हमारा युग−निर्माण सत् संकल्प

मैं आस्तिकता और कर्त्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्मकर्त्तव्य मानता हूँ। शरीर को भगवान का मंदिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करूँगा। मन को जीवन का केंद्रबिंदु मानकर उसे सदा स्वच्छ रखूँगा। कुविचारों और दुर्भावनाओं से इसे बचाए रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहूँगा। अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानूँगा और सबके हित में अपना हित समझूँगा। व्यक्तिगत स्वार्थ एवं सुख को सामूहिक स्वार्थ एवं सामूहिक हित से अधिक महत्त्व न दूँगा।

नागरिकता, नैतिकता, मानवता, सच्चरित्रता, शिष्टता, उदारता, आत्मीयता, सहिष्णुता जैसे सद्गुणों को सच्ची संपत्ति समझकर इन्हें व्यक्तिगत जीवन में निरंतर बढ़ाता चलूँगा। साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवाकार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने दूँगा। चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करूँगा। परंपराओं की तुलना में विवेक को महत्त्व दूँगा। अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करूँगा। मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को रखूँगा।

मेरा जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए होगा। संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्यप्रसार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाता रहूँगा। दूसरों के साथ वह व्यवहार न करूँगा, जो मुझे अपने लिए पसंद नहीं। ईमानदारी और परिश्रम की कमाई ही ग्रहण करूँगा। नारी जाति के प्रति माता, बहिन और पुत्री की दृष्टि रखूँगा। “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है” इस विश्वास के आधार पर मेरी मान्यता है कि मैं उत्कृष्ट बनूँगा और दूसरों को श्रेष्ठ बनाऊँगा, तो युग अवश्य बदलेगा। हमारा युगनिर्माण संकल्प अवश्य पूर्ण होगा।


युग-निर्माण करो!

(श्री लक्ष्मी नारायण ‘कमलेश’)


युग-निर्माण करो (कविता)

युग−निर्माण करो! आओ,युग−निर्माण करो!!

सोये हृदय जगाओ, सबमें प्राण भरो॥ युग.−

सब में क्षमाशीलता, सेवा−भाव भरें।

समता, सत्य, सुमति के सरस सुमन बिखरें॥ युग.−

शांति-ध्वजा लहराए, विमल−विवेक बढ़े।

सबमें सहिष्णुता का रंग पुनीत चढ़े॥ युग.−

निर्मल भाव उदय हों, हो विकास मन का।

प्रबल−पराक्रम जागे, भय भागे तन का ॥ युग.−

परहित व्रत अपनाएँ, कुमति, कुरीति कटें।

जीवन में जय पाएँ, सब संताप हटें ॥ युग.−


युग परिवर्तन की आधारशिला

इस अंक के प्रथम पृष्ठ पर ‘युग−निर्माण सत्संकल्प' दिया गया है। यही संकल्प गत मार्च अंक में भी था। पर उसमें कुछ पुनरुक्तियाँ तथा भाषा संबंधी अशुद्धियाँ रह जाने के कारण अब इसे परिष्कृत एवं संशोधित रूप से प्रस्तुत कर दिया गया है। युग−निर्माण, जिसे लेकर अखण्ड ज्योति परिवार अब निष्ठा और तत्परतापूर्वक अग्रसर हो रहा है, उसका बीज विचार यही है। उसी आधार पर हमारी सारी विचारणा, योजना, गतिविधियाँ एवं कार्यक्रम संचालित होंगे। इसे अपना घोषणा−पत्र भी कहा जा सकता है। हममें से प्रत्येक को एक दैनिक धर्म कृत्य की तरह इसे नित्य प्रातःकाल पढ़ना चाहिए और सामूहिक शुभ अवसरों पर एक व्यक्ति उच्चारण करे और शेष उसे दुहरावें की शैली से इसे पढ़ा एवं दुहराया जाना चाहिए।

संकल्प की महान महत्ता

संकल्प की शक्ति अपार है। यह विशाल ब्रह्मांड परमात्मा के एक छोटे से संकल्प का ही प्रतिफल है। परमात्मा में इच्छा उठी−‛एकोऽहंबहुस्याम’ मैं अकेला हूँ− बहुत हो जाऊँ, उस संकल्प के फलस्वरूप तीन गुण, पंचतत्त्व उपजे और यह सारा संसार बनकर तैयार हो गया। मनुष्य के संकल्प द्वारा इस ऊबड़−खाबड़ दुनिया को ऐसा सुव्यवस्थित रूप मिला है। यदि ऐसी आकांक्षा न जगी होती, आवश्यकता अनुभव न हुई होती तो कदाचित मानव प्राणी भी अन्य वन्य पशुओं की भाँति अपनी मौत के दिन पूरे कर रहा होता।

इच्छा जब बुद्धि द्वारा परिष्कृत होकर दृढ़ निश्चय का रूप धारण कर लेती है, तब वह संकल्प कहलाती है। मन का केंद्रीयकरण जब किसी संकल्प पर हो जाता है तो उसकी पूर्ति में विशेष कठिनाई नहीं रहती । मन की सामर्थ्य अपार है, जब भावनापूर्वक मनोबल किसी दिशा में संलग्न हो जाता है तो सफलता के उपकरण अनायास ही जुटते चले जाते हैं। बुरे संकल्पों की पूर्ति के लिए भी जब साधन बन जाते हैं, तब सत्संकल्पों के बारे में तो कहना ही क्या है। धर्म और संस्कृति का जो विशाल भवन मानव जाति के सिर पर छत्रछाया की तरह मौजूद है, उसका कारण ऋषियों का संकल्प ही है। संकल्प इस विश्व की सबसे प्रचंड शक्ति है। विज्ञान की शोध द्वारा अगणित प्राकृतिक शक्तियों पर विजय प्राप्त करके वशवर्ती बना लेने का श्रेय मानव की संकल्प शक्ति का ही है। शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, उद्योग, साहित्य, कला संगीत, आदि विविध दिशाओं में जो प्रगति हुई आज दिखाई पड़ती है उसके मूल में मानव का संकल्प ही सन्निहित है। इसे प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष कह सकते हैं। आकाँक्षा को मूर्त रूप देने के लिए जब मनुष्य किसी दिशा विशेष में अग्रसर होने के लिए दृढ़ निश्चय कर लेता है तो उसकी सफलता में सन्देह नहीं रह जाता।

इस युग को बदला ही जाय

इन दिनों जिस युग में हम रह रहे हैं उसकी ऐसी परिस्थितियाँ दिन−दिन घटती जाती हैं जिनमें रह कर मनुष्य प्रसन्नता और शान्ति प्राप्त करता हुआ प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सके। आज तो वही परिस्थितियाँ बढ़ोतरी पर हैं जिनमें रहते हुए दम घुटता है और रोटी पानी खाता हुआ मनुष्य भूखा प्यासा रहता अनुभव करता है। शारीरिक परिस्थितियों पर दृष्टिपात करें तो लगता है कि हमारी बाहरी चमड़ी का लिफाफा मात्र तो सीधा खड़ा है भीतर सब कुछ खोखला हो चुका। न किसी का पेट ठीक काम करता है न मस्तिष्क। रस रक्त से लेकर वीर्य ओज तक सभी धातुऐं निस्तेज, निष्प्राण पड़ी हैं। रोगों ने रोम−रोम में घेरा डाल रखा है, आये दिन किसी न किसी अंग में कोई न कोई बीमारी खड़ी रहती है। दवा और इन्जेक्शनों के बल पर, डाक्टर और हकीमों की कृपा से, गाढ़ी कमाई का एक बड़ा भाग खर्च करने के बाद जीवन नौका किसी प्रकार गतिशील रह पाती है।

अधिक परिश्रम का, ऋतुओं के प्रभाव का, हारी बीमारी का कोई जरा−सा झटका लग जाय तो उसका टी.वी. सरीखा असाध्य रूप बन जाने में देर नहीं लगती। कागज के पुतले को गला देने के लिए पानी की चंद बूँदें काफी होती हैं, हमारे जीवनी शक्ति से रहित शरीरों को मृत्यु के मुख में धकेल देने के लिए एक छोटी−सी बीमारी का कुछ दिन बना रहना पर्याप्त है। जरा−सी असफलता,प्रतिकूलता, शोक सन्ताप, क्षोभ अपमान और आवेश के आघात से पागल हो जाना, स्वास्थ्य खो बैठना, आत्म हत्या कर लेना, दूसरों की जान के ग्राहक बन जाना आदि दुर्घटनाऐं कर बैठने जैसी घटनाऐं आये दिन घटित होती रहती हैं। इससे प्रतीत होता है कि गम्भीरता, सहनशीलता और दूरदर्शिता की दिमागी ताकत समाप्त हो चुकी, शरीर ही नहीं हमारे मस्तिष्क भी खोखले हो चुके। ऐसा खोखला जीवन जीते हुए किसे कुछ आनन्द मिल सकता है? हर कोई अपनी जिन्दगी का भार बड़ी कठिनाई से ढो रहा है निराशा और खिन्नता के साथ मौत के दिन पूरे कर रहा है। बालकपन के बाद सीधा बुढ़ापा ही आ घेरता है यह पता ही नहीं चल पाता कि जवानी कब आई और कब चली गई।

इस स्थिति में कब तक पड़े रहें?

इन शारीरिक परिस्थितियों में क्या कोई जीवन का लाभ ले सकता है? ऐसी जर्जर परिस्थितियों में पुरुषार्थपूर्वक कोई बड़ी सफलता प्राप्त कर सकने की हिम्मत कर सकता है? अस्वस्थ शरीर में रहने वाला अस्वस्थ मन, केवल अस्वस्थ बातें ही सोच सकता है, अस्वस्थ योजनाऐं ही बना सकता है और अस्वस्थ काम ही कर सकता है। ऐसे लोग कोई सीधा शार्टकट ढूँढ़ते रहते हैं जिससे कम श्रम में अधिक लाभ मिल जाय, ऐसे तरीके केवल चोरी, ठगी, बेईमानी, बदमाशी के ही हो सकते हैं सो ही उन्हें अपने लिए सरल एवं उपयुक्त दिखाई पड़ते हैं। उन्हें ही वे करते हैं। अनीति और कुकर्मों की गतिविधियाँ अपनाते हैं। फलस्वरूप मानसिक स्वास्थ्य भी नष्ट हो जाता है। विकृत मन में अनेकों दुर्गुण, अनेकों व्यसन, अनेकों कुविचार अड्डा जमा कर बैठ जाते हैं और मनुष्य विकृतियों का घर मात्र बन कर रह जाता है। ऐसे विकृत व्यक्तियों से मिल कर बना हुआ समाज क्या कभी स्वस्थ समाज कहा जा सकता है? उसमें अपराध और क्लेश, कलह ही बढ़ते हैं। उत्पादन शक्ति के अभाव में दीनता और दरिद्रता ही घेरे रह सकती है। स्वार्थपरता और अनुदारता के बढ़ जाने से पारस्परिक स्नेह, सद्भावों का समाप्त हो जाना स्वाभाविक है। विश्वासघात, छल,शोषण ठगी और खुदगर्जी की बात सोचते रहने वाले लोग भला प्रेम, त्याग, उदारता और सेवा का महत्व क्या कभी समझेंगे? स्वयं कष्ट उठा कर दूसरों की सुविधा का ध्यान रखने की प्रवृत्ति उनमें कहाँ से पैदा होगी? और इसके अभाव में कोई राष्ट्र या समाज सभ्य, समुन्नत कैसे बन सकेगा?

निम्नकोटि का जीवन न जियें

सुखोपभोग, ऐश आराम, मौज−मजा और शान शौकत के लिए हर किसी को अधिक धन की, अधिकाधिक और बहुत अधिक धन की आवश्यकता अनुभव होती है। पर उसके उचित प्रकार से उपार्जन के योग्य न तो क्षमता होती है न योग्यता न शक्ति । इन्हें बढ़ाने में जो श्रम और अध्ययन अभीष्ट है उसके लिए शौर्य, धैर्य और साहस का अभाव रहने से मनुष्यों की योग्यता बड़ी निम्नकोटि की रहती है। निम्नकोटि की योग्यता के मूल्य पर थोड़ा सा ही उपार्जन सम्भव है। मितव्ययिता का अभाव और आकाँक्षाओं के अम्बार मिलकर इतनी अधिक आवश्यकता प्रस्तुत करते हैं कि हीन योग्यता के व्यक्ति के लिए उचित मार्ग से उसकी पूर्ति कर सकना किसी भी प्रकार संभव नहीं होता। ऐसी परिस्थितियों में लोग दिन रात असन्तुष्ट रहते हैं। और तृष्णा से अभिशप्त बेताल, ब्रह्म, राक्षस की तरह न सोचने योग्य सोचते और न करने योग्य करते हुए जीवन यात्रा पूरी करते हैं। जिस युग में इस प्रकार का जीवनचर्या आमफहम बनी हुई हो उसे सन्तोषजनक कैसे कहा जायेगा? उसमें रहते हुए शान्ति लाभ कौन करेगा?

शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियाँ जब विपन्न हो रही हों तब विज्ञान की उन्नति से उत्पन्न हुए अनेकों सुख साधन केवल, लालच,तृष्णा और असंतोष ही उत्पन्न कर सकते हैं। ललचाने वाली भोग वस्तुऐं बढ़ती जा रही हैं,उपार्जन और उपयोग की क्षमता नष्ट हो रही है। दोनों का सन्तुलन ठीक न रहने से असन्तोष की आग का भड़क उठना स्वाभाविक है। आज हर मनुष्य अपनी परिस्थिति से असन्तुष्ट है और यह तलाश कर रहा है कि उसका दोष किसे दिया जाय और उसका प्रतिशोध किससे लिया जाय? कुछ दिन पूर्व सोचते थे कि विदेशी शासन हमारे अभावों का कारण होगा, राजा महाराजाओं, धनी अमीरों, सेठ साहूकारों, जमींदार जागीरदारों के कारण हमारी परिस्थितियाँ बिगड़ी हुई हैं इनके हटते ही सब कुछ सुधर जायेगा। इनमें से अधिकाँश हट चुके,जो थोड़े बने हैं वे भी चंद दिनों में हटने वाले हैं इस पर भी परिस्थितियाँ जहाँ की तहाँ हैं, वरन् सच तो यह है कि और अधिक विषम हो गई हैं। विचार करने पर इसका कारण स्पष्ट हो जाता है। हमारा व्यक्तित्व घटिया होता चला जा रहा है और जब तक इस अधःपतन को रोकने का कोई प्रबल प्रयत्न न किया जायेगा तब तक परिस्थितियाँ दिन−दिन और भी अधिक गिरती चली जायेंगी।

साधन वृद्धि ही पर्याप्त नहीं

पिछले दिनों राष्ट्रीय आमदनी में कुछ वृद्धि हुई है तो साथ ही नशेबाजी, शौकीनी, सिनेमाखोरी, मुकदमेबाजी, फौजदारी, बेईमानी, चालाकी, रिश्वत, मिलावट, फिजूलखर्ची, विवाह शादियों की धूमधाम आदि कितनी ही बातें ऐसी बढ़ गई हैं, जिससे गरीबी पहले से भी और अधिक हो गई है। महँगाई और टैक्सों की बढ़ोतरी का भी कुप्रभाव पड़ा है पर उसकी तुलना में इन अकथनीय विकृतियों ने कहीं अधिक परेशानी का वातावरण उत्पन्न किया है। इसका सुधार करने के लिए अन्य उपाय भी आवश्यक हैं पर सबसे प्रमुख और सब से आवश्यक उपाय यह है कि हमारे विचारों और विश्वासों में आवश्यक हेर−फेर का मोड़ उत्पन्न किया जाय। नारेबाजी के रूप में, लोगों को दिग्भ्रान्त करने के रूप में अपनी विपत्तियों का कारण किसी को भी बताया जा सकता है पर सही बात यह है कि मनुष्य का घटिया दृष्टिकोण, घटिया स्तर और घटिया लक्ष ही सारी विपत्तियों का मूल कारण है। उसमें सुधार करने की ओर यदि ध्यान न दिया गया तो आर्थिक सुधार के लिए, रोग निवारण के लिए, सुख साधन बढ़ाने के लिए सरकारी या गैर सरकारी स्तर पर लम्बे चौड़े कार्यक्रम बनने पर भी परिस्थितियाँ जहाँ की तहाँ पड़ी रहेंगी। जमींदार हटेंगे तो नौकरशाह उनकी जगह ले लेंगे। पहले सेठ और जमींदारों के घरों में दौलत जमा होती थी, ब्याज, लगान और बेगार उनका नाम था अब वह नाम नक्शे बदल रहे हैं। अफसरों में रिश्वत और भ्रष्टाचार बढ़ रहा है और वे कोठी हवेली वाले बनते चले जा रहे हैं।

सुधार का मूल संस्थान

कानून के द्वारा इन परिस्थितियों के रोके जाने में थोड़ी सहायता भले ही मिलती हो। पर केवल उन्हीं के आधार पर पूरी तरह रोकथाम हो सकना सम्भव नहीं। अधिनायकवाद के नृशंस कानून भी इन्हें पूर्णतया रोक सकने में समर्थ नहीं हो सके हैं। रूस, जर्मनी, इटली आदि में लम्बे परीक्षण इस सम्बन्ध में हुए हैं उससे बलात् रोकी हुई दुष्प्रवृत्तियाँ अन्य किसी रास्ते से फूट पड़ने के परिणाम सामने आये हैं। अपराधों की रोकथाम और सज्जनता की अभिवृद्धि का एक मात्र आधार अन्तरात्मा की प्रेरणा पर ही निर्भर रहता है। दया, करुणा, मैत्री, उदारता जैसे सद्गुणों को भूगोल, इतिहास, गणित की तरह किसी को सिखाया नहीं जा सकता। त्याग और बलिदान की भावनाऐं किसी के कहने सुनने से नहीं आतीं। उनका उद्भव तो गहन आन्तरिक स्तर से होता है और उनका पनपना तभी सम्भव होता है जब आत्मा निरन्तर इस दिशा में प्रेरणा करती रहे।

हम शाँतिमय परिस्थितियों में, सौहार्द और सज्जनता के वातावरण में, सदाचार और स्नेह के युग में रहना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हीं में प्रसन्नता, स्थिरता और प्रगति की संभावना रहती है। द्वेष, रोग, अभाव, क्लेश, अनीति और स्वार्थपरता की परिस्थितियाँ यदि हमारे चारों ओर घिरी रहें तो चैन से रह सकना और शाँति की नींद ले सकना भला कैसे बन पड़ेगा? हममें से कोई भी यह चाहेगा कि उसे अप्रिय अवाँछनीय अवरोध की परिस्थितियों में दिन गुजारने पड़े? अन्तरात्मा की आकाँक्षा है शाँति और सद्भावनापूर्ण वातावरण की स्थिरता। इसी का नाम स्वर्ग है, इसी को सतयुग कहते हैं। इसकी प्रगति असंभव नहीं, पूर्णतया सरल और संभव है बशर्ते कि हम अपने दृष्टिकोण में थोड़ा परिवर्तन करने को तैयार हों, जीवन दर्शन के तथ्यों पर थोड़ा मनन और चिन्तन करें यह खोज करें कि किन गतिविधियों को अपनाने से व्यक्ति और समाज का प्रवाह सही दिशा में विकसित हो सकता है। जीवन को ठीक तरह से जीने की विद्या से हम अनजान जैसे बने बैठे हैं और अपने लिए तथा दूसरों के लिए अवाँछनीय वातावरण उत्पन्न कर रहे हैं।

परिवर्तन का उद्गम स्थल

परिस्थितियाँ बदलनी हों तो उनके उद्गम में काम करने वाले विचारों और कार्यों को बदलना सुधारना आवश्यक होता है। इस व्यक्तिगत परिवर्तन का सामूहिक रूप युग परिवर्तन से रूप में दृष्टिगोचर होता है। मनुष्य बदलता है तो जमाना भी बदलने लगता है। दृष्टिकोण में परिवर्तन आते ही वातावरण बदला हुआ दिखाई पड़ने लगता है। आन्तरिक परिवर्तन की तैयारी में लगा जाय तो बाह्य परिवर्तन स्वयमेव सामने उपस्थित हो जायेगा। एक-एक तिनका मिलकर रस्सी बनती है, एक-एक सींक मिलकर बुहारी कहलाती है, एक-एक बूँद गिरने से घड़ा भर जाता है, एक-एक व्यक्ति का निर्माण होता चले तो युगनिर्माण हुआ दृष्टिगोचर होगा।

मानवीय चेतना की परिशुद्धि

आज प्रत्येक विचारशील व्यक्ति यह अनुभव करता है कि मानवीय चेतना में वह दुर्गुण पर्याप्त मात्रा में बढ़ चले है जिनके कारण अशान्ति और अव्यवस्था छाई रहती है। इस स्थिति में परिवर्तन की आवश्यकता अनिवार्य रूप से प्रतीत होती है पर यह कार्य केवल आकांक्षा मात्र से पूर्ण न हो सकेगा, इसके लिये एक सुनिश्चित दिशा निर्धारित करनी होगी और उसके लिए सक्रिय रूप से संगठित कदम बढ़ाने होंगे। इसके बिना हमारी चाहडडड एक कल्पना मात्र बनी रहेगी। युग निर्माण संकडडड उसी दिशा में एक सुनिश्चित कदम है। इस घोषणापत्र की सभी भावनाऐं धर्म और शास्त्र की आडडड परम्पराओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। केवल उसे सामयिक आवश्यकता के अनुरूप एक व्यवस्थित ढंग से सरल भाषा के संक्षिप्त शब्दों में रख लिया गया है। इस घोषणा पत्र को हम ठीक समझें, उन पर मनन और चिन्तन करें तथा निश्चय करें कि हमें अपना जीवन इसी ढाँचे में ढालना है। दूसरों को उपदेश करने की अपेक्षा इस संकल्प पत्र में आत्म निर्माण पर सारा ध्यान केन्द्रित किया गया हैं। दूसरों को कुछ करने के लिए कहने का सबसे प्रभावशाली तरीका एक ही है कि हम वैसा करने लगें। अपना निर्माण ही युग निर्माण का अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम हो सकता है । बूँद−बूँद जल के मिलने से ही समुद्र बना है। एक−एक अच्छा मनुष्य मिलकर ही अच्छा समाज बनेगा। व्यक्ति निर्माण का व्यापक स्वरूप ही युग−निर्माण के रूप में परिलक्षित होगा।

प्रस्तुत युग−निर्माण की भावनाओं का स्पष्टीकरण और विवेचन पाठक अगले लेखों में पढ़ेंगे। इन भावनाओं को गहराई में अपने अन्तःकरणों में जब हम जमाने लगेंगे तो उसका सामूहिक स्वरूप एक युग आकाँक्षा के रूप से प्रस्तुत होगा और उसकी पूर्ति के लिए अनेकों देवता अनेकों महामानव नरतनु में नारायण रूप धारण करके प्रकटित हो पड़ेंगे। युग−परिवर्तन के लिए जिस अवतार की आवश्यकता है वह पहले आकाँक्षा रूप में ही अवतरित होगा। इसी अवतार का सूक्ष्म स्वरूप यह युग−निर्माण संकल्प है, इसके महत्व का मूल्याँकन हमें गंभीरतापूर्वक ही करना चाहिए।


आस्तिकता और कर्तव्यपालन

मैं आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म मानता हूँ। शरीर को भगवान का मन्दिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा। मन को जीवन का केन्द्रबिन्दु मानकर उसे सदा स्वच्छ रखूँगा। कुविचारों और दुर्भावनाओं से इसे बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहूँगा।

युग−निर्माण की प्रक्रिया में सबसे पहला स्थान आस्तिकता का है। ईश्वर में आस्था रखे बिना हमारी दुष्प्रवृत्तियाँ बिना नकेल के ऊँट की तरह, बिना लगाम के घोड़े की तरह बिना नाथ के बैल की तरह बिना अंकुश के हाथी की तरह उच्छृंखलता, अनीति और उद्दंडता की ओर द्रुत गति से दौड़ने लगती हैं। पानी को ऊँचा चढ़ाने के लिए अनेक प्रयत्न करने पड़ते हैं पर नीचे की ओर तो वह बिना किसी प्रयास के ही बहने लगता है। मन की गति भी पानी के समान है, उसे स्वर्ग पर चलाना हो तो अत्यधिक श्रमसाध्य साधन प्रयत्न करने पड़ते हैं पर कुमार्ग की ओर तो वह सहज ही सरपट दौड़ने लगता है। आस्तिकता मन को कुमार्ग पर दौड़ने से रोकने के लिए सबसे बड़ा अंकुश सिद्ध होता है।

पाप कर्मों से बचाव

पाप को छिपा लेने और तब दण्ड से बचे रहने की अगणित तरकीबें मनुष्य ने ढूँढ़ निकाली हैं। यों अदालत, पुलिस, जेल, कचहरी सब कुछ व्यवस्था अपराधों के लिए मौजूद है, पर उनसे बचे रहकर अनीति बरतते रहने की जितनी कुशलता मनुष्य को प्राप्त है उसकी तुलना में राजदंड के सारे साधन तुच्छ मालूम पड़ते हैं। रिश्वत को ही लीजिए वह एक बड़ा अपराध माना गया है और उसके लेने एवं देने वाले के लिए कई वर्ष की जेल का विधान है। इतने पर भी अदालतों तक में पुलिस तक में, जेल तक में रिश्वत कितने प्रचंड रूप में मौजूद है उसे हर कोई जानता है। अपराधों को रोकने वाले जब अपराध करने से नहीं रुकते तो जन साधारण से तो आशा ही क्या की जाय? डर दिखाते रहने के लिये मर्यादा माध्यम के रूप में यह सब मौजूद है उसे मौजूद रहना भी रहना भी चाहिए, पर समस्या का हल इनके द्वारा होने वाला नहीं है। जब तक मनुष्य अपने कर्तव्य धर्म का कठोरतापूर्वक पालन करने के लिए स्वयं ही श्रद्धा और विश्वासपूर्वक कटिबद्ध न होगा तब तक उसे बलात् सन्मार्गगामी बनाया जा सकना कठिन है। अधिनायकवाद के नृशंस आतंक द्वारा कुछ हद तक पापों की रोक−थाम संभव है। चोर के हाथ काट देने और व्यभिचारी का सिर उड़ा देने जैसे आतंकपूर्ण दंड लोगों को डरा तो देते हैं पर जिनके हाथ में ऐसी दंड व्यवस्था रहती है वे ही आतंकित जनता से प्रतिरोध के बारे में निश्चिन्त होकर स्वयं ही अनीति करने लगते हैं। डिक्टेटरशाही का इतिहास यही बताता है। फिर आतंकित जनता भीरु और कायर बनती है, उसकी आत्मिक स्थिति बहुत दुर्बल हो जाती है जिससे उसके स्वभाव में छोटे छोटे अनेकों दोष दुर्गुण प्रविष्ट हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप मनुष्य का व्यक्तित्व दिन−दिन दीन−हीन बनता चला जाता है। आतंकित लोगों में से महापुरुषों एवं नररत्नों का उत्पन्न होना भी संभव नहीं रहता। फिर यह आतंकपूर्ण स्थिति समाप्त होते ही वह दबी हुई अपराधी मनोवृत्ति जब अनेकों गुने भयंकर वेग से विकसित होती है तब उसका रोका जा सकना अतीव कठिन हो जाता है।

स्थायी सुख शान्ति का आधार

सदाचार के ऊपर हमारी व्यक्तिगत और सामूहिक सुख−शान्ति निर्भर रहती है। यह सदाचार तभी निभता है जब उसका उद्गम भीतर से प्रस्फुटित होता हो। बाहरी दबाव कोई क्षणिक परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं पर स्थायी हल तो अन्तः प्रेरणा पर ही निर्भर रहेगा। कर्तव्य पालन को मानव जीवन का आदर्श लक्ष एवं धर्म मानकर श्रेष्ठ आचरण करने की प्रवृत्ति तभी विकसित हो सकती है जब मन की दुर्बुद्धि पर आत्मा के विवेक का नियंत्रण बना रहे। इस नियंत्रण के वैज्ञानिक स्वरूप को ही आस्तिकता कहते हैं।

ईश्वर के अस्तित्व से इनकार नहीं किया जा सकता। जब हर वस्तु का कोई निर्माता होता है तो इतने विशाल, इतने व्यवस्थित विश्व का कोई निर्माता न हो ऐसा नहीं हो सकता। वह निर्माता धर्म, विवेक और आदर्श से रहित नहीं है। वह हमें जहाँ अगणित प्रकार की सुख सुविधाऐं देता है वहाँ हमारे कर्मों के भले बुरे परिणामों की भी व्यवस्था करता है। घट−घट वासी सर्वान्तर्यामी भगवान अपने असंख्य नेत्रों से हमारे गुप्त प्रकट कार्यों और विचारों को भली प्रकार जानते हैं। उनकी प्रसन्नता अप्रसन्नता इन्हीं सत्प्रवृत्तियों और दुष्प्रवृत्तियों पर निर्भर रहती है। दुख और सुख मिलने का आधार भी यही है। कोई कुकर्मी पाप दण्ड से बच नहीं सकता, कोई सुकर्मी सुख शान्ति का अधिकारी न बने ऐसा भी नहीं हो सकता। निष्पक्ष न्यायाधीश की भाँति परमात्मा हमारे हर भले बुरे कर्मों का प्रतिफल उत्पन्न करता है जिसे यह विश्वास होगा, उसकी असुरता घटेगी और देवत्व विकसित होगा, कर्मों का फल मिलने में देर तो होती है पर अंधेर की कोई गुँजाइश नहीं। जिसे यह विश्वास होगा वह दुष्ट दुर्जन नहीं बन सकता उसके लिए सज्जनता और कर्तव्यशीलता का ही एक मात्र मार्ग अपनाने के लिए रह जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए आस्तिकता की आवश्यकता को युगनिर्माण संकल्प में पहला स्थान दिया गया है। उपासना से हमारा आत्मबल बढ़ता है और कर्तव्य पालन की वह प्रेरणा अनायास ही उत्पन्न होती है जिसके आधार पर जीवन लक्ष की पूर्ति और विश्वशक्ति के दोनों ही उद्देश्य पूर्ण होते हैं।

आस्तिकता का प्रतिफल निश्चित रूप से कर्तव्य पालन है। जो आस्तिक कर्तव्य पालन की उपेक्षा करता है और कुछ पूजा पत्री करके मुफ्त में ही ईश्वर से धन वैभव प्राप्त कर लेने या दुष्कर्मों के फल से छुटकारा पाने की बात सोचता है उसे भोला बहका हुआ, नासमझ या जरूरत से ज्यादा चालाक कह सकते हैं। आस्तिकता की सबसे पहली प्रतिक्रिया अपने कर्तव्य को ईश्वर का आदेश मानकर उस पर चट्टान की तरह अटल बने रहने की प्रेरणा के रूप में परिलक्षित होती है। कर्तव्य परायणता की मात्रा किसमें कितनी है इसी आधार पर उसकी आस्तिकता के स्तर को नापा जा सकता है।

