हमारा सत्−संकल्प (कविता)

(श्री प्रेमनारायण जी ‘सरोज’)

आश्रित रहें न कभी किसी के, अपनी स्थिति आप सँभालें।

कहीं न पीछे हटें—सर्वथा, आगे अपने चरण बढ़ा लें॥

निर्भय हो निज कर्मक्षेत्र में, रुकें न हम, बढ़ते ही जाएँ।

विजय−शिखर पर, दृढ़−प्रतिज्ञ हो, हम सदैव चढ़ते ही जाएँ॥

भय से कातर हों न कभी हम, नहीं निराशा मन में लाएँ।

करें पूर्ण निज ध्येय निरन्तर, जीवन का पुरुषार्थ दिखाएँ॥

प्रबल−पराक्रम का हम अपने, अखिल विश्व में बिगुल बजा दें।

युग−निर्माण करें, वसुन्धरा, में अनुपम−सौन्दर्य सजादें॥

एकाकी हो तो भी अपना, करें न छोटा मन का घेरा।

एक चन्द्र−मण्डल कर देता, दूर रात्रि का घोर अन्धेरा॥

प्रभु का दिव्य−तेज हममें भी विद्यमान, हम यह जानें।

भ्रम का सब आवरण हटा कर, अपना सत्य रूप पहिचानें॥

आज सृष्टि के अञ्चल में हम, अपना विमल ओज चमकाएँ।

स्वयं चलें, सबको सत्पथ पर, चलने का सन्देश सुनाएँ॥

विषम परिस्थिति में भी दृढ़−व्रत हों, न कभी किञ्चित घबराएँ।

सोये हुए जगाएँ, गिरते हुए उठाएँ, राह बताएँ॥

यही ‘सत्य−संकल्प’ हमारा—प्राणिमात्र को सुख पहुँचाना।

यही परम−पूजा है प्रभु की—‛मानवता का धर्म निभाना’॥


मन का स्वास्थ्य पर प्रभाव

शरीर पर मन का क्या प्रभाव उत्पन्न होता है, इसकी चर्चा गत अंक के दो लेखों में की जा चुकी है। यदि मन में निराशा, क्षोभ, क्रोध आवेश, चिन्ता, भय, शोक जैसे भाव बने रहें तो स्वास्थ्य सुधार का लाख प्रयत्न करने पर भी शरीर की स्थिति दिन−दिन खराब होती जावेगी और कोई रोग न होने पर भी यह मनोविकार ही अकाल−मृत्यु का कारण बन जावेंगे। यह तथ्य पूर्णतया विज्ञान सम्मत हैं। भूतों के भय−भ्रम से डरकर कई व्यक्ति मरते एवं मरणासन्न स्थिति तक पहुँचते हुए देखे गये हैं। ऐसी कितनी ही घटनाओं में उस विपत्तिग्रस्त व्यक्ति का भय और भ्रम ही आपत्ति का एकमात्र कारण सिद्ध हुआ है। ज्योतिषियों द्वारा ग्रह दशा का भय दिला देने पर कई व्यक्ति निराशा के गर्त में डूबते और किंकर्तव्यविमूढ़ होते देखे गये हैं। इसी प्रकार मामूली सी हरारत को यदि धन अपहरण करने के लालच से कोई डॉक्टर तपेदिक बता दे और मृत्यु का खतरा समझा दे तो वह सामान्य रोग का रोगी भी डर के मारे अपने आप मौत के मुख में घुस पड़ने की स्थिति बना लेता है। भय और चिन्ता से उसका रक्त पतला पड़ जाता है और रोग निवारक शक्ति शिथिल हो जाती है। कई व्यक्तियों को निराशा और दुर्भाग्य के विचारों की अपने आप आदत भी पड़ जाती है। वे कोई न कोई बहाना ढूँढ़कर भविष्य अन्धकारमय होने की बात सोचते रहते हैं और सचमुच ही उनका भविष्य अन्धकारमय बन जाता है।

मनस्विता का प्रसाद

इसके विपरीत मनस्वी लोग मौत से लड़ने की भी हिम्मत रखते हैं और अपनी आशावादिता की प्रखरता से सचमुच अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न कर लेते हैं। हारी बाजी को जीतने में, डूबते−डूबते पार हो जाने में, असफलता को सफलता में परिणत कर देने में, जहाँ ईश्वर की कृपा छिपी रहती है वहाँ मनुष्य का साहस भी कम काम नहीं करता। यदि यों कहा जाय तो भी कोई अत्युक्ति न होगी कि साहसी के साहस को देखकर ईश्वर उस पर प्रसन्न होते एवं कृपापात्र बनते हैं। जो लोग निराशा के विचारों में निमग्न रह कर स्वयं ही डूबने का उपक्रम बना रहे हैं उन्हें कौन बचा सकेगा? निराश और भयभीत मनुष्य आमतौर से अपने पैर में आप कुल्हाड़ी मारने की योजना बनाते हैं। ईश्वर सबकी मनोकामना पूर्ण करता है तो इन सर्वनाश की कल्पना करने वालों का विचार क्यों पूरा न होगा?

स्वास्थ्य को ठीक बनाये रहने में अनेकों कारण गिनाये जा सकते हैं पर सबसे प्रधान कारण मानसिक स्थिति है। हँसमुख, प्रसन्नचित्त, अलमस्त, उत्साही, आशावादी लोग अनेक अड़चनों के होते हुए भी निरोग बने रहते हैं। मनोबल की प्रखरता के कारण उनके नाड़ी संस्थान में एक प्रचण्ड विद्युत प्रवाह दौड़ता रहता है और हर अंग को इतनी सामर्थ्य प्रदान करता रहता है जितनी भरपूर रक्त से भरी शिराओं के द्वारा भी प्राप्त नहीं होती। मनोबल के अभाव में हट्टे−कट्टे मोटे−ताजे आदमी भी कायरता, कमजोरी एवं दीनता−हीनता का परिचय देते देखे गये हैं। इसके विपरीत शरीर से दुबले−पतले लगने वाले व्यक्ति भी यदि मनस्वी हो तो ऐसे पुरुषार्थ एवं साहस का परिचय देते हैं कि दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। शरीर पर मन का अत्यधिक नियंत्रण रहता है इसलिए आरोग्य और दीर्घजीवन की प्रबल आकाँक्षा, आशा एवं भावना को दृढ़ विश्वास के आधार पर मजबूत बनाये रखने वाले व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपने स्वास्थ्य को अक्षुण्य बनाये रहते हैं। जिन्हें बात बात में आशंका बनी रहती है और स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होने का संदेह करते रहते हैं वे अपने इस संदेह के कारण ही बहुधा दुखद परिस्थितियाँ उत्पन्न कर लेते हैं और रोग शय्या पकड़ने के लिए विवश होते हैं।

विचारों का शरीर पर प्रभाव

दीनता और स्वाभिमान, आशा और निराशा, अकर्मण्यता और पुरुषार्थ, दैन्य और मनस्विता, आलस्य और उत्साह, प्रसन्नता और खिन्नता, नम्रता और अहंकार के भाव मनुष्य के चेहरे पर आसानी से पहचाने जा सकते हैं। जो जिस प्रकार के विचारों में रहता है चेहरे पर उसकी छाया दर्पण की तरह दिखाई देती है। विचारों का वह प्रभाव चेहरे तक ही सीमित नहीं रहता वरन् भीतरी एवं बाहरी सभी अंगों पर पड़ता है और उसका सारा ढाँचा ही उस चाल ढाल में ढल जाता है। स्त्रियों जैसी भावना रखने वाले जनाने पुरुषों की आवाज, चेष्टाएँ एवं गति−विधियाँ वैसी ही बन जाती हैं। कसाई, जल्लाद, वधिक और मछुआरों की आँखों में उनका मानसिक स्तर स्पष्ट छलकता रहता है, साथ ही उनकी वाणी, चाल−ढाल एवं प्रक्रिया में भी कठोरता का प्रतिबिम्ब स्पष्टतया देखा जा सकता है। यह प्रभाव भीतर के पाचन, रक्त संचार एवं वायु प्रवाह उत्पन्न करने वाले अंगों पर भी पड़ता है। आमाशय, आँत, फुफ्फुस, हृदय, यकृत, वृक्क, मूत्राशय, मस्तिष्क, नेत्र, कान, शिश्न, जिह्वा जैसे भीतरी अंगों पर भी उनका असर होता है और उनकी कार्य प्रणाली एवं गतिविधि में मन्दता, तीव्रता, अव्यवस्था तथा व्यतिक्रम उत्पन्न होने लगता है। अनैतिक एवं अनुपयुक्त विचारों का प्रभाव शरीर पर बहुत ही घातक पड़ता है। उनमें ऐसी शिथिलता एवं विकृति उत्पन्न हो जाती है कि पाचन रक्त संचार आदि का साधारण कार्य−क्रम चलते रहने में गतिरोध उत्पन्न होने से बीमारी के लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं और यदि यही प्रक्रिया लगातार चलती रहे तो भला चंगा आदमी रोगी हो जाता है।

विकृत और कुसंस्कारी स्वभाव

मानसिक संस्थान पर विचारों का प्रभाव पड़ना तो स्पष्ट ही है। हेय विचारों में निमग्न व्यक्ति अपनी स्मरण शक्ति खो बैठते हैं। क्रोधी और बात−बात में उत्तेजित होते रहने वाले विद्यार्थी कभी अच्छे डिविजनों में पास नहीं होते। उनकी अधिकाँश मानसिक शक्ति इस उत्तेजना एवं आवेश में ही खर्च हो चुकी होती है। फिर वे पाठ को भली प्रकार याद रख सकने की क्षमता कहाँ से उपलब्ध करें? चिन्तित और क्षुब्ध रहने वाले व्यक्ति आमतौर से कब्ज के रोगी देखे गये हैं। जिनके पेट में कब्ज ने जड़ पकड़ रखी है उन्हें छोटे−बड़े अनेक रोगों का शिकार होते रहना बिल्कुल स्वाभाविक है। क्रोधी कभी पनपता नहीं वह सदा ताँत जैसा दुबला ही बना रहता है। कुढ़ते रहने वालों को आमतौर से पेशाब की बीमारियाँ होती हैं। उनके गुर्दे और मूत्राशय की गतिविधि आमतौर से दोषपूर्ण पाई जाती है। कामुक प्रकृति के लोग प्रमेह, स्वप्नदोष, प्रदर आदि यौन रोगों के शिकार होते हैं।

प्रसन्नता और संतोष

जिन्हें हँसने की, प्रसन्न और संतुष्ट रहने की आदत है उनमें से कदाचित ही कोई कभी बीमार पड़ता है। ढेरों मक्खन मलाई खाते रहने वालों में उतनी जीवनी शक्ति नहीं पाई जाती जितनी संतुष्ट रहने वाले लोगों में होती है। प्रसन्नता और मुस्कान जिनके चेहरे पर छलकती रहती है उनके रक्त में रोग निरोधक शक्ति बहुत बड़े परिमाण में रहेगी। उत्साही और स्फूर्तिवान व्यक्तियों के यकृत आमाशय और आँतों से पाचक रस भरपूर मात्रा में उत्पन्न होते हैं। आशावादी लोगों को नाड़ी संस्थान सम्बन्धी रोग नहीं होते। उनके ज्ञान तन्तुओं में इतना विद्युत प्रवाह भरा रहता है कि हर अवयव अपनी चेष्टाऐं पूर्ण वेग एवं उत्साह के साथ जारी रखे रहता है। चरित्रवान और कर्तव्य परायण कर्मयोगी प्रकृति के मनुष्यों का दीर्घजीवी होना असंदिग्ध है।

यह ठीक है कि आहार−विहार पर स्वास्थ्य बहुत कुछ निर्भर रहता है। पर यह भी ठीक है कि आहार−विहार को केवल वे ही मनुष्य ठीक रख सकते हैं जिनका मन नियंत्रित स्थिति में बना रहता है। आलसी, चटोरे, लापरवाह, वासनाग्रस्त, चंचल मन वाला मनुष्य न तो किसी नियमित दिनचर्या पर चल सकता है और न जिह्वा तथा कामवासना पर अंकुश रख सकता है। वह आरोग्यरक्षा के लिए संयम पालन करने की ओर उचित दिनचर्या पर चलने को उपयुक्त गतिविधि अपनाने की योजना बनाता रहता है। दो चार दिन किसी कार्यक्रम पर चलते भी हैं पर जोश ठंडा होते ही मानसिक दुर्बलता उभर आती है और ढील पोल में सारी योजना नदी की बाढ़ के बहते हुए तिनकों की भाँति अस्त−व्यस्त हो जाती है। संकल्प शक्ति के अभाव में भला कौन कठोर नियमों का पालन कर सकने में सफल हो सका है?

आरोग्य शास्त्र और मनोविज्ञान

आरोग्य शास्त्रियों का पूरा जोर इस बात पर रहता है कि लोग आहार−विहार के नियमों का कठोरता से पालन करें ताकि उनके स्वास्थ की रक्षा हो सके। मनोविज्ञान शास्त्र इससे भी एक कदम बढ़कर कहता है कि मनुष्य को अपने मन पर नियंत्रण करना सीखना चाहिए ताकि आहार−विहार का संयम करने में विकृत स्वभाव की प्रधान बाधा पर विजय प्राप्त की जा सके। इन्द्रिय निग्रह और व्यवस्थित कार्यक्रम पर चलने के लिए जिस दृढ़ता की आवश्यकता है वह केवल उन्हीं व्यक्तियों में हो सकनी संभव है जिनने अपने मन पर काबू प्राप्त करना सीखा है एवं सद्विचारों को प्रचुर मात्रा में अपनाकर मन को सात्विकता के ढाँचे में ढाल लिया है। गीता के मतानुसार निग्रही मन ही मित्र है अनियंत्रित मन तो शत्रु की भाँति सर्वनाश के उपकरण ही एकत्रित करता रहता है।

योगी लोग ही मनोवाँछित आयु को प्राप्त कर सके हैं। केवल शारीरिक नियमों का पालन करके कोई व्यक्ति जितनी आयु प्राप्त कर सकता है उससे कई गुनी आयु मानसिक प्रक्रियाओं, योग साधनाओं को अपनाकर प्राप्त कर सकना संभव है। शरीर शास्त्र की दृष्टि से मनुष्य का सौ वर्ष जीवित रह सकना सन्तोष ही नहीं आश्चर्य का विषय भी माना जाता है, पर योगशास्त्र की दृष्टि से मनुष्य कई सौ वर्षों तक बिना जरा जीर्णता अनुभव किये जीवित रह सकता है। अभी भी कई ऐसे संत महात्मा देखे जा सकते हैं जिनकी आयु आरोग्य शास्त्रियों की कल्पना से बहुत आगे है। पौष्टिक आहार में जिन वस्तुओं की गणना है उनका दर्शन न होने पर भी घास−पात या कंदमूल के बल पर दीर्घ जीवन एवं सुदृढ़ आरोग्य प्राप्त करने की सफलता के पीछे केवल एक ही तथ्य काम करता दीखता है और वह है मनोबल की प्रचंडता।’ योग विद्या का एकमात्र आधार भी यही तथ्य है। इसी के आधार पर अनेकों प्रकार की ऋद्धि−सिद्धियाँ प्राप्त की जाती हैं, उन्हीं में से एक सिद्धि दीर्घ जीवन और स्वस्थ शरीर की भी है।

स्वतन्त्र नहीं संबद्ध विषय

स्वस्थ शरीर यद्यपि एक स्वतन्त्र विषय मालूम पड़ता है। उसके लिए अलग से विचार और कार्य भी किये जाते हैं। चिकित्सा शास्त्र, शरीर विज्ञान, औषधि संहिता, शल्यक्रिया आदि विषयों पर स्वतंत्र खोज भी हो रही है और प्रयोगशाला भी चल रही है। मेडिकल कालेजों से लेकर अस्पतालों तक फार्मेसियों से लेकर शोध संस्थानों तक अपार धन और जनशक्ति लगी हुई है। तात्कालिक कष्ट निवारण की दृष्टि से इनके द्वारा बहुत कुछ लोकहित भी हो रहा है, पर गिरते हुए स्वास्थ्य को उठाने की समस्या का हल इन सारे प्रयत्नों के बावजूद भी निकलता नहीं दीखता। आहार−विहार को ठीक तरह पालन किये बिना स्वास्थ्य का स्थायित्व संभव नहीं। उचित आहार−विहार की जानकारी प्रायः सभी को है पुस्तकों में पढ़कर या सुनकर उसे हर कोई जान भी सकता है, पर इस जानकारी से किसी का क्या बनता है? मन काबू में हो तो इन्द्रियाँ रुकें? और इन्द्रियाँ रुकें तब कहीं आहार-विहार के उचित विषयों पर चल सकता संभव हो। इसलिए हम पत्ते सींचने की अपेक्षा, जड़ सींचने की बात क्यों न सोचें? यदि सचमुच हमें स्वास्थ्य प्यारा हो, यदि सचमुच हमें शरीर को स्वस्थ रखे रहने की आकाँक्षा हो तो तथ्यों की खोज के लिए हमें गहरा उतरना पड़ेगा। गहराई में पहुँचने पर इस दिशा में एक ही तथ्य परिलक्षित होता है वह है मन का नियंत्रण− इसी का नाम है मानसिक स्वच्छता। कुविचारों और अनुपयुक्त आदतों की ओर मन को न जाने देने का नाम ही मनोनिग्रह है। दुष्प्रवृत्तियों और दुर्भावनाओं की कीचड़ को साफ कर देने का नाम ही मानसिक स्वच्छता है। स्वच्छ हुआ मन मानव जीवन में अनेक विभूतियों के वरदान उपस्थित करता है, उनमें से एक अक्षय आरोग्य भी है स्वस्थ शरीर की समस्या का हल स्वच्छ मन की संभावना पर ही निर्भर है।


मानसिक परिवर्तन से जीवन परिवर्तन

मन का प्रभाव यों जीवन के सभी क्षेत्रों पर है पर शरीर की भाँति ही आत्मा की स्थिति में हेर-फेर करने की भी शक्ति मन में अत्यधिक है। मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित होने वाला नाड़ी संस्थान संपूर्ण शरीर में चेतना प्रवाह का संचार करता है। इसलिए समस्त शरीर में जितनी भी चेतना है उस सब पर मस्तिष्क का नियंत्रण भी रहता है। मस्तिष्क की स्थूल प्रणाली मन की सूक्ष्म चेतना पर उसी प्रकार निर्भर है जिस प्रकार देह का जीवन जीव की स्थिति पर आधारित रहता है। मन का आधिपत्य मस्तिष्क पर है और यह मस्तिष्क अपनी चेतना को समस्त शरीर में नाड़ी संस्थान के आधार पर प्रवाहित करके उसके समस्त चेतना संस्थान का संचालन करता है। अतएव शरीर की स्थिति का बनना-बिगड़ना बहुत कुछ मन की स्थिति पर निर्भर रहता है।

मस्तिष्क का शरीर पर नियंत्रण

क्लोरोफार्म सुँघाकर जब मस्तिष्क को संज्ञा शून्य कर दिया जाता है तो देह में एक संचार आदि अन्य अवयवों की क्रियाऐं जारी रहते हुए भी देह मृत तुल्य बन जाती है। नशा पीने की स्थिति में भी जब मानसिक संतुलन लड़खड़ा जाता है तब सारा शरीर अस्त−व्यस्त कार्य करने लगता है। पागल आदमियों की शारीरिक चेष्टाऐं कैसी उपहासास्पद एवं असंतुलित होती हैं इसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। मानसिक विकारों से ग्रसित व्यक्ति अपना शारीरिक स्वास्थ्य निश्चय रूप से खो बैठते हैं। खिन्न रहने वाले किसी व्यक्ति को आज तक आरोग्य का लाभ नहीं मिला। इन बातों पर विचारों करने से स्पष्ट हो जाता है कि रक्त संचार के लिए हृदय की क्रिया, आहार को देहसात् करने में पाचन क्रिया, साँस लेने की प्राण संवहन क्रिया, आँत और गुर्दों की मल विसर्जन क्रिया कितनी ही महत्वपूर्ण क्यों न हो सर्वोपरि महत्व मस्तिष्क की चेतना प्रवाह क्रिया का ही है। शारीरिक स्थिति का एक चौथाई सञ्चालन संरक्षण से मन की शक्ति का उपयोग न किया जाय तो इस समस्या का संतोषजनक हल निकल ही न सकेगा।

शरीर के रोगों की तरह मन में भी अनेक रोग उत्पन्न होते रहते है और उनका उतना ही भयंकर प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है जितना हैजा, तपैदिक, लकवा आदि संघातिक रोगों का। भूतोन्माद की बीमारी प्रसिद्ध है। पिछड़े हुए समाज अधिकतर इस रोग से ग्रसित रहते हैं। उनका बहुत सा समय और धन इसके लिए नष्ट होता है और पीड़ा एवं परेशानी भी कम नहीं उठानी पड़ती। कई बार कुछ लोग अपनी ओर दूसरों का ध्यान आकर्षित करने के लिए ढोंग भी बनाते देखे गये हैं पर अधिकाँश घटनाऐं ऐसी नहीं होती। भूतोन्माद से पीड़ित रोगियों की शारीरिक एवं मानसिक दयनीय दशा देखकर यह नहीं माना जा सकता कि यह लोग एक कौतूहल के रूप में यह स्वाँग रचे हुए हैं। कई लोग तो इसी कुचक्र में अपने प्राण तक गंवा बैठते हैं। प्राण गँवाने की नौबत जिसमें उपस्थित हो जाय उसे ढोंग के लिए कोई क्यों करेगा?

शंका डायन मनसा भूत

रोगों के अनेक नाम हैं उनमें से एक नाम ‘वहम’ भी है। कहावत है कि ‘शंका डायन-मनसा भूत’ अर्थात् आशंका एवं संशय करते रहने से डायन जैसी प्राणों का शोषण करने वाली परिस्थिति मनः-क्षेत्र में बन जाती है और मस्तिष्क में एक भ्रम भर जाने से भूत जैसी डरावनी संभावना चारों ओर नाचती दीखती है। भूत का डर या भ्रम जब मन में विश्वास का रूप बनाकर मजबूती से जड़ जमा लेता है तो इन्द्रियाँ सचमुच भूत की उपस्थिति का अनुभव करने की स्थिति अपनी रचना शक्ति के आधार पर रचकर खड़ी कर देती है। कोई साधारण-सी वस्तु अन्धेरे में रखी हो तो साक्षात् भूत जैसी भूत जैसी भयंकर लगने लगती है। सुनसान जंगल में अकेले जाना पड़े तो पेड़-पत्तों का हवा से खड़खड़ाना या हिलना-डुलना भूत की उपस्थिति का प्रमाण प्रस्तुत करता है। कोई मकान बहुत दिन सूना पड़ा रहे तो उसके बारे से भूत रहने की किम्वदन्ती चल पड़ती है और उस पर विश्वास करने वाले लोग यदि उस घर में रहें तो उन्हें आसानी से भूत का दर्शन हो सकता है उनकी भावना ही उनके साथ इस प्रकार की आँख-मिचौनी करती रहती है। डरपोक आदमी स्वप्न में भी डरावने भूत-पलीत देखते रहते हैं। जिनके डडडडड डडडडड डडडडड डडडडड या किसी और चीज का वजन पड़ने से धड़कन की क्रिया में अन्तर पड़ जाय तो अर्ध तंद्रिक स्थिति में भयंकर स्वप्न दीखते हैं, डर लगता है। कोई ऐसा सपना दीखता है कि हम डर कर भाग रहे हैं पर भागा नहीं जाता, चिल्लाते हैं पर आवाज नहीं निकलती। ऐसी स्थिति का एकमात्र कारण हृदय की दुर्बलता और उस पर हाथ आदि का वजन पड़ जाना है पर प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इसे भूत का दबाव माना जाता है और कारण की चिकित्सा न करके लोग स्याने दिवानों के पास दौड़-धूप करते रहते हैं।

भूतोन्माद की वस्तुस्थिति

रक्त संचार प्रणाली, स्नायु व्यवस्था एवं नाड़ी संस्थान की गतिविधियों में कोई व्यावधान उपस्थित हो जाने से मस्तिष्क में बार-बार झटके लगते हैं। जैसे बिजली की व्यवस्था में कोई गड़बड़ी पड़ने पर बत्तियाँ बार-बार जलती बुझती हैं वैसे ही मस्तिष्क और शरीर के सम्बन्ध टूटने जैसे झटके कई बार उपरोक्त कारणों से लगने लगते हैं। रोगी अपनी पूर्व मान्यताओं एवं जन श्रुतियों के आधार पर उन्हें ‘भूत की करतूत’ मानने लगता है। दूसरे उसी प्रकार के विचार वाले जब जोरों से भूतोन्माद का समर्थन करते हैं तो ऐसे रोगी उस दूर की भावना को भली प्रकार विश्वास क्षेत्र में जमा लेते हैं और उन्हें बिलकुल स्वाभाविक रीति से वही सब अनुभव होने लगता है जो भूतोन्माद में होता देखा जाता है। सिर हिलने लगता है और पूछने-बताने की—आवेश आने की भूत भविष्य की देखी-अनदेखी बातें कहने की बात चल पड़ती है। भूत कैसे लगा और कैसे अच्छा होगा इसकी एक कल्पना रोगी का अन्तर्मन गढ़ता है और उस कहानी को इस संकट में ग्रस्त मनुष्य इसी तरह कहने लगता है मानों कोई भूत ही इसके मुँह से यह सब कहलवा रहा हो भूत की माँगी हुई मुराद पूजा-पत्री पूरी कर देने पर या किसी स्याने-दिवाने द्वारा भूत को पकड़ने, मंगाने या कोई बात पूरी होते देखकर यदि ऐसा रोगी यह विश्वास करले कि सिर पर चढ़ा हुआ भूत संतुष्ट हो गया या चला गया तो रोग से सहज ही छुटकारा मिल जाता है।

स्मरण रखने की बात यह है कि यह भूतोन्माद केवल उन्हीं पिछड़ी विचारधारा के लोगों को होता है जो इन बातों पर विश्वास करते या डरपोक प्रकृति के होते हैं। संसार के वे देश और समाज जो बौद्धिक दृष्टि से समृद्ध हो चुके हैं इन बातों पर विश्वास नहीं करते है, वहाँ भूतोन्माद भी नहीं पाया जाता। यदि इसमें कोई वास्तविकता होती है तो ज्वर, खाँसी, दस्त आदि की तरह यह रोग भी सभी देशों में बिना बौद्धिक स्तर का भेद भाव किये सर्वत्र पाया जाता। एक पिछड़े वर्ग तक यह बीमारी सीमित होने के कारण तथ्य स्पष्ट है कि उसकी जड़ केवल भय एवं भूत की मान्यता में होने से यह विशुद्ध रूप से मानसिक रोग है। कोई जड़ न होते हुए भी कितने लोगों का प्राण, धन, समय एवं स्वास्थ्य जिस बुरी तरह नष्ट होता है उसे देखते हुए यह सहज की अनुमान लगाया जा सकता है कि एक छोटी सी अनुपयुक्त भावना कितना बड़ा संकट उत्पन्न कर सकती है।

मक्खी मल-मल कर भैंस

इन पंक्तियों में हमारा उद्देश्य भूत-पलीत की विवेचना नहीं वरन् वह बताना मात्र है कि किस प्रकार एक छोटी सी मान्यता अपना विकराल रूप उपस्थित कर सकती है। शारीरिक रोगों में से तीन चौथाई रोग मानसिक होते है। डरपोक आदमी अपनी कल्पना से गढ़-गढ़ कर ‘मक्खी को मल-मल कर भैंस बनाने की’ कहावत चरितार्थ करते रहते हैं। मामूली सा रोग हुआ कि उनने उसका भयावह स्वरूप कहाँ तक बन सकता है इसकी कल्पना शुरू की और मौत के चित्र सामने खड़े कर लिये। अग्नि में घी डालने से जिस प्रकार वह बढ़ती ही जाती है इसी प्रकार शरीर ने उत्पन्न हुई बीमारी या दुर्बलता को भय और आशंका का ईधन दे देकर चाहे जितना विकराल बनाया जा सकता है। लोग बनाते भी रहते है।

