उद्यमेन हिं सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथेः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रवशन्ति मुखे मृगाः॥
—पंच तन्त्र
समस्त कार्य उद्यम करने से सिद्ध होते हैं केवल मनोरथ करने से कुछ नहीं मिलता, जैसे सोते हुये सिंह के मुख में हिरन अपने आप नहीं चले जाते।
कोई बड़ा नेतृत्व, पद या उत्तरदायित्व प्राप्त करने के इच्छुक तो सब रहते हैं पर उसे ठीक तरह सँभाल सकने की योग्यता किन्हीं विरलों में ही होती है। संयोगवश यदि कोई बड़ा उत्तरदायित्व मिल भी जाय तो आवश्यक गुण न रहने से ऐसे लोग अव्यवस्था फैलाते, हानि करते तथा अयोग्य सिद्ध होते हैं। जिनमें दूसरों की स्थिति, आवश्यकता और रुचि समझने की क्षमता नहीं वे उन से ठीक प्रकार काम भी नहीं ले सकते। अपने दुर्गुणों के कारण जो साथियों की दृष्टि में घृणास्पद, उपहास योग्य एवं उपेक्षणीय बना हुआ हो वह कैसे तो नियंत्रण रख सकेगा और कैसे काम ले सकेगा। ऐसी दशा में मिला हुआ नेतृत्व असफल ही सिद्ध होगा।
नम्रता और अहंमन्यता यों देखने में स्वभाव की छोटी-छोटी भिन्नताएँ हैं पर इनके प्रतिफल महान अन्तर प्रत्यन्तरों से भरे होते हैं। नम्र व्यक्ति किसी को कुछ दिये बिना भी केवल अपनी वाणी की मधुरता और व्यवहार की शिष्टता से ही दूसरों का मन जीत लेता है, परायों को अपना बना लेता है और प्रत्युत्तर में उनका स्नेह सहयोग पाकर सब प्रकार लाभान्वित रहता है। किन्तु जिसका स्वभाव अहंकारी एवं कर्कश है वह उनसे भी मनोमालिन्य ही पाता है जिनके लिए उसने ठोस सहायता की थी
वृत्तं यत्नेन संरक्षेत वित्ततयायति याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणः वृत्ततस्तु हतो हतः॥
—महाभारत
“अपने जातीय वृत्तांत (इतिहास) की यत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिये। धन तो आता जाता रहता है और धन की न्यूनता हो जाने से कोई नष्ट नहीं हो जाता किन्तु अपना प्राचीन गौरव नष्ट कर देने पर विनाश निश्चित है।”
एक मन सहायता का महत्व एक तोले चुभने वाली बात कहने में नष्ट हो जाता है। कढ़ाई भरे दूध में जरा भी खटाई पड़ने पर उसका फटना निश्चित है। श्रम, त्याग और प्रयत्नपूर्वक प्राप्त की हुई सद्भावना थोड़े से अप्रिय व्यवहार में नष्ट हो जाती है। जिनके स्वभाव में अहंकार सम्मिलित हो गया हो, वे अपने को सँभाल नहीं पाते। कुछ-न-कुछ चुभने वाला ही कहते या करते रहते हैं। फलतः उनके मित्र घटते और शत्रु बढ़ते चले जाते हैं।
शत्रुता, द्वेष मनोमालिन्य और लड़ाई झगड़ों में वास्तविक कारण 30 फीसदी और स्वभावजन्य दुर्बलताओं के कारण उत्पन्न हुई गलतफहमी 70 फीसदी होती है। यदि स्वभाव सज्जनता का है तो उन तीस फीसदी कारणों का भी परस्पर मिल-जुल कर समाधान खोजा जा सकता है। कोई मध्यस्थ भी समझौते का मार्ग ढूँढ़ सकता है। पर जहाँ स्वभाव सम्बन्धी दुर्बलताएँ भरी पड़ी हों वहाँ अकारण ही उत्तेजना, असहिष्णुता तुनुकमिजाजी और शंका संदेह की दृष्टि रहने से खटपट होती रहेगी। साधारण सी बातें तूल पकड़ती रहेंगी और लड़ाई झगड़े का वातावरण बना रहेगा। जिन लोगों के साथ रहना और काम करना है उनसे तनाव रहने पर चित्त में खिन्नता ही रहती है। इस स्थिर खिन्नता का प्रभाव शरीर और मन पर बहुत बुरा पड़ता है, प्रगति में भी अड़चन पैदा होती है। स्वभाव की यह छोटी छोटी कमजोरियाँ सुविधा सम्पन्न जीवन का भी आनन्द नष्ट कर देती हैं।
प्रगति के लिए जिस सूझबूझ की आवश्यकता पड़ती है उसका विकास तभी होता है जब मन शान्त और प्रसन्न रहे। संतुलित निश्चिन्त और प्रसन्न रहने वाले व्यक्ति का मस्तिष्क ही किसी समस्या के हर पहलू को ठीक तरह सोच समझ सकता है और गंभीर विवेचना के साथ किसी ठीक निष्कर्ष पर पहुँच सकता है। यदि मन क्षुब्ध, खिन्न और उत्तेजित रहेगा तो आवेश और अधीरता की स्थिति बनी रहेगी जिसमें किसी प्रश्न पर केवल एकांगी विचार कर सकना ही संभव होगा। अधूरे विचार के साथ किये गये निर्णय आम तौर से गलत सिद्ध होते हैं और उनको कार्यान्वित करने से हानि ही होती है। अच्छी सूझ-बूझ सबके लिए संभव हो सकती है केवल इसके लिए अपने स्वभाव को धीर गंभीर बनाना मात्र पर्याप्त होता है। जो अपने स्वभाव को सुधारने का, उसे सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न नहीं करते उन्हें अच्छी सूझ-बूझ से भी वंचित रहना पड़ता है।
बुरी आदतों का परिणाम उन बुरी प्रतिक्रियाओं के रूप में प्रस्तुत होता है जो चित्त को खिन्न करती हैं। खिन्न चित्त रहने वाले की तीन चौथाई शक्ति उस मानसिक सन्ताप से ही नष्ट हो जाती है। एक चौथाई से प्रगति के लिए कुछ ठीक से सोच सकना और जम कर कुछ ठोस काम कर सकना संभव नहीं होता। उन्नति की आकाँक्षा करने मात्र से काम नहीं चल सकता, उसके लिए उचित साधन भी होने चाहिएं। इन साधनों में सबसे बड़ा, सबसे प्रमुख, सबसे शक्तिशाली साधन है—मानसिक संतुलन और वह केवल उन्हें ही प्राप्त होता है जिनने अपने गुण-कर्म, स्वभाव का निर्माण सज्जनोचित रीति से सम्पन्न किया है।
प्रगति की दिशाएँ अनेक हैं, अनेक क्षेत्रों में जीवन बँटा हुआ है, पर उन सबका उचित विकास ऐसे स्वभाव की अपेक्षा रखता है जिसके कारण प्रतिकूलताएँ अनुकूलताओं के रूप में परिवर्तित होती रहें। साधन सामग्री की आवश्यकता सभी लोग अनुभव करते हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए जो संभव होता है सो करते भी हैं। पर इस तथ्य की उपेक्षा ही होती रहती है कि सत्प्रवृत्तियों के फलस्वरूप ही स्थायी सुख शान्ति के साधन उपलब्ध होते हैं। जितना प्रयत्न बाह्य साधनों को जुटाने में किया जाता है उतना ही यदि आत्मनिर्माण के लिए भी किया जाने लगे तो प्रगति की संभावना हजारों गुनी अधिक बढ़ सकती है।
जो भीतर होता है वही बाहर प्रस्तुत रहता है। हम अपने अन्तः-करण को दैवी सम्पत्तियों से सुसज्जित करें तो कोई कारण नहीं कि बाह्य जीवन में सुख शान्ति श्री समृद्धि और सिद्धि विभूति की प्रचुरता से वंचित रहना पड़े।
यौवनं धनसम्पत्ति प्रभुत्वमविवेकित।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥
—पंच तन्त्र
“यौवन, धन संपत्ति, प्रभुता और अविवेक इनमें से एक-एक भी अनर्थ का कारण होता है, फिर जहाँ ये चारों मौजूद हों उसके लिये क्या कहना।”
संगीत, शिल्प जैसे गुण प्रयत्न और पुरुषार्थ से मिल सकते हैं, पर समग्र विकास के लिए मानवीय सद्गुणों की ही अपेक्षा रहेगी। यदि व्यक्तित्व दोष, दूषणों से भरा हुआ है सुसंतुलित विकास कभी भी संभव न हो सकेगा। एक दिशा में थोड़ा सफल दीखते हुए भी मनुष्य अन्य सभी दिशाओं में असफल बना रहेगा। एकाँगी विकास से आनन्द एवं संतोष की परिस्थितियाँ किसी को भी प्राप्त नहीं हो सकतीं।
जिस प्रकार अच्छा बीज, उर्वर जमीन और उचित खाद पानी पाकर ठीक तरह बढ़ता और फलता फूलता है, उसी तरह जीवन के खेत में सद्गुणों के बीज उचित पुरुषार्थ की अनुकूल परिस्थितियों का खाद पानी पाकर विभूतियों एवं समृद्धियों से पल्लवित, पुष्पित और फलित होते रहते हैं। दुर्गुणी व्यक्ति अनुकूल परिस्थितियों के होते हुए भी दीनता एवं हीनता से ऊपर नहीं उठ पाते। दुर्भाग्य उन्हें जीवन सहचर की तरह हर जगह घेरे-घेरे ही फिरता रहता है। इसलिए जीवन विकास की बात सोचने के साथ ही हमें यह भी सोचना चाहिए कि व्यक्तित्व का सुसंतुलित निर्माण करने की दिशा में आवश्यक प्रयत्न किये जाते रहें।
यह सोचना गलत है कि किसी भी तरीके से धन कमा लिया और मनमाना खर्च करने की सुविधा रहे तो बस फिर आनन्द ही आनन्द रहेगा। सच बात यह है कि दुर्गुणी व्यक्तियों के पास यदि धन बढ़े भी तो इससे उनके लिए अगणित समस्याएँ तथा चिन्ताएँ उत्पन्न होंगी। धन का सच्चा लाभ सदुपयोग से मिलता है और ऐसा सदुपयोग केवल सत्प्रकृति के व्यक्तियों से ही संभव होता है।
आये दिन ऐसी घटनाएँ देखने और सुनने में आती रहती हैं कि धन सम्पत्ति की छीन झपट के प्रश्न को लेकर सम्पन्न परिवारों में फौजदारी, मुकदमेबाजी, शत्रुता एवं हत्या डकैती तक की दुर्घटनाएं घटित होती हैं। लड़के कुपात्र निकल जाते हैं और जुआ, शराब, व्यभिचार एवं अनेक प्रकार के व्यसनों में पूर्वजों की कमाई को उड़ा डालते हैं। अत्यधिक कमाने की तृष्णा में संलग्न व्यक्ति समय-कुसमय का, आराम, विश्राम का ध्यान छोड़कर दिन रात बेतरह जुटे रहते हैं और अपने स्वास्थ्य को खराब कर लेते हैं। लोभवश बेईमानी करके कितने ही व्यक्ति लोक निन्दा और परलोक में पाप के भागी बनते हैं। इस प्रकार के अनेकों अनर्थ और दुःख उन लोगों को सहन करने पड़ते हैं, जिनके पास धन तो है पर उसका सदुपयोग कर सकने लायक सद्बुद्धि नहीं है।
कई व्यक्ति स्वल्प साधना की सहायता से ही अपने मधुर स्वभाव, श्रम, पुरुषार्थ, उत्साह, सूझबूझ और अध्यवसाय के द्वारा भारी उन्नति कर लेते हैं, किन्तु कितने ही ऐसे भी होते हैं जो भरपूर, साधन सुविधाओं के होते हुए भी आलस्य, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, लापरवाही फिजूल खर्ची जैसे दोषों के कारण निरन्तर हानि उठाते चलते हैं और अन्त में दिवालिया हो जाते हैं। आज साधनों को बहुत महत्व दिया जाता है पर भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि साधनों का लाभ केवल उन्हें ही मिलेगा जिनमें आवश्यक मात्रा में सद्गुण रहे होंगे। बुरे लोग भी जो कुछ उन्नति कर पाते हैं उसमें भी अधिकाँश श्रेय उन अच्छाइयों का रहता है जो बुरे लोगों में भी एक सीमा तक रही होती हैं।
डाकू को जो सफलता मिलती है उसमें सारा श्रेय उसकी दुष्टता या अनैतिकता को ही नहीं मिल सकता। उसमें जो साहस, धैर्य, तितीक्षा, सतर्कता, निरोगिता, संगठन जैसे थोड़े बहुत गुण रहते हैं उन्हीं के बलबूते पर उसे लाभ मिलता है। यदि यह गुण न हों, कोई डाकू डरपोक, अधीर, चिन्तित, आरामतलब व आलसी, लापरवाह, रोगी, पृथकतावादी हो तो वह बहुत जल्दी विपत्ति में फँस जायगा। केवल अनीति पर उतारू होने से ही किसी को लाभदायक स्थिति प्राप्त नहीं हो सकती। चाहे सज्जन हो या दुर्जन, भले या बुरे किसी भी कार्य को सम्पन्न करने में हर मनुष्य को सुसंतुलित व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है। जिसने अपने को जितना गुणवान बना लिया होगा वह अपने लक्ष की ओर उतना ही अग्रसर बन सका होगा।
धन, शिक्षा, शिल्प, कला, कौशल, पद, यश आदि विभूतियों का उपार्जन, मन को लक्ष्य में तत्परतापूर्वक संलग्न करने, परिश्रम से प्रेम करने, समय फालतू न गंवाने, चित्त को अपने अभीष्ट विषय में लगाये रहने से ही संभव होता है। अपने अभीप्सित विषय का जिसका जितना मन लगेगा, उसके लिए जितना श्रम किया जायगा उतनी ही सफलता मिलेगी। परोपकार के श्रेष्ठ सत्कर्म कर सकना, यश और पुण्य कमाना भी उन्हीं के लिए संभव होता है जिनकी मनोभावनाएं पूरी तरह उस लक्ष में तन्मय रहती हैं।
ईश्वर प्राप्ति और आध्यात्मिक लक्ष की पूर्ति केवल वे लोग कर पाते हैं जो अपनी मनोभूमि को प्रयत्नपूर्वक दैवी गुणों से सुसज्जित और आसुरी वृत्तियों से रहित करने में प्राणमय से संलग्न होते हैं। जिन्होंने इस प्रकार आत्मनिग्रह की उपेक्षा की, दोष दुर्गुणों के सुधारने की उपेक्षा करके केवल थोड़ा पूजा पाठ करना ही पर्याप्त समझा—उनके लिए उस महान लक्ष की प्राप्ति कभी सम्भव नहीं होती।
कर्म करना—कर्तव्य धर्म का पालन मनुष्य का धर्म है। इसको छोड़ने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। पर काम करते समय आत्म-भाव को न भुलाना चाहिए और इसके लिए प्रतिदिन नियमपूर्वक ध्यान करना भी जरूरी है। इस प्रकार के ध्यान से आत्मिक विचारधारा दूसरे कार्य करते समय भी बहती रहेगी। इससे दुनिया को मनुष्यों एवं घटनाओं को तुम दूसरी ही दृष्टि से देखने लगोगे। इससे स्वार्थ भी छूट जायगा और दुनिया के बन्धन भी कष्ट नहीं देंगे। सच्चा आनन्द प्राप्त करने का यही मार्ग है। संसार में कोई जाने या अनजाने आनन्द प्राप्त करने की ही चेष्टा कर रहे हैं। कोई शराब पीकर उस आनन्द का भागी बनना चाहता है और कोई उत्तम मार्ग का अवलम्बन करके उसे प्राप्त करता है। आनन्द ही मनुष्यों का सच्चा और सहज स्वभाव है। सभी लोग ऐसा निर्मल सुख चाहते हैं जिसमें किसी दुःख का पुट न हो। सभी ऐसे ही आनन्द की खोज में हैं। पर यह केवल उन्हीं को मिल सकता है जो कर्म और ज्ञान का—लौकिकता और आध्यात्म का उचित सामञ्जस्य करने में सक्षम होते हैं।
—महर्षि रमण
‘अखण्ड ज्योति परिवार’ के प्रत्येक सदस्य से अनुरोध है कि वह मार्च ओर अप्रैल के इन दो अंकों को विशिष्ट ध्यानपूर्वक दो बार पढ़े और इनमें जो विचारधारा व्यक्त हुई है, उसके संबंध में अपना अभिमत हमें सूचित करे। युगनिर्माण योजना को कार्यान्वित करने के लिए कौन क्या तैयारी कर रहा है, यह जानने के पश्चात् ही अगले कदमों को उठाया जाना सम्भव होगा। आशा है कोई परिजन उपेक्षा न करेंगे और अपना अभिमत इसी महीने में भेज देंगे।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्
वर्ष 24 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 04
नवयुग की वीणा में तू कुछ ऐसा स्वर भर!!
—रामस्वरूप खरे ‘साहित्यरत्न’
जीवन का विकास सभी दिशाओं में सन्तुलित रूप में होता रहे तो ही उसकी शोभा, प्रतिष्ठा बनती है। धन का महत्व कितना ही अधिक क्यों न हो केवल उसी का उपार्जन आनन्दमय परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं कर सकता। शिक्षा की महत्ता कितनी ही बड़ी क्यों न मानी जाय अन्य दिशा में यदि पिछड़ापन बना रहे तो वह पढ़ाई भी किस काम की?
स्वास्थ्य की गणना उत्तम सुखों में की जाती है, पर सब गुणों में शून्य हो, केवल भैंसे की तरह शरीर ही हृष्ट पुष्ट बना रहे तो भी उससे कितना प्रयोजन साधेगा? किसी पेड़ की सारी शाखाएँ एक ही ओर झुकी रहें तो उसके टूट गिरने का खतरा रहेगा और कुरूपता भी दिखेगी। सुन्दर वृक्ष वे ही लगते हैं जो सब ओर सामान्य रूप से फैले फूटे होते हैं। जीवन विकास के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है।
एक दिशा में विकसित जीवन किसी कला कौशल के सीखने से, विशेष मनोयोग लगने से, संगति से, संयोग से, दूसरों की सहायता से या अन्य कारणों से भी हो सकता है। चिकित्सा, कला,
शरशैया पर पड़े हुए भीष्म पितामह उत्तरायण सूर्य आने पर प्राण त्यागने की तैयारी में लगे थे।
कुरु और पाण्डु कुल के नर-नारी उन्हें घेरे बैठे थे। पितामह ने उचित समझा कि उन्हें कुछ धर्मोपदेश दिया जाए। वे धर्म और सदाचार की विवेचना करने लगे।
सब ध्यानपूर्वक सुन रहे थे पर द्रौपदी के चेहरे पर व्यंग हास की हलकी सी रेखा दौड़ रही थी।
भीष्म ने उसे देखा और अभिप्राय को समझा।
वे बोले—बेटी! मेरी कल की करनी और आज की कथनी में अन्तर देखकर तुम आश्चर्य मत मानो। मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसका मन बनता है। जिन दिनों राज सभा में तुम्हारा अपमान हुआ था उन दिनों कौरवों का कुधान्य खाने से मेरी बुद्धि मलीन हो रही थी इसलिए तुम्हारे पक्ष में न्याय की आवाज न उठा सका। पर इन दिनों मुझे लंबी अवधि का उपवास करना पड़ा है सो भावनाएं स्वतः वैसी हो गईं जैसा कि मैं इस समय धर्मोपदेश में व्यक्त कर रहा हूँ।
द्रौपदी ने आहार की शुद्धि का महत्व समझा और क्षमा प्रार्थना के रूप में अपनी भूल पर दुःख प्रकट करते हुए पितामह के चरणों पर मस्तक झुका दिया।
अपने को बदले बिना दूसरों का बदला जा सकना संभव नहीं। युग-निर्माण का शुभारम्भ—श्रीगणेश अपने आपका निर्माण करने की प्रक्रिया के साथ होना चाहिए। वाणी और लेखनी की शक्ति अब धीरे-धीरे घटती जा रही है। क्योंकि वक्ता और लेखक स्वयं वैसा आचरण नहीं करते जैसा कि दूसरों से कराना चाहते हैं। चारित्रिक शिक्षा के लिए यह आवश्यक है कि उपदेशक दूसरों के सामने अपना आदर्श उपस्थित करें, यदि सद्भावनाओं की सम्पत्ति का संसार में बढ़ाया जाना उचित और आवश्यक है तो उसका प्रथम प्रयोग अपने आप पर ही आरम्भ करना चाहिए, जो वस्तु लाभदायक है उसका उपभोग सबसे पहले हम स्वयं ही क्यों न करें?
घटावभासको भानुर्घटनाशे न नश्यति।
देहवभावसकः साक्षी देह नाशे न नश्यति॥
—आत्म प्रवीघ उप0
“घड़े के भीतर दिखलाई पड़ने वाला सूर्य घड़े का नाश हो जाने पर नष्ट नहीं होता, वैसे ही देह में प्रकाशित आत्मा देह का नाश होने पर नष्ट नहीं होती।
सद्विचारों की महत्ता का अनुभव तो हम करते है पर उनकी दृढ़ता नहीं रह पाती। जब कोई अच्छी पुस्तक पढ़ते या सत्संग, प्रवचन सुनते हैं तो इच्छा होती है कि इसी अच्छे मार्ग पर चलें। पर जैसे ही वह प्रसंग पलटा कि दूसरी प्रकार के, पूर्व अभ्यास, विचार पुनः मस्तिष्क पर अधिकार जमा लेते हैं और वही पुराना घिसा-पिटा कार्यक्रम पुनः चलने लगता है। इस प्रकार उत्कृष्ट जीवन बनाने की आकाँक्षा एक कल्पना मात्र बनी रहती है उसके चरितार्थ होने का अवसर प्रायः आने ही नहीं पाता।
कारण यह है कि अभ्यस्त विचार बहुत दिनों से मस्तिष्क में अपनी जड़ जमाये हुए हैं, मन उनका अभ्यस्त भी बना हुआ है। शरीर ने एक स्वभाव एवं ढर्रे के रूप में उन्हें अपनाया हुआ है। इस प्रकार उन पुराने विचारों का पूरा आधिपत्य अपने मन और शरीर पर जमा हुआ है। यह आधिपत्य हटे और नये उत्कृष्ट विचार वह स्थान ग्रहण करें तो ही यह संभव है कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और अन्तःकरण चतुष्टय बदले। जब अन्तः भूमिका बदलेगी तब उसका प्रकाश बाह्य कार्यक्रमों में दृष्टिगोचर होगा। परिवर्तन का यही तरीका है।
उच्च विचारों को बहुत थोड़ी देर हमारी मनोभूमि में स्थान मिलता है। जितनी देर सत्संग, स्वाध्याय का अवसर मिलता है उतने थोड़े समय ही तो अच्छे विचार मस्तिष्क में ठहर पाते हैं। इसके बाद वही पुराने कुविचार आँधी तूफान की तरह आकर उन श्रेष्ठ विचारों की छोटी-सी बदली को उड़ाकर एक ओर भगा देते हैं। निकृष्ट विचारों में तात्कालिक लाभ और आकर्षण स्वभावतः अधिक होता है, चिरकाल से अभ्यास में आते रहने के कारण उनकी जड़ें भी बहुत गहरी हो जाती हैं। इन्हें उखाड़ कर नये श्रेष्ठ विचारों की स्थापना करना सचमुच बड़े अध्यवसाय का काम है।
किसी घने जंगल में कंटीली झाड़ियाँ सारी भूमि को घेरे रहती हैं, गहराई तक अपनी जड़ें जमाये रहती हैं। यदि उस जंगल को कृषि योग्य बनाना हो तो वह झाड़-झंखाड़ काटने की व्यवस्था करनी पड़ती है। फिर भूमि खोद कर जड़ें उखाड़नी पड़ती हैं। जोत कर खेत को एक समान करना पड़ता है। खाद और पानी की व्यवस्था जुटानी होती है। इतना प्रबंध करने पर ही वह घने जंगल की ऊबड़-खाबड़ भूमि परिपूर्ण अन्न उपजाने वाली कृषि भूमि के योग्य बन पाती है। मनोभूमियों को सत्कर्मों को, सद्भावनाओं की हरी-भरी फसल उगने योग्य बनाने के लिये ऐसा ही पुरुषार्थ किया जाना आवश्यक होता है।
दस-पाँच मिनट कुछ पढ़ने सुनने या सोचने, चाहने से ही परिष्कृत मनोभूमि का बन जाना और उसके द्वारा सत्कर्मों का प्रवाह बहने लगना कठिन है। इसलिये क्रम-बद्ध योजनाबद्ध, दीर्घकालीन और सुस्थिर प्रयत्न करना होता है। फैलाया हुआ पानी नीचे की ओर आसानी से बिना प्रयत्न के बहने लगता है। पर यदि उसे ऊपर पहुँचाना हो तो इसके लिए कई उपकरण जुटाने की व्यवस्था की जाती है। बिना विशेष प्रयत्नों के पानी ऊपर नहीं चढ़ सकता है। इसी प्रकार स्वल्प प्रयत्नों से मनोभूमि का परिवर्तन भी संभव नहीं और बिना आन्तरिक परिवर्तन के बाह्य जीवन में श्रेष्ठता की स्थापना हो ही कैसे सकती है?
जैसे विचारों को जितनी तीव्रता और निष्ठा के साथ जितनी अधिक देर मस्तिष्क में निवास करने का अवसर मिलता है वैसे ही प्रभाव की मनोभूमि में प्रबलता होती चलती है। देर तक स्वार्थपूर्ण विचार मन में रहें और थोड़ी देर सद्विचारों के लिये अवसर मिले तो वह अधिक देर रहने वाला प्रभाव कम समय वाले प्रभाव को परास्त कर देगा। इसलिये उत्कृष्ट जीवन की वास्तविक आकाँक्षा करने वाले के लिये एक ही मार्ग रह जाता है कि मन में अधिक समय तक अधिक प्रौढ़ अधिक प्रेरणाप्रद उत्कृष्ट कोटि के विचारों को स्थान मिले।
जिसका बहुमत होता है उसकी जीत होती है। बहती गंगा में यदि थोड़ा मैला पानी पड़ जाय तो उसकी गन्दगी प्रभावशाली न होगी, पर यदि गन्दे नाले में थोड़ा गंगाजल डाला जाय तो उसे पवित्र न बनाया जा सकेगा। इसी प्रकार यदि मन में अधिक समय तक बुरे विचार भरे रहेंगे तो थोड़ी देर, थोड़े से अच्छे विचारों को स्थान देने से भी कितना काम चलेगा? उचित यही है कि हमारा अधिकाँश समय इस प्रकार बीते जिससे उच्च भावनाएँ ही मनोभूमि में विचरण करती रहें।
संसार में बुराई इसलिए फैली है कि लोगों के मन में बुरे विचारों का बाहुल्य रहता है। चोर, डाकू, जुआरी, व्यभिचारी, व्यसनी अपने विचारों के पक्के होते हैं। जो उन्हें ठीक जाँच गया है उसी इच्छा की पूर्ति के लिए निरन्तर प्रयत्न करते हैं। निष्ठा के अनुरूप काम करने से भावान्तर में परिपक्वता आती है और उस परिपक्वता में दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता भरी रहती है।
कुलोनमकुलीन वा वीरं पुरु षमानिनम्।
चारित्र्यमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाशुचिम॥
—वाल्मीकि रामायण
“मनुष्य का आचरण ही यह बतलाता है कि यह कुलीन है या अकुलीन, वीर है या कायर, पवित्र है या अपवित्र।”
शराबी अपने विचारों में पक्का होता है। बदनामी, धनहीनता और स्वास्थ्य नाश की परवा न करके भी वह शराब पीता है। मन और कर्म की इस एकता से जो दृढ़ता उसमें रहती है उसके फलस्वरूप कई अन्य कमजोर प्रकृति के मनुष्य भी उसके प्रभाव में आकर शराब पीना सीख जाते हैं। चरित्र शिक्षण की यही पद्धति सफल होती है। बुरे स्तर के व्यक्ति अपनी बुराइयों में तन्मय रहकर दूसरे अनेकों को अपना साथी बनाते और बुराई सिखाते हैं।
बुराई की ही भाँति अच्छाई में भी अपनी शक्ति एवं विशेषता होती है पर वह प्रभावशाली तभी बनती है जब मन वचन और कर्म में एकता हो। यदि प्रौढ़ और परिपक्व आचरण के श्रेष्ठ व्यक्ति कभी प्रकाश में आते हैं तो उनसे भी अगणित लोग प्रेरणा प्राप्त करते हैं। गान्धीजी का प्रभाव अभी पिछले ही दिनों हम लोगों ने आँखों से देखा है। उनकी प्रेरणा से अगणित व्यक्तियों की भावनाएँ बदलीं और लाखों व्यक्तियों ने हँसते-हँसते भारी बलिदान की जोखिम उठाई।
अच्छाई इसीलिए पनप नहीं पाती कि उसका शिक्षण करने वाले ऐसे लोग नहीं निकल पाते जो अपनी एक निष्ठा के द्वारा दूसरों की अन्तरात्मा पर अपनी छाप छोड़ सकें। अपने अवगुणों को छिपाने के लिए या सस्ती प्रशंसा प्राप्त करने के लिए धर्म का आडम्बर मात्र ओढ़ लेते हैं। पर उपदेश कुशल बहुत हे पर जो आदर्शों को दैनिक जीवन में कार्यान्वित करें ऐसे लोग कम हैं। यही कारण है कि अच्छाई बढ़ नहीं पाती, फैल नहीं पाती। यदि सज्जनतापूर्ण सच्चे व्यक्तित्व प्रकाश में आने लगें तो उनके प्रभाव से अच्छाइयाँ भी तेजी से फैलें। बुराई का स्थान अच्छाई को मिल जाय और युग परिवर्तन की बात कुछ भी कठिन दिखाई न दे।
मातरं पितरं विप्रमाचार्य चावमन्य वे।
प पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवशं मतः॥
—वाल्मीकि रामायण
“जो कोई माता, पिता, ब्राह्मण और आचार्य का अपमान करता है वह यमराज के यहाँ जाने पर उस पाप का फल भोगता है।”
उत्कृष्ट एवं प्रौढ़ विचारों को अधिकाधिक समय तक हमारे मस्तिष्क में स्थान मिलता रहे ऐसा प्रबंध यदि कर लिया जाय तो कुछ ही दिनों में अपनी इच्छा, अभिलाषा, और प्रवृत्ति उसी दिशा में ढल जायगी और बाह्य जीवन में वह सात्विक परिवर्तन स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा। विचारों की शक्ति महान है उससे हमारा जीवन तो बदलता ही है संसार का नक्शा भी बदल सकता है।
कैसा अच्छा होता कि प्राचीन काल की तरह जीवन के प्रत्येक पहलू पर उत्कृष्ट समाधान प्रस्तुत करने वाले साधु ब्राह्मण आज भी हमें उपलब्ध रहे होते। वे अपने उज्ज्वल चरित्र, सुलझे हुए मस्तिष्क और परिपक्व ज्ञान द्वारा सच्चा मार्गदर्शन करा सकते तो कुमार्ग पर ले जाने वाली सभी दुष्प्रवृत्तियाँ शमन होतीं। पर आज उनके दर्शन दुर्लभ हैं। जो देश काल पात्र की स्थिति का ध्यान रखते हुए आज के बुद्धिवादी एवं संघर्षमय युग के अनुरूप समाधान प्रस्तुत करके जीवन को ऊँचा उठाने वाले व्यवहारिक सुझाव दे सकें, आज ऐसे मनीषी कहाँ हैं? उनका अभाव इतना अखरा है कि चारों ओर सूना ही सूना दीखता है। ऋषियों की यह भूमि ऋषि तत्व से रहित हो गई जैसी लगती है।
दुर्भाग्य एक और भी है कि स्वाध्याय के उपयुक्त साहित्य भी कहीं-कहीं ही दृष्टिगोचर होता है। पुस्तक विक्रेताओं की दुकानें खोज मारने पर मुश्किल से ही कुछ पुस्तकें ऐसी मिलेंगी जो जीवन निर्माण के लिए आज की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्यवहारिक सुझाव प्रस्तुत करती हों। प्रेसों में ऐसा कूड़ा कचरा दिन रात छपता है जिसे पढ़कर लोगों के दिमाग और भी अधिक खराब हों।
आज की परिस्थितियों में जो भी संभव हो हमें ऐसा साहित्य तलाश करना चाहिये जो प्रकाश एवं प्रेरणा प्रदान करने की क्षमता से सम्पन्न हो। उसे पढ़ने के लिए कम से कम घन्टा निश्चित रूप से नियत करना चाहिए। धीरे-धीरे समझ-समझ कर विचारपूर्वक उसे पढ़ना चाहिए। पढ़ने के बाद उन विचारों पर बराबर मनन करना चाहिये। जब भी मस्तिष्क खाली रहे यह सोचना आरम्भ कर देना चाहिए कि आज के स्वाध्याय में जो पढ़ा गया था, उस आदर्श तक पहुँचने के लिए हम प्रयत्न करें, जो कुछ सुधार संभव है उसे किसी न किसी रूप में जल्दी ही आरम्भ करें। श्रेष्ठ लोगों के चरित्रों को पढ़ना और वैसा ही गौरव स्वयं भी प्राप्त करने की बात सोचते रहना मनन और चिन्तन की दृष्टि से आवश्यक है।
दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदत्रं भक्ष्यते नित्यं वायते तादृपूर्ण प्रथा॥
—चाणक्य
“दीपक अन्धकार को खाता है और काले काजल को जन्म देता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति प्रतिदिन जैसा अन्न खाता है उसका वैसा ही परिणाम होता है।”
जितनी अधिक देर तक मन में उच्च भावनाओं का प्रवाह बहा रहे उतना ही अच्छा है। ऐसा साहित्य हमारे लिए संजीवन बूटी का काम करेगा। उसे पढ़ना अपने अत्यन्त प्राणप्रिय कामों में से एक बना लेना चाहिए। सुलझे हुए विचारों के सच्चे मार्गदर्शक न मिलने के अभाव की पूर्ति इस साहित्य से ही संभव है। आज उलझे हुए विचारों के लोग बहुत हैं। धर्म के नाम पर आलस्य, अकर्मण्यता, निराशा, दीनता, कर्तव्य की उपेक्षा, स्वार्थपरता, संकीर्णता की शिक्षा देने वाले सत्संगों से जितनी दूर रहा जाय उतना ही कल्याण है।
कहीं से भी, किसी प्रकार से भी जीवन को समुचित बनाने वाले, सुलझे हुए उत्कृष्ट विचारों को मस्तिष्क में भरने का साधन जुटाना चाहिए। स्वाध्याय से, सत्संग से, मनन से, चिन्तन से जैसे भी बन पड़े वैसे यह प्रश्न करना चाहिए कि हमारा मस्तिष्क उच्च विचारधारा में निर्मग्न रहे। यदि इस प्रकार के विचारों में मन लगने लगे, उनके आनन्द का अनुभव होने लगे तो समझना चाहिए कि आधी मंजिल पार कर ली गई।
जीव और ब्रह्मा की एकता का विश्लेषण करते हुये गंगा तट पर बैठे हुए एक तत्वदर्शी कह रहे थे कि जीव ईश्वर का ही अंश है। जो गुण ईश्वर में हैं वे जीव में भी मौजूद हैं।
सुनने वालों में से एक ने पूछा—भगवन्! ईश्वर तो सर्वश्र और सर्व शक्तिमान है। पर जीव तो अल्पज्ञ और अल्प सामर्थ्य वाला है, फिर इस भिन्नता के रहते एकता कैसी?
प्रवचनकर्ता ने जिज्ञासु से कहा—’एक लोटा गंगा जल भर लाओ। वह नीचे बहती हुई गंगा में से जल भर लाया। उससे पूछा गया—गंगा के जल और इस लोटे के जल में कोई अंतर तो नहीं है? जिज्ञासु ने कहा—नहीं।
तत्वदर्शी ने पूछा—सामने गंगाजल में नावें चल रही हैं। एक नाव इस लोटे के जल में भी चलाओ। जिज्ञासु ने कहा—लोटा छोटा है, इससे थोड़ा-सा जल है, इतने में भला नाव कैसे चलेगी?
प्रवचनकर्ता ने गम्भीर होकर कहा—प्रिय! जीव एक छोटे दायरे में सीमाबद्ध होने के कारण लोटे के जल के समान अल्पज्ञ और अशक्त बना हुआ है। यदि यह जल पुनः गंगा में लौट दिया जाय तो उसे ईश्वर जैसी सर्वज्ञता और सर्वशक्ति सम्पन्नता सहज ही प्राप्त हो सकती है।
जिज्ञासु की समझ में ईश्वर और जीव की स्थिति का अन्तर आ गया और वह यह भी जान गया कि संकीर्णता का सीमा बन्धन हटा कर कोई भी जीव ईश्वर बन सकता है।
देश, काल और पात्र की आवश्यकताओं को देखते हुए मानव जीवन की सार्थकता के लिए हमें आज क्या कार्यक्रम अपनाना चाहिये? गंभीरतापूर्वक यह विचार करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि दुर्भावना एवं दुष्प्रवृत्ति के बढ़े हुए प्रकोप के उन्मूलन के लिए हमें प्राण-पण से जुट पड़ना चाहिए। आज इसी ताड़का का उपद्रव इस ऋषि-भूमि में सबसे अधिक हो रहा है। जब तक सद्भावनाओं की प्रवृत्ति बढ़ेगी नहीं तब तक सुधार के सारे प्रयत्न निष्फल होते रहेंगे। ऊसर भूमि में बहुत वर्षा होने पर भी घास नहीं जमती, उसी प्रकार दुर्बुद्धि भरे हुए व्यक्ति बहुत उपकार करने एवं सहयोग देने से भी ऊँचे नहीं उठ सकते।
एतावज्जन्मसाफल्य यदनायत्तवृत्तिता।
ये पराधीनताँ यातास्ते वै जीवन्ति के मृतः॥
—हितोपदेश
“स्वाधीन होना ही जन्म की सफलता है। यदि पराधीन रहने वाले को भी जीवित माना जाय तो फिर मरा हुआ किसे कहा जायगा? अर्थात् वे ही मरे हुये के समान है जो पराधीन बने हैं।”
भिक्षुओं को देखकर सहृदय व्यक्ति को दया आना स्वाभाविक है। सोचते हैं—इन बेचारों को सुखी बनाने के लिए शक्ति भर मदद करनी चाहिए। भावना से प्रेरित होकर—अपने बच्चों का पेट काटते हैं, भविष्य के लिए कुछ बचा कर रखा था उसे समाप्त करते हैं और उसे भिखारियों में बाँट देते हैं। सोचते हैं यह बेचारे सुखी होंगे, जरूरत पूरी हो जाने पर आशीर्वाद देंगे। पर जब परिणाम देखते हैं तो दूसरा ही निकलता है। प्राप्त हुए पैसों को लेकर वह भिखारी बीड़ी खरीदता है या जोड़ने के लिए जमा कर लेता है। आज का काम चल गया, कल फिर वही व्यवसाय चलाता है। इस प्रकार हमारे जैसे ढेरों दानी रोज ही उसकी सहायता करते हैं पर एक सामयिक-सी ओछी आवश्यकता मात्र वे पूरी कर पाते हैं। भिखारी आजीवन भिक्षा वृत्ति ही करता रहता है, उसके दुःख का कोई अन्त नहीं होता।
क्या यह अच्छा न होता कि उसे कुछ काम करने के लिए समझाया या दबाया जाता। उस दिशा में उसका सहयोग किया जाता। यदि यह प्रयोग सफल हो सकता तो वह भिखारी दूसरे अन्य लोगों की तरह ही अपने भुजबल से कमाता खाता, स्वावलम्बी और स्वाभिमानी जीवन-यापन करता। स्वयं माँगने की अपेक्षा दूसरों को देने की स्थिति में होता। दान देकर नहीं उसकी वृत्ति को बदल कर ही समस्या का हल हो सकना सम्भव है।
बीमारों को देखकर, उन्हें कष्ट से कराहते हुए आर्थिक संकट में फँसते हुए देखकर सहृदय की भावना जगती है, वह सोचता है, ऐसे लोगों के लिए चिकित्सालय स्थापित कराना चाहिए। इस उदार भावना से प्रेरित होकर वह अपनी सारी सामर्थ्य खर्च करके औषधालय खुलवाता है। सोचता है इससे संसार की एक बड़ी कठिनाई दूर होगी। हर साल हजारों रोगी अच्छे हुआ करेंगे। औषधालय खुलता है, दवाएँ बँटती हैं, रोगी आते हैं और अच्छे भी होते हैं। पर आरोग्य रक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं होता। आहार-विहार का असंयम करने वाले व्यक्ति रोगमुक्त होते-होते अपने पुराने ढर्रे पर फिर आ जाते हैं। फिर बीमार पड़ते हैं। फिर दवा लेने आते हैं। एक रोग से पीछा छूटा नहीं कि दूसरा आ घेरता है। ढेरों औषधियाँ खर्च होती हैं, बेचारी चिकित्सक का समय लगता है पर बीमारी की समस्या ज्यों की त्यों उलझी रहती है।
विचारशीलता कहती है कि लोगों को आदतें बदलने की प्रेरणा दिये बिना काम न चलेगा। नशेबाजी घटेगी नहीं, असंयम घटेगा नहीं, अनियमितता घटेगी नहीं तो रोग भी कब छूटने वाला है। जलते तवे पर पानी के थोड़े से छींटे क्या प्रयोजन पूरा करेंगे। दवाओं से नहीं प्रवृत्ति बदलने से रोग छटेंगे, लोगों को इसी का शिक्षण देना चाहिए।
कोई मित्र या संबंधी कर्ज या गरीबी में फँस कर अपने पास आर्थिक सहायता को आता है। अपने को कठिनाई में डालकर उसकी वह आवश्यकता पूरी कर दी गई। सोचा था बेचारा एक बड़ी मुसीबत से निकल जायगा। पर ऐसा हो नहीं सका। पिछला कर्ज तो उसने चुका दिया, रुका हुआ कारोबार भी चालू कर लिया, पर फिजूलखर्ची की आदत नहीं छोड़ी। अपनी हैसियत से अधिक, उचित-अनुचित कामों में फिर खर्च किया, लापरवाही बरती। थोड़े ही दिन बाद वही अर्थसंकट फिर सामने आ गया। अब फिर वही संबंधी पहले की तरह दुबारा सहायता की याचना करता है। अब कहाँ से दिया जाय? यदि देने की स्थिति में भी हो तो बार-बार कब तक देते रहा जायगा। ऐसे ही दस-बीस मित्रों को माँगें उठने लगीं तो अपनी रोटी भी कठिन हो जायगी।
विवेक कहता है—आर्थिक तंगी की समस्या कठोर परिश्रम करने, मितव्ययिता बरतने और लापरवाही जरा भी न करने की आदत डालने से ही सुलझेगी। आर्थिक तंगी जिन कारणों से उत्पन्न हुई है वे कारण यदि बने रहे तो कुबेर भी उनकी जरूरत पूरी न कर सकेगा। घाटा और तंगी बनी ही रहेगी। सामयिक सहायता का थोड़ा महत्व हो सकता है पर ठोस हल तो आदतें सुधारना ही है। इसी के लिए इन मित्र स्वजनों को क्यों न समझाया, दबाया जाए?
तावद्भयेन भेतव्यं यावद्भयमनागत्।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशंकया॥
—चाणक्य
“तब तक ही भय से डरना चाहिए जब तक वह पास नहीं आता, परन्तु भय को अपने निकट आता देखकर निस्संकोच भाव से उस पर प्रहार करके नष्ट कर देना चाहिये।”
पुण्य-फल के अभाव में मनुष्य नाना प्रकार की आधि−व्याधियों से घिरे हुए पड़े हैं। एक तपस्वी सोचता है मैं कठोर तप करके आत्म-बल उपार्जित करूं, और उसका लाभ आशीर्वाद रूप से इन दीन दुखियों को प्रदान करूं। वह ऐसा ही करता भी है। निरन्तर कठोर तप में लगता है और कुछ पुण्य-पूँजी जमा करता है। जो दुखिया सामने आते हैं उनके लिए अपनी कमाई दान करता है। कुछ का भला होता है। तप थोड़ा, आशीर्वाद माँगने वाले बहुत, कुछ ही दिन में यह सारी पूँजी समाप्त हो जाती है। पहले जिनका दुख दूर किया था वे अब और नये कष्टों की शिकायत लेकर फिर सामने आते हैं—उनसे प्रशंसा सुनकर और भी नये दुखियों की भीड़ जमा होती है। अब क्या किया जाय? तप की पूँजी तो समाप्त हो चुकी। कष्ट तो पुण्य की पूँजी से दूर होते हैं। तप समाप्त हो गया उसे बाँटना सम्भव न रहा तो आशीर्वाद कैसे फलित हो? दुनिया की भीड़ जमा, तपस्वी खाली हाथ। जीवन भर की कठोर कमाई समाप्त हो गई पर एक भी दुखिया का कष्ट दूर न हुआ।
तपस्वी सोचता है यह तरीका गलत है। इन
दुखियों को स्वयं ही तप करने और पुण्य उपार्जित करने की प्रेरणा देनी चाहिए ताकि अपने बल-बूते पर ही यह लोग सुखी बन सकें। इनकी सच्ची सहायता प्रवृत्तियों के बदलने से ही हो सकती है। अपने ही पुण्य से कोई व्यक्ति सुखी और समुन्नत हो सकता है, अपनी मनोभूमि बदलने से ही तो दुख दारिद्र की स्थिति पलटती है।
अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरनिराध्यते।
स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम्॥
—वा0रा0
“माता, पिता और गुरु—ये प्रत्यक्ष देवता हैं। इनकी अवहेलना करके अप्रत्यक्ष देवता की विविध उपचारों से आराधना करने से क्या लाभ हो सकता है?”
एक व्यक्ति सोचता है गरीबी ही सब दुखों की जननी है। इसलिए लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उद्योग, उत्पादन, बाँध, बिजली, मिल, कारखाने आदि खोले जाने चाहिए, इसके लिए वह कोई कम्पनियाँ बनाता है। सरकार के द्वारा ऐसी योजनाएँ चलवाता है। कितने ही लोग काम से लगते भी हैं। तनख्वाहें भी अच्छी मिलती हैं। अनुमान था कि अब यह कर्मचारी लोग अच्छी आजीविका पाकर सुखी रहेंगे। पर बारीकी से देखने पर कुछ दूसरी ही बात दीखती है। जुआ, शराब, सिनेमा, फिजूलखर्ची, व्यसन, बदमाशी जैसे कुसंस्कार उस पैसे को देखते ही भड़क उठते हैं। अधिकाँश कमाई बुराइयों में खर्च करके वे तंगी और गरीबी में ही डूबे रहते हैं। वेतन बढ़ाने का आन्दोलन सफल होने पर बढ़ी आमदनी से जो सुख बढ़ने की सम्भावना थी वह भी सार्थक नहीं हुई। पैसा बढ़ा तो व्यसन भी बढ़े। वह लाभ नहीं ही मिला जो सोचा गया था।
इतने प्रयत्न करने के बाद देश में खुशहाली बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहने वाला सज्जन व्यक्ति इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि आमदनी का लाभ तभी मिलेगा जब सद्गुण भी पनपें। दुर्गुणों के रहते बढ़ी हुई आमदनी चलनी में दूध दुहने की तरह कुछ भी लाभदायक न रहेगी। खुशहाली के लिए प्रवृत्तियाँ बदलने पर भी जोर देना आवश्यक है।
एक व्यक्ति सोचता है कि राजनीति में बड़ी शक्ति है। सरकारी प्रयत्नों के द्वारा—कानून के द्वारा—देश की काया पलट की जा सकती है। इसलिए चुनाव लड़ना चाहिए और सरकार में प्रवेश करना चाहिए। वह चुनाव में खड़ा होता है। पर वोटर तो जातिवाद के प्रलोभनों के चक्कर में फँसे पड़े हैं, उन्हें सिद्धान्तों और व्यक्तियों की अच्छाई बुराई का, देश और समाज का ध्यान नहीं, वे तो अपने व्यक्तिगत संपर्क और स्वार्थ की बात सोचते हैं। अपने मिलने-जुलने वालों को किसी लाभ की आशा से वोट देते हैं। बेचारा ईमानदार देशभक्त हार जाता है। पैसा लुटाने वाला, तरह-तरह के हथकण्डे काम में लाने वाला दुश्चरित्र व्यक्ति जीत जाता है।
हारने के बाद वह सोचता है कि सरकार से मनचाहे अच्छे काम कराना तब तक संभव नहीं जब तक कि वोटरों की प्रवृत्ति न बदले, अच्छे सदस्य ही अच्छी सरकार बनाते हैं, और अच्छे सदस्यों का चुना जाना, अच्छे विचारों की जनता द्वारा ही संभव है। इसलिए पहला कार्य वोट देने वाली जनता को देशभक्ति, कर्तव्य पालन और वोट को राष्ट्रीय धाती मानने की शिक्षा देना है। जनता जितनी बदलेगी उतनी ही सरकार सुधरेगी अच्छे दूध से ही तो अच्छा घी निकलेगा।
एक व्यक्ति सोचता है कि बड़ा अफसर या अधिकारी बन कर वह जनता का बड़ा हित साधन करेगा। इसके लिए वह उच्च शिक्षा प्राप्त करता है घोर श्रम करके इस योग्य बनता है कि अधिकारी नियुक्त हो सके। सफलता मिलती है और वह पूरी ईमानदारी एवं लगन से जन हित का ध्यान रखते हुए व्यवस्था बनाता है। पर कुछ ही दिन में वह अपने को असफल और लाचार पाता है। निर्धारित सरकारी कार्य पद्धति की आड़ लेकर नीचे के कर्मचारी कामचोरी और रिश्वतखोरी की गुंजाइश बनाये रहते हैं। बेईमान जनता और बेईमान अफसर की मिलीभगत से रिश्वत पकड़ी नहीं जाती। सताये हुये लोगों की शिकायत को बेकार बताने के लिए कर्मचारी अपने कानूनी दाँव-पेंच पहले से ही ठीक रखते हैं। दंड देने की व्यवस्था बहुत ही जटिल होने के कारण वह अफसर अपने नीचे वालों का कुछ बिगाड़ भी नहीं सकता। सुधारवादी उत्साही अधिकारी हाथ मल कर रह जाता है।
इंजीनियर और ठेकेदार मिल कर निर्माण कार्यों में गड़बड़ी करें तो उनको कैसे पकड़ा जाय? पुलिस और डाकू मिल-जुल कर षड़यंत्र बना लें तो उनकी रोक-थाम कैसे हो? रिश्वत लेने वालों और देने वालों के पारस्परिक स्वार्थ सधे रहें तो उन पर प्रतिबंध कैसे लगे? व्यभिचारिणी और व्यभिचारी का परस्पर सहयोग रहने पर कानून क्या करे? सरकारी टैक्सों की चोरी में अधिकारी और व्यापारी दोनों ही मिल जायं तो उनकी रोक कैसे हो?
