चले नैतिकता अपनी भूल, चयन करने चिर सुख के फूल!
उठा करतीं लहरें रमणीक—उदधि फिर भी रहता है शान्त।
सुखी वह, जिसका हृदय विशाल—बना देती अतृप्ति ही क्लान्त॥
इन्द्रियाँ हैं जिसकी अनुकूल, उसी का जीवन सुख का मूल!
अनेकों बाधाओं के बाद— पथिक को मिलता कुछ आभास।
गहनतम के अन्तर में निहित— सर्वदा पावन दिव्य−प्रकाश॥
हटा लेता जो श्रम कर धूल, वही जाता, मोती पा फूल!
शलभ को मिलती जलकर शान्ति—त्याग ही सुख शाश्वत अभिराम।
साधन ही, जो हो निष्काम— साध्य बन जाती है अविराम॥
बिछाओ जग के पथ में फूल, उठाकर तुम्हें मिलें जो शूल!
—रामस्वरूप खरे “साहित्यरत्न”
अष्टग्रही योग के संदर्भ में गत सितम्बर अंक में यह बताया गया था कि इस प्रक्रिया के फलस्वरूप एक ओर जहाँ अगले दस वर्षों तक मानव जाति को कई आपत्तियों का सामना करना पड़ेगा वहाँ दूसरी ओर नवीन युग के आविर्भाव का श्रीगणेश भी होगा। विनाश के अशुभ कारणों के समाधान के लिए हमें अपनी उपासना एवं पुण्य प्रवृत्तियों को बढ़ाना चाहिए। धर्म कर्मों की की अभिवृद्धि होने से वातावरण में पवित्रता उत्पन्न होती है और उसके फलस्वरूप जो दैवी अशुभ अनिष्ट आने वाले हैं वे भी शान्त होते हैं। इस दिशा में आवश्यक प्रेरणाएँ दी जा रही हैं और वैयक्तिक एवं सामूहिक धर्मानुष्ठानों में प्रवृत्ति बढ़ रही है। यह प्रयत्न उत्साहपूर्वक बढ़ते रहें तो प्रकृति के अशुभ प्रयत्नों पर भी एक बड़ी सीमा तक काबू पाया जा सकता है, उनका बहुत अंशों में समाधान हो सकता है।
संदर्भ का दूसरा महत्व
दूसरी प्रक्रिया जो इस योग के आधार पर विकसित होने वाली है। वह युग−निर्माण की है। भारत का भविष्य सब प्रकार उज्ज्वल बनाने में यह योग बहुत ही महत्वपूर्ण है। तीस वर्ष बाद भारत संसार की सबसे बड़ी शक्ति होगा। विश्व का नेतृत्व यहीं की सभ्यता और संस्कृति करेगी और विज्ञान, उत्पादन, स्वास्थ्य, शिक्षा, शिल्प, राजनीति, शस्त्र, सेना, धर्म, सभ्यता की दृष्टि से इस देश की महत्ता सर्वोपरि हो जायगी। इस स्थिति का शुभारंभ भी अभी से होना है। अष्टग्रही योग के साथ−साथ यह निर्माणात्मक प्रक्रियाऐं भी अपने आप विकसित होंगी।
अखण्ड ज्योति परिवार की ओर से यह दोनों ही कार्यक्रम सुसंयत ढंग से चल रहे हैं। व्यक्तिगत उपासना की कक्षा ऊँची एवं तीव्र करने के लिए पंचसूत्री साधना क्रम चल रहा है। अशुभ अनिष्ट की शान्ति के लिए सामूहिक धर्मानुष्ठानों की गतिविधियाँ सक्रिय हैं। युग निर्माण की दिशा में जो कार्यक्रम पिछले पच्चीस वर्षों से किसी रूप में चल रहा था उसे भी अब सुव्यवस्थित रूप दिया जा रहा है। आत्मिक उत्कृष्टता और भौतिक श्रेष्ठता के दोनों लक्ष प्राप्त करने के लिए अब तक के चलते आ रहे अभियान को इस पुण्य पर्व पर बहुत ही सुव्यवस्थित रूप दिया गया है और इसे सुसंयत रूप से अग्रगामी बनाया जायेगा। अखण्ड ज्योति जिस मिशन को लेकर अवतीर्ण हुई थी उसे उसने अब तक बहुत शानदार ढंग से निबाहा है। अब आगे के दस वर्ष तो उसे जी जान से जुट जाने के लिए मिले हैं। लक्ष की पूर्ति के लिए हम सब को अब उसी ओर द्रुतगति से अग्रसर होना है।
हमारे दो कार्यक्रम
हम आत्मकल्याण और युग निर्माण—इन दो कार्यक्रमों को लेकर आगे बढ़ रहे हैं। गाड़ी के दो पहियों की तरह हमारे जीवन के दो पहलू हैं एक भीतरी दूसरा बाहरी। दोनों के सन्तुलन से ही हमारी सुख शान्ति स्थिर रह सकती है और इसी स्थिति में प्रगति सम्भव है। मनुष्य आत्मिक दृष्टि से पतित हो, दुर्मति, दुर्गुणी और दुष्कर्मी हो तो बाहरी जीवन में कितनी ही सुविधायें क्यों न उपलब्ध हों वह दुखी ही रहेगा। इस प्रगति की यदि बाह्य परिस्थितियाँ दूषित हैं तो आन्तरिक श्रेष्ठता भी देर तक टिक न सकेगी। असुरों के प्रभुता काल में बेचारे सन्त महात्मा जो किसी का कुछ नहीं बिगाड़ते थे अनीति के शिकार होते रहते थे। भगवान राम जब वनवास में थे तब उन्होंने असुरों द्वारा मारे गये सन्त महात्माओं की अस्थियों के ढेर लगे देखकर बहुत दुख मनाया। जिस समाज में दुष्टता और दुर्बुद्धि बढ़ जाती है उसमें सत्पुरुष भी न तो अपनी सज्जनता की और न अपनी ही रक्षा कर पाते हैं। इसलिए जीवन के दोनों पहलू ही रथ में जुते हुए दो घोड़ों की तरह सम्भालने पड़ते हैं। दोनों में ताल−मेल बिठाना पड़ता है। रथ का एक घोड़ा आगे की ओर चले और दूसरा पीछे की तरफ लौटे तो प्रगति रुद्ध जो जाती है। इसी प्रकार हमारा बाह्य जीवन और आन्तरिक स्थिति दोनों का समान रूप से प्रगतिशील होना आवश्यक माना गया है।
आत्मा सूक्ष्म है, निराकार है। स्थूल वस्तुओं की सहायता से ही उसका अस्तित्व और आकार सामने आता है। शरीर के आधार पर वह कार्य करता है, मन के आधार पर वह सोचता है और संसार क्षेत्र में गतिशील रहता है। शरीर, मन और संसार यह तीनों ही आत्मा के बाह्य शरीर हैं। इन तीनों की सुव्यवस्था पर आत्मिक स्थिरता निर्भर रहती है। आत्म कल्याण के लिए ईश्वर उपासना एवं योग साधना की आवश्यकता होती है; यह हमारी अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इसकी पूर्ति के लिए ऋषियों, शास्त्रों एवं पुरोहितों ने हमें कुछ−न−कुछ समय नित्य लगाते रहने का आदेश दिया है उपासना और साधना रहित व्यक्ति की आत्मा मलीन और पतनोन्मुख हो जाती है। स्वार्थ और भोग का नशा उसे पाप की नारकीय ज्वाला में घसीट ले जाता है। इसलिए अपने अस्तित्व का सही रूप जानने और अपने लक्ष के प्रति गतिशील रहने के लिए उसे आध्यात्म का सहारा लेना पड़ता है। आत्म−कल्याण का यही मार्ग है।
जीवन के तीन आधार
जितनी आवश्यकता आत्म−कल्याण की है उतनी ही जीवन के तीन आधारों को स्वस्थ रखने की है। शरीर, मन और समाज यही तीन आधार हैं जिन पर हमारी जीवन−यात्रा गतिवान रहती है। शरीर अपंग हो जाय, मन उन्मादग्रस्त हो जाय और संसार में युद्ध, दुर्भिक्ष, महामारी, भूकम्प जैसी आपत्तियाँ उत्पन्न हो जाएँ तो शांति रहेगी? कहाँ तो प्रगति टिकेगी? आत्म−कल्याण का लक्ष भी इन परिस्थितियों में किस प्रकार उपलब्ध हो सकेगा?
राजशासन और सामाजिक संस्थानों द्वारा यह प्रयत्न किसी न किसी रूप में रहता ही है कि जनता का शरीर, मन और सामाजिक स्तर सुस्थिर रहे। इसके बिना भौतिक प्रगति के सारे प्रयत्न निष्फल रहेंगे। जिस देश के निवासी बीमारी और कमजोरी से घिरे हों, मनों में अविवेक, अन्धविश्वास, असन्तोष घर किये हुए हों, समाज में द्वेष, असहयोग, अनीति, पाप, स्वार्थ जैसी प्रवृत्तियाँ पनप रही हों तो उस देश का भविष्य उज्ज्वल कैसे हो सकता है? चाहे कोई देश हो या समाज, गाँव हो या घर, परिवार हो या व्यक्ति , जहाँ भी यह असन्तुलन रहेगा, वहाँ न सुख दृष्टिगोचर होगा न शान्ति। पतन और पीड़ा विक्षोभ और असफलता ही वहाँ फैली फूटी दिखाई पड़ेगी।
एक समस्या के दो पहलू
भौतिकता और आध्यात्मिकता का परस्पर संयोग है। दोनों एक दूसरे से जुड़ी हुई हैं। एक के बिना दूसरी अधूरी है। जंगल में गुफा में भी रहने वाले विरक्त महात्मा को भोजन, प्रकाश, वस्त्र, माला, कमंडल, आसन, खड़ाऊ, पुस्तक, कम्बल, आग आदि वस्तुओं की आवश्यकता रहेगी ही और इन सब को जुटाने का प्रयत्न करना ही पड़ेगा, इसके बिना उसका जीवित रहना भी सम्भव न रहेगा। इतनी भौतिकता तो गुफा निवासी महात्मा को भी बरतनी पड़ेगी और अपने परिवार के प्रति प्रेम और त्याग बरतने की आध्यात्मिकता चोर उठाईगीरे और निरन्तर स्वार्थरत भौतिकवादी को भी रखनी पड़ेगी। भौतिकता को तमतत्व और आध्यात्मिकता को सततत्व, माना गया है। दोनों के मिलने से रजतत्व बना है। इसी में मानव की स्थिति है। एक के भी समाप्त हो जाने पर मनुष्य का रूप ही नहीं रहता। तम नष्ट होकर सत ही रह जाय तो व्यक्ति देवता या परमहंस होगा। यदि सत नष्ट होकर तम ही रह जाय तो असुरता या पैशाचिकता ही बच रहेगी। दोनों स्थितियों में मनुष्यत्व का व्यतिरेक हो जायेगा। इसलिए मानव जीवन की स्थिति जब तक है तब तक भौतिकता और आध्यात्मिकता दोनों ही साथ−साथ रहने वाली हैं। अन्तर केवल प्राथमिकता का है। सज्जनों के लिए आध्यात्मिकता की प्रमुखता रहती है, वे उसकी रक्षा के लिए भौतिक आधार की बहुत अंशों तक उपेक्षा भी कर सकते हैं। इसी प्रकार दुर्जनों के लिए भौतिकता का स्थान पहला है वे उस प्रकार के लाभों के लिए आध्यात्मिक मर्यादाओं का उल्लंघन भी कर देते हैं। इतने पर भी दोनों ही प्रकृति के लोग किसी न किसी रूप में भौतिक और आत्मिक तथ्यों को अपनाते ही हैं, उन्हें अपनाये ही रहना पड़ता है।
अगली कक्षाओं में प्रवेश
आत्म−कल्याण की महान प्रक्रिया गायत्री उपासना की प्रथम कक्षा को बढ़ाकर अब दूसरी कक्षा का कार्यक्रम प्रस्तुत कर दिया गया है। जप, अनुष्ठान हवन से आगे बढ़कर पंचकोशों के अनावरण के लिए उठाये गये कदम प्रगति की दृष्टि से आवश्यक थे। इसी प्रकार युग−निर्माण के लिए भी अब अगली कक्षा आरंभ होनी ही है। यह अगले कदम अधिक महत्वपूर्ण, अधिक उपयोगी, अधिक प्रभावशाली, अधिक व्यापक होंगे। छोटी कक्षाओं की तुलना में उच्च कक्षाएँ हर दृष्टि से भारी बैठती हैं, हमारे अगले कार्यक्रम भी अधिक उच्चकोटि के होने हैं। एक वर्ष के अज्ञातवास का अवकाश इसी की तैयारी के लिए था।
ऊपर कहा जा चुका है कि आत्मा का बाह्य−कलेवर, भौतिक क्रिया कलाप—शरीर, मन और समाज के तीन आधारों पर उसी प्रकार आधारित है जिस प्रकार हमारा आन्तरिक स्तर अन्नमय−कोश, मनोमय कोश, प्राणमय−कोश, विज्ञानमय−कोश, आनन्दमय-कोश के पाँच संस्थानों पर निर्भर है। आत्म−कल्याण की उच्च कक्षा में प्रवेश पाने के लिए जिस प्रकार इन पाँचों कोशों का अनावरण करना अभीष्ट है उसी प्रकार युग−निर्माण के लिए, भौतिक जीवन की सुस्थिरता के लिए (1) स्वस्थ शरीर (2) शुद्ध मन और (3) सभ्य समाज की आवश्यकता है। आध्यात्मिक और भौतिक प्रगति के दोनों पहिये जब चलेंगे तभी हम सच्ची सुख-शान्ति के अधिकारी बनेंगे। दोनों हाथ, दोनों पैर, दोनों आँख, दोनों कान, दोनों फेफड़े ठीक होने पर ही शरीर की स्वस्थता और सुडौलता निर्भर है। यदि लकवा मार जाय या कोई व्यक्ति टोंटा, लंगड़ा, काना हो जाय तो वह अधूरा अपंग ही रहेगा, इसी प्रकार हमारी आत्मिक और भौतिक प्रगति का समन्वय ही सच्चा विकास कहलावेगा। एकांगी विकास में अति है समस्वरता नहीं, वह आश्चर्यजनक हो सकती है आदर्श नहीं। हमें आदर्श को ही अपनाना पड़ेगा क्योंकि उसी में शक्ति और उसी में स्थिरता सन्निहित है।
जिस मनुष्य का व्यसनों तथा साँसारिक मोह से छुटकारा हो जाता है उसी को सच्ची प्रसन्नता प्राप्त हो सकती है। प्रसन्नता से प्रीति उत्पन्न होती है और प्रीति उत्पन्न होने से काया शान्त होती है। काया शान्त होने से सुख उत्पन्न होता है। सुख के उत्पन्न होने से चित्त समाहित हो जाता है। तब वह काम−भोगों को छोड़कर, पापों को छोड़कर, सवितर्क, सविचार तथा सविवेक प्रीति−सुख−संयुक्त ध्यान की स्थिति को प्राप्त होता है। वह इस काया को विवेक से उत्पन्न प्रीति−सुख द्वारा सींचता है, भिगोता है, पूर्ण करता है और चारों ओर से व्याप्त करता है। तब उसकी काया का कोई भी भाग विवेक से उत्पन्न उस प्रीति−सुख से अव्याप्त नहीं रहता।”
—महात्मा बुद्ध
इस सुरदुर्लभ मानव शरीर में प्राप्त हो सकने वाली शुभ सम्वेदनाओं में अवरोध उत्पन्न न हो उसके लिए यह आवश्यक है कि हमारी गतिशीलता के द्वार खुले रहें। शरीर के स्वस्थ, मन के स्वच्छ, समाज के सभ्य रहने पर ही हम उस आनन्द को प्राप्त कर सकते हैं, उस लक्ष को पूर्ण कर सकते हैं जिसके लिए यह जन्म हमें मिला है। यह तीन ही विभूतियाँ इस संसार में हैं, इन्हीं के आधार पर अन्य सब प्रकार की सम्पदायें उपलब्ध होती हैं। जिसके पास पारस होगा उसे धन की क्या कमी रहेगी? जिसके पास अमृत होगा उसे मृत्यु से क्यों डरना पड़ेगा? जिसके घर में कल्पवृक्ष होगा उसकी कोई कामना क्यों अपूर्ण रहेगी? स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की गणना पारस, अमृत और कल्पवृक्ष से की जा सकती है। पुराणों में वर्णित ये तीन विभूतियाँ चाहे काल्पनिक ही सिद्ध क्यों न हों पर यह प्रत्यक्ष विभूतियाँ ऐसी हैं जिन का सत्परिणाम हाथों हाथ देखा जा सकता है।
सुरक्षा और सदुपयोग
हर वस्तु की सुरक्षा उसके सदुपयोग पर निर्भर है। घड़ी कितनी ही कीमती क्यों न हो यदि उसे बेहिसाब छेड़ते रहा जायेगा तो बेचारी खराब हो ही जायगी। अनियमितताओं का दबाव कोई भी वस्तु देर तक बर्दाश्त नहीं कर सकती। देर तक सुरक्षित रखना हो तो सावधानी और नियमितता का ध्यान रखना पड़ेगा। शरीर, मन और समाज के बारे में भी यही बात है। इन तीनों में स्वभावतः कोई खास बुराई या कमी नहीं है, परमात्मा ने यह तीनों ही बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ रची हैं और इस योग्य बनाई हैं कि इनके आधार पर आत्मा भूलोक में ही स्वर्गलोक का आनन्द प्राप्त कर सके। किन्तु अनियमितताओं से तो सभी को हारना पड़ता है। हमारे दोषपूर्ण व्यवहार के कारण यह सब कुछ उलटा हो जाता है। जो सामग्री सुख शान्ति के साधनों के रूप में विनिर्मित और उपलब्ध हुई थी वह उलटी दुख और अशान्ति का हेतु बन जाती है।
असंयम ही रोग का कारण
स्वास्थ्य संयम पर निर्भर है। इन्द्रियों का संयम, आहार का संयम, ब्रह्मचर्य का संयम, दिनचर्या का संयम, उत्तेजनाओं का संयम यदि रखा जा सके तो फिर स्वास्थ्य बिगड़ने का प्रारब्धजन्य कर्म भोगों के अतिरिक्त और कोई कारण शेष नहीं रह जाता। यदि संयम साध लिया जाय तो गरीबी में दिन काटने वाला, घटिया आहार पाकर भी निरोग और दीर्घजीवी रह सकता है। इसके विपरीत असंयमी व्यक्ति विपुल धनवान होकर मूल्यवान आहार और औषधियों का सहारा मिलने पर भी रोगों से ग्रसित बना रहेगा। कमजोरी और बीमारी का अभिशाप असंयम के दंड स्वरूप मिलता है। यदि इन आपत्तियों से छूटना हो तो अपनी उच्छृंखल आदतों को संयमित करना पड़ेगा। इसके बिना स्वास्थ्य सुधार के जितने भी उपाय किये जायेंगे वे क्षणिक चमत्कार भले ही दिखा दें अन्ततः असफल ही रहेंगे। कोई औषधि कोई पद्धति ऐसी नहीं है जो असंयम के रहते हुए आरोग्य को सुरक्षित रख सके। जिसने संयम साध लिया उसके लिए उपयोगी आहार का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह जाता। घास खाकर घोड़ा, पत्ती खाकर हाथी, मैला खाकर सुअर यदि बलवान रह सकता है तो कोई कारण नहीं कि अन्न शाक और दूध जैसे उत्तम पदार्थ प्राप्त करके भी मनुष्य निरोग एवं दीर्घजीवी न रह सके। असंयम ही वह असुर है जो हमारी स्वास्थ्य संपदा को सब प्रकार चौपट किये दे रहा है। इसे मार भगाने का व्यापक अभियान यदि आरंभ किया जाय तो ही स्वास्थ्य की समस्या हल हो सकेगी। अस्पताल और डाक्टर तो क्षणिक उपचार कर सकते हैं, तात्कालिक लाभ दिखा सकते हैं। आरोग्य तो हमारी आदतों पर निर्भर है, यदि जीवन-यापन संबंधी आदतें बिगड़ी हुई हैं तो निरोगता को स्थिर रख सकना किसी भी प्रकार संभव न होगा।
मानसिक आरोग्य का आधार
शरीर रोगी होने से देह दुख पाती है; मन रोगी होने पर हमारा अन्तःकरण नरक की आग में झुलसता रहता है। कई व्यक्ति देह से तो निरोग दीखते हैं पर भीतर ही भीतर इतने अशान्त और उद्विग्न रहते हैं कि उनका कष्ट रोगग्रस्तों से भी कहीं अधिक दिखाई पड़ता है। ईर्ष्या द्वेष, क्रोध, प्रतिशोध की आग में जो लोग जलते रहते हैं उन्हें आग से जलने पर छाले पड़े हुए रोगी की अपेक्षा अधिक अशान्ति और उद्विग्नता रहती है। घाटा, अपमान, भय, आशंका, चिन्ता, शोक, असफलता, निराशा आदि कारणों से खिन्न बने हुए मन में इतनी गहरी व्यथा होती है कि उससे छूटने के लिए कई तो आत्म-हत्या तक कर बैठते हैं और कइयों से उसी उद्वेग में ऐसे कुकृत्य बन पड़ते हैं जिनके लिए उन्हें जीवन भर पश्चात्ताप करना पड़ता है। ओछी तबियत के कुछ आदमी हर किसी को बुरा समझने, हर किसी में बुराई ढूँढ़ने के आदी होते हैं, उन्हें बुराई के अतिरिक्त और कुछ कहीं भी-दीख नहीं पड़ता। ऐसे लोगों को यह दुनिया काली डरावनी रात की तरह और हर आदमी प्रेत-पिशाच की तरह भयंकर आकृति धारण किये चलता-फिरता नजर आता है। इस प्रकार की मनोभूमि के लोगों की दयनीय दशा का अनुमान लगाने में भी व्यथा होती है।
क्रूर, निर्दयी, अहंकारी, उद्दंड, दस्यु, तस्कर, ढीठ, अशिष्ट, गुंडा प्रकृति के लोगों के शिर पर एक प्रकार का शैतान हर घड़ी चढ़ा रहता है। नशे में मदहोश उन्मत्त की तरह उनकी वाणी, क्रिया एवं चेष्टाएँ होती हैं। कुछ भी आततायीपन वे कर गुजर सकते हैं। तिल को ताड़ समझ सकते हैं, खटका मात्र सुनकर क्रुद्ध विषधर सर्प की तरह वे किसी पर भी हमला कर सकते हैं। ऐसी पैशाचिक मनोभूमि के लोगों के भीतर श्मशान जैसी प्रतिहिंसा और दर्प की आग जलती हुई प्रत्यक्ष देखी जा सकती है।
मनोविकारों के दुष्परिणाम दीन, हीन, दरिद्र, अभागे, पतित, क्षुद्र, निराश प्रकृति के लोग सदा दुख और पतन की ही बात सोचते हैं, उन्हें दुर्भाग्य का ही रोना रोते और भविष्य के निराशा पूर्ण चित्र बनाते हुए ही देखा जायेगा। इन्हें संयोगवश कुछ सुख साधन मिल भी जाय तो भी उनकी वेषभूषा, मुखाकृति, भावभंगिमा निराश और दीन मनुष्यों जैसी ही मिलेगी। चोर, उठाईगीरे व्यभिचारी लम्पट, प्रकृति के लोग दूसरों के धन पर, रूप यौवन पर ही लार टपकाते रहते हैं। बेईमान, रिश्वतखोर, ठग, धोखेबाज, डाकू प्रकृति के लोग दूसरों के खीसे पर ऐसे ही घात लगाये रहते हैं जैसे बगुला मछली को ताकता रहता है। ऐसे लोगों का मलीन मन भला कहीं चैन पा सकता है? वे अभागे यह नहीं जानते कि मानसिक स्वच्छता की भी कोई स्थिति इस संसार में होती है और उसे प्राप्त करने वाला स्वर्गीय सुख शान्ति का अनुभव कर सकता है।
मनोविकार अगणित प्रकार के हैं और वे सभी अपने-अपने ढंग के रोग हैं। शरीर के रोग को दूसरे भी जान सकते हैं पर मन का रोग भीतर छिपा होने से वह केवल रोगी को ही दीखता है। इतना अन्तर तो अवश्य है बाकी कष्टों में कोई अन्तर नहीं। सच तो यह है कि शरीर के कष्ट से मन का कष्ट अधिक दुखदायी होता है। बुखार में पड़े रोगी को जितनी पीड़ा है, पुत्र शोक से संतप्त व्यक्ति को उससे कहीं अधिक है। सिर दर्द की तुलना में अपमान और असफलता का दुख गहरा है। क्रुद्ध और कामासक्त मनुष्य जितना असंतुलित दीखता है उतना जुकाम खाँसी का मरीज नहीं। लोभी और स्वार्थी जितना पाप प्रवृत्त रहता है उतना भूखा और दरिद्र नहीं। रोगी मनुष्य स्वयं जितना व्यथित रहता है, और दूसरों को जितना दुख देता है उसकी अपेक्षा मनोविकार ग्रस्त का क्षेत्र अधिक विस्तृत है। वह स्वयं भी अधिक दुख पाता है और दूसरे अधिक लोगों को अधिक मात्रा में सताता भी है। इसलिए शारीरिक आरोग्य की जितनी आवश्यकता अनुभव की जाती है, मानसिक आरोग्य पर उससे भी अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए।
समाजगत सामूहिक दुष्प्रवृत्तियाँ
समाजगत दोष एक प्रथा और परम्परा का रूप धारण कर लेते हैं, उनका प्रभाव छोटे बालकों के कोमल मन पर संस्कार की तरह जम जाता है और वे उन बुराइयों के ऐसे अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें वे हानिकारक तक नहीं दीखतीं, वरन् अभ्यस्त होने के कारण प्रिय भी लगने लगती हैं। ऐसी अनेकों सामाजिक कुरीतियाँ हमारे समाज में फैली हुई हैं जिनके कारण असंख्य जीवन बुरी तरह बर्बाद होते हैं और उन की सड़न की दुर्गन्ध से सारा वातावरण दूषित होता है। हम अपने हिन्दू समाज को ही लें, कितनी ही अमानवीय, अनैतिक, अविवेकपूर्ण परम्परायें हमारे मस्तिष्क पर हावी हो गई है। उन्हें यदि निष्पक्ष विचारक एवं समीक्षक की दृष्टि से देखा जाय तो निस्संदेह उन्हें गर्हित एवं त्याज्य ही स्वीकार किया जायेगा। पर चूँकि वे हमारे अभ्यास में आ गई हैं इसलिए न तो अनुचित लगती हैं और न त्याज्य। प्रिय वस्तु के पक्ष में मस्तिष्क दलीलें भी गढ़ लेता है और बेईमान वकील की तरह अपने झूठे मुवक्किल को जिताने के लिए दलीलों पर दलीलें पेश करता जाता है। इस प्रकार सामाजिक रोगों की जड़ें बहुत गहरी होती हैं, अनेक लोगों के दिमागों में वे फैली होती हैं इसलिए उनका उन्मूलन शारीरिक और मानसिक रोगों से भी अधिक कष्टसाध्य होता है।
व्यक्तिगत रोगों की अपेक्षा हैजा, प्लेग, इन्फ्लुएञ्जा, चेचक आदि संक्रामक रोग अधिक चिन्ताजनक माने जाते हैं—क्योंकि व्यक्तिगत रोगों से केवल रोगी को ही कष्ट होता है पर इन संक्रामक रोगों की छूत एक से दूसरे को लगती है और देखते−देखते बहुत बड़ा जन−समूह उन महामारियों का शिकार हो जाता है। सामाजिक अस्वस्थता की भी ठीक ऐसी ही स्थिति है। महामारियों की तरह उनका क्षेत्र भी व्यापक होता है और दुष्परिणाम भी। इसलिए इस ओर भी हमें पूरी−पूरी सावधानी बरतनी होगी अन्यथा शारीरिक और मानसिक आरोग्य प्राप्त करने के सारे प्रयत्न भी निष्फल चले जाएँगे और सामाजिक बीमारियाँ हमारे जीवन क्षेत्र को कलुषित एवं कुंठित बनाकर हमें गिरी दशा में ही पड़े रहने को विवश करती रहेंगी।
गाढ़ी कमाई की मूर्खतापूर्ण आतिशबाजी
विवाहों में होने वाली धूमधाम पर जितना पैसा हम खर्च करते हैं क्या उसके पीछे कोई औचित्य है? धन की बर्बादी को रोककर क्या वह पैसा वर−वधू के स्वास्थ्य या शिक्षा की उन्नति में नहीं लगाया जा सकता? यह प्रश्न हर समझदार आदमी के लिए विचारणीय है। दो दिन की धूमधाम में समय और शक्ति की इतनी बर्बादी का आखिर कोई प्रयोजन, कोई उद्देश्य कोई लाभ भी तो हो? विवेक कहता है कि यह परले सिरे की मूर्खता है। गरीब लोग इस आतिशबाजी में अपनी हड्डी, पसलियों को बारूद की तरह जला डालते हैं। वे कर्जदार हो जाते हैं, अपनी रोजी−रोटी से हाथ धो बैठते हैं, बाकी के छोटे बच्चों का भविष्य अन्धकारमय बना लेते हैं। घर की पूँजी एकाध शादी में ही बारूद की तरह उड़ जाती है, शेष बच्चे, छोटे बहिन-भाई दरिद्रता के अभिशाप में स्वास्थ्य और शिक्षा से भी वञ्चित हो जाते हैं। दहेज का राक्षस कितनी अबोध कन्याओं के कलेजे चीर−चीर कर खाये जा रहा है इसे हम सब खुली आँखों से देखते हैं। कितनी अधखिली कलियों को विषपान, फाँसी लगाकर तेजाब छिड़ककर, आत्महत्या करनी पड़ती हैं, कितनी ही बूढ़ों का ब्याही जाती हैं, कितनी ही कवारी रहती हैं, कितनी ही बहकाई और पथ भ्रष्ट की जाती हैं। दहेज के बूचड़खाने में कितनी कटी और अधकटी उधेड़ी और बिना उधेड़ी हुई बच्चियों की लाशें टंगी दीखती हैं। जिनकी आँखें हों वे अखबारों में रोज ही छपने वाले ऐसे समाचार पढ़ते रह सकते हैं, जिनके कलेजा हो वे अपने समाज की नृशंसता पर आँसू बहाते हुए सिसक−सिसक कर रो सकते हैं। इतना होने पर भी हम इन बुराइयों को रोक नहीं सकते। क्योंकि उनने एक सामाजिक रोग का रूप धारण कर लिया है। हर समझदार इस बुराई को जानता है और जब अपने ऊपर आ बनती है तब उसे महसूस भी करता है, पर बेचारा करे क्या, सामाजिक रोग तो आखिर सामाजिक रोग ही है, उसने परम्परा का रूप धारण कर लिया है उसे कैसे मिटाया जाय? कैसे हटाया जाय?
