कहा कि—विश्व की आबादी प्रतिवर्ष 45 करोड़ के हिसाब से बढ़ रही है। यदि यही गति रही तो कुछ ही दिन में यह स्थिति आ जायगी कि धरती पर पैर रखने की भी जगह न रहे।
न्यूयार्क 13 मई का समाचार है कि ब्रिटेन के जीव विज्ञान शास्त्री सर जुलियन हक्सले ने जनसंख्या सम्मेलन पर आयोजित एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन के अध्यक्ष पद से भाषण करते हुए चेतावनी दी कि—मानव जाति को अपनी ही संख्या वृद्धि से खतरा पैदा हो गया है। यह प्रश्न राष्ट्रसंघ की बृहत् सभा में उठाया जाना चाहिए और इस संकट को हल करने के लिए विश्व−व्यापी पैमाने पर प्रयत्न किया जाना चाहिए।
मरणं बिन्दु पातेन.....
जिस बात को हर्मेन वेटी, हीजवान फोस्टेर, जेम्स बोनर, जुलियन हक्सले आदि वैज्ञानिक आज कह रहे हैं उस विभीषिका को हमारे पूर्वज बहुत पहले ही जानते थे और उन्होंने युगों पूर्व यह चेतावनी दी थी कि ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में शिथिलता की नीति बरतने से, काम−वासना पर से अंकुश ढीला करने से मानव−जाति विपत्तियों में ही नहीं फंसेगी वरन् उसे मरण के लिए तैयार होना पड़ेगा। आप्त वचन है—‟मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिन्दु धारणम्” अर्थात् वीर्यपात ही मृत्यु और वीर्य का धारण ही जीवन है। व्यक्तिगत स्वास्थ्य की सुरक्षा, दृढ़ता, पुष्टि, दीर्घजीवन, प्रतिभा, मेघा, स्फूर्ति आदि अनेक वैयक्तिक लाभ ब्रह्मचर्य पालन, से उपलब्ध होते हैं। आत्मबल, श्रेय संचय एवं ईश्वर प्राप्ति का तो प्रमुख साधन ही है। सुसंतति भी केवल वे ही प्राप्त कर सकते हैं जो मनोविकारों से बचते हुए केवल संतानोत्पादन की आवश्यकता को ध्यान में रखकर गृहस्थ−धर्म का पालन करते हैं। विश्व हित की दृष्टि से जनसंख्या को सीमित एवं नियंत्रित रखा जाना आवश्यक है। अन्यथा प्रकृति के द्वारा उत्पन्न साधन बढ़ी हुई जन−संख्या के लिए अपर्याप्त हो जाएँगे और बढ़ी हुई आबादी संकट उत्पन्न कर देगी। इन बातों को ध्यान में रखते हुए ब्रह्मचर्य के पालन पर यहाँ बहुत जोर दिया जाता रहा और वासना को नियन्त्रित करने वाले अनेक धार्मिक नियम बनाये गये। आजीवन ब्रह्मचर्य, पवित्र वैधव्यजीवन, अधेड़ होते ही वानप्रस्थ, विद्याध्ययन काल में अनिवार्य ब्रह्मचर्य आदि की प्रथाऐं इसी दृष्टि से थी। व्यभिचार को भयंकर पाप इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए ठहराया गया था। यदि वे मान्यताऐं प्रतिष्ठित रहती तो वह विभीषिका सामने न आती जो उपरोक्त वैज्ञानिकों की भविष्यवाणी में प्रस्तुत है।
ब्रह्मचर्य की उपेक्षा
काम सेवन सम्बन्धी मर्यादाऐं शिथिल होने का, ब्रह्मचर्य के प्रति उपेक्षा बरतने का परिणाम सामने उपस्थित है। इसके लिए सभी विचारशील व्यक्ति एवं सरकारों के कर्णधार चिन्ताग्रस्त हो रहे हैं। इस तरह के बाह्य उपचार सोचते हैं पर उनसे भी कुछ बन पड़ेगा ऐसी आशा कम ही है। तृतीय पंचवर्षीय योजना में भारत सरकार परिवार नियोजन पर 25 करोड़ खर्च करने वाली थी पर अब वह रकम बढ़कर 50 करोड़ हो जाने की संभावना है। सरकार जानती है कि यदि आबादी की बढ़ोतरी नहीं रुकी तो प्रगति के सारे सपने धूमिल हो जावेंगे और जो विशाल योजनाऐं बनाई जा रही हैं वे आज की जैसी स्थिति कायम रखने के लिए भी अपर्याप्त सिद्ध होंगी।
विश्व जनसंख्या आँकड़ा विभाग ने बताया है कि वर्तमान गति से भारत की जन−संख्या अगले दस वर्ष में 10 करोड़ और बढ़ जायगी और इससे अगले दस साल में दुगुनी होकर 89 करोड़ 60 लाख तथा 22 साल बाद 1 अरब 88 करोड़ हो जायगी। सारे संसार में केवल चीन की जन−संख्या भारत से अधिक है। भारत में लगभग 44 करोड़ और चीन में 70 करोड़ मनुष्य अर्थात्—डय़ौढ़े से कुछ अधिक लोग हैं पर चीन के पास भारत से तीन गुनी जमीन है। इस दृष्टि से भूमि की कठिनाई को देखते हुए भारत के सामने चीन से भी अधिक कठिनाई रहेगी।
परिवार नियोजन की विशेषज्ञ श्रीमती मलिका घोष ने बताया कि प्रति मिनट भारत में 20 नये बच्चे पैदा हो जाते हैं जब कि मरने वालों की संख्या इससे काफी कम है। दार्जलिंग 2 अगस्त का समाचार है कि भक्तपुर गाँव की एक कृषक महिला 26 बच्चों की माँ है और ललितापुर की एक स्त्री अब तक 22 बच्चे जन्म चुकी है। इतने पर भी ऐसे मूर्ख इस दुनियाँ में बसते हैं जो संतान न होने पर दूसरी शादी करने की बात सोचते हैं और केवल इसी कारण अपने को भाग्यहीन मानकर संतान के लिए लालायित रहते हैं। ऐसे लोग यह भी नहीं सोचते कि विश्व संकट को कुछ कम करने में जो सौभाग्य उन्हें मिला है उस पर प्रसन्नता अनुभव क्यों न करें?
विभिन्न और विचित्र उपाय
समस्या सचमुच चिन्ताजनक है पर सूझ नहीं पड़ता कि नियन्त्रण के लिए क्या किया जाय? लोगों ने अपने−अपने ढंग से इसके हल भी सोचे हैं और उपाय भी किये हैं। हैदराबाद कार्पोरेशन के मेयर श्री वेद प्रकाश जी ने सुझाव रखा है कि—देश में बढ़ती हुई जन संख्या गंभीर रूप धारण कर चुकी है इसलिए एक कानून बनाकर तीन से अधिक बच्चे पैदा करने वालों पर अतिरिक्त कर लगाया जाना चाहिए और दंड व्यवस्था की जानी चाहिए।
भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय ने 300 रु॰ की मासिक आय वालों को गर्भ निरोध के साधन रबड़ की झिल्लियाँ, जेली, गोलियाँ आदि मुफ्त में और 500 तक की आय वालों को लागात से आधे में देने का निश्चय किया है। गाँवों में किसी की चाहे कितनी ही आमदनी क्यों न हो परिवार नि॰चिकित्सालयों में यह चीजें मुफ्त दी जावेगी। इन साधनों का स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ेगा यह अभी अनिश्चय है। लन्दन 13 सितम्बर का समाचार है कि ब्रिटेन की राष्ट्रीय विवाह निर्देशन समिति के चिकित्सा सलाहकार मण्डल के मंत्री डा॰ इर्थन डय़क्स ने चेतावनी दी है कि गर्भ निरोधक गोलियाँ जो कि शीघ्र ही ब्रिटेन के बाजार में आने वाली हैं केन्सर जैसे भयानक रोग का कारण बन सकती हैं।
नृशंस और रोमांचकारी हल
चीन ने इस समस्या का हल एक और भी ढंग से निकाला है। ताइपेह (फारमोसा) के कोमिताँगी प्रधान मंत्री चेन चेंग ने बताया कि पेकिंग सरकार बढ़ी हुई जनसंख्या के लिए खाद्यान्न का अभाव हो जाने से अपनी एक तिहाई जनसंख्या को विधिवत् नष्ट कर रही है। कम्यूनिस्टों ने जनसंख्या को तीन वर्गों में विभक्त किया है (1) आवश्यक (2) कम आवश्यक और (3) अनावश्यक। तीसरे अनावश्यक वर्ग में वृद्ध तथा उत्पादन कार्य के अयोग्य व्यक्ति शामिल हैं। इस नीति के अनुसार कम्युनिस्ट 14 करोड़ नागरिकों को नष्ट करने के लिए सीमांत क्षेत्रों में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। फारमोसा को ‘दी सेन्ट्रल डेलीन्यूज’ नामक पत्र में समाचार छापा है कि—‟चीनी साम्यवादियों ने सन् 1950 के बाद से आबादी घटाने के उद्देश्य से 3 करोड़ लोगों की हत्या की है और 9 करोड़ चीनियों को श्रम शिविरों में भेज दिया है।
एकमात्र हल—संयम
दुनियाँ के बुद्धिमान लोग अपने−अपने ढंग से इस जनसंख्या वृद्धि और उससे उत्पन्न संकट पर विचार एवं प्रयत्न करने में संलग्न हैं पर यह क्यों नहीं सोचा जाता कि कामुकता की बढ़ती हुई प्रवृत्ति पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए धार्मिक, नैतिक एवं स्वास्थ्य की महत्ता प्रतिपादित की जाय और जन−मानस में ब्रह्मचर्य के लिए आवश्यक श्रद्धा उत्पन्न की जाय। प्राचीन काल में करोड़ों वर्षों तक इसी आधार पर यह संकट उत्पन्न होने से रुका रह सका है,अन्यथा यदि वर्तमान काल जैसी कामुकता अनियंत्रित रही होती तो अब से हजारों लाखों वर्ष पूर्व ही यह विभीषिका उत्पन्न हो गई होती। संकट काल्पनिक नहीं वास्तविक है। ब्रह्मचर्य में शिथिलता उत्पन्न करने वाली विचारधाराऐं इसके लिए दोषी हैं। फैशन परस्ती, अश्लीलता, गंदे चित्र, सिनेमा, उत्तेजक साहित्य, सहशिक्षा, भद्दे गीत, दूषित वातावरण एवं वासना की स्वच्छन्दता का समर्थन जैसी बातें ही जन−मानस में कामुकता की प्रवृत्ति भड़काती हैं और उसी से जनसंख्या की बढ़ोतरी का संकट उत्पन्न होता है। स्वास्थ्य का सत्यानाश करने वाला तो यही प्रधान कारण है। आहार सम्बन्धी भूलें जितनी हानिकर हैं उससे अधिक यह वासनात्मक अनियंत्रित दुष्प्रवृत्ति अहितकर है। इसे रोका न गया, सँभाला न गया तो हमारे शरीर तो दिन−दिन चौपट होने ही है सामूहिक रूप से भी हमें आत्मघात के लिए तैयार होना पड़ेगा। ‘मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिन्दु धारणम्’ का सनातन सिद्धान्त कभी गलत नहीं हो सकता। यदि वासना पर नियंत्रण नहीं हो सकता तो जनसंख्या की वृद्धि भी नहीं रुक सकती। बाह्य उपचार एक सीमा तक ही उनकी रोकथाम कर सकते हैं। काम तो जड़ तक पहुँचने से ही बनेगा।
अष्टग्रही योग तो जप, तप से टल जायेगा पर अनियंत्रित वासना का सर्वनाशी योग ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा एवं आत्म संयम के अतिरिक्त और किसी प्रकार टलने वाला नहीं है। ग्रहों से रक्षा हो सकती है पर असंयम का महाग्रह किसी के टालने से टलने वाला नहीं है। यदि उससे बचने के लिए सतर्क न हुआ गया तो सर्वनाश का संकट निश्चित है आज न सही 90 वर्ष बाद सही।
भगवान ने मनुष्य के शरीर को इस योग्य बनाया है कि यदि उसका व्यतिक्रम न किया जाय तो वह निस्संदेह दीर्घजीवी हो सकता है और जब तक आयुष्य पूरा न हो हँसी−खुशी के साथ निरोग जीवन व्यतीत कर सकता है। प्राचीनकाल में यहाँ सभी दीर्घजीवी होते थे। अब भी जिनके शरीर और मन पर अनावश्यक दबाव नहीं पड़ा है वे दीर्घ जीवन का सुखोपभोग करते हैं।
दीर्घजीवन का मूल कारण
इन सब डेढ़ वर्ष के सामने पड़े दो समाचार पत्रों में ढेरों दीर्घजीवियों के समाचार मौजूद हैं। ढुन्नी का समाचार है कि सन् 1857 के गदर की आँखों देखी गाथाऐं सुनाने वाले धुको मेहता की मृत्यु 130 वर्ष की आयु में हुई। मेहता ने चार आना मासिक वेतन से नौकरी शुरू की थी अब से दो वर्ष पूर्व अर्थात् सन 1959 तक वह ग्राम में चौकीदारी की नौकरी करता था और शरीर से पूर्ण निरोग था। हुगली जिला में पुरसुरा थाना के अंतर्गत पाड़ा ग्राम की तिनकोरी नामक महिला की मृत्यु 125 वर्ष की आयु में 23 दिसम्बर को हुई। बुढ़िया अपने पीछे एक 70 वर्षीय पुत्री तथा 65 वर्षीय पुत्र तथा 35 पौत्र−पौत्रियाँ छोड़ गई है। कानपुर अनवरगञ्ज निवासी 151 वर्षीय वृद्ध मौलाना बहादुर अलीशाह की मृत्यु हो गई? उन्हें अपने घर में बड़ा आनन्द आता था। स्वर्गीय मौलाना ने अपनी अन्तिम इच्छा यही प्रकट की कि उन्हें उनके उसी मकान में दफनाया जाय जिसमें उसने हँसी−खुशी का जीवन व्यतीत किया। अकोला 9 अप्रेल का समाचार है कि भारत के सबसे वयोवृद्ध व्यक्ति इमाम अलीशा का मालेगाँव जहाँगीर में देहान्त हो गया। अलीशा की आयु मृत्यु के समय 178 वर्ष की थी। भोपाल का समाचार है कि होशंगाबाद के प्रसिद्ध काँग्रेस कार्यकर्ता चौधरी धन्नालाल का स्वर्गवास 115 वर्ष की आयु में हो गया, वे 1857 गदर की आँखों देखी घटनाऐं सुनाया करते थे। कपृरथला का समाचार है कि जिला अमृतसर के आयवा कलाँ गाँव के एक किसान ने अभी भी अपने यौवन को बन्दी बनाकर रखा हुआ है। उसकी आयु 120 वर्ष की है और अब भी वह अपने खेत में हल चलाता है। उसके स्वास्थ्य और दृष्टि में कोई फर्क नहीं आया है। किसान का नाम माधरसिंह है। इन्दौर में जनगणना संग्रह करने वालों ने जो आँकड़े संग्रह किये हैं उससे पता चला है कि नगर में बहुत से व्यक्ति सौ से ऊपर के हैं इनमें आधे से अधिक स्त्रियाँ हैं।
डा. विश्वेश्वरैया के अनुभव
भारत के सुप्रसिद्ध इंजीनियर श्री विश्वेश्वरैया से उनकी सौवीं वर्ष गाँठ के अवसर पर इस दीर्घायुष्य का कारण पूछा गया तो उसने बताया कि—‟नियत समय पर भोजन, थोड़ी खुराक, खूब भूख लगने पर खाना, छह से आठ घण्टे सोना, तीन चार मील तेज पैदल चलना, आठ घण्टे श्रम करना, विलासिता से दूर रहना, दीर्घजीवन के आवश्यक नियम हैं। उसने कहा इससे भी अधिक आवश्यक यह है कि मनुष्य प्रसन्नचित्त रहे, चिन्ता, क्रोध, उद्वेग और उत्तेजना से बचे; साथ ही मन को पवित्र, निष्कपट एवं शान्त संतुलित रखे। संसार में जितने भी दीर्घजीवी हुए हैं उनका आहार−विहार संयमित रहने के अतिरिक्त एक सब से बड़ा प्रधान कारण यह रहा है कि उनने अपने मन को उद्वेगों और उत्तेजनाओं से बचाये रखा, प्रसन्नता, आशा, उत्साह और निष्कपटता को अक्षुण्ण बनाये रखा।
प्रफुल्लता का वातावरण
लन्दन 28 नवम्बर का समाचार है कि सैमएवरिट नामक ब्रिटेन के 108 वर्षीय वृद्ध ने ऐसेक्स अस्पताल में अपनी छाती का आपरेशन कराने के बाद बहुत जल्दी डाक्टरों और नर्सों को आश्चर्य में डाल दिया। एवरिट ने कहा आशा, उत्साह, प्रसन्नता, धीरज और शान्ति के मनोभावों को स्थिर रखकर ही मैंने अपनी जीवनी शक्ति को बनाये रखा है और आगे भी बहुत दिन तक उसे बनाये रहूँगा। पाकिस्तान के हुजा प्रदेश में लोग 120 वर्ष तक जीते हैं उनमें से कितने ही तो 140 वर्ष के हैं। इस दीर्घ जीवन का प्रधान कारण वे मानसिक तनाव से बचे रहकर निश्चित रहना ही बताया करते हैं। 114 वर्षीय बैंनिमन लोगों से कहा करते थे कि गुस्सा मत करो, निश्चिन्त होकर सोओ। पेट के साथ निर्दयता न करो, खुश रहो और किसी की बुराई मत करो, तुम भी मेरी ही तरह दीर्घ जीवी हो सकते हो। केपिकिन चीन का चांग बोंग 151 वर्ष जिया, वह बताता था कि मैंने कभी अपने दिमाग को गरम नहीं होने दिया। क्रोध और चिन्ता को मैंने सदा अपने से हजारों कोस दूर रखा है। बलगेरिया के स्वास्थ्य विशेषज्ञ एक दीर्घजीवी डाक्टर चनी कौक ने अपने जीवन के अनुभवों का निष्कर्ष प्रकाशित करते हुए लिखा है—‟उत्तेजक मनोविकारों से दूर रहना चाहिए। शोक संताप, निराशा, पश्चात्ताप विक्षोभ एवं अशान्ति उत्पन्न करने वाले विचार ही आयु को क्षीण करने के प्रधान कारण हैं। कामुकता, क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, स्वार्थपरता एवं लालच के विचारों में डूबे रहने वाला मनुष्य कभी दीर्घजीवी नहीं हो सकता। मनुष्य की दुर्बलताऐं ही उसके स्वास्थ्य को चौपट करने का प्रधान कारण होती हैं।”
आन्तरिक स्थिति का स्वास्थ्य पर प्रभाव
मन की प्रसन्नता एवं अन्तःकरण की जिस शान्ति को दीर्घजीवन का प्रधान कारण माना गया है वह मानसिक स्वच्छता हमारे व्यक्तिगत जीवन के सर्वतोमुखी विकास की एकमात्र कुँजी है। आयु का लम्बा होना और निरोग रहना तो उसका एक बहुत छोटा लाभ है। वस्तुतः महानता का सर्वतोमुखी आधार ही वह है। जिसका मन संतुष्ट और शान्त है उसी का मानसिक स्तर दूरदर्शिता पूर्ण रह सकता है और उसी को सुलझी हुई विवेक बुद्धि प्राप्त हो सकती है। मन की शान्ति कोई बनावटी या बाहरी चीज नहीं है जिसे कोई अभ्यास करके या किसी उपचार द्वारा प्राप्त किया जा सके। यह तो केवल उसी आध्यात्मिक आधार पर प्राप्त हो सकती है जिसे उदारता, कर्तव्यपालन, सदाचार या सहनशीलता कहते हैं। अनुदार, कर्महीन, दुराचारी एवं असहिष्णु व्यक्ति जरा−जरा सी बात पर चिन्तित, उत्तेजित निराश एवं उद्विग्न हो उठते हैं। उनकी यह दुर्बलता आरोग्य को ही नहीं खाती वरन् मनोभूमि को भी मलीन बना देती है उसमें नाना प्रकार के दोष दुर्गुण पैदा हो जाते हैं जो किंकर्तव्यविमूढ़ बनाकर न करने योग्य काम करने वाले मूढ़मति जैसे आचरण करने को विवश करते हैं।
आवेश और उत्तेजना