हमारे शारीरिक कर्तव्य

कर्तव्य पालन का आरंभ अपने सबसे समीपवर्ती स्वजन से होता है। हमारा सबसे निकटवर्ती संबंधी अपना शरीर ही है। उसके साथ सद्व्यवहार करना उसे स्वस्थ और सुरक्षित रखना आवश्यक है। बीमारी और कमजोरी हमारे निमंत्रण पर आती है और स्वागत बन्द करने पर अपने आप चली जाती है। इन्द्रियों का असंयम, आहार−विहार की अनियमितता के कारण पाचन प्रणाली, रक्त संचार, मस्तिष्क, स्नायु संस्थान आदि की प्रमुख प्रक्रियाओं को भारी आघात लगता है और वे दुर्बल एवं विकृत होकर रोग ग्रसित होने लगते हैं। भीतर धीरे−धीरे एकत्रित होती रहने वाली विकृतियाँ कोई छोटा−मोटा अवसर पाकर किसी भी स्थान से किसी भी रूप में फूट पड़ती हैं इसी को हम बीमारी के नाम से पुकारते हैं।

आहार−विहार का संयम रखा जाय और हर कार्य में मर्यादा एवं नियमितता का ध्यान रखा जाय तो बीमार पड़ने का कोई प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। मनुष्य के सम्पर्क बन्धनों से बचे रहने वाले एवं प्रकृति का अनुसरण करने वाले सृष्टि के सभी जीव जन्तु आजीवन निरोगता का लाभ प्राप्त किये रहते हैं तो हमें भी बीमारी का क्यों शिकार बनना पड़ सकता है? अपनी भूल को सुधारने के लिए जो कटिबद्ध हो गया, आहार−विहार पर संयम रखने और नियमितता बरतने की जिसने ठान ली उसका स्वास्थ्य सुधरने ही वाला है। सबसे बड़ी चिकित्सा− सबसे बड़ी दवा अपनी उन आदतों को सुधार लेना है जो हमारे आरोग्य के लिए घातक हैं पर जिन्हें तुच्छ आकर्षणों के कारण अपनाये रहा जाता है। शरीर भगवान का मंदिर है, इसमें आत्मा का निरन्तर निवास है। जिस प्रकार किसी देवालय को गंदा, विकृत, नष्ट भ्रष्ट एवं तिरस्कृत करना पाप माना जाता है उसी प्रकार आत्मा के निवास मंदिर शरीर को अपनी बुरी आदतों के कारण नष्ट−भ्रष्ट करना एक अपराध है और उस अपराध के फलस्वरूप पीड़ा, बेचैनी, अशक्ति , अल्पायु और आर्थिक क्षति के रूप में विविध प्रकार की यातनाऐं भुगतनी पड़ती हैं। कर्तव्य पालन का आरंभ हमें शरीर रूपी स्वजन से ही आरंभ करना चाहिए और उसे निरोग बनाने के लिए उन गतिविधियों को अपनाना चाहिए जिनका उल्लेख स्वास्थ्य रक्षा के संदर्भ में गत मई और अगस्त के अंकों में विस्तारपूर्वक किया जा चुका है।

मन और उसके प्रति अपनी जिम्मेदारी

शरीर के साथ मन का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। शरीर स्थूल है मन सूक्ष्म। शरीर की शोभा सफाई और सजावट का तो कई व्यक्ति ध्यान रखते हैं पर उसे निरोग रखने के महत्व को भूले रहते हैं फलस्वरूप भीतर ही भीतर खोखली बनती जाने वाली देह सजाव शृंगर से भी सुन्दर नहीं लग पाती और सौन्दर्य की समस्या उलझी हुई ही पड़ी रहती है। इसी प्रकार आहार−विहार से शरीर को तो निरोग रख लिया जाय पर उस मन को जिसका सारे शरीर पर नियन्त्रण है—उपेक्षा की जाय तो भी काम चलने वाला नहीं है। वह आरोग्य उद्दंडता और अहंकार का अथवा कुछ अधिक कमाने खाने का साधन मात्र बन सकता है। मन को जीवन का केन्द्र बिन्दु इसलिए कहा गया है कि उसकी समझ जिस दिशा में भी हो जाती है उसी ओर हमारी सारी गतिविधियाँ संचारित होने लगती हैं। किसी बुरे से बुरे प्रसंग की ओर यदि मन रुचि लेने लगे तो वह कार्य परम प्रिय लगने लगता है और कितनी ही हानि उठा कर भी मनुष्य उधर लगा रहता है। नशेबाजी, जुआ जैसे अगणित व्यसन हैं जिनकी बुराई जानते हुए भी मनुष्य अपना सब कुछ गँवाता रहता है। मन का झुकाव ऐसी बात है जिसमें लाभ या हानि का बहुत महत्व नहीं रहता, प्रिय लगने वाले प्रसंग के लिए सब कुछ खो देने और बड़े से बड़े कष्ट सहने को भी मनुष्य सहज ही तैयार हो जाता है। फिर यही मन यदि अच्छी दिशा में मुड़ जाय, आत्म−सुधार ,आत्म−निर्माण और आत्म−विकास में रुचि लेने लगे तो जीवन में एक चमत्कार ही प्रस्तुत हो सकता है। सामान्य श्रेणी का, नगण्य स्थिति का मनुष्य भी महापुरुषों की श्रेणी में आसानी से पहुँच सकता है। सारी कठिनाई मन को अनुपयुक्त दिशा से उपयुक्त दिशा में मोड़ने की ही है। इस समस्या के हल होने पर मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनता हुआ देवत्व के लक्ष तक सुविधापूर्वक पहुँच सकता है।

मन को मलीन न होने दें

शरीर के प्रति कर्तव्य पालन करने की तरह मन के प्रति भी हमें अपने उत्तरदायित्वों को पूर्ण करना चाहिए। जिस प्रकार आरोग्य के नियमों की उपेक्षा करने से स्वास्थ्य बिगड़ जाता है, उसी प्रकार मन को स्वच्छ रखने की विधिवत व्यवस्था न रखने से वह भी कुविचारों और दुर्भावनाओं में ग्रसित रहने लगता है। शरीर की भाँति मन को सुधारा और सँभाला जा सकता है उसे पतनोन्मुख दिशा से मोड़ कर उन्नतिशील मार्ग के लिए समझाया और विवश किया जा सकता है। छोटे−मोटे हर प्रसंग को आशंका अविश्वास, सन्देह और छिद्रान्वेषण की पृष्ठ भूमि में सोचते और देखते रहने से न केवल संसार की हर वस्तु डरावनी लगती है वरन् अन्तःकरण भी दिन−दिन क्षुद्र और कलुषित बनता जाता है। व्यभिचार के, चोरी के, अनीति बरतने के क्रोध एवं प्रतिशोध के, ठगने एवं दंभ, पाखंड बनाने के कुविचार यदि मन में भरे रहें तो मानसिक स्वास्थ्य का नाश ही होने वाला है। ऐसे व्यक्तियों का व्यक्तित्व ओछा, भौंड़ा, बेहूदा और बेतुका बनता चला जाता है धीरे−धीरे ये उस स्थिति तक जा पहुँचते हैं कि उनकी सभ्य मनुष्यों में गणना करना भी उचित प्रतीत नहीं होता।

कुविचारों और दुर्भावनाओं से मन गंदा, मलिन और पतित होता है और अपनी सभी विशेषता और श्रेष्ठताओं को खो देता है इस स्थिति से सतर्क रहने और बचने की आवश्यकता को अनुभव करना हमारा पवित्र कर्तव्य है। मन को सही दिशा देते रहने के लिए स्वाध्याय की वैसी ही आवश्यकता है जैसे शरीर को भोजन देने की। आत्म−निर्माण करने वाली जीवन की समस्याओं को सही ढंग से सुलझाने वाली उत्कृष्ट विचारधारा की पुस्तकें पूरे ध्यान, मनन और चिन्तन के साथ पढ़ते रहना ही स्वाध्याय है। यदि सुलझे हुए विचारों के जीवन विद्या के ज्ञाता कोई सम्भ्रान्त सज्जन उपलब्ध हो सकते हों तो उनका सत्संग भी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। यों धर्म और अध्यात्म के नाम पर आलस, कर्तव्य त्याग, निराशा, भाग्यवाद परावलम्बन आदि भ्रान्तियों को बढ़ाने वाले प्रवचनकर्ता गली कूँचों में मक्खी, मच्छरों की तरह सत्संग की दुकानें लगाये बैठे हैं, उनमें जाने की अपेक्षा न जाना अधिक उत्तम है। इसी प्रकार स्वाध्याय के नाम पर जीवन निर्माण की ज्वलन्त समस्याओं को सुलझाने में कोई सहायता न देने वाली, किन्हीं देवी देवताओं के गुणानुवाद गाने वाली पुस्तकों का पाठ करते रहने से कोई वास्तविक प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।

कुविचारों और दुर्भावनाओं के समाधान के लिए स्वाध्याय,सत्संग,मनन और चिन्तन यह चार ही उपाय हैं। मानव जीवन की महत्ता को हम समझें, इस स्वर्ण अवसर के सदुपयोग की बात सोचें, अपनी गुत्थियों में से अधिकाँश की जिम्मेदारी अपनी समझें और उन्हें सुलझाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव में आवश्यक हेर−फेर के लिए सदा कटिबद्ध रहें । इस प्रकार की विचार शैली आत्म−निर्माण की प्रेरणा देने वाले सत्साहित्य से, प्रबुद्ध मस्तिष्क के सत्पुरुषों से एवं आत्म−निरीक्षण तथा आत्म−चिन्तन करने से किसी भी व्यक्ति को सहज ही उपलब्ध हो सकती है। दृष्टिकोण बदलते ही परिस्थितियाँ भी निश्चित रूप से बदल सकती हैं।

लोहा,लोहे से कटता है। गरम लोहे को ठंडे लोहे की छैनी काटती है। चुभे हुए काँटे को निकालने के लिए काँटे ही प्रयोग करना पड़ता है। विष को विष मारता है। हथियार से हथियार का मुकाबला किया जाता है। कुविचारों के समाधान का एक ही उपाय है उसके स्थान पर सद्विचारों को भर देना। किसी गिलास में भरी हुई हवा को हटाना हो तो उसमें पानी भर देना चाहिए। पानी का प्रवेश होने से हवा अपने आप निकल जायगी। बिल्ली पाल लेने से चूहे घर में कहाँ ठहरते हैं। कुविचारों को मार भगाने का एक ही तरीका है कि उनके स्थान पर सद्विचारों की स्थापना की जाय। मन में जब सद्विचार भरे रहेंगे तो उस भीड़ से भरी धर्मशाला को देखकर अपने आप लौट जाने वाले मुसाफिरों की तरह कुविचार भी कोई दूसरा रास्ता टटोलेंगे। स्वाध्याय और सत्संग में जितना अधिक समय लगाया जाता है उतनी ही कुविचारों से सुरक्षा बन पड़ती है। जीवन को सब प्रकार दुख दारिद्र से भर देने वाले कुकर्मों को अपनाने से ही मनुष्य का पतन होता है और यह कुकर्म, कुविचारों के प्रतिफल मात्र ही हैं। शान्ति और प्रगति के लिए हमें सद्विचारों की ही शरण में जाना पड़ता है, इसी प्रक्रिया का नाम स्वाध्याय और सत्संग है। रोटी और पानी जिस प्रकार शरीर की सुरक्षा और परिपुष्टि के लिए आवश्यक हैं उसी प्रकार आत्मिक स्थिरता और प्रगति के लिए सद्विचारों की प्रचुर मात्रा हमें उपलब्ध होनी ही चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति स्वाध्याय और सत्संग से, मनन और चिन्तन से पूरी होती है। युगनिर्माण के लिए, आत्म−निर्माण के लिए यह प्रधान साधन है। संकल्प की, मन की शुद्धि के लिए इसे ही रामबाण दवा माना गया है।


सबके हित में अपना हित

“अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानूँगा और सबके हित में अपना हित समझूँगा। व्यक्तिगत स्वार्थ एवं सुख को सामूहिक स्वार्थ एवं सामूहिक हित से अधिक महत्व न दूँगा।”

सामाजिक न्याय का सिद्धान्त ऐसा अकाट्य तथ्य है कि इसकी एक कदम के लिए भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। एक वर्ग के साथ अन्याय होगा तो दूसरा वर्ग कभी भी शान्तिपूर्ण जीवन यापन न कर सकेगा। लोहे की छड़ को एक सिरे पर गरम किया जाय तो उसकी गरमी धीरे−धीरे दूसरे सिरे तक भी पहुँच जायगी। सारी मनुष्य जाति एक लोहे की छड़ की तरह है उसको किसी भी स्थान पर गरम या ठंडा किया जाय दूसरे भागों पर उसका प्रभाव अनिवार्य रूप से पड़ेगा। सामाजिक न्याय सब को समान रूप से मिले, प्रत्येक मनुष्य मानवोचित अधिकारों का उपयोग दूसरों की भाँति ही कर सके ऐसी स्थिति पैदा किये बिना हमारा समाज शोषणमुक्त नहीं हो सकता । आर्थिक समता की बात समाजवादी विचारधारा के द्वारा राजनीतिक स्तर पर बड़े जोरों से कही जा रही है। साम्यवादी देश उग्र रूप से और समाजवादी देश मंथर गति से इसी मार्ग पर अग्रसर हो रहे हैं। अध्यात्मवाद की शिक्षा सनातन काल से यही रही है। यहाँ परिग्रह को सदा से पाप माना जाता रहा है। सामान्य जनता के स्तर से बहुत अधिक सुख साधन प्राप्त करना या धन सम्पत्ति जमा करना यहाँ सदा से पाप कहा गया है और यही निर्देश किया है कि सौ हाथों से कमाओ भले ही पर उसे हजार हाथों से दान अवश्य कर दो। अर्थात् अगणित बुराइयों को जन्म देने वाली संग्रह वृत्ति को पनपने न दो।

‘मैं’ नहीं ‘हम सब’

कोई व्यक्ति अपने पास सामान्य लोगों की अपेक्षा अत्यधिक धन तभी संग्रह कर सकता है जब उसमें कंजूसी, खुदगर्जी, अनुदारता और निष्ठुरता की भावन आवश्यकता से अधिक मात्रा में भरी हुई हो । जब कि दूसरे लोग भारी कठिनाइयों के बीच अत्यन्त कुत्सित और अभावग्रस्त जीवन यापन कर रहे हैं उनके बच्चे शिक्षा और चिकित्सा तक से वंचित हो रहे हैं तब उनकी आवश्यकताओं की ओर से जो आँख बन्द किये रहेगा, किसी को कुछ भी न देना चाहेगा, देगा तो राई रत्ती को देकर पहाड़ सा यश लूटने का ही अवसर मिलेगा तो ही कुछ देगा ऐसा व्यक्ति ही धनी बन सकता है। सामाजिक न्याय का तकाजा यह है कि हर व्यक्ति उत्पादन तो भरपूर करे पर उस उपार्जन के लाभ में दूसरों को भी सम्मिलित रखे। सब लोग मिल−जुलकर खायें। जिऐं और जीने दें। दुख और सुख को सब लोग मिल बाँट कर भोगें। यह दोनों ही भार यदि एक के कंधे पर आ पड़ते हैं तो वह दब कर चकनाचूर हो जाता हैं। पर यदि सब लोग इन्हें आपस में मिल कर बाँट लेते हैं तो किसी पर भार भी नहीं पड़ता, सब का चित्त हलका रहता है और समाज में विषमता का विष भी उत्पन्न नहीं हो पाता।

आर्थिक ही नहीं, सामाजिक समता भी

जिस प्रकार आर्थिक समता का सिद्धान्त सनातन और शाश्वत है उसी प्रकार सामाजिक समता का− मानवीय अधिकारों की समता का आदर्श भी अपरिहार्य है। इसको चुनौती नहीं दे सकते। किसी जाति वंश या कुल में जन्म लेने के कारण किसी मनुष्य के अधिकार कम नहीं हो सकते और न ऊँचे माने जा सकते हैं। छोटे या बड़े होने की, नीच या ऊँच होने की कसौटी गुण,कर्म,स्वभाव ही हो सकते हैं। अपनी व्यक्तिगत विशेषताओं के कारण किसी का न्यूनाधिक मान हो सकता है। पर इसलिए कोई कदापि बड़ा या छोटा नहीं माना जा सकता कि उसने अमुक कुल में जन्म लिया है। इस प्रकार की अविवेकपूर्ण मान्यताऐं जहाँ भी चल रही हैं वहाँ कुछ लोगों का अहंकार और कुछ लोगों का दैन्य भाव ही कारण हो सकता है। अब उगती हुई दुनियाँ इस प्रकार के कूड़े कबाड़ जैसे विचारों को तेजी से हटाती चली जा रही है। अफ्रीका और अमरीका में जहाँ गोरी, काली जातियों में नीच ऊँच की भावना मौजूद है उनका विरोध विश्व का सारा लोकमत कर रहा है। विचारशील क्षेत्रों से इस भेदभाव की भरपूर भर्त्सना की जा रही है और यह निश्चित है कि यह भेदभाव चंद दिनों का मेहमान है। सामाजिक समता की मान्यता को ही सर्वत्र स्वीकार किया जायेगा। भारत में जातियाँ नियत कामों और व्यवसायों को वंश परम्परा के साथ अधिक दक्षता के साथ उन्नत करते चलने की दृष्टि से बनी थीं। उनके निर्माताओं ने कभी स्वप्न में भी यह न सोचा होगा कि एक दिन इस पुनीत परम्परा में नीच−ऊँच का विष भी मिल जायेगा। पर आज तो यही विडम्बना चल रही है। गुण, कर्म, स्वभाव की उपेक्षा करके लोग केवल वंश और जाति के आधार पर ऊँच या नीच होने की मान्यता माने बैठे हैं। इस निरर्थक मूढ़ता का अन्त होना ही है। विवेक का उदय जैसे−जैसे होता जायेगा यह अन्धकार नष्ट होने ही वाला है। समय रहते हम अपनी समझदारी का परिचय देते हुए कुछ पहले ही छोड़ सकें तो वह एक प्रशंसा की बात ही होगी।

वर्ण और लिंग के अनुपयुक्त भेद भाव

स्त्रियों के बारे में पुरुषों ने जो ऐसी मान्यता बना रखी है कि वे उनकी गाय, भैंस जैसी सम्पत्ति हैं यह बहुत ही अनुपयुक्त है। कुछ शारीरिक अवयवों में भिन्नता या महत्ता नहीं मानी जा सकती है। इतिहासकार जानते हैं कि लाखों वर्षों तक संसार में ‘मातृकुल’ पद्धति का प्रचलन रहा है। माताऐं अपने परिवार की स्वामिनी होती थीं, नर उन्हीं के अनुशासन में रहते थे। अभी भी भारत के केरल प्रान्त में मातृकुलों का प्रचलन है। इससे यह सिद्ध नहीं होता कि स्त्री बड़ी और पुरुष छोटा है। यह सुविधा और व्यवस्था की बात है। उपार्जन कार्य जिसके हाथ होता है वह इस पूँजीवाद युग में स्वतः बड़ा माना जाने लगता है। आमतौर से पुरुष कमाते हैं इसलिए वे स्त्रियों पर मनमानी चलाते है। जहाँ स्त्रियाँ कमाती हैं, वहाँ पुरुषों को उनका अनुशासन मानना पड़ता है, यह अर्थ तन्त्र की एक प्रतिक्रिया मात्र है। मानवीय अधिकारों की मूलभूत आस्था पर इसका प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। स्त्रियाँ पुरुषों की दास हैं। यह मान्यता किसी भी प्रकार सामाजिक न्याय के अनुकूल नहीं। परस्पर प्रेम और सद्भाव से तो कुत्ते,घोड़े तक मनुष्य के ऊपर प्राण निछावर करने को तैयार हो जाते हैं। फिर स्त्री,पुरुष जिनकी अपूर्णता ही एक दूसरे के द्वारा पूर्ण होती है प्रेम और सौजन्य होने पर दो शरीर एक आत्मा बनकर क्यों न रहेंगे? वह कार्य बन्धनों और प्रतिबन्धों द्वारा संभव नहीं हो सकता।

हमें हर मानव प्राणी के मौलिक अधिकारों को स्वीकार करना ही चाहिए। हर व्यक्ति समान नागरिक अधिकार लेकर जन्मा है इस तथ्य को स्वीकार किया ही जाना चाहिए। जब तक उनके सामाजिक अधिकारों को स्वीकार न किया जायेगा, उन्हें कैदखाने का पशु मात्र बनाकर रखा जायेगा तब तक हमारी आधी जनता गुलाम की गुलाम बनी रहेगी। राजनैतिक स्वतंत्रता मिलने से हमें समता और स्वाधीनता के अधिकार मिलें हैं पर अभी भी स्त्रियों के रूप से आधा भारत उस अधिकार से वंचित है। शूद्रों की एक चौथाई जनता भी इन अधिकारों से वंचित है। इसे यों कहा जा सकता है कि उच्चवर्ण के पुरुषों को, जिनकी संख्या मूल आबादी की एक चौथाई मात्र है। मानसिक स्वाधीनता के अधिकार मिले हैं। तीन चौथाई जनता को भी यह अधिकार मिलने चाहिए। इसके बिना हमारी एक चौथाई स्वाधीनता सर्वथा अपूर्ण और अपर्याप्त ही बनी रहेगी।

व्यक्ति और समाज की अभिन्नता

यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि हम समाज के अभिन्न अंग हैं। जिस प्रकार एक शरीर से संबद्ध सभी अवयवों का स्वार्थ परस्पर संबद्ध है उसी प्रकार सारी मानव जाति एक ही नाव में बैठी हुई है। घड़ी का एक पुर्जा खराब हो जाने पर सारी मशीन ही बन्द हो जाती है। शरीर का एक अंग पीड़ित होने पर उसका प्रभाव अन्य अवयवों पर पड़ता है। उसी प्रकार हम सब एक ही सूत्र में पिरोये हुए मन को की तरह परस्पर संबद्ध हैं। प्रत्येक कड़ी के ठीक तरह जुड़े रहने से ही जंजीर की मजबूती है। उनका बिखरना शुरू हो जाय तो जंजीर नाम की कोई चीज न रहेगी। तिनके पृथक-पृथक दिशा में अपना स्वार्थ लेकर चल पड़े तो रस्सी कैसे बनी रह सकेगी। सीकें यदि आत्म समर्पण न करें तो बुहारी कैसे बनेगी। पानी की बूँदें अपने अपने स्वार्थ अलग सोचें तो इतना विशाल समुद्र कैसे बन सकेगा? जाति और राष्ट्र का अस्तित्व इसीलिए है कि विशाल जनता उसमें आत्मसात हुई होती है। पृथकता की भावना रखने वाले, भिन्न स्वार्थों, भिन्न आदर्शों और भिन्न मान्यताओं वाले लोग कहीं बहुत बड़ी संख्या में भी इकट्ठे हो जाएँ तो वे एक राष्ट्र, समाज एक जाति नहीं बन सकते। एकता के आदर्शों में बँधे हुए और उस आदर्श के लिए सब कुछ निछावर कर देने की भावना वाले व्यक्तियों का समूह ही समाज या राष्ट्र है। शक्ति का स्त्रोत यही है। परस्पर मिल जुलकर ऐसी भावना का विकास करने से ही हमारी सर्वांगीण प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।

अपने सीमित वर्ग के स्वार्थ की बात सोचना अध्यात्मवादी आदर्शों के विपरीत है, हमें सबके हित में अपना हित सोचना चाहिए। शरीर का एक अंग बहुत बड़ा हो जाय तो वह बेडौल लगेगा। कुछ लोग धनी, समृद्ध, सम्पन्न, विद्वान−धर्मात्मा, ज्ञानी, बलवान बन जाएँ तो इतने मात्र से किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति होने वाली नहीं । हम सब सुखी रहेंगे, सम्पन्न बनेंगे, स्वस्थ रहेंगे, सद्चरित्र बनेंगे तो ही प्रत्येक की सुख शान्ति सुरक्षित रह सकेगी। चोर व्यभिचारी और हत्यारों के बीच में निवास करने वाला कोई सज्जन व्यक्ति भी अपनी शक्ति सुरक्षित नहीं रख सकता। फिर सामाजिक अव्यवस्था के बीच व्यक्तिगत स्वार्थ साधन की बात सोचते रहने पर भी हम कहाँ कुछ लाभ कमा सकेंगे? और यदि कमा भी लिया तो उसे कहाँ कुछ सुरक्षित रख सकेंगे? कहाँ उसका उपयोग कर सकेंगे?

उत्थान और पतन के रास्ते

व्यक्तिगत स्वार्थ को सामूहिक स्वार्थ के लिए उत्सर्ग कर देने का नाम ही पुण्य, परमार्थ है, इसी को देशभक्ति, त्याग, बलिदान, महानता आदि नामों से पुकारते हैं। इसी नीति को अपना कर मनुष्य महापुरुष बनता है, लोकहित की भूमिका सम्पादन करता है, अपने आदर्श से अनेकों को प्रेरणा देता है, और अपने देश समाज का मुख उज्ज्वल करता है। मुक्ति और स्वर्ग का रास्ता भी यही है। भगवान को प्राप्त करने की मञ्जिल भी यही है। आत्मा की शान्ति और सद्गति भी उसी पर निर्भर है। इसके विपरीत दूसरा रास्ता वह है जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए सारे समाज का अहित करने के लिये मनुष्य कटिबद्ध हो जाता है। दूसरे चाहे जितनी आपत्ति में फँस जायँ, चाहे जितनी हानि और पीड़ा उठावें पर अपने के लिए किसी की कुछ परवा न की जाय। अपराधी मनोवृत्ति इसी को कहते हैं। नरक का रास्ता यही है। देश द्रोह, समाज द्रोह, धर्म द्रोह इसी को कहते हैं। आत्म हनन का, आत्म पतन का मार्ग यही है। इसी पर चलते हुए व्यक्ति नारकीय यंत्रणा से भरे हुये और सर्वनाश के गर्त में गिरता है।

सबके स्वार्थ में अपने स्वार्थ का समर्पण करके, व्यक्तिगत स्वार्थ से सामूहिक स्वार्थ का अधिक ध्यान रखने का आदर्श युग निर्माण संकल्प में इसीलिये सन्निहित रखा गया है कि हमारा सर्वांगीण विकास संभव हो सके। सब लोग परस्पर मिलजुल कर एक दूसरे को आगे बढ़ाने, ऊँचा उठाने, सुखी बनाने में सहयोग करेंगे तो वह युग समीप ही दिखाई देगा जिसकी पुनः स्थापना के लिये हम कटिबद्ध हुये हैं।


सद्गुणों की सच्ची सम्पत्ति

“नागरिकता, नैतिकता, मानवता सच्चरित्रता, शिष्टता उदारता, आधीनता, मानवता, सहिष्णुता जैसे सद्गुणों को सच्ची सम्पत्ति समझकर उन्हें व्यक्तिगत जीवन में निरन्तर बढ़ाता चलूँगा । साधना, स्वाध्याय संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने दूँगा। चारों और मधुरता, स्वच्छता एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करूँगा।”

युग निर्माण संकल्प का द्वितीय अनुच्छेद (पैराग्राफ) आत्म−सुधार की प्रेरणा उपलब्ध करने के लिये है। इस संसार का एक सुनिश्चित तथ्य है कि अपनी मुखाकृति ही बाहर के दर्पण में दीखती है। संसार एक दर्पण के समान है। हम जैसे भी कुछ सुन्दर कुरूप हैं वैसी ही छाया दर्पण में खड़ी दिखाई पड़ती है। सज्जनों के साथ यह दुनिया सज्जनता का बरताव करती है। सन्तों का सम्मान होता है, परोपकारियों के चरणों में लाखों मस्तक झुकते हैं। स्वार्थियों से घृणा की जाती है, कटुभाषियों का तिरस्कार होता है, कुकर्मियों की प्रताड़ना की जाती है। क्रोधी और आवेशग्रस्तों को भर्त्सनापूर्ण व्यवहार उपलब्ध होता है। अविश्वासी लोग अपने चारों ओर शत्रु ही शत्रु देखते हैं, गन्दे गलीजों को बीमारी और काहिल आलसियों को दरिद्रता घेरे रहती है।

आन्तरिक स्थिति का बाह्य प्रतिबिम्ब

चिन्ता में डूबे रहने वाले अपना खून सुखाया करते हैं। निराश, कायर, संशयी, भयभीत लोगों को अपना भविष्य अन्धकारमय दीखता रहता है तथा कोई अप्रत्याशित विपत्ति टूट पड़ने की आशंका बनी रहती है। इसके विपरीत साहसी पुरुषार्थी और आशावादी लोग पर्वतों की चोटी पर से अपना रास्ता बना लेते हैं। अपने स्वभाव में नम्रता, मधुरता, सदाशयता और भलमनसाहत की समुचित मात्रा समाविष्ट कर लें तो प्रत्युत्तर में हर दिशा से स्नेह, सहयोग और सम्मान उपलब्ध होने के साथ−साथ समृद्धि एवं प्रगति के अवरुद्ध द्वार भी खुल जाते हैं। मुक्ति और स्वर्ग जैसी अध्यात्मिक सफलताऐं ऋद्धियाँ सिद्धियाँ एवं विभूतियाँ भी आत्म−सुधार पर ही निर्भर रहती हैं। यह एक प्रत्यक्ष तथ्य है कि साधना रूपी औषधि तभी काम करती है जब आत्म−सुधार रूपी पथ्य का समुचित ध्यान रखा जाय। दुर्गुणों और दुर्भावों से भरे दुष्ट मानस वाले व्यक्ति न इस लोक में कोई सफलता पाते हैं न परलोक में उनकी सद्गति होती है।

भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से आत्म−सुधार अत्यन्त आवश्यक कार्य है। अपनी गलतियों को ढूँढ़ना, अपनी बुरी आदतों को समझना, अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को अनुभव करना और उन्हें सुधारने के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहना यही जीवन संग्राम है। भगवान ने गीता में इसी महाभारत रूपी संग्राम को निरन्तर जारी रखने की प्रेरणा दी थी और कहा था कि इसमें हारना या जीतना दोनों ही श्रेयस्कर हैं। आत्म−निमार्ण के व्यापक आन्दोलन का नाम ही युग−निर्माण है। एक−एक सींक मिल कर झाडू बनती है, इसी प्रकार सुधरे हुए एक−एक व्यक्ति जब बड़ी संख्या में बढ़ने लगेंगे तब युग बदल जायेगा। युग−निर्माण से तात्पर्य है व्यक्ति निर्माण और व्यक्ति निर्माण का अर्थ है गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से मानवीय विशेषताओं से परिपूर्ण व्यक्तित्व का विकास। इस लक्ष की पूर्ति के लिए यह आवश्यक है कि हर व्यक्ति अपनी निजी त्रुटियों एवं दुर्बलताओं पर अधिकाधिक ध्यान दे और उन्हें सुधारने के लिए प्राणप्रण से प्रयत्न करे। इसी क्रिया प्रणाली को अपना कर हम सब आगे बढ़ रहे हैं। सत् संकल्प के द्वितीय अनुच्छेद में इसी का स्पष्टीकरण किया गया है।