मृत्यु−भोज का श्मशान कर
रोते कलपते उन लोगों को मृत्यु भोज की लम्बी−चौड़ी दावत करने को विवश होना पड़ता है, जिनके घर में से कमाने वाले जवान आदमी की लाश उठे दो सप्ताह भी नहीं हुए हैं। एक ओर शोक की पीड़ा, एक ओर कमाऊ व्यक्ति के उठने से आर्थिक अव्यवस्था, और एक ओर समाज का श्मशान कर मृत्युभोज। शैव्या को रोहिताश्व के मरने पर अपनी आधी साड़ी फाड़कर मरघट का कर चुकाना पड़ा था। आज असंख्यों गृहस्थियाँ मृत्युभोज के रूप में अपने रोहिताश्वों के मरने का श्मशान कर चुकाने को विवश हैं। उन्हें मृत्यु भोज खिलाना पड़ेगा। अन्यथा चौधरी और पञ्च बात न कहने देंगे। रोते-कलपते लोगों के दरवाजे पर मृत्यु भोज खाने जा पहुँचने वाले मनुष्यों को विवेक की आँख से देखा जाय तो वे मुर्दे का माँस खाने वाले चील कौओं से दीखते हैं पर इनके विरुद्ध कोई कुछ कहे कैसे? सामाजिक रोग के विरुद्ध कौन आवाज उठाये? कौन उसका प्रतिरोध करके अपने को समाज की नजरों में गिराये? समय आने पर उस मृत्युभोज का विरोध करने वालों को मस्तक झुकाना पड़ता है। सामाजिक बुराइयाँ कोई हँसी खेल थोड़े ही है।
घूँघट और पर्दे की प्रथा ने नारी को पिंजड़े के पक्षी जैसी अपंग स्थिति में पहुँचा दिया है यह किससे छिपा है? बाल विवाह, वृद्ध विवाह, कन्या विक्रय, वर विक्रय जैसी कुरीतियों के अन्तिम परिणाम क्या होते हैं इसे कौन नहीं जानता? पर अभी भी यह कुरीतियाँ जीवित हैं। राजस्थान और मध्य−प्रदेश के देहातों में अभी भी इतनी छोटी आयु के बच्चों के इतनी अधिक संख्या में विवाह होते हैं कि स्तब्ध रह जाना पड़ता है। सुनते हैं कि कोई बाल−विवाह विरोधी कानून भी बना हुआ है पर इन बहुसंख्यक विवाहों को देखते हुए यह विश्वास करना कठिन होता है कि सचमुच ही कोई ऐसा कानून होगा। अल्पायु के बच्चे जब गृहस्थ क्रीड़ा करने लगेंगे तो उसका प्रभाव उन पर तथा उनकी संतान पर कैसा पड़ेगा यह कोई गुप्त रहस्य नहीं है। इसे हर कोई जानता है पर सामाजिक रिवाज तो आखिर रिवाज ही रहेगा। एक की देखा−देखी दूसरों को इसे अपनाना ही पड़ेगा।
अन्ध विश्वास और दुर्व्यसन
अन्धविश्वास मूलक कितने ही विचारों ने लाखों व्यक्तियों के जीवन बर्बाद किये हैं। भूत, पलीत, सयाने, दिवाने किस प्रकार लोगों को दिग्भ्रान्त करते हैं, देवी देवताओं के नाम पर कितने लोग ठगे जाते हैं, संडे, मुसंडे धर्म के नाम पर कितनी विशाल धन राशि को भोली जनता से ऐंठ लेते हैं यह तथ्य किसी से छिपे नहीं हैं। दान−पुण्य और दया-धर्म के नाम पर लाखों ऐसे लोग पलते हैं जिनका स्थान जेलखानों में होना चाहिए था। साठ लाख के करीब मनुष्य रंग−बिरंगे कपड़े पहनकर, चित्र−विचित्र वेश बनाकर दान−दक्षिणा के पैसे से पलते और बदले में आलस, अनीति एवं अकर्मण्यता का वातावरण उत्पन्न करते हैं। इतने मनुष्यों का श्रम और इतना धन यदि उपयोगी कार्यों में लग सका होता तो संसार का कितना हित होता? पर ऐसा हो कैसे सकता है? प्राचीन काल से चली आ रही परिपाटी भी भला कोई तोड़ने की चीज है? उसे तोड़ने का उपक्रम कैसे बन सकता है? सामाजिक बुराई तो अंगद के पैर की तरह जहाँ जम जाती है फिर उखड़ती थोड़े ही है।
माँसाहार, जुआ, ताश, व्यसन, बीड़ी, चाय, नशा, रिश्वतखोरी, मिलावट, कम तोलना, झूठ बोलना, शेखीखोरी आदि अनेकों बुरी आदतें अब सामाजिक प्रथाओं का रूप धारण करती चल रही हैं। फैशन की तरह अनेकों शौक हमारी आदत में सम्मिलित होते चले जा रहे हैं। समय की उपेक्षा, वायदे का पालन न करना, कहकर मुकर जाना उधार को हजम कर लेना जैसी बुराइयाँ अब चतुरता को अंग बनती जा रही हैं। राजनीति में झूठ को एक आवश्यक अंग माना जाने लगा है। इस प्रकार की अनेकों अनैतिकताऐं और बुराइयाँ अब धीरे−धीरे फैशन बनती चली जा रही हैं और हमारा सामाजिक स्वास्थ्य−सामूहिक स्तर बुरी तरह नीचे गिरता चला जा रहा है।
सभ्य समाज ही अभीष्ट है
रोगी शरीर, मलीन मन और असभ्य समाज में रहने वाली आत्मा कैसे अपने लक्ष को प्राप्त कर सकेगा? कैसे आत्म−कल्याण की ओर बढ़ सकेगा? इन बन्धनों में बँधे हुए उसके पैर प्रगति के पथ पर यदि चलें भी तो उनकी गति बहुत धीमी होगी। घोड़े को नाचने की कला सिखाई जाय तो इसके साथ−साथ यह भी आवश्यक है कि उसे अपनी कला दिखाने का क्षेत्र भी मिले। आत्मा समुन्नत हो इसके लिए उपासना आवश्यक है, अनिवार्य है। पर साथ ही जिस शरीर के द्वारा जिस मन के आधार पर जिस समाज में रहकर आत्मिक प्रगति की जाती है, उनका उचित स्थिति में होना भी जरूरी है। यदि इस ओर ध्यान न दिया गया तो उपासनात्मक साधना एकाँगी रहेगी, अपूर्ण मानी जायगी और सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।
इस दृष्टि में “अखण्ड ज्योति” के आध्यात्मिक मिशन में, आत्म कल्याण और युग निर्माण के उभय-पक्षीय कार्यक्रम सन्निहित हैं। गायत्री उपासना के माध्यम से हमारी आत्म−कल्याण प्रक्रिया निष्ठा और श्रद्धा के वातावरण में चल रही है। युग निर्माण के दूसरे कार्यक्रम पर भी अब हमें आवश्यक ध्यान देना है। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज का निर्माण ही युग निर्माण का आधार हो सकता है। इसके लिए हमें उसी उत्साह से अग्रसर होना है जिस उत्साह से कि आत्म−कल्याण की साधना में संलग्न रह रहे हैं। पक्षी दो पंखों से उड़ता है, हमारी आन्तरिक और बाह्य प्रगति मिलकर ही एक उभय-पक्षीय सर्वांगपूर्ण प्रगति सिद्ध हो सकेगी।
“जो चेला मूँड़ते फिरते हैं उनको घटिया किस्म का मनुष्य समझना चाहिये। इसी प्रकार जो अपने को सिद्ध पुरुष बतलाते फिरते हैं और अपनी अलौकिक शक्तियों का बखान करते रहते हैं वे भी घटिया आदमी ही होते हैं।”
—राम कृष्ण परमहंस
युग निर्माण की पुण्य प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिए हमें मिलजुलकर बहुत कुछ करना है। अग्रगामी दस वर्षों में जो कुछ करना है उसका आरम्भ अब नहीं तो फिर कब किया जाएगा?
शरीर को स्वस्थ रखने के लिए जिस संयमशीलता की आवश्यकता है उसकी जानकारी हममें से प्रत्येक की होनी चाहिए। इतना ही नहीं कभी रोगों से पाला पड़े तो हर व्यक्ति को अपनी चिकित्सा स्वयं करने की योग्यता भी रहनी चाहिए। यह उचित और सरल है। कब्ज पर काबू पाने की विधि ज्ञात हो जाय तो फिर निरोग रहने की निश्चिन्तता हो सकती है। संयमित जीवन अपनाने की विचारधारा जितनी पनपेगी उतना ही हम आरोग्य और दीर्घ जीवन का आनन्द प्राप्त करने में सफल हो जावेंगे।
शिक्षा की केन्द्रीय व्यवस्था
गायत्री तपोभूमि में अप्रैल से आरोग्य शिक्षा एवं कल्प चिकित्सा के दो−दो महीने वाले शिविर आरम्भ होंगे। जो लोग उनमें शामिल होंगे वे लाभ प्राप्त करेंगे। पर यह सुविधा सबको तो प्राप्त नहीं हो सकती। रोगियों और शिक्षार्थियों के लिये इतनी जगह और व्यवस्था यहाँ कहाँ है, जिसमें घर−घर में बीमारी और कमजोरी से पीड़ित व्यक्तियों का उपचार एवं शिक्षण यहाँ किया जा सके। फिर घर छोड़कर बाहर जाने में काम का हर्ज और मार्गव्यय, विशेष भोजन, उपचार आदि का खर्च भी पड़ता है जिसे सहन करना हर किसी के लिए सम्भव नहीं हो सकता। एक केन्द्रीय शिक्षण संस्था एवं आदर्श चिकित्सालय के रूप में ऐसी व्यवस्था का रहना ठीक है, पर इससे आरोग्य की व्यापक समस्या का हल नहीं हो सकता। यह समाधान तो तभी होगा जब स्वास्थ्य सुधार की , संयम, शिक्षा, आसन, प्राणायाम, व्यायाम, मालिश, जल उपचार, सूर्य उपचार, वस्तिक्रिया, उपवास, आहार शास्त्र आदि की जानकारी और प्रेरणा देने वाले प्रसार केन्द्र जगह−जगह हों। वहाँ जड़ी−बूटियों से बनी थोड़ी दवा-दारु भी सामयिक उपचार के रूप में रह सकती हैं पर मूल उद्देश्य आरोग्य शिक्षा ही हो। आरोग्य सम्बन्धी अज्ञान जितना बेपढ़ों की है उतना ही पढ़े-लिखों को भी है। सच तो यह है कि इस सम्बन्ध में बेपढ़ों से, पढ़े हुए अधिक मूर्ख हैं। कृत्रिमता चटोरापन, प्रकृति के प्रतिकूल रहन−सहन, आलस, नशा, व्यसन आदि में बेपढ़ों से वे कहीं आगे हैं इसलिये वे ही रोगी भी अधिक हैं। इनको दवायें नहीं उबार सकती हैं। प्राकृतिक जीवन की आरोग्य शिक्षा को अपनाने से ही इनका भला हो सकता है और खोया हुआ आरोग्य शिक्षा को अपनाने से ही इनका भला हो सकता है और खोया हुआ आरोग्य वापिस लौट सकता है। यह कार्य असप्ताल नहीं आरोग्य शिक्षा केन्द्र ही कर सकते हैं। भले ही स्वास्थ्य सुधार के नाम पर सही पर यदि हम स्वयं संयम सीखें और दूसरों को संयम सिखावें तो बाहर से भौतिक दीखते हुए भी वस्तुतः यह एक आध्यात्मिक कार्य ही है। तप साधना का पहला चरण संयम है। व्रत, उपवास ब्रह्मचर्य, मौन, जप, ध्यान आदि साधनाओं का उद्देश्य संयम साधना ही तो है। अनुशासन और नियमितता जैसे महान गुण इस साधना के साथ जुड़े हुए हैं।
मानसिक और सामाजिक बुराइयाँ
मन की मलीनता और समाजगत बुराइयाँ एवं कुरीतियाँ इसलिए टिकी हुई और बढ़ी हैं कि उनका पोषक वातावरण चारों ओर बना रहता है। मन एक दर्पण की तरह है उस पर जैसी छाया पड़ती है वैसा ही प्रतिबिम्ब दीखने लगता है। हमारे चारों ओर आज जिस प्रकार के विचार और कार्य फैले होते हैं उसी का प्रभाव ग्रहण करके अपनी प्रवृत्तियाँ भी उसी ओर मुड़ने लगती हैं। एक बुरा व्यक्ति दूसरे अनेकों को अपनी बुराइयाँ सिखा लेता है। व्यभिचारी, नशेबाज, दुर्व्यसनी अपनी आदतों को कितने ही लोगों को सिखा देते हैं। कुविचारों को फैलाने के अगणित माध्यम आज मौजूद हैं। अश्लीलता, कामुकता, व्यभिचार, उच्छृंखलता को प्रोत्साहन देने वाली पुस्तकों, तस्वीरों, गीतों, पत्र−पत्रिकाओं, फिल्मों की आज भारी धूम है, उनका आकर्षक एवं व्यापक प्रचार जन साधारण के भोले मस्तिष्कों को प्रभावित करके उन्हें अपने चंगुल में जकड़ लेता है और लोगों के मन बुराइयों की ओर झुक पड़ते हैं।
बुरे आदमी बुराई के सक्रिय सजीव प्रचारक होते हैं। वे अपने आचरणों द्वारा बुराइयों की शिक्षा लोगों को देते हैं। उनकी कथनी और करनी एक होती है। जहाँ भी ऐसा सामंजस्य होगा उसका प्रभाव अवश्य पड़ेगा। हम में से कुछ लोग धर्म−प्रचार का कार्य करते हैं पर वह सब कहने भर की बातें होती हैं। इन प्रचारकों की कथनी और करनी में अन्तर रहता है। यह अन्तर जहाँ भी रहेगा वहाँ प्रभाव भी क्षणिक रहेगा। सच्चे धर्म प्रचारक जिनकी कथनी और करनी एक रही है अपने अगणित अनुयायी बनाने में समर्थ हुए हैं। बुद्ध, गाँधी, तिलक, कबीर, नानक आदि की कथनी और करनी एक थी, वे अपने आदर्शों के प्रति सच्चे थे, इसलिए अगणित व्यक्ति उनका अनुकरण करने वाले, उनके आदर्शों पर बड़े से बड़ा त्याग करने वाले प्रस्तुत हो गये थे। आज अच्छाइयों के सच्चे एवं आदर्श प्रचारक नहीं है। बुराइयों के आस्थावान प्रचारक मौजूद हैं, वे बुरे काम करते हैं, बुराइयाँ सिखाते हैं, पर ऐसे धर्म−प्रचारक कहाँ हैं जो अपने आचरणों से दूसरों को शिक्षा और प्रेरणा प्रदान करें। जहाँ थोड़े बहुत सच्चे लोग हैं वहाँ प्रभाव भी पड़ रहा है। हजारों मील से आकर विदेशी ईसाई मिशिनरी भारत में ईसाई धर्म का प्रचार पूरी आस्था और लगन के साथ कर रहे हैं फलस्वरूप गत दस वर्षों में ही लाखों की संख्या में लोगों ने हिन्दू धर्म का परित्याग कर ईसाई धर्म की दीक्षा ली है।
सद्विचारों की उपयोगिता और आवश्यकता
हमारा शरीर आहार के आधार पर बनता और बिगड़ता है। इसी प्रकार मन का बनाव और बिगाड़ विचारों पर निर्भर रहता है। सद्विचारों के संपर्क में आये बिना कोई व्यक्ति उसी प्रकार मानसिक स्वच्छता प्राप्त नहीं कर सकता जिस प्रकार आहार की सुव्यवस्था किये बिना शरीर को बलवान बना सकना संभव नहीं होता। मन तभी स्वच्छ रह सकता है जब उसे सद्विचारों का सान्निध्य मिले। मानसिक स्वच्छता के लिए स्वाध्याय और सत्संग की आवश्यकता उसी प्रकार है जिस प्रकार बर्तन माँजने के लिए मिट्टी और पानी की उपयोगिता होती है। सद्विचारों का प्रसार जब कम हो जाता है और कुविचारों का विस्तार बढ़ जाता है तब स्वभावतः जन मानस में मलीनता छा जाती है और पाप तापों का, क्लेश कलह का रोग शोक का वातावरण पनपता दृष्टिगोचर होने लगता है। मनुष्य के भीतरी मन की बुराइयाँ उसके सामने विपत्ति बनकर आ खड़ी होती हैं। कुएँ की प्रतिध्वनि की तरह हमें अपनी भावनाओं के अनुरूप ही दूसरों का प्रत्युत्तर मिलता है। जैसे हम स्वयं है वैसे ही दूसरे भी दीखते हैं। स्वभावतः वे वैसे नहीं तो कम से कम हमारे लिए तो वैसे बन ही जाते हैं, अपना क्रोधी स्वभाव हो और दूसरों से झगड़ते रहने की आदत पड़ जाय तो उसके फलस्वरूप दूसरे लोग जो भले ही स्वभावतः क्रोधी न हों हमारे आचरण से क्षुब्ध होकर कुछ देर के लिए तो क्रोधी बन ही जाते हैं। चोर, व्यभिचारी, बेईमान, असभ्य, अकर्मण्य मनुष्य के संपर्क में आने वाले व्यक्ति कुछ देर तक तो घृणा और क्षोभ प्रकट करेंगे ही। मन का मैला मनुष्य कुढ़न का अभिशाप भोगता है अपनी सारी श्रेष्ठताएँ खोकर निम्न स्तर का बन जाता है। मित्रों को शत्रु रूप में बदल लेता है। लोक−परलोक तो उसके बिगड़ते ही हैं। इतनी हानिकारक मन की मलीनता हमारे लिए सर्वथा त्याज्य है। वैयक्तिक और सामूहिक सारे संघर्ष इसी पर ठहरे हुए हैं। पापों की जड़ यही है। इसे काट दिया जाय तो वे कटीली झाड़ियाँ जो पग−पग पर दुख देती हैं नष्ट हो सकती हैं।
सभ्य समाज की श्रेष्ठता
समाज में सभ्यता के, सहयोग के, स्वस्थ परम्पराओं के, न्याय और सदाचार के आधारों को पनपने का अवसर उत्पन्न करना युग−निर्माण योजना का तीसरा लक्ष है। फूट, अलगाव, असहयोग, अनुदारता, स्वार्थपरता, छीना-झपटी, संकीर्णता, शोषक, अपहरण की प्रवृत्तियाँ जब तक मौजूद हैं तब तक सदाचार और नैतिकता का पालन कैसे संभव हो सकता है? व्यक्तिगत स्वार्थपरता और संकीर्णता जितनी छोटी होगी उतने ही संकट पैदा करेगी। साम्प्रदायिकता, जातीयता, प्रांतीयता, भाषावाद आदि के नाम पर कितने संघर्ष पैदा करेगी। साम्प्रदायिकता, जातीयता, प्रांतीयता, भाषावाद आदि के नाम पर कितने संघर्ष और क्लेश पैदा होते हैं यह किसी से छिपा नहीं है। सामाजिक कुरीतियों की अन्धपरम्परा में कितना समय, श्रम और धन बर्बाद होता है इसे कौन नहीं जानता? उच्छृंखलता, गुण्डागर्दी, अपराधी प्रवृत्ति के दुष्ट दुराचारी लोग किस प्रकार शान्ति−प्रिय लोगों को सताते हैं यह सर्वविदित है। इन बुराइयों से जो समाज जितना ग्रसित होगा वह उतना ही दुख पावेगा। इस दृष्टि से भी हमारी स्थिति दयनीय है। सभ्य, शिष्ट, संगठित, सदाचारी समाज अभी हमारा कहाँ बन पा रहा है?
यह परिस्थितियाँ इस रूप में ही नहीं रहने दी जा सकतीं। इनका सुधार और परिवर्तन होना ही चाहिए। हमें ऐसा वातावरण उत्पन्न करना होगा जिसमें व्यक्तिगत रूप से जन−मानस में स्वच्छता और सामूहिक रूप से लोक−मानस में सभ्यता का संचार हो। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की स्थापना के लिए यों अनेकों कार्यक्रम हो सकते हैं और उनके विविध−विधि आयोजन समय−समय पर करने भी होंगे पर सबसे पहला कार्य है इन तथ्यों से जनसाधारण को परिचित कराना, उनकी उपयोगिता एवं आवश्यकता समझाना। बीज तभी उगता है जब जड़ जमाने के उपयुक्त उसे जमीन प्राप्त हो। ऊसर जमीन में अच्छा बीज भी कहाँ उग पाता है? आज लोगों की मनोभूमि ऊसर बनी हुई है, न उसमें इच्छा है न आकांक्षा; न आशा है न उत्साह; ऐसे अर्ध मूर्छित मन वाली जनता के सामने कोई कार्यक्रम रखे जाएँ तो वह उन्हें कहाँ सुनेगा? कैसे अपनायेगा?
पहले भूमि तैयार करनी पड़ेगी
युग−निर्माण की दिशा में हमें पहला कार्य एक ही करना होगा कि जन−मानस में स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज के निर्माण की आवश्यकता अनुभव करावें। लोगों को यह बतावें कि इन विभूतियों के बिना मानव जीवन निरर्थक जैसा है, ऐसे अर्धमृत जीवन में साँसों की गिनती पूरी कर लेने में क्या सार है? यदि जीना है तो इंसान की तरह क्यों न जियें, यदि मनुष्य का सुरदुर्लभ शरीर पाया है तो इसे सार्थक क्यों न करें? बीमार शरीर, मलीन मन, पतित समाज में रहना नरक के समान दुखदायी ही रहता है। सो जब उसे बदल सकना संभव है तो उस संभावना को सार्थक क्यों न किया जाय? इस प्रकार के प्रश्न जब जन−मानस के अन्तःकरण में उठने लगेंगे तो वह कुछ सोचने और कुछ करने के लिए भी तत्पर होगा। ऐसा जन−जागरण ही हमारा आज का प्रधान कार्य होना चाहिए।
प्रचार में बड़ी शक्ति है। चाय वालों ने चाय की और बीड़ी वालों ने बीड़ी की गंदी आदतें अपने प्रचार के बल पर घर−घर पहुँचा दी। सिनेमा के गंदे गाने छोटी देहातों में बच्चों की जवानों पर चढ़ गये, यह प्रचार साधनों की ही महत्ता है। हम युग−निर्माण के उपयुक्त संयम की, उदारता की, विवेक की आवश्यकता की ओर जनसाधारण का ध्यान आकर्षित करना चाहें तो प्रचार के बल पर ही हो सकता है। अखण्ड ज्योति परिवार का एक बड़ा विशाल और शक्तिशाली संगठन है। हम सब मिलकर आज युग−निर्माण के लिए उपयोगी एवं आवश्यक विचारों का प्रसार करें और कल उन आयोजनों, कार्यक्रमों, आन्दोलनों एवं अभियानों की व्यवस्था करें जो आज की अव्यवस्था को उखाड़ दें और उसके स्थान पर स्वर्गीय वातावरण को पृथ्वी पर अवतरित करने के उपकरण उपस्थित कर दें। हमें यही करना है—यही करेंगे भी।
आहार और विहार संबंधी मर्यादाओं का उल्लंघन ही स्वास्थ्य बिगाड़ने का एकमात्र कारण है। सृष्टि के समस्त प्राणी अपनी शारीरिक मर्यादाओं का पालन करते हैं फलस्वरूप वे अल्प बुद्धि और साधन−हीन होने पर भी सदा निरोग बने रहते हैं। जलचर, थलचर, नभचर, सभी जीव जन्तु आमतौर से निरोग रहते हैं। दृष्टि दौड़ाकर देखिये चौरासी लाख योनियों में से एक मनुष्य को छोड़कर अन्य सभी जीव आरोग्य का आनन्द उठाते हुए अपने जीवन के दिन पूरे करते दिखाई देंगे—खोजने पर भी बीमारियों में पड़ा कराहता हुआ कोई प्राणी कहीं दिखाई न देगा। एक अभागा मनुष्य ही ऐसा है जिसे अपने बहुमूल्य जीवन का एक बहुत बड़ा भाग बीमारी और कमजोरी की व्यथा सहते हुए बर्बाद करना पड़ता है।
सफलताओं का मूल आधार
बुद्धिमानों का यह कथन सर्वांश में सत्य है कि धर्म−अर्थ, काम मोक्ष का मूल आधार शरीर है। दुर्बल और रुग्ण शरीर वाला अपनी जीवन यात्रा का भार भी स्वयं वहन नहीं कर पाता, उसे पग−पग पर दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है। दूसरे लोग सहायता न करें तो अपना ही काम न चले ऐसे लोग धर्म कार्य कर सकने के लिए श्रम कैसे कर पावेंगे? धन कमाने के योग्य पुरुषार्थ भी उनसे कैसे बन पड़ेगा? कामोपभोग के लिए इन्द्रियों में सक्षमता कैसे स्थिर रहेगा? और फिर मोक्ष के योग्य श्रद्धा, विश्वास, धैर्य, श्रम और संकल्प का बल भी उनमें कहाँ से रहेगा? इसलिए बीमार और कमजोर आदमी इस संसार में कुछ भी प्राप्त कर सकने की स्थिति में नहीं रहता। रोग को पाप का फल माना गया है। वस्तुतः वह प्रत्यक्ष नरक ही है। नरक में पापी लोग जाते हैं। स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन करना भी सदाचार के, धर्म के अन्य नियमों को तोड़ने के समान ही अनुचित है। जब झूठ, हिंसा, चोरी, व्यभिचार आदि दुष्कर्मों द्वारा सामाजिक एवं नैतिक नियमों का उल्लंघन करने वाले ईश्वरीय और राजकीय दंड भोगते हैं तो स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन करने वाले क्यों पापी न माने जायेंगे? क्यों उन्हें प्रकृति दंड न देगी? शरीर में भीतर व्यथा और बाह्य जीवन में असफलता, यह दुहरा दंड उन लोगों के लिए सुनिश्चित है जो पेट पर अत्याचार करके उसे शक्तिहीन बना देते हैं। चटोरेपन की बुरी आदतें ही स्वास्थ्य की बर्बादी का एकमात्र कारण है, इसलिए इन आदतों को भले ही राजकीय दंड विधान में अपराध न माना गया हो पर प्रकृति की दंडसंहिता में अपराध ही गिना गया है और उसके लिए वह दंड सुनिश्चित है जिसे आज सब ही भुगत रहे हैं। भीतर व्यथा और बाहर असफलता के दंड हम में से अधिकाँश को आज सहन करने पड़ रहे हैं।
स्वास्थ्य की बर्बादी और उसका कारण
आयुर्वेद शास्त्र का मान्य सिद्धान्त यह है कि सम्पूर्ण रोग पेट के अपच से आरंभ होते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में भी यही मान्यता है कि सम्पूर्ण रोगों का एकमात्र कारण कब्ज है। अनेक रोग तो उसके बाह्य स्वरूप मात्र हैं। इन सब की जड़ पेट में रहती है। पेट खराब रहने से सभी रोग उपजते हैं और पाचन−क्रिया के ठीक रहने पर कोई आकस्मिक रोग बाहरी कारणों से लग जाय तो वह भी जल्दी ही अच्छा हो जाता है। एक यूनानी कहावत है कि “रोग और आरोग्य दोनों की ही कुञ्जी हर मनुष्य के पेट में सुरक्षित रखी हुई है।” जिसे कब्ज रहता है उसे विभिन्न रोगों का शिकार रहना ही पड़ेगा, जिसका पेट ठीक है उसके आरोग्य को कोई शक्ति नष्ट नहीं कर सकती, इस तथ्य को हम जितनी जल्दी समझ लें उतना ही अच्छा है।
अपच का विष
यदि पेट में पड़े हुए आहार का ठीक प्रकार पाचन न हो तो वह सड़ने लगता है। सड़ने से विषैली गैस उत्पन्न होती है और वह फिर रक्त में मिलकर या श्वास−प्रश्वास क्रिया के सहारे सारे शरीर में घूमने लगती है। उस विष को ठहरने के लिए जहाँ भी आश्रय मिल जाता है वहीं जमा होने लगता है और वहाँ मात्रा अधिक होते ही वहाँ रोग फूट निकलता है। रेगिस्तानों में रेत की आँधियाँ चलती रहती हैं। उड़ते हुए रेत को किसी पेड़ चट्टान आदि के सहारे थोड़ा−सा रुकने का आश्रय मिल गया तो कुछ ही देर में वहाँ रेत का एक बड़ा टीला जमा हो जाता है। यही बात हमारे शरीर में कब्ज के कारण उत्पन्न हुए विष की है साँस के साथ वह एक आँधी की तरह घूमता है और जहाँ भी थोड़ा सहारा मिला वहीं अड्डा जमा कर बैठ जाता है।
बरसाती नदियों में पहली वर्षा होते ही आस−पास का कूड़ा कचरा इकट्ठा होकर बहने लगता है। यह कचरा अपने ढंग से यों बहता चला जाता है पर यदि कहीं पानी में थोड़ी सी रोक या मोड़ आ जाय तो वह कचरा वहाँ जमा होने लगता है। नाली−मोरियों में भी रुकावट पड़ने पर कूड़ा−कचरा जमा होने का दृश्य हर जगह देखा जा सकता है। यही बात हमारे शरीर की भी है। पेट में निरन्तर विष की उत्पत्ति एकमात्र कब्ज से ही होती है।
कुछ अन्य कारण
कुछ बाहरी एवं सामयिक कारण भी शरीर में विष की मात्रा उत्पन्न करने वाले हो सकते हैं पर उनका प्रभाव थोड़ी ही देर में समाप्त हो जाता है। रक्त में श्वेत कणों की मात्रा यदि पर्याप्त हो तो बाहरी विष से लड़ने और परास्त कर बाहर निकाल फेंकने की बात आसानी से पूरी हो जाती है। जिस प्रकार सरकार शत्रुओं से देश की रक्षा करने के लिए सेना की व्यवस्था रखती है वैसे ही हमारे रक्त में भी श्वेत कणों की एक ऐसी फौज रहती है जो किसी भी बाहरी हमले का आसानी से मुकाबला कर सकती है। उसे परास्त करके देह से निकाल फेंकने में पूर्णतया सफल हो सकती है। छूत की बीमारियाँ आमतौर से उन्हें लगती हैं जिनका रक्त पहले से ही दूषित होने के कारण अपनी प्रतिरोध शक्ति खो बैठता है। हैजा, प्लेग, आदि महामारियों के दिनों में भी अनेक स्वयं सेवक रोगियों की सब प्रकार की सेवा करते रहते हैं पर उन्हें कुछ भी नहीं होता। पर सबसे बचते रहने वाले लोग वायु में उड़ने वाले कीटाणुओं से ही प्रभावित होकर उन फैली हुई महामारियों में ग्रसित हो जाते हैं और बचाव की बाहरी व्यवस्था का बहुत प्रयत्न करने पर भी अपनी जान खो बैठते हैं।
पेट की अशक्तता का प्रतिफल
कब्ज एक स्थायी रोग सरीखा बन जाता है। खान−पान संबंधी बुरी आदतों से सताया हुआ पेट अतन्तः अशक्त हो जाता है और अपना काम ठीक तरह कर सकने के अयोग्य हो जाता है। किसी प्रकार गाड़ी खिंचती तो है जीवन रक्षा होती रहे इतना पहिया लुढ़कता तो है पर अपच के कारण उत्पन्न होने वाली सड़न तो निरन्तर जारी ही रहती है। निरन्तर झरते रहने वाली पानी के झरने से सदा धार बहती ही रहती है। निरन्तर आग उगलने वाले ज्वालामुखी से सदा धुँआ निकलता ही रहता है। कमजोर पेट में जब कब्ज रहने लगा तो वहाँ से भी विषों की उत्पत्ति का उत्पादन निरन्तर ही होता रहेगा। निरन्तर की लड़ाई−लड़ना किस सेना के बस की बात है। मौके−मौके पर युद्ध कौशल दिखाया जा सकता है पर अनन्तकाल के लिए चौबीसों घंटे गोली चलाते रहने का भार जिस सेना पर आ पड़े और शत्रु का दल बादलों की तरह उमड़ता हुआ निरन्तर चलता ही आवे तो वे सैनिक कब तक अपने पैर टिकाते रहेंगे? शरीर की रोग−प्रतिरोधक शक्ति का भी इस निरन्तर की कब्ज से उत्पन्न विषों के साथ लड़ते−लड़ते एक प्रकार से अन्त ही हो जाता है। तब फिर शत्रुओं का खुलकर खेलने का अवसर मिलता है और देह नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित होती जाती है।
सब रोगों का एक की कारण
रोगों के नाम, लक्षण, चिन्ह, निदान के झंझट में पड़ने और उनके वर्गीकरण की उखाड़−पछाड़ में उलझने से कुछ लाभ नहीं। पेट में उत्पन्न हुआ विष जिस स्थान पर जमा होगा वहीं पीड़ा देगा। गाँठों में जमने से उसका नाम गठिया, सिर में जमने से सिर दर्द, फेफड़ों में जमने से क्षय, श्वाँस नली में जमने से खाँसी, चमड़ी में जमने से खुजली, दाँतों में जमने से पायरिया, गुर्दे में जमने से बहुमूत्र, उँगलियों में भर जाने से कोढ़ नाम हो जायेगा। बीमारियों का नामकरण करने और उनके निदान लक्षण में माथा पच्ची करने से क्या लाभ? गाँठो की बीमारी, सिर की बीमारी, कान की बीमारी, छाती की बीमारी कहकर भी वही प्रयोजन सिद्ध हो सकता है जो बड़े−बड़े वैद्यों से रोग का निदान और नामकरण कराने से होता है।
पेट में उत्पन्न होने वाली सड़न शरीर के किसी भी भाग में पहुँच सकती है और उससे किसी भी अंग में रोग उत्पन्न हो सकता है। डकारों में मुँह की और अपानवायु से गुदा मार्ग की ओर यह सड़न गैस के रूप में बाहर आती है तो उसकी दुर्गन्धि का कुछ अनुभव हो जाता है। यह गैसें अपने साथ सड़न भरे और भी विषाक्त तत्व साथ में उड़ाकर लाती हैं तो इनका जमाव प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। जीभ और दाँतों पर जो रोज मैल जमता है वह पेट से उड़कर ऊपर आई हुई गैसों का ही विकार है। धुँआ जहाँ उठता रहता है वहाँ छतों पर कालिख जमा हो जाती है। जीभ और दाँतों का मैल भी इसी प्रकार की कालिख है जिसे रोज साफ न किया जाय जो मुँह में बदबू आने लगे और स्वाद कडुआ रहने लगे। यह विकार कुछ तेज हो जाते हैं तो मसूड़ों को गलाने लगते हैं तब पायरिया पैदा हो जाता है, जीभ में छाले रहने लगते हैं, साँस के साथ बदबू आने लगती है, सोते में लार बहती है, यह सब एक ही बात के विभिन्न स्वरूप हैं।
अपच के विष का व्यापक प्रभाव
गले में टान्सिल बढ़ जाना, स्वर भंग, श्वाँस नाली में जख्म हो जाने से कफ़, खाँसी, बलगम की शिकायत उत्पन्न होती है। यही दूषित तत्व जब मस्तिष्क में जड़ जमाते हैं तो जुकाम, नाक बहना, सिर दर्द, आधाशीशी, स्मरण शक्ति की कमी, अनिद्रा, मूर्छा, मृगी, हिस्टीरिया, उन्माद आदि का रूप धारण कर लेते हैं। आँखें दुखना, कान बहना, बाल झड़ना, नाक बहना, सिर में खुजली चलना, भुसी जमना जैसे रोग भी सिर के भीतर की विकृतियाँ बाहर फूटने के कारण ही होते हैं विकार जिधर से भी बाहर फूट पड़े उधर ही बीमारी दिखाई देने लगती है। तिल्ली, जिगर, गुर्दे का दर्द, अतिसार, संग्रहणी, दस्त न होना, उदर शूल, वायुगोला, अंत्रपुच्छ आदि रोग एक ही जाति के हैं। उनके स्वरूप में ही भेद दीखता है, मूल सबका एक है। गुदा मार्ग में बवासीर, भगंदर आदि, गर्भाशय में प्रदर, सोम वन्ध्यत्व, मासिक धर्म की अनियमितता, गर्भ स्राव आदि, मूत्राशय में बहुमूत्र, पथरी, प्रमेह, मधुमेह आदि, अंडकोष में पानी बढ़ना, आँत उतरना आदि रोग होते हैं। इनमें भिन्नता दीखते हुए भी भीतरी वस्तु की स्थिति बिलकुल एक है।
