चित्त की वृत्तियों को शुद्ध करने से ही आत्मा की प्राप्ति होती है, जिसका अन्तःकरण मल-विकारों से भरा है, उसे आत्मा का साक्षात्कार नहीं हो सकता। सत्कर्म के द्वारा भावना शुद्ध होती है और भावशुद्धि से ईश्वर मिल जाता है। जो अपने दोषों को नहीं देखता, उनके शमन और निराकरण का उपाय नहीं करता, उसकी सारी साधनाएँ आडंबरमात्र हैं। मन को निर्मल बनाए बिना न भक्ति प्राप्त होती है, न उपासना बन पड़ती है। जिस ज्ञान से आचार शुद्ध न हो, सद्गुण न बढ़े, वह निरर्थक भारवहनमात्र है। जिस कर्म के पीछे उच्च भावनाएँ न हों, वह बंधन में बाँधने वाला ही होता है। इसलिए ज्ञान, कर्म और भक्तियोग की साधना करके आत्मा की प्राप्ति करने के इच्छुकों को सबसे पहले अपने आचार और विचार शुद्ध करने चाहिए।
— भगवान कृष्ण
मैं भूला-भटका हूँ राही, मंजिल दूर कहीं है। अनचाहा, चाहा बन जाता, मुश्किल एक यहींं है॥
माया के इस विकट जाल में, कब से यहाँ फँसा हूँ। अज्ञानी बन इस दलदल में, जाता यहाँ धँसा हूँ॥
ऐसे कठिन काल में आकर, रक्षा कर भगवान!
काम, क्रोध से मैं व्याकुल हूँ, राह तमिस्रा छाई। भटकाने को ये सब रिपु बन, राह रोकते धाई॥
चाह रहा हूँ बढ़ना पथ पर, पर छाई अँधियाली॥ आज विजन में भटक−भटककर, जीवन है यह खाली॥
जीवन को तुम ज्ञानवान, कर दो मेरे भगवान!
ध्रुव समान नन्हें बालक की, तुमने रक्षा की है। हिरणकश्यपु के जीवन से, तुमने शिक्षा दी है॥
टेर सुनी तुमने है गज की, ग्राह से उसे बचाया। चीर द्रौपदी का तुमने ही, आकर तुरत बढ़ाया॥
बढ़ने वाले इस राही को, राह दिखा भगवान!
तुम ही हो जन−मन के प्रेरक, तुम से जग चलता है। नाशवान यह जगत तुम्हारा, तुम से ही पलता है॥
मरुभूमि में पेड़ उगाते, इसमें क्या अचरज है। तुम्हीं सृष्टि के निर्माता, सब तेरे लिए सहज है॥
नाशवान जीवन अविनाशी, कर दो हे भगवान!
भवसागर के बीच पड़ी है, नैया बिन पतवार। तूफानी लहरों से, मेरा कर दो बेड़ा पार॥
पतितों के उद्धारक तुम हो, मैं हूँ पतित महान। भटक रहा हूँ कब से भगवन, मैं पापी अनजान।
इस अनजाने पापी का अब, पाप हरो भगवान।
पार लगाने वाले, मेरी नैया के भगवान॥
—कृत्यानंद सिंह
आत्मकल्याण के लिए जिस प्रकार सांसारिक साधनों की, धनबल, जनबल, शरीरबल, बुद्धिबल आदि की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार आत्मबल भी नितांत आवश्यक माना गया है। आत्मबल के अभाव में अन्य समस्त बल होने पर भी अपूर्णता ही बनी रहती है। इस अपूर्णता के कारण उसे भीरुता, आशंका, दुश्चिंता, भ्रांति, दीनता, कायरता, तृष्णा, कामना, वासना, निष्ठुरता, संकीर्णता, दुर्बुद्धि, दुष्प्रवृत्ति आदि अगणित विभीषिकाएँ घेरे रहती हैं। ऐसा व्यक्ति कितने ही अधिक साधनों से संपन्न क्यों न हो, अपने को सदा अभावग्रस्त ही अनुभव करेगा और अनेकों आशंकाएँ उसकी आंतरिक शांति को नष्ट करती रहेंगी।
उपासना का आध्यात्मिक पुरुषार्थ
जिस प्रकार मनुष्य को धन, विद्या, स्वास्थ्य आदि की कमी दूर करने के लिए अनेकों प्रयत्न, पुरुषार्थ करने पड़ते हैं, उसी प्रकार आत्मबल की पूर्ति के लिए उपासना का अवलंबन ग्रहण करना पड़ता है। उपासना मानव जीवन-प्रगति का एक अत्यन्त आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण अंग है; इसलिए संसार के सभी धर्मों ने, सभी ऋषियों और सभी शास्त्रों ने, उपासना को मनुष्य का एक दैनिक एवं अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य माना है। हिंदू धर्म तो इस संबंध में और भी अधिक जोर देता है। उसने स्थान−स्थान पर जहाँ उपासना का महत्त्व वर्णन किया, वहाँ उसकी उपेक्षा करने वालों की भर्त्सना में भी कमी नहीं रखी है। प्राचीनकाल में एक अस्पर्श और बहिष्कृत वर्ग भी होता था, जिन्हें अंत्यज कहते थे। इस वर्ग में समाज से बहिष्कृत ऐसे ही लोग रखे जाते थे, जो नैतिक एवं सामाजिक नियमों का उल्लंघन करते थे, उपासना की उपेक्षा करते थे। इस उपेक्षा के फलस्वरूप जीवन विकास का एक महत्त्वपूर्ण पहलू अविकसित ही पड़ा रहता है, इसलिए व्यक्ति को अपने सर्वांगीण विकास के संबंध में जागरुक बनाए रखने की दृष्टि से इस प्रकार के प्रतिबंधों की उपयोगिता भी है और आवश्यकता भी।
सर्वोपरि एवं सर्वसुलभ-साधना
उपासना में भारत की प्राचीनतम, सर्वोपरि एवं सर्वानुमोदित सर्वसुलभ-प्रक्रिया, 'गायत्री महाशक्ति' की ही है। सद्बुद्धि की देवी, आंतरिक पवित्रता और प्रगति की प्रतीक, इस गायत्री उपासना को ही ऋषियों ने, देवताओं ने, अवतारों ने और सभी विचारशील सत्पुरुषों ने अपने दैनिक जीवन में एक आवश्यक धर्मकृत्य के रूप में स्थान दिया था। जब तक मत-मतांतरों का जंजाल हिंदू धर्म में प्रविष्ट नहीं हुआ था, तब तक सर्वत्र एक ही भाषा, भेष, भाव की तरह उपासना की भी एकता बनी रही। वेदजननी गायत्री को ही ज्ञान−विज्ञान की अजस्र ज्ञानगंगा माना जाता रहा और इसी का नित्य-नैमित्तिक अवगाहन करके सब कोई कृतकृत्य होते रहे। पीछे जैसे−जैसे हिंदू धर्म में विकृतियाँ प्रवेश करती गईं, वैसे−वैसे वेद धर्म की उपेक्षा करके लोग अपनी−अपनी मरजी के सम्प्रदाय गढ़ते और अपनी−अपनी रुचि के देवताओं का प्रादुर्भाव करते चले गए। अपनी कल्पना और रचना की पुष्टि में उन्होंने अनेक ग्रंथ भी रच डाले। इस प्रकार भ्रांतियों का एक पूरा घटाटोप खड़ा हो गया। उपासना विधान, देवता, मंत्र आदि आध्यात्मिक उपकरण दिन−दिन बढ़ते गए और उनमें से प्रत्येक के निर्माताओं एवं अनुयायियों ने उनका प्रसार करने के लिए भरपूर महात्म्य बताया, भरपूर ढोल पीटा। यह हंगामा इतना बढ़ा कि सनातन उपासना— गायत्री की स्थिति वही हो गई जो नक्कारखाने में तूती की होती है। लोग उसे भूलने ही नहीं लगे, उपेक्षा ही नहीं करने लगे, वरन शाप लगी हुई, कलियुग में निष्फल, केवल ब्राह्मणों को ही मौरूसी, कान में कहने की गुप्त विद्या आदि बताकर उसकी ओर से जनसाधारण में अरुचि भी उत्पन्न करने लगे।
सनातन एवं आर्ष सत्य
असत्य देर तक नहीं ठहर सकता। तथ्यों को देर तक छिपाया नहीं जा सकता। बादलों की छाया में सूर्य कब तक ढँका रहेगा? अंततः उसका प्रकटीकरण तो होना ही है— होता ही है। भारतीय धर्म की सर्वश्रेष्ठ सनातन उपासना मत-मतांतरों के कोलाहल में कब तक उपेक्षित एवं तिरस्कृत पड़ी रह सकती थी? सत्य की शोध आखिर कभी तो होने ही वाली थी और तथ्यों का प्रकटीकरण किया ही जाने वाला था। हर्ष की बात है कि वह समय अब आ पहुँचा और वास्तविकता जैसे−जैसे सामने आई, वैसे−वैसे यह स्पष्ट हुआ कि लाखों वर्षों का हमारा आध्यात्मिक अनुसंधान गायत्री को ही सर्वोपरि उपासना स्वीकार करता रहा है, वही सदा की भाँति आज भी हमारे लिए उपयोगी हो सकती है। जिन्होंने किसी पूर्वाग्रह से अपने को बाँध नहीं लिया है, जिन्होंने विचारशीलता और सत्यान्वेषण से अपने को सर्वथा विमुख नहीं कर लिया है, उन्हें यह मानने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती कि आध्यात्मिक प्रगति एवं भावनात्मक एकता की दृष्टि से गायत्री उपासना को ही उपासना क्षेत्र में उसका उचित स्थान मिलना चाहिए। विचारशीलता की प्रचंड लहरों ने आज गायत्री को उसके प्राचीन स्थान पर पहुँचा देने का प्रयत्न पुनः आरंभ कर दिया है। लगता है गायत्री भारत की 'राष्ट्रीय उपासना' बनकर रहेगी और उसका आश्रय लेकर हम अपना आध्यात्मिक, मानसिक, नैतिक और सामाजिक जीवन ही ऊँचा न बनावेंगे, वरन वैयक्तिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुख-शांति की चिरस्थायी अभिवृद्धि भी करेंगे।
गायत्री विद्या के दो स्तर
गायत्री उपासना के दो स्तर हैं— एक साधारण, दूसरा विशेष। सर्वसाधारण के लिए दैनिक नित्यकर्म के रूप में, नवरात्रि आदि किन्हीं पर्वों पर नैमित्तिक रूप से एवं किसी विशेष आवश्यकता के समय उपचार रूप से जो साधना की जाती है, उसे साधारण स्तरीय उपासना कहते हैं। गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ के प्रथम भाग में इसी विधान और विज्ञान का वर्णन किया गया है। जिनकी अभिरुचि अध्यात्म की दिशा में बहुत गतिशील नहीं हुई है, जिनके पास अवकाश कम ही रहता है, उनके लिए अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य की तरह वही क्रम उपयुक्त है। इस प्रथम स्तरीय साधना को ऋषियों ने ‘एकमुखी’ गायत्री कहा है। चित्रों में एक मुख और दो हाथ वाली गायत्री माता का चित्र इसी स्तर के उपासकों के लिए निर्धारित किया है। शिक्षापद्धति को ‘स्कूल’ और ‘काॅलेज’ इन दो विभागों में विभक्त किया जाता है। आरंभिक छात्र स्कूली पढ़ाई पढ़ते हैं और आगे चलकर वे कालेज में प्रवेश करते हैं। यही बात आध्यात्मिक प्रगति के लिए निर्धारित गायत्री उपासना के संबंध में भी है। आरंभिक श्रेणी की एकमुखी गायत्री उपासना को ‘स्कूल कोर्स’ कहा जा सकता है। इससे अगला शिक्षण ‘काॅलेज कोर्स’ है। इसे पंचमुखी-पंचकोशी एवं उच्चस्तरीय उपासना कह सकते हैं। जिनने कम-से-कम पाँच वर्ष साधारण श्रेणी की उपासना करके अपनी श्रद्धा को परिपक्व कर लिया हो, उन साधकों को उच्चस्तरीय साधना के लिए अग्रसर होना होता है।
एकमुखी गायत्री का सीमा-क्षेत्र
सर्वसाधारण के लिए उपयोगी एकमुखी गायत्री उपासना की विवेचना भी गत दस वर्षों से अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में, छोटी−मोटी दसियों पुस्तकों में, प्रवचन, सत्संगों और व्यक्तिगत वार्त्तालापों में हम समय−समय पर करते रहे हैं। लाखों मनुष्यों ने उस विज्ञान का लाभ उठाया है और अभी भी उस मार्ग पर चलते हुए असंख्यों व्यक्ति लोक एवं परलोक के कल्याण का मार्ग प्रशस्त कर रहे हैं। गायत्री उपासना से साधक के मनःक्षेत्र में तत्काल सद्बुद्धि का विकास होता है, मलीन एवं अवरुद्ध पड़े हुए अंतःकरण की सफाई होना शुरू होती है और गुण, कर्म, स्वभाव में प्रवेश हुए दुरितों का समाधान होने की प्रक्रिया तत्क्षण आरंभ हो जाती है। उसका प्रकाश जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है। स्वभाव में मधुरता, सहनशीलता और दूरदर्शिता की प्रवृत्ति का समावेश होने से साधक के विचार और आचार में आश्चर्यजनक परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। फलस्वरूप अनेकों गुत्थियाँ सहज ही सुलझने लगती हैं। हमारी उलझनों के अधिकांश कारण बाहर नहीं, भीतर होते हैं। दूसरे लोग हमारी प्रगति और शांति में जितनी बाधा पहुँचाते हैं, उससे अनेक गुनी बाधा अपनी भीतरी दुर्बलताएँ उत्पन्न करती हैं। इन दुर्बलताओं को ही ‘कुबुद्धि’ कहते हैं। कुबुद्धि को हटाकर सद्बुद्धि की स्थापना ही एकमात्र वह आधार है, जिसके द्वारा चिंताओं, आपत्तियों और अभावों से घिरते हुए जीवन की कायापलट हो सकती है। यह परिवर्तन प्रसन्नता, सुविधा और संतोष के रूप में तुरंत ही देखा जा सकता है। दरद को दूर करने में जिस प्रकार ‘मर्फिया’ का इंजेक्शन या ‘कोकिन लोशन’ जादू का काम करता है, उसी प्रकार विभिन्न प्रकार के क्लेशों और दुःखों से संत्रस्त करने वाली कुबुद्धि को हटाने वाला सद्बुद्धि का उपचार मिलते ही क्लेशों के स्थान पर संतोष आ विराजता है।
आत्मबल की दिव्य विभूति
अन्तःकरण में सद्बुद्धि की स्थापना का अत्यधिक महत्त्व है। जिसे यह विभूति मिल गई, समझना चाहिए कि उसने पारसमणि ही प्राप्त कर ली। शास्त्रकारों ने सद्विचारों को कल्पवृक्ष और सद्भावनाओं को अमृत कहा है। जिसने यह सब प्राप्त कर लिया, उसे इस संसार में न तो किसी वस्तु का अभाव रहेगा और न उसकी शांति को कोई नष्ट कर सकेगा। अध्यात्म-साधना का प्रथम लक्ष्य अन्तःकरण में सद्बुद्धि की स्थापना करना है। इस प्रयोजन के लिए यों स्वाध्याय एवं सत्संग की बहुत महत्ता बताई है, पर उसके साथ−साथ साधना का समावेश होना भी आवश्यक है। साधना को बीज माना जाए तो स्वाध्याय और सत्संग को खाद-पानी कहना पड़ेगा। ‛श्रेय’ का पौधा इसी प्रकार फलता−फूलता है। साधनाओं में गायत्री उपासना ही सद्बुद्धि की स्थापना का उद्देश्य पूरा करती है। गायत्री को बुद्धि की, ज्ञान की, विवेक की देवी कहा गया है। इस महामंत्र में तेज और ज्ञान की शक्तियों का आह्वान किया गया है और सच्चे मन से की गई इस साधना से यह दोनों वस्तुएँ मिलती भी देखी जा सकती हैं। सद्बुद्धि की विभूति जैसे−जैसे अपने भीतर बढ़ती है, वैसे ही मनुष्य के गुण, कर्म और स्वभाव में सात्विकता की मात्रा की अभिवृद्धि होती है और इसके फलस्वरूप वह परिस्थितियाँ उत्पन्न होनी आरंभ हो जाती हैं, जिनमें सफलता, सहयोग, समृद्धि, संतुष्टि और शांति की प्राप्ति हुआ करती है।
गायत्री उपासना से अनेकों प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक लाभ होने का जो महात्म्य शास्त्रों ने कहा है और अनुभव द्वारा जिसे पूर्णतः सही पाया गया है, उसका आधार यह सद्बुद्धि ही है, जिसे गायत्री महामंत्र के जप-अनुष्ठानों एवं विभिन्न विधि-विधानों से प्राप्त किया जाता है। सर्वसाधारण के लिए गायत्री का यह सद्बुद्धि वाला क्षेत्र ही सरल पड़ता है। आरंभ में हर साधक को इसी कक्षा में प्रवेश करना पड़ता है।
तंत्र और योग की पद्धतियाँ
गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ के प्रथम भाग में सद्बुद्धि श्रेणी की साधना का विधान है। दूसरे में तंत्र और तीसरे भाग में पंचमुखी−पंचकोशी−उच्चस्तरीय गायत्री उपासना की विवेचना की गई है। तंत्र का विषय गोपनीय है। केवल वह परीक्षित, विश्वस्त भूमिका के व्यक्तियों को ही कहा और बताया जाता है, ऐसे लोग ही उसकी साधना कर सकते हैं। कुपात्रों के हाथ तंत्र विज्ञान का जाना दूसरों के लिए ही नहीं, वरन उन साधकों के खुद के लिए भी संकट का कारण बनता है। इसलिए तंत्रशास्त्र की परंपरा यह है कि वस्तुस्थिति को छिपाकर रखा जाए। साधारणतया कुछ कहा और लिखा भी जाए तो वह चर्चा एवं विवेचना तक ही सीमित रहे, उसकी प्रयोगविधि की गोपनीयता पर आचार्यों ने कठोर प्रतिबंध लगाये हैं, वे उचित भी हैं और आवश्यक भी। इसी परंपरा के अनुसार गायत्री महाविज्ञान के दूसरे भाग में गायत्री तंत्र का उल्लेख तो हुआ है, पर अनादि परंपरा के कारण उसकी विस्तृत विवेचना को अप्रकट ही रखा गया है। अधिकारी सत्पात्रों को गुरुपरंपरा से पूर्वकाल में भी यह ज्ञान मिलता रहा है और आगे भी मिलता रहेगा।
उच्चस्तरीय गायत्री उपासना में शरीर और मन के विभिन्न केंद्रों में प्रस्तुत पड़ी हुई अत्यंत महत्त्वपूर्ण शक्तियों के जागरण का विधान है। दूसरे शब्दों में इसे आत्मबल विकास का विज्ञान कह सकते हैं। जिस प्रकार कीमती तिजोरी में ही मूल्यवान रत्नराशि जमा की जाती है, उसी प्रकार परमात्मा ने मानव प्राणी के भीतर बड़ी चतुरता और सावधानी के साथ यह कीमती तिजोरियों में भरकर अमूल्य रत्नराशि छिपा दी है। छिपाने में उसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि वयस्क और परिपक्व बुद्धि होने का प्रमाण देकर ही उसका उपयोग संभव हो सके। यह ठीक भी है। अबोध बालकों की संपत्ति उनकी होने पर भी उन्हें नहीं सौंपी जाती। कोई संरक्षक उस पर नियुक्त रहता है। जब बच्चे बड़े, वयस्क और परिपक्व बुद्धि हो जाते हैं तो उन्हें वह संपदा प्रसन्नतापूर्वक दे दी जाती है। परमात्मा के इस संसार में स्थूल और सूक्ष्म प्रकार की अगणित शक्तियाँ बिखरी पड़ी हैं। वैज्ञानिक लोग बाह्यजगत की अनेक शक्तियों को जानने और उनका प्रयोग करने में दत्तचित्त हो लगे हुए हैं और वे एक-से-एक महत्त्वपूर्ण आविष्कार करते चले जा रहे हैं।
हमारी अंतर्जगत में, चेतना संस्थान में, बाह्यजगत की अपेक्षा असंख्यों गुनी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। उनका एक छोटा-सा भी आविष्कार बाह्यजगत में अब तक हुए समस्त आविष्कारों से बढ़कर सिद्ध हो सकता है। आत्मबल इस संसार का सबसे बड़ा बल है। अंतर्जगत की शक्तियों का महत्त्व कहने सुनने से नहीं, वरन अनुभव करने से ही जाना जा सकता है। प्राचीनकाल के ऋषि, महर्षि, योगी, यती इस अध्यात्म विज्ञान के ही रत्नों को खोजते रहे हैं। उनने जो कुछ पाया था, वह इतना महान था कि उसका इतिहास पढ़ने मात्र से हमारा मस्तक आज की गई-गुजरी स्थिति में भी गर्वोन्नत हो जाता है।
पंचमुखी गायत्री—पंचकोशी साधना
आंतरिक शक्तियों के जागरण की गायत्री प्रक्रिया पंचमुखी-पंचकोशी साधना कहलाती है। इसे ही ‘गायत्री योग’ भी कहते हैं। गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ के तीसरे खंड में उसी का उल्लेख किया गया है। जानकारी की दृष्टि से वह ग्रंथ महत्त्वपूर्ण है, पर इस मार्ग पर बढ़ने वाले साधक का कार्य उसे पढ़ने मात्र से ही नहीं चल सकता। आयुर्वेद के प्रमुख ग्रंथ ‘चरक संहिता’ में आरोग्य रक्षा और चिकित्सा के बारे में बहुत कुछ लिखा हुआ है, पर कोई रोगी उसे पढ़कर ही अपना काम नहीं चला सकता, रोगी को, किस प्रकार के रोग में, किस आयु में, किस ऋतु में, किन परिस्थितियों में, किस उपचार के साथ, क्या औषधि देनी चाहिए, इसका निर्णय करने के लिए एक विचारपूर्ण मार्गदर्शक भी आवश्यक होता है। अपने परिवार के जो परिजन हमारे सहचरत्व में साधना मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं, उनके लिए उच्चस्तरीय उपासना का एक व्यवस्थित दसवर्षीय शिक्षण क्रम बता दिया गया है। गत अक्टूबर अंक में प्रथम वर्ष का पाठ्यक्रम प्रस्तुत किया गया था, अब इस अंक के साथ द्वितीय वर्ष की साधना बताई जा रही है। अगले नौ वर्षों में यह क्रम इसी प्रकार चलता रहेगा। हर अक्टूबर में अखण्ड ज्योति का एक विशेष अंक गायत्री उपासकों के मार्गदर्शन के लिए निकलता रहेगा, शेष अंकों में युगनिर्माण योजना की विचारधारा रहा करेगी। लौकिक और पारलौकिक सुख-शांति के लिए गायत्री उपासना की उपयोगिता असाधारण है। उसका प्रथम चरण हमें सद्बुद्धि प्रदान करके जीवन की अधिकांश उलझनों को सुलझा देता है और द्वितीय चरण में प्रस्तुत आत्मशक्ति के जागरण का जो रहस्य सन्निहित है, उसके द्वारा मनुष्य नर से नारायण और पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है। युग−निर्माण की दृष्टि से भी इस आर्ष विज्ञान को हमें अपने जीवन में समुचित स्थान देना ही पड़ेगा। आत्मविकास की समस्या को हल कर सकना गायत्री उपासना की उपेक्षा करके असंभव नहीं, तो कठिन अवश्य रहेगा।
सद्बुद्धिदायिनी, एकमुखी, प्रथम स्तरीय गायत्री उपासना को भारतीय धर्म में प्रत्येक मनुष्य का एक अत्यंत आवश्यक अनिवार्य नित्यकर्म माना गया है। जिस प्रकार शौच, स्नान, भोजन, शयन आदि नित्यकर्म न करने से शारीरिक स्वास्थ्य संतुलन नष्ट होता है, उसी प्रकार गायत्री उपासना के अभाव में उस सद्बुद्धि से भी वंचित रहना पड़ता है, जो हमारे गुण, कर्म और स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए आवश्यक है। भौतिक समृद्धि और आत्मिक प्रगति के दो पहियों की गाड़ी पर ही हमारा सर्वांगपूर्ण जीवन विकास निर्भर रहता है। इसमें से एक अंग की उपेक्षा करने पर हमारी वही स्थिति हो जाती है, जो लंगड़े, काने एवं आधे शरीर में लकवा मारे हुए रोगी की होती है। मोटर का एक पहिया यदि चलते−चलते निकल पड़े तो उसके उलट जाने की दुर्घटना हो जाएगी। हमारी भौतिक समृद्धि तो बढ़ती जा रही है, पर आध्यात्मिक स्तर गिरी पड़ी स्थिति में ही बना हुआ है, ऐसी दशा में मोटर उलटने जैसी दुर्घटनाओं का दुःखद दृश्य हमें अपने जीवन में प्रत्यक्ष परिलक्षित होता है तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। किंतु जब यह गलती सुधार ली जाती है तो बिगड़े काम को बना लेने वाले बुद्धिमानों की तरह हम पुनः एक सुव्यवस्थित जीवनक्रम को विकसित हुआ देखते हैं।
हमारा व्यक्तिगत अनुभव
हमें अपने व्यक्तिगत जीवन का प्रायः सारे का सारा ही समय गायत्री की शोध, अन्वेषण और साधन करने में लगा देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस महाविद्या के संबंध में शास्त्रों में क्या लिखा है, यह जानने के लिए प्रायः दो हजार प्रमुख धर्मग्रंथों को पढ़ा है। पढ़कर उनका सारसंग्रह किया है। संपूर्ण भारत के कोने−कोने में इस विद्या के ज्ञाता मनीषियों और साधनासंलग्न तपस्वियों की खोज की है, उनके चरण धो−धोकर उनके अनुभव का सार एकत्रित किया है। स्वयं भी अपने जीवन का सबसे महत्त्वपूर्ण समय एकनिष्ठ भाव से उसी उपासना में लगाया है। इतने प्रयास का निचोड़ यह निकाला है कि गायत्री उपासना में लगाए हुए किसी भी व्यक्ति के, कोई क्षण निष्फल नहीं जा सकते। उसका कोई-न-कोई सत्परिणाम उसे मिलता ही है और वह निश्चित रूप से उससे कहीं अधिक होता है, जितना कि उपासना में लगे हुए समय का मूल्य हो सकता है। हमारे सानिध्य और सहचरत्व में जिन लोगों ने यह उपासना की है, उनका भी ऐसा ही अनुभव है। आध्यात्मिक प्रगति की ओर हर साधक के कदम बढ़े हैं, चाहे वह कितने ही मंद क्यों न रहे हों।
गायत्री उपासना का सीधा प्रभाव साधक की अंतरात्मा पर सात्त्विकता की अभिवृद्धि के रूप में पड़ता है। उसके मनःक्षेत्र में समाया हुआ तमोगुण, असुरत्व, तत्क्षण घटना आरंभ हो जाता है। अपने दोष-दुर्गुण देखने और समझने की क्षमता उसमें जागृत होती है, साथ ही कुकर्मों के प्रति घृणा करने और सत्कर्मों की ओर आकर्षित होने का स्वभाव भी अनायास ही बनने लगता है। बहुत पढ़ने और सुनने से भी जिन लोगों ने अपने ऊपर कोई प्रभाव ग्रहण नहीं किया था, उनका मन इस उपासना के द्वारा स्वयं ही द्रवित हुआ है और उस आंतरिक परिवर्तन के कारण बाहरी जीवन में आश्चर्यजनक हेर−फेर दिखाई देने लगा है। आत्मसुधार की प्रक्रिया में गायत्री उपासना का इतना अधिक महत्त्व देखकर ही प्राचीनकाल में ऋषियों ने संभवतः इसे सर्वसाधारण के लिए एक अनिवार्य धर्मकर्त्तव्य घोषित किया था।
अन्तःप्रेरणा का विकास और प्रकाश
