मैं चला शंख अपना बजाता हुआ।
मैं चला तो प्रभाती सुनाता हुआ॥
मैं चला तो जमीं आसमाँ हिल गये।
मैं चला शैल भी धूलि में मिल गये॥
मैं चला सिन्धु में आ गया ज्वार-सा
मैं चला शूल भी फूल बन खिल गये॥
मैं चला आँधियों को उठाता हुआ।
मैं चला बिजलियों को गिराता हुआ॥
मैं चला चाँद सूरज सितारे चले।
मैं चला सृष्टि के कार्य सारे चले॥
मैं चला साथ में चल पड़ा विश्व भी।
मैं चला लोग मेरे सहारे चले॥
मैं चला राह अपनी बनाता हुआ।
मैं चला राह जग को दिखाता हुआ॥
मैं चला चल पड़े सुप्त पाषाण भी।
मैं चला, तो सजग से हुये प्राण भी॥
मैं चला, पा गये शक्ति म्रियमाण भी।
मैं चला तो चले भाग्य-भगवान भी॥
मैं चला राष्ट्र सोया जगाता हुआ।
मैं चला जागरण - गीत गाता हुआ॥
-विनोद रस्तोगी
(श्री ज्ञानानन्द ब्रह्मचारी)
यह संसार भगवान द्वारा विनिर्मित और उसी से ओत-प्रोत है। यहाँ जो कुछ श्रेष्ठता दिखाई पड़ती है वह सब भगवान की ही विभूति है। जीव ईश्वर का ही पुत्र-अंश है। उसमें जो कुछ तेज और ऐश्वर्य दिखाई पड़ता है वह ईश्वरी या अंशों की अधिकता के कारण ही उपलब्ध होता है। आत्मा की प्रगति, उन्नति और विभूति की संभावना भगवन् के सान्निध्य में ही संभव होती है।
समस्त सद्गुणों का केन्द्र परमात्मा है। जिस प्रकार पृथ्वी पर ताप और प्रकाश सूर्य से ही आता है, उसी प्रकार मनुष्य को आध्यात्मिक श्रेष्ठताएँ और विभूतियाँ परमात्मा से ही प्राप्त होती हैं। इस संसार में समस्त दुःख, पापों के ही परिणाम हैं। अथवा मनुष्य अपने किये पापों का दण्ड भुगतता है या फिर दूसरों के पापों की लपेट में आ जाता है। दोनों प्रकार के दुःखों का कारण पाप ही होते हैं। यदि पापों को घटाया जा सके तो मानव जाति के दुःखों में निश्चय कही कमी हो सकती है। कुविचारों और कुकर्मों पर नियंत्रण धर्म-बुद्धि के विकसित होने से ही संभव होता है और यह धर्म-बुद्धि परमात्मा पर सच्चे मन से विश्वास रखने से उत्पन्न होती है। जो निष्पक्ष, न्यायकारी परमात्मा को घट-घटवासी और सर्वव्यापी समझेगा उसे सर्वत्र ईश्वर ही उपस्थित दिखाई पड़ेगा। ऐसी दशा में पाप करने का साहस खड़ा देख कर तो दुस्साहसी चोर भी अपनी हरकतें बन्द कर देता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति परमात्मा को निष्ठुरतापूर्वक कर्म फल देने वाला और सर्वव्यापी समझ लेना वह आस्तिक व्यक्ति पाप करने की बात सोच भी कैसे सकेगा?
ईश्वर का अविश्वास ही पापों की जड़ है, इस अविश्वास से प्रेरित होकर ही मनुष्य मर्यादाओं का उल्लंघन करके स्वार्थ और अहंकार की पूर्ति के लिये स्वेच्छाचारी बन जाता है। आत्म-नियंत्रण के लिए ईश्वर-विश्वास की अनिवार्य आवश्यकता मानी गई है। व्यक्ति सदाचार और सामूहिक कर्तव्य-परायणता के पालन के लिये ईश्वरीय विश्वास के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं हो सकता। इसलिए मनीषियों ने मनुष्य के दैनिक आवश्यक कर्तव्यों ईश्वर उपासना को सबसे प्रमुख और अनिवार्य माना है। जो इसकी उपेक्षा करते हैं उनकी भर्त्सना की और उन्हें कई प्रकार के दण्डों का भय भी बताया है।
खेद है कि आज नास्तिकता की सत्यानाशी बाढ़ तेजी से बढ़ती चली जा रही है। भौतिकवाद विचारधाराओं ने यह प्रतिपादित किया है कि ईश्वर न तो आँखों से दिखाई पड़ता है और न वैज्ञानिक शालाओं की जाँच द्वारा सिद्ध होता है इसलिए उसे मानने की आवश्यकता नहीं। अति उत्साही लोग इतनी बात से बहक जाते हैं और ईश्वर की आस्था पर अविश्वास करने लगते हैं। न तो वे कर्म फल के ईश्वरीय विधान पर विश्वास करते हैं और न उपासना की कोई आवश्यकता अनुभव करते हैं।
दूसरे प्रकार के नास्तिक इनसे भी गये-बीते हैं वे अपने को आस्तिक कहते और किसी ईश्वर को मानते भी हैं पर उनका यह कल्पित ईश्वर वास्तविक ईश्वर से सर्वथा भिन्न होता है। वे समझते कि ईश्वर तो केवल पूजा-स्तुति ही चाहता है, इसे से ही वह प्रसन्न होकर मनुष्य के पापों पर ध्यान नहीं देता। पूजा करने वालों के समस्त पाप किस सामान्य धार्मिक कर्मकांड के कर लेने से दूर हो जाते हैं। साथ ही वे ईश्वर से यह भी आशा रखते हैं कि जरा से पाठ, पूजन के बदले, बिना उनके योग्यता, पुरुषार्थ और लगन की जाँच किये वह मनमाना वरदान दे सकता है और उनके समस्त कामनाओं की पूर्ति कर सकता है। ये लोग ऐसा भी सोचते हैं कि साधु, ब्राह्मण परमात्मा के अधिक निकट हैं इसलिये यदि उन्हें दान दक्षिणा देकर प्रसन्न कर लिया जाय तो अपनी तगड़ी सिफारिश परमात्मा के यहाँ पहुँच सकती है और फिर तुरन्त ही मनमाने वरदान पाने और पाप के दण्ड से बचने की सुविधा हो सकती है। हम देखते हैं कि आजकल नाममात्र की आस्तिकता इसी विडम्बना की धुरी पर घूम रही है।
यह प्रच्छन्न नास्तिकता दिखाई तो ईश्वर-विश्वास जैसी ही पड़ती है, पर इससे लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। आस्तिकता का असली लाभ पाप से भय उत्पन्न करना है। इसके विपरीत जिस मान्यता के अनुसार दस-पाँच मिनट में पूरे हो सकने वाले कर्मकाण्डों द्वारा ही समस्त पापों का फल नष्ट हो सकने का आश्वासन दिया गया हो, उससे तो उलटे पाप के प्रति निर्भयता ही बढ़ेगी। जब पाप-फल से बच सकना इतना सरल मान लिया गया तो दुष्कर्मों द्वारा प्राप्त होने वाले आकर्षणों को छोड़ना कौन पसन्द करेगा? ऐसी मान्यता से प्रभावित होकर मध्यकालीन राजाओं और सरदारों ने बर्बर अत्याचार और अनैतिक आचरण करने के साथ-साथ पूजा-पाठ के भी बड़े-बड़े आयोजन किये थे। उन्होंने मंदिर भी बनवाये और भगवान को प्रसन्न करने वाले उत्सव आदि भी किये। पंडितों और ब्राह्मणों को कथा-भजन करने के लिये वृत्तियां भी दीं। सम्भवतः वे यही समझते थे कि उनका पहाड़ के बराबर अनैतिकता का कार्य-क्रम इस प्रकार धन द्वारा रचाई पूजा-पाठ की धूमधाम के पीछे छिप जायेगा। पंडितों और पुजारियों ने अपनी आजीविका की दृष्टि से ऐसे आश्वासन भी गढ़कर रख दिये, जिससे कुमार्गगामी व्यक्ति थोड़ा बहुत दान-पुण्य करते रहने तो तत्पर रहें। दान पुण्य की परिभाषा भी इन लोगों ने बड़े विचित्र ढंग से की कि केवल ब्राह्मण वंश में उत्पन्न हुये व्यक्ति को जो कुछ दिया जायेगा, वह अवश्य पुण्य माना जायेगा।
विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस प्रकार की अज्ञानमूलक धारणा व्यक्ति और समाज के लिये हानिकारक परिणाम ही उपस्थित कर सकती है। पापों के दण्ड से बच निकलने का आश्वासन पाकर लोग चरित्र गठन की उपेक्षा करने लगे, पापों का भय जाता रहा। ऐसी अनेक कथा-कहानियाँ गढ़ी गई जिनमें निकृष्ट से निकृष्ट कर्म जीवन भर करते रहने वाले व्यक्ति केवल एक बार अनजाने धोखे से-’नारायण ‘ का नाम लेने से मुक्त हो गये। इन कथाओं से सत्कर्मों की व्यर्थता सिद्ध होती है और प्रतीत होने लगता है कि जीवन-शोधन के लिये श्रम और त्याग करने की अपेक्षा थोड़ा-बहुत पूजा पाठ कर लेना ही अधिक सुविधाजनक है। ऐसी शिक्षा देने वाला अध्यात्म वस्तुतः अपने लक्ष्य से ही भ्रष्ट हो जाता है। आस्तिकता का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को सदाचारी और कर्तव्य परायण बनाना है। यदि इस बात को भूलकर लोग देवताओं को माँस, मदिरा या मिष्ठान्न की रिश्वत देकर मनमाने लाभ प्राप्त करने की बात सोचने लगें तो यह माना जायेगा कि उन्होंने ईश्वर को भी रिश्वत लेकर उल्टा-सीधा काम करने वाला मान लिया है। फिर तप, त्याग, संयम, धर्म, कर्तव्य आदि के कष्टसाध्य मार्ग की उपयोगिता क्या रह जायगी? जब ईश्वर अपनी प्रतिमा के दर्शन करने वाले, स्तुति गाने वाले और भोग लगाने वाले पर ही प्रसन्न होने लगा तो फिर यही मार्ग हर किसी को पसन्द आने लगेगा। फिर कोई क्यों उस संदर्भ के नाम पर कष्ट सहने को प्रस्तुत होगा जिसमें सर्वस्व त्याग और तिल-तिल कर जलने की अग्निपरीक्षा में होकर गुजरना पड़ता है।
इन्हीं मान्यताओं का फल आज हम यह देख रहे हैं कि पूजा-अर्चना में बहुत धन और समय खर्च करने वाले व्यक्ति भी चारित्रिक दृष्टि से बहुत गये गुजरे देखे जाते हैं। मन्दिर, झाँकी भजन-कीर्तन में बहुत उत्साह दिखाने वाले भी गुप्त-प्रकट रूप से बुरी तरह पाप पंक में डूबे रहते हैं। ‘जो कुछ होता है ईश्वर की इच्छा से ही होता है’- ऐसा मानने वाले आलसी और अकर्मण्य बनकर अपनी हीन स्थिति का दोष ईश्वर को लगाते रहते हैं और प्रगति के लिये कि यह प्रतीक्षा करते रहते हैं कि जब कभी ईश्वर की इच्छा हो जायगी तभी अनायास सब कुछ हो जायेगा। ऐसे लोग अनीति और अत्याचारों को भी ईश्वरेच्छा मान कर चुपचाप सहते रहते हैं। वे किसी दीन दुखी और निराश्रित की सेवा सहायता करने से भी इसीलिये विमुख रहते हैं कि इससे ईश्वर के इच्छा का विरोध होगा। इन्हीं मान्यताओं के आधार पर एक हजार वर्ष तक हम विदेशी आक्रमणकारियों के बर्बर अत्याचार सिर झुकाये सहते रहे। सोमनाथ मंदिर की अपार संपत्ति लुटते देखकर हमें भगवान की प्रार्थना करने के सिवाय कर्तव्यपालन का कोई अन्य मार्ग न सूझा। आस्तिकता का असली स्वरूप भुला कर जो अविवेकपूर्ण धारण हमने अपनाई, उसके कारण हम वस्तुतः ईश्वर से अधिकाधिक दूर होते गये आस्तिकता के नाम पर हमने दिखावटी पूजापाठ का जो भाव अपनाया उससे हमने पाया कुछ नहीं, केवल खोया ही खोया।
ऐसे विषम समय में तत्वदर्शी लोग भारी पीड़ा अनुभव कर रहे थे कि क्या इन काली घटाओं की चीर कर फिर कभी सच्ची आस्तिकता का सूर्य उदय होगा? यह प्रार्थना ईश्वर ने सुनी और वह दिन फिर सामने आया जिसमें जन साधारण को आस्तिकता का सच्चा स्वरूप समझने का अवसर मिल सके। युग-निर्माण-योजना को आस्तिकता के पुनरुद्धार का आन्दोलन ही कहना चाहिये। कहते हैं कि किसी समय नारद जी ने भक्ति का घर-घर प्रचार करने का व्रत लिया था और वे अथक श्रम करके सारी पृथ्वी पर अनवरत भ्रमण करते हुये समस्त नर-नारियों को ईश्वर उपासक बनाने में जुट गये थे। युग-निर्माण-योजना के जन्मदाता ने भी आस्तिकता की प्रेरणा करोड़ों आत्माओं तक पहुँचाई हैं और 24 लाख से अधिक व्यक्ति गायत्री के नैष्ठिक उपासक बनाये हैं। अब उनका प्रयत्न यही हैं कि घर-घर में आस्तिकता की आस्था फलती-फूलती नजर आवे। युग निर्माण योजना का प्रथम लक्ष्य आस्तिकता का प्रसार करना ही है। समस्त हिन्दू-जाति को उसकी संस्कृति के उद्गम केन्द्र से परिचित करने और गायत्री के माध्यम से भावनात्मक एकता उत्पन्न करने के लिये जो प्रयत्न किया जा रहा है उससे जातीय एकता का एक नवीन अरुणोदय होगा और हम चारों वेदों की जननी महाशक्ति गायत्री के साथ-साथ उसके 24 अक्षरों में सन्निहित अपनी महान संस्कृति को भी समझ सकेंगे। जातीय उत्कर्ष की दृष्टि से निश्चय ही यह एक बहुत बड़ा काम होगा।
युग-निर्माण योजना के अंतर्गत जिस आस्तिकता का प्रसार किया जा रहा है उसमें जप, तप, हवन, पूजन, भजन, ध्यान, कथा, कीर्तन, तीर्थ, पाठ, व्रत, अनुष्ठान आदि के लिये परिपूर्ण स्थान है, पर साथ ही समस्त शक्ति लगा कर हर आस्तिक के मन में यह संस्कार जमाये जा रहे हैं कि ईश्वर को निष्पक्ष, न्यायकारी और घट-घटवासी समझते हुये कुविचारों और दुष्कर्मों से डरें और उनसे बचने का प्रयत्न करें। प्रत्येक प्राणी में ईश्वर को समाया हुआ समझ कर उसके साथ सज्जनतापूर्ण सद्व्यवहार किया जाय। कर्तव्यपालन को ईश्वर की प्रसन्नता का सबसे बड़ा उपहार मानें और प्रभु की इस सुरम्य वाटिका-पृथ्वी में अधिकाधिक सुख-शान्ति विकसित करने के लिये एक ईमानदार माली की तरह सचेष्ट बना रहे। अपना अन्तःकरण इतना निर्मल का प्रकाश स्वयमेव झिलमिलाने लगे। प्रार्थना केवल सद्बुद्धि, सद्गुण, सद्भावना, सहनशीलता, पुरुषार्थ, धैर्य, साहस और सहिष्णुता के लिये आवश्यक क्षमता प्राप्त करने की ही की जाय। परिस्थितियों को सुलझाने और अभावों की पूर्ति के लिये जो साधन हमें मिले हुये हैं उन्हें ही प्रयोग में लाया जाय और संघर्ष का जीवन हँसते-खेलते बिताते हुये मन को संतुलित रखा जाय।
ये ही सब आस्तिकता के सच्चे लक्षण हैं। युगनिर्माण योजना का प्रयत्न यह है कि इन लक्षणों से युक्त भक्ति और पूजा की भावना को जन-मानस में स्थान मिले और सच्ची आस्तिकता के अपनाने के लिये मानव मात्र का अन्तःकरण उमंगने लगे।
मनुष्य का कल्याण परमपिता परमात्मा की शरण में जाने से ही हो सकता है। असुरता के चंगुल से छुड़ा कर देवत्व की ओर अग्रसर होने की प्रवृत्ति की साधना कहलाती है। साधना से हमारा जीवन सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत भी बनता जाता है। पर यह तभी संभव होता है जब हम जड़-विज्ञान तथा स्वार्थपूर्ण दिखावटी आस्तिकता से बचकर सच्चे स्वरूप में ईश्वर की उपासना करेंगे। युग-निर्माण योजना मानव-मात्र के हृदय में सच्ची आस्तिकता उत्पन्न करके उनका हित साधन करने के लिये ही चलाई गई है।
(श्री सोमाभाई डाह्याभाई पंड्या)
तवर्षडडडडडड की सबसे विशेषता और महत्ता उसका आध्यात्मवादी दृष्टिकोण है। अतीत काल से अब तक हमारे देश का गौरव इसी आधार पर प्रकाशवान रहा है। एक समय था जब यहाँ के निवासी तैंतीस कोटि देवताओं के नाम से पुकारे जाते थे, ज्ञान और विज्ञान की दृष्टि से उन्हें जगद्गुरु की पदवी प्राप्त हुई थी। व्यवस्था दूरदर्शिता और प्रतिभा का स्तर अत्यन्त ऊँचा होने के कारण चक्रवर्ती शासन का गुरुतर भार उन्हीं के कंधों पर डाला जाता था। धन, विद्या, चरित्र सब दृष्टियों से यह देश नररत्नों की खान माना जाता था। इस सब का कारण यहाँ की आध्यात्मिक विशेषता ही थी।
अध्यात्म-तत्वज्ञान को पारस माना गया है, क्योंकि उसका स्पर्श होते ही लोहे के समान तुच्छ श्रेणी के व्यक्तित्व भी सोने के समान बहुमूल्य और आकर्षक बन जाते हैं। अध्यात्म को कल्पवृक्ष कहा गया है क्योंकि उस दृष्टिकोण के प्राप्त होते ही मनुष्य आप्तकाम बन जाता है। अनावश्यक तृष्णाओं को वह मस्तिष्क में से कूड़े-कचरे की तरह बुहार कर बाहर फेंक देता है और जो कामनाएं आवश्यक होती हैं उन्हें तत्परता, पुरुषार्थ और लगन के साथ पूरा करने में जुट जाता है। इस प्रकार कार्य-संलग्न हुये व्यक्ति के लिये असफलता नाम की कोई वस्तु बाकी नहीं रहती। आलस्य और प्रमाद ही असफलता के जनक हैं, इन दो शत्रुओं को परास्त कर देने के बाद मनुष्य को आप्त-काम होने में देर नहीं लगती। उसकी कोई कामना अधूरी नहीं रहती।
अध्यात्म का आधार संयम है और संयमी मनुष्य के लिये शारीरिक अस्वास्थ्य का प्रश्न ही नहीं उठता। अध्यात्म का मूल मंत्र प्रेम है। जो दूसरों के साथ आत्मीयता, उदारता, सेवा, सहिष्णुता और मधुरता का व्यवहार करेगा उसके लिये दूसरों का सहयोग, सद्भाव एवं सौजन्य मिलेगा ही। सर्वत्र उसे स्नेही और सज्जन ही भरे हुये मिलेंगे। अध्यात्म तत्वज्ञान आत्म-शोधन पर अवलम्बित है। जो अपने दोष और त्रुटियों को समझ लेगा और उन्हें सुधारने के लिये सचेष्ट रहेगा उस व्यक्ति के सामने न तो कोई समस्या रहेगी और न उलझन। जब मनुष्य अपने ही दोष, दुर्गुण, कुविचार, कुसंस्कारों को रंगीन चश्मे की तरह आँख पर धारण किये रहता है तो सर्वत्र उसे नरक दिखाई पड़ता है। पर जब वह अपने को सुधारने और बदलने के लिये प्रयत्नशील होता है तो बाहरी समस्याएँ और परिस्थितियाँ अपने आप ही सरल हो जाती हैं। इस प्रकार आध्यात्मिक विचारधारा मनुष्य को स्वर्गीय जीवन की आनन्दमय अनुभूति कराती रहती है और अंततः आत्मा-परमात्मा को प्राप्त करने का लक्ष्य भी उसी मार्ग पर चलते हुये प्राप्त हो जाता है।
जीवन का प्रत्येक क्षेत्र जिसके प्रकाश से दिव्य हो उठता है, उसे अध्यात्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिये संसार के कोने-कोने से जिज्ञासु लोग यहाँ आते थे। नालंदा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा-दीक्षा के महान केन्द्र बने हुये थे। वहाँ प्रत्येक लौकिक विषय का शिक्षण होता था, पर दीक्षा का आधार अध्यात्म ही रहता था। उनमें शिक्षा प्राप्त करके निकलने वाले प्रत्येक छात्र का जीवन अध्यात्मवादी दृष्टिकोण में ढला रहता था। वे छात्र जहाँ कहीं भी जाते थे अपने उज्ज्वल चरित्र और सफल जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करके अध्यात्म की विजय पताका फहराते थे। जब तक वह परम्परा यथावत चलती रही तब तक भारत संसार का प्रत्येक क्षेत्र में नेतृत्व भी करता रहा और सुख-शान्ति की अजस्र धारा यहाँ निर्बाध गति से बहती रही।
भारत की महान आध्यात्मिक सम्पदा आज भी शास्त्रों और ग्रन्थों में ज्यों की त्यों मौजूद है। वैसे हम आज भी अध्यात्मवादी कहलाते हैं पर असलियत कुछ और ही हो गई है। जिस प्रकार असली के स्थान पर हर चीज नकली चल पड़ी है, वही दशा अध्यात्म की भी हुई है। जो तत्वज्ञान मनुष्य की आन्तरिक दुर्बलताओं को हटाने और महानताओं को जागृत करने का प्रधान साधन था, वही अब लोगों को आलसी, कर्तव्यशून्य और दीन-दुर्बल बनाने का निमित्त बना हुआ है। स्वार्थी लोगों ने भोली जनता को अज्ञान में फंसाये रखने और ठगते रहने का जो कुचक्र चलाया आज उसी को अध्यात्म समझा जाता है। गुरु लोग उसी के आधार पर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और भोले भाले अविवेकी लोग उसी टंट-घंट को सब कुछ मानकर स्वर्ग और मुक्ति के सपने देखते रहते हैं।
वर्तमान समय में प्रचलित आध्यात्मिक सिद्धान्त बड़े विचित्र हैं। उनके अनुसार ‘संसार मिथ्या है, इसके लिये किसी से मोह-माया न रख कर केवल भजन करते रहना चाहिये।’ ‘जो भाग्य में लिखा है वही होगा, मनुष्य उसे बदल नहीं सकता। इसलिये ज्यादा हाथ पैर पीटना व्यर्थ है।”देवताओं की प्रसन्नता अप्रसन्नता या सिद्ध महात्माओं के आशीर्वाद से उन्नति होती है, मनुष्य स्वयं कुछ नहीं कर सकता। लौकिक समस्याओं पर विचार करना माया में पड़ना है, जो कुछ हो रहा है सब भगवान की इच्छा है, उसकी इच्छा में हम क्यों बाधक बनें। अपनी मुक्ति की बात ही हमें सोचनी चाहिए, दुनिया से हमें क्या मतलब।’ ऐसी विचारधारा में फँसा हुआ व्यक्ति दिन पर दिन स्वार्थी और निराशा बनता जाता है। कर्तव्यों के प्रति उपेक्षा दिखलाता रहता है। ऐसे व्यक्ति हर क्षेत्र में असफल होते हैं।
देखा जाता है कि अध्यात्म की चर्चा करने वाले व्यक्तियों में से अधिकाँश को बहुत कुछ पूजा-पाठ करने पर भी-जीवन के हर क्षेत्र में असफलता मिलती है। कारण यही है कि ऐसे लोग अध्यात्म के सबसे प्रधान अंग जीवन-विकास की उपेक्षा किया करते हैं और केवल जप या पाठ को ही सब कुछ मान लेते हैं। ऐसा एकाँगी तत्वदर्शन किया एक व्यक्ति को कुछ शाँति या संतोष भले ही कर सके पर समस्त समाज को वह किसी भी रूप में स्पर्श नहीं कर सकता, और जब तक समाज का उत्थान न हो तब तक किसी एक व्यक्ति का स्थायी कल्याण हो सकना कैसे संभव हो सकता है? जिसमें गुण, कर्म स्वभाव के विकास का, जीवन की समस्याओं का ठीक प्रकार समाधान करने का विधान न पाया जाय वह तत्वज्ञान न उपयोगी सिद्ध हो सकता है और न प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है। प्राचीन काल में हमारी आध्यात्मिक विचारधारा मानव जीवन के हर पहलू को विकसित करने की क्षमता रखती थी, इसी से उसे अपनाने वाले भरपूर लाभान्वित हुये और जहाँ कहीं वे गये वहीं उनकी प्रशंसा और प्रतिष्ठा हुई।
पूजा, उपासना का आध्यात्मवाद में प्रमुख स्थान है, पर इसके साथ ही यह भी साधना का अनिवार्य अंग माना जाता है कि मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट और आदर्श बनावे। जीवन के हर क्षेत्र में आध्यात्मवाद का समावेश करे ऐसी जिन्दगी जिये जैसे कि मानव शरीर-धारी को जीनी चाहिए। पूजा को औषधि और जीवन विकास की परम्पराओं को पथ्य, परिचर्या माना गया है। औषधि तभी लाभ करेगी जब परहेज भी ठीक रखा जाय। चिकित्सक के बतलाये सारे नियमों का उल्लंघन करते रहने पर भी यदि कोई आशा करे कि औषधि सेवन मात्र से बीमारी दूर हो जाय तो यह उसकी गलती ही मानी जायगी। इसी प्रकार जीवन - विकास, समाज-कल्याण के सारे प्रयत्नों की उपेक्षा करके जो भजन मात्र से लक्ष्य की प्राप्ति चाहता है उसे भूला-भटका ही माना जायेगा। किसी धर्म ग्रंथ में यदि पूजा, भजन का वर्णन बढ़ा-चढ़ाकर अलंकारिक भाषा में लिख दिया गया है कि अमुक पूजा से सब कुछ प्राप्त हो जाता है, तो उसे मनुष्यों की श्रद्धा बढ़ाने के उद्देश्य से अलंकारिक उक्ति ही मानना चाहिये। सच्चे भक्त-जनों में भक्ति-भावना के साथ-साथ कर्तव्यपरायणता, परोपकार, उदारता आदि की प्रवृत्तियां भी पूर्ण मात्रा में होती हैं और इन्हीं के आधार पर उनको दैवी शक्तियाँ और जीवन की चरम सफलता प्राप्त होती है।
सच्चरित्रता, सदाचार, संयम, परमार्थ आदि गुणों पर आधार रखने वाला अध्यात्म ही सच्चा अध्यात्म कहा जा सकता है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का शोधन और जीवन विकास के उच्च गुणों का अभ्यास करना ही साधना है। भगवान को घट-घटवासी और न्यायकारी मान कर पापों से हर घड़ी बचते रहना ही सच्ची भक्ति है। प्राणी मात्र के हित की दृष्टि से उदारता, सेवा सहानुभूति, मधुरता का व्यवहार करना ही परमार्थ का सार है। सच्चाई, ईमानदारी, सज्जनता, सौजन्य आदि गुणों के बिना कोई मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता। जो अपने समय, धन, श्रम, बुद्धि को अन्य लोगों की सेवा में जितना अधिक लगाता है वस्तुतः वह उतना ही बड़ा महात्मा माना जा सकता है। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से जिसका जीवन जितना ओत-प्रोत है उसे उतना ही ईश्वर के निकट समझना चाहिए। सन्मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को स्वयमेव जो आत्मबल प्राप्त होता है वह किसी योगाभ्यासी की कठिन साधना से कम महत्वपूर्ण नहीं होता। वास्तविक अध्यात्म का स्वरूप यही है और इसी को जीवन में धारण करने वाला व्यक्ति अपना कल्याण करने के साथ दूसरे अनेकों को प्रकाश प्रदान करके उन्हें भी ऊंचा उठाने में सहायक बनता है।
इस समय इस बात की सबसे अधिक आवश्यकता है कि देशवासियों को अध्यात्म का सच्चा स्वरूप बतलाया जाय। उसका महत्व समझाया जाय और लोगों की विचार धारा को उस तरफ मोड़ा जाय। इस महान तत्व को केवल कथावार्ता का विषय न समझ कर जन-जीवन में व्यवहारिक रूप से उसका समावेश होना परमावश्यक है। मनुष्य का अन्तःकरण बदलते ही उसकी दुनिया भी बदल जाती है। जब संसार की परिस्थितियाँ जैसी विकृत हो उठी हैं उनका परिवर्तन होना अनिवार्य है अन्यथा हम दिन प्रति दिन पतन और कष्ट के खड्डे में ही गिरते जायेंगे। यह परिवर्तन बाहरी हेरफेर से संभव नहीं हो सकता वरन् उसके लिये मनुष्य की अन्तः चेतना को ही प्रभावित किया जाना चाहिये। इस प्रकार के बदलाव से ही हम सब रोग, शोक, क्लेश, कलह पाप-ताप, आधिव्याधि से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकेंगे। इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय ऐसा नहीं है जिससे संसार भर में फैली अशान्ति मिटकर लोगों को सुख शान्ति का दर्शन हो सके।
युग-निर्माण योजना को मैंने अच्छी तरह पढ़ा और समझा है। उसकी पृष्ठ भूमि में जो रहस्यमय शक्तियाँ काम कर रही हैं उनका भी कुछ परिचय मुझे प्राप्त हो चुका है। इसलिये मुझे इस बात से बड़ी प्रसन्नता होती है कि जनता को सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी बनाने का एक ठोस प्रयत्न किया जा रहा है। इसके द्वारा मनुष्यों के अनेक कष्ट, संताप तो मिट ही सकेंगे, पर सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भारत की महान निधि ‘अध्यात्म’ का सच्चा स्वरूप समझने और उसे अपने व्यवहारिक जीवन में स्थान देने का अलभ्य अवसर सर्व साधारण को प्राप्त हो सकेगा।
भारतवर्ष यदि अपनी समस्त कठिनाइयों को हल करके संसार का मार्गदर्शक बनना चाहे तो उसका एक मात्र आधार अध्यात्म ही है। इसी के द्वारा हमारा भूत काल महान बन सका था और इसी से भविष्य के उज्ज्वल बनने की आशा भी की जा सकती है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम व्यवहारिक अध्यात्म का स्वरूप सर्व साधारण को समझ सकें और उसके प्रत्यक्ष लाभों से लोगों को अवगत करा दें।
अशान्ति के दावानल में जलता हुआ समस्त संसार आज अध्यात्म के अमृत के लिये तरस रहा है। हमें आगे बढ़कर इसी महान तत्व ज्ञान का सच्चा स्वरूप प्रकट करने में अपनी शक्ति को लगाना है। युग-निर्माण योजना अध्यात्मवाद को जन-जन के जीवन में प्रविष्ट करने की व्यवहारिक विधि है। जितनी गहराई तक इसकी संभावनाओं पर विचार किया जाता है उतनी ही अधिक आशा बँधती है और लगता है कि यदि हम इस मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चल सकें तो प्राचीन काल की तरह भारत पुनः ‘स्वर्ग’ कहलाने का गौरव प्राप्त कर सकेगा और संसार के अन्य भागों के निवासी यहाँ से सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा प्राप्त करके इसे पुनः जगद्गुरु का सम्मान प्रदान करेंगे। खोये हुये अतीत को पुनः वापिस लाने का यह आध्यात्मिक प्रयत्न हमारे लिये आशा की किरण बनकर आया है और उसका हमें सादर अभिनन्दन करना चाहिये।
अपने शिष्यों को साथ लेकर महर्षि बोधायन एक बार बन विहार के लिए गये । मध्याह्न होते-होते वे लोग थक गये। वृक्षों की सघन छाया में विश्राम करने लगे तो सभी को नींद आ गई।
दिन ढल चुका था। महर्षि जगे और उनसे अपने सब शिष्यों को पुकारा। जागते, सोते और नींद ने सभी शिष्य गुरुदेव की आज्ञा सुनते ही उठ बैठे। पर गार्ग्य ज्यों का त्यों अब तक पड़ा रहा।
महर्षि को आश्चर्य हुआ और गार्ग्य के पास जाकर धीरे-धीरे उसे जगाने लगे। पर वह तो जागा पड़ा था। गार्ग्य ने कहा-भगवन्, एक महा भयंकर सर्प मेरे पैरों में लिपटा सोया पड़ा है। कुछ देर में जागेगा तब अपने रास्ते चला जायेगा। इतनी देर धैर्यपूर्वक मेरा अविचल पड़ा रहना ही उचित है।
गार्ग्य ज्यों का त्यों पड़ा रहा। दो घड़ी के बाद सर्प की नींद खुली और वह पास की गाड़ी की ओर अपने बिल में चला गया।
शिष्य उठा तो महर्षि ने उसे छाती से लगा लिया और उसके शील की भूरि-भूमि प्रशंसा की। दूसरे शिष्य मैत्रायण ने कहा-यह तो साहस का कार्य था, गुरु देव। आप गार्ग्य की साहसी क्यों नहीं कहते, शीलवान् क्यों कहते हैं?