रक्त में विकार घुल जाने से पित्ती, चकत्ता, फुंसी, दाद, कोढ़, खुजली, गठिया आदि कितने ही तरह के रोग फूट निकल सकते हैं। हृदय की धड़कन, लकवा, दमा, प्लूरिसी, अंत्रक्षय, ज्वर, उन्माद, स्नायु दौर्बल्य, नासूर, नपुंसकता जैसे कुछ रोग ऐसे हैं जो स्वतंत्र प्रकृति के दिखाई पड़ते हैं पर इनके मूल में भी उन्हीं विषों का धीरे−धीरे संचित होते रहना ही कारण होता है।
शुद्ध रक्त और जीवनी शक्ति
चोट लगना, जलना जैसे बाहरी कारणों से भी कभी−कभी शारीरिक कष्ट होते हैं, पर यदि रक्त की शुद्धता अक्षुण्ण हो तो उनके अच्छे होने में देर नहीं लगती। शुद्ध रक्त अपनी जीवनी शक्ति के आधार पर ऐसे आघातों का समाधान जल्दी ही कर देता है। टूटी हड्डी तक आसानी से जुड़ जाती है। पर यदि रक्त दूषित हो तो एक छोटा सा घाव भी लंबा समय लेकर कठिनाई से अच्छा होता है। जिनके रक्त में शर्करा की मात्रा अधिक होती है उन मधुमेह के रोगियों की छोटी सी फुंसी भी महीनों में अच्छी होती है। कोई बड़ा आपरेशन करना पड़े तो उसका घाव भरना दुर्लभ हो जाता है। कोढ़ी का खून ही तो खराब हो जाता है उसकी उँगलियों पर छोटे−छोटे जख्म होते हैं पर वे किसी भी दवा से अच्छे नहीं होते। ऐसी ही खराबियों के कारण भीतर ही भीतर जहाँ−तहाँ पीड़ायें उठती रहती हैं और मनुष्य उनसे निरन्तर दुःख पाता रहता है। जब दाँत उखड़ने का समय आता है तो सालों तक उनमें दर्द होता रहता है। कमर में दर्द, सिर में दर्द, गाँठों में दर्द, पसली में दर्द, आये दिन ऐसे ही झंझट खड़े रहते हैं। स्त्रियाँ जब मासिक धर्म से होने को होती हैं तब उन्हें कई दिन तक बुरी तरह पीड़ित रहना पड़ता है। प्रसव काल भी उनके लिए मृत्यु जैसा कष्टकारक होता है, पर ऐसा होता तभी है जब रक्त की सजीवता क्षीण हो चुकी हो। जिनकी जीवनी शक्ति सक्षम है उन्हें इस प्रकार की कोई कठिनाई नहीं होती। बुढ़ापे में भी उनके दाँत आँख सब काम करते रहते हैं देहातों के श्रमशील नर−नारी जिनका पाचन ठीक रहता है उन्हें इस प्रकार की कठिनाइयों में पड़ने और व्यथा सहने के लिए विवश नहीं होना पड़ता।
रोगों की जड़ को ही काटा जाय
पाचन क्रिया की खराबी समस्त रोगों की जड़ है। यदि जड़ काट दी जाय तो उसके पुष्प पल्लव भी सूखने लगेंगे। जिसकी जड़ हरी है तो उसे ऊपर से काट भी दिया जाय तो भी फिर नयी शाखायें फूटने लगेंगी। बीमारियों की जड़ निश्चित रूप से पेट में है। जिस अंग में रोग है वहाँ भी उपचार करने में हर्ज नहीं, रोग की स्थानीय चिकित्सा भी होनी चाहिए पर जड़ को ठीक किये बिना बाहर की लीपा पोती से क्या काम बनने वाला है? रक्त विकार के कारण शरीर में निकली हुई फुंसियों पर बाहर से मरहम लगा दी जाय तो वे एक जगह से अच्छी होकर दूसरी जगह निकलने लगेंगी या किसी अन्य रोग के रूप में प्रकट होंगी। ऐसी बीमारी तब अच्छी होती है जब रक्त शुद्धि का उपचार किया जाय। इसलिए प्रत्येक दुर्बल और रुग्ण व्यक्ति को डाली पत्तों की चिन्ता करने की बजाय जड़ पर ध्यान देना चाहिए और पाचन क्रिया की अशक्तता को दूर करने का उपचार करना चाहिए।
कुपथ्य और असंयम
पिछले लेख में बताया जा चुका है कि पेट में कब्ज उत्पन्न होना ही समस्त रोगों का प्रधान कारण है। यद्यपि ब्रह्मचर्य का अभाव, रात को जागना, दिन में सोना, परिश्रम कम करना या बहुत अधिक करना, बहुत कपड़े लादे रहना, मुँह ढ़ककर सोना, गंदगी, छूत आदि भी बीमारियों के कारण होते हैं और उनसे बचना भी आवश्यक है, पर सबसे अधिक ध्यान पेट की खराबी को सुधारने पर ही दिया जाना चाहिए। यदि पाचन ठीक हो तो यह छोटी−मोटी अनियमितताऐं भी अनिष्टकर प्रभाव नहीं डाल सकतीं पर यदि पेट खराब है तो इन्हें पालन करते हुए भी आरोग्य की रक्षा न हो सकेगी। उपेक्षा तो इन बातों की भी नहीं करनी है, ध्यान तो इन सब का भी पूरा−पूरा ही रखा जाना चाहिए, पर मूल आधार के रूप में हमें अपना बिगड़ा स्वास्थ्य सुधारने के लिये पेट की दुर्बलता दूर करने का ही उपचार करना चाहिए।
पेट एक दिन में खराब नहीं होता और न वह एक दिन में सुधर सकता है। दुनियाँ में कोई दवा ऐसी नहीं है जो खान-पान की आदतों को सुधारे बिना बिगड़ी हुई पाचन क्रिया को ठीक कर दे। इसलिए जो लोग बीमारियों से ग्रसित हैं, जिन्हें कब्ज रहता है उन्हें यदि स्थिर आरोग्य की आकांक्षा हो तो पेट को सुधारने का एक स्थिर एवं सुव्यवस्थित अभियान प्रारम्भ करना चाहिये।
पुरानी गंदगी की सफाई
इस दिशा में एक कार्य तो यह करना होता है कि आँतों में जमे और चिपके हुए मल की एक बार पूरी तरह सफाई कर डाली जाय। पुराने कब्ज के कारण मल आँतों में पड़े−पड़े पहले तो सड़ता है फिर सूखकर गाँठों के रूप में रोड़ा जैसा बनकर अड़ जाता है। ऐसी अनेकों गाठें आँतों में पड़ी रहती हैं। कितनी ही तो आँतों की दीवार से ऐसी चिपक जाती हैं कि छुड़ाये नहीं छूटतीं। आँतें एक तो वैसे ही कमजोर थीं, आमाशय से आये हुए मल को गुदा मार्ग तक यथासमय पहुँचाने में वैसे ही असमर्थता अनुभव करती थीं, इस पर भी यह गाँठें मार्ग में अड़ जायें तो मलावरोध का उत्पन्न होना बिलकुल स्वाभाविक हो जाता है। इसलिए कब्ज का उन्मूलन करने के लिए पहला कदम यह होना चाहिए कि पेट में जमा हुआ, सड़ा हुआ, सूखा मल एक बार बिलकुल साफ कर दिया जाय। गंदी नाली में जब बहुत दुर्गन्ध उठने लगती है तब उसे एक बार जड़ तक साफ करने की, सारी कीचड़ का हटाकर पूरी तरह सफाई करने की आवश्यकता होती है। यदि ऊपर−ऊपर से थोड़ी कीचड़ हटा दी जाय तो फिनायल छिड़ककर बदबू को ऊपर से दबा दिया जाय तो उससे कुछ स्थायी सुधार न होगा। दो−चार दिन बाद फिर बदबू उठने लगेगी। ऐसी ही सफाई पेट की भी करनी पड़ती है।
वस्ति−क्रिया एक अमोघ साधन
पेट की सफाई धुलाई के लिए वस्ति क्रिया (एनीमा) को सर्वोत्तम माना गया है। दवाओं से दस्त लेने में जो हानियाँ हैं एनीमा उससे सर्वथा मुक्त है। दस्तावर दवायें आमाशय और आँतों में चुभती हैं और वहाँ से पानी बहने लगता है। जैसे आँखों में मिर्च लगने से आँसू बहने लगते हैं वैसा ही कार्य पेट में जाकर यह दस्तावर दवायें करती हैं। पेट के पोषक और पाचक रस उनके प्रभाव से तेजी के साथ बहने लगते हैं। उस बहाव में ऊपर-ऊपर का थोड़ा सा मल बह जाता है। इस प्रकार दस्त होने से पेट कुछ हलका तो मालूम पड़ता है पर आवश्यक रस एक साथ इतनी मात्रा में निकल जाते हैं तो पाचन−क्रिया बिलकुल शिथिल हो जाती है। यदि उन दिनों भारी भोजन कर लिया गया तो पेट की शिथिल स्थिति में नये कब्ज का यह एक और कारण बन जाता है। इस प्रकार दस्त लेने से तत्काल पेट हलका भले ही हो जाय पर उन दवाओं के प्रभाव से पेट की दुर्बलता और भी अधिक बढ़ जाने से कब्ज के स्थायी होने की और भी अधिक संभावना बढ़ जाती है।
आराम और विश्राम की आवश्यकता
एनीमा के द्वारा जो पानी गुदा मार्ग से पेट में चढ़ाया जाता है वह आँतों की भली प्रकार सफाई कर देता है। लगातार कुछ दिन एनीमा लेते रहने से पुराना मल, सूखी हुई गाँठें निकलने लगती हैं। इस प्रकार आँतों की धुलाई भली प्रकार हो जाती है। इस सफाई की अवधि में पेट को अधिक से अधिक विश्राम देना आवश्यक होता है। आरम्भ में कुछ समय बिलकुल निराहार रहना और फिर दूध, छाछ, फलों का रस या शाकों का जूस लेते रहना, पेट को विश्राम देने का उचित उपाय है। एक ओर सफाई होने और दूसरी ओर विश्राम मिलने से थका हुआ, दुर्बल बना हुआ पेट अपनी थकान दूर कर लेता है और आराम मिल जाने से खोई हुई शक्ति को पुनः प्राप्त कर लेता है। थका मनुष्य रात्रि में नींद भर सो लेने से जिस प्रकार सवेरे ताजगी लिये हुए उठता है, उसी प्रकार यह सफाई और विश्राम की प्रक्रिया भी पेट को सो लेने का अवसर देती है और वह फिर धीरे−धीरे अपनी स्वाभाविक पाचन−क्रिया को सामान्य रूप से ठीक प्रकार चलाने की स्थिति में आ जाता है। पेट ठीक काम करने लगे और शुद्ध रक्त बनने लगे तो फिर बीमारियों की जड़ ही कट जाती है। रोग किसी भी अंग में क्यों न हो वहाँ तुरन्त लाभ दीखने लगता है।
भीतरी सफाई का प्रत्यक्ष प्रभाव
वैद्य लोग पुराने रोगों से ग्रसित रोगियों को पंच कर्म के द्वारा पहले उनका शरीर शोधन कर लेने और पीछे अन्य दवादारू देने की विधि को चिरकाल से जानते हैं। आयुर्वेद शास्त्र में पंच कर्मों का महत्व अत्यन्त विस्तारपूर्वक समझाया गया है। वस्ति (एनीमा), वमन, विरेचन, स्नेहन, स्वेदन यह पाँच कर्म देह में भीतर जमी हुई रोगों की जड़ को उखाड़ फेंकने के लिए बहुत ही प्रभावपूर्ण माने गये हैं। डाक्टर लोग भी अब अनेकों रोगों में पहले पेट साफ करने की दवायें देते हैं पीछे अन्य उपचार आरम्भ करते हैं। पेट की गर्मी कम होते ही विभिन्न अंगों में भरे हुए विष तुरन्त ढीले पड़ते हैं और रोग में तत्काल लाभ दिखाई देने लगता है। सिर दर्द, आँखें दुखना, मुँह के छाले, खुजली, रक्त विकार जैसे रोगों में आमतौर से पेट साफ करने के साथ ही अन्य चिकित्सा आरम्भ की जाती है। प्राकृतिक चिकित्सा का तो आधार ही उपवास और एनीमा है। उस विज्ञान के अनुसार दवादारू व्यर्थ ही नहीं वरन् हानिकारक भी है। प्रत्येक रोग का एकमात्र इलाज प्राकृतिक चिकित्सा में पेट की सफाई है। उपवास और एनीमा का वे प्रत्येक रोग में प्रयोग करते हैं। मिट्टी की पट्टी, टबबाथ, कटिस्नान, मेहन स्नान, गीली चादर, वाष्पस्नान आदि प्रक्रियाओं का तो गौण स्थान ही रहता है। बिगड़े हुए पुराने जीर्ण रोगों में प्राकृतिक चिकित्सा जितनी सफल होती है उतनी और कोई पद्धति सफल नहीं होती।
कल्प−चिकित्सा का अमोघ उपचार
पेट की सफाई के लिए आयुर्वेद शास्त्र की कल्प−चिकित्सा बहुत ही उपयोगी हैं। प्राचीनकाल में कुछ ऐसी औषधियों का तथा उपचार, प्रयोगों का लोगों को पता था जिनके सहारे पुराने जीर्ण−शीर्ण शरीरों को युवावस्था जैसा बना दिया जाता था। इसे कायाकल्प कहते थे। योगी लोग योग पद्धति से भी अपने वृद्ध शरीरों को पुनः युवा बना लेते थे। वह विद्या तो अब अन्य अनेक प्राचीन विद्याओं की भाँति लुप्त हो गई पर उसका एक अंश ‘कल्प−चिकित्सा’ अभी भी मौजूद है, जिसके लाभों को देखते हुए यह विश्वास किया जा सकता है कि प्राचीनकाल में ऐसी कोई विद्या रही हो तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।
दूध कल्प, छाछ कल्प, रस कल्प, यूष कल्प, आदि अनेक कल्प ऐसे हैं जो पुराने रोगों की पेट में रहने वाली जड़ को काट देने में अभी भी आश्चर्यजनक परिणाम उपस्थित करते देखे जाते हैं। बहुधा 40 दिन तक वैद्य लोग इस प्रकार के कल्प कराते हैं। पुराने ढंग के वैद्य केवल साधारण आहार बंद कराकर दूध, छाछ आदि पर रोगी को रखने और लौह पर्पटी आदि औषधियाँ देते रहने की प्रणाली अपनाते थे और उससे भी बहुत कुछ लाभ होता था। पर अब प्रबुद्ध वैद्यों ने इस कल्प−चिकित्सा में पंच कर्मों का भी समावेश करके उसे सर्वांगपूर्ण बना दिया है। वस्ति (एनीमा, स्नेहन, स्वेदन (वाष्प उपचार) आदि का प्रयोग करने से प्राकृतिक चिकित्सा के सभी तत्वों का इस प्रणाली में समावेश हो जाता है। साथ ही औषधियों का उपचार चलते रहने से दुहरे लाभ की संभावना रहती है। कल्प−चिकित्सा की यह प्रणाली अधिक प्रभावपूर्ण रहती है। 40 दिन का कल्प और 20 दिन पीछे धीरे−धीरे स्वाभाविक भोजन पर आने में इस प्रकार करीब दो महीने तो इस प्रक्रिया में लग जाते हैं, पर पेट का सुधार उससे भली प्रकार हो जाता है। पीछे यदि आहार−विहार ठीक रखा जाय और कुपथ्य द्वारा फिर पहले जैसा बिगाड़ उत्पन्न न कर लिया जाय तो पावन क्रिया सीधे रास्ते पर चलने लगती है। कब्ज की जड़ कट जाने से उसके शाखा पल्लवों के रूप में सारे शरीर में फैले हुए विभिन्न रोग भी नष्ट हो जाते हैं। स्वास्थ्य सुधार की यह एक उत्तम परिपाटी है।
शिक्षा और चिकित्सा की व्यवस्था
जिनके पेट अधिक दुर्बल हो गये हैं उनके लिए कल्प−चिकित्सा द्वारा उपचार करने तथा इस विज्ञान की सांगोपांग शिक्षा देने का प्रबंध गायत्री तपोभूमि में किया जा रहा है। संभवतः इसी अप्रैल से पहला वर्ग आरम्भ भी हो जायेगा। प्रत्येक वर्ग की अवधि दो−दो मास की रहा करेगी। 40 दिन का कल्प, 20 दिन स्वाभाविक भोजन पर पुनः लौटने का समय इस प्रकार 60 दिन लगा करेंगे। प्रतिदिन स्वास्थ्य विषयक एक प्रवचन, आरोग्य शास्त्र का स्वाध्याय करने के लिए तत्संबंधी पुस्तकालय, आरोग्य शास्त्र का व्यावहारिक शिक्षण, आसन, प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, मालिश, सूर्य−किरण चिकित्सा, वाष्प स्नान जलोपचार, आदि का दैनिक कार्यक्रम रहेगा। स्वास्थ्य बिगाड़ने की भूलों के प्रायश्चित स्वरूप 40 दिन का यह कल्प उपवास एक प्रकार का चांद्रायण व्रत ही है, गायत्री उपासना भी इसमें सम्मिलित रहने से इस कार्यक्रम से शारीरिक ही नहीं आत्मिक काया−कल्प भी होने की संभावना है। नित्य यज्ञ में सम्मिलित रहने से यज्ञ चिकित्सा का भी लाभ मिलेगा। अपने बिगड़े हुए पेट को सुधारने और आगे के लिए आहार−विहार संबंधी अच्छी आदतें डाल लेने के लिए यह दो महीने का शिक्षण काल किसी भी आरोग्याकाँक्षी के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। अपने तथा अपने परिजनों के लिए इस उपयोगी पद्धति को काम में लाकर एक स्वास्थ्य रक्षक की योग्यता भी प्राप्त की जा सकती है। जिन्हें इस संबंध में अधिक जिज्ञासा हो वे गायत्री−तपोभूमि मथुरा के पते पर पत्र व्यवहार कर सकते हैं।
पेट की अशक्तता और दुर्बलताओं को ठीक करने के लिए आहार संबंधी अपनी गतिविधियों को सुधारने की आवश्यकता रहती है, साथ ही स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए, ब्रह्मचर्य, श्रमशीलता, इन्द्रिय संयम, नियमित दिनचर्या एवं मस्तिष्क को शान्त रखने की आवश्यकता होती है। इन सब बातों को ठीक तरह समझ लेने और उन पर ठीक प्रकार अमल करने से स्वास्थ्य की सुरक्षा का बीमा हो सकता है और जो बीमारियाँ पीछे पड़ी रहती हैं उनसे पीछा छूट सकता है।
प्रथम सुख और प्रधान साधन
सुखों में पहला सुख ‘निरोगी काया’ माना गया है। यदि वह प्राप्त नहीं तो दूसरे अन्य सुख व्यर्थ ही रह जाते हैं। मानव जीवन का लक्ष अस्वस्थ व्यक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। कोई भी पुरुषार्थ चाहे वह आत्मिक हो या लौकिक, शुभ हो या अशुभ, शरीर की स्वस्थता के आधार पर ही बन पड़ना संभव है। आयुष्य का लम्बा और पूरा उपयोग भी वे ही कर पाते हैं जो निरोग रहते हैं। रोगी मनुष्य जहाँ पीड़ाओं से कराहते हुए दिन व्यतीत करते हैं वहाँ उनकी आयु भी घटती चलती है और उन्हें अकाल मृत्यु की तरह असमय में ही काल का ग्रास बनना पड़ता है। इस संसार में दीर्घायु केवल वे ही हुए हैं जो निरोग रहे हैं। जिन्हें बीमारी घेरे हैं उनका बुढ़ापा जवानी में ही आ जाता है और उसके पीछे−पीछे मौत भी जल्दी ही आ धमकती है। ऐसे व्यक्ति जब कभी अपने मानव जन्म को लेखा-जोखा लेने बैठते हैं तब उन्हें यही प्रतीत होता है कि हमारा यह जीवन बेकार ही रहा- व्यर्थ ही गया। धन−दौलत या अच्छे स्वजनों से कुछ सुविधा अवश्य रहती है पर अस्वस्थता की कमी को बाहरी दुनियाँ की कोई वस्तु पूरा नहीं कर सकती।
उन्नति और प्रगति का साधन
कोई देश समाज, वर्ग, समूह, धर्म तब तक समुन्नत नहीं हो सकता जब तक उसके लोग स्वस्थ न हों। बुद्धि−बल, श्रमशीलता , दुस्साहस, आशा, उत्साह, धैर्य, लगन, चरित्र, त्याग, माधुर्य आदि सद्गुण ही मनुष्य की मूलभूत सम्पत्ति हैं, इन्हीं के आधार पर उसे बाह्य−जीवन में भौतिक सम्पदायें प्राप्त होती हैं। जिनमें यह गुण न होंगे वे लौकिक जीवन में दीन−हीन ही बने रहेंगे, इसलिए सदा ही यह आवश्यकता अनुभव की जाती है कि राष्ट्रीय सम्पदा के मूल कारण गुणों से सुसम्पन्न नागरिक बढ़ें। कोई देश केवल गुणवान नागरिकों से ही समुन्नत हो सकता है। गुणहीन जनसंख्या तो भार रूप ही मानी जाती है। यह गुणशीलता आरोग्य की भूमि पर ही उपजती और बढ़ती है इसलिए राष्ट्रीय दृष्टि से भी और वैयक्तिक दृष्टि से भी निरोगता की उपयोगिता सर्वोपरि है। हमें अपने निज के आरोग्य की भी चिन्ता करनी चाहिए और अपने स्वजन परिजनों के स्वास्थ्य की उन्नति का भी ध्यान रखना चाहिए।
“अन्य व्यक्ति को मारने के लिये तलवार ढाल आदि शस्त्रों की आवश्यकता पड़ती है, पर अपने को मारना हो तो एक नहन्नी (नाखून काटने वाली) ही काफी होती है। इसी प्रकार जन−समाज को उपदेश देने के लिये मनुष्य को अनेक शास्त्रों के अभ्यास की आवश्यकता पड़ती है पर यदि स्वयं धर्म प्राप्त करना हो तो केवल एक ही धर्म−वाक्य के ऊपर विश्वास रखकर वैसा किया जा सकता है”
“संसार में रहकर जो ईश्वर की साधना कर सकते हैं वे ही सच्चे वीर कहे जा सकते हैं।”
“चकमक पत्थर चाहे सौ वर्ष तक जल में पड़ा रहे तो भी उसकी अग्नि नष्ट नहीं होती। उसे जल से निकालकर लोहे पर मारते ही चिनगारी निकलने लगती हैं। इसी प्रकार ईश्वर पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति चाहे हजारों अपवित्र—संसारी लोगों के बीच में पड़े रहें तो भी उनकी श्रद्धा और भक्ति में किसी प्रकार की कमी नहीं पड़ सकती।”
—रामकृष्ण परमहंस
मनुष्य के अस्तित्व पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो उसकी एकमात्र विशेषता उसका मनोबल ही दृष्टिगोचर होती है। शरीर की दृष्टि से वह अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत गया बीता है। मनोबल की विशेषता के कारण ही वह सृष्टि का मुकुटमणि प्राणी बना हुआ है। मन वस्तुतः एक बहुत बड़ी शक्ति है। अनन्त चेतना के केन्द्र परमात्मा का प्रकाश इस जड़ प्रकृति में जो पड़ता है तो उसका प्रतिबिम्ब मन के रूप में ही सामने आता है। जड़ पदार्थ कितने ही उत्कृष्ट क्यों न हों चेतना के बिना वे निरर्थक हैं। इस पृथ्वी के गर्भ में रत्नों की खानें, स्वर्ण भंडार और न जाने क्या−क्या बहुमूल्य संपदाएँ भरी पड़ी हैं पर वे तब तक प्रकाश में नहीं आती जब तक कोई चेतना सम्पन्न मनुष्य उनसे सम्पर्क स्थापित नहीं करता है। स्वर्ण और रत्न का मूल्य चेतन प्राणी की चेतना के कारण ही है अन्यथा वे मिट्टी कंकड़ के समान ही पड़े रहते हैं। इस देह को ही लीजिए। कितनी बहुमूल्य प्रिय एवं उपयोगी लगती है पर यदि चेतना नष्ट हो जाय—मूर्छा, उन्माद या मृत्यु की स्थिति आ जाय तो यह देह किसी काम की नहीं रह जाती। मानव−जीवन में जो कुछ श्रेष्ठता, एवं महत्ता है वह केवल उसकी मानसिक स्थिति−मनोभूमि के कारण ही है।
मनुष्य−मनुष्य के बीच का अन्तर
आलसी और उत्साही, कायर और वीर, दीन और समृद्ध, दुर्गुणी और सद्गुणी, पापी और पुण्यात्मा, अशिक्षित और विद्वान, तुच्छ और महान, तिरस्कृत और प्रतिष्ठित का जो आकाश−पाताल जैसा अन्तर मनुष्यों के बीच में दीख पड़ता है उसका प्रधान कारण उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति ही है। परिस्थितियाँ भी एक सीमा तक इन भिन्नताओं में सहायक होती हैं पर उनका प्रभाव पाँच प्रतिशत ही होता है। पंचानवे प्रतिशत कारण मानसिक स्थिति ही है। बुरी−से−बुरी परिस्थितियों में पड़ा हुआ मनुष्य भी अपनी कुशलता और मानसिक विशेषताओं के द्वारा उन बाधाओं को पार करता हुआ, देर−सवेर में अच्छी स्थिति प्राप्त कर लेगा। अपने सद्गुणों, सद्विचारों एवं सत्प्रयत्नों द्वारा कोई भी मनुष्य बुरी−से−बुरी परिस्थिति को पार करके ऊँचा उठ सकता है, मानवोचित सम्मान और सुविधायें प्राप्त कर सकता है। पर जिसकी मनोभूमि निम्न श्रेणी की है जो दुर्बुद्धि से, दुर्गुणों से, दुष्प्रवृत्तियों से ग्रसित है उसके पास यदि कुबेर जैसी सम्पदा और इन्द्र जैसी सुविधा हो तो भी वह अधिक दिन ठहर न सकेगी, कुछ ही दिन में नष्ट हो जायगी।
परमात्मा ने मनुष्य और मनुष्य के बीच में बहुत थोड़ा अन्तर रखा है। सभी के शरीर लगभग एक से हैं। आवश्यकतायें, विशेषताएँ, परिस्थितियाँ भी सभी की लगभग एक−सी हैं। शरीर और मस्तिष्क की बनावट और कार्य प्रणाली में भी कोई बहुत अन्तर नहीं है। यों थोड़ा बहुत अन्तर रहता है, वह इतना ही है जितना एक पेड़ के पत्तों में, या एक जाति के पक्षियों में रहता है। यह इतना अधिक नहीं है कि उसके कारण किसी को विवशता अनुभव करनी पड़े। कुछ थोड़े से रुग्ण अपंग या ऐसे ही असमर्थों को छोड़कर साधारणतया सभी को परमात्मा ने लगभग एक−सा शरीर और मन दिया हुआ होता है और यदि मनुष्य उनका सदुपयोग करे तो ऊँची से ऊँची स्थिति प्राप्त कर सकता है और यदि दुरुपयोग करने पर उतर आवे तो पतन, अन्धकार एवं नरक जैसी, अज्ञान दारिद्र एवं असमर्थता जैसी—बुरी परिस्थिति में ग्रसित हो सकता है।
सच्ची सम्पदा एवं विभूतियाँ
धन, यश, स्वास्थ्य, विद्या, सहयोग आदि विभूतियों के आधार पर इस संसार में नाना प्रकार की सम्पदायें और सुविधायें प्राप्त की जाती हैं। और यह विभूतियाँ मनुष्य की मानसिक स्थिति के अनुरूप आती या चली जाती हैं। भाग्य, देवता, ईश्वर, परिस्थिति आदि को भी दुख−सुख का कारण माना जाता है, पर थोड़ी और गहराई तक जाने पर यह बात भी स्पष्ट हो जाती है कि भाग्य एवं ईश्वर का वरदान एवं अभिशाप भी मनुष्य के अपने विचारों एवं कार्यों के आधार पर ही प्राप्त होता है। न तो ईश्वर अन्यायी है और न भाग्य लिखने वाला विधाता बावला है जो जिसका प्रारब्ध बिना विचारे चाहे जैसा लिख डाला करे। इस बाह्य जगत में अव्यवस्था चल भी सकती है, यहाँ रिश्वत, पक्षपात या भूल−चूक की गुँजाइश रहती है, पर सूक्ष्म जगत में ईश्वरीय विधान एवं कार्यफल के क्षेत्र में किसी प्रकार की गड़बड़ी संभव नहीं। वहाँ मनुष्य का कर्तृत्व ही परखा जाता है और उसी आधार पर प्रारब्ध का निर्माण किया जाता है। वस्तुतः पुरुषार्थ ही प्रारब्ध बनकर सामने आया हुआ है। आज का पुरुषार्थ अगले कल प्रारब्ध बनने वाला है। कर्म और उसका फल मिलने में देर−सवेर का जो अंतर रह जाता है वही भाग्य और ईश्वर को हमारे कर्म से बाहर की कोई स्वतन्त्र वस्तु मानने का भ्रम पैदा करता है। वस्तुतः कर्म ही प्रधान है। उसी का नाम आगे−पीछे भाग्य बन जाता है। मीठे दूध का नाम गुण और रूप भी तो समयानुसार बदलकर खट्टे गाढ़े दही के रूप में हो जाता है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ का अन्तर भी दूध और दही जैसा ही नाममात्र का है।
विचारों का प्रतिफल कर्म
कर्म जो आँखों से दिखाई देता है वह अदृश्य−विचारों का ही दृश्य रूप है। मनुष्य जैसा सोचता है वैसा करता है। चोरी, बेईमानी, दगाबाजी, शैतानी, बदमाशी कोई आदमी यकायक कभी नहीं कर सकता, उसके मन में उस प्रकार के विचार बहुत दिनों से घूमते रहते हैं। अवसर न मिलने से वे दबे हुए थे, समय पाते ही वे कार्य रूप में परिणत हो गये। बाहर के लोगों को किसी के द्वारा यकायक कोई दुष्कर्म होने की बात सुनकर इसलिए आश्चर्य होता है कि वे उसकी भीतरी स्थिति को नहीं जानते थे। इसी प्रकार कोई अधिक उच्चकोटि का सत्कर्म करने का भी आकस्मिक समाचार भले ही सुनने को मिले पर वस्तुतः उसकी तैयारी वह मनुष्य भीतर ही भीतर बहुत दिनों से कर रहा होता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति आज उन्नतिशील एवं सफलता सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं वे अचानक ही वैसे नहीं बन गये होते वरन् चिरकाल से उनका प्रयत्न उसके लिए चल रहा होता है। भीतरी पुरुषार्थ को उनने बहुत पहले जगा लिया होता है। उनने अपने मनःक्षेत्र में भीतर ही भीतर वह अच्छाइयाँ जमा कर ली होती हैं जिनके द्वारा बाह्य जगत में दूसरों का सहयोग एवं उन्नति का आधार निर्भर रहता है। बाह्य−जीवन हमारे भीतरी जीवन का प्रतिबिम्ब मात्र है। पर्दे के पीछे दीपक जल रहा है तो उसका कुछ प्रकाश बाहर भी परिलक्षित होता है। इसी प्रकार भीतरी पर्दे में जिनमें कुछ अच्छाइयाँ हैं वे ही उनकी कीमत पर बाह्य−जगत में सुख साधनों को खरीद लेते हैं।
अनैतिक प्रकृति के लोग बहुधा अपनी चालाकी से धन कमा लेते या कोई उन्नति कर लेते देखे जाते हैं। इससे उस कमाई का सारा श्रेय अनैतिकता को नहीं दिया जा सकता। माना कि लोगों की कमजोरी और भोलेपन का लाभ कई शैतान उठा लेते हैं पर इस शैतानी के पीछे भी उनकी चतुरता, तीव्र−बुद्धि, तत्परता, सावधानी, लगन, हिम्मत, कष्ट सहिष्णुता आदि अनेक गुण छिपे रहते हैं। डाकुओं में भी पुरुषार्थ, हिम्मत, बहादुरी, कष्ट−सहिष्णुता, चतुरता, सावधानी अपने साथियों के प्रति वफादारी आदि अनेक मानसिक गुण भी होते हैं। यदि यह गुण किसी में न हों और वह केवल बेईमानी से ही कुछ लाभ उठाना चाहे तो उसका प्रयास एक कदम भी सफल नहीं हो सकता। अनैतिक लोगों की सफलता से चकित होकर कई लोग अनैतिकता को लाभ और सफलता का हेतु मानने लगते हैं यह भूल है। अनैतिकता के फलस्वरूप तो उन्हें सर्वत्र अविश्वास, घृणा, तिरस्कार, असहयोग एवं यथा अवसर राजकीय एवं ईश्वरीय दंड ही मिलता है। लाभ का श्रेय तो उस मनोभूमि को है जो प्रयत्नपूर्वक इतनी जल्दी बनाई गई कि अनैतिकता के दंड एवं लोगों की पकड़ से बचते हुए एक प्रकार की सफलता प्राप्त कर ली गई। बेवकूफ एवं आलसी, लापरवाह एवं अड़ियल प्रकृति के लोग अनैतिकता को अपनाकर भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। यदि पाप से ही कमाई होती हुई होती तो हर दुरात्मा को सफलता मिली होती। फिर जो लाखों अनैतिक मनोभूमि वाले भीख−टूक पर गुजारा करते दिखाई देते हैं वे सब के सब मालदार ही हो गये होते।
लौकिक सफलताओं का आधार
तात्पर्य केवल इतना है कि नीति और अनीति के आधार पर प्रतिष्ठा−अप्रतिष्ठा, प्रेम, द्वेष, शान्ति−अशान्ति, दंड पुरस्कार, स्वर्ग−नरक मिलते हैं, पर लौकिक सफलताओं का आधार जागरुकता, पुरुषार्थ, लगन, साहस आदि गुण ही हैं। यह सभी गुण शरीर के नहीं, मन के हैं। मन को उपयोगी, अनुकूल, उचित आदतों का, विचार पद्धति का अभ्यस्त बना लेने से ही नाना प्रकार के उन गुणों का आविर्भाव होता है जो लौकिक एवं पारलौकिक सफलताओं के मूल आधार हैं।
शरीर को आलस, असंयम, उपेक्षा एवं दुर्व्यसनों में पड़ा रहने दिया जाय तो उसकी सारी विशेषताएँ नष्ट हो जायेंगी। इसी प्रकार मन को अव्यवस्थित पड़ा रहने दिया जाय, उसे कुसंस्कार−ग्रस्त होने से संभाला न जाय तो निश्चय ही वह हीन स्थिति को पकड़ लेगा। पानी का स्वभाव नीचे की तरफ बहना है, ऊपर उठाने के लिए बहुत प्रयत्न करते हैं तब सफलता मिलती है। मन का भी यही हाल है यदि उसे रोका, संभाला, समझाया, बाँधा और उठाया न जाय तो उसका कुसंस्कारी दुर्गुणी, पतनोन्मुखी, आलसी एवं दीन−दरिद्र प्रकृति का बन जाना ही निश्चित है। आज इसी प्रकार का मानसिक अवसाद चारों ओर फैल रहा है। शरीर की दुर्बलता और बीमारी जिस प्रकार व्यापक रूप से फैली दिखाई देती है वैसी ही हमारी मानसिक दुर्बलता एवं रुग्णता भी कम शोचनीय नहीं है। कलह प्रिय, क्रोधी, तुनक-मिज़ाज, असहिष्णु, ईर्ष्यालु, छिद्रान्वेषी, अहंकारी, उद्दण्ड, प्रकृति के लोगों से हमारा समाज भरा पड़ा है। इन दुर्गुणों के कारण पारस्परिक प्रेम−भावना, आत्मीयता एवं घनिष्ठता दिन−दिन नष्ट होती जाती है और एक आदमी दूसरे से दिन−दिन दूर पड़ता जाता है। प्रेम, सहयोग, प्रसन्नता, मुस्कान, नम्रता, उदारता, सहिष्णुता, शिष्टता, कृतज्ञता के गुणों से यदि मनोभूमि परिष्कृत हो तो परस्पर का प्रेम−भाव कितना बढ़े, कितना सुदृढ़ रहे और फलस्वरूप कितनी प्रगति एवं प्रसन्नता का वातावरण बन जाय?
