सच्चा शूरवीर मनुष्य

सच्चा मनुष्य एक शूरवीर सिपाही की भाँति निर्भीक रहता है। वह आदर्श और सिद्धांतों का पालन करने के लिए अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े करा देेने पर भी पथ से विचलित नहीं होता। दूसरों के प्राणों की रक्षा करने के लिए जिसने अपने प्राणों की बाजी लगा डाली है, उस उदारचित्त सैनिक का जीवन किसी संत से कम नहीं है। तीर-तलवारों की वर्षा जिसके विश्वास को डगमगाती नहीं, जो अपने प्राण से बढ़कर राष्ट्र के गौरव और सम्मान को समझता है, वही शूरवीर इस धरती पर धन्य होता है।

जिसने अपने शरीर को तिनके के समान माना और सोने को पत्थर की तरह देखा, विषय-सुखों को जिसने दुत्कार कर भगा दिया, वह गृहस्थ हो या विरक्त, सच्चा संत ही कहा जाएगा। मरना सभी को है, पर जो आदर्श के लिए मरता है, मरना उसी का सफल है। जीते तो सभी हैं, पर जो सिद्धांत के लिए जीवित हैं, जीना उन्हीं का सार्थक है। यह जीवन चारों ओर पाप और कुमार्गों के शत्रुओं से घिरा है। जो कभी हताश नहीं होता, जो शत्रुओं के सामने आत्मसमर्पण नहीं करता, वही शूरवीर है। कष्ट उठाते हुए भी जिसने धर्म नहीं छोड़ा, उसी का जन्म सार्थक हुआ कहा जाएगा।

− संत तुकाराम

वर्ष-23 संपादक−श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-11


जीवन−गीत


जीवन−गीत (कविता)

जब तक है विश्वास, लगन दृढ़—क्षमता की पतवार!

माँझी, भय क्या तुझे, भले हो आँधी या मँझधार!!

आज उदधि सीमा−बंधन से—

मुक्त हो रहा, ले अँगड़ाई!

लहरों के विद्रोही उर में—

जाग उठी सोई तरुणाई!!

जाने क्यों विक्षुब्ध हृदय में, उसके आया ज्वार!

झूम−झूमकर खेते जाना, मत होना लाचार!!

खेल खेलने ही आता है—

साहस से तूफान विचारा!

जहाँ चाह है, वहाँ राह है—

निकट इसी से सदा किनारा!!

मंजिल स्वयं चली आएगी, थककर तेरे द्वार!

झुका न देना भाल कहीं तू , इस जीवन से हार!!

थक जाएगी डगर एक दिन—

गति में यदि आए न शिथिलता!

मिल जाएगी शांति सुनिश्चित—

अधरों पर आए न विकलता!!

शूलों की नोकों पर खिलते, सुंदर सुमन अपार!

भूल न जाना पंथ, घिरा हो चहुँदिशि में अँधियार!!

— रामस्वरूप खरे


जिंदगी जीने की विद्या भी सीखी जाए

प्रत्येक उद्योग-धंधे को चलाने से पूर्व उसके संबंध में अधिक जानकारी प्राप्त करने की आवश्यकता होती है कि उसे किस प्रकार ठीक तरह चलाया जाए, यह जानना भी जरूरी होता है। कल-कारखाने, खेती, व्यापार, मशीन, फैक्ट्री आदि कुछ भी काम करना हो, पहला प्रयत्न यही किया जाता है कि इसके संबंध में बारीकी से सब कुछ जान लें और इन उद्योगों को किस प्रकार चलाया जाता है, इसका ठीक−ठीक अनुभव प्राप्त कर लें। कुछ आलसी व्यक्ति अपने प्रमादवश जानकारी की तो उपेक्षा करते हैं और उस कार्य को आरंभ कर देते हैं, तो उन्हें घाटा उठाना पड़ता है और अंततः उनका कारोबार चौपट हो जाता है।

शिक्षणरहित व्यापार

मोटर चलाना आरंभ कर दिया जाए और न तो ड्राइवरी सीखी हो और न उसके कल-पुरजों की कोई जानकारी हो तो दुर्घटना की ही आशंका रहेगी। मोटर का टूटना और बैठने वालों का खतरे में पड़ जाना स्वाभाविक है। हिसाब−किताब, क्रय-विक्रय का अनुभव हुए बिना व्यापार क्या चलने वाला है? जिसे कृषि करना आता नहीं है, वह खेतों में बीज बखेरता फिरे तो इतने मात्र से अच्छी फसल की आशा कैसे की जाएगी? फौज, पुलिस, प्रशासन, रेलवे आदि के सरकारी महकमों में काम करने वाले व्यक्ति पहले ट्रेनिंग प्राप्त करते हैं पीछे उनकी नियुक्ति होती है। यदि ट्रेनिंग के बिना अनाड़ी रंगरूट इन विभागों में नियुक्त कर दिया जाए तो किसी अच्छे परिणाम की आशा नहीं की जा सकती, वे अनाड़ी व्यक्ति जहाँ जावेंगे, वहाँ संकट ही उत्पन्न करेंगे।

जिंदगी जीना एक भारी उद्योग है। किसी बड़े मिल-मालिक को जिस प्रकार छोटी से लेकर बड़ी तक अगणित समस्याओं को प्रतिक्षण सुलझाते रहना पड़ता है, उसी प्रकार मानव जीवन में अगणित समस्याएँ हर घड़ी प्रस्तुत रहती हैं और उन्हें समय−समय पर सुलझाना आवश्यक होता है। यदि यह सुलझाव ठीक न हुआ तो गुत्थियाँ और अधिक उलझ जाती हैं। गलत दृष्टि वाले व्यक्ति अपनी मामूली समस्याओं को गलत मार्ग अपनाकर इतनी उलझा लेते हैं कि मूल समस्या की अपेक्षा वह उलझन अधिक परेशानी उत्पन्न करती है।

जीवन भी एक शासन

किसी देश के राजा को अपनी प्रजा के सुख−दुःख की, राज्यकोष की, कर्मचारियों की कुशलता की, शत्रुओं से सुरक्षा की, उद्दंड अपराधियों के नियंत्रण की, मंत्रिमंडल के संगठन आदि की अनेकों समस्याओं का सामना करना पड़ता है और प्रत्येक गुत्थी को सही तरीके से सुलझाना पड़ता है। कोई मूर्ख राजा उचित हल न ढूँढ सके और उलटी-सीधी गतिविधियाँ अपनाए तो प्रजा में अशांति, शासन में असंतोष तथा व्यवस्था में गतिरोध उत्पन्न हो जाएगा। ऐसा राजा स्वयं भी नष्ट होता है और अपने राज्य भर में विपत्ति की विभीषिकाएँ खड़ी कर देता है। जीवन को किसी बड़े राज-काज का संचालन करने में ही उपमा दी जा सकती है। राज्य बड़ा होता है, जीवन छोटा, पर गुत्थियाँ दोनों की एक-सी रहती हैं। हाथी बड़ा है, मच्छर छोटा, पर दोनों को ही अपने−अपने निर्वाह की बात समान रूप से सोचनी पड़ती है और उनका हल ढूँढने के लिए समान रूप से दौड़−धूप करनी होती है। जीवन के बाह्य उत्तरदायित्व छोटे हों या बड़े, हर मनुष्य को एक नियत परिधि में अपनी कठिनाइयों का हल आप खोजना पड़ता है और अपना रास्ता स्वयं साफ करना होता है।

पूर्ण निश्चिंतता संभव नहीं

इस संसार में एक भी व्यक्ति ऐसा पैदा नहीं हुआ जिसे पूर्ण निश्चिंतता के साथ सरल और शांतिपूर्ण जीवनयापन करने की सुविधा मिली हो। यदि ऐसा होता तो मानवीय बुद्धि का विकास ही संभव न होता। चाकू की धार तभी तेज होती है, जब पत्थर पर उसे घिसा जाता है, निष्क्रिय पड़े रहने पर तो उस पर जंग ही चढ़ती है। कठिनाइयों और समस्याओं से रहित जीवन निर्जीव और आनंदरहित ही बनेगा, उसमें जड़ता, अनुत्साह और अवसाद ही घिरा रहेगा। घिसने और टकराने से शक्ति उत्पन्न होती है, यह वैज्ञानिक नियम है। ईश्वर अपने प्रिय पुत्र जीव को शक्तिमान, प्रगतिशील, विकासोन्मुख, चतुर, साहसी और पराक्रमी बनाना चाहता है, इसीलिए उसने समस्याओं और कठिनाइयों का एक बड़ा अंबार प्रत्येक मनुष्य के सामने खड़ा किया होता है।

बिल्ली अपने छोटे बच्चों को चूहे का शिकार करना स्वयं सिखाती है। पकड़े हुए घायल चूहे को वह बच्चों के सामने छोड़ती है, बच्चे उस पर आक्रमण करते हैं, मारते और खाते हैं। इस प्रकार उन्हें शिकार करने का अनुभव हो जाता है। परमात्मा बिल्ली की तरह मनुष्यरूपी बच्चों को उलझी समस्याओं से घायल चूहे सामने छोड़ता और पराक्रम-पुरुषार्थ की, विचार और विवेक की शिक्षा का साधन प्रस्तुत करता है। यह घायल चूहे तो अधमरे पहले से ही थे। चूहे मारने में कोई कठिनाई नहीं है। उन्हें तो बिल्ली स्वयं ही मारकर दे सकती थी, पर बच्चों को शिकार खेलना सिखाना तो बड़ा प्रश्न था, इसके बिना बच्चे अपने पैरों पर खड़े ही न हो पाते। ईश्वर आसानी से हमारी समस्याएँ हल कर सकता है, वह करता भी है, पर हमें भी तो अपनी चेतना का विकास करना सीखना है; इसलिए अधमरे चूहे की तरह गुत्थियाँ भी सामने आती ही रहती हैं। एक के बाद दूसरी का ताँता लगा ही रहता है।

हलचल और हेर−फेर आवश्यक

फिल्म की तस्वीरें एक के बाद दूसरी न आवें तो सिनेमा देखने का मजा ही मिट्टी हो जाए। पूरे खेल में एक ही तस्वीर सामने खड़ी रहे तो उसे देखना कौन पसंद करेगा? अनेकों हलचल भरे दृश्य होने से ही तो मनोरंजन का आनंद मिलता है, जिसने जितनी अधिक गुत्थियाँ सुलझाई होंगी, उसका साहस उतना ही बढ़ेगा, उसका अंतःकरण उतना ही खिलेगा, उसका चेतन उतना ही विकसित होगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही परमात्मा ने अपनी समस्त सृष्टि में ऐसी व्यवस्था की है कि समस्याओं से रहित कोई भी प्राणी रह न पावे। ऐसा एक भी जीव न बचे, जिसे अपने दैनिक जीवन में अगणित प्रकार की गुत्थियाँ न सुलझानी पड़े, यदि ऐसा न होता तो वहाँ जो गतिशीलता दिखाई पड़ रही है, वह कब की समाप्त हो गई होती, सब कुछ निर्जीव हो गया होगा। संघर्ष ही तो जीवन है। जीव संघर्ष में ही उत्पन्न होता है और संघर्ष करते रहते उसके श्वाँस पूरे होते हैं। संघर्ष समाप्त होने का नाम निद्रा, मूर्छा, जड़ता और मृत्यु ही होता है।

संघर्ष ही जीवन है

संघर्ष से बचे रह सकना किसी के लिए भी संभव नहीं। शांति की खोज में वन, पर्वतों में गुफा बनाकर रहने वाले योगी-यतियों को भी अपने आहार के लिए, लकड़ियों के लिए, निवास के लिए, जल के लिए, छाया के लिए और शरीर ढकने के लिए कुछ-न-कुछ साधन जुटाने पड़ते हैं और इस कार्य में उन्हें बहुत समय, श्रम, खोज तथा दौड़−धूप करनी होती है। फिर और कौन होगा, जिसे सदा शांति रहे। राजा-रईस, अमीर-उमराव, सेठ-साहूकारों के बारे में यह सोचा जाता है कि वे मौज में पड़े−पड़े जिंदगी काटते होंगे, पर सही बात यह है कि उनका ठाट−बाट तभी तक कायम है जब तक कि वे संघर्षसंलग्न है। जिस दिन चैन से रोटी खाने और मौज के दिन गुजारने की बात उनके मस्तिष्क में घुस जाएगी, उसी दिन से उनका वैभव समाप्त होने लगेगा। लक्ष्मी तो उद्योगी सिंहों को वरण करती है। निष्क्रिय लोगों के लिए तो दारिद्र्य और कुंठा का ही तिरस्कार निश्चित रहता है।

यह सोचना उचित नहीं कि किसी प्रकार हमें समस्याओं से छुटकारा मिल जाएगा। उलझनों से रहित जीवन की व्यवस्था इस सृष्टि में नहीं हुई है। इसलिए उससे बचे रहने की कल्पना किसी को भी नहीं करनी चाहिए, वरन यह सोचना चाहिए कि आए दिन उपस्थित होने वाली समस्याओं के सुलझने का सही तरीका क्या है, उसे जानें। पैरों में जूते पहन लेने पर रास्ते में बिखरे हुए काँटों से सहज ही बचाव हो जाता है। अपने पास उलझनों को सुलझाने का यदि सही दृष्टिकोण मौजूद हो तो कठिन और भयंकर दिखने वाली समस्याएँ भी बात-की-बात में सुलझती चली जाती हैं।

प्रतिकूलता को अनुकूल बनाना

आमतौर से यह सोचा जाता है कि जैसा हम सोचते हैं, जैसा हम चाहते हैं, इसी के अनुरूप परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाएँ, इसी के अनुरूप दूसरे व्यक्ति आचरण करने लगें। अपनी हर सही-गलत और आकांक्षाओं को हम पूर्ण हुआ देखना चाहते हैं। मानो सामने जो कुछ है, वह सब गीली मिट्टीमात्र है, उसका जो कुछ बनाना चाहते हैं, वही तुरंत बनकर तैयार हो जाएगा, और जैसे उसे चलाना चाहते हैं, वैसे ही चलने लगेगा। यह आकांक्षा भी इसी प्रकार असफल रहने वाली है, जैसी कठिनाइयों से पूर्ण सुरक्षित रहने की कामना। जिस प्रकार कठिनाइयों से निपटने के लिए कटिबद्ध रहना आवश्यक है, वैसे ही संघर्ष को एक अनिवार्य तत्त्व मान लेना आवश्यक है। इसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि यह भली प्रकार जान लिया जाए कि परिस्थितियाँ अपने अनुकूल बनें, यही सोचते रहने की अपेक्षा यह सोचना भी उचित है कि हम परिस्थितियों के अनुकूल झुकने और ढलने का प्रयत्न करें। दूसरे व्यक्ति हमारे अनुकूल ही अपना स्वभाव बदल लें और जैसा हम चाहते हैं, वैसे ही चलें, यह सोचने की अपेक्षा यह सोचना अधिक युक्तिसंगत है कि इस बहुरंगी दुनियाँ से मिल−जुलकर चलने और जैसा कुछ यहाँ है, उसी से काम चलाने के लायक लचक अपने अंदर उत्पन्न करें। समझौते की नीति पर यहाँ सारा काम चल रहा है। रात और दिन परस्पर विरोधी होते हुए भी जब संध्या-समय एक जगह एकत्रित हो सकते हैं तो क्या यह उचित नहीं कि विरोधी तत्वों का भी समन्वय खोजें और मिल-जुलकर चलने का सह-अस्तित्त्व भी अपनाया जाए?

जीवन का एक ज्वलंत प्रश्न

अपने को अप्रिय लगने वाली, दुःख देने वाली और कठिनाइयों को बढ़ाने वाली समस्याएँ किस प्रकार अपने अनुकूल बनाई जाएँ, यह जीवन विज्ञान का यह एक ज्वलंत प्रश्न है? दूसरे व्यक्ति या पदार्थ अपने ढंग के बने होते हैं, वे इच्छामात्र से अपने अनुकूल कहाँ बन पाते हैं? प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने के लिए अपने भीतर कुछ विशेषताएँ होनी चाहिए। जिनने अपने में वे विशेषताऐं पैदा कर ली हैं, उनके लिए उनकी प्रतिपक्षी परिस्थितियाँ बहुत हद तक अनुकूल बन जाती हैं। लुहार अपनी भट्टी में लोहे के टूटे−फूटे टुकड़ों को डालकर नरम करता है और उसकी इच्छित वस्तु बनाता है। अपने भीतर भी ऐसी विशेषताएँ होनी चाहिए, जिससे विपन्नता संपन्नता में बदल सके।

जिंदगी जीने की कला में प्रधानतया दो ही शिक्षण होते हैं। एकदूसरों की प्रतिकूलता को अनुकूलता से परिवर्तित करने की सामर्थ्य, दूसरे आगत प्रतिकूलता को हँसते−खेलते सहन कर लेने की क्षमता, यह सामर्थ्य और क्षमता जिसमें जितनी होगी, वह जीवन-संग्राम में उतना ही सफल रहेगा। इस बेढंगे और चित्र−विचित्र संसार में भी उसकी गाड़ी उसी तरह चलती रहेगी, जैसे फौजी टैंक ऊबड़−खाबड़ जमीन को पार करते हुए भी अपने लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।

जीने की कला भी सीखें

जीवन हम जीते हैं, उसे जीना ही पड़ता है, पर यह खेद की बात है कि हम उसे विधिवत् जीने की विद्या नहीं सीखते। कृषि, व्यापार, मशीन, शिल्प, चिकित्सा आदि की अपेक्षा भी जिंदगी जीने की विद्या महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि उसकी आवश्यकता हमें प्रतिक्षण, हर समस्या के सुलझाने और हर कठिनाई के हल करने में पड़ती है। प्रगति और समृद्धि भी, सुरक्षा और व्यवस्था भी उसी पर निर्भर रहती है। जब कठिनाइयों का आते रहना अनिवार्य है, जब परिस्थितियों का प्रतिकूल रहना स्वाभाविक है, तो यह भी आवश्यक है कि हम प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने के लिए सामर्थ्य और क्षमता उत्पन्न करें। इन्हीं दोनों गुणों का समन्वयात्मक शिक्षण जीवन-विद्या कहलाता है। इसे प्राचीनकाल में भारत का प्रत्येक नागरिक सीखता था। अध्यात्म के नाम से इसी की ख्याती सारे विश्व में थी। भारत इसी का धनी समझा जाता था। अब इस ओर से उपेक्षा होने लगी तो अनाड़ी ड्राइवर की तरह हमारी जीवनरूपी मोटरें दलदलों में फँसी हुई दुर्घटनाग्रस्त हो रही हैं।

अखण्ड ज्योति इसी संजीवनी विद्या का व्यवस्थित शिक्षण अब आरंभ करने जा रही है। पत्रिका के पृष्ठों पर लेखरूप में और व्यावहारिक शिक्षण शिविर और सत्रों के रूप में जनसाधारण को प्राप्त होगा। विश्वास है कि उससे मानवता की सच्ची सेवा संभव हो सकेगी।


हम ईश्वर से विमुख न हों

जिंदगी को ठीक तरह जीने के लिए एक ऐसे साथी की आवश्यकता रहती है, जो पूरे रास्ते हमारे साथ रहे, रास्ता बताए, प्यार करे, सलाह दे और सहायता की शक्ति तथा भावना दोनों से ही संपन्न हो। ऐसा साथी मिल जाने पर जिंदगी की लंबी मंजिल बड़ी हँसी−खुशी और सुविधा के साथ पूरी जाती है। अकेले चलने में यह लम्बा रास्ता भारी हो जाता है और कठिन प्रतीत होता है।

जीवन का सच्चा सहचर

ऐसा सबसे उपयुक्त साथी जो निरंतर मित्र, सखा, सेवक, गुरु, सहायक की तरह हर घड़ी प्रस्तुत रहे और बदले में कुछ भी प्रत्युपकार न माँगे; केवल एक ईश्वर ही हो सकता है। ईश्वर को जीवन का सहचर बना लेने से मंजिल इतनी मंगलमय हो जाती है कि यह धरती ही ईश्वर के लोक— स्वर्ग जैसी आनंदयुक्त प्रतीत होने लगती है। यों ईश्वर सबके साथ है और वह सबकी सहायता भी करता है, पर जो उसे समझते और देखते हैं, वास्तविक लाभ उन्हें ही मिल पाता है। किसी के घर में सोना गड़ा है और वह प्रतीत न हो तो गरीबी ही अनुभव होती रहेगी, किंतु यदि मालूम हो कि हमारे घर में इतना सोना है तो उसका भले ही उपयोग न किया जाए, मन में अमीरी का गर्व और विश्वास बना रहेगा। ईश्वर को भूले रहने पर हमें अकेलापन प्रतीत होता है, पर जब उसे अपने रोम−रोम में समाया हुआ, अजस्र प्रेम और सहयोग बरसाता हुआ अनुभव करते हैं तो साहस हजारों गुना अधिक हो जाता है। आशा और विश्वास से हृदय हर घड़ी भरा रहता है।

जिसने ईश्वर को भुला रखा है, अपने बलबूते पर ही सब कुछ करता है और सोचता है, उसे जिंदगी बहुत भारी प्रतीत होती है, इतना वजन उठाकर चलने में उसके पैर लड़खड़ाने लगते हैं। कठिनाइयाँ और आपत्तियाँ सामने आने पर भय और आशंका से कलेजा धक−धक करने लगता है। अपने साधनों में कमी दिखने पर भविष्य अंधकारमय प्रतीत होने लगता है; पर जिसे ईश्वर पर विश्वास है, वह सदा यही अनुभव करेगा, कोई बड़ी शक्ति मेरे साथ है। जहाँ अपना बल थकेगा, वहाँ उसका बल मिलेगा। जहाँ अपने साधन कम पड़ रहे होंगे, वहाँ उसके साधन उपलब्ध होंगे। इस संसार में क्षण−क्षण पर प्राणघातक संकट और आपत्तियों के पर्वत मौजूद हैं, जो उनसे अब तक अपनी रक्षा करता रहा है, वह आगे क्यों न करेगा?

निरंतर की दैवी सहायताएँ

अब तक के जीवन पर यदि हम ध्यान दें तो ऐसे ढेरों प्रसंग याद आ जावेंगे जब चारों ओर अन्धेरा छाया हुआ था और यह प्रतीत होता था कि नाव अब डूबी; पर स्थिति बदलीं, विपत्ति की घटाएँ हटीं और सुरक्षा के साधन बन गए। लोग इसे आकस्मिक अवसर कहकर ईश्वर के प्रति अपनी आस्था को भुलाते रहते हैं। वास्तविकता यह है कि समय-समय पर हमें दैवी सहायता मिलती है और अपने स्वल्प साधन रहते हुए भी कोई बड़ी शक्ति सहायता करने के लिए आ पहुँचती है। कृतघ्नता को हमने स्वभाव में यदि सम्मिलित नहीं किया है, तो अपने निज जीवन में ही अगणित अवसर दैवी सहायता के ढूँढ सकते हैं और वह विश्वास कर सकते हैं कि उसकी अहेतु की कृपा निरंतर हमारे ऊपर बरसती रहती है।

अब तक जिसने समय−समय पर इतनी सहायता की है। जन्म लेने से पहले ही हर घड़ी गरम, मीठे और ताजे दूध से निरंतर भरे रहने वाले दो−दो डिब्बे जिसने तैयार करके रख दिए थे, माता के रूप में धोबिन, भंगन, डाॅक्टर, नर्स, आया तथा मनमाना खरच और दुलार करने वाली एक चौबीस घंटे की बिना वेतन की सेविका जिसने नियुक्त कर रखी थी। प्रत्येक अवसर पर जिसकी सहायता मिलती रही है, वह आगे भी मिलेगी ही और अपना भविष्य उज्ज्वल बनेगा ही, यह विश्वास करने वाला व्यक्ति कभी निराश नहीं हो सकता, उसकी हिम्मत कभी टूट नहीं सकती। आस्तिकता के आधार पर ही हमारी हिम्मत बढ़ती है और साहसी शूरवीरों जैसा कलेजा बना रहता है।

निर्भयता का वरदान

डरता वह है, जिसे ईश्वर का डर नहीं होता। जो ईश्वर से डरता है उसके आदेशों का उल्लंघन नहीं करता, उसे इस संसार में किसी से भी डरना नहीं पड़ता। संसार की हर वस्तु से डरने और सशंकित रहने का एक ही कारण है। ईश्वर से न डरना, उसकी अवज्ञा करना, जो ऐसा नहीं करते, उसे अपना मित्र, सहायक और मार्गदर्शक मानते हैं, उन्हें सबसे पहला उपहार निर्भयता का प्राप्त होता है। उन्हें फिर किसी से भी डरना नहीं पड़ता, आपत्तियाँ उसे खिलवाड़ सरीखी दिखती हैं। वस्तुतः इस पुण्य उपवन संसार में डरने का कहीं कोई कारण नहीं है। कागज का डरावना चेहरा पहनकर छोटे बच्चों को डराने का विनोद किया जाता है, वैसा ही विनोद कठिनाइयाँ दिखाकर हमारे साथ किया जाता रहता है।

पिता अपने बच्चे को तलवार घुमाकर डराना चाहे तो क्या बच्चा कभी डरता है? ईश्वर के हाथ में इस संसार की सारी बागडोर है। दीखने वाली कठिनाइयाँ भले ही तलवार जैसी चमकें, उनके मूँठ तो अपने परम स्नेही के हाथ में हैं, फिर डरने की क्या बात रही। ईश्वरविश्वासी का सोचना इसी ढंग का होता है। हर डराने वाली घटना उसे खिलवाड़ जैसी लगती है और विषम घड़ियों में भी न तो उसे घबराहट होती है और न परेशानी।

सच्चा स्वजन और सहायक

अपना सहायक, पिता−माता सहायक, स्वामी, सखा, भ्राता, सखा-परिजन और धन, जिसने ईश्वर को मान रखा है, उसे किसी बड़े-से-बड़े अमीर से, राजाधिराज से अधिक आत्मविश्वास बना रहेगा। राजा-रईसों के लड़के अपने पिता की जरा-सी शक्ति और संपत्ति पर गर्व कर सकते हैं तो अनंत सामर्थ्यों और असीम विभूतियों के स्वामी ईश्वर को जो अपना पिता मानेगा, उसे इस संसार से फैला हुआ सब कुछ ही अनुभव होगा। इतना अतुल वैभव जब अपना— अपने पिता का ही है, तब दरिद्रता और गरीबी की बात सोचने का प्रश्न ही नहीं उठता। गरीब वे हैं, जो केवल अपनी ही संपत्ति को अपना मानते हैं। ईश्वर को अपने से पृथक, दूर एवं असंबद्ध मानने वाले को ही गरीबी दुःख देती है और उसे ही तृष्णा सताती है। जब सब कुछ अपने ईश्वर का ही है तो फिर असंतोष किस चीज का? कमी किस बात की?