ऐसे लोगों का उपचार केवल दवादारू से कदापि संभव नहीं हो सकता। यदि कोई कुशल चिकित्सक अपने व्यक्तित्व से रोगी को प्रभावित कर दे और बीमारी के घटने या जल्दी अच्छे होने का विश्वास दिला दे तो बीमारी जादू की तरह अच्छी होती देखी गई है। मानसोपचार एवं प्राण चिकित्सा की स्वतंत्र चिकित्सा प्रणाली भी प्रादुर्भूत हुई है जिसके अनुसार रोगी का संकल्प बल एवं विश्वास बढ़ाकर बिना किसी दवादारू के कठिन से कठिन रोगों का इलाज किया जाता है। जिस प्रकार अनुपयुक्त विश्वास की शक्ति से राईभर कठिनाई पहाड़ बनकर सामने खड़ी हो सकती है उसी विश्वास को यदि पहाड़ को घटाकर राई बनाने में लगा दिया जाय तो उसका समुचित लाभ क्यों न होगा? जिस प्रकार स्वार्थी चिकित्सक मामूली रोग को भयंकर बनाकर रोगी को डराने और उसे घबरा कर धन ही नहीं प्राण हरण में भी सफल हो जाते हैं उसी प्रकार यदि कोई सहृदय एवं मनस्वी चिकित्सक अपने रोगी की संकल्प शक्ति को विकसित कर आशा का संचार कर सके तो बीमारी इतनी जल्दी अच्छी होती है कि लोग उसे जादू या दैवी कृपा मानने लगते है।

मनोबल की प्रचण्ड शक्ति

आध्यात्मिक तथ्यों की शोध में अपना जीवन का प्रायः पूरा ही समय लगा देने के कारण हमारा व्यक्तिगत अनुभव यही है कि आशा और उत्साह उत्पन्न करके साधारण स्थिति का मनुष्य भी असाधारण बन सकता है और अपनी हम लौकिक कठिनाई पर अपना मानसिक परिवर्तन करने पर निश्चित रूप से विजय प्राप्त कर सकते हैं। स्वास्थ्य के संबन्ध में तो यह तथ्य सुनिश्चित है। मरणासन्न और कष्ट साध्य रोगी को यदि आशा, स्फूर्ति और दृढ़ता की भावनाओं से प्रोत्साहित किये जा सके तो उनके अच्छे होने की संभावना तीन-चौथाई बढ़ जाती है। अब तक के जीवन में हम यदा-कदा शारीरिक कष्ट पीड़ित रोगियों का उपचार करते रहते हैं और अब तो एक विधिवत् कल्प चिकित्सालय गायत्री तपोभूमि में चल रहा है। चिकित्साक्षेत्र के अपने उत्साहवर्धक अनुभवों के आधार पर हमारा पूरा और पक्का विश्वास यह हो गया है कि रोग निवारण के किए किसी भी उपचार की उपेक्षा मानसोपचार का महत्व अनेक गुना अधिक है। निरोग रोगी को यदि आशावादी बनाया जा सके तो उसका आधा रोग तुरन्त दूर हो जाता है।

पदार्थ विज्ञान की भाँति मनोविज्ञान भी एक स्वतन्त्र विज्ञान एवं महान शास्त्र है। जिस प्रकार भौतिक विज्ञानी अपनी प्रयोगशालाओं में प्रकृति के मूलतत्वों की क्षमता का पता लगाकर उनके द्वारा विविध प्रकार के आविष्कार करने में समर्थ होते हैं उसी प्रकार मनोविज्ञान की भी अपनी सत्ता और महत्ता है। मनुष्य की मनः स्थिति में हेर−फेर करके उसके जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अद्भुत क्रान्ति उत्पन्न की जा सकती है। शारीरिक दृष्टि से सभी मनुष्य लगभग एक समान हैं, उनकी कार्य क्षमता एवं परिस्थितियों में भी कोई विशेष अन्तर नहीं होता। पर एक व्यक्ति से दूसरे के बीच जो जमीन आसमान जैसा अन्तर दीखता है इसका एकमात्र कारण उसकी मनः स्थिति है। देवता और असुर इस मनुष्य के शरीर में ही रहते हैं उनकी आकृति में नहीं प्रकृति में अन्तर होता है। गुण, कर्म, स्वभाव में अन्तर आने से, आन्तरिक स्तर में हेर−फेर होने से आज के जीवन के क्रम में कल दुरात्मा कुसंस्कारी एवं दीन−हीन प्रकृति का मनुष्य अपने में आवश्यक हेर−फेर करके संत, सत्पुरुष एवं महामानव बन सकता है। इसके विपरीत यदि पतनोन्मुख प्रवृत्तियों को अपना लिया जाय तो आज के श्रेष्ठ समझे जाने वाले व्यक्ति पतित एवं घृणित बन सकते हैं।

शरीर की स्थिति यदि हमें सुधारनी हो तो स्वास्थ्य की उपेक्षा करने की अपनी बुरी आदत छोड़नी पड़ेगी, अपनी दिनचर्या के प्रत्येक अंग पर आरोग्य की दृष्टि से विचार करना होगा और जहाँ सुधार की जरूरत है वहाँ छोटी−मोटी अड़चनों का विचार करते हुए, आरोग्य की महत्ता को सर्वोपरि समझते हुए, आवश्यक हेर−फेर करने में जुट जाना पड़ेगा। यह भावना जिस दिन दृढ़ता का रूप धारण करने लगेगी, कल्पना न रहकर क्रिया बन जायगी, उसके दूसरे ही दिन स्वास्थ्य में आशाजनक हेर−फेर दिखाई देने लगेगा। कुछ देर भी लगे तो धैर्य और दृढ़ता वाले व्यक्ति सरलता से उपयुक्त समय की प्रतीक्षा भी कर सकते हैं।

जीवन में क्रान्ति के लिए कदम

मन की पतनोन्मुख प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम चारों ओर हमारे सामने बिखरे पड़े हैं। मनुष्य का सुविकसित जीवन जहाँ देवताओं की ईर्ष्या का विषय होना चाहिए वहाँ वह कीड़े−मकोड़े की तरह रोते दीखता, किसी प्रकार दिन काटने की हेय परिस्थितियों में पड़ा सड़ता रहता है। यह दुखद दुष्परिणाम असंख्य उदाहरणों के साथ हमारे चारों ओर मौजूद हैं। अब मन की विकासोन्मुख, ऊर्ध्वगामी शक्तियों का चमत्कार हमें देखना है। इतिहास के हर पृष्ठ पर अंकित महामानवों की एकमात्र विशेषता उनकी मनःस्थिति ही रही है। इस एक गुण के अभाव में उनकी समस्त विशेषताऐं तुच्छ−सी ही परिणाम उत्पन्न करने वाली सिद्ध होती। आज ऐसे मनस्वी लोगों का अभाव है जो जन साधारण को अपनी मनस्विता के सत्परिणामों का उदाहरण उपस्थित करके उन्हें इस ओर उन्मुख होने की प्रेरणा दे सकें। इस अभाव की पूर्ति यदि की जा सके तो संसार का दृश्य ही दूसरा बन सकता है। अब इस अभाव की पूर्ति करने में हम आप मिलकर जुट जावें और अपने मानसिक स्तर में सुधार कर न केवल अपना ही जीवन क्रम तुच्छ से महान बनावें, वरन् दूसरों का भी मार्गदर्शन करने की सच्ची क्षमता प्राप्त करें।

मन का सुधार होते ही शरीर का सुधार होना निर्विवाद है। आर्थिक परिस्थितियाँ भी उसी परिवर्तन के साथ परिवर्तित हो सकती हैं। हम श्रीसमृद्धि, सफलता और शान्ति से परिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते हैं, अपने परिवर्तन से दूसरों को आश्चर्यचकित कर सकते हैं। मानसिक परिवर्तन के लिए कदम उठाना जीवन में एक महान क्रान्ति उत्पन्न करता है। राजनैतिक और सामाजिक क्रान्ति की ही भाँति हमारी जीवन क्रान्ति भी महत्वपूर्ण है। विचार शोधन के द्वारा यदि हम इस महान प्रक्रिया को पूरा कर सकें तो वह निश्चय ही एक महान घटना होगी।


परिवार भी हमारा एक शरीर ही है

शारीरिक समस्या के बाद पारिवारिक एवं आर्थिक समस्याओं का नम्बर आता है। परिवार भी एक प्रकार का सामाजिक शरीर ही है। मनुष्य अपनी देह तक ही सीमित नहीं रहता, वरन् उसे अपनी स्त्री, बच्चे, भाई बहिन, माता−पिता आदि को मिलाकर एक कुटुम्ब बनाना पड़ता है। एक घर में एक साथ रहने वाला कुटुम्ब भी एक प्रकार से एक शरीर ही होता है। जिस प्रकार अपनी देह के पालन−पोषण की, दुख−सुख की चिन्ता करनी पड़ती है वैसे ही परिवार के प्रत्येक सदस्य के बारे में हमें सोचना समझना और विचार करना पड़ता है। उनका उत्तरदायित्व सिर पर लेना पड़ता है। आर्थिक दृष्टि से भी अपनी देह की ही भाँति उन सबका भरण पोषण करना स्वस्थ एवं प्रसन्न रखना, प्रगतिशील बनाना आवश्यक होता है। घर के लोगों का सुखी या दुखी होना, अच्छा या बुरा होना अपने शरीर के किसी अंश का पीड़ित या प्रसन्न रहना है।

परिवार की सुव्यवस्था

हर कोई चाहता है कि उसका परिवार उसकी इच्छानुकूल अच्छे स्वभाव का, अच्छे गुण और चरित्र का हो। पड़ौस का कोई परिवार दुखी, अस्त−व्यस्त या क्लेश−कलह में डूबा हुआ हो तो लोग उसका उपहास करते हुए मजा ले सकते हैं, पर अपने परिवार का एक भी सदस्य यदि बुरे स्वभाव का दिखाई देता है या न करने योग्य काम करता है तो उसका सीधा प्रभाव अपनी आर्थिक स्थिति पर, प्रतिष्ठा पर, संगठन एवं व्यवस्था पर पड़ता है। इस गड़बड़ी से अपने को वैसा ही कष्ट होता है जैसा शरीर के किसी अंग के ठीक तरह काम न करने पर होता है इसलिए हर किसी की आकाँक्षा यह रहती है कि परिवार की भीतरी व्यवस्था क्रिया, प्रेम, सचाई, सेवा, सद्गुण, पुरुषार्थ, मितव्ययिता के आधार पर चले। घर का कोई सदस्य बाहर वालों को धोखा देकर कमाई कर लावे, चोरी चालाकी करे, झूठ बोले ठगे इसे तो प्रसन्नतापूर्वक सहन कर लिया जाता है पर घर के भीतर परिवार के सदस्य एक दूसरे के प्रति ऐसा ही व्यवहार करने लगें तो अव्यवस्था और क्लेश का वातावरण उत्पन्न हो जाता है। कोई यह नहीं चाहता कि मेरी स्त्री व्यभिचारिणी बने और मेरा पुत्र घर में चोरी करके ले जाया करे, बच्चे आपस में लड़ा करें, एक भाई दूसरे भाई से सहानुभूति न रखे। कारण स्पष्ट है कि मानव स्वभाव के दुर्गुण निश्चित रूप से कष्टकारक प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं।

दुर्गुणों का विशाल क्षेत्र

जो दुर्गुण घर के भीतर किसी सदस्य में प्रवेश पाकर घर की सारी व्यवस्था को अस्त−व्यस्त कर देते हैं, वे ही दुर्गुण समाज के व्यापक क्षेत्र में अशान्ति उत्पन्न करते हैं। यदि आपके घर का कोई सदस्य बाजार से सौदा मँगाने पर उसमें से पैसे बचा लेता है, गलत हिसाब बता देता है तो उसका प्रभाव घर की आर्थिक स्थिति पर पड़ता है और व्यक्ति घर के अन्य लोगों का अविश्वासी बन जाता है एवं बड़ा आर्थिक उत्तरदायित्व सौंपे जाने के अयोग्य माना जाता है। यही बात जब बढ़ती है तो वह पैसे चुराने वाला लड़का बड़े होने पर यदि व्यापारी बनता है तो अपने साझी से चोरी करता है, ग्राहकों को कम नापता−तोलता है, अथवा यदि नौकर है तो रिश्वतखोरी, समय की चोरी आदि बुराइयाँ पैदा करता है। ऐसे दुश्चरित्र लोगों की बात आखिर खुलती ही है। लोगों की आँखों में वह घृणा−पात्र बनता चला जाता है, अविश्वासी बनता है और फिर उसे सच्चे मन से प्यार करने वाला कोई नहीं रह जाता। शिष्टाचारवश उससे मीठी बातें लोग कर सकते हैं पर जब भी सच्ची सहायता का वक्त आता है तब सभी मुँह छिपा जाते हैं। भीतर दबी हुई ऐसे समय में आमतौर से असहयोग के रूप में प्रकट होती हैं। कभी तो उसके मित्र ही उसके प्रति दबी हुई घृणा का अप्रत्यक्ष प्रतिरोध करते हैं और मुसीबत के समय सहायता करने की अपेक्षा अनुकूल अवसर आया जान कर चोट भी करते हैं।

दूसरों के दुर्व्यवहार का कारण

जिस पर मित्रों ने कुसमय में चोट की है वह समझता है मेरे साथ दुर्व्यवहार किया गया, अनीति बरती गई, मित्र शत्रु बन गये। पर सच बात यह है कि वे उसके मित्र थे ही नहीं, केवल ऊपरी शिष्टाचार बरतने वाले चापलूस लोग थे जो परीक्षा के समय असली रूप में प्रकट हो गये। सच बात यह है कि किसी बेईमान का कोई सच्चा मित्र नहीं होता। स्वार्थ, लाभ या मजबूरी जब तक एक रस्सी में बाँधे रहती है तब तक लोग बेईमान के साथ बँधे रहते हैं और जब भी अवसर मिलता है तब रस्सी तोड़कर भागते हैं। चोर भी नहीं चाहते कि उसका साथी चोरी के माल में हिस्सा बाँटते समय चोरी बेईमानी करे। डाकू भी यह नहीं चाहते कि उनके साथी उन्हीं के घर पर डाका मारें। व्यभिचारी व्यक्ति इस कुकर्म में अपने दिन−रात साथ रहने वाले लोगों से भी यह आशा नहीं करते कि वे उसी की बहिन, बेटी या पत्नी को कुमार्गगामी बनावें। जब कभी इसमें व्यक्तिक्रम होता है तभी मित्रता शत्रुता में बदल जाती है। इसका अर्थ यह हुआ कि ईमानदारी ही एकमात्र ऐसा तत्व है जिसके ऊपर मित्रता टिकी रह सकती है, सहानुभूति उपलब्ध होती रह सकती है और समय पर दूसरे लोग उस श्रद्धा से प्रेरित होकर बड़ी से बड़ी सहायता कर सकते हैं। यह स्पष्ट है कि कोई व्यक्ति यदि इस संसार में बड़ी सफलता प्राप्त कर सकते हैं तो उसका सर्वोपरि कारण उसके मित्रों की सहायता से ही हुआ है। जिसे यह नहीं मिल सकी वह कितनी ही बड़ी योग्यता या क्षमता सम्पन्न क्यों न रहा है कभी कोई बड़ी सफलता प्राप्त नहीं कर सका है। झूठे और चोर प्रकृति के मनुष्य कभी−कभी कुछ सफलता प्राप्त कर तो लेते हैं पर वह होती बहुत ही क्षणिक एवं स्वल्प है। जैसे−जैसे लोग उससे सावधान होते जाते हैं, बचने की कोशिश करते हैं वैसे ही वैसे उसकी सफलता का क्षेत्र सिकुड़ता चला जाता है। और अन्ततः उसके असफलता एवं दुर्गति ही हाथ रह जाती है।

अपनी ही दुर्गति के निमित्त कारण

कोई यह न चाहेगा कि उसका लड़का इस प्रकार लोगों का घृणास्पद, मित्र−हीन एवं अन्ततः दुर्गति का अधिकारी बनें। पर अपने बच्चे का भविष्य अन्धकारमय बनाने की प्रक्रिया हम उसी दिन से चालू कर देते हैं जिस दिन कि बाजार से साग भाजी खरीदने में पैसे बचाने की भद्दी आदत को हम उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं और उसे एक हलकी−सी बात मानते हैं। बचपन में यह आदत दो−चार पैसों से शुरू होती है पीछे स्कूल जाते समय वह कापी, किताब के नाम पर बैठती है और अन्ततः जेवर-रुपये चुराने या लड़−झगड़ कर आवश्यकता से अधिक पैसे ले लेने की बात तक जा पहुँचती है। अपव्यय करने की आदत आरंभ में छोटी होती है। बच्चे दो−चार आना पाकर उसकी बेकार चीजें खरीदते है पीछे उन्हें शौक-मौज की चीजें खरीदना अच्छा लगने लगता है चाहे वह बेकार ही क्यों न हों। कई अच्छी आमदनी के लोग भी सदा कर्जदार और आर्थिक तंगी में बने रहते हैं क्योंकि उन्हें अनावश्यक खर्च करने की, फिजूलखर्ची की बुरी लत लगी होती है यह लत उनने बचपन में उस समय सीखी होती है जब घर से उन्हें खर्च करने के लिए किसी प्रकार पैसे मिल जाते थे और पैसे का मूल्य उनकी दृष्टि में तुच्छ प्रतीत होता था। यदि उन्हें आरंभ में ही यह समझा दिया गया होता कि पैसा कितने कठोर श्रम से कमाया जाता है और उसके सदुपयोग-दुरुपयोग के परिणामों में क्या अन्तर है तो सम्भवतः बच्चा अपव्यय की बुरी आदतों से बच जाता और उसे कर्जदारी, आर्थिक तंगी से ग्रसित एवं इसी के लिए चोरी, बेईमानी करने के लिए विवश न होना पड़ता।

उज्ज्वल भविष्य की योजना

हम अपने भविष्य के बारे में सोचते रहते हैं। अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने की योजना बनाते रहते है पर वह योजना तब तक अधूरी ही है जब तक कि हम अपने सारे परिवार के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की बात न सोचें। क्योंकि अकेले अपनी उन्नति होती रहने पर भी पिछड़े हुए कुटुम्बी त्रासदायक ही बने रहते हैं। कोई व्यक्ति कितनी ही आर्थिक, पद, सत्ता या विद्या, बुद्धि के क्षेत्र में उन्नति क्यों न कर ले जब तक उसका परिवार भी उन्नति के क्षेत्र में कदम-कदम बढ़ाकर न चलेगा तब तक प्रगति सर्वथा अधूरी ही रहेगी। स्त्री-बच्चे चाहे कितने ही छोटे या कम महत्व के क्यों न दीखते हों वे अपने जीवन के एक अंग होने के कारण निरन्तर हमारी मानसिक शान्ति या अशान्ति के कारण बने रहेंगे। इसलिए उनकी ओर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए जितना कि हम अपने व्यक्तित्व के सम्बन्ध में रख सकते हैं।

आमतौर से लोग अपने स्त्री-बच्चों को प्रसन्न रखने या उन्नतिशील बनाने के सम्बन्ध में इतना ही सोच पाते हैं कि समुचित आर्थिक प्रबन्ध हो जाये तो उनकी प्रगति एवं सन्तुष्टि के लिए पर्याप्त है। बच्चों की फीस, पढ़ाई, कपड़ा, जेब-खर्च आदि का प्रबन्ध होता रहे तो बस बाकी सब कुछ अपने आप हो जायेगा। इसी प्रकार धर्मपत्नी के बारे में सोचते हैं कि यदि उन्हें जेवर, कपड़ा, नौकर, आराम आदि का समुचित प्रबन्ध मिल जाय तो फिर उनके सुखी रहने का पर्याप्त साधन बन जायेगा। इस प्रकार की मान्यता सब प्रकार अधूरी एवं निरर्थक है। किसी भी मनुष्य की प्रसन्नता एवं प्रगति उसे प्राप्त होने वाली भौतिक सुविधाओं एवं वस्तुओं पर निर्भर नहीं वरन् उसके गुण, कर्म और स्वभाव पर निर्भर है।

गरीबी अभिशाप नहीं

गरीबी में भी कई परिवार स्वर्ग का आनंद उठाते है और कई के यहाँ प्रचुर लक्ष्मी होते हुए भी नरक का वातावरण बना रहता है। कितने ही लोग गरीब घर में जन्म लेकर प्रगति के पथ पर अपने पुरुषार्थ से आगे बढ़े हैं और उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचे हैं। इसके विपरीत कितने ही व्यक्ति अमीरों में पाले−पोसे और सब कुछ प्राप्त होने पर भी पूर्वजों से प्राप्त उत्तराधिकार की प्रचुर सम्पदा को गँवा बैठे हैं। उन्नति के सब साधन मिलने पर भी आगे बढ़ना तो दूर उलटे अवनति के गर्त में गिरे हैं। इसलिए यह सोचना भूल है कि आर्थिक प्रबंध ठीक होने पर सारा प्रबंध सुखी एवं सन्तुष्ट रह सकता है। तथ्य यह है कि शान्ति, प्रगति और समृद्धि मनुष्यों के स्वभाव पर निर्भर रहती है। दृष्टिकोण के गलत या सही होने के कारण ही द्वेष बढ़ता है या प्रेम पनपता है। अच्छी आदतें जहाँ होती है वहाँ पराये अपने बन जाते हैं। परायों को अपना बना लेने के सद्गुण जिनके पास हैं सचमुच इस संसार में वे ही अमीर हैं वे जहाँ कही भी रहेंगे वहीं उनके मित्र और सहयोगी पर्याप्त मात्रा में पैदा होने और बढ़ने लगेंगे। गुलाब की खुशबू अपने चारों ओर भौंरे और मधुमक्खी जमा कर लेती है। अच्छी आदतें मनुष्य रूपी फूल में खुशबू का काम करती है उनके कारण दूसरे असंख्य लोग मधुमक्खी और भौंरे के रूप में सहायक एवं प्रशंसक बनकर मंडराने लगते हैं। इसके विपरीत बुरी आदतें वह दुर्गन्ध है जिनसे हर किसी की नाक फूटती है और हर कोई वहाँ से दूर भागना चाहता है।

क्या अर्थ व्यवस्था ही पर्याप्त है?

हम यदि सचमुच ही अपने परिवार को सुखी बनाना चाहते हैं तो उनकी आर्थिक व्यवस्था ठीक रखने तक की ही बात सोचकर सन्तोष न कर लें वरन् उनके स्वभाव को अच्छाई की दिशा में ढालने का प्रयत्न भी उतनी ही तत्परता से करें जितना कि आर्थिक सुविधा जुटाने के लिए करते हैं। माना कि आर्थिक सुविधा के बिना प्रगति रुक जाती है और असुविधा एवं असन्तोष का जन्म होता है, माना कि हममें से हर एक को अपना आर्थिक संतुलन ठीक बनाये रखने के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए पर यह भी मान लेने की ही बात है कि इतने मात्र से किसी का जीवन न तो प्रगतिशील बन सकता है। आदतें यों देखने में बहुत ही छोटी वस्तुऐं दिखाई पड़ती है कई बार तो उनका कुछ मूल्य और महत्व भी समझ में नहीं आता पर सच बात यही है कि उन्हीं के ऊपर जीवन की सारी आधारशिला रखी होती है। छोटा सा बीज ही अनुकूल परिस्थितियों में पाले−पोसे जाने पर विशाल वृक्ष के रूप में परिणत होता है। छोटी−छोटी आदतें ही मनुष्य के जीवन का विकास या विनाश का एकमात्र आधार होती हैं। विष वृक्ष और अमरफल के जैसे परस्पर विरोधी गुण हैं वैसे ही प्रतिफल बुरी और अच्छी आदतों के होते हैं। यदि हमें अपने परिवार को सुखी और समुन्नत बनाना हो तो अपने प्रत्येक परिजन में अच्छी आदतें उत्पन्न करने के लिए जी-जान से प्रयत्न करना चाहिये।

आरम्भ छोटा अन्त बड़ा

जिस प्रकार साग खरीदकर लाते समय बच्चे को पैसे बचा लेने की आदत आगे बढ़कर उसे चोर, बेईमान, मित्रहीन, बन्दीग्रहवासी एवं दुर्गतिग्रस्त बना सकती है उसी प्रकार अन्य बुरी आदतें भी उनके पतन का कारण बन सकती हैं। आलस्य, आवेश, उद्दंडता, कटुभाषण, अशिष्टता, शौकीनी, मटरगस्ती, सिनेमाबाजी, बुरी संगति, फिजूलखर्ची, फैशन−परस्ती, चटोरापन, बहानेबाजी, समय का दुरुपयोग आदि−आदि दुर्गुणों के विषवृक्ष धीरे−धीरे बढ़ते रहने पर एक दिन ऐसे भयानक प्रतिफल उत्पन्न कर सकते हैं जिनके कारण जीवन में सफलता, दुर्दशा, पीड़ा और पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ दिखाई ही न दे। यदि कोई पिता अपने स्त्री, बच्चे के लिए आर्थिक सुविधाऐं तो जुटाता है पर उनकी अच्छी आदतों को बढ़ाने एवं बुरी आदतों को हटाने के लिए प्रयत्न नहीं करता तो उसका परिवार कभी भी शान्तिपूर्ण परिस्थितियों में नहीं रह सकता। जिसके घर में क्लेश रहेगा, अनुपयुक्त घटनाऐं और परिस्थितियाँ बनी रहेंगी वहाँ शान्ति कहाँ रहेगी और जहाँ शान्ति नहीं वहाँ समृद्धि का अर्थ ही क्या रह जाता है?