हम देखते हैं कि उत्तेजना और आवेश से ग्रसित मनुष्य जरा−जरा सी बात पर न करने योग्य ऐसे कार्य कर बैठते हैं जिनके लिए उन्हें जीवन भर संताप की आग में जलना पड़ता है। आत्महत्याऐं बहुधा ऐसी ही उद्विग्न अवस्था में होती रहती हैं। समाचार है कि—कानपुर जिले के ग्राम निगोह के निवासी एक व्यक्ति को अपनी छह महीने की कन्या की हत्या करने के अपराध में पुलिस ने पकड़ा है। बताया जाता है कि नन्हीं बच्ची के लगातार रोने के कारण क्रुद्ध होकर उक्त व्यक्ति ने उसे उठाकर जोर से जमीन पर पटक दिया जिससे बच्ची तत्काल मर गई। इस पर घबरा कर वह व्यक्ति स्वयं भी आत्महत्या करने के लिए कुँए में कूदने दौड़ा किन्तु लोगों ने उसे पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया। उरई के समीप घोहर निवासी एक व्यक्ति ने अपनी 5 वर्षीय पुत्री को कुँए में फेंक दिया। पिता अपने दुधमुँहे है पुत्र को भी कुँए में फेंकना चाहता था पर पत्नी उसे लेकर भाग खड़ी हुई और किसी प्रकार उसकी जान बची। पुलिस ने उक्त पिता को गिरफ्तार कर लिया। बालिका को मृत अवस्था में कुँए से निकाला गया। जालन्धर (पंजाब) के पास सराय खास नामक ग्राम में पारिवारिक कलह के कारण रतनकौर नामक एक महिला ने अपनी अल्पवयस्का पुत्री के सहित कुँए में छलाँग लगाली। माता और पुत्री दोनों ही जल में डूब गई और दम तोड़ दिया। हलद्वानी में होली के दिन सैशन कोर्ट के निकट एक पोस्ट कर्मचारी की हत्या करदी गई। बताया गया है कि दो युवकों ने रंग डालने के विवाद को लेकर अन्य दो व्यक्तियों पर चाकू से आक्रमण कर दिया जिससे एक व्यक्ति की तत्काल मृत्यु हो गई। दसरे को गंभीर अवस्था में अस्पताल में दाखिल किया गया। बुलन्दशहर नगर से चार मील दूर नैथला ग्राम के निकट दो घोड़े ताँगों के कोचवान एवं ताँगों में बैठे हुए मुसाफिरों में दौड़ की बहस छिड़ गई। कुछ देर तो दौड़ चली परन्तु अन्त में एक मुसाफिर के कुछ तानाकशी करने पर दूसरे ताँगे के मुसाफिर क्रुद्ध हो गये और मारपीट होने लगी। घायलों में से एक युवक की अस्पताल में पहुँचते−पहुँचते मृत्यु हो गई। जौनपुर जिले के मलिकानपुर ग्राम में एक कुँऐ की नाली की सफाई के प्रसंग को लेकर केवटों के दो दलों में झगड़ा हो गया जिसके फलस्वरूप एक व्यक्ति अस्पताल में पहुँचते−पहुँचते मर गया कई को सख्त चोट आई।
छोटी बात बड़ी हानि
अक्सर बहुत ही छोटी बातों को लेकर लोग उत्तेजित हो जाते हैं। धैर्य और विवेक से काम लिया जाय; सहिष्णुता और समझदारी को आधार लेकर कलह के छोटे से कारण का समाधान कर लिया जाय तो बात उतनी न बढ़े जितनी कि उत्तेजना में लुप्त हुए विवेक के कारण बढ़ जाती है। समाचार है कि—कानपुर में एक कुत्ते के पीछे झगड़ा हो जाने के फलस्वरूप एक व्यक्ति ने काशीराम नामक एक व्यक्ति की कनपटी में करौली मार दी। उसे चिन्ताजनक हालत में अस्पताल में भर्ती किया गया। घटना क्रम के अनुसार शौकत के कुत्ते ने काशीराम के घर के सामने टट्टी कर दी थी इसकी शिकायत ने विवाद और हमले का रुप धारण कर लिया। शौकत को गिरफ्तार कर लिया गया। बिजनौर जिले के गाजीपुर गाँव में होली के अवसर पर झगड़ा हो गया। 30 व्यक्ति जख्मी हुए। श्यामलाल नामक व्यक्ति मर गया। घायलों में औरतें और बच्चे भी हैं। सहारनपुर के नुमाइश कैम्प के बच्चों में झगड़ा हुआ जो बात बढ़ कर औरतों तक जा पहुँची औरतों ने झगड़ा और बढ़ाया तो मर्द भी पहुँचे। मर्द और भी आगे बढ़े और उन्होंने अपने हितैषियों को भी मदद के लिए बुला लिया। परिणाम स्वरूप यह झगड़ा राजनैतिक दल बन्दी का अखाड़ा बन गया और 7 आदमियों के सिर फट गये। पुलिस ने दोनों ओर के कई व्यक्तियों को गिरफ्तार कर लिया। जावरा (रतलाम) में कौन पहले पानी भरे, इस छोटी सी बात ने इतना भयंकर रुप धारण किया कि मारपीट में एक युवक अत्यधिक घायल हुआ और अस्पताल में पहुँचते−पहुँचते उसकी मृत्यु हो गई।
आवेश की हानिकर प्रतिक्रिया
उत्तेजना, आवेश और असहिष्णुता आज हमारी मनोभूमि पर बुरी तरह छाती जा रही है। इसका परिणाम सब प्रकार अहितकर हो रहा है। आगरा 3 जनवरी का समाचार है कि गत सप्ताह हृदय की गति रुक जाने से अनेक मौतें होने पर प्रमुख डाक्टर गंभीर चिन्ता व्यक्त कर रहे हैं। हृदय की गति अचानक बन्द हो जाने से अभी−अभी बीस मृत्यु हुई हैं और आगरा अस्पताल में हृदय रोग से पीड़ित रोगियों की संख्या बहुत अधिक हो गई है। हृदय रोगों का एक प्रमुख कारण मनुष्य का निरन्तर चिन्तित रहना है। बुलन्दशहर से छह मील दूर ग्राम सिखैड़ा के एक किसान मलखानसिंह की फसल इस वर्ष की भयंकर वर्षा एवं बाढ़ के कारण नष्ट हो गई। उसे यही चिन्ता हो गई है कि—’अब क्या होगा? इसी वाक्य को बार−बार दुहराते−दुहराते उसके हृदय की गति बन्द हो गई और बेचारा देखते−देखते संसार से चल बसा।
विश्व के चतुर्थ राष्ट्रीय केन्सर सम्मेलन की रिपोर्ट से पता चलता है कि 99 अस्पतालों में 212362 फेफड़े के केन्सर के रोगियों का आपरेशन हुआ। उसमें से आपरेशन के बाद स्त्रियाँ तो 100 में से 62 अच्छी हो गई पर पुरुष केवल 30 प्रतिशत ही बच सके। डाक्टरों का कहना है कि स्त्रियों की अपेक्षा पुरुष अधिक चिन्तित रहते हैं और इसी कारण वे रोग−निरोधक जीवनी शक्ति से वंचित हो जाते हैं। भारत के मानसिक रोगों के अस्पतालों के अधीक्षकों का एक सम्मेलन पिछले दिनों आगरा में हुआ था इसमें बताया गया कि भारत में इस समय पागलों की संख्या 850000 है। सन् 1954 के बाद यह संख्या तेजी से बढ़ी है। अखिल भारतीय मानसिक चिकित्सा संस्थान के सर्वेक्षण से प्रकट हुआ है कि—”ग्रामों की अपेक्षा शहरों में मानसिक रोगी अधिक हैं और इसका प्रमुख कारण शहरी जीवन की परेशानियाँ हैं। लोग आर्थिक एवं पारिवारिक चिन्ताओं में अपना मानसिक सन्तुलन खे बैठते हैं और पागलपन से सम्बन्धित रोगों में ग्रसित हो जाते हैं। पागलों में 27 प्रतिशत पुरुष और 11 प्रतिशत महिलाऐं हैं, क्योंकि पुरुष स्त्रियों की अपेक्षा अधिक चिन्ता−ग्रस्त रहते हैं।
उन्माद और अकाल मृत्यु
उन्माद, आत्म−हत्या, छोटी बातों पर भयंकर उत्पात, बीमारी, अकाल, मृत्यु आदि अनेक आपत्तियों का कारण हमारा मानसिक असंतुलन मलीन मन ही असन्तुलित होता है। जीवन के प्रति, जीवन की समस्याओं के प्रति, कर्तव्यपालन के प्रति सही दृष्टि रखने वाले व्यक्ति ही मानसिक दृष्टि से सन्तुलित रह सकते हैं और अपनी आन्तरिक शान्ति स्थिर रख सकते हैं। मन की स्वच्छता जीवन की अमूल्य निधि है इसे खोकर हम दीर्घजीवन से ही वंचित नहीं होते सामान्य जीवन यापन कर सकने की स्थिति से भी वंचित हो जाते।
यदि मनुष्य अपनी पाशविक वृत्तियों पर नियंत्रण न करे, उन्हें यों ही उच्छृंखलतापूर्वक पनपने दे तो उसकी स्थिति नर शरीरधारी पिशाच जैसी हो जाती है। सर्प को चाहे भूल में ही अनजाने ही किसी ने छेड़ दिया है पर वह अपने को थोड़ा आघात लगने मात्र से इतना क्रुद्ध एवं उत्तेजित हो जाता है कि सामने वाले की जान लेकर ही पीछा छोड़ता है। कहते हैं कि सिंह, बाघ आदि हिंस्र पशु केवल इतनी सी बात पर क्रुद्ध हो जाते हैं कि उनकी आँख से आँख कैसे मिलाई। नीची आँख करके कोई सामने से भले ही निकल जाय पर आँखों की तरफ देखने लगे तो उसे वे अपना अपमान मानते हैं और इतनी सी बात पर आक्रमण करके सामने वाले की बोटी−बोटी नोंच डालते हैं। लोग बताते हैं कि पिशाच भी ऐसे ही असहिष्णु होते हैं। उनके पीपल मरघट के नीचे होकर गुजर जाय या कोई ऐसा काम कर बैठे जिसे वे पसन्द नहीं करते तो अपनी नापसंदगी का बदला वे सामने वाले की जान लेकर ही चुकाते हैं। सर्प, बाघ और पिशाच मनुष्य योनि में नहीं माने जाते पर मनुष्यों में भी अगणित ऐसे देखे जाते हैं जिन्होंने अपनी दुवृत्तियों पर नियंत्रण करना नहीं सीखा और फलस्वरूप असहिष्णुता की उत्तेजना में ऐसे काम करने लगे जो मनुष्यता को लज्जित करते हैं।
असंतुलन का प्रतिफल
बड़े लोभ, बड़े प्रतिशोध, बड़े कारण को लेकर बहुधा हत्याऐं, लूट, डुबकियाँ होती रहती हैं। पर जरा सी बात पर जब मनुष्य क्रोध में पागल होकर एक दूसरे की जाने लेने को उतारू हो जाते हैं तब पता चलता है कि आत्म−नियंत्रण की, विवेक की और अपने को मानसिक दृष्टि से सुसंस्कृत बनाने की कितनी अधिक आवश्यकता है और उसके अभाव में कितने दुष्परिणाम सामने उपस्थित होते हैं। हरिद्वार का समाचार है कि एक दुकानदार से किसी ग्राहक ने चार आने का सौदा खरीदा। ग्राहक नये−पुराने पैसे मिलाकर 24 नये पैसे दे रहा था जब कि दुकानदार 25 माँग रहा था। झगड़ा बढ़ गया और दुकानदार ने ग्राहक तथा उसकी पत्नी को छुरा घोंप दिया। हापुड़ का समाचार है कि जट्टा नामक 30 वर्षीय युवक एक नये−पैसे के झगड़े को लेकर अपनी जान गँवा बैठा। जट्टा ढाई आने के बदले 16 नये पैसे माँग रहा था, किन्तु दूसरा 15 दे रहा था। इतनी सी बात पर उसे छुरा घोंप दिया गया और अस्पताल में उसकी मृत्यु हो गई। कनखल का समाचार है कि दक्ष प्रजापति के मंदिर में एक यात्री ने दान के लिए एक नया पैसा फेंका जो दो साधुओं के बीच में पड़ा। दोनों उस पर अपना दावा करते हुए आपस में लड़ पड़े। एक ने दूसरे पर कुल्हाड़ी से हमला किया जिससे उसकी तुरन्त मृत्यु हो गई।
क्रोध का उन्माद
बरेली जिले में−थाना भोजपुर के ग्राम मढौली में 55 वर्षीय एक जाठव इसलिए मारा गया कि उसने मजदूरी पर जाने से इनकार किया था। दिल्ली का समाचार है कि रेखीराम नामक व्यक्ति एक व्यक्ति के यहाँ भोजन करता था, भोजन के पैसे चुकाने की बात पर कहासुनी हो गई और भोजन कराने वाले ने खुखरी से उसकी हत्या कर दी। मेरठ का समाचार है कि दो युवक साइकिलों पर आमने−सामने से आ रहे थे। संयोगवश साइकिलों में टक्कर हो गई। इतनी सी बात पर एक दूसरे का कसूर बताते हुए लड़ पड़े और एक ने दूसरे को छुरा घोंप कर बुरी तरह घायल कर दिया। कानपुर जजी से मौनी बाबा नामक साधु को फाँसी का हुक्म सुनाया है। उक्त साधु एक दूसरे सरजूसिंह नामक साधु के यहाँ अतिथि बनकर ठहरा। एक दो दिन तो उसे आतिथ्य मिला पर जब चले जाने को कहा गया तो उसने क्रुद्ध होकर सोते हुए सरजूसिंह की कुल्हाड़ी से हत्या कर दी। हिंडौन में 20 रुपया चढ़ा हुआ किराया अदा करने के विवाद में एक किरायेदार ने क्रोधान्ध होकर सात व्यक्तियों को घायल कर दिया जिसमें तीन की मृत्यु हो गई। दिल्ली सैशन जज ने पहाड़गंज के जयराम नामक युवक को फाँसी की सजा दी। युवक ने एक हकीम से इलाज कराया था। इलाज में 150) की दवा खा चुका था। फायदा न होने पर उसने हकीम से रुपया वापिस माँगा और न देने पर हकीम की हत्या कर दी। आगरा जिला के बरौली गाँव में ताश खेलते−खेलते दो प्रतिद्वन्दियों में झगड़ा हो गया और एक ने दूसरे की गँड़ासे से हत्या कर दी।
ऐसे समाचारों की वास्तविकता तो अदालतों में ही सिद्ध होती है पर उनसे इतना निर्ष्कष अवश्य निकलता है कि भयंकर काण्ड होने के लिये यह जरूरी नहीं कि उसके पीछे कोई कारण बहुत बड़ा ही होना चाहिए। मानसिक दुर्बलता, अविवेकशीलता, उत्तेजना और आत्म−नियंत्रण का अभाव स्वयं ही एक बड़ी विपत्ति है। चिनगारी मौजूद हो तो उसे दावानल का रूप धारण करने में कितनी देर लगेगी, केवल पनपने के लिए थोड़ा सा घास−पात चाहिए। कलह और संघर्ष का वातावरण घर−घर में जो देखने को मिलता है और उसका बहुत ही दुखद अन्त देखने को मिलता है उसमें कारण उतने कठिन नहीं होते। मानसिक कुसंस्कारों के कारण ही छोटी बातें भयंकर तूल धारण कर लेती हैं और उनसे अनर्थ उपस्थित हो जाता है।
आत्म−हत्याओं की बाढ़
आत्म−हत्याओं के जो दुखद समाचार आये दिन पढ़ने को मिलते रहते हैं उनमें भी बात छोटी और उत्तेजना बड़ी होती है। जोधपुर का समाचार है कि यहाँ के एक घनाड्य परिवार का बी. काम. का छात्र परीक्षा में असफल होने के कारण कायालाना झील में डूब कर मर गया। अमृतसर जिला सप्लाई कन्ट्रोलर के 16 वर्षीय पुत्र ने विष खाकर अनुत्तीर्ण होने के कारण आत्महत्या कर ली। गुड़गाँव डी. एम. डी. कालेज के एक छात्र ने रेल के आगे कटकर इसलिए आत्महत्या कर ली कि कम हाजिरी होने के कारण उसे परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं मिली थी। नैनीताल कालिज के एक छात्र ने अपने मकान के पीछे गौशाला में जाकर इसलिए फाँसी लगा ली कि वह जल्दी−जल्दी पैन खो देता था इस पर घर वाले उसे धमकाते थे। झाँसी के पास घुरैया गाँव के कृष्णनंद नामक युवक ने अपने सीने में गोली मारकर इसलिए आत्महत्या कर ली कि मैट्रिक परीक्षा में असफल रहा था। जबलपुर जिले में परसवारा गाँव का एक बारह वर्षीय लड़का इसलिए रेल के आगे कट मरा कि पिता ने किसी घरेलू बात पर उसे जरा सा डाँट दिया था। बेतूल के पुलिस थानेदार का 12 वर्षीय बालक भी इसी प्रकार पिता के जरा सा डाँटने पर क्रुद्ध होकर कुँए में कूद पड़ा और मर गया।
खिन्नता के वातावरण में
गृह कलह की साधारण समस्याओं पर खिन्न होकर मानसिक असंतुलन के कारण अगणित स्त्रियाँ जलकर फाँसी लगाकर कुँए में कूदकर, रेल से नीचे कटकर, विष खाकर आत्महत्या करती रहती हैं। इन घटनाओं के बारे में ऐसा सोचा जाता है कि इनमें घर वाले अत्याचार करते होंगे। ऐसा अनेक बार होता भी है। पर सदा केवल यही कारण रहता हो ऐसी बात नहीं है। यदि अत्याचार ही कारण रहता तो गृह−कलह से क्षुब्ध होकर पुरुष आत्म−हत्याऐं न करते क्योंकि उन्हें तो काफी स्वतंत्रता भी रहती है। हापुड़ के मुन्नालाल दलाल पारिवारिक कलह से क्षुब्ध होकर रेल के नीचे लेटकर कट गये। पहाड़गंज दिल्ली के 20 वर्षीय युवक मदनलाल ने फ्रेण्डस कालानी के निकट रेलगाड़ी के नीचे आकर पारिवारिक कलह के कारण आत्महत्या करली। कई तो इन छोटी बातों पर इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि अपना ही नहीं अपने सारे परिवार का सर्वनाश करके चैन लेते हैं। इटावा के मुहल्ला खिड़कीरतनचंद का जगदम्बा प्रसाद सक्सेना अपनी दो नन्हीं सी बच्चियों को कुँए में पटक कर पत्नी को काटकर स्वयं रेल के नीचे कट मरा। बम्बई का एक बैंक कर्मचारी पदमाकर भी अपनी पत्नी तथा दो बच्चों का गला घोटकर स्वयं रेल के नीचे कट गया। महिलाऐं भी ऐसे कृत्य करने में पीछे नहीं रहतीं। जूनागढ़ में एक महिला अपनी तीन पुत्रियों और एक पुत्र को कुँए में पटक कर स्वयं भी उसी में डूब मरी। मलेर कोटला का समाचार है कि भेनी गाँव की एक महिला ने अपने पति से क्रुद्ध होकर अपने 6 वर्षीय पुत्र और 4 वर्षीय पुत्र को गला घोटकर मार डाला। इलाहाबाद नगर के निकट एक मजदूर ने अपने पाँच वर्षीय बच्चे को छुरे से काट डाला और स्वयं भी आत्महत्या कर ली।
असंतुलित मनोभूमि
इन घटनाओं पर विचार किया जाय तो उत्तेजना, क्रोध, विक्षोभ अधीरता असहिष्णुता और निर्दयता आदि मानसिक कारण ही प्रधान होते हैं। शोक, निराशा, हानि और असफलता के अवसर आने पर भी असंतुलित व्यक्ति ऐसे ही काण्ड कर बैठते हैं। हापुड़ के विजयपाल नामक पुलिस कान्स्टेिबिल ने बन्दूक की गोली मारकर आत्म−हत्या कर ली। एक मास पूर्व उसकी पत्नी तथा दो बच्चे हैजे में मर गये थे इसी से वह शोकातुर रहा करता था। चाँद कोट गढ़वाल का एक पी. ए. सी. सिपाही तालाब में कूदकर मर गया, कुछ दिन पूर्व उसकी पत्नी मरी थी इसी का उसे बहुत शोक था।
प्रेम की असफलता, प्रेमियों की अनबन, सामाजिक कारणों से विवाह न हो सकना, विवाह के लिये या पतियों के साथ जाने को मजबूर होना आदि कारणों में आत्म−हत्या का कुछ कारण भी समझ में आता है पर कई बार बहुत से कारण इतने सामान्य होते हैं कि उनके कारण इतनी उत्तेजना का होना आश्चर्यजनक लगता है। इलाहाबाद का समाचार है कि एक 19 वर्षीय लड़के ने इसलिए आत्म−हत्या कर ली कि उसकी पत्नी उसे प्रेम नहीं करती थी और उपेक्षा दिखाती थी। लखनऊ के एक अध्यापक ने इसलिए विष खाकर आत्म−हत्या का प्रयत्न किया कि उसे एक छात्र से 1 महीने की ट्यूशन फीस वसूल नहीं हुई थी। दिल्ली का गुरुवक्ससिंह नामक पोस्टल क्लर्क तार विभाग की पाँचवीं मंजिल से कूदकर मर गया। जेब में मिले पत्र से पता चलता है कि वह यह गुत्थी सुलझा सकने में असमर्थ रहा कि पहले अपना विवाह करे या अपनी बहिन का!
क्या यह इतने बड़े कारण थे?
मोती नगर दिल्ली के 9 वीं कक्षा के एक छात्र गोवर्धनलाल ने नीलाथोथा खाकर आत्म−हत्या कर ली। उसके पास जो पत्र मिला है उसमें लिखा है—‟कलियुग के हालात देखते हुए मैं इस संसार से जा रहा हूँ। सम्बन्धियों को नमस्ते।” पटना का समाचार है कि विहार शरीफ नगर के एक युवक ने सबडिवीजनल अधिकारी को अपने खून से पत्र लिखकर अनुरोध भरी चेतावनी दी है कि—‟अगर 2 जून तक उसकी प्रेमिका वेदामी देवी से शादी नहीं करादी गई तो वह 9 जून को सबडिवीजनल अधिकारी की कोठी के निकट फाँसी लगाकर आत्म−हत्या कर लेगा।”
कई बार तो मिल−जुल कर एक साथ कई व्यक्तियों के मृत्यु समझौते के रूप में आत्म−हत्या करने के समाचार मिलते हैं। टिहरी गढ़वाल के पास सतेपाली गाँव के निकट नयार नदी में तीन युवतियों की लाशें तैरती हुई पाई गई। तीनों की चुटियाँ और कमर आपस में बँधी हुई थी। इससे प्रतीत होता है कि तीनों ने सलाह करके ऐसा निश्चय किया होगा। बम्बई, ब्रजेश्वरी मुहल्ले के एक होटल में एक डाक्टर, उनके 17 वर्षीय पुत्र 11 वर्षीय पुत्री तथा 18 वर्षीय भानजी की लाशें बरामद हुई। जहर का इंजेक्शन, पिचकारी आदि उस कमरे से मिलने से पता चला कि सब को जहर का इंजेक्शन लगा है। मृतकों के पास एक चिट्ठी मिली है जिस में लिखा है—‛यह मृत्यु समझौता उनने स्वेच्छा से किया है। इस के लिए न किसी को दोषी माना जाय और न तंग किया जाय!’