बर्बादी की दुष्प्रवृत्ति
समय की बर्बादी को यदि लोग धन की हानि से बढ़कर मानने लगें, तो क्या हमारा जो बहुमूल्य समय यों ही आलस में बीतता रहता है क्या कुछ उत्पादन करने या सीखने में न लगे? विदेशों में आजीविका कमाने के बाद बचे हुए समय में से कुछ घंटे हर कोई व्यक्ति अध्ययन के लिए लगाता है और इसी क्रम के आधार पर जीवन के अन्त तक वह साधारण नागरिक भी उतना ज्ञान संचय कर लेता है जितना कि हम में से उद्भट विद्वान समझे जाने वाले लोगों को भी नहीं होता। जापान में बचे हुए समय को लोग गृह−उद्योगों में लगाते हैं और फालतू समय में अपनी कमाई बढ़ाने के अतिरिक्त विदेशों में भेजने के लिए बहुत सस्ता माल तैयार कर देते हैं जिससे उनकी राष्ट्रीय भी बढ़ती है। एक ओर हम हैं जो स्कूल छोड़ने के बाद अध्ययन को तिलाञ्जलि ही दे देते हैं और नियत व्यवसाय के अतिरिक्त कोई दूसरी सहायक आजीविका की बात भी नहीं सोचते। क्या स्त्री क्या पुरुष सभी इस बात में अपना गौरव समझते हैं कि उन्हें शारीरिक श्रम न करना पड़े। समय की बर्बादी शारीरिक नहीं मानसिक दुर्गुण है। मन में जब तक इसके लिए रुचि, आकाँक्षा एवं उत्साह पैदा न होगा, जब तक इस हानि को मन हानि ही नहीं मानेगा तब तक सुधार का प्रश्न ही कहाँ पैदा होगा? टाइम टेबल बनाकर—कार्यक्रम निर्धारित कर, कितने लोग अपनी दिनचर्या चलाते हैं? फुरसत न मिलने की बहानेबाजी हर कोई करता है पर ध्यानपूर्वक देखा जाय तो उसका बहुत सा समय, आलस, प्रमाद, लापरवाही और मंदगति से काम करने में नष्ट होता है। समय के अपव्यय को रोककर और उसे नियमित दिनचर्या की सुदृढ़ श्रृंखला में आबद्ध कर हम अपने आज के सामान्य जीवन को असामान्य जीवन में बदल सकते हैं। पर यह होगा तभी न जब मन का अवसाद टूटे? जब लक्षहीनता, अनुत्साह एवं अव्यवस्था से पीछा छूटे?
अन्तर्दोषों का प्रतिफल
नैतिक आदर्शों का पालन शरीर के प्रतिबंधों पर नहीं मन की उच्चस्थिति पर निर्भर है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के षडरिपु जो मन में छिपे बैठे रहते हैं समय−समय पर हिंसा, झूठ, पाखंड, स्वार्थ, बेईमानी, रिश्वतखोरी, दहेज,कन्या विक्रय, वर विक्रय, माँसाहार जुआ, चोरी आदि सामाजिक बुराइयों के रूप में फूट पड़ते हैं। नाना प्रकार के दुष्कर्म यद्यपि अलग−अलग प्रकार के दीख पड़ते हैं पर उनका मूल एक ही है ‘मन की मलीनता’। जिस प्रकार पेट खराब होने से नाना प्रकार के शारीरिक रोग उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार मन मलीन होने पर हमारे वैयक्तिक और आन्तरिक जीवन में नाना प्रकार के कुकर्म बन पड़ते हैं। जिस प्रकार रोगों के कारण शरीर की पीड़ा उठानी पड़ती है उसी प्रकार मन की मलीनता से हमारा सारा बौद्धिक संस्थान—विचार क्षेत्र औंधा हो जाता है और कार्यशैली ऐसी ओछी बन पड़ती है कि पग−पग पर असफलता, चिन्ता, त्रास, शोक, विक्षोभ के अवसर उपस्थित होने लगते हैं। अव्यवस्थित मनोभूमि को लेकर इस संसार में न तो कोई महान बना है और न किसी ने अपने जीवन को सफल बनाया है। उसके लिए क्लेश और कलह, शोक और संताप दैन्य और दारिद्र ही सुनिश्चित हैं, न्यूनाधिक मात्रा में वे ही उसे मिलने हैं, वे ही मिलते भी रहते हैं।
एक स्मरणीय तथ्य
यह स्मरण रखने योग्य बात है, यह गाँठ बाँध लेने योग्य तथ्य है कि मनुष्य के जीवन में एकमात्र विभूति उसका मन है। इस मन को यदि संभाला और साधा न जाएगा, सुधारा और सुसंस्कृत न किया जाएगा तो वह नीचे बहने वाले जल की तरह स्वभावतः पतनोन्मुख होगा। मन को स्वच्छ बनाना—हमारे चेतन जगत का सबसे बड़ा पुरुषार्थ की ओर जिनके कदम बढ़े हैं उनके लिए लौकिक सफलताओं और समृद्धियों का द्वार प्रशस्त होता है और उन्हीं ने आत्मिक लक्ष प्राप्त किया है। मन पर चढ़े हुए मल आवरण जब हट जाते हैं तो अपनी आत्मा में ही परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन होने लगते हैं। मन की मलीनता के रहते प्रत्येक दुख और अशुभ मनुष्य के आगे−पीछे ही घूमता रहेगा। देवत्व तो मानसिक स्वस्थता का ही दूसरा नाम है। जिसने अपना अन्तःकरण स्वच्छ कर लिया उसने इसी देह में देवत्व का लाभ उठाया है और इसी धरती पर स्वर्ग का आनन्द लिया है। ‘स्वच्छ मन’ जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। युग−निर्माण के लिए हमें इस पर पूरी सावधानी से ध्यान देना होगा।
स्वच्छ मन मानव जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, स्वार्थ, पाप, व्यभिचार, अपहरण, क्रोध, अहंकार आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मन में बढ़ें तो मनुष्य पिशाच बन जाता है। उसकी सारी क्रियाऐं और चेष्टाएँ ऐसी हो जाती हैं जिससे उसे मनुष्य शरीर में रहते हुए भी प्रत्यक्ष असुर के रूप में देखा जा सकता है। आलस, प्रमोद, निराशा, अनुत्साह, अनियमितता, दीर्घ−सूत्रता, विलासिता जैसे दुर्गुण मन में जम जाएँ तो वह एक प्रकार से पशु ही बन जाता है। सींग पूँछ भले ही उसके न हों पर जीवन के अपव्यय की दृष्टि से वह सब प्रकार पशु से भी अधिक घाटे में रहता है।
मन की मलीनता प्रगति के द्वार बन्द कर देती है। उससे न जमकर श्रम हो पाता है और न पुरुषार्थ के लिए समुचित साहस की पूँजी ही उसके पास शेष रहती है। दूषित दृष्टिकोण के कारण भीतर ही भीतर वह निरन्तर जलता भुनता रहता है और अशान्ति, उद्विग्नता में घिरा रहता है। झुँझलाहट, अशिष्टता, कटुता ही उसके चेहरे और व्यवहार से टपकती है। दूसरे हर किसी को खराब बताना, सब में दोष ढूँढ़ना और उन्हें अपना शत्रु मानना ऐसा मानसिक दुर्गुण है जिसके कारण अपने भी बिराने हो जाते हैं, जो लोग प्यार करते थे और सहयोग देते थे वे भी उदासीन, असन्तुष्ट और प्रतिपक्षी बन जाते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने आपको मरघट के ठूँठ करील की तरह सर्वथा एकाकी और सताया हुआ ही अनुभव करते रहते हैं। बेचारों की स्थिति दयनीय रहती है।
भीतरी गन्दगी की दुर्गन्धित सड़न
आलसी और अव्यवस्थित, छिद्रान्वेषी और उद्विग्न मनुष्य के लिए यह संसार नरक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। पापी और दुराचारी, चोर और व्यभिचारी की न लोक में प्रतिष्ठा हैं और न परलोक में स्थान। ऐसे लोग क्षणिक सुख की मृग तृष्णा में भटकते और ओस चाटते फिरते हैं, फिर भी उन्हें सन्ताप के अतिरिक्त मिलता कुछ नहीं। दो घड़ी डरते काँपते कुछ ऐश कर भी लिया तो उसकी प्रतिक्रिया में चिर−अशान्ति उनके पल्ले बँध जाती है। मन की मलीनता से बढ़कर इस संसार में मनुष्य का और कोई शत्रु नहीं है। यह पिशाचिनी भीतर ही भीतर कलेजे को चाटती रहती है और जो कुछ मानव−जीवन में श्रेष्ठता है उस सब को चुपके−चुपके खा जाती है। बेचारा मनुष्य अपनी बर्बादी की इस तपेदिक का समझ भी तो नहीं पाता। वह बाहर ही बाहर कारणों को ढूँढ़ता रहता है; कभी इस पर कभी उस पर दोष मड़ता रहता है और भीतर ही भीतर चलने वाली यह सत्यानाशी आरी सब कुछ चीर डालती है। उन्नति, प्रगति, शान्ति, स्नेह, आत्मीयता, प्रसन्नता जैसे लाभ जो उसे मन के स्वच्छ होने पर सहज ही मिल सकते थे उसके लिए एक असंभव जैसी चीज बने रहते हैं।
मानसिक स्वच्छता का महत्व
काश, मनुष्य मन की स्वच्छता का महत्व समझ पाया होता तो उसका जीवन कितने आनंद और उल्लास के साथ व्यतीत हुआ होता दूसरों की श्रेष्ठता को देखने वाली, उसमें अच्छाइयाँ तलाश करने वाली यदि अपनी प्रेम−दृष्टि जग पड़े तो बुरे लोगों में भी बहुत कुछ आनन्ददायक, बहुत कुछ अच्छा, बहुत कुछ अनुकरणीय हमें दीख पड़े। दत्तात्रेय ऋषि ने जब अपनी दोष−दृष्टि त्याग कर श्रेष्ठता ढूँढ़ने वाली वृत्ति जागृत कर ली तो उन्हें चील, कौए, कुत्ते, मकड़ी, मछली जैसे तुच्छ प्राणी भी गुणों के भाण्डागार दीख पड़े और वे ऐसे ही तुच्छ जीवों को अपना गुरु बनाते गये, उनसे बहुत कुछ सीखते गये। हम चाहें तो चोरों से भी सावधानी, सतर्कता, साहस, लगन, ढूँढ़ खोज जैसे अनेक गुणों को सीख सकते हैं। इस दृष्टि से वे हम से कहीं अधिक आगे होते हैं। पाप की उपेक्षा कर पुण्य को और अशुभ की उपेक्षा कर शुभ को तलाश करने का हमारा स्वभाव यदि बन जाय तो इस संसार में हमें सर्वत्र ईश्वर ही ईश्वर चमकता नजर आवे। उसकी इस पुण्य कृति में सर्वत्र आनन्द ही आनन्द झरता दीखने लगे। सारी दुनियाँ हमारे लिए उपकार, सहयोग, स्नेह और सद्भावना का उपहार लिए खड़ी है, पर हम उसे देख कहाँ पाते हैं। मन की मलीनता तो हमें केवल दुर्गन्ध सूँघने और गंदगी और ढूँढ़ने के लिए ही विवश किये रहती है।
धर्म और श्रम की कमाई
ईमानदारी और मेहनत से जो धर्म की कमाई की जाती है उसी से आदमी फलता−फूलता है, यह बात यदि मन में बैठ जाय तो हम सादगी और किफायतशारी का जीवन व्यतीत करते हुए सन्तोषपूर्वक अपना निर्वाह क्यों न करने लगेंगे? और फिर धर्म उपार्जित कमाई का अनीति से अछूता अन्न हमारी नस−नाड़ियों में रक्त बनकर घूमेगा तो हमारा आत्मसम्मान और आत्मगौरव क्यों आकाश को न चूमने लगेगा? क्यों हम हिमालय जैसा ऊँचा मस्तक न रख सकेंगे? और क्यों हमें हमारी महानता का—श्रेष्ठता का—उत्कृष्टता का अनुभव होने से अन्तःकरण में सन्तोष एवं गर्व भरा न दीखेगा?
प्यार, आत्मीयता, ममता की आँखों से जब हम दूसरों की देखेंगे तो वे हमें अपने ही दिखाई पड़ेंगे। अपने छोटे से कुटुम्ब को देखकर हमें आनन्द होता है। फिर यदि हम दूसरों को बाहर वालों को भी उसी आँख से देखने लगें तो वे भी अपने ही प्रतीत होंगे। अपने कुटुम्बियों के जब अनेक दोष दुर्गुण हम बर्दाश्त करते हैं, उन्हें भूलते, छिपाते और क्षमा करते हैं तो बाहर वालों के प्रति वैसा क्यों नहीं किया जा सकता? उदारता, सेवा, सहयोग, स्नेह, नेकी और भलाई की प्रवृत्ति को यदि हम विकसित कर लें तो देवता की योनि प्राप्त होने का आनन्द हमें इसी मनुष्य जन्म में मिल सकता है। हो सकता है कि हमारी भलमनसाहत और सज्जनता का कोई थोड़ा दुरुपयोग कर ले, उससे अनुचित लाभ उठा ले, इतने पर भी उसके ठगने वाले के मन पर भी अपनी सज्जनता की छाप पड़ी रहेगी और वह कभी न कभी उसके लिए पश्चात्ताप करता हुआ सुधार की ओर चलेगा। अनेक सन्तों और सज्जनों के ऐसे उदाहरण हैं जिनने दुष्टता को अपनी सज्जनता से जीता है। फिर चालाक आदमी भी तो दूसरे अधिक चालाकों द्वारा ठग लिये जाते हैं, वे भी कहाँ सदा बिना ठगे रहते हैं। फिर यदि हमें अपनी भलमनसाहत के कारण कभी कुछ ठगा जाना पड़ा तो इसमें कौन बहुत बड़ी बात हो गई, जिसके लिए पछताया जाय। छोटा बच्चा जिसे हम अपना मानते हैं जन्म से लेकर वयस्क होने तक हमें ठगता ही तो रहता है। उस पर जब हम नहीं झुँझलाते तो प्रेम से परिपूर्ण हृदय हो जाने पर दूसरों पर भी क्यों झुँझलाहट आवेगी?
सुख दुःख में समस्वरता
लाभ की तरह हानि का, संयोग की तरह वियोग का, दिन की तरह रात का आना बिलकुल स्वाभाविक है। कपड़े के ताने−बाने की तरह यह जीवन भी सुख और दुख, उतार और चढ़ाव के ताने−बाने से बुना हुआ है। यहाँ बुरा और भला सब कुछ है। बुरा इसलिए है कि उसमें सुधारने का प्रयत्न करते हुए हम अपने को अधिक पुरुषार्थी अधिक पुण्यवान बनावें, शुभ इसलिए है कि उसे देखकर हम प्रमुदित हों और उस उपलब्धि का वितरण दूसरों को भी करें। दोनों ही प्रकार की—भली और बुरी परिस्थितियों से हँसते−खेलते भी निपटा जा सकता है तो फिर रोते कलपते उनसे क्यों निपटें? ताश खेलने में बाजी हार जाने पर, खेल खेलते हुए परास्त हो जाने पर, नाटक करते हुए आपत्तिग्रस्त हो जाने पर कौन रोता कलपता है? उस हानि को हलके मन से, उपेक्षा भाव से देखने पर उसका प्रभाव मन पर जरा−सी देर हलका−सा रहता है और फिर हम अपना आगे का काम स्वस्थ चित्त से करने लगते हैं। यदि हमारा मन विवेकी हो तो शोक, वियोग, हानि, कष्ट, परेशानी, दुर्व्यवहार आदि के अप्रिय प्रसंगों को हँसकर सहन कर सकते हैं, और फिर सन्तुलित मन को उन समस्याओं का हल खोजने में लगाकर आगत कठिनाई से पार होने का मार्ग भी आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। मन की स्वच्छता से विवेक जागृत होता है, सोचने का सही तरीका अभ्यास में आता है और तब प्रायः सभी उलझी हुई समस्यायें शान्तिपूर्वक सुलझ जाती हैं।
उत्थान और आनन्द का मार्ग
इन थोड़ी सी पंक्तियों में यह विस्तारपूर्वक नहीं बताया जा सकता कि मन की मलीनता को हटा देने पर हम पतन और संताप से कितने बचे रह सकते हैं, और मन को स्वच्छ रखकर उत्थान और आनन्द का कितना अधिक लाभ प्राप्त हो सकता है। यह लिखने−पढ़ने और कहने−सुनने की नहीं, करने और अनुभव में लाने की बात है। लौकिक जीवन को आनन्द और उत्थान की दिशा में गतिवान करने का प्रमुख उपाय यह है कि हम अपने मन को स्वच्छ कर उसकी मलीनताओं को हटावें। मनन करने वाले को ही मनुष्य कहते हैं। अपनी भीतरी मलीनताओं को खोजना और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करना इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। संसार के प्रत्येक महापुरुष को अनिवार्यतः यह पुरुषार्थ करना पड़ा है। क्या यह कोई ऐसा कठिन काम है जो हम नहीं कर सकते? दूसरों को सुधारना कठिन हो सकता है, वह अपना मन अपनी बात न माने, यह कैसे हो सकता है। हम अपने आपको तो सुधार ही सकते हैं, अपने आपको तो समझा ही सकते हैं, अपने को तो सन्मार्ग पर चला ही सकते हैं। इसमें दूसरा कोई क्या बाधा देगा? हम ऊँचे उठना भी चाहते हैं और उसका साधन भी हमारे हाथ में है तो फिर उसके लिए पुरुषार्थ क्यों न करें? आत्म−सुधार के लिए, आत्म निर्माण के लिए, आत्म विकास के लिए क्यों कटिबद्ध न हों?