हमें अपने व्यक्तिगत संपर्क में आए हुए ऐसे हजारों व्यक्तियों का पता है, जिन्होंने गायत्री उपासना आरंभ करने के बाद अपने विचार और कार्यों में कायाकल्प जैसा परिवर्तन किया। जो लोग माँस खाते थे, नशेबाजी की लत जिन्हें बुरी तरह घेरे हुए थी, शराब, गाँजा, भाँग, अफीम, चरस, तमाकू के जो गुलाम बने हुए थे, उनमें से किसी ने एकबारगी, किसी ने धीरे−धीरे इन्हें बिना किसी बाहरी दबाव या उपदेश के अपने आप ही छोड़ दिया। उनके भीतर से ही कुछ ऐसी प्रेरणा और घृणा उत्पन्न हुई, जिसके कारण उन्हें इन सत्यानाशी दुर्व्यसनों को अनायास ही छोड़ देने का सुअवसर मिल गया। जुआ, सट्टा, चोरी, बेईमानी, रिश्वत, मिलावट आदि के द्वारा भारी कमाई करने वाले लोगों में से कितनों ने ही बुराइयों को सर्वांश में अथवा बहुत अंश में परित्याग कर दिया और गरीबी एवं सादगी का जीवन बिताते हुए कम खरच में मितव्ययितापूर्वक हँसी-खुशी एवं संतोष का जीवन बिताने लगे। गायत्री को माता−माता पुकारते रहने पर कितने ही व्यक्तियों की भावनाओं का ऐसा विकास हुआ कि उन्हें नारीमात्र में माता की प्रतिमा घूमती हुई दिखाई देने लगी और पहले जो व्यभिचार और दुराचार की दिशा में मन दौड़ा करता था, वह मार्ग बिलकुल ही अवरुद्ध हो गया। अश्लील साहित्य पढ़ने, गंदे चित्र देखने, गंदी आदतों में अपना शरीर निचोड़ने की जिन्हें बुरी लतें लगी हुई थीं, उनकी यह बुराइयाँ गायत्री उपासना के प्रभाव से बड़ी सरलतापूर्वक छूटती देखी गई हैं। चढ़ते खून के किशोर और नवयुवकों में ऐसे विचार बहुत करके देखे जाते हैं। हमारा सुनिश्चित मत है कि उसकी मानसिक स्थिति स्वच्छ करने में गायत्री उपासना जादू जैसा काम करती है।
स्नेह सौजन्य की अभिवृद्धि
जिन घरों में द्वेष, क्लेश, कलह और संघर्ष का वातावरण बना रहता था, परिवार के हर सदस्य को मनमुटाव की स्थिति में देखा जाता था, उन घरों में गायत्री का प्रवेश हुआ, सब लोग थोड़ी−थोड़ी उपासना करने लगे, तो कुछ ही दिनों में परिस्थितियाँ ही बदल गईं। द्वेष का स्थान प्रेम ने ले लिया और सब लोग स्नेह सहयोगपूर्वक मिल−जुलकर रहने लगे। कितने ही ऐसे लोगों को हम जानते हैं जो आए दिन बीमार रहते थे, कोई-न-कोई रोग उन्हें घेरे ही रहता था। शारीरिक कष्ट, अशक्तता, उपार्जन में असमर्थता और दवादारू में बढ़ते हुए खरच के कारण उन्हें निरंतर चिंता घेरे रहती थी, पर जब उन्होंने गायत्री उपासना आरंभ की तो यह दवा उन सबसे अधिक अचूक सिद्ध हुई, जो उनने बहुत पैसा खरच करके खरीदी थीं। किसी भी अनुभवी डाॅक्टर की अपेक्षा यह उपासनाक्रम उनके लिए अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ। कारण स्पष्ट है, गायत्री की उपासना से व्यक्ति के अंतःकरण में सात्त्विकता और सद्बुद्धि का जो विकास होता है, उससे आहार-विहार, आचार-विचार, रहन-सहन, खान-पान सभी कुछ बदलता है और उस परिवर्तन का प्रभाव शरीर, मन, धन, व्यवसाय, परिवार, समाज सभी पर पड़ता है। अपना व्यवहार नम्र मधुर और सज्जनतापूर्ण हो जाने से लोगों के साथ बिगड़े हुए संबंध सुधरते हैं और शत्रुओं को मित्रों एवं सहायक के रूप में बदला हुआ पाया जाता है। अपना सुधार होने पर दूसरों का सुधरा हुआ व्यवहार उपलब्ध होना निश्चित ही रहता है।
अभाव एवं आपदाओं का समाधान
आर्थिक कठिनाई, संतान का अभाव, बीमारी, मुकदमा, शत्रुओं का प्रकोप, कुसमय, स्वजनों से मनोमालिन्य, प्रयत्नों में असफलता, आकस्मिक दुर्दैव, द्वेष, दुर्भाव, चिंता, निराशा, शोक-संतापों में ग्रसित व्यक्तियों को गायत्री उपासना की सलाह मान लेने के लिए यदि कभी तैयार कर लिया गया है, तो उसका परिणाम आशाजनक ही निकला है। प्रस्तुत कठिनाइयों का किसी-न-किसी मार्ग से आशाजनक समाधान हुआ है। श्रद्धा, भावना की दृष्टि से विचार करने वाले इसे मंत्र शक्तियाँ, माता की कृपा मानते हैं, पर वास्तविकता यह है कि उनके अपने विचार व्यवहार में ऐसा हेर-फेर हो गया होता है, जिसके कारण गुत्थियों के सुलझने और कठिनाइयों के हल होने का उपाय सहज ही बन पड़ता है। अशांत और उद्विग्न मन रहने पर अपने विचार और कार्य अस्त-व्यस्त रहते हैं, उत्तेजित और असंतुलित मन यह सोच नहीं पाता कि प्रस्तुत कठिनाइयों का सही हल क्या हो सकता है। गायत्री उपासना के प्रभाव से जब आत्मबल बढ़ता है, सद्बुद्धि का प्रकाश अंतःकरण में उत्पन्न होता है तो कठिनाई को पार करने का उचित मार्ग सूझ पड़ता है, इतना ही नहीं, उस पर चलने का साहस भी उत्पन्न होता है। उचित मार्ग अपनाकर मनुष्य संसार की बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को पार कर सकता है, बड़ी-से-बड़ी उलझनें सुलझा सकता है, फिर छोटी-मोटी समस्याओं का हल होना तो कठिन ही क्या है ।
दिव्य विभूति की दिव्य अनुभूति
सद्बुद्धि को कल्पलता कहा गया है। जिस मस्तिष्क में उसे स्थान मिल जाएगा, वहाँ पुष्पवाटिका जैसी महक उठती रहेगी और चित्त को आह्लादित करने वाली धारा प्रवाहित होती रहेगी। चंदन का वृक्ष अपने आस-पास के पौधों को सुगंधित बना लेता है। संतुलित मस्तिष्क चंदन वृक्ष से बढ़कर है, वह स्वयं तो शांति की सुगंध प्राप्त करता ही है, अपने संपर्क में आने वाले अन्य अगणित मस्तिष्कों को भी सन्मार्गगामी बना देता है। गायत्री उपासना का प्रभाव मनःक्षेत्र के शांत, स्वस्थ और प्रगतिशील बनाने में वही काम करता है, जो वनस्पतियों के लिए वर्षा का जल किया करता है। कहते हैं कि ‘नागदमन’ बूटी की गंध पाकर वहाँ से साँप बहुत दूर भाग जाते हैं। कुविचारों और दुर्भावनाओं के साँपों को दूर भगाने के लिए गायत्री उपासना को एक उच्चकोटि की ‘नागदमन’ बूटी कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी। अनुपयुक्त कामनाओं को हटाकर चित्त को तृष्णा और वासना से रहित बना देना या संतोष उत्पन्न करने वाला वातावरण, जहाँ गायत्री उपासना उत्पन्न करती है, वहाँ उचित आवश्यकताओं को पूर्ण करने के योग्य आवश्यक साहस, प्रतिभा एवं सूझ-बूझ भी उसके द्वारा उत्पन्न होती है। इस प्रकार अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति कुछ कठिन नहीं रह जाती। गायत्री को कामधेनु इसीलिए कहा गया है। इसका श्रद्धापूर्वक पयपान करने के उपरांत कोई अतृप्ति शेष नहीं रह जाती।
आंतरिक दुर्बलताओं और त्रुटियों के कारण ही मनुष्य का सांसारिक जीवन अभावग्रस्त, अविकसित एवं अशांत रहता है। भीतर की कमजोरी ही बाहर दीनता और हीनता के रूप से दृष्टिगोचर होती है। आत्मघाती लोग ही इस संसार में तिरस्कृत अवांछित घृणित उपेक्षित और असफल रहते हैं। जिसके भीतर आत्मबल भरा होगा, जिसके अंतर में प्रकाश उठ रहा होगा, उसके बाह्य जीवन का प्रत्येक क्षेत्र, आशा उत्साह, स्फूर्ति, तेजस्विता और पुरुषार्थ से परिपूर्ण दिखाई देगा। भीतरी बल की आभा को बाहर प्रकट होने से कोई आवरण रोक नहीं सकता। गरीबी, अस्वस्थता एवं विपन्न परिस्थितियों में पड़े हुए होने पर भी मनस्वी व्यक्ति अपनी महानता की प्रभा फैलाते रहते हैं। ऐसे लोगों की दुर्दशा क्षणिक ही हो सकती है, चिरस्थायी नहीं। व्यक्ति का विकसित व्यक्तित्व ही वस्तुतः उसकी सच्ची संपत्ति सिद्ध होती है। यह संपत्ति जिसके पास मौजूद है, उसे न तो दरिद्र कहा जा सकता है और न असफल। बादलों के टुकड़े चंद्रमा को देर तक कहाँ छिपाए रहते हैं? विपन्नता किसी मनस्वी व्यक्ति को दुर्दशाग्रस्त स्थिति में देर तक कहाँ पड़ा रख सकती है? जहाँ आत्मबल होगा, वहाँ कोई भी अभाव, चाहे वह व्यक्तिगत हो अथवा सांसारिक अधिक समय तक टिक नहीं सकेगा। गायत्री उपासना मनुष्य के व्यक्तित्व, आंतरिक स्तर और आत्मबल को बढ़ाती है, जिससे उसकी सुख−शांति और समृद्धि का मार्ग हर दिशा में प्रशस्त होता है।
उपासना— एक आवश्यक धर्मकर्त्तव्य
हमारे नित्यकर्म में जिस प्रकार स्नान, भोजन, श्रम, विश्राम आवश्यक हैं, उसी प्रकार गायत्री उपासना के लिए एक छोटा समय भाग नियत रहना चाहिए। सद्बुद्धि से बढ़कर और कोई संपत्ति इस संसार में नहीं। जब कि साधारण मूल्य वाली वस्तुओं के उपार्जन के लिए हम इतना श्रम करते हैं तो क्या हमें इस धरती की सबसे श्रेष्ठ संपदा का उपार्जन करने के लिए कुछ भी समय न लगाने की हठ पर ही अड़ा रहना उचित है? गायत्री के प्रथम स्तर जिसमें जप, अनुष्ठानों, बीजमंत्रों और अमुक विधि−विधानों की आवश्यकता होती है, सर्वसाधारण के लिए सरल है। इसमें कोई भूल रहने पर भी हानि की संभावना नहीं रहती। थोड़ा करने या विधि−विधान की पूरी जानकारी न होने पर लाभ भले ही थोड़ा मिले, पर हानि या प्रतिकूल फल की तो किसी भी दशा में कोई आशंका नहीं रहती। मानव प्राणी में मानवता की विशेषता को बढ़ाने वाली इस आध्यात्म विज्ञानसम्मत, परम श्रेयस्कर प्रक्रिया को, हममें से प्रत्येक को किसी-न-किसी रूप में अपनाना ही चाहिए। दैनिक जीवन का एक आवश्यक धर्मकर्त्तव्य समझकर उसे अपने नित्यकर्म में उचित स्थान देना ही चाहिए।
ज्वलंत अंगार जब ठंडा होने लगता है तो उसका ऊपरी परत भस्म बनकर आवरण जैसा चढ़ जाता है। जब इस आवरण को स्पर्श करते हैं तो अंगार न तो गरम मालूम पड़ता है और न प्रकाशवान। ऐसी स्थिति में यह पहचानना भी कठिन होता है कि इसके भीतर अभी अग्नि का अंश भी है या नहीं। पर जब उस भस्म -आवरण को हटा दिया जाता है तो भीतर छिपी हुई अग्नि पुनः प्रकट हो जाती है और उसकी गरमी तथा रोशनी पुनः पूर्ववत् दिखाई पड़ने लगती है। यही बात हमारी आत्मिक स्थिति पर लागू होती है । परमात्मा का अंश होने के कारण आत्मा में वे सब शक्तियाँ और विशेषताएँ बीजरूप से मौजूद रहती हैं, जो परमात्मा में भरी होती हैं। किंतु मल−विक्षेपों के आवरण जब उस पर चढ़ जाते हैं तो उसकी स्थिति भी भस्म से ढँके हुए अंगार जैसी बन जाती है। मायाबद्ध जीव की स्थिति बड़ी दीन−हीन और दयनीय दिखाई पड़ती है। दुःख-दारिद्रय के, रोग−शोक के, अभाव-अज्ञान, व्यथा-वेदना के, कष्ट-क्लेशों में ऐसा ग्रसित रहता है कि यह विश्वास करना कठिन हो जाता है कि ऐसी दयनीय स्थिति में पड़ा हुआ मानव प्राणी भला सत्, चित और आनंदस्वरूप परमात्मा का अंश भी हो सकता है। ठंडी भस्म का आवरण छूकर और उसकी कालिमा देखकर यह मानना कठिन होता है कि इसके भीतर ज्वलंत अग्निपुंज भी छिपा होगा।
आत्मा की निर्विकार स्थिति
आत्मा अपनी स्वाभाविक स्थिति में हो, उसके आवरण हट जाएँ तो उसकी स्थिति इतनी उत्कृष्ट होती है कि हर क्षण अनंत आनंद का रसास्वादन करने का ही सौभाग्य उसे उपलब्ध रहता है। इसी स्थिति को प्राप्त करना आध्यात्मिक साधना का लक्ष्य है। इस मार्ग को अवरुद्ध करने वाले वे मल−विक्षेप और आवरण ही हैं, जिनके कारण महान संभावनाएँ साथ लेकर आई हुई आत्मा, इन तुच्छ परिस्थितियों में पड़े रहने के लिए विवश होती है। मानव शरीर ही इन आवरणों की सफाई कर लेने का एकमात्र अवसर है। यदि यह ऐसे ही बर्बाद चला गया या कुविचारों और कुकर्मों में मस्त रहकर उन आवरणों को और भी बढ़ा लिया गया तो फिर चौरासी लाख योनियों की लंबी अवधि तक उसी भार में दबा पड़ा रहना पड़ता है।
मल और आवरणों का निराकरण
इन आवरणों की सफाई में दुहरा लाभ है, जहाँ मलीनता हटने से आत्मा पर चढ़ा हुआ भार हलका होते चलने से अन्तःकरण में शांति और प्रफुल्लता बढ़ती है, वहाँ इन आवरण द्वारों के खुलने पर विभूतियों का एक विशिष्ट भांडागार उपलब्ध होता चलता है। पाँच आवरणों को ही पाँच कोश कहते हैं। इन द्वारों के खोलने की वैज्ञानिक विधि का नाम ही पंचकोशी गायत्री साधना अथवा पंचमुखी गायत्री उपासना है। उच्च कक्षा में प्रवेश करने वाले साधकों के लिए इसी आराधना का प्रयोग करना पड़ता है। प्रथम स्तरीय साधना का अधिकांश कार्यक्रम स्थूल वस्तुओं या स्थूल विधि-विधानों पर निर्भर है। माला, आसन, पंचपात्र, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, अक्षत, चित्र, मूर्ति, हवन-सामग्री, मंत्रोच्चारण, व्रत-उपवास, पाठ, कीर्त्तन, अनुष्ठान, ब्रह्मभोज, तर्पण, मार्जन आदि यह सभी कुछ स्थूल आधार हैं। इसे साकार उपासना कह सकते हैं। प्रथम कक्षा के लिए यह सब आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। इस आधार के बिना ऊपर की कक्षा में प्रवेश कर सकना उसी प्रकार संभव नहीं, जिस प्रकार सीढ़ी या जीने की सहायता के बिना छलाँग मारकर छत पर चढ़ जाना कठिन होता है। स्कूल की पढ़ाई की उपेक्षा करके सीधे कॉलेज में प्रवेश नहीं मिलता, उसी प्रकार प्रथम स्तरीय स्थूल विधि-व्यवस्था के आधार पर बनी हुई साकार उपासना के बिना उच्चस्तरीय निराकार साधना में सफलता प्राप्त कर सकना किसी के लिए संभव नहीं हो सकता।
भावनात्मक साधना स्तर
उच्चस्तरीय गायत्री उपासना में वस्तुओं, उपकरणों और विधानों का तारतम्य घटने लगता है और ध्यान, भावना एवं निष्ठा में तीव्रगति से अभिवृद्धि होने लगती है। यह उपासना बिना किसी वस्तु के भी हो सकती है। एकांत निर्जन वनों में रहकर घोर तपस्या करने वाले योगियों के लिए अन्न और वस्त्र तक उपलब्ध नहीं होता तो धूप दीप की, हवन ब्रह्मभोज की व्यवस्था कहाँ से बनेगी? सच बात यह है कि तब उन्हें इनमें से किसी भी उपकरण की आवश्यकता नहीं रह जाती। वे आत्मा की अग्नि में प्राण को हवि बनाकर निरंतर अखंड यज्ञ करते रहते हैं। गायत्री चालीसा में “हंसारूढ़ सितंबरधारी” पद में जिस हंसवाहिनी और श्वेत वस्त्रधारिणी गायत्री माता का उल्लेख हुआ है, उसका स्वरूप उच्चस्तरीय साधना में कुछ और ही हो जाता है।
श्वास-प्रश्वास क्रिया के साथ जो ‘सोऽहम’ की ध्वनि होती, उसे हंसयोग कहते हैं। यह हंस अर्थात् सोऽहम तत्त्व ही गायत्री का वाहन बन जाता है । माला का स्थान यह श्वास प्रक्रिया ले लेती है, इड़ा-पिंगला— चन्द्र-सूर्य नाड़ियों का आरोहण-अवरोहण माला फेरने का काम करता है। 54 ग्रंथियाँ आरोहण की और 54 अवरोहण की मिलकर 108 दाने की यह सूक्ष्म चक्र-सारिणी घूमने लगती है। सुषुम्ना सुमेरु कहते हैं। माला में एक मध्य-बिंदु बड़ा दाना रहता है, जिसे सुमेरु के नाम से हम संबोधन करते हैं। आध्यात्मिक माला से सुषुम्ना नाड़ी का वही स्वरूप और स्थान बन जाता है। यह सोऽहम संस्थान उच्चस्तरीय साधना में गायत्री माता का हंस वाहन बन जाता है। इस माला पर वे विहार और विचरण करने लगती है। इसी वीणा में उनकी झंकार उठने लगती है और इसी स्थल से नीर-क्षीर विवेक का हंसगुण साधक की अंतरात्मा में उत्पन्न होने लगता है।
माता का सूक्ष्म स्वरूप
श्वेत वस्त्रधारिणी गायत्री माता का हम पूजन करते हैं। ‛सूर्यमंडल मध्यस्था’ की छवि बनाकर उसे सूर्य प्रकाश के बीच बैठी हुई प्रतिमा बनाकर उसकी प्रतिष्ठा करते हैं। पर उच्चस्तरीय साधना में माता का पूरा आवरण इस शुभ्र ज्योति के स्वरूप में ही परिलक्षित होता है। प्रकाशपुंज के रूप में ही गायत्री माता का दर्शन, ध्यान और साक्षात्कार हो जाता है। जिस प्रकार प्रथम स्तर के साधकों को हंसारूढ़ गायत्री माता का नारी देह में दर्शन, साक्षात्कार, जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में होता रहता है, उसी प्रकार उच्च भूमिका के साधक को प्रकाश की छोटी-छोटी चिनगारियों के रूप में, किरणों के रूप में और तेजस्वी ज्योतिपिंड के रूप में दर्शन एवं साक्षात्कार होता है। स्तर बदलने के साथ साधनों एवं उपकरणों की श्रृंखला भी बदल जाती है। स्कूल की प्रारंभिक कक्षाओं में लकड़ी की तख्ती पर खड़िया और मोटी कलम से बड़े-बड़े अक्षर लिखने का अभ्यास करना पड़ता है, पर आगे चलकर कापी और फाॅउन्टेन पेन के माध्यम से लिखने की क्रिया संपन्न होती है।
साधना-क्षेत्र में भी ऐसे परिवर्तन का होना कोई आश्चर्य, विरोध या मतभेद की बात नहीं, वरन एक स्वाभाविक विकासक्रम है। भारतीय धर्म में साकार और निराकार की जो द्विधा परंपराएँ चली आ रही हैं, इनमें न तो कोई विरोध है और न विभ्रम। दोनों ही एकदूसरे की पूरक हैं। अपने-अपने स्थान पर दोनों ही उपयुक्त हैं और आवश्यक भी। पंचकोशी गायत्री उपासना का विधानक्रम निराकार उपासना जैसा ही है। इसीलिए पंचमुखी गायत्री को अलंकारिक रूप से चित्रित तो करते हैं, पर पूजा के लिए एकमुखी गायत्री की तस्वीरें तथा मूर्तियाँ ही प्रयुक्त होती हैं। इस उद्देश्य के लिए पंचमुखी गायत्री का प्रयोग नहीं होता।
पंचमुखी, दशभुजी गायत्री
गायत्री महाविज्ञान तृतीय भाग में पंचमुखी और दशभुजी गायत्री की विवेचना करते हुए हम विस्तारपूर्वक यह बता चुके हैं कि अन्नमयकोश, मनोमयकोश, प्राणमयकोश, विज्ञानमयकोश और आनंदमयकोश यही पाँच गायत्री के पाँच मुख हैं। इन कोशों में छिपी हुई अत्यंत महत्त्वपूर्ण शक्तियों को विकसित करना और उन आवरणों का परिमार्जन करके आत्मशांति का रसास्वादन करना पंचकोशी आराधना का प्रधान उद्देश्य है। प्रथम स्तरीय उपासना में लौकिक लाभों का मार्ग प्रशस्त होता है। (1) सद्ज्ञान (2) स्वास्थ्य सुधार (3) उत्साह एवं स्फूर्ति (4) सहयोग एवं मित्रता की अभिवृद्धि (5) अभावों की पूर्ति, यह पाँच लाभ प्रथम श्रेणी के निष्ठावान साधक को मिलते हैं। ऊँची श्रेणी में यह लाभ और भी उच्चकोटि के हो जाते हैं। (1) साहस एवं निर्भीकता (2) विवेक एवं दूरदर्शिता (3) पुरुषार्थ एवं तृप्ति यह पाँच सिद्धियाँ पंचकोशी साधना की हैं। जैसे नर−नारी का जोड़ा होता है, वैसे ही दो−दो सद्गुणों का यह जोड़ा दस की संख्या में हो जाता है। इन्हें पंचमुखी गायत्री की दस भुजाएँ अथवा दस सिद्धियाँ कह सकते हैं।
सद्गुण और श्रेष्ठ विभूतियाँ
गुणों की अभिवृद्धि पर संपदाओं और विभूतियों की उत्पत्ति एवं अभिवृद्धि निर्भर रहती है। जिस प्रकार बिना जड़ का पौधा देर तक खड़ा नहीं रह सकता, उसी प्रकार योग्यता और प्रतिभा न होने पर अनायास कोई संपदा मिल भी जाए तो देर तक ठहर नहीं पाती । जड़ मजबूत होने पर ऊपर की टहनी कट जाने पर भी फिर उसकी शाखाएँ फूट जाती हैं, उसी प्रकार यदि सद्गुणों की जड़ मनोभूमि में मजबूती से जमी हुई हो तो किन्हीं आकस्मिक कारणों से दरिद्रता एवं विपत्ति सामने आ जाने पर भी वे ठहर नहीं पातीं और कोई नई सुविधा उत्पन्न होकर उस अभाव की पूर्ति कर देती है। गायत्री उपासना से प्रत्यक्ष तो किसी को छप्पर फाड़कर संपदा नहीं मिलती, पर साधक के अंदर वे तत्त्व विकसित हो जाते हैं, जिनके साथ अनेकों प्रकार की सुख−संपदाएँ जुड़ी रहती हैं। वर्षा होते ही हरियाली उग आती है और कीट-पतंगों की अजस्र उत्पत्ति होने लगती है। मानवोचित सद्गुणों का विकास होने के साथ−साथ वे मंगलमयी सुख-सुविधाएँ, समृद्धियाँ और विभूतियाँ सामने आ जाती हैं, जिनके लिए आमतौर से लोग तरसते रहते हैं और जिनकी उपलब्धि को कोई दैवी वरदान या सिद्धि चमत्कार माना जाता है।
चमत्कार को नमस्कार
मोटे तौर से चमत्कार उन बातों को माना जाता है, जो मानव शरीर की सीमा और सामर्थ्य से बाहर की है। हवा में उड़ना, पानी पर चलना, अदृश्य हो जाना, रूप बदल लेना आदि क्रियाओं की किसी समय सिद्धियाँ कहा जाता था। पर अब विज्ञान की उन्नति के कारण यह बातें अमुक मशीनों की सहायता से सस्ती और सुलभ हो गईं, इसलिए इन क्षमताओं के प्राप्त कर लेने पर भी कोई विशेष प्रयोजन सिद्धि नहीं होता। बाजीगरी के अनेकों अचंभे में डालने वाले खेल जादूगर लोग दिखाया करते हैं। मैस्मरेजम और हिप्नोटिज्म से भी बहुत मनोरंजक तमाशे होते देखे गए हैं। कौतूहल उत्पन्न करके अचंभे में डालने वाली बातें, इस विज्ञान की उन्नति के युग जबकि सौरमंडल की यात्रा करने के लिए मानव संचालित यान उड़ रहे हैं, कोई विशेष महत्त्व नहीं रखते।
एक ही हाइड्रोजन बम से जब करोड़ों मनुष्यों को पलक मारते नष्ट कर डालना संभव हो गया है तो मारण, मोहन, उच्चाटन आदि के अभिचार क्या महत्त्व रखते हैं। यह प्रयोजन तो नशीली चीजों से या मामूली हथियारों से भी पूरे हो सकते हैं। गायत्री उपासना के द्वारा इस प्रकार के चमत्कारों की आशा से श्रम करना बालबुद्धि वाले ओछे स्तर के लोगों के लिए ही संभव है। बेशक अनेकों अचंभे में डालने वाले काम कर सकना तपस्वी साधकों के लिए संभव है, पर उनकी तुच्छता को समझते हुए इन पंक्तियों में उनकी उपेक्षा ही की जा रही है। उनका कोई वर्णन और विवेचन करने की हमारी इच्छा आकांक्षा इसलिए नहीं है कि उससे साधक की अभिरुचि उच्चकोटि के लाभ उठाने की अपेक्षा इन बाल-विनोदों के स्तर के अभिमुख हो सकती है, जिसका परिणाम शक्ति की बर्बादी करके सस्ती वाहवाही पाने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं होता।
आत्मबल का सर्वोपरि लाभ
गायत्री उपासना की उच्च भूमिका में प्रवेश करने का सबसे बड़ा लाभ आत्मबल की वृद्धि है। धनबल, विद्याबल, बुद्धिबल, शस्त्रबल, संघबल का चमत्कार हम रोज ही अपने चारों ओर देखते रहते हैं। आत्मबल का अनुभव हमें नहीं है, क्योंकि उस बल के बलवान लोग आस−पास दिखाई नहीं पड़ते। पर जब कभी भी ऐसे आत्मबलसंपन्न योद्धा कहीं दृष्टिगोचर होते हैं तो उन की महत्ता संसार के समस्त भौतिक बलसंपन्न लोगों से कहीं अधिक होती है। इन्हें ही महापुरुष कहते हैं। नररत्नों में इन्हीं की गणना होती है। जमाने को बदल देने की, आत्मकल्याण की, दूसरों का सच्चा हितसाधन कर सकने की अपार क्षमता उनमें होती है। इसी को सच्ची सिद्धि कहते हैं। उच्चस्तरीय गायत्री उपासना का उपासक दिन−दिन महानता की ओर तीव्र गति से अग्रसर होने लगता है।
अन्नमयकोश इस स्थूलशरीर को कहते हैं। असंयम और अनियमितता के कारण, प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करते रहने के कारण, आहार-विहार की मर्यादाएँ तोड़ने के कारण स्वास्थ्य संस्थान में विकृति आती है। यह विकृति जब तक सीमित मात्रा में रहती है, तब तक तो शरीर उसे बरदाश्त करते हुए किसी प्रकार अपना काम चलाता रहता है। पर जब उसकी मात्रा बहुत बढ़ जाती है और उसका सहज निष्कासन संभव नहीं रहता तो बीमारी के रूप में एक हड़ताली विद्रोह उठ खड़ा होता है।
विकृति का तात्कालिक समाधान
विज्ञ व्यक्ति वस्तुस्थिति को तभी संभालने का प्रयत्न करते हैं, जब विकृति के थोड़ा भी जमा होने के चिह्न दिखाई पड़ते हैं। शरीर में सुस्ती, थकान, आलस, कमजोरी का होना, आँख, कान, दाँत, आँत, मस्तिष्क आदि की शक्तियों का घटना इस बात का चिह्न है कि पाचनक्रिया, रक्तशुद्धि एवं सफाई की प्रक्रिया में कहीं गड़बड़ी उत्पन्न हो गई है। नया कार्यभार देना बंद करके कुछ दिन शरीर को विश्राम करने की व्यवस्था कर दी जाए और जिस अवयव में विकार उत्पन्न होता दिखाई दे उसकी सहायता करके संचित विकृति को हटा दिया जाए। आहार−विहार में जहाँ गड़बड़ी चल रही हो, उसे ठीक कर लेने से भी ऐसी विकृतियों का समाधान हो जाता है। अधिक विकार उत्पन्न होने की दशा में किसी चिकित्सा का सहारा लेना पड़ता है।
अन्नमयकोश को विकाररहित बनाए रखने के लिए प्राकृतिक जीवनयापन करने की पद्धति, बहुत ही निर्दोष और आध्यात्मिक आदर्शों के सर्वथा अनुकूल है। उपवास, बस्तिक्रिया एवं जल, मृत्तिका, उष्णता आदि के द्वारा पाँच तत्त्वों के उपचार एक प्रकार से योग-साधना के ही अंग हैं। प्राकृतिक चिकित्सा को अन्नमयकोश की एक सरल साधन-पद्धति भी कह सकते हैं। इस वर्ष मई अंक में निरोग रहने की क्रम-व्यवस्था और अगस्त अंक में रोग होने पर उसकी चिकित्सा कर सकने लायक आवश्यक जानकारी दी जा चुकी है। इसे सर्वसाधारण के लिए अन्नमयकोश की एक साधना ही समझना चाहिए।