महर्षि के होठों पर एक हलकी मुस्कान दौड़ गई। उनने कहा-भद्र। शील से ही साहस की शोभा है। जो शील के लिए साहस किया जाता है वही सराहनीय है। दुःशील के लिए दुस्साहस करने वाले निन्दनीय होते हैं। सराहा वही साहस जाता है जो विवेक, धैर्य और सदाचरण से संयुक्त हो।
(श्री रविशंकर करुणाशंकर औदीच्य)
आचार्य जी का विकसित जीवन गायत्री उपासना के साथ आरंभ होता है। अधेड़ आयु होने तक उनने अपना अधिकाँश समय इसी कार्य में लगाया है। उनके जीवन का विश्लेषण करें तो गायत्री उपासना गायत्री तत्व ज्ञान का अध्ययन, गायत्री उपासकों को खोजना और उनके अनुभवों का लाभ प्राप्त करना ही प्रमुख कार्य प्रतीत होते हैं। चालीस वर्ष के आयु के पीछे उनने आवश्यक आत्म-बल और आत्म-विश्वास प्राप्त करने के पश्चात गायत्री प्रचार आरम्भ किया और थोड़े ही वर्षों में उसे उच्च शिखर तक पहुँचा दिया। करोड़ों को उन्होंने यह तत्वज्ञान सिखाया और समझाया, लाखों ने उनके बताये मार्ग पर निष्ठापूर्वक कदम उठाये और अब तक वे उसी उपासनाक्रम को श्रद्धापूर्वक अपनाये हुए हैं। इस प्रकार विहंगम दृष्टि से देखा जाय तो आचार्य जी का जीवन गायत्रीमय ही दीखता है।
पिछले 15 वर्षों में अनेक बार मेरा उनसे मिलना हुआ। गायत्री उपासना में मेरी अत्यधिक श्रद्धा है, इसलिए तद्विषयक अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए मैं उन्हीं के पास दौड़ता हूँ। अन्यान्य बातों के साथ एक बात पर मैं सदा ही उनसे चर्चा करता हूँ कि- गायत्री उपासना का जो महात्म्य बताया जाता है, उसके द्वारा अनेक कामनाओं की पूर्ति, प्रस्तुत कठिनाइयों का समाधान, उज्ज्वल भविष्य की संभावना, पाप निवारण और परलोक की सद्गति का जो लाभ मिलना प्रतिपादित किया जाता है, वह कहाँ तक ठीक? इस संबंध में उनने अपने ग्रन्थों में बहुत कुछ लिखा है। मौखिक रूप से वे इतना कहते रहते थे- ‘यह असत्य नहीं, हम असत्य को प्रतिपादित नहीं करते। उपासना के द्वारा व्यक्ति का अन्तःकरण निर्मल बनता है और उसमें सुसंस्कारों के बीज आसानी से बोये तथा बढ़ाये जा सकते हैं। सुसंस्कारों, सत्कर्मों और सद्भावनाओं का फल मनुष्य के लिए सब प्रकार श्रेयस्कर ही होता है। इसलिए यदि गायत्री उपासक का भविष्य उज्ज्वल बने तो इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है?
फिर भी मेरा समाधान न हो पा रहा था, क्योंकि मैं देखता हूँ कि कई व्यक्ति उपासना तो बहुत करते हैं पर उनमें मानवीय गुण निकृष्ट कोटि के ही बने रहते हैं। ऐसी दशा में यह कैसे माना जाय कि उनका भविष्य उज्ज्वल बनेगा। उपासना तो वही सार्थक मानी जा सकती है जो मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट बना सके। उत्कृष्टता के फलस्वरूप ही वह प्रतिभा और क्षमता प्राप्त होनी संभव है जिसके द्वारा उन्नति का सुयोग मिले, अनिष्ट हटे और जन-साधारण का स्नेह, विश्वास प्राप्त हो। उन्नति इन्हीं बातों पर निर्भर है। लोक और परलोक की सुख शान्ति का आधार भी यही तथ्य है। यदि यह स्थिति प्राप्त न हुई तो कोई व्यक्ति केवल गायत्री जप से ही कैसे उन्नतिशील बनेगा? और कैसे सुख शान्ति का अधिकारी बनेगा? यह बात मेरी समझ में ठीक तरह नहीं आ रही थी। इस सम्बन्ध में मेरा मन सदा संदिग्ध ही बना रहा। जप के द्वारा ही जब सारे काम हो सकते हैं तो फिर पुरुषार्थ का क्या महत्व रह जायगा? यह संदेह मन में बार-बार उठता ही रहा।
पिछली गायत्री जयन्ती के चांद्रायण शिविर में में जब मैं मथुरा गया और आचार्य जी ने जो नया रहस्योद्घाटन किया उससे मेरा संदेह तिरोहित हो गया। उनने कहा-पिछले दस वर्षों में उपासकों की मनोभूमि को जोता गया है, अब उसमें बीज बोया जा रहा है। कुसंस्कारी व्यक्ति न तो आत्मशोधन जैसे महान् कार्य का महत्व समझता है और न उसके लिए तैयार ही होता है। मंद दृष्टि के कारण उसे अपने दोष दीखते ही नहीं, कोई दूसरा बताता है तो उसे अहंकारवश अपना अपमान मानता है। आत्मशोधन के बिना व्यक्तित्व निखरता नहीं और इस निखार के बिना वह श्रेष्ठता उत्पन्न नहीं होती जिसके फलस्वरूप जीवन का हर क्षेत्र सफलता और सुख शान्ति से परिपूर्ण होता है। गायत्री उपासना के द्वारा मिलने वाले असंख्य लाभों का मूल कारण आत्म शोधन और आत्म परिष्कार ही है। जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि द्वारा व्यक्ति की मनोभूमि को कोमल एवं उर्वर बनाया जाता है। उसके बाद उसमें सत्प्रवृत्तियों के बीज बोये जाते हैं। अब तक जप तक की प्रक्रिया बताकर उपासकों की भूमि का शोधन किया है अब उन्हें सत्प्रवृत्तियों की प्रेरणा देकर बीज बोया जा रहा है। यह बीज सत्कर्मों के रूप में उगेगा, हरा भरा होगा, फलेगा-फूलेगा, तब स्पष्ट हो जायगा कि गायत्री महामंत्र का जो महात्म्य बताया जाता है वह सही है या गलत। ऋषियों की वाणी कभी असत्य नहीं होती। गायत्री का जो महात्म्य लिखा मिलता है उसमें एक अक्षर भी असत्य नहीं है, यह अब कुछ ही दिन में स्पष्ट हो जायेगा। जो अनुष्ठान के माध्यम से केवल सनो-भूमि जोती जाती है, उतने मात्र को ही पूर्ण गायत्री उपासना नहीं मानना चाहिए। वह तो पूर्वार्ध मात्र है। अब उपासना का उत्तरार्ध सिखाया जायगा, जिसे जीवन निर्माण की साधना कहना चाहिए। उपासना और साधना के दो पहिये होने से ही आत्मिक उन्नति का रथ अग्रसर होता है और वही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। उन्हीं के द्वारा साधक सिद्धियों और विभूतियों का अधिकारी बनता है। हमने उपासना के साथ-साथ सेवा धर्म और आत्मशोधन को भी समान महत्व दिया है। त्रिपदा गायत्री का एक पाद सेवन करने से नहीं वरन् तीनों पादों की समुचित उपासना करने से ही पूर्णता प्राप्त होती हैं।
इस प्रवचन का सार यह निकला कि जप ध्यान अनुष्ठान आदि की उपासनात्मक पूजा प्रक्रिया साधना का पूर्वार्ध है। उसकी पूर्णता आत्म-शोधन करने वाली सद्बुद्धि का व्यवहारिक जीवन में व्यवहारिक प्रयोग करने से ही संभव होता है। ऐसी उपासना जिसमें भगवान् का स्मरण करने के साथ-साथ आन्तरिक दोष दुर्गुणों का शमन एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयत्न भी चल रहा हो निश्चय ही सर्वांगपूर्ण साधना कहलायेगी। उसका फल मनुष्य को महापुरुष बनने के रूप में ही दृष्टि गोचर होगा। जमीन जोतने मात्र से किसी किसान को भरी पूरी फसल नहीं मिल सकती। उसे बीज बोने, सींचने, निराने, रखाने, काटने आदि की झंझट की क्रियाएं भी करनी पड़ती है तब कहीं उसके कोठे अन्न से भरते है। इसी प्रकार गायत्री उपासना में जप-अनुष्ठान के अतिरिक्त आत्म निर्माण का कार्य भी करना होता है। बिजली के दोनों तार मिलने पर जैसे बल्ब जलता है उसी प्रकार उपासना के साथ जीवन साधना का समन्वय होने पर मनुष्य अनेक विभूतियों का अधिकारी बन जाता है। इस सुनिश्चित तथ्य पर किसी को संदेह की गुँजाइश नहीं हो सकती। मेरा भी संदेह उस दिन के प्रवचन को भूलकर भली प्रकार दूर हो गया।
युग निर्माण योजना का सूक्ष्म परिचय कराते हुए उस दिन आचार्य जी ने कहा था- ‘यह गायत्री उपासना का ही विकसित रूप है। छोटे छात्रों को पहले अक्षर ज्ञान कराते हैं। जब उतना याद कर लेता है तो उसे अंक गणित सिखाना आरम्भ कर दिया जाता है। एक के बाद एक सिखाने की पद्धति हमें अच्छी लगी सो अब तक जप, ध्यान अनुष्ठान रूपी अक्षर ज्ञान सिखाते रहे। अब आत्म शोधन रूपी अंक गणित सिखाया जा रहा है। पूर्ण शिक्षा में अक्षरों की भाँति अंकों को भी सीखना पड़ता है। सच्चे उपासक को जप ध्यान के अतिरिक्त सद्बुद्धि की देवी गायत्री को अपने अन्तःकरण में बिठा कर उसे निर्मल, उज्ज्वल एवं प्रकाशवान भी बनाना पड़ता है। इसे युग-निर्माण योजना की अंक गणित कहा जा सकता है। जप ध्यान का अक्षर ज्ञान सीखने के साथ-साथ उसकी भी अनिवार्य आवश्यकता थी। सो अब प्रत्येक अध्यात्म प्रेमी को शेष आधी मंजिल पूरी करने के लिए भी कटिबद्ध होना चाहिए और इस कार्यक्रम में भी उसी श्रद्धा के साथ भाग लेना चाहिए जैसे कि गायत्री उपासना के जप, अनुष्ठान वाले प्रथम चरण में भाग लिया था।”
उसी प्रकार उसी दिन आचार्य जी ने यज्ञ की सूक्ष्म विवेचना करते हुए कहा “वायु शोधन, और अन्न वनस्पति प्राणियों का परिपोषण करने वाला अग्नि होत्र आत्म विकास की पहली मंजिल है जिसमें होता को अपना अन्न, घृत, शाकल्य चरु समिधा आदि धर्म से प्राप्त हो सकने वाली वस्तुएं होमनी पड़ती हैं। इसलिए अग्नि होत्रों को द्रव्य यज्ञ भी कहते हैं। इनमें द्रव्य संग्रह करना पड़ता है, और उसी का खर्च होता है। पंडितों को भी दक्षिणा में द्रव्य ही दिया जाता है। यज्ञ का यह दक्षिणा में द्रव्य ही दिया जाता है। यज्ञ का यह स्थूल रूप है। इसलिए इसका फल भी स्वास्थ्य संवर्धन जैसा स्थूल ही होता है। यह प्राथमिक शिक्षण है। परमार्थ के लिए, लोक सेवा के लिए हमें अपनी कमाई का एक अंश खर्च करना चाहिए। इसी प्रवृत्ति को विकसित करने के लिए समारोहपूर्वक या कार्यों का आयोजन किया जाता है। उसे भावनात्मक सूक्ष्म यज्ञ अभिनय का प्राथमिक अभ्यास कह सकते हैं। जिस प्रकार अभिनेता लोग एकान्त में अभिनय का अभ्यास करके उसमें प्रवीणता प्राप्त कर लेने के उपरान्त रंग मंच पर उतरते हैं उसी प्रकार अग्नि होत्र का द्रव्य यज्ञ कर लेने के बाद जब लोक हित के लिए एक सीमा तक स्वार्थ त्याग का अभ्यास हो जाता है तब अध्यात्म मार्ग का पथिक अपना समय, बुद्धि,
भावना और श्रद्धा को जनता जनार्दन की सेवा में अर्पण करने के लिए भली प्रकार अग्रसर होता है, यहाँ समग्र यज्ञ कहला सकता है। यही सर्वांगपूर्ण है और इसी का प्रतिफल वह होता है जो यज्ञों के महात्म्य का प्रतिपादन करते हुए धर्मशास्त्रों विस्तारपूर्वक बताया गया है।
युग निर्माण योजना का पूरा कार्यक्रम परमार्थ पूर्ण सेवा कार्यों से भरा हुआ है। इन 108 कार्यक्रमों को 108 कुण्डों का यज्ञ कह सकते हैं। आचार्य जी ने पहला गायत्री यज्ञ 108 कुण्डों का गायत्री तपोभूमि में किया था। उसमें साधक अपने-अपने उपयुक्त कुण्ड पर बैठे और होता बने थे। यह दूसरा गायत्री यज्ञ जो अब युग-निर्माण योजना के नाम से आरंभ किया गया है अधिक महत्वपूर्ण, अधिक शक्तिशाली है। उसमें बैठने वालो को घी सामग्री आदि की आहुतियाँ देनी पड़ती थीं, इसमें समय रूपी घृत और भावना रूपी सामग्री होमनी पड़ेगी। जिस प्रकार जप अनुष्ठान के बाद आचार्य जी ने गायत्री की उच्च स्तरीय साधना आत्म शोधन के रूप में प्रस्तुत की हैं इसी प्रकार जीवन यज्ञ का प्रखर स्वरूप धर्म अपनाने के रूप में सामने रखा है। युग-निर्माण योजना में यही सब कुछ भरा हुआ है कि जिसके माध्यम से जन मानस का स्तर भरा हुआ हैं जिसके माध्यम से जन मानस का स्तर ऊँचा उठे और एक व्यक्ति दूसरों को ऊँचा उठाने एवं आगे बढ़ाने में प्रसन्नता अनुभव करे।
आचार्य जी के आयोजन कितने महत्वपूर्ण हैं इसका आज मूल्याँकन नहीं हो सकता। उसका महत्व तो भावी इतिहासकार ही आँक सकेगा। गायत्री और यज्ञ के माध्यम से वे आत्म-शोधन और सेवा धर्म का व्यापक अभियान आरंभ कर रहे हैं उससे न केवल उसमें सम्मिलित होने वालों का ही महा-हित साधन होगा वरन् समस्त विश्व की सुख शान्ति बढ़ेगी। इस महान आयोजन की शतमुख से प्रशंसा कर सकना भी मेरे लिए संभव नहीं हो सकता।
वाराणसी नगरी के राजा एक दिन प्रजा के दुख-सुख को जानने के लिए राज पुरोहित के साथ राज्य में भ्रमण करने निकले। उन्होंने वेश बदल लिया ताकि कोई उन्हें पहिचान न सके।
भ्रमण करते-करते वे किसी उपनगर में पहुँचे। पुरोहित नित्य कर्म के लिए दूर गये थे। राजा पेड़ के नीचे सुस्ता रहे थे।
उधर से एक सद्गृहस्थ निकला तो सुन्दर आभा वाले इस तेजस्वी व्यक्ति को अतिथि समझ कर घर से भोजन लेने चला गया। लौटकर आया तो अनेक व्यंजनों से सुसज्जित थाल उसके हाथ में था। उसे अतिथि के आगे रख दिया।
तब तक पुरोहित भी वापिस आ चुके थे। राजा ने स्वयं भूखे होते हुए भी वह थाल पुरोहित को दे दिया। पुरोहित ने उसे खाया नहीं। वे कुछ देर सोते रहे और थोड़ी दूर तपश्चर्या में निरत एक तपस्वी को वह भोजन अर्पित कर दिया। तपस्वी ने चारों ओर दृष्टिपात किया तो उसे एक भिक्षु दिखाई दिया। तपस्वी ने थाल का भोजन भिक्षु के भिक्षा पात्र में डाल दिया। भिक्षु ने उसे सन्तोषपूर्वक खा लिया।
जो सद्गृहस्थ थाल लेकर आया था, उसने यह सब देखा और आश्चर्य चकित हो अतिथि से पूछा-”बन्धू। आपके लिये आगत भोजन को स्वयं न करके दूसरे को दे देने का क्या कारण है?”
अतिथि ने उत्तर दिया-”मैं साधारण गृहस्थ हूँ। मेरी उपयोगिता मेरे निज के जीवन तक ही सीमित है। किन्तु यह ब्राह्मण जिन्हें मैंने उपलब्ध भोजन दिया संसार के लिए अधिक उपयोगी है। इनका शरीर असंख्य मानवों को ज्ञान-दान करके उन्हें सन्मार्ग पर लगाता है, इनकी उपयोगिता अधिक है। इसलिए मैंने अपनी तुलना में उन्हें अधिक उपयोगी पाया और वह भोजन उन्हें दे दिया।
गृहस्थी ने ब्राह्मण से पूछा-भगवन्, भला आपने अपना भोजन दूसरे को क्यों दे दिया?
ब्राह्मण ने कहा-तपस्या का महत्व ब्रह्मकर्म से भी अधिक है। तप के द्वारा जो ब्रह्मतेज उत्पन्न होता है उससे ब्रह्मकर्म से भी अधिक लोक हित की संभावना रहती है। तपस्या का साहस कोई विरले ही करते हैं सो उस पुण्य परम्परा का पोषण आवश्यक है। मैंने स्वार्थ का नहीं उपयोगिता का ध्यान रखा और आगत भोजन तपस्वी को दे दिया।
गृहस्थ ने तपस्वी से पूछा-आपने वह भोजन भिक्षु को किस कारण दे डाला, भगवन्।”
तपस्वी ने शान्त स्वर से कहा- भद्र, मैं इन्द्रियों को जीतने की साधना कर रहा हूँ। इसके लिए हठपूर्वक उनका निरोध करना आवश्यक है। स्वादिष्ट व्यंजनों का आहार मेरी स्वादेन्द्रिय को विचलित करने वाला, बाधक सिद्ध होता सो मैंने यही उचित समझा कि अपने से अधिक सत्पात्र उस अपरिग्रही भिक्षु को दे दूँ।
गृहस्थ ने भिक्षु- आपने किस कारण वह भोजन स्वयं ही कर लिया? मैं विवेक को जागरण करने के लिए द्वार-द्वार पर परिभ्रमण करता हूँ ताकि व्यक्ति स्वार्थी न बने, उपयोगिता का ध्यान रखकर ही उपलब्ध साधनों का उपभोग किया जाय। यह प्रशिक्षण मेरे जीवन का व्रत है। इन तीनों में इस पुण्य परम्परा को फलित होते मैंने देखा और प्रेम-पूर्वक भोजन कर लिया।
अतिथि ने सद्गृहस्थ को और भी अधिक स्पष्टता से समझाते हुए कहा- विवेक ही इस संसार का मेरुदण्ड है। यदि मनुष्य स्वार्थ ही सोचे और उपयोगिता एवं लोकहित की बात को भुला दे तो फिर यहाँ नरक और अशान्ति के अतिरिक्त और कुछ शेष न रहेगा। यह धरती पुण्य के बल पर ही चलती है। सो हे सद्गृहस्थ। हम सबको श्रद्धा और विवेक की परमार्थिक पुण्य परम्पराओं को भूखे रह कर भी सींचते रहना चाहिए।
(श्री प्रेमप्रकाश वार्ष्णेय एम. ए.)
यह सुनिश्चित तथ्य है कि व्यक्ति का चरित्रबल और मनोबल न बढ़ सका तो वह सब कुछ साधन रहते हुये भी दुर्बल ही रहेगा। लड़ाई में कायर लोग कीमती हथियारों को भी छोड़कर भाग खड़े होते हैं और बहादुर लोग लाठियों के बल पर ही विजय प्राप्त कर लेते हैं। सामान नहीं, साहस जीतता है। धन केवल रोजगार करने से ही नहीं मिल जाता वरन् उसके लिये चतुरता और योग्यता की भी आवश्यकता होती है। आरोग्य दवाओं से नहीं, संयम से मिलता है। दोस्त और दुश्मन बढ़ाने की जड़ मनुष्य के भले या बुरे स्वभाव में छिपी रहती है। ईश्वर को प्राप्त करने में पूजा, परिचर्या ही नहीं अन्तःकरण की श्रद्धा ही सफल होती है। किसी राष्ट्र की संपत्ति वहाँ का सोना-चाँदी नहीं वरन् उसके नागरिकों का व्यक्तित्व ही होता है। इसलिये ज्ञानी लोग सदा से यही उपदेश देते आये हैं कि यदि किसी समाज या राष्ट्र को बलवान बनाना हो तो केवल उसकी सुविधायें और सामग्री बढ़ाने से काम न चलेगा वरन् वहाँ के जन-साधारण के चरित्र और साहस को बढ़ाना होगा। आदर्शवादी व्यक्ति ही वह कार्य कर सकते हैं, जिसमें से अन्धकार को नष्ट करने वाली आशा की किरण उत्पन्न होती हैं।
लोकशिक्षण की जितनी उपयोगिता प्राचीन काल में थी, आज उससे कहीं अधिक है। क्योंकि जन-मानस में जितनी विकृति उस समय भी आज उससे अधिक ही है। इस बात को लोग समझ भी रहे हैं और सभी स्वीकार करते हैं। किसी मनुष्य का जीवन केवल धन या सुखोपभोग की सामग्री के आधार पर ही सफल नहीं बन सकता। उसके लिये एक उत्तम श्रेणी के व्यक्तित्त्व की भी आवश्यकता होती है। इसलिये सच्ची सुख-समृद्धि के लिये विभिन्न सामग्रियों के साथ ही मानवीय सद्गुणों के विकास की आवश्यकता होती है। ओछे स्वभाव के और हीन दृष्टि कोण रखने वाले मनुष्य अपार समृद्धि प्राप्त हो जाने पर भी उसका सदुपयोग नहीं कर सकते और हीन ही बने रहते हैं। इसलिये प्राचीन समय की भाँति वर्तमान काल में भी यह तथ्य ज्यों का त्यों विद्यमान है कि उन्नति करने के लिये जन साधारण की आन्तरिक स्थिति को उत्कृष्ट बनाया जाय। इसके बिना यदि किसी अन्य उपाय से प्रगति हो भी गई-समृद्धि बढ़ गई, तो भी वह ज्यादा दिन तक टिक न सकेगी। मानवीय दोष-दुर्गुणों की भट्टी में धन-वैभव का ईंधन कुछ ही देर में जल-बल कर भस्म हो जाता है।
मनुष्य की प्रकृति अनुकरण करने की है। जहाँ बुरी परम्परायें चल पड़ती हैं वहाँ लोग उनका ही अनुकरण करने लगते हैं, और जहाँ अच्छे रिवाज चल पड़ते वहाँ उन्हीं को पसन्द करने लग जाते हैं। बंगाल में अधिकाँश व्यक्ति मछली खाते हैं तो वहाँ मछली न खाने की बात सुनकर आश्चर्य किया जाता है और गुजरात में बहुसंख्यक जनता शाकाहारी हैं तो वहाँ माँस-मछली खाने की बात पर घृणा का भाव प्रकट किया जाता है। बुरे और भले और स्वभाव, आचरण, व्यवहार, एवं कार्यों के बारे में भी यही बात है। देखा-देखी से मनुष्य जाति में जितनी गतिविधियाँ बढ़ती और फैलती फूटती हैं उतनी और किसी प्रकार नहीं बढ़तीं।
धर्म शास्त्रों में अनेक अच्छी बातें लिखी हुई हैं। उन्हें कथा-प्रवचन और पाठ-स्वाध्याय के रूप में हम सुनते-समझते भी रहते हैं, पर वैसे आदर्श कार्यों के उदाहरण देखने को न मिल सकने से वे बातें सिद्धान्तों तक ही सीमित रह जाती हैं। व्यवहार में तो वे ही बातें सीखी जाती हैं जो अपने चारों ओर दिखाई पड़ती हैं। तमाखू पीने की बुरी आदत बेतरह बढ़ती जा रही है। उससे लाभ किसी प्रकार का कुछ भी नहीं, हानि अनेक प्रकार की है। इसका कारण देखा−देखी का भाव ही है। बाप को पीते देखकर बेटा और दोस्त को पीते देखकर दोस्त उस लत को सीखता है और यह बुराई छूत की बीमारी की तरह दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती चली जा रही है।
इसी प्रकार अन्य बुराइयाँ भी पनपती रहती हैं। किन्तु अच्छाइयों की कभी बढ़ती होती है तो उसमें भी यही नियम काम करता है। भगवान वृद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर जब कुछ स्त्री-पुरुषों ने संन्यास ग्रहण किया तो उनकी देखा−देखी अन्य सहस्रों व्यक्ति भी प्रव्रज्या के लिये तत्पर हो गये। देखते-देखते लाखों की संख्या में बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणी बौद्ध धर्म का प्रचार करते हुए देश देशान्तरों में दृष्टिगोचर होने लगे। महात्मा गान्धी द्वारा संचालित स्वराज्य-संग्राम में भी यही हुआ। नमक सत्याग्रह, धरना, झण्डा, जुलूस, हड़ताल आदि की लहर दौड़ी तो उसके प्रवाह में स्वराज्य आन्दोलन के सिद्धान्तों और लक्ष्य से अपरिचित लोग भी हजारों-लाखों की संख्या में जेल जाने को तैयार हो गये थे। दहेज, मृत्युभोज जैसी कुरीतियों को प्रायः हर समझदार आदमी हानिकारक मानता है, पर उनका प्रचलन इसीलिये बन्द नहीं होता कि दूसरे लोग वैसा करते हैं अपने को भी वैसा ही करना पड़ता है।
अच्छे कामों, अच्छी, बातों, अच्छी परम्पराओं का फलना-फूलना इस बात पर निर्भर है कि उनका प्रचार एक सुव्यवस्थित आन्दोलन के रूप में किया जाय और उनकी जानकारी अधिकाधिक लोगों को कराई जाती रहे। सत्कार्यों का आयोजन और उनका नियमपूर्वक प्रचार करने से वह वातावरण बन सकता है जिससे प्रभावित होकर लोग स्वयं भी उस मार्ग का अनुकरण करने लगें। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति का मूल्य और महत्व राजनीतिक क्रान्ति से कई गुना अधिक है। ऐसा व्यापक कार्यक्रम न तो व्यक्तिगत उपासना की तरह एकाकी उपायों से संभव है और न कथा-प्रवचनों द्वारा उसे प्रत्यक्ष रूप दिया जा सकता है। यह कार्य जब कभी सम्पन्न किया जायगा तभी यही प्रयत्न करना होगा कि अच्छे आचरणों तथा श्रेष्ठ परंपराओं को उत्साहपूर्ण वातावरण में एक सुनियोजित रूप में अग्रसर किया जाय।
युग-निर्माण योजना को मैंने इसी रूप में देखा और समझा है। शरीर, मन, परिवार और समाज के माध्यम से जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों का प्रचलन इस योजना का उद्देश्य प्रतीत होता है। संसार के इतिहास में क्राँतियाँ इसी प्रकार उत्पन्न, विकसित और सफल हुई है। योजना के 108 कार्यक्रमों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाय तो यही प्रकट होता हैं कि सद्विचारों और सत्कार्यों को एक योजनाबद्ध आन्दोलन का रूप देकर उन्हें जन-स्वभाव में अभ्यस्त कराने के लिये यह प्रयत्न मजबूत हाथों द्वारा आरम्भ किया गया है। इसकी सफलता धर्म की, सदाचार की, संस्कृति की और मानवता के उच्च आदर्शों की विजय मानी जायगी। मुझे आशा है कि मानवीय विवेक और देवत्व की भावना का पूरा सहयोग इस ‘ज्ञान-यज्ञ’ में पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होगा।
(स्वामी सन्तोषानन्द जी महाराज)
सभी क्षेत्रों में आज यह अनुभव किया जा रहा है कि एक ओर जितने प्रयत्न उन्नति के लिये किये जा रहे है उतना ही दूसरी ओर अवनति का द्वार प्रशस्त हो रहा है। आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिये उद्योग-धन्धे बढ़ाये जा रहे हैं, कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने की व्यवस्था की जा रही है, शिक्षा की प्रगति के लिये स्कूल-कालेजों की संख्या बढ़ रही है, चिकित्सा के लिये अस्पतालों और डाक्टरों की संख्या वृद्धि की जा रही है, अपराध रोकने के लिये कानून, पुलिस और अदालत पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, यातायात की सुविधा बढ़ाने के लिये रेल, मोटर, जहाज, स्कूटर, सड़कें आदि के निर्माण का विशाल कार्यक्रम चल रहा है। मनोरंजन के लिये सिनेमा, सर्कस, नाटक, खेल-कूद, पार्क आदि का विकास हो रहा है। इन्हें देखते हुये सहज ही यह अनुभव होता है कि प्रगति के इन भारी साधनों द्वारा मनुष्य जाति की सुख-सुविधाओं में अवश्य ही वृद्धि होगी।
लोक-शिक्षण के प्रयत्न भी स्वल्प नहीं हैं। सरकार अपनी योजनाओं और सफलताओं से जनता को परिचित करने के लिये भारी व्यय करके प्रदर्शनियाँ लगाती हैं, सिनेमा दिखाती हैं, ग्राम सेवक, ब्लॉक-कर्मचारी, कल्याण-विभाग के कार्य कर्ता भारी संख्या में काम कर रहे हैं। कृषि, स्वास्थ्य, सहयोग, शिक्षा आदि का प्रशिक्षण करने के लिये बड़े-बड़े विभाग बने हुये हैं और उनमें प्रचुर धन एवं जन शक्ति का उपयोग होता है। रेडियो द्वारा देश-भक्ति , सदाचार स्वास्थ्य आदि के अनेक प्रकार के कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं। राजनेता, मंत्री आदि के भाषणों की आये दिन धूम मची रहती है। राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र के कार्यकर्ता अपने-अपने ढंग से निरन्तर प्रवचन करते रहते हैं। उनके विशाल प्रयत्नों को देखते हुये यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जनता को अवश्य ही उच्च भावनाओं से ओत-प्रोत, कर्तव्य परायण, आदर्श प्रेमी और सुखी बन जाना चाहिये।
विकास और सुधार का, शिक्षा और समृद्धि का, चिकित्सा और सुविधाओं का जितना विशाल आयोजन आज हो रहा है उतना संसार के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। इसे देखते हुये जहाँ एक ओर बँधती हैं वहाँ दूसरी ओर देखते हैं तो निराशा से चित्त क्षुब्ध होने लगता है। इतनी चेष्टा करने पर भी स्थिति हर दिशा में बिगड़ती ही जा रही है। शारीरिक दृष्टि से लोग अपने को अशक्त , दुर्बल और रोगी ही अनुभव करते हैं। ऐसे भाग्यशाली विरले ही मिलेंगे जो अपने को पूर्ण निरोग होने का भरोसा कर सकें। श्रद्धा, विश्वास और आत्मीयता का गृहस्थ-जीवन कोई विरले ही बिता पा रहे हैं। दाम्पत्य और पारिवारिक जीवन जहाँ भी देखिये वहाँ विषाक्त बना दिखाई देता है। आमदनी से खर्च सबका बढ़ा हुआ है। सभी अपने को गरीब अभावग्रस्त अनुभव करते हैं। शिक्षितों को नौकरी न मिलने पर ठीक वेतन न मिलने की शिकायत रहती है। गुण्डागर्दी और अपराधों की तो बाढ़ ही आ गई है जिससे हर व्यक्ति सदैव सशंकित बना रहता है। सरकारी क्षेत्रों में रिश्वतखोरी और लापरवाही बेहिसाब बढ़ गई है जिससे न्याय और अधिकारों का प्राप्त होना दिन-दिन महंगा और कष्टसाध्य बनता चला जा रहा है। सार्वजनिक संस्थाओं के पोल खाते जब सामने आते है तब और भी अधिक निराशा होती हैं। जिनकी स्थापना लोगों को उच्च आदर्श सिखाने के लिये की गई हो, उसके संचालक और पदाधिकारी ही यदि आदर्शहीनता का परिचय देने लगें तो फिर कौन उनके उपदेशों को सुनेगा और कौन उन पर आचरण करेगा?