शरीर की उपेक्षा करने वाले को रोगग्रस्त होकर पछताना पड़ जाता है। अकाल मृत्यु में मरते समय उसे अपनी भूलों पर भारी दुःख होता है। देह का विकसित रूप ही परिवार है। कर्तव्य, उत्तरदायित्व, आवश्यकता, व्यवस्था और स्नेह के स्वाभाविक बन्धनों ने परिवार को मनुष्य के साथ ईश्वर ने इतनी मजबूती से बाँध दिया है कि उससे छुटकारा मिल सकना कठिन है। देह के सभी अंग−प्रत्यंगों को जिस प्रकार हमें अपने साथ ही रखना और सँभालना होता है उसी प्रकार परिवार के सदस्यों को भी साथ लेकर चलना होता है। साथियों का सज्जन होना ही स्वर्ग और दुर्जन होना ही नरक माना जाता है। यदि अपने परिजनों की दुर्जनता छुटाने और सज्जनता बनाने में हम सफल न तो हो सकें तो इसका दण्ड हमारी आत्मा हर घड़ी जलन, कुढ़न, खेद, पश्चाताप आदि के रूप में हमें देती रहेगी और एक प्रकार से नरक की आग में हम सदा जलते रहेंगे।

एक राष्ट्रीय अपराध

परिवार के सदस्यों को दुर्गुणी बनने देना समाज एवं राष्ट्र के साथ अपराध करने के समान है। समाज में अगणित चोर, डाकू, बेईमान, व्यभिचारी भरे पड़े हैं, इन कलाओं को सीखने का कोई विधिवत विद्यालय कहीं खुला नहीं है। हमारे ही बच्चे चुपके−चुपके यहाँ से सब कुछ सीखते हैं और यहीं से प्राप्त हुई आदतें उन भयंकर अपराधों का रूप धारण कर लेती हैं। शिक्षा का स्थान स्कूल हो सकते हैं पर दीक्षा का स्थान तो घर ही है। बेचारा अध्यापक गणित, भूगोल, इतिहास आदि को ही पढ़ा सकता है। गुण, कर्म, स्वभाव को उत्तम बनाने की दीक्षा देने का उत्तरदायित्व घर वालों पर है, माता−पिता पर है। जिन माता−पिता ने जाने या अनजाने में बुरी आदतें सिखाकर अपने बालकों को एक दुष्ट नागरिक के रूप में राष्ट्र के सामने उपस्थित किया उसने सचमुच समाज की एक बड़ी कुसेवा की है। बच्चों का भविष्य बनाने एवं अपने लिए जीवन भर कुढ़न का सरंजाम जमा कर लेने का उत्तरदायित्व भी उनका ही मानना पड़ेगा।

हमारा पूर्ण शरीर परिवार के सभी सदस्यों से मिलकर बना है। इसे स्वस्थ रखना भी हमारा कर्तव्य है। जिस प्रकार अनुपयुक्त विचारों से हमारी देह रोगग्रस्त होती है उसी प्रकार अपने कर्तव्य को भुला देने से, परिवार के प्रति अपना दृष्टिकोण सही न रखने से हमारा यह कुटुम्ब, शरीर रोगग्रस्त होता है पारिवारिक स्वास्थ्य का सुधार भी शारीरिक स्वास्थ्य को सुधारने की तरह पूर्णतया संभव है पर इसके लिए हमें अपने को ही सुधारना पड़ेगा। अपने को सुधारने से दूसरे स्वतः ही सुधरने लगते हैं।


परिजनों के सुधार की पूर्ण प्रक्रिया

आमतौर से लोग दूसरों को अपने अनुकूल बनाने के लिए उपदेश देने की प्रणाली को अपनाते हैं। सोचा यह जाता है कि लच्छेदार भाषा में लम्बा-चौड़ा उपदेश करने से दूसरे प्रभावित हो सकते हैं और अपना स्वभाव एवं दृष्टिकोण बदलकर हमारे अनुयायी या अनुकूल बन सकते हैं। इसी मान्यता के आधार पर आज चारों ओर प्रवचनों, भाषणों और लेखों की घुड़दौड़ मची हुई है। यह मान्यता पूर्णतया निरर्थक है ऐसा तो नहीं कह सकते क्योंकि कभी-कभी इनका कुछ प्रभाव भी होता देखा गया है, पर यदि वक्ता के व्यक्तित्व से सुनने वाला प्रभावित हो तभी वह प्रभाव पड़ता है। सभा, सोसाइटियों में भाषण करते समय लोग प्रस्तुत वक्ता की बढ़ा-चढ़ाकर प्रशंसा करते हैं। यदि सुनने वालों ने उस पर विश्वास कर लिया और वक्ता ने उस पर विश्वास कर लिया और वक्ता के व्यक्तित्व से प्रभावित हो गये तब तो वे उसकी बात ध्यानपूर्वक सुनेंगे एवं उसका प्रभाव भी ग्रहण करेंगे अन्यथा उसकी भाषण शैली की आलोचना को अपने मनोरंजन का विषय बनाकर खिसक जावेंगे।

वाचालता की निरर्थकता

आज वक्ता बहुत बढ़ गये हैं और साथ ही वाचालता भी, पर देखा यह गया है कि अपने स्वार्थ की कोई बात भले ही मान लें पर ऐसी काई भी बात उनकी न सुनी मानी जायगी जिसमें सुनने वाले को कोई कष्ट या नुकसान दीखता हो। राजनैतिक व्याख्यानदाता असंतोष उभार कर कोई बढ़ी−चढ़ी माँगे करने, हड़ताल कराने, लड़ाने के लिए श्रोताओं को तत्पर कर सकते है पर जुआ, नशा, सिनेमा, आलस्य, असंयम, स्वार्थ, कुविचार, दुर्भाव, दुःस्वभाव आदि छोड़ने के लिए प्रस्तुत नहीं कर पाते क्योंकि मनुष्य स्वार्थ, संकीर्णता एवं बुराई को बड़ी कठिनाई से ही छोड़ता है। उसे छुड़ाने के लिए उच्चकोटि के श्रेष्ठ संस्कार वाले व्यक्ति ही सफल होते हैं क्योंकि वे वाणी से नहीं अपने आचरण एवं व्यक्तित्व से दूसरों को प्रभावित करते हैं। इस प्रकार के ठोस प्रभाव से प्रभावित व्यक्ति ही अपने में सुधार या त्याग कर सकने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।

वाणी की चतुरता से प्रभावित करने की कला अब जनता द्वारा एक प्रकार से वेश्या-नृत्य की तरह तिरस्कृत एवं बहिष्कृत ही की जा रही है। लोग उससे कुछ मनोरंजन भले ही कर लें, अपने में कोई ठोस परिवर्तन तब तक नहीं करेंगे जब तक वक्ता के व्यक्तित्व से अत्याधिक प्रभावित न हों। यह तथ्य जितना सामाजिक क्षेत्र में लागू होता है उतना ही पारिवारिक क्षेत्र में भी। हम चाहते है कि हमारे परिजन, स्त्री, बच्चे हमारा कहना मानें, अनुकूल आचरण करें और उस रास्ते पर चलें जिस पर हम चलाना चाहते हैं तो उनके सामने अपना आचरण भी प्रस्तुत करना पड़ेगा। ठीक है समझाना-बुझाना भी उचित और आवश्यक है यदि तर्क, प्रमाण और उदाहरणों से कोई बिना लाग-लपेट की बात सीधे ढंग से समझाई जाय तो उसका कुछ न कुछ प्रभाव भी पड़ता है और परिणाम भी निकलता है पर हृदय, स्वभाव, विचार और भाव परिवर्तन जैसी कोई बड़ी बात किसी से कराने के लिए सबसे कारगर उपाय यही है कि हम अपने आपको बदलें, सुधारें और अपने उत्कृष्ट व्यक्तित्व की छाप अपने अनुयायियों पर छोड़ें। जलते हुए दीपक से दूसरे दीपक जलाये जाते हैं। जो स्वयं ही बुझा पड़ा है वह दूसरों में प्रकाश कैसे उत्पन्न करेगा?

वातावरण का प्रभाव

परिवार में शान्ति और व्यवस्था तभी रह सकती है जब घर के लिए सज्जनता, स्नेह एवं सदाचरण से परिपूर्ण गतिविधियाँ अपनावें। आज हमारे चारों ओर जो दूषित वातावरण फैला हुआ है उसका प्रभाव दुर्बल मस्तिष्क के लोग आसानी से ग्रहण कर लेते है अच्छाई की अपेक्षा बुराई अधिक आसानी से सीखी जा सकती है। वातावरण के सम्पर्क में हमारे घर वाले भी आते ही हैं, चारों ओर जो हो रहा है उसे वे भी देखते-सुनते ही हैं अतएव वे भी उन बुराइयों को सीख लेते हैं जो छोटी होते हुए भी हमारी पारिवारिक जैसी सिद्ध हो सकती है। दुर्गुणों और दुर्भावों का सबसे बुरा प्रभाव परिवार पर पड़ता है क्योंकि अधिक समय तक, अधिक घनिष्ठतापूर्वक परिवार के लोग ही साथ−साथ रहते हैं और अपने गुण-दोषों से एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। समाज में मनुष्य एक दूसरे से बहुत थोड़े समय तक मिलते हैं, वहाँ बनावट भी बरती जाती है इसलिए किसी प्रकार दुर्गुणी व्यक्ति भी अपना काम चला लेते हैं। पर परिवार में तो हर आदमी की आदतें नंगे रूप में प्रकट हो जाती हैं क्योंकि उसी क्षेत्र में तो उसे अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट करने के लिए विवश होना पड़ता है। किसी व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप उसके परिवार में रह कर ही देखा जा सकता है। क्योंकि ढोंग बाहर तो चल जाता है पर घर में तो उसे अपना नग्न स्वरूप ही प्रकट करना होता है।

परिजनों को दुर्गुणी न बनने दें

दुर्गुणी परिजन, उतना ही दुख देते हैं जितना शरीर में घुसा हुआ कोई निरन्तर पीड़ा देने वाला कष्ट साध्य रोग। दुर्गुणी स्वजनों को सद्गुणी बनाना उतना ही आवश्यक है जितना बीमार शरीर को निरोग बनाना। शरीर में घुसे हुए रोगों की उपेक्षा करने और उसे पनपने देने में एक दिन मृत्यु संकट ही उपस्थित हो जाता है। उसी प्रकार परिजनों में घुसे हुए दुर्गुण उस छोटे से घर को नष्ट−भ्रष्ट और नारकीय अग्नि और कुण्ड जैसा दुखदायक बना सकते हैं। इसलिए समय रहते उस स्थिति में परिवर्तन कर लेना चाहिए। आग छोटे रूप में जब लगी होती है तब प्रारम्भिक दशा में उसे आसानी से बुझाया जा सकता है पर जब वह दावानल का प्रचण्ड रूप धारण कर ले तब उसे बुझा पाना संभव नहीं रहता। दुर्गुणों के समाधान के लिए प्रयत्न आरम्भिक स्थिति में सफल हो सकते हैं उनमें परिपक्वता आ जाने पर सुधार की गुँजाइश बहुत ही कम रह जाती है।

कोई व्यक्ति यदि सुखी रहने की आकाँक्षा करता हो तो उसे अपने शरीर की तरह परिवार को भी निर्मल बनाना पड़ेगा और उसके लिए उसे पूरा ध्यान देना, प्रयत्न करना अपेक्षित होगा। यह कैसे हो? यह सोचते समय हमें यह ध्यान रखना होगा कि उपदेश देने की प्रक्रिया एक बहुत छोटी सीमा तक ही कारगर होती है। इतने मात्र से यदि काम चल गया होता तो हर घर में कोई-कोई समझाने−बुझाने वाला रहता ही है और वह अपने बलबूते कुछ न कुछ साँव-पटाँव समझाता ही रहता है। तब फिर सुधार क्यों न हो गया होता? फिर कोई घर क्यों अशान्ति का केन्द्र रहा होता?

परिवार संस्था को नष्ट न करें

पाश्चात्य देशों में परिवार संस्था को ही नष्ट कर डालने का प्रयत्न चल रहा है। वे रोग के साथ रोगी को भी समाप्त कर रहे हैं। वहाँ वयस्क होते ही लड़कों को माता-पिता का आश्रय छोड़कर स्वावलम्बी बनना पड़ता है और अपना अलग घर बसाना पड़ता है। इस प्रकार स्त्री और उसके छोटे बच्चे ही परिवार रह जाता है। माँ-बाप बुड्ढे होने पर अपनी संचित कमाई पर गुजारा करते हैं या सरकार से वृद्धावस्था की सहायता लेकर ‘वृद्ध गृहों’ में रह जिन्दगी के दिन पूरे कर लेते हैं। फिर भी उनकी समस्या सुलझ नहीं पा रही है। दुर्गुणी पति-पत्नी एक दूसरे को दुख देते ही हैं और उन्हें पुराने को छोड़ने तथा नया साथी ढूँढ़ने की मृगतृष्णा में निरन्तर भटकना पड़ता है। किशोर बालक वहाँ भी माता-पिता के लिए सिर दर्द बने रहते हैं। वयस्क होकर स्वावलम्बी हो जाने से पूर्व के दिन, जब तक कि बच्चे किशोर रहते हैं माता−पिता को बुरी तरह कुढ़ाते रहते हैं। इस गुत्थी को योरोप वाले भी नहीं सुलझा पा रहे हैं फिर भारत में तो वह सुलझेगी भी कैसे? जहाँ माता-पिता, छोटे बहिन-भाई, विधवाऐं, विधुर आर्थिक तथा अन्य कारणों से विवश होकर एक ही नाव में बैठ कर जिन्दगी पार करते हैं। हमारी धार्मिक मान्यताऐं बच्चों का भविष्य, आर्थिक परिस्थितियाँ एवं उपार्जन की कठिनाई को देखते हुए परिवार को उस प्रकार तोड़−फोड़ डालना संभव नहीं हो सकता। ऐसी दशा में योरोप की अपेक्षा हमारे लिए यह और भी अधिक आवश्यक है कि परिवार की परिस्थितियाँ सुधारने का प्रयत्न किया जाय और यह कार्य आर्थिक सुधार से नहीं मानसिक स्तरों के स्वस्थ निर्माण से ही संभव है। घर के लोग सद्गुणी बनें तभी समस्या सुलझ सकती है।

परिवार की सुख−समृद्धि

प्रत्येक सद्गृहस्थ की यह आकांक्षा रहती है कि उसका परिवार खुशहाल और प्रेमपूर्ण वातावरण में निर्वाह करे पर वह इसके लिए उन्हें सद्गुणी बनाने की आवश्यकता की ओर ध्यान नहीं देता। ऐसी दशा में वह आकाँक्षा अतृप्त ही रह जाती है और निर्धन व्यक्ति जिस प्रकार मन-मसोसते और अपने दुर्भाग्य को कोसते रहते हैं उसी तरह दुर्गुणी परिवार के संचालक को भी अपनी व्यथा को हर घड़ी सहन करते रहना पड़ता है। पर इतने से भी कुछ काम चलने वाला नहीं है। बढ़ती हुई बुराई जब विस्फोट की स्थिति में पहुँचती है तो सहन शक्ति का भी अन्त हो जाता है और जीवित नरक के प्रत्यक्ष दर्शन करने को विवश होना पड़ता है।

परिवार को सुधारने की इच्छा रखने वाले हर व्यक्ति को सबसे पहले अपने आप को सुधारना पड़ेगा। क्योंकि असली प्रवचन वही है। माता और पिता पर बच्चों को जन्म देने का ही नहीं, उन्हें सुसंस्कारी बनाने और दीक्षा देने का उत्तरदायित्व भी है। पढ़ाई ठीक न होने का दोष शिक्षकों को दिया जा सकता है पर आदतें ठीक न होने का दोष विशुद्ध रूप से अभिभावकों को ही दिया जाएगा जिनने ढील छोड़कर बच्चों पर बहुत खर्च किया है, बच्चा पैसे के मूल्य को समझ नहीं पाता और वह फिजूलखर्ची की आदत सीख जाता है अन्ततः वही आदत बढ़ी−चढ़ी स्थिति में पहुँचकर बच्चे को ‘उडाऊ’ बना देती है। माता−पिता यदि आरम्भ से ही मितव्ययी रहें और धन को सदुपयोग से बरतें, सादगी अपनावें तो बच्चा भी धन की उपयोगिता एवं आवश्यकता को समझेगा और अपव्ययी न बन सकेगा। माता−पिता में परस्पर जो कलह-संघर्ष और मनोमालिन्य रहता है उसका प्रभाव बच्चों के कोमल हृदय पर पड़े बिना रह नहीं सकता। वे भी द्वेष, घृणा, कटुता और दुराव की भावनाऐं हृदयंगम कर लेते हैं और आगे चलकर यही दुर्गुण क्लेश एवं द्वेष का विकराल रूप धारण करके सामने आते हैं। जिस माता के हृदय में अपने पति के प्रति, ईश्वर के प्रति, धर्म के प्रति श्रद्धा होगी उसके बालक भी अपने माता−पिता के प्रति, बड़े−बूढ़ों के प्रति श्रद्धावान एवं भावनाशील रहेंगे।

शिक्षा का सामयिक प्रारंभ

एक माता किसी सुयोग्य मनोवैज्ञानिक के पास गई और पूछा कि वह अपने चार वर्ष बच्चे की शिक्षा कब से आरम्भ करावें? मनोवैज्ञानिक ने उत्तर दिया आप पाँच वर्ष लेट हो गई। बालक के गर्भ में आते ही उसका शिक्षण अपने आप में आवश्यक हेर−फेर कर आरम्भ कर लेना चाहिए। पाँच वर्ष की आयु तक तो बालक अपनी आधी पढ़ाई समाप्त कर लेता है। सूक्ष्म रूप से घर के सारे प्रभाव परमाणु बच्चे के अन्तःकरण में प्रवेश कर जाते हैं, स्वभाव ढल जाता है। पाँच वर्ष के बाद तो उसे स्वभाव जन्य नहीं अक्षर ज्ञान की शिक्षा प्राप्त करनी ही शेष रह जाती है।

रज वीर्य के संयोग से बालक का शरीर ही नहीं बनता वरन् दोनों के मन की मानसिक स्थिति के आधार पर बालक का मन भी बनता है। जो माता−पिता स्वयं दुर्गुणों एवं कुसंस्कारों से भरे पड़े हैं वे अपने बच्चों में क्योंकर सत्प्रवृत्तियाँ पनपती देख पायेंगे? काम वासना में अन्धे होकर जिन्होंने बिना पूर्व तैयारी के बिना अपने गुण, कर्म, स्वभाव में आवश्यक सुधार किये संतानोत्पादन किया है वस्तुतः उनने विष बीज ही बोया है आमतौर से पहली संतान मूर्ख और अन्तिम संतान बुद्धिमान होती देखी जाती है उसका कारण माता-पिता का नव-यौवन की स्थिति में अपरिपक्व मस्तिष्क एवं ढलती उम्र में बुद्धिमान होना ही एकमात्र कारण है, उस पर वातावरण का प्रभाव जन्म लेने के बाद पड़ता है पर वास्तविक जन्म तो गर्भ के आने के दिन से आरम्भ हो जाती है।

माता-पिता का दायित्व

अभिमन्यु को चक्रव्यूह वेधन की शिक्षा अर्जुन ने तब दी थी जब वह अपनी माता द्रौपदी के गर्भ में था। हर एक बालक अभिमन्यु की परिस्थिति में ही होता है, उसे जो कुछ सिखाया जाता है हम अर्जुन की तरह अपनी वाणी या क्रिया द्वारा उसे सिखा सकते हैं। रानी मदालसा ने अपने बच्चों को गर्भ में ही ब्रह्मज्ञान की शिक्षा देकर ब्रह्मज्ञानी उत्पन्न किया था। जब उसके पति ने एक बालक राजकाज के उपयुक्त बनाने का अनुरोध किया तो मदालसा ने उन्हीं गुणों का एक तेजस्वी बालक उत्पन्न कर दिया। हर माता की स्थिति मदालसा की सी होती है यदि वह अपने गुण, कर्म, स्वभाव में आवश्यक सुधार कर ले तो वैसे ही गुणवान् बालक को जन्म दे सकती है जैसा कि वह चाहे। ऊसर खेत और सड़े बीज के संयोग से जैसे बेतुके अविकसित पौधे पैदा हो सकते है वैसे ही बच्चे हमारे घरों में जन्मते हैं। गुलाब के फूल बढ़िया खेत में अच्छे माली के पुरुषार्थ से उगाये जाते हैं पर कटीली झाड़ियाँ चाहे जब उपज पड़ती हैं। अच्छी संतान सुसंस्कारी माता−पिता ही प्रयत्नपूर्वक उत्पन्न कर सकते हैं। किन्तु कुसंस्कारी बालक हर कोई फूहड़ स्त्री-पुरुष उगलते रह सकते हैं। अच्छी सद्गुणी संतान की आकाँक्षा गुलाब की फसल उगाने की तरह है जिसके लिए माँ-बाप को काफी तत्पर होना पड़ता है। यदि यह कार्य हमें कठिन लगता हो तो संस्कारवान सन्तान की आकाँक्षा भी छोड़ देनी चाहिए और जैसे भी उद्दंड, दुर्गुणी, कुसंस्कारी, दुर्गति बच्चे जन्मे उन्हें अपनी करनी का फल मानकर सन्तोष कर लेना चाहिए।

पहले अपना सुधार

एक महात्मा इसलिए प्रसिद्ध था कि उसकी शिक्षाओं का दूसरों पर बड़ा असर पड़ता है जिससे जो कुछ कह देते थे वह वैसा ही करने लगता था। इस प्रशंसा को सुनकर एक माता अपने बालक को लेकर यह उपदेश दिलाने महात्मा के पास पहुँची कि बच्चा अधिक शक्कर न खाया करे। डाक्टर मिठाई के लिए मना करते थे पर बालक मानता न था। महात्मा पहले तो कुछ गंभीर हुए पर पीछे महिला को दस दिन बाद आकर उपदेश दिलाने के लिए कह कर उसे विदा कर दिया। महिला दस दिन बाद फिर आई। महात्मा ने शक्कर न खाने का उपदेश दिया और बालक ने उसी दिन से उसे मानना शुरू कर दिया। पास बैठने वाले लोगों ने पूछा इतनी छोटी बात के लिए आपने दस दिन बाद आने के लिए उस महिला को क्यों कहा? महात्मा जी ने बताया कि तब वह स्वयं शक्कर बड़ी रुचिपूर्वक खाते थे इसलिए इन दिनों दिये गये उपदेश का कोई प्रभाव बालक पर नहीं पड़ सकता था। इन दस दिनों में मैनें स्वयं शक्कर त्यागी और उसके प्रति घृणा बुद्धि भी पैदा की। इतना सुधार अपने में कर लेने के बाद ही मेरे लिए यह सम्भव हो सका कि बच्चे को शक्कर छोड़ने का प्रभावशाली उपदेश दे सकूँ।

बच्चों को आमतौर से उनके अभिभावक बहुत अच्छे उपदेश देते रहते हैं और उन्हें राम, भरत एवं श्रवण कुमार देखना चाहते हैं। पर कभी यह नहीं सोचते कि क्या हमने अपनी वाणी एवं आकाँक्षा को अपने में आवश्यक सुधार करके इस योग्य बना लिया है कि उसका प्रभाव बच्चों पर पड़ सके?


उत्तराधिकार में परिवार को पाँच रत्न दीजिए

धन दौलत, खेती, जमीन-जायदाद, सोना−चाँदी, रुपया, व्यापार आदि अनेकों माँ-बाप अपने बच्चों को उत्तराधिकार में देकर जाते है। इससे उनका कुछ दिन काम भी चलता है पर व्यक्तित्व के विकास की दृष्टि से यह सभी चीजें अपर्याप्त हैं। निम्न श्रेणी का व्यक्तित्व होने पर आलस्य और प्रमाद से ग्रसित व्यक्ति उत्तराधिकार में प्राप्त हुई सम्पदाओं को भी सुरक्षित नहीं रख सकता। वह दुर्गुणों के कारण इन चीजों को बर्बाद कर देता है या उसे अज्ञानी और अव्यवस्थित पाकर लक्ष्मी स्वयं ही छोड़ कर चली जाती है। बड़े परिश्रम और लगन के साथ सञ्चय करके माँ-बाप अपने बच्चों के लिए कुछ इसलिए छोड़ते हैं कि हमारे पीछे भी बच्चे सुखपूर्वक रहेंगे, पर वे यह भूल जाते हैं कि सद्गुणों का समुचित उन्हें लाभ पहुँचाना तो दूर उलटे अनेक दुर्गुणों को बढ़ावा देने वाली सिद्ध होगी। गरीब बच्चे उतने नहीं बिगड़ते जितने अमीरों के। गरीब को रोज कमाना और रोज खाना पड़ता है। फालतू कामों के लिए उनके पास पैसा भी नहीं होता इसलिए वे एयाशी, विलासिता, व्यसन और बदमाशी के फेर में पड़ने से सहज ही बच जाते हैं। पर जिनके घर में सुविधा है उनके दुर्गुणों को पनपने में भी सुविधा रहती है वे दुखदायक परिस्थितियों में आसानी से—कुछ ही दिनों में फँस जाते हैं।

अभिभावकों की जिम्मेदारी

अभिभावकों का कर्तव्य है कि अपने बच्चों के लालन−पालन का, खिलाने−पिलाने का, लाड़-चाव का, सुख−सुविधा का, पढ़ाई−लिखाई, ब्याह शादी और आजीविका में लगाने का समुचित ध्यान रखें। पर इतने तक ही सीमित हो जाने से उनका कर्तव्य पूर्ण नहीं हो जाता। इन सब बातों से अधिक उत्तरदायित्व उन पर इस बात का है अपने बच्चों को सभ्य और सद्गुणी बना कर जावें। शारीरिक, बौद्धिक और आर्थिक विकास को महत्वपूर्ण माना जाता है सो ठीक है पर यह न भूलना चाहिए कि यदि बालक में अच्छी आदतों का, सत्प्रवृत्तियों का, सद्भावनाओं का समुचित विकास नहीं किया गया है तो वह बलवान, विद्वान, धनवान कुछ भी क्यों न रहे मानसिक दृष्टि से सदा दुखी नहीं बन सकता है। साधनों के आधार पर सुविधा बढ़ सकती है पर शान्ति और सन्तोष तो अच्छी मनोवृत्तियों के ही प्रतिफल हैं। कुसंस्कारी व्यक्ति को कभी भी सुख नहीं मिल सकता। वैभव के कारण दूसरों में अपने सुखी होने का भ्रम पैदा किया जा सकता है पर वस्तु स्थिति सदा यही रहती है कि जिसका दृष्टिकोण ऊँचा है सच्चा सुख केवल उन्हीं तक सीमित रहेगा।

बच्चों का उज्ज्वल भविष्य

जो अभिभावक अपने बच्चों को सचमुच सुखी बनाना चाहते हों, उनके भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहतें हों उनके लिए आवश्यक है कि सद्गुणों की दैवी सम्पदा अपनी संतति को अधिकाधिक मात्रा में देने का प्रयत्न करें। पर यह दे सकना उन्हीं के लिए संभव है जिनके पास स्वतः कुछ हो। धनी व्यक्ति ही अपने बच्चों के लिए धन छोड़ सकते हैं। सद्गुणी व्यक्ति ही उत्तराधिकार में अपनी संतति को निखरा हुआ व्यक्तित्व प्रदान कर सकते हैं। बच्चों को कुछ देने या छोड़ जाने की प्रसन्नता प्राप्त करने से पूर्व अभिभावकों को पहले कठोर श्रम करके स्वयं कमाई करनी पड़ती है तब उस संग्रह को किसी के लिए दे सकना संभव होता है। सद्गुणों की पूँजी पहले हमें अपने स्वभाव में संचित करनी पड़ेगी। उसके बिना बच्चों को अच्छा बनाने की बात सोचना व्यर्थ है। ढपोरशंख की कथा है कि वह कहता बहुत था और करता कुछ नहीं था। हम बालकों को सज्जन बनने की शिक्षा दें और स्वयं दुर्जन बनें रहें तो अभीष्ट उद्देश्य किसी भी प्रकार पूरा न हो सकेगा। बच्चों को सुधारने से पूर्व हमें अपने आपको सुधारना होगा। बालकों की समझ अविकसित होती है वे उपदेशों को अच्छी तरह समझ नहीं पाते पर उनकी अनुकरण शक्ति प्रबल रहती है जो उसकी नकल तुरन्त करने लगते हैं।

श्रम-शीलता की शिक्षा

यदि हम चाहते हैं कि हमारे बालक आलसी और अकर्मण्य न बनें तो हमें उनके सामने श्रमशीलता एवं कार्य संलग्नता का उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए और अपनी ही भाँति उन्हें भी किसी उपयुक्त कार्यक्रम में लगे रहने की दिनचर्या बना देनी चाहिए। व्यवस्था ऐसी करनी कि बालक खिन्न होकर नहीं वरन् मनोरंजन समझकर बताये हुए कार्यों में लगा रहें। उसका मन न लगता हो तो किसी दूसरे प्रकार से हेर-फेर कर देना चाहिए। खेलना भी एक काम है यदि वह नियत समय और उचित वातावरण में सम्पन्न किया जाय। खेलों में जहाँ मनोरंजन के लिए स्थान रहे वहाँ बुद्धि-विकास एवं सामाजिक प्रवृत्तियों की भी गुँजाइश रहनी चाहिए। घर के कई उपयोगी कामों में बच्चों को लगाये रहने और साथ ही उनका मनोरंजन होते रहने की अपनी परिस्थितियों के अनुरूप व्यवस्था कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति आसानी से बना सकता है। पुरस्कार और प्रशंसा के द्वारा भी बच्चों को उपयोगी कामों में लगे रहने की प्रेरणा दी जा सकती है। समय को व्यर्थ न जाने देना और उसे किसी न किसी उपयोगी कार्य में निरन्तर लगाये रहने की आदत मानव जीवन की सब से बड़ी श्रेष्ठता एवं विशेषता है। जिसने अपने बच्चों को यह आदत सिखा दी उसने उनके लिए अपार सम्पत्ति उत्तराधिकार में छोड़ने की अपेक्षा कहीं अधिक उपकार किया है, यह मानना चाहिए।

उदारता एक दिव्य गुण

उदारता दूसरा गुण है। बच्चे अपने भाई-बहिनों से अकसर लड़ते-झगड़ते रहते हैं खाने−पीने की वस्तुओं के लिए, खिलौनों के लिए, या और किन्हीं वस्तुओं के लिए आपस में छीना−झपटी करते रहते हैं। इस आदत को जरा भी प्रोत्साहन नहीं देना चाहिए वरन् उन्हें यह सिखाना चाहिए कि मिठाई आदि कोई स्वादिष्ट चीज पहले अपने दूसरे बहिन-भाइयों को बाँटे तब खुद खावें। जो बच्चा अधिक स्वार्थी हो उसी से यह बटवारे का काम कराना चाहिए। और उसे उचित बँटवारा करने पर, स्वयं सबसे पीछे और कम लेने की सज्जनता पर जी खोलकर बधाई देनी चाहिए तथा इस कार्य की उपयोगिता भी समझनी चाहिए। ईर्ष्यावश दूसरे बच्चों की चीजों को तोड़ने-फोड़ने या खराब करने की आदत किसी बच्चे की पड़ने लगी हो तो इस की बुराई समझनी चाहिए और उपकार एवं स्नेह बुद्धि जगाकर दूसरों की वस्तुओं को सँभालकर रखने एवं सहायता करने की प्रवृत्ति पैदा करनी चाहिए। एक दूसरे के कटु−व्यवहार को सहना, मित्रता में भी समन्वय उत्पन्न करना, भूलने और क्षमा करने की नीति रखना, अपने कर्तव्य को स्मरण रखना और अधिकार को भूल जाना जहाँ भी स्वीकार किया जायेगा वहाँ की शान्ति और प्रेम भावना को कोई भी कारण नष्ट न कर सकेगा। उदारता पारिवारिक शान्ति की सबसे बड़ी गारन्टी है।