शिक्षक और मार्गदर्शक

रास्ता वह भूलता है, जिसे बताने वाला नहीं होता या बताने वाले की बात सुनने की जिसे फुरसत नहीं होती। अंतरात्मा में बैठा हुआ ईश्वर, उचित और अनुचित की, कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य की प्रेरणा निरंतर देता रहता है। जो उसे सुनेगा, उसका महत्त्व समझेगा और सम्मान करेगा, उसे सीधे रास्ते पर चलने में कोई कठिनाई न होगी और जो सीधे रास्ते चलता है, उसे लोक में सुख और परलोक में शांति की कमी नहीं रहती। यश, प्रतिष्ठा और सम्मान उसके पीछे फिरते हैं। भले ही धन की दृष्टि से वह अमीर न हो पावे, पर महत्ता उसके चरणों पर लोटती रहती है। महापुरुषों और नररत्नों में ही वह गिना जाता है। ईश्वर को जिसने पहचाना और अपनाया, वह नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बनकर रहता है। सदाचार और कर्त्तव्यपरायणता, आत्मविश्वास और निर्भयता, आशा और धैर्य, आनंद और संतोष यही सब तो आस्तिकता के चिह्न हैं। जैसे−जैसे ईश्वर विश्वास बढ़ता है, वैसे-ही-वैसे यह महानताएँ अपने आप उत्पन्न होती जाती हैं। जीवन की सार्थकता और सफलता इन्हीं बातों पर तो निर्भर है।

न उपेक्षा करें, न विमुख हों

ईश्वर की उपेक्षा करने में परमात्मा की कोई हानि नहीं। हमारे भजन-ध्यान से उनका कुछ बनता-बिगड़ता नहीं, न उसकी कृपा में इससे कोई अंतर आता है। वे तो अपने पुत्रों का हित-चिंतन वैसे ही करते रहते हैं, जैसे माता−पिता छोटे शिशु का करते हैं। उपेक्षा से हानि अपनी ही है। अकेलापन सदा अखरता है। दूसरे स्वजन-संबंधी एक समय तक ही साथ रह सकते हैं, उनका प्रेम भी बदले की प्रक्रिया पर निर्भर रहता है, फिर उनकी क्षमता और उदारता भी उतनी बढ़ी-चढ़ी कहाँ होती है। सबसे श्रेष्ठ और सबसे सस्ता साथी ईश्वर ही हो सकता है। उसकी उपेक्षा करके अपना ही सबसे अधिक अहित होता है। हम उन सब लाभों से वंचित रह जाते हैं, जो भगवान के सान्निध्य में रहने से प्राप्त होते थे, हो सकते थे।

गाड़ी दो पहिये से चलती है। अपनी गाड़ी में एक पहिया अपना और एक ईश्वर का लगा लें तो जो गति आती है, वह एक पहिये से नहीं आ सकती। ईश्वरविहीन जीवन ऐसा ही है जैसा बिना शरीर के प्रेत-पिशाच की योनि में विचरण करने वाली आत्मा। उसे अशांति ही मिलती है, असंतोष, द्वेष, क्लेश से ही ऐसी मनोभूमि जलती और संत्रस्त रहती है। परमात्मा से विमुख होकर हम पाते कुछ नहीं, खोते बहुत हैं। समय रहते इस भूल को सुधार लिया जाए तो ही अच्छा है।


जीव पर दो प्रकृतियों की छाया

दो वस्तुओं के मिलने से एक तीसरी चीज बनती है। दिन और रात्रि की मिलन-बेला को संध्या कहते हैं। संध्या न रात है और न दिन, पर ध्यानपूर्वक देखा जाए तो उसमें दोनों का ही अस्तित्त्व मौजूद है। सोडा-कास्टिक और तेल मिलकर साबुन बन जाता है। साबुन न तेल के सदृश है और न सोडा के। उसका रूप दोनों से भिन्न है, फिर भी परीक्षण के बाद उन दोनों ही वस्तुओं का साबुन में आस्तित्त्व प्रमाणित हो जाता है। प्राणी भी ऐसे ही दो सम्मिश्रणों का एक तीसरा रूप है। परम ब्रह्म परमात्मा और पंचभौतिक प्रकृति, इन दोनों के सम्मिश्रण से जो तीसरी सत्ता उत्पन्न होती है, उसका नाम जीव है। ब्रह्म चेतन है, इसलिए उसका गुण आत्मिक चेतना, अंतःकरण एवं भावना के रूप में मौजूद हैं। प्रकृति जड़ है, इसलिए शरीर का सारा ही ढाँचा जड़ है। जीव की चेतना एवं प्रेरणा से वह चलता है। जब यह चेतना तनिक भी अशक्त या अस्त−व्यस्त होती है तो शरीर का सारा ढाँचा ही लड़खड़ा जाता है, सारा खेल ही खत्म हो जाता है। साइकिल चलाने वाले के पैरों में जब तक दम है, तभी तक पहिये घूमते हैं जब पैर थक गए तो साइकिल का चलना भी बंद हो जाता है। शरीर में जो क्रियाशीलता दिखाई पड़ती है, वह जीव की उपस्थिति और शक्ति का चिह्न है। यह शक्ति कुंठित होते ही शरीर दुर्बल, वृद्ध, रुग्ण और मृतक बन जाता है और तब वह घृणित लगने लगता है। निर्जीव होने पर तो जल्दी-से-जल्दी उसकी अंत्येष्टि ही करनी पड़ती है। पंचतत्त्व अपने-अपने तत्त्वों में मिल जाते हैं, वह सम्मिश्रण समाप्त हो जाने से दोनों को अपने-अपने स्वतंत्र रूप में पहुँच जाना पड़ता है।

जड़ और चेतन के अपने−अपने गुणधर्म भी हैं। ईश्वर चेतन है, इसलिए उसका अंश— जीव चेतन तो है ही, उसमें वे सब विशेषताएँ भी बीजरूप में मौजूद हैं, जो उसके मूल उद्गम-ब्रह्म में ओत-प्रोत हैं। ईश्वर सत्, चित् और आनंदस्वरूप है। जीव में भी सत्य में ही प्रसन्नता तथा संतोष अनुभव करने की प्रकृति है। कोई व्यक्ति स्वार्थवश स्वयं भले ही दूसरों से असत्य व्यवहार करे, पर उसके साथ दूसरे जब झूँठ, कपट, छल, विश्वासघात का व्यवहार करते हैं, तो बड़ा अप्रिय लगता है और दुःख होता है। हर किसी को यही पसंद होता है कि दूसरे उसके साथ पूर्ण निष्कपटता का, सच्चाई का व्यवहार करें, छल और धोखे की बात सुनते ही मन में भय, आशंका और घृणा उत्पन्न होती है। इससे स्पष्ट है कि जीव अपने उद्गम-केंद्र ब्रह्म का ‘सत्’ गुण अपने अंदर गहराई तक धारण किए हुए हैं।

चित् अर्थात चेतना सक्रियता। जीव भी ईश्वर की भाँति ही आजीवन, निरंतर सक्रिय रहता है। सोते समय, मूर्छा के समय केवल मस्तिष्क का एक छोटा भाग अचेत होता है, बाकी समस्त शरीर हर घड़ी काम करता रहता है। रक्तसंचार, श्वास−प्रश्वास, पाचन, स्वप्न आदि की क्रियाएँ बराबर चलती रहती हैं, शरीर के सभी कल-पुरजे अचेतन कहे जाने वाले मस्तिष्क के सहारे ठीक वैसा ही काम करते रहते हैं, जैसे जागते रहने पर होता था। विचार, भावना, विवेक, उत्साह, स्फूर्ति एवं क्रियाशीलता को चेतनता का ही अंग कहा जाएगा। ईश्वर चित् अर्थात चेतन है तो जीव भी वैसा ही क्यों न रहेगा। जब परमात्मा की सत्ता समस्त ब्रह्मांड में व्यापक होकर असंख्य प्रकार की प्रक्रियाएँ निरंतर संचारित रखती हैं तो जीव भी पिंड में, शरीर में व्याप्त होकर अहिर्निश अपना चेतना-व्यापार क्यों जारी न रखेगा।

परमात्मा आनंदस्वरूप है। उसकी प्रत्येक क्रिया आनंदपूर्ण है, आनंद के लिए है। आनंद-उद्भव एवं विस्तार करने के लिए है। उसने क्रीड़ा करने के लिए यह सारा संसार रचा है। लीलाधर की लीलाएँ आह्लाद और उल्लास प्रदान करने वाली हैं। प्राणी भी आनंद की ही खोज में निरंतर संलग्न रहता है। उसे अपनी समझ के अनुसार जहाँ कहीं भी आनंद दिखता है, वहीं जा पहुँचता है, जो वस्तुएँ उसे आनंददायक लगती हैं, उन्हें ही प्राप्त करने की चेष्टा करता है। सच्चा आनंद और झूठा आनंद परखने में भूल हो सकती है पर इतना निश्चित है कि हर प्राणी आनंद चाहता है और अपनी परिष्कृत अथवा अपरिष्कृत बुद्धि के अनुसार जहाँ भी आनंद दिखाई पड़ता है, वहीं रहना चाहता है, उसी को प्राप्त करना चाहता है। इसी चाहना— आकांक्षा के लिए उसका प्रायः सारा ही जीवन उत्सर्ग होता है। सत्, चित्, आनंद का सम्मिश्रित रूप ही ब्रह्म है; चूँकि हम सब इन तीनों ही को चाहते हैं और इन्हें ही अधिक मात्रा में प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं, इसलिए यही कहना होगा कि हमारी प्रवृत्ति ब्रह्मप्राप्ति की दिशा में है। यही हमारी प्रकृति भी है। इस संसार में समस्त जड़-चेतन अपनी−अपनी प्रकृति के अनुसार प्रवृत्तिरत है। जीव भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। उसे ब्रह्मप्राप्ति ही अभीष्ट है। इसके बिना उसका काम क्षण भर भी नहीं चल सकता, इस प्रकृति के विरुद्ध उसे क्षण भर भी चैन नहीं पड़ सकता।

इतना होते हुए भी देखा यह जाता है कि प्राणी अनैतिक कृत्यों में, दुष्कर्मों में अधिक रुचि लेता है और आलस और अहंकार, वासना और तृष्णा के फेर में पड़ा हुआ लोभवश उस ओर चलता है, जिस ओर अंधकार और असंतोष ही उपलब्ध होने वाला है। इसका कारण जड़ता का जीव पर पड़ने वाला प्रभाव ही है। यह स्पष्ट है कि प्राणी जड़ और चेतन तत्त्वों का सम्मिश्रित रूप है। चेतनतत्त्व— ब्रह्म की स्थिति उसे सत्, चित्  और आनंद की ओर उन्मुख रखती है; किन्तु जड़ता के प्रभाव से भी वह अछूता नहीं रहता। प्रकृति की, माया की, जड़ता की छाया भी उस पर बनी रहती है। इस प्रभाव के कारण ही अपना मार्ग निश्चित करने में, उचित गतिविधियाँ अपनाने में बाधा पड़ती है। इसी खींच-तान में वह दिग्भ्रांत हो जाता है।

जड़ता का प्रभाव जीव पर जितना अधिक होगा, उतना ही वह जड़ पदार्थों से प्रेम अधिक करेगा, उनका स्वामित्व, संग्रह एवं उपयोग उतना ही उसे अधिक रुचेगा। आलस्य, मोह और अहंकार ये जड़ता के प्रधान चिह्न हैं। जड़ पदार्थ निर्जीव है, इसलिए जिसमें जड़ता बढ़ेगी, वह उतना ही आलसी बनता जावेगा। प्रयत्न, पुरुषार्थ, परिश्रम में रुचि न होगी; अध्ययन, भजन एवं सत्कर्मों में मन न लगना इस बात का चिह्न है कि ‘चित्’ ईश्वरीय तत्त्व का विरोधी— ‘आलस’ आसुरी तत्त्व अपने अंदर भर रहा है। उसी प्रकार वस्तुओं को उपकरणमात्र मानकर उनसे सामयिक लाभ उठा लेने की बात न सोचकर उपलब्ध संपदा को अपनी मौरूसी मान बैठना, उनके छिनने पर रोना-चिल्लाना यह प्रकट करता है कि नाशवान और निर्जीव पदार्थों के प्रति अवांछनीय ममता जोड़ ली गई है, अहंकार तो असुरता का, तमोगुण का, प्रत्यक्ष चिह्न है। क्षण−क्षण में बदलती रहने वाली वस्तुओं और परिस्थितियों की अनुकूलता पर जो घमंड करता है, वह यह भूल जाता है कि इस संसार का प्रत्येक परमाणु अत्यंत द्रुतगति से अपनी धुरी पर घूमता है और प्रत्येक परिस्थिति तेजी के साथ उलटती−पलटती रहती है, फिर पानी में उठने वाले बुलबुले की तरह इस क्षण प्राप्त सौभाग्य पर इतराना क्या, ऐंठना और अकड़ना क्या? जो आज है, वह कल कहाँ रहने वाला है, फिर अहंकार करने का प्रश्न ही कहाँ उत्पन्न होता है।

लोभ और मोह के वशीभूत होकर, वासना और तृष्णा से प्रेरित होकर प्राणी विविध प्रकार के अकर्म और दुष्कर्म करता रहता है। यही अज्ञान है, यही माया है, यही अविद्या है। एक ओर आत्मा की सत्, चित् और आनंद की मूल प्रकृति, उसे उच्च भूमिका की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देती है, दूसरी ओर जड़ता एवं माया का प्रकोप जीव के ऊपर होता रहता है। एक दिशा में दैवी प्रकृति खींचती है दूसरी तरफ आसुरी प्रकृति जोर लगाती है। फलस्वरूप धर्मक्षेत्र-कुरुक्षेत्र—अंतःकरण में अशांति और असंतोष का महाभारत मचा रहता है। जड़ता हमें बंधन में बाँधती है और चेतना मुक्ति का संदेश प्रदान करती है।

इस रस्साकशी में जीतता वही पक्ष है, जिस पर आत्मा अपनी स्वीकृति की मुहर लगा देती है। उसका वोट जिधर पड़ता है, उधर ही जीत हो जाती है। किसी बच्चे पर दो माताएँ अपना दावा करें तो न्यायाधीश उस पक्ष में फैसला देता है, जिसे कि बच्चा पहचान ले और जिसके पास जाना पसंद करे। जड़ता और चेतना ऐसी ही माता और विमाता है, दोनों ही आत्मा पर अपना दावा करती हैं और उसे अपने पक्ष में फुसलाना चाहती हैं। अच्छाई इतनी ही है कि फैसला आत्मा की अभिरुचि के ऊपर निर्भर रखा गया है। पतन और उत्थान के दोनों ही मार्ग उसके लिए खुले हुए हैं। वह जिसे चाहे उसे पसंद कर सकती है।

जीव पर दैवी और आसुरी दोनों ही चेतनाओं का प्रभाव है, वह जिस ओर उन्मुख होगा, वैसा ही उसका स्वरूप बनता जाएगा। जड़ता एवं माया में लिप्त होते चलने पर वह अधोगति का अधिकारी होता है और पाप, पतन, नरक की दुर्गति में निमग्न होता जाता है; पर यदि वह अपनी मूल प्रकृति सत्-चित्-आनंद का निर्वाह करता चले तो बंधन से मुक्ति निश्चित है, फिर पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती।


सन्मार्ग का राजपथ कभी भी न छोड़ें

घने जंगलों में पशुओं और वनवासियों के इधर−उधर चलने से छोटी−छोटी पगडंडियाँ बन जाती हैं। जहाँ से वे शुरू होती है, वहाँ अक्सर ऐसी लगती हैं मानों ये कोई सुव्यवस्थित रास्ते हैं; पर आगे कुछ दूर चलकर वे समाप्त हो जाती हैं और सघन वन रास्ता रोककर खड़ा हो जाता है। कई बार इन प्रदेशों को पार करने वाले यात्री गलती से सही रास्ता छोड़कर इन ओछी पगडंडियों पर चल पड़ते हैं तो आरंभ में उन्हें बड़ी प्रसन्नता होती है, वे सोचते हैं बड़ा रास्ता चक्करदार था, उस पर चलते हुए देर में मंजिल पार होती; पर यह सीधी पगडंडी जल्दी पहुँचा देगी और जहाँ हम पहुँचना चाहते हैं, वहाँ जल्दी पहुँच जाएँगे। वह प्रसन्नता देर तक नहीं रह पाती। कुछ आगे निकल जाने के बाद जब रास्ता बंद हो जाता है और घनी-कँटीली झाड़ियों में रहने वाले सिंह, व्याघ्र, रीछ, अजगर जब इधर−उधर फिरते दीखते हैं, तो प्राण सूखने लगते हैं। लंबी मंजिल चलने पर लौटना भी तो काफी दुःखदायक होता है। पगडंडी के लोभ में कितनी ही बार चतुर शिकारियों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है।

जीवन का सघन वन

जीवन एक वन है, साधारण नहीं। सघन−सुरम्य ही नहीं, कँटीली झाड़ियों से भरा हुआ भी। इसे ठीक तरह पार करना काफी दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता द्वारा ही संभव है। सदाचार और धर्म की सीधी सड़क इसे पार करने के लिए बनी हुई है। उस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचना समयसाध्य तो है, पर जोखिम उसमें नहीं है। इतनी बात न समझकर जल्दबाज लोग पगडंडियाँ ढूँढते हैं, जहाँ−तहाँ उन्हें वे दिखती भी हैं। बेचारों को यह पता नहीं होता कि यह अंत तक नहीं पहुँचतीं, बीच में ही विश्वासघाती मित्र की तरह रास्ता छोड़ देती हैं और जल्दी काम बनने का लालच दिखाकर ऐसे दलदल में फँसा देती हैं, जहाँ से वापिस लौटना भी आसान नहीं रहता।

अनीति पर चलकर जल्दी काम बना लेने और अधिक कमा लेने का लालच एक छोटी सीमा तक ही ठीक सिद्ध होता है। आगे चलकर तो उसमें भारी विपत्तियाँ-ही-विपत्तियाँ आती हैं। आरंभ में कई बात लाभदायक दिखती हैं, पर अंत इसका कैसा होगा, यह सोचकर ही बुद्धिमान लोग उस आरंभिक लालच को स्वीकार करते हैं। जहाँ अंततः जोखिम दिखती है, समझदार लोग उससे दूर ही रहते हैं। वे जानते हैं कि विनाश आरंभ में आकर्षक ही लगता है। पाप के साथ आरंभिक प्रलोभनों की एक लालच भरी गुदगुदी जुड़ी रहती है, उसी से तो मूर्खों को जाल में फँसाया जाता है। शैतान का नुकीला पंजा रेशम की टोपी से ढँका रहता है। मछली को पकड़ने वाली डोरी के सिरे पर जरा-सा आटा लगा रहता है। चिड़ियों को पकड़ने वाले जाल के आस−पास अनाज के दाने फैले होते हैं। इस आरंभिक लालच की व्यर्थता न समझ पाने के कारण ही तो मछली और चिड़िया अपना जीवन संकट में डालती हैं।

पगडंडियों का प्रलोभन

पाप और अनीति का मार्ग ऐसा ही है, जैसा सघन वन की पगडंडियों पर चलना। ऐसा ही है जैसा मछली का काँटे समेत आटा निगलना और जाल में पड़े हुए दानों के लिए चिड़ियों की तरह आगा−पीछा न सोचना। अभीष्ट कामनाओं की जल्दी-से-जल्दी, अधिक-से-अधिक मात्रा में पूर्ति हो जाए, इस लालच से लोग वह काम करना चाहते हैं, जो तुरंत सफलता की मंजिल तक पहुँचा दे। जल्दी और अधिकता दोनों ही बातें अच्छी हैं, पर यदि उनके लिए यात्रा का उद्देश्य ही नष्ट होता हो, तब उन्हें बुद्धिमत्ता नहीं माना जाएगा।

चोरी, बेईमानी, झूठ, छल, विश्वासघात, अनीति, अपहरण, पाप, व्यभिचार आदि को आरंभ करते समय यही सोचा जाता है कि एक बढ़िया लाभ तुरंत प्राप्त होगा। ईमानदारी के राजमार्ग पर चलते हुए मंजिल देर में पूरी होती थी, उसमें सीमा और मर्यादाओं का भी सीमा-बंधन है। पर पापमार्ग में चलते हुए ऐसा लगता है कि मनमाना लोगों को ठगने से, कमजोरों को डराने से सहज ही बड़ा लाभ कमाया जा सकता है। अशक्त से उनकी वस्तुएँ छीन लेना थोड़ी-सी चालाकी से ही सुगम हो जाता है। लोगों की असावधानी या भलमनसाहत का चतुरतापूर्वक आसानी से भरपूर अनुचित लाभ उठाया जा सकता है। ऐसा सोचने से यह प्रतीत होता है कि अनीति का मार्ग अपना लेने में कोई हर्ज नहीं। कितने ही ऐसे उदाहरण भी सामने आते हैं कि अमुक व्यक्तियों ने अनीति का मार्ग अपनाया और जल्दी बहुत लाभ कमा लिया; फिर हम भी ऐसा ही क्यों न करें?

आरंभ ही नहीं अंत भी देखें

आरंभिक लाभ को ही सब कुछ समझने वाले लोग मछली, चिड़ियों और पगडंडी पर दौड़ पड़ने वाले लोगों की तरह दूसरों की अपेक्षा अपने को अधिक बुद्धिमान मानते हैं और अपनी चतुरता पर गर्व भी करते हैं, पर जल्दी ही यह स्पष्ट हो जाता है कि जैसा सोचा गया था; वस्तुतः वैसी बात नहीं है। पाप का दुष्परिणाम आज नहीं तो कल सामने आने ही वाला है। पारा खाकर उसे कोई हजम नहीं कर सकता, वह देर−सवेर में शरीर को फोड़कर बाहर ही निकलता है। इसी प्रकार पाप भी कभी पचता नही, हो सकता है कि आज का फल आज न मिले, पर कल तो वह मिलने ही वाला है। इस संसार में अनेकों यातनाओं से ग्रसित व्यक्ति देखे जाते हैं। यदि उन पर ध्यान दिया जाए तो सहज ही जाना जा सकता है कि व्यथा और असफलता भी यहाँ कम नहीं है। कुमार्ग पर चलते हुए सामयिक सफलता भी सदा ही मिलती रहे, ऐसी कोई बात नहीं, दंड का भी यहाँ समुचित विधि−विधान मौजूद है।

प्रतिफल से छुटकारा नहीं

अस्पतालों में ध्यानपूर्वक निरीक्षण करें तो वहाँ कराहते हुए, चिंतित, दुखी और पीड़ित मनुष्यों की भारी संख्या पीड़ा से छटपटाती हुई मिलेगी। यह सभी करुणा के पात्र हैं और उनके प्रति शुभकामना तथा सहायता की बुद्धि ही रखना हमारे लिए उचित है। पर विवेचना की दृष्टि से देखा जाए तो उनमें से अगणित ऐसे मिलेंगे, जिन्होंने मर्यादाओं का उल्लंघन किया था, किसी भी प्रकार जल्दी— क्षणिक लाभ प्राप्त करने की बात सोची थी। स्वास्थ्य और संयम की मर्यादाओं का उल्लंघन किये बिना बीमार पड़ना कदाचित ही कभी होता है। सृष्टि के कोई जीव प्रकृति की मर्यादाओं का पालन करते रहने के कारण जब बीमार नहीं पड़ते तो मनुष्य को ही क्यों पड़ना चाहिए? बीमारों का घर−घर में बिस्तर हो रहा है, अस्पताल तो बिस्तर के एक नगण्य प्रतीकमात्र हैं। इनका निरीक्षण करके यह आचरण, मर्यादाओं का उल्लंघन किस सीमा तक हमारे लिए हितकर हो सकता है?

जेलखानों में जाकर देखें तो प्रतीत होगा कि एक-से- एक चतुर और उद्दंड व्यक्ति अपनी असफलता की करुण कहानी कह रहे हैं। फाँसी के फंदे अनेकों नृशंसों को उनकी करनी का फल चखा चुके हैं। जेल की कोठरियों की यदि जबान रही होती तो वह एक महापुराण सुनाती और बताती कि बदमाशी का फल तात्कालिक लाभ ही नहीं नारकीय यंत्रणा भी है।

तिरस्कार और प्रताड़ना

समाज में सर्वत्र बरसने वाली घृणा, गुंडापन की एक भारी सजा है। भोजन, वस्त्र, ऐश, आराम, जमीन-जायदाद, भोग−विलास छोटे दरजे की चीजें हैं। समाज का सम्मान इस सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण और आनंददायक है। व्यक्ति गरीब रहकर यदि अपने चरित्र की रक्षा करता हुआ, श्रद्धा और सम्मान का अनुकरणीय आदर्श जीवन व्यतीत करे तो उसे अपेक्षाकृत अधिक आनंद मिलेगा। जिसके ऊपर सर्वत्र घृणा बरसती है, जिसे गुंडा, उद्दंड, पापी और कुकर्मी माना जाता है, वह कितनी ही कमाई कर ले, कितना ऐशो-आराम कर ले, एक निकृष्ट, पतित और क्षुद्र व्यक्ति की तरह सदा नीची आँखें ही किए रहेगा। उसके लिए किसी स्वजन-परिजन की आँखों में सच्ची श्रद्धा और सच्ची सहानुभूति की एक बूँद भी न मिलेगी। ऐसा अतृप्त और असफल जीवन लेकर भी अनीतिमान व्यक्ति यदि अपने को सफल और बुद्धिमान माने तो यह उनकी नासमझी ही कही जाएगी।

सबसे बड़ा दंड आत्मप्रताड़ना का है। अनीति के मार्ग पर चलने वाले को उसकी अंतरात्मा निरंतर धिक्कारती रहती है। मानव जीवन सत्कर्मों द्वारा स्वयं शांति पाने और दूसरों को सुख देने के लिए मिला है। इसी में उसकी सफलता भी है; पर यदि उसके द्वारा दूसरों का अहित होता है और अपने को आत्मप्रताड़ना की अशांति भोगनी पड़ती है तो यही कहना होगा कि नर तन प्राप्त होने का एक अमूल्य अवसर व्यर्थ ही हाथ से चला गया।

क्षुद्रता और पतन का घृणित मार्ग

संसार का इतिहास साक्षी है कि सन्मार्ग को छोड़कर जिसने कुमार्ग को अपनाया है, नीति को परित्यागकर अनीति को पसंद किया है, वह सदा क्षुद्र, पतित और घृणित ही रहा है। उसके द्वारा इस संसार में शोक-संताप, क्लेश और द्वेष ही बढ़ा है। शूल हूलते रहने वाले काँटे तो यहाँ पहले से ही बहुत थे। अपना जीवन भी यदि उन्हीं पतितों की संख्या बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ तो इसमें क्या भलाई हुई, क्या समझदारी रही? तृष्णा और वासना की क्षणिक पूर्ति करके यदि आत्मप्रताड़ना का, नारकीय यंत्रणा का, लोकमत की लानत का अभिशाप पाया तो इनमें क्या अच्छाई समझी गई?

अनीति का मार्ग असफलता की कँटीली झाड़ियों में फँसाकर हमारे जीवनोद्देश्य को ही नष्ट कर देता है। हम पगडंडियों पर न चलें। राजमार्ग को ही अपनाएँ। देर में सही, थोड़ी सही, पर जो सफलता मिलेगी, वह स्थायी भी होगी और शांतिदायक भी। पाप का प्रलोभन आरंभ में ही मधुर लगता है, पर अंत तो उसका हलाहल की भाँति कटु है। साँप और बिच्छू दूर से देखने में सुंदर लगते हैं, पर उनका दंशन प्राणघातक वेदना ही प्रदान करता है। पाप भी लगभग ऐसा ही है, वह भले ही सुंदर दिखे, लाभदायक प्रतीत हो; पर अंततः वह अनर्थ ही सिद्ध होगा। जीवन जीने की कला का एक महत्त्वपूर्ण आधार यह है कि पाप के प्रलोभनों से बचें और सन्मार्ग के राजपथ का कभी परित्याग न करें।


मानव जीवन एक अलभ्य अवसर

मानव जीवन भगवान का सबसे बड़ा वरदान है। परमात्मा, आत्मा को इस संसार-क्षेत्र में जो बड़े-से-बड़ा उपहार दे सकता है, वह है मानव जन्म। यह इतना बड़ा सौभाग्य है कि इसके लिए देवता भी तरसते हैं, देवताओं को स्वर्गलोक में केवल सुख ही प्राप्त है। वे केवल अपने पूर्वसंचित शुभकर्मों का सत्परिणाममात्र ही भोगते हैं, नए कर्म करने का अवसर उन्हें नहीं है। देवलोक में देवता लोग कोई और पुण्यसंचय करना चाहें तो नहीं कर सकते, क्योंकि वहाँ कोई पीड़ित-परेशान नहीं है, जिसकी सेवा-सहायता करके पुण्य-लाभ किया जा सके। ऐसी दशा में पुण्य क्षीण होने पर वे पुनः धरती पर आ जाते हैं। देव योनि को भी भोग योनि माना गया है। पशु−पक्षियों, कृमि-कीटों को इसलिए भोग योनि मानते हैं कि वे पूर्वसंचित अशुभ कर्मों का फल भोगते हैं और देव योनि इसलिए है कि उन्हें शुभ कर्मों का सुख परिणाम भोगते रहने के लिए एक विशेष स्थिति में भेज दिया गया है। इस दृष्टि से पशुओं और देवताओं की योनियाँ भोग योनियाँ ही ठहरती हैं, भले ही उनमें सुख और दुःख प्राप्ति की भिन्नता रहती हो।

मनुष्य योनि इन दोनों से श्रेष्ठ है, क्योंकि उसमें कर्म करने की भी सुविधा प्राप्त है और सुख-दुःख दोनों ही स्वादों को चखने का परिपूर्ण अवसर प्राप्त है। केवल मिठाई-ही-मिठाई सदा खाने को मिले तो फिर उसमें कोई आनंद न रहेगा। इसी प्रकार यदि नमक निरंतर मिले तो उससे भी अरुचि हो जाएगी। नमक से मिठाई का और मिठाई से नमक का महत्त्व बढ़ता है। रात से दिन की उपयोगिता को समझा जा सकता है। यदि सदा दिन-ही-दिन रहे या रात-ही-रात रहे तो समय काटना कठिन हो जाए। इसी प्रकार सुख और दुःख की बात भी है। सदा सुख ही भोगना पड़े तो वह जीवन भी नीरस हो जाएगा और सदा दुःख की स्थिति भी असहनीय हो जाती है। दुःख और सुख दोनों का ही निरंतर रहना उदासीनता का कारण बन जाता है।

मनुष्य योनि में दोनों ही स्थितियाँ प्राप्त करते रहने की धूप−छाँह उपलब्ध होती है, यहाँ सरदी−गरमी दोनों का मिर्च-मिठाई की तरह दो प्रकार का, एकदूसरे का पूरक सहायक— स्वाद उपलब्ध होता है और इच्छानुकूल भले−बुरे कर्म करके अपना भविष्य उज्ज्वल अथवा अंधकारमय बनाने की पूर्ण सुविधा प्राप्त है। स्वतंत्रता को सबसे बड़ा सुख माना गया है। 'सुख जग में स्वाधीन' की उक्ति प्रसिद्ध है। मनुष्य योनि में कर्म करने की जो स्वतंत्रता प्राप्त है, इसके लिए जो बुद्धिबल, अंतःकरण तथा अवसर मिला हुआ है, वह अन्य योनियों में कहाँ है?