धार्मिक अनुष्ठानों की आये दिन धूम रहती है। कथा, हवन, कीर्तन, सम्मेलन रोज ही कहीं-न-कहीं होते रहते हैं। इन्हें देखते हुये यही जान पड़ता है कि धर्म का विस्तार हो रहा है। साधु-सन्तों की संख्या लाखों तक पहुँच जाने से एक सामान्य मनुष्य यही समझता है कि उनके द्वारा जनता में ज्ञान वृद्धि और धर्म की जागृति होती ही होगी। पर जब वास्तविक परिणाम का पता लगाया जाता है तो आँखों के आगे अँधेरा छा जाता हैं और यही प्रतीत होता है कि यहाँ तो मेंड़ ही खेत को खाये जा रही है।
प्रगति का बाह्य आवरण दिन-दिन बहुत बढ़ता चला जाता है, आडम्बर का घटाटोप बँध रहा है, पर भीतर सब कुछ खोखला हैं। मनुष्य का चरित्र, दृष्टिकोण एवं आदर्श पतित होने पर सभी ऊपरी उपचार निरर्थक सिद्ध होते है। रक्त-विकार से रुग्ण शरीर में जगह-जगह निकलते रहने वाले फोड़ों पर मरहम लगा देने मात्र से कोई स्थायी हल नहीं निकल सकता। जड़ के सींचे बिना केवल पत्तों पर छिड़काव कर देने से पेड़ की हरियाली कब तक बनी रहेगी?
संसार में दिन-दिन बढ़ती जाने वाली उलझनों का एक मात्र कारण मनुष्य के आन्तरिक स्तर, चरित्र, दृष्टिकोण एवं आदर्श का अधोगामी होना है। इस सुधार के बिना अन्य सारे प्रयत्न निरर्थक हैं। बढ़ा हुआ धन, बढ़े हुये साधन, बढ़ी हुई सुविधाएं कुमार्गगामी व्यक्ति को और भी अधिक दुष्ट बनायेगी। इन बढ़े हुये साधनों का उपयोग वह विलासिता, स्वार्थपरता, अहंकार की पूर्ति और दूसरों के उत्पीड़न में ही करेगा। असंयमी मनुष्य को कभी रोग-शोक से छुटकारा नहीं मिल सकता भले ही उसे स्वास्थ्य-सुधार के कैसे ही अच्छे अवसर क्यों न मिलते रहें।
कठिनाइयाँ, अभावों और विपत्तियों की जड़ मनुष्य के भीतर रहती हैं। जितना प्रयत्न संसार को सुखी और समृद्ध बनाने के लिये किया जा रहा है यदि उसका सौवाँ भाग भी मनुष्यों के आन्तरिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिये किया जाता तो आज स्थिति कुछ और ही होती। जब तक हम वास्तविक दशा को न समझेंगे तब तक असफलता और निराशा के अतिरिक्त और क्या हाथ लगने वाला है। जिन लोगों के कन्धों पर जन सेवा का भार है वे ही यदि अपने कर्तव्य की उपेक्षा करके जैसे बने वैसे स्वार्थ साधने का ठान लें तो फिर उनके दिखावटी प्रयत्नों से किसी शुभ परिणाम की आशा कैसे की जा सकती है?
बाहरी आडम्बरों के बढ़ने से किसी समस्या का हल न होगा। मानव-जीवन की दिन-दिन बढ़ने वाली समस्त आपत्तियों का समाधान करने का केवल एक ही मार्ग है कि उठाया जाय और उसकी भावना, श्रद्धा तथा आकाँक्षाओं को धर्म एवं सदाचार से नियंत्रित रखा जाय। जब मनुष्य अपने आत्म गौरव, कर्तव्य और लक्ष्य को भली प्रकार अनुभव कर सकेगा तभी पशु प्रवृत्ति से ऊंचा उठ कर मनुष्य के योग्य यशस्वी पथ का पथिक बन सकता है।
रोग का ठीक निदान हो जाने पर चिकित्सा संबंधी आधी कठिनाई हल हो जाती है। पेट में कब्ज रहने पर अनेक रोग उठ खड़े होते हैं, स्वभाव में क्रोध की मात्रा बढ़ जाने से अनेकों विरोधी तथा शत्रु पैदा हो जाते हैं। इसी प्रकार मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित और चरित्र पतित हो जाने पर उसे प्रत्येक दिशा में आपत्तियाँ दिखाई देने लगती हैं। इसी प्रकार जिस राष्ट्र की जनता स्वार्थी, विलासी, कायर, आलसी और दुर्गुणी हो जाती है, वहाँ अगणित प्रकार के शोक सन्ताप बढ़ने लगते हैं। बाहरी उपचारों से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता रोग के कारणों को हटाने से ही व्यथा दूर होती है। व्यक्तियों का आन्तरिक स्तर ऊँचा उठाने पर ही पतन का प्रत्येक दृश्य उन्नति में बदलने लगता है।
विश्वशान्ति की स्थिति उत्पन्न करने का कोई प्रयत्न तभी सफल होगा जब व्यक्तियों की भावनाओं को ऊँचा उठाने को सर्वोपरि महत्व की बात मान कर योजना बनाई जाय। मुझे युग-निर्माण योजना में ऐसा ही प्रयत्न प्रतीत होता है। उसके संयोजकों ने समस्या की जड़ ढूँढ़ने का प्रयत्न किया है और रोग के सही निदान के अनुरूप चिकित्सा आरम्भ की है। सही दिशा में उठाये हुये कदम ही सही परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। यदि इन प्रयत्नों को प्रोत्साहन मिला तो विश्वासपूर्वक यह आशा की जा सकती है कि संसारव्यापी अशान्ति की समस्या का हल निकलेगा और मानव जाति का भविष्य पुनः उज्ज्वल बनेगा।
(पं. जुगलकिशोर शर्मा शास्त्री एम. ए.)
भारतवर्ष में समय-समय पर क्राँतियाँ हुई हैं और उनके फल स्वरूप महापुरुषों ने इस देश को अधर्म के गर्त में गिरने से बचाया है। आध्यात्मिक उत्थान के साथ-साथ नैतिक, धार्मिक एवं सामाजिक उत्थान भी हुआ। इन क्रान्तियों से बहुत बड़ा लोकहित होता रहा है। पर यह सम्भव तभी हुआ जब उस परिवर्तन का आधार वैदिक परम्परायें रहीं। उन परम्पराओं की पुनर्जागृति ने भारत ही नहीं समस्त संसार को प्रकाशवान बनाया।
आज मानव-समाज जिन अभावों और संकटों की स्थिति में घिरा हुआ है उससे छुटकारा पाने के लिये वह प्रयत्नशील है। समय भी गतिशील है। संसार के सभी राष्ट्र अपने-अपने-ढंग से उन्नति कर रहे हैं। हम पिछड़ते हैं। दौड़ इतनी तेजी से चल रही है कि जो पिछड़ गया उसे बहुत पश्चात्ताप करना पड़ेगा। इसलिये समय रहते जागने और प्रगति पथ पर अग्रसर होने की आकाँक्षा हम भारतियों के मन में भी उठना स्वाभाविक है। ऐसी सामूहिक आकांक्षायें ही क्रान्तियाँ बनकर प्रकट होती हैं। कोई साधारण व्यक्ति भी पहले कदम उठाये तो जनता उसके पीछे चल पड़ने में संकोच नहीं करती।
हमारी वर्तमान शारीरिक, मानसिक, नैतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति निस्सन्देह असंतोषजनक है और उसमें परिवर्तन की आवश्यकता स्पष्ट रूप से प्रतीत हो रही है। इस परिवर्तन के लिये अनेक प्रयास चल रहें हैं। पर देखना यह है कि उनमें साध्य के साथ साधनों की भी पवित्रता रहती है या नहीं। हमारी प्राचीन वैदिक परम्पराओं को फलने-फूलने का अवसर रहता है या नहीं? यदि राजनैतिक, आर्थिक सामाजिक परिवर्तन किसी उपाय से हो गये, पर साथ ही हमारी वे परम्परायें चली गईं जिन पर कि मानव जाति का भविष्य निर्भर है तो फिर वह सुधार भी अन्ततः बिगाड़ के समान ही दुखदायी होगा। आदर्शभ्रष्ट होकर हम कुछ उपार्जन या सुधार भी कर सके तो पथ से भटके हुये लोग देर तक उसका लाभ न उठा सकेंगे। दूसरे कारणों को लेकर परस्पर टकरावेंगे और जो कुछ कमाया था उसे गँवाने में देर न लगेगी।
इसलिये ध्यान में रखने की बात यह है कि उत्थान के लिये हम जो भी प्रयत्न करें उनमें वैदिक परम्पराओं का ही आधार रहे। नीति, धर्म और सदाचार के आधार पर ही सच्ची प्रगति संभव हो सकती है। जीवन में सत्य की प्रतिष्ठा को उचित स्थान देकर ही मनुष्य चिरस्थायी उन्नति कर सकता है। सात्विकता को अवलम्बन कर प्रगति के पथ पर चलते हुये सफलता प्राप्त करने में भले ही कुछ विलम्ब हो, पर विद्वेष, घृणा और हिंसा पर आधारित नाशकारी तूफान द्वारा कुछ प्राप्त कर लेने की अपेक्षा वह मन्द प्रगति अधिक कल्याणकारी सिद्ध होगी।
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ की युग-निर्माण योजना द्वारा वैदिक परम्पराओं के अनुरूप भारतीय समाज का स्तर ऊँचा उठाने का जो प्रयास हो रहा है उससे हमारी बाह्य जीवन की समस्यायें तथा उलझने तो सुलझेगी ही, साथ ही सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाने में भी उससे भारी सहायता मिलेगी। सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण लाभ यही है। व्यक्ति का चरित्र ऊँचा उठे, आदर्शों के प्रति उसका अन्तःकरण निष्ठावान बने, धर्म और कर्तव्य को प्रधान मानकर चले तो फिर वे समस्याएँ जो पहाड़ सी विशाल और घटाओं सी भयंकर दीखती हैं बात ही बात में सरल हो सकती हैं।
बाह्य जीवन की समस्त कठिनाइयाँ आन्तरिक स्थिति की छाया ही होती हैं। पाप का फल दुःख और पुण्य का फल सुख के रूप में देखा जाता है। इसलिये यदि व्यक्तिगत या सामूहिक जीवन से दुख दारिद्र को हटाया हो तो उसका एक ही उपाय हो सकता है कि धर्म-बुद्धि के जागरण और धर्म प्रवृत्तियों के प्रोत्साहन के लिये हम सब तत्परतापूर्वक कटिबद्ध होकर काम करें।
अवसाद की स्थिति से ऊँचे उठकर हमें सच्ची चिरस्थायी प्रगति के लिये कार्य करना चाहिये। वह कार्य-पद्धति धर्म, नीति और सदाचार का वैदिक परम्पराओं के अनुरूप ही होनी चाहिये। प्राचीन काल में समय-समय पर ऐसी क्राँतियाँ होती रही हैं और उनने जन-जीवन की अनेक गुत्थियों को सुलझाते हुये धर्ममय सुख-शान्ति का वातावरण उत्पन्न किया था। युग-निर्माण योजना आदर्शवाद, धार्मिकता को लाने का एक दिव्य प्रयत्न है। इससे बाह्य जीवन की अपेक्षा भी आन्तरिक स्तर का उत्कर्ष अधिक होगा। विश्व-शान्ति के लिये ऐसी ही उन्नति और प्रगति अपेक्षित है। मैं इस योजना को एक आध्यात्मिक क्राँति मानता हूँ और इसकी सफलता के लिये परमात्मा से हार्दिक प्रार्थना करता हूँ।
कुरुक्षेत्र के सुविस्तृत मैदान में दूर-दूर तक महाभारत युद्ध में मरे योद्धाओं की लाशें बिछी पड़ी थीं। गिद्ध और कौए उन्हें नोंच-नोंच कर खा रहे थे। उस घमासान के कारण सब कुछ कुचला ही कुचला पड़ा था।
शिष्यों समेत शमीक ऋषि उधर से निकले तो इस महानाश के बीच दो पक्षी-शावकों को एक गज घंटा के पास चहचहाते देखा गया। शिष्यों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने महर्षि से पूछा-”भला, इस सब कुछ कुचल डालने वाले घमासान में ये बच्चे कैसे बच गये?”
शमीक ने कहा-शिष्यों, युद्ध के समय आकाश में उड़ती हुई चिड़िया को तीर लगने से वह भूमि पर गिर पड़ी और उसने दो अण्डे प्रसव किये। संयोगवश एक हाथी के गले का घण्टा टूट कर अण्डों पर गिरा जिससे उनकी रक्षा हो गई। जब परिपक्व होकर वे बच्चे के रूप में घण्टे के नीचे की मिट्टी हटाकर बाहर निकले हैं, सो तुम इन्हें उठा लो और आश्रम में ले जाकर इनका पालन पोषण-करो।
एक शिष्य ने पूछा-”जिस देव ने इन बच्चों की, ऐसे महासमर में रक्षा की क्या वह इनका पोषण न करेगा?” महर्षि ने कहा-”प्रिय, जहाँ दैव का काम समाप्त हो जाता है वहाँ से मनुष्य का कार्य आरम्भ होता है। दैव ने मनुष्य को दया और सामर्थ्य का वरदान इसीलिए दिया है कि उनके द्वारा दैव के छोड़े हुये शेष कार्य को पूरा किया जाय।”
(श्री गुरुचरण दत्त शास्त्री, काव्यतीर्थ)
मनुष्य की जिन्दगी इस पृथ्वी की सब से बड़ी विभूति है। परमात्मा यदि आत्मा को सब से बड़ा उपहार दे सकता है तो वह यही है कि उसे मनुष्य शरीर में निवास करने का सौभाग्य प्रदान कर। बोलने, हँसने, पढ़ने, लिखने, सोचने, करने के जितने साधन मनुष्य शरीर में प्राप्त है उतने चौरासी लाख योनियों में से किसी को प्राप्त नहीं हैं। हमें जो मनुष्य का जीवन प्राप्त हुआ हैं, इसे साधारण नहीं, असाधारण सौभाग्य मानना चाहिये और इस सुअवसर का पूरा लाभ उठाने का प्रयत्न करना चाहिये।
पर हममें से अधिकाँश मनुष्य न तो इस जीवन का महत्व समझते हैं और जीने की ठीक विधि जानते हैं। उल्टे-सीधे ढंग से किया हुआ कोई कार्य वैसा ही परिणाम भी उत्पन्न करता है। जिन्दगी जीना न आता हो तो यह सौभाग्य भी दुर्भाग्य के समान सिद्ध होता है। हम प्रायः देखते हैं कि बहुसंख्यक व्यक्ति मानव जीवन पाकर भी दयनीय स्थिति में पड़े रहते और दुःख, दरिद्रता की पीड़ा, कष्ट सहन करते रहते हैं। इसका कारण यही है कि उन्हें जीना नहीं आता। यदि वे जीवन को ठीक ढंग से व्यतीत करने की कला सीख लें तो फिर रोग-शोक और दुःख-दारिद्र का कोई कारण नहीं रह सकता।
किसी के पास मोटर गाड़ी तो बहुत बढ़िया हो पर ठीक चलाना न आवे तो वह उसके द्वारा संकट ही पैदा करेगा। तैरना न जानने वाले के लिये तालाब में घुस कर मनोरंजन करना विपत्ति का कारण ही बनेगा। बिजली सम्बन्धी जानकारी जिसे न हो, और वह उसकी उधेड़बुन करने लगे तो खतरे का सामना ही करना पड़ेगा। अनाड़ी चिकित्सक अस्पताल में रखी कीमती दवाओं से भी रोगी का अहित ही करेगा। सरकस में काम करने वाले खिलाड़ी यदि अपने-अपने खेलों में अभ्यस्त न हों तो अपनी जान के हाथ धो बैठेंगे और सरकस वाले की भी बदनामी करेंगे। इस संसार को हम भगवान का सरकस कह सकते हैं। इससे कुछ योग्य खिलाड़ी तो स्वयं यश प्राप्त करते हैं और मालिक का गौरव भी बढ़ाते हैं और कुछ ऐसे फूहड़ होते हैं कि स्वयं चोट खाते हैं और परमात्मा की निन्दा के कारण भी बनते हैं।
वस्तुतः यह संसार बहुत सरल और सुरम्य है। हमें वह क्षमता और योग्यता भी प्राप्त है जिससे आनन्दमय जीवन व्यतीत करने लायक सामग्री उत्पन्न कर ले अथवा जो कुछ उपलब्ध है उसे ही अपने अनुकूल ढाल लें। इस संसार की तथा मनुष्य जीवन की रचना ऐसे सुन्दर ढंग से हुई है कि यहाँ आनन्द और उल्लास के अतिरिक्त और कुछ देखने को मिल ही नहीं सकता। इतना होते हुये भी जब यह जान पड़ता है कि अधिकाँश मनुष्य अपने जीवन से असंतुष्ट और खिन्न हैं तो यही निकलता है कि वे जीवन को सही रास्ते से जीने की विद्या नहीं जानते।
मनीषियों का कथन है कि ‘जिओ और जीने दो।’ सचमुच बुद्धिमान वही माना जा सकता है जो जिन्दगी ठीक तरह से जी सके और सज्जन वह है जो दूसरों को भी जी सकने की सुविधा मिलने में सहायक बन सके। पर स्थिति यह है कि हम न तो जीते हैं और न दूसरों को जीने देते हैं। जिन विचारों, जिन विश्वासों, जिन आकाँक्षाओं और जिन आदर्शों को ग्रहण करने से हमें जिन्दगी के जीने का सही रास्ता मिल सकता हैं उनको न तो हम अपनाते हैं और न उनकी आवश्यकता समझते हैं। इसके विपरीत उन निरंकुश, अदूरदर्शिता पूर्ण एवं निरर्थक विचारों को अपना लेते हैं जो पग-पग पर चिन्ता, असफलता और तनाव पैदा करते हैं।
थोड़ी और साधारण श्रेणी की साधन-सामग्री द्वारा भी बड़ी प्रसन्नता के साथ जिया जा सकता है। अपने साथियों का स्तर यदि बहुत ऊँचा न हो तो भी उन्हें निभाया जा सकता है और हँस-खेल कर काम चल सकता है। जैसी भी स्थिति हमें प्राप्त है उसी को सुव्यवस्थित बना लिया जाय तो हँसी-खुशी का जीवन बिताने की उसी में गुँजाइश हो सकती है। यह सोचने की बजाय कि अमुक लाभ प्राप्त होने से हम प्रसन्न हो सकते हैं हम को यह विचार करना चाहिये कि अपना कर्तव्य ठीक तरह से पालन करना ही पर्याप्त है और उसी से हमको सदैव प्रसन्नता प्राप्त होती रहेगी। संयमी और संतोषी के लिये रोग-शोक और चिन्ताओं की कहीं गुँजाइश ही नहीं रहती। जो इस संसार को एक नाट्य शाला की तरह मानकर अपना अभिनय ठीक तरह करने में ही सफलता मान लेता है उसे प्रिय-अप्रिय घटनाओं का बहुत चिन्ता नहीं रहती। एक ही व्यक्ति नाटक में कभी राजा कभी रंक, कभी स्त्री कभी पुरुष, कभी पंडित कभी मूर्ख बनता रहता है और जब खेल समाप्त हो जाता है तो अपने को नाटक कम्पनी का एक साधारण कर्मचारी मात्र समझकर संतोष की साँस लेता हुआ गहरी नींद सो जाता है। यही जिन्दगी जीने का ठीक तत्व-दर्शन है। पग-पग पर आने वाली भली बुरी स्थितियों को जो धूप-छाँह की तरह समझता है और उनको निरन्तर परिवर्तनशील मानता है उसे न कभी निराशा होगी और न मदोन्मत्तता। मनोरंजन के लिये खेलने वाले खिलाड़ी जिस तरह हार-जीत को विशेष महत्व नहीं देते उसी तरह जिन्दगी का स्वरूप ठीक तरह समझ सकने वाले व्यक्ति भी अपना मन हर स्थिति में प्रसन्न बनाये रहते हैं।
अपने गुण-कर्म-स्वभाव में आवश्यक संतुलन रखने वाले व्यक्ति की जीवन-नौका आसानी से तैरती चली जाती है। जिसने अपने में निरालस्यपन, नियमितता, एकाग्रता लगन धैर्य, साहस जैसे सद्गुण पैदा कर लिये जिसने अपना मार्ग सदाचार और मानवीय मर्यादाओं के अनुरूप चुन लिया, जिसने अपने स्वभाव में प्रसन्नता, प्रफुल्लता, मधुरता शिष्टाचार, सेवा, उदारता, आदि सत्प्रवृत्तियों को सम्मिलित कर लिया उसको सदा और सर्वत्र सफलता ही प्राप्त हुआ करेगी। ऐसा व्यक्ति जहाँ भी रहेगा उसे लोग सिर-आँखों पर रखेंगे। घटिया और घृणित व्यक्तित्व के मनुष्य ही जहाँ-तहाँ दुत्कारे जाते हैं। उन्हें ही उपहास और तिरस्कार का भाजन बनना पड़ता है। शोषण भी कायरों का होता है। जिसमें आवश्यक शौर्य और साहस मौजूद है उसको न तो सताया जा सकता हैं और न गिराया। चट्टान जैसे सुदृढ़ व्यक्तित्व परिस्थितियों के आगे झुकते नहीं वरन् उन्हें झुका लेते हैं। उन्हें कोई बिगाड़ नहीं सकता वरन् वे बिगड़ों को भी सुधारने में कृतकार्य होते हैं।
जिसने जिन्दगी जीने की विद्या सीख ली उसने सब कुछ सीख लिया। जिसको यह नहीं आता, उसको चाहे और बहुत सी बातें आती हों तो भी यही कहना पड़ेगा कि अभी वह कुछ भी नहीं जानता। युग निर्माण योजना में मुझे सबसे बड़ी विशेषता यही जान पड़ी कि उसमें जिन्दगी को ठीक ढंग से जीने की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे मानव जाति के विकास में अड़ी हुई सभी बाधाओं का समाधान हो जाता हैं। जितनी प्रचार की शिक्षायें और कला कौशल की तालीम दी जा रही है उन सबकी अपेक्षा आवश्यक और महत्वपूर्ण शिक्षा यही है कि मनुष्य जिन्दगी को इस तरह जिये कि जिससे पशु स्थिति से निकल कर मनुष्य-योनि में जन्म लेने का सच्चा आनन्द और लाभ प्राप्त कर सके। ऐसा प्रशिक्षण मानव जाति के लिये कितना उपकारी हो सकता है, जब मैं उसकी विस्तृत संभावनाओं पर विचार करता हूँ तो मेरा मन आशा और उल्लास से भर जाता है।
हम न तो स्वयं ही जीना जानते हैं और न दूसरों को ही जीने देते हैं। दाम्पत्य जीवन का स्वर्गीय आनन्द ले सकने लायक न तो हमारा स्वभाव ही सुविकसित होता है और न स्त्रियों को हम इस बात का अवसर देते हैं कि वे शिक्षा और लोक व्यवहार का ज्ञान प्राप्त करके अपना समुचित विकास कर सकें। घर के भीतर साधनहीन, तिरस्कृत और उपेक्षित स्थिति में पड़ी रहने के कारण वे बेचारी अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकने में असमर्थ रहती हैं और पति के कामों में सहयोग देकर उनकी त्रुटियों का संतुलन भी नहीं कर सकतीं। स्त्री और पुरुष दोनों का व्यक्तित्व यदि गिरा हुआ रहे तो उससे उनकी गृहस्थी नरक के सदृश्य बन जाती है और उनकी सन्तान भी दुर्गुणों की खान बन निकृष्ट जीवन व्यतीत करती है।
पिछड़ी हुई जाति वालों के साथ भी हमारा व्यवहार बर्बरतापूर्ण होता है। किसी वंश विशेष में जन्म लेने के कारण मनुष्य को नीच माना जाय और उसके नागरिक अधिकारों का अपहरण किया जाय अथवा उसे हेय माना जाय तो इस तिरस्कृत स्थिति में बने रहने से उसका विकास रुक ही जायगा। अस्वर्णों को आज कैसी गिरी हुई स्थिति में जीवन बिताना पड़ रहा हैं यह हम अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देख रहे हैं। ‘जियो और जीने दो’ सिद्धान्त की आज सर्वत्र अवहेलना हो रही है। जीने की कला सीखकर न तो हम स्वयं विकास करने का प्रयत्न करते हैं और न दूसरों को वह अवसर मिलने देना चाहतें हैं जिससे वे विकसित बन कर मानवीय अधिकारों को प्राप्त कर सकें।
ईर्ष्या की दुष्प्रवृत्ति आज जन मानस में एक भयानक महामारी बन कर घुसी हुई है। दूसरों को उन्नति करते देख जल-भुनकर खाक हो जाना और उसे नीचा दिखाने के लिये अपनी हानि भी सह लेना आज की एक साधारण रीति-नीति बनी हुई है। इससे कितने ही विकासोन्मुख व्यक्तियों को अकारण ही पद दलित स्थिति में ही पड़े रहने को विवश होना पड़ता हैं। यदि लोग ईर्ष्या को त्याग कर दूसरों की उन्नति में प्रसन्न होने और सहायता करने की प्रवृत्ति को अपनावें तो उससे सभी को लाभ पहुँच सकता है और मानव जाति की शक्ति का एक भारी अपव्यय रुक सकता है।
युग-निर्माण योजना का साराँश मैंने तो यही समझा है कि वह जिन्दगी जीने की विद्या है। ‘जियो और जीने दो’ की शिक्षा का प्रसार करने के लिये ही यह कार्यक्रम बनाया गया है। इस प्रशिक्षण द्वारा मानव जाति की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति होगी। पृथ्वी पर स्वर्ग को अवतरित करने के इस महान कार्यक्रम की जितनी प्रशंसा की जाय कम है।
(श्री गौरीशंकर वाजपेयी)
शिक्षा को मनुष्य का ज्ञान-नेत्र कहा गया है। इन दो चर्म-नेत्रों से हम अपने आस-पास की वस्तुओं को देखते हैं, पर शिक्षा के माध्यम से समस्त संसार को देख और समझ सकते हैं। ज्ञान और विज्ञान का अक्षय भंडार पुस्तकों में भरा पड़ा है। महापुरुषों ने अपनी विद्या का सार निकाल कर पुस्तकों में सुरक्षित रख दिया है। शिक्षित व्यक्ति वह सब जानकारी आसानी से घर बैठे प्राप्त कर सकते हैं। संसार भर की गति-विधियों, रीति-नीतियों, विचार-धाराओं, ऐतिहासिक अनुभवों की जानकारी प्राप्त करने के लिये बहुमूल्य सामग्री पुस्तकों में मौजूद है। मानव जीवन की महत्ता, स्थिति उद्देश्य, समस्या और ठीक तरह जी सकने की कला सीखने के लिये भी हमें सत्साहित्य का सहारा लेना पड़ता हैं। जो शिक्षित नहीं उसके लिये ये सारे द्वार बन्द ही समझने चाहिये।
अशिक्षित को एक प्रकार से अंधा ही माना गया है, क्योंकि वह पशु-पक्षियों की तरह आँखों के आगे आने वाले पदार्थों को ही देख सकता है। अनुभूतियों और संवेदनाओं का रसास्वादन करने वाली कोमल वृत्तियाँ जो संगीत, साहित्य, कला के माध्यम से विकसित होती हैं, उस बेचारे के लिये दुर्लभ ही बनी रहती हैं। संसार के इतिहास को समझने और उसकी घटनाओं से शिक्षा ग्रहण करने में वह व्यक्ति कैसे समर्थ हो सकता है जो पढ़ना ही नहीं जानता? जहाँ वह रहता है वहाँ की स्थिति और समस्याएँ ही उसे सारी दुनिया प्रतीत होती हैं। उसे क्या पता कि हमारी स्थिति से सर्वथा भिन्न रीति-नीति अपनाये हुये व्यक्ति भी इस संसार में रहते हैं। तुलनात्मक अध्ययन किये बिना कोई कैसे जान सकता है कि हमारी गति विधियाँ ठीक हैं या उनमें सुधार की आवश्यकता है?