सफाई और सादगी

सफाई तीसरा गुण है जो बच्चों आरम्भ से ही उत्पन्न करना चाहिए। सफाई से प्रेम होने का अर्थ है मैल से घृणा। धोबी के धुले कपड़े चटपट पहन लेना और पुराने कपड़े में उतारकर फेंक देना सफाई नहीं है, यह तो सौन्दर्य के प्रति आकर्षण मात्र है। शरीर के किसी अंग पर मैल जमा न होने देना, रगड़−रगड़ कर भली प्रकार स्नान करना, दाँत और जीभ ठीक तरह साफ करना, धुले कपड़े पहनना, अपने उपयोग की सभी चीजें ठीक रखना यह सभी आदतें आवश्यक हैं। पर सबसे बड़ी बात यह है कि अपनी कोई वस्तु अव्यवस्थित पड़ी न रहने दी जाय। कपड़े, जूते, बर्तन, पुस्तकें, कलम आदि वस्तुओं को बच्चे जहाँ−तहाँ पटक कर दूसरे काम में लग जाते हैं। उन्हें सिखाया जाना चाहिए कि एक काम पूरा करके तब दूसरा आरंभ करना चाहिए और गन्दगी से घृणा करनी चाहिए। गन्दगी के उत्पन्न होते ही साफ करना चाहिए। हर वस्तु स्वच्छ और सलीके से रखनी चाहिए। गन्दगी से घृणा न हो उसे सहन करना, मानव स्वभाव का एक बहुत बड़ा दूषण है।

तड़क−भड़क, शौकीनी, फैशन−परस्ती सफाई जैसी दीखते हुए भी उससे सर्वथा भिन्न है। सादगी ही सज्जनता की पोशाक है। जो लोग फैशन बनाकर अपने आपको गुड्डे गुड़ियों जैसा सजाते हैं वे मानसिक दृष्टि से पीछे ही कहे जा सकते हैं। शालीनता का प्रधान चिह्न सादगी ही माना गया है और सभी सम्भ्रान्त व्यक्ति उसी को महत्व देते हैं। चीजों को सुव्यवस्थित एवं सुसज्जित रूप से रखने की आदत आरम्भ में छोटी ही क्यों न लगती हो आगे चलकर व्यक्ति को एक सुयोग्य व्यवस्थापक एवं सुरुचि सम्पन्न व्यक्ति बना देती है। इसलिए बच्चों को बारबार टोकते रह कर, उन्हें बारबार समझते रह कर सँभालने और साफ रखने की आदत का अभ्यासी बनाना चाहिए। एक काम को पूरा करके दूसरे को हाथ लगाया जाय। यह आदत धैर्य और व्यवस्था का पूर्ण रूप है। कपड़े, पुस्तकें, बर्तन, जूते आदि यथास्थान रखे बिना वे आगे का काम न करें यह आदत डाली जा सके तो एक काम अधूरा छोड़कर दूसरे में लगने की, दूसरा छोड़कर तीसरे में संलग्न हो जाने की बाल बुद्धि से बचा जा सकता है। और बच्चा आगे चलकर इस आदत के कारण ही जीवन के हर क्षेत्र में सफलता का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। पूरा मन लगाकर जो भी काम किया जायेगा उसमें जादू जैसी विशेषता होती है और हमारे अधूरे मन से किये हुए काम आमतौर से फूहड़पन लिये होते हैं।

समय का सदुपयोग

समय का पालन, नियत दिनचर्या के आधार पर यथा समय पर अपने सब काम करने की आदतें मानव जीवन के सदुपयोग का महत्वपूर्ण गुण हैं। अधिकाँश व्यक्ति समय का मूल्य नहीं समझते। ईश्वर ने सम्पत्ति के रूप में मानव प्राणी को यही सबसे बड़ी− सबसे मूल्यवान वस्तु दी है। वह जो कुछ भी विभूति चाहे अपने समय का पूरा उपयोग करके उसे प्राप्त कर सकता है। समय के सदुपयोग का नाम ही पुरुषार्थ है। नियमित रूप से व्यवस्थित गति से चलती रहने वाली चींटी भी योजन लम्बी मंजिल पार कर लेती है पर निठल्ला बैठने वाला गरुड़ भी जहाँ का तहाँ रहता है। फुरसत न मिलने की शिकायत तो हर आदमी करता है और अपने को कार्य व्यस्त भी मानता है पर सच बात यह है कि कोई बिरला ही अपने आधे समय का भी ठीक उपयोग कर पाता है। धीरे−धीरे अधूरे अव्यवस्थित प्रकार से, आवश्यकता से अधिक समय मामूली बातों में लगा कर अनुपयोगी कामों में लगे रहकर आमतौर से लोग अपनी आधी जिन्दगी नष्ट कर लेते हैं। लिखित दिनचर्या बनाये बिना यह पता ही नहीं लगता कि आवश्यक और अनावश्यक कार्य कौन−कौन से हैं और कब कौनसा, कार्य, कितने समय में करना है। इसलिए बच्चों को समय का महत्व समझाना चाहिए। व्यस्तता का महत्व बताना चाहिए और समय की बर्बादी की हानि से उन्हें परिचित रखना चाहिए। जल्दी सोना और जल्दी उठना किसी भी प्रगतिशील जीवन में रुचि रखने वालो के लिए नितान्त आवश्यक है। जिसके सामने कोई अनिवार्य कारण न हों उन्हें सूर्य अस्त होने के तीन घण्टे के बाद तक अवश्य सो जाना चाहिए और प्रातःकाल सूर्य उदय होने से दो घण्टे पहले उठ बैठना चाहिए। यह सोने और उठने की आदत जिनने ठीक कर ली वे बच्चे निश्चित रूप में पढ़ाई में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होते रहेंगे। इस आदत के कारण प्रतिदिन कई महत्वपूर्ण घण्टे अधिक कार्य करने के लिए मिल जाते हैं और उसको जिस भी कार्य में लगाया जाय उसी में मनुष्य आशाजनक उन्नति कर सकता है। जिसने अपने समय का मूल्य समझ लिया और उसके सदुपयोग की ठान ली समझना चाहिए कि उसने अपने जीवन को सफल बनाने की आधी मंजिल पार कर ली।

शिष्टाचार और सज्जनता

पाँचवाँ गुण जो बच्चों को सिखाया जाना चाहिए वह है—नम्रता। सज्जनता, शिष्टाचार, मधुर−भाषण, भलमनसाहत यही तो वह विशेषताऐं हैं जिनसे आकर्षित होकर लोग अपने ऊपर अनुकम्पा अनुभव करते हैं। पराये को अपना बनाने का गुण केवल मात्र सज्जनता के व्यवहार में ही सन्निहित है। अनुदार, रूखे, कर्कश, अशिष्ट, कटुभाषी व्यक्ति अपनों को भी पराया बना देते हैं और मित्रों से शत्रुता उत्पन्न कर लेते हैं। उसके विपरीत जिनकी वाणी में प्रेम घुला रहता है, आदर के साथ बोलते हैं और नम्रता और सज्जनता का परिचय देते हैं उनके शत्रु भी देर तक शत्रु नहीं रह सकते, उन्हें प्रतिकूलता छोड़कर अनुकूल बनने के लिए विवश होना पड़ता है।

परिवार के विद्यालय में सज्जनता एवं मधुरता का अभ्यास छोटी आयु से ही बालकों को कराया जाना चाहिए। बड़े−छोटों के साथ आप या तुम कहते हुए सम्मान सूचक शब्दों में ही बात करें। प्रताड़ना एवं भर्त्सना भरी बात भी कोई गलती करने पर कही जा सकती है पर वह होनी नम्र और शिष्ट शब्दों में ही चाहिए। गाली−गलौज भरे मर्मभेदी, व्यंगात्मक, तिरस्कारपूर्ण कटु शब्द हर किसी को बुरे लगते हैं। छोटों पर भी उसका बुरा प्रभाव पड़ता है। जिह्वा पर इतना काबू होना चाहिए कि वह आवेश भरे दुष्ट शब्दों को बोलने न पाये। दुष्ट शब्दों की प्रतिक्रिया दुष्टतापूर्ण ही होती है उससे केवल द्वेष बढ़ता है। कभी इनकार का अवसर आवे तो उसमें भी अपनी असमर्थता नम्र शब्दों में प्रकट करनी चाहिए। कटु शब्दों में इनकार करने से सामने वाले पर दुहरा प्रहार होता है और वह भी तिलमिलाकर दुहरी दुष्टता धारण कर लेता है। विवाद, इनकार एवं प्रतिद्वन्दिता में भी शिष्ट भाषा और सामने वाले के सम्मान का ध्यान रखा जाना चाहिए।

चरण स्पर्श पूर्वक अभिवंदन

घर का प्रत्येक व्यक्ति अपने बड़ों का विशेषतया माता−पिता एवं वयोवृद्धों का नित्य चरणस्पर्श के साथ अभिवादन किया करे। यह परम्परा हमारे हर घर में आरम्भ की जानी चाहिए। इसका प्रभाव परिवार के स्नेह सम्बन्धों पर बहुत समाधान नित्य ही होता रहता है। कोई कटुता उत्पन्न होती है तो इस प्रक्रिया के द्वारा उसका बहुत कुछ समाधान नित्य ही होता रहता है। छोटे बच्चे अपने बड़े भाई को प्रणाम किया करें। बड़े अपने बड़ों को प्रणाम करें और चरण प्रतीक का अभिवन्दन किया करें। स्वर्गीय पूर्वजों के चित्र अथवा चरण प्रतीक हर घर में रहने चाहिए और उनके अभिवन्दन की धर्म प्रक्रिया परिवार के प्रत्येक सदस्य को नित्य कर्म की तरह पूर्ण करनी चाहिए। बहुएँ अपने पति के, सास-ससुर के, बड़ी ननद के, जेठ-जिठानी के तथा घर में जो और वयोवृद्ध हों उनका चरण स्पर्श पूर्वक अभिवन्दन किया करें। सज्जनता, नम्रता और धार्मिकता की यह पुनीत परिपाटी जिन घरों में चल पड़ेगी वहाँ पारिवारिक कलह का एक बहुत बड़ा भाग स्वयमेव समाप्त हो जायेगा। आरम्भ में संकोचवश, इस नई प्रथा को अपनाने में घर के सदस्य आना-कानी कर सकते हैं पर यदि साहसपूर्वक एक दो व्यक्ति भी इसे अपना लें तो कुछ दिन में और सब लोग भी इस श्रेष्ठ परम्परा को अवश्य अपना लेंगे।

वाणी से भी और क्रिया से भी

परिवार के सत् शिक्षण के लिए यह अत्यन्त सरल कार्यक्रम है पर इसकी महत्ता अत्यधिक है (1) श्रमशीलता (2) उदारता (3) सफाई (4) समय का सदुपयोग (5) शिष्टाचार के पाँच नियम जिस परिवार में जड़ जमा लेंगे वहाँ स्वर्ग के लक्षण कुछ ही दिन में प्रत्यक्ष दिखाई देने लगेंगे। यह पाँचों गुण छोटों की सिखाने से पूर्व बड़ों को पहले अपने में उत्पन्न करने चाहिएं और वाणी से ही नहीं क्रिया से भी छोटों को इनकी शिक्षा देनी चाहिए। यों सद्गुण अनेक हैं पर इन पाँच की महत्ता सर्वोपरि है। गृहपति का तथा परिवार के प्रत्येक उत्तरदायी व्यक्ति का कर्तव्य है कि इन्हें अपने स्वभाव का अंग बनावें। यह गुण जितने-जितने अंशों में बढ़ेंगे परिवार में पारस्परिक सम्बन्ध मधुर होने के साथ−साथ आर्थिक तथा अन्य प्रकार की प्रगति के साधन जुटने लगेंगे। जिन्हें अपना परिवार देव परिवार के रूप में देखने की इच्छा हो वे इन पाँच गुणों का प्रवेश परिजनों में कराते रहने के लिए कटिबद्ध हों और देखें कि उनका बृहत् शरीर परिवार कितना स्वस्थ, समर्थ एवं सुविकसित बनता चला जाता है।


आर्थिक परिस्थितियाँ और उनका सुधार

जिस प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य और पारिवारिक सुसंबंध का प्रधान आधार मानसिक सन्तुलन ठीक रहना है उसी प्रकार जीवन की तीसरी आवश्यकता अर्थ व्यवस्था का ठीक रहना या बिगड़ जाना बहुत कुछ हमारी मनोदशा पर निर्भर रहता है। आज अधिकाँश लोग आर्थिक तंगी का अनुभव करते हैं। जिनकी आजीविका कम है उनको कठिनाई अनुभव करना तो स्वाभाविक ही है, पर जो लोग काफी उपार्जन करते हैं वे भी जब परेशान दिखते हैं तब उसका कारण उनकी खर्च करने संबंधी नीति में भूल होना ही होता है।

आजीविका बढ़ाने के लिए जहाँ शिक्षा, पूँजी, एवं परिस्थिति कारण होती हैं वहाँ मनुष्य का व्यक्तित्व भी बहुत कुछ काम करता है। चाहे नौकरी हो चाहे व्यापार या कृषि सभी कार्यों में उन्नति के लिए प्रभावशाली एवं सुगठित व्यक्तित्व की आवश्यकता रहती है। अकेला मनुष्य केवल अपने बलबूते पर कुछ भी नहीं कर सकता। चिड़ियाँ और पशु−पक्षी जन्म के बहुत थोड़े समय बाद ही अपने बलबूते पर अपना जीवन क्रम स्वयं चलाने लगते हैं उन्हें किसी के सहयोग की आवश्यकता नहीं होती। पर मनुष्य के लिए यह बात जीवन भर सम्भव नहीं। उसे पग−पग पर दूसरों की सहायता लेनी पड़ती है। जिसे दूसरों का जितना अधिक सहयोग मिल जाता है वह उतना ही उन्नति कर सकने में सफल होता है।

विरोध और असहयोग

नौकरी करने वाले के साथी या सहायक यदि विरोधी न रह कर सहयोगी रहें और मालिक की आँखों में उसकी अच्छाई जम जावे तो ही उसकी उन्नति हो सकना संभव है। जिसके साथी हर घड़ी लड़ते रहते हैं, नुकसान पहुँचाते और शिकायत करने पर तुले रहते हैं, जिसके अफसर असंतुष्ट रहते हैं उसकी अधिक उन्नति कैसे हो सकेगी? जिस व्यापारी के ग्राहक उसके यहाँ से असंतुष्ट होकर जाते हैं, वे स्वयं तो दुबारा उसके यहाँ आते ही नहीं अपने प्रभाव के दूसरों लोगों को भी उसकी बुराई करके बरगला देते हैं। जिसके यहाँ ग्राहक घटेंगे उसकी आमदनी कैसे न घटेगी? जिस किसान के पड़ौसी असंतुष्ट हैं वे यदि सीधा नुकसान न पहुँचावें तो भी चिड़ियों या जानवरों द्वारा जब किसी प्रकार उसका नुकसान हो रहा होगा तो उसे रोकने में उपेक्षा बरतेंगे। मजदूरों की आजकल कमी है जो वे पहले भले स्वभाव वाले के यहाँ काम करने के लिए जाना चाहते हैं। नहर के पानी से लेकर सहकारी बैंकों तक के कार्य में बुरे स्वभाव के व्यक्ति को सदा पीछे रहना और असहयोग का सामना करना पड़ता है।

व्यक्तित्व का आकर्षण

यह एक तथ्य है कि जिसके सहयोगी समर्थक एवं प्रशंसक अधिक होते हैं उसे ही आर्थिक क्षेत्र में भी सफलता मिलती है। जिसके प्रति द्वेष, विरोध एवं निन्दा का वातावरण फैला रहेगा वह दिन−दिन अधिक अकेला पड़ता जायेगा और उपेक्षा, असहयोग एवं तिरस्कार का मानसिक आघात सहते रहने के साथ−साथ अपना आर्थिक सन्तुलन भी खोता चला जायेगा। आमदनी बढ़ाने के लिए जहाँ ऊँची शिक्षा, अनुभव, विशेषज्ञता, पूँजी, स्वास्थ्य एवं परिस्थितियों की आवश्यकता है वहाँ यह भी नितान्त आवश्यक है कि मनुष्य का व्यक्तित्व आकर्षक, प्रभावशाली एवं मधुर हो। अन्य बातें प्राप्त करने में कारणवश कुछ कठिनाई भी हो सकती है पर अपने स्वभाव को बदल कर हम समस्या का बहुत बढ़ा अंश बड़ी आसानी से हल कर सकते हैं। जिसे सहयोगी बढ़ाने की विद्या का ज्ञान है उसे पूँजी, ज्ञान एवं अनुकूलता प्राप्त करने में भी ज्यादा देर नहीं लगती।

मानवीय सदाशयता का लाभ

मानत जाति में से उदारता और भलमनसाहत का लोप अभी नहीं हुआ है। माना कि सज्जनता घट रही है, स्वार्थ बढ़ रहा है और लोग एक दूसरे के सहायक न होकर ईर्ष्या और शत्रुता का परिचय देने में अग्रणी रहते हैं, इतना होने पर भी अभी इस संसार में मानवता बहुत कुछ बाकी है। और उसका लाभ उन लोगों को सदा मिलता ही रहेगा जो इसके अधिकारी हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम उनके स्वभाव को ऐसा ढाले जिससे दूसरों की सहानुभूति अनायास ही उपलब्ध हो सके। चालाक आदमी लच्छेदार बातें बनाकर एक बार किसी को ठग सकते हैं पर बार-बार ऐसा कर सकना उसके लिए कदापि संभव न होगा। मनुष्य में भले−बुरे की परख करने का विवेक मौजूद है और वह बदमाशों तथा बदमाशियों को देर तक पनपने नहीं दे सकता। चालाकी और बेईमानी से कमाई हो सकती है यह बात उतनी ही देर के लिए ठीक है जब तक कि भंडाफोड़ नहीं हो जाता और यह एक सनातन सत्य है कि बुराई या भलाई देर तक छिपी नहीं रह सकती। भलाई का विस्तार मंदगति से होता है पर बुराई तो अत्यन्त द्रुतगति से आकाश−पाताल तक जा पहुँचती है। इसलिए आमतौर से चालाकी और बेईमानी के आधार पर चलने वाले काम कुछ ही दिन में नष्ट हो जाते हैं। उपभोक्ता और सहकर्मी ही उनके सबसे बड़े शत्रु बन जाते हैं।

अनीति की कमाई

चोर और बेईमान, दुष्ट और दुर्गुणी व्यक्ति घात लगाकर कभी कुछ कमाई कर लें तो भी वह देर तक ठहरती नहीं। पहले तो उपार्जनकर्ता के दुर्गुण ही उस कमाई को स्वाहा कर देते हैं यदि उससे भी बची रहे तो दैवी प्रकोप की तरह बीमारी, राजदण्ड, चोरी, फिजूलखर्ची आदि में उसका अन्त होता है। दुर्गुणी अन्ततः निर्धन होकर ही रहता है। चालाकों में से अधिकाँश को उपेक्षित एवं तिरस्कृत जीवन बिताना पड़ता है। ऐसे लोग दूसरे के लिए भय, संदेह और आशंका के कारण ही बने रहते हैं उन्हें सहयोग से अभाव में चारों ओर असफलता का ही मुँह देखना पड़ता है। ऐसे लोगों की आर्थिक उन्नति कैसे संभव होगी? उन्हें अपने निम्न स्वभाव के कारण निम्न परिस्थितियों में ही पड़ा रहना पड़ेगा। उन्नतिशील व्यक्ति इस संसार में बहुत हुए हैं पर वे सभी उदार मन और दूरदर्शी रहे हैं। जिनका अन्तःकरण विशाल है उन्हीं के प्रति लोगों की सद्भावना एकत्रित होती है और केवल वे ही अनुपयुक्त परिस्थितियों को परास्त करते हुए स्थायी प्रगति की ओर अग्रसर होते है। कुछ दिन के लिए अस्थाई लाभ उचक्के लोग भी दूसरों को धोखे में डाल कर प्राप्त कर सकते हैं पर यह स्मरण रखने की बात है कि उसमें कभी स्थायित्व न होगा, ऐसी उन्नति देर तक ठहर न सकेगी।

अच्छाइयाँ ही लाभकर हैं

जिन्होंने छोटी स्थिति से ऊँचे उठ कर कोई बड़ी और स्थायी सफलता प्राप्त की है उनमें से शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी आदतों और अच्छाइयों की मात्रा अधिक न रही हो। चोर और ठगों में भी कुछ अच्छाइयाँ होती है वे बहुत सतर्क, एकाग्र बुद्धि, मधुर भाषी, स्फूर्तिवान एवं साहसी होते हैं। इस प्रकार के सद्गुणों के आधार पर ही वे अपनी बुराई को देर तक छिपाये रह सकते हैं। यदि इस प्रकार का एक भी सद्गुण उनमें न हो तो उनकी बुरी, ठगी को एक कदम भी सफलता नहीं मिल सकती। चोरों की सफलता का श्रेय उनकी दुष्प्रवृत्तियों से नहीं वरन् उन सत्प्रवृत्तियों को दिया जायेगा जो कुछ समय के लिए ही सही अपने आवरण में बदमाशी को छिपा लेती है। जब चोर इन सद्गुणों का थोड़ा और दिखावटी प्रयोग करके इतना लाभ उठा लेते है तो जिनके मन में वस्तुतः उनकी जड़ जमी हुई है वे कितना लाभ उठा सकेंगे?

संसार में जितने भी बड़े व्यापार चल रहे हैं उनमें सच्चाई और सदाशयता का बहुत बड़ा अंश मिला हुआ है। भले ही वे लोग अपना काफी नफा निकालते हों पर ग्राहक के हित का पूरा−पूरा ध्यान रखते हैं। बढ़िया किस्म की घड़ियाँ, साइकिलें, मोटरें, साबुन, दवाएँ कपड़े आदि बनाने वाले कारखाने आज भी अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाते हुए अधिकाधिक उन्नति करते चले जाते हैं। इसके विपरीत जिनने नकली, अनुपयोगी, रद्दी−सद्दी चीजें बनाकर सस्ते भाव में ग्राहकों को बेच देने की नीति अपनाई वे दिवालिया हो गये। घाटा देकर बरबाद हो गये। ग्राहक एक बार कुछ अधिक पैसे खुशी−खुशी दे सकता है यदि उसे मजबूत और अच्छी चीज मिले। अधिक मूल्य देने की बात दो−चार दिन ही खटकेगी पर चीज की खराबी तो उसे तब तक क्षुब्ध करती रहेगी जब तक कि वह उसके सामने है। लोग सस्ती देशी चीजों की अपेक्षा विलायती महँगे दाम की चीजें खरीदना पसंद करते हैं, उसका कारण यही है कि देशी निर्माता अपने ग्राहक के स्थायी हित को ध्यान में नहीं रखते, उसे सस्तेपन के प्रलोभन में फँसाना चाहते हैं। यह नीति अन्ततः असफल ही होती है। हमारे देशी उद्योगों को इस नीति के कारण भारी हानि पहुँच रही है।

धोखेबाजी का दुखद अंत

नकली शहद, नकली घी, पानी मिला दूध, नकली दवाएँ, मिलावटी खाद्य पदार्थ, जेवरों में नकली धातुओं का सम्मिश्रण, जूतों के तले में कागज भर देना, कम तोलना, कम नापना, ठीक कीमत न बताकर मोलभाव करने में वक्त गँवाना आदि नकली कामों के पीछे जो मनोवृत्ति काम करती है उससे हमारे राष्ट्रीय व्यापार को भारी क्षति पहुँची है। ग्राहक दुकानदार के पास मजबूरी में जाता तो है पर उसे ठग और चोर समझ कर हर बात में सशंकित रहता है। दस जगह इसी संदेह और भ्रम में मारा−मारा फिरता है कि कहीं उसे खराब चीज महँगे दाम में न भेड़ दी जाय। यह परिस्थितियाँ बहुत दुःखदायी हैं, इससे हमारे राष्ट्रीय चरित्र के साथ−साथ व्यापारिक क्षति भी होती है। इन परिस्थितियों को उत्पन्न करने वाले लोग व्यापार की प्रतिष्ठा एवं मर्यादा को ही नष्ट नहीं करते वरन् अपने आर्थिक लाभ को भी भारी क्षति पहुँचाते हैं।

ईमानदारी को सुदृढ़ आधार मानकर जिनने अपना कारोबार आरंभ किया उन्हें आरंभिक दिनों में बेईमानों की प्रतिस्पर्धा में हानि रहती है। दूध के जले छाछ को भी फूँक कर पीते हैं। पर जब उन्हें यह विश्वास हो जाता है कि यह जलता दूध नहीं, ठंडी छाछ है तो उसे प्रसन्नता पूर्वक पीने लगते हैं। बढ़िया मिठाई बेचने वाले, आज भी मालामाल हैं दूर−दूर से आकर लोग उनकी दुकान पर मँडराते रहते हैं। इस नीति को जो कोई भी अपनायेगा वह जरूर सफलता प्राप्त करेगा। ईमानदारी का जहाँ व्यवहार होगा वहाँ ग्राहक गुलाब के फूल पर उड़ने वाले भौंरों की तरह घिरे रहेंगे और वहाँ आर्थिक घाटे का कोई कारण न रह जायेगा। बरगद के पेड़ की तरह ईमानदारी देर में पनपती है पर वह दृढ़तापूर्वक दीर्घकाल तक अपनी महत्ता से लाभान्वित करती है। इसके विपरीत बेईमानी हथेली पर सरसों जमाने वाले बाजीगरी तमाशे की तरह है जो कुछ देर आश्चर्यचकित करने के बाद रद्दी कूड़े में फेंके जाने के ही काम आता है। यदि हम अपने निर्धारित कार्यक्रम में इस नीति का समावेश कर लें तो हमारी आमदनी में निश्चय ही बहुत सुधार हो सकता है।

पूरा श्रम, पूरा लाभ

पूरे मन से, पूरे उत्साह से काम को एक विनोद, मनोरंजन या खेल समझ कर किया जाय तो उससे कितनी ही विशेषताऐं प्रकट होंगी और शरीर पर उसका अनुकूल प्रभाव पड़ेगा। किन्तु यदि काम को भार समझ कर रोते-झींकते, अधूरे मन से बेगार भुगतने की तरह किया गया है तो काम का प्रतिफल घटिया दर्जे का तो होना ही है साथ ही उसका शरीर पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा, थकान आवेगी। उद्विग्नता बढ़ेगी और समय भी बहुत बर्बाद होगा। स्फूर्ति और उत्साह के वातावरण में किया हुआ काम जितना एक घंटे में हँसते−खेलते हो जाता है उतना रोते झींकते, चुन−मुन चुन−मुन करते, आधा करना- आधा छोड़ना को नीति अपनाते हुए करने से चार घंटे में भी नहीं हो सकता । आजीविका बढ़ाने के लिए अधिक काम अधिक श्रम करना जरूरी है। इसे उमंग और उत्साह की मनोदशा के साथ करने पर ही आशाजनक फलदायक बनाया जा सकता है। काम को देखकर जिनका जी रोता है, जिन्हें आलस हर घड़ी घेरे रहता है उन्हें दरिद्रता से पीछा छूटने की आशा न करनी चाहिए। लक्ष्मी सदा से प्रयत्नशील, उद्योगी स्फूर्तिवान और निरन्तर कार्य संलग्न रहने वाले पुरुषार्थियों की ही अनुगामिनी रही है।