सच्ची और स्थिर सम्पत्ति

आमतौर से धन दौलत को, जेवर जायदाद को सम्पत्ति समझा जाता है। इन्हीं के उपार्जन के लिए हर किसी का मन ललचाता रहता है। अपनी−अपनी परिस्थिति योग्यता और चतुरता के आधार पर लोग इन्हें कमाते भी हैं और जो सुख सुविधा इनके द्वारा प्राप्त की जा सकती है उसका उपयोग भी करते हैं। जन प्रवृत्ति की इस धारा पर गंभीरता पूर्वक विचार करने से यह प्रयत्न अधूरा, एकांगी एवं दोषपूर्ण ही सिद्ध होता है। धन सम्पत्ति भी उसी के लिए सुखदायक हो सकती है जिसके पास सद्गुणों की आध्यात्मिक सम्पत्ति होगी। यदि उसका अभाव रहा तो धन दौलत पाकर लोगों के दिमाग ही खराब होते हैं। वे अहंकारी उद्दंड, अत्याचारी अपव्ययी, शेखीखोर व्यसनी लालची और कुकर्मी बनते हैं। निरन्तर असन्तोष में डूबे रहते हैं और ईर्ष्या द्वेष की जंजीरों से बुरी तरह जकड़ जाते हैं। सद्गुणी व्यक्ति उपलब्ध संपदा के सदुपयोग से जहाँ अपना और अपने परिवार का जीवन क्रम सुविकसित बनाते हैं वहाँ वे समाज के लिए लाभदायक पुण्य परमार्थों का भी आयोजन करते हैं। इस दृष्टि से धन सम्पत्ति की उपयोगिता तभी रह जाती है जब उसके साथ सद्गुणों की सम्पत्ति भी समन्वित हो । सद्गुणी रहने पर सम्पत्ति उपार्जित की जा सकती है, पर दुर्गुणी के लिए उत्तराधिकार आदि प्रारब्धजन्य किसी कारणवश प्राप्त हुई सम्पदा भी न केवल कुछ ही दिन में स्वाहा हो जाती है वरन् अनेकों प्रकार की विपत्तियाँ भी उत्पन्न करके रख देती है। इसलिए धन दौलत को झूठी और सद्गुणों को सच्ची सम्पदा कहा गया है। झूठी सम्पत्ति कमाने से नहीं, सच्ची सम्पत्ति के संग्रह में ही मनुष्य की बुद्धिमत्ता परखी जाती है।

अस्थिर और चंचल चपला

नागरिक कर्तव्यों का ध्यान रखना, भौतिकता, मानवता, सच्चरित्रता, शिष्टता, उदारता, आत्मीयता, दूसरों के सुख दुख में अपने जैसी सुख−दुख की अनुभूति, दूसरों की भावनाओं का आदर करते हुए सहिष्णुता, समन्वय और समझौता करके चलने की उदारता, मीठा बोलना, शिष्टाचार बरतना और हर कार्य में मुस्तैदी तथा सज्जनता का परिचय देना आदि कितने ही ऐसे सद्गुण हैं जिनको अधिकाधिक मात्रा में निरन्तर बढ़ाते चलने का प्रयत्न हमें करते रहना चाहिए। यह सम्पत्ति जिसने जितनी मात्रा में एकत्रित कर ली, वस्तुतः वही सच्चे अर्थों में उतने धन का धनी माना जायेगा। पैसा अस्थिर है, लक्ष्मी को चंचल कहा गया है। परिस्थितियों के दो थपेड़ों में जीवन भर की कमाई देखते−देखते नष्ट हो सकती है। बीमारी, मुकदमा, चोरी, विवाह−शादी, घाटा, आपत्ति आदि के एक दो थपेड़ों में ही धनवानों को निर्धन होते हम रोज ही देखते हैं। पर सद्गुणों की सम्पत्ति ऐसी है जो हर विपत्ति के बाद और भी अधिक प्रखर बनती है। हर अग्नि संस्कार के बाद सोना अधिक खरा बनता चलता है। विपत्तियों और कठिनाइयों में भी सद्गुणों का जो परिचय दिया जाता है वह इतिहास की एक अमर गाथा बनकर रह जाता है। कर्ण का युद्धस्थल में घायल पड़े होने पर भी अपना दाँत तोड़कर उसमें लगा सोना दान करने का यश तब तक अजर अमर रहेगा जब तक यह धरती आकाश कायम है। हरिश्चन्द्र, शिवि, दधीच, मोरध्वज , शैव्या, सीता आदि ने अपने सद्गुणों की परीक्षा दी थी पर इससे उनकी यह आध्यात्मिक सम्पदा विजय पताका के रूप में सदा फहराते रहने के लिए अजर अमर हो गई। मानव जीवन की यही सच्ची सम्पत्ति है और उसे ही निरन्तर बढ़ाते चलने का प्रयत्न करना चाहिए। छाया की भाँति धन-दौलत की लौकिक सम्पत्ति तो अनायास ही सच्ची सम्पदा के सद्गुणों के पीछे−पीछे चला करती हैं।

साधना अनिवार्य है

शास्त्रों में आत्म निर्माण के चार साधन बताये गये हैं (1) साधन (2) स्वाध्याय (3) संयम (4)सेवा, इन चारों की वही उपयोगिता है जो शरीर में हाथ पैरों की है। इनके बिना आत्म−कल्याण की दिशा में एक कदम भी आगे बढ़ सकना संभव नहीं हो सकता। ईश्वर उपासना को दैनिक जीवन में से बिलकुल हटा देना किसी भी प्रकार उपयुक्त नहीं। मन न लगने पर भी किसी न किसी प्रकार आदत में इसे सम्मिलित करने के लिए साधना का कुछ न कुछ अभ्यास नित्य ही करते रहना चाहिए। आत्म शक्ति जब कभी जिस किसी को भी प्राप्त हुई है तब उसमें आस्तिकता और उपासना का कोई न कोई अंश जरूर रहा है। भले ही हम बिस्तर से उठते और सोते समय पन्द्रह−पन्द्रह मिनट भगवान सर्वव्यापक, निष्पक्ष न्यायकारी, विचार और कार्यों के अनुरूप प्रसन्न एवं अप्रसन्न होने वाले परमात्मा का ध्यान और स्मरण किया करें, पर किसी न किसी रूप से दैनिक उपासना तो किया ही करें। नित्य कर्म से निवृत्त होकर विधिवत् थोड़ी पूजा बन पड़े, इसमें फुरसत का प्रश्न नहीं, अभिरुचि का प्रश्न है। थोड़ी अभिरुचि इधर बढ़ते ही इस मार्ग से आनन्द आने लगता है और फुरसत उसके लिए सहज ही मिल सकती है। आस्तिकता और उपासना की मानव जीवन में कितनी अधिक आवश्यकता और उपयोगिता है इसका उल्लेख मार्च की ‘अखंड−ज्योति’ में किया जा चुका है। उपासना निश्चित रूप में एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक पुरुषार्थ है। इस दिशा में लगाया हुआ थोड़ा सा समय भी किसी भी लाभदायक कार्य में किये गये श्रम की अपेक्षा कम महत्वपूर्ण एवं लाभदायक सिद्ध नहीं होता।

स्वाध्याय की महत्ता

स्वाध्याय की उपयोगिता पिछले लेख में बताई जा चुकी है। मैले कपड़े को साफ करने के लिए जो उपयोगिता साबुन की है वही मन पर चढ़े हुए मैल को शुद्ध करने के लिए स्वाध्याय की है। मनुष्य के पास सर्वोत्तम विशेषता उसकी विचार बुद्धि की ही है और इन विचारों का सही एवं सुसंस्कृत बनना स्वाध्याय पर निर्भर है। श्रेष्ठ पुरुषों की कमी, उनके पास समय का अभाव और अपने लिए भी समुचित फुरसत की कमी रहने के कारण अब उपयुक्त सत्संग की व्यवस्था बन सकना कठिन है, ऐसी दशा में जीवन निर्माण के श्रेष्ठ साहित्य का स्वाध्याय ही सत्संग की आवश्यकता को भी पूरी करता है। विचारों का निर्माण ही जीवन निर्माण है, इसलिए स्वाध्याय की उपयोगिता आहार से भी बढ़कर हो जाती है। जिस प्रकार भोजन त्याग कर शरीर को जीवित रख सकना कठिन है, इसी प्रकार स्वाध्याय की उपेक्षा करके, उसका परित्याग करके कोई व्यक्ति न तो अपने आत्मिक स्तर को ऊँचा उठा सकता है और न स्थिर रख सकता है । बिना पढ़े लोगों के लिए भी उचित है कि वे श्रेष्ठ साहित्य का स्वाद किया करें। दुर्भिक्ष काल में जिस प्रकार साधन सम्पन्न लोग भूखों मरते हुओं को अन्न की व्यवस्था जुटाते हुए पुण्य लाभ करते हैं उसी प्रकार स्वाध्यायशील अपने घर के तथा बाहर के अशिक्षितों को पढ़ाकर सयाना करें और उनके आत्मिक जीवन को हरा−भरा रखने में अपने पसीने से सिंचन करने के महान पुण्य प्राप्त किया करें। ज्ञान दान इस संसार का सर्वश्रेष्ठ दान है। इसकी तुलना और किसी बड़े से बड़े पुण्य के साथ भी नहीं हो सकती ।

सर्वांगीण संयम

इन्द्रियों का संयम तो आवश्यक है। चटोरेपन और काम−वासना पर तो कड़ा नियंत्रण होना ही चाहिए। साथ ही स्वभाव और विचारों का संयम भी आवश्यक है। विचारों को अनुपयुक्त दिशा में जाने से रोकने के लिए उनके विरोधी विचार करने की आदत डालनी चाहिए। लोहे को लोहा काटता है, काँटे से काँटा निकलता है, विचारों से विचार कटते हैं। बुरे विचार जब भी मन में आवें तब उनके ठीक विरोधी विचार करना आरम्भ कर देना चाहिए। जिस प्रकार दोनों पक्ष के वकीलों की बहस सुनने पर अदालत सही निर्णय दे सकने के लायक अपना निष्कर्ष निकाल पाती है, उसी प्रकार कुविचारों के साथ−साथ यदि सद्विचारों का पक्ष भी प्रस्तुत किया जाय तभी विवेक द्वारा कुछ सही निर्णय किये जाने की आशा रहती है। यदि कोई अदालत केवल एक ही पक्ष के बयान, गवाह एवं बहस सुने, दूसरे पक्ष की बात कहने सुनने वाला कोई न हो तो अदालत को सही बात समझने में कठिनाई रहेगी और ठीक निर्णय दे सकना उसके लिए कठिन हो जायेगा। एक पक्षीय विचार मन में उठने लगें तो बुद्धि का झुकाव उन्हीं की ओर हो जाता है और वैसे ही कार्य करने का आदेश दे देती है।

हमारे निर्णय ठीक हों इसलिए यह नितान्त आवश्यक है कि कुविचारों के ठीक विरोधी सद्विचारों वाला पहलू भी हम बुद्धिरूपी अदालत के सामने निरन्तर प्रस्तुत करते रहें। हर बात के दो पहलू होते हैं, दोनों पर विचार कर लेने से बौद्धिक संयम का लाभ प्राप्त होता है फिर हम आवेश उत्तेजना या भावुकता में कोई एक पक्षीय निर्णय कर बैठने के खतरे में नहीं पड़ते। स्वभाव का संयम आवेश और उत्तेजना से संबद्ध है। छोटी−छोटी बातों पर कई व्यक्ति बहुत अधिक उत्तेजित हो उठते हैं। क्रोध, आवेश, द्वेष, मैत्री, उदारता, भावुकता आदि की दुर्गति कर देते हैं, उस आवेश से उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों के संबन्ध में विचार नहीं करते और समय निकल जाने पर पछताते रहते हैं। स्वभाव का छिछोरापन छुड़ा कर उसे संजीदा और गंभीर बनाना मानसिक संयम की प्रमुख प्रक्रिया है। जब हमारा संयम इन्द्रिय निग्रह तक ही नहीं, विचार और स्वभाव के नियंत्रण क्षेत्र में भी कारगर होता है तब भी संयमशीलता की सफलता मानी जाती है।

सेवा का सोमरस

सेवा वह अग्नि है जिसमें तपे बिना कोई अन्तःकरण शुद्धता निर्मलता, उदारता एवं आध्यात्मिकता की कसौटी पर खरा उतर सकने योग्य नहीं बन सकता। संन्यास लेने से पूर्व जीवन का एक चौथाई भाग वानप्रस्थ में रहकर समाज सेवा करने के लिए नियत किया हुआ है। जो लोग सेवा धर्म की अत्यंत आवश्यक प्रक्रिया से कतराते हैं और केवल भजन करके आत्मिक प्रगति की आशा करते हैं वे वैसे ही बालक हैं जो प्रथम कक्षा से छलांग मार कर अन्तिम कक्षा उत्तीर्ण करना चाहते हों और बीच की सभी कक्षाओं को छोड़ देना चाहते हों। सद्विचारों का क्रियात्मक रूप सेवा है। आत्मशुद्धि का प्रत्यक्ष चिह्न सेवा एवं परमार्थ में रुचि ही है। जो अपने मतलब से मतलब रखने में चौकस है, जिसे अपने दीन दुखी बन्धु बाँधवो की कठिनाइयों का कोई ध्यान नहीं, जो केवल अपनी ही लौकिक या पारलौकिक उन्नति की स्वार्थ साधना में लगा रहता है वह अभागा चाहे योगी यती ही क्यों न हो, आत्म कल्याण के लक्ष को कदापि प्राप्त न कर सकेगा। स्वार्थ जब तक परमार्थ में न बदलेगा तब तक आत्मा भी परमात्मा पद को प्राप्त नहीं कर सकती।

सेवा का आत्म सन्तोष से सीधा सम्बन्ध है। परोपकार की दृष्टि से निस्वार्थ भावना से हम जो कुछ करते हैं उसकी प्रतिक्रिया आत्म संतोष के रूप में तुरन्त ही परिलक्षित होने लगती है। आत्म−सन्तोष को ही शास्त्रों में सोमरस कहा गया है उसे ही पीकर ऋषि−मुनि देवपद प्राप्त किया करते थे। सत्कार्यों द्वारा आत्म संतोष की कुछ बूँद जिन्हें उपलब्ध होती रहती हैं वे अपने को कृतकृत्य माने बिना नहीं रह सकते। सामाजिक दृष्टि से भी सेवा एक अत्यन्त उपयोगी प्रक्रिया है उससे पिछड़े हुए लोगों को ऊपर उठने और दीन दुखियों को राहत प्राप्त करने का अवसर मिलता है। दुख और सुख को बाँट लेना आध्यात्मिक साम्यवाद है। सुखी लोग अपने सुख का एक अंग दुखियों को बाँट दें तो उनके ऊपर लदा हुआ सुविधाओं का अनावश्यक भार घट सकता है और मोटे पेट वाले रोगी को वादी छँट जाने से जैसी प्रसन्नता होती है वैसी ही उन्हें भी मिल सकती है। इसी प्रकार दुखियों का दुख थोड़ा−थोड़ा वे लोग बाँट लें जो समर्थ हैं तो उन बेचारों का दुख भी हलका हो सकता है।

एक के पास नमक दूसरे के पास शक्कर हो और दोनों अपने−अपने से ही काम चलाएँ तो दोनों के भोजन अस्वादिष्ट रहेंगे पर यदि वे दोनों आपस में बाँट लें तो नमकीन और मीठे स्वाद का व्यंजन दोनों को ही मिल सकता है। धन के बँटवारे की माँग भौतिक साम्यवाद के क्षेत्रों से उठ रही है। आध्यात्मिक साम्यवाद की माँग दुख और सुख के बँटवारे की है। इसी का सक्रिय रूप सेवा धर्म है। सेवा सदाचार का अंग है,अध्यात्म का प्रमुख सोपान समाज की प्रगति का इसे आधार स्तम्भ कह सकते हैं। सहयोग और सामूहिकता की सत्प्रवृत्तियाँ सेवा बुद्धि की उदारता होने पर ही पनप सकती हैं और उनके पनपने पर ही कोई राष्ट्र सुसम्पन्न एवं समुन्नत हो सकता है।

सज्जनोचित शिष्ट व्यवहार

चारों ओर मधुरता, स्वच्छता एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करना मनुष्यता का आवश्यक गुण है। चंदन का वृक्ष अपने आस-पास के पेड़-पौधों को भी अपने समान सुगन्धित बना लेता है, दीपक स्वयं प्रकाशित होता है और अपनी आदत से समीपवर्ती क्षेत्र को आलोकित कर देता है, बर्फ के आस−पास की हवा ठंडी हो जाती है और अग्नि के समीप मनुष्य में मानवोचित गुण हैं या नहीं, इसकी परीक्षा यह है कि वह अपने सम्पर्क की वस्तुओं को, देह, वस्त्र, घर औजार आदि उपकरणों को स्वच्छ रखता है या नहीं, गंदा, गलीज, मैला, कुचैला, फूहड़, अव्यवस्थित व्यक्ति एक प्रकार का पशु ही माना जायेगा। मन और स्वभाव में स्वच्छता होगी तो उसके आस−पास भी सफाई का वातावरण दृष्टिगोचर होगा। भीतर की सज्जनता बाहर नम्रता और मधुरता बनकर मुखरित होती है। कठोर वाणी केवल कठोर हृदय व्यक्ति ही बोल सकता है। जिसके व्यवहार में अहंकार, उद्दंडता, कटाक्ष, व्यंग्य, निंदा, तिरस्कार, उपहास जैसे भाव टपकते हैं वह व्यक्ति वस्तुतः दुष्ट है। यदि हम किसी को कुछ दे नहीं सकते तो कम से कम मनुष्योचित नम्र और मधुरवाणी में उत्तर तो दे ही सकते हैं। मीठी और कड़ुई वाणी के कारण ही कोयल को प्रशंसा और कौए को निन्दा का भाजन बनना पड़ता है। हम यदि स्वच्छता मधुरता और सज्जनता का शिष्ट व्यवहार करना भी नहीं जानते तो क्योंकर मनुष्य कहलाने के अधिकारी बन सकते हैं? जिसके आस−पास का वातावरण गंदगी, द्वेष, असन्तोष और क्षोभ से भरा हुआ है उसे मनुष्योचित सद्गुणों से रहित ही माना जायेगा। हमारा कर्तव्य है कि हम चन्दन वृक्ष की तरह बनें और अपनी सुगंधि से सारे समीपवर्ती क्षेत्र को सुवासित बनाएँ।


विवेक को विजयी बनाया जाय

“परमात्माओं की तुलना में विवेक को महत्व दूँगा। अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा, नीति पथ पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करूँगा। मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं, उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को रखूँगा।”

उचित अनुचित का, लाभ हानि का, निष्कर्ष निकालने और किधर चलना, किधर नहीं चलना इसका निर्णय करने के उपयुक्त बुद्धि भगवान ने मनुष्य को दी है। उसी के आधार पर उसकी गतिविधियाँ चलती भी हैं। पर देखा यह जाता है कि दैनिक जीवन की साधारण बातों में जो विवेक ठीक काम करता है वही महत्वपूर्ण समस्या सामने आने पर कुंठित हो जाता है। परम्पराओं की तुलना में तो किसी विरले का ही विवेक जागृत रहता है, अन्यथा आन्तरिक विरोध रहते हुए भी लोग पानी में बहते हुए तिनके की तरह अनिच्छित दिशा में बहने लगते हैं। भेड़ों का झुण्ड जिधर भी चल पड़े उसी ओर सब भेड़ें बढ़ती जाती हैं। एक भेड़ कुएँ में गिरती हुई अपने प्राण गँवाने लगती है। देखा−देखी की नकल बनाने की प्रवृत्ति बन्दर में पाई जाती है वह दूसरों को जैसा करते देखता है वैसा ही खुद भी करने लगता है। इस अन्धानुकरण की आदत को जब मनुष्यों में भी इतनी बुरी तरह घुसा देखा जाता है तो अनायास ही डार्विन की उस थ्योरी को मान लेने के लिए मन करता है जिसके अनुसार उसने यह सिद्ध करने की कोशिश की है कि आदमी बन्दर की औलाद है।

नशेबाजी का भेड़ियाधसान

समाज में प्रचलित कितनी ही प्रथाऐं ऐसी हैं जिनमें लाभ रत्ती भर भी नहीं हानि अनेक प्रकार से है पर एक की देखा−देखी दूसरा उसे करने लगता है। बीड़ी और चाय का प्रचार दिन−दिन बढ़ रहा है। छोटे−छोटे बच्चे बड़े शौक से उन्हें पीते हैं। सोचा यह जाता है कि यह चीजें बड़प्पन अथवा सभ्यता की निशानी हैं। इन्हें पीना एक फैशन की पूर्ति करना है और अपने को अमीर, धनवान साबित करना है। ऐसी ही कुछ भ्रान्तियों से प्रेरित होकर शौक, मौज, फैशन जैसी शेखीखोरी की भावना से एक की देखा−देखी दूसरा इन नशीली वस्तुओं को अपनाता है और अन्त में एक बुरी कुटेव के रूप में वह लत ऐसी बुरी तरह लग जाती है कि छुड़ाये नहीं छूटती। यह निर्विवाद सिद्ध हो चुका है कि तमाखू पीने की आदत से आदमी की जिन्दगी कम से कम दस वर्ष घट जाती है। कफ़, खाँसी, रक्त चाप, स्मरण शक्ति का नाश, वीर्य रोग, क्षय तथा केन्सर सरीखे रोग तमाखू पीने से उत्पन्न होते हैं। मुँह से साँस के साथ बदबू निकलती है और रोज इतने पैसे खर्च होते रहते हैं जिन्हें यदि इकट्ठे करके बैंक में जमा करते रहा जाता तो कई पीढ़ियों तक चलने वाला एक मकान उतने ही धन से बनाया जा सकता था।

चार आने प्रतिदिन तमाखू में खर्च करने वाला साल में 90 रुपये और तीस वर्ष भी इस लत में गुजारे तो 2700) खर्च करता है। तीस साल में कम से कम इतनी ही ब्याज तो जरूर मिल सकती है। यदि यह पैसे बचाकर रखे गये होते तो बुढ़ापे में 5400) की रकम तो बीड़ी से बचाकर ही रखी जा सकती थी और उसके द्वारा अन्तिम दिन आराम से गुजर सकते थे। चाय का खर्च और भी ज्यादा है। दो चार प्याले पी लेने पर चार आठ आने सहज ठंडे होते हैं। गठिया, मधुमेह, बहुमूत्र, दिल की धड़कन, रक्त विकार, अपच, मलावरोध, दाद, छाजन, मुँह के छाले, पायेरिया, बाल झड़ना आदि कितने ही रोग चाय पीने से होते हैं पैसा तो बीड़ी से भी ज्यादा खर्च होता है जो यदि बचा लिया गया होता तो उपरोक्त बीड़ी वाले क्रम से भी कहीं अधिक होता।

चाय, बीड़ी, भाँग, गाँजा, शराब, अफीम आदि सभी नशीली चीजें एक भयंकर दुर्व्यसन हैं। इनके द्वारा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट होता है और आर्थिक स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ता है। हर नशेबाज स्वभाव की दृष्टि से दिन−दिन घटिया आदमी बनता जाता है। क्रोध, आवेश, चिन्ता, निराशा, आलस, निर्दयता, अविश्वास आदि कितने ही मानसिक दुर्गुण उपज पड़ते हैं। समझाने पर या स्वयं विचार करने पर हर नशेबाज इस लत की बुराई को स्वीकार करता है पर विवेक की प्रखरता और साहस की सजीवता न होने से कर कुछ नहीं पाता। एक अन्ध परम्परा में अन्धी भेड़ की तरह बहता चला जाता है। क्या यही मनुष्य की बुद्धिमत्ता है?

कुरीतियों का अपव्यय

सामाजिक कुरीतियों से हिन्दू समाज इतना जर्जर हो रहा है कि इन विकृतियों के कारण जीवन−यापन कर सकना भी मध्य वर्ग के लोगों के लिए कठिन होता चला जा रहा है। बच्चों का विवाह एक नरभक्षी पिशाच की तरह हर अभिभावक के सिर पर नंगी तलवार लिये नाचता रहता है। विवाह के दिन जीवन भर की गाढ़ी कमाई के पैसों को होली की तरह फूँक देने के लिए हर किसी को विवश होना पड़ता है। घर में न हो तो कर्ज लेना पड़ता है। पीछे रहने वाले छोटे बच्चों के शिक्षण एवं पोषण में भारी कटौती करनी पड़ती है। दवादारू तक के लिए लोग मोहताज हो जाते हैं और गरीबी में बेमौत मरने के लिए लोग विवश होते हैं क्योंकि घर में जो कुछ गुँजाइश थी बड़े बच्चों के विवाह की होली में स्वाहा हो चुकी होती है। हत्यारा दहेज कसाई की−सी नंगी छुरी लेकर हमारी बच्चियों का खून पी जाने के लिए निर्भय होकर विचरण करता रहता है। कोई उसका विरोध तक करने का साहस नहीं करता। जैसे भेड़ियों को देखकर बकरी डर के मारे मिमियाना तक बंद कर देती है उसी प्रकार दहेज का अवसर आने पर बड़े−बड़े सुधारकों के मुँह पर भी ताले पड़ जाते हैं। कहते सुना जाता है—क्या करें—बात तो बुरी है, नासमझी की भी, पर सामाजिक प्रथा परम्परा को तोड़ें कैसे? लोग हमें क्या कहेंगे?

मृत्यु भोज, औसर मौसर, नेगचार, मुंडन, डस्टौन, जनेऊ और भी न जाने क्या−क्या ऊट−पटाँग काम करने के लिए लोग विवश होते रहते हैं और जो कुछ कमाते हैं उसका अधिकाँश भाग इन्हीं फिजूलखर्चियों में स्वाहा करते रहते हैं। जेवर बनवाने में रुपये में आठ आने हाथ रहते हैं, जान जोखिम, ईर्ष्या, अहंकार सुरक्षा की चिन्ता, ब्याज की हानि आदि अनेकों आपत्तियाँ उत्पन्न होती हैं फिर भी परम्परा जो है। सब लोग जैसा करते हैं वैसा ही हम क्यों न करें? न करेंगे तो अपनी हेटी होगी, बात बिगड़ेगी, नाक कटेगी, ऐसा सोचते रहने वाले इस भेड़ियाधसान को पार कर ही कैसे सकते हैं? विवेक का परम्पराओं की तुलना में परास्त हो जाना वैसा ही आश्चर्यजनक है जैसा बकरे का शेर की गरदन मरोड़ देना। आश्चर्य की बात तो अवश्य है पर हो यही रहा है। विवेकशीलता झक मारती और परम्परा की विजयवैजन्ती पहने फिरती है। बिल्ली सकपका कर एक कोने में बैठी है और चुहिया चाबुक चमकाती है। यह कौतूहल किसी सरकस में नहीं, हमारे व्यवहारिक जीवन में आये दिन होता रहता है और हम उसके विरुद्ध आवाज तक नहीं उठाते, सोचते तक नहीं।

विवेक को विजयी बनावें

युग−निर्माण के सत्संकल्प में विवेक को विजयी बनाने का शंखनाद है। हम हर बात को उचित अनुचित को कसौटी पर कसना सीखें। जो उचित हो वही करें, जो ग्राह्य हो वही ग्रहण करें, जो करने लायक हो उसी को करें लोग क्या कहते हैं, क्या कहेंगे, इस प्रश्न पर विचार करते समय हमें सोचना होगा कि लोग दो तरह के हैं एक विचारशील दूसरे अविचारी। विवेकशील पाँच व्यक्तियों की सम्मति अविचारी पाँच लाख व्यक्तियों के समान वजन रखती है। विवेकशीलों की संख्या सदा ही थोड़ी रही है वन में सिंह थोड़े और सियार बहुत रहते हैं, एक सिंह की दहाड़, हजार सियारों की हुँआ हुँआ से अधिक महत्व रखती है। सस्ती वाहवाही और उथली निंदा करने वाले अविचारी लोगों से हमारा समाज भरा पड़ा है, उनके संकेतों पर चलने लगा जाय तो इस दुनिया में जीवित रह सकना मुश्किल है। कहते हैं कि एक बार एक टट्टू पर बाप बेटे दोनों चढ़े जा रहे थे लोगों ने देखा तो कहा—कैसे निर्दयी हैं घोड़े को मार लेंगे। फिर दोनों पैदल चलने लगे तो देखने वालों ने कहा—कैसे मूर्ख हैं घोड़ा होते हुए भी दोनों पैदल चलते हैं। इस पर बेटा चढ़ा और बाप पैदल चलने लगा। दर्शक बोले—लड़का कैसा नालायक है बाप को पैदल चलाता है खुद चढ़ा हुआ है। तब बाप चढ़ गया और बेटा पैदल चला। देखने वाले बोले—बुड्ढा कैसा निष्ठुर है बेटे पर तरस नहीं खाता। अन्त में बाप बेटों ने निश्चय किया इन सस्ती निंदा प्रशंसा करने वालों की बात को दो कौड़ी का समझा जाय और वह किया जाय जो हम लोगों को उचित जँचे। ऐसा ही निर्णय हमें भी करना चाहिए। अन्यथा ज्यादा खर्च करने पर इतराने का और कम खर्च करने पर कंजूसी का इल्जाम लगाने वाले तो हर हालत में कुछ न कुछ कहते ही रहेंगे।

सफलता बनाम असफलता

लोगों की दृष्टि में सफलता का ही मूल्य है। जो सफल हो गया, उसी की प्रशंसा की जाती है। देखने वाले यह नहीं देखते कि सफलता नीतिपूर्वक प्राप्त की गई या अनीतिपूर्वक। झूठे, बेईमान, दगाबाज, चोर, लुटेरे भी बहुत धन कमा सकते हैं। किसी चालाकी से कोई बड़ा पद या गौरव भी प्राप्त कर सकते हैं। आप लोग तो उस कमाई और विभूति मात्र को ही देख कर उसकी प्रशंसा करने लगते हैं और समर्थन भी। पर सोचना चाहिए कि क्या यह तरीका उचित है? सफलता की अपेक्षा नीति श्रेष्ठ है। यदि नीति पर चलते हुए परिस्थितिवश असफलता मिली है तो वह भी कम गौरव की बात नहीं। नीति का स्थायी महत्व है, सफलता का अस्थायी। सफलता न मिलने से भौतिक जीवन के उत्कर्ष में थोड़ी असुविधा रह सकती है पर नीति त्याग देने पर तो लोक परलोक आत्म−सन्तोष, चरित्र, धर्म, कर्त्तव्य और लोक हित सभी कुछ नष्ट हो जाता है। ईसा मसीह ने क्रास पर चढ़ कर पराजय स्वीकार की पर नीति का परित्याग नहीं किया। शिवाजी, राणा प्रताप, बन्दा वैरागी, गुरु गोविन्द सिंह, लक्ष्मीबाई, सुभाष बोस आदि को पराजय का ही मुँह देखना पड़ा पर उनकी वह पराजय भी विजय से अधिक महत्वपूर्ण थी। धर्म और सदाचार पर दृढ़ रहने वाले सफलता में नहीं कर्त्तव्य पालन में प्रसन्नता अनुभव करते हैं और इसी दृढ़ता को स्थिर रख सकने को एक बड़ी भारी सफलता मानते हैं। अनीति और असफलता में से यदि एक को चुनना पड़े तो असफलता को ही पसंद करना चाहिए, अनीति को नहीं। जल्दी सफलता प्राप्त करने के लोभ में अनीति के मार्ग पर चल पड़ना ऐसी बड़ी भूल है जिसके लिए सदा पश्चात्ताप ही करना पड़ता है।