प्रकट पापों से गुप्त पापों की संख्या सैकड़ों गुनी अधिक होती है। जो पाप प्रकट भी हो जाते हैं, उनके लिए तो कानूनी पेचीदगियों के कारण अपराधियों को दण्ड कहाँ मिलता है? ऐसी दशा में यह आशा करना कि अधिकारी या मिनिस्टर बन कर कोई बड़ा काम किया जा सकेगा, निराधार और निरर्थक है। अच्छी बुरी सरकारों में अन्तर तो अवश्य होता है पर समाज में फैले हुए अगणित अनाचारों को केवल सरकारी यंत्र के आधार पर ही नहीं रोका जा सकता। इसलिए जन-मानस में नैतिकता की-कर्तव्य भावना का, प्रवृत्तियों का जागृत रहना आवश्यक है। मनुष्य आत्मा की पुकार पर ही बुराइयों से रुक सकता है, पापों से बच सकता है। अन्यथा सरकार के लिए विशेषतया आज जैसी प्रजातंत्री सरकारों के लिए अपराधों को पूर्ण रूपेण रोक सकना कठिन ही है।
स्थिति पर विचार करने से यह समझ में आता है कि कानून या प्रशासन के माध्यम से नहीं, धर्म और कर्तव्य की भावनाएँ जागृत करने से मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियाँ नियंत्रण में रह सकती हैं और तभी क्लेश, कलह, अभाव, अनाचार उत्पन्न करने वाली अनेकों बुराइयों को हटाया जा सकता है।
तदलं प्रतिपक्षमुन्नतेरवलम्व्य व्यवसाय वन्ध्यता।
निवसन्ति पराक्रमा श्रया न निवादेन समं समृद्धयः॥
—भारवि
“उन्नति-मार्ग में बाधक अनुत्साह का अवलम्बन करके पड़े रहना अनुचित है, क्योंकि सब प्रकार की समृद्धियाँ पराक्रमी-उत्साही पुरुष को ही प्राप्त होती हैं और उत्साह हीन को त्याग देती हैं।”
गुण्डागर्दी मिटाने के लिए, अपराधियों को दण्ड दिलाने के लिए संघर्षात्मक जो प्रयोग किये जाते हैं, उनसे भी दुष्टता घटती नहीं, बढ़ती है। चोर-ठग जेल में जाकर अन्य साथियों के सान्निध्य में अपनी कला में और भी अधिक पारंगत बन कर निकलते हैं। यदि उनका हृदय परिवर्तन न हुआ तो हर जेल जीवन के बाद अपराधी प्रवृत्ति के लोग और भी अधिक खतरनाक बन कर निकलते हैं। भावना बदलने से वाल्मीकि और अंगुलिमाल जैसे डाकू, अम्बपाली और गणिका जैसे शील रहित, सूर और तुलसी जैसे कामुक बदल कर कुछ से कुछ हो सकते हैं। यह उद्देश्य दण्ड मात्र से पूरा नहीं होता। संसार से अपराधों को जड़ से काटने के लिए जेल पर्याप्त नहीं, सुधारात्मक शिक्षण की उपयोगिता अधिक है।
हम ऐसे समाज में रहना चाहते हैं जहाँ सब लोग एक दूसरे को प्यार करें, सद्भाव रखें, और परस्पर उदारता एवं सहायता का मधुर व्यवहार किया करें। हर व्यक्ति परिश्रमी और सन्तोषी हो। ईमानदारी और सचाई की नीति अपनाते हुए सादगी का जीवन उच्च आदर्शों के साथ बितावे। कोई किसी का न अनहित चाहे न द्वेष करे और न अनधिकार चेष्टा करके किसी के स्वत्वों का अपहरण किया जाय।
सुख और दुख को मिल बाँट कर भोगें, अपना ही नहीं दूसरों का सुख दुख भी सब लोग अपना ही मानें। जितनी इच्छा अपनी उन्नति एवं सुविधा की रहती है उतनी ही दूसरों की भी रहे। नर-नारियों के बीच पवित्र भावनाओं की गंगा जैसी निर्मल धारा बहती रहे। दाम्पत्य-जीवन की मर्यादाओं से बाहर कोई किसी को विकार की दृष्टि से न देखे। तृष्णा और वासना को, ख्याति और पदवी को तुच्छता की दृष्टि से देखा जाय। कर्तव्य पालन के आत्मसन्तोष में परिपूर्ण तृप्ति अनुभव हो। अपराध कहीं देखने-सुनने को भी न मिलें। कोई किसी का अहित न चाहे, कोई किसी को दुखी न करे। संयम और व्यवस्था का जीवन बिताते हुए लोग निरोग रहें और दीर्घ काल तक सूखपूर्वक जिएँ।
जब मनुष्य इस प्रकार की जीवन नीति अपना लेंगे तो रोक-शोक भय, क्लेश, अभाव, युद्ध, दुर्भिक्ष, प्रकृति प्रकोप जैसे उत्पात भी कहीं देखने को न मिलेंगे। ऐसा समय ही सतयुग कहलाता है। जो विपत्तियाँ आज चारों ओर से उमड़ती घुमड़ती रहती हैं, जो समस्याएँ सारे संसार को चिन्तित किये रहती हैं वे दैवी नहीं मनुष्यकृत हैं। वह यदि अपने को संभाले, सुधारे तो परिस्थितियाँ सुधरने में देर ही कितनी लगे? प्राचीन काल में जब नीति और धर्म को जन मानस में समुचित स्थान प्राप्त था तो इस धरती पर ही स्वर्ग बिखरा पड़ा रहता था। आज के जैसी आकृति वाले मनुष्य ही तब उच्च प्रकृति के कारण देव बने हुए विचरण करते थे। ऐसा स्वर्णिम युग यदि पूर्व काल में रह चुका है तो प्रयत्न करने पर अब वैसा ही फिर क्यों नहीं हो सकता?
मनुष्य बुद्धिमान प्राणी है। प्रयत्न करने पर वह यह सोच और समझ सकता है कि उसका वास्तविक कल्याण किस में है। कुविचारों और कुकर्मों को अपना कर सुख प्राप्त करने की उसकी आकाँक्षा पूर्ण नहीं हुई। इतिहास भी उसकी व्यर्थता सिद्ध करता है और प्रत्यक्ष अनुभवों से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि ‘पाप करने और सुख पाने’ की नीति गलत है उससे किसी अच्छे परिणाम की आशा नहीं की जा सकती। सादगी और सचाई का जीवन चाहे देखने में साधारण ही क्यों न प्रतीत हो, चमक दमक के आकर्षणों से रहित ही क्यों न
कर्मायत्तं फलं पुँसाँ बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
तथापि सुधियश्चार्याः सुविचार्येव कुर्वते॥
—चाणक्य
“फल मनुष्य के कर्म के अधीन है और बुद्धि कर्म के अनुसार आगे बढ़ने वाली है, तथापि विद्वान और सज्जन व्यक्ति अच्छी तरह से विचार करके ही कोई कार्य करते हैं।”
हो, अन्ततः श्रेयस्कर ही सिद्ध होता है। सन्तोष और आनन्द उसी में मिल सकता है।
मनुष्य जाति समय-समय पर विभिन्न प्रयोग करती रही है, अतीत में समय-समय पर उसने अनुभवों से लाभ उठाया और भूलों को सुधारा है। यदि समुचित प्रयत्न किये जाय तो वह सीधी चाल पर चलने के लिये फिर भी उद्यत हो सकती है। शान्ति का आकाँक्षी मनुष्य, उसके उचित मूल्य को चुकाने के लिए रजामंद हो भी सकता है। यह कोई असंभव बात नहीं है कि भौतिकवाद के दुष्परिणामों को भली प्रकार देख लेने के बाद विश्व-मानव की अन्तरात्मा पुनः आध्यात्मवाद की ओर मुड़ पड़े। इस प्रकार का तनिक-सा परिवर्तन यदि हो सके, दृष्टि कोण में जरा सा अन्तर आ जाय, जितनी चेष्टा कुमार्ग पर चलने की रहती है उससे आधी भी सन्मार्ग की ओर होने लगे, तो युग परिवर्तन का स्वप्न साकार होने में देर ही कितनी लगेगी?
पाप कर्मों की योजना, तैयारी एवं सफलता अत्यधिक चतुरता पर निर्भर रहती है। कम प्रयत्न, कम साहस, कम प्रतिज्ञा और कम बुद्धिमता से पाप कर्म कर सकना संभव नहीं हो सकता। यदि कोई वैसा दुस्साहस करेगा तो उसकी कलई जल्दी ही खुल जायगी। पाप करना और उसे छिपा लेना,
न शुद्रोऽपि प्रथम सुकृता पेक्षया संश्रयाय।
प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किम्पुनर्यस्तयोच्चैः॥
—कालिदास
“अपने साथ उपकार करने वाला मित्र यदि दैवयोग से अपने घर आ जाय तो सामान्य मनुष्य भी प्रेमपूर्वक उसका आदर करते हैं, उससे विमुख नहीं होते, फिर उच्चाशय व्यक्तियों का तो कहना ही क्या है।”
दंड से बचे रहना साधारण चतुरता का काम नहीं है। जो लोग इतना कर सकते हैं वे इससे आधी भी चतुरता सत्कर्मों में लगादे तो जीवनमुक्त नहीं तो महापुरुष अवश्य ही बन सकते हैं।
सचाई का मार्ग सीधा और सरल है। कम बुद्धिमान आदमी भी ईमानदारी का आचरण कर सकता है। सन्मार्ग पर चलने लगना वस्तुतः कुछ विशेष कठिन नहीं है। थोड़ी-सी सादगी अपना ली जाय, जरा सी मेहनत और बढ़ा दी जाय, मन की लोलुपता को जरा-सा रोक लिया जाय तो ईश्वर का पुत्र-मनुष्य जो आत्मा बनकर इस धरती पर अवतीर्ण हुआ है यहाँ से परमात्मा बन कर वापिस जाने की शानदार सफलता प्राप्त कर सकता है। जीवन का पूरा-पूरा लाभ ले सकता है।
प्रयत्न से सब कुछ हो सकता है। प्रयत्न से युग भी बदला जा सकता है। प्रगति के पथ पर हर दिशा में तेजी से कदम बढ़ाते-चलने वाले मनुष्य के लिए यह बात क्यों कठिन होनी चाहिये कि वह विवेकसंगत दृष्टिकोण के साथ अपनी जीवन-नीति निर्धारित करे, और यदि पिछले दिनों कुछ भूल होती रही है तो उसे साहसपूर्वक सुधार ले? इस प्रकार का मोड़ अब आने ही वाला है। विश्व-मानव की अंतरात्मा अब आकुलता पूर्वक यह चाहने लगी है कि समय बदले, परिस्थितियाँ उलटें, और शोक−संताप उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियों पर अंकुश लगे। अन्तरिक्ष से, दशों दिशाओं से यही प्रतिध्वनि उठती है और ईश्वरीय आश्वासन मिल रहा है कि यह परिवर्तन निकट भविष्य में होकर रहेगा।
नाव में लगे रहने वाले पतवार चाहे कितने ही तुच्छ प्रतीत क्यों न हों नौका की दिशा बदलने का श्रेय उन्हीं को मिलता है। रेल की लाइन बदलने वाले, मोटर को घुमाने वाले, जहाजों की दिशा फेरने वाले पुर्जे छोटे-छोटे होते हैं पर इन शक्तिशाली यंत्रों का संचालन इन्हीं के आधार पर संभव होता हैं। घोड़े के मुँह में रहने वाली लगाम, ऊंट की नकेल, बैल की नाथ, हाथी का अंकुश, सरकस का शेर का हंटर जरा-जरा से ही तो होते हैं पर उन्हीं से यह शक्तिशाली पशु नियंत्रण में रखे और उपयोग में लाये जाते हैं। समाज भी एक प्रबल एवं शक्तिशाली यंत्र वाहन के समान है।
जब तक मानव मन में भरी हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटा कर उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना न होगी तब तक संसार की एक भी उलझन न सुलझेगी।
प्रवृत्तियों के परिवर्तन की दिशा में हर मनुष्य चाहे वह कितना ही अयोग्य एवं तुच्छ क्यों न हो, कुछ-न-कुछ कर सकता है। ऐसा कर्तृत्व जन-मानस में उत्पन्न किया जाना चाहिए। प्रश्न केवल यह है कि इसे करे कौन? नींव का पत्थर, नाव का पतवार, रेल की पटरी, मोटर का पेट्रोल, देखने में तुच्छ भले ही लगें पर अनिवार्य आवश्यकता तो उन्हीं की रहती है। यह आवश्यकता पूर्ण न हो तो इन शक्तिशाली यंत्रों की गतिविधियाँ रुकी ही पड़ी रहेंगी। आज प्रगति का अभियान इसी लिए रुका पड़ा है कि उसे अग्रगामी बनाने वाले लौह पुरुष दृष्टि गोचर नहीं होते। सस्ती वाहवाही लूटने वाले लुटेरे हर जगह मौजूद हैं, नाम बड़ाई के भूखे भिखारी जनसेवा के सदावर्त से अपनी भूख बुझाने के लिए इधर-उधर मारे-मारे फिरते रहते हैं, पर बीज की तरह गल कर विशाल वृक्ष के रूप में परिणत जो हो सकें ऐसा साहस किन्हीं बिरलों में ही होता है।
युग निर्माण की नींव खोदी जा रही है, उस विशाल भवन के निर्माण की योजना बन चुकी है। अब केवल नींव में रखे जाने वाले पत्थरों की तलाश है। भारत भूमि की विशेषता और ऋषि-रक्त की महत्ता पर जब ध्यान देते हैं तो यह विश्वास सहज ही हो जाता है कि कर्तव्य की पुकार सुनने और उसे पूरा करने वाले तत्व यहाँ सदा से रहे हैं और अब भी उनका बीज नाश नहीं हुआ है।
नदी में बाढ़ आई। फुफकारती हुई सर्पिणी की तरह लहरें तट की मर्यादा को तोड़ती हुईं चारों और फैलने लगीं।
प्रवाह में भारी प्रचंडता थी। तटवर्ती वृक्ष और भूखण्ड उसकी लपेट में आकर धराशायी होने लगे।
किनारे पर शमी का एक विशाल वृक्ष मुद्दतों से अकड़ा खड़ा था। वह सोचता था मेरी जड़ें गहरी हैं मैं परिपक्व भी हूँ और सुदृढ़ भी, इन लहरों की क्यों परवा करूं ?
उसका सोचना चल ही रहा था कि लहरों ने जड़ के नीचे की मिट्टी काटनी शुरू कर दी। हर लहर के साथ मिट्टी खिसकने लगी। मजबूत तने से प्रवाह टकराया तो वहाँ एक नया संघर्ष होने लगा। वृक्ष की निश्चितता काम न आई। देखते-देखते वह उखड़ गया। देखने वालों ने आश्चर्य से देखा कि नदी तट का पुरातन शमी लहरों पर उतराता हुआ लुढ़कता-पुढ़कता बहा चला जा रहा है।
पास ही एक बेंत का छोटा सा गुल्म खड़ा था। उसने सोचा विपत्ति आने से पूर्व सुरक्षा का उपाय कर लेना चाहिए। वह झुका और मिट्टी के सतह पर लेट गया। गरजती हुई पानी की लहरें उसके ऊपर होकर गुजरती रहीं। बाढ़ उतरी तो देखने वालों ने देखा कि बेंत का पौधा सुरक्षित है और खतरा टलते ही अपना मस्तक उठाने की तैयारी कर रहा है।
पूछने वालों ने पूछा—विशाल शमी वृक्ष क्यों उखड़ गया और बेंत का छोटा पौधा बाढ़ से बचा रहा?
बताने वाले ने बताया—अहंकारी अक्खड़ और अदूरदर्शी समय की गति को नहीं पहचानते और ढिठाई उन्हें ले बैठती है। किन्तु जो नम्र हैं, दूरदर्शी और विवेकवान हैं, वे झुकते हैं, टकराने से बचते हैं और सज्जनता का सुफल देर तक प्राप्त करते रहते हैं।
उत्तमा स्वयमाख्याता पितुः ख्याता च मध्यमाः।
अधमा मातुलात् ख्यात् श्वसुर हयाताधमावमा॥
—अज्ञात
“उत्तम पुरुष स्वयं अपने नाम से प्रसिद्ध होते हैं, मध्यम पुरुष अपने पिता के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं, निम्न श्रेणी वाले मामा के नाम से ख्याति प्राप्त करते हैं और सबसे नीचे दर्जे के व्यक्ति ससुर के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं।”
चिर संचित संस्कार धीरे-धीरे ही दूर होते हैं। छोड़ देने की इच्छा रहते हुये भी अभ्यास में आई नई बातें बार-बार प्रबल हो उठती हैं और प्रयत्नों को असफल करने की रचना रचती हैं। यह कठिनाई प्रत्येक आत्मसुधार करने वाले के सामने आती है। सफल वही होता है जो असफलताओं से खिन्न होकर प्रयत्न नहीं छोड़ता। बार-बार भूलें होना स्वाभाविक है पर उन्हें सुधारने की प्रक्रिया छोड़ी नहीं जानी चाहिए। निराश हुये बिना, बार-बार लौट आने वाले बुरी आदतों को सुधारने में लगा ही रहना चाहिए।
अपनी अच्छाइयों को भी समझना चाहिये। जो सद्गुण मौजूद हैं उन्हें बढ़ाना चाहिए, जो नहीं हैं उन्हें उत्पन्न करना चाहिये। नशेबाजी की आदत किसी को जन्म से ही नहीं होती। पीछे से सीखी जाती है। जो सद्गुण हमें अब तक के वातावरण में प्राप्त नहीं हो सके हैं, उन्हें सीखने का अभ्यास अब आरम्भ किया जा सकता है। सिखाने से बन्दर जैसा उद्दण्ड जानवर तरह तरह के खेल तमाशे करना सीख जाता है तो कोई कारण नहीं कि मन पर लाठी के बल से नियन्त्रण रखा जाय, प्यार पुचकार से समझाया जाय तो वह भी सद्गुणों को अपने स्वभाव का अंग न बना ले। यह कार्य कठिन दीखता तो है पर वस्तुतः वैसा नहीं है।
कुरंग, मातंग, पतंग, भृंग, मीना
हताः पंच भिरेव पंच।
एकः प्रमादी स कथँ न हन्यते
यस्सेवते पंचभिरेव पंच॥
“हिरन गाने से, हाथी कामोपभोग से, पतंग रूप पर मोहित होने से, भ्रमर गंध से और मछलियाँ जिह्वा के स्वाद में आसक्त होकर अपने प्राण खोते हैं। फिर जिन्हें, पाँच इन्द्रियाँ हैं और जो उन सबों के विषय में फँसे रहते हैं तो वे मृत्यु-संकट से कैसे रक्षित रह सकते हैं?”
रात को सोते समय दिन भर के कार्यों का लेखा जोखा लेना चाहिये। जिस प्रकार प्रातः या दिन में कोई समय स्वाध्याय के लिये नियम किया गया है उसी प्रकार रात को सोते समय कुछ मिनट अपने दिन भर के कामों पर समीक्षक की कठोर दृष्टि से आवश्यक विवेचन करने में लगाये जायँ। शरीर से प्रायः कम ही दुष्कर्म होते हैं पर मन में यह बुरी लत पड़ी रहती है कि छोटे कारणों को लेकर बुरी-बुरी बातें सोचने लगे। किसी का रूप यौवन देखकर उसकी ओर अनैतिक भाव उठते हैं, कोई हमारी थोड़ी-सी हानि कर दे तो उसके प्रति मारने मरने तक की प्रतिहिंसा जगती है, किसी की बढ़ती को देखकर ईर्ष्या होना, कहीं स्वार्थ सधता दीखे तो चोरी की इच्छा होना जैसे अनेकों दुर्भाव मन में उठते रहते हैं। यद्यपि वह दुर्भाव कार्यान्वित नहीं हो सके, किसी पर प्रकट भी नहीं हुए, पर उनसे अपनी जो हानि होनी थी वह तो हुई ही। मनोभूमि अपवित्र हुई, अनीति को प्रश्रय मिला और पाप का बीजाँकुर उत्पन्न हुआ। यदि कभी ऐसा अवसर आवे कि बाहरी रोक-थाम न हो तो उठने वाले कुविचार आसानी से चरितार्थ भी हो सकते हैं।
जो चोरी करने की बात सोचता रहता है उसके लिये अवसर पाते ही वैसा कर बैठना क्या कठिन होगा? शरीर से ब्रह्मचारी और मन से व्यभिचारी बना हुआ व्यक्ति वस्तुतः व्यभिचारी ही माना जायगा। मजबूरी के प्रतिबन्धों से शारीरिक क्रिया भले ही न हुई, पर वह पाप सूक्ष्म रूप से मन में तो मौजूद था। मौका मिलता तो वह कुकर्म भी हो ही जाता।
कई बार सदाचारी समझे जाने वाले लोग आश्चर्यजनक दुष्कर्म करते पाये जाते हैं । उसका कारण यही है कि उनके भीतर-ही-भीतर वह दुष्प्रवृत्ति जड़ जमाये बैठी रहती है। उसे जब भी अवसर मिलता है नग्न रूप में प्रकट हो जाती है। इसलिये प्रयत्न यह होना चाहिये कि मनोभूमि में भीतर ही भीतर छिपे रहने वाले दुर्भावों का उन्मूलन करते रहा जाय।
रात को सोते समय आत्म-निरीक्षण करके यह देखना चाहिये कि आज कब-कब, किस-किस घटना को लेकर क्या-क्या दुर्भाव हुए? फिर सोचना चाहिए कि इन भावों के स्थान पर किन-किन भावों का आना उचित था। आगे जब कभी ऐसे अवसर आवें तो इस प्रकार सोचने की बजाय हम इस प्रकार सोचा करेंगे, इस प्रकार की विचारणा करनी चाहिए और मन को वैसी ही सलाह देनी चाहिये। इसके लिये कोई कठोर व्रत लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन एक दिन का काम नहीं है। रोज ही यह प्रयत्न चलता रहे तो दृष्टिकोण स्वयं ही बदलने लगता है। दुष्प्रवृत्तियां वहीं पनपती रहती हैं जहाँ उनकी रोक-थाम नहीं होती। चोरों की घात अँधेरे में ही लगती है, मच्छर सीलन के स्थान पर अण्डे देते हैं, इसी प्रकार दुष्प्रवृत्तियाँ वहीं पनपेंगी जहाँ उन पर कड़ी नजर न रक्खी जायगी। जहाँ चौकीदारी का, जाँच पड़ताल का, ठीक प्रबन्ध रहता है वहाँ चोरों की घात नहीं लगती। दुर्भाव भी एक प्रकार के चोर ही हैं जो वहाँ ठहरते हैं जहाँ निरीक्षण न होता हो। चौकसी और निगरानी को देखकर उन्हें वह स्थान छोड़ने को ही विवश होना पड़ता है।
अगले दिन क्या कार्य करने हैं और उनमें क्या-क्या ऐसे अवसर आ सकते हैं जिनमें दुर्भावनाएं उठने की संभावना है। यदि आशंका के अनुरूप परिस्थिति आये तो उस समय मन में क्या-क्या प्रतिक्रिया उठे? क्या दृष्टिकोण रहे? आदि बातों को पहले से ही सोच रखना चाहिए और अवसर आने पर वैसी ही भावनाएँ मन में लाने का प्रयत्न करना चाहिए।
इस प्रकार दिन में सद्विचारों का अभ्यास करना और रात को उनकी विवेचना करना उचित है। आज की समीक्षा और कल की तैयारी करने से कुविचारों पर नियंत्रण प्राप्त करते चलना सहज होता जाता है। उसी प्रकार जो सद्गुण अपने में नहीं थे, उन्हें किस प्रकार धीरे-धीरे अपने स्वभाव में शामिल किया जाय, इसकी नित्य विवेचना होती रहे तो उनका भी अभ्यास में सम्मिलित हो जाना कुछ कठिन नहीं रहता।
दिन में किसी समय कम से कम एक घण्टे का जीवन-निर्माता स्वाध्याय, रात को एक या आधा घण्टा आत्म-निरीक्षण एवं निर्माण की विवेचना का यदि नित्य नियम रहे और दिनभर अपने विचारों और आचरणों पर कड़ी निगरानी रखी जाय तो हमारी आन्तरिक गतिविधियों में भारी परिवर्तन हो सकता है। दैनिक जीवन में क्या परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर आमतौर से क्या विचार उठा करते हैं उन्हें समझना चाहिए और यह विचार करना चाहिये कि उनमें कितना औचित्य एवं कितना अनौचित्य रहता है। जो अनुचित हो उसे छोड़कर उसके स्थान पर उचित दृष्टिकोण अपनाने की बात सोची जाय तो यह विचारणा कार्य रूप में भी परिणत होने लगती है।
नात्युच्चशिखरो मेरुः नातिनीचं रसातलम्।
व्यवसायद्वितीयानाँ नाप्यापारो महोदधिः॥
—अज्ञात
“उद्योगी पुरुष के लिये सुमेरु पर्वत की चोटी भी अधिक ऊँची नहीं है, उसके लिये रसातल भी अधिक गहरा नहीं है और न वह समुद्र को ही अथाह और अपार समझता है।
यदि विचार बदल जायेंगे तो कार्यों का बदलना सुनिश्चित है। कार्य बदलने पर भी विचारों का न बदलना संभव है, पर विचार बदल जाने पर उनसे विपरीत कार्य देर तक नहीं होते रह सकते। विचार बीज है, कार्य अंकुर। विचार पिता है, कार्य पुत्र। इसलिए जीवन परिवर्तन का कार्य विचार परिवर्तन से ही आरम्भ होता है। जीवन निर्माण का-आत्म-निर्माण का अर्थ है—”विचार निर्माण।”
लोहे से लोहा काटा जाता है, काँटे से काँटा निकलता है, विष को विष मारता है, सशस्त्र सेना का मुकाबला करने के लिए वैसी ही सेना चाहिए। कुविचारों का शमन सद्विचारों से ही संभव है। इसलिए यह नितान्त आवश्यक है कि अपने गुण, कर्म स्वभाव में जो त्रुटियाँ एवं बुराइयाँ दिखाई दें उनके विरोधी विचारों को पर्याप्त मात्रा में जुटा कर रखा जाय और उन्हें बार-बार मस्तिष्क में स्थान मिलते रहने का प्रबन्ध किया जाय। जब आलस्य घेर रहा हो तब परिश्रम, उत्साह स्फूर्ति और तत्परता को प्रोत्साहन देने वाले विचारों पर देर तक मनन चिन्तन करना चाहिए, आलस्य हट जायगा। जब कामुकता जग रही हो तो ब्रह्मचर्य, मातृ-भावना एवं चारित्रिक पवित्रता की विचारधारा को मन में स्थान देना चाहिए वासना शाँत हो जायगी।
क्रोध का आवेश चढ़ रहा हो तो शान्ति, प्रेम, क्षमा, मैत्री, सहानुभूति, उदारता की दृष्टि से विचार करना शुरू कर देना चाहिए, गुस्सा ठंडा हो जायगा। शोक, निराशा और चिन्ता घेरने लगे तब साहस, आशा, पुरुषार्थ और पुनर्निर्माण की बात सोचनी चाहिए, मन सन्तुलित होने लगेगा। यदि निकृष्ट विचार मनुष्य को गिरा सकते हैं तो उत्कृष्ट विचार उसे ऊँचा भी उठा सकते हैं।
पादाहत यदुत्थाय मूर्धानमधिरोहति।
स्वस्थादेवापमानेऽपि देहिनस्तद्वरं रजः॥
—माघ
“जो धूल पैर से ठुकराए जाने पर उड़ कर ठोकर मारने वाले के सिर पर चढ़ कर बैठ जाती है, वह अपमान सह कर भी निश्चिन्त बने रहने वाले देहधारी मनुष्य की अपेक्षा श्रेष्ठ है।”
अपनी दुर्बलताएँ छोड़ने के लिए यह आवश्यक है कि उनकी हानियों पर अधिक से अधिक विचार किया जाय। साथ ही वह बुराई छोड़ देने पर जो लाभ मिलेगा उसका आशापूर्ण चित्र भी मन में बनाना चाहिए। नशा छोड़ना हो तो उसके द्वारा जो शारीरिक, आर्थिक और मानसिक हानियाँ होती हैं उन पर विचार करना और उसे छोड़ने पर स्वास्थ्य सुधार, पैसे की बचत तथा मनोबल बढ़ने का सुनहरा चित्र मनःक्षेत्र में स्थापित करना आवश्यक है। कुछ दिन लगातार यह उपक्रम चलने लगे तो नशे के प्रति घृणा हो जायगी और वह अवश्य छूट जायगा । किन्तु यदि इस प्रक्रिया को पूर्ण किये बिना ही किसी जोश आवेश में नशा छोड़ देने की प्रतिज्ञा कर ली है तो यह आशंका ही बनी रहेगी कि वह उत्साह ठण्डा होने पर पुरानी आदत फिर प्रबल हो उठे और नशा करना शुरू हो जाय। इसलिए इस सुनिश्चित तथ्य को भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि जीवन को सुधार की दिशा में मोड़ने के लिए उत्कृष्ट कोटि की विचारधारा को मनोभूमि में नियमित रूप से स्थान देते रहना नितान्त आवश्यक है। इस अनिवार्य आवश्यकता की उपेक्षा करके कभी कोई व्यक्ति न अब तक आत्म निर्माण कर सकता है और न आगे कर सकेगा।
युग निर्माण का सद्संकल्प सितम्बर अंक में छपा है। इसे नित्य दुहराना चाहिए। स्वाध्याय से पहले इसे एक बार भावनापूर्वक पढ़ना और तब स्वाध्याय आरम्भ करना चाहिए। सत्संगों और विचार गोष्ठियों में इसे पढ़ा और दुहराया जाना चाहिए। एक व्यक्ति संकल्प का एक-एक वाक्य पढ़े और बाकी लोग उसे दुहरावें। इस सत्संकल्प का पढ़ा जाना हमारे नित्य नियमों का एक अंग रहना चाहिए।
यदि हम अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठता के ढाँचे में ढालने के लिये सचमुच ही उत्सुक एवं उद्यत हों तो अपने दैनिक कार्यक्रम में उत्कृष्ट विचारधाराओं को मस्तिष्क में ठूँसने का एक नियमित विभाग बना ही लेना चाहिए। मन लगे चाहे न लगे, फुरसत मिले चाहे न मिले, इसके लिये बलपूर्वक, हठपूर्वक समय निकालना ही चाहिए। नित्य कितने ही काम अनिच्छापूर्वक भी करते रहते हैं और समय न रहने पर भी आकस्मिक स्थिति के अनुरूप समय निकालना पड़ता है। विचार-निर्माण को भी ऐसी ही एक अनिवार्य आवश्यकता मानना चाहिए और उसके लिए हठपूर्वक कटिबद्ध हो जाना चाहिए। थोड़े ही समय में यही क्रम बहुत ही रुचिकर लगने लगेगा, सन्तोष और आनन्ददायक प्रतीत होगा।
नित्य नियमित ईश्वर उपासना के बारे में हम सदा से कहते रहे हैं। चरित्र निर्माण की आधार-शाला आस्तिकता है। ईश्वर विश्वास छोड़ देने से मनुष्य अंकुश रहित उन्मत्त हाथी की तरह आचरण करता है-अपने लिए तथा दूसरों के लिए विपत्ति का कारण बनता है। इसलिए हम में से हर एक को किसी न किसी रूप में ईश्वर उपासना नित्य ही करनी चाहिए। गायत्री उपासना की शिक्षा “अखंड ज्योति” के पृष्ठों पर लम्बे समय से हम देते चले आ रहे हैं। वह न बन पड़े तो जितना भी जिस प्रकार भी संभव हो ईश्वर स्मरण करना चाहिए। इतना तो हर कोई कर सकता है कि सो कर उठते समय पन्द्रह मिनट ईश्वर का ध्यान स्मरण करके तब अन्य कार्य करे इसी प्रकार रात को सोते समय भी परमात्मा का स्मरण करते हुए सोया जाय।
“अखण्ड ज्योति” के प्रत्येक पाठक को व युगनिर्माण योजना के प्रत्येक सदस्य को (1) अपने दैनिक जीवन में उपासना को स्थान देना चाहिये। (2) स्वाध्याय के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित करना चाहिए। (3) नित्य युग निर्माण का सत्संकल्प पढ़ना चाहिये। (4) सोते समय आत्मनिरीक्षण का कार्यक्रम नियमित रूप से चलाना चाहिये। (5) दिन में समय-समय पर कुविचारों से लड़ते रहने की तैयारी करनी चाहिये। यह पाँच कार्यक्रम आत्मनिर्माण की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक हैं। युग-निर्माण अपने आप से ही आरम्भ करना है, इसलिये यह पाँच कार्य जितनी जल्दी आरम्भ किये जा सकें उतना ही उत्तम है।
प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्यों को विद्याध्ययन के साथ-साथ अनुशासन, शिष्टाचार, क्षमाशीलता, तितीक्षा आदि सद्गुणों की भी शिक्षा देते थे। उस समय यह विश्वास था कि विद्या के समान ही चरित्र भी आवश्यक है और उसके शिक्षण पर भी पूरा-पूरा ध्यान दिया जाना चाहिये।
ऋषि धौम्य के आश्रम में कितने ही छात्र पढ़ते थे। वे उन्हें पूरी तत्परता से पढ़ाते, साथ ही सद्गुणों की वृद्धि हुई या नहीं इसकी परीक्षा भी लेते रहते थे।
एक दिन मूसलाधार वर्षा हो रही थी। गुरु ने अपने छात्र आरुणि से कहा बेटा! खेत की मेंड़ टूट जाने से पानी बाहर निकलता जा रहा है सो तुम जाकर मेंड़ बाँध आओ।” छात्र तत्काल उठ खड़ा हुआ और खेत की ओर चल दिया।
पानी का बहाव तेज था। छात्र से रुका नहीं। कोई उपाय न देख आरुणि इस स्थान पर स्वयं लेट गया। इस प्रकार पानी को खेत में रोके रहने में उसे सफलता मिल गई।
बहुत रात बीत जाने पर भी जब छात्र न लौटा तो धौम्य को चिन्ता हुई और वे खेत पर उसे ढूंढ़ने पहुँचे। देखा तो छात्र पानी को रोके मेंड़ के पास पड़ा है। देखते ही गुरु की छाती भर आई। उसने उठा कर शिष्य को गले लगा लिया।
इसी प्रकार धौम्य ने अपने एक दूसरे छात्र उपमन्यु को गौएँ चराते हुए अध्ययन करते रहने की आज्ञा दी। पर उसके भोजन का कुछ प्रबन्ध न किया और देखना चाहा कि देखें वह किस प्रकार अपना काम चलाता है। छात्र भिक्षा माँग कर भोजन करने लगा। वह भी न मिलने पर गौओं का दूध दुह कर अपना काम चलाने लगा।
धौम्य ने कहा—”बेटा! उपमन्यु छात्र के लिये उचित है कि आश्रम के नियमों का पालन करे और गुरु की आज्ञा बिना कार्य न करे।” छात्र ने अपनी भूल स्वीकार की और कहा भविष्य में भूखा रहना तो बात क्या है, प्राण जाने का अवसर आने पर भी आश्रम की व्यवस्था का पालन करूंगा। उसने कई दिन निराहार होकर दुर्बल हो जाने तक अपनी इस निष्ठा की परीक्षा भी दी।
छात्र संतुष्ट थे कि उन्हें सद्गुण सिखाने के लिये कष्टसाध्य कार्यों के द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है। सच्ची विद्या अक्षर ज्ञान में नहीं, सद्गुणों से परिपक्व श्रेष्ठ व्यक्तित्व में ही सन्निहित है।
युग निर्माण के लिए आवश्यक प्रयत्न करने के लिए आवश्यक है कि जिस दुनिया में हम रहते हैं यदि वह गंदी और दूषित रही तो अपने लिए ही संकट और चिन्ता की स्थिति बनी रहेगी। यदि चारों ओर दुष्टतापूर्ण वातावरण बना हुआ हो तो अपने सत्प्रयत्न भी निरर्थक चले जाते हैं।
चोर, डाकू, दुष्ट, दुराचारी, व्यभिचारी, बेईमान, गुण्डे और शरारती लोगों के बीच रह कर कोई सज्जन व्यक्ति भी अपनी सज्जनता की रक्षा नहीं कर सकता। उसके मार्ग में इतनी अड़चनें उत्पन्न हो जाती हैं कि उन्हें सुलझाने और सँभालने में ही अधिकाँश शक्ति खर्च होती रहती है। प्रगति और आत्म कल्याण की बात सोचने और वैसी व्यवस्था बनाने के लिए मनोबल ही शेष नहीं रह पाता। क्षोभ और सन्ताप से ग्रस्त व्यक्ति प्रतिरोध और प्रत्याक्रमण की बात ही सोच सकता है। उसका मन अशुभ भावनाओं में ही डूबा रहेगा और विवश होकर वह गतिविधि अपनानी पड़ेगी जो उसे कभी भी प्रिय नहीं थी।
आत्मिक प्रगति के लिए उपयुक्त वातावरण बना रहे इसके लिए यह आवश्यक है कि दुष्टता की प्रवृत्तियों का शमन करने के लिए हम प्रयत्नशील रहें। उपेक्षा करने से तो विपत्ति और भी बढ़ेगी। अनीति पर यदि अंकुश न रहे, दुष्टता पर यदि नियंत्रण न रहे तो वह दिन दूरी रात चौगुनी गति से अपना विस्तार करेगी। इसलिए मानव-समाज में बढ़ती जाने वाली दुष्प्रवृत्तियों की ओर से आँखें मूँद कर नहीं बैठे रहना चाहिये। अन्यथा संसार में जो पाप-ताप की ज्वालाएँ बढ़ेगी उनकी चपेट में अपना छप्पर भी आये बिना न रहेगा। दूषित वातावरण में अच्छे व्यक्ति की भी शान्ति सुरक्षित नहीं रहती।
अपनी व्यक्तिगत सुख शान्ति एवं सुरक्षा की दृष्टि से भी विचार करें तो यह आवश्यक प्रतीत होगा कि व्यापक क्षेत्र में फैली हुई बुराइयों के प्रतिरोध के लिए समुचित ध्यान रखा जाय और कुछ काम किया जाय। युग-निर्माण की बात केवल पुण्य-परमार्थ की दृष्टि से नहीं, स्वार्थों की, सुरक्षा की बात ध्यान रख कर भी सोचनी चाहिए। मुहल्ले में व्यापक व्यभिचार फैला हो तो उसकी चर्चा और प्रेरणा से अपने घर के लड़के-लड़कियों पर भी बुरा प्रभाव पड़े बिना न रहेगा। स्कूल में बच्चे गंदी गाली दें तथा दूसरी बुरी आदतों में लिप्त हों तो अपना बच्चा भी वहाँ से उन बुराइयों को सीख कर आवेगा। चोर-उठाईगीरों की संख्या अपने क्षेत्र में बढ़ेगी तो किसी दिन अपने कपड़े, बर्तनों के उठ जाने का भी अवसर आ ही सकता है।
गाँव में पार्टीबन्दी, मुकदमेबाजी का दौर चल रहा हो तो उस खींच-तान में अपने को भी किसी पक्ष की बुराई ओढ़नी पड़ेगी। जिसकी हाँ में हाँ न मिलाई जायगी वही बुरा मानेगा। आस-पास बीमारी फैले तो घर में सफाई आदि का प्रयत्न करते-करते भी उसका प्रकोप अपने यहाँ भी प्रवेश कर सकता है और दूसरों की गन्दगी से उत्पन्न हुई बीमारी की हानि अपने को भी सहनी पड़ सकती है।
समाज में कुरीतियाँ फैली हों और हम उन्हें अविवेकपूर्ण समझ कर न मानें तो बहुमत का विरोध सहना पड़ेगा। अपनी कन्या विवाह योग्य हो जाय और समाज में दहेज की दुष्प्रवृत्ति जड़ जमाये रहे तो विवश होकर हमें दहेज देने के लिए कष्ट सह कर प्रबन्ध करना होगा। बेईमान दुकानदारों के बीच रहते हुए हमें बिना मिलावट की शुद्ध सामग्री कहाँ उपलब्ध होगी? हृदयहीन चिकित्सकों का लक्ष्य यदि लूट खसोट ही हो तो वहाँ गरीब आदमी की जीवन-रक्षा कैसे सम्भव होगी? कचहरी और पुलिस में यदि रिश्वतखोरी का बाहुल्य हो जाय तो न्याय की रक्षा और अपराधों की रोक कहाँ से हो सकेगी?
नशेबाजी का प्रचलन बढ़ जाय तो अपने स्वजन संबन्धी भी कहीं न कहीं से उस लत को सीख आवेंगे और इसका प्रभाव अपने घर पर भी पड़ेगा। सिनेमा की गन्दी फिल्मों की गन्दी हवा चुपके-चुपके हर घर में प्रवेश करती चली आ रही है। जिस फैशन का प्रचलन बाजार में सब ओर दीखता है उसके लिये अपने स्वजन-संबन्धी ललचाने लगते हैं और अनुपयुक्त समझने पर भी हम उसे रोक नहीं पाते।
वातावरण में फैली हुई विचारधाराएँ और बुराइयाँ हवा और सर्दी-गर्मी की तरह अपने ऊपर भी आक्रमण करती हैं इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि बुराइयों से अपने बचाव का मोर्चा छोटा न रखा जाय। घर में ही सब कुछ बचाव नहीं हो सकता, बाहरी परिस्थितियों को बिगड़ने न देने के लिए भी प्रयत्न करना आवश्यक है। युग-निर्माण योजना के अंतर्गत समाज-सुधार पर जो अधिक जोर दिया जाता है इसका कारण परमार्थ तो है ही—विश्व शांति जन-कल्याण और सामूहिक प्रगति का लक्ष तो है ही, पर साथ ही यह तथ्य भी सन्निहित है कि हमारे व्यक्तिगत स्वार्थ भी तभी सुरक्षित रह सकेंगे जब समाज का वातावरण उत्कृष्ट विचारधाराओं से प्रभावित हो।
यदि निष्ठुरता की ही प्रधानता फैली रहे तो हमारी बीमारी मुसीबत में भला कौन मदद देने आयेगा? जिस व्यक्ति को मुसीबत के वक्त उधार दिया है यदि वह बेईमान होगा तो अपना उधार कब लौटेगा? डाकुओं और लुटेरों के क्षेत्र में रास्ता चलना भी कठिन हो जाता है। मेले में अपना बच्चा खो जाय और उस भीड़ में सहृदय लोग न हों तो वह बालक कहीं भटक-भटक कर ही मर सकता है। होटल वाले और हलवाई यदि खराब चीजें ही बनाते हैं तो आवश्यकता पड़ने पर जब भी वहाँ से कुछ खरीदना पड़ेगा तभी स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न होगा। कुमार्ग पर चलने चलाने वाले लोगों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव अपने परिवार पर भी पड़ता है और बचाव का ध्यान रखते हुए भी अनिष्ट की सम्भावना रहती है।
लोकेषु निर्धनों दुःखी ऋणग्रस्ततोऽधिकम्।
ताम्याँ रोगयुतो दुःखी तेम्यो दुःखी कुभार्यंकः॥
—विदुर
“संसार में सबसे पहला दुःखी निर्धन है। इससे अधिक दुःखी वह है जो ऋणी है। इन दोनों से अधिक वह है जो सदैव रोगी रहता है सबसे अधिक वह है जिसकी स्त्री दुष्ट है।”
आत्म-कल्याण के लिए साधन, वैराग्य एवं त्याग का मार्ग अपनाने की आकाँक्षा बलवती होती है तो मार्गदर्शन के लिए किन्हीं, सन्त, धर्मात्मा समझे जाने वालों के पास पहुँचते हैं। पर यदि वे सच्चे नहीं हैं और अपना सम्प्रदाय बढ़ाने, चेले मूँड़ने, प्रतिष्ठा बढ़ाने और धन एकत्रित करने में लगे हैं, तो ऐसी दशा में वे जो कुछ सिखावेंगे, बतावेंगे वह उसी दृष्टि से होगा, जिससे उनके स्वार्थों की पूर्ति होती हो। ऐसी दशा में यह बहुत ही कठिन है कि बेचारे सत्यान्वेषी मुमुक्षु को कोई सही मार्ग मिल सके।
अपनी कन्या को हम पाल-पोस कर बड़ा करते हैं, पढ़ाते-लिखाते हैं, अच्छा घर-वर ढूँढ़ने के लिए जी जान एक करते हैं, और पेट पर पट्टी बाँध कर विवाह का भारी खर्च भी जुटाते हैं। पर जब कन्या ससुराल जाती है और वहाँ घर से लेकर सास-ननद तक सब को अहंकारी, निष्ठुर, स्वार्थी, हृदयहीन अनुभव करती है तो उसे वहाँ जेल या नरक जैसा अनुभव होता है। लौट कर पिता के घर आती है तो आठ-आठ आँसू उसकी आँखों से बरसते हैं। माता-पिता का हृदय टूक-टूक होने लगता है। जिस बच्ची के सुख सपनों के लिए जीवन भर इतने कष्ट सहे उसे इतनी व्यथा सहनी पड़ रही है यह देखकर उनकी छाती फटने लगती है। वे सोचते हैं, काश किसी निर्धन मजबूर या अशिक्षित ऐसे परिवार में कन्या जा पहुँचती जहाँ स्नेह सौजन्य की उदारता, आत्मीयता की गंगा बहती तो हमारी बच्ची उस अभावग्रस्त स्थिति में भी कितनी सुखी रह सकती।
अपना लड़का बड़ा हो जाता है—विवाह करते हैं। बहू सुन्दर सुशिक्षित ढूँढ़ते हैं। बड़ी आशा और उत्साह से जेवर कपड़ा बनवाते हैं, धूम धाम से विवाह करते हैं। सोचते हैं बहूरानी गृहलक्ष्मी की तरह आवेगी और अव्यवस्थित घर में अपने सद्गुणों से आशा और उत्साह का वातावरण उत्पन्न करेगी। पर विवाह होकर जब बहू घर आती है तो उसका स्वभाव दूसरे ही साँचे में ढला मिलता है। कर्कश, आलसी, अशिष्ट, स्वार्थी, छिद्रान्वेषी स्वभाव के कारण वह सब की शिकायत करती है, सब से लड़ती है और अन्त में अपने पति को लेकर कुटुम्ब से अलग रहने लगती है। परिवार की आशाओं पर पानी फिर जाता है। लड़का बड़ा होकर पिता के उत्तरदायित्वों में हाथ बंटायेगा, बहू अपनी सास का भार हल्का करेगी, यह सोचा गया था। पर निकला उल्टा। लड़के से कुछ आशाएँ थीं वह भी हाथ से चला गया। विवाह बहुत महंगा पड़ा। सारा परिवार दुःख मानता है और सोचता है कि यदि सद्गुणी, उदार दृष्टिकोण की, सेवाभावी, श्रमशील स्वभाव की बहू घर में आती तो कितना अच्छा होता। ऐसी बहू यदि काली, कलूटी, अशिक्षित, गरीब घर की होती तो भी क्या हर्ज था।
मित्रों से मित्रता कायम रखने में बहुत धन और समय खर्च किया, उनकी प्रसन्नता के लिए बहुत त्याग किये, बुराइयाँ भी सहीं, पर अवसर आने पर वे ही मित्र जब धोखा दे जाते हैं, विश्वासघात करके हमें उल्लू बनाते हुए अपने वास्तविक रूप में प्रकट होते हैं तो मन को बड़ा धक्का लगता है और सोचते हैं—हे भगवान्, क्या तेरी इस दुनिया में से मित्रता और सचाई सचमुच ही उठ गई। यदि प्रेम और प्रेमी का वास्तविक स्वरूप इस संसार में बना रहता तो यहाँ कितनी मंगलमय परिस्थितियाँ रहतीं, सब लोग कितने हँसते-खेलते रहते।
जिधर भी दृष्टि पसार कर देखते हैं, इस सुन्दर सुसज्जित दुनिया में एक ही कमी दीखती है—उच्च भावनाओं, उदारता, आत्मीयता एवं कर्तव्यनिष्ठा की। इस अभाव के कारण परमात्मा की यह सुन्दर कृति, वसुधा—मरघट-सी डरावनी और नरक-सी वीभत्स दीखती है। अविश्वास सन्देह, आशंका और विपत्ति की घटाएं ही चारों ओर घुमड़ती दीखती हैं। यहाँ सब कुछ विकसित और गतिशील दीखता है पर एक ही वस्तु मूर्छित, निर्जीव, पतनोन्मुख एवं मुरझाई दीखती है, वह है—मनुष्य की अन्तरात्मा। इसी की उपेक्षा सब से अधिक हो रही है। सब कुछ बढ़ाने की योजनाएँ बन रही हैं पर मनुष्यत्व का, चरित्र और आदर्शवाद का भी उत्कर्ष हो इसकी न तो आवश्यकता समझी जाती है और न चेष्टा की जाती है। कहने सुनने की, लिखने बाँचने की परिधि में जहाँ-तहाँ कुछ किया भी जा रहा है, पर उसके पीछे कोई ठोस पृष्ठभूमि न होने से वह भी एक मनोविनोद मात्र बनकर रह जाता है।
दुख इसी बात का है कि इस संसार की—इस मानव-जीवन की—सबसे प्रमुख, सबसे महत्वपूर्ण, सबसे आवश्यक सबसे उपयोगी समस्या—सद्भावनाओं की अभिवृद्धि के लिए हम कोई ठोस आधार क्यों नहीं ढूंढ़ते? उसके लिए ठोस प्रयत्न क्यों नहीं करते?