पशुओं को बलपूर्वक काम में जोतकर उनसे कोई, कुछ लाभ भले ही प्राप्त कर ले, पर उनमें स्वयं किसी का उपकार करने की सद्भावना कहाँ होती है? उस भावना के अभाव में उनके द्वारा जो कर्म मनुष्य के लाभ के लिए किए जाते हैं, वे पुण्यरूप नहीं बनते। कोई जीव दूसरों के लिए अपना शरीर दान करे तो उसका बड़ा पुण्य माना जाएगा, पर किसी का जबरदस्ती कत्ल हो जाए तो वह आत्मदानी थोड़े ही कहलावेगा। दधीचि ने देवताओं को इंद्रवज्र बनाने के लिए अपनी अस्थियाँ दान की, शिवि ने कबूतर के बदले बाज को अपना माँस तोलकर दिया, दलीप ने ऋषि की गाय के बदले में अपना शरीर सिंह को सौंप दिया, घर आए भूखे बहेलिये के लिए कपोत-कपोती ने अपना शरीर सौंप दिया, तो उनकी गाथाएँ इतिहास के पृष्ठों में अंकित हैं और वे पुण्यफल के भागी भी हुए, पर सिंह, व्याघ्र, सर्प, डाकू, हत्यारे अनेकों का वध करते रहते हैं। जिनका वध किया गया है, उन्हें कोई पुण्य थोड़े ही मिलता है? इसी प्रकार पशुओं से बलात् दूसरों ने कुछ लाभ उठा लिया तो उसमें उन्हें कोई सद्गति का अधिकार थोड़े ही मिला। कारण यही है कि उनमें भावना-बुद्धि का अभाव होने से सेवाकर्म करते हुए भी पुण्यफल से वंचित रहना पड़ता है। देव योनि में तो सेवा का अवसर ही नहीं रहता। कहते हैं कि वे राजा-रईसों की तरह मखमली कालीनों पर पड़े ऐश-आराम करते रहते हैं। जहाँ कोई समस्याएँ ही नहीं होंगी, वहाँ सुलझाने और विकास करने का अवसर ही कहाँ मिलेगा? और जहाँ कोई दुखी-दरिद्र ही नहीं है, वहाँ सेवा का अवसर किसे प्राप्त होगा? इस प्रकार सुखी होते हुए भी उनका जीवन एकांगी रहता है।

केवल मनुष्य योनि में उभयपक्षीय सुविधाएँ प्राप्त हैं। वह चाहे शुभ करे, चाहे अशुभ। भावना की चेतना उसे परिपूर्ण मात्रा में प्राप्त है, उसी के आधार पर ही तो कर्मों की अच्छाई और बुराई आँकी जाती है और उसी के अनुरूप पुण्य-पाप का हिसाब गिना जाता है, जिनमें इस प्रकार की भावचेतना ही नहीं, उन निम्न श्रेणी के जीवों को पुण्य-लाभ कैसे मिलेगा? मनुष्य बड़ा सौभाग्यशाली है कि उसे भावनातत्त्व मिला है, ऐसे लोक में जन्मा है, जहाँ दुखी और पिछड़े हुए भी कम नहीं हैं, जिनकी सेवा करके उसे पुण्य-लाभ करने की चाह जितनी सुविधा प्राप्त है। सुख और दुख दोनों के ही ताने-बाने से मानव जीवन बुना होने के कारण उसे दुःखों से बचने और सुखों को बढ़ाने के लिए प्रयत्न करते हुए आत्मिक चेतना को बढ़ाने और इस बढ़ोत्तरी के द्वारा उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचने का अवसर मिलता है, यह दूसरी योनियों में कहाँ उपलब्ध है?

मानव प्राणी को जो सुविधाएँ प्राप्त हैं, वे पशु-पक्षियों की दृष्टि से इतनी ही बढ़ी−चढ़ी है, जितनी मनुष्य अपनी अपेक्षा स्वर्गलोकनिवासी देवताओं की सुविधाओं को बढ़ा−चढ़ा मानता है। वाणी के अभाव में दूसरे जीवों को अपनी अभिव्यक्तियाँ भीतर ही दबाए रहना पड़ता है,वे अपनी मनोभावनाएँ दूसरों पर प्रकट नहीं कर सकते हैं। पशुओं को वह बुद्धि भी प्राप्त नहीं है, जिससे वे अपने श्रम की तुलना में आवश्यक सुविधाएँ प्राप्त कर सकें। पूरे दिन परिश्रम करके वे केवल पेट भरनेमात्र का लाभ कर पाते हैं। आत्मरक्षा के लिए भी तो बेचारों के पास साधन नहीं है। कसाईखानों में रोज ही गाजर−मूली की तरह लाखों की संख्या में कट जाते हैं। पेट भरने और जीवन भर में दस-पाँच बार कामसेवन करने की क्षणिक तृप्ति के अतिरिक्त इनके संतोष का और क्या साधन है? उनकी तुलना में बोलने, गाने, लिखने, पढ़ने, स्वादिष्ट प्रकार के भोजन खाने, मकान, पलंग, स्त्री, पुत्र, कुटुंब, मनोरंजन आदि के जो विपुल साधन प्राप्त हैं, उन्हें देखते हुए यही कहा जाएगा कि अन्य जीवों की तुलना में इस धरती पर ही इतना सुख प्राप्त है जो यदि उन्हें मिल जाए तो वे स्वर्गप्राप्ति का ही अनुभव करें और यदि मनुष्य से उसका शरीर छीनकर किसी निम्न योनियों में डाल दिया जाए और साथ ही विवेक-बुद्धि भी जागृत रहे तो वह उस स्थिति में घबराकर आत्महत्या ही कर डालने पर उतारू हो जाएगा। अन्य जीवों के संतोष की बात इतनी ही है कि उन्हें बुद्धि न होने से असंतोष भी नहीं होता है और जैसी भी कुछ स्थिति प्राप्त है, उसी में वे अपना काम चलाते रहते हैं।

परमात्मा का जीव के लिए सबसे बड़ा उपहार मनुष्य शरीर है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद यह एक अवसर उसे अपनी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का परिचय देने के लिए ही मिलता है। साल भर पढ़ने वाले विद्यार्थियों को एक सप्ताह परीक्षा देनी पड़ती है और यह सिद्ध करना पड़ता है कि उनने पढ़ाई में उचित श्रम किया है। यह प्रमाणित कर देने पर उन्हें उत्तीर्ण होने का सम्मान मिलता और साथ ही उसका लाभ भी, किंतु जो छात्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं, उनके बारे में यही माना जाता है कि इनने उचित श्रम नहीं किया और दंडस्वरूप उन्हें पुनः उसी पुरानी कक्षा में एक वर्ष तक पड़े रहने दिया जाता है।

चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करके जीव को अपने को सुधारने और सन्मार्गगामी बनने की शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है। वह पढ़ाई पूरी होने पर मनुष्य शरीर का एक अलभ्य अवसर परीक्षाकाल जैसा मिलता है, उसमें उसे यह सिद्ध करना पड़ता है कि उसने कितनी आत्मिक प्रगति की, अपने को कितना सुधारा, दृष्टिकोण कितना परिमार्जित किया और उत्कृष्ट भूमिका की ओर कितनी यात्रा पूरी की गई? मानव जीवन का प्रत्येक दिन एक−एक प्रश्नपत्र है। इसमें जो समस्याएँ सामने आती हैं, वे ही प्रश्नपत्र हैं। इन प्रश्नों को किस भावना से, किस दृष्टिकोण से हल किया जा रहा है, हमारा परीक्षक उसे बहुत ही बारीकी से जाँचता है। यदि हमारा दृष्टिकोण पशुओं जैसा ही स्वार्थपरता और तृष्णा-वासना की क्षुद्रता से परिपूर्ण रहा, तब तो अनुत्तीर्ण होकर फिर चौरासी लाख योनियों की कक्षा में पड़े रहना होता है। यदि जीवनचर्या आदर्श रही और आचार−विचार की दृष्टि से अपनी उत्कर्षता सिद्ध हुई तो पूर्णता और परमानंद का प्रमाणपत्र परीक्षा में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण हुए छात्रों की तरह मनुष्य को भी मिलता है।

आए दिन की छोटी−मोटी असुविधाओं को हमें हलकी दृष्टि से देखना चाहिए। वे तुच्छ, नगण्य और महत्त्वहीन होती हैं, उनमें उलझने और बहुत महत्त्व देने से जीवन का मूल लक्ष्य दृष्टि से ओझल हो जाता है; इसलिए उचित यही है कि हम मानव जीवनरूप में प्राप्त हुए ईश्वरीय विशेष वरदान का महत्त्व समझें और इसे सार्थक बनाने में तत्परतापूर्वक कटिबद्ध हों।


कर्म पर भावना का प्रभाव

यों कर्म के बाह्यरूप को देखकर भी उसके भले-बुरे होने का अनुमान लगाया जाता है, पर उसकी वास्तविक कसौटी कर्त्ता की भावना ही रहती है। आमतौर से सद्भावना की प्रेरणा से जो कर्म किए जाते हैं, वे शुभ, सराहनीय और नैतिक ही होते हैं, पर कभी−कभी बाहर से भर्त्सनायोग्य दिखने वाले कुछ कार्य ऐसे भी होते हैं, जो सद्भावनापूर्वक किए गए होते हैं। ऐसी दशा में आध्यात्मिक दृष्टि से उन्हें शुभ ही माना जाएगा और उनका परिणाम भी कर्त्ता को शुभ ही मिलेगा, भले ही लौकिक दृष्टि से उन्हें निंदनीय कहा जाए।

बाह्यस्वरूप वास्तविक नहीं

लौकिक दृष्टि से कर्म के बाह्यस्वरूप को ही महत्त्व दिया जाता है, क्योंकि व्यक्ति की भावना का प्रमाण उसी से तो मिलता है। भीतर की बात कर्त्ता या उसका भगवान ही समझता है। लोगों को तो किसी की मनोवृत्ति का परिचय उसकी बाह्य गतिविधियों से ही मिलता है, इसलिए मोटी कसौटी कर्म का स्वरूप ही मानी गई है और उसी के आधार पर निंदा-प्रशंसा भी होती है। राजदंड और लोकमत भी उसी आधार पर कर्म के भले−बुरे होने का निष्कर्ष निकालते हैं। काम चलाने की दृष्टि से यह व्यवस्था ठीक भी है, पर वास्तविकता को जानना हो तो कर्त्ता की भावना को ही महत्त्व देना पड़ेगा।

गेरुआ वस्त्रधारी, कमंडल-चिमटा लिए, जटाजूट, भस्म, त्रिपुंड से सुसज्जित व्यक्ति को आमतौर से संत महात्मा माना जाता है और लोग उसका आदर-सम्मान भी करते हैं। वेशभूषा को देखकर उसके त्यागी, भगवतभक्त और परमार्थप्रिय होने की मान्यता बनती है, पर ऐसा भी हो सकता है कि किसी चोर-डाकू ने अपनी वास्तविकता छिपाए रखने और आसानी से अपना दुष्कर्म करते रह सकने की दृष्टि से आवरण बनाया हो। इस प्रकार की प्रवंचना से लोग धोखा खा सकते हैं, पर कर्त्ता के लिए तो वह दुहरा पाप ही हो जाएगा। चोरी के साथ-साथ धोखेबाजी का दुहरा पुट लग जाने से साधारण चोर की अपेक्षा उस ठग-चोर का अपराध दूना हो गया। उसका दूना पतन होगा। दूना नरक मिलेगा।

टट्टी की ओट शिकार

अन्य कर्म भी ऐसे हो सकते हैं जो बाहर से अच्छे दिखाई पड़ें, पर उनके पीछे कर्त्ता की दुरभिसंधि छिपी हो। शुभकार्यों की आड़ में अशुभ कर्म होते हुए भी आए दिन देखने को मिलते हैं। गौशाला, विधवाश्रम, अनाथालय जैसी संस्थाएँ बाहर से सदुद्देश्य को लेकर खोली गई प्रतीत होती हैं, पर कई बार उनके भीतरी घोटाले ऐसे रूप में सामने आते हैं, जिनसे उनके पीछे स्वार्थ-साधन का व्यापार छिपा मालूम होता है।

धर्म-पुण्य की बात दूसरों से कहकर स्वयं मुफ्त का माल लूटने वाले धर्मध्वजी लोगों की धर्मशिक्षा भी ऐसी ही प्रवंचना होती है। उसमें धर्म-प्रेरणा का नहीं, स्वार्थ-साधना का ही उद्देश्य प्रधान रहता है। ऐसी दशा में बाहर से धर्मजीवी दीखते हुए भी वे लोग साधारण जेबकटों की अपेक्षा धर्मबुद्धि का शोषण करने का पाप भी करते हैं और दुहरे अपराधी ठहरते हैं। सामूहिक आयोजनों और संस्थाओं की सेवा-व्यवस्था करने वाले जब टट्टी की ओट शिकार करते है, तो उनका पाप अधिक प्रबल ही माना जाता है। बाहर के लोग जिन्हें वास्तविकता का ज्ञान नहीं है, वे सत्कर्मों में लगे लोगों की प्रशंसा ही करेंगे, आदर ही देंगे, पर कर्त्ता को उसका परिणाम उस दृष्टिकोण के अनुरूप ही मिलेगा, जिससे प्रेरित होकर उसने वह कार्य किया है।

बाहर कठोर, भीतर कोमल

इसी प्रकार बाहर से बुरे दीखने वाले कार्य भी ऐसे हो सकते हैं जो निंदनीय और घृणित दिखाई दें पर सदुद्देश्य से प्रेरित किये जाने के कारण वस्तुतः वे शुभकर्म ही माने जाते हैं और उनमें आत्मा का पतन नहीं, उत्थान ही होता है। डाॅक्टर के आपरेशन करते समय रोगी की चिल्लाहट और वेदना को देखते हुए यह अनुमान होता है कि कोई निर्दयी किसी असहाय पर जुल्म ढा रहा है। समीप जाकर देखने से इस बात की और भी अधिक पुष्टि हो जाती है। एक आदमी चाकू हाथ में लिए है, किसी के शरीर में उसे भोंक रहा है, खून बह रहा है, पीड़ित व्यक्ति मेज पर पड़ा है उसे जकड़ रखा गया है, उसकी कष्ट और चीत्कार पर वह खड़े हुए कंपाउंडर आदि ध्यान नहीं देते। कैसी हृदयहीनता का दृश्य है। देखने वाले अनजान आदमी को यह घोर अत्याचार ही प्रतीत होगा, पर वे जानकार लोग जिन्हें डाॅक्टर के सदुद्देश्य और ऑपरेशन के बाद एक बड़े रोग की मुक्ति का विश्वास है, वे विचलित नहीं होते। उन्हें उस खून-खच्चर, तड़पन, चिल्लाहट, के बीच भी करुणा और सद्भावना का दर्शन होता है और वह डाक्टर भी अपनी आत्मा के सामने सच्चा होने के कारण इतनी चीर-फाड़ करने के बाद भी पुण्यात्मा ही ठहरता है। कर्म का बाह्यस्वरूप नहीं, कर्त्ता की भावना ही तो प्रधान मानी जाती है।

अनैतिकता से नैतिकता

किसी भूखे, पीड़ित या दीन-दुखी की सहायता के उद्देश्य से कोई बालक घर से रोटी या कपड़ा चुराकर ले जाता है और उसे दुखियों को दे आता है। घरवालों की प्रकृति का ज्ञान होने के कारण उसे यह आशा नहीं है कि उस भरे-पूरे घर में से दीन-दुखियों के लिए माँगने पर भी कुछ मिल सकेगा, ऐसी दशा में वह चोरी करना ही उचित समझता है। बात खुलती है; घरवाले उसकी भर्त्सना करते हैं, चोरी का अपराध लगाकर ताड़ना देते हैं। बाहरी दृष्टि से बालक का वह कार्य चोरी ही गिना जा सकता है; पर वस्तुतः उसकी आत्मा ने जिन परिस्थितियों में उसे चोरी करने की आज्ञा दी, वे ऐसी ही थीं कि बालक अपराधी नहीं ठहरता।

कर्म के बाहरी और भीतरी स्वरूप में अंतर अथवा प्रतिकूलता होने पर लोग तो बाहरी बात को ही महत्त्व देंगे। जो कार्य अनैतिक दीखेंगे, उनकी भर्त्सना भी करेंगे और दंड भी मिलेगा। उतना होते हुए भी आंतरिक भावना की ही प्रमुखता रहेगी। नैतिक उद्देश्यों के लिए अनैतिक कार्य भी शुभ ही माने जाते हैं। अच्छा तो यही है कि भीतर-बाहर की परिस्थितियाँ एक-सी रहें। भीतर भी सदुद्देश्य हो और बाहर भी प्रियदर्शी कार्य बनें, पर यदि कारणवश कभी ऐसा सामंजस्य न भी हो पावे, प्रतिकूलता ही दीखे तो आत्मिक उद्देश्य ही प्रधान रहेंगे, उन्हीं के आधार पर कर्त्ता को पापी या पुण्यात्मा ठहराया जाएगा।

पाप−पुण्य का मूल आधार

दैनिक जीवन में हम जो कुछ करते हैं, उनमें से कुछ कार्य पाप, कुछ पुण्य, कुछ साधारण क्रियाकलाप दिखाई देते हैं। अनुमान यही होता है कि जो शुभकर्म बने हैं उनका पुण्यफल मिलेगा। जो पाप किए हैं, उनका नरक मिलेगा और जो नित्यकर्म, जैसे जीवन यात्रा के साधारण कर्म हैं, वे व्यर्थ— निरर्थक माने जावेंगे; पर वस्तुस्थिति ऐसी नहीं है। हमारा दृष्टिकोण जिंदगी जीने के संबंध में जैसा भी कुछ रहा होगा, उसी के आधार पर उन कर्मों की गणना होगी और वैसा ही शुभ−अशुभ फल मिलेगा।

गृहस्थ का पालन करते समय हम ऐसा सोचें कि भगवान ने माली की तरह एक छोटा उपवन उगाने और उसे फलने-फूलनेयोग्य बनाने का उत्तरदायित्व सौंपा है और उसे पूरी ईमानदारी तथा सद्भावना से देखने पर अपने स्त्री−बच्चे हमें भगवान के बगीचे के एक सुरभित वृक्ष लगेंगे और उनकी सेवा करते हुए उस बगीचे के मालिक परमात्मा की प्रसन्नता की आशा बँधेगी। यदि वे लोग अपने अनुकूल नहीं भी बन पाते, अपनी सेवा-सहायता नहीं भी करते, तो भी कोई दुःख न होगा। अपना कर्त्तव्यपालन करते रहने में कभी त्रुटि करने की इच्छा न होगी। माली अपने मालिक के हर पौधे को सींचता है। कँटीली झाड़ियों वाले नींबू और मधुर फल वाले आम के झाड़ों में से किसी के प्रति भी उसे रोष या मोह नहीं होता, मालिक ने जिस प्रकृति के भी पेड़ सींचने को दे दिए उन्हें ही तो उसे बढ़ाना-बनाना है। गृहस्थ में सब कोई अपनी मनमरजी के नहीं होते, उनमें कुछ अनुपयुक्त स्वभाव के भी होते हैं। ऐसी दशा में कर्त्तव्य-बुद्धि से— ईश्वर का बगीचा सींचने वाले माली की तरह जो अपने परिवार का पालन करता है, उसका कार्य ईश्वरभक्ति और देवालय की पूजा करते रहने वाले पुजारी की धर्मचर्या से किसी भी प्रकार कम श्रेष्ठ नहीं ठहरता।

स्वार्थपरता के भवबंधन

कर्म तब बंधन रूप होता है, जब वह स्वार्थबुद्धि से, फल की आशा से और अहंकार की पूर्ति के लिए किया जाता है। तभी ऐसी स्थिति आती है कि इच्छित परिणाम न मिलने पर क्षोभ और दुःख उपजे। इस दृष्टिकोण से यदि जिंदगी जीने का क्रम बना है तो अपनी मरजी से विरुद्ध जो कुछ भी हो रहा होगा, उस सबसे अशांति एवं उद्विग्नता उठेगी। स्त्री-बच्चे यदि अपने इच्छानुगामी नहीं बनते तो उन पर रोष आवेगा और उनकी सेवा बंद कर देने की इच्छा उत्पन्न होगी। सुंदर और सेवाभावी स्त्री में अनुरक्त होना और फूहड़, कर्कश के प्रति कुपित रहना स्वार्थबुद्धि का ही प्रतिफल है। स्वार्थ का परत जितनी ही मोटी होगी, उतने ही हमारे भवबंधन मजबूती से बँधते चले जावेंगे; पर यदि हमारा प्रत्येक कार्य परमार्थबुद्धि से, उच्च दृष्टिकोण से किया जा रहा हो तो साधारण दीखने वाले कार्य भी पुण्यफलदायक, मुक्ति की ओर ले जाने वाले सिद्ध होंगे।

जीवन का प्रत्येक कार्य हम उच्च आदर्शों की पूर्ति की दृष्टि रखकर करें। सबसे बड़ा स्वार्थ-परमार्थ— जीवनोद्देश्य की पूर्ति को ही मानें। आजीविका कमाने से लेकर नित्यकर्म करने तक में हम ईश्वर के सौंपे उत्तरदायित्वों को एक ईमानदार सेवक की तरह पूरा करते रहने का ध्यान रखें तो वह भावना ही हमारे साधारण दिखने वाले कार्यों को भी पुण्य-परमार्थ बना देगी और उनका परिणाम लोक और परलोक दोनों में कल्याणकारक ही होगा।

भावनाओं का परिष्कार

हमें अपनी भावना का परिष्कार करना चाहिए। संकीर्णता और स्वार्थपरता जब तक कायम है, तब तक श्रेष्ठ काम करते हुए भी उनमें से कोई स्वार्थ-साधन करने की इच्छा बनी रहेगी और फिर चाहे वह इच्छा पूर्ण भी न हो पावे, पर उस दुर्भावना के आधार पर वह सत्कर्म भी पापरूप ही प्रस्तुत होंगे। जब अवसर मिलेगा, तब स्वार्थपरता प्रबल होकर दुष्कर्म करा भी लेगी; किन्तु यदि अपना दृष्टिकोण उच्च है, प्रत्येक कार्य कर्त्तव्यपालन की धर्मबुद्धि से किया जा रहा है तो साधारण श्रेणी का जीवनयापन करते हुए अपना गृहस्थपालन भी तप−साधना और योगाभ्यास की तरह सत्कर्म सिद्ध होगा और उसी में जीवनोद्देश्य के पथ पर भारी प्रगति होती चली जाएगी।

इस संसार में भावना ही प्रधान है। कर्म का भला-बुरा रूप उसी के आधार पर बंधनकारक और मुक्तिदायक बनता है। सद्भावना से प्रेरित कर्म सदा शुभ और श्रेष्ठ ही होते हैं, पर कदाचित व अनुपयुक्त भी बन पड़े तो भी लोकदृष्टि से हेय ठहरते हुए वे आत्मिक दृष्टि से उत्कृष्ट ही सिद्ध होंगे। आंतरिक उत्कृष्टता, सदाशयता, उच्चभावना और कर्त्तव्य-बुद्धि रखकर हम साधारण जीवन व्यतीत करते हुए भी महान बनते हैं और इसी से हमारी लक्ष्यपूर्ति सरल बनती है।


बड़प्पन की बात सोचें, बड़े काम करें

जीव— अणु से विभु, लघु से महान, आत्मा से परमात्मा और नर से नारायण बनने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है। यह आकांक्षा अपूर्णता को हटाते हुए पूर्णता प्राप्त करने के उद्देश्य से है। उसे ही बड़प्पन प्राप्त करने की आकांक्षा कहते हैं। बड़ा बनने की, विकसित होने की, प्रगति करने की अभिलाषा से प्रेरित होकर जीव विविध-विधि प्रयत्न करता रहता है। शारीरिक क्षुधाओं की पूर्ति के अतिरिक्त मनुष्य की शेष सभी क्रियाएँ प्रायः महत्त्व को उपलब्ध करने के उद्देश्य से ही होती हैं।

उचित और उत्तम आकांक्षा

बड़प्पन की इच्छा सबको होती है, पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि उसे कैसे प्राप्त किया जाए। जो जानते हैं, वे उस ज्ञान को आचरण में लाने का साहस नहीं करते। आमतौर से यह सोचा जाता है कि जिसका ठाठ−बाट जितना बड़ा है, वह उसी अनुपात से बड़ा माना जाएगा। मोटर, बंगला, सोना, जायदाद, कारोबार, सत्ता, पद आदि के अनुसार किसी को बड़ा मानने का रिवाज चल पड़ा है। इससे प्रतीत होता है कि लोग मनुष्य के व्यक्तित्त्व को नहीं, उसकी दौलत को बड़ा मानते हैं। यदि ऐसा ही है तो पहाड़ों को बड़ा माना जाना चाहिए, जिनके पास किसी बड़े जमींदार से अधिक जमीन और किसी बड़े किले से अधिक पत्थर होता है। धातुओं की खानें भी बहुत मूल्यवान होती हैं, फिर उन्हें ही महान क्यों न मान लिया जाए?

यह दृष्टिदोष ही है कि बड़प्पन को लोग दौलत में खोजते हैं । पैसा तो कोई चोर-बेईमान भी इकट्ठा कर सकता है। उत्तराधिकार में बाप−दादों की बहुत बड़ी संपत्ति किसी मूर्ख व्यक्ति को भी मिल सकती है। गुणों के अभाव में भी किसी को धन-संपत्ति के आधार पर बड़प्पन की मान्यता का होना एक बड़ा गलत दृष्टिकोण है। इस मान्यता को जनमानस में स्थान मिल जाने से लोग किसी भी मूल्य पर धनी बनना चाहते हैं और जिनके पास धन नहीं है, वे भी बड़प्पन के प्रमाणस्वरूप ठाठ बनाने में इतना खरच करते हैं कि उनकी आर्थिक कमर ही टूट जाती है। कर्ज, तंगी और परेशानी से वे निरंतर घिरे रहते हैं।

अपव्यय और ठाठ−बाट की बालबुद्धि

विवाह-शादियों में, दावतों में, फैशन बनाने में, ठाठ−बाट जोड़ने में जो अंधाधुंध खरच किया जाता है, उसकी व्यर्थता को समझते हुए भी लोग करते इसलिए हैं कि दूसरों की आँखों में अपनी अमीरी सिद्ध हो जाए। जब अमीरी को ही बड़प्पन का चिह्न मान लिया गया तो स्वभावतः उसकी प्राप्ति के लिए हर किसी की लालसा लगी रहना स्वाभाविक है। इस लालसा के कारण खरच बढ़ता है, फिर उसकी पूर्ति की चिंता बढ़ती है। कमाई के जितने साधन बढ़ते जाते हैं, खरच का अनुपात उससे अधिक बढ़ता जाता है। सुरसा के मुँह की तरह इसकी पूर्ति होती ही नहीं। चिंतित और परेशान रहने वाला व्यक्ति बड़प्पन तो क्या प्राप्त करेगा, गाँठ की अपनी शाँति और हँसी−खुशी भी खो बैठता है।

कर्ज के बोझ से लदे हुए, व्यक्तियों में से अधिकांश ऐसे लोग होते हैं, जिसने अपना खरच अंधाधुंध बढ़ाया है। इस बड़े खरच से उनके शरीर, मन, आत्मा तथा परिजनों के विकास में बहुत थोड़ा लगा होता है, शेष तो शान−शौकत के कामों में ही बर्बाद हुआ होता है। कीमती पोशाक और सोने-चाँदी के जेवर इसलिए ही तो पहने जाते हैं कि उन्हें देखकर लोग अपने बड़प्पन का अनुमान लगा सकें। यह बचपन जैसी नासमझी की बातें हैं।

अमीरी और बड़प्पन का अंतर

धनी होना कोई बुरी बात नहीं है, उससे कई सुविधाएँ मिलती हैं और प्रसन्नता देने वाली परिस्थितियाँ भी प्राप्त होती हैं, उसका कोई विरोध नहीं किया जा रहा है और न उपार्जन करने से किसी को रोका जा रहा है। इन पंक्तियों में हमारा उद्देश्य यह कहने का है कि ठाठ−बाट से अमीरी सिद्ध हो सकती है, बड़प्पन प्रमाणित नहीं किया जा सकता। बड़प्पन व्यक्तित्व से संबंधित है : गरीब घरों में उत्पन्न हुए लोग भी बड़े होते हैं। धन का अभाव किसी की महत्ता को कुंठित नहीं कर सकता। संत-महात्मा तो स्वेच्छापूर्वक गरीबी का जीवन निर्वाह करते हैं, क्या उन्हें तुच्छ समझा जाएगा?