प्रतिष्ठा और प्रशंसा

जिस वस्तु से प्रतिष्ठा बढ़ती है, प्रशंसा होती है उसी काम को करने के लिए उसी मार्ग पर चलने के लिए लोगों को प्रोत्साहन मिलता है। हम प्रशंसा और निन्दा करने में, सम्मान और तिरस्कार करने में थोड़ी सावधानी बरतें तो लोगों को कुमार्ग पर न चलने और सत्पथ अपनाने में बहुत हद तक प्रेरणा दे सकते हैं। आमतौर से उनकी प्रशंसा की जाती है जिनने विशेष सफलता, योग्यता, सम्पदा एवं विभूति एकत्रित कर ली है। चमत्कार को नमस्कार किया जाता है। यह तरीका गलत है। विभूतियों को लोग केवल अपनी सुख सुविधा के लिए ही एकत्रित नहीं करते वरन् प्रतिष्ठा प्राप्त करना भी उद्देश्य होता है। जबकि धन वैभव वालों को ही समाज में प्रतिष्ठा मिलती है तो मान का भूखा मनुष्य किसी भी कीमत पर उसे प्राप्त करने के लिए आतुर हो उठता है। अनीति और अपराधों की बढ़ोतरी का एक प्रमुख कारण यह है कि अन्धी जनता हर सफलता की प्रशंसा करती है और हर असफलता को तिरस्कार की दृष्टि से देखती है। धन के प्रति, धनी के प्रति आदर बुद्धि तभी रहनी चाहिए जब वह नीति और सदाचारपूर्वक कमाया गया हो। यदि अधर्म और अनीति से उपार्जित धन द्वारा धनी बने हुए व्यक्ति के प्रति हम आदर बुद्धि रखते हैं तो इससे उस प्रकार के अपराध करने की प्रकृति को प्रोत्साहन ही मिलता है और इस दृष्टि से उस अपराध वृद्धि में हम स्वयं भी भागीदार बनते हैं।

सहयोग और प्रोत्साहन

दूसरों को सन्मार्ग पर चलाने का, कुमार्ग की ओर प्रोत्साहित करने का एक बहुत बड़ा साधन हमारे पास मौजूद है वह है आदर और अनादर। जिस प्रकार वोट देना एक छोटी घटना मात्र है पर उसका परिणाम दूरगामी होता है उसी प्रकार आदर के प्रकटीकरण का भी दूरगामी परिणाम संभव है। थोड़े से वोट चुनाव संतुलन को इधर से उधर कर सकते हैं और उस चुने हुए व्यक्ति का व्यक्तित्व किसी महत्वपूर्ण स्थान पर पहुँच कर राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में अप्रत्याशित भूमिका सम्पादन कर सकता है। थोड़े से वोट व्यापक क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखा सकते हैं और अनहोनी संभावनाऐं साकार बना सकते हैं उसी प्रकार हमारी आदर बुद्धि यदि विवेकपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करे तो कितने ही कुमार्ग पर बढ़ते हुए कदम रुक सकते हैं और कितने ही सन्मार्ग की ओर चलते हुए झिझकने वाले पथिक प्रेरणा और प्रोत्साहन पाकर उस दिशा में तत्परतापूर्वक अग्रसर हो सकते हैं।

जिन लोगों ने बाधाओं को सहते हुए भी अपने जीवन में कुछ आदर्श उपस्थित किये हैं, उनका सार्वजनिक सम्मान होना चाहिए, उनकी प्रशंसा मुक्त कण्ठ से की जानी चाहिए और जो लोग निन्दनीय मार्गों द्वारा उन्नति कर रहे हैं उनकी प्रशंसा एवं सहायता किसी भी रूप में नहीं करनी चाहिए। अवाँछनीय कार्या में सम्मिलित होना भी एक प्रकार से उन्हें प्रोत्साहन देना ही है क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों की उपस्थिति मात्र से लोग उस कार्य में उनका समर्थन मान लेते हैं और फिर स्वयं भी उसका सहयोग करने लगते हैं। इस प्रकार अनुचित कार्यों में हमारा प्रत्यक्ष और परोक्ष समर्थन अन्ततः उन्हें बढ़ाने वाला ही सिद्ध होता है।

मनुष्य के मूल्यांकन की कसौटी

हमें मनुष्य का मूल्याँकन उसकी सफलताओं एवं विभूतियों से नहीं वरन् उस नीति और गतिविधि के आधार पर करना चाहिए जिसके आधार पर वह सफलता प्राप्त की गई। बेईमानी से करोड़पति बना व्यक्ति भी हमारी दृष्टि में तिरस्कृत होना चाहिए और वह असफल और गरीब व्यक्ति जिसने विपन्न परिस्थितियों में भी जीवन के उच्च आदर्शों की रक्षा की उसे प्रशंसा, प्रतिष्ठा, श्रद्धा सम्मान और सहयोग सभी कुछ प्रदान किया जाना चाहिए। यह याद रखने की बात है कि जब तक जनता का, निन्दा प्रशंसा का, आदर तिरस्कार का मापदंड न बदलेगा तब तक गुंडे मूँछों पर ताव देकर अपनी सफलता पर गर्व करते हुए दिन−दिन अधिक उच्छृंखल होते चलेंगे और सदाचार के कारण सीमित सफलता या असफलता प्राप्त करने वाले खिन्न और निराश रह कर सत्पथ से विचलित होने लगेंगे। युग−निर्माण संकल्प में यह प्रबल प्रेरणा प्रस्तुत की गई है कि हम मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी उसकी सफलताओं को नहीं सज्जनता और आदर्शवादिता को ही रखें।


स्वार्थ ही नहीं परमार्थ को भी साधें

“मेरा जीवन स्वार्थ के लिए नहीं परमार्थ के लिए होगा। संसार में सत्प्रयत्नों के पुण्य प्रचार के लिए अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाता रहूँगा।”

भगवान ने मनुष्य को इतनी सारी सुविधाऐं, विशेषताऐं इसलिए नहीं दी हैं कि वह उनसे स्वयं ही मौज−मजा करे और अपनी काम−वासनाओं की आग के भड़कने और फिर उन्हें बुझाने के गोरखधंधे में लगा रहे। यदि मौज मजा करने के लिए ही ईश्वर ने मनुष्य को इतनी सुविधाऐं दी होतीं और अन्य प्राणियों को अकारण इससे वंचित रखा होता तो निश्चय ही वह पक्षपाती ठहरता। अन्य जीवों के साथ अनुदारता और मनुष्य के साथ उदारता बरतने का अन्याय भला वह परमात्मा क्यों करेगा, जो निष्पक्ष, जगत पिता, समदर्शी और न्यायकारी के नाम से प्रसिद्ध है।

मनुष्य की उपलब्ध विभूतियाँ

अन्य प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य को जो कुछ बुद्धि, प्रतिभा, योग्यता, भावना, वाणी, विद्या, चतुरता, सम्पत्ति कला, सौन्दर्य, विज्ञान, सत्ता आदि विभूतियों का वरदान मिला है, वह एक प्रकार की सार्वजनिक अमानत है। राज्यकोष की चाबी खजानची के पास रहती है, इसका अर्थ यह नहीं कि वह खजाना उसके व्यक्तिगत उपयोग के लिए है। फौजी गोला, बारूद और सेना को आज्ञा देने का अधिकार सेनाध्यक्ष के हाथ में रहता है पर इसका अर्थ यह नहीं कि इन सब चीजों का उपयोग वह अपने लाभ के लिए करने लगे। सिक्का ढालने वाले, नोट छापने वाले कर्मचारी अपने निज के लिए यह ढलाई या छपाई करने लगें तो क्या उचित कहा जायेगा? सरकारी राजकाज चलाने के लिए बड़े−बड़े अफसर अधिकारी नियुक्त रहते हैं। उनको सत्ता प्रदान की जाती है उनका उपयोग उन्हें राजकाज के लिए ही करना पड़ता है, अपने निज के लिए तो वे सिर्फ उतना ही खर्च कर सकते हैं जितना उन्हें वेतन मिलता है। मनुष्य भी परमात्मा का जेष्ठ पुत्र होने के कारण एक प्रकार से युवराज, मन्त्री, खजानची, सेनाध्यक्ष, अफसर जैसे पद पर नियुक्त हुआ है। उसे अन्य प्राणियों की तुलना में जो कुछ अधिक मिला है वह सब ईश्वरीय प्रयोजनों को पूर्ण करने के लिए है।

राजा अपने हाथ में रहने वाली सत्ता का ठीक तरह से संचालन करने के लिए जिस प्रकार अपना मंत्रिमंडल नियुक्त कर लेता है मनुष्य की नियुक्ति इसी प्रकार हुई है। निजी खर्च के लिए तो उसको उतना ही वेतन मिला है जितना अन्य प्राणियों को। साम्यवादी देशों की सरकारें अपने कर्मचारियों के वेतन में उनकी योग्यता के अनुरूप थोड़ा अन्तर तो रखती हैं पर वह अन्तर होता बहुत ही स्वल्प है। अन्य प्राणी आहार, विश्राम आदि की उतनी ही सुविधा पाते हैं जितनी प्रकृति उन्हें देती है। मनुष्य स्वादिष्ट व्यंजन, सर्दी−गर्मी निवारण करने के लिए वस्त्र, सुविधाजनक मकान, वाणी, लेखन, अग्निवाहन, अस्त्र−शस्त्र, वैज्ञानिक उपकरण, संगठित समाज, शासन तंत्र आदि की विशेष सुविधाऐं भी प्राप्त करत है यह उसका विशेष वेतन है। इतना प्राप्त करके उसे सन्तुष्ट और प्रसन्न रहना चाहिए क्योंकि अन्य प्राणियों की तुलना में यह वेतन भत्ता बहुत अधिक है।

मानव जीवन की आवश्यक जिम्मेदारी

जीवनोपयोगी अनिवार्य सुविधाऐं उपार्जित करने के बाद मनुष्य को अपनी शेष शक्ति और प्रतिभा का उपयोग जनकल्याण के लिए, लोकहित के लिए, सद्भावनाओं की अभिवृद्धि के लिए करना चाहिए। यही उसकी ड्यूटी और नौकरी है। जो इसे पूरी नहीं करता वह एक प्रकार का अपराधी माना जायेगा और कर्तव्य-पालन की उपेक्षा करने का दंड प्राप्त करेगा। राज कर्मचारियों पर कोई निजी कारोबार न करने का प्रतिबंध रहता है। कारण यह है कि सरकार जानती है कि जीवन निर्वाह के लिए दिये जाने वाले वेतन पर संतुष्ट न रह कर यदि कर्मचारी अधिक उपार्जन के लालच में पड़ा रहेगा तो सरकारी काम की उपेक्षा करेगा इसलिए उसे सचेत कर दिया जाता है कि नियत घंटे तो सरकारी ड्यूटी में लगावे ही, साथ ही बचे हुए घंटे अपनी योग्यता शक्ति और प्रसन्नता बढ़ाने में लगावे ताकि ड्यूटी के काम पूरे करने में कोई विघ्न उत्पन्न न हो। इस प्रतिबंध का उल्लंघन करके निजी सुख साधनों को जुटाने और निजी मौज−मजा करने में यदि कोई कर्मचारी लगा रहने लगे और सरकारी ड्यूटी को तिलाँजलि दे दे तो उसे राजा का कोपभाजन बनना पड़ेगा और अपराध का दंड भी मिलेगा। ईश्वरीय उद्देश्यों को पूर्ण करने में अपनी शक्ति और क्षमता लगाने के लिए गर्भकाल में ही जिससे इकरार नामा लिखा लिया जाता है वह मनुष्य यदि अवसर आने पर धोखा दे, उपलब्धि क्षमताओं को समाज हित की अपेक्षा स्वार्थ साधन में लगाने लगे तो उसका यह कार्य अनुचित भी माना जायेगा और अपराध भी।

खुदगर्जी में ही न लिपटे रहें

युग−निर्माण संकल्प में इस अत्यन्त आवश्यक कर्तव्य की ओर ध्यान आकर्षित किया गया है कि मनुष्य का जीवन स्वार्थ के लिए नहीं, परमार्थ के लिए है। शास्त्रों में अपनी कमाई को आप ही खा जाने वाले को चोर माना गया है। सौ हाथों से कमाने और हजार हाथों से दान करने की नीति पर चलने की प्रवृत्ति हर किसी को अपनानी चाहिए। जो मिला है उसे बाँट कर खाना चाहिए। मनुष्य को जो कुछ अन्य प्राणियों के अतिरिक्त मिला हुआ है वह उसका अपना निज का उपार्जन नहीं, वरन् सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के श्रेष्ठ सत्पुरुषों के श्रम और त्याग का फल है। यदि ऐसा न हुआ होता तो मनुष्य भी एक दुर्बल वन्य पशु की तरह रीछ बन्दरों की तरह अपने दिन काट रहा होता। त्याग और उपकार की पुण्य प्रक्रिया का नाम ही धर्म, संस्कृति एवं मानवता है। उसी के आधार पर प्रगति पथ पर इतना आगे बढ़ आना संभव हुआ है। यदि इस पुण्य प्रक्रिया को तोड़ दिया जाय, मनुष्य केवल अपने मतलब की ही बात सोचने और उसी में लगे रहने की नीति अपनाने लगे, तो निश्चय ही मानवीय संस्कृति नष्ट हो जायगी और ईश्वरीय आदेश के उल्लंघन के फलस्वरूप जो विकृति उत्पन्न होगी उससे समस्त विश्व को भारी त्रास सहन करना पड़ेगा। परमार्थ की उपेक्षा करना अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारना है। शान्ति और समृद्धि की आधारशिला के रूप में जो परमार्थ मानव जाति की अन्तरात्मा बना चला आ रहा है उसे नष्ट−भ्रष्ट कर डालना, स्वार्थी बन कर जीना निश्चय ही सबसे बड़ी मूर्खता है। इस मूर्खता को अपना कर हम सर्वतोमुखी आपत्तियों को ही आमंत्रण देते हैं और उलझनों के दलदल में आज की तरह ही दिन−दिन गहरे घुसते चले जाते हैं।

सत्प्रवृत्तियों की महत्ता

संसार में जितना भी कुछ सत्कार्य बन पड़ रहा है उस सब के मूल में सत्प्रवृत्तियाँ ही काम करती हैं। लहलहाती खेती तभी देखी जा सकती है जब बीज का अस्तित्व मौजूद हो। बीज के बिना पौधा कहाँ से उगेगा? भले या बुरे कार्य अनायास ही नहीं उपज पड़ते, उनके मूल में सद्विचारों और कुविचारों की जड़ जमी होती है। समय पाकर बीज जिस प्रकार अँकुरित होता और फलता−फूलता है उसी प्रकार सत्प्रवृत्तियाँ ही अगणित प्रकार के पुण्य परमार्थों के रूप में विकसित एवं परिलक्षित होती हैं। जिस शुष्क हृदय में सद्भावनाओं के लिए—सद्विचारों के लिए कोई स्थान नहीं मिला उसके द्वारा जीवन में कोई श्रेष्ठ कार्य बन पड़े यह लगभग असंभव ही मानना चाहिए। जिन लोगों ने कोई सत्कर्म किये हैं, आदर्श का अनुसरण किया है उनमें से प्रत्येक को उससे पूर्व अपनी पाशविक वृत्तियों पर नियन्त्रण कर सकने योग्य सद्विचारों का लाभ किसी न किसी प्रकार मिल चुका होता। कुकर्मी और दुर्बुद्धि मनुष्यों को इस घृणित स्थिति में पड़े रखने की जिम्मेदारी उनकी उस भूल पर है जिसके कारण कि सद्विचारों की आवश्यकता और उपयोगिता को समझने से वंचित रहे, जीवन के इस सर्वोपरि लाभ की उपेक्षा करते रहे, उसे व्यर्थ मानकर उससे बचते और कतराते रहे। मूलतः मनुष्य एक प्रकार का काला कुरूप लोहा मात्र है सद्विचारों का पारस छूकर ही वह सोना बनता है। एक नगण्य तुच्छ प्राणी को मानवता के महान गौरव से गौरवान्वित कर जिसे यह सौभाग्य नहीं मिल सका वह बेचारा भला क्यों कर अपने जीवन-लक्ष को समझ सकेगा? और क्योंकर उसके लिए कुछ प्रयत्न पुरुषार्थ कर सकेगा?

सर्वोत्तम परमार्थ

इस संसार में अनेकों परमार्थ और उपकार के कार्य हैं। वे सब आवरण मात्र हैं उनकी आत्मा में, सद्भावनायें सन्निहित है। सद्भावना रहित सत्कर्म भी केवल ढोंग मात्र बन कर रह जाते हैं। अनेकों व्यक्ति और अनेकों संस्थाऐं आज परमार्थ का आडम्बर ओढ़कर सिंह की खाल ओढ़ कर फिरने वाले शृगाल का उपहासास्पद उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। उससे लाभ किसी का कुछ नहीं होता, विडम्बना बढ़ती है और परमार्थ को भी लोग आशंका एवं संदेह की दृष्टि से देखने लगते हैं। प्राण रहित शरीर कितने ही सुन्दर वस्त्र धारण किये हुए क्यों न हो, उसे कोई पसंद न करेगा, न उससे किसी का कोई भला होगा। इसी प्रकार सद्भावना रहित जो कुछ भी लोकहित, जनसेवा नाम के प्रयास किये जायेंगे वे भलाई नहीं, बुराई ही उत्पन्न करेंगे। इसलिए यदि संसार में सच्चे परमार्थ का स्वर्गीय वातावरण देखने की इच्छा हो तो सद्भावनाओं का वातावरण उत्पन्न करना चाहिए। पत्तों को नहीं जड़ को सींचना चाहिए।

बुराइयाँ कैसे मिटेंगी

बुराइयाँ आज संसार में इसलिए बढ़ और फल−फूल रही हैं कि उनका अपने आचरण द्वारा प्रचार करने वाले सच्चे प्रचारक पूरी−तरह मन, कर्म, वचन से बुराई करने और फैलाने वाले लोग बहुसंख्यक मौजूद हैं। अच्छाइयाँ आज इसलिए घट रही हैं कि उनका ढोल बजाने वाले लोग तो कहीं−कहीं मिलते भी हैं पर अपने कार्यों द्वारा निष्ठात्मक करने वाले लोग दृष्टिगोचर नहीं होते। एक शराबी बीसियों अपने शराबी मित्र और तैयार कर लेता है, एक वेश्या अनेकों व्यभिचारियों का सृजन कर लेती है, एक जुआरी दस नये जुआरी बढ़ा देता है। क्योंकि इन लोगों की शराब, व्यभिचार और जुआ पर पूरी निष्ठा है वे उसका प्रचार अपनी वाणी से ही नहीं क्रिया से भी करते हैं। निष्ठा में सदा शक्ति भरी रहती है। वह भली हो या बुरी अपना प्रभाव जरूर दिखायेगी। निष्ठा की एक ही कसौटी है कि मनुष्य उसके लिए अपना समय श्रम, धन और प्रभाव खर्च करता रहता है। जिन कार्यों का समर्थन हम ऊपरी मन से करते हैं उनके बारे में गाल तो बहुत बजा सकते हैं पर जब कुछ त्याग करने का अवसर आता है तो तुरन्त कन्नी काट जाते हैं। अच्छाइयों के प्रचारक आज निष्ठावान नहीं बातूनी लोग ही दिखाई पड़ते हैं, फलस्वरूप बुराइयों की तरह अच्छाइयों का प्रसार नहीं हो पाता और वे पोथी के बैंगनों की तरह केवल कहने−सुनने भर की बातें रह जाती हैं। कथा−वार्ताओं को लोग व्यवहार की नहीं कहने−सुनने की बात मानते हैं और इतने मात्र से ही पुण्य, लाभ की संभावना मान लेते हैं।

ब्रह्मदान का सर्वोत्कृष्ट पुण्य

सत्प्रवृत्तियों को मनुष्य के हृदय में उतार देने से बढ़ कर और कोई महत्वपूर्ण कार्य इस संसार में नहीं हो सकता। वस्तुओं की सहायता भी आवश्यकता के समय उपयोगी सिद्ध हो सकती है पर उसका स्थायी महत्व नहीं है। हर आदमी स्थायी रूप से अपनी समस्या अपने पुरुषार्थ और विवेक से ही हल कर सकता है। दूसरों की सहायता पर जीवित रहना न तो किसी मनुष्य के गौरव के अनुकूल है और न उससे स्थायी हल ही निकलता है। जितनी भी कठिनाइयाँ व्यक्तिगत तथा सामूहिक जीवन में दिखाई पड़ती हैं उनका एक मात्र कारण कुबुद्धि है। यदि मनुष्य अपनी आदतों को सुधार ले, स्वभाव को बना ले और विचारों तथा कार्यों का ठीक तारतम्य बिठा ले तो बाहर से उत्पन्न होती दीखने वाली सभी कठिनाइयाँ बात की बात में हल हो सकती हैं। व्यक्ति और समाज का कल्याण इसी में है कि सत्प्रवृत्तियों को अधिकाधिक पनपने का अवसर मिले। इसी प्रयास में प्राचीन काल में कुछ लोग अपना जीवन उत्सर्ग करते थे, उन्हें बड़ा माना जाता था और ब्राह्मण के सम्मानसूचक पद पर प्रतिष्ठित किया जाता था। चूँकि सत्प्रवृत्तियों को पनपाना संसार का सबसे महत्वपूर्ण धर्म कार्य है इसलिए उसमें लगे हुए व्यक्तियों को सम्मान का शीर्ष स्थान भी मिलना ही चाहिए। दानों में सर्वोत्तम दान ब्रह्मदान कहा जाता है। ब्रह्मदान का अर्थ है ज्ञान−दान। ज्ञान का अर्थ है वह भावना और निष्ठा जो मनुष्य के नैतिक स्तर को सुस्थिर बनाए रहती है। युग−निर्माण संकल्प में जिन सत्प्रवृत्तियों के पुण्य−प्रसार की प्रेरणा की गई है वह यही ब्रह्मदान है। इसे अमृत जल से सींचा जाने पर मुरझाया हुआ युग−मानस पुनः हरा भरा पुष्प पल्लवों से परिपूर्ण बन सकता है। इसी महान कार्य को वह परमार्थ कहा जा सकता है जिसके पूरा करने के लिए परमात्मा ने मनुष्य को विशेष क्षमता, सत्ता और महत्ता प्रदान की है।

दैनिक जीवन में परमार्थ का स्थान

समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ और धन की पाँचों विभूतियों का अधिकाधिक भाग हमें परमार्थ के लिए लगाना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन की आवश्यकता पूर्ति में ही इन दिव्य विभूतियों को पूरी तरह नष्ट न कर देना चाहिए वरन् न्यूनाधिक मात्रा में कुछ न कुछ इनका अंश परमार्थ के लिए,सत्प्रवृत्तियों के विकास के लिए सुरक्षित रख लेना चाहिए। दैनिक जीवन में जिस प्रकार अन्य अनेक आवश्यक कार्य नियत रहते हैं और उन्हें किसी न किसी प्रकार पूरा करते ही हैं उसी प्रकार इस परमार्थ कार्य को भी एक नितान्त आवश्यक और लोक−परलोक के लिए श्रेयस्कर महत्वपूर्ण कार्य मानना चाहिए। जिस कार्य को हम महत्वपूर्ण मान लेंगे उसके लिए समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक नियमित अंश निरन्तर लगाते रहना भार रूप प्रतीत न होगा वरन् उस मार्ग में किया हुआ प्रयत्न जीवन को धन्य बनाने वाला सर्वोत्तम सार्थक हुआ कार्य प्रतीत होने लगेगा।


विश्वशान्ति के तीन आधार

“दूसरों के साथ वह व्यवहार न करूँगा जो मुझे अपने लिए पसंद नहीं। ईमानदारी और परिश्रम की कमाई ही ग्रहण करूँगा। नारी जाति के प्रति माता, बहिन और पुत्री की दृष्टि रखूँगा।”

दुकानदार वही ईमानदार माना जाता है जिस के यहाँ खरीदने और बेचने के बाँट एक ही रहते हैं। कई बेईमान दुकानदार दूसरों का माल खरीदने के लिए भारी बाँट रखते हैं और अपना बेचने के लिए हलके । दूसरों की चीज उचित मात्रा से अधिक प्राप्त हो जाय और अपनी हिसाब से भी कम दी जाय इस नीति को बरतने वाले—दुहरे बाँट रखने वाले बेईमान दुकानदार सब की निगाह में घृणित ठहरते हैं। ऐसे व्यापारियों की हम भर्त्सना करते हैं पर आश्चर्य की बात यह है कि हमने भी वही नीति अपना रखी है और अपने दोष देखने के लिए नजर भी नहीं उठाते।

अपने समान दूसरे भी

हम चाहते हैं कि दूसरे लोग हमारे साथ सज्जनता का, उदार और मधुर व्यवहार करें हमारी प्रगति में सहायक हों और कोई ऐसा कार्य न करें जिससे प्रसन्नता और सुविधा में किसी प्रकार का विघ्न उत्पन्न न हो। ठीक ऐसी ही आशा दूसरे लोग भी हम से करते हैं। जब हम ऐसा सोचते हैं कि अपने स्वार्थ की पूर्ति में कोई आँच न आने दी जाय और दूसरों से अनुचित लाभ उठा लें, तो वैसी ही आकाँक्षा दूसरे भी हम से क्यों न करेंगे? लेने और देने के दो बाँट रखने में ही सारी गड़बड़ी पैदा होती है। यदि यही ठीक है कि हम किसी के सहायक न बनें, किसी के काम न आवें, किसी से उदारता, नम्रता और क्षमा की नीति न बरतें तो इस के लिए भी तैयार रहना चाहिए कि दूसरे लोग हमारे साथ वैसी ही धृष्टता बरतेंगे तो हम अपने मन में कुछ बुरा न मानेंगे।

जब हम रेल में चढ़ते हैं और दूसरे लोग पैर फैलाये बिस्तर जमाये बैठे होते हैं तो हमें खड़ा रहना पड़ता है। उन लोगों से पैर समेट लेने और हमें भी बैठ जाने देने के लिए कहते हैं तो वे लड़ने आते हैं। झंझट से बचने के लिए हम खड़े−खड़े अपनी यात्रा पूरी करते हैं और मन ही मन उन जगह घेरे बैठ लोगों की स्वार्थपरता और अनुदारता को कोसते हैं। पर जब हमें जगह मिल जाती है तो हम भी वैसा ही व्यवहार करते हैं। उसी तरह पैर फैला लेते हैं और नये यात्रियों के प्रति ठीक वैसे ही निष्ठुर बन जाते हैं। क्या यह दुहरा दृष्टिकोण उचित है?

दुमुही नीति

हमारी कन्या विवाह योग्य हो जाती है तो हम चाहते हैं कि लड़के वाले बिना दहेज के सज्जनोचित व्यवहार करते हुए विवाह सम्बन्ध स्वीकार करें, दहेज माँगने वालों को बहुत कोसते हैं, पर जब अपना लड़का विवाह योग्य हो जाता है तो हम भी ठीक वैसी ही अनुदारता दिखाते हैं जैसी अपनी लड़की के विवाह अवसर पर दूसरों ने दिखाई थी। कोई हमारी चोरी, बेईमानी कर लेता है, ठग लेता है तो बहुत बुरा लगता है पर प्रकारांतर से वैसी ही नीति अपने कारोबार में हम भी बरतते हैं और तब उस चतुरता पर प्रसन्न होते और गर्व अनुभव करते हैं। यह दुमुही नीति बरती जाती रही तो मानव समाज में सुख−शान्ति कैसे कायम रह सकेगी?

कोई व्यक्ति अपनी जरूरत के वक्त कुछ उधार हमसे ले जाता है तो हम यही आशा करते हैं कि आड़े वक्त की इस सहायता को सामने वाला व्यक्ति कृतज्ञतापूर्वक याद रखेगा और जल्दी से जल्दी इस उधार को लौटा देगा। यदि वह वापिस देते वक्त आँखें बदलता है तो हमें कितना बुरा लगता है। यदि इसी बात को ध्यान रखा जाय और किसी से उधार को लौटाने के लिए अपनी आकाँक्षा के अनुरूप ही ध्यान रखा जाय तो कितना अच्छा हो। हम किसी का उधार आवश्यकता से अधिक एक क्षण भी क्यों रोक रखें? हम दूसरों से यह आशा करते हैं कि वे जब भी कुछ कहें या उत्तर दें, नम्र शिष्ट, मधुर और प्रेम भरी बातों से सहानुभूतिपूर्ण रुख के साथ बोलें। कोई कटुता, रुखाई, निष्ठुरता, उपेक्षा और अशिष्टता के साथ जवाब देता है तो अपने को बहुत दुख होता है। यदि यह बात मन में समा जाय तो फिर हमारी वाणी में सदा शिष्टता और मधुरता ही क्यों न घुली रहेगी? अपने कष्ट के समय हमें दूसरों की सहायता विशेष रूप से अपेक्षित होती है इस बात को ध्यान में रखा जाय तो जब दूसरे लोग कष्ट में पड़े हों, उन्हें हमारी सहायता की अपेक्षा हो तब क्या यही उचित है कि हम निष्ठुरता धारण कर लें? अपने बच्चों से हम यह आशा करते हैं कि बुढ़ापे में हमारी सेवा करेंगे। हमारे किये उपकारों का प्रतिफल कृतज्ञतापूर्वक चुकावेंगे, पर अपने बूढ़े माँ−बाप के प्रति हमारा व्यवहार बहुत ही उपेक्षापूर्ण रहता है। इस दुहरी नीति का क्या कभी कोई सत्परिणाम निकल सकता है?

एक ही तराजू से क्यों न तोलें?