कारण और निवारण
आत्म−हत्याओं की यह प्रवृत्ति जिस तेजी से बढ़ती जाती है वह चिन्ताजनक है। उत्तर−प्रदेश के संकलित आँकड़ों में बताया गया है कि गत वर्ष 2365 व्यक्तियों ने आत्म−हत्याऐं की जब कि उससे पहले वर्ष यह संख्या 1800 थी। मध्य−प्रदेश में 1960 में 1556 आत्म−हत्याऐं हुई जब कि 1953 में केवल 684 हुई। छोटे से गुजरात में केवल महिलाओं की आत्म−हत्याऐं ही 520 तक पहुँच गई। सारे भारतवर्ष में यह संख्या प्रति वर्ष 21 हजार तक पहुँच चुकी है।
इन आत्म−हत्याओं का प्रत्यक्ष कारण घरेलू झगड़े, लम्बी बीमारी, सम्बन्धियों की मृत्यु का शोक, दुर्व्यवहार, गैर कानूनी गर्भ, सामाजिक कलंक, प्रेम की असफलता, परीक्षा, अपमान, गरीबी, प्रतिशोध, उन्माद आदि बताये जाते हैं। इन कठिनाइयों के समाधान का प्रयत्न किया जाना चाहिए और ऐसा वातावरण बनाया जाना चाहिए कि जिसमें वे परिस्थितियाँ न रहें जिनके कारण लोगों को ऐसे दुखद कृत्य करने पड़ते हैं। फिर भी यह विचारणीय है कि मानव जीवन की सभी कठिनाइयाँ कभी हल नहीं हो सकती। कोई न कोई ऐसे कारण बने ही रहेंगे, जिनमें इच्छा के प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़े। धैर्य, साहस, विवेक के साथ प्रस्तुत कठिनाई से पार निकलने या उसका विकल्प सोचने का कोई प्रयत्न किया जाय तो मनुष्य कठिन से कठिन स्थिति का सामना कर सकता है और थोड़े ही दिनों फिर अच्छी स्थिति प्राप्त कर सकता है। आवेश और उत्तेजना घबराहट और हड़बड़ी, क्रोध और असंतुलन ही वे कारण हैं जिनमें किंकर्तव्यविमूढ़ होकर लोग न करने योग्य हत्या और आत्महत्या जैसे दुखद कृत्य कर बैठते हैं। इनसे कोई समस्या सुलझती नहीं, वरन् मरने वाले अपने पीछे सन्ताप की एक लम्बी शृंखला पीछे वालों के लिए छोड़ जाते हैं।
मूल समस्या पर ध्यान दिया जाय
आत्म−हत्या कर बैठने वाले थोड़े हैं पर ऐसे असंख्य हैं जो मानसिक उद्वेगों के कारण विक्षिप्त जैसे बने रहते हैं। उनकी गणना न मरने वालों में ही होती है न जीने वालों में है। मानसिक सन्तुलन खो बैठने के कारण वे अपनी सूझ−समझ, बुद्धि, दूरदर्शिता एवं क्रिया शक्ति से हाथ धो बैठते हैं और बहुत कुछ कर सकने की स्थिति में होते हुए भी कुछ कर नहीं पाते। मानसिक विक्षोभ आज अगणित लोगों को उसी प्रकार का लुंज−पुंज बनाये हुए है। आंशिक रूप से यह आवेश, उन्माद तो हम में से अनेकों को चढ़ता रहता है और समय−समय पर उसके छोटे−बड़े दुष्परिणाम भी सामने आते रहते हैं।
मानसिक मलीनता, शारीरिक अस्वस्थता से भयंकर है। रोगी उतना दुखदायी नहीं जितना आवेश−ग्रस्त, आततायी। वह कभी भी किसी छोटी−सी बात पर भी कोई बड़ा अनर्थ खड़ा कर सकता है। इसी मानसिक विकृति से हम सब बचें यह नितान्त आवश्यक है। मन की स्वच्छता बढ़ाने और उसके सुसंस्कारित बनाने के लिए हमें विवेकशीलता की अभिवृद्धि करनी होगी जनसाधारण के मन में शान्ति, सहनशीलता, उदारता, धीरज, शिष्टाचार, संयम एवं दूरदर्शिता की प्रवृत्ति उत्पन्न करनी होगी। पाशविक वृत्तियों पर नियंत्रण इसी आधार पर स्थापित किया जा सकता है और आत्म−नियंत्रण प्राप्त करके ही कोई सुसंस्कृत मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने का अधिकारी बन सकता है। समाज में जब तक सुख−शान्ति की आकांक्षा एक कल्पना मात्र ही बनी रहेगी। उच्छृंखल मनोभूमि के सुधारने की ओर ध्यान न दिया गया तो हत्याओं और आत्म−हत्याओं की प्रवृत्ति दिन−दिन बढ़ती रहेगी।
कुटुम्ब एक प्रकार से मनुष्य का सामाजिक शरीर ही है। जैसे शरीर के एक भाग को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए शरीर के दूसरे भाग में कोई कमी नहीं रहने देते और सारे अवयव एक दूसरे की उन्नति एवं परिपुष्टि से लाभ उठाते हैं वही आधार कुटुम्ब का भी होता है। आधार ‘अपनेपन’ को विस्तृत करना है। माता अपना जीवन रस निचोड़ कर बच्चे का शरीर बनाती है, और उसे पालती−पोसती है; पिता अपनी कमाई को स्वयं कष्ट में रहकर भी बच्चों के लिए खर्च करता और जमा पूँजी को उत्तराधिकार के रूप में उन्हीं को सौंप जाता है। भाई−भाई एक ही हाथ की उंगलियों की तरह मिल−जुल कर काम करते हैं। पति−पत्नी आपस में इतने घुल जाते हैं कि एक प्राण दो शरीर का उदाहरण बनते हैं। संतान अपने माता−पिता को ब्रह्मा, विष्णु के समान पूज्य मानती हैं। बहिन−भाई का सम्बन्ध तो अलौकिक ही रहता है। सास, बहू में माता−पुत्री जैसा, देवरानी जिठानी में बहिन−बहिन जैसा प्रेम भाव रहता है। इसी आधार पर कुटुम्बी लोग मिलकर एक सम्मिलित सामाजिक शरीर जैसे बन जाते हैं और उसकी इकट्ठी शक्ति से आर्थिक एवं सामाजिक लाभ अत्यधिक होता है। इस संगठन की छाया में परिवार के बच्चे, बूढ़े, विधवाऐं, अशक्त , उपार्जन न कर सकने वाले, अयोग्य व्यक्ति भी बड़े आनंदपूर्वक अपना समय काट लेते हैं। एक दूसरे के दुख−दर्द को बटाकर बड़ी से बड़ी मुसीबत को हलकी कर लेते हैं।
रामायण का आदर्श
निर्जीव वस्तुऐं एक और एक मिल कर दो होती हैं पर सजीव मनुष्य एक और एक मिल कर ग्यारह होते हैं। इस सच्चाई का प्रत्यक्ष अनुभव वहाँ किया जा सकता है जहाँ परिवार के सभी लोग परस्पर सच्चा प्रेम करते हैं। एक दूसरे के लिए आदर, उदारता, त्याग एवं आत्मीयता की भावनाऐं निरन्तर प्रदान करते रहते हैं। रामायण का सबसे बड़ा शिक्षण पारिवारिक आधार की आध्यात्मिकता एवं कर्तव्य शीलता का शिक्षण ही है। एक से कोई भूल होती है तो दूसरे स्वयं कष्ट उठा कर अपनी उदारता से उसका समाधान करते हैं। दशरथ का केकैयी को अनुचित वरदान देने के लिए भी वचन−बद्ध होना, केकैयी का अनुचित वरदान माँगना, राम का धोबी के कथन से प्रभावित होकर सीता को वनवास देना यह तीनों ही मानवीय दुर्बलताऐं हैं पर इनका समाधान रामायण में प्रतिहिंसा और विद्वेष के रूप में नहीं वरन् दूसरे पक्ष के आदर्श त्याग के रूप में प्रस्तुत किया है। दशरथ केकैयी को संतुष्ट करने के लिए स्वयं पुत्र शोक में मरना स्वीकार करते हैं, राम भी विमाता और पिता को प्रसन्न करने के लिए अनुचित आज्ञा होते हुए भी खुशी−खुशी वन चले जाते हैं, भाई की सुरक्षा के लिए और पति की सेवा के लिए सीता वनवास का कष्टसाध्य जीवन स्वीकार करती है। भरत भाई का अधिकार लेना किसी भी प्रकार स्वीकार नहीं करते और राम की खड़ाऊँ को सिंहासन पर बिठाकर स्वयं भी एक तपस्वी की तरह जीवन बिताते हुए राज−काज चलाते हैं। सीता को जब परित्याग किया जाता है तो वे अपने पति के प्रति दुर्भावना नहीं लाती वरन् उनके यश की रक्षा के लिये बाल्मीकि के आश्रम में विछोह और अभाव का जीवन बिताना स्वीकार करती हैं। कौशिल्या न तो अपने बेटे को वन जाने से रोकती है और न उर्मिला अपने पति को। परिवार का सच्चा आधार यही प्रेम यही आत्म त्याग है। प्रेम उदारता सेवा और आत्म त्याग की व्यावहारिक शिक्षा मिले इसीलिए कुटुम्ब की पद्धति मानवजाति में प्रचलित हुई है। यह आधार न रहे तो फिर कीड़े मकोड़ों का सा ही अपना भी पारिवारिक जीवन रहेगा।
संगठन और प्रेम की प्रतीक—परिवार
स्वजन सम्बन्धियों के बीच अधिक से अधिक प्रेम होना चाहिए। एक दूसरे की प्रगति एवं शान्ति के लिए जी जान से प्रयत्न करें। किसी से कोई भूल हो जाय तो उसे भी रामायण के पात्रों की तरह स्वयं कष्ट सहकर भूल करने वाले को सुधरने एवं पश्चाताप करने का अवसर प्रदान करें तभी कुटुम्ब का उद्देश्य और कर्तव्य पूरा हो सकता है। भारत की यह आदर्श परिवार प्रणाली लाखों वर्षों तक घर−घर में स्वर्गीय वातावरण बनाये रहने में समर्थ रही है। अभी भी जिन घरों में वह वातावरण है वहाँ कितनी ही कठिनाइयाँ होते हुए भी आनन्द एवं संतोष का निर्झर बहता है। पर अब व्यक्तिगत स्वार्थपरता, अनुदारता, लोभ, अहंकार आदि मानसिक मलीनताओं की अभिवृद्धि के साथ−साथ पारिवारिक आधार भी टूटते जा रहे हैं। घर−घर में कलह, ईर्ष्या, खींचतान, शोषण, द्वेष और मनोमालिन्य का वातावरण दिखाई पड़ता है। प्रेम और आत्मीयता के अभाव में मजबूरी के बन्धनों में बँधे हुए बंदियों की तरह कुटुम्बी लोग एक घर में रहते तो हैं, एक चौके में रोटी भी खाते हैं पर उनमें वैसी सहानुभूति नहीं होती जिसकी सुगंधि से हर कुटुम्बी का मन आनन्द विभोर हो सके। इतना ही नहीं मनुष्य का व्यक्तिगत भावना स्तर जितना क्षुद्र होता जाता है उसी अनुपात से वह बाहर वालों की तरह घर वालों के लिए भी घातक बनता जाता है। लोभी, स्वार्थी, संकीर्ण और क्रूर स्वभाव बन जाने पर अपने और पराये किसी पर भी आक्रमण करते उसे देर नहीं लगती।
क्षमा और उदारता
छोटी−छोटी जिन बातों की उपेक्षा, हँसी, आत्मत्याग, सत्याग्रह आदि के आधार पर सुधारा जा सकता था, उतनी सी प्रतिकूलताओं पर एक कुटुम्बी दूसरे की जान लेने लगा है। जरा से लोभ के लिए, जरा से स्वार्थ के लिए आत्मीयता को त्यागकर मनुष्य अपने कुटुम्बियों के लिए ही कैसा खून का प्यास बन जाता है उसकी अगणित घटनाऐं पढ़ने और सुनने में आती रहती हैं। सामने पड़े हुए गत वर्ष के अखबारों में से कुछ समाचार नीचे प्रस्तुत करते हैं :— घटनाओं का वास्तविक निष्कर्ष तो उनके अदालती निर्णय से निकला होगा पर आरोप एवं जनश्रुति के आधार पर समाचार पत्रों में प्रकाशित घटनाऐं इस प्रकार छपी हैं:—
स्वार्थ के लिए स्नेह का तिरस्कार
नाथद्वारा (मेवाड़) का रामशंकर नामक युवक अपने सगे भाई को जहर देने के आरोप में अपनी पत्नी समेत पकड़ा गया। बताया जाता है कि इस बड़े भाई ने छोटे भाई को उसके हक की जायदाद से वंचित करने के लिये दूध में विष मिला कर उसे पिला दिया था। टेकमलपुर (आजमगढ़) के एक अहीर पर यह आरोप है कि उसने खेती के बटवारे की समस्या सामने आने पर अपने दो बेटों को ही गंडासे से कत्ल कर डाला। जाजऊ (आगरा) का एक युवक अपनी नानी को दिन दहाड़े मार डालने के अपराध में पकड़ा गया। अभियुक्त नानी की पाँच बीघा जमीन हड़पना चाहता था, नानी इसके लिये तैयार न होती थी। एटा जिले के खड़ौआ गाँव में एक छोटी−सी जमीन के बटवारे पर एक का व्यक्ति कत्ल हो गया। इस सिलसिले में उसका बड़ा भाई और भतीजा पकड़ा गया है। दिल्ली का समाचार है कि एक अठारह वर्षीय युवक ने अपनी माता की गोदी में से छीनकर छोटे भाई को जमुना में फेंक दिया। युवक अपनी माता के चरित्र पर संदेह करता था और बच्चे को पिता के रहते हुए भी अवैध होने का अनुमान लगाता था। अकोला में गोपाल सिंह नामक व्यक्ति को अपनी सत्तर वर्षीय माता से उसके जेवर हड़पने के लोभ से हत्या करने के अपराध में पकड़ा गया है। दूर गाँव (राँची) के उराव जाति के एक व्यक्ति ने अपने पिता को लाठी से इसलिए मार डाला कि पिता ने उसे गाली दी थी। भुट्टी वाला (पंजाब) के अवतारसिंह नामक व्यक्ति को फाँसी का दंड मिला है। अपराधी ने भूमि सम्बन्धी एक मामूली से लोभ के कारण अपने पिता, भाई, भावज तथा उसके तीन बच्चों को मार डाला। ग्वालियर का केदारनाथ नामक व्यक्ति इसलिए पकड़ा गया है कि उसने रोटी बनाने में देर कर लेने के कारण पिता से कुपित होकर उसके पेट में भाला घुसेड़ कर मार डाला।
कृतघ्नता और निर्दयता
बदायूँ का एक धनाढ्य वैश्य लड़का इसलिए पकड़ा गया है कि उसने पूजा पर बैठे हुए अपने पिता को कुल्हाड़ी से काट डाला। कलारपुरी (गुडगाँवा) की एक सत्तर वर्षीय बुढ़िया कुँए में फेंक कर मार डाली गई। बताया जाता है कि उसकी चालीस बीघा जमीन हड़पने के लिए उसके कुटुम्बियों ने ही यह कुकृत्य किया है। इसी प्रकार 10 हजार के जेवर नकदी तथा 30 बीघा जमीन पर कुटुम्बियों की ही कुदृष्टि होने के कारण बघौली (हरदोई) की आनंदी देवी नामक महिला को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा। आनन्द पर्वत (दिल्ली) के राजू नामक 4 वर्षीय बालक की लाश पुलिस ने बरामद की है। बताया जाता है कि पिता ने किसी बात पर क्रुद्ध होकर बच्चे को इतना पीटा कि बेचारे ने दम ही तोड़ दिया। जुन्नारदेव (छिन्दवाड़ा) में एक व्यक्ति ने अपने दामाद को घरेलू झगड़े के निपटारे के लिए बुलाया। बेचारे ने समझौते का एक फार्मूला तैयार किया पर उसे एक पक्ष स्वीकार नहीं कर रहा था। रात को वह व्यक्ति छुरे से गोद कर मार डाला गया। कहा जाता है कि जिस साले को समझौता पसंद नहीं था उसी ने अपने बहनोई की हत्या कराई। दिल्ली के किशनगंज मुहल्ले में सुरजीसिंह नामक व्यक्ति अपनी पत्नी तथा साले को मार डालने के अपराध में पकड़ा गया है। बात इतनी सी बताई जाती है कि साला अपनी बहिन को लिवाने आया था पर अपराधी अपनी पत्नी को भेजना नहीं चाहता था। चित्तौड़गढ़ में एक धनी माहेश्वरी बुढ़िया की लाश को पुलिस ने मरघट में जलने से रोका और उसके पुत्रों को पकड़ा है। कहा जाता है कि अपनी माता की सम्पत्ति जल्दी ही प्राप्त करने के लिए पुत्र अधीर रहते थे और उन दोनों ने मिलकर बुढ़िया का गला घोंट डाला।
मोह ममता की इतिश्री
भागलपुर के एक गाँव का कोई व्यक्ति बैल बेचकर उसके रुपये लाया। उनमें से एक रुपया उसके छोटे पुत्र ने ले लिया। इस पर क्रुद्ध होकर उसने उस्तरे से लड़के का गला काट डाला। इस काण्ड की सूचना माता ने थाने में जाकर पुलिस को दी। धनपुरी (जबलपुर) में एक व्यक्ति अपनी ससुराल में ही मारा गया। बताया जाता है कि दामाद अपनी पत्नी को विदा कराने की जिद कर रहा था। ससुर भेज नहीं रहा था। कहा सुनी हुई तो ससुर ने दामाद के सिर में मूसल दे मारा जिससे वह वहीं ढेर हो गया। राँची (बिहार) के एक लखपती ठेकेदार राम किशनदास के पुत्र राजकुमार ने अपनी सौतेली माता, चाची व उनके कई बच्चों की हत्या कर डाली, जिससे उसके पिता की सम्पत्ति पर दावा करने वाला अन्य कोई न रहे। वह इन सब को किसी बहाने से एक मोटर में बैठा कर दूर ले गया और वहाँ अपने मित्र मोटर ड्राइवर रशीद की सहायता से सब को छुरे से काट कर मोटर के बाहर फेंक दिया। मुकदमा चलने पर दोनों अभियुक्तो को प्राण दण्ड दिया गया। कृष्णनगर, दिल्ली के महेशचन्द्र को अपनी सौतेली माँ की हत्या करने के अपराध में फाँसी की सजा हुई है। अभियुक्त की माता छह वर्ष पूर्व मर गई थी, इसके बाद उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली और उसके नाम एक मकान भी खरीद दिया। हत्यारा चाहता था कि वह यह मकान उसे मिले। इसके लिए उसने पिता से कहा भी पर वह राजी न हुआ तो उसने माता को छुरे से मार डाला और पिता जब बचाने आया तो उसे भी घायल कर दिया। ग्राम मेहरा चौधरी (आगरा) में दो सगे भाइयों में किसी सामान्य कारण पर भयंकर संघर्ष हो गया जिसके फलस्वरूप एक भाई घटनास्थल पर ही मर गया और उसकी पत्नी तथा पुत्री साँघातिक रूप से घायल हो गई। झाँसी की एक कुम्हारिन ने किसी छोटी सी बात पर क्रुद्ध होकर अपने चार वर्ष के छोटे से बालक को ही हँसिये से काट डाला।
अनियंत्रित हिंसावृत्ति
ज्ञात हुआ है कि हरदोई जिले के महमदपुर तेरा ग्राम में एक लड़के ने अपनी माँ के आभूषण नकदी हड़पने के लालच में उसकी हत्या कर दी। जब उसने देखा कि उसका बड़ा भाई इस रहस्य को प्रकट कर देगा तो उसे भी मौत के घाट उतार दिया और सारा माल असवाब जो घर में था लेकर चम्पत हो गया। भगतपुर (मुरादाबाद) दो सगे भाइयों में, जो अलग रहते थे, एक बार नाले के ऊपर झगड़ा हो गया जिसमें एक ने बल्लम मारकर दूसरे की हत्या कर दी। गोंडा में एक रेल कर्मचारी की दो पत्नियों में पारस्परिक कलह के फलस्वरूप बड़ी ने छोटी को कृपाण से मार दिया। बड़ी पत्नी के सन्तान न होने के कारण उक्त कर्मचारी ने कुछ समय पूर्व ही दूसरा विवाह किया था। पलवल (जि. गुडगाँवा) के प्रतापसिंह नामक युवक को अपनी 85 वर्षीय नानी की हत्या के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। वह समय−समय पर नानी से सहायता लिया करता था। इस बार नानी ने उसे कुछ देने से इनकार कर दिया तो उसने−उसे जान से मार दिया।
घरेलू नौकर जो परिवार के सदस्यों की तरह ही वफादार रहते थे अब जमाने के साथ वे भी अपना रंग बदल रहे हैं। शाहदरा के एक चाय स्टाल पर काम करने वाले नौकर धूरासिंह ने स्टाल के मालिक मूलचन्द तथा उसके पिता को जहर देकर 350) चम्पत कर दिये। अस्पताल में वे दोनों बच गये। धूरासिंह को तीन वर्ष की सजा मिली।
इस प्रकार की घटनाऐं भले ही थोड़ी मात्रा में होती हों पर हमारे पारिवारिक जीवन और स्वजन सम्बन्धियों के प्रति रहने वाली स्वाभाविक आत्मीयता में कमी होने का संकेत करती हैं। प्रेम भावना, आत्मीयता और ममता यदि घटती चली गई और उसकी स्थिरता एवं अभिवृद्धि की, आध्यात्मिक आधारों की रक्षा न की गई तो मनुष्य दिन−दिन निष्ठुर ही होता जायेगा और उसका अन्त कहाँ होगा, यह कल्पना करने मात्र से दिल दहलने लगता है।
