अब आयें कितनी ही बाधा,
मैं न रुकूँगा, मैं न झुकूँगा।
डर कर तज दूँ यदि मैं चलना,
आशाओं को होगा जलना,
कितने दिन सुख से रह सकता?
अलग कहाँ जीवन से व्याधा,
मैं न डरूँगा, मैं न हटूँगा॥1॥
बढ़े कदम अब रुक न सकेंगे,
प्राण भला अपमान सहेंगे!
जितना कष्ट मिले, सह लूँगा,
मैंने काट दिया पथ आधा,
पीर सहूँगा, उफ् कहूँगा॥2॥
माना कठिन हुआ है जीना,
पग पग पर पड़ता विष पीना,
फिर भी क्या चिन्ता है मुझको,
जीवन संघर्षो में साधा,
चला चलूँगा, लक्ष्य गहूँगा।
मैं न रुकूँगा, मैं न झूकूँग॥3॥
मानव प्राणी यदि अपने कर्तव्य−धर्म का ठीक प्रकार पालन करे तो ईश्वर का अविनाशी राजकुमार एवं सृष्टि का मुकुटमणि ही माना जायेगा, क्योंकि उसके अन्दर की महानता जब प्रकट, प्रस्फुटित एवं परिपुष्ट होती है तो वह महामानव, देवता एवं परमात्मा के रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है। इस धरती पर अब तक ऐसे अगणित अवतारी महापुरुष, नर−रत्न, महान आत्मा, ऋषि, महर्षि, देवदूत एवं त्यागी तपस्वी उत्पन्न हुए हैं जिनके शरीर भले ही आज जीवित न हों पर उनका अमर यश सर्वसाधारण के लिए आज भी प्रकाश−दीप बनकर मार्ग दर्शन कर रहा है। कितने ही भूले−भटके व्यक्ति उस प्रकाश में अपना मार्ग खोज निकालते हैं। ऐसे आदर्शवादी नररत्न बनने का श्रेय उन्हें ही प्राप्त हुआ है जिनने अपनी महानता को विकसित किया है। देवत्व हर व्यक्ति के अन्दर पर्याप्त मात्रा में भरा पड़ा है यदि वह चाहे तो आसानी से उसे जगा सकता है और जिसके अन्दर का सोया देवत्व जगा, उसका बाह्य जीवन सब प्रकार उज्ज्वल बनना सर्वथा स्वाभाविक है।
नव−रत्नों का भाण्डागार
भारत का प्राचीन इतिहास ऐसे नव−रत्नों का इतिहास है जिनने अपने देवत्व को जगाया ही नहीं, जगमगाया भी था। इस देश के प्रत्येक मानव में यह प्रतिस्पर्धा होती रही है कि वह श्रेष्ठता की दृष्टि से अपने किसी साथी से पीछे न रहे। यहाँ हर व्यक्ति ने यह प्रयत्न किया है कि मानवता की कसौटी पर वह सर्वथा खरा उतरे, उसके चरित्र एवं व्यक्तित्व में कोई ऐसा दाग धब्बा न लगे जिससे उसके अन्तःकरण में निवास करने वाले देवता को लज्जा या संकोच अनुभव करना पड़े। इसी विशेषता के कारण यह भारत भूमि धरती का स्वर्ग कहलाती रही है और यहाँ के तेतीस कोटि निवासी अपने आदर्शवाद के कारण संसार भर में भूसुर—पृथ्वी के देवता कहलाते रहे हैं। तेतीस कोटि देवता इसी भारत भूमि पर निवास किया करते थे।
भौतिक सुख−शान्ति, समृद्धि एवं सम्पत्ति मानवीय व्यक्तित्व की अनुगामिनी रहीं हैं, रहती हैं। गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से जो व्यक्ति पूर्णता के निकट पहुँचता जायेगा वह कभी अभावग्रस्त न रहेगा। स्वेच्छा से त्याग करे, बात दूसरी है, पर सद्गुणी व्यक्ति प्रकृति की ओर से कभी अभावग्रस्त या दीन दरिद्र नहीं रखा जाता। पुरुषार्थी उद्योगी, दृढ़-चरित्र कर्मयोगी के लिए पर्वत रास्ता देते हैं और बादल उन पर छाया करते हैं। अभावग्रस्त और दीन दरिद्र तो उन्हें रहना पड़ता है जिनका व्यक्तित्व दोषपूर्ण है। जिनके गुण कर्म स्वभाव का स्तर मानवता के मापदंड तक ऊँचा उठा हुआ है उनके लिए इस संसार में विपत्तियों का नहीं सम्पदाओं का ही उपहार प्रस्तुत रहता है। प्राचीनकाल में जिस प्रकार हमारा देश नर−रत्नों से भरा पड़ा था वैसे ही भौतिक ऐश्वर्य की भी कमी न थी। जहाँ सज्जनों का बाहुल्य होगा वहाँ सुख−शान्ति भी चिरस्थायी रहेगी ही। जहाँ सन्मार्ग का पथ अपनाया हुआ है वहाँ न तो समस्याऐं उपजती हैं न गुत्थियाँ उलझती हैं।
मानवता के आदर्शों पर आस्था
युग−निर्माण का हमारा स्वप्न यही है कि हममें से हर व्यक्ति मानवता के आदर्शों पर सच्ची आस्था रखने वाला और उस पर निरन्तर आरुढ़ रहने वाला बने। दूसरे लोगों की कल्पना दूसरी तरह की है। वे सोचते हैं धन दौलत, उद्योग, सम्पत्ति एवं साधन सुविधाऐं जुटा देने से मनुष्य का जीवन स्तर ऊँचा उठ जायेगा और उसकी समस्याऐं सुलझ जायेंगी। सम्पत्ति की वृद्धि करना अच्छी बात है, सुविधाऐं बढ़ेंगी तो उससे आसानी ही रहेगी पर यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि भावना और आदर्श की दृष्टि से मनुष्य का आन्तरिक स्तर गिरा रहा तो सम्पत्ति और सुविधा बढ़ने से भी चैन न मिलेगा वरन् उन्हें पाकर अनीतिवान मनुष्य और भी अधिक दुष्कर्म करने लगेगा, और भी अधिक विपत्ति में फँसेगा। ऐश्वर्य बढ़ना चाहिए, पर साथ ही उत्तरदायित्व को समझने एवं उपलब्ध साधनों का सदुपयोग करने की विवेकशीलता भी बढ़नी चाहिए।
मनुष्य का आन्तरिक स्तर इसी आधार पर ढाला जाना चाहिए कि वह स्वयं चैन से रहे और दूसरों को चैन से रहने दे। स्वयं प्रगतिशील बने और दूसरों को प्रगति के पथ पर चलने में सहयोग प्रदान करे। अनीति को न तो सहन करे और न किसी को अन्यायपूर्वक सतावें। अपना कर्तव्य पालन करे और दूसरों के सामने ऐसा आदर्श प्रस्तुत करे जिससे उन्हें भी श्रेष्ठता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले। धन संग्रह की तृष्णा, पद, अधिकार, सत्ता, एवं अहंकार की पूर्ति में आज जिस प्रकार लोग अपनी उन्नति समझते हैं और मौज-मजा कर लेने को जैसे जीवन की सफलता मानते हैं वैसे ही यदि जीवन को आदर्श, महान, कर्तव्यरत एवं धर्मपरायण बनाने की हर व्यक्ति को लगन लग जावे तो मनुष्य आदर्श मनुष्य बन सकता है और मानव प्राणी कितना महान है इसका प्रतिक्षण अनुभव कर सकता है। सद्भावनाओं में जिन लोगों का मन डूबा रहेगा उनका शरीर आदर्श कार्य ही करेगा और उन कार्यों से उन व्यक्तियों का निज का कल्याण तो होगा ही साथ ही जो उनके सम्पर्क में आवेंगे वे भी सन्तोष एवं प्रसन्नता अनुभव करेंगे।
विकास का सच्चा प्रयास
आज हम उन्नति तो चाहते हैं पर मानवीय सद्गुणों के विकास का प्रयत्न नहीं करते। समाज में शान्ति और सम्पन्नता रहे यह सभी की इच्छा है पर इसके मूल आधार पारस्परिक प्रेम भाव की वृद्धि का उपाय नहीं करते। भौतिक सुविधाओं में वह शक्ति नहीं है कि व्यक्ति को श्रेष्ठ बना दे पर अच्छे व्यक्तित्व में गुण मौजूद हैं कि वह सम्पन्नता का उपार्जन कर ले। हम इस तथ्य को जब तक न समझेंगे तब तक दौलत के पीछे भागते रहेंगे। आदर्शवाद की उपेक्षा करके सम्पन्नता के लिए घुड़दौड़ लगाने का परिणाम लाभ के स्थान पर हानिकारक ही सिद्ध हो सकता है। यह दुनियाँ अधिक अच्छी, अधिक सुन्दर, अधिक सम्पन्न अधिक शान्तिपूर्ण बने, यदि हम सब यही चाहते हैं तो फिर इस प्रगति के मूल आधार—व्यक्तित्व की श्रेष्ठता की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता यही आश्चर्य है। प्रगति तभी स्थायी रह सकेगी, सुख शान्ति में तभी स्थिरता रहेगी जब मनुष्य अपने को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने का प्रयत्न करे। इस उपेक्षित तथ्य को अनिवार्य आवश्यकता के रूप में जब तक हम स्वीकार न करेंगे और व्यक्तिगत एवं सामूहिक चरित्र को ऊँचा उठाने के लिए कटिबद्ध न होंगे तब तक अगणित समस्याओं की उलझनों से हमें छुटकारा न मिलेगा।
मलीनता का वातावरण
आत्मा स्वभावतः पवित्र है, उसमें परमात्मा का प्रचुर अंश विद्यमान रहने में देवतत्व की सभी विशेषताऐं और संभावनाऐं मौजूद हैं। पर प्रस्तुत वातावरण की मलीनता से प्रभावित होकर वह भी मलीन जैसा बन जाता है। अपनी यह दुर्गति देखना हमें कदापि सहन न होना चाहिए। कोई दूसरा कीचड़ में फँस जाय या नदी नाली में गिर पड़े तो हमें उस पर दया आती है और उसे निकलने के लिए उदारतापूर्वक प्रत्येक संभव सहायता देने का प्रयत्न करते हैं। यह उचित भी है और मानव धर्म के अनुकूल भी। किन्तु आश्चर्य तब होता है जब अपने आपको मलीनता की कीचड़ में कंठतम धँसे होने पर भी स्वयं निकलने का प्रयत्न नहीं करते और न उसके संबंध में कुछ सोचते हैं। औरों की सहायता करना पुण्य है पर अपनी सहायता करना, अपना उद्धार करना, अपना उत्कर्ष करना तो उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। आत्मा का उद्धार करना सबसे बड़ा पुण्य परमार्थ माना गया है।
सुख की खोज करते−करते मनुष्य दौलत की देहरी पर अपना सिर पटकता रहता है। दौलत−मंदी के बाहरी ठाट−बाट को देखकर, भोग सामग्री को देखकर यह भ्रम होता है कि वस्तुतः यही सुखी है और इनकी स्थिति यदि अपने को प्राप्त हो जाय तो हम भी भरपूर आनंद उठा सकेंगे, पर यह बात अनुभव की कसौटी पर कसे जाने से गलत ही सिद्ध हुई है। दौलत की आवश्यकता उतनी ही मात्रा में है जितने से कि दैनिक जीवन का साधारण कार्यक्रम पूरा होता रहे, इससे अधिक परिग्रह जिसके पास भी होगा, जहाँ भी होगा वहाँ नाना प्रकार की समस्याऐं उत्पन्न होंगी और आदर्शवाद के अभाव में वे समस्याऐं ऐसे उलझती रहेंगी कि व्यक्ति अपनी साधारण और स्वाभाविक शान्ति से भी हाथ धो बैठेगा। धन कमाना या संग्रह करना अपने आप में कुछ भी महत्व नहीं रखता, महत्वपूर्ण तो उसका सदुपयोग ही है। कितने ही व्यक्ति विपुल सम्पदा के स्वामी होते हैं पर उसका उपयोग नहीं जानते। कंजूस की तरह उसे जोड़ते रहते हैं और अन्त में दूसरों के लूट ले जाने के लिए सब कुछ पड़ा छोड़ जाते हैं। धन से किसी ने यदि कुछ लाभ उठाया है तो उसका श्रेय सदुपयोग करने वाली बुद्धि को ही दिया जायेगा। यह विवेक बुद्धि ही सुख शान्ति की सच्ची आधारशिला है।
सच्ची प्रगति का एकमात्र उपाय
आत्म−कल्याण के लिए सद्गुणों की, सद्विचारों की सद्भावनाओं की सत्कर्मों की अभिवृद्धि होनी चाहिए। जब तक यह प्रगति रुकी है तब तक प्रगति जैसी लगने वाली तड़क−भड़क एक खोखली विडम्बना मात्र ही रहेगी। मनुष्य का सच्चा धन उसका आत्मिक−स्तर ही है। यह स्तर जिस का जितना ऊँचा है वह उतना ही धनी माना जायेगा। महानता वस्तुओं में नहीं मानवीय गुण, कर्म, स्वभाव में सन्निहित रहती है। हम उत्कर्ष की ओर चढ़ें, उन्नति करें, सुख साधन बढ़ावें पर यह भली−भाँति याद रखें की धन सम्पदा से नहीं, मानवीय सद्गुणों के मूल्य पर ही वह आनन्द और उत्कर्ष प्राप्त हो सकता है जो वास्तविक, सुदृढ़ और चिरस्थायी है।
स्वार्थ और परमार्थ में बहुत थोड़ा−सा अन्तर है। स्वार्थ उसे कहते हैं जो शरीर को तो सुविधा पहुँचाता हो पर आत्मा की उपेक्षा करता हो। चूँकि हम आत्मा ही हैं शरीर तो हमारा वाहन या उपकरण मात्र है। इसलिये वाहन या उपकरण को लाभ पहुँचे किन्तु स्वामी दुख पावे तो ऐसा कार्यक्रम मूर्खतापूर्ण कहा जायेगा। इसके विपरीत परमार्थ में आत्मा के कल्याण का ध्यान प्रधान रूप से रखा जाता है, आत्मा के उत्कर्ष होने से शरीर को सब प्रकार सुखी एवं सन्तुष्ट रखने वाली आवश्यक परिस्थितियाँ अपने आप उपस्थित होती रहती हैं। केवल अनावश्यक विलासिता पर ही अंकुश लगता है। फिर भी यदि कभी ऐसा अवसर आवे कि शरीर को कष्ट देकर आत्मा को लाभ देना पड़े तो उसमें संकोच न करना ही बुद्धिमानी है। यही परमार्थ है। परमार्थ का अर्थ है पर स्वार्थ। जिस कार्य के द्वारा तुच्छ स्वार्थ की, शरीर तक सीमित रहने वाले स्वार्थ की पूर्ति होती है वही त्याज्य है। जो स्वार्थ अपनी आत्मा का, शरीर का, परिजनों का एवं सारे समाज का हित साधन करता है, वह तो प्रशंसनीय ही है। ऐसा परमार्थ सर्वत्र अभिनंदनीय माना जाता है। वही मनुष्य की सर्वोत्तम दूरदर्शिता का चिन्ह भी है। इसी पथ पर चलते हुए इस सुरदुर्लभ मानव जीवन का लक्ष पूरा हो सकता है।
परमार्थ की साधना
आत्म−कल्याण और युग−निर्माण का जो कार्यक्रम लेकर हम चले हैं वह सच्चे अर्थों में परमार्थ की साधना है क्योंकि उससे अपना तो लौकिक और पारलौकिक हित साधन होता ही है साथ ही आस−पास का वातावरण भी सुधारता है, दूसरों को भी लाभ मिलता है। युग−निर्माण कार्यक्रम की योजना सफल होने से दूसरों को लाभ है ही किन्तु साथ ही अपना दुहरा लाभ है। जिस सुधार कार्य को हम आरंभ करेंगे वह सबसे पहले हमारे निकटवर्ती लोगों को प्रभावित करेगा क्योंकि यह प्रचार और प्रसार कहीं दूर देश में नहीं वरन् अपने घर कुटुम्ब और पड़ौस से ही आरंभ करना है। उनके विचार उत्कृष्ट बनने से उनमें श्रेष्ठता और देवत्व की मात्रा बढ़ने से निश्चय ही हम पर उसका अत्यधिक प्रभाव पड़ेगा। वे असहयोगी एवं आक्रमणकारी न रह कर हमारे लिए प्रेम, सहयोग एवं सज्जनता से बरतने वाले बनेंगे। इससे अपनी आन्तरिक शान्ति तो बढ़ेगी ही, बाहरी सहयोग एवं स्नेह भाव बढ़ने से संगठन जैसी शक्ति भी बढ़ेगी और सहयोग रहने से आर्थिक, सामाजिक एवं अन्य अनेक प्रकार के लाभों में भी अभिवृद्धि होगी। इसके अतिरिक्त लोकसेवा, जनहित एवं व्यक्ति निर्माण का जो पुण्य प्राप्त होगा वह भी साथ में जुड़ा हुआ है। यह दुहरा लाभ मिलता है।
सुरक्षा की चारदीवारी
प्राचीन काल में राजा लोग अपनी राजधानी की सुरक्षा के लिए नगर से बाहर एक बड़ा परकोटा बनाते थे ताकि शत्रु का हमला उस परकोटे के बाहर रुका रहे और अपनी सुरक्षा में सहायता में सहायता मिले। किसी जमाने में युग−निर्माण जैसे कार्यक्रम विशुद्ध पुण्य की दृष्टि से कोई भले ही करते रहे हों पर आज वह हमारा सर्वोपरि स्वार्थ है। समाज का ढाँचा अब इतना शृंखलाबद्ध एवं सघन हो गया है कि एक का प्रभाव दूसरे पर पड़े बिना नहीं रह सकता। हम व्यक्तिगत रूप से अपनी भौतिक उन्नति कितनी ही करे लें पर बुरे स्वभाव के कुटुम्बियों, मित्रों और पड़ौसियों से घिरे रहने पर हमें निरन्तर चिन्तित रहना पड़ेगा। जो सद्गुण हमने अपने स्वभाव में बड़ी कठिनाई से सम्मिलित किये हैं उन्हें भी बुराई का वातावरण स्थिर न रहने देगा और उनकी दुष्टता की प्रतिक्रिया में हमारी अच्छाई भी डूबने लगेगी। इसलिए अब अपने आपकी भलाई, अपने आपकी अच्छाई की संकुचित सीमा में सोचते रहने से काम न चलेगा। अब वह दायरा बढ़ाकर कुछ अधिक विस्तृत क्षेत्र में फैलाना पड़ेगा तभी अपनी शान्ति और सुरक्षा की समस्या हल होगी।
सच्चा स्वार्थ इसी से सधेगा
युग−निर्माण कार्यक्रम सच्चे अर्थों में अत्यन्त दूरदर्शितापूर्ण स्वार्थ-साधन है क्योंकि उसके द्वारा हम अपने आस−पास सज्जनों का निर्माण करते हैं, सज्जनों का स्नेह एवं सहयोग हमारे सुख में बढ़ोत्तरी ही करेगा। सेवा करने का आत्म−सन्तोष, यश, प्रतिष्ठा एवं परलोक के लिए पुण्य संचय का विशेष लाभ इसके अतिरिक्त है। इस ओर बढ़ाये हुए कदम हमें युग−निर्माता, लोक सेवी, देश भक्त, समाज सुधारक, धर्मात्मा, परोपकारी एवं महापुरुषों की श्रेणी में ले जाकर बिठा देते हैं इतिहासकारों की कलम के नीचे हमारा नाम जमता है और जनता हमें अभिनंदनीय मानती है, यह लाभ इसके अतिरिक्त हैं। वस्तुतः यह अपनी और अपने बच्चों की स्वार्थ−साधना का श्रेष्ठ तरीका है। इन प्रयत्नों से कोई और न सुधरे, केवल हमारा परिवार ही सम्भ्रान्त बन जावे तो उसकी सज्जनता से हमारा आज का समय भी आनंद से कटेगा और बुढ़ापा भी उनके बीच रहते हुए शान्ति से बीतेगा। कुसंस्कारी परिजन नरक में रहने वाले यमदूतों से अधिक दुख देते हैं इसका अनुभव उन्हें भली−भाँति होगा जिनको स्त्री, पति, पुत्र, पुत्री, भाई, भतीजे, दामाद, बहनोई, कर्कश, उद्दण्ड एवं कुमार्गगामी मिले हैं। उनकी गतिविधियों से जिसका जी दिन−रात जलता रहता है, वह बेचारा घायल से भी बुरा पड़ता है। घायल अपने कष्ट को कह तो सकता है, कराह तो सकता है पर उस बेचारे के लिए तो इस पर भी प्रतिबंध है। जी की जलन में भीतर ही भीतर सुलगते रहने की व्यथा कितनी कष्टकारक होती है इसे कोई भुक्त-भोगी ही जान सकता है।
समय से पहले चेतें
इस व्यथा से छुटकारा दिलाने का कोई कारगर उपाय यदि मिल सके तो कोई इस प्रकार का परिजन−पीड़ित—पड़ौसियों और स्वजन संबंधियों का सताया हुआ मनुष्य, उसके लिए बड़े से बड़ा त्याग और खर्च करने को तैयार हो सकता है। हमें सोचना चाहिए कि भयंकर बीमारी में फँस जाने पर प्रचुर धन खर्च करने की अपेक्षा, उस बीमारी को न होने देने या रोके रहने के लिए समय रहते कुछ थोड़ा खर्च कर लिया जाय तो क्या वह बुद्धिमानी न होगी? शत्रु का हमला होने पर उसे लड़कर परास्त करने का तरीका महँगा और समय रहते शत्रु को निरस्त कर देने का तरीका सस्ता है। हैजा या इन्फ्लुऐंजा फैलने के दिनों में क्या हम अपने घर में सब को सुरक्षा की सुई नहीं लगवा देते? सुरक्षा की सुई के रूप में ही हमें अपने निकटवर्ती क्षेत्र में सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का शिक्षण कार्य आरंभ कर देना चाहिए। अपने बच्चों का भविष्य बनाने और उन्हें सुखी रखने के लिए यों हम बहुत कुछ सोचते और बहुत कुछ करते हैं। अच्छा भोजन, अच्छे वस्त्र, ऊँची शिक्षा, विवाह शादी में विपुल खर्च, चिकित्सा, मनोरञ्जन आदि की सुविधाऐं जुटाने में हर अभिभावक बहुत त्याग और बहुत खर्च करता है, इन बातों पर सोचता-विचारता भी बहुत रहता है। अपने प्यारे बच्चों और परिजनों के लिए ऐसा करना उचित भी है। पर इसी स्थान पर दाल में नमक डालना भूल जाने की तरह एक बहुत बड़ी भूल हम कर बैठते हैं कि उन्हें सुसंस्कारी बनाने के लिए कुछ नहीं करते। शिक्षा तो देते दिलाते रहते हैं पर दीक्षा की ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता।
कुसंस्कारों की गरिमा
हजार योग्यताऐं और लाख समृद्धियाँ एक ओर और सुसंस्कारों को एक ओर रखकर तोला जाय तो सुसंस्कारों का पलड़ा भारी बैठेगा। सुसंस्कारी व्यक्ति गरीब रहते हुए भी आनंद एवं उल्लास का जीवन व्यतीत कर सकता है पर कुसंस्कारी व्यक्ति कुबेर सी सम्पदा और इन्द्र से वैभव का स्वामी होते हुए भी संतप्त रहेगा और अपने संबंधियों को संतप्त करेगा। इसलिए प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति का कर्तव्य है कि अपने उत्तराधिकारियों को जमीन, घर, नकदी, शिक्षा आदि से विभूषित करने की बात ही न सोचें वरन् उन्हें सुसंस्कारी बनाने के लिए भी प्रयत्न करें। यह कार्य अध्यापकों पर नहीं छोड़ा जा सकता यह तो हमारे स्वयं करने का है। युग−निर्माण योजना के अन्तर्गत व्यक्ति निर्माण के लिए हम जो कुछ करते हैं उससे इसी आवश्यकता की पूर्ति होती है। अपने परिजनों को दीक्षा देने का, उन्हें सुसंस्कारी, सद्विचार, सद्भाव, उदार दृष्टिकोण, सच्चरित्रता, मानवता एवं दूरदर्शिता अपनाने के लिए प्रेरणा देने का जितना कारगर उपाय इस योजना में सन्निहित है उतना अन्य प्रकार से संभव नहीं हो सकता। यदि हम इस ओर उपेक्षा करते हैं तो मानव जीवन को धन्य बनाने वाले एक श्रेष्ठ पुण्य परमार्थ से ही वञ्चित नहीं होते वरन् अपने निकटवर्ती लोगों को कुमार्गगामी बनने से रोकने में उपेक्षा करने के अपराधी भी बनते हैं और उस अपराध का दंड हमारे परिजन और पड़ौसी वैसे ही देंगे जैसे गत अंक में छोटे−छोटे कारणों पर अपने परिवार के लोगों को मार तक डालने वाले समाचारों वाले लेख में चर्चा हुई थी।
