ध्येय का पथ (कविता)

(श्री रघुनाथ त्रिपाठी)

शक्ति पाकर, इस जगत से

याचना मैं क्यों करूँगा।

विष पचा लूँगा, अमिय की

कामना ही क्यों करूँगा ॥1॥

जग चले चाहे विपथ हो,

दानवों की भावना ले।

ध्येय अपना सत्य का ले

विपथगामी क्यों बनूँगा ॥2॥

दे चुका सर्वस्व अपना

विश्व का जब त्राण करने,

फिर धरा की शांति हरने

मनुजता को क्यों दलूँगा॥3॥

त्याग कर तृष्णा अहंता

हो गया मैं आज निर्भय।

छोड़ आया जिस डगर को

उस डगर को क्यों वरूँगा॥ 4॥


युग-निर्माण का आधार-तत्त्व

समाजरूपी जंजीर की मनुष्य एक कड़ीमात्र है। छड़ का एक सिरा आग में तपाया जाए या बरफ में ठंडा किया जाए तो उसका दूसरा सिरा भी गरम या ठंडा हो जाता है। ऐसा नहीं हो सकता है कि छड़ का जितना स्थान तपाया जाए उतना ही गरम हो और बाकी सब ज्यों का त्यों बना रहे। मनुष्य समाज भी एक छड़ की तरह है। यदि किसी समाज में दोष-दुर्गुण उत्पन्न होते हैं तो शांतिप्रेमी लोग भी उसके कुप्रभाव से बच नहीं सकते और यदि सद्प्रवृत्तियों से सारा समाज भरा रहता है तो एक व्यक्ति दुर्गुणी हो तो भी उसे समाज के दबाव से सुधरने को विवश होना पड़ता है। विश्वशांति और युग-निर्माण के जिस महान लक्ष्य को लेकर हम अग्रसर होते हैं, वह केवल कुछ व्यक्तियों के संत बन जाने से संभव न होगा, वरन जनसमूह में व्याप्त प्रवृत्तियों का ध्यान रखना होगा और दोष-दुर्गुणों को, द्वेष-दुर्भावों को हटाकर उनके स्थान पर सद्विचारों और सत्कर्मों की स्थापना करनी पड़ेगी।

विचारों से कार्य-प्रेरणा

कार्यों का मूल, विचार है। मस्तिष्क में जिस प्रकार के विचार घूमते हैं, उसी प्रकार के कार्य होने लगते हैं। जिस वर्ग के लोग स्वार्थपरता, तृष्णा, वासना और अहंता के विचारों में डूबे रहते हैं, वहाँ नाना प्रकार के क्लेश, कलह, दुष्कर्म एवं अपराध निरंतर बढ़ते रहते हैं। पर जहाँ परमार्थ, संयम, संतोष और नम्रता आदर्शवाद को प्रधानता दी जाती है, वहाँ सर्वत्र सत्कर्म होते दिखाई पड़ते हैं और उसके फलस्वरूप, सतयुगी सुख-शांति का वातावरण बन जाता है। जिस प्रकार स्वस्थ शरीर से स्वच्छ मन का संबंध है, उसी प्रकार स्वच्छ मन के ऊपर सभ्य समाज की संभावना निर्भर है। यदि शरीर बीमार पड़ा रहेगा तो मन में निम्न श्रेणी के विचार ही आवेंगे। अस्वस्थ व्यक्ति देर तक उच्च भावनाएँ अपने मन में धारण किए नहीं रह सकता। उसी प्रकार अस्वच्छ मन वाले व्यक्तियों से भरा समाज कभी सभ्य कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता। मानव जाति एकता, प्रेम, प्रगति, शांति एवं समृद्धि की ओर अग्रसर हो, इसका एकमात्र उपाय यही है कि लोगों के मन आदर्शवाद, धर्म, कर्त्तव्यपरायणता, परोपकार एवं आस्तिकता की भावनाओं से ओत-प्रोत रहें। इस दिशा में यदि हमारे कदम उठते रहेंगे तो उन्नति के लिए जिन योग्यताओं एवं क्षमता की आवश्यकता है, वे सब कुछ ही समय में अनायास प्राप्त हो जाएँगी। पर यदि दुर्गुणी लोग बहुत चतुर और साधनसंपन्न बनें तो भी उस चतुरता और क्षमता के दुरुपयोग होने पर विपत्ति ही बढ़ेगी।

आदर्शवाद की भावना

आदर्श समाज की रचना के लिए आदर्शवाद के सिद्धांतों को जनमानस में गहराई तक प्रवेश कराया जाना आवश्यक है। कोई नियम, निर्देश, प्रतिबंध या कानून मनुष्य को सदाचारी बनने के लिए विवश नहीं कर सकते। वह अपनी चतुरता से हर प्रतिबंध का उल्लंघन करने की तरकीब निकाल सकता है। पर यदि आत्मिक अंकुश लगा रहेगा तो बाह्यजीवन में अनेक कठिनाइयाँ होते हुए भी वह सत्य और धर्म पर स्थिर रह सकता है। उसे कोई प्रलोभन, भय या आपत्ति सत्पथ से डिगा नहीं सकती। यह आध्यात्मिक अंकुश ही हमारे उन सारे सपनों का आधार है, जिनके अनुसार समाज को सभ्य बनाने और युग परिवर्तित होने की आशा की जाती है।

श्रेयपथ के पथिक

किसी समय भारत सभ्यता की दृष्टि से बहुत ऊँचा था। उस स्थान का एक ही कारण था कि हमारा सारा समाज आदर्शवाद पर परिपूर्ण निष्ठा धारण किए रहता था। श्रेयमार्ग पर, धर्मपथ पर, चलने की जब भी प्रवृत्ति उत्पन्न हुई है, तभी सतयुग के स्वर्गीय दृश्य उपस्थित हो गए हैं और जहाँ भी स्वार्थपरता और दुष्टता की बात है वहाँ क्लेश-कलह का, दुख-दारिद्र का नारकीय वातावरण उत्पन्न हो गया है। हमारे पूर्व पुरुष इस तथ्य को जानते थे, इसलिए वे सुख-साधनों को ढूँढ़ने के साथ-साथ इस बात के लिए भी सचेष्ट रहते थे कि हर व्यक्ति आदर्शवादी बने। आदर्शवादी व्यक्ति स्वयं ही आत्मशांति प्राप्त नहीं करता, वरन सारे समाज के लिए आनंद और उल्लास की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देता है।

रामायण का आदर्श

रामायणकाल पर जब दृष्टिपात करते हैं तो राम, लक्ष्मण, भरत, कौशिल्या, सुमित्रा, सीता, उर्मिला, हनुमान, जटायु आदि के आदर्शवाद को ही उस स्वर्गीय आनंद को उत्पन्न करते हुए पाते हैं, जिसके स्मरणमात्र से हम आज भी पुलकित और भावविभोर हो जाते हैं। यदि इन महापुरुषों ने ऊँचे आदर्शवाद का परिचय न दिया होता, हर एक ने अपने-अपने संकुचित स्वार्थ की दृष्टि से सोचा होता तो राज घरानों में होते रहने वाले षड़यंत्रों से बढ़कर वहाँ और कोई विशेषता दृष्टिगोचर न होती। अपने माता-पिता की प्रसन्नता के लिए रामचंद्र जी ने जिस प्रकार का उदार दृष्टिकोण रखा, उससे आज तक बच्चों को मातृ-पितृभक्ति की शिक्षा मिल रही है। लक्ष्मण और भरत का भ्रातृप्रेम, कौशिल्या और सुमित्रा का अपने बच्चों को सन्मार्ग पर कष्ट उठाने के लिए प्रोत्साहन, सीता का पतिव्रत, उर्मिला का अपने पति के आदर्शवादी बनने का संतोष, हनुमान का न्यायपक्ष के लिए अपना जीवनदान करना, जटायु जैसे दुर्बल पक्षी का अन्याय से संघर्ष करते हुए प्राण देना आदि कतिपय महानताएँ ऐसी हैं, जिनके होने से ही रामायण, रामायण कहला सकने योग्य बनी है।

अंधे माता-पिता की काँवर को कंधे पर रखकर उन्हें तीर्थयात्रा कराने वाले श्रवणकुमार, अपने पूर्वज पुरुषों को मुक्ति की आवश्यकता और प्यासी भूमि को तृप्त करने के लिए कठोर तप करने वाले भागीरथ, अपने पिता शांतनु के विवाह का साधन बनाने के लिए स्वयं आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत धारण करने वाले भीष्म, पिता ययाति की प्रसन्नता के लिए अपना यौवन दान देने वाले पुरु का आदर्श चरित्र आज भी हमारे बच्चों में पितृभक्ति पैदा करने के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं।

पतिव्रत और पत्नीव्रत

पतिव्रत धर्म का अनुकरणीय उदाहरण उत्पन्न करने वाली भारतीय नारियाँ इस गए-गुजरे जमाने में भी धर्म से लड़खड़ाने वाले पैरों को धर्ममार्ग पर आरुढ़ रहने की शिक्षा देती रहती हैं। अंधे पति के साथ विवाह होने पर धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी ने अपनी आँखों पर जीवन भर के लिए पट्टी बाँध ली। पति की मर्यादा की रक्षा के लिए शैव्या ने अपने बच्चे का तथा अपना बिकना स्वीकार किया और दासी का निकृष्ट जीवन शिरोधार्य कर लिया। सीता वन-वन मारी-मारी फिरीं। सुकन्या ने अस्थि-पिंजरमात्र च्यवन ऋषि के साथ हुए अपने विवाह को प्रसन्नतापूर्वक निवाहा। दमयंती ने अपने पति के लिए क्या-क्या कष्ट नहीं सहे। चित्तौड़ की रानियाँ अपने पतियों की प्रतिष्ठा रखने के लिए जीवित चिताओं में जल गईं। चूड़ावत की पत्नी हाडी रानी ने अपने पति को वासनाग्रस्त होकर रणक्षेत्र में जाने से इंकार करने पर अपना सिर काटकर ही उसके सामने रख दिया और उसके यश पर आँच आने देना स्वीकार न किया।

पतियों ने भी पत्नीव्रत को नारी के पतिव्रत से कम महत्त्व नहीं दिया। यज्ञ के समय पत्नी की आवश्यकता अनुभव होते हुए भी राम, एक पत्नी के रहते दूसरी से विवाह करने को किसी भी प्रकार तैयार न हुए, उनने सोने की सीता बनाकर काम चलाया। इंद्रपुरी में अर्जुन के पहुँचने पर उर्वशी ने उसके सामने काम प्रस्ताव किया और उसी के समान पुत्र प्राप्ति की कामना प्रकट की तो अर्जुन ने यही उत्तर दिया कि मैं विवाहित हूँ, पत्नीव्रत नष्ट नहीं कर सकता, आप मुझे ही कुंती माता की तरह अपना पुत्र मानकर अपनी पुत्रप्राप्ति की कामना पूर्ण करें। छत्रपति शिवाजी के सामने जब एक सुंदर यवन युवती पेश की गई तो उनने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए इतना ही कहा—"काश! मेरी माता भी इतनी ही सुंदर होती तो मैं कुरूप क्यों जन्मता।" संत तुकाराम कहीं से मिले हुए सारे गन्ने रास्ते में ही बालकों को बाँटकर जब केवल एक गन्ना ही घर लेकर पहुँचते हैं, तो उनकी कर्कशा पत्नी आग बबूला हो जाती है और वह गन्ना तुकाराम की पीठ पर दे मारती है; वह गन्ना बीच से टूट जाता है। तुकाराम क्रुद्ध नहीं होते, वे जानते हैं कि पति के अपमान की तरह पत्नी का अपमान भी पाप है। जिस प्रकार पत्नी के लिए 'अंध, वधिर, क्रोधी अति दीना' पति का अपमान न करना धर्म है, उसी प्रकार पति के लिए भी कर्कशा एवं दुर्गुणी पत्नी को निबाहना और क्षमा करते रहना कर्त्तव्य है। तुकाराम इस अपमान को क्षमा कर देते हैं और हँसते हुए केवल इतना ही कहते हैं—"देवि ! गन्ना एक था और खाने वाले हम दो। तुमने पीठ पर मारकर इसका ठीक बँटवारा कर दिया। लो एक तुम खाओ एक मैं खाता हूँ।"

गुरुजनों का प्रत्युपकार

गुरुभक्ति का आदर्श उपस्थित करते हुए विश्वामित्र की प्रसन्नता के लिए राजा हरिश्चंद्र अपना राज-पाट ही उन्हें नहीं दे देते, वरन अपना शरीर और स्त्री-बच्चे बेचकर उनकी दक्षिणा भी चुकाते हैं। दलीप, गुरु की गौ पर सिंह द्वारा आक्रमण होने पर, अपना शरीर देकर भी गुरुधन की रक्षा करते हैं। मिट्टी की प्रतिमा बनाकर द्रोणाचार्य को गुरु बनाने वाले एकलव्य के सामने जब साक्षात द्रोणाचार्य उपस्थित होते हैं और वे गुरु दक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा माँगते हैं तो एकलव्य खुशी-खुशी अंगूठा काटकर उनके सामने रख देता है। समर्थ गुरु रामदास को सिंहनी के दूध की आवश्यकता पड़ने पर उनके शिष्य शिवाजी अपने जीवन को खतरे में डालकर चल देते हैं और गुरु की अभीष्ट वस्तु लाकर उनके लिए प्रस्तुत करते हैं। गुरु के खेत में पानी रोकने में असमर्थ हो जाने पर बालक आरुणि का स्वयं ही लेटकर पानी रोकना यह बताता है कि गुरुऋण से उऋण होने के लिए शिष्यों में कितनी निष्ठा रहती थी और वे कृतज्ञता की भावनाओं से प्रेरित होकर प्रत्युपकार के लिए क्या-क्या करने को तैयार नहीं रहते थे।

मित्रता का मूल्य

मित्रता का मूल्य चुकाने में सच्चे मित्रों को पीछे नहीं रहना चाहिए और समय पड़ने पर बड़ी-से-बड़ी बाजी लगा देनी चाहिए। इसका उदाहरण हम कृष्ण-सुदामा और कृष्ण-अर्जुन के प्रसंग में भली प्रकार देख सकते हैं। युधिष्ठिर जब स्वर्ग जाने लगे हैं और उनके सेवक कुत्ते को वहाँ प्रवेश मिलता नहीं दीखा है, तो उनने स्वयं भी जाने से इनकार कर दिया। वे तभी देवलोक गए, जब उनके प्रिय सेवक कुत्ते को भी साथ ले चलने की अनुमति मिल गई। यह हुआ स्वामी का सेवक के प्रति कर्त्तव्य। स्वामी के प्रति सेवक का क्या कर्त्तव्य होता है, इसे संयम राय ने जाना था। पृथ्वीराज युद्ध के मैदान में घायल पड़े हैं, गिद्ध उनका माँस नोंच-नोंचकर खा रहे हैं, आँखें निकालने ही वाले हैं कि पास में घायल पड़ा सेवक संयम राय होश में आते ही यह दृश्य देखकर व्यथित हो जाता है। स्वामी की रक्षा करने के लिए उठ सकने में असमर्थ होने पर वह दूसरा उपाय सोचता है। पास में पड़ी तलवार से अपना माँस काट-काटकर गिद्धों के सामने फेंकना शुरू करता है। गिद्ध पृथ्वीराज को छोड़कर उस फेंके माँस को खाने लग जाते हैं। इतने में रक्षक दल आ पहुँचता है और पृथ्वीराज की जान बच जाती है। उदयपुर का शासक बनवीर जब असली उत्तराधिकारी राजकुमार को अपने रास्ते से हटाने के लिए उसका कत्ल करने पहुँचता है तो पन्नाधाय उसके सामने अपना लड़का पेश कर देती है और अपने स्वामी के बालक को बचा लेती है। सेवक और स्वामी के बीच में क्या संबंध होने चाहिए, इसका अनुकरणीय उदाहरण हमें इन घटनाओं में उपलब्ध होता है। मुहम्मद गोरी ने जब पृथ्वीराज को कैद कर लिया तो उनके सेवक चंद वरदायी ने यही उचित समझा कि अपने स्वामी का मृत्यु के समय तक साथ दिया जाए। उसने समय आने पर अपने प्राणों की परवाह न करते हुए यह कर्त्तव्य किस प्रकार निवाहा, इसे इतिहास के विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं।

त्याग और बलिदान

'आदर्शवाद की भावनाएँ' यदि मन में रहें तो मनुष्य साधारण स्थिति में होने पर भी अपना अनुकरणीय आदर्श संसार के सामने उपस्थित कर सकता है और शरीर न रहने पर भी अपने उज्ज्वल चरित्र के द्वारा जनसमाज का चिरकाल तक मार्गदर्शन करता रह सकता है। वाजिश्रवा ने अपना सर्वस्व धन-धान्य, यहाँ तक कि पुत्र नचिकेता को भी राष्ट्र की आवश्यकता के लिए यमाचार्य को दान कर दिया था। हर्षवर्धन और अशोक ने अपना विशाल साम्राज्य तथा अपार धन का विपुल भंडार धर्मप्रसार के लिए संकल्प कर दिया था। भामाशाह ने अपनी सारी दौलत राणा प्रताप के चरणों पर अर्पित करके उन्हें स्वाधीनता संग्राम जारी रखने की प्रेरणा की थी। सुभाष चन्द्र बोस को आजाद हिंद फौज के संचालन के लिए रंगून के भारतीयों ने अपनी करोड़ों रुपयों की संपदा देकर गर्व और संतोष अनुभव किया था। सेठ जमनालाल बजाज ने गाँधी जी को स्वतंत्रता संग्राम चलाने के लिए अपना सर्वस्व उनके चरणों पर अर्पित कर दिया। शिवाजी, राणा प्रताप, बंदा वैरागी, गुरु गोविंद सिंह, हकीकत राय आदि वीरों ने धर्म की रक्षा के लिए क्या-क्या कष्ट नहीं उठाए। राजा जनक हल जोतकर अपने गुजारे के लिए अनाज उत्पन्न करते थे और राज्यकोष की एक पाई भी अपने काम में नहीं लगाते थे। अहिल्याबाई ने अपनी सारी आमदनी तीर्थों और देवालयों के निर्माण और जीर्णोद्धार में लगा रखी थी। कर्ण की दानवीरता प्रसिद्ध है। वे जो कुछ प्राप्त करते थे, वह सारे का सारा सत्कार्यों की सहायता के लिए उसी दिन दान कर देते थे। इतने बड़े साम्राज्य का मंत्री होते हुए भी चाणक्य ने अपने निजी जीवन को त्यागमय ही बनाए रखा। वे फूँस की कुटिया में लंगोटी लगाकर रहते थे और अपनी योग्यता का लाभ अपने आपको नहीं, वरन सारे समाज को देने में संतोष अनुभव करते थे।

महापुरुषों की परंपरा

धार्मिकता की अभिवृद्धि के लिए कितने ही सत्पुरुषों ने अपने जीवन अर्पण किए  हैं। दधीचि ने अपनी हड्डियाँ तक देवत्व की रक्षा करने के लिए दान कर दीं। राजा शिवि ने शरणागत कबूतर की रक्षा के लिए उसके बराबर अपना माँस काटकर दे दिया। बुद्ध, महावीर, गाँधी, दयानंद, शंकराचार्य, नानक, कबीर, तुकाराम, रामदास, विवेकानंद आदि ने धर्मप्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए अपना सारा जीवन ही लगा दिया और वे अनेक कठिनाइयाँ सहते हुए भी जनसेवा के कार्य में संलग्न रहे। सत्प्रवृत्तियाँ जब भी किसी मनुष्य के मन में जाग पड़ती हैं तो वह पिछले बुरे जीवन का परित्याग करके उच्चकोटि का महापुरुष बन जाता है। तुलसीदास की मोह-वासना प्रसिद्ध है, वे रात में मुर्दे पर बैठकर नदी को  पार करके और पनाले पर लटकते हुए साँप को पकड़कर स्त्री के पास पहुँचे थे। सूरदास का वेश्यागामी जीवन प्रसिद्ध है, जिससे क्षुब्ध होकर उसने अपनी आँखें फोड़ी थीं। अंबपाली सारे यौवनकाल में वेश्यावृत्ति करती रही। वाल्मीकि का बहुत बड़ा जीवन भाग डाकू का कार्य करते हुए बीता। अजामिल कसाई था। अंगुलिमाल नित्य नरहत्या करके मनुष्यों की उंगलियों की माला पहनता था। इस प्रकार के घृणित जीवन बिताने वालों के मन में भी जब धर्मप्रवृत्ति जीवित हुई तो उनके जीवन का कायाकल्प ही हो गया था और वे देवताओं की श्रेणी में गिने जाने लगे।

इस अग्नि परीक्षा को स्वीकारें

सभ्य समाज की रचना इस आदर्शवाद को हृदयंगम करने से ही संभव हो सकती है, जिसे हमारे पूर्व पुरुषों ने बड़ी श्रद्धा भावना के साथ अपने जीवन का लक्ष्य बनाए रखा था। हो सकता है कि महानता के मार्ग पर चलते हुए किसी को कष्ट और कठिनाइयों की अग्नि परीक्षा में होकर गुजरना पड़े, पर उसे आत्मिक शांति और कर्त्तव्यपालन की प्रसन्नता हर घड़ी बनी रहती है। इस मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति को असुविधा हो सकती है, पर समाज का विकास इसी त्याग और बलिदान के ऊपर निर्भर रहता है। चरित्रवान व्यक्ति ही किसी समाज की सच्ची संपत्ति होते हैं। हम अतीतकाल में विश्व के सुदृढ़ आदर्शवाद के आधार पर ही रहे हैं। अतः जबकि हम अपनी उस पुरानी महानता और उज्ज्वल परंपरा को पुनः लौटाने चले हैं तो हमें आदर्शवाद का ही अवलंबन करना होगा। धैर्य और कर्त्तव्य को दृढ़तापूर्वक जीवन में धारण करना पड़ेगा।


सामाजिक प्रगति का एकमात्र आधार

स्वार्थपरता की मात्रा जब मर्यादाओं का उल्लंघन करने लगती है, तब मनुष्य किसी भी मार्ग से अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए तत्पर हो जाता है। उचित-अनुचित का विचार छोड़कर, जैसे भी बने वैसे अपना स्वार्थ सिद्ध करने की नीति जब अपनाई जाने लगती है, तो मनुष्य का व्यक्तित्व असुरता से परिपूर्ण हो जाता है। असुरता की जहाँ वृद्धि होगी, वहाँ सुख-शांति का ठहर सकना संभव न होगा। अनैतिक दृष्टिकोण अपनाए हुए व्यक्तियों का समाज असभ्य ही कहला सकता है। वहाँ निरंतर क्लेश-कलह ही नहीं, सर्वनाश के अवसर भी उपस्थित होते रहते हैं। आज हमारे समाज में अपराधों, क्लेशों, संघर्षों, अभावों, चिंताओं और समस्याओं का घटाटोप दिखाई पड़ता है, उसका एकमात्र कारण व्यक्तियों के मन में बढ़ी हुई स्वार्थपरता, चरित्रहीनता, एवं संकुचित दृष्टि ही है। आदर्शवाद का, धर्मनीति एवं मर्यादा का उल्लंघन जब कभी भी अधिक मात्रा में होने लगा है, तब उसका परिणाम सारे समाज को भुगतना पड़ता है ।

स्वार्थपरता के उत्पात

स्वार्थ से मनुष्य कैसा निर्मोही हो जाता है, इसके अगणित उदाहरणों से इतिहास भरा पड़ा है। स्वजन-संबंधियों के रिश्ते भी स्वार्थपरता के तूफान में नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। औरंगजेब अपने सगे भाई दारा को अपने मार्ग का काँटा समझता है और उसका सिर काटकर अपने बाप के आगे पेश करता है। सगे भाई के प्राण लेना और बाप को अपने प्राण प्यारे बेटे का कटा हुआ सिर दिखाकर मृत्यु से अधिक यंत्रणा सहने को विवश करने वाली यह डाकिन स्वार्थपरता ही तो है। बालि ने अपने सगे भाई सुग्रीव की स्त्री का अपहरण कर लिया। रावण ने विभीषण को भरी सभा में सदुपदेश देने के कारण लात मारकर तिरस्कृत किया। कौरवों ने पांडवों को क्या-क्या दुःख नहीं दिए। एक ओर राम-लक्ष्मण और भरत का आदर्श प्रेम है, दूसरी ओर औरंगजेब, बालि, रावण और कौरवों के कुकृत्य हैं। इस अंतर को प्रस्तुत करने का कारण धर्म और अधर्म की आस्था-अनास्था ही हो सकती है।

बाप-बेटे का कितना पवित्र संबंध है। पिता की आज्ञा पालन करने के लिए जहाँ राम, श्रवणकुमार, भीष्म, पुरु, आदि ने अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किए, वहाँ ऐसी भी परंपरा मौजूद हैं, जिनमें बेटे ने बाप को तिरस्कृत, पददलित और मौत के मुँह में धकेल देने में कसर न रखी। जहाँगीर ने अकबर को कैद किया था। खुसरो ने जहाँगीर के खिलाफ बगावत की। औरंगजेब शाहजहाँ को कैदकर उसकी गद्दी पर आप बैठ गया और सलीम ने औरंगजेब के साथ वही व्यवहार किया। बेटों की बापों के प्रति की गई यह करतूतें किस समाज के लिए गौरवास्पद हो सकती हैं?