जब कुविचार मन में आते हैं तब उसका प्रतिफल कुकर्मों के रूप में सामने आता है। मन में पाप रहेगा तो शरीर से भी पाप ही बन पड़ेंगे। मन को उच्च भावनाओं से ओत−प्रोत रखने के लिए प्राचीन काल में अनेक उपाय किये जाते थे और यह प्रयत्न किया जाता था कि कोई ऐसे माध्यम पनपने न पावें, जो जनता की अपराधी मनोवृत्ति को भड़कावें। इस प्रकार के प्रतिबन्ध जब तक कठोर रहें और उच्च भावनाओं को हृदयंगम करने वाली शिक्षा सर्वसुलभ रही तब तक हमारे समाज का स्तर ऊँचा रहा। आज जब इस दिशा में शिथिलता बरती जाने लगी तो बाँध टूटने से चारों ओर फैलने वाले पानी की तरह अनाचार भी बेतरह बढ़ने लगा।
राजधानी का हाल
दैनिक हिन्दुस्तान ने अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में लिखा है—‟राजधानी में बढ़ती हुई गुण्डागर्दी ने यहाँ की विशिष्ट अपराध स्थिति के सर्वेक्षण और उसे सुधारने के उपायों पर विचार करने के लिए बाध्य किया है।” एक विवरण के अनुसार भूतपूर्व पुलि सर्जन अपराधियों के प्रमुख हैं और दिल्ली से कहीं बड़े क्षेत्र वाले पंजाब प्रान्त में जहाँ केवल 600 इश्तिहारी मुलजिम हैं वहाँ दिल्ली में उनकी संख्या 1200 से ज्यादा है। कोई 1500 व्यक्ति बदमाशों (गुण्डों) की सूची में हैं जिनमें 650 दस नम्बरी बदमाश बताये जाते हैं। इनके तौर तरीके भी अजीबोगरीब हैं। बड़े आदमियों की तरह रहने वाले और खेरात पर या दूसरी तरह रौब−दौब रखने वाले इन लोगों का मुकाबला करना हर किसी के वश का काम नहीं है। कहते हैं कि चारों तरफ की आलोचना से तंग आकर पुलिस सक्रिय बनी है।”
लोकसभा में केन्द्रीय मंत्री ने बताया कि इस साल दिल्ली में 2322 गुण्डे गिरफ्तार किये गये। पुलिस ने 1442 स्थानों पर छापे मारे और जुआ, आबकारी तथा हथियार कानून के अन्तर्गत मुकदमें चलाये। गतवर्ष 8308 मुकदमे निपटाये गये। यातायात नियमों का उल्लंघन करने वालों की संख्या गत वर्ष 2,11,866 रही जब कि उससे पिछले साल यह संख्या केवल 96,976 थीं। इन पर 49,00,00 रु. जुर्माना किया गया।
गुण्डों का बढ़ता हुआ दुस्साहस जन−साधारण के लिए एक आतंक का विषय बना हुआ है। समाचार है कि झाँसी रोड पर रिवाल्वरों और छुरों से लैस 9 गुण्डे मोटर पर सवार होकर आये और हवा में गोलियाँ चलाकर मुहल्ले वालों को आतंकित कर दिया। उन्होंने एक घर में घुसकर मालिक को अधमरा कर दिया, घर में आग लगा दी और विश्वम्भर को बाँध कर ले गये। जीवन नगर में गुण्डे एक स्त्री को छेड़ते थे, उसके पिता ने रोका तो वे बन्दूकों से लैस होकर घर पर चढ़ आये। बन्दूकें चलाकर बाहर वालों को रोकते रहे और पति−पत्नी को गंडासे से काट डाला और उनके आठ वर्षीय बालक का एक हाथ और दोनों पैर काट ले गये।
यह समस्या केवल दिल्ली की नहीं अपराधों की प्रवृत्ति सर्वत्र अपना सिर उठा रही है। उत्तर−प्रदेश की पिछले वर्ष की रिपोर्ट है कि ऐसे अपराध जिनमें सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा, गत वर्ष 64857 थे, पर इस वर्ष वह 66154 हो गये। केरल के गृहमंत्री ने बताया कि कम्युनिस्ट शासन के 22 महीनों में 672 हत्याऐं हुई जिनमें 25 राजनैतिक कारणों से हुईं। राजस्थान के गृहमंत्री ने बताया कि गत दो वर्षों में राजस्थान के विभिन्न जिलों में 82 व्यक्तियों के नाक−कान काटे गये जिनमें चार सरपंच भी सम्मिलित हैं।
गरीबी नहीं पाप बुद्धि
कुछ लोग सोचते हैं कि गरीबी और परेशानी के कारण लोग चोरी, ठगी आदि करने लगते हैं यह बात एक अंश तक ही सही है। गरीब और दुर्बल आदमी छोटी−मोटी उठाईगीरी कर सकता है। पर बड़े उत्पात वही करेगा जिसकी भुजाओं में बल और दिमाग में चुस्ती होगी। सम्पन्न और सामर्थ्यवान लोगों की दुष्प्रवृत्तियाँ ऐसे भयंकर अपराधों को जन्म देती हैं जैसा कि बेचारे गरीब कभी कल्पना भी नहीं कर सकते। यह सोचना उचित नहीं कि गरीबी के साथ−साथ अपराधी मनोवृत्ति का भी अन्त हो जायेगा। सच बात यह है कि अपराधी प्रवृत्ति एक प्रकार का मानसिक रोग है जो सत्संग, स्वाध्याय और नैतिक शिक्षा के अभाव में पनपता है। नीचे कुछ ऐसे समाचार उपस्थित हैं जिन्हें पढ़कर यह अनुमान लगाया जा सकेगा कि गरीबी से पीड़ित नहीं, अनैतिक विचारधारा वाले व्यक्ति साधन सम्पन्न होते हुए भी अपराध करते हैं।
मद्रास की खुफिया पुलिस ने केरल राज्य के यवानु फुल्हे नामक स्थान पर सौ−सौ रुपये के जाली नोट छापने की मशीन पकड़ी है। कोचीन में भी कुछ दिन पूर्व ऐसी ही मशीन पकड़ी गई थी। कलकत्ता पुलिस ने एक प्रेस में भारी संख्या में जाली रेलवे टिकट और छापने का सामान बरामद करके तीन व्यक्तियों को पकड़ा है। पंजाब के प्यारेलाल नामक साइकिल व्यापारी के पास 18 हजार रुपये थे, उसकी जेब लखनऊ के अमीनुदौला पार्क में कट गई। काटने वाला सुन्दर अक्षरों में लिखा हुआ पर्चा जेब में रख गया। जिसमें लिखा था—‟आपकी आवश्यकता से मेरी आवश्यकता अधिक बड़ी है। धन्यवाद!” केन्द्रीय गुप्तचर विभाग ने कई मास के परिश्रम के बाद ठगों के एक ऐसे बहुत बड़े गिरोह का पता लगाया है जो वर्षों से अलीगढ़, हाथरस, बुलन्दशहर, खुर्जा, भोपाल, ग्वालियर, दिल्ली आदि में सक्रिय था। जिसकी 36 शाखाऐं तथा एक हजार रुपया दैनिक आय है। इसने दर्जनों नाम से जाली व्यापार रचा हुआ था। पुलिस ने कागजों से भरे अनेक बक्स अपने कब्जे में कर लिये। नागपुर में कुछ दिन पूर्व एक व्यापारी ने अपने यहाँ 23 हजार की डकैती की रिपोर्ट की थी तथा छुरे के तीन घाव भी दिखाये थे। बताया जाता है कि अब पुलिस ने उसे ही धोखाधड़ी के अपराध में पकड़ा है और रुपये भी चावल के बोरों में तथा तकिये में प्राप्त कर लिये हैं। कहते हैं कि व्यापारी कर्जदार था और इस प्रकार डकैती का बहाना बनाकर लोगों का कर्ज मारना चाहता था। बम्बई पुलिस को पता चला है कि नगर में एक ऐसा स्कूल चल रहा है जो जेबकटी, ताला तोड़ने, उठाईगीरी, ठगी आदि की नियमित शिक्षा और शिक्षार्थियों को छात्रवृत्ति देता है।
तेज दिमागों की नूतन सूझें
दिल्ली पुलिस का खूफिया विभाग उन शिकायतों की जाँच पड़ताल कर रहा है जो कोलोनाइजरों की एक फर्म द्वारा फर्जी प्लाटों की बिक्री के संबंध में प्राप्त हुई हैं। फर्म ने 200 से ऊपर लोगों को प्लाट बेचे। लेकिन जब वे लोग कब्जा लेने के लिए पहुँचे तो उन्हें मालूम हुआ कि जो जमीन उन्हें बेची गई वह हैं ही नहीं। इसमें लाखों रुपये का चकमा दिया गया मालूम पड़ता है। सब्जी मंडी के एक बैंक मैनेजर ने रिपोर्ट की है कि किसी सफेद पोश ने जाली चैक बनाकर 20400 रु. बैंक से निकलवा लिये हैं। एक और व्यक्ति लगभग 1 लाख 26 हजार रुपयों के जाली बौण्ड बेचकर फरार हो गया। मोदी नगर के एक व्यक्ति को उसने अपने 4 हजार के जाली बौण्ड 2200 में बेचे। इस खरीदने वाले ने एक आवश्यकता के लिए उन बौण्डों को कस्टोडियन के दफ्तर में जमा किया तो आडिट आफिस में पता चला कि ये बौण्ड जाली हैं। पीछे मालूम हुआ कि उस फरार व्यक्ति ने विभिन्न लोगों को ऐसे ही जाली बौण्ड लगभग 1 लाख 26 हजार के बेचे थे। खरीदने वाले सभी पछता रहे हैं।
आगरा फोर्ट की रेलवे पुलिस ने खुरजा के लल्लूमल नामक एक व्यक्ति को जाली टिकट चैकर बनकर यात्रियों से रुपया ऐंठते रहने के अभियोग में गिरफ्तार किया है। बुलन्दशहर जिले के तीन व्यक्तियों को पुलिस ने अन्तर्राष्ट्रीय ठगी के षड्यंत्र अभियोग में गिरफ्तार किया है। बताया जाता कि यह गिरोह इंडोनेशिया, मालाय, अफ्रीका, घाना आदि विदेशों के समाचार−पत्रों में जाली लाटरियों का विज्ञापन छपाकर काफी धन बटोरता था पर इनाम किसी को नहीं देता था। इन्दौर के एक फर्म पर पाँच लाख रुपया रेलवे से ठगने का अभियोग लगा है। कहा जाता है कि गत वर्ष रेलवे माल गोदाम में चोरी हुई रेलवे रसीदों के द्वारा उसने जाली हुण्डी बिल्टी बनाकर रेलवे से यह रकम वसूल की थी। बुलन्दशहर पुलिस ने जाली परमिट बनाकर कन्ट्रोल की चीजें प्राप्त करने वालों का एक गिरोह पकड़ा है।
बिना लाइसेन्स फीस दिये रेडियो का उपयोग करने वाले सम्भ्रान्त कहे जाने वाले लोगों की संख्या गत वर्ष 24 हजार थी। बिना टिकट यात्रा करने वाले यात्रियों की संख्या गत वर्ष 9021228 थी जिनसे 18200000 रु . जुर्माना वसूल किया गया । उससे पिछले वर्ष की अपेक्षा गत वर्ष ड्यौढ़े लोगों ने यात्रा की ।
चिन्ता और दुख का विषय
अपराधी मनोवृत्ति के लोग अशिक्षित एवं निम्न स्तर के होते थे। पर अब जब कि शिक्षित और सभ्य समाज में यह प्रवृत्ति बढ़ रही है तो बात कुछ अधिक चिन्ता की हो जाती है। शिक्षित लोग समाज का शीर्ष माने जाते हैं, पर जब उनमें अनुपयुक्त प्रवृत्ति पनपने लगे तो निश्चय ही उसका प्रभाव निम्न स्तर के गुण्डों की अपेक्षा अधिक व्यापक क्षेत्र तक फैलता है।
दिल्ली में पाँच सुशिक्षित युवकों की गिरफ्तारी से अनेक सनसनीपूर्ण हत्याओं, चोरियों, डकैतियों और धमकी देकर रुपया ऐंठने का भेद खुला है,महरौली के निकट एक होनहार युवक की हत्या, हावड़ा स्टेशन पर मिली एक युवती की लाश, शस्त्रों की चोरी एवं अनेक डकैतियों से इनका सम्बन्ध बताया जाता है। दल के अनेक सदस्य बताये जाते हैं और सभी सुशिक्षित हैं। दिल्ली, चुरु और अम्बाला में इनके अड्डे पकड़े गये हैं। कानपुर का समाचार है कि राज्य सरकार का गुप्तचर विभाग तथा उच्च अधिकारी लगभग दो दर्जन सफेदपोशों तथा 15 मोटर कारों एवं उनके मालिकों की गतिविधियों पर कड़ी नजर रखे हुए है। पता चला है कि कानपुर के कतिपय रईसों, राजनैतिक नेताओं, व्यापारियों, एडवोकेटों एवं मिल−मालिकों ने शहर में और बाहर ऐसे अड्डे कायम कर लिये हैं जिनमें अपहृत युवतियों को ले जाया जाता है। थाना मुड़सान के थानेदार ने दिल्ली विश्वविद्यालय के एक एम.ए. के छात्र को अमरीकी रिवाल्वर तथा 15 कारतूसों समेत पकड़ा है। कलकत्ता से यह हथियार चुराकर वह इधर बेचने आया था। गाजियाबाद का समाचार है कि रेलवे पुलिस ने दनकौर से आने वाली पैसेंञ्जर पर एक शिक्षित युवक को पकड़ा है जो रेलवे के तार काटकर बड़ी मात्रा में चुराते रहने वाले गिरोह का सदस्य बताया जाता है। उसके तीन अन्य साथी भी पकड़े गये हैं। रानीखेत का समाचार है कि यहाँ चोरों का एक ऐसा दल सक्रिय है जो क्लोरोफार्म का कपड़ा सुँघाकर लोगों को बेहोश कर देता है और निधड़क होकर चोरी करता है मुरैना के गणेशपुरा मुहल्ले में चोरों ने 12 जगह चोरी की जिनमें उनने सभी घरों में क्लोरोफार्म सुँघा कर घर मालिकों को बेहोश किया था। मुंगेर में एक धनी व्यक्ति के पड़ौस में ठहरे हुए कुछ सफेदपोशों ने जमीन के भीतर ही भीतर बहुत लम्बी सुरंग बनाकर उस व्यक्ति के घर में प्रवेश पा लिया और लगभग दो लाख रुपये का सामान उस सुरंग से होकर ही ले गये। झाँसी जिले में बिखरे हुए वैष्णव एवं जैन मन्दिरों की कलात्मक मूर्तियाँ चुराकर विदेशों को निर्यात करने वाले एक सभ्य लोगों के गिरोह का पता पुलिस ने लगाया है। प्राप्त सूचनाओं से विदित हुआ है कि यह लोग लगभग एक लाख रुपये की मूर्तियाँ विदेशों को भेज चुके हैं।
उत्तर −प्रदेश विधान सभा की भूतपूर्व सदस्या एवं उर्दू की शायर बेगम सईदजहाँ को आठ वर्ष की कैद तथा 5 हजार रुपये जुर्माने की सजा हुई है। उन पर नकली मौत की कहानी गढ़कर बीमा कम्पनी से 90 हजार वसूल करने के षडयंत्र का अपराध लगाया गया था। औरैया की पुलिस ने साइकिलें छीनने ओर राहजनी करने वाले सशस्त्र विद्यार्थियों का एक गिरोह पकड़ा है कहा जाता है कि पिस्तौल के बल पर यह गिरोह कई महीने से लूट मार कर रहा था। पकड़े हुए विद्यार्थियों में एक बी. ए . का छात्र है।
तस्कर व्यापार का दौरदौड़ा
जालंधर के मशहूर सर्राफों को पाकिस्तानी सोने का तस्कर व्यापार करने के अभियोग में दो−दो वर्ष की सजा मिली है। अभियुक्तों की दुकानों पर छापा मार कर पुलिस ने लगभग डेढ़ लाख रुपये का सोना और 50 हजार के नोट बरामद किये थे। बम्बई के झवेरी बाजार में एक जौहरी के यहाँ छापा मारकर तीन लाख रुपये का गैर कानूनी ढंग से लाया हुआ सोना पकड़ा गया। चुँगी के अधिकारी फेरी वालों और कुलियों का वेष बनाकर इसका सुराग लगाने में सफल हुए। मद्रास के रामनद जिले के समुद्री तट पर कस्टम अधिकारियों ने लंका से चोरी छिपे लाया हुआ दो लाख रुपये का सोना पकड़ा है। राजस्थान विधानसभा के गृहमंत्री ने बताया कि जोधपुर के जौहरियों की दुकानों पर जो छापे मारे गये उससे ज्ञात होता है कि 46 जौहरियों ने 1॥ करोड़ रुपये की कीमत का सोना चोरी छिपे बाहर से मँगाया। बम्बई के तट के अधिकारियों न डाक द्वारा आने वाले 25 ऐसे लिफाफे पकड़े हैं जिनमें एक−एक तोले सोने का पाउडर छिपाकर अदन से मंगाया गया था। लायलपुर के कस्टम विभाग ने एक व्यापारी के यहाँ 40 हजार रुपया मूल्य की 487 तस्करी घड़ियाँ बरामद की हैं।
सरकारी रिपोर्ट से विदित हुआ है कि जनवरी से मार्च तक की एक तिमाही में सीमा शुल्क अधिकारियों ने 39 लाख 6 हजार मूल्य की वस्तुऐं जब्त कीं और 3881 मामले पकड़े। उन पकड़ी गई तस्करी वस्तुओं में सोना, चाँदी, हीरे, जवाहरात मुद्रा आदि प्रमुख हैं।
अपराधी मनोवृत्ति से छुटकारा पाने से ही जनता में शान्ति स्थिर रह सकती है और यह तभी संभव है जब नैतिक विचारधारा से प्रत्येक नागरिक की मनोभूमि को सरोवर बनाने का प्रयत्न किया जाय।
अपराधों की वृद्धि पर आमतौर से सरकार को दोष दिया जाता है। एक अंश में उसको यह उत्तरदायित्व है भी कि पुलिस एवं अदालतों के माध्यम से उन्हें रोकने का प्रयत्न करे । इस प्रयत्न में उसकी शिथिलता होने पर उसकी आलोचना भी करनी चाहिए और अधिक सतर्क रहने के लिए दबाव भी डालना चाहिए। परन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि सरकार की मशीन में हम ही सब हैं। हमारे ही बच्चे और भाई बन्धु सरकारी कर्मचारी बनते हैं। यदि हमारा सामूहिक चरित्र उच्चकोटि का नहीं है, उसमें त्रुटि है तो हमारे परिवार से गये कर्मचारी भी उन बुराइयों को अपने साथ ले जाकर सरकारी मशीन को वैसा ही बना देंगे। कई बार जनता द्वारा उपस्थित किये प्रलोभन कर्मचारियों को पथभ्रष्ट कर देते हैं। कई बार जनता के फैले हुए अनाचार के मुकाबले में कर्मचारी अपने को असमर्थ पाते हैं और जन सहयोग के अभाव में अपराधियों को पकड़ने और सजा दिलाने में सफल नहीं हो पाते। सरकारी मशीन को सुधारने और कर्मचारियों में फैले हुए भ्रष्टाचार को रोकने के लिए यों उच्च अधिकारी कुछ न कुछ करते रहते हैं, इसका थोड़ा बहुत प्रभाव भी पड़ता है, भय भी रहता है और सुधार भी होता है। फिर भी यह उपचार रक्त विकार से उत्पन्न फोड़ों पर बाहरी मरहम पट्टी करने के समान ही है।
भ्रष्टाचार उन्मूलन के प्रयत्न
पंजाब सरकार द्वारा प्रकट किये गये आँकड़ों द्वारा प्रकट होता है कि गतवर्ष 350 सरकारी कर्मचारियों को भ्रष्टाचार के कारण सरकारी नौकरियों से बरखास्त किया गया। ऐसे ही कारणों से 156 की तरक्की रोकी गई। 133 को चेतावनियाँ दी गई, 37 की निंदा की गई और 15 को तनज्जुल किया गया। 11 को जेल हुई 10 को अनिवार्य रूप से रिटायर किया गया। 12 को छोटी−मोटी सजाऐं दी गई। इसके अलावा कुछ की पैंशनें घटा दी गईं कुछ का बोनस वेतन और ग्रेच्युटी जब्त की गई। उत्तर−प्रदेश में 1334 कर्मचारी दंडित हुए। जिनमें 1058 को नौकरी से निकाल दिया गया, 29 बर्खास्त हुए, 52 पद वनत हुए, 186 की उन्नति रोकी गई। केन्द्रीय मंत्रालय की स्पेशल पुलिस संस्थान की मासिक रिपोर्ट में बताया गया है कि नवम्बर में 101 सरकारी कर्मचारियों के विरुद्ध खुली जाँच की गई जिनमें 27 गजटेड आफीसर थे। पं. नेहरू ने लोकसभा में यह स्वीकार किया कि जाली पासपोर्ट बनाने वालों का एक व्यापक जाल देश भर में फैल गया है। उनके अड्डे कई प्रान्तों में हैं।
अधिकारियों में ऐसे भी हैं
गाजियाबाद के सरकारी खजाने से लगभग 16 लाख का गबन करने के अपराध में तीन अधिकारियों को कठोर दंड दिया गया है। एक को 4 वर्ष की सजा और 55 हजार जुर्माना हुआ है। काँगड़ा जिले के एक ब्लाक डेवलपमेंट आफीसर को मेरठ पुलिस ने एक होटल में 1 लाख 10 हजार के करेंसी नोटों समेत पकड़ा है। कहते हैं कि एक पखवाड़े पूर्व से वह यह रकम सरकारी खजाने से लेकर फरार था और पाकिस्तान भाग जाने की तैयारी कर रहा था।
दिल्ली निगम के कुछ विभागों में कितने साहस के साथ रिश्वत ली जाती है यह रहस्योद्घाटन करते हुए निगम की बैठक में एक वरिष्ठ अधिकारी श्री कवरलाल गुप्ता ने कहा— इंजीनियरिंग विभाग से एक व्यक्ति के केस की फाइल निकलवानी थी। परन्तु जब कई बार प्रयत्न करने के पश्चात् भी फाइल न मिली तो मैंने असिस्टेंट इंजीनियर को कहा कि वह फाइल तीन दिन के भीतर निकलनी चाहिए। बेचारे असि. इंजीनियर ने अपनी जेब से पाँच रुपये देकर अपने क्लर्क को रिकार्ड आफिस भेजा और वह क्लर्क तुरन्त फाइल लेकर आ गया। रिश्वत लेने वाले अपने इंजीनियर को भी नहीं बख्शते!