हम चाहते हैं कि हमारी बहू−बेटियों की दूसरे लोग इज्जत करें, उन्हें अपनी बहिन−बेटी की निगाह से देखें। फिर यह क्योंकर उचित होगा कि हम दूसरों की बहिन−बेटियों को दुष्टताभरी दृष्टि से देखें? अपने दुख के समान ही दूसरों को जो समझेगा वह माँस कैसे खा सकेगा? किसी की बेईमानी करने, किसी को तिरस्कृत, लाँछित और जलील करने की बात कैसे सोचेगा? अपनी छोटी−मोटी भूलों के बारे में हम यही आशा करते हैं कि लोग उन पर बहुत ध्यान न देंगे, ‘क्षमा करो और भूल जाओ’ की नीति अपनावें तो फिर हमें भी उतनी ही उदारता मन में क्यों नहीं रखनी चाहिये और कभी किसी से कोई दुर्व्यवहार अपने साथ बन पड़ा है तो उसे क्यों न भुला देना चाहिए।

अपने साथ हम दूसरों से जिस सज्जनतापूर्ण व्यवहार की आशा करते हैं उसी प्रकार की नीति हमें दूसरों के साथ अपनानी चाहिए। हो सकता है कि कुछ दुष्ट लोग हमारी सज्जनता के बदले में उसके अनुसार व्यवहार न करें। उदारता का लाभ उठाने वाले और स्वयं निष्ठुरता धारण किये रहने वाले नर पशुओं की इस दुनिया में कमी नहीं है। कृतघ्न और उपकारी पर ही घात चलाने वाले लोग हर जगह भरे पड़े हैं। उनकी दुर्नीति का अपने को शिकार न बनना पड़े, इसकी सावधानी तो रखनी चाहिए, पर अपने कर्तव्य और सौजन्य को इसलिए नहीं छोड़ देना चाहिए कि उसके लिए सत्पात्र नहीं मिलते। बादल हर जगह वर्षा करते हैं, सूर्य और चन्द्रमा हर जगह अपना प्रकाश फैलाते हैं, पृथ्वी सब किसी का भार और मल−मूत्र उठाती है फिर हमें भी वैसी ही महानता और उदारता का परिचय क्यों नहीं देना चाहिए?

उदार प्रकृति के लोग कई बार चालाक लोगों द्वारा ठगे जाते हैं और उससे उन्हें घाटा भी रहता है, पर उनकी सज्जनता से प्रभावित होकर दूसरे लोग जितनी उनकी सहायता करते हैं उस लाभ के बदले में वह ठगे जाने का घाटा कम ही रहता है। सब मिलाकर वे लाभ में ही रहते हैं। इसी प्रकार स्वार्थी लोग किसी के काम नहीं आने से अपना कुछ हर्ज या हानि होने का अवसर नहीं आने देते पर उनकी कोई सहायता नहीं करता तो वे लाभ से वंचित ही रहते हैं। ऐसी दशा में वह अनुदार चालाक व्यक्ति , उस उदार और भोले व्यक्ति की अपेक्षा घाटे में ही रहता है। दुहरे बाँट रखने वाले बेईमान दुकानदारों को कभी फलते-फूलते नहीं देखा गया। स्वयं खुदगर्जी और अशिष्टता बरतने वाले लोग जब दूसरों से सज्जनता और सहायता की आशा करते हैं तो वे ठीक दुहरे बाँट रखने वाले बेईमान दुकानदार का अनुकरण करते हैं। ऐसा व्यवहार कभी किसी के लिए उन्नति और प्रसन्नता का कारण नहीं बन सकता।

ईमानदारी की श्रेष्ठ नीति

युग निर्माण सत्संकल्प में यह बलपूर्वक कहा गया है कि हम दूसरों से वैसा ही मधुर व्यवहार करें जैसा अपने लिए दूसरों से चाहते हैं। इस व्यवहार में ईमानदारी का स्थान सर्वोपरि है। चापलूस, ठग और खुशामदी लोग भी मीठी वाणी तो खूब बोल सकते हैं पर उनकी नीयत खराब होने से, स्वार्थ सिद्धि का प्रयोजन छिपा रहने से वह मधुरता निन्दनीय ही बन कर रह जाती है। मधुरता की महत्ता तभी है जब उसके साथ ईमानदारी भी जुड़ी हुई है। ईमानदारी और सद्भावना को सोना कहा जा सकता तो मधुरता शिष्टता को सुगन्ध। सोने का मूल्य अधिक है सुगन्ध का कम। लोहे पर सुगन्ध लगा दी जाय तो उसकी उतनी प्रशंसा नहीं हो सकती बेईमान मधुरभाषी हो तो और भी अधिक खतरनाक होते हैं, उन्हें पहचानना कठिन पड़ता है, इसलिए बहुधा उनसे अधिक धोखा खाया जाता है।

ईमानदारी की कमाई औषधि रूप है जो थोड़ी खाई जाने पर भी बहुत गुण करती है। फिजूलखर्ची को छोड़कर यदि मितव्ययिता के साथ काम चलाया जाय तो कम आमदनी वाले लोग भी आनन्दपूर्वक हँसी−खुशी का जीवन व्यतीत कर सकते हैं। आमदनी बढ़ाने का प्रयत्न करना उचित है, जिससे जीवन विकास के लिए उचित साधन सामग्री जुटाई जा सके और किन्हीं दूसरों का भी भला किया जा सके। धन बुरा नहीं, आवश्यक वस्तु है। अपनी क्षमता, योग्यता और श्रमशीलता के द्वारा कमाया जाना उचित है और साथ ही उसे उपयोगी कार्यों में लगाया जाना भी आवश्यक है। धन निन्दनीय तभी होता है जब उसे अनीतिपूर्वक , कुमार्ग से कमाया जाय, व्यसनों और अपव्यय में बर्बाद किया जाय अथवा जोड़−जोड़कर जमा किया जाय।

कई व्यक्ति लालच के मारे अधिक कमाने की लालसा में अनीति का रास्ता पकड़ लेते हैं और अवाँछनीय रीति से, दूसरों को सताकर बिना परिश्रम के, लोगों की मजबूरियों से समुचित लाभ उठाकर बहुत धन कमाने लगते हैं। कई तो जुआ, सट्टा, चोरी, मुनाफाखोरी, रिश्वत, धोखेबाजी, कमतोल, कमनाप, मिलावट आदि अनैतिक तरीकों को ही अपनी बुद्धिमानी का चिन्ह और जल्दी धनी बनने का तरीका मान बैठते हैं। ऐसे लोग दूसरों के भोलेपन और अज्ञान का अनुचित लाभ उठाकर कई बार जल्दी धनी भी बन जाते हैं पर वह धन देर तक ठहरता नहीं। उसकी बर्बादी ऐसी बुरी तरह होती है कि हृदय में पश्चाताप और सिर पर पाप की पोटली के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता। किसी कुकर्मी को इस संसार में फलते−फूलते नहीं देखा गया। कुमार्ग से कमाया गया हुआ मन का धन कुछ देर के लिए प्रसन्नता दे सकता है पर अन्त में वह रुलाता हुआ ही विदा होता है। बिना परिश्रम किये मुफ्त में मिला हुआ धन भी बुराइयों को ही जन्म देता है। पैतृक उत्तराधिकार के रूप से जिन्हें बहुत−सा धन अनायास ही मिल गया है वे अपने शील सदाचार को कदाचित ही कभी स्थिर रख पाते हैं। उनमें अनायास ढेरों दुर्गुण उपज पड़ते हैं और वे ही अन्ततः उनके पतन का कारण बनते हैं।

कभी न पचने वाला विष

संखिया का विष खाने से तुरन्त मृत्यु हो जाती है और कुचला खाने से प्राण निकलने में कुछ देर लगती है। बेईमानी की कमाई और मुफ्त में मिली दौलत में इतना ही अन्तर होता है जितना संखिया और कुचला में। अखाद्य दोनों ही है और दोनों ही हानिकर भी। इसलिए हर आदमी को ध्यान रखना चाहिए कि वह ईमानदारी से कमावे और परिश्रमपूर्वक उपार्जन करे। इस प्रकार यदि थोड़ा भी कमाया जा सके तो उसी से काम चला लेना चाहिए। जितनी अक्ल गलत तरीके से कमाने में खर्च की जाती है उतनी यदि खर्च घटाने व्यवस्थित जीवन बनाने और श्रमशीलता एवं योग्यता बढ़ाने से खर्च की जाय तो निश्चय ही अपनी आर्थिक समस्या को हर कोई बड़ी आसानी से हल कर सकता है। ईमानदारी की कमाई से जो आत्म−संतोष रहता है उससे स्वास्थ्य की सुरक्षा, ईश्वरीय प्रकोप से निश्चिन्तता−हर दिशा में फलने−फूलने की संभावना बनी रहती है और हर भले आदमी की दृष्टि में अपना महत्व एवं गौरव बढ़ा−चढ़ा रहने से हर घड़ी आन्तरिक प्रफुल्लता बनी रहती है। आत्मकल्याण और पारलौकिक सद्गति का भी यही मार्ग है। इस सन्मार्ग को अपनाना ही बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का चिन्ह माना जाता है।

पवित्रता की साक्षात् प्रतिमा

नारी इस संसार की सर्वोत्कृष्ट पवित्रता है। जननी के रूप में वह अगाध वात्सल्य लेकर इस धरती पर अवतीर्ण होती है। नारी के रूप में त्याग और बलिदान की, प्रेम और आत्मदान की सजीव प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठित होती है। बहिन के रूप में स्नेह, उदारता और ममता की देवी जैसी परिलक्षित होती है। पुत्री के रूप में वह कोमलता, मृदुता, सरलता, निश्छलता की प्रतिकृति के रूप में इस नीरस संसार को सरस बनाती रहती है। परमात्मा ने नारी में सत्यशिव और सुन्दर का अनन्त भंडार भरा है। उसके नेत्रों में एक अलौकिक ज्योति रहती है, जिसकी कुछ किरणें पड़ने मात्र से निष्ठुर हृदयों की भी मुरझाई हुई कली खिल सकती है। दुर्बल अपंग मानव को शक्तिवान और सत्ता सम्पन्न बनाने का सबसे बड़ा श्रेय यदि किसी को हो सकता है तो नारी को ही है। वह मूर्तिमान प्रेरणा, भावना और स्फूर्ति के रूप में अचेतन को चेतन बनाती है। उसके सान्निध्य में अकिंचित व्यक्ति का भाग्य मुखरित हो उठता है। वह अपने को कृत−कृत्य हुआ अनुभव करता है।

दूसरा विषाक्त पहलू

नारी की महत्ता अग्नि के समान है। अग्नि हमारे जीवन का स्रोत है, उसके अभाव में हम निर्जीव और निष्प्राण बनकर ही रह सकते हैं। उसकी उपयोगिता की जितनी महिमा गाई जाय उतनी ही कम है। पर इस अग्नि का दूसरा पहलू भी है, वह स्पर्श करते ही काली नागिन की तरह लप−लपाती हुई उठती है और छूते ही छटपटा देने वाली—भारी पीड़ा देने वाली परिस्थिति उत्पन्न कर देती है। नारी में जहाँ अनन्त गुण हैं वहाँ एक दोष ऐसा भी है जिसके स्पर्श करते ही असीम वेदना में छटपटाना पड़ता है। वह रूप है—नारी का रमणी रूप। रमण की आकाँक्षा से जब भी उसे देखा, सोचा और छुआ जायेगा तभी वह काली नागिन की तरह अपने विष भरे दंश चुभो देगी। बिच्छू की बनावट कैसी अच्छी है सुनहरे रंग का यह सुन्दर जीव कितना मनोहर लगता है पर उसके डंक को छूते ही विपत्ति खड़ी हो जाती है। मधुमक्खी कितनी उपकारी है। भौंरा कितना मधुर गूँजता है, काँतर कैसे रंग−बिरंगे पैरों से चलती है, बर्र और ततैया अपने छत्तों में बैठे हुए कैसे सुन्दर गुलदस्ते से सजे दीखते हैं, पर इनमें से किसी का भी स्पर्श हमारे लिए विपत्ति का कारण बन जाता है। नारी के कामिनी और रमणी के रूप में जो एक विष की छोटी सी पोटली छिपी हुई है उस सुनहरी कटार से हमें बचना ही चाहिए।

अपने से बड़ी आयु की नारी को माता के रूप में, समान आयु वाली को बहिन के रूप में, छोटी को पुत्री के रूप में देखकर, उन्हीं भावनाओं का अधिकाधिक अभिवर्धन करके हम उतने ही आह्लादित और प्रमुदित हो सकते हैं जैसे माता सरस्वती, माता लक्ष्मी, माता दुर्गा के चरणों में बैठा हुआ उनके अनन्त वात्सल्य का अनुभव करता है। हम गायत्री के उपासक भगवान की सर्वश्रेष्ठ सजीव प्रतिमा को नारी के रूप में ही मानते हैं। नारी में भगवान की अनन्त करुणा हमारी भक्ति भावना का दार्शनिक आधार है। उपासना में ही नहीं, व्यवहारिक जीवन में भी हमारा दृष्टिकोण यही रहना चाहिए। नारी मात्र को हम पवित्र दृष्टि से देखें, वासना की दृष्टि से न उसे सोचें न उसे देखें न उसे छुऐं।

दृष्टिकोण की पवित्रता

दाम्पत्य जीवन में सन्तानोत्पादन का विशेष प्रयोजन या अवसर आवश्यक हो तो पति−पत्नी कुछ क्षण के लिए वासना का एक हलका धूप−छाँह अनुभव कर सकते हैं। शास्त्रों में तो इतनी भी छूट नहीं है, उन्होंने तो गर्भाधान संस्कार को भी यज्ञोपवीत या मुण्डन−संस्कार की भाति एक पवित्र धर्म कृत्य माना है और इसी दृष्टि से उस क्रिया को सम्पन्न करने की आज्ञा दी है। पर मानवीय दुर्बलता को देखते हुए दाम्पत्य जीवन में एक सीमित मर्यादा के अन्तर्गत वासना को छूट मिल सकती है। इसके अतिरिक्त दाम्पत्य जीवन भी ऐसा ही पवित्र होना चाहिए जैसा कि दो सहोदर भाइयों का या दो सगी बहिनों को होता है। विवाह का उद्देश्य दो शरीरों को एक आत्मा बनाकर जीवन की गाड़ी का भार दो कंधों पर ढोते चलना है, दुष्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करना नहीं। यह तो सिनेमा का, गंदे चित्रों का, अश्लील साहित्य का और दुर्बुद्धि का प्रमाद है जो हमने नारी की परम पुनीत प्रतिमा को ऐसे अश्लील गन्दे और गर्हित रूप में गिरा रखा है। नारी को वासना के उद्देश्य से सोचना या देखना उसकी महानता का वैसा ही तिरस्कार करना है जैसे किसी देव मन्दिर की प्रतिमा को चुरा कर पत्थर को अपनी किसी आवश्यकता को पूर्ण करने के उद्देश्य से देखना। यह दृष्टि जितनी निन्दनीय और घृणित है उतनी ही हानिकारक और विग्रह उत्पन्न करने वाली भी। हमें उस स्थिति को अपने भीतर से और सारे समाज से हटाना होगा और नारी को उस स्वरूप में पुनः प्रतिष्ठापित करना होगा जिसकी एक दृष्टि मात्र से मानव प्राणी धन्य होता रहा है।

समानता और एकता

उपरोक्त पंक्तियों में नारी का जैसा चित्रण नर की दृष्टि से किया गया है ठीक वैसा ही चित्रण कुछ शब्दों के हेर−फेर के साथ नारी की दृष्टि से नर के संबंध में किया जा सकता है। जननेन्द्रिय की बनावट में राई रत्ती अन्तर होते हुए भी मनुष्य की दृष्टि से दोनों ही लगभग समान क्षमता, बुद्धि, भावना एवं स्थिति के बने हुए हैं। यह ठीक है कि दोनों में अपनी−अपनी विशेषताऐं और अपनी−अपनी न्यूनताऐं हैं उनकी पूर्ति के लिए दोनों एक दूसरे का आश्रय लेते हैं। यह आश्रय केवल पति−पत्नी के रूप में केवल काम प्रयोजन के रूप में हो ऐसा किसी किसी भी प्रकार आवश्यक नहीं। नारी के प्रति नर और नर के प्रति नारी पवित्र, पुनीत कर्तव्य और स्नेह का सात्विक एवं स्वर्गीय संबंध रखते हुए भी माता, पुत्री या बहिन के रूप में सखा, सहोदर, स्वजन और आत्मीय के रूप में श्रेष्ठ सम्बन्ध रख सकते हैं वैसा ही रखना भी चाहिए। पवित्रता में जो अजस्र बल है वह वासना की नारकीय कीचड़ में कभी भी दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। वासना और प्रेम दो दृष्टिकोण एक दूसरे से उतने ही भिन्न हैं जितना स्वर्ग से नरक में भिन्नता है। व्यभिचार में द्वेष, ईर्ष्या, आधिपत्य, संकीर्णता, कामुकता रूप, सौन्दर्य, श्रृंगार, कलह, निराशा, कुढ़न, पतन, ह्रास, निन्दा आदि अगणित यंत्रणाऐं भरी पड़ी हैं, पर प्रेम इन सबसे सर्वथा मुक्त है। पवित्रता में त्याग, उदारता, शुभ कामना, सहृदयता और शान्ति के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता।

युग−निर्माण संकल्प में आत्मवत् सर्वभूतेषु की, परद्रव्येषु लोष्ठवत् की, मातृवत् परदारेषु की परम पवित्र भावनाऐं भरी पड़ी हैं, इन्हीं के आधार पर नवयुग का सृजन हो सकता है इन्हीं का अवलम्बन लेकर इस दुनिया को स्वर्ग के रूप में परिणत करने का स्वप्न साकार हो सकता है।


उत्कृष्टता से ही श्रेष्ठता जन्मेगी

“मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। इस विश्वास के आधार पर मेरी मान्यता है कि मैं उत्कृष्ट बनूँगा और दूसरों को श्रेष्ठ बनाऊँगा तो युग अवश्य बदलेगा। हमारा युग−निर्माण संकल्प अवश्य पूर्ण होगा।”

परिस्थितियों का हमारे जीवन पर प्रभाव पड़ता है। आस−पास का जैसा वातावरण होता है वैसा बनने और करने के लिए मनोभूमि का रुझान होता है और साधारण स्थिति के लोग उन परिस्थितियों के ढाँचे में ही ढल जाते हैं। घटनाऐं हमें प्रभावित करती हैं, व्यक्तियों का प्रभाव अपने ऊपर पड़ता है इतना होते हुए भी यह मानना पड़ेगा कि सबसे अधिक प्रभाव अपने विश्वासों का ही अपने ऊपर पड़ता है। परिस्थितियाँ किसी को भी तभी प्रभावित कर सकती हैं जब मनुष्य उनके आगे सिर झुका दे यदि उनके दबाव को अस्वीकार कर दिया जाय तो फिर कोई परिस्थिति किसी मनुष्य को अपने दबाव में देर तक नहीं रख सकती। विश्वासों की तुलना में परिस्थितियों का प्रभाव निश्चय ही नगण्य है।

भाग्य के रचयिता

कहते हैं कि भाग्य की रचना ब्रह्माजी करते हैं, सुना जाता है कि कर्म रेखाऐं जन्म से पहले ही माथे पर लिख दी जाती हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि तकदीर के आगे तदवीर की नहीं चलती। यह किम्वदन्तियाँ एक सीमा तक ही सच हो सकती हैं। जन्म से अन्धे, अपंग उत्पन्न हुए या अशक्त अविकसित लोग ऐसी बात कहें तो उस पर भरोसा किया जा सकता है। अप्रत्याशित दुर्घटना के शिकार कई बार हम हो जाते हैं और ऐसी विपत्ति सामने आ खड़ी होती है जिससे बच सकना या रोका जा सकना अपने वश में नहीं होता। अग्नि−काण्ड, भूकम्प, युद्ध, महामारी, अकाल, मृत्यु, दुर्भिक्ष, रेल, मोटर आदि का पलट जाना, चोरी, डकैती आदि के कई अवसर ऐसे आ जाते हैं कि मनुष्य उनकी संभावना को न तो समझ पाता है और न रोकने में समर्थ हो पाता है ऐसी कुछ घटनाओं के बारे में भाग्य या होतव्यता की बात मानकर सन्तोष किया जाता है। पीड़ित मनुष्य के आन्तरिक विक्षोभ को शान्त करने के लिए भाग्यवाद का सिद्धान्त एक वैसा ही उत्तम उपचार है जैसे घायल व्यक्ति की तड़पन दूर करने के लिए डाक्टर लोग नींद लाने के लिए दवा खिला देते हैं, मर्फिया का इन्जेक्शन लगा देते हैं या कोकिन आदि की फुरहरी लगाकर पीड़ित स्थान को सुन्न कर देते हैं। यह विशेष परिस्थितियों के विशेष उपचार हैं। यदाकदा ही ऐसी बातें होती हैं इसलिए इन्हें अपवाद ही कहा जायेगा।

नियम नहीं; अपवाद

पुरुषार्थ एक नियम है और भाग्य उसका अपवाद। अपवादों का भी अस्तित्व तो मानना पड़ता है पर उनके आधार पर कोई नीति नहीं अपनाई जा सकती, कोई कार्यक्रम नहीं बनाया जा सकता। कभी−कभी स्त्रियों के पेट से मनुष्याकृति से भिन्न प्रकार के बच्चे जन्मते देखे गये हैं, कभी−कभी कोई पेड़ कुसमय में ही फल−फूल देने लगता है, कभी−कभी ग्रीष्म ऋतु में ओले बरस जाते हैं, यह अपवाद हैं इन्हें कौतुक या कौतूहल की दृष्टि से देखा जा सकता है पर इनको नियम नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार भाग्य की गणना अपवादों में तो हो सकती है पर यह नहीं माना जा सकता कि मानव जीवन की सारी गतिविधियाँ ही पूर्व निश्चित भाग्य विधान के अनुसार होती हैं। यदि ऐसा होता तो पुरुषार्थ और प्रयत्न की कोई आवश्यकता ही न रह जाती। जिसके भाग्य में जैसा होता है वैसा यदि अमिट ही है तो फिर पुरुषार्थ करने से भी अधिक क्या मिलता? और पुरुषार्थ न करने पर भी भाग्य में लिखी सफलता अनायास ही क्यों न मिल जाती?

पुरुषार्थ की अदम्य प्रेरणा

हर व्यक्ति अपने−अपने अभीष्ट उद्देश्यों के लिए पुरुषार्थ करने में संलग्न रहता है इससे प्रकट है कि आत्मा का सुनिश्चित विश्वास पुरुषार्थ के ऊपर है और वह उसी की प्रेरणा निरन्तर प्रस्तुत करती रहती है। हमें जानना चाहिए कि ब्रह्माजी किसी का भाग्य नहीं लिखते हर मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। जिस प्रकार कल का जमाया हुआ दूध आज दही बन जाता है उसी प्रकार कल का पुरुषार्थ आज भाग्य बन कर प्रस्तुत होता है। आज के कर्मों का फल आज ही नहीं मिल जाता। उसका परिपाक होने में, परिणाम निकलने में कुछ देर लगती है। यह देरी ही भाग्य कहा जा सकता है। परमात्मा समदर्शी और न्यायकारी है उसे अपने सब पुत्र समान रूप से प्रिय हैं फिर वह किसी का भाग्य अच्छा किसी का बुरा लिखने का अन्याय और पक्षपात क्यों करेगा? उसने अपने हर बालक को भले या बुरे कर्म करने की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रदान की है पर साथ ही यह भी बता दिया है कि उनके भले या बुरे परिणाम भी अवश्य प्राप्त होंगे। इस कर्म फल को ही यदि भाग्य कहें तो अत्युक्ति न होगी।

उलझनों का सुलझाव

हमारे जीवन में अगणित समस्याऐं उलझी हुई गुत्थियों के रूप में विकराल वेष धारण किये सामने खड़ी हैं। इस कटु सत्य को मानना ही चाहिए कि उनके उत्पादक हम स्वयं हैं और यदि इस तथ्य को स्वीकार करके अपनी आदतों, विचारधाराओं, मान्यताओं और गतिविधियों को सुधारने के लिए तैयार हों तो इन उलझनों को हम स्वयं ही सुलझा भी सकते हैं। बेचारे ग्रह नक्षत्रों पर दोष थोपना बेकार है। लाखों करोड़ों मील दूर दिन रात चक्कर काटते हुए अपनी मौत के दिन पूरे करने वाले ग्रह नक्षत्र भला हमें क्या तो परेशान करेंगे और क्या हमें सुख सुविधा प्रदान करेंगे? उनका पीछा छोड़ें और सच्चे ग्रहों का पूजन आरंभ करें जिनकी थोड़ी सी कृपाकोर से ही हमारा सारा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है, सारी आकाँक्षाऐं देखते−देखते पूर्ण हो सकती हैं।

प्रत्यक्ष नव दुर्गाऐं

नव दुर्गाओं की नव रात्रियों में हम हर साल पूजा करते हैं। कहते हैं कि वे अनेकों ऋद्धि−सिद्धियाँ प्रदान करती हैं। सुख सुविधाओं की उपलब्धि के लिए, उनकी कृपा और सहायता करने के लिए विविध विधि साधन पूजन किये जाते हैं। जिस प्रकार देवलोक में निवासिनी नवदुर्गाऐं हैं उसी प्रकार भू−लोक में निवास करने वाली, हमारे अत्यन्त समीप−शरीर और मस्तिष्क में ही रहने वाली—नौ प्रत्यक्ष देवियाँ भी हैं और उनकी साधना का प्रत्यक्ष परिणाम भी मिलता है। देव−लोक वासिनी देवियों के प्रसन्न होने और न होने की बात संदिग्ध भी हो सकती है पर शरीर लोक में रहने वाली इन देवियों की साधना का श्रम कभी भी व्यर्थ नहीं जा सकता। यदि थोड़ा भी प्रयत्न इनकी साधना के लिए किया जाय तो उसका भी समुचित लाभ मिल जाता है। हमारे मनःक्षेत्र में विचरण करने वाली इन नौ देवियों के नाम है :—

(1) आकाँक्षा (2) विचारणा (3) भावना (4) श्रद्धा (5) निष्ठा (6) प्रवृत्ति (7) क्षमता (8) क्रिया (9) मर्यादा। इनका संतुलित विकास करके मनुष्य अष्ट−सिद्धियों और नव−सिद्धियों का स्वामी बन सकता है। संसार के प्रत्येक प्रगतिशील मनुष्य को जाने या अनजाने में इनकी साधना करनी ही पड़ी है और इन्हीं के अनुग्रह से उन्हें उन्नति के उच्च शिखर पर चढ़ने का अवसर मिला है।

उत्कृष्टता से श्रेष्ठता का जन्म

अपने को उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न किया जाय तो हमारे सम्पर्क में आने वाले दूसरे लोग भी श्रेष्ठ बन सकते हैं। आदर्श सदा कुछ ऊँचा रहता है और उसकी प्रतिकृति कुछ नीची रह जाती है। आदर्श का प्रतिष्ठापन करने वालों को सामान्य जनता के स्तर से सदा ऊँचा रहना पड़ा है। संसार को हम जितना अच्छा बनाना और देखना चाहते हैं हमें उसकी अपेक्षा कहीं ऊँचा बनने का आदर्श उपस्थित करना पड़ेगा। उत्कृष्टता ही श्रेष्ठता उत्पन्न कर सकती है। परिपक्व शरीर की माता छोटे बच्चे का प्रसव करती है। आदर्श पिता बनें तो ही सुसंतति का सौभाग्य प्राप्त कर सकेंगे। हम आदर्श गुरु हों तो श्रेष्ठ शिष्यों की श्रद्धा का लाभ मिलेगा। यदि हम आदर्श पति हों तो ही पतिव्रता पत्नी की सेवा प्राप्त कर सकेंगे। शरीर की अपेक्षा छाया कुछ कुरूप ही रह जाती है। चेहरे की अपेक्षा फोटो में कुछ न्यूनता ही रहती है। हम अपने आपको जिस स्तर तक विकसित कर सके होंगे हमारे समीपवर्ती लोग उस से प्रभावित होकर कुछ ऊपर तो उठेंगे तो भी अपनी अपेक्षा कुछ नीचे रह जावेंगे। इसलिए हम दूसरों से जितनी सज्जनता और श्रेष्ठता की आशा करते हों, उसकी तुलना में अपने को कुछ अधिक ही ऊँचा प्रमाणित करना होगा। हमें हर चंद यह याद रखे रहना होगा कि उत्कृष्टता के बिना श्रेष्ठता उत्पन्न नहीं हो सकती।

सक्रिय शिक्षण ही आवश्यकता

लेखों और भाषणों का युग अब बीत गया। गाल बजाकर, लम्बी चौड़ी डींग हाँक कर या बड़े−बड़े कागज काले करके संसार के सुधार की आशा करना व्यर्थ है। इन साधनों से थोड़ी मदद मिल सकती है पर उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। युग−निर्माण जैसे महान कार्य के लिए तो यह साधन सर्वथा अपर्याप्त और अपूर्ण हैं। इसका प्रधान साधन यही हो सकता है कि हम अपना मानसिक स्तर ऊँचा उठायें, चरित्रात्मक दृष्टि से अपेक्षाकृत उत्कृष्ट बनें। अपने आचरण से ही दूसरों को प्रभावशाली शिक्षा दी जा सकती है। गणित, भूगोल, इतिहास आदि की शिक्षा में कहने−सुनने की प्रक्रिया से काम चल सकता है पर व्यक्ति निर्माण के लिए तो निखरे हुए व्यक्तित्वों की ही आवश्यकता पड़ेगी। उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए सब से पहले हमें स्वयं ही आगे आना पड़ेगा। हमारी उत्कृष्टता के संदर्भ में संसार की श्रेष्ठता अपने आप बढ़ने लगेगी। हम बदलेंगे तो युग भी जरूर बदलेगा और हमारा युग−निर्माण संकल्प भी अवश्य पूर्ण होगा।

आज ऋषि, मुनि नहीं रहे जो अपने आदर्श चरित्र द्वारा लोक शिक्षण करके जनसाधारण के स्तर को ऊँचा उठाते। आज ब्राह्मण भी नहीं रहे जो अपने अगाध ज्ञान, वन्दनीय त्याग और प्रबल पुरुषार्थ से जनमानस की पतनोन्मुख पशु प्रवृत्तियों को मोड़ कर देवत्व की दिशा में पलट डालने का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठाते। वृक्षों के अभाव में एरंड का पेड़ ही वृक्ष कहलाता है। हम अखण्ड ज्योति परिवार के परिजन अपने छोटे−छोटे व्यक्तियों को ही आदर्शवाद की दिशा में अग्रसर करें तो भी कुछ न कुछ प्रयोजन सिद्ध होगा। कम से कम एक अवरुद्ध द्वार तो खुलेगा ही। यदि हम मार्ग बनाने में अपनी छोटी−छोटी हस्तियों को जला दें तो कल आने वाले युग प्रवर्तकों की मंजिल आसान हो जायगी। युग−निर्माण के सत्संकल्प का शंखनाद करते हुए हम छोटे−छोटे लोग आगे बढ़ चलेंगे तो प्रस्तुत पड़ी हुई युग−निर्मात्री शक्तियों को जागरण की आवश्यकता अवश्य होगी। राष्ट्र की प्रबुद्धता और चेतना को यदि चारित्रिक उत्थान के लिए हम जागृत कर सकें तो आज न सही कल; हमारा युग−निर्माण संकल्प पूर्ण होगा, पूर्ण होकर रहेगा।