अनीति और अधर्म का मार्ग

कंस ने अपनी बहिन देवकी के आठ बच्चों को पत्थर पर पटककर मार डाला। गुरुभक्ति के स्थान पर उनके साथ अमानवीय व्यवहार करने वाले शिष्यों की भी कमी नहीं रही है। भस्मासुर अपने गुरु शिवजी पर उनके दिए हुए वरदान का उलटा प्रयोग करने एवं उन्हें भस्म करके पार्वती का अपहरण करने को उतारू हो गया। गुरु गोविंद सिंह की हत्या उनके एक शिष्य ने ही कर दी। दयानंद को उनके प्रिय सेवक जगन्नाथ ने ही विष खिला दिया। ईसामसीह को उनके एक शिष्य ने ही तीस रुपए के लोभ में गिरफ्तार करके फाँसी पर चढ़वा दिया। जहाँ गुरुभक्ति के एक-से-एक ऊँचे उदाहरण मौजूद हैं वहाँ ऐसी निकृष्ट घटनाएँ भी कम नहीं हैं। अपने स्वामी की रक्षा के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग करने वाले संयम राय, पन्नाधाय जैसे और उदाहरण मौजूद है, वहाँ सिराजुदौला से विश्वासघात करके उसके राज्य और जीवन को नष्ट करा देने वाले मीर जाफर जैसे नौकरों के कुकृत्य भी देखने को मिलते रहते हैं।

पतिव्रत भारतीय नारी की विशेषता रही है, पर सूर्पनखा जैसी भी नारियाँ हुई हैं, जो अपने विवाहित पति को छोड़कर परपुरुषों की कल्पना से स्वच्छंद विचरण करती रहीं और समाज में भयंकर कांडों की निमित्त बनीं। एक नारीव्रत का उल्लंघन जिनने किया, उनने विपत्ति को ही आमंत्रण किया है। उत्तानपाद ने एक स्त्री के रहते दूसरी से विवाह किया। उस ईर्ष्या से पहली रानी के पुत्र ध्रुव का अपमान हुआ और बच्चे को घर ही छोड़ देना पड़ा। दशरथ ने तीन विवाह करके कौन शांति पाई? पांडु ने कुंती के रहते माद्री से और विवाह कर लिया तो उन्हें क्षयग्रस्त होकर अकाल मृत्यु के मुख में जाना पड़ा। रावण ने सीता का अपहरण करके कई स्त्री घर में रखनी चाहीं। कीचक ने द्रौपदी पर कुदृष्टि डाली, अलाउद्दीन चित्तौड़ की रानी पद्मावती पर ललचाया। इन सबका क्या परिणाम हुआ? यह किसी से छिपा नहीं है। कुमार्ग पर जिसने भी कदम बढ़ाया है, उसने अपने लिए ही नहीं, वरन दूसरों के लिए भी संकट उत्पन्न किया है।

पापबुद्धि के दुष्परिणाम

रावण, कंस, जरासंध, हिरण्यकश्यप, वेन, नहुष, दुर्योधन, औरंगजेब, नादिरशाह आदि नृशंस शासकों ने अपने मुँह पर कालिख पोती और अन्य अगणित लोगों को उत्पीड़न एवं यंत्रणा में सहने के लिए विवश किया। मुहम्मद गोरी अपनी महत्वाकांक्षाएँ पूरी करने के लिए क्या-क्या नहीं करता रहा? क्या नेपोलियन और सिकंदर ने असंख्यों अपराधों के खून से धरती नहीं रंगी। कुमार्ग पर चलने वाले व्यक्ति सारे समाज को ही दुःख देते हैं। जयचंद ने देशद्रोह करके मुहम्मद गोरी को भारत पर आक्रमण करने के लिए बुलाया तो उस कुकृत्य का दुष्परिणाम राष्ट्र को अद्यावधि सहना पड़ रहा है। दूसरी ओर एक व्यक्ति की देशभक्ति के कारण इंग्लैंड के मालामाल और समुन्नत हो जाने का भी उदाहरण मौजूद है। शाहजहाँ की पुत्री जहानआरा का इलाज एक अँग्रेज डॉक्टर ने किया था। उससे जब बादशाह ने पूछा कि आपने मेरी बेटी की जान बचाई है, आप को क्या पुरस्कार दूँ? तो उसने अपने लिए कुछ न माँगते हुए इतना ही कहा कि, "मेरे देश से आने वाले माल पर से चुंगी माफ कर दीजिए।" शाहजहाँ ने उसे स्वीकार कर लिया और भारत के बाजार इंग्लैंड के माल से पट गए। उस लाभ से इंग्लैंड जैसा पिछड़ा हुआ देश संसार का अग्रणी बन गया।

यह दुर्बुद्धि किन्हीं श्रेष्ठ व्यक्तियों को अपने चंगुल में फँसा ले तो उन्हें भी पतन के गर्त्त में धकेल सकती है। विश्वामित्र ऋषि को प्रलोभन आया तो वे मेनका के जाल में फँस गए। पाराशर केवट कन्या पर मोहित हो गए और अपने को सँभाले न रह सके। चंद्रमा ने गुरु पत्नी गमन का पाप कमाया और इंद्र जैसे देवता अहिल्या का सतीत्त्व नष्ट करने के कुकर्म में प्रवृत्त हुए। भीष्म और द्रोणाचार्य जैसे विवेकशील दुर्योधन की अनीति का समर्थन करने लगे। इससे प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा तभी तक रह सकता है, जब तक कि उसकी धर्मबुद्धि सावधान रहे। पापबुद्धि के प्रकोप से यदि मनुष्य सँभल न सके तो वह स्वयं तो अंधकार के गर्त्त में गिरता ही है और भी दूसरे अनेकों को अपने साथ पापपंक में ले डूबता है।

धर्मबुद्धि की सत्प्रेरणा

धर्मबुद्धि के जाग्रत होने पर फतेसिंह जोरावर जैसे छोटे-छोटे बालक, दीवार में जीवित चुने जाना हँसी-खुशी स्वीकार कर सकते हैं। चोटी न कटने देने के बदले बोटी-बोटी कटवाने को प्रसन्नतापूर्वक तैयार होते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक बनकर असंख्यों व्यक्ति सब प्रकार की बर्बादी सहन करते हैं और फाँसी के तख्तों पर गीता की पुस्तकें छाती से चिपकाए हुए चढ़ते चले जाते हैं। राम की सेना में रीछ-बंदर जैसे दुर्बल प्राणी अपने प्राणों की आहुति देने के लिए सम्मिलित होते हैं। एक छोटी गिलहरी तक अपने बालों में धूरि भर-भरकर उसे समुद्र में झाड़ देने का अनवरत श्रम करके, समुद्र को उथला करके, राम की सेना का मार्ग प्रशस्त करती है। धर्मबुद्धि से दुर्बल व्यक्तियों में भी हजार हाथी का बल आ जाता है, पर स्वार्थी बुद्धि तो सेनापतियों को भी कायर बना देती है। द्रौपदी को भरी सभा में नग्न किए जाते समय भीष्म और द्रोण जैसे योद्धा नपुंसक बने बैठे रहे। उनके मुख से एक शब्द भी विरोध का न निकला। थोड़े से मुट्ठी भर विदेशी आक्रमणकारी भारत में आए थे, पर उनका संगठित मुकाबला करने के लिए यहाँ के शासक तैयार न हुए और पददलित होते चले गए। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई सहायता और आश्रय प्राप्त करने के लिए समर्थ राजाओं के पास जाती है, पर अँग्रेजों के डर से वे उसे साफ इनकार कर देते हैं। कितने ही भारतीय अंग्रेजों और मुसलमानों के नाक के बाल बने रहे और देश को गुलामी की जंजीरों से देर तक जकड़े रहने को अपनी स्वार्थबुद्धि के कारण करने और न करने योग्य सब कुछ करते रहे। जहाँ राणा प्रताप और शिवाजी जैसे स्वाभिमानी जीवन भर भारतीय स्वतंत्रता के लिए तिल-तिल लड़ते रहे, वहाँ खुशी−खुशी अपनी बहिन-बेटियाँ देकर अपने लिए सुविधाएँ प्राप्त करने वाले भी कम न थे। राणा सांगा 84 घाव होने पर भी युद्धरत हैं, पर दूसरे लोग शत्रु से मिलकर अपना स्वार्थ साधने में लगे रहते हैं।

मानव जीवन की विशेषता

मनुष्य हाड़-माँस का पुतला, एक तुच्छ प्राणिमात्र है, उसमें न कुछ विशेषता है न न्यूनता। उच्च भावनाओं के आधार पर वह देवता बन जाता है, तुच्छ विचारों के कारण वह पशु दिखाई पड़ता और निकृष्ट पापबुद्धि को अपनाकर वह असुर एवं पिशाच बन जाता है। इस लोक में जो कुछ सुख-शांति, समृद्धि और प्रगति दिखाई पड़ती है, वह सब सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का परिचय है। जितनी भी उलझनें, पीड़ाएँ और कठिनाइयाँ दिखती हैं, उनके मूल में कुबुद्धि का विषबीज ही फलता-फूलता रहता है। सैंकड़ों-हजारों वर्ष बीत जाने पर भी पुरानी ऐतिहासिक इमारतें लोहे की चट्टान की तरह आज भी अडिग खड़ी हैं, पर हमारे बनाए हुए बाँध, स्कूल, पुल इधर बनकर तैयार नहीं हो पाते, उधर बिखरने शुरू हो जाते हैं। सामान और ज्ञान दोनों ही आज पहले की अपेक्षा अधिक उच्चकोटि का उपलब्ध है, पर उस लगन की कमी ही दिखाई पड़ती है, जिसके कारण प्राचीनकाल में लोग स्वल्प साधन होते हुए भी बड़ी-बड़ी मजबूत चीजें बनाकर खड़ी कर देते थे। कुतुब मीनार, ताजमहल, आबू के जैन मन्दिर, मदुरा के, मीनाक्षी के देवालय, अजंता की गुफाएँ, मिश्र के पिरामिड और चीन की दीवार समय के बौद्धिक ज्ञान का नहीं, उत्कृष्ट वस्तु निर्माण करने की भावना का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।

भौतिक उन्नति ही पर्याप्त नहीं

मशीनों, कारखानों, नहर-बाँध और सड़कों के आधार पर हमारी सुख-शांति नहीं बढ़ सकती। इनसे थोड़ी आमदनी बढ़ सकती है, पर उस बढ़ी आमदनी से अनर्थ ही बढ़ने वाला है। देखा जाता है कि कारखानों के मजदूर और दूसरे श्रमिक 40 फीसदी तक पैसा शराब, तमाकू, सिनेमा आदि में खरच कर डालते हैं। आमदनी बढ़ती चलने पर तरह-तरह की फिजूलखरची के साधन बढ़ते जाते हैं। जिन्हें ऊँची तनख्वाहें मिलती हैं, वे भी अभाव और कमी का रोना रोते रहते हैं। धनी लोगों के व्यक्तिगत एवं पारिवारिक-सामाजिक जीवन में क्लेश और द्वेष भरा रहता है। पैसे के साथ-साथ दुर्गुण बढ़ते चलने पर वह दौलत, और उलटी विपत्ति का कारण बनती चलती है। इसलिए आर्थिक उन्नति के साथ-साथ विवेकशीलता और सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि भी अवश्य रहेगी। यदि इस दिशा में उपेक्षा बरती गई तो प्रगति के लिए आर्थिक सुविधा बढ़ाने के जो प्रयत्न किए जा रहे हैं, वे हमारी समस्याओं को सुलझा सकने में कदापि समर्थ न हो सकेंगे।

जब तक मजदूर ईमानदारी से काम न करेंगे कोई कारखाना पनप न सकेगा। जब तक चीजें अच्छी और मजबूत न बनेंगी, उससे किसी खरीदने वाले को लाभ न मिलेगा। जब तक विक्रेता और व्यापारी मिलावट, कम तोल-नाप, मुनाफाखोरी न छोड़ेंगे तब तक व्यापार की स्थिति दयनीय ही बनी रहेगी। सरकारी कर्मचारी जब तक अहंकार, रिश्वत, कामचोरी और घोटाला करने की प्रवृत्ति न छोड़ेंगे तब तक शासन यंत्र का उद्देश्य पूरा न होगा। यह सत्प्रवृत्तियाँ इन वर्गों में अभी उतनी नहीं दिखाई देतीं जितनी होनी चाहिए। यही कारण है कि हमारी प्रगति अवरुद्ध बनी पड़ी है। साधनों की कमी नहीं है। आज जितना ज्ञान, धन और श्रम-साधन अपने पास मौजूद हैं, उसका सदुपयोग होने लगे तो सुख-सुविधाओं की अनेक गुनी अभिवृद्धि हो सकती है।

आत्मकल्याण का प्रधान साधन

आत्मकल्याण की लक्ष्यपूर्ति तो सर्वथा सत्प्रवृत्तियों पर ही निर्भर है। ईश्वर का साक्षात्कार, स्वर्ग एवं मुक्ति को प्राप्त कर सकना केवल उन्हीं के लिए संभव है, जिनके विचार और कार्य उच्चकोटि के, आदर्शवादी एवं परमार्थ-भावनाओं से ओत-प्रोत हैं। कुकर्मी और पापवृत्तियों में डूबे हुए लोग चाहे कितना ही धार्मिक कर्मकांड क्यों न करते रहें, कितना भजन-पूजन कर लें, उन्हें ईश्वर के दरबार में प्रवेश न मिल सकेगा। भगवान घट-घटवासी हैं, वे भावनाओं को परखते हैं और हमारी प्रवृत्तियों को भली प्रकार जानते हैं, उन्हें किसी बाह्य-उपचार से बहकाया नहीं जा सकता। वे किसी पर तभी कृपा करते हैं जब भावना की उत्कृष्टता को परख लेते हैं। उन्हें भजन से अधिक ‘भाव’ प्यारा है। भावनाशील व्यक्ति बिना भजन के भी ईश्वर को प्राप्त कर सकता है, पर भावनाहीन व्यक्ति के लिए केवल भजन के बल पर लक्ष्यप्राप्ति संभव नहीं हो सकती।

लौकिक और पारलौकिक, भौतिक और आत्मिक कल्याण के लिए, उत्कृष्ट भावनाओं की अभिवृद्धि नितांत आवश्यक है। प्राचीनकाल में जब भी अनर्थ के अवसर आए हैं तब उनका कारण मनुष्यों की स्वार्थपरता एवं पापबुद्धि ही रही है और जब भी सुख-शांति का आनंदमयमय वातावरण रहा है तब उसके पीछे सद्भावनाओं का बाहुल्य ही मूल कारण रहा है। आज भी हमारे लिए वही मार्ग शेष है। इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग न पहले था और न आगे रहेगा। सभ्य समाज की स्थिति जब-जब रही है तब धर्मबुद्धि की ही प्रधानता रही है, हमें वर्त्तमान दुर्दशा से ऊँचे उठने के लिए जनमानस में गहराई तक धर्मबुद्धि की स्थापना करनी होगी। इसी आधार पर विश्वव्यापी सुख-शांति का वातावरण बन सकना संभव होगा।


भौतिक ही नहीं, आत्मिक प्रगति भी

युगनिर्माण योजना के अंतर्गत स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज की रचना का कार्यक्रम वस्तुतः व्यक्ति निर्माण का कार्यक्रम है। आज अनेकों वस्तुएँ बन रही हैं, उनकी उत्कृष्टता और मात्रा बढ़ाने के लिए सतत प्रयत्न हो रहे हैं, पर एक वस्तु ऐसी भी है जिसका महत्त्व सबसे बढ़-चढ़कर होते हुए भी उपेक्षा के गर्त्त में गिरी-पड़ी सड़ रही है, वह वस्तु है— मनुष्यता। इसे उठाने के लिए ध्यान देने की न उपयोगिता समझी जाती है न आवश्यकता। मनुष्य का स्तर दिन-दिन गिरता चला जा रहा है। उसका स्वास्थ्य,उसका विवेक, उसका पारस्परिक सद्व्यवहार दिन-दिन घटता और गिरता चला जा रहा है, फलस्वरूप अगणित प्रकार के सुख-साधनों की बढ़ोत्तरी होते जाने पर भी मनुष्य दिन-दिन अधिक दुखी, अधिक चिंतित, अधिक क्षुब्ध होता चला जा रहा है। साधन-सामग्री की वृद्धि के साथ-साथ उसकी मानसिक गरीबी एवं व्यथा भी बढ़ती चली जा रही है।

यह बढ़ोत्तरी किस काम की?

अस्पताल बढ़ रहे हैं, पर स्वास्थ्य गिर रहा है। पैसा बढ़ रहा है, पर आवश्यकताएँ बढ़ जाने से अभावों का दुःख दूना हो रहा है। विद्यालय बढ़ रहे हैं, पर अविवेक और अदूरदर्शिता का साम्राज्य अधिक विस्तृत होता जाता है। पुलिस, कचहरी, और जेलों की संख्या बढ़ रही है, अपराधों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। प्रचार, प्रवचन और संगठनों की धूम है, पर स्वार्थपरता द्वेष और अविश्वास की मात्रा में बढ़ोत्तरी ही होती चलती है। विज्ञान की सहायता से सुविधाएँ बढ़ाने वाले आविष्कार आए दिन होते रहते हैं, पर असुविधाओं का कोई अंत नहीं, हर व्यक्ति पहले की अपेक्षा अब अधिक असुविधा और परेशानी अनुभव करता है। प्रगति के लिए हम जितने ही हाथ-पैर पीटते हैं, उतना ही पीछे लौटने का उपक्रम बन जाता है। सुख-शांति के लिए बनाए गए उपकरण उलटे अधिक असुविधा उत्पन्न करने वाले बन रहे हैं। इसका कारण एक ही है कि आंतरिक स्तर की ओर पूर्ण उपेक्षा बरती जाती है। बाहर की टीप-टाप से स्थिति को सुंदर और सुसज्जित दिखाने के लिए हम जितना प्रयत्न करते हैं, यदि उससे आधा भी भीतरी स्थिति को सँभालने के लिए ध्यान दिया जाए तो स्थिति का वह रूप न रहे जो आज दिखाई पड़ता है।

यदि यह अपव्यय रुक सके

पोशाक, फैशन, क्रीम, पाउडर, जेवर आदि के द्वारा शरीर को सजाने में जितना समय और धन हम खरच करते रहते हैं, उससे आधा भी यदि व्यायाम, मालिश एवं संतुलित आहार में खरच किया जाता रहे तो हमारा सौंदर्य और स्वास्थ्य ऐसा अच्छा हो जाए कि फटे-टूटे कपड़े पहनकर भी। गुदड़ी में छिपे लाल की तरह हमारा व्यक्तित्व निखरकर चमकने लगे। स्कूल-कालेजों की थोथी पढ़ाई करके नौकरी का उद्देश्य पूरा कर लेने में जितनी शक्ति लगती है, यदि उसका आधा श्रम भी गुण, कर्म, स्वभाव को अच्छा बनाने की प्रक्रिया में खरच करके व्यक्तित्व का सर्वांगपूर्ण विकास करने में लगाया जाए तो व्यक्ति साधारण व्यक्ति न रहकर महापुरुष बन सकता है और वह अपना ही नहीं, अपने संपर्क में आने वाले अनेकों का भविष्य उज्ज्वल कर सकता है। जितना पैसा व्यसनों में, नशेबाजी में, सिनेमा जैसे भद्दे मनोरंजनों में, कुप्रथाओं में, अंधविश्वासों में, धूमधाम बनाने में नष्ट किया जाता है, उसका आधा भी यदि राष्ट्रीय पुनरुत्थान के कार्यों में हम स्वेच्छापूर्वक लगा दें तो वर्त्तमान पंचवर्षीय योजना की अपेक्षा दस गुनी योजना हम बिना किसी विदेशी सहायता के बड़ी आसानी से चला सकते हैं और विकास के जो सपने आज कठिन दिखाई पड़ते हैं, वे जादू की तरह साकार होकर हमारे सामने आकर उपस्थित हो सकते हैं।

लोक शिक्षण की उपयोगिता

अस्पतालों में खरच होने वाली विशाल धनराशि यदि स्वास्थ्य रक्षा के शिक्षण एवं साधन जुटाने में, व्यायामशाला बनाने में, सफाई सिखाने में, संयम की आदतें बनाने में लगा दी जाए तो बीमार पड़ने का प्रश्न ही उत्पन्न न हो और अस्पतालों की जरूरत बहुत कम रह जाए। डॉक्टर-वैद्यों की विशाल फौज यदि दवाएँ बनाने की अपेक्षा स्वास्थ्य शिक्षक-अध्यापक का कार्य करने लगे तो बीमारी की जड़ जो असंयम के रूप में हमारे मस्तिष्कों में जमी बैठी है, आसानी से उखाड़ी जा सकती है। दवा के बलबूते पर रोग की बढ़ोत्तरी में रत्ती भर भी कमी नहीं की जा सकती। शारीरिक सारी व्यथाओं का एकमात्र कारण असंयम है और उसे रोकने का कोई प्रयत्न न किया गया तो हर घर के लिए एक डॉक्टर नियुक्त कर देने पर भी रोगों से छुटकारा मिलने वाला नहीं है। जेल और पुलिस के भय से अपराधों की वृद्धि नहीं रुक सकती। जितने अपराध होते हैं उनमें से दसवाँ भाग भी प्रकाश में नहीं आता। जो प्रकट होते हैं, उनमें से सबको पुलिस कहाँ पकड़ पाती है? जो पकड़े जाते हैं, उनमें से कितने अपराधियों को दंड मिलता है? अधिकांश तो सबूत के अभाव से वकीलों की चतुरता एवं प्रलोभनों के आकर्षण से बिना दंड पाए ही छूट जाते हैं। जिन्हें थोड़ी सजा भी मिलती है, उनमें से बहुसंख्यक और भी अधिक प्रशिक्षित होकर अपनी कला में पारंगत होकर वापस लौटते हैं। ऐसी दशा में यह आशा करना कि इन बाह्य प्रयत्नों से अपराध रुक जाएँगे, एक दुराशामात्र ही है। यह कार्य तो धर्मबुद्धि, ईमानदारी और कर्तव्य-भावना जागृत होने पर ही संभव है। जब तक मनुष्य पाप से घृणा करना न सीखेंगे, पुण्य के प्रति श्रद्धा न जगेगी तब तक उसे दुष्कर्मों के प्रबल आकर्षण से रोके रखना और किसी भी प्रकार संभव न होगा।

योग्यताएँ ही पर्याप्त नहीं

हर नागरिक का साक्षर होना एक अच्छी बात है, पर साक्षरता के साथ-साथ यदि सदाचार का व्यवहारिक शिक्षण न मिला तो शिक्षा के कारण प्राप्त हुई चतुरता एक मुसीबत उत्पन्न करेगी। अशिक्षित व्यक्ति दुष्टता पर उतारू होने से जितना संकट उत्पन्न कर सकता है, उससे अनेकों गुनी मुसीबत सुशिक्षित व्यक्ति करेगा। अशिक्षित झूठ बोलने वाला थोड़े ही दिनों में बदनाम हो जाएगा, पर यदि कोई झूठा वकील, झूठे गवाही से झूठी साक्षी दिलाकर अपने मुवक्किल को जिताने में सफलता प्राप्त करता रहता है तो हजारों व्यक्तियों को झूठ बोलने की कला का विधिवत शिक्षण देने का अपराध करते रहने पर भी उसकी प्रशंसा ही होगी, प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी। कदाचित वह झूठा वकील बिना पढ़ा रह गया होता तो झूठ का इतना विस्तार कहाँ कर पाता? अशिक्षितों की अपेक्षा शिक्षितों में सभी विशेषताएँ बढ़ती हैं, तो संकट उत्पन्न करने की, ठगने और धोखा देने की क्षमता क्यों न बढ़ेगी? भ्रष्टाचार की जड़ निम्नस्तर की गरीब जनता में नहीं, ऊँचे पदाधिकारियों में रहती है। बुराई नीचे से ऊपर को नहीं, वरन ऊपर से नीचे को चलती है। नेतृत्व करने वाला सुशिक्षित वर्ग यदि आचरण भ्रष्ट हो जाए तो उसका प्रभाव निम्नस्तर के लोगों पर पड़े बिना रह नहीं सकता।

योग्यताओं की प्रशंसा की जाती है और प्रतिष्ठा भी। पर वस्तुतः महत्त्व भावनाओं का है। निम्नकोटि की भावनाएँ रखने वाला व्यक्ति भले ही उच्च योग्यताओं से संपन्न हो, संसार का अहित ही करेगा, पर यदि भावनाएँ ऊँची हैं तो स्वल्प क्षमतासंपन्न व्यक्ति भी अत्यन्त उपयोगी और महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ हो सकेगा। एक इंजीनियर बहुत योग्य है, पर यदि वह लालची और रिश्वतखोर है तो उसकी देख-रेख में बनी हुई इमारत महँगी पड़ेगी और थोड़े ही दिनों में टूट-फूट जाएगी, किन्तु यदि साधारण स्वल्प शिक्षित मिस्त्री की देख-रेख में ईमानदारी के साथ काम किया जाए और अच्छा सामान लगाया जाए तो वह इमारत कम खरच में भी बनेगी और अधिक दिन भी टिकेगी। योग्यता की महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता, पर यदि उसमें उच्च भावनाओं का समुचित समावेश नहीं तो उससे लक्ष्य की प्रगति नहीं हो सकती।

ईमानदार हाथों में सुरक्षा

जिन देशों में शासन, निर्माण, उद्योग, शिक्षण और मार्गदर्शन का कार्य ईमानदार हाथों में रहा है, वहाँ कम योग्यता के व्यक्तियों ने आश्चर्यजनक प्रगति करके दिखाई है। पर यदि बेईमानों का वर्चस्व रहा है, तो प्रचुर धन व्यय होने और बड़ी-बड़ी लम्बी-चौड़ी योजनाएँ बनने पर भी असफलता ही हाथ लगी है। साधनों का महत्त्व तभी है, जब उच्च-भावना वाले व्यक्तियों के हाथ में उनका उपयोग होने की व्यवस्था बने। बंदर के हाथ में तलवार पड़ने पर जिस प्रकार अहित की ही आशंका रहती है, उसी प्रकार बेईमान व्यक्ति दुर्भाग्य से कहीं योग्यतासंपन्न, साधनसंपन्न और शिक्षासंपन्न हों, तब तो उनके आक्रमण से दुनिया को अपनी जान बचाना भी कठिन पड़ जाता है। शस्त्रों का उद्देश्य शांति, रक्षा एवं आततायियों का नियंत्रण होता है, पर आज अंतर्राष्ट्रीय जगत में जो शस्त्रों की होड़ चल रही है, उनका शिकार बेचारे निर्दोषों और दीन-हीनों को ही होना पड़ेगा। यह शस्त्र यदि अनीति को रोकने के काम आ सके होते तो कितना अच्छा होता, पर इनका उपयोग तो अपने स्वार्थों की अभिवृद्धि के लिए ही किया जाने वाला है। ऐसी दशा में इन अस्त्रों को बनाने वाले लोग चतुरता और योग्यता की दृष्टि से प्रशंसनीय माने जाने पर भी वस्तुतः संसार के लिए संकटरूप ही हैं।

दुर्भावनाएँ और युद्ध का दानव

यदि दुर्भावनाओं का मिट सकना संभव हो सके तो सारी दुनिया में जो करोड़ों सुयोग्य व्यक्ति युद्ध के दानव को प्रसन्न करने के लिए दिन-रात लगे हुए हैं, उनका श्रम तथा विपुल धन जो अस्त्रों-शस्त्रों तथा युद्ध-साधनों में व्यय होता है, वह दूसरे उपयोगी निर्माण कार्यों में लग सकता है और गरीबी, बीमारी, बेकारी, अशिक्षा, अन्याय आदि व्यथाओं से पीड़ित मानव जाति कुछ ही समय में शांति एवं प्रगति का आनंदमय वातावरण उपलब्ध कर सकती है। किंतु यदि दुर्भावनाओं का यही दौर चलता रहा तो संसार की विपत्तियाँ बढ़ने ही वाली हैं, उसे नारकीय यंत्रणाओं की आग में झुलसने के लिए विवश होना ही पड़ेगा। घृणा, स्वार्थ, ईर्ष्या, अहंकार, अविश्वास और अनीति जैसी दुर्भावनाओं का एकमात्र परिणाम दुःख-दारिद्रय एवं विनाश ही हो सकता है। हम इसी मार्ग पर चल रहे हैं और वैसे ही दुःखद प्रतिफल, पग-पग पर उपलब्ध करते चल रहे हैं। यदि इस सत्यानाश की सड़क पर दौड़ते रहने से हमारे कदम न रुक सके, तो भविष्य निश्चित रूप से अंधकारमय ही बनेगा!

साधनों का अभाव नहीं

इस संसार में सारी मनुष्य जाति के लिए सुख-सुविधापूर्वक रहने एवं शांति, प्रसन्नता, प्रेम और आनंद भरा जीवन व्यतीत करने के लिए पर्याप्त साधन मौजूद हैं। सब लोग हिल-मिलकर, संतोष और सदाचार का जीवन व्यतीत करें तो यहाँ किसी को, किसी वस्तु का अभाव न रहे। भौतिक दृष्टि से कोई समस्या मानव प्राणी के सामने नहीं है। परमात्मा ने अन्न, जल, दूध, शाक, फल आदि आहार के लिए प्रचुर साधन इस धरती पर पैदा किए हैं। वस्त्र, मकान, धातुएँ, खनिज, जड़ी-बूटियाँ, वृक्ष, नदी, सरोवर सभी कुछ सुविधाएँ मौजूद हैं। मानव का अवतरण इस पृथ्वी पर करने से पूर्व परमात्मा ने सभी कुछ यहाँ पर्याप्त मात्रा में प्रस्तुत रखा है और अगणित शक्तियाँ एवं विशेषताओं से संपन्न इस देह की भी रचना की है। दुःख का वास्तविक कारण यहाँ कुछ भी नहीं है। सारी बुराई और विपत्ति की जड़ मनुष्य के मस्तिष्क में है। साँप के फन में विष की थैली होती है, वही थैली मनुष्य के मस्तिष्क में है। दुर्बुद्धि, दुर्भावना एवं दुष्टता के जहर से भरा हुआ मनुष्य अपनी प्रत्येक फुसकार के साथ वायुमंडल को दूषित कर रहा है और जो भी समीप आता है उसे डस लेता है। सुख-शांति से भरी इस साधन-सुविधासंपन्न दुनिया को उसी ने दुःख-दैन्य से भरी हुई नारकीय स्थिति में ले जाकर पटक दिया है। यदि यह विष निकाला न गया, इसी प्रकार बढ़ने दिया गया, तो प्रगति के नाम पर किए जाने वाले सारे प्रयत्न आडंबरमात्र सिद्ध होंगे और विपत्ति का दौर बढ़ता ही चलेगा।

सुख की आकांक्षा कैसे पूरी हो?

