जीवन जन्म सुधार करुंगा।
धर्म-कर्म-रत रहूँ सदा मैं, प्यारे प्रभु से प्यार करुँगा॥1॥
तन को राखूँ स्वस्थ नियम से, मन को साध आत्म-संयम से,
स्वाध्याय-सत्संग न त्यागूँ, कभी नहीं कुविचार करुँगा॥2॥
बन विशुद्ध सेवा-व्रत-धारी, करुँ काम सब के हितकारी,
जनहित अपना स्वार्थ समझलूँ, जनता का उपकार करुँगा॥3॥
निज कर्तव्यों पर बलि जाऊँ, सद्गुण की संपत्ति बढ़ाऊँ,
तज आलस्य-प्रमाद सर्वथा, सज्जनता संचार करुँगा॥4॥
मानवता से प्रीति न तोडूँ, दुख के भय से नीति न छोडूँ,
अनौचित्य से मिले सिद्धि भी, उसे नहीं स्वीकार करुँगा॥5॥
अपने को उत्कृष्ट बनाऊँ, सभी बन्धुओं को अपनाऊँ,
परम पुनीत कार्य हित अपना, ज्ञान-प्रभाव निसार करुँगा॥6॥
दुर्व्यवहार समाप्त करुं मैं,श्रम की पूँजी प्राप्त करुँ मैं,
सादा जीवन अपनाऊँगा, अपना उच्च विचार करुँगा॥7॥
मैं हूँ अपना भाग्य-विधाता, बन जाऊँ युग का निर्माता,
‘अम्ब’ यही अभिलाषा मेरी, जगती का उद्धार करुँगा॥8॥
—पं. अम्बादत शर्मा ‘अम्ब’
जीवन-क्रम को सुव्यवस्थित रीति से चलाने के लिए आवश्यक साधनों में आरोग्य का स्थान सर्वप्रथम है। सुख, शाँति और प्रगति के साधनों को जुटाने के लिए स्वस्थ शरीर ही समर्थ हो सकता है। जब शरीर की शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं बुढ़ापा आ घेरता है अथवा रोगों के चंगुल में जकड़ जाता है तो मनुष्य की स्थिति दीन−हीन एवं आर्त कातर जैसी हो जाती है। युवावस्था में जो लोग सिंह की तरह गरजते और हिरन की तरह उछलते रहते हैं उन्हें वृद्धावस्था में शक्तियों के क्षीण हो जाने पर एक असहाय एवं लुञ्ज-पुञ्ज असमर्थ प्राणी की तरह छोटी-छोटी बातों के लिए दूसरों की सहायता के लिए तरसते देखा है। यों वृद्धावस्था शाँति की अवस्था है। यदि युवावस्था में शक्तियों का दुरुपयोग करके शरीर के जीवन तत्व को क्षत, विक्षत न कर लिया गया हो तो साधारणतः वृद्धावस्था में भी काम चलाऊ शक्ति बनी रहती है। 84 वर्ष के राजगोपालाचार्य, 72 वर्ष के जवाहर लाल नेहरू, 86 वर्ष के लोकनायक अणे, 100 वर्ष के विश्वेसरैया, 100 से अधिक के महर्षि कर्वे जैसे अगणित व्यक्ति ऐसे हैं जो वृद्ध कहे जा सकने की आयु के होते हुए भी तरुणों जैसी सक्षमता बनाये हुए हैं। इसके विपरीत 50 वर्ष की आयु के ऐसे व्यक्ति भी बहुत बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं जिनके लिए जिन्दगी भार हो रही है। शक्ति का भण्डार चुक जाने पर खोखला बना हुआ शरीर किसी भी आयु का क्यों न हो असहाय स्थिति को पहुँच जाता है और जीवित रहते हुए भी मृतक से अधिक दुख भुगतता है।
रोग जनित कष्ट
बीमारियों ने जिन्हें घेर लिया है उनके कष्टों का तो कहना ही क्या है। प्रत्येक रोग अपने साथ एक जलन, अशान्ति एवं पीड़ा लिये हुए होता है। रोगों की भिन्नता के कारण यह कष्ट न्यूनाधिक हो सकता है पर अशान्ति हर रोगी को रहती है। कुछ रोग ऐसे होते हैं जिनके शरीर में रहते हुए भी मनुष्य किसी प्रकार अपना दैनिक कार्य-क्रम चलाता रहता है और कुछ ऐसे होते हैं जिनकी तीव्र व्यथा के कारण चारपाई पकड़नी पड़ती है। आम तौर से रोगी उन्हें ही माना जाता है जो काम करने में असमर्थ होकर चारपाई पर गिर पड़ें, दर्द से कराहें, दूसरों की सहायता की अपेक्षा करें और जिनकी सहायता के लिए डाक्टर बुलाना पड़े। अब अस्वस्थता इतनी व्यापक होती चली जा रही है कि जो लोग किसी प्रकार अपनी देह को घसीटते ले चलते हैं, कष्ट को बाहर प्रकट न करके भीतर सहते रहते हैं उन्हें मोटे तौर से रोगी भी नहीं माना जाता। कुछ न कुछ व्यथा बनी रहना तो आज एक फैशन जैसा आम रिवाज हो गया है। कुल्ला, दातौन की तरह दवाओं का सेवन भी एक दैनिक आवश्यकता बनती जा रही है।
तीव्र और मन्द रोगों का अन्तर
रोग मन्द हो या तीव्र शरीर की शक्तियों का उत्पादन रोकता है और संग्रहीन बल को दिन-दिन नष्ट करता चलता है। मंद रोगों में यह विनाश प्रक्रिया धीरे-धीरे चलती है और मनुष्य अकाल मृत्यु की ओर धीरे-धीरे घिसटता चलता है। तीव्र रोगों में यह कार्य आँधी तूफान की तरह होता है और यदि समुचित रोक-थाम न हुई तो असह्य पीड़ा को सहता हुआ रोगी तेजी से दौड़ता हुआ काल के मुख में प्रवेश कर जाता है। जो लोग बीमारियों से ग्रसित हैं उनको जीवन धारण किये रहना ही एक समस्या है, जिन्दगी के दिन किसी प्रकार काट लें तो यही उनके लिए एक बड़ा पुरुषार्थ है,अन्यथा एक-एक दिन पीड़ा और परेशानी के कारण पहाड़ की तरह भारी मालूम पड़ता है। ऐसी परिस्थिति में फंसे हुए मनुष्य उन्नति और प्रगति की कल्पनाऐं ही कर सकते हैं, उसके लिए उन्हें वह अवसर कहाँ मिल पाता है जो स्वस्थ और पुष्ट शरीर वालों के लिए संभव होता है।
रोग मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह भीतर ही भीतर जीवन तत्व को चूसता रहता है और उसे ऐसा खोखला एवं निकम्मा बना देता है कि किसी दिशा में पुरुषार्थ करने की क्षमता शेष नहीं रही। प्रगति पथ में बाधा पहुँचाने वाली संसार में अनेक कठिनाइयाँ हैं, गरीबी, अविद्या, शत्रुता, शोषण, अविवेक, अनुपयुक्त शासन, अविवेक समाज, दैवी प्रकोप आदि बहुत से कारण ऐसे हैं जो मनुष्य की उचित प्रगति को रोकते हैं। आलस्य, असभ्यता, उत्तेजना, निराशा, मूर्खता आदि कई व्यक्तिगत दोष भी ऐसे हैं जो जीवन को ऊपर उठने नहीं देते और बार-बार नीचे दबोचते रहते हैं। पर इन सबसे बढ़कर मनुष्य का शत्रु रोग है। बीमार आदमी यदि सद्गुणी भी हो और साँसारिक परिस्थितियाँ प्रतिकूल न भी हों तो भी वह हीन स्थिति में ही पड़ा रहेगा। प्रगति के लिए जिस पुरुषार्थ की आवश्यकता है वह तभी बन पड़ता है जब शरीर निरोग हो। बीमार का सारा ध्यान अपनी व्यथा पर केन्द्रित रहता है। दिन काटने की आवश्यक बातें तो उसे विवश होकर पूरी करनी ही पड़ती है पर उन मजबूरियों से ऊपर उठकर मनः क्षेत्र में कुछ ऐसा उत्साह शेष नहीं रहता जिसके आधार पर उन्नति की किसी बड़ी योजना को पूरा किया जा सके।
जमा पूँजी का क्षरण
रोग के साथ-साथ क्षरण और कष्ट की प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है। देह में जो कुछ जमा पूँजी है, बीमारी उसे दिन-दिन घटाती और बर्बाद करती चलती है। कष्ट में कराहता हुआ बेचैनी और अशान्ति अनुभव करता हुआ मनुष्य क्या तो प्रगति की बात सोचेगा और क्या उस मार्ग पर दूर तक चल सकेगा? महत्वाकाँक्षी व्यक्ति आगे तो बढ़ना चाहते हैं उनकी कामनायें तो बड़ी-बड़ी होती हैं पर शरीर साथ नहीं देता। ऐसी दशा में वे शक्ति से बाहर खींचतान करके शरीर पर कुछ देर अत्याचार भी करते रहते हैं पर इतने से भी क्या काम बनने वाला था। पूरे पुरुषार्थ की शरीर में क्षमता नहीं होती, स्वल्प प्रयत्न से वह महत्वाकाँक्षाऐं पूरी नहीं होती ऐसी दशा में उन्हें निराशा, दुर्भाग्य, क्षोभ आदि के खीज भरे विचार और उठने लगते हैं जिससे एक विशेष प्रकार का मानसिक कष्ट और बढ़ जाता है।
शरीर बल की अपेक्षा
आजीविका उपार्जन के लिए अच्छे अवसर प्राप्त कर सकना मनुष्य के लिए ही संभव है। क्या व्यापार,क्या नौकरी दोनों ही कार्य शरीर बल की अपेक्षा रखते हैं। विद्या और बुद्धिबल बढ़ाने के लिए जिस शिक्षण और अध्यवसाय की जरूरत है वह भी निरोग रहने पर ही बन पड़ता है। समाज सेवा, परमार्थ, साधना, भजन, ध्यान, धर्म−कर्म जैसे पुण्य कर्मों के लिए जिस मनोबल की आवश्यकता है वह अस्वस्थ रहने वालों में कहाँ होता है। थोड़ी खींचतान कर गाड़ी आगे चलाते हैं पर दूर तक वह भी चल नहीं पाती। यश कीर्ति की कामना करने वालों को जो त्याग करना पड़ता है उसके लायक अस्वस्थ व्यक्ति में न तो साहस होता है और न साधन ही जुड़ पाता है। मौज-मजा करने की कामना भी ऐसे लोग कहाँ पूरी कर पाते हैं। विनोद और मनोरंजन के लिए अवकाश की भी जरूरत पड़ती है और मनः स्थिति की भी, यह दोनों ही बातें अस्वस्थता की स्थिति में नहीं बन पड़ती। इन्द्रियों की शक्ति घट जाने से कोई भी रोग भोगते हुए दूनी पीड़ा बढ़ जाने की आशंका सामने खड़ी रहती है। इस प्रकार आशा और आनंद के सभी द्वार रोगी व्यक्ति के लिए अवरुद्ध बने रहते हैं।
अस्वस्थता की अन्तर्व्यथा
संसार में कोई महत्वपूर्ण काम करने की, उन्नति एवं सफलता की, आनन्द उल्लास की, सन्तोष और शान्ति प्राप्त करने की आकाँक्षा हर व्यक्ति को रहती है पर कितने लोग हैं जो अपना अभीष्ट मनोरथ पूरा कर पाते हैं? इन मन मसोस कर असफल रहने वाले व्यक्ति यों में से अधिकाँश वे होते हैं जिन्हें अस्वस्थता घेरे रहती है। उनके लिए न तो अपने लिए प्रसन्नता प्राप्त करना संभव होता है और न अपने परिवार की कोई महत्वपूर्ण सेवा बन पड़ती है। रोगी की सेवा में घर के लोगों को समय लगाना पड़ता है। यह परिचर्या किन्हीं बिरले ही मनस्वी व्यक्तियों को रुचती है अन्यथा सब लोग हँसते-खेलते वातावरण में रहना पसंद करते हैं और दुखी बीमार की मनोव्यथा के सम्पर्क में आकर अपने को उदास बनाने से बचना चाहते हैं। कुछ समय तो भले ही उत्साहपूर्वक रोगी की सेवा बन पड़े पर देर तक उसमें लगना पड़े तो घृणा और खिन्नता उत्पन्न होती है। रोगी की परिचर्या करने वाले घर के लोग बाहर से भले ही शिष्टाचार बरतें, पर भीतर ही भीतर घृणा और खिन्नता के भाव भरे रहते हैं। इस प्रकार की मनोभावनाओं के बीच रोगी अपने दिन काट सकता है पर शान्ति एवं प्रसन्नता अनुभव नहीं कर सकता। छूत का भय, घर और वस्त्रों में बढ़ने वाली गंदगी, परिचर्या में लगने वाला समय, कष्टमय वातावरण की मनहूसियत, दवा दारु का खर्च, उपार्जन में कमी आदि का चिड़चिड़ापन आदि कितनी ही बातें ऐसी उत्पन्न हो जाती हैं जिससे रोगी व्यक्ति से उसके घर वाले भी खिन्न रहते हैं और उसके सम्पर्क में आने से कतराने एवं पीछा छुड़ाने की भावनाएं व्यक्त करने लगते हैं। ऐसी परिस्थितियों से घिरा हुआ रोगी जो अपने आपके लिए ही भार रूप है, क्या अपने परिवार की सेवा करेगा? और क्या उन्हें सुखी रखेगा?
अस्वस्थता की भयंकरता
रोग को आज जिस प्रकार एक फैशन मान लिया गया है और उसकी हानियों को गंभीरता से न सोचने का जो स्वभाव बनता जा रहा है वह बीमारी से भी अधिक भयंकर है। किसी चीज को हटाने या मिटाने का प्रयत्न मनुष्य तभी करता है जब उसकी भयंकरता और हानियों को भली प्रकार समझे। बीमारी और कमजोरी मानव जीवन की सबसे बड़ी क्षति है। लोग धन की हानि को प्रधानता देते हैं पर वस्तुतः स्वास्थ्य की हानि ही सबसे बड़ी हानि है। कमाई में लोग, धन सम्पत्ति या प्रतिष्ठा को सब कुछ समझते हैं पर यह भूल जाते हैं कि स्वस्थ शरीर के बिना न तो किसी भी बड़ी सफलता को उपलब्ध किया जा सकता है और न उसे स्थिर रखा जा सकता है। विभूतियाँ उसी के पास ठहरती हैं जो उनकी सुरक्षा रखने में समर्थ हैं। दुर्बल व्यक्ति को लक्ष्मी ही नहीं विभूति तिरस्कृत करती हुई विदा हो जाती है। इसलिए लक्ष जो भी हो उसे प्राप्त करने एवं सुरक्षित रखने के लिए सर्वोपरिसाधन स्वास्थ्य की चिन्ता, अभिवृद्धि एवं सुरक्षा करनी ही चाहिए।
स्वास्थ्य की उपयोगिता हमें समझनी चाहिये और यह भी जानना चाहिए कि इस बहुमूल्य विभूति को खो देने पर मनुष्य मणिहीन सर्प की तरह निस्तेज हो जाता है। उपेक्षा करने से हर चीज घटती और नष्ट होती है। हमारे स्वास्थ्य का विनाश भी इस बुरी आदत के कारण ही होता है कि हम स्वास्थ्य की उपयोगिता की ओर ध्यान नहीं देते और न यह सोचते हैं कि उसकी क्षति जीवन की कितनी भयानक क्षति है। यदि इस ओर हमारा समुचित ध्यान हो तो जिस प्रकार धन दौलत की चिन्ता में बहुत सारा समय लगाते हैं उसी प्रकार आरोग्य की रक्षा के लिए क्यों समय न लगावेंगे? क्यों ध्यान न देंगे? जिस ओर ध्यान दिया जायेगा उस ओर प्रगति का होना अवश्यम्भावी है। मनुष्य का चित्त एक जादू भरी शक्ति अपने अन्दर छिपाये बैठा है। उस शक्ति को जिस दिशा में भी प्रयुक्त किया जाने लगे उसी ओर भारी सफलता के उपकरण देखते-देखते इकट्ठे होने लगते हैं।
गम्भीर एवं महत्त्वपूर्ण समस्या
जिस प्रकार बिना विद्या पढ़े कोई विद्वान नहीं बन सकता, उसी प्रकार स्वास्थ्य की दिशा में जागरुक रहे बिना और उसकी सुरक्षा के लिए सचेष्ट रहे बिना कोई व्यक्ति न तो निरोग रह सकता है और न दीर्घजीवी बन सकता है। इसलिए जिन्हें जीवन से प्यार है। जो मनुष्य जीवन का कुछ लाभ लेना चाहते हैं उन्हें सबसे प्रथम एक ही काम करना चाहिए कि स्वास्थ्य के महत्व पर गम्भीरतापूर्वक विचार करें, उसके अभाव में होने वाली हानियों तथा स्वस्थ शरीर की संभावनाओं पर देर तक सोचें। यदि यह महत्व ठीक तरह समझ में आ जाय तो हम आरोग्य को प्राप्त करने के लिए सच्चे मन से सचेष्ट होंगे और तब दुर्बल शरीर को सबल बनाना और रोगों से छुटकारा प्राप्त करना कुछ भी कठिन न रहेगा।
किसी वस्तु को नष्ट करना आसान है पर बनाना कठिन है। किसी बड़े कारखाने को आग लगाकर कुछ घण्टों में बर्बाद किया जा सकता है पर नये सिरे से उसे खड़ा करना मुश्किल है। किसी बड़ी इमारत को तोड़ना हो तो कुछ मामूली श्रेणी के अनजान मजदूर भी कुछ दिन में उसे तोड़ सकते हैं पर यदि नये सिरे से मकान बनाना हो तो कुशल कारीगरों की, बहुत सामान की जरूरत पड़ेगी और बहुत दिन उस निर्माण में लगेंगे। इसी प्रकार स्वास्थ्य को नष्ट कर डालना सुगम है पर उसे बनाने के लिए, सुरक्षित रखने के लिए तथा बढ़ाने के लिए बहुत प्रयत्न करने का आवश्यकता पड़ती है।
उपेक्षा से बर्बादी
उपेक्षा और लापरवाही स्वास्थ्य की बर्बादी का प्रधान कारण है, उस कारण को ठीक किये बिना कोई व्यक्ति न तो अपने बिगड़े हुए स्वास्थ्य को सुधार सकता है और न स्वस्थ शरीर को देर तक सुरक्षित रख सकता है। उपेक्षा के गर्त में पड़ी हुई हर वस्तु नष्ट होती है, जिस चीज की भी साज सँभाल न की जायगी वही कुछ दिन में बिगड़ने लगेगी और संभाल कर रखने पर वह जितने दिन जीवित रहती उसकी अपेक्षा लापरवाही का तिरस्कार सहकर कहीं जल्दी टूट फूट जायगी। लोग अपने धन दौलत की चौकसी रखते हैं, खेती बाड़ी की, कोठी गोदाम की रखवाली का समुचित ध्यान रखते हैं पर आरोग्य जैसी अमूल्य सम्पत्ति की ओर सर्वथा उपेक्षा धारण किये रहते हैं। ऐसी दशा से शरीर यदि दिन-दिन क्षीण होता चले तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं है।
सूक्ष्म एवं महत्वपूर्ण यंत्र
शरीर एक मोटर के समान है। जिसमें अनेकों सूक्ष्म यंत्र लगे हुए हैं। ड्राइवर यदि उन यंत्रों के संबंध में सावधानी बरते और उन्हें ठीक तरह काम में ले तो वही मोटर देर तक चलती है। अनाड़ी ड्राइवर, जिसे तेज दौड़ाने का तो शौक है पर इस बात का ध्यान नहीं हो कि क्या-क्या सावधानी बरतना आवश्यक है, वह मोटर को थोड़े ही दिनों में बर्बाद कर देगा। इंजन के कीमती पुर्जे अपने चलाने वाले से इस बात की अपेक्षा करते हैं कि उनकी क्षमता से अधिक भार न पड़ने दिया जाय। अत्याचार से हर चीज नष्ट होती है फिर वे बेचारे पुर्जे भी अपवाद क्यों होंगे? अनाड़ी ड्राइवर जिस प्रकार असावधानी के कारण कीमती मोटर को भी कुछ दिन में कूड़ा बना देता है उसी प्रकार शरीर के साथ लापरवाही बरतने वाले, अत्याचार करने वाले लोग भी कमजोरी और बीमारी के शिकार होकर अकाल मृत्यु के मुख में चले जाते हैं। चतुर ड्राइवर जिस प्रकार पुरानी मोटर से भी बहुत दिन काम ले लेते हैं उसी प्रकार शरीर के प्रति सावधानी बरतने वाले दुर्बल मनुष्य भी अपनी सामान्य शारीरिक स्थिति से भी बहुत दिन तक काम चलाते रहते हैं।
सुरक्षा और सावधानी
महात्मा गाँधी का वजन 96 पौंड था। शरीर की दृष्टि से दुर्बल और स्वल्प सामर्थ्य वाले थे, यदि कोई दूसरा असंयमी व्यक्ति उनकी जैसी शारीरिक स्थिति में होता तो वह अधेड़ होने तक रोगों में ग्रस्त होकर मरखप गया होता। पर गाँधी जी ने जीवन का महत्व समझा। शरीर को भगवान की सौंपी हुई एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अमानत मानकर उसके द्वारा समुचित सत्कर्म करने का निश्चय किया तो उन्हें यही उचित प्रतीत हुआ कि सबसे प्रथम शरीर की सुरक्षा पर ध्यान दिया जाय। उन्होंने 36 वर्ष की आयु में ब्रह्मचर्य का व्रत लिया, भोजन पर से स्वाद की दृष्टि बदली और औषधिरूप से उपयोगी से उपयोगी आहार ही लेना आरम्भ कर दिया, दैनिक क्रियाकलापों में प्राकृतिक नियमों का पालन और मन का संतुलन रखने का दृढ़ निश्चय कर लिया, फलस्वरूप वे दुबले-पतले शरीर को लेकर ही दीर्घ जीवन एवं निरोग शरीर का लक्ष प्राप्त करने के लिए तेजी से बढ़ने लगे। यदि दुर्घटना घटित न हुई होती—गोली काण्ड का शिकार उन्हें न बनना पड़ा होता तो वे शारीरिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण आदर्श लोगों के सामने रखने जा रहे थे। अस्सी वर्ष की आयु में उनका शारीरिक संस्थान एवं जीवन क्रम ऐसा संतुलित चल रहा था कि बीमार पड़ने का कोई प्रश्न ही न था। वे एक सौ बीस वर्ष अवश्य जी सकते थे। पर दैव-दुर्विपाक को क्या कहा जाय?
प्रकृति की मर्यादाओं का पालन
सृष्टि के समस्त जन्तुओं पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि ये प्राणी भले ही अल्प बुद्धि हों पर प्रकृति की मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते। फल स्वरूप वे जन्म के दिन से लेकर मृत्यु के दिन पर्यन्त निरोग जीवन ही जीते हैं। जंगली जानवरों से वन प्रदेश भरा रहता है क्या शाकाहारी, क्या माँसाहारी सभी पशु आनन्द की किलकारियाँ भरते हुए निरोग जीवन व्यतीत करते हैं। पक्षियों को लीजिए तितली, मक्खी से लेकर बड़े-बड़े पक्षियों तक कोई भी बीमार पड़ते नहीं देखे जाते। बुढ़ापे से संत्रस्त, दुर्बलता से ग्रसित, बीमारियों के पाश में जकड़ा हुआ कभी कोई जीव-जन्तु नहीं देखा जाता। समय आने पर मरते तो सभी हैं, पर मनुष्य की तरह सड़ते और कराहते रहने का कष्ट किसी को नहीं भुगतना पड़ता। मनुष्य ने प्राकृतिक मर्यादाओं का उल्लंघन करते रहने की जो ठान ठानी है उसी के फलस्वरूप उसे नाना प्रकार के रोगों में ग्रसित होना पड़ता है। अपनी बुरी आदतें उसने अपने बन्धन में बंधे हुए जिन पशु पक्षियों को भी सिखा दी हैं, उनको प्रकृति के विपरीत अनुपयुक्त आहार-विहार करने को विवश किया है वे भी बीमार पड़ने लगे हैं। सभ्यताभिमानी मनुष्य ने अपना ही स्वास्थ्य नहीं गँवाया है वरन् अपने आश्रय में आये हुए अन्य जीवों की भी ऐसी ही दुर्दशा की है।
सभ्यता की घुड़दौड़
प्रकृति के अनुकूल जब तक मनुष्य चलता रहा तब तक वह स्वस्थ और निरोग जीवन व्यतीत करता रहा। हमारे पूर्वज कई-कई सौ वर्षों तक जीवित रहते और इतने बलवान होते थे कि उनके शारीरिक पराक्रमों की गाथाऐं सुनकर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है। यह स्थिति दिन-दिन दुर्बल होती चली गई। इसका एक मात्र कारण यही रहा है कि सभ्यता की घुड़दौड़ में पड़कर कृत्रिमता को अपनाया गया और वह कृत्रिमता आहार-विहार में भी गहराई तक प्रवेश करती गई। शरीर के यन्त्र इसी ढंग से बने हुए हैं कि वे प्राकृतिक आहार-विहार के आधार पर ही ठीक प्रकार काम करते रह सकते हैं। उन पर बलात्कार किया जायेगा तो फिर उन अंगों का असमर्थ और रुग्ण हो जाना स्वाभाविक है। सभी जीव जन्तु स्वाभाविक स्थिति में उपलब्ध होने वाला आहार उसके मूल रूप में ग्रहण करते हैं। घास खाने वाले जानवर घास को और माँस खाने वाले जानवर माँस को पकाते, उबालते, तलते, भूनते नहीं हैं। चिड़िया दाने बीनती है या कीड़े-मकोड़े खाती है। मनुष्य का आहार अन्न, कंदमूल, फल, शाक, दूध, शहद आदि हैं। पर उसका लाभ तभी है जब उसे प्राकृतिक रूप से लिया जाय। भूनने, पकाने, तलने, जलाने की क्रियाओं में खाद्य के जीवन तत्व अग्नि द्वारा नष्ट हो जाते हैं और फिर कोयला जैसी निस्सार स्थिति में पहुँचा हुआ आहार खाना पड़ता है। पूड़ी, पकौड़ी, मिठाई, अचार, चटनी और नाना प्रकार के व्यंजन जो आज हमारी थाली की शोभा बढ़ाते हैं और बहुत जायका ले ले करके खाये जाते हैं उनके जीवन तत्व नष्ट हो जाते हैं। बहुत पैसा खर्च करके जीवन तत्व से रहित निर्जीव जैसा आहार खाकर भले कैसे आशा की जाय कि उसमें से हमें स्वास्थ्यप्रद तत्वों की उपलब्धि होगी।
सन्तानोत्पादन का उत्तरदायित्व
ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में समस्त विश्व के जीव−जन्तुओं की एक सुदृढ़ परम्परा है कि क्रीड़ा या विनोद के लिये कोई भी प्राणी कभी काम सेवन नहीं करता। मादा को जब सन्तानोत्पत्ति की प्रकृति प्रदत्त प्रेरणा होती है तभी वह नर के सामने अपनी वासना प्रकट करती है, तभी नर उसे सन्तुष्ट करने के लिए उत्तेजित होता है। नर की ओर से अनिच्छुक मादा के सामने कभी काम प्रस्ताव नहीं होता। इसी प्रकृति मर्यादा के बन्धनों में बँधे हुए प्राणी अपने ओजस् और पराक्रम की रक्षा कर पाते हैं। मनुष्य ने इस दिशा में जितनी अति बरती हैं, मर्यादाओं का जितना उल्लंघन किया है उसे देखते हुए अस्वस्थता का जितना दंड मिल रहा है उसे कम ही कहा जा सकता है। रात को देर तक जागना, दिन को देर तक सोना, बिजली की तेज रोशनी से आँखों पर दबाव, कपड़ों से शरीर को लादे रहकर स्वच्छ हवा से रोम कूपों से वंचित रखना, शारीरिक परिश्रम की अधिकता या कमी औषधियों की भरमार आदि कितने ही ऐसे कारण हैं जो स्पष्टतः प्रकृति विरोधी आचरण कहे जा सकते हैं और जिनका स्वास्थ्य के ऊपर निश्चित रूप से अहितकर प्रभाव पड़ता है।
इन बुराइयों को यदि मनुष्य आँखें मूँदकर अपनाये रहे और प्रकृति की मर्यादाओं का पालन करने में सावधानी न बरते तो फिर उसकी शारीरिक स्थिति का ईश्वर ही रक्षक है। जिन्हें अपने जीवन से प्यार रहा है उनने सबसे पहला कार्य एक ही किया है कि अपनी प्रकृति विरोधी बुरी आदतों को छोड़ने और अपने आहार विहार को सुधारने में दृढ़ता एवं कठोरता से साथ आत्म नियंत्रण के लिए कदम उठाया है। जो आदतों के गुलाम हैं, इन्द्रिय लोलुपता पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते, जीभ के चटोरेपन को रोकने की जिनकी इच्छा नहीं होती, ब्रह्मचर्य का महत्व जो नहीं समझते वे कभी निरोग न रह सकेंगे? निरन्तर अपराध करने वाला अपराधी सजग शासन में देर तक स्वेच्छाचार नहीं कर सकता। उसे दण्ड का भागी बनना ही पड़ता है। इसी प्रकार प्रकृति के शासन में स्वेच्छाचारी बनने वाले निरंकुश लोग दण्ड के भागी बनें और रोगों की नारकीय योजनायें सहें तो इसमें आश्चर्य की क्या बात होगी?