स्वास्थ्य से मनोबल का संबंध
शरीर के निरोग और स्फूर्तिवान रहने से आध्यात्मिक उन्नति के आगामी कार्यक्रम सरल रहते हैं। जिनके पैर पहली ही सीढ़ी पर लड़खड़ाने लगते हैं, वे ऊपर की मंजिल तक कैसे पहुँच सकेंगे? इसलिए अध्यात्म मार्ग के पथिकों को सबसे पहले सबसे अधिक ध्यान शारीरिक निरोगता पर देना पड़ता है। भले ही पहलवान न बना जाए, पर साधक को शारीरिक कष्टों की व्यथा से मुक्त होना ही चाहिए, अन्यथा रोग-व्याधि में उलझा हुआ मन भजन-ध्यान में कैसे लग सकेगा? बीमार आदमी अपना संकल्प बल खींचता है, उसे सदा चिंता, निराशा, दीनता और कातरता घेरे रहती है। चित्त की स्थिरता तो उससे बन ही नहीं पड़ती। ऐसी दशा में गायत्री उपासना की विशिष्ट साधना तो क्या, सामान्य भजन-साधन भी बन नहीं पड़ता, जो किया जाता है वह चिह्नपूजामात्र रह जाता है।
इसीलिए हठयोग, राजयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग आदि सभी साधन मार्गों में अन्नमयकोश की साधना, आरोग्य-रक्षा पर बहुत अधिक जोर दिया है और नेति-धोति, बस्ति, वज्रोली, कपालभाति, न्योली, आसन, प्राणायाम, सूर्यनमस्कार, व्रत, उपवास, चांद्रायण, पैदल तीर्थयात्रा, परिक्रमा, नदीस्नान, तप, प्रतीक्षा आदि के अगणित विधान बताए हैं। उन्हें धर्म, पुण्य और ईश्वरप्राप्ति का साधन माना गया है, जबकि इसका प्रधान उद्देश्य स्वास्थ्य-रक्षा ही है। आरोग्य-रक्षा को अध्यात्म-साधना से भिन्न मानना भारी भूल है। दोनों का अत्यंत घनिष्ठ संबंध है। देह को नश्वर या भवबंधन समझकर उसकी उपेक्षा करना अविवेक का ही चिह्न है। शरीर को भगवान का मंदिर कहा गया है। अपने इष्टदेव के मंदिर की तोड़-फोड़ करना, गंदा-गलीज बनाना किसी भावनाशील भक्त के लिए शोभा नहीं देता।
शरीर भगवान का देवमंदिर
जो देवमूर्ति की तो पूजा किया करे, पर उसके निवास मंदिर को अपवित्र और क्षतिग्रस्त बनाता रहे, उस भक्त की कौन प्रशंसा करेगा? इसलिए साधना-पथ के पथिकों को उनके मार्गदर्शक वह शिक्षा दिया करते हैं, जिससे उनका शरीर निरोग, सक्रिय और स्फूर्तिवान बने। प्राचीन गुरुकुलों में छात्रों की शिक्षा में उनके स्वास्थ्य पर बारीकी से ध्यान दिया जाता था। योगाभ्यास का आरंभ भी यहीं से होता है। अन्नमयकोश को गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में प्रथम स्थान मिला हुआ है। वस्तुतः यह विषय प्राथमिकता देने योग्य ही है। गायत्री तपोभूमि की गतिविधियों में, साधन-प्रक्रियाओं में आरोग्य-रक्षा पर समुचित ध्यान दिया जाता है और उसका समुचित कार्यक्रम भी बन रहा है।
गत वर्ष 'अक्टूबर' अंक में अन्नमयकोश की साधना के लिए तपश्चर्या की ओर साधकों का ध्यान आकर्षित किया गया था और इसके लिए ‘अस्वाद व्रत’ की सरल साधना बताई गई थी। सप्ताह में कम-से-कम एक दिन ऐसा रखना, जिसमें नमक और मीठा दोनों ही स्वाद छोड़ रखे जाएँ, स्वाद विजय के लिए एक कारगर उपाय माना गया है। जिनके लिए संभव है, वे अधिक दिनों तक लगातार नमक या मीठा अथवा दोनों ही छोड़ सकते हैं। इनके छोड़ने से हानि कुछ नहीं, लाभ बहुत है। जितना नमक और शक्कर शरीर के लिए आवश्यक है, उतना अन्न, शाक, दूध आदि में पहले से ही मौजूद है। बाहर से जितनी मात्रा में इन्हें स्वाद के लिए मिलाते हैं, वह अनावश्यक ही नहीं, हानिकर भी होता है। स्वाद के लोभ में मनुष्य अधिक मात्रा में अनुपयुक्त चीजें खा जाता है। यदि यह मिलावट न हो तो केवल वे ही चीजें खाई जा सकेंगी, जो अपने शरीर के लिए उचित एवं उपयुक्त हैं। साथ ही बिना स्वाद का भोजन कोई विशेष आकर्षक न होने के कारण भूख से ज्यादा भी न खाया जा सकेगा। इतना प्रतिबंध रहने पर आरोग्य की आधी समस्या हल हो जाती है। अस्वस्थता का आधा कारण आवश्यकता से अधिक मात्रा में अनुपयुक्त वस्तुओं को खाते रहना ही है। यह नियंत्रण बन पड़े तो दवाओं का आधा खरच और शरीर का आधा कष्ट सहज ही समाप्त हो सकता है।
मन और इंद्रियों का निग्रह
इंद्रियनिग्रह का महत्त्व और महात्म्य अध्यात्म मार्ग में अत्यधिक बताया गया है। इसका अभ्यास करने के लिए कुछ व्यवस्थित क्रम बनाना पड़ता है। दसों इंद्रियों में स्वादेंद्रिय और कामेंद्रिय यह दो ही प्रधान एवं प्रबल मानी गई हैं। इन दो के वश में हो जाने पर शेष आठ तो सहज ही वशवर्त्ती बन जाती हैं। इन प्रबल दो इंद्रियों में कुछ आपसी तालमेल ऐसा है कि स्वादेंद्रिय के वश में हो जाने से कामेंद्रिय की प्रबलता स्वयमेव नष्ट हो जाती है। ब्रह्मचर्यपालन में जिसकी अभिरुचि हो, जो उसका महत्त्व समझते हों, उन्हें अस्वाद व्रतपालन करना चाहिए। चटोरा आदमी अपनी जीभ को ही नहीं, अन्य सभी इंद्रियों को चटोरी, अनियंत्रित बना लेता है। जिसका मन तरह-तरह के चटपटे, मीठे, जायकेदार व्यंजन चखने के लिए ललचाता रहता है, जिनकी जीभ जायके के लिए लार टपकाती रहती है, उनकी अन्य नौ इंद्रियाँ कभी काबू में नहीं आ सकतीं और न मन ही एकाग्र हो सकता है। इसलिए साधक को मन पर अंकुश लगाने की पूर्व भूमिका के रूप में जीभ पर अंकुश लगाना पड़ता है। वह स्वाद को जीतने के लिए एक शूरवीर योद्धा की तरह अपनी संकल्पशक्ति को तलवार बनाकर साधन-समर में उतरता है और काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के षडरिपुओं के पहिले किले ‘असंयम’ पर धावा बोल देता है। यह पहला मोर्चा फतह होने पर आगे की लड़ाई बहुत सरल हो जाती है।
लोलुपता का सर्वव्यापी प्रभाव
चटोरेपन में गरीबी और अमीरी कारण नहीं। अमीर लोग कीमती प्रकार की कटोरियाँ सजाते हैं। गरीब लोग मिर्च की चटनी की लुगदी जैसी बनाकर रोटी पर रख लेते हैं और उसे जलती जीभ के ऊपर होकर गले उतारते हैं, गुड़ की आवश्यक मात्रा खाए बिना उनका भी काम नहीं चलता। समय-कुसमय भुने चना-मटर खाने से उनका भी मुँह चलता रहता है। अमीर लोगों की यह आदत कीमती खाद्य पदार्थों से तृप्त होती है। गरीब सस्ती चीजों से काम चलाते हैं। यह सस्ते और महँगे का भेद छोड़ दिया जाए तो चटोरेपन की दृष्टि से दोनों समान स्थिति के होते हैं। यह मानसिक दुर्बलता सभी क्षेत्रों में व्याप्त है इसलिए उसके निराकरण का प्रयत्न भी सभी लोगों को करना चाहिए। स्वास्थ्य की आवश्यकता के अनुरूप नमक, शक्कर, नींबू आदि को औषध रूप में लेना एक बात है और चटोरेपन से प्रेरित होकर अंट-शंट चीजें उदरस्थ करते रहना बिलकुल दूसरी स्थिति है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह से तो आवश्यकतानुसार विष, धातुएँ और नशे भी शोधित और सीमित मात्रा में सेवन कर लिए जाते हैं, पर व्यसन के रूप में उनका मनमाना उपयोग अहितकर ही होता है। स्वाद की दृष्टि से खाया हुआ नमक और मीठा भी अंततः स्वास्थ्य को बिगाड़ने वाला ही सिद्ध होता है। अपच, मलावरोध, जिगर, तिल्ली, दंतक्षत, दिल की धड़कन, वायुविकार, खून-खराबी आदि अनेक बीमारियों का कारण भी इनका अधिक मात्रा में सेवन करना ही होता है। इन जंजालों से छुटकारा पाने के लिए हर साधक को स्वाद जीतने का प्रयत्न करना ही चाहिए। मन को वश में करने के लिए भी यह अभ्यास एक बहुत ही उपयुक्त साधन सिद्ध होता है।
सात्त्विक अन्न से उत्कृष्ट मन
अन्न से मन बनता है। जैसे संस्कारों का अन्न खाया जाता है, मन की प्रवृत्ति वैसी ही बन जाती है। मन को शुद्ध, संयमी, स्थिर और सन्मार्गगामी बनाने का प्रधान उपाय अन्न पर संयम करना है। अभक्ष खाने वाले, माँस, मदिरा, नशेबाजी में ग्रस्त मनुष्य आत्मकल्याण के मार्ग पर दूर तक चल सकेंगे, यह संदिग्ध है। जिह्वा का चटोरापन मन में उसी प्रकार चंचलता उत्पन्न करता है, जिस प्रकार तेज हवा चलने से जलाशय में लहरें उठने लगती हैं। अनीति की कमाई की रोटी खाने वाला, वह आंतरिक स्वच्छता कैसे प्राप्त कर सकेगा, जिसमें भगवान का विराजमान हो सकना संभव होता है। साधना का प्रथम चरण अन्न की शुद्धि है। दूध, मलाई खाकर शरीर मोटा हो सकता है, पर मन को निर्मल बनाने के लिए अन्न में सात्त्विकता की आवश्यक मात्रा का मिला होना आवश्यक है।
पिछले वर्ष स्वाद पर नियंत्रण करने के लिए सप्ताह में एक बार नमक, शक्कर का त्याग करने के लिए उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना के साधकों को शिक्षण दिया गया था। एक वर्ष में 52 दिन वह अस्वाद व्रतपालन कर लेने वालों को उसमें आवश्यक आनंद मिलना शुरू हो गया होगा। कुछ दिन ही जीभ बदमाशी करती है। फीका, अलौना भोजन करने में बहुत नाक-भौं सिकोड़ती है और कई बार तो स्वास्थ्य पर असर पड़ने की बहानेबाजी भी गढ़ लेती है। कई लोग कब्ज रहने, कमजोरी आने आदि की कल्पना करने लगते हैं, जबकि सच बात यह है कि नमक-शक्कर की अनावश्यक मात्रा से अनेक प्रकार के रक्त, हृदय और पेशाब संबंधी रोग उत्पन्न होते हैं और अस्वादव्रतपालन करने से रक्त इतना शुद्ध हो जाता है कि साँप के काटने तक का असर उस पर नहीं होता। स्वास्थ्य में उसका प्रभाव निश्चित रूप से सुधारात्मक होता है। एक वर्ष में यह प्रयोग भले ही 52 दिन ही क्यों न किया हो, पर प्रयोगकर्त्ताओं ने यह अनुभव किया होगा कि उनकी भावनाएँ उससे बहुत शुद्ध हुई हैं, स्वास्थ्य सुधरा है और मन पर नियंत्रण करने से एक सीमा तक प्रसन्नतादायक सफलता मिली है। अस्वाद व्रत का आनंद जिसे एक बार मिलने लगा, वह उसे छोड़ देने की बात सोच भी नहीं सकता।
इस वर्ष के लिए दो व्रत
आहार को हमें पूर्ण सात्त्विक बनाने का लक्ष्य सामने रखकर चलना होगा। ठीक है कि यह मंजिल एक दिन में पूरी नहीं हो सकती। धीरे-धीरे कदम बढ़ाते हुए ही इस यात्रा को पूरा करना पड़ेगा। गत वर्ष सप्ताह में एक दिन का अस्वाद व्रत बताया गया था, पर अन्नमयकोश की शुद्धि के लिए इतने से ही काम नहीं चलने वाला है। अब इस वर्ष हमें एक कदम और बढ़ाना है। (1) अस्वाद व्रत को एक के बजाय सप्ताह में दो बार रखा जा सकता है और (2) थाली में अनेक प्रकार की वस्तुएँ न रखकर उनकी मात्रा को सीमित कर देना, यह दो बातें इस दूसरे वर्ष के साधनक्रम से हमें सम्मिलित कर लेनी चाहिए। अस्वाद व्रत रविवार के लिए रखा गया था, क्योंकि वह गायत्री के देवता सविता का दिन है। उस दिन का व्रत आध्यात्मिक दृष्टि से भी विशेष फलप्रद है। पर जिनके लिए वह दिन असुविधाजनक पड़ता है, वे अन्य किसी दिन की व्यवस्था बनाते रहे हैं। इस वर्ष 'रविवार' और 'गुरुवार' को अस्वाद व्रत रखना चाहिए। पर जिन्हें इन दिनों में असुविधा पड़ती हो, वे इनकी बजाय कोई दूसरे दो दिन भी नियत कर सकते हैं।
अनेक प्रकार के व्यंजनों से हानि
आरोग्यशास्त्र का यह सुदृढ़ नियम है कि भोजन में एक समय एक साथ अनेक प्रकार की वस्तुएँ न होनी चाहिए। हर वस्तु का पाचनकाल न्यूनाधिक होता है। उनके लिए पाचक-रसों की आवश्यकता भी पृथक प्रकार की रहती है। यदि अनेक प्रकार के व्यंजन बनाकर एक साथ खाए जाएँगे तो उसका हाल उस खिचड़ी जैसा हो जाएगा, जिसमें आध घंटे से लेकर छह घंटे तक पकने वाली चीजें इकट्ठी करके पकाई जा रही हैं। इनमें से कुछ चीजें कच्ची रह जावेंगी। जिस थाली में अनेकों कटोरियाँ होंगी, अनेकों व्यंजन परोसे गए होंगे, वह स्वास्थ्य की दृष्टि से खाने वाले के लिए उस बढ़ी हुई संख्या के अनुपात से ही हानिकर होंगी। संत महात्मा बहुधा एक ही वस्तु खाते हैं। यदि कई प्रकार की चीजें उन्हें खानी पड़ें तो आपत्ति धर्म की तरह उन सबको इकट्ठी करके उनकी संख्या एक कर लेते हैं और अनेक स्वादों को नष्टकर एक ही स्वाद बना लेते हैं। इस आदर्श के पीछे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के सुधारने का एक बड़ा ही महत्त्वपूर्ण तथ्य सन्निहित है। भोगों को, स्वादों को सीमित करना, मन को वश में करने का, इंद्रियनिग्रह का एकमात्र उपाय है। भोजन में जितने अधिक प्रकार की वस्तुओं का समावेश किया जाएगा, उतनी ही पाचनक्रिया खराब होगी, उतना ही खरच बढ़ेगा और उतना ही मन चंचल होगा। इसलिए संयम का अवलंबन करते हुए ही साधन-पथ के पथिक को अग्रसर होना पड़ता है। चटोरा व्यक्ति मन को कभी संयम में ला सकेगा, इसमें संदेह ही है।
कटोरियों की संख्या घटे
जिनकी आर्थिक स्थिति थोड़ी सुधरी हुई है, वे आमतौर से भोजन की शान इस बात में समझते हैं कि उसमें कितनी ही कटोरियाँ सजी हुई हों। कितने ही प्रकार के शाक, दाल, भात, रायते, अचार, चटनी, पापड़, मिठाई, पकौड़ी, नमकीन आदि के कितने ही तरह के स्वाद उन्हें पसंद लगते हैं। इस शान और शेखीखोरी को हमें चटोरेपन और असंयम का, विलासिता और चंचलता का चिह्न मानना चाहिए। सादगी ही सभ्यता का चिह्न माना गया है, यह सादगी भोजन में भी रहनी ही चाहिए। अन्नमयकोश का परिशोधन करने की उच्चस्तरीय गायत्री साधना का हमारा प्रथम प्रयास ही लड़खड़ाने लगेगा, यदि इतना भी न बन पड़ा तो आगे जो कठिन तपश्चर्याएँ करने का अवसर प्रस्तुत होगा, उसे किस प्रकार किया जा सकेगा?
भोजन में दो वस्तुएँ रहना पर्याप्त है। एक खाने की वस्तु, दूसरी लगाने की। रोटी-शाक, रोटी-दाल, भात-दाल जैसी किन्हीं दो वस्तुओं का जोड़ा मिला लेने से एक खाने की प्रधान वस्तु और दूसरी सहायक का जोड़ा आसानी से बन जाता है। हर भोजन में वस्तुएँ बदली जा सकती हैं, पर उनकी संख्या दो ही हों। जिस प्रकार पति और पत्नी की दो तक ही कामसेवन की मर्यादा सीमित रहती है, उसी प्रकार स्वादसेवन के लिए भी दो का जोड़ा पर्याप्त है। कोई यह न सोचे कि इसका स्वास्थ्य पर कुछ बुरा असर पड़ेगा। इससे पाचनक्रिया तो सुधरेगी ही, मन भी बहुत संयमी बनेगा। संयमी मन जितना पारलौकिक सद्गति के लिए आवश्यक होता है, उतना ही लौकिक-समृद्धि और सफलताएँ उपलब्ध करने के लिए भी उपयोगी है। चंचलता मिटाकर एकाग्रता उत्पन्न करने के लिए यदि इतना त्याग करना पड़ता है तो उसे कोई बहुत बड़ी बात नहीं मानना चाहिए।
धीरे-धीरे भी चला जा सकता है
जो लोग अधिक चटोरे हैं, जिन्हें इतना त्याग कर सकना कठिन मालूम पड़ता है, वे इतना तो करें ही कि भोजन में जितनी संख्या में वस्तुएँ रहती हैं, उसकी संख्या अबकी अपेक्षा घटा लें और उनकी सीमा निर्धारित कर लें। तीन-चार से अधिक तो यह संख्या किसी भी प्रकार नहीं होनी चाहिए। इस वर्ष एक साथ खाए जाने वाले पदार्थों की संख्या चार या तीन रखें तो उन्हें घटाते हुए आगे वर्षों में दो ही कर लेने का लक्ष्य रखना चाहिए। अन्नमयकोश की साधना का द्वितीय वर्षीय साधनक्रम (1) एक सप्ताह में दो दिन नमक-शक्कर छोड़कर अस्वादक्रम का पालन और (2) भोजन में एक बार में खाद्य वस्तुओं की संख्या दो तक सीमित रखना, यह दो बातें रखी गई हैं। दुर्बल मनोभूमि वाले एक सप्ताह में एक बार अस्वाद व्रत रखते हुए और भोजन में वस्तुओं की संख्या तीन या चार रखते हुए भी धीरे-धीरे आगे बढ़ सकते हैं।
नर को नारायण और पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने का लक्ष्य लेकर युगनिर्माण योजना का आरंभ हुआ है। मानव तुच्छ नहीं महान है। वह महान तत्त्व से अवतरित होता है, महान लक्ष्य लेकर इस पृथ्वी पर आता है और महानता की शानदार जिंदगी जीते हुए, महान आदर्श उपस्थित करते हुए, महान तत्त्व को उपलब्ध करने के लिए ही उसकी जीवनयात्रा चलती है। इस राजमार्ग पर वह चलता रहे तो उसे पग-पग पर आनंद, संतोष और उल्लास की परिस्थिति अनुभव होगी। अपने आस-पास का सारा वातावरण उसे सज्जनता और सौम्यता से ओत-प्रोत दिखाई देगा। जहाँ बदमाशी और गंदगी है, वहाँ उसे हटाने और मिटाने को एक परीक्षा या कसौटी की तरह समझकर सुलझे हुए दृष्टिकोण का व्यक्ति खिन्न होने की अपेक्षा कठोर कर्तव्यपालन को एक चुनौती के रूप में स्वीकार करेगा।
छोटी बातों का बड़ा महत्त्व
महानता के इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें छोटी बातों से अपना प्रयत्न आरंभ करना पड़ता है, उनके मिलने से ही सर्वांगपूर्ण महानता विकसित होती है। छोटे−छोटे पिंडों से मिलकर यह विशाल ब्रह्मांड बना है और हर पिंड सूक्ष्म अंडों का, अणुओं का समूहमात्र है। इसी प्रकार छोटी−छोटी अच्छी आदतें, अच्छी भावना, अच्छी मान्यता, अच्छी श्रद्धा, अच्छी प्रवृत्ति, अच्छी आकांक्षा मिलकर एक 'सर्वतोमुखी श्रेष्ठता' विकसित होती है। कोई महापुरुष, संत या ऋषि और कुछ नहीं, केवल छोटी−छोटी अच्छाइयों का एक समूह हैं। यह छोटी अच्छाइयाँ यदि समाप्त हो जाएँ तो उसका सारा वैभव, बुद्धिबल और पुरुषार्थ मिलकर भी महानता की रक्षा न कर सकेगा, वह फिर तुच्छ का तुच्छ बन जावेगा। छोटी अच्छाइयाँ देखने में सूक्ष्म लगती हैं, पर वस्तुतः इन्हीं ईंटों को चुनकर महानता का विशाल भवन खड़ा किया जाता है।
छोटी−छोटी, अच्छी-बुरी आदतें विकसित होने पर मनुष्य के जीवन को बनाने और बिगाड़ने में भारी योगदान करती हैं। चोरी, जुआ, नशा, व्यभिचार, आलस आदि की बुरी आदतें आरंभ में बहुत छोटे रूप में ही उत्पन्न होती हैं, पर जब मनुष्य के मस्तिष्क पर पूरी तरह छा जाती हैं और उसे अपना गुलाम बना लेती हैं तो फिर वह बेचारा ऐसा बेबस हो जाता है कि इन घृणित बातों से ऊपर उठ ही नहीं पाता। अपने सर्वस्व को इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों की वेदी पर बलिदान कर देता है।
छोटी अच्छाइयों का सत्परिणाम
जिस प्रकार छोटी बुराइयाँ आरंभ होकर भयंकर रूप धारण करती हैं, उसी प्रकार अच्छाइयों का छोटा आरंभ यदि क्रमबद्ध रूप से अग्रसर होता रहे तो उसका अंतिम परिणाम ऐसा महान हो सकता है, जिस पर गर्व और संतोष व्यक्त किया जा सके। अन्नमयकोश की साधना के यह दो व्रत भले ही छोटे लगें, पर उनके परिणाम वासना पर नियंत्रण होते चलने से मनुष्य की श्रेष्ठता बढ़ाने के लिए बहुत ही सहायक हो सकते हैं। वासना और तृष्णा की डाकिनों में से एक को— वासना को, यदि कुछ काबू में रखा जा सके तो निःसंदेह इस संसार की आधी विपत्ति हल हो सकती है। मानवीय शरीर और मन का सत्यानाश करने वाली डाकिन वासना है, जिससे समाज में अगणित प्रकार के पाप, द्वेष, अनाचार, अत्याचार उत्पन्न होते हैं। इन दोनों को सीमित किए बिना आत्मिक सद्गुणों का असीम विस्तार हो सकना संभव नहीं। इसलिए अध्यात्म विद्या के आचार्य विविध विधि साधनाएँ बनाकर मानव अंतःकरणों को इन कषाय-कल्मषों से विमुक्त करने का प्रयत्न किया करते हैं। अन्नमयकोश की साधना के लिए हमारे दो प्रयत्न भी इस दिशा में उठाए गए आरंभिक कदम हैं, जिनका सत्परिणाम, सादगी, संतोष, सौम्यता और सज्जनता के रूप में कुछ ही समय में प्रस्फुटित हुआ देखा जा सकता है।
गृहस्थ में तपश्चर्या का विधान
अंतःप्रदेश में जड़ जमाकर बैठी हुई असुरता से लड़ने के लिए जो कष्टसाध्य प्रयास साधक को करना पड़ता है, उसे तप कहते हैं। अन्नमयकोश की साधना तपश्चर्या नाम से पुकारी जाती है। उसे आहार की तपश्चर्या और विहार की तपश्चर्या, दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। आहार की तपश्चर्या को अस्वाद व्रत और पदार्थ सीमाबंध के रूप में पिछले लेख में प्रस्तुत कर चुके हैं। विहार की तपश्चर्या में (1) ब्रह्मचर्य और (2) निरालस्य, इन दो बातों को रखा गया है। कामसेवन की समस्या व्यक्तिगत मानी जाती है, पर वस्तुतः वह पूर्णतया सामाजिक है। व्यक्तियों के स्वास्थ्य से उसका सीधा संबंध है। और संतान की दुर्बलता से हमारी भावी पीढ़ियों को सत्यानाश होना भी एक ऐसी महत्त्वपूर्ण बात है, जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। व्यक्तिगत जीवन में शरीर का खोखलापन, दुर्बलताजन्य-कायाकष्ट , मूत्ररोग, जननेंद्रिय संबंधी बीमारियाँ, अल्पायु, जवानी में बुढ़ापा, औषधियों का खरच, उपार्जन में अशक्तता, चित्त में खिन्नता, पीड़ा, घरवालों की परेशानी, स्वजनों की घृणा और झुँझलाहट, मानसिक दीनता , चिड़चिड़ापन, विचारशक्ति का अभाव, चंचलता आदि अगणित व्यथाएँ ऐसी हैं, जो अव्यवस्थित, अनियंत्रित कामसेवन करने वालों के पीछे लग जाती हैं और जीवन के रस से ही उन्हें हाथ धोकर निराशा और उदासीनता भरा निकृष्ट जीवनयापन करने के लिए विवश होना पड़ता है।
ब्रह्मचर्य से जीवन विकास
ब्रह्मचर्य की महत्ता का आरोग्यशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र एक स्वर से गुणगान करते हैं। दोनों ही यह मानते हैं कि व्यक्तित्त्व के सर्वांगीण विकास के लिए ब्रह्मचर्य को अमृत ही मानना चाहिए। “मरणं बिन्दुपातेन, जीवनं बिन्दु धारणम्।” की उक्ति में ऋषि ने यही कहा है कि ब्रह्मचर्य को ही जीवन और उसके नाश को ही मरण मानना चाहिए। जिन्हें जिंदगी से प्यार नहीं, जो मौत के मुँह में जाने के लिए आतुर हैं उन्हें अनियंत्रित कामसेवन का रास्ता अपना लेना चाहिए। सर्वनाश कुछ ही समय में उनके सामने आ खड़ा होगा। महापुरुषों में, महानता में सदा से ब्रह्मचर्य का बड़ा योग रहा है।
हनुमान, भीष्म, शंकराचार्य, दयानंद आदि में ब्रह्मचर्य का तेज किस प्रकार प्रस्फुटित हुआ था, यह सर्वविदित है। पहलवानों को इस संबंध में काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। बुद्धिजीवी लोगों में से जो उत्कृष्ट श्रेणी के हैं, वे ऊर्ध्वरेता रहकर ही देर तक अपनी बौद्धिक प्रतिभा को स्थिर रख पाते हैं। काम-वासना में नष्ट होने से जो शक्ति बचा ली जाती है, वह ओज, तेज, सौंदर्य−उल्लास, शौर्य, साहस, स्फूर्ति आदि महत्त्वपूर्ण तत्वों में परिणत होकर शरीर में छलकने लगती है तो मानव शरीर की शोभा और स्थिरता पहले की अपेक्षा बहुत बढ़ जाती है। रोगों का मुकाबला करने वाली जीवनीशक्ति उन्हीं शरीरों में रह पाती है, जो अपना सार निचोड़ते रहने में सावधानी बरतते हैं। भजन, ध्यान, श्रद्धा, भक्ति और ईश्वरप्राप्ति के योग्य मनोभूमि बनाने वालों को वासना की ओर से अपना मुँह मोड़ना ही पड़ता है। जिसे इंद्रिय लोलुपता घेरे रहती है, उसके लिए उच्च श्रेणी के व्यक्तियों में अपनी गणना करा सकना कठिन है।
विवाहित जीवन की मर्यादाएँ
अविवाहित, अखंड ब्रह्मचारी रहना सबके बस की बात नहीं है। कोई विशिष्ट व्यक्ति उस आदर्श का पालन करे तो उनकी प्रशंसा करनी चाहिए, पर सर्वसाधारण के लिए विवाहित जीवन सरल, सुविधाजनक और सुव्यवस्थित प्रगति की दृष्टि से उचित ही है। चार वर्णाश्रमों की पद्धति वैज्ञानिक भी है और व्यावहारिक भी। नर और नारी में जो अपूर्णता है, वह एकदूसरे के साथ एकात्म होकर पूर्ण करें, यह उचित है और आवश्यक भी। किंतु विवाह होने का मतलब यह नहीं है कि दोनों सर्वनाश के गड्ढे में ओंधे मुँह गिरने के लिए अंधी दौड़ लगाने लगें। महात्मा गाँधी ने 'अनीति की राह पर' नामक अपनी पुस्तक में विवाहित जीवन में रहते हुए अधिकाधिक ब्रह्मचर्य पालन करने पर बहुत जोर दिया है। वे स्वयं 36 वर्ष की आयु से अखंड ब्रह्मचर्य पालन करने लगे थे। पति-पत्नी की आत्मीयता, प्रेम-भावना और प्रसन्नता बढ़ाने में अंधी वासना सहायक नहीं, वरन हानिकारक ही सिद्ध होती है। सुसंतति की प्राप्ति और सौंदर्य की रक्षा की दृष्टि से तो यह और भी अधिक आवश्यक है कि दांपत्ति जीवन में ब्रह्मचर्य को समुचित स्थान मिले। यह भली भाँति समझ लेना चाहिए कि महानता के ऊँचे मार्ग पर चढ़ने के लिए जिस पेट्रोल की आवश्यकता है, वह इंद्रिय संयम के द्वारा बचाकर ही एकत्रित किया जा सकता है। जिनका जीवन-रस इन घृणित छिद्रों में होकर अमर्यादित रूप से टपकता रहेगा, उनके पास वह पूँजी बच न सकेगी, जिसके मूल्य पर महानता को उपलब्ध कर सकना संभव होता है।