जो व्यक्ति कभी समाचार पत्रों को हाथ नहीं लगाता, उसे क्या मालूम कि दुनिया कितनी बड़ी है और उसमें प्रतिदिन कैसी-कैसी घटनायें हो रही हैं? संसार में उथल-पुथल मचा देने वाली और मौजूदा परिस्थिति में घोर उलट फेर करने वाली प्रचंड विचारधाराओं का रहस्य अशिक्षित व्यक्ति को कैसे विदित हो सकता है? चाहे इन्हीं क्रान्तिकारी परिवर्तनों के कारण उसका जीवन-क्रम सर्वथा बदल रहा हो तो भी वह उनके स्वरूप और परिणाम से अनजान ही बना रहता है। सभ्यतापूर्वक बैठना-उठना, पहनना-ओढ़ना, बोलना-चालना भी अब शिक्षा पर ही निर्भर हैं। आजीविका कमाने में अब शिक्षा भी पूँजी की ही तरह आवश्यक बन गई है। हिसाब रखने पत्र व्यवहार करने, सरकारी टैक्सों का उचित भुगतान करने आदि में शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है। जो लोग नौकरी से गुजारा करते हैं उनके लिये तो शिक्षा एक प्रकार से अनिवार्य ही है। बिना पढ़े व्यक्ति को कठिन शारीरिक श्रम करने पर भी बहुत थोड़े पैसे मिलते हैं जब कि शिक्षित व्यक्ति कम समय में और कम श्रम में अधिक कमा सकता है।
यों शिक्षा की आवश्यकता सदा से रही है, पर अब तो उसके बिना काम चल सकना ही कठिन हो गया है। अपनी गिनती सभ्य लोगों में कराने के लिये यह आवश्यक है कि मनुष्य शिक्षा प्राप्त करे। अशिक्षा को मनुष्यता का कलंक और राष्ट्र का दुर्भाग्य ही कहना चाहिये। जो देश शिक्षा की दृष्टि से जितना पिछड़ा हुआ होगा वह उतना ही गिरा हुआ माना जायगा। इसलिये समझदार नेता और दूरदर्शी समाज-संचालक इस बात के लिये प्राणपण से चेष्टा करते रहते हैं कि उनका राष्ट्र जितना जल्दी संभव हो सके अशिक्षा रूप अभिशाप के पंजे से छुटकारा पा जाय। इस कार्य में जितनी देर लगती है प्रगति के कार्य में उतनी ही बाधा पड़ती रहती है।
संसार के सभी उन्नतिशील देशों ने सब से अधिक ध्यान और सबसे अधिक महत्व अपनी शिक्षा समस्या को दिया है और उसको हल करने में उन्होंने हर संभव उपाय से काम लिया है। प्रगति पथ तभी प्रशस्त हुआ है जब कि शिक्षा का विकास किया गया है। छोटे बच्चों का शिक्षण स्कूलों में हो सकता है पर जब तक वे पढ़ लिखकर योग्य बनेंगे और देश के रचनात्मक कार्यों में सहयोग देने लायक हो सकेंगे तब तक राष्ट्र के विकास कार्यों को स्थगित नहीं रखा जा सकता। इसलिये जिस देश में अशिक्षितों की संख्या अधिक हो वहाँ प्रौढ़ शिक्षा पर सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होती है। हमारी सरकार ने इस दिशा में जो प्रयत्न किया है उसे अपर्याप्त और असंतोषजनक ही कहा जा सकता है। उत्तर-प्रदेश में बच्चों को स्कूलों में जगह मिल सकना ही एक समस्या बना हुआ है। जब उन्हीं के लिये पूरी व्यवस्था नहीं है तो बेचारे प्रौढ़ों की खबर कौन लें? आर्थिक तंगी, विभागीय कर्मचारियों का प्रमाद, जनता की उपेक्षा आदि कितनी ही बाधायें ऐसी हैं, जिनके कारण प्रौढ़-शिक्षा का प्रबन्ध किया जा सकना संभव नहीं हो रहा है। सरकार कुछ सोचती और करती भी है तो उसका उचित परिणाम निकलने में अनेकों बाधायें उपस्थित हो जाती हैं।
हमारे देश में शिक्षित व्यक्तियों की संख्या 23 प्रतिशत बताई गई है। सौ में से 77 व्यक्ति निरक्षर ही हैं। यदि हमको अपने देश को शीघ्र प्रगति करनी हो तो उसके लिये प्रौढ़-शिक्षा की समस्या का शीघ्र हल करना भी अनिवार्य है। वयस्क स्त्री-पुरुषों को साक्षर बनाने के लिये एक व्यापक आन्दोलन चलाया जाना आवश्यक है और जब तक यह समस्या हल न हो तब तक निरन्तर प्रयत्न करते रहना हम सबका परम कर्तव्य है।
क्यूबा में प्रौढ़ शिक्षा की समस्या को इस प्रकार हल किया गया था कि वहाँ प्रत्येक शिक्षित को देशभक्ति का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिये कहा गया और उसके लिये यह शर्त रखी गई कि वह सेवा भावना से कम से कम 5 प्रतिशत व्यक्तियों को शिक्षित बना कर दिखावे। जिनके पास इस प्रकार देशभक्ति के प्रमाणपत्र नहीं होते थे उनको राष्ट्रीय हित के प्रति उपेक्षा करने वाला समझा जाता था और सरकार से मिलने वाली सुविधाओं से उनको वंचित रहना पड़ता था। चुनाव में खड़े होने वालों को ऐसे प्रमाणपत्र आवश्यक रूप से प्रस्तुत करने पड़ते हैं। इसी प्रकार सरकारी ऋण, अनुदान या विशेष प्रोत्साहन प्राप्त करने के लिये इन प्रमाणपत्रों को प्राथमिकता दी जाती है। इन लाभों के कारण वहाँ कि शिक्षितों ने उत्साहपूर्वक शिक्षा-प्रसार के कार्य को अपनाया और 4-5 वर्ष के भीतर अशिक्षा का पूरी तरह उन्मूलन हो गया। उपयुक्त आयु का एक भी व्यक्ति निरक्षर न बचा। हमारी सरकार भी इस प्रकार का कोई कदम उठा कर इस समस्या को बहुत कुछ हल कर सकती है।
सरकार क्या करेगी और कब करेगी, इसकी प्रतीक्षा न करके यदि सेवाभावी संस्थाएँ और व्यक्ति भी इस समस्या को हल करने के लिये उठ खड़े हों तो बहुत काम हो सकता है। हमारे देश में धर्म के नाम पर धन और समय पर्याप्त मात्रा में व्यय किया जाता है। कथा, ब्रह्मभोज, तीर्थ यात्रा, देवाराधन के लिये अरबों रुपया खर्च होता रहता है। 56 लाख व्यक्ति तो साधुओं के रूप में धर्म-कार्य के व्रतधारी माने ही जाते हैं। फिर ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो अपनी आजीविका कमाने के साथ-साथ धर्म-कार्यों में काफी समय लगाते हैं। यदि इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों को एक करोड़ भी मान लिया जाय और उनमें से एक चौथाई भी ऐसे निकल सकें जो साक्षरता प्रचार का कार्य करने योग्य हों तो 25-30 लाख व्यक्ति तो इस कार्य के लिये धार्मिक क्षेत्र में से ही मिल सकते हैं। यदि ये लोग इस बात का अनुभव कर सकें कि विद्या-दान भी धर्म का एक बहुत बड़ा अंग है और उसके लिये नियमित रूप से समय देने लग जाये तो यह एक बहुत बड़ा काम हो सकता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति एक वर्ष में दस व्यक्तियों को साक्षर बनाने की प्रतिज्ञा ले तो 25 लाख व्यक्ति प्रति वर्ष ढाई करोड़ व्यक्तियों को साक्षर बना सकते हैं।
यह तो केवल धर्म-क्षेत्र के व्यक्तियों की बात हुई। अब सरकारी कार्यों में, शिक्षा संस्थाओं में सामाजिक सेवा कार्यों में लगे हुये व्यक्ति भी यदि इस ओर ध्यान देने लगे तो करीब इतने ही व्यक्ति और भी निकल सकते हैं और इस प्रकार प्रति वर्ष पाँच करोड़ व्यक्तियों को साक्षर बनाने का कार्य हो सकता है। इस गति से चलते हुये 5-6 वर्षों में निरक्षरता उन्मूलन का लक्ष्य पूरी तरह सहज में ही प्राप्त किया जा सकता है।
यों देखने में यह कार्य बहुत बड़ा मालूम पड़ता और कठिन भी। पर वास्तव में बात ऐसी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर कुछ न कुछ त्याग, उदारता, पुण्य, परमार्थ के भाव रहते ही है। जब उनको जागृत कर दिया जाता है तो मनुष्य बड़े से बड़े त्याग और बलिदान का परिचय देने में नहीं चूकता। यदि जन-मानस की कोमल भावनाओं को जागृत करने के लिये व्यापक ज्ञान-यज्ञ आरम्भ किया जाय तो विश्वास है कि वह प्रयत्न निरर्थक नहीं जायगा। आचार्यजी ने सन् 1958 में एक हजार कुण्डों का गायत्री महायज्ञ मथुरा में किया था। उसमें प्रायः 5 लाख व्यक्ति भारत के कोने-कोने से पहुँचे थे। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति के किराये-भाड़े तथा काम हर्ज करके यात्रा करने में औसत हिसाब से 40-50 रुपया अवश्य खर्च हुआ होगा। भावनाओं के जागृति करने से ही इतना समय और धन खर्च कर सकना लोगों के लिये सम्भव हुआ। यदि वे भावनाएं शिक्षा-प्रसार की दशा में जागृत कर हो जायँ और आचार्य जी के यज्ञ में आने वाले वे लाख व्यक्ति ही प्रौढ़ शिक्षा में लग पड़े तो इतना बड़ा काम हो सकता है कि लोग आश्चर्य चकित वह जावें और अन्य संस्थायें भी इसी का अनुकरण करने लगें।
जून की ‘अखण्ड-’ में जो योजना सम्बन्धी कार्यक्रम छपा है उसे मैंने ध्यानपूर्वक पढ़ा है। वैसे ही उसमें जितने कार्यक्रम बतलाये गये हैं सभी महत्वपूर्ण हैं पर मुझे सबसे अधिक सामयिक और उपयोगी प्रौढ़ शिक्षा वाला आन्दोलन ही जान पड़ा। प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति अपना ‘ज्ञान-ऋण’ चुकाने के लिये कुछ समय और कुछ धन नियमित रूप से खर्च करने लगे तो घर-घर में, मुहल्ले-मुहल्ले प्रौढ़-पाठशालाएं चल सकती हैं। पुरुष, पुरुषों को पढ़ायें और महिला, महिलाओं को। इस प्रकार हट शिक्षित के लिये एक धर्मभावना युक्त श्रेष्ठ पुण्य परमार्थ और देशभक्ति से पूर्ण मनोरंजक कार्यक्रम मिल सकता हैं। जो शिक्षित स्वयं न करना चाहें, वे ज्ञान-ऋण चुकाने के लिये कुछ धन हर महीने देने लगें तो ऐसे कुछ व्यक्तियों के सम्मिलित रुपयों से अध्यापकों को नौकर रखकर भी यह कार्य किया जा सकता है। अन्य कार्यों में लगे रहने वाले व्यक्तियों की ज्ञान-वृद्धि के लिये ऐसी रात्रि पाठशालाओं की भी भारी आवश्यकता है जिनके माध्यम से लोग अपनी विद्या और योग्यता को निरन्तर बढ़ाते चलें। स्कूलों में बालक जितनी शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं उतनी ही पर्याप्त नहीं समझी नहीं चाहिये। काम से लग जाने के बाद भी शिक्षा का क्रम जारी रह सके, इसके लिये विभिन्न प्रकार का रात्रि पाठशालाएं खोली जाने आवश्यक हैं। जहाँ जैसी आवश्यकता हो वहाँ वैसे प्रयत्न आरम्भ किये जानी चाहिये और शिक्षा का स्तर बढ़ता ही रहना चाहिये। देश जितना सुशिक्षित और सुसंस्कृत होगा उतना ही उसका गौरव बढ़ता जायगा।
शतं दद्यान्न विवदेदिति विज्ञस्य संमतम्।
बिना हेतुमपि द्वन्द्वमेतन्मूर्खस्य लक्षणम्॥
-हितोपदेश
अपनी सैकड़ों की हानि सहन करले पर झगड़े को बचावे यह बुद्धिमानों का मार्ग है और बिना किसी कारण ही कलह कर बैठना मूर्ख का लक्षण है।
‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों में से प्रत्येक को अपने परिवार के निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिये परिवार-विद्यालय चलाने पर बहुत जोर दिया है। वास्तव में प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य का आरम्भ अपने घर से होना चाहिये। घर में शिक्षा का प्रसार करने के बाद स्वभावतः मनुष्य का उत्साह बढ़ेगा और वह उसके लिये समय तथा धन भी खर्च करने लगेगा। आचार्य जी का व्यक्तिगत प्रभाव लाखों लोगों पर है, उनके चलाये आन्दोलनों में सहज ही वे लोग आगे बढ़कर भाग ले सकते हैं। इस आन्दोलन से देश का महान कल्याण होगा इसमें कोई सन्देह नहीं।
लघु कथा-
सफलता का श्रेय किसे मिले इस प्रश्न पर एक दिन विवाद उठ खड़ा हुआ। ‘संकल्प’ ने अपने को, ‘बल’ ने अपने को और ‘बुद्धि’ ने अपने को अधिक महत्वपूर्ण बताया। तीनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुये थे। अन्त में तय हुआ कि ‘विवेक’ को पंच बना इस झगड़े का फैसला कराया जाय।
तीनों को साथ लेकर विवेक चल पड़ा। उसने एक हाथ में लोहे की टेढ़ी कील ली और दूसरे में हथौड़ा। चलते-चलते वे लोग ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ एक सुन्दर बालक खेल रहा था। विवेक ने बालक से कहा कि-”बेटा, इस टेढ़ी कील को अगर तुम हथौड़ा से ठोंक कर सीधी कर दो तो मैं तुमको भर पेट मिठाई खिलाऊँ खिलौनी से भरी एक पिटारी भी दूँ।”
बालक की आँखें चमक उठीं। वह बड़ी आशा और उत्साह से प्रयत्न करने लगा। पर कील को सीधा कर सकना तो दूर उससे हथौड़ा उठा तक नहीं। भारी औजार को उठाने लायक उसके हाथों में बल नहीं था। बहुत प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिली तो बालक खिन्न होकर चला गया।
इससे उन लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला कि सफलता प्राप्त करने को अकेला ‘संकल्प’ अपर्याप्त है।
चारों आगे बढ़े तो थोड़ी दूर जाने पर एक श्रमिक दिखाई दिया। वह खर्राटे लेता हुआ सो रहा था। विवेक ने उसे झकझोर कर जगाया और कहा कि “इस कील को हथौड़ा मार कर सीधा कर दो तो मैं तुम्हें दस रुपया दूँगा। उनींदी आँखों से श्रमिक ने कुछ प्रयत्न भी किया, पर वह आँखों से श्रमिक ने कुछ प्रयत्न भी किया, पर वह नींद की खुमारी में ही बना रहा। उसने हथौड़ा एक ओर रख दिया और वहीं लेट कर खर्राटे भरने लगा।
निष्कर्ष निकला कि अकेला ‘बल’ भी काफी नहीं है। सामर्थ्य रखते हुये भी संकल्प न होने से श्रमिक जब कील को सीधी न कर सका तो इसके सिवाय और क्या कहा जा सकता था।
चारों आगे बढ़े। सामने से एक सुसज्जित वेश-भूषा वाला कलाकार आता दिखाई दिया। विवेक ने प्रार्थना की कि “अगर आप इस कील को सीधी कर सको तो एक अशर्फी आपको भेंट की जायगी।”
कलाकार तैयार हो गया। उसने रेतीली जमीन पर कील को रखा और जोर से हथौड़े की चोट मारी। धमाके के साथ धूल ऊपर उड़ी और पाँचों की आँखों में भर गई। अब वे कील का सीधा करना तो भूल गये और आँखों के बचाव की चिन्ता करने लगे। कलाकार हथौड़ा पटक कर अपनी राह चला गया। विवेक ने कहा कि हमें लौट चलना चाहिये, क्योंकि जिस बात को हम जानना चाहते थे वह मालूम पड़ गई। संकल्प, बल और बुद्धि का सम्मिलित रूप ही सफलता का श्रेय प्राप्त कर सकता है। एकाकी रूप में आप लोग तीनों अधूरे-अपूर्ण हैं।
एक बार एक डरपोक खरगोश अपनी झाड़ी के पास बहुत चिन्तित होकर बैठा था। पास में रहने वाले दूसरे जानवर उसकी व्यथा जानने के लिये इकट्ठे हो गये और पूछने लगे कि वह किस कारण इतना परेशान हो रहा है?
खरगोश ने कहा-विपत्ति के बादल सिर पर मँडरा रहे हैं, क्या तुम इस बात को समझते नहीं। किसी भी क्षण मुसीबत हमारे ऊपर बिजली की तरह गिर सकती है। तुम को इस बात पर खूब विचार करना चाहिये और उससे बचने के उपायों पर ध्यान देना चाहिये।
सभी जानवर गम्भीर हो गये और किसी भारी विपत्ति की कल्पना करके डरने लगे। उन्होंने खरगोश से कहा- आखिर बात क्या है? कुछ बतलाओ तो सही।
खरगोश की छाती धड़क रही थी। उसने किसी प्रकार अपने को संभालकर कहना आरम्भ किया-यह इतना बड़ा आकाश हमारे सिरों के ऊपर फैला हुआ है। इसके वजन का कुछ ठिकाना नहीं। असंख्य तारों समेत इस भारी आसमान का कभी भी हमारे ऊपर गिर पड़ना संभव है। यदि ऐसा हुआ तो हम बात की बात में कुचल जायेंगे। क्या यह कोई कम डर की बात है?
उसने फिर कहा-यह धरती बिना किसी सहारे के अधर में लटक रही है। क्या पता कभी नीचे धसकने लग जाय। यदि ऐसा हुआ तो हम न जाने किस गर्त में जा गिरेंगे। और तुम देखते नहीं कि धरती पर प्राणियों की संख्या बढ़ रही है और खाद्य घट रहा है। यदि ऐसा ही क्रम रहा तो एक दिन भूखों मन जाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहेगा।
वहाँ पर मौजूद जानवरों को ये बातें व्यर्थ की जान पड़ी और उन्होंने उन्हें अनसुनी कर दिया। कई जानवर कहने लगे कि विपत्ति का समय आने पर उसका कोई न कोई उपाय कर लिया जायगा, अभी से इस प्रकार का भय करके सदा डरते रहना मूर्खता की बात है।
पर कोई-कोई जानवर बहुत शंकाशील निकले। वे भी खरगोश की तरह डर गये और अपने बचाव का उपाय सोचने लगे। टिटहरी आकाश की ओर पैर करके सोने लगी ताकि ऊपर से इतना भारी बोझा गिरे तो वह उसे अपने पैरों पर रोक ले। बन्दर पेड़ से कई-कई बार उतर कर यह देखने लगा कि कहीं धरती धसक तो नहीं रही है। केंचुए ने मिट्टी खाने की आदत डाली ताकि भोजन समाप्त होने पर भी वह अपना गुजारा कर सके।
कहते हैं कि खरगोश को यह तीन ही अनुयायी मिले और वे तीनों उसी चाल पर अब तक चले जा रहे हैं।
सूरज आकाश में होकर गुजर रहा था तो उसने सुना कि कुछ लोग इकट्ठा होकर उसे देवता न कह कर आग का गोला मात्र बता रहे हैं। इस पर सूरज को बड़ा बुरा जान पड़ा और उसने दूसरे दिन अपने रथ पर चढ़कर जाने से इनकार कर दिया।
संसार में हलचल मच गई। प्रभात होने में देर होते देखकर सभी देव-दानव चिन्ता में डूब गये। कारण जानने और बाधा को हटाने के लिये प्राची से कहा गया। प्राची ने सूरज की बहुत कुछ प्रशंसा और अभ्यर्थना की और उसे सदा की भाँति रथ पर चढ़कर जाने के लिये मनाया।
सूरज बोला-जिन लोगों का अनादि काल से मैं इतना उपकार कर रहा हूँ वे मुझ आग का गोला कहें, तो ऐसे कृतघ्नों का अब मैं मुँह भी न देखूँगा। अब मैं यात्रा पर जाना नहीं चाहता।
प्राची ने उसे समझाया-लोक-दृष्टि तो बालकों द्वारा फेंके गये पत्थरों के समान है। विचारशील समुद्र की तरह गम्भीर होते है, फेंके हुये पत्थर उसके गर्भ में विलीन हो जाती है। पर अहंकारी कच्चे घड़े के समान होता है जो छोटे से आघात को भी सहन नहीं कर सकता और जरा-सी चोट से टूट कर छितरा जाता है। आपको क्षुद्र कच्चे घड़े की तरह नहीं वरन् गम्भीर समुद्र की तरह की व्यवहार करना चाहिये।
सूरज विचारों में डूब गया और उसे यात्रा के लिये रथ पर सवार होकर जाना ही उचित जान पड़ा।
(श्री जानकीनन्दन शरण गार्ग्य)
गुणों का अभ्यास क्रियाओं के द्वारा किया जाता है। तैरना सीखने के लिये तालाब में उतरना पड़ता है। पहलवानी सीखने वाले अखाड़े का आश्रय लेते हैं। संगीत सीखने वाले बाजों की सहायता लेते हैं। ईश्वर-भक्ति की भावना बढ़ाने के लिये पूजा-उपासना में संलग्न होना पड़ता है। शिक्षार्थी को कापी, पुस्तक, कलम, दवात का उपयोग करने की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिकों को अपने अन्वेषण कार्य में अनेक प्रकार के यन्त्रों, रासायनिक द्रव्यों और प्रयोगशालाओं की जरूरत होती है। सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिये सत्कर्मों में लगे रहने का कार्यक्रम बनाना पड़ता है। केवल चाहने या सोचने से सद्गुणों का अभ्यास नहीं हो सकता, लिये जो सद्गुणों की उपयोगिता और महत्व का अनुभव करते हों, उनको अपने भीतर जमा हुआ देखना चाहते हों, उनके लिये आवश्यक है कि अपने दैनिक जीवन में किसी न किसी रूप में सत्कार्यों का व्यवहार अवश्य करते रहें। जो विचार उपयोगी प्रतीत होते हैं उन्हें कार्यान्वित करने के लिये भी तत्पर रहें।
युग-निर्माण योजना एक आध्यात्मिक आन्दोलन है। मनुष्य यदि सच्चे अर्थों में मनुष्य बनना चाहता हो, आध्यात्मिकता को वचन मात्र की वस्तु न रख कर उसे अपने जीवन में उतारना चाहता हो, तो यह नितान्त आवश्यक है कि वह आध्यात्मिक गुणों को अपने स्वभाव का एक अंग बनाने का प्रयत्न करें। इस महान तत्वज्ञान का प्रयोजन यही है कि पूजा, स्वाध्याय, ध्यान, भजन, कथा-कीर्तन, व्रत, उपवास द्वारा अपने स्वभाव को ऐसा बनावे जिससे आध्यात्मिक आदर्शों के अनुकूल गति-विधियाँ स्वाभाविक रूप से अपनाने लगे। सत्कर्मों के पुण्यफल से ही तो सुख शान्ति की प्राप्ति होती है और सत्कर्म तभी होने लगते हैं जब कि मन में सद्गुणों का निवास हो जाय। इसलिये शास्त्रों में सद्विचारों और सद्गुणों को ही समस्त सुख-शान्ति का मूल बतलाया है और उनके निरन्तर अभ्यास तथा वृद्धि पर अत्यधिक जोर दिया है।
सत्कर्मों को अभ्यास में लाते हुए मनुष्य अपने सद्गुणों को बढ़ाये और सद्भावनाओं की दैवी सम्पत्ति को संचित करता हुआ जीवन-लक्ष्य की पूर्ति में सफल हो, यही उद्देश्य युग-निर्माण योजना में सन्निहित है। उसके कार्यक्रमों में इस बात का ध्यान रखा गया है कि मनुष्य अपने स्वार्थ और संकीर्णता को कम करता हुआ परमार्थ समझने लगे। हमारा पतन तभी से आरम्भ हुआ जब से व्यक्तिगत स्वार्थ का भाव बढ़ने लगा। जब हर व्यक्ति अपने मतलब की बात ही सुनना और करना चाहता है तो स्वभावतः नीचे की ओर गिरने लगता है। उसके विचार और कार्य दिन-दिन अधिक घृणित और निकृष्ट होते जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों का समाज सदैव क्लेश और द्वेष की नारकीय भावनाओं में ग्रस्त रहता है और पीड़ा तथा कष्टों से कराहता रहता है। पिछले दिनों हमारा सबसे बड़ा दोष व्यक्तिवाद रहा है। उसी के कारण हम एक हजार वर्ष तक दूसरों के गुलाम बने रहे हैं। अब भी वह हमारे राष्ट्र और समाज की प्रगति में एक बड़ा रोड़ा सिद्ध हो रहा है।
जब तक स्वार्थपरता का दायरा कम नहीं होता तब तक व्यक्ति कितना ही योग्य और कार्यकुशल क्यों न हो वह समाज के लिये अभिशाप एवं संकट बन कर ही रहेगा। किसी समाज की उन्नति और सुख-शान्ति इसी बात पर निर्भर है कि उसके सदस्य-व्यक्तिगत लाभ को कम और समूहगत लाभ को अधिक महत्व दें। आध्यात्मिकता का लक्ष्य भी यही है। पर इस लक्ष्य के अनुसार लोगों को व्यवहार न करते देखकर साम्यवादी सिद्धान्त के अनुयाइयों ने बलपूर्वक मनुष्य को परमार्थी और संयमी बनने के लिये विवश किया है। रास्ता एक ही है, चाहे उसे आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए आत्म सन्तोष, पुण्य एवं आन्तरिक लाभ उठाते हुए पूरा किया जाय अथवा डंडे के बल पर साम्यवादी व्यवस्था द्वारा रोते कलपते स्वीकार किया जाय। करना यही पड़ेगा। मनुष्य को स्वार्थ की संकीर्णता से ऊँचा उठकर परमार्थ की श्रेष्ठता को ही स्वीकार करना होगा। इस परिवर्तन के बिना एक भी उलझन सुलझेगी नहीं। इसलिये हमको यही प्रयत्न करना चाहिये कि मनुष्य का अन्तःकरण तृष्णा वासना की गन्दी कीचड़ से बाहर निकले और पुण्य-परमार्थ की मलय मारुत का रसास्वादन करते हुए अपने को धन्य बनावे।
युग-निर्माण योजना का निर्माण इन्हीं तथ्यों को दृष्टिगोचर रखकर किया गया है। उसमें प्रयत्न यह किया गया है कि मनुष्य (1) उपासना (2) आत्मशोधन और (3) परमार्थ के त्रिविधि कार्यक्रम को अपनाता हुआ आत्मकल्याण का लक्ष्य भी पूरा करे और संसार की सुख-शांति बढ़ाने में योगदान देता हुआ यशस्वी बने। अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार हममें से प्रत्येक को निश्चय कर लेना चाहिये और उसे पूर्ण करते हुये तथा अपने सद्गुणों को बढ़ाते हुए प्रगति-मार्ग पर बढ़ना चाहिये। लोक कल्याण तो इस प्रकार होता ही रहेगा।
अपने से छोटों को भी ‘तू’ न कहकर तुम या आप कहा जाय तो उसकी प्रतिक्रिया स्वभावतः होगी ही। दूसरे भी वैसा ही कहने लगेंगे। बड़ों के चरण स्पर्श करने की पद्धति चल पड़े तो अनुशासनहीनता की भावना मिटकर गुरुजनों के प्रति श्रद्धा भावना स्वभावतः पनपेगी। एक व्यक्ति दूसरों का सम्मान करे तो उसे भी दूसरे व्यक्तियों से सम्मान प्राप्त होगा। परस्पर शिष्टाचार, सम्मान, सद्भाव और श्रद्धा को बढ़ाने का अभ्यास करते हुए हम सज्जनता और सौजन्य की ही वृद्धि करेंगे। इससे हमारा आन्तरिक स्तर ऊँचा उठेगा और संसार में सद्भावना की एक श्रेष्ठ परम्परा का विकास होगा।
परिवार-निर्माण का कार्यक्रम अपनाकर यदि हम रोज अपने घर वालों को सभ्यता और सज्जनता की शिक्षा देंगे तो स्वभावतः हमें भी वैसा ही बनना पड़ेगा। बाहर वालों के आगे लम्बी-चौड़ी बातें हाँकी जा सकती हैं, पर घर वालों को तो अपनी सारी बातें मालूम होती हैं, इसलिये उन्हें जो कुछ सिखाना हो उसे अपने जीवन में भी ढालना पड़ता है। अन्यथा उपहास ही होगा। परिवार के लोग अपनी दैनिक विचार गोष्ठी से लाभ न भी उठावें या उन पर थोड़ा-सा ही प्रभाव पड़े पर हमको तो उनके सामने अपना वैसा सुधरा हुआ रूप रखना ही पड़ेगा, जो एक शिक्षक के उपयुक्त हो। ऐसी दशा में अपना सुधार तो होगा ही।
दीवारों पर शिक्षाप्रद वाक्य लिखने से जहाँ अपनी कृति पर संतोष होता है वहाँ वे विचार मन में गूँजते भी रहते हैं। उन विचारों के प्रति अपना आकर्षण और झुकाव बढ़ता है और फलस्वरूप एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव हमें वैसा ही बनने या ढलने के लिये विवश करने लगता है।
‘एक से दस योजना’ के अनुसार जिन दस व्यक्तियों तक युग-निर्माण योजना की उत्कृष्ट विचारधारा पहुँचाने का उत्तरदायित्व हम अपने ऊपर लेंगे उनकी दृष्टि में अपना स्वरूप निश्चय ही एक परमार्थी और लोकसेवक का होगा। जो परामर्श बार-बार उन्हें देते रहेंगे उस पर स्वयं भी अमल करना होगा। इस प्रकार एक प्रकार की लोक-लाज के बंधन बँधेंगे और विवश होकर अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये वैसा ही बनना पड़ेगा जैसा कि दूसरों से बार-बार कहते हैं। किसी से सम्बन्ध न रखने वाला कुछ भी करता रह सकता है, पर धर्म-प्रचारक का रूप, चाहे 10 व्यक्तियों तक ही सीमित क्यों न हो, जब बन गया तो एक ऐसी लोक-लाज सम्मुख आ जाती है जो कुमार्ग पर जाने से बलपूर्वक रोके रखती है और दूसरों की अपेक्षा अपने को अधिक आदर्शवादी रहने की प्रेरणा करती है। संजीवन-विद्या की शिक्षा दूसरों को देने का साहस करने वाला व्यक्ति क्या उन आदर्शों से अपने आपको अछूता रख सकता है? मेंहदी पीसने वाले के हाथ जिस प्रकार अपने आप ही लाल हो जाते हैं उसी प्रकार सद्ज्ञान प्रचार का थोड़ा-सा भी कार्य अपने हाथ में लेने से उसका लाभ अपने को तो मिलेगा ही।