उदारता और दूरदर्शिता का ही दूसरा नाम बड़प्पन है। जो जितना उदार है, वह उतना ही बड़ा माना जाएगा। जिसकी भावना आकांक्षा और विचारधारा ऊँची होगी, जो आदर्शवाद के प्रति जितनी ही आस्था रखता होगा, उसकी कृतियाँ श्रेष्ठ पुरुषों जैसी होंगी। सज्जन व्यक्ति ऊँचे स्तर की बात सोचते और ऊँचे काम करते हैं। जिससे मानवता कलंकित होती हो, जिससे व्यक्तित्व का मूल्य घटता हो, ऐसे काम वे कितना ही कष्ट आने या दूसरों के द्वारा कितने ही परेशान किए जाने पर भी करने को तैयार नहीं होते। यों सुविधा के समय हर कोई बड़ी−बड़ी आदर्श की बातें कर सकता है, पर परीक्षा की घड़ी आने पर ही यह पता चलता है कि कौन उदार और कौन अनुदार है, कौन छोटा और कौन बड़ा है।

भय, रोष और प्रलोभन का अवसर आने पर जो श्रेष्ठता टिक न सके, उसे अवास्तविक और दिखावटी ही माना जाएगा। छोटे बच्चे छोटी चीजें चाहते हैं और उनके मिलने पर प्रसन्न हो जाते हैं। जिनका अंतःकरण छोटा है, वे भी एक प्रकार के बच्चे ही हैं, उनकी आकांक्षा तुच्छ और नश्वर वस्तुओं तक सीमित बनी रहती है। तृष्णा-वासना में ही उनकी इच्छा लिपटी रहती है और उन्हीं की प्राप्ति तथा अप्राप्ति में उन्हें सुख−दुःख अनुभव होता रहता है। यह मिट्टी के खिलौने खेलने वाले, बालू के महल बनाने वाले बच्चों जैसा क्रीड़ा−विनोद है। इनसे शरीर की कुछ क्षण के लिए तृप्ति हो सकती है, पर आत्मा का तो कुछ भी भला नहीं होता, अपना भावनास्तर तो जरा भी ऊँचा नहीं उठता।

ऊँचा सोचें, ऊँचा करें

बड़े आदमी ऊँची बात सोचते हैं, ऊँचे काम करते हैं और ऊँची सूझ−बूझ का परिचय देते हैं। दुनियाँ किसी को तब बड़ा मानती है, जब वह औसत दरजे के आदमी से अधिक ऊँचा सिद्ध होता है। जिसका सोचने का तरीका उच्च आदर्शों पर अवलंबित है, जो किसी कार्य में हाथ डालने से पहले, किसी मार्ग पर पैर बढ़ाने से पहले सौ बार यह सोचता है कि एक श्रेष्ठ व्यक्ति के लिए यह उचित है या नहीं, वस्तुतः वही बड़प्पन का अधिकारी है। प्रलोभनों की ओर जो खिंचता रहता है, डर से जो काँपता रहता है, वह तो संसार की क्षुद्रता द्वारा नचाई जाने वाली कठपुतली के समान है। ऐसे लोग बड़प्पन का दावा नहीं कर सकते।

छोटे बच्चे उत्पात करते रहते हैं, कहनी-अनकहनी कहते रहते हैं, पर बड़े न तो उससे उत्तेजित होते हैं और न अपना मन क्षुब्ध करते हैं। लड़कपन में नासमझी ही तो भरी रहती है, ऐसा सोचकर वे मुस्करा भर देते हैं। बच्चे को कुछ कहना होता है तो मीठे-कडुवे शब्दों में कहते भी हैं, पर क्षोभ होने का अवसर नहीं आने देते। बड़े आदमी, जिनका दिल और दिमाग दोनों बड़े हैं, ओछे लोगों की छोटी हरकतों से उद्विग्न नहीं होते। गलती को सुधारने का प्रयत्न करते हुए भी वे अपना मानसिक संतुलन नहीं बिगाड़ते। बड़े आदमी का प्रमुख चिह्न यह है कि वह न घटनाओं से, न व्यक्तियों से, किसी से भी उद्विग्न नहीं होता। धीरज उसके हाथ से कभी छूटता नहीं, शोक-संताप की घड़ियों में भी वह चट्टान की तरह अडिग भाव से अपने स्थान पर अड़ा रहता है।

न द्वेष न दुर्भाव

'जैसे को तैसा' यह नीति अपना लेने पर तो बड़ा भी छोटा हो जाता है। गाली का जबाब गाली से और घूँसे का जबाब घूँसे से देने में कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसा तो पशु भी आपस में लड़कर द्वंदयुद्ध कर लेते हैं। क्षमा और सहनशीलता हर किसी का काम नहीं है, उसे बड़े आदमियों में ही देखा जा सकता है। वे 'नेकी कर कुए में डाल' की नीति अपनाते हैं, किसी के साथ कुछ उपकार किया है तो उसकी चर्चा करना तो दूर, स्मरण भी नहीं करते; पर छोटे आदमी पग−पग पर अपने राई से अहसान को उस पर जताते हैं, जिसके साथ उसने कुछ उपकार किया है। वे इतना तक नहीं जानते कि जितनी बार अहसान जताया जाएगा, उतना ही उसका मूल्य घटता जाएगा और कई बार कह देने के पश्चात तो वह बिलकुल ही समाप्त हो जाएगा।

बड़े आदमी अपने आपको सज्जनता की कसौटी पर निरंतर कसते रहते हैं और जहाँ कहीं जरा−सा भी खोट दिखाई देता है, वहाँ तुरंत सँभलने और सुधरने को तत्पर हो जाते हैं। क्षुद्र व्यक्ति अपनी हर बात को सही सिद्ध करने की कोशिश करते हैं और जो भी खराबी दिखाई पड़ती है, उसका दोष दूसरों पर मढ़ देते हैं, बड़े आदमियों का तरीका इससे भिन्न होता है। वे प्रत्येक कार्य में यह देखते हैं कि मेरा जितना कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व था, वह पूरा किया या नहीं? अपनी गलतियाँ वे स्वयं सोचते और दूसरों से पूछते हैं; पर मूर्ख तो यही सोचता है कि उसमें कोई खोट नहीं, गलतियाँ तो दूसरे ही करते हैं।

विचारशैली और कार्यपद्धति

बड़े आदमी आज की ही नहीं कल की भी सोचते हैं। उन्हें दूरदर्शिता प्रिय होती है। अपना कल्याण किस बात में है? जीवन की सार्थकता किस नीति को अपनाने में है? जो अमूल्य अवसर आज उपलब्ध है, उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग क्या है? वे यही सोचते रहते हैं और इन्हीं प्रेरणाओं के प्रकाश में वे अपना कार्यक्रम निर्धारित करते हैं। दूसरों का शोषण नहीं, उनकी सहायता ही करें, किसी से लेकर नहीं, किसी को देकर ही यहाँ से चलें, यही उनकी आकांक्षा रहती है। बड़े आदमी सादगी अपनाते हैं, नम्र रहते हैं, मधुर बोलते हैं और प्रत्येक कार्य में शिष्टाचार एवं सज्जनता का पुट बनाए रहते हैं । उनकी यह आंतरिक महानता ही दूसरों की आँखों में बड़ा आदमी प्रमाणित करती हैं और इस प्रमाणिकता के आधार पर उन परिस्थितियों को भी प्राप्त कर लेते हैं, जो बड़प्पन की प्रतीक मानी जाती हैं।

बड़प्पन बाहर नहीं, भीतर रहता है। बाहरी ठाठ−बाट से नहीं, दिल और दिमाग को चौड़ा, उदार और दूरदर्शी रखकर ही उसे प्राप्त किया जाता है। हम बड़े बनने का सच्चे अर्थों में प्रयत्न करें तो सचमुच ही वैसे बन सकते हैं।


प्रियदर्शन और छिद्रांवेषण

रात और दिन की तरह, धूप और छाँह की तरह, मिर्च और मिठाई की तरह इस संसार में प्रिय और अप्रिय दोनों ही प्रकार के कारण, पदार्थ तथा व्यक्ति मौजूद हैं। दो तरह के न रहकर वे एक ही प्रकार के हो जाएँ तो संसार की भिन्नता, विचित्रता और शोभा नष्ट हो जाएगी। भिन्नता को हटाकर एकता स्थापित करने के लिए जो प्रयत्न हमें करने पड़ते हैं, फिर उनका कोई कारण न रहेगा। बाधाओं को हटाकर सुविधाएँ उत्पन्न करने के लिए ही तो हमारे सारे प्रयत्न चलते हैं; यदि एक ही स्थिति निरंतर बनी रहने वाली हो तो फिर प्रयत्नों का कोई उद्देश्य ही न रहेगा, ऐसी दशा में यहाँ निष्क्रियता का साम्राज्य छाया रहेगा।

बाहर नहीं, भीतर देखें

संसार की रचना में दोष और ईश्वर की भूल ढूँढने की अपेक्षा, हमें यही सोचना चाहिए कि क्या ऐसा संभव है कि अप्रिय के दुष्प्रभावों से बचा रहा जा सके और प्रिय की प्राप्ति के लाभों से लाभान्वित हुआ जा सके? विचार करने पर प्रतीत होता है कि ऐसी सुविधा भी परमात्मा की इस सृष्टि में मौजूद है। यदि उस सुविधा से लाभ उठाना जान लिया जाए तो ऐसा हो सकता है कि संसार की रचना परस्पर विरोधी, प्रिय और अप्रिय तत्त्वों से हुई होने पर भी हम शांति, संतोष और आनंद का जीवन व्यतीत कर सकें।

यदि हमें सचमुच प्रिय की प्राप्ति और अप्रिय से मुक्ति अभीष्ट हो तो इसके लिए जो एकमात्र मार्ग सुनिश्चित है, उसे ही अपनाना होगा। वह मार्ग है—‛प्रियदर्शन।’ इस संसार में कोई भी व्यक्ति और पदार्थ न तो पूर्णतया बुरा है और न पूर्णतया अच्छा है, हर किसी में कुछ दोष हैं, कुछ गुण। जिस प्रकार हम उसे देखते हैं, उसी तरह का वह दीखने लगता है। विभिन्न स्थान पर खड़े होकर एक ही वस्तु को यदि देखा जाए तो वह अलग−अलग प्रकार की दिखाई देती है। एक फोटोग्राफर अपना कैमरा लेकर किसी इमारत या मनुष्य के आगे-पीछे, दाएँ−बाएँ घूमता है और विभिन्न स्थानों पर खड़े होकर फोटो खींचता है तो वे तैयार हुए चित्र एकदूसरे से सर्वथा भिन्न दीखते हैं, यद्यपि वे एक ही व्यक्ति या वस्तु के होते हैं। सामने से फोटो खींचने पर मनुष्य जैसा दिखाई देगा, पीठ की ओर से खींचा हुआ चित्र उससे पृथक प्रकार का खिंचेगा। एक ही वस्तु अनेक प्रकार की दीखे तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। अलग−अलग कोणों से देखने पर हर वस्तु भिन्नता लिए हुए दीखती है। इसी को दृष्टिकोण कहते हैं। दृष्टिकोण की भिन्नता से इस सारे संसार का स्वरूप ही बदल जाता है।

दृष्टिकोण का अंतर

भागवत में वर्णन आता है कि जिस समय कंस की राजसभा में श्रीकृष्ण जी ने प्रवेश किया, उस समय वहाँ के सभासदों को वे वैसे ही दिखाई पड़े जैसा कि उनके सोचने का ढंग था। किसी को वे योद्धा, किसी को काल, किसी को ब्रह्म, किसी को बालक, किसी को त्राता आदि के रूप में दीखे। इसी प्रकार रामायण में वर्णन आता है कि सीता-स्वयंवर में रामचंद्र जी ने जब प्रवेश किया तो वहाँ उपस्थित लोगों को वे उनके दृष्टिकोण के अनुसार परस्पर विरोधी रूपों में दीखे। इसमें आश्चर्य जैसी कुछ भी बात नहीं है। यह सारा संसार सीता-स्वयंवर की तरह है, यहाँ का हर आदमी, हर वस्तु को अपनी भावना के अनुरूप देखता और उसी से प्रसन्नता तथा अप्रसन्नता अनुभव करता है।

एक ही वस्तु या व्यक्ति को कितने ही प्रकार से देखा जा सकता है। एक मनुष्य उसकी माता की दृष्टि में छोटे बालक, पत्नी की दृष्टि में प्रेमावतार, बच्चों की दृष्टि में वात्सल्यपूर्ण अभिभावक, मित्र की दृष्टि में प्राणप्रिय सहयोगी, शत्रु की दृष्टि में कालनेमि, दुकानदार की दृष्टि में ग्राहक, डाॅक्टर की दृष्टि में रोगी, वकील की दृष्टि में मुवक्किल, अध्यापक की दृष्टि में छात्र दिखाई पड़ता है। मच्छर, जूएँ और खटमल उसे रक्त से भरी एक टंकी समझते हैं। सिंह, व्याघ्र की दृष्टि में तो वह एक अच्छा-खासा स्वादिष्ट भोजन पिंड ही लगेगा। व्यक्ति एक ही है, पर अनेकों को उनकी अपनी दृष्टि के अनुसार वह अनेक प्रकार का दीखता है। इन देखने वालों में से कोई भी भूल नहीं कर रहा है। सचमुच वह व्यक्ति इतनी ही विशेषताओं से युक्त है कि उसे जिस प्रकार समझा और देखा जाता है, वह उन सभी दृष्टिकोणों में ‘फिट’ बैठता है।

जो चाहें सो चुन लें

एक बगीचे में सुगंधित फूल भी खिले होते हैं और जहाँ-तहाँ गंदगी भी पड़ी होती है। भौंरा सुगंध का आनंद प्राप्त करता है, मधुमक्खी शहद चूसती है और गोबर में किलोल करने वाला गुबरीला कीड़ा कहीं पड़ी गन्दगी को ढूँढ लेता और उसी दुर्गंध में लोट-पोटकर अपनी इच्छित स्थिति प्राप्त करता है। लकड़हारा उसमें से सूखी लकड़ी तोड़कर अपना काम चलाता है, पक्षी उसे धर्मशाला समझते हैं, माली के लिए वह निर्वाह का उद्योग-धंधा है, संतों के लिए भजन का स्थान, चोरों को छिपने का आश्रय और भी न जाने वह किसके लिए क्या−क्या है। सभी अपनी−अपनी दृष्टि से उसे देखते हैं और दुःख तथा सुख अनुभव करते हैं।

यह संसार भी ईश्वर का एक सुरम्य उद्यान है। यहाँ जैसी जिसकी दृष्टि हो, वैसा ही मिल जाने के लायक पर्याप्त पदार्थ तथा व्यक्ति मिल जाते हैं। नशेबाज जहाँ कहीं भी जाते हैं, उन्हें अपने साथी मिल जाते हैं। चोर-चोरों को और जुआरी-जुआरियों को ढूँढ लेते हैं। व्यभिचारी और वेश्याएँ एकदूसरे को आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। संत-समागम और सत्संग के प्रेमी अपना प्रिय वातावरण ढूँढ लेते हैं। सज्जनों को सज्जन, कवियों को कवि, साहित्यकारों को साहित्यकार, कलाकारों को कलाकारों के साथ संपर्क बनाने में देर नहीं लगती। मनुष्य में एक ऐसा चुंबकत्व मौजूद है, जिसके अनुसार उसे अपना प्रिय वातावरण तलाश करने और प्राप्त करने में देर नहीं लगती। जैसी अपनी प्रवृत्ति और भावना होती है, उसी के अनुरूप परिस्थितियाँ भी सामने आकर खड़ी हो जाती हैं।

गुण ढूँढें, दोष नहीं

यदि हम सज्जनता ढूँढने निकलें तो सर्वत्र न्यूनाधिक मात्रा में सज्जनता दिखाई देगी। मानवता के श्रेष्ठ गुणों से रहित कोई भी व्यक्ति इस संसार में नहीं है। गुण और अच्छाइयाँ ढूँढने निकलें तो बुरे समझे जाने वाले मनुष्यों में भी अगणित ऐसी अच्छाइयाँ दिखाई देंगी, जिनसे अपना चित्त प्रसन्न हो सके । इसके विपरीत यदि बुराई ढूँढना ही अपना उद्देश्य हो तो श्रेष्ठ, सज्जन और संभ्रांत माने जाने वाले लोगों में भी अनेकों दोष सूझ पड़ सकते हैं और उनकी निंदा करने का अवसर मिल सकता है। सज्जनता तलाश करने की भावना मन में रहने पर जो लोग श्रेष्ठ और प्रिय दिखाई देते हैं, वे ही दोषदर्शी के लिए, छिद्रान्वेषण के लिए दुर्गुणों की खान, निंदनीय और शत्रु प्रतीत होंगे। देखने और सोचने का तरीका बदल जाने से भिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होना स्वाभाविक ही है।

हमें बाह्य व्यक्ति, पदार्थ और कारण बुरे दिखाई पड़ते हैं, पर यह नहीं सूझता कि अपना दृष्टिकोण ही तो कहीं दूषित नहीं है? आत्मनिरीक्षण इस संसार का सबसे कठिन काम है। अपने दोषों को ढूँढ सकना समुद्र के तल में से मोती ढूँढ़ लाने वाले गोतेखोरों के कार्य से भी अधिक दुष्कर है। अपने दोषों को स्वीकार कर सकना, किसी साहसी से ही बन पड़ता है और सुधारने के प्रयत्न को कोई विरला शूरवीर ही करता है। यही कारण है कि हममें से अधिकांश व्यक्ति दोषदर्शी, छिद्रान्वेषी, दृष्टिकोण अपनाए रहते हैं और हर किसी को दोषी, निन्दनीय, घृणित एवं दुर्भावनायुक्त समझते रहते हैं। परिणामस्वरूप सर्वत्र हमें दुष्टता और शत्रुता ही दीखती है; निराशा और व्यथा ही घेरे रहती है।

अपनी दुनियाँ आप बनावें

सारे संसार को अपनी इच्छानुकूल बना लेना कठिन है; क्योंकि यह परमात्मा का बनाया हुआ है और अपनी इस कृति को वही बदल सकता है, पर अपनी निज की दुनियाँ को अपने अनुकूल बदल सकना हममें से हर एक के लिए संभव है। जिस प्रकार परमात्मा का बनाया हुआ एक संसार है, उसी प्रकार हर मनुष्य की बनाई हुई भी उसकी अपनी एक निजी दुनियाँ होती है, जिसे वह अपने दृष्टिकोण के अनुसार बनाता है, उसी में संतुष्ट-असंतुष्ट, खिन्न-प्रसन्न बना रहता है। यदि कोई चाहे तो अपनी दुनियाँ को बदल सकता है। दृष्टिकोण के परिवर्तन के साथ−साथ यह परिवर्तन पूर्णतया संभव है।

अपने प्रियजनों में भी जब हम दोष निकालने खड़े होते हैं तो वे इतने भयानक दीखते हैं कि उनका तुरंत परित्याग कर देने या खून-खच्चर करके बदला देने की प्रतिहिंसा जागृत होती है। माता ने अमुक दिन चाँटा मारा था, अपमान किया था, पिताजी ने अमुक आवश्यकता पूर्ण नहीं की थी, भाई ने उपेक्षा का व्यवहार किया था, भावज ने ताना मारा था, बहिन ने चुगली की थी, स्त्री ने आज्ञा का उल्लंघन किया था, पुत्र ने अवज्ञा की थी, नौकर ने अशिष्टता दिखाई थी। इस प्रकार की घटनाओं का स्मरण किया जाए तो वे एक के बाद एक असंख्य सूझ पड़ेंगी। जिन्हें हम दुर्भावना गिनते हैं, संभव है उन लोगों के मन में वैसा भाव बिलकुल भी न रहा हो, पर अपनी रंगीन चश्मों वाली आँखों से तो उनका साधारण व्यवहार भी दुष्टतापूर्ण सूझ पड़ सकता है। ऐसी दशा में उन सबको शत्रु समझ लिया जाना स्वाभाविक ही है। शत्रुओं के बीच रहता हुआ मनुष्य नरक, अशांति और असंतोष ही अनुभव कर सकता है। हममें से अधिकांस के पारिवारिक जीवन आज ऐसे ही उद्विग्न बने हुए हैं।

सद्भाव रखें— शांति प्राप्त करें

यदि यह दृष्टिकोण बदल लिया जाए तो अपनी दुनियाँ बिलकुल दूसरी ही तरह की बन जाती है। स्वजनों और स्नेहीजनों की अच्छाइयों, सेवाओं, उपकारों, सज्जनताओं और उपयोगिताओं का यदि विचार किया जाए तो ऐसा लगेगा, मानो वर्षा में पूर्व दिशा से उठते हुए बादलों की तरह उनकी श्रेष्ठताएँ मस्तिष्क में उमड़ती चली आ रही हैं। कौन स्वजन ऐसा है, जिसके असीम उपकार अपने ऊपर नहीं। माता का वात्सल्य, पिता का सौजन्य, भाई का सद्भाव, पत्नी का आत्मदान, मित्र का सहयोग इतनी अधिक मात्रा में अपने को मिला होता है कि उनका विस्तारपूर्वक स्मरण किया जाए तो लगेगा कि हम देवताओं के बीच रहते हैं। उपकार, करुणा, सेवा और सहायता से, प्रेम और सहयोग से भरी यह दुनियाँ तब इतनी सुंदर लगती है कि उसके कण−कण के प्रति श्रद्धा से मस्तक झुक जाता है और अपने आप दूसरों के उपकार-भार से लदा हुआ सा प्रतीत होता है।

जीवन में हर घड़ी आनंद और संतोष की मंगलमय अनुभूतियाँ उपलब्ध करते रहना अथवा द्वेष, विक्षेप और असंतोष की नारकीय अग्नि में जलते रहना बिलकुल अपने निज के हाथ की बात है। इसमें न कोई दूसरा बाधक है और न सहायक। अपना दृष्टिकोण यदि दोषदर्शी हो तो उसका प्रतिफल हमें घोर अशांति के रूप में मिलेगा ही और यदि हमारा सोचने का तरीका प्रियदर्शी, गुणग्राही है, तो संसार की विविधता और विचित्रता हमारे मार्ग में विशेष बाधक नहीं हो सकती। संतोष, आनंद की अनुभूतियों का रसास्वादन करने से तब हमें कोई नहीं रोक सकता। दोनों मार्ग हमारे सामने खुले पड़े हैं, जिधर भी चाहें हम प्रसन्नतापूर्वक, स्वेच्छापूर्वक खुशी−खुशी चल सकते हैं।


सफलता ही नहीं, असफलता भी

कार्यों का परिणाम मिलता है यह एक ध्रुवसत्य है। कोई भी क्रिया प्रतिक्रिया से रहित नहीं है। जो कुछ किया जाता है, उसका प्रतिफल भी अवश्य होता है; पर यह प्रतिफल कब, कितनी मात्रा में, कैसा होगा; उसका रूप ठीक तरह निश्चित नहीं किया जा सकता। यह बातें परिस्थितियों पर भी निर्भर रहती हैं। साइकिल चलाने में कितनी देर में कितनी दूर पहुँच जावेंगे, उसका एक उत्तर नहीं हो सकता; क्योंकि साथ में और भी कितनी ही बातों से इसका उत्तर संबंधित है। सड़क खराब है या अच्छी? हवा सामने की है या पीछे की? चलाने वाले का स्वास्थ्य कैसा है? साइकिल अच्छी हालत में है या खराब हालत में? इन बातों की अनुकूलता-प्रतिकूलता जानकर ही यह अनुमान किया जा सकता है कि यात्रा कितनी देर में पूरी होगी।

प्रयत्न और परिस्थितियाँ

हम जो सफलता चाहते हैं, जिसके लिए प्रयत्नशील हैं, वह कामना कब तक पूरी हो जावेगी, इसका उत्तर सोचने से पूर्व अन्य परिस्थितियों को भुलाया नहीं जा सकता, अपना स्वभाव, सूझ−बूझ, श्रमशीलता, योग्यता, दूसरों का सहयोग, सामयिक परिस्थितियाँ, साधनों का अच्छा-बुरा होना, सिर पर लदे हुए तात्कालिक उत्तरदायित्व, प्रगति की गुंजाइश, स्वास्थ्य आदि अनेक बातों से सफलता संबंधित रहती है और सब बातें सदा अपने अनुकूल ही नहीं रहती, इसलिए केवल इसी आधार पर सफलता की आशा नहीं की जा सकती कि हमने प्रयत्न पूरा किया, तो सफलता भी निश्चित रूप से नियत समय पर मिल ही जानी चाहिए।

एक विद्यार्थी बहुत परिश्रमी और ठीक प्रकार पढ़ने लिखने वाला है और विद्याध्ययन में अपनी ओर से कुछ त्रुटि नहीं रहने देता, पर परिस्थितियाँ यदि उसके प्रतिकूल रहती हैं तो परीक्षाफल संदिग्ध हो जाता है। स्वास्थ्य का यकायक बिगड़ जाना, घर में कोई आघात लगाने वाली शोक-संतापभरी दुर्घटना हो जाना, किसी कारण मन का खिन्न या क्षुभित रहना, अध्यापक का सुशिक्षित न होना, समय पर पुस्तक का न मिल सकना, बुरे साथियों द्वारा पढ़ाई के समय ध्यान बटाने वाला उच्छृंखल वातावरण बने रहना, घर से विद्यालय बहुत दूर होने पर चलते−चलते थक जाना, प्रश्नपत्र में अप्रत्याशित विषयों का आ जाना, परीक्षक की असावधानी या कठोरता, परीक्षाकाल में कोई आकस्मिक उद्वेग आदि कितने ही कारण ऐसे हो सकते हैं, जिनसे परिश्रमी और ठीक तरह पढ़ने वाले विद्यार्थी को भी असफलता का मुँह देखना पड़े।

इसी प्रकार सफलता के ऐसे कारण भी हो सकते हैं, जिनके कारण कम परिश्रम करने वाला छात्र भी उत्तीर्ण हो जाए। सुशिक्षित अध्यापक, प्रसन्नतादायक वातावरण, अच्छे साथी, हलके प्रश्नपत्र, उदार परीक्षक, सामयिक सूझ-बूझ, परीक्षा-समय का वातावरण , पर्चे आउट होना या नकल आदि का अनैतिक लाभ आदि कितने ही कारण ऐसे हो सकते हैं, जिनके कारण ऐसे विद्यार्थी अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण हों, जिनके श्रम को देखते हुए असफलता की ही आशा की जाती थी।

श्रम का सत्परिणाम

यों श्रम का सत्परिणाम एक सुनिश्चित तथ्य है। मेहनत कभी भी बेकार नहीं जाती। उसका सुफल मिलता ही है। श्रमशील की योग्यता, प्रतिभा, क्षमता एवं सूझ−बूझ निरंतर बढ़ती ही जाती है और उसका लाभ प्रकारांतर से मिलता ही है। इसी प्रकार आलसी को कोई आकस्मिक सफलता मिल भी जाए तो उससे तात्कालिक प्रसन्नता प्राप्त की जा सकती है, पर उन विशेषताओं से वर्जित ही रहना पड़ेगा जो कठोर श्रम और गहन अध्यवसाय के कारण अपने को प्राप्त हो सकती थीं। आजकल अनीति का बोलबाला है। अनैतिक उपायों को काम में लाकर सफलता प्राप्त कर लेते हैं और नीति और मर्यादाओं का पालन करने वालों को उनके मुकाबले में पीछे रहना पड़ता है। ऐसी दशा में कई लोग जल्दी सफलता प्राप्त करने के लिए अनीति का मार्ग अपनाते हैं, पर वहाँ भी यही अनिश्चितता है। हर चोर, लखपती कहाँ बन पाता है? उसमें से भी कितनों को ही हाथ−पैर तुड़वा बैठने या जेल में चक्की पीसते−पीसते मरते रहने का दुर्भाग्य भुगतना पड़ता है। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता कि बुराई पर उतारू हो जाने से सफलता अवश्य ही, थोड़े दिन में ही मिल जाएगी।

संसार की नियत विधि-व्यवस्था

यदि श्रम का सत्परिणाम सुनिश्चित न होता तो कोई क्यों श्रमशीलता का कष्टसाध्य मार्ग अपनाता? कृषि, व्यापार, उद्योग, शिल्प, शिक्षा आदि में करोड़ों आदमी निरंतर पूर्ण तत्परता के साथ लगे रहते हैं और प्रतिफल भी उनको मिलता ही है। किसान खेती से ही तो गुजारा करते हैं, कारखानों को लाभ होता ही है। विद्या प्राप्त करने पर अच्छी जीविका मिलती ही है। यदि ऐसा न होता तो सभी लोग अनिश्चितता अनुभव करते और किसी भी कार्यपद्धति पर लोगों का मन न जमता; पर ऐसा है नहीं । यह सारा संसार एक नियत विधि-व्यवस्था पर चल रहा है। पुरुषार्थी को विजय लक्ष्मी वरण करती है और अकर्मण्य के पल्ले दीनता, दरिद्रता बँधी रहती है। इस विधान पर विश्वास करके प्रत्येक व्यक्ति कार्यसंलग्न हो रहा है और कष्टसाध्य लगते हुए भी प्रयत्न में संलग्न रहता है।