स्वेच्छाचार का दण्ड
जिनने अपने स्वेच्छाचार के फलस्वरूप रोगों का दण्ड पाया है उनके लिए यही उचित है कि सच्चे हृदय से प्रायश्चित करते हुए अपनी आदतों और गति विधियों को सुधारते हुए प्राकृतिक जीवनयापन की सौम्य पद्धति को अपनावें। पर देखा जाता है कि लोग इसके लिए तैयार नहीं। वे चाहते हैं कि हमारा स्वेच्छाचार ज्यों का त्यों कायम रहे। रोग के निवारण के लिए कोई जादू जैसी दवा मिल जाय तो पेट में जाते-जाते सारे रोगों को छू मन्तर कर दे। इसी आशा से वे एक के बाद दूसरे डाक्टर के पास दवाऐं और सुइयाँ लेने के लिए मंडराते रहते हैं। प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं होता। दवाऐं कुछ देर के लिये रोग को छिपा देती हैं, उनका असर जैसे ही दूर हुआ कि रोग उसी रूप में या अन्य रूप में उभर आता है। एक मर्ज अच्छा हो नहीं पाया कि दूसरे नये रोग की शुरुआत हो गई। इसी कुचक्र में झूलते हुए लोगों की सारी जिन्दगी बीत जाती है।
तात्कालिक नहीं स्थायी उपचार
किसी कष्ट विशेष को दूर करने के लिए तात्कालिक उपचार के रूप में दवा कारगर हो सकती हैं पर उनके आधार पर खोये हुए स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त कर सकता सर्वथा असंभव है। इसके लिए धैर्य और साहस से काम लेना पड़ेगा। जिस मकान को गिराने में आठ दिन लगे उसे यदि फिर से बनाना या ठीक करना हो उसमें निश्चय ही उससे दूने, चौगुने दिन लगेंगे। स्वास्थ्य को खराब करने में हमने इतने वर्षों तक शरीर पर निरन्तर अत्याचार किया है तो उसके सुधार में भी कुछ तो देर लगेगी ही। फिर भी जिस प्रकार टूटी मोटर की मरम्मत हो जाने के बाद भी उसकी अधिक साज संभाल रखनी पड़ती है उसी प्रकार खोये स्वास्थ्य को प्राप्त कर लेने के बाद भी अपेक्षाकृत अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होगी।
उतावली न की जाय
जो रोगी या दुर्बल शरीर वाले व्यक्ति स्वास्थ्य सुधारने के लिए अत्यधिक उतावले होते हैं,चन्द दिनों या कुछ घण्टों में जादू मन्त्र की तरह पूर्ण निरोगिता चाहते हैं वे उतावले बच्चों की तरह हैं जो हथेली पर सरसों जमाना चाहते हैं और अन्त में निराशा एवं खिन्नता अनुभव करते हैं। हममें से हर एक को यह जान लेना चाहिए कि स्वास्थ्य सुधार एक साधना है। बिगड़े हुए शरीर को रोग रहित और सतेज बनाने के लिए तप करने की आवश्यकता होती है। आत्म नियंत्रण करके अपनी बुरी आदतों पर विजय प्राप्त करने एवं प्रकृति का अनुसरण करते हुए अपने आपको मानवोचित विधि व्यवस्था में ढालने के लिए जो लोग दृढ़तापूर्वक कदम उठाने का साहस कर सकें उन्हें ही स्वस्थ शरीर का दिव्य वरदान प्राप्त करने की आशा करनी चाहिए। जिन्हें इतना धैर्य न हो, उन्हें मृगतृष्णा में भटकते हुए हिरन की तरह अपनी शक्तियों को बर्बाद करते रहने और पग-पग पर पछताते हुए जादू भरे इलाज की खोज में लगा रहना चाहिए। उनकी बालबुद्धि को इसी में सन्तोष मिल सकता है चाहे वह क्षण स्थायी ही क्यों न हो।
मनुष्य की अनेक मानसिक दुर्बलताओं में एक बहुत बुरी दुर्बलता यही है कि वह उचित मूल्य चुकाये बिना बहुत जल्दी में, बहुत आसानी से, बहुत कुछ प्राप्त कर सकना चाहता है। इसी का नाम लालच है। इस संसार में हर काम एक नियम, क्रम और व्यवस्था के अनुसार चल रहा है। सूर्य, चन्द्रमा तारे पृथ्वी सब अपनी यात्रा एक पूर्ण सुव्यवस्थित गतिविधि के आधार पर चलाते हैं। यदि उनकी चाल में क्षणभर का भी अन्तर आ जाय तो प्रलय जैसे अवसर उपस्थित हो सकते हैं। पृथ्वी, जल, हवा, अग्नि, आकाश पाँचों तत्व अपने गुण धैर्य को अत्यन्त दृढ़तापूर्वक धारण किये न रहें तो इस संसार का सारा संचार क्रम की अस्त-व्यस्त हो जाय। गेहूँ से गेहूँ, मनुष्य से मनुष्य और पशु से पशु उत्पन्न होने की, समय पर ऋतु के आने की, पुण्य और पाप का समुचित परिणाम मिलने की व्यवस्था यदि संसार में न रहे, सब कुछ अनियमित होने लगे तब तो इस दुनियाँ का काम एक दिन के लिए भी चलना कठिन हो जाय। निश्चय ही भगवान का विधान या प्रकृति की व्यवस्था पूर्ण सुव्यवस्थित है और यहाँ हर काम उचित समय पर उचित श्रम से, उचित व्यक्तियों द्वारा, उचित साधनों से पूर्ण होता है। किन्तु लालची लोग चाहते हैं कि हमारे लिए सृष्टि का नियम बदल जाय और जैसे हम चाहते हैं तुर्त-फुर्त हमारा उद्देश्य पूरा हो जाय।
स्वस्थ शरीर का सच्च सुख
स्वस्थ शरीर में अपार सुख हैं और सुख का लाभ हर कोई उठाना चाहता है। पर खेद है कि उसका उचित मूल्य चुकाने के लिए कटिबद्ध होने की अपेक्षा लोग कोई पगडंडी ढूँढ़ते हैं जिससे उन्हें लम्बी यात्रा न करनी पड़े और काम जल्दी ही बन जाय। इस लालच में बहुत से लोग कुछ उपाय सोचते और कुछ तरकीबें भिड़ाते रहते हैं फिर भी सृष्टि के नियमों को बदल सकने में अब तक किसी को सफलता नहीं मिली। उचित मूल्य चुकाकर ही महत्वपूर्ण वस्तु के लेने का क्रम ज्यों का त्यों बना हुआ है। व्यतिक्रम करने वाले जल्दबाज लोग समय-समय पर तरकीबें सोचते रहते हैं पर अन्ततः उन्हें निराश ही होना पड़ता है।
जादू के खेल मनुष्य की लालची वृत्ति की तृप्ति का एक मनोरंजक पहलू हैं। लोग चाहते हैं कि मिट्टी से रुपया बन जाय, झोली में से जानवर पैदा होने लगें, हथेली पर सरसों उग आवे, डिब्बी में से मिठाई पैदा होने लगे। बाजीगर इन बातों को इसी प्रकार करके दिखा भी देता है। पर वह सफलता देखने भर की होती है। बाजीगर आँखों में धूल झोंककर भुलावा देकर दर्शकों को थोड़ी देर के लिए बहका भर देता है, वे कुछ समय तक खुश भी हो जाते हैं, पर अन्ततः उसका परिणाम समय की बर्बादी और निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। बिना श्रम के रुपया, मिठाई, पौधे, जानवर आदि उपलब्ध करने की आकाँक्षा असफल ही रह जाती है। यदि इतनी जल्दी यह सब काम हो सके होते तो बेचारा बाजीगर क्यों दर-दर मारा फिरता, वह तो स्वयं ही कब का लखपती, करोड़पति बन गया होता। पर करे क्या, सारी बुद्धि लड़ाकर भी वह बेचारा प्रकृति के कठोर नियमों का उल्लंघन करने में समर्थ कहाँ हो पाता है। बाजीगरी केवल बच्चों का मन बहलाने का खेल बनकर रह जाती है। रुपया, मिठाई, पौधे, जानवर आदि दुनियाँ में जो लोग प्राप्त करते हैं वे बाजीगरी से नहीं, उचित श्रम के आधार पर प्राप्त करते हैं। बुद्धिमान लोग इस तथ्य को भली प्रकार जानते हैं इसलिए वे उचित मूल्य देकर अभीष्ट वस्तु प्राप्त करने की योजना बनाते हैं और अपना अभीष्ट मनोरथ पूरा करते हैं।
उचित मूल्य अनिवार्य है
स्वास्थ्य सुधार का मनोरथ जितना ही महत्व पूर्ण है उतना ही बड़ा उसका मूल्य भी है। जिनने भी अपने बिगड़े स्वास्थ्य को बनाया है, बने स्वास्थ्य को बढ़ाया है उनने उचित मूल्य चुकाने में आना कानी नहीं की है। जिन नियमों के तोड़ने से स्वास्थ्य खराब होता है उनके पालन से ही गलती में सुधार हो सकता है। गलती को दुहराते रहा जाय और किसी चालाकी से बात की बात में स्वास्थ्य की संपदा मिल जाय ऐसा सोचना किसी बुद्धिमान के लिए नहीं, लालची व्यक्ति के लिए ही उचित है। लालची पाता कुछ नहीं खोता बहुत है। ठग विद्या इसी तथ्य पर ठहरी हुई है। ठग लोग मनुष्यों की लालची प्रवृत्ति को जानते हैं, वे जिसमें अधिक लालच भाँपते हैं उसी पर अपना जाल फैला देते हैं और उसे बुरी तरह ठग लेते हैं। ठगों द्वारा लोगों को ठगने की नई-नई तरकीबें प्रयोग की जाती रहती हैं सब के मूल में एक ही तथ्य रहता है कि—किसी भोले लालची आदमी को बहुत जल्दी अत्यधिक लाभ मिलने की बात बताई जाय। लोभ में अन्धे मनुष्य का विवेक कुंठित हो जाता है। वह यह सोच नहीं पाता कि इतनी जल्दी, इतने स्वल्प प्रयास में इतना अधिक लाभ भला किसी प्रकार हो सकता है बेचारा बहक जाता है, ठग उसे अपने जाल में फंसा लेते हैं और वह नासमझ बहुत कुछ खोकर पछताता हुआ हाथ मलकर रह जाता है। घटनाऐं भिन्न-भिन्न प्रकार हो सकती हैं पर सारी ठग विद्या की मूल प्रक्रिया यही रहती है। हर ठगे जाने वाले को यही तथ्य दुहराये जाते हैं।
जादू जैसी तरकीबें
स्वास्थ्य के बारे में भी यही लालची प्रवृत्ति मनुष्यों में पाई जाती है। वे ऐसी तरकीबों के ही पीछे पड़े रहते हैं जिनसे वर्षों तक शरीर पर अत्याचार करके उसे बिगाड़ने में जो अस्वास्थ्यकर परिणाम सामने आये हैं, उन्हें क्षण भर में सुधार लिया जाय। इसके लिए एक ही तरकीब उन्हें सूझ पड़ती है, वह है—‛दवा’। दवाओं के विज्ञापनबाज अपनी मामूली सी चीज का लाभ, उसकी वास्तविकता की अपेक्षा सैकड़ों हजारों गुना बढ़ा चढ़ाकर बताते हैं। लम्बे-चौड़े आश्वासन देते हैं। अच्छे हुए लोगों के प्रमाणपत्र छापते हैं। दीवारों को पोस्टरों से और अखबारों को विज्ञापनों से भर देते हैं। सूचीपत्र, पर्चे, पोस्टर, पेम्पफलेट आदि अगणित विज्ञापन साधनों की गोलाबारी से बेचारा मरीज परास्त हो जाता है। वह अपना त्राण इन्हीं के आश्रय में देखता है। जल्दी निरोग होने की उसकी प्राकाँक्षा का दवादारू वाले अनुचित लाभ उठाते रहते हैं। उसके मामूली से रोग को बहुत बढ़ा−चढ़ा कर बता देते हैं। डरा हुआ व्यक्ति प्राण रक्षा के लिए अपना सब कुछ होमने को तैयार हो जाता है, डाक्टरों की जेबें गरम होती रहती हैं, कोठी बंगले और मोटरें बढ़ती रहती हैं। बेचारा मरीज बहुत कुछ गँवाकर भी मरीज का मरीज बना रहता है।
बिगड़े को बनाना
हमारा उद्देश्य यहाँ औषधियों या चिकित्सकों की निन्दा करना नहीं वरन् लोगों की इस भूल पर प्रकाश डालना है कि आरोग्य के जिन नियमों का उल्लंघन करने से शरीर के भीतरी कलपुर्जे जिस प्रकार दुर्बल और अशक्त होते गये और अन्ततः वे बीमारी के चंगुल में फँस गये, उस उल्टी चाल को पलटे बिना आखिर शरीर सुधर कैसे जायेगा? दवा की उपयोगिता हो सकती है। उसकी उत्तेजना और संहारक शक्ति से शरीर में बढ़ा हुआ विष परास्त किया जा सकता है। पर दवाओं के इस आक्रमण में केवल रोग कीटाणु ही नहीं मरते साथ में रक्त के स्वस्थ एवं संरक्षक जीवाणुओं का भी विनाश होता है। कोई दवा ऐसी नहीं हो सकती जो शरीर में भीतर जाकर केवल रोग कीटाणुओं को ही मारे और स्वस्थ कणों को बचा दे। दोनों ही प्रकार के अणु साथ साथ रहते हैं। दवाऐं रोगों को मारने का जितना लाभ पहुँचाती हैं उतनी ही हानि स्वस्थ जीवन तत्वों को मारकर साथ की साथ पहुँचा देती हैं। फिर जो विष दवाओं द्वारा परास्त किया गया था वह शरीर से बाहर कहाँ निकला? वह तो भीतर ही दबा हुआ किसी कोने में मूर्च्छित सा बना पड़ा रहता है। अवसर मिलते ही वह उसी रूप में या अन्य किसी रूप में पुनः प्रकट हो जाता है। देखा गया है कि एक रोग दूर हुआ नहीं कि दूसरा नया उपज पड़ा। फिर वह तीक्ष्ण दवाऐं भी तो विषैले और विजातीय पदार्थों से बनी होती हैं। उनका शरीर में प्रवेश होना एक प्रकार के नये रोग तत्वों का शरीर में प्रवेश करना है।
तीक्ष्ण औषधियों की प्रतिक्रिया
कुनैन के सेवन से मलेरिया बुखार दूर हो जाता है पर उसकी गर्मी दिमाग पर इतनी चढ़ जाती है कि बहरापन, या कान बहना जैसे नये रोग उठ खड़े होते हैं। ऐस्प्रीन खाने से ज्ञान तन्तु संज्ञा शून्य हो जाने से एक प्रकार का जो नशा सा आता है उस से दर्द की अनुभूति बन्द हो जाती है। इस प्रकार कुछ देर तक ऐस्प्रीन खाने से दर्द में लाभ हुआ तो प्रतीत होता है पर दिल पर उसका बुरा प्रभाव पड़ने से हृदय रोग उत्पन्न होने लगते हैं। अफीम मिली दवाओं से अतिसार तो बन्द हो जाता है पर आँते सिकुड़ जाने से मलावरोध की नई शिकायत शुरू हो जाती है। पेन्सलीन की प्रतिक्रिया कई बार प्राणघातक तक होती देखी गई है इसलिए डाक्टरों ने अब उसे अन्धाधुन्ध हर मर्ज में देते रहने की अपनी आदत पर पुनर्विचार करना शुरू कर दिया है और अब उसे सोच समझकर ही देते हैं। कई प्रकार के इंजेक्शन ऐसे होते हैं जो रोग कीटाणुओं पर असर करने से पहले, अपना बुरा असर दिखा देते हैं। सुई लगते ही बुखार जैसा असर शरीर में दीखने लगता है। इन बुराइयों की जानकारी हमें होनी ही चाहिए। अन्यथा स्वास्थ्य सुधार के लिए दवाओं की उपयोगिता के सम्बन्ध में जो अन्धविश्वास आज चल रहा है वह अन्ततः घातक ही सिद्ध होगा।
आदतों का सुधार
स्वास्थ्य सुधार के लिए अपनी आदतों की—आहार विहार की पद्धति को बदलता ही एकमात्र स्थायी उपाय है। चूँकि यह उपाय कष्टसाध्य है, इसमें मन मारना पड़ता है, आरम्भ से ही सुधरे स्वास्थ्य को प्राप्त करने के लिए अन्य निर्माण कार्यों की तरह धैर्यपूर्वक समय की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। इसके विपरीत दवा दारु के बल पर निरोग हो जाने की कल्पना में इस प्रकार का कोई प्रतिबन्ध नहीं रहता। डाक्टर लोग आहार-विहार पर कोई खास प्रतिबन्ध नहीं लगाते, जी चाहे सो खाते-पीते रहने और चाहे जैसे रहने सहने की छूट देते हैं। दवा सेवन या इञ्जेक्शन लगने में कुछ मिनट ही खर्च होते हैं और कभी न पूरे होने वाले-जल्दी स्वास्थ्य लाभ करा लेने वाले चिकित्सक के आश्वासनों में रोगी का मन बहलता रहता है। इस प्रकार तुलनात्मक दृष्टि से मनुष्य को लाभ इसी में दीखता है कि आहार-विहार में परिवर्तन करने की कष्टकर प्रक्रिया को अपनाने, उसमें समय लगाने और मन मारने की अपेक्षा दवा दारु के बलबूते पर निरोग हो जाना सस्ता और अच्छा है। यही सोचकर आज कोटि कोटि जनता अपनी रोगमुक्ति के लिए दवाखानों की शरण में पड़ी डाक्टरों के पैर पलोटती रहती है। जादूगर की मिठाई की तरह तत्काल कुछ लाभ भी इसमें दीखता है। तत्काल का चमत्कार लोगों की बाल बुद्धि को संतुष्ट कर देने के लिए पर्याप्त माना जाता है।
एक रोगी ने अपने ऊपर अब जो चमत्कार किसी दवा या डाक्टर का देखा था वह उसकी चर्चा किसी दूसरे रोगी से करता है। वह रोगी अपना कोई ऐसा ही अनुभव अन्य रोगी को बताता है। इस प्रकार दवाओं की प्रशंसा भी चलती रहती है, चिकित्सकों का गुणगान भी होता रहता है और साथ ही रोगों का कष्ट भी यथावत् बना रहता है। यह भूल-भुलैया आज व्यापक रूप से एक गहरे अन्धविश्वास की तरह सर्वत्र व्याप्त हो रही है। अमुक तालाब या कुँड में स्नान कर लेने से, अमुक बाबा की भभूत लगा लेने से समस्त रोग दूर हो जाते हैं, ऐसी बातों को तो अब अन्ध-विश्वास माना जाने लगा है पर दवाओं से आरोग्य प्राप्त हो सकता है यह अन्ध-विश्वास अभी भी अत्यन्त भयावह रूप से मानव जाति के मस्तिष्कों पर चढ़ा हुआ है। चूँकि तालाब कुण्ड के स्नान से, भभूत से या मियाँ मसान की पूजा से आरोग्य लाभ की बात अशिक्षित और सयाने, ज्योतिषी, बाबाजी कहते हैं इसलिए उनकी बात संदेहास्पद मानी जाने लगी, पर जिस बात को मोटर बंगले वाले, उच्च शिक्षित कहे जाने वाले प्रमाण पत्र प्राप्त सरकार में सम्मान्य डाक्टर लोग कहें उस बात को कैसे झुठलाया जाय? दवा से आरोग्य प्राप्त हो सकता है, दीर्घ जीवन मिल सकता है यह मान्यता विशुद्ध रूप से अन्धविश्वास है। इस तथ्य को आज नहीं तो कल स्वीकार किया ही जाने वाला है।
अनियमिततायें स्वास्थ्य की शत्रु
अपना वर्षों का समय और सारी कमाई गंवा कर भी जिनने भूल भुलैयों में भटकने के अतिरिक्त कुछ भी नहीं पाया है वे रोगग्रस्त एवं दुर्बलकाय व्यक्ति कभी न कभी तो वास्तविकता पर विचार करने के लिये विवश होंगे ही। जब भी वे इस समस्या पर ठंडे दिल से विचार करेंगे, तब उन्हें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि अनियमितताऐं ही आरोग्य नाश का एकमात्र कारण होती हैं और स्वास्थ्य सुधार के लिए एक ही उपाय है−स्वास्थ्य के सनातन नियमों का पालन। आज असंयम का युग है। सर्वत्र उच्छृंखलता का बोलबाला हो रहा है। ऐसी स्थिति में संयम की बात को उपहास एवं उपेक्षा में ही डाला जा सकता है। इतना होते हुए भी सत्य, सत्य ही रहेगा। तथ्यों को कोई बदल नहीं सकता है। आरोग्य केवल एक ही उपाय से प्राप्त हो सकता है और वह है स्वास्थ्य के नियमों का कठोरता से पालन-बात कठिन है और अरुचिकर भी, पर स्वास्थ्य सम्पदा भी तो अमूल्य वस्तु है। उसे जो प्राप्त करना चाहेंगे उन्हें उसका उचित मूल्य भी चुकाने के लिए तैयार रहना होगा।
शरीर के द्वारा निरन्तर जो मानसिक एवं शारीरिक श्रम होता रहता है उसके कारण खर्च होने वाली शक्ति की क्षतिपूर्ति आहार द्वारा होती है। आहार ही पचकर रस, रक्त, माँस, मज्जा, अस्ति, मेद, वीर्य बनाता हुआ शक्ति से रूप में परिणत होता है। आहार को मुख में ठूँसते ही वह न तो शरीर का भाग बन जाता है और न शक्ति के रूप में परिणत होता है। वरन् यह कार्य पाचन यन्त्रों को करना पड़ता है। मुँह से स्रवित होने वाले रस, आमाशय की ग्रन्थियों से निकलने वाला पाचक रस, जिगर से निकलने वाला पित्त, आँतों से निकलने वाला रस अपने अन्दर एक ऐसा जादू भरा रहस्य छिपाये हुए हैं कि उनके संयोग से अन्न आदि से बने आहार का एक अद्भुत प्रकार का रूपान्तर होता है। अन्न, शाक दूध आदि वनस्पति जाति की वस्तुओं का परिवर्तन रक्त और माँस जैसे प्राणि जाति के तत्वों में हो पाना सचमुच एक जादू है। इसलिए पाचन क्रिया को एक जादू की पिटारी कहा जा सकता है। ईश्वर की इस अद्भुत क्रियाप्रणाली पर जितना आश्चर्य प्रकट किया जाय कम है।
पाचन प्रणाली का महत्व
यह पाचन प्रणाली ही हमारे जीवन की आधार शिला है। जिस शरीर में यह प्रक्रिया ठीक प्रकार चल रही है वह आरोग्य के मार्ग में आने वाली सभी बाधाओं पर विजय प्राप्त कर सकता है। इसके विपरीत जिसका पाचन संस्थान बिगड़ गया उसके लिए अन्य सब सुविधाऐं रहते हुए भी विपत्ति का पहाड़ सामने खड़ा दिखाई देता रहता है। लोग ऐसा सोचते रहते हैं कि हम दूध, घी, मेवा, फल आदि कीमती चीजें खावेंगे, पौष्टिक पकवान मिष्ठान सेवन करेंगे तो हृष्ट-पुष्ट एवं बलवान बन जावेंगे। इसी दृष्टिकोण से लोग बहुमूल्य भोजनों की व्यवस्था जुटाते हैं। स्वाद की तृप्ति के साथ बलवृद्धि की अभिलाषा भी कीमती भोजन बनाते समय रहा करती है। इस प्रकार की मान्यता बनाते समय लोग यह भूल जाते हैं कि भोजन को शक्ति के रूप में परिणत करने का सारा श्रेय पाचन प्रणाली को है। यदि वह ठीक नहीं है तो आहार पचेगा नहीं और यदि पचा नहीं तो रक्त के रूप में परिणत न होकर मल मार्ग से ज्यों का त्यों निकल जायेगा। यहाँ यह बात जान लेने की है कि जिस प्रकार ठीक तरह से पचा हुआ आहार शरीर का अंग बनकर शक्ति की वृद्धि करता है उसी प्रकार अनपचा भोजन व्यर्थ ही बर्बाद होकर मल ही नहीं बन जाता वरन् अनेक प्रकार की गड़बड़ी उत्पन्न करके शरीर को भारी हानि पहुँचाता है।
खिचड़ी पकाने के लिए चूल्हे पर पतीली चढ़ाई जाय तो वह तभी पकेगी जब उचित मात्रा में ईंधन हो। यदि ईंधन के नाम पर दो चार छोटी लकड़ी ही पास में हों तो पतीली का पानी भी ठीक तरह गरम न हो पावेगा। लकड़ी भी हाथ से चली जावेंगी और चूल्हा भी काला हो जावेगा। खिचड़ी कच्ची की कच्ची रहेगी। इसी प्रकार जब पाचन यन्त्र दुर्बल हो जाते हैं और उनमें से पचाने वाले रस पर्याप्त मात्रा में नहीं निकलते तो आहार पचने का लाभ तो मिलता नहीं जो थोड़ा बहुत पाचन रस शरीर में पड़ा था वह भी निरर्थक बर्बाद होता है। इस प्रकार देह का एक महत्वपूर्ण रस दिन-दिन नष्ट तो होता चलता है पर पचे अन्न से रक्त बनने पर वह पाचन रस भी पुनः बनते सो कार्य हो नहीं पाता। इस प्रकार संचित खजाना दिन-दिन खाली होता जाता है और नया रक्त न बनने पर शरीर में दुर्बलता और जीर्णता बढ़ती जाती है। प्रकृति माता को धन्यवाद है कि वह साँस द्वारा, जल द्वारा, निद्रा द्वारा और न जाने कैसे कैसे अपच के कारण शुद्ध रक्त न बनने पर भी कोई ऐसे प्रबन्ध करती रहती है कि हम जीवित बने रहें। यदि यह उदारता न मिली होती तो अपच जैसे भयंकर रोग के रोगी को कुछ ही दिन में मरखप कर समाप्त हो जाना चाहिये था।
आहार का परिपाक
अन्न एक सजीव पदार्थ है। यदि पेट की रासायनिक क्रियाओं द्वारा उसे पचाकर शरीर ने आत्म सात नहीं कर लिया है और मल मार्ग से बाहर निकलने तक उसे न सड़ने देने योग्य पाचन रस पर्याप्त मात्र में उसमें मिले नहीं रहें तो यह सजीव अपच की स्थिति में वायु और जल का सम्पर्क मिलने से पेट में सड़ना आरम्भ कर देता है। सड़ने से खमीर, विष, खटिक, गैस एवं तेजाब जैसी हानिकर वस्तुऐं पैदा होती हैं, जिनका कार्य शरीर को जलाना, गड़बड़ाना एवं नष्ट करना होता है। जिस प्रकार बिगड़ा हुआ हाथी अपने महावत मालिक एवं समीपवर्ती लोगों के लिए उपयोगी न रहकर प्राण घातक बन जाता है उसी प्रकार पेट में अनपचा, सड़ता हुआ आहार नाना प्रकार के उपद्रव खड़े करता है। मुँह से डकारें आते समय और मलद्वार से अपान वायु निकलते समय यह अपच के कारण उत्पन्न हुआ सड़न ही वायु रूप होकर बाहर निकलता है। यही सड़ी वायु यदि मस्तिष्क की ओर चलने लगे तो सिर दर्द, जुकाम, आधाशीशी, मृगी, मूर्च्छा, अनिद्रा, पागलपन जैसे रोग उत्पन्न करती है। मुख की ओर इसकी गतिविधि रहे तो मुँह में छाले, दाँत दर्द, पायेरिया, मसूड़े फूलना, लार बहना, कंठ बैठना, आदि बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। पेट में यही विष घुमड़ने लगे तो वायु गोला, अफरा, पेट फूलना, डकारें, हिचकी, संग्रहणी, अतिसार, जलोदर, तिल्ली, जिगर की सूजन, बवासीर आदि रोग उठ खड़े होते हैं। थोड़ा बहुत जो पाचन होता है उसमें भी पेट में घुमड़ने वाले विष सम्मिलित हो जाते हैं। फल स्वरूप रक्त में विषैलापन बढ़ने लगता है। रक्त चाप, हृदय की धड़कन, पक्षाघात, गठिया, मधुमेह, पथरी, कोढ़ केन्सर फोड़े, चकत्ते जैसे रोग तभी होते हैं जब रक्त में विषैले तत्व अधिक मात्रा में बढ़ जाते हैं।
रक्त शुद्धि की महत्ता