अपनी निश्चित आजीविका में से एक निश्चित अंश ज्ञान-दान के लिये लगाते रहने से उस पैसे से समीपवर्ती क्षेत्र में पाठशालाएं, पुस्तकालय, नवयुग केन्द्र, प्रचार-सामग्री वितरण, शिविर-सम्मेलन आदि की व्यवस्था में उसे लगाया जाय तो दूसरे लोग सच्चे अध्यात्म का-जीवन विद्या का-प्रकाश प्राप्त कर सकेंगे और उसका पुण्यफल भी हमको प्राप्त होगा। दान के माध्यम से सेवा और सेवा कार्यों में दान का उपयोग नित्य ही होते रहने से यह स्वर्ण-सुयोग अपनी आत्मा को निरन्तर परोपकारी बनाये रखने में सहायक होगा। ऐसे कार्यों में धन और समय दोनों का सम्मिलित प्रयोग होता रहे, तो मनुष्य की परमार्थ भावनाएँ धीरे-धीरे अवश्य विकसित होंगी। जिन व्यक्तियों के परिवार की जिम्मेदारी उनके पुत्र और अन्य घर के लोग उठाने लग गये हैं वे वानप्रस्थ के समान घर से अवकाश लेकर उपासना और सेवा कार्यों में अधिकाधिक समय लगाते हुये गृहस्थ में रहकर भी संन्यास का सा सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।
सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन में जो अविवेकी जनता से टक्कर लेनी पड़ती है उससे अपना आत्मबल और साहस बढ़ता है। अनीति और अविवेक का प्रतिकार करने में जो कष्ट उठाना पड़ता है-उपहास, तिरस्कार, विरोध, आक्रमण, प्रतिशोध सहना पड़ता है उससे सत्यनिष्ठ व्यक्ति का धैर्य, शौर्य, तेज, ओज और आत्मबल निरंतर बढ़ता है।
दहेज, मृत्युभोज, पशु-बलि, बाल-विवाह, अनमेल विवाह, कन्या विक्रय, नशेबाजी, माँसाहार, भिक्षा-व्यवसाय, छूतछात, पर्दा, जेवरों में धन की बरबादी, भूत-पलीत की पूजा, अन्न की जूठन छोड़ना, अश्लीलता, जुआ, सट्टा आदि अनेकों सामाजिक कुरीतियाँ हमारे यहाँ प्रचलित हैं, उनको हटाकर स्वस्थ परम्परायें स्थापित करने में रूढ़िवादियों के साथ पग-पग पर टकराना पड़ सकता है। यह भी संभव है कि इस टकराव में अपने को क्षति उठानी पड़े। धर्म के लिये कष्ट उठाने का अवसर आने से मनुष्य के शौर्य और साहस की परीक्षा होती है, और उसका चरित्र उज्ज्वल बनता है।
वृक्ष, वनस्पति, शाक-भाजी, फल-फूल, जड़ी-बूटी की हरियाली लगाने से नेत्रों की शीलता और रोशनी बढ़ती है। ऑक्सीजन अधिक उत्पन्न होने से आरोग्य लाभ होता है। सात्विक खाद्य द्वारा सात्विक बुद्धि भी उत्पन्न होती है। सुगंध से मस्तिष्क को बल मिलता है। देश में अन्न की जो कमी पड़ रही है उसकी कुछ पूर्ति शाकों के उत्पादन से हो सकती है। जड़ी-बूटियों की कृषि होने लगे तो आयुर्वेद का खोया हुआ गौरव पुनः स्थापित होने लगे। आज कल जो सड़ी, गली, नकली, जड़ी-बूटियाँ बाजार में मिलती हैं उनका प्रभाव भी वैसा ही नाम मात्र का होता है। तुलसी का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगे और घर-घर में उसकी पूजा करने का नियम हो जाय तो भी आरोग्य और सात्विकता की बहुत वृद्धि हो। जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं वहाँ वर्षा भी अधिक होने का प्रतिपादन वैज्ञानिकों ने किया है। पशु पालन के लिये भी हरियाली की वृद्धि आवश्यक है। भवन निर्माण, जलावन, फर्नीचर आदि सभी कार्यों में लकड़ी चाहिये। पशुओं की भाँति वृक्ष भी हमारा बहुत उपकार करते हैं, इसलिये उनका उत्पादन और वृद्धि करने के लिये भी युग-निर्माण योजना में विशेष रूप से बल दिया गया है। इस कार्यक्रम को अपनाने की जिनकी स्थिति हो वे सचमुच पुण्य प्राप्ति के साथ-साथ समाज की बड़ी सेवा भी कर सकते हैं। जिनके पास कृषि योग्य भूमि है उन्हें तो इस ओर अवश्य ध्यान देना चाहिये। गाँवों में शाक-भाजी की भारी कमी देखी जाती है उसका कारण हमारी उपेक्षा बुद्धि हो है। भारत भूमि को हरी-भरी शस्य-श्यामला बनाने के लिये हमें इस पुण्य कार्य के लिये अवश्य अपनी स्थिति के अनुसार प्रयत्न करना चाहिये।
गौ, भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिये मेरुदण्ड के समान है। गोबर की खाद और बैल की शक्ति के बिना इस गरीब देश का काम ट्रैक्टरों और रासायनिक खाद से पूरा नहीं हो सकता। दूध के आवश्यक गुण गौ-दुग्ध में ही होते हैं। संसार भर में इसे ही उपयोगी माना गया है और हर जगह दूध के लिये गाय ही पाली जाती है। भैंस के दूध में घी भले ही ज्यादा हो पर गुण की दृष्टि से वह बहुत ही गया-बीता है। धर्म कार्यों में भी गौघृत का ही विधान है। हमारा दुर्भाग्य है कि गौ-वंश का स्तर भी गिरता जा रहा है और उसकी हत्या भी तीव्र गति से हो रही है। हमें गौ-पालन और गौ-संरक्षण के लिये ठोस कदम उठाने चाहिये, जिससे कृषि और दूध की समस्या का हल निकल सके। गाय में जो आध्यात्मिक सूक्ष्म विशेषताएँ हैं वे हमारे भावना स्तर एवं अन्तःकरण को सन्मार्ग पर प्रेरित करने में बड़ी सहायक होती हैं। भगवान कृष्ण ने गोपाल बनकर, गोवर्द्धन का कार्यक्रम ऊँचा उठाकर संसार का भारी उपकार किया था। इस उपकारी कार्यक्रम में हमें भी शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिये।
मनुष्य के सोलह संस्कार यदि ठीक प्रकार मनाये जा सकें तो उसके अन्तःकरण में श्रेष्ठता की ओर अग्रसर करने वाली छाप पड़ेगी। पर्व-त्यौहारों को मिल-जुलकर मनाया जा सके तो उससे सामाजिक जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा मिलेगी। जन्मदिन मनाने से मनुष्य गौरव और सम्मान का अनुभव करता है और शेष जीवन का सदुपयोग करने की प्रेरणा मिलती है। इन समारोहों को धार्मिक कर्मकाण्ड के साथ किया जाय और साथ ही सद्-विचार, प्रेरणा, जीवन-विद्या, धर्म, नीति आदि को भी माध्यम बनाया जाय तो सर्व साधारण में श्रेष्ठ भावनाओं की वृद्धि करने में काफी सहायता मिल सकती हैं।
मंदिर, मठों का सदुपयोग होने लगे तो वे साँस्कृतिक पुनरुत्थान, युग-परिवर्तन और समाज की नव रचना के महत्वपूर्ण केन्द्र बन सकते हैं। गायत्री-मंत्र लेखन संग्रह करके नये युग-निर्माण-मन्दिर स्थापित किये जा सकते हैं। जहाँ अपनी विचारधारा के दस-पाँच व्यक्ति भी हों, वहाँ वे मिल-जुलकर ‘युग-निर्माण मित्र-मण्डल’ चला सकते हैं और उसके द्वारा उस क्षेत्र में प्रेरणा और प्रकाश प्रदान करने का बहुत काम हो सकता है। नव रात्रि में 8 दिन के शिक्षण शिविर चलाये जा सकते हैं। उनमें व्यवहारिक जीवन को आध्यात्मवादी बनाने का प्रशिक्षण दिया जाया करे तो बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति के लिये पृष्ठभूमि तैयार हो सकती है।
साहित्यकार नवयुग के अनुरूप धर्म और व्यवहार का समन्वय सिखाने वाला साहित्य लिखें। प्रकाशक इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये छापने और बेचने की व्यवस्था करे, चित्रकार ऐसे ही सद्प्रेरणाप्रद चित्र बनावे, कवि और गायक अपनी कला द्वारा जन साधारण में आदर्शवाद और कर्तव्य-परायणता की उमंगे उठावे, अभिनेता ऐसे श्रेष्ठ और मनोरंजक साधन प्रस्तुत करें जो जन-मानस को ऊँचा उठावे। इसी प्रकार व्यापारी अपना व्यापार ऐसी सच्चाई और जन हित की भावना से करें कि उससे जनता का स्तर ऊँचा हो सके। ऐसे प्रेस हर शहर में होने चाहिये जो युग-निर्माण कार्यक्रम के केन्द्र रहें और इसी विषय का साहित्य प्रकाशित करते रहें। सदियों की गुलामी के बाद जगी हुई भारतीय जनता की बौद्धिक भूख को बुझाने के लिये ज्ञान-उपकरणों की बड़ी मात्रा में आवश्यकता है। विज्ञ जनों को इसकी पूर्ति के लिये तत्पर होना चाहिये।
अध्यापक और चिकित्सक इस सम्बन्ध में सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं। उनके पास जो रोगी आते हैं उन्हें वे औषधि के साथ-साथ पथ्य-रूप में उपासना, आत्म शोधन और सेवा कार्य करते रहने की भी शिक्षा दे सकते हैं। यह उनके पूर्व कर्मों का निराकरण करने वाला एक प्रायश्चित होगा, जिससे आगामी जीवन सुखी बन सकेगा। अध्यापक अपने छात्रों को शिक्षा के साथ-साथ चारित्रिक और नैतिक शिक्षा भी दे सकते हैं। बच्चों के अभिभावकों से भी उनका कुछ न कुछ संपर्क और प्रभाव भी रहता है। इस परिचय के आधार पर वे अभिभावकों को भी यह प्रेरणा दे सकते हैं कि बच्चों को सुधारने की दृष्टि वे स्वयं भी अपनी प्रवृत्तियों में सुधार करें। बड़े अधिकारी अपने छोटे मातहतों को, पुरोहित अपने यजमानों को, दुकानदार अपने ग्राहकों को, मालिक मजदूरों को अपने परिचय और प्रभाव का उपयोग करके सुधारने का प्रयत्न करते रहें तो इससे बहुत लाभ हो सकता है। इससे उनके दोष घटेंगे, और सद्गुणों का विकास होगा।
जैसे पीछे बतलाया जा चुका है युग-निर्माण योजना तीन भागों में विभक्त है-उपासना आत्मशोधन और सेवा। इनमें से गायत्री उपासना की शिक्षा आचार्य जी पिछले पन्द्रह वर्षों से देते आ रहे हैं। गत दो वर्षों से उसकी उच्चस्तरीय शिक्षा भी पंचकोशी साधना के रूप में चल रही है। योजना में सर्व साधारण के लिये सामान्य उपासना क्रम बतलाया गया है। इसे कार्यक्रम का एक अनिवार्य अंग मानना चाहिये। विशेष उपासना की विधि ‘गायत्री महा विज्ञान’ में मौजूद है और उसकी शिक्षा भी अधिकार भेद से दी जा रही है। शेष आत्मशोधन और सेवा कार्यों से अधिकाँश कार्यक्रम सम्बन्धित हैं। आत्म-कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये इन तीनों को ही पूर्ण करना पड़ता है। मुझे जान पड़ता हैं कि समाज की स्थिति को सुधारने और व्यक्ति को अपना जीवन लक्ष्यपूर्ण करने के लिये एक सन्तुलित और समन्वयपूर्ण कार्यक्रम युग-निर्माण-योजना के रूप में जनता के सामने रखा गया है, जिसके लिये निर्माता हमारे धन्यवाद के पात्र हैं।
महाप्राज्ञ का जब अन्तकाल निकट आया तो उसने अत्यन्त के द्वारा प्राप्त ‘सूर्यकान्त मणि’ अपने पुत्र सौमनस को दी और कहा- यह कामधेनु के समान मनोवाञ्छा प्रदान करने वाली है। इसको संभाल कर रखना। इससे तुम्हारी सब आवश्यकताएँ सहज में पूर्ण हो सकेंगी और तुम्हें कभी किसी चीज का अभाव नहीं हो सकेगा।
सौमनस ने मणि तो ले ली पर पिता के उपदेशों पर कुछ ध्यान नहीं दिया। रात्रि के समय दीपक के स्थान पर वह उसका उपयोग करने लगा। एक दिन उसकी प्रेयसी वेश्या ने उपहार में वह मणि माँगी और सौमनस ने उसे बिना किसी संकोच के दे डाला।
वेश्या ने कुछ समय बाद एक जौहरी के हाथ उसे बेच दिया और उस धन से शृंगार की सामग्री खरीद ली। जौहरी ने मणि की परीक्षा की और रासायनिक प्रयोगों द्वारा उसकी सहायता से बहुत-सा सोना बना लिया। इससे वह बड़ा वैभवशाली बन गया और अपना जीवन राजा-महाराजाओं की तरह व्यतीत करने लगा। अनेक दीन-दुखियों की भी उसने उस स्वर्ग राशि से बहुत सहायता की।
आनन्द ने अपने शिष्य विद्रुध को यह कथा सुनाते हुये कहा- वत्स। यह जीवन सूर्यकान्त मणि के समान है। इसका सदुपयोग करना कोई-कोई पारखी जौहरी ही जानते हैं, अन्यथा सौमनस और गणिका की तरह उसे कौड़ी मोल गँवा देने वाले ही बहुत होते हैं।
मानव नर और नारी के दो भागों में विभक्त है। गुठली के भीतर दो दल रहते है और दोनों के सम्मिश्रण से ही उसका अस्तित्व रहता है। इसी प्रकार नर-नारी का सम्मिलित स्वरूप ही मनुष्य नाम का अधिकारी होता है। नारी को अर्द्धांगिनी कहते हैं। आधा अंग पुरुष है, आधा नारी, दोनों ही अपूर्ण हैं। इस अपूर्णता की पूर्ति उनके पारस्परिक सहयोग से ही होता है।
जिस प्रकार शरीर में दो हाथ, दो पैर, दो आँखें, दो नथुने, दो कान, दो फेफड़े, दो गुर्दे, दो कंधे होते हैं और दोनों की उपयोगिता एवं स्थिति समान हैं, उसी प्रकार मानव जाति के दो अंग नर और नारी ईश्वर के यहाँ से अपनी अपनी विशेषता उपयोगिता एवं महत्ता लेकर आये हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक तो हैं, पर कोई, किसी से हेय सा हीन नहीं है। दोनों के कर्तव्य और अधिकार समान हैं। सुविधा की दृष्टि से प्राचीन काल में ऐसी व्यवस्था की गई कि एक घर की देखभाल करे और दूसरा बाहर जाकर उपार्जन का प्रयत्न करे। इस प्रकार का कार्य विभाजन कर लेने से दोनों को सुविधा और निश्चिन्तता रहती है। संसार के अधिकाँश भागों में बहुत करके पुरुष बाहर का काम सँभालना है और स्त्रियाँ गृह कार्य करती हैं। पर वह नियम भी कोई पत्थर की लकीर नहीं। भारत के पर्वतीय प्रदेशों में सैंकड़ों स्थान ऐसे हैं जहाँ स्त्रियाँ उपार्जन करती हैं और पुरुष गृह-प्रबन्ध संभालते हैं। टिम्बकटू (अफ्रीका) में तो ऐसा रिवाज है कि पुरुषों को स्त्रियों के आगे घूँघट निकाल कर रहना पड़ता है।
सुविधा की दृष्टि से संसार के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी रीति-रिवाजों के अनुसार नर-नारी के कार्य-क्षेत्र बँट गये हैं। फिर भी इसके कारण दोनों के नागरिक अधिकारों में कोई अन्तर नहीं आता। जो मानवीय अधिकार पुरुष को प्राप्त है वही स्वभावतः नारी को भी प्राप्त होने चाहिये। दोनों के लिये सामाजिक और नैतिक व्यवस्था एक सी होनी चाहिए। दोनों के ऊपर एक से नियम कानून और बंधन लागू होने चाहिये। प्राचीन काल में ऐसी ही न्यायोचित व्यवस्था प्रचलित भी थी। नर और नारी समान रूप से मानवीय अधिकारों का उपभोग करते थे। पर मध्यकालीन सामंतीयुग में जब कि ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का जंगली कानून जोर पकड़ रहा था, नारी की शारीरिक निर्बलता का अनुचित लाभ उठा कर ऐसे प्रतिबंध लगा दिये गये जिससे उसकी स्थिति मनुष्य की न रह कर पशु की-सी हो गई। पुरुष को स्त्री के ऊपर इतना अधिक स्वामित्व प्रदान किया गया कि वह उसे अचल सम्पत्ति की तरह खरीद और बेच भी सकता था। मारने पीटने का भी उसे वैसा ही अधिकार मिला जैसा पशु-पालक अपने पशुओं के साथ किया करते हैं।
नारी की दुर्दशा पिछले दिनों इतनी बढ़ी कि उसे तिनके की तरह दीन-हीन और पराधीन बना दिया गया। पिंजड़े में बन्द रहने वाले पक्षी को कम से कम मुँह ढक कर तो नहीं रहना पड़ता, पर भारतीय स्त्रियों की स्थिति उनसे भी गई बीती हो गई। घर की चहार दीवारी के भीतर भी उन्हें पर्दे में मुँह ढके रहने को विवश होना पड़ा। शिक्षा के नाम पर शून्य, स्वावलम्बन के नाम पर अपाहिज, अनुभव के नाम पर सर्वथा अज्ञान जिस दृष्टि से भी देखा जाय उनकी स्थिति गई गुजरी हो गई। कभी वैधव्य का दुर्भाग्य सहन करना पड़े तो बेचारी का जीवन घोर तिरस्कृत और कष्टपूर्ण हो जाता है। जिनके बच्चों के लिये पतिदेव कुछ संपत्ति न छोड़ गये हों, उनके लिये तो अपना और बच्चों का पेट भर सकना भी महा-कठिन हो जाता है।
इस उत्पीड़न का फल नारी के लिये तो त्रासदायक हुआ ही, पुरुष भी अर्धांग पक्षाघात से पीड़ित रोगी तरह लुंज-पुंज हो गये। जिसकी अर्धांगिनी बौद्धिक दृष्टि से गई बीती स्थिति में पड़ी हो, जिसकी गृहलक्ष्मी ज्ञानशून्य अवस्था में हो वहाँ प्रगतिशील घरों की तरह उत्तम व्यवस्था रह सके इसकी आशा नहीं की जा सकती। ऐसे घरों में सद्गुणी सन्तानें भी कहाँ से आवेंगी? बच्चे का शरीर माता के ही शरीर में से बनता है। उसको छाती का रस-दूध पीकर ही तो वह बड़ा होता है। माता के पास जैसे कुछ संस्कार होंगे वैसे ही बालक में आयेंगे। जब कि माता शिक्षा, दीक्षा, अनुभव से हीन है, गुण कर्म, स्वभाव की दृष्टि से अविकसित अवस्था में पड़ी है, तो यह आशा करना कि उससे उत्पन्न होने वाली संतान श्रेष्ठ-सत्पुरुषों की श्रेणी गिने जा सकने लायक बन सकेगी, दुराशा मात्र ही है। शिक्षा के द्वारा भले ही वे कोई बड़ी या छोटी नौकरी प्राप्त कर लें, पर सद्गुणों से रहित माता द्वारा उत्पन्न बालक आदर्श-वान नहीं हो सकते। हम देखते हैं कि हमारी आगामी पीढ़ियाँ दिन पर दिन घटिया किस्म की बनती चली जा रही है। इसका मुख्य कारण नारी का अविकसित स्थिति में पड़ा रहना ही है।
नारी के प्रति सामन्तवादी-अन्यायपूर्ण दृष्टि कोण रखते हुये पुरुष कभी सच्ची प्रगति का अधिकारी नहीं हो सकता। जो किसी को सताता है उसे ईश्वर सताता है। जो दूसरों को गुलाम रखना चाहता है उसे कोई और गुलाम बना लेता है। हम पिछले एक हजार वर्ष तक राजनैतिक गुलामी में रहे हैं। और इस कारण भली प्रकार जानते हैं कि पराधीनता कितनी कष्टकारक होती हैं। नारी को जैसी पराधीनता सहनी पड़ती है वह तो राजनैतिक पराधीनता से भी अनेक गुनी अधिक कठोर और कष्टकारक है। जो लोग परम्पराओं के नाम पर, शास्त्रों के नाम पर इस अनीति का समर्थन करते हैं वे ईश्वर की दृष्टि में अपराधी ही माने जायेंगे और अपने अपराध का दण्ड भी उनको भोगना पड़ेगा।
युग-निर्माण योजना की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि उसमें नारी के उत्थान पर बहुत अधिक जोर दिया गया है। नारी के लिये जिस प्रकार पति-व्रत धर्म माना जाता है उसी प्रकार युग-निर्माण योजना में पत्नी-व्रत को भी एक अनिवार्य धर्म-कर्तव्य माना गया है। नारी के प्रति नर का भी वही कर्तव्य है जिसका पालन नारी नर के प्रति करती है। दोनों को समान नियमों, धर्मों का पालन करना चाहिये। जो कुछ सुविधा या छूट एक पक्ष चाहे, वही दूसरे पक्ष को भी मिलना चाहिये। इस न्यायोचित मान्यता को युग-निर्माण योजना और स्वतन्त्रता के ईश्वर प्रदत्त अधिकारों का दोनों ही उपभोग करे और सच्चाई प्रेम तथा वफादारी के बंधनों में दाम्पत्य-जीवन को स्वर्गीय आनन्द से परिपूर्ण बनावें तो योजना के अनुसार नर-नारी एक दूसरे के सच्चे मित्र बनकर अपने परिवारों को देवताओं का निवास स्थान बना सकते हैं। योजना के सदस्यों से आग्रह-पूर्वक यह कहा गया है कि अपने-अपने घरों में स्त्री शिक्षा की अनिवार्य रूप से व्यवस्था करें। जो स्त्रियाँ साक्षर नहीं हैं उन्हें साक्षर बनावें, साथ ही उनके बौद्धिक विकास के लिये एक घरेलू विद्यालय चलाया जाय। पारिवारिक ज्ञान गोष्ठियों का कार्यक्रम इसी दृष्टि से बनाया गया है। पुस्तकें पढ़कर सुनाना, ऐतिहासिक घटनायें, कहानियाँ, समाचार एवं प्रश्नोत्तर के माध्यम से जीवन को विकसित करने वाली विचारधारा स्त्रियों को निरन्तर देते रहने पर योजना में बहुत जोर दिया गया है। इसका फल यह होगा कि नारी अपने गौरव को समझेगी, जीवन की बहुमूल्यता और उसके सदुपयोग की तरफ ध्यान देगी।
लड़कियों को नियमित रूप से स्कूल भेजने और स्त्रियों की तीसरे पहर चलने वाली प्रौढ़ पाठशालाओं की ओर यदि हम भली प्रकार ध्यान दें तो
स्त्री-शिक्षा का आवश्यक विकास होगा। शिक्षा के साथ-साथ उन्हें कला कौशल की, उद्योग-धन्धों की ऐसी शिक्षा भी दी जानी चाहिये जिससे आवश्यकतानुसार वे कुछ आर्थिक स्वावलम्बन भी प्राप्त कर सकें। परिवार की नैतिक, सामाजिक आर्थिक दृष्टि से उत्तम व्यवस्था करना नारी की प्रवीणता पर ही निर्भर है। एक व्यापक पाठ्यक्रम बनाकर घर-घर में शिक्षा-व्यवस्था का विस्तार करके नारी को प्राचीन काल की तरह सब तरह से योग्य और समर्थ बनाना ही युग-निर्माण योजना का उद्देश्य है। यह लक्ष्य जितना ही पूर्ण होगा उतना ही हमारे घरों का वातावरण स्वर्गीय बनता चला जायगा।
युग-निर्माण योजना में पर्दा प्रथा को मिटाने का पूर्णतः समर्थन किया गया है। बड़ों के सम्मान में सिर ढकने की परम्परा को शिष्टाचार की दृष्टि से स्वीकार किया जा सकता है, पर ऐसा पर्दा जिसमें किसी से बोलने और मुँह को पेट तक घूँघट से ढके रहने का प्रतिबंध हो किसी दृष्टि से उचित या लाभदायक नहीं कहा जा सकता। उसे हटाने का प्रयत्न अवश्य किया जाना चाहिये ताकि नारी भी अपने मानवीय अधिकारों और व्यक्तित्त्व का अनुभव कर सकें।
दहेज को युग-निर्माण योजना में हिन्दू-समाज का गलित-कोढ़ माना है और यह प्रयत्न किया जा रहा है कि इस अनीति का जल्दी से जल्दी अन्त हो। युग-निर्माण योजना के सदस्य सबसे पहले इस संबंध में श्रीगणेश करेंगे। वे बिना दहेज के विवाहों का आदर्श जनता के सामने रखेंगे तो निश्चय ही उसका प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा। अब तक दहेज के विरुद्ध प्रस्ताव पास करके ही हम उसका विरोध किया करते थे, जिससे उसका फल भी नाम मात्र का दिखाई पड़ता था। पर जब प्रत्यक्ष और सक्रिय रूप से उसके उन्मूलन का प्रयत्न किया जायगा तो इस घृणित प्रथा का अन्त अवश्य निकट आ जायगा, ऐसी आशा है।
गायत्री-उपासना के द्वारा आचार्य जी ने नारी को भगवान की सर्वश्रेष्ठ प्रतिमा सिद्ध किया है। उसके प्रति पूज्य और पवित्र भाव रखने, श्रद्धा और सत्कार का व्यवहार करने की शिक्षा गायत्री की प्रतिमा पूजा के रूप में देनी आरम्भ की है। यज्ञ-अनुष्ठानों के बाद कन्या-भोजन की परम्परा इसी दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप देने के विचार से प्रचलित हुई है। नारी मात्र को माता गायत्री का प्रतिनिधि मानकर जब उसका समुचित सत्कार होने लगेगा तो मनु भगवान की वह उक्ति सार्थक होकर रहेगी जिसमें कहा गया है “जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं।”
अश्लीलता की वह दुष्प्रवृत्ति जिसके अनुसार नारी को कामिनी एवं रमणी माना जाता है और उसे विलासिता के भाव से देखा जाता है युग-निर्माण योजना के अनुसार अत्यन्त घृणित है। युवा स्त्रियों के अर्ध नग्न चित्रों को इसलिये टाँगना और देखते रहना कि पाशविक वृत्तियाँ भड़के मनुष्य की शील मर्यादा के बाहर की वस्तु है। गन्दे उपन्यास, कहानियाँ, तस्वीरें, फिल्में, गन्दे गाने, जिनसे नारी के प्रति विकार बुद्धि भड़के मानव जाति के लिये निश्चय ही अहितकर बात है। नारी का सम्मान गिराने वाले इन कुकृत्यों को यदि हम त्यागने का निश्चय कर लें और उनसे घृणा की जाने लगे तो सर्वत्र पवित्रता का वातावरण दृष्टिगोचर हो सकता है। योजना में लड़कियों को यह विशेष रूप से समझाया गया है कि वे अपने गौरव का ध्यान रखते हुये ऐसी पोशाक न पहिने, ऐसा वेश विन्यास और शृंगार न करें जो उन्हें रमणी या ओछे स्तर की सिद्ध करता हो। शील, लज्जा और शिष्टता ही नारी का भूषण है, जो उनकी पोशाक, वाणी, दृष्टि एवं चेष्टा से सदैव प्रकट होते रहना चाहिये।
आन्दोलन के रूप में नारी-उत्थान का जो महान कार्यक्रम लेकर युग-निर्माण-योजना चल रही है उसमें सतयुग के अवतरण की सम्भावनाएँ निहित जान पड़ती हैं। ऐसे आन्दोलन सफल हों तभी हम प्राचीन भारत की संस्कृति को पुनः जीवित, जागृत होते देख सकते हैं और तभी नारी को उसका वह गौरवान्वित पद प्राप्त हो सकता है, जिस पर मनुष्य जाति का भाग्य और भविष्य निर्भर है।
गन्ध-विहीन फूल है जैसे, चन्द्र चन्द्रिका-हीन
यों ही फीका है मनुष्य का, जीवन प्रेम-विहीन,
प्रेम स्वर्ग है, स्वर्ग प्रेम है, प्रेम अशंक अशोक,
ईश्वर का प्रतिबिम्ब प्रेम है, प्रेम हृदय आलोक॥
-रामनरेश त्रिपाठी
होगा नहीं निराश, प्राप्ति को यदि न मुझे अभिलाष,
कहा विफलता यदि फल का है तुम्हें नहीं विश्वास,
हानि-लाभ, यश-अपयश, सुख-दुख इस विधि उलझे साथ,
अलग-अलग कर नहीं सकेंगे, यह मानव के हाथ।
विष की प्याली ढुल जायेगी, वे अमृत-घट फोड़।
तू सुख से मुख मोड़, तुझे फिर देगा दुख भी छोड़।
-विद्यावती मिश्र
लालच किया मुक्ति का जिसने,
वह ईश्वर पूजना नहीं है।
बनकर वेद मन्त्र-सा मुझ को,
मन्दिर में गूँजना नहीं है॥
संकटग्रस्त किसी नाविक को, निज पतवार थमा देने से-
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी नौका तर जाती है।
-रामावतार त्यागी
अभय रहेंगे हम इस जग में, प्रेम बीज को बोना है।
देशभक्ति की बहती सुरसरि में, अपने कर धोना है॥
है ‘स्वरूप’ जग को बतलाना-मौत सदैव खिलौना है।
भारत माँ के हृदय-हार में, शीश प्रसून पिरोना है॥
-रामस्वरूप खरे
सँभलना गिरकर जगत का ही नियम है,
माना जाना रूठकर भी सहज क्रम है,
किन्तु गिरकर रूठकर जो और भूले-वह सखे।
बस एक मेरा विवश मन है।
-यमुनेश श्रीवास्तव
जो आँधियों में बुझ नहीं सका वहीं चिराग तू।
जो बारिसों में दब नहीं सकी वही है आग तू॥
कदम-कदम पर बिजलियाँ उछालता चला है तू॥
बढ़ा जा बाबरे। दिखा न अपने दिल के दाग तू॥
-विनोद रस्तोगी
डिगो न अपने पथ से तो सब कुछ पा सकते हो प्यारे।