नये समाज की, सभ्य समाज की, नवयुग की, रचना करने के लिए एक ही प्रक्रिया पूर्ण करनी होगी और वह है—”भाव परिवर्तन”। इसके लिए ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो इस पुण्य प्रक्रिया की महत्ता और श्रेष्ठता को सच्चे मन से अनुभव करें, उसके लिए कुछ समय देने और श्रम करने को भी तत्पर हों।
राष्ट्र के भावनात्मक निर्माण के लिए अनेकों प्रवृत्तियों को अग्रसर करने की आवश्यकता अनुभव होती है। पर लोक-सेवकों के अभाव में वे सबकी सब कागजी कल्पना जैसी बन कर रह जाती हैं। इस युग में निरक्षरता सबसे बड़ा अभिशाप है। आवश्यकता इस बात की है कि देश में एक भी नर-नारी अपढ़ न रहें। यह कार्य सरकारी स्कूलों के द्वारा संभव नहीं। जो लोग दिन भर काम में लगे रहते हैं वे स्कूल कैसे जावें? और यदि वे जाने भी लगें तो इन करोड़ों लोगों को पढ़ाने का खर्च सरकार कहाँ से लावे?
यह कार्य केवल इस प्रकार हो सकता है कि प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति सेवा बुद्धि से कम-से-कम पाँच व्यक्तियों को साक्षर बनाने की प्रतिज्ञा ले। अपने घर वालों में से, पड़ौसियों में से पाँच व्यक्तियों को शिक्षा की उपयोगिता समझा कर उन्हें एक घंटा प्रतिदिन पढ़ने के लिए तैयार कर लेना कुछ कठिन तो अवश्य है पर असंभव नहीं। शिक्षा का महत्व न समझने वाले इसे बेकार की बात समझेंगे, उपहास करेंगे, असमर्थता प्रकट करेंगे और निराशा की बात कहेंगे। पर प्रयत्न करने वाले में यदि कुछ विशेषता हो और वह लगा ही रहे तो अन्ततः उसे सफलता मिलेगी। प्रौढ़ शिक्षा की दिशा में वह भारी काम कर सकेगा।
“अखण्ड ज्योति परिवार” के 30 हजार सदस्य यदि इसी वर्ष यह कार्य आरम्भ कर दें तो सवा लाख व्यक्तियों को वे शिक्षित कर सकते हैं। आगामी दश वर्षों में 15 लाख का शिक्षण इन दिनों जो हम लोग हैं वे ही कर सकते हैं। यदि अपना परिवार बढ़ता रहे और उसका प्रत्येक सदस्य हर वर्ष एक नया शिक्षित व्यक्ति ऐसा और तैयार कर ले जो हमारी ही तरह प्रौढ़ शिक्षा के लिए समय देने लगे तो आगामी दश वर्ष में वह शृंखला चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती हुई साक्षरता की देश व्यापी आवश्यकता को सहज ही पूरा कर सकती है। हम लोग थोड़े से हैं, पर व्रतशील बनकर इस एक कार्य को ही हाथ में ले लें तो प्रौढ़ शिक्षा को पूरी तरह सुनिश्चित रूप से हमारा अपना परिवार ही पूरा कर सकता है। इतनी बड़ी बात का पूरा होना क्या कोई कम महत्व की बात है?
लोक एव विषयालु रंजर्न।
दुःख गर्भमपि मन्यते सुखम्॥
आमिषं बडिश गर्भमप्यहो।
मोहतो ग्रसर्ति यद्वदण्डलः॥
“मछली जैसे माँस के टुकड़े को ही देखती है, उसके नीचे छुपे हुये काँटे पर ध्यान नहीं देती, उसी प्रकार दुनिया के लोग विषयों के बाह्य आकर्षण को ही देखते हैं, विषयों के परिणामस्वरूप अवश्यम्भावी दुःख को नहीं देखते।”
खाद्य समस्या आज की दूसरी समस्या है। जनसंख्या बढ़ती जा रही है और धरती उतना अन्न नहीं उपजाती। फल स्वरूप विदेशों से अन्न मँगाने में हमें परावलम्बी होना पड़ता है और विपुल धन विदेशों को भेजना पड़ता है। कभी ऐसा अवसर या जाय कि युद्ध आदि कारणों से विदेशों से अन्न न मिले तो कैसी बीते? इस दृष्टि से स्वावलम्बी होना हमारे लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। इसे देर तक बिना हल किये नहीं रहा जा सकता।
अन्न का उत्पादन बढ़ाना, शाक भाजी का अधिक उपयोग करना, अन्न को जरा भी बर्बाद न होने देना जरूरी है। साथ ही झूठन छोड़ने और अधिक प्रकार के खाद्यान्न परोसे जाने वाली, अधिक व्यक्तियों को सम्मिलित करने वाली दावतों की प्रथा समाप्त करना भी आवश्यक है। इसलिए व्यापक लोक शिक्षण किया जाना चाहिए। खाली जगहों में, यहाँ तक कि घर के आँगनों में भी जहाँ संभव हो वहाँ शाक भाजी उगाये जाने चाहिए। खाद्य का उत्पादन एक राष्ट्रीय गौरव की बात समझी जाय और हर व्यक्ति इस दिशा में दिलचस्पी लेने लगे, इसके लिए प्रयत्न किया जाय।
एक कार्य बहुत ही सरल यह है कि सप्ताह में कम-से-कम एक समय कुछ न खाने या शाक दूध
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।
जो रहीम दीनहि लखे, दीनबंधु सम होय॥
दिव्य दीनता के रसहिं, का जानै जग अन्धु।
भली विचारी दीनता, दीन बंधु के बंधु॥
ऊँचे पानी न टिकै, नीचे ही ठहराय।
नीचा होय सो भर पिवै, ऊँचा प्यासा जाय॥
सत्त नाम कड़वा लगे, मीठा लागे दाम।
दुविधा में दोऊ गये, माया मिली न राम॥
पर रहने की उपवास प्रक्रिया को प्रचलित किया जाय। आध्यात्मिक, धार्मिक, शारीरिक, मानसिक, राष्ट्रीय हर दृष्टि से यह उपवास आवश्यक है। इस प्रक्रिया के प्रचलित होने से 7 प्रतिशत अन्न की बचत हो सकती है और बिना उत्पादन बढ़े भी सारी समस्या का तत्काल हल निकल सकता है।
कुछ लोग यह उपवास बिलकुल न करेंगे तो कुछ ऐसे भी होंगे जो पूरे दिन का साप्ताहिक उपवास रखेंगे। इस प्रकार यदि यह आन्दोलन जोर पकड़ता है तो न केवल खाद्य समस्या ही हल हो वरन् मनुष्यों में इस बहाने देश भक्ति, जनहित एवं स्वावलम्बन की भावनाएँ भी उमड़ें। उपवास का स्वास्थ्य पर जो आशाजनक प्रभाव पड़ेगा वह लाभ तो और भी अधिक उत्साहवर्धक होगा। सात्विक आहार, मसालों की उपेक्षा, कड़ी भूख लगने पर चबा-चबा कर ही भोजन करना, भगवान के अर्पण करके खाना आदि कितनी ही भोजन संबंधी सत्प्रवृत्तियाँ इसी आन्दोलन के साथ-जोड़ी जा सकती हैं और उनका शारीरिक और मानसिक दृष्टि से आशाजनक सत्परिणाम हो सकता है।
देखा देखी ही तो प्रवृत्तियाँ पनपती हैं। हम 30 हजार व्यक्तियों में से प्रत्येक का परिवार पाँच मनुष्यों का भी हो तो डेढ़ लाख व्यक्ति, कल से ही यह खाद्य बचत का, आहार शुद्धि का व्रत आन्दोलन चला सकते हैं। और प्रयत्न करें तो उसकी प्रेरणा दूसरों को भी देकर इस प्रक्रिया को देशव्यापी बना सकते हैं। निश्चय ही उसका राष्ट्र की खाद्य समस्या पर भारी असर पड़ेगा।
जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए ब्रह्मचर्य को व्यवहारिक बनाने के लिए हम अधिक निष्ठापूर्ण आचरण करें। वासना भड़काने वाले साहित्य, चित्र, फिल्म, दृश्य एवं प्रसंगों का बहिष्कार करें। वानप्रस्थ की परम्परा आरम्भ करें, बाल विवाहों को रोकें, संतति सीमा बन्ध का ध्यान रखें। इस संबंध में परिवार नियोजन विशेषज्ञों का भी परामर्श प्राप्त करें।
छोटे परिवारों का उत्तरदायित्व भी ठीक तरह निवाह सकना आज की स्थिति में कठिन पड़ता है तो उसे अधिक क्यों बढ़ाया जाय? यह विचार-धारा हम लोगों के जीवन में स्थान प्राप्त करे तो स्वास्थ्य सुधरेगा, आयु बढ़ेगी, ब्रह्मचर्य का तेज व्यक्तित्व के विकास में सहायता करेगा और आत्मबल की आशाजनक आम वृद्धि होगी। जन संख्या की बढ़ोतरी रोकने का राष्ट्रीय प्रश्न थोड़ी-सी सावधानी रखने से ही हल हो सकता है।
सामाजिक कुरीतियाँ अन्ध-परम्पराओं के रूप में ही बढ़ती हैं। उनके पीछे विवेक नहीं अनुकरण ही प्रधान होता है। यदि बुरी प्रथाओं के दुष्परिणामों को समझते हुए भी लोग देखा-देखी हानि कारक बातों को अपनाये रहते हैं तो वैसी ही अनुकरणीय आदर्श और उपयोगी परम्पराएँ हम लोग प्रस्तुत करने लगें तो निश्चय ही उनका भारी स्वागत होगा और जनता उन्हें भी एक परम्परा मान कर उत्साहपूर्वक उस मार्ग पर चलने लगेगी।
गायत्री यज्ञ आन्दोलन को आरम्भ करते हुए यज्ञ कार्यों को केवल पंडितों का ही अधिकार न मान कर प्रत्येक गायत्री-उपासक को, महिलाओं को सम्मिलित करने और गुपचुप मन्त्र न पढ़कर सस्वर उच्चारण करने की प्रक्रिया को जन्म दिया था तो आरंभ में उसका थोड़ा विरोध हुआ पर अब वह सब एक परम्परा बन गया। सर्वत्र अब इसी परम्परा को अपनाया जाता है और कोई उसका विरोध नहीं करता। कन्या भोज की प्रथा जोर पकड़ती जाती है और कच्चा भोजन सामूहिक सम्मेलनों में बिना ननुनच के स्वीकार किया जाता है। आरम्भ में जो विरोध था वह समाप्त हुआ। बड़े पैमाने पर जो भी भले-बुरे कार्य होने लगते हैं वे ही एक प्रथा बन जाते हैं। हमारे 30 हजार परिवार आसानी से उपयोगी परम्पराओं को जन्म दे सकते हैं।
दहेज की हत्यारी कुप्रथा का अन्त करने के लिए यदि हमारे 30 हजार परिवार तैयार हो जायें तो आदर्श विचारों का एक नया दौर देश भर में खड़ा हो सकता है। बिना दहेज के, बिना जेवरों के, बिना गाजे बाजे के, बहुत छोटी बरात के, परम सात्विक वातावरण में सम्पन्न होने वाले विवाहों को देखकर जन-मानस की कली खिल पड़ेगी और असंख्यों व्यक्ति उसी का अनुकरण करने लगेंगे। क्या इतना साहस दिखा सकना अपने परिवार के लिए कुछ असंभव कार्य है? हम लोग थोड़ी हिम्मत दिखावें तो आसानी से ऐसी परम्परा चल पड़ सकती है। हिन्दू जाति के मुँह पर लगी हुई एक भारी कलंक कालिमा धुल सकती है और हर सद्गृहस्थ को चिन्ता में जलाने वाली, खून के आँसुओं से रुलाने वाली उस दुष्ट पूतना का अन्त हो सकता है।
जातियों और उपजातियों का जंजाल देश में फूट फैलाने और दहेज जैसी कुप्रथाओं को जन्म देने का प्रधान कारण है। अब समय आ गया है कि जातियाँ न सही तो उपजातियों की संकीर्णता तो समाप्त करने के लिए कदम बढ़ा ही दिया जाय। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-शास्त्रों में इन चार ही जातियों का वर्णन मिलता है। उप-जातियों का जंजाल काट कर रोटी-बेटी का दायरा जाति मात्र में बढ़ा दिया जाय, तो अच्छे लड़के ढूँढ़ने में, अच्छी कन्याएँ प्राप्त करने में भारी सुविधा हो सकती है।
अंतर्गतमलो दुष्टस्तीर्थ स्नान शतैरपि।
न शुष्यति यथा भाण्डं सुराया दहितं चतत्॥
—चाणक्य
“जिसका हृदय द्वेष अथवा विकारों से दूषित है, ऐसा दुष्ट सौ बार तीर्थ स्नान से भी शुद्ध नहीं हो सकता, जैसे मदिरा का पात्र आग में तपाने से भी शुद्ध नहीं होता।”
ब्राह्मणों में करीब 450 ऐसी उपजातियाँ हैं जिनमें परस्पर रोटी-बेटी का व्यवहार नहीं होता। यदि ब्राह्मण मात्र में वह दायरा बढ़ा दिया जाय तो सबको कितनी अधिक सुविधा होगी, उसकी कल्पना प्रत्येक समझदार आसानी से कर सकता है। संकीर्णता भी इससे घटेगी और आत्मीयता का दायरा बढ़ेगा। इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र भी अपना दायरा बढ़ाते हुए एकता की दिशा में बढ़ने का आध्यात्मिक लक्ष पूरा कर सकते हैं।
नशेबाजी और माँसाहार की असुरता का व्यापक प्रसार मनुष्यों की मनोभूमि में दिन-दिन तमोगुण बढ़ाता जा रहा है। दया, करुणा, मैत्री, आत्मीयता, न्याय की मानवीय सत्प्रवृत्तियों से माँसाहार का वैर है। दोनों एक दूसरे के घोर प्रतिकूल हैं। जीभ के स्वाद जैसे अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए जो दूसरों को प्राणान्तक पीड़ा दे सकता है उसमें देवत्व की, मनुष्यता की स्थिरता कैसे रहेगी? माँसाहार, आहार का नहीं, एक नैतिक प्रश्न है। इसे नैतिक स्तर पर ही विचारा जाना चाहिए। अगणित काम ऐसे हैं, जो नैतिक प्रश्न हटा दिया जाय तो वे लाभ-कारक सिद्ध हो सकते हैं। भाई-बहिनों का विवाह होने लगे तो बड़ी आर्थिक सुविधा रहे, पर नैतिक कारणों से हम उसे लाभदायक होते हुए भी स्वीकार नहीं कर सकते। माँसाहार स्वास्थ्य के लिए लाभदायक भी होता हो तो भी इससे उसको नैतिक समर्थन नहीं मिल सकता। उसका परित्याग ही किया जाना चाहिए।
नशेबाजी में केवल हानि ही हानि है, लाभ कुछ नहीं। तमाखू, गाँजा, चरस, भाँग, अफीम, शराब से किसी का कुछ लाभ नहीं होता। हानि अपार है। शरीर खोखला होता है और मन में दुष्प्रवृत्तियाँ उठती हैं। शरीर और मन दोनों क्षेत्रों में नशेबाजी से भारी हानि होती है। धन का अपव्यय इतना अधिक होता है कि यदि उसे रोका जा सके तो वह बचत उत्थान के कार्यों में भारी योगदान दे सकती है। नशा सेवन से उत्पन्न हुई शारीरिक और मानसिक मलीनता मनुष्य के नैतिक जीवन को प्रभावित करती है। भावनाओं का परिवर्तन करने के लिए नशेबाजी को छोड़ना आवश्यक है।
सुधार और निर्माण का आन्दोलन माँसाहार सुधार और नशेबाजी को छोड़ने के साथ सुसंबद्ध है। यदि यह तुच्छ सी बातें भी न छोड़ी जा सकीं तो असत्य, कामुकता, बेईमानी जैसे बड़ी बुराइयाँ कैसे दूर होंगी?
स्वास्थ्य की समस्या का हल करने के लिए, व्यायाम और श्रमशीलता को जन जीवन में प्रधान स्थान मिलना चाहिए। आहार बिहार के सुसंयम का सफाई और नियमितता का प्रयत्न होना चाहिए। आर्थिक कठिनाइयों को सुलझाने के लिए मितव्ययिता और सादगी को अपनाया जाना आवश्यक है। सामाजिक शान्ति के लिए न्याय, समानता, उदारता का आचरण होना चाहिए। इन सत्प्रवृत्तियों को स्थिति के अनुसार हम अपने व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित करने लगें तो निश्चय ही उससे श्रेष्ठ परम्पराओं का जन्म होगा और दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करने लगेंगे।
यही सभी प्रक्रियाएँ युग-निर्माण योजना के अंतर्गत कार्यान्वित की जानी हैं। इसका श्रीगणेश अपने परिवार से होना है। इसलिए जब इस बात की आवश्यकता है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व को समझे, जो सुना और समझा गया है उसे कार्यान्वित करने के लिए कटिबद्ध हो।
बूँद-बूँद जोड़ने से घड़ा भर जाता है, पतले धागे मिलकर मोटा मजबूत रस्सा बनाते हैं। हम सबका सम्मिलित प्रयत्न युग-निर्माण के रूप में परिणित हो सकता है। युग बदल सकता है बशर्ते कि हम स्वयं बदलें। बहुत कुछ हो सकता है बशर्ते कि हम स्वयं भी कुछ करने को तैयार हों। अपने बदलने, सुधरने और करने की अब आवश्यकता है। इस परिवर्तन के साथ ही हमारा समाज, राष्ट्र और संसार बदलेगा। प्रलोभनों और आकर्षणों में अपने आपको घुलाते रहने की अपेक्षा अब हमें आदर्शवाद की प्रतिष्ठापना करने के लिए कष्ट उठाने की भावनाएँ अपने अन्दर उत्पन्न करनी हैं। यही उत्पादन विश्व शान्ति की सुरम्य हरियाली के रूप में दृष्टि-गोचर हो सकेगा।
समाज सेवा का सबसे समीपवर्ती और सबसे सरल कार्यक्षेत्र हमारा परिवार ही हो सकता है। ईश्वर ने जिन प्राणियों के साथ रक्त-संबंध बना कर तथा कर्तव्य और उत्तरदायित्व के बंधनों में बाँध कर परिवार रूप में प्रस्तुत किया है उनकी सेवा करना प्रत्येक दृष्टि से आवश्यक है। यों जितने अधिक मनुष्यों और प्राणियों की सेवा जितनी जिससे बन पड़े उतनी ही उत्तम है। पर कौटुम्बिक उत्तरदायित्व तो अनिवार्य रूप से उठाने ही होते हैं, इनमें उपेक्षा बरतने से जो दुष्परिणाम निकलते हैं, वे धर्म-कर्तव्य, समाज-हित और परिवार संगठन की दृष्टि से बहुत ही विपरीत एवं घातक सिद्ध होते हैं। इसलिए सेवा धर्म की ओर लक्ष रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह कार्य अपने घर से ही आरम्भ करना चाहिए।
यों अपने परिवार के लिए भोजन वस्त्र की व्यवस्था सभी करते हैं। बच्चों की शिक्षा, और विवाह का प्रबन्ध भी सबको करना पड़ता है। दवादारु, मनोरंजन तथा अन्य आवश्यक व्यवस्थाएँ भी समय-समय पर होती रहती हैं। इन कार्यों को गरीब अमीर अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार उपेक्षा या उत्साह से किसी न किसी तरह पूरा करते ही रहते हैं। पर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात छूटी ही रह जाती है और वह है परिवार को संस्कारवान बनाना।
सुसंस्कारों के अभाव में मनुष्य का व्यक्तित्व गिरा हुआ ही बना रहता है। जिसका व्यक्तित्व निम्न श्रेणी का है। वह भले ही धन, विद्या, स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रतिभा आदि की दृष्टि से कितना ही बढ़ा चढ़ा क्यों न हो, निकृष्ट प्रकार का जीवन ही व्यतीत करेगा। उसे न तो स्वयं ही आन्तरिक शान्ति मिलेगी और न उसके संपर्क में रहने वाले सुख पूर्वक निर्वाह कर सकेंगे। दुर्गुणी व्यक्ति समाज के लिए, अपने लिए और परिवार के लिए अभिशाप ही सिद्ध होते हैं। इसलिए परिवार में सद्गुणों की सुसंस्कारिता की अभिवृद्धि करना प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का एक आवश्यक धर्म कर्तव्य माना गया है।
स्कूलों में अध्यापक लोग निर्धारित पाठ्यक्रम पढ़ा सकते हैं पर उनसे चरित्र शिक्षण की आशा करनी चाहिए। क्योंकि चरित्र कहने-सुनने से नहीं सीखा जाता, उसके लिये तो वातावरण एवं अनुकरणीय उदाहरण चाहिए। स्कूलों के अध्यापकों का संपर्क बच्चों से पढ़ाई के निर्धारित घंटों में ही होता है—उनके निजी चरित्र और व्यक्तिगत व्यवहार से सीधा संबंध न होने से छात्र कोई सीधा प्रभाव ग्रहण नहीं करते। बुराई तो कहीं से भी सीखी जा सकती है, पर अच्छाई के लिए अनुकरण की
दोषाः प्रभवन्ति रागिणाँ।
गृहेषु पंचेन्द्रिय निग्रहस्तपः॥
अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते।
निवृत्तरागस्य गृहं तपेवनम्॥
“विषयानुरागी मनुष्य वन में जाकर भी दोषों से मुक्त नहीं हो सकते और संयमी जन घर में रहकर भी इन्द्रिय निग्रह कर लेते हैं। इसलिये शुभ कर्मों में प्रवृत्त होने वाले वीतराग पुरुषों के लिये उनका घर भी तपोवन के सदृश्य है।”
प्रेरणा देने वाले आदर्शों की आवश्यकता होती है। अभ्यास में अच्छाइयाँ तब आती हैं जब प्रभावित करने के लिए वैसा वातावरण भी प्रस्तुत हो। इस प्रकार की व्यवस्था घर में रहे तो ही यह संभव है कि बच्चों पर जीवन की श्रेष्ठता के ढाँचे में ढालने वाली छाप पड़े।
परिवार की सबसे बड़ी सेवा एक ही हो सकती है कि घर के हर व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न किया जाय। जिस प्रकार अपनी त्रुटियों और बुराइयों को घटाने और हटाने की उपयोगिता है। उसी प्रकार “परिवार-शरीर” के प्रत्येक अंग को-प्रत्येक परिजन को सुधरा हुआ एवं सुसंस्कृत बनाना आवश्यक है। यह कार्य दूसरे लोग नहीं कर सकते, स्वयं किये बिना यह उद्देश्य पूरा नहीं होगा। क्योंकि घर वालों पर जितना अपना प्रभाव एवं अपनत्व है उतना दूसरों का नहीं हो सकता, घर के प्रभावशाली व्यक्तियों को ही यह कार्य अपने हाथ में लेना चाहिए।
डाँटने-फटकारने, व भला-बुरा कहने, दोषारोपण एवं झुँझलाहट से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं
आरम्भ गुर्वी क्षयिणी क्रमेण।
लध्वी पुरा बुद्धिमती च पश्चात्॥
दिनस्य पूर्वार्धं परार्ध्यं भिन्ना।
छायेव मैत्री खल सज्जनानाम्॥
—पंच तंत्र
“दुष्टों की मित्रता सूर्योदय के समय की तरह आरम्भ में लंबी चौड़ी होती है फिर क्रमशः घटती चली जाती है और सज्जनों की मित्रता दोपहर के पश्चात् की छाया के समान पहले छोटी होती है और फिर क्रमशः बढ़ती जाती है।
होता। जिस प्रकार अपने ऊपर झुँझलाकर या लम्बी चौड़ी योजना बनाकर एक दिन में अपना सुधार नहीं हो सकता, उसी प्रकार परिवार की बहुत दिन की जमी हुई भली-बुरी स्थिति उतावली में नहीं बदली जा सकती। बन्दर को तमाशा करना सिखाने वाले कलन्दर जिस धैर्य, अध्यवसाय और सतत प्रयत्न से काम लेते हैं वही रास्ता हमें भी अपनाना पड़ेगा। तोड़-फोड़ सरल होती है पर निर्माण कार्य कठिन है। मनुष्य की योग्यता और प्रतिभा उसकी रचना शक्ति को देखकर ही आँकी जाती है। परिवार के निर्माण में बड़ी चतुरता, कुशलता, धैर्य, प्रेम, सहिष्णुता एवं आत्मीयता से काम लेना होता है। समय-समय पर साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनानी पड़ती है, तब कहीं शनैः-शनैः अभीष्ट परिणाम सामने आता है।
इसके लिए घरेलू पाठशाला एवं सत्संग गोष्ठी के रूप में दैनिक शिक्षण क्रम का एक कार्यक्रम निर्धारित करना चाहिए। सुविधा के समय परिवार के सब लोग मिल जुल कर बैठा करें और प्रेरणाप्रद प्रसंगों को लेकर वार्तालाप किया करें। दैनिक समाचार पत्रों में छपने वाली कुछ भली या बुरी खबरों को लेकर उनकी आलोचना इस ढंग से की जा सकती है कि सुनने वालों पर भलाई के प्रति निष्ठा और बुराई के प्रति घृणा भाव पैदा हो। नई खबरें सुनने की सबकी इच्छा रहती है। आकर्षक, मनोरंजक और विवेचनात्मक ढंग से खबरें सुनाने का कार्य घर के सभी लोग पसंद करेंगे। उनका मनोरंजन भी होगा शिक्षा भी मिलेगी। इसी प्रकार महापुरुषों के जीवन चरित्रों के कोई अंश, व्रत पर्वों के इतिहास, पौराणिक उपाख्यान, कथा-गाथाएँ कहने का कार्यक्रम चलाया जाता रहे तो घर में सबका मनोरंजन भी होगा और अप्रत्यक्ष रूप में वे सब शिक्षाएँ भी मिलने लगेंगी जो परिजनों को सुसंस्कृत बनाने के लिए आवश्यक हैं।
कभी-कभी घर की समस्याओं पर विचार विनिमय भी करते रहना चाहिए। किसे क्या कठिनाई और क्या शिकायत है इसकी जानकारी परस्पर सब लोग रखे रहें और उसका हल खोजते रहें तो निश्चय ही वे बढ़ेंगी नहीं, घटेंगी ही। कड़ा प्रतिबंध लगा कर व्यक्तित्व की स्वतंत्रता को एक दम अवरुद्ध कर देना तो ठीक नहीं, पर प्रयत्न यह करना चाहिए कि सब लोग अपनी भूलों के समझने और सुधारने को आवश्यकता अनुभव करने लगें।
“अखण्ड-ज्योति” के लेखों को पढ़कर सब लोगों को सुनाना, परिवार-निर्माण की दृष्टि से बहुत उपयोगी हो सकता है। उस उद्देश्य के लिए जो कुछ कहना समझाना आवश्यक है वह सब कुछ अब इस पत्रिका के पृष्ठों पर रहा करेगा, युग-निर्माण के संदेशवाहक के रूप में यदि इन लेखों को सुनाया जायगा तो सुनाने वाले को उपदेशक बनने का व्यय भी न सहना पड़ेगा और अभीष्ट उद्देश्य भी पूरा होता रहेगा।
अशिक्षा के विरुद्ध व्यापक अभियान आरम्भ करने की जो अपनी योजना है, उसका आरंभ अपनी घरेलू ज्ञान-गोष्ठी ही से हमें आरम्भ करना चाहिए। घर में जो बिना पढ़े हैं उन्हें पढ़ाना चाहिए। प्रयत्न यह करना चाहिए कि कोई भी निरक्षर न रहे। निरक्षरता मानव-जीवन का एक कलंक है। इस कलंक से अपने घर के सभी सदस्यों को मुक्त कर लेना चाहिए। “अखण्ड-ज्योति” का एक भी सदस्य ऐसा न हो जिसकी स्त्री बिना पढ़ी रह जाय। घूँघट और संकोच की मूर्खता को इस पुनीत कार्य में जरा भी आड़े नहीं आने देना चाहिए। घर के बड़े-बूढ़ों को इस कार्य में अपनी सहमति देने के लिए रजामंद करना चाहिए। एकान्त समय में तो उनकी बिना सहमति के भी शिक्षण चल सकता है। जो स्त्रियाँ बड़ी आयु की हो चुकीं या जिन घरों में पर्दा नहीं होता वहाँ तो यह कठिनाई भी नहीं आती। कई बार बड़ी आयु की स्त्रियाँ इसे व्यर्थ समझती हैं, कहती हैं “हमें कोई नौकरी थोड़े ही करनी है जो पढ़ें।” उन्हें समझाना चाहिए कि पढ़ना, ज्ञान के नेत्र खोलने के लिए होता है, नौकरी के लिए नहीं। शिक्षा की उपयोगिता समझा कर तरुण, अधेड़ और बूढ़ों को भी इस कार्य के लिए तैयार किया जा सकता है। यदि अपना स्वभाव मधुर और उत्साह पक्का है तो आज नहीं तो कल, घर के निरक्षर लोग साक्षर बनने को उद्यत हो ही जावेंगे।
सामूहिक अथवा व्यक्तिगत रूप में ईश्वर उपासना, (2) शरीर और वस्त्रों की सफाई (3) वस्तुओं को यथास्थान सुव्यवस्थित रूप से रखना (4) बड़ों को नित्य अभिवादन करना, माता पिता एवं वृद्धों के चरण छूना (5) शृंगार एवं विलासिता के उपकरणों को छोड़कर सादगी अपनाना (6) रात को जल्दी सोना और प्रातः जल्दी उठना (7) निर्धारित दिनचर्या बना कर निरन्तर व्यस्त रहना, आलस्य को पास भी न फटकने देना (8) गाली देना या ‘तू’ का संबोधन तथा कटु भाषण छोड़कर मधुर वाणी से विनम्र संभाषण करना (9) आमदनी और खर्च का लिखित हिसाब रखना (10) टूटी-फूटी वस्तुओं की मरम्मत करके उन्हें पूर्ण निरुपयोगी होने तक काम में लेना (11) भोजन को सात्विक रखना, आहार संबंधी नियमों का पालन करना और भगवान को भोग लगाकर खाना (12) श्रम एवं व्यायाम की व्यवस्था रखना (13) हँसमुख
दानेन तुल्यो निबिरस्ति नान्यो।
लोभाच्य नान्योस्ति परः पृथिव्याम्॥
विभूषणं शीलसमं न चान्यत्संतोष।
तुल्यं वनमस्ति नान्यतृ ॥
—पंच तंत्र
“दान के समान दूसरी कोई निधि नहीं है, लोभ के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है, शील के समान दूसरा भूषण नहीं है, और संतोष के समान अन्य कोई धन नहीं है।”
रहना (14) एक दूसरे की सुविधा तथा सम्मान का ध्यान रखना, (15) आगन्तुकों के साथ शिष्टाचार बरतना (16) सद्विचारों का पढ़ना सुनना आदि कितनी ही अच्छाइयाँ ऐसी हैं जिनका प्रवेश प्रत्येक परिवार में होना ही चाहिए। घर के वातावरण में जितना प्रेम, सौजन्य रहेगा, श्रम, सादगी और भावनात्मक उत्साह को स्थान मिलेगा उतना ही वहाँ उत्कर्ष एवं उल्लास दृष्टि-गोचर होने लगेगा।
इस रचनात्मक सुधार कार्यों के लिए मौखिक प्रदेश ही पर्याप्त न होगा वरन् यह प्रयत्न भी करते रहना पड़ेगा कि घर के अन्य सदस्यों का सहयोग प्राप्त कर इन कार्यक्रमों को व्यवहारिक रूप मिले। सब लोग न सही-आरंभ में थोड़े सदस्य भी इस प्रकार आचरण करने लगें, तो शेष पर भी देर-सवेर में प्रभाव पड़ेगा और वे भी इन अच्छाइयों को अपनाने के लिए विवश होंगे।
परिवार को सभ्य, सुशिक्षित, सच्चरित्र एवं विवेकशील बनाने के लिए प्रयत्न करना प्रत्येक विचारवान् मनुष्य का आवश्यक धर्म कर्तव्य है। उसे पूरा करने से हम अपना उत्तरदायित्व पूरा करते हैं, समाज को सुसंस्कृत बनाने में भारी योगदान देते हैं और अपने बगीचे के सुविकसित होने से स्वयं भी लाभान्वित होते हैं। युग-निर्माण के लिए परिवार-निर्माण आवश्यक है। इसके लिए हमें ध्यान भी देना चाहिए और समय भी।
देव, दानव और मनुष्यों की श्रेणी में बैठे हुए मानव प्राणी परस्पर लड़ते-झगड़ते रहते और धरती को खून से लाल करते रहते।
दुखी होकर धरती माता प्रजापति के पास पहुँची और अपनी दुख गाथा कह सुनाई। पुत्रों का रक्त बहते देखकर माता का दुखी होना स्वाभाविक भी था।
ब्रह्मा जी ने तीनों बच्चों को बुलाया और कहा इस प्रकार लड़ते झगड़ते रहने से तुम संसार को नरक बना दोगे और स्वयं भी नष्ट हो जाओगे।
अपराधी की तरह तीनों बालक शिर झुकाए खड़े थे। उनने पूछा—पितामह, कोई ऐसी शिक्षा दीजिए जिस पर चलते हुए हम कलह से बचें और शान्ति तथा सुविधा प्राप्त करें।
ब्रह्मा जी गंभीर हो गये, उन्होंने पूरे मनोयोग से शान्ति की शिक्षा का एक ही बीज-मंत्र बोला—’द’ ‘द’, ‘द”। तीनों लड़के गंभीरता पूर्वक उसका अर्थ समझने और व्याख्या करने में लग गये।
सोच विचार बहुत देर होता रहा तो स्तब्धता को भंग करते हुए प्रजापति ने बच्चों से पूछा—हमारी सूत्र शिक्षा का क्या अर्थ समझे?
देवता ने कहा—द अर्थात् दान। जिसके पास सुख साधन मौजूद हैं उन्हें उनका उपभोग अपने ही लिए नहीं करना चाहिए। वरन् दूसरे अभावग्रस्तों को अपनी कमाई देकर आन्तरिक आनन्द प्राप्त करना चाहिए।
अब मनुष्य की बारी आई। प्रजापति के प्रश्न का उत्तर देते हुए उसने कहा—द अर्थात् दमन। अन्तःकरण में वासना और तृष्णा के जो तूफान उठते रहते हैं उन्हें दमन करना, षडरिपुओं को परास्त करना, पौरुष और प्रयत्न में संलग्न रहना आलस को दबाना। यही मैंने समझा है। मनुष्य का कल्याण इसी में दीखता है।
असुर ने अपनी अभिव्यक्ति बताते हुए कहा—द का अर्थ है दया! दुष्टता निर्दयी ही कर सकता है। जिसे दूसरों के कष्ट अपने कष्टों के समान चुभेंगे वह किसी को सताने की असुरता से बचेगा।
ब्रह्मा जी ने स्वीकृति से शिर हिलाया और कहा यही मेरी शिक्षा का साराँश है जो तुमने समझा है। अपने दोषों को ढूंढ़ने, समझने और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करते रहने पर ही तुम शान्तिपूर्वक जीवन यापन कर सकोगे।
इस धर्म शिक्षा का साराँश जानते तो सब हैं पर भेद है कि मानने वाले कोई विरले ही निकलते हैं। ब्रह्मा जी की शान्ति आज भी सबके सामने प्रस्तुत है, यदि इस पर चला जा सके तो आनन्दमय जीवन में कोई अड़चन न रहे।
मधु संचय
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(संकलित)
कब जाना शलभ बिचारे न जलना उसकी नादानी है,
शबनम का कतरा क्या जाने वह मोती है या पानी है।
कंटक में कलियाँ पलीं चटखकर फूल बनी अलि मँडराया,
ये क्या जाने अलि तब तक है जब तक यह खिली जवानी है।
जो देने में ही सुख पाते प्रतिदान नहीं माँगा करते,
जिनको विश्वास अडिग निजपर वरदान नहीं माँगा करते॥
जिन पर सागर को गर्व वही लहरें अपहृत हो जाती हैं,
बन मेघ श्याम अम्बर के नीले आँगन में छा जाती हैं।
सागर का प्रेम अगाव विकल हो आवाहन करता जाता,
थे सजल घटायें सावन बन, धरती पर चू-चू जाती हैं।
जिनको वसुधा से प्रेम स्वर्ग का दान नहीं माँगा करते,
जिनको विश्वास अडिग निजपर वरदान नहीं माँगा करते॥
—भोलानाथ ‘बिम्ब’
यह जिन्दगी है एक यज्ञ
जिस में हमें है होम देना,
जिन्दगी है सतत चलना
जिन्दगी है सतत जलना।
भूल जायें हम कि चलना
भूल जायें हम कि बढ़ना।
तो मरण में जिन्दगी में फर्क क्या है?
लौ नहीं यदि उठ रही हो दीप का फिर मूल्य क्या है?
लौ नहीं यदि उठ रहीं हो दीप का फिर मूल्य क्या है?
—महेश सन्तोषी
केवल नारी नहीं सुनो हम साथी हैं, भगिनी माँ हैं।
नहीं वासना का साधन हैं, हम ममता हैं, गरिमा हैं।
आँचल में जीवन धारा है, कर में आतुर राखी है।
मस्तक पर सिन्दूर बिन्दू, अनुराग त्याग की सीमा है।
हैं गृहिणी, सहषर्म चारिणी, कुल दीपक की बाती हैं।
आज हमारा रूप प्रदर्शन करते तुम बाजारों में,
लगा रहे हो चित्र हमारे गली गली दीवारों में,
तुम राखी का मूल्य चुकाते बहनों को अपमानित कर,
गृह लक्ष्मी का चित्रण करते विज्ञापन बाजारों में।
देख तुम्हारी कुरुचि लाज से धरती में गड़ जाती हम।
—गंगारानी वर्मा
परोपकार-हीन व्यक्ति भूमि हेतु भार है,
किसी बड़े विचारवान का बड़ा विचार है—
कि जो परोपकार-लीन है तथा उदार है,
वही महान है, वही बड़ा सभी प्रकार है,
बड़े बनो, बनो न किन्तु भूमि भार के लिए?
मनुष्य का शरीर है—परोपकार के लिए॥
तमाम भूमि लोक आज रोग शोक से भरा,
कुभावना मिटा रही मनुष्य की परम्परा,
समाज के बचाव का रहा न और आसरा,
पुकारती तुम्हें अधीरता भरी वसुन्धरा,
सहायता करो, व्यथाभरी पुकार के लिए।
मनुष्य का शरीर है-परोपकार के लिए॥
—श्री ‘राजेश’
तुम देकर शाप चले जाना,
मैं अगर आदमी हूँ, वरदान बना लूँगा।
फट सकता ज्वालामुखी तुम्हारे अन्तर का,
सम्भव है समझो तुम अभिनय अभिनन्दन
हो सकता मेरे दिवस, फिरे तुम आशिष दो
मजबूरी से बँध कर पूजा के बन्धन में,
इसीलिए न मैं कदमों में शीश झुकाऊँगा।
बन सकता कभी न गुञ्जन मैं इस नन्दन में,
चाहे जो लाख भुजंग भले विष लिपटायें
लग सकता नहीं कलंक भलारे? चन्दन में?