आचार्य कृपालानी ने लोकसभा में यह रहस्योद्घाटन किया कि खादी के लिए एक रेलवे वेगन की आवश्यकता थी। परन्तु प्रयत्न करने के बावजूद भी वैगन का मिल सका। इस पर मेरे कार्यकर्ताओं ने मुझे बताया कि बिना रिश्वत दिये वैगन प्राप्त नहीं होगा। अतः मैंने इसकी स्वीकृति दे दी। इस पर रेल उपमंत्री शाहनबाज ने लोक सभा में बताया कि घटना की जाँच करने पर बात सही पाई गई और दोषी कर्मचारियों को दण्ड दिया गया है। कानपुर महापालिका के सभाषद श्री. देवीदास आर्य ने नगरपालिका के कर्मचारियों की भ्रष्टाचार चर्चा करते हुए कहा कि— गोविंद नगर के एक पुरुषार्थी से दुकान का 2 रुपये का लाइसेन्स बनाने के लिए दो रुपया घूँस न मिलने पर उसका कुरता घूँस में ले लिया।
पुलिस वाले भी चपेट में
निश्चय ही अपराधों को रोकने का उत्तरदायित्व बहुत कुछ पुलिस पर है। पर गुण्डागर्दी जब दुस्साहस का रूप धारण कर लेती है तो उसकी चपेट में पुलिस वाले भी आ जाते हैं। दुस्साहसी गुण्डे उनसे भी डरते नहीं वरन् प्रतिशोध लेने के लिए उलटे उन पर भी आक्रमण करते हैं।
दिल्ली की सराय रोहिल्ला के थानेदार ज्ञानीराय जब दो अन्य सिपाहियों के साथ रोहतक रोड़ पर जा रहे थे तो दिन दहाड़े बीसियों लोगों के बीच जसवन्त नामक गुण्डे ने थानेदार को छुरा भोंक दिया। बताया जाता है उक्त थानेदार ने जुआ खेलने के अपराध में उसके दल के दस−बारह व्यक्तियों को पकड़ा था यह उसी से चिढ़ा हुआ था। इतनी भीड़ के बीच यह कृत्य करके भी वह भाग गया और पकड़ा न जा सका। अहमदाबाद के एक पुलिस सिपाही को एक फेरी वाले ने इसलिए छुरा घोंप कर मार डाला कि उसे सड़क पर रास्ता रोक कर बैठने से मना किया जा रहा था। सशस्त्र बदमाशों से टोकटाक करने पर क्रुद्ध होकर शिकोहाबाद थाने के राजबहादुर सिपाही को गोली मार दी गई।
समाचार है कि एटा जिले के निघौती थाने के इंचार्ज सूरजपाल सिंह के घर में घुस कर चोरों ने उन्हें तथा उनके स्त्री बच्चों को डंडों से मारा। अगले दिन पुलिस लाइन के रिजर्व इन्सपेक्टर श्री अमर सिंह के घर में जाकर उन पर लाठी से आक्रमण किया जिससे उनके सिर में चोट आई। इससे पूर्व जैथरा और सदावर थानों के थानेदारों के यहाँ भी चोरी हो चुकी हैं। एटा के शहर कोतवाल श्री रु माल सिंह पर चोरों ने घातक हमला कर दिया जिससे वे बेहोश होकर गिर पड़े। चोर उनका रिवाल्वर, चार सौ रुपया तथा उनकी स्त्री के जेवर कपड़े ले जाने में सफल हो गये। गंजडुंढ़वारा के थानेदार व उनके बच्चे को भी कुछ दिन पूर्व चोरों ने इसी प्रकार घायल किया था। मैनपुरी जिले के किशनी थाने के इंचार्ज श्री. सुखवीरसिंह के घर से नकदी जेवर आदि समेत तिजोरी उठा ले गये जो थाने से डेढ़ मील दूर मिली। थाना जसराना के पुलिस सब इन्सपेक्टर के यहाँ भी चोरों ने इसी प्रकार की साहसिक चोरी की थी। बदायूँ का समाचार है कि कादर चौक के थानेदार के घर में घुस कर चोर उनका रिवाल्वर तथा कीमती सामान चुरा ले गये। अल्लापुर, सहसबान, बिनावर के थानेदारों के यहाँ भी ऐसी ही चोरियाँ हुई जिनमें उनकी वर्दी तक चली गई। चोरों ने श्री डोटियाल डिप्टी कलक्टर के यहाँ भी सेंध लगाई और उनकी जन्म भर की कमाई चुरा ले गये। आगरा का समाचार है कि लगभग एक दर्जन डाकुओं ने फतेहाबाद के थानेदार श्री. त्यागी के घर सशस्त्र डकैती डाली। डाकू थानेदार तथा उनके स्त्री बच्चों को बुरी तरह घायल कर गये और नकदी जेवर ले गये।
वे भी दूध के धुले कहाँ हैं?
फिर सब पुलिस वाले भी दूध के धुले कहाँ होते हैं? उनमें भी कितने ही अपराधी प्रवृत्ति के पाये जाते हैं सुधरे हुए लोग ही बिगड़ों को सुधार सकते हैं। इसके अभाव में उनसे भी कोई बड़ी आशा कैसे रखी जा सकती है उत्तर प्रदेश की रिपोर्ट है कि भ्रष्टाचार तथा कर्त्तव्य में त्रुटि करने के कारण जून से दिसम्बर तक छह महीनों में 38 पुलिस वालों के विरुद्ध कार्यवाही की गई जिनमें से 23 को मुअत्तिल 8 को पदावनत तथा 3 को बर्खास्त कर दिया गया।
झाँसी से सात मील दूर थाना कुठोद में एक डकैती डालने के अभियोग में दरवारसिंह तथा कमलसिंह, दो पुलिस सिपाहियों को गिरफ्तार कर लिया गया। ये दोनों सिपाही सदर बाजार के थाने में नियुक्त थे। उरई पुलिस उक्त दोनों सिपाहियों को हथकड़ी डाल कर ले गई। सीकर का समाचार है कि लोसल के मन्दिर में चोरी करते हुए ग्रामीणों ने 5 व्यक्ति पकड़े जिनमें 3 सिपाही भी थे। उन्हें डिप्टी पुलिस सुपरिण्टेण्डेेण्ट के सुपुर्द कर दिया गया। कोयम्बटूर का समाचार है कि मद्रास पुलिस ने छापा मारकर एक पुलिस सब इन्सपेक्टर के घर से 6 लाख 70 हजार के जाली नोट बरामद किये और छह अन्य व्यक्तियों के साथ उसे भी गिरफ्तार कर लिया।
अपराधों की प्रवृत्ति को रोकने के लिए पुलिस और सरकार पर पूर्णतया निर्भर रहने से सुरक्षा की समस्या हल नहीं हो सकती। वे लोग एक सीमा तक ही अपनी स्थिति के अनुसार कुछ रोकथाम कर सकते हैं। असली रोकथाम तो जनता की संगठित शक्ति एवं सामाजिक स्तर की उत्कृष्टता के द्वारा ही संभव है। जैसे उपयुक्त भूमि और खाद पानी मिलने पर ही बीज उगता और फलता−फूलता है उसी प्रकार गुण्डा−तत्व भी तभी फलते−फूलते हैं जब उनका विरोध और असहयोग शिथिल होता है। लोग डरते हैं और प्रतिरोध करने के लिए, दंड दिलाने के लिए, असहयोग करने के लिए संगठित नहीं होते। फलस्वरूप गुण्डा−तत्व सामने का मोर्चा खाली देखकर मनमानी करते हैं। यदि पग−पग पर उन्हें प्रतिरोध का सामना करना पड़े, प्रबुद्ध जनता अपनी आत्मरक्षा के लिए भीरुता छोड़ कर संगठित होने लगे तो वह न केवल अपराधी तत्वों को ही समाप्त कर सकती है अपितु भ्रष्टाचारी एवं शिथिल सरकारी कर्मचारी को भी रास्ते पर ला सकती है।
नैतिक आदर्शों की रक्षा के लिए कष्ट सह सकने, त्याग करने और संगठित होने की प्रवृत्ति बढ़ने पर ही हमारी सुरक्षा निश्चित हो सकती है। इसके अभाव में बेचारी सरकार कितना कुछ कर सकेगी?
हमारा सामाजिक जीवन दाम्पत्य जीवन से आरम्भ होता है। पति−पत्नी के बीच जितने प्रेम, सौजन्य, आत्म−भाव, आत्म−समर्पण एवं वफादारी के भाव रहेंगे उतना ही गृहस्थ जीवन आनन्दमय होगा। और उसी अनुपात से श्री, समृद्धि एवं शान्ति बढ़ेगी। धर्म की आरम्भिक शिक्षाओं में नारी को पूज्य, पवित्र, श्रेष्ठ एवं सम्मानास्पद माना गया है और कहा गया है कि जहाँ नारी की पूजा होगी वहीं लक्ष्मी का निवास होगा। सभी दृष्टियों से विचार करने पर नारी को प्रसन्न एवं संतुष्ट रखना पुरुष का परम पवित्र कर्त्तव्य माना गया है । नारी को गौ के समान अवध्य माना गया है। उस पर हाथ उठाने वाले को कापुरुष एवं नारकीय कीट बताया गया है। कोई भूल भी उससे होती हो तो उसे उदारतापूर्वक क्षमा करने एवं प्रेम के साथ सुधारने की ही भारतीय परम्परा रही है। बड़ी आयु की हो जाने पर भी नारी को भोली कन्या, ममतामयी माता एवं स्नेहसिक्त भगिनी के रूप में ही देखना उचित माना गया है । धर्म पत्नी के रूप में तो वह साक्षात लक्ष्मी का रूप धारण करके ही घर में विराजती है।
खेद है कि आज उसका दर्जा पशुओं सरीखा हो रहा है। जरा−जरा सी बात पर लोग उसे सताते एवं तिरस्कृत करते हैं। इतना ही नहीं कितने ही नर−पिशाच तो उसका रक्त पान करके ही अपनी दानवी दुष्टता को शान्त करते हैं। विवाहिता वधुओं का ससुराल के लिए आत्म−त्याग करना एक अलौकिक कार्य है। इसका बदला चुकाने के लिये ससुराल वाले उसके प्रति जितनी भी कृतज्ञता प्रकट करें, जितना भी सम्मान एवं स्नेह करें उतना ही कम है। पर आज वह सौजन्य जहाँ−तहाँ ही देखने को मिलता है। बहू के आत्मसमर्पण सेवा, उदारता एवं कोमल भावनाओं का पहाड़ न देखकर लोग उसकी छोटी−मोटी भूलों को ही बढ़ा−चढ़ाकर देखने लगते हैं और उसे तुच्छ पशु से भी अधिक तिरस्कृत करने में ही नहीं, कई बार उसका खून पीने तक में नहीं हिचकते। ऐसी नृशंसता भरे समाचार आये दिन अखबारों में छपते रहते हैं।
अहंकार और अत्याचार
विजय राघवगढ़ थाने के परसवारा गाँव का समाचार है कि वहाँ एक व्यक्ति अपनी पत्नी को लेने ससुराल में आया और तुरन्त साथ चलने को कहा। पत्नी ने अपने पिता-माता के लौट जाने तक रुकने के लिए कहा क्योंकि वे दोनों बाहर गये हुए थे। पत्नी की यह सलाह पति को सहन न हुई इतनी सी बात पर उसने पत्नी की कुदाली से हत्या कर दी। जबलपुर के गंगा सागर मुहल्ले के रमेश नामक व्यक्ति की उसे घर से बाहर बुलाकर छुरे से हत्या कर दी गई। कहा जाता है कि मृतक ने कुछ दिन पूर्व एक परित्यक्त स्त्री कलावती से विवाह किया था। परित्यक्त का पूर्व पति इसे सहन न कर सका और उसने इस नये पति को ही मार डाला। दिल्ली झण्डेवालान मुहल्ले के ओमप्रकाश को प्रेमवती नामक लड़की को मार डालने के अपराध में आजीवन कारावास की सजा दी है। अभियुक्त लड़की से विवाह करना चाहता था, पर उसका पिता रजामंद न था। पिता का क्रोध उसने लड़की पर निकाला और उसी का कत्ल कर दिया।
लुधियाना के पास बरेबाल गाँव का सुखासिंह अपनी पत्नी की हत्या के अपराध में पकड़ा गया है। बताया जाता है कि उसकी पत्नी खाना लेकर देर में खेत पर पहुँची। इस पर अभियुक्त आग-बबूला हो गया और उसने अपनी पत्नी को भाले से मार डाला। मेरठ के जज ने परमात्मा शरण नामक व्यक्ति को फाँसी की सजा सुनाई। अभियुक्त अपनी विवाहिता पत्नी से पिण्ड छुड़ाकर एक ईसाई नर्स से विवाह करना चाहता था। उसने सोती हुई पत्नी पर तेल छिड़क कर आग लगा दी। इलाहाबाद जिले के भरवारी गाँव में रात को पति− पत्नी में कहा-सुनी हो जाने पर पति ने पत्नी की नाक और वक्षस्थल काट लिए। फगवाड़ा की 25 वर्षीय युवती कैलाश रानी ने अपने मृत्यु बयान में मजिस्ट्रेट के सामने बयान देते हुए कहा— मेरी सास ने मेरे शरीर पर मिट्टी को तेल छिड़क कर आग लगा दी और द्वार बन्द कर दिया। बचने का और कोई उपाय न देखकर मैंने पिछवाड़े के मकान के पीछे छलाँग लगाई अस्पताल में पाँच घंटे उपचार के बाद भी युवती बच न सकी। जलाने का कारण इतना भर बताया जाता है कि वह अपने पति से सास और देवर की शिकायत किया करती थी।
क्रूरता और विश्वासघात
दिल्ली की सदर बाजार पुलिस ने गली बरना के कँवरपाल नामक दर्जी को अपनी 21 वर्षीय पत्नी शकुन्तला की हत्या के अपराध में खून भरी कैंची के साथ गिरफ्तार किया है। बताया जाता है कि शादी को दस वर्ष बीत जाने पर भी उसके कोई बच्चा नहीं हुआ था। इसी बात पर कँवरपाल उससे चिढ़ा रहता था। उस दिन उसने कैंची से उसका गला ही काट डाला। इटावा का समाचार है कि कानपुर से एक युवक के साथ भाग कर आई हुई युवती ने यमुना में कूदकर आत्महत्या करने का असफल प्रयत्न किया। उसका कथित प्रेमी उसे छोड़कर भाग गया था, जिस पर ग्लानि और दुख के कारण घर वापिस न लौटकर उसने आत्महत्या का प्रयास किया, परन्तु घाट पर खड़े लोगों ने उसे बचा लिया । आगरा जिले के अएला गाँव में एक व्यक्ति ने साधारण सी तकरार पर क्रुद्ध होकर तलवार से अपनी गर्भवती धर्म पत्नी को काट डाला । पटियाला जिले के नियामतपुर गाँव से खंडीबाई नामक महिला की हत्या के सिलसिले में उसका सिनेमा शौकीन पति तेजाराम पकड़ा गया है। बताया जाता है कि सिनेमा के लिए पैसे न देने पर दिन में उसने पत्नी को मारा तब तो उसके पिता ने बीच बचाव कर दिया पर रात को उसने सोती हुई स्त्री पर कुल्हाड़ी से वार करके उसे काट ही डाला।
बन्धन और उत्पीड़न की अति
गोरखपुर के दौरा जज ने अलगू, प्यारे और सौतेली माँ तिलका को क्रमशः 6−6 व 4 साल की सजा सुना दी। अभियुक्तों ने अलगू की पत्नी दुखिनी को किसी छोटी−सी बात पर नाराज होकर नंगी करके खाट पर पन्द्रह दिनों तक जंजीरों से बाँधे रखा, भूखा रखा और उन पर उसके गुप्तांग, कपोल, ललाट और नितम्बों को खुरपी गरम करके जलाने का भी अभियोग था। बताया जाता है कि छपरा में एक स्त्री बिना आज्ञा लिए अपनी बहन के यहाँ चली गई इस पर उसके पति और सास ने उसको बाँधकर, लोहे की गर्म सलाखों, हसियें से उसके स्तनों दानों गाल, कानों को दाग दिया। जब भी वह दर्द से चिल्लाती तो पति लाठियों से प्रहार करता। विदित हुआ है कि हिसार जिले के चाम्बन गाँव में एक लड़की का एक युवक से प्रेम था। विवाह की संभावना न देखकर दोनों प्रेमी घर से निकल भागे। लड़की के भाई ने दोनों को पीछा किया और गाँव से कुछ ही दूर उन्हें घेरकर दोनों का कत्ल कर दिया। पुलिस ने हत्यारे को गिरफ्तार कर लिया। दिल्ली के रामलाल नामक व्यक्ति को अपनी पन्द्रह वर्षीय बहिन की हत्या करने के अपराध में पकड़ा गया है कहते हैं कि लड़की अपने इच्छित युवक से शादी करना चाहती थी पर भाई को यह बात मंजूर न थी। क्रुद्ध भाई ने अपनी बहिन को ही मार डाला। खुरजा के निकट पहासू गाँव का समाचार है कि एक कुम्हार युवती लड़की किसी पड़ौसी युवक को प्रेम करने लगी। वह गर्भवती हो गई तो अपने प्रेमी के साथ गाँव छोड़कर अन्यत्र जाने लगी। घर वाले उसे पकड़ लाये और रात को उसके माँ बाप ने ही उसका कत्ल कर दिया और खुद कुँए में कूद पड़े। कुम्हारिन तो मर गई पर कुम्हार जीवित बच गया।
दहेज की बलिवेदी पर
कन्या जैसे अमूल्य रत्न को प्राप्त करने में जहाँ ससुराल वालों को अपना सौभाग्य मानना चाहिए वहाँ वे उलटे यह मानते हैं कि हमने किसी की बेटी को अपने घर में लेकर उसके साथ बड़ा उपकार किया है। इस उपकार के बदले में वे आये दिन बेटी वालों पर अपनी ऐंठ दिखाते रहते हैं और दहेज के रूप में बढ़ी−चढ़ी रिश्वत माँगते हैं। माँगते ही नहीं, न मिलने पर अपने घर में आई हुई उस निरपराध बालिका को तरह−तरह से सताते हैं और कई बार तो उसकी जान के ग्राहक ही बन जाते हैं। कोटला मुबारकपुर निवासी बेनी प्रसाद और उसकी माता उमरावती को दिल्ली सैशन जज ने आजन्म कारावास की सजा दी है। इस्तगासे के अनुसार नव−विवाहिता बहू कसला पर उसकी सास उमरावती ने मिट्टी का तेल छिड़का और पति बेनीप्रसाद ने आग लगा दी। अभियुक्त लड़की के पिता से रुपया ऐंठन चाहते थे वह न दे सका तो लड़की को ही इस प्रकार जला डाला। इटावा के कंचौरसी गाँव के एक सेठ के पुत्र ने अपनी पत्नी को घर में बन्द करके निर्दयतापूर्वक पीटते−पीटते कई हड्डियाँ तोड़ दीं। कहा जाता है कि उस स्त्री का पति व ससुर इस बात पर सदा जोर देते रहते थे कि वह अपनी धनी माता के पास से लाकर उन्हें धन दे। उसने लाकर दिया भी। पर जब माँ के पास कुछ न रहा तो उसे उस प्रकार सताया जाने लगा। निराश होकर यह दर्दनाक काण्ड कर बैठा। प्रयाग के अहियापुर मुहल्ले में हनुमान प्रसाद नामक 36 वर्षीय व्यक्ति ने अपने घर की धन्नी में रस्सी बाँधकर फाँसी लगा ली। कहा जाता है कि अपनी दो पुत्रियों के विवाह की विफलता से निराश होकर उसने ऐसा किया। मृतक बहुत गरीब था। एक पंडा की नौकरी करता था। पुत्रियों के विवाह के लिए सब जगह दहेज की माँग की जाती थी जिसकी सामर्थ्य उसमें नहीं थी। इसी प्रकार सीतापुर के एक 40 वर्षीय दुकानदार ने रेल के नीचे कटकर अपने जीवन का अन्त कर लिया। उसकी लड़की युवा हो गई थी पर बेचारा दहेज का प्रबन्ध न कर सका।
कुछ समय पूर्व कलकत्ता की स्नेहलता नामक एक लड़की ने स्वयं आत्महत्या की थी। उसके पास जो पत्र प्राप्त हुआ था उसमें उसने लिखा था कि मेरे माता−पिता दहेज न जुटा सकने के कारण निरन्तर चिन्ता ग्रस्त रहते हैं। उनका दुख मुझसे देखा नहीं जाता । जिस समाज में कन्याओं का यह मूल्य है कि उसे बिना दहेज लिए कोई स्वीकार नहीं कर सकता ऐसे पतित लोगों के बीच जीवित रहने की भी मेरी इच्छा नहीं है, इसलिए मैं स्वेच्छा से आत्मघात करती हूँ।
एक दूसरा रास्ता
कलकत्ता से 12 मील दूर शेवड़ा कुली नामक स्थान में एक व्यक्ति अपनी कन्या का विवाह 45 वर्ष के व्यक्ति के साथ करने जा रहा था। नवयुवकों ने उसे रोका और समान आयु का सुधरे विचार का लड़का ढूँढ़ देने का आश्वासन दिया। लड़की के पिता का कथन है कि वह दहेज देने की असमर्थता के कारण ही ऐसा अनमेल विवाह करने को मजबूर हो रहा था। जावरा क्षेत्र के ग्राम पीपलिया में एक लड़की का विवाह 65 वर्ष के बूढ़े के साथ हुआ है। कन्या का बाप मजबूरी के साथ−साथ लालच का भी शिकार हो गया।