तुम भी ऊँचे उठ सकते हो, छू सकते हो नभ के तारे॥
अटल रहा जो अपने पथ पर, लाख मुसीबत आने में।
मिली सफलता उसको जग में, जीने में मर जाने में॥
-मैथिलीशरण गुप्त
नवीन पर्व के लिए, नवीन प्राण चाहिए।
स्वतन्त्र देश हो गया,
प्रभत्वमय दिशा मही,
निशा कराल टल चली,
स्वतन्त्र माँ, विभामयी,
मुक्त मातृ-भूमि को नवीन मान चाहिए॥
चढ़ रहा निकेत है कि,
स्वर्ग छू गया सरल,
दिशा-दिशा पुकारती कि,
साधना करो सफल,
मुक्त गीत ही रहा नवीन राग चाहिए॥
युवक कमर कसो कि,
कष्ट कंटकों की राह है,
प्राण-दान का समय,
उमंग है, उछाह है,
पगों में आँधियाँ भरे प्रयाण-गान चाहिए॥ नवीन पर्व
के लिए --------
-‘अज्ञात’
(श्री भवानीदत्त आयुर्वेदाचार्य)
मैं छोटा ही था तब कहीं से एक विचित्र पत्र मेरे पिताजी के नाम से आया। उसमें लिखा था कि आगामी कुम्भ पर्व पर प्रयोग में शाकलद्वीपीय ब्राह्मणों का ‘अखिल-भारतीय-सम्मेलन’ होगा उसमें सब विचारशील स्वजातिबन्धु अवश्य पधारें। इस संदेश के साथ उसमें यह भी लिखा था कि इस पत्र की दस नकल करके जाति बन्धुओं को भेजनी चाहिये, जो भेजेगा उसे ब्रह्मयज्ञ का फल मिलेगा जो आलस या उपेक्षा करेगा वह जाति द्रोह के पाप से नरक में पड़ेगा। ऐसी ही एक चिट्ठी कुछ दिन बाद और भी देखने में आई “हरे राम-हरे कृष्ण” वाक्य 108 बार लिखा था और साथ ही यह संदेश भी था कि इसकी दस प्रतियाँ करके दूसरों को देनी चाहिये। जो देगा उसे सुख, सौभाग्य, धन संतान की प्राप्ति होगी और जो उपेक्षा करेगा उसे ईश्वरीय कोप का भागी बनना पड़ेगा।
उन दिनों तो इस प्रकार के पत्रों की उपयोगिता मैं न समझ सका, पर पीछे जब विचार किया जो जान पड़ा कि प्राचीन काल में जब प्रचार के आधुनिक साधन न थे तब किसी संदेश को व्यापक रूप से फैलाने के लिये एक से दस की पद्धति बहुत उपयोगी थी। इस उपाय से कोई भी संदेश या विचार देश-देशान्तरों तक सहज ही पहुँचाया जा सकता था। व्यक्ति के साधन सीमित होते हैं, पर जब सब लोग सम्मिलित साधनों से किसी बात को फैलाने में सहयोग देने लगें तो उसके व्यापक बन सकने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है।
आज प्रचार के अनेक साधन उत्पन्न हो गये हैं फिर भी ‘एक से दस’ वाली प्राचीन पद्धति की उपयोगिता अब भी इसलिये बहुत अधिक है कि उसमें व्यक्तियों का व्यक्तित्व और प्रभाव भी प्रचार के साथ जुड़ा रहता है। उस बात को दस आदमियों तक फैलाने का प्रयत्न जो व्यक्ति करता है उसका मनोबल, मस्तिष्क साथ में जुड़ जाने से उसमें एक नवीन शक्ति उत्पन्न हो जाती है। वह व्यक्ति लोगों को अपनी ओर से भी समझाता है और पूछी हुई शंकाओं का उत्तर भी देता है। परिचित व्यक्ति जब अपनी जान पहिचान वालों के पास कोई सन्देश भेजता है तो उसे अधिक विश्वस्त भी माना जाता हैं। इसलिये चाहे वह पद्धति आज प्रचलित न हो पर उपयोगिता की दृष्टि से उसकी महत्ता आज ही नहीं सदैव अक्षुण्ण रहेगी।
देखते हैं कि ‘युग-निर्माण-योजना’ में सत्प्रवृत्तियों के प्रसार के लिये उसी ‘एक से दस’ वाली चिर पुरातन और परीक्षित मनोवैज्ञानिक पद्धति को आधार बनाया गया है। जो संदेश सूत्र−संचालक द्वारा प्राप्त हो उसे हर सदस्य अपने प्रभाव क्षेत्र के दस व्यक्तियों को कहें, समझावें और उसी मार्ग पर चलने के लिये तैयार करने में अपने प्रभाव का उपयोग करें तो यह निस्सन्देह एक महत्वपूर्ण एवं ठोस कार्य हो सकता है। सीमा विस्तार की दृष्टि से भी यह पद्धति इतनी तेजी से बढ़ने और फैलने वाली है कि कुछ ही समय में समस्त विश्व में उसका विस्तार हो सकता संभव जान पड़ता है।
स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की नव रचना का जो आध्यात्मिक कार्यक्रम इस योजना द्वारा प्रसारित और कार्यान्वित किया जा रहा है उसे विश्वव्यापी बनाया जाना आवश्यक है। हजार, दो हजार व्यक्तियों तक कोई अच्छी परम्परा सीमित रह जाय तो करोड़ों में फैली हुई बुराई की तुलना में उसका क्या महत्व है? इसलिये इतनी बड़ी योजना के लिये उसकी व्यापकता का ध्यान रखना ही पड़ेगा। यह संभावना एक से दस वाली पद्धति से जैसी सरलतापूर्वक सफल हो सकती है उतनी और किसी प्रकार नहीं हो सकती।
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के हम 30 हजार सदस्य आचार्य जी की प्रेरणा से आत्म निर्माण और समाज-निर्माण की पुण्य-प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिये कटिबद्ध हुये हैं। इस योजना को हमें दस-दस व्यक्तियों तक फैलाना है। इस प्रकार पहले ही प्रयास में हम 30 हजार से 3 लाख बनेंगे। दूसरे प्रयास में 3 लाख के दस गुने अर्थात् 30 लाख होंगे। तीसरे में यह संख्या दस गुनी होकर 3 करोड़ तक पहुँचेगी। चौथी मंजिल पर पहुँचकर 30 करोड़ और पाँचवीं मंजिल पर दस गुने के क्रम से 3 अरब हो सकती है। इतनी ही जनसंख्या इस पृथ्वी पर रहती है। पाँच बार प्रयास करके-पाँच मंजिलें पार करके “एक से दस” की योजना के अनुसार हम इस पुण्य प्रक्रिया को देशव्यापी ही नहीं विश्व-व्यापी भी बना सकते हैं।
माना कि इस संसार में आलसी, प्रमादी, नास्तिक, अपराधी प्रकृति के, अच्छे कामों में रोड़ा अटकाने वाले व्यक्ति भी कम नहीं हैं, जो सहयोग देना तो दूर उल्टा उपहास करेंगे और जहाँ तक बन पड़ेगा बाधा डालेंगे। कुछ शिक्षा के अभाव से इसे समझ भी न सकेंगे और कुछ समझेंगे तो अहंकार-वश उसका अनुसरण न करेंगे। इतना होते हुये भी यदि दसवाँ अंश सफलता मिल सके तो भी कम महत्व की बात नहीं है। पाप में आकर्षण तो बहुत होता है तो भी वह किसी तरह पुण्य की बराबरी नहीं कर सकता। डाकू , हत्यारे, पापी, ठग व्यभिचारी, शराबी बहुत कोशिश करने पर अपने जैसे 10-20 व्यक्ति ही नये पैदा कर सकते हैं। पर गाँधी, बुद्ध, ईसा और महावीर जैसी आत्माएं अपने असंख्यों अनुयायी बनाने में समर्थ हो गईं। निश्चय ही यदि सत्प्रवृत्तियाँ सच्चे व्यक्तियों द्वारा श्रेष्ठ साधनों से प्रसारित की जायें तो वे भी गतिशील होती हैं और उनका भारी प्रभाव जन-मानस पर पड़ता है। अधिक समय नहीं हुआ कि भारतीय-स्वाधीनता संग्राम में लाखों व्यक्तियों ने देशभक्ति की उद्दात्त भावनाओं से प्रेरित होकर अपना तन-मन-धन मातृभूमि की बलिवेदी पर प्रसन्नतापूर्वक अर्पण कर दिया था। यदि कोई वैसा ही सारयुक्त और वस्तुतः उपयोगी आन्दोलन पुनः सामने आवे तो जनता का पर्याप्त सहयोग फिर मिल सकता है। इसलिये निराश होने की जरा भी आवश्यकता नहीं कि बहुत से लोग इस कार्य की उपेक्षा या उपहास करेंगे। यदि थोड़े लोग भी साहस प्रदर्शित कर सकें तो लक्ष्य की पूर्ति आसानी से हो सकेगी। दुष्प्रवृत्तियों की तरह सत्प्रवृत्तियाँ भी छूत की तरह लोगों पर असर करती हैं और जो प्रयत्न हृदय से किये जाते हैं वे कभी निष्फल नहीं होते।
हर व्यक्ति को अपने प्रभाव क्षेत्र में सेवा का स्वतन्त्र उत्तरदायित्व सौंप कर लोगों को संस्थावाद को उस बुराई से बचा लिया गया है जिसके कारण आये दिन राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं, नामवरी और यश के लिये सिर फूटते हैं, और धन-संग्रह करके हड़पने का अवसर मिलता है। राजनीति में या आर्थिक विषयों से सम्बन्धित संस्थाओं में चुनाव पद्धति की आवश्यकता हो सकती है, पर आध्यात्मिक कार्यक्रमों में तो व्यक्ति की उत्कृष्टता ही सर्वोपरि रहती है। सुचारक को अकेला एक ओर खड़ा होना होता है और सारी दुनिया उसका विरोध करती है। उसे जमाने को पलटना पड़ता है और यह कार्य पग-पग पर विरोध और तिरस्कार सहते हुये भी करना होता है। यदि ऐसे कार्य जनमत द्वारा चुनाव के आधार पर चला करे, तो बहुमत जैसा कुछ हैं-अथवा अधिकाँश लोग जैसे हैं, वैसी ही रीति-नीति युग-निर्माताओं को भी स्वीकार करनी पड़ेगी।
आर्ष आदर्शों को जीवन में उतारने और उन्हें अपने परिचित लोगों में- अपने प्रभाव क्षेत्र में फैलाने का कार्य ऐसा हैं जिसे बिना किसी संगठन के भी चलाया जा सकता है। संसार के सभी धर्म इसी प्रकार चलाये गये है। पीछे तो हर अच्छी वस्तु में भी विकृति आ जाती है, पर अपने-अपने समय पर सभी धर्मों ने जनता की बड़ी सेवा की है और जन-जीवन को आवश्यक मोड़ दिये हैं। हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई, मुसलमान, पारसी जैन आदि कोई भी धर्म संस्था बनाकर आगे नहीं बढ़ा है। श्रेष्ठ लोगों ने अपनी श्रेष्ठता को फैलाकर ही इन धर्मों का विस्तार किया था। युग-निर्माण योजना भी मानव-धर्म पर आधारित है और यह हरी दूब की भाँति स्वयं ही फैलेगी। एक दीपक से दूसरा चलने वाली पद्धति ही इसमें सफल होगी।
अनेक दोषों से इस योजना को बचाये रखने के लिये इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्य का ध्यान रखा गया है। यह कार्यक्रम आँधी-तूफान के ढंग का नहीं है। आत्मोन्नति की पुण्य-प्रक्रिया शान्ति और सुव्यवस्था के आधार पर ही अग्रसर होती है। युग-निर्माण योजना के मुख्य सिद्धान्तों को समझने के बाद उसके प्रचार का उत्तरदायित्व विचारशील प्रबुद्ध आत्माओं पर छोड़ दिया गया है। इसको जो जितने अंशों में कार्यान्वित कर सकेगा वह अपना और दूसरों का उतना ही हित साधन करेगा।
योजना में दिये गये छोटे-छोटे कार्यक्रमों को देखकर कोई सज्जन कदाचित यह सोचने लगे होंगे कि इसमें तो खाने पीने पौधे उगाने, पाठशालायें चलाने जैसे साधारण कार्यक्रम हैं, इनसे युग परिवर्तन कैसे संभव होगा? आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करना जैसा महान कार्य इसके द्वारा कैसे हो सकेगा? ऐसा सन्देह करने वालों को महात्मा गाँधी के चर्खा और खादी आन्दोलन का स्मरण करना चाहिये। बापू सदा यह कहते रहते थे कि “चर्खे से ही स्वराज्य मिल सकता है, खादी के बिना आजादी संभव नहीं।” लोग उनकी हँसी उड़ाते थे और कहते थे कि इतनी बड़ी और शक्तिशाली अंगरेजी सल्तनत चर्खा चलाकर कैसे हटाई जा सकती है, इसके लिये तो मारधाड़ उखाड़-पछाड़ से भरी हुई कोई तूफानी योजना बननी चाहिये। गान्धी जी कहते थे-”मारधाड़ में हम हार जायेंगे, क्योंकि इसके साधन अँग्रेजों के पास अधिक हैं। हमको जन-मानस में आजादी, आत्म गौरव और स्वावलम्बन के प्रति तड़पन पैदा करनी है। वह तड़पन जिस दिन उत्पन्न हो गई उसी दिन अंग्रेजों को भागना पड़ेगा।” उस तड़पन को उत्पन्न करने के लिये गाँधी ने छोटे-छोटे प्रतीक रूप कार्यक्रम सामने रखे थे। चर्खा को आत्म निर्भरता, स्वावलम्बन और देशभक्ति का प्रतीक बनाकर गाँधी जी ने राष्ट्र के सम्मुख उपस्थित किया था। खादी से इन्हीं भावनाओं का उद्भव पहनने वाले के अन्तःकरण में होता था। नमक सत्याग्रह छेड़कर उन्होंने विदेशी कानून के प्रति व्यापक अवज्ञा उत्पन्न की थी। यों नमक का प्रश्न कोई बहुत बड़ी बात न थी। उससे प्रति वर्ष केवल दो-चार पैसा टैक्स प्रत्येक आदमी का बचाया जा सकता था। इतनी सी बात अंग्रेज सरकार आसानी से मान सकती थी और गाँधीजी के कहने से नमक टैक्स छोड़ सकती थी। पर बात इतनी ही नहीं थी। उसके पीछे प्रचण्ड प्रेरणा देने वाले भावनात्मक तथ्य छिपे थे। नमक सत्याग्रह द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को तत्कालीन सरकार के कानूनों के प्रति बगावत करने की प्रेरणा दी गई थी। विशुद्ध रूप से वह एक मनोवैज्ञानिक आन्दोलन था।
खादी की बात भी ऐसी ही थी। चर्खा के सम्बन्ध में देश के बड़े-बड़े आदमी कहते थे कि हमारा वक्त कीमती है, इस छोटे काम में हम उसे खर्च क्यों करें? इससे जितनी देर में दो-चार पैसे का उपार्जन होगा उतनी देर में हम सैकड़ों रुपये कमा कर स्वराज्य आन्दोलन में दे सकते हैं। पर गाँधीजी ने ऐसे लोगों को समझाया कि प्रश्न पैसे का नहीं हैं, भावना का है। भावना न जगे तो पैसा व्यर्थ है। बिना पैसे के भावनाशील व्यक्ति सब कुछ कर डालते है, पर भावना से शून्य पैसा धूल के समान है। उससे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिये कार्य का असीम भार होते हुये भी गान्धी जी नियमित रूप से स्वयं चर्खा चलाते थे और अपने साथियों से भी चलवाते थे। भावनायें किसी प्रतीक का आश्रय लेकर ही जग सकती हैं। कोरी कल्पना करते रहने से मनोरंजन भले ही हो जाय पर उससे स्वभाव और संस्कारों का निर्माण नहीं हो सकता। यही कारण है कि प्राचीन काल में भी भावनाओं को जागृत करने के लिये भाँति-भाँति के कर्मकाण्डों की व्यवस्था की गई थी, चाहे वे तर्कशील व्यक्तियों को अनावश्यक ही क्यों न जान पड़ते हों। ईश्वर के प्रति भक्ति -भावना और श्रद्धा विश्वास जागृत करने के लिये प्रतिमा पूजन, आरती, नैवेद्य, धूप, चन्दन आदि के उपचार करने आवश्यक होते हैं। इनकी सहायता से ही क्रमशः जन-मानस में भावना का उदय हो जाता है।
यही कारण है कि किसी भी विषय में यदि हम छोटे से छोटा नियम भी स्वीकार कर लें और उस पर सच्चाई के साथ चलें तो कुछ ही समय में हमारे भीतर एक नवीन परिवर्तन हो जाता है। जातकों में एक कथा है कि एक बार एक बहेलिया भगवान बुद्ध के पास आकर मुक्ति का उपाय पूछने लगा। बुद्ध ने उसे अहिंसा धर्म का उपदेश दिया कि जो मन वचन कर्म से किसी प्राणी को कष्ट पहुँचायेगा वह भव-बन्धन से अवश्य छुटकारा पा जायगा। बहेलिया ने कहा-”भगवन्। यह बात तो मेरे लिये असम्भव है, क्योंकि मेरी जीविका का साधन तो पशु-पक्षियों का मारना, पकड़ना ही है। यदि मैं अहिंसा-धर्म को स्वीकार करूंगा तो फिर मेरा निर्वाह कैसे हो सकेगा? मुझे तो इसके सिवाय और काम आता भी नहीं।” बुद्ध जी ने कुछ देर सोच कर कहा-पूर्ण अहिंसा पालन संभव न हो तो जितना बन पड़े उतने अंश में ही पालन करो। कबूतर, चिड़िया, खरगोश, लोमड़ी जैसे निर्बल और निरीह प्राणियों का मारना त्याग का अहिंसा व्रत का पालन करो। बहेलिया ने उत्तर दिया-भगवन्। मैं ऐसे साधारण, छोटे जीवों को पकड़ कर ही तो अपना गुजारा करता हूँ। सिंह, व्याघ्र आदि का शिकार करने की न मेरी सामर्थ्य है और न उसके साधन ही मुझे प्राप्त हैं। बुद्ध ने कहा- अच्छा, तब तुम अपनी इच्छा से किसी एक जीव को कभी न मारने का व्रत ग्रहण कर लो और फिर जैसे-जैसे सुविधा हो अन्य जीवों के सम्बन्ध में भी प्रतिज्ञा करते रहना। बहेलिया ने बहुत सोच विचार कर केवल एक जीव को अपने लिये अनावश्यक समझा और उसने भगवान बुद्ध के सामने कौआ को न मारने का व्रत लिया। इसके फलस्वरूप अहिंसाव्रत की महत्ता उसके हृदय में जम गई और समयानुसार वह स्वयमेव अधिकाधिक विकसित होती चली गई। अन्त में वह बहेलिया पूर्ण रूप से अहिंसक बन गया और बुद्ध का शिष्य बनकर एक बहुत बड़े महात्मा के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
यही कार्य पद्धति युग-निर्माण योजना में व्यवहार में लाई गई है। सर्व साधारण के सामने छोटे-छोटे कार्यक्रम रखकर उनकी मनोवृत्ति को आध्यात्मिक तत्वों की ओर प्रेरित करने का प्रयत्न किया गया है। उपासना की विधि एक नहीं हजारों है। साधारण जप, नाम स्मरण से लेकर कठिन योगाभ्यास तक का विधान विभिन्न मनोवृत्तियों के व्यक्तियों के लिये किया गया है। कोई व्यक्ति जो आरंभ में केवल एक माला जपने से उपासना आरम्भ करता है। धीरे-धीरे बहुत बड़ी साधनाओं तक पहुँच जाता है और अन्त में परमहंसों के समान संसार से पूर्णतः निर्लिप्त होकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। उस समय उसे सभी ईश्वरीय शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं और लोग उसे साक्षात भगवान स्वरूप ही मानने लगते हैं। पर यह भगवान केवल बाहरी नहीं अन्तःकरण की होनी चाहिये। परमात्मा मनुष्य के मन और अन्तर की भावनाओं को देखता है। उसकी दृष्टि में महत्व इस बात का है कि मनुष्य धार्मिक सिद्धान्तों पर कहाँ तक सचाई के साथ आचरण करता है। गुण-कर्म-स्वभाव की शुद्धि हुये बिना, भावना और चरित्र का परिमार्जन हुये बिना, साधना निरर्थक ही बनी रहती है। भ्रष्ट चरित्र वाला व्यक्ति कितना भी जप, ध्यान क्यों न करे वह सब निष्फल है। अन्तःकरण का स्तर ऊँचा हो, हृदय में ईश्वर-भक्ति के अंकुर मौजूद हों तो साधारण उपासना द्वारा भी केवट, शबरी, विदुर गोपी द्रौपदी, नरसी, नाई की तरह परमात्मशक्ति की कृपा उपलब्ध की जा सकती है।
जीवन की शुद्धि का सबसे बड़ा साधन परमार्थ ही माना गया है। दूसरों के दुःख में अपना दुख और दूसरों के सुख में अपना सुख समझने से उदार बुद्धि जागृत होती है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा स्वभावतः पुण्य-कर्मों की ओर अग्रसर होती है और उसके फलस्वरूप लोक-परलोक का सुख भी मिलता है और ईश्वर का अनुग्रह भी प्राप्त होता है। जीवन-शोधन और परमार्थ की भावनायें किस प्रकार मन में उठें, किस तरह उनका विकास हो यह समस्या भी आध्यात्मिकता की वृद्धि के लिये विचारणीय है। प्राचीन काम लें उस समय की स्थिति और आवश्यकता को देखते हुये परमार्थ के कार्यक्रम बनाये गये थे। आज की स्थिति में लोक कल्याण और व्यक्ति का आत्मविकास जिस प्रकार हो सके उस पर विचार करके युग-निर्माण-योजना बनाई है। इसके कार्यक्रम छोटे-छोटे दीखते हुये भी इनके पीछे जो महान तथ्य छिपा पड़ा है वह निश्चय ही असाधारण है। इस योजना में व्यक्ति के कल्याण के साथ समाज का व्यापक हित भी दिखाई पड़ता है।
(श्री प्रेमचन्द सारस्वत)
युग-निर्माण योजना में जिन कार्यक्रमों को लेकर जागरण की शंखध्वनि की गई है वे ऐसे है कि उनके आधार पर ही मनुष्य का आत्मिक और भौतिक कल्याण हो सकता है। आहार-शुद्धि पर ध्यान दिया जाना आत्मोन्नति का एक आवश्यक अंग है। हम जैसा अन्न खाते है वैसा ही मन बनता है। यदि हमारा आहार राजसी और तामसी हुआ तो फिर उससे उत्पन्न होने वाला मानसिक स्तर मलीन ही रहेगा। उस मलीनता पर कथा, प्रवचनों का भी कोई रंग न चढ़ेगा। हम देखते है कि अनेक व्यक्ति जो नित्य धर्म-शास्त्रों को पढ़ते या सुनते रहते हैं आचरणों की दृष्टि से निम्न श्रेणी के होते हैं। इसका कारण उनके आहार का दोषयुक्त होना ही होता है। यदि हमारा आहार शुद्ध रहे आस्वाद व्रत का पालन करते हुये सतोगुणी पदार्थों का भोजन किया जाय, नियत समय पर भगवान का भोग लगाकर आहार ग्रहण करने का नियम पालन होता रहे तो उसके फल से मन शान्त रहेगा, सभी इन्द्रियाँ वश में रहेंगी और चित्त भी डाँवाडोल न होगा। सतोगुणी मन से विचार भी सतोगुणी उत्पन्न होंगे और उससे सद्भावनायें भी उठेंगी। ऐसी स्थिति जहाँ होगी वहाँ थोड़ा-सा प्रवचन या स्वाध्याय भी बहुत प्रेरणा प्रदान कर सकेगा और मनुष्य को सन्मार्ग पर काफी दूर तक बढ़ा सकेगा।
ब्रह्मचर्य का महत्व तो सबको विदित ही हैं। जीवन-शक्ति और ओज का मूल यही है। इसी से मनुष्य की प्रतिभा और स्मरण शक्ति का विकास होता है और उसकी गिनती विद्वानों में की जा सकती है। हमारे दीर्घजीवन और आरोग्य का आधार भी अधिकाँश में ब्रह्मचर्य पर ही रहता है। असंयमी मनुष्य शारीरिक और मानसिक रोगों के शिकार हुआ करते हैं, वे प्रायः अल्पायु होते हैं और उनकी सन्तान भी दुर्बल और दुर्गुणी देखी जाती है। ब्रह्मचर्य के अभाव से ही जन-संख्या वृद्धि की समस्या भारत ही नहीं समस्त संसार को परेशान किये हुये है। इसी के फल स्वरूप करोड़ों स्त्री-पुरुष यौन रोगों से पीड़ित रहते हैं। रक्त चाप, हृदय की धड़कन, मधुमेह क्षय जैसे रोग प्रायः असंयमी लोगों को ही होते हैं। अगर मन में काम-वासना सम्बन्धी विचार आते रहें तो उससे भी शरीर और मनका बहुत पतन होता है। इस प्रकार के विचारों की वृद्धि होती है जिससे अनेक व्यक्तियों और परिवारों की सुख-शान्ति नष्ट हो जाती है और वे तरह-तरह की आपत्तियों और दुर्भाग्य में फंस जाते हैं। इन बुराइयों के कारण समाज भी खोखला बन जाता हैं और उसकी श्रेष्ठता हुये युग-निर्माण योजना में सर्व साधारण को यथासंभव अधिक समय तक ब्रह्मचर्य पालन के कार्यक्रम पर अमल करने को कहा गया है। यह नियम विवाहित और अविवाहित दोनों पर लागू होता है। गृहस्थ को भी इस सम्बन्ध में पूरी सावधानी रखनी चाहिये। अमर्यादित काम सेवन एक प्रकार की आत्म-हत्या है।
सादगी का रहन-सहन और सामान्य वेश-भूषा सज्जनता और बड़प्पन का चिन्ह है। जिस तरह फौजी पोशाक पहिन लेने से उसी तरह की भावनायें और चेष्टायें बनने लग जाती हैं, साधु-सन्त जैसी पोशाक धारण करने से कुछ न कुछ उसी तरह के विचार और काम करने लग जाता है, उसी प्रकार सज्जनों की तरह सादा और आडम्बर शून्य वेषभूषा में रहने से मनुष्य के मन में सौम्य भावनायें और विचारों का उदय होता रहता है। इससे विनय, नम्रता, निरहंकारिता की वृद्धि होती है।
श्रम की महत्ता को स्वीकार करना, सब काम समय पर करना, आलस्य और प्रमाद से बचे रहना भी इस योजना के मुख्य अंग में आशा, उत्साह, प्रसन्नता आदि सद्गुणों का आविर्भाव होता है और उसका व्यक्तित्व दिन पर दिन श्रेष्ठ बनता जाता है। जो मनुष्य सदैव किसी उपयोगी कार्य में संलग्न रहता है, सबके साथ नम्रता, मधुरता, उदारता का व्यवहार करता है, वह सबको प्रिय लगने लगता है, दूसरे लोगों का सहयोग उसे सहज ही प्राप्त होता रहता है और इस प्रकार उसे हर एक कार्य में सफलता प्राप्त होती रहती है।
यद्यपि आजकल बहुसंख्यक व्यक्ति किसी प्रकार बहुत-सा पैसा इकट्ठा करके अमीर वन जाने को ही सफलता का सबसे बड़ा चिन्ह मानते है, पर यह कोरा भ्रम है। सच्ची सम्पत्ति तो ईमानदारी, मितव्ययिता और कर्तव्यपरायणता ही है। जिसमें ये गुण होगे उसे कभी किसी प्रकार का अभाव अनुभव नहीं हो सकता और यही सच्ची अमीरी का लक्षण है। जो दूसरों के दुःख में स्वयं भी दुःख अनुभव करता है और दूसरों के सुख को देखकर आनन्दित होता है वही परमार्थी कहा जाता है, अन्य लोग उसका हृदय से सम्मान करते हैं, उससे प्रेम रखते हैं। इस भावना की वृद्धि के लिये योजना में चमड़े का उपयोग, रेशम का व्यवहार और जीवों की हिंसा करके या उनको कष्ट पहुँचाकर प्राप्त की जाने वाली वस्तुएं या औषधियों को त्यागने आदेश दिया गया है। माँसाहार तो स्पष्ट ही सहृदयता की भावना को नष्ट करने वाला है। जीव-दया मनुष्यता का एक बहुत बड़ा लक्षण है। इस दृष्टि से पक्षियों को पिंजड़े में बन्द रख कर उनको कष्ट देना, पशुओं से उनकी सामर्थ्य से अधिक काम लेना, घोड़ों और बैलों को घायल होने पर भी गाड़ी ताँगों में जोतना उनको निर्दयतापूर्वक मारना-पीटना आदि कार्य अमानुषिक ही माने जायेंगे। इन कार्यों को छोड़ने से मानवता के भाव की वृद्धि होती है और आत्मोत्थान में बड़ी सहायता मिलती है।
स्वाध्याय को पूजा का ही एक अंग माना गया है। उत्तम और सदुपदेशपूर्ण ग्रंथों के पढ़ते रहने से विचारो की शुद्धि और उन्नति होती है। इसके लिये युग-निर्माण-योजना में कथा, पुराण और धर्म शास्त्रों के साथ-साथ वर्तमान समय में रची गई सद्विचारयुक्त और जीवन-निर्माण में सहायक बन सकने वाली पुस्तकों को स्वाध्याय योग्य बतलाया गया है। पूजा और उपासना की तरह जीवन की स्थूल समस्याओं और मानसिक उलझनों को समझना तथा उनको हल करने का ठीक मार्ग जानना आवश्यक है। जो पुस्तकें इस उद्देश्य की पूर्ति करने वाली हों उनमें से किसी न किसी को नित्य नियमपूर्वक पढ़ते रहना और उसके उपदेशों को मनन और चिन्तनपूर्वक व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना ही सच्चा स्वाध्याय कहा जा सकता है। इससे हम उन भूलों से भी बच सकते हैं जो संसार की उलझनों के कारण समय-समय पर पैदा होती है और जिनमें फंसकर मनुष्य मार्गच्युत हो जाता है।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये योजना में एक बहुत बढ़िया उपाय बताया है कि हम प्रति दिन सोते समय दिन भर के कार्यों का लेखा-जोखा लें। जो भूलें हुई हों उनके लिये आगे के लिये कान पकड़ कर सावधान रहने की प्रतिज्ञा करें और अच्छी बातों को निरन्तर करते रहने का संकल्प करें। युग-निर्माण योजना के सदस्यों को सोने से पर्व इस प्रकार का आत्म निरीक्षण अवश्य करना चाहिये और आत्मशोधन तथा आत्मविकास की दृष्टि से आगामी दिन का कार्यक्रम बनाना चाहिये। प्रातः काल उठकर रात्रि के समय किये हुये निश्चय पर पुनः विचार करना और आज दिन भर विशेष सावधानी के साथ व्यवहार करने की तैयारी करनी आवश्यक है। प्रातःकाल युग-निर्माण के संकल्प का पढ़ना भी प्रत्येक सदस्य का अनिवार्य कर्तव्य है जिससे योजना का लक्ष्य सदैव ध्यान में बना रहे और उससे अपने चरित्र और आचरण की उन्नति होती रहे।