इतना होते हुए भी अपवादों की कमी नहीं रहती। पुरुषार्थियों को असफलता और आलसियों को आकस्मिक लाभ की घटनाएँ भी घटित होती रहती हैं; यद्यपि ऐसा कम और कभी−कभी ही होता है, पर होता अवश्य है। संख्या में थोड़ी रहने के कारण इन्हें अपवाद कहा जाता है। यह अपवाद भी कई बार मनुष्य के मन को विचलित और क्षुब्ध कर दिया करते हैं। जिन्हें ऐसी ही उलटी परिस्थितियों से पाला पड़ा है, वे पुरुषार्थ की व्यर्थता और भाग्य के सर्वोपरि होने की बात सोचने लगते हैं। कई बार तो ऐसे लोग हतोत्साहित और निराश होकर ऐसा भी सोचने लगते है कि ,‟अपने बलबूते कुछ बनने वाला नहीं है, जो कुछ होना होगा भाग्य से ही होगा, जब दिन फिरेंगे तभी कुछ लाभ होगा। हमारा हाथ−पैर पीटना बेकार है। तकदीर के आगे बेचारी तदबीर क्या कर सकती है।”

भाग्य और पुरुषार्थ

ऐसा सोचना न तो उचित है और न आवश्यक। भाग्य भी पुरुषार्थ का ही साथ देता है। अकर्मण्य लोग आकस्मिक सुयोग किसी प्रकार प्राप्त भी कर लें तो देर तक उसका लाभ नहीं उठा सकते। क्षमता पर ही स्थिरता अवलंबित है। अयोग्य व्यक्ति जब कार्यक्षेत्र में उतरते हैं तो उन्हें खोटे सिक्के की तरह अलग फेंक दिया जाता है। आकस्मिक सौभाग्य किसी अयोग्य को मिल तो सकता है, पर वह देर तक उसके पास टिका नहीं रह सकता। जिसने श्रम करके जो कमाया है, वही उसका सदुपयोग भी कर सकता है। ‘माल मुफ्त दिल बेरहम’ वाली कहावत के अनुसार अनायास प्राप्त हुई सफलताएँ देर तक ही नहीं ठहरती, वे किसी-न-किसी मार्ग में जल्दी ही विदा हो जाती हैं। अपव्यय की आदत उन्हें ही पड़ती है, जिन्हें बिना मेहनत की कमाई हाथ लगी है। फिजूलखरची और असावधानी बरतने से तो समुद्र का जल भी समाप्त हो सकता है। फिर छोटी−छोटी सफलताओं का टिके रहना तो संभव ही कैसे हो सकता है।

हम अपवादों पर ध्यान न दें। स्थिर व्यवस्था और विधान के प्रति आस्था रखें। कर्म तत्परतापूर्वक करें, उसमें तनिक भी असावधानी न होने दें, पर सफलता के लिए उतावले न हों । अमुक समय तक, अमुक मात्रा में सफलता मिल ही जानी चाहिए, यह कोई निश्चय नहीं कह सकता। परिस्थितियाँ और घटनाएँ उसमें विघ्न डाल सकती हैं। और मंजिल तक पहुँचने में देर लग सकती है। बीच−बीच में कई अवसर असफलता के मिल सकते हैं। लंबा रास्ता लगातार चलते हुए कहाँ पार होता है? बीच−बीच में रुकना भी तो पड़ता है। चलते रहने से मंजिल कटती है तो उसे प्रगति कह सकते हैं, पर निरंतर चलना, निरंतर प्रगति भी कहाँ संभव है। कुछ देर रुकना और सुस्ताना भी तो पड़ता है। जितनी देर रुके, उतनी देर यही सोचते रहना उचित नहीं कि इस समय हमारा भाग्य साथ नहीं दे रहा है, प्रगति रुक रही है, सफलता नहीं मिल रही है। दिन में काम करने के बाद रात को सोना भी तो पड़ता है।

अहंकार और असावधानी पर नियंत्रण

हमें प्रत्येक पग पर सफलता ही मिले, यह कोई आवश्यक बात नहीं। असफलता में जो आघात लगता है, उससे अधिक सावधानी बरतने और अधिक तत्परतापूर्वक श्रम करने की प्रेरणा मिलती है। भूल सुधारने का मौका भी इन्हीं झटकों से मिलता है, अन्यथा लगातार सफलता के मद में उन्मत्त मनुष्य को 'बादल या मकड़ी का जाला' कहलाने में भी देर नहीं लगती।

लक्ष्य को सोच-विचारकर नियत करना चाहिए और फिर उस पर दृढ़तापूर्वक चलते रहना चाहिए। मनुष्य का धर्मकर्त्तव्य कर्म करते रहना है। इसे न करने पर वह 'कर्त्तव्यघात' के पाप का भागी बनता है; इसलिए हर व्यक्ति को बिना एक क्षण भी गँवाए अपने जीवनोद्देश्य की प्राप्ति के लिए निर्धारित कर्त्तव्य-पथ पर चलते रहना चाहिए। यह मान्यता सर्वथा सत्य है कि सत्कर्म का सत्परिणाम ही मिलता है। साथ ही यह भी मानकर चलना चाहिए कि हमारा हर कदम सफलता और प्रगति के लिए ही नहीं होता। कितने ही कारण इस संसार में ऐसे मौजूद रहते हैं, जो प्रगति को रोकते हैं और जितनी जल्दी हम चाहते हैं, उतनी जल्दी सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। बाधाओं की मंजिलें पार करने में जो लोग अपने धैर्य और साहस का परिचय देते हैं, घबराते और असंतुलित नहीं होते, वे ही दृढ़ चरित्र और स्वस्थ मानस कहला सकने के अधिकारी होते हैं। धैर्य और साहस ही तो मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता है। असफलताएँ इस विशेषता को परखने आया करती हैं और जो उसकी परीक्षा में उत्तीर्ण होता है, उसे इतना मनोबल दे जाती है, जिसके आधार पर उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकें।

प्रयत्न करें, पर विचलित न हों

हमें सफलता के लिए शक्ति भर प्रयत्न करने चाहिए; पर असफलता के लिए भी जी में गुँजाइश रखनी चाहिए। प्रगति के पथ पर चलने वाले व्यक्ति को इस धूप-छाँह का सामना करना पड़ा है। हर कदम सफलता से ही भरा मिले, ऐसी आशा केवल बालबुद्धि वालों को शोभा देती है, विवेकशीलों को नहीं । केवल सफलता की ही आशा करना और उसके न मिलने पर सिर धुनना अथवा निराश हो बैठना, ओछे, उथले और बचकाने स्वभाव का चिह्न है। जिंदगी जीने की विद्या का एक महत्त्वपूर्ण पाठ यह है कि हम न छोटी−मोटी सफलताओं से हर्षोन्मत्त हों और न असफलताओं को देखकर हिम्मत हारें। दिन और रात की भाँति असफलता का चक्र भी चलते ही रहने वाला है। एक ही तरह की वस्तु सदा मिले, यह असंभव आशा हमें आरंभ से ही नहीं करनी चाहिए और असफलता के लिए भी अपने कार्यक्रम में उचित गुंजाइश रखे रहना चाहिए और उसका भी वैसा स्वागत करना चाहिए जैसा सायंकालीन संध्या का करते हैं। प्रातःकाल की ऊषा भी उतनी ही सुंदर होती है, जितनी सायंकाल की संध्या। सफलताओं में, सुख−सुविधाओं की जैसी आशा केंद्रित रहती है, वैसी ही आत्मसुधार की, धीरे−धीरे बनाने की प्रेरणा असफलता में भी सन्निहित है। वस्तुतः ये दोनों आपस में सगी बहनें हैं, कुशलक्षेम पूछने और परस्पर मिलने अक्सर आया करती हैं। इनके प्रेमालाप में हम बंधक क्यों बनें? अपनी कर्त्तव्यपरायणता का आतिथ्य प्रस्तुत करते हुए इन दोनों का ही उचित स्वागत क्यों न किया करें?


अहंकार की असुरता से बचा जाए

इस संसार की हर वस्तु में अच्छाई के साथ−साथ कुछ बुराई भी मिली होती है। कोई व्यक्ति या वस्तु यहाँ ऐसी नहीं बनी, जिसमें न्यूनाधिक मात्रा में गुण, दोषों का समावेश न हो। प्रत्येक अच्छाई अपने साथ कुछ बुराई छिपाए रहती है, और प्रत्येक बुराई के पीछे कुछ अच्छाई का भी तत्त्व छिपा रहता है। सफलता और असफलता के बारे में यही बात लागू होती है। यों आमतौर से हर आदमी सफलता चाहता है और उसे प्राप्तकर प्रसन्न होता है। असफलता में हानि एवं खिन्नता अनुभव होती है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि इच्छापूर्ति में सुख और उसमें पड़ी हुई बाधा को दुःख माना गया है।

फूल में काँटा

इतना होते हुए भी सफलता में कुछ हानि और असफलता का कुछ लाभ भी होता है। असफलता हमें अपनी भूलों पर विचार करने का मौका देती है और यह सिखाती है कि हम जहाँ गलती करते रहे हैं, वहाँ अधिक ध्यान दें और उसमें सुधार करें। असावधानी बरतने और अधूरे मन से काम करने पर आमतौर से सब काम बिगड़ते हैं। श्रम से जी चुराने, आलस में पड़े रहने, समय-कुसमय का ध्यान न रखने से भी असफलता की संभावना बढ़ जाती है। कटु स्वभाव और अशिष्ट व्यवहार से भी दूसरे लोग चिढ़ते और असहयोगी बनते हैं, ऐसी दशा में भी अपनी इच्छापूर्ति के मार्ग में बाधा उत्पन्न होती है । असफलता मिलने पर आमतौर से मनुष्य दूसरों पर उसका उत्तरदायित्व डालकर स्वयं निर्दोष बनना चाहता है, पर बुद्धिमत्ता का अंश जब जागृत रहता है, तब वह यह भी सोचता है कि मेरी भूल कहाँ−कहाँ रही और उसे कैसे सुधारा जाए?

जिस प्रकार ऊधम मचाने और बताया हुआ काम न करने पर, बच्चे को धमका देने पर वह रुकता, सोचता और बदलता है, उसी प्रकार असफलतारुपी दैवी फटकार पड़ने पर मनुष्य को यह भी सोचना पड़ता है कि उसके लिए क्या करना उचित और क्या करना अनुचित था। अपनी गतिविधियों को सुधार लेने पर जहाँ बिगड़े काम के बनने की संभावना बढ़ जाती है, वहाँ सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि मनुष्य को अपनी आदतों और गतिविधियों में सुधार करने का अवसर मिलता है। यह सुधार उस अमुक बिगड़े काम को बनाने में ही सहायक नहीं होता, वरन भविष्य के लिए सफलताओं का एक व्यवस्थित शिक्षण देकर प्रगति का मार्ग भी प्रशस्त कर देता है। इस प्रकार असफलता खेदजनक, कष्टदायक होते हुए भी कटुवादी सहृदय मित्र की तरह कुछ लाभदायक सिद्ध होती है।

लाभ के साथ हानि भी

सफलता की अच्छाई सर्वविदित है ही। उससे अभीष्ट लाभ प्राप्त होता है, दूसरे प्रशंसा करते हैं, अपना हौसला बढ़ता है, आदि-आदि लाभों को हम सब भली-भाँति जानते हैं और इसलिए उसे चाहते तथा पसंद भी करते हैं। पर उसमें एक छोटी बुराई भी छिपी रहती है, यदि उसकी ओर से असावधान रहा जाए तो वह हानिकारक भी सिद्ध होती है। इस बुराई का नाम है—‛मद’ या ‘अहंकार’। सफलता पाकर मनुष्य इतराने लगता है, वह अपनी औकात भूल जाता है और एक सफलता को पाकर वह यह सोचने लगता है— ''मुझ से बड़ा बुद्धिमान, चतुर और पुरुषार्थी कोई नहीं, मैं हर दिशा में चुटकी बजाते सफलता प्राप्त कर सकता हूँ।”

आत्मविश्वास और अहंकार

आत्मविश्वास होना अलग बात है, वह एक आध्यात्मिक गुण है; पर अहंकार तो उससे सर्वथा भिन्न वस्तु है। मोटे रूप में आत्मविश्वास तथा अहंकार एक-से दीखते हैं, पर उनमें जमीन-आसमान जैसा अंतर रहता है। कायरता और अहिंसा बाहर से देखने में एक सरीखी लगती है, पर उनकी मनोदशा में दिन-रात जैसा भेद रहता है। आत्मविश्वासी आत्मा की महत्ता मानते हुए भी सावधानी, परिश्रम, अध्यवसाय, परिस्थितियाँ, दूसरों का सहयोग, जागरुकता आदि बातों पर ही सफलता को अवलंबित समझता है और सफलता-असफलता की परवाह न करके अपने सुनिश्चित पथ पर मजबूती से पैर बढ़ाता हुआ चला जाता है।

आत्मविश्वास का अर्थ है—   अपने कर्त्तव्य-पथ पर दृढ़ रहना और कठिनाइयों से तनिक भी विचलित न होना। अहंकार इससे भिन्न वस्तु है। इसे ‘मद’ इसलिए कहा गया है कि नशीली चीजें खाकर जिस प्रकार उन्मत्तता आ जाती है, उसी प्रकार एक छोटी सफलता पाकर मनुष्य सोचने लगता है कि मैं ही सब कुछ हूँ, मुझमें कोई त्रुटि नहीं, मेरी बुद्धि सारी दुनियाँ से बढ़कर है। जो चाहूँ सो चुटकी बजाते पूरा कर सकता हूँ। छोटी स्थिति के आदमी, जिनके दिल और दिमाग छोटे हैं— कोई मामूली−सा लाभ, पद, श्रेय या महत्त्व पाकर इतराने और बौराने लगते हैं। उनकी अकड़ उद्दण्डता और अशिष्टता के रूप में चेहरे पर झलकती रहती है। सरकारी अफसरों, राजा-रईसों और तथाकथित बड़े आदमियों में से कितने ही ऐसे होते हैं, जिनकी अकड़ और उद्दंडता देखकर यही सोचना पड़ता है कि छोटी−सी सफलता पाकर इन्होंने सज्जनता का मार्ग छोड़ दिया और उद्धतता को अपना लिया है।

उद्धतता का ओछापन

उद्धतता सारी मनुष्य जाति का— सज्जनता का अपमान है। यह किसी से भी बरदाश्त नहीं होती। मानव की आत्मा इसके प्रति विद्रोह करती है। जिन्हें कोई व्यक्तिगत स्वार्थ हो, उनकी बात दूसरी है, वैसे साधारणतया सभी को अहंकार बुरा लगता है। भले ही उसका कोई तुरंत विरोध न करे, पर जब भी अवसर आता है, अहंकारी व्यक्ति देखता है कि उसका एक भी सच्चा मित्र इस संसार में नहीं है। चापलूस और खुशामदी लोग जो अपने मतलब के लिए नाक का बाल बने हुए थे, अवसर पाते ही गिरे में लात लगाने का प्रयत्न करते हैं।

भगवान को मनुष्य के दुर्गुणों में सबसे अप्रिय अहंकार है। ईश्वर का अंश होने से जीव महान है, पर यह सारी महानता ईश्वर की है। अपनी स्वतंत्र सत्ता की दृष्टि से मनुष्य अत्यंत तुच्छ है। वह कितनी ही बातों में पशु−पक्षियों से भी पिछड़ा हुआ है। दूसरों की सहायता के बिना उसका काम ही नहीं चलता, जो कुछ भी लाभ या सुख प्राप्त होता है, उसमें उसकी निज की योग्यता का जितना महत्त्व है, उसकी अपेक्षा दूसरों के सहयोग और अनुग्रह का सहस्रों गुना अधिक श्रेय सम्मिलित रहता है।

एकाकी रहने वाला मनुष्य तो लखनऊ के अस्पताल में पड़े हुए भेड़ियों द्वारा पाले गए रामू बालक जैसा ही अविकसित रह सकता है। रामू भी जैसा कुछ है, भेड़ियों के पालने के कारण है। यदि मनुष्य के बालक को कोई न पाले, किसी का सहयोग न मिले तो वह सृष्टि के अन्य जीवों की तरह जीवित भी नहीं रह सकता। आठ-दस वर्ष की आयु तक तो उसे सर्वथा परावलंबी रहना पड़ता है। बीमारी, अशक्ति, स्वाभाविक ज्ञान की कमी आदि अनेकों खामियाँ उसमें ऐसी हैं, जिनसे अन्य जीवों के बच्चे ग्रस्त नहीं होते। उसकी सारी उन्नति और सफलता सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक हुए मानवीय सामूहिक सत्प्रयत्नों का ही परिणाम है। समाज के ऋण और सहयोग का— दूसरों की कृपा और अनुकंपा का महत्त्व भूलकर यदि कोई इतराता है और अहंकारी बनकर मदोन्मत्त होता है, तो यह उसकी तुच्छता ही मानी जाएगी।

सत्यानाशी दुर्गुण

अहंकार का नाश करने का परमात्मा सदा प्रयत्न करते रहते हैं; क्योंकि यही दुर्गुण भव-बंधनों में जीव को बाँधे रहने में सबसे कड़ी लौह-शृंखला का काम करता है। अहंकारी के मन से सब सद्गुण उसी प्रकार विदा होने लगते हैं, जैसे तालाब का पानी सूखने पर उसके तट पर रहने वाले पक्षी अन्यत्र चले जाते हैं। अहंकार से अन्य दुर्गुणों का पोषण होता है और घमंडी आदमी में वे सब बुराइयाँ उत्पन्न हो जाती हैं, जो गुंडों या असुरों में होती हैं। असुर या गुंडों का अहंकार ही आरंभ में विकृत होता है, इसके पश्चात् वे दूसरों को तुच्छ समझते हुए उनकी हर क्रिया में अपना अपमान देखने लगते हैं और उसका प्रतिशोध लेने के लिए जहरीले साँप की तरह अनर्थ करने पर उतारू हो जाते हैं। एकाध बार ऐसे अनर्थों में सफलता मिलने पर तो वे पूरे नर-पिशाच ही बन जाते हैं। डाकू और हत्यारों में लोभवृत्ति उतनी प्रबल नहीं होती, जितनी अहम्मन्यता। अहंकार को ही असुरता का प्रतीक माना गया है। अहंकारी की महत्त्वाकांक्षाएँ संसार के लिए एक विपत्ति ही सिद्ध होती हैं। सिकंदर, तैमूरलंग, नादिर शाह, औरंगजेब, नेपोलियन आदि के अहंकार ने कितनी निरीह जनता को संत्रस्त किया इसका रोमांचकारी चित्र इतिहास के हर विद्यार्थी को याद है। अहंकार का मार्ग हर मनुष्य को इसी दिशा में ले जाता है। जितनी उसकी क्षमता और परिस्थिति होती है, उसी अनुपात से वह जनविपत्ति का कारण बनता जाता है।

सफलताएँ  प्राप्त करने का हम प्रयत्न करें, पर यह न भूलें कि उसके साथ फूल में काँटे की तरह जो अहंकार छिपा रहता है, उसका आक्रमण अपने ऊपर न हो जाए। हर सफलता के लिए हमें अपने सहयोगियों और मार्गदर्शकों का कृतज्ञ होना चाहिए तथा ईश्वर को सच्चे हृदय से धन्यवाद देना चाहिए कि उसकी अनुकंपा से ही इतना श्रेय प्राप्त हो सकना संभव हुआ। मनुष्य को अपनी महानता याद रखनी चाहिए, किंतु तुच्छता को भी भूल न जाना चाहिए। एक ही झटके में बड़े−बड़े किले जब चूर−चूर हो जाते हैं तो बेचारे तुच्छ मनुष्य की तो बिसात ही कितनी है। आज एक कार्य में सफलता मिली है तो यह आवश्यक नहीं कि कल भी— दूसरे काम में भी सफलता मिल जावेगी।

नम्रता और सज्जनता को न भूलें

अहंकार की उद्धतता मनुष्य के ओछेपन का चिह्न है। बड़प्पन में हर व्यक्ति झुकता और नम्र बनता है। उन्नति और सुधार उसी का संभव है जो अपनी त्रुटियों और दुर्बलताओं को जानता है। जो अपने को सर्वोपरि माने बैठा है, उसे सुधार की बात सोचने का अवसर ही कहाँ है? ऐसे मनुष्य हवा भरे हुए पानी के बबूले की तरह अंत में उपहास के पात्र बनते हुए नष्ट ही हो जाते हैं, इसलिए विज्ञजन अहंकार को बहुत ही हेय मानते रहे हैं। हर सफलता प्राप्त करते समय हमें यह आत्मनिरीक्षण करते रहना चाहिए कि कहीं इससे हमारा अहंकार तो नहीं बढ़ा, यदि बढ़ा हो तो सोचना चाहिए कि लाभ की अपेक्षा हमारी हानि ही अधिक हुई है। अहंकार को एक भारी हानि ही नहीं, विपत्ति भी मानना चाहिए।


द्वेष-दुर्भाव से कोई लाभ नहीं?

जीवन की अनेक कष्टकारक परिस्थितियों में द्वेष एवं मनोमालिन्य के कारण हमें सबसे अधिक त्रास मिलता है। अन्य बुरी परिस्थितियाँ थोड़ी देर ठहरती हैं और अपना कुप्रभाव दिखाकर विदा हो जाती हैं, पर द्वेष का दुःख देर तक बना रहता है और कई बार तो मन में ऐसी जड़ जमाकर बैठ जाता है कि निरंतर काँटे की तरह खटकने लगता है। बैर में एक और खराबी है कि उसके कारण प्रतिशोध एवं प्रतिहिंसा की भावना पैदा होती है जिससे अपना द्वेष है। उसे कोई-न-कोई हानि पहुँचाने को जी चाहता है और जी की जलन तब तक शांत नहीं होती, जब तक बदला नहीं ले लिया जाता।

बदला लेना एक नया कुचक्र शुरू करता है। जिसे त्रास दिया गया है, उसके मन में ठीक वैसी ही प्रतिहिंसा उत्पन्न होती है, जैसी बदला लेने से पूर्व अपने मन में थी। उसके मन में प्रतिशोध का रोष उमड़ता है और अपने ऊपर चोट करता है। अब यह पहिया घूमने लगता है, क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। दोनों पक्ष एकदूसरे से अपना बदला चुकाने लगते हैं। इस चपेट में दूसरे अनेकों निर्दोष आते हैं। कभी−कभी इसका संगठित रूप पार्टीबंदी के रूप में उठ खड़ा होता है। हत्या, कत्ल, डकैती, फौजदारी, छुरेबाजी, लूट, अपहरण, चोरी आदि की जितनी घटनाएँ धन के लालच से होती हैं, उससे कई गुनी शत्रुता के कारण होती हैं।

सबसे बड़ा दुःख

चिंता, भय, निराशा, शोक, अपमान आदि अनेकों कारणों से मनुष्य का मन दुःखी रहता है, पर उन सबको मिलाकर भी उतना दुःख मन को नहीं होता जितना द्वेष के कारण होता है। सर्प जैसा तुच्छ कीड़ा क्रोध के वशीभूत होकर इतना उग्र बन जाता है कि छेड़ने वाले की जान लिए बिना संतुष्ट नहीं होता। कई बार तो वह अपने छेड़ने वाले को वर्षों तक याद रखता है और जब भी उसे अवसर मिलता है, तभी अपने बैर का प्रतिशोध लेकर जी की जलन मिटाता है। मनुष्य तो अधिक संवेदनशील है। क्रोध उसे पागल ही बना देता है। चाणक्य जैसा विद्वान, जरा-से अपमान से क्रुद्ध होकर इतना असंतुलित हो गया कि उसने नंद वंश का सर्वनाश करके ही चैन लिया। द्रौपदी के जरा-से व्यंगय से क्षुभित होकर दुर्योधन इतना क्रूर बन गया कि उसने पांडवों से बदला लेने के लिए महाभारत जैसी विभीषिका को स्वीकार कर लिया। चंबल घाटी के दुर्दांत दस्युओं की समस्या जिसने लाखों मनुष्यों का नागरिक जीवन अस्त−व्यस्त किया है, डाकुओं के प्रारम्भिक जीवन में किसी साधारण बात से उत्पन्न द्वेष और प्रतिशोध से आरंभ होती है और अब तक वह समाज को भारी क्षति पहुँचा रही है।

द्वेष की प्रतिक्रिया

इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो भी भयंकर संघर्षों और आक्रमणों के बीच द्वेष को ही प्रधान कारण पाते हैं। अन्य सभी कारण गौण थे। शांत भाव से जंगलों में जीवनयापन करने वाले पशु, जिनके बीच कोई समस्या नहीं है, कभी क्रोध और द्वेष के वशीभूत होकर ऐसे असंतुलित होकर लड़ पड़ते हैं, कि एकदूसरे की जान लेकर ही पीछे हटते हैं। सिंह, व्याघ्र, रीछ और भैंसों में ऐसी ही लड़ाई होती है। कुत्तों को लड़ते हुए तो हम रोज ही देखते हैं। तीतर, बटेर और मुर्गों की लड़ाई भी कराई जाती है। कुत्ता-बिल्ली के बीच अकारण बैर है। कोई किसी का माँस भी नहीं खाता फिर भी द्वेषवश एकदूसरे की जान के ग्राहक बने रहते हैं। द्वेष से क्रोध उत्पन्न होता है और क्रोध में उन्मत्त होकर मनुष्य पागलों की तरह वह कुकर्म कर बैठता है, जिसके लिए उसे सदा पश्चात्ताप-ही-पश्चात्ताप करते रहना पड़ता है।

शरीर और मन की अन्य व्यथाएँ कम समय तक कष्ट देती हैं। बुखार, खाँसी, दस्त, दरद आदि सदा नहीं रहते। दस−पाँच दिन में वे अपने आप अच्छे हो जाते हैं। न अच्छे हों तो कोई अच्छा चिकित्सक तेज उपचार करने खड़ा हो जाए तो वह कष्ट तुरंत या एकाध दिन में ही मिट सकता है। चिंताएँ जिस कारण रहती हैं, वह कारण दूर होते ही चिंता भी दूर हो जाती है। उसी प्रकार अन्य मनोव्यथाएँ भी समय−समय पर घटती-मिटती रहती हैं। पर द्वेष का रूप ही कुछ विलक्षण है। वह घृणा, ईर्ष्या, शत्रुता, मनोमालिन्य, प्रतिहिंसा आदि के अनेक रूप धारण करके मन में छिपा बैठा रहता है। प्रतिपक्षी को कैसे हानि पहुँचे, यह एक ही योजना वह बनाता रहता है। यह योजना यदि बन भी जाए और कार्यरूप में परिणत भी हो जाए तो इतनी महँगी पड़ती है कि उससे अपनी बहुमूल्य शक्तियाँ इस निरर्थक काम में बिलकुल ही व्यर्थ बर्बाद होती हैं। उसका कुछ भी लाभ अपने को नहीं मिलता, वरन प्रतिक्रिया का शिकार होने पर कभी भारी क्षति उठाने की आशंका और खड़ी हो जाती है।

अपने पैरों कुल्हाड़ी

आग जहाँ रखी जाती है, पहले उसी को जलाती है। दूसरी दूर की वस्तु को वह पीछे जलावेगी, पहले तो उसी चीज को समाप्त करेगी, जिसमें उसे रखा जाएगा। तेजाब जहाँ कहीं गिर पड़ता है उसी वस्तु को गला देता है। आग और तेजाब की तरह द्वेष की अग्नि जिसके मन में रहती है, उसका मनःसंस्थान सूझ−बूझ से रहित, असंतुलित और अस्त−व्यस्त बनकर मूर्ख, पागल एवं विक्षिप्त जैसी स्थिति उत्पन्न कर देता है। जरा−जरा−सी बात पर लड़ाई, झगड़ा, उठना, कटुवचन, दुर्व्यवहार, असहयोग, अवज्ञा, उपेक्षा, उपहास, अपमान आदि की चुभने वाली बातें कई बार स्वजन-संबंधियों में, परिवार के लोगों में परस्पर चलने लगती हैं, वहाँ साथ−साथ रह सकना कठिन हो जाता है। इन बुरी बातों से बने परिवार नष्ट हो जाते हैं। स्नेह संबंध समाप्त होकर, पराएपन के भाव उत्पन्न होते हैं और अंततः भावनात्मक संबंध ही विच्छेद हो जाता है, ऊपर से शिष्टाचार संबंध भले ही बना रहे।