आयुर्वेद शास्त्र में सब रोगों का एकमात्र कारण मलावरोध को माना गया है। जिसकी पाचन क्रिया ठीक नहीं है। छूत के रोग भी उन्हीं पर आक्रमण करते हैं। छूत के रोगों से पूरा बचाव हो सकना किसी भी प्रकार संभव नहीं, क्योंकि हवा में असंख्य प्रकार के रोग कीटाणु उड़ते रहते हैं। साँस के साथ वे निर्बाध गति से देह में भीतर प्रवेश करते ही रहते हैं। उनका बचाव केवल उन्हीं के लिए सम्भव है जिनका रक्त शुद्ध है। निर्दोष रक्त में इतनी तेजस्विता होती है कि भयंकर से भयंकर रोगों के कीटाणु उसके सम्पर्क में आते-आते नष्ट हो जाते हैं। महामारी फैलने के दिनों में कितने ही स्वयं सेवक रोगियों की सेवा तथा मृतकों की आन्त्येष्ठि क्रिया करने में तत्परतापूर्वक लगे रहते हैं उनका कुछ भी नहीं बिगड़ता। इसके विपरीत अपनी सुरक्षा का बहुत ध्यान रखने वाले लोग भी बचाव का हर संभव उपाय करने पर भी रोगी होकर मर जाते हैं। इस अन्तर का कारण रक्त की शुद्धता और अशुद्धता ही रहती है।
मलावरोध-अपच यों तो साधारण सा रोग मालूम पड़ता है पर लगभग समस्त बीमारियों की जड़ उसी में सन्निहित रहती है। लोग विभिन्न बीमारियों का इलाज करते रहते हैं पर जड़ को भूल ही जाते हैं। किसी विष वृक्ष के पत्ते तोड़ते रहने पर भी तब तक उससे छुटकारा न मिलेगा जब तक कि जड़ को न काटा जाय। लोग आये दिन नाना प्रकार के रोगों से ग्रसित रहते हैं और उनकी विविध विधि चिकित्सा करने के लिए नई-नई औषधियाँ और नये नये डाक्टर ढूँढ़ते रहते हैं। यह जड़ को छोड़कर पत्ते-पत्ते पर भटकने के समान है। यदि कब्ज का इलाज करके पाचन प्रणाली को ठीक कर लिया जाय तो पेट की गैस और विष उत्पन्न होना बन्द हो जाने पर सब रोगों की जड़ ही कट जायगी। जब शुद्ध रक्त समुचित मात्रा में बनने लगेगा तो उसकी तेजस्विता से जहाँ तहाँ पिछले जमे हुए विकार भी बाहर निकल जाएँगे।
अपच का अनिष्ट
बहुमूल्य कहे जाने वाले भोजन का लाभ तभी है जब पाचन क्रिया उसे ठीक तरह पचा सकने की स्थिति में हो अन्यथा भारी भोजन सस्ते साधारण भोजन की अपेक्षा लाभदायक नहीं हानिकारक ही सिद्ध होगा। इसलिए हमारी दृष्टि खाद्य पदार्थों के महँगे और बहुमूल्य होने की ओर नहीं, पाचन संस्थान को ठीक करने की ओर होनी चाहिए। आरोग्य शास्त्र के वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि रुग्ण पाचन प्रणाली के द्वारा कई बार अधपका आहार भी रक्त की ओर बढ़ने लगता है। चूँकि वह ठीक प्रकार पचा नहीं होता इसलिए उसे रक्त अपने में आत्मसात नहीं कर पाता और वह कच्चा रक्त इधर-उधर मारा-मारा फिरने के बाद शरीर से बाहर किसी कष्टकर प्रक्रिया द्वारा बाहर निकलने का प्रयत्न करता है। बलगम प्रायः ऐसे ही अधपके रक्त का एक रूप है। मुख के द्वारा तथा नाक के द्वारा कफ जिन्हें गिरता रहता है। उनमें से अधिकाँश अपच के रोगी होते हैं। मुहासे एवं फोड़ा फुन्सी के रूप में भी यही कफ त्वचा फोड़कर बाहर निकलता है। छाजन और दाद का रोग इस अधपके रक्त के किसी एक स्थान पर गौंद की तरह जम जाने के कारण होता है।
सौंदर्य का ठोस उपाय
सौंदर्य सभी को प्रिय है। उसके लिए अनेकों नर-नारी लालायित रहते हैं। चेहरे को सजाने के लिए वे कई प्रकार के रंग रोगन भी लगाते हैं। फिर भी नकली चीज नकली ही रहती है। वह बाहर से किया हुआ रंग-रोगन थोड़ी देर में मिट जाता है और अस्वस्थता की कुरुपता सामने आ खड़ी होती है। शरीर के जिस चमक को, अंगों की सुडौलता को, कोमलता को, लालिमा को, उभार को सौंदर्य कहा जाता है वह शुद्ध रक्त के प्रचुर परिमाण में उत्पन्न होने पर ही उपलब्ध होनी संभव है। देर तक काम करने की शक्ति, उत्साह, स्फूर्ति, मस्तिष्क की प्रखरता, गहरी नींद, आँख, कान, दाँत आदि की सामर्थ्य, अवयवों की सुदृढ़ता को निरोग शरीर का अंश माना जाता है। इन विशेषताओं से युक्त शरीर सौंदर्यवान कहे जाते हैं। सुन्दरता को देखकर स्वयं को नहीं दूसरों को भी प्रसन्नता होती है। लोग उससे प्रभावित भी होते हैं और आकर्षित भी। सौंदर्य के उपासकों और इच्छुकों को यह जान लेना चाहिए कि यह सब प्रताप पेट की शुद्ध पाचन क्रिया का है। जिसके अन्दर शक्ति के उत्पादन का कार्यक्रम ठीक प्रकार चल रहा है और जो उस उत्पादित शक्ति को अनावश्यक रूप से दुरुपयोग नहीं करता उसके अंग प्रत्यंगों में सुदृढ़ता और शोभा उत्पन्न करने वाले तत्व बढ़ेंगे ही और वह सुन्दर लगेगा ही। गोरे वर्ण का अच्छी बनावट का व्यक्ति भी यदि रक्ताल्पता और अपच का रोगी हो तो पके हुए पीले आम की तरह वह निर्जीव दिखाई देगा, उसकी आँखों पर होठों पर, चेहरे पर उदासी और मुर्दनी छाई हुई होगी। ऐसा व्यक्ति रंग या बनावट अच्छी होते हुए भी कुरूप ही लगेगा। इसके विपरीत जिसके अंग प्रत्यंगों में से रक्त की परिपूर्णता छलकती रहती है वह काला कुरूप होने पर भी असाधारण सुन्दर और तेजस्वी प्रतीत होता है। उत्साह और चैतन्यता की किरणें उसके प्रत्येक अंग से बिखरती रहती हैं। ऐसे लोगों को सुन्दर नहीं तो और क्या कहा जायेगा? सौंदर्य कोई वस्तु नहीं, आरोग्य का ही नाम सुन्दरता है और आरोग्य क्या है? इसका संक्षिप्त उत्तर पेट की पाचन-क्रिया का ठीक होना ही कहा जा सकता है।
दीर्घ जीवन और तेजस्विता
दीर्घ जीवन, सुन्दरता, कार्यक्षमता, तेजस्विता उत्साह, स्फूर्ति, साहस, पुरुषार्थ, पराक्रम, योगशक्ति आदि शरीर से सम्बन्धित विभूतियाँ निश्चय ही मानव जीवन को धन्य बनाती हैं। इनके बलबूते पर मनुष्य एक से एक बढ़कर साँसारिक सफलताऐं प्राप्त कर सकता है। इन्हीं के बल पर परमार्थ, धैर्यधारण, आत्म-कल्याण और जीवन मुक्ति जैसे आध्यात्मिक लाभों को प्राप्त कर सकना संभव होता है। यह लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार की विभूतियाँ केवल उन्हीं के लिए संभव हैं जो शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ और सुदृढ़ हैं। इसलिए इन लाभों के लिए हम सबका लालायित होना स्वाभाविक ही है। पर कितने खेद की बात है कि हम जानते हुए भी अनजान बने हुए हैं। समुद्र को रत्नों का भाँडागार कहा जाता है। जीवन का रत्न भाण्डागार हमारा पेट है। यदि पेट को सक्षम रखा जा सके तो वह निरन्तर हमें एक से एक बढ़कर रत्न देता रह सकता है। समुद्र मंथन से केवल 14 रत्न निकले थे पर हम चाहें तो अपने उदर-उदधि की आराधना करके उसके द्वारा जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति करने का वरदान माँग सकते हैं। अगणित प्रकार के रत्न प्राप्त कर सकते हैं। अपनी पाचन प्रणाली को यदि हम ठीक कर सकें तो समझना चाहिए कि जीवन विकास की आधी समस्या का हल करने में हम सफल हो गये।
जिन मिलों और कारखानों में अनेकों मशीनें लगी रहती हैं और भारी उत्पादन होता रहता है, उनकी भी उत्पादन शक्ति का केन्द्र वह इंजन या मोटर ही रहता है जो इन सारे यंत्रों को चलाने के लिए शक्ति उत्पन्न करता है। मनुष्य शरीर भी एक बड़े मिल या कारखाने के समान है जिसमें अनेकों प्रकार के गुण, चातुर्य, कला कौशल एवं विशेषण परिलक्षित होते हैं। डाक्टर, इञ्जीनियर, प्रोफेसर, वैज्ञानिक, वकील, नेता, लेखक, कवि, गायक, चित्रकार, नट, अभिनेता, कलाकार, पहलवान, खिलाड़ी, व्यापारी, योगी, तपस्वी आदि की अपनी-अपनी ऐसी विशेषताऐं होती हैं जिनसे मनुष्य का गौरव बढ़ता है। मानव शरीर में ऐसी-ऐसी असंख्यों विशेषताऐं, किसी मिल में लगी अनेकों मशीनों की तरह भरी रहती है। पर वे रहती हैं सुप्त स्थिति में। उनके जागरण के लिए समुचित शक्ति प्राप्त हो तो उनमें से किसी भी विशेषता को जीवित करके कोई भी व्यक्ति महान बन सकता है और उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है, पर यह संभव तभी हो सकता है जबकि उन विशेषताओं को जागृत कर सकने योग्य समुचित शक्ति प्राप्त हो।
खराब इंजन की मशीन
बाइलर या मोटर खराब होने से किसी भी मिल में लगी हुई अनेकों मशीनें बेकार पड़ी रहती हैं या बहुत थोड़ा काम कर पाती है। कीमती से कीमती मशीन तभी अपना काम करेगी जब उसे चलाने के लिए शक्ति प्राप्त हो। मनुष्य अपनी प्रगति की अनेकों आकांक्षाऐं करता रहता है पर उसमें शारीरिक एवं मानसिक शक्ति का समुचित उत्पादन न होने से कर कुछ नहीं पाता। उसके मनोरथ कल्पना मात्र रहकर ही मुरझा जाते हैं। विशेषताओं के बीज हर मनुष्य के भीतर मौजूद हैं पर उन बीजों को वृक्ष रूप में परिणत करने के लिए जिस स्थिति एवं साधन सामग्री की आवश्यकता है वह समुचित मात्रा में न हो तो प्रगति का पथ अवरुद्ध ही रहेगा। शक्ति का समुचित उत्पादन हमारे जीवन की एक ऐसी आवश्यकता है जिसकी पूर्ति हुए बिना जीवन एक प्रकार से असफल ही बना रहता है।
एक छात्र अच्छे डिवीजनों में उत्तीर्ण होता हुआ उच्च-शिक्षा प्राप्त करना चाहता है। उसकी इच्छा सच्ची और लगन पक्की है, इसके लिए वह प्रयत्न भी भरपूर करता रहता है पर शरीर में शक्ति का समुचित उत्पादन न होने से बेचारा कुछ कर नहीं पाता। स्मरण शक्ति कुंठित हो रही है, सिर दर्द करता है, शरीर थका-थका सा रहता है, पुस्तकों से मन उचटा रहता है, उदासी छाई रहती है, जो याद करता है भूल जाता है, ऐसी स्थिति में उच्च-शिक्षा प्राप्त करने का उसका मनोरथ कैसे पूरा हो? यह सारे लक्षण शक्ति की न्यूनता प्रकट करते हैं। मस्तिष्क में सजीवता होने के लिए जितनी शक्ति आवश्यक है वह बनती नहीं और थकान घेरे रहती है। ऐसी स्थिति में उसकी पढ़ाई का उद्देश्य कैसे पूरा हो सकेगा? विद्यार्थी की ही तरह प्रत्येक महत्वपूर्ण व्यक्ति को अपने कार्य को ठीक तरह चलाने एवं योग्यताऐं निखारने के लिए कुछ विशेष सामर्थ्य की जरूरत पड़ती है।
महत्वपूर्ण कार्य के लिए या महत्वपूर्ण व्यक्ति के लिए ही क्यों—साधारण मजदूर को भी कार्य शक्ति तो चाहिए ही, उसके बिना वह श्रम कहाँ से कर सकेगा और रोटी कैसे कमा सकेगा? हर छोटे या बड़े—महत्वपूर्ण या महत्वहीन—व्यक्ति को प्रगति न सही साधारण जीवनक्रम चलाने के लिए शक्ति की आवश्यकता पड़ती है और वह जिसके पास जितनी मात्रा में अधिक है वह उतना ही सफल होते देखा गया है। किसी मिल या कारखाने को ठीक तरह चलाने में उसकी शक्ति-उत्पादन-प्रणाली का सबसे अधिक महत्व है। इसी प्रकार जीवन की विभिन्न दिशा में गतिशील रहने वाली विशेषताओं का जागरण एवं अभिवर्धन इस बात पर निर्भर रहता है कि शरीर में शक्ति का उत्पादन कितना होता है और उस उत्पादन का उपयोग कैसे किया जाता है।
महत्वपूर्ण समस्या
जीवन की महत्वपूर्ण समस्याओं में शक्ति के उत्पादन की समस्या सर्वोपरि है। कभी-कभी ऐसा भी देखा गया है कि कई लोग शक्ति होते हुए भी उसका ठीक उपयोग न करके उसे आलस्य और प्रमाद में बर्बाद करते रहते हैं, पर अधिकतर होता यह है कि शक्ति की कमी ही प्रगति के पथ को अवरुद्ध किये रहती है। जिस प्रकार बिना पूँजी के व्यापार नहीं हो सकता, बिना शिक्षा के अच्छा पद नहीं मिल सकता उसी प्रकार समुचित मात्रा में शक्ति का उत्पादन शरीर में न होता रहे तो किसी भी दिशा में सफलता प्राप्त होना कठिन ही बना रहेगा। हमें शक्ति के समुचित मात्रा में उत्पादन की चिन्ता करनी चाहिए और उसके लिए उत्पादन के एकमात्र संस्थान पाचन यंत्र पर ध्यान देना चाहिए, यही हमारे शरीर रूपी मिल का बाइलर या इंजन है। इसकी उपेक्षा करके कोई भी व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सका, किसी की भी जिन्दगी चैन से नहीं कटी, फिर हम यदि उस ओर उपेक्षा धारण किये रहें तो शिकारी से डरकर बालू में मुँह गाढ़कर अपनी जान बचाने की बात सोचने वाले शुतुरमुर्ग की भाँति हम केवल अपने अनिष्ट को ही आमंत्रित करेंगे। इंजन की उपेक्षा करके कोई रेलगाड़ी आगे नहीं बढ़ सकती, पेट की मशीन को बिगड़ी पड़ी रहने देकर कोई व्यक्ति अपनी सुख-शान्ति और श्री समृद्धि देर तक स्थिर नहीं रख सकता। शक्ति के अभाव में शरीर क्षीण होता है, साथ-साथ उसमें सन्निहित विशेषताऐं भी क्षीण होने लगती हैं। जिसकी आमदनी टूट गई है और खर्च ज्यों का त्यों बढ़ा हुआ है उस फर्म का आज नहीं तो कल दिवाला पिटने ही वाला है। हमें देखना होगा कि हमारा जीवन-फर्म कहीं इसी प्रकार दिवालिया बनने तो नहीं जा रहा है। जो व्यापारी अपने गिरते हुए व्यापार और घाटे की समय रहते व्यवस्था नहीं सोचता उसके हाथ में अन्ततः पश्चात्ताप ही रह जाता है। देखना है कि हम भी कहीं हाथ मल-मलकर पछताने की स्थिति की ओर ही तो नहीं बढ़ रहे हैं।
शक्ति के उत्पादन की न्यूनता
शरीर के अन्य अंग भी समय-समय पर रुग्ण होते रहते हैं। पर उनके मूल में अपच ही छिपा रहता है। शक्ति के उत्पादन की न्यूनता और खर्च का ज्यों का त्यों रहना देह के विभिन्न अंगों की सामर्थ्य को दिन-दिन घटाता चलता है। वे बाहर से तो ज्यों के त्यों दीखते हैं पर भीतर ही भीतर घुनी लकड़ी की तरह खोखले हो जाते हैं। इन दुर्बल अंगों पर कोई भी साधारण-सा कारण भयंकर आक्रमण जैसा रूप धारण कर लेता है। सीढ़ी पर पैर फिसलने मात्र की छोटी सी चोट खाकर एक व्यक्ति की दोनों पैरों की हड्डियाँ पाँच जगह से टूटते हमने अपनी आँखों देखी हैं। सीढ़ियों की ऊँचाई बहुत मामूली थी। दो तीन सीढ़ी गिरने मात्र से ऐसी दुर्घटना हो गई और फिर वह आठ महीने अस्पताल में रह कर चलने फिरने लायक बन सके। घटना मामूली और परिणाम इतना घातक! इस प्रश्न का उत्तर डाक्टर ने एक ही दिया कि इनकी हड्डियाँ खोखली हो चुकी थीं। एक ओर तिमंजिले मकान पर से गिर पड़ने पर भी एक बच्चे को मामूली सी चोट लगी और दूसरी ओर तीन सीढ़ियों पर से पैर फिसलने पर पाँच जगह हड्डी टूटी। इसे यदि भाग्य कहकर संतोष न किया जाय और विचारपूर्वक खोला जाय तो एक के शरीर में जीवनी शक्ति का बाहुल्य और दूसरे के शरीर में उसकी न्यूनता ही सिद्ध होती है।
दुर्बलता के दुष्परिणाम
मामूली सी ठण्ड लगने पर जुकाम, जरा-सी ठण्ड लगने पर पसली का दर्द, थोड़ी-सी चिकना खाते ही खाँसी, दस दिन बुखार आते ही तपैदिक, छोटा सा जख्म होते ही विषव्रण होने के आसार बन जाते हैं। इलाज करने वाले इस पीड़ित अंग की चिकित्सा में जुटे रहते हैं पर यह भूल जाते कि यह अंग जीवनतत्व रहित खोखले लिफाफे की तरह खड़े हुए हैं जिनमें एक पिन जितना आघात सहने की सामर्थ्य नहीं रह गई है। दवा उन रोगों की सामाजिक चिकित्सा तो कर देती है पर शक्ति के अभाव की पूर्ति उनके द्वारा कैसे की जा सकती है? यदि दवाओं में शक्ति उत्पादन की इतनी क्षमता रही होती तो प्रत्येक धनी आदमी दवा खाकर हनुमान और भीम की तरह बलवान हो गया होता।
कारणवश किसी अंग में कोई रोग हो भी जाय तो नसों में पर्याप्त मात्रा में शुद्ध रक्त भरा रहने पर कठिन से कठिन रोग भी चन्द दिनों में अच्छा हो जाता है। शुद्ध रक्त की तेजस्विता अपने शत्रु रोग कीटाणुओं को बात की बात बाहर निकाल फेंकती है। प्रचंड पवन के सामने हलके-फुलके तिनके उड़ते ही दीखते हैं उसी प्रकार धमनियों में परिपूर्ण मात्रा में प्रवाहित होने वाला शुद्ध रक्त किसी भी रोग को शरीर में देर तक टिका रहने नहीं दे सकता। इसलिए विभिन्न अंग की छुट-पुट बीमारियों पर अधिक ध्यान न देकर हमें यही प्रयत्न करना चाहिए कि परिपूर्ण मात्रा में शुद्ध रक्त का उत्पादन होता रहे और यह तभी संभव है जब पाचक यंत्र ठीक काम कर रहे हैं, जिन्हें आरोग्य की अभिलाषा है उन्हें आगे चलकर पौष्टिक भोजन की आवश्यकता हो सकती है। व्यायामशाला की जरूरत पड़ सकती है, पर सबसे पहला काम उसके सामने एक ही है कि पेट ठीक काम करे और जो रूखा−सूखा खाया गया है वह ठीक प्रकार पचकर शुद्ध रक्त के रूप में ठीक प्रकार परिणत होने लगे। इतनी समस्या हल हो जाने पर आरोग्य की ही नहीं जीवन के सर्वांगीण विकास की आधी से अधिक कठिनाई दूर हो जाती है।
मृगतृष्णा में न भटकें
पेट क्यों खराब होता है और उसके सुधारने के क्या उपाय हैं, अब हमें इन दो प्रश्नों पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा। किसी दवा या जादू से पाचन−क्रिया सुधारी जा सकती है इस मृगतृष्णा को हम जितनी जल्दी छोड़ सकें उतना ही कल्याण है। पेट हमारी बुरी आदतों के लगातार अत्याचार करने से खराब हुआ होता है उसके सुधार का उपाय भी एकमात्र यही है कि पाचन क्रिया को ठीक रखने वाली आदतों को कठोरता पूर्वक अपने स्वभाव का एक अंग बनावें। आरोग्य शास्त्र के नियमों पर दृढ़तापूर्वक चलें और बिगड़े को सुधारने के लिए जितनी देर लगती है उतने समय की धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करें। किसी भी बुरी आदत से एक दिन में पेट खराब नहीं हो जाता, बिगड़ते बिगड़ते भी उसे बहुत दिन लग जाते हैं इसी प्रकार स्वास्थ्यकर अच्छी आदतें अपना लेने पर भी दो−चार दिन में वह बिगड़े यंत्र ठीक प्रकार काम करने नहीं लगेंगे। उसमें समय लगेगा और थोड़ी−थोड़ी प्रगति पर संतोष करते हुए धैर्यपूर्वक प्रगति की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। जिन्हें बहुत उतावली हो वे अपनी उतावली से स्वयं अधीर होते रह सकते हैं। काम तो काम के रास्ते ही होगा। उनकी अधीरता को देखकर प्रकृति अपने नियम नहीं बदल सकती। बच्चे गुठली बोकर जल्दी से आम का वृक्ष उगाना चाहते हैं न उगने पर खीजते भी हैं और निराश भी होते हैं पर प्रकृति उनकी बाल−बुद्धि की परवा कहाँ करती है? आम की गुठली से जितने दिन में वृक्ष बन सकता है उतना समय लगता ही है। धैर्य रखने वाला सन्तोषपूर्वक आम के बगीचे का मालिक बनता है और अधीर को मिलता तो कुछ नहीं खीज़, झुँझलाहट और निराशा का सामना मुफ्त में करना पड़ता है। पेट के सुधार की समस्या पर विचार करने से पूर्व हमें इस तथ्य को भली प्रकार हृदयंगम करना होगा। जिन्हें अत्यधिक उतावली हो रही हो उनके लिए यही अच्छा है कि वे बाल क्रीड़ा की तरह इस जीवन−कल्प के तथ्य पर विचार ही न करें और जल्दी−पल्दी की पगडंडियों में मृगतृष्णा की तरह उसी प्रकार आगे भी भटकते रहें जिस तरह कि अब तक भटकते रहे हैं।
मन का नियन्त्रण
शरीर का नियन्त्रण मन करता है मन की गतिविधियाँ बिगड़ जाने से शरीर की सारी विधि व्यवस्था बिगड़ जाती है। पेट के खराब होने का कारण भी मन का खराब होना है। जिस प्रकार घुड़सवार अपने घोड़े को मनचाही चाल से जिस दिशा में मोड़ना चाहे मोड़ सकता है। हाथी का महावत अपने हाथी से मनचाहा काम लेता है। सरकस वाले अपने जानवरों से आश्चर्यजनक काम लेते हैं, वैसे ही शरीर एक प्रकार का जानवर है, मन उसका संचालक। मन की गतिविधियाँ ही शरीर की स्थिति में भला या बुरा परिवर्तन करने के लिए उत्तरदायी होती हैं। आरोग्य घुड़सवार का घोड़ा बिगड़ैल ही नहीं होगा वरन् उसके लिए जीवन संकट भी उपस्थित कर देगा। उसी प्रकार प्रमादी मन अपना ही लोक−परलोक नहीं बिगाड़ता वरन् शरीर का भी सत्यानाश कर देता है। असंयत मन वाले मनुष्य का शरीर कभी निरोग नहीं रह सकता ।
पाचन−क्रिया पर प्रभाव डालने वाली चार बातें प्रमुख हैं—(1) मन का असंयत होना (2) आहार की अव्यवस्था (3) श्रम का संतुलन (4) दैनिक कार्यक्रमों में असावधानी । इन चार बातों से ही आरोग्य नष्ट होता है, पाचन प्रणाली बिगड़ती है और इन्हीं के सुधार से उसका सुधार स्वभावतः होने लगता है। अगले पृष्ठों पर इन्हीं चार बातों पर विचार करेंगे।
इस सृष्टि में चेतना और पदार्थ दो तत्व मिलकर विविध गतिविधियों को जन्म देते हैं। बिजली के संचालन में ऋण और धन दो धाराऐं जब तक पृथक-पृथक रहती हैं तब तक वे निष्प्रयोजक ही बनी रहती हैं पर जब, जहाँ वे इकट्ठी हो जाती हैं तभी शक्ति का प्रत्यक्ष दर्शन होने लगता है। जड़ और चेतन इसी प्रकार की दो धाराऐं हैं। प्राणियों में तथा वनस्पतियों में जो जीवन तत्व है वही उनके पंच भौतिक शरीरों को गतिवान बनाता है। यह जीवन तत्व जैसे−जैसे घटता जाता है वे शिथिल,जीर्ण,दुर्बल होने लगते हैं और जब यह तत्व उनमें से बिलकुल चला जाता है तो प्राणियों तथा वनस्पतियों के शरीर निष्क्रिय एवं चेतनाहीन होकर मृतक बन जाते हैं। यह चेतना तत्व जिस प्राणी में जितना अधिक होता है वह उतना ही चैतन्य, स्फूर्तिवान् बुद्धिमान एवं तेजस्वी होता है। इस चेतना की न्यूनाधिकता से ही एक जाति के प्राणियों में तुलनात्मक विशेषता एवं न्यूनता दृष्टिगोचर होती रहती है।
मन का शरीर पर नियंत्रण
जिस प्रकार परमात्मा का इस सारी सृष्टि पर नियंत्रण है, उसकी इच्छा, आज्ञा और प्रेरणा से ही सारे काम चलते हैं, उसी प्रकार इस शरीर रूपी सृष्टि के ऊपर आत्मा की सत्ता काम करती है। अन्तरात्मा की स्थिति के अनुरूप शरीर का ढाँचा भी संभलता और बिगड़ता रहता है। स्वास्थ्य का आधार केवल आहार−विहार आदि को ही मान लेना भूल है। बेशक खान−पान और दिनचर्या का शरीर पर बहुत प्रभाव पड़ता है पर उससे भी अधिक प्रभाव मनः स्थिति का पड़ता है। मन के प्रसन्न रहने का स्वास्थ्य पर इतना अच्छा प्रभाव पड़ता है कि गरीब आदमी जिसे भरपेट भोजन भी नहीं मिलता हट्टा−कट्टा और दीर्घजीवी बना रहता है। इसके विपरीत जिसका चित्त दुखी और चिन्तित रहता है सब कुछ सुख साधन होते हुए भी दिन−दिन दुर्बल होने लगता है। आरोग्य की रक्षा में आहार,चिकित्सा,दिनचर्या, नियम पालन आदि का बड़ा महत्व है पर यदि मन की स्थिति बिगड़ी हुई हो तो यह सारे साधन जुटा लेने पर भी कुछ उद्देश्य पूर्ण न हो सकेगा।
मानव जीवन की खोज करने वाले वैज्ञानिक अब इस निष्कर्ष पर पहुँचते जाते हैं कि प्राचीन काल में मनुष्य की आयु कई सौ वर्ष होती थी । महाभारत के कई प्रमुख पात्रों की आयु तीन सौ वर्ष से अधिक थी । इससे पूर्व का ऐतिहासिक क्रम तो ठीक जाना नहीं जा सका पर नृतत्व-विज्ञान अन्वेषकों का विचार है कि संभवतः बीस हजार वर्ष पूर्व मनुष्य पाँच सौ वर्ष तक जीवित रहता होगा। आहार−विहार की कितनी सुविधा उन दिनों रही होगी यह कहना तो कठिन है पर इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उस समय लोग मानसिक उलझनों में नहीं फंसे रहते थे। चिन्ता, भय, लोभ, शोक ,काम, क्रोध द्वेष, ईर्ष्या, ढोंग, अहंकार जैसे मनोविकार उन दिनों नहीं के बराबर थे, वासनाऐं और तृष्णाऐं उन्हें निरन्तर छेदती न रहती थी । सन्तोष और प्रसन्नता उनके दो प्रधान गुण थे और उन गुणों के कारण ही उनका विकासक्रम निरन्तर अग्रगामी बना रहता था।