तुम बनकर, प्रिय पाषाण भुवन में खोजना
मैं अगर पुजारी हूँ भगवान बना लूँगा॥
—चतुरीसिंह निर्मल
जिस प्रकार स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म प्राण की शक्ति अधिक मानी जाती है उसी प्रकार स्थूल यज्ञों की अपेक्षा सूक्ष्म यज्ञ की महत्ता असंख्य गुनी अधिक होती हैं। घी, सामग्री, समिधा आदि के द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञ ‘स्थूल’ कहलाते हैं और ज्ञान-यज्ञ को ‘सूक्ष्म’ कहा गया है। यों स्थूल यज्ञों की महिमा भी कम नहीं है, पर ज्ञान यज्ञ तो सर्वोपरि है। गीता में भगवान ने कहा है कि ज्ञान से बढ़कर इस संसार में पवित्र और कुछ नहीं। निस्संदेह आत्मा को प्रकाश से परिपूर्ण बनाने के लिए ज्ञान ही एक मात्र आधार होता है। अज्ञान को ही माया एवं भव बन्धन के नाम से पुकारते हैं और ज्ञान को मुक्ति का आधार माना गया है।
केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्वला
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजा।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता वार्यते,
क्षीयन्तेऽखिल भूषणानि सतत बाग्भूषणं भूषणम्॥
—भर्तृहरि
“बाजूबन्द अथवा चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार मनुष्य को विभूषित नहीं करते, न स्नान से, न सुगन्धित उबटन से, न फूलों से और न सँवारे हुये केशों से उसकी शोभा वृद्धि होती है। एक मात्र संस्कारित वाणी ही मनुष्य का सच्चा आभूषण है जिसके सन्मुख अन्य सब आभूषण फीके पड़ जाते हैं।”
स्कूली पढ़ाई जिसमें गणित, भूगोल, इतिहास, साहित्य आदि की जानकारी कराई जाती है शिक्षा कहलाती है और जीवन का स्वरूप-उसका लक्ष, कर्तव्य एवं दृष्टिकोण निर्धारित करने संबंधी विवेचना को ‘ज्ञान’ कहते हैं। ज्ञान को ही अमृत कहते हैं। आत्मा का स्वरूप समझ कर तदनुरूप गतिविधियाँ अपनाने से मनुष्य महापुरुष ऋषि, दृष्टा और अवतार बन जाता है। आत्मोत्कर्ष की सीढ़ी ज्ञात ही तो है।
ज्ञान की आराधना इस विश्व का सबसे श्रेष्ठ सत्कर्म है। इसीलिए ब्रह्म-दान एवं ब्रह्म-भोज की महत्ता अत्यधिक मानी जाती है। अन्न से शरीर की भूख बुझती है, ज्ञान की आत्मा की क्षुधा शान्त की जाती है, अन्न से शरीर पुष्ट होता है और ज्ञान से आत्मबल बढ़ता है। इसलिए अन्न, वस्त्र, आदि के दानों की अपेक्षा ज्ञान-दान का पुण्य असंख्यों गुना अधिक माना गया है। अन्न आदि के दान का प्रतिफल जीव को अन्य योनियों में भी मिल सकता है। अच्छा भोजन तो पशु पक्षी भी कर लेते हैं, पर ज्ञान का प्रतिफल मनुष्य योनि में ही प्राप्त हो सकता है, इस लिए ज्ञान-दान करने वालों को अपने पुण्यों का प्रतिफल इसी रूप में प्राप्त करने के लिए मनुष्य योनि में ही अगला जन्म लेने का अधिकार तो मिल ही जाता है।
अन्न, जल, धन आदि से शरीर की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। कुछ समय के लिए शारीरिक असुविधाएँ ही दूर होती हैं, इसलिए उनका पुण्य फल भी उतना ही सीमित माना गया है। ज्ञान-दान से आत्मविकास होता है, तथा संसार में प्रेम, पुण्य, शान्ति और समृद्धि की बढ़ोत्तरी होने की व्यवस्था बनती है। इतने महत्वपूर्ण कार्य का प्रतिफल भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। इसीलिए सब दानों से ‘ब्रह्मा दान’ की गरिमा अधिक है। सब दानियों में ब्रह्मदानी की अधिक प्रशंसा होती है। ब्राह्मण लोग निर्धन होते हुए भी निरन्तर ब्रह्मदान में लगे रहने के कारण ‘भूसुर’—पृथ्वी के देवता—जैसी गौरवास्पद पदवी प्राप्त करते थे। इस ब्रह्मकर्म में रत रहने वाले ब्राह्मणों को भोजन कराने का भी पुण्य इसीलिए था कि उस अन्न से निर्वाह होने पर वे शरीर से अधिक ब्रह्म-कर्म कर सकते थे ब्रह्म-का अर्थ ‘ज्ञान’ भी है। ज्ञान की उपासना ‘ब्रह्म’ की उपासना के रूप में ही की जाती है। आत्मा में ज्ञान का प्रकार बन कर ही ब्रह्म का अवतरण होता है।
जिस प्रकार दैनिक जीवन में लौकिक और पारलौकिक दृष्टि से हम अनेकों कार्य नियमित रूप से करते हैं उसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ के लिए भी कुछ समय निर्धारित करना चाहिए। उत्कृष्ट जीवन के लिए प्रेरणा देने वाले सद्ज्ञान को स्वयं पढ़ना समझना और मनन चिन्तन करना आत्म कल्याण की दृष्टि से आवश्यक है। सद्भावनाओं की शिक्षा दूसरों को देना परोपकार की सबसे पुनीत प्रक्रिया है। इन दोनों का समावेश ज्ञान यज्ञ में होता है। प्रेरणाप्रद सद् विचारों की सम्पत्ति अपने लिए जमा करना और उस श्रेय-साधन से दूसरों को लाभान्वित बनाना इतना श्रेष्ठ सत्कर्म है कि उसकी तुलना और किसी शुभ कार्य से नहीं हो सकती। ज्ञान यज्ञ की तुलना में अन्य सब यज्ञ तुच्छ ही माने जा सकते हैं।
ज्ञान-यज्ञ में समय-रूपी घृत की आहुतियाँ देनी पड़ती हैं। जिस प्रकार बिना घृत होमे अग्निहोत्र सम्पन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार समय-दान दिये बिना कोई ज्ञान-यज्ञ का होता भी नहीं हो सकता। अग्निहोत्र में कुछ न कुछ धन खर्च करना ही पड़ता है उसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ में समय लगाये बिना काम नहीं चल सकता। फुरसत न मिलने का बहाना करके इस सत्कर्म के लाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। स्वाध्याय के लिए, मनन चिन्तन के लिए कोई तो समय चाहिए ही। दूसरों को प्रेरणा देने के लिए उनके पास जाना, बैठना, चर्चा करना समय लगाने पर ही संभव होगा। इसलिए शरीर के लिए, कमाने-खाने की ही तरह ही आत्मा के लिए ज्ञान यज्ञ में कुछ समय लगाना भी हमें आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझना चाहिए।
फुरसत न मिलने का शाब्दिक अर्थ कुछ भी हो, वास्तविक अर्थ यह है कि उस कार्य को दूसरे कर्मों की अपेक्षा कम महत्व का समझा गया है। जो काम जरूरी प्रतीत होता है उसे अन्य सब काम छोड़ कर प्राथमिकता दी जाती है। बच्चा बीमार हो जाय, मुकदमे की तारीख हो, या व्यापार संबंधी कोई जरूरी काम आ जाय तो अन्य कामों को छोड़ कर भी पहले उसे करते हैं। शरीर में रोग उठ खड़ा हो तो सबसे पहले उसी की चिन्ता करते हैं। जो सबसे जरूरी काम समझा जाता है उसके लिए सबसे अधिक समय दिया जाता है जो अनावश्यक, महत्वहीन और उपेक्षणीय समझे जाते हैं। ज्ञान-या की पुण्य-प्रक्रिया को उतना महत्वहीन न समझा जाना चाहिए कि फुरसत न मिलने का बहाना बना कर उससे पिण्ड छुड़ाने का उपक्रम करना पड़े। स्नान, भोजन, शयन, नित्यकर्म जैसे आवश्यक कार्यों में ही हमें इस पुण्य-प्रक्रिया को भी अपने दैनिक कार्यों में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करना चाहिए।
अन्य शुभ कार्य धन देने से भी हो सकते हैं। धर्मशाला, मंदिर, कुआँ, तालाब, सदावर्त, प्याऊ,
भोगे रोग भयं कुले च्युत भयं वित्तेनुषालाद् भयं,
माने दैन्यभयं बले रिपुमय रुपे जरायाँ भयम्।
शास्त्रे बादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं,
सर्ववस्तु भयावहं भुवि नृणाँ वैराग्य मेवाभयम्॥
—भर्तृहरि
“भोगों में रोग का भय है, ऊँचे कुल में पतन का भय है, धन में राज का, मान में गरीबी का, बल में शत्रु का तथा रूप में वृद्धावस्था का भय है। शास्त्र में वादविवाद का, गुण में दुष्ट व्यक्तियों का तथा शरीर में काल का भय है। इस प्रकार संसार में मनुष्यों के लिए सभी वस्तुएँ भयपूर्ण हैं, भय से रहित तो केवल वैराग्य ही हैं।”
कथा, पाठ आदि के आयोजन पैसा खर्च करने से बिना समय लगाये भी हो सकते हैं, पर कुछ काम ऐसे हैं जिनके लिए स्वयं ही कष्ट उठाना पड़ता है। अपने मुँह से खाये बिना पेट नहीं भरेगा, स्वयं पढ़े बिना विद्या नहीं आवेगी, स्वास्थ्य सुधारने के लिए आप ही व्यायाम करना पड़ता है। यह कार्य दूसरों से नहीं कराये जा सकते। इसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ के लिए अपनी अभिरुचि, अपनी श्रद्धा, अपना श्रम, अपना समय लगाना आवश्यक है।
दानामिज्या तपःशौचं तीर्थसेवा श्रुतं तथा।
पर्वाज्येतान्य तीर्थानि यदि भावों न निर्मलः॥
निगृही तेन्द्रियग्रामों यत्रैव च बसेन्नरः।
तत्र तस्य कुरुक्षेत्र नैमिषं पुष्कराणि च॥
—महर्षि अगस्त्य
“मन का भाव यदि शुद्ध न हो तो दान, यज्ञ, तप, शौच तीर्थ सेवन, शास्त्र श्रवण एवं स्वाध्याय ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं। पर जिस व्यक्ति ने अपनी इन्द्रियों को-वासनाओं को वश में कर लिया है, वह जहाँ कहीं निवास करता है, वहीं उसके लिये कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर आदि तीर्थ हो जाते हैं।”
युग-निर्माण की—आत्म-निर्माण की पुण्य-प्रक्रिया का श्रीगणेश हमें आज से ही, अभी से ही आरम्भ करना चाहिए। इसका प्रथम चरण है ज्ञान-यज्ञ का आयोजन। भोजन की तरह ही सद्विचारों की धारणा को एक अनिवार्य आध्यात्मिक आवश्यकता समझा जाय और उसकी उपेक्षा किसी भी बहानेबाजी का सहारा लेकर न की जाय। यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि समय का उपयोग पेट के धंधे करते रहने में ही नहीं है। भौतिक सम्पत्ति से सद्ज्ञान की दैवी-सम्पत्ति का महत्व तनिक भी कम नहीं है। पैसे की कमाई ही दौलत नहीं कहलाती। सच्ची दौलत तो आन्तरिक सद्वृत्तियों का बढ़ना ही है। नश्वर सम्पत्ति की तुलना में शाश्वत विभूतियों का मूल्यांकन कम नहीं किया जाना चाहिए।
अपने आपको सद्विचारों की दैवी-सम्पत्ति से समृद्ध बनाने के लिए, अपने परिवार को सुसंस्कृत एवं सुविकसित बनाने के लिए, समाज में सभ्यता, सदाचार, विवेकशीलता जागृत करके स्नेह और सदाचार का वातावरण उत्पन्न करने के लिए एक ही उपाय हो सकता है और वह है-”सद्भावनाओं की वृद्धि।” जिस प्रकार प्रयत्न करने से खेतों और कारखानों में पैदावार पढ़ाई जा सकती है उसी प्रकार मनुष्यों के मस्तिष्कों और अन्तःकरणों में भी सद्विचारों और सद्भावों का उत्पादन विशाल परिमाण में किया जा सकता है। सच्ची लगन वाले मनुष्य निष्ठापूर्वक इस कार्य को अपने हाथ में लें तो आज की स्थिति बदल सकती है और स्वार्थ-परता का शुष्क श्मशान परमार्थ की सुरम्य हरियाली से भरा उद्यान बन सकता है।
ज्ञान-यज्ञ का आयोजन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए होना चाहिए। सर्वश्रेष्ठ सत्कर्म के रूप में हममें से प्रत्येक को इसे एक अत्यन्त आवश्यक धर्म कर्तव्य के रूप में अपनाना चाहिए। ‘अखण्ड ज्योति” के प्रत्येक सदस्य को ज्ञान-यज्ञ का होता बनना चाहिए। कुछ नियत निर्धारित समय नियमित रूप से हमें इस कार्य के लिए निकालना ही चाहिए और उसका उपयोग अपने प्रभाव क्षेत्र में सद्भावनाएं उत्पन्न करने के लिए करना चाहिए। युगारंभ का श्रीगणेश हमारे इसी शुभ संकल्प के साथ होना चाहिए। प्रत्येक सत्कार्य के आरंभ में जिस प्रकार हवन-पूजन आवश्यक होता है, युग-परिवर्तन का शुभारंभ करते हुए हम ज्ञान-यज्ञ का आयोजन करें और उसमें सक्रिय रूप से भाग लें तो ही काम चलेगा।
जिस प्रकार आक्रमणकारी चीन से निपटने के लिए हम अपने सैन्य साधन तेजी से बढ़ाने में संलग्न है जिस प्रकार गरीबी और अशिक्षा को दूर करने के लिए देश में अनेकों प्रवृत्तियाँ चल रही हैं उसी प्रकार सद्भावनाओं का अकाल दूर करने के लिए विशाल परिमाण में यह प्रयत्न करना होगा कि जन-मानस में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद के लिए उत्साह उत्पन्न हो, लोग उसका महत्व समझें और इस दिशा में अग्रसर होने के लिए आवश्यक धैर्य और शौर्य की वृत्ति को परिपक्व बनावें।
जिस प्रकार कृषि का एक बड़ा फार्म बनाने के लिए विशिष्ट उपकरणों की आवश्यकता होती है, जिस प्रकार कोई बड़ा कारखाना या मिल लगाने के लिए अनेकों यंत्र एवं उपकरण अभीष्ट होते हैं इसी प्रकार सद्भावनाओं का उत्पादन विशाल परिमाण में करने के लिए बड़े उपकरणों की आवश्यकता होगी। यह उपकरण हो सकते हैं वे व्यक्ति जो अपने साथ कुछ जन्मजात सुसंस्कार लेकर जन्मे हों। मजबूत लोहे की बनी हुई मशीनें ही देर तक ठीक काम कर सकती हैं। कच्चे लोहे से बने हुए यन्त्र या पुर्जे थोड़ा-सा दबाव पड़ने पर बिगड़ जाते हैं। तत्काल उत्साह देकर या आवेश उत्पन्न करके किसी से तत्काल कुछ सत्कर्म कराया तो जा सकता है पर मनोभूमि की कच्चाई के कारण वह उत्साह देर तक ठहरता नहीं, आवेश ठण्डा होते ही लोग पुनः अपने पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं।
दृढ़ चरित्र, दृढ़ प्रतिज्ञ और प्रकाशवान् व्यक्तित्व ही युग-निर्माण का उद्देश्य पूर्ण कर सकते हैं, अब उन्हीं को ढूँढ़ा और पकाया जाना चाहिए। प्रारंभिक प्रयत्न यह होना चाहिए कि जिन लोगों में, धैर्य नीति के सदाचार के बीजाँकुर किसी रूप में उगे हुए दिखाई पड़ें पहले उन्हें प्रभावित किया जाय। खाद और पानी पाकर मुरझाये हुए पौधे भी हरे भरे होते और तेजी से बढ़ते हैं। जिनमें थोड़ी भी अभिरुचि सत्प्रवृत्तियों की ओर है उन्हें यदि सत्संग का खाद और स्वाध्याय का पानी मिलने लगे तो वे अवश्य ही सुविकसित होंगे।
युग निर्माण की प्रौढ़ विचार धारा वर्षा के जल के समान उपयोगी सिद्ध होती है। हम लोग अपने छोटे-छोटे व्यक्तित्वों के द्वारा भी उन नव विकसित अंकुरों के लिए खाद की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। विद्वानों और दिग्गजों से शास्त्रार्थ करने की शक्ति भले ही न हो पर अभिनव बीजाँकुरों को प्रेरणा देने के लिए कोई भी ईमानदार और भावनाशील व्यक्ति कुछ न कुछ प्रेरणा देने वाला मार्ग दर्शन अवश्य कर सकता है। देखना यह चाहिए कि हमारे परिवार, पड़ौस में, स्वजन सहयोगियों में और परिचित प्रियजनों में कौन-कौन व्यक्ति ऐसे हैं जिनके गुण-कर्म-स्वभाव में सज्जनता और विचारशीलता का अंश समुचित मात्रा में विद्यमान है। जो लोग ऐसे दीख पड़े उनके नाम नोट कर लेने
लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीड्यन्।
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः॥
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमा सादयेद्।
न तु प्रतिनिविष्टमूर्ख जन चित्तमाराधर्यत॥
—भर्तृहरि
“यत्नपूर्वक पेरने से कदाचित बालू में से तेल निकल आवे, मृग तृष्णा से प्यास बुझ जाय, ढूँढ़ने से खरगोश का सींग मिल जाय—चाहे ये सब असंभव कार्य किसी प्रकार संभव हो जायें, परन्तु मूर्ख का मन जिस तरफ झुक गया है उसे हटा सकना किसी प्रकार संभव नहीं।”
चाहिए और उन्हें प्रेरणा देने का कार्य अपने जिम्मे ले लेना चाहिए।
सत्साहित्य पढ़ने में रुचि उत्पन्न करना पहला काम है। आमतौर से लोग आत्मनिर्माण जैसे रूखे
माँगन मरन समान है, मत कोई माँगों भीख।
माँगन ते मरना भला, यह सत गुरु की सीख॥
जल ज्यों प्यारा माछरी, लोभी प्यारा दाम।
माता प्यारा बालका, भक्त पियारा राम॥
जो तोकूँ काँटा दुवै, ताहि बोय तू फूल।
तोकों फूल का फूल है, बाको है तिरसूल॥
खट्टा मीठा चरपरा, जिह्वा सब रस लेय।
चारों कुतिया मिल गई, पहरा किसका देय॥
—कबीर
और शुष्क समझे जाने वाले विषय को पढ़ना और सुनना पसंद नहीं करते। मनोरंजन और स्वार्थ की बातों में सहज ही मन लगता है पर उत्कृष्ट आदर्शवाद को सुनने समझने तक की अभिरुचि नहीं जगती इस ओर अभिरुचि नहीं जगती इस ओर अभिरुचि को जगाना, आधी बाजी जीत लेने के समान है। किसी जमाने में चाय का प्रचार बिल्कुल भी न था, लोग उसके नाम, स्वाद और गुण से बिल्कुल भी परिचित न थे, पर चाय कम्पनी के प्रचारकों ने बड़े ही सुव्यवस्थित रूप से उसका प्रचार जम कर किया और कुछ ही दिनों में उसका चस्का जन-साधारण को लगा दिया। आज घर-घर में चाय का प्रचार है। रात दिनों होठों पर प्याले लगे रहते हैं। बीड़ी और सिगरेट का प्रचार भी इसी तरह व्यापक बनता जाता है। यही गतिविधि यदि सद्विचारों, सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने में अपनाई जावे तो उसका भी वैसा ही परिणाम निकलेगा। यदि सद्विचारों को सुनने समझने में चाय, बीड़ी जैसा रस आने लगे तो समझना चाहिए तीन चौथाई मोर्चा फतह हो गया। विचारों को यदि अन्तःकरण में समुचित स्थान मिल जावे तो उसका प्रभाव प्रत्यक्ष जीवन पर पड़ेगा ही, लोग वैसे ही काम भी अवश्य करने लगेंगे।
निकिल के बने सिक्कों का खोटा-खरा परखने के लिए दुकानदार लोग एक चुम्बक अपने पास रखते हैं और उससे छूकर यह जान लेते हैं कि वह असली है या नकली। जो सिक्के चुम्बक से चिपक जाते हैं वे असली, जो नहीं चिपकते वे नकली माने जाते हैं। सद्विचारों की ओर अभिरुचि जिनकी लग सके उनसे यह सहज ही आशा की जा सकती है कि वे आगे चल कर श्रेष्ठ कर्मों में भी प्रवृत्त होंगे और युग-निर्माण कार्यक्रम के लिए कुछ उपयुक्त सिद्ध हो सकेंगे। मनोभूमि की श्रेष्ठता को ठीक तरह परिपक्व बनाने के लिए बहुत दिनों तक लगातार उसे सद्विचारों को हृदयंगम करते रहने की आवश्यकता होती है। अभ्रक भस्म, मकरध्वज आदि रसायन बनाने के लिए उनके अग्नि-संस्कार करने पड़ते हैं, अनेकों पुट देने होते हैं और घुटाई पिसाई की व्यवस्था बनाई जाती है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति के ‘दृढ़ पुरुष’ बनाने के लिए उसे देर तक प्रौढ़ सद्विचारों के साथ अपने आपको घोटना पीसना पड़ता है। रसायन बनाने वाले वैद्यों की तरह युग-पुरुष बनाने के लिए हमें भी उसी प्रक्रिया को अपनाना होगा।
बड़े काम के लिए बड़े व्यक्तित्वों की आवश्यकता पड़ती है। हाथ लोहे की मोटी जंजीरों से बाँधे जाते हैं। पतली कमजोर रस्सी में बाँध कर उन्हें रोक रख सकना कठिन है। युग-निर्माण जैसे महान कार्य के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है जिन्होंने उत्कृष्ट विचारों का चिन्तन और मनन करते-करते अपनी मनोभूमि को प्रलोभन और कठिनाइयों से टक्कर लेने की क्षमता से सुसम्पन्न बना लिया हो। बाह्य आवेश से नहीं वरन् अन्तरात्मा की सुस्थिर प्रेरणा के आधार पर जो लोग श्रेष्ठता के सन्मार्ग पर आरुढ़ होते हैं उन्हीं के लिए अन्त तक उस पर चलते रहना संभव होता है।
भड़काने वाले, आवेश उत्पन्न करने वाले भाषण सुनकर, लेख पढ़कर या अन्य प्रकार की उत्तेजना से प्रभावित होकर कोई व्यक्ति तत्काल सत्कर्म करने की प्रतिज्ञा कर लेते हैं, पर आन्तरिक दुर्बलता के कारण वह प्रतिज्ञा देर तक निभती नहीं। नामवरी और प्रशंसा के लोभ से कई व्यक्ति कुछ सत्कर्म करते हैं उसमें दिखावा अधिक होता है। जब तक दिखावा रहा तब तक उत्साह भी रहा, जब पद छिना, प्रतिष्ठा घटी तभी वे उससे विरत होने लगे। हमने अनेक आन्दोलनों के भीतर घुसकर देखा है, अनेकों से हमारा अत्यन्त घनिष्ठ संबन्ध रहा है, और अनेक आन्दोलनों को हमने जन्म दिया है। इसलिए हमारे जीवनभर के अनुभवों का निष्कर्ष इस रूप में है कि मनोभूमि की परिपक्वता के बिना जो लोग क्षणिक प्रेरणा या आवेश में कुछ काम कर बैठते हैं वे देर तक परमार्थ के कठिन मार्ग पर चलते नहीं रह सकते। व्रत को अन्त तक निबाहने की आशा केवल उन्हीं से की जा सकती है जिन्होंने उस आदर्शवाद की भावनाओं को चिरकाल तक अपने अन्तःकरण में पर्याप्त स्थान दिया है और भली प्रकार सोच समझ कर उस मार्ग पर चलने का कदम उठाया है। युग-निर्माण के लिए ऐसे ही परिपक्व मनोभूमि के व्यक्तियों की आवश्यकता है।
समाज में अनेकों प्रकार की सत्प्रवृत्तियों का बढ़ाया जाना और अनेकों दुष्प्रवृत्तियों का हटाया जाना आवश्यक है। जिस सभ्य समाज की रचना का स्वप्न साकार करने के लिए हम अग्रसर हो रहे हैं उसका आधार ऐसे सुदृढ़ व्यक्तित्व ही हो सकते हैं जो अपना आदर्श उपस्थित करके दूसरों को अनुकरण की प्रेरणा दे सकें। बुराइयों को मिटाने के लिए उनसे टक्कर लेना आवश्यक है। टकराने में चोट लगने का खतरा रहता ही है, उसे सहने में शूरवीर ही समर्थ होते हैं। कमजोर तबियत के आदमी ऐसे अवसरों पर भाग खड़े होते हैं और विरोधियों के हौसले बढ़ाने में सहायक होते हैं। युग-निर्माण कार्यों में अनुकरण के उपयुक्त आदर्श उपस्थित करना और दुराचार से संघर्ष करना अनिवार्य है। इसलिए यह भी आवश्यक है कि इन प्रवृत्तियों को अग्रसर करने वाले लोग काफी मजबूत हों। यह आन्तरिक मजबूती, सद्विचारों को निरन्तर हृदयंगम करते रहने से ही प्राप्त हो सकती है।
सज्जन प्रकृति के नर-नारियों को तलाश करना और उन्हें स्वाध्याय-सत्संग के बाद पानी से सींचना विशाल वट वृक्षों को रोपने के समान इस युग का सबसे बड़ा पुण्य परमार्थ समझा जाना चाहिए। पतित मनोभूमि का मनुष्य दीन, हीन और तुच्छ घृणित ही समझा जा सकता है, पर यदि वह आत्मबल सम्पन्न हो तो नर-रत्न, महापुरुष, ऋषि और अवतार भी बन सकता है। तुच्छ को महान बना देने की शक्ति केवल उत्कृष्ट विचारों में ही रहती है। स्वाति का जल सीप में पड़ने से मोती बनता है, बाँस में पड़ने से बंसलोचन और केला में जाने से कपूर बनता है। सद्विचारों की स्वाति बूँद जिस मन मस्तिष्क में प्रवेश करती है उसे अजर-अमर ही बना देती है, वह उज्ज्वल नक्षत्र की तरह स्वयं चमकता है और अन्य अनेकों को प्रकाश देने का निमित्त बन जाता है। इसलिए सद्विचारों की उपयुक्त मनोभूमि में प्रतिष्ठा करने का प्रयत्न ‘ब्रह्मकर्म’ माना जाता है। उससे बड़ा पुण्य-परमार्थ और कुछ भी इस धरती पर नहीं है।
विपदि धैर्यमथाम्युदये क्षमा
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रम
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृति सिद्ध मिदं हि महात्मनाम्॥
—हितोपदेश
“महान पुरुषों में ये गुण स्वभावतः पाये जाते हैं—विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय के अवसर पर क्षमा, सभा में भाषण-कुशलता, युद्ध में विक्रम, यश में रुचि और शास्त्र अध्ययन की लगन।”
इन तथ्यों को हमें भली-भाँति समझना चाहिए और धर्म-कर्तव्य की दृष्टि से, जीवन को सफल बनाने की दृष्टि से, युग-निर्माण की दृष्टि से सद्विचारों के प्रचार की पुण्य प्रक्रिया को अपने और दूसरों की
अजात मृत मूर्खाणाँ वरमाद्यौन चान्तिमः।
सकृद दुखः करावाद्यौ अन्तिमस्तु पदे-पदे॥
—हितोपदेश
“जो पुत्र पैदा ही न हुआ हो अथवा पैदा होकर मर गया हो अथवा मूर्ख हो, इन तीनों में पहले दो ही तीसरे की अपेक्षा अधिक अच्छे हैं। क्योंकि वे दोनों तो एक बार ही दुःख देते हैं, जबकि तीसरा (अर्थात् मूर्ख पुत्र) पद-पद पर दुःख कारक होता है।”
मनोभूमि में गहराई तक प्रवेश करने के लिए अपना समय और मनोयोग नियमित रूप से लगाते रहने का व्रत लेना चाहिए। स्वयं स्वाध्यायशील बनें, मनन और चिन्तन द्वारा आत्म-निर्माण के लिए सद्विचारों को व्यवहारिक जीवन में उतारें, अपने परिवार के हर सदस्य को इस लाभ से लाभान्वित होने के लिए प्रेरित करें। साथ ही यह भी प्रयत्न करें कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र, में सभी प्रिय परिचित जनों में उस विचारधारा का विस्तार हो। जिन पर भी अपना प्रभाव हो, उन्हें ऐसी प्रेरणा देनी चाहिए कि वे सद्विचारों को नियमित रूप से अपनाने की अभिरुचि उत्पन्न करें। प्रभाव वही सराहनीय है जिससे प्रभावित व्यक्तियों को उत्कर्ष की प्रेरणा मिले। जिस में भी सुसंस्कारों का बीजाँकुर दिखाई पड़े उसे सींचने के लिए हमें अवसर और अवकाश निकाल ही लेना चाहिए।
हम “अखण्ड-ज्योति” के सदस्य इस गतिविधि को सच्चे मन से अपनावेंगे तो अपना परिवार दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा। सज्जनों का समुदाय बढ़ना उनका अल्पमत में न रह कर बहुमत तक पहुँच जाना इस बात का परिपुष्ट प्रमाण होगा कि युग परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया सफलता के बिल्कुल समीप जा पहुँची है। इस प्रजातंत्र के युग में जिसे वोट अधिक मिल जाते हैं वही दल या व्यक्ति राज्य शासन संभालता है। उसी की इच्छा सारी प्रजा को माननी पड़ती है। सज्जनता का, सद्भावना का, मानवता का यदि बहुमत होगा, अधिक संख्या में लोग इस प्रकार के बन जायेंगे तो उसका प्रतिफल भी यही होगा कि अल्पमत वाले दुर्बुद्धियुक्त व्यक्तियों को बहुमत के आगे झुकने को विवश होना पड़े। आज सद्भावना अल्पमत में है तो दुष्प्रवृत्तियों के आगे उन्हें परास्त होना पड़ता है, कल जब दुर्भावनाएं अल्पमत में होगी तो उन्हें सद्भावनाओं का आधिपत्य स्वीकार करना होगा। हमें यही सब तो करना है।
हमारा एक भी प्रिय परिजन ऐसा न रहे जो अपने प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत होने पर भी सद्विचारों में अभिरुचि लेने के लिए प्रेरणा प्राप्त न करे। स्वाध्याय का साधन “अखण्ड ज्योति” प्रस्तुत करती है, सत्संग की प्रेरणा पूर्ति हम स्वयं करें। उभय पक्षीय लाभों के प्रभाव से अपने परिवार को पूरी तरह लाभान्वित करें। इसमें हमारा धर्म-कर्तव्य पालन होता है, स्वजनों का जीवन सुधारता है और युग-निर्माण का एक सबसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होता है। ऐसे उपयोगी कार्य के लिए हमें प्रयत्नशील होना ही चाहिए।
अणु बम बनाने के लिए प्रधानतया ‘यूरेनियम’ धातु की आवश्यकता होती है। “हैवी वाटर” का उस कार्य में बहुत उपयोग होता है। यह पदार्थ जिनके पास पर्याप्त मात्रा में होते हैं वे ही अणु-शक्ति उत्पन्न करने और उस प्रकार के आयुध बना सकने में सफल होते हैं। युग-निर्माण के लिए ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता होती है जो जन्मजात रूप से संस्कारवान हों। कुसंस्कार तो थोड़ी-सी बुरी संगति से उत्पन्न हो जाते हैं पर सुसंस्कार चिरकालीन साधना से ही विनिर्मित होते हैं। हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के 16 संस्कार तो समारोह-पूर्वक किये जाते हैं और नित्य नैमित्तिक उपासना, स्वाध्याय, व्रत, पर्व, अनुष्ठान, कथा, कीर्तन, सत्संग, देव दर्शन, हवन, तीर्थयात्रा, श्राद्ध आदि के द्वारा यह प्रयत्न निरन्तर होते हैं कि व्यक्ति को सुसंस्कारी बनाने की प्रक्रिया बन्द न होने पावे, उसका क्रम किसी न किसी प्रकार चलता ही रहे।
उपदेशों का महत्व तो बहुत है पर यह ध्यान रखना चाहिये कि वे सुसंस्कारी व्यक्तियों को ही प्रभावित करते हैं। चिकने घड़े पर पानी की बूँदें ठहरती नहीं, बेंत की बेल विपुल वर्षा होने पर भी फलती-फूलती नहीं। आज कथा, वार्ता, प्रवचन, सत्संगों का आयोजन पूर्वकाल की अपेक्षा कहीं अधिक होता है पर सुनने वाले उनका लाभ समय काटने या मनोरंजन करने जितना ही प्राप्त करते हैं। जो उपदेश दिये गये थे उन पर चलने की इच्छा उत्पन्न नहीं होती, हाँ, उन्हीं उपदेशों में कोई बात ऐसी आ जाय जो उनकी दुष्प्रवृत्तियों का परोक्ष रूप से भी समर्थन करती हो तो उसे याद रख लेते हैं और अपने दोषों के समर्थन में उन बातों को ‘सनातन’ कह कर उचित सिद्ध करने की चेष्टा करते रहते हैं।
प्राचीन काल में संस्कार और पात्रत्व पर बहुत ध्यान दिया जाता था ओर चुने हुए व्यक्तियों को ही प्रभावशाली श्रेष्ठ सत्कर्मों में लगाया जाता था। गुरुकुलों में पात्रत्व की परीक्षा के बाद ही छात्रों की भर्ती होती थी। धर्म प्रवचन का अधिकार किसी को तब मिलता था जब वह त्याग और तप की कसौटी पर अपने को सुसंस्कारी सिद्ध कर देता था। संस्कार मनोभूमि की परिपक्वता का प्रतीक है, जो देर तक एक गतिविधि को अपनाये रहने के बाद ही परिपुष्ट होते हैं। युग-निर्माण के लिए संस्कारवान मनोभूमि के व्यक्तित्वों की आवश्यकता पड़ेगी अन्यथा दुर्बल स्तर के व्यक्ति सहज ही निराश होते हैं, फिसलते और गड़बड़ी उत्पन्न करते दिखाई देंगे। आज लोक सेवक कहलाने वाले व्यक्ति जो अनेक प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न करते और कलंक-कथाएँ प्रस्तुत करते देखे जाते हैं इसका कारण यह ही है कि उपयुक्त मनोभूमि बनने से पूर्व ही वे ‘नेता’ बन जाते हैं और फिर अपने पद का दुरुपयोग करते हैं।
हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम्।
श्रोतस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम्॥
—अज्ञात
“हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का आभूषण सत्य-भाषण है, शास्त्र सुनना कानों का भूषण है। फिर दूसरे आभूषणों की क्या आवश्यकता हैं?”
वानप्रस्थ के बाद संन्यास लेकर लोक सेवा के लिए परिव्राजक व्रत धारण करने का पूर्व नियम इसीलिए था कि जीवन भर की सुसंस्कार साधना के उपरान्त व्यक्ति जब तृष्णा-वासना और पुत्रेषणा वित्तेषणा, लोकेषणा से रहित हो जाय।
पीछे तो इसका विस्तार अपरिमित क्षेत्र में होना है। अगणित व्यक्ति, संगठन, देश और समूह इस योजना को अपने-अपने ढंग से कार्यान्वित करेंगे। जिस प्रकार आध्यात्मवाद, साम्यवाद, भौतिकवाद आदि अनेक ‘वाद’ कोई संस्था नहीं वरन् विचार-धारा एवं प्रेरणा होती हैं, व्यक्ति या संगठन इन्हें अपने-अपने ढंग से कार्यान्वित करते हैं, इसी प्रकार युग-निर्माण कार्यक्रम एक प्रकाश-प्रवाह एवं प्रोत्साहन उत्पन्न करने वाला एक मार्गदर्शन बनकर विकसित होगा। आज “अखण्ड-ज्योति परिवार” उसकी प्रथम भूमिका सम्पादित करने का विनम्र प्रयत्न मात्र ही कर सकेगा। इतना कार्य कर सकने की क्षमता उसमें मौजूद है यह भली प्रकार सोच समझकर, नाप तोलकर ही कार्य आरम्भ किया गया है। ‘लोग हँसाई’ का हमें भी ध्यान है।
‘एक से दस’ योजना के अंतर्गत प्रत्येक परिजन को यह काम सौंप दिया गया है कि वह मछली पकड़ने के लिए काम में आने वाली आटे की गोली की तरह ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका को माध्यम बनाकर सुसंस्कारी लोगों की तलाश करे और जहाँ जितने व्यक्ति इस प्रकार के मिल जावें वहाँ उन्हें प्रोत्साहित करने के लिये उनके घरों पर जाकर मिलने की ‘धर्म फेरी’ प्रक्रिया और उन्हें इकट्ठे करके समय-समय पर ‘विचार गोष्ठी’ चलाने की प्रक्रियाओं द्वारा यह प्रयत्न करते रहें कि उनके सुसंस्कारों का अभिवर्धन और परिपाक नियमित रूप से होता रहे। केवल स्वाध्याय ही पर्याप्त नहीं, उसके साथ-साथ जीवित प्रेरणा जुड़ी रहे तो ही सोने-सुगन्धि का योग बनता है। ‘अखण्ड-ज्योति’ जिस विचारधारा को प्रस्तुत करती है उसकी सजीव प्रेरणा, पाठकों को देना अपने प्रबुद्ध परिजनों का काम है। अपने को, अपने परिवार को और अपने प्रभाव क्षेत्र को आवश्यक प्रकाश देने की क्षमता हममें से प्रत्येक में मौजूद है, अब समय है कि उसका उचित उपयोग आरम्भ कर दिया जाय।
दूसरा कार्यक्रम इससे भी महत्वपूर्ण है वह है—”नई प्रबुद्ध पीढ़ी का अवतरण” इस संबन्ध में दिसम्बर 62 की पत्रिका के पृष्ठ 46 पर आवश्यक संकेत किया जा चुका है। युग बदलना सुनिश्चित है। सन् 62 के अष्टग्रही योग का प्रभाव सन् 72 तक दश वर्ष तक रहने वाला है। इस अवधि में इतनी क्रान्ति-प्रतिक्रान्तियाँ होंगी कि मनुष्य को दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणामों पर निश्चित विश्वास हो जायगा, खिन्न होकर उसे सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने और सन्मार्ग पर चलने के लिये विवश होना पड़ेगा। आज के प्रवचन और लेख कारगर न होंगे। उन्हें तो लोग अनसुना ही करते रहेंगे। समय की प्रताड़ना ही उन्हें विवश करेगी और कोई अन्य मार्ग न देखकर सबको यही सोचना और यही करना पड़ेगा कि धर्म एवं सदाचार का मार्ग ही श्रेयस्कर है। विवशता सब कुछ करा लेगी। आज तो हम उस ढाँचे को प्रस्तुत कर रहें हैं जिस पर चलने के लिए
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायाँ विषं शिरे।
वृश्रिकस्य विषं पुच्छे सर्वांगे दुनृणाँ विषम्072
—चाणक्य
“साँप के दाँतों में विष रहता है, मक्खी के सिर में माहुर रहता है, बिच्छू की पूँछ में विष रहता है पर दुष्टों के समस्त शरीर में विष रहता है।”
तैयार योजना मिल जाय। मकान बनाने के पूर्व इंजीनियर उसका नक्शा बनाते हैं। योजना बनाने वाले कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं, तैयारी के बाद निर्माण भी आरंभ हो जाता है। कार्ल मार्क्स ने साम्यवाद की रूपरेखा प्रस्तुत की ओर लेनिन ने उन्हें कार्यान्वित किया। स्वामी विरजानन्द की योजना को दयानन्द ने, और रामकृष्ण परमहंस की योजना को विवेकानन्द ने कार्यान्वित किया था। आज युग-निर्माण की योजना कागजी भले ही दिखे इन्हें कार्यान्वित करने वाले समयानुसार सहज ही कार्यान्वित करने लगे। उन कर्मठ युग पुरुषों के अवतरण का यही समय है।
सूक्ष्मदर्शी, सिद्ध पुरुषों के मतानुसार यह निश्चित है कि अगले दिन अत्यंत उच्चकोटि की दिव्य आत्माएँ भारत भूमि पर अवतरित होंगी। व्यास, वशिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवलक्य, पाराशर, कपिल, कणाद, पातञ्जलि, जैसे योगी, अर्जुन, भीम, हनुमान, अंगद, परशुराम, सहस्रार्जुन जैसे योद्धा, विश्वकर्मा जैसे कलाकार, नागार्जुन जैसे रसायनज्ञ, चरक, सुश्रुत, धन्वन्तरि, अश्विनीकुमार जैसे चिकित्सक, चाणक्य जैसे राजनीतिज्ञ, रावण जैसे वैज्ञानिक, भीष्म, द्रोण जैसे शस्त्र-शास्त्री, भरत, लक्ष्मण, हरिश्चन्द्र, ध्रुव, प्रह्लाद, कर्ण, श्रवणकुमार, शिव, दधीचि जैसे महापुरुष नारद जैसे प्रचारक, जनक, युधिष्ठिर, अशोक, विक्रमादित्य जैसे शासक, प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, गुरुगोविन्दसिंह, वन्दावैरागी, तिलक, सुभाष जैसे देशभक्त बुद्ध, गान्धी, महावीर, शंकराचार्य जैसे अवतारी, सीता सावित्री, अरुन्धती, अनुसूया, गौतमी, जैसी नारियाँ फिर इस देश में जन्म लेंगी। वे आत्माएं अपनी महान आत्मिक स्थिति के द्वारा युग निर्माण के कार्यों को सफल बना कर रहेंगी। गान्धी जी के स्वराज्य आन्दोलन को पूर्ण करने के लिए कितनी ही उच्च कोटि की आत्माएँ उनके समय में अवतरित हुई थीं। युग-निर्माण का प्रत्यक्ष कार्यक्रम सन् 72 के बाद जब दिखाई देगा और 88 तक पूरा हो लेगा, उस कार्य के लिये जिन महान आत्माओं का प्रमुख हाथ रहने वाला है उनके जन्म का समय काल ठीक यही है।
दशरथ और कौशल्या, स्वयंभू मनु और शत-रूपा देवकी और वसुदेव अर्जुन और द्रौपदी जैसे दम्पत्ति ही इन उच्च स्तर की आत्माओं को जन्म देने में समर्थ हो सकते हैं। इसलिए यह भी प्रयत्न करना होगा कि आदर्श जीवन बिताने वाले, उच्च विचार धाराओं से परिपूर्ण, नर-नारी उन आत्माओं को जन्म देने के लिए उपयुक्त स्थान प्रस्तुत करें। घटिया, तुच्छ, पतित स्वार्थी और हीन मनोभूमि वाले असुर प्रकृति माता-पिता के शरीरों में उच्च आत्माएँ प्रवेश नहीं करतीं, उनके यहाँ उसी श्रेणी की दुष्टात्माएं जन्म लेती हैं। किसी महापुरुष को अपने घर बुलाना होता है तो घर की सफाई और पहुँनाई का प्रबन्ध भी उसकी शान के उपयुक्त ही करना पड़ता है। महापुरुष जिनके घर में जन्में वैसे पति पत्नी का आदर्शवादी होना भी आवश्यक है। अर्जुन-द्रौपदी ने जिस प्रकार गर्भ में ही अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोड़ने की शिक्षा दे दी थी, ऐसा ही प्रशिक्षण कर सकने की क्षमता जिन माता पिता में हो वे ही महापुरुषों को जन्म दे सकते हैं। इस प्रकार का महान उत्पादन करने का उत्तरदायित्व उठाने के लिए कठिन तपश्चर्या करने वाले नर−नारी अपने परिवार में से निकलें ऐसी हमारी हार्दिक अभिलाषा है।
अवतारी युगपुरुष न सही, मध्यम श्रेणी के महापुरुष भी उत्कृष्ट श्रेणी के पति पत्नी ही उत्पन्न कर सकते हैं। भविष्य में ऐसे संस्कारवान व्यक्तियों की भारी संख्या में आवश्यकता पड़ेगी। राम के साथ प्राणवान से अनीति उन्मूलन करने वाले रीछ−वानरों की कितनी बड़ी सेना थी? वैसी ही सुसंस्कारी नई पीढ़ी को विनिर्मित करने का कार्य अब आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। संस्कारवान तेजस्वी बालक उत्पन्न करने का महाअभियान उनके माता पिता को सुसंस्कृत बनाने के कार्य से ही आरम्भ किया जा सकता है।
आज की पीढ़ी कमजोर मिट्टी की बनी हुई है। माता-पिता ने पूर्व तैयारी का निश्चित लक्ष लेकर उसे पैदा नहीं किया है और न वैसी दीक्षा, वैसी संस्कृति का लाभ ही उसे मिला है। ऐसी दशा में यदि आज की पीढ़ी दुर्बल मनोभूमि की, आदर्शों का भार उठाने में असमर्थ दीखती है तो कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। अगली पीढ़ी के लिए हमें ऐसी तैयारी करनी चाहिये जो जन्म के साथ ही उच्च संस्कार साथ लेकर आवे। चिकनी मिट्टी के ही अच्छे खिलौने या बर्तन बन सकते हैं। बालू रेत लेकर कोई चतुर कुम्हार भी कुछ बना नहीं पाता, उसका श्रम निरर्थक ही चला जाता है। खराब लोहे से अच्छी मशीनें नहीं बन सकतीं, इसी प्रकार जन्मजात संस्कारों के बिना वह दृढ़ता नहीं आती जिसके आधार पर युग निर्माण जैसे महान कार्य संपन्न हो सकें।
किन उपायों से सुसंतति उत्पन्न हो सकती है यह एक स्वतन्त्र विषय है। इस पर हम आगे बहुत कुछ-बताने समझाने वाले हैं। पर आवश्यकता इस बात की है कि उसके लिए आत्म-नियंत्रण, आत्म शिक्षण और आत्म विकास के मार्ग पर चलना पति-पत्नी पहले से ही आरंभ कर दें ताकि उनकी निज की मनोभूमि तो उपयुक्त प्रकार की बन जाय। बालकों का निर्माण, आत्म निर्माण के साथ ही आरम्भ होता है दुर्गुणी माता पिता केवल बाहरी प्रशिक्षण के आधार पर सन्तान के उत्कृष्ट मनोभूमि का नहीं बना सकते। नई पीढ़ी की उत्कृष्टता, उनके पिता-माता की उत्कृष्टता पर निर्भर रहती है। इसलिए हममें से जो संतान को उत्तरदायित्व उठाने की स्थिति में हैं उन्हें अपनी धर्म पत्नियों को अपने अनुरूप मनोभूमि का बनाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण आरंभ करना ही पड़ेगा।
जो व्यक्ति पूर्व संस्कारों के कारण आज धर्म रुचि सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं उन्हें खोजना, संबन्ध सूत्र में बाँधना और स्वाध्याय-सत्संग के लाभ से लाभान्वित करना यह प्रथम कार्य है और साथ ही नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए तपश्चर्या करने वाले साहसी व्यक्तियों को उपयुक्त तैयारी के लिए प्रेरणा देना दूसरा कार्यक्रम है। इन दोनों को ही उत्साह-पूर्वक अपनाया जाना चाहिये ताकि जल्दी ही परिपक्व मनोभूमि वाले संस्कारी युग-पुरुषों की एक बड़ी सेना सामने प्रस्तुत दिखाई देने लगे।
भगवान बुद्ध एक बार निबिड़ वन को पार करते हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी भेंट अंगुलिमाल डाकू से हो गई। वह सदैव अनेक निर्दोषों का वध करके उनकी उंगलियों की माला अपने गले में धारण किया करता था। आज सामने आये हुए साधु को देखकर उसकी बाछें खिल उठीं।
“आज आप ही मेरे पहले शिकार होंगे” अँगुलिमाल ने बुद्ध से कहा और अपनी पैनी तलवार म्यान से बाहर निकाली।
तथागत मुसकराये, उनने कहा—”वत्स, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। मैं कहीं भागने वाला नहीं हूँ। दो क्षण का विलम्ब सहन कर सको तो मेरी एक बात सुन लो।”
डाकू ठिठक गया, उसने कहा—”कहिए—क्या कहना है?”
तथागत ने कहा—”सामने वाले वृक्ष से एक पत्ता तोड़कर जमीन पर रख दो।” डाकू ने वैसा ही कर दिया। उन्होंने फिर कहा—”अब इसे पुनः पेड़ से जोड़ दो।” डाकू ने कहा—यह कैसे संभव है। तोड़ना सरल है पर उसे जोड़ा नहीं जा सकता।
बुद्ध ने गंभीर मुद्रा में कहा—वत्स, इस संसार में मार-काट तोड़-फोड़ उपद्रव और विनाश यह सभी सरल हैं। इन्हें कोई तुच्छ व्यक्ति भी कर सकता है फिर तुम इसमें अपनी क्या विशेषता सोचते हो और किस बात का अभिमान करते हो? बड़प्पन की बात निर्माण है—विनाश नहीं। तुम विनाश के तुच्छ आचरण को छोड़कर निर्माण का महान कार्यक्रम क्यों नहीं अपनाते?
अंगुलिमाल के अन्तःकरण में वे शब्द तीर की तरह घुसते गये। तलवार उसके हाथ से छूट पड़ी। कातर होकर उसने तथागत से पूछा—”इतनी देर तक पाप कर्म करने पर भी क्या मैं पुनः धर्मात्मा हो सकता हूँ?” वे बोले—”वत्स, मनुष्य अपने विचार और कार्यों को बदल कर कभी भी पाप से पुण्य की ओर मुड़ सकता है। धर्म का मार्ग किसी के लिए अवरुद्ध नहीं है। तुम अपना दृष्टिकोण बदलोगे तो सारा जीवन ही बदल जायगा।” विचार बदले तो मनुष्य बदला। अँगुलिमाल ने दस्यु कर्म छोड़कर प्रव्रज्या ले ली। वह भगवान बुद्ध के प्रख्यात शिष्यों में से एक हुआ।
सरदार चूड़ावत का विवाह हुए अभी थोड़े ही दिन हुए थे। पत्नी जैसी रूपवती थी, वैसी ही गुणवती भी।
औरंगजेब के अत्याचारों का प्रतिरोध करने के लिए राजपूतों को युद्ध के लिये आए दिन तैयार रहना पड़ता था। ऐसी ही एक चुनौती फिर सामने आ गई। चूड़ावत को दूसरे ही दिन युद्ध का मोर्चा संभालने का आदेश मिला।
एक ओर कर्तव्य की पुकार दूसरी ओर नवविवाहिता पत्नी का आकर्षण। सरदार का मन दोनों ओर डोलने लगा? मोर्चे पर जाये या नहीं? पत्नी को छोड़े या नहीं? दोनों ही ओर उसका मन बढ़ने लौटने लगा।
पति को असमंजस में पड़ा हुआ देखकर रानी की चिन्ता बढ़ी। उसने कारण पूछा तो सरदार ने अपनी अन्तर्व्यथा कह सुनाई।
रानी गम्भीर हो गई। उसने सोचा मेरा आकर्षण यदि पति को कर्त्तव्यपथ से विचलित करने वाला बनता है तो मेरा न रहना ही देश-धर्म के हित में होगा। मुझे अपना बलिदान करके पतिदेव की द्विविधा मिटानी चाहिए ताकि वे एकाग्रचित्त से कर्तव्य पालन कर सकें।
एक हाथ में तलवार और दूसरे से बाल पकड़े। रानी ने पूरे बल से वार किया और सिर कटकर चूड़ावत की गोद में जा गिरा।
कर्तव्य पथ से विचलित न होने देने के लिए जहाँ नारियों में इतना आत्मबल भरा पड़ा हो वहाँ नर के लिए कायरता अपनाना सम्भव नहीं हो सकता। चूड़ावत ने घोड़ा युद्ध-क्षेत्र की ओर बढ़ाया और बिजली की तरह शत्रु दल पर टूट पड़ा।
वोपदेव का मन पढ़ने में नहीं लगता था, उसकी स्मरण शक्ति अच्छी न था। पाठशाला में अध्यापकों और सहपाठियों का उन्हें उपहास सहना पड़ता था। घर पर भी इसी कारण प्रताड़ना होती थी। बच्चा निराश हो चला। उसने सोचा पढ़ने से क्या लाभ? कोई दूसरा काम करेंगे।
पाठशाला छोड़कर वोपदेव निकल पड़ा। इधर उधर भटकते-भटकते बहुत दिन हो गये। एक दिन वह ग्राम के निकट कुएं के किनारे बैठा अपनी दुरवस्था पर विचार करने लगा। अपनी समस्या का हल ढूँढ़ने लगा।
सोचते समय उसकी निगाह सामने वाले पत्थर पर गई। पानी सींचते समय रस्सी की जो घिसट पड़ती थी उससे पत्थर पर गहरी लकीरें बन गई थीं। वोपदेव सोचने लगा इतना कठोर पत्थर यदि कोमल रस्सी की बार-बार रगड़ पड़ने पर घिस सकता है तो मेरी मोटी बुद्धि निरन्तर प्रयत्न और अभ्यास करने से विद्याध्ययन के योग्य क्यों नहीं बन सकती?
बालक ने अपना साहस बटोरा और पुनः पाठशाला में जा पहुँचा। अबकी बार उसने पूरे मन और दूने परिश्रम से पढ़ना आरम्भ कर दिया। प्रयत्न से प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली। मन्दबुद्धि छात्र मेधावी स्नातक बनकर निकला।
महा वैयाकरण वोपदेव को कौन नहीं जानता। आरम्भ में वह महा मन्दबुद्धि था। इस मूढ़मति छात्र ने साहस से पुरुषार्थ से काम लिया तो प्रतिकूलताएँ अनुकूल बन गई। वोपदेव की गाथा हर छात्र के लिये विचारणीय है और अनुकरणीय भी।
यों परिवर्तन सभी कठिन होते हैं, पर व्यक्तियों का परिवर्तन सब से कठिन कार्य है। मकान, कारखाने, सड़क, पुल आदि को पुराने ढंग से बदलकर यदि नई डिजाइन का बनाना हो तो वह कार्य भी कठिन होता है। और व्यक्ति का, जो अनेक आदतों, संस्कारों, प्रवृत्तियों, वासनाओं, विश्वासों और मान्यताओं का समूह है, बदला जाना तो और भी कठिन है। इस कठिनाई को समझते हुए भी इसे करना तो पड़ेगा ही। जिस दुनिया में आज हम रह रहे हैं वह निश्चित रूप से इस स्थिति में पहुँच गई है कि अब उसे बदला ही जाना चाहिए। युग-परिवर्तन समय की अनिवार्य आवश्यकता है, इसकी उपेक्षा करने पर सामूहिक सर्वनाश का ही विकल्प सामने रह जायगा।
युग-निर्माण की विचार धाराएँ अपने-अपने देश, समाज, व्यक्ति के अनुरूप अपने-अपने क्षेत्रों में समस्त विश्व में फैलानी हैं। अपनी परिस्थिति, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के लोग अपने-अपने ढंग से उसे कार्यान्वित करेंगे। इसका आरम्भ मात्र “अखण्ड-ज्योति परिवार” द्वारा हो रहा है। यह आरम्भ कितना ही छोटा क्यों न हो उसका उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। अपने इस छोटे क्षेत्र में ही यह प्रयोग आरम्भ कर रहे हैं, ताकि इसका अनुकरण बड़े विशाल क्षेत्र में हो सके ।
“अखण्ड ज्योति परिवार” के प्रत्येक सदस्य को हम उस दृष्टि से देखते हैं जैसे कि कोई वयोवृद्ध व्यक्ति अपने निज के कुटुम्ब परिवार को देखता है। जिस प्रकार हम में से हर एक को अपना-अपना परिवार सुविकसित करना है, उसी प्रकार हम भी “अखण्ड-ज्योति परिवार” के सदस्यों को अपना निजी कुटुम्ब मानकर उसे ऐसा सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाना चाहते हैं जिसे देखकर दूसरों को भी उसी ढाँचे में ढलने की प्रेरणा मिले। पर हमारे यह प्रयत्न सफल तभी हो सकते हैं जब प्रत्येक परिजन हमें भी वैसी-ही आत्मीयता की दृष्टि से देखे और जो कहा या लिखा जा रहा है उसे भावनापूर्वक सुने समझे। उपेक्षित बूढ़े लोग जिस प्रकार अपनी बेकार बकझक करते रहते हैं और घर के लोग उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते यदि वही स्थिति अपनी भी रही तो वह स्वप्न साकार न हो सकेंगे, जिन्हें देखने के लिये ही जीवित रहने की हमारी इच्छा शेष है।
हमारी आकाँक्षा इसी प्रकार पूर्ण हो सकती है युग-निर्माण की प्रयोग प्रक्रिया इसी तरह कार्यान्वित हो सकती है कि परिवार के सभी स्वजन “अखण्ड-ज्योति” को अपनी सत्परामर्शदात्री युग-प्रेरणा अनुभव करते हुए उसे ध्यानपूर्वक सुनें—समझें। हम सम्पादक, साहित्यकार या आचार्यजी बनकर नहीं रहना चाहते। हमारा स्थान अपने परिवार में वही होना चाहिये जो उसी घर से रक्त संबंधित अभिभावकों का होता है। इतनी आत्मीयता भी यदि हम लोगों के बीच न बन सकी तो उपेक्षित परदेशी की स्थिति में परिजनों के गुण-कर्म-स्वभाव में वह परिवर्तन लाना हमारे लिए कैसे संभव हो सकेगा?