हमारे आध्यात्मिक लक्ष की आधारशिला मन की स्वच्छता है। जप, तप, भजन, ध्यान, व्रत, उपवास, तीर्थ, हवन, दान, पुण्य, कथा, कीर्तन सभी का महत्व है पर उनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलता है जिनने मन की स्वच्छता के लिए भी समुचित श्रम किया है। मन मलीन हो, दुष्टता एवं नीचता की दुष्प्रवृत्तियों से मन गन्दी कीचड़ की तरह सड़ रहा हो तो भजन, पूजन का भी कितना लाभ मिलने वाला है? अन्तरात्मा की निर्मलता अपने आप में एक साधन है जिसमें किलोल करने के लिए भगवान स्वयं दौड़े आते हैं। थोड़ी साधना से भी उन्हें आत्म−दर्शन का मुक्ति एवं साक्षात्कार का लक्ष सहज ही प्राप्त हो जाता है। स्वल्प साधना भी उनके लिए सिद्धि दायिनी बन जाती है।
आन्तरिक श्रेष्ठता और सज्जनता
‘सुमनस्’ शब्द संस्कृत भाषा में एक बहुत ही प्रतिष्ठा और श्रेष्ठता का प्रतीक है। जिसका मन स्वच्छ होता है उसे ‘सुमनस’ कहकर सम्मानित किया जाता है। ऋषि लोग प्रसन्न होकर किसी को ‘सुमनस्’ अर्थात् सुन्दर मन वाला होने का आशीर्वाद दिया करते थे। वस्तुतः इस निकम्मे प्राणी मनुष्य में यदि कोई विशेषता हो सकती है तो वह उसकी मानसिक स्वच्छता ही है। जिसे यह संपदा प्राप्त हुई उसका जीवन सच्चे अर्थों में सफल हो गया। स्वच्छ मन वाले महामानवों को देव समाज जहाँ बढ़ता है वहीं स्वर्ग बन जाता है। स्थान चाहे पृथ्वी हो या कोई और लोक, स्वर्ग वहीं रहेगा जहाँ ऊँचे मन वाले मनुष्य रहेंगे। किसी राष्ट्र की दौलत सोना, चाँदी नहीं वरन् वहाँ की उच्च मन वाली जनता ही है। श्रेष्ठ मनुष्य का मूल्य सोने और चाँदी के पहाड़ से अधिक है। गाँधी और बुद्ध की कीमत रुपयों में नहीं आँकी जा सकती।
वैयक्तिक और सामूहिक दोनों ही दृष्टियों से जनमानस की स्वच्छता एवं उत्कृष्टता नितान्त आवश्यक है। इसके बिना न तो मनुष्य व्यक्तिगत रूप से सुखी रह सकेगा और न समाज ही समुन्नत हो सकेगा। आमदनी और सुविधायें बढ़ाने वाली योजनाएँ भी तब तक कुछ अधिक उपयोगी सिद्ध न होंगी जब तक अन्तःकरण का स्तर ऊँचा न उठे। ज्ञान, धन, बल और साधन बढ़ जाने से दुष्ट मनुष्य की दुष्टता और अधिक बढ़ जाती है। दूध पीने से साँप का विष ही बढ़ता है। इसलिए राजकीय योजनाएँ जो भी हों, हमारी अध्यात्मिक योजनाएँ यही होनी चाहिए कि मनुष्य का मन ऊँचा उठे, शुद्ध हो, उत्कृष्टताओं एवं सद्गुणों से परिपूर्ण हो, उन्नति करे, यही योजना सच्ची योजना हो सकती है और इसी में सफलता मिलने पर ही सुख साधन बढ़ाने वाली योजनाएँ उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। कुसंस्कारी व्यक्ति −यों को अधिक साधन मिलने लगें तो वे अनीति एवं दुष्टता की ही वृद्धि करेंगे। अशान्ति और उच्छृंखलता ही उनसे बढ़ेगी। साधनहीन दुष्ट की अपेक्षा साधन सम्पन्न शैतान अधिक उत्पात ही करेगा।
आत्म−निर्माण और लोक शिक्षण
“अखण्ड−ज्योति” निर्माण का मिशन लेकर अग्रसर होती है। अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य को इस ओर ध्यान देना होगा। हम अपने मनों को स्वच्छ करें, अपनी मलीनता को बुहारें और अपने समीपवर्ती, संबंधित, परिचित लोगों को भी वैसी ही प्रेरणा करे। अपना आदर्श उपस्थित करके दूसरों को अनुकरण करने के लिए उदाहरण उपस्थित करना प्रचार का सबसे प्रभावशाली तरीका है, पर शिक्षा, उपदेश, प्रचार, अध्ययन, शिक्षण, पठन, श्रवण आदि का भी कुछ तो प्रभाव पड़ता ही है। दोनों ही माध्यमों से हमें लोक शिक्षण के लिए प्रवृत्त होना चाहिए। जन−मानस की स्वच्छता का अभियान संसार की उत्कृष्ट धर्म सेवा और ईश्वर की सच्ची पूजा ही मानी जायगी। इस दिशा में हमारा उत्साह उठना ही चाहिये। हमारा पुरुषार्थ जागना ही चाहिए, हमारा कदम उठना ही चाहिए।
“किसी धर्म को इसलिये स्वीकार मत करो कि वह सबसे प्राचीन है। प्राचीन होना ही सच्चे होने का प्रमाण नहीं होता। अनेक बार पुराने घरों को गिराना पड़ता है और पुराने वस्त्रों का बदलना तो आवश्यक होता है।”
“किसी धर्म को इसलिये स्वीकार न करो कि वह सबसे नया है। नई चीजें समय की कसौटी पर परखी न जाने के कारण सदा श्रेष्ठ नहीं होती।”
“किसी धर्म को इसलिये मत स्वीकार करो कि उस पर विपुल जन−संख्या का विश्वास है, क्योंकि विपुल जन−संख्या का विश्वास तो प्रायः अज्ञान मूलक धर्म पर होता है। एक समय था जबकि विपुल जन−संख्या दास प्रथा को सत्य मानती थी, पर इससे दास−प्रथा का औचित्य सिद्ध नहीं हो सकता।”
“किसी धर्म पर इसलिये श्रद्धा मत करो कि उसे इने-गिने थोड़े से लोगों ने स्वीकार किया है। कभी−कभी अल्प जन−संख्या किसी ऐसे धर्म को अंगीकार कर लेती है जो अन्धकारमय और भ्रांत होता है।”
“किसी धर्म को इसलिये अंगीकार मत करो कि वह किसी सर्वत्यागी महात्मा द्वारा चलाया गया है, क्योंकि हमें कई ऐसे त्यागी मिलते हैं जो सब कुछ त्याग देते हैं पर जानते कुछ भी नहीं। वे कट्टरपंथी होते हैं।”
—स्वामी रामतीर्थ
असभ्य समाज में, अविवेकी लोगों में रहने वाला कोई श्रेष्ठ व्यक्ति भी शान्ति लाभ नहीं कर सकता। कोई असाधारण मनस्वी उन्हें सुधारने में अपनी असाधारण प्रतिभा व्यय करते हुए कुछ अनुकूलता तो उत्पन्न कर सकता है, और ऐसा भी हो सकता है कि सर्पों के लिपटे रहने पर भी अप्रभावित रहने वाले चन्दन वृक्ष की तरह अपनी मानसिक शान्ति को स्थिर रख सके। पर ऐसा होता कम ही है, कोई बिरले ही लोग इस उच्च स्थिति के होते हैं। महात्मा इमर्सन जैसे लोग उँगलियों पर गिनने लायक ही होते हैं जो दावा कर सकें कि—"मुझे नरक में भेज दो, मैं अपने लिए वहाँ भी स्वर्ग बना लूँगा।"
बुरे लोगों के बीच।
बुरे लोगों के बीच रहते हुए सज्जनों को भी कष्ट ही होता है। जहाँ नर बलि चढ़ाने की प्रथा है उन निर्दय, अविवेकी, जंगली, असभ्य लोगों की बस्ती में रहने वाले भले मानुस को भी अपनी सुरक्षा कहाँ अनुभव होगी? बेचारा डरता ही रहेगा कि किसी दिन मेरा ही नम्बर न आ जाय। गन्दे लोगों के मुहल्ले में रहने वाले सफाई पसंद व्यक्ति का भी कल्याण कहाँ है। चारों ओर गन्दगी सड़ रही होगी बदबू उठ रही होगी तो अपने एक घर की सफाई रखने से भी क्या काम चलेगा? दूसरों के द्वारा उत्पन्न की हुई गन्दगी हवा के साथ उड़कर उस स्वच्छ प्रकृति मनुष्य को भी प्रसन्न न रहने देगी। बाज़ार में हैजा फैले तो स्वास्थ्य के नियमों का पालन करने वाले भी उसकी चपेट में आते हैं। मुहल्ले में आग लगे तो अपना छप्पर भी उसकी लपेटों में आता है।
एक गाँव में कुछ लोग साम्प्रदायिक दंगा करें या कोई और उपद्रव करें तो सरकार उसका सामूहिक जुर्माना सारे गाँव पर करती है और शान्तिप्रिय लोगों को भी वह दंड चुकाना होता है। तब शान्तिप्रिय लोगों को भी कानून में निर्दोष नहीं माना जाता। क्योंकि किसी व्यक्ति का इतना ही कर्तव्य नहीं है कि वह शान्ति के साथ सभ्यतापूर्वक स्वयं रहे वरन् यह भी उसका कर्तव्य है कि जो दूसरे उपद्रवकारी हैं उन्हें समझावे या रोके, न रुकते हों तो प्रतिरोध करे। यदि किसी ने अपने तक ही शान्ति को सीमित रखा है, दूसरे उपद्रवियों को नहीं रोका है तो यह न रोकना भी नागरिक शास्त्र के अनुसार, मानवीय कर्तव्य शास्त्र के अनुसार एक अपराध है और उस अपराध का दंड यदि सामूहिक जुर्माने के रूप में वसूल किया जाता है तो उस शान्तिप्रिय व्यक्ति की यह दलील निकम्मी मानी जायगी कि मैं क्या करूँ? मेरा क्या कसूर है? कोई मैंने थोड़े ही अपराध किया है।
न अपराध करें न करने दें
हमें स्मरण रखना चाहिए कि स्वयं अपराध न करना ही हमारी निर्दोषिता का प्रमाण नहीं है। अपराधों और बुराइयों को रोकना भी प्रत्येक सभ्य एवं प्रबुद्ध नागरिक का कर्तव्य है। यदि किसी की आँखों के आगे हत्या, लूट, चोरी, बलात्कार, आदि नृशंस कृत्य होते रहें और वह मौन पत्थर की तरह चुपचाप खड़े देखते रहें, कोई प्रतिरोध न करें तो यह निष्क्रियता एवं अकर्मण्यता भी कानूनन अपराध मानी जायगी और न्यायाधीश इस जड़ता के लिए भी दंड देगा। इसे कायरता और मानवीय कर्त्तव्यों की उपेक्षा माना जाएगा। गाँवों में जिनके पास बन्दूकें रहती हैं उनका यह कर्तव्य भी हो जाता है कि यदि गाँव में दूसरों के यहाँ डकैती पड़े तो डाकुओं से मुकाबला करने के लिए उन बन्दूकों का उपयोग करें। यदि वे बन्दूक वाले डर के मारे अपने घरों में चुपचाप जान बचाये बैठे रहें और डकैती बिना प्रतिरोध पड़ती रहे तो इस काण्ड में डकैतों की तरह उन डरपोक बन्दूकधारियों को भी अपराधी माना जाएगा और सरकार उनकी बन्दूकें जब्त कर लेगी।
सभ्य नागरिक का पवित्र कर्त्तव्य
समाज शास्त्र के अनुसार प्रत्येक सभ्य नागरिक का यह पवित्र कर्तव्य है कि बुराइयों से वह स्वयं बचे और दूसरों को बचावे। अपराध न तो स्वयं करे और न करने दे। जो स्वयं तो पाप नहीं करता पर पापियों का प्रतिरोध नहीं करता वह एक प्रकार से पाप को पोषण ही करता है। क्योंकि जब कोई बाधा देने वाला ही न होगा तो पाप और भी तीव्र गति से बढ़ेगा? हम सब एक नाव में बैठे हैं यदि इन बैठने वालों में से कोई नाव के पेंदे में छेद करे या उछलकूद मचाकर नाव को डगमगाये तो बाकी बैठने वालों का कर्तव्य है कि उसे ऐसा करने से रोकें। यदि न रोका जाएगा तो नाव का डूबना और सब लोगों का संकट में पड़ना संभव है। यदि उस उपद्रवी व्यक्ति को अन्य लोग नहीं रोकते हैं तो उन्हें यह कहने का अधिकार नहीं है कि क्या करें, हमारा क्या कसूर है, हमने नाव में छेद थोड़े ही किया था। छेद करने वाले को न रोकना भी स्वयं छेद करने के समान ही घातक है। मनुष्य समाज परस्पर इतनी घनिष्ठता से जुड़ा हुआ है कि दूसरों को भुगतना पड़ता है। जयचन्द और मीरजाफर की गद्दारी से सारे भारत की जनता को कितने लम्बे समय की गुलामी की यातनाएँ सहनी पड़ीं।
कुसंस्कारी वातावरण का प्रभाव
हमारे समाज में यदि चारों ओर अज्ञान, अविवेक, कुसंस्कार, अन्धविश्वास, अनैतिकता, अशिष्टता का वातावरण फैला रहेगा तो उसका प्रभाव हमारे अपने ऊपर न सही तो अपने परिवार के अल्प विकसित लोगों पर अवश्य पड़ेगा। जिस स्कूल के बच्चे गंदी गालियाँ देते हैं उसमें पढ़ने जाने पर हमारा बच्चा भी गालियाँ देना सीखकर आएगा। गंदे गीत, गंदे फिल्म, गंदे प्रदर्शन, गंदी पुस्तकें, गंदे चित्र कितने असंख्य अबोध मस्तिष्कों पर अपना प्रभाव डालते हैं और उन्हें कितना गंदा बना देते हैं, इसे हम प्रत्यक्ष अपनी आँखों से देख सकते हैं। दो वेश्याएँ किसी मुहल्ले में आकर रहती हैं और वे सारे मुहल्ले में शारीरिक या मानसिक व्यभिचार के कीटाणु फैला देती हैं। शारीरिक न सही, मानसिक व्यभिचार तो उस मुहल्ले के अधिकाँश निवासियों के मस्तिष्क में घूमने लगता है। यदि मुहल्ले वाले उन वेश्याओं को हटाने का प्रयत्न न करें तो उनके अपने नौजवान लड़के बर्बाद हो जावेंगे। बुराई की उपेक्षा करना पर्याप्त नहीं है, पाप की ओर से आँखें बंद किये रहना सज्जनता की निशानी नहीं है। इससे तो अनाचार की आग ही फैलेगी और उसकी लपेटों से हम स्वयं भी अछूते न रह सकेंगे।
समाज में पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों को रोकना केवल सरकार का ही काम नहीं है, वरन् उसका पूरा उत्तरदायित्व सभ्य नागरिकों पर है। प्रबुद्ध और मनस्वी लोग जिस बुराई के विरुद्ध आवाज उठाते हैं वह आज नहीं तो कल मिटकर रहती हैं। अँग्रेजों के फौलादी चंगुल में जकड़ी हुई भारत की स्वाधीनता को मुक्त कराने के लिए−गुलामी के बंधन तोड़ने के लिए जब प्रबुद्ध लोगों ने आवाज उठाई तो क्या वह आवाज व्यर्थ चली गई! देर लगी, कष्ट आये पर वह मोर्चा सफल ही हुआ। समाजगत अनैतिकता, अविवेक, अन्धविश्वास और असभ्यता इसलिए जीवित है कि उनका विरोध करने के लिए वैसी जोरदार आवाजें नहीं उठतीं जैसी राजनैतिक गुलामी के विरुद्ध उठी थीं। यदि उसी स्तर का प्रतिरोध उत्पन्न किया जा सके तो हमारी सामाजिक गंदगी निश्चय ही दूर हो सकती है, सभ्य समाज के सभ्य नागरिक कहलाने का गौरव हम निश्चय ही प्राप्त कर सकते हैं।
सामाजिक कुरीतियों की जंजीर
हम अपनी सामाजिक कुरीतियों पर ध्यान दें तो लगता है कि लोहे की गरम सलाखों से बनी हुई जंजीरों की तरह वे हमें जकड़े हुए हैं और हर घड़ी हमारी नस-नस को जलाती रहती हैं। घर में तीन−चार कन्याएं जन्म ले ले तो माता−पिता की नींद हराम हो जाती है। वे जैसे-जैसे बढ़ने लगती हैं वैसे ही वैसे अभिभावकों का खून सूखता चला जाता है। विवाह—आह विवाह—कन्या का विवाह उनके माता-पिता के यहाँ डकैती, लूट, बर्बादी होने के समान है। आजकल साधारण नागरिकों की आमदनी इतनी ही मुश्किल से हो पाती है कि वे अपना पेट पाल सके। जितना धन दहेज के लिए चाहिए उतना जमा करना तभी संभव है जब या तो कोई आदमी अपना पेट काटे, नंगा रहे, दवादारू के बिना भाग्य भरोसे बीमारी से निपटे, बच्चों को शिक्षा न दे या फिर कहीं से बेईमानी करके लावे। इन उपायों के अतिरिक्त सामान्य श्रेणी के नागरिक के लिए उतना धन जमा करना कैसे संभव हो सकता है, जितने कि कन्या के विवाह में जरूरत पड़ती है—माँगा जाता है। यह संकट कौन कन्या का पिता किस पीड़ा और चिन्ता के साथ पार करता है, इसके पीछे लम्बी करुण कहानी छिपी रहती है। कर्ज का ब्याज, भावी जीवन में अँधेरा शेष बच्चों की शिक्षा एवं प्रगति में गतिरोध जैसी आपत्तियों को कन्या का विवाह अपने पिता और छोटे भाई−बहिनों के लिए छोड़ जाता है। विवाह का पत्थर छाती पर से हटा तो अर्थ संकट का आरा अपनी काट शुरू कर देता है। कई कन्याएँ हैं तब तो जीवित ही मृत्यु है। मृत्यु एक दिन कष्ट देकर शाँति की गोद में सुला देती है पर यह जीवित मृत्यु तो पग-पग पर काटती, नोचती, छेदती और चीरती रहती है।
सत्यानाशी विवाहोन्माद
हमारे हिन्दू समाज में विवाह शादी के अवसर पर जैसा अन्धापन और बावलापन छा जाता है उसे देखकर हैरत होती है। पृथ्वी के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक घूम जाइए, कोई भी देश, कोई भी धर्म, कोई भी समाज ऐसा न मिलेगा। जहाँ विवाह-शादियों के अवसर पर पैसे की ऐसी होली जलाई जाती हो जैसी हमारे यहाँ जलाई जाती है। बरात की निकासी, आतिशबाजी, बाजे, नाच, स्वाँग, दावत, जाफत देखकर ऐसा लगता है कि यह शादी वाले कोई लखपती, करोड़पती हैं और अपने अनाप-शनाप पैसे का कोई उपयोग न देखकर उसकी होली जला देने पर उतर आये हैं। जिन्हें अपने बच्चों का लालन-पालन और शिक्षण दुर्लभ है वे यदि ऐसे स्वाँग बनावें जैसे कि विवाह के दिनों में आमतौर से बनाये जाते हैं तो उसे समझदारी की कसौटी पर केवल ‘उन्माद’ ही कहा जा सकता है। सारी दुनियाँ में कही भी ऐसा ‘सत्यानाशी विवाहोन्माद’ नहीं देखा जाता। मामूली-सी रस्म की तरह, एक बहुत छोटे घरेलू उत्सव की तरह लोग विवाह-शादी कर लेते हैं। भार किसी को नहीं पड़ता, तैयारी किसी को नहीं करनी पड़ती। पर एक हम हैं जिनके जीवन में बच्चों का विवाह ही जीवन भर भारी समस्या बना रहता है, और इसी उलझन को सुलझाते-सुलझाते मर खप जाते हैं।
धर्म के नाम पर पाखण्ड
यह एक कुरीति की चर्चा हुई। ऐसी अगणित कुरीतियाँ हमें घेरे हुए हैं। स्वास्थ्य सुधार के लिए, शिक्षा के लिए, मनोरंजन के लिए, दूसरों की भलाई के लिए, आत्मकल्याण के लिए हम कुछ कर नहीं पाते। आधी से अधिक कमाई उन व्यर्थ की बातों में बर्बाद हो जाती है जिनका कोई प्रयोजन नहीं, कोई लाभ नहीं, कोई परिणाम नहीं। धर्म के नाम पर हमारे मनों में जो उच्चकोटि की भावनाएँ उठती हैं दान देने की जो श्रद्धा उत्पन्न होती है उनका लाभ ज्ञान और धर्म बढ़ाने वाले, पीड़ित और पतितों को राहत देने वाले कार्यों की वृद्धि के रूप में विकसित होना चाहिए था पर होता इससे सर्वथा विपरीत है। काल्पनिक सब्ज बाग दिखाकर संडे-मुसंडे लाल-पीले कपड़े पहनकर लोगों को ठगते रहते हैं। भोले लोग समझते हैं धर्म हो गया, पुण्य कमा लिया, पर वास्तविकता ऐसी कहाँ होती है। धूर्त लोगों को गुलछर्रे उड़ाने के लिए दिया हुआ धन भला धर्म कैसे हो जाएगा? पुण्य कर्म कैसे माना जाएगा? जिसका परिणाम न तो ज्ञान की सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि हो और न पीड़ितों को कोई राहत मिले, वह कार्य पाखंड ही रहेगा, धर्म नहीं। आज धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला है और भोली जनता अपनी गाढ़ी कमाई का अरबों रुपया उसी पाखंड पर स्वाहा कर देती है। पाखण्डों पर खर्च होने वाला समय और धन यदि उपयोगी कार्यों में लगे तो उसका कितना बड़ा सत्परिणाम उत्पन्न हो। मृत्युभोज, पशुबलि, बालविवाह, नींच-ऊँच, स्याने, दिवाने, भूत पलीत, कन्या विक्रय, स्त्रियों द्वारा गाये जाने वाले गन्दे गीत, पर्दा, होली में कीचड़ उछालना, दिवाली पर जुआ खेलना आदि अगणित ऐसी कुरीतियाँ हमारे समाज में प्रचलित हैं, जिनके कारण अनेक रोगों से ग्रसित रोगी की तरह हम सामाजिक दृष्टि से दिन-दिन दुर्बल होते चले जा रहे हैं।
स्वार्थपरता और संकीर्णता
ऊपर धार्मिक मान्यताओं के आधार पर प्रचलित कुरीतियों की कुछ चर्चा की गई है। राष्ट्रीय दृष्टि से स्वार्थपरता, व्यक्तिवाद, असहयोग, संकीर्णता हमारा एक प्रमुख दोष है। सारी दुनियाँ परस्पर सहयोग के आधार पर आगे बढ़ रही है। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह परस्पर सहयोग के आधार पर ही बढ़ा और समुन्नत हुआ है। जहाँ प्रेम, ममता, एकता, आत्मीयता, सहयोग और उदारता है वहीं स्वर्ग रहेगा। समाजवाद और साम्यवाद की मान्यता यही है कि व्यक्ति को अपने लिए नहीं समाज के लिए जीवित रहना चाहिए। सामूहिक सुख-शान्ति बढ़ाने के लिए अपनी समृद्धि और सुविधा का त्याग करना चाहिए। धर्म और अध्यात्म की शिक्षा भी वही है कि व्यक्ति अपने लिए धन, वैभव जमा न करके अपनी प्रतिभा, बुद्धि, क्षमता और सम्पदा को जीवन निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं के लिए ही उपयोग करे और शेष जो कुछ बचता हो सबको सामूहिक उत्थान में लगा दे। जिस समाज में ऐसे परमार्थी लोग होंगे वही फलेगा, फूलेगा और वही सुखी रहेगा। जहाँ स्वार्थपरता आपाधापी, जमाखोरी की प्रवृत्ति पनप रही होगी वहाँ अनैतिकता के सभी कुकर्म बढ़ेंगे और फैलेंगे। सामान्य नागरिकों के स्तर से अत्यधिक ऊँचे स्तर का सुखोपभोग करने की प्रवृत्ति जहाँ भी पनपेगी वहीं शोषण, अन्याय, दुराचार, द्वेष, संघर्ष, ईर्ष्या आदि बुराइयाँ विकसित होंगी। प्राचीनकाल में जिनकी प्रतिभा अधिक कमाने की होती थी वे अपने राष्ट्रीय स्तर से अधिक उपलब्ध धन को लोकहित के कार्यों में दान कर देते थे। जीवन की सार्थकता, सेवा कार्यों में लगी हुई शक्ति के आधार पर ही आँकी जाती थी।
आज जो जितना धनी है वह उतना बड़प्पन पाता है, यह मूल्याँकन गलत है। जिसने राष्ट्रीय स्तर से जितना अधिक जमा कर रखा है वह उतनी ही बड़ी गलती कर रहा है। इस गलती को प्रोत्साहित नहीं, निरुत्साहित किया जाना चाहिए, अन्यथा हर व्यक्ति अधिक धनी, अधिक सुख सम्पन्न, अधिक विलासी होने की इच्छा करेगा। इससे संघर्ष और पाप बढ़ेंगे। सहयोग, प्रेम, त्याग, उदारता और परमार्थ की सत्प्रवृत्तियों का उन्मूलन व्यक्तिगत स्वार्थपरता ही कर रही है। इसे हटाने और उदारता, सहकारिता, लोकहित, परमार्थ की भावनाओं को पनपाने के लिए हमें शक्ति भर प्रयत्न करना होगा, तभी हमारा समाज सभ्य बनेगा। अन्यथा शोषण और विद्रोह की, जमाखोरी और चोरी की, असभ्यता फैलती ही रहेगी और मानव जाति का दुख बढ़ता ही रहेगा।
सद्गुण, सभ्यता की निशानी
विवेक, न्याय, अनुशासन, संयम, ईमानदारी, समाजनिष्ठा, व्यवहार, आत्मगौरव जैसे सद्गुणों का नाम ही सभ्यता है। इसी को संस्कृति कहते हैं। भारतीय संस्कृति तो निश्चित रूप से यही है इसी के आधार पर हम प्राचीनकाल में महान थे। और जबकि अपने प्राचीन अतीत को पुनः वापिस लाने के लिए, युग निर्माण के लिए हम अग्रसर हो रहे हैं तो हमें व्यक्ति और समाज में उन्हीं गुणों का आविर्भाव एवं विकास करना होगा। पोशाक, वेशभूषा, शिक्षा, धन, पद आदि की दृष्टि से हम भले ही अपने को सभ्य मानते रहें पर यह तो विडम्बना मात्र है। सच्ची सभ्यता मानवीय गुणों के सामूहिक विस्तार पर ही निर्भर रहती है और उसी के आधार पर कोई समाज या राष्ट्र फलता-फूलता है और तभी उससे संबंधित नागरिकों का सच्चा हित साधन होता है।
सभ्य समाज की स्थापना के लिए
सामाजिक कुरीतियों और सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों का कायम रहना सज्जनों के लिए भी विपत्ति का कारण ही रहेगा। व्यक्ति कितनी ही उन्नति कर ले पतित वातावरण में वह उन्नति भी बालू की भीति की तरह अस्थिर रहेगी। इसलिए हमें जितनी व्यक्तिगत उन्नति की चिन्ता है उतनी ही सामाजिक उन्नति का भी ध्यान रखना होगा और उसके लिए हर संभव प्रयत्न करना होगा। इस दिशा में की हुई उपेक्षा हमारे अपने लिए ही घातक होगी। अपने समाज के सुधार पर ध्यान देना उतना ही आवश्यक है जितना अपना स्वास्थ्य एवं उपार्जन की समस्याओं का सुलझाना। समाजगत पापों से हम निर्दोष होते हुए भी पापी बनते हैं। भूकम्प, दुर्भिक्ष, युद्ध, महामारी आदि के रूप में ईश्वर भी हमें सामूहिक दंड दिया करता है और सचेत करता है कि हम अपने को ही नहीं सारे समाज को भी सुधारें। स्वयं ही सभ्य न बने; सार समाज को भी सभ्य बनावें।
भक्ति-भावना
सकल कामना हीन जे, राम भगति रस लीन।
नाम सुप्रेम पियूष ह्रद, तिन्हहुँ किए मन मीन॥
निरगुन तें एहि भाँति बड़, नाम प्रभाउ अपार।
कहउँ नामु बड़ राम तें, निज विचार अनुसार॥
सवरी गीध सुसेवकनि, सुगति दीन्हि रघुनाथ।
नाम उधारे अमित खल, बेद बिदित गुनगाथा॥
ब्रह्म राम तें नामु बड़, बरदायक बरदानि।
रामचरित सत कोटि महँ, लिय महेस जिये जानि॥
नामु राम को कलपतरु, कलि कल्यान निवासु।
जो सुमिरत भयो भाँग तें, तुलसी तुलसीदासु॥
रामनाम नरकेसरी, कनककसिपु कलिकाल।
जापकजन प्रहलाद जिमि, पालिहि दलि सुरसाल॥
सठ सेवक की प्रीति रुचि, रखिहहिं राम कृपाल।
उपल किए जलजान जेहिं, सचिव सुमति कपि भालु॥
हौंहु कहावत सबु कहत, राम सहत उपहास।
साहिब सीतानाथ सो, सेवक तुलसीदास॥
प्रभु तरु तर कपि डार पर, ते किए आपु समान।
तुलसी कहूँ न राम से, साहिब सीलनिधान॥
राम निकाई रावरी, है सब ही को नीक।
जौं यह साँची है सदा, तौ नीकौ तुलसीक॥
करम बचन मन छाड़ि छलु, जब लागि जनु न तुम्हार।
तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं, किएँ कोटि उपचार॥
जसु तुम्हार मानस बिमल, हंसिनि जीहा जासु।
मुकताहल गुन गन चुनइ, राम बसहु हियँ तासु॥
सबु करि मागहिं एक फलु, राम चरन रति होउ।
तिन्ह कें मन मंदिर बसहु, सिय रघुनन्दन दोउ॥
स्वामि सखा पितु मातु गुर, जिन्ह के सब तुम्ह तात।
मन मंदिर तिन्ह कें बसहु, सीय सहित दोउ भ्रात॥
जाहि न चाहिअ कबहुँ कुछ, तुम्ह सन सहज सनेहु।
बसहु निरंतर तासु मन, सो राउर निज गेहु॥
स्वपच सबर खस जमन जड़, पावँर कोल किरात।
राम कहत पावन परम, होत भुवन विख्यात॥
मातु मते महुँ मानि मोहि, जो कछु करहिं सो थोर।
अघ अवगुन छमि आदरहिं, समुझि आपनी ओर॥
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आत्म-कल्याण का लक्ष प्राप्त करने के लिए आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया को अपनाना आवश्यक है। जप, तप, ध्यान-भजन की सारी आध्यात्मिक विधि व्यवस्था इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए है। पर यह उद्देश्य जिन साधनों से प्राप्त होता है वह शरीर, मन और समाज हैं। इनके सुव्यवस्थित रहे बिना आत्म-कल्याण का लक्ष प्राप्त होना तो दूर जीवित रहने के दिन कटने भी कठिन हो जाते हैं। साधना का प्रथम सोपान, बाह्य-जीवन को सुव्यवस्थित बनाते हुए आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करना है। इस प्रथम कक्षा को उत्तीर्ण किये बिना जो लोग छलाँग मारकर ऊपर चोटी पर चढ़ना चाहते हैं, सीधे प्रत्याहार, समाधि, चक्र-वेधन, कुण्डलिनी जागरण की बात सोचते हैं उन्हें असफलता ही मिलती है। आत्मिक पूर्णता का लक्ष मलीन और दूषित साधनों से कैसे प्राप्त किया जा सकेगा?
लक्ष की ओर गति
स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज के सहारे ही आत्मा अपने लक्ष की ओर गतिवान होती है। इसलिए प्रगति की इस पहली मंजिल को हमें सावधानी से पूरा करना चाहिए। इसके बाद अगली मंजिलें बहुत ही सरल हो जाती हैं। प्रथम कक्षा कमजोर रहे तो आगे का काम कैसे चलेगा? जिसके पैर ही कमजोर हैं उससे दौड़ कैसे लगाई जा सकेगी? जिसने प्राथमिक पाठशाला के स्वर, व्यंजन, गिनती, पहाड़े ही ठीक तरह याद नहीं किए हैं, उसके लिए एम.ए. की उत्तीर्णता का स्वप्न, काल्पनिक ही रह जाएगा।
योग-साधना में पहले यम-नियमों की साधना करनी पड़ती है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह—यम और शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान—नियम इन दसों बातों पर बारीकी से ध्यान दिया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि इनका उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सुव्यवस्था ही है। ब्रह्मचर्य, शौच और तप का कार्यक्रम शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से रखा गया है। इन्द्रियों का संयम ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत आता है। शरीर, वस्त्र, घर एवं उपकरणों की स्वच्छता का तात्पर्य शौच है। तप का अर्थ है शारीरिक और मानसिक श्रम—आसन, प्राणायाम, व्यायाम, तितिक्षा, कष्ट-सहिष्णुता आदि। इन्हीं या ऐसे ही सद्गुणों से स्वास्थ्य की रक्षा होती है। सत्य, सन्तोष, स्वाध्याय और ईश्वर उपासना यह चार आधार मानसिक स्वच्छता के लिए हैं। छल-कपट, दंभ-पाखंड आदि कुविचारों का शमन सत्य-निष्ठा से होता है। सन्तोषी को तृष्णाऐं और वासनाऐं क्यों सतावेंगी? स्वाध्याय और मनन-चिन्तन करते रहने से मन की मलीनता हटेगी ही। ईश्वर का उपासक सर्वत्र उस अंतर्यामी को उपस्थित देखेगा तो क्यों पाप में प्रवृत्त होगा और क्यों भय, चिन्ता, शोक, निराशा आदि में डूबेगा? इसी प्रकार सामाजिक सुव्यवस्था के लिए अहिंसा, अस्तेय और अपरिग्रह हैं। दूसरों में अपनी ही आत्मा देखकर उनसे प्रेम, सहयोग एवं उदारता का व्यवहार करना अहिंसा है। अपनी न्यायेपार्जित कमाई पर ही गुजारा करना अस्तेय है और निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं से बची हुई प्रतिभा, विद्या, क्षमता, समय एवं सम्पत्ति को समाज के हित में वापिस लौटा देना, दान कर देना अपरिग्रह है। इन्हीं तथ्यों पर कोई समाज फलता-फूलता और संगठित रहता है। यम और नियम योग-साधना के प्राथमिक कार्यक्रम हैं। योग से ही आत्मा की प्राप्ति संभव है। इसलिए लक्ष पूर्ति की सच्ची अभिलाषा जिन्हें है उन्हें सच्चा मार्ग भी अपनाना पड़ता है।
छलाँग नहीं लगाई जा सकती
जो साधक इन आरम्भिक बातों की उपेक्षा करते हैं और समाधि तक ही सीधे पहुँचना चाहते हैं, जीवन को सब प्रकार अस्त-व्यस्त और पतित-गलित स्थिति में पड़ा रखकर जो आध्यात्मिक पूर्णता की बात सोचते हैं, वे अतिवादी ही कहे जायेंगे। आग के बिना जैसे भोजन पका लेना कठिन है वैसे ही आत्मिक प्रगति के आवश्यक उपकरणों का परित्याग कर, शरीर मन और समाज को हीन स्थिति में रखने से प्रयोजन कैसे सिद्ध होगा? प्राचीन काल में कठिन तपश्चर्या और साधना का मार्ग अपनाकर लोग इन तीनों साधनों को शुद्ध करते थे। आज के जल्दबाज लोगों ने अमुक जगह स्नान कर लेने, अमुक पुस्तक पढ़ लेने, अमुक जप कर लेने मात्र से चुटकियों में परम-लक्ष की प्राप्ति की कल्पना आरम्भ कर दी है। स्नान, पाठ, जप का पूरा लाभ उन्हीं को मिल सकता है जिनके साधन सबल हैं। सब प्रकार की हीन और पतित स्थिति में पड़े हुए लोगों का केवल इन उपचारों का मात्र सहारा लेकर भव-सागर से पार हो सकना कठिन है। यदि यह मार्ग इतना ही सरल होता तो प्राचीन काल में किसी को इतनी कष्ट-साध्य, श्रम-साध्य और समय साध्य साधनाऐं न करनी पड़तीं। वे भी आज के लोगों की तरह कुछ उपचार मात्र करके सब कुछ प्राप्त कर लेने की बात क्यों न सोच लेते?
राजमार्ग यही रहा है
प्राचीन इतिहास पर जब हम दृष्टिपात करते हैं तो हमें अध्यात्म-लक्ष की प्राप्त करने वाले महापुरुषों में प्रथम सोपान की सफलता प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित होती है। जिन्होंने परमात्मा की प्राप्ति की, वे परशुराम, विश्वामित्र, अगस्त, शुक्राचार्य, द्रोणाचार्य आदि क्या शारीरिक दृष्टि से दुर्बल थे? अत्रि, वशिष्ठ, अंगिरा, याज्ञवल्क्य, भारद्वाज, गौतम आदि ऋषियों के मानसिक स्तर क्या गिरे हुये थे? समाज को अवसाद की ओर जाते देखकर उसे रोकने के लिए व्यास जी ने पुराणों की साहित्य रचना आरम्भ की थी। चरक, सुश्रुत, वागभट्ट ने आयुर्वेद शास्त्र का निर्माण किया था। नारद जी प्रचार के लिए परिव्राजक बन गये थे। परशुरामजी ने लड़ाई ही ठान दी थी। भगवान बुद्ध, महावीर, कबीर, नानक, गाँधी, दयानन्द, विवेकानन्द, रामतीर्थ आदि अर्वाचीन ऋषियों ने भी अस्वस्थ समाज को स्वस्थ बनाने के प्रयत्न को ही अपनी प्रधान साधना बना लिया था। वे जानते थे कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। समाज का अधिक भाग पतित स्थिति में पड़ा रहे तो थोड़े से साधना-रत व्यक्तियों के लिए भी उस कीचड़ को पार कर सकना कठिन होगा। बलवान हाथी भी दलदल में फंस जाता है, पतित-समाज की परिस्थितियाँ ध्यान, भजन में संलग्न व्यक्तियों का मन भी अपने जाल में उलझा लेती है।
मैं अकेला नहीं हम सब
इस तथ्य को भगवान बुद्ध जानते थे। इसलिए उन्होंने अपना कार्यक्रम सुनिश्चित रूप से स्थिर कर लिया था। वे बारबार कहा करते थे कि—‟जब तक एक भी प्राणी इस बन्धन में है तब तक मैं मुक्त नहीं हो सकता। मैं हर बार जन्म लेकर दूसरों को मुक्ति की प्रेरणा दूँगा और जब तक कोई भी जीव भव-बन्धनों में बंधा मिलेगा तब तक उसे छुड़ाने को ही अपना लक्ष बनाये रहूँगा।” सामाजिक जीवन का व्यक्तिगत जीवन से अटूट संबंध है। समाज की उपेक्षा करके एक व्यक्ति यदि अपनी ही भलाई की बात सोचता है तो यह उसकी संकीर्णता है। संकीर्ण दृष्टिकोण वाला व्यक्ति कैसे अध्यात्मवादी कहला सकता है? और कैसे उस संकुचित हृदय वाले तुच्छ व्यक्ति को परमात्मा की महानता को समझने और प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है? परमात्मा दूसरों के लिए ही सब कुछ करने में निरन्तर संलग्न है, फिर उसका सच्चा भक्त अनुदार, स्वार्थी, संकीर्ण एवं केवल अपनी ही बात सोचने तक सीमित कैसे रह सकता है? साधक पर साध्य का कुछ तो प्रभाव पड़ना ही चाहिए। उदार, दानी, सहृदय, उपकारी परमात्मा का भक्त क्या इन गुणों से सर्वथा रहित ही रह जाएगा? क्या वह दूसरों की सेवा और सहायता करके समाज में सज्जनता एवं शान्ति बढ़ाने के लिए कुछ भी न करके केवल पूजा पाठ में ही बैठा रहेगा?