नारी के प्रति हमारा जो अनुदार, संकीर्ण, अहंकार भरा दृष्टिकोण है उसे जितना तुच्छ, हीन और उत्पीड़न के योग्य हम समझते हैं उसमें कितनी मानवता है? यह प्रश्न हमारे मन को यदि झकझोरता नहीं है तो यही मानना होगा कि हमारी अन्तरात्मा मर गई और हम मनुष्यता के साथ रहने वाली आवश्यक भलमनसाहत को छोड़ बैठे। नारी ने नर के आगे आत्मत्याग का जो अनुपम आदर्श रखा है उसका यह अर्थ नहीं होना चाहिए कि उसका मूल्य कुछ भी न समझा जाय, उसे मनमाने ढंग से सताया जाय और इतना बंधन में बाँधा जाय कि वह हिल-डुल ही न सके।
पराधीनताओं के बंधन सब दिशाओं में टूट रहे हैं। नारी की आत्मा भी पूछती है कि उसे मानवोचित सम्मान और स्वातंत्र्य कब मिलेगा? नागरिक अधिकारों से कब तक उसे वंचित रहना पड़ेगा ? और कब उसे वह अवसर प्राप्त होगा कि पिंजड़े में बन्द पक्षी एवं खूँटे से बंधे पशु से उसे कुछ अधिक समझा जाय? वह केवल उपभोग की ही मशीन न समझी जाय वरन् उसे उन्नति एवं प्रगति का भी अवसर मिले। इस स्थिति को लाने के लिए हमें अपने सड़े-गले, क्रूर एवं रूढ़िवादी विचार बदलने पड़ेंगे और वह नैतिक दृष्टि अपनानी होगी जिसके आधार पर पति−पत्नी एक दूसरे के प्रति प्रेम विश्वास, आदर त्याग, सेवा, क्षमा एवं उदारता एवं समानता का व्यवहार करते हुए सच्चे दाम्पत्य जीवन की सुदृढ़ आधारशिला रख सकें।
मनुष्य की दुर्भावनाऐं जब तक व्यक्तिगत जीवन तक सीमित रहती हैं तब तक उसका प्रभाव उतने लोगों तक सीमित रहता है जितनों से कि उस व्यक्ति को सम्पर्क रह सके। परन्तु जब राज सत्ता और विज्ञान का भी सहारा मिल जाय तो उन दुर्भावनाओं को विश्वव्यापी होने और सर्वग्रही संकट उत्पन्न करने में कुछ भी कठिनाई नहीं रहती। स्वार्थी का संघर्ष, संकीर्णता और अनुदारता का दृष्टिकोण, शोषण और वर्चस्व का मोह आज असीम नृशंसता के रुप में अट्टहास कर रहा है। राजसत्ता और विज्ञान की सहायता से उसका जो स्वरूप बन गया है उससे मानवता की आत्मा थर−थर काँपने लगी है। प्रगति के नाम पर मानव प्राणी का, चिर संचित सभ्यता का नामोनिशान मिटाकर रख देने वाले हथियारों की विशाल परिमाण में जो तैयारी हो चुकी है, उसमें चिंगारी लगने की देर है कि यह बेचारा भूमण्डल बात की बात में नष्ट−भ्रष्ट हो जायेगा। मानव मन की दुर्भावनाओं की घातकता अत्यन्त विशाल है, 24000 मील व्यास का यह नन्हा सा पृथ्वी ग्रह उसके लिए एक ग्रास के बराबर है।
50 मेगाटन बम
इस 6 अक्टूबर को रूस ने जो 50 मेगाटन अणुबम का विस्फोट परीक्षण किया उससे सारे संसार में तहलका मच गया है। वैज्ञानिकों को कथन है —‟ऐसा बम जहाँ भी गिरेगा वहाँ 400 फुट गहरा और 10 मील लम्बा चौड़ा गड्ढा बन जायेगा और सात मील क्षेत्र में एक भी प्राणी जीवित न बचेगा। वैज्ञानिक रस्क लैप ने कहा है कि एक ही मेगाटन बम सारे वाशिंगटन के सर्वनाश के लिए काफी है। इसके अलावा नगर में 10 मील दूर तक की इमारतों की दीवारें नष्ट हो जावेंगी। 5−6 मील तक फौलाद की बनी इमारतें भी न बच सकेंगी। इसके अलावा तीस मील तक के घेरे में लोगों को ऐसा घायल कर देगा जो बाद में तड़प−तड़प कर मर ही जायेंगे।” यह तो एक मेगाटन बम की बात हुई। पचास टन का बम तो इससे भी पचास गुना संहार करेगा। उसके सम्बन्ध में डाक्टर लैप ने कहा है कि—‟पचास मेगाटन का एक हाइड्रोजन बम यदि व्हाइट हाउस पर गिरे तो उससे 10 से 20 हजार वर्ग मील तक के क्षेत्र के लोग उसकी रेडियो सक्रियता से प्रभावित हो जावेंगे। इस बम के विस्फोट से जो आग की लपटें उठेंगी वे सात मील के घेरे में होंगी। यदि इस बम का परीक्षण अटलांटिक सागर में किया जाय तो उससे ध्रुव क्षेत्र की सारी बर्फ पिघल जायगी और समुद्र भीषण रूप से उफन पड़ेंगे।”
उपरोक्त प्रकार का एक परीक्षण करने पर अमरीका ने उससे भी दस गुना शक्ति शाली 500 मेगाटन का बम बनाने की धमकी दी है, जो एक ही सारी पृथ्वी के वातावरण को विषाक्त एवं प्राणियों के न रहने योग्य बनाने के लिए पर्याप्त है। अमेरिका ने 20 से 25 मेगाटन के ‘स्टेंडर्ड बम’ बनाने का तो निश्चय कर भी लिया है।
भयानक रेडियो विकरण
रसायन शास्त्र के अमरीकी नोबुल पुरस्कार विजेता प्रो. लीनस पालंग ने अपनी योरोप यात्रा करते हुए केम्ब्रिज में एक वक्तव्य देते हुए कहा— “वर्तमान अणु परीक्षणों से वातावरण में जो रेडियो विकिरण की वृद्धि हो रही है उससे दस लाख व्यक्ति केन्सर से पीड़ित हो जाएँगे। और आने वाले वर्षों में 30 लाख तक बच्चे ऐसे ही केन्सर से पीड़ित जन्मेंगे।”
न्यूयार्क 2 नवम्बर का समाचार है कि अमरीका शीघ्र ही ‘एम.बम’ का परीक्षण करेगा। यह मृत्युकिरण न्यूट्रान बम होगा जो सैनिकों को बिना कष्ट के नष्ट करेगा। लोग जहाँ के तहाँ बैठे के बैठे रह जाएँगे और उनके जीवन का अन्त हो जायेगा। किन्तु मकान तथा अन्य सामान ज्यों के त्यों सुरक्षित रहेंगे।” इस मृत्यु बम के बारे में आजकल अमेरिका में घर−घर चर्चा है । ‘न्यूयार्क वर्ल्ड टेलीग्राफ’ पत्र ने तो पूरे एक पृष्ठ का लेख छापकर इस बम की भीषणता चित्रित की है।
एक से एक बढ़कर
कुछ दिन पूर्व इंग्लैण्ड के वैज्ञानिकों ने घोषणा की थी कि उन्होंने एक ऐसा विष तैयार कर लिया है जिसकी आधा सेर मात्रा हवा में उड़ा दी जाय जो सारी दुनियाँ की मृत्यु हो सकती है। पाकिस्तान में अमेरिका द्वारा एक मृत्यु पट्टी बनाये जाने का रहस्योद्घाटन जिस दिनों हुआ था उन दिनों उस मृत्युकिरण की भी जानकारी प्रकट हो गई थी जिसके कारण किसी लम्बे प्रदेश को भी ऐसा विषाक्त बनाया जा सकता है जिसमें प्रवेश करने मात्र से कोई जीवित न रहे।
दार्शनिक रसेल ने अणु विरोधी आन्दोलन के संदर्भ में बताया है कि जितने अणु परीक्षण अब तक हो चुके उनकी रेडियो सक्रियता भी इतनी घातक है कि उसका दुष्परिणाम लम्बे समय तक लाखों−करोड़ों मनुष्यों को भुगतना पड़ेगा। फिर यदि यह परीक्षण आगे और भी जारी रखे गये तो युद्ध न होने पर भी इन परीक्षणों से ही मानव जाति के सामने स्वास्थ्य सम्बन्धी भयंकर संकट उत्पन्न हो जायेगा और उसका दुष्परिणाम अनेक पीढ़ियों तक भुगतना पड़ेगा।
सन् 1945 में जापान के हिरोशिमा नगर पर पहली बार एक छोटे से अणुबम का प्रयोग किया गया था जिससे एक ही मिनट में 80,000 व्यक्ति तत्क्षण मर गये थे। घायल, अपंग, विकलांग और बाद में मरने वालों की संख्या इनसे बहुत बड़ी है। 16 वर्ष बीत जाने पर भी जापानी अभी वहाँ की रेडियो सक्रियता से हानि उठा रहें हैं और आगे पीढ़ियों तक उठाते रहेंगे। अब इन आयुधों में जो उन्नति हुई है उसे देखते हुए हिरोशिमा वाला वह बम खिलौना मात्र प्रतीत होता है। रूस द्वारा अभी−अभी परीक्षण किया हुआ 50 मेगाटन का बम उसकी अपेक्षा किया 2500 गुना अधिक संहारक है। भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डाक्टर कोठारी ने 125 मेगाटन के तब तक हुए अणु परीक्षणों के प्रभाव का हिसाब लगाकर बताया है कि — “ जो हो चुका उतने मात्र से अगले तीस वर्षों में 1,50,000 से अधिक लोग काल के ग्रास बनेंगे इसी अवधि में 5 लाख अतिरिक्त व्यक्ति हड्डी के ट्यूमर से मरेंगे।” लेकिन अब तक तो 170 मेगाटन के परीक्षण तो अकेला रूस ही कर चुका, यह हिसाब तो 125 मेगाटन का ही है। आगे जो परीक्षण होने वाले हैं उनकी हानि का तो अनुमान भी कठिन है फिर यदि कहीं इनका प्रहार भी होने लगा तब तो सर्वनाश के दृश्य ही उपस्थित होंगे।
बारूद का अपार भण्डार
इसी 10 जनवरी को ब्रिटिश अणु वैज्ञानिक तथा नोबुल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर पी. एम. एस. ब्लैंकट ने बम्बई में बताया है कि— “अमरीकी अणु आयुधों का भण्डार अगर एकत्रित किया जाय तो दुनियाँ के हर स्त्री पुरुष तथा बच्चे को 20 टन डाइना माइट बारूद मिल सकती है। और रूसी अणु आयुध भी इससे किसी तरह कम नहीं है।” रूस और अमेरिका दो देशों की ही बारूद पृथ्वी के हर मनुष्य के हिस्से में 40 टन आती है। सारी पृथ्वी के अन्य देशों की कुल मिलाकर इससे आधी अर्थात् 20 टन बारूद की औसत और मान लिया जाय तो हर व्यक्ति के हिस्से में 60 टन बारूद आवेगी। 60 टन अर्थात् 60×27 टन = 1635 मन। एक मनुष्य की खुराक बच्चे बुड्ढ़े और बीमार और स्वस्थ का औसत लगाकर 8 छटाँक अन्न की भी मानी जाय तो 4॥ मन वार्षिक के हिसाब से करीब 350 वर्षों तक खाते रहने के लिए यह डायनामाइट बारूद ही पर्याप्त हो सकती है।
जब कि संसार के करोड़ों व्यक्ति अन्न के अभाव और भुखमरी से पीड़ित हैं तब मनुष्य की दुर्बुद्धि उन अभावों को दूर करने में लगाया जा सकने वाला पैसा, श्रम एवं बुद्धिबल इस प्रकार संहारक कार्यों में खर्च करने के लिए लगा रही है। बारूद अन्न से तो अवश्य ही महँगी होती है। जिस बुद्धि ने 350 वर्षों तक हर आदमी के हिस्से में आध सेर बारूद खाते रहने लायक भण्डार जमा कर लिया क्या वह उतना उत्पादन अन्न का नहीं कर सकती थी? मृत्यु के साधन जुटाने में जितना प्रयत्न हुआ है क्या उतना जीवन को बढ़ाने और सुसंस्कृत बनाने के लिए नहीं किया जा सकता था?
युद्ध और उसका कारण
जिन कारणों को लेकर युद्ध होते हैं उन कारणों को मिटाने के लिए लोग तैयार नहीं, उन कारणों की प्रतिक्रिया रोकने के लिए बारूदी हथियार जमा करते जाते हैं। समर्थ लोग असमर्थों को अपने पैरों तले कुचल कर उनका रक्त शोषण करने के लिए भेड़ियों की तरह लालायित हो रहे हैं। सताये हुए लोग उफ न करें ऐसा हो नहीं सकता। प्रतिरोध को रोकने के लिए कोई नैतिक आधार तो उनके पास है नहीं, बारूद से भून डालने की धमकी ही उचित प्रतीत हो रही है। इस नीति को अपनाये रहने से बाहर की शान्ति कुछ दिनों रखी जा सकती है पर भीतर सुलगने वाला असंतोष विस्फोट का रूप धारण करता ही रहेगा। अब तो युद्ध का वातावरण बनाये रहना भी एक सुव्यवस्थित व्यापार बन गया है।
बर्कले (केलिफोर्निया) में रसायन वैज्ञानिक डा. लाइनस ने बताया कि—अमरीकी उद्योग को 5 अरब डालर वार्षिक तक मुनाफा होता है। यह कारण भी उसके लिए अन्तर्राष्ट्रीय तनाव कायम रखने के लिए एक आकर्षक तत्व है। अमेरिका 41 अरब डालर वार्षिक प्रतिरक्षा पर खर्च करता है।
इन तथ्यों के रहते शान्ति कैसी?
जाति विद्वेष, शोषण, साम्राज्य, अन्याय एवं असमानता की भावनाऐं राजसत्ता का आश्रय पाकर विश्व के कोने-कोने में रोमांचकारी कुकृत्य करा रही हैं। नैरोवी (अफ्रीका) के समाचार हैं कि पुर्तगाल के साम्राज्यवादी अंगोला में अपनी सत्ता बनाये रखने के लिए 50 हजार से अधिक अफ्रीकियों का कत्ल कर चुके। उनकी योजना भी 1॥ लाख और अफ्रीकियों को कत्ल करने की है। अल्जीरिया में फ्राँस ने, तिब्बत में चीनियों ने लाखों निर्दोष व्यक्तियों को इसलिए भून डाला कि वे विदेशी जुए को कंधे पर रखने के लिए तैयार नहीं हुए। फिलिस्तीन में जर्मनी के निर्दयी आइखमैन पर जो मुकदमा चला उसमें प्रकट हुआ कि 60 लाख यहूदी केवल जाति विद्वेष के नाम पर भयंकर यातनाऐं देकर कत्ल किये गये। कांगो, लाओस, द. वियतनाम, क्यूबा, अफ्रीका, कोरिया, मिश्र आदि में पिछले दिनों जो हुआ है तथा अब जो हो रहा है उसे समाचार पत्रों के पाठक भली−भाँति जानते हैं। भीतर ही भीतर जो अशान्ति सर्वत्र सुलग रही है, वह इन प्रकट घटनाओं से भी अधिक भयंकर और महत्वपूर्ण है।
सद्भावनाओं का आश्रय
भीतर ही भीतर सुलग रही विश्वव्यापी अशान्ति और सामने प्रस्तुत सत्यानाशी युद्ध विभीषिका का अन्त कैसे हो सकता है? इस प्रश्न पर विचार करते हुए एक ही सत्य सामने उपस्थित होता है कि मानवी बुद्धि को दुर्भावनाओं की कीचड़ में से निकाला जाय तो ही समस्याओं का सुलझ सकना संभव है। दुर्बुद्धि के दलदल में फँसी हुई मानव जाति अपना उद्धार केवल एक ही प्रकार कर सकती है और वह है—सद्भावनाओं का आश्रय, अनीति को छोड़कर नीति को अपनाने से ही हमारा कल्याण हो सकता है। स्वार्थ और संकीर्णता के दायरे में सोचने के अपेक्षा सब के हित और उदारता की, न्याय, भ्रातृत्व और समानता की दृष्टि को जिस दिन हम सब अपनाने लगेंगे उसी दिन विश्वव्यापी संकट दूर होगा। जब तक ऐसा नहीं होता तब तक हमारे मस्तिष्क विनाश की घातक चालों में ही लगे रहेंगे और उनका दुष्परिणाम एक−न−एक दिन सामूहिक आत्महत्या के रूप में हमारे सामने उपस्थित होगा ही।
यह ठीक है कि आज कतिपय कारणों से अनीति और गुण्डागर्दी की दुष्प्रवृत्तियाँ एक चिन्ताजनक मात्रा में मौजूद हैं और भीतर ही भीतर बढ़ती एवं फैलती भी जाती हैं पर यह नहीं सोच लेना चाहिए कि सचाई, सेवा, महानता, उदारता, दया, सेवा एवं सदाचार जैसी सत्प्रवृत्तियाँ तथा धैर्य, साहस, पुरुषार्थ एवं शौर्य जैसे सद्गुणों की सर्वथा कमी है। मनुष्य की आत्मा में जो श्रेष्ठता है वह कभी मर नहीं सकती जो प्रकाश है वह कभी बुझ नहीं सकता। इसलिए पूर्ण रूप से कोई व्यक्ति या समाज बुरा नहीं हो सकता।
मनुष्य जाति में फैली हुई दुष्प्रवृत्तियों के प्रति सावधान रहना चाहिए और उनका उन्मूलन करने के लिए सतत प्रयत्न करना चाहिए। साथ ही जहाँ सत्प्रवृत्तियों के अंकुर जम रहे है उन्हें सींचने, खाद लगाने एवं रखवाली करने का प्रयत्न करना चाहिए। दैवी और आसुरी दोनों ही प्रवृत्तियाँ मनुष्य में रहती हैं इनमें से यदि असुरता बढ़ जाती है तो सर्वत्र अशान्ति एवं आपत्तियों की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और यदि देवत्व पनपने लगे तो इसी भूमि पर सुख−शान्ति का ऐसा वातावरण उत्पन्न हो जाता है कि स्वर्ग जैसी आनन्द दायक स्थिति हमारी आँखों के आगे उपस्थित हो जाय। आज बुराई बढ़ रही है और अच्छाई मुरझा गई है। इसीलिए चारों ओर नारकीय वातावरण उत्पन्न होता जाता है। इसे बदलने का प्रयत्न किया जाय, बढ़ी हुई असुरता को मिटाने और बीज रूप से सर्वत्र प्रस्तुत अच्छाई को सींचने का प्रयत्न किया जाय तो युग ही बदल सकता है। हमें इसी पर विचार करना है और यही सब करने के लिए तत्पर होना है। पिछले पृष्ठों पर बढ़ती हुई बुराइयों के समाचारों का दिग्दर्शन कराया गया अब आगे के पृष्ठों पर भलाई की सजीव शक्तियों का परिचय देने वाली गत डेढ़ वर्ष की खबरें प्रस्तुत करेंगे।
दूसरों के दुख को अपना दुख समझने वाले
दूसरों के दुख दर्द को अपना दुख दर्द समझने वाले उदार लोगों की इस दुनियाँ में कमी नहीं है। इन्दौर यशवन्त अस्पताल में 64 व्यक्तियों ने अपनी आँखें नेत्रहीनों के लिए दान दी हैं जिनमें से 50 का उपयोग आपरेशन करके अंधों को दृष्टिवान बनाने के लिए कर भी लिया गया। इन्दौर में मानव रक्त कोष में रक्त दान का अभियान भी आशाजनक प्रगति कर रहा है। लोगों ने 3, 60, 300 सी. सी. रक्त अपने शरीरों से निकलवा कर उन रोगियों के लिए दिया है, जिनकी इसके बिना प्राण रक्षा हो सकनी कठिन थी।
नैलोर जिले में गुण्टूर के एडवोकेट श्री एम. बी. नरसिंहराव अब तक ब्लडबैंक को 40 बार अपना रक्त दान कर चुके हैं—लेकिन फिर भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। अब उन्होंने उस्मानिया जनरल अस्पताल हैदराबाद के नाम एक वसीयत की है कि मृत्यु के बाद उनका शरीर विद्यार्थियों की शिक्षा के निमित्त चीरफाड़ के लिए और आँखें किसी जरूरतमन्द को देने के लिए प्रयोग की जावें।
नौगाँव (बुन्देलखण्ड) के सिविल सर्जन डा. रुद्रदत्त खरे ने, गर्भाशय फट जाने के कारण एक मरणासन्न महिला को अपना एक पौण्ड खून दान करके रोगिणी को बचा लिया। रोगिणी के घरवालों में से जब कोई रक्त दान के लिए तैयार न हुआ तो डाक्टर स्वयं ही इसके लिए तैयार हो गये। वे पहले भी एकबार एक असाध्य रोगी को इसी प्रकार एक पौण्ड खून दे चुके हैं।
नागपुर मेडिकल कालेज में एक 60 वर्षीय वृद्ध की आँखें एक तीस वर्षीय युवती की आँखों में लगा दी गईं। युवती की आँख पाँच वर्ष की आयु में ही चेचक से चली गई थी अब वह वृद्ध की आँखें पाकर पुनः देखने लग गई है।
जिन्हें कर्तव्य प्राण से प्रिय लगा
राष्ट्रपति ने अदम्य साहस और कर्त्तव्यपरायणता के लिए पठानकोट के फायरमैन श्री लाल सिंह को पुलिस और अग्नि सेवा का वीरता−पदक प्रदान किया है।