स्वजनों के ‘प्रगाढ़ सौजन्य की ही हमें आशा है। इसी आशा के बल पर इतना बड़ा संकल्प किया गया। अब तक जितना मिला है उससे ज्यादा आगे मिलना चाहिये क्योंकि अब तक जितने कदम उठाये गये हैं यह अगला कदम उन सबसे अधिक बड़ा है और कठिन भी। इसके लिये परिजनों का प्रगाढ़ सौजन्य न मिला तो हमारे पैर लड़खड़ाने लगेंगे। इसका ध्यान रखना प्रत्येक परिजन का कर्तव्य है। इस कर्तव्य की उपेक्षा न की जानी चाहिए।
युग निर्माण योजना की रूपरेखा गतवर्ष के अंकों में बताई जाती रही है। सितंबर , अक्टूबर, नवंबर दिसंबर, 62 के अंकों में उसे और भी स्पष्ट किया गया है। मार्च और अप्रैल 63 के अंकों में योजना के उद्देश्य एवं लक्ष्य का और भी अधिक स्पष्टीकरण किया गया है। इसे ध्यानपूर्वक दो बार पढ़ा जाना चाहिये। इस विचारधारा के संबंध में अपने अभिमत लिखने चाहिएं और यह बताना चाहिये कि कौन पाठक उसे कार्यान्वित करने के लिए क्या करने की तैयारी कर रहा है। इन सूचनाओं के आधार पर परिवार की वर्तमान स्थिति को समझ सकना और प्रगति के अगले कदम उठा सकना सम्भव हो सकेगा।
जब पत्रकार की कलम कहीं बिक जाती है,
तब बुझ जाती है उसकी सारी तेज आग।
बेजान खोखले हो जाते हैं शब्द सभी,
वे जगा नहीं पाते फिर सोया हुआ भाग
जब गायक के दो अधर स्वर्ण से मढ़ जाते,
सब सातों स्वर हो जाते हैं नाराज बहुत।
वह गाने लगता है संकेत इशारों पर
करने लगते हैं किन्तु बगावत साज बहुत॥
जब फर्माइश पर लिखने लगता कविता कवि,
तब सरस्वती पछताती है सिर धुनती है।
शब्दों की तब शक्तियाँ सभी संन्यासिन हो,
कविता के चरम पतन की गाथा सुनती हैं॥
जब राह दिखाने वाले कदम भटक जाते,
तब जन जीवन की प्रगति सभी रुक जाती है।
तब देश समूचा अन्धकार में खो जाता,
मंजिल पर पहुँचे बिना दृष्टि थक जाती है॥
जब विद्रोही खुद कर सकता है सलाम,
तब बेखटके अन्याय जुल्म होने लगता।
शूली पर चढ़ने वाले करते समझौता,
तब राष्ट्र शहीदों की गरिमा खोने लगता।
जब पूर्वाग्रहों में कैद समीक्षा हो जाती ।
तब नीर क्षीर पिक काक भेद ही मिट जाता।
सब की है अलग कसौटी और अलग निर्णय,
निस्पृह साधक इस भीड़ भाड़ में लुट जाता॥
—दिनकर सोनवलक
*समाप्त*
उद्यमेन हिं सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथेः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रवशन्ति मुखे मृगाः॥
—पंच तन्त्र
समस्त कार्य उद्यम करने से सिद्ध होते हैं केवल मनोरथ करने से कुछ नहीं मिलता, जैसे सोते हुये सिंह के मुख में हिरन अपने आप नहीं चले जाते।
कोई बड़ा नेतृत्व, पद या उत्तरदायित्व प्राप्त करने के इच्छुक तो सब रहते हैं पर उसे ठीक तरह सँभाल सकने की योग्यता किन्हीं विरलों में ही होती है। संयोगवश यदि कोई बड़ा उत्तरदायित्व मिल भी जाय तो आवश्यक गुण न रहने से ऐसे लोग अव्यवस्था फैलाते, हानि करते तथा अयोग्य सिद्ध होते हैं। जिनमें दूसरों की स्थिति, आवश्यकता और रुचि समझने की क्षमता नहीं वे उन से ठीक प्रकार काम भी नहीं ले सकते। अपने दुर्गुणों के कारण जो साथियों की दृष्टि में घृणास्पद, उपहास योग्य एवं उपेक्षणीय बना हुआ हो वह कैसे तो नियंत्रण रख सकेगा और कैसे काम ले सकेगा। ऐसी दशा में मिला हुआ नेतृत्व असफल ही सिद्ध होगा।
नम्रता और अहंमन्यता यों देखने में स्वभाव की छोटी-छोटी भिन्नताएँ हैं पर इनके प्रतिफल महान अन्तर प्रत्यन्तरों से भरे होते हैं। नम्र व्यक्ति किसी को कुछ दिये बिना भी केवल अपनी वाणी की मधुरता और व्यवहार की शिष्टता से ही दूसरों का मन जीत लेता है, परायों को अपना बना लेता है और प्रत्युत्तर में उनका स्नेह सहयोग पाकर सब प्रकार लाभान्वित रहता है। किन्तु जिसका स्वभाव अहंकारी एवं कर्कश है वह उनसे भी मनोमालिन्य ही पाता है जिनके लिए उसने ठोस सहायता की थी
वृत्तं यत्नेन संरक्षेत वित्ततयायति याति च।
अक्षीणो वित्ततः क्षीणः वृत्ततस्तु हतो हतः॥
—महाभारत
“अपने जातीय वृत्तांत (इतिहास) की यत्न पूर्वक रक्षा करनी चाहिये। धन तो आता जाता रहता है और धन की न्यूनता हो जाने से कोई नष्ट नहीं हो जाता किन्तु अपना प्राचीन गौरव नष्ट कर देने पर विनाश निश्चित है।”
एक मन सहायता का महत्व एक तोले चुभने वाली बात कहने में नष्ट हो जाता है। कढ़ाई भरे दूध में जरा भी खटाई पड़ने पर उसका फटना निश्चित है। श्रम, त्याग और प्रयत्नपूर्वक प्राप्त की हुई सद्भावना थोड़े से अप्रिय व्यवहार में नष्ट हो जाती है। जिनके स्वभाव में अहंकार सम्मिलित हो गया हो, वे अपने को सँभाल नहीं पाते। कुछ-न-कुछ चुभने वाला ही कहते या करते रहते हैं। फलतः उनके मित्र घटते और शत्रु बढ़ते चले जाते हैं।
शत्रुता, द्वेष मनोमालिन्य और लड़ाई झगड़ों में वास्तविक कारण 30 फीसदी और स्वभावजन्य दुर्बलताओं के कारण उत्पन्न हुई गलतफहमी 70 फीसदी होती है। यदि स्वभाव सज्जनता का है तो उन तीस फीसदी कारणों का भी परस्पर मिल-जुल कर समाधान खोजा जा सकता है। कोई मध्यस्थ भी समझौते का मार्ग ढूँढ़ सकता है। पर जहाँ स्वभाव सम्बन्धी दुर्बलताएँ भरी पड़ी हों वहाँ अकारण ही उत्तेजना, असहिष्णुता तुनुकमिजाजी और शंका संदेह की दृष्टि रहने से खटपट होती रहेगी। साधारण सी बातें तूल पकड़ती रहेंगी और लड़ाई झगड़े का वातावरण बना रहेगा। जिन लोगों के साथ रहना और काम करना है उनसे तनाव रहने पर चित्त में खिन्नता ही रहती है। इस स्थिर खिन्नता का प्रभाव शरीर और मन पर बहुत बुरा पड़ता है, प्रगति में भी अड़चन पैदा होती है। स्वभाव की यह छोटी छोटी कमजोरियाँ सुविधा सम्पन्न जीवन का भी आनन्द नष्ट कर देती हैं।
प्रगति के लिए जिस सूझबूझ की आवश्यकता पड़ती है उसका विकास तभी होता है जब मन शान्त और प्रसन्न रहे। संतुलित निश्चिन्त और प्रसन्न रहने वाले व्यक्ति का मस्तिष्क ही किसी समस्या के हर पहलू को ठीक तरह सोच समझ सकता है और गंभीर विवेचना के साथ किसी ठीक निष्कर्ष पर पहुँच सकता है। यदि मन क्षुब्ध, खिन्न और उत्तेजित रहेगा तो आवेश और अधीरता की स्थिति बनी रहेगी जिसमें किसी प्रश्न पर केवल एकांगी विचार कर सकना ही संभव होगा। अधूरे विचार के साथ किये गये निर्णय आम तौर से गलत सिद्ध होते हैं और उनको कार्यान्वित करने से हानि ही होती है। अच्छी सूझ-बूझ सबके लिए संभव हो सकती है केवल इसके लिए अपने स्वभाव को धीर गंभीर बनाना मात्र पर्याप्त होता है। जो अपने स्वभाव को सुधारने का, उसे सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न नहीं करते उन्हें अच्छी सूझ-बूझ से भी वंचित रहना पड़ता है।
बुरी आदतों का परिणाम उन बुरी प्रतिक्रियाओं के रूप में प्रस्तुत होता है जो चित्त को खिन्न करती हैं। खिन्न चित्त रहने वाले की तीन चौथाई शक्ति उस मानसिक सन्ताप से ही नष्ट हो जाती है। एक चौथाई से प्रगति के लिए कुछ ठीक से सोच सकना और जम कर कुछ ठोस काम कर सकना संभव नहीं होता। उन्नति की आकाँक्षा करने मात्र से काम नहीं चल सकता, उसके लिए उचित साधन भी होने चाहिएं। इन साधनों में सबसे बड़ा, सबसे प्रमुख, सबसे शक्तिशाली साधन है—मानसिक संतुलन और वह केवल उन्हें ही प्राप्त होता है जिनने अपने गुण-कर्म, स्वभाव का निर्माण सज्जनोचित रीति से सम्पन्न किया है।
प्रगति की दिशाएँ अनेक हैं, अनेक क्षेत्रों में जीवन बँटा हुआ है, पर उन सबका उचित विकास ऐसे स्वभाव की अपेक्षा रखता है जिसके कारण प्रतिकूलताएँ अनुकूलताओं के रूप में परिवर्तित होती रहें। साधन सामग्री की आवश्यकता सभी लोग अनुभव करते हैं और उन्हें प्राप्त करने के लिए जो संभव होता है सो करते भी हैं। पर इस तथ्य की उपेक्षा ही होती रहती है कि सत्प्रवृत्तियों के फलस्वरूप ही स्थायी सुख शान्ति के साधन उपलब्ध होते हैं। जितना प्रयत्न बाह्य साधनों को जुटाने में किया जाता है उतना ही यदि आत्मनिर्माण के लिए भी किया जाने लगे तो प्रगति की संभावना हजारों गुनी अधिक बढ़ सकती है।
जो भीतर होता है वही बाहर प्रस्तुत रहता है। हम अपने अन्तः-करण को दैवी सम्पत्तियों से सुसज्जित करें तो कोई कारण नहीं कि बाह्य जीवन में सुख शान्ति श्री समृद्धि और सिद्धि विभूति की प्रचुरता से वंचित रहना पड़े।
यौवनं धनसम्पत्ति प्रभुत्वमविवेकित।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥
—पंच तन्त्र
“यौवन, धन संपत्ति, प्रभुता और अविवेक इनमें से एक-एक भी अनर्थ का कारण होता है, फिर जहाँ ये चारों मौजूद हों उसके लिये क्या कहना।”
संगीत, शिल्प जैसे गुण प्रयत्न और पुरुषार्थ से मिल सकते हैं, पर समग्र विकास के लिए मानवीय सद्गुणों की ही अपेक्षा रहेगी। यदि व्यक्तित्व दोष, दूषणों से भरा हुआ है सुसंतुलित विकास कभी भी संभव न हो सकेगा। एक दिशा में थोड़ा सफल दीखते हुए भी मनुष्य अन्य सभी दिशाओं में असफल बना रहेगा। एकाँगी विकास से आनन्द एवं संतोष की परिस्थितियाँ किसी को भी प्राप्त नहीं हो सकतीं।
जिस प्रकार अच्छा बीज, उर्वर जमीन और उचित खाद पानी पाकर ठीक तरह बढ़ता और फलता फूलता है, उसी तरह जीवन के खेत में सद्गुणों के बीज उचित पुरुषार्थ की अनुकूल परिस्थितियों का खाद पानी पाकर विभूतियों एवं समृद्धियों से पल्लवित, पुष्पित और फलित होते रहते हैं। दुर्गुणी व्यक्ति अनुकूल परिस्थितियों के होते हुए भी दीनता एवं हीनता से ऊपर नहीं उठ पाते। दुर्भाग्य उन्हें जीवन सहचर की तरह हर जगह घेरे-घेरे ही फिरता रहता है। इसलिए जीवन विकास की बात सोचने के साथ ही हमें यह भी सोचना चाहिए कि व्यक्तित्व का सुसंतुलित निर्माण करने की दिशा में आवश्यक प्रयत्न किये जाते रहें।
यह सोचना गलत है कि किसी भी तरीके से धन कमा लिया और मनमाना खर्च करने की सुविधा रहे तो बस फिर आनन्द ही आनन्द रहेगा। सच बात यह है कि दुर्गुणी व्यक्तियों के पास यदि धन बढ़े भी तो इससे उनके लिए अगणित समस्याएँ तथा चिन्ताएँ उत्पन्न होंगी। धन का सच्चा लाभ सदुपयोग से मिलता है और ऐसा सदुपयोग केवल सत्प्रकृति के व्यक्तियों से ही संभव होता है।
आये दिन ऐसी घटनाएँ देखने और सुनने में आती रहती हैं कि धन सम्पत्ति की छीन झपट के प्रश्न को लेकर सम्पन्न परिवारों में फौजदारी, मुकदमेबाजी, शत्रुता एवं हत्या डकैती तक की दुर्घटनाएं घटित होती हैं। लड़के कुपात्र निकल जाते हैं और जुआ, शराब, व्यभिचार एवं अनेक प्रकार के व्यसनों में पूर्वजों की कमाई को उड़ा डालते हैं। अत्यधिक कमाने की तृष्णा में संलग्न व्यक्ति समय-कुसमय का, आराम, विश्राम का ध्यान छोड़कर दिन रात बेतरह जुटे रहते हैं और अपने स्वास्थ्य को खराब कर लेते हैं। लोभवश बेईमानी करके कितने ही व्यक्ति लोक निन्दा और परलोक में पाप के भागी बनते हैं। इस प्रकार के अनेकों अनर्थ और दुःख उन लोगों को सहन करने पड़ते हैं, जिनके पास धन तो है पर उसका सदुपयोग कर सकने लायक सद्बुद्धि नहीं है।
कई व्यक्ति स्वल्प साधना की सहायता से ही अपने मधुर स्वभाव, श्रम, पुरुषार्थ, उत्साह, सूझबूझ और अध्यवसाय के द्वारा भारी उन्नति कर लेते हैं, किन्तु कितने ही ऐसे भी होते हैं जो भरपूर, साधन सुविधाओं के होते हुए भी आलस्य, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, लापरवाही फिजूल खर्ची जैसे दोषों के कारण निरन्तर हानि उठाते चलते हैं और अन्त में दिवालिया हो जाते हैं। आज साधनों को बहुत महत्व दिया जाता है पर भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि साधनों का लाभ केवल उन्हें ही मिलेगा जिनमें आवश्यक मात्रा में सद्गुण रहे होंगे। बुरे लोग भी जो कुछ उन्नति कर पाते हैं उसमें भी अधिकाँश श्रेय उन अच्छाइयों का रहता है जो बुरे लोगों में भी एक सीमा तक रही होती हैं।
डाकू को जो सफलता मिलती है उसमें सारा श्रेय उसकी दुष्टता या अनैतिकता को ही नहीं मिल सकता। उसमें जो साहस, धैर्य, तितीक्षा, सतर्कता, निरोगिता, संगठन जैसे थोड़े बहुत गुण रहते हैं उन्हीं के बलबूते पर उसे लाभ मिलता है। यदि यह गुण न हों, कोई डाकू डरपोक, अधीर, चिन्तित, आरामतलब व आलसी, लापरवाह, रोगी, पृथकतावादी हो तो वह बहुत जल्दी विपत्ति में फँस जायगा। केवल अनीति पर उतारू होने से ही किसी को लाभदायक स्थिति प्राप्त नहीं हो सकती। चाहे सज्जन हो या दुर्जन, भले या बुरे किसी भी कार्य को सम्पन्न करने में हर मनुष्य को सुसंतुलित व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है। जिसने अपने को जितना गुणवान बना लिया होगा वह अपने लक्ष की ओर उतना ही अग्रसर बन सका होगा।
धन, शिक्षा, शिल्प, कला, कौशल, पद, यश आदि विभूतियों का उपार्जन, मन को लक्ष्य में तत्परतापूर्वक संलग्न करने, परिश्रम से प्रेम करने, समय फालतू न गंवाने, चित्त को अपने अभीष्ट विषय में लगाये रहने से ही संभव होता है। अपने अभीप्सित विषय का जिसका जितना मन लगेगा, उसके लिए जितना श्रम किया जायगा उतनी ही सफलता मिलेगी। परोपकार के श्रेष्ठ सत्कर्म कर सकना, यश और पुण्य कमाना भी उन्हीं के लिए संभव होता है जिनकी मनोभावनाएं पूरी तरह उस लक्ष में तन्मय रहती हैं।
ईश्वर प्राप्ति और आध्यात्मिक लक्ष की पूर्ति केवल वे लोग कर पाते हैं जो अपनी मनोभूमि को प्रयत्नपूर्वक दैवी गुणों से सुसज्जित और आसुरी वृत्तियों से रहित करने में प्राणमय से संलग्न होते हैं। जिन्होंने इस प्रकार आत्मनिग्रह की उपेक्षा की, दोष दुर्गुणों के सुधारने की उपेक्षा करके केवल थोड़ा पूजा पाठ करना ही पर्याप्त समझा—उनके लिए उस महान लक्ष की प्राप्ति कभी सम्भव नहीं होती।
कर्म करना—कर्तव्य धर्म का पालन मनुष्य का धर्म है। इसको छोड़ने की बिल्कुल आवश्यकता नहीं है। पर काम करते समय आत्म-भाव को न भुलाना चाहिए और इसके लिए प्रतिदिन नियमपूर्वक ध्यान करना भी जरूरी है। इस प्रकार के ध्यान से आत्मिक विचारधारा दूसरे कार्य करते समय भी बहती रहेगी। इससे दुनिया को मनुष्यों एवं घटनाओं को तुम दूसरी ही दृष्टि से देखने लगोगे। इससे स्वार्थ भी छूट जायगा और दुनिया के बन्धन भी कष्ट नहीं देंगे। सच्चा आनन्द प्राप्त करने का यही मार्ग है। संसार में कोई जाने या अनजाने आनन्द प्राप्त करने की ही चेष्टा कर रहे हैं। कोई शराब पीकर उस आनन्द का भागी बनना चाहता है और कोई उत्तम मार्ग का अवलम्बन करके उसे प्राप्त करता है। आनन्द ही मनुष्यों का सच्चा और सहज स्वभाव है। सभी लोग ऐसा निर्मल सुख चाहते हैं जिसमें किसी दुःख का पुट न हो। सभी ऐसे ही आनन्द की खोज में हैं। पर यह केवल उन्हीं को मिल सकता है जो कर्म और ज्ञान का—लौकिकता और आध्यात्म का उचित सामञ्जस्य करने में सक्षम होते हैं।
—महर्षि रमण
‘अखण्ड ज्योति परिवार’ के प्रत्येक सदस्य से अनुरोध है कि वह मार्च ओर अप्रैल के इन दो अंकों को विशिष्ट ध्यानपूर्वक दो बार पढ़े और इनमें जो विचारधारा व्यक्त हुई है, उसके संबंध में अपना अभिमत हमें सूचित करे। युगनिर्माण योजना को कार्यान्वित करने के लिए कौन क्या तैयारी कर रहा है, यह जानने के पश्चात् ही अगले कदमों को उठाया जाना सम्भव होगा। आशा है कोई परिजन उपेक्षा न करेंगे और अपना अभिमत इसी महीने में भेज देंगे।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्
वर्ष 24 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 04
नवयुग की वीणा में तू कुछ ऐसा स्वर भर!!
—रामस्वरूप खरे ‘साहित्यरत्न’
जीवन का विकास सभी दिशाओं में सन्तुलित रूप में होता रहे तो ही उसकी शोभा, प्रतिष्ठा बनती है। धन का महत्व कितना ही अधिक क्यों न हो केवल उसी का उपार्जन आनन्दमय परिस्थितियाँ उत्पन्न नहीं कर सकता। शिक्षा की महत्ता कितनी ही बड़ी क्यों न मानी जाय अन्य दिशा में यदि पिछड़ापन बना रहे तो वह पढ़ाई भी किस काम की?
स्वास्थ्य की गणना उत्तम सुखों में की जाती है, पर सब गुणों में शून्य हो, केवल भैंसे की तरह शरीर ही हृष्ट पुष्ट बना रहे तो भी उससे कितना प्रयोजन साधेगा? किसी पेड़ की सारी शाखाएँ एक ही ओर झुकी रहें तो उसके टूट गिरने का खतरा रहेगा और कुरूपता भी दिखेगी। सुन्दर वृक्ष वे ही लगते हैं जो सब ओर सामान्य रूप से फैले फूटे होते हैं। जीवन विकास के सम्बन्ध में भी यही बात लागू होती है।
एक दिशा में विकसित जीवन किसी कला कौशल के सीखने से, विशेष मनोयोग लगने से, संगति से, संयोग से, दूसरों की सहायता से या अन्य कारणों से भी हो सकता है। चिकित्सा, कला,
शरशैया पर पड़े हुए भीष्म पितामह उत्तरायण सूर्य आने पर प्राण त्यागने की तैयारी में लगे थे।
कुरु और पाण्डु कुल के नर-नारी उन्हें घेरे बैठे थे। पितामह ने उचित समझा कि उन्हें कुछ धर्मोपदेश दिया जाए। वे धर्म और सदाचार की विवेचना करने लगे।
सब ध्यानपूर्वक सुन रहे थे पर द्रौपदी के चेहरे पर व्यंग हास की हलकी सी रेखा दौड़ रही थी।
भीष्म ने उसे देखा और अभिप्राय को समझा।
वे बोले—बेटी! मेरी कल की करनी और आज की कथनी में अन्तर देखकर तुम आश्चर्य मत मानो। मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसका मन बनता है। जिन दिनों राज सभा में तुम्हारा अपमान हुआ था उन दिनों कौरवों का कुधान्य खाने से मेरी बुद्धि मलीन हो रही थी इसलिए तुम्हारे पक्ष में न्याय की आवाज न उठा सका। पर इन दिनों मुझे लंबी अवधि का उपवास करना पड़ा है सो भावनाएं स्वतः वैसी हो गईं जैसा कि मैं इस समय धर्मोपदेश में व्यक्त कर रहा हूँ।
द्रौपदी ने आहार की शुद्धि का महत्व समझा और क्षमा प्रार्थना के रूप में अपनी भूल पर दुःख प्रकट करते हुए पितामह के चरणों पर मस्तक झुका दिया।
अपने को बदले बिना दूसरों का बदला जा सकना संभव नहीं। युग-निर्माण का शुभारम्भ—श्रीगणेश अपने आपका निर्माण करने की प्रक्रिया के साथ होना चाहिए। वाणी और लेखनी की शक्ति अब धीरे-धीरे घटती जा रही है। क्योंकि वक्ता और लेखक स्वयं वैसा आचरण नहीं करते जैसा कि दूसरों से कराना चाहते हैं। चारित्रिक शिक्षा के लिए यह आवश्यक है कि उपदेशक दूसरों के सामने अपना आदर्श उपस्थित करें, यदि सद्भावनाओं की सम्पत्ति का संसार में बढ़ाया जाना उचित और आवश्यक है तो उसका प्रथम प्रयोग अपने आप पर ही आरम्भ करना चाहिए, जो वस्तु लाभदायक है उसका उपभोग सबसे पहले हम स्वयं ही क्यों न करें?
घटावभासको भानुर्घटनाशे न नश्यति।
देहवभावसकः साक्षी देह नाशे न नश्यति॥
—आत्म प्रवीघ उप0
“घड़े के भीतर दिखलाई पड़ने वाला सूर्य घड़े का नाश हो जाने पर नष्ट नहीं होता, वैसे ही देह में प्रकाशित आत्मा देह का नाश होने पर नष्ट नहीं होती।
सद्विचारों की महत्ता का अनुभव तो हम करते है पर उनकी दृढ़ता नहीं रह पाती। जब कोई अच्छी पुस्तक पढ़ते या सत्संग, प्रवचन सुनते हैं तो इच्छा होती है कि इसी अच्छे मार्ग पर चलें। पर जैसे ही वह प्रसंग पलटा कि दूसरी प्रकार के, पूर्व अभ्यास, विचार पुनः मस्तिष्क पर अधिकार जमा लेते हैं और वही पुराना घिसा-पिटा कार्यक्रम पुनः चलने लगता है। इस प्रकार उत्कृष्ट जीवन बनाने की आकाँक्षा एक कल्पना मात्र बनी रहती है उसके चरितार्थ होने का अवसर प्रायः आने ही नहीं पाता।
कारण यह है कि अभ्यस्त विचार बहुत दिनों से मस्तिष्क में अपनी जड़ जमाये हुए हैं, मन उनका अभ्यस्त भी बना हुआ है। शरीर ने एक स्वभाव एवं ढर्रे के रूप में उन्हें अपनाया हुआ है। इस प्रकार उन पुराने विचारों का पूरा आधिपत्य अपने मन और शरीर पर जमा हुआ है। यह आधिपत्य हटे और नये उत्कृष्ट विचार वह स्थान ग्रहण करें तो ही यह संभव है कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और अन्तःकरण चतुष्टय बदले। जब अन्तः भूमिका बदलेगी तब उसका प्रकाश बाह्य कार्यक्रमों में दृष्टिगोचर होगा। परिवर्तन का यही तरीका है।
उच्च विचारों को बहुत थोड़ी देर हमारी मनोभूमि में स्थान मिलता है। जितनी देर सत्संग, स्वाध्याय का अवसर मिलता है उतने थोड़े समय ही तो अच्छे विचार मस्तिष्क में ठहर पाते हैं। इसके बाद वही पुराने कुविचार आँधी तूफान की तरह आकर उन श्रेष्ठ विचारों की छोटी-सी बदली को उड़ाकर एक ओर भगा देते हैं। निकृष्ट विचारों में तात्कालिक लाभ और आकर्षण स्वभावतः अधिक होता है, चिरकाल से अभ्यास में आते रहने के कारण उनकी जड़ें भी बहुत गहरी हो जाती हैं। इन्हें उखाड़ कर नये श्रेष्ठ विचारों की स्थापना करना सचमुच बड़े अध्यवसाय का काम है।
किसी घने जंगल में कंटीली झाड़ियाँ सारी भूमि को घेरे रहती हैं, गहराई तक अपनी जड़ें जमाये रहती हैं। यदि उस जंगल को कृषि योग्य बनाना हो तो वह झाड़-झंखाड़ काटने की व्यवस्था करनी पड़ती है। फिर भूमि खोद कर जड़ें उखाड़नी पड़ती हैं। जोत कर खेत को एक समान करना पड़ता है। खाद और पानी की व्यवस्था जुटानी होती है। इतना प्रबंध करने पर ही वह घने जंगल की ऊबड़-खाबड़ भूमि परिपूर्ण अन्न उपजाने वाली कृषि भूमि के योग्य बन पाती है। मनोभूमियों को सत्कर्मों को, सद्भावनाओं की हरी-भरी फसल उगने योग्य बनाने के लिये ऐसा ही पुरुषार्थ किया जाना आवश्यक होता है।
दस-पाँच मिनट कुछ पढ़ने सुनने या सोचने, चाहने से ही परिष्कृत मनोभूमि का बन जाना और उसके द्वारा सत्कर्मों का प्रवाह बहने लगना कठिन है। इसलिये क्रम-बद्ध योजनाबद्ध, दीर्घकालीन और सुस्थिर प्रयत्न करना होता है। फैलाया हुआ पानी नीचे की ओर आसानी से बिना प्रयत्न के बहने लगता है। पर यदि उसे ऊपर पहुँचाना हो तो इसके लिए कई उपकरण जुटाने की व्यवस्था की जाती है। बिना विशेष प्रयत्नों के पानी ऊपर नहीं चढ़ सकता है। इसी प्रकार स्वल्प प्रयत्नों से मनोभूमि का परिवर्तन भी संभव नहीं और बिना आन्तरिक परिवर्तन के बाह्य जीवन में श्रेष्ठता की स्थापना हो ही कैसे सकती है?
जैसे विचारों को जितनी तीव्रता और निष्ठा के साथ जितनी अधिक देर मस्तिष्क में निवास करने का अवसर मिलता है वैसे ही प्रभाव की मनोभूमि में प्रबलता होती चलती है। देर तक स्वार्थपूर्ण विचार मन में रहें और थोड़ी देर सद्विचारों के लिये अवसर मिले तो वह अधिक देर रहने वाला प्रभाव कम समय वाले प्रभाव को परास्त कर देगा। इसलिये उत्कृष्ट जीवन की वास्तविक आकाँक्षा करने वाले के लिये एक ही मार्ग रह जाता है कि मन में अधिक समय तक अधिक प्रौढ़ अधिक प्रेरणाप्रद उत्कृष्ट कोटि के विचारों को स्थान मिले।
जिसका बहुमत होता है उसकी जीत होती है। बहती गंगा में यदि थोड़ा मैला पानी पड़ जाय तो उसकी गन्दगी प्रभावशाली न होगी, पर यदि गन्दे नाले में थोड़ा गंगाजल डाला जाय तो उसे पवित्र न बनाया जा सकेगा। इसी प्रकार यदि मन में अधिक समय तक बुरे विचार भरे रहेंगे तो थोड़ी देर, थोड़े से अच्छे विचारों को स्थान देने से भी कितना काम चलेगा? उचित यही है कि हमारा अधिकाँश समय इस प्रकार बीते जिससे उच्च भावनाएँ ही मनोभूमि में विचरण करती रहें।
संसार में बुराई इसलिए फैली है कि लोगों के मन में बुरे विचारों का बाहुल्य रहता है। चोर, डाकू, जुआरी, व्यभिचारी, व्यसनी अपने विचारों के पक्के होते हैं। जो उन्हें ठीक जाँच गया है उसी इच्छा की पूर्ति के लिए निरन्तर प्रयत्न करते हैं। निष्ठा के अनुरूप काम करने से भावान्तर में परिपक्वता आती है और उस परिपक्वता में दूसरों को प्रभावित करने की क्षमता भरी रहती है।
कुलोनमकुलीन वा वीरं पुरु षमानिनम्।
चारित्र्यमेव व्याख्याति शुचिं वा यदि वाशुचिम॥
—वाल्मीकि रामायण
“मनुष्य का आचरण ही यह बतलाता है कि यह कुलीन है या अकुलीन, वीर है या कायर, पवित्र है या अपवित्र।”
शराबी अपने विचारों में पक्का होता है। बदनामी, धनहीनता और स्वास्थ्य नाश की परवा न करके भी वह शराब पीता है। मन और कर्म की इस एकता से जो दृढ़ता उसमें रहती है उसके फलस्वरूप कई अन्य कमजोर प्रकृति के मनुष्य भी उसके प्रभाव में आकर शराब पीना सीख जाते हैं। चरित्र शिक्षण की यही पद्धति सफल होती है। बुरे स्तर के व्यक्ति अपनी बुराइयों में तन्मय रहकर दूसरे अनेकों को अपना साथी बनाते और बुराई सिखाते हैं।
बुराई की ही भाँति अच्छाई में भी अपनी शक्ति एवं विशेषता होती है पर वह प्रभावशाली तभी बनती है जब मन वचन और कर्म में एकता हो। यदि प्रौढ़ और परिपक्व आचरण के श्रेष्ठ व्यक्ति कभी प्रकाश में आते हैं तो उनसे भी अगणित लोग प्रेरणा प्राप्त करते हैं। गान्धीजी का प्रभाव अभी पिछले ही दिनों हम लोगों ने आँखों से देखा है। उनकी प्रेरणा से अगणित व्यक्तियों की भावनाएँ बदलीं और लाखों व्यक्तियों ने हँसते-हँसते भारी बलिदान की जोखिम उठाई।
अच्छाई इसीलिए पनप नहीं पाती कि उसका शिक्षण करने वाले ऐसे लोग नहीं निकल पाते जो अपनी एक निष्ठा के द्वारा दूसरों की अन्तरात्मा पर अपनी छाप छोड़ सकें। अपने अवगुणों को छिपाने के लिए या सस्ती प्रशंसा प्राप्त करने के लिए धर्म का आडम्बर मात्र ओढ़ लेते हैं। पर उपदेश कुशल बहुत हे पर जो आदर्शों को दैनिक जीवन में कार्यान्वित करें ऐसे लोग कम हैं। यही कारण है कि अच्छाई बढ़ नहीं पाती, फैल नहीं पाती। यदि सज्जनतापूर्ण सच्चे व्यक्तित्व प्रकाश में आने लगें तो उनके प्रभाव से अच्छाइयाँ भी तेजी से फैलें। बुराई का स्थान अच्छाई को मिल जाय और युग परिवर्तन की बात कुछ भी कठिन दिखाई न दे।
मातरं पितरं विप्रमाचार्य चावमन्य वे।
प पश्यति फलं तस्य प्रेतराजवशं मतः॥
—वाल्मीकि रामायण
“जो कोई माता, पिता, ब्राह्मण और आचार्य का अपमान करता है वह यमराज के यहाँ जाने पर उस पाप का फल भोगता है।”
उत्कृष्ट एवं प्रौढ़ विचारों को अधिकाधिक समय तक हमारे मस्तिष्क में स्थान मिलता रहे ऐसा प्रबंध यदि कर लिया जाय तो कुछ ही दिनों में अपनी इच्छा, अभिलाषा, और प्रवृत्ति उसी दिशा में ढल जायगी और बाह्य जीवन में वह सात्विक परिवर्तन स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगेगा। विचारों की शक्ति महान है उससे हमारा जीवन तो बदलता ही है संसार का नक्शा भी बदल सकता है।
कैसा अच्छा होता कि प्राचीन काल की तरह जीवन के प्रत्येक पहलू पर उत्कृष्ट समाधान प्रस्तुत करने वाले साधु ब्राह्मण आज भी हमें उपलब्ध रहे होते। वे अपने उज्ज्वल चरित्र, सुलझे हुए मस्तिष्क और परिपक्व ज्ञान द्वारा सच्चा मार्गदर्शन करा सकते तो कुमार्ग पर ले जाने वाली सभी दुष्प्रवृत्तियाँ शमन होतीं। पर आज उनके दर्शन दुर्लभ हैं। जो देश काल पात्र की स्थिति का ध्यान रखते हुए आज के बुद्धिवादी एवं संघर्षमय युग के अनुरूप समाधान प्रस्तुत करके जीवन को ऊँचा उठाने वाले व्यवहारिक सुझाव दे सकें, आज ऐसे मनीषी कहाँ हैं? उनका अभाव इतना अखरा है कि चारों ओर सूना ही सूना दीखता है। ऋषियों की यह भूमि ऋषि तत्व से रहित हो गई जैसी लगती है।
दुर्भाग्य एक और भी है कि स्वाध्याय के उपयुक्त साहित्य भी कहीं-कहीं ही दृष्टिगोचर होता है। पुस्तक विक्रेताओं की दुकानें खोज मारने पर मुश्किल से ही कुछ पुस्तकें ऐसी मिलेंगी जो जीवन निर्माण के लिए आज की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्यवहारिक सुझाव प्रस्तुत करती हों। प्रेसों में ऐसा कूड़ा कचरा दिन रात छपता है जिसे पढ़कर लोगों के दिमाग और भी अधिक खराब हों।
आज की परिस्थितियों में जो भी संभव हो हमें ऐसा साहित्य तलाश करना चाहिये जो प्रकाश एवं प्रेरणा प्रदान करने की क्षमता से सम्पन्न हो। उसे पढ़ने के लिए कम से कम घन्टा निश्चित रूप से नियत करना चाहिए। धीरे-धीरे समझ-समझ कर विचारपूर्वक उसे पढ़ना चाहिए। पढ़ने के बाद उन विचारों पर बराबर मनन करना चाहिये। जब भी मस्तिष्क खाली रहे यह सोचना आरम्भ कर देना चाहिए कि आज के स्वाध्याय में जो पढ़ा गया था, उस आदर्श तक पहुँचने के लिए हम प्रयत्न करें, जो कुछ सुधार संभव है उसे किसी न किसी रूप में जल्दी ही आरम्भ करें। श्रेष्ठ लोगों के चरित्रों को पढ़ना और वैसा ही गौरव स्वयं भी प्राप्त करने की बात सोचते रहना मनन और चिन्तन की दृष्टि से आवश्यक है।
दीपो भक्षयते ध्वान्तं कज्जलं च प्रसूयते।
यदत्रं भक्ष्यते नित्यं वायते तादृपूर्ण प्रथा॥
—चाणक्य
“दीपक अन्धकार को खाता है और काले काजल को जन्म देता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति प्रतिदिन जैसा अन्न खाता है उसका वैसा ही परिणाम होता है।”
जितनी अधिक देर तक मन में उच्च भावनाओं का प्रवाह बहा रहे उतना ही अच्छा है। ऐसा साहित्य हमारे लिए संजीवन बूटी का काम करेगा। उसे पढ़ना अपने अत्यन्त प्राणप्रिय कामों में से एक बना लेना चाहिए। सुलझे हुए विचारों के सच्चे मार्गदर्शक न मिलने के अभाव की पूर्ति इस साहित्य से ही संभव है। आज उलझे हुए विचारों के लोग बहुत हैं। धर्म के नाम पर आलस्य, अकर्मण्यता, निराशा, दीनता, कर्तव्य की उपेक्षा, स्वार्थपरता, संकीर्णता की शिक्षा देने वाले सत्संगों से जितनी दूर रहा जाय उतना ही कल्याण है।
कहीं से भी, किसी प्रकार से भी जीवन को समुचित बनाने वाले, सुलझे हुए उत्कृष्ट विचारों को मस्तिष्क में भरने का साधन जुटाना चाहिए। स्वाध्याय से, सत्संग से, मनन से, चिन्तन से जैसे भी बन पड़े वैसे यह प्रश्न करना चाहिए कि हमारा मस्तिष्क उच्च विचारधारा में निर्मग्न रहे। यदि इस प्रकार के विचारों में मन लगने लगे, उनके आनन्द का अनुभव होने लगे तो समझना चाहिए कि आधी मंजिल पार कर ली गई।
जीव और ब्रह्मा की एकता का विश्लेषण करते हुये गंगा तट पर बैठे हुए एक तत्वदर्शी कह रहे थे कि जीव ईश्वर का ही अंश है। जो गुण ईश्वर में हैं वे जीव में भी मौजूद हैं।
सुनने वालों में से एक ने पूछा—भगवन्! ईश्वर तो सर्वश्र और सर्व शक्तिमान है। पर जीव तो अल्पज्ञ और अल्प सामर्थ्य वाला है, फिर इस भिन्नता के रहते एकता कैसी?
प्रवचनकर्ता ने जिज्ञासु से कहा—’एक लोटा गंगा जल भर लाओ। वह नीचे बहती हुई गंगा में से जल भर लाया। उससे पूछा गया—गंगा के जल और इस लोटे के जल में कोई अंतर तो नहीं है? जिज्ञासु ने कहा—नहीं।
तत्वदर्शी ने पूछा—सामने गंगाजल में नावें चल रही हैं। एक नाव इस लोटे के जल में भी चलाओ। जिज्ञासु ने कहा—लोटा छोटा है, इससे थोड़ा-सा जल है, इतने में भला नाव कैसे चलेगी?
प्रवचनकर्ता ने गम्भीर होकर कहा—प्रिय! जीव एक छोटे दायरे में सीमाबद्ध होने के कारण लोटे के जल के समान अल्पज्ञ और अशक्त बना हुआ है। यदि यह जल पुनः गंगा में लौट दिया जाय तो उसे ईश्वर जैसी सर्वज्ञता और सर्वशक्ति सम्पन्नता सहज ही प्राप्त हो सकती है।
जिज्ञासु की समझ में ईश्वर और जीव की स्थिति का अन्तर आ गया और वह यह भी जान गया कि संकीर्णता का सीमा बन्धन हटा कर कोई भी जीव ईश्वर बन सकता है।
देश, काल और पात्र की आवश्यकताओं को देखते हुए मानव जीवन की सार्थकता के लिए हमें आज क्या कार्यक्रम अपनाना चाहिये? गंभीरतापूर्वक यह विचार करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि दुर्भावना एवं दुष्प्रवृत्ति के बढ़े हुए प्रकोप के उन्मूलन के लिए हमें प्राण-पण से जुट पड़ना चाहिए। आज इसी ताड़का का उपद्रव इस ऋषि-भूमि में सबसे अधिक हो रहा है। जब तक सद्भावनाओं की प्रवृत्ति बढ़ेगी नहीं तब तक सुधार के सारे प्रयत्न निष्फल होते रहेंगे। ऊसर भूमि में बहुत वर्षा होने पर भी घास नहीं जमती, उसी प्रकार दुर्बुद्धि भरे हुए व्यक्ति बहुत उपकार करने एवं सहयोग देने से भी ऊँचे नहीं उठ सकते।
एतावज्जन्मसाफल्य यदनायत्तवृत्तिता।
ये पराधीनताँ यातास्ते वै जीवन्ति के मृतः॥
—हितोपदेश
“स्वाधीन होना ही जन्म की सफलता है। यदि पराधीन रहने वाले को भी जीवित माना जाय तो फिर मरा हुआ किसे कहा जायगा? अर्थात् वे ही मरे हुये के समान है जो पराधीन बने हैं।”
भिक्षुओं को देखकर सहृदय व्यक्ति को दया आना स्वाभाविक है। सोचते हैं—इन बेचारों को सुखी बनाने के लिए शक्ति भर मदद करनी चाहिए। भावना से प्रेरित होकर—अपने बच्चों का पेट काटते हैं, भविष्य के लिए कुछ बचा कर रखा था उसे समाप्त करते हैं और उसे भिखारियों में बाँट देते हैं। सोचते हैं यह बेचारे सुखी होंगे, जरूरत पूरी हो जाने पर आशीर्वाद देंगे। पर जब परिणाम देखते हैं तो दूसरा ही निकलता है। प्राप्त हुए पैसों को लेकर वह भिखारी बीड़ी खरीदता है या जोड़ने के लिए जमा कर लेता है। आज का काम चल गया, कल फिर वही व्यवसाय चलाता है। इस प्रकार हमारे जैसे ढेरों दानी रोज ही उसकी सहायता करते हैं पर एक सामयिक-सी ओछी आवश्यकता मात्र वे पूरी कर पाते हैं। भिखारी आजीवन भिक्षा वृत्ति ही करता रहता है, उसके दुःख का कोई अन्त नहीं होता।
क्या यह अच्छा न होता कि उसे कुछ काम करने के लिए समझाया या दबाया जाता। उस दिशा में उसका सहयोग किया जाता। यदि यह प्रयोग सफल हो सकता तो वह भिखारी दूसरे अन्य लोगों की तरह ही अपने भुजबल से कमाता खाता, स्वावलम्बी और स्वाभिमानी जीवन-यापन करता। स्वयं माँगने की अपेक्षा दूसरों को देने की स्थिति में होता। दान देकर नहीं उसकी वृत्ति को बदल कर ही समस्या का हल हो सकना सम्भव है।
बीमारों को देखकर, उन्हें कष्ट से कराहते हुए आर्थिक संकट में फँसते हुए देखकर सहृदय की भावना जगती है, वह सोचता है, ऐसे लोगों के लिए चिकित्सालय स्थापित कराना चाहिए। इस उदार भावना से प्रेरित होकर वह अपनी सारी सामर्थ्य खर्च करके औषधालय खुलवाता है। सोचता है इससे संसार की एक बड़ी कठिनाई दूर होगी। हर साल हजारों रोगी अच्छे हुआ करेंगे। औषधालय खुलता है, दवाएँ बँटती हैं, रोगी आते हैं और अच्छे भी होते हैं। पर आरोग्य रक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं होता। आहार-विहार का असंयम करने वाले व्यक्ति रोगमुक्त होते-होते अपने पुराने ढर्रे पर फिर आ जाते हैं। फिर बीमार पड़ते हैं। फिर दवा लेने आते हैं। एक रोग से पीछा छूटा नहीं कि दूसरा आ घेरता है। ढेरों औषधियाँ खर्च होती हैं, बेचारी चिकित्सक का समय लगता है पर बीमारी की समस्या ज्यों की त्यों उलझी रहती है।
विचारशीलता कहती है कि लोगों को आदतें बदलने की प्रेरणा दिये बिना काम न चलेगा। नशेबाजी घटेगी नहीं, असंयम घटेगा नहीं, अनियमितता घटेगी नहीं तो रोग भी कब छूटने वाला है। जलते तवे पर पानी के थोड़े से छींटे क्या प्रयोजन पूरा करेंगे। दवाओं से नहीं प्रवृत्ति बदलने से रोग छटेंगे, लोगों को इसी का शिक्षण देना चाहिए।
कोई मित्र या संबंधी कर्ज या गरीबी में फँस कर अपने पास आर्थिक सहायता को आता है। अपने को कठिनाई में डालकर उसकी वह आवश्यकता पूरी कर दी गई। सोचा था बेचारा एक बड़ी मुसीबत से निकल जायगा। पर ऐसा हो नहीं सका। पिछला कर्ज तो उसने चुका दिया, रुका हुआ कारोबार भी चालू कर लिया, पर फिजूलखर्ची की आदत नहीं छोड़ी। अपनी हैसियत से अधिक, उचित-अनुचित कामों में फिर खर्च किया, लापरवाही बरती। थोड़े ही दिन बाद वही अर्थसंकट फिर सामने आ गया। अब फिर वही संबंधी पहले की तरह दुबारा सहायता की याचना करता है। अब कहाँ से दिया जाय? यदि देने की स्थिति में भी हो तो बार-बार कब तक देते रहा जायगा। ऐसे ही दस-बीस मित्रों को माँगें उठने लगीं तो अपनी रोटी भी कठिन हो जायगी।
विवेक कहता है—आर्थिक तंगी की समस्या कठोर परिश्रम करने, मितव्ययिता बरतने और लापरवाही जरा भी न करने की आदत डालने से ही सुलझेगी। आर्थिक तंगी जिन कारणों से उत्पन्न हुई है वे कारण यदि बने रहे तो कुबेर भी उनकी जरूरत पूरी न कर सकेगा। घाटा और तंगी बनी ही रहेगी। सामयिक सहायता का थोड़ा महत्व हो सकता है पर ठोस हल तो आदतें सुधारना ही है। इसी के लिए इन मित्र स्वजनों को क्यों न समझाया, दबाया जाए?
तावद्भयेन भेतव्यं यावद्भयमनागत्।
आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमशंकया॥
—चाणक्य
“तब तक ही भय से डरना चाहिए जब तक वह पास नहीं आता, परन्तु भय को अपने निकट आता देखकर निस्संकोच भाव से उस पर प्रहार करके नष्ट कर देना चाहिये।”
पुण्य-फल के अभाव में मनुष्य नाना प्रकार की आधि−व्याधियों से घिरे हुए पड़े हैं। एक तपस्वी सोचता है मैं कठोर तप करके आत्म-बल उपार्जित करूं, और उसका लाभ आशीर्वाद रूप से इन दीन दुखियों को प्रदान करूं। वह ऐसा ही करता भी है। निरन्तर कठोर तप में लगता है और कुछ पुण्य-पूँजी जमा करता है। जो दुखिया सामने आते हैं उनके लिए अपनी कमाई दान करता है। कुछ का भला होता है। तप थोड़ा, आशीर्वाद माँगने वाले बहुत, कुछ ही दिन में यह सारी पूँजी समाप्त हो जाती है। पहले जिनका दुख दूर किया था वे अब और नये कष्टों की शिकायत लेकर फिर सामने आते हैं—उनसे प्रशंसा सुनकर और भी नये दुखियों की भीड़ जमा होती है। अब क्या किया जाय? तप की पूँजी तो समाप्त हो चुकी। कष्ट तो पुण्य की पूँजी से दूर होते हैं। तप समाप्त हो गया उसे बाँटना सम्भव न रहा तो आशीर्वाद कैसे फलित हो? दुनिया की भीड़ जमा, तपस्वी खाली हाथ। जीवन भर की कठोर कमाई समाप्त हो गई पर एक भी दुखिया का कष्ट दूर न हुआ।
तपस्वी सोचता है यह तरीका गलत है। इन
दुखियों को स्वयं ही तप करने और पुण्य उपार्जित करने की प्रेरणा देनी चाहिए ताकि अपने बल-बूते पर ही यह लोग सुखी बन सकें। इनकी सच्ची सहायता प्रवृत्तियों के बदलने से ही हो सकती है। अपने ही पुण्य से कोई व्यक्ति सुखी और समुन्नत हो सकता है, अपनी मनोभूमि बदलने से ही तो दुख दारिद्र की स्थिति पलटती है।
अस्वाधीनं कथं दैवं प्रकारैरनिराध्यते।
स्वाधीनं समतिक्रम्य मातरं पितरं गुरुम्॥
—वा0रा0
“माता, पिता और गुरु—ये प्रत्यक्ष देवता हैं। इनकी अवहेलना करके अप्रत्यक्ष देवता की विविध उपचारों से आराधना करने से क्या लाभ हो सकता है?”
एक व्यक्ति सोचता है गरीबी ही सब दुखों की जननी है। इसलिए लोगों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उद्योग, उत्पादन, बाँध, बिजली, मिल, कारखाने आदि खोले जाने चाहिए, इसके लिए वह कोई कम्पनियाँ बनाता है। सरकार के द्वारा ऐसी योजनाएँ चलवाता है। कितने ही लोग काम से लगते भी हैं। तनख्वाहें भी अच्छी मिलती हैं। अनुमान था कि अब यह कर्मचारी लोग अच्छी आजीविका पाकर सुखी रहेंगे। पर बारीकी से देखने पर कुछ दूसरी ही बात दीखती है। जुआ, शराब, सिनेमा, फिजूलखर्ची, व्यसन, बदमाशी जैसे कुसंस्कार उस पैसे को देखते ही भड़क उठते हैं। अधिकाँश कमाई बुराइयों में खर्च करके वे तंगी और गरीबी में ही डूबे रहते हैं। वेतन बढ़ाने का आन्दोलन सफल होने पर बढ़ी आमदनी से जो सुख बढ़ने की सम्भावना थी वह भी सार्थक नहीं हुई। पैसा बढ़ा तो व्यसन भी बढ़े। वह लाभ नहीं ही मिला जो सोचा गया था।
इतने प्रयत्न करने के बाद देश में खुशहाली बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहने वाला सज्जन व्यक्ति इसी निष्कर्ष पर पहुँचता है कि आमदनी का लाभ तभी मिलेगा जब सद्गुण भी पनपें। दुर्गुणों के रहते बढ़ी हुई आमदनी चलनी में दूध दुहने की तरह कुछ भी लाभदायक न रहेगी। खुशहाली के लिए प्रवृत्तियाँ बदलने पर भी जोर देना आवश्यक है।
एक व्यक्ति सोचता है कि राजनीति में बड़ी शक्ति है। सरकारी प्रयत्नों के द्वारा—कानून के द्वारा—देश की काया पलट की जा सकती है। इसलिए चुनाव लड़ना चाहिए और सरकार में प्रवेश करना चाहिए। वह चुनाव में खड़ा होता है। पर वोटर तो जातिवाद के प्रलोभनों के चक्कर में फँसे पड़े हैं, उन्हें सिद्धान्तों और व्यक्तियों की अच्छाई बुराई का, देश और समाज का ध्यान नहीं, वे तो अपने व्यक्तिगत संपर्क और स्वार्थ की बात सोचते हैं। अपने मिलने-जुलने वालों को किसी लाभ की आशा से वोट देते हैं। बेचारा ईमानदार देशभक्त हार जाता है। पैसा लुटाने वाला, तरह-तरह के हथकण्डे काम में लाने वाला दुश्चरित्र व्यक्ति जीत जाता है।
हारने के बाद वह सोचता है कि सरकार से मनचाहे अच्छे काम कराना तब तक संभव नहीं जब तक कि वोटरों की प्रवृत्ति न बदले, अच्छे सदस्य ही अच्छी सरकार बनाते हैं, और अच्छे सदस्यों का चुना जाना, अच्छे विचारों की जनता द्वारा ही संभव है। इसलिए पहला कार्य वोट देने वाली जनता को देशभक्ति, कर्तव्य पालन और वोट को राष्ट्रीय धाती मानने की शिक्षा देना है। जनता जितनी बदलेगी उतनी ही सरकार सुधरेगी अच्छे दूध से ही तो अच्छा घी निकलेगा।
एक व्यक्ति सोचता है कि बड़ा अफसर या अधिकारी बन कर वह जनता का बड़ा हित साधन करेगा। इसके लिए वह उच्च शिक्षा प्राप्त करता है घोर श्रम करके इस योग्य बनता है कि अधिकारी नियुक्त हो सके। सफलता मिलती है और वह पूरी ईमानदारी एवं लगन से जन हित का ध्यान रखते हुए व्यवस्था बनाता है। पर कुछ ही दिन में वह अपने को असफल और लाचार पाता है। निर्धारित सरकारी कार्य पद्धति की आड़ लेकर नीचे के कर्मचारी कामचोरी और रिश्वतखोरी की गुंजाइश बनाये रहते हैं। बेईमान जनता और बेईमान अफसर की मिलीभगत से रिश्वत पकड़ी नहीं जाती। सताये हुये लोगों की शिकायत को बेकार बताने के लिए कर्मचारी अपने कानूनी दाँव-पेंच पहले से ही ठीक रखते हैं। दंड देने की व्यवस्था बहुत ही जटिल होने के कारण वह अफसर अपने नीचे वालों का कुछ बिगाड़ भी नहीं सकता। सुधारवादी उत्साही अधिकारी हाथ मल कर रह जाता है।
इंजीनियर और ठेकेदार मिल कर निर्माण कार्यों में गड़बड़ी करें तो उनको कैसे पकड़ा जाय? पुलिस और डाकू मिल-जुल कर षड़यंत्र बना लें तो उनकी रोक-थाम कैसे हो? रिश्वत लेने वालों और देने वालों के पारस्परिक स्वार्थ सधे रहें तो उन पर प्रतिबंध कैसे लगे? व्यभिचारिणी और व्यभिचारी का परस्पर सहयोग रहने पर कानून क्या करे? सरकारी टैक्सों की चोरी में अधिकारी और व्यापारी दोनों ही मिल जायं तो उनकी रोक कैसे हो?