मनुष्य सुख का इच्छुक दीखता है, पर कार्य दुःख प्राप्ति के कर रहा है। बाह्यजगत में सुख-साधन बढ़ाने के जो प्रयत्न चल रहे हैं, वे उस समय तक सफल नहीं हो सकते जब तक कि अंतःजगत के निर्माण का और भी हमारा प्रयत्न आरंभ न हो जाए। भावनाएँ दूषित भले ही पड़ी रहें, पर बाह्यसाधन बढ़ते जाने से मनुष्य सुखी रहने लगेगा, यह कल्पना मृगतृष्णामात्र है। मजदूर का वेतन बढ़े, पर उसकी शराब पीने, जुआ खेलने की आदत यदि और भी अधिक बढ़ जाए तो उस बढ़ी हुई मजदूरी से वह क्या लाभ उठा सकेगा? व्यापार और खेती से आमदनी बढ़े सो ठीक है, पर फिजूलखरची, विलासिता और विवाहोन्माद सरीखी कुरीतियों के रहते उस बढोत्तरी से भी क्या काम चलने वाला है? सुरसा के मुँह की तरह यह खरच तो बढ़ते ही जावेंगे और अभाव ज्यों का त्यों सताता रहेगा। शिक्षा के साथ दीक्षा का प्रबंध न होने से सुशिक्षित लोगों में अहंकार, उच्छृंखलता, विलासिता, स्वार्थपरता आदि दुर्गुण ही बढ़ेंगे, वे दूसरे का हित-साधन कर सकना तो दूर, स्वयं अपने लिए ही एक समस्या बने रहेंगे। असंयमी आदतों के रहते हुए स्वास्थ्य कहाँ सँभल सकेगा? लोभ और स्वार्थ की जब प्रबलता है और पाप-पुण्य का, अनुचित उचित का, विवेक कुंठित हो गया तो अपराधों और दुष्कर्मों की, संघर्ष और द्वेष की, बाढ़ कैसे रुकेगी? बेईमान हाथों में गई हुई कोई उत्तम-से-उत्तम योजना कब सफल हो सकेगी? आत्मीयता और सौजन्य के अभाव में हमारा समीपवर्त्ती वातावरण स्नेह और सद्भावना से रहित ही रहेगा। वैज्ञानिक-साधन हमें आलसी और उद्दंड बनाने में ही समर्थ हो सकेंगे, उनसे न्याय का नहीं, पशुबल का ही पक्ष प्रबल होगा। आंतरिक सत्प्रवृत्तियों के अभाव में बाह्यजीवन की प्रत्येक प्रगति हमारे लिए अपेक्षाकृत अधिक विपत्ति का ही कारण बनती जाएगी।

प्रगति का प्रधान आधार

प्रगति और शांति का प्रधान आधार साधन-सामग्री नहीं सद्भावना है। सद्भावना का क्षेत्र अंतर्जगत है। हम उसे उपेक्षित स्थिति में ही पड़ा रहने दे रहे हैं, यह भारी भूल है। भावना की उत्कृष्टता होने पर स्वल्प साधनसंपन्न लोग भी आनंद का जीवन व्यतीत कर सकते हैं, पर प्रचुर साधनों के होते हुए भी दुर्भावनाग्रस्त व्यक्ति छप्पन लाख यादवों की तरह आपस में ही लड़-कटकर नष्ट हो जाते हैं। साँप के लिए दूध का हर प्याला उसकी दुष्टता को और अधिक बल देता है, उसी प्रकार दुर्भावनाओं से भरे हुए अंतःकरणों के लिए, भौतिक संपदा की अभिवृद्धि और भी अधिक विपत्ति का कारण है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हम देख भी रहे हैं। देहाती क्षेत्र की शांति वहाँ की कृषि-आमदनी बढ़ने के साथ-साथ ही नष्ट होती चली जा रही है। वहाँ झगड़े और उपद्रव, पार्टीवादी का द्वेष, विवाह-शादियों का अपव्यय पहले की अपेक्षा अब आमदनी की दृष्टि से भी अधिक तेज अनुपात से बढ़ रहा है।

आंतरिक प्रगति को न भूलें

साधनों की दृष्टि आवश्यक है। व्यापार, उद्योग, कृषि, शिक्षा, विज्ञान, मनोरंजन, पुलिस, कचहरी, प्रचार, संगठन, विज्ञान, अनुसंधान आदि सभी कुछ बढ़ना चाहिए, पर साथ ही यह भी ध्यान रहे कि यह उपयोगी तभी होगा जब साथ ही सद्भावनाओं की, सत्प्रवृत्तियों की, विवेकशीलता की एवं सज्जनता की भी अभिवृद्धि हो। यदि भौतिक उन्नति की ही ओर हमारा ध्यान रहा और आत्मिक-प्रगति की उपेक्षा की जाती रही, तो यह सारे प्रयत्न जो आज इतने मनोयोगपूर्वक किए जा रहे हैं, निरर्थक ही नहीं, हानिकारक भी होंगे। संयम और विवेक के अभाव में जिस प्रकार परिवार नियोजन जैसी अच्छी बात व्यभिचार बढ़ाने में ही सहायक हो रही है , उसी प्रकार हर अच्छी योजना, हर अच्छी प्रगति, मानव जाति पर, समस्त संसार पर विपत्ति की घटा बनकर ही घुमड़ेगी। इस तथ्य को हम जितनी जल्दी समझ लें, जितनी गहराई तक मस्तिष्क में उतार लें उतनी ही अधिक भलाई है।


हम दो में से एक मार्ग चुन लें

इस संसार में उत्थान और पतन के दो मार्ग हैं, जो परस्पर विरोधी दिशाओं में चलते हैं। इनमें से एक को परमार्थ, दूसरे को स्वार्थ कहते हैं। इन्हें हम पुण्य, पाप, श्रेय, प्रेय आदि नामों से पुकारते हैं। प्रशंसा और निंदा के, स्वर्ग और नरक के, शांति और अशांति के मार्ग भी यही हैं। इनमें से मनुष्य स्वेच्छापूर्वक अपने लिए किसी को भी चुन सकता है और अपना भविष्य सुख-शांतिमय या क्लेश-कलहमय बना सकता है। श्रेयमार्ग पर चलते हुए मनुष्य मानवता की महानताओं को अपनाकर अंत में देवत्त्व तक जा पहुँचता है और स्वर्गीय आनंद की परिस्थितियों का रसास्वादन करता है। इसके विपरीत प्रेयमार्ग पर चलते हुए मनुष्य अपने पद से च्युत होकर पशुता का वरण करता है और अंत में असुरता की स्थिति में पहुँचकर नरक जैसी अशांत एवं क्षुब्ध मनोदशा के उद्वेगों में झुलसाने लगता है।

अनिच्छापूर्वक अभिगमन

यह जानते हुए भी कि स्वार्थ का परिणाम दुःख और परमार्थ का परिणाम सुख होता है, लोग आमतौर पर यही गलती दुहराते रहते हैं कि परमार्थ का मार्ग छोड़कर स्वार्थ के मार्ग पर चलने लगते हैं। श्रेय को अपनाने की इच्छा रहते हुए भी प्रेय की ओर ही मन लगता है और मन में संकोच, लज्जा, भय एवं आशंका रहते हुए भी पैर उसी दिशा में बढ़ने लगते हैं। सुख का मार्ग छोड़कर दुःख की ओर, स्वर्ग का मार्ग छोड़कर नरक की ओर चलने के लिए जो शक्ति विवश कर देती है, उसी का नाम माया या अविद्या है। धर्मग्रंथों में माया एवं अविद्या की बड़ी निंदा की गई है और इनके चंगुल में फँसे हुए जीव को भर्त्सना की दृष्टि से देखा गया है। यह विचारणीय बात है कि सत्पुरुषों से, सद्ग्रंथों से तथा अपने अनुभव से व्यक्ति पुण्य की महत्ता और पाप की हानियों को जानता हुआ भी जिस माया या अविद्या की प्रेरणा से कुपथगामी बनता है, वस्तुतः वह है क्या वस्तु? और उसकी इतनी प्रबल प्रचंडता का कारण क्या है?

अनीति की विशेषता यह है कि उससे तुरंत लाभ होता है, किंतु पीछे कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं। इसके विपरीत नीति का मार्ग ऐसा है, जिस पर चलने वाले को आरंभ में तप-त्याग करना पड़ता है और पीछे देर से उसके लाभ दृष्टिगोचर होते हैं। अदूरदर्शी लोगों को तुरंत का लाभ दिखाई पड़ता है और देर के लाभ तक ठहर सकने योग्य धैर्य एवं साहस नहीं होता। प्रलोभनों पर वे फिसल पड़ते हैं और उसी कुचक्र में अपना भविष्य अंधकारमय बना लेते हैं। आज के, अभी के, क्षणिक लाभ की ओर इतना अधिक आकर्षित हो जाना कि भविष्य में उसके दुष्परिणामों का ध्यान ही न रहे, इसी का नाम माया या अविद्या है। दूसरे शब्दों में इस मूर्खता को—अदूरदर्शिता, अविवेक, अधीरता या विचारहीनता भी कह सकते हैं।

भवसागर और मायानगरी

इस दुनिया को आध्यात्मिक भाषा में ‘भवसागर’ कहते हैं। मायानगरी या जादूनगरी भी इसे कहा जाता है। भवसागर इसलिए कहा गया है कि वह घड़ियालों और मगरमच्छों से भरा पड़ा है, जो दाँव लगते ही शिकार को निगल जाते हैं। मायानगरी इसलिये कहा गया है कि यहाँ कदम-कदम पर मनुष्य को पहेलियाँ बूझनी पड़ती हैं। भूल-भुलैयों के महल में फँसे हुए मनुष्य को बाहर निकलने के लिए सही रास्ता ढूँढ़ने में अपनी पूरी बुद्धि का प्रयोग करना पड़ता है, तब कहीं उसे रास्ता मिलता है। यदि थोड़ा भी असावधान रहे ,उपेक्षा करे तो उसी में भटकते फिरना पड़ता है और बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिलता। घड़ियालों और मगरमच्छों से भरे तालाब में स्नान करने वाले को हर घड़ी सतर्क रहना पड़ता है, जरा-सी असावधानी उसके लिए प्राणघातक दुष्परिणाम उत्पन्न कर सकती है। जादू की नगरी इसलिए कहा जाता है कि यहाँ हर चीज के दो रूप हैं— बाहर कुछ और भीतर कुछ। इसमें वास्तविकता क्या है, यह जाने बिना धोखा होने का बड़ा डर रहता है। बाजीगर मिट्टी का टुकड़ा लेकर उसे जादू से मिठाई बना देता है, किसी वस्तु को किसी रूप में दिखा देता है, इसमें वह “नजर बाँध देने” का जादू करता है। आँखें वास्तविकता को समझने में धोखा खाती रहती हैं और कुछ-का-कुछ दिखाई देता रहता है। जादूगर दर्शकों की मूर्खता पर मन-ही-मन मुस्कराता रहता है।

जादू के महल और धोखाधड़ी

पांडवों का एक ऐसा महल था, जिसमें जल के स्थान पर थल और थल के स्थान पर जल दिखाई पड़ता था। कौरव एक दिन वहाँ गए तो वह भी धोखा खा गए। द्रौपदी इस पर हँस पड़ी और यही हँसी अंत में महाभारत का कारण बनी। इस मायानगरी दुनिया का सारा महल ही जल को थल और थल को जल दिखा देने वाला बना खड़ा है। जिसमें पग-पग पर भ्रमित होने वाले हम कौरवों का उपहास हो रहा है। रूप और सौंदर्य, जिसके ऊपर लोग मरे-कटे जा रहे हैं, चमड़ी की चमकमात्र हैं। इस चमकती पन्नी को मल-मूत्र के हाड़माँस के दुर्गंधभरे घड़े के ऊपर चिपकाकर लोगों को कितने बड़े भ्रम में डाल रखा है, बाजीगरी की इस चतुराई को देखकर हैरत में पड़ना पड़ता है।

दौलत का व्यर्थ अहंकार

धन— चाँदी, ताँबे और कागज के टुकड़े, नोटों की अपनी एक निराली दुनिया है। वे एक हाथ से दूसरे में और दूसरे से तीसरे में मस्ती के साथ घूमते रहते हैं। देर तक वे कहीं भी नहीं ठहर सकते। फिर भी लोग सोचते रहते हैं कि हमारे पास इतना धन जमा है, इतने धन के स्वामी हैं। तिजोरी में, बैंक में धन रखा हो या सरकारी खजाने में जमा हो या अपने बाद उस पर किसी और का कब्जा हो जाए, इसमें अपना क्या बनता-बिगड़ता है? सिक्के हमारे मरने-जीने की परवाह किए बिना अपनी व्यवस्था के अनुसार घूमते फिरते रहते हैं, पर लोग उनके साथ न जाने क्या-क्या अरमान संजोए बैठे रहते हैं। जमीन-जायदाद, सोना, चाँदी तथा अत्यावश्यक वस्तुएँ एक की मालिकी में से दूसरे के हाथ जाती रहती हैं, वह वस्तुएँ ज्यों की त्यों रहती हैं, स्वामित्व जताने वाले एक के बाद दूसरे-तीसरे आते हैं और मरते-खपते चले जाते हैं। जाने वालों में से हर एक खाली हाथ प्रयाण करता है, फिर भी जिसे मरने वाले का उत्तराधिकार मिला है, वह सोचता है कि मुझे दौलत मिल गई। दौलत हँसती है कि, "बेवकूफ, तू जितना सदुपयोग कर ले उतना तेरा लाभ है, जमा हुई संपदा तो तीसरे, चौथे, पाँचवें, छठवें को उसी क्रम से हस्तांतरित होती रहेगी, जैसी तुझे हुई है।" दौलत मुस्कुराती है, पर बेचारा भोला दर्शक यह सब समझ नहीं पाता और अपने धनी होने के अभिमान में इतराता फिरता है। जादू की नगरी में लोग व्यर्थ ही बावले बने फिरते हैं। काम और लोभ के वशीभूत होकर वासना और तृष्णा से ग्रसित होकर हम क्या-क्या अनर्थ नहीं करते?

प्रवंचना और विडंबना

होली के दिनों में रास्तागीरों का मजाक बनाने के लिए कई मनचले लोग ऐसा करते हैं कि सड़क पर रुपया, अठन्नी आदि कोई सिक्का मजबूत मसाले से चिपका देते हैं। रास्तागीर उसे देखता है और ललचाता है। लोगों की आँख बचाकर उस पड़े हुए सिक्के को उठा ले जाने का उपक्रम करता है। उठाने की कोशिश करता है तो वह चिपका हुआ सिक्का उखड़ता नहीं। इस लालच पर व्यंग्य करते हुए वे मनचले लोग हँस पड़ते हैं, जिनने यह चालाकी कर रखी थी। बेचारा रास्तागीर अपना उपहास सहता हुआ सिटपिटाता मुँह लेकर खीजता हुआ चला जाता है। ऐसा ही मजाक हम सबके साथ यह जादू की दुनिया करती रहती है। रूप और सौंदर्य पर मोहित होकर मनुष्य विकारग्रस्त होता है, इस विकार में उसे मिलता कुछ नहीं नष्ट बहुत होता है। मानसिक शांति, स्वास्थ्य, पौरुष एवं भविष्य सभी कुछ दाँव पर लगाकर वह इस रूप-सौंदर्य को हड़पना चाहता है, हड़पने में कुछ नहीं आता। केवल अपना जीवन इस पर निचुड़ जाने की हानि उठाकर भोला दर्शक हाथ मलकर पछताता रह जाता है। धन की भी यही बात है। जमीन, तिजोरी, बैंक और कारखाने में अपनी समझी जाने वाली दौलत को छोड़कर लोग खाली हाथ चले जाते हैं।

छोटा लाभ बड़ी हानि

वह माया, जिसमें भ्रमित होकर मनुष्य तुरंत के छोटे से लाभ के लिए भविष्य को अंधकारमय बना लेता है, कोई बाहरी शक्ति या देवी दानवी नहीं है, मनुष्य की अदूरदर्शिता ही है। दूरगामी परिणामों की चिंता न करते हुए, तुरंत का लाभ सोचने से मनुष्य दुष्कर्म करने पर उतारू होता है, किंतु यदि उसका सोचना इस ढंग से हो कि मुझे स्थाई शांति किस प्रकार मिलेगी तो उसका दृष्टिकोण बिलकुल दूसरे ही ढंग का हो जाएगा, तब वह उस तरह सोचेगा जैसा बुद्धिमान सोचते हैं और वैसा करेगा, जैसे भले मानस करते हैं। चरित्र का आधार यह दूरदर्शितापूर्ण दृष्टिकोण ही है। संसार की सुख-शांति इसी बुद्धिमत्ता के विकास पर निर्भर है। युगनिर्माण योजना के अंतर्गत सभ्य समाज की रचना का जो हमारा लक्ष्य है, उसकी पूर्ति का प्रधान अवलंबन यह है कि मनुष्य दूरदर्शी बने, आज का कार्य करने से पूर्व कल की संभावनाओं का ध्यान रखे। विवेक से काम ले। वह करे जो करने योग्य हो। वह सोचे जो सोचने योग्य हो। जो उचित जँचे, उसे अपनावे और जो अनुचित दिखाई देता है, उससे अलग हो जावे।

अनीति के मार्ग पर दिखाई देने वाले प्रलोभनों की ओर दौड़ने वाले मन को कड़ी लगाम लगाकर रोक सकने लायक वीरता जिसमें होगी, वही योद्धा जीवन-संग्राम में विजय प्राप्त करेगा। लक्ष्य की पूर्णता का श्रेयाधिकारी वही बन सकेगा, जो भविष्य के सुंदर स्वप्नों का संसार बनाने के लिए आज कष्ट उठाने को तैयार है, वही तपस्वी अपनी साधना का वरदान कल उपलब्ध करेगा। जिसने आज नीरस दीखने वाले कार्यक्रम को भी, कठिन दीखने वाले मार्ग को भी, भविष्य की उज्ज्वल आशाओं को ध्यान में रखते हुए अपनाने का साहस दिखाया, वही वस्तुतः इस संसार में धीरवान महापुरुष कहलाने का अधिकारी बन सकता है। ऐसे धीर-वीर लोगों के द्वारा ही यह धरती शोभा को प्राप्त करती है, उन्हीं के प्रताप से यह लोक स्वर्गलोक बनता है। वे ही अपने पराक्रम से युग का परिवर्तन एवं निर्माण किया करते हैं। समाज की रचना के ईंट-चूने का काम यह धीरे-धीरे ही पूरा किया करते हैं। आज उन्हीं को ढूँढ़ा जाना और उन्हीं का निर्माण किया जाना आवश्यक प्रतीत हो रहा है।

ओछापन और महानता

ओछीबुद्धि होने के कारण ही किसी व्यक्ति को ओछा कहा जाता है। यों लंबाई-ऊँचाई में तो बहुत थोड़ा-थोड़ा अंतर लोगों में देखा जाता है, पर विवेक की दृष्टि से उनमें आकाश-पाताल का अंतर रहता है। कोई वामन अंगुल के बौने जैसे होते हैं तो कोई भूधराकार हनुमान जैसे लगते हैं। यह अंतर शारीरिक नहीं, मानसिक ही होता है। ओछे मनुष्य अपना आज का संकुचित लाभ ही सदा ध्यान में रखते हैं और इसके लिए दूसरों का कितना ही बड़ा अहित होता हो तो उसकी परवाह नहीं करते। जिन्हें दूरदर्शिता प्राप्त है, जिनका विवेक जागृत हो गया है, वे महान कहलाते हैं, उनकी दृष्टि सुविस्तृत दूरी तक देख सकने में समर्थ होती है। वे सबके हित में अपना हित समझते हैं। सबके सुख में अपना सुख अनुभव करते हैं और स्वार्थ-साधन करके अपनी तोंद बढ़ाने में वे जोंक का उदाहरण नहीं बनते, वरन खिलते हुए पुष्प की तरह अपना सारा सौरभ दूसरों की सुख-शांति के लिए बिखेरते हुए अपना यशशरीर अमर छोड़कर इस संसार में से हँसते-हँसाते हुए विदा होते हैं। जीवन की यही सार्थकता है और इसे प्राप्त वे ही कर पाते हैं, जो महान हैं— जिनका दृष्टिकोण विशाल एवं महान है। माया से विरत, विवेकशील और ज्ञानी-विज्ञानी वे ही हैं, जिनने ओछेपन को ठुकरा देने और महानता को छाती पर धारण करने का साहस दिखाया। वीरों की पूजा सर्वदा-सर्वत्र होती है। भगवान राम और कृष्ण भी वीरता के कारण पूजे जाते हैं। भगवान के दरबार में पग-पग पर फिसलने वाले लुँज-पुँज लोगों के लिए नहीं, केवल उनके लिए सम्मान का स्थान मिल सकता है, जो अंगद की तरह पैर जमाकर अपनी महानता, वीरता एवं उत्कृष्टता का प्रमाण प्रस्तुत कर सकें। मुक्ति तो उनके लिए एक तुच्छ उपहारमात्र है, स्वर्ग तो उन्हें अनायास ही मिलने वाला है।

प्रलोभन और संयम

काँटे की नोंक में लगे हुए जरा से आटे का लोभ मछली संवरण नहीं कर पाती और अपनी जान से हाथ धो बैठती है। जाल में बिखरे हुए जरा से दानों की उपेक्षा यदि भोली चिड़िया कर सकी होती, तो फड़ाफड़ा-फड़ाफड़ाकर मरने की आपत्ति से वह बच सकती थी। दीपक के रूप पर मुग्ध होकर आगे-पीछे न सोचने वाला पतंगा आखिर पाता क्या है? खुद भी जल मरता है और दीपक को भी बुझा देता है। रस का लोभी भौंरा, कमल की पंखुड़ियों में बंद होकर हाथी का कलेवा बन जाता है। ठग आरंभ में थोड़ा लालच दिखाकर अंत में किसी भोले आदमी को बुरी तरह मूँड़ लेते हैं। यदि इनमें आरंभिक प्रलोभन से बच निकलने के लायक धैर्य रहा होता तो बेचारों की इस प्रकार दुर्गति क्यों होती? जेलखानों में निंदा, घृणा और यातना का जीवन व्यतीत करने वाले लोगों में से अधिकांश वे हैं, जो अपने तात्कालिक लोभ एवं आवेश का संवरण न कर सके और आज जनसमाज से बहिष्कृत स्थिति में दयनीय जीवनयापन कर रहे हैं। नरक की बड़ी जेल में ले जाने वाला भी यह एक ही कारण है, प्रलोभनों में फिसलने से बच सकने लायक धैर्य का अभाव। यदि यह एक कमी लोगों के मनःक्षेत्र में से निकल सके तो निस्संदेह हम में से हर कोई महापुरुष बन सकता है और अपने को आनंदमय स्थिति में रख सकता है। इतना ही नहीं वरन सर्वत्र सुख-शांति का वातावरण उत्पन्न करने में महान योगदान दे सकता है।

विभूतियों के लिए पात्रत्व

भगवान के भंडार में बहुत विभूतियाँ भरी पड़ी हैं, पर वे सबको उसी प्रकार नहीं मिलतीं जिस प्रकार बंदूक का लाइसेंस सरकार हर किसी को नहीं देती। परीक्षा के बाद ही विद्यार्थी को उत्तीर्ण होने का प्रमाणपत्र मिलता है। आग में तपाए जाने के बाद ही स्वर्ण को खरा घोषित किया जाता है। किसान साल भर तक अपने शरीर और धन को मिट्टी में मिलाए रखने के बाद ही फसल की अन्नराशि का अधिकारी बनता है। माली को कितने दिन तक कितने धैर्यपूर्वक पौधों की सेवा करनी पड़ती है, तब वे फल देने वाले विशाल वृक्ष बनते हैं। कागज का महल एक दिन में खड़ा हो सकता है, पर विशाल बाँध बनाने का निर्माण कार्य तो वर्षों में पूरा हो पाता है। चोरी, बेईमानी में अपने व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा बेचकर कुछ छोटा-सा लाभ कभी भी प्राप्त किया जा सकता है, पर महापुरुष, नररत्न और सफल जीवन सत्पुरुष कहलाने की महान सफलता तो पग-पग पर अपनी महानता को सुरक्षित रखने के लिए तप, त्याग करने पर ही प्राप्त हो सकनी संभव होती है।

यहाँ हर श्रेष्ठ व्यक्ति को कठिनाइयों की, असुविधाओं की अग्नि परीक्षाओं में होकर गुजरना पड़ा है। जो विवेक को अपनाए रहता है, प्रलोभनों में स्खलित नहीं होता, और सन्मार्ग से किसी भी कारण कदम पीछे नहीं हटाता, वस्तुतः वही इस भवसागर को पार करता है, वही माया के जादू से अछूता बचा रहता है और उसी का मानव शरीर धारण करना सार्थक होता है। श्रेय का मार्ग महान है। पुण्य-परमार्थ के, श्रेष्ठता और महानता के, धार्मिकता और आस्तिकता के, पुण्य-पथ पर चलना कुछ कठिन नहीं है और इस दिशा में चलते हुए निरंतर प्राप्त होती रहने वाली शांति को उपलब्ध करना भी कुछ कष्टसाध्य नहीं है। आवश्यकता केवल इतनी ही है कि मनुष्य तुरंत के लोभ का त्याग कर दूरवर्त्ती परिणामों पर विचार करे और उसी के आधार पर अपनी गतिविधियाँ विनिर्मित करने के लिए कृतसंकल्प एवं कटिबद्ध हो जावे। दोनों मार्ग सामने खुले पड़े हैं, यह अपनी इच्छा के ऊपर पूर्णतया निर्भर है कि दोनों में से किसी को भी चुन लें। सभ्य समाज की रचना का होना या वर्त्तमान असभ्यता का और भी दिन-दिन अधिक बढ़ते जाना, हमारे इसी चुनाव पर निर्भर है। राजनैतिक वोट तो बार-बार पड़ते रहते हैं, हमें जीवन-लक्ष्य के चुनाव में एक ही बार वोट डालनी है। एक श्रेय, दूसरा प्रेय, यह दोनों ही उम्मीदवार खड़े हैं। यह हमारी अपनी पसंदगी की बात है कि इनमें से किसी एक को वोट देकर उसे विजयी बना दें।


महत्त्वकांक्षाएँ और असंतोष

आज अधिकाधिक सफलता जल्दी से जल्दी प्राप्त करने के लिए हर व्यक्ति लालायित है। यह लालसा इतनी अधिक है कि वह अपनी उचित मर्यादाओं से कहीं अधिक चाहता है, यह नहीं सोचता कि मेरी योग्यता, श्रमशीलता तथा सामर्थ्य की तुलना में जो कुछ मिला हुआ है, वह संतोषजनक है या नहीं? हर व्यक्ति असंतुष्ट दिखाई पड़ता है। इसका कारण एक ही है कि वह, जितना प्राप्त हो चुका है, हो रहा है, उसे अपर्याप्त मानता है और अधिक वस्तुएँ प्राप्त करने के लिए लालायित है। जितनी आकांक्षा करता है, उसकी तुलना में उसे जितना कम मिला हुआ होता है, उतना ही वह दुखी और असंतुष्ट रहता है। असंतोष एक प्रकार का दरद है, जिससे मनुष्य को उसी प्रकार की बेचैनी बनी रहती है, जैसे आँख का दरद, पेट का दरद, कान का दरद, दाढ़ का दरद होने पर होती है। हम अपने चारों ओर ऐसे ही दरदमंदों का समूह इकट्ठा हुआ देखते हैं।

असंतोष से अवनति

उन्नति की आकांक्षा एक बात है और असंतोष बिलकुल दूसरी। उन्नतिशील व्यक्ति आशा, उत्साह, धैर्य और साहस को साथ लेकर प्रसन्न मुखमुद्रा और स्थिर चित्त के साथ आगे बढ़ते हैं। गहरे पानी में उतरते हुए हाथी जिस प्रकार अपना एक-एक कदम बहुत सँभाल-सँभालकर रखता है और जहाँ गड्ढा दीखता है वहाँ से तुरंत पैर पीछे हटा लेता है, उसी प्रकार प्रत्येक उन्नतिशील व्यक्ति सँभल-सँभलकर अपना प्रत्येक कदम आगे बढ़ाता है। स्वस्थ चित्त एवं उद्वेगरहित व्यक्ति ही वर्त्तमान कठिनाइयों का सही कारण ढूँढ़ सकने और उसका उपाय खोज निकाल सकने में समर्थ हो सकता है। उसी की सूझ-बूझ ठीक तरह काम करती है और वही कठिनाइयों और बाधाओं का निराकरण कर सकने में समर्थ होता है और वही प्रतिकूल परिस्थितियों में देर तक दृढ़तापूर्वक खड़ा रह सकता है। जिसमें इतनी दृढ़ता न होगी, वह अधीर व्यक्ति कभी किसी महत्त्वपूर्ण सफलता का अधिकारी न हो सकेगा।