अपने परिवार को उत्तम शिक्षा देते रहना, आन्तरिक दाम्पत्य प्रेम, पतिव्रत की तरह पत्नीव्रत का भी पालन, ब्रह्मचर्य का अधिकाधिक पालन आदि के कार्यक्रमों का एक बहुत बड़ा रहस्य यह है कि नई पीढ़ी में होनहार तथा दिव्यगुण-सम्पन्न बालक पैदा किये जा सके। बालक का शरीर और मन माता के शरीर और मन का ही एक अंश होता है। जहाँ माताएँ सुयोग्य और सन्तुष्ट मनोवृत्ति रखेंगी और ज्ञान तथा सद्गुणों की दृष्टि से श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाली होंगी वहीं सद्गुणी बालक उत्पन्न हो सकेंगे। युग-निर्माण के लिये जन्मजात सुसंस्कार लेकर उत्पन्न होने वाले बालकों की आवश्यकता होगी। यह कार्य स्कूलों की पढ़ाई से पूरा नहीं हो सकता, वरन् सुसंस्कारी माताओं द्वारा ही संभव हो सकता है। पत्नी का मानसिक विकास बहुत कुछ उसके पति की मनोभूमि का निर्भर रहता है। इसी तथ्य को समझकर योजना में इस बात पर बहुत जोर दिया गया है कि प्रत्येक पुरुष पत्नीव्रत धारण करे, अपनी धर्मपत्नी के प्रति पूर्ण निष्ठावान, सहृदय और उदार रहे और साथ ही उसके सर्वांगीण विकास की उचित व्यवस्था का भी ध्यान रखे। पुरुष यदि योजना के अनुरूप अपने में इस प्रकार का परिवर्तन कर सकेंगे तो इसका फल उन्हें सच्चे दाम्पत्य-प्रेम, सुव्यवस्थित गृहस्थी और होनहार बालकों के रूप में प्राप्त होगा।
इसी प्रकार के अनेक कार्यक्रम व्यक्तिगत सुधार और जीवन-शोधन के लिये युग-निर्माण योजना में रखे गये हैं। इन्हें पालन करने वाले व्यक्ति का जीवन अवश्य ही सुख शान्तिमय बन सकता है। समाज का कल्याण भी इसके द्वारा होगा। इस दृष्टि से यह योजना निस्सन्देह एक दैवी वरदान की तरह ही समझी जायगी।
लघु कथा-
किसी राजा ने एक बिलाव पाल रखा था। वह उसे बहुत प्यार करता था और दुलार से उसका नाम रख दिया था ‘व्याघ्र’।
एक दिन दरबार में ‘व्याघ्र’ नाम पर चर्चा होने लगी। किसी दरबारी ने कहा कि व्याघ्र से अच्छा नाम तो वनराज ‘सिंह’ का है। इसे सिंह क्यों न कहा जाय। यह बात राजा को पसन्द आ गई और उसे सिंह के नाम से बुलाया जाने लगा।
कुछ दिन बाद एक मंत्री ने बातचीत करते-करते यह सम्मति दी कि सिंह से तो मेघ बड़ा होता है जिसकी गर्ज को सुन कर सब जानवर डर जाते हैं। इसलिये इसका नाम मेघ रखा जाना उचित है। राजा ने भी इसको ठीक बतलाया और उस दिन से उसका नाम ‘मेघ’ पड़ गया।
एक दिन कोई विद्वान कवि राजा के दरबार में आये। उन्हें मेघ नाम अच्छा न लगा। पवन के वेग से मेघ जरा-सी देर में छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, इसलिये राजा के बिलाव को पवन क्यों न कहा जाय? राजा इससे सहमत हो गये। उन्होंने बिलाव को पवन कहना आरम्भ कर दिया। कुछ समय पश्चात प्रसंगवश किसी मंत्री ने कहा-”महाराज। दुर्ग, पवन को भी रोक देते हैं। आँधी और तूफान भी उसे हिला नहीं सकते। इस बिलाव का नाम ‘दुर्ग’ रखना बहुत ठीक होगा और लोगों ने भी इसका समर्थन किया और बिलाव ‘दुर्ग’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
पर अभी इस नाम-चर्चा का अन्त नहीं आया था। एक दिन कोई अन्य देशीय अतिथि वहाँ आया। उसने ‘दुर्ग’ नाम की कथा सुनकर कहा कि-चूहा बड़े-बड़े दुर्गों में छेद कर देते हैं। इस दृष्टि से यदि इसे ‘चूहा’ कहा जाय तो अधिक उपयुक्त होगा। कुछ दरबारियों ने भी उसकी हाँ में हाँ मिला दी और बिलाव का नाम बदल कर ‘चूहा’ रख दिया गया।
बहुत दिन तक ‘चूहा’ नाम ही चलता रहा। फिर एक दिन जब नाम की चर्चा चल पड़ी तो प्रधान अमात्य ने कहा कि यह बिलाव तो स्वयं चूहा का शिकार करता है और चूहे इसे देखते ही अन्तर्धान हो जाते हैं। तब चूहा की बजाय बिलाव नाम ही क्या बुरा है? यह बात सब की समझ में आ गई और बिलाव अपने असली नाम से ही पुकारा जाने लगा। अब नाम बदलने की समस्या सदा के लिये समाप्त हो गई।
राज पुरोहित ने इसकी चर्चा करते हुये एक समय कहा-अपना यथार्थ व्यक्तित्व ही सबसे श्रेष्ठ है। हम जैसे हैं वैसे ही कहे जायँ तो कोई हर्ज नहीं। जो अपनी स्थिति नहीं है वैसा बनने में अनिश्चितता और विडम्बना ही रहती है और उससे कोई लाभ भी नहीं निकलता।
एक बार एक उल्लू ने सपना देखा कि वह कल्पवृक्ष के रम्य उपवन के बिलकुल समीप जा पहुँचा और वह देवदुर्लभ स्थान उससे कुछ ही दूरी पर रह गया है। उतने में उसकी आँख खुल गई।
उल्लू तेजी से उस सपने वाले उपवन की ओर बेतहाशा उड़ चला। आकाश में उड़ते एक सारस ने इतनी तेजी से भागने का कारण पूछा तो उल्लू ने कल्पतरु का उपवन समीप ही होने की बात को सुनाई। सारस भी लोभ संवरण न कर सका, वह भी उल्लू के साथ उड़ चला।
दूसरे पक्षियों ने दोनों की इस दौड़ का कारण पूछा तो वे भी उधर ही उड़ चले। अब तो मोर, पपीहा, बाज, बतख, कौआ, कोयल, तीतर, बटेर, सभी उसी दिशा में भागे। उस दिन कोई पक्षी ऐसा न बचा जो इस उड़न-प्रतियोगिता में सम्मिलित न हुआ हो।
एक बूढ़ा गिद्ध पाकर के पेड़ पर अपने कोटर में बैठा हुआ यह कौतुक देख रहा था। उसके छोटे बच्चे ने उस दौड़ धूप का कारण पूछा तो बूढ़े गिद्ध ने समाधान करते हुए कहा-दुःस्वप्नों के पीछे दौड़ की अन्धी प्रवृत्ति अब मनुष्यों से हटकर पक्षियों में भी लग गई प्रतीत होती है, तो हे पुत्र। अब भगवान ही हम लोगों का रक्षक है।
परोपकार की महत्ता
किसी जिज्ञासु ने ईरान के दार्शनिक कवि शेख सादी से प्रश्न किया-”भगवन्। परोपकारी बड़ा होता है या ताकतवर?” पहले तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो तो मैं तुम्हारी जिज्ञासा का समाधान कर दूँगा। यह बताओ कि हातिम के समय में सबसे बड़ा पहलवान कौन था।”
जिज्ञासु ने बहुत सोचा-विचारा पर उसे पर्याप्त समय तक प्रयत्न करने पर भी इसका उत्तर न सूझ पड़ा। अन्त में, उसने कहा-”हातिम के उपकार तो विख्यात हैं और उनकी कथा सबको याद है। पर उस जमाने के किसी पहलवान ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसके कारण उसे आज तक याद रखा जाता।”
शेख सादी ने उसे समझाया कि “तुम ने ठीक कहा हैं। इस कथन में ही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी मौजूद हैं।” पूछने वाला संतुष्ट होकर चला गया। उसने परोपकार की महत्ता को समझ लिया।
भट्टी और धौंकनी
लुहार की भट्टी और हवा भरने की धौंकनी में एक बार लड़ाई हो पड़ी।
भट्टी ने आग बबूला होकर कहा-मरे जानवर की घृणित खाल से बनी कुरूप धौंकनी, तेरी बदबू भरी साँस मुझे बहुत खलती है, हट, मेरे सामने से।
धौंकनी क्रुद्ध नहीं हुई। उसने शान्त स्वर से कहा-बहिन, भूल गई कि तुम्हारे चेहरे की लालिमा मेरे ही निरन्तर श्वासोच्छासों की परिणित है। मेरे विरत हो जाते ही तुम काली कलूटी कोयल की राख बनकर रह जाओगी।
क्रोध नाश का मूल है
सृष्टि का निर्माण कार्य पूर्ण हो गया। मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, देव, दानव सभी ने अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को समझा और अपने-अपने क्षेत्र में काम करने के लिए चल दिये।
अन्त के लिए शैतान बच गया। उसने भगवान से प्रार्थना की कि मुझे भी कोई काम और क्षेत्र सौंप दीजिए।
भगवान चिन्ता में पड़ गये। यदि शैतान को शरीर मिल गया तो फिर इसके द्वारा उत्पन्न हुए उपद्रवों का पारावार न रहेगा। इसलिए इसे शरीर तो नहीं दिया जा सकता, पर कुछ न कुछ काम तो बताना ही पड़ेगा।
बहुत सोच कर भगवान ने शैतान से कहा-तुम्हें क्रोध का रूप दिया गया। इस संसार में जिन्हें तुम नष्ट होने वाला समझो, उनके सिर पर चढ़ जाया करना।
तब से लेकर अब तक शैतान मारा मारा फिरता है। उसे कोई निश्चित स्थान और काम तो नहीं मिला। पर जिसकी दुर्गति होने वाली भवितव्यता उसे दीखती है उसी के सिर पर क्रोध बन कर चढ़ जाता है।
यह तथ्य सर्व विदित है कि जिसे क्रोध आता है उसका सर्वनाश होकर रहता है। शैतान के कानून को कोई तो जानते हैं और कोई नहीं भी जानते।
अज्ञातवास से लौटते ही हमने अपने मार्गदर्शक के आदेश से ‘युग-निर्माण-योजना’ को विचारधारा का परिचय देना आरम्भ कर दिया था। दो वर्ष तक सैद्धान्तिक प्रशिक्षण अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों द्वारा देकर अब गत गुरु पूर्णिमा (6 जुलाई) से उसे व्यवहारिक कार्यरूप में प्रस्तुत कर दिया गया है। उस पुनीत पर्व पर इसका उद्घाटन हो गया और योजना अब कार्यरूप में अग्रसर हो रही है।
हमारे अनुरोध को परिजनों ने पूरे ध्यान से सुना और समझा है और उसी दिन तदनुसार व्यवहार भी आरम्भ कर दिया है। प्राप्त समाचारों के अनुसार तीन चौथाई परिजनों ने उस दिन उपवास रखा, विशेष जप-हवन किया और जहाँ जितने सदस्य थे उनने इकट्ठे होकर प्रतिज्ञा ली कि आज के दिन से अपनी उपासना को अधिक निष्ठापूर्वक आरम्भ करेंगे, जीवन शोधन पर पूरा ध्यान देंगे और जन-जागृति के लिए सेवा-बुद्धि से कुछ न कुछ समय नियमित रूप से लगाते रहेंगे। परमार्थ का सबसे श्रेष्ठ तरीका किसी को सन्मार्ग की प्रेरणा देना ही हो सकता है। अपना सुधार करके ही कोई मनुष्य आपत्तियों और कठिनाइयों से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। दूसरों की भौतिक सहायता तो उसे तत्कालिक थोड़ा लाभ भले ही पहुँचा दे पर स्थायी हित साधन तो अपने सुधार से ही होता है। इसलिये युग-निर्माण कार्यक्रम में जन-भावनाओं को उत्कृष्ट बनाने को ही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ माना गया है। प्रसन्नता की बात है कि योजना को कार्यान्वित करते हुये प्रत्येक सदस्य ने उपासना और जीवन शोधन के साथ-साथ परमार्थ को भी आवश्यक महत्व दिया है। ज्ञान-यज्ञ के लिए सभी परिजन अपनी भावना समय, एवं श्रद्धा अर्पित करेंगे, हमारे लिए यह सबसे अधिक प्रसन्नता और सन्तोष की बात है।
अनुमान यह था कि समाचार थोड़े आवेंगे इस लिये उनमें से अधिक प्रभावशाली समाचारों को अगस्त अंक में पाठकों की जानकारी और उत्साह वृद्धि के लिये प्रकाशित करेंगे। यह अंक दस दिन लेट भी इसी कारण किया गया है। पर जो समाचार 30 हजार परिजनों ने भेजे वे इतनी अधिक संख्या में और ऐसे महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें संक्षिप्त करके एक-एक दो-दो पंक्ति में भी छापा जाय तो साधारण अखंड-ज्योति से तिगुने पृष्ठों की आवश्यकता पड़ेगी। इस विवशता से समाचार नहीं छापे जा रहे हैं। इस अंक में केवल वे लेख ही दिये गये हैं जिनमें प्रबुद्ध मनीषियों ने युग-निर्माण-योजना के सम्बन्ध में अपने-अपने दृष्टिकोण उपस्थित किये हैं। इनसे पाठकों को योजना का स्वरूप समझने में सहायता मिलेगी।
समाचारों का साराँश यह है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रायः प्रत्येक पाठक ने गुरुपूर्णिमा के दिन निश्चय किया है। इस परिवर्तन को ही हम युग-निर्माण की आधारशिला मानते है। हम बदलेंगे तो हमारी दुनिया भी बदलेगी यह निश्चित है। उपासना अध्यात्म का मूल है। गायत्री उपासना को तो हिन्दू-संस्कृति की गंगोत्री माना गया है। इसलिए नवीन प्रेरणा के अनुसार पुराने उपासकों ने अपना जप-साधन अधिक श्रद्धा-भावना से परिपूर्ण बनाने का निश्चय किया है। जो इस मार्ग पर आगे बढ़ चुके हैं उन्होंने पंचकोशी गायत्री-साधना के माध्यम से अपने अन्नमयकोश, मनोमयकोश, प्राणमयकोश विज्ञानमयकोश, आनन्दमयकोश का परिष्कार करते हुये आत्म-साक्षात्कार की स्थिति तक पहुँचने का प्रण किया है। जो लोग अभी नये-नये ही इस परिवार में सम्मिलित हुए हैं, उन्होंने गुरुपूर्णिमा से अपनी साधना किसी न किसी रूप से प्रारम्भ कर दी है। साथ ही सबने यह आश्वासन दिया है कि अपने कुटुम्बी, सम्बन्धी और मित्रों को उपासना मार्ग में लगाने का शक्तिभर प्रयत्न करेंगे। स्त्रियों की उपासना पर अधिक जोर दिया गया था, ताकि नई पीढ़ी को प्रबुद्ध बनाने में सहायता मिले। इस सुझाव का प्रायः सभी ने स्वागत किया है और तदनुसार प्रयत्न भी आरम्भ कर दिया है। जैसा कि आश्वासन मिला है यदि ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों की धर्मपत्नियाँ निष्ठापूर्वक गायत्री-उपासना में सम्मिलित हो सकीं तो इसमें सन्देह नहीं कि अगली पीढ़ी के लिए सहस्रों महापुरुष और महा नारियाँ भारतमाता का गौरव बढ़ाने वाले पैदा हो सकेंगे। पारिवारिक ज्ञान गोष्ठियाँ इस दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक हैं। इस सम्बन्ध में भी उत्साहवर्धक सूचनाएँ मिली हैं। आधे से अधिक पाठक ऐसे हैं जिन्होंने अपने घरों में एक घण्टा रोज ज्ञानचर्चा और शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था में प्रतिदिन लगाना आरम्भ कर दिया है। परिवार सुधरेंगे तो सारा समाज ही सुधरेगा और इसी क्रम से समस्त संसार का सुधार संभव हो सकेगा। अपने परिवारों में हमें नम्रता, शिष्टाचार, उदारता, प्रेम, न्याय, एकता और सहिष्णुता की परम्परा कायम करनी है। ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ को इस दिशा में सब से पहले और सबसे प्रभावशाली कदम उठाना है। प्राप्त समाचारों से विदित होता है कि यह कदम हजारों विचारशील पाठकों ने इसी गुरुपूर्णिमा से उठा दिया है और शेष कुछ ही दिनों में उठाने जा रहे हैं।
रात को जल्दी सोना, प्रातः जल्दी उठना, दिन भर की दिनचर्या का प्रोग्राम सबेरे ही बना लेना और फिर उसी के अनुसार काम करना चाहिए। प्रातः बहुत हल्का जलपान करना, दिन में दो बार भोजन करना, सप्ताह में एक दिन उपवास रखना, थाली में जूठन न छोड़ना, भगवान को भोग लगाकर खाना जैसी आहार शुद्धि की योजना दो तिहाई लोगों ने स्वीकार कर ली है। कितने ही ऐसे भी हैं जिन्होंने आजीवन नमक मसाले छोड़ देने का व्रत लिया है। ब्रह्मचर्य सम्बन्धी सूचनाओं से पता चलता है कि लोगों का जो क्रम अब तक रहा है उससे संयम नियम की मात्रा दूनी हो जायगी। असंयम आधा घट जायगा।
नशा, माँस, फैशन, फिजूलखर्ची, सिनेमा, पान, चाय आदि छोड़ने वालों की संख्या पाँच हजार से ऊपर है। वृक्षारोपण में सैकड़ों लोगों ने भाग लिया है। तुलसी और फूल घर-घर में बोये जा रहे हैं। सेवा-भावना से सैकड़ों प्रौढ़ पाठशालाएँ जगह-जगह पारस्परिक सहयोग के आधार पर स्थापित हुई है, जिनमें साक्षरता के साथ-साथ जीवन-विद्या के प्रत्येक पहलू पर भी प्रशिक्षण की व्यवस्था रहेगी। इसी प्रकार प्रेरणाप्रद पुस्तकें संग्रह करके उन्हें घर-घर पढ़ाये जाने का कार्यक्रम बनाकर लगभग पचास उत्साही व्यक्तियों ने छोटे-छोटे पुस्तकालय स्थापित किये हैं। महिलाओं को गृहविज्ञान तथा सिलाई की शिक्षा के साथ-साथ प्रयोग महिला विद्यापीठ की परीक्षाएँ दिलाने वाले सात केन्द्र विभिन्न नगरों में स्थापित हुए हैं।
मृत्युभोज, पशुबलि, बाल विवाह, अनमेल विवाह कन्या विक्रय, पर्दा प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों को हटाने के लिये जगह-जगह आन्दोलन आरम्भ कर दिया गया है। दहेज उन्मूलन की ओर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। प्रयत्न यह किया जा रहा है कि अपने परिवार में ऐसे आदर्श विवाहों की परम्परा चल पड़े जिनमें वरपक्ष दहेज न ले और कन्यापक्ष जेवर न चढ़ने दे। बिना धूमधाम और लम्बी चौड़ी बरात के बहुत ही सादी रीति से विवाह हुआ करे। विवाह योग्य लड़के और लड़कियों में यह हस्ताक्षर आन्दोलन आरम्भ कर दिया गया है कि यदि उनके अभिभावक दहेज और फिजूलखर्ची से भरा विवाह करना चाहेंगे तो उसे स्वीकार न करेंगे और आजीवन कुँवारे ही बने रहेंगे। इस प्रकार की कुरीतियों के विरुद्ध जन-भावनाएँ जागृत करने के लिये कितने ही विचार-शील लोगों ने टोली बनाकर निकालना और घर-घर जाकर अपन अभिप्राय समझाना आरम्भ कर दिया है। आदर्श वाक्य दीवारों पर लिखने का आन्दोलन बहुत जोर पकड़ेगा ऐसा लगता है, क्योंकि इसे कार्यान्वित करने की सूचनाएँ आधे के लगभग परिजनों ने भेजी हैं।
परिवार के जो सदस्य चिकित्सा-कार्य कर रहे हैं उन्होंने अपने रोगियों को सात्विक आहार-विहार तथा जप-स्वाध्याय की आवश्यकता समझाना शुरू कर दिया है। कितने ही अध्यापक अपने छात्रों को अतिरिक्त रूप से नैतिकता और मानवता की शिक्षा भी देने लगे हैं। पुरोहितों ने अपने यजमानों को धर्म शिक्षा देनी आरंभ कर दी है। जिन लोगों के पास अवकाश है उनमें से कई वयोवृद्ध सज्जनों ने रामायण, गीता की कथाएँ कहना और पाठशालाएँ चलाना आरम्भ कर दिया है। सन्त-महात्मा भी इधर आकर्षित हुये हैं और उन्होंने भी शिक्षा-प्रसार के कार्यक्रम में सहयोग देना आरम्भ कर दिया है। एक महात्मा ने तो छः गाँवों में कन्या पाठशालाएँ स्थापित कराई है जिनका खर्च इस वर्ष ग्रामवासी चन्दा करके चलायेंगे और अगले वर्ष उन्हें सरकारी सहायता प्राप्त हो जायगी। छोटे गाँवों में जहाँ स्कूल नहीं थे वहाँ इस वर्ष कितनी ही प्राइमरी पाठशालायें इसी प्रकार के प्रयत्नों द्वारा खुली हैं।
सवालक्ष गायत्री मंत्र लिखाकर सामूहिक गायत्री-मन्दिर स्थापित करने का कार्यक्रम बहुत जगह आरम्भ हुआ है। अहमदाबाद शाखा ने सवा करोड़ मंत्र लिखाये हैं और उन मंत्रों का एक मंदिर युग-निर्माण केन्द्र के रूप में शीघ्र ही स्थापित होने वाला है। इन केन्द्रों में ही परिवार का कार्यालय रहेगा और वहाँ समय-समय पर कीर्तन-भजन तथा जप-स्वाध्याय के आयोजन होते रहेंगे। इनमें गायत्री माता का एक बड़ा चित्र भी स्थापित किया जायगा। पुराने मंदिरों में धर्म प्रवृत्तियाँ आरंभ कराने का भी कितनी ही जगह प्रयत्न चल रहा है। कुछ टूटे मंदिरों की मरम्मत करके उन्हें पूजा-उपासना और सत्संग आदि के कार्यक्रमों के उपयुक्त बनाया जा रहा हैं।
साप्ताहिक सत्संगों की प्रक्रिया शिथिल पड़ गई थी। अब उसमें पुनः जागृति आई है और प्रति सप्ताह किसी एक सदस्य के घर पर सत्संग होते रहने का क्रम फिर से आरम्भ कर दिया गया है। इन सत्संगों में एक तिहाई समय हवन में और दो तिहाई प्रवचनों में लगा करेगा। आगामी आश्विन में नवरात्रि प्रायः सभी शाखाओं में सामूहिक अनुष्ठानों और शिक्षण शिविरों के रूप में मनाई जायगी। पर्व और त्यौहारों का सामूहिक आयोजन करने की विधिवत पद्धति बनाने की सभी जगह से माँग आई है और आशा है कि वह जल्दी ही बन जायगी। षोडश संस्कारों में से प्रमुख संस्कारों को सरल विधि से कर सकना लोग सीखना चाहते हैं, जिससे परस्पर मिल-जुलकर बिना खर्च के ऐसे आयोजन कर लिया जाया करे। ऐसी सरल, संक्षिप्त और सर्व साधारण के लिये उपयोगी पद्धति भी शाखाओं की आवश्यकता पूरी करने के लिये जल्दी ही बन जायगी। एक छोटी पुस्तक जन्म-दिन मनाने की भी बनाई जानी है। जन्म दिन मनाने की प्रथा उत्साहपूर्वक चलाई जानी चाहिये ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की महत्ता और उपयोगिता पर आवश्यक विचार करते हुये भावी-जीवन का सदुपयोग करने के लिये विशेष प्रेरणा प्राप्त कर सके।
कई व्यक्तियों के ऐसे पत्र आये हैं जो अपनी-अपनी जातियों या उपजातियों में कुरीतियों का उन्मूलन तथा सत्प्रवृत्तियों की वृद्धि करने के लिये जातीय-संगठन बनाना चाहते हैं। यह कार्य हमें उपयोगी ही प्रतीत हुआ है और ऐसे लोगों को स्वीकृति देते हुये हमने उन्हें व्यवहारिक मार्ग दर्शन के लिये मथुरा भी बुलाया है। ऐसे छोटे-छोटे प्रयत्नों से भी सामाजिक उत्कर्ष में बहुत योगदान मिल सकता है।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आये हुये हजारों समाचारों को छापना संभव न हो सका, परिजन व्यक्तियों ने विशेष रचनात्मक कार्य किये हैं, उन्हें वे कार्य करने की प्रेरणा कैसे मिली, प्रयत्न कैसे किये, कठिनाई क्या आई और प्रगति कैसे हुई, इसको आवश्यक जानकारों दूसरों का मार्ग-दर्शन करने के उद्देश्य से छोटे-छोटे लेखों के रूप में छापी जाया करेगी। कोई सज्जन आत्मश्लाघा की दृष्टि से ऐसे समाचार न भेजे। वरन् विशुद्ध रूप से जन-मार्ग दर्शन ही उसका उद्देश्य हो तो अच्छा है। इसमें व्यक्तियों के नाम रहे ही नहीं। यदि अत्यन्त आवश्यकतावश कहीं उनका उल्लेख करना ही हो तो अत्यन्त संक्षेप में किया जाय। स्मरण रहे कि नाम छपाने की मनोवृत्ति लोकेषणा-अहंकार को उत्पन्न करती है, जो कि सच्चे लोक सेवकों के लिये विष के तुल्य त्याज्य मानी गई है। इससे पुण्य क्षीण होते चले जाते हैं और परस्पर ईर्ष्या-द्वेष उत्पन्न होते हैं सो अलग।
यह स्पष्ट है कि युग-निर्माण का उद्देश्य जन-मानस में अध्यात्म तत्वों का समावेश करना है। उपासना, जीवन-शोधन और परमार्थ के त्रिविध कार्यक्रमों को अपनाते हुये हमें जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये ही अग्रसर होना है। योजना में सन्निहित कार्यक्रम हमारे आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सहायक या साधन-मात्र ही हो सकते हैं। हमें लक्ष्य को प्रधानता देते हुये उसकी पूर्ति के लिये ही इन कार्यों को करना है। लक्ष्य को भूल कर दूसरी संस्थाओं की तरह लोकरंजन, दिखावट, यश की कामना या तुच्छ स्वार्थ की प्राप्ति के लिये कार्य करने से तो वही दुर्गति हमारी भी होगी जो दूसरी की हो रही है।
राजा-भोज अपने मन्त्री के साथ कहीं दूर यात्रा कर रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक किसान को ऊबड़-खाबड़ जमीन पर गहरी नींद में सोते देखा। राजा ने मन्त्री से पूछा-ऐसी ऊँची-नीची, ढेले और कंकड़ों से भरी हुई जमीन में इस किसान को गहरी नींद क्यों कैसे आ गई? हमें तो थोड़ी अड़चन होने पर निद्रा उचट जाती है।
मन्त्री ने कहा-महाराज। यह सब अभ्यास और परिस्थितियों पर निर्भर है। मनुष्य से अधिक कोई कठोर नहीं और न उससे अधिक कोई कोमल होता है। परिस्थितियाँ मनुष्य को अपने अनुकूल बना लिया करती हैं।
पर यह बात राजा को पूरी तरह नहीं जँची। मन्त्री ने कहा-”तब इसकी परीक्षा कर ली जाय।” दोनों ने सलाह करके उस किसान को राजमहलों में रखने का निर्णय किया जिससे उसे कुछ दिन तक राजसी ठाठ-बाट से रखकर उसकी जाँच की जाय। महलों में पहुँचने पर उसके खाने, पीने और सोने का बढ़िया-से- बढ़िया इन्तजाम किया गया और उसे खूब आराम से रखा जाने लगा। इस प्रकार कई महीने बीत गये और किसान वैसे ही राजसी जीवन का अभ्यस्त हो गया।
प्रयोग का अन्तिम दिन आ पहुँचा। मन्त्री ने किसान के पलंग पर बिछे गद्दे से भीतर कुछ पत्ते और तिनके चुपके रखवा दिये। राजा छिपकर देखने लगा कि देखें इस परिवर्तन का क्या परिणाम होता है।
किसान रात भर करवटें बदलता रहा। उसे नींद नहीं आई। सबेरे राजा उसके पास पहुँचे तो उसने शिकायत की गद्दे में कुछ गढ़ने वाली चीज मालूम पड़ती है, जिसने नींद हराम कर दी।
मन्त्री ने कहा-यह वही किसान है जो ढेले और कंकड़ों पर धूप में पड़ा सो रहा था। आज इसे पलंग पर बिछे रुई के गद्दे में तिनके भी चुभते हैं। यह अभ्यास का ही अन्तर है। कठोरता और कोमलता की जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़े कुछ ही दिनों में मनुष्य उन्हीं का अभ्यस्त हो जाता है।
उठो, तरुण विक्षुब्ध न हो तुम नव-युग के आधार हो
युग-निर्माण-योजना की तुम सबल सुदृढ़ पतवार हो
(1)
युग-प्रेरक दृढ़ वक्ष तुम्हारा साहस से सम्पन्न हो।
आयें बाधाएँ ही कितनी पर न कभी तुम खिन्न हो॥
सदा हँसो जैसे हँसते हैं सुमन कटीली डाल पर।
ब्रह्मचर्य का तेज झलकता रहे अपरिमित, भाल पर॥
चलो स्वयं ही पथ प्रशस्त कर कितना ही अँधियार हो
ऐसी ज्योति जलाओ जिससे धरती पर उजियार हो
(2)
तुम्हें न रोक सकें आकर्षण और प्रलोभन बड़े-बड़े।
रहो देखते बन तटस्थ सब, दिव्य-लक्ष्य -हित सदा अड़े॥
जिधर बढ़ें युग-चरण तुम्हारे प्रलय उधर ही मच जाए।
छूलें जिसे भुजाएँ, दुस्तर-कार्य पूर्ण वह हो जाए॥
नई क्रान्ति की नई चुनौती, तुम्हें सहज स्वीकार हो!
अटल-साधना, श्रम-संयम के तुम्हीं दिव्य अवतार हो!!
(3)
जग में कार्य असम्भव क्या यदि लगन सत्य-शुभ-सुन्दर हो।
उर में हो विश्वास अमित, चरणों में गति-शाश्वत-स्वर हो।
क्योंकि जगत में जी सकता वह जिसकी भुज-दंडों में बल।
उसका क्या जीवन जो जर्जर चिन्तित-कायर अति निर्बल॥
अस्तु अभय बन बिचरो साथी, तुम्हें सभी से प्यार हो!
बढ़ो सदा तूफानों में तुम, चाहे भीषण ज्वार हो!!