द्वेष के कारण जो क्रोध और प्रतिहिंसा का भाव उत्पन्न होता है, उससे प्रतिपक्षी को जितनी हानि पहुँचती है, उससे अनेकों गुनी हानि अपनी होती है। मनोविज्ञान शास्त्र के ज्ञाता जानते हैं कि द्वेष के दुर्भाव के कारण मनोभूमि में ऐसी ग्रंथियाँ बन जाती हैं, जो आगे चलकर अनेकों कष्टसाध्य एवं असाध्य रोगों को जन्म देती हैं, उन रोगों की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि दवादारू का भी कोई असर उन पर नहीं पड़ता। स्वभाव और गुणों का स्तर गिरता है, जिससे व्यक्ति निम्न श्रेणी के निकृष्ट कोटि के विचार और कार्य करने पर उतारू होता है। जिसका मन द्वेष-दुर्भावनाओं से भरा रहता है, उससे ऐसे किसी श्रेष्ठ कार्य की आशा नहीं की जा सकती, जो उसकी कीर्ति को बढ़ावे, दूसरों को सुविधा उत्पन्न करें अथवा समाज की प्रगति में योग देवे। अधःपतन का सबसे सरल मार्ग एक ही है कि मनुष्य अपनी मनोभूमि को द्वेष-दुर्भावों से भरा रखे। शेष सभी सत्यानाशी दुर्गुण अपने आप वहाँ इकट्ठे होते चले जावेंगे।

घोर अशांति और भयंकर विक्षोभ

वैयक्तिक जीवन में घोर अशांति और समस्त संसार में भयंकर विक्षोभ पैदा करने वाले इस दुष्ट द्वेष की जड़ तलाश करने निकलते हैं, तो उसका उद्गम गलतफहमी से निकलता हुआ दिखाई देता है। ऐसी घटनाएँ कम ही होती हैं कि जब किसी ने लोभवश किसी को सताया होता है और उसके कारण द्वेष उत्पन्न हुआ होता है। ऐसी घटनाएँ 20 प्रतिशत और गलतफहमी से उत्पन्न हुए द्वेष की घटनाएँ 80 प्रतिशत होती हैं। पेशेवर दुष्ट, दुराचारियों और गुंडों से निपटने के लिए प्रतिशोध के व्यवस्थित तरीके तथा शासनशक्ति का सहारा लिया जा सकता है, पर वह भी न्याय की रक्षा, बुरे का सुधार और सामाजिक शांति-व्यवस्था की पवित्र दृष्टि से ही होना चाहिए। रोगी से नहीं, रोग से घृणा करनी चाहिए। दुष्ट से नहीं, दुष्टता से निपटना चाहिए।

इस संसार में कोई भी व्यक्ति न तो पूर्णतः बुरा है और न भला। जो आज बुरा है, कल भला भी बन सकता है। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अजामिल, सदन कसाई, गणिका आदि के कितने ही प्राचीन और अगणित अर्वाचीन ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जिनमें बुरे व्यक्ति अच्छे बने हैं, उसने अपने आपको बिलकुल ही बदल डाला है। ऐसी दशा में किसी व्यक्ति के प्रति घृणा या द्वेष रखना क्योंकर उचित हो सकता है? सभी प्राणी जब भगवान के अंश हैं, सभी की आत्मा में जब परमात्मा की छाया है तो उसे घृणित माना भी कैसे जा सकता है?गंदगी लगा हुआ बरतन जब माँज-धोकर शुद्ध किया जा सकता है तो बुरा व्यक्ति भी सुधरने पर श्रेष्ठ और सम्माननीय क्यों नहीं बन सकता? जब व्यक्ति परिवर्तनशील ही है, तो उससे स्थायी द्वेष और शत्रुता करने का कोई कारण नहीं रह जाता।

दुष्टता का प्रतिशोध दुष्टता से ही हो, यह कोई जरूरी बात नहीं है। प्रेम और भलमनसाहत से भी यह हो सकता है। गांधी जी ने अपने जीवन में सत्य और प्रेम का शस्त्र अपने प्रबल प्रतिपक्षियों पर चलाकर उन्हें परास्त करके प्रेमयुद्ध का एक अनुपम उदाहरण हमारी आँखों के सामने अभी−अभी रखा है। यह शस्त्र हम में से हर कोई उन लोगों के विरुद्ध चला सकता है, जिन्हें कुमार्ग पर चलता हुआ देखा जाए। यह कार्य बिना रत्ती भर द्वेष मन में रखे पूर्ण सद्भावना के साथ किया जा सकता है। प्रेम की लड़ाई भी लड़ी जा सकती है और यदि अपना पक्ष सच्चाई और न्याय का है तो बुराई को सुधारने में सफलता भी प्राप्त की जा सकती है।

एक बड़ा कारण गलतफहमी

द्वेष का प्रधान कारण गलतफहमी होता है। आमतौर से हम उन सबको अपना शत्रु या विरोधी मान लेते हैं, जो हमारे विचारों से सहमत नहीं होते, हमारी पसंदगी की गतिविधियाँ नहीं अपनाते। हर आदमी यह सोचता है कि बाकी सब लोग मेरी इच्छानुसार सोचें और करें। यह आकांक्षा बहुत ही गलत, अहंकारपूर्ण और नासमझी से भरी हुई है। अपनी समझ से हमारा सोचना और करना हमारे लिए ठीक हो सकता है, पर यह जरूरी नहीं कि बाकी सब लोग भी उसी को ठीक समझें, जिसे हम पसंद करते हैं। रुचि भिन्नता और विचार मित्रता इस संसार की शोभा और विचित्रता है। यदि नैतिक आदर्शों पर हम सब सहमत हों तो फिर बाहरी, साधारण रुचि भिन्नताएँ हमारे प्रेमभाव में बाधक न होनी चाहिए।

हर आदमी की अपनी मनोभूमि, रुचि, भावना और परिस्थिति होती है। वह उसी आधार पर सोचता, चाहता और करता है। हमें इतनी उदारता रखनी ही चाहिए कि दूसरों की भावनाओं का आदर न कर सकें तो कम-से-कम उसे सहन तो कर ही लें। असहिष्णुता मनुष्य का एक नैतिक दुर्गुण है, जिसमें अहंकार की गंध आती है। इतना दुस्साहस तो परमात्मा भी नहीं करता। उसने शास्त्रों के द्वारा अपनी रुचि और इच्छा प्रकट कर दी है कि इस प्रकार का आचरण हमें करना चाहिए। इतने पर भी जो उसकी आज्ञा की अवज्ञा करते हैं, उन्हें वह सहन करता है, तत्काल ही उन पर आगबबूला नहीं हो जाता, वरन सौम्य और शांत विधि-व्यवस्था से इन अवज्ञाकारियों के सुधार का कार्य धैर्यपूर्वक करता रहता है। हम ईश्वर से भी बड़े बनें और हर किसी को अपनी मरजी का बनाना और चलाना चाहें तो यह एक मूर्खताभरी बात ही होगी।

सहिष्णुता और सह-अस्तित्त्व

यह हो सकता है कि कोई पूर्ण ईमानदार होते हुए भी अपनी समझ के अनुसार हमारे विचारों से भिन्नता रखे। भारत में अनेकों देवी−देवता, संप्रदाय, मत-मतांतर, धर्मग्रंथ, पूजा-विधान एवं रीति−रिवाज प्रचलित हैं। इनमें परस्पर कोई समानता नहीं, वरन कई बार तो प्रतिकूलता दिखती है। इतने पर भी यहाँ सदा से विचार स्वातंत्र्य को पसंद किया गया है। इस भिन्नता से सत्य की शोध में सहायता ही मिलती है। उपयोगिता और वास्तविकता की कसौटी पर जो खरा उतरेगा, वही विचार अंततः जीवित रहेगा, शेष को समीक्षा एवं विवेक की कसौटी खोटा सिद्ध करके फेंक देगी। इसके लिए धैर्य रखना और प्रतीक्षा करना ही उचित है, पिछले दिनों जोर−जबरदस्ती के बल पर मतों को फैलाने का प्रयत्न किया जा चुका है। यह प्रयत्न सफल तो नहीं हुआ; अपने पीछे एक घृणा, कटुता और दुःखभरी गाथा ही छोड़ गया है। अभी भी कुछ लोग उसी की पुनरावृत्ति करते हैं। तलवार से न सही, गाली−गलौज अथवा अन्य तरीकों से दूसरों को अपना अनुयायी बनाना चाहते हैं। यह असहिष्णुता उचित नहीं, हमें सह-अस्तित्त्व को मान्यता देनी चाहिए। अपने पक्ष का उचित रीति से समर्थन और प्रचार करें और दूसरों को दबाने या विवश करने की बात न सोचें। विचार परिवर्तन और हृदय परिवर्तन सद्भावना के वातावरण में होना चाहिए। सामाजिक ही नहीं, घरेलू जीवन में भी हमारी रीति−नीति यही रहे।

हम किसी के सामने कोई प्रस्ताव रखते हैं या कुछ पाने की आशा करते हैं। अपनी समझ या परिस्थिति के अनुसार वह उसे स्वीकार नहीं करता तो यह मान बैठना गलती है कि वह हमारा दुश्मन ही हो गया। भूलवश अनजाने में भी कोई व्यक्ति ऐसी बात कह सकता है या ऐसा काम कर सकता है, जो हमें शत्रुतापूर्ण मालूम पड़े। किंतु उसकी दृष्टि से उसका इरादा जरा भी बुरा नहीं। जिस प्रकार हम अपनी सुविधा सोचते हैं, उसी प्रकार दूसरे व्यक्ति भी अपनी सुविधा की दृष्टि से हमारे प्रस्ताव की उपेक्षा कर सकते हैं। इस उपेक्षा को हम शत्रुता क्यों मानें? हमारी हर इच्छा दूसरों को पूरी कर ही देनी चाहिए, यह मान्यता बना लेना एक ऐसी गलती है, जिसके फलस्वरूप पग−पग पर शत्रुता ही बढ़ती चली जाती है और धीरे−धीरे अपने सब मित्र साथ छोड़ते तथा शत्रु बनते दिखाई देने लगते हैं।

समझौते का बिंदु ढूँढें

अपने से भिन्न विचारों को भी हमें सहन करना चाहिए। दूसरों के स्वार्थ और अपने स्वार्थ जहाँ टकराते हों, वहाँ बीच का-- समझौते का मार्ग खोजना चाहिये। ‘सब कुछ या कुछ नहीं’ की नीति गलत है। जितना मिले उतना लो, शेष के लिए कोशिश करो, यही नीति उचित है। जिस हद तक हम दूसरों से मतैक्य का आधार ढूँढ़ सकते हों ढूँढें और प्रयत्न यह करें कि जो मतैक्य के आधार हैं, उन पर जोर दें। उनकी चर्चा करें और उस क्षेत्र को विस्तृत करें। मतभेद के प्रसंगों की चर्चा तभी करें, जब दोनों ओर की मनोभूमि उसे सुनने−समझने और सुधारने की स्थिति में हो। समय−कुसमय मतभेदों की ही चर्चा करते रहना, उसी का रोना रोते रहना, द्वेष-दुर्भाव बढ़ाने में ही सहायता करता है।

दूसरे को बदनीयत मान बैठना, उनके हर कार्य में द्वेष-दुर्भाव की गंध सूँघना अपनी तुच्छता का प्रतीक है। सद्भावना से भी कोई व्यक्ति अपने से असहमत हो सकता है और अपनी आशाओं के प्रतिकूल उत्तर दे सकता है। इतने मात्र से हमें क्रुद्ध क्यों होना चाहिए। एकदूसरे के प्रति जो गलतफहमी की गाठें मन में बन जाती हैं, उनके निवारण का उपाय एक ही है कि उससे एकांत में जी खोलकर बात की जाए और वास्तविकता तथा गलतफहमी का सही रूप से निरूपण कर लिया जाए। इस दुनियाँ में तीन-चौथाई झगड़े गलतफहमी के आधार पर होते हैं। यदि परस्पर जी खोलकर शुद्ध मन से अपने प्रतिपक्षी के साथ बातचीत करते रहने की नीति अपनाई जाए, तो द्वेष का सबसे जबरदस्त किला सहज ही ढह सकता है।

हमें द्वेषी नहीं, प्रेमी बनना चाहिए। दूसरों के प्रति दुर्भावना या घृणा लेकर नहीं, सद्भाव एवं स्नेह लेकर जीवन व्यतीत करना चाहिए। हमारा अपना निज का लाभ, सुख और कल्याण इसी में है।


जिंदगी खेल की तरह जिएँ

जिंदगी को भाररूप मानकर चलने से वह इतनी भारी प्रतीत होती है कि उसका बोझ उठाए नहीं उठता, पर यदि उसके बारे में हलका−फुलका दृष्टिकोण रखा जाए तो हँसते−खेलते दिन गुजरते जाते हैं। जो लोग छोटी−छोटी बातों को बहुत महत्त्व देते हैं, जरा-सी समस्या को बहुत बड़ी मान बैठते हैं। उन्हें आए दिन भय और विभीषिका की काली घटाएँ ही अपने चारों ओर उमड़ती दिखाई देती रहती हैं। किंतु जो इस सारे संसार को ही एक क्रीड़ास्थल मानते हैं, उनके लिए यहाँ न कोई चिंता की बात है और न परेशानी की।

नाटक का अभिनय

नाटक के परदे बार−बार बदलते रहते हैं। उसमें काम करने वाले अभिनेताओं को कई−कई प्रकार के वेष बदलने और कई−कई प्रकार के अभिनय करने पड़ते हैं। जो अभिनेता अभी राजा का पार्ट राजसी ठाठ-बाट के साथ, बड़े शान, रौब, गर्व और गौरव के साथ कर रहा था, थोड़ी देर बाद उसे भिखारी का पार्ट अदा करना पड़ता है। वैसी ही फटी−टूटी पोशाक पहनकर दीनता भरे शब्दों में भिक्षा−याचना करता है। कभी उसे चोर बनना पड़ता है, तो कभी जनाना पोशाक पहनकर नारी की तरह अपने को प्रस्तुत करना पड़ता है। इस प्रकार एक ही व्यक्ति अनेक तरह के अभिनय तो करता है, पर मन में इस परिवर्तन का प्रभाव ग्रहण नहीं करता। न तो उसे राजा बनते समय कोई हर्षातिरेक होता है और न भिखारी बनते हुए दुःख होता है। नारी के अभिनय में भी उसे लज्जा या संकोच अनुभव नहीं होता; क्योंकि वह जानता है कि यह सब खेल−खेल में हो रहा है। नाटक में जो अभिनय करना पड़ा वह तो दिखावामात्र था। वस्तुतः तो मैं नाटक कंपनी का एक छोटा-सा नौकर मात्र हूँ, जिसे इस प्रकार अपना कार्य करके उदरपूर्ति की व्यवस्था जुटानी पड़ती है।

उद्विग्नता क्यों?

अभिनेता के लिए खिन्न या उद्विग्न होने का कोई कारण नहीं है। देखने वाले उस अभिनय से प्रभावित हो सकते हैं, पर वह नट प्रभावशाली प्रदर्शन करते हुए भी अप्रभावित बना रहता है। जिंदगी जीने की कला का यही रहस्यपूर्ण सिद्धांत अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। जिसने इसे समझ और सीख लिया, उसके लिए चिंतित और उदास बनाने वाली कोई भी परिस्थिति इस दुनियाँ में रह नहीं जाती।

हम किसी भी काम में लापरवाही और असावधानी न बरतें; किंतु किसी भी बात को अनावश्यक महत्त्व भी न दें। खिलाड़ी लोग खेल के मैदान में पूरी दिलचस्पी के साथ अपने−अपने पक्ष को विजयी बनाने के लिए भरपूर कोशिश करते हैं, जरा भी असावधानी नहीं बरतते और न बचाव तथा प्रहार के किसी अवसर की उपेक्षा करते हैं। अपनी समझ और स्थिति के अनुसार दोनों ही पक्ष भरपूर भाग-दौड़ करते हैं। विजय की आकांक्षा प्रत्येक खिलाड़ी को रहती है, हर कोई गौरव और प्रशंसा प्राप्त करना चाहता है और इसके लिए जो कुछ संभव है, सो भरपूर प्रयत्न करता भी है। इतना होते हुए भी हर खिलाड़ी जानता है कि यह सब आखिर खेल ही तो है। खेल की हार−जीत कोई बहुत बड़ा महत्त्व नहीं रखती। खेले के मैदान से बाहर निकलते ही हारे और जीते दोनों ही खिलाड़ी, पक्ष−विपक्ष की, हार−जीत की भावना को भूल जाते हैं और प्रेम तथा आनंद के साथ आगे का कार्य साधारण रीति से फिर करने लगते हैं।

खेल को खेल की तरह खेलें

जिंदगी का खेल भी हाॅकी, फुटबाॅल, पोलो, कैरम, शतरंज के खेलों की तरह खेला जाना चाहिए। शतरंज के खिलाड़ियों के ऊँट, हाथी, प्यादा, शाह आदि क्षण−क्षण में मरते-जीते रहते हैं। खिलाड़ी को इस लाभ−हानि से हलकी−सी मुस्कुराहटमात्र आती है, वह इसे कोई बहुत महत्त्व नहीं देते। जो महत्त्व देने लगा उसके खेल का मजा मिट्टी हो जाता है। ऐसे ही नासमझ खिलाड़ी अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और जरा-सी हार−जीत को महत्त्व देकर आपस में लड़−मरते और शत्रुता बाँध लेते हैं। यही बात जीवनयापन संबंधी नीति में ओछा दृष्टिकोण रहने से भी होती है। जो हँसते हुए जिंदगी जीना नहीं जानते, जिन्हें छोटी−छोटी बातें बहुत बड़ी लगती हैं, वे चिंता, भय, आशंका, निराशा और विक्षोभ में ही डूबे पड़े रहते हैं।

वर्षा के दिनों में बादलों के समूह जब उठते हैं तो उनमें अनेकों प्रकार की आकृतियाँ बनती-बिगड़ती दिखाई देती हैं। अभी एक बादल पहाड़ की चोटी की शक्ल में उठा था, अभी वह रीछ की शक्ल में बदला, अभी ऊँट जैसा बना, अभी पेड़ जैसा दीखने लगा। यह बदलती हुई आकृतियाँ दर्शक के लिए मनोरंजन और कौतूहल का ही कारण बनती हैं। उस परिवर्तन से कोई अपनी निज की हानि−लाभ होने की बात नहीं सोचता। संसार में भी अनेकों चित्र−विचित्र परिस्थितियाँ एकदूसरे से भिन्न और प्रतिकूल रूप धारण करके हमारे सामने आती रहती हैं। कभी ऐसा लगता है कि हम विजयी हुए, धनवान बने, उच्च पद पर पहुँचे और कभी ऐसा दीखता है कि बस सब कुछ चौपट हुआ, अब गिरे अब मरे। हानि और असफलता की निराशाजनक संभावना आँखों में फिरती है। कभी−कभी परिस्थितियाँ अचानक मोड़ लेती हैं। सफलता के पथ पर चलते−चलते अचानक कोई भारी विघ्न सामने आ जाता है और असफलता के क्षणों में कोई ऐसा प्रकाश उत्पन्न होता है कि निराशा आशा में बदल जाती है। इन परिवर्तनों के साथ−साथ यदि मनुष्य अपनी प्रसन्नता और शांति को भी उलटता−पुलटता रहे तब उसे क्षण−क्षण में रोना−हँसना पड़ेगा। फिर उसकी प्रसन्नता परिस्थितियों के हाथ बिकी हुई होगी।

संतुलन न खोवें

यह उचित नहीं कि हम अपना मानसिक संतुलन परिस्थितियों के पास गिरवी रख दें। हमें परिस्थितियों का दास नहीं होना चाहिए। हम कठपुतली न बनें और परिस्थितियों के इशारे पर नाच नाचने के लिए विवश न हों। यह मानवीय गौरव के प्रतिकूल बात है। रूप−कुरूप बने खिलौने हमारी रुचि भिन्नता को ध्यान में रखकर परमात्मा ने भेजे हैं। मिट्टी के बने साँप, शेर को देखकर रोने और कागज के आम, अनार देखकर उछलने का उपक्रम अपना भी लो तो छोटे बालकों के बचपन और अपने बड़प्पन में क्या अंतर रह जाएगा? अनुकूलताएँ कागज के आम, अनार और प्रतिकूलताएँ मिट्टी के साँप, शेर हैं। यह भिन्न प्रकार के मनोरंजन के लिए सामने आते हैं, इनसे भय क्यों किया जाए? उन्हें ललचाई आँखों से क्यों देखा जाए?

झूला झूलते समय आगे-पीछे जाना पड़ता है। चरखी वाले झूलों में ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर आने का चक्र घूमता है। यह आगे-पीछे और ऊपर-नीचे आना−जाना ही तो झूला झूलने का आनंद है। एक ही जगह झूला अड़ा रहे तो फिर उस पर बैठना कौन पसंद करेगा। प्रिय और अप्रिय परिस्थितियाँ हमें झूला झूलने के खेल जैसी लगनी चाहिए। इस धूप−छाँव में, इस कटु-मधुर में, इस शीत-ग्रीष्म की विभिन्नता में हमें रस लेना चाहिए। खिन्नता और उद्विग्नता की इसमें बात ही क्या है?

छोटे को बड़ा न समझें

कहते हैं कि हाथी की आँखें उसके शरीर की तुलना में बहुत छोटी होने के कारण उसे बाहर की चीजें बहुत बड़ी दिखाई पड़ती है। इससे वह अपनी तुलना में और सबको बहुत बड़ा देखता है और डरा−डरा रहता है। यह डर ही उसे जरा-से अंकुश और दुर्बल से महावत का वशवर्ती बनने को विवश करता है। हाथी की इस नासमझी पर हँसा जा सकता है, पर अपने ऊपर हम में से कोई भी नहीं हँसता कि जरा−जरा-सी प्रिय−अप्रिय बातों को बहुत बड़ा महत्त्व देकर इनके कारण हर्षोन्मत होकर अहंकार में इतराने लगते हैं या फिर निराशा के गर्त में डूबकर आत्महत्या करने, घर छोड़कर भाग निकलने, हाथ में लिया हुआ काम बंद कर देने जैसी उद्धत बातें सोचने लगते हैं। भागने से भी समस्याएँ पीछा कहाँ छोड़ने वाली हैं? शुतुरमुर्ग अपना पीछा करने वाले शिकारी से जान बचाने के लिए बालू में अपना मुँह गाड़ लेता है और सोचता है कि आँखें बंद कर लेने पर शिकारी का भय दूर हो जाएगा, पर जल्दी ही शुतुरमुर्ग को अपनी भूल प्रतीत हो जाती है, जब शिकारी उसे और भी जल्दी पकड़ लेता है।

निराश, खिन्न और उद्विग्न होने से तो कठिनाइयों का आक्रमण और भी दूने वेग से होता है। असावधानी और उपेक्षा की तरह उद्विग्नता और चिंता भी मनुष्य की शक्ति, योग्यता एवं प्रतिभा को नष्ट−भ्रष्ट करके रख देती हैं। सामर्थ्यवान होते हुए लुंज−पुंज बन जाने का सबसे बड़ा कारण यह है कि मनुष्य छोटी−मोटी प्रतिकूलताओं को बढ़ा−चढ़ाकर देखता है और उस स्वनिर्मित विभीषिकाओं से आप-ही-आप डरता−मरता और मूर्छित चेतना के साथ−साथ विक्षुब्ध जीवन व्यतीत करता रहता है।

अधिक-से-अधिक कितनी हानि

सोचना चाहिए कि जो मुसीबत सामने दिखाई पड़ती है, वह अधिक-से-अधिक कितनी हानि पहुँचा सकती है और उतनी हानि हो जाने पर भी अपना साधारण जीवनक्रम चलता रह सकता है या नहीं? यदि उस हानि को उठाकर भी जीवनक्रम का पहिया लुढ़कता रह सकता है तो फिर हताश होने की क्या बात रह जाती है? कोई विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाता है। इसकी हानि अधिक-से-अधिक इतनी ही हो सकती है कि नौकरी एक वर्ष बाद लगे या एक वर्ष की फीस आदि का पैसा अधिक लग जाए। यह हानि मानव जीवन की पेचीदगियों को देखते हुए अप्रत्याशित नहीं है; जबकि 60 प्रतिशत अनुत्तीर्ण और 40 प्रतिशत उत्तीर्ण होने वालों की संख्या ही हर साल सामने आती है तो अनुत्तीर्ण होना कोई ऐसी बड़ी दुर्घटना होना नहीं माना जा सकता, जिसके लिए वह छात्र आत्महत्या जैसी बातें सोचे या अपने मन को बहुत छोटा बनावे।

अपने ऊपर कोई मुकदमा चल रहा है। उसमें कुछ अर्थहानि या राजदंड हो तो आपत्ति आ सकती है। जब जेलों में रहने वाले कैदी आजीवन कारावास को हँसते−खेलते काट लेते हैं, तो उस मुकदमे में ही अपने ऊपर क्या वज्रपात होने वाला है, जिसके कारण आधीर बना जाए? बीमारी किसे नहीं आती, यदि अपने को या किसी परिजन को बीमारी का सामना करना पड़ रहा है, तो मौत ही सामने खड़ी क्यों सूझनी चाहिए? असाध्य समझे जाने वाले रोगी भी तो अच्छे होते रहते हैं। फिर मान लीजिए किसी को मरना ही पड़े तो इसमें कौन अनहोनी बात है। आज नहीं तो कल सभी का अपने रास्ते जाना है, किसी के अभाव में इस दुनियाँ का कोई काम रुकता नहीं, प्रियजनों का विछोह भी तो लोगों को सहना पड़ता है, फिर अपने सामने भी यदि वैसी परिस्थितियाँ आने वाली हों तो उसके लिए चिंतातुर क्यों रहा जाए?

व्यापार में दस दिन लाभ होता है तो एक दिन हानि का भी होता है। खेती में जहाँ अच्छी फसल उगा करती है, वहाँ अतिवृष्टि, अनावृष्टि से दुर्भिक्ष भी पड़ते हैं और लोग किसी प्रकार उस दुर्भिक्ष का मुकाबला करते हुए भी जीवित रहते हैं। चोरी, डकैती, अग्निकांड आदि में लोगों का सर्वस्व चला जाता है, फिर कुछ दिन बाद पुनः काम-चलाऊ स्थिति बन जाती है और गाड़ी फिर लुढ़कने लगती है। जब दुर्घटना में एक टाँग कट जाती है तो वह सोचता है कि एक पैर से तो चलना क्या, खड़ा हो सकना भी कठिन है; पर कुछ दिन बाद उपाय निकलता है लकड़ी के सहारे वह लँगड़ा आदमी खड़ा होता है, चलता है और दौड़ने भी लगता है। ईश्वर की इस सृष्टि में ऐसी व्यवस्था मौजूद है कि तथाकथित विपत्ति आने के बाद उसका कोई प्रतिकार भी निकलता है और बिगड़ी को बनाने वाला ईश्वर उस अव्यवस्था में भी व्यवस्था का कोई मार्ग निकाल देता है।

आशंकाओं की विभीषिका

भविष्य में जिन आपत्तियों के आने की हम आशंकाएँ किया करते हैं, वस्तुतः उनमें से एक-चौथाई भी सामने नहीं आतीं। जो आती हैं, वे वैसी भयंकर नहीं होती, जैसी कि डरते हुए कल्पना की जाती थी। कठिनाई देने वाला उसके समाधान का मार्ग भी सुझाता है। दरद देने वाला दवा भी देता है। ईश्वर किसी को भी असहाय नहीं छोड़ता वह विपत्ति में भी साथ रहता है। माता छोटे बच्चे को नदी में स्नान कराते समय मजबूती से पकड़े भी रहती है कि कहीं वह डूब या बह न जाए। परमात्मा कठिनाइयों भरा नदीस्नान तो कराता है, पर हम में से किसी भी बालक का हाथ नहीं छोड़ता। कठिन समय में भी उसका सहारा मिलता रहता है। अंधेरे में भी उसका प्रकाश चमकता रहता है।

हम हर काम में पूरी−पूरी सावधानी बरतें, मुस्तैद रहें और सतर्कतापूर्वक अपने कर्त्तव्य का ठीक−ठीक पालन करते रहें, पर साथ ही यह भी ध्यान रखें कि यहाँ ऐसा महत्त्वपूर्ण कुछ भी नहीं है, जिसके लिए चिंतित, परेशान, उद्विग्न और निराश हों। पतंग की डोरी की तरह परिस्थितियाँ उलझती भी रहती हैं और सुलझती भी। रात के बाद दिन निकलता है, मौत के बाद जीवन मिलता है, निद्रा के बाद जागृति आती है। फिर हम आशा का सूत्र क्यों तोड़ें? हिम्मत क्यों हारें? दिल क्यों टूटने दें? संपदा में भी जो रोते खीझते रहते हैं, उनकी अपेक्षा वे अधिक बुद्धिमान हैं जो विपदा में भी मुस्कराना जानते हैं। परिस्थितियाँ जिन्हें दबा डालती हैं, जिन्हें तोड़ देती हैं, वे कमजोर मनुष्य दीन−दुर्बल और दया के पात्र ही समझे जा सकते हैं। धीर और वीर वे हैं, जो निडर रहते हैं, हिम्मत नहीं छोड़ते, अधीर नहीं होते और हर कठिनाई का हँसते−मुस्कराते स्वागत करते हैं।

हम टूट जाने वाले कच्ची मिट्टी के खिलौने क्यों बनें? लोहे को घन क्यों न बनें जो निरंतर चोटें पड़ते रहने पर भी अविचल बना रहता है। माथे पर शिकन भी नहीं आने देता। कठिनाई बेशक बड़ी होती हैं, पर मनुष्य की आत्मा उससे बड़ी है। धैर्यवान समुद्र को लाँघते और असंभव को संभव बनाते हैं। जरा−जरा-सी कठिनाइयाँ हमें डराती और विक्षुब्ध करती हैं, यह स्थिति खेदजनक ही मानी जाएगी, मानव जीवन के अनुपयुक्त भी। जिंदगी सचमुच एक खेलमात्र है, उसे खेल की तरह ही जिया जाना चाहिए।


इतना भी क्या कम है?