प्रशस्ति में बताया गया है कि पठानकोट रेलवे स्टेशन के समीप, जहाँ गोला-बारूद रखा जाता है, माल−डिब्बे से अस्त्र−शस्त्र उतारते समय गोला−बारूद और अन्य विस्फोटक पदार्थों में भयानक विस्फोट हुआ। विस्फोट से तीन माल−डिब्बे उड़ गए और दो बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए। बहुत से आदमी मरे और कई बुरी तरह घायल हुए। अग्नि ज्वाला धधक उठी और पास के सरकारी गोदामों के लिए खतरा पैदा हो गया। चारों तरफ विस्फोटक पदार्थ बिखर गया। पूरे क्षेत्र की सम्पत्ति और जन−जीवन को भयानक खतरा उपस्थित हो गया। इस विकट परिस्थिति में मजदूर फायरमैन श्री लालसिंह ने अपनी जान जोखिम में डालकर आग बुझाने वाले पम्प से आग बुझाना शुरू किया। श्री लालसिंह के साहस और वीरता से प्रभावित होकर अन्य लोग भी आग बुझाने के लिए दौड़ पड़े और आग पर काबू पा लिया। श्री लालसिंह के अदम्य साहस और कर्त्तव्यपरायणता से जन−जीवन और सरकारी सम्पत्ति नष्ट होने से बचायी जा सकी।
नागौद में अमरन नदी में भीषण बाढ़ के परिणामस्वरूप कई घरों को नुकसान पहुँचा। एक 18 वर्षीय लड़का भी उसमें बह गया, लेकिन उसको बचाने की हिम्मत किसी में नहीं हुई लड़का आगे एक टीले में अटक गया था। पता चला है कि दो युवकों—व्रजराजसिंह तथा वीरेन्द्र प्रतापसिंह ने अपनी जान हथेली पर रख उस लड़के को बचा लिया। नगर की जनता ने उन्हें इस कृत्य के लिए बधाई दी और उनकी प्रशंसा की।
राष्ट्रपति ने उत्तर प्रदेश के कांस्टेबल, स्व॰ आनन्द बल्लभ को उनकी वीरता और साहस के लिए पुलिस पदक दिया है। श्री आनन्द बल्लभ ने एक डूबते व्यक्ति को बचाने में अपनी जान गँवा दी थी। बताया जाता है कि 28 नवम्बर, 1958 को कांस्टेबल आनन्द बल्लभ उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले की कोतवाली मेला ककेड़ा के घाट पर तैनात थे। उन्होंने एक व्यक्ति रामपालसिंह को गंगा में डूबते हुए देखा। श्री आनन्द बल्लभ तुरन्त नदी में कूद पड़े। रामपालसिंह ने बहुत कसकर आनन्द बल्लभ सिंह को पकड़ लिया, जिससे दोनों के दोनों पानी में बहुत गहरे चले गए। दोनों की बहुत से मल्लाहों ने काफी देर तक तलाश की, लेकिन कुछ सफलता नहीं मिली। कुछ देर बाद रामपालसिंह घटना स्थल से करीब आधा मील पर बहता पाया गया उसे अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसकी मृत्यु हो गई। दुबारा तलाश करने पर भी कांस्टेबल आनन्द बल्लभ का शव नहीं मिला।
दान और उदारता
भोपाल के पास चौहारियाबाई नामक एक गरीब विधवा ने अपना सवत्त्व गाँव में लड़कियों का स्कूल बनाने के लिए दान कर दिया। विधवा ने 1500 मूल्य के जेवर तथा नकदी एवं 700 की जमीन मध्य प्रदेश के उपमन्त्री श्री एम. पी. दुबे के गाँव पधारने पर उन्हें सौंप दी और मकान पशु आदि बेचकर 5000 रु. और भी देने का वायदा किया। विधवा ने इच्छा प्रकट की कि उसके जीवन में ही कन्या स्कूल बन जाय। मन्त्री महोदय विधवा के इस सर्वस्व दान पर भाव विभोर हो उठे। उनने सरकार की ओर से 3000 रु. देने की तत्काल घोषणा की और स्कूल बनवाने की व्यवस्था हो गई।
राँची मेडिकल कालेज अस्पताल में मातृ सेवा सदन खोलने के लिए श्री. एम. बख्शी ने 25 हजार रुपये का दान दिया है। जोधपुर जिले के मघानियाँ गाँव की एक वृद्ध महिला यशोदा देवी ने अपने पुत्रों को कसम दिलाई कि वे उसके मरने के बाद उसका मोसर (मृत्यु भोज) न करें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने 18 हजार रुपये का एक मकान खरीद कर स्थानीय कन्या पाठशाला को दान कर दिया। देवबन्द (सहारनपुर) में जन्मे और कलकत्ता निवासी श्री आनन्द प्रकाश अग्रवाल ने अपने पिताजी की स्मृति में 50 हजार रुपया स्थानीय कन्या विद्यालय के लिए दिया है।
हम से तो पशु−पक्षी अच्छे
यह उदारता, सेवा और दयालुता की सत्प्रवृत्ति पशु−पक्षियों और निम्नश्रेणी के जीव−जन्तुओं में भी पर्याप्त मात्रा में पाई जाती है। मनुष्य जो अपने को सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी मानता है केवल इसी आधार पर बड़प्पन प्राप्त करने का अधिकारी हो सकता है कि उसके विचार और कार्य अन्य जीवों से अधिक धर्म, सदाचार एवं नीति पूर्ण हों। जिनमें यह विशेषताऐं नहीं हैं उन नर−पशुओं से वे साधारण पशु श्रेष्ठ माने जायेंगे जिनमें नैतिकता प्रेम, हिम्मत, सेवा एवं सहायता की प्रवृत्ति अधिक मात्रा में पाई जाती है।
संगरूर जिले के अमरगढ़ नामक गाँव में एक अलसेशियन स्वामिभक्त कुत्ते ने अपने मालिक की चिता में जल कर जान दे दी। बताया जाता है कि उसके मालिक की ट्रैक्टर की पैट्रोल की टंकी में जलने से मृत्यु हो गई। कुत्ता शवयात्रा में साथ−साथ रहा जब उसके मालिक की चिता में आग लगाई गई तो उसने उसमें कूदने की कोशिश की, परन्तु लोग उसे बाँध कर गाँव ले आए। थोड़ी देर बाद कुत्ता गाँव से भाग खड़ा हुआ और उसने जलती चिता में कूदकर अपने प्राण दे दिए।
मेरठ के साम्प्रदायिक दंगे में एक स्वामिभक्त कुत्ते ने अपने मालिक के साथ ही जान दे दी। शाहमीर दरवाजा क्षेत्र में एक रिक्शा चालक अपने रिक्शे को ले जा रहा था; और उसी के साथ उसका कुत्ता भी चल रहा था। रास्ते में एक व्यक्ति ने रिक्शा चालक पर छुरे से वार किया। कुत्ते ने जब अपने मालिक को विपत्ति में देखा तो वह आक्रमणकारी पर झपट उठा। इस पर आक्रमणकारी ने कुत्ते पर भी ऐसा घातक प्रहार किया कि वह वहीं मर गया।
हांसी के निकटवर्ती ग्राम सिसाय से प्राप्त एक समाचार में बताया गया है कि वहाँ एक किसान के प्राणों की रक्षा एक बन्दर की बुद्धिमानी के फलस्वरूप ही हो पाई। घटना इस प्रकार बताई जाती है कि एक किसान अपने खेत में पड़ा हुआ सो रहा था। उसी समय एक साँप द्रुतगति से उसकी ओर बढ़ कर आने लगा। एक बन्दर भी समीप ही बैठा हुआ इस दृश्य को देख रहा था। उसने जब साँप को किसान की ओर बढ़ते हुए देखा तो खों−खों करके उसे जगा दिया। जागने के बाद किसान ने भाग कर अपने प्राणों की रक्षा करने में सफलता प्राप्त कर ली।
प्रेम और ममता
सहपऊ (मथुरा) का समाचार है कि एक बन्दरिया ने एक बिल्ली का बच्चा पाल लिया है। बच्चा कहीं अरक्षित जगह में पड़ा उसे मिल गया था। बन्दरिया ने दया वश उसे उठा लिया और अपना दूध पिलाकर पालना आरम्भ कर दिया। बच्चा बिलकुल स्वस्थ है। बन्दरिया उछलते-कूदते समय बच्चे को मुँह और हाथ की सहायता से पकड़े रहती है। कस्बे में बिल्ली के बच्चे से बन्दर का यह अनोखा प्यार आश्चर्य का विषय बन गया है। दूर−दूर से सैकड़ों आदमी उसे देखने आते हैं।
कपूरथला, तरनतारन से यह दिलचस्प सूचना मिली है कि चकटोबयां नामक गाँव में एक ऊँटनी ने एक बछड़े को अपना दूध पिलाकर पाला है। कहा जाता है कि इस गाँव के सरपंच जैलसिंह की गाय एक बछड़ा छोड़कर मर गई। बछड़ा बहुत छोटा था। सरपंच के पास एक ऊँटनी भी थी, जिसका कोई बच्चा न था। कहते हैं कि बछड़े के प्यार से इस ऊँटनी के स्तनों में दूध आ गया और उसने बछड़े को अपना दूध पिलाना शुरू कर दिया। अब यह बछड़ा ऊँटनी के दूध पर ही पल रहा है। सैंकड़ों लोग ऊँटनी और बछड़े को देखने आते हैं।
लखनऊ के बलरामपुर अस्पताल में आजकल रामू नामक एक बालक पाला जा रहा है। इसे भेड़ियों की माँद में पकड़ा गया था। वह भेड़ियों की तरह ही गुर्राता, उन्हीं की तरह चलता और कच्चा माँस खाता था। अब इलाज के बाद उसकी आदतें मनुष्य जैसी बनती जा रही हैं। इस बच्चे को एक भेड़िया मादा कहीं से उठा लाई थी उसे दया आ गई और खाने के बजाय उसे अपना दूध पिलाकर पाल लिया था। अन्त में शिकारियों द्वारा माँद में यह बालक पकड़ा गया। अठसैनी का समाचार है कि छोटे जन्तुओं द्वारा भी अपने साथी की सहायता करने का एक दृश्य यहाँ तब देखने को मिला जब तक चूहे ने अपने साथी चूहे को साँप के मुँह से छुड़ा लिया। दर्शकों का कहना है कि एक साँप ने अचानक एक चूहे को पकड़ लिया और वह जैसे ही उसे निगलने वाला था कि अचानक चूहे के दूसरे साथी ने साँप पर पीछे से ऐसा विकट आक्रमण किया कि साँप ने बुरी तरह घायल होकर दम तोड़ दिया। इस प्रकार चूहे ने अपने साथी को मौत के मुँह में जाने से बचा लिया।
सागर जिले के रहली नामक स्थान से गायों और तेंदुए के बीच युद्ध होने और वन्य−पशुओं के भाग जाने का समाचार मिला है। बताते हैं कि रहली के निकटवर्ती जंगल में जब कुछ गायें घास चर रही थीं तभी अचानक एक बछड़े पर तेंदुए ने हमला किया और उसे अपने पंजे में जकड़ लिया। बछड़े का रंभाना और करुणापूर्ण चीखें सुनकर उसका माँ और अन्य गायें एक साथ तेंदुए पर टूट पड़ीं। गायों के पैने सींगों की मार के आगे तेंदुआ टिक न सका और दुम दबाकर भाग खड़ा हुआ और बछड़े की जान बच गई।
बंगाली मार्केट नई दिल्ली का समाचार है कि एक समझदार कुत्ते ने एक लड़की की इज्जत बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। कहा जाता है कि लड़की स्कूल से लौट रही थी कि एक बदमाश ने लड़की को किसी बहाने पास के घर में बुला लिया और बलात्कार करना चाहा। लड़की चिल्लाई। यह सब करतूत पास ही खड़ा एक कुत्ता देख रहा था वह बदमाश पर झपटा और उसे काटकर घायल कर दिया। शोर सुनकर पड़ौसी आ गये और बदमाश पकड़ लिया गया।
उप−रेलमन्त्री ने एक प्रश्न का उत्तर देते हुए लोकसभा में बताया कि अपराधों का पता लगाने के लिए दक्षिणी रेलवे ने कुत्तों का एक दस्ता तैयार किया है। छह महीने में यह कुत्ते 4500 की चोरी का पता लगाकर अपराधियों को गिरफ्तार भी करा चुके हैं।
उप−कृषिमंत्री ने राज्य सभा में बताया कि हिसार के पशु−पालन फार्म में विभिन्न प्रकार के एक हजार बहुमूल्य पशु हैं जिनमें एक गधा ही 60 हजार रुपये का है। जो खच्चर पैदा करने के काम आता है।
मुँगेर जिले के नादियाग ग्राम में केले के वृक्ष से लटकते हुए साँप की पूँछ पकड़ कर मुसाहार तेली ने अपनी जान बचाई। नदी की आकस्मिक बाढ़ में गाँव के 83 व्यक्ति तो बह कर मर गये पर बहते हुए मुसाहार के हाथ साँप की पूँछ पड़ गई उसी के सहारे वह रुका रहा और प्रयत्न करके किनारे भी आ गया। साँप ने आपत्तिजनक तेली पर दया दृष्टि रखी और उसे काटने की अपेक्षा सहायता करना ही उचित समझा।
यह समाचार हमको यह विचार करने के लिए विवश करते हैं कि हमारी वर्तमान नैतिक स्थिति एवं मनोभूमि क्या इन निम्न श्रेणी के समझे जाने वाले जीव−जन्तुओं की अपेक्षा किसी प्रकार ऊँची है? और क्या हम अपने को उनसे श्रेष्ठ कहने के अधिकारी रह गये हैं?
सामूहिक सत्प्रयत्नों के अतिरिक्त मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन में आदर्शवाद एवं नैतिकता का उदाहरण प्रस्तुत करके जन−साधारण को उतनी अच्छी शिक्षा दे सकता है, जितनी अनेकों व्याख्यानों से भी सम्भव नहीं। प्रत्येक व्यक्ति आत्म−निर्माण का प्रयत्न करे तो उससे आत्म−कल्याण का पुण्य, परमार्थ का उद्देश्य तो पूरा होता ही है साथ ही लोकशिक्षण की भी एक प्रभावशाली प्रक्रिया आरम्भ होती है। जिनने अपनी व्यक्तिगत सचाई एवं ईमानदारी का उदाहरण प्रस्तुत किया उनने लोक शिक्षण का एक महान कार्य किया यही समझा जाना चाहिए। ऐसे उदाहरण अब बढ़ रहे हैं यह प्रसन्नता की बात है।
ईमानदारी के आदर्श उदाहरण
बुलन्दशहर के एक हायर सेकेन्डरी स्कूल के चपरासी दुर्गाप्रसाद ने डकैतों को अपना सर्वस्व तो दे दिया पर सरकारी साइकिल उस समय तक नहीं दी जब तक कि डकैतों ने गोली मारकर उसे धराशायी नहीं बना दिया। चपरासी अपने गाँव जा रहा था, रास्ते में डकैतों ने उसे रोक कर लूट लिया पर जब उससे सरकारी साइकिल छीननी चाही तो उसने स्पष्ट कह दिया कि यह राष्ट्र की सम्पत्ति है और मेरी जिम्मेदारी है कि इसे अपने जीवित रहते किसी को हानि न पहुँचने दूँ। इसे लेना हो तो आप मुझे मारकर ही ले सकते हैं। डाकू गोली मार देने के बाद ही उससे साइकिल छीनने में सफल हुए। पेट में गोली लगा दुर्गाप्रसाद अस्पताल पहुँचाया गया जहाँ उसकी हालत सुधर रही है। उसकी सहायता के लिए छात्रों ने दुर्गा सहायता कोष खोला है।
जबलपुर के श्री सुराजीलाल नामक एक स्थानीय सुरक्षा कर्मचारी ने पिछले दिनों यहाँ 8॥ हजार रु. के खोये करेंसी नोटों को उसके स्वामी तक सही सलामत पहुँचा कर अद्वितीय ईमानदारी का उदाहरण पेश किया है।
बताया जाता है कि उक्त नोटों का स्वामी जब चुँगी पोस्ट से काम कर वापिस लौट रहा था, तभी स्कूटर की तेज रफ्तार के बीच उसकी जेब से वे नोट खिसक गए। सुराजीलाल इस घटना को देख रहे थे। तत्काल ही उन्होंने जमीन पर पड़े हुए नोटों का बंडल उठाया और साइकिल पर चढ़कर उसे वे दे आए। उक्त नोटों के स्वामी ने उन्हें पारिश्रमिक देने की चेष्टा की पर उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया।
हिण्डौन उप खंडाधीश कार्यालय के जमींदार श्री रामसहाय तथा महुवा तहसील के चपरासी श्री मोतीसिंह ने 6800 रुपयों के नोट उनके असली मालिक को लौटा कर उत्कृष्ट ईमानदारी का परिचय दिया है। मामला इस प्रकार था कि उप खंडाधीश श्री गुमानसिंह दौरे के सम्बन्ध में मण्डावर गये और डाक बंगले में ठहरे। जब कि अधिकारी गिरदावरी का निरीक्षण करने मौके पर गए तो चपरासी पीने के पानी के लिए एक महाजन से मिट्टी का मटका मोल लाये। जिस समय वे उसे पानी भरने के लिए साफ करने लगे तो एक कपड़े में बन्धे हुए 3800 रुपयों के नोट मिले जो उन्होंने अधिकारी महोदय के समक्ष पेश कर दिये और बाद में उनके द्वारा नोटों के असली मालिक को लौटा दिये गये।
नागपुर में इतवारी भाजी मंडी की सड़क पर सीताराम कोष्ठी नामक लड़के को 1000 रु. के नोट पड़े मिले। बालक उनका लोभ न करके घर जाने की अपेक्षा धर्म कर्तव्य का ध्यान रखकर सीधा लकड़गंज पुलिस स्टेशन पहुँचा और वह रुपया वहाँ जमा करा दिया।
साम्प्रदायिकता और पक्षपात के इस युग में भी कितने उदार हृदय व्यक्ति मौजूद हैं इसका एक उदाहरण ऋषिकेश से प्राप्त एक समाचार में मिलता है।
पिता का हृदय
ऋषिकेश की जनता में उस समय भारी विस्मय हो गया जब कि मेजर अजीजुल करीम ने वैदिक रीति से कन्यादान किया। बाद में ज्ञात हुआ है कि वह लड़की उनके एक मित्र की थी जो मरते समय इन्हें सौंप गये थे। श्री अजीजुल करीम ने उसे अपनी पुत्री की भाँति पाला−पोसा और जनता को भी इस रहस्य का पता न चला, परन्तु जब उसका विवाह वैदिक रीति से किया गया तो जनता ने आश्चर्य किया तब मेजर ने उक्त रहस्य खोला। लड़की के विदाई के समय मेजर व उनकी पत्नी रो रहे थे।
सदाचार का सम्मान
सत्कार्यों के लिए सर्व-साधारण को प्रोत्साहन मिले इसके लिए उन सच्चरित्र व्यक्तियों का भी सम्मान किया जाना चाहिए जो गरीब होने के कारण उपेक्षित पड़े रहते हैं। आमतौर से धनी, विद्वान, नेता एवं सत्ताधारी लोग ही सच्चे सम्मान पाते हैं, इससे गरीब लोगों के उत्साह की अभिवृद्धि नहीं होती। सार्वजनिक सम्मान के अवसर संपन्नता एवं बड़प्पन की दृष्टि से न मिले वरन् व्यक्तित्व की श्रेष्ठता को ध्यान में रखकर इस प्रकार का चयन हो तो इसका बहुत भारी प्रभाव जनमानस पर पड़ सकता है जहाँ−तहाँ ऐसा हो भी रहा है।
सहारनपुर जिला समाज कल्याण समिति के भवन के शिलान्यास का शुभ कार्य गाँव की 80 वर्षीय हरिजन वृद्धा के हाथों सम्पन्न हुआ। इस भवन के निर्माण में ग्रामीणों ने उत्साहपूर्वक श्रमदान देने का निश्चय किया है। जबलपुर से 65 मील दूर दमोह में विज्ञान कक्ष का उद्घाटन विद्यालय के एक चपरासी अयोध्या प्रसाद द्वारा सम्पन्न हुआ। जब उसने फीता काट कर उद्घाटन की रस्म पूरी की तो उपस्थित सभ्य जनों ने जोरों से तालियाँ बजाकर अपनी प्रसन्नता प्रकट की।
एकाकी सेवा करने वाले
संस्थाओं के अतिरिक्त लोक निर्माण का कार्य मनुष्य व्यक्तिगत रूप से भी कर सकता है। यों एकाकी व्यक्ति की शक्ति सीमित होती है पर यदि वह चाहे तो अपनी आस्था पर दृढ़ रहकर नियमित रूप से सत्कार्यों के लिए सतत प्रयत्न करता रहे तो स्वयं एक स्वतन्त्र संस्था बन जाता है। कई ऐसे अनुकरणीय उदाहरण सामने आते रहते हैं जिनमें निष्ठावान् लोकसेवियों को सराहनीय साहस देखकर प्रसन्नता होती है और उनका अनुकरण करने के लिए प्रेरणा भी मिलती है।