आत्म−निर्माण हमारा प्रमुख कर्तव्य

जिनने अखण्ड ज्योति के इस वर्ष के पिछले सब अंक पढ़े हैं वे जानते हैं कि युग−निर्माण योजना क्या है? और उसकी पूर्ति के लिए हमें क्या करना होगा? युग−निर्माण के तीन अंग हैं—

(1) आत्म−निर्माण (2) कुटुम्ब−निर्माण (3) समाज निर्माण। आत्म−निर्माण कार्यक्रम के अन्तर्गत अपने गुण, कर्म, स्वभाव के भीतर जो अनेकों प्रकार की बुराइयाँ भरी पड़ी हैं उन्हें धीरे−धीरे सुधारते हुए सभ्य, सुसंस्कृत, सज्जन और श्रेष्ठ मानव बनाने की ओर अग्रसर होना पड़ेगा। यह प्रगति धीमी हो सकती है। हम मानते हैं कि सब में इतना बल नहीं होता कि परिस्थितियों और आदतों के कारण गहराई तक जड़ जमाकर बैठी हुई अनेकों बुराइयों और त्रुटियों को एक ही दिन में सुधार लिया जाय। मनुष्य अपूर्ण और दुर्बल है, आत्म−निर्माण का कार्य सब से कठिन कार्य है। इतना होने पर भी असंभव नहीं कि किसी न किसी रूप में अपने सुधार का कुछ न कुछ कार्य आज से ही आरम्भ कर दिया जाय और आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की मंजिल पार करने के लिए कदम−कदम बढ़ाते हुए एक दिन पूर्णता का परम लक्ष प्राप्त कर लिया जाय। हमें यह निश्चय करना ही पड़ेगा कि हमें अब अपनी बुराइयों और दुर्बलताओं से जूझना है।

गीता में अर्जुन और कृष्ण का संवाद मूलतः इन आन्तरिक बुराइयों से लड़ने के लिए ही है। कौरवों और पाण्डवों के रूप में तमोगुण असुरता और सतोगुण मानवता के संघर्ष का ही महाभारत में चित्रण किया गया है। यह महाभारत युग−निर्माण योजना के साथ−साथ आरम्भ किया जा रहा है। हम में से प्रत्येक को अर्जुन बन कर इसी महाभारत की विजय के लिए गाण्डीव उठाना और पाँचजन्य बजाना पड़ेगा। प्रगति कितनी ही मन्द क्यों न हो, कार्यक्रम कितना ही हलका क्यों न बनाया जाय आत्म−सुधार की दिशा में हमें चल पड़ने को अब तत्पर होना ही होगा।

आमतौर से हर आदमी अपने को सही, निर्दोष, निर्भ्रान्त और ठीक काम करने वाला मानता है। जबकि वस्तुतः उसमें अनेकों त्रुटियाँ और बुराइयाँ भरी पड़ी रहती हैं और बुराइयों के कारण शक्तियों की बर्बादी ही नहीं होती रहती वरन् आये दिन नित नई आपत्तियाँ भी खड़ी होती रहती हैं। पर कठिनाई एक ही है कि अपने दोष किसी की समझ में नहीं आते। जीवनक्रम का जो ढर्रा चल रहा है उससे असन्तोष तो रहता है पर यह सूझ नहीं पड़ता कि इसमें क्या परिवर्तन किया जाय और किस प्रकार किया जाय? अपनी आँख का तिल किसी को दिखाई नहीं पड़ता। अपना चेहरा अपनी आँखों से देख सकना कठिन है। यह तभी संभव होता है जब दर्पण का सहारा मिले। अपनी भूलों को ढूँढ़ने के लिए दर्पण के समान आत्म निरीक्षण की सद्बुद्धि अभीष्ट होती है। जिस प्रकार हम दूसरों की आलोचना, बहुत बारीकी से उसके दोषों को बताते हुए कर सकते हैं वैसी ही निष्पक्ष और तीक्ष्ण दृष्टि अपने बारे में पैदा हो जाय तो आत्म-सुधार की आधी मंजिल पार हो जाती है।

रोग और उसकी चिकित्सा

रोग का सही निदान हो जाय तो चिकित्सा का कार्य बहुत सरल हो जाता है। बीमारी का पता लग जाने पर फिर उसकी दवा ढूँढ़ निकालना कठिन नहीं रहता। हमारी प्रगति और सुख शान्ति में बाधा पड़ने के कारणों में अधिकाँश अपने दोष होते हैं। कभी−कभी दुष्ट, दुरात्मा अकारण ही दूसरों को सताने में मजा लेते हैं और अपना स्वार्थ साधन करने के लिए शैतानी कुचक्र रचते रहते हैं। इनका प्रतिरोध करने के लिए भी अपने में सज्जनता का होना आवश्यक है क्योंकि दुष्ट दुरात्माओं से निपटने के लिए अपने साथ जिस जनशक्ति की, लोकमत की, राजसत्ता की सहायता आवश्यक होती है उसकी उपलब्धि भी अपने सज्जन होने पर ही संभव है। अपना स्वभाव और चरित्र यदि दूषित हो तो किसी अवसर पर हमें निर्दोष सताया जा रहा हो तो भी अपना कोई सहायक न बनेगा। वरन् उस मुसीबत को मजा चखने की बात कहकर प्रसन्नता अनुभव करेंगे। दुष्टों को आक्रमण करने के लिए कुछ निमित्त चाहिए? उत्कृष्ट कोटि की सज्जनता के सामने उनके भी हौसले परास्त हो जाते हैं। सज्जनता में अपनी एक विशिष्ट शान्ति है जिसके आगे पड़ने में दुष्ट दुरात्माओं को आमतौर से हिचक होती है, यदि वे हमला करते भी हैं तो उन्हें अन्ततः परास्त ही होना पड़ता है। यह एक तथ्य है कि दृढ़ चरित्र के लोगों ने अपनी आत्मिक विशेषताओं के कारण न केवल परास्त किया है वरन् उनका हृदय परिवर्तन करके दुरात्मा से धर्मात्मा भी बना दिया है। इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से पूरी तरह रंगे हुए हैं। दुष्टों से निपटने की समस्याऐं रहतीं तो हर मनुष्य के जीवन में हैं पर परेशान उन्हें ही करती हैं जिनमें अपनी त्रुटियाँ कुछ विशेष मात्रा में होती हैं। पर यह समस्याऐं अपवाद रूप ही हैं।

प्रगति और शान्ति का आधार

मूल प्रश्न उन तथ्यों का है जिनके ऊपर हमारी प्रगति और शान्ति निर्भर रहती है। यह तथ्य अपने सद्गुण ही हो सकते हैं। धन, विद्या, बुद्धि, बल, मित्र आदि अनेकों बल इस दुनिया में ऐसे मौजूद हैं जिनकी सहायता से प्रगति का पहिया आगे घूमता है पर सबसे बड़ा बल है, स्वभाव बल, चरित्र बल, विचार बल, व्यवस्था बल। इसका विचार अपनी भीतरी स्थिति को सुधारने पर ही संभव हो सकता है। पर कठिनाई यह है कि अपना पक्षपात करने का ऐसा पर्दा मनुष्य की बुद्धि पर पड़ा रहता है कि अपनी त्रुटियाँ दीख ही नहीं पड़तीं। सारी खराबियाँ और बुराइयाँ दूसरों में दीखती हैं। लोग दूसरों को सुधारना चाहते हैं और स्वयं अपरिवर्तनशील रहना चाहते हैं।

अपनी आलोचना कर सकना, आत्म निरीक्षण करके अपनी बुराइयाँ ढूँढ़ सकना और उन्हें सुधारने के लिए तत्पर हो सकना सचमुच ही एक बड़ी बहादुरी और दूरदर्शिता का काम है। जिसमें इतना साहस आ गया उसे सच्चे अर्थों में अध्यात्मिक व्यक्ति कहा जा सकता है। आत्म कल्याण की पहली सीढ़ी आत्म−निरीक्षण और दूसरी आत्म−सुधार है। जो अपनी समीक्षा करने और अपना सुधार कर सकने की आवश्यकता को समझता है और उसके लिए ईमानदारी से तत्पर रहता है वह गिरी हुई स्थिति में नहीं पड़ा रह सकता। उसके जीवन का विकास होने ही वाला है, उसे प्रगति के पथ पर चलते हुए एक दिन महापुरुषों की श्रेणी में अपनी गणना कराने का अवसर मिलने ही वाला है।

आत्म−चिन्तन और उपासना

अखण्ड−ज्योति के प्रत्येक पाठक को प्रातःकाल का समय ईश्वर चिन्तन के लिए और सायंकाल का समय आत्म−निरीक्षण के लिए नियत करना चाहिए। नित्य कर्म से निवृत्त होकर नियमित संध्या जप ध्यान करना एक उचित धर्म विधान है। उसे पालन करने का प्रयत्न हम सब लोग करें। असुविधा और परिस्थितियों के कारण इसमें कुछ व्यतिरेक होना क्षम्य भी कहा जा सकता है पर शैया पर नींद खुलने से लेकर जमीन पर पैर रखने के बीच का जो थोड़ा−सा समय रहता है वह अनिवार्य रूप से हम में से हर एक को ईश्वर चिन्तन में लगाना चाहिए। इस समय में फुरसत न मिलने जैसे बहाने का भी कोई प्रश्न नहीं है। सर्वव्यापक निष्पक्ष, न्यायकारी, परमेश्वर से सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करने की प्रार्थना इस समय मन ही मन करते रहनी चाहिए। गायत्री मन्त्र का भावार्थ भी यही है। मानसिक गायत्री जाप इसे कहा जा सकता है। भावनापूर्वक मानसिक जाप और परमात्मा का ध्यान इस समय बहुत आसानी से हो सकता है। जो लोग नियमित उपासना करते हैं उन्हें भी और जो नहीं करते हैं उन्हें भी यह क्रम आरम्भ कर देना चाहिए। चारपाई से नीचे उतरने से पूर्व 15 मिनट की यह प्रार्थना अपने परिवार के हर व्यक्ति को करनी चाहिए और अपने प्रभाव में परिवार के जो−जो सदस्य हों उनसे इसे नियमित रूप से कराना चाहिए।

अपना दैनिक कार्य आरंभ करने से पूर्व “युग−निर्माण का सत्संकल्प” भावनापूर्वक पढ़ना चाहिए। जो पढ़े नहीं हैं उन्हें उतना ही कह लेना चाहिए। उन्हें उस मन्त्र का सार भाग अपने शब्दों में कह लेना चाहिए। मानव−जीवन का आदर्श, कर्तव्य धर्म और सदाचार का इस संकल्प मन्त्र में भावनापूर्ण समावेश हुआ है। इसका पाठ करना किसी धर्म ग्रन्थ के पाठ से कम प्रेरणा और पुण्य फल प्रदान करने वाला नहीं है।

बुराइयों और त्रुटियों का सुधार

सायंकाल को चारपाई पर पड़ने से लेकर सोने तक का समय आत्म−निरीक्षण में लगाना चाहिए। आज के दिन हमने क्या−क्या भूलें और बुराइयाँ कीं इस पर बहुत बारीकी से सोचना चाहिए। भूलें वे हैं जो अपराधों की श्रेणी में नहीं आतीं पर व्यक्ति के विकास में बाधक हैं। चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, आलस, प्रमाद, कटुभाषण, अशिष्टता, निंदा, चुगली, कुसंग, चिन्ता, परेशानी, व्यसन, वासनात्मक कुविचारों एवं दुर्भावनाओं में जो समय नष्ट होता है उसे स्पष्टतः समय की बर्बादी कहा जायेगा। प्रगति के मार्ग में यह छोटे−छोटे दुर्गुण ही बहुत बड़ी बाधा बनकर प्रस्तुत होते हैं इसलिए सायंकाल को आत्म−निरीक्षण के समय यह विचार करना चाहिए कि आज इस प्रकार की भूलों में हमारा कितना समय बर्बाद हुआ। यह भूलें प्रत्यक्षतः अपराध नहीं मानी जातीं तो भी यह अपराधों के समान ही हानिकारक हैं। बुराइयों में नैतिक बुराइयाँ गिनी जाती हैं झूठ, हिंसा, नशेबाजी, व्यभिचार, बेईमानी, चोरी, जुआ, ठगी, क्रूरता, गुण्डागर्दी, अशिष्टता आदि की मोटी बुराइयाँ तो स्पष्टतः त्याज्य हैं। इनके विचारों का मन में प्रवेश करना भी मानसिक पाप कहा जाता है। उससे भी बचना चाहिए। आज दिन में जो बुराइयाँ और भूलें बन पड़ी हैं उनका आत्मा द्वारा मन से उसी प्रकार लेखा−जोखा लिया जाना चाहिए जिस प्रकार कोई उद्योगपति अपने कारखाने के मैनेजर से रोज के कार्य और हिसाब का लेखा−जोखा लिया करता है। दोषों की कमी होते चलना और गुणों की बढ़ोत्तरी होना आत्मिक प्रगति के व्यापार में लाभ होने का चिन्ह है। यदि बुराइयाँ बढ़ रही हैं और अच्छाइयाँ घटें तो समझना चाहिए फर्म दिवालिया होने जा रही है। पूर्ण निर्दोष कोई नहीं, और न कोई पूर्ण गुणवान ही इस दुनिया में है। फिर भी प्रयत्न करते रहा जाय तो हमारी बुराइयाँ और भूलें दिन−दिन घटती और श्रेष्ठताऐं बढ़ती चल सकती हैं। इससे आज का लेखा−जोखा समझने के बाद कल के लिए ऐसी योजना सोचनी चाहिए कि श्रेष्ठता की अभिवृद्धि और क्षुद्रता की कमी होने लगे। रोज−रोज यह कार्यक्रम ठीक तरह बनाया जाता रहे और उस पर अगले दिन चला जाता रहे तो आत्म−सुधार का कार्य निरन्तर गतिवान रह सकता है।

समय का विभाजन

हम में हर एक को आठ घण्टे रोजी−रोटी कमाने के लिए, दस घण्टे सोने, खाने और नित्य कर्म के लिए लगाने चाहिए। इसके बाद 6 घण्टे शेष बचते हैं। इन्हें आत्म−निर्माण में, परिवार निर्माण में और समाज निर्माण के लिए परमार्थ प्रयोजन में खर्च करना चाहिए। उपासना यदि सच्चे मन से पूर्ण निष्ठा से और तन्मयतापूर्वक की जाय तो वह एक घण्टा भी, बेमन से बेगार भुगत कर किये जाने वाले छह घण्टे जप से भी अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती है। घट−घट−वासी भगवान विधान को नहीं, भावना को देखते हैं। विशेष व्यक्तियों द्वारा या विशेष अवसरों पर विशेष साधनाओं के लिए विशेष समय भी उपासना में लगाया जाना चाहिए, पर साधारण परिस्थितियों के व्यक्तियों के लिए नियमित रूप से सच्चे मन से की गई एक घण्टे की उपासना भी पर्याप्त हो सकती है। परमार्थ के लिए निकाले गये छह घण्टे में से उपासना का एक घण्टा कम कर देने के बाद शेष पाँच घण्टे जो बचते हैं उनमें से एक घण्टा स्वाध्याय के लिए निश्चित रूप से रखा जाना चाहिए। यह कार्य भजन से किसी भी प्रकार कम महत्व का नहीं है। आत्म−निर्माण की समस्याओं को, जीवन की विभिन्न गुत्थियों को सुलझाने में सहायता करने वाला साहित्य ही स्वास्थ्य की आवश्यकता पूरी करता है। कथा पुराणों की धर्म गाथाऐं सुनना पढ़ना उचित है पर उसे स्वाध्याय नहीं मानना चाहिए क्योंकि उसके द्वारा वर्तमान काल की परिस्थितियों और समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कोई क्रमबद्ध सुझाव प्रस्तुत नहीं किये जाते हैं।

प्रतिभा और क्षमता बढ़ावें

ज्ञान वृद्धि के लिए, अपने बौद्धिक विकास के लिए विद्याध्ययन, शारीरिक उन्नति के लिए व्यायाम, टहलना, उपचार, कोई कला कौशल सीखना आदि के कार्यक्रम भी आत्म−निर्माण के अन्तर्गत आते हैं। हम आज जहाँ हैं कल उससे ऊँचे स्तर पर पहुँचे, आज की अपेक्षा कल हमारी क्षमता, योग्यता, शक्ति, सामर्थ्य और प्रतिभा अधिक विकसित हो यह भावना रखते हुए अगले दिन का कार्यक्रम बनाते रहना चाहिए और एक−एक कदम प्रगति की ओर बढ़ाते हुए पूर्ण विकास के लिए हमें निरन्तर अग्रसर होते रहना चाहिए। विभिन्न व्यक्तियों की परिस्थिति अभिरुचि और सुविधा भिन्न−भिन्न प्रकार की होती है इसलिए सब के लिए कोई एक समान कार्यक्रम तो नहीं बन सकता पर सोचने और ढूँढ़ने पर हर व्यक्ति अपनी प्रतिभा और क्षमता को आज की अपेक्षा कल कुछ न कुछ अधिक बढ़ाने के लिए कोई न कोई उपाय निकाल ही सकता है। कोई न कोई मार्ग ढूँढ़ ही सकता है।


वास्तविक परिवार नियोजन

युग निर्माण योजना के स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज रचना का दूसरा कार्यक्रम कुटुम्ब निर्माण का है। इसे ही वास्तविक परिवार नियोजन भी कह सकते हैं। जिस प्रकार विभिन्न अवयवों के मिलने से एक शरीर बनता है उसी प्रकार कुटुम्ब के सब सदस्यों को मिलकर एक परिवार या पूर्ण व्यक्तित्व बनता है। घर का एक आदमी आदर्शवादी और श्रेष्ठ बने, तथा शेष सारा कुटुम्ब फूहड़पन का ऊबड़−खाबड़ जीवन व्यतीत करे, यह बहुत ही बेतुकी बात है। हम कुल्ला तो रोज कर लिया करें, मुँह तो खूब धो लिया करें पर अन्य सारे शरीर को गंदा ही रहने दें। स्नान और सफाई की व्यवस्था न करें तो यह कहाँ की शुद्धता मानी जायगी। स्त्री, बच्चे, भाई, बहिन जो लोग मिलजुलकर एक साथ एक घर में रहते हैं, एक चौके में भोजन करते हैं उनके गुण कर्म स्वभावों का आपस में तालमेल बैठना चाहिए। सभी को अपने आवश्यक कर्तव्यों का पालन करना और स्वभाव में इतनी सज्जनता उत्पन्न करना आवश्यक है कि जिससे सब लोग शान्तिपूर्वक रह सकें।

परिवार की साँस्कृतिक पाठशाला

जीवन विकास की शिक्षा का अधिकाँश भाग परिवार की पाठशाला में पूर्ण होता है। परिवार के वातावरण को ही संस्कृति कहते हैं, खानदान की अच्छाई की तलाश इस पारिवारिक वातावरण के आधार पर ही की जाती है। विवाह शादियों में लोग ऊँचे खानदान की बात बहुत बारीकी से देखा करते हैं। अब तो वह रूढ़ि मात्र रह गई, पर प्राचीन काल में इस देखभाल का, खानदान का मतलब परिवार के रहन−सहन, आदर्श स्वभाव एवं वातावरण ही समझा जाता था। उन्नतिशील व्यक्तियों और महापुरुषों का निर्माण इस खानदानी वातावरण में पाले−पोसे जाने से ही संभव होता है। निकृष्ट परिस्थितियों के कुटुम्ब में पाले−पोसे जाने पर कोई विरला ही अपवाद रूप से कभी कोई विकसित व्यक्तित्व का महापुरुष बन सका होगा। इसलिए यह आवश्यक है कि जैसे हम अपने स्वास्थ्य, सुविधा, मनोरंजन, उपार्जन आदि की बातें सोचा करते हैं, उसी प्रकार अपने ऊपर जिस परिवार का उत्तरदायित्व भगवान ने सौंपा है उसे सभ्य सुसंस्कृत और सुविकसित बनाने के लिए पूरा−पूरा ध्यान दें और इसके लिए जो कुछ किया जाना संभव हो उसे पूरी तत्परता और दिलचस्पी के साथ एक आवश्यक और महत्वपूर्ण कार्य समझ कर करते रहें। हमारे घर दीक्षा विद्यालय होने चाहिएं। बच्चे स्कूल में शिक्षा प्राप्त करें, पर व्यक्तित्व के विकास की आवश्यक दीक्षा उन्हें घर में मिल सके ऐसा वातावरण उत्पन्न करना, हम में से प्रत्येक को अपना परम पवित्र कर्तव्य मानना चाहिए। कार्य यह भी कठिन है, प्रगति भी मंद हो सकती है, पर उपेक्षा से भी काम चलने वाला नहीं है। कुछ करने से ही तो आगे बढ़ना संभव होगा।

परिवार विकास की आवश्यकता

साधना स्वाध्याय और आत्मोन्नति के लिए परमार्थ के लिए छोड़े गये छह घंटों में से आधा समय अर्थात् तीन घंटे खर्च किये जा सकते हैं। शेष तीन घंटे परिवार और समाज की सेवा में लगाने चाहिएं। जिन्हें अपना परिवार सभ्य और सुविकसित देखना हो तो उन्हें कम से कम एक घंटा अपनी परिवार गोष्ठी के लिए बिलकुल निश्चित रूप से नियत रखना चाहिए। जब सब लोग फुरसत में होते हैं तब परिवार की दैनिक समस्याओं पर विचार विनिमय करने के लिए एक नियत समय पर ज्ञान गोष्ठी का कार्यक्रम रखा जाया करे। आज के दिन किसके मन में क्या भले−बुरे भाव उठे और क्या प्रिय−अप्रिय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा इसकी चर्चा इस गोष्ठी में की जाती रहनी चाहिए और उलझनों को सुलझाने वाले सुझाव भी साथ−साथ ही प्रस्तुत किये जाते रहने चाहिए। समाचार पत्रों में छपती रहने वाली, अपने आस-पास घटित होते रहने वाली घटनाओं से लेकर उनकी आलोचना और समीक्षा इस दृष्टिकोण को लेकर की जानी चाहिए कि उस समीक्षा के प्रभाव से अपने परिवार को दुष्टों और दुष्टताओं से सावधान रहने और सज्जनों एवं सत्कर्मों की ओर अभिमुख होने की प्रेरणा मिले। पौराणिक उपन्यास या कहानियों के माध्यम से भी इस प्रकार का शिक्षण हो सकता है। कहानी कहना भी एक बड़ी महत्वपूर्ण कला है और परिवार निर्माण के लिए तो उसकी उपयोगिता बहुत ही अधिक है। व्याख्यान, प्रवचन, भजन, सत्संग आदि के कार्यक्रम सभा सुसाइटियों के उपयुक्त हो सकते हैं पर घर की दैनिक गोष्ठियों में उनका विशेष उपयोग नहीं है। उनमें कृत्रिमता का पुट अधिक रहने से नये−नये लोगों पर ही प्रभाव पड़ता है। घर में सीधी−साधी बातें ही कारगर होती हैं। चर्चा, समीक्षा विचार विनिमय, गप−शप कहानी आदि के हलके फुलके तरीके न तो किसी के मस्तिष्क पर भार बनते हैं और न उन्हें सुनाते सुनते कोई ऊबता है। इसलिए परिवार का प्रशिक्षण इन्हीं साधनों के आधार पर किया जाना चाहिए। हमारी दैनिक परिवार ज्ञान गोष्ठियों की प्रक्रिया ही गतिमान हो सकती है।

अभिभावकों का उत्तरदायित्व

कोई अभिभावक अपने स्त्री, बच्चों के लिए, परिवारजनों के लिए भोजन, वस्त्र, दवा, फीस, किताब, जेबखर्च, मनोविनोद आदि का प्रबन्ध कर देने मात्र से अपने कर्तव्यों से उऋण नहीं हो सकता। पैसे खर्च करके जो लोग अपने पारिवारिक कर्तव्यों को पूरा किया मानते हैं वे सारी भूल करते हैं। सुसंस्कारों का प्रदान करना एवं उनकी मनोभूमि को सुरुचिपूर्ण, सुसंस्कृत बनाना भी उन्हीं का काम है, इसके बिना अधिकाँश उत्तरदायित्व अपूर्ण ही माना जायेगा। स्कूलों में शिक्षा मिल सकती है दीक्षा नहीं। संस्कृति की दीक्षा तो उसी वातावरण में मिलती है जहाँ मनुष्य रहता है। प्राचीन काल में ऋषि अपने शिष्यों की शिक्षा और दीक्षा दोनों का ही प्रबन्ध अपने आश्रमों में रखकर किया करते थे। वे आश्रम छात्रों के घर भी थे और शिक्षालय भी। गुरुकुलों में सर्वांगपूर्ण विकास का वातावरण रहता था और उनमें पलकर बालक अपने भावी जीवन को समुन्नत बनाने की शिक्षा साधना किया करते थे। आज वैसा वातावरण बाहर कहीं नहीं दीखता। अब यह कार्य प्रत्येक अभिभावक को स्वयं करना पड़ेगा। अपने घर का वातावरण ऐसा बनाना पड़ेगा जिसमें रहने और साँस लेने से परिवार का प्रत्येक व्यक्ति सभ्य नागरिक बनने की सुविधा प्राप्त कर सके। हमारे घरों को दीक्षा विद्यालयों में परिणत होना चाहिए। बड़ों का जीवन ऐसा हो जिसे देखकर छोटे यह प्रभाव अनायास ही ग्रहण कर लें और स्वयं भी आगे वैसे ही बनने और ढलने की तैयारी करें। एक घण्टे की ज्ञान गोष्ठी के अतिरिक्त निरन्तर अपने परिवार की गतिविधियों पर दृष्टि रखें और समय−समय पर परिजनों का प्रेम, शाँति, धैर्य, एवं सज्जनता के साथ आवश्यक मार्ग−दर्शन करते रहें तो उसका प्रभाव घर के वातावरण को प्रभावित करता ही रहेगा।

प्रणाली और प्रक्रिया सीखिये।

कई व्यक्ति अपने परिवार को सुसंस्कृत तो बनाना चाहते हैं पर इसके लिए केवल अपशब्द कहना, क्रोधित रहना, निन्दा करना, गाली−गलौज या मारपीट करना जैसे बेहूदे तरीके ही उनके पास होते हैं। इन उपायों से किसी का सुधर सकना तो दूर, उलटे अधिक बिगड़ने, चिड़चिड़े होने और विरोधी बनने का ही परिणाम सामने आ सकता है। जिस प्रकार स्कूल के बच्चों को पढ़ाने के लिए अध्यापकों को पढ़ाने की ट्रेनिंग अलग से लेनी पड़ती है उसी प्रकार अभिभावकों को, गृहस्वामियों और कुलपतियों को भी अपने परिवार का प्रशिक्षण करने की क्रमबद्ध शिक्षा प्राप्त करनी पड़ेगी। दुख की बात है कि जहाँ मशीनें चलाने और नौकरी करने जैसे कामों की ट्रेनिंग के लिए अनेकों स्थानों पर प्रशिक्षण चलते हैं वहाँ अपना जीवन भलमनसाहत के साथ जीने और अपने अंगभूत परिवार को सुसंस्कृत बनाने की क्षमता प्राप्त करने का कोई प्रशिक्षण संस्थान नहीं है। लगता है कि इस अभाव की पूर्ति के लिए भी हमें ही एक व्यापक और प्रभावपूर्ण व्यवस्था बनानी पड़ेगी। जब तक ऐसी कोई व्यवहारिक शिक्षण व्यवस्था नहीं बन जाती तब तक अखण्ड ज्योति के पृष्ठों में ही बहुत कुछ मार्गदर्शन प्रस्तुत किया जाता रहेगा।

जो हो, हमें आत्म−निर्माण और परिवार निर्माण की उपयोगिता और आवश्यकता समझनी ही होगी और आज की परिस्थितियों के अनुसार हमें कुछ न कुछ सोचने और करने के लिए कटिबद्ध होना ही पड़ेगा। युग−निर्माण का श्रीगणेश और शुभारम्भ इसी प्रकार तो होने वाला है।


अपना परिवार बढ़ता ही चले

जिस प्रकार सिर, धड़ और पैरों के तीन भागों में हमारा शरीर बँटा हुआ है उसी प्रकार जीवन भी वैयक्तिक, पारिवारिक और सामाजिक इन तीन भागों में विभाजित है। हम व्यक्तिगत रूप से अच्छे हों, परिवार भी सभ्य हो पर चारों ओर रहने वाले वे लोग जिनसे निरन्तर अपना काम पड़ता है यदि असभ्य, असंस्कृत और अनैतिक प्रकृति के हों तो प्रगति का पथ ही नहीं रुका रहेगा वरन् पग−पग पर कठिनाइयों का सामना पड़ेगा। जिस प्रकार जलवायु के अच्छे होने से घटिया आहार मिलने पर भी मनुष्य स्वस्थ रह सकता है उसी प्रकार चारों ओर का वातावरण प्रसन्नता और प्रफुल्लता से भरा हो तो असुविधाओं से भरा हुआ अभावग्रस्त जीवन भी हँसी−खुशी से कट जाता है। सिर, धड़ और अधोभाग इन तीनों में से एक भाग भी यदि रुग्ण या अशक्त रहे तो सारा शरीर ही विपन्न स्थिति में पड़ा रहेगा उसी प्रकार व्यक्तिगत और पारिवारिक विकास के साधन जुटा लेने पर भी यदि सामाजिक जीवन अस्त−व्यस्त बना हुआ है तो उसके कारण चिन्ता और परेशानी की स्थिति बनी ही रहेगी।

समीपवर्ती वातावरण को बदलें

हमें अपने आस−पास का वातावरण अच्छा बनाने का प्रयत्न करना ही चाहिए इस ओर से उपेक्षा रखने और अपने मतलब से मतलब रखने की नीति अपनाने से लाभ नहीं घाटा ही रहता है। सारे समाज को बदल डालना अपने लिए सम्भव भले ही न हो पर इतना तो हर कोई कर सकता है कि सद्भावनाशील व्यक्तियों का एक संगठन बनावे। उत्तम प्रकृति के लोग यदि आपस में प्रेम−भाव, एकता, समीपता और सहयोग के आधार पर परस्पर सुसंबद्ध रहने लगें तो उनकी सम्मिलित शक्ति एक महत्वपूर्ण बात बन जाती है और उसके द्वारा चारों ओर फैले हुए अनैतिक वातावरण को उच्छृंखल होने से रोक रखने में भारी सहायता मिलती है। एक गुण्डा भी अकेला कुछ नहीं कर सकता वरन् आसानी से पिट जाता है। उसकी शक्ति तो तभी बढ़ती है जब संगठन का बल और प्रभाव उसके पीछे रहता है। गिरोह−बन्द होने पर ही गुण्डे अपनी उद्दंडताओं का प्रदर्शन करते हैं। संगठन अपने आप में एक महान शक्ति है। गुण्डों के लिए वह उपयोगी सिद्ध हो सकती है तो सज्जनों के लिए वह काम की वस्तु क्यों सिद्ध न होगी?