मानसिक कुकल्पनाओं से बचें
अपने दांपत्ति जीवन से बाहर की वासना के बारे में कल्पना करना, सोचना, उत्पन्न होना, उसके लिए कदम उठाना तो नियत कामसेवन की अपेक्षा अनेकों गुना अधिक हानिकारक है। शास्त्रों में मानसिक और शारीरिक व्यभिचार को पाप और पतन का कारण एवं नरक में ले जाने वाला अपराध बताया गया है। नैतिकता और कानून की दृष्टि से भी वह हेय है। आरोग्य, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र एवं अध्यात्म की दृष्टि से विचार किया जाए, तब तो व्यभिचार एक बहुत ही भयानक कुकर्म सिद्ध होता है। अनेकों प्रकार की अशांतियाँ उत्पन्न करना, इस हेयकर्म का प्रत्यक्ष फल सर्वत्र देखा जा सकता है।
गायत्री उपासना की उच्चस्तरीय साधना का क्रम ब्रह्मचर्य की उपेक्षा करके आगे नहीं बढ़ सकता। पाठक जानते हैं कि गायत्री के छोटे−बड़े अनुष्ठानों के समय ब्रह्मचर्य का अनिवार्य रूप से पालन करना पड़ता है। अन्नमयकोश की साधना सारे जीवन चलने वाली है, इसलिए वैसा निषेधात्मक प्रतिबंध तो इसमें नहीं है, पर इतना प्रत्येक साधक को मानकर चलना पड़ेगा कि वह अपनी कामसेवन संबंधी गतिविधियों पर आगे क्रमशः अधिक ध्यान देगा और उसे अधिक सीमाबद्ध करेगा। सृष्टि के सभी जीव-जंतु संतानोत्पादन की प्रचंड स्फुरणा होने पर ही नियत समय पर एक बार कामसेवन करते हैं और जब तक दूसरे बच्चे की आवश्यकता न हो नर-मादा का संयोग नहीं होता। मादा की प्रेरणा पर ही नर उत्तेजित होता है, अपनी ओर से वह कभी मादा से छेड़−छाड़ नहीं करता। मनुष्य को पशु-पक्षियों से अधिक विवेकवान और संयमी होना चाहिए न कि अधिक मूर्ख और अधिक असंयमी।
न्यूनतम मर्यादा का अनिवार्य परिपालन
इस संबंध में आज की जो स्थिति है उसे सुनने-समझने से हर विचारशील व्यक्ति की आँखें बरसने लगती हैं। वासना का मंद विष खाकर लोग किस प्रकार आत्मघात करते चले जा रहे हैं, यह करुण कथा सब प्रकार चिंताजनक है। इस दिशा में नियंत्रण न रखा जा सका तो उसका परिणाम व्यक्ति और समाज के लिए सब प्रकार घातक ही होने वाला है। जनसाधारण को इस दुष्प्रवृत्ति से बचना ही चाहिए, पर गायत्री उपासकों के लिए तो यह आत्मिक प्रगति का प्रधान आधार ही माना गया है। अन्नमयकोश के साधकों को वासना पर नियंत्रण कायम करने के लिए बड़े और साहसपूर्ण कदम उठाने चाहिए। सप्ताह में एक बार से गिरी हुई मर्यादा तो किसी की भी न रहे। इस स्तर से भी नीचे उतर पड़ना आत्मिक प्रगति के लिए ही नहीं, शारीरिक सुरक्षा और मानसिक स्थिरता के लिए भी घातक है। यह न्यूनतम अवधि इस गए-गुजरे जमाने और लोगों के दुर्बल मानसिक स्तर को देखते हुए ही मानी जा सकती है। वस्तुतः इससे अधिक बड़ी मर्यादाएँ ही बनाना किसी विचारशील या अध्यात्मवादी सद्गृहस्थों के लिए संतोष की बात हो सकती है। जिनका विवाह नहीं हुआ है, जोड़ा बिछुड़ चुका है या दूर देश में रहने के कारण संयोग का अवसर नहीं है, उन्हें तो अपने ऊपर पूर्ण नियंत्रण रखते हुए शक्तिसंचय के लिए ही तत्पर रहना चाहिए।
संतान के लिए श्रेष्ठ अनुदान
हर व्यक्ति यह पसंद करता है कि उसे सुसंतति प्राप्त हो। पूर्वकाल में तो इसके लिए कितनों ने ही कठिन तपस्या की थी और देवताओं से संतान का वरदान पाया था। सचमुच! जिनके घर में स्वस्थ, सुंदर, दीर्घजीवी, बुद्धिमान, होनहार, सदाचारी बालक जन्मते हैं, वे सब प्रकार धन्य हैं। ऐसी बाल−विभूतियों की उपलब्धि में जहाँ माता−पिता की शिक्षा−दीक्षा, सुसंस्कार, स्वभाव, बुद्धिमत्ता, आर्थिक स्थिति आदि कारण हैं, वहाँ सबसे बड़ा कारण उनका ब्रह्मचर्य है। शरीर का अंतिम सार— धातु परिपक्व और परिपुष्ट होने पर ही इस योग्य होता है कि उससे उत्कृष्ट कोटि का प्रजनन हो सके। बालकों में ओज, तेज, साहस, पुरुषार्थ, शौर्य, धैर्य, आदर्शवाद आदि उच्च गुणों का सीधा संबंध माता−पिता के ब्रह्मचर्य से है। कामवासना के कीड़े अपना शरीर और मनोबल तो खोते ही हैं, संतान भी दुर्बल, रोगी, अल्पायु, मंदबुद्धि, आलसी, कायर और ऐसे ही अन्य दुर्गुणों से ग्रसित उत्पन्न होती है। अपराधी मनोवृत्ति के बालक आमतौर से असंयमी और दुराचारी माता−पिता की संतान होते हैं।
सुसंतति का अमूल्य उपहार
संतान के लिए लोग इच्छुक तो बहुत रहते हैं, उनके लिए खरच भी खूब करते हैं और उत्तराधिकार में छोड़ भी बहुत जाते हैं, पर वे श्रेष्ठ सद्गुणों से संपन्न होकर जन्में, इनके लिए तप, त्याग कुछ भी नहीं करते। ब्रह्मचर्य का अधिकाधिक पालन करना अपनी भावी संतान की सबसे बड़ी सेवा है। पोशाक, जेवर, दहेज, शिक्षा, भोजन, जायदाद देकर हम बच्चों का उतना भला नहीं कर सकते, जितना उन्हें सुदृढ़ जीवनतत्त्व और सद्गुणों का आत्मिक उपहार देकर सुखी और समृद्ध बना सकते हैं। बच्चों के लिए माता−पिता बहुत कष्ट सहते हैं और त्याग भी करते हैं। क्या ही अच्छा होता यदि उनने ब्रह्मचर्य की साधना करके उनके लिए सर्वश्रेष्ठ तप-त्याग किया होता। हर तपस्या का एक श्रेष्ठ वरदान मिलता है, ब्रह्मचर्य की तपस्या से शारीरिक मानसिक आध्यात्मिक उन्नति के अनेकों लाभ, वरदानों के साथ एक ईश्वरीय उपहार यह भी है कि ऐसी होनहार संतान मिले, जो पिता−माता के गौरव एवं यश को बढ़ाकर सच्चे अर्थों में वंश चलाने वाली सिद्ध हो।
आलस— एक प्रकार की आत्महत्या है
दूसरा व्रत निरालस्य का है। आलस में पड़े−पड़े हम अपना बहुमूल्य बहुत-सा समय आए दिन नष्ट करते रहते हैं। मंद गति से, हलका−हलका बेमन काम करने से समय पूरा नष्ट हो जाता है, पर काम एक चौथाई भी दिखाई नहीं देता, जो होता है वह भी फूहड़पन से भरा हुआ— अधूरा आदि अनुपयुक्त । ऐसे कामों को समय और श्रम की बर्बादी ही कहा जा सकता हैं। लोग समझते हैं हम दिन भर काम करते हैं और फुर्सत नहीं पाते। आलस और ढीलेपन की प्रवृत्ति बहुत ही बुरी है। ईश्वर ने समयरूपी संपत्ति प्रचुर मात्रा में देकर ही मनुष्य को उसके मूल्य पर चाहे जो विभूति उपलब्ध कर सकने की सुविधा दी है, पर जो लोग समय का मूल्य ही नहीं समझते और जिंदगी के दिन ज्यों त्यों काटते रहते हैं, उन्हें निम्नकोटि का असफल और अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने के लिए ही विवश होना पड़ता है।
समयरूपी दैवी संपत्ति को आलस्य से बर्बाद करना ऐसा ही है, जैसे परसी हुई थाली को लात मारकर छितरा देना। आलसी मनुष्य अपने आपका सबसे बड़ा शत्रु है। शरीर के भीतर प्रत्येक अंग-प्रत्यंग अपनी नियत क्रियाशीलता में अहिर्निश कार्यरत रहता है, फिर बाहर की देह को ही क्यों आलसी होना चाहिए, क्यों काम से घृणा करनी चाहिए, क्यों परिश्रम से जी चुराना चाहिए। आलस और दरिद्रता एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। लक्ष्मी सदा उत्साही, उद्योगी और पुरुषार्थी लोगों का आश्रय ढूँढ़ती है। आलसी तो अनायास प्राप्त हुई पैतृक संपत्ति तक को सुरक्षित नहीं रख सकते। अध्यात्म का अर्थ है— प्रबल पुरुषार्थ।
सवेरे जल्दी उठने की आदत
अखण्ड ज्योति परिवार के सब सदस्यों को पंचकोशी साधना कर सकना कठिन प्रतीत हो तो उसके उपयोगी अंशों को तो अपना ही लेना चाहिए, वह भी साधना ही गिनी जाएगी। जप, तप न बन पड़े तो भी ब्रह्मर्चय का सीमाबंध और आलस्य के विरुद्ध विद्रोह का झंडा खड़ा करने के लिए हममें से प्रत्येक को खड़ा हो ही जाना चाहिए। सबेरे जल्दी उठने की आदत निरालस्यता का पहला चिह्न है। जिन्हें रात की कोई खास ड्यूटी करनी पड़ती है, उनकी बात दूसरी है। इन अपवादों को छोड़कर हममें से प्रत्येक को सूर्योदय से कम-से-कम एक घंटा पूर्व तो उठ ही बैठना चाहिए। नित्यकर्म से निवृत्त होकर अपने उस कार्य में लग जाना चाहिए, जो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है। प्रातःकाल की परिस्थिति और मनःस्थिति ऐसी होती है कि उसमें जो भी काम किया जाए, वह सफल होता चला जाएगा।
नियमित दिनचर्या और क्रमबद्धता
जल्दी उठने के लिए जल्दी सोना आवश्यक है। अपना कार्यक्रम ऐसा बनाना चाहिए कि सूर्य अस्त होने से तीन−चार घंटे के भीतर सोने की व्यवस्था बन जाए। यह कहावत ही नहीं, तथ्य भी है कि, "जल्दी सोना और जल्दी उठना मनुष्य को स्वस्थ, बुद्धिमान और संपत्तिवान बनाता है।" जिनका ब्राह्ममुहूर्त्त सोते रहने और सुस्ती में पड़े ऐंड़ते रहने में बीतता है, उन अभागों का आधा जीवन व्यर्थ ही बर्बाद हो जाता है। सवेरे के दो−तीन घंटे इतने मूल्यवान होते हैं कि उनकी तुलना में पूरे दिन भर के सारे घंटे मिलकर भी कम सिद्ध होते हैं। लेखकों, कवियों, वैज्ञानिकों, विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों, साधकों और सत्पुरुषों को प्रातःकाल का समय प्राणप्रिय होता है। वे उसे किसी भी मूल्य पर खोने और गंवाने को तैयार नहीं होते। समय का ठीक तरह विभाजन करके उस कार्यक्रम पर चलते हुए मनुष्य आसानी से दूना काम कर सकता है। हममें से प्रत्येक को अपनी दिनचर्या बनाते रहना चाहिए और कठोरतापूर्वक उसे पालन करते हुए अपने जीवन को क्रमबद्ध बनाना चाहिए।
अध्यात्म की एक पुण्य परंपरा
प्राचीनकाल के सभी ऋषि−महर्षि अपने समय का एक-एक क्षण क्रियासंलग्न रखते थे और अपने शिष्यों को, छात्रों को, और जनसाधारण को ऐसी ही प्रेरणा देते थे कि वे समयरूपी ईश्वरीय अमूल्य उपहार का एक क्षण भी आलस और प्रमाद में नष्ट न करें। क्रमबद्ध, व्यवस्थित और प्रोग्राम बनाकर, समय का विभाजन करते हुए, नियत समय पर, नियत कार्य पूरे मनोयोग और दिलचस्पी से करना ही श्रम और समय का सदुपयोग कहा जाता है। हममें से प्रत्येक को अपनी गतिविधियाँ इसी प्रकार नियमित करनी चाहिए। एक क्षण भी बिना आलस में बिताए, रोटी कमाना, शरीर-व्यवस्था, मनोरंजन, परिवार-निर्माण, लोकसेवा, ईश्वर-उपासना आदि आवश्यक कार्यों में हमारा समय बँटा हुआ हो और जब भी जो भी काम करें, पूरे उत्साह पूरे मनोयोग, पूरे परिश्रम और पूरी दिलचस्पी के साथ एक खेल समझकर पूरा करें। इस प्रक्रिया से कार्य की उत्कृष्टता बढ़ती है और थकान पास भी नहीं भटकने पाती।
श्रम और समय को जो लोग प्यार करते हैं, वस्तुतः वे ही उसका लाभ उठा पाते हैं। अध्यात्म मार्ग के पथिकों को, गायत्री उपासना के अंतर्गत अन्नमयकोश की साधना करने वालों को असंयम से लड़ना चाहिए और आलस से भी। इस मोर्चे को फतह करके ही आगे की प्रगति के द्वार खुलते हैं।
स्थूलशरीर की सूक्ष्मचेतना ‘मन’ कहलाती है, यों मन को ग्यारहवीं इंद्रिय भी माना गया है। पाँच ज्ञानेंद्रियाँ और पाँच कर्मेंद्रियाँ सर्वविदित हैं। मन इन सबका संचालक होने के कारण उसे भी ग्यारहवीं संचालक इंद्रिय मानते हैं। मन का सारे शरीर पर साम्राज्य है। प्राण तो जीवन-तत्त्व है। उसके ऊपर जीवन-मरण निर्भर रहता है। मन में इतनी शक्ति तो नहीं है कि जीवन-मृत्यु की समस्या उत्पन्न करे, पर इतना अवश्य है कि दसों इंद्रियों की तथा सारे चेतना-संस्थान की गतिविधियाँ उसी के आधार पर संचालित होती हैं। देखने में मनुष्य हाड़-माँस का बना मालूम होता है। पर ध्यानपूर्वक देखा जाए तो वह विचार और विश्वासों का बना होता है। हाड़−माँस सभी मनुष्यों का प्रायः एक समान होता है। नाक, कान की बनावट में बहुत थोड़ा अंतर पाया जाता है। आहार−विहार भी प्रायः एक-सा ही देखा जाता है। इतने पर भी व्यक्तियों में इतना अंतर होता है कि उसे आकाश−पाताल कहा जा सकता है। यह अंतर शारीरिक स्थिति का नहीं, वरन मानसिक स्थिति का होता है।
मानसिक स्थिति का आधार
विचार, विश्वास, अभिरुचि, आकांक्षा और दृष्टिकोण का निर्धारण हमारी मानसिक स्थिति के आधार पर होता है और उन्हीं तथ्यों में भिन्नता रहने से हर मनुष्य का व्यक्तित्त्व पृथक-पृथक प्रकार का बनता है। मोटी दृष्टि से गरीबी−अमीरी, जाति-पाति, विद्या-बुद्धि, सत्ताशक्ति या वैभव के आधार पर छोटे−बड़े का अंतर किया जाता है, पर जब गंभीरता से देखा जाता है तो स्पष्ट प्रतीत होता है कि मानसिक स्थिति ही व्यक्तित्वों के अंतर का प्रधान कारण है। धन, विद्या, वैभव, सत्ताशक्ति आदि के उपार्जन में भी मनोभूमि की उत्कृष्टता एवं निकृष्टता प्रधान आधार रहती है। यदि कोई व्यक्ति आलसी, प्रमादी, दीर्घसूत्री, जिद्दी, निरुद्योगी, प्रकृति का हो तो उसे जन्मजात अनेकों सुविधाएँ प्राप्त होते हुए भी उन्नति का अवसर प्राप्त नहीं होता। इतना ही नहीं, जो कुछ पूर्वज दे गए थे, वह भी अस्त−व्यस्त हो जाता है। इसके विपरीत जिनकी मनोभूमि आशावादी, उत्साही, प्रगतिशील, श्रमशील एवं बारीकी से सोचने-समझने की होती है, वे विपन्न परिस्थितियों में जन्म लेने पर भी अपने अध्यवसाय से वह परिस्थितियाँ उत्पन्न कर लेते हैं, जिनमें अभीष्ट उन्नति की व्यवस्था बन जाए।
आंतरिक स्थिति की सुव्यवस्था
मानसिक स्थिति की उत्कृष्टता के आधार पर ही मनुष्य की निरोगता, प्रसन्नता, विद्या, बुद्धि, कीर्त्ति, पारिवारिक सुव्यवस्था, समृद्धि का सुयोग बनता है। मनुष्य का किसी विशेष दिशा में उन्नति कर सकना इस बात पर निर्भर है कि कितना मनोयोग, कितना प्रयत्न और कितना पुरुषार्थ उस कार्य में लगाया गया है। मनःस्थिति अस्त−व्यस्त रहने पर किसी कार्य में सफलता प्राप्त कर सकना तो दूर, जीवन का साधारण-क्रम स्थिर रख सकना कठिन हो जाता है। यदि थोड़ी-अधिक विकृति आ जाए तो व्यक्ति की सत्ता शठ, जड़मूर्ख, कुबुद्धि, दुराग्रही, उद्दंड जैसी उपहासास्पद एवं घृणास्पद बन जाती है। विकृति कुछ और आगे बढ़े तो उसे उन्मादी एवं विक्षिप्त माना जाने लगता है, यही स्थिति आगे बढ़कर असामाजिक एवं पागल बनाकर जेलखाने या पागलखाने में बंद कराने की दयनीय स्थिति में पहुँचा देती है। हीन और पतित स्थिति में पड़े हुए लोग साधनों की स्थिति से इतने दुर्बल नहीं होते, जितने मानसिक विकास की दृष्टि से गिरे हुए होते हैं।
मनोमयकोश का विकास
अन्नमयकोश की उच्चस्तरीय गायत्री उपासना के साथ−साथ साधक को मनोमयकोश को सुव्यवस्थित बनाना पड़ता है। गायत्री माता के पाँच मुखों में से पहला अन्नमयकोश और दूसरा मनोमयकोश है। मन की गतिविधियाँ संतुलित रहें, इसके लिए यह आवश्यक है कि हमारी आस्था, मान्यता, श्रद्धा, अभिरुचि एवं आकांक्षा परिष्कृत हों।
मनोमयकोश की साधना में अपनी सोचने की प्रक्रिया को हमें परिमार्जित करना होगा। हीन श्रेणी के जिन विचारों ने हमारी मनोभूमि पर अधिकार कर रखा है, उसकी सफाई करनी पड़ेगी। यों आमतौर से हर आदमी अपने को बुद्धिमान, सही सोचने वाला और निर्दोष मानता है। गलतियाँ उसे दूसरे में दीखती हैं और अपने आप में कोई दोष सूझ नहीं पड़ता, पर थोड़ी बारीकी से ढूँढ़ने पर अपने मान्यताओं और विचारधाराओं में से आधी से अधिक भ्रांत, अनुपयुक्त एवं दोषपूर्ण सिद्ध होती हैं। इस स्थिति में सुधार करना ही मनोमयकोश की साधना का लक्ष्य है।
नित्य की मानसिक सफाई
गत वर्ष स्वाध्याय और मनन-चिंतन की साधना पाठकों ने आरंभ की थी और अखण्ड ज्योति के लेखों या किसी भी जीवन निर्माण करने वाली प्रेरणाप्रद पुस्तक को पढ़ने और उस पर मनन चिन्तन करते रहने का कार्य−क्रम अपनाया था। विचारों के परिमार्जन के लिए स्वाध्याय आवश्यक है। कुविचारों की काट सद्विचारों से ही होती है। गरम लोहे को ठंडा लोहा काटता है, काँटे-से-काँटा निकाला जाता है और विष-से-विष का शमन होता है। स्वाध्याय और सत्संग के माध्यम से जो सद्विचार ग्रहण किए जाते हैं, इन्हीं के द्वारा कुविचारों और कुसंस्कारों का प्रतिरोध किया जाता है। रोज ही घर में धूलि जमती है, उसे बुहारी से रोज ही झाड़ना पड़ता है। रोज ही दाँत मैले होते हैं। रोज ही मंजन करना पड़ता है। इसी प्रकार जनसंपर्क से रोज ही दूषित प्रवृत्तियाँ हमारे ऊपर आक्रमण करती हैं और उनका निवारण करने के लिए रोज ही स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था करनी पड़ती है। चूँकि अब आज की परिस्थितियों में सुलझे हुए विचारों का ऐसा सत्संग जो जीवन को सर्वांगपूर्ण प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सके, प्रायः दुर्लभ ही दीख पड़ता है। इसलिए इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ऐसे साहित्य के स्वाध्याय पर ही निर्भर रहना पड़ता है जो विज्ञानसम्मत ढंग से हमारी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए जीवन जीने की कला ठीक प्रकार सिखा सके । स्वाध्याय को इसी दृष्टि से एक अनिवार्य साधना माना गया है और उसे भजन के समकक्ष ही पुण्य फलदायक माना गया है। पंचकोशी साधना में साधकों के लिए तो वह नितांत अनिवार्य ही है।
सत्संकल्प का मनन-चिंतन
इस वर्ष स्वाध्याय के मनन-चिंतन को गत वर्ष जितना विस्तृत एवं क्षेत्र में बिखरा हुआ न रखकर उसे सीमाबद्ध कर रहे हैं, ताकि थोड़े विचारों पर अधिक तत्परता और तन्मयता के साथ चित्त-वृत्तियों को एकाग्र करते हुए मनोभूमि का सुदृढ़ निर्माण किया जा सके । गत मास युगनिर्माण संकल्प आरंभिक पृष्ठ पर छपा है और उसकी विस्तार से व्याख्या भी की गई है। यह संकल्प अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को दैनिक-साधना एवं उपासना की तरह मनोयोगपूर्वक नित्य ही पढ़ना और उस पर मनन रखना चाहिए।
संकल्प में जिन भावनाओं का उल्लेख किया गया है, उसके अनुकूल अपनी आकांक्षा एवं अभिरुचि हमें जागृत करनी है, अपनी मनोभूमि को इस ढाँचे में ढालना है और धीरे−धीरे इसी मार्ग पर चलते रहना है। किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि संकल्प को पढ़ने एवं विचारने का अर्थ यह है कि पहले ही दिन यह सब बातें हमारे जीवन में पूर्णतया कार्यान्वित होने लगें और यदि न हो सकीं तो अपने ऊपर प्रतिज्ञा-भंग का दोष लगेगा। वस्तुतः यह प्रतिज्ञा या व्रत नहीं है, संकल्पमात्र है। ‘सं’ कहते हैं अच्छी और ‘कल्प’ कहते हैं कल्पना को। एक अच्छी कल्पना, जिसे हममें भावी जीवन में करने की तीव्र आकांक्षा हो 'संकल्प' कहलावेगा। व्रत या प्रतिज्ञा इससे सर्वथा भिन्न बात है। व्रत लेकर उसे सदा पालन करना ही चाहिए। कितने ही कष्ट उठाकर भी व्रत का पालन करना चाहिए। पर संकल्प इससे हलकी और नीचे की स्थिति है। उसमें निश्चित रूप से कुछ भी करने की प्रतिज्ञा नहीं है। केवल अपनी मनोभूमि में इन भावनाओं को गहराई से उतार लेने की, भली प्रकार हृदयंगम कर लेने की बात है।
भावनाओं के परिपक्व होने पर मनुष्य अपनी अंतःप्रेरणा से विवश होकर स्वतः ही उस प्रकार के कार्य करने लगता है। हम प्रतिबंधों पर विश्वास नहीं करते। संकल्पबल के अभाव से प्रतिज्ञाएँ आए दिन टूटती रहती हैं। अंतःकरण में किसी भावना ने गहराई तक प्रवेश न किया हो और आवेश में आकर कोई प्रतिज्ञा कर ली जाए तो वह निभ नहीं पाती। पर यदि किसी तथ्य को मनुष्य पूरी तरह भावना-क्षेत्र में जमा ले तो बिना किसी पूर्ण-प्रतिज्ञा के भी वह उस पर अड़ा रहता है और अपनी उस आस्था की पूर्ति के लिए बड़े-से-बड़ा त्याग करने को तत्पर हो जाता है।
मनन और चिंतन
सत्संकल्प को पढ़ लेना पर्याप्त न होगा। एकांत में बैठकर शांतचित्त से इस प्रेरणा−संदेश के प्रत्येक वाक्य पर देर तक विचार करना चाहिए। सन्निहित प्रेरणा के स्वरूप का चिंतन विस्तारपूर्वक करते हुए यह सोचना चाहिए कि ये भावनाएँ कितनी वास्तविक, कितनी उपयोगी, कितनी सत्परिणामदायिनी, कितनी श्रेष्ठ और कितनी महान हैं। यदि सच्चे मन से उन पर विश्वास करें और उसी के आधार पर अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करें तो जीवन कितना उत्कृष्ट, कितना दिव्य, कितना शांतिमय और कितना आदर्श बन सकता है।
आस्तिकता और कर्त्तव्यपरायणता
संकल्प-पत्र का प्रथम वाक्य है—‟मैं आस्तिकता और कर्त्तव्यपरायणता को मानव जीवन का कर्त्तव्य मानता हूँ।” सोचना चाहिए कि आस्तिकता कितना महत्त्वपूर्ण मानवीय गुण है। उसके कारण मन पर कितना अधिक अंकुश रहता है। चौबीस घंटे का एक सच्चा स्वजन-संबंधी सर्वशक्तिमान ईश्वर, जब अपने साथ रहते हुए अनुभव होता है तो कितनी हिम्मत बँधी रहती है। ईश्वरीय सद्गुणों का निरंतर चिंतन करते रहने से उस आदर्श के अनुकूल अपने आप को ढालने में भी कितनी सुविधा होती है। आत्मा के आंतरिक संतोष का नाम ही ईश्वरीय प्रसन्नता है, सो यह कार्य सन्मार्ग पर चलने वाले के लिए कितना सरल और सुगम है, ईश्वर की सृष्टि को सुंदर-सुविकसित बनाकर सच्ची ईश्वरभक्ति का परिचय देने वाला विवेकशील व्यक्ति जितना आनंद और उल्लास प्राप्त करता है, उतना विपुल वैभव वाले को भी नहीं मिलता। ईश्वरप्राप्ति का लक्ष्य, ईश्वर-आदेशों पर चलते हुए प्राप्त कर सकना कितना सुगम रखा गया है। वासना और तृष्णा के बंधनों को तोड़कर कर्त्तव्यपरायणता को अपना लक्ष्य रखने वाला कितना संतुष्ट रहता है। महापुरुषों का सर्वोपरि गुण, कर्त्तव्यपरायणता ही तो होती है। इसे अपनाकर हम भी महापुरुष क्यों न बन सकेंगे। जीवन का सर्वश्रेष्ठ सदुपयोग अपने कंधों पर आए हुए उत्तरदायित्वों को एक ईमानदार मनुष्य की तरह पालन करने में ही तो है। कर्म ही तो धर्म की आत्मा है। कर्मयोगी और कर्मवीर को ही तो धर्मात्मा कहते हैं। जिसने कर्म को महान माना और कर्त्तव्यपालन मार्ग में आने वाले सहस्र प्रलोभनों और कष्टों की उपेक्षा कर दी, वही तो महात्मा है। महात्मा, ईश्वर उपासना को जीवन के आवश्यक कर्त्तव्यों में से एक मानकर उसे नियमित रूप से करते हैं और साथ ही शारीरिक, मानसिक, कौटुंबिक, सामाजिक क्षेत्रों में अपने किसी भी कर्त्तव्य की उपेक्षा नहीं करते। महात्मा ही तो अपने सद्गुणों को विकसित करते−करते परमात्मा बन जाते हैं। आत्मा को उच्च आदर्शों के परिपालन में संलग्न रखकर हम परमात्मा की प्राप्ति का शास्त्रसम्मत मार्ग क्यों न अपनावें? ईश्वरप्राप्ति के लिए कर्त्तव्यों का त्याग करने वाले भ्रांत व्यक्तियों की तरह अपना समय बर्बाद करने वालों की भूलों से शिक्षा लेते हुए हम सच्चे शास्त्रसम्मत, आर्ष निर्देशित मार्ग पर ही क्यों न चलें?