उतावली और जल्दबाजी

उतावले और जल्दबाज, असंतुष्ट और उद्विग्न व्यक्ति एक प्रकार के ‘अधपगले’ कहे जा सकते हैं। वे जो कुछ चाहते हैं, उसे तुरंत ही प्राप्त हो जाने की कल्पना किया करते हैं। यदि जरा भी देर लगती है तो अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और प्रगति के लिए अत्यंत आवश्यक गुण मानसिक स्थिरता को खोकर, असंतोषरूपी उस भारी विपत्ति को कंधे पर ओढ़ लेते हैं, जिसका भार लेकर उन्नति की दिशा में कोई आदमी देर तक नहीं चल सकता। असंतोष एक प्रकार का मानसिक बुखार है। जिस प्रकार बुखार का रोगी शारीरिक और मानसिक दोनों ही दृष्टियों से अशक्त हो जाता है, खड़े होते ही उसके पैर लड़खड़ा जाते हैं, कुछ ही देर पढ़ने, बोलने या सोचने से सिर दरद करने लगता है, उसी प्रकार असंतोष से ग्रसित मानसिक रोगी भी कुछ कर-धर नहीं सकता। उसे कुढ़न ही हर घड़ी घेरे रहती है। क्षुब्ध और उत्तेजित मन से वह अंट-शंट बातें ही सोच सकता है। दूसरों पर दोषारोपण करके अपने द्वेष और क्रोध को बढ़ाते रहना ही उससे बन पड़ता है। अपनी मानसिक स्थिति जिनने इस प्रकार की असंतुलित बना ली है, वे व्यक्ति अपने उद्वेग की उलझन में ही उलझे पड़े रहते हैं। उनकी सारी शक्तियाँ कुढ़न, द्वेष, असंतोष, छिद्रान्वेषण, दोषारोपण, प्रतिशोध, निंदा, ईर्ष्या आदि में ही नष्ट होती रहती हैं। प्रगति के पथ पर बढ़ने के लिए जिन सद्गुणों की आवश्यकता है, वह इन असंतुष्ट व्यक्तियों को तिलांजलि देकर अपने आप पलायन कर जाते हैं और वह अभागा एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा दुर्भाग्य अपने सामने उपस्थित होते देखता रहता है।

तुच्छता से महत्ता की ओर

उन्नति की आकांक्षा एक बहुत ही उचित, स्वाभाविक एवं अध्यात्मिक मनोवृत्ति है। तुच्छता से आगे बढ़कर महत्ता को प्राप्त करना प्रत्येक मानव प्राणी का स्वाभाविक कर्त्तव्य है। जीवन की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए इस प्रकार की अभिलाषा का होना उचित भी है और आवश्यक एवं प्रशंसनीय भी। पर यह आकांक्षा तभी सफल हो सकती है, जब धैर्य, साहस, विवेक और पुरुषार्थ का समुचित सम्मिश्रण उसके साथ हो। प्रसन्न मन और स्थिर चित्त रहना, इस मार्ग पर चलने वाले पथिक के लिए नितांत आवश्यक है। वैज्ञानिक शोध करने वाले शोधकर्त्ता जीवन भर किसी शोध में लगे रहते हैं और एक प्रकार से सफलता नहीं मिलती तो दूसरा-तीसरा मार्ग सोचते हैं, पर लगे उसी कार्य में रहते हैं। धैर्य में रत्ती भर भी कमी नहीं आने देते, असंतोष की एक रेखा भी उनके चेहरे पर नहीं होती। काम को काम समझकर करते रहने को ही वे अपने संतोष का आधार बनाए रहते हैं और वर्षों बीत जाने पर भी यदि सफलता न मिले तो खिन्नता की एक शिकन माथे पर नहीं पड़ने देते। यही स्थिति जिस किसी के मनःक्षेत्र की होगी, केवल वही इस संसार में कोई महत्त्वपूर्ण कार्य कर सकेगा, केवल वही कोई बड़ी सफलता प्राप्त कर सकेगा।

कुढ़न की ओछी आदत

असंतुष्ट व्यक्ति एक ओछा व्यक्ति है, जो प्रगति-पथ पर बढ़ने की तैयारी में अपनी शक्ति को लगाने की अपेक्षा उसे कुढ़न में नष्ट करता रहता है। इस संसार की रचना कल्पवृक्ष के समान नहीं हुई है कि जो कुछ हम चाहें वह तुरंत ही मिल जाया करे। यह कर्मभूमि है, यहाँ हर किसी को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है, अपनी योग्यता और विशेषता का प्रमाण प्रस्तुत किए बिना कोई किसी महत्त्वपूर्ण स्थान पर नहीं पहुँच सकता। यहाँ हर किसी को परीक्षा की अग्नि में तपाया जाता है और जो इस कसौटी पर खरा उतरता है, उसी को प्रामाणिक एवं विश्वस्त माना जाता है। ऐसे ही लोगों का दुनिया सहयोग करती है और उसे ही प्रगति के प्रवेश द्वार में घुसने की अनुमति प्रदान करती है। कुढ़न और असंतोष किसी भी व्यक्ति के कुपात्र होने का सबसे बड़ा प्रमाण हैं। कुपात्रों का, टूटे और गंदे बरतनों का स्थान, सदा कूड़े के ढेर में रहा है। हम भी यदि अपनी कुपात्रता सिद्ध करेंगे, तो सम्मान के स्थान पर नहीं पहुँचने दिए जाएँगे, कूड़े के ढेर में ही पड़े रहेंगे।

संतोष और उल्लास

इस संसार का यह नियम है कि हँसमुख, प्रसन्नचित्त, आशावादी, उत्साही और संतुष्ट व्यक्ति के पीछे-पीछे लोग फिरते हैं। क्योंकि हर व्यक्ति अपने जीवन में कुछ दुःख और चिंता छिपाए बैठा रहता है, वह अपना मन हलका करने के लिए ऐसा सहारा ढूँढ़ता है, जहाँ उसके घावों को कुरेदा न जाए, मरहम लगे। मनोरंजन के लिए लोग इसीलिए अपना बहुत-सा समय और धन खरच करते हैं। सिनेमा, खेल, तमाशे, मेले-ठेले, सैर, यात्रा आदि मनोरंजनों की आवश्यकता इसी दृष्टि से मानी जाती है। उनके दूसरे लाभ भी हो सकते हैं पर प्रधान उद्देश्य यही रहता है। यही आवश्यकता लोग उस व्यक्ति से पूरी करना चाहते हैं जो संतुष्ट और प्रसन्न दीखता है। खिले हुए गुलाब के चारों ओर भौंरे इसलिए मंडराते रहते हैं, क्योंकि फूल अपने आप में सर्वांगपूर्ण, विकसित, प्रसन्न और सफल दिखाई देता है। सूखे, मुरझाए, कुचले हुए और सड़े-गले फूल पर भौंरा तो क्या, कोई मक्खी भी नहीं बैठती, उसे उपेक्षा, उपहास और तिरस्कार के गर्त्त में फेंक दिया जाता है।

मुँह फुलाए, रूठे बैठे रहने वाले और चिड़चिड़ाते-बड़बड़ाते रहने वाले नर−नारी अपने समीपवर्त्ती लोगों की सहानुभूति खो बैठते हैं। उनसे सब लोग डरने और कतराने लगते हैं। चेचक और हैजा के रोगी से सब कोई अपना बचाव करते हैं कि कहीं यह छूत हमें भी न लग जाए। असंतुष्ट और खिन्न मनुष्य से झूठी सहानुभूति कोई भले ही प्रकट कर दे, वस्तुतः मन-ही-मन उससे घृणा करते हैं और बचने की कोशिश करते हैं। कुढ़ने वाले व्यक्ति की कष्टकथा सुनकर कौन आदमी अपने दुःख को बढ़ाना चाहेगा? यहाँ तो सबको मनोरंजन की चाह है, हँसोड़ और प्रसन्नमुख व्यक्ति की तलाश है। उसके समीप रहकर लोग अपना मनोरंजन करना चाहते हैं। मनहूस-सी शक्ल बनाए बैठे रहने वाले और दुःख-दुर्भाग्य का रोना रोते रहने वाले लोगों के पास अपना मन क्षुब्ध करने के लिए भला कौन तैयार होगा? संत और महापुरुषों की बात दूसरी है, वे दुखियों के लिए अपना प्राण भी दे सकते हैं, पर सामान्य लोग तो उनसे बचने की ही कोशिश करेंगे।

सद्गुणों का प्रतिफल

उन्नति कोई उपहार नहीं है, जो छत फाड़कर अनायास ही हमारे घर में बरस पड़े। उसके लिए मनुष्य को कठोर प्रयत्न करने पड़ते हैं, प्रतीक्षा करनी पड़ती है, और एक मार्ग अवरुद्ध हो जाए तो दूसरा सोचना पड़ता है। गुण, योग्यता और क्षमता ही सफलता का मूल्य है। जिसमें जितनी क्षमता होगी, उसे उतना लाभ मिलेगा। कभी-कभी इसके अपवाद भी हो सकते हैं, पर आमतौर से होता यही है कि उत्कृष्टता को प्राथमिकता मिलती है। दूध को गरम करते ही उसका अच्छा अंश मलाई के रूप में ऊपर तैरने लगता है। जिन व्यक्तियों का व्यक्तित्व जितना सुव्यवस्थित होता है, उन्हें उतनी ही आसानी से , उतनी ही बड़ी महत्ता एवं सफलता उपलब्ध हो जाती है। खेलकूद की प्रतियोगिताओं में जो खिलाड़ी अधिक सामर्थ्यवान होते हैं, वे ही बाजी जीतते और पुरस्कार पाते हैं। परीक्षा में अच्छे नंबर लाने वाले अपनी प्रतिभा का उचित परिणाम अनायास ही प्राप्त कर लेते हैं। गुण, कर्म, स्वभाव को सुव्यवस्थित बनावें तो असंतोष के कारणों का स्वयं ही समाधान होता चलेगा।

गरीबी धन की नहीं मन की

गरीबी दुनिया में वस्तुतः इतनी अधिक नहीं है जितनी कि दिखाई पड़ती है। मनुष्य प्रचुर धन का स्वामी बनने के, अंततः ऐश्वर्य का सुखोपभोग करने के सपने देखा करता है, अपने से बड़े लोगों के साथ अपनी तुलना करके खिन्न होता है कि मैं भी इतना ही बड़ा क्यों न हो जाऊँ? बस, ईर्ष्या और तृष्णा की आग प्रचंड वेग से उसके मन में जलने लगती है। कपड़ों में लगी आग से जलता हुआ मनुष्य कोई और उपाय न देखकर कुँए में कूद पड़ने को भी इस आशा से तैयार हो जाता है कि मेरी जलन मिट जाएगी। इसी प्रकार जिसका मन महत्त्वाकांक्षाओं की तृष्णा में बुरी तरह जल रहा है, उसके लिए कुकर्म के कुँए में कूद पड़ना भी कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।

मनुष्य अनेकों वस्तु चाहता है। अपने से बड़े और सुखी-संपन्न स्थिति के लोगों को देखकर यह इच्छा उत्पन्न होती है कि हमारे पास भी इतना ही वैभव और ऐश्वर्य क्यों न हो? इस प्रकार की तृष्णा ही असंतोष का कारण देखी जाती है। हमें चाहिए कि अपने से नीचे गिरे हुए, दुखी और गरीबों से अपनी तुलना करते हुए संतोष की साँस लें कि परमात्मा ने हमें अनेकों से कमजोर भले ही बनाया हो, पर असंख्यों से ऊँचा भी रखा है। असंतोष के यदि दस कारण जीवन में होते हैं तो सौ कारण संतोष के भी होते हैं। जो कुछ संतोष के कारण हमें प्राप्त हैं, उन पर विचार करें और उनसे अपना चित्त प्रसन्न रखने का प्रयत्न करें तो दृष्टिकोण के बदलते ही मन की खिन्नता का प्रत्यावर्त्तन प्रसन्नता और उल्लास में हो जाता है। हर इच्छा किसी की भी पूरी नहीं हुई। सबको, जो कुछ है, उसी पर सबर करके अधिक प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहना पड़ता है। यही क्रम शांतिदायक है, इसी को अपनाकर हम संतोष के अधिकारी बन सकते हैं।

अमीरी नहीं महानता

महत्वाकांक्षा गुणों की होनी चाहिए। हम दूसरों की अपेक्षा अधिक विद्वान, अधिक स्वस्थ, अधिक संयमी, अधिक सेवाभावी, अधिक सभ्य, अधिक सहिष्णु अधिक धार्मिक बनें, यह प्रतिस्पर्धाएँ यदि चलने लगें तो व्यक्ति का पतन नहीं, उत्थान ही होगा। तुच्छ कीट-पतंग की तरह निम्न श्रेणी का जीवनयापन न करके हम नररत्नों की श्रेणी में अपना नाम अंकित करें, महापुरुषों जैसे आदर्श उपस्थित करें! जीवन का लक्ष्य पूर्ण करके जीवनमुक्ति का आनंद प्राप्त करें— ऐसी महत्वाकांक्षाएँ यदि मन में जागृत रहें और उनके लिए हम प्रयत्न करें तो उसका प्रतिफल ऐसा हो सकता है, जिसके आधार पर सभ्य समाज की रचना और युग-निर्माण का उद्देश्य पूर्ण हो सके।


वित्तेषणा की डाकिन

धन के संबंध में असंतोष लोभ बनकर फूटता है। वासना का असंतोष काम कहलाता है। स्वामित्त्व का असंतोष मोह कहलाता है। अहंकार की पूर्ति में कहीं त्रुटि रह जाने का असंतोष क्रोध कहलाता है। मानसिक शत्रुओं का, पाप एवं दुष्कर्मों का सारा परिवार असंतोष से ही अपना पोषण पाता है। परिवारों का मधुर मेल-मिलाप इसी के कारण नष्ट होता है। दांपत्ति जीवन की प्रेम प्रतीति में पलीता लगाने वाला यही दुष्ट है। शांति और प्रेम के साथ मधुर जीवनयापन करते हुए आनंद की सरिता बहाने और अपना तथा दूसरों का कल्याण करने में संलग्न होने की अपेक्षा वैभव इकट्ठा करने की हविस में देश-विदेश मारे-मारे फिरने और प्रेत पलीत की तरह निरंतर व्यस्त, व्यथित रहने में यह असंतोष ही एकमात्र कारण हो सकता है।

असंतोष को प्रगति का चिह्न मानना सर्वथा भूल है। उससे आकांक्षाओं को उत्तेजना तो अवश्य मिलती है, पर उनकी पूर्ति कदापि नहीं हो सकती। कोई महत्त्वपूर्ण सफलता बिना व्यक्तित्त्व के आवश्यक गुणों में अभिवृद्धि किए कदापि संभव नहीं हो सकती और इन गुणों का बढ़ाना शांत चित्त, आत्मनिरीक्षण, आवश्यक धैर्य और निरंतर अभ्यास से ही संभव है। इन्हें बढ़ा सकना उद्विग्न असंतोषी के लिए किस प्रकार शक्य हो सकता है? वह बावला तो आज ही, अभी ही, सब कुछ पाने की तृष्णा में सब पर हावी होने का उपक्रम बनाए रहता है, उसे इतनी फुर्सत कहाँ है, जो आत्मनिरीक्षण करे और अपने अंदर उन महापुरुषों जैसे गुणों को बढ़ावे, जिनके आधार पर महान कार्यों की पूर्ति हुआ करती है और मनुष्य उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचा करता है।

तीन एषणाएँ

असंतोष का असुर तीन रूप बनाकर अपनी मायावी दुष्टता के साथ हमारे सामने प्रस्तुत होता रहता है और प्रेम तथा आनंद के साथ जीवनयापन कर सकने वाली सहनशीलता में पलीता लगाता रहता है। (1) वित्तेषणा (2) पुत्रेषणा (3) लोकेषणा— असंतोष के यही तीन स्वरूप हैं। धन, वासना और अहंता की तृष्णा जब अमर्यादित हो उठती है तो उसे एशणा कहा जाता है। उचित प्रयत्न के साथ, उचित आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए, उचित रीति से धन कमाया जाना उचित है, यह प्रशंसनीय और आवश्यक भी है, क्योंकि इसके बिना अपने शरीर और परिवार का निर्वाह नहीं हो सकता। जिन्होंने गृहस्थ धर्म अपना लिया है और विवाहित जीवनयापन कर रहे हैं, उनका उचित मर्यादा के अंतर्गत संतानोत्पादन की दृष्टि रखकर कामोपभोग भी उचित है। अपने पीछे अपने स्मारक के रूप में समाज के श्रेष्ठ नागरिकों को श्रद्धांजलि अर्पित करके जाना ही संतानोत्पादन का उद्देश्य है। कामसेवन उसका एक विनोद भरा शुभारंभमात्र है।

हम शुभकार्य करके दूसरों की दृष्टि में अपना सम्मान स्थिर करें और अपने आत्मगौरव के अनुरूप सेवा और सदाचार भरा उत्कृष्ट जीवनयापन करते हुए श्रद्धा के भाजन बनें, यह यशस्वी होने की आकांक्षा भी उचित है, क्योंकि इसी से प्रेरित होकर मनुष्य कष्टसाध्य शुभकर्मों को करने के लिए तैयार होता है। पर यह तीनों ही आवश्यकताएँ पूर्ण कर सकना असंतोष और अधीरता से संभव नहीं। इससे तो मनुष्य मर्यादाएँ छोड़कर उच्छृंखलतापूर्वक अनुचित मार्ग अपना लेता है।

औचित्य और मर्यादा

धन, वासना और अहंता की उचित और व्यवस्थित प्रगति तो विवेक एवं दूरदर्शिता के आधार पर ही संभव हो सकती है। इसके लिए यह आवश्यक है कि हम आज की स्थिति पर संतोष अनुभव करते हुए मन को प्रसन्नता से, आशा से, उत्साह से परिपूर्ण रखें। जिससे प्रगति का कठिन मार्ग पार करते हुए हम दिन-दिन ऊँचे उठ सकने की स्थिति को प्राप्त कर सकें। असंतुष्ट व्यक्ति एक प्रकार का उन्मत्त होता है जो स्वयं परेशान रहता है और दूसरों को परेशान करता है। परिस्थितियों के साथ समझौता करके ही इस संसार में सबको काम चलाना पड़ता है। परिस्थितियों को अपने अनुरूप ढालने में लगा रहना चाहिए, पर साथ ही अपने को भी परिस्थितियों के अनुरूप ढालना चाहिए।

हमें तीनों एशणाओं से बचते हुए आनंद-उल्लास का, प्रेम और संतोष का नैतिक जीवन व्यतीत करने की ही इच्छा करनी चाहिए। बड़ा आदमी बनने की महत्त्वाकांक्षा वाले व्यक्ति इस संसार में अत्यधिक हानिकारक सिद्ध होते हैं। आततायी उपद्रवकारियों की तरह वे दूसरों को पददलित करते हुए उनकी लाशों पर ही चढ़कर बड़े बन पाते हैं। इसलिए भौतिक विभूतियों की तृष्णा को अध्यात्मवाद की दृष्टि से सदा ही हेय माना जाता रहा है। उसे रोकने और नियंत्रित रखने के लिए पग-पग पर शिक्षण दिया जाता रहा है। समाज का संतुलन महत्त्वाकांक्षी लोग ही बिगाड़ते हैं, इसलिए इन मानसिक रोगियों से ऐसे ही सतर्क रहना चाहिए, जैसे ईंट मारने वाले पागलों से बचा जाता है।

धन की मृगमरीचिका

आज धन के लिए हर व्यक्ति प्यासा-सा फिरता है। धन, अधिक धन, और अधिक धन यह एक ही पुकार हर दिल और दिमाग में से उठती सुनाई देती है। धर्मध्वजी संत-महंतों से लेकर जेबकतरे और चोर-डाकुओं तक हर वर्ग के लोग धन की आकांक्षा से अपने-अपने चरखे चलाते रहते हैं। विचारणीय बात है कि क्या धन की उतनी ही आवश्यकता है, क्या गरीबी इस सीमा तक पहुँच गई है कि मनुष्य को निरंतर धन के लिए उद्विग्न हुए बिना काम न चले? बात ऐसी बिलकुल भी नहीं है। भगवान ने इतनी वस्तुएँ और साधन-सामग्री इस धरती पर पहले से ही पैदा कर रखी है कि मिल-बाँटकर मनुष्य अपना गुजारा कर सके और शांति और आनंद के साथ हिल-मिलकर प्रेमपूर्वक जीवनयापन करते हुए लक्ष्य प्राप्ति के लिए अग्रसर हो सके।

रोटी, कपड़ा और मकान मनुष्य जीवन की प्रधान भौतिक आवश्यकताएँ हैं। यह आवश्यकताएँ इतनी छोटी और थोड़ी हैं कि बड़ी आसानी से थोड़े ही समय के उचित श्रम में उन्हें पूरा कर सकते हैं। गरीब कहे जाने वाले लोग भी इन तीनों आवश्यकताओं को पूरा कर लेते हैं और संतोषपूर्वक हँसते-खेलते जीवन व्यतीत करते रहते हैं। इसके विपरीत वे लोग हैं, जिनके यहाँ सब कुछ होते हुए भी दिन-रात धन की हाय-हाय लगी रहती है। अशांति, बेचैनी, चिंता और परेशानी से रहित जिनका एक क्षण भी व्यतीत नहीं होता। ऐसे लोग वस्तुतः बड़े दयनीय हैं। बेचारे न जीवन का मूल समझ सके और न उसका लाभ प्राप्त कर सके। इन अभागों की दुर्दशा पर केवल दुःख के आँसू ही बहाए जा सकते हैं। असंतोष की आग में जलते रहने वाले ये अमीर वस्तुतः विशाल अस्पताल के कीमती पलंगों पर पड़े हुए वे रोगी हैं, जो आग से झुलसे हुए हैं, जिनके बाहर और भीतर आग ही, जलन-ही-जलन पीड़ा दे रही है। कीमती इमारत एवं बहुमूल्य पलंग का क्या सुख इन बेचारों को मिल सकेगा?

सादगी का मितव्ययी जीवन

भारत गरीब देश है, यहाँ हर आदमी की औसत आमदनी बहुत थोड़ी है। हमारा उत्पादन कम है। योग्यता और क्षमता भी स्वल्प है। ऐसी दशा में राष्ट्रीय आय का स्वल्प होना स्वाभाविक है। इसलिए हममें से हर एक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि उतना ही खरच अपने ऊपर करे, जितना कि मध्यम वर्ग के भारतीय नागरिकों को अपने ऊपर करना उचित है। यदि कुछ लोग अपने ऊपर अधिक खरच करेंगे, अधिक जमा करने की सोचेंगे तो उनके कार्यों से दूसरों को उतना ही अभावग्रस्त रहना पड़ेगा। एक ऊँची मीनार खड़ी करने पर जमीन में उतना ही गहरा गड्ढा कहीं-न-कहीं करना पड़ता है। एक व्यक्ति धनी तभी हो सकता है, जब दूसरे अनेकों के हिस्से की राष्ट्रीय आय का भाग अपने नीचे दबा लें। इस प्रवृत्ति के फलस्वरूप दूसरे अनेकों को अभावग्रस्त एवं गरीब रहने के लिए विवश होना पड़ता है। इसलिए संग्रह की, विलासिता की प्रवृत्ति को हेय माना गया है। अध्यात्मवाद के अपरिग्रह से लेकर भौतिकवादी साम्यवाद तक सभी न्यायसंगत दृष्टिकोणों का निष्कर्ष एक ही है कि हर व्यक्ति को उतनी ही सुख-सुविधा प्राप्त रहे, जितनी कि उस समाज के मध्यमवर्गीय नागरिकों को प्राप्त होती है।

गरीब और अमीर के बीच का अंतर

वर्त्तमान अर्थतंत्र के कारण यदि किसी व्यक्ति की आमदनी अधिक होती है तो उसका कर्त्तव्य है कि उसे समाज को पुनः दान आदि के रूप में लौटा दे। हाथ में पाँच उँगलियाँ होती हैं, उनमें से कुछ छोटी कुछ बड़ी भी हैं। योग्यता और पुरुषार्थ के आधार पर यह अंतर मनुष्य की सुख-सुविधाओं में भी रह सकता है, पर यह होना उतना ही चाहिए, जितना कि उँगलियों की लंबाई में होता है। यह अनुपात दस-पाँच प्रतिशत से अधिक नहीं है। इससे अधिक अंतर यदि लोगों की आर्थिक स्थिति में रहेगा तो उससे समाज में अशांति ही उत्पन्न होगी। उससे ईर्ष्या और अनाचार का ही जन्म होगा। यह एक तथ्य है, जिसे हम चाहें विवेक उदारता और न्याय की दृष्टि से अपनाकर अपनी महानता का परिचय दे सकते हैं, अन्यथा आज नहीं तो कल बलपूर्वक ऐसा करने के लिए विवश किया जाने लगेगा।

गरीब और अमीर के बीच इतना अंतर किसी भी प्रकार स्थिर नहीं रह सकता, जितना कि आज देखा जाता है। संत विनोबा के भूदान आंदोलन से लेकर सरकार की करनीति तक धीरे-धीरे सब ओर से वही प्रयत्न चल रहे हैं कि व्यक्ति अधिक संपन्न न रहने पावे। इस युगवाणी को हम विवेकपूर्वक सुन लें और अमीरी की महत्त्वाकांक्षाएँ छोड़कर मध्यवर्ती जीवनयापन करने की बात तक अपने को सीमित कर लें तो हमारे असंतोष का एक बहुत बड़ा कारण अनायास ही समाप्त हो सकता है। गुजर के लायक हम सब कमाते भी हैं, प्रयत्न करके इसे कुछ और भी बढ़ा सकते हैं। अमीरी के सपनों का नशा, यदि हमारे मस्तिष्कों पर से उतर जाए तो स्वस्थ, सुविकसित एवं शांतिमय जीवनयापन करने के लिए हमें एक नई दिशा मिल सकती है।

फिजूलखरची से बचना ही चाहिए

हमारे खरच दिन−दिन बढ़ते चले जा रहे हैं। विलासिता की बिलकुल बेकार आदतों को हम दैनिक आवश्यकता मान बैठे हैं और खरचे अंधाधुंध बढ़ाए चले जा रहे हैं। हर व्यक्ति अपने से अधिक अमीर की नकल करके स्वयं भी अमीर कहलाने की मृगतृष्णा में भटक रहा है। अमीरों के से ठाठ−बाठ बनाने में गरीब लोग जब अपनी औकात और हैसियत का ध्यान छोड़ देते हैं, तब एक उपहासास्पद स्थिति पैदा हो जाती है। फैशन का भूत लोगों पर इसलिए सवार है कि वे कीमती पोशाक, जेवर, नगीने पहनकर, ठाठ−बाठ इकट्ठा करके बड़े और अमीर आदमी समझे जाने लगें। फैशनपरस्ती एक घटिया दर्जे का छिछोरापन है।

अमीरी की विडंबना बनाने में जो फिजूलखरची के उपकरण जुटाते हैं, उन्हें बालबुद्धि ही कहा जा सकता है। आज तो विलासिता की सामग्री को भी आवश्यकता समझने की हमारी बुद्धि भ्रमित होने लगी है। सिनेमा, बीड़ी, मटरगश्ती, शृंगार-साधन, चाय-पानी, यार-दोस्त आदि महकमे काफी खरचीले बैठते हैं। कीमती कपड़े के कई−कई जोड़े रखने, जेवर आदि बनाने में ढेरों पैसा खरच होता है। हाथ से काम न करके, छोटे−छोटे कामों को स्वयं न करके, पैसे देकर कराने में आलसी भी बनना पड़ता है और पैसा भी खरच होता है। टूटी−फूटी चीजों की मरम्मत न कराके, उन्हें पूर्णरूपेण बेकार हुए बिना ही फेंक दिया जाता है। अव्यवस्थित रूप से पड़ी हुई चीजें समय से पूर्व ही नष्ट और बर्बाद होती रहती हैं। खरच में हाथ खुला रखने पर उचित आमदनी होने पर भी तंगी बनी रहती है। उधार की आदत फिजूलखरची को बहुत बढ़ा देती है। जब कभी जो कुछ भी लेना हो, नकद लेना चाहिए और उतना खरच करना चाहिए, जितनी आमदनी हो। उधार देना भी आज के अनैतिक युग में अपने पैसे को सड़क पर बिखेर देने के समान है। लेकर वापिस करने वाले कोई बिरले ही देखे जाते हैं। सामाजिक कुरीतियों में वाहवाही और लोकाचार की उपेक्षा करके ही पैसे की व्यर्थ बर्बादी को रोका जा सकता है। यह सूत्र हैं, जिन पर विस्तारपूर्वक विचार करके हम मितव्ययी बन सकते हैं और आर्थिक तंगी के कारण उत्पन्न होने वाले असंतोष से बच सकते हैं। बुद्धिमानी पैसा कमाने में नहीं, उसके खरच करने में है। कमाई तो कभी−कभी अनायास भी हो सकती है, पर खरच के संबंध में मनुष्य कितना सतर्क रहा है, इससे उसकी बुद्धिमानी परखी जा सकती है।