संकीर्णता नहीं, दूरदर्शिता चाहिए
हम स्वार्थ में ही न लगे रहें परमार्थ की बात भी सोचें। परमार्थ किसी पर कोई अहसान या उपकार करना नहीं वरन् अपने ही दूरवर्ती एवं चिरस्थायी स्वार्थ को बुद्धिमत्ता के साथ सम्पन्न करना है। जो परमार्थ साधता है वही सच्चा स्वार्थी है क्योंकि उसे आज ही नहीं कल भी सुख प्राप्त होता है। उसकी आज की ही अभिलाषा पूर्ण नहीं होती वरन् चिरकाल तक अपने अभीष्ट की सिद्धि का लाभ उठाता रहता है। हम संकुचित स्वार्थ की सीमा से बाहर सिर उठाकर यदि दूर तक देख सकें दूर तक सोच सकें तो व्यक्ति-निर्माण की, युग−निर्माण की प्रस्तुत योजना रोटी कमाने के आवश्यक कार्यों की तरह ही उपयोगी एवं अपनाने योग्य प्रतीत होगी। यदि इसके लिए हम कुछ करने भी लगें तो प्रतीत होगा कि हम अपने जीवन के बहुमूल्य क्षणों का उपयोग एक ऐसे कार्य में कर रहे हैं जिससे हमारा, हमारे परिजनों का, सारे संसार का सब प्रकार भारी हित साधन संभव होता है, हो रहा है।
युग−निर्माण के जिस स्वप्न को साकार बनाने के लिए हम आगे बढ़ रहे हैं उसका लक्ष ऐसे समाज की स्थापना है जिसमें सब लोग स्वभावतः एक दूसरे के प्रति प्रेम, आत्मीयता, उदारता, सेवा एवं सहानुभूति का व्यवहार करें। एक दूसरे के दुख दर्द को अपना दुख दर्द समझें और उसे घटाने एवं मिटाने का भी ऐसा ही प्रयत्न करें जैसा कि अपने निज के कष्ट को मिटाने के लिए किया जाता है। दूसरों की उन्नति, सुविधा एवं प्रसन्नता में लोग वैसा ही आनन्द अनुभव करें जैसे अपने आपको कोई लाभ मिलने पर होता है। दूसरों की प्रसन्नता एवं उन्नति के लिए लोग वैसा ही प्रयत्न करें जैसा अपने उत्कर्ष के लिए किया जाता है। आत्मीयता की—आत्मिक एकता की—इस परिधि को बढ़ाना आध्यात्मिकता का व्यावहारिक बाह्य रूप है।
उभय पक्षों का समन्वय
जिस प्रकार भगवान के दो रूप हैं एक निराकार और दूसरा साकार, दोनों का मिला हुआ रूप ही भगवान का सर्वांगपूर्ण रूप है। इसी प्रकार अध्यात्म का निराकार रूप वह है जो हमारे अन्तः करण में आस्तिकता, धार्मिकता एवं भक्ति-भावना को ओत−प्रोत रखता है। पूजा, उपासना, ध्यान, भजन, स्वाध्याय चिन्तन आदि उसके उपाय हैं। पर इतने मात्र को ही अध्यात्म का पूर्ण स्वरूप नहीं माना जा सकता यह तो उसका एक अंश मात्र है। पूर्णता तब आती है जब बाह्य वातावरण में भी वह अध्यात्म भावनाऐं साकार रूप से दिखाई देती हैं। जैसे हमारा मन अध्यात्म तत्व में डूबा रहने पर सुख प्राप्त करता है वैसे ही हमारा समाज यदि आध्यात्मिक आदर्शों को अपना कर धर्म नीति पर चले तो शान्ति की स्थापना हो सकती है। भीतर उत्पन्न होने वाली दुर्भावनाओं की बाहर फैलने वाली सडांद ही अशान्ति के रूप में प्रकट होती है। यदि समाज में उपस्थित अनेकों समस्याओं, बुराइयों, उलझनों, संघर्षों का स्थायी समाधान करना है तो मनुष्य के भीतर भरी हुई दुर्भावनाओं की सडांद को साफ करना पड़ेगा। अन्यथा बाह्य उपचार इसके लिए कुछ विशेष कारगर न होंगे।
अलग−अलग समस्याओं के अलग−अलग उपाय एवं समाधान भी हो सकते हैं, पर वे सब होंगे सामयिक ही, तात्कालिक ही। उनसे स्थायी हल न निकलेगा। रक्त विषैला हो रहा हो तो एक फुँसी को मरहम लगा कर अच्छा भले ही कर लिया जाय पर अन्य नई फुन्सियाँ उठने से रोक सकने में बेचारी मरहम कैसे सफल होगी? रक्त को शुद्ध करने वाले उपचार से ही फुन्सियों की स्थायी चिकित्सा हो सकती है। इसी प्रकार बाह्य जीवन में, व्यापक समाज क्षेत्र में जो अशान्ति दीख पड़ती है, उसका शमन तभी संभव है जब मूल कारणों को, आन्तरिक दुर्भावनाओं को हटाया जाय।
क्षेत्र संकुचित न रखें
अध्यात्म तब तक एकाँगी एवं अपूर्ण है जब तक कि अपने भीतर के सीमित क्षेत्र तक ही अवरुद्ध है। उसका प्रकाश एवं विकास बाहर भी होना चाहिए। पूजा के साथ−साथ हमें बाह्य वातावरण को भी—समाज को भी—अपना ही शरीर, अपना ही परिवार मान कर उसका सुव्यवस्थित निर्माण करने का भी प्रयत्न करना चाहिए। कोई स्त्री स्वयं तो फैशन बनाये बैठी हो पर उसके बाल−बच्चे गंदगी में लिपटे, फूहड़पन के साथ अव्यवस्थित रीति से विचर रहे हों तो वह फैशन बनाये बैठी स्त्री निन्दा ही नहीं उपहास की पात्र भी होगी। उसका फैशन बनाना तभी सार्थक होगा, तभी उसकी सुरुचि को प्रमाणित करेगा जब वह अपने बाल−बच्चों को भी साफ सुथरा बनाये होगी। बच्चों के प्रति उपेक्षा बरतने से तो यही सिद्ध होता है कि उसके स्वभाव में सफाई या सौंदर्य नहीं है केवल अपने शरीर का आडम्बर बनाये बैठी है। यदि उसे वस्तुतः सुरुचि का अभ्यास होता तो जरूर अपने बच्चों को, घर को तथा अन्य वस्तुओं को भी सुसज्जित एवं शोभनीय ढंग से रख रही होती। ठीक यही बात उन लोगों पर भी लागू होती है जो अपने आपको आध्यात्मवादी एवं भजनानन्दी कहते हैं। अग्नि के समान ही अध्यात्म भी एक प्रभावशाली तत्व है, जहाँ अग्नि रहेगी वहाँ गर्मी और रोशनी भी दीख पड़ेगी। जहाँ अध्यात्म रहेगा वहाँ का समीपवर्ती वातावरण भी श्रेष्ठता एवं उत्कृष्टता की विशेषताओं से प्रभावित हो रहा होगा। यदि हम सच्चे अध्यात्मवादी होंगे तो यह हो नहीं सकता कि उस तथ्य से निकटवर्ती वातावरण बिना प्रभावित हुए बना रहे।
सद्गुणों में महानता सन्निहित
जिस विश्व शान्ति का, युग निर्माण का, लक्ष लेकर हम अग्रसर हो रहे हैं वह तभी संभव है जब मनुष्य समाज में आदर्शवाद, कर्तव्यपरायणता, आत्मीयता, उदारता, सेवा भावना जैसे गुणों का विकास हो। श्रेष्ठ गुणों से ही मनुष्य की महानता प्रकाश में आती है। सम्पत्ति, शिक्षा, स्वास्थ्य, सत्ता, संगठन आदि विभूतियाँ कितनी ही बड़ी मात्रा में उपलब्ध हो जाने से मनुष्य श्रेष्ठ नहीं बन सकता और यदि अन्तःकरण दुष्टता से भरा रहा तो इनके द्वारा वह और भी अधिक अनर्थ करेगा। इसलिए विश्व−शान्ति की दृष्टि से श्रेष्ठ सद्गुणों की सम्पदा को ही इस संसार में बढ़ाया जाना आवश्यक है। इसका ही गीताकार ने “दैवी संपदा” के रूप में वर्णन किया है। इस संसार की सबसे बड़ी सम्पत्ति एवं विभूति, दैवी संपदा ही है। इसकी जितनी अभिवृद्धि होगी उतना ही मानव−जीवन में सुख शान्ति का आधार सुदृढ़ होता चला जायेगा।
आत्म−कल्याण का लक्ष निश्चित रूप में तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक बाह्य परिस्थितियाँ अनीति एवं अव्यवस्था से भरी रहेंगी। त्रेता युग में रावण की अनीति ने बेचारे तपस्वियों को तप करना दुर्लभ कर दिया था, उनकी हड्डियों के बड़े−बड़े ढेर भगवान राम ने वनवास के समय जहाँ−तहाँ पड़े देखे तो उनकी आँखें बरसने लगीं और तत्काल उन्होंने उठाकर “निश्चर हीन करो मही” की प्रतिज्ञा कर डाली। इस कार्य को सम्पन्न किये बिना भगवान राम अपना अवतार लक्ष पूरा भी नहीं कर सकते थे। धर्म की स्थापना के साथ−साथ अधर्म का उन्मूलन भी तो अवतार का लक्ष होता है। यदि वे केवल ऋषियों की भक्ति भावना का उपदेश मात्र ही देते रहते और उधर असुर अपने उपद्रव यथावत जारी रखते तो रामचन्द्रजी का उद्देश्य कैसे पूरा होता? बेचारे तपस्वी उसी प्रकार सताये जाते और असुरों द्वारा खाये जाते रहते। बन्धन में बँधे हुए देवता रावण के बन्दीगृह में कराहते रहते। ऐसी दशा में ऋषियों का ज्ञान, ध्यान और देवताओं की पूजा अर्चा से भी कितना प्रयोजन सिद्ध होता? इन तथ्यों को समझते हुए भगवान ने असुरता का उन्मूलन ही अपना लक्ष बनाया था।
एकांगी नहीं परिपूर्ण अध्यात्म
हमें अध्यात्म को एकांगी नहीं, सर्वांगीण एवं परिपूर्ण बनाना होगा। “अखण्ड−ज्योति” परिवार अध्यात्म आदर्शों पर चलने वाले लोगों का समूह है, हम लोग पूजा-उपासना को अपना एक प्रिय एवं आवश्यक कार्यक्रम मानते हैं। सही दिशा में चलने का यह प्राथमिक महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली कदम है। जो उपासना नहीं करता उसका मार्ग अन्धेरे से, कंटकों से भरा हुआ है। जिसका आधार सही है, अवलम्बन सच्चा है वह आज न सही कल, अब न सही फिर गन्तव्य लक्ष तक पहुँचेगा ही। पर यहाँ एक ही बात ध्यान रखने की है कि लक्ष और दिशा सही हो जाने पर भी दोनों पैरों से चलने का प्रबन्ध करना पड़ेगा। लंगड़े व्यक्ति भी लकड़ी की टाँग लगाकर या हाथों का सहारा लेकर घिसटने की व्यवस्था बनाकर आगे बढ़ते हैं। यदि ऐसी कोई सहायक व्यवस्था न बनाई जाय तो केवल एक टाँग से सही रास्ता मिल जाने पर भी उस पर चल सकना और गन्तव्य स्थान तक पहुँच सकना संभव न होगा। अध्यात्म मार्ग में भी दो टाँगों की जरूरत है। एक टाँग है साधना, दूसरी है सेवा। भीतरी, अन्तःकरण की सफाई के साथ−साथ, बाहरी सामाजिक सफाई के लिए भी सक्रिय होना आवश्यक है। इसी प्रयत्नशीलता पर युग निर्माण का आज का सपना कल सार्थक एवं मूर्तिमान होकर सामने प्रस्तुत हो सकता है।
मनुष्य अपनी स्वार्थपरता पर अंकुश लगाना और परमार्थ वृत्ति को बढ़ाना आरम्भ करे तभी यह संभव है कि सभ्य समाज की रचना हो सके। चूँकि विश्व शान्ति का आधार सभ्य समाज की रचना ही है और वह मानसिक स्वच्छता के आधार पर अवलम्बित है इसलिए हमें सभ्य समाज और स्वच्छ मन के अनुकूल परिस्थितियाँ बनाने में जुटना होगा। शारीरिक अस्वस्थता का निवारण−स्वस्थ शरीर का लाभ भी तभी मिलेगा जब मनोभूमि में आत्मसंयम का समुचित स्थान हो। असंयमी लोगों का न शरीर स्वस्थ रहता है और न मन, फिर उन्हीं लोगों का समूह—समाज भी सभ्य कैसे रह सकेगा? इन सब बातों पर विचार करते हुए हमें अपनी आत्मिक प्रगति को सर्वांगपूर्ण बनाने की दृष्टि से भी और विश्वशान्ति की दृष्टि से भी अपने समीपवर्ती समाज की मनोभूमि उत्कृष्ट बनाने का कार्य−क्रम हाथ में लेना होगा। विचारों से ही क्रिया उत्पन्न होती है। अवाँछनीय क्रियाऐं रोकनी हैं तो उनकी जड़ खोदनी होगी। पाप या पुण्य की जड़ मन में रहती है। मन को पवित्र बनाने का धर्म अभियान जब तक संगठित एवं व्यवस्थित रूप में न चलाया जायेगा तब तक अन्य राजनैतिक एवं आर्थिक आधार पर चलने वाले आन्दोलन से कदापि कोई ठोस परिणाम निकल न सकेगा।
तृष्णा और वासनाओं पर नियंत्रण
पारस्परिक सद्भावनाऐं जिस प्रकार बढ़ सकें, व्यक्ति अपनी तृष्णा और वासना पर जिस प्रकार नियंत्रण रख सके, दूसरों की सेवा सहायता करते हुए जिस प्रकार वह सन्तोष लाभ कर सके, उसी आधार को बलवान करने से मनुष्य अधिक सभ्य, अधिक पवित्र, अधिक श्रेष्ठ एवं अधिक महान बन सकेगा। यह श्रेष्ठता ही देवत्व है। मनुष्य असुर भी है और देवता भी। दुर्बुद्धि और दुष्टता को अपनाकर वह असुर बन जाता है, सद्बुद्धि एवं सज्जनता को धारण कर देवता के रूप से परिलक्षित होता है। बढ़ी हुई असुरता के कारण आज चारों ओर अन्धकार एवं विपत्तियों की काली घटाऐं घुमड़ रहीं हैं इनको हटाया जाना तभी सम्भव है तब देवत्व का तूफानी पवन चलने और आध्यात्मिकता का प्रचण्ड सूर्य उदय होने लगे। हमारे सत्प्रयत्नों से यह सर्वथा सम्भव है। मनुष्य की आत्मिक शक्ति की महत्ता अत्यधिक प्रबल है। साधारण लोगों का संघबल असाधारण लगने वाले, आश्चर्यजनक दीखने वाले कठिन कार्यों को पूरा कर दिया करता है, फिर अध्यात्म का आधार लेकर चलने वाले, सदुद्देश्य एवं विश्व शान्ति के लिए आत्म−त्याग करने वाले लोगों का समूह यदि अपनी गहन श्रद्धा का सम्बल पकड़कर अग्रसर होगा तो क्या युग−निर्माण का सपना, सपना ही बना रहेगा, या वह योजना, योजना मात्र ही बनी रहेगी? नहीं ऐसा हो नहीं सकता। युग, अपनी पुकार किन्हीं भी छोटे-बड़े लोगों को निमित्त बनाकर अपने आप पूरा कर लिया करता है। समय की आवश्यकताऐं किसी न किसी माध्यम से पूरी होकर रहती हैं। अशान्ति की विपन्न परिस्थितियों से संत्रस्त मानवता की आज एक ही पुकार है—मानवता का युग आये। यह पुकार अनसुनी नहीं रह सकती और न उपेक्षित। वह सुनी भी जायगी और पूर्ण भी होगी। फिर उस सफलता का श्रेय लाभ करने में हम भी सम्मिलित क्यों न हों? अपनी आध्यात्मिक साधना को अधूरी लंगड़ी एवं एकांगी रखने की अपेक्षा उसे सर्वांगपूर्ण बनाने का प्रयत्न क्यों न करें? युग निर्माण योजना के लिए अग्रसर होना इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिये आवश्यक भी है और अनिवार्य भी।
विश्व में स्थायी शाँति की स्थापना जिन आधारों पर संभव है उनमें आस्तिकता सर्वप्रधान है। ईश्वर के अस्तित्व पर, उनकी सर्व व्यापकता और न्यायशीलता पर विश्वास हुए बिना मनुष्य के लिए यह कठिन है कि वह प्रलोभनों के समय, आपत्तियों के समय भी अपने कर्तव्य धर्म से विचलित न हो। सामाजिक एवं राजकीय प्रतिबन्ध एक सीमा तक जन साधारण को कुमार्गगामी होने से बचा सकते हैं। वे अधिक से अधिक इतना कर सकते हैं कि किसी व्यक्ति के दुष्कर्म कर लेने के पश्चात् उसकी भर्त्सना या दण्ड की व्यवस्था करें। पर यह तो बहुत पीछे की बात हुई। कुकर्म का प्रारम्भ कुविचारों से ही हो जाता है। मन में कुविचार उठते हैं तो मस्तिष्क उसके अनुरूप अनेक योजनायें बनाने लगता है और उन योजनाओं में से छोटे-बड़े रूप में कई फलित भी होती रहती हैं। पकड़ में तो कोई एकाध आती है और पकड़े जाने पर भी दंड का भागीदार कभी−कभी होना पड़ता है अन्यथा लोग अपनी चतुरता और सफाई के बल पर छूट भी जाते हैं।
अशान्ति का एकमात्र कारण
कुकर्मों के कारण ही इस संसार में भारी अशान्ति है। परस्पर जो राग-द्वेष और छीना-झपटी की अनीतिपूर्ण प्रक्रिया आज चल रही है उसी के फलस्वरूप विविध संघर्ष और क्लेश दृष्टिगोचर होते हैं। दैवी विपत्तियाँ भी हमारे पूर्व संचित दुष्कर्मों के फलस्वरूप ही आती हैं। संसार में जितना भी कष्ट है वह किसी न किसी के कुकर्म का फल है। आक्रमणकारी एवं अपहरणकर्ता का कुकर्म उसके लिए तो दुखदायक होता ही है पर पहले दूसरे निर्दोषों को भी अपनी चपेट में ले लेता है। संसार में जितने ही कुकर्म पनपेंगे उतने ही दुख भी बढ़ते रहेंगे। इसलिए यदि हमें शान्ति की स्थापना करनी है तो कुकर्मों को हटाना पड़ेगा। यह कुकर्म कैसे घटें? इस पर विचार करते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि कुविचार ही कुकर्मों के उत्पादक हैं। मस्तिष्क में घूमती रहने वाली अधर्म मूलक विचारधारा ही अवसर पाकर कुकर्म का रूप धारण करती है। पानी ही जमकर बर्फ बनेगा। यदि हवा में पानी का अंश न हो तो बर्फ कैसे गिरेगी? हवा में रहने वाला पानी अदृश्य और गिरने वाली बर्फ दृश्य है, इसी प्रकार कुविचारों को सूक्ष्म अदृश्य एवं कुकर्म को स्थूल दृश्य−पाप कहा जा सकता है। कुकर्मों को मिटाने के लिए कुविचारों पर प्रहार करना आवश्यक है।
अनैतिकता का आकर्षण
कुविचारों में अनैतिक बातों का समावेश रहता है। अनैतिकता में एक आकर्षण है। जुआ, चोरी, लूट, व्यभिचार, बेईमानी आदि का परिणाम पीछे कुछ भी हो तत्काल इनमें बहुत लाभ एवं बहुत आकर्षण दिखाई पड़ता है। इस लोभ एवं आकर्षण को नियंत्रित रखने का एकमात्र उपाय यदि हो सकता है तो वह ईश्वरीय न्याय का भय ही है। पाप को छिपाये रहना और राजदंड से बचे रहना आज की दुनियाँ में कुछ बहुत मुश्किल नहीं है। इसलिए मनुष्य सोचता है कि जब पाप के प्रतिफल से बचा जा सकता है तो फिर उसके लाभ और लोभ को क्यों छोड़ा जाय? आज यही विचारधारा दुष्कर्मों को बढ़ावा दे रही है और इसी कारण हमारे मनों में कुविचारों की घटाऐं स्वच्छन्द होकर विचरण करती रहती हैं।
कुविचारों पर अंकुश रखना किसी आन्तरिक, एवं भावनात्मक आधार पर ही संभव है। ईश्वर की सर्वज्ञता एवं निष्पक्ष न्यायशीलता की बात जब तक मन में न जमेगी तब तक और किसी आधार पर मानसिक दुर्भावनाओं को रोका न जा सकेगा। कर्मफल, स्वर्ग नरक, परलोक, पुनर्जन्म पर जिसका विश्वास है वही कुमार्ग पर पैर बढ़ाते हुए हिचकेगा। जिसका अन्तःकरण कुमार्ग पर चलने से रोकता है केवल वही कुकर्मों से बच सकता है। आन्तरिक अंकुश ही सच्चा अंकुश हो सकता है। सत्कर्म का कोई तात्कालिक प्रत्यक्ष लाभ न मिले, या उस मार्ग में कष्ट उठाना पड़े तो भी आस्तिक विचार का आदमी यह सोचकर सन्तोष कर सकता है कि सर्वज्ञ ईश्वर की न्यायशीलता निश्चित है तो आज न सही कल मेरे सत्कर्म का फल मिलेगा। पर यदि किसी को ईश्वर पर आस्था न हुई, कर्मफल के बारे में संदेह रहा तो फिर सत्कर्म के लिए कष्ट उठाना या त्याग करना निश्चय ही कठिन हो जायेगा।
दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश
सत्कर्म का तुरन्त ही वैसा लाभ नहीं मिलता जैसा कुकर्म का। इसीलिए लोग सन्मार्ग छोड़कर कुमार्ग पर चलने को तत्पर होते हैं। इस कठिनाई के रहते हुए भी कोई व्यक्ति यदि कुकर्मों का लोभ छोड़कर सत्कर्म से होने वाले स्वल्प लाभ पर सन्तोष करता है तो उसे पुण्य परमार्थ का, ईश्वरीय प्रसन्नता का एवं समयानुसार सत्परिणाम प्राप्त होने का विश्वास अवश्य होना चाहिए। इस विश्वास के अभाव में मनुष्य भटक जाता है और बिना पतवार की नाव की तरह उसका मन न सोचने योग्य सोचने में और न करने योग्य करने में अग्रसर हो चलता है। ईश्वरीय विश्वास के अभाव में मन की दुष्प्रवृत्तियों पर अंकुश और किस प्रकार लगाया जाना संभव है इसका और कोई सुनिश्चित विकल्प अभी तक किसी की समझ में नहीं आया है।
पापी के सामाजिक बहिष्कार एवं सार्वजनिक निन्दा की एक प्रथा प्राचीनकाल में सबल थी। उस कारण किसी कदर लोग बुराई से बचे। अब वह बन्धन भी टूट चले। कहीं हैं भी तो वे रोटी बेटी की रूढ़ियों तक सीमित हैं। झूठ बोलने वाले, बेईमानी करने वाले, अनीति बरतने वाले का सामाजिक बहिष्कार होता अब कहीं दीखता नहीं। उलटे ऐसे लोगों से डरकर या लाभ उठाने का अवसर देखकर अनेक लोग उनके समर्थक बन जाते हैं। यही बात राजदण्ड के बारे में है। एक तो कानून ही बहुत थोड़ा−सा दंड देते हैं। दूसरे पुलिस का इतना विस्तार भी नहीं कि छिपकर हुए दुष्कर्मों का भी पता प्राप्त कर सके। फिर दंड दिलाने के लिए जितना सबूत, जितने गवाह चाहिएं वह नहीं जुट पाते तो असंख्य लोग अपराधी होते हुए भी छूट जाते हैं। धन खर्च कर सकने वालों के लिए तो इस प्रकार की छूट और भी सुलभ हो जाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सामाजिक बहिष्कार एवं राजदंड की पद्धतियाँ कुकर्मों को रोकने तक में सफल नहीं हो पा रहीं हैं तो कुविचारों के उठने की गुप्त मनोभूमि की गहराई तक तो उनका प्रवेश हो सकना और भी कठिन है। लोकनिन्दा और राजदण्ड की उपेक्षा का भाव यदि मन में जम जाये तो मनुष्य और भी ढीठ एवं उच्छृंखल हो जाता है। आज ऐसी ही ढीठाई एवं उच्छृंखलता तेजी से बढ़ती चली जा रही।
आदर्शवाद के अनेक प्रयोग