प्रकट पापों से गुप्त पापों की संख्या सैकड़ों गुनी अधिक होती है। जो पाप प्रकट भी हो जाते हैं, उनके लिए तो कानूनी पेचीदगियों के कारण अपराधियों को दण्ड कहाँ मिलता है? ऐसी दशा में यह आशा करना कि अधिकारी या मिनिस्टर बन कर कोई बड़ा काम किया जा सकेगा, निराधार और निरर्थक है। अच्छी बुरी सरकारों में अन्तर तो अवश्य होता है पर समाज में फैले हुए अगणित अनाचारों को केवल सरकारी यंत्र के आधार पर ही नहीं रोका जा सकता। इसलिए जन-मानस में नैतिकता की-कर्तव्य भावना का, प्रवृत्तियों का जागृत रहना आवश्यक है। मनुष्य आत्मा की पुकार पर ही बुराइयों से रुक सकता है, पापों से बच सकता है। अन्यथा सरकार के लिए विशेषतया आज जैसी प्रजातंत्री सरकारों के लिए अपराधों को पूर्ण रूपेण रोक सकना कठिन ही है।
स्थिति पर विचार करने से यह समझ में आता है कि कानून या प्रशासन के माध्यम से नहीं, धर्म और कर्तव्य की भावनाएँ जागृत करने से मनुष्य की दुष्प्रवृत्तियाँ नियंत्रण में रह सकती हैं और तभी क्लेश, कलह, अभाव, अनाचार उत्पन्न करने वाली अनेकों बुराइयों को हटाया जा सकता है।
तदलं प्रतिपक्षमुन्नतेरवलम्व्य व्यवसाय वन्ध्यता।
निवसन्ति पराक्रमा श्रया न निवादेन समं समृद्धयः॥
—भारवि
“उन्नति-मार्ग में बाधक अनुत्साह का अवलम्बन करके पड़े रहना अनुचित है, क्योंकि सब प्रकार की समृद्धियाँ पराक्रमी-उत्साही पुरुष को ही प्राप्त होती हैं और उत्साह हीन को त्याग देती हैं।”
गुण्डागर्दी मिटाने के लिए, अपराधियों को दण्ड दिलाने के लिए संघर्षात्मक जो प्रयोग किये जाते हैं, उनसे भी दुष्टता घटती नहीं, बढ़ती है। चोर-ठग जेल में जाकर अन्य साथियों के सान्निध्य में अपनी कला में और भी अधिक पारंगत बन कर निकलते हैं। यदि उनका हृदय परिवर्तन न हुआ तो हर जेल जीवन के बाद अपराधी प्रवृत्ति के लोग और भी अधिक खतरनाक बन कर निकलते हैं। भावना बदलने से वाल्मीकि और अंगुलिमाल जैसे डाकू, अम्बपाली और गणिका जैसे शील रहित, सूर और तुलसी जैसे कामुक बदल कर कुछ से कुछ हो सकते हैं। यह उद्देश्य दण्ड मात्र से पूरा नहीं होता। संसार से अपराधों को जड़ से काटने के लिए जेल पर्याप्त नहीं, सुधारात्मक शिक्षण की उपयोगिता अधिक है।
हम ऐसे समाज में रहना चाहते हैं जहाँ सब लोग एक दूसरे को प्यार करें, सद्भाव रखें, और परस्पर उदारता एवं सहायता का मधुर व्यवहार किया करें। हर व्यक्ति परिश्रमी और सन्तोषी हो। ईमानदारी और सचाई की नीति अपनाते हुए सादगी का जीवन उच्च आदर्शों के साथ बितावे। कोई किसी का न अनहित चाहे न द्वेष करे और न अनधिकार चेष्टा करके किसी के स्वत्वों का अपहरण किया जाय।
सुख और दुख को मिल बाँट कर भोगें, अपना ही नहीं दूसरों का सुख दुख भी सब लोग अपना ही मानें। जितनी इच्छा अपनी उन्नति एवं सुविधा की रहती है उतनी ही दूसरों की भी रहे। नर-नारियों के बीच पवित्र भावनाओं की गंगा जैसी निर्मल धारा बहती रहे। दाम्पत्य-जीवन की मर्यादाओं से बाहर कोई किसी को विकार की दृष्टि से न देखे। तृष्णा और वासना को, ख्याति और पदवी को तुच्छता की दृष्टि से देखा जाय। कर्तव्य पालन के आत्मसन्तोष में परिपूर्ण तृप्ति अनुभव हो। अपराध कहीं देखने-सुनने को भी न मिलें। कोई किसी का अहित न चाहे, कोई किसी को दुखी न करे। संयम और व्यवस्था का जीवन बिताते हुए लोग निरोग रहें और दीर्घ काल तक सूखपूर्वक जिएँ।
जब मनुष्य इस प्रकार की जीवन नीति अपना लेंगे तो रोक-शोक भय, क्लेश, अभाव, युद्ध, दुर्भिक्ष, प्रकृति प्रकोप जैसे उत्पात भी कहीं देखने को न मिलेंगे। ऐसा समय ही सतयुग कहलाता है। जो विपत्तियाँ आज चारों ओर से उमड़ती घुमड़ती रहती हैं, जो समस्याएँ सारे संसार को चिन्तित किये रहती हैं वे दैवी नहीं मनुष्यकृत हैं। वह यदि अपने को संभाले, सुधारे तो परिस्थितियाँ सुधरने में देर ही कितनी लगे? प्राचीन काल में जब नीति और धर्म को जन मानस में समुचित स्थान प्राप्त था तो इस धरती पर ही स्वर्ग बिखरा पड़ा रहता था। आज के जैसी आकृति वाले मनुष्य ही तब उच्च प्रकृति के कारण देव बने हुए विचरण करते थे। ऐसा स्वर्णिम युग यदि पूर्व काल में रह चुका है तो प्रयत्न करने पर अब वैसा ही फिर क्यों नहीं हो सकता?
मनुष्य बुद्धिमान प्राणी है। प्रयत्न करने पर वह यह सोच और समझ सकता है कि उसका वास्तविक कल्याण किस में है। कुविचारों और कुकर्मों को अपना कर सुख प्राप्त करने की उसकी आकाँक्षा पूर्ण नहीं हुई। इतिहास भी उसकी व्यर्थता सिद्ध करता है और प्रत्यक्ष अनुभवों से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि ‘पाप करने और सुख पाने’ की नीति गलत है उससे किसी अच्छे परिणाम की आशा नहीं की जा सकती। सादगी और सचाई का जीवन चाहे देखने में साधारण ही क्यों न प्रतीत हो, चमक दमक के आकर्षणों से रहित ही क्यों न
कर्मायत्तं फलं पुँसाँ बुद्धिः कर्मानुसारिणी।
तथापि सुधियश्चार्याः सुविचार्येव कुर्वते॥
—चाणक्य
“फल मनुष्य के कर्म के अधीन है और बुद्धि कर्म के अनुसार आगे बढ़ने वाली है, तथापि विद्वान और सज्जन व्यक्ति अच्छी तरह से विचार करके ही कोई कार्य करते हैं।”
हो, अन्ततः श्रेयस्कर ही सिद्ध होता है। सन्तोष और आनन्द उसी में मिल सकता है।
मनुष्य जाति समय-समय पर विभिन्न प्रयोग करती रही है, अतीत में समय-समय पर उसने अनुभवों से लाभ उठाया और भूलों को सुधारा है। यदि समुचित प्रयत्न किये जाय तो वह सीधी चाल पर चलने के लिये फिर भी उद्यत हो सकती है। शान्ति का आकाँक्षी मनुष्य, उसके उचित मूल्य को चुकाने के लिए रजामंद हो भी सकता है। यह कोई असंभव बात नहीं है कि भौतिकवाद के दुष्परिणामों को भली प्रकार देख लेने के बाद विश्व-मानव की अन्तरात्मा पुनः आध्यात्मवाद की ओर मुड़ पड़े। इस प्रकार का तनिक-सा परिवर्तन यदि हो सके, दृष्टि कोण में जरा सा अन्तर आ जाय, जितनी चेष्टा कुमार्ग पर चलने की रहती है उससे आधी भी सन्मार्ग की ओर होने लगे, तो युग परिवर्तन का स्वप्न साकार होने में देर ही कितनी लगेगी?
पाप कर्मों की योजना, तैयारी एवं सफलता अत्यधिक चतुरता पर निर्भर रहती है। कम प्रयत्न, कम साहस, कम प्रतिज्ञा और कम बुद्धिमता से पाप कर्म कर सकना संभव नहीं हो सकता। यदि कोई वैसा दुस्साहस करेगा तो उसकी कलई जल्दी ही खुल जायगी। पाप करना और उसे छिपा लेना,
न शुद्रोऽपि प्रथम सुकृता पेक्षया संश्रयाय।
प्राप्ते मित्रे भवति विमुखः किम्पुनर्यस्तयोच्चैः॥
—कालिदास
“अपने साथ उपकार करने वाला मित्र यदि दैवयोग से अपने घर आ जाय तो सामान्य मनुष्य भी प्रेमपूर्वक उसका आदर करते हैं, उससे विमुख नहीं होते, फिर उच्चाशय व्यक्तियों का तो कहना ही क्या है।”
दंड से बचे रहना साधारण चतुरता का काम नहीं है। जो लोग इतना कर सकते हैं वे इससे आधी भी चतुरता सत्कर्मों में लगादे तो जीवनमुक्त नहीं तो महापुरुष अवश्य ही बन सकते हैं।
सचाई का मार्ग सीधा और सरल है। कम बुद्धिमान आदमी भी ईमानदारी का आचरण कर सकता है। सन्मार्ग पर चलने लगना वस्तुतः कुछ विशेष कठिन नहीं है। थोड़ी-सी सादगी अपना ली जाय, जरा सी मेहनत और बढ़ा दी जाय, मन की लोलुपता को जरा-सा रोक लिया जाय तो ईश्वर का पुत्र-मनुष्य जो आत्मा बनकर इस धरती पर अवतीर्ण हुआ है यहाँ से परमात्मा बन कर वापिस जाने की शानदार सफलता प्राप्त कर सकता है। जीवन का पूरा-पूरा लाभ ले सकता है।
प्रयत्न से सब कुछ हो सकता है। प्रयत्न से युग भी बदला जा सकता है। प्रगति के पथ पर हर दिशा में तेजी से कदम बढ़ाते-चलने वाले मनुष्य के लिए यह बात क्यों कठिन होनी चाहिये कि वह विवेकसंगत दृष्टिकोण के साथ अपनी जीवन-नीति निर्धारित करे, और यदि पिछले दिनों कुछ भूल होती रही है तो उसे साहसपूर्वक सुधार ले? इस प्रकार का मोड़ अब आने ही वाला है। विश्व-मानव की अंतरात्मा अब आकुलता पूर्वक यह चाहने लगी है कि समय बदले, परिस्थितियाँ उलटें, और शोक−संताप उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियों पर अंकुश लगे। अन्तरिक्ष से, दशों दिशाओं से यही प्रतिध्वनि उठती है और ईश्वरीय आश्वासन मिल रहा है कि यह परिवर्तन निकट भविष्य में होकर रहेगा।
नाव में लगे रहने वाले पतवार चाहे कितने ही तुच्छ प्रतीत क्यों न हों नौका की दिशा बदलने का श्रेय उन्हीं को मिलता है। रेल की लाइन बदलने वाले, मोटर को घुमाने वाले, जहाजों की दिशा फेरने वाले पुर्जे छोटे-छोटे होते हैं पर इन शक्तिशाली यंत्रों का संचालन इन्हीं के आधार पर संभव होता हैं। घोड़े के मुँह में रहने वाली लगाम, ऊंट की नकेल, बैल की नाथ, हाथी का अंकुश, सरकस का शेर का हंटर जरा-जरा से ही तो होते हैं पर उन्हीं से यह शक्तिशाली पशु नियंत्रण में रखे और उपयोग में लाये जाते हैं। समाज भी एक प्रबल एवं शक्तिशाली यंत्र वाहन के समान है।
जब तक मानव मन में भरी हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटा कर उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठापना न होगी तब तक संसार की एक भी उलझन न सुलझेगी।
प्रवृत्तियों के परिवर्तन की दिशा में हर मनुष्य चाहे वह कितना ही अयोग्य एवं तुच्छ क्यों न हो, कुछ-न-कुछ कर सकता है। ऐसा कर्तृत्व जन-मानस में उत्पन्न किया जाना चाहिए। प्रश्न केवल यह है कि इसे करे कौन? नींव का पत्थर, नाव का पतवार, रेल की पटरी, मोटर का पेट्रोल, देखने में तुच्छ भले ही लगें पर अनिवार्य आवश्यकता तो उन्हीं की रहती है। यह आवश्यकता पूर्ण न हो तो इन शक्तिशाली यंत्रों की गतिविधियाँ रुकी ही पड़ी रहेंगी। आज प्रगति का अभियान इसी लिए रुका पड़ा है कि उसे अग्रगामी बनाने वाले लौह पुरुष दृष्टि गोचर नहीं होते। सस्ती वाहवाही लूटने वाले लुटेरे हर जगह मौजूद हैं, नाम बड़ाई के भूखे भिखारी जनसेवा के सदावर्त से अपनी भूख बुझाने के लिए इधर-उधर मारे-मारे फिरते रहते हैं, पर बीज की तरह गल कर विशाल वृक्ष के रूप में परिणत जो हो सकें ऐसा साहस किन्हीं बिरलों में ही होता है।
युग निर्माण की नींव खोदी जा रही है, उस विशाल भवन के निर्माण की योजना बन चुकी है। अब केवल नींव में रखे जाने वाले पत्थरों की तलाश है। भारत भूमि की विशेषता और ऋषि-रक्त की महत्ता पर जब ध्यान देते हैं तो यह विश्वास सहज ही हो जाता है कि कर्तव्य की पुकार सुनने और उसे पूरा करने वाले तत्व यहाँ सदा से रहे हैं और अब भी उनका बीज नाश नहीं हुआ है।
नदी में बाढ़ आई। फुफकारती हुई सर्पिणी की तरह लहरें तट की मर्यादा को तोड़ती हुईं चारों और फैलने लगीं।
प्रवाह में भारी प्रचंडता थी। तटवर्ती वृक्ष और भूखण्ड उसकी लपेट में आकर धराशायी होने लगे।
किनारे पर शमी का एक विशाल वृक्ष मुद्दतों से अकड़ा खड़ा था। वह सोचता था मेरी जड़ें गहरी हैं मैं परिपक्व भी हूँ और सुदृढ़ भी, इन लहरों की क्यों परवा करूं ?
उसका सोचना चल ही रहा था कि लहरों ने जड़ के नीचे की मिट्टी काटनी शुरू कर दी। हर लहर के साथ मिट्टी खिसकने लगी। मजबूत तने से प्रवाह टकराया तो वहाँ एक नया संघर्ष होने लगा। वृक्ष की निश्चितता काम न आई। देखते-देखते वह उखड़ गया। देखने वालों ने आश्चर्य से देखा कि नदी तट का पुरातन शमी लहरों पर उतराता हुआ लुढ़कता-पुढ़कता बहा चला जा रहा है।
पास ही एक बेंत का छोटा सा गुल्म खड़ा था। उसने सोचा विपत्ति आने से पूर्व सुरक्षा का उपाय कर लेना चाहिए। वह झुका और मिट्टी के सतह पर लेट गया। गरजती हुई पानी की लहरें उसके ऊपर होकर गुजरती रहीं। बाढ़ उतरी तो देखने वालों ने देखा कि बेंत का पौधा सुरक्षित है और खतरा टलते ही अपना मस्तक उठाने की तैयारी कर रहा है।
पूछने वालों ने पूछा—विशाल शमी वृक्ष क्यों उखड़ गया और बेंत का छोटा पौधा बाढ़ से बचा रहा?
बताने वाले ने बताया—अहंकारी अक्खड़ और अदूरदर्शी समय की गति को नहीं पहचानते और ढिठाई उन्हें ले बैठती है। किन्तु जो नम्र हैं, दूरदर्शी और विवेकवान हैं, वे झुकते हैं, टकराने से बचते हैं और सज्जनता का सुफल देर तक प्राप्त करते रहते हैं।
उत्तमा स्वयमाख्याता पितुः ख्याता च मध्यमाः।
अधमा मातुलात् ख्यात् श्वसुर हयाताधमावमा॥
—अज्ञात
“उत्तम पुरुष स्वयं अपने नाम से प्रसिद्ध होते हैं, मध्यम पुरुष अपने पिता के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं, निम्न श्रेणी वाले मामा के नाम से ख्याति प्राप्त करते हैं और सबसे नीचे दर्जे के व्यक्ति ससुर के नाम से प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं।”
चिर संचित संस्कार धीरे-धीरे ही दूर होते हैं। छोड़ देने की इच्छा रहते हुये भी अभ्यास में आई नई बातें बार-बार प्रबल हो उठती हैं और प्रयत्नों को असफल करने की रचना रचती हैं। यह कठिनाई प्रत्येक आत्मसुधार करने वाले के सामने आती है। सफल वही होता है जो असफलताओं से खिन्न होकर प्रयत्न नहीं छोड़ता। बार-बार भूलें होना स्वाभाविक है पर उन्हें सुधारने की प्रक्रिया छोड़ी नहीं जानी चाहिए। निराश हुये बिना, बार-बार लौट आने वाले बुरी आदतों को सुधारने में लगा ही रहना चाहिए।
अपनी अच्छाइयों को भी समझना चाहिये। जो सद्गुण मौजूद हैं उन्हें बढ़ाना चाहिए, जो नहीं हैं उन्हें उत्पन्न करना चाहिये। नशेबाजी की आदत किसी को जन्म से ही नहीं होती। पीछे से सीखी जाती है। जो सद्गुण हमें अब तक के वातावरण में प्राप्त नहीं हो सके हैं, उन्हें सीखने का अभ्यास अब आरम्भ किया जा सकता है। सिखाने से बन्दर जैसा उद्दण्ड जानवर तरह तरह के खेल तमाशे करना सीख जाता है तो कोई कारण नहीं कि मन पर लाठी के बल से नियन्त्रण रखा जाय, प्यार पुचकार से समझाया जाय तो वह भी सद्गुणों को अपने स्वभाव का अंग न बना ले। यह कार्य कठिन दीखता तो है पर वस्तुतः वैसा नहीं है।
कुरंग, मातंग, पतंग, भृंग, मीना
हताः पंच भिरेव पंच।
एकः प्रमादी स कथँ न हन्यते
यस्सेवते पंचभिरेव पंच॥
“हिरन गाने से, हाथी कामोपभोग से, पतंग रूप पर मोहित होने से, भ्रमर गंध से और मछलियाँ जिह्वा के स्वाद में आसक्त होकर अपने प्राण खोते हैं। फिर जिन्हें, पाँच इन्द्रियाँ हैं और जो उन सबों के विषय में फँसे रहते हैं तो वे मृत्यु-संकट से कैसे रक्षित रह सकते हैं?”
रात को सोते समय दिन भर के कार्यों का लेखा जोखा लेना चाहिये। जिस प्रकार प्रातः या दिन में कोई समय स्वाध्याय के लिये नियम किया गया है उसी प्रकार रात को सोते समय कुछ मिनट अपने दिन भर के कामों पर समीक्षक की कठोर दृष्टि से आवश्यक विवेचन करने में लगाये जायँ। शरीर से प्रायः कम ही दुष्कर्म होते हैं पर मन में यह बुरी लत पड़ी रहती है कि छोटे कारणों को लेकर बुरी-बुरी बातें सोचने लगे। किसी का रूप यौवन देखकर उसकी ओर अनैतिक भाव उठते हैं, कोई हमारी थोड़ी-सी हानि कर दे तो उसके प्रति मारने मरने तक की प्रतिहिंसा जगती है, किसी की बढ़ती को देखकर ईर्ष्या होना, कहीं स्वार्थ सधता दीखे तो चोरी की इच्छा होना जैसे अनेकों दुर्भाव मन में उठते रहते हैं। यद्यपि वह दुर्भाव कार्यान्वित नहीं हो सके, किसी पर प्रकट भी नहीं हुए, पर उनसे अपनी जो हानि होनी थी वह तो हुई ही। मनोभूमि अपवित्र हुई, अनीति को प्रश्रय मिला और पाप का बीजाँकुर उत्पन्न हुआ। यदि कभी ऐसा अवसर आवे कि बाहरी रोक-थाम न हो तो उठने वाले कुविचार आसानी से चरितार्थ भी हो सकते हैं।
जो चोरी करने की बात सोचता रहता है उसके लिये अवसर पाते ही वैसा कर बैठना क्या कठिन होगा? शरीर से ब्रह्मचारी और मन से व्यभिचारी बना हुआ व्यक्ति वस्तुतः व्यभिचारी ही माना जायगा। मजबूरी के प्रतिबन्धों से शारीरिक क्रिया भले ही न हुई, पर वह पाप सूक्ष्म रूप से मन में तो मौजूद था। मौका मिलता तो वह कुकर्म भी हो ही जाता।
कई बार सदाचारी समझे जाने वाले लोग आश्चर्यजनक दुष्कर्म करते पाये जाते हैं । उसका कारण यही है कि उनके भीतर-ही-भीतर वह दुष्प्रवृत्ति जड़ जमाये बैठी रहती है। उसे जब भी अवसर मिलता है नग्न रूप में प्रकट हो जाती है। इसलिये प्रयत्न यह होना चाहिये कि मनोभूमि में भीतर ही भीतर छिपे रहने वाले दुर्भावों का उन्मूलन करते रहा जाय।
रात को सोते समय आत्म-निरीक्षण करके यह देखना चाहिये कि आज कब-कब, किस-किस घटना को लेकर क्या-क्या दुर्भाव हुए? फिर सोचना चाहिए कि इन भावों के स्थान पर किन-किन भावों का आना उचित था। आगे जब कभी ऐसे अवसर आवें तो इस प्रकार सोचने की बजाय हम इस प्रकार सोचा करेंगे, इस प्रकार की विचारणा करनी चाहिए और मन को वैसी ही सलाह देनी चाहिये। इसके लिये कोई कठोर व्रत लेने की जरूरत नहीं है, क्योंकि दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन एक दिन का काम नहीं है। रोज ही यह प्रयत्न चलता रहे तो दृष्टिकोण स्वयं ही बदलने लगता है। दुष्प्रवृत्तियां वहीं पनपती रहती हैं जहाँ उनकी रोक-थाम नहीं होती। चोरों की घात अँधेरे में ही लगती है, मच्छर सीलन के स्थान पर अण्डे देते हैं, इसी प्रकार दुष्प्रवृत्तियाँ वहीं पनपेंगी जहाँ उन पर कड़ी नजर न रक्खी जायगी। जहाँ चौकीदारी का, जाँच पड़ताल का, ठीक प्रबन्ध रहता है वहाँ चोरों की घात नहीं लगती। दुर्भाव भी एक प्रकार के चोर ही हैं जो वहाँ ठहरते हैं जहाँ निरीक्षण न होता हो। चौकसी और निगरानी को देखकर उन्हें वह स्थान छोड़ने को ही विवश होना पड़ता है।
अगले दिन क्या कार्य करने हैं और उनमें क्या-क्या ऐसे अवसर आ सकते हैं जिनमें दुर्भावनाएं उठने की संभावना है। यदि आशंका के अनुरूप परिस्थिति आये तो उस समय मन में क्या-क्या प्रतिक्रिया उठे? क्या दृष्टिकोण रहे? आदि बातों को पहले से ही सोच रखना चाहिए और अवसर आने पर वैसी ही भावनाएँ मन में लाने का प्रयत्न करना चाहिए।
इस प्रकार दिन में सद्विचारों का अभ्यास करना और रात को उनकी विवेचना करना उचित है। आज की समीक्षा और कल की तैयारी करने से कुविचारों पर नियंत्रण प्राप्त करते चलना सहज होता जाता है। उसी प्रकार जो सद्गुण अपने में नहीं थे, उन्हें किस प्रकार धीरे-धीरे अपने स्वभाव में शामिल किया जाय, इसकी नित्य विवेचना होती रहे तो उनका भी अभ्यास में सम्मिलित हो जाना कुछ कठिन नहीं रहता।
दिन में किसी समय कम से कम एक घण्टे का जीवन-निर्माता स्वाध्याय, रात को एक या आधा घण्टा आत्म-निरीक्षण एवं निर्माण की विवेचना का यदि नित्य नियम रहे और दिनभर अपने विचारों और आचरणों पर कड़ी निगरानी रखी जाय तो हमारी आन्तरिक गतिविधियों में भारी परिवर्तन हो सकता है। दैनिक जीवन में क्या परिस्थितियाँ उत्पन्न होने पर आमतौर से क्या विचार उठा करते हैं उन्हें समझना चाहिए और यह विचार करना चाहिये कि उनमें कितना औचित्य एवं कितना अनौचित्य रहता है। जो अनुचित हो उसे छोड़कर उसके स्थान पर उचित दृष्टिकोण अपनाने की बात सोची जाय तो यह विचारणा कार्य रूप में भी परिणत होने लगती है।
नात्युच्चशिखरो मेरुः नातिनीचं रसातलम्।
व्यवसायद्वितीयानाँ नाप्यापारो महोदधिः॥
—अज्ञात
“उद्योगी पुरुष के लिये सुमेरु पर्वत की चोटी भी अधिक ऊँची नहीं है, उसके लिये रसातल भी अधिक गहरा नहीं है और न वह समुद्र को ही अथाह और अपार समझता है।
यदि विचार बदल जायेंगे तो कार्यों का बदलना सुनिश्चित है। कार्य बदलने पर भी विचारों का न बदलना संभव है, पर विचार बदल जाने पर उनसे विपरीत कार्य देर तक नहीं होते रह सकते। विचार बीज है, कार्य अंकुर। विचार पिता है, कार्य पुत्र। इसलिए जीवन परिवर्तन का कार्य विचार परिवर्तन से ही आरम्भ होता है। जीवन निर्माण का-आत्म-निर्माण का अर्थ है—”विचार निर्माण।”
लोहे से लोहा काटा जाता है, काँटे से काँटा निकलता है, विष को विष मारता है, सशस्त्र सेना का मुकाबला करने के लिए वैसी ही सेना चाहिए। कुविचारों का शमन सद्विचारों से ही संभव है। इसलिए यह नितान्त आवश्यक है कि अपने गुण, कर्म स्वभाव में जो त्रुटियाँ एवं बुराइयाँ दिखाई दें उनके विरोधी विचारों को पर्याप्त मात्रा में जुटा कर रखा जाय और उन्हें बार-बार मस्तिष्क में स्थान मिलते रहने का प्रबन्ध किया जाय। जब आलस्य घेर रहा हो तब परिश्रम, उत्साह स्फूर्ति और तत्परता को प्रोत्साहन देने वाले विचारों पर देर तक मनन चिन्तन करना चाहिए, आलस्य हट जायगा। जब कामुकता जग रही हो तो ब्रह्मचर्य, मातृ-भावना एवं चारित्रिक पवित्रता की विचारधारा को मन में स्थान देना चाहिए वासना शाँत हो जायगी।
क्रोध का आवेश चढ़ रहा हो तो शान्ति, प्रेम, क्षमा, मैत्री, सहानुभूति, उदारता की दृष्टि से विचार करना शुरू कर देना चाहिए, गुस्सा ठंडा हो जायगा। शोक, निराशा और चिन्ता घेरने लगे तब साहस, आशा, पुरुषार्थ और पुनर्निर्माण की बात सोचनी चाहिए, मन सन्तुलित होने लगेगा। यदि निकृष्ट विचार मनुष्य को गिरा सकते हैं तो उत्कृष्ट विचार उसे ऊँचा भी उठा सकते हैं।
पादाहत यदुत्थाय मूर्धानमधिरोहति।
स्वस्थादेवापमानेऽपि देहिनस्तद्वरं रजः॥
—माघ
“जो धूल पैर से ठुकराए जाने पर उड़ कर ठोकर मारने वाले के सिर पर चढ़ कर बैठ जाती है, वह अपमान सह कर भी निश्चिन्त बने रहने वाले देहधारी मनुष्य की अपेक्षा श्रेष्ठ है।”
अपनी दुर्बलताएँ छोड़ने के लिए यह आवश्यक है कि उनकी हानियों पर अधिक से अधिक विचार किया जाय। साथ ही वह बुराई छोड़ देने पर जो लाभ मिलेगा उसका आशापूर्ण चित्र भी मन में बनाना चाहिए। नशा छोड़ना हो तो उसके द्वारा जो शारीरिक, आर्थिक और मानसिक हानियाँ होती हैं उन पर विचार करना और उसे छोड़ने पर स्वास्थ्य सुधार, पैसे की बचत तथा मनोबल बढ़ने का सुनहरा चित्र मनःक्षेत्र में स्थापित करना आवश्यक है। कुछ दिन लगातार यह उपक्रम चलने लगे तो नशे के प्रति घृणा हो जायगी और वह अवश्य छूट जायगा । किन्तु यदि इस प्रक्रिया को पूर्ण किये बिना ही किसी जोश आवेश में नशा छोड़ देने की प्रतिज्ञा कर ली है तो यह आशंका ही बनी रहेगी कि वह उत्साह ठण्डा होने पर पुरानी आदत फिर प्रबल हो उठे और नशा करना शुरू हो जाय। इसलिए इस सुनिश्चित तथ्य को भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि जीवन को सुधार की दिशा में मोड़ने के लिए उत्कृष्ट कोटि की विचारधारा को मनोभूमि में नियमित रूप से स्थान देते रहना नितान्त आवश्यक है। इस अनिवार्य आवश्यकता की उपेक्षा करके कभी कोई व्यक्ति न अब तक आत्म निर्माण कर सकता है और न आगे कर सकेगा।
युग निर्माण का सद्संकल्प सितम्बर अंक में छपा है। इसे नित्य दुहराना चाहिए। स्वाध्याय से पहले इसे एक बार भावनापूर्वक पढ़ना और तब स्वाध्याय आरम्भ करना चाहिए। सत्संगों और विचार गोष्ठियों में इसे पढ़ा और दुहराया जाना चाहिए। एक व्यक्ति संकल्प का एक-एक वाक्य पढ़े और बाकी लोग उसे दुहरावें। इस सत्संकल्प का पढ़ा जाना हमारे नित्य नियमों का एक अंग रहना चाहिए।
यदि हम अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठता के ढाँचे में ढालने के लिये सचमुच ही उत्सुक एवं उद्यत हों तो अपने दैनिक कार्यक्रम में उत्कृष्ट विचारधाराओं को मस्तिष्क में ठूँसने का एक नियमित विभाग बना ही लेना चाहिए। मन लगे चाहे न लगे, फुरसत मिले चाहे न मिले, इसके लिये बलपूर्वक, हठपूर्वक समय निकालना ही चाहिए। नित्य कितने ही काम अनिच्छापूर्वक भी करते रहते हैं और समय न रहने पर भी आकस्मिक स्थिति के अनुरूप समय निकालना पड़ता है। विचार-निर्माण को भी ऐसी ही एक अनिवार्य आवश्यकता मानना चाहिए और उसके लिए हठपूर्वक कटिबद्ध हो जाना चाहिए। थोड़े ही समय में यही क्रम बहुत ही रुचिकर लगने लगेगा, सन्तोष और आनन्ददायक प्रतीत होगा।
नित्य नियमित ईश्वर उपासना के बारे में हम सदा से कहते रहे हैं। चरित्र निर्माण की आधार-शाला आस्तिकता है। ईश्वर विश्वास छोड़ देने से मनुष्य अंकुश रहित उन्मत्त हाथी की तरह आचरण करता है-अपने लिए तथा दूसरों के लिए विपत्ति का कारण बनता है। इसलिए हम में से हर एक को किसी न किसी रूप में ईश्वर उपासना नित्य ही करनी चाहिए। गायत्री उपासना की शिक्षा “अखंड ज्योति” के पृष्ठों पर लम्बे समय से हम देते चले आ रहे हैं। वह न बन पड़े तो जितना भी जिस प्रकार भी संभव हो ईश्वर स्मरण करना चाहिए। इतना तो हर कोई कर सकता है कि सो कर उठते समय पन्द्रह मिनट ईश्वर का ध्यान स्मरण करके तब अन्य कार्य करे इसी प्रकार रात को सोते समय भी परमात्मा का स्मरण करते हुए सोया जाय।
“अखण्ड ज्योति” के प्रत्येक पाठक को व युगनिर्माण योजना के प्रत्येक सदस्य को (1) अपने दैनिक जीवन में उपासना को स्थान देना चाहिये। (2) स्वाध्याय के लिए कोई निश्चित समय निर्धारित करना चाहिए। (3) नित्य युग निर्माण का सत्संकल्प पढ़ना चाहिये। (4) सोते समय आत्मनिरीक्षण का कार्यक्रम नियमित रूप से चलाना चाहिये। (5) दिन में समय-समय पर कुविचारों से लड़ते रहने की तैयारी करनी चाहिये। यह पाँच कार्यक्रम आत्मनिर्माण की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक हैं। युग-निर्माण अपने आप से ही आरम्भ करना है, इसलिये यह पाँच कार्य जितनी जल्दी आरम्भ किये जा सकें उतना ही उत्तम है।
प्राचीन काल में गुरु अपने शिष्यों को विद्याध्ययन के साथ-साथ अनुशासन, शिष्टाचार, क्षमाशीलता, तितीक्षा आदि सद्गुणों की भी शिक्षा देते थे। उस समय यह विश्वास था कि विद्या के समान ही चरित्र भी आवश्यक है और उसके शिक्षण पर भी पूरा-पूरा ध्यान दिया जाना चाहिये।
ऋषि धौम्य के आश्रम में कितने ही छात्र पढ़ते थे। वे उन्हें पूरी तत्परता से पढ़ाते, साथ ही सद्गुणों की वृद्धि हुई या नहीं इसकी परीक्षा भी लेते रहते थे।
एक दिन मूसलाधार वर्षा हो रही थी। गुरु ने अपने छात्र आरुणि से कहा बेटा! खेत की मेंड़ टूट जाने से पानी बाहर निकलता जा रहा है सो तुम जाकर मेंड़ बाँध आओ।” छात्र तत्काल उठ खड़ा हुआ और खेत की ओर चल दिया।
पानी का बहाव तेज था। छात्र से रुका नहीं। कोई उपाय न देख आरुणि इस स्थान पर स्वयं लेट गया। इस प्रकार पानी को खेत में रोके रहने में उसे सफलता मिल गई।
बहुत रात बीत जाने पर भी जब छात्र न लौटा तो धौम्य को चिन्ता हुई और वे खेत पर उसे ढूंढ़ने पहुँचे। देखा तो छात्र पानी को रोके मेंड़ के पास पड़ा है। देखते ही गुरु की छाती भर आई। उसने उठा कर शिष्य को गले लगा लिया।
इसी प्रकार धौम्य ने अपने एक दूसरे छात्र उपमन्यु को गौएँ चराते हुए अध्ययन करते रहने की आज्ञा दी। पर उसके भोजन का कुछ प्रबन्ध न किया और देखना चाहा कि देखें वह किस प्रकार अपना काम चलाता है। छात्र भिक्षा माँग कर भोजन करने लगा। वह भी न मिलने पर गौओं का दूध दुह कर अपना काम चलाने लगा।
धौम्य ने कहा—”बेटा! उपमन्यु छात्र के लिये उचित है कि आश्रम के नियमों का पालन करे और गुरु की आज्ञा बिना कार्य न करे।” छात्र ने अपनी भूल स्वीकार की और कहा भविष्य में भूखा रहना तो बात क्या है, प्राण जाने का अवसर आने पर भी आश्रम की व्यवस्था का पालन करूंगा। उसने कई दिन निराहार होकर दुर्बल हो जाने तक अपनी इस निष्ठा की परीक्षा भी दी।
छात्र संतुष्ट थे कि उन्हें सद्गुण सिखाने के लिये कष्टसाध्य कार्यों के द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है। सच्ची विद्या अक्षर ज्ञान में नहीं, सद्गुणों से परिपक्व श्रेष्ठ व्यक्तित्व में ही सन्निहित है।
युग निर्माण के लिए आवश्यक प्रयत्न करने के लिए आवश्यक है कि जिस दुनिया में हम रहते हैं यदि वह गंदी और दूषित रही तो अपने लिए ही संकट और चिन्ता की स्थिति बनी रहेगी। यदि चारों ओर दुष्टतापूर्ण वातावरण बना हुआ हो तो अपने सत्प्रयत्न भी निरर्थक चले जाते हैं।
चोर, डाकू, दुष्ट, दुराचारी, व्यभिचारी, बेईमान, गुण्डे और शरारती लोगों के बीच रह कर कोई सज्जन व्यक्ति भी अपनी सज्जनता की रक्षा नहीं कर सकता। उसके मार्ग में इतनी अड़चनें उत्पन्न हो जाती हैं कि उन्हें सुलझाने और सँभालने में ही अधिकाँश शक्ति खर्च होती रहती है। प्रगति और आत्म कल्याण की बात सोचने और वैसी व्यवस्था बनाने के लिए मनोबल ही शेष नहीं रह पाता। क्षोभ और सन्ताप से ग्रस्त व्यक्ति प्रतिरोध और प्रत्याक्रमण की बात ही सोच सकता है। उसका मन अशुभ भावनाओं में ही डूबा रहेगा और विवश होकर वह गतिविधि अपनानी पड़ेगी जो उसे कभी भी प्रिय नहीं थी।
आत्मिक प्रगति के लिए उपयुक्त वातावरण बना रहे इसके लिए यह आवश्यक है कि दुष्टता की प्रवृत्तियों का शमन करने के लिए हम प्रयत्नशील रहें। उपेक्षा करने से तो विपत्ति और भी बढ़ेगी। अनीति पर यदि अंकुश न रहे, दुष्टता पर यदि नियंत्रण न रहे तो वह दिन दूरी रात चौगुनी गति से अपना विस्तार करेगी। इसलिए मानव-समाज में बढ़ती जाने वाली दुष्प्रवृत्तियों की ओर से आँखें मूँद कर नहीं बैठे रहना चाहिये। अन्यथा संसार में जो पाप-ताप की ज्वालाएँ बढ़ेगी उनकी चपेट में अपना छप्पर भी आये बिना न रहेगा। दूषित वातावरण में अच्छे व्यक्ति की भी शान्ति सुरक्षित नहीं रहती।
अपनी व्यक्तिगत सुख शान्ति एवं सुरक्षा की दृष्टि से भी विचार करें तो यह आवश्यक प्रतीत होगा कि व्यापक क्षेत्र में फैली हुई बुराइयों के प्रतिरोध के लिए समुचित ध्यान रखा जाय और कुछ काम किया जाय। युग-निर्माण की बात केवल पुण्य-परमार्थ की दृष्टि से नहीं, स्वार्थों की, सुरक्षा की बात ध्यान रख कर भी सोचनी चाहिए। मुहल्ले में व्यापक व्यभिचार फैला हो तो उसकी चर्चा और प्रेरणा से अपने घर के लड़के-लड़कियों पर भी बुरा प्रभाव पड़े बिना न रहेगा। स्कूल में बच्चे गंदी गाली दें तथा दूसरी बुरी आदतों में लिप्त हों तो अपना बच्चा भी वहाँ से उन बुराइयों को सीख कर आवेगा। चोर-उठाईगीरों की संख्या अपने क्षेत्र में बढ़ेगी तो किसी दिन अपने कपड़े, बर्तनों के उठ जाने का भी अवसर आ ही सकता है।
गाँव में पार्टीबन्दी, मुकदमेबाजी का दौर चल रहा हो तो उस खींच-तान में अपने को भी किसी पक्ष की बुराई ओढ़नी पड़ेगी। जिसकी हाँ में हाँ न मिलाई जायगी वही बुरा मानेगा। आस-पास बीमारी फैले तो घर में सफाई आदि का प्रयत्न करते-करते भी उसका प्रकोप अपने यहाँ भी प्रवेश कर सकता है और दूसरों की गन्दगी से उत्पन्न हुई बीमारी की हानि अपने को भी सहनी पड़ सकती है।
समाज में कुरीतियाँ फैली हों और हम उन्हें अविवेकपूर्ण समझ कर न मानें तो बहुमत का विरोध सहना पड़ेगा। अपनी कन्या विवाह योग्य हो जाय और समाज में दहेज की दुष्प्रवृत्ति जड़ जमाये रहे तो विवश होकर हमें दहेज देने के लिए कष्ट सह कर प्रबन्ध करना होगा। बेईमान दुकानदारों के बीच रहते हुए हमें बिना मिलावट की शुद्ध सामग्री कहाँ उपलब्ध होगी? हृदयहीन चिकित्सकों का लक्ष्य यदि लूट खसोट ही हो तो वहाँ गरीब आदमी की जीवन-रक्षा कैसे सम्भव होगी? कचहरी और पुलिस में यदि रिश्वतखोरी का बाहुल्य हो जाय तो न्याय की रक्षा और अपराधों की रोक कहाँ से हो सकेगी?
नशेबाजी का प्रचलन बढ़ जाय तो अपने स्वजन संबन्धी भी कहीं न कहीं से उस लत को सीख आवेंगे और इसका प्रभाव अपने घर पर भी पड़ेगा। सिनेमा की गन्दी फिल्मों की गन्दी हवा चुपके-चुपके हर घर में प्रवेश करती चली आ रही है। जिस फैशन का प्रचलन बाजार में सब ओर दीखता है उसके लिये अपने स्वजन-संबन्धी ललचाने लगते हैं और अनुपयुक्त समझने पर भी हम उसे रोक नहीं पाते।
वातावरण में फैली हुई विचारधाराएँ और बुराइयाँ हवा और सर्दी-गर्मी की तरह अपने ऊपर भी आक्रमण करती हैं इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि बुराइयों से अपने बचाव का मोर्चा छोटा न रखा जाय। घर में ही सब कुछ बचाव नहीं हो सकता, बाहरी परिस्थितियों को बिगड़ने न देने के लिए भी प्रयत्न करना आवश्यक है। युग-निर्माण योजना के अंतर्गत समाज-सुधार पर जो अधिक जोर दिया जाता है इसका कारण परमार्थ तो है ही—विश्व शांति जन-कल्याण और सामूहिक प्रगति का लक्ष तो है ही, पर साथ ही यह तथ्य भी सन्निहित है कि हमारे व्यक्तिगत स्वार्थ भी तभी सुरक्षित रह सकेंगे जब समाज का वातावरण उत्कृष्ट विचारधाराओं से प्रभावित हो।
यदि निष्ठुरता की ही प्रधानता फैली रहे तो हमारी बीमारी मुसीबत में भला कौन मदद देने आयेगा? जिस व्यक्ति को मुसीबत के वक्त उधार दिया है यदि वह बेईमान होगा तो अपना उधार कब लौटेगा? डाकुओं और लुटेरों के क्षेत्र में रास्ता चलना भी कठिन हो जाता है। मेले में अपना बच्चा खो जाय और उस भीड़ में सहृदय लोग न हों तो वह बालक कहीं भटक-भटक कर ही मर सकता है। होटल वाले और हलवाई यदि खराब चीजें ही बनाते हैं तो आवश्यकता पड़ने पर जब भी वहाँ से कुछ खरीदना पड़ेगा तभी स्वास्थ्य के लिए संकट उत्पन्न होगा। कुमार्ग पर चलने चलाने वाले लोगों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव अपने परिवार पर भी पड़ता है और बचाव का ध्यान रखते हुए भी अनिष्ट की सम्भावना रहती है।
लोकेषु निर्धनों दुःखी ऋणग्रस्ततोऽधिकम्।
ताम्याँ रोगयुतो दुःखी तेम्यो दुःखी कुभार्यंकः॥
—विदुर
“संसार में सबसे पहला दुःखी निर्धन है। इससे अधिक दुःखी वह है जो ऋणी है। इन दोनों से अधिक वह है जो सदैव रोगी रहता है सबसे अधिक वह है जिसकी स्त्री दुष्ट है।”
आत्म-कल्याण के लिए साधन, वैराग्य एवं त्याग का मार्ग अपनाने की आकाँक्षा बलवती होती है तो मार्गदर्शन के लिए किन्हीं, सन्त, धर्मात्मा समझे जाने वालों के पास पहुँचते हैं। पर यदि वे सच्चे नहीं हैं और अपना सम्प्रदाय बढ़ाने, चेले मूँड़ने, प्रतिष्ठा बढ़ाने और धन एकत्रित करने में लगे हैं, तो ऐसी दशा में वे जो कुछ सिखावेंगे, बतावेंगे वह उसी दृष्टि से होगा, जिससे उनके स्वार्थों की पूर्ति होती हो। ऐसी दशा में यह बहुत ही कठिन है कि बेचारे सत्यान्वेषी मुमुक्षु को कोई सही मार्ग मिल सके।
अपनी कन्या को हम पाल-पोस कर बड़ा करते हैं, पढ़ाते-लिखाते हैं, अच्छा घर-वर ढूँढ़ने के लिए जी जान एक करते हैं, और पेट पर पट्टी बाँध कर विवाह का भारी खर्च भी जुटाते हैं। पर जब कन्या ससुराल जाती है और वहाँ घर से लेकर सास-ननद तक सब को अहंकारी, निष्ठुर, स्वार्थी, हृदयहीन अनुभव करती है तो उसे वहाँ जेल या नरक जैसा अनुभव होता है। लौट कर पिता के घर आती है तो आठ-आठ आँसू उसकी आँखों से बरसते हैं। माता-पिता का हृदय टूक-टूक होने लगता है। जिस बच्ची के सुख सपनों के लिए जीवन भर इतने कष्ट सहे उसे इतनी व्यथा सहनी पड़ रही है यह देखकर उनकी छाती फटने लगती है। वे सोचते हैं, काश किसी निर्धन मजबूर या अशिक्षित ऐसे परिवार में कन्या जा पहुँचती जहाँ स्नेह सौजन्य की उदारता, आत्मीयता की गंगा बहती तो हमारी बच्ची उस अभावग्रस्त स्थिति में भी कितनी सुखी रह सकती।
अपना लड़का बड़ा हो जाता है—विवाह करते हैं। बहू सुन्दर सुशिक्षित ढूँढ़ते हैं। बड़ी आशा और उत्साह से जेवर कपड़ा बनवाते हैं, धूम धाम से विवाह करते हैं। सोचते हैं बहूरानी गृहलक्ष्मी की तरह आवेगी और अव्यवस्थित घर में अपने सद्गुणों से आशा और उत्साह का वातावरण उत्पन्न करेगी। पर विवाह होकर जब बहू घर आती है तो उसका स्वभाव दूसरे ही साँचे में ढला मिलता है। कर्कश, आलसी, अशिष्ट, स्वार्थी, छिद्रान्वेषी स्वभाव के कारण वह सब की शिकायत करती है, सब से लड़ती है और अन्त में अपने पति को लेकर कुटुम्ब से अलग रहने लगती है। परिवार की आशाओं पर पानी फिर जाता है। लड़का बड़ा होकर पिता के उत्तरदायित्वों में हाथ बंटायेगा, बहू अपनी सास का भार हल्का करेगी, यह सोचा गया था। पर निकला उल्टा। लड़के से कुछ आशाएँ थीं वह भी हाथ से चला गया। विवाह बहुत महंगा पड़ा। सारा परिवार दुःख मानता है और सोचता है कि यदि सद्गुणी, उदार दृष्टिकोण की, सेवाभावी, श्रमशील स्वभाव की बहू घर में आती तो कितना अच्छा होता। ऐसी बहू यदि काली, कलूटी, अशिक्षित, गरीब घर की होती तो भी क्या हर्ज था।
मित्रों से मित्रता कायम रखने में बहुत धन और समय खर्च किया, उनकी प्रसन्नता के लिए बहुत त्याग किये, बुराइयाँ भी सहीं, पर अवसर आने पर वे ही मित्र जब धोखा दे जाते हैं, विश्वासघात करके हमें उल्लू बनाते हुए अपने वास्तविक रूप में प्रकट होते हैं तो मन को बड़ा धक्का लगता है और सोचते हैं—हे भगवान्, क्या तेरी इस दुनिया में से मित्रता और सचाई सचमुच ही उठ गई। यदि प्रेम और प्रेमी का वास्तविक स्वरूप इस संसार में बना रहता तो यहाँ कितनी मंगलमय परिस्थितियाँ रहतीं, सब लोग कितने हँसते-खेलते रहते।
जिधर भी दृष्टि पसार कर देखते हैं, इस सुन्दर सुसज्जित दुनिया में एक ही कमी दीखती है—उच्च भावनाओं, उदारता, आत्मीयता एवं कर्तव्यनिष्ठा की। इस अभाव के कारण परमात्मा की यह सुन्दर कृति, वसुधा—मरघट-सी डरावनी और नरक-सी वीभत्स दीखती है। अविश्वास सन्देह, आशंका और विपत्ति की घटाएं ही चारों ओर घुमड़ती दीखती हैं। यहाँ सब कुछ विकसित और गतिशील दीखता है पर एक ही वस्तु मूर्छित, निर्जीव, पतनोन्मुख एवं मुरझाई दीखती है, वह है—मनुष्य की अन्तरात्मा। इसी की उपेक्षा सब से अधिक हो रही है। सब कुछ बढ़ाने की योजनाएँ बन रही हैं पर मनुष्यत्व का, चरित्र और आदर्शवाद का भी उत्कर्ष हो इसकी न तो आवश्यकता समझी जाती है और न चेष्टा की जाती है। कहने सुनने की, लिखने बाँचने की परिधि में जहाँ-तहाँ कुछ किया भी जा रहा है, पर उसके पीछे कोई ठोस पृष्ठभूमि न होने से वह भी एक मनोविनोद मात्र बनकर रह जाता है।
दुख इसी बात का है कि इस संसार की—इस मानव-जीवन की—सबसे प्रमुख, सबसे महत्वपूर्ण, सबसे आवश्यक सबसे उपयोगी समस्या—सद्भावनाओं की अभिवृद्धि के लिए हम कोई ठोस आधार क्यों नहीं ढूंढ़ते? उसके लिए ठोस प्रयत्न क्यों नहीं करते?