आत्मसंयम और नियमितता
दूसरा वाक्य संकल्प-पत्र का है—‟शरीर को भगवान का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करूँगा।” इस वाक्य का स्वाध्याय, मनन और चिंतन करते हुए विचार करना चाहिए कि, "ईश्वर ने इस संसार के विविध आनंदों का रसास्वादन करने के लिए यह कितना सुंदर, कितना महत्त्वपूर्ण शरीर दिया है। शरीर छिन जाने पर सूक्ष्मप्राण केवल चेतना रूप रह जाते हैं। फिर संसार की विभिन्न रंग−बिरंगी अनुभूतियों का अनुभव करने की क्षमता हमें कहाँ रह पाती है? देवलोक में कुछ आनंद है, उन्हें प्राप्त करने के लिए जीव स्वर्ग जाने की आकांक्षा करता है। पर कुछ आनंद ऐसे हैं, जो स्वर्गलोक में भी नहीं हैं और जिन्हें प्राप्त करने की इच्छा से देवता भी स्वर्ग छोड़कर नरदेह में जन्म लेते और इस 'स्वर्गादपि गरीयसी' धरती पर विचरण करने की आकांक्षा करते रहते हैं और जब भी उन्हें ऐसा अवसर मिलता है, तभी अपना सौभाग्य मानते हैं। मानव शरीर न तो उपेक्षणीय है और न यह अपना भूलोक अन्य किसी लोक से हीन है । इसलिए देशभक्ति की भाँति ही हमें अपनी धरतीमाता में जन्म लेने का गर्व अनुभव करना चाहिए। इसे छोड़कर स्वर्ग आदि किसी लोक में जाने की नहीं, वरन इसे ही स्वर्ग बनाने की आकांक्षा करनी चाहिए और उस आकांक्षा के लिए अपने आप को बीज की तरह गलाकर अभीष्ट स्थिति उत्पन्न करनी चाहिए।"
न शरीर तुच्छ है, न यह संसार
यह नर शरीर तुच्छ नहीं, घृणित नहीं, रोग-शोक का घर नहीं, वरन सच्चिदानंद प्रभु का मंदिर है। जैसी श्रद्धा और निष्ठा किसी देवालय के प्रति हमारी हो सकती है, उससे अनेक गुनी श्रद्धा हमें इस शरीर के प्रति रखनी चाहिए, क्योंकि इसमें आत्मा का—परमात्मा का साक्षात निवास है। सूर्य और चंद्रमा की शक्तियाँ नेत्रों के रूप से इस मंदिर में प्रकाशित हैं। मरुत यहाँ साँस के रूप में अहिर्निश सफाई करता रहता है। अग्निदेव उदर में निवास करते हुए भोजन पचाने वाले रसोइये की तरह कार्य करते हैं। वरुण देवता के जल की उपस्थिति इस शरीर में तीन-चौथाई रहती है। दसों इंद्रियों में दस दिग्पाल विराजमान हैं। मस्तिष्क के सहस्रार कमल में 'शेषशायी विष्णु' का स्थान है। षट्चक्रों को, 108 उपत्यकाओं में, 84 ग्रंथियों में अगणित शक्तिबीज अपना−अपना स्थान जमाए हुए हैं। असंख्य ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ और निधियाँ, अप्सराओं, यक्षिणियों और किन्नरों की तरह इसमें विचरण करती रहती हैं। ऐसे मानव शरीर का स्वामित्व प्राप्त करके हमें अपने सौभाग्य और गौरव का अनुभव करना चाहिए।
किसी मूल्यवान् वस्तु को प्राप्त करने के उपरांत प्रत्येक जिम्मेदार व्यक्ति का यह कर्त्तव्य हो जाता है कि उसे संभाल कर रखे और किसी प्रकार क्षतिग्रस्त न होने दे। नरदेह जैसी सुरदुर्लभ विभूति को प्राप्त करने के उपरांत उसे निरोग, स्वच्छ एवं सुदृढ़ बनाए रहने के लिए आवश्यक सावधानी बरतना हममें से प्रत्येक का परम पवित्र-कर्त्तव्य है। बीमारी, दुर्बलता और अकालमृत्यु का कारण इस ओर उपेक्षा बरतना और देह के साथ अत्याचार करना ही होता है। इस अनीति को बंद कर देने के बाद शरीर अपनी स्वाभाविक स्थिति को स्वतः पहुँच जाता है। रोगों से बचने और उन्हें लड़कर मार भगाने की समुचित क्षमता शरीर में मौजूद है, पर निरंतर के अपने निज के अत्याचार होते रहें तो बेचारा कहाँ तक बचाव करेगा? कहाँ तक बीमारी से बचा रहेगा? असंयम और अनियमितता ही समस्त शारीरिक अव्यवस्थाओं का एकमात्र कारण होने से इन दोनों डाकिनों को मार भगाना ही उचित है। भगवान राम को मारने के लिए ताड़का और भगवान कृष्ण को मारने के लिए पूतना आई थी। हमारे आत्मा और परमात्मा के निवास, इस देवशरीर को मारने के लिए अनियमितता और वासनारूपी डाकिनें अपने कपटरूप बनाकर आए दिन सामने आती रहती हैं। इनके प्रपंच से सावधान और सतर्क रहना ही सब प्रकार उचित है।
सत्संकल्प के तीन अनुच्छेद
संकल्प में तीन पैराग्राफ (अनुच्छेद) हैं। प्रथम अनुच्छेद में सन्निहित सद्विचारों की शृंखला पर ऊपर की पंक्तियों में विचार किया गया है। इसी प्रकार के विचार शेष अनुच्छेदों में और भी भरे पड़े हैं। विस्तारभय से यहाँ एक ही पैराग्राफ पर चिंतन करने के कुछ विचार प्रस्तुत किए गए हैं। हमें पूरे संकल्प में सन्निहित सभी विचारों पर धीरे−धीरे मनन और चिंतन करते रहना चाहिए। गत अंक में इस संबंध में और भी अधिक विस्तारपूर्वक विचार हो चुका है। चिंतन और मनन के समय ऐसे−ऐसे अगणित विचार उठ सकते हैं। उन पर एकांत में बैठकर मनन करते रहना चाहिए। युधिष्ठिर ने बाल्यकाल में ‘सत्यं वद’— इतना-सा गुरु का दिया हुआ पाठ याद करने में बहुत समय लगाया था। सत्संकल्प की विचारधारा इतनी विस्तृत है कि उस पर चिंतन-मनन करते रहने में एक वर्ष का समय लग जाना कुछ अधिक नहीं है।
मनोमयकोश की शुद्धि का सबसे प्रधान एवं सबसे महत्त्वपूर्ण साधन यह है कि मस्तिष्क में अधिक-से-अधिक समय तक श्रेष्ठ विचारधारा प्रवाहित होती रहे। मन को एकाग्र करने के लिए कई प्रकार के ध्यान आदि भी हैं और उनका शिक्षण हम अगले वर्षों में करेंगे भी। पर उनकी उपयोगिता तभी है, जब सद्विचारों द्वारा मनोभूमि को पहले परिमार्जित एवं उर्वर बना लिया जाए। ऊसर भूमि में अच्छा बीज भी नहीं जमता। मनःक्षेत्र में अगणित चमत्कारी शक्तियाँ छिपी पड़ी हैं, इनमें एक-एक की महत्ता किसी देवी या दानवी से कम नहीं है। पर यह सब मलीनता के गर्त्त में दबी पड़ी हुई सड़ती रहती हैं। मनोबल का चमत्कार जब भी प्रकट होता है तो मनुष्य ऋषियों, महापुरुषों, देवता एवं अवतारों की श्रेणी में गिना जाने लगता है। यह बल बढ़ता उसी का है, जिसने कषाय-कल्मषों से अपनी विचार भूमिका को स्वच्छ करने की साधना आरंभ कर दी है। इस वर्ष पंचकोशी गायत्री साधना के उच्चस्तरीय शिक्षा के शिक्षार्थियों को मनोमयकोश का परिमार्जन करने के लिए उपरोक्त 'विचार शोधन' की प्रक्रिया ही प्रस्तुत की जा रही है।
मन की चंचलता और लोलुपता प्रसिद्ध है। अनियंत्रित मन अल्हड़ बछड़े की तरह इन्ही खाड़-खंडकों में कूदता-फाँदता रहता है। उसकी इन गतिविधियों के कारण मनुष्य का सारा जीवन ही अव्यवस्थित हो जाता है। आकांक्षाएँ बहुत, कामनाएँ असीम, पर दृढ़ता और तत्परता जरा भी नहीं, ऐसी मनोभूमि उपहासास्पद ही होती है। उसमें असंतोष ही असंतोष भरा रहता है। उन्नतिशीलों को देखकर ईर्ष्या बढ़ती है, अपने दुर्भाग्य पर रोना आता है, असफलता का दोष किसी-न-किसी पर थोपते रहने की विडंबना चलती रहती है, पर इनसे काम तो कुछ नहीं बनता। मन की असंस्कृत स्थिति एक ऐसी कमी है, जिसकी पूर्ति संसार की और किसी भी वस्तु से नहीं हो सकती। इस कमी के रहते हुए हर व्यक्ति ओछा-छिछोरा, अविवेकी, असंयमी, बालबुद्धि, अविकसित और हर क्षेत्र में असफल ही रहता है।
एकाग्रता का प्रतिफल
मनोमयकोश की साधना का उद्देश्य स्वर्ग, मुक्ति या सिद्ध चमत्कारों की खोज करना ही नहीं, वरन व्यावहारिक जीवन को सुसंयत और सुविकसित बनाना है। मन की शक्ति उस जलप्रपात की तरह है, जो साधारणतः यों ही मुद्दतों से गिरता और बहता रहता है, पर यदि उसी से पनचक्की या बिजली बनाने का कार्य किया जाए तो आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त होने की सुविधा बन जाती है और वह निरर्थक दीखने वाला झरना बहुत लाभदायक एवं उपयोगी सिद्ध होता है। मन में जो प्रचंड शक्ति भरी है, उसका महत्त्व जिनने जान लिया, वे अपना सारा ध्यान मन को नियंत्रित करने में लगाते हैं। उसकी चंचलता को रोकते और एकाग्रता को बढ़ाते हैं। अच्छे नंबरों से, ऊँचे डिवीजनों से पास होने वाले विद्यार्थी, महत्त्वपूर्ण अन्वेषण करने वाले वैज्ञानिक, मेधावी वकील, डॉक्टर, इंजीनियर और कारीगर एकाग्रता के बलबूते पर ही गौरवान्वित होते हैं। कवि, लेखक, चित्रकार, गायक, कलाकारों में जो प्रतिभा दीख पड़ती है, वह उनकी तन्मयता का ही प्रतिफल है। कुशल व्यापारी अपने कारोबार में अपने को घुला देता है। लक्ष्य को वही बेध पाता है, जिसे अर्जुन की तरह बाण की नोंक और चिड़िया का मस्तक ही दिखाई देता है। भक्त और साधकों को अपने इष्टदेव में तन्मय हो जाने पर ही साक्षात्कार का लाभ मिलता है। समाधि और कुछ नहीं, चित्त को एकाग्र करने की परिपूर्ण सफलता का ही दूसरा नाम है।
मन ही मित्र, मन ही शत्रु
गीता में कहा गया है कि, "वश में किया हुआ मन ही अपना मित्र और अव्यवस्थित चित्त ही अपना सबसे बड़ा शत्रु है।" जिसने अपने आपको जीत लिया, वह तीनों लोक जीत लेने के समान विजयी माना जाता है। आध्यात्मिक और भौतिक विभूतियाँ इस संसार में इतनी अधिक हैं कि ध्यानपूर्वक देखने से यह दुनिया जादू की नगरी जैसी प्रतीत होती है। परमात्मा की इस पुण्य वाटिका में खिला हुआ हर पुष्प, उसका कोई भी पुत्र बेरोकटोक प्राप्त कर सकता है, पर साथ ही यह प्रतिबंध लगा हुआ है कि मनस्विता की नाप-तौल के आधार पर ही यहाँ ऊँचे स्तरों तक प्रवेश मिलता है। जिस प्रकार सिनेमा में अधिक दाम का टिकट खरीदने वाले को अधिक सुविधा की सीट मिलती है, वैसे ही ईश्वर के इस जादूनगरी खेल में अधिक आनंददायक अनुभूतियाँ उन्हें मिलती हैं, जिनके पास अधिक मनस्विता संग्रह होती है। मन का ही साम्राज्य इस सारे चेतना जगत पर छाया हुआ है। ऋषियों के आश्रमों में उनकी प्रचंड विचारधारा से प्रभावित होकर गाय और सिंह एक साथ बैठे रहते है। युगपुरुष अपने संकल्पबल से संसार की विचाराधारा ही बदल डालते हैं। महात्मा गांधी, भगवान बुद्ध, ईसामसीह आदि महापुरुषों ने कितने अधिक लोगों का जीवन बदल डाला, यह किसी से छिपा नहीं है।
मनोमयकोश से अगला प्राणमयकोश है। कई स्थानों पर पहले प्राणमयकोश और फिर मनोमयकोश का उल्लेख मिलता है। इस क्रम भेद में उलझने से कोई लाभ नहीं। थाली में आए हुए पदार्थों में से पहले दाल खावें या शाक, यह प्रश्न अभिरुचि और सुविधा से संबंधित है। कोई सैद्धांतिक इसका महत्त्व नहीं है। इस प्रकार मनोमय और प्राणमयकोश के आगे-पीछे वाले क्रम को कोई महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। मन की शक्ति से प्राण की शक्ति अधिक एवं सूक्ष्म है। यह शरीर का एक अंगमात्र है, उसे ग्यारहवीं इंद्रिय कहा गया है। पर प्राण इससे भिन्न, इससे प्रबल और इससे सूक्ष्म है। इसलिए हमने महत्त्व की दृष्टि से मन के बाद प्राण की शिक्षा देने का क्रम अपनाया है।
पराप्रकृति की चेतनाशक्ति
सृष्टि, परा और अपरा प्रकृति के दो भागों में विभक्त है। एक को जड़, दूसरे को चेतन कह सकते हैं। शरीर में मन की चेतना पंचतत्वों के सम्मिलन की चेतना मानी जाती है। आत्मा में प्रकाश प्राप्त करते हुए भी वह आत्मा का नहीं, शरीर का ही अंश माना जाता है। इसी प्रकार विश्वव्यापी पंचतत्त्वों की, महाभूतों की सम्मिलित चेतना का नाम प्राण है। प्राण को जीवनीशक्ति भी कह सकते हैं। वह वायु में, आकाश में घुला तो रहता है, पर इनसे भिन्न है। जिसे जड़ प्रकृति कहते हैं, वस्तुतः वह भी जड़ नहीं है। उसमें प्राण की एक स्वल्पमात्रा भरी रहती है। पूर्ण निष्प्राण वस्तु पूर्णतः निरुपयोग ही नहीं होती, वरन नष्ट भी हो जाती है। प्राण के अभाव में कोई वस्तु अपना स्वरूप धारण किए नहीं रख सकती। उसके जो स्वाभाविक गुण हैं, वे भी स्थिर नहीं रहते।
प्राण को एक प्रकार की सजीव विद्युतशक्ति कह सकते हैं, जो समस्त संसार में वायु, आकाश गरमी एवं ईथर की तरह समायी हुई है। यह तत्त्व जिस प्राणी में जितना अधिक होता है, वह उतना ही स्फूर्तिवान, तेजस्वी, साहसी एवं सुदृढ़ दिखाई देता है। शरीर में व्याप्त इसी तत्त्व को 'जीवनीशक्ति' एवं ‘ओज’ कहते हैं और मन में व्यक्त होने पर यह तत्त्व प्रतिभा एवं तेज कहलाता है। वीर्य में यह विद्युतशक्ति अधिक मात्रा में भरी रहने से ब्रह्मचारी लोग मनस्वी एवं तेजस्वी बनते हैं। इसी के अभाव से चमड़ी गोरी-पीली होने पर भी, नख-शिख का ढाँचा सुंदर दीखने पर भी मनुष्य निस्तेज, उदास, मुरझाया हुआ और लुंज-पुंज सरीखा लगता है। भीतरी तेजस्विता के अभाव से चमड़ी की सुंदरता निर्जीव जैसी लगती है। मन को लुभाने वाले सौंदर्य में जो तेजस्विता एवं मृदुलता बिखरी होती है, वह और कुछ नहीं, प्राण का ही उभार है। वृक्ष, वनस्पतियों, पुष्पों से लेकर शिशु और शावकों, किशोरों-किशोरियों में जो कुछ आह्लाद दीख पड़ता है, वह सब प्राण का ही प्रताप है। यह शक्ति कहीं चेहरे के सौंदर्य में, कहीं वाणी की मृदुलता में, कहीं प्रतिभा में, कहीं बुद्धिमत्ता में, कहीं कला-कौशल में, कहीं भक्ति में, कहीं अन्य किसी रूप में देखी जाती है।
प्राण का आध्यात्मिक स्वरूप
दुर्गा के रूप में अध्यात्म जगत में इसी तत्त्व को पूजा जाता है। शक्ति यही है। दुर्गा सप्तशती में 'या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण तिष्ठति' आदि श्लोकों में अनेक रूप से, उसी तत्त्व के लिए ‘नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमोनमः' कहकर अभिवंदन किया गया है। विजयदशमी की शक्तिपुंज के रूप में हम इस प्राणतत्त्व का ही आह्वान और अभिनंदन करते हैं। विश्व-सृष्टि में समाया हुआ यह प्राण, जब दुर्बल पड़ जाता है तो हीनता का युग आ जाता है, सब जीव-जंतु दुर्बलकाय, अल्पजीवी, मंदबुद्धि और हीनभावनाओं वाले हो जाते हैं। किंतु जब इसकी प्रौढ़ता रहती है तो इस सृष्टि में सब कुछ उत्कृष्ट रहता है। सतयुग और कलियुग का भेद इस विश्वप्राण की प्रौढ़ता और वृद्धता पर निर्भर है। जब सृष्टि में से यह प्राण वृद्ध होते−होते मरण की, परिसमाप्ति की स्थिति में पहुँचता है तो प्रलय की घड़ी प्रस्तुत हो जाती है। परमाणुओं के एकदूसरे के साथ संबद्ध रखने वाला चुंबकत्व−प्राण ही नहीं रहा तो वे सब बिखरकर धूलि की तरह छितरा जाते हैं। जितने स्वरूप बने हुए थे, वे सब नष्ट हो जाते हैं, इसी का नाम प्रलय है। जब दीर्घकाल के पश्चात यह प्राण चिरनिंद्रा में से जागकर नवजीवन ग्रहण करता है तो सृष्टि-उत्पादन की प्रक्रिया पुनः आरंभ हो जाती है। जीवात्माओं को इस परा और अपरा प्रकृति का आवरण धारण करके कोई स्वरूप ग्रहण करने का अवसर मिलता है और वे पुनः जीव-जंतुओं के रूप में चलते-फिरते दृष्टिगोचर होने लगते हैं।
यह प्राणतत्त्व किन्हीं प्राणियों को पूर्वसंग्रहित संस्कार एवं पुण्यों के कारण जन्मजात रूप से अधिक मात्रा में उपलब्ध होता है। इसे उनका सौभाग्य ही कहना चाहिए। पर जिन्हें वह न्यून मात्रा में प्राप्त है, उन्हें निराश होने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। प्रयत्नों के द्वारा इस तत्त्व को कोई भी—अभीष्ट आकांक्षा के अनुरूप अपने अंदर धारण कर सकता है। जिसमें कम है, वह उसकी पूर्ति, इस विश्वव्यापी प्राणतत्त्व में से बिना किसी रोक-टोक चाहे जितनी मात्रा में लेकर कर सकता है। जिनमें पर्याप्त मात्रा है, वह और भी अधिक मात्रा में उसे ग्रहण करके अपनी तेजस्विता और प्रतिभा में अभीष्ट अभिवृद्धि कर सकते हैं।
प्राणतत्त्व की उपलब्धि
यों स्वास्थ्य जन्मजात रूप से भी किसी-किसी का अच्छा होता है। कोई-कोई आहार-विहार ठीक रखने मात्र से बलवान बने रहते हैं, व्यायाम की पूर्ति वे अपने दैनिक कार्यों से भी कर लेते हैं, तात्पर्य यह है कि बिना व्यायाम के भी कितने ही व्यक्ति बलवान और परिपुष्ट देखे जाते हैं, इतने पर भी व्यायाम का महत्त्व कम नहीं होता। जिन्हें विशेष रूप से अपना स्वास्थ्य संभालना है, उन्हें नियमित व्यायाम को अपने दैनिक जीवन में स्थान देना पड़ता है। कोई पहलवान, कोई खिलाड़ी ऐसा नहीं होता, जो रोज व्यायाम न करता हो। स्वास्थ्य की अभिवृद्धि के लिए जिस प्रकार व्यायाम का एक विशेष महत्त्व है, उसी प्रकार प्राणशक्ति की अभिवृद्धि के लिए प्राणायाम का स्थान है। प्राणों के व्यायाम को ही ‘प्राणायाम’ कहते हैं। जीवन विकास के लिए प्राणधन की समुचित मात्रा चाहिए। इसका उपार्जन करना अपने को एक बड़ी शक्ति से वंचित रखना ही कहा जाएगा। धन के बिना व्यापार नहीं हो सकता, पूँजी के अभाव में कोई उद्योग-धंधा चल सकना संभव नहीं। इसी प्रकार चेतना और प्रेरणा, प्रतिभा और पुरुषार्थ के बिना जीवन-विकास की प्रक्रिया अग्रसर नहीं हो पाती। यह सब लक्षण प्राणशक्ति के ही हैं। प्राण का संपादन जीवन-व्यापार के लिए आवश्यक पूँजी एकत्रित करने के समान है। इस तथ्य को भली प्रकार समझकर ही ऋषियों ने अध्यात्म-साधना में प्राणायाम को प्रमुख स्थान दिया है। संध्या-वंदन, हवन, अनुष्ठान आदि प्रत्येक नित्य-नैमित्तिक धर्मकार्यों में प्राणायाम को अनिवार्य स्थान मिला हुआ है। कोई भी धर्मकार्य ऐसा नहीं, जिसे आरंभ करते हुए प्राणायाम न करना पड़ता हो। यों सभी कार्यों में प्राण चाहिए पर असुरता एवं दुष्प्रवृत्तियों से लड़ते हुए धर्मचेतना को आगे बढ़ाने में पग-पग पर प्रलोभनों से संग्राम करना पड़ता है, इसलिए आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने वाले को अतिरिक्त प्राण की भी आवश्यकता होती है। इसलिए प्राणायाम को आवश्यक महत्त्व मिलना उचित ही है।
शरीर और मन पर जीवन-तत्त्व का प्रभाव
दैनिक जीवन में आवश्यक जीवनीशक्ति प्राप्त करके सफलता के मार्ग प्रशस्त करना हर किसी को आवश्यक होता है, इसलिए प्राणायाम की साधारण प्रक्रिया भी सर्वसाधारण के लिए उपयोगी है। प्राणतत्त्व के आधार पर शरीर और मन के अनेक रोगों का निर्धारण कर सकना अब विज्ञानसम्मत तथ्य के रूप में सामने आ चुका है। मैस्मरेजम और हिप्नाॅटिज्म के सिद्धांतों से पाश्चात्य चिकित्सक, वैज्ञानिक अब अपने रोगियों को आवश्यक प्राणतत्त्व प्रदान करके उन्हें रोगमुक्त बनाने में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करने लगे हैं। हमारी 'प्राण चिकित्सा विज्ञान' पुस्तक जिन्होंने पढ़ी है, वे जानते हैं कि औषधि विज्ञान की तरह ‘प्राण विज्ञान’ भी एक स्वतंत्र आरोग्य विज्ञान है और उसके द्वारा भी अन्य चिकित्सा प्रणालियों की भाँति ही रोगमुक्ति एवं आरोग्यवृद्धि का उद्देश्य पूर्ण किया जा सकता है। जापान के सुप्रसिद्ध डाॅक्टर शेराबुज ने विशुद्ध रूप से प्राणायाम के आधार पर अपने असाध्य क्षयरोग से छुटकारा पाया था। अच्छा होने पर उन्होंने प्राणविद्या के महान ज्ञान को जनसाधारण में फैलाने का व्रत लिया था और हजारों-लाखों व्यक्तियों को इसी आधार पर आरोग्यवृद्धि के लाभ से लाभान्वित किया था। भारत के योगीजन इस तत्त्व का उपयोग शरीर और मन की साधारण उन्नति में एवं लौकिक समस्याओं के समाधान में करते रहे हैं। ‘स्वर विज्ञान’ इसी का एक स्वतंत्रशास्त्र है। शिवस्वरोदय आदि कितने ही प्राचीन ग्रंथ इस संबंध में मिलते हैं और प्रायः सभी योगशास्त्रों में स्वरविद्या का न्यूनाधिक उल्लेख मिलता है। एक छोटी पुस्तक इस संबंध में अपने यहाँ से भी प्रकाशित हो चुकी है।
श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया
प्राण को ग्रहण करना श्वास-प्रश्वास क्रिया के आधार पर ही संभव होता है। प्राणवायु में घुला रहता है, इसलिए मोटे तौर से उसे वायु ही समझा जाता है। 'प्राणवायु' शब्द भी इसी स्थूल-दृष्टि के कारण प्रचलित हुआ है, अन्यथा प्राण और वायु दोनों एक दीखते हुए भी वस्तुतः उसी प्रकार पृथक हैं, जैसे मीठे दूध में, दूध और चीनी दो अलग पदार्थ होते हुए भी किसी उद्देश्य के लिए मिलाए हुए होते हैं। स्वर विज्ञान, श्वास विज्ञान के नाम से जो भी प्रक्रियाएँ प्रचलित हैं, उन्हें वस्तुतः प्राणविज्ञान ही समझना चाहिए। क्योंकि साँस में ली जाने वाली वायु में आक्सीजन आदि गुणों को ही साधारण रीति से शरीर खींच पाता है, उसमें जो प्राण घुला है, उसको विशेष विधि-व्यवस्था से प्राणायाम-प्रक्रिया से ही प्राप्त कर सकना संभव होता है।
प्राणकोश की साधना में प्राणायाम का विशेष महत्त्व माना गया है। पर वही सब कुछ नहीं है, प्रारंभिक साधकों को श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया की विशेष विधि द्वारा अखिल-आकाश में से प्राणतत्त्व की आवश्यक मात्रा खींचकर अपने भीतर धारण करनी पड़ती है, जिससे शरीर और मन में आवश्यक बलिष्ठता का समावेश हो सके। पीछे प्राणतत्त्व को आकाश से अभीष्ट मात्रा में खींचकर उसका उपयोग संसार के विभिन्न कार्यों में करने की क्षमता प्राप्त हो जाती है तो यह नरदेह एक प्रकार का विशाल बिजलीघर बन जाता है, जिससे अपना ही नहीं, दूसरे अनेकों का भी हित-साधन हो सकता है। किसी बड़े बिजलीघर से संबंधित अनेक कल-कारखाने चलते रहते हैं और हजारों-लाखों घरों में रोशनी, पंखा, रेडियो आदि की आवश्यकता पूरी होती है। प्राणविद्या का निष्णांत व्यक्ति अखिल आकाश में व्याप्त प्राण-प्रवाह को मनमानी मात्रा में उपलब्ध करके उससे इतना बड़ा श्रेष्ठ-साधन कर सकता है, जितना कर सकना किसी अमीर, धनी, सत्तावान एवं शासन के लिए संभव नहीं है।
प्राणमयकोश की साधना में प्राणविद्या का क्रमिक शिक्षण प्राप्त करना पड़ता है। गतवर्ष इस संदर्भ में प्राणाकर्षण प्राणायाम की शिक्षा दी गई थी। और बताया गया था कि—
गत वर्ष की प्राणशिक्षा
(1) “प्रातःकाल नित्यकर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख पालथी मारकर बैठिए। दोनों हाथ घुटनों पर रखिए, मेरुदंड सीधा रखिए। नेत्र बंद कर लीजिए। ध्यान कीजिए कि अखिल आकाश में तेज और शक्ति से ओत-प्रोत प्राणतत्त्व व्याप्त हो रहा है। गरम भाप के, सूर्य के प्रकाश में चमकते हुए बादलों जैसी शक्ल के, प्राण का उफान हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है। और उस प्राण-उफान के बीच हम निश्चिन्त, शांतचित्त एवं प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए हैं।”
(2) ‟नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे-धीरे साँस खींचना आरंभ कीजिए और भावना कीजिए कि प्राणतत्त्व के उफनते हुए बादलों को हम अपनी साँस द्वारा भीतर खींच रहे हैं। जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसले में, साँप अपने बिल में प्रवेश करता है, उसी प्रकार प्रवाह हमारी नासिका द्वारा साँस के साथ शरीर के भीतर प्रवेश करता है और मस्तिष्क, छाती, हृदय, पेट, आँतों से लेकर समस्त अंगों में प्रवेश कर जाता है।”
(3) “जब साँस पूरी खिंच जाए तो उसे भीतर रोकिए और भावना कीजिए कि, ‟जो प्राणतत्त्व खींचा गया है, उसे हमारे भीतरी अंग−प्रत्यंग सोख रहे हैं। जिस प्रकार मिट्टी पर पानी डाला जाए तो वह उसे सोख जाती है, उसी प्रकार अपने अंग सूखी मिट्टी के समान हैं और जलरूपी इस खींचे हुए प्राण को सोखकर अपने अंदर सदा के लिए धारण कर रहे हैं। साथ ही प्राणतत्त्व में सम्मिश्रित चैतन्य, तेज, बल, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम सरीखे अनेक तत्त्व हमारे अंग-प्रत्यंग में स्थिर हो रहे हैं।”
(4) “जितनी देर साँस आसानी से रोकी जा सके, उतनी देर रोकने के बाद धीरे-धीरे साँस बाहर निकालिए। साथ ही भावना कीजिए कि प्राणवायु का सारतत्त्व हमारे अंग-प्रत्यंगों के द्वारा खींच लिए जाने के बाद अब वैसा ही निकम्मा वायु बाहर निकाला जा रहा है, जैसा कि मक्खन निकाल लेने के बाद निस्तार दूध हटा दिया जाता है। शरीर और मन में जो विकार थे, वे सब इस निकलती हुई साँस के साथ घुल गए हैं और काले धुँए के समान अनेक दूषणों को लेकर वह बाहर निकल रहे हैं।”
(5) “पूरी साँस बाहर निकल जाने के बाद कुछ देर बाहर साँस रोकिए अर्थात बिना साँस के रहिए और भावना कीजिए कि अंदर के जो दोष बाहर निकाले गए थे। उनको वापिस न लौटने देने की दृष्टि से दरवाजा बंद कर दिया गया है और वे बहिष्कृत होकर हमसे बहुत दूर उड़े जा रहे हैं।”
“इस प्रकार पाँच अंगों में विभाजित इस प्राणाकर्षण प्राणायाम को नित्य ही जप से पूर्व करना चाहिए। आरंभ 5 प्राणायामों से किया जाए। अर्थात उपरोक्त क्रिया पाँच बार दुहराई जाए। इसके बाद हर महीने एक प्राणायाम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक वर्ष में आधा घंटा तक पहुँचा देनी चाहिए।”
उपरोक्त प्राणाकर्षण-विधान गत वर्ष अक्टूबर मास के अंक में छपा था। इस एक वर्ष में जिन्होंने इस विधान के अनुसार साधना की है, उन्होंने आशातीत सत्परिणाम प्राप्त किया है। जो निरुत्साह और निराश रहा करते थे, जिनकी नस−नाड़ियाँ शिथिल रहा करती थीं, जरा-सा काम करने पर जो थक जाते थे, थोड़ी भी कठिनाई में जिनका दिल धड़कने लगता है। चिंता और आकांक्षा से जिनका चित्त आतंकित रहा करता था, वे इस प्राणायाम के प्रयोग से अपने अंदर जादू जैसा परिवर्तन अनुभव करने लगे हैं। उन्हें अनुभव होता है कि कोई अतिरिक्त शक्ति उनके शरीर में प्रवेश कर गई है और उसकी सहायता से आत्मविश्वास एवं आत्मबल दूना हो गया है। काम में मन लगने और आशावादी रहने का एक विशेष परिवर्तन 90 प्रतिशत साधकों में हुआ है।
इस वर्ष का अगला पाठ्यक्रम
जिनने प्रथम वर्ष की यह प्राणाकर्षण साधना आरंभ न की हों, उन्हें यह अंक मिलते ही तुरंत आरंभ कर देनी चाहिए। प्राणतत्त्व जितना बहुमूल्य है, उतना ही सुलभ भी। इतनी सुलभ वस्तु जो भावनापूर्वक साँस खींचनेमात्र से अपने को उपलब्ध हो सकती है और गुणों की दृष्टि से जो संसार की किसी भी मूल्यवान वस्तु से कम महत्त्व की नहीं है, उसकी उपेक्षा किया जाना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है। आध्यात्मिक साधनाएँ समय की बर्बादी नहीं हैं। भौतिक पुरुषार्थों से प्राप्त होने वाले लाभों की अपेक्षा विधिवत किए हुए आध्यात्मिक पुरुषार्थों का लाभ निश्चय ही अत्यधिक होता है। प्राणाकर्षण प्राणायाम एक चुनी हुई सरल साधना है, जिसका प्राणमयकोश के परिमार्जन में महत्त्वपूर्ण स्थान माना गया है।
जिन लोगों ने प्रथम वर्ष की साधना आरंभ नहीं की है, उनके लिए एक वर्ष तक उपरोक्त साधना करते रहना ही उचित है। किंतु जो एक वर्ष तक इसे कर चुके, उनके लिए 'लोम-विलोम, सूर्यवेधन प्राणायाम' साधना का द्वितीय वर्षीय कार्यक्रम उचित एवं उपयुक्त रहेगा। यह साधना इस प्रकार करनी चाहिए—
(1) किसी शांत एकांत स्थान में प्रातःकाल स्थिर चित्त होकर बैठिए। पूर्व की ओर मुख, पालथी मारकर सरल पद्मासन से बैठना, मेरुदंड सीधा, नेत्र अधखुले, घुटनों पर दोनों हाथ, यह प्राणमुद्रा कहलाती है— इसी पर बैठना चाहिए।
(2) बाँए हाथ को मोड़कर तिरछा कीजिए। उसकी हथेली पर दाहिने हाथ की कोहनी रखिए। दाहिना हाथ ऊपर उठाइए। अंगूठा दाहिने नथुने पर और मध्यमा तथा अनामिका उंगलियाँ बाँए नथुने पर रखिए।
(3) बाँए नासिका के छिद्र को मध्यमा (बीच की) और अनामिका (तीसरे नंबर की ) उंगली से बंद कर लीजिए। दाहिने नथुने से धीरे−धीरे साँस खींचना आरम्भ कीजिए। साँस फेफड़े तक ही सीमित न रहे, उसे नाभि तक ले जाना चाहिए और धीरे−धीरे इतनी वायु पेट में ले जानी चाहिए, जिससे वह पूरी तरह फूल जाए।
(4) ध्यान कीजिए कि सूर्य की किरणों जैसा प्रवाह, वायु में सम्मिश्रित होकर दाहिने नासिका छिद्र में अवस्थित पिंगला नाड़ी द्वारा अपने शरीर में प्रवेश कर रहा है और उसकी ऊष्मा अपने भीतरी अंग−प्रत्यंगों को तेजस्वी बना रही है।
(5) साँस को कुछ देर भीतर रोकिए। दोनों नासिका छिद्र बंद कर लीजिए और ध्यान कीजिए कि नाभिचक्र में प्राणवायु द्वारा एकत्रित हुआ तेज, नाभिचक्र में एकत्रित हो रहा है। नाभिस्थल में चिरकाल से प्रसुप्त पड़ा हुआ सूर्यचक्र, इस आगत प्रकाशवान प्राणवायु से प्रभावित होकर प्रकाशवान प्राणवायु से प्रभावित होकर प्रकाशवान हो रहा है और उसकी चमक बढ़ती जा रही है।
(6) दाहिने नासिका छिद्र को अंगूठे से बंद कर लीजिए। बाँया खोल दीजिए। साँस को धीरे−धीरे बाँए नथुने से बाहर निकालिए और ध्यान कीजिए कि सूर्यचक्र को सुषुप्त और धुँधला बनाए रहने वाले कल्मष, इस छोड़ी हुई साँस के साथ बाहर निकल रहे हैं। इन कल्मषों के मिल जाने के कारण साँस खींचते समय जो शुभ्र-वर्ण तेजस्वी प्रकाश भीतर गया था, वह अब मलीन हो गया और पीतवर्ण होकर साँस के साथ बाँए नथुने की इड़ा नाड़ी द्वारा बाहर निकल रहा है।
(7) दोनों नथुने फिर बंद कर लीजिए । फेफड़ों को बिना साँस के खाली रखिए। ध्यान कीजिए कि बाहरी प्राण बाहर रोक दिया गया है। उसका दबाव भीतर प्राण पर बिलकुल भी न रहने से वह हलका हो गया है। नाभिचक्र में जितना प्राण सूर्यपिण्ड की तरह एकत्रित था, वह तेजपुंज की तरह ऊपर की ओर अग्निशिखाओं की तरह ऊपर उठ रहा है। उसकी लपटें पेट के ऊर्ध्व भाग,फुफ्फुस से फैलती हुई कंठ तक पहुँच रही हैं। भीतरी अवयवों में सुषुम्ना नाड़ी में से प्रस्फुटित हुआ यह प्राणतेज अंतःप्रदेश को प्रकाशमान बना रहा है।
(8) अंगूठे से दाहिना छिद्र बंद कीजिए और बाँए नथुने से साँस खींचते हुए ध्यान कीजिए कि इड़ा नाड़ी द्वारा सूर्यप्रकाश जैसा प्राणतत्त्व साँस से मिलकर शरीर में भीतर प्रवेश कर रहा है और वह तेज सुषुम्ना विनिर्मित नाभिस्थल के सूर्यचक्र में प्रवेश करके वहाँ अपना भंडार जमा कर रहा है। इस तेज संचय से सूर्यचक्र क्रमशः अधिक तेजस्वी बनता चलता जा रहा है।
(9) दोनों नासिका छिद्रों को बंद कर लीजिए। साँस को भीतर रोकिए। ध्यान कीजिए कि साँस के साथ एकत्रित किया हुआ तेजस्वी प्राण, नाभिस्थित सूर्यचक्र में अपनी तेजस्विता को चिरस्थायी बना रहा है। तेजस्विता निरंतर बढ़ रही है और वह अपनी लपटें पुनः ऊपर की ओर अग्निशिखा की तरह ऊर्ध्वगामी बना रही है। इस तेज से सुषुम्ना नाड़ी निरंतर परिपुष्ट हो रही है।
(10) बाँया नथुना बंद कीजिए और दाहिने से साँस धीरे−धीरे बाहर निकालिए। ध्यान कीजिए कि सूर्यचक्र का कल्मष धुँए की तरह तेजस्वी साँस में मिलकर उसे धुँधला पीला बना रहा है और पीली प्राणवायु पिंगला नाड़ी द्वारा बाहर निकल रही है। भीतरी कषाय-कल्मष बाहर निकलने से अंतःकरण बहुत हलका हो रहा है।