समाजनिष्ठा, देशभक्ति या आदर्शवाद के नाम पर एक और भी प्रयोग इस शताब्दी में ऐसा हो रहा है जिसमें ईश्वर की उपेक्षा करके इन आधारों पर मनुष्य को सदाचारी एवं आत्मसम्मान युक्त बनाने का परीक्षण किया गया है। साम्यवादी विचारधारा इसी की पोषक है। रूस आदि साम्यवादी देशों में इसका प्रयोग पिछले पचास वर्षों से चल रहा है। उस पर सूक्ष्म दृष्टि डालने पर स्पष्ट हो जाता है कि वह प्रयोग एक प्रकार से असफल ही रहा है। भक्ति एवं समाज निष्ठा का भरपूर शिक्षण देने पर भी वहाँ अपराधों की संख्या आस्तिक देशों से भी कहीं अधिक है। इन देशों में जितना उत्पीड़न और रक्तपात जनता की दुष्प्रवृत्तियों को रोकने के लिए किया गया है वह लोमहर्षक है। इतने दमन और नियंत्रण की परिस्थितियों ने आतंक तो पैदा कर दिया है जिसके भय से निर्धारित प्रतिबन्धों के विरुद्ध कोई सिर न उठावे। पर हृदय परिवर्तन नहीं हुआ है। भीतर ही भीतर अनैतिकता की वह आग मौजूद है और समय−समय पर उसकी चिनगारियाँ सामने आती रहती हैं। रूस के शीर्षस्थ नेताओं को आये दिन देशद्रोही ठहराकर मौत के घाट उतारा जाता रहता है। एक दिन के देशभक्त दूसरे ही दिन देशद्रोही घोषित कर दिये जाते हैं। इस प्रक्रिया के शिकार जितने बहुसंख्यक शीर्षस्थ नेता रूस में हुए हैं उसे देखते हुए सोचना पड़ता है कि जब इन ऊँचे कहे जाने वाले लोगों का यह हाल है तो साधारण या निम्न वर्ग का क्या हाल होगा? जर्मनी, इटली, स्पेन आदि देशों में अधिनायकवाद का भी परीक्षण करके देख लिया है। बुरे कहे जाने वाले लोगों को दमन के बल पर कुचल डालने से लोग अच्छे रास्ते पर चलेंगे इसका भयानक परीक्षण हुआ है पर जनता कितनी सुधरी यह तो पीछे खोजा जायेगा, पहले यही देख लिया जाय कि इस विचारधारा के शीर्षस्थ लोग ही परस्पर कितने विश्वासघाती और निष्ठुर सिद्ध हुए और इन सत्ताधारियों ने आपस में ही एक दूसरे से कितनी प्रतिद्वंद्विता, ईर्ष्या, विश्वासघात एवं निष्ठुरता की नीति बरती। शीर्षस्थ स्तर पर जो परीक्षण असफल रहा है वह सामान्य स्तर की जनता में सफल होगा ऐसी आशा करना दुराशा मात्र ही कहा जायेगा।
दंड नीति की असफलता
सामूहिक भर्त्सना, राजदंड और समाजनिष्ठा यह तीनों ही बातें अच्छी हैं और इन तीनों की उपयोगिता भी है पर मनुष्य के आन्तरिक स्तर को सद्विचारों में ओतप्रोत रखने एवं सत्कर्मों के लिए कुछ भी कष्ट उठाने की सुदृढ़ प्रेरणा इनमें नहीं है। वह तो ईश्वर निष्ठा में ही है। उपरोक्त तीन दृष्टिकोण उपयोगिता, अनुपयोगिता की कसौटी पर नैतिक मूल्यों को बदल लेते हैं इसलिए मनुष्य सोचता है कि सदाचार तो एक साधारण सा नीति−नियम मात्र है, उसे आवश्यकतानुसार तोड़ा भी जा सकता है। माँसाहार को ही लीजिए—भौतिक दृष्टि रखने वाले लोग आर्थिक या अन्य उपयोगिताओं के कारण उसे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं, और निरपराध प्राणी को मर्मान्तक कष्ट देकर उसका प्राणघात करने में कुछ संकोच नहीं करते। जब एक अवसर पर यह मान लिया गया कि अपने लाभ के लिए दूसरे का प्राणघात करने में कुछ हर्ज नहीं तो यह नीति दूसरे अवसर पर मनुष्यों के प्रति भी व्यवहार में लाई जा सकती है। प्रश्न हत्या में पाप होने का न रहा, उपयोगिता की न्यूनाधिकता का रह गया, जिसे भिन्न−भिन्न व्यक्ति अपनी कसौटी पर अलग−अलग ढंग से भी कस सकते हैं और कोई अतिवादी चिड़ियों का शिकार खेलने की तरह मनुष्यों का भी शिकार खेलकर अपना मनोरंजन कर सकता है। कानपुर में एक कनपटी मार बाबा लोहे की कील से सड़क पर सोते हुए कितने ही निरीह मजदूरों को मौत के घाट उतार कर अपना मनोरंजन कर भी चुका है। यह उपयोगितावाद की विचारधारा मनुष्य को अवसरवादी ही बना सकती है, आदर्शवादी नहीं। और जब तक आदर्शवाद में सुदृढ़ निष्ठा न होगी तब तक मनुष्य अपने लाभ और लोभ को त्यागकर देर तक परमार्थवादी न बना रह सकेगा। स्वार्थ और परमार्थ के संघर्ष में ऐसे लोग देर तक पुण्य−पथ पर सुदृढ़ नहीं रह सकते।
एकमात्र उपाय यही है
इन सब बातों पर विचार करते हुए ईश्वर विश्वास ही एकमात्र वह उपाय रह जाता है जो सत्प्रवृत्तियों को किसी नीति के रूप में नहीं, वरन् मानव जीवन की मूल−भूत आधार शिला मानकर हृदयंगम करने के लिए प्रेरणा दे सकता है। धर्म और कर्तव्य पालन आस्तिकता की दो भुजाऐं हैं। सच्चे ईश्वर−विश्वासी के लिए यह आवश्यक है कि वह अपनी धर्मशीलता और कर्तव्य परायणता के आधार पर परमात्मा को प्रसन्न करे। सब प्राणियों में परमात्मा की ज्योति देखे और सब के साथ शिष्टता, सज्जनता एवं सहृदयता का व्यवहार करे। पाप का दंड मिलने और पुण्य का पुरस्कार प्राप्त होने की मान्यता उसके धैर्य को कायम रख सकती है। इस उलटी दुनियाँ में सन्मार्ग पर चलते हुए कुछ कष्ट भी उठाना पड़े तो परलोक या अगले जन्म में न्याय मिल जाने की आशा भी उसे कठिन अवसरों पर विचलित होने से रोके रह सकती है।
आस्तिकता के सत्परिणाम
आस्तिकता के, आध्यात्मिक लाभ असंख्य हैं। स्वर्ग और मुक्ति का प्राप्त होना, भव बन्धनों से छूटना, जीवन मुक्ति का आनंद लेना, ऋद्धि−सिद्धियों की उपलब्धि, ईश्वर की कृपा से कष्टों से छुटकारा, आत्मबल की वृद्धि आदि अगणित लाभ आस्तिकता एवं उपासना से संबंधित हैं। पर सामाजिक एवं लौकिक दृष्टि से आस्तिकता का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह मनुष्य को कुकर्म करने से ही नहीं, कुविचार से भी दूर रहने की प्रेरणा देती है। आत्म नियंत्रण का यही उपाय ऐसा है जो हमारे नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा को जन−मानस में गहराई तक जमाये रह सकता है। अपने सुधार और दूसरों के साथ सद्व्यवहार की जिस प्रक्रिया के ऊपर विश्व शान्ति की संभावना निर्भर है उसके लिए आस्तिकता ही एक प्रेरक शक्ति का केन्द्र बन सकती है। जीव लघु से महान बने, अणु से विभु के रूप में विकसित हो, आत्मा को परमात्मा के रूप में परिणत करे यह आकाँक्षा आस्तिकता के आधार पर ही तो जागृत होगी और इस आकाँक्षा की पूर्ति के लिए उसे धर्मनिष्ठा, आत्मसंयम, परोपकार एवं सदाचार का अनिवार्यतः अवलम्बन करना पड़ेगा। यही वह मार्ग हो सकता है जो हमारी वैयक्तिक एवं सामाजिक दुरवस्था का समाधान करके वह परिस्थिति उत्पन्न करे जिसमें सब लोग सुखपूर्वक रह सकें और विश्वव्यापी शान्ति का सुखद आनंद अनुभव कर सकें।
आस्तिकता की मान्यताओं को सुस्थिर रखने के लिए उपासना की अनिवार्यतः आवश्यकता है। स्थूल वस्तुऐं हर समय आँखों के आगे उपस्थित रहती हैं और उनका अनुभव इन्द्रियों से बार−बार होता रहता है। पर जो सूक्ष्म है, अदृश्य है उसका यदि विशेष रूप से स्मरण चिन्तन न किया जाय तो उसका विस्मरण हो जाना स्वाभाविक ही है। उपयोग में आने वाली सामान्य वस्तुऐं भी यदि बहुत दिन तक व्यवहार में नहीं आती तो हम उन्हें भूल जाते हैं। मनुष्य का स्वभाव ही कुछ भुलक्कड़ ढंग का है यदि ऐसा न होता तो उसके मस्तिष्क में पुरानी स्मृतियाँ इतनी अधिक भरी रहतीं कि नई बातों को सुनने−समझने का स्थान ही न बचता। यह भुलक्कड़पन उन बातों पर तो बहुत ही अधिक प्रभाव डालता है जो सामने नहीं है, दीखती नहीं तथा इन्द्रियों द्वारा अनुभव में नहीं आती।
ईश्वर की अदृश्य सत्ता
ईश्वर भी ऐसी ही एक अदृश्य सत्ता है जो न तो इन्द्रियों से अनुभव में आती है और न आँखों से दीखती है। ऐसी दशा में आमतौर से लोग उसे भूले रहते हैं। किन्तु वह मान्यता एवं धुंधली−सी छाया मात्र बनकर मस्तिष्क के किसी कोने में पड़ी रहती है। इतने मात्र से आस्तिकता का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। कुविचारों को रोकने और कुकर्मों पर अंकुश रखने के लिए ईश्वर की एक स्पष्ट स्मृति हमारे हृदय पटल पर अंकित रहनी चाहिए और उसका वैसा ही स्मरण रहना चाहिए जैसा हमें अपने घर में रहने वाले निकटस्थ कुटुम्बी परिजनों का रहता है। इसके बिना ईश्वर का भय एवं प्रकाश हमारे अन्तःकरण में स्थिर न रह सकेगा।
हमारे स्वर्गीय परिजन, जो कभी हमें अत्यन्त प्रिय थे जब आँखों के आगे न हों तो उनकी याद कभी−कभी ही भूले भटके आती है। उनकी कुछ सेवा करने का विचार भी शायद ही कभी वार्षिक श्राद्ध आदि के समय आता हो, यदि आया भी तो लकीर पीटने के रूप में छोटी−सी चिन्ह पूजा कर दी जाती है। किन्तु जब वे स्वर्गीय परिजन जीवित थे, घर में रहते थे तब उनका स्मरण तो सदा रहता ही था, उनकी इच्छाओं को समझने और उनकी पूर्ति करने के लिए भी शक्ति भर प्रयत्न किया जाता था। पर अब वह बात नहीं रही। कारण कि वह स्मृति क्षेत्र से, दैनिक सम्पर्क से दूर चले गये, ऐसी दशा में उन्हें भूल जाना हमारे लिए सर्वथा स्वाभाविक है। कदाचित कोई दैवी चमत्कार ऐसा हो कि वे मृत व्यक्ति पुनः जीवित हो आवें और भूत, प्रेत के रूप में घर में रहने लगें तो हमारा अपना रवैया पुनःवैसा ही वरन् उससे भी कहीं अच्छा हो जावेगा और उनकी सेवा सुश्रूषा पूर्ण तत्परता के साथ करने लगेंगे। मनुष्य की स्मृति कुछ ऐसी ही दुर्बल है कि जो वस्तु सामने रहेगी उसे ही वह याद रख सकेगा।
भगवान का सान्निध्य
आस्तिकता का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है जब ईश्वर को हम अपने सहचर के रूप में अनुभव करें। कुविचार का अवसर आते ही, कुकर्म की इच्छा जगते ही भगवान हमारे आगे एक धर्मोपदेशक के रूप में, न्यायाधीश के रूप में, पुलिस अधिकारी के रूप में उपस्थित हो सके तो ही यह संभव है कि कुमार्ग पर बढ़ते हुए कदम रुक सकें। सन्मार्ग पर चलने की जब आकाँक्षा उठे, और सामने प्रस्तुत कठिनाइयों के कारण मन आगे बढ़ने से हिचकिचावे तब भगवान का स्वरूप उत्साह बढ़ाने वाले, प्रेरणा देने वाले एवं समर्थन करने वाले के रूप में सामने आना चाहिए। हिम्मत बढ़ाने वाला कोई उत्साही व्यक्ति साथ हो तो मनुष्य बहुत कुछ कर गुजरता है, यदि सन्मार्ग के पथ पर प्रस्तुत कठिनाइयों को कुचलते हुए आगे बढ़ जाने का प्रोत्साहन भगवान की ओर से प्राप्त होवे तो मनुष्य क्या नहीं कर सकता?
परमात्मा का मूर्तिमान रूप हमारी आँखों के आगे विचरता रहे, वह अदृश्य सत्ता सामने साकार रूप में प्रस्तुत—परिलक्षित—दीखे, तभी यह संभव है कि अधर्म को परित्याग कर धर्म को दृढ़तापूर्वक पकड़े रहने के लिए हमारी मनोभूमि खरी उतरे। अदृश्य परमात्मा को दृश्य रूप में, साथी और सहचर के रूप में अनुभव करते रहने का महान कार्य ‘उपासना’ द्वारा ही पूरा हो सकता है। जप, ध्यान, पूजन, अर्चन आदि के विधान इसीलिए बनाये गये हैं कि उस आधार पर बार−बार मनुष्य परमात्मा का मनोयोग पूर्वक स्मरण करे और उस स्मृति के आधार पर प्रभु को अपने निकटवर्ती संबंधी, कुटुँबी, साथी एवं सहचर के रूप में उपस्थित रहता हुआ सदा अनुभव करता रहे। पूजा से इसी मनोवैज्ञानिक आवश्यकता की पूर्ति हो सकती है। बार−बार स्मरण करने से दो बिछुड़े हुए विरहीजन अपने प्रिय को और भी अधिक निकट हृदय में बसा हुआ अनुभव कर सकते हैं तो क्या परमात्मा को इस प्रकार स्मरण करके निकटवर्ती के रूप में अनुभव नहीं किया जा सकता? यदि हम अपने प्रियतम को निरन्तर साथ रहते अनुभव कर सकें तो पापों से बचे रहना और पुण्य प्रयत्नों में संलग्न रहना तो सहज ही हो जायेगा साथ ही हम निर्भय, निश्चिन्त, आशावादी और उत्साही भी रहेंगे। जिसके साथ परमात्मा जैसी शक्ति है वह किसी से क्यों डरेगा? चिन्ता, भय, शोक, निराशा का उसके लिए क्या कारण शेष रह जायेगा? उसे अपना भविष्य उज्ज्वल और भाग्य प्रकाशपूर्ण क्यों दिखाई न देगा? ऐसा व्यक्ति बुरी परिस्थितियों को क्षणिक एवं अपने सुधार के लिए लगी हुई एक हलकी चपत मानकर सदा प्रफुल्लित, संतुष्ट और आनन्दित ही रह सकता है। जब परमात्मा सत्य है, शिव है, सुन्दर है तो उसके उपासक का स्वरूप भी वैसा ही क्यों न होगा?
सत्प्रवृत्तियों का केन्द्र
परमात्मा समस्त सत्प्रवृत्तियों एवं अनन्त शक्तियों का केन्द्र है। जीव अन्त में विभु बनना चाहता है तो उसे अपने सामने एक आदर्श उपस्थित रखना होगा। बड़ी−बड़ी इमारतें बनाने वाले इंजीनियर पहले उसका नक्शा या ‘मॉडल’ बनाते हैं और उसी के आधार पर अपना निर्माण कार्य प्रारम्भ करते हैं। हम अग्रगामी होना चाहते हैं, आत्मा को परमात्मा रूप में, मानव को महामानव के, विश्व मानव के रूप में परिणत करना चाहते हैं तो आवश्यक है कि उसके लिए कोई नक्शा या ‘मॉडल’ सामने हो। सात्विक आनन्द स्वरूप परमात्मा ऐसा ही आधार है जिसको निहारते हुए हम अपनी प्रगति का कार्यक्रम तैयार कर सकते हैं। कहते हैं कि भृंग नामक मक्खी झींगुर को पकड़ कर अपने घर ले जाती है, झींगुर उसकी गुँजार सुनता और रूप देखता रहता है, फलस्वरूप धीरे−धीरे वह उस तन्मयता के आधार पर अपना झींगुर स्वरूप बदल कर भृंग के रूप में कायाकल्प कर लेता है। पुरानी धर्म पुस्तकों में ‘कीट भृंग’ का यह दृष्टान्त जगह−जगह मिलता है। बात कहाँ तक सच है, यह खोज का विषय है पर आत्मा के सम्बन्ध में यह सर्वथा सत्य है। वह परमात्मा का सच्चे मन से जितना−जितना चिन्तन करता है उसी अनुपात से परमात्मा रूप में बदलता जाता है। साधारण आत्माओं से महात्मा बनते कितनों को ही देखा गया है। जीवन का लक्ष आत्मोत्कर्ष है उसकी पूर्ति में परमात्मा का स्मरण चिन्तन एवं भजन पूजन की प्रक्रिया का अपनाया जाना आवश्यक है।
भक्ति −भावना का विस्तार
ईश्वर और जीव की निकटता, एक का दूसरे के रूप में परिणत होना मानसिक तत्व के आधार पर संभव हो सकता है उसका नाम है प्रेम या भक्ति । मनुष्य और मनुष्य के हृदय भी इसी गोंद के आधार पर चिपकते और घनिष्ठ होते हैं। परमात्मा और आत्मा की एकता भी इसी तथ्य पर निर्भर है। भौतिक पदार्थ नाशवान हैं, वे क्षण−क्षण में बनते-बिगड़ते रहते हैं। जीवों का भी यही हाल है वे भी अपनी रुचि और परिस्थिति के अनुसार आँखें बदलते रहते हैं। इसलिए उनसे सच्चा और चिरस्थायी प्रेम निभ नहीं सकता। सामने वाले की स्थिति का प्रभाव अपने ऊपर पड़ता ही है इसलिए प्रेम की साधना करने वाले को ऐसा आधार ढूँढ़ना पड़ता है जो अपरिवर्तनशील एवं उच्च संभावनाओं से ओत−प्रोत हो। इस विश्व में परमात्मा ही एकमात्र ऐसी वस्तु है जो मानव जीवन की सर्वश्रेष्ठ रसानुभूति प्रेम भावना की अभिवृद्धि में सहायक हो सकती है। भक्ति भावना अपने आप में एक विभूति है और जिसे इसका एक कण भी प्राप्त हो गया वह धन्य हो जाता है। इस भक्ति साधना का अभ्यास भी उपासना की पूजा अर्चा द्वारा ही संभव है।
आस्तिकता के अगणित लाभों का उठाया जाना तभी हो सकता है जब उपासना को दैनिक जीवन में नियमित एवं निश्चित रूप से निरन्तर करते रहा जाय। केवल ईश्वर है इतना मान लेने मात्र से उस मान्यता के द्वारा कुछ महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिए हममें से हर एक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि दैनिक जीवन में उपासना के लिए कोई निश्चित समय एवं निर्धारित विधान अवश्य रहे।
गायत्री की सर्वोपरि साधना
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि हिन्दू धर्म में प्रचलित सभी उपासनाओं में गायत्री का स्थान सर्वोपरि है। अनादि एवं सनातन साधना वही है। अवतारों ऋषियों, महापुरुषों एवं सर्व-साधारण ने इसे युग−युगों से अपनाये रखा है। पिछले अन्धकार युग में जब अनेक मत मतान्तर और देवी देवता उपज पड़े तो उपासना विधानों का बहुसंख्यक हो जाना भी स्वाभाविक ही था। आज विविध-विधि उपासनाऐं हिन्दू धर्म में प्रचलित हैं। वे चलती रहें तो भी कुछ हानि नहीं, पर गायत्री उपासना को भावात्मक एकता एवं प्राचीनतम साधन परम्परा को सजीव रखने के लिए प्रथम स्थान देना होगा। जो लोग कोई और उपासना करते हैं किसी और मन्त्र या देवी देवता को मानते हैं उन्हें भी उचित है कि उस उपासना में कम से कम 108 गायत्री मन्त्रों का जप सम्मिलित कर लें। इसमें पाँच छह मिनट ही तो लगती हैं।
जो लोग उपासना बिलकुल भी नहीं करते उन्हें 108 मन्त्र गायत्री जप करने में 5−6 मिनट का समय लगाना तो आरंभ कर ही देना चाहिए। जिन्हें स्नान या समय सम्बन्धी असुविधा है वे बिना स्नान के भी गायत्री मन्त्र−लेखन या मौन मानसिक जप कर सकते हैं। प्रातः सोकर उठते समय और रात को सोने के समय पाँच−पाँच मिनट का समय लगा सकने में तो किसी को भी कुछ कठिनाई न होनी चाहिए। जो व्यक्ति सम्प्रदाय−भेद के कारण—जैसे जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि—गायत्री का जप न करे सकें वे अपने साम्प्रदायिक मन्त्र का इसी भाँति नियमित रूप से जप करते हुए सुफल प्राप्त कर सकते हैं।
उपासना का दैनिक जीवन में स्थान
गायत्री उपासना के लाभ असामान्य हैं। इस महाशक्ति की विधिवत् आराधना करके मनुष्य अपने आत्मबल को आशातीत स्थिति तक ऊँचा उठा सकता है और उससे उपलब्ध हो सकने वाले भौतिक एवं आत्मिक, लौकिक एवं पारलौकिक लाभों से लाभान्वित हो सकता है। विभिन्न प्रकार की साँसारिक कठिनाइयों के समाधान एवं श्री समृद्धि और सफलता के लिए गायत्री का उपयोग किया जाता है वह विशेष विधान गायत्री ग्रन्थों में अलग से हम लिख चुके हैं। विशेष प्रयोजनों के लिए उन्हीं से मार्गदर्शन लेना पड़ेगा। पर युग निर्माण की दृष्टि से जन साधारण में आस्तिकता का प्रसार करना अनिवार्य है और इसके लिए गायत्री को ही प्रधानता मिलनी चाहिए।
आस्तिकता मनुष्य को सच्चा मनुष्य बनाये रखने के लिए एक सुदृढ़ अवलम्बन है। यह आस्तिकता उपासना के बलबूते पर ही मूर्तिमान बनती है। इसलिये हमें उपासना पर पूरा जोर देना चाहिये। हम स्वयं यदि अभी तक उपासना नहीं करते तो आज से ही उसका शुभारम्भ किसी न किसी रूप में आरम्भ कर देना चाहिये। यह अपने तक की सीमित न रहे वरन् अपने स्वजन संबंधियों में भी इसका प्रसार होना चाहिये। हमको प्रयत्न करना चाहिये कि हमारा प्रभाव क्षेत्र जहाँ तक है वहाँ तक गायत्री उपासना को दैनिक जीवन में कोई न कोई स्थान, कोई न कोई समय अवश्य मिले। युग निर्माण की यही प्रधान एवं प्रमुख प्रक्रिया रह सकती है। हमारा भविष्य आस्तिकता एवं उपासना का आश्रय लिये बिना उज्ज्वल नहीं हो सकता।
पुराणों में देवासुर संग्राम का वर्णन पग−पग पर किया गया है। प्रत्येक पुराण में किसी न किसी बहाने किन्हीं देवताओं और किन्हीं असुरों की लड़ाई के प्रसंग बार−बार वर्णन किये गये हैं। सच तो यह है कि यह देवासुर संग्राम अनादि काल से चल रहा है और अनन्त तक चलता रहेगा। गीता में जिस धर्म क्षेत्र कुरुक्षेत्र का वर्णन है और जिस महाभारत में धर्म और अधर्म का पक्ष प्रतिपादन करने वाली कौरव-पाण्डव सेनाओं का वर्णन हुआ है वह भी केवल उस शास्त्र युद्ध तक सीमित नहीं है वरन् हमारे अन्तः करण में निरन्तर होते रहने वाले देवासुर संग्राम का ही चित्रण है। रीछ, वानर की राम सेना और रावण, कुम्भकरण, मेघनाद जैसे समर्थ योद्धाओं का युद्ध भी एक प्रकार की हमारी भीतरी स्थिति का ही बाह्य चित्रण है। अध्यात्म रामायण में इसका निरूपण अधिक स्पष्ट रूप से हुआ है। प्रत्येक अवतार पाप को नाश करने और पुण्य की स्थापना के लिए—देवताओं की रक्षा और असुरों के संहार के लिए अवतरित होता है। ऐसा अवतार समय−समय पर हममें से अनेकों के अन्तःकरण में अवतरित होते हुए देखा भी जाता है।