हमारे दीर्घजीवी पूर्वज
दो हजार वर्ष पूर्व के ग्रीस इतिहास लेखक आरायन ने अपने ग्रन्थ में लिखा है कि—‟ भारतवासी आमतौर से एक सौ चालीस वर्ष तक जीते हैं। इससे अधिक आयु के भी वहाँ कितने ही मनुष्य पाये जाते हैं।” भारत ही नहीं संसार के अन्य भागों में भी ऐसा ही दीर्घजीवन कुछ शताब्दियों पूर्व तक देखा गया है। इन दिनों भी जिन लोगों ने अपने शरीर को प्रकृति के नियमों पर चलाया और मन को संतुलित रखा उनके लिए दीर्घजीवन अभी भी एक साधारण बात रही है। फ्राँस की नाटककार महिला अन्ना डी.विहच 112 वर्ष तक जीवित रहीं। रोम का डीमाक्रीटस नामक वैज्ञानिक 109 वर्ष जिया। स्विटजरलेण्ड का मिटल स्टेड नामक सैनिक 112 वर्ष की आयु में मरा। इण्डेल के आर्किगहम नामक श्रमजीवी ने 144 वर्ष की आयु पाई। यदि वह पेड़ से लकड़ी काटते समय गिरकर मर न गया होता तो संभवतः और भी अधिक समय तक जीता। इंग्लैण्ड के एक 152 वर्षीय टामस पार नामक व्यक्ति का सार्वजनिक अभिनंदन करके उसे सम्मानित किया गया था। नार्वे का डकन वर्ग नामक व्यक्ति 146 वर्ष तक जिया वह अपने को हर दृष्टि से युवक मानता था। 130 वर्ष की आयु में उसने अपना अन्तिम विवाह किया था। योरोप में पिछले ही दिनों थामस वार 152 वर्ष, हैनरी जेनिकिन्स 169 वर्ष, मेरी वििलंगडन 112 वर्ष, फाउण्ड डेस्माँड 140 वर्ष,केथराइन एलन 131 वर्ष जीवित रहे हैं। भारत में भी प्रभाकर शास्त्री 109 वर्ष ,रामसेठ मुरकी 105 वर्ष आदि सैकड़ों मनुष्य शतायु हो चुके हैं। अभी भी प्रसिद्ध व्यक्तियों में महर्षि कर्वे, विश्वेश्वरय्या आदि कितने ही दीर्घजीवी मौजूद हैं। अप्रसिद्ध साधारण नागरिकों में तो उनकी संख्या सैकड़ों तक हो सकती है। योगी और तपस्वियों में तो कितने ही शतायु शरीर अभी भी मौजूद हैं।
मनोविकारों का कुप्रभाव
इन दीर्घजीवी व्यक्तियों में आहार−विहार संबंधी कोई भिन्नताऐं रही हों तो बात अलग है पर उनमें से सभी ऐसे थे जो प्रसन्न रहते थे और मनोविकारों से मुक्त रहा करते थे। शरीर में उत्पन्न होने वाले रोग जिस प्रकार जीवन तत्व को तेजी से समाप्त करते हैं और मृत्यु को निकट ला देते हैं उसी प्रकार मनोविकार संक्रामक रोगों की तरह ही घातक सिद्ध होते हैं। आयु को कम करने और देह को धीरे−धीरे गलाते चलने में मनोविकारों से उत्पन्न होने वाला विष शारीरिक रोगों की अपेक्षा किसी भी प्रकार कम नहीं है। काम-वासना को ही लीजिए। यह सर्व विदित है कि वीर्य शरीर की एक अमूल्य सम्पदा है, उसका व्यय जब भी होगा तभी शक्ति का एक महत्वपूर्ण भाग नष्ट होगा। मानसिक काम सेवन से भी उसी प्रकार की हानि होती है। मस्तिष्क में अश्लील, वासना सम्बन्धी विचार घुमड़ते रहने से मानसिक तन्तु उत्तेजित बने रहते हैं और मानसिक तत्वों का बड़ी मात्रा में क्षरण होता रहता है। शरीर की वासना काम सेवन से कुछ समय के लिए शान्त हो सकती है पर मानसिक वासना की शान्ति इस प्रकार भी संभव नहीं है। जब भी गंदे विचार आते हैं तुरन्त मस्तिष्क उत्तेजित होना आरम्भ कर देता है और निरन्तर शरीर से काम सेवन करते वाले मनुष्य की तरह उसका भी शक्ति स्राव होता रहता है। ऐसे लोग देह में भले ही ब्रह्मचारी बने रहें मानसिक व्यभिचार के कारण ब्रह्मचर्य का लाभ कदापि प्राप्त नहीं कर सकते।
क्रोध की भयंकरता
क्रोध की भयंकरता के संबन्ध में जो वैज्ञानिक शोधें हुई हैं उनसे प्रतीत होता है कि यह दुुर्गुण भी किसी भयंकर रोग से कम नहीं है। डाक्टर अरोली और केनन ने अनेक परीक्षणों के बाद यह घोषित किया है कि—‛क्रोध के कारण अनिवार्यतः उत्पन्न होने वाली रक्त की विषैली शर्करा हाजमा बिगाड़ने के लिए सबसे अधिक भयावह है। ‛आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी के स्वास्थ्य निरीक्षक डाक्टर हेमन वर्ग ने अपनी रिर्पोट में उल्लेख किया है कि—‟इस वर्ष परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने वाले छात्रों में अधिकाँश चिड़चिड़े मिज़ाज के थे।” पागलखाने की रिपोर्ट बताती है कि क्रोध से उत्पन्न होने वाले मानसिक रोगों ने अनेकों को पागल बना दिया। डाक्टर जे. एक्टर का कथन है कि—‛पन्द्रह मिनट क्रोध करने में शरीर की इतनी शक्ति खर्च हो जाती है जितनी से हम घण्टे परिश्रम कर सकते हैं’ न्यूयार्क के वैज्ञानिकों ने परीक्षा करने के लिए गुस्से में भरे हुए मनुष्य का कुछ बूँद खून लेकर पिचकारी द्वारा खरगोश के शरीर में पहुँचाया, नतीजा यह हुआ कि बाईस मिनट बाद खरगोश आदमियों को काटने दौड़ने लगा। पेंतीस मिनट पर उसने अपने को काटना शुरू कर दिया और एक घण्टे के अन्दर पैर पटक−पटक कर मर गया। क्रोध के समय शरीर में उत्पन्न होने वाले विष की भयंकरता का कुछ परिचय उस परीक्षण से सहज ही चल जाता है।
बाईबिल कहती है—‛क्रोध को लेकर सोना अपनी बगल में जहरीले साँप को लेकर सोना है।’ वैज्ञानिक सोन्हा का कथन है—‟क्रोध, शराब की तरह मनुष्य को विचारशून्य दुर्बल एवं लकवे की तरह शक्तिहीन कर देता है। दुर्भाग्य की तरह यह जिसके पीछे पड़ता है उसका सर्वनाश करके ही छोड़ता है। दार्शनिक अरस्तू का कथन है—‟जिसने क्रोध की अग्नि अपने हृदय में प्रज्ज्वलित कर रखी है उसे चिता से क्या प्रयोजन?”
हर मनोविकार एक रोग
निरन्तर संचय करने में लगे रहना,जोड़ते जाना,किसी को न देना, कन्जूसी के विचारों में डूबे रहना, अनुदारता और लोभ की मनोभूमि बनाये रखना सुप्त मन के संचारित भावना संस्थान एवं जागृत मन द्वारा प्रेरित चेतना प्रवाह को ‘संकोची’ बना देता है। शरीर की हर क्रिया में “न छोड़ने और पकड़े रहने” की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है। पेट पर इसका तुरन्त प्रभाव पड़ता है। दस्त साफ होने में रुकावट पड़ने लगती है। पेट भरा रहता है, उसमें मल इकट्ठा होता रहता है। आँतें मल त्यागने में कन्जूसी करती हैं। त्वचा के रोम कूप पसीना बाहर निकालने में संकोच करते हैं फलस्वरूप चर्मरोग उत्पन्न होते हैं। फेफड़े साँस को बाहर निकालते हुए झिझकते हैं अतएव रक्त की सफाई ठीक तरह न होने से कई प्रकार के रक्त विकार उठ खड़े होते हैं। सन्तान हीन व्यक्तियों में अधिकतर कन्जूस प्रकृति के होते हैं। उनकी गुप्त चेतना अपनी कमाई का उत्तराधिकार किसी को देना नहीं चाहती इसलिए वीर्य कोषों की ग्रन्थियाँ इस प्रकार सिकुड़कर बैठ जाती हैं कि संतान उत्पन्न होने की प्रक्रिया ही रुक जाती है।
रोग निवृत्ति के लिए दान देने की धार्मिक प्रथा में बड़ा भारी धार्मिक एवं मनोवैज्ञानिक तथ्य छिपा हुआ है। मृत्यु के समय अन्नदान एवं गौ दान करने से शान्तिपूर्वक प्राण त्याग होते देखा जाता है। साधारण रोगों के समय भी दीन दुखियों को या किन्हीं ज्ञानवर्धक, धर्म विस्तारक कार्यों में कुछ दान देने से रोगी के मन में एक प्रकार का सन्तोष एवं धर्म उल्लास पैदा होता है और उससे उसकी रोग निवृत्ति में भारी सहायता मिलती है। जेनेवा के मेडिकल जनरल में एक ऐसी ही घटना का उल्लेख कुछ दिन पूर्व छिपा था। घटना इस प्रकार बताई गई—‟एक लड़का बहुत दिन से जीर्ण ज्वर से ग्रस्त था। वह रोज डाक्टर के पास दवा खरीदने जाया करता था। एक दिन रास्ते में उसने भूख से तड़पती हुई एक बुढ़िया को देखा तो उसका मन दया से द्रवित हो गया। लड़के ने दवा के सारे पैसे उस स्त्री को दे दिये और स्वयं बिना दवा लिये ही वापिस लौट आया। अपने इस उदार काम की प्रसन्नता लड़के को तमाम दिन बनी रही। फलस्वरूप उसका कई महीने का रोग उसी दिन चला गया।”
भय, भ्रम, निराशा और चिन्ता में डूबे हुए कितने ही व्यक्ति अपना सर्वनाश करते रहते हैं। इन मानसिक दुर्बलताओं के कारण भले−चंगे लोग बीमार पड़ते हैं और बीमार आदमी मरने के लिए प्रस्तुत होते देखे गये हैं। कहते हैं कि एक बार यमराज ने महामारी को बुलाकर एक शहर से दस हजार मनुष्य मार लाने को भेजा। कुछ दिन बाद वह लौटी तो उसके साथ एक लाख मृत आत्माऐं खड़ी थीं। यमराज झल्लाये और कहा−हमने तो दस हजार मारने को कहा था यह एक लाख क्यों मारे गये? महामारी ने गिड़गिड़ाते हुए कहा− ‟भगवन! मैंने दस हजार से एक भी अधिक नहीं मारा। शेष 90 हजार तो डर के मारे स्वयं ही मर गये हैं और अकारण मेरे पीछे चले आये हैं।”
मनोबल की प्रचण्ड शक्ति
साहसी लोग प्राणघातक रोगों पर अपने मनोबल के सहारे विजय प्राप्त करते हैं पर कितने ही कमजोर तबियत के भय, आशंका और संशय से ग्रसित रह कर निरोग से रोगी ही नहीं बनते मामूली से कष्ट को बहुत बढ़ा−चढ़ा कर मानने से सचमुच ही बीमार पड़ जाते हैं। कितने ही डाक्टर, ज्योतिषी, भूत झाड़ने वाले ओझा और सहानुभूति दिखाने वाले बात को बढ़ा−चढ़ाकर बताते हैं और उस कष्ट को मिटाने में अपनी छोटी सहायता को बहुत बड़ी बताने के लिए बात का बतंगड़ खड़ा कर देते हैं। यदि मनुष्य इन पर विश्वास करने लगे तो सचमुच ही हड़बड़ा जाता है और वह घबराहट ही एक भारी विपत्ति बन जाती है। भूत,पलीतों से डरकर बीमार होने की ही नहीं प्राण गँवाने की भी कितनी ही घटनाऐं सामने आती रहती हैं। परीक्षा में अनुत्तीर्ण होने, घाटा लग जाने, किसी प्रिय स्वजन के मरने, राजदंड का भय, अपमान, भविष्य की अशुभ आशंका आदि मानसिक उलझनों से कितने ही व्यक्ति पागल होते, कई आत्म−हत्या करते और कई उद्विग्न होकर न करने योग्य काम करते और न सोचने योग्य बातें सोचने से विपन्न स्थिति में पड़े देखे गये हैं। इसके विपरीत अनेकों व्यक्ति ऐसे होते हैं जो विपत्ति की घड़ी में भी हँसते और मौत के साथ ठठोली करते देखे गये हैं।
मौत के साथ ठठोली
सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी कन्हाईलाल दत्त को जब मृत्यु दण्ड सुनाया गया तो फाँसी की कोठरियों में रहने के दिनों में उनका वजन 15 पौण्ड बढ़ गया था। काकोरी षड़यन्त्र के कैदी श्री रामप्रसाद बिस्मिल फाँसी लगने से एक घण्टा पूर्व अपना दैनिक व्यायाम कर रहे थे। फाँसी घर चौकीदार ने आश्चर्यचकित होकर पूछा— आप तो एक घण्टा बाद मरने वाले हैं फिर व्यायाम से क्या लाभ? श्री बिस्मिल ने हँसते हुए कहा—‛जब मौत नियत समय पर अपना काम करना नहीं छोड़ेगी तो मैं ही क्यों लापरवाही बरतूँ और समय के दुरुपयोग का अपराधी बनूँ।” अद्योवा के युद्ध में एक आयरिश सिपाही शेरो थेडरी बुरी तरह घायल हुआ। गोलियाँ उसके दाहिने फेफड़े में पीछे से घुसीं और फेफड़ा, आमाशय, जिगर, पित्तकोश चीरती हुई आँतों में तेरह दुहरें छेद बनाकर पेट में पड़ी रह गईं। खून बहुत निकल चुका था, जख्म बहुत थे, गोलियों और छर्रों से पेट भरा पड़ा था। डाक्टर निराश थे। उसे आपरेशन रूम में ले जाया जा रहा था तो शेडरी ने डाक्टर का कन्धा पकड़ा और धीरे से कहा—‟डाक्टर परेशान होने की जरा भी जरूरत नहीं है। जब तक मेरी छाती में बिना छिदा दिल मौजूद है तब तक मरने की कोई बात नहीं। मैं मर नहीं सकता आपरेशन के बाद में जरूर अच्छा हो जाऊँगा।” सचमुच उसने अपने विश्वास को सही सिद्ध कर दिखा दिया। वह मरा नहीं इतने बड़े आपरेशन के बाद भी अच्छा हो गया। उसी अस्पताल में एक और अनेकों गोलियों से छिदा दूसरा सैनिक भर्ती हुआ तो उसने अपने पड़ौसी की स्थिति को समझने के बाद हँसते हुए कहा जब मेरा साथी इतने घावों के बाद बच सकता है तो मेरे मरने का सवाल ही नहीं उठता।
मन रोगी तो शरीर रोगी
इस प्रकार के अनेकों आशावादी व्यक्ति भयंकर विपत्तियों से अपने साहस के बल पर आपत्ति को पार कर लेते हैं। दूसरी ओर निराशावादी, जरा−जरासी बात पर खिन्न होकर अपना भविष्य ही अन्धकारमय नहीं बनाते वरन् स्वास्थ्य को भी चौपट कर लेते हैं। ऐसे कितने ही व्यक्ति हैं जिनकी शारीरिक स्थिति कुछ बहुत बुरी नहीं है पर आशंका, चिन्ता, क्रोध और क्षोभ ने उनका मानसिक स्तर बुरी तरह जर्जर कर रखा है। मन के रोगी होने पर कोई भी व्यक्ति निरोग नहीं रह सकता यह एक सुनिश्चित तथ्य है। ईर्ष्या और द्वेष की आग में जलने वाले अपने लिए सबसे बड़े शत्रु हैं । दूसरों की बढ़ोतरी देखकर जल भुन जाने की बुरी आदत अनेक व्यक्तियों की होती है, वे स्वयं तो उन्नति कर नहीं पाते दूसरों का रास्ता रोककर उन्हें अपने से पिछड़ा हुआ रखना चाहते हैं। ऐसे अहंकारी और तुच्छ मनोभूमि के व्यक्ति मन ही मन सदा कुढ़ते रहते हैं। उन्हें कुढ़ाने के लिए कोई न कोई कारण कहीं न कहीं से सामने आता ही रहता है। ऐसे लोग अपने मनोविकारों के कारण कोई न कोई रोग भी सदा शरीर में पाले रहते हैं। गंदे मन वाले व्यक्ति का शरीर भी सदा गंदा रहेगा और जहाँ गन्दगी रहेगी वहाँ रोग का निवास होगा ही। आरोग्य की आकाँक्षा रखने वालों को अपने शरीर की बाहरी और भीतरी गन्दगी ही साफ नहीं करनी पड़ती वरन् मानसिक गन्दगी को भी साफ करना अनिवार्य होता है। इसके अभाव में आहार−विहार की नियमितता से भी स्वास्थ्य की रक्षा नहीं हो सकती ।
मनोविकारों का प्रभाव शारीरिक स्वास्थ्य पर अत्यधिक पड़ता है। सीधा, सरल और स्वाभाविक जीवन सब प्रकार शान्तिदायक और श्रेयस्कर है। सज्जनों से मित्रता, दुखियों पर करुणा, उन्नतिशीलों को देखकर प्रसन्नता और दुष्टों के प्रति उपेक्षा भाव रखकर मनुष्य अपनी मनोभूमि को शान्त रख सकता है। कई बार दुष्टों के दुर्व्यवहार से उत्पन्न होने वाली अव्यवस्था को रोकने के लिए उनसे निपटना पड़ता है, पर कठोर से कठोर संघर्ष करते हुए भी सद्भावना बनाये रखी जा सकती है। गान्धी जी ने इस प्रकार के सफल संघर्ष का एक आध्यात्मिक प्रयोग करके जनसाधारण के लिए उपयोगी मार्ग दर्शन किया है। ऐसे अवसर तो कम ही आते हैं कि सारा दोष सामने वाले का ही हो और हम सर्वथा निर्दोष हों। यदि मनुष्य अपने दोषों को देखता और सुधारता रहे तथा व्यक्ति समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप नीति निर्धारित करता रहे तो व्यक्तिगत जीवन में अधिकाँश द्वेष और संघर्षों से बचा जा सकता है।
हमारे आन्तरिक शत्रु
काम,क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, निराशा, विक्षोभ, चिन्ता , भय, शोक, संशय आदि के मनोविकार आमतौर से अपने भीतर से ही उत्पन्न होते हैं। इनकी जड़ मानसिक दुर्बलता एवं विचारों की भ्रान्ति में ही सन्निहित रहती है। बाहर का कोई छोटा बड़ा निमित्त जो उन विकारों को भड़काने के लिए मिल ही जाता है वास्तविक कारण न भी हो तो भी संशयग्रस्त मनः स्थिति वाले व्यक्ति कोई कारण कल्पना के आधार पर गढ़ लेते हैं या भविष्य की आशंकाओं के भयानक चित्र बना−बनाकर उससे और दुख पाते रहते हैं। हालाँकि उसका वास्तविक प्रयोजन कुछ भी नहीं है। दूसरों की बढ़ोत्तरी देखकर या प्रशंसा सुनकर जिन्हें सन्ताप होता है वे अपनी हीनता और असफलता की तुलना करके अपनी प्रगति की बात तो सोच नहीं पाते उस विक्षोभ को ईर्ष्या में परिणत कर लेते हैं और किसी प्रकार नीचा दिखाने की तरकीबें सोचने में अपना मस्तिष्क और समय बर्बाद करते रहते हैं। ईर्ष्या से उत्पन्न द्वेष, निन्दा, चुगली, कटाक्ष, विरोध आदि से बढ़ते−बढ़ते संघर्ष एवं शत्रुता में परिणत हो जाता है तब अकारण ही सैकड़ों ऐसी समस्याऐं सामने आ खड़ी होती हैं जिन्हें सुलझाना एक असाधारण सिरदर्द बन जाता है।
ईर्ष्या की भाँति ही निराशा, आवेश, भय, चिंता, संयम आदि की प्रतिक्रियाऐं होती हैं। यह मानसिक रोग मस्तिष्क के उन तत्वों को बुरी तरह नष्ट करते रहते हैं जो स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की दृष्टि से अत्यन्त उपयोगी एवं आवश्यक हैं। जिस प्रकार पाचन क्रिया का ठीक रहना स्वास्थ्य की रक्षा के लिए आवश्यक है उसी प्रकार मन और मस्तिष्क का शान्त एवं सौम्य रहना भी अनिवार्य है। यह सर्वविदित तथ्य है कि मन का नियंत्रण शरीर पर रहता है, जड़ तत्वों पर चेतना शासन करती है। यदि अन्तःचेतना में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाय तो शरीर का अस्वस्थ रहना सुनिश्चित है। देह में कोई रोग न भी हो पर यदि व्यक्ति मनोविकारों से ग्रसित है तो उसे बीमारी से भी अधिक कष्ट बना रहेगा और जीवन तत्व एवं आयुष्य का निरंतर क्षरण होता रहेगा।
शरीर पर मानसिक नियंत्रण
शरीर के समस्त अंगों में जिस प्रकार हृदय की धड़कन द्वारा रक्त संचार की व्यवस्था बनी रहती है, उसी प्रकार मस्तिष्क द्वारा, ज्ञान तन्तुओं द्वारा सारे शरीर की चेतना पर नियंत्रण होता है, देह में कहीं पर एक मक्खी भी बैठे तो उसकी सूचना ज्ञान तन्तुओं द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचती है और वहाँ से हाथ को मस्तिष्क ही उस मक्खी को उड़ाने की आज्ञा देता है। इस प्रकार हमारी प्रत्येक क्रिया पर मस्तिष्क का नियंत्रण होता है। यों मन की चेतना हमारे सारे शरीर में व्याप्त रहती है पर उसका प्रधान केन्द्र मस्तिष्क है। यह सुप्त और जागृत दो भागों में विभक्त है। आदतें सुप्त मस्तिष्क में और विचारधारायें जागृत मन में अपनी जड़े जमाये रहती हैं। इन दोनों के द्वारा हमारी बौद्धिक गतिविधियाँ ही नहीं स्वास्थ्य संबंधी प्रक्रिया का भी संचालन होता है। पाचन क्रिया के बाद सबसे महत्वपूर्ण अंग मस्तिष्क ही माना जाता है। इसलिए उसका निर्विकार रहना आवश्यक है। पेट में यदि कोई विषैली चीज पहुँच जाय तो उसके कारण उलटी, दस्त ,जी मिचलाना, घबराहट आदि अनेक विकृतियाँ पैदा हो जाती है। मस्तिष्क में भी यदि कुविचारों और दुर्भावनाओं का विष प्रवेश कर जाय तो उसके द्वारा पेट में गये हुए विष नाड़ी संस्थान एवं ज्ञान तन्तुओं द्वारा सारे शरीर में फैल जाता है, फलस्वरूप नाना प्रकार के रोग उपज पड़ते हैं।
भय का घातक प्रभाव
सिंह आदि हिंसकों की गंध पाकर कमजोर तबियत के बकरी आदि पशु किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं और बोलने तक भूल जाते हैं। भय के विचार मन में आते ही उनका प्राण सूख जाता है, सिंह को देखकर वे भागना तो दूर हिलते−डुलते तक नहीं और आसानी से उसके शिकार बन जाते हैं। फाँसी की कोठरी से निकालकर जब मृत्यु दंड पाये हुए कैदी वध स्थल पर ले जाये जाते हैं तो उनमें से कई ऐसे होते हैं जिनका डर के मारे बहुत बुरा हाल हो जाता है, धोती में मल−मूत्र निकल जाता है और अर्धमृत मूर्छित जैसी अवस्था में उन्हें फाँसी का फंदा पहनाया जाता है। यद्यपि मृत्यु से पूर्व कष्ट की कोई बात नहीं थी पर भय का विचार ही शरीर को संज्ञा शून्य कर देने के लिए पर्याप्त होता है।
सुस्वादु भोजनों पर बैठा हुआ भूखा मनुष्य बड़े प्रेम से खाना आरंभ करता है। इतने में तो यदि किसी प्रिय स्वजन की मृत्यु का समाचार मिलता है तो क्षणभर में भूख न जाने कहाँ चली जाती है और एक ग्रास भी मुँह के भीतर नहीं चलता। श्रवण कुमार और रामचन्द्र जी के पिता तो पुत्र विछोह के शोक में अपने प्राण ही दे बैठे थे । अभी भी ऐसे समाचार आते रहते हैं कि पति−पत्नी में से एक की मृत्यु होने पर दूसरे की मृत्यु शोक संतप्त अवस्था में ही हो गई। शोक एक मनोभाव मात्र है। शरीर में कोई रोग या आघात न होने पर भी मानसिक कष्ट के कारण शरीर इतना अधिक प्रभावित होता है कि उसे प्राण तक छोड़ने के लिए विवश होना पड़ता है। क्रोध के विचार आते ही सारा शरीर काँपने लगता है, आँखें लाल हो जाती हैं, स्वर बदल जाता है, चेहरा तमक जाता है। इसी प्रकार प्रसन्नता के विचारों की मस्ती देखते ही बनती है।
अन्तर्जगत के कुटिल द्वन्द्व
मनोभावों को दबाने के कारण अन्तर्जगत में प्राणघातक ग्रन्थियाँ बन जाने की बात मनोवैज्ञानिक स्वीकार करते हैं। प्रयोगों से पता चला है कि कोई व्यक्ति यदि अपने मनोविकारों को प्रकट न करे छिपाये रहे तो उसकी घुटन संकटपूर्ण परिस्थिति पैदा कर देती है। सास बहू में सदा झगड़ा बना रहे और दोनों मन ही मन कुढ़ती रहें तो सास अन्धी हो सकती और बहू को क्षय, अंत्रदाह जैसे रोगों में ग्रसित हो जाना संभव है। अतृप्त काम वासना को दमन करने के कारण हिस्टीरिया, पागलपन, मूर्छा जैसे रोग होते देखे गये हैं। ईर्ष्यालु, कपटी, मायावी, पाखंडी ठग, जालसाज प्रकृति के लोग दुहरा व्यक्तित्व बनाये रहते हैं। भीतर कुछ और बाहर कुछ और का पाखंड जिन्हें बनाये रखना पड़ता है उनके हृदय, यकृत,गुर्दे, की क्रिया शक्ति तेजी से नष्ट होती है और चिरस्थायी रोगों के चंगुल में वे फंस जाते हैं। अपमान का घूँट जिन्हें पीना पड़ा है, बेबसी के कारण किसी के बन्धनों में पड़े हुए जो तड़फ तड़फड़ाते रहते हैं, जिनकी कामनाऐं अधूरी रहती हैं उन्हें स्नायु दौर्बल्य, अनिद्रा, दुःस्वप्न, मूत्र रोगों से ग्रसित होते देखा गया है। जिन स्त्रियों के दाम्पत्ति जीवन असन्तोष भरे रहते हैं पर सामाजिक भय से विवश होकर ससुराल में रहना पड़ता है उन्हें कई प्रकार के रोगों में घुल−घुलकर मरते देख गया है। ऐसे रोगियों की मनोव्यथा दूर हुए बिना कोई दवा दारु कारगर नहीं होती।
भूकम्प या तूफान आने पर जिस प्रकार किसी नगर की स्थिति उलट−पलट जैसी हो जाती है वैसी ही स्थिति मनोविकारों के उफान आते रहने पर शरीर की हो जाती है। चिन्ता को चिता की उपमा दी गई है, चिता मरे को जलाती है पर चिन्ता तो जीवित को ही जला डालती है। जो लोग मनसूबे बड़े−बड़े बाँधते रहते हैं पर अपनी अयोग्यताओं एवं दुर्गुणों के कारण कर कुछ नहीं पाते, ऐसे अतृप्त कामना वाले मनुष्य गठिया, रक्तचाप, मन दृष्टि, मलावरोध जैसे रोगों से ग्रसित होते देखे गये हैं। असन्तोषी, ईर्ष्यालु और कुढ़न में ग्रस्त रहने वालों का शरीर कभी भी पनप नहीं सकता भले है उन्हें खाने−पीने की कितनी ही उत्तम सुविधा क्यों न प्राप्त हो। हर आदमी को विरोधी झूँठा, बेईमान और अविश्वस्त समझने वाले वहमी मनुष्य घृणा और आशंका से अपनी मनोभूमि को गंदी किये रहते हैं और उस गंदगी से उनका रक्त भी दूषित तत्वों से भर जाता है। ऐसे लोगों को रक्ताल्पता से लेकर पक्षाघात तक भयंकर रोग होने की सम्भावना बनी रहती है। केन्सर रोग आमतौर से उन्हें होता है जो चिन्ता और बेचैनी के शिकार रहते हैं, जिनके मन में काम वासना के अश्लील विचार निरन्तर घूमते रहते हैं उन्हें स्वप्न दोष, प्रमेह, बहुमूत्र आदि की शिकायत कुछ ही दिनों में पैदा हो जाती है। जिन्हें निराशा घेरे रहती है, अन्धकारमय भविष्य की ही कल्पना जिन पर सवार रहती है उन्हें फोड़े, फुँसी और दाद, छाजन जैसे चर्म रोग उठ खड़े होते हैं।