भगवान का मंदिर तोड़ा न जाय
शरीर भगवान का मन्दिर है। आत्मा का निवास होने से उसकी पवित्रता सब प्रकार अक्षुण्य रखे जाने योग्य है। मंदिर को तोड़-फोड़ डालने वाला व्यक्ति पापी और दुष्ट कहा जाता है। फिर असंयम और अनियमितताओं की कुल्हाड़ी चलाकर शरीर को तोड़-फोड़ डालने वाला मनुष्य भला धर्मात्मा कैसे हो सकता है? मंदिरों का सुधारना, जीर्णोद्धार कराना पुण्य कार्यों में गिना जाता है तो अपने या दूसरों के शरीरों को स्वस्थ एवं सुन्दर बनाना, आत्मा के निवास मंदिर को ठीक करना भी एक धर्म कार्य ही माना जाएगा। हममें से प्रत्येक धर्म प्रेमी और अध्यात्मवादी को ईश्वर उपासना की भाँति ही स्वास्थ्य की समुन्नति की ओर भी रुचि लेनी चाहिए।
भटके को रास्ते पर लावें
कुमार्गगामी भूले-भटके लोगों को रास्ते पर लाने के लिए सभी प्रयत्न धर्म सेवा के अंतर्गत माने जाते हैं। मेले ठेलों में खोये हुए या अन्य प्रकार बिछड़े हुए बच्चों को उदार लोग अपना समय बरबाद करके भी उनके माता-पिता तक पहुँचा देने का प्रयत्न करते हैं। रास्ता भटके हुए अनजान आदमी को लोग उसके गंतव्य स्थान पर पहुँचा देने में सलाह एवं सहयोग देकर सहायता करते हैं। आज अनेकों का मन अपने अभिभावक धर्म से बिछुड़ कर काँटों की झाड़ी में भटक रहा है। इन बालकों को, इन भटके हुओं को उनके गन्तव्य स्थानों तक पहुँचा देना भी एक पुण्य कार्य ही है। कुमार्गगामी को समझा-बुझाकर सन्मार्ग पर लाने का सत्पुरुष सदा की प्रयत्न करते रहते हैं। नारद जी ने डाकू बाल्मीक को समझा बुझाकर ऋषि बाल्मीक के रूप में परिणत कर दिया था। गौतमबुद्ध ने अंगुलिमाल डाकू और अम्बपाली वेश्या को धर्मपरायण बनाया था। यह कार्य अत्यन्त ही सराहनीय माने जाते हैं। हममें से अनेकों के मन अंगुलिमाल डाकू और अम्बपाली वेश्या से अधिक पतित है उन्हें सुधारने का प्रयत्न भी बुद्ध के सत्प्रयत्न जैसा ही महान गिना जाएगा।
राजनैतिक गुलामी और सामाजिक हीनता
राजनैतिक गुलामी की जंजीरों में जकड़ी हुई जनता को स्वराज्य दिलाने के लिए जिन लोगों ने त्याग और बलिदान किये उनकी कीर्ति युग-युगान्तरों तक उज्ज्वल रहेगी। इतिहासकार उनके नामों को स्वर्णाक्षरों में अंकित करते रहेंगे और हमारी भावी पीढ़ियाँ कृतज्ञता से उनके आगे मस्तक झुकाते हुए श्रद्धापूर्वक स्मरण करती रहेंगी। आज हमारी सामाजिक हीनता, अनैतिकता, असमानता, रूढ़ियों एवं कुसंस्कारों की गुलामी भी एक चुनौती के रूप में प्रस्तुत है। इसे न हटाया जा सका तो राजनैतिक गुलामी उतनी हानि नहीं पहुँचा सकती जितनी सामाजिक कुसंस्कारों की गुलामी। अंग्रेज जितना धन यहाँ से विलायत ले जाते थे उससे हजार गुना अधिक धन हम कुरीतियों की होली में स्वाहा कर देते हैं। जितने अत्याचार अंग्रेज हम पर करते थे उससे हजार गुने अत्याचार हम एक दूसरे पर सामाजिक कारणों से करते रहते हैं। स्त्रियों और अस्वर्णों के रूप में हमारी तीन चौथाई जनता आज भी अपने मनुष्योचित अधिकारों से वंचित है। इन्हें जिस अनीति का शिकार होना पड़ता है क्या हम किसी भी विदेशी शासन की अपेक्षा कम नृशंस है?
नृशंसता का प्रतिरोध
राजनैतिक पराधीनता एवं विदेशियों द्वारा बरती गई नृशंसता के विरुद्ध पिछले दिनों हमारे मनों में असंतोष उत्पन्न हुआ था तो उसका बाह्य स्वरूप स्वराज्य आन्दोलन के रूप में—स्वाधीनता संग्राम के रूप में—सामने आया था। जन-मानस का व्यापक असंतोष राजमुकुटों को तिनके के समान उड़ाकर फेंक सकता है। दुनियाँ का इतिहास साक्षी है कि बड़ी से बड़ी क्रूर सल्तनतें जन-असंतोष की आग में जलकर भस्म हो गईं। जनता की मनोभूमि जब करवट बदलती है तो बड़ी से बड़ी विडम्बनाएँ धराशायी हो जाती हैं। जिस हीन सामाजिक दुरवस्था में हम आज पड़े हैं वह भी तभी तक टिकी रह सकती है जब तक जन-मानस में उसके प्रति उभार नहीं आता। यह बुराइयाँ अभी अखरती तो हैं पर यदि काँटे की तरह उनकी चुभन हम अनुभव करने लगे तो फिर इन्हें उखाड़ फेंकने में कितनी देर लगेगी?
युग की प्रखर चुनौती
सामाजिक असभ्यता हमारे लिए राजनीतिक गुलामी से अधिक त्रासदायक स्थिति में हमारे सामने मौजूद है। स्वाधीनता संग्राम के बलिदानी सेनानी स्वर्ग से हमें पूछते हैं कि हमारा कारवाँ एक ही मंजिल पर पड़ाव डालकर क्यों पड़ा रहा? आगे का पड़ाव सामाजिक असभ्यता के उन्मूलन का था, अगला मोर्चा वहाँ जमना था—पर सैनिकों ने हथियार खोलकर क्यों रख दिये? युग की आत्मा इन प्रश्नों का उत्तर चाहती है। हमें इसका उत्तर देना होगा। यदि हम सामाजिक असभ्यता के उन्मूलन के लिए कुछ नहीं करना चाहते, कुछ नहीं कर सकते तो जहाँ भावी इतिहासकार जिस प्रकार स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों को श्रद्धा से मस्तक झुकाते रहेंगे वहाँ हमें धिक्कारने में भी कसर न रहने देंगे।
लक्ष पूर्ति के लिए यह आवश्यक है
आध्यात्मिक लक्ष की पूर्ति के लिए अग्रसर हुए हम धर्मप्रेमी ईश्वरभक्त लोगों के कन्धों पर लौकिक कर्तव्यों की पूर्ति का भी एक बड़ा उत्तरदायित्व है। ईश्वर को हम पूजें और उसकी प्रजा से प्रेम करे; भगवान का अर्चन करें और उसकी वाटिका को—दुनियाँ को—सुरम्य बनावें तभी हम उसके सच्चे भक्त कहला सकेंगे तभी उसका सच्चा प्रेम प्राप्त करने के अधिकारी हो सकेंगे। हमारे आध्यात्मिक लक्ष की पूर्ति का प्रथम सोपान सुव्यवस्थित जीवन है। स्वस्थ शरीर स्वच्छ मन, सभ्य समाज उसके तीन आधार हैं। इन आधारों को संतुलित करने के लिए सबल और समर्थ बनाने के लिए हमें कुछ करना ही पड़ेगा, कटिबद्ध होना ही पड़ेगा। युग-निर्माण का महान कार्य हमारे इस कर्तृत्व पर ही निर्भर है। इसकी न तो अब उपेक्षा की जा सकती है और न आँखें चुराई जा सकती हैं। भगवान यही हम से कराना चाहते हैं। यही हमें करना भी होगा।
“घोड़ा की दोनों आँखों के सामने ‘अँधेरी’ पहिनाये बिना उसे चलाया नहीं जा सकता। षडरिपु (काम, क्रोध आदि) को भी ऐसा ही समझना चाहिये। उनको वश में किये बिना मन रूपी घोड़ा ईश्वर की दिशा में अग्रसर नहीं हो सकता।”
—रामकृष्ण परमहंस
पशु अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को पूर्ण कर आनन्द की नींद सो सकता है, पेट की भूख मिट जाने से उसे तृप्ति मिल सकती है पर मनुष्य का इतने मात्र से काम नहीं चल सकता। पेट और शरीर ही नहीं उसका अदृश्य अन्तःकरण भी इस पंच-भौतिक शरीर के समान ही सक्रिय रहता है ओर उसे भी भूख लगती है, उसमें भी अभिलाषा रहती है। यह भूख ‘ज्ञान’ की है यह अभिलाषा ‘दान’ की है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य अपने आपको अन्धकार में पड़ा हुआ और दान के अभाव में असत् की—स्वार्थ की—असुरता में डूबा हुआ अनुभव करता रहता है।
आत्मा की अतृप्त आकाँक्षा
मनुष्य के आत्मिक क्षेत्र में एक पुकार सदैव उठती रहती है—‛तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्योर्माऽमृतंगमय’। अर्थात्—अन्धकार से प्रकाश की ओर, असत् से सत् की ओर, मृत्यु से अमृत की ओर हे प्रभु हमें ले चलिए ताकि हम मृत्यु से बचकर अमृत को प्राप्त कर सकें। जिसका जीवन खाने-सोने में ही बीता वस्तुतः वह मर गया। जिसने परमार्थ कमाया उसी का मानव जन्म सफल हुआ और उसे ही जीवित एवं अमर कहा जा सकता है। ज्ञान और दान की आत्मिक भूख प्रत्येक मनुष्य को लगी रहती है। जिसकी यह क्षुधा तृप्त नहीं होती उसका अन्तरात्मा मुरझाया, अशान्त एवं मूर्छित जैसा बना रहता है, उसकी सारी दिव्य विशेषताऐं अविकसित अर्ध-मृत स्थिति में पड़ी-पड़ी नष्ट होती रहती हैं। ऐसी स्थिति में जिन्हें रहना पड़ता है उन्हें पशु से भी गया बीता माना गया है। पशु यह सन्तोष कर सकता है कि उसकी कोई आत्मिक आकाँक्षा नहीं है, पर मनुष्य में वह है, यही आकाँक्षा उसकी एकमात्र विशेषता भी है, यदि वह भी पूर्ण न हो सकी तो क्षुधित और तृषित आत्मा असन्तुष्ट ही जीवन यात्रा पूरी करता है।
परमार्थ की पुण्य-प्रवृत्ति
प्रत्येक श्रेष्ठ व्यक्ति ने—प्रत्येक बुद्धिमान और विचारशील मनुष्य ने—यह ध्यान रखा है कि उसके जीवन में कुछ परमार्थ अवश्य बन पड़े। भजन, पूजन, तीर्थ, उद्यापन, कथा-कीर्तन आत्मबल बढ़ाने के लिए आवश्यक विधान हैं। पर उनका संबंध अपने तक ही सीमित है, उनका लाभ केवल अपने को ही मिलने वाला है इसलिए वे उपयोगी, उचित एवं महत्वपूर्ण तो हैं पर पुण्य परमार्थ की श्रेणी में नहीं गिने जा सकते। परमार्थ वे हैं जिनसे संसार में सद्-विचारों और सद्भावों की वृद्धि होती है तथा पिछड़े हुओं को उठने का अवसर मिलता है। प्राचीन काल में ब्राह्मण वर्ग इस परमार्थ में ही अपना सारा जीवन लगाता था। ज्ञान-प्रसार, लोक-शिक्षण, सत्प्रवृत्तियों का उन्नयन, सत्कर्मों की प्रेरणा एवं दुष्प्रवृत्तियों के शमन के लिए उनका निरन्तर प्रयत्न रहता था। गिरे हुओं को उठाने के लिए, पतितों और पीड़ितों को सहारा मिले ऐसी व्यवस्था बनाने के लिए उनके जीवन का अधिकाँश समय व्यतीत होता था। उस महान कार्यक्रम को सच्चा और प्रभावशाली बनाने के लिए जिस आत्म-बल की आवश्यकता पड़ती है वह उपासना द्वारा ही प्राप्त होता है, इसलिए ब्राह्मण वर्ग उपासना और तपश्चर्या में भी पूर्ण श्रद्धापूर्वक संलग्न रहता था। इन विशेषताओं के कारण ही उन्हें भू-सुर की उपाधि मिलती थी, उन्हें श्रेष्ठ माना जाता था, लोग उन्हें पूजते थे और उनको जीवन-निर्वाह की चिन्ताओं से मुक्त रखने के लिए आवश्यक दान-दक्षिणा भी देते थे। जनता का यह मूल्याँकन सही भी था। जो स्वयं अपना सारा जीवन परमार्थ में ही लगाये हुए हैं और दूसरों को परमार्थ की प्रेरणा देते हैं, ऐसे ही लोगों के द्वारा तो व्यक्ति और समाज की श्रेष्ठता कायम रह सकती है। इस मानवोचित श्रेष्ठता के लिए जिनका जितना समय और श्रम, मन और धन लगता है वे उतने ही अंश में ब्राह्मण हैं, पूज्य हैं, सराहनीय हैं, वन्दनीय हैं। ऐसे ही सत्पुरुषों की अधिकता से संसार में सुख-शान्ति बढ़ती है और उनके अभाव में ही सर्वत्र दुख-दारिद्र का संकट छाने लगता है।
धर्म का विकृत स्वरूप
आज हम अपने चारों ओर दृष्टि पसार कर देखते हैं तो लगता है कि मानवीय विशेषता एवं उत्कृष्टता का सर्वश्रेष्ठ आधार परमार्थ बुरी तरह उपेक्षित हो रहा है। परमार्थ के नाम पर पाखंड पुज रहा है। जिस लक्ष के लिए—सद्भावना, सज्जनता एवं सहृदयता को बढ़ाने के लिए—परमार्थ प्रचलित हुआ था वह उद्देश्य लोगों की आँखों से ओझल हो गया है और धूर्तता एवं प्रवंचना भरे जंजालों को परमार्थ समझकर उन पर शक्ति बर्बाद की जा रही है। ऐसी दशा में हमारी ज्ञान और दान की भूख अतृप्त ही बनी रहेगी और इस अतृप्ति एवं अभाव के कारण व्यक्ति का चरित्र और समाज का उत्कर्ष कैसे उच्च-स्तर की ओर गतिवान हो सकेगा? आज न तो वर्ग के रूप में ब्राह्मण दृष्टिगोचर होता है और न परमार्थ की ब्रह्म-प्रवृत्ति ही जीवित है। ऐसी दशा में हमारा वैयक्तिक और सामाजिक पतन ही निश्चित था और वह सामने प्रस्तुत भी है। अमुक वंश में जन्म लेने मात्र से ब्राह्मण कर्मों से रहित होने पर भी अपने को ब्राह्मण समझने का मिथ्या अहंकार करने वाले लोग बहुत हैं। संस्कृत भाषा में कुछ श्लोक मंत्र रट लेने और पूजा-कथा की प्रक्रिया के बदले धन बटोरने वाले पोथी पांडे भी पर्याप्त हैं। पर जिनकी अन्तरात्मा में परमार्थ की प्रवृत्ति को जीवित रखने के लिए अपने आपको खाद बना कर गला देने की तड़पन हो ऐसे ब्रह्म-वर्चस्व सम्पन्न तेजस्वी ब्रह्म-परायण व्यक्ति उंगलियों पर गिनने लायक संख्या में भी मुश्किल से मिलेंगे। यदि उनकी बहुतायत रही होती तो हमारा स्तर आज भी उतना ही ऊँचा रहा होता जितना प्राचीन काल में था।
परोपकार का महान प्रतिफल
उद्योग, विज्ञान, शिक्षा, चिकित्सा, शासन, शिल्प-कला आदि विविध क्षेत्रों में अनेक प्रकार की प्रगति दीखती है, उसके पीछे उन अन्वेषकों, विचारकों-आविष्कारकों, निर्माताओं का अथक परिश्रम ही मुख्य है। यदि उनने परमार्थ-वृत्ति अपनाकर लोक-हित की दृष्टि से अपना जीवन न खपाया होता तो आज जो भौतिक प्रगति दीख रही है कदापि संभव न हुई होती। वे मनीषी यदि अपने जीवन का लक्ष यदि हमारी ही तरह कमाना-खाना बनाये रहे होते तो वे अपने तीव्र बुद्धिबल से अपने लिए अधिक सुख-साधन एकत्रित कर लेते, कुछ अधिक मौज-मजा करके मर जाते, पर न तो उनका यश अमर होता और न उनके द्वारा दूसरों को कोई लाभ ही मिला होता। ऐसी दशा में वे मरते समय आत्म-संतोष क्या लाभ करते? उन्हें भी हमारी ही तरह कीड़े-मकोड़े की मौत मरते हुए पश्चाताप के आँसू बहाकर यहाँ से विदाई लेनी पड़ती। जिन महान मनीषियों ने परमार्थ-लक्ष अपनाकर विश्व मानव की महान सेवाऐं कीं, भूखे-नंगे तो वे भी नहीं रहते होंगे, बेशक उनको वासनाओं और तृष्णाओं पर संयम करके परमार्थ की कमाई की ओर ध्यान देना पड़ा होगा, उसका महत्व हृदयंगम करना पड़ा होगा, पर इससे क्या वे घाटे में रहे? नहीं उनने भी बहुत पाया। सारी मानवजाति चिरकाल तक उनकी ऋणी रहेगी, और अगणित अन्तःकरणों से निकले हुए आशीर्वाद उनकी आत्मा को अनन्त-काल तक स्वर्ग में असीम शान्ति प्रदान करते रहेंगे।
स्वार्थपरता की संकीर्णता
देश, धर्म, जाति और समाज के लिए अपने को गला देने वाले, परमार्थी लोगों की इस देश में कभी कमी नहीं रही। वासना और तृष्णा की पूर्ति से मिलने वाली सुख सुविधाओं को यहाँ अत्यन्त तुच्छ और घृणित एवं निकृष्ट कोटि की सफलता माना जाता रहा है। जो लोग इस स्तर में उलझे रहे उन्हें उपहासास्पद माना जाता रहा। यही कारण था कि भारत में घर-घर नर रत्न पैदा होते रहे, महापुरुष जन्मते रहे। असुरता का शमन करने के लिए हड्डियाँ देने वाले दधीच, दानशीलता पर आँच न आने देने वाले कर्ण और मोरध्वज, सत्य की रक्षा के लिए खुद बिक जाने वाले और अपने स्त्री बच्चों को बेच देने वाले हरिश्चन्द्र, गौ के बदले अपने प्राण प्रस्तुत करने वाले दलीप, युग निर्माताओं को आत्म-समर्पण कर देने वाले हनुमान यहाँ घर-घर पैदा होते रहते थे। भारत के शानदार इतिहास के पृष्ठ उन परमार्थी लोगों की गौरव गाथाओं से भरे पड़े हैं जिनने अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीने का लक्ष अपनाया। विदेशी शासकों के विरुद्ध जो पिछले एक हजार वर्षों तक स्वतंत्रता संग्राम लड़ा जाता रहा उसमें बलिदान होने वाले अगणित शहीदों की चिताऐं भले ही बुझ गई हों पर उनकी रोशनी अभी भी हमें रास्ता बताने के लिए जल रही है।
आज की महानतम आवश्यकता
युग-निर्माण का महान कार्य आज की प्रचण्ड आवश्यकता है। जिस खंडहर स्थिति में हमारे शरीर, मन और समाज के भग्नावशेष पड़े हैं उन्हें उसी दशा में पड़े रहने देने की उपेक्षा जिन्हें सन्तोष दे सकती है उन्हें ‘जीवित मृत’ ही कहना पड़ेगा। आज बेशक ऐसे ही लोगों की संख्या अधिक है, जिन्हें अपने काम से काम, अपने मतलब से मतलब—रखने की नीति पसंद है। पर ऐसे लोगों का बीज नष्ट नहीं हुआ है जो परमार्थ की महत्ता समझते हैं और लोकहित के लिए, विश्व-मानव के उत्कर्ष के लिए यदि उन्हें कुछ प्रयत्न या त्याग करना पड़े तो उसके लिए भी इनकार न करेंगे। युग-निर्माण जैसी युग की पुकार सर्वथा अनसुनी, नितान्त उपेक्षित पड़ी रहे और उसके लिए कोई अपनी प्रसन्नता, अभिरुचि प्रकट न करे और कोई उसमें कुछ हाथ न बटावे अभी इतने आत्मिक पतन का जमाना नहीं आया है। नष्ट−भ्रष्ट स्वास्थ की पीड़ा से तड़पते हुए रुग्ण मनुष्यों को निरोग और दीर्घजीवी देखने के लिए—क्या किसी की आँखें उत्सुक नहीं? दुर्बुद्धि और दुराचार में डूबे हुए नर-पिशाच की तरह मानसिक अशान्ति की नारकीय ज्वाला में जलते हुए लोगों को सज्जनता, सद्भावना, स्नेह और सत्कर्मों में संलग्न रहकर शान्ति एवं सन्तोष के साथ मुसकराते हुए देखने के लिए क्या किसी का मन न हुलसेगा? द्वेष, असहयोग, अविवेक, अन्धविश्वास एवं उच्छृंखलता के वातावरण को हटाकर स्नेह, सहयोग, न्याय, विवेक, व्यवस्था एवं अनुशासन से सुसम्पन्न सभ्य-समाज की स्थापना किसे प्रिय न लगेगी? यह तीनों ही बातें उत्तम, महत्वपूर्ण एवं आवश्यक हैं। किन्तु इनका प्रस्तुत होना तभी संभव है जब इसके लिए हम प्रयत्न करें। स्वार्थ में सिर से पैर तक उलझा हुआ मनुष्य इस प्रकार के निस्वार्थ कामों में तभी रुचि ले सकता है जब उसमें परमार्थ भावना जगे। विश्वास किया जाना चाहिए कि हमारे ऋषि रक्त में अभी परमार्थ भावना बिलकुल निस्वत्व नहीं हुई है। वह मूर्छित पड़ी है, उद्बोधन मिलने पर वह जग सकती है।
चुनौती को कौन स्वीकार करे?
यों इस देश में छप्पन लाख धर्म का व्यवसाय करके अपनी रोटी कमाने वाले पेशेवर धर्मसेवक मौजूद हैं जो दान दक्षिण के ऊपर अपना निर्वाह करते हैं और जिनसे स्वभावतः यह आशा की जानी चाहिए कि वे मनुष्य जाति के भौतिक एवं आत्मिक उत्कर्ष में कुछ योग दें। पर उस ओर तो अन्धेरा ही दीखता है। उजाला हमें अपने हृदय का तेल जलाकर करना पड़ेगा। कार्यव्यस्त गृहस्थ लोगों के द्वारा ही अब तक संसार की बड़ी प्रवृत्तियाँ चली हैं। युग-निर्माण के लिए भी वे बहुत कुछ कर सकते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों से इस प्रकार की आशा की जा सकती है। उत्कृष्टता और भावना की दृष्टि से हम लोग संख्या में थोड़े होते हुए भी एक बड़ी शक्ति के रूप में संगठित हैं। परमार्थ का लक्ष हमें प्रिय है। आत्मा में ईश्वरीय प्रकाश उत्पन्न करने के लिए हम लोग अपने को साधना और तपश्चर्या के द्वारा इस योग्य बना चुके हैं कि जो कुछ कहें उसे दूसरे सुनें, जो कुछ करें उसका दूसरे अनुकरण करें, कुछ प्रेरणा करें तो दूसरे उस पर चलना शुरू करें। हमारा लक्ष सत्य है, हमारे साधन शुद्ध हैं, हमारा कर्तृत्व भावना पूर्ण है तो क्यों हमारी बात सुनी न जायगी? क्यों हमारी प्रेरणा मानी न जायगी?
ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न किया जाये
युग-निर्माण के लिए हमें ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करना है। जिन दुर्बलताओं और बुराइयों ने जन-मानस पर आधिपत्य जमा रखा है उनकी बुराइयों और हानियों को यदि मनुष्य भली प्रकार समझ ले तो उन्हें छोड़ने कि लिए अवश्य उत्सुक होगा। यदि प्रगति और शान्ति का सच्चा मार्ग उसे विश्वासपूर्वक उपलब्ध हो जाय तो अनैतिक, अपराधपूर्ण, खतरे से भरे हुए दुखदायी रास्ते पर वह क्यों चलेगा? संसार में जितनी भी क्रान्तियाँ हुई हैं उनमें सर्वप्रथम विचार विस्तार ही हुआ है। ज्ञान ही क्रिया का पूर्व रूप है। कोई तभी दृश्य रूप में आता है जब पहले वैसे विचार मन में गहराई तक अपनी जड़ जमा लेते हैं।
ज्ञान-यज्ञ का पुण्य आयोजन
हमें अपना व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन श्रेष्ठ सुव्यवस्थित एवं प्रगतिशील बनाना है तो उसके लिए सद्ज्ञान ही आत्मा की भूख है उस भूख को पूर्ण करने के लिए हमें अपनी परमार्थ वृत्ति को प्रबुद्ध करना पड़ेगा। ज्ञान-दान सबसे बड़ा है। इसे ब्रह्म कर्म कहा गया है। आपत्ति से उबारने वाले साधनों में ज्ञान ही प्रधान है। व्यक्ति में सुधार और परिवर्तन इसी माध्यम से संभव हो सकता है। अखण्ड-ज्योति-परिवार के साथ अब हम युगनिर्माण के लिए ज्ञान यज्ञ आरंभ करते हैं। विभिन्न प्रयोजनों की पूर्ति के लिए विभिन्न यज्ञों के आयोजन होते रहे हैं। गायत्री का अग्निहोत्र, यज्ञ प्रथम अध्याय के रूप में अब अपने नियत लक्ष तक आ पहुँचा। यज्ञ की महत्ता से अपरिचित जनता ने उसका महत्व समझा भी और उसे अपनाया भी। अब ऊँची कक्षा में पंचकोश साधना के साथ-साथ ज्ञान यज्ञ का महाअभियान आरंभ किया जा रहा है। युग-निर्माण की पृष्ठभूमि यही है।
“जिस प्रकार आकाश में ऊँचा उड़ते हुये भी गिद्ध की दृष्टि पृथ्वी पर पड़े हुये माँस के टुकड़े की तरफ रहती है उसी प्रकार शास्त्र पढ़े हुये पंडित अत्यन्त उच्च ज्ञान की बातें कहते रहते हैं पर उनका मन तो साँसारिक दाल, भात, पकवान, सुन्दर वस्त्र, धन, मान आदि में ही लगा रहता है।”
भूख और प्यास से पीड़ित रहने वाला प्राणी दिन-दिन दुर्बल होता जाता है और कुछ ही दिन में वह मरणासन्न स्थिति तक जा पहुँचता है आत्मा को ज्ञान की भूख और दान की प्यास रहती है यही उसका अन्न-जल है। इनके न मिलने से अन्तस्तल का दुर्बल और रुग्ण होना स्वाभाविक है। यही दुर्बलता और रुग्णता बाह्य-जीवन में अज्ञान, दारिद्र, रोग, कुसंस्कार, दुर्भाव, अनीति आदि रूप धारण करके हमारे लिए विविध-विधि पीड़ा एवं यातनाऐं प्रस्तुत करती रहती है। गाय को तिलतिल सता कर भूखा मारने वाला दुष्ट व्यक्ति , छुरी फेर कर जल्दी ही गला काट देने वाले कसाई से अधिक नृशंस माना जाता हैं आत्म-हत्यारे अनेक प्रकार के होते हैं पर सब में बुरे वे हैं जो आत्मा को दुख और प्यास से तरसा-तरसा कर मारते हैं। गौ-हत्यारे ‘कलंकी’ कहलाते हैं, इन आत्म-हत्यारों को क्या कहा जाना चाहिए वैसा शब्द ढूँढ़ने से ही मिलेगा।
आत्मा की भूख और प्यास
हमने अपनी आत्माओं को उसकी स्वाभाविक भूख ‘ज्ञान’ और स्वाभाविक प्यास ‘दान’ से वंचित रखा है उसी का परिणाम हमारे व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में गतिरोध शीत-युद्ध एवं संकटकालीन स्थिति जैसा सामने उपस्थित है। जीवन की वास्तविक समस्याओं को सुलझाने वाला सच्चा ज्ञान हमें कहाँ मिलता है? ज्ञान के नाम पर न जाने क्या-क्या अलाय-बलाय हम पढ़ा करते हैं पर ऐसी वस्तुऐं ढूँढ़ते तक नहीं जो हमारी आज की हीन स्थिति से एक कदम ऊँचा उठाने का व्यावहारिक मार्ग-दर्शन करे, प्रत्यक्ष प्रकाश प्रदान करे। न तो ऐसा साहित्य दिखाई पड़ता है और न ऐसा सत्संग। यदि कहीं हो भी तो उसमें अत्यधिक रोचक भयानक अभिव्यक्तियाँ न रहने से लोग उसे तलाश नहीं करते, पसंद नहीं करते। इसी प्रकार दान की समस्या है। दान के नाम पर हर रोज ही जेब कटाते रहते हैं पर जिससे मानव अन्तरात्मा की सत्प्रवृत्तियों में अभिवृद्धि हो या गिरे हुओं को पीड़ितों को ऊपर उठने का सहारा मिले। ऐसा विवेकपूर्ण दान कौन करता है? दान के नाम पर हम ठगाते तो बहुत हैं पर सत्परिणाम की कसौटी पर कस कर कुछ खर्च करने वाले कोई बिरले ही होते हैं।
सद्विचार और सत्प्रवृत्तियाँ
युग का अवसान सद्विचारों और सत्प्रवृत्तियों के घट जाने से होता है, उसका निर्माण-कार्य इन दोनों की अभिवृद्घि से ही संभव है। बाह्य-जगत में कोई चीज तभी आती है जब वह मनोभूमि में गहराई तक पड़ जमा लेती है। हमारी मनोभूमि में दूषित प्रकार के विचार और विश्वास गहराई तक जम गये हैं, यदि इनका उन्मूलन हो सके और इनके स्थान पर सद्विचारों एवं उच्च-आदर्शों की प्रतिष्ठापना की जा सके तो युग-परिवर्तन का कार्य कुछ भी कठिन न रहेगा। भावना और विचारधाराऐं जब आदर्शवाद से परिपूर्ण होंगी तो फिर अपना प्रत्येक कार्य भी उत्कृष्ट प्रकार का होगा और जहाँ उत्तम कार्य-कलाप पनपता है। श्रेष्ठ गतिविधियाँ बढ़ती हैं, वहाँ स्वर्ग का राज्य पृथ्वी पर उतर आता है। सुख-शान्ति के सभी साधन वहाँ स्वयमेव प्रस्तुत हो जाते हैं।
हमें यही करना है। ज्ञान-यज्ञ ही अब हमारा अभियान है। लोक-शिक्षण के लिए हम सब कटिबद्ध होंगे। ‘अखण्ड-ज्योति’ का बड़ा परिवार है। हममें से प्रत्येक दीपक जलाने को तत्पर होगा तो इस अन्धेरी रात में दीपावली का पुण्य-पर्व झिलमिलाने लगेगा। जिन कुविचारों ने हमारे शरीरों को चौपट कर रखा है, हमारे मनों को मलीन बना रखा है, हमारे समाज को विसंगठित एवं पतनोन्मुख बना रखा है, उन्हें बुहार कर बाहर फेंक देने के लिए हमें स्वच्छता-सैनिकों की तरह अपनी झाडू सँभालनी पड़ेगी। अपनी गंदगी हमें आप बटोरनी पड़ेगी, अपने दाँत हमें आप माँजने पड़ेंगे, अपना कमरा हमें आप झाड़ना पड़ेगा। किसी दूसरे का आसरा क्यों तकें? अंग्रेजों को हमारी फूट ने बुलाया था हमारे संगठन ने उन्हें भगा दिया। दुर्भावनाऐं और दुष्प्रवृत्तियाँ हमारी लापरवाही से पनपती रही हैं जब उनके उन्मूलन का व्रत धारण का लिया जाएगा और इसके लिए एक प्राण एक मन होकर जुट जाया जाएगा तो वे कब तक ठहरेंगी? कहाँ तक ठहरेंगी?