नये समाज की, सभ्य समाज की, नवयुग की, रचना करने के लिए एक ही प्रक्रिया पूर्ण करनी होगी और वह है—”भाव परिवर्तन”। इसके लिए ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो इस पुण्य प्रक्रिया की महत्ता और श्रेष्ठता को सच्चे मन से अनुभव करें, उसके लिए कुछ समय देने और श्रम करने को भी तत्पर हों।
राष्ट्र के भावनात्मक निर्माण के लिए अनेकों प्रवृत्तियों को अग्रसर करने की आवश्यकता अनुभव होती है। पर लोक-सेवकों के अभाव में वे सबकी सब कागजी कल्पना जैसी बन कर रह जाती हैं। इस युग में निरक्षरता सबसे बड़ा अभिशाप है। आवश्यकता इस बात की है कि देश में एक भी नर-नारी अपढ़ न रहें। यह कार्य सरकारी स्कूलों के द्वारा संभव नहीं। जो लोग दिन भर काम में लगे रहते हैं वे स्कूल कैसे जावें? और यदि वे जाने भी लगें तो इन करोड़ों लोगों को पढ़ाने का खर्च सरकार कहाँ से लावे?
यह कार्य केवल इस प्रकार हो सकता है कि प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति सेवा बुद्धि से कम-से-कम पाँच व्यक्तियों को साक्षर बनाने की प्रतिज्ञा ले। अपने घर वालों में से, पड़ौसियों में से पाँच व्यक्तियों को शिक्षा की उपयोगिता समझा कर उन्हें एक घंटा प्रतिदिन पढ़ने के लिए तैयार कर लेना कुछ कठिन तो अवश्य है पर असंभव नहीं। शिक्षा का महत्व न समझने वाले इसे बेकार की बात समझेंगे, उपहास करेंगे, असमर्थता प्रकट करेंगे और निराशा की बात कहेंगे। पर प्रयत्न करने वाले में यदि कुछ विशेषता हो और वह लगा ही रहे तो अन्ततः उसे सफलता मिलेगी। प्रौढ़ शिक्षा की दिशा में वह भारी काम कर सकेगा।
“अखण्ड ज्योति परिवार” के 30 हजार सदस्य यदि इसी वर्ष यह कार्य आरम्भ कर दें तो सवा लाख व्यक्तियों को वे शिक्षित कर सकते हैं। आगामी दश वर्षों में 15 लाख का शिक्षण इन दिनों जो हम लोग हैं वे ही कर सकते हैं। यदि अपना परिवार बढ़ता रहे और उसका प्रत्येक सदस्य हर वर्ष एक नया शिक्षित व्यक्ति ऐसा और तैयार कर ले जो हमारी ही तरह प्रौढ़ शिक्षा के लिए समय देने लगे तो आगामी दश वर्ष में वह शृंखला चक्रवृद्धि ब्याज की तरह बढ़ती हुई साक्षरता की देश व्यापी आवश्यकता को सहज ही पूरा कर सकती है। हम लोग थोड़े से हैं, पर व्रतशील बनकर इस एक कार्य को ही हाथ में ले लें तो प्रौढ़ शिक्षा को पूरी तरह सुनिश्चित रूप से हमारा अपना परिवार ही पूरा कर सकता है। इतनी बड़ी बात का पूरा होना क्या कोई कम महत्व की बात है?
लोक एव विषयालु रंजर्न।
दुःख गर्भमपि मन्यते सुखम्॥
आमिषं बडिश गर्भमप्यहो।
मोहतो ग्रसर्ति यद्वदण्डलः॥
“मछली जैसे माँस के टुकड़े को ही देखती है, उसके नीचे छुपे हुये काँटे पर ध्यान नहीं देती, उसी प्रकार दुनिया के लोग विषयों के बाह्य आकर्षण को ही देखते हैं, विषयों के परिणामस्वरूप अवश्यम्भावी दुःख को नहीं देखते।”
खाद्य समस्या आज की दूसरी समस्या है। जनसंख्या बढ़ती जा रही है और धरती उतना अन्न नहीं उपजाती। फल स्वरूप विदेशों से अन्न मँगाने में हमें परावलम्बी होना पड़ता है और विपुल धन विदेशों को भेजना पड़ता है। कभी ऐसा अवसर या जाय कि युद्ध आदि कारणों से विदेशों से अन्न न मिले तो कैसी बीते? इस दृष्टि से स्वावलम्बी होना हमारे लिए जीवन-मरण का प्रश्न है। इसे देर तक बिना हल किये नहीं रहा जा सकता।
अन्न का उत्पादन बढ़ाना, शाक भाजी का अधिक उपयोग करना, अन्न को जरा भी बर्बाद न होने देना जरूरी है। साथ ही झूठन छोड़ने और अधिक प्रकार के खाद्यान्न परोसे जाने वाली, अधिक व्यक्तियों को सम्मिलित करने वाली दावतों की प्रथा समाप्त करना भी आवश्यक है। इसलिए व्यापक लोक शिक्षण किया जाना चाहिए। खाली जगहों में, यहाँ तक कि घर के आँगनों में भी जहाँ संभव हो वहाँ शाक भाजी उगाये जाने चाहिए। खाद्य का उत्पादन एक राष्ट्रीय गौरव की बात समझी जाय और हर व्यक्ति इस दिशा में दिलचस्पी लेने लगे, इसके लिए प्रयत्न किया जाय।
एक कार्य बहुत ही सरल यह है कि सप्ताह में कम-से-कम एक समय कुछ न खाने या शाक दूध
दीन सबन को लखत है, दीनहिं लखै न कोय।
जो रहीम दीनहि लखे, दीनबंधु सम होय॥
दिव्य दीनता के रसहिं, का जानै जग अन्धु।
भली विचारी दीनता, दीन बंधु के बंधु॥
ऊँचे पानी न टिकै, नीचे ही ठहराय।
नीचा होय सो भर पिवै, ऊँचा प्यासा जाय॥
सत्त नाम कड़वा लगे, मीठा लागे दाम।
दुविधा में दोऊ गये, माया मिली न राम॥
पर रहने की उपवास प्रक्रिया को प्रचलित किया जाय। आध्यात्मिक, धार्मिक, शारीरिक, मानसिक, राष्ट्रीय हर दृष्टि से यह उपवास आवश्यक है। इस प्रक्रिया के प्रचलित होने से 7 प्रतिशत अन्न की बचत हो सकती है और बिना उत्पादन बढ़े भी सारी समस्या का तत्काल हल निकल सकता है।
कुछ लोग यह उपवास बिलकुल न करेंगे तो कुछ ऐसे भी होंगे जो पूरे दिन का साप्ताहिक उपवास रखेंगे। इस प्रकार यदि यह आन्दोलन जोर पकड़ता है तो न केवल खाद्य समस्या ही हल हो वरन् मनुष्यों में इस बहाने देश भक्ति, जनहित एवं स्वावलम्बन की भावनाएँ भी उमड़ें। उपवास का स्वास्थ्य पर जो आशाजनक प्रभाव पड़ेगा वह लाभ तो और भी अधिक उत्साहवर्धक होगा। सात्विक आहार, मसालों की उपेक्षा, कड़ी भूख लगने पर चबा-चबा कर ही भोजन करना, भगवान के अर्पण करके खाना आदि कितनी ही भोजन संबंधी सत्प्रवृत्तियाँ इसी आन्दोलन के साथ-जोड़ी जा सकती हैं और उनका शारीरिक और मानसिक दृष्टि से आशाजनक सत्परिणाम हो सकता है।
देखा देखी ही तो प्रवृत्तियाँ पनपती हैं। हम 30 हजार व्यक्तियों में से प्रत्येक का परिवार पाँच मनुष्यों का भी हो तो डेढ़ लाख व्यक्ति, कल से ही यह खाद्य बचत का, आहार शुद्धि का व्रत आन्दोलन चला सकते हैं। और प्रयत्न करें तो उसकी प्रेरणा दूसरों को भी देकर इस प्रक्रिया को देशव्यापी बना सकते हैं। निश्चय ही उसका राष्ट्र की खाद्य समस्या पर भारी असर पड़ेगा।
जनसंख्या की वृद्धि को रोकने के लिए ब्रह्मचर्य को व्यवहारिक बनाने के लिए हम अधिक निष्ठापूर्ण आचरण करें। वासना भड़काने वाले साहित्य, चित्र, फिल्म, दृश्य एवं प्रसंगों का बहिष्कार करें। वानप्रस्थ की परम्परा आरम्भ करें, बाल विवाहों को रोकें, संतति सीमा बन्ध का ध्यान रखें। इस संबंध में परिवार नियोजन विशेषज्ञों का भी परामर्श प्राप्त करें।
छोटे परिवारों का उत्तरदायित्व भी ठीक तरह निवाह सकना आज की स्थिति में कठिन पड़ता है तो उसे अधिक क्यों बढ़ाया जाय? यह विचार-धारा हम लोगों के जीवन में स्थान प्राप्त करे तो स्वास्थ्य सुधरेगा, आयु बढ़ेगी, ब्रह्मचर्य का तेज व्यक्तित्व के विकास में सहायता करेगा और आत्मबल की आशाजनक आम वृद्धि होगी। जन संख्या की बढ़ोतरी रोकने का राष्ट्रीय प्रश्न थोड़ी-सी सावधानी रखने से ही हल हो सकता है।
सामाजिक कुरीतियाँ अन्ध-परम्पराओं के रूप में ही बढ़ती हैं। उनके पीछे विवेक नहीं अनुकरण ही प्रधान होता है। यदि बुरी प्रथाओं के दुष्परिणामों को समझते हुए भी लोग देखा-देखी हानि कारक बातों को अपनाये रहते हैं तो वैसी ही अनुकरणीय आदर्श और उपयोगी परम्पराएँ हम लोग प्रस्तुत करने लगें तो निश्चय ही उनका भारी स्वागत होगा और जनता उन्हें भी एक परम्परा मान कर उत्साहपूर्वक उस मार्ग पर चलने लगेगी।
गायत्री यज्ञ आन्दोलन को आरम्भ करते हुए यज्ञ कार्यों को केवल पंडितों का ही अधिकार न मान कर प्रत्येक गायत्री-उपासक को, महिलाओं को सम्मिलित करने और गुपचुप मन्त्र न पढ़कर सस्वर उच्चारण करने की प्रक्रिया को जन्म दिया था तो आरंभ में उसका थोड़ा विरोध हुआ पर अब वह सब एक परम्परा बन गया। सर्वत्र अब इसी परम्परा को अपनाया जाता है और कोई उसका विरोध नहीं करता। कन्या भोज की प्रथा जोर पकड़ती जाती है और कच्चा भोजन सामूहिक सम्मेलनों में बिना ननुनच के स्वीकार किया जाता है। आरम्भ में जो विरोध था वह समाप्त हुआ। बड़े पैमाने पर जो भी भले-बुरे कार्य होने लगते हैं वे ही एक प्रथा बन जाते हैं। हमारे 30 हजार परिवार आसानी से उपयोगी परम्पराओं को जन्म दे सकते हैं।
दहेज की हत्यारी कुप्रथा का अन्त करने के लिए यदि हमारे 30 हजार परिवार तैयार हो जायें तो आदर्श विचारों का एक नया दौर देश भर में खड़ा हो सकता है। बिना दहेज के, बिना जेवरों के, बिना गाजे बाजे के, बहुत छोटी बरात के, परम सात्विक वातावरण में सम्पन्न होने वाले विवाहों को देखकर जन-मानस की कली खिल पड़ेगी और असंख्यों व्यक्ति उसी का अनुकरण करने लगेंगे। क्या इतना साहस दिखा सकना अपने परिवार के लिए कुछ असंभव कार्य है? हम लोग थोड़ी हिम्मत दिखावें तो आसानी से ऐसी परम्परा चल पड़ सकती है। हिन्दू जाति के मुँह पर लगी हुई एक भारी कलंक कालिमा धुल सकती है और हर सद्गृहस्थ को चिन्ता में जलाने वाली, खून के आँसुओं से रुलाने वाली उस दुष्ट पूतना का अन्त हो सकता है।
जातियों और उपजातियों का जंजाल देश में फूट फैलाने और दहेज जैसी कुप्रथाओं को जन्म देने का प्रधान कारण है। अब समय आ गया है कि जातियाँ न सही तो उपजातियों की संकीर्णता तो समाप्त करने के लिए कदम बढ़ा ही दिया जाय। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र-शास्त्रों में इन चार ही जातियों का वर्णन मिलता है। उप-जातियों का जंजाल काट कर रोटी-बेटी का दायरा जाति मात्र में बढ़ा दिया जाय, तो अच्छे लड़के ढूँढ़ने में, अच्छी कन्याएँ प्राप्त करने में भारी सुविधा हो सकती है।
अंतर्गतमलो दुष्टस्तीर्थ स्नान शतैरपि।
न शुष्यति यथा भाण्डं सुराया दहितं चतत्॥
—चाणक्य
“जिसका हृदय द्वेष अथवा विकारों से दूषित है, ऐसा दुष्ट सौ बार तीर्थ स्नान से भी शुद्ध नहीं हो सकता, जैसे मदिरा का पात्र आग में तपाने से भी शुद्ध नहीं होता।”
ब्राह्मणों में करीब 450 ऐसी उपजातियाँ हैं जिनमें परस्पर रोटी-बेटी का व्यवहार नहीं होता। यदि ब्राह्मण मात्र में वह दायरा बढ़ा दिया जाय तो सबको कितनी अधिक सुविधा होगी, उसकी कल्पना प्रत्येक समझदार आसानी से कर सकता है। संकीर्णता भी इससे घटेगी और आत्मीयता का दायरा बढ़ेगा। इसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र भी अपना दायरा बढ़ाते हुए एकता की दिशा में बढ़ने का आध्यात्मिक लक्ष पूरा कर सकते हैं।
नशेबाजी और माँसाहार की असुरता का व्यापक प्रसार मनुष्यों की मनोभूमि में दिन-दिन तमोगुण बढ़ाता जा रहा है। दया, करुणा, मैत्री, आत्मीयता, न्याय की मानवीय सत्प्रवृत्तियों से माँसाहार का वैर है। दोनों एक दूसरे के घोर प्रतिकूल हैं। जीभ के स्वाद जैसे अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए जो दूसरों को प्राणान्तक पीड़ा दे सकता है उसमें देवत्व की, मनुष्यता की स्थिरता कैसे रहेगी? माँसाहार, आहार का नहीं, एक नैतिक प्रश्न है। इसे नैतिक स्तर पर ही विचारा जाना चाहिए। अगणित काम ऐसे हैं, जो नैतिक प्रश्न हटा दिया जाय तो वे लाभ-कारक सिद्ध हो सकते हैं। भाई-बहिनों का विवाह होने लगे तो बड़ी आर्थिक सुविधा रहे, पर नैतिक कारणों से हम उसे लाभदायक होते हुए भी स्वीकार नहीं कर सकते। माँसाहार स्वास्थ्य के लिए लाभदायक भी होता हो तो भी इससे उसको नैतिक समर्थन नहीं मिल सकता। उसका परित्याग ही किया जाना चाहिए।
नशेबाजी में केवल हानि ही हानि है, लाभ कुछ नहीं। तमाखू, गाँजा, चरस, भाँग, अफीम, शराब से किसी का कुछ लाभ नहीं होता। हानि अपार है। शरीर खोखला होता है और मन में दुष्प्रवृत्तियाँ उठती हैं। शरीर और मन दोनों क्षेत्रों में नशेबाजी से भारी हानि होती है। धन का अपव्यय इतना अधिक होता है कि यदि उसे रोका जा सके तो वह बचत उत्थान के कार्यों में भारी योगदान दे सकती है। नशा सेवन से उत्पन्न हुई शारीरिक और मानसिक मलीनता मनुष्य के नैतिक जीवन को प्रभावित करती है। भावनाओं का परिवर्तन करने के लिए नशेबाजी को छोड़ना आवश्यक है।
सुधार और निर्माण का आन्दोलन माँसाहार सुधार और नशेबाजी को छोड़ने के साथ सुसंबद्ध है। यदि यह तुच्छ सी बातें भी न छोड़ी जा सकीं तो असत्य, कामुकता, बेईमानी जैसे बड़ी बुराइयाँ कैसे दूर होंगी?
स्वास्थ्य की समस्या का हल करने के लिए, व्यायाम और श्रमशीलता को जन जीवन में प्रधान स्थान मिलना चाहिए। आहार बिहार के सुसंयम का सफाई और नियमितता का प्रयत्न होना चाहिए। आर्थिक कठिनाइयों को सुलझाने के लिए मितव्ययिता और सादगी को अपनाया जाना आवश्यक है। सामाजिक शान्ति के लिए न्याय, समानता, उदारता का आचरण होना चाहिए। इन सत्प्रवृत्तियों को स्थिति के अनुसार हम अपने व्यावहारिक जीवन में कार्यान्वित करने लगें तो निश्चय ही उससे श्रेष्ठ परम्पराओं का जन्म होगा और दूसरे लोग भी उनका अनुकरण करने लगेंगे।
यही सभी प्रक्रियाएँ युग-निर्माण योजना के अंतर्गत कार्यान्वित की जानी हैं। इसका श्रीगणेश अपने परिवार से होना है। इसलिए जब इस बात की आवश्यकता है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व को समझे, जो सुना और समझा गया है उसे कार्यान्वित करने के लिए कटिबद्ध हो।
बूँद-बूँद जोड़ने से घड़ा भर जाता है, पतले धागे मिलकर मोटा मजबूत रस्सा बनाते हैं। हम सबका सम्मिलित प्रयत्न युग-निर्माण के रूप में परिणित हो सकता है। युग बदल सकता है बशर्ते कि हम स्वयं बदलें। बहुत कुछ हो सकता है बशर्ते कि हम स्वयं भी कुछ करने को तैयार हों। अपने बदलने, सुधरने और करने की अब आवश्यकता है। इस परिवर्तन के साथ ही हमारा समाज, राष्ट्र और संसार बदलेगा। प्रलोभनों और आकर्षणों में अपने आपको घुलाते रहने की अपेक्षा अब हमें आदर्शवाद की प्रतिष्ठापना करने के लिए कष्ट उठाने की भावनाएँ अपने अन्दर उत्पन्न करनी हैं। यही उत्पादन विश्व शान्ति की सुरम्य हरियाली के रूप में दृष्टि-गोचर हो सकेगा।
समाज सेवा का सबसे समीपवर्ती और सबसे सरल कार्यक्षेत्र हमारा परिवार ही हो सकता है। ईश्वर ने जिन प्राणियों के साथ रक्त-संबंध बना कर तथा कर्तव्य और उत्तरदायित्व के बंधनों में बाँध कर परिवार रूप में प्रस्तुत किया है उनकी सेवा करना प्रत्येक दृष्टि से आवश्यक है। यों जितने अधिक मनुष्यों और प्राणियों की सेवा जितनी जिससे बन पड़े उतनी ही उत्तम है। पर कौटुम्बिक उत्तरदायित्व तो अनिवार्य रूप से उठाने ही होते हैं, इनमें उपेक्षा बरतने से जो दुष्परिणाम निकलते हैं, वे धर्म-कर्तव्य, समाज-हित और परिवार संगठन की दृष्टि से बहुत ही विपरीत एवं घातक सिद्ध होते हैं। इसलिए सेवा धर्म की ओर लक्ष रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह कार्य अपने घर से ही आरम्भ करना चाहिए।
यों अपने परिवार के लिए भोजन वस्त्र की व्यवस्था सभी करते हैं। बच्चों की शिक्षा, और विवाह का प्रबन्ध भी सबको करना पड़ता है। दवादारु, मनोरंजन तथा अन्य आवश्यक व्यवस्थाएँ भी समय-समय पर होती रहती हैं। इन कार्यों को गरीब अमीर अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार उपेक्षा या उत्साह से किसी न किसी तरह पूरा करते ही रहते हैं। पर एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात छूटी ही रह जाती है और वह है परिवार को संस्कारवान बनाना।
सुसंस्कारों के अभाव में मनुष्य का व्यक्तित्व गिरा हुआ ही बना रहता है। जिसका व्यक्तित्व निम्न श्रेणी का है। वह भले ही धन, विद्या, स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रतिभा आदि की दृष्टि से कितना ही बढ़ा चढ़ा क्यों न हो, निकृष्ट प्रकार का जीवन ही व्यतीत करेगा। उसे न तो स्वयं ही आन्तरिक शान्ति मिलेगी और न उसके संपर्क में रहने वाले सुख पूर्वक निर्वाह कर सकेंगे। दुर्गुणी व्यक्ति समाज के लिए, अपने लिए और परिवार के लिए अभिशाप ही सिद्ध होते हैं। इसलिए परिवार में सद्गुणों की सुसंस्कारिता की अभिवृद्धि करना प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का एक आवश्यक धर्म कर्तव्य माना गया है।
स्कूलों में अध्यापक लोग निर्धारित पाठ्यक्रम पढ़ा सकते हैं पर उनसे चरित्र शिक्षण की आशा करनी चाहिए। क्योंकि चरित्र कहने-सुनने से नहीं सीखा जाता, उसके लिये तो वातावरण एवं अनुकरणीय उदाहरण चाहिए। स्कूलों के अध्यापकों का संपर्क बच्चों से पढ़ाई के निर्धारित घंटों में ही होता है—उनके निजी चरित्र और व्यक्तिगत व्यवहार से सीधा संबंध न होने से छात्र कोई सीधा प्रभाव ग्रहण नहीं करते। बुराई तो कहीं से भी सीखी जा सकती है, पर अच्छाई के लिए अनुकरण की
दोषाः प्रभवन्ति रागिणाँ।
गृहेषु पंचेन्द्रिय निग्रहस्तपः॥
अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते।
निवृत्तरागस्य गृहं तपेवनम्॥
“विषयानुरागी मनुष्य वन में जाकर भी दोषों से मुक्त नहीं हो सकते और संयमी जन घर में रहकर भी इन्द्रिय निग्रह कर लेते हैं। इसलिये शुभ कर्मों में प्रवृत्त होने वाले वीतराग पुरुषों के लिये उनका घर भी तपोवन के सदृश्य है।”
प्रेरणा देने वाले आदर्शों की आवश्यकता होती है। अभ्यास में अच्छाइयाँ तब आती हैं जब प्रभावित करने के लिए वैसा वातावरण भी प्रस्तुत हो। इस प्रकार की व्यवस्था घर में रहे तो ही यह संभव है कि बच्चों पर जीवन की श्रेष्ठता के ढाँचे में ढालने वाली छाप पड़े।
परिवार की सबसे बड़ी सेवा एक ही हो सकती है कि घर के हर व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न किया जाय। जिस प्रकार अपनी त्रुटियों और बुराइयों को घटाने और हटाने की उपयोगिता है। उसी प्रकार “परिवार-शरीर” के प्रत्येक अंग को-प्रत्येक परिजन को सुधरा हुआ एवं सुसंस्कृत बनाना आवश्यक है। यह कार्य दूसरे लोग नहीं कर सकते, स्वयं किये बिना यह उद्देश्य पूरा नहीं होगा। क्योंकि घर वालों पर जितना अपना प्रभाव एवं अपनत्व है उतना दूसरों का नहीं हो सकता, घर के प्रभावशाली व्यक्तियों को ही यह कार्य अपने हाथ में लेना चाहिए।
डाँटने-फटकारने, व भला-बुरा कहने, दोषारोपण एवं झुँझलाहट से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं
आरम्भ गुर्वी क्षयिणी क्रमेण।
लध्वी पुरा बुद्धिमती च पश्चात्॥
दिनस्य पूर्वार्धं परार्ध्यं भिन्ना।
छायेव मैत्री खल सज्जनानाम्॥
—पंच तंत्र
“दुष्टों की मित्रता सूर्योदय के समय की तरह आरम्भ में लंबी चौड़ी होती है फिर क्रमशः घटती चली जाती है और सज्जनों की मित्रता दोपहर के पश्चात् की छाया के समान पहले छोटी होती है और फिर क्रमशः बढ़ती जाती है।
होता। जिस प्रकार अपने ऊपर झुँझलाकर या लम्बी चौड़ी योजना बनाकर एक दिन में अपना सुधार नहीं हो सकता, उसी प्रकार परिवार की बहुत दिन की जमी हुई भली-बुरी स्थिति उतावली में नहीं बदली जा सकती। बन्दर को तमाशा करना सिखाने वाले कलन्दर जिस धैर्य, अध्यवसाय और सतत प्रयत्न से काम लेते हैं वही रास्ता हमें भी अपनाना पड़ेगा। तोड़-फोड़ सरल होती है पर निर्माण कार्य कठिन है। मनुष्य की योग्यता और प्रतिभा उसकी रचना शक्ति को देखकर ही आँकी जाती है। परिवार के निर्माण में बड़ी चतुरता, कुशलता, धैर्य, प्रेम, सहिष्णुता एवं आत्मीयता से काम लेना होता है। समय-समय पर साम, दाम, दंड, भेद की नीति अपनानी पड़ती है, तब कहीं शनैः-शनैः अभीष्ट परिणाम सामने आता है।
इसके लिए घरेलू पाठशाला एवं सत्संग गोष्ठी के रूप में दैनिक शिक्षण क्रम का एक कार्यक्रम निर्धारित करना चाहिए। सुविधा के समय परिवार के सब लोग मिल जुल कर बैठा करें और प्रेरणाप्रद प्रसंगों को लेकर वार्तालाप किया करें। दैनिक समाचार पत्रों में छपने वाली कुछ भली या बुरी खबरों को लेकर उनकी आलोचना इस ढंग से की जा सकती है कि सुनने वालों पर भलाई के प्रति निष्ठा और बुराई के प्रति घृणा भाव पैदा हो। नई खबरें सुनने की सबकी इच्छा रहती है। आकर्षक, मनोरंजक और विवेचनात्मक ढंग से खबरें सुनाने का कार्य घर के सभी लोग पसंद करेंगे। उनका मनोरंजन भी होगा शिक्षा भी मिलेगी। इसी प्रकार महापुरुषों के जीवन चरित्रों के कोई अंश, व्रत पर्वों के इतिहास, पौराणिक उपाख्यान, कथा-गाथाएँ कहने का कार्यक्रम चलाया जाता रहे तो घर में सबका मनोरंजन भी होगा और अप्रत्यक्ष रूप में वे सब शिक्षाएँ भी मिलने लगेंगी जो परिजनों को सुसंस्कृत बनाने के लिए आवश्यक हैं।
कभी-कभी घर की समस्याओं पर विचार विनिमय भी करते रहना चाहिए। किसे क्या कठिनाई और क्या शिकायत है इसकी जानकारी परस्पर सब लोग रखे रहें और उसका हल खोजते रहें तो निश्चय ही वे बढ़ेंगी नहीं, घटेंगी ही। कड़ा प्रतिबंध लगा कर व्यक्तित्व की स्वतंत्रता को एक दम अवरुद्ध कर देना तो ठीक नहीं, पर प्रयत्न यह करना चाहिए कि सब लोग अपनी भूलों के समझने और सुधारने को आवश्यकता अनुभव करने लगें।
“अखण्ड-ज्योति” के लेखों को पढ़कर सब लोगों को सुनाना, परिवार-निर्माण की दृष्टि से बहुत उपयोगी हो सकता है। उस उद्देश्य के लिए जो कुछ कहना समझाना आवश्यक है वह सब कुछ अब इस पत्रिका के पृष्ठों पर रहा करेगा, युग-निर्माण के संदेशवाहक के रूप में यदि इन लेखों को सुनाया जायगा तो सुनाने वाले को उपदेशक बनने का व्यय भी न सहना पड़ेगा और अभीष्ट उद्देश्य भी पूरा होता रहेगा।
अशिक्षा के विरुद्ध व्यापक अभियान आरम्भ करने की जो अपनी योजना है, उसका आरंभ अपनी घरेलू ज्ञान-गोष्ठी ही से हमें आरम्भ करना चाहिए। घर में जो बिना पढ़े हैं उन्हें पढ़ाना चाहिए। प्रयत्न यह करना चाहिए कि कोई भी निरक्षर न रहे। निरक्षरता मानव-जीवन का एक कलंक है। इस कलंक से अपने घर के सभी सदस्यों को मुक्त कर लेना चाहिए। “अखण्ड-ज्योति” का एक भी सदस्य ऐसा न हो जिसकी स्त्री बिना पढ़ी रह जाय। घूँघट और संकोच की मूर्खता को इस पुनीत कार्य में जरा भी आड़े नहीं आने देना चाहिए। घर के बड़े-बूढ़ों को इस कार्य में अपनी सहमति देने के लिए रजामंद करना चाहिए। एकान्त समय में तो उनकी बिना सहमति के भी शिक्षण चल सकता है। जो स्त्रियाँ बड़ी आयु की हो चुकीं या जिन घरों में पर्दा नहीं होता वहाँ तो यह कठिनाई भी नहीं आती। कई बार बड़ी आयु की स्त्रियाँ इसे व्यर्थ समझती हैं, कहती हैं “हमें कोई नौकरी थोड़े ही करनी है जो पढ़ें।” उन्हें समझाना चाहिए कि पढ़ना, ज्ञान के नेत्र खोलने के लिए होता है, नौकरी के लिए नहीं। शिक्षा की उपयोगिता समझा कर तरुण, अधेड़ और बूढ़ों को भी इस कार्य के लिए तैयार किया जा सकता है। यदि अपना स्वभाव मधुर और उत्साह पक्का है तो आज नहीं तो कल, घर के निरक्षर लोग साक्षर बनने को उद्यत हो ही जावेंगे।
सामूहिक अथवा व्यक्तिगत रूप में ईश्वर उपासना, (2) शरीर और वस्त्रों की सफाई (3) वस्तुओं को यथास्थान सुव्यवस्थित रूप से रखना (4) बड़ों को नित्य अभिवादन करना, माता पिता एवं वृद्धों के चरण छूना (5) शृंगार एवं विलासिता के उपकरणों को छोड़कर सादगी अपनाना (6) रात को जल्दी सोना और प्रातः जल्दी उठना (7) निर्धारित दिनचर्या बना कर निरन्तर व्यस्त रहना, आलस्य को पास भी न फटकने देना (8) गाली देना या ‘तू’ का संबोधन तथा कटु भाषण छोड़कर मधुर वाणी से विनम्र संभाषण करना (9) आमदनी और खर्च का लिखित हिसाब रखना (10) टूटी-फूटी वस्तुओं की मरम्मत करके उन्हें पूर्ण निरुपयोगी होने तक काम में लेना (11) भोजन को सात्विक रखना, आहार संबंधी नियमों का पालन करना और भगवान को भोग लगाकर खाना (12) श्रम एवं व्यायाम की व्यवस्था रखना (13) हँसमुख
दानेन तुल्यो निबिरस्ति नान्यो।
लोभाच्य नान्योस्ति परः पृथिव्याम्॥
विभूषणं शीलसमं न चान्यत्संतोष।
तुल्यं वनमस्ति नान्यतृ ॥
—पंच तंत्र
“दान के समान दूसरी कोई निधि नहीं है, लोभ के समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है, शील के समान दूसरा भूषण नहीं है, और संतोष के समान अन्य कोई धन नहीं है।”
रहना (14) एक दूसरे की सुविधा तथा सम्मान का ध्यान रखना, (15) आगन्तुकों के साथ शिष्टाचार बरतना (16) सद्विचारों का पढ़ना सुनना आदि कितनी ही अच्छाइयाँ ऐसी हैं जिनका प्रवेश प्रत्येक परिवार में होना ही चाहिए। घर के वातावरण में जितना प्रेम, सौजन्य रहेगा, श्रम, सादगी और भावनात्मक उत्साह को स्थान मिलेगा उतना ही वहाँ उत्कर्ष एवं उल्लास दृष्टि-गोचर होने लगेगा।
इस रचनात्मक सुधार कार्यों के लिए मौखिक प्रदेश ही पर्याप्त न होगा वरन् यह प्रयत्न भी करते रहना पड़ेगा कि घर के अन्य सदस्यों का सहयोग प्राप्त कर इन कार्यक्रमों को व्यवहारिक रूप मिले। सब लोग न सही-आरंभ में थोड़े सदस्य भी इस प्रकार आचरण करने लगें, तो शेष पर भी देर-सवेर में प्रभाव पड़ेगा और वे भी इन अच्छाइयों को अपनाने के लिए विवश होंगे।
परिवार को सभ्य, सुशिक्षित, सच्चरित्र एवं विवेकशील बनाने के लिए प्रयत्न करना प्रत्येक विचारवान् मनुष्य का आवश्यक धर्म कर्तव्य है। उसे पूरा करने से हम अपना उत्तरदायित्व पूरा करते हैं, समाज को सुसंस्कृत बनाने में भारी योगदान देते हैं और अपने बगीचे के सुविकसित होने से स्वयं भी लाभान्वित होते हैं। युग-निर्माण के लिए परिवार-निर्माण आवश्यक है। इसके लिए हमें ध्यान भी देना चाहिए और समय भी।
देव, दानव और मनुष्यों की श्रेणी में बैठे हुए मानव प्राणी परस्पर लड़ते-झगड़ते रहते और धरती को खून से लाल करते रहते।
दुखी होकर धरती माता प्रजापति के पास पहुँची और अपनी दुख गाथा कह सुनाई। पुत्रों का रक्त बहते देखकर माता का दुखी होना स्वाभाविक भी था।
ब्रह्मा जी ने तीनों बच्चों को बुलाया और कहा इस प्रकार लड़ते झगड़ते रहने से तुम संसार को नरक बना दोगे और स्वयं भी नष्ट हो जाओगे।
अपराधी की तरह तीनों बालक शिर झुकाए खड़े थे। उनने पूछा—पितामह, कोई ऐसी शिक्षा दीजिए जिस पर चलते हुए हम कलह से बचें और शान्ति तथा सुविधा प्राप्त करें।
ब्रह्मा जी गंभीर हो गये, उन्होंने पूरे मनोयोग से शान्ति की शिक्षा का एक ही बीज-मंत्र बोला—’द’ ‘द’, ‘द”। तीनों लड़के गंभीरता पूर्वक उसका अर्थ समझने और व्याख्या करने में लग गये।
सोच विचार बहुत देर होता रहा तो स्तब्धता को भंग करते हुए प्रजापति ने बच्चों से पूछा—हमारी सूत्र शिक्षा का क्या अर्थ समझे?
देवता ने कहा—द अर्थात् दान। जिसके पास सुख साधन मौजूद हैं उन्हें उनका उपभोग अपने ही लिए नहीं करना चाहिए। वरन् दूसरे अभावग्रस्तों को अपनी कमाई देकर आन्तरिक आनन्द प्राप्त करना चाहिए।
अब मनुष्य की बारी आई। प्रजापति के प्रश्न का उत्तर देते हुए उसने कहा—द अर्थात् दमन। अन्तःकरण में वासना और तृष्णा के जो तूफान उठते रहते हैं उन्हें दमन करना, षडरिपुओं को परास्त करना, पौरुष और प्रयत्न में संलग्न रहना आलस को दबाना। यही मैंने समझा है। मनुष्य का कल्याण इसी में दीखता है।
असुर ने अपनी अभिव्यक्ति बताते हुए कहा—द का अर्थ है दया! दुष्टता निर्दयी ही कर सकता है। जिसे दूसरों के कष्ट अपने कष्टों के समान चुभेंगे वह किसी को सताने की असुरता से बचेगा।
ब्रह्मा जी ने स्वीकृति से शिर हिलाया और कहा यही मेरी शिक्षा का साराँश है जो तुमने समझा है। अपने दोषों को ढूंढ़ने, समझने और उन्हें सुधारने का प्रयत्न करते रहने पर ही तुम शान्तिपूर्वक जीवन यापन कर सकोगे।
इस धर्म शिक्षा का साराँश जानते तो सब हैं पर भेद है कि मानने वाले कोई विरले ही निकलते हैं। ब्रह्मा जी की शान्ति आज भी सबके सामने प्रस्तुत है, यदि इस पर चला जा सके तो आनन्दमय जीवन में कोई अड़चन न रहे।
मधु संचय
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(संकलित)
कब जाना शलभ बिचारे न जलना उसकी नादानी है,
शबनम का कतरा क्या जाने वह मोती है या पानी है।
कंटक में कलियाँ पलीं चटखकर फूल बनी अलि मँडराया,
ये क्या जाने अलि तब तक है जब तक यह खिली जवानी है।
जो देने में ही सुख पाते प्रतिदान नहीं माँगा करते,
जिनको विश्वास अडिग निजपर वरदान नहीं माँगा करते॥
जिन पर सागर को गर्व वही लहरें अपहृत हो जाती हैं,
बन मेघ श्याम अम्बर के नीले आँगन में छा जाती हैं।
सागर का प्रेम अगाव विकल हो आवाहन करता जाता,
थे सजल घटायें सावन बन, धरती पर चू-चू जाती हैं।
जिनको वसुधा से प्रेम स्वर्ग का दान नहीं माँगा करते,
जिनको विश्वास अडिग निजपर वरदान नहीं माँगा करते॥
—भोलानाथ ‘बिम्ब’
यह जिन्दगी है एक यज्ञ
जिस में हमें है होम देना,
जिन्दगी है सतत चलना
जिन्दगी है सतत जलना।
भूल जायें हम कि चलना
भूल जायें हम कि बढ़ना।
तो मरण में जिन्दगी में फर्क क्या है?
लौ नहीं यदि उठ रही हो दीप का फिर मूल्य क्या है?
लौ नहीं यदि उठ रहीं हो दीप का फिर मूल्य क्या है?
—महेश सन्तोषी
केवल नारी नहीं सुनो हम साथी हैं, भगिनी माँ हैं।
नहीं वासना का साधन हैं, हम ममता हैं, गरिमा हैं।
आँचल में जीवन धारा है, कर में आतुर राखी है।
मस्तक पर सिन्दूर बिन्दू, अनुराग त्याग की सीमा है।
हैं गृहिणी, सहषर्म चारिणी, कुल दीपक की बाती हैं।
आज हमारा रूप प्रदर्शन करते तुम बाजारों में,
लगा रहे हो चित्र हमारे गली गली दीवारों में,
तुम राखी का मूल्य चुकाते बहनों को अपमानित कर,
गृह लक्ष्मी का चित्रण करते विज्ञापन बाजारों में।
देख तुम्हारी कुरुचि लाज से धरती में गड़ जाती हम।
—गंगारानी वर्मा
परोपकार-हीन व्यक्ति भूमि हेतु भार है,
किसी बड़े विचारवान का बड़ा विचार है—
कि जो परोपकार-लीन है तथा उदार है,
वही महान है, वही बड़ा सभी प्रकार है,
बड़े बनो, बनो न किन्तु भूमि भार के लिए?
मनुष्य का शरीर है—परोपकार के लिए॥
तमाम भूमि लोक आज रोग शोक से भरा,
कुभावना मिटा रही मनुष्य की परम्परा,
समाज के बचाव का रहा न और आसरा,
पुकारती तुम्हें अधीरता भरी वसुन्धरा,
सहायता करो, व्यथाभरी पुकार के लिए।
मनुष्य का शरीर है-परोपकार के लिए॥
—श्री ‘राजेश’
तुम देकर शाप चले जाना,
मैं अगर आदमी हूँ, वरदान बना लूँगा।
फट सकता ज्वालामुखी तुम्हारे अन्तर का,
सम्भव है समझो तुम अभिनय अभिनन्दन
हो सकता मेरे दिवस, फिरे तुम आशिष दो
मजबूरी से बँध कर पूजा के बन्धन में,
इसीलिए न मैं कदमों में शीश झुकाऊँगा।
बन सकता कभी न गुञ्जन मैं इस नन्दन में,
चाहे जो लाख भुजंग भले विष लिपटायें
लग सकता नहीं कलंक भलारे? चन्दन में?