पाप पुण्य के प्रबल संस्कार
मनुष्य के भीतर पाप और पुण्य के दोनों प्रकार के प्रबल संस्कार मौजूद हैं। दोनों की शक्ति प्रचंड है दोनों ही उद्भट योद्धाओं के समान हैं। दोनों एक−दूसरे से प्रतिकूल प्रकृति के होने से परस्पर लड़ते भी रहते हैं और एक−दूसरे को परास्त करने का प्रयत्न भी करते हैं। यही देवासुर संग्राम है। हर मनुष्य के भीतर पाप और पतन की असुरता के कुसंस्कार पर्याप्त मात्रा में पाये जाते हैं। चौरासी लाख निम्न योनियों में लाखों वर्षों तक भ्रमण करने की अवधि में इसने इन्हें जमा किया होता है। पाशविक वृत्तियाँ उन पतित योनियों में उपयुक्त भले ही कहीं जायँ पर मनुष्य के महान गौरव को देखते हुए वे हेय एवं त्याज्य ही होती हैं। सुरदुर्लभ मानव जाति शरीर में देवत्व की छाया रहती है क्योंकि यह योनि ईश्वर के सबसे निकट है। इस शरीर में आये हुए जीव के लिए ईश्वर तक पहुँचने में छोटी छलाँग लगानी मात्र शेष रह जाती है। इसलिए उसका महत्व एवं उत्तरदायित्व भी अधिक है। देवत्व मनुष्य को अपनी तरह ऊँचा उठाने के लिए खींचता है और असुरता की पाशविक वृत्तियाँ अपनी ओर आकृष्ट किये रहना चाहती हैं। इसी खींचतान में हवा के सहारे उड़ने वाले तिनकों की तरह आमतौर से मनुष्य कभी इधर कभी उधर उड़ते रहते हैं। कोई व्यक्ति एक समय बुरे काम करता है तो दूसरे समय में अच्छे काम करता हुआ दिखाई देता है और कोई इसके प्रतिकूल अच्छे कामों को छोड़कर बुराई में धँसते देखा जाता है। ऐसे उदाहरणों में मनुष्य की मानसिक दुर्बलता और शुभ−अशुभ प्रवृत्तियों की प्रबलता का प्रमाण उपलब्ध होता है।
शुभ और अशुभ प्रवृत्तियाँ
अन्तःकरण में रहने वाली शुभ और अशुभ प्रवृत्तियों में से जिसे भी अपने अनुकूल वातावरण मिल जाता है वही पनपने और बढ़ने लगती हैं। जिसे पोषण नहीं मिलता वह सूख जाती है। जो व्यक्ति आज बहुत बुरा दीखता है वह उत्तम परिस्थितियाँ एवं विचारधारा के सान्निध्य में आने से कल बहुत ही उत्तम प्रकृति का बन सकता है और जिसे आज अच्छा समझा जाता है वही कल बुरे वातावरण में फँसकर बुरा बन सकता है। इसलिए विचारक सदा से यह कहते आये हैं कि इस संसार में बुरा कोई मनुष्य नहीं केवल परिस्थितियाँ और भावनाऐं ही बुरी हैं, जिन्हें बदला जा सकता है। लोहे या पत्थर की तरह नहीं मनुष्य का अन्तःकरण गीली मिट्टी और मोम की तरह है जिसे पिघलाया जा सकता है, बदला जा सकता है।
अध्यात्म विद्या का उद्देश्य मानव प्राणी की अन्तःचेतना को पिघलाकर श्रेष्ठता एवं उत्कृष्टता के ढाँचे में ढालना है। माना कि पाशविक वृत्तियाँ प्रबल हैं, उनमें आकर्षण और प्रलोभन बहुत है जिससे दुर्बल प्रकृति का जीव अनायास ही उनकी ओर खिंच जाता है पर उसका अर्थ यह नहीं कि सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाया या परिपुष्ट नहीं किया जा सकता। कार्य थोड़ा कठिन अवश्य है पर असंभव किसी भी प्रकार नहीं है। पानी को फैला देने से वह निचाई की ओर आसानी से बहने लगेगा पर यदि उसे ऊँचा उठाना हो तो अनेक उपकरण इकट्ठे करके और बल प्रयोग करने से ही वह ऊपर चढ़ेगा। इसी प्रकार मनोवृत्तियों के निम्नगामी प्रवाह को ऊर्ध्वगामी बनाने में श्रम तो पड़ता है और समय भी लगता है। अध्यात्म विद्या में श्रम और समय लगना इस प्रकार स्वाभाविक ही है। पानी ऊपर खींचना हो तो साधन और शक्ति के अनुरूप मात्रा में ही चढ़ेगा पर गिराने और नीचे बहाने में न समय की आवश्यकता है न शक्ति की, चाहे जितनी मात्रा में उसे क्षण भर में नीचे गिराया जा सकता है। पर ऊँचा उठाने की प्रक्रिया इस प्रकार नहीं हो सकती। इसलिए अध्यात्म का मार्ग श्रमसाध्य, समस्यासाध्य और क्रमिक सफलताओं के साथ पूरा हो सकने वाला माना जाता है।
जीतता देवत्व ही है
देवासुर संग्राम में आमतौर से असुर पहली बाजी जीतते हैं पर देवता जब अपनी बेखबरी और लापरवाही छोड़कर कटिबद्ध होते हैं तो अन्तिम विजय उन्हीं की होती है। पुराणों में वर्णित देवासुर संग्राम की किसी भी कथा को लें, एक ही कथानक मिलेगा—असुर बहुत ही प्रबल हैं वे मरते दम तक दुस्साहसपूर्ण युद्ध करते हैं पर चूँकि उनकी सत्ता मूलतः पाप और अज्ञान पर खड़ी होती है इसलिए वह दुर्बलता ही उन्हें ले बैठती है और देवपक्ष का जैसे ही सुव्यवस्थित आक्रमण शुरू होता है वैसे ही असुर लड़खड़ा जाते हैं। देवताओं में लापरवाही की, विसंगठित रहने की जो कमी है वही उन्हें असुरों से हराती रहती है जब वे अपनी इस भूल को समझ जाते हैं और छोड़ देने को तत्पर होते हैं तो उनकी विजय निश्चित हो जाती है।
ऋषि मुनियों को तभी तक लंका के निश्चर मारते खाते रहे जब तक कि वे अलग−अलग अपनी−अपनी कुटियों में जप−तप करते रहे, पर जब संगठित प्रतिरोध का अभियान आरंभ हुआ तो रीछ, बन्दरों की सेना ने लंका को तहस−नहस कर दिया। देवताओं को शुँभ−निशुँभ असुरों की सेना से परास्त होते देखकर ब्रह्माजी ने उनके शरीरों से थोड़ी−थोड़ी शक्ति निकाल कर उस संघ शक्ति से ‘दुर्गा’ नामक एक स्वतंत्र शक्ति की रचना कर दी और उस दुर्गा ने देखते−देखते उन भयंकर असुरों को मार गिराया। इसी प्रकार का एक प्रयोग त्रेता में भी हुआ था। रावण के नाश का कोई उपाय न देखकर ऋषियों ने अपना−अपना रक्त एक घड़े में इकट्ठा किया और उसे जमीन में गाड़ दिया। वही रक्त कालान्तर में सीताजी के रूप में प्रकट हुआ। राजा जनक का हल जोतते समय उसी घड़े के टूटने से प्रकट हुई जो बालिका प्राप्त हुई वह सीता ही आगे चलकर रावण का वंश नष्ट करने का कारण बनी।
उद्बोधन का अभाव
देवत्व हर व्यक्ति के अन्तःकरण में पर्याप्त मात्रा में मौजूद है पर वह प्रसुप्त और बिखरा पड़ा रहता है, उसे अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं होता। लंका लाँघने से पहले हनुमान को अपने ऊपर विश्वास नहीं हो रहा था तब जामवन्त ने प्रोत्साहन देकर उन्हें छलाँग लगाने के लिए उकसाया और वे समुद्र लाँघने में पूर्णतया सफल रहे। अर्जुन भी दोनों सेनाओं के बीच खड़ा हुआ काँप रहा था, धनुष उसके हाथों से छूट रहा था और कुछ सूझ न पड़ता था। कृष्ण ने उसे आवश्यक ज्ञान और प्रोत्साहन दिया तो पार्थ की भुजाऐं फड़कने लगीं। गाण्डीव उठाकर उसने ऐसा घनघोर युद्ध किया कि कौरवों की समुद्र सी उमड़ती सेना अस्त−व्यस्त हो गई। अहंकारी असुर उच्छृंखलता में अभ्यस्त होने के कारण पहली बाजी जीतते हैं और प्रतीत होता है कि इनको हराना कठिन है पर यह निश्चित है कि पाप अत्यन्त दुर्बल होता है। घास के ढेर की तरह वह कितना ही बड़ा क्यों न हो व्यवस्थित रूप से लगाई हुई एक ही छोटी चिनगारी उसे नष्ट कर देने के लिए पर्याप्त होती है। देवत्व के पीछे सत्य है, धर्म है, स्थायित्व है, इसलिए इनके पास स्वल्प साधन होते हुए भी अन्त में जीत उन्हीं की निश्चित रहती है। असफलता तो उन्हें तभी तक मिलती है जब तक वे असंगठित और अव्यवस्थित रहते हैं। यह दो दुर्गुण ही उन्हें संकटों में फँसाते हैं। भूल और बुराई का दंड तो सभी को भोगना पड़ता है। देवता भी उससे कैसे बच सकते हैं? लापरवाही, आलस, प्रमाद, ढील−ढाल और उपेक्षा जहाँ कहीं होगी वहाँ देर−सवेर में विपत्ति अवश्य आवेगी। देवता हो या मनुष्य कोई भी यह भूल करेगा तो दंड पावेगा। इसी प्रकार विसंगठन, फूट, पृथकता एवं स्वार्थपरता का भाव भी मानव जाति के लिए एक अभिशाप है। संघ शक्ति का अवलम्बन किये बिना मनुष्य अपनी आत्म−रक्षा तक कर सकने में समर्थ नहीं हो सकता।
व्यक्तिगत क्षेत्र हो चाहे सामाजिक क्षेत्र, दोनों में यह एक ही सिद्धान्त काम करता है। यदि हमारी पाशविक वृत्तियाँ प्रबल हो रही होंगी और देवत्व बिखरा प्रसुप्त स्थिति में पड़ा होगा तो फिर असुर बुद्धि और असुर प्रवृत्ति ही बलवती रहने से जीवन निम्न कोटि का, पतन और पाप से भरा हुआ दिखाई पड़ेगा। इसके विपरीत यदि देवत्व सजग, संघबद्ध और सक्रिय रह रहा होगा तो असुरता परास्त हुए बिना न रहेगी। मनुष्य के शरीर में न कुछ अच्छाई है न बुराई। उसकी भीतरी स्थिति ही बाह्य जीवन में फूटती रहती है। इस आन्तरिक स्तर को सुधारने और सँभालने का कार्य जिस प्रक्रिया द्वारा होना सम्भव है उसे ही ‘अध्यात्म’ नाम से पुकारा जाता है।
‘असतो मा सद्गमय’
अध्यात्म का उद्देश्य मनुष्य को पाप और कुविचारों की असुरता से छुड़ाकर सत्य और धर्म की सुख−शान्तिमयी गोदी में पहुँचा देने का है। यह सोचना गलती है कि धर्म को अपनाने से मनुष्य घाटे में रहेंगे। जिस धर्म को अपनाने से मनुष्य घाटे में रहें वह सच्चा धर्म नहीं हो सकता। आज कल धर्म के नाम पर जो अस्वाभाविक आडम्बर पुज रहा है उसके बारे में यह सोचना तो ठीक है पर असली धर्म तो पारलौकिक और इहलौकिक दोनों ही सुखों का साधन जुटाता है। प्राचीनकाल में जब घर−घर धर्म की प्रतिष्ठा रहती थी तो भारत में घर−घर धन, वैभव, बल, पुरुषार्थ, विद्या, बुद्धि, स्नेह, सौजन्य, उल्लास का वातावरण बिखरा पड़ा होता था। आज जब कि अधर्ममूलक विचारधारा और कार्यप्रणाली को अपना लिया है घर−घर नरक दृश्य दीख पड़ते हैं। अभाव, दरिद्र, रोग−शोक, क्लेश−कलह, अज्ञान, अविवेक ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार, अभाव जहाँ भी रहेंगे वहाँ नरक की अग्नि ही जलेगी।
मानव जीवन हमें इसलिए प्राप्त नहीं हुआ कि इस जन्म में नरक जैसी कष्टदायक परिस्थितियों में पड़े रहकर तिल−तिल जलने जैसा कष्ट उठाते हुए मौत के दिन पूरे करें और परलोक के लिए अनन्तकाल तक दुर्गति का साधन इकट्ठा करें। जीवन की महत्वपूर्ण समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिस प्रकार का लक्ष्यविहीन जीवन हम व्यतीत कर रहे हैं क्या वही उचित है? क्या यही मनुष्य जन्म जैसे सुरदुर्लभ सौभाग्य का सदुपयोग है? हम अनेकों महत्वपूर्ण समस्याओं को उपेक्षा में डाले रहते हैं और निरर्थक बातों को बहुत आवश्यक समझकर उनके लिए माथा-फोड़ी करते रहते हैं। यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो यही प्रतीत होगा कि हमारे सामने सबसे महत्वपूर्ण समस्या एक ही है और वह है—‟जीवन का लक्ष एवं कार्यक्रम निश्चित करना।” यदि इस समस्या को हल कर लिया गया तो अन्य सारी समस्याऐं हल हो जाती हैं। यदि यह उलझी पड़ी हैं तो चारों ओर उलझनें ही उलझनें बनी रहेंगी।
असुरता का उन्मूलन आवश्यक
आज हमारे भीतर और बाहर सर्वत्र असुरता का बोलबाला है। वैयक्तिक जीवन में हमारी अंतःचेतना असुरता की अन्धकारपूर्ण पाशविक प्रवृत्तियों से भरी हुई है। फलस्वरूप मनुष्य शरीर पाकर भी हम घृणित श्रेणी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसी प्रकार सामाजिक जीवन में भी अनाचार का वातावरण प्रबल होता जाता है जिसके फलस्वरूप, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, समाज, राजनीति, पारस्परिक सम्बन्ध, नैतिकता और कर्तव्य पालन, उत्पादन और उद्योग प्रत्येक क्षेत्र में संकट उत्पन्न हो रहे हैं और चारों ओर अशान्ति की काली घटायें घुमड़ती हुई दिखाई पड़ती हैं। असुरता की प्रबलता जहाँ कहीं भी होगी वहाँ आपत्तियाँ ही बढ़ेंगी। सुख-शान्ति तो देवत्व के साथ ही अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। यदि हमें अपना व्यक्तिगत जीवन सुखी और सामाजिक जीवन शान्तिमय देखना हो तो उसका एक ही उपाय रह जाता है—असुरता को परास्त करके देवत्व की अभिवृद्धि करना। असुरता जब तक हारेगी नहीं, तब तक अशान्ति का मिट सकना और किस प्रकार संभव होगा?
देवासुर संग्राम पूर्व पौराणिक काल में भी चलता था। व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन के दोनों मोर्चों पर यह लड़ाई प्रचंड गति से चल रही है। इसी का नाम—विश्व−संकट है। यदि यह विश्व−संकट हमें सचमुच ही अप्रिय लगता है, इस कष्टमय स्थिति से सचमुच ही बचना चाहते हैं तो फिर उस असुरता को परास्त करने के लिए क्यों तत्पर नहीं होते जो मानव जाति के ऊपर आई हुई विश्वव्यापी आपत्तियों का एकमात्र कारण है?
यह सर्वथा सम्भव और सरल है कि मानवीय अन्तःकरण में निवास करने वाली दैवी या आसुरी वृत्तियों में से किसी को भी—सजग करके इस मिट्टी के पुतले को असुर या देवता के रूप में परिवर्तित किया जा सके। हर बुरी या भली वृत्ति अपने अनुकूल वातावरण मिलने से पनपती और प्रतिकूल वातावरण मिलने पर मुरझा जाती है। यह वातावरण बाहरी जीवन में देखा−देखी का भी होता है। दूसरों को कोई आचरण करते देखकर आमतौर पर मनुष्य उनकी नकल करने लगता है। अधिकाँश लोग ऐसे होते हैं जो किसी तथ्य पर स्वयं विचार न करके केवल बाहरी जीवन में घटित होने वाली या आस−पास दिखाई देने वाली घटनाओं से प्रभाव ग्रहण करते और उसी मार्ग पर चलने लगते हैं। इसलिए लोगों की प्रवृत्तियों को मोड़ने के लिए परिस्थितियों एवं घटनाओं को ऐसा क्रम बनाना पड़ता है जिससे प्रभावित होकर लोग उसका अनुकरण करने की इच्छा करने लगें।
अनुपयुक्त परम्पराऐं
वातावरण में अनुपयुक्त परम्पराऐं जो चल पड़ती हैं, समय−समय पर उन्हें सुधारने के लिए सुधार आन्दोलन चलाने पड़ते हैं। नाली में जब बहुत कीचड़ जम जाती है तो पानी फैलने लगता है, बदबू भी उड़ती है और बीमारियाँ फैलने का खतरा उपस्थित हो जाता है। ऐसी दशा में नाली को जड़ तक साफ करने और उसकी कीचड़ को एक बार पूरी तरह साफ कर देने की जरूरत पड़ती है। इस सफाई को ही सुधार आन्दोलन, सामाजिक क्रान्ति या युग−निर्माण कहते हैं। दुष्कर्मों को देखकर दूसरे लोग दुष्कर्म करने पर उतारू होते हैं और यह परम्परा छूत की बीमारी की तरह जब फैलने लगती है तो सारा वातावरण गंदा हो जाता है। इसलिए युग निर्माण के लिये नितान्त आवश्यक होता है कि दुष्प्रवृत्तियाँ हटें और उनका स्थान सत्प्रवृत्तियाँ ग्रहण करें। सत्कर्म जब बढ़ेंगे, सज्जनता की प्रथा परम्परा एवं गतिविधि का वातावरण चारों ओर दीख पड़ेगा तो साधारण लोग उसी से प्रेरणा ग्रहण करने लगेंगे और यह अच्छाई का प्रसार भी उसी तरह होगा जिस प्रकार कि बुराई की छूत एक से दूसरे को लगती है।
स्वस्थ परम्पराओं की स्थापना
कुकर्मों अन्धविश्वासों कुविचारों और दूषित परम्पराओं को हटा कर उनके स्थान पर सत्कर्मों, सद्विचारों और स्वस्थ परम्पराओं को प्रतिष्ठित करने का क्रान्तिकारी परिवर्तन यों बहुत ही कठिन मालूम पड़ता है पर यदि विचारक्रान्ति की सफल साधना कर ली जाय तो जन मानस में हेर−फेर होते ही उसका परिणाम बाह्य जीवन में तुरंत और प्रत्यक्ष दीखने लगता है। विचार बदलने से ही मनुष्य बदलता है। मनोभूमि का परिवर्तन बाह्य जीवन में दृष्टिगोचर न हो ऐसा सम्भव नहीं। पर बिना विचारों का परिवर्तन हुए बलात् किन्हीं बुराइयों को रोकने को प्रयत्न किया जाय तो वे बुराइयाँ कुछ समय के लिए दब तो सकती हैं पर थोड़ी ही देर में वे कोई और रूप धारण कर प्रकट हो जाती हैं या चुपके−चुपके भीतर ही भीतर बढ़ती रहती हैं। दहेज जैसी घातक कुरीति का भी उन्मूलन नहीं हो पा रहा है। दहेज विरोधी कानून बन जाने पर लोग चुपके−चुपके लेन−देन करने लगे हैं। इसे कौन सा कानून रोक पावेगा? रिश्वतखोरी, व्यभिचार सरीखे परस्पर सहयोग से चलने वाले पाप कदाचित ही कभी पकड़ में आते हैं। इसलिए दुष्प्रवृत्तियों को बाहरी दमन या प्रतिबन्ध से शमन करने की बात सोचना निस्सार है। ऐसे प्रतिबन्ध होने तो चाहिएं पर उनसे ही काम चल जायेगा, ऐसा नहीं सोचना चाहिए। इसका एक-मात्र उपाय हृदय परिवर्तन ही है जो विचार परिवर्तन के साथ ही संभव होता है।
अनुकरण की प्रवृत्ति
यह ध्यान रखने की बात है कि मनुष्य सब कुछ स्वयं ही सोचने और करने नहीं लगता। मौलिकता की मात्रा तो बहुत थोड़ी होती है, अधिकतर तो लोग बाहर से ही प्रभाव ग्रहण करते हैं। चूँकि बुराइयों की चर्चाऐं और घटनाऐं बहुत होती रहती हैं इसलिए लोगों का मन उसी ओर झुक पड़ता है। यदि विचारों का प्रवाह अच्छाई की दिशा में प्रवाहित हो रहा हो तो लोगों के मन उसकी ओर भी झुके बिना नहीं रह सकते। आज इसी प्रवाह परिवर्तन की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उत्तम विचारों में शक्ति न हो सो बात नहीं है, पर वे इतनी कम मात्रा में हमसे संबंधित रहते हैं कि उनका थोड़ा−सा ही प्रभाव पड़ता है। यदि अधिक समय तक अधिक गहरे सद्विचारों का सम्पर्क किसी व्यक्ति को उपलब्ध हो तो उसकी मनोदशा श्रेष्ठता की दिशा में मुड़े बिना नहीं रह सकती। स्वाध्याय और सत्संग की धर्म-ग्रन्थों में भूरि−भूरि प्रशंसा की गई है। उन्हें जीवन का नितान्त आवश्यक एवं अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है। स्वाध्याय की उपेक्षा करने वाले की भर्त्सना करते हुए शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है ‟जो व्यक्ति जिस दिन स्वाध्याय नहीं करता उस दिन वह अपने कर्तव्य और वर्ण धर्म से पतित हो जाता है।” यही बात सत्संग के बारे में भी है। अच्छे व्यक्ति और अच्छे विचारों की तुलना पारस पत्थर से की गई है जिसे छूकर लौह सरीखे कलुषित अन्तःकरण भी स्वर्ण जैसे बहुमूल्य बन जाते हैं।
स्वाध्याय और सत्संग
जीवन को परिवर्तन करने वाले स्वाध्याय और सत्संग की आज कोई व्यवस्था नहीं दीखती। पुराणों की दन्त कथाओं को रटते रहने का नाम स्वाध्याय और परलोक की, देवताओं की या दार्शनिक बातों की कल्पना में उड़ते रहने वाले विचारों को सत्संग कहा जाता है। ऐसी परम्पराऐं जहाँ−तहाँ दीख तो पड़ती हैं पर उनमें कोई तथ्य न होने से उसका प्रभाव कुछ नहीं पड़ता। सजीव स्वाध्याय और सत्संग का यदि आयोजन बन पड़े तो उसमें मनुष्य की अन्तरात्मा को हिला डालने की शक्ति प्रत्यक्ष दिखाई देगी। यदि वेश्या का नृत्य देखकर, गन्दे गीत सुनकर, अश्लील साहित्य पढ़कर, वासनापूर्ण चित्र देखकर, कामुकता की चर्चा में सम्मिलित होकर हमारा मन तुरन्त कलुषित एवं विचलित हो उठता हो तो श्रेष्ठता के विचार एवं कार्य हमें अच्छाई की ओर मुड़ने के लिए क्यों प्रेरणा न देंगे? शर्त केवल इतनी ही है कि जिस प्रकार कामुकता की विचारधारा सजीव होती है वैसा ही सजीव हमारा स्वाध्याय और सत्संग भी होना चाहिए। सात्विकता में यदि कोई शक्ति न होती तो संसार में अगणित महापुरुष अपने जीवन को इतना आदर्श एवं महान बना सके और संसार की इतनी बड़ी सेवा कर सके वह कैसे संभव होता?