अजमेर का समाचार है कि अपने आपको कितने ही आधुनिक विचारों की समझने वाली रमणी को यहाँ उस समय तो अपने सिर पर दुपट्टा अथवा चुनरी डालनी ही पड़ती है, जब नगर में विचरने वाले ‘सरदारजी’ राजस्थानी बोली में भारतीय परम्परा का बखान करते हुए नंगे सिर को ढक लेने की हठ करते हैं। सरदारजी इसी नगर में वर्षों से ‘राम नाम’ का प्रचार करते देखे जाते हैं। आपको कैसा ही नास्तिक समझे सरदारजी के अनुनय विनय के सामने उसे ‘रामनाम’ कहना ही पड़ता है। रामनाम का पीला चोगा पहने सर पर चक्र, कमर में लटकती कटार एवं हाथ में पुरानी−सी तलवार लिए सरदार मानसिंह उर्फ ‘रामनाम’ बाहर से आने वाले यात्रियों के लिए भी बड़ा आश्चर्य जनक खिलौना बन जाते हैं। सिर पर रोटियों से भरी टोकरी, एक हाथ में सब्जी का पात्र लिए सरदार जी बस्तियों में माँगते दिखाई देते हैं। माँगी हुई रोटियाँ एवं सब्जी को वे लूले−लंगड़े व भूखे−प्यासों को वितरित कर देते हैं। इसके अतिरिक्त बहुत अधिक जरूरतमन्द व्यक्ति यों को नगर के होटलों व निजी संस्थानों में छोटी−मोटी नौकरी भी दिला देने के कारण ‘सरदारजी’ को चलता−फिरता ‛ऐम्पलायमेंट एक्सचेंज’ भी कहा जाता है।
खगड़िया (मुँगेर) की एक अधेड़ भिखारिन ‘पगली’ की मृत्यु पर वहाँ के निवासियों ने 48 घंटे ‘रामधुन’ करके तथा दरिद्र नारायण भोजन कराके अपनी हार्दिक श्रद्धाञ्जलि अर्पित की। स्मारक के लिए एक बाल−उद्यान बनाने के लिए भी धन संग्रह किया जा रहा है। पगली का असली नाम रामप्यारी था। वह असहाय रोगियों, अपाहिजों का दुख−दर्द सहन नहीं कर पाती थी। घर−घर भीख माँग कर वह जो भोजन इकट्ठा करती, उसे उन अपंगों को ही खिलाया करती थी और उनकी जो सेवा बन पड़ती किया करती थी।
बोन का समाचार है कि योरोप की सड़कों पर आजकल एक 73 वर्षीय बूढ़ा एक बड़ा−सा सफेद झंडा लिए अकेला घूमता है। यह वर्षों से इस तरह घूम रहा है। जहाँ भी लोग उसकी बात सुनने को तैयार होते हैं वहीं वह सज्जनता और नैतिकता की शिक्षा देने लगता है। सरकारों के प्रयत्नों द्वारा इस दिशा में कुछ हो सकने की उसे आशा नहीं है इसलिये जनता को समझाते फिरने का कार्यक्रम उसने बनाया है। बूढ़े का नाम डेटवीलर है वह स्विट्जरलैंड का निवासी है। पहले वह एक होटल चलाता था और अच्छी कमाई होती थी। पर उसने मिशन के लिए उसे छोड़ दिया और इस प्रकार सफेद झण्डा लेकर गली−गली अकेला घूमने और उपदेश करने के लिए चल दिया। बहुत लोग उसका उपहास करते हैं और कुछ उसकी बातें सहानुभूति के साथ सुनते हैं।
भूल सुधार और प्रायश्चित
अपनी भूलों को जनता के सामने प्रकट करके और स्वयं उसका दण्ड प्रायश्चित रूप में अपनाकर मनुष्य आत्म सुधार कर सकता है, लोगों के लिए एक आदर्श उपस्थित कर सकता है और अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त कर सकता है।
सूरत शहर की नगर पालिका की सफाई कमेटी के अध्यक्ष ने अपनी एक छोटी−सी भूल के लिए आदर्श प्रायश्चित करके अधिकारी वर्ग के सामने एक अच्छा उदाहरण रखा है। उनकी सिफारिश पर गरीबों का मुफ्त एक्सरे होता था। लेकिन उसने अपनी पत्नी का भी मुफ्त एक्सरे करा लिया। बाद में उसने अनुभव किया कि उनसे भूल हुई। अतः प्रायश्चित स्वरूप अपने पद से त्यागपत्र दे दिया।
“मैं जेबकतरा हूँ, मुझसे सावधान रहिए”
“मैं जेबकतरा हूँ, मुझसे सावधान रहिये”, इन शब्दों की तख्तियाँ कमर और सीने पर लटका कर गत रविवार को इन्दौर की सड़कों पर घूमने वाला एक व्यक्ति लोगों का आकर्षण−केन्द्र बन गया। उत्सुक दर्शकों को इस व्यक्ति के साथ चल रहे पुलिस के सिपाही ने बताया कि वह नगर का माना हुआ अपराधी है और जेब काटना ही उसका मुख्य काम है। सिपाही ने यह भी बताया कि आज वह समझाने पर स्वेच्छा से ऐसी तख्तियाँ लगाकर नगर में घूमने के लिए राजी हो गया।
शिमोगा क्षेत्र के तीर्थवल्ली नामक स्थान में एक भिक्षुक ने अपनी सारी संचित कमाई स्थानीय अस्पताल को दान कर दी। यों वह भीख माँगता था, कंजूसी करके उसने जन्म भर में एक हजार रुपये इकट्ठे किए पाये थे। अन्त में उसे सद्बुद्धि आई कि पेट भरने के बाद संग्रह की मनुष्य को क्या आवश्यकता है? फिर भीख की कमाई तो किसी भी प्रकार संग्रह करने के योग्य नहीं है उसने अपना सारा संग्रहित धन उदारतापूर्वक अस्पताल को दे डाला।
कई व्यक्तियों ने रेलवे की बिना टिकट यात्रा का सरकारी टैक्स चुराने की अपनी भूलों का प्रायश्चित करते हुए चोरी की रकम सरकार को लौटाई है। बेईमानी से संग्रह किया धन कितने ही लोगों ने लोकहित के कार्यों में दान करके अपनी आत्मा पर बढ़े हुए बोझ को हलका किया है। जिसे हानि पहुँचाई थी या दुर्व्यवहार किया था उससे क्षमा माँगने और उसकी स्वेच्छा से क्षति पूर्ति करने के भी कितने ही उदाहरण देखने में आते हैं। इस प्रायश्चित भावना का विकास होना निश्चय ही उज्ज्वल भविष्य की आशा का उत्साहवर्धक चिन्ह है।
गिरी हुई मनोभूमि के लोग छोटी−सी कठिनाई सामने आने पर हताश हो जाते हैं, साहस छोड़ बैठते हैं और दीन−हीन बनकर गिरा हुआ जीवन बिताना ही अपना भाग्य मानने लगते हैं। पर साहसी लोग अपने साहस, धैर्य, अध्यवसाय, प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा भारी बाधाओं पर भी विजय प्राप्त करके अपने लिए रास्ता निकाल लेते हैं। यदि साहस को न गिरने दिया जाय तो कोई भी व्यक्ति विघ्न बाधाओं को चीरते हुए ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है जो सर्वसाधारण को आश्चर्य जैसा लगे।
कानपुर के एक 30 वर्षीय नेत्र विहीन श्री शंकर दयाल भंडारी ने इस वर्ष द्वितीय श्रेणी में एक साथ एम.ए. तथा साहित्य सम्मेलन की ‘साहित्य रत्न’ परीक्षा पास की है। उन्होंने हाई स्कूल प्रथम श्रेणी में तथा इंटर एवं बी.ए. द्वितीय श्रेणी में पास किया था। इन्दौर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन की साहित्य रत्न परीक्षा मूक−बधिर विद्यालय के एक नेत्रविहीन छात्र श्री बद्रीप्रसाद दुबे ने सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की। इसी प्रकार एक और अन्धे छात्र ने विशारद परीक्षा पास की है। नागपुर में विजयकुमार और रामकृष्ण नामक दो अन्धे छात्रों ने क्रमशः प्रथम और द्वितीय श्रेणी में मैट्रिक परीक्षा पास की है।
प्रकृति पर मानवीय विजय
प्रकृति के ऊपर मानवीय लगन की विजय का एक अद्भुत उदाहरण 21 वर्षीय यादव मेशराम ने प्रस्तुत किया है। भण्डारा जिला स्थित तुमसर का यह निवासी जन्म से ही दोनों भुजाओं से हीन है। प्रकृति ने उसे हाथ नहीं दिये किन्तु विद्याध्ययन की उसकी उत्कट इच्छा अपंगता के कारण भी नहीं मुरझाई। वह इस वर्ष युनिवर्सिटी परीक्षा में बैठा है। अपने सभी परीक्षाओं का उत्तर उसने अपने पैरों में कलम दबा कर लिखे हैं। अधिकारियों ने उसे सहायता के लिए लेखक भी देना चाहा पर उसने इनकार करके पैरों से ही लिखकर प्रश्न पत्र हल किये।
झाँसी के जिला विकास कार्यालय में एक ऐसा टाइपिस्ट भी है जिसके हाथ नहीं है लेकिन टाइप की गति 45 शब्द प्रति मिनट है। मेहरोनी गाँव के उक्त निवासी 36 वर्षीय नवाब अली के दोनों हाथ 14 वर्ष की आयु में एक दुर्घटना की भेंट हो गये थे। लेकिन जीवन की कठोरता को जिस वीरता के साथ उन्होंने स्वीकार किया, वह श्रद्धा से सिर झुकाने योग्य है। मुसीबतों का सामना करते हुए उसने अध्ययन जारी रखा और 27 वर्ष की आयु में हाई स्कूल परीक्षा पास कर ली। कुछ दिन ग्राम पंचायत में सचिव का काम करते हुए उन्होंने टाइप राइटिंग सीखा और आज इस पद पर काम कर रहे हैं।
पूना का समाचार है कि अपने परिश्रम से एम.ए. फिर एल.एल.बी. की उपाधियाँ प्राप्त करने वाले एक सिपाही का महाराष्ट्र सरकार ने औरंगाबाद में पुलिस प्रोसीक्यूटर नियुक्त किया है। श्री. रघुनाथ पाँडुरंग देवेरे ने लगातार 14 वर्ष तक मामूली सिपाही के रूप में काम किया और उसी बीच उनने पढ़ते रहकर उपरोक्त सारी परीक्षाऐं पास कर लीं।
अमरीका की 20 वर्षीय छात्रा क्यूबर्ट ने रोम की ओलम्पिक प्रतियोगिता में 100 मीटर की दौड़ 11 सैकिण्ड में पूरी करके सारे संसार का अब तक की दौड़ का रिकार्ड तोड़ दिया और विश्व की सबसे तेज दौड़ने वाली महिला घोषित की गई। यह लड़की जोड़ो के दर्द के कारण सात वर्ष की उम्र तक चल भी नहीं सकती थी पर वह निराश नहीं हुई। अपना स्वास्थ्य सुधारने के लिए निरन्तर प्रयत्न करती रही और तेरह वर्ष में ही उसने इतना स्वास्थ्य सुधार लिया कि विश्व में अपना रिकार्ड कायम कर सके।
लगन और प्रयत्न
फिल्म अभिनेता श्री पृथ्वीराज कपूर ने पत्रकारों को बताया कि आगामी 5 वर्षों में उन्होंने 9 भाषाऐं सीखने का निश्चय किया है। उन्होंने पंजाब की भाषा समस्या पर व्यंग करते हुए कहा कि पंजाबी 14 साल से इस बात पर बहस कर रहे हैं कि वे पहले हिन्दी पढ़ें या पंजाबी। यदि वे मेरे उदाहरण पर चलते तो अब तक 27 भाषाऐं सीख लेते।
इन्दोर के उषागंज निवासी 69 वर्षीय श्री. लक्ष्मी नारायण अवस्थी ने एम.ए. परीक्षा पास की है। उनकी पुत्री ने राजनीति में एम.ए. की परिक्षा देने की तैयारी की है। वे परीक्षा देने में अपनी पुत्री से एक दो वर्ष आगे रहते रहे हैं। डाक तार विभाग की सेवा से अवकाश प्राप्त इस पढ़ाकू को आज भी 100 रु. मासिक पेन्शन मिलती है, पर उनकी अध्ययन लालसा अभी भी अदम्य है।
बेलगाँव का समाचार है कि श्री. एल. के. मुकर्जी नामक सज्जन 1946 में सारे भारत की पदयात्रा करने के लिए निकले हैं। अब तक 80 हजार मील की पद यात्रा कर चुके हैं। सन् 1963 तक वे अपनी यात्रा पूरी हो जाने की आशा करते हैं। यात्रा समाप्ति के बाद वे भारत−भ्रमण पर एक सर्वांगपूर्ण पुस्तक लिखेंगे।
लुधियाना के पास दाऊदपुर के भूतपूर्व सैनिक तथा आज के कृषक श्री. जगनसिंह ने एक बीघा जमीन में 125 मन प्याज पैदा करके नया रिकार्ड स्थापित किया है। आमतौर से एक बीघे में 20 से 50 मन तक प्याज पैदा होता है। प्राप्त सूचना के अनुसार इस प्याज में एक−एक का वजन एक सेर तक था।
सिंह से भिड़ने वाले नरसिंह
साहस और पुरुषार्थ की कमी ने हो तो एक साधारण मनुष्य भी बड़ी से बड़ी विपत्ति से जूझ सकता है। विपत्ति उतनी हानि नहीं पहुँचाती जितनी पस्तहिम्मती और कायरता। यदि घबराया न जाय तो सिंह जैसे भंयकर पशु से भी मनुष्य लड़ सकता है और उसे परास्त कर सकता है।
गढ़वाल जिले के सिमतौली गाँव के मोल्याराम नामक युवक ने बिना किसी हथियार के बाघ को मारकर सब को आश्चर्य में डाल दिया। वह अपने खेत में हल चला रहा था कि झाड़ी से निकलकर अचानक बाघ उस पर झपटा। उसने एक हाथ से बाघ का गला पकड़ा और दूसरे से पत्थर उठाकर उसे पीट−पीटकर मार दिया। बाघ के पंजों से युवक भी घायल हुआ है और अस्पताल में है।
बेतूल जिले के बिसनौर तहसील में एक युवक और सिंह के बीच कुश्ती होने का समाचार मिला है। यात्रियों का एक दल जब बैलगाड़ी से दूसरे गाँव जा रहा था तो रास्ते में एक युवक ने शेर का सामना किया और बिना साहस खोये आधा घण्टे तक उस दुर्दान्त पशु से द्वन्द्व युद्ध करता रहा। पश्चात् शेर को अन्य ग्रामीणों की सहायता से मार दिया गया।
टिहरी अस्पताल में केसर पट्टी के नीली गाँव का एक नवयुवक भैरवदत्त घायल होकर भर्ती हुआ है। उसने तीन दिन पूर्व अपने गाँव में भालू से भिड़कर अदम्य साहस का परिचय दिया था। खेतों में छिपे पाँच भालुओं के एक परिवार ने उस पर हमला किया था पर युवक ने कुल्हाड़ी से उनका सामना किया। दो भालू मारे गये और तीन भाग गये।
जो साहस हिंस्र पशुओं को परास्त करने में काम करता है वही चोर डाकुओं का मुकाबला करने में भी प्रयुक्त हो सकता है। यदि प्रतिरोध के लिए व्यक्ति −गत साहस और सामूहिक जन−बल संगठित हो तो उनकी वैसी दाल न गलने पावे जैसी कि आजकल जगह जगह गल जाती है।
डाकुओं से मुकाबला
बदायूँ जिले के मोहन नगला नाम के ग्राम के वासियों ने सशस्त्र डाकू दल का मुकाबला करके वीरता का परिचय दिया और गाँव को लूटे जाने से बचा लिया। डाकू झाझन नामक व्यक्ति के यहाँ डाका डालना चाहते थे, उनने गोली भी चलाई पर गाँव वाले डरे नहीं, उनने लाठी और बल्लमों से ही मुकाबला किया और एक डाकू को जीवित ही पकड़ लिया।
करौली डिवीजन के करोड़ ग्राम में हीरालाल नामक व्यक्ति के यहाँ डकैती डालकर मारा पीटा और उसके जेवर तथा अन्य सामान लूट लिया। ग्रामीणों ने डाकुओं का चम्बल पार मध्य−प्रदेश तक पीछा किया और दो को पकड़ लिया। पुलिस अधीक्षक ने ग्रामीणों के साहस से प्रभावित होकर उन्हें दो बन्दूकें एवं कुछ नकद पारितोषिक देने की सिफारिश की है। प्रयाग के लाहंदा गाँव में डकैती डालने के लिए आये हुए दस डाकुओं का मुकाबला किया गया और पीछा करके उन्हें गाँव से उलटे पैरों भाग जाने को विवश कर दिया।
मथुरा में बाबूगढ़ के खादर में डकैतों के एक दल और ग्रामीणों के संगठित दल में देर तक गोली चली, अन्त में ग्रामीणों ने एक डकैत को देशी बन्दूक तथा 26 कारतूसों व एक हाथ गोले के साथ पकड़ लिया। शेष डाकू भाग गये। कानपुर जिले के चिगौल ग्राम निवासियों ने डकैती डालने आये डाकुओं का आठ मील तक पीछा किया और अन्त में 4 डकैतों को पकड़ लाये। डाकुओं द्वारा बड़े पैमाने पर गोलियाँ चलाने पर भी ग्रामीण भयभीत नहीं हुए और लाठियों तथा ईंट-पत्थरों से उनका मुकाबला करते रहे।
राँची के एक किसान की बहादुरी और बुद्धिमानी के द्वारा किस प्रकार एक भीषण डकैती बचा ली गई, इस सम्बन्ध में एक समाचार जिले के सरीडकेल ग्राम से प्राप्त हुआ है। कहा जाता है कि डकैतों का एक गिरोह उक्त किसान के घर पहुँचा और जब सैंध लगा रहा था तो किसान जाग पड़ा। उसने धैर्य नहीं खोया और चुपके से छत से उतर कर डकैतों के गिरोह में मिल गया। मौका देखकर उसने एक डकैत के हाथ पर फरसे से वार किया। उक्त डकैत के हाथ में एक भरी बन्दूक थी। वह वहीं लुढ़क गया। पश्चात् किसान और डकैतों में उठा−पटक और लड़ाई हुई। किसान ने अन्य दो डाकुओं की भी बुरी तरह मरम्मत की। डकैत भयभीत होकर भाग गए। डकैतों का सरदार बुरी तरह घायल हो गया तथा किसान ने रात भर उसे पकड़े रखा। सवेरे उसे पुलिस को सौंप दिया गया।
प्रयत्न और पुरुषार्थ, धैर्य और साहस, आशा और उत्साह, त्याग और बलिदान, शौर्य और पराक्रम के गुण जिनके पास हैं उनके लिये कोई विपत्ति देर तक मार्ग रोके खड़ी नहीं रह सकती। कोई विघ्न उनको विचलित नहीं कर सकता। सफलता साहस के चरण चूमती रहती है। पुरुषार्थी लोग अपने भाग्य का निर्माण आप करते हैं।
सबसे करना प्रेम जगत में यही धर्म सच्चा है।
जो हैं जग में हीन पतित अति, उनको गले लगाओ।
जो हैं दीन दुखी व पीड़ित उनको धीर बंधाओ॥
जिन्हें न कोई त्राता जग में उनको जा अपनाओ।
जो रोते हैं उन्हें हंसाओ, सबसे प्रेम जताओ॥
सब में प्रभु का रूप निहारो, यही भाव अच्छा है।॥ सब से.॥
सबसे हिलमिल रहना सीखो, करो न द्वेष किसी से॥
सबसे मीठी वानी बोलो, होगा भला इसी से।
जो अनाथ हैं उन्हें सहारा देना बड़ी खुशी से॥
तुच्छ न समझो कभी किसी को, रखना नेह सभी से।
गिरे हुए हैं, उन्हें उठाओ यही मार्ग अच्छा है।॥सब से.॥
एक प्रभु के सब बालक हैं सब हैं उसके प्यारे॥
अहंकार से बने हुए हैं हम सब न्यारे न्यारे।
हिन्दू, मुस्लिम, जैन, पारसी, बौद्ध, सिक्ख, ईसाई॥
सब भारत माता के जाये, सब हैं भाई भाई।
फिर भाई-भाई आपस में लड़ना क्या अच्छा है।॥ सब से.॥
जहाँ निराशा, उदासीनता का हो गहन अंधेरा॥
आलस, जड़ता, निष्क्रियता का जहाँ पड़ा हो डेरा।
वहाँ ज्ञान का दीप जलाकर नव प्रकाश फैलाओ।
सारा जग आनन्द मग्न हो, ऐसा राग सुनाओ॥
सबको सुख पहुँचाना, केवल यही कर्म अच्छा है।॥ सब से.॥
जो है अपने पास कला, विद्या या धन-संपत्ति।
सबके हित में उसे लगाओ यदि चाहते मुक्ति॥
मेरा मेरा मत कर भाई यहाँ नहीं कुछ तेरा।
छोड़ छाड़ सब चलना होगा, दुनियाँ रैन बसेरा॥
इसीलिये सेवामय जीवन जीना ही अच्छा है।॥ सब से.॥
—रामकुमार भारतीय
*समाप्त*