आर्थिक उन्नति के मूलभूत तथ्य

आमदनी कैसे बढ़े, इसका व्यापारिक एवं व्यवहारिक रूप व्यक्ति की अपनी योग्यता क्षमता एवं परिस्थितियों पर निर्भर है इनमें अनुकूलता उत्पन्न करना मनुष्य की दूरदर्शिता और सूझबूझ पर निर्भर है पर यह एक मान्य सिद्धान्त हर व्यक्ति पर हर परिस्थिति में लागू रहेगा कि उसे अपने में सज्जनता, मधुरता, उदारता और ईमानदारी की मात्रा बड़े परिमाण में बढ़ानी चाहिए। पुरुषार्थी और कार्य संलग्न बनना चाहिए। आशा उत्साह और और विश्वास के साथ जो काम किया जायेगा वह अपनी प्रतिष्ठा एवं प्रशंसा का कारण भी रहेगा और साथ ही आर्थिक उन्नति का निमित्त भी बनेगा। सदाचारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और मेहनत के साथ जो कर्मचारी काम करते हैं वे अधिकारियों के प्राणप्रिय बनते हैं और उन्नति का द्वार भी प्रशस्त करते हैं। हरामखोरों को बातूनी, चापलूस और तिकड़मी बनकर काम चलाना पड़ता है पर ईमानदारी अपने में सबसे बड़ी तिकड़म है जिसे कोई चालाक कभी भी प्राप्त न कर सकेगा।


मितव्ययिता का उपयोगी दृष्टिकोण

मनोदशा में आवश्यक सुधार हुए बिना न तो शारीरिक स्थिति सुधरती है और न पारिवारिक व्यवस्था बनती है। आर्थिक प्रश्न भी बहुत कुछ इसी के ऊपर निर्भर है। मन एक प्रकार का प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है। उसके नीचे बैठकर हम जैसी भी कल्पनाऐं करते हैं, भावनाऐं रखते हैं वैसी ही परिस्थितियाँ सामने आकर खड़ी हो जाती हैं। बिगड़ा हुआ मन ही मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु और सुधरा हुआ मन ही अपना सबसे बड़ा मित्र है। इसलिए गीताकार ने कहा है कि “उद्धरेदात्मात्मानं नात्मानं अवसादयेत्” अर्थात् अपना सुधार आप करें अपने को गिरने न दें। अपना सुधार मनुष्य स्वयं ही कर सकता है। दूसरे की सिग्वावन की उपेक्षा भी की जा सकती है और नुक्ताचीनी भी। सुधरता कोई व्यक्ति तभी है जब उसके मन में अपने सुधार की तीव्र आकाँक्षा जागृत होती है। यह आत्म−सुधार का जागरण ही मनुष्य के सोये हुए भाग्य का जागरण है। लोग ज्योतिषियों से पूछते रहते हैं कि हमारा भाग्योदय कब होगा? वे बेचारे क्या उत्तर दे सकते हैं? हर मनुष्य का भाग्य उसकी अपनी मुट्ठी में है। अपनी आदतों के कारण ही उसकी दुर्गति बनाई गई होती है। जब मनुष्य अपनी त्रुटियों को सुधारने, दृष्टिकोण को बदलने और अच्छी आदतों को उत्पन्न करने के लिए कटिबद्ध हो जाता है तो इस परिवर्तन के साथ−साथ उसका भाग्य भी बदलने लगता है।

दो प्रमुख कारण

आर्थिक कठिनाइयों के दो कारण हैं एक उपार्जन की कमी दूसरी खर्च की अधिकता। अपने में अधिक दक्षता उत्पन्न करके, पूरे मन और दिलचस्पी से जुटने, सचाई और अच्छाई की नीति रखने तथा साथियों में अपने प्रति सद्भावना उत्पन्न करने वाला व्यवहार क्रम बना लेने से हर आदमी की हर प्रकार की उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है साथ ही आर्थिक उन्नति के ऐसे अवसर भी अनायास उपस्थित होते हैं जिनकी पूर्व आशा बहुत कम थी। उपार्जन में कुछ कमी रहे तो भी काम चल सकता है यदि अपने उपार्जित धन का सदुपयोग करना हमें ज्ञात हो। गरीबी का एक बहुत बड़ा कारण होता है फिजूलखर्ची। कमाने में कोई बहुत बुद्धिमत्ता की बात नहीं है। कोई बेवकूफ आदमी भी परिस्थिति अनुकूल होने पर बहुत धन उपार्जित कर सकता है। उत्तराधिकार, ब्याज भाड़ा, गढ़ा धन, लाटरी, जुआ, चोरी या कोई और ऐसे नैतिक या अनैतिक कारण ऐसे हो सकते हैं जिनके कारण मनुष्य को बिना परिश्रम एवं योग्यता के ही अनायास बहुत लाभ होने लगे। व्यापार एवं कृषि में भी कोई ऐसी अनुकूलताएँ अकस्मात् आते देखी गई हैं जिनके कारण कोई अयोग्य व्यक्ति भी अमीर बन जाते हैं। बुद्धिमानी की सबसे बड़ी परीक्षा इसमें हैं कि उपार्जित पैसे खर्च किस काम में, किस प्रकार, कितनी मात्रा में किया जाता है।

सबसे बुरी किस्म के बेवकूफ

बेवकूफों की अनेक किस्म हैं उनमें सबसे बुरी किस्म के बेवकूफ वे हैं जिन्हें पैसे का महत्व और उपयोग मालूम नहीं और जो अनावश्यक कामों में अमर्यादित खर्च करते रहते हैं। फिजूलखर्ची दरिद्रता की सगी बहिन है। वह जहाँ कहीं जाती है वहाँ अपनी सहेली को जरूर बुला लेती है। यदि कुबेर भी अपव्यय करने लगे तो कुछ दिन में उसका खजाना खाली हो जाना निश्चित है। दुनियाँ में ऐसे असंख्यों व्यक्ति हैं जिनकी योग्यता कम होने या परिस्थितियाँ प्रतिकूल होने से उपार्जन थोड़ा हो पाता है फिर भी वे मितव्ययिता और दूरदर्शिता से अपना खर्च चलाकर अपने गृहस्थ का पालन करते हैं और बिना किसी के कर्जदार बने हँसी−खुशी का जीवन बिताते रहते हैं। इसके विपरीत ऐसे लोग भी देखे जाते हैं जिनकी आमदनी काफी अच्छी होते हुए भी सदा पैसे की तंगी बनी रहती है वे आमदनी कम होने की−शिकायत करते हैं पर खर्च कम करने की बात नहीं सोचते। यदि इस ओर ध्यान दिया जाने लगे तो हर आदमी आर्थिक कठिनाई की उलझन बड़ी आसानी के साथ पार कर सकता है।

पैसे का सदुपयोग

मितव्ययिता का दृष्टिकोण रखना, अपनी गाढ़ी कमाई के एक पैसे का सदुपयोग करना जिसने सीख लिया उसे तंगी और परेशानी की कोई बात न रहेगी। आमतौर से लोग अपने से बड़ी हैसियत के लोगों की खर्च करने में नक्ल बनाने का उपहासास्पद−बन्दर अनुकरण−करते हैं। नक्ल बनानी है तो उनकी योग्यताओं और विशेषताओं की तथा अच्छाइयों की नक्ल करनी चाहिए जिनके कारण वे बड़े बन सकने में समर्थ हुए। अंग्रेजों में व्यक्तिगत एवं सामाजिक रूप से अनेकों अच्छाइयाँ थी, उनके स्वभाव, चरित्र, दृष्टिकोण एवं कार्यक्रम में जो व्यवस्था भरी हुई थी उसी के कारण वे उन्नतिशील बने और इतनी दूर−दूर तक देर तक अपना साम्राज्य जमा सकने में समर्थ हुए। हमने उन गुणों की ओर तो ध्यान नहीं दिया, केवल उनकी पोशाक की नकल बनाकर काले अंग्रेजी बनने का स्वाँग करने लगे। उनकी भाषा बोलने, उनके जैसा खाना खाने उनके जैसा रहन−सहन बनाकर नकलची लोग समझने लगें कि हम भी आधे अंग्रेज हो गये। इसी स्वाँग के बनाने में अनेक बेवकूफों ने अपने खर्च अन्धाधुन्ध बढ़ा लिए और गरीबी के गर्त में औंधे मुँह गिर पड़े।

विवेकहीन अन्धानुकरण

अंग्रेजों की आमदनी बहुत थी वे मनचाहा खर्च कर सकते थे। वे अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान की रक्षा के लिए इस गरम देश में रहकर भी अपने ठण्डे मुल्क की पोशाक पहनते थे, हिन्दुस्तानी भाषा जानते हुए भी अपनी मातृ भाषा में बोलने में ही गौरव अनुभव करते थे। उन्होंने अपने को श्रेष्ठ समझा और अपनी दृढ़ता से दूसरे की कमजोरी को प्रभावित किया। एक हम हैं जो उनकी दृढ़ता देश भक्ति ,स्वाभिमान एवं विशेषताओं को तो छू भी न सके उलटे बन्दर की तरह नकल बनाने लगे अपनी भाषा, संस्कृति, पोशाक, आहार, परम्परा आदि को तिलाञ्जलि देकर हमने पाया कुछ नहीं समझदार लोगों की आँखों में उपहासास्पद बने और खर्च भी बढ़ा लिये । अब अंग्रेज भारत में नहीं हैं राजनैतिक गुलामी से भी छुटकारा मिल गया पर काले अंग्रेज अभी भी उनकी सांस्कृतिक गुलामी को गले में लपेटे बैठे हैं और इसी दुर्बुद्धि है कि भारतीय परम्पराओं के अनुरूप जीवन क्रम रखने की अपेक्षा अंग्रेजी परम्पराओं के अनुरूप वेश विन्यास एवं ढंग ढाँचा बनाना कहीं अधिक खर्चीला है और इतना खर्चीला ढोंग जो कोई भी बनावेगा दरिद्रता का अभिशाप उसे घेरे ही रहेगा। नक्कालों की हर जगह हँसी उड़ाई जाती है। साँस्कृतिक नकलची जहाँ आर्थिक तंगी में घिरे रहते हैं वहाँ हर समझदार की दृष्टि में परले सिरे के मूर्ख भी माने जाते हैं। हमें इस खर्चीले मूर्खता से बचकर भारतीय रहन−सहन अपनाये रहना चाहिए। हर शिक्षित को इस ओर अधिक ध्यान देना चाहिए क्योंकि शिक्षा के कारण उनकी बढ़ी हुई आमदनी को भी यही नकलची प्रवृत्ति बरबाद करती रहती है।

सादगी की श्रेष्ठता

सादगी सबसे बड़ा फैशन है। संसार के सभी सभ्य और श्रेष्ठ नर−नारी सादगी को ही अपनी प्रतिष्ठा एवं महत्ता के अनुरूप मानते रहे हैं। कीमती पोशाकें पहन कर, जेवरों से अपने को सजा कर, बेहूदे ढंग का केश विन्यास बनाकर, शान और शेखी के खर्चीले उपकरण जमाकर कोई व्यक्ति न तो प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है और न ऊँचा बन सकता है। अपनी हैसियत बढ़ी−चढ़ी दिखाने के लिए आमतौर से लोग ऐसे ढोंग बनाते हैं। वे सोचते हैं इस प्रकार स्वाँग बनाये फिरने से हमें अमीर या बड़ा आदमी माना जायेगा पर परिणाम उलटा होता है। आज हर गरीब और बेवकूफ अपनी वास्तविकता और खोखलेपन को छिपाने के लिए ऐसे ही ढोंग रचे फिरता है, इसलिए जो जितना ही इस प्रकार का आडंबर बढ़ा-चढ़ाकर बनाता है वह उतना ही खोखला समझा जाता है। इसलिए यदि अपने छिछोरेपन का ढिंढोरा नहीं पीटना है और आर्थिक तंगी को गले नहीं लटकाना है तो सभ्यता और शेखी के नाम पर चल रहे इस अनावश्यक आडंबर को तुरन्त समाप्त करना चाहिए। लड़कियों को तो और भी अधिक संयम इस दिशा में बरतना चाहिए क्योंकि उनकी तड़क−भड़क भरी रहन−सहन, देखने वालो में अनुपयुक्त दुर्बुद्धि उत्पन्न करती है। अपने ऊपर जिन्हें बाजारू लोगों की कुदृष्टि पड़ने देना अनुचित लगता हो उन सभी लड़कियों को सादगी का बाना धारण करना चाहिए। कुलीन घरों की बहिन बेटियों के लिए इसी में औचित्य है और इसी में शोभा। पैसे की बहुत कुछ बचत भी इसी में हो सकती है और परिवार की तंगी का एक सीमा तक हल निकल सकता है।

जेवरों की व्यर्थता

जेवरों में बन्द कर दिया गया धन यदि बैंक में ही डाल दिया जाय तो वह जिन्दगी भर में ब्याज समेत कई गुना हो सकता है और उस बढ़े हुए पैसे से बच्चों की शिक्षा दीक्षा की समस्या हल हो सकती है। इसके विपरीत जेवरों में लगा हुआ धन दिन−दिन घटता है। घिसने और टूटने से बराबर हानि ही होती चलती है। टाँका, बट्टा, मिलावट और बनवाई में इतना अधिक नुकसान होता है कि दो तीन बार टूटने-बनने का क्रम बनने पर जेवरों में लगी हुई पूरी−पूरी पूँजी बर्बाद हो जाती है। चोरों द्वारा चुराये जाने और जान जोखिम होने की संभावना बनी रहती है। जिनके पास जेवर नहीं है उनसे प्रतिस्पर्धा पैदा होती है और ईर्ष्या, कलह का एक निमित्त उत्पन्न हो जाता है। सोना-चाँदी राष्ट्रीय साख के रूप में सरकार के पास रहे तो उससे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार में सुविधा होती है। यह मूल्यवान धातुएँ यदि लोगों के शरीरों पर लदी रहें तो इससे व्यक्ति का कोई लाभ नहीं, राष्ट्रीय अहित बहुत है क्योंकि इन धातुओं के अभाव में अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार पनप नहीं पाता और देश की समृद्धि बढ़ नहीं पाती। जब देश गरीब रहेगा तो व्यक्ति भी गरीब ही रहेंगे। इसलिए जेवर पहनने के रिवाज को भी आर्थिक दृष्टि से निरुत्साहित ही किया जाना चाहिए। जेवर और कपड़ों में अनावश्यक फैशन की दृष्टि से जितना खर्च किया जाता है, सादगी का दृष्टिकोण रखने पर उस खर्च का आसानी से आधा घटाया जा सकता है। विलासिता के छोटे-बड़े अनेकों प्रसाधन ऐसे हैं जिन्हें या तो बिलकुल ही हटाया जा सकता है या उनके स्थान पर सीधी-सादी कम खर्च की चीजें काम में लाई जा सकती हैं। हमें यदि अपनी आर्थिक स्थिति को संतुलित रखना हो तो इन छोटी−छोटी बातों पर भी पूरा ध्यान देना होगा क्योंकि बूँद−बूँद से घट भरता है और एक छोटे छेद में होकर भरे हुए बर्तन का सारा पानी धीरे−धीरे टपक जाता है।

कुरीतियाँ एवं अन्धविश्वास

विवाह-शादी, रीति-रिवाज, तीज-त्यौहार, संडे-मुसंडे, मेले-ठेले, एवं अन्धविश्वास हमारी आर्थिक स्थिति पर बहुत बुरा प्रभाव डालते हैं। इन कार्यों में हिन्दू की आधी कमाई बर्बाद हो जाती है। जिस पैसे का स्वास्थ्य वृद्धि, शिक्षा, उद्योग, व्यवसाय आदि में लगाकर परिवार क सदस्यों को सुखी एवं उन्नतिशील बनाया जा सकता था वह गाढ़ी कमाई का उपार्जित धन इन व्यर्थ की बातों में बर्बाद होता है। साहस और विवेक की दुर्बलता के कारण हम इस अपडर से सहम जाते हैं कि दूसरे लोग क्या कहेंगे? हमारी इज्जत और बात घट जायगी। वास्तविकता यह है कि हम में से हर कोई इन कुरीतियों की बुराई को भली प्रकार जनता है, उनसे घृणा करता है और बचना चाहता है पर अपने को अकेला समझकर इनके विरोध में कोई सक्रिय कदम नहीं उठा पाता। यदि कोई इन सुधार कार्यों में अग्रणी बन सके तो उसकी प्रशंसा ही होगी, प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी। कुछ कूप-मंडूक हर सुधार का विरोध करने की भाँति इस प्रकार के साहस का भी विरोध कर सकते हैं पर उनकी यह बकझक बेबुनियाद होने के कारण कुछ दुष्परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकती।

विवाह-शादियों में लोग उन्मत्त होकर अपनी गाढ़ी कमाई के पैसे की होली फूँकते हैं। इस पागलपन को उसी तरह रोक जाना चाहिए जिस प्रकार कोई पागल अपने कपड़े फाड़ने लगे या आत्मा हत्या का सरंजाम जुटाने लगे तो समझदार लोग उसे रोकते हैं । अमीर लोग अपने अन्धाधुन्ध कमाये हुए रुपये का कोई सदुपयोग न देखकर उसकी आतिशबाजी उड़ावें तो बात समझ में आती है। क्योंकि सत्कार्य में खर्च करने की तो उनकी प्रवृत्ति नहीं, जमा करके रखेंगे तो उससे उनके बच्चे कुमार्गगामी बनेंगे। बिना परिश्रम के प्राप्त हुआ पैसा हर किसी को पागल बनाता है इसलिए अपने बच्चों को पागल बनाने का उपकरण छोड़ जाने की अपेक्षा यदि वे ब्याह शादी की धूम-धड़ाके में बहुत कुछ फूँक जाते हैं तो अपना पागलपन स्वयं ही समाप्त करके निवृत्त हो जाते हैं, बच्चे उस विष से बचे रहते हैं । इस दृष्टि से उनके लिए तो उस प्रकार का अपव्यय भी किसी प्रकार ठीक हो सकता है। पर उनकी नकल वे लोग क्यों करें जिनकी सीमित आमदनी है, जो पसीने की कमाई कमाते हैं और मुश्किल से गुजारा करते हैं।

विवाह शादी में अपव्यय

सारे संसार में विवाह-शादी बहुत ही स्वल्प व्यय में सीधे−साधे तरीके से सम्पन्न होती हैं केवल हम ही हैं जो हजारों रुपया इस साधारण सी बात के कारण अन्धाधुन्ध फूँक डालते हैं। विवाहोन्माद एक सामाजिक पागलपन है। यदि इससे छुटकारा न पाया गया तो हमारी वही दशा होगी जो पागलों की हो सकती है। इतने मनुष्यों की बरात, इतने बाजे-गाजे, आतिशबाजी, सवारी शिकारी विवाह जैसे एक पवित्र धर्म कार्य में क्यों आवश्यक है इसका कोई भी विवेकपूर्ण उत्तर सूझ नहीं पड़ता। अपनी हैसियत से अधिक धन लोग दहेज में, जेवर में, साड़ी चढ़ावे में खर्च करें इसका कोई भी तो औचित्य नहीं है। फिर इस आर्थिक बर्बादी के कुमार्ग पर देर तक क्यों चलते रहा जाय? जिनके दो−चार कन्याएँ और दो−चार बच्चे विवाह-शादी के लिए होंगे वे मध्यम श्रेणी के लोग अन्य सब व्यवस्था ठीक रखते हुए भी विवाह के झटकों से ही निर्धनता में डूब जाएँगे और अपना तथा छोटे बच्चों का भविष्य अन्धकारमय बना लेंगे। इसलिए अब साहस करने का समय आ गया। विवाहोन्माद से हमें बचना होगा और सादगी के लिए कदम बढ़ाना होगा। इस कुरीति के आगे सिर झुकाने की अपेक्षा यदि बच्चों को आजीवन अविवाहित रहना पड़े तो भी कुछ हर्ज नहीं। अनीति के आगे नाक रगड़ने की अपेक्षा त्याग और तप का आदर्श अपना कर कष्टसाध्य जीवन यापन करना अच्छा है। विवाह-शादियों में, रीति-रिवाजों में, मेले-ठेलों में, संडे-मुसंडे में जब तक हमारी गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद होता रहेगा तब तक आर्थिक सुधार की आशा दुराशा मात्र ही बनी रहेगी।

अपव्यय से बचा जाय

पैसों को फूँकने उड़ाने में नहीं वरन् एक-एक पाई सदुपयोग में खर्च करने के लिए हमें प्रयुक्त किया जाना चाहिए। अनावश्यक चीजें चाहें वे सस्ती ही क्यों न मिल रही हों कभी नहीं खरीदनी चाहिए। वस्तुओं का जमा करते चलना, पुरानी चीजों को पूरी तरह समाप्त हुए बिना नई−नई मँगाते चलना दरिद्रता को आमंत्रण देने के समान है। जो टूटे को बनाना और रूठे को मनाना जानता है वही बुद्धिमान है। पुरानी और टूटी चीजों की मरम्मत करके उन्हें देर तक काम में लाने की कला प्रत्येक सद्गृहस्थ को आनी ही चाहिए। चूहे, कीड़े, बन्दर घर का बहुत सारा सामान बर्बाद करते रहते हैं, गंदगी और अव्यवस्था में पड़ी−पड़ी अनेकों वस्तुऐं समय से पूर्व ही नष्ट हो जाती है। संभाल कर रखने पर हर चीज देर तक टिकती है और आर्थिक तंगी को रोकने के लिए इससे बहुत सहारा मिलता है। हर महीने नियत बजट बनाकर व्यवस्थापूर्वक खर्च करने वाले न तो कभी कर्जदार बनते हैं और न परेशानी अनुभव करते हैं। अपनी मर्यादा को समझकर जितनी लम्बी सौड़ उतने पैर पसारने की गति पर चलने वाले लोग बड़ी शान्ति से अपना जीवन व्यतीत कर लेते हैं। जिन्हें कोई दुर्व्यसन नहीं, शेखीखोरी और फिजूलखर्ची की व्यर्थता को जो समझता है, जिसने संयम और सादगी को अपना रखा है आवश्यक कार्यों में दिल खोलकर खर्च करने की उदारता रखते हुए भी जो व्यर्थ कार्यों में एक पाई भी बर्बाद नहीं करता ऐसा मितव्ययी और विवेकशील व्यक्ति कभी आर्थिक तंगी का शिकार न होगा। लक्ष्मी उसका साथ कभी भी नहीं छोड़ेगी।


जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता—संजीवनी विद्या

युग निर्माण योजना के अन्तर्गत स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की रचना का जो कार्यक्रम चल रहा है उसमें से इस अंक में स्वच्छ मन की उपयोगिता पर प्रकाश डाला जा रहा है। मन की स्वच्छता इतनी महत्वपूर्ण वस्तु है कि उसके प्राप्त करने के लिए निरन्तर लालायित रहते हैं। स्वच्छ मन निश्चित रूप से एक कल्प वृक्ष है जिसे प्राप्त करने के बाद कोई भी मनोकामना अपूर्ण नहीं रह सकती। स्वच्छ मन केवल स्वच्छ कामनाऐं ही कर सकता है और ऐसी कामनाऐं बड़ी सरलता−पूर्वक पूर्ण होते रहने की व्यवस्था भगवान की इस सुरम्य सृष्टि में पहले से ही मौजूद है। तृष्णा और वासना का दावानल ही ऐसा है जो आवश्यक सुविधाऐं मिल जाने पर ही तृप्त नहीं होता।

सन्मार्गगामी सत्प्रवृत्तियाँ

स्वस्थ शरीर का सारा आधार मन की सन्मार्गगामी प्रवृत्तियों पर निर्भर है। परिवार की सुव्यवस्था एवं आर्थिक संतुलन का ठीक रहना भी तभी संभव है जब अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न नहीं किया, उनके सामने अपना अनुकरणीय आदर्श नहीं रखा वे कभी पारिवारिक उलझनों और कलह क्लेशों से छुटकारा प्राप्त न कर सकेंगे। इसी प्रकार जो पूरे मन से खरा काम करने और ईमानदारी एवं सज्जनता बरतने में तत्पर रहेंगे उनकी आमदनी ही नहीं प्रतिष्ठा भी बढ़ेगी। मितव्ययी हुए बिना कुबेर भी निर्धन हो सकता है फिर साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या है। आज जिस फिजूलखर्ची को लोगों ने सभ्यता और आवश्यकता का नाम दे रखा है यदि उसमें सुधार न हुआ तो आर्थिक तंगी बनी ही रहेगी। अर्थ व्यवस्था का सुधार हमारे दृष्टिकोण में सुधार हुए बिना चाहे जितनी आमदनी कर लेने पर भी हो नहीं सकता। जीवन की सारी समस्याऐं हमारी मानसिक स्थिति के साथ जुड़ी हुई हैं। ताली घुमाने से ही ताला खुलता है अपने को बदलने से ही परिस्थितियाँ बदलती हैं।

शरीर, परिवार और अर्थव्यवस्था की भाँति ही मानव जीवन में ज्ञान का स्थान है। अज्ञानी मनुष्यों की तुलना पशु से की जाती है। जिसमें ज्ञान का जितना ही अभाव है वह उतना ही पिछड़ा हुआ माना जाता है और उसकी परिस्थितियाँ भी निम्न स्तर की ही बनी रहती हैं। गरीबी जिस प्रकार दुखदायी मानी जाती है उसी प्रकार अविद्या भी है। अज्ञान के बंधनों में जकड़े हुए मनुष्य को हीन कोटि का जीवन− यापन करने के लिए ही विवश होना पड़ता है। प्रगति का एक महत्वपूर्ण सोपान ‘ज्ञान’ है। जिसे ज्ञान प्राप्ति के साधन नहीं मिल सके वह अंधे के समान एक बहुत ही संकुचित विचारधारा में हुआ कुँए के मेंढक की तरह अपने दिन पूरे करता है।

सफलताओं का आधार ज्ञान

लौकिक और पारलौकिक दोनों ही प्रकार की सफलताऐं ज्ञान पर निर्भर रहती है। इस संसार में जितने भी उन्नतिशील एवं सफल जीवन मनुष्य हुए हैं उनने अपने ज्ञान को बढ़ाने में सतत प्रयत्न किया है। शरीर की दृष्टि से सभी मनुष्य एक समान हैं पर उनमें जो छोटे-बड़े का अन्तर दिखाई पड़ता है उसका प्रधान कारण उनका ज्ञान ही है। डाक्टर, वकील, इञ्जीनियर, वैज्ञानिक, नेता, शासक, व्यापारी, साहित्यकार, सभी उच्च वर्ग के समझे जाने वाले लोग अपने ज्ञान के आधार पर ही यह उच्च स्तर प्राप्त कर सकते हैं। स्वल्प शिक्षा वाला व्यक्ति भला किस प्रकार इन ऊँचे पदों का अधिकारी हो सकता है? जैसे छोटी मछली को बड़ी मछली निगल जाती है उसी प्रकार बेचारे अज्ञानी लोगों का आमतौर से चतुर चालाक लोगों द्वारा निरन्तर शोषण किया जाता रहता है। जब तक अज्ञान छाया रहेगा यह कानूनी और गैर-कानूनी शोषण रुक भी न सकेगा। नारी जाति और निम्न वर्ग के करोड़ों प्राणी आमतौर से इसीलिए सताये जाते रहे हैं कि वे बौद्धिक दृष्टि से अपने प्रतिस्पर्धियों की तुलना में पिछड़े रहे। ज्ञानहीन व्यक्ति शरीर की मजदूरी से ही जीवन−यापन कर सकता है, शरीर में बुढ़ापा, बीमारी, अशक्तता जैसा कोई व्यतिक्रम उत्पन्न हो जाय और किन्हीं दूसरों की उदार सहायता न मिले तो जीवन धारणा करना भी कठिन हो जाता है। शारीरिक श्रम से एक स्वल्प मात्रा में आजीविका हो सकती है उसमें से मौत बुढ़ापे के लिए बचाकर कितना रखा जा सकता है? पर बुद्धिजीवी, ज्ञानवान लोग अपनी शिक्षा का समुचित लाभ उठाते हैं, उनकी उपार्जन शक्ति इतनी होती है कि संतोषपूर्ण जीवन यापन करते हुए आड़े वक्त के लिए भी बचाकर रख सकते हैं। रूस जैसे साम्यवादी देश में भी बौद्धिक विशेषता के लिए विशेष आर्थिक सुविधा देने का प्रबन्ध है फिर गैर साम्यवादी देशों का तो कहना ही क्या है। यहाँ तो सारा दारोमदार शिक्षा और चतुरता पर ही निर्भर है।