शक्ति का प्रदर्शन होने से भी विरोधियों के हौसले परास्त हो जाते हैं। अनैतिक तत्व उच्छृंखल तो अवश्य होते हैं पर उनके पीछे नैतिक बल न रहने से दुर्बलता ही भरी रहती है, जिसका शमन थोड़े से ही शक्ति प्रदर्शन से सरलतापूर्वक हो जाता है। चोर तभी सेंध लगाते हैं जब घर के लोग सोये पड़े हों, उल्लू चमगादड़ तभी तक सक्रिय रहते हैं जब तक प्रकाश नहीं होता। अनैतिक तत्व भी वहीं पनपते हैं जहाँ उन्हें आलोचना या विरोध की आशंका नहीं होती। पुलिस चौकी के आस−पास आमतौर से चोरियाँ नहीं होतीं क्योंकि चोर जानते हैं कि यहाँ प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है इसलिए जोखिम के इस स्थान को छोड़ कर वहाँ मोर्चा लगाना चाहिए जहाँ कमजोरी ज्यादा हो। जिसके पीछे कोई नहीं होता आमतौर से उसे ही सताया जाता है। सज्जन लोग आमतौर से इसीलिए परेशान किये जाते हैं क्योंकि वे गुण्डों की तरह संगठित नहीं होते। यदि उनमें भी आवश्यक संगठन की व्यवस्था बन जाय तो उसकी क्षमता अनैतिक तत्वों की अपेक्षा सैकड़ों गुनी अधिक रहेगी और इस संगठन मात्र से बुराइयों के सुधार में भारी योगदान मिलने लगेगा।

संगठन की महान शक्ति

कहते हैं कि निर्जीव चीजें एक और एक दो होती हैं किन्तु जीवित मनुष्य यदि सच्चेपन से एक दूसरे को प्रेम करें और एकता की सुदृढ़ भावना में संबद्ध हों तो वे एक और एक मिलकर ग्यारह बन जाते हैं। उनकी शक्ति का परिमाण अनेक गुना अधिक बन जाता है। हमें इस प्रक्रिया को अपनाना ही होगा इसके बिना और कोई मार्ग नहीं। सज्जनों का संगठन हुए बिना दुर्जनता का पलायन और किसी उपाय से नहीं हो सकता।

इतिहास साक्षी है कि अनैतिकता के प्रतिरोध के लिए नैतिक तत्वों को संगठित होना पड़ा है और उस संगठन के बल बूते पर ही दुष्टता को परास्त कर सकना संभव हुआ है। अवतारी और युग−पुरुषों ने भी धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश केवल अपने एकाकी बल बूते पर नहीं कर लिया है वरन् उन्हें भी संगठन की रचना करनी पड़ी है और उसी का सहारा लेकर यह लोक−शिक्षण करना पड़ा है कि सज्जनता की रक्षा केवल संगठित शक्ति द्वारा ही संभव होगी। भगवान राम को रीछ, बन्दरों की सेना इकट्ठी पड़ी थी, भगवान कृष्ण के साथ गोप और पशु पालकों का एक बड़ा संगठन था। राणा प्रताप को सेना इकट्ठी करने के लिए भामाशाह ने आर्थिक साधन जुटाये थे। सुभाष बोस ने आजाद हिन्द फौज बनाई थी। महात्मा गान्धी ने स्वराज्य आन्दोलन के लिए कितना विशाल संगठन खड़ा किया था।

असुरों से संत्रस्त देवता जब अपनी करुण पुकार लेकर ब्रह्माजी के पास गये तब उन्होंने सब देवताओं की थोड़ी−थोड़ी शक्ति इकट्ठी करके दुर्गा देवी की रचना कर दी तब उसके द्वारा असुरों का हनन हुआ। रावण के त्रास से संत्रस्त ऋषियों ने अपना थोड़ा−थोड़ा खून एक घड़े में जमा करके जमीन में गाड़ा था तब उसमें से सीता जन्मी और उन्हीं के निमित्त से असुर कुल का सर्वनाश हो सका। बुद्ध भगवान को एक बड़ा शिष्य मण्डल तात्कालिक पाप−वृत्तियों से लोहा लेने के लिए संगठित करना पड़ा था। विभिन्न मत−मतान्तरों और सम्प्रदायों, और पंथों की रचनाऐं भी तत्कालिक किसी सुधार की आवश्यकता के कारण ही हुई थीं। सिक्ख पंथ मुसलमानों के अन्यायों से बचाव की दृष्टि से बना और बढ़ा था, सामाजिक कुरीतियों के समाधान के लिए आर्य समाज का अस्तित्व सामने आया। धर्म और सत्य के आदर्श सब सम्प्रदायों में एक ही हैं कोई मौलिक मतभेद किसी में नहीं है फिर भी समय−समय पर अनेक संगठन बनते रहते हैं इनका उद्देश्य तात्कालिक परिस्थितियाँ ही होती हैं। संगठन का सहारा लिये बिना समाज सुधार एवं युग−निर्माण जैसे महान कार्य तो और किसी प्रकार संभव ही नहीं हो सकते, इसलिए हम को भी अपने व्यक्तिगत जीवन को सुविकसित बनाने के लिए अपने साथ सज्जनों का एक संगठन रखना ही पड़ेगा। युग−निर्माण की जनमानस विकास योजना के लिए भी इस की अनिवार्य आवश्यकता है।

सहृदय सज्जनों की खोजबीन

हमें अपने परिवार में, रिश्तेदारों में, स्वजन सम्बन्धियों में, ग्राहकों में, साथी−मित्रों में, परिचित अपरिचितों में यह दृष्टि डालनी होगी कि उन में से कौन−कौन ऐसे हैं जिनमें सज्जनता एवं विचारशीलता के बीजांकुर मौजूद हैं। ऐसे लोगों के नाम अपनी डायरी में नोट कर लेने चाहिए और बीमा कम्पनी के एजेण्ट जैसे अपने काम के लोगों के पीछे बराबर लगे ही रहते हैं, अनेक तर्क, दलील और उदाहरणों से बीमे की उपयोगिता समझाकर अपने व्यक्तित्व का प्रभाव डालकर एक न एक दिन उसका बीमा करा ही लेते हैं उसी प्रकार अपना प्रयत्न भी यदि सद्विचारों से उनका मस्तिष्क भर देने में लगा रहे तो उनमें से कइयों की जीवन दिशा बदल सकती है और वे अपनी विचारधारा से अवश्य ही प्रभावित हो सकते हैं। विचारों की एकता होने पर और परस्पर मिलते−जुलते रहने पर प्रेम और आत्म−भाव का विकास होता है इसी आधार पर आमतौर से लोग संगठित हुआ भी करते हैं।

जब तक विचारों में एकता न होगी, आकाँक्षाओं और भावनाओं को प्रवाह एक दिशा में न होगा तब तक संगठन में मजबूती न आवेगी। सज्जनों में भी अनेक मान्यताओं और अनेक विचारधाराओं के लोग होते हैं पर उनमें विचारों की एक दिशा न होने से प्रेम और एकता का अभाव ही रहता है। असुरों को मारने के उद्देश्य से ही रीछ, बानरों की सेना राम के साथ हुई थी। यदि सब रीछ, बन्दरों के उद्देश्य, आदर्श, विचारभाव भिन्न−भिन्न प्रकार के होते तो उनकी सेना थोड़े ही दिनों में बिखर जाती। जो लड़ाई का उद्देश्य न लेकर और किसी कामना से सेना में आये होते तो वे झंझट का समय सामने आते ही भाग खड़े होते। किसी भी संगठन का प्राण उसके आदर्शों में अटूट निष्ठा ही होती है। हमें अपने आस−पास के लोगों में से जिनमें सत्प्रवृत्ति के लक्षण दिखाई पड़ें उनमें युग−निर्माण के आदर्शों के प्रति स्वस्थ शरीर और स्वच्छ मन और सभ्य समाज की रचना के प्रति आत्म−निर्माण, परिवार−निर्माण और समाज−निर्माण के प्रति भावना एवं आस्था उत्पन्न करनी चाहिए, ऐसे आस्थावान् व्यक्ति ही अपने संगठन की रीढ़ हो सकते हैं।

विचारधारा का विस्तार

एक दिन की चर्चा से युग−निर्माण की विचारधारा किसी को समझाई नहीं जा सकती। फिर हर किसी का समझने का ढंग एवं व्यक्तित्व भी इतना प्रभावपूर्ण नहीं होता कि उससे प्रभावित होकर इस सुविस्तृत विचारधारा को हर कोई भली प्रकार समझ ले और तुरन्त ही हृदयंगम कर लें। किसी बात को कहा तो थोड़ी ही देर में जा सकता है पर उसे किसी के गले उतार देना बड़ा समयसाध्य और श्रमसाध्य कर्म है। यदि ऐसा न हुआ होता तो सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, दया, दान, संयम, सेवा जैसे दस पाँच गुणों की धारणा कराने के लिए ऋषियों को इतने शास्त्र, पुराण क्यों रचने पड़ते और सारे जीवन उसी का प्रसार विविध प्रकार से करने में क्यों संलग्न रहना पड़ता। मनुष्यों का मन आमतौर से जंग लगे ताले की तरह होता है जिसे खोलने के लिए अपने व्यक्तिगत प्रेम और सद्भाव का तेल डालना पड़ता है और आवश्यक तर्कों एवं तथ्यों से भरी विचारधारा की सही ताली लगानी पड़ती है तब कहीं उसके खुलने का उपक्रम बनता है।

अखण्ड ज्योति को जन−मानस को खोलने वाली ताली के रूप में प्रस्तुत करने के लिए हम एक निष्ठावान लुहार की तरह कृतकार्य हो रहे हैं। आपका काम है कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र के हर सज्जन प्रकृति व्यक्ति के मन में अपने स्नेह, सौजन्य का तेल लगाकर चिकनाई पैदा करें और इस ताली को जिसे हमने अपनी सारी अन्तःचेतना उड़ेल कर एक कारगर वस्तु बना दिया है प्रवेश करा देने का यत्न करें। अपने मुँह से अपनी बात बढ़ी−चढ़ी कहना अच्छा नहीं लगता पर अनुभव यह बताता है कि जिन लोगों को अखण्ड ज्योति पढ़ने और सुनने का अवसर मिल रहा है वे निश्चित रूप से बदल रहे हैं, ढल रहे हैं, उठ रहे हैं, बढ़ रहे हैं, चल रहे हैं। प्रेरणा का प्रवाह यदि किसी कारणवश टूट ही न गया तो यह प्रवाह जिनके मनःक्षेत्र तक निरन्तर पहुँचेगा वे कुछ बन कर ही रहेंगे, कुछ होकर ही रहेंगे।

धर्म और सदाचार की शान्ति सेना

जिस प्रकार वेतन और शस्त्र की व्यवस्था हुए बिना सेना का संगठन नहीं हो सकता उसी प्रकार सज्जनों की युग−निर्माण सेवा का संगठन भी पाठकों के प्रयत्न और अखण्ड ज्योति की विचारधारा का समन्वय हुए बिना संभव नहीं हो सकता। हम में से प्रत्येक को इस महत्वपूर्ण कार्य में संलग्न होकर युग−निर्माण के क्षेत्र का विस्तार करना चाहिए। अपना परिवार बढ़ाने का यही तरीका है। अपनी अखण्ड ज्योति पत्रिका हम उन सब लोगों तक पहुँचावें—उसके लेखों की प्रशंसा करके पढ़ने का आकर्षण पैदा करें और समय−समय पर प्रस्तुत प्रसंगों पर चर्चा करते हुए उनकी अभिरुचि का परिष्कार करते रहें। आप इतना प्रयत्न करेंगे और पत्रिका के छपे पत्रों में लिपटी हुई हमारी भावना भी कुछ काम करेगी तो दोनों के समन्वय का एक बड़ा सुखद रूप सामने आवेगा और लोगों को तेजी से बदलते हुए हम प्रत्यक्ष देख सकेंगे। किसी मित्र, कुटुम्बी या सम्बन्धी के साथ इससे बड़ा उपकार और कुछ नहीं हो सकता कि उसके अन्तःकरण में उच्चकोटि की भावना और विचार−धारा भर दी जाय इसी आधार पर तो किसी का लोक−परलोक सुख−शान्तिमय बन सकता है। ब्रह्मदान से, ज्ञान−दान से, बढ़कर इस पृथ्वी पर और कोई दान नहीं है यदि हम अपने क्षेत्र के कुछ लोगों को अखण्ड ज्योति का नियमित पाठक बनाने में सफल हो जाते हैं तो निश्चय ही यह प्रयत्न युग−निर्माण की सेना के सैनिक भर्ती करने के समान ही महत्वपूर्ण है। जब इन सैनिकों का एक सुसज्जित संगठन बनकर तैयार होगा तब हम देखेंगे कि अनैतिकता की वे विभीषिकाऐं जो आज काली घटाओं की तरह हमारे सिर पर घुमड़ रही हैं सहज ही तिरोहित होने लगेंगी।

परिवार रचना की दो परम्पराऐं

परिवारों का गठन दो प्रकार का होता है, एक रक्त परिवार दूसरा विचार परिवार। माता−पिता के खून से बनकर जो परिवार बनता है वह घर, कुटुम्ब कहलाता है। भावनाओं और आकाँक्षाओं की एकता वाले लोग भी एक कुटुम्बी ही बन जाते हैं। चोर, डाकू, जुआरी, नशेबाज जब एक स्वभाव और एक कार्यक्रम के कारण अत्यन्त घनिष्ठ बन जाते हैं तो आध्यात्मिक भावनाओं, प्रेरणाओं और योजनाओं से प्रभावित व्यक्ति आपस में घनिष्ठ क्यों कर न होंगे? रक्त के आधार पर बना हुआ वंश परिवार कहलाता है और भावनाओं के आधार पर बना संगठन ज्ञान−परिवार या गुरु−परिवार कहलाता है। प्राचीन काल में गोत्रों की रचना दोनों ही प्रकार से हुई है वंश परम्परा से भी और गुरु परम्परा से भी। कश्यप, भारद्वाज, गर्ग, वशिष्ठ, आदि गोत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र चारों ही वर्णों में मिलते हैं। इससे यह भ्रम होता है कि उन ऋषियों के वंशज चारों वर्णों में कैसे हुए? बात यह है कि यह गोत्र पुत्र परम्परा से ही नहीं, शिष्य परम्परा से भी चले हैं। इसी से सब वर्णों में ऋषियों के गोत्र मिलते हैं। हमें अपने वंश परिवार के विकास का ही नहीं, गुरु परिवार के, ज्ञान परिवार के, निर्माण का भी ध्यान रखना होगा और उसके विस्तार का भी।

संगठन तो पहले भी हमने किया था पर हमारे विचारों को नियमित रूप से पढ़ने−सुनने की शर्त न रहने से उनकी न तो जीवन दिशा बन सकी और न आस्था दृढ़ रह सकी। जिनके पास हम निरन्तर अपनी भावनाऐं और प्रेरणाऐं नहीं पहुँचा पाते उनका हमारे साथ देर तक संबद्ध रह सकना सम्भव भी नहीं था। अब उस भूल को सुधार लिया गया है और केवल उन्हीं को परिवार का सदस्य माना गया है जो हमारी भावनाओं को कम से कम सुनने को तो तैयार हों। अखण्ड ज्योति को नियमित रूप से पढ़ते रहना अब अपने परिवार की प्रारम्भिक शर्त बना दी गई है। नया संगठन इसी आधार पर किया जा रहा है। सज्जनों का कर्तव्य है कि इस आधार पर अपने परिवार का निर्माण और विस्तार करने के लिए उसी प्रकार लगें जिस प्रकार हम प्रति ग्राहक के पीछे तेरह आना वार्षिक का घाटा देते हुए प्राणप्रण से अखण्ड ज्योति के पन्ने−पन्ने में भावना और प्रेरणा लपेटने में लगे हुए हैं।

निर्माण का महत्वपूर्ण साधन

अपना परिवार जब बढ़ेगा तो उससे हम में से हर एक को व्यक्तिगत जीवन के विकास में भारी सहायता मिलेगी। एक से विचारों के लोगों में स्वभावतः प्रेम−भाव पैदा होता है। एक दूसरे को प्रेरणा और प्रोत्साहन देते हैं और लौकिक जीवन में भी एक दूसरे की सहायता किसी न किसी प्रकार करते हैं। दूसरे लोग इस संघबद्धता से प्रभावित होते हैं। विरोधियों और दुरात्माओं को भय रहता है और सज्जन सदाचारियों की हिम्मत बँधी रहती है। अनेकों अरुचिकर प्रसंग तो सज्जनों के संगठन के भय से अपने आप ही टल जाते हैं। इस प्रकार हम में से प्रत्येक को अपने वैयक्तिक जीवन का सर्वांगपूर्ण विकास करने के लिए अपने समीपवर्ती क्षेत्र में से जितनों को भी अपने प्रभाव क्षेत्र में ला सकना सम्भव हो उसके लिए शिथिल मन से नहीं पूरे उत्साह से प्रयत्न करना चाहिए।

युग−परिवर्तन कार्यक्रम का आधार ही यह संगठन होगा। व्यापक अनैतिकता का अन्त सत्पुरुषों की संगठित शक्ति के बिना और किसी उपाय से सम्भव नहीं। जितना−जितना यह संगठन व्यापक और प्रबल होता जायेगा उसी अनुपात से अपने कार्यक्रम बनते चलेंगे और एक−एक कदम उठाते हुए उस लक्ष की पूर्णता तक पहुँच सकेंगे जिसके ऊपर समस्त विश्व की—समस्त मानव जाति की—सुख शान्ति निर्भर है।


दस सूत्री रचनात्मक योजना

हमने अपना कार्य आरम्भ कर दिया है। अब आपका कर्तव्य है कि आप अपना कार्य आरम्भ कर दें। दोनों हाथों से ही ताली बजेगी। युग−निर्माण योजना साझे की खेती है, सात पाँच का छप्पर है। सब मिलकर कटिबद्ध होंगे तो ही काम चलेगा। शरीर के सभी अंग अपने−अपने हिस्से का काम ठीक तरह करते हैं तो ही स्वास्थ्य ठीक रहता है। यदि थोड़े से कम महत्वपूर्ण लगने वाले अंग प्रत्यंग भी अपना काम करना छोड़ दें तो सारे शरीर के लिए विपत्ति खड़ी हो जाती है। घड़ी के पुर्जों की तरह अखण्ड ज्योति परिवार के हर पुर्जे को अपने जिम्मे का काम निपटाने के लिए प्रसन्नता और उत्साहपूर्वक तत्पर हो जाना चाहिए।

उपासना की अनिवार्यता

(1) प्रातःकालीन ईश्वर उपासना का कोई न कोई रूप हम में से प्रत्येक को नियत और निश्चित कर लेना चाहिए। जो लोग क्रमबद्ध गायत्री उपासना कर रहे हैं, उन्हें निष्ठा को, श्रद्धा−विश्वास को दिन−दिन बढ़ाते चलना चाहिए। अक्टूबर अंक में हर वर्ष उन्हें एक−एक साल का पाठ्यक्रम मिलता रहेगा, उस पर चलने पर गृहस्थ में रहते हुए उच्च स्तरीय आत्मिक भूमिका तक पहुँच सकना नैष्ठिक साधकों के लिए पूर्णतया संभव हो सकेगा। जिन्होंने अभी उपासना को कोई क्रम नहीं रखा है उन्हें यह अंक पहुँचने के बाद गत पृष्ठों पर “केवल हम ही नहीं, हमारा परिवार भी” लेख के अन्तर्गत सुझाये हुए प्रकार से गायत्री उपासना आरंभ कर देनी चाहिए। आध्यात्मिक विकास के लिए उपासना अनिवार्य है। हमारा पहला कदम यही होना चाहिए। इसके साथ ही ‘युग-निर्माण संकल्प’ भी उपासना का एक अंग समझकर पढ़ा जाना चाहिए।

आत्मनिरीक्षण और आत्मचिन्तन

(2) सोते समय आत्मचिन्तन करना जरूरी है। अपनी त्रुटियों और बुराइयों को रोज ही ढूँढ़ना चाहिए और अगले दिन उन्हें घटाने की बात सोचनी चाहिए। रस्सी की थोड़ी−थोड़ी रगड़ रोज पड़ते रहने से पत्थर पर निशान बन जाता है तो सुधार का थोड़ा−थोड़ा प्रयत्न भी यदि चलता रहे, उस मार्ग पर धीरे−धीरे भी हम चलें तो कुछ ही दिनों में हमारा बहुत कुछ सुधरा हुआ स्पष्ट दीखने लगेगा। निरन्तर चलते रहने वाला मंदगामी कछुआ भी जब लम्बी यात्राऐं पूरी कर सकता है तो अपनी खराबियों को सोचने, सुधारने और निरंतर चलने वाला क्रम हमें एक दिन पूर्ण पवित्रता के लक्ष तक क्यों नहीं पहुँचा देगा?

समय का सदुपयोग

(3) अपने समय विभाजन की योजना एक दिन पूर्व बना लेनी चाहिए और चौबीस घण्टा पूरा होते ही यह निरीक्षण करना चाहिए कि निर्धारित योजना के अनुसार हमने कार्यक्रम चलाया या नहीं? आकस्मिक कारणों से हेर फेर करना पड़े तो बात दूसरी है, पर आलस्य और प्रमाद पर कड़ा अंकुश रखना चाहिए और उसे निर्धारित कार्यक्रम को बिगाड़ने में सफल न होने देना चाहिये। जिसकी दिनचर्या उद्देश्यपूर्ण दृष्टिकोण का समन्वय करते हुए ठीक बन गई और उसका पहिया भली प्रकार लुढ़कने लगे तो समझना चाहिये कि जीवन की सफलता का आधा लक्ष पूर्ण होने की आशा बँध गई। लोग आमतौर से निरुद्देश्य जीते हैं और अविवेकपूर्ण सोचते और बिना व्यवस्था के करते रहते हैं। फलस्वरूप उनकी भारी दौड़−धूप एवं परेशानी भी कोई कारगर परिणाम नहीं निकलने देती। सोचने का और करने का कोई व्यवस्थित तरीका किन्हीं सिद्धान्तों और आदर्शों के आधार पर हम बनावें तो बहुत कुछ बन सकता है, बहुत कुछ हो सकता है। शरीर चलाने के लिए, रोटी कमाने के लिए और मानवीय धर्म−कर्तव्यों के लिए हमारा समय विभाजित रहना चाहिये और उस बनाये हुए कार्यक्रम पर मजबूती से चला जाना चाहिये।

स्वाध्याय एक आवश्यक नित्यकर्म

(4) स्वाध्याय का स्थान भजन के समान ही है। उसे साधना का एक सुनिश्चित अंग मानना चाहिये। भजन−पूजन की उपासना सरल है। घण्टा, आधा घण्टा पूजा−पाठ की विधि पूरी कर लेना कुछ कठिन नहीं है। ढर्रे पर पड़ जाने पर वह भी दैनिक जीवन का एक अंग बन जाता है और उसकी पूर्ति में कुछ कठिनाई नहीं दीखती। जिसे साधना कहा जाता है वह कार्य कठिन है। उसमें जीवन के हर पहलू को सुधारने और सँभालने का लक्ष रहता है और आन्तरिक अव्यवस्था के हर मोर्चे पर डटकर लोहा लेना पड़ता है। उपासक बनना सरल है पर साधक बनना तो लोहे के चने चबाना है। साधना के अन्तर्गत उपासना का कार्यक्रम आ जाता है पर साधनाविहीन उपासना तो एकांगी अधूरी और विडम्बना मात्र बनकर रह जाती है। ‘अखण्ड−ज्योति’ के पाठकों को साधक बनाया जा रहा है और उन्हें इसके लिए आवश्यक अस्त्र और शस्त्र, औजार और साधना, विचार और सुझाव, प्रेरणा और प्रकाश केवल मात्र स्वाध्याय के भण्डार से ही उपलब्ध हो सकते हैं। जीवन निर्माण के लिए प्रेरणाप्रद विचारों को अपनाते रहने से जिसे ज्ञान उत्पन्न न हो सका, उसका साधना पथ पर चल सकना असंभव जैसा ही है। इसलिए हम में से प्रत्येक को साधना का एक नियत क्रम स्थिर कर ही लेना चाहिए।

शम और दम

(5) आत्मबल प्राप्त करने के लिए जिस प्रकार ध्यान, अनुष्ठान, स्वाध्याय आदि का पुरुषार्थ करना पड़ता है उसी प्रकार अपने गुण कर्म और स्वभाव को सुव्यवस्थित बनाकर मनोभूमि को संतुलित करने में भारी प्रयत्न करना होता है। आध्यात्मिक पुरुषार्थ के रूप में उपासना और मानसिक पुरुषार्थ के रूप में भावना की गणना होती है। कुविचारों से सद्विचारों की काट होती है। घड़ी−घड़ी पर निराशा के, उत्तेजना के, आवेश के, वासना के, ईर्ष्या द्वेष के, लोभ−मोह के, आलस्य और प्रमाद के विचार मन में उठते रहते हैं। इनसे लड़ने के लिए इनके प्रतिपक्षी विचारों की एक सुव्यवस्थित शृंखला पहले से ही बना रखनी चाहिए। ठंडे लोहे से गरम लोहा काटा जाता है। मजबूत काँटे से पैर में चुभा हुआ काँटा निकलता है। कुविचारों का शमन सद्विचारों से होता है। जिस प्रकार अनेक रोगों से ग्रसित रोगी अपने दर्द, खाँसी, बुखार, दाद, फोड़ा, आदि की अलग−अलग दवायें तैयार रखता है उसी प्रकार देखना चाहिये कि हमारे मन में किस−किस प्रकार के कुविचार रोज उठते हैं और उनकी काट करने के लिए कौन−कौन से विरोधी विचार उपयुक्त हो सकते हैं। उन्हें पहले ही मन में भली प्रकार जमाकर रखना चाहिए और मानसिक शत्रुओं का, कुविचारों का आक्रमण आरंभ होते ही इन काट करने वाली भावनाओं का, दवाओं का प्रयोग आरंभ कर देना चाहिये। शास्त्रों में इसे ‘शम’ के नाम से पुकारा गया है, इसी का स्थूल रूप ‘दम’ है जो अनुचित काम करने की इच्छा हो रही है उसे बलपूर्वक हठपूर्वक आग्रहपूर्वक उसी प्रकार न करने के लिए अड़ जाना, जिस प्रकार शत्रु के सामने न झुकने के लिए तनकर खड़े हो जाते हैं, ‘दम’ कहलाता है। शम और दम की शक्ति हमें अपने भीतर निरन्तर बढ़ाते रहनी चाहिये।

प्रगतिशील जीवन

(6) जिस प्रकार अध्यात्मिक और मानसिक पुरुषार्थ आवश्यक है उसी प्रकार स्थूल जीवन को भी प्रगतिशील और समुन्नत बनाने के प्रयत्न करना भी आवश्यक माना जाना चाहिये। यों आमतौर से सभी लोगों का पूरा मन प्रायः इसी पुरुषार्थ में लगा रहता है। पर उनकी भूल यह है कि वे केवल मात्र धन उपार्जन को ‘उसके संग्रह की’ अपने धनी होने के प्रदर्शन को ही उन्नति का मापदंड मान बैठते हैं। धन की जीवन को सादगी से गुजारने की सीमा तक ही अनिवार्य आवश्यकता है। इसके बाद उसकी उपयोगिता तभी रह जाती है जब उसका कुछ महत्वपूर्ण उपयोग हो सके अन्यथा वह अधिक बढ़ा हुआ धन विपत्तियों का कारण ही बनता है। हमें धन तक ही सीमित न रहकर अपनी विभिन्न क्षमताऐं, योग्यताऐं, और प्रतिभाऐं बढ़ाने को भी समय लगाना चाहिए। व्यायाम मालिश आदि के द्वारा स्वास्थ सुधारना, शिक्षा का स्तर बढ़ाना, संगीत, शिल्प आदि कला कौशल सीखना, आदि अनेकों मार्ग ऐसे हो सकते हैं जिससे अपना व्यक्तित्व प्रभावपूर्ण बने। विपत्ति के समय में परदेश में, धन नष्ट हो जाने की स्थिति में यह योग्यताऐं ही एक विशिष्ट सम्पत्ति के रूप में सहायक होती हैं। इनके अभाव से आपत्तिग्रस्त व्यक्ति को भारी दुर्दशा का सामना करना पड़ता है। धन, जायदाद तो मरने पर यहीं छूट जाता है पर योग्यताऐं संस्कार रूप में मन के साथ अगले जन्म के लिये भी साथ जाती हैं, इसलिए अपनी परिस्थिति के अनुसार हर व्यक्ति को अपनी भौतिक योग्यताएँ बढ़ाने के लिए भी दैनिक कार्यक्रम में कोई स्थान रखना चाहिए।

परिवार−प्रशिक्षण

(7) परिवार की बौद्धिक शिक्षा−दीक्षा के लिए कम से कम एक घंटा नियत रहे, जिससे कथा कहानियों द्वारा, किन्हीं घटनाओं या समाचारों की आलोचना द्वारा मनोरंजक ढंग से जीवन के आवश्यक अनुभव प्राप्त कराने वाला शिक्षण करना चाहिए। यह शिक्षण हलका−फुलका मनोरंजन गपशप और सबको प्रसन्नतादायक होना चाहिए। गंभीर मुद्रा में, उत्तेजित होकर घर वालों पर व्यंग और कटाक्ष करते हुए यह शिक्षण कदाचित न चल सकेगा, इसका पहले से ही ध्यान करना चाहिए। घर के अशिक्षितों को साक्षर बनाने की प्रौढ़ पाठशाला चल सके तो यह अत्यन्त उपयोगी है। जिनकी स्त्रियाँ बिना पढ़ी हैं और पढ़ने की स्थिति में हैं उन्हें अवश्य ही पढ़ाया जाना चाहिए। जो कम पढ़ी हैं उनकी अधिक शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए। परिवार निर्माण में और प्रगतिशील जीवन बनाने के लिए पुत्री का भी विचारशील और सुशिक्षित होना आवश्यक है। पारिवारिक शिक्षा−दीक्षा की कोई न कोई प्रक्रिया घर में किसी न किसी रूप में नियमित रूप से चलती रहनी चाहिए।

सभ्यता का छोटा किन्तु महत्वपूर्ण प्रारंभ

(8) दो सुधार हमारे पारिवारिक जीवन में अब चल ही पड़ने चाहिएं। (1) बड़ों का नित्य अभिवादन−चरणस्पर्श (2) तू शब्द का पूर्ण निषेध। बहुत कम परिवार ऐसे होंगे जिनमें बड़ों का अभिवादन करने की प्रक्रिया चलती होगी। चरण स्पर्श में तो बड़े बड़ों तक को झिझक लगती है। बाहर के संत महात्माओं के पैर तो लोग छू लेते हैं पर घर में माता−पिता, बड़े भाई, भावज को नित्य अभिवादन करने और पैर छूने में संकोच करते हैं। पाप कर्म में झिझक तो समझ में आती है पर सत्कर्म में झिझकना और संकोच करना बहुत ही विचित्र लगता है। इस झूठी झिझक को हमें अपने घर से बिलकुल उखाड़ फेंकना चाहिए और प्रातः उठते ही अभिवादन की पद्धति आरंभ करानी चाहिए। यह सुधार हमें अपने से आरंभ कर देना चाहिए। घर में जो बड़े हों उनके नित्य प्रातः उठते ही पैर छुआ करें। जो छोटे हैं उन्हें भी अपनी ओर से नमस्कार के लिए जो शब्द अपने क्षेत्र में प्रचलित हो उसके द्वारा अभिवादन करना चाहिए। वैसे देशव्यापी अभिवादन एकता के लिए नमस्कार या नमस्ते शब्द अधिक उपयुक्त रहेंगे।