मनुष्य के उदास, खिन्न और चिंतित रहने का सबसे बड़ा कारण असंतोष है। जितना कुछ उपलब्ध है, वह हमें बहुत कम दिखाई पड़ता है। आकांक्षाओं की तुलना में जब परिस्थितियाँ हलकी पड़ती हैं, तो यह अनुभव होता है कि हम दीन, दरिद्र, दुखियारे और अभावग्रस्त हैं। धन के बारे में आमतौर से यही स्थिति लोगों की होती है। जिससे पूछा जाए, वह यही उत्तर देगा कि मेरी आकांक्षाओं की तुलना में मेरी आर्थिक स्थिति गिरी हुई है। यह कमी उसे दुखी और असंतुष्ट बनाए रहती है। और भी अनेकों आकांक्षाएँ ऐसी हैं, जिनकी अतृप्ति से मन खिन्न रहता है। यश, सम्मान, पद आदि की इच्छा भी ऐसी ही प्रबल होती हैं। उसकी पूर्ति अपनी भावना के अनुरूप न हो तो मन भारी बना रहता है। उदासी छाई रहती है। वासनाओं की पूर्ति भी एक कारण होता है। कामक्रीड़ा का विनोद मनुष्य को अन्य सब विनोदों में अधिक प्रिय है। इस प्रिय स्थिति को वह अधिक विस्तार में, अधिक समय तक, अधिक मात्रा में प्राप्त करना चाहता है। कुछ कमी इसमें रहती दिखती है तो भी उसे अप्रसन्नता अनुभव होती है।

आनंद की आकांक्षा

मनुष्य स्वभावतः आनंदी जीव है। आनंद प्राप्त करने के लिए ही आत्मा इस भूलोक में अवतरित होती है। आनंद की खोज में ही जीव निरंतर लगा रहता है। जिधर उसे आनंद अनुभव होता है, उधर ही चल पड़ता है। आनंद कहाँ है?कहाँ नहीं? यह प्रश्न दूसरा है। मृग पानी की तृष्णा में सफेद रेत को जलाशय मानकर भागा−भागा फिरे, यह भ्रमपूर्ण स्थिति का होना बात दूसरी है, पर इच्छा और प्रयत्न तो उसका जल के लिए ही है। हर मनुष्य आनंद चाहता है। वह कहाँ है और कैसे मिले, यह प्रश्न दूसरा है। हर एक की अपनी समझ अलग होती है, जिसे जैसे सूझ पड़ता है, वह वैसे सोचता और करता है, पर यह निर्विवाद है कि आनंद ही प्राणी का अभीष्ट है और वह उसी के लिए प्रयत्नशील है। परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयत्न भी तो इसीलिए है कि वह परमानंद, सच्चिदानंद, ब्रह्मानंदस्वरूप है। सबसे अधिक आनंददायक स्थिति परमात्मा की प्राप्ति के साथ प्राप्त होती है, इसीलिए तो ईश्वरप्राप्ति का प्रयत्न विचारशील लोग किया करते हैं। सांसारिक अनेक प्रकार के साधन-सामग्री इकट्ठी करते रहना, विलासिता के अगणित साधन जुटाना, विनोद-मनोरंजन के लिए लालायित रहना भी तो इसीलिए है कि आनंदमय अवसर प्राप्त होता रहे।

उपलब्धि का मार्ग

आनंद कैसे प्राप्त हो, इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने से एक ही उपाय प्रतीत होता है— वह है, कामनाओं की पूर्ति। आप्तकामतृप्त मनुष्य ही संतुष्ट और आनंदयुक्त दिखाई पड़ता है। स्वर्ग को स्वर्ग इसलिए कहते हैं कि वहाँ कल्पवृक्ष और कामधेनु की सत्ता फैली हुई है। कल्पवृक्ष के नीचे बैठने से जिसकी जैसी भी कामना हो, वह तुरंत पूर्ण हो जाती है। यही बातें कामधेनु के बारे में भी है, उसके समीप जाने पर भी कामनाओं की पूर्ति होती है। कामनाएँ जिनकी पूर्ण हो गई हैं, वे देवताओं के समान सुखी रहेंगे, सुंदर दिखेंगे और अपने को अजर−अमर अनुभव करेंगे। जिस स्थान पर कामनापूर्ति के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु सरीखे दो−दो साधन मौजूद हों, उस स्वर्ग की कामना हम सब करते हैं तो यह उचित ही है। परिपूर्ण आनंद की उपलब्धि यदि स्वर्ग में होती है, तो वही तो हमें अभीष्ट होगा भी।

कामना कैसे पूर्ण हों?

विचारणीय प्रश्न यह है कि कामनापूर्ति के साधन हम कैसे जुटावें, जिससे आनंद की प्राप्ति संभव हो सके। इसके दो उपाय हैं, एक यह है कि जो वस्तुएँ हम चाहते हैं, वह प्राप्त हो जाए, दूसरा यह कि जो प्राप्त है, उसे पर्याप्त मान लिया जाए। कामनाएँ करते समय अक्सर लोग यह भूल जाते हैं कि आज की अपनी परिस्थितियों में कितना, क्या संभव हो सकता है? अपने साधन किस सीमा तक अधिक सुविधाएँ दे सकने में समर्थ हैं? आज की अपनी क्षमता और स्थिति को भूलकर लोग कल्पना के ऐसे प्रवाह में बहने लगते हैं, जिसका आज की परिस्थिति से कोई तालमेल नहीं बैठता। दूसरे लोगों ने इतनी उन्नति कर ली या इतनी सुविधा प्राप्त कर ली तो हम भी उतना ही क्यों न प्राप्त कर लें। यहाँ वह भूल जाते हैं कि उन्होंने कितने समय में, किन परिस्थितियों में, किन साधनों के द्वारा क्या लाभ प्राप्त किया है। उन साधनों  को हम भी जुटावें और जितने−जितने साधन बढ़ते जाए, उतनी-ही-उतनी आकाँक्षाएँ भी बढ़ाते जावें।

हम शेखचिल्ली न बनें?

शेखचिल्ली का उपहास इसलिए उड़ाया जाता है कि वह बेचारा अपने वर्त्तमान साधनों की अल्पता का विचार न करके बड़ी−बड़ी कामनाएँ करने लगता था। यों विवाह करने और सच्चा होने की कामना कोई असंभव बात नहीं है। बहुत लोग इस इच्छा को पूर्ण करते हैं, पर शेखचिल्ली को मूर्ख इसलिए माना गया कि उसने उतने साधन जुटाने में लगने की अपेक्षा तुरंत— क्षण भर में अपना मनोरथ पूरा करने की उड़ान उड़नी शुरू कर दी। फलस्वरूप वह कामनापूर्ति से ही वंचित नहीं रहा, वरन इस हड़बड़ी में सिर पर रखा तेल का घड़ा भी फोड़ बैठा और नई मुसीबत में फँस गया। अपनी औकात, हैसियत, योग्यता और परिस्थिति की बात को भुलाकर बहुत से लोग बड़े−बड़े मनोरथों की पूर्ति के लिए कल्पना-लोक में उड़ते रहते हैं और वे सपने जब दूर हटते, देर लगाते दिखते हैं तो व्याकुल हो जाते हैं, असंतोष और अतृप्ति की आग में बेतरह जलने लगते हैं।

आनंद को प्राप्त करने के लिए जो सचमुच इच्छुक हैं, उन्हें ऐसी भूल नहीं करनी चाहिए। आज के साधनों से सुविधापूर्वक कल हम क्या, कितना लाभ प्राप्त कर सकते हैं; बस कामना को इतना ही बढ़ने देना चाहिए। इससे अधिक यदि वह बढ़ रही हो तो तुरंत रोकना चाहिए। कल जब परिस्थितियाँ अधिक अच्छी हो जाए तो परसों के लिए उससे बड़ी कामना की जा सकती है। कामना और कल्पना को बढ़ाने में कोई कठिनाई नहीं। क्षण भर में सात समुद्रों का राजा बनने की आकांक्षा बढ़ाई जा सकती है। कठिनाई तो उसका नियंत्रण करने में है। आनंदप्राप्ति के इच्छुकों को यह नियंत्रण करना ही होता है, अन्यथा बढ़ी हुई कामनाओं के सामने उपाय और साधन इतने ही तुच्छ सिद्ध होते हैं, जितने जलते तवे पर पानी के कुछ छींटे।

प्रगति करें, पर हड़बड़ाऐं नहीं

प्रगति करना मनुष्य का धर्म है। उन्नति के लिए, आगे बढ़ने के लिए हर एक को प्रयत्न और पुरुषार्थ करना चाहिए। यह उचित भी है और आवश्यक भी। पर यह सब कार्य सुव्यवस्थित, सुनियंत्रित, क्रमबद्ध और संतुलित विचारशीलता के साथ होना चाहिए। हाथी पानी में घुसता है तो हर पैर पर अपना वजन तोल लेता है, जब एक पैर ठीक तरह जम जाता है, तब दूसरा आगे बढ़ाता है, यदि वह अंधाधुंध जलाशय में दौड़ पड़े तो उसका भारी शरीर उसे किसी विपत्ति जैसे गड्ढे में ही फंसा देगा। बहुत जल्दी अनियंत्रित कामनाओं की पूर्ति के लिए आतुर मनुष्य कुकर्म करके या तो विपत्ति में फँस जाते हैं अथवा निराशा और खिन्नता के गर्त्त में डूबे हुए अपने भाग्य को धुनते रहते हैं। एक काम और भी ऐसे लोग किया करते हैं, वह यह कि जो कोई सामने आ जाए, उसी पर अपनी असफलता का दोष मढ़ देते हैं। इसके असहयोग के कारण मेरा काम बिगड़ा, उसने बाधा पहुँचाई, इसने टाँग अड़ाई आदि की शिकायत जो भी आस−पास दिखे, उसी पर लगाने लगते हैं। और कोई दिखाई न पड़े तो लाखों−करोड़ों मील पर रहने वाले राहु, केतु, शनिश्चर, भूत, पलीत, देवता, विधाता, भाग्य, दुर्दिन आदि पर दोषारोपण करके किसी प्रकार अपना मन हलका करते हैं। किसी−किसी को सरकार भी सारी कठिनाइयों का कारण प्रतीत होती है। वे उसी पर सारा दोष थोपकर आप निवृत्त होना चाहते हैं।

साधनों और कामना से तालमेल

साधनों की तुलना में कामनाएँ अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर रखना असंतोष का प्रधान कारण है। और यह भूल जब तक बनी रहेगी, तब तक असंतोष और अशांति की मनोभूमि बनी रहने के कारण आनंद का दर्शन दुर्लभ ही रहेगा। महत्वाकाँक्षाऐं उच्च जीवन की, आदर्शवाद की, आत्म−निर्माण की और महामानव बनने की रहनी चाहिए। इस सुरदुर्लभ मानव−जीवन का सर्वश्रेष्ठ उपयोग जो हो सकता है वह कर डाले, यह महत्वाकाँक्षा प्रशंसनीय है। इस मार्ग पर बढ़ाया हुआ प्रत्येक कदम आत्मसंतोष का वातावरण उत्पन्न करेगा किन्तु भौतिक अधिकाधिक भौतिक संपदाओं की, अहंकार की पूर्ति, विलासिता की महत्वाकाँक्षाऐं यदि मन में कोलाहल कर रही होंगी तो हर सफलता के बाद और दूनी आग भड़केगी और अधिक लालची बनकर मनुष्य अपने आप अधिक लाभ प्राप्त करते चलने के साथ−साथ अधिक दीन-दरिद्र होने का भी अनुभव कर रहा होगा।

क्या यह भी कुछ कम है?

जितना कुछ आज मिला हुआ है, यदि विचार करें तो वह किसी भी प्रकार कम नहीं है, वरन ऐसा प्रतीत होगा कि परमात्मा ने बहुत पहले ही आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुत कुछ हमें दे रखा है और वह इतना पर्याप्त है कि उस पर गर्व और संतोष अनुभव किया जा सकता है। अपने से नीची परिस्थितियों में पड़े हुए करोड़ों मनुष्य ऐसे होंगे, जिन्हें यदि हमारे जैसा अवसर मिल जाए तो वे इसे अपना भारी सौभाग्य समझें। असंख्य अस्वस्थ एवं पीड़ाग्रस्त मनुष्यों की तुलना में क्या हमारा काम-चलाऊ स्वास्थ्य वाला शरीर कुछ अधिक बुरा है? कोढ़ी, अंधे, अपाहिज, गूँगे, बहरे लोगों की तुलना में क्या अपना अच्छा खासा शरीर कुछ कम है? रोज कुँआ खोदने, रोज पानी पीने वाले असंख्य मनुष्य ऐसे हैं, जिनकी आजीविका सर्वथा अनिश्चित रहती है और किसी दिन फाका, किसी दिन अधपेट रहना पड़ता है, क्या उनकी तुलना में हमारे आजीविका स्रोत अच्छे नहीं हैं? जिनका गृहस्थ है ही नहीं, है तो घोर कलह और अविश्वास से भरा हुआ है, उनकी तुलना में कुछ त्रुटियाँ रहते हुए भी क्या हमारा परिवार अधिक गया-बीता है? जिनने सामाजिक सम्मान और नागरिक अधिकार अनुभव भी नहीं किया, उन पिछड़े लोगों की तुलना में जो जन्मजात सुविधाएँ हमें मिली हुई हैं, वे कुछ कम हैं? पशु−पक्षी, कीट-पतंग, जीव−जंतु जिन्हें बोलने, पढ़ने, सोचने, खाने, सोने, रहने, पहनने, कमाने आदि की कोई सुविधा प्राप्त नहीं है, उनकी तुलना में हमारा मनुष्य जीवन क्या कहीं उत्कृष्ट स्थिति में नहीं है? इन प्रश्नों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि परमात्मा ने जो कुछ हमें दिया है, वह बहुत है, दूसरों की तुलना में कहीं ज्यादा है और इतना है कि उसके आधार पर हँसी−खुशी का जीवन सुविधापूर्वक व्यतीत किया जा सकता है।

सबसे बड़ी बाधा

आनंद का सबसे बड़ा शत्रु है असंतोष। हम प्रगति के पथ पर उत्साहपूर्वक बढ़े। परिपूर्ण पुरुषार्थ करें। आशापूर्ण सुंदर भविष्य की रचना के लिए संलग्न रहें; पर साथ ही यह भी ध्यान रखें कि असंतोष की आग में जलना छोड़ें। इस दावानल में आनंद ही नहीं, मानसिक संतुलन और सामर्थ्य का स्रोत भी समाप्त हो जाता है। असंतोष से प्रगति का पथ प्रशस्त नहीं, अवरुद्ध होता है। जल्दी कामना पूर्ण हो, इस हड़बड़ी में ही चित्त उलझा रहता है। प्रगति-पथ पर व्यवस्थापूर्वक बढ़ चलने के योग्य धैर्य और शांत चित्त द्वारा बन सकने वाली योजना भी उससे कहाँ बन पड़ती है? ऐसा व्यक्ति कोई ठोस सफलता प्राप्त कर सकेगा, इसमें संदेह ही बना रहेगा।

कामधेनु और कल्पवृक्ष

आज जो उपलब्ध है, उससे पूरा−पूरा आनंद उठाया जाना चाहिए। अपना शरीर, परिवार, आजीविका आदि के जो साधन उपलब्ध हैं, उनसे चित्त में पूर्ण संतोष और हर्ष अनुभव करना चाहिए। जो मिला है, वह ईश्वर की अपार कृपा का फल है। अकेला मानव जीवन ही संसार के समस्त प्राणियों की तुलना में सबसे बड़ा सौभाग्य है, फिर वह चाहे कितना ही अभावग्रस्त क्यों न हो। अपने अभावों की बात ही सदा नहीं सोचते रहना चाहिए, वरन यह भी सोचना चाहिए कि जो मिला हुआ है, वह भी क्या किसी प्रकार कम है? कामधेनु और कल्पवृक्ष हमारे अंतःकरण में मौजूद हैं। तृष्णाओं को सीमित करना कल्पवृक्ष है और जो मिला है, उस पर आनंद की अनुभूति करना कामधेनु है। स्वर्ग अपने भीतर है। आनंद के अमृत को खोजने कहीं जाना नहीं है। उसका मंगलकलश तो अपने हृदय में ही सुसज्जित रखा हुआ है। हम संतोष की साँस लें तो उसके साथ−साथ आनंद का मलय-मारुत प्रवाहित होगा। संतोषी मनुष्य की मुट्ठी में आनंद भरा रहता है। वह स्वयं तृप्त रहता है और अपनी तृप्ति की सुगंध से समीपवर्त्ती लोगों को भी तृप्त करता रहता है।


प्रसन्न रहें, प्रफुल्ल बनें?

रुपये के दोनों भागों में भिन्न प्रकार की आकृति बनी होती है। एक तरफ कुछ और लिखा रहता है और दूसरी ओर दूसरी प्रकार के अंकन होते हैं। जिधर से भी हम उसे देखते हैं, वही आकृति सामने आ जाती है। संसार में अच्छा और बुरा दोनों प्रकार का मसाला लगा हुआ है। ईंट और चूना अलग−अलग तरह की चीजें हैं, पर उन दोनों को मिलाकर ही इमारत बनती है। लगता है ईश्वर को इस दुनियाँ की इमारत बनाते समय अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के पदार्थों की जरूरत अनुभव हुई होगी। जो भी हो यह एक तथ्य है कि यहाँ परस्पर विरोधी दो सत्ताएँ मौजूद हैं। प्रिय−अप्रिय, सुख−दुःख, पुण्य-पाप, मित्र−शत्रु, शुभ−अशुभ, विजय−पराजय, सत्−तम, देव−असुर। इन दोनों को परस्पर विरोधी कहिए या एकदूसरे के पूरक कहिए, दोनों यहाँ मौजूद हैं।

ईश्वर की विविध रचना

यह भिन्नता परमात्मा ने क्यों बनाई?  इसका वास्तविक कारण तो वही जानता है, पर इतना हम सब जानते हैं कि विकास और विनोद की दृष्टि से संघर्ष आवश्यक है, उसके बिना गतिहीनता का सन्नाटा छा जाएगा। सब भले, निरोग, सज्जन, विद्वान हों तो फिर कचहरी, पुलिस, फौज, युद्ध, धर-पकड़, नियन्त्रण, अस्पताल, जेल, धर्मोपदेश, उपार्जन, संग्रह, लोकसेवा, शासन आदि की कोई जरूरत ही न रह जाएगी। दुनियाँ में जो इतनी हलचल दिखाई पड़ती है, वह सब नष्ट हो जाएगी और सर्वत्र सन्नाटा छाया रहेगा। संभव है, विनोदी परमेश्वर ने अपनी दुनियाँ को बिल्ली-चूहे का खिलौना जैसा बनाकर खड़ा किया है।

जो हो, हम अपनी मनमरजी की दुनियाँ नहीं बना सकते। यह जैसी भी कुछ है, उसी में काम चलाना पड़ता है। सुधार के लिए समय−समय पर नेता, गुरु, मार्गदर्शक, विचारक और अवतार यहाँ आते रहते हैं और कुछ समय के लिए असंतुलित स्थिति को संतुलित कर जाते हैं। बिगाड़ फिर शुरू हो जाता है और कुछ दिन बाद कोई नया अवतार फिर आता है। इस प्रकार बिगाड़ने वाली आसुरी और सुधारने वाली दैवी शक्तियाँ अपना−अपना काम बराबर करती रहती है। यहाँ यह रस्साकशी अनादिकाल में चलती चली आ रही है और आगे भी चलती रहेगी।

शुभ में अनुरक्ति, अशुभ की उपेक्षा

सोचना यह है कि यहाँ हम किस प्रकार सोचें और करें, जिससे हमारे आनंद−उद्देश्य में विक्षेप उत्पन्न न हो। उपाय एक ही है कि हम शुभ में अनुरक्त रहें और अशुभ की उपेक्षा करें। उपेक्षा से मतलब यह नहीं कि उसे सुधारा न जाए, गंदगी को जहाँ का तहाँ पड़ा रहने दिया जाए, वरन यह है कि मस्तिष्क को उससे अत्यधिक प्रभावित न होने दिया जाए, उसी का चिंतन सदा न करते रहा जाए। अनुरक्ति से मतलब यह है कि यहाँ जो कुछ श्रेष्ठ है, शुभ है, उससे अधिक संपर्क बढ़ाया जाए, उसकी समीपता प्राप्त की जाए और उसी के संबंध में मस्तिष्क को अधिक सोच-विचार करने दिया जाए।

हमारे मन और मस्तिष्क की बनावट दर्पण की तरह है, इसमें जिस प्रकार की छाया पड़ती है, उसका रूप वैसा ही दीखने लगता है। जो वस्तु सामने रखी होगी, दर्पण में भी वैसी ही आकृति प्रतिबिंबित होगी। जैसे लोगों के संपर्क में रहा जाएगा, जैसा साहित्य पढ़ा जाएगा, जैसे वातावरण में बसा जाएगा, जैसा सोचते रहा जाएगा, मन उसी ढाँचे में ढलने लगेगा और फिर धीरे−धीरे अपना स्वभाव एवं दृष्टिकोण भी वैसा ही बन जाएगा। छोटे बच्चे जो कुछ देखते-सुनते हैं, उसी की नकल बनाने लगते हैं। उनका सारा शिक्षण ही इस प्रकार चलता है। विकास का क्रम भी यही है, थोड़े व्यक्ति ऐसे भी होते हैं, जो अपनी मनःस्थिति से प्रतिकूलता को भी अनुकूलता में परिणत कर लेते हैं, पर अधिकांश ऐसे होते हैं, जो परिस्थितियों के प्रवाह में बहने लगते हैं। मस्तिष्क में जिस प्रकार के विचार भरे रहते हैं, वस्तुतः उसका संग्रह ही सच्ची परिस्थिति है। उसी के प्रभाव से मानव जीवन की दिशाएँ बनती और मुड़ती रहती हैं।

विचारों का आकर्षण

अपने मस्तिष्क में किस प्रकार की विचारधाराएँ उठती, बनती और जमती हैं, इसे देखना और समझना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि इसी के आधार पर तो जीवन की दिशा बननी है। हम जैसा सोचते हैं, वैसा करने लगते हैं और जो करते हैं, वही हमारा व्यक्तित्व एवं चरित्र माना जाता है। हम क्या बन रहे हैं, बनने जा रहे हैं, और अंततः क्या बन जाएँगे, इसका निष्कर्ष निकालना कुछ अधिक कठिन नहीं है। किस स्तर की विचारधारा मस्तिष्क में घूमती रहती हैं, किन भावनाओं से प्रेम है, यह मालूम हो जाने पर यह अनुमान सहज ही लग जाता है कि हमारा भविष्य क्या बनने जा रहा है।

अच्छा भाग्य उज्ज्वल भविष्य

यह मान्यता है कि भाग्य की कर्मरेखाएँ मस्तक की खोपड़ी के भीतर लिखी होती हैं। जो कुछ उसमें लिखा हुआ है, वही होकर रहता है। यह मान्यता इस अर्थ में तो सर्वथा सत्य मालूम पड़ती है कि खोपड़ी के भीतर रहने वाले मस्तिष्क में जिस तरह की भावना, विचारधारा, मान्यता तथा अभिरुचि जम गई होगी उसी दिशा में उसका जीवन मुड़ेगा और वैसी ही परिस्थितियाँ उसे उपलब्ध हो जाएँगी। मनीषियों का कथन है कि “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।” क्योंकि वह स्वयं ही अपने लिए किसी विचारशैली को पसंद करता है और जिसे वह चुन लेता है, उसी का प्रतिफल उसके सामने आकर खड़ा हो जाता है।

हर कोई यह सोचता है कि उसका भविष्य उज्ज्वल बने, सदा प्रसन्नता रहे और मंगलमय परिस्थितियों एवं व्यक्तियों से संपर्क रहा करे। इस इच्छा की पूर्ति तनिक भी असंभव नहीं है, यदि अपने विचारों पर नियंत्रण करना, कुविचारों को हटाना और सद्विचारों को अपनाना सीख लिया जाए। विचारों में एक उच्चकोटि की आकर्षक शक्ति रहती है। वे उसी प्रकार के व्यक्तियों, साधनों और परिस्थितियों को खींच के पास बुला लेते हैं जैसे कि वे स्वयं होते हैं। चोर का चोरों से वास्ता बढ़ता जाता है और सज्जनों के सत्संग में सत्पुरुषों की संख्या बढ़ती जाती है। कामुकता के गंदे विचार जिन मस्तिष्कों में भरे पड़े रहते हैं, उन्हें अश्लील पुस्तकें, बेहूदी तस्वीरें, भद्दे फिल्म, घृणित स्त्रियाँ, दुष्ट साथी कहीं-न-कहीं से मिल ही जाते हैं। यह सब सरंजाम जुट जाने के बाद वह दुर्गति भी अपने आप आगे आ जाती है, जो ऐसे लोगों के लिए उचित है।

बुराई में अच्छाई खोजें

बुराइयों की ओर से हमें अन्यमनस्क रहना चाहिए। उन्हें बढ़ने से रोकना तो चाहिए, पर निरंतर उन्हीं का चिंतन करें और उन्हीं में तन्मय होकर अपनी मनोभूमि को भी वैसी ही गंदी बना लें, यह उचित नहीं। बुरी बातों को सोचते रहने से मन में क्रोध, क्षोभ, घृणा, द्वेष और दुःख की ही भावनाएँ बढ़ेंगी और इस बढ़ोत्तरी से न अपना आंतरिक विकास होगा, वरन उलटे बाहरी स्वभाव में निंदा, ईर्ष्या, द्वेष, कुढ़न, कटुता का समावेश हो जाने से अपने व्यक्तित्व का स्तर नीचा हो जाएगा। चिड़चिड़ापन, झुँझलाहट, अविश्वास, तिरस्कार, क्रोध, आवेश का स्वभाव उन लोगों का बन जाता है, जो दुनियाँ में बुराई ढूँढते, देखते, सुनते और मानते रहते हैं। यह लाभदायक नहीं हानिकारक प्रक्रिया है। चित्त को दुर्भावनाओं में डुबाए रहना कहाँ की बुद्धिमानी है? इसमें अपना तो अहित-ही-अहित है।

दुनियाँ में जबकि बुराई ही नहीं, अच्छाई भी मौजूद हैं तो उसे ही क्यों न ढूँढा, सोचा, चुना और अपनाया जाए, जिससे अपने मन को शांति, संतोष और प्रसन्नता अनुभव हो। लोगों ने अपने साथ अनेकों उपकार और अनेकों अपकार किए होते हैं। यदि अपकारों को याद रखा जाए और उपकारों को भुला दिया जाए तो दुनियाँ अत्यंत निष्कृष्ट कोटि के स्वार्थियों से भरी प्रतीत होगी; किंतु यदि अपकारों की उपेक्षा कर उपकारों को ही स्मरण रखा जाए तो ऐसा प्रतीत होगा कि इस संसार में अधिकतर लोग देवता जैसे स्वभाव वाले ही रहते हैं।

भीतरी परिवर्तन से बाह्य परिवर्तन

संसार को असुरों से भरा देख−देखकर कुढ़ते रहने का यदि अपना मन हो तो इसका बहुत सरल उपाय है कि मनुष्यों की बुराइयों को ढूँढा, देखा, सुना और सोचा जाए। इसके विपरीत यदि ऐसा विचार हो कि संसार में देवताओं का निवास देखकर संतोष और प्रफुल्लता की अनुभूति उपलब्ध हो तो वह मार्ग भी सरल है। करना केवल इतना पड़ेगा कि लोगों के सद्गुण, सत्कर्म, सद्भाव और सत्प्रयत्नों को खोजने में मन लगाना होगा और उनकी छोटी−छोटी भूलों की उपेक्षा एवं अपूर्णता को एक छोटी−सी झाँकीमात्र समझकर उपेक्षा में डाल देना होगा। इस आंतरिक परिवर्तन से बाहरी दुनियाँ बिलकुल दूसरी प्रकार की दिखाई देने लगेगी।