मनोभूमि का संतुलन
निरोगिता की आकाँक्षा करने वालों को पेट की सफाई रखना आवश्यक है इसी प्रकार यह भी अनिवार्य है कि अपनी मनोभूमि को संतुलित एवं स्वच्छ रखें। पेट और मस्तिष्क स्वास्थ्य की गाड़ी को ठीक प्रकार चलाने वाले दो पहिये हैं इनमें एक बिगड़ गया तो दूसरा भी बेकार ही बना रहेगा। मनोभूमि को संतुलित रखने के लिए यह आवश्यक है कि हमारा स्वभाव हंसोड़, सन्तोषी और निर्भय रहने का हो । हर काम को पूरी जिम्मेदारी से करना चाहिए और अति महत्व किसी भी बात को नहीं देना चाहिए। खिलाड़ी जिस प्रकार फील्ड में पूरी तत्परता से खेलते हैं पर हार जीत का कोई प्रभाव अपने मन पर नहीं पड़ने देते, रंगमंच पर नाटक करने वाले अभिनेता अपना अभिनय पूरे मनोयोग से करते हैं और नाटक में घटित हुई घटनाओं का अपने मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने देते। जीवन की हर समस्या को हमें खिलाड़ी की दृष्टि से ही देखना चाहिए और हमारा कर्तव्य करते हुए भी किसी को इतना महत्व न देना चाहिए कि उसके दबाव से मानसिक संस्थान अस्त−व्यस्त होने लगे। वेदान्त की ‘संसार स्वप्न’ मान्यता की उपयोगिता इसी दृष्टि से है। कर्तव्य के लिए जो परिस्थितियाँ सामने आ पड़ें उनके लिए हलकी दृष्टि रखना और किसी भी बात को बहुत अधिक महत्व न देना स्वास्थ्य की दृष्टि से एक बहुत ही उपयोगी गुण है।
हँसी खुशी का जीवन
हँसते और हँसाते रहने वाले अपनी आयुष्य बढ़ाते हैं और दूसरों को सजीवता का उपहार देते हैं। जो महत्व बगीचे में खिलते हुए फूलों का है वही उपयोगिता मानव समाज में प्रसन्न मुख, रहने वालों की है। रोगियों की परिचर्या करने वाली प्रसन्न मुख, मुस्कुराते रहने वाली, विनम्र स्वभाव की नर्सें कितनी ही बार कीमती दवादारू से अधिक जीवन दायिनी सिद्ध होती हैं। वे अपने उत्तम स्वभाव के कारण असाध्य और निराश रोगियों में भी आशा भर जीवनी शक्ति का संचार करके रोग−मुक्ति में हमारी सहायता करती देखी गईं हैं। जिस घर में एक दो व्यक्ति भी इस प्रकार अलमस्त तबियत के होते हैं वे सारे परिवार की चिन्ता और परेशानी को उसी प्रकार पी जाते हैं जिस प्रकार समुद्र मंथन का विष शंकर जी पी गये थे। मुँह फुलाये, मनहूस की तरह खिन्न बैठे रहने का स्वभाव एक अभिशाप है, ऐसे लोग स्वयं ही संत्रस्त नहीं रहते वरन् अपने सम्बन्धित लोगों का भी प्राण चूसते रहते हैं। हंसोड़ लोग आमतौर से मोटे होते हैं। लोग समझते हैं कि वे सुखी एवं स्वस्थ हैं इसलिए हँसा करते हैं पर सच बात यह है कि वे अपने प्रसन्न स्वभाव के कारण ही स्वस्थ और सुखी दीखने जैसी स्थिति में रहते हैं। दुनियाँ में हर आदमी के सामने समस्याऐं हैं सब की अपनी−अपनी उलझनें हैं, पूर्ण सन्तुष्ट और सुखी व्यक्ति की रचना परमात्मा ने नहीं की है। जितना कुछ प्राप्त है उस पर आनन्द मनाने, सन्तुष्ट रहने की और अधिक प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करते रहने की नीति जिनने अपना ली है उनके लिए हँसते रहने के अगणित कारण अपने चारों ओर बिखरे दिखाई पड़ते हैं।
आस्तिक को किसका डर
ईश्वर पर विश्वास करने वाले के लिए निराश होने और डरने का कोई कारण नहीं हो सकता। जब इस समस्त सृष्टि की बागडोर हमारे पिता−परमेश्वर के हाथ में है तो भविष्य के निराशाजनक होने का कारण क्या हो सकता है? जिस ईश्वर ने जन्म से पूर्व गरम और मीठे दूध की दो थैलियाँ हमारे लिए तैयार रखी थी वह क्या कभी हमें असहाय छोड़ सकता है। अपने भीतर बाहर जब सर्वत्र परमात्मा संरक्षक के रूप में मौजूद है तो डरा किससे जाय? डरने की चीज एक ही है−पाप वृत्तियों से यदि हम डरने लगें तो सर्वत्र निर्भयता ही निर्भयता का साम्राज्य दिखाई देगा। डराती तो हमें हमारी दुर्बलताएं ही हैं। अपने गुण, कार्य, स्वभाव में से बीन−बीन कर हमें दुर्बलताओं को निकालना चाहिए। आत्म निरीक्षण, आत्म−शोधन आत्म−विकास की तात्विक दृष्टि को अपनाकर हम अपनी मनोभूमि को दिन−दिन शुद्ध बनाते चलें तो चित्त सदा प्रसन्न रहेगा, भविष्य आशाजनक दिखाई देगा और वर्तमान कठिनाइयों को सुलझाने के लिए एक सही दृष्टिकोण मिलेगा जिसके आधार पर कठिन समस्याओं को भी सरलतापूर्वक सुलझाया जाना संभव होगा।
मानसिक संतुलन आवश्यक है
स्वास्थ्य सुधार के लिए मानसिक संतुलन अनिवार्यतः आवश्यक है। ओछे और बिगड़े स्वभाव के लोग कभी निरोग रह सकेंगे इसमें संदेह है। चिकित्सा का उपचार सामयिक है उससे तात्कालिक कष्ट दूर हो सकता है पर रोग की जड़ बनी रहेगी तो बीमारी फिर उखड़ेगी या कोई और नया रूप धारण कर सामने आवेगी। प्राकृतिक मर्यादाओं के अनुरूप आहार−विहार अपनाकर स्वास्थ्य को सुरक्षित रखना, एवं विषैली तीव्र औषधियों से बचते हुए सौम्य चिकित्सा पद्धति से बिगड़े हुए स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त कर सकना संभव हो सकता है पर स्थायित्व तभी आवेगा जब मनोभूमि का भी आवश्यक सुधार हो, शारीरिक रोगों से छुटकारा प्राप्त करना जितना आवश्यक है उतनी ही आवश्यकता इस बात की भी है कि मस्तिष्क को मनोविकारों से रहित बनाया जाय। स्वच्छ पेट और स्वच्छ मन ही दीर्घजीवन एवं आरोग्य रक्षा का सर्वोत्तम एवं सुनिश्चित माध्यम हो सकता है। यदि वस्तुतः हम चिरस्थायी आरोग्य चाहते हों तो इन दोनों की उपेक्षा किसी भी प्रकार नहीं की जा सकती।
जीवनोपयोगी सामान्य ज्ञान प्रकृति ने सभी के लिए सुलभ रखा है। उसी के बलबूते पर सृष्टि के सभी जीव जन्तु अपने आरोग्य की रक्षा करते हैं। आरोग्य विद्या का जानना सभी के लिए नितान्त आवश्यक समझकर प्रकृति ने यह कृपा की है कि न्यून या अधिक बुद्धि वाले किसी भी प्राणी को उस ज्ञान से वंचित नहीं रखा है। कदाचित यह ज्ञान डाक्टरों और विद्वानों तक ही सीमित होता, शिक्षालयों में ही उसकी जानकारी संभव रही होती तो केवल सुशिक्षित लोग ही निरोग रह पाते और उस जानकारी के अभाव में बेचारे अल्प बुद्धि वाले प्राणी रोग ग्रसित दृष्टि−गोचर होते। धन्यवाद है कि परमात्मा से ऐसी भूल हुई नहीं है, उसने हर इन्द्रिय को इतना स्वाभाविक ज्ञान प्रदान कर रखा है कि यदि प्राणी अत्याचार न करे और इन्द्रियों को अपनी प्रेरणा के अनुसार काम करने दे तो उसके आरोग्य एवं दीर्घ जीवन के सम्बन्ध में कोई गतिरोध उत्पन्न ही न हो।
पेट की पाचन क्रिया
पेट में कोई वस्तु मुख में होकर ही जाती है, मुख के दरवाजे पर दाँत, जीभ और कण्ठ यह तीन डाक्टर इस योग्यता से सम्पन्न नियुक्त किये गये हैं कि वे कोई अनुपयुक्त ऐसी वस्तु भीतर न जाने दें जो हानिकर अहितकर हो। दाँत इसलिए हैं कि वे हर चीज को इतना पीसें कि कण्ठ के बहुत छोटे से छेद में बारीक पिसा हुआ एवं तरल बना हुआ आहार आसानी से नीचे उतर जाय। गले में बहुत छोटा छेद इसीलिए रखा गया है कि वह कोई कम पिसी, मोटी, सूखी चीज भीतर न जाने दे। जीभ इसलिए है कि क्या आहार अपने उपयुक्त है क्या अनुपयुक्त इसकी परीक्षा बारीकी से किया करे और जो वस्तुऐं अपने शरीर के लिए हितकर हों उन्हीं को ग्रहण करने की स्वीकृति दे। कण्ठ,दाँत और जीभ इन तीनों की ही चाबी आमाशय के पास है। पहले खाया हुआ भोजन जब तक भली प्रकार हजम न हो जाय और नये भोजन की जब तक आवश्यकता ने पड़े तब तक वह खाने की रुचि और चेतना ही उत्पन्न नहीं करता। उस स्थिति में खाई हुई कोई चीज स्वास्थ्यकर होते हुए भी केवल हानि ही कर सकती है।
पाचन क्रिया की खराबी को रोगों की जड़ बताया गया है। यह खराबी तभी उत्पन्न होती है जब मुख में नियुक्त तीन डाक्टरों की और पेट में नियुक्त व्यवस्थापक की आज्ञाओं का उल्लंघन करके हम हर प्रकार धींग−धींगी करने को उतारू हो जाते हैं। वे बेचारे पाचन यंत्र बहुत दुर्बल हैं। घड़ी के पुर्जे जितने नाजुक होते हैं उससे भी अधिक संवेदनशील हैं। घड़ी के साथ कोई धींग मस्ती करे तो उसे खराब होना ही पड़ेगा। पाचन यंत्र की दुर्गति भी इसी कारण होती है।
बुझाई अग्नि पर चढ़ी कढ़ाई
सृष्टि का कोई भी प्राणी खाने की प्रक्रिया तभी आरम्भ करता है जब पेट में क्षुधा जागृत होती है। बिना भूख के खाना बुझी हुई अग्नि के ऊपर कढ़ाई पकाने के प्रयत्न के समान है। सिंह तभी शिकार पर आक्रमण करता है जब उसे भूख लगी हो। पेट भरा होने पर वह भोजन की चिन्ता छोड़कर आनन्द मनाता रहता है। कदाचित कोई शिकार पकड़ में भी आ जाय तो उसे मारकर कहीं छिपा देता है और खाता तभी है जब कड़ाके की भूख लगती है। कुत्ते का पेट भरा हो और उसे कहीं से रोटी मिले तो मुँह में दबा कर ले जाता है और जरूरत के वक्त खाने के लिए पंजों से जमीन खोदकर गाड़ आता है। अन्य सभी जीव जन्तु भूख न होने पर आहार के लिए मुँह नहीं खोलते। प्रकृति ने उन्हें जो सामान्य ज्ञान दे रखा है उसके आधार पर वे जानते हैं कि बिना भूख खाना अपने लिए एक घातक विपत्ति को आमंत्रण देना है। केवल बुद्धिमान कहलाने वाला एक मनुष्य ही ऐसा है जो अपने बौद्धिक अहंकार के कारण स्वादिष्ट भोजनों के लोभ में अथवा बुरी आदतों का आदी होकर बिना भूख खाता रहता है और बेचारे पेट की शक्तियों को निरन्तर कुचल−कुचल कर नष्ट करता रहता है।
अन्धाधुन्ध चलने वाली रेल
रेलगाड़ी किसी स्टेशन से अगले स्टेशन को तब छूटती है जब अगले स्टेशन वाला यह स्वीकृति दे दे कि लाइन साफ है और गाड़ी छोड़ी जा सकती है। इसके लिए सरकार ने ऐसा प्रबन्ध किया हुआ है कि एक लोहे का गोला प्रमाण पत्र के रूप में इंजन ड्राइवर को मिलता है। तब उस ‘टोकन’ या टेबिलेट कहे जाने वाले गोले को लेकर गाड़ी अगले स्टेशन के लिए रवाना होती है। यह गोला एक सुरक्षित ऐसी अलमारी में रखा रहता है। जिसे खोलना अगले स्टेशन के स्टेशन मास्टर के हाथ में होता है। यह टोकन लिए बिना गाड़ी चल दे तो दुर्घटना होकर रहेगी। मनमानी करने वाला ड्राइवर चाहे जब ट्रेन दौड़ा दे, टोकन आदि की परवाह न करे तो वह विपत्ति ही उत्पन्न करेगा। ऐसी उद्दंडता करने वाले ड्राइवरों को कड़ी सजा भुगतनी पड़ सकती है। हमारे शरीर में आहार की रेल को चलाने का भी यही कायदा है। आहार एक है। उसे मुँह के स्टेशन से पेट के अगले स्टेशन के लिए तभी छूटना चाहिये जब पेट का स्टेशन मास्टर लाइन क्लीयर होने का आदेश दे दे। पिछला अन्न ठीक तरह पच नहीं पाया, खुलकर भूख लगी नहीं ऐसी दशा में नया बोझा लाकर आमाशय पर पटक देना उसके साथ सरासर अन्याय है। स्टेशन की लाइनें गाड़ियों से भरी हैं, वे गाड़ी हटें तभी तो नई गाड़ी वहाँ बुलाई जा सकती है। पहली खड़ी गाड़ियाँ पटरी से हटाये बिना उसी पर और गाड़ी बुला ली जाय तो गाड़ियाँ आपस में टकरा जावेंगी और भयंकर हानि होगी। बिना भूख खाना बिलकुल इसी तरह का है जैसे लाइन साफ हुए बिना एक रेल पर दूसरी रेल चढ़ा देना। पेट से तीव्र भूख रूपी टोकन पाये बिना यदि मुँह के स्टेशन से अन्धाधुन्ध आहार की गाड़ी छोड़ी जायगी तो दुर्घटना के अतिरिक्त और किसी प्रकार की क्या आशा की जा सकती है?
बुरी आदतों का कुचक्र
मनुष्य ने अनेक प्रकार की भली बुरी उन्नतियाँ की हैं उनमें से एक बहुत बुरी उन्नति अपनी आहार संबंधी बुरी आदत के बारे में की है। भूख न लगने पर भी खाना एक ऐसी गलती है जिसका दंड पाचन क्रिया नष्ट होने के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। इस गलती का कारण यह मालूम होता है कि जिह्वा इन्द्रियों को नकली जायकों में बहका−बहका कर उसे एक रिश्वतखोर राज कर्मचारी अथवा अभ्यस्त नशेबाज की स्थिति में पहुँचा दिया गया है। किसी भी प्राणी का स्वाभाविक आहार उसके मूल रूप में उपलब्ध स्थिति में ही हो सकता है। चिड़िया दाने चुगती है, पशु घास खाते हैं, हिंसक जीव, माँस और कीड़े मकोड़े अपनी−अपनी उपयोगी चीजें खाते हैं पर वे खाते उसी रूप में हैं जिसमें कि प्राकृतिक रूप से वह आहार उपलब्ध होता है। कोई भी उसे न पकाता, न पीसता है और न स्वाद के लिए कोई अतिरिक्त मिर्च−मसाला उसमें मिलाता है। इस मर्यादा का पालन करने पर ही भूख के अनुसार आहार का नियम वे ठीक प्रकार चला पाते हैं। मनुष्य ने अपने आहार में पोषण की उपयोगिता की उपेक्षा करके स्वाद को प्रधानता दी है। वह चाहता तो शाक, फल, दूध पर अपना गुजारा कर सकता था। अन्न के बिना काम नहीं चलता था तो उसे हरे रूप में अथवा सूखे अन्न को भिगोकर पुनः अंकुरित करके सजीव रूप में उसे ले सकता था। पाचन क्रिया को बहुत दुर्बल बना लिया तो उबालने की क्रिया भी अपना सकता था। पर हर पदार्थ को जला डालने, भून डालने से उसके पोषक तत्व नष्ट करने की प्रक्रिया अपनाने से तो उसमें बचता ही क्या है। पोषण की दृष्टि से हमारे स्वादिष्ट कहलाने वाले पदार्थ केवल कोयला या छूँछ की श्रेणी में गिने जा सकते हैं।
पाचन यंत्र का विनाश
इस स्वत्व विहीन निर्जीव आहार को भी यदि मनुष्य भूख की मर्यादा का ध्यान रखते हुए खाता तो भी गनीमत था,पर मिर्च−मसालों के आधार पर उन्हें भी अधिक मात्रा में और बिना आवश्यकता के समय-कुसमय खाने की ठान ठानली। ऐसी दशा में पाचन यंत्र कब तक अपना सही काम कर सकता था, उसे बिगड़ना ही था, बिगड़ा भी हुआ है। मिर्च मसाले जो आज हमारे भोजन के प्रधान अंग बने हुए हैं, न केवल व्यर्थ हैं वरन् हानि−कारक भी हैं। छोटे बच्चे को लाल मिर्च खिलाई जाय तो वह उसकी जलन से बेचैन हो जायेगा और बुरी तरह तड़प−तड़प कर रोने लगेगा। जिसने अपनी जीभ की आदत नहीं बिगाड़ी है उस प्रत्येक व्यक्ति का यही हाल होगा, चाहे वह छोटी आयु का हो, चाहे बड़ी आयु का। जीभ का डाक्टर न मिर्च को शरीर के उपयोगी स्वीकार करता है न मसाले को। पर हमारी बुद्धि ही है जो हर किसी की आदत बिगाड़ देती है। रिश्वतखोरी का चस्का, जुए का चस्का, सिनेमा का चस्का, व्यभिचार का चस्का, नशेबाजी का चस्का जैसे आदत में शामिल होने पर मुश्किल से छूटता है उसी प्रकार प्रत्यक्ष हानिकर दीखते हुए भी मिर्च मसाले और खटाई मिठाई के सम्मिश्रण से बनी हुई जायकेदार कहलाने वाली चीजें भी हमें प्रिय लगने लगती हैं और उन्हीं के स्वाद के लालच में मनुष्य समय, कुसमय आवश्यक, अनावश्यक भोजन करता है। भूख न लगने पर भी जब थाली सामने आती है या जायके की हुड़क लगती है तो लोग कुछ न कुछ मुँह में ठूँसना आरंभ कर देते हैं। कितने लोग हैं जो भूख की तृप्ति के लिए उपयोगी आहार को औषधि रूप में ग्रहण करते हैं? कितने लोग हैं जो आहार का चुनाव करते समय उसकी पोषण शक्ति का ध्यान रखते हैं? आमतौर से एक आनन्द, स्वाद, विनोद, फैशन के रूप में ही तरह−तरह के चित्र−विचित्र भोजन खाये जाते हैं। इसी बुरी आदत ने हमारे जीवन वृक्ष की जड़ पर कुल्हाड़ा चलाया है, जब तक यह बनी रहेगी तब तक पेट के सुधारने और शरीर के निरोग रहने की आशा को दुराशा मात्र ही मानी जानी चाहिए।
भूख लगने पर ही खाया जाय
जब कड़ाके की भूख लगती है तभी मुख और आमाशय में से पाचक रसों का स्राव आरम्भ होता है। भोजन केवल आमाशय के ही रसों से नहीं पचता वरन् उसमें मुख से निकलने वाली लार का भी पर्याप्त मात्रा में सम्मिश्रण होना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब धीरे−धीरे भली प्रकार चबाते हुए प्रत्येक ग्रास को देर तक मुँह में रख के निगलें। उसे बाईस बार चबाने का नियम स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बनाया है। इसके तीन लाभ हैं (1) आहार में मुँह से निकलने वाले पाचक रसों का समावेश पर्याप्त मात्रा में हो जावे (2) ग्रास पिसकर इतना पतला हो जावे कि कंठ के छिद्र पर अनावश्यक दबाव न पड़कर आसानी से नीचे उतर जाय (3) परिपूर्ण पिसे हुए आहार को पेट आसानी से हजम कर सके।
जो लोग जल्दी में दो चार दाँत मारकर अधकुचले ग्रासी को निगलते रहते हैं उनके दाँतों का काम आँतों को करना पड़ता है। पीसने की शक्ति दाँतों में है आमाशय में नहीं। अधकुचले आहार को बेचारा पेट स्वयं ही पीसे भी और स्वयं भी पचावे भी तो उसे दूनी शक्ति खर्च करनी पड़ती है। साथ ही बिना चबाया हुआ ग्रास मोटा भी रहता है जिससे गले के छिद्र को उसे निगलने में असुविधा होती है। छिद्र चौड़ा हो जाता है और रगड़ पड़ने से भोजन नली की खराबी से दाह, खाँसी, कफ़ जैसे रोगों की जड़ जमने लगती है। मुँह की लार पर्याप्त मात्रा में न मिल पाने से सूखा जैसा ग्रास निगलते समय कष्टकारक होता ही है। इस कमी को लोग रसाली दाल आदि के साथ ग्रास को भिगोकर पूरी करते हैं। जल्दी−जल्दी बिना पूरी तरह चबाये भोजन करने की आदत बहुत ही बुरी है। पाचन यंत्र को बिगाड़ने में इस बुरी आदत का भी एक बड़ा हिस्सा रहता है। कहावत है कि—‟रोटी को पीना चाहिए और पानी को खाना चाहिए” इसका तात्पर्य यह है कि रोटी को इतना चबाया जाय कि वह पानी की तरह पतली हो जाय और पानी को धीरे−धीरे चूस−चूस कर एक−एक घूँट को कुछ देर मुँह में रखकर इस प्रकार पिया जाय कि वह कार्य भी रोटी खाने जैसा लाभदायक हो जाय। पानी पीते समय यदि कुछ देर मुँह में उसे रखे रहा जाय तो मुँह की लार का समावेश होने से वह पानी भी पाचक एवं गुणकारक बन जायेगा।
हानिकारक अभक्ष पदार्थ
मसाले और मिठाई अनावश्यक ही नहीं हानिकारक भी हैं। आरम्भ में वे पाचक जैसे दिखाई पड़ते हैं पर उनमें पाचन का नहीं भड़काने मात्र का गुण है। घोड़े को दौड़ाने में जो कार्य चाबुक कर सकती है वही कार्य पेट को पीटने में मसाले करते हैं। आरंभ में इससे कुछ लाभ भले ही दिखाई दे पर पीछे पेट की शक्ति जब दिन−दिन क्षीण होती जाती है तो यह मसाले भी कुछ काम नहीं करते। इतना ही नहीं इनकी आदत भी पड़ जाती है। कमजोर घोड़ा जैसे चाबुक से पिटे बिना दौड़ना तो दूर साधारण चाल से भी नहीं चल पाता वही दशा पेट की भी हो जाती है। अरुचि, अपच, आदि अनेक व्यथाओं से ग्रसित उदर फिर नशे के आधार पर ही जीवित रहने वाले शराबी की स्थिति में पहुँचकर दिन−दिन अशक्त होता जाता है। स्वाद के नाम पर बिना भूख, अधिक मात्रा में भोजन होते रहने की हानि तो प्रत्यक्ष ही है। इसलिए जिन्हें आरोग्य प्यारा है उन्हें खटाई मिठाई से मिर्च, मसालों से भरे हुए ‘स्वादिष्ट’ कहलाने वाले व्यंजनों का मोह छोड़ना ही होगा।
प्रातः काल थोड़ा दूध या छाछ ली जा सकती है। शरीर से कठोर काम करने वाले मजदूरों को छोड़कर और किसी को भी प्रातःकाल भारी नाश्ता नहीं करना चाहिए। रात को सोते रहने के कारण सबेरे तक पिछला भोजन ठीक तरह हजम नहीं हो पाता। इसलिए उसे दोपहर तक पचाने का अवसर देना चाहिए। प्रातः थोड़ा दूध या छाछ ही पर्याप्त है। अधिक कमजोर पाचन प्रकृति के लिए नींबू और शहद गर्मियों में ठंडे और जाड़ों में गरम जल में मिलाकर पी लिया करें तो उनके लिए इतना ही जलपान पर्याप्त हैं। मध्याह्न और सायंकाल भोजन के लिए दो समय पर्याप्त है। पचास वर्ष से अधिक उम्र वालों के लिए दोपहर को एक समय भोजन और शाम को फल दूध जैसी कोई हलकी चीज लेनी चाहिए। नियत दो समयों के अतिरिक्त बीच में थोड़ी−थोड़ी चाट पकौड़ी लेते रहने की आदत को बिलकुल ही छोड़ देना चाहिए।
इन नियमों का ध्यान रखा जाय
सप्ताह में एक दिन पेट को पूर्ण विश्राम देने के लिए उपवास भी करना चाहिए। सरकारी कर्मचारियों को सप्ताह में एक दिन छुट्टी मिलती है। बाजार भी अब सप्ताह में एक बार बन्द रहते हैं। चौबीस घंटे के नौकर पेट को भी सप्ताह में एक दिन की फुरसत मिलनी चाहिए ताकि वह छह दिन की थकान मिटाकर अगले सप्ताह मुस्तैदी से काम करने के लिए ताजगी प्राप्त कर सके। उपवास के दिन जो केवल जल, नींबू, शहद आदि पर न रह सकें वे दूध−छाछ, शाक फल जैसा रसीला हलका अल्पाहार ले सकते हैं। आजकल अन्न छोड़कर मावा की मिठाइयाँ, कूटू सिंघाड़े आदि की बनी गरिष्ठ चीजें खाने की जो रूढ़ी चल रही है वह तो उपवास करने से भी अधिक खराब है। उपवास का लाभ तभी है जब वह अन्ध परम्परा के रूप में नहीं, विवेक−पूर्वक किया जाय।
“क्या खायें?” यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना “कैसे खायें’ की बात महत्वपूर्ण है। कीमती पौष्टिक पदार्थों की सुविधा जुटाने या विटामिनों की सूची तलाश करने की उतनी आवश्यकता नहीं, जितनी खाने में सावधानी रखना। हाथी, घोड़े, हिरन, लंगूर सरीखे प्राणी जब घासपात जैसी चारण समझी जाने वाली चीज से आवश्यक बल प्राप्त कर सकते हैं तो हम अन्न, दूध, शाक, फल जैसी सात्विक और परिपूर्ण पौष्टिक चीजों से क्यों समुचित शक्ति प्राप्त नहीं कर सकते हैं। उन्हें पकाने और खाने का ढंग बदल देने मात्र से काम चल सकता है। सूखे अन्नों को पानी में भिगोकर अंकुरित करके फल और मेवों की तरह उपयोगी बनाया जा सकता है। अन्न या शाक पकाने हों तो उन्हें छिलके समेत थोड़ा कुचल कर भाप से उबाल लिया जाय तो उनके पोषक तत्व पकाने में नष्ट न होकर काफी अंशों में सुरक्षित रह सकते हैं और हमें समुचित शक्ति दे सकते हैं। थोड़ा नमक काम में लिया जा सकता है पर मिर्च मसाले तो छोड़ ही देने चाहिए। चीनी निरर्थक ही नहीं हानिकारक भी है। जरूरत प्रतीत हो तो गुड़, शहद, खजूर, शहद, किशमिश आदि की सहायता से मिठास की जरूरत पूरी की जा सकती है। मिठाइयाँ, पकवान, चाट पकौड़ी, अचार आदि चीजों से जितना बचा जा सके बचना ही चाहिए। हरे शाक भाजी सलाद बनाकर खाये जा सकते हैं। गाजर, मूली, शलजम, टमाटर, ककड़ी, पालक आँवला, अदरक, नीबू, आदि जो चीजें समय पर मिल सकें उन्हें काटकर भोजन के समय कच्चा खाने से स्वाद भी प्राप्त होता है और पोषण भी। फलों में संतरा, पपीता आदि सस्ते भी हैं और अच्छे भी। अंगूर, अनार सेब आदि महंगे फल जो लोग नहीं खा सकते उनके लिए अमरूद, खीरा, आम, जामुन, ककड़ी, बेर, खरबूजा, तरबूज केला आदि की कुछ व्यवस्था करते रहना चाहिए। घी तेल को केवल तीव्र पाचन क्रिया वाले ही पचा सकते हैं। दुर्बल पेट वालों को दूध, दही एवं फल, शाकों में घी वाले पैसे खर्च करने चाहिए इससे उन्हें पोषण भी मिलेगा और पेट पर अनावश्यक दबाव भी न पड़ेगा।