सादगी ही श्रेष्ठ है

सादगी, मितव्ययिता और सामान्य श्रेणी का जीवनयापन करने से ही मनुष्य का गौरव है। सज्जनता का यही परिधान है। समाज में जब तक यह प्रवृत्ति विकसित न होगी, हम अशांति और असभ्यता की ही ओर बढ़ते रहेंगे। कहते हैं कि जरूरतों से प्रेरित होकर मनुष्य दुष्कर्म करते हैं, फिर हम इसकी जड़ को ही क्यों न काटें? अपनी जरूरतों को ही सीमित क्यों न करें? जिससे दुष्कर्म करने की आवश्यकता ही न पड़े। संतोषी को सबसे बड़ा सुखी माना गया है। वित्तेषणा पर नियंत्रण प्राप्त करने के लिए यदि हम सादगी को अपनी जीवन-नीति बना लें और मितव्ययिता को अपनाकर तृष्णा को निरर्थक अनुभव करने लगें तो सचमुच अपना जीवन बड़ा सुखी हो सकता है। यदि स्वयं सुखी रहना और दूसरों को शांति से रहने देना हमें अभीष्ट हो तो वित्तेषणा को अस्वाभाविक, अनैतिक, अवांछनीय एवं अनुपयुक्त मानना पड़ेगा। यह डायन जब तक हमारे पीछे पड़ी रहती, तब तक न चैन की साँस लेने का अवसर मिलता है और न दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारे को कोई मार्ग रह जाता है। जिसे निरंतर धन की हाय लगी हुई है, वह सज्जनता और सदाचार का जीवन देर तक नहीं बिता सकता। अवसर आते ही उसका अनीति के मार्ग पर फिसल पड़ना निश्चित है। यह फिसलन ही असभ्यता है। सभ्य समाज की रचना के लिए वित्तेषणा को अपना प्रथम शत्रु मानते हुए सादगी सीमितता और सज्जनता की बुद्धि उत्पन्न करनी चाहिए।


पिशाचिनी पुत्रेषणा

जीवनयापन के लिए थोड़े से धन की, नियमित आजीविका की आवश्यकता पड़ती है। निर्वाह की अनेक आवश्यकताओं में से एक धन भी है। उसके लिए भी ध्यान देना एवं प्रयत्न करना आवश्यक है, पर यदि सब ओर से ध्यान हटाकर धन को ही एकमात्र लक्ष्य मान लिया जाए और उसी की बात दिन-रात सोचते रहा जाए, उसी के निमित्त पूरा जीवनक्रम लगाए रखा जाए तो यह बहुत ही अनुचित बात है। इसी को वित्तेषणा कहते हैं। साधन न रहकर जब धन, साध्य बन जाता है तो उस तृष्णा के वशीभूत होकर मनुष्य बुरे-से-बुरे अनीतियुक्त काम करते हैं। गरीबी नहीं, तृष्णा दुष्कर्मों की जननी है। गरीब भीख माँग सकता है या पेट भरने लायक कोई छोटी−मोटी बुराई कर सकता है, उसमें इतनी अक्ल कहाँ होती है, जो बड़े−बड़े योजनाबद्ध प्लान बनाकर अनैतिक उपायों पर परदे डालकर बहुत कुछ डकार जाए। यह कार्य सुशिक्षित, साधनसंपन्न और सामर्थ्यवान लोगों का है।

अनीति की जननी तृष्णा

डाकू गरीब नहीं होते, गरीब बंदूक कहाँ से प्राप्त करेगा? शरीर में इतना बल कहाँ से लावेगा? रिश्वतखोरी, बेईमानी, ठगी के जो विशालकाय अनर्थ होते हैं, वे सब उच्च वर्ग के लोगों द्वारा संपन्न किए जाते हैं। उसके मूल में गरीबी नहीं, धन की तृष्णा होती है। निर्वाह के लायक उचित आवश्यकताएँ पूर्ण करने योग्य धन के उपार्जन और संग्रह की मर्यादा सीमित करके मनुष्य सुखी हो सकता है। अपने चरित्र को सँभाले रख सकता है। बाल बच्चों को उत्तराधिकार में मुफ्त का माल देकर उन्हें निकम्मे बनाने से बचाए रह सकता है और जनसाधारण में ईर्ष्या एवं असंतोष उत्पन्न होने से रोके रह सकता है। धन की असीम तृष्णा में संलग्न व्यक्ति यह सब बुराइयाँ पैदा करते रहते हैं। यह तृष्णा उनके निज के लिए ही नहीं, सारे समाज के लिए घातक सिद्ध होती है इसलिए वित्त को नहीं वित्तेषणा को निंदनीय ठहराया गया है। इस दिशा में संतोष की, मर्यादा की मनोवृत्ति रखकर ही मनुष्य अपने मानसिक स्तर को इतनी फुर्सत में रख सकता है कि वह अपने आत्मकल्याण की बात सोच सके और उसके लिए कुछ कर सके। इस तृष्णा से बचे रहने वाले के पास ही इतना मन, उत्साह और समय खाली रह सकता है कि वह देश धर्म की कुछ बात सोच सके और उसके लिए प्रयत्न कर सके। श्रेयमार्ग पर ध्यान दिए बिना, उसके लिए समय लगाए बिना, जीवन सफल एवं सार्थक नहीं हो सकता और इधर कदम उठा सकना उन्हीं के लिए संभव है, जिनका मन धन को नहीं, जीवन के सर्वांगीण विकास को अपना लक्ष्य निर्धारित कर सका होगा।

अमर्यादित वासना दूसरी दुष्प्रवृत्ति है— “पुत्रेषणा”। पुत्रेषणा का मोटा अर्थ संतानोत्पादन है। इसका पाशविक रूप काम-वासना है। सृष्टि का क्रम बंद न हो जाए, इस दृष्टि से उस बाजीगर ने प्राणियों के शरीर और मन में एक ऐसा विकार उत्पन्न कर दिया है, जिसके आकर्षण से वशीभूत होकर उसे परिवार बनाने और बढ़ाने का कठिन काम पूरा करने में आनाकानी न करनी पड़े। विचारपूर्वक देखा जाए तो प्रजनन की क्रिया माता के लिए प्राणघातक संकट जैसी है। नौ महीने गर्भ में बालक का शरीर वह अपने शरीर का रक्त-माँस देकर ही बनाती है। इतना माँस और रक्त अपने शरीर में से देकर वह बहुत कुछ खोती ही है। बहुत दिन तक जो दूध पिलाती है, यह भी उसी का रक्त छाती में होकर दूध बनकर निचुड़ता रहता है। गर्भ के दिनों में माता का स्वास्थ्य कितना गिर जाता है इसे सब कोई जानते हैं। प्रसवकाल की पीड़ा की कल्पना कर सकना भुक्तभोगी के लिए ही संभव है, फिर बालकों के लालन−पालन में दिन−रात किस तरह गुजारनी पड़ती है, इस परिश्रम का अनुमान लगाया जाए तो लगता है कि माता को कितना अधिक कष्ट सहन करना पड़ता है। यदि इतनी बड़ी कठिनाई को समाज के लिए कोई महत्त्वपूर्ण उपहार सुसंतति के रूप में देने की पूर्व तैयारी के साथ किया गया हो तब तो बात दूसरी है, अन्यथा जो मानव जीवन सत्कर्मों में लग सकता था, उसे संतानोत्पादन जैसे कष्टसाध्य कार्य में लगाकर और कुसंस्कारी बालक उत्पन्न करके, अपने लिए उनके लालन−पालन और समाज के लिए इस कुसंस्कारक सेना के द्वारा होने वाले उपद्रवों के बढ़ाने में भला क्या अच्छाई हो सकती है?

संतानोत्पादन का उत्तरदायित्व

काम-विकार से ग्रसित होकर लोग बिना विचारे संतानोत्पादन का महान उत्तरदायित्व कंधे पर ले बैठते हैं और उसके वहन करने योग्य परिपूर्ण क्षमता न होने पर अपने लिए ही नहीं, सारे समाज के लिए संकट उत्पन्न करते हैं। संतानोत्पादन के द्वारा समाज को श्रेष्ठ नागरिक प्रदान करने की परिपूर्ण जिम्मेदारी के लिए समुचित तैयारी होने पर कामसेवन की सार्थकता कही जा सकती है, पर केवल विकारग्रस्त होकर क्षण भर के सुख के लिए प्रजनन और बालकों का भार उठाने जैसा कार्य निस्संदेह एक दुस्साहसमात्र है। आज ऐसा ही अविवेकपूर्ण दुस्साहस चारों ओर बढ़ रहा है। इससे बालकों की जन्मसंख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि खाद्य समस्या से लेकर वस्त्र, मकान, चिकित्सा, शिक्षा, रोजी-रोटी आदि के सभी साधन पिछड़ते चले जा रहे हैं। सारे साधन जुटाकर बढ़ती हुई जनसंख्या के उपयुक्त आवश्यक साधन जुटाने में विचारशील लोग लगे हुए हैं, पर जितना बन पाता है, उससे कहीं ज्यादा आवश्यकता यह बढ़ती हुई जनसंख्या उत्पन्न कर देती है।

बढ़ती हुई जनसंख्या

फरवरी की 'अखण्ड ज्योति' में पृष्ठ 15 पर— 'अब नहीं तो 65 वर्ष बाद सही' नामक एक लेख छपा है। इसमें संसार के प्रमुख विचारकों एवं समाजशास्त्री वैज्ञानिकों के अभिमत दिए हैं, जिनमें उनने यह स्पष्ट घोषणा की है कि यदि प्रजनन का यही क्रम जारी रहा तो कुछ ही दिन में अन्न, स्थान, निवास की समस्या काबू से बाहर हो जाएगी। प्रो. हर्मन वेरी का कथन है कि,  "ईसा के 10 हजार वर्ष पूर्व सारी दुनिया में मनुष्यों की आबादी केवल 10 लाख थी, वह अब बढ़कर 3 अरब हो गई। वृद्धि के इस अनुमान से सन् 2050 में दुनिया की आबादी 9 अरब हो जाएगी तो प्रति व्यक्ति के हिस्से में केवल 1 वर्ग मीटर जमीन आवेगी। तब धरती पर इतने लोगों के लिए न खाना मिल सकेगा, न शुद्ध वायु, न पानी, न बिजली। मकानों में सोने के लिए जगह न बचेगी, उनमें खड़े भर रहा जा सकेगा। जानवरों का नामो-निशान तक दुनिया में से मिट जाएगा, क्योंकि जब मनुष्यों के रहने के और खाने के लिए ही धरती की शक्ति पर्याप्त न होगी तो बेचारे पशुओं को उसमें से कौन हिस्सा बटाने देगा। लोग उन्हें मार-काटकर बहुत पहले ही चट कर जाएँगे।”

बढ़ती हुई जनसंख्या अगणित समस्याएँ उत्पन्न करेगी। इस बढ़ती हुई महँगाई और घटती हुई आमदनी में अंधाधुंध बच्चे पैदा करते जाना किसी भी दृष्टि से बुद्धिमत्ता का काम नहीं है। यदि बच्चे की उचित शिक्षा का, उचित पोषण का ठीक प्रबंध, वर्त्तमान आर्थिक अव्यवस्था में नहीं हो सकता तो उनको उपजाया ही क्यों जाए? संतान पैदा करना एक महान उत्तरदायित्व अपने कंधे पर लेना है। यह उचित तो है, पर शर्त यही है कि उसके लिए आवश्यक क्षमता और योग्यता हमारे में हो। स्वास्थ्य, शिक्षा और धन की दृष्टि से हम इतने समर्थ हों कि अपने जीवन की उचित आवश्यकताओं को पूर्ण करने के साथ−साथ बच्चों को सभ्य नागरिक बना सकने में समर्थ हो सकें। इसके बिना संतानोत्पादन एक सामाजिक अपराध है।

ब्रह्मचर्य की आवश्यकता

स्वास्थ्य की सुरक्षा, दीर्घजीवन, जीवनीशक्ति की स्थिरता का ब्रह्मचर्य से अटूट संबंध है। प्राचीनकाल में इस ओर पूरा−पूरा ध्यान रखा जाता था, फलस्वरूप स्वास्थ्य की स्थिति बहुत ही उत्तम रहती थी। अब जबकि काम-वासना को एक क्रीड़ा−कौतुक मान लिया गया है और खिलवाड़ एवं मनोरंजन की तरह उसका उपयोग किया जाने लगा है, स्वास्थ्य की बर्बादी भयंकर रूप से सामने आ रही है। चेहरों के तेज नष्ट हो चले हैं, मस्तिष्क जरा−सा काम करने में दरद करने लग जाता है, शरीरों में हर घड़ी थकान छाई रहती है, परिश्रम करते नहीं बन पड़ता, कमजोरी नस−नस में व्याप्त रहती है, लगता है देह का हर कल−पुर्जा खोखला हो चला है और जीवन की गाड़ी किसी प्रकार जीवन के दिन पूरे करने के लिए लड़खड़ा−लड़खड़ाकर चल रही है। स्वास्थ्य की इतनी बर्बादी का प्रधान कारण यह काम-कौतुक ही है, जिसमें ग्रस्त होकर सारे छोटे−छोटे बच्चे तक अपना सर्वनाश करने में लगे हुए हैं। किशोरावस्था पार करते−करते उन्हें बुढ़ापा आ घेरता है और जवानी आने से पहले मौत की घंटी बजने लगती है।

आग भड़काने वाले प्रसाधन

सिनेमा, अश्लील चित्र, बेहूदा साहित्य, गंदे गाने तथा कुसंग का वातावरण वासना की आग बुरी तरह भड़काने में लगा हुआ है। फलस्वरूप हमारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य चौपट होता चला जा रहा है। इस दुर्गति की स्थिति में समाज की श्रेष्ठता की आशा तो की ही कैसे जाए? भाई-बहन की, पिता-पुत्री की दृष्टि से नर-नारी अब आपस में एकदूसरे को कहाँ देखते हैं? वासना की दूषित दृष्टि का रंगीन चश्मा आँखों पर चढ़ा होता है और विकारपूर्ण अनैतिक ढंग से सोचने की एवं वैसी ही चेष्टाओं का अवसर ढूँढ़ने की प्रवृत्ति मन में भरी रहती है। फलस्वरूप मानसिक ओज का निरंतर क्षरण होता रहता है।

संक्रामक रोगों से भी भयंकर

यह दृष्टिदोष, यह विकारचिंतन, किसी भी संक्रामक रोग से कम भयंकर नहीं है। हैजा, प्लेग, फ्ल्यू, कोढ़, तपैदिक, चेचक, इन्फ्लुएँजा जैसी बीमारियाँ स्पष्ट दीखती हैं, इसलिए उनका इलाज भी हो जाता है, पर विकार दृष्टि का अदृश्य रोग ऐसा है, जो न पकड़ में आता है और न उसका किसी अस्पताल में इलाज किया जाता है। दांपत्ति जीवन पर इसका कितना बुरा प्रभाव पड़ता है, गृहस्थ की नींव इस बुराई के कारण कितनी खोखली हो जाती है और अपने बड़ों की दुष्प्रवृत्तियों का बच्चों के कोमल मन पर कैसा घातक प्रभाव पड़ता है, यह बहुत ही गंभीर प्रश्न है। मानसिक व्यभिचार की हानि, शारीरिक व्यभिचार से किसी प्रकार कम नहीं है। विचार ही तो अंत में कार्यरूप में परिणित होते हैं। मानसिक विकार आज नहीं तो कल शरीर-संयोग के रूप में प्रकट होता है। प्राकृतिक और अप्राकृतिक दुष्प्रवृत्तियों का जन्म मानसिक विकार के कारण ही होता है। भड़कीला श्रृंगार व्यभिचार का पूर्णरूप है। वेश्याएँ इसी अस्त्र के आधार पर लोगों में विकार उत्पन्न करके, उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती हैं।

भड़कीले श्रृंगार से बचें

आज भड़कीला श्रृंगार फैशन कहा जाता है और उसे कला, सुरुचि एवं सभ्यता का चिह्न कहकर पुकारा जाता है। कहा और माना जो कुछ भी जाए, वास्तविकता ज्यों की त्यों रहेगी। हमारे उठती उम्र के बच्चे और बच्ची इस पतन-पथ पर कदम न बढ़ावें, इसका ध्यान रखा जाना चाहिए। पुराने समय में गुरुकुलों की शिक्षा पूर्ण करके गधा पच्चीसी की कच्ची उम्र पार कर लेने तक छात्रों के सिर मुड़े रखे जाते थे, उन्हें कोई श्रृंगार नहीं करने दिया जाता था। दर्पण देखने की मनाही थी, क्योंकि इससे अपने रूप-यौवन का गर्व मन में उठता है। और उससे किसी को आकर्षित करने की कामना जगती है। इस विषवृक्ष की पत्ती तोड़ने से नहीं, जड़ काटने से काम चलेगा । उत्तेजक श्रृंगार की जड़ में वासना का विकार स्पष्ट है, इससे देखने वालों के मन में विक्षोभ उत्पन्न होता है। कुछ विशेष अंगों को ढककर रखने की परंपरा इसी दृष्टि से है। श्रृंगार-साधनों की जितनी ही वृद्धि होगी व्यभिचार की उतना ही उत्तेजन मिलेगा। इसलिए हम सफाई से रहें, स्वच्छता पसंद करें, सादगी से रहें और सभ्य वेशभूषा धारण करें, पर फूहड़पन को बढ़ने न दें। आज फूहड़पन बढ़ रहा है। हमारी भोली बच्चियाँ इसकी बुराई को समझ नहीं पातीं और वे दूसरों की देखा−देखी भद्दे ढंग से अपना वेश-विन्यास बनाने लगती हैं। उन्हें समझाया जाना चाहिए कि बेटी, यह न तो सभ्यता है और न भारतीय परंपरा! ढलती उम्र आने से पूर्व तक तो भारतीय लड़कियाँ, नीचे आँखें रखने से लेकर सिर ढकने और घूँघट मारने तक न जाने क्या−क्या प्रतिबंध अपने ऊपर लगाए रहती थीं। अब उतने प्रतिबंधों की भले ही आवश्यकता न रही हो, पर इतनी आवश्यकता तो सदा ही रहेगी कि उठती उम्र में अपेक्षाकृत अधिक सादगी अपनाई जाए और भड़कीले श्रृंगार से यथासंभव अधिकाधिक बचा जाए।

वासनात्मक असंतोष

धन के असंतोष की भाँति वासनात्मक असंतोष भी मानसिक शांति को नष्ट करके रख देता है, पतिव्रत और पत्नीव्रत की महानता परलोक और आत्मा की सद्गति की दृष्टि से तो अनिवार्य है ही; सामाजिक जीवन की स्वस्थता की दृष्टि से भी आवश्यक है। हम इस संबंध में एक बहुत छोटी सीमा में अपने को आबद्ध रखें। जिस प्रकार अपनी कमाई के अतिरिक्त दूसरों का पैसा हड़पना पाप है, उसी प्रकार अपनी छोटी−सी दांपत्ति-मर्यादा के बाहर विकार की दृष्टि रखना भी घातक है। पाप दृष्टि से हजार नारियों को देखने पर भी संयोग का अवसर एक से भी नहीं मिलता। पाप हजार मन का चढ़ा और लाभ रत्ती भर भी न हुआ। ऐसी व्यर्थ विडंबना में, पापपंक में, अपने को लिप्त करने से क्या भलाई हो सकती है? जो विवाहित हैं, वे समझ लें कि वासना का क्षेत्र उनके लिए उतना ही सीमित है, इससे बाहर नहीं। अपनी रूखी रोटी खाकर ही हमें संतोष करना पड़ता है. फिर अपना दांपत्ति जीवन जैसा भी कुछ संयोगवश बन गया है, उसी में संतोष करके शांति प्राप्त क्यों न करें?

अविवेक पर अंकुश रखा जाए

अविवाहित लोगों को बेवक्त की शहनाई नहीं बजानी चाहिए। अकारण अशांति को आमंत्रण देने से अपने सत्यानाश का सरंजाम ही इकट्ठा होता है। वे जिनके जोड़े बिछुड़ चुके हैं, वे अपनी शक्तियों को संग्रहित करके अपने शरीर एवं मन को पुष्ट करने में इस अवसर का लाभ क्यों न उठावें। वासना और कुछ नहीं, मछली का पेट फाड़ डालने वाली आटा लगी काँटे की नोंकमात्र है। इसमें जो क्षणिक-सा जादूभरा आकर्षण है, उससे अपने को बचाए रखने की दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता लोगों में नहीं है। इसी में वे उस भयानक बर्बादी को अपना लेते हैं, जिससे यदि बचा जा सका होता तो अपनी गणना संसार के श्रेष्ठ व्यक्तियों में होती, जीवन का लक्ष्य सार्थक होता और समाज को एक कल्याणकारक दिशा प्राप्त होती।

असंतोष हर क्षेत्र में घातक है। धन में ही नहीं, वासना के क्षेत्र में भी उसकी भयंकरता उतनी ही प्रचंड है। वित्तेषणा ने समाज का आर्थिक ढाँचा लड़खड़ा दिया है तो पुत्रेषणा ने मानसिक ढाँचा। संसार को अणुबमों से उतना खतरा नहीं है, जितना वासना के बवंडर से। हमारा स्वास्थ्य, मानसिक-संतुलन, नैतिक-दृष्टिकोण, पारिवारिक-व्यवस्था, आर्थिक ढाँचा, दाम्पत्ति डडडड डडडड पवित्रता सभी कुछ इस बात पर निर्भर है कि काम−वासना की दुष्प्रवृत्ति पर अधिकाधिक अंकुश रखा जाए। यदि इस ओर हमारा मन ललचाता रहा, अपनी मर्यादाओं में जो कुछ उपलब्ध है, उससे अधिक असंतोष धारण करके आक्रमण एवं अपहरण की नीति अपनाई गई तो उससे अनर्थ ही उत्पन्न होगा। सभ्य समाज की रचना में वित्तेषणा के बाद पुत्रेषणा ही दूसरी बाधा है। इसे ब्रह्मचर्य का व्यापक प्रसार करके ही दूर किया जा सकता है। पिशाचिनी पुत्रेषणा की ओर से उपेक्षाभाव रखने में ही हमारा कल्याण है।


लोकेषणा की हेय लालसा

काम-वासना की शारीरिक और मानसिक अमर्यादित प्रक्रियाएँ, व्यभिचार को जन्म देती हैं और उससे स्वास्थ्य, सद्भाव एवं दांपत्ति जीवन की निष्ठा पर भारी आघात पहुँचता है। संतान का सद्गुणी होना बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि पति-पत्नी में हार्दिक प्रेम रहे। जिस दांपत्ति जीवन में अविश्वास, संदेह, दुर्भाव एवं मनोमालिन्य बना रहेगा, वहाँ सुसंतति का जन्म कदापि संभव न होगा। चरित्र पर संदेह होना, पति−पत्नी के प्रेम एवं विश्वास में आग लगाने वाला पलीता है। “एक नारी ब्रह्मचारी” वाली कहावत में बहुत कुछ तथ्य है। नारी के लिए पतिव्रत की जो महत्ता है, यही नर के लिए पत्नीव्रत की। रामायण में पतिव्रता के लिए यह धर्म बताया है कि वह, “अंध, बधिर, क्रोधी, अति दीना” जैसा पति मिलने पर संतुष्ट रहे और उसे ही ईश्वर की प्रतिमूर्ति समझकर सेवा करे। ठीक यही बात पति के लिए लागू होती है। संयोगवश जैसी भी कुछ काली, कानी, लँगड़ी, अंधी, दुर्गुणी, फूहड़, कर्कशा, मूर्ख, रोगी, अपंग नारी मिल गई है, उसे गृहलक्ष्मी, देवी की प्रतिमूर्ति समझकर प्रेमपूर्वक निवाहे और अपनी इसी छोटी दुनिया से संतुष्ट रहकर कुमार्ग पर मन न दौड़ाए।

सुसंतति के अभाव में पारिवारिक जीवन नष्ट होते चले जा रहे हैं, और हर पीढ़ी अपनी पूर्व पीढ़ी की अपेक्षा अधिक दुर्गुणी एवं कुसंस्कारी बनती चली जा रही है। यह असुरता के विकास का क्रम यदि इसी प्रकार चलता रहा तो हमारी सभ्यता और संस्कृति नष्ट होती ही चली जाएगी और सभ्य समाज की रचना के स्वप्न अधूरे ही पड़े रहेंगे। इसलिए हमें यौन सदाचार के लिए प्रबल प्रयत्न करना चाहिए और इसकी जड़, ‘मानसिक असंयम’ को दूर करना चाहिए। दृष्टिकोण में से वासना को हटाना और अपने दांपत्ति जीवन को ईश्वरीय आज्ञा मानकर संतुष्ट रहना, जहाँ धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से भी आवश्यक है, वहाँ समाज की रचना की दृष्टि से भी अनिवार्य है। हम व्यभिचार बुद्धि का परित्याग करके जब बहिन-भाई के, पिता-पुत्री के पवित्र संबंधो में संतोष एवं आनंद का अनुभव करेंगे तभी यह आशा की जा सकेगी कि हमारा समाज सभ्य बने और जिस स्वर्गीय वातावरण को इस धरती पर अवतरित देखना चाहते हैं, वह आकांक्षा पूर्ण हो।

लोकेषणा की प्रवंचना

वित्तेषणा, पुत्रेषणा के अतिरिक्त तीसरी एषणा है—‘लोकेषणा’। वाहवाही लूटने की, दूसरों के मुँह अपनी प्रशंसा सुनने की, मानसिक दुर्बलता को लोकेषणा कहते हैं। यों उचित मर्यादा में यह वृत्ति भी उचित धन-उपार्जन और संयमी दांपत्ति जीवन की तरह उपयोगी होती है, इस आधार पर मनुष्य सत्कर्म करता और अपने चरित्र को ऊँचा रखता है। बुराइयों से बचता और निंदा से डरता हुआ मर्यादा के अंदर रहना सीखता है। इस दृष्टि से यशकामना को उत्तम माना गया है। पर यह उत्तमता तभी तक स्थिर रहती है, जब मनुष्य ईमानदारी से धन कमाने की तरह अपने उत्कृष्ट आचरण एवं श्रेष्ठ सत्कर्मों द्वारा उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। यदि अमीरी का रौब गाँठकर फिजूलखरची के द्वारा अपना बड़प्पन सिद्ध करके प्रशंसा प्राप्त करने का प्रयत्न किया जा रहा है तो वह लोकेषणा निंदनीय भी है और अहितकर भी।

कीमती कपड़े और जेवर

आज शेखीखोरी, बनावट, ढोंग, फैशनपरस्ती और बड़प्पन दिखाने की बहुत होड़ चल रही है। इन बातों में लोग अपनी हैसियत से बहुत अधिक खरच करते हैं। ठाठ−बाठ बनाने में अपनी गाढ़ी कमाई का अधिकांश भाग फूँक देते हैं। कीमती कपड़े पहनने की कोई उपयोगिता समझ में नहीं आती। शरीर ढँकने के लिए सीधे−सादे कपड़े पर्याप्त हैं, पर जब उनमें प्रचुर धन खरच करके कीमती सूट और महँगी साड़ी पहनकर लोग बाजार में निकलते हैं तो उनका उद्देश्य देखने वालों पर यह रौब गाँठना होता है कि हम बहुत बड़े अमीर हैं। इसी प्रकार जेवर लादे फिरने का फूहड़पन भी इसी ओछी बुद्धि का परिचायक है कि लोग हमें धनी समझें। धनी होने का प्रमाणपत्र गले में लटकाए फिरने, हाथ-पैरों में बाँधे फिरने का फितूर ही जेवर पहनने की भोंड़ी शक्ल बनाए फिरता है। जो धन बैंक में जमा होकर या किसी कारोबार में लगकर दिन−दिन बढ़ता रह सकता था और कितने ही लोगों के लिए रोजी−रोटी उत्पन्न करने वाला बन सकता था, उसे जेवरों में रोककर पंगु बना देना, वस्तुतः लक्ष्मी जी का अपमान है।

पैसे की उपयोगिता तभी है, जब वह घूमता रहे। यदि उसे जमीन में गाढ़ दिया जाए या जेवर जैसे दिन−दिन घटने वाले, ईर्ष्या उत्पन्न करने वाले, अहंकार बढ़ाने वाले और चोर-उचक्कों का मन ललचाने वाले व्यर्थ कामों में लगा दिया जाए तो उसकी फिर क्या उपयोगिता रह जाती है? यह तो लक्ष्मी देवी के हाथ-पैर तोड़कर उसे लुँज−पुँज बना देने जैसा अनुपयुक्त कार्य हुआ? कीमती पोशाक न पहनकर यदि हम सादे कपड़े पहनें तो यह हमारी सज्जनता और बुद्धिमत्ता का चिह्न होगा। इस विभाग में बचा हुआ पैसा हम अपने और दूसरों के आवश्यक कार्यों में लगाकर अपनी दूरदर्शिता और भलमनसाहत का परिचय दे सकते हैं।