विचारधारा का व्यापक विस्तार
हमारी पहली योजना यह है कि—‛अखण्ड-ज्योति’ का प्रत्येक सदस्य अब एक धार्मिक पत्रिका का पाठक मात्र न रहेगा वरन् वह एक लोक शिक्षक के रूप में अपना उत्तरदायित्व अनुभव करेगा। युग-निर्माण के लिए आवश्यक प्रकाश ‘अखण्ड-ज्योति’ प्रस्तुत करेगी, वह एक बिजली घर के रूप में रहेगी और हम में से प्रत्येक एक बल्ब के रूप में प्रकाशित होकर अपने क्षेत्र में प्रकाश फैलावेगा। अज्ञान ही मानव जाति का सबसे बड़ा शत्रु है, इसी अन्धकार में नाना प्रकार के पाप पनपते हैं। उल्लू, चमगादड़, सर्प, बिच्छू, काँतर, कानखजूरे अन्धेरे में ही बैठे रहते हैं। छछूँदर अपने दर्जन भर बच्चे-कच्चों का अन्धेरे में ही प्रसव करती है। प्रकाश के सामने उनका ठहरना बन नहीं पड़ता। दुर्बुद्धि की छछूँदर का परिवार भी अज्ञान के वातावरण में ही पनपता है। ज्ञान की मशाल जलाने पर अन्धेरा मिटेगा और उसके पीछे पोषण पाने वाला जंजाल भी किनारा कस जाएगा।
धन दान नहीं, समय दान
धन का दान करने वाले बहुत हैं। धन के बल पर नहर सड़क बन सकती हैं। लोक मानस को उत्कृष्ट नहीं बनाया जा सकता। यह कार्य सत्पुरुषों के भावनापूर्ण समयदान से ही संभव होगा। युग-निर्माण के लिए धन की नहीं, समय की, श्रद्धा की, भावना की, उत्साह की आवश्यकता पड़ेगी। नोटों के बन्डल यहाँ कूड़े-करकट के समान सिद्ध होंगे। समय का दान ही सबसे बड़ा दान है, सच्चा दान है। धनवान लोग अश्रद्धा एवं अनिच्छा रहते हुए भी मान, प्रतिफल, दबाव या अन्य किसी कारण से उपेक्षापूर्वक भी कुछ पैसे दान-खाते फेंक सकते हैं, पर समय-दान केवल वही कर सकेगा जिसकी उस कार्य में श्रद्धा होगी। इस श्रद्धा-युक्त समय-दान में गरीब और अमीर समान रूप से भाग ले सकते हैं। युग-निर्माण के लिए इसी दान की आवश्यकता पड़ेगी और आशा की जायगी कि अपने परिवार के लोगों में से कोई इस दिशा में कन्जूसी न दिखावेगा।
क्षेत्र हम स्वयं तलाश करें
अखण्ड ज्योति परिवार अब तक शिक्षक संघ के रूप में परिणत होने जा रहा है। लोक-मानस को प्रबुद्ध करने के लिए हममें से प्रत्येक को कुछ करना पड़ेगा। अपना शिक्षा क्षेत्र हम स्वयं तलाश करें। अपने मित्रों, स्वजनों, सम्बन्धियों, परिचितों, परिजनों तथा स्त्री-बच्चों पर निगाह डालकर, बारीक नजर डालकर यह देखें कि उनमें से कौन-कौन हमसे सहानुभूति रखते हैं, किस-किस की हमारे प्रति आदर बुद्धि है, कौन हमारी बात को ध्यानपूर्वक सुन सकेंगे। आरम्भ में ऐसे लोगों की एक सूची अपनी डायरी में नोट कर लेनी चाहिए और यह निश्चय करना चाहिए कि इन्हें युग-निर्माण की विचारधारा से परिचित एवं प्रभावित करने का हम प्रयत्न करेंगे। यह कार्य साहित्य के माध्यम से होगा। अधिक परिचित समीपवर्ती लोगों की बात का कुछ कम प्रभाव होता है पर श्रेष्ठ लोगों के लिखे सत्साहित्य के बारे में ऐसी बात नहीं है। संदेश वाहक के रूप में सत्साहित्य पढ़ाने का काम ऐसा है जो उन लोगों को भी प्रभावित कर सकता है जो व्यक्तिगत रूप से हम से अधिक प्रभावित नहीं होते। चलते-फिरते पुस्तकालय के रूप में हम अपनी ऐसी अच्छी पुस्तकें जो युग-निर्माण के उद्देश्य को पूरा करती हैं, अपने प्रभाव क्षेत्र में पढ़ाते रहने का कार्य अपने जिम्मे लेलें तो इस छोटी सेवा का भी बहुत भारी परिणाम उत्पन्न हो सकता है। विचारों की शक्ति इस संसार की सर्वोपरि शक्ति है। आग की भट्टी में गरम करके फौलाद को भी पिघलाया और ढाला जा सकता है। विचारों की भट्टी में तपाया और ढाला हुआ मनुष्य तुच्छ से महान, असुर से देव, स्वार्थी से परमार्थी और आत्मा से परमात्मा बन सकता है। विचारों की शक्ति का महत्व हम समझें और सद्विचारों के ढाँचे में लोगों के मस्तिष्कों को ढालने की क्रिया आरंभ कर दें तो भले ही अपने गले में मालाएँ न पड़ें पर सच्चे अर्थों में हम लोक-शिक्षक, जन-मानस के परिवर्तनकारी एवं लोक निर्माता सिद्ध हो सकते हैं।
आग से आग जलेगी
‘अखण्ड-ज्योति’ आपके पास पहुँचती ही है। इन दिनों जो अंक उसके निकल रहे हैं तथा आगे निकलेंगे उनमें जीवन को निर्माण करने वाला तत्व बहुत कुछ है। उसे हृदय की स्याही में डुबोकर प्राणपूर्ण भाषा में, पूरे मनोयोग की कलम से लिखा जा रहा है। उसमें जीवन एवं प्रकाश की मात्रा मौजूद है। आगे जैसे-जैसे अपनी गतिविधियाँ तीव्र होंगी यह आग और भी अधिक तीव्र होगी। इन अंकों को अधिकाधिक लोगों को पढ़ाया जाना चाहिए। पत्रिका पहुँचे तो उसे उलट-पुलट कर एक कोने में न पटक दिया जाना चाहिए वरन् स्वयं कम से कम दो बार उसे पढ़ें और अपने प्रभाव क्षेत्र के जिन-जिन शिक्षितों के नाम अपनी डायरी में नोट किये थे, उनके यहाँ जाकर, इन अंकों एवं लेखों का महत्व समझाते हुए पढ़ने को दिया जाय। फिर एक बार लेने जाया जाय। अंक देने और लेने के निमित्त दो बार हर महीने जिनसे मिला जाय उनसे अंक में प्रस्तुत विचारों के ऊपर कुछ चर्चा भी की जाय। चर्चा और पठन दोनों बातों के मिलने से स्वाध्याय और सत्संग की दुहरी आवश्यकता पूरी होती है। यह दोनों की लाभ घर बैठे पहुँचाने का धर्म कार्य किसी भी श्रेष्ठ कार्य से कम महत्वपूर्ण नहीं है। समय दान का यह छोटा सा काम कुछ ही दिन बाद अपना जादू जैसा असर उपस्थित करेगा और जिनको सेवा दी जा रही है उनके विचारों में भारी परिवर्तन आरम्भ होगा।
युग-निर्माण की विचारधारा पर अत्यन्त सस्ती सुन्दर एवं प्रभावपूर्ण पुस्तिकाओं की एक सीरीज प्रस्तुत करने की हम तैयारी कर रहे हैं। हमारे भीम और हनुमान जैसे बजरंगी शरीरों को जिस असंयम ने बर्बाद कर दिया उनके विरुद्ध हमारे मन में रोष है, इस असंयम के शासन का उन्मूलन करने के लिए परशुराम जैसा कुठार तेज किया जा रहा है। हमारे हरिश्चन्द्र, भरत, कपिल, कणाद जैसे चरित्र एवं आदर्श को जिन्होंने नष्ट करके चालाक, बेईमान, विलासी और स्वार्थरत नर पशुओं में बदल दिया उन कुविचारों की असुरता पर प्रहार करने के लिए दधीच की हड्डियों का वज्र बनाया जा रहा है। हमारे प्रेम, स्नेह, ममता, आत्मीयता, उदारता और सहयोग से ओत-प्रोत देव समाज को जिस अन्ध तमिस्रा की लंका ने कैद कर लिया पतित और पद दलित किया उसका अन्त अब निकट है। उस लंका दहन के लिए हनुमान की पूँछ तेल भीगे कपड़ों से लपेटी ही जा रही है। यह दुर्बुद्धि जिसने हमारी सभ्यता एवं संस्कृति के आदर्श एवं उत्कर्ष को गिराया है उसके लिए हमारे मन में बड़ा क्षोभ है। यह क्षोभ जलती आग की तरह अब बाहर निकलेगा तो वे दुष्टताऐं जो हमारे मनः क्षेत्रों में आज जमी बैठी हैं और किलोल कर रही हैं, देर तक ठहर न सकेंगी। उन्हें अपना स्थान छोड़ना ही पड़ेगा।
एक दीपक से, दस दीपक जलें
छोटी, सस्ती, सुन्दर, सुसज्जित एवं आग भरी पुस्तिकाओं की एक लम्बी सीरीज लिखने का हमारा विचार है। अखण्ड-ज्योति के सदस्य लोग शिक्षक की तरह अपनी डायरी में नोट किये नाम वाले व्यक्तियों को उन्हें भी यथासमय पढ़ाते रहेंगे। और उन विषयों पर चर्चा करते रहेंगे तो यह लोक शिक्षण का एक विशाल कार्यक्रम चल पड़ेगा। 20 हजार हम लोक शिक्षक यदि हर साल 10 व्यक्तियों को यह विचारधारा पहुँचाने लगें और फिर उन दस व्यक्तियों में से भी कुछ व्यक्ति इस कार्य प्रणाली को अपना लें तो चक्रवृद्धि ब्याज के सिद्धान्त से अगले पाँच वर्षों में ही देश के कोने-कोने में यह शिक्षण पद्धति कार्यान्वित हो सकती है। हमारा सारा ही राष्ट्र इस युग-निर्माण विश्वविद्यालय के अन्तर्गत शिक्षा प्राप्त कर सकता है।
शिक्षित वर्ग तक युग-निर्माण की विचारधारा को पहुँचाने का एक प्रभावशाली उपाय ऊपर बताया गया है। पर पूरी योजना इससे अत्यधिक विशाल है। यह तो उसका एक अंश मात्र है। हमारे देश में अशिक्षित समाज शिक्षितों से कहीं अधिक बड़ा है। उसके लिए पढ़कर सुनाने, समझाने, सत्संग एवं प्रवचन की शैली ही कारगर हो सकती है। अपने घर में ही कई स्त्री बच्चे ऐसे होते हैं जो पढ़े-लिखे नहीं होते पर सुन-समझ तो वे भी सकते हैं। कथा, कहानियों, संस्मरणों एवं घटनाओं का मनोरंजक प्रसंग बनाकर बड़ी से बड़ी शिक्षाऐं उनको हृदयंगम कराई जा सकती हैं। यह सुनाने-समझाने का गुण भी हमें पैदा करना पड़ेगा। संकोच, झिझक, झेंप, शर्म, बड़प्पन की बीमारियों को इस मार्ग में बाधक नहीं होने देना चाहिए। सत्कर्म में बाधा डालने वाले दुष्ट-दुर्जनों की तरह यह दुर्गुण भी बड़े बंधन सरीखे हैं, उन्हें भी तोड़-फोड़ ही डालना चाहिए। नारद जी भगवान का संदेश पहुँचाने के लिए घर-घर भक्ति का प्रचार कर सकते हैं, शंकराचार्य पैदल द्वार-द्वार पर धर्म का अलख जगा सकते हैं, मीरा भक्ति की निर्झरिणी बहाने के लिए यहाँ-वहाँ नाचती फिर सकती है तो क्या हम उनसे भी बड़े हैं, जो लोक शिक्षण में झिझकें, शर्म, अपमान अनुभव करें। यह कार्य बड़प्पन को घटाने वाले नहीं बढ़ाने वाले हैं। सन्निपात के मरीज की गाली सुनकर भी विचारशील डाक्टर अपना इलाज छोड़ते नहीं। बेवकूफों का उपहास एवं तिरस्कार हमें अपने पथ से विचलित क्यों कर सकेगा? अशिक्षितों को भी सद्विचारों की शिक्षा दी जा सकती है। उन्हें इकट्ठे करने के लिए कोई न कोई आकर्षक तरीका ढूँढ़ निकालना हर बुद्धिमान आदमी के लिए संभव ही हो सकता है।
सत्संग और स्वाध्याय का समन्वय
शिक्षितों को साहित्य के सहारे और अशिक्षितों को सत्संग के सहारे प्रबुद्ध करने की प्रक्रिया को अपनाना लोक शिक्षकों का आवश्यक कर्तव्य है। यह प्रक्रिया जितनी तीव्र एवं भावनापूर्ण होगी उतना ही लोक मानस अधिक प्रभावित होगा। विचारों में आवश्यक परिवर्तन हो जाने पर, मनोभूमि के अनुकूल हो जाने पर, सत्सम्बन्धी प्रतिज्ञाओं आन्दोलनों विरोधों एवं प्रतिरोधों की प्रक्रियाऐं भी बन सकती हैं और उन्हें सफलतापूर्वक बढ़ाया भी जा सकता है। पर उसके लिए जन-मानस की प्रबुद्धता आवश्यक है। पहला स्तर यही है। प्रत्यक्ष रूप अगले स्तर पर आवेगा। पहले विचार पीछे कार्य की परम्परा सदा से रही है, वही अब भी रहेगी।
प्रवृत्तियों के अन्य आयोजन
दीवारों पर वाक्य लिखना, जहाँ-तहाँ ध्यान आकर्षित करने वाले पोस्टर लगाना आदि तरीके भी उपयोगी हो सकते हैं। ऐसे कामों को कोई व्यक्ति अकेला भी कर सकता है। ऊपर की पूरी योजना ऐसी है जिसे अकेला मनुष्य कार्यान्वित कर सकता है, पत्रिका तथा पुस्तकें पढ़ाना, अशिक्षितों को इकट्ठे करके कथा, कहानियों द्वारा या पुस्तकें पढ़कर सुनाना, वाक्य लिखना या पोस्टर लगाना यह कार्य कोई भी अकेला आदमी कहीं भी करता रह सकता है। जब तक विचार पुस्तिकाऐं नहीं छप जातीं तब तक अपने पुस्तकालय की अन्य उपयोगी पुस्तकें पढ़ाते रहने का सिलसिला चलता रह सकता है। जहाँ कुछ लोग एक विचारधारा के हैं वे संगठित होकर इस कार्य प्रणाली को चलाते रह सकते हैं। गायत्री-परिवार नाम जिन्हें पसन्द है वे उसी नाम से संगठन चलाते रहें, जिन्हें उपासना में अधिक रुचि नहीं, समाज सेवा के कार्यों तक ही जिनकी अभिरुचि है वे युगनिर्माण योजना के नाम से भी अपना संगठन रख सकते हैं। जहाँ प्रचारात्मक स्तर से आगे बढ़कर कुछ रचनात्मक कार्य करने या आन्दोलनात्मक प्रवृत्ति चलाने की स्थिति है वे वैसा भी कर सकते हैं। अपना यह बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों को अपनाने का बीस-सूत्री कार्यक्रम पहले भी चलता था। जो लोग प्रभावित होते थे, वे उस प्रकार के प्रतिज्ञा पत्रों पर हस्ताक्षर करते थे, वह प्रतिज्ञाओं भी इसी योजना से संबद्ध हैं। पर प्रतिज्ञाओं से पहले उन विषयों पर पूरा विश्वास जमाने के लिए मनोभूमि में गहराई तक उन बातों के लाभ-हानि पर विश्वास जमाया जाना आवश्यक है। अन्यथा वह प्रतिज्ञाऐं भी दिखावटी रहती हैं और कुछ ही दिन में टूट जाती हैं। जड़े मजबूत होने से ही ऊपर का आधार सुदृढ़ होता है। बिना समझे गायत्री उपासना करने वाले भी कुछ दिन बाद उसे छोड़ बैठते हैं, उसी प्रकार क्षणिक उत्साह में की हुई प्रतिज्ञाऐं भी टूट ही जाती हैं। जड़ की मजबूती के लिए विचार मंथन का पूरा अवसर मिले तभी भावना में परिपक्वता आवेगी।
वसन्त पंचमी से शुभारंभ
वसन्त पंचमी अखण्ड-ज्योति-परिवार द्वारा आरंभ की जाने वाली प्रवृत्तियों का शुभ मुहूर्त है। इसी दिन अखंड दीपक स्थापित हुआ था, इसी दिन हमने अनुष्ठान आरंभ किये थे; इसी दिन मथुरा में आना हुआ था, इसी दिन 108 कुण्ड वाले गायत्री यज्ञ का आरंभ किया गया था, इसी दिन गायत्री-तपोभूमि प्रेस, और अखंड-ज्योति प्रेस, खुले थे। अब अष्टग्रही योग से संबंधित युग-निर्माण योजना का कार्यारंभ भी वसन्त पंचमी के दिन—माता सरस्वती की जन्म-जयन्ती के दिन—सुव्यवस्थित रूप से अग्रसर होता है। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज के लाभों से मानव जाति को लाभान्वित करने के लिए हमें बहुत कुछ करना है। आइए हम सब मिल-जुलकर इस दिशा में सक्रिय कदम उठावें। सफलता तो सुनिश्चित ही है।
“किसी धर्म से उच्च होने की कसौटी यह नहीं हो सकती कि वह किसी ऐसे मनुष्य का चलाया है, जिसका चरित्र अत्यन्त उच्च था। अधिकाँश उत्तम चरित्र वाले लोग तत्त्वज्ञान के निरूपण में असफल रहे है। जैसे किसी मनुष्य की पाचनशक्ति असाधारण रूप से प्रबल हो, तथापि उसे पाचनक्रिया का कुछ भी ज्ञान न हो।”
“जब तक आप स्वयं अपने हृदयस्थ अन्धकार के दूर करने के लिये उद्यत नहीं होते, तब तक संसार में चाहे तीन सौ तेंतीत कोटि मुक्ति दाता आ जावें, तो भी आपका कोई भला नहीं हो सकता। धर्म का सारतत्त्व है अपने ऊपर से पर्दे को हटाना अर्थात् अपने आपका रहस्य जानना।”
पिछले पृष्ठों पर लिखा हुआ प्रचारात्मक कार्यक्रम इस दृष्टि से बनाया गया है कि उसके आधार पर कोई एक व्यक्ति भी अपना छोटा क्षेत्र बनाकर कार्य आरंभ कर सकता है। व्यापक क्षेत्र में विस्तृत किये जाने वाले प्रयत्न, संगठित प्रयत्नों से ही सफल होते हैं, इसलिए हमें अधिक संघ-बद्ध एवं संगठित ही होना पड़ेगा और युग-निर्माण की महान योजना को सफल बनाने के लिए; असंयम, अविवेक एवं अनाचार से निपटने के लिए—अन्ततः एक सुसंगठित सेना के रूप में ही कदम बढ़ाना पड़ेगा। पर उस संघ का निर्माण भी तो एक सुदृढ़ आधार पर होना चाहिए। अपरिपक्व विचारों वाले, लोगों में कोई क्षणिक आवेश उत्पन्न करके कुछ काम करा लेना कठिन नहीं है। अधिकाँश आन्दोलन ऐसे ही उत्तेजनात्मक वातावरण में उत्पन्न किये जाते हैं पर वे देर तक ठहरते नहीं, जोश ठंडा होते ही वह कार्यक्रम भी समाप्त हो जाता है। ऐसे अनेक आन्दोलन आँधी-तूफान की तरह उठते और पानी के बबूले की तरह नष्ट होते हमने अपनी आँखों देखे हैं।
आन्तरिक निष्ठा का आधार
यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि पारमार्थिक कार्यों में निरन्तर प्रेरणा देने वाली आत्मिक स्थिति जिनकी बन गई होगी वे ही युग-निर्माण जैसे महान कार्य के लिए देर तक धैर्यपूर्वक कुछ कर सकने वाले होंगे। ऐसे ही लोगों के द्वारा ठोस कार्यों की आशा की जा सकती है। गायत्री आन्दोलन में केवल भाषण या यज्ञ-प्रदर्शन देखकर जो लोग शामिल हुए थे वे देर तक अपनी माला साधे न रह सके, पर जिन लोगों ने गायत्री साहित्य पढ़कर विचार मंथन के बाद इस मार्ग पर कदम बढ़ाया था, वे पूर्ण निष्ठा और श्रद्धा के साथ लक्ष की ओर तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं। युग-निर्माण कार्य के लिए हम उत्तेजनात्मक वातावरण में अपरिपक्व लोगों को साथ लेकर बालू के महल जैसा कच्चा आधार खड़ा नहीं करना चाहते। इसलिए इस संघ में उन्हीं लोगों पर आशा भरी नजर डाली जायगी जो बात को गहराई तक समझ चुके हैं, उसकी जड़ तक जा चुके हैं।
अखण्ड ज्योति परिवार में वे लोग हैं जो गत चौबीस वर्षों से हमारे साथ हिल-मिलकर बैठते और हमारे चौके में भोजन करते हैं। अखण्ड ज्योति का एक रसोई-घर है, हम अपने हाथ से अपनी गहरी प्रेम-भावना के साथ बड़े-बड़े अरमानों के साथ इस भोजन को पकाते हैं और जो स्वजन हमें अपना समझते हैं उनको माता जैसी वात्सल्य भावना के साथ परोसते खिलाते हैं। जिन्हें इस परिवार में रहते इस रसोई-घर में भोजन करते लम्बा समय हो गया उनसे हमें बड़ी-बड़ी आशाऐं यदि हैं तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। गायत्री आन्दोलन गत दस वर्षों में कितने विशाल रूप में पनपा था। गायत्री तपोभूमि का निर्माण 24 लक्ष गायत्री उपासकों का आविर्भाव एक हजार कुण्डों वाले यज्ञ का अभूतपूर्व आयोजन, देश भर में 24 कुण्डों के यज्ञों की आश्चर्यजनक पूर्ति आदि अगणित कार्य ऐसे हैं जो बात की बात में करके रख दिये। युग-निर्माण की इतनी विशाल योजना जिसमें जन-मानस को उलट-पलटकर रख देने का हमारा संकल्प है वह आज असंभव जैसी—शेखचिल्ली की कल्पना जैसी लग सकती है पर हम जानते हैं— हमारा अन्तराल बोलता है कि यह सब होने ही वाला है, होकर रहने ही वाला है।
एकाकी किन्तु संगठित कार्यक्रम
प्रस्तुत प्रचारात्मक योजना को लेकर अपना संघ-बद्ध अखण्ड ज्योति परिवार अग्रसर हो रहा है। हर परिजन को अभी हाल में प्रारंभिक कार्यक्रम ऐसा सौंपा गया है जिसे वह अकेला ही कर सके। औंधे-सीधे लोगों का भानमती का कुनबा इकट्ठा करके कोई संगठन बना लिया जाय तो वह ठहरता कहाँ है? गायत्री परिवारों की कितनी ही शाखाऐं इसी प्रकार ठप्प हुईं। अब उस गलती को दुबारा नहीं दुहराना चाहिए। जिन लोगों की दृष्टि में विचारों का कोई मूल्य या महत्व नहीं, वे किसी कार्य में देर तक कब ठहरने वाले हैं? जो लोग अखंड ज्योति नहीं मंगा सके,जो गायत्री साहित्य नहीं पढ़ सके वे किसी समय बड़े भारी श्रद्धावान दीखने वाले साधक भी आज सब कुछ छोड़ बैठे दीखते हैं। प्रेरणा का सूत्र टूट गया, अपना निज का कोई गहरा स्तर था नहीं फिर उनके पैर भौतिक बाधाओं के झकझोरे में कब तक टिके रहते? इसीलिए हम यह बारीकी से देखते रहते हैं कि सामने बैठा हुआ लम्बी-चौड़ी बातें बनाने वाला व्यक्ति हमारी विचारधारा के साथ अखंड ज्योति या साहित्य के माध्यम से बँधा है या नहीं? यदि वह इस की उपेक्षा करता है तो हम समझ लेते हैं कि यह देर तक टिकने वाला नहीं है। जो हमारे विचारों को प्यार नहीं करते, उनका मूल्य नहीं समझते वे शिष्टाचार में मीठे शब्द भले ही कहें—गुरुजी, गुरुजी! भले ही कहें वस्तुतः हजारों मील दूर हैं, उनसे किसी बड़े काम की कोई आशा नहीं रखी जा सकती।
सुदृढ़ लोगों का समर्थ संगठन
जीवन का लम्बे कटु और मधुर अनुभवों का निष्कर्ष यही है। इसलिए हम अखण्ड ज्योति परिवार के लोगों को एक सुदृढ़ संघ मानते हैं और आशा करते हैं कि इस संघ की शाखाऐं देश के कौने-कौने में फैले। क्योंकि बिना संगठन के युग-निर्माण जैसा विशाल कार्य पूरा हो सकना किसी भी प्रकार संभव न होगा। पर लंगड़े संगठन, अन्धी शाखाऐं बनने से कुछ लाभ नहीं। लाभ भले ही थोड़ा हो पर ठोस हो। इसलिए उस संगठन में कौन सम्मिलित हों इसकी तलाश आरंभ करने का अपना यह पहला कदम है। अखण्ड ज्योति और आगे छपने वाली 108 पुस्तिकाओं की अत्यन्त सुन्दर और सस्ती युग-निर्माण सीरीज पढ़ते रहने में जिनने रुचि ली है, जिन्हें आनन्द आया है, जिनने प्रसन्नता प्रकट की है, उत्साह दिखाया है उन्हें इस योग्य माना जा सकता है कि अपने संगठन के यह सदस्य बनें। विचारों की एकता से ही अखंड ज्योति परिवार एक प्रचंड शक्ति के रूप में विद्यमान है। विचारों की एकता एक अत्यन्त सुदृढ़ एवं अत्यन्त शक्तिशाली तत्व है। इस तत्व के आधार पर जिनके हृदय जुड़ गये हैं वे ही एक जी और एक प्राण होकर कुछ काम कर सकने में समर्थ होते हैं। डाकुओं के छोटे-छोटे गिरोह विचारों की एकता और व्यक्तिगत वफादारी के आधार पर ही संगठित होते और आतंक फैलाते हैं। यही तथ्य सज्जनों के लिए भी है। उनका संगठन भी विचारधारा, भावना एवं वफादारी के आधार पर ही दृढ़ हो सकता है। हमें आगे बढ़ना और फैलना है तो ऐसे ही लोग तलाश करने पड़ेंगे। इस तलाश की दृष्टि से ही यह विचार-प्रसार योजना है जो पिछले लेख में प्रस्तुत की गई है।
भविष्य की महान संभावनाऐं
कुछ दिन यह क्रम यदि हम लोग निष्ठापूर्वक चलाते रहें तो विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि हम आज जितने हैं उसकी अपेक्षा अगले वर्ष की जनवरी तक कई गुने हो जावेंगे और हममें से प्रत्येक अखण्ड ज्योति का सदस्य अपनी विचारधारा के लोगों के साथ सम्बन्धित एवं संगठित होकर एक छोटी संस्था का रूप धारण कर लेगा। संस्थाऐं बनावें नहीं, स्वयं एक संस्था बनें। संस्थाओं में लोग अकसर उत्तरदायित्व को एक दूसरे पर टालते हैं और पारस्परिक मनमुटाव एवं ईर्ष्या के दलदल में फंस जाते हैं। व्यक्ति ने स्वयं ही एक संस्था का रूप धारण कर लिया है तो फिर यह झंझट क्यों पैदा होंगे? फिर हम व्यक्ति को अपने प्रयत्न का श्रेय और सन्तोष भी मिलेगा, संस्थाओं में किसी के प्रयत्न का श्रेय किसी को मिलता भी देखा जाता है। इसलिए योजना यह है कि हम में से हर व्यक्ति एक संस्था का रूप धारण करने और अपने प्रचार के आधार पर एक छोटा सर्किल गठित करे। एक नगर में ऐसे अनेकों सर्किल रह सकते हैं और वे इकट्ठे होकर एक बड़े सामूहिक संगठन का रूप बना सकते हैं। अपने संगठन का यही रूप रहे और प्रयत्न यह किया जाय कि इस वर्ष जो नये लोग अपने विचार प्रभाव में आये हैं, आगे चलकर वे भी अपने विचारों की वंश-वृद्धि कर अपना एक स्वतन्त्र सर्किल बनावें। इसी प्रकार वंश बढ़ते हैं, उसी प्रकार संगठन पनपते हैं। यही हमें भी करना चाहिए।
स्वस्थ शरीर के लिए सत्प्रयत्न
स्थान-स्थान पर जब संगठन बनने लगें, कई व्यक्तियों का सम्मिलित प्रयत्न जब दीखने लगे तब उसके द्वारा प्रत्यक्ष प्रवृत्तियों की योजनाऐं चल सकती हैं। स्वस्थ शरीर का उद्देश्य प्राप्त करने के लिए—आसन, प्राणायाम, सूर्य नमस्कार आदि सिखाने वाली व्यायाम कक्षाऐं चल सकती हैं, व्यायामशालाऐं बन सकती हैं, महिलाओं को घरों में जाकर स्वास्थ सुधारने वाले आसन सिखाने का कार्य कोई कुशल महिलाऐं कर सकती हैं। आहार सम्बन्धी बुरी आदतों को छुड़ाने के लिए—माँसाहार और नशेबाजी दूर करने के लिए विचार-सत्रों का आयोजन किया जा सकता है। प्राकृतिक चिकित्सालयों, कल्प चिकित्सालयों और आरोग्याश्रमों की व्यवस्था की जा सकती है। रोगियों को परामर्श देने के लिए ऐसे प्रचार अस्पताल भी खुल सकते हैं जिनमें अनुभवी आरोग्यशास्त्री रोगी की कठिनाई को ध्यानपूर्वक सुने और वह परामर्श दे जिसमें निरोगता प्राप्त करना उसके लिए सुलभ हो जाय। प्रत्येक रोग की छोटी-छोटी परामर्श पुस्तिकाऐं भी हो सकती हैं जिन्हें लोग खरीदें और अपना इलाज आप कर लें। जैसे दवा की कीमत देनी पड़ती है उसी प्रकार इन परामर्शकर्ताओं को भी लोग एक-दो आना मूल्य देकर खरीदें और अपना इलाज आप कर सकने में समर्थ हो जावें। तुलसी की खेती करके उसके द्वारा बन सकने वाली सस्ती औषधियाँ बनाई और बिना मूल्य वितरण की जा सकती हैं। स्वास्थ्य सम्बन्धी चित्र-पट, मैजिक लालटेन से सिनेमा जैसे दृश्य एवं भजन-संगीत आदि के द्वारा लोगों को इकट्ठा करके उन्हें आवश्यक शिक्षण दिया जा सकता है। ब्रह्मचर्य की शिक्षा का प्रचार स्कूलों में किया जा सकता है। बड़े-बड़े रंगीन चित्रों की प्रदर्शनी लगाकर भी स्वास्थ सम्बन्धी योजनाओं का प्रसार किया जा सकता है। सरकारी स्वास्थ्य विभाग रैड क्रास सोसाइटी एवं अन्य जगहों के द्वारा स्वास्थ्य सम्बन्धी ज्ञान के बड़े-बड़े रंगीन नक्शे एवं चित्र छपे हैं उन्हें जहाँ-जहाँ टाँगने, बेचने एवं दिखाने का क्रम चल सकता है। गर्मी की छुट्टियों में विद्यार्थियों के लिए, अन्य अवकाश के समयों पर अन्य लोगों के लिए स्वास्थ्य शिविर लगाये जा सकते हैं। इस प्रकार की परिस्थितियों के अनुसार अनेकों बातें सोचीं और की जा सकती हैं।
स्वच्छ मनोभूमि के लिए दो उपचार
स्वच्छ मन का आन्दोलन व्यक्ति की आन्तरिक दुर्बलता के विरुद्ध एक महान अभियान है। कुविचारों की हानियाँ, स्वार्थपरता के दुष्परिणाम अभी लोगों की आँखों में नहीं हैं। आज हर आदमी यही सोचता है कि अनैतिक रहने में ही उसका भौतिक लाभ है। इसलिए वह बाहर से नैतिकता का समर्थन करते हुए भी भीतर ही भीतर अनैतिक रहता है। हमें मानसिक स्वच्छता का वह पहलू जनता के सामने प्रस्तुत करना होगा जिसके अनुसार यह भली प्रकार समझा जा सके कि अनैतिकता व्यक्तिगत स्वार्थपरता की दृष्टि से भी घातक है। इसमें हानि ही हानि है। वह विचारधारा अभी सामने नहीं आई है। अब तक लोग सदाचार का लाभ परलोक में मिलने की ही बात जानते हैं। अब धर्म और परलोक की बात को एक ओर रखकर नवें दृष्टिकोण के अनुसार लोगों को यह समझाना पड़ेगा कि सूखी हड्डी चबाकर जिस प्रकार कुत्ता अपने ही जबड़े को घायल कर लेता और वह मसूड़ों से निकला हुआ अपना ही खून पीकर कुछ देर प्रसन्न रहते हुए भी अन्ततः घाटे में रहता है उसी प्रकार अनैतिकता भौतिक दृष्टि से भी, स्वार्थ की दृष्टि से भी अन्ततः घातक है। बात पुरानी है पर कहना नये ढंग से पड़ेगी। हर व्यक्तिगत बुराई के विरुद्ध हम इसी दृष्टिकोण से एक प्रचंड विचारधारा का सर्वांगपूर्ण आचार शास्त्र प्रस्तुत करते जा रहे हैं। ऊपर जिन छोटी पुस्तिकाओं के प्रकाशन की चर्चा की गई है उन्हीं में यह विचारधारा रहेगी और हमारा विश्वास है कि पढ़ने वाले को भी उसी दृष्टि से सोचने को विवश होना पड़ेगा। उस विचारधारा को हम समझें, औरों को समझावें तो व्यक्ति अपने आपको बदल सकता है। मनुष्य विचार वाला और परिवर्तनशील प्राणी है, उसे बदला जाना संभव है, बदला जाता रहा है, और बदला जा भी सकेगा।
सत्संग और स्वाध्याय की शक्ति
व्यक्तिगत विचारधारा का परिवर्तन सत्संग और स्वाध्याय से ही सम्भव है। इस क्षेत्र में यही दो माध्यम काम करते हैं। चिन्तन और मनन की आदत पड़े तो मनुष्य आत्म−निरीक्षण कर सकता है और अपनी बुराइयों के एवं दुर्बलताओं के बारे में बहुत कुछ सोच−समझ सकता है, उन्हें छोड़ और सुधार भी सकता है। ऐसी विचार−गोष्ठियाँ जिनमें अपनी मानसिक स्थिति को सुधारने का मार्ग−दर्शन होता रहे बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। ईश्वर उपासना का भी इस दृष्टि से अत्यधिक महत्व है। आस्तिकता एवं उपासना को अपनाने से भी मनुष्य सज्जन बनता है। ईश्वर के निष्पक्ष न्यायकारी और पापों का दण्ड देने वाला मानने से कर्मफल की अनिवार्यता पर निष्ठा जमती है और मनुष्य नरक एवं दुर्गति के भय से, पाप से बचता है। इसलिए ईश्वर−उपासना का अधिकाधिक प्रचार करना चाहिए। यों गायत्री उपासना हिन्दू धर्म में सर्वश्रेष्ठ है, यही अनादि, सनातन तथा सभ्यता एवं संस्कृति की गंगोत्री है। इसको उपासना का माध्यम बनाने के लिए पूरा जोर दिया जाय। पर इसे अनिवार्य न बनाया जाय। कोई दूसरा माध्यम रखना चाहे तो वैसा भी कर सकते हैं। किसी न किसी रूप में उपासना के लिए हर व्यक्ति को समझाया जाय। बहुधा लोग ईश्वर और देवता को स्वार्थ, लाभ करने और सिद्धि वरदान प्राप्त करने के लिए पूजते हैं और इसी रूप को जानते हैं। अब उसका दूसरा पहलू भी समझाया जाना चाहिए कि पापों का दण्ड और अकर्मण्यता की उपेक्षा न करने में भी ईश्वर बड़ा कठोर है। इस कठोरता से भी जन−साधारण को परिचित कराया जाना चाहिए और अधूरी आस्तिकता को सर्वांगपूर्ण रूप से प्रस्तुत किया जाना चाहिए। स्वच्छ मन का सम्बन्ध चूँकि हर व्यक्ति के अपने निजी आत्म−निरीक्षण एवं आत्म−सुधार से है इसलिए व्यक्तिगत रूप से विचार−विमर्श ही इस दृष्टि से उपयोगी हो सकता है। कोई आन्दोलनात्मक रूप इसका अभी समझ में नहीं आता पर यदि कोई सूझ पड़े तो वह भी करना चाहिए।
सभ्य समाज की अभिनव रचना
सभ्य समाज की दिशा में अनेकों सामूहिक एवं आन्दोलनात्मक कार्यक्रम बन सकते हैं। पशुबलि विरोध का गतवर्ष एक पदयात्रा एवं सत्याग्रह जैसा कार्यक्रम चला था। जुलूस, प्रभातफेरी एवं पदयात्रा के रूप एक से वस्त्र पहिन कर, पोस्टर, झंडे, नारे जैसी तैयारी के साथ कोई समूह निकलता है तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव जनता पर पड़ता है। यज्ञ आयोजनों में जल यात्रा, परिक्रमा जैसे कार्यों को देखकर स्त्रियों का उल्लास रोके नहीं रुकता और जो आरंभ में उसकी उपेक्षा करती थीं वे भी दूसरों को उसमें देखकर आप भी सम्मिलित होने को आतुर हो उठती देखी गई हैं। काँग्रेस के स्वतंत्रता संग्राम में इस प्रकार के सामूहिक जुलूसों का बड़ा महत्व रहा है। जन−समुदाय की सम्मिलित शक्ति को देखकर समर्थकों के हौंसले दूने हो जाते हैं और वे कुछ कर गुजरने के लिए उत्साह में भर जाते हैं। विरोधियों के हौंसले पस्त करने में भी इस प्रकार के प्रदर्शन जादू का काम करते हैं। तपोभूमि में एक हजार कुण्डों का जो विशाल आयोजन हुआ था, उससे प्रभावित लोगों द्वारा देश भर में हजारों गायत्री यज्ञों की व्यवस्था बन गई। समाज विरोधी कुकृत्यों एवं दुष्प्रवृत्तियों के विरोध में यदि यदा−कदा सामूहिक प्रदर्शन संभव हो सके; उसमें पर्याप्त संख्या में अपने संगठित कार्यकर्ता सम्मिलित हों तो निश्चय ही उसका भारी प्रभाव जनता पर पड़ेगा। मेले की भीड़ का हज्जूम घूमना बात दूसरी है पर एक सी वेशभूषा के संगठित लोक सेवकों का प्रदर्शन तो कुछ दूसरा ही अर्थ रखता है। कहते हैं कि चोर के पैर नहीं होते वह घर के लोगों के जाग पड़ने और खाँस देने मात्र से भाग जाता है। सामाजिक कुरीतियाँ असत्य पर अविवेक पर ठहरी हुई हैं, वे कागज के रावण जैसी दीखती तो बहुत बड़ी हैं पर अन्दर ही अन्दर खोखली पड़ी हैं। उनमें आग लगाने के लिए एक मशाल काफी हो सकती है। चोर जैसे अविवेक को भगा देने के लिए इतने जागृत लोगों का शक्ति प्रदर्शन कुछ माने रखता है। दिन निकलते ही उल्लू, चमगादड़ छिपने लगते हैं विरोध के सामने अविवेकपूर्ण परम्पराऐं क्या टिकेंगी?