हम चाहें तो विचार शक्ति का उपयोग अपने आपको सुधारने और दूसरों में भारी हेर−फेर करने के लिए कर सकते है। युग−निर्माण के लिए उपयुक्त विचारधारा अखण्ड−ज्योति प्रस्तुत करने के लिए अब विशेष रूप से कटिबद्ध हुई है। जीवन के हर पहलू पर विचार कर सकने योग्य पाठ्य सामग्री अगले दिनों अखण्ड−ज्योति के पृष्ठों पर और छोटे ट्रैक्टों के रूप में प्रस्तुत की जाने वाली है। उस विचारधारा को अधिकाधिक लोगों से परिचित कराने का कार्य अखण्ड−ज्योति नहीं कर सकती, वह तो परिवार के प्रत्येक सदस्य को ही करना पड़ेगा। माना कि हम सब की व्यक्तिगत क्षमता, योग्यता, चरित्र एवं शैली ऐसी नहीं है कि लोगों को प्रभावित कर सकें पर इतना तो किया ही जा सकता है कि श्रेष्ठ विचारों से सम्पर्क बनावें। संदेश वाहक का कार्य करना तो कुछ कठिन नहीं है। डाक्टर बनना हर एक के लिए कठिन है। इलाज करना हर कोई नहीं जानता पर इतना तो कोई भी कर सकता है कि बीमार और डाक्टर का संयोग मिला दे। दोनों के मिल जाने से भी रोग निवृत्ति का एक स्वर्ण सुयोग जैसा बड़ा महत्वपूर्ण निमित्त बन जाता है। ऐसा सुयोग बनाने का प्रबन्ध भी हम सब करने लगें तो बहुत बड़ा काम युग परिवर्तन की दिशा में हो सकता है।
दोष और दुर्गुणों से ग्रसित लोगों को कुमार्ग से हटा सकने में यदि किसी प्रकार सफलता मिल जाती है तो यह एक बहुत बड़ा पुण्य परमार्थ हो जाता है। धन या धन से खरीदी जा सकने वाली वस्तुऐं दूसरों को दान दे सकना हर आदमी का काम नहीं है यह तो वे ही कर सकते हैं जिनके पास जीवन निर्वाह की आवश्यकताऐं पूरी करने के बाद कुछ बचा रहता है। जिनके लिए अपने परिवार का भरण पोषण भी कठिन है वे किस प्रकार दूसरों का कोई बड़ा आर्थिक उपकार कर सकेंगे। यों तात्कालिक सहायता के रूप में कभी किसी को कुछ दे दिया तो उससे उसका कुछ बनने वाला भी नहीं है। यदि विचार साधन उपलब्ध करके हम किसी के जीवन में हेर−फेर का अवसर उपस्थित कर देते हैं तो उतने मात्र से इतना बड़ा उपकार हो सकता है जो बड़े−बड़े धनी और अमीरों द्वारा बन पड़ने वाले दान−पुण्य की अपेक्षा अनेक गुना अधिक प्रभावशाली होगा।
सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा
एक व्यक्ति सद्विचारों के प्रसार को अपना धर्म कर्तव्य मानकर निरन्तर अपने सम्बन्धित व्यक्तियों को सत्प्रेरणाऐं देता रहता है। उस प्रेरणा से प्रभावित होकर मान लीजिए एक आदमी ने बीड़ी पीना छोड़ दिया तो देखने में वह एक बहुत छोटी बात हुई पर गम्भीरता से विचार करने पर प्रतीत होगा कि इस छोटी सफलता का पुण्य भी कितना बड़ा उपकार है। जिसने बीड़ी पीना छोड़ा वह यदि चार आना प्रतिदिन की भी बीड़ी−दिया सलाई में खर्च करता तो महीने में 7॥ रु. और साल में 90 रु. होते। यदि चालीस वर्ष वह और जिये तो 90 × 40 = 3600 रु. हुए। चालीस साल तक यदि यह रकम बैंक या पोस्ट आफिस में जमा करते रहा जाय तो कम से कम दूनी हो सकती है। इस प्रकार 7200 रु. का लाभ उस बीड़ी छोड़ देने से हो सकता है। बीड़ी पीने से आँखों में, फेफड़े में, पेट में, रक्त में अनेक दोष उत्पन्न होते और उनसे बीमारियाँ उपजने एवं आयु घटने की हानि होती। बीमारियों में शारीरिक कष्ट के अतिरिक्त खर्च भी पड़ता है और उपार्जन नहीं हो पाता। बीड़ी छोड़ देने पर उन बीमारियों के खर्चों से बचत, शारीरिक कष्टों से बचत, कमाने में बाधा पड़ने से जो हानि होती उससे बचत, आयु में कई वर्ष बढ़ जाने का आनन्द और अर्थ लाभ इस प्रकार केवल आर्थिक दृष्टि से ही विचार किया जाय तो बीड़ी छोड़ने वाले को उन 7200 रु. की अतिरिक्त यह बचत होने का लाभ उसके अतिरिक्त है। यह सारे लाभ उस व्यक्ति को तब मिले जब किसी ने उसके पीछे पड़कर बीड़ी छोड़ने के लिए प्रभावित कर लिया। वस्तुतः इसमें सारा पुण्य उसी व्यक्ति का है जिसने बीड़ी छोड़ने की प्रेरणा दी। यह प्रेरणा देने वाला यदि 7200 रु. दान देना चाहता तो वैसा कर सकना कठिन था फिर भी उसका प्रचार कार्य इतना महत्वपूर्ण रहा कि उसके फल से उस व्यक्ति को इतना लाभ हो गया। नशेबाजी के कारण बुद्धि के तमोगुणी होने पर वह जो और भी दुष्कर्म करता उनसे बचे रहना संभव हो गया सो अलग। इस प्रकार उपकार की दृष्टि से देखा जाय तो हजारों रुपया दान करने वाले की अपेक्षा यह धर्मप्रचार का कार्य अधिक महत्वपूर्ण ठहरा।
इसी प्रकार अन्य बुराइयाँ छुड़ाने से कितना बड़ा उपकार होता है इसका वर्णन हो सकना कठिन है। एक व्यक्ति से माँसाहार छुड़ा दिया तो सैकड़ों प्राणियों को करुणाजनक प्राणघात जैसे उपयुक्त समय तक विवाह के लिए प्रतीक्षा करने की सलाह देते रहता तो क्या उचित न होता? फिर वे कार्य क्यों करने पड़ते जो अपनी या बेटी की हत्या के समान ही भयंकर थे।
छोटी−छोटी बातों पर आये दिन आत्म−हत्याऐं होती रहती हैं इनका कारण धैर्य का अभाव है। मामूली बातों पर एक दूसरे का कत्ल कर डालते हैं, इनका कारण असहिष्णुता है। छोटे−छोटे प्रलोभनों पर लोग अपना नैतिक पतन कर लेते हैं इनका कारण दूरदर्शिता की कमी है। थोड़े से असंयम के कारण लोग अपना स्वास्थ्य खो बैठते हैं, इसका कारण आत्म−नियंत्रण की शिथिलता है। लोग अशिक्षित एवं अभावग्रस्त बने रहते हैं, इसका कारण आलस और लापरवाही है। सामाजिक कुरीतियों पर बहुत धन खर्च करना पड़ता है इसका कारण विवेकशीलता की त्रुटि है। फिजूलखर्ची, फैशन−परस्ती और शेखी−खोरी की आदतों से लोग अपना आर्थिक संतुलन बिगाड़ लेते हैं यह विवेक की दुर्बलता है। इस प्रकार की अनेकों बौद्धिक एवं मानसिक दुर्बलताऐं हमारे जीवन को अपंग बनाये रहती हैं। सब प्रकार समर्थ होते हुए भी हम इन छोटी−छोटी कमियों के कारण अपने जीवन को असंतुष्ट और दुखमय बनाये रहते हैं। ईर्ष्या द्वेष की वेदी पर अपनी बहुमूल्य रचनात्मक शक्तियों को लोग लड़ाई-झगड़े में खर्च करते रहते हैं। ऐसे लोगों ने यदि सही मार्ग में विचार करने की पद्धति जान ली होती तो आज की स्थिति की अपेक्षा उनकी स्थिति निश्चय ही भिन्न होती।
विचारकता और दूरदर्शिता
विचारकता का, दूरदर्शिता का जीवन की समस्याओं पर सही ढंग से सोच सकने का, उचित दृष्टिकोण से वस्तुस्थिति को देख सकने का, क्षणिक प्रलोभन और स्थायी लाभ में अन्तर कर सकने का, उचित और अनुचित के परिणामों को समुचित निरूपण कर सकने का, मानव−जीवन के लक्ष और सदुपयोग की उपेक्षा करके उसे व्यर्थ गंवाने पर अन्त में उपस्थित होने वाले पश्चात्ताप का यदि हम ठीक प्रकार विश्लेषण करने लगें तो उस स्थिति में कदापि पड़े नहीं सकते जिसमें कि आज पड़े हुए हैं। यदि यह विचारशीलता जागृत हो सकी होती तो जीवन का स्वरूप कुछ और ही होता। जिनने अपने जीवन को सफल बनाया है सदुपयोग किया है और उत्कर्ष का वरदान प्राप्त किया है उनने विचारशीलता की ही आराधना की है। सद्विचारों के बिना किसी का अच्छा स्वभाव नहीं बन सकता, अच्छे स्वभाव के बिना अच्छे आचरण बन सकना कठिन है और अच्छे आचरणों के बिना महानता का लाभ किसी को भी प्राप्त नहीं हो सकता। इसलिए जिसे मानव−जीवन की महानता के अनुरूप श्रेय एवं उत्कर्ष प्राप्त करना हो उसे विचारशीलता का ही अवलम्बन ग्रहण करना पड़ता है।
सद्विचारों की प्रधानता
विचारों की शक्ति अपार है। सद्विचारों की प्रधानता वाला समय ही सतयुग है। सद्भावनाओं से परिपूर्ण प्रदेश ही स्वर्ग है। सत्प्रवृत्तियों से ओत−प्रोत मनुष्य ही देवता है। इस संसार में जो कुछ सुख−शान्ति है वह सद्विचारों का ही परिणाम है। जब इस तत्व की कमी हो जाती है, कुविचार प्रबल हो जाते हैं तभी कलियुग दीखने लगता है, तभी नरक के दृश्य सामने आते हैं, तभी नर−पशुओं की संख्या बढ़ती है, और सर्वत्र क्लेश-कलह के, अशान्ति-आपत्ति के बादल घुमड़ने लगते हैं। असुरता और देवत्व के दोनों पक्ष सामने हैं। एक नाश का दूसरा निर्माण का मार्ग है। हम चाहें जिसे स्वेच्छापूर्वक अपना सकते हैं और उनके परिणामों का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं। प्राचीनकाल में ऋषि−मुनि और साधु-ब्राह्मण इस तथ्य को भली प्रकार जानते थे और वे सत्प्रवृत्तियों को जन−मानस में भरे रहने के लिए निरन्तर प्रयत्न करते रहते थे। नारद जी का सारा जीवन धर्मप्रचार में लगा, वे स्वल्प ही एक जगह ठहरते थे और निरन्तर भ्रमण करके सद्ज्ञान का विस्तार करते रहते थे। उनकी इसी सेवा से प्रसन्न होकर भगवान ने उन्हें चाहे जब स्वर्ग में बेरोक−टोक आ सकने का विशेष अधिकार दिया था जो और किसी ऋषि को प्राप्त न था। जगद्गुरु शंकराचार्य, बुद्ध, महावीर, दयानन्द, गाँधी, विवेकानन्द, रामतीर्थ, चैतन्य, मीरा, सूरदास, तुलसीदास, कबीर, नानक आदि सभी समाज सुधारकों को अपने−अपने ढंग से धर्मप्रचार का कार्यक्रम अपनाना पड़ा है। कालान्तर में गिरते-गिरते जब मनुष्य का मानसिक स्तर चिन्ताजनक स्थिति तक उतर जाता है तो उसे उठाने के लिए फिर कुछ विशेष प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है। इस आवश्यकता को प्रत्येक युग के विवेकशील लोग अनुभव करते रहे हैं और उनने उसकी पूर्ति के लिए प्राण−प्रण से प्रयत्न भी किया है।
सुख−शान्ति का एकमात्र उपाय
मानव−जाति सुख−शान्ति से रहे और सब लोग इस नर−तनु का समुचित लाभ प्राप्त करें इसका उपाय इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है कि सद्विचारों की पूँजी कम न होने दी जाय। हर व्यक्ति सद्विचारों का महत्व समझे, उसकी प्रचण्ड शक्ति का सही अनुमान लगावे और अपने को तथा अपने समीपवर्ती लोगों को अधिकाधिक मात्रा में सद्विचारों से ओत−प्रोत करने का प्रयत्न करे। तभी यह संभव है कि जीवन की दिशा बदले और हर कुकर्म छोड़कर सत्कर्मों से प्रवृत्त हों। संसार की सुख−शान्ति इसी पर निर्भर है। युग−निर्माण योजना इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए है।
यह सर्वविदित है कि इस संसार की सर्वोत्कृष्ट वस्तु ‘ज्ञान’ है। ज्ञान की आराधना से ही मनुष्य तुच्छ से महान बनता है, बन्धन से मुक्त होता है। इस ज्ञान के अभाव की जो अज्ञान की जो अज्ञान स्थिति है उसमें डूबा रहने से ही मनुष्य पतन के, पाप के, अन्धकार के गर्त में डूब कर दुर्गति को प्राप्त होता है। इसलिए शास्त्रों ने और आप्त पुरुषों ने सदा एक स्वर से ज्ञान प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहने के लिए हर व्यक्ति को आदेश दिया है। जिसकी ज्ञान में दिलचस्पी नहीं, जो विवेक का महत्व नहीं समझता, जिसे मनन और चिन्तन में अभिरुचि नहीं, जो प्रस्तुत समस्याओं पर विचार करना नहीं चाहता वह एक प्रकार से पशु ही कहा जा सकता है। ऐसे नर−पशुओं की वृद्धि से धरती का भार बढ़ता है और नाना प्रकार के लोक संकट उत्पन्न होते हैं।
विचारों की प्रेरक शक्ति
मनुष्य को किसी भी दिशा में अग्रसर करने की प्रेरणा केवल विचार शक्ति द्वारा ही मिल सकती है। पाप पूर्ण विचार जहाँ मनुष्य को पापी बनाते हैं वहाँ पुण्य के विचारों से वह धर्मात्मा, महात्मा एवं परमात्मा बन जाता है। इस हाड़−माँस की गीली मिट्टी जैसे शरीर का किसी ढाँचे में ढालना एवं पकाना एकमात्र विचार शक्ति द्वारा ही सम्भव होता है। कुछ लोग अपने आप अपने विचारों का निर्माण करते हैं कुछ लोग समीपवर्ती वातावरण से प्रभाव ग्रहण करके अपनी विचारधारा की दिशा बनाते हैं। जो भी हो, है महत्व विचार शक्ति का ही। शारीरिक दृष्टि से भी मनुष्य लगभग एक से हैं पर उनके बीच जो जमीन आसमान जैसा अन्तर दीख पड़ता है उसका कारण और कुछ नहीं केवल ज्ञान का स्तर एवं विचारों का प्रवाह ही है।
ज्ञान की महत्ता बताते हुए कितनी ही जगह ऋषियों ने उसे ईश्वर के रूप में ही प्रतिपादित किया है। गीताकार का कथन है कि—‟इस संसार में ज्ञान से बढ़कर श्रेष्ठ और कोई वस्तु नहीं है।” ज्ञान दान को ब्रह्मदान कहते हैं। प्राचीन काल में ब्राह्मण और साधु ज्ञानदान का परम पुनीत सत्कर्म निरन्तर किया करते थे इसलिए उन्हें पूजनीय श्रद्धास्पद एवं श्रेष्ठ माना जाता है। जीवन की सर्वोपरि श्रेष्ठ वस्तु का निरन्तर दान करने वालों को सम्माननीय एवं श्रेष्ठ माना भी क्यों न जाता, जन−समाज की मनोदिशा का निर्माण उन्हीं के सत्प्रयत्नों पर ही निर्भर जो था। जब तक इस देश के साधु और ब्राह्मण अपना कर्तव्य पालन ठीक प्रकार करते रहे तब तक हम अपने गुण, कर्म, स्वभाव की श्रेष्ठता के कारण विश्व के नेता भी रहे और प्रचुर भौतिक सम्पदाओं के अधिपति भी। क्यों न हों, विवेक ही तो इस विश्व की सर्वोपरि शक्ति है। बुद्धिमान को ही बलवान कहा जाता है। बुद्धिहीन का बल तो एक क्षणभंगुर दिखावा मात्र है।
भौतिक सहायता की स्वल्प सीमा
किसी दुखी व्यक्ति को अन्न, जल, वस्त्र, औषधि, पैसा आदि उपकरणों से सहायता करके कुछ समय के लिए उसके कष्ट को कम किया जा सकता है। जब उस दान का प्रभाव समाप्त हो जायेगा तो फिर वह कष्ट पुनः ज्यों का त्यों हो जायेगा। फिर इस प्रकार की सहायता धन सम्पन्न लोग ही कर सकते हैं, वे ही कुँआ, बावड़ी, प्याऊ, धर्मशाला, सदावर्त, औषधालय आदि खुलवा सकते हैं। जिनके पास धन नहीं है वे ऐसे कार्य इच्छा रहते हुए भी नहीं कर सकते। धन दान का सदा सदुपयोग ही नहीं होता। कई बार दुष्ट दुरात्मा लोग आपत्तिजनक एवं धर्मात्मा होने का ढोंग बनाकर दान ले जाते हैं और फिर उसे बुरे मार्ग में खर्च करके देने वाले को भी पाप का भागी बनाते हैं। इसलिए दान एक प्रशंसनीय सत्कर्म होते हुए भी उसमें सम्पन्नता और सदुपयोग की शर्त लगी हुई है। यह दो शर्तें पूरी न हो सकें तो धन दान की सत्प्रवृत्ति भी निष्फल हो जाती है। यदि वह सफल भी हो तो उससे किसी के कष्ट का एक सीमित अवधि तक ही निवारण हो सकता है सदा के लिए उन्मूलन नहीं। इसका अर्थ यह नहीं कि धन दान की उपेक्षा की जानी चाहिए। इन पंक्तियों का यह उद्देश्य नहीं। अपनी पुण्यकमाई में से एक नियत अंश हर आदमी को नियमित रूप से निकालते रहना चाहिए और उसका विवेकपूर्ण सत्कार्यों में उपयोग करने का गृहस्थ−धर्म तो सदा ही पालन करना चाहिए।
इन पंक्तियों का प्रयोजन यह है कि—ज्ञान−दान की पुनीत प्रक्रिया को हम लोग इस संसार का सर्वश्रेष्ठ परमार्थ समझ कर उसे अत्यधिक महत्व दें और इस बात का प्रयत्न करें कि विचारकता एवं विवेकशीलता की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिले। हर आदमी ज्ञान की महत्ता एवं उपयोगिता को समझे। आज जिस प्रकार शारीरिक आलस बढ़ रहा है, लोग श्रम से जी चुराने लगे हैं उसी प्रकार वे जीवन की महत्वपूर्ण समस्याओं पर गहराई से विचार करना छोड़ कर केवल प्रचलित परम्पराओं के आधार पर, दूसरों की देखा−देखी भेड़ चाल से चलते रहते हैं। यही स्थिति आज के अनुपयुक्त वातावरण के लिए उत्तरदायी है।
मनोभूमि ढालने की अग्नि
जैसे लोहे को किसी अन्य आकृति में ढालना हो तो उसे गरम करके नरम बनाना पड़ता है, तब वह पिछली आकृति को छोड़कर किसी अन्य आकृति में ढलता है। वैसे ही मनुष्य का अन्तःकरण ज्ञान और विवेक की आग में ही नरम बनता है और तभी वह अपने पूर्व पथ को छोड़कर किसी अच्छे मार्ग पर चलने को तैयार होता है। पाप और बुराई को तो लोग दूसरों की देखा−देखी एवं उनसे प्राप्त होने वाले तात्कालिक लाभों से प्रभावित होकर ही अपना लेते हैं, पर कुकर्म का लोभ त्याग कर, सत्कर्म की ओर अग्रसर होना, हीन स्थिति से ऊँचे उठकर उच्च स्थिति के लिए प्रयत्नशील होना, बिना तीव्र भावना एवं बिना उत्कृष्ट प्रेरणा के सम्भव नहीं हो सकता और यह कार्य ज्ञान की अग्नि द्वारा ही सम्भव हो सकता है। मशीनें, कोयला, भाप, तेल, गैस, बिजली, अणु आदि भी आग्नेय शक्ति द्वारा गतिशील होती हैं, मनुष्य रूपी मशीन को यदि उत्कर्ष के श्रेष्ठ मार्ग पर चलाना हो तो उसे ज्ञान की—विवेक की शक्ति अनिवार्यतः चाहिए। इसके बिना हृदय की आँखें नहीं खुलतीं और न दूरवर्ती भलाई, बुराई सूझ पड़ती है। केवल ज्ञान में ही वह शक्ति सन्निहित है जो व्यक्ति के अन्तस्तल को पलटे और उसे अनुपयुक्त मार्ग से हटाकर उपयुक्त मार्ग पर प्रवृत्त करें।
विचारों की शक्ति , उपयोगिता, आवश्यकता, को समझने और स्वीकार करने के लिए जन−साधारण को यदि तत्पर न किया जा सका तो युग−परिवर्तन का स्वप्न एक शेखचिल्ली की कल्पना मात्र ही बना रहेगा। सद्विचारों के सम्पर्क में आकर आवश्यक प्रेरणा जो लोग ग्रहण न करेंगे, उन्हें दण्ड के अतिरिक्त और किसी प्रकार सुधारा न जा सकेगा। प्रजातन्त्र युग में छोटे दोषों के लिए मर्मान्तक पीड़ा देकर मृत्यु−दण्ड या उसी के समान आँखें फोड़ने, हाथ काटने जैसे नृशंस दण्ड दिये जाने भी संभव नहीं। यदि दिये भी जावें तो उनसे बचे रहना जिनके लिए संभव होगा, वे दण्डशक्ति रखने वाले लोग तो उन कुकृत्यों को कर ही सकेंगे। अधिक छिपकर पकड़ में न आने की अधिक चतुरता तो तब भी चल ही सकेगी। ऐसी दशा में अनीति का उन्मूलन तो नृशंस दंड व्यवस्था में भी न हो सकेगा। जिन देशों में आज भी अधिकनायकवाद है और प्रतिपक्षियों को नृशंस दंड देने के क्रम चल रहे हैं, वहाँ भी दंड का उद्देश्य सफल कहाँ हो पा रहा है? दंड की एक सीमा तक उपयोगिता हो सकती है पर मानवी प्रकृति उससे नहीं बदली जा सकती, यह परिवर्तन तो हृदय−परिवर्तन के साथ ही हो सकता है और हृदय परिवर्तन का मार्ग ज्ञान का अवलम्बन ही हो सकता है। नारद ने बाल्मीकि और बुद्ध ने अंगुलिमाल जैसे भयंकर डाकू को ज्ञान देकर ही संत बनाया था।
धर्मसेवा का सर्वश्रेष्ठ माध्यम
हम ज्ञान का प्रकाश फैलाने का व्रत लें। धर्म−सेवा का अनादि काल से लेकर अद्यावधि यह एक ही सर्वोपरि माध्यम रहा है। सत्कर्म की प्रेरणा देने से बढ़कर और कोई पुण्य हो भी नहीं सकता। इसे गरीब अमीर, विद्वान, अविद्वान सभी अपनी सामर्थ्य के अनुसार कर सकते हैं। सबल भावना वाला व्यक्ति अपने समीपवर्ती क्षेत्र में अपनी भावनाऐं, मान्यताऐं अवश्य फैला सकता है। यह ठीक है कि हर एक के पास निज के उपार्जित उत्कृष्ट विचार नहीं हो सकते और उसका निज का व्यक्तित्व भी इतना प्रभावशाली नहीं हो सकता कि उसकी दी हुई शिक्षा को लोग शिरोधार्य कर लें। पर इतना तो हो ही सकता है कि संदेशवाहक के रूप में उत्कृष्ट विचारों को अपने सम्पर्क में आने वाले लोगों तक पहुँचाया जा सके। भोजन बनाना कठिन हो सकता है। पर परोसने में क्या कठिनाई? घड़ी, मशीन बनाना कठिन हो सकता पर उसका उपयोग करने में—दूसरों को समय बता देने में क्या असुविधा पड़ेगी? ज्ञान प्रसार के व्रतधारी ‘अखण्ड−ज्योति संस्था’ द्वारा युग निर्माण के लिए इन दिनों प्रस्तुत की जाने वाली प्रचण्ड एवं प्रखर विचारधारा को जनसाधारण तक पहुँचाने में एक संदेशवाहक का कार्य तो आसानी से कर सकते हैं। थोड़ी−सी अभिरुचि एवं प्रवृत्ति इस ओर मुड़नी चाहिए। कुछ दिनों इसे अपने स्वभाव में सम्मिलित करने की तो कठिनाई रहेगी पर यह सब जैसे ही अभ्यास बना वैसे ही एक धर्म सेवा की, ज्ञान यज्ञ की, एक महान प्रक्रिया चल पड़ेगी और साधारण व्यक्ति भी युग निर्माण के लिए एक उपयोगी परमार्थ करने का श्रेय लाभ लेने लगेगा।
ज्ञान यज्ञ के लिए समय दान