‘अज्ञान’ का अंधकार

परलोक और आत्म− कल्याण की उपलब्धि ज्ञान का विकास हुए बिना किसी भी प्रकार संभव नहीं है। ज्ञानहीन कर्मकाण्ड को कोल्हू के बैल की उपमा दी गई है। गीता, योगवशिष्ठ में आध्यात्म विकास का प्रारंभिक आधार ज्ञान वृद्धि को माना है। स्वाध्याय और सत्संग की इतनी अधिक महिमा धर्म ग्रन्थों में वर्णन की गई है कि उसकी आवश्यकता भजन से भी पहले मालूम पड़ती है। देखा भी यही गया है कि आवेश में आकर साधना और तपश्चर्या करने में लगे हुए लोग किसी छोटे से कारण से विचलित होकर अपना मार्ग बदल देते हैं पर जितने विवेक और ज्ञानपूर्वक बहुत चिन्तन और मनन के बाद इस मार्ग को अपनाया है वे जीवन भर सुनिश्चित रूप से लक्ष की ओर चलते रहते हैं। वेदान्त में ज्ञान की पूर्णता को ही मुक्ति माना गया है। ज्ञान और विवेक बिना अध्यात्म की गाड़ी एक पग भी आगे नहीं बढ़ती।

सर्वत्र शिक्षा की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। जगह−जगह स्कूल, कालेज खोले जा रहे हैं। रात्रि पाठशालाऐं, प्रौढ़ पाठशालाऐं चलाई जा रही हैं। जगह−जगह वाचनालय पुस्तकालय खुल रहे हैं। रेडियो, अखबार, लेखक, पत्रकार, वक्ता, गायक, अध्यापक सभी कोई जनता की ज्ञान वृद्धि में लगे हुए हैं। अज्ञान के विरुद्ध इतना बड़ा अभियान विशाल धन और जन-शक्ति के साथ लगा हुआ है इससे स्पष्ट है कि हर विचारशील व्यक्ति मानव−जीवन में ज्ञानवृद्धि की आवश्यकता अनुभव करता है। गरीब लोग भी अपने आवश्यक खर्चों में कटौती करके अपने बच्चों को पढ़ाते-लिखाते हैं क्योंकि यह धीरे−धीरे समझ में आने ही लगा है कि बिना शिक्षा भी आवश्यक मानी जाने लगी है। अब यह कहना बन्द होता जाता है कि “हमें अपने बच्चों को नौकरी थोड़े ही करानी है जो पढ़ावें।” एक जमाना था कि लोग ऐसा सोचते थे कि पढ़ाई का उद्देश्य नौकरी करना मात्र है। अब यह समझा जाने लगा है कि व्यक्तित्व का विकास करने के लिए ज्ञानवृद्धि एक आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य तथ्य भी है।

विवेकशीलता एवं विचारकता

लौकिक उन्नति के लिए शिक्षा आवश्यक है। पारलौकिक लक्ष प्राप्ति के लिए ज्ञान की उपासना जरूरी है। व्यक्तिगत जीवन का स्वस्थ विकास करने के लिए भी विवेकशीलता एवं विचारकता अनिवार्य है। जो अपनी परिस्थितियों पर विचार नहीं करता, अपनी दुर्बलताओं और त्रुटियों को नहीं खोजता और यह नहीं जानता कि अपने दृष्टिकोण में क्या−क्या हेर−फेर करना आवश्यक है वह जड़ प्रकृति का मनुष्य न तो अपने को बदल सकेगा और न उसकी विपन्न परिस्थितियाँ ही बदलेंगी। जिस प्रकार स्कूली शिक्षा के द्वारा भाषा, गणित भूगोल इतिहास आदि जाना जाता है। जिस प्रकार गीता, रामायण, वेद, शास्त्र आदि से आत्मज्ञान उपलब्ध होता है उसी प्रकार व्यक्तित्व का निर्माण करने के लिए गुण, कर्म स्वभाव में त्रुटियाँ होने पर उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों और उनके सुधार से उत्पन्न होने वाली विभूतियों के बारे में भी हमारी जानकारी होनी चाहिए। यह एक स्वतंत्र शास्त्र है। इसे ही जीवन विद्या या संजीवनी विद्या कहते हैं। अन्य समस्त विद्याऐं पीछे की हैं सबसे पहली उपयोगिता एवं आवश्यकता इसी ज्ञान की है क्योंकि इसके बिना व्यक्तित्व का विकास तो दूर यह समझ में भी नहीं आता कि अपने में सुधार किये बिना परिस्थितियों में सुधार होना, कैसे संभव है।

आमतौर से हर आदमी यही सोचता है कि उसके सामने उपस्थित कठिनाइयों के कारण दूसरे लोग या कोई अभाव हैं। वे साधन जुटाने की कोशिश करते हैं और दबाव डालकर, लड़−झगड़ कर या खुशामद चापलूसी से दूसरों को अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्न करते हैं। इसी कोशिश में उनका प्रायः सारा जीवन लग जाता है। फिर भी सफलता तनिक भी नहीं मिलती। न अभीष्ट मात्रा में साधन सामग्री जुट पाती है न अभाव दूर होते हैं और न दूसरे लोग अपने अनुयायी बनते हैं। इस असफलता को प्रायः भाग्य पर, ग्रह दशा पर, बुरे जमाने पर थोप कर अपनी निर्दोषिता सिद्ध की जाती है और आत्म प्रवंचना करके किसी प्रकार मन हलका कर लिया जाता है। पर इससे उद्देश्य की पूर्ति कहाँ होती है? गुत्थी ज्यों की त्यों उलझी रहती है।

मनोवृत्तियों का सुधार

जिस प्रकार यह मान लिया गया कि नौकरी के लिए ही पढ़ा नहीं जाता उसके दूसरे भी लाभ हैं, जिस प्रकार यह जान लिया गया कि केवल एकान्त में भजन करना ही पर्याप्त नहीं, मनोवृत्तियों का सुधार भी आत्मकल्याण के लिए अनिवार्य है, उसी प्रकार अब हमें स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि जीवन के हर क्षेत्र में उत्थान, पतन, सुख, दुख, सन्तोष एवं सफलता, असफलता का सारा श्रेय हमारी अपनी अन्तःस्थिति, विचारधारा एवं दृष्टिकोण पर निर्भर है। सारे दुनियाँ के काँटे नहीं बीने जा सकते कि नंगे पैर घूमने पर भी उनके चुभने का अवसर न आवे। हाँ, यह हो सकता है कि अपने पैर में जूता पहन लिया जाये ताकि काँटे अपना प्रभाव न डालें। सारी दुनियाँ हमारी इच्छानुकूल ढल जावे ऐसा नहीं हो सकता, हाँ यह संभव है कि हम अपने में इतना सुधार कर लें कि बुरे लोग, खटकने वाले अभाव एवं संसार के अगणित कारणों का अपने ऊपर कोई प्रभाव न पड़े। प्राचीन काल में योद्धा लोग लोहे का कवच पहनकर युद्ध स्थल में जाते थे ताकि दुश्मन की तलवार उनके शरीर पर असर न करे। हम भी अपने सुधरे हुए दृष्टिकोण का ऐसा कवच पहन सकते हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियाँ अपनी प्रतिकूलता ही न छोड़ दें वरन् अपने अनुकूल भी बन जावें।

संजीवनी विद्या की प्रधानता

बहुत पढ़े-लिखे लोग भी, बढ़े−चढ़े ज्ञानी-ध्यानी भी इस संजीवनी विद्या को नहीं जानते। इसके अभाव में उनका सारा बढ़ा−चढ़ा ज्ञान एक बाह्य आडंबर मात्र रह जाता है। अन्य योग्यताओं के द्वारा कमाई हो सकती है, पदवी या प्रतिष्ठा भी मिल सकती हैं पर व्यक्तिगत उलझनों का सुलझाना कदापि संभव नहीं हो सकता। भीतर जलते रहने वाली असन्तोष की आग कभी नहीं बुझ सकती। छोटी−मोटी प्रतिकूलताओं में अपना मानसिक सन्तुलन स्थिर रख सकना उसके लिए नितान्त असंभव रहेगा। ऐसा खिन्न मानस रहने वाला मनुष्य वस्तुतः दुखिया या अभागा ही रहेगा भले ही वह बाहर से अमीर या बड़ा आदमी समझा जाता रहे।

जीवन को सुविकसित संतुष्ट एवं सुखी बनाने के संदर्भ में हम अर्थकारी शिक्षा या परलोक में स्वर्ग देने वाली गूढ़ विद्या को नहीं वरन् उस संजीवनी विद्या को ही प्रधानता देंगे जो हमारे दृष्टिकोण को सुधारती है और अपने सुधार एवं परिवर्तन का कार्यक्रम प्रस्तुत कर बाह्य जगत की सारी परिस्थितियों को ही बदल डालने में समर्थ होती है। यह संजीवनी विद्या सीखना हर जीवधारी के लिए उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार किसी मोटर चलाने वाले को उसकी मशीनरी के बारे में जानकारी रखना। यह एक तथ्य है कि मनोवृत्तियाँ ही परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। परिस्थितियाँ बदलने के इच्छुकों को मनोवृत्तियाँ बदलने के लिए तत्पर होना होगा। पर जब हमें इस सम्बन्ध में कुछ ज्ञात ही नहीं है, दूसरों पर दोष थोपकर अपने को निर्दोष समझने की अपनी बुरी लत का जब तक हमें पता ही नहीं है तब तक सुधार का प्रश्न ही कहाँ उत्पन्न होता है। और इसके बिना सुख-शान्तिमय, प्रसन्नता और उल्लास भरा जीवन−यापन कर सकने का अवसर आ सकना भी कैसे संभव हो सकता है?

ज्ञान की उपयोगिता को हमने समझना और स्वीकार करना आरंभ कर दिया है तो अब एक कदम आगे बढ़कर यह भी स्वीकार कर ही लेना चाहिए कि आत्म शान्ति एवं आत्म उन्नति के लिए जीवन विद्या का परिपूर्ण ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है। जब तक यह ज्ञान हमें प्राप्त न होगा तब तक और सब ज्ञान मिलकर भी नितान्त अपूर्ण रहेंगे।


इस संसार की श्रेष्ठतम विभूति—ज्ञान

सच्चा ज्ञान वह है जो हमें हमारे गुण, कर्म, स्वभाव की त्रुटियाँ सुझाने, अच्छाइयाँ बढ़ाने एवं आत्म−निर्माण की प्रेरणा प्रस्तुत करता है। यह सच्चा ज्ञान ही हमारे स्वाध्याय और सत्संग का, चिन्तन और मनन का विषय होना चाहिए। कहते हैं कि संजीवनी बूटी का सेवन करने से मृतक व्यक्ति भी जीवित हो जाते हैं। हनुमान द्वारा पर्वत समेत यह बूटी लक्ष्मण जी की मूर्च्छा जगाने के लिए काम में लाई गई थी। वह बूटी औषधि रूप में तो मिलती नहीं है पर सूक्ष्म रूप में अभी भी मौजूद है। आत्म−निर्माण की विद्या—संजीवनी विद्या—कही जाती है इससे मूर्छित पड़ा हुआ मृतक तुल्य अन्तःकरण पुनः जागृत हो जाता है और प्रगति में बाधक अपनी आदतों को, विचार श्रृंखलाओं को सुव्यवस्थित बनाने में लगकर अपने आपका कायाकल्प ही कर लेता है। सुधरी विचारधारा का मनुष्य ही देवता कहलाता है। कहते हैं देवता स्वर्ग में रहते हैं। देव वृत्तियों वाले मनुष्य जहाँ कहीं भी रहते हैं वहाँ स्वर्ग जैसी परिस्थितियाँ अपने आप बन जाती हैं। अपने को सुधारने से चारों ओर बिखरी हुई परिस्थितियाँ उसी प्रकार सुधर जाती हैं जैसे दीपक के जलते ही चारों ओर फैला हुआ अँधेरा उजाले में बदल जाता है।

आत्म−विश्लेषण और आत्म− निर्माण

स्वाध्याय और सत्संग का विषय प्राचीन काल में आत्म−विश्लेषण और आत्मनिर्माण ही हुआ करता था। गुरुजन इसी विषय की शिक्षा दिया करते थे। उच्च शिक्षा वस्तुतः यही है। कला कौशल की अर्थकारी जो विद्या स्कूल-कालेजों में पढ़ाई जाती है वह हमारी जानकारी और कार्य कुशलता को तो बढ़ा सकती है पर आदतों और दृष्टिकोण को सुधारने की उसमें कोई विशेष व्यवस्था नहीं है। इसी प्रकार कथावार्ता के आधार पर होने वाले सत्संग प्राचीनकाल के किन्हीं देवताओं या अवतारों के चरित्र सुनाने या ब्रह्म-प्रकृति—स्वर्ग-मुक्ति जैसी दार्शनिक बातों पर तो कुछ चर्चा करते हैं पर यह नहीं बताते कि हम अपने व्यक्तित्व का विकास कैसे करें? आत्म− निर्माण का विषय इतना महत्वहीन नहीं है कि उसे विधिवत् जानने−समझने के लिए कहीं कोई स्थान ही न मिले। ज्ञान की प्रशंसा तो लोग करते हैं उसकी आवश्यकता भी अनुभव करते हैं पर आत्म−ज्ञान जैसे उपयोगी विषय की ओर कुछ भी ध्यान नहीं देते। आत्मविद्या और आत्म−ज्ञान का आरम्भ अपनी छोटी−छोटी आदतों के बारे में जानने और छोटी−छोटी बातों का सुधारने से ही हो सकता है। जिसे सोना-जागना, बोलना, बात करना, सोचना, समझना, खाना-पीना, चलना-फिरना भी सही ढंग से नहीं आता वह आत्मा और परमात्मा की अत्यन्त ऊँची शिक्षा को व्यावहारिक जीवन में ढाल सकेगा इससे पूरा−पूरा संदेह हैं। आत्म−ज्ञान का आरंभ अपनी आन्तरिक स्थिति को जानने और छोटी आदतों के द्वारा उत्पन्न हो सकने वाले बड़े−बड़े परिणामों को समझने से किया जाना चाहिए। आत्म−विद्या का तात्पर्य है अपने आपको अपने व्यक्तित्व और दृष्टिकोण को उपयुक्त ढाँचे में डालने की कुशलता। मोटर विद्या में कुशल वही कहा जायेगा जो मोटर चलाना और उसे सुधारना जानता है। आत्म−विद्या का ज्ञान वही है जो आत्म−संयम और आत्म−निर्माण जैसे महत्वपूर्ण विषय पर क्रियात्मक रूप से निष्णान्त हो चुका है। वेदान्त, गीता और दर्शन शास्त्र को घोंटते रहने वाले या उन पर लम्बे-चौड़े प्रवचन करने वाले आचरण रहित वक्ता को नहीं, आत्म− ज्ञानी उस व्यक्ति को कहा जायेगा जो अपने मन की दुर्बलताओं से सतर्क रहता है और अपने आपको ठीक दिशा में ढालने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहता है, चाहे वह अशिक्षित ही क्यों न हो।

अध्यात्म की पहली शिक्षा

सुकरात के पास एक व्यक्ति गया और उसने आत्म-कल्याण का उपाय पूछा। वह व्यक्ति गंदे कपड़े पहने था और बाल बेतरतीब बढ़कर फैले हुए थे। सुकरात ने कहा—‟आत्म-कल्याण की पहली शिक्षा तुम्हारे लिए यह है कि अपने शरीर और कपड़ों को धोकर बिलकुल साफ रखा करो और बालों को संभाल कर घर से बाहर निकला करो।” उस व्यक्ति को इस पर सन्तोष नहीं हुआ और पुनः निवेदन किया मेरा पूछने का तात्पर्य मुक्ति, स्वर्ग, परमात्मा की प्राप्ति आदि से था। सुकरात ने बीच में ही बात काटते हुए कहा—सो मैं जानता हूँ कि आपके पूछने का तात्पर्य क्या था। पर उसका आरंभिक उपाय यही है जो मैंने आपको बताया। स्वच्छता सौन्दर्य और व्यवस्था की भावना का विकास हुए बिना कोई व्यक्ति उस परम पवित्र, अनन्तः सौन्दर्ययुक्त और महान व्यवस्थापक परमात्मा को तब न तक तो समझ सकता है और न उस तक पहुँच सकता है जब तक कि वह अपने दृष्टिकोण में परमात्मा की इस विशेषताओं को स्थान नहीं देता। कोई भी गंदा फूहड़, आलसी और अस्त-व्यस्त मनुष्य परमात्मा को नहीं पा सकता और न ही मुक्ति का अधिकारी हो सकता है। इस लिए तुम पहले आत्म-निर्माण करो—इस मार्ग पर चलने वाले को परमात्मा अपने आप मिल जाता है।

भजन के साथ भाव भी

जप, तप, ध्यान, मनन, पूजा से निश्चय ही मनुष्य का कल्याण होता है पर इनके साथ-साथ आत्म-सुधार की अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रक्रिया भी चलती रहनी चाहिए। यह सोचना भूल है कि भजन करने से सब सद्गुण अपने आप आ जाते हैं। यदि ऐसा रहा होता तो भारत में 56 लाख संत महात्माओं पंडा पुजारियों की जो इतनी बड़ी सेना विचरण करती है, यह लोग सद्गुणी और सुधरे हुए विचारों के और उच्च चरित्र के रहे होते और उनने अपने प्रभाव से सारे देश को ही नहीं सारे विश्व को सुधार दिया होता। पर हम देखते है कि इन धर्मजीवी लोगों में से अधिकाँश का व्यक्तित्व सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों से भी गयाबीता है। इसलिए हमें यह मानकर ही चलना होगा कि भजन के साथ−साथ व्यक्तित्व सुधारने की आत्म−निर्माण की समानान्तर प्रक्रिया को भी पूरी सावधानी और तत्परता के साथ चलाना होगा। आत्म−सुधार कर लेने वाला व्यक्ति बिना भजन किये भी पार हो सकता है पर जिसका अन्तःकरण मलीनताओं और गन्दगी से भरा पड़ा है वह बहुत भजन करने पर भी अभीष्ट लक्ष तक न पहुँच सकेगा। भजन के लिए जहाँ उत्साह उत्पन्न किया जाय वहाँ आत्म−निर्माण की बात पर भी पूरा ध्यान दिया जाय। अन्न और जल दोनों के सम्मिश्रण से ही एक पूर्ण भोजन तैयार होता है। भजन की पूर्णता और सफलता भी आत्म−निर्माण की ओर प्रगति किये बिना संदिग्ध ही बनी रहेगी।

दैवी सम्पदाओं का संग्रह

परिवार को उत्तराधिकार में देने के लिए पाँच उपहारों की चर्चा पिछले लेख में की जा चुकी हैं। श्रमशीलता, उदारता, सफाई, समय का सदुपयोग, शिष्टाचार की संक्षिप्त चर्चा की जा चुकी है। आर्थिक स्थिति के सुधार की चर्चा करते हुए ईमानदारी, तत्परता, मधुरता एवं मितव्ययिता की महत्ता पर प्रकाश डाला गया है। स्वास्थ्य सुधार के लिए आत्म-संयम, इन्द्रिय निग्रह निश्चिन्तता, मानसिक संतुलन एवं उचित आहार−विहार का प्रतिपाद किया गया है। यह सब आत्म−निर्माण की प्रक्रिया है। शरीर, परिवार, धन, प्रतिष्ठा, दूसरों की अपने प्रति सहानुभूति आदि अनेक लौकिक डडडड तो इन गुणों के हैं ही पर इनसे भी अनेक गुण लाभ आत्मशान्तिवाद हैं। ज्योति जहाँ रहेगी वो स्थान गरम जरूर रहेगा इसी प्रकार जिस मन में सत्प्रवृत्तियाँ जागृत रहेंगी उसमें सन्तोष, शान्ति एवं उल्लास का वातावरण निश्चित रूप से बना रहेगा। अध्यात्म नगद धर्म है उसका परिणाम प्राप्त करने के लिए किसी को मृत्यु के उपरान्त तक स्वर्ग प्राप्ति की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। अपना दृष्टिकोण बदलने से साथ−साथ निराशा आशा में बदल जाती है और खिन्नता का स्थान मुस्कान ग्रहण कर लेती हैं। असन्तोष और उद्वेग में जलते हुए व्यक्ति जिस दृष्टिकोण को अपनाकर सन्तोष एवं उल्लास का अनुभव कर सकें वस्तुतः वही अध्यात्म है। यह सच्चा अध्यात्म गूढ़ रहस्यों भरी योग्य विद्याओं की तुलना में कहीं अधिक सरल भी है और प्रत्यक्ष लाभदायक भी।

आग्रह नहीं विवेक

ज्ञान की विभूति प्राप्त करने के लिए यह लेख लिखा जा रहा है। विवेकशीलता एवं दृष्टिकोण का परिमार्जन ही इसके मूल आधार हैं। हमारी अनेकों मान्यताऐं दूसरों की देखा-देखी के अनुकरण की एवं प्रचलित परम्पराओं के आधार पर बनी होती हैं। उनके पीछे विवेक नहीं, आग्रह भरा रहता है। सोचने-विचारने का कष्ट बहुत कम लोग उठाते हैं। अपनी श्रेणी के अथवा अपने से बड़े समझे जाने वाले लोग जो कुछ करते हैं, जैसे सोचते या करते हैं आमतौर से हीन मनोवृत्ति के लोग उसी प्रकार सोचने लगते हैं। हमारी सोचने की पद्धति स्वतंत्र होनी चाहिए। हमें विचारक और दूरदर्शी बनाना चाहिए और हर कार्य के परिणाम की सुव्यवस्थित कल्पना करते हुए ही उसे करना चाहिए। अनेकों सामाजिक कुरीतियाँ हमारा समय और धन बुरी तरह बर्बाद करती हैं। हम अन्धानुकरण की मानसिक दुर्बलता के शिकार होकर उसी लकीर को पीटते रहते हैं और यह निश्चय नहीं कर पाते कि जो उन्नति है उसे ही करने के लिए अपनी स्वतंत्र प्रतिभा, साहस, नैतिकता एवं विवेकशीलता का परिचय दें। यदि साहस समेट लिया जाय तो न केवल हमारी अपनी ही बर्बादी बचे वरन् दूसरों के लिए भी एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत हो।

हमें ऐसा साहस एकत्रित करते रहना चाहिए। परिवार को रुष्ट करके उन्हें विरोधी बनाकर खिन्न करके तो नहीं पर प्रयत्नपूर्वक धीरे−धीरे उनके धन और समय बर्बाद करने वाली कुरीतियों और फिजूलखर्चियों को अवश्य ही हटाना चाहिए। इनके स्थान पर ऐसे मनोरंजक कार्यक्रम प्रस्तुत करने चाहिएं जो रूखापन न आने देकर दैनिक जीवन को उत्साह एवं उल्लासमय भी बनायें रहें और उपयोगी भी हों। संगीत, सामूहिक प्रार्थना, पारस्परिक विचार-विनिमय, छोटे−मोटे खेल, भ्रमण, सजावट, सफाई, रसोई, व्यवस्था, चित्रकारी, फूल-पौधे आदि के कार्यक्रम यदि सब लोग हिल मिलकर चलावें तो यह छोटी−मोटी बातें भी उल्लास और उत्साह का वातावरण उत्पन्न किये रह सकती हैं। कुरीतियों और फिजूलखर्चियों के पीछे कुछ मनोरंजन कुछ नवीनता का कार्यक्रम छिपा रहता है इसीलिए लोग उनकी ओर आकर्षित रहते हैं। यदि हम अन्य प्रकार से उत्साह एवं नवीनता उत्पन्न किये रह सकें तो कुरीतियों में धन एवं समय बर्बाद करने की इच्छा स्वतः ही समाप्त हो जायगी। सादगी को भी कलात्मक प्रक्रिया के साथ बड़ी सुन्दर एवं नयनाभिराम बनाया जा सकता है। हमें इसी ओर ध्यान देना चाहिए।

परिस्थितियों में परिवर्तन

परिस्थितियों का बदलना हमारे गुण, कर्म, स्वभाव के परिवर्तन पर निर्भर है। इस तथ्य पर इतनी अधिक देर तक, इतने अधिक प्रकार से विचार किया जाना चाहिए कि यह सत्य हमारे अन्तःकरण में गहराई तक प्रवेश कर जावे। स्वाध्याय और सत्संग का यही प्रधान विषय रखा जाय। पढ़ने और सुनने की आदत बहुत कम लोगों को होती है जिन्हें होती है वे केवल मनोरंजन की या कल्पना लोक में बहुत ऊँची उड़ान लगाने वाली बातें पढ़ना या सुनना पसन्द करते हैं। किस्से कहानियाँ, उपन्यास, जासूसी, तिलस्म, वासनात्मक साहित्य आज बहुत पढ़ा, बेचा और छापा जाने लगा है और सिनेमा, नाटक, सरकस, खेल-कूद, प्रदर्शन, नृत्य, संगीत, कथावार्ता आदि में भी मनोरंजन की ही प्रधानता रहती है। लोग कल्पना लोक में विचरण करते रहना पसंद करते हैं। यह आदत ज्ञान−वृद्धि में जितनी सहायक होती है उससे कहीं अधिक बाधक होती है। हमारे बहुमूल्य समय का उपयोग जीवन की सबसे आवश्यकता आत्म-निर्माण की विचारधारा के अवगाहन में लगना चाहिए। ऐसा साहित्य कम मिलता है पर जहाँ कहीं से थोड़ा बहुत मिलता है उसे अवश्य ही एकत्रित करना चाहिए। घर में जिस प्रकार जेवर और अच्छे कपड़ों का थोड़ा बहुत संग्रह रहता ही है उसी प्रकार सत्साहित्य की एक अलमारी हर घर में रहनी चाहिए और उसे पढ़ने और सुनने का कार्यक्रम नित्य ही चलते रहना चाहिए।

विचारों का परिस्थितियों पर प्रभाव

अपना और अपने परिवार का सुधार इसी कार्यक्रम के साथ आरम्भ हो सकता है। पहले विचार बदलते हैं फिर उसका असर कार्यों पर पड़ता है। कार्य वृक्ष है तो विचार उसका बीज। बीज के बिना वृक्ष का उत्पन्न होना और बढ़ना संभव नहीं। हम अच्छे विचारों को मस्तिष्क में लाने का प्रयत्न नहीं करते। अच्छी परिस्थितियाँ प्राप्त करने के लिए हर व्यक्ति लालायित है। स्वास्थ्य, धन, विद्या, बुद्धि, सुमधुर पारिवारिक संबंध आदि विभूतियाँ हर कोई चाहता है पर यह भूल जाता है कि यह बातें अच्छे कार्यों के किये जाने पर निर्भर हैं। काम को ठीक ढंग से, उचित रूप से किया जाय तो सफलता का मार्ग सरल हो जाता है और हर मनचाही उचित सफलता हर किसी को मिल सकती हैं। असफलताओं का सबसे बड़ा कारण कार्यक्रमों की अव्यवस्था ही होता है और कार्यों का सुव्यवस्थित होना, सुलझी हुई विचारधारा एवं संतुलित दृष्टिकोण पर निर्भर रहता है। सुलझे हुए विचारों का अस्तित्व आज काल्पनिक जंजाल से भरे साहित्य, भाषण एवं दृश्यों के पीछे विलुप्त होता चला जा रहा है। ज्ञान गंगा सूखती चली जा रही है और उसके स्थान पर कुविचारों की वैतरणी उफनती चली आ रही है। इन परिस्थितियों को बदलना नितान्त आवश्यक हैं। हमें अपने और अपने परिवार के लोगों की विचारधारा में ऐसे तत्वों का अधिकाधिक समावेश करना चाहिए जो जीवन की समस्याओं पर सुलझा हुआ दृष्टिकोण उपस्थित करें और हम आत्म निर्माण की समस्या सुलझाने के लिए आवश्यक प्रेरणा एवं प्रकाश प्राप्त करें।

अविवेक का अन्धकार

विवेक ही ज्ञान है। अविवेक का अन्धकार हमारे चारों ओर छाया हुआ है इसे हटाकर विवेक का प्रकाश उत्पन्न करना नितान्त आवश्यक है। सत्साहित्य से पारस्परिक विचार−विनिमय से एवं हर बात पर औचित्य की दृष्टि रखकर विचार करने से वह विवेक प्राप्त हो सकता है जिससे हम प्रत्येक समस्या के वास्तविक रूप को समझ सकें और उसका वास्तविक हल ढूँढ़ सकें। ज्ञान का तात्पर्य इस सुलझे दृष्टिकोण से ही है। जिसे यह प्राप्त हो गया उसके लिए जीवन भार नहीं रह जाता वरन् एक मनोरंजन बन जाता है। लोग क्या कहेंगे, इस अपडर में कितने ही व्यक्ति आत्महनन करते रहते हैं। इसी दृष्टि से लोग फैशन बनाये फिरते हैं। दूसरों की आँखों में अपनी अमीरी जताने के लिए ही लोग अनेक प्रकार की फिजूलखर्ची करते रहते हैं। विवेक प्राप्त होने से ही मनुष्य इस व्यर्थ के भ्रम से बच सकता है। सच बात यह है कि हर आदमी अपनी निज की समस्याओं में व्याप्त है उसे इतनी फुरसत नहीं कि देखें और कोई मान्यता स्थिर करें। हजारों बेकार की बातें हर आदमी के सामने से निकलती रहती हैं और वह उन्हें देखते हुए भी अनदेखा सा बना रहता है हमारी वह महँगी शेखीखोरी जिसके कारण अपना समय और धन ही नहीं जीवन भी बुरी तरह बर्बाद हो जाता है, लोगों के लिए बेकार की और दो कौड़ी की बात है। यदि यह वास्तविकता समझ में आ जाय तो अपनी बर्बादी करने की बेवकूफी को सहज ही छोड़ सकते हैं और अपनी शक्तियों को उन कार्यों में लगा सकते हैं जो लौकिक एवं पारलौकिक सुख-शान्ति के लिए आवश्यक हैं।

जीवन की महत्वपूर्ण समस्या

विवेक मानव जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण सम्पदा है। इस सम्पदा को कमाने और बढ़ाने के लिए हमें वैसा ही प्रयत्न करना चाहिए जैसा धन, बल, प्रतिष्ठा आदि की प्राप्ति के लिए करते रहे हैं। गीता में कहा गया है कि ज्ञान की तुलना में और कोई श्रेष्ठ वस्तु इस संसार में नहीं है इस सर्वश्रेष्ठ वस्तु को अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करके हम श्रेष्ठतम उत्कर्ष एवं आनन्द प्राप्त करने के लिए अग्रसर क्यों न हों?