अहंता की पूर्ति के लिए

विवाह-शादियों में लोग अंधे होकर पैसे की होली जलाते हैं। उनका प्रयोजन शायद यही रहता होगा कि उत्सव में शामिल होने वाले अथवा दर्शक लोग इन पैसे की होली फूँकने वालों को अमीर समझकर उनकी प्रशंसा करें। मृत्युभोज या अन्य बड़ी−बड़ी दावतों के मूल में भी वाहवाही लूटने की मनोवृत्ति छिपी रहती है। दूसरों की तुलना में अपने को अधिक अमीर साबित करके अधिक वाहवाही लूटने के लिए अपना घर खाली कर डालते हैं, कर्जदार बन जाते हैं और कई बार तो मतवाले होकर इतना खरच कर बैठते हैं कि पीछे उन्हें अपने आवश्यक कार्यों को ठीक तरह चलाने में भी कठिनाई अनुभव होने लगती है। मोटर, घोड़ा, गाड़ी, कोठी, बँगले, नौकर−चाकर आदि का भारी सरंजाम आवश्यकता की पूर्ति के लिए नहीं, ठाठ−बाठ दिखाने और अमीरी प्रदर्शित करने के लिए जुटाया जाता है। बड़े आदमी बनने के शौक में जितनी फिजूलखरची इन कामों में की जाती है, उससे कहीं कम में काम चल सकता था।

अमीरी प्रशंसनीय नहीं

किसी जमाने में अमीरी बड़प्पन का चिह्न रही होगी, पर अब जैसे−जैसे विचारशीलता बढ़ रही है, अमीरी को घृणा और ईर्ष्या-द्वेष की दृष्टि से देखा जाने लगा है। सर्वसाधारण की गरीबी और परेशानी को घटाने में अपनी कमाई को खरच न करके जो लोग उसका संग्रह करते चले जा रहे हैं, अपने ऊपर अंधाधुंध खरच कर रहे हैं और वाहवाही लूटने के लिए उसे फूहड़पन के साथ उलीचते हैं, उन्हें स्वार्थी, निष्ठुर एवं मदांध ही कहा जा सकता है। बड़प्पन पाने की आशा से जो लोग यह उद्धतपन करते हों, उन्हें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि उनका यह छिछोरापन प्रशंसा का नहीं, निंदा का कारण बनता चला जा रहा है और वह समय दूर नहीं, जब इस प्रकार की मूर्खता अवांछनीय मानी जाने लगेगी। लोग उनसे घृणा करके ही चुप न हो जाएँगे, वरन ऐसे उद्धत प्रदर्शनों का विरोध करेंगे और रोकेंगे।

सार्वजनिक जीवन का सत्यानाश

सार्वजनिक संस्थाओं का सत्यानाश इसी प्रवृत्ति ने किया है। पदाधिकारी बनने की हवस में प्रायः सभी महत्त्वपूर्ण जन-संगठन, ईर्ष्या और कलह के अखाड़े बने हुए हैं। हर कोई बड़प्पन और पदवी चाहता है, जिसे मिल जाती है, वह फिर उसे सदा के लिए छाती से चिपकाए बैठा रहना चाहता है। जिसे नहीं मिलती वह सत्ताप्राप्त को पदच्युत करने के लिए ही नहीं, उस संस्था की प्रगति को ही नष्ट करने पर तुल जाता है। धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक सभी संस्थाएँ इस बीमारी की शिकार हो रही हैं और इसी पारस्परिक कलह में अपनी उपयोगिता एवं शक्ति गँवाती चली जा रही हैं। व्यक्तियों का पतन भी इसी कुचक्र में हो रहा है। एक व्यक्ति स्वयं सत्ता हथियाने और अपने प्रतिद्वंद्वी को गिराने के लिए जितने हथकंडे प्रयोग करता है, जितने कुचक्र और षड़यंत्र बनाने में अपनी शक्ति खरच करता है, उतनी ही यदि वह सच्चे मन से सच्ची सेवा करने में लगा दे तो लोक−परलोक भी सुधरे, आत्मा को शांति भी मिले और जनता-जनार्दन की कुछ ठोस सेवा भी बन पड़े।

बड़े बनने के ओछे उपाय

प्रशंसा का उद्देश्य लेकर थोड़ा−सा सेवाकार्य कर देने वाले, लंबे−चौड़े लेक्चर झाड़ने वाले, बढ़-चढ़कर बातें बनाने वाले लोग अपने हथकंडों से बड़प्पन लूटने में सफल हो जाते हैं, यह सामाजिक जीवन के लिए एक खतरा है। राजनैतिक चुनावों में अयोग्य और अनुपयुक्त व्यक्ति भी केवल बड़प्पन प्राप्त करने के लिए उम्मीदवार खड़े हो जाते हैं और अंधाधुंध धन व्यय कर देते हैं।

थोड़ा−सा दान देकर अपने नाम का पत्थर लगवाने की या नामवरी छपवाने की प्रवृत्ति निम्नकोटि की है। इसमें दान या सेवा का नहीं, प्रशंसा प्राप्त करने का अहंकार ही प्रधान है। अहंता को पाप माना गया है, पाप ही नहीं, उसे पाप का मूल भी कहा गया है। 'पाप मूल अभिमान' की उक्ति प्रसिद्ध है। यह पाप जहाँ भी रहेगा, वहाँ सेवा क्या बन पड़ेगी? सत्कर्म कहाँ संभव होगा? नाम के भूखे पागल लोग, जहाँ नाम नहीं मिलता वहाँ से खिसकने लगते हैं और वहाँ जोड़−तोड़ भिड़ाते हैं, जहाँ किसी भी प्रकार उन्हें नामवरी प्राप्त हो। एक संस्था छोड़कर दूसरी में, दूसरी को छोड़ तीसरी में घुसते-फिरने वाले लोग, आमतौर से इसी मर्ज के मरीज होते हैं। सैद्धांतिक मतभेद के कारण तो कोई विरले ही इस प्रकार का परिवर्तन करते हैं। हमारा सार्वजनिक जीवन इस लोकेषणा की दुष्प्रवृत्ति के कारण कितना गंदा और मलिन होता चला जा रहा है, यह देखकर भारी दुःख होता है।

स्वराज्य में विश्वास करने वाले राजनीतिक विचार के लोग जब स्वतंत्रता संग्राम में जुट पड़े तो उस संघबद्ध प्रयत्न ने एक चमत्कार उत्पन्न कर दिया। निस्वार्थता एवं संगठन का परिणाम सदा ही चमत्कारिक होता है। धार्मिक जगत में त्यागी समझे जाने वाले लोग यदि अपनी लोकेषणा को त्याग कर सके होते तो भारत की धर्मप्रधान जनता को चारित्रिक दृष्टि से कहीं अधिक समुन्नत कर सकना बहुत ही सरल हो गया होता। धन और वासना का प्रलोभन छूट सकता है, पर लोकेषणा तो सबसे प्रबल है, उसका लोभ त्यागी कहे जाने वाले लोगों से भी नहीं त्यागा जाता।

मूकसेवा की महत्ता

हमें मूकसेवा को महत्त्व देना चाहिए। नींव के अज्ञात पत्थरों की छाती पर ही विशाल इमारतें तैयार होती हैं। इतिहास के पन्नों पर लाखों परमार्थियों में से किसी एक का नाम संयोगवश आ पाता है। यदि सभी सज्जनों का नाम छापा जाने लगे तो दुनिया का सारा कागज इसी काम में समाप्त हो जाएगा। यह सोचकर हमें प्रशंसा की ओर से उदास ही नहीं रहना चाहिए, वरन उसको तिलांजलि भी देनी चाहिए। नामवरी के लिए जो लोग आतुर हैं, उनको निम्नस्तर का स्वार्थी ही माना जाना चाहिए। जो बदले की नीयत से सत्कर्म कर रहा है, वह व्यापारी है। पुण्य और परमार्थ को वाहवाही के लिए बेच देने वाले व्यापारी हीरा बेचकर काँच खरीदने वाले मूर्ख की तरह हैं। जिसने प्रशंसा प्राप्त कर ली, उसे पुण्यफल नाम की और कोई चीज मिलने वाली नहीं है। दुहरी कीमत वसूल नहीं की जा सकती। अहंकार को तृप्त करने के लिए प्रशंसा प्राप्त कर लेने के बाद किसी को यह आशा न करनी चाहिए कि इस कार्य में उसे परमार्थ का दुहरा लाभ भी मिल जाएगा।

प्राचीनकाल में गुप्तदान की बड़ी महत्ता थी। बाइबिल में कहा गया है कि, ‟तू दाहिने हाथ से दान इस प्रकार कर कि तेरा बाँया हाथ भी जानने न पावे।” पुण्य और पाप का जितना बखान होता है, उतना ही वह घट जाता है। लोकेषणा का लोभी ईश्वर का प्यारा नहीं हो सकता। प्रभु को तो निरभिमानता ही प्रिय है। अठारह पुराण विभिन्न काल में विभिन्न व्यक्तियों के द्वारा लिखे गए हैं, पर उनमें से किसी ने भी अपना नाम न देकर व्यास जी को ही उनकी रचना का श्रेय दिया है। तुलसीकृत रामायण में कई व्यक्तियों ने अपनी कृतियों के क्षेपक लगाए, पर उसमें अपना नहीं तुलसीदास जी का ही नाम रखा। प्राचीनकाल में नाम से बचने की प्रवृत्ति थी। लोग नाम को नहीं, काम को महत्त्व देते थे। सत्कर्म करने से आत्मा में जो संतोष उत्पन्न होता और समीपवर्त्ती लोगों में जो गहरी श्रद्धा उत्पन्न होती है, उतना ही लाभ प्राप्त करके प्रत्येक सत्कर्म प्रेमी को संतुष्ट हो जाना चाहिए। सेवा का यही परिपूर्ण पुरस्कार है।

आत्मसंतोष के लिए सत्कर्म

वाहवाही और नामवरी के लिए ओछे उपायों का अवलंबन करना उतना ही हेय है, जितना धन और वासना की पूर्ति, अनैतिक उपायों से करना। इस मानसिक दुर्बलता ने समाज का अन्य किसी भी भयंकर बुराई से कम अहित नहीं किया है। सभ्य समाज की रचना के तीन प्रमुख आधारों में हमें सज्जनता का श्रेय प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए और हत्यारी लोकेषणा से दूर रहना चाहिए। आज महत्त्वाकांक्षाओं की आग में सारी दुनिया जल रही है। उन्नति के नाम पर प्रगति की अभिलाषा से बुरे−बुरे दुष्कर्म करने में संलग्न हैं। हमें संतोष का अमृत पीना और पिलाना चाहिए। और यह समझना तथा समझाना चाहिए कि वाहवाही व्यर्थ है। आत्मसंतोष के लिए श्रद्धापूर्वक सत्कर्म करते रहना ही श्रेष्ठ है। उसी में अपना और सबका कल्याण समाया हुआ है।


सभ्य समाज में नारी का स्थान

मनुष्य समाज नर और नारी दो तत्त्वों से मिलकर उसी प्रकार बना है, जिस प्रकार ईंट-चूना मिलकर इमारत बनती है। दोनों का महत्त्व और स्थान समान है। दोनों की उन्नति का सम्मिलित रूप ही वास्तविक उन्नति कही जा सकती है। संसार की आधी जनसंख्या नर के रूप में और आधी नारी के रूप में विभाजित है। यदि केवल पुरुष ही शिक्षित, सुयोग्य, समुन्नत और स्वतंत्र रहें और स्त्रियों को अशिक्षित, अयोग्य, पददलित एवं परतंत्र, प्रतिबंधित रखा जाए तो आधी जनसंख्या पतित स्थिति में ही पड़ी रहेगी। आधी और अधूरी उन्नति उस गाड़ी के समान मानी जाएगी, जिसका एक पहिया तो बहुत सुंदर है, पर दूसरा टूटा पड़ा है। सभ्य समाज वही कहा जाएगा, जिसमें नर के समान नारी को भी न्याय एवं विकास का अधिकार प्राप्त हो।

कन्या और पुत्र में अंतर क्यों?

कन्या और पुत्र के बीच में अंतर करना, एक को व्यर्थ और दूसरे को महत्त्वपूर्ण मानना, यह हमारा अन्यायपूर्ण दृष्टिकोण है। पुत्र हमें कमाई खिलावेंगे, बुढ़ापे में सेवा करेंगे, वंश चलाएँगे और पिंडदान देकर स्वर्ग पहुँचावेंगे, इन मान्यताओं के आधार पर हमें पुत्र की कामना अधिक रहती है। उसके जन्म पर खुशियाँ मनाई जाती हैं और कन्या होने पर उसे पराए घर का कूड़ा मानकर उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। लालन−पालन, स्वास्थ्य, शिक्षा, खान−पान, आदि सभी बातों में कन्या-पुत्र के बीच भेदभाव बरता जाता है। फलस्वरूप कन्याएँ अविकसित एवं अशिक्षित रह जाती हैं, उनकी प्रतिभा एवं क्षमता कुंठित ही पड़ी रहती है। स्वावलंबन की दृष्टि से उनमें कोई सामर्थ्य ऐसी नहीं रहने दी जाती, जिससे कुसमय आने पर वे अपना और अपने बच्चों का भरण-पोषण स्वयं कर सकें। उपार्जन एवं व्यवहारिक ज्ञान न होने के कारण आर्थिक जीवन में वे प्रायः असमर्थ ही रहती हैं। कुसमय में या तो उन्हें बिलख−बिलखकर हीनतापूर्ण, पराश्रित, तिरस्कार भरा जीवनयापन करना पड़ता है या फिर अनैतिक अवलंबन स्वीकार करके अपने दिन काटने पड़ते हैं। जिन्हें उत्तराधिकार में कुछ संपत्ति मिलती है, वे उसका भी लाभ नहीं उठा पातीं, कुटुंबी और रिश्तेदार उनकी दुर्बलता का लाभ उठाकर उन्हें उससे भी वंचित कर देते हैं। पति को पसंद न आने पर पत्नी का जीवन कैसा दयनीय हो जाता है, उसके असंख्यों उदाहरण आँखों के आगे आए दिन आते रहते हैं। हिंदू नारी के सामने यह सारी कठिनाइयाँ केवल इसलिए उत्पन्न होती हैं कि उसे पुरुष की तुलना में हेय और तुच्छ माना जाता है।

शिक्षा और दीक्षा की समता

यदि कन्या और पुत्र में कोई अंतर न करे। दोनों को लालन−पालन, ज्ञानवर्द्धन शिक्षा−दीक्षा एवं स्वावलंबन की दृष्टि से समान रूप से विकसित करने की यदि हमारी दृष्टि रहे तो लड़कियाँ हर भली-बुरी परिस्थिति में अपने पाँवों पर खड़ी रहने और स्वाभिमानी जीवन बिताने लायक हो सकती हैं। वे अपने बढ़े हुए ज्ञान से गृह व्यवस्था को अच्छी तरह सँभाल सकती हैं, पति के लिए सच्ची संगिनी बन सकती हैं और अपने बच्चों को सुसंस्कृत बना सकती हैं। समाज का आधा अंश पददलित रहे और आधा अंग विकसित रहे तो यह अर्धांग बात— पक्षाघात के रोगी की जैसी स्थिति रहेगी। ऐसा लंगड़ा, लूला, काना, कुरूप समाज किसी प्रकार विकसित नहीं हो सकता। नारी के प्रति जब तक हमारा दृष्टिकोण न बदलेगा, जब तक कन्या को पुत्र से हीन माना जाता रहेगा, तब तक एक पहिये की टूटी−फूटी गाड़ी की तरह ही हमारा खचड़ा चलेगा। प्रगति के पथ पर चलने के लिए हर माता को यह मान्यता बनानी पड़ेगी कि कन्या और पुत्र में कोई अंतर नहीं।

बेटे-पोते से वंश चलता है, उस मूर्खता को भी त्याग देना चाहिए। वंश हमेशा अच्छे कार्यों से चलता है। महापुरुषों का यश और नाम अभी भी चल रहा है, जबकि लाखों मनुष्य कुत्ते की मौत रोज मरते रहते हैं और दो-तीन पीढ़ी बाद उनके बेटे-पोते तक नाम भूल जाते हैं। बेटे के लिए लोग किस कदर लालायित रहते हैं, किस तरह मियाँ मसान पूजते, देवी-देवताओं की मनौती मनाते हैं, उसे देखकर इनकी संकीर्णता पर तरस आता है।

दोनों हाथों की तरह, दोनों आँखों की तरह, हमें बेटी-बेटे एक समान मानने चाहिए और उनकी शिक्षा दीक्षा की समान व्यवस्था करनी चाहिए, तभी सभ्य समाज की रचना का श्रीगणेश हो सकेगा। नारी को उपेक्षा की दृष्टि से देखते रहने पर तो प्रगति का पथ सर्वथा अवरुद्ध ही पड़ा रहेगा।

क्या परदाप्रथा आवश्यक है?

नर और नारी के अधिकार में हमें समता को ही स्थान देना पड़ेगा। जो बात एक के लिए उपयोगी है, वही दूसरे के लिए भी उचित हो सकती है। यदि स्त्री पर पुरुषों की कुदृष्टि पड़ने से उसका शील नष्ट होने का भय है तो यही भय पुरुषों के लिए भी करना उचित है, क्योंकि उन पर भी नारी की दृष्टि पड़ सकती है और उनका भी शील नष्ट हो सकता है। ऐसी दशा में यदि नारी के लिए परदा उचित है तो पुरुषों को भी घूँघट धारण करना चाहिए। यदि पुरुष ऐसे विश्वस्त हैं कि वे किसी की भी कुदृष्टि से विचलित नहीं होते तो यह विश्वास नारी पर भी करना पड़ेगा। स्वास्थ्य के लिए नितांत हानिकारक और सांसारिक ज्ञान से वंचित रखने वाली, नारी को मानसिक एवं व्यवहारिक दृष्टि से अशक्त बना देने वाली परदाप्रथा का आज कोई औचित्य नहीं। सामन्तवादी नृशंस शासनकाल में जब स्त्रियों के अपहरण का भय निरंतर बना रहता था, उस समय नवयुवतियों को घर से बाहर न निकलने देने और घूँघट मारकर रहने का कोई औचित्य हो सकता था। पर आज वह परिस्थितियाँ नहीं रहीं तो भी बंदरिया की तरह इस मरे बच्चे की लाश को हम छाती से क्यों चिपकाए रहें?

बंगाल, गुजरात, पंजाब, महाराष्ट्र, दक्षिण भारत में जहाँ परदा नहीं होता, वहाँ दुराचार फैल गया हो और उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, आदि थोड़े से प्रदेश के उच्चवर्ग में जहाँ परदा होता है, वहाँ कोई बहुत बड़ा सदाचार रह रहा है। क्या ऐसी बात है? वस्तुस्थिति इससे उलटी है, जहाँ जितना छिपाव रहेगा, वहाँ उतना आकर्षण बढ़ेगा। यह आकर्षण ही व्यभिचार को जन्म देता है। परदा सदाचार का नहीं, दुराचार का प्रतीक है। यह एक स्पष्ट स्वीकृति है कि हमें अपनी बहू−बेटियों के सदाचार का विश्वास नहीं, इसलिए इन्हें मुँह खोलने, बात करने की भी स्वाधीनता न देकर हम पिंजड़े के पक्षी या जेल के कैदी की तरह हर घड़ी बनाए रहते हैं। मरी लाश को कफन से ढँक देने की बात समझ में आती है, पर जीवित नारी को लाश मानकर उसे परदे से लपेटे रहने का क्या औचित्य हो सकता है?

दहेज का अनौचित्य

दहेज स्पष्टतः नारी जाति का तिरस्कार है। बूढ़ी गाय या बीमार बछिया को कोई पंडा तभी दान में लेता है, जब उसके चारे के लिए कुछ दक्षिणा भी साथ में मिले। इसी प्रकार कन्या को स्वीकार करने की कृपा का मुआवजा लोग दहेज के रूप में माँगें तो इससे बूढ़ी गाय या बीमार बछिया से ही लड़की की तुलना होती है। तिरस्कृत नारी गृहलक्ष्मी नहीं हो सकती। सम्मान और स्वागत के साथ सौभाग्य की साक्षात देवी मानकर जब तक नारी को घर में स्थान न मिलेगा, तब तक उसकी मनोदशा उस स्तर की कदापि नहीं हो सकती कि वह अपने व्यक्तित्व को निखारती हुई अपनी क्षमताओं का लाभ पति के परिवार को या अपने बच्चों को दे सके। उसका मन सदा भिचा−भिचा-सा रहेगा और आत्मग्लानि एवं आत्महीनता के कारण वह अपने आपको जमीन में गढ़ी जाती-सी अनुभव करती रहेगी।

दहेज की कमी के कारण जिसका विवाह अनेक स्थानों से अस्वीकृत हो चुका है, बड़ी खुशामद और घर के बरतन, कपड़े बेचकर जिसके पिता ने अपनी बच्ची के हाथ पीले किए हैं, वह कन्या अपनी व्यर्थता और हीनता ही सदा अनुभव करती रहेगी। जिनकी ससुराल वालों ने उसके पिता को इतना सताकर काबुली पठान की तरह दहेज वसूल किया है, उनके प्रति कोई कन्या कभी सम्मान के भाव नहीं रख सकती। मजबूरी से वह अपनी व्यथा अपने भीतर छिपाए रह सकती है, पर साथ ही गहरी घृणा भी उसके मन में अवश्य छिपी रहेगी। दहेज के कारण कितनी आर्थिक विषमता समाज में पैदा होती है, इसे हम सब भली−भाँति जानते हैं। हममें से हर एक के यहाँ पुत्र है और साथ ही कन्या भी। यदि पुत्र के विवाह में दहेज लिया जाता है तो कन्या के में देना भी पड़ेगा। फिर क्यों दूसरों को पीड़ा दें और स्वयं उत्पीड़न सहें। दहेज के मिटने से सभी का लाभ है।

लालच, अहंता और मूर्खता

दहेज के पीछे जहाँ लड़केवालों की लोभवृत्ति काम करती है, वहाँ शेखीखोरी की अहंता भी कम नहीं जुड़ी होती। लोगों को भ्रम है कि, ‟जो जितना पैसा फूँकता है, वह उतना बड़ा अमीर समझा जाता है और जो जितना अमीर होता है, वह उतना ही बड़प्पन का अधिकारी है।” यह मान्यता वास्तविकता से बिलकुल विपरीत है। गाढ़ी कमाई का पैसा धूमधाम और बरात-दावत जैसे निरर्थक और कष्टसाध्य कार्य में उड़ा डालने में क्या बुद्धिमानी है? कोई भी उड़ाऊ आदमी, घरफूँक तमाशा देखने का ऊतपन अपनाकर दूसरों का उपहासास्पद ही बना है। फिर तीन दिन थोड़ी वाहवाही भी मिल जाए तो अपने बाल-बच्चों के पोषण के लिए नितांत आवश्यक पैसा इस प्रकार उड़ा देने से उत्पन्न होने वाली कठिनाई की तुलना में उस क्षणिक वाहवाही का मूल्य कितना हो सकता है? विवेक की कसौटी पर देखने से विवाह-शादियों में होने वाला खरच एक प्रकार से बिलकुल ही मूर्खतापूर्ण और निरर्थक सिद्ध होता है।

एक तीसरा कारण यह भी है कि कन्या के लिए बहुमूल्य जेवर चढ़ाने की माँग भी होती है। कन्यावाले प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लड़केवाले को मजबूर करते हैं कि वह कीमती जेवर और कपड़े चढ़ावें और अपनी अमीरी प्रमाणित करें। इस खरचीली माँग को पूरा करने के लिए लड़केवाला—'मियाँ की जूती मियाँ का सिर' वाली कहावत चरितार्थ करके लड़की वाले से ही जेवरों की कीमत दहेज के रूप में वसूल करता है। दहेज का विरोध आरंभ करने के साथ−साथ ही जेवर और कपड़ों का दिखावा बंद करने की प्रथा भी चलानी पड़ेगी। इस चढ़ावे को प्रतिष्ठा और प्रशंसा का आधार बिलकुल भी न बनने दिया जाए।

बड़ी संख्या में बरात ले जाने की, बड़ी−बड़ी दावत करने की, आतिशबाजी चलाने की, गाजे−बाजे की ऐसी कौन-सी आवश्यकता है, जिसके बिना विवाह कार्य संपन्न न हो सकता हो? यह फिजूलखरची हटाकर विवाह को अत्यंत सादा और सरल बना देना चाहिए, जिससे वह न तो लड़कीवाले के लिए कष्टसाध्य रहे और न लड़केवाले के लिए भारी पड़े। वर-कन्या के भावी जीवन प्रगति के लिए यदि कुछ दे सकना उनके पिता-माताओं के लिए संभव हो तो वह विवाह के कुछ समय बाद स्वेच्छापूर्वक उस समय दें, जबकि दबाव और प्रतिष्ठा जैसा कोई प्रश्न शेष न रह जाए।

बच्चियों पर कुठाराघात

विवाहों को महँगा बनाना अपनी बच्चियों के जीवन-विकास पर कुठाराघात करना है। जिन्हें अपनी या दूसरों की बच्चियों के प्रति मोह-ममता न हो, जिन्हें इस दो दिन की धूमधाम की तुलना में नारी जाति की बर्बादी उपेक्षणीय लगती हो, वे ही विवाहोन्माद का समर्थन कर सकते हैं। जब तक विवाह को भी नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ, यज्ञोपवीत की तरह एक बहुत ही सरल, स्वाभाविक, सादा और कम खरच का न बनाया जाएगा, तब तक नारी जाति की उन्नति और सुख-शांति की आशा दुराशामात्र ही रहेगी।

रूप नहीं, गुण की प्रधानता

यदि लड़के यह माँग करते हैं कि हमें सबसे अधिक रूपवती लड़की ही चाहिए तो यही अधिकार लड़कियाँ भी लेंगी। काले-कुरूप लड़कों को तब अविवाहित ही रहना पड़ेगा; क्योंकि लड़कों की भाँति लड़कियाँ भी रूप-लावण्य की कसौटी पर ही लड़कों का चुनाव करने लगेंगी। आज काली-कुरूप लड़कियों को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है, कल यही समस्या काले-कलूटे लड़कों के सामने उत्पन्न होगी। यदि कुरूप लड़कियों का उनके पति तिरस्कार करते हैं तो कुरूप लड़कों को कैसे अपनी पत्नी का आदर मिल सकेगा? नाप-तोल के एक ही बाँट रखने पड़ेंगे। भारत गरम देश है, यहाँ अधिकांश लोग काले-कलूटे होते हैं, क्या नर क्या नारी। यदि यहाँ गुण के आधार पर नहीं, रूप के आधार पर पसंदगी की प्रथा डाली तो राष्ट्र के दांपत्ति जीवन में असंतोष की वह आग सुलगने लगेगी कि तलाक और परित्यागों के प्रवाह में सारी गृह व्यवस्था नष्ट हो जाएगी। रूप की प्यास विवाह के बाद भी बनी रहेगी और उससे दांपत्ति जीवन की पवित्रता नष्ट होकर व्यभिचार और परित्याग की व्यापक अव्यवस्था दृष्टिगोचर होने लगेगी।

दोनों के लिए एक ही कसौटी

यदि स्त्री के मरने के बाद पुरुष दूसरा, तीसरा विवाह कर सकता है तो नारी को किस तर्क के आधार पर उस अधिकार से वंचित रखा जाएगा? यदि पतिव्रत आवश्यक है तो पत्नीव्रत की उपेक्षा कैसे सहन होगी? यदि पति के साथ सती हो जाना उचित है तो वह आदर्श पतियों को भी क्यों उपस्थित नहीं करना चाहिए? यदि वृद्ध पुरुष किशोरी लड़कियों को विवाह-बंधन में बाँध सकते हैं तो वृद्धाएँ भी किशोर लड़कों को वैसे ही बंधन में बँधने को विवश होने की आशा क्यों न करें? यदि कुलक्षणी स्त्री को उसका पति नहीं निबाहना चाहता तो बेवकूफ पति को उसकी स्त्री क्यों न दुत्कार देगी? नारी से हम शील-सदाचार की बड़ी−बड़ी आशाएँ करते हैं, उस बेचारी ने अपना प्राण निचोड़−निचोड़कर हमारी उस आशा की पूर्ति भी की है। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरा पक्ष बिलकुल ही निरंकुश रहे और शील-सदाचार का सारा भार एक ही पक्ष के ऊपर डाल दिया जाए।

जो भी नियम उचित एवं आवश्यक हों, वे दोनों ही पक्षों के ऊपर समान रूप से लागू होने चाहिए। यदि वर्त्तमान व्यवस्थाएँ और परंपराएँ नारी के लिए ठीक हैं तो उन्हें ही पुरुषों को भी अपना लेना चाहिए। यदि पुरुष अपने लिए कुछ अधिक सुविधाएँ चाहते हैं तो वे ही नारी को भी देने की उदारता उन्हें करनी चाहिए। न्याय की आत्मा कहती है कि, "नर और नारी के कार्यक्षेत्र में तथा शारीरिक स्थिति में भले ही कुछ अंतर रहे, पर इसी कारण उन्हें मानवोचित अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।" भले या बुरे जो भी नियम बनें, वे दोनों के लिए ही समान बनें।