एक घंटा रोज का समय हम इस कार्य के लिए नित्य लगाया करें कि युग निर्माण विचारधारा को सुनने समझने की अभिरुचि साधारण लोगों में उत्पन्न की जा सके तो इतने मात्र से भी बहुत काम हो सकता है। हममें से हर एक का कुछ न कुछ परिचय एवं प्रभाव क्षेत्र होता है। उसमें जो शिक्षित हों उन्हें अपना युग निर्माण साहित्य पढ़ने देने और फिर उनसे वापिस लेने के लिए उनके पास आना-जाना आरम्भ करना चाहिए। पुस्तकें बाँट देने से या पुस्तकालय खोल देने से कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। जब तक लोगों की अभिरुचि ही न जागेगी, तब तक मुफ्त में मिली हुई पुस्तक को भी लोग न पढ़ेंगे और पुस्तकालय खुल गये तो उसमें पढ़ने न आवेंगे। कार्य तो जनसम्पर्क से ही होगा।
विचार−परिवार का निर्माण
हमें अपने परिचय एवं प्रभाव क्षेत्र में से शिक्षित एवं सौम्य प्रकृति के लोगों की एक लिस्ट बनाकर उसे अपनी डायरी में नोट करना चाहिए और फिर ज्ञान दान के लिए दिये हुए घण्टे में उनके घर जाकर मिलना चाहिए। जो पुस्तक अगले दिन उन्हें पढ़ानी हो अन्य बातों के प्रसंग के साथ, उस पुस्तक के संबंध में चर्चा करनी चाहिए और उसकी उपयोगिता, श्रेष्ठता एवं महत्ता की भूरि−भूरि प्रशंसा इस प्रकार करनी चाहिए कि उस व्यक्ति में उसे पढ़ने की अभिरुचि जागृत हो। यदि पहली वार्ता में वह अभिरुचि जागृत न हुई हो तो फिर किसी अन्य दिन उस सम्बन्ध में पुनः प्रशंसा करनी चाहिए। जैसे भूख लगने पर ही भोजन खाया जाना गुणकारक होता है वैसे ही अभिरुचि जगाकर दिया हुआ साहित्य ही मनोयोगपूर्वक पढ़ा जाता है और उसी का कुछ प्रभाव भी पड़ता है। जब तक अभिरुचि न जगे, जब तक वह उस पुस्तक को पढ़ने की माँग न करने लगे तब तक उसे पढ़ने नहीं देनी चाहिए वरन् लगातार प्रयत्न करना चाहिए कि वह आपके द्वारा की हुई उस पुस्तक की प्रशंसा सुनकर उसे पढ़ने की आपसे माँग करे। माँग होने पर उसके पास स्वयं ही उसे पहुँचाने जाना चाहिए और वापिस लेने कब आवें, यह भी पूछ लेना चाहिए, ताकि वह उपेक्षा में डाले न रखे। इस प्रकार बार−बार आने जाने का, मिलने-जुलने का सिलसिला परमार्थ बुद्धि से चला देने पर अपने मिशन के सम्बन्ध में विचार−विनिमय एवं वार्तालाप का अवसर भी मिल सकेगा और पुस्तक में प्रस्तुत विचारों का अपने व्यक्तिगत विचारों द्वारा समर्थन करने से पढ़े हुए विषय की पुष्टि भी होगी। इस प्रकार लगातार हमारे द्वारा प्रस्तुत विचारधारा और आपके द्वारा उत्पन्न की हुई अभिरुचि एवं प्रेरणा से उसे पढ़ने वाले के मन पर प्रभाव अवश्य पड़ेगा। आज न सही कल उसमें परिवर्तन होगा ही। पूर्ण रूप से न सही किसी अंश में वह अपने से सहमत होगा कि और बहुत न सही थोड़े अंश में विचार बदलने से उसके कदम भी श्रेष्ठता की दिशा में तीव्र या मन्दगति से अवश्य बढ़ेंगे।
शिक्षित ही नहीं अशिक्षित भी
शिक्षितों को यह साहित्य पढ़ाया जाना चाहिए किन्तु अशिक्षितों को, स्त्री-बच्चों को सुनाने के लिए भी इन अंकों में बहुत कुछ है। बाहर के लोग सुनने न आयें न सही हम अपने घर के स्त्री-बच्चों को इकट्ठा करके उन्हें अखंड−ज्योति में प्रस्तुत छोटी−छोटी कथा कहानियाँ एवं उनके समझने लायक आवश्यक बातें उनको अपनी भाषा में सुनाने-समझाने के लिए घरेलू सत्संग तो चला ही सकते हैं। लोगों से घर−घर मिलने जाने और व्यक्तिगत चर्चाऐं करने से भी सत्संग का उद्देश्य पूरा हो सकता है। अशिक्षितों को इकट्ठे करने पर उनसे पृथक−पृथक मिलकर अपनी विचारधारा से परिचित कराया जा सकता है। स्वाध्याय और सत्संग ज्ञान यज्ञ के दो पहलू हैं, इनका आरम्भ सबसे पहले ऊपर बताई हुई पंक्तियों के अनुसार ही हमें आरम्भ कर देना चाहिए ताकि लोगों की सोई हुई जिज्ञासा एवं अभिरुचि का जागरण हो सके। यदि उस कुँभकरणी निद्रा से मानवी चेतना को जगाया जा सका तो वह जागरण अभूतपूर्व हलचल उत्पन्न करने वाला होगा यह निश्चित है।
कुछ दिन बाद युग−निर्माण के लिए मानव−जीवन के हर पहलू पर प्रेरणाप्रद विचारधारा देने वाली एक सस्ती, सुन्दर ट्रैक्टमाला प्रकाशित करने का विचार है, पर अभी उसमें देर है। संभवतः कई महीने उस कार्य में लगें। अभी तो हमें अखण्ड−ज्योति के माध्यम से ही अपना कार्य आरंभ करना है। पाँच शिक्षितों को अपनी पत्रिका पढ़ाने और पाँच अशिक्षितों को उसे सुनाने के लिए हममें से प्रत्येक को व्रत लेना चाहिए। दस व्यक्तियों तक संदेश पहुँचाते रहने का कार्य यों देखने में छोटा लगता है पर इसके फलितार्थ बहुत ही महत्वपूर्ण एवं दूरगामी हो सकते हैं। अखण्ड−ज्योति−परिवार के बीस हजार सदस्य यदि दस व्यक्तियों का धर्म शिक्षण अपने−अपने जिम्मे ले लें तो दो लाख व्यक्तियों का हर वर्ष बहुत कुछ सिखाया जा सकता है। उन दो लाख शिक्षार्थियों में से यदि बीस हजार व्यक्ति हर वर्ष यह शिक्षण सेवा अपने जिम्मे लेते चलें तो चक्रवृद्धि ब्याज वाले सिद्धान्त के अनुसार अगले दस वर्षों में करोड़ों व्यक्तियों की अन्तरात्मा में ऐसी विचारक्रान्ति के बीज बोये जा सकते हैं जिससे सत्प्रवृत्तियों की नयनाभिराम हरियाली सर्वत्र दीखने लगे।
युग−निर्माण का सत्संकल्प
इस अंक के आरम्भिक सचित्र पृष्ठ पर युग−निर्माण का सत्संकल्प छपा है। यह अखण्ड−ज्योति परिवार की दैनिक प्रतिज्ञा है। प्रत्येक शुभ कार्य के आरंभ में पूजा, उपासना आरम्भ करने में भी संकल्प का विधान पूरा करने की हमारी धार्मिक परम्परा अनादि काल से चली आती है। यह संकल्प भी उसी प्रकार प्रयुक्त होना चाहिए। इसे बड़े अक्षरों में एक कार्ड बोर्ड पर लिखकर रख लेना चाहिए। सवेरे उठते ही इसे दुहराकर तब शैया का परित्याग किया जाय। पूजा, उपासना आरंभ करने से पूर्व इसे एक बार भावनापूर्वक पढ़ लिया जाय। साप्ताहिक एवं सामयिक सत्संगों, गोष्ठियों में एक व्यक्ति इसे पढ़े और शेष उसे दुहरायें। सब के हाथ में एक−एक संकल्प पत्र हो तो पढ़ने और दुहराने में सुगमता रहेगी। इसी प्रकार बड़े यज्ञों में या उत्सवों में एक व्यक्ति मंच पर जाकर इसे थोड़ा−थोड़ा करके बोले और जनता उसे दुहरावे। ऐसे अवसरों पर यह पत्र अधिक संख्या में जनता में वितरण किये जा सकते हैं ताकि नये आदमियों को भी इन्हें पढ़ने-बोलने और समझने में सुगमता हो। एक रुपये में 100 के हिसाब से इन्हें अखण्ड−ज्योति कार्यालय से भी मंगाया जा सकता है।
यह संकल्प घर−घर में प्रचलित होना चाहिए। परिवार के लोग इसे पढ़ने और दुहराने के लिए प्रातः सायं पूजा, उपासना के समय एक हो जाया करें और इस संकल्प को पढ़ने के साथ−साथ थोड़ा बहुत नियमित या अनियमित (मानसिक) गायत्री जप ध्यान करें। ऐसी परम्पराऐं हर घर में आरम्भ की जानी चाहिएं। युग−निर्माण का आरम्भ इस सत्संकल्प में सन्निहित भावनाओं के साथ ही होता है।
आगामी तीन अंक
युग−निर्माण के तीन आधारों का अधिक स्पष्टीकरण करने के लिए अखण्ड−ज्योति के आगामी तीन अंकों में विशेष प्रयास किया जायेगा। अप्रैल का अंक तो साधारण विषयों पर ही होगा। इसके बाद मई का अंक स्वस्थ शरीर, जून का अंक स्वच्छ मन तथा जुलाई का अंक सभ्य−समाज सम्बन्धी समस्याओं पर अधिक विस्तारपूर्वक विचार प्रस्तुत करेंगे। यह छोटे−छोटे विशेषाँक वैसे ही महत्वपूर्ण होंगे जैसे गत अक्टूबर एवं जनवरी के साधनाँक एवं युग−निर्माण अंक निकल चुके हैं। इस वर्ष के प्रत्येक अंक को हमें दो बार ध्यानपूर्वक पढ़ना चाहिए और इस विचारधारा को 5 पढ़े लोगों को पढ़ाकर एवं 5 बिना पढ़ों को सुनाकर आगे बढ़ाना चाहिए। यह दस व्यक्तियों का अपना विचार−परिवार अखण्ड−ज्योति का प्रत्येक सदस्य बनाने लगे तो उन सब का सम्मिलित एक विशाल विश्व−विद्यालय सरीखा शिक्षण सत्र व्यापक पैमाने पर चलता रह सकता है और जनवरी अंक में प्रस्तुत कार्यक्रम बहुत ही सरलतापूर्वक कार्यान्वित हो सकता है। थोड़ी इच्छा शक्ति, थोड़ी सेवा और थोड़ी परमार्थ बुद्धि हम जगा लें तो बड़ी आसानी से उस अभाव की पूर्ति हो सकती है जिसके लिए आज चारों ओर से पुकार उठ रही है। युग वाणी की उपेक्षा करना हम प्रबुद्ध अध्यात्म प्रेमी व्यक्तियों के लिए न तो उचित ही होगा और न शोभनीय। हमें इच्छा और अनिच्छा से युग−निर्माण के महान उत्तरदायित्व को अपने कन्धों पर लेना ही पड़ेगा और उसे पूरा भी करना ही होगा।
अष्टग्रही योग ता . 5 को और सप्तग्रही योग ता. 9 फरवरी को समाप्त हो गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार इस अवसर पर गायत्री−तपोभूमि में नौ दिन का एक छोटा आयोजन होने के साथ−साथ वसन्त−पञ्चमी के दिन युग−निर्माण का सत्संकल्प किया गया और उसकी विधिवत घोषणा की गई।
युग परिवर्तन का सन्देश
हम निरन्तर यह घोषणा करते रहे हैं कि अष्टग्रही का पुण्य पर्व युग−निर्माण का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सन्देश लेकर आ रहा है। यह ठीक है कि वीर पुरुष समय को बदल देते हैं, उनका प्रचंड आत्मबल, साहस, पुरुषार्थ और ज्वलन्त भाव प्रवाह इतना शक्तिशाली होता है कि करोड़ों व्यक्ति उन्हीं की तरह विचार करने लगते हैं। भगवान बुद्ध, ईसामसीह, महात्मा गाँधी, कार्लमार्क्स आदि कितनी ही आत्माऐं इन पिछले दो हजार वर्षों में ही ऐसी हुई हैं जिनने करोड़ों मस्तिष्कों को अपनी ही तरह सोचने और करने के लिए विवश कर दिया। साथ−साथ ऐसा भी होता है कि समय का प्रवाह भी लोगों को एक विशेष दिशा में सोचने और करने के लिए विवश कर देता है। युगों की मान्यता का आधार यही है। समय के साथ−साथ लोगों की विचार एवं कार्य प्रणाली में भला या बुरा अन्तर उपस्थित हो जाता है। अध्यात्म शास्त्र एवं सूक्ष्म विज्ञान के तत्त्वदर्शी इस तथ्य को समझ पाते हैं। वे उस प्रवाह से बचने और अपनी स्थिति को संभाले रहने के लिए सामयिक चेतावनी भी देते रहते हैं। जैसे सर्दी आरम्भ होते ही मोटे कपड़ों की व्यवस्था करने एवं वर्षा ऋतु आते ही मकानों की टूटी छतें संभालने में लगना पड़ता है वैसे ही कुसमय का प्रवाह आने पर, कलियुग आदि कठिन समय आने पर उनमें सुरक्षा के लिए और अधिक सावधानी से अपनी मनोभूमि को ठीक रखना पड़ता है। छतें उनकी चुचाती हैं जो वर्षा की उपेक्षा करके उनकी मरम्मत नहीं करते, ठंड उन्हें सताती है जो मोटे कपड़ों का प्रबन्ध नहीं करते। कलियुग का बुरा समय भी केवल उन्हें प्रभावित करता है जो अपनी सुरक्षा में सतर्क नहीं रहते। अन्यथा सद्विचार, सत्कर्म, सद्भाव, सत्प्रयत्न सदा हर काल में संभव हैं और सज्जनता की ज्योति हर स्थिति में जलती रह सकती है। सत्य को प्राप्त करने में मनुष्य किन्हीं भी परिस्थितियों को चीरता हुआ सफलता प्राप्त कर सकता है।
विनाश ही नहीं विकास भी
आत्म विद्या के अत्यन्त उच्चकोटि के तत्त्वदर्शियों से गत कई वर्षों से सम्पर्क बनाकर भी और ज्योतिष विद्या के आधार पर भी हमने यह जाना है कि अष्टग्रही योग का एक पहलू जहाँ विनाश है वहाँ दूसरा पहलू विकास भी है। विनाश के सरंजाम हर क्षेत्र में मौजूद हैं और बढ़ रहे हैं। तृतीय महायुद्ध में अणु अस्त्रों के प्रयोग से जो भयंकर स्थिति पैदा हो सकती है वह विभीषिका सामने मौजूद है। वह घटाऐं थोड़ी देर के लिए भी बरस पड़ें तो विनाश का इतना विकराल रूप सामने आवेगा कि हम में से बहुत कम लोग उसे देखने को जीवित रहेंगे। इसके अतिरिक्त तन−तन में, मन−मन में जो पाप का विष भरा हुआ है वह आये दिन असंख्यों त्रास बनकर उबलता ही रहता है। कौनसा घर, कौनसा नगर, कौनसा देश ऐसा है जहाँ के व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन में नरक की आग कहीं जल रही है? मानवीय शक्ति अधिकतर विनाश कार्यों में ही तो लगी है। पाप की ओर बढ़ती हुई प्रवृत्तियाँ न रुक सकीं तो विनाश का रुकना संभव नहीं है। दुर्भावनाऐं एक मनुष्य और दूसरे मनुष्य के बीच में मंथरा की तरह विलगाव और द्वेष का अग्वा खड़ा कर रही हैं इनके विस्फोट आये दिन होते रहते हैं। हत्याऐं, लूट, ठगी, विश्वासघात के पैशाचिक दृश्य हर जगह देखे जा सकते हैं और उनके दुष्परिणाम भी। देर केवल सामूहिक रूप से विशाल परिमाण में भड़कने की है। सो मनुष्य उसके लिए भी उतावला हो रहा है। ऐसी दशा में विनाश की अधिक चिन्ता करना व्यर्थ है। वह तो अपने आप बड़ी तेजी से सुरसा की तरह मुँह फाड़ कर हमें खा जाने के लिए तेजी से चला ही आ रहा है, उसकी समीपता अब कितनी दूर रही है? मूर्ख ही उसे दूर मान सकते हैं, विचारशीलों के लिए वह बहुत ही निकट है।
न निराश हों न उपहास करें
कई व्यक्ति अष्टग्रही के दिनों में प्रलय न होने से बहुत निराश हैं। कई तो पूजा, पाठ करने वालों का उपहास भी खूब कर रहे हैं। इस निराशा और उपहास से मनुष्य की वज्र मूर्खता का ही परिचय मिलता है। जिस दिन बीज बोया जाय उसी दिन उसका फल मिले ऐसी कल्पना केवल पागल ही कर सकते हैं। पागल यदि निराश हों या उपहास उड़ावें तो उनके लिए कुछ न कहना ही उचित है। जिनने यह कहा या जिनने यह समझा कि अष्टग्रही के दिनों में धरती फटेगी और आसमान टूटेगा वे दोनों ही परले सिरे के अविवेकशील माने जा सकते हैं। साँप के काटने और विष पीने से भी तो मृत्यु तत्क्षण नहीं होती। उसमें भी तो देर लगती है फिर अष्टग्रही का प्रभाव उसी क्षण हो जाना चाहिए ऐसी आशा किस आधार पर की जा सकती है। रूस ने पिछले दिनों 50 मेगाटन का एक अणु परीक्षण किया था उसका प्रभाव अगले तीस साल तक चलने और लाखों मनुष्यों के मरने एवं रोग ग्रसित होने की सुनिश्चित घोषणा वैज्ञानिक लोग कर चुके हैं। उन घोषणाओं पर कोई अविश्वास नहीं करता। जिस दिन परीक्षण विस्फोट हुआ उसी दिन लाखों आदमी नहीं मर गये इसलिए वैज्ञानिकों की घोषणाऐं झूठी हैं ऐसा अनुमान लगाने वाले बौद्धिक दृष्टि से अनजान बालक ही माने जाएँगे।
बीज बोते ही फलों से लदा पेड़ उपज पड़ने की आशा और प्रतीक्षा करने वाले लोग इसी श्रेणी के होते हैं। विनाश की घड़ी टल गई ऐसी बात तब तक कैसे सोची जा सकती है जब तक कि विश्व के राजनीतिक नेता संहार के एक से एक भयंकर आयुध बनाने, उन पर विपुल धन खर्च करने और स्वार्थ सिद्धि के लिए दत्तचित्त हैं। विज्ञान का जो विकास इन दिनों हुआ है वह बड़ी प्रसन्नता की बात है। उससे कितनी ही सुविधाऐं भी बढ़ी हैं, पर बन्दर के हाथ में तलवार लग जाने से जैसे अनर्थ की आशंका रहती है वैसी ही इन मूर्ख विश्वनेताओं के हाथों घातक अणुअस्त्र लग जाने से उत्पन्न हो गई है। कौन जाने यह बन्दर कब क्या अनर्थ खड़ा करे दें। विनाश तो इनकी मुट्ठी में दबा हुआ है। विवेक को तिलाञ्जलि देकर उन्मत्तों की तरह आचरण करने वाले यह तथाकथित विश्वनेता कभी भी कुछ भी कर गुजर सकते हैं। इन परिस्थितियों के रहते हुए जो यह सोचता है कि विनाश की घड़ी टल गई, अशुभ भविष्य की विभीषिका झूँठी निकली, वह वस्तुतः एक अनजान बालक ही कहे जाने योग्य है।
उन विश्व नेताओं, राज्याध्यक्षों को ही क्यों दोष दिया जाय, आज तो व्यापक मनोवृत्ति ही ऐसी बन गई है। जो काम हम अपने छोटे क्षेत्र में करते हैं, जो नीति हमने अपने जीवन में अपनाई हुई है उसी का उनने राजसत्ता के क्षेत्र में प्रयोग करना शुरू किया है। हम सब कम अनर्थ इसलिए कर पाते हैं क्योंकि हमारी शक्ति छोटी और साधन सीमित हैं। यदि कल बड़े साधन मिलें तो हम में से कौन, क्या अनर्थ करने में किसी से पीछे रहेगा? महत्व मनुष्यों का नहीं मनोवृत्ति का है। जिस स्वार्थ, पाप और असुरता की सर्पिणी ने हमारे मस्तिष्कों पर अधिकार कर लिया है, हृदयों में गहराई तक प्रवेश कर लिया है वह कभी भी अपने दाँत गढ़ा सकती है और व्यापक अनर्थ की आशंकाओं को भी क्षण भर में मूर्तिमान बना सकती है। छोटे परिमाण में तो घर−घर और जगह−जगह उसका दिग्दर्शन हम कुकर्मों के दुष्परिणामों में आये दिन देखते ही रहते हैं। अष्टग्रही के आधार पर जिस अशुभ की कल्पना की गई थी वह तब तक झूँठी नहीं कही जा सकती जब तक कि विश्व युद्ध के कारण मौजूद हैं और मानव प्राणी अपनी गतिविधियों को सुधारने में तत्पर नहीं हो रहा है।
क्रिया की प्रतिक्रिया
हमें विनाश की बात सोचकर भयभीत नहीं होना चाहिए। वरन् विकास की संभावनाओं पर विचार करना चाहिए। क्रिया के साथ−साथ सदा प्रतिक्रिया भी उत्पन्न होती है। शरीर पर रोगों के आक्रमण के साथ ही रक्त के स्वस्थ जीवाणु रोगों से लड़ने के लिए अपना सारा साहस बटोर कर बीमारी को देह से बाहर निकाल फेंकने के लिए भी जी जान से जुट जाते हैं। रोगों से छुटकारा इसी प्रक्रिया पर निर्भर रहता है। यदि रक्त के स्वस्थ कीटाणु अपनी क्षमता और सक्रियता खो बैठें तो फिर रोग से छुटकारा पाने की संभावना ही समाप्त हो जाती है। कोई भी इलाज फिर रोगी को बचा नहीं सकता। चिकित्सा का उद्देश्य रक्त के स्वस्थ जीवाणुओं को लड़ाई में सहायता पहुँचाना मात्र है। इसी प्रकार विनाश की संभावनाऐं कूटनीतिक वार्तालापों से, राज्याध्यक्ष सम्मेलनों से, मध्यस्थों से, प्रस्तावों से समाप्त नहीं हो सकतीं। इनके आधार पर समय टल सकता है अनर्थ की संभावना नष्ट नहीं होगी। कारण के मौजूद रहते परिस्थिति कभी भी फिर बिगड़ सकती है। पाप का प्रतिरोध पुण्य में, स्वार्थ का प्रतिरोध परमार्थ में, असुरता का प्रतिरोध देवत्व में सन्निहित है। यदि हम अनर्थ से बचना चाहते हैं तो उसका एकमात्र उपाय यही हो सकता है कि पूरे मन और सच्चे हृदय से परमार्थ के, धर्म के, मानवता के आदर्शों को अपनाया जाय और दृढ़तापूर्वक उन पर चला जाय।
कुछ साधन निर्माण में भी लगें
विनाश के साधन जुटाने में कितनी जनसंख्या, कितने मस्तिष्क, कितने साधन, कितने कारखाने, कितने वैज्ञानिक, कितने नेता, कितना धन, कितना प्रचार, कितना संगठन काम कर रहा है, यह देखते हुए चिन्ता होना स्वाभाविक ही है जब इतनी मानवीय शक्ति अनर्थ को मूर्तिमान बनाने के लिए संलग्न है तो उसके प्रतिरोध के लिए कुछ तो संगठित रूप से होना ही चाहिए। रावण के पास बहुत साधन थे पर उसके प्रतिरोध में रीछ−बन्दरों की ही सही एक सेना तो खड़ी की ही गई थी। विनाश का प्रतिरोध करने के लिए विकास की योजना हमें बनानी ही पड़ेगी। विकास से हमारा तात्पर्य आर्थिक या वैज्ञानिक साधनों को बढ़ाने से नहीं, वरन् मानवीय अन्तःकरण की उत्कृष्टता को बढ़ाने से, सद्विचारों, सदुद्देश्य, सत्कर्मों और सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने से है। इस विकास पर ही विनाश के टलने की संभावना निर्भर है। अखण्ड−ज्योति परिवार के कंधों पर विकास का उत्तरदायित्व आया है और उसके साधन जुटाने में उसे इच्छा या अनिच्छा से संलग्न होना ही पड़ेगा। अष्टग्रही के सम्बन्ध में हम सदा से घोषणा करते रहे हैं कि उन तारीखों में कोई भी खास बात नहीं होने वाली है। सितम्बर और अक्टूबर के अंकों में यह छाप चुके हैं कि “पाठक जिस आनन्द से यह पत्रिका पढ़ रहे हैं उसी आनन्द से अष्टग्रही के दिन भी व्यतीत करेंगे।” हुआ भी वही। कई व्यक्ति ऐसा कहते हैं कि अनर्थ तो उन्हीं दिनों होने वाला था पर कीर्तन, भजन, यज्ञ आदि आयोजनों की जो बाढ़ आई उससे अनर्थ टल गया। यह शंका और समाधान दोनों ही गलत है। न तो 5 फरवरी को कोई अनर्थ होने वाला था और न वह भजन, हवन से टला है। यदि भजन से अनर्थ टलने वाली बात मानी जाय तो यह पूजा पाठ केवल भारत में ही हुआ था। संसार के अनेक देश ऐसे हैं जो पूजा, पाठ तो दूर ईश्वर तक को नहीं मानते, अष्टग्रही को कोई प्रभाव स्वीकार नहीं करते, उन पर तो आपत्ति आनी चाहिए थी, वहाँ तो अनर्थ होना चाहिए था। भारत धर्म, कर्मों से बचा तो पाकिस्तान और चीन कैसे बचे?