(11) दोनों नासिका छिद्रों को पुनः बंद कीजिए और उपरोक्त नं. 6 की तरह फेफड़ों को साँस से बिलकुल खाली रखिए। नाभिचक्र से कंठ तक सुषुम्ना का प्रकाशपुंज ऊपर उठता देखिए। भीतरी अवयवों में एक दिव्य-ज्योति जगमगाती अनुभव कीजिए।
परिभाषा एवं ज्ञातव्य
यह एक लोम−विलोम सूर्यवेधन प्राणायाम हुआ। साँस के साथ खींचा हुआ प्राण, नाभि में स्थित सूर्यचक्र को जागृत करता है। उसके आलस्य और अंधकार को वेधता है और वह सूर्यचक्र अपनी परिधि की वेधन करता हुआ सुषुम्ना मार्ग से उदर, छाती और कंठ तक अपना तेज फेंकता है। इन कारणों से इसे सूर्यवेधन कहते हैं। लोम कहते हैं सीधे को, विलोम कहते हैं उलटे को। एक बार सीधा, एक बार उलटा। फिर उलटा, फिर सीधा। फिर उलटा, फिर सीधा। बाँए से खींचना, दाँये से निकालना। दाहिने से खींचना बाँए से निकालना। यह उलटा-सीधा चक्र रहने से इसे लोम-विलोम कहते हैं। प्राणायाम की प्रकृति के अनुसार इसे लोम-विलोम सूर्यवेधन प्राणायाम कहा जाता है। साँस खींचने को पूरक, रोकने को अंतःकुंभक, निकालने को रेचक और बाहर साँस रोकने को बाह्यकुंभक कहते हैं। बाँए स्वर में चंद्रधारा एवं इड़ा नाड़ी और दाहिने स्वर में सूर्यधारा एवं पिंगला नाड़ी अवस्थित हैं। दोनों के मिलने के स्थल पर जो प्रकाशपुंज एवं तड़ित प्राण उत्पन्न होता है, उसे सुषुम्ना कहते हैं। यह परिभाषा भी हमें स्मरण रखनी चाहिए। एक बार उलटा, एक बार सीधा। एक बार दाँए से खींचना बाँए से निकालना, एक बार बाँए से खींचकर दाँए से निकालना, यह दोनों क्रियाएँ मिलने से एक पूर्ण लोम-विलोम सूर्यवेधन प्राणायाम बनता है। आरंभ में इन्हें तीन की संख्या से करना चाहिए। फिर हर महीने एक बढ़ाते हुए सात महीनों में इन्हें दस तक पहुँचा देना चाहिए। साँस को छोड़ने-निकालने की क्रिया जितनी धीमी रखी जा सके, उतनी ही अच्छी है। ध्यान रखिए कि भावना जितनी ही गहरी होगी, उतना ही अधिक सत्परिणाम उत्पन्न होगा।
प्रकाशपुंज के ज्योतिस्फुल्लिंग
गायत्री का देवता सविता है। सविता सूर्य को कहते हैं। प्रथम कक्षा के साधकों को प्रतिमा के आधार पर ध्यान करना पड़ता है, पर उसमें भी सूर्यमंडल के मध्य में अवस्थित माता की प्रतिमा होती है। इससे ऊँची कक्षा में सूर्य के समान गोलाकार प्रकाशपुंज ही गायत्री माता का स्वरूप रह जाता है और उसी का ध्यान करते हैं। यह ध्यान करते हुए प्रकाश पर्याप्त मात्रा में अपने अंतःप्रदेश में व्याप्त होता है तो ही यह प्रकाशपुंज का ध्यान ठीक तरह जमता है। इस उद्देश्य की पूर्ति इस सूर्य प्राणायाम से होती है। अपने भीतर-बाहर सब कुछ प्रकाशवान दीखता है। तमोगुणरूपी अंधकार तिरोहित होने लगता है और यदा−कदा आध्यात्मिक चेष्टाएँ विभिन्न रंग-रूप के, ज्योति-स्फुल्लिंगों के रूप में साधकों को परिलक्षित होती रहती हैं। प्रकाशदर्शन की अनुभूतियाँ आशा और उल्लास की प्रतीक मानी जाती हैं।
प्राणतत्त्व की एक उपयुक्त मात्रा इस प्राणायाम से साधकों को उपलब्ध होगी। यह मात्रा थोड़ी होते हुए भी अपनी शारीरिक, मानसिक, सांसारिक एवं आध्यात्मिक प्रगति में बहुत सहायक होती है। साधारण गृहस्थों एवं कार्यव्यस्त व्यक्तियों के उपयुक्त अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर साधनाक्रम बताया जा रहा है। जिन्हें अधिक अवकाश है, जिनका समय और मस्तिष्क खाली रहता है वे इन साधनाओं में अधिक तीव्रता उत्पन्न करके अधिक लाभ उठा सकते हैं। प्राण को निग्रहीत करने से मनुष्य मनचाही आयु प्राप्त कर सकता है। भीष्म की तरह शरशैय्या पर पड़े हुए भी छह महीने तक मृत्यु को टाल सकता है। इच्छानुसार जब चाहे समाधि लेकर प्राण त्याग कर सकता है। साधारण जीवन में वह एक शक्तिपुंज, बिजलीघर के समान सिद्ध होता है जिसकी प्रेरणा से उनका निज का जीवन ही नहीं, संबंधित वातावरण भी सुदूर देशों तक प्रभावित होता है। प्राण की महत्ता असाधारण है और वैसी ही प्राणायाम की भी।
अखिल आकाश में संव्याप्त महाप्राण को, भावना तथा श्वासक्रिया के सम्मिश्रित प्रयोग द्वारा खींचना और अपने अंदर धारण करना, प्राणायाम कहलाता है। प्राणायाम नित्यकर्मों में आने से बहुत सरल भी है और उसकी उच्च भूमिकाएँ इतनी ही कठिन एवं महत्त्वपूर्ण भी हैं कि इसी विद्या का गाहन-अवगाहन करके मनुष्य देवतुल्य सामर्थ्यवान बन सकता है। यम ने नचिकेता को इसे पंचाग्नि-विद्या के नाम से सिखाया था। प्रश्न उपनिषद् में प्राणविद्या के कुछ तथ्यों पर प्रकाश आता है, इससे प्रतीत होता है कि प्राणतत्त्व पर आधिपत्य प्राप्त कर लेने वाला व्यक्ति सामान्य व्यक्ति न रहकर अगणित विभूतियों का अधिपति बन जाता है। 84 प्रकार के प्राणायामों का योग-ग्रंथों में वर्णन मिलता है। इनमें से प्राणमयकोश का परिमार्जन करने की दृष्टि से, जितने सर्वसाधारण के लिए सुलभ हैं, उन्हें आगामी नौ वर्षों में बता दिया जाएगा। जो केवल विशिष्ट साधकों के लिए ही उपयुक्त हैं, जिन विधानों में भूल हो जाने से खतरे की आशंका रहती है और जो केवल अनुभवी मार्गदर्शकों के सामने ही किए या सीखे जा सकते है, उनका वर्णन इन पृष्ठों पर न करेंगे। उन्हें व्यक्तिगत शिक्षण के लिए ही सुरक्षित रखा जाएगा। कुंडलिनी जागरण, षट्चक्रों का वेधन, प्राण-संधान, निर्विकल्प और सविकल्प समाधियाँ यद्यपि प्राणविद्या के अंतर्गत दी जाती हैं, फिर भी वह विषय ऐसा जटिल है कि लिखने, छापने और पढ़ने मात्र से उसका किया जाना संभव नहीं। अधिकार और पात्रत्व बढ़ने पर ही कोई व्यक्ति उन विशिष्ट साधनाओं से लाभ उठा सकता है।
व्यक्ति-विद्युत का धारा-प्रवाह
प्राणतत्त्व का एक दूसरा प्रयोग भी है, जिसे 'व्यक्ति-विद्युत' कहते हैं। मैस्मरेजम के ज्ञाता जिसे पर्सनल ‘मेग्नेटिज्म’ के नाम से कुछ अंश तक जान सके हैं और उसके प्रयोगों की थोड़ी-सी प्रक्रिया काम में लाने लगे हैं, वह व्यक्ति-विद्युत के महान विज्ञान का ही एक छोटा-सा अंश है, भारतीय योगी इसे शक्ति-संचार या शक्तिपात के रूप में प्रयुक्त करते हैं। 'मानवीय विद्युत के चमत्कार' नामक हमारी पुस्तक जिन्होंने पढ़ी है, वे जानते हैं कि मनुष्य का शरीर और मन अपने भीतर कितनी भारी मात्रा में बिजली धारण किए हुए हैं और उसके द्वारा किन−किन प्रयोजनों की सिद्धि होती है। प्राण इससे भी उत्कृष्ट कोटि की विद्युत है। कोई प्राणवान व्यक्ति यदि चाहे तो अपने प्राणबल से दुर्बल प्राण वालों को उसी प्रकार लाभान्वित कर सकता है, जैसे कोई धनी व्यक्ति अपने पैसे से निर्धनों का भला कर सकता है।
शिक्षा के साथ−साथ शक्तिदान भी
साधना-क्षेत्र में गुरु−शिष्य परंपरा से इस शक्ति का आदान−प्रदान होता रहता है। अध्यापक अपने शिष्यों को केवल ज्ञान देते हैं, पर गुरु अपने शिष्यों को शिक्षा के साथ−साथ शक्ति का एक भाग भी दिया करते हैं। इसलिए गुरु को धर्मपिता कहा जाता है। शरीर को जन्म देने वाला पिता अपनी संतान की शिक्षा−दीक्षा भी करता है और अपनी कमाई हुई संपत्ति का एक बड़ा भाग उन पर खरच भी करता है। गुरुओं को भी ऐसा ही करना पड़ता है। गुरु को धर्मपिता इसलिए कहते हैं, क्योंकि वह अपने धर्मपुत्रों, शिष्यों को, निस्वार्थ भाव से अपनी उपार्जित तपश्चर्या का एक अंश उपहार में देकर उनको सुखी और समुन्नत बनाने के लिए बहुत कुछ आत्मत्याग करता रहता है।
यों अभिवादन का उत्तर आशीर्वाद में देने का एक आम रिवाज है। जिसे हम प्रणाम करेंगे, वह गुरुजन कुछ-न-कुछ मंगल वचन ही उत्तर में कहेंगे। पर वे आशीर्वाद सार्थक किसी−किसी के ही होते हैं। कारण स्पष्ट है, कोई हीन वीर्य पदार्थ फलप्रद नहीं होता। सड़ा, घुना बीज कहाँ उगता है? आशीर्वाद के साथ-साथ अपने पुण्य और तप का एक अंश यदि नहीं दिया गया तो उसे शिष्टाचारमात्र ही माना जाएगा और उसका प्रतिफल सुनने वाले को मनोरंजन जितना ही होगा। सामर्थ्यवान गुरु, अधिकारी-सत्पात्रों को उनकी श्रद्धा और सत्प्रवृत्तियों से प्रसन्न होकर यदि सच्चा आशीर्वाद देते हैं तो वह सफल ही होते देखा जाता है। कभी−कभी कोई विरले प्रारब्ध ही ऐसे होते हैं, जो भोगने के अतिरिक्त और किसी प्रकार समाप्त नहीं होते। ऐसे कठिन प्रारब्ध भी सच्चे आशीर्वाद से बहुत हलके होकर आसानी से भुगत लिए जाने योग्य बन जाते हैं। सच्चे आशीर्वादों का महत्त्व सर्वविदित है। इसलिए कोई शुभ कार्य करते समय सत्पुरुषों का आशीर्वाद प्राप्त किया करते हैं। यदि वह मिल जाता है तो मंजिल बहुत सरल हो जाती है।
दिव्य शक्तियों का उच्च अनुदान
गायत्री उपासना की उच्चस्तरीय पंचकोशी साधन-शिक्षा प्राप्त करने वाले साधकों के लिए एक विशिष्ट आशीर्वाद का प्रेरणा-प्रवाह हम लोगों को उपलब्ध है। शक्ति-संचार साधना के नाम से गत वर्ष उसकी जानकारी साधकों को हो चुकी है। प्रत्येक रविवार को सूर्योदय से 1.5 घंटे पूर्व से लेकर आधा घंटे पूर्व तक के, एक घंटा समय में कोई उच्च-आत्माएँ अपने परिवार के लिए एक प्राण-प्रेरणा भेजती हैं। उसे हममें से कोई भी निर्बाध रूप से प्राप्त कर सकता है। गत वर्ष कुछ सीमित व्यक्तियों को इसका लाभ मिल सका था। सब साधकों के लिए प्रेरणा-प्रवाह उपलब्ध न था। पर इस वर्ष वह कठिनाई दूर हो गई है और उच्च आत्माओं का उतना प्रेरणा-प्रवाह उपलब्ध हो गया है कि हम में से कोई भी प्राणमयकोश की साधना करने वाला उसका लाभ उठा सकता है। गत वर्ष उसके लिए एक विशेष विधि भी भेजी गई थी। इस वर्ष इन्हीं पंक्तियों में अगले वर्ष का शक्ति-संचार विधान प्रस्तुत किया जा रहा है।
शक्तिसंचार-साधना विधिः−
(1) रविवार को प्रातःकाल सूर्य उदय होने से 2 घंटा पूर्व से लेकर आधा घंटा पूर्व तक और सायंकाल 9.30 से 10.30 तक का समय, इस साधना के लिए नियत है। प्रातःकाल के 1.5 घंटा और सायंकाल के एक घंटा, कुल 2.5 घंटा में से अपनी सुविधानुसार शक्तिसंचार-साधना के लिए नियत कर लेना चाहिए। इस साधना में स्नान करना अनिवार्य नहीं है। हाथ, पैर, मुँह धोकर बैठा जा सकता है।
(2) पालथी मारकर, मेरुदंड सीधा रखकर, नेत्रों को अधखुले रखकर ध्यानमुद्रा में बैठिए। दोनों हाथों को घुटनों पर रखिए। उत्तर दिशा में मुँह कीजिए।
(3) भावना कीजिए कि हिमालय जैसे उच्च स्थान से कोई दिव्य शक्ति हमें आशीर्वाद, प्रेरणा और प्रोत्साहन भरा प्राण-प्रवाह हमारे लिए भेज रही है और हम उसे श्रद्धापूर्वक अपने अंतःप्रदेश में धारण कर रहे हैं।
(4) धारणा कीजिए कि अन्तरिक्ष से एक शुभ्र वर्ण, पीत आभा वाला, भाप के बादलों जैसा प्राण-प्रवाह उमड़ता चला आता है। धुनी हुई रुई या हलकी बरफ जैसी या उफनते हुए दूध के झाग जैसी एक मृदुल विद्युतधारा अपने चारों ओर फैली हुई है। कुहरे की तरह उसने हमारे सब ओर की परिधि घेर ली है और हम उसके मध्य बैठे हुए आनंद एवं उल्लास का अनुभव कर रहे हैं।
(5) ध्यान कीजिए किसी दिव्य चेतना द्वारा प्रेरित यह प्राण-प्रवाह अपने सब इंद्रिय छिद्रों तथा रोमकूपों द्वारा शरीर के भीतर प्रवेश करके अपने अंग-प्रत्यंगों में संव्याप्त हो रहा है। उस प्रवाह के साथ−साथ अपने भीतर उच्च आस्था, श्रेष्ठ श्रद्धा, आशा, उत्साह, कोमलता, दया, विवेक, आनंद, उल्लास, नीति, धर्म, त्याग, संयम, परमार्थ आदि की उच्च भावनाएँ भी घुली हुई चली आ रही हैं और उन्हें उपलब्ध करके अपना अंतःकरण महापुरुषों जैसा उदार, महान, दूरदर्शी एवं आदर्शवादी बन रहा है।
(6) विश्वास कीजिए कि यह प्रवाह ईश्वरीय है— ऋषियों जैसी पवित्रता इसमें ओत-प्रोत है। यह शक्ति अपने भीतर प्रविष्ट होकर परमात्मा का पुण्य-प्रकाश अपने भीतर उत्पन्न कर रहा है, आत्मा की परिणति परमात्मा के स्वरूप में होती जाती है, इस दिव्य प्रवाह को प्राप्तकर अपना आत्म, परमात्म के अधिकाधिक निकट पहुँचता चला जा रहा है।
आधा घंटे में असाधारण उपलब्धि
प्रत्येक रविवार को नियत समय पर आधा घंटा इन भावनाओं से ओत-प्रोत रहने का स्वयं प्रयत्न करना और दूसरी ओर से अपने परिवार के लिए विशेष रूप से नियोजित, उच्च आत्माओं की प्रेरणा-व्यवस्था का स्वर्ण सुयोग प्राप्त करके सभी लोग निश्चय ही बहुत लाभ प्राप्त कर सकते हैं। साधारण साधना में केवल उतना ही लाभ होता है, जितना अपना पुरुषार्थ रहता है, पर इसमें एक ओर से अपना पुरुषार्थ और दूसरी ओर से उन आत्माओं द्वारा प्रेरित पुण्य प्राण−प्रवाह उपलब्ध होने से दूना लाभ होता है और अभीष्ट लक्ष्य सफलता की आशा अधिक सुनिश्चित बनती जाती है। इस साधना में हमारा भी एक सीमा तक प्रोत्साहन एवं सहयोग सन्निहित है।
अंग्रेजी महीनों के हिसाब से यह समय इस प्रकार रखा जाना चाहिए। दिसंबर, जनवरी, फरवरी प्रातः 5.30 से 7.00 तक, मार्च, अप्रैल, मई प्रातः 4.30 से 6.00 तक, जून, जुलाई, अगस्त 4.00 से 5.30 तक, सितंबर, अक्टूबर, नवम्बर 4.30 से 6.00 तक। रात्रि का समय सदा ही 9.30 से 10.30 रहेगा। प्रातःकाल या सायंकाल में से कोई एक ही समय नियत करना चाहिए।
गत वर्ष जिनने शक्तिसंचार की उपासना की है, उन्हें इस वर्ष उपरोक्त क्रम से व्यवस्था करनी चाहिए, जिनने अभी आरंभ नहीं किया है, उन्हें इसी विधान से अपना आरंभ कर देना चाहिए। इस एक साल के अनुभव के आधार पर यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि यह विधान पंचकोशी साधना की अन्य समस्त साधनाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसका लाभ हममें से किसी को भी छोड़ना नहीं चाहिए।
विज्ञानमयकोश भावनाओं से विनिर्मित आवरण है। उस पर प्रधानतम भावनाओं की श्रेष्ठता का ही प्रभाव पड़ता है। शरीर और मन के गुण और दोष मानवीय अंतःचेतना को जितना प्रभावित करते हैं, उसकी अपेक्षा भावनाओं की उत्कृष्टता एवं निकृष्टता का प्रभाव कहीं अधिक पड़ता है। इसलिए अध्यात्म मार्ग में भावशुद्धि पर पूरा−पूरा ध्यान दिया जाता है। नीयत या ईमान जिसे कहते हैं, उसे ही धार्मिक-क्षेत्र में भावना कहा गया है। शरीर और मन के द्वारा किए गए पुण्य−पापों का मूल्यांकन मनुष्य की नीयत या भावना के आधार पर ही होता है। कई कार्य बाहर से पाप सरीखे दीखने पर भी उच्च भावना से प्रेरित होकर किए जाने के कारण वस्तुतः पुण्य फलदायक होते हैं, भले ही उसे लोगों की दृष्टि में पाप या अपराध माना जाए। इसी प्रकार बाहर से पुण्य दीखने वाले कार्यों में भी यदि कर्त्ता की दुरभिसंधि छिपी हुई है। लोक-दिखावे या बगुलाभक्ति के लिए अपने पापों पर परदा डालने या प्रशंसा प्राप्त करके लोगों का अधिक शोषण करने की दृष्टि से कोई धर्म-कर्म जैसा ढोंग रचा है तो वह आध्यात्मिक दृष्टि से पाप ही माना जाएगा, फिर चाहे लोग उस कार्य की कितनी ही प्रशंसा क्यों न किया करें।
भावना का वर्चस्व
भगवान, भावना के वश में रहते हैं। भक्ति, भावना का ही एक रूप है। प्रेम का निवास भी भावना-क्षेत्र में ही होता है और उस प्रेम को ही इस संसार में परमात्मा का प्रत्यक्ष स्वरूप मानते हैं। भावनापूर्वक चढ़ाया हुआ तुलसीपत्र भगवान को भावरहित छप्पन व्यंजनों से अधिक प्रिय होता है। श्रद्धा और विश्वास को अध्यात्म जगत का सूर्य, चंद्र कहते हैं। कोई विधि−विधान न जानते हुए भी साधक श्रद्धा और विश्वास के आधार पर लक्ष्य प्राप्त कर लेता है, इसके विपरीत विधि−विधानों में पूर्ण निष्ठगत व्यक्ति भी भावनारहित साधना करे तो उसे लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती। मन और शरीर की भाँति भावनाओं की शुद्धि करने की भी आवश्यकता होती है। विज्ञानमयकोश के परिमार्जन में इसी प्रकार का कार्यक्रम अपनाना पड़ता है।
कृतघ्नता का अभिशाप
गत वर्ष कृतघ्नता पिशाचिनी को बहिष्कृत करके अपने भावना-क्षेत्र में कृतज्ञता को स्थान देने का कार्यक्रम विज्ञानमयकोश की शुद्धि के लिए बताया गया था और कहा गया था कि, ‟आत्मिक प्रगति के पथ पर कृतघ्नता एक बहुत बड़ी चट्टान है।'' पति−पत्नी में, सास−बहू में, पिता−पुत्र में, भाई−भाई में, मित्र−मित्र में, स्वामी-सेवक में जो संघर्ष देखा जाता है, उसके मूल में कृतघ्नता की वृत्ति ही प्रधान रूप से काम कर रही होती है। एकदूसरे के अगणित उपकारों को भूल जाते हैं और किसी तुच्छ-सी बुराई को याद रखकर उसे ही महत्त्व देते रहते हैं। फलस्वरूप इन पुण्य संबंधों में शत्रुता और दुर्भावना का विष पनपने लगता है। यदि सोचने का तरीका सज्जनतापूर्ण है और एकदूसरे के उपकारों को ही महत्त्व दें, छोटी−मोटी भूलों या बुराइयों को मानवीय दुर्बलता की एक छोटी-सी घटना समझकर उसकी उपेक्षा करें तो सभी में प्रेम संबंध अटूट रह सकते हैं। दोषदृष्टि की प्रधानता से हमें अपने चारों ओर शत्रु और दुष्ट ही भरे दिखाई पड़ते थे, वे कृतज्ञता की उपकार-बुद्धि जागृत होने पर मित्र और स्वजन-स्नेही प्रतीत होने लगते हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य दूसरों का ऋणी है। इसलिए उसे सबके प्रति कृतज्ञता की भावनाएँ धारण किए रहना चाहिए। दूसरों के उपकारों को स्मरण रखना सज्जनता का प्रथम चिह्न है।
कृतज्ञता के प्रतीक चिह्न
कृतज्ञता को व्यावहारिक रूप में लाने के लिए गत वर्ष यह कार्यक्रम बताए गए थे—(1) पिता, चाचा, ताऊ, बाबा, माता, चाची, दादी, बुआ, बड़े भाई, भावज आदि अपने से जो बड़े हों, उनके नित्य चरणस्पर्श करने चाहिए। (2) स्त्रियाँ अपने पति, सास-ससुर, जेठ-जिठानी, बड़ी ननद आदि के नित्य चरणस्पर्श करें। (3) रात को जब सोएँ तो दिन भर में जिन−जिन की सहायता से हमें जीवनयापन में लाभ अथवा सुविधा प्राप्त हुई, उन सबके प्रति उपकार मानना चाहिए, कृतज्ञ होना चाहिए और मन-ही-मन अभिनंदन करना चाहिए। (4) प्रातःकाल जब सोकर उठें तो जीवन में जिन व्यक्तियों का स्नेह-सहयोग प्राप्त हुआ हो तो उन ज्ञात और अज्ञात प्राणियों का कृतज्ञतापूर्वक स्मरण करें और उनकी जीवित या स्वर्गीय आत्माओं को अभिनंदन करें। वंदना के बाद ही चारपाई से नीचे पैर रखें।
अब इस वर्ष हमें दूसरे ऐसे ही एक महान गुण को हृदयंगम करना है। वह है—'निरहंकारिता।' अहंकारी मनुष्य एक प्रकार से उन्मत्त हो जाता है। दूसरों से अपने को श्रेष्ठ समझता है और अन्यों के प्रति तुच्छता एवं घृणा के भाव रखता है। अहंकार एक प्रकार से घट−घटवासी भगवान से ही घृणा करने के समान है। परमात्मा सदुर्गुण से जितना अप्रसन्न होता है, उतना और किसी से नहीं। भगवान को ‘गर्वहारी’ भी कहा गया है। वे किसी का घमंड सहन नहीं करते, उसे चूर−चूर करने के लिए कोई-न-कोई व्यवस्था करते ही रहते हैं। असुरों के नाश का कारण उनका अहंकार ही था। समता और एकता में सबसे बड़ी बाधा अहंकार ही उत्पन्न करता है। शोषण, गुंडागर्दी, अनीति और अत्याचारों के पीछे अहंकार ही अट्टहास कर रहा होता है।
अहंकार की असुरता
ढोंग, बनावट, शेखीखोरी, फैशन, फिजूलखरची, अपव्यय, नशा, व्यसन आदि अनेकों बुराइयाँ अहंकार से ही पैदा होती हैं। उच्छृंखलता, उद्दंडता, अशिष्टता, कटु भाषण, दुर्व्यवहार आदि दुर्गुण का मूल कारण अभिमान ही है। लड़ाई-झगड़ों में द्वेष और मनोमालिन्य में वास्तविक कारण तो बहुत थोड़े और छोटे होते हैं, पर प्रधानतया अहंकार की ही समस्या नग्न−नृत्य कर रही होती है। नर को नारी से, सवर्णों को अछूतों से, धनी को निर्धन से श्रेष्ठ माने जाने की मान्यता के पीछे अहंकार व अति के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है। जिस प्रकार जान या अनजान में जरा-सा आघात लगने पर सर्प दूसरों की जान का ग्राहक बन जाता है, उसी प्रकार अहंकारी व्यक्ति भी दूसरों के राई जैसे भी दोष के परिणामस्वरूप वज्र-प्रहार जैसा प्रतिशोध लेने पर उतारू हो जाता है। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए नीतिकारों ने— पापमूल अभिमान कहा है। क्रूरता, नृशंसता और पैशाचिकता से भरे भयंकर दुष्कर्मों में अन्य कारण उतने नहीं होते, जितना अहंकार प्रबल होता है।
द्वैत से अद्वैत की ओर
आत्मा को भव बंधनों में बाँधने वाला अहंकार ही है। जिसका ‘अहम्’ जितना प्रबल है, वह उससे उतना ही दूर रहेगा। 'अपनी खुदी मिटा दे, तेरा खुदा मिलेगा' की उक्ति में यही कहा गया है कि अपनापन समाप्त कर देने से ही आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति होती है। पति-पत्नी जब अपने स्वतंत्र अस्तित्त्व को एक साथ घुलाकर सम्मिलित स्वार्थ और सम्मिलित अहम् का निर्माण करते हैं, तभी उन्हें दांपत्ति जीवन का सच्चा आनंद उपलब्ध होता है। लहर जब तक अपनी अलग सत्ता बनाए रहेगी, वह समुद्र का अंग न बन सकेगी। आत्मसमर्पण में अहंकार को ही समर्पित किया जाता है। भक्त जब भगवान को आत्मसमर्पण करता है तो और कुछ नहीं केवल अहंकार प्रभु के चरणों पर समर्पित करके उनकी इच्छा में अपनी इच्छा मिला देता है। अद्वैत की—वेदांत की— शिक्षा द्वैतभाव को मिटाकर आत्मा और परमात्मा की एकता अनुभव करने की है। इसमें एकमात्र साधन अहंकार को मिटाने का ही करना पड़ता है। भवबंधनों को काटकर जीवनमुक्त होने की प्रक्रिया में भी अहम् की समाप्ति का ही साधन प्रमुख है।
आध्यात्मिक सद्गुणों में नम्रता, मधुरता, सज्जनता, शिष्टाचार, सेवा, सहानुभूति, उदारता, क्षमा, दया आदि को प्रमुख माना गया है। उनका उदय केवल उसी मनोभूमि में संभव होगा, जहाँ निरहंकारिता होगी। स्वार्थपरता अहंकार की पूर्ति के लिए ही तो होती है। इसके मिटने पर मनुष्य का दृष्टिकोण अत्यंत उदार, विशाल और परमार्थपूर्ण बन जाता है। सादगी और सज्जनता उसकी प्रत्येक क्रिया में से टपकती है। सामाजिक जीवन में शांति और सद्भावनाएँ इसी सद्गुण के आधार पर बढ़ती हैं। संतोष और सौम्यता की प्रकृति भी निरहंकारिता के वातावरण में ही बढ़ती हैं। अहंकारी तो दिन−दिन अधिकाधिक स्वार्थी बनता जाता है। उसे अपनी महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए दूसरों को कुचल−मसलकर रख देने में जरा भी संकोच नहीं होता। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए शास्त्रकारों ने अहंकार को असुरता बताया है और कहा है कि जहाँ यह दुर्गुण होगा, वहाँ धीरे−धीरे अन्य छोटे−मोटे, पाप-दोष स्वयं ही एकत्रित होने लगेंगे।
सस्ती वाहवाही—एक प्रवंचना
वाहवाही लूटने के लिए किए गए कार्य, धर्म-श्रेणी में नहीं गिने जाते। फोटो और नाम छपाने के लिए जो लोग दान देते हैं, अपने नाम के पत्थर और शिलालेख लगवाते फिरते है, उन्हें पुण्य कुछ नहीं मिलता। जो कुछ किया था, वह वाहवाही मिलने पर बराबर हो जाता है। इसलिए विचारशील लोग सदा गुप्तदान करते हैं। किसी के ऊपर उपकार किया हो तो प्रकट नहीं होने देते। प्रशंसा करा लेने से अहंकार बढ़ता है। संस्थाओं में पदलोलुपता के कारण संघर्ष इसीलिए रहता है जिससे कि पदाधिकारी को दूसरों की अपेक्षा कुछ अधिक नामवरी कमाने का लोभ रहता है। इस छोटे से कारण को लेकर लोग बुरी तरह लड़ते हैं और इसके संघर्ष में संगठन एवं लक्ष्य का ही सत्यानाश हो जाता है। सज्जन सेवा तो खूब करते है, पर पदलोलुपता से सदा ही बचते रहते हैं। जो अहंकार में डूबा हुआ है, प्रशंसा और प्रतिष्ठा का भूखा है, वह व्यक्ति सच्ची सेवा कर नहीं सकेगा और उसका कोई पुण्य उच्च श्रेणी का नहीं गिना जा सकेगा।
दूसरों का सम्मान-अभिवादन
विज्ञानमयकोश का अनावरण करने के लिए हमें इस वर्ष निरहंकारिता का अभ्यास करना चाहिए। भगवान ने हर किसी में कोई-न-कोई विशेषता दी है, उसकी उस महत्ता को देखते हुए। सम्मान की दृष्टि से देखना चाहिए। सबमें परमात्मा का अंश मौजूद है, इसलिए जिस प्रकार हर देवमंदिर को हम श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं, उसी प्रकार—‟सिया राममय सब जग जानी। करो प्रणाम जोरि युग पानी॥” की भावना प्रत्येक व्यक्ति के प्रति रखनी चाहिए। अपनी प्रशंसा सुनने में बहुत रस नहीं लेना चाहिए। अन्यथा इस कमजोरी से लाभ उठाकर चापलूस और ठग हमें बुरी तरह उल्लू बनावेंगे और ठगेंगे। चापलूसी और खुशामद का धंधा आजकल बहुत जोरों पर है। धंधेखोर लोग झूठी प्रशंसा करके अपने को परम हितैषी सिद्ध करते हैं और जब भोला शिकार फँस जाता है, तब उसे हलाल कर देते हैं। जब कोई आदमी अपनी बढ़−चढ़कर प्रशंसा कर रहा हो तो तुरंत ही सावधान होना चाहिए और देखना चाहिए कि कहीं कुछ दाल में काला तो नहीं है। लोग सस्ती वाहवाही लूटने के लोभ को यदि त्याग सकें तो दुनिया में से आधी ठगबाजी का अंत हो सकता हैं।
हमें सत्कर्म करके आत्मसंतोष की आकांक्षा रखनी चाहिए और लोक-दिखावे की—वाहवाही की—बालबुद्धि को घटिया लोगों की ललक समझकर अपने को उससे ऊँचा उठाना चाहिए। प्रयत्न यह करना चाहिए कि अपना कोई कार्य ऐसा न हो, जिससे अहंकार की, बनावट की, शेखीखोरी की, प्रसिद्धि की गंध आवे। प्रतिष्ठा चाहने से नहीं मिलती, वह तो छाया के समान है, जो पीछे भागने से और दूर हटती जाती है। निरहंकारी व्यक्तियों के प्रति दूसरों के मन में जो गहरी श्रद्धा उत्पन्न होती है, वस्तुतः वही चिरस्थायी और सच्ची प्रतिष्ठा कही जा सकती है। सत्कर्म करने वालों को वह अनायास ही मिलती है, उसके लिए उसके पीछे भागने की जरूरत नहीं पड़ती।
चापलूसी और ठगबाजी
किसी की झूठी प्रशंसा करके उसका अहंकार बढ़ा देने की गलती हमें नहीं करनी चाहिए। इससे उस बेचारे को व्यर्थ ही अपने संबंध में बड़प्पन का भ्रम होता है और अहंकार बढ़ने से नाश का द्वार खुलता है। राजा-रईसों का नाश उनके चापलूस मुसाहिब ही करते रहे हैं। हाँ-में-हाँ मिलाकर गलती को और अधिक बढ़ने देना शुभचिंतकों का काम नहीं है। सच्ची सलाह— नम्रता, सज्जनता, मधुरता और आत्मीयता की भावना से ओत-प्रोत होकर— एकांत में ठीक प्रकार समझाते हुए दी जाए तो वज्रमूर्खों को छोड़कर समझदार लोग उस पर ध्यान देते भी हैं और सुधरने का प्रयत्न भी करते हैं। ऐसे प्रसंगों में बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है, क्योंकि अपने अहंकार को जरा भी ठेस लगने से लोग आगबबूला होने लगते हैं और अपमान की गंध सूँघने लगते हैं, सो ऐसी सलाह देते समय भीगते बंदर द्वारा सीख देने वाली, बया पक्षी का घोंसला नोंच डालने वाली कथा का भी स्मरण रखना चाहिए। पर अपने हितैषी के लिए तो यह जोखिम भी उठाना चाहिए और अवसर देखकर उचित सलाह देनी चाहिए। चुप बैठे रहने से बुराई घटती नहीं बढ़ती ही रहती है। अपने को ही नहीं, अपने स्वजन-संबंधियों को भी निरहंकारी बनने की सलाह देते रहना चाहिए।
दूसरों को उचित मान देने में भी कंजूसी नहीं करनी चाहिए। इससे अपनी निरहंकारिता बढ़ती है। गुरुजनों का चरणस्पर्श करने की प्रक्रिया गत वर्ष कृतज्ञता का सद्गुण बढ़ाने के संदर्भ में दी गई थी। इस वर्ष हमें दूसरे लोगों को हाथ जोड़कर अपनी नम्रता दर्शाते हुए अभिवादन करने की आदत बढ़ानी चाहिए। आमतौर से लोग मिलने−जुलने का अवसर आने पर भी प्रायः बहुत कम ही एकदूसरे का अभिवादन करते हैं। कई तो ऐसा सोचते हैं कि इस संबंध में पहल करने वाला छोटा हो जाता है, सो हम क्यों छोटे बनें। कई बार प्रेम का अभाव, रूखापन और उदासी, उपेक्षा आदि कारण भी इसके होते हैं। यह सभी बातें बुरी हैं। हमें अपने सभी प्रेमी परिचितों का सम्मान करना चाहिए और यदि छोटे लोग अपना कर्त्तव्य भूल रहे हैं, वे पहले से हमें अभिवादन नहीं करते तो इसकी जरा भी परवाह न करके हमें अपनी सज्जनता का परिचय देते हुए पहले से ही अभिवादन करना चाहिए। सबमें ईश्वर है, सबमें कोई विशेषता है। किसी-न-किसी बात में हर कोई हमसे बड़ा है, फिर हमें उसके बड़प्पन का ध्यान, रखते हुए पहले से अभिवादन करने में संकोच क्यों होना चाहिए।
‘तू’ नहीं, ‘आप’
दूसरों को— छोटों को भी ‘तू’ संबोधन नहीं करना चाहिए। इसमें अपने अहंकार की गंध रहती है। पत्नी को, बच्चों को, अपने से छोटों को भी तुम या आप ही कहना चाहिए और आदेश के साथ सम्मान सूचक शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। 'तू वहाँ चला जा' कहने की अपेक्षा ‘तुम वहाँ चले जाओ’ या 'आप वहाँ चले जाइए।' कहने में जीभ न तो घिस जाती है और न घटती है, बोलने में कुछ भार भी नहीं पड़ता और देर भी नहीं लगती। केवल पुरानी आदत को सुधारना पड़ता है, सो प्रयत्न करने से थोड़ी भूल−चूक के बाद कुछ ही दिन में आसानी से सुधर भी जाता है। हमारे इस आत्मसुधार से दूसरों को उचित सम्मान मिलता हैं। उन्हें प्रसन्नता भी होती है। अपना कर्त्तव्य निभता है। अहंकार घटता है और एक उचित परंपरा का प्रसार होता है। गाली-गलौज और फूहड़-कटु शब्दों की गुंजाइश तो इन सभ्य संबोधनों का अभ्यास होने पर बहुत ही कम रह जाती है।
कहते हैं कि प्यार में ईश्वर को भी ‘तू’ कहते हैं तो अपने प्रियजनों को तू क्यों न कहें? यह प्रश्न निरर्थक है। ईश्वर महान है, उसे शब्दों की नहीं, भावना की परख होती है। पर हम मनुष्य तुच्छ होने के कारण शब्दों द्वारा भावना को परखते हैं, माना कि स्त्री या बच्चों को कोई ईश्वर जितना प्रिय या महान मान ले तो भी इसमें क्या हर्ज है कि उन्हें तू की अपेक्षा ‘तुम’ या ‘आप’ का संबोधन करें। इससे एक स्वस्थ परंपरा का जन्म होता है। हमें देखकर घर के दूसरे लोग भी एक सद्गुण सीखते हैं तो बुरी बात को हटा क्यों न दिया जाए। प्रियजनों से प्यार करने का ‘तू’ कहना ही एकमात्र आधार नहीं है। इस एक को छोड़कर और भी ऐसी अनेकों बातें, सेवाएँ ऐसी हो सकती हैं, जिनसे प्रगाढ़ प्रेम प्रकट किया जा सके। अपनी निरहंकारिता घटती हो, दूसरों को उचित मान मिलता हो और एक सभ्य परंपरा का जन्म होता हो तो हमें इसके लिए अपनी अब तक की ‘तू’ बोलने की आदत को सुधार ही लेना चाहिए। यदि इतने छोटे सुधार करने में भी हम संकोच करेंगे, झिझकेंगे तो आत्मनिर्माण, परिवार निर्माण, युग−निर्माण जैसे महान निर्माण कार्यों का उत्तरदायित्व किस प्रकार उठाया जा सकेगा?