एक गाड़ी के दो पहिये

शिक्षा और ज्ञान की दृष्टि से भारतीय नारी अत्यधिक पिछड़ी हुई है। उसका यह पिछड़ापन समाज की प्रगति में सब प्रकार बाधक है। एक पहिये की गाड़ी से कोई क्या आशा करेगा? अर्धांग पक्षाघात का रोगी अपनी सफल जीवनचर्या कैसे बना सकेगा। जिसकी आधी जनसंख्या नारी के रूप में दीन−हीन, शिक्षा−दीक्षा से रहित, मानवीय अधिकारों से वंचित और हर प्रकार पददलित स्थिति में पड़ी हुई है, वह समाज भला किस प्रकार सभ्यता और प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकेगा? इस कठिनाई पर हमें विचार करना होगा। राष्ट्र की आधी जनसंख्या को इस दुर्गति में देर तक नहीं छोड़ा जा सकता। यदि हमें सामाजिक स्तर में सभ्यता को स्थान देना है तो नारी के न्यायपूर्ण अधिकारों को उसे देने के लिए हमें इच्छा या अनिच्छा से तैयार होना ही पड़ेगा।


समाज−सुधार की अनिवार्य आवश्यकता

हमारे समाज में जहाँ अनेकों अच्छाइयाँ हैं, वहाँ कितनी ही बुराइयाँ भी हैं। अच्छाइयों को दृढ़तापूर्वक अपनाए रहने की निष्ठा जहाँ हम में होनी चाहिए, वहाँ इतना साहस भी रहना चाहिए कि जिन कुरीतियों को अनुचित एवं हानिकर समझते हैं, उनका परित्याग कर सकें। समय के परिवर्तन के साथ−साथ रीति−रिवाजों और प्रथा-परंपराओं को बदलने की भी आवश्यकता होगी, यदि यह परिवर्तन एवं सुधार कार्य रुक जाए तो समाज में सड़न पैदा हो जाती है।

समयानुसार परिवर्तन

जाड़े में गरम कपड़े पहने जाते हैं, पर गरमी आते ही हलके वस्त्र पहनने पड़ते हैं और जाड़े वाले ऊनी कपड़े तब निरुपयोगी हो जाने के कारण उठाकर रख देने पड़ते हैं। बरसात में छाता आवश्यक होता है, पर सरदी में उसकी कोई उपयोगिता नहीं रह जाती। स्वस्थ मनुष्य जो कुछ खाता है, वह बीमार होने पर नहीं दिया जा सकता। खुशहाली के दिनों में जैसा खरच करते हैं, अकाल पड़ जाने पर उसमें बहुत किफायत करनी पड़ती है। समयानुसार परिवर्तन की बात सभी स्वीकार करते हैं, इसी में बुद्धिमत्ता भी है। वैदिककाल में यज्ञों को आवश्यक धर्मकृत्य माना जाता था। कालांतर में उस विधान में विकृति आई और लोग यज्ञों के नाम पर पशुबलि करने लगे। देवी-देवताओं पर भी बलि चढ़ाई जाने लगी। एक अच्छी यज्ञप्रथा, जिसमें लोग अपनी बुराइयों और दुष्प्रवृत्तियों रूपी पशुता की बलि दिया करते थे, समय के परिवर्तन के साथ−साथ पशुबलि जैसे घृणित कार्य में बदल गई। इसे सुधारने के लिए भगवान बुद्ध आए, उनने अहिंसा का आंदोलन चलाकर पशुबलि की प्रथा-परंपरा का उन्मूलन करके रख दिया। कुछ दिन बाद अच्छी प्रथाएँ भी रूढ़ि बन जाती हैं और लोग अपनी बुराइयों को मिलाकर उन अच्छाइयों को भी विकृत कर देते हैं, तब उन्हें भी सुधारना आवश्यक हो जाता है।

बुद्ध द्वारा प्रसारित अहिंसा का सिद्धांत बड़ा अच्छा था, पर कालांतर में लोग उसके कारण कायर, अकर्मण्य और आत्मरक्षा योग्य पौरुष से भी हीन होने लगे। तब भगवान शंकराचार्य ने उसमें सुधार करने का आंदोलन आरंभ किया। उन्होंने बुद्ध धर्म की मान्यताओं का, अहिंसा के विकृत स्वरूप का विरोध करके पुरुषार्थपूर्ण वेदांत का प्रतिपादन किया और बुद्ध धर्म की जड़ हिला दी।

भक्तिवाद और संतकाल

बहुत समय बीतने पर जब वेदांत भी मिथ्या अहंकार का रूप धारण करने लगा और लोग समाज से विरक्त होकर शुष्क व्यक्तिवादी बनने लगे, अपने मतलब से मतलब रखने लगे तो उसकी बुराइयों को देखते हुए संतों ने भक्तिवाद का प्रचलन किया। सामूहिक कीर्त्तनों, मंदिरों एवं धर्मोत्सवों का प्रसार करके उन्होंने हिंदू समाज में उस समय फैली हुई पृथकतावादी विचारधाराओं को सामूहिकता एवं संगठन के रूप में मोड़ा, जिससे विश्रृंखलित हिंदू समाज परस्पर मिलने-जुलने का महत्त्व समझें और विदेशी आक्रमणों का जो ताँता उस समय लगा हुआ था, उसके विरुद्ध संगठित होने का प्रयत्न करें।

सिख धर्म का आध्यात्मिक स्वरूप भक्तिवादी है। गुरु नानक की वाणियाँ ग्रंथ साहब में भक्तिवाद की ही धारा हैं, पर वस्तुतः उस संगठन ने हिंदू समाज पर हो रहे विधर्मी आक्रमणों से रक्षा का बहुत बड़ा कार्य संपन्न किया। उस समय राजनैतिक एवं सामाजिक संगठन संभव नहीं था। जनता को धार्मिक झंडे के तले ही इकट्ठा किया जा सकता था। भक्तिकाल में यही प्रयत्न होते रहे। इसके बाद वह भक्तिवाद भी कालांतर में ढोंग-पाखंड का केंद्र बन गया। निकम्मे आलसी एवं धूर्त्त लोग इसी बहाने लोगों की श्रद्धा का पोषण करने लगे और उसमें सुधार की आवश्यकता अनुभव हुई तो स्वामी दयानंद ने आर्य समाज का आंदोलन आरंभ किया और कितनी ही कुरीतियों का उन्मूलन करके सुधार की एक महत्त्वपूर्ण धारा प्रवाहित कर दी।

सुधार की सनातन परिपाटी

यह सुधार कार्य सदा से होता रहा है। समय-समय पर ऋषि उस समय की परिस्थितियों को देखकर विभिन्न स्मृतियों की रचना करते रहे हैं। आजकल हिंदू कानून याज्ञवल्क्य स्मृति के आधार पर बना हुआ है। इससे पूर्व कालों में मनुस्मृति, पाराशर स्मृति आदि अनेकों स्मृतियाँ कार्यान्वित रही हैं। समय बदलने के साथ−साथ ऋषियों की स्मृतियाँ भी बदलने की आवश्यकता अनुभव होती रही और तदनुसार उन्होंने सामयिक विधानों को बदल देने में भी संकोच नहीं किया। मानवता के नैतिक गुणों को प्रतिपादित करने वाला आध्यात्मिक धर्म अपरिवर्तनशील है। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्तेय, दान, परोपकार, तप, संयम आदि के आध्यात्मिक नियम हर युग में एक से रहते हैं, पर खान-पान, वेषभूषा, रहन-सहन, रीति-रिवाज आदि के व्यावहारिक धर्म में सामयिक स्थिति के अनुसार हेर-फेर होता रहता है। एक समय में अच्छी रही वस्तु समयानुसार जब जीर्ण-शीर्ण हो जाती है तो उस फटी-पुरानी को बदलकर उसके स्थान पर नई को लाया जाता है। बूढ़े बैलों को पेंशन देकर नए बछड़े खरीदने का क्रम हर किसान के यहाँ चलता रहता है। हमारा शरीर भी जब बूढ़ा हो जाता है तब जीव उसे बदलकर नया चोला धारण कर लेता है। चूँकि यह शरीर पुराना है, इसलिए बढ़िया है, उसे नहीं छोड़ेंगे, ऐसा सोचा जाए तो इस दुनिया में बूढ़े बीमार ही भरे पड़े रहेंगे और तब हर दिशा में अस्पताल जैसी पीड़ा परेशानी ही बिखरी दिखाई देगी।

परिवर्तन और असुविधा

हर परिवर्तन असुविधाजनक होता है, पर उसके किए बिना काम नहीं चलता। सरकारी कर्मचारियों की बदली होती रहती है तो उसमें कुछ अड़चन और परेशानी जरूर होती है, पर यह अनिवार्य है। सब कर्मचारी अपने-अपने स्थान पर जमे बैठे रहें तो उनके राग-द्वेष का अनुचित प्रभाव जनता पर पड़ने लगेगा इसलिए बहुत खरच पड़ने और परेशानी होने की बात को जानते हुए भी कर्मचारियों का परिवर्तन होते रहना आवश्यकता माना जाता है। रीति-रिवाजों का हेर-फेर भी इसी प्रकार अनिवार्य एवं आवश्यक होता है। अपरिवर्तनवादियों को उस में बहुत अड़चन जैसी बात दीखती है और वे विरोध भी करते हैं, पर उनके विरोध को सहन करते हुए भी समाज को आगे ही बढ़ना पड़ता है। इसके अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं।

बाल विवाह का प्रतिपादन

यवनकाल में जब कुमारी कन्याओं का अपहरण शासकों की वासना−अग्नि तृप्त करने के लिए आम बात बनी हुई थी, तब छोटी लड़कियों को बहू के रूप में परिणित कर देने की उपयोगिता सोची गई। यद्यपि उससे होने वाली शारीरिक और मानसिक हानि को सब लोग समझते थे, पर अपहरण जैसे आघात को सहने की अपेक्षा वह हानि कम महत्त्व की समझी गई और बाल विवाह चल पड़ा। पंडित काशीनाथ ने शीघ्रबाध में 8, 9,10 वर्षों की कन्याओं के विवाह का प्रतिपादन श्लोक बनाकर कर दिया और यहाँ तक लिख दिया कि बारह वर्ष से अधिक बड़ी कन्या हो जाने पर भी विवाह न करने से उसके अभिभावक रौख-नरक को जाते हैं। विचार की दृष्टि से बात बिलकुल अटपटी है। कहाँ तो वैदिककाल की पच्चीस वर्ष तक ब्रह्मचर्यपूर्वक विद्याध्ययन करने के बाद लड़के-लड़कियों के विवाह करने की सुदृढ़ परंपरा और कहाँ यहाँ आठ वर्ष की कन्या का विवाह करने पर स्वर्ग का पुण्य मिलने की उपहासास्पद व्यवस्था। पर उस समय वही उचित था। बाल विवाह की सामयिक उपयोगिता सबकी समझ में आ गई और उसका प्रचलन कुछ ही दिनों में हो गया। किसी समझदार ने उसका विरोध नहीं किया। परदाप्रथा भी इसी आधार पर थी। स्त्रियों को घर से बाहर न जाने देने, घर के भीतर ही रहने, यज्ञ आदि किसी सामूहिक कार्य में भाग न लेने की प्रथा इसलिए चलाई गई कि अपनी बहू-बेटियों के रूप-लावण्य की चर्चा बाहर न फैलने पाए और आततायियों का दाँत उन पर होने से भयंकर आपत्ति आने से बचाव हो सके। वह परिस्थितियाँ आज नहीं रहीं। आज हमारी बहिन-बेटियों की इज्जत सुरक्षित है, फिर बाल विवाह और परदाप्रथा की क्या उपयोगिता रह जाती है? यह तर्क किसी काम का नहीं कि यह पुरानी प्रथा है, ब्रह्मचर्यपूर्वक पच्चीस वर्ष तक विद्याध्ययन करके विवाह करने वाली बात को एक समय बदलकर बाल विवाह जैसी अटपटी बात को स्वीकार कर लिया गया तो अब वैसी परिस्थिति न रहने पर सनातन वैदिक परंपरा को पुनः लाने में क्यों आपत्ति होनी चाहिए? परदा भारतीय संस्कृति के सर्वथा विपरीत है। प्राचीनकाल की महिलाओं के रहन-सहन का वर्णन धर्मग्रंथों में मिलता है, उनमें परदा का कहीं संकेत भी नहीं है। चित्रों में भी कोई प्राचीनकाल की भारतीय नारी घूँघट काढ़े नहीं दिखाई देती। फिर मध्यकाल की एक सामाजिक प्रथा को हम अतीत से चली आने वाली सनातन प्रथा की तुलना में क्यों महत्त्व दें? परदाप्रथा और बाल विवाह की कोई उपयोगिता किसी भी दृष्टि से जब दिखाई नहीं देती तो उनके लिए आग्रह क्यों किया जाए?

जेवरों की परिपाटी

किसी समय संग्रहित धन को सुरक्षित रखने के लिए बैंक जैसे कोई विश्वस्त संस्थान न थे। घर में धन रहने पर चोरी होने का डर रहता था। इसलिए लोग अपनी संग्रहित कमाई को सोने-चाँदी के जेवर बनाकर हर घड़ी अपने साथ रखते थे और शरीर पर धारण किए रहते थे। आज स्थिति भिन्न है। बैंकों में पैसा सुरक्षित भी है, ब्याज भी मिलता है। जेवर बनाने में टाँका, बट्टा, मजूरी, टूट-फूट, घिसन आदि में नुकसान भी बहुत होता है, साथ ही शत्रुता ईर्ष्या देखा-देखी से गरीबों को भी उनकी आकांक्षा जगने से किसी भी प्रकार धन प्राप्त करने की अभिलाषा, चोरी, डकैती, हत्या आदि का खतरा पैदा होता है। गंदगी बढ़ती है एवं नाक में पहने जाने वाले जेवरों से तो साँस लेने एवं नासिका छिद्रों की सफाई तक में बाधा पड़ती है, जो आरोग्य की दृष्टि से बहुत हानिकारक है। इन बुराइयों को जानते हुए भी, जेवर की अनुपयोगिता समझते हुए भी यदि हम केवल प्रथा परंपरा के आधार पर उसे अपनाए रहते हैं तो इसमें कौन-सी बुद्धिमत्ता की बात कही जा सकती है?

मृत्युभोज का कारण

मृत्युभोज की बड़ी दावतें देने की प्रथा उस समय चली होगी जब बार−बार अकाल पड़ते थे और भूखे-प्यासे लोग अधिक रहते थे, तब मृतात्मा की शांति के लिए भूखे-प्यासों को भोजन कराके पुण्यप्राप्ति की बात सोची जाती होगी। पर आज जब यार-दोस्तों को भूखे-प्यासे अकाल पीड़ितों के स्थान पर दावत खिलाने बुलाया जाए तो इसमें खाने वाले और खिलाने वाले का क्या गौरव रह जाता है? जिस घर में एक व्यक्ति को मरे पंद्रह दिन भी नहीं हुए हैं, वहाँ शोक सांत्वना देने के स्थान पर दोस्त लोग दावत उड़ाने और उस बेचारे के घर को खाली करने जा पहुँचें तो इसमें क्या भलमनसाहत की बात है? एक व्यक्ति के मर जाने से परिवार की क्षति होना स्वाभाविक है। इस पर भी बड़े प्रीतिभोज का भार उस परिवार पर पड़े तो उसकी आर्थिक स्थिति और भी बिगड़ेगी। सताए को और सताने वाली इस प्रथा से—‘मरे को मारें शाह मदार’ वाली कहावत ही चरितार्थ होती है। ऐसे रिवाजों को इसलिए जारी रखा जाए कि इसकी प्रथा चली आ रही है तो यह मानसिक दुर्बलता क्योंकर उचित कही जा सकती है?

भूत-पलीतों का अंधविश्वास

भूत-पलीत के नाम पर सयाने-दिवाने कैसा भ्रम-जंजाल उत्पन्न करते हैं, लोगों को कितना डरपोक बनाते हैं, और कमजोर दिल-दिमाग वालों को तो सचमुच ही वह भ्रमपूर्ण मान्यता, एक बीमारी बनकर चिपक जाती है और कई बार तो उससे प्राणघातक दुष्परिणाम तक होते हैं। गाँव-गाँव के जाति-जाति के ऐसे असंख्यों देवता उपज पड़े हैं, जिनकी शास्त्र-पुराणों में कहीं चर्चा दिखाई नहीं पड़ती। फिर यह उपजे हुए देवी-देवता, भूत-पलीतों की श्रेणी में ही आते हैं। इन्हीं पर ज्यादातर बकरे, भैंसे, मुर्गे, कबूतर, शराब, गाँजा चढ़ाने का रिवाज है। हिंदू धर्म में वैदिक और पौराणिक देवताओं की ही क्या कमी है, जो इन प्रेत-पिशाचों का एक नया वर्ग और देवताओं की श्रेणी में सम्मिलित किया जाए? इनसे अनेकों भ्रांतियाँ बढ़ती हैं, कई बार बहुत हानिकारक परिणाम होते हैं।

हमारा हर त्योहार सामाजिक सुव्यवस्थाओं का संदेश लेकर आता है। श्रावणी वेदाध्ययन का, विजयदशमी शारीरिक बल का, दिवाली धन के सदुपयोग का, गोपाष्टमी गोसंवर्द्धन का, बसंतपंचमी विद्याध्ययन का, होली सफाई का, गंगादशहरा तप का, गुरु पूर्णिमा गुरुजनों के सम्मान का शिक्षण करने आती है। इन पुनीत पर्वों के उद्देश्य के विपरीत अहितकर उलटे काम किए जाएँ तो यह कितने दुःख की बात होगी। दिवाली पर जुआ खेलना, होली पर नशे पीना और अश्लील उद्दंडता का प्रदर्शन करना कितना बुरा है। पुरानी प्रथा कहकर यदि इन अनुचित बातों को चलने दिया जाए तो उससे कोई सत्परिणाम प्राप्त होने वाला नहीं है।

दान में विवेक की आवश्यकता

दान एक बहुत ही अच्छी परंपरा है। आध्यात्मिक उदारता और सामाजिक उन्नति के लिए उसकी भारी आवश्यकता भी है। जिस समाज के लोग लोभी, कंजूस और स्वार्थी बनकर अपना ही स्वार्थ-साधन करने में लगे रहते हैं, दूसरों की उन्नति में योग देने के लिए अपना समय एवं धन खरच करना नहीं चाहते, उस वर्ग के लोगों की स्वार्थपरता ही उनके अधःपतन का कारण बन जाती है। पर साथ ही यह भी ध्यान रखने की बात है कि दान का उपयोग विवेकपूर्वक हो। अपने से पिछड़े हुए दीन-दुखी असमर्थ लोगों को उनकी प्रगति के आवश्यक साधन जुटाने में सहायता करते रहना उचित है। ज्ञान और सदाचार बढ़ाने वाले सत् शिक्षण को ब्रह्मदान कहा गया है। संसार का कल्याण इसी महान प्रक्रिया पर निर्भर है इसलिए उस प्रक्रिया को सजीव रखने के लिए भी अपनी पुण्य कमाई में से देते रहना आवश्यक है। गिरे हुओं को उठाने के लिए उनकी साधनों से अथवा ज्ञान से सहायता करना ही दान का उद्देश्य है। पर जब इस उद्देश्य के विपरीत अमुक वंश या अमुक वेष के लोगों को उनकी पात्रता एवं गतिविधियों का ध्यान न रखते हुए स्वर्ग प्राप्ति की अंधश्रद्धा के आधार पर दान दिया जाता है तो उससे लाभ कुछ नहीं, हानि बहुत है। निकम्मे, निठल्ले, आलसी, दुर्गुणी और धूर्त्तों को मुफ्त की कमाई जब अनायास ही मिल जाती है तो उनके दुर्गुण दिन दूने बढ़ते रहते हैं। धर्म के नाम पर उसमें विवेक का समन्वय नहीं होता। यदि विवेकपूर्वक, उपयोगी एवं सत्कार्यों के लिए वह धन खरच किया जाए तो उससे समाज में सत्प्रवृत्तियाँ भी बढ़ सकती हैं और उनके सत्परिणाम का पुण्य उस दानी को भी मिल सकता है। दान की प्रवृत्ति बढ़ाने की जहाँ आवश्यकता है; कुपात्रों और अंधविश्वास से धन लुटाने के अपव्यय को रोकना भी उचित है।

व्यर्थ के चुन्न-पुन्न

पिछले लेख में विवाह-शादियों में धन की होली खेले जाने की मूर्खता पर प्रकाश डाला जा चुका है। उस अपव्यय को रोकने के लिए यदि प्रयत्न न किया गया तो हमारा आर्थिक और सामाजिक ढाँचा बुरी तरह लड़खड़ाने लगेगा। हमारा समाज बुद्धि, धर्म, उदारता एवं अनेकों जन्मजात विशेषताओं के कारण संसार के किसी भी प्रगतिशील समाज से पीछे नहीं है, पर उसकी सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि सामाजिक कुरीतियों में धन और समय का भारी अपव्यय करने के लिए उसे विवश होना पड़ता है। इसी प्रकार उसकी सबसे बड़ी दुर्बलता भी यह है कि इन प्रथाओं की हानियों को भली प्रकार जानते और मानते हुए भी वह उन्हें छोड़ने का साहस नहीं कर पाता। विवाह ही नहीं, विवाह के बाद भी त्योहारों पर या विशेष अवसरों पर कन्या वालों को वरपक्ष के यहाँ अनेकों कीमती उपहार भेजते रहना पड़ता है। जो धीरे−धीरे करके कुछ दिन में विवाह जितना ही एक और ऊपरी खरच बँध जाता है। लड़की के बच्चा होने पर उसके बच्चों का विवाह होने पर बहुत-सा उपहार एवं प्रदर्शन के साथ देने का रिवाज है। जिनकी आर्थिक स्थिति इस लायक नहीं है, उनके लिए तो यह व्यर्थ के रीति−रिवाज भी बहुत भारी पड़ते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा की दृष्टि से लोग इन्हें करते तो हैं, पर मन-ही-मन उससे दुःख भी बहुत पाते हैं। जिन्हें दिया जाता है, उनके लिए भी वे प्राप्त चीजें मेवा, मिठाई, कपड़े, खिलौने आदि कुछ विशेष उपयोगी नहीं होते। एक व्यर्थ के आडंबर में ही इतना धन खरच करना पड़ता है जिसके कारण लोगों की आर्थिक स्थिति इतनी खोखली हो जाती है कि प्रगति के किसी भी मार्ग पर बढ़ सकना उनके लिए संभव नहीं रहता।

नशेबाजी का फैशन

नशेबाजी ने अब एक फैशन का रूप धारण कर लिया है। लाभ-हानि की दृष्टि से नहीं, फैशन की दृष्टि से लोग उसका उपयोग करते हैं। तमाकू का प्रचलन कितना अधिक हो गया है, इस पर आश्चर्य होता है। लगभग दो करोड़ रुपये मूल्य का तमाकू हम प्रतिदिन पीते हैं, अर्थात् 720 करोड़ वार्षिक का धुँआ हर वर्ष यों ही उड़ा दिया जाता है और उसके बदले में कैंसर, कफ, खाँसी, श्वास, प्रदाह, अनिद्रा, गठिया, दमा, स्नायु, दौर्बल्य, लकवा सरीखे भयंकर रोग खरीद लिए जाते हैं। जितनी जमीन में तमाकू उपजाई जाती है, उतने में अन्न उपजे तो लाखों करोड़ों का पेट भर सकता है। जितनी जनशक्ति तमाकू उपजाने, बीड़ी-सिगरेट बनाने में लगी रहती है, वह यदि उपयोगी उत्पादन करे तो लोगों की कितनी ही महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं। शराब, गाँजा, चरस, अफीम, भाँग, चाय आदि नशे हमारे शारीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य को भी चौपट करते हैं। क्रोध, उत्तेजना, आवेश, चिंता, दीर्घसूत्रता आदि अनेकों तामसिक दुर्गुण नशेबाजों में बढ़ते रहते हैं और वे धीरे−धीरे असभ्य कहलाने वाली बुराइयों में ग्रसित होते चले जाते हैं। सभ्य समाज की रचना के लिए जिन बुराइयों का उन्मूलन आवश्यक है, उनमें से नशेबाजी का स्थान उपेक्षणीय नहीं है। फैशन के नाम पर यह व्यर्थ ही नहीं, हानिकर आदत यदि चलते रहने दी गई तो हमारा स्तर ऊँचा न उठ सकेगा।

नीच−ऊँच का आधार

गुण, कर्म, स्वभाव के कारण मनुष्य ऊँचे भी बनते हैं और नीचे भी गिने जाते हैं। अपनी विशेषताओं के कारण लोग प्रतिष्ठा भी प्राप्त करते हैं और नीच भी समझे जाते हैं, पर यह एक विचित्र बात है कि अमुक घर, वंश या कुल में जन्म लेने के कारण किसी को ऊँचा या नीचा समझा जावे। हर वंश में भले आदमी हो सकते हैं और बुरे भी। फिर उन सारे वंश को नीचा या ऊँचा मान लेना किसी भी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता। प्राचीनकाल में किसी वंश के लोगों ने अच्छे या बुरे काम करके कोई प्रतिष्ठा या निंदा प्राप्त की थी तो उनके वंशजों को भी बिना उनके वर्त्तमान गुणों की जाँच किए, पूर्वजों जैसा ही मान लिया जाए, इसमें क्या बुद्धिमत्ता है? कलेक्टर के बच्चों को कलेक्टर और डॉक्टर के बच्चों को जब डॉक्टर नहीं माना जाता तो किन्हीं भले या बुरे पूर्व पुरुषों के वंशजों को उन्हीं जैसा ऊँच या नीच कैसे माना जा सकता है?

विशाल मानव समाज में अनेकों वंश, परिवार और वर्ग हो सकते हैं, पर जाति तो एक मनुष्य ही रहेगी। घोड़ा, गाय, भैंस, बकरी आदि पशुओं की जिस प्रकार अपनी−अपनी जाति होती है, उसी प्रकार मनुष्य की भी एक जाति है। गाय−गाय के बीच अंतर हो सकता है, यह अंतर उसकी निजी विशेषताओं के कारण होगा, पर पूज्य तो सभी गायें मानी जाएँगी। उनके सामाजिक सम्मान में तो कोई कमी न करेगा। मनुष्य और मनुष्य के बीच में ऊँच−नीच की दीवार खड़ी करना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता। यह अनुपयुक्त दृष्टिकोण हमारे सामाजिक संगठन में भारी बाधा बना हुआ है। करोड़ों हिंदुओं को विधर्मी बना देने और देश के खंड−खंड करा देने का सारा दोष इसी संकीर्णता का है। हम जब तक अनेक भागों में विभक्त रहेंगे और एकदूसरे से घृणा करते रहेंगे, तब तक संगठित समाज की एकता का आशाजनक वातावरण कैसे उत्पन्न हो पावेगा?