तुम बनकर, प्रिय पाषाण भुवन में खोजना
मैं अगर पुजारी हूँ भगवान बना लूँगा॥
—चतुरीसिंह निर्मल
जिस प्रकार स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म प्राण की शक्ति अधिक मानी जाती है उसी प्रकार स्थूल यज्ञों की अपेक्षा सूक्ष्म यज्ञ की महत्ता असंख्य गुनी अधिक होती हैं। घी, सामग्री, समिधा आदि के द्वारा सम्पन्न होने वाले यज्ञ ‘स्थूल’ कहलाते हैं और ज्ञान-यज्ञ को ‘सूक्ष्म’ कहा गया है। यों स्थूल यज्ञों की महिमा भी कम नहीं है, पर ज्ञान यज्ञ तो सर्वोपरि है। गीता में भगवान ने कहा है कि ज्ञान से बढ़कर इस संसार में पवित्र और कुछ नहीं। निस्संदेह आत्मा को प्रकाश से परिपूर्ण बनाने के लिए ज्ञान ही एक मात्र आधार होता है। अज्ञान को ही माया एवं भव बन्धन के नाम से पुकारते हैं और ज्ञान को मुक्ति का आधार माना गया है।
केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्वला
न स्नानं न विलेपनं न कुसुमं नालंकृता मूर्धजा।
वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता वार्यते,
क्षीयन्तेऽखिल भूषणानि सतत बाग्भूषणं भूषणम्॥
—भर्तृहरि
“बाजूबन्द अथवा चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार मनुष्य को विभूषित नहीं करते, न स्नान से, न सुगन्धित उबटन से, न फूलों से और न सँवारे हुये केशों से उसकी शोभा वृद्धि होती है। एक मात्र संस्कारित वाणी ही मनुष्य का सच्चा आभूषण है जिसके सन्मुख अन्य सब आभूषण फीके पड़ जाते हैं।”
स्कूली पढ़ाई जिसमें गणित, भूगोल, इतिहास, साहित्य आदि की जानकारी कराई जाती है शिक्षा कहलाती है और जीवन का स्वरूप-उसका लक्ष, कर्तव्य एवं दृष्टिकोण निर्धारित करने संबंधी विवेचना को ‘ज्ञान’ कहते हैं। ज्ञान को ही अमृत कहते हैं। आत्मा का स्वरूप समझ कर तदनुरूप गतिविधियाँ अपनाने से मनुष्य महापुरुष ऋषि, दृष्टा और अवतार बन जाता है। आत्मोत्कर्ष की सीढ़ी ज्ञात ही तो है।
ज्ञान की आराधना इस विश्व का सबसे श्रेष्ठ सत्कर्म है। इसीलिए ब्रह्म-दान एवं ब्रह्म-भोज की महत्ता अत्यधिक मानी जाती है। अन्न से शरीर की भूख बुझती है, ज्ञान की आत्मा की क्षुधा शान्त की जाती है, अन्न से शरीर पुष्ट होता है और ज्ञान से आत्मबल बढ़ता है। इसलिए अन्न, वस्त्र, आदि के दानों की अपेक्षा ज्ञान-दान का पुण्य असंख्यों गुना अधिक माना गया है। अन्न आदि के दान का प्रतिफल जीव को अन्य योनियों में भी मिल सकता है। अच्छा भोजन तो पशु पक्षी भी कर लेते हैं, पर ज्ञान का प्रतिफल मनुष्य योनि में ही प्राप्त हो सकता है, इस लिए ज्ञान-दान करने वालों को अपने पुण्यों का प्रतिफल इसी रूप में प्राप्त करने के लिए मनुष्य योनि में ही अगला जन्म लेने का अधिकार तो मिल ही जाता है।
अन्न, जल, धन आदि से शरीर की आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। कुछ समय के लिए शारीरिक असुविधाएँ ही दूर होती हैं, इसलिए उनका पुण्य फल भी उतना ही सीमित माना गया है। ज्ञान-दान से आत्मविकास होता है, तथा संसार में प्रेम, पुण्य, शान्ति और समृद्धि की बढ़ोत्तरी होने की व्यवस्था बनती है। इतने महत्वपूर्ण कार्य का प्रतिफल भी उसी के अनुरूप होना चाहिए। इसीलिए सब दानों से ‘ब्रह्मा दान’ की गरिमा अधिक है। सब दानियों में ब्रह्मदानी की अधिक प्रशंसा होती है। ब्राह्मण लोग निर्धन होते हुए भी निरन्तर ब्रह्मदान में लगे रहने के कारण ‘भूसुर’—पृथ्वी के देवता—जैसी गौरवास्पद पदवी प्राप्त करते थे। इस ब्रह्मकर्म में रत रहने वाले ब्राह्मणों को भोजन कराने का भी पुण्य इसीलिए था कि उस अन्न से निर्वाह होने पर वे शरीर से अधिक ब्रह्म-कर्म कर सकते थे ब्रह्म-का अर्थ ‘ज्ञान’ भी है। ज्ञान की उपासना ‘ब्रह्म’ की उपासना के रूप में ही की जाती है। आत्मा में ज्ञान का प्रकार बन कर ही ब्रह्म का अवतरण होता है।
जिस प्रकार दैनिक जीवन में लौकिक और पारलौकिक दृष्टि से हम अनेकों कार्य नियमित रूप से करते हैं उसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ के लिए भी कुछ समय निर्धारित करना चाहिए। उत्कृष्ट जीवन के लिए प्रेरणा देने वाले सद्ज्ञान को स्वयं पढ़ना समझना और मनन चिन्तन करना आत्म कल्याण की दृष्टि से आवश्यक है। सद्भावनाओं की शिक्षा दूसरों को देना परोपकार की सबसे पुनीत प्रक्रिया है। इन दोनों का समावेश ज्ञान यज्ञ में होता है। प्रेरणाप्रद सद् विचारों की सम्पत्ति अपने लिए जमा करना और उस श्रेय-साधन से दूसरों को लाभान्वित बनाना इतना श्रेष्ठ सत्कर्म है कि उसकी तुलना और किसी शुभ कार्य से नहीं हो सकती। ज्ञान यज्ञ की तुलना में अन्य सब यज्ञ तुच्छ ही माने जा सकते हैं।
ज्ञान-यज्ञ में समय-रूपी घृत की आहुतियाँ देनी पड़ती हैं। जिस प्रकार बिना घृत होमे अग्निहोत्र सम्पन्न नहीं हो सकता उसी प्रकार समय-दान दिये बिना कोई ज्ञान-यज्ञ का होता भी नहीं हो सकता। अग्निहोत्र में कुछ न कुछ धन खर्च करना ही पड़ता है उसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ में समय लगाये बिना काम नहीं चल सकता। फुरसत न मिलने का बहाना करके इस सत्कर्म के लाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। स्वाध्याय के लिए, मनन चिन्तन के लिए कोई तो समय चाहिए ही। दूसरों को प्रेरणा देने के लिए उनके पास जाना, बैठना, चर्चा करना समय लगाने पर ही संभव होगा। इसलिए शरीर के लिए, कमाने-खाने की ही तरह ही आत्मा के लिए ज्ञान यज्ञ में कुछ समय लगाना भी हमें आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य समझना चाहिए।
फुरसत न मिलने का शाब्दिक अर्थ कुछ भी हो, वास्तविक अर्थ यह है कि उस कार्य को दूसरे कर्मों की अपेक्षा कम महत्व का समझा गया है। जो काम जरूरी प्रतीत होता है उसे अन्य सब काम छोड़ कर प्राथमिकता दी जाती है। बच्चा बीमार हो जाय, मुकदमे की तारीख हो, या व्यापार संबंधी कोई जरूरी काम आ जाय तो अन्य कामों को छोड़ कर भी पहले उसे करते हैं। शरीर में रोग उठ खड़ा हो तो सबसे पहले उसी की चिन्ता करते हैं। जो सबसे जरूरी काम समझा जाता है उसके लिए सबसे अधिक समय दिया जाता है जो अनावश्यक, महत्वहीन और उपेक्षणीय समझे जाते हैं। ज्ञान-या की पुण्य-प्रक्रिया को उतना महत्वहीन न समझा जाना चाहिए कि फुरसत न मिलने का बहाना बना कर उससे पिण्ड छुड़ाने का उपक्रम करना पड़े। स्नान, भोजन, शयन, नित्यकर्म जैसे आवश्यक कार्यों में ही हमें इस पुण्य-प्रक्रिया को भी अपने दैनिक कार्यों में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करना चाहिए।
अन्य शुभ कार्य धन देने से भी हो सकते हैं। धर्मशाला, मंदिर, कुआँ, तालाब, सदावर्त, प्याऊ,
भोगे रोग भयं कुले च्युत भयं वित्तेनुषालाद् भयं,
माने दैन्यभयं बले रिपुमय रुपे जरायाँ भयम्।
शास्त्रे बादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद् भयं,
सर्ववस्तु भयावहं भुवि नृणाँ वैराग्य मेवाभयम्॥
—भर्तृहरि
“भोगों में रोग का भय है, ऊँचे कुल में पतन का भय है, धन में राज का, मान में गरीबी का, बल में शत्रु का तथा रूप में वृद्धावस्था का भय है। शास्त्र में वादविवाद का, गुण में दुष्ट व्यक्तियों का तथा शरीर में काल का भय है। इस प्रकार संसार में मनुष्यों के लिए सभी वस्तुएँ भयपूर्ण हैं, भय से रहित तो केवल वैराग्य ही हैं।”
कथा, पाठ आदि के आयोजन पैसा खर्च करने से बिना समय लगाये भी हो सकते हैं, पर कुछ काम ऐसे हैं जिनके लिए स्वयं ही कष्ट उठाना पड़ता है। अपने मुँह से खाये बिना पेट नहीं भरेगा, स्वयं पढ़े बिना विद्या नहीं आवेगी, स्वास्थ्य सुधारने के लिए आप ही व्यायाम करना पड़ता है। यह कार्य दूसरों से नहीं कराये जा सकते। इसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ के लिए अपनी अभिरुचि, अपनी श्रद्धा, अपना श्रम, अपना समय लगाना आवश्यक है।
दानामिज्या तपःशौचं तीर्थसेवा श्रुतं तथा।
पर्वाज्येतान्य तीर्थानि यदि भावों न निर्मलः॥
निगृही तेन्द्रियग्रामों यत्रैव च बसेन्नरः।
तत्र तस्य कुरुक्षेत्र नैमिषं पुष्कराणि च॥
—महर्षि अगस्त्य
“मन का भाव यदि शुद्ध न हो तो दान, यज्ञ, तप, शौच तीर्थ सेवन, शास्त्र श्रवण एवं स्वाध्याय ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं। पर जिस व्यक्ति ने अपनी इन्द्रियों को-वासनाओं को वश में कर लिया है, वह जहाँ कहीं निवास करता है, वहीं उसके लिये कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर आदि तीर्थ हो जाते हैं।”
युग-निर्माण की—आत्म-निर्माण की पुण्य-प्रक्रिया का श्रीगणेश हमें आज से ही, अभी से ही आरम्भ करना चाहिए। इसका प्रथम चरण है ज्ञान-यज्ञ का आयोजन। भोजन की तरह ही सद्विचारों की धारणा को एक अनिवार्य आध्यात्मिक आवश्यकता समझा जाय और उसकी उपेक्षा किसी भी बहानेबाजी का सहारा लेकर न की जाय। यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि समय का उपयोग पेट के धंधे करते रहने में ही नहीं है। भौतिक सम्पत्ति से सद्ज्ञान की दैवी-सम्पत्ति का महत्व तनिक भी कम नहीं है। पैसे की कमाई ही दौलत नहीं कहलाती। सच्ची दौलत तो आन्तरिक सद्वृत्तियों का बढ़ना ही है। नश्वर सम्पत्ति की तुलना में शाश्वत विभूतियों का मूल्यांकन कम नहीं किया जाना चाहिए।
अपने आपको सद्विचारों की दैवी-सम्पत्ति से समृद्ध बनाने के लिए, अपने परिवार को सुसंस्कृत एवं सुविकसित बनाने के लिए, समाज में सभ्यता, सदाचार, विवेकशीलता जागृत करके स्नेह और सदाचार का वातावरण उत्पन्न करने के लिए एक ही उपाय हो सकता है और वह है-”सद्भावनाओं की वृद्धि।” जिस प्रकार प्रयत्न करने से खेतों और कारखानों में पैदावार पढ़ाई जा सकती है उसी प्रकार मनुष्यों के मस्तिष्कों और अन्तःकरणों में भी सद्विचारों और सद्भावों का उत्पादन विशाल परिमाण में किया जा सकता है। सच्ची लगन वाले मनुष्य निष्ठापूर्वक इस कार्य को अपने हाथ में लें तो आज की स्थिति बदल सकती है और स्वार्थ-परता का शुष्क श्मशान परमार्थ की सुरम्य हरियाली से भरा उद्यान बन सकता है।
ज्ञान-यज्ञ का आयोजन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए होना चाहिए। सर्वश्रेष्ठ सत्कर्म के रूप में हममें से प्रत्येक को इसे एक अत्यन्त आवश्यक धर्म कर्तव्य के रूप में अपनाना चाहिए। ‘अखण्ड ज्योति” के प्रत्येक सदस्य को ज्ञान-यज्ञ का होता बनना चाहिए। कुछ नियत निर्धारित समय नियमित रूप से हमें इस कार्य के लिए निकालना ही चाहिए और उसका उपयोग अपने प्रभाव क्षेत्र में सद्भावनाएं उत्पन्न करने के लिए करना चाहिए। युगारंभ का श्रीगणेश हमारे इसी शुभ संकल्प के साथ होना चाहिए। प्रत्येक सत्कार्य के आरंभ में जिस प्रकार हवन-पूजन आवश्यक होता है, युग-परिवर्तन का शुभारंभ करते हुए हम ज्ञान-यज्ञ का आयोजन करें और उसमें सक्रिय रूप से भाग लें तो ही काम चलेगा।
जिस प्रकार आक्रमणकारी चीन से निपटने के लिए हम अपने सैन्य साधन तेजी से बढ़ाने में संलग्न है जिस प्रकार गरीबी और अशिक्षा को दूर करने के लिए देश में अनेकों प्रवृत्तियाँ चल रही हैं उसी प्रकार सद्भावनाओं का अकाल दूर करने के लिए विशाल परिमाण में यह प्रयत्न करना होगा कि जन-मानस में उत्कृष्टता एवं आदर्शवाद के लिए उत्साह उत्पन्न हो, लोग उसका महत्व समझें और इस दिशा में अग्रसर होने के लिए आवश्यक धैर्य और शौर्य की वृत्ति को परिपक्व बनावें।
जिस प्रकार कृषि का एक बड़ा फार्म बनाने के लिए विशिष्ट उपकरणों की आवश्यकता होती है, जिस प्रकार कोई बड़ा कारखाना या मिल लगाने के लिए अनेकों यंत्र एवं उपकरण अभीष्ट होते हैं इसी प्रकार सद्भावनाओं का उत्पादन विशाल परिमाण में करने के लिए बड़े उपकरणों की आवश्यकता होगी। यह उपकरण हो सकते हैं वे व्यक्ति जो अपने साथ कुछ जन्मजात सुसंस्कार लेकर जन्मे हों। मजबूत लोहे की बनी हुई मशीनें ही देर तक ठीक काम कर सकती हैं। कच्चे लोहे से बने हुए यन्त्र या पुर्जे थोड़ा-सा दबाव पड़ने पर बिगड़ जाते हैं। तत्काल उत्साह देकर या आवेश उत्पन्न करके किसी से तत्काल कुछ सत्कर्म कराया तो जा सकता है पर मनोभूमि की कच्चाई के कारण वह उत्साह देर तक ठहरता नहीं, आवेश ठण्डा होते ही लोग पुनः अपने पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं।
दृढ़ चरित्र, दृढ़ प्रतिज्ञ और प्रकाशवान् व्यक्तित्व ही युग-निर्माण का उद्देश्य पूर्ण कर सकते हैं, अब उन्हीं को ढूँढ़ा और पकाया जाना चाहिए। प्रारंभिक प्रयत्न यह होना चाहिए कि जिन लोगों में, धैर्य नीति के सदाचार के बीजाँकुर किसी रूप में उगे हुए दिखाई पड़ें पहले उन्हें प्रभावित किया जाय। खाद और पानी पाकर मुरझाये हुए पौधे भी हरे भरे होते और तेजी से बढ़ते हैं। जिनमें थोड़ी भी अभिरुचि सत्प्रवृत्तियों की ओर है उन्हें यदि सत्संग का खाद और स्वाध्याय का पानी मिलने लगे तो वे अवश्य ही सुविकसित होंगे।
युग निर्माण की प्रौढ़ विचार धारा वर्षा के जल के समान उपयोगी सिद्ध होती है। हम लोग अपने छोटे-छोटे व्यक्तित्वों के द्वारा भी उन नव विकसित अंकुरों के लिए खाद की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। विद्वानों और दिग्गजों से शास्त्रार्थ करने की शक्ति भले ही न हो पर अभिनव बीजाँकुरों को प्रेरणा देने के लिए कोई भी ईमानदार और भावनाशील व्यक्ति कुछ न कुछ प्रेरणा देने वाला मार्ग दर्शन अवश्य कर सकता है। देखना यह चाहिए कि हमारे परिवार, पड़ौस में, स्वजन सहयोगियों में और परिचित प्रियजनों में कौन-कौन व्यक्ति ऐसे हैं जिनके गुण-कर्म-स्वभाव में सज्जनता और विचारशीलता का अंश समुचित मात्रा में विद्यमान है। जो लोग ऐसे दीख पड़े उनके नाम नोट कर लेने
लभेत सिकतासु तैलमपि यत्नतः पीड्यन्।
पिबेच्च मृगतृष्णिकासु सलिलं पिपासार्दितः॥
कदाचिदपि पर्यटञ्छशविषाणमा सादयेद्।
न तु प्रतिनिविष्टमूर्ख जन चित्तमाराधर्यत॥
—भर्तृहरि
“यत्नपूर्वक पेरने से कदाचित बालू में से तेल निकल आवे, मृग तृष्णा से प्यास बुझ जाय, ढूँढ़ने से खरगोश का सींग मिल जाय—चाहे ये सब असंभव कार्य किसी प्रकार संभव हो जायें, परन्तु मूर्ख का मन जिस तरफ झुक गया है उसे हटा सकना किसी प्रकार संभव नहीं।”
चाहिए और उन्हें प्रेरणा देने का कार्य अपने जिम्मे ले लेना चाहिए।
सत्साहित्य पढ़ने में रुचि उत्पन्न करना पहला काम है। आमतौर से लोग आत्मनिर्माण जैसे रूखे
माँगन मरन समान है, मत कोई माँगों भीख।
माँगन ते मरना भला, यह सत गुरु की सीख॥
जल ज्यों प्यारा माछरी, लोभी प्यारा दाम।
माता प्यारा बालका, भक्त पियारा राम॥
जो तोकूँ काँटा दुवै, ताहि बोय तू फूल।
तोकों फूल का फूल है, बाको है तिरसूल॥
खट्टा मीठा चरपरा, जिह्वा सब रस लेय।
चारों कुतिया मिल गई, पहरा किसका देय॥
—कबीर
और शुष्क समझे जाने वाले विषय को पढ़ना और सुनना पसंद नहीं करते। मनोरंजन और स्वार्थ की बातों में सहज ही मन लगता है पर उत्कृष्ट आदर्शवाद को सुनने समझने तक की अभिरुचि नहीं जगती इस ओर अभिरुचि नहीं जगती इस ओर अभिरुचि को जगाना, आधी बाजी जीत लेने के समान है। किसी जमाने में चाय का प्रचार बिल्कुल भी न था, लोग उसके नाम, स्वाद और गुण से बिल्कुल भी परिचित न थे, पर चाय कम्पनी के प्रचारकों ने बड़े ही सुव्यवस्थित रूप से उसका प्रचार जम कर किया और कुछ ही दिनों में उसका चस्का जन-साधारण को लगा दिया। आज घर-घर में चाय का प्रचार है। रात दिनों होठों पर प्याले लगे रहते हैं। बीड़ी और सिगरेट का प्रचार भी इसी तरह व्यापक बनता जाता है। यही गतिविधि यदि सद्विचारों, सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने में अपनाई जावे तो उसका भी वैसा ही परिणाम निकलेगा। यदि सद्विचारों को सुनने समझने में चाय, बीड़ी जैसा रस आने लगे तो समझना चाहिए तीन चौथाई मोर्चा फतह हो गया। विचारों को यदि अन्तःकरण में समुचित स्थान मिल जावे तो उसका प्रभाव प्रत्यक्ष जीवन पर पड़ेगा ही, लोग वैसे ही काम भी अवश्य करने लगेंगे।
निकिल के बने सिक्कों का खोटा-खरा परखने के लिए दुकानदार लोग एक चुम्बक अपने पास रखते हैं और उससे छूकर यह जान लेते हैं कि वह असली है या नकली। जो सिक्के चुम्बक से चिपक जाते हैं वे असली, जो नहीं चिपकते वे नकली माने जाते हैं। सद्विचारों की ओर अभिरुचि जिनकी लग सके उनसे यह सहज ही आशा की जा सकती है कि वे आगे चल कर श्रेष्ठ कर्मों में भी प्रवृत्त होंगे और युग-निर्माण कार्यक्रम के लिए कुछ उपयुक्त सिद्ध हो सकेंगे। मनोभूमि की श्रेष्ठता को ठीक तरह परिपक्व बनाने के लिए बहुत दिनों तक लगातार उसे सद्विचारों को हृदयंगम करते रहने की आवश्यकता होती है। अभ्रक भस्म, मकरध्वज आदि रसायन बनाने के लिए उनके अग्नि-संस्कार करने पड़ते हैं, अनेकों पुट देने होते हैं और घुटाई पिसाई की व्यवस्था बनाई जाती है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति के ‘दृढ़ पुरुष’ बनाने के लिए उसे देर तक प्रौढ़ सद्विचारों के साथ अपने आपको घोटना पीसना पड़ता है। रसायन बनाने वाले वैद्यों की तरह युग-पुरुष बनाने के लिए हमें भी उसी प्रक्रिया को अपनाना होगा।
बड़े काम के लिए बड़े व्यक्तित्वों की आवश्यकता पड़ती है। हाथ लोहे की मोटी जंजीरों से बाँधे जाते हैं। पतली कमजोर रस्सी में बाँध कर उन्हें रोक रख सकना कठिन है। युग-निर्माण जैसे महान कार्य के लिए ऐसे लोगों की आवश्यकता है जिन्होंने उत्कृष्ट विचारों का चिन्तन और मनन करते-करते अपनी मनोभूमि को प्रलोभन और कठिनाइयों से टक्कर लेने की क्षमता से सुसम्पन्न बना लिया हो। बाह्य आवेश से नहीं वरन् अन्तरात्मा की सुस्थिर प्रेरणा के आधार पर जो लोग श्रेष्ठता के सन्मार्ग पर आरुढ़ होते हैं उन्हीं के लिए अन्त तक उस पर चलते रहना संभव होता है।
भड़काने वाले, आवेश उत्पन्न करने वाले भाषण सुनकर, लेख पढ़कर या अन्य प्रकार की उत्तेजना से प्रभावित होकर कोई व्यक्ति तत्काल सत्कर्म करने की प्रतिज्ञा कर लेते हैं, पर आन्तरिक दुर्बलता के कारण वह प्रतिज्ञा देर तक निभती नहीं। नामवरी और प्रशंसा के लोभ से कई व्यक्ति कुछ सत्कर्म करते हैं उसमें दिखावा अधिक होता है। जब तक दिखावा रहा तब तक उत्साह भी रहा, जब पद छिना, प्रतिष्ठा घटी तभी वे उससे विरत होने लगे। हमने अनेक आन्दोलनों के भीतर घुसकर देखा है, अनेकों से हमारा अत्यन्त घनिष्ठ संबन्ध रहा है, और अनेक आन्दोलनों को हमने जन्म दिया है। इसलिए हमारे जीवनभर के अनुभवों का निष्कर्ष इस रूप में है कि मनोभूमि की परिपक्वता के बिना जो लोग क्षणिक प्रेरणा या आवेश में कुछ काम कर बैठते हैं वे देर तक परमार्थ के कठिन मार्ग पर चलते नहीं रह सकते। व्रत को अन्त तक निबाहने की आशा केवल उन्हीं से की जा सकती है जिन्होंने उस आदर्शवाद की भावनाओं को चिरकाल तक अपने अन्तःकरण में पर्याप्त स्थान दिया है और भली प्रकार सोच समझ कर उस मार्ग पर चलने का कदम उठाया है। युग-निर्माण के लिए ऐसे ही परिपक्व मनोभूमि के व्यक्तियों की आवश्यकता है।
समाज में अनेकों प्रकार की सत्प्रवृत्तियों का बढ़ाया जाना और अनेकों दुष्प्रवृत्तियों का हटाया जाना आवश्यक है। जिस सभ्य समाज की रचना का स्वप्न साकार करने के लिए हम अग्रसर हो रहे हैं उसका आधार ऐसे सुदृढ़ व्यक्तित्व ही हो सकते हैं जो अपना आदर्श उपस्थित करके दूसरों को अनुकरण की प्रेरणा दे सकें। बुराइयों को मिटाने के लिए उनसे टक्कर लेना आवश्यक है। टकराने में चोट लगने का खतरा रहता ही है, उसे सहने में शूरवीर ही समर्थ होते हैं। कमजोर तबियत के आदमी ऐसे अवसरों पर भाग खड़े होते हैं और विरोधियों के हौसले बढ़ाने में सहायक होते हैं। युग-निर्माण कार्यों में अनुकरण के उपयुक्त आदर्श उपस्थित करना और दुराचार से संघर्ष करना अनिवार्य है। इसलिए यह भी आवश्यक है कि इन प्रवृत्तियों को अग्रसर करने वाले लोग काफी मजबूत हों। यह आन्तरिक मजबूती, सद्विचारों को निरन्तर हृदयंगम करते रहने से ही प्राप्त हो सकती है।
सज्जन प्रकृति के नर-नारियों को तलाश करना और उन्हें स्वाध्याय-सत्संग के बाद पानी से सींचना विशाल वट वृक्षों को रोपने के समान इस युग का सबसे बड़ा पुण्य परमार्थ समझा जाना चाहिए। पतित मनोभूमि का मनुष्य दीन, हीन और तुच्छ घृणित ही समझा जा सकता है, पर यदि वह आत्मबल सम्पन्न हो तो नर-रत्न, महापुरुष, ऋषि और अवतार भी बन सकता है। तुच्छ को महान बना देने की शक्ति केवल उत्कृष्ट विचारों में ही रहती है। स्वाति का जल सीप में पड़ने से मोती बनता है, बाँस में पड़ने से बंसलोचन और केला में जाने से कपूर बनता है। सद्विचारों की स्वाति बूँद जिस मन मस्तिष्क में प्रवेश करती है उसे अजर-अमर ही बना देती है, वह उज्ज्वल नक्षत्र की तरह स्वयं चमकता है और अन्य अनेकों को प्रकाश देने का निमित्त बन जाता है। इसलिए सद्विचारों की उपयुक्त मनोभूमि में प्रतिष्ठा करने का प्रयत्न ‘ब्रह्मकर्म’ माना जाता है। उससे बड़ा पुण्य-परमार्थ और कुछ भी इस धरती पर नहीं है।
विपदि धैर्यमथाम्युदये क्षमा
सदसि वाक्पटुता युधि विक्रम
यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ
प्रकृति सिद्ध मिदं हि महात्मनाम्॥
—हितोपदेश
“महान पुरुषों में ये गुण स्वभावतः पाये जाते हैं—विपत्ति में धैर्य, अभ्युदय के अवसर पर क्षमा, सभा में भाषण-कुशलता, युद्ध में विक्रम, यश में रुचि और शास्त्र अध्ययन की लगन।”
इन तथ्यों को हमें भली-भाँति समझना चाहिए और धर्म-कर्तव्य की दृष्टि से, जीवन को सफल बनाने की दृष्टि से, युग-निर्माण की दृष्टि से सद्विचारों के प्रचार की पुण्य प्रक्रिया को अपने और दूसरों की
अजात मृत मूर्खाणाँ वरमाद्यौन चान्तिमः।
सकृद दुखः करावाद्यौ अन्तिमस्तु पदे-पदे॥
—हितोपदेश
“जो पुत्र पैदा ही न हुआ हो अथवा पैदा होकर मर गया हो अथवा मूर्ख हो, इन तीनों में पहले दो ही तीसरे की अपेक्षा अधिक अच्छे हैं। क्योंकि वे दोनों तो एक बार ही दुःख देते हैं, जबकि तीसरा (अर्थात् मूर्ख पुत्र) पद-पद पर दुःख कारक होता है।”
मनोभूमि में गहराई तक प्रवेश करने के लिए अपना समय और मनोयोग नियमित रूप से लगाते रहने का व्रत लेना चाहिए। स्वयं स्वाध्यायशील बनें, मनन और चिन्तन द्वारा आत्म-निर्माण के लिए सद्विचारों को व्यवहारिक जीवन में उतारें, अपने परिवार के हर सदस्य को इस लाभ से लाभान्वित होने के लिए प्रेरित करें। साथ ही यह भी प्रयत्न करें कि अपने समीपवर्ती क्षेत्र, में सभी प्रिय परिचित जनों में उस विचारधारा का विस्तार हो। जिन पर भी अपना प्रभाव हो, उन्हें ऐसी प्रेरणा देनी चाहिए कि वे सद्विचारों को नियमित रूप से अपनाने की अभिरुचि उत्पन्न करें। प्रभाव वही सराहनीय है जिससे प्रभावित व्यक्तियों को उत्कर्ष की प्रेरणा मिले। जिस में भी सुसंस्कारों का बीजाँकुर दिखाई पड़े उसे सींचने के लिए हमें अवसर और अवकाश निकाल ही लेना चाहिए।
हम “अखण्ड-ज्योति” के सदस्य इस गतिविधि को सच्चे मन से अपनावेंगे तो अपना परिवार दिन दूना रात चौगुना बढ़ेगा। सज्जनों का समुदाय बढ़ना उनका अल्पमत में न रह कर बहुमत तक पहुँच जाना इस बात का परिपुष्ट प्रमाण होगा कि युग परिवर्तन की पुण्य प्रक्रिया सफलता के बिल्कुल समीप जा पहुँची है। इस प्रजातंत्र के युग में जिसे वोट अधिक मिल जाते हैं वही दल या व्यक्ति राज्य शासन संभालता है। उसी की इच्छा सारी प्रजा को माननी पड़ती है। सज्जनता का, सद्भावना का, मानवता का यदि बहुमत होगा, अधिक संख्या में लोग इस प्रकार के बन जायेंगे तो उसका प्रतिफल भी यही होगा कि अल्पमत वाले दुर्बुद्धियुक्त व्यक्तियों को बहुमत के आगे झुकने को विवश होना पड़े। आज सद्भावना अल्पमत में है तो दुष्प्रवृत्तियों के आगे उन्हें परास्त होना पड़ता है, कल जब दुर्भावनाएं अल्पमत में होगी तो उन्हें सद्भावनाओं का आधिपत्य स्वीकार करना होगा। हमें यही सब तो करना है।
हमारा एक भी प्रिय परिजन ऐसा न रहे जो अपने प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत होने पर भी सद्विचारों में अभिरुचि लेने के लिए प्रेरणा प्राप्त न करे। स्वाध्याय का साधन “अखण्ड ज्योति” प्रस्तुत करती है, सत्संग की प्रेरणा पूर्ति हम स्वयं करें। उभय पक्षीय लाभों के प्रभाव से अपने परिवार को पूरी तरह लाभान्वित करें। इसमें हमारा धर्म-कर्तव्य पालन होता है, स्वजनों का जीवन सुधारता है और युग-निर्माण का एक सबसे महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होता है। ऐसे उपयोगी कार्य के लिए हमें प्रयत्नशील होना ही चाहिए।
अणु बम बनाने के लिए प्रधानतया ‘यूरेनियम’ धातु की आवश्यकता होती है। “हैवी वाटर” का उस कार्य में बहुत उपयोग होता है। यह पदार्थ जिनके पास पर्याप्त मात्रा में होते हैं वे ही अणु-शक्ति उत्पन्न करने और उस प्रकार के आयुध बना सकने में सफल होते हैं। युग-निर्माण के लिए ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता होती है जो जन्मजात रूप से संस्कारवान हों। कुसंस्कार तो थोड़ी-सी बुरी संगति से उत्पन्न हो जाते हैं पर सुसंस्कार चिरकालीन साधना से ही विनिर्मित होते हैं। हिन्दू धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के 16 संस्कार तो समारोह-पूर्वक किये जाते हैं और नित्य नैमित्तिक उपासना, स्वाध्याय, व्रत, पर्व, अनुष्ठान, कथा, कीर्तन, सत्संग, देव दर्शन, हवन, तीर्थयात्रा, श्राद्ध आदि के द्वारा यह प्रयत्न निरन्तर होते हैं कि व्यक्ति को सुसंस्कारी बनाने की प्रक्रिया बन्द न होने पावे, उसका क्रम किसी न किसी प्रकार चलता ही रहे।
उपदेशों का महत्व तो बहुत है पर यह ध्यान रखना चाहिये कि वे सुसंस्कारी व्यक्तियों को ही प्रभावित करते हैं। चिकने घड़े पर पानी की बूँदें ठहरती नहीं, बेंत की बेल विपुल वर्षा होने पर भी फलती-फूलती नहीं। आज कथा, वार्ता, प्रवचन, सत्संगों का आयोजन पूर्वकाल की अपेक्षा कहीं अधिक होता है पर सुनने वाले उनका लाभ समय काटने या मनोरंजन करने जितना ही प्राप्त करते हैं। जो उपदेश दिये गये थे उन पर चलने की इच्छा उत्पन्न नहीं होती, हाँ, उन्हीं उपदेशों में कोई बात ऐसी आ जाय जो उनकी दुष्प्रवृत्तियों का परोक्ष रूप से भी समर्थन करती हो तो उसे याद रख लेते हैं और अपने दोषों के समर्थन में उन बातों को ‘सनातन’ कह कर उचित सिद्ध करने की चेष्टा करते रहते हैं।
प्राचीन काल में संस्कार और पात्रत्व पर बहुत ध्यान दिया जाता था ओर चुने हुए व्यक्तियों को ही प्रभावशाली श्रेष्ठ सत्कर्मों में लगाया जाता था। गुरुकुलों में पात्रत्व की परीक्षा के बाद ही छात्रों की भर्ती होती थी। धर्म प्रवचन का अधिकार किसी को तब मिलता था जब वह त्याग और तप की कसौटी पर अपने को सुसंस्कारी सिद्ध कर देता था। संस्कार मनोभूमि की परिपक्वता का प्रतीक है, जो देर तक एक गतिविधि को अपनाये रहने के बाद ही परिपुष्ट होते हैं। युग-निर्माण के लिए संस्कारवान मनोभूमि के व्यक्तित्वों की आवश्यकता पड़ेगी अन्यथा दुर्बल स्तर के व्यक्ति सहज ही निराश होते हैं, फिसलते और गड़बड़ी उत्पन्न करते दिखाई देंगे। आज लोक सेवक कहलाने वाले व्यक्ति जो अनेक प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न करते और कलंक-कथाएँ प्रस्तुत करते देखे जाते हैं इसका कारण यह ही है कि उपयुक्त मनोभूमि बनने से पूर्व ही वे ‘नेता’ बन जाते हैं और फिर अपने पद का दुरुपयोग करते हैं।
हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम्।
श्रोतस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम्॥
—अज्ञात
“हाथ का भूषण दान है, कण्ठ का आभूषण सत्य-भाषण है, शास्त्र सुनना कानों का भूषण है। फिर दूसरे आभूषणों की क्या आवश्यकता हैं?”
वानप्रस्थ के बाद संन्यास लेकर लोक सेवा के लिए परिव्राजक व्रत धारण करने का पूर्व नियम इसीलिए था कि जीवन भर की सुसंस्कार साधना के उपरान्त व्यक्ति जब तृष्णा-वासना और पुत्रेषणा वित्तेषणा, लोकेषणा से रहित हो जाय।
पीछे तो इसका विस्तार अपरिमित क्षेत्र में होना है। अगणित व्यक्ति, संगठन, देश और समूह इस योजना को अपने-अपने ढंग से कार्यान्वित करेंगे। जिस प्रकार आध्यात्मवाद, साम्यवाद, भौतिकवाद आदि अनेक ‘वाद’ कोई संस्था नहीं वरन् विचार-धारा एवं प्रेरणा होती हैं, व्यक्ति या संगठन इन्हें अपने-अपने ढंग से कार्यान्वित करते हैं, इसी प्रकार युग-निर्माण कार्यक्रम एक प्रकाश-प्रवाह एवं प्रोत्साहन उत्पन्न करने वाला एक मार्गदर्शन बनकर विकसित होगा। आज “अखण्ड-ज्योति परिवार” उसकी प्रथम भूमिका सम्पादित करने का विनम्र प्रयत्न मात्र ही कर सकेगा। इतना कार्य कर सकने की क्षमता उसमें मौजूद है यह भली प्रकार सोच समझकर, नाप तोलकर ही कार्य आरम्भ किया गया है। ‘लोग हँसाई’ का हमें भी ध्यान है।
‘एक से दस’ योजना के अंतर्गत प्रत्येक परिजन को यह काम सौंप दिया गया है कि वह मछली पकड़ने के लिए काम में आने वाली आटे की गोली की तरह ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका को माध्यम बनाकर सुसंस्कारी लोगों की तलाश करे और जहाँ जितने व्यक्ति इस प्रकार के मिल जावें वहाँ उन्हें प्रोत्साहित करने के लिये उनके घरों पर जाकर मिलने की ‘धर्म फेरी’ प्रक्रिया और उन्हें इकट्ठे करके समय-समय पर ‘विचार गोष्ठी’ चलाने की प्रक्रियाओं द्वारा यह प्रयत्न करते रहें कि उनके सुसंस्कारों का अभिवर्धन और परिपाक नियमित रूप से होता रहे। केवल स्वाध्याय ही पर्याप्त नहीं, उसके साथ-साथ जीवित प्रेरणा जुड़ी रहे तो ही सोने-सुगन्धि का योग बनता है। ‘अखण्ड-ज्योति’ जिस विचारधारा को प्रस्तुत करती है उसकी सजीव प्रेरणा, पाठकों को देना अपने प्रबुद्ध परिजनों का काम है। अपने को, अपने परिवार को और अपने प्रभाव क्षेत्र को आवश्यक प्रकाश देने की क्षमता हममें से प्रत्येक में मौजूद है, अब समय है कि उसका उचित उपयोग आरम्भ कर दिया जाय।
दूसरा कार्यक्रम इससे भी महत्वपूर्ण है वह है—”नई प्रबुद्ध पीढ़ी का अवतरण” इस संबन्ध में दिसम्बर 62 की पत्रिका के पृष्ठ 46 पर आवश्यक संकेत किया जा चुका है। युग बदलना सुनिश्चित है। सन् 62 के अष्टग्रही योग का प्रभाव सन् 72 तक दश वर्ष तक रहने वाला है। इस अवधि में इतनी क्रान्ति-प्रतिक्रान्तियाँ होंगी कि मनुष्य को दुष्प्रवृत्तियों के दुष्परिणामों पर निश्चित विश्वास हो जायगा, खिन्न होकर उसे सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने और सन्मार्ग पर चलने के लिये विवश होना पड़ेगा। आज के प्रवचन और लेख कारगर न होंगे। उन्हें तो लोग अनसुना ही करते रहेंगे। समय की प्रताड़ना ही उन्हें विवश करेगी और कोई अन्य मार्ग न देखकर सबको यही सोचना और यही करना पड़ेगा कि धर्म एवं सदाचार का मार्ग ही श्रेयस्कर है। विवशता सब कुछ करा लेगी। आज तो हम उस ढाँचे को प्रस्तुत कर रहें हैं जिस पर चलने के लिए
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकायाँ विषं शिरे।
वृश्रिकस्य विषं पुच्छे सर्वांगे दुनृणाँ विषम्072
—चाणक्य
“साँप के दाँतों में विष रहता है, मक्खी के सिर में माहुर रहता है, बिच्छू की पूँछ में विष रहता है पर दुष्टों के समस्त शरीर में विष रहता है।”
तैयार योजना मिल जाय। मकान बनाने के पूर्व इंजीनियर उसका नक्शा बनाते हैं। योजना बनाने वाले कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं, तैयारी के बाद निर्माण भी आरंभ हो जाता है। कार्ल मार्क्स ने साम्यवाद की रूपरेखा प्रस्तुत की ओर लेनिन ने उन्हें कार्यान्वित किया। स्वामी विरजानन्द की योजना को दयानन्द ने, और रामकृष्ण परमहंस की योजना को विवेकानन्द ने कार्यान्वित किया था। आज युग-निर्माण की योजना कागजी भले ही दिखे इन्हें कार्यान्वित करने वाले समयानुसार सहज ही कार्यान्वित करने लगे। उन कर्मठ युग पुरुषों के अवतरण का यही समय है।
सूक्ष्मदर्शी, सिद्ध पुरुषों के मतानुसार यह निश्चित है कि अगले दिन अत्यंत उच्चकोटि की दिव्य आत्माएँ भारत भूमि पर अवतरित होंगी। व्यास, वशिष्ठ, विश्वामित्र, याज्ञवलक्य, पाराशर, कपिल, कणाद, पातञ्जलि, जैसे योगी, अर्जुन, भीम, हनुमान, अंगद, परशुराम, सहस्रार्जुन जैसे योद्धा, विश्वकर्मा जैसे कलाकार, नागार्जुन जैसे रसायनज्ञ, चरक, सुश्रुत, धन्वन्तरि, अश्विनीकुमार जैसे चिकित्सक, चाणक्य जैसे राजनीतिज्ञ, रावण जैसे वैज्ञानिक, भीष्म, द्रोण जैसे शस्त्र-शास्त्री, भरत, लक्ष्मण, हरिश्चन्द्र, ध्रुव, प्रह्लाद, कर्ण, श्रवणकुमार, शिव, दधीचि जैसे महापुरुष नारद जैसे प्रचारक, जनक, युधिष्ठिर, अशोक, विक्रमादित्य जैसे शासक, प्रताप, शिवाजी, लक्ष्मीबाई, गुरुगोविन्दसिंह, वन्दावैरागी, तिलक, सुभाष जैसे देशभक्त बुद्ध, गान्धी, महावीर, शंकराचार्य जैसे अवतारी, सीता सावित्री, अरुन्धती, अनुसूया, गौतमी, जैसी नारियाँ फिर इस देश में जन्म लेंगी। वे आत्माएं अपनी महान आत्मिक स्थिति के द्वारा युग निर्माण के कार्यों को सफल बना कर रहेंगी। गान्धी जी के स्वराज्य आन्दोलन को पूर्ण करने के लिए कितनी ही उच्च कोटि की आत्माएँ उनके समय में अवतरित हुई थीं। युग-निर्माण का प्रत्यक्ष कार्यक्रम सन् 72 के बाद जब दिखाई देगा और 88 तक पूरा हो लेगा, उस कार्य के लिये जिन महान आत्माओं का प्रमुख हाथ रहने वाला है उनके जन्म का समय काल ठीक यही है।
दशरथ और कौशल्या, स्वयंभू मनु और शत-रूपा देवकी और वसुदेव अर्जुन और द्रौपदी जैसे दम्पत्ति ही इन उच्च स्तर की आत्माओं को जन्म देने में समर्थ हो सकते हैं। इसलिए यह भी प्रयत्न करना होगा कि आदर्श जीवन बिताने वाले, उच्च विचार धाराओं से परिपूर्ण, नर-नारी उन आत्माओं को जन्म देने के लिए उपयुक्त स्थान प्रस्तुत करें। घटिया, तुच्छ, पतित स्वार्थी और हीन मनोभूमि वाले असुर प्रकृति माता-पिता के शरीरों में उच्च आत्माएँ प्रवेश नहीं करतीं, उनके यहाँ उसी श्रेणी की दुष्टात्माएं जन्म लेती हैं। किसी महापुरुष को अपने घर बुलाना होता है तो घर की सफाई और पहुँनाई का प्रबन्ध भी उसकी शान के उपयुक्त ही करना पड़ता है। महापुरुष जिनके घर में जन्में वैसे पति पत्नी का आदर्शवादी होना भी आवश्यक है। अर्जुन-द्रौपदी ने जिस प्रकार गर्भ में ही अभिमन्यु को चक्रव्यूह तोड़ने की शिक्षा दे दी थी, ऐसा ही प्रशिक्षण कर सकने की क्षमता जिन माता पिता में हो वे ही महापुरुषों को जन्म दे सकते हैं। इस प्रकार का महान उत्पादन करने का उत्तरदायित्व उठाने के लिए कठिन तपश्चर्या करने वाले नर−नारी अपने परिवार में से निकलें ऐसी हमारी हार्दिक अभिलाषा है।
अवतारी युगपुरुष न सही, मध्यम श्रेणी के महापुरुष भी उत्कृष्ट श्रेणी के पति पत्नी ही उत्पन्न कर सकते हैं। भविष्य में ऐसे संस्कारवान व्यक्तियों की भारी संख्या में आवश्यकता पड़ेगी। राम के साथ प्राणवान से अनीति उन्मूलन करने वाले रीछ−वानरों की कितनी बड़ी सेना थी? वैसी ही सुसंस्कारी नई पीढ़ी को विनिर्मित करने का कार्य अब आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। संस्कारवान तेजस्वी बालक उत्पन्न करने का महाअभियान उनके माता पिता को सुसंस्कृत बनाने के कार्य से ही आरम्भ किया जा सकता है।
आज की पीढ़ी कमजोर मिट्टी की बनी हुई है। माता-पिता ने पूर्व तैयारी का निश्चित लक्ष लेकर उसे पैदा नहीं किया है और न वैसी दीक्षा, वैसी संस्कृति का लाभ ही उसे मिला है। ऐसी दशा में यदि आज की पीढ़ी दुर्बल मनोभूमि की, आदर्शों का भार उठाने में असमर्थ दीखती है तो कुछ आश्चर्य की बात नहीं है। अगली पीढ़ी के लिए हमें ऐसी तैयारी करनी चाहिये जो जन्म के साथ ही उच्च संस्कार साथ लेकर आवे। चिकनी मिट्टी के ही अच्छे खिलौने या बर्तन बन सकते हैं। बालू रेत लेकर कोई चतुर कुम्हार भी कुछ बना नहीं पाता, उसका श्रम निरर्थक ही चला जाता है। खराब लोहे से अच्छी मशीनें नहीं बन सकतीं, इसी प्रकार जन्मजात संस्कारों के बिना वह दृढ़ता नहीं आती जिसके आधार पर युग निर्माण जैसे महान कार्य संपन्न हो सकें।
किन उपायों से सुसंतति उत्पन्न हो सकती है यह एक स्वतन्त्र विषय है। इस पर हम आगे बहुत कुछ-बताने समझाने वाले हैं। पर आवश्यकता इस बात की है कि उसके लिए आत्म-नियंत्रण, आत्म शिक्षण और आत्म विकास के मार्ग पर चलना पति-पत्नी पहले से ही आरंभ कर दें ताकि उनकी निज की मनोभूमि तो उपयुक्त प्रकार की बन जाय। बालकों का निर्माण, आत्म निर्माण के साथ ही आरम्भ होता है दुर्गुणी माता पिता केवल बाहरी प्रशिक्षण के आधार पर सन्तान के उत्कृष्ट मनोभूमि का नहीं बना सकते। नई पीढ़ी की उत्कृष्टता, उनके पिता-माता की उत्कृष्टता पर निर्भर रहती है। इसलिए हममें से जो संतान को उत्तरदायित्व उठाने की स्थिति में हैं उन्हें अपनी धर्म पत्नियों को अपने अनुरूप मनोभूमि का बनाने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण आरंभ करना ही पड़ेगा।
जो व्यक्ति पूर्व संस्कारों के कारण आज धर्म रुचि सम्पन्न दिखाई पड़ते हैं उन्हें खोजना, संबन्ध सूत्र में बाँधना और स्वाध्याय-सत्संग के लाभ से लाभान्वित करना यह प्रथम कार्य है और साथ ही नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए तपश्चर्या करने वाले साहसी व्यक्तियों को उपयुक्त तैयारी के लिए प्रेरणा देना दूसरा कार्यक्रम है। इन दोनों को ही उत्साह-पूर्वक अपनाया जाना चाहिये ताकि जल्दी ही परिपक्व मनोभूमि वाले संस्कारी युग-पुरुषों की एक बड़ी सेना सामने प्रस्तुत दिखाई देने लगे।
भगवान बुद्ध एक बार निबिड़ वन को पार करते हुए कहीं जा रहे थे। रास्ते में उनकी भेंट अंगुलिमाल डाकू से हो गई। वह सदैव अनेक निर्दोषों का वध करके उनकी उंगलियों की माला अपने गले में धारण किया करता था। आज सामने आये हुए साधु को देखकर उसकी बाछें खिल उठीं।
“आज आप ही मेरे पहले शिकार होंगे” अँगुलिमाल ने बुद्ध से कहा और अपनी पैनी तलवार म्यान से बाहर निकाली।
तथागत मुसकराये, उनने कहा—”वत्स, तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। मैं कहीं भागने वाला नहीं हूँ। दो क्षण का विलम्ब सहन कर सको तो मेरी एक बात सुन लो।”
डाकू ठिठक गया, उसने कहा—”कहिए—क्या कहना है?”
तथागत ने कहा—”सामने वाले वृक्ष से एक पत्ता तोड़कर जमीन पर रख दो।” डाकू ने वैसा ही कर दिया। उन्होंने फिर कहा—”अब इसे पुनः पेड़ से जोड़ दो।” डाकू ने कहा—यह कैसे संभव है। तोड़ना सरल है पर उसे जोड़ा नहीं जा सकता।
बुद्ध ने गंभीर मुद्रा में कहा—वत्स, इस संसार में मार-काट तोड़-फोड़ उपद्रव और विनाश यह सभी सरल हैं। इन्हें कोई तुच्छ व्यक्ति भी कर सकता है फिर तुम इसमें अपनी क्या विशेषता सोचते हो और किस बात का अभिमान करते हो? बड़प्पन की बात निर्माण है—विनाश नहीं। तुम विनाश के तुच्छ आचरण को छोड़कर निर्माण का महान कार्यक्रम क्यों नहीं अपनाते?
अंगुलिमाल के अन्तःकरण में वे शब्द तीर की तरह घुसते गये। तलवार उसके हाथ से छूट पड़ी। कातर होकर उसने तथागत से पूछा—”इतनी देर तक पाप कर्म करने पर भी क्या मैं पुनः धर्मात्मा हो सकता हूँ?” वे बोले—”वत्स, मनुष्य अपने विचार और कार्यों को बदल कर कभी भी पाप से पुण्य की ओर मुड़ सकता है। धर्म का मार्ग किसी के लिए अवरुद्ध नहीं है। तुम अपना दृष्टिकोण बदलोगे तो सारा जीवन ही बदल जायगा।” विचार बदले तो मनुष्य बदला। अँगुलिमाल ने दस्यु कर्म छोड़कर प्रव्रज्या ले ली। वह भगवान बुद्ध के प्रख्यात शिष्यों में से एक हुआ।
सरदार चूड़ावत का विवाह हुए अभी थोड़े ही दिन हुए थे। पत्नी जैसी रूपवती थी, वैसी ही गुणवती भी।
औरंगजेब के अत्याचारों का प्रतिरोध करने के लिए राजपूतों को युद्ध के लिये आए दिन तैयार रहना पड़ता था। ऐसी ही एक चुनौती फिर सामने आ गई। चूड़ावत को दूसरे ही दिन युद्ध का मोर्चा संभालने का आदेश मिला।
एक ओर कर्तव्य की पुकार दूसरी ओर नवविवाहिता पत्नी का आकर्षण। सरदार का मन दोनों ओर डोलने लगा? मोर्चे पर जाये या नहीं? पत्नी को छोड़े या नहीं? दोनों ही ओर उसका मन बढ़ने लौटने लगा।
पति को असमंजस में पड़ा हुआ देखकर रानी की चिन्ता बढ़ी। उसने कारण पूछा तो सरदार ने अपनी अन्तर्व्यथा कह सुनाई।
रानी गम्भीर हो गई। उसने सोचा मेरा आकर्षण यदि पति को कर्त्तव्यपथ से विचलित करने वाला बनता है तो मेरा न रहना ही देश-धर्म के हित में होगा। मुझे अपना बलिदान करके पतिदेव की द्विविधा मिटानी चाहिए ताकि वे एकाग्रचित्त से कर्तव्य पालन कर सकें।
एक हाथ में तलवार और दूसरे से बाल पकड़े। रानी ने पूरे बल से वार किया और सिर कटकर चूड़ावत की गोद में जा गिरा।
कर्तव्य पथ से विचलित न होने देने के लिए जहाँ नारियों में इतना आत्मबल भरा पड़ा हो वहाँ नर के लिए कायरता अपनाना सम्भव नहीं हो सकता। चूड़ावत ने घोड़ा युद्ध-क्षेत्र की ओर बढ़ाया और बिजली की तरह शत्रु दल पर टूट पड़ा।
वोपदेव का मन पढ़ने में नहीं लगता था, उसकी स्मरण शक्ति अच्छी न था। पाठशाला में अध्यापकों और सहपाठियों का उन्हें उपहास सहना पड़ता था। घर पर भी इसी कारण प्रताड़ना होती थी। बच्चा निराश हो चला। उसने सोचा पढ़ने से क्या लाभ? कोई दूसरा काम करेंगे।
पाठशाला छोड़कर वोपदेव निकल पड़ा। इधर उधर भटकते-भटकते बहुत दिन हो गये। एक दिन वह ग्राम के निकट कुएं के किनारे बैठा अपनी दुरवस्था पर विचार करने लगा। अपनी समस्या का हल ढूँढ़ने लगा।
सोचते समय उसकी निगाह सामने वाले पत्थर पर गई। पानी सींचते समय रस्सी की जो घिसट पड़ती थी उससे पत्थर पर गहरी लकीरें बन गई थीं। वोपदेव सोचने लगा इतना कठोर पत्थर यदि कोमल रस्सी की बार-बार रगड़ पड़ने पर घिस सकता है तो मेरी मोटी बुद्धि निरन्तर प्रयत्न और अभ्यास करने से विद्याध्ययन के योग्य क्यों नहीं बन सकती?
बालक ने अपना साहस बटोरा और पुनः पाठशाला में जा पहुँचा। अबकी बार उसने पूरे मन और दूने परिश्रम से पढ़ना आरम्भ कर दिया। प्रयत्न से प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली। मन्दबुद्धि छात्र मेधावी स्नातक बनकर निकला।
महा वैयाकरण वोपदेव को कौन नहीं जानता। आरम्भ में वह महा मन्दबुद्धि था। इस मूढ़मति छात्र ने साहस से पुरुषार्थ से काम लिया तो प्रतिकूलताएँ अनुकूल बन गई। वोपदेव की गाथा हर छात्र के लिये विचारणीय है और अनुकरणीय भी।
यों परिवर्तन सभी कठिन होते हैं, पर व्यक्तियों का परिवर्तन सब से कठिन कार्य है। मकान, कारखाने, सड़क, पुल आदि को पुराने ढंग से बदलकर यदि नई डिजाइन का बनाना हो तो वह कार्य भी कठिन होता है। और व्यक्ति का, जो अनेक आदतों, संस्कारों, प्रवृत्तियों, वासनाओं, विश्वासों और मान्यताओं का समूह है, बदला जाना तो और भी कठिन है। इस कठिनाई को समझते हुए भी इसे करना तो पड़ेगा ही। जिस दुनिया में आज हम रह रहे हैं वह निश्चित रूप से इस स्थिति में पहुँच गई है कि अब उसे बदला ही जाना चाहिए। युग-परिवर्तन समय की अनिवार्य आवश्यकता है, इसकी उपेक्षा करने पर सामूहिक सर्वनाश का ही विकल्प सामने रह जायगा।
युग-निर्माण की विचार धाराएँ अपने-अपने देश, समाज, व्यक्ति के अनुरूप अपने-अपने क्षेत्रों में समस्त विश्व में फैलानी हैं। अपनी परिस्थिति, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों के लोग अपने-अपने ढंग से उसे कार्यान्वित करेंगे। इसका आरम्भ मात्र “अखण्ड-ज्योति परिवार” द्वारा हो रहा है। यह आरम्भ कितना ही छोटा क्यों न हो उसका उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है। अपने इस छोटे क्षेत्र में ही यह प्रयोग आरम्भ कर रहे हैं, ताकि इसका अनुकरण बड़े विशाल क्षेत्र में हो सके ।
“अखण्ड ज्योति परिवार” के प्रत्येक सदस्य को हम उस दृष्टि से देखते हैं जैसे कि कोई वयोवृद्ध व्यक्ति अपने निज के कुटुम्ब परिवार को देखता है। जिस प्रकार हम में से हर एक को अपना-अपना परिवार सुविकसित करना है, उसी प्रकार हम भी “अखण्ड-ज्योति परिवार” के सदस्यों को अपना निजी कुटुम्ब मानकर उसे ऐसा सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाना चाहते हैं जिसे देखकर दूसरों को भी उसी ढाँचे में ढलने की प्रेरणा मिले। पर हमारे यह प्रयत्न सफल तभी हो सकते हैं जब प्रत्येक परिजन हमें भी वैसी-ही आत्मीयता की दृष्टि से देखे और जो कहा या लिखा जा रहा है उसे भावनापूर्वक सुने समझे। उपेक्षित बूढ़े लोग जिस प्रकार अपनी बेकार बकझक करते रहते हैं और घर के लोग उनकी बातों पर ध्यान नहीं देते यदि वही स्थिति अपनी भी रही तो वह स्वप्न साकार न हो सकेंगे, जिन्हें देखने के लिये ही जीवित रहने की हमारी इच्छा शेष है।
हमारी आकाँक्षा इसी प्रकार पूर्ण हो सकती है युग-निर्माण की प्रयोग प्रक्रिया इसी तरह कार्यान्वित हो सकती है कि परिवार के सभी स्वजन “अखण्ड-ज्योति” को अपनी सत्परामर्शदात्री युग-प्रेरणा अनुभव करते हुए उसे ध्यानपूर्वक सुनें—समझें। हम सम्पादक, साहित्यकार या आचार्यजी बनकर नहीं रहना चाहते। हमारा स्थान अपने परिवार में वही होना चाहिये जो उसी घर से रक्त संबंधित अभिभावकों का होता है। इतनी आत्मीयता भी यदि हम लोगों के बीच न बन सकी तो उपेक्षित परदेशी की स्थिति में परिजनों के गुण-कर्म-स्वभाव में वह परिवर्तन लाना हमारे लिए कैसे संभव हो सकेगा?
स्वजनों के ‘प्रगाढ़ सौजन्य की ही हमें आशा है। इसी आशा के बल पर इतना बड़ा संकल्प किया गया। अब तक जितना मिला है उससे ज्यादा आगे मिलना चाहिये क्योंकि अब तक जितने कदम उठाये गये हैं यह अगला कदम उन सबसे अधिक बड़ा है और कठिन भी। इसके लिये परिजनों का प्रगाढ़ सौजन्य न मिला तो हमारे पैर लड़खड़ाने लगेंगे। इसका ध्यान रखना प्रत्येक परिजन का कर्तव्य है। इस कर्तव्य की उपेक्षा न की जानी चाहिए।
युग निर्माण योजना की रूपरेखा गतवर्ष के अंकों में बताई जाती रही है। सितंबर , अक्टूबर, नवंबर दिसंबर, 62 के अंकों में उसे और भी स्पष्ट किया गया है। मार्च और अप्रैल 63 के अंकों में योजना के उद्देश्य एवं लक्ष्य का और भी अधिक स्पष्टीकरण किया गया है। इसे ध्यानपूर्वक दो बार पढ़ा जाना चाहिये। इस विचारधारा के संबंध में अपने अभिमत लिखने चाहिएं और यह बताना चाहिये कि कौन पाठक उसे कार्यान्वित करने के लिए क्या करने की तैयारी कर रहा है। इन सूचनाओं के आधार पर परिवार की वर्तमान स्थिति को समझ सकना और प्रगति के अगले कदम उठा सकना सम्भव हो सकेगा।
जब पत्रकार की कलम कहीं बिक जाती है,
तब बुझ जाती है उसकी सारी तेज आग।
बेजान खोखले हो जाते हैं शब्द सभी,
वे जगा नहीं पाते फिर सोया हुआ भाग
जब गायक के दो अधर स्वर्ण से मढ़ जाते,
सब सातों स्वर हो जाते हैं नाराज बहुत।
वह गाने लगता है संकेत इशारों पर
करने लगते हैं किन्तु बगावत साज बहुत॥
जब फर्माइश पर लिखने लगता कविता कवि,
तब सरस्वती पछताती है सिर धुनती है।
शब्दों की तब शक्तियाँ सभी संन्यासिन हो,
कविता के चरम पतन की गाथा सुनती हैं॥
जब राह दिखाने वाले कदम भटक जाते,
तब जन जीवन की प्रगति सभी रुक जाती है।
तब देश समूचा अन्धकार में खो जाता,
मंजिल पर पहुँचे बिना दृष्टि थक जाती है॥
जब विद्रोही खुद कर सकता है सलाम,
तब बेखटके अन्याय जुल्म होने लगता।
शूली पर चढ़ने वाले करते समझौता,
तब राष्ट्र शहीदों की गरिमा खोने लगता।
जब पूर्वाग्रहों में कैद समीक्षा हो जाती ।
तब नीर क्षीर पिक काक भेद ही मिट जाता।
सब की है अलग कसौटी और अलग निर्णय,
निस्पृह साधक इस भीड़ भाड़ में लुट जाता॥
—दिनकर सोनवलक
*समाप्त*