सात्विकता की प्रधानता
जो कुछ भी हम खायें, भगवान को भोग लगा कर एक दिव्य प्रसाद समझकर प्रसन्न मन से खावें। अन्न को देवता मानकर उसका सम्मान करते हुए उसकी पोषण शक्ति का ध्यान करते हुए प्रमुदित चित्त से खाया हुआ भोजन एक विशेष प्राणशक्ति से सम्पन्न हो जाता है। सात्विक कमाई का सात्विक प्रकृति के स्नेही स्वजनों द्वारा पकाया हुआ शान्तिमय वातावरण में, प्रसन्न चित्त होकर ग्रहण किया हुआ साधारण भोजन भी दूषित परिस्थितियों के बहुत कीमती भोजन की अपेक्षा कहीं अधिक लाभदायक होता है। आहार से हमारे पोषण का सीधा संबन्ध है इसलिए उसे उपेक्षा पूर्वक नहीं, विचारपूर्वक ग्रहण करना चाहिए। शौक, स्वाद को छोड़कर हमारा भोजन प्रकृति की प्रेरणा और उपयोगिता का पूरा−पूरा ध्यान रखकर ही उदरस्थ किया जाने लगे तो स्वास्थ्य की एक पेचीदा समस्या का सहज ही हल हो सकता है।
जिस प्रकार कोई मशीन अपनी सामर्थ्य से अत्यधिक काम करने से जल्दी टूट−फूट जाती है और पड़ी रहने से जंग खाकर पुरानी हो जाती है उसी प्रकार शरीर रूपी मशीन का भी उचित मात्रा में श्रमशील रहना आवश्यक है। सृष्टि के सभी जीव−जन्तु आहार की तलाश में दिनभर घूमते फिरते रहते हैं, जिससे उनका शरीर उचित मात्रा में श्रम कर लेता है। आहार के पाचन और रक्त संचार की व्यवस्था ठीक प्रकार बनाये रहने के लिए इस प्रकार की श्रमशीलता आवश्यक भी है।
चिड़ियाँ सवेरा होते ही दाना चुगने की तलाश में अपने घोंसले से उड़ जाती हैं और दिनभर इधर से उधर फुदकती रहती हैं। हिरन दिनभर चलते फिरते और चौकड़ी भरते नजर आते हैं। जंगलों में स्वतन्त्र निर्वाह करने वाले पशु, बन्दर, लंगूर, गिलहरी, चींटी, तितली, मधुमक्खी आदि जीव−जन्तु सारे दिन गतिशील रहते हैं, कुछ न कुछ करते रहते हैं। यदि वे अपने यह भ्रमण बन्द कर दें तो उनका रक्त संचार पाचन स्नायु−संस्थान सभी कुछ शिथिल पड़ जाय और जिस प्रकार काम न करने वाले मनुष्य कमजोरी और बीमारी से ग्रसित बने रहते हैं इसी प्रकार वे जीव−जन्तु भी रुग्ण रहने लगें।
आराम की जिन्दगी−मौत का निमंत्रण
आरोग्य की रक्षा के लिए मानसिक संतुलन और उचित आहार आवश्यक है उसी प्रकार समुचित शारीरिक श्रम व्यवस्था रहनी भी जरूरी है। देखा गया है कि लोग शारीरिक श्रम करने में संकोच करते हैं उसमें बेइज्जती समझते हैं और आराम की जिंदगी गुजारना चाहते हैं। आलस्य और हरामखोरी की आदत ने मनुष्य का जितना अहित किया है उतना शायद ही अन्य किसी बुराई ने किया हो। जिस प्रकार भूमि को जोत, बोकर, नाना प्रकार के अन्न, शाक उपजाये जाते हैं, जिस प्रकार खान खोदकर धातुऐं और खनिज पदार्थ निकाले जाते हैं, जिस प्रकार दूध बिलोकर घी निकाला जाता है उसी प्रकार इस शरीर को परिश्रम में लगाकर उद्योग और पुरुषार्थ के बल पर ही विभिन्न दिशाओं में उन्नति की जाती है और श्री समृद्धि का प्रतिफल प्राप्त किया जाता है। उद्योगी पुरुषों को ही लक्ष्मी मिलने की उक्ति अक्षरशः सत्य है। जिनने भी जीवन का कुछ लाभ लिया है उनने उद्योगी और परिश्रमी बने रहने की निरन्तर पूरी−पूरी चेष्टा की है। एक डच कहावत के अनुसार ‘आराम की जिन्दगी−मौत का निमंत्रण कही जाती है।’
विद्या प्राप्ति, धन उपार्जन, कला कौशल, कृषि व्यापार, लोक सेवा आदि कार्यों के लिए ही नहीं आरोग्य की रक्षा के लिए भी श्रमशीलता आवश्यक है। जो लोग मेहनत से जी चुराते हैं, शरीर को कष्ट देने में बेइज्जती समझते हैं वे अपनी भूल का परिणाम दुर्बलता और अस्वस्थता में ही प्राप्त करेंगे, उनका स्वास्थ्य कभी ठीक न रह सकेगा। आरोग्य के उपासक अखाड़ों में, व्यायाम शालाओं में खेल के मैदानों में अपनी साधना करते हैं और स्वास्थ्य के देवता का अभीप्सित वरदान प्राप्त करते हैं। कोई पहलवान आज तक ऐसा नहीं हुआ जिसने व्यायामशाला में जाने से इनकार किया हो, कसरत कुश्ती से जी चुराया हो। कोई खिलाड़ी तब तक प्रशंसा का पात्र नहीं बन सकता जब तक वह खेल के मैदानों में अपने शरीर को उछालने कुदाने में संकोच करता रहे। क्या कोई कुशल कारीगर ऐसा हो सकता है जो परिश्रम से जी चुराता रहा हो? जिनके हट्टे−कट्टे और मजबूत शरीर दिखाई पड़ते हैं उनमें से प्रत्येक व्यक्ति परिश्रमी रहा होता है। आलस्य से आराम मिल सकता है पर यह आराम बड़ा महँगा पड़ता है। प्रगति के सब द्वार तो उससे रुकते ही हैं, स्वास्थ्य भी निश्चित रूप से चौपट होता है।
श्रम का अवाँछनीय तिरस्कार
भारतवर्ष में न जाने कैसे एक भयानक भ्रम फैल गया है कि गरीब और नीची श्रेणी के लोग ही शारीरिक श्रम करते हैं। अमीर और शिक्षितों को दिमागी काम भले ही करना पड़े पर शारीरिक श्रम नहीं करना चाहिए। जिसे शारीरिक श्रम करना पड़ता है वह अपनी बेइज्जती समझता है। अमीर लोग अपने कपड़े पहनने और जूते बाँधने का काम भी नौकरों से कराते देखे गये हैं। थोड़ा−सा वजन ले चलने के लिए कुली और थोड़ी दूर चलने के लिए उन्हें सवारी चाहिए। श्रमजीवी लोग यहाँ अछूत या शुद्र समझे जाते हैं। शारीरिक काम करना चूँकि बेइज्जती का कारण है इसलिए कारीगरी और मजदूरी का पेशा भी बेइज्जती की बात गिन ली गई और जो कोई भी इन कामों को करने लगे वे घृणा की दृष्टि से देखे जाने लगे, नीच या अछूत समझे जाने लगे। इस दूषित दृष्टिकोण ने हमारा सामाजिक अधःपतन किया। बेइज्जती से खिन्न होकर करोड़ों निम्न श्रेणी के कहे जाने वाले लोग विधर्मी होकर एक बड़े सिर दर्द का कारण बने हुए हैं। जो बच्चे पढ़ते जा रहे हैं वे बेइज्जती के कृषि कारीगरी सरीखे शारीरिक श्रमों को छोड़कर क्लर्की जैसे आराम के काम तलाश करते फिरते हैं। इससे राष्ट्र की आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। मजूर कम होते जा रहे हैं, उत्पादन घटता जा रहा है और पढ़े लिखों की बेकारों बढ़ती हुई संख्या नाना प्रकार के अनैतिक कार्यों में संलग्न होकर सामाजिक शक्ति नष्ट करने में लगी हुई है।
इस प्रवृत्ति का सबसे घातक असर स्वास्थ्य पर हो रहा है। आरामतलब रईसों और सेठों में से एक प्रतिशत भी स्वस्थ न मिलेंगे। बाबू लोगों के कोट पेंट उतारकर देखा जाय तो हड्डियों का ढाँचा मात्र दिखाई देगा। अपच और अनिद्रा से सभी परेशान होंगे। चाय और बीड़ी के आधार पर किसी प्रकार उनकी टूटी गाड़ी लुढ़कती रहती है। शिक्षितों का स्वास्थ्य अशिक्षितों की तुलना में अत्यधिक खराब पाया जाता है, इसका एक बड़ा कारण उनका शारीरिक श्रम से जी चुराना भी है।
महिलाऐं भी पीछे नहीं
महिलाऐं इस बुराई में पुरुषों से आगे ही बढ़ जाना चाहती हैं। थोड़े खाते, पीते, पढ़े लिखे और कुलीन घरों की महिलाऐं यह पसन्द नहीं करतीं कि उन्हें चूल्हा, चक्की, बरतनों की सफाई, झाडू, बुहारी आदि मामूली समझे जाने वाले काम अपने हाथ से करने पड़ें। इन कार्यों के लिए उन्हें नौकर की आवश्यकता पड़ती है। स्वयं करना पड़े तो बेइज्जती अनुभव होती है। जिन्हें अपने हाथ से कुछ काम नहीं करना पड़ता वे इसमें अपना गर्व और सौभाग्य समझती हैं। स्वेटर बुनना और उपन्यास पढ़ना ही उन्हें इज्जत का काम दीखता है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि उनके स्वास्थ्य पुरुषों की अपेक्षा भी अधिक खराब होते चले जा रहे हैं। पुरुषों को घर से बाहर जाने आने का तथा और भी कुछ धरने उठाने का काम तो भी रहता है पर स्त्रियों का कार्यक्षेत्र और भी संकुचित हो जाता है। फिर बार−बार प्रसव होते रहने और दूध पिलाते रहने के कारण वे स्वभावतः शरीर की दृष्टि से कुछ दुर्बल होती हैं ऐसी दशा में श्रम को त्याग देने पर उनके रक्त संचार एवं पाचन व्यवस्था पर और भी बुरा असर पड़ता है, देहाती महिलायें जो खेती के काम में लगी रहती हैं एवं चक्की पीसना, कुँए से पानी भरना, गोबर थापने जैसे परिश्रम भरे काम करती रहती हैं उनका स्वास्थ्य कितना अच्छा रहता है। प्रसव काल का कष्ट उन्हें जरा भी परेशान नहीं करता। बीमारी उनके पास फटकती तक नहीं। परिश्रम का विकल्प केवल रोग ही हो सकता है। जो मेहनत से जी चुराते हैं उन्हें बीमारी का बोझ उठाना ही पड़ेगा।
यह भली भाँति स्मरण रखा जाना चाहिए कि स्वस्थ रहने के लिए शारीरिक श्रम की समुचित व्यवस्था रखे रहना आवश्यक है। चाहे वह उपार्जन के लिए हो, चाहे खेल के लिए, चाहे व्यायाम के लिए, रूप कैसा भी क्यों न हो पर नित्य पसीना बहाने वाली और शरीर के प्रत्येक अंग में समुचित हलचल उत्पन्न करने वाली श्रम की नित्य नियमित प्रक्रिया बनी ही रहनी चाहिए। बुद्धिजीवी व्यक्तियों के लिए तो यह सब और भी अधिक आवश्यक है। जिनके पास पढ़ने लिखने का काम अधिक रहता है, उनकी जीवनी शक्ति पाचन यंत्रों से खिंचकर मस्तिष्क में लग जाती है इसलिए उनकी भूख घट जाती है और पाचन शिथिल पड़ जाता है। ऐसी दशा में उनके लिए यह और भी अधिक आवश्यक है कि अपने शारीरिक श्रम के लिए कोई न कोई व्यवस्था अवश्य ढूँढ़ निकालें।
व्यायाम सबके लिए आवश्यक
संतुलित व्यायाम की ओर हममें से प्रत्येक को ध्यान देना चाहिए। जिन्हें मेहनत मजदूरी करनी पड़ती है उनके हाथ तो पूरा काम करते रहते हैं पर कितने ही अवयव ऐसे रह जाते हैं जिनको आवश्यकता से कम ही श्रम करना पड़ता है। जिन्हें बैठे रहने का, लिखने पढ़ने का काम करना पड़ता है उनके लिए तो यह अनिवार्य है कि वे नियमित रूप से व्यायाम किया करें। साधारण श्रम और व्यवस्थित व्यायाम में एक बहुत बड़ा अन्तर मनोभावना का है। श्रम, श्रम के लिए किया जाता है। इसलिए इसमें व्यायाम या स्वास्थ्य अभिवर्द्धन की भावना नहीं रहती। इस भावना के अभाव में अंग−प्रत्यंगों का वह विकास नहीं होता जो होना चाहिए। लुहार दिन भर हथौड़ा चलाता है, कुली दिनभर माल ढोता है उनका परिश्रम किसी पहलवान अखाड़े में किये हुए व्यायाम से कम नहीं होता है। पर इन श्रम जीवियों के अंग−प्रत्यंग इतने विकसित नहीं होते जितने स्वास्थ्य वृद्धि का संकल्प लेकर नियमित व्यायाम करने वाले पहलवान के। पोस्टमैन दिनभर चिट्ठी बाँटने के लिए कितने ही मील का चक्कर लगाते हैं पर भावनापूर्वक एक दो मील स्वास्थ्य भावना को लेकर टहलने वालों के बराबर उन्हें लाभ नहीं होता। श्रम के साथ यदि स्वास्थ्य वृद्धि का संकल्प भी जुड़ा रहता है तो उसका प्रभाव सोना और सुगन्धि के समन्वय के समान असाधारण लाभदायक ही होता है।
हलके और संतुलित व्यायाम
श्रमजीवी लोगों के लिए भी आसन, प्राणायाम, टहलना, मालिश, सूर्य नमस्कार एवं संतुलित व्यायाम आवश्यक है। फिर बुद्धिजीवी लोगों के लिए तो उनकी नितान्त आवश्यकता है कम से कम एक घण्टे का समय इस दृष्टि से हर किसी को लगाना चाहिए। यह सोचना भूल है कि यह एक घण्टा बेकार चला जायेगा। इस थोड़े से समय को लगाने से शरीर की जो क्षमता एवं सामर्थ्य बढ़ेगी उससे कई शेष 23 घण्टे बहुत ही अच्छी तरह व्यतीत होंगे, ड्योढ़ा काम होगा और गहरी नींद आवेगी। बच्चे, बूढ़े, बीमार, कमजोर, महिलाऐं, गर्भवती, सभी के लिए ऐसे हलके और संतुलित व्यायाम हो सकते हैं जिनसे उनके दुर्बल शरीर पर अनावश्यक दबाव न पड़े और वे बिना किसी थकान का अनुभव किये स्फूर्ति शक्ति एवं ताजगी प्राप्त कर सकें। पहलवानों के लिए डण्ड बैठक, डंबल, मुदगर जैसे कठोर व्यायाम उपयोगी होते हैं पर स्वल्प सामर्थ्य वाले लोगों के लिए अथवा जिन्हें दिन भर कड़ी मेहनत करनी पड़ती है उनके लिए हलके व्यायामों की ही आवश्यकता है।
दुर्बलता और अस्वस्थता का एक इलाज व्यायाम भी है। सूर्य चिकित्सा, प्राण−चिकित्सा, जल चिकित्सा, औषधि−चिकित्सा की ही भाँति एक अत्यन्त उपयोगी प्रक्रिया व्यायाम−चिकित्सा भी है। यदि हमारे दैनिक जीवन में इसके लिए समुचित स्थान मिले तो न केवल कमजोरी सशक्तता में परिणत हो वरन् बीमारियों को हटाने और मिटाने में भी सहायता मिले। अशक्ति से अशक्त मनुष्य के लिए व्यायामों का उपचार हो सकता है और हर परिस्थिति का हर व्यक्ति उससे आशाजनक लाभ प्राप्त कर सकता है।
जिन्हें समय और सुविधा है उनके लिए एक से एक अच्छे व्यायाम मौजूद हैं। अखाड़े में जाने वालों के लिए डंड बैठक, कुश्ती, डंबल, मुदगर सरीखी अनेकों विधियाँ उन व्यायाम शालाओं के संचालक सिखा देते हैं। हाकी, क्रिकेट, पोलो, दौड़, तैराकी,लम्बी कूद, लाठी चलाना आदि खेलों की शिक्षाऐं एवं प्रतियोगिताऐं भी होती रहती हैं। मनोरंजन एवं व्यायाम के खेल स्कूलों, कालेजों, स्काउटों एवं अन्य संस्थाओं द्वारा जहाँ−तहाँ सिखाये और कराये जाते रहते हैं। इन्हें वे लोग कर सकते हैं जिनके शरीर निरोग हैं और खेलने के लिए उचित मात्रा में स्फूर्ति मौजूद है। पर ऐसे लोगों की संख्या बहुत थोड़ी है।
यह पंक्तियाँ हम उन अधिकाँश लोगों के लिए लिख रहे हैं। जिनके पास न तो कड़े व्यायामों के लिए शक्ति है, न स्फूर्ति, न उमंग। जिन्हें अशक्तता अनुभव होती रहती है और दैनिक कार्यक्रम पूरा करना ही बहुत थका देने वाला और भार रूप प्रतीत होता है। आज अधिकाँश लोग इसी प्रकार के दृष्टिगोचर होते हैं। जवानी में जिन्हें बुढ़ापा घेरे हुए हैं ऐसे युवक भी वस्तुतः वृद्धों में ही गिने जाने योग्य हैं। बूढ़े कमजोरों के लिए जो व्यायाम उपयुक्त हो सकते हों, जो शक्ति को जरा भी नष्ट न करके थकान न बढ़ाते हुए उत्साह एवं स्फूर्ति की ही वृद्धि करें ऐसे ही हलके व्यायाम आज की स्थिति में सर्वसाधारण के लिए उपयोगी हो सकते हैं।
हलके−फुलके व्यायाम
ऐसे हलके व्यायामों का भी एक स्वतन्त्र विज्ञान है। पिछले पृष्ठों पर बताया जा चुका है कि व्यायाम भी एक स्वतन्त्र चिकित्सा विज्ञान है और केवल उसी के आधार पर कठिन रोगों का समाधान एवं अशक्तता का निवारण हो सकता है। आसन और प्राणायाम ऐसे ही योगिक व्यायाम हैं। इनमें से कुछ कठिन और कुछ बहुत सरल है। प्राचीन काल में 84 आसन प्रचलित थे जिनमें से अधिकाँश योगियों के काम के थे। वनों में रहने वाले तपस्वी अपनी धारणा ध्यान आदि मानसिक उपासनाओं में लगे रहते थे, पर इससे शरीर की क्रिया तो बिगड़ती थी। उन्हें इस आवश्यकता की पूर्ति आसनों द्वारा पूरी करनी पड़ती थी। 84 आसन उन लोगों ने अपनी आवश्यकता की दृष्टि से बनाये थे। उनमें से कितने ही ऐसे हैं जो सर्वसाधारण के लिए बहुत उपयोगी हैं। अब आरोग्यशास्त्र के विशेषज्ञों ने और भी आगे खोज की है और ऐसे अनेक हलके व्यायाम खोज निकाले हैं जो आसनों की ही जाति में गिने जा सकते हैं। अपच,संग्रहणी, गठिया, लकवा, रक्तचाप, अनिद्रा, मधुमेह जैसे कठिन रोगों को अच्छा करने के लिए कुछ व्यायाम जादू की तरह काम करते देखे गये हैं। वृद्धावस्था को दूर करने के लिए आसनों की ऐसी पद्धतियाँ ढूँढ़ निकाली गई हैं जिन्हें मनुष्य चारपाई पर पड़े−पड़े बिना किसी कष्ट के कर सकता है। रोगियों के व्यायाम भी ऐसे हैं जिनके लिए किसी अखाड़े में जाना नहीं पड़ता, वरन् चारपाई पर पड़े−पड़े ही कुछ अंगों को एक वैज्ञानिक पद्धति के अनुसार चलाते रहने से रुका हुआ रक्त संचार चालू हो जाता है और अस्वस्थता के निवारण में बड़ी सहायता मिलती है।
बाल वृद्ध सभी के लिये उपयोगी
छोटे बच्चों के लिए ऐसे हलके व्यायाम हैं, जिनसे उनके कोमल अंगों पर दबाव तो जरा भी नहीं पड़ता पर शरीर के प्रत्येक अवयव की आशाजनक प्रगति होने लगती है। प्राचीन काल में गुरुकुलों में रहने वाले छात्र अपने अनुभवी गुरुजनों से ऐसे ही व्यायामों की शिक्षा प्राप्त करते थे और शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त मस्तिष्क को ज्ञान से परिपूर्ण करके ही नहीं, शरीर को आरोग्य से परिपूर्ण करके भी लौटते थे। स्कूलों से न सही, घरों में यदि हमारे बच्चे उन वैज्ञानिक अंग संचालन प्रवृत्तियों को अपनाकर व्यायाम की आवश्यकताओं को पूरा करते रहें तो निश्चय ही उनकी शारीरिक स्थिति बेहतर हो सकती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से महिलाओं की समस्या भी बड़ी पेचीदा है। वे सामाजिक बन्धनों के कारण न तो व्यायाम शालाओं में जा सकती हैं और न खेल के मैदान में। टहलने तक की उन्हें फुरसत नहीं रहती। ऐसी दशा में यह हलके व्यायाम ही उनके लिए संजीवनी बूटी का काम कर सकते हैं। जिन्हें चक्की पीसने या खेती मजूरी जैसे कड़े देहाती काम नहीं करने पड़ते ऐसी ‘शहरी’ महिलाओं के लिए योगिक सन्तुलित, व्यायामों की अत्याधिक आवश्यकता है। उन्हें जितना लाभ उस प्रक्रिया को नित्य थोड़ी देर अपनाने से मिल सकता है उतना कीमती औषधियों के खाने से भी नहीं मिल सकता।
वृद्ध पुरुष यदि नित्य थोड़ी देर इस अंग संचालन प्रणाली को काम में लाया करें तो वे बहुत दिन तक अपने जीर्ण शरीर में भी सामर्थ्य और क्षमता को धारण किये रह सकते हैं। जीर्णता और असहाय अशक्तता से तो उन्हें मृत्यु पर्यन्त छुटकारा मिला रह सकता है। युवा व्यक्ति जो बुढ़ापे की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं वे आसनों की सहायता से इस क्षति पर नियंत्रण कर सकते हैं। वे देर तक युवावस्था का आनन्द लेते रह सकते हैं। यह स्पष्ट है कि मनोविकारों से छुटकारा पाकर सन्तुष्ट और प्रसन्न रहने वाला व्यक्ति निरोग रह सकता है। यह भी सर्वविदित है कि जिसका आहार संयमित और संतुलित होगा वह कभी बीमार न पड़ेगा। इसी प्रकार यह भी हमें नोट कर लेना चाहिए कि शारीरिक श्रम का बहुत कम या बहुत अधिक होना भी अस्वस्थता को आमंत्रित करता है। जिसे निरोग रहना हो उसे न तो इतनी मेहनत करनी चाहिए जिसे देह बर्दाश्त न कर सके और न लुँज−पुञ्ज बैठे रहकर पाचन प्रणाली एवं रक्त संचार पद्धति को ही खराब कर लेना चाहिए। पढ़े लिखे लोगों को बहुधा शारीरिक श्रम कम और मानसिक कार्य अधिक करना पड़ता है। उनके लिए तो व्यायाम की उपेक्षा एक खतरे की बात ही कही जा सकती है। इस लापरवाही का मूल्य उन्हें अपने स्वास्थ्य की बर्बादी के रूप में ही चुकाना पड़ता है।
प्रत्येक स्वास्थ्य प्रेमी के लिए
विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों के बालकों, वृद्धों, महिलाओं, रोगियों एवं रोगणियों के लिए पृथक पृथक प्रकार के ऐसे हलके व्यायामों की आवश्यकता है जो उनके द्वारा बिना किसी कष्ट उठाये बन पड़े। अलग−अलग रोगों के लिए भी अलग से ऐसी व्यायाम विधियाँ हैं जो उन रोगों पर कीमती दवाओं से भी अधिक असर डालती हैं। इन योगिक व्यायाम पद्धतियों का−आसनों का−श्वास प्रश्वास क्रियाओं एवं प्रणालियों का विस्तृत एवं व्यवस्थित विधान हम पाठकों के सामने पुस्तकों के रूप में भी प्रस्तुत करेंगे और उनके प्रत्यक्ष शिक्षण की व्यवस्था भी करेंगे। खोये हुए स्वास्थ्य को प्राप्त करने के लिए वैसा ही एक व्यापक आन्दोलन करना पड़ेगा, जैसे खोई हुई राजनैतिक स्वाधीनता को प्राप्त करने के लिये स्वतंत्रता संग्राम लड़ना पड़ा था। ‘अखण्ड−ज्योति’ अपने एक भी पाठक को रोगी देखना पसंद न करेगी। पिछले दस वर्षों तक गायत्री और यज्ञ के प्रचार की तरह अब आगामी दस वर्षों में हमें सर्वांगीण स्वास्थ्य का व्यापक आन्दोलन करना है, स्वस्थ शरीर, स्वस्थ मन, स्वस्थ समाज का विविध आरोग्य ही एक सर्वांगीण स्वास्थ्य माना जाता है। हम राष्ट्र को शारीरिक मानसिक एवं सामाजिक दृष्टि से स्वस्थ एवं बलिष्ठ बनाने के लिए कार्य करेंगे। विचारों का देशव्यापी प्रचार एवं शिक्षण करने की जो व्यवस्थित योजना हमारे मस्तिष्क में है वह शीघ्र ही मूर्त रूप धारण करेगी।
बात कहाँ से कहाँ पहुँच गई। हम सरल व्यायामों की बात कह रहे थे, कहने लगे भविष्य की प्रणाली की बात। विषयान्तर को छोड़कर यहाँ यही कहना और समझना चाहिए कि प्रत्येक स्वास्थ्य प्रेमी को किसी न किसी रूप में व्यायाम को अपने दैनिक जीवन में स्थान देना चाहिए और उनका चुनाव करते समय वर्तमान शारीरिक स्थितियों में हलके और योगिक व्यायाम ही सर्व साधारण के लिए उपयुक्त हो सकते हैं, इसलिए उनकी और ही सर्वसाधारण का ध्यान अधिक आकर्षित करना चाहिए।
टहलना
सरल व्यायामों से प्रातःकाल टहलने जाना बहुत ही सुखद है। सूर्योदय के पूर्व उषाकाल की वायु इतनी प्राणप्रद होती है कि उसे जितनी अधिक लूटा जा सके, लूटकर अपने फेंफड़े में भर लेना चाहिए। रात को 9−10 बजे तक सो जाने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि सवेरे जल्दी उठ बैठना संभव हो सके। नित्यकर्म से निवृत्त होकर टहलने निकल जाना चाहिए। स्लो मार्च से भी नहीं, डबल मार्च से भी नहीं, क्विक मार्च से टहलना श्रेयस्कर है। झुककर नहीं, सीना तानकर चलना चाहिए। मुँह बन्द रहे। साँस नाक से लेनी चाहिए। टहलने के समय बात−चीत करते जाने से साँस मुँह के द्वारा आने−जाने लगती है, जो फेफड़े के लिए हानिकारक है। इसलिए यदि कई साथी मिलकर टहलने जा रहे हों तो अधिक बातें नहीं करनी चाहिए। पैरों के साथ साथ हाथ भी आगे होता चलता है। खुली हवा में हरे−भरे खेतों या वृक्षों की अधिकता जिधर हो उधर ही टहलने जाना चाहिए। गन्दी हवा जहाँ निकल रही है उधर टहलना तो न टहलने से भी अधिक हानिकारक है। एक घण्टा प्रति−दिन समय लगाया जाय तो 3−4 मील टहला जा सकता है। यह एक घण्टा सारे दिन ताजगी बनाये रहेगा।
मालिश