दहेज विरोधी अभियान
दहेज के विरोधी पुस्तिकाऐं स्कूल−स्कूल में जाकर लड़की−लड़कों को पढ़ाई जा सकती हैं और उनके विवेक को जागृत करके इस निश्चय पर दृढ़ किया जा सकता है कि वे आजीवन अविवाहित रहना स्वीकार करें पर दहेज और फिजूलखर्ची भरे विवाहोन्माद के पिशाच के आगे मस्तक न झुकायें। बड़े−बूढों की पकी हुई लकड़ी मुश्किल से झुकती है। पर बच्चों के शुद्ध हृदय में विवेक की छाप जल्दी पड़ती है वे तर्क को जल्दी समझते हैं। समाज−सुधारकों की एक पीढ़ी इन कुरीतियों से लड़ते−लड़ते मर खप गई पर उन्माद जहाँ का तहाँ है, घटा नहीं बढ़ा है। अब हम दूसरे मोर्चे पर लड़ेंगे। नक्कू चौधरी और पंच अपना काम करें वे दहेज और विवाह की फिजूलखर्ची को जितना चाहें बढ़ावें, उन्हें छूट है। हम उनके मनसूबों को उनके घर में ही मिट्टी में मिला देंगे। घर−घर में प्रहलाद उत्पन्न करके इन हिरण्यकश्यपों को बता देंगे कि इस अनीति को, मूर्खता को अब अधिक देर चलने नहीं दिया जा सकता। अब न विवाहोन्माद का खरदूषण जिन्दा रखा जा सकता है और न दहेज की सूर्पणखा स्वच्छन्द विचरती रहने दी जा सकती है। मूर्खता की यह पूतना अनेक बालकों के कलेजे खा गई अब इसका अन्त आ पहुँचा। उसे अपनी मौत मरना ही है।
सामाजिक दबाव का मूल्याँकन
बाल विवाह के विरुद्ध शारदा कानून मौजूद है, दहेज के खिलाफ भी कोई कानून पास हुआ है पर इनसे कुछ बनने वाला नहीं है। कानून तो हर बुराई के विरुद्ध मौजूद है पर उन बुराइयों को करने वाले कितने पकड़ में आते हैं? और जो पकड़े जाते हैं उनमें से कितने सजा पाते हैं? और उन सजा पाने वालों में से कितने उन्हें छोड़ देने की बात सोचते हैं? आज के नरम और लचकीले कानून तो न्याय के नाटक और वकीलों की चाँदी बनने के माध्यम रह गये हैं। उनसे बुराइयों का दमन इतनी पुलिस और इतनी अदालतें होते हुए भी कितना कम हो पाता है इसे हम में से हर कोई जानता है। यह सब उपयोगी हैं, इनकी आवश्यकता भी है पर सामाजिक अनाचार, अन्धविश्वास, अविवेक और अन्याय का उन्मूलन इन ढीले−ढीले कानूनों से नहीं वरन् प्रजातंत्री पद्धति में केवल सामाजिक वातावरण बनाने से ही हो सकता है। खाद्य पदार्थों में मिलावट, रिश्वत, बेईमानी, चोर−बजारी, मुनाफाखोरी, आदि तब मिटेगी जब इनके करने वाले समाज से बहिष्कृत होंगे। अभी तो वे मूँछों पर ताव देते हुए जितनी अनीति करते हैं उतना ही अधिक मान पाते हैं। धन से मान मिलने की वर्तमान परिपाटी ने हर आदमी को लालच की ओर झुकने का अवसर दिया है। हमें ईमानदार, गरीबों और परमार्थ के लिए कष्ट सहने वाले अनेक सज्जनों को सार्वजनिक सम्मान के आयोजन करने होंगे, जिससे उनका अनुकरण करने की प्रवृत्ति जन−मानस में पनपे। सार्वजनिक मान पत्र, अभिनंदन, थैली, पुरस्कार, पदक आदि देते रहने की कुछ व्यवस्था कोई सार्वजनिक संस्था करती रहे तो इससे सचाई और ईमानदारी के लिए कष्ट सहने वाले लोगों का हौसला बढ़ सकता है।
बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष
बुराइयों की होली जलाई जा सकती है। जिस प्रकार रामलीला का कागजी रावण मरता है, सूर्पणखा की हर साल नाक कटती है होली, के अवसर पर होलिका राक्षसी की चिता जलाई जाती है, उसी प्रकार अश्लीलता, नशेबाजी, बेईमानी, एवं कुरीतियों की होली जलाई जा सकती है और उनके विरुद्ध जन−मानस में घृणा उत्पन्न की जा सकती है। हमें यह पूरा−पूरा ध्यान रखना होगा कि कोई अशान्ति, उत्तेजना या उपद्रव जैसी बात न होने पावे। किसी को चिढ़ाया न जाय। और यदि विरोध में कोई कुछ अनुचित व्यवहार भी करे तो पूर्ण शान्त रहा जाय और मुसकान एवं विनय मात्र से उसका उत्तर दिया जाय।
इस प्रकार के अगणित प्रचारात्मक सुधारात्मक, आन्दोलनात्मक, विरोधात्मक, प्रदर्शनात्मक, रचनात्मक एवं सेवात्मक कार्यक्रम हो सकते हैं। स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न योजनाऐं बन सकती हैं। बड़ों के पैर छूने की, कष्ट पीड़ितों की सेवा करने की, और पाठशालाएँ चलाकर विचारात्मक शिक्षा देने की योजनाऐं बन सकती हैं।
युग−निर्माण शिक्षा का व्यापक विश्व−विद्यालय
पूर्व लेख में यह बताया जा चुका है कि हम में से हर एक छह दिन तक लोगों को अपनी पुस्तकें पढ़ने के लिए देने और वापिस लेने के लिए कुछ लोगों के घर जाया करें,उनसे पुस्तकों या अखण्ड−ज्योति में प्रस्तुत विषयों पर चर्चा किया करे और इन लोगों को सातवें दिन इकट्ठा करके सत्संग लगाने या क्लास चलाने जैसा एक साप्ताहिक आयोजन किया करे। गायत्री−परिवारों में हवन के माध्यम से अब तक इस प्रकार के सत्संग चलते थे। यदि हवन महँगा पड़ता है उसका प्रबन्ध न हो सके तो ईश्वर प्रार्थना और थोड़ी पूजा के साथ इस प्रकार के वर्ग चलाये जा सकते हैं। सस्ती पुस्तिकाओं का सैट जब तैयार हो जाएगा तब तो उसका एक बहुत ही सुन्दर शिक्षात्मक रूप बन पड़ेगा। एक ही पुस्तक को अपने सेवा क्षेत्र के लोगों को पढ़ने दिया जाय और उन्हें छह दिन तक इस पर विचार करने का अवसर मिले। रविवार को या अन्य किसी नियत सुविधा के दिन उन सब को इकट्ठा करके पुस्तिका में प्रस्तुत विषय का मौखिक शिक्षण किया जाय। शंका-समाधान और विचार-विनिमय किया जाय। दूसरे सप्ताह दूसरी पुस्तिका दी जाय। इस प्रकार वर्ष में 52 पुस्तिकाऐं पढ़ने तथा उनके संबंध में मौखिक शिक्षण प्राप्त करने का अवसर इन सभी को मिलता रहे।
हम सब लोक शिक्षक बनें
युग−निर्माण योजना के यह शिक्षण वर्ग हम में से प्रत्येक व्यक्ति चला सकता है। उन्हें लोकप्रिय बनाने के लिए परीक्षा और प्रमाणपत्रों का भी सिलसिला चल सकता है। प्रत्येक रविवार को जो मौखिक शिक्षण चले उसमें छह दिन में पढ़ी हुई पुस्तिका के सम्बन्ध में प्रश्न भी पूछे जावें, और उन प्रश्नों के प्रश्नांक रखे जावें। जो उत्तर प्राप्त हों उनके सही गलत होने के हिसाब से वह शिक्षक ही नम्बर देता चले। यह नम्बर एक नियमित रजिस्टर में दर्ज होते चलें और साल भर के सब नम्बरों को जोड़कर इन शिक्षार्थियों को उत्तीर्ण और अनुत्तीर्ण किया जाय। उत्तीर्ण छात्रों को एक दीक्षान्त समारोह करके मथुरा से भेजे गये उत्तीर्णता के प्रमाण−पत्र दिये जाएँ और प्रवचनों द्वारा इन छात्रों के कर्तव्य भी बतायें जाएँ। इस प्रकार यह छोटे समारोह भी उन छात्रों के लिए महत्वपूर्ण एवं उत्साहवर्धक हो सकते हैं। स्कूलों के अध्यापक तो बड़ी सरलता से इस प्रकार की व्यवस्था कर सकते हैं और युग−निर्माण योजना में भारी योगदान कर सकते हैं। इस योजना के अनुसार लाखों छात्रों को युग−निर्माण योजना के अन्तर्गत शिक्षित एवं दीक्षित करके उन्हें स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज के लिए एक उपयुक्त माध्यम बनाया जा सकता है।
दस संस्कार और दस त्यौहार
पुँसवन, नामकरण, मुंडन, विद्यारंभ, अन्नप्राशन यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ और जन्मदिन, तथा श्राद्ध यह दस संस्कार और श्रावणी, जन्माष्टमी, विजयादशमी, दिवाली, वसन्त पंचमी, शिवरात्रि, होली, रामनवमी, गायत्री जयन्ती, और गुरुपूर्णिमा वह दस त्यौहार भारतीय संस्कृति के विस्तार के लिए, सर्वश्रेष्ठ आयोजन हैं। संस्कारों के समय एक परिवार को छोटी ज्ञानगोष्ठी के रूप में इन संस्कारों में सन्निहित उच्च उद्देश्यों के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है और त्यौहारों के अवसर पर एक नगर के लोगों को यह पर्व सुधरे हुए एवं आकर्षक कार्यक्रमों के साथ मनाने के लिए एकत्रित कर उन्हें उन त्यौहारों में ओत−प्रोत महान प्रेरणाओं से प्रभावित किया जा सकता है। संस्कारों एवं त्यौहारों के महत्व, रहस्य एवं संदेश को समझने की योग्यता हम लोग प्राप्त करें। बिना खर्च के या कम खर्च में इनके मनाये जाने का प्रबन्ध हो सके तो जनता उनमें आवश्यक अभिरुचि अवश्य लेगी। इस प्रकार धार्मिक वातावरण में धर्मशिक्षाऐं देने के उत्तम अवसर बार−बार सामने आ सकेंगे और उस माध्यम से बार−बार धर्म प्रेरणा देकर लोगों की मनोभूमि को युग−निर्माण के अनुरूप श्रेष्ठता में ढाला जा सकेगा। संस्कारों और त्यौहारों का महत्व समझने वाली तथा उनका हर किसी के कर सकने जैसा सरल विधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तिकाऐं भी जल्दी ही तैयार हो जायेंगी। उनके आधार पर हम कार्य व्यस्त लोग भी अपने क्षेत्र में ढेरों छोटे−बड़े धर्म प्रचार आयोजन करा सकते हैं। सस्ते खर्च में यदि संस्कार कराये जाने की सुविधा हो जाय तो प्रत्येक हिन्दू परिवार इसके लिए उत्सुक होगा। त्यौहारों के दिन लोगों का मन मनोरंजन के ‘मूड’ में रहता है। छुट्टी एवं फुरसत भी रहती है। उस दिन आकर्षक कार्यक्रम रखा जा सके तो धर्म प्रचार का एक बहुत सुन्दर आयोजन सहज ही बन सकता है।
सोचते ही न रहें, कुछ करें भी
योजनाऐं अनेक सोचीं और कार्यान्वित की जा सकती हैं। पर वे कागजी ही बनी रहें तो क्या लाभ? हमें अपनी परमार्थ वृत्ति को जगाना है। और समयदान के लिए उदारतापूर्वक कदम बढ़ाना है। जन−मानस में ज्ञान का प्रकाश करने के लिए हमें समयदान करना है। हमसे यह बन पड़े तभी युगनिर्माण योजना का इस अंक में प्रस्तुत स्वप्न मूर्तिमान हो सकता है। हमारा हर सपना पूरा होता रहा है क्योंकि उसके पीछे कोई उच्च शक्ति काम करती रही है। यह सपना भी सार्थक ही होना है। आप भी उसके श्रेष्ठ लाभ में भागीदार क्यों न बनें?
अष्टग्रही योग अब सन्निकट आ गया उसके संबंध में काफी चर्चा पिछले अंकों में की जा चुकी है। इसके अशुभ परिणामों की शान्ति और शुभ परिणामों की अभिवृद्धि के लिए हमें इस अवसर पर अधिक से अधिक सत्कार्य एवं धर्मानुष्ठान करने चाहिए। ता॰ 1 से 9 फरवरी तक नौ दिनों में अष्टग्रही और सप्तग्रही दोनों योग रहेंगे। इन दिनों अखण्ड−ज्योति−परिवार के सभी सदस्य कुछ अधिक गायत्री उपासना करने का शक्तिभर प्रयत्न करें। प्रतिदिन तीन घंटा समय लगा देने से 27 माला प्रतिदिन करते हुए 9 दिन में 24 हजार का एक गायत्री पुरश्चरण हो सकता है। प्रातः सायं दोनों समय मिलाकर तीन घंटे रोज 9 दिन तक लगाते रहना कोई इतनी बड़ी समस्या नहीं है जिसे भावनाशील व्यक्ति हल न कर सके। यदि कार्य की उपयोगिता समझी जा सके तो इतना समय बहुत ही आसानी से निकल सकता है। नवरात्रि में नौ दिन तक अनुष्ठान करने के हम में से अनेकों अभ्यस्त हैं। उसके नियम गत अक्टूबर अंक में छपे ही थे। इन नियमों के आधार पर बड़ी आसानी से यह नौ दिन की साधना की जा सकती है। अन्तिम दिन 240 आहुतियों का हवन कर लेना चाहिए।
अनुष्ठान करने वाले यदि अपनी साधना की सूचना मथुरा भेज देंगे तो उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का दोष-परिमार्जन एवं संरक्षण यहाँ किया जाता रहेगा।
जो इतना न कर सकें वे कम भी कर सकते हैं। 11 माला प्रतिदिन जपने से 9 दिन में 108 मालाऐं हो सकती हैं। इसमें प्रतिदिन करीब 1 घंटा लगेगा। गायत्री चालीसा पाठ, गायत्री मंत्र लेखन, गायत्री सहस्र नाम पाठ आदि उपासनाऐं भी उत्तम हैं। भजन, कीर्तन एवं रामायण गीता आदि के पाठ भी जिनसे बन पड़े करें। इसी प्रकार और भी उपासनात्मक कार्यक्रम बनाये जा सकते हैं। जिससे जितना बन पड़े कुछ न कुछ करना अवश्य चाहिए।
मकर और कुंभ राशि के लिए यह योग कुछ अधिक अशुभ हैं। उन्हें तो शान्ति की साधना अवश्य ही करनी चाहिए।
जहाँ सुविधा हो वहाँ मिल−जुलकर सामूहिक गायत्री अनुष्ठान किये जाएँ और अन्त में हवन सब का सम्मिलित हो। ऐसे छोटे−छोटे आयोजन हर जगह बड़ी आसानी से हो सकते हैं। अलग−अलग साधना की अपेक्षा सामूहिक धर्मानुष्ठानों का महत्व कहीं अधिक है।
ज्ञान−दान आवश्यक है
जप, हवन के अतिरिक्त ऐसे समय में कुछ दान भी प्रत्येक धर्म प्रेमी को करना चाहिए। दानों में ज्ञान−दान सर्वश्रेष्ठ है। पंचकोशों की गायत्री उपासना वाला अखंड−ज्योति का अक्टूबर अंक इसके लिए सर्वश्रेष्ठ है। उसमें अष्टग्रही योग की विवेचना का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण लेख भी है। अंक की पृष्ठ संख्या साधारण अंक से बहुत अधिक होने के कारण उसकी लागत सात आने के करीब आई है फिर भी धर्मप्रचार की दृष्टि से उसका मूल्य चार आना ही रखा गया है। प्रत्येक गायत्री उपासक के पास इसका रहना आवश्यक है। अष्टग्रही के अवसर पर व्यक्तिगत साधना करने वाले तथा सामूहिक आयोजन करने वाले सज्जन इस अक्टूबर अंक की अधिक प्रतियाँ मँगाकर धर्मप्रेमियों को दान करें। गायत्री चालीसा, गायत्री माता के चित्र तथा दो−दो आने मूल्य की दस पुस्तकों का सवा रुपये वाला सस्ता गायत्री सैट भी इस उद्देश्य के लिए बहुत उपयुक्त है। जप और हवन करने वाले ज्ञान−दान का सच्चा ब्रह्मभोज भी इस अवसर पर अवश्य करें। अनुष्ठानों के अन्त में कन्या भोजन भी कराये जावें।
गायत्री तपोभूमि में
गायत्री तपोभूमि में इस अवसर पर कोई बड़ा आयोजन नहीं किया जा रहा हैं। पर एक छोटा शान्ति अनुष्ठान यहाँ भी चलेगा। नवग्रहों की शान्ति के जप, और महामृत्युञ्जय का जप पंडितों द्वारा प्रतिदिन होता रहेगा। तपोभूमि की तीन यज्ञ शालाओं में से एक नवग्रह यज्ञ और दूसरी में महामृत्युञ्जय यज्ञ नौ दिन तक होगा। प्रधान यज्ञशाला में गायत्री यज्ञ होता ही है। तपोभूमि की युग−निर्माण योजना का शुभारंभ एवं बारह वर्ष बाद आने वाले वृन्दावन का प्रथम स्नान भी वसन्त पंचमी को ही रहेगा। फिर भी यहाँ किसी बड़े सम्मेलन या आयोजन की योजना नहीं है। फिर भी संभवतः कुछ लोग अपना सुरक्षात्मक जप अनुष्ठान करने तपोभूमि में आना चाहेंगे। ऐसे लोगों से प्रार्थना है कि अपने आने की पूर्व सूचना दे दें ताकि उन्हें ठहरने आदि की असुविधा न हो ।
यज्ञ एवं सम्मेलन
गत तीन महीनों में अष्टग्रही योग की शान्ति एवं युग−निर्माण शुभारंभ के लिए देश भर में सहस्रों गायत्री यज्ञ बड़े उत्साहपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हो चुके हैं। आगामी दो महीनों में भी कितने ही आयोजन विभिन्न स्थानों पर होने जा रहे हैं। उनमें कुछ की तारीखें नीचे दी जा रही हैं। इन सब शुभ आयोजनों में सम्मिलित होने एवं सहयोग देने का शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए।
(1) साधनाश्रम कोटा में 108 कुण्डों का गायत्री महायज्ञ ता॰ 6,7,8,9 फरवरी को होगा। उसके यज्ञ का सामूहिक 24 करोड़ का जप संकल्प पूरा करने के लिए श्री शंभूसिंह जी कौशिक दौरा कर रहे हैं।
(2) गायत्री−परिवार बिलासपुर के तत्वावधान में 51 कुण्डों का गायत्री महायज्ञ मार्च के दूसरे सप्ताह में होगा। सामूहिक जप संकल्प की पूर्ति के लिए श्री गिरजासहाय व्यास दौरा कर रहे हैं।
(3) संस्कृति संस्थान, बरेली ने संयुक्त प्रान्त में 24 करोड़ सामूहिक जप एवं अधिकाधिक यज्ञानुष्ठान कराने का संकल्प किया है। श्री॰ चमनलाल गौतम इसके लिए दौरा कर रहे हैं। आचार्य जी द्वारा सम्पादित 108 उपनिषदों के प्रकाशित हो जाने का हर्षोत्सव एवं सामूहिक यज्ञ मार्च के अन्त में होगा।
(4)गायत्री−परिवार,जयपुर की ओर से एक विशाल गायत्री यज्ञ शिवरात्रि पर सम्पन्न होगा। श्री॰ चन्द्रमुखी रस्तोगी सामूहिक जप की पूर्ति के लिए घर−घर जाकर प्रेरणा दे रही हैं।
(5) जाखल (जयपुर) में एक बड़ा गायत्री यज्ञ ता॰ 5,6,7,8 जनवरी को होगा। श्री इन्द्रसिंह शेखावत उसे सफल बनाने के लिए विशेष प्रयत्न कर रहे हैं।
(6) गायत्री−परिवार, जोधपुर के तत्वावधान में 9 कुण्ड का गायत्री महायज्ञ ता. 1 से 9 फरवरी तक होगा। प्रबंध एवं स्वागत समिति में 34 सज्जन चुने गये हैं।
(7) हरदी (बिलासपुर) में 11 कुण्डों का गायत्री महायज्ञ ता. 15 से 20 जनवरी तक होगा।
(8) बहरायच में गत 17 से 20 नवम्बर तक जो 108 कुण्डों का विशाल यज्ञ हुआ था उसके बाद वहाँ के गायत्री−परिवार ने निकटवर्ती क्षेत्र में 108 कुण्डों के यज्ञ कराने का कार्यक्रम बनाया है जो सफलतापूर्वक चल रहा है।
(9) ग्वालियर, झाँसी, डबरा, भिण्ड, जावरा, आगर, नागपुर, लीविया, दिगोंड़ा आदि अनेक स्थानों पर यज्ञों की तैयारियाँ जोरों से हो रही हैं।
जन जीवन के हे। अधिनायक, युगवीणा के ओ।
अमर राग।स्वर्गीय धरा के सृजन हार, गति के लय के हे नव विधान।
तुम कर्म योग बनकर जग में जीवन को कर्म बना देते।
जिसके आगे दुनियाँ झुकती, उसको तुम सहज बना देते।
सम्भव है जग में सब कुछ ही, गूँजे यह अमर गान तेरा।
सम्बल ले कर्म बढ़े आगे, पथ कौन रोक पाये तेरा।
नश्वर मिट्टी के पुतले में तेरा ही है यह कर्म याग।
जन जीवन के हे! अधिनायक युग वीणा के ओ! अमर राग॥
तू ही कविता में निर्झर बन जगती पर अमृत बिखर रहा।
निर्मल भावों की गंगा बन स्वर्गीय धरा पर निखर रहा॥
मानव हित वसुधा पर तू ही, तप त्याग दान आदर्श अमर।
गौरव गरिमा, साहस निष्ठा, श्रद्धा भक्ति के दीप अमर।
करने वसुधा को शान्त सुखी शीतल छाया के विटपराज।
जन जीवन के हे। अधिनायक युगवीणा के ओ! अमर राग॥
युग दृष्टा तुम, युग सृष्टा तुम, परिवर्तन के ओ शंखनाद।
बनना बढ़ना मिटना जग में, तेरी लीला का चिर विधान।
सृष्टि को खेल बना कब से, तू खेल रहा ओ! लीला धर।
बनते गिरते इन पुतलों में तू सत्य नित्य औ! अजर अमर।
हे अविनाशी हे निर्विकार तू खण्ड−खण्ड में निराकार।
जन जीवन के हे! अधिनायक, युगवीणा के ओ! अमर राग॥
उतरो विहँसो बिखरो मानव, मन मन्दिर में आराध्य राम।
हे अमर दीप हे पारिजात, मानवता के हे! शरणदान॥
उर वीणा की बन मधुर राग, छेड़ो छेड़ो वह अमर तान।
जिसमें मानव सब झूम उठें, जग पर बरसो, करुणानिधान।
सुख शान्ति प्रेम मैत्री करुणा, खोलो इनके हे! देव द्वार।
जन जीवन के हे! अधिनायक युगवीणा के ओ! अमर राग॥
*समाप्त*