अशुभ की संभावना टली नहीं
वस्तुस्थिति दूसरी ही है अशुभ की संभावना बनी हुई है। पाप वृत्तियाँ अपने आप कहीं न कहीं से अनर्थ पकड़ लाती हैं। चोरी की प्रवृत्ति जेलखाने में और कुपथ्य की आदत शफाखाने में, पाप की प्रवृत्ति नरक में जिस प्रकार ले पहुँचती है उसी प्रकार दुर्भावनाओं से आच्छादित मस्तिष्क विपत्ति को भी कहीं न कहीं से बुला लाते हैं यह विपत्ति मानव−पक्ष या दैवी प्रकोप के किसी भी रूप में सामने आ सकती है। युद्ध, महामारी, भूकम्प, बाढ़, अग्निकाण्ड जैसी आकस्मिक भयानक घटनाऐं हों, चाहे धीरे−धीरे शरीर, मन और समाज की स्वस्थता क्षीण होकर दुर्बलता के अभिशाप में जल जाने की स्थिति आवे, बात एक ही है। किस घटनाक्रम के साथ हुआ, इसका कोई महत्व नहीं है। गोली लगने से मृत्यु हुई तो क्या और अफीम खाकर मरे तो क्या परिणाम तो एक ही है। चूँकि पाप अपने प्रचंड रूप में हमारे चारों ओर अट्टहास कर रहा है इसलिए अनिष्ट टल गया ऐसा किसी को भी नहीं सोचना चाहिए। बड़े काम समय भी बड़ा ही लगाते हैं। विश्व बहुत बड़ा है उसके परिवर्तन में भी समय लगता है। उत्पन्न विभीषिकाऐं कब किस रूप में घटित हों इसके प्रकारों या अवसरों का निश्चित स्वरूप या समय तो निश्चित नहीं किया जा सकता पर इतनी बात तो सामान्य बुद्धि से भी सोची जा सकती है कि बुराई का परिणाम अशुभ के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। हम में से हर कोई यह जानता है कि उसके पाप, पुण्य से ज्यादा हैं इसलिए किसी को भी यह समझने में गफलत न होनी चाहिए कि उसका भविष्य अच्छाई से अधिक बुराई की ओर—सुख से दुख की ओर बढ़ रहा है।
समय की प्रेरणा और युग की पुकार
युग परिवर्तन की सम्भावना हमारी कल्पना नहीं, समय की प्रेरणा है। क्योंकि इसके बिना न व्यक्ति का कल्याण है और न विश्व का उद्धार संभव है। विकास का यही संदेश लेकर अष्टग्रही आई है। यह सन्देश धार्मिकता का, आस्तिकता का एवं मानवता का सन्देश है। इन दिनों भारत भर में जितना भजन, पूजा, कीर्तन, हवन, व्रत, उपवास, दान, पुण्य हुआ उतना एक साथ इतने व्यापक रूप में गत पाँच हजार वर्षों से कभी नहीं हुआ। कोई सोच सकते हैं कि ऐसा डर की वजह से किया गया, पर सच बात यह नहीं है। डर से लोग घबराते हैं और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं तब भजन बनना तो दूर समझ-बूझ तक काम नहीं करती। ध्यान, भक्ति और धर्मानुष्ठान तो स्वस्थ बुद्धि से ही संभव है। लाखों−करोड़ों व्यक्तियों के मन इन दिनों अपने आप हुलसित हुए, वे अपनी अंतःप्रेरणा को रोक न सके और धर्मानुष्ठानों में लग गये। कइयों ने इन दिनों ऐसी उदारता एवं श्रेष्ठता का परिचय दिखाया जैसा उनके जीवन में कभी भी देखा नहीं गया था। यह डर की वजह से नहीं अन्तः प्रेरणा से ही सम्भव हो सका। अष्टग्रही की प्रेरणा जिस धर्म विकास की है वह कितनी प्रत्यक्ष, स्पष्ट और सत्य है इसका प्रमाण हमने पिछले दिनों व्यापक धर्माचरणों के रूप से प्राप्त कर लिया है। यह प्रक्रिया तीन दिन का चमत्कार दिखाकर समाप्त नहीं हो गई, यह अब अत्यन्त दृढ़तापूर्वक आगे प्रगतिशील होगी।
वसन्त पञ्चमी के दिन गायत्री तपोभूमि में जो युग निर्माण संकल्प लिया गया, वही अब “अखंड−ज्योति परिवार” विचारों के प्रकाश एवं कार्यों में प्रेरणा उत्पन्न करने का प्रधान माध्यम बनेगा। अष्टग्रही चली गई पर अपना यही आदेश हमारे लिए छोड़ गई है जिसे पूरा करने में हम सब कटिबद्ध हो रहे हैं।
युग परिवर्तन की संभावनाओं के सम्बन्ध में महायोगी श्री अरविन्द ने अब से कुछ वर्ष पूर्व एक पत्र लेखक को जो उत्तर दिया था वह विशेष रूप से मननीय है। उन्होंने लिखा था—
“इस समय संसार में बहुत बुरी—बुरी से बुरी घटनायें हो रही हैं और मैं कहना चाहता हूँ कि अभी इससे भी कहीं अधिक बुरी परिस्थिति आना निश्चित है। पर इसमें घबराने की कोई बात नहीं, वरन् मनुष्यों को यह समझना चाहिये कि इस प्रकार की घटनाओं का होना अनिवार्य है, क्योंकि हमारे भीतर घुसे हुए अनेक दोषों का निराकरण तभी हो सकेगा जब कि वे बाहर निकल कर विनष्ट हो जायें। तभी एक नवीन और श्रेष्ठ संसार की रचना हो सकनी संभव है। इस दृष्टि से इन घटनाओं को अब अधिक समय तक रोका नहीं जा सकता। इस सम्बन्ध में हमको इस कहावत को ध्यान में रखना चाहिये कि प्रभात होने के पूर्व एक बार अन्धकार और भी गहरा हो जाता है। साथ ही मैं यह भी बतला देना चाहता हूँ अब जो दुनिया बनेगी वह नई तरह की सामग्री से और नये नमूने की बनेगी, इसलिये हमको पुरानी चीजों के नष्ट होने का अधिक शोक नहीं करना चाहिये।”
इसी प्रकार की सम्भावनायें अन्य कई भारतीय सन्त भी प्रकट कर चुके हैं। महात्मा सूरदास के नाम से एक भजन तो सर्वत्र प्रसिद्ध है कि “सहस बरस लों सतयुग बीते धर्म की बेल बढ़े। स्वर्ण−फूल पृथ्वी पर फूले पुनि जग दशा फिरे” आदि−आदि। मान सरोवर पर निवास करने वाले योग−विद्या के महान अभ्यासी श्री अवधूत स्वामी का कहना है कि− ‟सन् 1964 से सतयुग−आगमन के चिन्ह प्रत्यक्ष दिखाई देने लगेंगे और उसकी शक्ति दिन पर दिन बढ़ने लगेगी। इसके फल से संसार में से पाप, ताप, रोग, शोक मिटकर मनुष्य सुखपूर्वक रहने लगेंगे।” इसी प्रकार गंगोत्री के प्रसिद्ध तपस्वी, बर्फ के बीच में नग्न रहकर तपस्या करने वाले स्वामी रामानन्द महाराज ने कहा है कि—‟अब संसार का रूप बहुत शीघ्र बदलेगा।” हिमालय के परम सिद्ध महात्मा शतानन्द ने कहा है—‟साधक श्रेष्ठ कलिजीव आज क्रम−विकास के उच्च शिखर पर चढ़कर भगवान की चरण वन्दना की आशा में हैं। प्रभु आज शरणागति रूपी नौका में स्वयं कर्णधार बनकर भवसागर पार करा रहे हैं।”
महात्मा विश्वरञ्जन ब्रह्मचारी ने लिखा है—जगदीश्वर की जैसी प्रेरणा मिल रही है उससे अब हम लोगों को हताश होने का कोई कारण नहीं है। इस घोर मिथ्यायुग में ही सत्ययुग का प्रकाश बिखर जायेगा। अब पुनः इस देश में ऋषियुग आयेगा। फिर यह भारत ही समग्र वसुधा को ज्ञानप्रकाश द्वारा अमृत का पथ प्रदर्शन करायेगा, लक्ष्यवस्तु का सन्धान बतायेगा। वह दिन आयेगा—अवश्य ही आयेगा।”
यह नहीं समझ लेना चाहिये कि इस प्रकार की सम्मतियाँ आधुनिक समय के महापुरुषों ने ही प्रकट की हैं। नहीं, हमारे प्राचीन धर्म ग्रन्थों में भी इनका समर्थन किया गया है और स्पष्ट लिखा है कि इस प्रकार का युग−परिवर्तन सृष्टि का अटल नियम है और यथा अवसर नियमपूर्वक होता ही रहता है। महाभारत के वनपर्व में महाराज युधिष्ठिर के कलियुग के सम्बन्ध में प्रश्न करने पर महामुनि मार्कण्डेय का निम्न कथन इस सम्बन्ध में विशेष महत्वपूर्ण है—
ततस्तुमुल संघाते वर्तमान युगक्षये ॥88॥
द्विजाति पूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति।
दैवः कालान्तरे ऽन्यासीन पुवर्लोक विवद्धये॥89॥
भविष्यति पुनः दैवमनुकूलं यदृव्छया ।
यदाँ चंद्रश्च सूर्यश्च तथा तिष्य बृहस्पतिः ।
एक राशौसमेष्यन्ति प्रवत्स्यति तदाकृतम्॥90॥
काल वर्षीय पर्जन्यो नक्षत्राणि शुभानिच ।
क्षेमं सुभिक्ष मारोग्यं भविष्यति निरामयम्॥91॥
“पहले युग के समाप्त होने के अवसर पर बड़ी ही कठिन अवस्था तथा संघर्ष को सहन करते हुये क्रम से श्रेष्ठ जनों की वृद्धि होती है। इसके पश्चात् ईश्वर की दया से फिर अनुकूल समय आता है। जब चन्द्र, सूर्य, पुष्य और बृहस्पति एक राशि में समान अंश पर हो जायेंगे तब फिर सतयुग आरम्भ होगा। तत्पश्चात् शुभ नक्षत्रों में समयानुकूल वर्षा होने लगेगी और सुकाल होकर सब लोग आरोग्यता तथा सुख का उपभोग करने लगेंगे।”
इस प्रकार के युग−परिवर्तन के वर्णन भागवत तथा अन्य ग्रन्थों में भी जगह−जगह पाये जाते हैं, पर उपर्युक्त कथन की एक विशेषता यह है कि इसमें युग−परिवर्तन के समय ग्रहों की क्या स्थिति होती है, इसे प्रकट कर दिया गया है और इस आधार पर हम उसका बहुत कुछ सही अनुमान लगा सकते हैं। यह चन्द्रमा, सूर्य और बृहस्पति तथा पुष्य नक्षत्र का जो एक साथ योग होना लिखा है वह ज्योतिर्विज्ञान के ज्ञाताओं के मतानुसार अभी कुछ ही समय पहले हुआ है। पर जैसा ऊपर कहा गया है यह सत् तत्वों का विकास और तामसी तत्वों का निराकरण क्रमशः ही होगा। यों तो हमने ऐसे भी लोग देखे थे जो कहते थे कि युग−परिवर्तन एक दिन में होगा। शाम को लोग कलियुग की अवस्था में सोयेंगे और सुबह उठेंगे तो समस्त लक्षण धर्म−युग के दिखाई पड़ेंगे। पर ये सब तो मनोरञ्जन या अर्थ का अनर्थ करने वालों की बातें हैं। युग−परिवर्तन विकास और इतिहास के सिद्धान्तों के अनुसार क्रमशः ही होगा और उसे नियमानुसार महा कठिन प्रक्रिया और परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ेगा। वैसी एक परिस्थिति सन् 1962 से आरम्भ होगी, जिसका प्रत्यक्ष फल दस−पाँच वर्ष के भीतर दिखलाई पड़ने लगेगा।
इस सम्बन्ध में ईसाइयों की एकमात्र धर्म पुस्तक बाइबिल में वर्णित भविष्य कथन भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। महात्मा ईसा के प्रधान शिष्य ‘महायोगी’ जनने ‘रिवेलेशन’ शीर्षक अध्याय में संसार का भविष्य कथन करते हुए भावी युग परिवर्तन का स्पष्ट रूप से वर्णन किया है। उन्होंने कल−कारखानों और पूँजीवाद की वृद्धि का जिक्र करते हुये संसारव्यापी महायुद्ध का रोमाँचकारी वर्णन किया है और बतलाया है कि अन्त में मानव जाति की रक्षा के लिये ईश्वरीय शक्ति का आविर्भाव होगा और पृथ्वी पर धर्मराज की स्थापना की जायगी। उस धर्म राज्य का वर्णन ‘बाइबिल’ में इन शब्दों में मिलता है—
ईश्वरीय दण्ड स्वरूप
‟लड़ाई और प्राकृतिक दुर्घटनाओं में करोड़ों मनुष्यों के नष्ट हो जाने के पश्चात् जब पृथ्वी की शासन व्यवस्था धार्मिक सन्त पुरुषों द्वारा होने लगेगी तो सब कष्टों का अन्त हो जायेगा और मानव समाज सुख से जीवन व्यतीत करने लगेगा। सब लोग ईश्वरीय आदेश के अनुसार चलने लगेंगे और पाप कर्मों को त्याग देंगे। तब दुनियाँ में सेनाओं और जहाजी बेड़ों का नाम भी न रहेगा और लोग तलवारों को तोड़कर हल का फार बना लेंगे। एक देश के निवासी दूसरे देश के निवासियों से झगड़ा न करेंगे और युद्ध सदा के लिए बन्द हो जायेगा। सब स्त्री और पुरुष दूसरे स्त्री−पुरुषों को बहिन या भाई कह कर पुकारने लगेंगे। कोई मनुष्य छोटी उम्र में न मरेगा और सब सौ वर्ष की पूरी आयु तक जीवित रहेंगे। इस युग में शासनाधिकार सिर्फ उन्हीं लोगों के हाथ में रहेगा जिनका चरित्र शुद्ध तथा पवित्र होगा, जो नम्र तथा विनयशील होंगे और त्याग वृत्ति का जीवन पसन्द करेंगे।”
ईसाई धर्म के बड़े−बड़े विद्वानों ने इन भविष्यवाणियों की आलोचना तथा व्याख्या करके बड़े−बड़े ग्रन्थ लिखे हैं और सिद्ध किया है कि यह जमाना अब सर्वथा समीप आ चुका है। राजनीति तथा इतिहास के ज्ञाता, जो प्राचीन धर्म ग्रन्थों से किसी तरह का सम्बन्ध नहीं रखते, वे भी भिन्न शब्दों में इसी से बिल्कुल मिलती−जुलती संभावना प्रकट कर रहे हैं। अंग्रेजी के महान लेखक श्री एच. जी. वेल्स ने ‘शेप आफ दी थिंग्स टू कम’ (आने वाली घटनाओं का स्वरूप) नामक एक बड़ी पुस्तक लिखी है, उसमें भी भावी−समाज का हूबहू ऐसा ही चित्र खींचा गया है। उनके मतानुसार सन 2000 ईस्वी से पहले ऐसी दुनियाँ का निर्माण सर्वत्र आरम्भ हो जायेगा।
सामूहिक प्रयत्नों के बलबूते पर ही समाज का सुधार एवं परिवर्तन सम्भव है। जो कार्य एक व्यक्ति के लिये असम्भव होता है, वही सामूहिक प्रयत्नों से सरल हो जाता है। आन्दोलन के द्वारा जन−मानस में आवश्यक हेर फेर करना एवं सामूहिक श्रम शक्ति से बड़े−बड़े श्रेष्ठ कार्यों को सम्पन्न कर सकना अधिक कठिन नहीं रहता। राष्ट्र निर्माण के लिये जन−आन्दोलन के रूप में सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित किया जाना आवश्यक है। इस प्रकार के प्रयत्न जहाँ−तहाँ चल भी रहे हैं।
आचार्य विनोबा भावे ने उज्जैन से 10 मील दूर पन्त पिपलिया गाँव में पत्रकारों को बताया कि उनकी 9 वर्षीय पदयात्रा में 9 लाख एकड़ भूमि भूदान में मिली है। अभी तक मिली सारी जमीन देश के भूमि−हीनों में वितरित कर दी गई है और इन जमीनों पर अब अच्छी फसल उगी हुई है। आचार्य ने कहा कि भूदान आन्दोलन में अधिक से अधिक 3500 लोग लगे हुए हैं और 9 वर्षों में 9 लाख एकड़ भूमि का वितरण काफी महत्वपूर्ण बात है।
इलाहाबाद से 24 मील दूर, मेजा तहसील के बरनपुर गाँव के किसानों के अपनी कुल खेती की जमीन ग्राम सर्वोदय मंडल को दान में दे दी है। जिला सर्वोदय मंडल के मंत्री श्री सुरेश राम ने कहा कि इस समय बरनपुर सर्वोदय मंडल के पास 1300 एकड़ जमीन है और गाँव में एक भी भूमिहीन व्यक्ति नहीं है। किसान अब इस बात का प्रयत्न कर रहे हैं कि वे अपनी खादी स्वयं तैयार करें और अपने यहाँ ग्रामोद्योग चालू करें।
झाँसी जिले में एक गाँव है गोरा कलाँ। यहाँ के 60 में से 40 परिवारों ने बाँध बनाने के लिए 4,045 रुपये नकद और 10,000 रुपये मूल्य के सामान एवं श्रम की व्यवस्था की। बाँध की लम्बाई और चौड़ाई क्रमशः 316 फुट एवं 38 फुट है तथा इससे 150 एकड़ भूमि की सिंचाई होगी। उसकी कुल लागत अनुमानतः 20,575 रुपये होगी। राज्य सरकार ने 6,500 रुपये का अनुदान स्वीकार किया है।
बाडमेर जिले के खडीन ग्राम के लोगों ने अपने श्रमबल से एक कुआँ खोदा है, जिसमें 120 फीट की गहराई पर मीठा पानी प्राप्त हो गया है। गत 40 दिनों से ग्रामवासी अपने पुरुषार्थ से अपनी समस्या को सुलझाने के लिए श्रमदान कर रहे थे। अब इस कुएँ पर पनघट, स्नानागार, पशुओं के लिए कुण्ड आदि के निर्माण होंगे। इन सब पर 20 हजार के व्यय का अनुमान है। श्री हीरालाल ने संपत्तिदान के रूप में इस रकम को देने की घोषणा की है।
बीकानेर जिले की बीकानेर नोखा तथा कोलायत पंचायत समितियों के कई ग्रामों के निवासियों ने मृत्यु−भोज का बहिष्कार करने का निश्चय कर लिया है। इन ग्रामों की हरिजन तथा अन्य पिछड़ी हुई जातियों के बूढ़े लोगों का कहना है कि यह जरूरी नहीं कि जो गलत काम हमारे पूर्वजों ने किये हम भी उन्हीं की पुनरावृत्ति करें। पहले जब आवागमन के मार्ग नहीं थे, पारस्परिक रूप से मिलना कम हो जाता था, उस समय मृत्यु−भोज के बहाने हम लोग मिलकर अपनी समस्याओं के समाधान हेतु वार्तालाप कर लेते थे तथा उसके उपराँत थकान मिटाने हेतु भोजन करके विश्राम किया जाता था। पर अब जब कि वे परिस्थितियाँ नहीं रहीं तो मृत्यु−भोज क्यों किये जायें?