तेल की सहायता से मालिश करने की रिवाज पहलवानों में देखी जाती है। जच्चा स्त्रियों को, छोटे बच्चों को या दर्द के बीमारी को तेल मालिश की जाती है। पर सही बात यह है कि मालिश हर बाल, वृद्ध के लिए, नर नारी के लिए, समान रूप से उपयोगी है। रक्त संचार और अंगों की माँसपेशियों को गतिशील बनाने के लिए मालिश की उपयोगिता असाधारण है। स्नान से पहले आधा घण्टा स्वयं मालिश करनी चाहिए। तेल के साथ भी यह हो सकती है और बिना तेल के भी। तेल का उपयोग इतना ही है कि चमड़ी पर रगड़ का असर न पड़े। बाल न टूटें एवं रगड़ते समय हाथों में चिकनाई एवं फिसलन बनी रहे। रोम कूपों में होकर तेल भीतर नहीं जा सकता। इसलिए तेल से कपड़े चिकने होने का जिन्हें डर हो वे उसे कुछ विशेष आवश्यक न समझकर छोड़ भी सकते हैं और सादे हाथों से अथवा रोंएदार तौलिये से अपने आप अपनी मालिश कर सकते हैं। दूसरों से भी इस कार्य में मदद ली जा सकती है। स्नान के समय धीरे−धीरे प्रत्येक अंग प्रत्येक को काफी देर तक रगड़−रगड़ कर स्नान किया जाय तो उससे भी मालिश की आवश्यकता पूरी हो सकती है। यह ध्यान रखने की बात है कि हृदय की ओर मालिश को ले जाया जाय। हृदय से नीचे की ओर हलके हाथ से और नीचे से हृदय की ओर दबाव देकर मालिश करनी चाहिए
मालिश की भी अपनी एक विशेष पद्धति है। इसकी विस्तृत विवेचना पाठक फिर कभी पढ़ेंगे पर यहाँ इतना ही समझ लेना चाहिए कि सरल व्यायामों में मालिश का महत्व अद्भुत है। इस लिए टहलकर आने के बाद कुछ देर मालिश भी अवश्य करनी चाहिए। स्नान यदि पहले कर लिया गया है तो बिना तेल के केवल हाथों से अथवा तौलिये से हल्की मालिश की जा सकती है इसके बाद स्नान की आवश्यकता नहीं रहती । टहलने और मालिश करने के बीच में आसनों का या हलके व्यायाम करने के बीच में आसनों का या हलके व्यायाम एवं प्राणायाम का समय रहना चाहिए। विभिन्न परिस्थिति के लोगों के लिए विभिन्न प्रकार के व्यायाम हो सकते हैं पर सूर्य नमस्कार की आसन प्रणाली ऐसी है जो सर्वसाधारण के लिए समान रूप से उपयोगी है। नीचे सूर्य नमस्कार के अनेकों प्रकारों में से एक सर्वसुलभ विधान प्रस्तुत कर रहे हैं, इन्हें हर कोई अपना सकता है और आशाजनक लाभ उठा सकता है।
सूर्य नमस्कार
प्रातःकाल सूर्य भगवान के सामने खड़े होकर शरीर और आत्मा में तेजस्विता की प्रेरणा करने वाले भगवान भास्कर का ध्यान करते हुए−गायत्री मंत्र के मानसिक जप के साथ सूर्य नमस्कार व्यायाम करने से अन्य सभी कसरतों की अपेक्षा शरीर को बहुत बल मिलता है। यह पद्धति धार्मिक भी है और वैज्ञानिक भी । आरोग्य शास्त्र की दृष्टि से विचार किया जाय तो शरीर के प्रायः प्रत्येक अंग का संचालन इससे हो जाता है। कमजोर और सामान्य स्वास्थ्य वाले स्त्री−पुरुष भी इसे सुविधापूर्वक कर सकते है। जिस प्रकार वर्ष में बारह महीने होते हैं उसी प्रकार इस एक ही व्यायाम में 12 आसन हो जाते हैं। आरम्भ और अन्त के दो आसन नमस्कार आसन हैं। शेष दस आसन शरीर के प्रत्येक अंग का संचालन करके उसमें सक्रियता का संचार करते है। इन्हें क्रमशः करना चाहिए। प्रारम्भ में पाँच बार इसे किया जाय क्योंकि जिन्हें अभ्यास नहीं है उन्हें आरम्भ में कुछ कठिनाई होती है। रगें और पुट्ठे दर्द भी करने लगते हैं। इसलिए आरम्भ थोड़े से करके पीछे क्रमशः उसे बढ़ाते जाना चाहिए।
इसी प्रकार के और भी कितने ही सरल व्यायाम हैं जिन्हें कमजोर स्वास्थ्य रहने पर भी सुविधापूर्वक किया जा सकता है। अपनी स्थिति के अनुरूप चुनाव करके हममें से प्रत्येक को कोई न कोई व्यायाम नित्य नियमित रूप से करना आरम्भ कर देना चाहिए।
सूर्य नमस्कार के 12 आसन:−
1,12 नमस्कारासन 2,9 हस्तपादासन 3,8 एक पादप्रसरणासन 4— द्विपाद प्रसरणासन 5−अष्टाँग प्राणिपातासन 6−सर्पासन 7−भूधरासन 10−ऊर्ध्व नमस्कारासन 11−उपवेशनासन।
नियमित, संयत और व्यवस्थित जीवन जीने से वह शान्ति और सुविधापूर्वक चलता है। मनुष्य शरीर ही नहीं मामूली वस्तुऐं भी यही अपेक्षा करती हैं कि उनका संचालन क्रमबद्ध रीति से हो। घड़ी को सधे हाथ से नियत समय पर चाबी दिया कीजिए संभालकर रखा कीजिए तो ही वह पूरे दिन जी सकेगी। यदि दिन में कई बार,समय कुसमय, झटके से चाबी भरें, गलत हो जायगी। कपड़ों की साज संभाल रखने से वे काफी दिन काम देते हैं जो उन्हें ऐसे ही इधर−उधर बेसिल−सिले पटकते रहते हैं उन्हें कीड़े, चूहे, झींगुर खा जाते हैं, मैल और उपेक्षा से उनकी जिन्दगी आधी रह जाती है। संसार की कोई वस्तु यह नहीं चाहती कि उसके साथ उपेक्षा बरती जाय। उपेक्षा एक प्रकार का तिरस्कार है। तिरस्कार सब को बुरा लगता है। हमारा शरीर भी उपेक्षा बर्दाश्त नहीं करता, वह रूठकर कोप भवन में चला जाता है बीमार पड़ जाता है और तब तक रूठा ही पड़ा रहता है जब तक उसे पुनः उचित सत्कार का—व्यवस्थितता का आश्वासन न दिया जाय।
नियमित विधि व्यवस्था
स्कूल की शिक्षा में प्रत्येक विषय के घेरे नियत होते हैं। कल कारखानों के हर विभाग में समय की पाबंदी कार्यशैली और गतिविधि को नियमित रखा जाता है। शरीर का कार्य भी तभी चलता है जब उसका संचालन पूर्ण व्यवस्थित रूप से किया जाय। दिनभर के कार्यक्रम की हमारी उचित दिनचर्या बनी होनी चाहिए और हर कार्य नियत समय पर व्यवस्थित विधि व्यवस्था के साथ होना चाहिए, तभी स्वास्थ्य की सुरक्षा संभव हो सकेगी।
भोजन का समय दो बार हो सकता है। मध्याह्न और सायंकाल को दो बार नियत आहार लेते रहने से पाचन क्रिया ठीक प्रकार अपना काम करती रहती है। सारे दिन बकरी की तरह मुँह चलाते रहने से पेट की वही दशा हो जाती है जो अध−पकी खिचड़ी में बीच में ही कुछ और उसी में पकने के लिए डाल देने से होती है। चूल्हे पर चढ़ी हुई पतीली तभी कोई भोजन ठीक प्रकार पकाकर देगी जब बीच में उसके साथ छेड़खानी न की जाय। थोड़ी−थोड़ी देर बाद अनेक प्रकार की अनेक चीजें यदि पकने के लिए डालते रहा जाय तो उस पतीली की कुछ चीजें घुल जायेंगी, कुछ जलने लगेंगी कुछ कच्ची रह जावेंगी। जो लोग समय, कुसमय जीभ के चटोरेपन या दोस्ती एवं शेखी के लिए बार−बार बिस्किट, नाश्ता, तफरीह उड़ाते रहते हैं उनके पाचन कभी ठीक नहीं रह सकते। भोजन के बारे में यह कठोर नियम बनाया जाना चाहिए कि दिन में दो बार ही खाया जाय। बीच के समय में कुछ भी न खाने का कठोर प्रतिबंध रखा जाय।
संयमित और संतुलित आहार
प्रातःकाल पतली, रसीली चीजें लेनी चाहिए। पानी में नींबू, शहद मिलाकर उसका शरबत लिया जा सकता है। फलों का रस दूध या छाछ भी ठीक हो सकते हैं। जिन्हें कठोर शारीरिक श्रम करना है वे ही कोई भारी चीज खाया करें। हलके काम करने वाले या बैठे रहने वालों के लिए एक गिलास कोई द्रव पदार्थ लेकर काम चला लेना चाहिए। कारण कि रात का किया हुआ भोजन सोते समय पाचन क्रिया के शिथिल हो जाने से सबेरे तक अच्छी तरह नहीं पचता। उसका ठीक परिपाक दोपहर तक हो पाता है, यदि सवेरे ही भारी नाश्ता कर लिया जाय तो रात का बिना पचा भोजन नये भोजन के साथ मिलकर गड़बड़ी पैदा करता है। प्रातः भारी नाश्ता करने की आदत दुर्बलों और रोगियों के लिए तो सर्वथा हानिकारक ही है।
फल, दूध, शाक,रोटी जो कुछ लेना हो दोपहर के भोजन के समय ले लेना चाहिए। एक समय में बहुत अधिक प्रकार की वस्तुऐं न हों इसका ध्यान रखना चाहिए। जितनी कम प्रकार की चीजें थाली में होंगी उतना ही पाचन अच्छा रहेगा। साधारण रोटी, उबली हुई सब्जी, शहद,दूध, कोई फल, सलाद इतनी चीजें भाजन में रहें तो पर्याप्त है। मसालों से परहेज करना चाहिए। लाल मिर्च तो बहुत ही बुरी है। नमक, अदरक, नींबू अच्छे मसाले हैं, इनकी सहायता से भोजन को स्वादिष्ट भी बनाया जा सकता है। प्रातः काल उठते ही एक गिलास पानी पी लेने की आदत बहुत ही अच्छी है। पानी पीकर कुछ देर बाद शौच जाया जाय तो उससे दस्त साफ और खुलकर पेशाब होता है। इससे भीतर की सफाई करने की एक वैसी ही आवश्यकता पूरी होती है जैसे म्युनिसिपल कर्मचारी रुकी हुई नालियों को पानी डालकर बुहारी लगाने की क्रिया द्वारा सफाई करते हैं।
ब्रह्म मुहूर्त की अमृत वेला
रात को जल्दी सोने और प्रातः जल्दी उठने की आदत स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही आवश्यक है। प्रकृति ने रात सोने के लिए और दिन काम करने के लिए बनाये हैं। दिन छिपते ही चिड़ियाँ अपने घोंसलों में जाती हैं, पशु जंगल में चरकर अपने आश्रय स्थानों को लौट आते हैं। रात्रि में काम करने वाले हिंसक पशु पक्षी या चोर बटमार सरीखे ही कोई हो सकते हैं इसलिए उन्हें निशाचर के बुरे नाम से संबोधन किया जाता है। जो लोग देर तक रात को जागते, मटरगश्ती करते, खेल−तमाशों में घूमते, हाहा हूं हूं करते रहते हैं वे उतने ही अंश से निशाचर हैं जितनी कि रात जागने में गँवाते हैं। रेल, पुलिस आदि की जिनकी ड्यूटी ही रात की है उनकी मजबूरी समझ में आती है पर जो लोग अकारण रात में जागते रहते हैं और सवेरे दिन निकले तक पड़े सोते रहते हैं वे स्वास्थ्य सम्बन्धी एक भयंकर भूल करते हैं। शाम का भोजन जल्दी ही कर लेना चाहिए और जितनी जल्दी हो सके सो जाना चाहिए। नींद पूरी करके ब्रह्म मुहूर्त में आँख खुलती है तो शरीर में एक उत्साहवर्धक ताजगी दिखाई पड़ती है। उस समय जो भी काम किया जायेगा बहुत ही अच्छा होगा। विद्यार्थी यदि उस समय पढ़ते हैं तो थोड़ी ही देर की पढ़ाई अन्य समयों में कई घण्टे पढ़ने से अधिक फलप्रद होती है। जो लोग भगवान का भजन करना चाहते हैं उनके लिए भी वह समय सर्वोत्तम है जो स्वास्थ्य सुधार के लिए भ्रमण को जाना चाहते हैं उनके लिए प्रातः ब्रह्म मुहूर्त की वायु अमृतमयी है। सूर्योदय से पूर्व दो घण्टे से लेकर दिन निकलने तक का समय ‘अमृत’ कहा जाता है। उस समय का अपने प्रिय विषय के लिए उपयोग करके कोई भी बहुत आशाजनक लाभ हो सकता है। यह अमृत समय सोने में नष्ट नहीं किया जाना चाहिए। पर ऐसा संभव उन्हीं के लिए है जो रात को जल्दी से जल्दी सोने की व्यवस्था बनावें। देर से सोकर जल्दी उठने का क्रम बनाया जायेगा तो उससे तो नींद भी पूरी न हो सकेगी और कच्ची नींद में उठना लाभ के स्थान पर हानिकारक ही होता है।
नियत दिनचर्या की आवश्यकता
अपनी सुविधा और स्वास्थ्य के नियमों का ध्यान रखते हुए अपनी एक नियत दिनचर्या बना लेनी चाहिए और फिर दृढ़तापूर्वक उसी पर चलते रहना चाहिए। समय का विभाजन यदि ठीक प्रकार किया जाय और उस कार्यक्रम का कड़ाई के साथ पालन किया जाता रहे तो आलस्य और प्रमाद में यों ही बर्बाद होते रहने वाला बहुत सा समय बच सकता है और उस बचे समय का सुव्यवस्थित उपयोग करके मनुष्य स्वास्थ्य को ही नहीं सुधारता वरन् उन्नति के अनेकों द्वार खोल लेता है। संसार का एक भी उन्नतिशील व्यक्ति ऐसा नहीं हुआ जिसने अपना दैनिक कार्य−क्रम बनाकर समय की बर्बादी को न रोका हो। आलसी और फूहड़ लोग बहुत धीमी गति से इधर−उधर चहकते हुए, सहज−सहज थोड़े से काम में घण्टों गुजार देते हैं। कुछ लोग एक काम पूरा होने से पहले नया काम शुरू कर देते है और पहले काम को अधूरा ही पड़ा रहने देते हैं। ऐसे लोगों का कोई भी काम पूरा नहीं हो पाता। चाहिये यह कि जो काम समय से किया है उसे ठीक तरह पूरा करके समेट लें तब दूसरा काम आरंभ करें। दस अधूरे काम करने की अपेक्षा दो पूरे काम करना सदा अधिक लाभप्रद सिद्ध होता है।
बहुमूल्य एवं अलभ्य सम्पत्ति
समय ही जीवन है। यही हमारी सर्वोत्तम सम्पत्ति है। भगवान ने आयुष्य की अमूल्य पूँजी मनुष्य को दी है और कहा है कि वह इस पूँजी का जिस ओर भी सदुपयोग करेगा उधर ही उसे आशा−जनक सफलताऐं प्राप्त होने लगेंगी। रुपया हाथ में हो तो उसके बदलें में बाजार में बिकने वाली हर चीज खरीदी जा सकती है। समय भी एक प्रकार का रुपया है उसे जिस काम में भी खर्च किया जायेगा उसी दिशा में प्रगति होने लगेगी। रुपये से दवा भी खरीदी जा सकती है और जहर भी। समय को आलस्य प्रमाद, व्यसन लापरवाही मटरगश्ती और शौक-मौज की निस्सार बातों में या कुविचारों एवं दुष्कर्मों में खर्च करना जहर खरीदने की बराबर है पर जो अपना एक−एक मिनट बहुमूल्य समझ कर उसे सुव्यवस्थित कार्यक्रम बनाकर खर्च करते हैं वे अपने जीवन का सच्चा लाभ उठा लेते हैं। व्यवस्थित आदतों वाले मनुष्य का अन्तर्मन भी व्यवस्थित हो जाता है और फिर उसके नियंत्रण में चलने वाला शरीर भी नियमित और व्यवस्थित रीति से काम करने लगता है। काम कम हो या ज्यादा, हर व्यक्ति को नियत दिनचर्या के अनुसार ही उसे पूरा करना चाहिए। नौकरी में काम करने के घंटे नियम होते हैं, स्कूल में पढ़ने के घंटे विषय वार विभाजित रहते हैं। बाजार की दुकानें खुलने और बन्द होने का समय सरकार ने नियत कर दिया है। व्यवस्थित रीति से नियत समय में ही बहुत काम हो जाता है और अव्यवस्थित कार्यप्रणाली से समय तो बहुत बर्बाद होता है पर काम जरा−सा दिखाई पड़ता है। समय की अव्यवस्था का सबसे खराब प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ता है। शौच, स्नान, कुल्ला, दातौन, सोना जागना, खाना, पीना,किसी भी बात का जिनका नियम नहीं उन्हें अनुशासन भंग करने का दंड प्रकृति देगी ही और उन्हें अस्वस्थता की शिकायत बनी ही रहेगी।
अनावश्यक अपव्यय रोका जाय
शक्तियों का अनावश्यक अपव्यय न होने पावे इसका पूरा−पूरा ध्यान रखना चाहिए। दिन भर के प्रकाश में काम करने के बाद आँखें रात में अंधेरे का आराम चाहती हैं। जहाँ तक हो सके रात को बिजली के तेज प्रकाश से बचना चाहिए। सिनेमा की नैतिक बुराई तो प्रसिद्ध ही है। आँखों पर उस तेज रोशनी का बुरा असर पड़ता है। आँखों की बीमारियाँ बढ़ाने में सिनेमा भी एक प्रमुख कारण है। कपडे़ इतने न पहनने चाहिए जो शरीर को सर्दी गर्मी का अनुभव ही न होने दें। ऋतु प्रभाव से शरीर को पूर्णतया बचाये रहने पर सहन शक्ति का गुण नष्ट होने लगता है। ऐसे लोगों को जरा गर्मी लगने पर लू लगने की आशंका बनी रहती है।
आहार और साँस की स्वच्छता
मुँह ढ़ककर सोने की आदत रक्त की शुद्धता के मार्ग में भारी बाधा पहुँचाती है। स्वच्छ जल और स्वच्छ भोजन मिलने पर बीमारी आ घेरती हैं इसे सभी जानते हैं। गंदगी से रोग फैलते हैं। भोजन और जल यदि गंदे बर्तनों से गंदे हाथों, गंदे व्यक्तियों, गंदे स्थानों से सम्बन्धित रहेगा तो अवश्य ही गंदा एवं हानिकर हो जायेगा। इसलिए आहार में सफाई का पूरा पूरा ध्यान रखना आवश्यक माना जाता है। वायु के संबंध में भी यह सफाई बरती जानी चाहिए। अन्न और जल के बिना कुछ समय मनुष्य जीवित भी रह सकता है पर वायु के बिना क्षणभर भी जीवित रहना कठिन है। इससे वायु की उपयोगिता स्पष्ट है। उसे ग्रहण करते समय स्वच्छता का ध्यान रखना चाहिए। हमारे रहने और काम करने का स्थान ऐसा न हो जहाँ स्वच्छ हवा और सीधी धूप नहीं पहुँचती हो। कहते हैं कि जहाँ स्वच्छ हवा और सीधी धूप नहीं पहुँचती वहाँ डाक्टर पहुँचा करते हैं। सोते समय मुँह ढक कर सोने से शरीर का विष लेकर बाहर निकलने वाली हवा का ही पुनः पुनः फेफड़ों में प्रवेश होने लगता है इस प्रकार वह हर बार, हर साँस अधिक विषैली होती जाती है। शरीर में से जो भी चीज बाहर निकलती है अशुद्ध और विषैली होती है इसलिए मलमूत्र आदि को दूर ही रखा जाता है। शरीर से बाहर आई हुई साँस भी मल मूत्र की तरह ही विषैली होती है उसे दुबारा कदापि प्रयोग न करना चाहिए। मुँह ढ़ककर सोने की आदत में यही गलती दुहरानी पड़ती है और उस गलती से शरीर में विषैले तत्व बढ़ने लगते हैं।
ब्रह्मचर्य ही जीवन है
ब्रह्मचर्य का आरोग्य रक्षा की दृष्टि से बहुत महत्व है। रज वीर्य शरीर के सत्व भाग हैं। इनकी मात्रा कम पड़ जाने से देह खोखली हो जाती है और प्रत्येक इन्द्रिय की शक्ति घटने लगती है। 40 बूँद रक्त का 1 बूँद वीर्य बनता है। यदि इस अमूल्य सम्पत्ति को संचित रखा जाय तो अंग प्रत्यंग स्वयमेव पुष्ट होते चलेंगे। पर यदि इस जीवन रस को निचोड़ते रहा जायेगा तो बाहर का लिफाफा भले ही चमकता रहे भीतर ही भीतर सब कुछ खोखला हो जाता है और यह कहने की आवश्यकता नहीं कि खोखली देह पर किसी भी बीमारी का कितनी जल्दी आक्रमण हो सकता है। ब्रह्मचारियों और विधुरों के लिए तो संयम का जो स्वाभाविक सौभाग्य मिला हुआ है उसका उन्हें पूरा पूरा लाभ उठाना चाहिए। विवाहितों को भी इस सम्बन्ध में मर्यादाओं का पूरा−पूरा ध्यान रखना चाहिए। गृहस्थ के महान उत्तरदायित्व को निबाहने के लिए गाड़ी के दो पहियों की तरह पति−पत्नी का दाम्पत्य जीवन होता है। सन्तानोत्पत्ति अनिवार्य आवश्यकता अनुभव होने पर ही काम सेवन किया जाना चाहिए। एक महीने में एकबार से अधिक तो ब्रह्मचर्य को तोड़ना ही न चाहिए। संयमी दम्पत्ति अपने स्वास्थ्य को ही ठीक नहीं रखते वरन् अपनी संतति का भी स्वस्थ निर्माण करते हैं। विषयी और असंयमी माता पिता द्वारा उत्पन्न की गई संतान शारीरिक दृष्टि से तो दुर्बल एवं अस्वस्थ होती ही है, मानसिक दृष्टि से भी उसमें अनेकों त्रुटियाँ रह जाती हैं। कच्चे बीज से उत्पन्न होने वाला पौधा दुर्बल ही रहेगा। इसी प्रकार संयम द्वारा जिनने अपनी जीवनी शक्ति को परिपुष्ट नहीं किया है उन पति−पत्नी को कोई होनहार एवं तेजस्वी बालक प्राप्त नहीं हो सकते। इन्द्रियों का अमर्यादित उपयोग करने से योनि रोग, एवं मूत्र रोग उत्पन्न होने की संभावना भी सदा बनी ही रहती हैं।
नियत समय,नियत कार्य, नियत मात्रा, नियत कार्यक्रम, नियत व्यवस्था, नियत खर्च, नियत आहार नियत विहार की व्यवस्था बना लेने वाले व्यक्ति ही अपने जीवन का पूरा लाभ उठा सकते हैं और उनका सर्वांगीण स्वास्थ्य स्थिर रहता है।
रोग हो जाने पर उसकी चिकित्सा चिकित्सकों के द्वारा कराई जा सकती है। उससे तात्कालिक कष्ट मिट भी सकता है पर स्वास्थ्य की सुरक्षा एवं अभिवृद्धि की समस्या का हल किसी भी इलाज से नहीं हो सकता। इसके लिए तो अपना आहार विहार ही सुधारना होगा। यदि हमारा स्वास्थ्य गिर रहा हो तो उसे सुधारने के लिए चिकित्सकों की नहीं प्रकृति माता की शरण में जाना चाहिए। जिस माता के राज्य में कीट पतंग, पशु पक्षी सभी आनन्द की किलोल करते और निरोग जीवन व्यतीत करते हैं वह मनुष्य के प्रति अपनी कृपा में कंजूसी क्यों करेगी? बालक से माता तभी तक रुष्ट रहती है जब तक वह उद्दंडता बरतता है। उच्छृंखलता छोड़ते ही वह माता को पूर्ववत् ही प्राप्त करने लगता है। अपनी गतिविधियों में आवश्यक हेर−फेर किये बिना बिगड़े हुए स्वास्थ्य का सुधारा जाना संभव नहीं। औषधियों से यदि बिगड़े हुए स्वास्थ्य सुधर जाया करते तो सभी धनी लोग एक से एक बढ़कर हृष्ट−पुष्ट होते। जो जितने पैसे खर्च कर सकता वह उतनी ही अधिक औषधियाँ खरीद कर उतना ही अधिक बलवान बन जाता। तब गरीब मजदूरों को दुर्बल ही रहना पड़ता। पर प्रकृति ने यहाँ धन या वस्तुओं के आधार पर नहीं उचित संयम के आधार पर ही स्वास्थ्य की सुरक्षा का आधार रखा है। इसलिए हर एक को यह समझ लेना चाहिए कि यदि बिगड़े स्वास्थ्य को सुधारना है या सुधरे को बढ़ाना है तो उसका एकमात्र उपाय यही हो सकता है कि हम प्रकृति के नियमों का अधिकाधिक अनुसरण करें।
आत्म−निरीक्षण और आत्म−सुधार
आमतौर से मनुष्य को अपनी भूलें दिखाई नहीं पड़ती। दूसरों के दोष वह आसानी से ढूँढ़ सकता है पर अपनी कमियों की वह सदा उपेक्षा किया करता है। हम कहाँ चूक रहे हैं यह जानने के लिए आत्म−निरीक्षण एवं आत्म−चिन्तन की प्रवृत्ति जागृत करनी चाहिए। दोष दर्शन एवं आलोचना करने की कुशलता को यदि अपने ऊपर मनुष्य प्रयुक्त करने लगे तो कल्याण के सभी अवरुद्ध मार्ग खुल सकते हैं। अपनी भूलों को समझने और सुधारने के लिए जो प्रयत्नशील है उसे देर तक दुरावस्था से घिरा नहीं रहना पड़ सकता। यह सिद्धान्त जीवन के हर क्षेत्र में लागू होता है। लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में मनुष्य निश्चित रूप में आशाजनक उन्नति अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ के आधार पर कर सकता है। उसकी आन्तरिक दुर्बलताऐं रास्ता रोके रहती हैं। सबसे बड़ी बाधा यही है, यदि इसे हटाने के लिए कोई व्यक्ति समुद्यत हो जाय तो उसकी प्रगति का मार्ग हर दिशा में खुल सकता है। लोग परिस्थितियों को सुधारना चाहते हैं, इच्छानुकूल लाभ एवं अवसर उपलब्ध करना चाहते हैं पर इसके योग्य अपने आपको बनाने का प्रयत्न नहीं करते।
पात्र को ही उपयुक्त वस्तुऐं मिलने का नियम इस सृष्टि में अनादि काल से चला आ रहा है, उसमें परिवर्तन नहीं हो सकता। वर्षा का पानी सभी जगह समान रूप से बरसता है पर जहाँ जितना गहरा गड्ढा होता है वहाँ उतना जल जमा हो जाता है। पात्रत्व की वृद्धि के साथ−साथ विभूतियों की अभिवृद्धि का सनातन नियम अनादि काल की तरह अभी भी विद्यमान है, जो इस तथ्य को समझते हैं वे अपनी त्रुटियों और कमजोरियों को ढूँढ़ने एवं उन्हें सुधारने का प्रयत्न करते हैं और इस कार्य में जितनी सफलता मिलती जाती है सफलता का लक्ष उतना ही निकट आ जाता है। आरोग्य की विभूति प्राप्त करने के लिए भी यही बात अक्षरशः लागू होती है जिनने अपनी भूलों को ढूँढ़ने की पैनी दृष्टि को अपनी समीक्षा में लगाया और देह को खोखला कर डालने वाली भीतर छिपी अपनी बुरी आदतों को ढूँढ़ निकाला, वे अपने चिकित्सक आप ही हैं। उनकी आत्म चिकित्सा कभी निष्फल नहीं जा सकती।
वस्तुस्थिति की जानकारी
हमें कुछ प्रश्न अपने आपसे उसी प्रकार पूछने चाहिये जिस प्रकार कोई सुयोग्य चिकित्सक अपने रोगी की स्थिति जानने के लिए उससे अनेकों प्रश्न करके बीमारी का निदान एवं वस्तुस्थिति को जानने के लिए करता है। हमें आपसे पूछना चाहिये कि—
(1) क्या हम केवल तीव्र भूख लगने पर ही खाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं करते कि भूख न लगी हो और आदत से लाचार होकर खाने बैठ जाते हैं।
(2) पहला भोजन अच्छी तरह पचने की प्रतीक्षा किये बिना क्या बीच−बीच में कुछ वस्तुऐं स्वाद के लिए तो नहीं खाते रहते हैं?