एक सभ्य परंपरा का पुण्य-प्रसार
विज्ञानमयकोश की साधना के लिए इस वर्ष हम सब निरहंकारिता का अभ्यास करेंगे। अपने कार्यों में जहाँ−जहाँ अहंकार की गंध आती हो ,वहाँ से उसकी सफाई करेंगे। नम्रता, सज्जनता और सादगी अपने हर काम में बढ़नी चाहिए। दूसरों को—छोटों को भी—हाथ जोड़कर अभिवादन करने की आदत डालनी चाहिए और ‘तू’ का बहिष्कार करके ‘तुम’ या ‘आप’ का प्रयोग करने का प्रयत्न करते हुए, इसे धीरे−धीरे अपने स्वभाव में सम्मिलित कर लेना चाहिए। यह सुधार आध्यात्मिक दृष्टि से जितना श्रेष्ठ है, उतना ही सामाजिक दृष्टि से भी उपयोगी सिद्ध होगा। इसका प्रयोग अपने घर की प्रयोगशाला में आज से ही आरंभ कर देना चाहिए।
आनन्दमयकोश गायत्री माता के पाँच मुखों में से अंतिम मुख है। प्रेम, आत्मीयता और एकता में ही आनंद सन्निहित है। साधन-सामग्री की—धन-संपत्ति की उपलब्धि में कई लोग आनंद की अभिलाषा करते हैं, कई का अनुमान होता है कि वासनाओं एवं तृष्णाओं की पूर्ति का साधन जुट जाने से उन्हें आनंद प्राप्त होगा, पर यह कल्पनाएँ अंततः मिथ्या ही सिद्ध होती हैं। जिनके पास प्रचुर धन-ऐश्वर्य भरा पड़ा है, उन्हें भी खिन्न और असंतुष्ट देखा जाता है। वासनाएँ और तृष्णाएँ कभी तृप्त नहीं होती हैं। एक इच्छा पूर्ण होते−होते उससे अनेक गुनी तीव्र आकांक्षा जागृत हो उठती है और पहले जितना अभाव अनुभव होता था, अब नया अभाव उससे भी कई गुना असंतोष उत्पन्न किए रहता है। आग पर तेल डालने से जैसे वह बुझती नहीं, वरन और अधिक भड़क उठती है, उसी प्रकार भोगों की, वस्तुओं की मनमानी प्राप्ति हो जाने पर भी किसी को संतोष नहीं होता। सुख किसी पदार्थ में नहीं रहता, वह तो मन की एक वृत्ति है, जो संतोष के साथ जुड़ी रहती है। स्वल्प साधनों में भी संतुष्ट रह सकना संभव है। कठिनाइयों के बीच भी अनेकों को मुस्कुराते और धैर्यपूर्वक कर्त्तव्यपालन करते रहते देखा गया है।
आनंद की अनुभूति
इस संसार में आनंद की अनुभूति का एक ही स्थान है— ‛प्रेम’। जिस किसी वस्तु में, जिस किसी कार्य में, जिस किसी व्यक्ति में, जिस किसी विचार में हमें प्रेम हो जाता है, अपनापन अनुभव होने लगता है, उसी की समीपता आनंद का आस्वादन कराने लगती है। परायी वस्तुएँ चाहे कितनी ही उत्तम क्यों न हों, हमें प्रिय नहीं लगतीं, किंतु अपनी घटिया चीजें भी आनंद उल्लास देने लगती हैं। सच बात यह है कि हमें अपनी आत्मा ही प्रिय है। यह आत्मभाव जितने क्षेत्र में व्यापक और विस्तृत होता जाता है, उतना ही अपना आनंद भी व्यापक होने लगता है। यदि हम सारे संसार को, विश्व के समस्त प्राणियों को अपना मानें तो निश्चय ही यहाँ जो कुछ भी है, वह सब प्राणप्रिय लगने लगेगा। घृणा और तिरस्कार योग्य कोई वस्तु न लगेगी। जहाँ पाप और गंदगी भी हो, वहाँ उसे अपने लिए सफाई और सेवा का एक आवश्यक कर्त्तव्य जैसा अनुभव होगा। अस्पताल में मरीजों को भरा देखकर डाक्टर न तो घृणा करता है और न विचलित होता है, वरन अधिक करुणा से, अधिक कर्त्तव्यपरायणता से प्रेरित होकर अधिक तत्परतापूर्वक जुटता है। मरीजों की अधिक सेवा करने को वह अपना सौभाग्य और अधिक श्रेय प्राप्त करने का एक स्वर्ण सुयोग मानता है। इस संसार में भरी हुई गंदगी, और बुराई से कोई आध्यात्मिक व्यक्ति विचलित नहीं होता, वरन अधिक सेवा के लिए अधिक तत्परतापूर्वक सफाई करने को एक आवश्यक जिम्मेदारी समझकर उस ओर वह प्रेम और प्रसन्नतापूर्वक, तन्मयता और तत्परतापूर्वक कार्यसंलग्न हो जाता है। सेवा में भी रुचि उसे तभी आती है, जब उसे अपना कर्त्तव्य मानता है। आनंद तो अपनेपन में ही है।
मन लगने और न लगने का कारण
ईश्वर उपासना में मन केवल उसी का लगता है, जो परमात्मा को अपना सगा, स्वजन, संबंधी, अत्यंत घनिष्ठ आत्मीयजन मानता है। मीरा को अपने ‘गिरधर गोपाल’ तभी प्राण प्रिय लगते थे, जब वह उन्हें अपना सचमुच का विवाहित पति मानती थी। रामकृष्ण परमहंस माता के प्रेम में आनंदविभोर तभी हो पाते थे, जब वह उसे अपनी सगी जननी अनुभव करते थे। उन्हीं भक्तों ने भगवान को अपने निकट देखा और साक्षात्कार किया है, जिन्होंने अगाध प्रेम के साथ घनिष्ठ आत्मीयता के बंधनों में अपने इष्टदेव को आबद्ध किया है। अभी भी ऐसे अगणित ईश्वरभक्त हैं, जिनको अपने इष्टदेव पर अगाध श्रद्धा है और वे कठिनाइयों, असफलताओं और आपत्तियों में भी भगवान की अपार करुणा अनुभव करते हैं। वस्तुतः उन्हीं का प्रेम सच्चा है, जो प्रस्तुत सुख को ईश्वर की दया और आगत दुःख को दैवी कृपा मानते हैं। अपने से किसी को भला क्या शिकायत हो सकती है। अपना बच्चा गाली देता है तो भी उसकी तोतली बोली कोयल की तरह मीठी लगती है। माता की चपत खाकर भी कौन बालक उसकी गोदी का परित्याग करता है? सुख के लिए ईश्वर की स्तुति और दुःख के लिए भर्त्सना करने वाले खुदगरज लोग वस्तुतः प्रेमतत्त्व से अनभिज्ञ ही हैं।
एकात्मभाव की ध्यान-साधना
गत वर्ष ईश्वर के प्रति— गायत्री माता के प्रति—आत्मीयता, एकता, तन्मयता और अनन्यता उत्पन्न करने वाली एक ध्यान-साधना बताई गई थी। और कहा गया था कि, ‟गायत्री जप करते हुए अपने को एक वर्ष के बालक के रूप में निर्मल, निष्काम मानना चाहिए और गायत्री माता को अपनी सगी जननी मानकर उसके साथ क्रीड़ा-विनोद करने, पयपान एवं स्नेह पाने की ध्यान-धारणा करनी चाहिए, इस ध्यान के साथ जिन लोगों ने जप किया है, उनके आनंद में वृद्धि हुई है, मन लगा है और यह शिकायत दूर हो गई है कि चित्त नहीं लगता। मन प्रेम का गुलाम है। जो भी वस्तु प्यारी लगती है, मन भाग−भागकर वहीं जाता है। रूखे, नीरस, व्यर्थ और उपेक्षणीय समझे जाने वाले कार्यों में ही मन नहीं लगता। यदि गायत्री माता के प्रति सचमुच ही अपनी आत्मीयता एवं भक्तिभावना हो तो उनके चरण छोड़कर मन अन्यत्र जाना ही न चाहेगा। हमें ऐसे सहस्रों उपासकों की स्थिति का परिचय है, जो तन्मयतापूर्वक भावविभोर होते हैं और जिन्हें उस परम तत्त्व की समीपता अहिर्निश अनुभव होती रहती है। इसमें उनका श्रद्धा-विश्वास ही प्रधान कारण है।
ध्यान-धारणा का सीमाबंध
इस वर्ष इस प्रेम और आत्मीयता की, आनंदमयकोश का अनावरण करने वाली साधना का अगला पाठ हमें पढ़ना है। गत वर्ष माता और पुत्र के क्रीड़ा-विनोद के एक बड़े चौड़े दायरे में ध्यान करने की गुंजाइश थी। आगे−आगे इस दायरे को छोटा और सीमित करते चलना पड़ेगा। इस वर्ष सूर्यप्रकाश मध्य गायत्री माता के मुखमंडलमात्र का ध्यान करना पड़ेगा और उनके दाहिने नेत्र में जो ज्योतिबिंदु काला तिल है, उस पर अपना ध्यान एकाग्र करना होगा। आरंभ में कुछ दिनों यह तिल काला ही दिखाई देगा। पर पीछे धीरे−धीरे जैसे−जैसे एकाग्रता बढ़ती जाएगी, इसमें प्रकाश अनुभव होने लगेगा। कालापन घटकर सफेदी बढ़ेगी और कुछ दिन बाद मुखमंडल या काला तिल न दीखकर केवलमात्र प्रकाशपुंज ही दीखने लगेगा। प्रकाश ज्योति के रूप में—सविता के भर्गो रूप में जब ध्यान एकाग्र होने लगता है और पहले जैसी साकार मूर्त्ति की आवश्यकता अनुभव नहीं होती तो यह माना जाता है कि अब साधक निराकार साधना के उपयुक्त मनोभूमि उपलब्ध कर सका।
द्वैत से अद्वैत की ओर
प्रतिमा का स्थान ज्योति को प्राप्त हो जाए, ऐसी स्थिति आने में कुछ दिन लगते हैं। बहुत दिन तक सम्मिश्रित रूप चलता रहता है, कभी प्रतिमा, कभी ज्योति वह द्विधा स्थिति वैसी ही है, जैसी संध्याकाल में दिन और रात का अधूरा सम्मिलन होता है। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त्त में कुछ रात्रि का अंधकार शेष रहता है। कुछ दिन का प्रकाश आरंभ हो जाता है। साकार और निराकार का—प्रतिमा और प्रकाश का ऐसा ही ब्रह्ममुहूर्त्त जैसा सामंजस्य इस वर्ष पंचकोशी साधना के साधकों को अनुभव होगा। इससे अगले वर्ष विशुद्ध प्रकाश-ज्योति के दिव्य दर्शन के लाभ का सुअवसर सभी निष्ठावान् साधकों को प्राप्त होगा। जिनको इसमें कठिनाई होगी, उन्हें घृत-दीपक पर त्राटक करके आज्ञाचक्र में तृतीय नेत्रोन्मीलन वाली साधना का विधान बताकर दिव्य ज्योति के साक्षात्कार का मार्ग सरल कर दिया जाएगा। भ्रू-मध्य भाग में तीसरा दिव्य नेत्र रहता है। शंकर, दुर्गा आदि के चित्रों में भृकुटी स्थान पर एक तीसरा—तिरछा नेत्र बना हुआ देखा जाता है। यह हर मनुष्य के आज्ञाचक्र में भी प्रसुप्त पड़ा रहता है। यह जब ज्योतिर्मय हो जाता है तो सूक्ष्मजगत की महत्त्वपूर्ण संभावनाएँ एवं अदृश्य अनुभूतियाँ सहज ही परिलक्षित होने लगती हैं। ऐसे व्यक्ति को देश, काल, पात्र आदि के आवरणों को वेधकर बहुत-सी उन अज्ञात बातों को जान लेना संभव होता है, जो साधारण मनुष्य को रहस्यमय एवं अलौकिक ही प्रतीत होती हैं।
ज्योतिर्मयी का दिव्य दर्शन
गायत्री माता के ज्योतिर्मय मुखमंडल का ध्यान करते हुए, उनके दाहिने नेत्र के काले तिल का ध्यान करना और उसमें से प्रकाश स्फुल्लिंग निकलते हुए अनुभव करने का ध्यान ऊपर बताया गया है। इस प्रकाश के प्रति वैसी ही श्रद्धा-भावना होनी चाहिए, जैसी किसी प्रत्यक्ष देवता के ज्योतिर्मय शरीर में प्रकट होने के समय भक्त के मन में हो सकती है। यदि श्रद्धा में न्यूनता रही तो केवल रोशनीमात्र दिखेगी और उस दिव्य दर्शन के समय जो आह्लाद अंतःकरण में उठना चाहिए, वह न उठेगा। अनुभव करना चाहिए कि ज्योतिर्मय होकर प्रकाश स्फुल्लिंगों के रूप में माता ही अपने सामने प्रस्तुत हो रही हैं और हम श्रद्धापूर्वक उस दिव्य दर्शन का परम संतोष, आनंद एवं उल्लास प्राप्त कर रहे हैं।
इस प्रकाश को अपने भीतर प्रवेश करते हुआ और अपनी आत्मा को इस ‘तेजस्’ में तादात्म्य होता हुआ अनुभव करना चाहिए। जिस प्रकार लोहा अग्नि में पड़कर लाल हो जाता है, उसी प्रकार हमें भावना करनी चाहिए कि माता ज्योतिर्मयी के साथ हमारा तादात्म्य हो रहा है। उनका हममें और हमारा उनमें तादात्म्यभाव— एकीकरण हो रहा है। हम दो न रहकर एक हो रहे हैं। द्वैत मिट रहा है और अद्वैत की सिद्धि की ओर प्रगति हो रही है। अणु से विभु के रूप में—नर से नारायण रूप में—पुरुष से पुरुषोत्तम रूप में परिणत होने के लिए इस प्रकाश-ज्योति की भट्टी में पड़े हुए स्वर्ण की तरह हम अपने आपको निर्मल बना रहे हैं।
क्रिया के स्थान पर भावना की वृद्धि
यह ध्यान आनंदमयकोश की साधना के लिए प्रातःकाल किया जाना चाहिए। जप के साथ यह ध्यान चलता रह सकता है। माला लेकर इस ध्यान को करने में कठिनाई पड़ती हो तो नित्य-नियम की एक माला फेरने के बाद मानसिक जप और ध्यान का कार्यक्रम बना लेना चाहिए। यह पहले ही बताया जा चुका है कि इस उच्चस्तरीय साधनाक्रम में शारीरिक क्रियाएँ घटती जाती हैं और मानसिक धारणा-ध्यान का क्रम बढ़ता जाता है। पंचकोशों की साधना करते हुए इस वर्ष तो नहीं, पर अगले वर्षों में एक माला नियमित गायत्री जप और नवरात्रियों के दो लघु अनुष्ठान, इतना ही कार्यक्रम शेष रह जाता है, बाकी तो सब कुछ धारणा और ध्यान क्षेत्र में ही श्रम करना पड़ता है।
दृष्टिकोण का परिमार्जन
प्रेम और आत्मीयता की भावना से हर किसी को देखना, सबमें इस ज्योतिर्मयी की आभा निहारना और सबके प्रति श्रद्धा-सम्मान के भाव रखना, यह प्रयोग निरन्तर करते रहना चाहिए। जिस वस्तु को भी, जिस व्यक्ति को भी, जिस प्राणी को भी देखें, उसे प्रेम और ममता की भावना से देखें। उसमें गुण ढूंढें और प्रभु की पुनीत रचना अनुभव करते हुए उसके सान्निध्य का आनंद लाभ करें। बुराइयों को मिटाना और घटाना आवश्यक है। पाप के विरुद्ध संघर्ष करना ही कर्त्तव्य है। पर यह संघर्ष करते हुए भी पापी या कुमार्गगामी को केवल भूला−भटका अज्ञानी बालक ही मानना चाहिए। हमें पाप से घृणा करनी चाहिए, पापी से नहीं। रोग को नष्ट करना चाहिए, रोगी को नहीं। इस संसार में न कोई पूर्णतया पापी है और न पूर्ण पुण्यात्मा। सबमें न्यूनाधिक मात्रा से गुण-दोष मौजूद हैं। सभी में सीखने योग्य और प्रसन्न होने योग्य बहुत कुछ मौजूद है और सभी को किसी-न-किसी रूप में सुधार करने की आवश्यकता है। ऐसी दशा में सुधार के आवश्यक प्रयत्न करते हुए भी हमें तीव्र घृणा से बचना चाहिए। सुधार की पुण्य-प्रक्रिया घृणा से नहीं, प्रेम से ही संभव हो सकती है। प्रेम और आत्मीयता का दृष्टिकोण दिन−दिन अधिक व्यापक बनाते हुए हमें आनंदमयकोश की साधना को सफल बनाना चाहिए।
घर में तपोवन
गृहस्थ में रहते हुए विरक्त योगी की तरह रह सकना हर किसी के लिए संभव हो सकता है। कर्त्तव्य-कर्मों को एक साधना-पद्धति का अंग मानते हुए धर्म और नीति का मार्ग पकड़े रहने वाले कर्मयोगी के लिए घर ही तपोवन की तरह शांतिमय हो सकता है। ओछे दृष्टिकोण के कारण मन में जो कुविचार उठते हैं और शरीर से दुष्कर्म बनते हैं, उन्हीं के कारण जीव भवबंधनों में बँधता है। यदि अपनी भावनाएँ अध्यात्म दृष्टिकोण से ओत−प्रोत रखते हुए गृहस्थ जीवन का सुलझे हुए दृष्टिकोण से संचालन किया जाए तो हम जीवनमुक्ति की स्थिति में रह सकते हैं और इस धरती पर ही निवास करते हुए स्वर्गीय सुख−शांति का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं। इसी स्थिति तक साधक का पहुँचना पंचकोशी, पंचमुखी गायत्री साधना का उद्देश्य है। हमें इस मार्ग पर चलने का साहस प्राप्त हो, यही सर्वशक्तिमान सत्ता से प्रार्थना है।
गत आठ महीनों से गायत्री तपोभूमि में प्राकृतिक चिकित्सा एवं कल्प-विधान का जो कार्यक्रम चल रहा था, उससे करीब 200 व्यक्ति लाभ उठा चुके हैं। इस बीच में जो अनुभव हुए हैं, उनसे कल्प-चिकित्सा की एक अधिक प्रभावशाली और सफल प्रणाली 'चांद्रायण व्रत' की सिद्ध हुई है। दूधकल्प, छाछकल्प आदि के द्वारा रोगियों को जितना समय और पैसा खरच करना पड़ता है, उसकी तुलना में ‛चांद्रायण व्रत’ में समय भी कम लगता है, खरच भी कम पड़ता है और लाभ भी अधिक होता है। इस अनुभव के आधार पर अब यहाँ चिकित्सा-प्रक्रिया में कुछ विशेष हेर-फेर किया जा रहा है। उसे शारीरिक लाभ वाली ही न रहने देकर आध्यात्मिक लाभों से संयुक्त भी बना दिया गया है।
चांद्रायण व्रत
धर्मग्रंथों में पापों का प्रायश्चित्त करने के लिए 'चांद्रायण व्रत' का भारी महात्म्य वर्णन किया गया है और लिखा है कि, "इससे आत्मा पर चढ़े हुए मल धुलते हैं एवं अन्तःकरण निर्मल होता है" इस व्रत का विधान यह है कि पूर्णमासी के दिन मनुष्य अपना पूर्ण आहार करता है और जितना आहार होता है, उसका पंद्रहवाँ भाग प्रतिदिन कम करता जाता है। यह कमी करते−करते अंत में अमावस्या के दिन पूर्ण निराहार रहना होता है। प्रतिपदा को भी निराहार ही रहते हैं और दौज को पूर्णाहार का पंद्रहवाँ भाग लेकर फिर उतना−उतना ही रोज बढ़ाते हैं। जैसे पहले कृष्णपक्ष में प्रतिदिन क्रमशः आहार घटाया गया था, उसी प्रकार अगले शुल्कपक्ष में क्रमशः आहार बढ़ाते हुए पूर्णिमा को पूरा भोजन ले लेते हैं। आहार में क्या वस्तु रहें, यह व्रत करने वाले की स्थिति देखकर निर्णय किया जाता है।
चंद्रमा जिस प्रकार पूर्णमासी को पूरा निकलता है, फिर कृष्णपक्ष में एक−एक कला घटता हुआ अमावस्या को पूर्ण अदृश्य हो जाता है। उसी क्रम से व्रत करने वाले का भोजन भी घटता है। शुक्लपक्ष में चंद्रमा जिस प्रकार एक−एक कला बढ़ता है, उसी प्रकार आहार का क्रम भी बढ़ाया जाता है। चंद्रमा पर उस व्रत का आधार रहने से इसे ‘चांद्रायण व्रत’ कहा जाता है और ठंडी किरणों की भाँति ही उसे शांतिदायक माना जाता है। व्रत के शास्त्रीय-विधान में गोबर और गोमूत्र को शरीर पर लेपकर स्नान करना, पंचगव्य, गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत आदि पाँच पदार्थों का सेवन तथा ब्रह्मचर्य, मौन,आदि कितनी ही तपश्चर्याओं का सम्मिश्रण है। साथ ही जप, अनुष्ठान का विधान भी है।
चिकित्सा और प्रायश्चित्त
अपनी चिकित्सा-प्रणाली में अब चांद्रायण व्रत को प्रमुख आधार मान लिया गया है। अभी आमतौर से उदर रोगी ही यहाँ आते हैं, उनकी चिकित्सा इसी विधि से की जाएगी। पंचतत्त्वों के विधान में एनीमा द्वारा पुराने संग्रहित मल की सफाई, मिट्टी की पट्टी द्वारा संचित विषों का निष्कासन, कटिस्नान (टब बाथ) द्वारा रक्ताभिसरण, सूर्यस्नान द्वारा सूक्ष्म विद्युत-प्रवाह का स्नायु तंतुओं में संचार, वाष्पस्नान द्वारा दूषित तत्त्वों का स्वेद द्वारा निष्कासन, आदि का जो विधान है, उसका तो चिकित्सार्थी को समुचित प्रयोग कराया ही जाता रहेगा। साथ ही पापों के प्रायश्चित्त वाला विधान भी रहेगा। इससे शरीर और अंतःकरण दोनों को ही शुद्ध करने का प्रयत्न किया जाता रहेगा। अन्य अनेक दुःखों की भाँति रोग भी हमारे किन्हीं पापों के ही फल होते हैं। आत्मा की शुद्धि और पापों का प्रायश्चित्त करते हुए जो शारीरिक चिकित्सा का क्रम चलेगा, वह अवश्य ही दुहरा लाभ पहुँचावेगा।
एक मास की तपश्चर्या
इस एक मास में सवालक्ष गायत्री अनुष्ठान बड़े आनंदपूर्वक पूर्ण हो जाता है। मौन, ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, चमड़े का त्याग, अपनी सेवा आप करना आदि तपश्चर्याएँ भी जो घर में चलनी कठिन पड़ती हैं, यहाँ आसानी से निभ जाती हैं। नित्यप्रति हवन में सम्मिलित होने का लाभ तो यहाँ सहज ही उपलब्ध है, तपोभूमि के निकट की जो जमीन अब उपलब्ध हो गई है, उसमें सुगंधित पुष्पों, लता, गुल्मों, तुलसी पल्लवों और जड़ी−बूटियों के पौधों से आच्छादित एक सुरम्य तपोवन बनाया जा रहा है, उसमें दिन भर रहने से वन-काननों जैसा मन को शान्ति देने वाला वातावरण भी उपलब्ध होगा। ऐसे वातावरण में एक मास की तपश्चर्यायुक्त साधना वस्तुतः आध्यात्मिक चिकित्सा है, उसका प्रधान लाभ तो आत्मा को ही मिलने वाला है। शारीरिक चिकित्सा का लाभ तो एक गौण लाभ रह जाता है।
शरीर के लिए जिस प्रकार चिकित्साक्रम बनाया जाता है, उसी प्रकार इस जन्म में बन पड़े पापों का स्वरूप जानकर इसी प्रकार आधार पर उनका विशेष प्रायश्चित्त भी यदि आवश्यक होता है तो इस चांद्रायण व्रत के साथ जोड़ दिया जाता है। पूर्वजन्मों के पाप, जो प्रारब्ध बन चुके हैं और जिनका इस जन्म में भोगना अनिवार्य हो गया है, उसके बारे में कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, पर इस जन्म के पाप, जो अभी प्रारब्ध संस्कारों के रूप में परिपक्व नहीं हुए हैं, वे प्रायश्चितों के द्वारा समाप्त हो जाते हैं। मुकदमा चलने पर जेल की सजा हो जाए, तब तो माफी माँगने पर भी छूटना मुश्किल है, पर फैसला होने से पहले यदि अपने प्रतिपक्षी को संतोष देने वाला कोई समझौता हो जाए तो जेल जाने की नौबत नहीं आती। इस जन्म के अशुभ कर्मों में से बहुत थोड़ों का फल इसी जन्म में हो पाता है। उनमें से अधिकांश का दंड आमतौर से अगले जन्म में मिलता है। उन्हें यदि अभी समाप्त कर लिया जाए और शेष जीवन में दुष्कर्म न किए जाएँ तो आगे का परलोक शांति और सद्गति से परिपूर्ण हो सकता है। अपना दूरवर्त्ती भविष्य उज्ज्वल बनाने की दृष्टि से भी यह व्रत-चिकित्सा एक दुहरा लाभ देने वाली पद्धति सिद्ध होगी।
संजीवन विद्या का शिक्षण
तीसरा एक लाभ यह भी है कि इस एक महीने में यहाँ विधिवत् शिक्षणक्रम का लाभ मिलेगा। युगनिर्माण योजना के अनुरूप स्वजनों का जीवन ढालने के लिए हमें उनसे बहुत कुछ कहना है। जीवन अनेक दिशाओं में फैला हुआ है, उसकी प्रत्येक दिशा में अगणित गुत्थियाँ और समस्याएँ सामने रहती हैं। यदि यह हल नहीं हो पातीं तो जीवन नरक बन जाता है। चिंता, भय, शोक, निराशा, खिन्नता और व्यथा को सहन करते हुए जिंदगी के दिन काटने पड़ते हैं। सुलझे हुए दृष्टिकोण को अपनाकर मनुष्य स्वल्प साधनों और विपन्न परिस्थितियों में भी हँसने, संतुष्ट रहने एवं प्रगति की ओर चलने का मार्ग प्राप्त कर सकता है। जिंदगी जीने की विद्या का नाम ही ‘संजीवन विद्या’ है। इसी की जानकारी न होने से अधिकांश लोग दुख-दारिद्रय में डूबे पड़े रहते हैं। इस एक मास के शिक्षणक्रम का मूल आधार ‘संजीवन विद्या’ (जिंदगी जीने की कला) ही होगा। इसे ही व्यवहारिक आध्यात्मवाद भी कह सकते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा, कल्प−चिकित्सा तो इस संजीवन विद्या का एक छोटा-सा अंग ही है, उसकी भी विधिवत् शिक्षा इस एक मास में मिलेगी, जिससे शिक्षार्थी अवसर आने पर अपने और अपने स्वजन-संबंधियों की प्राकृतिक चिकित्सा करके बिना किसी खरच के रोग−मुक्ति का लाभ दे सकें।
निरोगों के लिए अधिक उपयुक्त