दूसरी बात नाम के अन्त में जी लगाकर आप या तुम के साथ बोलने की है। तू शब्द अनन्य आत्मीयता का बोधक तो है पर उसकी सामाजिक उपयोगिता नहीं है। साधारणतया इसमें अशिष्टता का पुट है। व्यक्ति को व्यक्ति का आदर करना चाहिए और यह आदर मन तथा व्यवहार में ही नहीं, वाणी से भी प्रकट होना चाहिए। छोटों को भी, स्त्री बच्चों को भी हमें आप या तुम कहकर बोलना चाहिए और हो सके तो उनके नाम के आगे जी भी लगानी चाहिए। इससे उनकी वाणी मधुर हो जाती है और शिष्टाचार का सभ्यता और संस्कृति का प्रचार होता है। इसलिए इस प्रकार का प्रचलन करना ही चाहिए। आरंभ में एक दो दिन मजाक बन सकता है, अपने को भी अटपटा लग सकता है और कुछ दिन नये अभ्यास के कारण आधा तीतर, आधा बटेर भी हो सकता है। पर यदि दृढ़ता से कुछ दिन इसका अभ्यास चलाते रहा जाय तो अभिवादन और शिष्ट संबोधन की दोनों ही प्रक्रियाऐं अपने परिवार में चल सकती हैं और फिर उनकी देखा−देखी प्रसार दूर−दूर तक हो सकता है।

स्वच्छता और व्यवस्था

(9) सफाई और व्यवस्था को हमें अपनी आदत में सम्मिलित करना ही चाहिए। जिस प्रकार हम आत्मा का सम्मान करते हैं, ईश्वर का सम्मान करते हैं, दूसरों का सम्मान करना चाहते हैं उसी प्रकार हमें अपने साधनों, उपकरणों और वस्तुओं का भी आदर करना चाहिए। कपड़े, जूते बिस्तर, पुस्तकें, कलम, दवात, बर्तन, खाद्य−पदार्थ आदि सभी वस्तुऐं साफ सुथरी और यथा स्थान सुसज्जित रूप से रखी रहनी चाहिये। कला और सौन्दर्य रूप से रखी रहनी चाहिएं। कला और सौन्दर्य भी अध्यात्म के अत्यन्त आवश्यक गुण हैं। जिसे सफाई से प्रेम नहीं, जहाँ-तहाँ गंदगी और अव्यवस्था वगैरह रहती है वह फूहड़ प्रकृति का आदमी अध्यात्मवादी होने का दावा नहीं कर सकता। गंदगी से हमें उसी प्रकार जानी दुश्मनी रखनी चाहिए जिस प्रकार साँप, बिच्छू, पाप और कुकर्म से घृणा करते हैं। गंदगी पैदा होती ही रहती है। उससे बचा नहीं जा सकता, पर उसे तुरन्त स्वयं साफ करना चाहिये। गंदगी से घृणा उसी की सार्थक है जो उसे हटाने की प्रक्रिया में उत्साह रखता है। जो गंदगी साफ करने से जी चुराता है वह सफाई पसंद नहीं, वरन् गंदगी को प्रेम करने वाला है। प्रेमी ही अपनी प्रिय वस्तु को हटाने में संकोच कर सकता है। जो चीज यथास्थान नहीं रखी गई है वह महत्वपूर्ण और कीमती होते हुए भी कूड़ा बन जाती है और कूड़ा भी अपने नियत स्थान पर रखा होने से सुरुचि का परिचायक होता है। हमें अपनी हर वस्तु का आदर करना चाहिए। मकान का, पलंग का, बिस्तर का, कपड़ों का, पुस्तकों का, बर्तनों का भी। इस आदर का एक ही चिन्ह है कि उन्हें यथास्थान रखा गया है या नहीं। साबुन और बुहारी से हमें सच्ची दोस्ती करनी चाहिए। कपड़े धुले हुए साफ रहें, स्नान में शरीर का मैल पूरी तरह छुड़ाया जाय, मंजन करने में चूक न की जाय। घर की नालियाँ साफ रहें, छतों पर मकड़ी के जाले कहीं भी दिखाई न पड़ें, हर चीज अपने स्थान पर सुसज्जित रूप से रखी और साफ सुथरी हो तो अपनी झोंपड़ी भी देव मंदिर से सुन्दर लग सकती है और अपने व्यक्तित्व, संस्कृति, सुरुचि कलात्मक दृष्टिकोण और सुधरे हुए स्वभाव का प्रमाण मिल सकता है। यह सब हमें करना ही चाहिए।

विचार परिवार की रचना एवं वृद्धि

(10) सज्जनों की अभिवृद्धि और एकता युग−निर्माण का दसवाँ कार्यक्रम है अपनी ओर से अपने परिवार की भलाई सोचते रहना ही पर्याप्त नहीं, वरन् हमें यह भी प्रयत्न करना होगा कि संबंधित लोगों में सज्जनता बढ़े, अपने विचारों के लोगों की संख्या बढ़ती चले और उनमें परस्पर एकता, घनिष्ठता, सहकारिता, एवं सभ्यसमाज की रचना करने के लिए मिलजुल कर कुछ करने की भावना भी पैदा हो। इस युग में संगठन ही सबसे बड़ा है। वोट के द्वारा अब राज पलट जाते हैं। एकाध विद्वान को लोग मखौल में उड़ा देते हैं और संगठित मूर्खों का दल हर प्रकार की मनमानी करने में सफल होता है। वैयक्तिक जीवन में एक संघ शक्ति से सुसज्जित होने के लिए भी और सभ्यसमाज की रचना के लिए भी हमें अपने समीपवर्ती सज्जनों को संघबद्ध करना, उनके विचारों में प्रगतिशीलता उत्पन्न करना होगा। युग−निर्माण के लिए जो बड़ी−बड़ी बातें सोची गई हैं उनकी पूर्ति करना ऐसे संगठन द्वारा ही सम्भव होगा। विचार परिवार की रचना में हमें पूरे उत्साह के साथ अभिरुचि लेनी चाहिए।

यह कार्य हमें ‘अखण्ड−ज्योति’ के प्रेरणा सूत्र को माध्यम बनाकर करना होगा। जिस प्रकार एक धागे में अनेक मनके पिरोये रहते हैं और माला मजबूत बनी रहती है इसी प्रकार ‘अखण्ड−ज्योति’ की सदस्यता उसके पाठकों में मानसिक प्रौढ़ता और परिवार भावना पैदा करती रहेगी। हमारा पिछला गायत्री परिवार का संगठन इसीलिए बिखर गया कि उनकी विचार प्रौढ़ता बढ़ाने और एकता स्थिर रखने का कोई ठीक माध्यम नहीं था। जप साधना भी बड़ा कठिन कार्य है। निरन्तर प्रेरणा के बिना वह श्रद्धा भी आज की परिस्थितियों में देर तक नहीं टिक पाती। अब उस भूल को सुधार लिया गया है और युग−निर्माण योजना के सदस्य, सहयोगी एवं अपने स्वजन केवल उन्हें ही गिनना आरम्भ किया है जो कम से कम हमारी बात सुनने में हमारे विचारों को पढ़ने समझने में तो दिलचस्पी लेते हों।

संगठन से ही समाज निर्माण संभव

सामाजिक बुराइयों, कुरीतियों, अनैतिकताओं में से अधिकाँश ऐसी हैं जिनका उन्मूलन और उनके स्थान पर स्वस्थ परम्पराओं की स्थापना संगठित प्रयत्नों से ही सम्भव हो सकेगी। जुआ, चोरी, रिश्वतखोरी, मिलावट, बेईमानी, व्यसन, व्यभिचार, दहेज, मृत्युभोज, नशेबाजी, माँसाहार, पर्दा, बाल−विवाह, अनमेल विवाह, उच्छृंखलता, गुण्डागर्दी, फैशन, फिजूलखर्ची आदि अगणित बुराइयाँ ऐसी हैं जो अपने समाज में गहरी जड़ जमा चुकी हैं। इनका विरोध करने को एक व्यक्ति खड़ा होगा तो पिस जायेगा, किन्तु यदि संगठित प्रतिरोध करने का और इनके स्थान पर आदर्श परम्पराओं के अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने का प्रचलन बढ़ेगा तो सभ्यसमाज की स्थापना का स्वप्न सार्थक ही होकर रहेगा।


हमारा आगामी कार्य−क्रम

युग−निर्माण योजना को व्यवहारिक रूप देने के लिए हम ‘अखण्ड−ज्योति’ परिवार को उसी प्रकार प्रयुक्त करेंगे जैसे एक वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में तन्मय हो जाता है या एक माली अपने बगीचे में अपने आपको खो देता है। बगीचे का हर खिलता हुआ फूल माली की अन्तरात्मा में प्रसन्नता की लहरें उद्वेलित करता है, हमारी प्रसन्नता का स्त्रोत भी अब ‘अखण्ड−ज्योति’ परिवार से सम्बद्ध स्वजनों के खिलते और निखरते जीवन के साथ सम्बद्ध रहेगा। दुनिया बहुत बड़ी है, व्यक्ति छोटा है। हर व्यक्ति को एक सीमित कार्यक्षेत्र चुनकर उसमें अपने आपको जुटा देना पड़ता है तभी कोई सफलता दृष्टिगोचर हो सकती है। असीम विश्व की असीम आवश्यकताओं को सीमित मानव किस प्रकार पूरा कर सकता है? विश्व कल्याण की भावना रखते हुए भी उसका व्यवहारिक रूप तो किसी सीमित कार्य-क्षेत्र में ही रह सकेगा। हमने अपना कार्य-क्षेत्र ‘अखण्ड−ज्योति’ परिवार के स्वजनों में घुल जाने का बना लिया है। यह क्षेत्र जितना जितना बढ़ेगा उतना−उतना ही हमारी सेवा प्रक्रिया भी विस्तृत होती जायगी।

शिक्षण कहाँ सफल होता है?

उपदेश किसी को भी दिया जा सकता है पर कुछ करने के लिए उसी को दबाया जा सकता है जिस पर अपना कुछ जोर हो । जिस पर अपना कुछ जोर नहीं उससे यह आशा कैसे की जा सकती है कि यह हमारा कहना मानेंगे और हमारे प्रयत्न के अनुरूप अपने को ढालने के लिये तत्पर होंगे? माता अपने गर्भस्थ बालक को अपने शरीर का रक्त −प्रदान करती रहती है और उसी से बच्चे का शरीर बढ़ता है। यह प्रक्रिया एक ‘नाल’ नामक नाड़ी के माध्यम से चलती है यह नाड़ी माता के उदर में से निकलकर बच्चे के उदर में प्रवेश करती है। इसी से होकर माता का रक्त बच्चे के शरीर में प्रवेश करता है। यदि कदाचित यह नाड़ी टूट जाय तो माता का रक्त बच्चे के शरीर में पहुँचना भी बन्द हो जायेगा और फिर गर्भस्थ बालक का पोषण भी माता न कर सकेगी। हम भी अपनी अन्तरात्मा का रस कुछ व्यक्तियों को निरन्तर पिला कर उनके आध्यात्मिक शरीर की वृद्धि और पुष्टि करना चाहते हैं पर ऐसे लोग वे ही हो सकते हैं जो हमसे सच्चे मन से सम्बद्ध रहना पसन्द करें। ‘अखण्ड−ज्योति’ परिवार ऐसे ही लोगों का समूह है, जो हमारे विचारों का आदर ही नहीं करता, उनकी उपयोगिता भी समझता है और उसके प्रमाणस्वरूप चार आना महीना ‘अखण्ड−ज्योति’ खरीदने के लिए भी खर्च कर देता है। निश्चय ही हमारे लिए इसी उर्वरा भूमि में अपनी जोतने बोने की, सींचने सँभालने की प्रक्रिया आरंभ करनी है।

निर्माण की आकाँक्षा

हमारा मन है कि ‘अखण्ड−ज्योति’ परिवार का प्रत्येक सदस्य शरीर से निरोग रहे, और हँसी−खुशी का दीर्घ जीवन प्राप्त करे। हम अपने परिजनों की उन आदतों को छुड़ाना चाहेंगे जिनके कारण वे अपने स्वास्थ्य को बर्बाद करते हुए रोगों के चंगुल से फँसने की स्थिति तक आ पहुँचे हैं। दवा दारु से तात्कालिक लाभ हो सकता है। सामयिक कष्टों की निवृत्ति के लिए इलाज की व्यवस्था की जाती है, उसका भी हम प्रबन्ध करने में लगे हुए हैं। प्राकृतिक चिकित्सा की शिक्षण व्यवस्था इसी दृष्टि से आरंभ की गई है। दुर्लभ जड़ी−बूटियों का एक सर्वांगपूर्ण उद्यान भी गायत्री तपोभूमि की बगल में इसी महीने से लगाना आरम्भ कर दिया है, जिनके आधार पर कठिन रोगों का सरलतापूर्वक इलाज हो सके। यह तो सामयिक बात हुई। स्थिर स्वास्थ्य की रक्षा तो स्वास्थ्य को बर्बाद करने वाली आदतें बदलने से ही होगी। हम चाहेंगे कि ‘अखण्ड−ज्योति’ के पाठक केवल हमारे लेख पढ़कर ही सन्तुष्ट न हो जायँ, वरन् उन बातों पर अमल करें, अपने को सुधारें और गिरे हुए स्वास्थ्य को अच्छा बनाकर हमारे हर्ष और सन्तोष को बढ़ावें।

स्वभाव तथा भावना का परिष्कार

सोचने का तरीका गलत होने से जीवन में अगणित गुत्थियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। भावना, आकाँक्षा, अभिरुचि और प्रवृत्ति के कुमार्गगामी हो जाने से असन्तोष, अभाव और सन्ताप का बाहुल्य हो जाता है जिसके कारण मनुष्य अपने को नारकीय अग्नि में, चिन्ता की चिता में झुलसता अनुभव करता है। हमारी अभिलाषा है कि ‘अखण्ड−ज्योति’ परिवार का प्रत्येक सदस्य विचार करने की कला सीखे, जिन्दगी जीने की विद्या की प्रवीणता प्राप्त करे और दृष्टिकोण एवं कार्यक्रम में आवश्यक हेर−फेर करके आनन्द और उल्लास के प्रकाश और विकास का जीवन जिए। हममें हर एक का परिवार सीता सावित्री जैसी नारियों से, श्रवणकुमार जैसे बच्चों से, भरत जैसे भाइयों से, कौशिल्या जैसी माताओं से, दशरथ जैसे पिताओं से भरा-पूरा हो। प्रेम और सद्भावना के वातावरण में अभावग्रस्त जीवन भी स्वर्ग जैसा लगता है स्वभाव और दृष्टिकोण में थोड़ा अन्तर कर लिया जाय तो हमारे परिवार में सचमुच स्वर्गीय सुख शान्ति विराजती दीख सकती है और उस वातावरण में पले हुए बालक नररत्न और महापुरुष ही बनकर निकल सकते हैं। ऐसे हीरे मोतियों की खानें अपने परिवार के हर घर में देखने की हमारी आकाँक्षा अब अत्यधिक प्रबल होती जाती है।

जीवन सेवाशून्य न रहे

हमारा मन है कि अपने परिजन कमाने खाने की ही एक बात सोचते−सोचते और उसी के लिए मानव जीवन को बर्बाद करते हुए खाली हाथ दुनिया से न उठ जायँ। उन्हें ऐसा कुछ करने का भी अवसर मिले जिसके लाभ से लाभान्वित होकर वे जीवन−लीला समाप्त करते हुए गर्व अनुभव कर सकें और सन्तोष की साँस ले सकें। इसके लिए सेवा और परमार्थ के लिए अपना कुछ समय और श्रम लगाना ही चाहिए। लोगों ने एक−एक ईंट खिसका कर हमारे आदर्श देश जाति और समाज को बर्बाद किया है। यदि हम उसके निर्माण के लिए एक−एक ईंट प्रस्तुत करें तो हमारी संस्कृति का महल पुनः उतना ही ऊँचा उठ सकता है जितना प्राचीन काल में था। सेवा की अग्नि में पके बिना कोई जीवन पवित्र और परिपक्व नहीं बन सकता। अन्तः प्रदेश में सद्गुणों की जड़ जमाने के लिए भी सेवा धर्म को अपनाना जरूरी है। कुछ न कुछ काम हम नित्य ऐसा किया करें जो समाज के सुखी, समृद्ध, शान्त सन्तुष्ट और सुविकसित होने में सहायक सिद्ध हो सके। यह सेवा अपनी निज की, अपने परिवार की एवं अपने समीपवर्ती लोगों की सुविधा और परिस्थिति के अनुसार हो सकती है। हम लोग सेवा-कार्यों के लिए जीवन में थोड़ा−थोड़ा भी स्थान रखें तो उसके द्वारा युग−निर्माण की दिशा में आशाजनक और आश्चर्यजनक कार्य हो सकता है।

परिवार की, आत्मीयता की भावना जब बढ़ती है तो मनुष्य अपनों के लिए बहुत कुछ सोचता और करता है। हमारा मन इन दिनों अपने आत्मीयजनों को ऐसा बनाने के लिए मचल रहा है कि इस निर्माण को देखकर देखने वाले आश्चर्यचकित रह जायें और यह अनुभव करें कि युग−निर्माण योजना कोई शेखचिल्ली की कल्पना नहीं, वरन् एक अत्यन्त सरल और पूर्ण व्यवहारिक पद्धति है जिसे अपनाया और व्यापक बनाया जा सकना न तो कठिन है और न असंभव। समझा यह जाता है कि लोगों का स्वभाव जन्म से ही बना आता है उसे बदला और बनाया नहीं जाता। इस धारणा को भ्रान्त सिद्ध करने का हमारा विचार है। हम अपनों को बदलना चाहते हैं। अपनी प्रयोगशाला में हम बबूलों को चन्दन बनाने की तैयारी कर रहे हैं। विज्ञान के द्वारा भौतिक जगत में इतने आश्चर्यजनक परिवर्तन हो रहें हैं तो ज्ञान के द्वारा मनुष्य की अन्तःस्थिति में भी आशाजनक परिवर्तन की आशा की जा सकती है।

जीवनोपयोगी वास्तविक शिक्षा

प्राचीन काल में ऋषियों के गुरुकुलों में निवास करने वाले छात्र वहाँ के वातावरण में लौह पुरुष बनते और ढलते थे। ऐसे गुरुकुलों का चलाना अब अपने वश की बात नहीं दीखती। क्योंकि हर माता−पिता अपने बच्चों को नौकरी कराने की बात सोचता है और इसके लिए नौकरी दिलाने वाले सार्टीफिकिट दिलाने वाली पढ़ाई पढ़ाता है। वह शिक्षा भार पूरा करने पर छात्र में उतनी मानसिक शक्ति शेष नहीं रह जाती कि जीवन की विभिन्न दिशाओं को विकसित करने वाली विशाल शिक्षा का भी भार बहन कर सके। दोनों एक साथ चलाने पर किसी के भी सफल न होने का भय है और केवल वह जीवन विद्या, जिसे पढ़कर नौकरी का टिकट नहीं मिलता, आज की परिस्थितियों में कोई पढ़ने को तैयार होगा, इसमें भारी सन्देह है। इसलिए गुरुकुल की योजना तो नहीं बना रहे हैं पर ऐसी व्यवस्था जल्दी ही करेंगे, जिसके अनुसार, ‘अखण्ड−ज्योति’ परिवार के सदस्यगण अपनी धर्मपत्नी समेत कम से कम दस दिन आकर हमारे पास रहें और दोनों मिलकर एक सुविकसित सुख−शान्तिमय जीवन एवं परिवार बनाने का शिक्षण प्राप्त करें। इसके लिए परिवार के प्रत्येक सदस्य को मथुरा आने का आमंत्रण मिलेगा और इस आशा के साथ उन्हें यहाँ बुलाया जायेगा कि इस दस दिन के शिक्षण में वे एक नई दिशा और नई प्रेरणा प्राप्त करके अपने मुरझाये जीवन में आशा की प्रभात किरणें उठती देखेंगे।

उपासना और अध्यात्म का मार्ग

‟अखण्ड ज्योति” परिवार के दूरवर्ती देशव्यापी सभी सदस्यगण मथुरा नहीं आ सकेंगे यह हम जानते हैं। इसलिए आगे ऐसा भी प्रयत्न करेंगे कि जहाँ अपने परिजन कुछ अधिक संख्या में हैं वहाँ गोष्ठियों का आयोजन किया जाय और जो विचार विनिमय शिविरों में करने वाले हैं वह इन तीन दिन की गोष्ठियों में भी पूरा कर लें। बड़े सभा-सम्मेलनों के ऐसे आयोजनों में जहाँ घटिया श्रेणी की भीड़ मनोरंजक बातें सुनने आया करती है, हमारा आने जाने का अब विचार नहीं है। विचारशील लोगों की गोष्ठी में जिनमें भले ही पच्चीस−पचास व्यक्ति जमा हुए हों ठोस काम होने की संभावना रहती है और उन्हीं में आने−जाने की बात हमें रुचेगी। भविष्य में विचार गोष्ठियों के लिए ही हम अपना कुछ समय निकाला करेंगे और परिजनों के घरों पर पहुँचने और जीवन विकास में कुछ सक्रिय मार्ग दर्शन का सुख सौभाग्य प्राप्त किया करेंगे। अपने विचार पुत्रों को देखकर हमारा भावुक अन्तःकरण उससे अधिक आह्लादित होता है जितना किसी पिता का अपने बच्चे को गोदी में खिलाते समय होता है।

उपासना और साधन शिक्षा

आध्यात्मिक साधनाओं में जिनकी विशेष अभिरुचि है उनका मार्गदर्शन पूर्ववत चलता रहेगा। साधारण गायत्री उपासना का शिक्षण गत 12 वर्षों से निरन्तर दिया जाता रहा है। अपरिचितों को इससे परिचित कराने और प्रारंभिक मार्ग दर्शन कराने का कार्य अब हमने अपने कंधे पर न रखकर पाठकों के जिम्मे छोड़ दिया है। क्योंकि उनमें से अधिकाँश ऐसे हैं जो इस संबंध में दूसरों को शिक्षण करने की योग्यता प्राप्त कर चुके हैं। गायत्री साधना की उच्च स्तरीय शिक्षा क्रमबद्ध रूप में देते चलने का कार्य−क्रम हम अगले 9 वर्षों तक निरन्तर चलाते रहेंगे। गत अक्टूबर 61 में पंचकोशी गायत्री उपासना का पाठ्यक्रम छापा था, अब दूसरे वर्ष का पाठ्यक्रम आगामी अक्टूबर 62 के अंक में छपेगा। इसी प्रकार एक अंक हर साल निर्धारित पाठ्यक्रम का शिक्षण करते हुए निकलते रहेंगे और इन दस वर्षों में गायत्री का उच्च स्तरीय कोर्स पूर्ण हो जायेगा।

परिवार की नाड़ी परीक्षा

इन दिनों ‘अखण्ड ज्योति’ के सदस्यों की मनोदशा क्या है? उनमें से भावना दृष्टि से कौन हमारे कितने समीप और कौन कितनी दूर है इसकी जाँच करना आवश्यक है। इस नाड़ी परीक्षा के बाद ही यह निश्चित किया जा सकेगा कि आज की परिस्थितियों में युग निर्माण योजना को कितना मूर्त रूप दिया जा सकता है। लेखनी और वाणी तक ही सीमित न रहकर अब हम रचनात्मक कार्यक्रम में प्रवृत्त होने वाले हैं और वैयक्तिक एवं सामाजिक उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए कुछ प्रबल प्रयत्न करने के लिए अग्रसर होने वाले हैं। इससे पूर्व हमें अपनी शक्ति को तोल लेना और जान लेना आवश्यक है कि हममें से कौन कितने पानी में है।

इस अंक से अन्तिम पृष्ठ पर जो परिपत्र छपा है उसे भरकर इसी महीने भेज देना चाहिए। इसमें किसी भी पाठक को न तो ढील डालनी चाहिए और न उपेक्षा करनी चाहिए। पूरी और सही जानकारी न मिलने से युग−निर्माण के लिए हमें जो कदम उठाने हैं उनका निश्चय करने में द्विविधा उत्पन्न हो जायगी। इसलिए साथ वाले फार्म को भरकर भेजना पाठक अपना एक आवश्यक कर्तव्य समझें और इसे भर कर इसी महीने निश्चित रूप से भेज दें। हमें अपने परिवार की आध्यात्मिक उत्कृष्टता पर विश्वास है और उसी आधार पर युग−निर्माण की विशाल योजना का क्रियात्मक रूप प्रस्तुत करने जा रहें हैं। सर्वशक्तिमान सत्ता की प्रेरणा और इच्छा तो इस प्रयत्न के पीछे सन्निहित है ही।


आश्विन की नवरात्रि

इस वर्ष आश्विन मास की नवरात्रि तक 29 सितम्बर शनिवार से आरम्भ होकर ता. 7 अक्टूबर रविवार तक चलेगी। गायत्री उपासना के लिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। इस अवसर पर पाठकों को 24 हजार अनुष्ठान अथवा जितना बन पड़े उतनी अपनी सामर्थ्यानुसार उपासना करनी चाहिए।

(11) आपकी ‘अखण्ड−ज्योति’ को घर में कौन−कौन पढ़ते सुनते हैं? बाहर के लोगों में उसे कौन कौन पढ़ने ले जाते हैं? इन सबके नाम लिखिए—

(12) आपके नगर में अखण्ड−ज्योति के जिन अन्य ग्राहकों से परिचय हो उनके भी नाम लिखिए उनमें से आपने जिन्हें बनाया हो उनका उल्लेख भी कीजिए—

(13) इस वर्ष के अंकों में प्रस्तुत युग निर्माण योजना के साथ आपका किन बातों में मतैक्य और किन बातों में मतभेद है?

(14) योजना के अन्तर्गत आगे किन−किन बातों को और सम्मिलित किया जाना चाहिए? एवं इसकी सफलता के लिए क्या−क्या प्रयत्न किये जाने चाहिएं?

(15) योजना के एक सदस्य होने के नाते आप आत्म-निर्माण के लिए क्या कार्यक्रम बना रहे हैं? अपनी त्रुटि को सुधारने के लिए क्या करने जा रहे हैं?

(16) परिवार निर्माण के लिए आप क्या कार्यक्रम बनायेंगे?

(17) अपने “विशाल परिवार” को बढ़ाने के लिए आप किस प्रकार, क्या प्रयत्न किया करेंगे?

(18) रचनात्मक कार्यक्रम के अन्तर्गत प्रस्तुत कार्यों में से आपके लिए किन बातों को निबाहना सम्भव है?

(19) उसकी उपासना का क्या क्रम चलता है? आगे इसमें क्या प्रगति करेंगे?

(20) डडडड की सफलता के लिए आप क्या प्रयत्न करेंगे?

नोट− यदि इस डडडड सब प्रश्नों का विस्तारपूर्वक उत्तर लिख सकना संभव न हो तो कृपया दूसरे सादे कागज पर लिखें।


हमारा महत्वपूर्ण सत्साहित्य प्रकाशन

कुछ विशिष्ट पुस्तकें

सूक्त संहिता 1॥)

संस्कार पद्धति 2॥)

भारतीय संस्कृति की रूप रेखा 2)

व्रत और त्यौहार 1)

प्रेरणाप्रद दृष्टांत 2)

सरल चिकित्सा−विज्ञान 2)

कल्प चिकित्सा 2)

स्वास्थ्य, सौंदर्य, दीर्घजीवन और आनन्द की पथ−प्रदर्शक पुस्तकें

1—स्वस्थ बनने की विद्या 1:)

2—बिना औषधि के कायाकल्प 1:)

3—दीर्घ जीवन के रहस्य 1:)

4—उन्नति का मूलमंत्र ब्रह्मचर्य 1:)

5—जिन्दगी कैसे जिऐं? 1:)

6—आसन और प्राणायाम 1:)

7— बुद्धि बढ़ाने के उपाय 1:)

8—क्या खायें क्यों खायें? कैसे खायें? 1:)

9—दूध की आश्चर्यजनक शक्ति 1:)

10—तुलसी के गुण 1:)

11—यौवन चिरस्थायी कैसे हो? 1:)

12—सौन्दर्य बढ़ाने के ठोस उपाय 1:)

13—पंचतत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण 1:)

14—उपवास के चमत्कार 1:)

15—कब्ज की सरल चिकित्सा 1:)

16— स्त्री रोगों की चिकित्सा 1:)

17—बाल रोगों की चिकित्सा 1:)

18—नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा 1:)

19—घरेलू चिकित्सा विज्ञान 1:)

20—सूर्य चिकित्सा विज्ञान 1:)

21—प्राण चिकित्सा विज्ञान 1:)

22—स्वप्न दोष की चिकित्सा 1:)

23—भोग में योग 1:)

24—पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि 1:)

25—मनचाही संतान 1:)

26—मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार 1:)

श्री, समृद्धि, सफलता और सिद्धिदायक अलभ्य साहित्य

1—मैं क्या हूँ? 1:)

2—परकाया प्रवेश 1:)

3—मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा 1:)

4—स्वर योग से दिव्य ज्ञान 1:)

5—ज्ञानयोग कर्मयोग भक्ति योग 1:)

6—वशीकरण की सच्ची सिद्धि 1:)

7—जीव जन्तुओं की भाषा 1:)

8— ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है? 1:)

9—क्या धर्म? क्या अधर्म? 1:)

10—गृहस्थ योग 1:)

11—हस्तरेखा विज्ञान 1:)

12—हमें स्वप्न क्यों दीखते हैं? 1:)

13—मरने के बाद हमारा क्या होता है? 1:)

14—आकृति देखकर मनुष्य की पहचान 1:)

15—अमृत, पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति 1:)

16—धनवान बनने के गुप्त रहस्य 1:)

17—मित्रभाव बढ़ाने की कला 1:)

18—चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग 1:)

19—दाम्पत्ति जीवन का स्वर्ग 1:)

20—जीवन का महान जागरण 1:)

21—तुम तुच्छ नहीं—महान हो 1:)

22—हमारी पारिवारिक समस्यायें कैसे सुलझें?1:)

23—हम वक्त कैसे बनें? 1:)

24—लेखक बनने की कला 1:)

25— हिन्दू धर्म का प्रधान आधार यज्ञोपवीत 1:)

26—वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ 1:)

6) से अधिक की पुस्तक लेने पर डाकखर्च न देना पड़ेगा।

पता—अखण्ड ज्योति प्रेस, मथुरा

*समाप्त*