आगरा की कंजर सभा ने निश्चय किया है कि भविष्य में कोई भी कंजर महिला न तो बाजार में भीख माँगेगी न झूठन ही लेगी। यदि कोई कंजर इसके विरुद्ध कार्य करेगा तो उसे जातीय दण्ड दिया जायेगा। कंजर सभा के मन्त्री ने नगर की आम जनता और पुलिस से अपील की है कि वे इस प्रकार भीख माँगती महिलाओं को सभा के पास पहुँचा दें।
नसीराबाद के निकटवर्ती ग्राम सनोद में होलिकोत्सव पर 100 जाट, 25 गूजर, 10 नायक एवं 10 भंगियों ने ग्राम द्वारा आयोजित एक सभा में शराब व बीड़ी न पीने का प्रण किया। सभी ग्रामीणों ने बीड़ी व शराब का परित्याग करने के साथ−साथ इसके विरुद्ध चलने वाले पर 50 रुपया आर्थिक दण्ड का भी निश्चय किया है।
बूंदी जिले की जैथल ग्राम पंचायत ने राजस्थान धूम्रपान अधिनियम के अंतर्गत बालकों में धूम्रपान की बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोकने का निश्चय किया है। उक्त निश्चय के अनुसार पंचायत ने धूम्रपान की हानियों से अनभिज्ञ एवं बीड़ी विक्रेताओं को नोटिस दिया है कि यदि 16 वर्ष से कम आयु के बालकों को बीड़ी या तम्बाकू प्राप्त करने या पिलाने में किसी प्रकार की सहायता दी गई तो पंचायत सहायता देने वाले व्यक्ति के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करेगी जिसके अनुसार 25 रु. से 100 रु. तक का अर्थ−दण्ड दिया जा सकता है।
बाँसवाड़ा जिले की बागीदौरा पंचायत समिति क्षेत्र के मोटी टेम्बी आदिवासी गाँव के ग्राम मुखिया प्रशिक्षण शिविर में पंचायत समिति के प्रधान एवं समाज शिक्षा प्रसार अधिकारी की अपील पर 11 भील नवयुवकों ने पीढ़ियों से चली आई प्रथा को तोड़कर अपने गले व हाथों के गहनों को उतार फेंका और प्रण किया कि अब से गहने कभी नहीं पहनेंगे। बाँसवाड़ा के आदिवासियों ने जिले में यह अनूठा उदाहरण उपस्थित किया है।
दिल्ली, अमृतकौर पुरी के अनेकों नागरिकों ने एक सभा में यह प्रतिज्ञा की कि भविष्य में चोरी, डाका आदि डालने का काम नहीं करेंगे। इसके अतिरिक्त मद्यपान, धूम्रपान एवं माँस भक्षण न करने की भी प्रतिज्ञा की। प्रतिज्ञा अणुव्रत समिति की नैतिक आँदोलन सम्बन्धी एक सभा में की गयी। सभा में मुनि नागराज ने आदर्श जीवन बिताने पर बल दिया कि जीवन में जो प्रण ले उस पर चल कर जीवन बिताये।
जयपुर का समाचार है कि कंजर जाति के लिए बसाई गई आदर्श बस्ती रामनगर में इस पिछड़ी जाति के लोग, जो अपनी अपराधी प्रवृत्तियों के कारण बदनाम थे, अब अच्छे और आधुनिक नागरिक जीवन के अभ्यस्त हो रहे हैं। बस्तियों में रहना और वैध उपायों से कमाकर खाना, इन लोगों ने आरम्भ कर दिया है। शराब, माँस, भूत−प्रेत, गंदगी, जुआ, चोरी आदि अनेकों बुराइयों को उनने बहुत हद तक छोड़ दिया है।
इन्दौर वाणगंज क्षेत्र के पास कुष्ठ निवारक अस्पताल के समीप बसे हुये कष्ट रोग ग्रस्त 20 स्त्री पुरुषों ने भीख माँगकर अपने लिए एक कुँआ बनवाया है। कुष्ठ रोगियों ने अपने लिए एक कुष्ठ सेवा समिति भी गठित की है जिसका मंत्री भी उनमें से ही एक चुना गया है। ये कोढ़ी इस अस्पताल से ही निकले हैं पर समाज में अपना कोई स्थान न पाकर एक अलग गाँव बसाकर रहने लगे हैं।
लुधियाना की महिलाओं के इस निर्णय के बाद कि अश्लील पोस्टरों और सिनेमा विज्ञापनों के खिलाफ आन्दोलन शुरू किया जाय, कुछ शिक्षित पुरुषों ने फैशनेबल औरतों के खिलाफ भी आन्दोलन चलाने का निर्णय किया है। इन शिक्षित पुरुषों के एक प्रवक्ता ने बताया कि इसके लिए एक संस्था बनायी जा रही है। उक्त आन्दोलन 1951 के नमूने पर होगा। छोटे−छोटे कार्ड छपवाये जायेंगे, जिन पर लिखा होगा। ‟बहनजी, सिर कज्जो” (बहनजी सिर ढ़ककर चलो।) ये कार्ड उन औरतों को पकड़ाये जायेंगे, जो नंगे सिर होंगी।
लोदी कालोनी दिल्ली में बसे कायस्थों की एक उपजाति की संस्था ने फैसला किया है कि हर दूसरा रविवार “स्त्री अवकाश दिवस” मनाया जाय। स्त्री अवकाश दिवस का अर्थ है कि इस दिन गृहणियाँ बाहर बाग−बगीचों में घूमने जायँ और गृह प्रमुख घर का सारा कामकाज संभालें। घर का कामकाज संभालने में झाडू बुहारी देना, साग−सब्जी खरीदना, बच्चों को नहलाना−धुलाना, साफ कपड़े पहनाना और रसोई की देख−भाल करना आदि सब कुछ है। यदि किसी परिवार में नौकर अथवा महरी नहीं है, तो गृहपति को घर के कामकाज के अंतर्गत बर्तन भी स्वयं माँजने पड़ेंगे। उपरोक्त संस्था द्वारा किये गये निश्चय के अनुसार महिलाओं को हर पन्द्रहवें दिन पूर्ण विश्राम दिया जायेगा। विश्राम के दिन वे रविवारीय समाचार पत्रों के पन्ने पलटेंगी अथवा रेडियो सुनेंगी। घर के किसी काम को हाथ ने लगायेंगी। यह योजना कितनी लाभदायक होगी, यह तो इसके क्रियान्वित होने के बाद ही पता चल सकेगा। लेकिन इसका उद्देश्य निस्सन्देह खरा है।
राजस्थान के सीकर जिले में टोडा गाँव कदाचित सारे राज्य में पहला ऐसा गाँव है जहाँ कोई प्रौढ़ निरिक्षक नहीं हैं। गाँव के सभी प्रौढ़ों को साक्षर बनाने के लिये ग्रीष्मावकाश में प्राथमिक पाठशाला के अध्यापकों द्वारा प्रौढ़ शिक्षा अभियान आयोजित किया गया था और इसके परिणामस्वरूप गाँव के सभी प्रौढ़ों को साक्षर बनाया जा चुका है।
अश्लीलता विरोधी आन्दोलन सर्वोदय कार्यकर्ताओं द्वारा देश भर में चलाया जा रहा है। दीवारों पर लगे हुए कुरुचिपूर्ण सिनेमाओं के पोस्टरों को हटाना तथा अश्लील साहित्य एवं चित्रों की होली जलाना इस आन्दोलन का एक जनप्रिय कार्यक्रम बन गया है।
विदिशा (मध्य प्रदेश) में सनातन धर्म विद्यार्थी परिषद ने ‘चोटी रखाओ आन्दोलन’ आरम्भ करने का निश्चय किया है। आन्दोलन का उद्घाटन करने के लिए लोकसभा के अध्यक्ष श्री अनन्त शयनम् आयंगर से प्रार्थना की गई है।
राजस्थान में प्रजातान्त्रिक विकेन्द्रीकरण के फलस्वरूप ग्रामीण जीवन में कितनी विचार क्राँति आई है उसका उदाहरण रतन नगर पंचायत समिति के बूटिया ग्राम पंचायत के सरपंच श्री हरिराम ने उपस्थित किया है। यहाँ के ग्रामीण क्षेत्रों में मृत्युभोज की मूढ़ परम्परा इतनी रुढ़ हो चुकी थी कि कोई उसे तोड़ने की हिम्मत नहीं करता था। किन्तु श्री हरिराम ने ग्रामीणों एवं निकट संबंधियों के घोर विरोध के बावजूद अपने पिता के दिवंगत होने पर उनका मृत्यु−भोज करने से सर्वथा इंकार कर दिया। श्री हरिराम एक संपन्न परिवार के व्यक्ति हैं तथा उनके दिवंगत पिता श्री टीकूराम भी बहुत प्रभावशाली थे। इस घटना की यहाँ काफी चर्चा है।
प्रयाग स्वराज्य भवन अब निराश्रित बच्चों और नवजात शिशुओं के आश्रम के रूप में चल रहा है। इसमें अधिकतर निराश्रित शरणार्थी बच्चे हैं जिनकी संख्या लगभग दो सौ है। स्वराज्य भवन में माताओं द्वारा लोक−लाज के भय से अपने किये पापों पर पर्दा डालने के लिए सड़कों के किनारे अथवा कूड़े पर फेंके गये नवजात शिशुओं के लिए एक अलग कक्ष है जिसमें इस समय लगभग 10 बच्चे हैं।
क्यूबा में गत वर्ष निरक्षरता के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी युद्ध छेड़ा गया। क्यूबा की 65 लाख जनसंख्या में से दस वर्ष से अधिक उम्र के कोई दस लाख व्यक्ति लिखना−पढ़ना नहीं जानते थे। यह तय किया गया कि उनको प्रारंभिक लिखना−पढ़ना आ जाना चाहिए। कोई 3 लाख कार्यकर्ता निरक्षरता निवारण की लड़ाई में कूद पड़े। माध्यमिक स्कूलों को एक वर्ष के लिए बन्द कर दिया गया और उनके सब छात्रों को शहरों और गाँवों में निरक्षरता के मोर्चे पर भेज दिया गया। इस राष्ट्रव्यापी युद्ध का यह नतीजा निकला कि अब क्यूबा में निरक्षरों की संख्या 3 प्रतिशत ही रह गई है। निरक्षरता के मोर्चे पर विजय प्राप्त करके लौटने वाले कार्यकर्त्ताओं का क्यूबा में शानदार स्वागत किया गया। विजयी सेना का स्वागत होना भी चाहिए। क्या हम क्यूबा के इस उदाहरण से कुछ सबक लेंगे? हमारे यहाँ बालकों को प्राथमिक शिक्षा देने का प्रयास तो किया जा रहा है, किन्तु प्रौढ़ों को साक्षर बनाने की दिशा में कुछ नहीं हो रहा है। जब सन् 37 में काँग्रेस ने मंत्रिमंडल बनाए थे, तो साक्षरता प्रसार का कार्यक्रम जोरों से चला था। अब भी प्रौढ़ों को साक्षर बनाने के लिए कुछ न कुछ विशेष कार्यक्रम अपनाया जाना चाहिए।
लन्दन की सर्वे रिपोर्ट है कि आज से सात सौ वर्ष पूर्व योरोप में 20 हजार कुष्ठ केन्द्र 1, 80, 70, 700 रोगियों की सेवा शुश्रूषा में व्यस्त थे। किन्तु अब वहाँ कुष्ठ रोगियों की संख्या 20 हजार से भी कम बताई जाती है। यह सब वहाँ की जनता के महान प्रयत्न एवं लगन से ही संभव हो सका है, सरकारी सहयोग तो इसमें मिला ही है।
इस प्रकार की सत्प्रवृत्तियाँ भारत में चल तो रही हैं पर उनकी स्थिति अभी दुर्बल ही है। अपने पिछड़े हुए देश में सुधारात्मक एवं रचनात्मक आन्दोलन अधिक सक्रिय होने चाहिएं।
समझा जाता है कि स्त्री और बच्चे कमजोर होते हैं, उनमें साहस नहीं होता। पर यह अनुमान सर्वथा सत्य नहीं है। प्रत्येक सद्गुण सभी श्रेणी के, सभी स्थिति के और सभी आयु के मनुष्यों में मौजूद रहता है। यदि उन्हें बढ़ने और विकसित होने के अवसर मिलें तो श्रेष्ठ प्रवृत्तियाँ सभी में—स्त्री, बच्चों में भी समुचित मात्रा में पनप सकती हैं।
समाचार पत्रों में ऐसे अनेक समाचार छपते रहते हैं जिनसे स्त्रियों और बच्चों में पाये जाने वाले साहस, धैर्य, पराक्रम, त्याग और महानता का प्रत्यक्ष परिचय मिलता है। इस देश की मिट्टी में सद्गुणों का प्रचुर प्रभाव छिपा पड़ा है। हमारे रक्त में सत्प्रवृत्तियों की धारा लाखों वर्षों से अपनी उत्कृष्ट संस्कृति के रूप में प्रवाहित हो रही है। आवश्यकता उसके उद्बोधन और जागरण की है। पुरुष तो बहुत कुछ कर ही सकता है पर सीमित क्षेत्र एवं सामर्थ्य होते हुए भी हमारी नारी और हमारे बालक तक अपनी महानता का कितना उत्कृष्ट परिचय दे सकते हैं इसके कुछ समाचार नीचे देखिए।
जबलपुर के बहुरीबंद गाँव की एक ग्रामीण महिला ने खूँखार बाघ से निहत्थे द्वन्द्व युद्ध करके अपने तीन वर्षीय बालक को बचा लिया। महिला ने साहस नहीं खोया उसने एक हाथ से बच्चे को पकड़े रखा और दूसरे हाथ से अपनी लाठी बाघ के मुँह में घुसेड़ दी। बाघ बच्चे को छोड़ कर भाग खड़ा हुआ और घायल बच्चे को अस्पताल पहुँचाया गया जहाँ उसकी जीवन रक्षा हो गई।
हिमाचल प्रदेश के एक गाँव की हरिजन महिला ने खेत पर काम करते हुए अपने पति को चीते द्वारा ग्रास बनाये जाने से बचा लिया। चीता जैसे ही पुरुष पर झपटा कि उसकी स्त्री कुल्हाड़ी लेकर उस दुर्दान्त पशु से भिड़ गई और कई प्रहार करके उसका काम तमाम कर दिया मण्डी के डिप्टी कमिश्नर ने इस वीरांगना को पुरस्कृत करके शासन की ओर से उसका सम्मान किया है।
सकल गढ़ के बैरारा गाँव की एक महिला ने उसका जेवर उतारते हुए एक बदमाश को पकड़ लिया और उसकी मूँछें जोर से पकड़ कर मूली की तरह उखाड़ ली। गोहाटी का समाचार है कि एक महिला से घर में छुप कर घुसे बदमाश ने जब बलात्कार करना चाहा तो महिला ने साहसपूर्वक उसके हाथ में लगा छुरा छीन लिया और उससे उसके गुप्त अंग ही काट डाले। घायल बदमाश की चिल्लाहट सुनकर लोग इकट्ठे हो गये और उसे पकड़कर पुलिस के सुपुर्द कर दिया।
ग्वालियर जिले के सेवरी गाँव में आये हुए डाकुओं का एक पति-पत्नी ने बड़े साहस के साथ मुकाबला किया। डाकू ने दम्पत्ति पर गोली चलाई पर वह निशाना चूक गई। इस पर दोनों ने मिलकर तमंचा छीनकर एक डाकू पकड़ लिया। शोर सुनकर ग्रामीण भी आ गये और डाकू पुलिस के सुपुर्द कर दिया गया। पुलिस सुपरिन्डेन्ट ने दम्पत्ति को वीरता के उपलक्ष में पुरुष को साफा कुर्ता और पाजामा तथा महिला को एक साड़ी पुरस्कार स्वरूप भेंट की।
प्रेरणा की पुँज महिलाएँ
बदाऊं की अबला स्त्रियों ने कर्मठता के क्षेत्र में सबल पुरुषों को चुनौती दे दी। मलखानपुर ग्राम के निवासियों को सलाह दी गई थी कि गाँव के समीप यदि 700 फुट लम्बा और 6 फुट ऊँचा बाँध बना दिया जाय, तो वहाँ वर्षा में पानी जमा न हो सकेगा। परन्तु आलसी ग्रामीण इस सुझाव के समीप भी न फटके। वर्षा का पानी गाँव में इस प्रकार जमा हो जाता था कि एक झील−सी बन जाया करती थी और हर साल एक न एक बच्चा उसमें अवश्य डूबता था। गतवर्ष मोहिनी नामक एक ग्रामीण महिला की 8 वर्षीय बच्ची इसी जल प्लावन की भेंट चढ़ गई थी। मोहिनी देवी ने भी ग्रामीणों को प्रेरित किया, किन्तु कोई भी इसके लिए तैयार न हुआ। तब मोहिनी देवी स्वयं हाथ में फावड़ा लेकर बाँध बनाने पर अकेली जुट गई। ग्रामीण महिलाओं ने अपने पतियों को धिक्कारा, पर उनके कान पर जूँ भी न रेंगी। इस पर ग्रामीण महिलाओं का एक समूह मोहिनी देवी की मदद के लिए आया। इन 36 महिलाओं ने चिलचिलाती धूप की तनिक भी परवा न कर अपना काम जारी रखा और सात दिनों में न केवल बाँध तैयार कर दिया, बल्कि उसके ऊपर 15 फुट चौड़ी सड़क भी तैयार कर डाली, जिसे उन्होंने कंकड़ों और पत्थरों से कूट−कूट कर पक्का भी कर दिया है।
देवास मंडल में ग्राम गूजर गाँव की एक महिला ने विकास कार्यों में अपनी रुचि एवं निष्ठा के कारण समूचे विकास कार्यक्रम को एक अपूर्व गति प्रदान कर दी है। गूजर गाँव की महिला श्रीमती सीताबाई ने अपने ग्राम को एक आदर्श ग्राम के रूप में परिवर्तित करने का संकल्प कर लिया है। उन्होंने ग्रामवासियों को साथ ले ग्रामीण मार्गों को कीचड़ से मुक्त करने हेतु बोल्डरों को बिछवाया एवं लगभग दो हजार रुपये का श्रमदान करवाया। लगभग 17 सौ रुपये की ग्राम−सहायता से एक पेय नलकूप तथा केवल श्रमदान से एक कुण्डी तैयार की गयी। ग्राम का शालाभवन तैयार हो चुका है तथा पंचायत भवन शीघ्र ही बनाया जाने को प्रस्ताव है। ग्राम को मुख्य सड़क से जोड़ने के लिये एक कच्ची सड़क बनाने का कार्य हाथ में ले लिया गया है। श्रीमती सीताबाई जो ग्राम की महिला सरपंच हैं, इन्हीं को यह श्रेय है कि ग्राम के झगड़े समाप्त हुए। एक महिला मंडल का भी आप संचालन कर रही हैं। इस प्रकार एक ग्रामीण महिला की प्रेरणा से न सिर्फ गूजरगाँव चहुँमुखी प्रगति के लिए कृतसंकल्प है; अपितु अन्य ग्राम भी यहाँ से प्रेरणा ग्रहण कर रहे हैं।
पिथौरागढ़ के समीप भारत तिब्बत सीमा पर स्थित चौंदस पट्टी के सिरखा और रुंगा गाँवों की महिलाओं ने भूमि कटाव से अपने मकानों को बचाने के लिए श्रमदान प्रारम्भ किया है। पहाड़ी नाले की तेज धार से, जो बरसात में बहुत तीव्र हो जाती थी, गाँव की भूमि निरन्तर कटती जा रही थी और कभी−कभी मकानों के अन्दर भी पानी भर जाता था। ग्रामवासियों को सुझाया गया कि नाले की धार की तीव्रता कम करने के लिए उस पर सीढ़ियाँ काटी जावें और पत्थर बिछाये जावें। कुछ आगे चलकर पानी के कटाव के लिए बड़ा गड्ढा बनाया जावे। परन्तु जब इस योजना को कार्यान्वित करने की बात आई तो इस गाँव के पुरुष हमेशा की तरह सीमा की मंडियों की ओर व्यापार के लिए चले गए थे। महिलाओं ने संगठित होकर भूक्षरण से गाँव की रक्षा का काम प्रारम्भ कर दिया और एक भारी संकट को टाल दिया।
साहसी और उदार मन बच्चे
जोधपुर जिले के चौकड़ी ग्राम में एक खूनी बघेरे ने 16 स्त्री−पुरुषों को घायल करके एक झोपड़ी में प्रवेश किया और वहाँ बैठे हुए एक व्यक्ति की गरदन पीछे से पकड़ ली। पास में बैठे हुए एक 9 वर्षीय बालक ने अद्भुत साहस का परिचय दिया। वह डरा नहीं वरन् घास काटने की करसी बघेरा के पेट में मारी। बालक लगातार करसी मारता ही रहा और बाद में उसका अन्त ही कर दिया।
नाथद्वारा के समीप साँपों का खेड़ा नामक गाँव में चीते ने बहुत उत्पात मचा रखा था। एक दिन दो लड़के बकरियाँ चराने जंगल में गये तो उस आठ फुट लम्बे चीते ने बड़े लड़के पर आक्रमण कर दिया। छोटे 9 वर्ष के बालक ने उस अवसर पर साहस से काम लेकर अपनी छोटी तलवार चीते के पेट में घुसेड़ दी और उसे मार डाला। रतलाम के पास खरसार गाँव के युवक शंकरलाल ने भी इसी प्रकार द्वन्द्व युद्ध करके तलवार से एक चीते को मारा।
हैदराबाद में करीम नगर के एक दस वर्षीय चिगुरु वेंकट नरसु नामक एक हरिजन लड़के को भारतीय बाल कल्याण परिषद् की ओर से एक राष्ट्रीय पदक प्रदान किया गया है। इसे यह पदक एक साहसपूर्ण कार्य के लिये दिया गया है, जो उसने गत जनवरी में किया था। गत जनवरी में उसने एक 6 वर्षीय लड़की को बचाया था, जो अकस्मात् कुँए में गिर गई थी। जिस समय वह बच्ची कुँए में गिर गई तो उसके साथ खेल रही एक अन्य बालिका तथा माँ ने शोर मचाया। वेंकट नरसु उस समय कहीं नजदीक में ही खेल रहा था। वह फौरन भागा आया और कुँए में कूद पड़ा। उसने बच्ची को बचा लिया। राज्य के शिक्षा मंत्री श्री एस. वी. पी. पट्टाभिराम राव ने इस साहसी लड़के को उक्त पदक से स्कूली बच्चों की एक सभा में विभूषित किया।
भारतीय शिशु कल्याण परिषद नई दिल्ली ने पश्चिमी गोदावरी जिले के इलुरु निवासी एक 16 वर्षीय लड़के कुमार पी. नरसिंह को असाधारण साहस दिखाने के लिए इस वर्ष के राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए छाँटा है। आन्ध्र प्रदेश शिशु कल्याण परिषद के अनुसार इस लड़के ने बुटगेसबरम गाँव में एक 60 वर्षीय वृद्धा को उसके जलते हुये मकान से बचाया।
ग्वालियर जिले के भितरवार नामक गाँव में एक आठ वर्ष का लड़का अपने पौच वर्ष के भाई को बचाने के लिये एक कुँए में कूद पड़ा। उसका छोटा भाई सहसा कुँए में गिर पड़ा था। अपने छोटे भाई को बचाने के प्रयत्न में असफल होने पर बड़े भाई ने जोरों से चिल्लाना शुरू कर दिया, जिससे गाँव के बहुत से लोग एकत्र हो गए और उन्होंने उन दोनों भाइयों को उस कुँए से निकाल लिया। अब वे दोनों भाई स्वस्थ हैं।
मथुरा के बाटी ग्राम में श्री वन्दनसिंह के 10 वर्षीय पुत्र रामजीत सिंह ने अपनी माँ के साथ स्नान करते समय डूबते हुये एक 7 वर्षीय बालक को बचाने का साहसिक कार्य किया, जिसकी सारे गाँव ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की और मंडल काँग्रेस के अध्यक्ष श्री मोतीलाल ने 10 रु. का पुरस्कार देकर बालक को प्रोत्साहन दिया।
रायपुर में एक पच्चीस वर्षीय नवयुवक की कल सायंकाल भिलाई के पास सुपेला नामक स्थान पर अपनी छोटी बहन को बचाते हुये रेल दुर्घटना में मृत्यु हो गई। दोनों भाई−बहन उक्त स्थान के पास रेलवे लाइन को पार कर रहे थे, कि एक इंजन भी उसी लाइन पर बड़ी रफ्तार से गुजर रहा था। भाई ने तत्परता से बहन को तो लाइन से बाहर धकेल दिया परन्तु स्वयं इंजन के नीचे आ जाने से दुर्घटना ग्रस्त हो गया। बहन को कोई चोट नहीं पहुँची।
जयपुर बाड़मेर में स्थानीय राजकीय मिडल स्कूल की 7 वीं कक्षा के 12 वर्षीय छात्र चेतनदास ने पिछले 4 वर्षों में अल्प बचत योजना में लगभग 450 रु. जमा कराए हैं। इस विद्यार्थी को अपने माता−पिता से न किसी प्रकार का जेब खर्च मिलता है और न इसने आज तक कभी अल्प बचत में जमा कराने के लिए द्रव्य ही माँगा है। यह धनराशि चेतनदास ने स्वयं अर्जित की है। विद्यार्थी ने अवकाश के समय में प्रतिदिन समाचार पत्रों की बिक्री करके जो धन कमाया है उसे नियमित रूप से अल्प बचत योजना में लगाकर अन्य विद्यार्थियों के लिये एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसके छोटे भाई ने, जो पाँचवीं कक्षा में पढ़ता है, पत्र पत्रिकाएँ बेचकर एक साइकिल भी खरीद ली है।
इन समाचारों से उस युग की याद हरी हो जाती है जब यहाँ कुन्ती जैसी नारी और अभिमन्यु जैसे बालक घर−घर में पाये जाते थे।
न युग नया है, न तप नया है, धरति उनीदी, मनुज उनींदा−
प्रगति−उषा की ललाट सृजा, अभी न रवि सूर्य का उदय हुआ है।
न जाने कितनी कलियाँ कुआरी हैं, न जाने कितनी गलियाँ रुआँसी—
अभी न पक्षी उडे गगन में न अभी डडडड गई है।
झुके पलक जागृति के अभी तक, नहीं सृजन के गले में फाँसी—
बड़ी स्वार्थ की जंजीर जो दृढ़, वही अभी तक खुली नहीं है।
अभी न मन की तृषा मिटी है, अभी न डर की व्यथा गई है—
समझ सके जो नम आँसुओं को, न ऐसे कवि का जनम हुआ है।
वही निशा है वही दिशा है, वहीं अपनी अनजान राहें—
वही मनुज है वही अनुज है, शकल सृष्टि न बदल सकी है।
खड़ी मसजिदें धरा पर, वही अजाने वहीं है भूले—
वही है मंदिर वही पूजारी, अभी न पूजा बदल सकी है।
सजी सजाई खड़ी पालकी, अभी न आई दुल्हिन सफलता−
अरे, किसी मनचले भ्रमर ने, अभी न कलि का हृदय छुआ है।
अभी न सागर में ज्वार आया, हँसी न श्रम की पूनम गगन पर−
अभी उमंगें अधरी सबकी, अभी न नजरें बदल सकीं हैं।
वही बहारें, वही खिजाँ है, वहीं सजायें, तनिक न अन्तरन साज बदला,
न राग बदला, न भावनायें बदल सकीं हैं।
अभी न बाँधे कफन सिरों पर, अभी मशालें जली नहीं है−
संभल, अरे−फिरसे अरिग्यों के, नवीन पवि का सृजन हुआ है।
−रामस्वरूप खरे
*समाप्त*