दृष्टिकोण का परिवर्तन

नजरें तेरी बदली तो नजारे बदल गये। किश्ती ने बदला रुख तो, किनारे बदल गये॥

कविता की इन पंक्तियों में एक सनातन सत्य छिपा हुआ है। जब अपनी नजरें बदलती हैं तो नजारे अर्थात् दृश्य बदल जाते हैं। नाव जब अपना मुँह दूसरी तरफ मोड़ लेती है जो इधर का किनारा उधर का इधर दीखने लगता है। एक जंक्शन पर पास−पास खड़ी हुई दो गाड़ियों में से आरंभ में एक छोटी सी मोड़ पर दिशाओं में थोड़ा सा अन्तर बनता है। धीरे−धीरे यह अन्तर इतना बढ़ जाता है कि एक दिल्ली से चलकर कलकत्ता जा पहुँचती है और दूसरी बम्बई। दिल्ली में उन दोनों के बीच सैकड़ों मील का अन्तर पड़ जाता है । मानव जीवन में भी यही तथ्य काम करता है। व्यक्तियों के दृष्टिकोण में थोड़ा−थोड़ा अन्तर होता है पर वह जरा सा ही अन्तर जीवन की परिस्थितियों में भारी भिन्नता प्रस्तुत कर देता है।

आरम्भ छोटा अन्त बड़ा

बच्चा आरम्भ में एक पैसा चुराने की आदत सीखता है, बड़ा होने पर वह कुछ बढ़ी−चढ़ी गड़बड़ी करने लगता है, समयानुसार बड़े हाथ मारने की क्षमता प्राप्त करता है और यदि परिस्थिति अनुकूल रहें तो एक दिन नामी चोर होकर जेलखाने में जा पहुँचता है। सभी उसे घृणा करते हैं, कोई अपना नहीं रह जाता। सर्वत्र निन्दा, सहयोग, घृणा ही उसे प्राप्त होती है और कठिनाइयों से पार निकलने का कोई रास्ता नहीं दीखता। एक दूसरा उसी का साथी बच्चा ईमानदारी पर दृढ़ आस्था जमाता है। माँ-बाप उस पर पूरा भरोसा करते हैं, अध्यापक उस पर प्रेम और गर्व करते हैं, बड़ा होने पर जहाँ वह कारोबार करता है वहाँ उसका सम्मान देवता की तरह होता है और अपने कृपालुओं की सहायता से बहुत ऊँची स्थिति तक जा पहुँचता है। आरम्भ में इन दोनों बालकों के स्वभाव में थोड़ा अन्तर था। एक दो पैसा चुराने न चुराने य उससे खरीदी जा सकने वाली वस्तु के मिलने न मिलने का कोई महत्व न था, पर इस भिन्नता ने जब अपनी परिपक्वता प्राप्त की तो दोनों में इतना अन्तर आ गया कि जिसका कोई अन्दाज नहीं। बुराई और भलाई की परस्पर विरोधी वृत्तियाँ आरंभ में बहुत छोटे रूप में होती हैं पर उनका परिपोषण होते रहने से धीरे−धीरे बड़ा विशाल रूप बन जाता है। व्यभिचार का आरंभ हँसी, दिल्लगी या छोटी उच्छृंखलता से होता है, इस मार्ग पर बढ़ते हुए कदम किसी नारी को वेश्या बना सकते हैं। इसके विपरीत यदि सदाचार के प्रति थोड़ी दृढ़ता रहे तो वही वृत्ति आरम्भ में छोटी−छोटी उपेक्षा या टालटूल के रूप में दिखाई पड़ती है पर अन्त में वही व्यक्ति आलस-प्रमाद और लापरवाही में अपना सब कुछ गँवाकर दर-दर ठोकरें खाते फिरने की स्थिति में पहुँच जाता हैं। एक दूसरा व्यक्ति जिसे परिश्रम में अपना गौरव और चमकता भविष्य दीखता है निरन्तर हँसी−खुशी के साथ परिश्रम करता रहता है और इसी पुरुषार्थ के बल पर वह उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचा होता है।

अविश्वास और सन्देह

हर किसी पर अविश्वास करने वाले, सब को संदेह और तुच्छता की दृष्टि से देखने वाले व्यक्ति अपने मन में ऐसा सोचते हैं कि हम बहुत बुद्धिमान हैं किसी की बातों में नहीं आते और चौकस रहकर अपनी जरा भी हानि नहीं होने देते पर वस्तुतः यह उनकी भारी भूल है। अविश्वासी को किसी का सच्चा प्रेम नहीं मिल सकता। भावना छिपती नहीं, जब दूसरे को सह मालूम पड़ता है कि यह हमारे प्रति अविश्वास करता है तो वह भी सच्चा प्रेम नहीं कर सकता और न सहानुभूति रखता है। ऐसी प्रकृति के व्यक्ति आमतौर से मित्रविहीन देखे गये हैं। माना कि विश्वास में खतरा है। यदि खरे खोटे की परख न करके हर किसी पर विश्वास करने लग जाय तो उसमें ठगे जाने का खतरा भी है। पर साथ ही यह भी निश्चित है कि किसी ने कभी दूसरों को अपना बनाया है तो उसे उस पर पूरा विश्वास अवश्य करना पड़ा है। एक व्यक्ति दूसरे का गुलाम तभी बनता है जब उसमें अपने लिए सच्ची सहानुभूति एवं आस्था अनुभव करता है। दाम्पत्ति जीवन में, भाई-भाइयों में जहाँ भी सच्ची आत्मीयता पाई जायगी वहाँ उसके मूल में विश्वास वफादारी और गहरा आत्म−भाव अवश्य होगा। अविश्वास के वातावरण में एक ऐसी घुटन रहती है कि मनुष्य वहाँ से अलग हटकर ही सन्तोष की साँस ले पाता है। परायों को अपना बनाने और अपनों को पराया बनाने में यह विश्वास एवं अविश्वास ही प्रमुख कारण रहा होता है।

छिद्रान्वेषण की दुष्प्रवृत्ति

छिद्रान्वेषण की वृत्ति अपने अन्दर हो तो संसार के सभी मनुष्य दुष्ट दुराचारी दिखाई देंगे। ढूँढ़ने पर दोष तो भगवान में भी मिल सकते है, न हों तो थोपे जा सकते हैं। कोई हानि होने या आपत्ति आने पर लोग करने भी हैं। कई तो अपने ऊपर आई हुई आपत्ति का कारण तक पूजा को मान लेते हैं और उसी पर सारा दोष थोपकर छोड़कर अलग हो जाते हैं। मनुष्यों में दोष ढूँढ़ते रहने पर तो उनमें असंख्य दोष निकाले या सोचे जा सकते हैं। ऐसी छिद्रान्वेषी प्रकृति के लोगों को सारी दुनियाँ बुराइयों से भरी हुई दुष्ट दुराचारी और अपने प्रति शत्रुता रखने वाली दिखाई देती हैं। उन्हें अपने चारों ओर नारकीय वातावरण दृष्टिगोचर होता है। निन्दा और आलोचना के अतिरिक्त कभी किसी के प्रति अच्छे भाव वे प्रकट ही नहीं कर पाते किसी की प्रशंसा उनके मुख से निकलती ही नहीं। ऐसे लोग अपनी इस क्षुद्रता के कारण ही सब के बुरे बने रहते हैं। पीठ पीछे की हुई निन्दा नमक-मिर्च मिलकर उस आदमी के पास जा पहुँचती है जिसके बारे में बुरा अभिमत प्रकट किया गया था। आमतौर पर सुनने वाले लोग अपनी विशेषता प्रकट करने के लिए उस सुनी हुई बुराई को उस तक पहुँचा देते हैं जिसके संबंध में कटु अभिमत प्रकट किया गया था ऐसी दशा में वह भी प्रतिरोध की भावना में शत्रुता का ही रुख धारण करता है और धीरे−धीरे उसके विरोधी एवं शत्रुओं की संख्या बढ़ती जाती है। रूठे बैठे रहने वाले, मुँह फुलाकर बात करने वाले, भौहें बढ़ाये रहने वाले और कर्कश स्वर में बोलने वाले व्यक्ति किसी के मन में अपने लिए आदर भाव प्राप्त नहीं कर सकते उन्हें बदले में द्वेष, घृणा, विरोध ही उपलब्ध होते हैं। अपना मन हर घड़ी खिन्न, संतप्त और क्षुभित रहता है उसकी जलन से होने वाले शारीरिक एवं मानसिक दुष्परिणामों की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।

गुण ग्राहकता ही श्रेष्ठ है

जिनको दूसरों के गुण देखने की आदत है वे बुरे लोगों में भी चतुरता, मुस्तैदी, पुरुषार्थ, साहस आदि गुणों को देखते हैं और उनकी विशेषताओं की प्रशंसा करते हैं। यह ठीक है कि बुराइयों का प्रतिरोध किया जाना चाहिए, उन्हें रोका जाना चाहिए। पर यह भी ठीक है कि किसी को निन्दा करके या चिढ़ाने से नहीं सुधारा जा सकता। उन परिस्थितियों, समस्याओं और मनोवृत्तियों को सुधारने के लिए प्रयत्न करना होगा जिनके कारण बुराई उत्पन्न होती है। आमतौर से मनुष्य उससे प्रभावित रहता है जो उसकी किसी न किसी अंश में प्रशंसा करता है और उसमें जो थोड़ी बहुत अच्छाई है उसका आदर करता है। मनुष्य अपने विरोधी की नहीं प्रशंसक की बात मान सकता है और यदि सुधार संभव है तो उसी के द्वारा संभव है जिसके प्रति उसके मन में सद्भावना जमीं हुई है। यह सद्भावना जमाये रहने में वे ही सफल हो सकते हैं जो सद्भावनायुक्त, गुणग्राही एवं प्रशंसक हैं। इस विशेषता के कारण मनुष्य अजात शत्रु हो जाता है, जो अपने बुरे स्वभाव के कारण शत्रुता करना चाहते हैं वे भी देर तक कर नहीं पाते। सज्जनता के सामने उन्हें एक दिन परास्त ही होना पड़ता है। ऐसे अगणित उदाहरण आये दिन आँखों के सामने उपस्थित होते रहते हैं जिनमें सज्जनता के हथियार से दुर्जनों को परास्त ही नहीं किया गया वरन् उनका हृदय परिवर्तन करके सज्जनता का अनुयायी भी बना लिया गया। शत्रुओं की संख्या घटाने और मित्रों की संख्या बढ़ाने का सबसे उत्तम तरीका यह है कि हम दूसरों की अच्छाइयाँ ढूँढ़ना और उनकी प्रशंसा करना सीखें। इससे दूसरों पर तो अच्छा प्रभाव पड़ता ही है अपना मन भी प्रसन्नता अनुभव करता है।

दो परस्पर विरोधी मार्ग

गुबरीले कीड़े का और भौंरे का उदाहरण स्पष्ट है। गंदा कीड़ा केवल गंदगी, गोबर और विष्ठा की तलाश में बगीचा ढूँढ़ डालता है और अपनी अभीष्ट वस्तु ढूँढ़कर ही चैन लेता है। इसके विपरीत भौंरा फूलों पर ही दृष्टि रखता है। उन्हीं पर बैठता है और सुगंधि का आनन्द लाभ करता है। उसे पता भी नहीं चलता कि इस बाग में कहीं गोबर पड़ा हुआ है भी या नहीं। बगीचे में गोबर भी पड़ा रहता है और फूल भी होते हैं पर गंदा कीड़ा अपनी मनोवृत्ति के अनुरूप चीज ढूँढ़कर अपने आपको उस गंदगी से गंदा करता है और दूसरों की दृष्टि में घृणित भी बनता है। भौंरे की मनोवृत्ति उस गन्दे कीड़े से भिन्न होती है इसलिए उसे गुलाब के सुगन्धित पुष्पों का रस भी मिलता है और कवियों द्वारा प्रशंसा का अधिकारी भी बनता है। हम में से कुछ लोग गन्दे गुबरीले कीड़े का उदाहरण बनते हैं और कुछ भौंरों के पद चिह्नों पर चलते है। इन दोनों मार्गों में से हम भी अपने लिए कोई एक मार्ग चुन सकते हैं और उसी के अनुरूप घृणित एवं उत्कृष्ट परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकते हैं। छिद्रान्वेषण गन्दे गुबरीले कीड़े की मनोवृत्ति है और गुण ग्राहकता सुरुचिपूर्ण भौंरे की, जो अपने को पसंद लगे उसे आसानी से स्वभाव का अंग बना सकते हैं।

आवेश और अधीरता

जरा सी प्रतिकूलता को सहन न कर सकने वाले आवेशग्रस्त, उत्तेजित, अधीर और उतावले मनुष्य सदा गलत सोचते और गलत काम करते हैं। उत्तेजना एक प्रकार का दिमागी बुखार है। जिस प्रकार बुखार आने पर देह का सारा कार्यक्रम लड़खड़ा जाता है उसी प्रकार आवेश आने पर मस्तिष्क की विचारणा एवं निर्णय में कोई व्यक्ति सही निर्णय नहीं कर सकता। आवेशग्रस्त मनुष्य प्रायः न करने योग्य ऐसे काम कर डालते हैं जिनके लिए पीछे सदा पश्चाताप ही करते रहना पड़ता हैं। आत्महत्याऐं प्रायः इन्हीं परिस्थितियों में होती हैं। कहनी अनकहनी कह बैठते हैं। मारपीट, गाली-गलौज, लड़ाई-झगड़े, कत्ल आदि के दुखद कार्य भी उत्तेजना के वातावरण में ही बन पड़ते हैं। अधीरता भी एक प्रकार का आवेश ही है। बहुत जल्दी मनमानी सफलता अत्यन्त सरलतापूर्वक मिल जाने के सपने बाल बुद्धि के लोग देखा करते हैं वे यह नहीं सोचते कि महत्वपूर्ण सफलताऐं तब मिला करती हैं जबकि व्यक्ति श्रमशीलता, पुरुषार्थ, साहस, धैर्य एवं सद्गुणों की अग्नि परीक्षा में गुजर कर अपने आपको उसके उपयुक्त सिद्ध कर देता है। जल्दीबाजी में बनता कुछ नहीं, बिगड़ता बहुत कुछ है। इसलिए धैर्य को सन्तुलन और शान्ति को एक श्रेष्ठ मानवीय गुण माना गया है। कठिनाइयों से हर किसी को पाला पड़ता है, विघ्नों से रहित कोई काम नहीं। तुर्त−फुर्त सफलता किसे मिली है, किसके सब साथी सज्जन और सद्गुणी होते हैं?

हर समझदार आदमी को सहनशीलता, धैर्य और समझौते का मार्ग अपनाना पड़ता है। जो प्राप्त है उसमें प्रसन्नता अनुभव करते हुए अधिक के लिए प्रयत्नशील रहना बुद्धिमानी की बात है पर यह परले सिरे की मूर्खता है कि अपनी कल्पना के अनुरूप सब कुछ न मिल जाने पर मनुष्य खिन्न, दुखी और असंतुष्ट ही बना रहे। सबकी सब इच्छाऐं कभी पूरी नहीं हो सकती। अधूरे में भी जो सन्तोष कर सकता है उसी को इस संसार में थोड़ी सी प्रसन्नता उपलब्ध हो सकती है। अन्यथा असंतोष और तृष्णा की आग में जल मरने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं हैं। अधीर, असंतोष और महत्वाकाँक्षी मनुष्य जितने दुखी देखे जाते हैं उतनी जलन, दर्द और पीड़ा से पीड़ित घायल और बीमारों को भी नहीं होती। सन्तोष का मरहम लगाकर कोई भी व्यक्ति इस जलन से छुटकारा प्राप्त कर सकता है।

कुढ़न की असाध्य बीमारी

कुढ़न एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं। आपकी स्थिति को दूसरों की तुलना से हीन मानकर कितने ही व्यक्ति असन्तोष में कुढ़ते रहते हैं। पुरुषार्थ के अभाव में प्रयत्नपूर्वक वे उस ऊँची स्थिति तक पहुँचने का साहस तो करते नहीं, उलटे जो आगे बढ़े हुए हैं उनमें ईर्ष्या करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि यदि आगे बढ़े हुए की टाँग पकड़ कर पीछे घसीट लिया जाय या आगे बढ़ने से रोक दिया जाय तो विषमता की स्थिति दूर हो सकती है। ईर्ष्या में यही भाव छिपा रहता है। दूसरों की प्रशंसा या बढ़ती सहन न कर सकने में ईर्ष्यालु की महत्वाकाँक्षा छिपी रहती है। वह अपने से बड़े समझे जाने वालों की तुलना में अपने को हीन समझा जाना पसन्द नहीं करता। इस कमी को प्रयत्न और पुरुषार्थ द्वारा स्वयं उन्नति करके पूरा किया जा सकता है, पर इस कठिन मार्ग पर चलने की अपेक्षा लोग ठीक समझते हैं कि आगे बढ़े हुओं को घसीटा जाय, उनकी निन्दा की जाय या हानि पहुँचाई जाय। ईर्ष्यालु लोग ऐसा ही कुछ किया करते हैं। कुछ आगे बढ़े हुए लोग अपने से छोटों को बढ़ते नहीं देखना चाहते। वे सोचते हैं यह यदि बढ़कर मेरी बराबर आ जावेंगे तो फिर मेरी क्या विशेषता रहेगी? इसलिए बढ़ते हुओं को ऊपर उठने से पहले ही दबा देना चाहिए।

क्षुद्रता की ठंडी आग से बचें

आज इसी प्रकार की क्षुद्र मनोवृत्तियों क साम्राज्य है। कुढ़न और ईर्ष्या की आग में झुलसते रहने वाले व्यक्ति अपना मानसिक अहित तो करते ही हैं अपनी जलन बुझाने के लिए जो षडयंत्र रचते हैं उसमें उनकी उनकी इतनी शक्ति खर्च होती रहती है जिसकी बचत करके उपयोगी मार्ग में लगाया गया होता तो अपनी बहुत उन्नति हुई होती। लोगों का जितना समय और मनोयोग इन दुष्प्रवृत्तियों में लगता है यदि उतना आत्म−कल्याण अथवा दूसरों की सेवा-सहायता में लगता तो कितना बड़ा हित साधन हो सकता था। ईर्ष्या और कुढ़न की मूर्खता पर जितना ही गम्भीरता से विचार किया जाता है उतनी ही उसकी व्यर्थता और हानि स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगती है।

इन द्वेष वृत्तियों का परित्याग करके यदि मनुष्य अपने अन्दर सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने में लग जाय तो उसकी दुनियाँ आज की अपेक्षा कल दूसरी ही हो सकती है। दृष्टिकोण के बदलने से दृश्य बदलते हैं। नाव के मुड़ने से किनारे पलट जाते हैं। हमें इस प्रकार का सुधार अपने आप में निरन्तर करते चलना चाहिए। सुधार के लिए हर दिन शुभ है उसके लिए कोई आयु अधिक नहीं। बूढ़े और मौत के मुँह में खड़े हुए व्यक्ति भी यदि अपने में सुधार करें तो उन्हें भी आशाजनक सफलता प्राप्त हो सकती है। फिर जिनके सामने अभी लम्बा जीवन पड़ा है वे तो इस आत्म−सुधार की प्रक्रिया को धीरे−धीरे चलाते रहें तो भी अपने जीवन क्रम का कायाकल्प ही कर सकते हैं।


मानसिक स्वच्छता का महत्व

मन की चाल दुमुँही है। जिस प्रकार दुमुँहा साँप कभी आगे चलता है कभी पीछे उसी प्रकार मन में दो परस्पर विरोधी वृत्तियाँ काम करती रहती हैं। उनमें से किसे प्रोत्साहन दिया जाय और किये रोका जाय यह कार्य विवेक बुद्धि का है। हमें बारीकी के साथ यह देखना होगा कि इस समय हमारे मन की गति किस दिशा में है? यदि सही दिशा में प्रगति हो रही है तो उसे प्रोत्साहन दिया जाय और यदि दिशा गलत है तो उसे पूरी शक्ति के साथ रोका जाय इसी में बुद्धिमत्ता है। क्योंकि सही दिशा में चलता हुआ मन जहाँ हमारे लिए श्रेयस्कर परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है वहाँ कुमार्ग पर चलते रहने से एक दिन दुखदायी दुर्दिन का सामना भी करना पड़ सकता है। इसलिए समय रहते चेत जाना ही उचित है।

उचित मार्ग पर पदार्पण

उचित दिशा में चलता हुआ मन आशावादी, दूरदर्शी, पुरुषार्थ, गुणग्राही, और सुधारवादी होता रहने वाला, तुरन्त की बात सोचने वाला, भाग्यवादी, कठिनाइयों की बात सोच−सोचकर खिन्न रहने वाला और आपका पक्षपात करने वाला होता है। वह परिस्थितियों के निर्माण में अपने उत्तरदायित्व को स्वीकार नहीं करता। मन पत्थर या काँच का बना नहीं होता जो बदला न जा सके। प्रयत्न करने पर मन को सुधारा और बदला जा सकता है। यह सुधार ही जीवन का वास्तविक सुधार है। युग−निर्माण का प्रमुख आधार यह मानसिक परिवर्तन ही है। दुमुँहे साँप की उलटी चाल को यदि सीधी कर दिया जाय तो वह पीछे लौटने की अपेक्षा स्वभावतः आगे बढ़ने लगेगा। हमारा मन यदि अग्रगामी पथ पर बढ़ने की दिशा पकड़ ले तो जीवन के सुख शान्ति और भविष्य के उज्ज्वल बनने में कोई सन्देह नहीं रह जाता।

कई लोग ऐसा सोचते रहते हैं कि आज जो कठिनाइयाँ सामने हैं वे कल और बढ़ेंगी, इसलिए परिस्थिति दिन−दिन अधिक खराब होती जावेंगी और अन्त बहुत दुखमय होगा। जिनके सोचने का क्रम यह है कल्पना शक्ति उनके सामने वैसे ही भयंकर संभावनाओं के चित्र बना-बनाकर खड़ी करती रहती है, जिससे दिन−रात भयभीत होने और परेशान रहने का वातावरण बना रहता है। निराशा छाई रहती है। भविष्य अन्धकारमय दीखता है। दुर्भाग्य की घटाऐं चारों ओर से घुमड़ती आती हैं। इस प्रकार के कल्पना चित्र जिसके मन में उठते रहेंगे वह खिन्न और निराश ही रहेगा और बढ़ने एवं पुरुषार्थ करने की क्षमता दिन−दिन घटती चली जायगी। अन्त में वह इसी मानसिक दुर्बलता के कारण लुञ्ज−पुञ्ज एवं सामर्थ्यहीन बन जायेगा किसी काम को आरंभ करते ही उसके मन में असफलता की आशंका सामने खड़ी काम करते न बन पड़ेगा। ऐसे लोगों का शंका शंकित मन से किया हुआ कार्य सफलता की मंजिल तक पहुँच सकेगा इसकी संभावना कम ही रहेगी।

उज्ज्वल भविष्य की आशा

जिनने आशा और उत्साह का स्वभाव बना लिया है वे उज्ज्वल भविष्य के उदीयमान सूर्य पर विश्वास करते हैं। ठीक है, कभी−कभी कोई बदली भी आ जाती है और धूप कुछ देर के लिए रुक भी जाती है पर बादलों के कारण क्या सूर्य सदा के लिए अस्त हो सकता है? असफलताऐं और बाधाऐं आते रहना स्वाभाविक है उनका जीवन में आते रहना वैसा ही है जैसा आकाश में धूप−छाँह की आँख मिचौली होते रहना। कठिनाइयाँ मनुष्य के पुरुषार्थ को जगाने और अधिक सावधानी के साथ आगे बढ़ने की चेतावनी देती जाती है। उनमें डरने की कोई बात नहीं। आज असफलता मिली है, आज प्रतिकूलता उपस्थित है, आज संकट का सामना करना पड़ रहा है तो कल भी वैसी ही स्थिति बनी रहेगी, ऐसा क्यों सोचा जाय? आशावादी व्यक्ति छोटी−मोटी असफलताओं की परवाह नहीं करते। वे रास्ता खोजते हैं और धैर्य, साहस, विवेक एवं पुरुषार्थ को मजबूती के साथ पकड़े रहते हैं क्योंकि आपत्ति के समय में साथ पकड़े रहते है क्योंकि आपत्ति के समय में यही चार सच्चे मित्र बताये गये हैं।

परीक्षा की कसौटी

परीक्षा में फेल हो गये, घाटा लग गया, नौकरी नहीं मिली, बीमार पड़ गये, स्वजनों से लड़ाई हो गई, जैसा चाहते थे वैसा प्रसंग न बन पड़ा तो उसमें निराश होने की क्या बात है। अगला प्रयास और भी उत्साह और श्रम से करने पर आज न सही, कल फिर सफलता का अवसर प्राप्त हो सकता है। एक राजा जब लड़ाई में 13 बार हार गया और शत्रु के सिपाही उसका पीछा कर रहे थे तब वह अपनी जान बचाये एक खोह में छिपा बैठा था। सब साधन नष्ट हो जाने से उसे निराशा घेरने लगी थी और भविष्य अन्धकारमय दीखता था। इतने में उसने सामने की दीवार पर देखा कि मकड़ी बार−बार जाला बुनती है और वह बार−बार टूट जाता है। फिर भी मकड़ी निराश नहीं होती और हर असफलता के बाद उसी हिम्मत के साथ फिर अपने काम में जुट जाती है। तेरह बार असफल होने के बाद चौदहवीं बार मकड़ी अपना टूटा तागा जोड़ने और जाला बनाने का काम आगे बढ़ाने में सफल हो गई। इस दृश्य का राजा के मन पर बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने सोचा छोटी−सी कौड़ी−मकड़ी जब हिम्मत नहीं छोड़ती तो मेरे जैसे बुद्धिमान और क्षमता सम्पन्न मनुष्य के लिए हिम्मत छोड़ बैठना क्योंकर उचित हो सकता है? राजा ने हिम्मत समेटी और फिर लड़ाई की तैयारी में पूरे उत्साह के साथ लग गया। चौदहवीं बार उसे सफलता मिल गई। हमारे लिए यह उदाहरण मार्गदर्शन का काम दे सकता है। पहलवान कई बार कुश्ती में पिछड़ जाते हैं पर क्या इससे वे कुश्ती लड़ना छोड़ देते हैं? घुड़ सवारी सीखते समय गिर पड़ने से कौन सवार घोड़े पर चढ़ना छोड़ बैठता है? छोटे बच्चे जब चलना और खड़ा होना सीखते हैं तो बार−बार गिरते और असफल रहते हैं पर इतने में ही वे कहाँ हिम्मत हारते हैं। कब अपना प्रयत्न छोड़ते हैं। वरन् हर असफलता के बाद और अधिक उत्साह तथा प्रसन्नता के साथ उठने चलने का उपक्रम करते हैं। हम इन छोटे बच्चों से बहुत कुछ सीख सकते हैं।