इस चांद्रायण व्रत-साधन एवं संजीवन विद्या शिक्षण से लाभ उठाने के लिए यह जरूरी नहीं कि कोई रोगी हो, तभी आवे। सच तो यह है, जो जितना निरोग होगा, वही उतना अधिक लाभ उठा सकेगा। शरीर चिकित्सा के झंझटों में ही न लगे रहकर उसे इस जीवन-शोधन एवं आत्मनिर्माण के कार्यक्रम में अधिक समय लगाने का अवसर मिले तो उसी अनुपात से लाभ भी अधिक होगा। अब तक भी यहाँ असाध्य छूत रोगों से ग्रसित अशक्त, दुर्बल, कराहने, खाँसने और थूकने वाले गंभीर रोगी नहीं लिए गए हैं, क्योंकि उनके उपयुक्त स्थान तथा साधन यहाँ नहीं हैं। आमतौर से कब्ज सरीखे पेट के या अन्य साधारण रोगों के रोगियों को ही यहाँ आने की स्वीकृति दी गई है। आगे भी उतनी ही सीमा तक रहना संभव हो सकेगा; क्योंकि अपना जीवन लक्ष्य सदा से सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि रहा है। ईसाई मिशनरी जिस प्रकार चिकित्सा के माध्यम से अपनी विचारधारा का प्रसार करते हैं, वही मंतव्य हमारा भी है; इसीलिए जो सुनने और समझने की स्थिति में हैं, वे ही रोगी यहाँ आने दिए जाते हैं। आगे भी यही क्रम चलेगा। जो लोग रोगी नहीं हैं, वे आरोग्य-रक्षा तथा दूसरों की स्वास्थ-सेवा कर सकने की शिक्षा प्राप्त करने आ सकते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा का एक विधिवत् पाठ्यक्रम भी एक महीने में संपन्न होता है और उसमें उत्तीर्ण होने वालों को प्रमाणपत्र भी दिया जाता है।
हमारी इच्छा है कि अपने परिवार में सभी व्यक्ति एक−एक करके इस शिक्षाक्रम का लाभ प्राप्त करने के लिए मथुरा आते रहें। स्वजनों के साथ रहने और रखने में अन्य लोगों की तरह हमें भी सुख मिलता है। हमारा अनुमान है कि हमारी ही भाँति स्वजनों को भी यह सुख मिलता होगा। अपनी मन की व्यथा और भावनाओं को हम जल्दी−पल्दी के कार्यक्रमों में कुछ ठीक तरह व्यक्त भी नहीं कर पाते। एक महीने हमारे समीप रहने वालों से हमें बहुत कुछ अपनी कहने और उनकी सुनने का अवकाश मिलेगा।
परिजनों को हमारा निमंत्रण
पहले रोगी आवेदनपत्र भेजते थे कि, ‟हम रोगी हैं, चिकित्सा के लिए तपोभूमि में आने की हमें स्वीकृति दी जाए।” अब हम निमंत्रण भेजते हैं कि, ‟प्रत्येक परिजन हमारे पास एक महीने रहकर साधना, तपश्चर्या, चिकित्सा, शिक्षा एवं आत्मिक एकता का लाभ प्राप्त करने के लिए मथुरा आवें।”
अंग्रेजी तारीखों से नहीं, भारतीय महीनों की पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा तक किसी भी महीने यहाँ रहने को आया जा सकता है। आने-जाने तथा तीर्थयात्रा एवं घूमने-फिरने में 10-5 दिन, और भी लग जाते हैं, इसलिए 40 दिन का अवकाश जब निकलता हो, तभी आना चाहिए। आने से पूर्व स्वीकृति लेना हर हालत में आवश्यक है, क्योंकि यहाँ स्थान कम और आगंतुकों की संख्या स्वभावतः अधिक रहेगी। एक साथ अधिक लोगों से विस्तारपूर्वक विचार-विनिमय नहीं हो सकता, इसलिए थोड़े−थोड़े लोगों को ही यहाँ आने देने की नीति अपनाई गई है।
अखण्ड ज्योति के पाठकों को हम सदा से अपना व्यक्तिगत विचार−परिवार मानते रहे हैं। हमारे शरीर को नमस्कार करने वाली भीड़ को हमने लाखों की संख्या में इधर से ऊपर घूमते-फिरते देखा है; पर जिन्हें हमारे विचारों के प्रति श्रद्धा हो, ऐसे व्यक्ति बहुत थोड़े हैं। भीड़ को हम कौतूहल की दृष्टि से देखते हैं, पर आत्मीय केवल उन्हें ही समझते हैं, जो हमारे विचारों का मूल्याँकन करते है, उन्हें प्रेम करते और अपनाते हैं। जो हमारी आत्मा की प्रेरणाओं को अपनाता है, वही हमारा सच्चा आत्मीय हो भी सकता है। ऐसे स्वजनों के प्रति ही हमारी भावनाएँ निरंतर उमड़ती रहती हैं। पशु और पक्षी भी अपने आत्मीयों को प्यार करते हैं, फिर हम तो मनुष्य हैं।
आत्मीयता के अटूट बंधन
अपने और परिजनों के बीच आत्मीयता के अटूट बंधन जो पिछले 23 वर्षों से दिन−दिन सुदृढ़ होते चले आए हैं, उसका प्रतिफल मनुष्य और मनुष्य के बीच दोस्ती होने की प्रसन्नता जितना ही सीमित नहीं रहना चाहिए। हमने सदा से यही प्रयत्न किया है कि लोगों की हमारे प्रति जो श्रद्धा है, उससे उत्पन्न प्रभाव का समुचित प्रतिफल उन्हें वापिस मिले। परिजनों पर जो अपना प्रभाव है, उसका उपयोग हमने केवल मात्र इसी एक कार्य में किया है कि उन्हें कल्याण-पथ पर चलने में प्रोत्साहन मिले। वे सद्विचारों और सत्कार्यों को अपनावें, सत्प्रवृत्तियों का अनुसरण करें और फलस्वरूप लोक और परलोक को सुख-शांति से परिपूर्ण बनाते हुए जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में तेजी से अग्रसर हों। गायत्री उपासना, यज्ञ आयोजन, कुरीतियों और दुष्प्रवृत्तियों का प्रतिरोध आंदोलन आदि अनेक कार्यक्रम हम समय−समय पर इसी दृष्टि से बनाते और उनमें स्वजनों को प्रवृत्त करते रहे हैं। जिन कार्यों में उनका हित-साधन ही हमने समझा और सोचा है, उन्हीं की प्रेरणा दी है। अभी हमें दस वर्ष कुछ विशेष कार्य करने का आदेश प्राप्त हुआ है। तदनुसार युगनिर्माण योजना का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम हाथ में लिया गया है। इस योजना में सम्मिलित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति का भारी हित-साधन होता हुआ हमें दीखता है।
सुख-शांतिमय जीवन
हम चाहते हैं कि हमारे प्रत्येक परिजन की प्रत्येक समस्या सुलझी हुई हो, उसे कोई चिंता न रहे, निराशा और असफलता का कभी मुँह न देखना पड़े, आरोग्य और दीर्घ जीवन प्राप्त हो, दांपत्ति जीवन में अहिर्निश प्रेम की वर्षा होती रहे, संतान सुयोग्य और सद्गुणी हो, आर्थिक कठिनाई का कभी सामना न करना पड़े, मित्रों और स्वजनों का परिपूर्ण प्रेम मिले, दिन−दिन, उन्नति होती रहे, लोक और परलोक में सर्वत्र सुख-शांति की परिस्थितियाँ उत्पन्न हों, मन में प्रसन्नता और संतोष की लहरें उठती रहें। इस धरती पर ही स्वर्ग बिखरा हुआ, दिखाई पड़े। स्वजनों के प्रति हमारी यह आकांक्षा कोई कल्पना, शुभकामना या आशीर्वादमात्र नहीं है; वरन यह एक तथ्य है, जिसे हर किसी के लिए प्राप्त कर लेना संभव है। हमारा निज का जीवन इस बात का साक्षी है कि अपने आपके बदल लेने पर बाहर के दृश्य भी बदले जाते हैं। स्वर्ग और नरक हमारे अपने भीतर छिपे बैठे हैं। उनमें से चाहे जिसे भी स्वेच्छापूर्वक अपने लिए प्रस्तुत किया जा सकता है। प्रत्येक आत्मविद्या के ज्ञाता का यही अनुभव है कि अपना दृष्टिकोण बदलते ही सारी दुनिया बदल जाती है। बाहर के सारे लोग सेवा में उपस्थित रहें और सारी विभूतियाँ चरणों में प्रस्तुत कर दें तो भी वासना और तृष्णा का बीमार, माया के सन्निपात ज्वर में ग्रस्त व्यक्ति संतुष्ट नहीं हो सकता, पर जिसने अपनी समस्याओं का, और इस जादूनगरी का सही रूप समझ लिया, उसके लिए हँसने, उल्लसित एवं संतुष्ट रहने के अतिरिक्त और कोई हड़बड़ी जैसी बात यहाँ नहीं है।
ध्रुवसत्य और सुनिश्चित तथ्य
हमारी यह मान्यताएँ सनातन सत्य और ध्रुवतथ्यों पर निर्भर हैं। हमने स्वयं इस सत्य का परीक्षण अपने जीवन पर किया है, और अक्षरशः खरा पाया है। जिन दूसरों ने भी ऐसा प्रयोग अपने ऊपर किया है उनका भी यही निष्कर्ष है। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को हम उसी सत्य का दर्शन और इसी तथ्य का अनुभव कराना चाहते हैं। इन्हें बदलना चाहते हैं, ताकि वे बदले हुए प्रतिफल का लाभ उठा सकें और यह देख सकें कि स्वर्ग यहीं मौजूद है और हम उसका पूरा−पूरा लाभ ले सकते हैं। अब आगे हम ऐसा ही प्रयत्न करने जा रहे हैं, उसी प्रक्रिया का नाम ‘युगनिर्माण योजना’ रखा है।
इसका लाभ सारे संसार को मिलने वाला है, पर आरंभ अखण्ड ज्योति परिवार से ही हो रहा है। जिनके साथ हम आत्मश्रद्धा और प्रेम के बंधनों से मजबूती के साथ जुड़े हुए हैं, उन्हीं से तो अपने को बदलने का अनुरोध कर सकते हैं। जिनसे हमारा कोई परिचय नहीं, जिन पर हमारा कोई प्रभाव नहीं, वे क्यों हमारी बातें सुनेंगे और सुन भी लें तो क्यों मानेंगे; इसलिए 'घर बाँधकर तब बाहर बाँधने' वाली कहावत के अनुसार युग−निर्माण का कार्य अपने घर से, अपने स्वजनों से आरंभ कर रहे हैं और इसलिए इसका नाम 'अखण्ड ज्योति' परिवार की युगनिर्माण योजना रखा है। आरंभ यहाँ से होकर इसका विस्तार तो सारे देश में, सारे समाज में, सारे विश्व में होना है।
संघशक्ति की आवश्यकता
युगनिर्माण योजना की आरंभिक एक मोटी रूपरेखा 'सितंबर अंक' में प्रस्तुत की जा चुकी है। अपने पैर जितने आगे बढ़ेंगे, उसी अनुपात से अधिक महत्त्वपूर्ण एवं अधिक प्रभावोत्पादक उत्तरदायित्व भी कंधे पर उठाए जावेंगे। आरंभिक दस सूत्री कार्यक्रम ऐसा है, जिसे कोई व्यस्त और फुरसत न मिलने की बात कहने वाला व्यक्ति भी चलते-फिरते पूरा कर सकता है। इधर रुचि बढ़ाने पर अधिक समय और मनोयोग लगने लगेगा तो वे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक समस्याएँ सरलतापूर्वक हल होंगी, जो आज पहाड़ के समान भारी और समुद्र की तरह दुस्तर दिखती है। संघबद्ध आत्मबल का प्रचंड प्रभाव इतना बड़ा होता है कि उसकी तुलना में इंद्रवज्र भी छोटा पड़ता है। गांधी जी इसी अस्त्र को प्रबल और सार्थक बनाने में लगे हुए थे।
कहने की आवश्यकता नहीं कि इस युग की सबसे बड़ी शक्ति, संगठन है। इतिहास साक्षी है कि जब कभी युग-परिवर्तन जैसे महान और व्यापक कार्यों की योजना बनी है तो उसके लिए संघबल ही संपादित करना पड़ा है। लंकाविजय, गोवर्धन-धारण, बौद्धधर्म-प्रसार, सीता जन्म, दुर्गावतरण आदि की कथाएँ पाठकों को स्मरण हैं। वे जानते हैं कि संघशक्ति ही इस धरती का सबसे बड़ा चमत्कार है। बड़े कार्यों के लिए बड़ी शक्ति चाहिए और बड़ी शक्ति सदा से संगठन में सन्निहित रही है। युग-निर्माण जैसे महान कार्य के लिए भी संघशक्ति ही अपेक्षित है। इसलिए प्रारंभिक रूप से अखण्ड ज्योति परिवार को ही एक धर्मसंगठन का रूप दिया जा रहा है।
कथनी ही नहीं, करनी भी
प्रिय परिजनों को हम केवल सिखाते रहकर ही अपना जीवन व्यतीत नहीं कर देना चाहते, वरन यह भी चाहते है कि जो कहा गया है, सुनाया गया है, उसे समझा जाए और किया भी जाए। युगनिर्माण योजना केवल लेखों तक सीमित न रहने दी जाएगी, वरन अपने प्रत्येक परिजन पर हम दबाव डालेंगे की वे इस प्रक्रिया को कार्यांवित भी करें। ये कहना-सुनना सरल है,पर करना सदा ही कठिन होता है। इस कठिनाई को संघबद्ध होकर दूर किया जा सकता है। एकदूसरे की प्रेरणा से आगे बढ़ते हैं। देखा-देखी अनुकरण करना और जिधर बहुत चलें, उधर स्वयं भी चल पड़ना मानवीय प्रवृत्ति है। इसके कारण संघबद्ध आयोजन यदि सही आधार पर नियोजित किए गए हैं तो सदा बढ़ते, फैलते और सफल होते देखे जाते हैं।
अखण्ड ज्योति परिवार का संगठन इस आधार पर किया जा रहा है कि एक कर्मठ कार्यकर्त्ता जिसे शाखा-संयोजक कहा जाएगा, अपनी देख−रेख में लगभग 10 सदस्यों का उत्तरदायित्व संभाले और उन्हें युग-निर्माण की विचारधारा को कार्यान्वित कराने के लिए आवश्यक प्रकाश और प्रेरणा देता रहे। युगनिर्माण योजना का कोई शुल्क नहीं है, पर अखण्ड ज्योति का स्थायी ग्राहक होना अनिवार्य है। कर्मठ कार्यकर्त्ता सदा से अपने प्रयत्नों से 10-5 ग्राहक अखण्ड ज्योति के बनाते रहे हैं। उन्हें ही फिलहाल शाखा-संयोजक नियुक्त किया जा रहा है। जिनने प्रयत्न करके जिन्हें ग्राहक बनाया हो, वे उनसे मिल−जुलकर या पत्र व्यवहार द्वारा युग−निर्माण की विचारधारा को अपनाने और प्रस्तुत मार्ग पर चलने के लिए अनुरोध करते रहेंगे। अखण्ड ज्योति की प्रेरणा और शाखा-संयोजकों का व्यक्तिगत अनुरोध, दोनों के सम्मिलित प्रयत्न से सदस्यगण आलस्य छोड़कर निर्धारित मार्ग पर उत्साहपूर्वक अग्रसर होने लगेंगे, ऐसी आशा है।
शाखा-संयोजकों का कार्यक्षेत्र
शाखा-संयोजक का क्षेत्र किसी नगर विशेष तक सीमित न रहेगा, वरन जहाँ भी उसका प्रभाव हो, वहाँ अखण्ड ज्योति के सदस्य बनावेगा और उन्हें चंदा वसूल करके ही छोड़ न देगा, वरन आवश्यक पूछताछ और विचार-विनिमय करके तथा संभव हो तो विचार गोष्ठियों के द्वारा योजना को कार्यान्वित करने को प्रयत्नशील रहेगा। जिन नगरों में कई शाखा-संयोजक हैं, वे सब मिलकर अपने नगर का केंद्रीय संगठन बना लेंगे और अपने−अपने सदस्यों की सम्मिलित गोष्ठियाँ भी समय−समय पर किया करेंगे। अब विचार गोष्ठियों में यज्ञकार्य प्रतीक रूप रहेंगे। छोटा हवन कम खरच से हो सकता है। जहाँ वैसी व्यवस्था न बन पड़े, वहाँ घी का दीपक जलाकर घृताहुतियों का, धूपबत्ती जलाकर हवन सामग्री का और सामूहिक गायत्री पाठ से मंत्र बोलने का उद्देश्य पूरा हो सकता है। इस प्रकार यज्ञ की एक छोटी प्रतीक पूजा आसानी से हो सकती है। सत्संगों के आरंभ में गायत्री जप, हवन, भजन आदि के कार्यक्रम भी रहें, पर प्रधानता विचार-विनिमय को दी जाए। जहाँ अच्छे वक्ता न हों, वहाँ अखण्ड ज्योति के लेख पढ़कर सुनाए जा सकते हैं।
प्रत्येक सदस्य यह करे
सदस्यगण यह करेंगे कि उन्हें भी स्वयं शाखा-संयोजक का स्वतंत्र उत्तरदायित्व उठाने का प्रयत्न करना है। प्रत्येक सदस्य प्रयत्न करे तो अपने संबद्ध दस सदस्य बना सकता है और इस प्रकार यह शृंखला बढ़ती हुई लाखों-करोड़ों व्यक्तियों को अपने संगठन में संघबद्ध कर सकती है । संगठन जितना बड़ा रूप धारण करेगा, उतना ही सुधार एवं परिवर्तन कार्य भी गतिशील होगा।
सितंबर अंक में ‘परिचय और विवरण’ नामक फाॅर्म अंतिम पृष्ठ पर छपा है, उसे भरकर अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक को इसी मास मथुरा भेज देना चाहिए। उससे उनकी परिस्थितियों का पता चलेगा और उस पर ध्यान रखते हुए उन्हें आवश्यक परामर्श देते रह सकना संभव होगा। इस फाॅर्म को भेजने में कोई सदस्य शिथिलता एवं आलस्य न करें।
प्रेमोपहार एवं ज्ञानदान
इस वर्ष के सभी अंक अपने ढंग के अनोखे हैं, उनमें प्रस्तुत विचारधारा की सभी विचारशील लोगों ने एक स्वर से भूरि-भूरि प्रशंसा की है। अब अंतिम चार अंक और भी अधिक महत्त्व के हैं। सितंबर का युगनिर्माण अंक पाठक पढ़ चुके हैं । इसे योजना का घोषणा-पत्र ही कहना चाहिए। अक्टूबर अंक आपके हाथ में है। उच्चस्तरीय गायत्री उपासना की दृष्टि से यह पाठ्य−सामग्री बहुमूल्य है। नवंबर और दिसंबर के अंक मानव जीवन की प्रत्येक समस्या और गुत्थी पर प्रकाश डालने वाले और उनका हल प्रस्तुत करने वाले होंगे। इन्हें जीवन विद्या अंक कह सकते हैं।
प्रत्येक परिजन को यह प्रयत्न करना चाहिए कि अपने मित्रों, स्वजन-संबंधियों, प्रेमी और परिचितों तक इन अंकों को पहुँचाने की व्यवस्था करें। चार अंकों का चंदा (1) यदि दबाव देकर या आग्रह करके भी वसूल करना पड़े तो वैसा करना चाहिए। उदार सज्जन ऐसा भी कर सकते हैं कि अपने पास से 10-5 रु. खरच करके अपने कुछ मित्रों को उपहार में चार अंक भिजवा दें। यह एक उच्चकोटि का ब्रह्मदान या ज्ञान उपहार हो सकता है।
शाखा-संचालक बनने की दृष्टि से यह तात्कालिक प्रयत्न बहुत ही सरल है। नमूने के रूप में चार अंक भिजवाने के लिए अपने पास से एक−एक रुपया जमा कर दिया जाए। अपने उपहार की सूचना उन्हें दे दी जाए और यदि उन्हें यह अंक पसंद आ जाए तो जनवरी में ग्राहक बनने की शर्त उनसे कर लें।
अखण्ड ज्योति परिवार को हम संगठित करना चाहते हैं। उसे आत्मबल का एक प्रचंड शक्तिस्रोत बनाना चाहते हैं। प्रत्येक को इसमें उत्साहपूर्वक भाग लेना चाहिए और समुचित सहयोग करना चाहिए।
अपनी विचारधारा के अनुरूप पाठ्य-सामग्री लेकर निम्न पत्रिकाएँ निकल रही हैं। पाठक उनके नमूने माँगकर देखें और अपनी रुचि के अनुरूप इनके ग्राहक बनने का प्रयत्न करें।
1—‛युग−साधना’—संपादक श्री. शंभु सिंह जी कौशिक, साधनाश्रम, पो.बोरखेड़ा जि.कोटा। वार्षिक मूल्य 4 रु॰। 15 अगस्त से प्रकाशित होने लगा है।
2—ज्ञान−यज्ञ—संपादक श्री.गिरजा सहाय व्यास, युग−निर्माण प्रेस, गायत्री प्रचार केंद्र, दयाल बंद बिलासपुर। वार्षिक मूल्य 3)। 15 अगस्त से प्रकाशित होने लगा हैं।
3—‛युग−संस्कृति’—संपादक—श्री.चमनलाल गौतम, संस्कृति संस्थान, ख्वाजा कुतुब, बरेली। वार्षिक मूल्य 3) दीपावली से निकलने जा रहा है।
4—‛गायत्री विज्ञान’—(गुजराती भाषा) संपादक—प्रो.अवधूत, सोने वाला चाल पो.गोरेगाँव (बम्बई) वार्षिक मूल्य 5)। चार वर्ष से निकल रहा है।
5—‛ब्रह्मास्त्र’—संपादक श्री. कन्हैयालाल श्रीवास्तव एम.ए. एल. टी. पो. रिसिया जि.बहरायच। वार्षिक मूल्य 2)। एक वर्ष से निकल रहा है।
6—मारुत संजीवन—संपादक श्री. रामनारायण जी ‘हृदयस्थ’ मु. पो. नुनहड जि. गिर्द (ग्वालियर) वार्षिक मूल्य 2) 13 साल से निकल रहा है।
1—गायत्री महाविज्ञान (तीन भाग) मू. 10॥)
प्रथम भाग— इसमें गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, शंकाओं का समाधान, गायत्री उपासना से कष्ट निवारण, आत्मसाक्षात्कार और ऋद्धि−सिद्धि का मार्ग आदि अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों का प्रतिपादन किया गया है। मू.3॥)
द्वितीय भाग— इसमें मुख्यतया गायत्री की वाममार्गी तांत्रिक साधना के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि विधानों का वर्णन किया गया है। गायत्री संबंधी कई महत्त्वपूर्ण रचनाएँ भी प्राचीन शास्त्रों से दी गई हैं। मू.3॥)
तृतीय भाग— इसमें गायत्री द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों की साधना बतलाई गई है, जैसे जपयोग, प्राणयोग, शब्दयोग, कुण्डलिनी योग आदि। पंचकोशों को सिद्ध करने का मार्ग दिग्दर्शन भी किया गया है। मू. 3॥)
2−गायत्री यज्ञविधान (दो भाग) 4)
प्रथम भाग— इसमें गायत्री यज्ञ का विज्ञान, लाभ और महत्त्व शास्त्रीय दृष्टि से भली प्रकार समझाए गए हैं। मू. 2)
द्वितीय भाग— गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रीय विधि, क्रिया, जलयात्रा, मंडप प्रवेश, वेदीपूजन, अग्निपूजन, पूर्णाहुति आदि समस्त विधान बड़े स्पष्ट रूप से समझा दिया गया है। मू. 2)
3—गायत्री चित्रावली (दो भाग) 3॥)
प्रथम भाग— विविध प्रयोजनों के लिए ध्यान करने योग्य गायत्री माता के बढ़िया कागज पर छपे 24 तिरंगे चित्र व्याख्या सहित। 1॥)
द्वितीय भाग— गायत्री के 26 अक्षरों संबंधी 26 श्लोक, 26 लेख और 26 आर्ट पेपर पर छपे तिरंगे चित्र। 2)
4—गायत्री ज्ञान−मंदिर सैट की 44 पुस्तकें 11)
यह सैट एक प्रकार का छोटा घरेलू पुस्तकालय है। जिसमें गायत्री महाविद्या की महत्त्वपूर्ण साधनाएँ बतलाई गई हैं और गायत्री के एक−एक अक्षर में सन्निहित आध्यात्मिकता, धार्मिकता तथा मानवता की शिक्षाओं का वर्णन किया गया है। 6 रु.से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाकखरच माफ। 5) से कम की वी. पी. नहीं भेजी जाती।
पता—अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा।
जल उठे यदि दीप सुंदर साधना का, तो प्रकाशित पंथ होगा, दूर तम!
कालिमा उड़ जाएगी निःश्वास बन—
हृदय पावन हो उठेगा सौम्य अति!
भावना जब द्वेष की निःशेष हो—
कर उठेगी वरण सच्ची सरल मति!!
मान या अपमान में भी जो रहे—
एक−सा, सुस्थिर−विवेकी और सम!
स्वावलंबी−धीर और प्रशांत हो—
जो करेगा सरल उर से वरण श्रम!!
बढ़ चले यदि कामना निष्काम ले तो सफल, पा सिद्धि−होगा दूर भ्रम!
हेम जलता है स्वयं जब अग्नि में—
मलिनता खो, प्राप्त करता रूप शुभ!
और जलकर जब मिटा देता अहं—
तभी प्रिय से मिल मुदित होता शलभ!!
चीर रजनी का तमस बहु सिहरती—
भोर पाने के लिए अविराम वह!
मूक साधक−सी जलाती रूप निज—
ज्योति−लघु, निष्काम पर-हित सरल वह!!
प्राप्त करने से प्रथम, कुछ त्याग करने का सनातन से रहा क्रम!
कूल मिल जाए, अगर यह चाहते—
पार कर तूफान, दृढ़ विश्वास ले!
मत निराशा से व्यथित हो अमाँ में—
धीर रख पूनम हंसेगी, आश ले!!
फूल खिलते जो कटीली डाल पर—
चूम धरती के चरण कहते सदा!
दुःख सहो हंस−हंस उठाकर भाल निज—
विघ्न−बाधा मिल, सुपथ रोकें यदा!!
साधना ही बन उठेगी साध्य-शुभ, यदि मिले शृंगार-साधन उचित-श्रम!
—रामस्वरूप खरे ‛साहित्य रत्न’
*समाप्त*
सितंबर का युगनिर्माण अंक और यह अक्टूबर का उच्चस्तरीय गायत्री साधना अंक आपको पसंद आया होगा। नवंबर, दिसंबर के जीवन-विद्या अंक होंगे, जिनमे जीव की विविध समस्याओं को सुलझाने वाला हल रहेगा। यह चारों अंक इस वर्ष के सबसे महत्त्वपूर्ण अंक हैं। आप इन चारों को घर-घर पहुँचाने का प्रयत्न कीजिए। अपनी ओर से अपने स्वजन संबंधियों को यह चारों अंक उपहार में भेजिए। एक-एक रुपये का यह उपहार, हजारों रुपयों के मूल्य के भी उपहारों से अधिक महत्त्वपूर्ण होगा।