सुधार और सफाई

हमारा समाज जितना श्रेष्ठ और प्राचीन है, उतनी ही कुरीतियाँ और बुराइयाँ भी उसमें प्रवेश कर गई हैं। जिस प्रकार सिर में पड़ जाने वाले जुओं को बीन−बीनकर फेंक दिया जाता है, उसी प्रकार सामाजिक रीति−रिवाजों को भी विवेक की कसौटी पर कसना होगा, जो उपयुक्त हों उनको प्रोत्साहन देने और जो अनुपयुक्त हों उनका परित्याग करने के लिए हमें तत्पर होना होगा। दूरदर्शी किसान अपनी खेती में उपजने वाले धान्य को सींचता रखाता है, पर हानिकारक घास-पात को खोदता हटाता भी रहता है। यदि ऐसा न किया जाए तो निरर्थक घास-पात बढ़ जाने से धान्य की फसल ही नष्ट हो जाएगी। समाजरूपी खेत में जहाँ सत्प्रवृत्ति की फसल को सींचा और रखाया जाना आवश्यक है, वहाँ कुरीतियों के घास-पात को उखाड़ने की भी नितांत आवश्यकता रहेगी। हमें इस ओर से उदासीन नहीं रहना चाहिए।

संकोच और विरोध

एक मानसिक दुर्बलता लोगों में यह देखी जाती है कि उन्हें पुराना ढर्रा ही पसंद होता है, नई व्यवस्था चलाते हुए उन्हें झिझक एवं संकोच का अनुभव होता है। अच्छाई को अच्छाई मानते हुए भी वे संकोचवश उसे कर नहीं पाते और बुराई को बुराई समझते हुए भी उसको हटाने का साहस उनमें नहीं होता। वे सोचा करते हैं कि इस परिवर्तन का लोग उपहास या विरोध करेंगे। अनेक तरह की बात कहेंगे और तरह−तरह के प्रश्न पूछेंगे, उनका उत्तर देने या समाधान करने का साहस अपने में न होने से झेंप उठानी पड़ेगी और हमारी अप्रतिष्ठा बढ़ेगी। पर यह मान्यता सर्वथा थोथी और निरर्थक है। वीर और साहसी पुरुष जो अनुपयुक्त प्रथाओं को तोड़कर उनके स्थान पर उपयुक्त प्रथाओं की स्थापना में अग्रसर होते हैं, वे जननेतृत्व करने वाले, महापुरुष एवं युग प्रवर्त्तक समझे जाते हैं। जिन कुप्रथाओं का उल्लेख ऊपर की पंक्तियों में किया गया है; विचारशील लोगों में से प्रायः हर एक ही उनका उन्मूलन उचित समझता है, पर यह सोचकर कि मैं अकेला ही कैसे कोई कदम उठाऊँ? बेचारा संकोचवश चुप बैठा रहता है। यदि कोई साहसी व्यक्ति आगे बढ़कर समाज का मार्गदर्शन करने के लिए अपना अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत कर सके तो निश्चय ही उनकी निंदा नहीं प्रशंसा होगी।

साहस की आवश्यकता

हो सकता है कि सड़े−गले दिमाग के कुछ कूड़ापंथी, इन समाज-सुधार कार्यों का विरोध करें। पर विरोध से डरना क्यों चाहिए? क्या संघर्ष को ही जीवन नहीं कहा गया है? जिस मार्ग में कोई कठिनाई न आए, वह भी क्या मंजिल? विरोध और विघ्नों को चीरते हुए आगे बढ़ने को ही तो पराक्रम कहते हैं। धार को चीरती हुई प्रवाह की उलटी दिशा बढ़ चलने वाली मछली ही तो दर्शकों के आकर्षण का केंद्र बनती है। प्रवाह की दिशा में लुढ़कता−पुढ़कता तो कूड़ा−कचरा भी चला जाता है। विवेकपूर्ण नैतिक धर्म-मर्यादाओं के पालन में हमें नितांत श्रद्धावान और परंपरावादी रहना चाहिए, पर कुरीतियों के सड़े-गले मवाद को साफ करने से झिझकने में तो कायरता और दुर्बलता ही कारण हो सकती है। जनहित, समाज−कल्याण और युग−निर्माण की दृष्टि से हमें इतना साहस तो दिखाना ही पड़ेगा।


लक्ष्यपूर्ति के लिए हमें भी कुछ तो करना ही होगा

मानव प्राणी, परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ कृति है। प्रभु ने उसकी रचना पर सबसे अधिक श्रम किया है और उसे सर्वांगपूर्ण बनाया। वाणी, बुद्धि और भावना का अनुपम उपहार उसे मिला हुआ है, उसका यदि सदुपयोग कर सके तो मनुष्य सचमुच पृथ्वी का देवता बन सकता है और अपने समाज एवं वातावरण को स्वर्ग जैसा आनंदमय परिस्थितियों से परिपूर्ण कर सकता है। इस प्रकार की सभी सुविधाएँ और क्षमताएँ उसे जन्मजात रूप से प्राप्त हैं, पर दुर्भाग्य इतना ही है कि श्रेष्ठ सत्प्रवृत्तियों को अपनाकर जो दूरगामी महान परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं, उनके लिए धैर्य रखने और श्रम करने की गुँजाइश उसे नहीं रहती, अधिक से अधिक तत्क्षण तुरंत लाभ प्राप्त करने की अधीरता में वह न करने योग्य काम करने लगता है और न चलने योग्य मार्ग पर चलने लगता है। पर इतनी-सी ही एक छोटी भूल उसे कहीं-से-कहीं ले पहुँचती है। उसका निजी जीवन अशांत रहता है और दूसरों को अशांतिमय परिस्थितियों में धकेलता है। सभ्यता का अर्थ है— 'सदाचार'। सदाचार का परित्याग करके, मानवीय कर्त्तव्य की मर्यादाओं का उल्लंघन करने से व्यक्ति आकृति में मनुष्य रहते हुए भी प्रकृति में पशु बन जाता है। पशुओं का समाज असभ्य कहलाता है, आज मनुष्य समाज अपनी चारित्रिक क्षुद्रता के कारण असभ्य ही बना हुआ है।

सत्प्रवृत्तियों का विस्तार

किन सत्प्रवृत्तियों के पनपने से समाज में श्री, समृद्धि एवं सुव्यवस्था रह सकती है और किन सद्गुणों को अपनाने से मनुष्य देव जीवन जैसी शांति तथा सुविधा प्राप्त कर सकता है, उसका कुछ दिग्दर्शन इस अंक में कराया गया है। पिछले अंकों में भी इस संबंध में काफी चर्चा की जा चुकी है। इनमें से कोई बात ऐसी नई नहीं है, जिसे हम जानते न हों, पहले भी यह सब बातें हम जाने और समझे हुए होते हैं। पर कठिनाई केवल कार्यरूप में परिणत करने की रहती है। भाषणों और लेखों में हम अनेकों महत्त्वपूर्ण बातें सुनते−पढ़ते हैं। कितनी ही आवश्यकताएँ हम सोचते-समझते भी हैं, पर वे केवल कल्पना तक ही सीमित रह जाती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि जो कुछ हम उचित एवं आवश्यक समझते हैं, उसे कार्यान्वित करने का भी प्रयत्न करें। धीरे−धीरे भी चलती रहने वाली चींटी योजनों की यात्रा पार कर लेती है, पर केवल विचारमग्न बैठा रहने वाला गरुड़ भी जहाँ का तहाँ पड़ा रहता है। सद्विचारों का कोई परिणाम देखना हो तो उन्हें कार्यान्वित ही करना पड़ता है।

प्रचंड संघशक्ति की सामर्थ्य

बहती हुई जलधारा की ओर प्रवाह में बहते चले जाना सुगम है। ऊपर से नीचे उतर आना भी सहज है। पर बहती हुई धारा को चीरकर उलटे चलना और नीचे से ऊपर चढ़ना कठिन होता है। आज मानव समाज में जो दुष्प्रवृत्तियाँ एवं अंधपरंपरा चल रही है, उसी में भेड़चाल चलते रहना सामान्य बात है। पर उन्हें हटाकर जीवन का नया क्रम बनाना हो और दूसरों को गिरावट से खींचकर उत्थान की ओर खींचना हो तो इसके लिए विशेष मनोबल, साहस, पुरुषार्थ एवं प्रयत्न की आवश्यकता पड़ेगी। साधारणतः इस प्रकार का कार्य एकाकी नहीं हो पाता। इसके लिए संगठित एवं सुसंबद्ध शक्ति उत्पन्न करनी पड़ती है।

भारी-से-भारी चीज को नीचे पटक देने में एक धक्का मार देना पर्याप्त है, पर ऊपर उठाने के लिए क्रेन जैसी कीमती मशीन और उसे उपयोग में लाने वाले कुशल कारीगरों की आवश्यकता पड़ती है। युग−निर्माण के जिस महान लक्ष्य को लेकर हम अग्रसर हो रहे हैं, उसके लिए भी एक सुसंगठित जनशक्ति का सुनियोजित ढंग से कार्य−संलग्न होना आवश्यक है। जिस प्रकार अनेक पुर्जों के मिले बिना कोई मशीन नहीं बन सकती, उसी प्रकार कितने ही मनुष्यों का एक सुगठित संगठन बने बिना युग−निर्माण जैसे महान कार्य की सफलता संभव नहीं ।

लंका विजय का श्रेय अकेले राम को नहीं, रीछ-बंदरों की सारी सेना को है। गोवर्धन उठाने में गोप-बालकों का लाठी लगाकर खड़े होना भी महत्त्वहीन नहीं है। देवताओं के सामूहिक रक्तसंचय से भरे हुए घड़े से ही सीता का जन्म हुआ था और वे ही रावण जैसे अपराजित योद्धा के नाश का कारण बनी थीं। यों संघशक्ति प्रत्येक युग में महत्त्वपूर्ण रही है, पर इस कलियुग में तो वही सर्वोपरि है। वोट के बल से सरकारें बदल जाती हैं तो सामूहिक जनप्रयास से युग का बदल जाना भी क्यों कठिन होना चाहिए?

हमारा सजीव संगठन

'अखण्ड ज्योति परिवार' को हमने सदा से एक सजीव, सक्रिय एवं सत्प्रवृत्तियों में संलग्न सेना माना है। इसी के द्वारा गत बीस वर्षों से लाखों मनुष्यों के जीवन में ऐसे हेर−फेर संभव हुए, जिनसे राष्ट्रीय प्रगति में भारी योगदान मिला है। 'अखण्ड ज्योति' केवल सन्मार्ग का शिक्षण ही नहीं देती, वरन उसके साथ एक प्रेरणा भी सन्निहित रहती है, जिसके कारण पाठक केवल उन विचारों को पढ़कर ही संतुष्ट नहीं हो जाता, वरन कुछ उस दिशा में कदम भी बढ़ाने पड़ते हैं। इन विचारों के साथ घुली हुई प्रेरणा जिसके पास तक पहुँचेगी, वह निश्चेष्ट दर्शकमात्र नहीं रह सकता, उसे सत्पथ पर अग्रसर होना ही होता है, उसके बिना उसे चैन भी नहीं मिल सकता। प्रकाश की जो किरणें 'अखण्ड ज्योति' अपने पाठकों के मन में उत्पन्न करती है, उनसे उनका जीवन भी ज्योतिर्मय होने लगता है। गत अक्टूबर 1961 से तो उसका स्वरूप ही दूसरा बन गया है, वह अब 'साधारण ज्योति' न रहकर एक 'जाज्वल्यमान मशाल' बन गई है। युग−निर्माण के लिए ऐसी ही ज्वाला की आवश्यकता भी थी।

सदाचार, चरित्र−निर्माण, आस्तिकता और मानवीय धर्म कर्त्तव्यों को मानव जीवन में कूट−कूटकर भर देने के लिए ही अपना प्रचंड प्रयास गत 25 वर्ष से चलता रहा है। अब जबकि हमारा कार्यकाल दस वर्ष ही शेष है— उसमें से भी एक वर्ष बीत चुका— तो बाकी नौ वर्षों में अत्यधिक तत्परता के साथ द्रुतगति से कदम बढ़ाने पड़ेंगे। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की रचना का त्रिविधि कार्यक्रम व्यापक विस्तृत जनसमूह के अंतस्थल तक पहुँचाने और उसे कार्यान्वित कराने का कार्य छोटा नहीं, सचमुच ही बड़ा है। इसके लिए बड़े साधन भी चाहिए। यह साधन, जनशक्ति ही हो सकती है। घर का साधारण−सा छप्पर उठाने के लिए बहुत आदमियों की जरूरत पड़ती है तो युग−निर्माण और साँस्कृतिक पुनरुत्थान का छप्पर उठाने का कार्य बिना जनशक्ति के कैसे संभव होगा? यह युगांतरकारी शक्ति कहीं बाहर से नहीं, हमें अपने ही भीतर से उत्पन्न करनी है। हमें अपनी शिथिलता एवं उपेक्षा को तत्परता एवं क्रियाशीलता में परिणत करना है।

खेद की बात है कि 'गायत्री परिवार' का एक विशाल संगठन बना था, पर उसके सदस्यों को 'अखण्ड ज्योति' पढ़ते रहने का महत्त्व हम न समझा सके, फलस्वरूप उनमें से अधिकांश लोग उस दिशा में चल सकने की स्थिति में न आ सके, जो हमारा लक्ष्य था। अब यह निश्चित रूप से स्वीकार कर लिया गया है कि उन्हीं को अपने परिवार का परिजन माना जा सकता है और उन्हीं से कुछ आशा रखी जा सकती है जो 'अखण्ड ज्योति' पढ़ते हैं। जो हमारी वाणी को सुनना नहीं चाहते, जिन्हें हमारे विचारों और प्रेरणाओं की आवश्यकता नहीं, जो हमारे सुझावों और संदेशों का कोई मूल्य नहीं मानते, उन्हें परिजन कहना हमारा एक भ्रममात्र था, जो अब पूरी तरह दूर कर लिया गया है। अपने परिचित लोगों की भारी भीड़ में से हम युग−निर्माण जैसे महान कार्य में कुछ सहयोग की आशा उन्हीं से करते हैं, जो कम-से-कम हमारे विचारों के प्रति सहानुभूति रखते हैं और उन्हें पढ़ने की आवश्यकता अनुभव करते हैं।

आगामी कार्यक्रम और उनका आधार

गत जनवरी के अंक में हम अपनी आगामी योजनाओं की चर्चा कर चुके हैं। 'युग−निर्माण' के लिए विचार ही पर्याप्त नहीं, वरन रचनात्मक कार्यक्रमों को अपनाकर हमें व्यक्तिगत जीवन में आदर्शवादिता की स्थापना और समाज में स्वस्थ परंपराएँ डालने के लिए अनेक प्रयत्न करने होंगे। देश-काल, पात्र की स्थिति देखते हुए कार्यक्रमों में हेर−फेर होते रह सकते हैं, पर आवश्यकता उन व्यक्तियों की है जो 'युग−निर्माण' की विचारधारा को अपने तथा दूसरों के जीवन में साकार रूप दे सकें। ऐसे व्यक्ति 'अखण्ड ज्योति' के पाठकों में से निकल सकेंगे। इसका हमें पूरा और पक्का विश्वास है। कार्य की महानता और क्षेत्र की व्यापकता को देखते हुए अभी 'अखण्ड ज्योति परिवार' संख्या की दृष्टि से बहुत छोटा है, इसे बढ़ाने की आवश्यकता है। पिछले अंकों में वर्त्तमान स्वजनों से हम यह प्रार्थना करते रहे हैं कि 'अखण्ड ज्योति परिवार' को बढ़ाने के लिए प्रयत्न किया जाए। अपना क्षेत्र जितना विस्तृत होगा सफलता की संभावना भी उतनी ही बढ़ेगी। जिनके पास 'अखण्ड ज्योति' पहुँचती है, उन्हें उसे एक बार नहीं, दो-तीन बार पढ़ना चाहिए। जितनी बार पढ़ेंगे, उसमें कुछ नई बात और नई प्रेरणा मिलेगी। जिन्हें हम अपना समझते हैं, जिनके उत्थान में हमारी दिलचस्पी है, उन सबको इसके पढ़ने के लिए बाध्य करना चाहिए और जो बिना पढ़े हैं, उन्हें पढ़कर सुनाना चाहिए। जिन्हें हमारे विचार निरंतर मिलते रहेंगे, वे सदा छूँछे नहीं बने रह सकते, उनके विचारों ओर कार्यों में प्रगति होनी ही है—होगी ही।

हममें से किसी के स्वजन, संबंधी, मित्र, पड़ोसी ऐसे न रहें, जो 'अखण्ड ज्योति' न पढ़ते हों। बहिनें और बेटियाँ ससुराल में चली जाती हैं, बहनोई और दामाद दूर रहते हैं, उन्हें जिस प्रकार अन्य उपहार दिए जाते हैं, उसी प्रकार अपने पास से उनका चंदा जमा करके पत्रिका चालू कराई जा सकती है। अन्य मित्रों और संबंधियों की हितकामना से भी ऐसे उपहार देना, उनकी सच्ची सहायता का आयोजन करना है। विचारों से बड़ा उपहार और कोई इस संसार में हो नहीं सकता। साथ ही यह भी प्रयत्न करते रहना चाहिए कि वे लोग अपने पैसों से उपयोगी वस्तु खरीदना सीखें। दूसरों के उपहार पर परावलंबी न बने रहें।

गुरु पूर्णिमा का पुनीत पर्व

इस मास 'गुरु पूर्णिमा' का पुनीत पर्व 17 जुलाई सन् 1962 को है। हम सब 'गुरु पूर्णिमा' को गुरुजनों के सम्मान में श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए, इस पुण्य पर्व को मनाते हुए, अपना परम पवित्र धर्मकर्त्तव्य पालन करते हैं। ऋषि ऋण इस पर्व पर अपनी किश्त चुकाने के लिए तकाजा करने आया करता है। धर्म और संस्कृति के प्रेमी अपने−अपने ढंग से वह श्रद्धांजलि अर्पित करते भी हैं। 'अखण्ड ज्योति' के पाठक भी उसके अपवाद नहीं। वे भी इस पर्व को खाली नहीं जाने देते। इस बार उनके लिए एक विशेष कर्त्तव्य यह हो सकता है कि 'युगनिर्माण योजना' को सफल बनाने के लिए 'अखण्ड ज्योति' के नए सदस्य बनाने का प्रयत्न करें। यह अंक पहुँचने के बाद 'गुरु पूर्णिमा' के लगभग 15 दिन शेष रहेंगे। जहाँ जितने 'अखण्ड ज्योति' के ग्राहक हैं, वे इकट्ठे होकर एक डेपूटेशन के रूप में धर्मफेरी लगाते रहें या अकेले-अकेले इसके लिए प्रयत्न करें तो आशाजनक कार्य हो सकता है। कितने ही नए ग्राहक बन सकते हैं। यह छोटा प्रयत्न शारीरिक श्रमदानमात्र है, पर इसका परिणाम 'युग−निर्माण' के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हो सकता है। जितना परिवार बढ़ेगा उतनी ही सद्विचारों और सत्कार्यों की वृद्धि भी होगी। और इसका पुण्यफल उन लोगों को मिलने वाला है, जो इस सत्प्रयत्न में सक्रिय रूप से अपने श्रमदान की श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए हमारा सेवाक्षेत्र बढ़ाने में सहायता करेंगे। हमारी सेवा, सहायता एवं प्रसन्नता का सबसे बड़ा कार्य यही हो सकता है। शरीर को पूजने वालों के प्रति नहीं, हमारी आत्मा को संतोष देने के लिए जो प्रयत्न करते हैं, उन्हीं के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा से हमारा मस्तक नत हो सकता है।

परिवार बढ़ाने का आवश्यक कार्य

इस अंक में एक अतिरिक्त 'परिशिष्ट−पत्र' इसी उद्देश्य से लगाया गया है। उसमें चार ग्राहक बनाने के कूपन संलग्न हैं। जो ग्राहक बनाए जाएँ, उनके पते इन कूपनों में भरकर भेजे जा सकते हैं और चंदा मनीऑर्डर से । इस संदर्भ में हमें यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि आर्थिक दृष्टि से 'अखण्ड ज्योति' इन दिनों घाटे में चल रही है। पृष्ठ संख्या लगभग ड्यौढ़ी कर देने के कारण अब उसकी लागत 3) न रहकर 4) के करीब पहुँच रही है। इस घाटे की पूर्ति पुस्तकों के लाभांश से या किसी अन्य प्रकार से करनी पड़ती है। किसी को ऐसा स्वप्न में भी न सोचना चाहिए; ग्राहक बढ़ाने में कोई आर्थिक लाभ सन्निहित हैं, विशुद्ध रूप से जनहित एवं अपने महान मिशन का विस्तार करने की दृष्टि से ही यह सोचा और कहा जा रहा है। कार्यक्षेत्र को बढ़ाए बिना, वह सपने पूरे न हो सकेंगे, जिनके लिए हम जीवित हैं।

संगठन के बिना इस युग में कोई बड़ा काम हो सकना संभव नहीं। संगठन जितना बड़ा होगा— उसके सदस्य जितने उत्कृष्ट होंगे— उतनी ही शक्ति उत्पन्न होगी और उसके द्वारा उतनी ही बड़ी सफलता की आशा की जा सकती है। 'गायत्री परिवार' के संगठन में सदस्य के त्याग और निष्ठा की कोई परीक्षात्मक शर्त न रहने से उसमें घटिया श्रेणी के लोग भर गए और अब बिखरते भी जा रहे हैं। ऐसी दशा में 'युगनिर्माण कार्य' को आगे बढ़ाने के लिए परिवार का हम पुनर्गठन कर रहे हैं, इसमें केवल भावनाशील और निष्ठावान व्यक्ति ही सम्मिलित किए जा रहे हैं। प्रारंभिक शर्त के रूप में 'अखण्ड ज्योति' का पाठक होना, परिजन की प्रारंभिक परीक्षा रखी गई है। सत्कार्यों का मूल सद्विचार है, सद्विचारों को सुनने-समझने और उनके प्रति निष्ठा रखने में जिन्हें विश्वास नहीं, जो इतने उच्चकोटि के विचारों के लिए चार आना मासिक खरच नहीं करना चाहते, उनसे मानवता की पुकार के लिए 'युगनिर्माण कार्य' के लिए कोई कदम उठा सकना कैसे संभव हो सकता है?

इस वर्ष हमारा सारा ध्यान अपने बिखरे हुए परिवार को पुनर्गठित करने में लगा हुआ है। अगणित लोगों से हमारा संबंध और परिचय रहा। कितने ही तो हमें गुरु कहने और पैर छूने में भी बहुत उत्साह दिखाते रहे। अब उस भीड़ में से अपने-पराए की कसौटी के रूप में हमने 'अखण्ड ज्योति' की सदस्यता को एक शर्त बना दिया है। जो इससे कतराते हैं, उनकी चतुरता इस कसौटी पर स्पष्ट हो जाएगी। और असली नकली की छाँट का अवसर आसानी से मिल जाएगा। जो थोड़े से असली स्वजन हमारे साथ रह जाएँगे, वे भले ही थोड़े हों, पर उनसे कुछ आशा रखी जा सकेगी और जो महान कार्य कंधे पर उठाया है, उसके लिए अपनी शक्ति को ठीक तरह आँका जा सकेगा, फिर उसी आधार पर आगे के कदम उठावेंगे।

परिवार दो होते हैं—(1) वंश परिवार (2) विचार परिवार। वंश परिवार वह है, जिसमें रक्तसंबंध होता है। इसका आधार पिता रहता है। दूसरा परिवार, विचार परिवार है, जिसमें भावनात्मक एकता के आधार पर आत्मीयता स्थिर रहती है। इसका आधार गुरु होता है। 'अखण्ड ज्योति परिवार' इस दूसरे प्रकार का ही कुटुंब है। वर्त्तमान परिजनों का कर्त्तव्य है कि वे अपने क्षेत्र में अपना विचार परिवार बढ़ावें। जहाँ जितने 'अखण्ड ज्योति' के सदस्य रहेंगे, वहाँ उतना ही अपना परिवार माना जाएगा। इसलिए यह प्रयत्न किया ही जाना चाहिए कि अपने विचार परिवार का विस्तार हो। संगठन का अब अपना प्रारंभिक आधार यही है। इसलिए 'गुरु पूर्णिमा' के पावन पर्व पर हममें से हर एक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि जो लोग पहले हमसे या गायत्री परिवार से किसी प्रकार संबंधित रहे हैं, वे यदि उस संबंध को आगे भी बनाए रखना चाहते हों तो 'अखण्ड ज्योति' की सदस्यता स्वीकार करें। पूर्व परिचय के क्षेत्र तक ही सीमित न रहकर अब आगे कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। अपने इस वर्ष के सब अंक यदि पाठक किन्हीं भावनाशील व्यक्तियों को पढ़ने के लिए देंगे तो उन्हें नापसंद न किया जा सकेगा। जो पसंद करते हैं, उन्हें चार आना महीना इसके लिए खरच कर सकना कोई भार प्रतीत न होगा।

सभ्य समाज की रचना के लिए एक सशक्त, प्रबुद्ध एवं सुविस्तृत संगठन की अनिवार्य आवश्यकता है। यह संगठन 'अखण्ड ज्योति' के सदस्यों का ही हो सकता है। इस सदस्यता के लिए विशाल जनसमुदाय को तैयार करने से ही 'युगनिर्माण योजना' को सफल बनाया जा सकना संभव है। हममें से प्रत्येक को इसके लिए प्राणपण से प्रयत्न करना चाहिए। 'गुरु पूर्णिमा' इसके लिए विशेष संदेश लेकर सामने उपस्थित हो रही है।


गायत्री तपोभूमि में शानदार स्वास्थ्य शिविर

गायत्री तपोभूमि में 1 जून से स्वास्थ्य शिविर, बड़े उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। चिकित्सार्थियों और शिक्षार्थियों की संख्या आशा से बहुत अधिक थी। प्राकृतिक चिकित्सा की विधिवत शिक्षा का सुनियोजित कार्यक्रम भली प्रकार चलता रहा। जयपुर प्राकृतिक चिकित्सालय के संचालक डॉ. सुखरामदास, नागपुर के डॉ. के. एम. रेड्डी, उरुली काँचन के डॉ. शरणप्रसाद, ग्वालियर के डॉ. अमलकुमार दत्त, झाँसी के प्रो. अन्ना, कोटा के डॉ. रामचरण महेंद्र आदि कितने ही विद्वानों ने शारीरिक मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य के संबंध में महत्त्वपूर्ण शिक्षण दिया। आचार्य जी की एक क्रमबद्ध व्याख्यानमाला 'युगनिर्माण योजना' पर प्रकाश डालने के लिए चलती रही। शिक्षार्थियों में बड़ा उत्साह रहा और उनने मनोयोगपूर्वक सारे कार्यक्रम को अपनाया।

रोगियों को इस थोड़ी ही अवधि में आशाजनक लाभ हुआ। आधे से अधिक कष्ट इस थोड़ी ही अवधि में अच्छा होने पर प्रायः सभी चिकित्सार्थियों को बड़ा संतोष रहा।‍ जिनने प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान को इस अवधि में ठीक तरह समझ लिया है, वे इस प्रणाली के अनन्य भक्त बन गए हैं और लगता है कि वे अपना ही नहीं दूसरे अनेकों का भी स्वास्थ्य सुधार सकने में समर्थ होंगे।

इस बार बहुत अधिक रोगी इकट्ठे हो जाने से व्यवस्था में असुविधा रही। आगे थोड़ी संख्या ही रखने का निश्चय किया गया है, ताकि व्यवस्था और सेवा, ठीक प्रकार की जा सके। आगे अभी कब्ज के रोगी ही चिकित्सालय में रखने का कार्यक्रम रखा गया है।

अगले तीन अंक

स्वास्थ्य शिविर में जो लोग नहीं आ सके, उनकी जानकारी के लिए प्राकृतिक चिकित्सा शिक्षण के लिए अगस्त की अखण्ड ज्योति, ‘प्राकृतिक चिकित्सा अंक’ के रूप में रहेगी। शिविर में हुए शिक्षण का सारांश उसमें रहेगा। सितंबर का अंक 'युग−निर्माण अंक' होगा, जिसमें योजना के सत्संकल्प में सन्निहित भावनाओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया जाएगा और किस प्रकार आत्मनिर्माण एवं राष्ट्रनिर्माण की गतिविधियों को आगे बढ़ाया जाए, इस पर प्रकाश डाला जाएगा। अक्टूबर अंक में 'पंचकोशी गायत्री-साधना' का अगले वर्ष का साधना क्रम रहेगा। गत अक्टूबर अंक के अनुसार प्रथम वर्ष की साधना-पद्धति को जिन्होंने अपनाया है, उनके लिए दूसरे वर्ष का यह अगला पाठ्यक्रम है। इसी प्रकार हर साल अक्टूबर अंकों में एक−एक वर्ष का 'पंचकोशी-साधना शिक्षण' चलते रहने से वह दश वर्ष में पूर्ण हो जाएगा।

कल्प चिकित्सालय तपोभूमि में पूर्व योजना के अनुसार बराबर चलता रहेगा। अप्रैल से जून तक तीन महीनों में जो आशाजनक लाभ रोगियों को हुआ है, उसे देखते हुए लगता है कि इस पद्धति से लाभ उठाने के लिए बड़ी संख्या में अस्वस्थ लोग यहाँ आते रहेंगे। अभी कब्ज सरीखे पेट के रोगी ही लिए जा रहे हैं। स्थान आदि की अधिक सुविधा होने पर जटिल रोगों के लिए भी व्यवस्था करेंगे।

गुरु पूर्णिमा पर सामूहिक आयोजन

ता. 17 जुलाई को 'गुरु पूर्णिमा' पर्व है। उस दिन सामूहिक उत्सव का आयोजन किया जाए। यज्ञ, भजन, कीर्त्तन, एवं गुरुजनों के प्रति श्रद्धांजलि के अतिरिक्त इस पर्व के महत्त्व पर प्रवचन भी हों। इन आयोजनों की सूचना मथुरा भी भेजनी चाहिए।

*समाप्त*