हम कायर न बनें

निराशा एक प्रकार की कायरता है। बुज़दिल आदमी ही हिम्मत हारते हैं। जिसमें वीरता और शूरता का, पुरुषार्थ और पराक्रम का एक कण भी शेष होगा वह यह ही अनुभव करेगा कि मनुष्य महान है, उसकी शक्तियाँ महान है, वह दृढ़ निश्चय और सतत परिश्रम के द्वारा असंभव को संभव बना सकता है। यह जरूरी नहीं कि पहला प्रयत्न ही सफल होना चाहिए। असफलताओं का कल के लिए आशान्वित रहते हैं वस्तुतः वे ही शूरवीर हैं। वीरता शरीर में नहीं मन में निवास करती हैं। जो मरते दम तक आशा को नहीं छोड़ते और जीवन संग्राम को खेल समझते हुए हँसते, खेलते, लड़ते रहते हैं उन्हीं वीर पुरुषार्थों महामानवों के गले में अन्ततः विजय वैजयन्ती पहनाई जाती है। बार−बार अग्नि परीक्षा में से गुजरने के बाद ही सोना कुन्दन कहलाता है। कठिनाइयों और असफलताओं से हताश न होना वीरता का यह एक ही चिन्ह है। जिन्होंने अपने को इस कसौटी पर खरा सिद्ध किया है उन्हीं की जीवन साधना सफल हुई है और उन्हीं के नाम इतिहास के पृष्ठों पर अमर रहें हैं।

राई को पर्वत न मानें

कई लोग दैनिक जीवन में घटती रहने वाली छोटी−छोटी बातों को बहुत अधिक महत्व देने लगते हैं और राई को पर्वत मानकर क्षुब्ध बनें रहते हैं। यह मन की दुर्बलता ही है। जीवन एक खेल की तरह खेले जाने पर ही आनन्दमय बन सकता है खिलाड़ी लोग क्षण-क्षण में हारते-जीतते हैं। दोनों ही परिस्थितियों में वे अपना मानसिक संतुलन ठीक बनाये रहते हैं। कोई खिलाड़ी यदि हर हार पर सिर धुनने लगे और हर जीत पर हर्षोन्मत हो जाय तो यह उसकी एक मूर्खता ही मानी जायगी। संसार एक नाट्यशाला है। जीवन एक नाटक है। जिसमें हमें अनेक तरह के रूप बनाकर अभिनय करना होता है। कभी राजा, कभी बन्दी, कभी योद्धा कभी भिश्ती बनकर पार्ट अदा करते हैं। नट केवल इतना ही ध्यान रखता है कि हर अभिनय को वह पूरी तन्मयता के साथ पूरा करें। दर्शक, राजा या भिश्ती बनने के कारण नहीं अभिनेता की इसलिए प्रशंसा करते हैं कि जो भी काम सौंपा गया था उसने उसे पूरी खूबी और दिलचस्पी से किया। हमें सफलता का ही नहीं असफलता का भी अभिनय करने को विवश होना पड़ता है। इन परिस्थितियों में हम अपना मानसिक सन्तुलन क्यों खोते। हर पार्ट को पूरी दिलचस्पी और हँसी−खुशी से पूरा क्यों न करें? जो असफलता और परेशानी के अभिनय को ठीक तरह खेल सकता है वस्तुतः वही प्रशंसनीय खिलाड़ी है। हमें जीवन नाटक को खेलना ही चाहिए, पर अन्तस्तल तक उसकी कोई ऐसी प्रतिक्रिया न पहुँचने देनी चाहिए जो दुखद हो। हमें भविष्य की बड़ी से बड़ी आशा करनी चाहिए किन्तु बुरी से बुरी परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए तैयार करना चाहिए।

परिपूर्ण कोई नहीं

किसी व्यक्ति में या किसी वस्तु में थोड़ा सा भी अवगुण देखकर कई व्यक्ति आग−बबूला हो उठते हैं और उसकी उस छोटी सी बुराई को ही बढ़ा-चढ़ाकर कल्पित करते हुए ऐसा मान बैठते हैं मानों यही सबसे खराब हो। अपनी एक बात किसी ने नहीं मानी तो उसे अपना पूरा शत्रु ही समझ बैठते हैं। जीवन में अनेकों सुविधाऐं रहते हुए भी यदि कोई एक असुविधा है तो उन सुविधाओं की प्रसन्नता अनुभव न करते हुए सदा उस अभाव का ही चिंतन करके खिन्न बने रहते हैं। ऐसे लोगों को सदा संताप और क्रोध की आग में ही झुलसते रहना पड़ेगा। इस संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं जिसमें कोई दोष-दुर्गुण नहीं और न ही कोई वस्तु ऐसी है जो सब प्रकार हमारे अनुकूल ही हो। सब व्यक्ति सदा वही आचरण करें जो हमें पसंद है ऐसा हो नहीं सकता। सदा मनचाही परिस्थितियाँ किसे मिली हैं? किसी को समझौता करके जो मिला है उस पर सन्तोष करते हुए यथासंभव सुधार करते चलने की नीति अपनानी पड़ी है तभी वह सुखी रह सकता है। जिसने कुछ नहीं, या सब कुछ की माँग की है उसे क्षोभ के अतिरिक्त और कुछ उपलब्ध नहीं हुआ है। अपनी धर्मपत्नी में कई अवगुण भी हो सकते हैं यदि उन अवगुणों पर ही ध्यान रखा जाय तो वह बहुत दुखदायक प्रतीत होगी। किन्तु यदि उसके त्याग, आत्म-समर्पण, वफादारी, सेवा-बुद्धि, उपयोगिता, उदारता एवं निस्वार्थता की कितनी ही विशेषताओं का देर तक चिन्तन करें तो लगेगा कि वह साक्षात् देवी के रूप में हमारे घर अवतरित हुई है। उसी प्रकार पिता−माता के एक कटुवाक्य पर क्षुब्ध हो उठने उपकार, वात्सल्य एवं सहायता की लम्बी शृंखला पर विचार करें तो उत्तेजनावश कह दिया गया एक कटु शब्द बहुत ही तुच्छ प्रतीत होगा। मन को बुराई के बीच अच्छाई ढूँढ़ निकालने की आदत डालकर ही हम अपनी प्रसन्नता को कायम रख सकते हैं।

दूरदर्शिता का तकाजा

जो आज का, अभी का, तुरन्त का लाभ सोचता है और इसके लिए कल की हानि की भी परवा नहीं करता वह उतावला मन विपत्तियों को आमंत्रण देता रहता है। प्रत्येक महान कार्य समयसाध्य और श्रमसाध्य होता है। उसकी पूर्ति के लिए आरंभ में बहुत कष्ट सहना पड़ता है, प्रतीक्षा करनी होती है और धैर्य रखना होता है। जिसमें इतना धैर्य नहीं वह तत्काल के छोटे लाभ पर ही फिसल पड़ता है और कई बार तो यह भी नहीं सोचता कि कल इसका क्या परिणाम होगा? चोर, ठग, बेईमान, उचक्के लोग तुरन्त कुछ फायदा उठा लेते हैं पर जिन व्यक्तियों को एक बार दुख दिया उनसे सदा के लिए संबन्ध समाप्त हो जाते हैं। फिर नया शिकार ढूँढ़ना पड़ता है। ऐसे लोग अपने ही परिचितों की नजर को बचाते हुए अतृप्ति और आत्मग्लानि से ग्रसित प्रेत−पिशाच की तरह जहाँ−तहाँ मारे−मारे फिरते रहते हैं और अन्त में उनका कोई सच्चा सहायक नहीं रह जाता। वासना के वशीभूत होकर लोग ब्रह्मचर्य की मर्यादा का उल्लंघन करते रहते हैं। तत्काल तो उन्हें कुछ प्रसन्नता होती है पर पीछे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ही चौपट हो जाता है पर पीछे विरोध एवं शत्रुता का सामना करना पड़ता है तो उस क्षणिक आवेश पर पछताने की बात ही हाथ में शेष रह जाती है। स्कूल पढ़ने जाना छोड़कर फीस के पैसे सिनेमा में खर्च कर देने वाले विद्यार्थी को उस समय अपनी करतूत पर दुख नहीं वरन् गर्व ही होता है पर पीछे जब वह अशिक्षित रह जाता है और जीवन को कष्टमय प्रक्रियाओं के साथ व्यतीत करता है तब उसे अपनी भूल का पता चलता है। दूरदर्शिता और अदूरदर्शिता का अन्तर स्पष्ट है। उसके परिणाम भी साफ हैं। मन की अदूरदर्शिता एक विपत्ति है। जिसमें तुरन्त का कुछ लाभ भले ही दिखाई पड़े पर अंत बड़ा दुखदायी होता है। मन में इतनी विवेकशीलता होनी ही चाहिए कि वह आज की, अभी की ही बात न सोचकर कल की, भविष्य की और अन्तिम परिणाम की बात सोचें। जिसने अपने विचारों में दूरदर्शिता के लिए स्थान रखा है उसे ही बुद्धिमान कहा जा सकता है।

अपना सुधार−संसार का सुधार

अपने सुधार के बिना परिस्थितियाँ नहीं सुधर सकतीं। अपना दृष्टिकोण बदले बिना जीवन की गतिविधियाँ नहीं बदली जा सकती हैं। इस तथ्य को मनुष्य जितनी जल्दी समझ ले उतना ही अच्छा है। हम दूसरों को सुधारना चाहते हैं पर इसके लिए समर्थ वहीं हो सकता है जो पहले इस सुधार के प्रयोग को अपने ऊपर आजमा कर योग्यता की परीक्षा दे दे। दूसरे लोग अपना कहना न मानें यह हो सकता है पर हम अपनी बात स्वयं ही न मानें इसका क्या कारण है? अपनी मान्यताओं को यदि हम स्वयं ही कार्य रूप में परिणित न करेंगे तो फिर सभी स्त्री बच्चों से, मित्र पड़ौसियों से या सारे संसार से यह आशा कैसे करेंगे कि वे अपनी बुरी आदतों को छोड़कर उस उत्तम मार्ग पर चलने लगें जिसकी कि आप शिक्षा देते हैं।

अपना मन अपना है, उसे समझाना और सुधारना तो अपने वश क बात हो ही सकती है। बाहरी अस्वच्छता साफ करने में कुछ अड़चने आवें यह बात समझ में आती है पर अपना घर, अपना मन भी साफ सुथरा न बनाया जा सकने में कौन बहानेबाजी ठीक जँचेगी? यह कार्य कोई देवता या गुरु कर देगा यह सोचना व्यर्थ है। हर आदमी अपने को स्वयं ही सुधार या बिगाड़ सकता है, दूसरे लोग इस कार्य में सहायता कर सकते हैं पर रोटी खाने, दही जमने, विद्या पढ़ने की तरह मन को सुधारने का काम भी स्वयं करना पड़ेगा। हमारे बदले की कोई दूसरा रोटी खा लिया करे, कोई दूसरा टट्टी हो आया करे यह नहीं हो सकता इसी प्रकार यह भी नहीं हो सकता कि किसी दूसरे के आशीर्वाद या वरदान से हमारी मानसिक अस्वच्छता दूर हो जाय। यह कार्य स्वयं ही करना होगा हमें भी स्वयं ही करना पड़ेगा। संसार के सुधार का आन्दोलन करना चाहिए पर संसार में, समाज में सबसे पहला वह व्यक्ति कौन हो सकता है जिससे सुधार कार्य आरंभ किया जाय? वह हम स्वयं ही हो सकते हैं। अपने प्रयत्न से अपने को सुधार कर ही हम संसार और समाज की सेवा कर सकने के अधिकारी सिद्ध हो सकते हैं।


मानसिक स्वच्छता के चार आधार

आमतौर से लोग आहार, निद्रा, शौच, स्नान आदि शारीरिक नित्य कर्मों में और रोजी रोटी कमाने में ही सारा समय लगा देते हैं। बचे हुए समय को वे गपशप आलस, प्रमाद, ताश, सिनेमा आदि निरर्थक कामों में लगा देते हैं। इसी ढर्रे में सारी जिन्दगी व्यतीत हो जाती है।(1) साधना (2) स्वाध्याय (3) नियम (4) सेवा। इन चार कामों के लिए अपनी दिनचर्या में निश्चित रूप से अपनी स्थिति के अनुरूप स्थान देना चाहिए।

उपासना की अनिवार्य आवश्यकता

नियमित उपासना मनुष्य जीवन में एक अत्यन्त आवश्यक धर्म-कृत्य है। इसकी उपेक्षा किसी को भी नहीं करनी चाहिए। उपासना की जो भी अपनी विधि हो करते हुए दो भावनाऐं मन में बराबर बनायें रहनी चाहिए कि परमात्मा घट−घट वासी और सर्वान्तर्यामी है। वह हमारी हर प्रवृत्ति को भली भाँति जानता है और हमारी भावनाओं के अनुरूप ही वह प्रसन्न-अप्रसन्न होता है अथवा दुख−सुख का दण्ड पुरस्कार प्रदान करता है। वह दयालु होते हुए भी न्यायकारी तथा व्यवस्थाप्रिय है। ईश्वर को हम इसलिए स्मरण रखें कि कुकर्म और कुविचारों से हमें सदा भय बना रहे और ईश्वर की प्रसन्नता के लिए उसके बताये धर्म मार्ग पर चलते हुए या उसकी दुनियाँ में सद्भावना बढ़ाते हुए उसका अनुग्रह प्राप्त कर सकें। “जो सन्मार्ग पर चल रहा है उसके साथ ईश्वर है इसलिए उसे किसी बड़े आततायी से भी डरने की आवश्यकता नहीं है।”

आस्तिकता का प्रतिफल है ‘निर्भयता’ जो हर घड़ी ईश्वर को अपने सहायक के रूप में साथ रहता हुआ अनुभव करेगा वह किसी से क्यों डरेगा। इतना बड़ा बलवान उसके साथ है उसे किसी समस्या या किसी वस्तु से डरने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। ईश्वर महान है। उसकी दया, करुणा, वात्सल्य, दान, न्याय, क्षमा, उदारता, आत्मीयता आदि महानता का स्मरण रखने और वैसे ही स्वयं बनने की चेष्टा करने से ईश्वरीय समीपता एवं महानता प्राप्त होती है, उसी का नाम ‘मुक्ति’ है। इन भावनाओं के साथ की हुई ईश्वर उपासना उपासक की आत्मा में तुरन्त एवं निश्चित रूप से आत्मबल प्रदान करती है।

उपासक उच्चस्तरीय होनी चाहिए आत्मकल्याण के लिए। गायत्री मंत्र में सद्बुद्धि की उपासना है। सद्बुद्धि ही मानव जीवन की सर्वोपरि महत्ता एवं विभूति है। ईश्वर की सद्बुद्धि के, सत्प्रवृत्ति के रूप में उपासना करना ही सच्ची उपासना हो सकती है, यही गायत्री उपासना है। हमारा प्रातःकाल थोड़ा बहुत समय इस कार्य के लिए अवश्य लगता है। यदि अत्यन्त ही व्यस्तता है तो भी उतना तो हो ही सकता है कि प्रातःकाल आँख खुलते ही हम चारपाई पर बैठ कर कुछ देर गायत्री माता का सद्बुद्धि के रूप में ध्यान करते हुए, सत्य−वृत्तियों को जीवन में अधिकाधिक मात्रा में धारण करने की कुछ देर भावना करें। पन्द्रह मिनट इस प्रकार लगाने के लिए समय का अभाव जैसी बात नहीं कही जा सकती। अनिच्छा हो तो बहाना कुछ भी बनाया जा सकता है। जिनके पास अवकाश है वे स्नान करके नित्य-नियमित पूजा अपनी श्रद्धा और मान्यता के अनुरूप किया करें। चूँकि गायत्री मन्त्र भारतीय धर्म और संस्कृति का आदि बीज है, इसलिए उसके लिए अपनी रुचि के साधन क्रम में भी कोई महत्वपूर्ण स्थान अवश्य रखना चाहिए।

स्वाध्याय क्यों और किसका?

स्वाध्याय का उद्देश्य पूर्व ही स्पष्ट किया जा चुका है। गीता भागवत पढ़ना धर्म शिक्षा की दृष्टि से अलग बात है। उसके लिए जितनी इच्छा हो अलग से समय रखना चाहिए। पर जीवन निर्माण के लिए व्यावहारिक विचार देने वाला सुलझा हुआ विचारपूर्ण एवं क्रमबद्ध साहित्य पढ़ना- हम इस आत्मसुधार कार्यक्रम के लिए आवश्यक समझें। “अखण्ड−ज्योति” पत्रिका इन दिनों हम इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए चला रहे हैं, जिस प्रकार वात्सल्यमयी माता अपने बच्चों के लिए अपनी बुद्धि और सामर्थ्य के अनुरूप उत्तम से उत्तम भोजन बनाने का प्रयत्न करती है। इसके अतिरिक्त भी जो साहित्य इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपलब्ध हो सके उसे अवश्य पढ़ते रहना चाहिए।

आत्म सुधार का मार्ग

आत्म संयम का कार्यक्रम संसार की सबसे बड़ी सेवा है। अपना आदर्श प्रस्तुत किये बिना हम दूसरों को अच्छाई की ओर एक कदम भी आगे बढ़ने की प्रेरणा नहीं दे सकते और न जिस गिरी हुई स्थिति में पड़े हुए हैं उससे ऊँचे उठ सकते हैं। इसलिए आत्मनिरीक्षण, आत्मसुधार और आत्मविकास के लिए विचार करने योजना बनाने और उस निर्धारित कार्यक्रम पर चलने का हमें नियमित प्रोग्राम बनाना चाहिए। अपने विचार और कार्यों का लेखा−जोखा रखने के लिए, डायरी में चार विभाग बना लेने चाहिए। (1) आज हमने साधना के लिए कितना समय लगाया और उपासना के लिए कितना समय लगाया और उपासना के कर्मकाण्ड के साथ−साथ जो भावनाऐं रखनी चाहिए वे कितनी श्रद्धा के साथ कितनी गहराई तक रखीं? (2) आज हमने स्वाध्याय की दृष्टि से कौन सी पुस्तकें के कितने पृष्ठ पढ़े और उन में प्राप्त हुई महत्वपूर्ण बातों पर कितनी देर मनन-चिन्तन किया? (3) आज हमने अपने दिन भर के विचारों और कार्यों की बड़ी समीक्षा करके उनमें क्या−क्या गुण-दोष पाये और कल उन दोषों को सुधारने एवं गुणों को बढ़ाने के लिए क्या निश्चय किया? (4) आज हमने दूसरों को क्या सेवा लाभ दिया? इन चारों बातों पर यदि नित्य बारीक नजर रखी जाय, इनके महत्व को सोचते-समझते रहा जाय और दैनिक जीवन में इनके लिए स्थान दिया जाता रहे तो एक बहुत बड़े अभाव की पूर्ति हो सकती है। ऐसी डायरी रखना और उसे नित्य लिखना प्रत्येक आत्म कल्याण के इच्छुक के लिए आवश्यक है।

समीक्षा और निराकरण

अपने गुण, कर्म, स्वभाव में जो त्रुटियाँ हों उन पर अपने आलोचक या विरोधी की दृष्टि से निरीक्षण करते रहना चाहिए। जब तक अपने प्रति पक्षपात की दृष्टि रहती है तब तक दोष एक भी सूझ नहीं पड़ता, पर जब निष्पक्ष आलोचक की दृष्टि से देखते हैं तो खुर्दबीन के शीशे की तरह अगणित त्रुटियाँ अपने में दिखाई देने लगती हैं। त्रुटियों को सुधारते और अच्छाइयों बढ़ाते चलना प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का आवश्यक कर्त्तव्य है। अपने में कोई अच्छे गुण भी हो सकते हैं और यह भी हो सकता है कि उनका विकास अभी पूरी तरह न हो पाया हो। इस विकास के लिए भी हमें सतत प्रयत्न करना चाहिए। आदत में सम्मिलित हुई कई बुराइयाँ यदि आरम्भ में ही पूर्णतया छोड़ सकना संभव न हो तो उनकी मात्रा दिन−दिन घटाते चलना शुरू कर देना चाहिए। जैसे बीड़ी पीने की आदत पड़ी हुई है और एक दिन में 10 बीड़ी पीते हैं तो हर महीने एक बीड़ी घटाते चलिये तो दस महीने में पूर्णतया छोड़ने की प्रक्रिया भी बन सकती है। अच्छा तो यही है कि एक बार पूरा मनोबल एकत्रित करके उन्हें झटके के साथ उखाड़ कर फेंक दिया जाय पर जिनसे इतना न बन पड़े, वे धीरे−धीरे भी सुधार के मार्ग पर चल सकते हैं।

अच्छाइयाँ भी हर मनुष्य में होती हैं। उनको समझना चाहिए और उन पर प्रसन्न होना चाहिए। जिस प्रकार बुराइयों को ढूँढ़कर उन पर क्षुब्ध होना, घृणा करना, हानियों की संभावना पर विचार करते रहना और उन्हें त्यागने के लिए नित्य एक कदम बढ़ाते चलना आवश्यक है उसी प्रकार अपनी अच्छाइयों को ढूँढ़ना, उन पर संतोष अनुभव करना और उन्हें बढ़ाते चलने के लिए आगे और भी अधिक बड़े कदम उठाने का प्रयत्न करते रहना आवश्यक है। हर आदमी में बुराइयाँ और अच्छाइयाँ अपने−अपने ढंग की होती है और अलग−अलग प्रकार की। इसलिए हर व्यक्ति को अपनी शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलताओं को स्वयं ही ढूँढ़ना चाहिए और उनके घटाने का कार्यक्रम स्वयं ही बनाना चाहिए।

दैनिक कार्यों का लेखा-जोखा

रात को सोने से पूर्व अपने दिन भर के विचारों और कार्यों का लेखा−जोखा लेना चाहिए और देखना चाहिए कि पिछले कल की अपेक्षा आज बुराइयों में कुछ कमी और अच्छाइयों में कुछ वृद्धि हुई या नहीं? कल रात को आज के लिये जो कार्यक्रम निर्धारित किया गया था उस पर किस सीमा तक चल सकना संभव हो सका? यदि त्रुटियाँ अधिक रहीं हो उनमें बाह्य परिस्थितियों का कारण प्रधान था या अपनी कमजोरी का? देर तक इन बातों पर विचार करने से वस्तुस्थिति समझ में आ जाती है और उस आधार पर अगले दिन के लिए आज के अनुभव को ध्यान में रखते हुए नया कार्यक्रम बना सकना सरल होता है।

सेवा कार्य का निजी क्षेत्र

सेवा कार्यों में अपने सुधार के अतिरिक्त दूसरा कदम अपने परिवार को सुधारने का है। घर के अधिकाँश सदस्यों की फुरसत का जो समय होता है उसमें मनोरंजन एवं सुधार का सम्मिश्रित कार्यक्रम चलाने की व्यवस्था करनी चाहिए। इसमें वातावरण गंभीर नहीं मनोरंजक बनाना चाहिए। आदेश और उत्तेजना के लिए इसमें कभी अवसर न आने देना चाहिए वरन् ऐसा वातावरण रखना चाहिए कि उसमें सम्मिलित होने की घर के सभी लोगों को उत्सुकता बनी रहे। कहानी कहने की कला इस दृष्टि से बहुत उपयोगी सिद्ध होती है। इसे बच्चे−बूढ़े सभी पसंद करते हैं। ऐतिहासिक, पौराणिक, शिक्षाप्रद, मनोरंजक कहानियों की पुस्तकें बाजार में मिलती हैं। उनमें से छाँट−छाँट कर अच्छी कहानियाँ दिन में याद कर लेनी चाहिए और रात को उन्हें घर के लोगों को सुनाना चाहिए। कहानी कहने की कला में यह विशेषता होनी चाहिए कि कथानक के पात्र आपस में कुछ ऐसी बातें भी कहें जो जीवन की किन्हीं समस्याओं पर प्रकाश डालती हों। यह कुशलता कहानी कहने वाली की है कि वह मनोरञ्जन के साथ−साथ शिक्षा का समुचित पुट अपनी शैली में सम्मिश्रित रखे और घर वालों के मस्तिष्क में वे सब बातें बिठाता चले जो उनके मानसिक विकास के लिए आवश्यक है।

पारिवारिक समस्याओं पर विचार−विनिमय, एक दूसरे की कठिनाई को समझना,पारस्परिक मनोमालिन्य के कारणों की ढूँढ़ और उनके समाधान का उपाय आदि विषयों पर घर के लोगों की सलाह भी लेते रहने का, अपने−अपने सुझाव देते रहने का भी अवसर इन शिक्षा सत्रों में मिल सकता हैं। कोई विचारोत्तेजक लेख पढ़कर सुनाये जा सकते हैं। जिस घर के लोग परस्पर मिल−जुल कर बैठते हैं जी खोलकर अपनी−अपनी बात कह लेते हैं वहाँ मानसिक घुटन नहीं रहती। सबका चित्त प्रसन्न रहता है और आगे की प्रगति का मार्ग खुलता चला जाता है। जो पढ़े-लिखे नहीं उन्हें साक्षर बनाने का,जो पढ़े हैं उन्हें अधिक पढ़ाने का प्रयत्न भी इसी पाठशाला में चल सकता है। विविध प्रकार की ज्ञानवर्धक बातें शंका−समाधान के रूप में प्रश्नोत्तर के रूप में इस ज्ञान गोष्ठी में होती रह सकती हैं। परिवार माहौल उसकी प्रगति के लिए मार्ग−दर्शन मिल सकता है इस घरेलू पार्लियामेण्ट में न्याय निर्णय से लेकर आगामी योजनाऐं बनाने तक के हँसी−हँसी में ही वे कार्य−क्रम चलते रह सकते हैं तो जो परिजनों के उत्थान एवं कल्याण के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं उपयोगी सिद्ध हों। यह ज्ञान गोष्ठियाँ ‘अखंड ज्योति’ परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने−अपने घरों में आरंभ कर ही देनी चाहिएं। युग−निर्माण योजना की सफलता का बहुत कुछ आधार इन गोष्ठियों पर रहेगा।

साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा चतुर्विधि कार्य−क्रम युग निर्माण का आधार है। इसे ही अपना कर व्यक्ति का व्यक्तित्व महान बनना है मन की स्वच्छता भी इन चार साधनों पर निर्भर है इन्हें हम प्राण−प्रण से अपनायें इसी से जीवन लक्ष की सफलता संभव हो सकती है।

शरीर, परिवार, धन, ज्ञान और आत्मबल यह पाँच वस्तुऐं मानव जीवन में सबसे बड़ी विभूतियाँ हैं। इनकी प्राप्ति मन की स्वच्छता पर ही निर्भर है यह पाँच विभूतियाँ मन को स्वच्छ कर लेने के बाद जब मिल जाती हैं तो जीवन में कोई भी अभाव शेष नहीं रह जाता। मन को कल्पवृक्ष कहा गया है स्वच्छ मन सचमुच ही हमें सब कुछ देने में समर्थ है

गायत्री तपोभूमि में

ता.1 जून से 30 तक चलने वाला एक महीने का स्वास्थ्य शिविर यह अंक पहुँचने तक यहाँ भली प्रकार चलने लगेगा। देश के कोने−कोने से स्वास्थ्य लाभ के लिए तथा प्राकृतिक जीवन एवं चिकित्सा की शिक्षा प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में लोग आ रहे हैं। गाँधीजी द्वारा स्थापित उरुली काँचन चिकित्सा के प्रधान चिकित्सक डा. श्री शरण सिंह, जयपुर प्राकृतिक चिकित्सालय के संचालक डा. सुखरामदास, नागपुर प्राकृतिक चिकित्सालय के संस्थापक डा.कृ.श.रेड्डी—डा.गोखले प्रिंसिपल जगदीश शरण, डा.अमलकुमार दत्त, एम.बी.बी.एस. डा.रामचरण महेन्द्र एम.ए. पी.एच.डी. अन्ना साहब एवं अन्य कई देश भर के गन्य मान्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस शिविर का शिक्षण कार्य करेंगे।

*समाप्त*