(3) पेट की गुंजाइश का आधा भाग भोजन के लिए, चौथाई पानी के लिए और चौथाई हवा के लिए खाली छोड़ने का नियम क्या हम ठीक तरह पालन करते हैं? कहीं आधे पेट से अधिक तो भोजन नहीं कर लेते? भोजन इतनी मात्रा में तो नहीं हो जाता जिससे आलस्य आने लगे?
(4) मुँह में गया हुआ प्रत्येक ग्रास क्या काफी चबाने के बाद ही उदरस्थ करते हैं? कहीं उसे पतली चीजों के सहारे जल्दी−जल्दी आधा कुचल करके ही तो नहीं निगल लेते?
(5) क्या आपके भोजन में अन्न की मात्रा आधे से अधिक रहती है।
(6) कहीं आप का भोजन माँस, मछली, पकवान, मिठाई, चटनी, अचार, मिर्च मसाले जैसे हानिकारक पदार्थों से भरा तो नहीं रहता?
(7) नशीली चीजों की आदत तो आपने नहीं डाल ली? चाय, तम्बाकू, पान की भरमार से कहीं आप अपना पाचन संस्थान नष्ट तो नहीं करते रहते?
(8) रात को जल्दी सोने और सवेरे जल्दी उठने का स्वर्ण नियम आप पालन करते हैं या नहीं?
(9) कहीं आपकी रोटी बेईमानी से कमाई हुई तो नहीं होती? आपको पता है न कि बिना परिश्रम की कमाई बीमारी बनकर फूटती है?
(10) शारीरिक परिश्रम की उपयोगिता आप भली प्रकार समझते हैं न? दिनभर में शरीर से इतना परिश्रम आप करते रहते हैं न जिससे थककर रात को गहरी नींद आवे?
(11) व्यायाम, आसन, सूर्य नमस्कार, व्यायाम, टहलना, मालिश आदि स्वास्थ्य सुधारने वाली क्रियाओं का आपके दैनिक जीवन में स्थान है न?
(12) गंदगी से आपको घृणा है न? अपने शरीर, वस्त्र, बिस्तर, घर, बर्तन रसोई आदि की सफाई का पूरा ध्यान रखते हैं न? अन्न, जल और साँस को ग्रहण करते हुए उसकी स्वच्छता की उपेक्षा तो नहीं करते? मुँह ढ़ककर तो नहीं सोते? एक ही थाली कटोरी में लोग मिलकर भोजन तो नहीं करते?
(13) ब्रह्मचर्य की मर्यादाओं का ध्यान रखते हैं न? अश्लील बातों का चिन्तन तो नहीं करते रहते? कामोत्तेजक, संगीत, सिनेमा, वार्तालाप चित्र एवं साहित्य से दूर रहते हैं न?
(14) चिन्ता, शोक, क्रोध, आवेश, ईर्ष्या, द्वेष, उत्तेजना, भय, आशंका, निराशा जैसे मनोविकारों ने आपको ग्रसित तो नहीं कर रखा है? समस्याओं को शान्त चित्त और धैर्य के साथ सुलझाने की अपेक्षा आपने हड़बड़ाने, क्षुब्य एवं किंकर्त्तव्य विमूढ़ होने की आदत तो नहीं डाल रखी है?
(15) आये दिन आप रूठे तो नहीं बैठे रहते? हँसने और मुस्कुराने की आदत को कहीं आपने छोड़ तो नहीं दिया है?
(16) सप्ताह में एक बार उपवास करके पेट को एक दिन की छुट्टी दिया करते हैं न?
(17) अपने सामर्थ्य से अधिक शारीरिक या मानसिक काम तो नहीं करते? आँखों को खराब करने और दिमाग को भन्ना देने जितनी मात्रा में आप पढ़ने−लिखने का काम तो नहीं करते? शारीरिक श्रम की मात्रा शक्ति से बाहर तो नहीं है?
(18) बात−बात में दवादारू की भरमार तो आप नहीं करते रहते? तीव्र औषधियों के अधिक सेवन से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव का आपको ज्ञान है न?
(19) ईश्वर उपासना की सर्वोपरि सब रोग नाशक औषधि का आप नित्य सेवन करते हैं न? उपासना के लिए आपने अपने दैनिक कार्य−क्रम में कोई समय नियत रखा है न?
यह उन्नीस प्रश्न अपने आप से पूछने चाहिए और उनका उत्तर प्राप्त करके अपने रोग के मूल कारणों को स्वयं ही तलाश करना चाहिए। रोग का सही निदान आधा इलाज ही जाना माना जाता है। अस्वास्थ्यकर कारणों को हटा देना चिकित्सा का प्रधान अंग है। इस मानी से अपना अधिकाँश इलाज हम स्वयं कर सकते हैं। शेष जो तात्कालिक उपचार बच रहा उसे किसी भी विवेकशील चिकित्सक की थोड़ी सी सहायता में दूर हटाया जा सकता है। वस्तुतः अपने सर्वोत्तम चिकित्सक हम स्वयं हो सकते हैं।
इस अंक में रोगों से बचे रहने और गिरे हुए स्वास्थ्य को सुधारने वाले नियमों पर प्रकाश डाला गया है। जिन्हें आरोग्य की आकाँक्षा रही है उन्हें इन्हीं नियमों पर चलना पड़ा है और आगे भी जो निरोग जीवन व्यतीत करना चाहेंगे उन्हें आत्म संयम और नियमितता के इन्हीं नियमों का पालन करना पड़ेगा। बीमारी न आवे इसकी सुरक्षा के लिए इनका पालन आवश्यक है और चिकित्सा द्वारा रोग मुक्त होने के पश्चात् जो यह चाहते हैं कि पुनः उन्हें बीमारी का शिकार न होना पड़े उन्हें इन सभी बातों का ध्यान रखना पड़ेगा जिनकी चर्चा इस अंक में की गई है। प्रकृति बड़ी दयालु है उसने हमें आरोग्य रक्षा के अनेक साधनों से सम्पन्न शरीर दिया है और उसे सुविकसित करने योग्य अगणित साधन उत्पन्न किये हैं पर साथ ही उसकी कठोरता भी निश्चित है। अनुशासन भंग करने पर फौजी सिपाही को जिस प्रकार ‘कोर्ट मार्शल’ का कड़ा दण्ड भुगतना पड़ता है उसी प्रकार प्रकृति का कठोर शासन भी उच्छृंखल आचरण करने वालो को ‘सबक सिखाने’ के लिए काफी कड़ाई बरतता है। उच्छृंखल आचरण को जब तक छोड़ा न जायेगा तब तक बीमारी और कमजोरी की सजा भी बराबर मिलती रहेगी। मकान को तोड़−फोड़ करने वाला किराएदार जिस प्रकार जबरदस्ती निकाल बाहर किया जाता है वैसी ही स्वास्थ्य को बर्बाद करने में लगे हुए असंयमी मनुष्य अकाल में ही काल कवलित होते हैं, उन्हें दीर्घ जीवन के अपने स्वाभाविक अधिकार से वंचित होने के लिए विवश होना पड़ता है।
आरोग्य की उलझन भरी गुत्थी
आरोग्य की समस्या हल करने के लिए साधारणतः ध्यान दो बातों की ओर आकर्षित किया जाता है। एक यह कि—हर व्यक्ति प्रकृति के नियमों का ध्यान रखते हुए स्वास्थ्य को स्थिर रखने वाले नियमों का कड़ाई से पालन करे और आज सभ्यता के नाम पर अस्वाभाविक जीवन की जो उच्छृंखलता फैली हुई है उसे रोका जाय। दूसरी यह कि रोग ग्रस्त होने पर बीमारी को दबाकर जल्दी अच्छे होने की उतावली करने की चिकित्सा की अपेक्षा रोग को जड़ से उखाड़ने वाली चिकित्सा प्रणाली अपनाई जाय। भले ही कुछ देर लगे, भले ही कुछ झंझट भरे उपचार अपनाने पड़ें, पर एक बार पूरी तरह सफाई करके स्थायी रूप से रोगमुक्ति का प्रबन्ध किया जाय। इन दोनों बातों की ओर यदि जनसाधारण का समुचित ध्यान आकर्षित होने लगे तो स्वास्थ्य की उलझी हुई समस्या सहज ही हल हो सकती है और राष्ट्र अर्धमूर्छित स्थिति से उबरकर सशक्त एवं सक्षम बन सकता है। भौतिक या आध्यात्म की स्थायी प्रगति की आशा भी इन्हीं परिस्थितियों में की जा सकती है।
हमारा स्वास्थ्य आन्दोलन
युगनिर्माण योजना के अपने महान संकल्प के अनुसार ‘अखंड−ज्योति’ ने स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की तैयारी का जो व्यापक आन्दोलन आरम्भ किया है उसमें पहला स्थान आरोग्य का है। इस अंक में उन शाश्वत नियमों की चर्चा की गई है जिन्हें अपनाये बिना कोई त्राण नहीं। यह असुविधाजनक लग सकते हैं पर कीमती हर वस्तु असुविधाजनक प्रयत्नों से ही प्राप्त होती है। धन, विद्या, कला, प्रतिभा आदि कोई भी विभूति ऐसी नहीं जो कष्ट साध्य प्रयत्नों से प्राप्त न होती हो, फिर आरोग्य ही क्या ऐसी गई बीती चीज है जो यों ही घूरे पर पड़ी मिल जायगी। उसे प्राप्त करने के लिए हर बलिष्ठ व्यक्ति को अपने आप पर कड़ाई बरतनी पड़ी है। हमें भी अपनी आदतों के टूटे और बिखरे तारों को जोड़कर समस्वर बनाना पड़ेगा तभी उस शरीर वीणा में से आरोग्य आनन्द की मधुर लहर झंकृत हो सकेगी।
इस अंक में मोटे रूप से आरोग्य रक्षा के प्रमुख नियमों की संक्षिप्त सी चर्चा की गई है। इन नियमों की बारीकियों के सम्बन्ध से अभी बहुत कुछ जानना और कहना बाकी है। उसे क्रमशः ‘अखण्ड−ज्योति’ के पृष्ठों पर पाठक पढ़ते रहेंगे। चिकित्सा का दूसरा अंग पाठकों के सामने प्रस्तुत नहीं किया जा सका। जून का स्वच्छ मन अंक जुलाई का सभ्य समाज अंक निकालने के पश्चात काई एक अंक ऐसा भी निकालेंगे जिसमें रोगों की जड़ काट देने वाली और स्थायी आरोग्य की जड़ जमा देने वाली चिकित्सा पद्धति का विस्तारपूर्वक उल्लेख होगा। यहाँ तो इतना कह देना ही पर्याप्त होगा कि प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति ही एकमात्र वह उपचार प्रणाली हो सकती है जिसके आधार पर सही उपचार होने के पश्चात मनुष्य स्थायी रूप से रोगमुक्त हो सकता है।
पंच तत्वों की सात चिकित्सा
यह शरीर पंचतत्वों से बना हुआ है। देह में जो कुछ दिखाई पड़ता है वह सब मिट्टी, पानी, हवा, गर्मी और आकाश का ही रूपान्तर है। मकान में टूट−फूट हो जाने पर मरम्मत के लिए भी ईंट, चूना, सीमेन्ट, मिट्टी, पत्थर आदि की ही जरूरत पड़ती है, क्योंकि वह इन्हीं का बना होता है। कपड़ा फट जाय तो उसकी मरम्मत कपड़े का दूसरा टुकड़ा लगाकर ही की जाती है। फूटे हुए बर्तन में पंचतत्वों का संतुलन ही अस्त−व्यस्त होता है। तूफान में छप्पर उड़ जाय तो उसकी टूट−फूट फूँस से ही की जाती है और फिर उसे यथास्थान रख देने से यथावत् काम चलने लगता है। शरीर के लिए भी यही प्रणाली अपनानी पड़ती है। जो तत्व देह से विकृत हो गया है उसे पंचतत्वों से की जाने वाली चिकित्सा प्रणाली से ही स्थायी रूप से अच्छा किया जा सकता है।
महात्मा गान्धी इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे। वे जीवन के अन्तिम दिनों में प्राकृतिक जीवन यापन एवं चिकित्सा पद्धति को विस्तृत करने के लिए बहुत कुछ करने की योजना बना चुके थे। उरूली काँचन में उन्होंने इसके लिए केन्द्र भी बनाया था और धन का प्रबन्ध भी किया था। वे वहाँ स्वयं कुछ नियमित समय भी देते रहने वाले थे, पर काल की कराल गति ने उन हाथों वह कार्य सुविकसित होने का अवसर आने न दिया। यद्यपि आज भी उनका लिखा हुआ आरोग्य संबंधी साहित्य इस प्रकार की चिकित्सा के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शन कराने के लिए प्रस्तुत है। संसार के अगणित विचारशील आरोग्य शास्त्री पहले से ही इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके हैं कि रोगों का निराकरण, भीतर भरे हुए विषों को तीव्र दवाओं से दबा देने से नहीं जीवनी शक्ति को उत्साहित करके उसकी रोग निरोध शक्ति को सजग कर देने से ही संभव हो सकता है। जल चिकित्सा, कटिस्नान, मेहन स्नान, मेरुदण्ड स्नान, गीले कपड़े के बन्धन, वाष्प स्नान, मिट्टी की पट्टी, सूर्यअभिताप, सेंक, मालिश जैसे प्राकृतिक उपचार देह की रोग निरोधक शक्ति को ऐसा सक्षम बना देते हैं कि रोगों को एकबार पूरी तरह बाहर निकाल फेंकना और शरीर को शुद्ध बना सकना संभव होता है। सबसे बड़ी बात इस प्रणाली में यह है कि अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तरह वर्षों तक थका देने वाला शिक्षण इसके लिए प्राप्त नहीं करना पड़ता। थोड़ी सी जानकारी और समझदारी के आधार पर कोई भी व्यक्ति अपनी और दूसरों की प्राकृतिक चिकित्सा कर सकता है। समयानुसार किसी अंक में इस सारी पद्धति को प्रस्तुत करेंगे तो पाठकों को आश्चर्य होगा कि इतनी महान चिकित्सा प्रणाली इतनी सरल कैसे हो सकती है। पर बात यही है कि जो कुछ वास्तविक है उसे परमात्मा ने सरल ही रखा है ताकि उसका हर पुत्र आसानी से उसे अपना सके। पशु पक्षियों तक को जब यह ज्ञान प्रकृति ने समझा कर रखा है तो फिर मनुष्य के लिए ही वह क्यों दुस्साध्य रखा जाता।
पेट की सफाई सर्वोत्तम
पेट की सफाई आरोग्य रक्षा की आधारशिला है। यदि पाचन यंत्र ठीक काम करने लगे तो फिर भरपूर मात्रा में स्वस्थ रक्त उत्पन्न होते रहने के मार्ग में क्या कठिनाई शेष रह जायगी? और यदि यह कठिनाई हल हो गई तो बिगड़ा हुआ स्वास्थ्य क्यों न सँभल जायेगा? इसलिए पेट में जमे पुराने कब्ज को बस्तिक्रिया (ऐनेमा) द्वारा साफ कर दिया जाय और उपवास द्वारा कुछ समय पेट को पूर्ण विश्राम मिलने की व्यवस्था कर दी जाय तो थका हुआ पेट फिर तरोताजा होकर अपना कर्तव्यपालन करते रहने के लिए कटिबद्ध हो जायेगा। साथ−साथ शीतल जलीय प्रतिक्रिया द्वारा सुप्त शक्तियों का जागरण मृतिका द्वारा विष बहिर्गमन, ऊष्मा द्वारा प्रवाह संचारण आदि प्रक्रियाऐं भी साथ−साथ चलती रहें तो एक प्रकार से देह के भीतर कलपुर्जों का पुनर्गठन ओवर हालिंग ही हो सकता है। प्रयोग और परीक्षण इस चिकित्सा पद्धति की उपयोगिता से स्वतः ही प्रभावित कर देते हैं।
गायत्री तपोभूमि में कल्प-चिकित्सा का कार्यक्रम एक छोटे रूप में गत 1 अप्रैल से चल रहा है आगे इसका और भी बड़ा रूप बन सकता है और रोग निवृत्ति एवं आरोग्य रक्षा के लिए अगणित व्यक्ति उससे लाभान्वित हो सकते हैं। अभी साधन के अभाव में वह छोटा ही है और केवल कब्ज के मरीज ही लिये जा रहे हैं पर आगे इतने से ही काम न चलेगा। केन्द्रीय कार्यालय इस पद्धति की शिक्षा के लिए ही उपयुक्त हो सकता है। चिकित्सा प्रणाली की व्यवस्था और शिक्षा के लिए तो गाँव गाँव और घर−घर में प्रबन्ध करना पड़ेगा। सारा देश रोगी है, घर-घर में अव्यवस्था घुसी हुई है, इसे हटाने के लिए यदि एक जगह दस बीस रोगी रखकर इलाज करने का प्रबन्ध हो भी गया तो उससे कुछ बनने वाला नहीं है। समस्या तो तभी सुलझेगी जब आरोग्य रक्षा एवं मुक्ति की प्रक्रिया को हर कोई जाने और माने। इसके लिए एक व्यक्ति और एक स्थान से कुछ काम न बनेगा। हम में से हर एक को इधर ध्यान करना पड़ेगा और अपने अपने क्षेत्र में कुछ काम करना पड़ेगा। कम से कम अपने और अपने परिजनों के शरीरों को स्वस्थ रखने की दिशा में तो कुछ करना ही पड़ेगा। क्या करना चाहिए इस संबंध में यह अंक आधा मार्ग दर्शन कर सकता है। आधे की पूर्ति भी अगले किसी महीने में प्राकृतिक चिकित्सा अंक निकलने पर हो जायेगी। उस ज्ञान को कार्यान्वित करने के लिए अपनी अपनी परिस्थितियों के अनुसार कुछ न कुछ करने के लिए हममें से हर एक छोटा बड़ा कदम उठ सकता है और उसके अनुसार लाभ भी प्राप्त कर सकता है।
जून का स्वास्थ्य शिविर
जानकारी प्राप्त करना तो पुस्तकों एवं लेखों के आधार पर भी हो सकता है पर उसे जीवन व्यवहार में उतारने के लिए कुछ दिन नये वातावरण में रहना आवश्यक होता है। तीर्थ यात्रा का उद्देश्य भी यही है। प्रभावशाली व्यक्तित्व एवं उपयुक्त वातावरण के सम्पर्क में आकर ही मनुष्य अपने स्वभाव को बदल पाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए इस बार 1 से 30 जून तक एक महीने का गायत्री तपोभूमि में ‘स्वास्थ्य शिविर’ लगाने का निश्चय किया गया है। जिन्हें इस विषय में अभिरुचि हो वे इसमें सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। इस अंक में जिन स्वास्थ्यवर्धक प्रक्रियाओं का उल्लेख है उनका व्यावहारिक शिक्षण तथा प्राकृतिक चिकित्सा के सभी अंगों का क्रियात्मक स्वरूप आगन्तुकों की शिक्षा के लिए प्रस्तुत किया जायेगा जिससे वे अपने ही नहीं दूसरों के स्वास्थ्य को सुधारने में सफल एवं समर्थ हो सकें।
शिविर में 18 से 60 वर्ष तक की आयु के ऐसे लोग ही लिए जावेंगे जिन्हें कोई छूत का या खाँसी आदि साथ रहने वाले दूसरे साथियों को असुविधा उत्पन्न करने वाला रोग न हों। आगन्तुकों का निर्व्यसनी, कर्तव्यनिष्ठ, मधुरभाषी, अनुशासन−प्रिय सेवाभावी एवं शिक्षित होना आवश्यक है।
इस शिविर में कई प्राकृतिक चिकित्सालयों के संचालक एवं स्वास्थ्य विशेषज्ञ शिक्षण के लिए आने वाले हैं। खेलकूद, भ्रमण, तीर्थ यात्रा आदि का मनोरंजक कार्यक्रम भी रहा करेगा। गर्मी की छुट्टियाँ आनन्दपूर्ण वातावरण में बिताने, स्वास्थ्य संबंधी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त करने एवं जीवन को सुविकसित बनाने की प्रेरणा के लिए यह एक महीने का शिक्षण बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगा। जिन्हें अवकाश हो वे इसमें सम्मिलित होने का अवश्य प्रयत्न करें। जिन्हें थोड़ी अस्वस्थता रहती है वे अपने प्राकृतिक उपचार का लाभ भी इस अवसर पर प्राप्त कर सकेंगे एवं प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति का सांगोपांग शिक्षण प्राप्तकर अपने तथा अपने परिजनों की आरोग्य रक्षा कर सकने में भी समर्थ हो सकते हैं।
अपना भोजन खर्च प्रत्येक शिक्षार्थी को स्वयं करना होगा जो संभवतः 20 रु. से 25 रु. तक एक महीने में पड़ेगा। शिक्षार्थियों की चुनी हुई समिति के हाथ में भोजन प्रबंध रहेगा और प्रत्येक के हिस्से में जो खर्च आवेगा वह उसे देना होगा। अपने दोनों तरफ का मार्ग व्यय, भोजन खर्च तथा अन्य आवश्यक खर्च साथ लेकर ही घर से चलना चाहिए, ताकि पीछे परेशानी न उठानी पड़े, अपने बिस्तर, कपड़े तथा थाली, लोटा, कटोरी आदि पात्र भी साथ लाने चाहिए।
शिक्षा के साथ−साथ जो अपनी चिकित्सा कराना चाहेंगे उनके लिए उसकी व्यवस्था भी करा दी जावेगी। जिन्हें इस प्रकार की दुहरी आवश्यकता हो उन्हें इसके लिए पहले से ही पत्र व्यवहार कर लेना चाहिए, ताकि उनके लिए चिकित्सा की सीट सुरक्षित रखी जाय। स्मरण रहे छूत के रोगों के रोगी, अशक्त, महिलाऐं एवं जिनके कारण दूसरों को असुविधा होती है ऐसे रोगों के रोगियों के लिए अभी यहाँ व्यवस्था नहीं है।
इस एक मास के स्वास्थ्य शिविर में शिक्षा देने के लिए कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ आ रहे हैं। शरीर विज्ञान की शिक्षा देने के लिए ग्वालियर के डा. अमल कुमार, प्राकृतिक चिकित्सा की शिक्षा के लिए जयपुर प्राकृतिक चिकित्सालय के संचालनकर्ता सुखरामदास एवं जोधपुर प्राकृतिक चिकित्सालय के संचालक डा. सरदारमल दुग्गड़ पधार रहे हैं। व्यायाम आसन एवं सूर्य नमस्कार का शिक्षण झाँसी के व्यायाम विशेषज्ञ श्री. अन्नासाहब करेंगे। प्रिंसिपल जगदीशशरण अग्रवाल आदि अनेक अन्य विद्वानों का भी शिक्षण रहेगा।
जिन्हें आना हो वे अपना (1) पूरा नाम (2) पूरा पता (3) आयु (4) जाति (5) शिक्षा (6) व्यवसाय (7) शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का पूरा विवरण लिखकर 20 मई तक स्वीकृति प्राप्त कर लें। बिना स्वीकृति पाये कोई सज्जन न आवें। −
*समाप्त*