द्वेष की फूटी आँख से दीखने पर यहाँ सर्वत्र अंधेरा-ही-अंधेरा सूझेगा, पर यदि प्रेम की ज्योति की पुतली में चमक होगी, तो यह सुंदर तस्वीर-सी दुनियाँ अत्यंत मनोरम और शोभा सौंदर्य से परिपूर्ण दीख पड़ेगी। दुनियाँ को बदलने से पहले हमें अपनी आँख का इलाज करना होगा। संसार में बिखरे हुए सब काँटे हटाकर निष्कंटक मार्ग बना सकना कठिन है। हाँ, यह हो सकता है कि पैरों में जूते पहनकर काँटे-कंकड़ों को कुचलते हुए चाहे जिधर से अपना रास्ता बना लिया जाए। अपने देखने का ढंग बदल लिया जाए, अपनी विचारशैली को यदि सुधार लिया जाए तो यहाँ प्रसन्नता और आनंददायक परिस्थितियाँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सकती हैं। अपने छोटे−मोटे साधन और भले−बुरे स्वजन-संबंधी ही प्राणप्रिय दीखने लग सकते हैं। संतोष के लिए यहाँ पर्याप्त साधन मौजूद हैं।

अच्छाई को ढूँढें और अपनावें

संसार में बुराई बहुत है पर अच्छाई से अधिक नहीं। यदि यहाँ पाप और अशुभ ही अधिक होता तो आनंदी आत्मा इस भूलोक में अवतरित होने के लिए स्वेच्छापूर्वक कभी भी तैयार न होती। कोई मरना नहीं चाहता, मरते समय दुःख मानता है, उसका तात्पर्य ही यह है कि यहाँ उसे अप्रिय की अपेक्षा प्रिय, दुःख की अपेक्षा सुख अधिक दिखाई दिया है। दुखी व्यक्ति तो आत्महत्या तक के लिए उतारू हो जाता है; पर हम सब मरने की बात सुनने तक से घबराते हैं। आत्मा यह अनुभव करती है कि यहाँ दुःख की अपेक्षा सुख अधिक है। बुराई की तुलना में अच्छाई बढ़ी−चढ़ी है, इसलिए यहाँ ही रहना चाहिए। इस शरीर में ही रहना चाहिए। इसे छोड़कर नहीं जाना चाहिए। मौत का डर लगना इसी तथ्य की पुष्टि करता है।

गांधी जी के तीन गुरु

गांधी जी की चौकी पर तीन बंदरों के खिलौने रखे रहते थे। एक ने मुँह पर अपने दोनों हाथ रखे थे। दूसरे ने कानों पर तीसरे ने आँखों पर, इसका अर्थ यह था कि मुँह से न बुरी बात बोलो, कानों से न बुरी बात सुनो, आँखों से न बुरी बात देखो। गांधी जी इन खिलौनों को अपना गुरु मानते थे और उनकी शिक्षाओं पर चलते थे। बुराइयों का प्रतिरोध भी वे सद्भावना से करते थे। लड़ाई करते हुए भी वे प्रतिपक्षी के प्रति प्रेमभावना रखते थे। किसी को भी वे दुष्ट नहीं मानते थे। उनकी मान्यता थी कि जो बुरा दीखता है उसमें भी कितनी ही अच्छाइयाँ हो सकती हैं। और जो अच्छा दीखता है, उसमें भी कोई-न-कोई दोष होना संभव है, इसलिए किसी का पूर्ण विश्लेषण न करके उसके श्रेष्ठ भाग को ही देखा और स्पर्श किया जाना चाहिए। तीन बंदरों की शिक्षा इसी मार्ग पर चलने का हमें निर्देश करती हैं।

हर घड़ी कुढ़ते और कुड़कुड़ाते और बड़बड़ाते रहने की आदत बहुत ही बुरी, हानिकारक और विपत्तियों को जन्म देने वाली है। इससे अपने भी पराए हो जाते हैं। निंदा और कटाक्ष करते रहने वाला दूसरों की आँखों में अपना सम्मान खो बैठता है। प्रशंसा और प्रसन्नता की आदत जिन्होंने अपना ली है, उनके आस−पास बच्चे-बूढ़े सभी घिरे रहते हैं। गुलाब के फूल पर मधुमक्खियाँ और भौंरे घिरे रहते हैं। उसकी सुगंध से दूर−दूर तक के लोगों का चित्त प्रसन्न रहता है। संतुष्ट और प्रसन्नचित्त रहने वाले, हर घड़ी मधुर मुस्कान जिसके चेहरे पर खेलती रहती है, वस्तुतः गुलाब के फूल के समान है, जो अपना जीवन धन्य बनाता है और दूसरों पर आनंद का उपहार बरसाता हुआ, उनका स्नेह आशीर्वाद संपादन करता रहता है।

प्रसन्नता की विभूति

प्रसन्न रह सकना इस संसार का बहुत बड़ा सुख है। हर कोई प्रसन्नता चाहता है, आनंद की खोज में है और विनोद तथा उल्लासमयी परिस्थितियों को ढूँढता है। यह आकांक्षा निश्चय ही पूर्ण हो सकती है, यदि हम बुराइयों की उपेक्षा करना और अच्छाइयों से लिपटे रहना पसंद करें। इस संसार में सभी कुछ है। अच्छाई भी कम नहीं है। बुरे आदमियों में से भी अच्छाई ढूँढें। आपत्तियों से जो शिक्षा मिलती है, उसे कठोर अध्यापक द्वारा कान ऐंठकर दी हुई सिखावन की तरह सीखें। उपकारों को स्मरण रखें। जहाँ जो कुछ श्रेष्ठ हो रहा है, उसे सुनें और समझें। 'अच्छा देखो और प्रसन्न रहो' का मंत्र हमें भली प्रकार जपना और हृदयंगम करना चाहिए।

स्वभाव में प्रसन्नता को सम्मिलित कर लेने में जीवन की बहुत बड़ी सार्थकता और सफलता सन्निहित है। मुँह लटकाए रहने की, रूठने की, भवें तरेरे रहने की आदत छोड़ देनी चाहिए। हँसते और मुस्कराते रहने वाले का आधा डर तो अपने आप ही चला जाता है और आधे डर को वह अपने पुरुषार्थ तथा स्वजनों के सहयोग से दूर कर लेता है, जो प्रसन्नमुख रहने के कारण अनायास ही मित्रता करने लगे थे। प्रसन्नता, मित्र बढ़ाने का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। जो हँसता है, उसकी हँसी में सम्मिलित रहने के लिए दसियों व्यक्ति लालायित रहते हैं। पर जो साँप की तरह मुँह फुलाए बैठा रहता हैं और व्यंगय बाणों की, कटुवचनों की फुसकार ही छोड़ता रहता है, उसके समीप जाने की हिम्मत कौन करेगा?

अप्रसन्नता का एकमात्र कारण दोषदर्शक दृष्टिकोण ही है। यदि अपना मन कलुषित न हो, दृष्टिकोण उदार रहे और दूसरों की अच्छाई को समझ सकने की बुद्धि सजीव रहे तो फिर प्रसन्नता का वातावरण ही सर्वत्र दिखाई देगा। आदत में प्रसन्नता और मुस्कान को शामिल कर लेने में तो भीतरी और बाहरी दोनों ही प्रसन्नताएँ गंगा−यमुना की तरह इकट्ठी होकर एक तीर्थराज प्रयाग की—आनंदमय जीवन की रचना करती हैं। इस संगम पर स्नान करने वाला हर व्यक्ति शांति और प्रफुल्लता अनुभव करता है। हम अपनी प्रवृत्तियों को इसी दिशा में क्यों न मोड़ें? कीचड़ में भी कमल खिल सकता है तो हमें विपन्न परिस्थितियों में रहते हुए भी प्रफुल्लित रहने में क्या कठिनाई होनी चाहिए।


हम और हमारी युगनिर्माण योजना

युगनिर्माण योजना के महान कार्यक्रम को अग्रसर करने के लिए अखण्ड ज्योति परिवार को अब एक सुगठित संगठन का रूप दिया जा रहा है। संघ के बिना वह शक्ति उत्पन्न नहीं हो सकती, जिससे मानव जाति की अंतःचेतना तथा बाह्य वातावरण में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटाकर उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना संभव हो सके। भगवान बुद्ध ने तंत्रयुग की वाममार्गी दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन करने के लिए संघशक्ति का उद्भव किया था। “धम्मं शरणं गच्छामि, बुद्धं शरणं गच्छामि” के साथ−साथ उन्होंने ‘संघं शरणं गच्छामि’ की भावना को भी प्रमुखता दी थी। बुद्ध धर्म में प्रवेश करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को “संघं शरणं गच्छामि” की भावना को अनिवार्य रूप से हृदयंगम करना पड़ता था। संघ के प्रति निष्ठावान हुए बिना उनका कोई अनुचर नैष्ठिक कहलाने का अधिकारी न होता था।

आज की विषम परिस्थितियाँ

आज वह आवश्यकता और भी अधिक प्रबल रूप से समाने आई है। व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय जीवन में आज अगणित दुष्प्रवृत्तियों का प्रवेश हो गया है और फलस्वरूप सर्वत्र रोग, शोक, क्लेश, कलह, पाप, संताप, अनीति, अत्याचार का वातावरण दृष्टिगोचर हो रहा है। अशांतिमय और अनिश्चित परिस्थितियों के कारण हर कोई खिन्न, उद्विग्न और निराश दीखता है। जीवन की प्रत्येक गुत्थी उलझी हुई प्रतीत होती है। इन परिस्थितियों को बदलने के लिए जहाँ उत्कृष्ट कोटि के विचारों का विस्तार होना आवश्यक है, वहाँ यह भी आवश्यक है कि अनुपयुक्त परंपराओं को हटाकर उनके स्थान पर आदर्शवादी उदाहरण प्रस्तुत किए जाएँ। श्रेष्ठता का संगठित और व्यवस्थित प्रयत्न किया जाएगा, तभी वह व्यापक परिमाण में बढ़ और पनप सकेगी।

सामाजिक कुरीतियों के कारण हिंदू समाज जर्जर और जीर्ण−शीर्ण बना हुआ है, उसका पुनर्निर्माण करके प्राचीनकाल जैसी आदर्श परंपराओं को अपने सामाजिक जीवन में प्रविष्ट करना होगा। राजनैतिक क्षेत्र में इतनी बुराइयाँ घुस पड़ी हैं कि प्रगति के स्थान पर पतन के लक्षण दृष्टिगोचर हो रहे हैं। वैयक्तिक जीवन में वासना, तृष्णा, स्वार्थपरता और अकर्मण्यता का साम्राज्य छाया हुआ है। संयमी और सदाचारी जीवन बिताना एक कल्पना एवं मखौल की वस्तु समझी जाती है। पारिवारिक जीवन में विश्वास, त्याग, निष्ठा, वफादारी और प्रेम निरंतर घट रहे हैं। एक घर में रहते हुए भी परिवार के लोग धर्मशाला में टिके हुए परदेशियों की भावना से दिन गुजारते हैं। आर्थिक-क्षेत्र में सर्वत्र बेईमानी, मिलावट, रिश्वत, चालाकी, धोखाधड़ी की तूती बोलती है। आर्थिक पवित्रता, ईमानदारी को अब मूर्खता समझा जाता है। व्यसन और व्यभिचार तेजी से बढ़ रहे हैं। नशेबाजी, गुंडागर्दी, अपराध, ईर्ष्या, द्वेष, निंदा, चुगली, फैशन, तड़क−भड़क, अश्लीलता, कामुकता की वे प्रवृत्तियाँ बराबर पनपती चली जा रही हैं, जो वैयक्तिक और सामूहिक जीवन को नरक बनाकर ही छोड़ती हैं। जो परिस्थितियाँ आज हैं, उन्हें यदि रोका न गया तो मानव जाति को सामूहिक आत्महत्या करने के लिए, सर्वनाश के गर्त्त में गिरने के लिए विवश होना पड़ेगा।

सर्वनाशी दावानल

विभीषिकाओं का यह दवानल जब चारों ओर गगनचुंबी लपटों के साथ उठता चला आ रहा हो, तब विवेकशील प्रबुद्ध आत्माओं के लिए यह कठिन होगा कि वे आँखें बंद करके यह सब देखते रहें और इस दावानल को बुझाने के लिए कुछ भी प्रयत्न न करें। इतने विशाल क्षेत्र में फैले हुए अनाचार के विरुद्ध मोर्चा लेना एक-दो व्यक्तियों का काम नहीं है। 'अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता।' इसके लिए विशाल परिमाण में संगठित प्रयत्नों की ही आवश्यकता होगी। युगनिर्माण योजना का आरंभ करते हुए पहला कार्य अखण्ड ज्योति परिवार की प्रबुद्ध एवं जागृत आत्माओं को संगठित रूप से सुगठित करना आवश्यक था। ‘घर बाँधकर बाँधने’ वाली कहावत के अनुसार जो मार्गदर्शन हमें सारे मानव समाज को, सारे विश्व को कराना है, उसकी एक प्रयोगशाला अपना घर, अपना परिवार बनने जा रहा है। युग−परिवर्तन के लिए संघशक्ति अनिवार्य है। इसके बिना एक कदम भी प्रगति नहीं हो सकती। इसलिए हम सब अब सुगठित रूप से संघबद्ध हो रहे हैं।

अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक ग्राहक को युगनिर्माण योजना का सदस्य बनाया जा रहा है। सदस्यता की कोई फीस नहीं है। योजना की वाणी और प्रेरणा का संदेश लेकर निकलने वाली अखण्ड ज्योति को जो लोग मँगाते हैं, उनकी भावना और विचारधारा इस योग्य बन और ढल ही जाने वाली है कि वे प्रस्तुत कार्यक्रम में अपने उत्तरदायित्व को निबाहने के लिए कटिबद्ध हो सके। सितंबर अंक में 'परिचय और विवरण' नामक एक फार्म छपा था, उसे भरकर अधिकांश पाठकों ने भेज दिया था, जिनने अभी तक नहीं भेजा है, वे बिना एक क्षण का आलस किए यह पंक्तियाँ पढ़ते ही अपना फार्म भरकर भेज दें। इन सूचनाओं के आधार पर प्रत्येक परिजन की परिस्थितियाँ और भावनाओं को, उनके व्यक्तित्व को ठीक तरह समझ सकना संभव होगा और उस विस्तृत जानकारी के आधार पर आगे की गतिविधियों का निर्धारण किया जाएगा।

योजना का प्रथम चरण

युगनिर्माण योजना का प्राथमिक कार्यक्रम हम सबको इस महीने में पूरा कर लेना चाहिए। प्रत्येक सदस्य का सदस्यता पत्र नवंबर मास में मथुरा पहुँच जाना चाहिए। यह प्रथम और अत्यंत सरल अनुरोध भी जो परिजन पालन न कर सकेंगे, उनके संबंध में निराशा ही व्यक्त करनी पड़ेगी। आगे हमें बहुत बड़े कदम उठाने और मिल-जुलकर महत्त्वपूर्ण भूमिका का संपादन करना है। छोटे कामों के लिए भी हम ढीले नहीं हो सकते। हमें अपना विचार-क्षेत्र बढ़ाना ही होगा और परिवार के सदस्यों की संख्या बढ़ानी ही होगी। सारे देश में ही नहीं, समस्त विश्व में मानव संस्कृति के विस्तार का अपना मिशन यदि एक छोटी सीमा में ही संकुचित रह गया, तो विश्वमानव की सेवा कर सकना, धर्मराज्य एवं विश्वशांति की स्थापना का लक्ष्य किस प्रकार पूरा हो सकेगा?

हम में से प्रत्येक को यह भी प्रयत्न करना होगा कि हमारी विचार-संतति बढ़े। संतान उत्पन्न करने से पितरों की सद्गति होती सुनी जाती है। आज की परिस्थितियों में अधिक बच्चे उत्पन्न करना भले ही आवश्यक न रहा हो, पर विचार−संतान का उत्पन्न करना निश्चय ही एक श्रेष्ठ परमार्थ हो सकता है। सद्विचारों और सत्कर्मों की अभिवृद्धि के उद्देश्य से बनाई गई युगनिर्माण योजना की वंश परंपरा हम में से हर एक को बढ़ानी चाहिए। जिस प्रकार अनेक स्वार्थ-साधनों के लिए हम दूसरों को तरह−तरह से प्रभावित करते, बदलते और फुसलाते हैं उसी प्रकार इस परमार्थ-साधन के क्षेत्र में उन सबको घसीट लाने का प्रयत्न करना चाहिए, जिनसे हमारा संपर्क है, जिन पर हमारा प्रभाव है।

प्रसार और प्रचार की आवश्यकता

ईसाई मिशन का जब प्रचार भारत में हुआ था, तो अंग्रेज कलेक्टरों, कमिश्नरों की स्त्रियाँ, लड़कियाँ एक−एक पैसा मूल्य की लूका, युहन्ना, मरकुस, मत्ती पुस्तकें घर−घर बेचने जातीं और बिना रत्ती भर संकोच, झिझक किए अपनी धर्मसेवा के लिए इस छोटे काम को अंगीकार करती थीं। उसी लगन का परिणाम है कि आज ईसाई धर्म में करोड़ों व्यक्ति दीक्षित हो गए। प्राचीनकाल में साधु-ब्राह्मण घर−घर धर्मशिक्षा देने के लिए जाया करते थे। अलख जगाने और धर्मफेरी लगाने की पुण्यपरंपरा उच्चकोटि के धर्मकार्यों में गिनी गई है। हमें भी कुछ ऐसा ही प्रयत्न करना होगा। संकोच, झिझक, आलस, तौहीन जैसी छोटी कमजोरियों पर विजय प्राप्त करके कुछ समय ऐसा निकालना ही पड़ेगा कि अपनी ‘अखण्ड ज्योति’ अपने समीपवर्त्ती दस−बीस व्यक्तियों को पढ़ाने−सुनाने के लिए दौड़−धूप की जाती रहे। युग निर्माण के लिए आवश्यक लोक-शिक्षण और कार्यक्रम अखण्ड ज्योति द्वारा प्रस्तुत किया जाता है, इस चेतना का क्षेत्र व्यापक बनाने के लिए हमें जी-जान एक कर देना चाहिए। कोई मित्र, पड़ोसी ऐसा न बचे जो इस विचारधारा से अपरिचित हो।

दिवाली का प्रेमोपहार

अभी 5−6 दिन पूर्व इस वर्ष की दिवाली गई है। दिवाली भारत का सबसे बड़ा त्यौहार है। इस दिन हर कोई दीपक जलाता है और मिठाई के उपहार बाँटते हैं। हम अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य आध्यात्मिक दीपक— ज्ञानदीपक जलावें। मिठाई की जगह सद्भावनाओं का उपहार भेजें। शुभकामना के रंग−बिरंगे कार्ड, कलैंडर आदि उपहार भेजने के स्थान पर यह अच्छा है कि स्वजनों को अखण्ड ज्योति के अंक भेंट में दें। इस प्रकार हमारी आध्यात्मिक दीपावली मनेगी और युग निर्माण विचारधारा के ज्ञानदीप लोगों की अंतरात्मा में टिमटिमाने लगेंगे। इस वर्ष सितंबर का सत्−संकल्प अंक, अक्टूबर का उच्चस्तरीय गायत्री साधना अंक, नवंबर और दिसंबर के संजीवन विद्या अंक—इस प्रकार यह चार अंक अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। युगनिर्माण योजना की संक्षिप्त विचारधारा इन चारों में आ गई है। चार−चार आने का प्रत्येक अंक होने से यह चार अंक एक रुपये के हो जाते हैं। अपने दस−पाँच मित्रों, स्वजनों को यह एक−एक रुपये के चार−चार अंक अपनी ओर से भिजवाने का दिवाली प्रेमोपहार भेजा जा सकता है। यह उच्चकोटि का ज्ञानदान सच्चा ब्रह्मभोज कहा जा सकता है। आज ऐसे सत्पात्र ब्राह्मण मुश्किल से ही ढूँढें मिलेंगे, जिन्हें खिलाने से समाज का हित और पुण्य की प्राप्ति हो सके, पर ज्ञानदान जिसे भी दिया जाएगा। उनमें थोड़ा भी सुधार हुआ तो उस सुधार का पुण्यफल उन सज्जनों को मिलेगा, जिन्होंने प्रेमोपहार में यह सत्साहित्य भेजकर सच्ची और गहरी वास्तविक मित्रता एवं शुभचिंतन का परिचय दिया था।


प्रशिक्षण संबंधी व्यापक योजना

युगनिर्माण योजना की पृष्ठभूमि का परिचय पाठक इस वर्ष की अखंड ज्योति के पृष्ठों में प्राप्त कर चुके हैं। उसे प्रत्यक्ष और व्यावहारिक रूप से समझने और हृदयंगम करने की आवश्यकता है। केवल पढ़ना मात्र ही पर्याप्त नहीं है। इस संबंध में सुनने−समझने और परस्पर विचार करने की भी आवश्यकता है, ताकि व्यक्तिगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए हर व्यक्ति अपने ढंग से अपने जीवन में योजना को कार्यान्वित करने की रूपरेखा बना सके। हर आदमी की परिस्थितियाँ भिन्न हैं, इसलिए उसके सोचने और करने का ढंग भी भिन्न हो सकता है, एक ही लक्ष्य की दिशा में अनेक व्यक्ति, अनेक स्थानों पर पैर रखते हुए चलते हैं। युग निर्माण के लिए हर किसी का योगदान एक तरह का नहीं हो सकता, उसमें भिन्नता रहेगी और उस भिन्नता के संबंध में हम लोग पारस्परिक विचार−विनिमय करके अधिक उपयुक्त तरीका खोज सकते हैं। इसी प्रकार शंका−अशंका और मतभेद के अनेक स्थल हो सकते हैं, उनका समाधान और समन्वय भी पारस्परिक विचार−विनिमय से ही संभव हो सकता है।

इसके लिए एक क्रमबद्ध प्रशिक्षण की आवश्यकता पड़ेगी। अखंड ज्योति परिवार के हर व्यक्ति को केंद्रीय विचारधारा के अधिक निकट संपर्क में आना होगा; इसलिए योजना के प्रत्येक सदस्य को, अखण्ड ज्योति के प्रत्येक ग्राहक का यह निमंत्रण दिया गया है कि वह एक महीना मथुरा आकर हमारे संपर्क में रहने और शिक्षा, साधना, चिकित्सा और सत्संग वाले, अक्टूबर अंक में पृष्ठ 54 पर छपे कार्यक्रम में सम्मिलित होने की तैयारी करें। कुछ लोग अधिक कार्यव्यस्त हो सकते हैं, जिनके लिए एक महीना कठिन है। उनके लिए दस दिन वाला शिक्षणक्रम रखा जाया करेगा। जो बात एक महीने में की जाती थी, वह सभी संक्षिप्त रूप से दस दिन में की जाया करेगी। 'अधिक गुड़ डालने से अधिक मीठा' वाली कहावत के अनुसार लाभ तो अधिक समय देने वालों को ही मिलेगा, पर विवशता में दस दिन की बात से भी काम चल सकता है।

माघ, बैसाख, श्रावण और कार्तिक यह चार महीने धार्मिक दृष्टि से अधिक पवित्र और जप, साधना आदि के अधिक उपयुक्त माने गये हैं; इसलिए चांद्रायण व्रत द्वारा आत्मशोधन, तपश्चर्या, प्रायश्चित्त, पुरश्चरण करने का कार्यक्रम वर्ष में इन चार महीने गायत्री तपोभूमि में रहा करेगा। साथ ही प्राकृतिक चिकित्सा एवं अरोग्य-रक्षा का कार्यक्रम रहेगा। जिन्हें छोटे−मोटे रोग हों, वे उनका चांद्रायणकल्प भी इसी महीने की अवधि में करके रोगमुक्त बनने का प्रयत्न करेंगे। इन्हें स्वास्थ्य−शिविर भी कह सकते हैं। जो समुचित शिक्षण प्राप्त कर सकेंगे, वे प्राकृतिक चिकित्सालय द्वारा दूसरों की चिकित्सा कर सकने की क्षमता भी इसी एक महीने में प्राप्त कर लेंगे।

दस−दस दिन के शिविर वर्ष में तीन बार हुआ करेंगे। आश्विन सुदी प्रतिपदा से विजयादशमी तथा चैत्र सुदी प्रतिपदा से दशमी तक, जेष्ठ सुदी प्रतिपदा से दशमी (गायत्री जयंती) तक, दस−दस दिन के तीन शिविरों में आने वाले लोगों को भी संजीवन विद्या के तत्त्वज्ञान पर आवश्यक विचार−विमर्श करने का अवसर मिलेगा और वे आगंतुक अपनी जीवन-दिशा को सीधी करने और शांतिमय बनाने के संबंध में बहुत कुछ सुन-समझ सकेंगे।

दस−दस सदस्यों के एक ग्रुप लीडर (शाखा संचालक) नियुक्त करके अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों को संघबद्ध करने की योजना कार्यान्वित की जा रही है। दस−दस शाखासंचालकों का अर्थात सौ सदस्यों का एक क्षेत्रीय संगठन रहेगा। इन क्षेत्रीय संगठनों के तीन−तीन दिन के शिक्षण शिविर रहें। विचार−विनिमय का इन संक्षिप्त शिविरों में भी इन सौ सदस्यों को अवसर मिल सकता है। मथुरा से कोई व्यक्ति पहुँचकर विचारगोष्ठी के रूप में युगनिर्माण योजना को जीवन में ढालने संबंधी समस्याओं पर आवश्यक प्रेरणा और परामर्श दे सकता है। बन पड़ेगा तो हम स्वयं भी ऐसे कुछ शिविरों में पहुँचने का प्रयत्न किया करेंगे। शिक्षण पाए हुए अन्य व्यक्ति भी इन शिविरों का संचालन कर सकते हैं। इस प्रकार एक प्रकार से अखण्ड ज्योति परिवार के सभी सदस्यों को एक बार मथुरा आकर या अपने स्थानीय शिविरों में शिक्षण प्राप्त करना चाहिए। जब साधारण कार्यों के लिए ट्रेनिंग की आवश्यकता होती है, हर जगह ट्रेंड व्यक्तियों को महत्त्व मिलता है, तो फिर युगनिर्माण योजना की महान प्रक्रिया का उत्तरदायित्व वहन करने वालों के लिए यह सब क्यों आवश्यक न होगा? संगठन कार्ययोजना का प्रथम चरण पूरा होते ही हमें द्वितीय चरण की तैयारी में लगना होगा। चांद्रायण व्रत संबंधी एक महीने का प्रथम सत्र पौष सुदी पूर्णिमा से माघ सुदी पूर्णिमा तक (9 जनवरी से 8 फरवरी 63 तक) चलेगा। जिन्हें एक महीने का अवकाश हो, वे इसके लिए तैयारी करें और जिन्हें 10 दिन का अवकाश हो वे चैत्र की नवरात्रि में (26 मार्च से 4 अप्रैल 63 तक) आने का प्रयत्न करें। तीन−तीन दिन के शिविरों की रूपरेखा भी अगले अंक में छपेगी। संगठन कार्य पूरा होने पर इस योजना को कार्यान्वित किया जाएगा।


मशाल ज्ञान की लिये, बढ़े चलो, बढ़े चलो?


मशाल ज्ञान की लिये, बढ़े चलो, बढ़े चलो (kavita)

घिरा समस्त विश्व में अथाह अंधकार है, मशाल ज्ञान की लिये बढ़े चलो, बढ़े चलो!

तुम्हें प्रभात के प्रकाश से असीम प्यार है! मशाल ज्ञान की लिये बढ़े चलो, बढ़े चलो!!

अखण्ड ज्योति के प्रकाश से निशा समाप्त हो,— प्रभात में नये समाज के प्रत्यक्ष चित्र हों!

समस्त शाप−ताप−ग्लानि−दैत्य−कालिमा मिटे,— सभी विवेकशील पाप−हीन हों− पवित्र हों!

प्रकाश के प्रसार का खुला नवीन द्वार है— मशाल ज्ञान की लिये बढ़े चलो, बढ़े चलो!

घिरा समस्त विश्व में असीम अंधकार है,— मशाल ज्ञान की लिये बढ़े चलो, बढ़े चलो!!

युगों−युगों गिरी हुई, डरी हुई, दबी हुई,— घिसी हुई, पिसी हुई मनुष्यता कराहती!

युगों−युगों के रोग−शोक क्लेश−दंभ−ढोंग से,— अधर्म के अनेक बन्धनों से मुक्ति चाहती!

तुम्हें उबारना इसे अभी सभी प्रकार है, मशाल ज्ञान की लिये बढ़े चलो, बढ़े चलो!

घिरा समस्त विश्व में अथाह अंधकार है! मशाल ज्ञान की लिए बढ़े चलो, बढ़े चलो!!

मरी हुई मनुष्यता अनेक बार जी उठी,— सुज्ञान के प्रकाश से मिटी समस्त भ्रान्ति है!

समाज का स्वरूप जीर्ण−शीर्ण, ध्वस्त−सा हुआ,— सभी सशक्त रूप से हुई नवीन क्रान्ति है!

उसी नवीन क्रान्ति की उठी पुनः पुकार है! मशाल ज्ञान की लिये बढ़े चलो, बढ़े चलो!

घिरा समस्त लोक में अथाह अंधकार है— मशाल ज्ञान की लिये बढ़े चलो, बढ़े चलो!!

—रजेश एम. ए.

*समाप्त*