-रामस्वरूप खरे
वेदान्त साधारण लोगों को इसलिए अपनी ओर खींचता है कि वह उनके धर्मग्रन्थ वेद की शिक्षा है। शिक्षित व्यक्ति को वह इसलिए आकर्षित करता है कि सूर्य के तले दर्शन कहलाने योग्य कोई भी ऐसा दार्शनिक ज्ञान नहीं है जो वेदान्तिक अद्वैतवाद का समर्थन न करता हो और न ऐसा कोई विज्ञान ही है जो वेदान्त अथवा सत्य के पक्ष की पुष्टि और उन्नति न करता हो। पर वह वेदान्त काल्पनिक नहीं व्यावहारिक होना चाहिए। पुस्तकों में छपे हुये और कीड़ों के आहार के लिए अलमारियों में रखे हुये वेदान्त से काम न चलेगा। लाभ प्राप्त करने के लिए तुमको इसे आचरण में लाना होगा। जो वेदान्त तुम्हारी ठण्ड (अकर्मण्यता) को दूर नहीं करता जो आपको प्रसन्नता प्रदान नहीं करता जो आपके बोझ को नहीं उतारता, तो ऐसे वेदान्त को ठुकरा कर अलग कर दो। सच्चा वेदान्त बतलाता है कि आपका कर्म सफल हो इसके लिये आपको उसके परिणाम पर ध्यान नहीं देना चाहिए, आपको उसके फल की परवाह नहीं करनी चाहिए। साधन और उद्देश्य को मिलाकर एक कर दो तो काम ही आपका उद्देश्य या लक्ष्य बन जायगा। बस, परिणाम और फल की परवाह मत करो। सफलता अथवा असफलता मेरे लिए कुछ नहीं है, मुझे काम जरूर करना होगा, क्योंकि मुझे काम प्यारा लगता है, मुझे केवल काम के लिए ही काम करना चाहिए। काम करना मेरा उद्देश्य है, कर्म में प्रवृत्त रहना ही मेरा जीवन है। वही मेरा स्वरूप, मेरी असली आत्मा और शक्ति है। अतः मुझे काम करना ही होगा।
-स्वामी रामतीर्थ
*समाप्त*
मैं चला शंख अपना बजाता हुआ।
मैं चला तो प्रभाती सुनाता हुआ॥
मैं चला तो जमीं आसमाँ हिल गये।
मैं चला शैल भी धूलि में मिल गये॥
मैं चला सिन्धु में आ गया ज्वार-सा
मैं चला शूल भी फूल बन खिल गये॥
मैं चला आँधियों को उठाता हुआ।
मैं चला बिजलियों को गिराता हुआ॥
मैं चला चाँद सूरज सितारे चले।
मैं चला सृष्टि के कार्य सारे चले॥
मैं चला साथ में चल पड़ा विश्व भी।
मैं चला लोग मेरे सहारे चले॥
मैं चला राह अपनी बनाता हुआ।
मैं चला राह जग को दिखाता हुआ॥
मैं चला चल पड़े सुप्त पाषाण भी।
मैं चला, तो सजग से हुये प्राण भी॥
मैं चला, पा गये शक्ति म्रियमाण भी।
मैं चला तो चले भाग्य-भगवान भी॥
मैं चला राष्ट्र सोया जगाता हुआ।
मैं चला जागरण - गीत गाता हुआ॥
-विनोद रस्तोगी
(श्री ज्ञानानन्द ब्रह्मचारी)
यह संसार भगवान द्वारा विनिर्मित और उसी से ओत-प्रोत है। यहाँ जो कुछ श्रेष्ठता दिखाई पड़ती है वह सब भगवान की ही विभूति है। जीव ईश्वर का ही पुत्र-अंश है। उसमें जो कुछ तेज और ऐश्वर्य दिखाई पड़ता है वह ईश्वरी या अंशों की अधिकता के कारण ही उपलब्ध होता है। आत्मा की प्रगति, उन्नति और विभूति की संभावना भगवन् के सान्निध्य में ही संभव होती है।
समस्त सद्गुणों का केन्द्र परमात्मा है। जिस प्रकार पृथ्वी पर ताप और प्रकाश सूर्य से ही आता है, उसी प्रकार मनुष्य को आध्यात्मिक श्रेष्ठताएँ और विभूतियाँ परमात्मा से ही प्राप्त होती हैं। इस संसार में समस्त दुःख, पापों के ही परिणाम हैं। अथवा मनुष्य अपने किये पापों का दण्ड भुगतता है या फिर दूसरों के पापों की लपेट में आ जाता है। दोनों प्रकार के दुःखों का कारण पाप ही होते हैं। यदि पापों को घटाया जा सके तो मानव जाति के दुःखों में निश्चय कही कमी हो सकती है। कुविचारों और कुकर्मों पर नियंत्रण धर्म-बुद्धि के विकसित होने से ही संभव होता है और यह धर्म-बुद्धि परमात्मा पर सच्चे मन से विश्वास रखने से उत्पन्न होती है। जो निष्पक्ष, न्यायकारी परमात्मा को घट-घटवासी और सर्वव्यापी समझेगा उसे सर्वत्र ईश्वर ही उपस्थित दिखाई पड़ेगा। ऐसी दशा में पाप करने का साहस खड़ा देख कर तो दुस्साहसी चोर भी अपनी हरकतें बन्द कर देता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति परमात्मा को निष्ठुरतापूर्वक कर्म फल देने वाला और सर्वव्यापी समझ लेना वह आस्तिक व्यक्ति पाप करने की बात सोच भी कैसे सकेगा?
ईश्वर का अविश्वास ही पापों की जड़ है, इस अविश्वास से प्रेरित होकर ही मनुष्य मर्यादाओं का उल्लंघन करके स्वार्थ और अहंकार की पूर्ति के लिये स्वेच्छाचारी बन जाता है। आत्म-नियंत्रण के लिए ईश्वर-विश्वास की अनिवार्य आवश्यकता मानी गई है। व्यक्ति सदाचार और सामूहिक कर्तव्य-परायणता के पालन के लिये ईश्वरीय विश्वास के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं हो सकता। इसलिए मनीषियों ने मनुष्य के दैनिक आवश्यक कर्तव्यों ईश्वर उपासना को सबसे प्रमुख और अनिवार्य माना है। जो इसकी उपेक्षा करते हैं उनकी भर्त्सना की और उन्हें कई प्रकार के दण्डों का भय भी बताया है।
खेद है कि आज नास्तिकता की सत्यानाशी बाढ़ तेजी से बढ़ती चली जा रही है। भौतिकवाद विचारधाराओं ने यह प्रतिपादित किया है कि ईश्वर न तो आँखों से दिखाई पड़ता है और न वैज्ञानिक शालाओं की जाँच द्वारा सिद्ध होता है इसलिए उसे मानने की आवश्यकता नहीं। अति उत्साही लोग इतनी बात से बहक जाते हैं और ईश्वर की आस्था पर अविश्वास करने लगते हैं। न तो वे कर्म फल के ईश्वरीय विधान पर विश्वास करते हैं और न उपासना की कोई आवश्यकता अनुभव करते हैं।
दूसरे प्रकार के नास्तिक इनसे भी गये-बीते हैं वे अपने को आस्तिक कहते और किसी ईश्वर को मानते भी हैं पर उनका यह कल्पित ईश्वर वास्तविक ईश्वर से सर्वथा भिन्न होता है। वे समझते कि ईश्वर तो केवल पूजा-स्तुति ही चाहता है, इसे से ही वह प्रसन्न होकर मनुष्य के पापों पर ध्यान नहीं देता। पूजा करने वालों के समस्त पाप किस सामान्य धार्मिक कर्मकांड के कर लेने से दूर हो जाते हैं। साथ ही वे ईश्वर से यह भी आशा रखते हैं कि जरा से पाठ, पूजन के बदले, बिना उनके योग्यता, पुरुषार्थ और लगन की जाँच किये वह मनमाना वरदान दे सकता है और उनके समस्त कामनाओं की पूर्ति कर सकता है। ये लोग ऐसा भी सोचते हैं कि साधु, ब्राह्मण परमात्मा के अधिक निकट हैं इसलिये यदि उन्हें दान दक्षिणा देकर प्रसन्न कर लिया जाय तो अपनी तगड़ी सिफारिश परमात्मा के यहाँ पहुँच सकती है और फिर तुरन्त ही मनमाने वरदान पाने और पाप के दण्ड से बचने की सुविधा हो सकती है। हम देखते हैं कि आजकल नाममात्र की आस्तिकता इसी विडम्बना की धुरी पर घूम रही है।
यह प्रच्छन्न नास्तिकता दिखाई तो ईश्वर-विश्वास जैसी ही पड़ती है, पर इससे लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। आस्तिकता का असली लाभ पाप से भय उत्पन्न करना है। इसके विपरीत जिस मान्यता के अनुसार दस-पाँच मिनट में पूरे हो सकने वाले कर्मकाण्डों द्वारा ही समस्त पापों का फल नष्ट हो सकने का आश्वासन दिया गया हो, उससे तो उलटे पाप के प्रति निर्भयता ही बढ़ेगी। जब पाप-फल से बच सकना इतना सरल मान लिया गया तो दुष्कर्मों द्वारा प्राप्त होने वाले आकर्षणों को छोड़ना कौन पसन्द करेगा? ऐसी मान्यता से प्रभावित होकर मध्यकालीन राजाओं और सरदारों ने बर्बर अत्याचार और अनैतिक आचरण करने के साथ-साथ पूजा-पाठ के भी बड़े-बड़े आयोजन किये थे। उन्होंने मंदिर भी बनवाये और भगवान को प्रसन्न करने वाले उत्सव आदि भी किये। पंडितों और ब्राह्मणों को कथा-भजन करने के लिये वृत्तियां भी दीं। सम्भवतः वे यही समझते थे कि उनका पहाड़ के बराबर अनैतिकता का कार्य-क्रम इस प्रकार धन द्वारा रचाई पूजा-पाठ की धूमधाम के पीछे छिप जायेगा। पंडितों और पुजारियों ने अपनी आजीविका की दृष्टि से ऐसे आश्वासन भी गढ़कर रख दिये, जिससे कुमार्गगामी व्यक्ति थोड़ा बहुत दान-पुण्य करते रहने तो तत्पर रहें। दान पुण्य की परिभाषा भी इन लोगों ने बड़े विचित्र ढंग से की कि केवल ब्राह्मण वंश में उत्पन्न हुये व्यक्ति को जो कुछ दिया जायेगा, वह अवश्य पुण्य माना जायेगा।
विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि इस प्रकार की अज्ञानमूलक धारणा व्यक्ति और समाज के लिये हानिकारक परिणाम ही उपस्थित कर सकती है। पापों के दण्ड से बच निकलने का आश्वासन पाकर लोग चरित्र गठन की उपेक्षा करने लगे, पापों का भय जाता रहा। ऐसी अनेक कथा-कहानियाँ गढ़ी गई जिनमें निकृष्ट से निकृष्ट कर्म जीवन भर करते रहने वाले व्यक्ति केवल एक बार अनजाने धोखे से-’नारायण ‘ का नाम लेने से मुक्त हो गये। इन कथाओं से सत्कर्मों की व्यर्थता सिद्ध होती है और प्रतीत होने लगता है कि जीवन-शोधन के लिये श्रम और त्याग करने की अपेक्षा थोड़ा-बहुत पूजा पाठ कर लेना ही अधिक सुविधाजनक है। ऐसी शिक्षा देने वाला अध्यात्म वस्तुतः अपने लक्ष्य से ही भ्रष्ट हो जाता है। आस्तिकता का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को सदाचारी और कर्तव्य परायण बनाना है। यदि इस बात को भूलकर लोग देवताओं को माँस, मदिरा या मिष्ठान्न की रिश्वत देकर मनमाने लाभ प्राप्त करने की बात सोचने लगें तो यह माना जायेगा कि उन्होंने ईश्वर को भी रिश्वत लेकर उल्टा-सीधा काम करने वाला मान लिया है। फिर तप, त्याग, संयम, धर्म, कर्तव्य आदि के कष्टसाध्य मार्ग की उपयोगिता क्या रह जायगी? जब ईश्वर अपनी प्रतिमा के दर्शन करने वाले, स्तुति गाने वाले और भोग लगाने वाले पर ही प्रसन्न होने लगा तो फिर यही मार्ग हर किसी को पसन्द आने लगेगा। फिर कोई क्यों उस संदर्भ के नाम पर कष्ट सहने को प्रस्तुत होगा जिसमें सर्वस्व त्याग और तिल-तिल कर जलने की अग्निपरीक्षा में होकर गुजरना पड़ता है।
इन्हीं मान्यताओं का फल आज हम यह देख रहे हैं कि पूजा-अर्चना में बहुत धन और समय खर्च करने वाले व्यक्ति भी चारित्रिक दृष्टि से बहुत गये गुजरे देखे जाते हैं। मन्दिर, झाँकी भजन-कीर्तन में बहुत उत्साह दिखाने वाले भी गुप्त-प्रकट रूप से बुरी तरह पाप पंक में डूबे रहते हैं। ‘जो कुछ होता है ईश्वर की इच्छा से ही होता है’- ऐसा मानने वाले आलसी और अकर्मण्य बनकर अपनी हीन स्थिति का दोष ईश्वर को लगाते रहते हैं और प्रगति के लिये कि यह प्रतीक्षा करते रहते हैं कि जब कभी ईश्वर की इच्छा हो जायगी तभी अनायास सब कुछ हो जायेगा। ऐसे लोग अनीति और अत्याचारों को भी ईश्वरेच्छा मान कर चुपचाप सहते रहते हैं। वे किसी दीन दुखी और निराश्रित की सेवा सहायता करने से भी इसीलिये विमुख रहते हैं कि इससे ईश्वर के इच्छा का विरोध होगा। इन्हीं मान्यताओं के आधार पर एक हजार वर्ष तक हम विदेशी आक्रमणकारियों के बर्बर अत्याचार सिर झुकाये सहते रहे। सोमनाथ मंदिर की अपार संपत्ति लुटते देखकर हमें भगवान की प्रार्थना करने के सिवाय कर्तव्यपालन का कोई अन्य मार्ग न सूझा। आस्तिकता का असली स्वरूप भुला कर जो अविवेकपूर्ण धारण हमने अपनाई, उसके कारण हम वस्तुतः ईश्वर से अधिकाधिक दूर होते गये आस्तिकता के नाम पर हमने दिखावटी पूजापाठ का जो भाव अपनाया उससे हमने पाया कुछ नहीं, केवल खोया ही खोया।
ऐसे विषम समय में तत्वदर्शी लोग भारी पीड़ा अनुभव कर रहे थे कि क्या इन काली घटाओं की चीर कर फिर कभी सच्ची आस्तिकता का सूर्य उदय होगा? यह प्रार्थना ईश्वर ने सुनी और वह दिन फिर सामने आया जिसमें जन साधारण को आस्तिकता का सच्चा स्वरूप समझने का अवसर मिल सके। युग-निर्माण-योजना को आस्तिकता के पुनरुद्धार का आन्दोलन ही कहना चाहिये। कहते हैं कि किसी समय नारद जी ने भक्ति का घर-घर प्रचार करने का व्रत लिया था और वे अथक श्रम करके सारी पृथ्वी पर अनवरत भ्रमण करते हुये समस्त नर-नारियों को ईश्वर उपासक बनाने में जुट गये थे। युग-निर्माण-योजना के जन्मदाता ने भी आस्तिकता की प्रेरणा करोड़ों आत्माओं तक पहुँचाई हैं और 24 लाख से अधिक व्यक्ति गायत्री के नैष्ठिक उपासक बनाये हैं। अब उनका प्रयत्न यही हैं कि घर-घर में आस्तिकता की आस्था फलती-फूलती नजर आवे। युग निर्माण योजना का प्रथम लक्ष्य आस्तिकता का प्रसार करना ही है। समस्त हिन्दू-जाति को उसकी संस्कृति के उद्गम केन्द्र से परिचित करने और गायत्री के माध्यम से भावनात्मक एकता उत्पन्न करने के लिये जो प्रयत्न किया जा रहा है उससे जातीय एकता का एक नवीन अरुणोदय होगा और हम चारों वेदों की जननी महाशक्ति गायत्री के साथ-साथ उसके 24 अक्षरों में सन्निहित अपनी महान संस्कृति को भी समझ सकेंगे। जातीय उत्कर्ष की दृष्टि से निश्चय ही यह एक बहुत बड़ा काम होगा।
युग-निर्माण योजना के अंतर्गत जिस आस्तिकता का प्रसार किया जा रहा है उसमें जप, तप, हवन, पूजन, भजन, ध्यान, कथा, कीर्तन, तीर्थ, पाठ, व्रत, अनुष्ठान आदि के लिये परिपूर्ण स्थान है, पर साथ ही समस्त शक्ति लगा कर हर आस्तिक के मन में यह संस्कार जमाये जा रहे हैं कि ईश्वर को निष्पक्ष, न्यायकारी और घट-घटवासी समझते हुये कुविचारों और दुष्कर्मों से डरें और उनसे बचने का प्रयत्न करें। प्रत्येक प्राणी में ईश्वर को समाया हुआ समझ कर उसके साथ सज्जनतापूर्ण सद्व्यवहार किया जाय। कर्तव्यपालन को ईश्वर की प्रसन्नता का सबसे बड़ा उपहार मानें और प्रभु की इस सुरम्य वाटिका-पृथ्वी में अधिकाधिक सुख-शान्ति विकसित करने के लिये एक ईमानदार माली की तरह सचेष्ट बना रहे। अपना अन्तःकरण इतना निर्मल का प्रकाश स्वयमेव झिलमिलाने लगे। प्रार्थना केवल सद्बुद्धि, सद्गुण, सद्भावना, सहनशीलता, पुरुषार्थ, धैर्य, साहस और सहिष्णुता के लिये आवश्यक क्षमता प्राप्त करने की ही की जाय। परिस्थितियों को सुलझाने और अभावों की पूर्ति के लिये जो साधन हमें मिले हुये हैं उन्हें ही प्रयोग में लाया जाय और संघर्ष का जीवन हँसते-खेलते बिताते हुये मन को संतुलित रखा जाय।
ये ही सब आस्तिकता के सच्चे लक्षण हैं। युगनिर्माण योजना का प्रयत्न यह है कि इन लक्षणों से युक्त भक्ति और पूजा की भावना को जन-मानस में स्थान मिले और सच्ची आस्तिकता के अपनाने के लिये मानव मात्र का अन्तःकरण उमंगने लगे।
मनुष्य का कल्याण परमपिता परमात्मा की शरण में जाने से ही हो सकता है। असुरता के चंगुल से छुड़ा कर देवत्व की ओर अग्रसर होने की प्रवृत्ति की साधना कहलाती है। साधना से हमारा जीवन सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत भी बनता जाता है। पर यह तभी संभव होता है जब हम जड़-विज्ञान तथा स्वार्थपूर्ण दिखावटी आस्तिकता से बचकर सच्चे स्वरूप में ईश्वर की उपासना करेंगे। युग-निर्माण योजना मानव-मात्र के हृदय में सच्ची आस्तिकता उत्पन्न करके उनका हित साधन करने के लिये ही चलाई गई है।
(श्री सोमाभाई डाह्याभाई पंड्या)
तवर्षडडडडडड की सबसे विशेषता और महत्ता उसका आध्यात्मवादी दृष्टिकोण है। अतीत काल से अब तक हमारे देश का गौरव इसी आधार पर प्रकाशवान रहा है। एक समय था जब यहाँ के निवासी तैंतीस कोटि देवताओं के नाम से पुकारे जाते थे, ज्ञान और विज्ञान की दृष्टि से उन्हें जगद्गुरु की पदवी प्राप्त हुई थी। व्यवस्था दूरदर्शिता और प्रतिभा का स्तर अत्यन्त ऊँचा होने के कारण चक्रवर्ती शासन का गुरुतर भार उन्हीं के कंधों पर डाला जाता था। धन, विद्या, चरित्र सब दृष्टियों से यह देश नररत्नों की खान माना जाता था। इस सब का कारण यहाँ की आध्यात्मिक विशेषता ही थी।
अध्यात्म-तत्वज्ञान को पारस माना गया है, क्योंकि उसका स्पर्श होते ही लोहे के समान तुच्छ श्रेणी के व्यक्तित्व भी सोने के समान बहुमूल्य और आकर्षक बन जाते हैं। अध्यात्म को कल्पवृक्ष कहा गया है क्योंकि उस दृष्टिकोण के प्राप्त होते ही मनुष्य आप्तकाम बन जाता है। अनावश्यक तृष्णाओं को वह मस्तिष्क में से कूड़े-कचरे की तरह बुहार कर बाहर फेंक देता है और जो कामनाएं आवश्यक होती हैं उन्हें तत्परता, पुरुषार्थ और लगन के साथ पूरा करने में जुट जाता है। इस प्रकार कार्य-संलग्न हुये व्यक्ति के लिये असफलता नाम की कोई वस्तु बाकी नहीं रहती। आलस्य और प्रमाद ही असफलता के जनक हैं, इन दो शत्रुओं को परास्त कर देने के बाद मनुष्य को आप्त-काम होने में देर नहीं लगती। उसकी कोई कामना अधूरी नहीं रहती।
अध्यात्म का आधार संयम है और संयमी मनुष्य के लिये शारीरिक अस्वास्थ्य का प्रश्न ही नहीं उठता। अध्यात्म का मूल मंत्र प्रेम है। जो दूसरों के साथ आत्मीयता, उदारता, सेवा, सहिष्णुता और मधुरता का व्यवहार करेगा उसके लिये दूसरों का सहयोग, सद्भाव एवं सौजन्य मिलेगा ही। सर्वत्र उसे स्नेही और सज्जन ही भरे हुये मिलेंगे। अध्यात्म तत्वज्ञान आत्म-शोधन पर अवलम्बित है। जो अपने दोष और त्रुटियों को समझ लेगा और उन्हें सुधारने के लिये सचेष्ट रहेगा उस व्यक्ति के सामने न तो कोई समस्या रहेगी और न उलझन। जब मनुष्य अपने ही दोष, दुर्गुण, कुविचार, कुसंस्कारों को रंगीन चश्मे की तरह आँख पर धारण किये रहता है तो सर्वत्र उसे नरक दिखाई पड़ता है। पर जब वह अपने को सुधारने और बदलने के लिये प्रयत्नशील होता है तो बाहरी समस्याएँ और परिस्थितियाँ अपने आप ही सरल हो जाती हैं। इस प्रकार आध्यात्मिक विचारधारा मनुष्य को स्वर्गीय जीवन की आनन्दमय अनुभूति कराती रहती है और अंततः आत्मा-परमात्मा को प्राप्त करने का लक्ष्य भी उसी मार्ग पर चलते हुये प्राप्त हो जाता है।
जीवन का प्रत्येक क्षेत्र जिसके प्रकाश से दिव्य हो उठता है, उसे अध्यात्म की शिक्षा प्राप्त करने के लिये संसार के कोने-कोने से जिज्ञासु लोग यहाँ आते थे। नालंदा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा-दीक्षा के महान केन्द्र बने हुये थे। वहाँ प्रत्येक लौकिक विषय का शिक्षण होता था, पर दीक्षा का आधार अध्यात्म ही रहता था। उनमें शिक्षा प्राप्त करके निकलने वाले प्रत्येक छात्र का जीवन अध्यात्मवादी दृष्टिकोण में ढला रहता था। वे छात्र जहाँ कहीं भी जाते थे अपने उज्ज्वल चरित्र और सफल जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करके अध्यात्म की विजय पताका फहराते थे। जब तक वह परम्परा यथावत चलती रही तब तक भारत संसार का प्रत्येक क्षेत्र में नेतृत्व भी करता रहा और सुख-शान्ति की अजस्र धारा यहाँ निर्बाध गति से बहती रही।
भारत की महान आध्यात्मिक सम्पदा आज भी शास्त्रों और ग्रन्थों में ज्यों की त्यों मौजूद है। वैसे हम आज भी अध्यात्मवादी कहलाते हैं पर असलियत कुछ और ही हो गई है। जिस प्रकार असली के स्थान पर हर चीज नकली चल पड़ी है, वही दशा अध्यात्म की भी हुई है। जो तत्वज्ञान मनुष्य की आन्तरिक दुर्बलताओं को हटाने और महानताओं को जागृत करने का प्रधान साधन था, वही अब लोगों को आलसी, कर्तव्यशून्य और दीन-दुर्बल बनाने का निमित्त बना हुआ है। स्वार्थी लोगों ने भोली जनता को अज्ञान में फंसाये रखने और ठगते रहने का जो कुचक्र चलाया आज उसी को अध्यात्म समझा जाता है। गुरु लोग उसी के आधार पर अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं और भोले भाले अविवेकी लोग उसी टंट-घंट को सब कुछ मानकर स्वर्ग और मुक्ति के सपने देखते रहते हैं।
वर्तमान समय में प्रचलित आध्यात्मिक सिद्धान्त बड़े विचित्र हैं। उनके अनुसार ‘संसार मिथ्या है, इसके लिये किसी से मोह-माया न रख कर केवल भजन करते रहना चाहिये।’ ‘जो भाग्य में लिखा है वही होगा, मनुष्य उसे बदल नहीं सकता। इसलिये ज्यादा हाथ पैर पीटना व्यर्थ है।”देवताओं की प्रसन्नता अप्रसन्नता या सिद्ध महात्माओं के आशीर्वाद से उन्नति होती है, मनुष्य स्वयं कुछ नहीं कर सकता। लौकिक समस्याओं पर विचार करना माया में पड़ना है, जो कुछ हो रहा है सब भगवान की इच्छा है, उसकी इच्छा में हम क्यों बाधक बनें। अपनी मुक्ति की बात ही हमें सोचनी चाहिए, दुनिया से हमें क्या मतलब।’ ऐसी विचारधारा में फँसा हुआ व्यक्ति दिन पर दिन स्वार्थी और निराशा बनता जाता है। कर्तव्यों के प्रति उपेक्षा दिखलाता रहता है। ऐसे व्यक्ति हर क्षेत्र में असफल होते हैं।
देखा जाता है कि अध्यात्म की चर्चा करने वाले व्यक्तियों में से अधिकाँश को बहुत कुछ पूजा-पाठ करने पर भी-जीवन के हर क्षेत्र में असफलता मिलती है। कारण यही है कि ऐसे लोग अध्यात्म के सबसे प्रधान अंग जीवन-विकास की उपेक्षा किया करते हैं और केवल जप या पाठ को ही सब कुछ मान लेते हैं। ऐसा एकाँगी तत्वदर्शन किया एक व्यक्ति को कुछ शाँति या संतोष भले ही कर सके पर समस्त समाज को वह किसी भी रूप में स्पर्श नहीं कर सकता, और जब तक समाज का उत्थान न हो तब तक किसी एक व्यक्ति का स्थायी कल्याण हो सकना कैसे संभव हो सकता है? जिसमें गुण, कर्म स्वभाव के विकास का, जीवन की समस्याओं का ठीक प्रकार समाधान करने का विधान न पाया जाय वह तत्वज्ञान न उपयोगी सिद्ध हो सकता है और न प्रतिष्ठा प्राप्त कर सकता है। प्राचीन काल में हमारी आध्यात्मिक विचारधारा मानव जीवन के हर पहलू को विकसित करने की क्षमता रखती थी, इसी से उसे अपनाने वाले भरपूर लाभान्वित हुये और जहाँ कहीं वे गये वहीं उनकी प्रशंसा और प्रतिष्ठा हुई।
पूजा, उपासना का आध्यात्मवाद में प्रमुख स्थान है, पर इसके साथ ही यह भी साधना का अनिवार्य अंग माना जाता है कि मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट और आदर्श बनावे। जीवन के हर क्षेत्र में आध्यात्मवाद का समावेश करे ऐसी जिन्दगी जिये जैसे कि मानव शरीर-धारी को जीनी चाहिए। पूजा को औषधि और जीवन विकास की परम्पराओं को पथ्य, परिचर्या माना गया है। औषधि तभी लाभ करेगी जब परहेज भी ठीक रखा जाय। चिकित्सक के बतलाये सारे नियमों का उल्लंघन करते रहने पर भी यदि कोई आशा करे कि औषधि सेवन मात्र से बीमारी दूर हो जाय तो यह उसकी गलती ही मानी जायगी। इसी प्रकार जीवन - विकास, समाज-कल्याण के सारे प्रयत्नों की उपेक्षा करके जो भजन मात्र से लक्ष्य की प्राप्ति चाहता है उसे भूला-भटका ही माना जायेगा। किसी धर्म ग्रंथ में यदि पूजा, भजन का वर्णन बढ़ा-चढ़ाकर अलंकारिक भाषा में लिख दिया गया है कि अमुक पूजा से सब कुछ प्राप्त हो जाता है, तो उसे मनुष्यों की श्रद्धा बढ़ाने के उद्देश्य से अलंकारिक उक्ति ही मानना चाहिये। सच्चे भक्त-जनों में भक्ति-भावना के साथ-साथ कर्तव्यपरायणता, परोपकार, उदारता आदि की प्रवृत्तियां भी पूर्ण मात्रा में होती हैं और इन्हीं के आधार पर उनको दैवी शक्तियाँ और जीवन की चरम सफलता प्राप्त होती है।
सच्चरित्रता, सदाचार, संयम, परमार्थ आदि गुणों पर आधार रखने वाला अध्यात्म ही सच्चा अध्यात्म कहा जा सकता है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का शोधन और जीवन विकास के उच्च गुणों का अभ्यास करना ही साधना है। भगवान को घट-घटवासी और न्यायकारी मान कर पापों से हर घड़ी बचते रहना ही सच्ची भक्ति है। प्राणी मात्र के हित की दृष्टि से उदारता, सेवा सहानुभूति, मधुरता का व्यवहार करना ही परमार्थ का सार है। सच्चाई, ईमानदारी, सज्जनता, सौजन्य आदि गुणों के बिना कोई मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता। जो अपने समय, धन, श्रम, बुद्धि को अन्य लोगों की सेवा में जितना अधिक लगाता है वस्तुतः वह उतना ही बड़ा महात्मा माना जा सकता है। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से जिसका जीवन जितना ओत-प्रोत है उसे उतना ही ईश्वर के निकट समझना चाहिए। सन्मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति को स्वयमेव जो आत्मबल प्राप्त होता है वह किसी योगाभ्यासी की कठिन साधना से कम महत्वपूर्ण नहीं होता। वास्तविक अध्यात्म का स्वरूप यही है और इसी को जीवन में धारण करने वाला व्यक्ति अपना कल्याण करने के साथ दूसरे अनेकों को प्रकाश प्रदान करके उन्हें भी ऊंचा उठाने में सहायक बनता है।
इस समय इस बात की सबसे अधिक आवश्यकता है कि देशवासियों को अध्यात्म का सच्चा स्वरूप बतलाया जाय। उसका महत्व समझाया जाय और लोगों की विचार धारा को उस तरफ मोड़ा जाय। इस महान तत्व को केवल कथावार्ता का विषय न समझ कर जन-जीवन में व्यवहारिक रूप से उसका समावेश होना परमावश्यक है। मनुष्य का अन्तःकरण बदलते ही उसकी दुनिया भी बदल जाती है। जब संसार की परिस्थितियाँ जैसी विकृत हो उठी हैं उनका परिवर्तन होना अनिवार्य है अन्यथा हम दिन प्रति दिन पतन और कष्ट के खड्डे में ही गिरते जायेंगे। यह परिवर्तन बाहरी हेरफेर से संभव नहीं हो सकता वरन् उसके लिये मनुष्य की अन्तः चेतना को ही प्रभावित किया जाना चाहिये। इस प्रकार के बदलाव से ही हम सब रोग, शोक, क्लेश, कलह पाप-ताप, आधिव्याधि से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकेंगे। इसके अतिरिक्त अन्य कोई उपाय ऐसा नहीं है जिससे संसार भर में फैली अशान्ति मिटकर लोगों को सुख शान्ति का दर्शन हो सके।
युग-निर्माण योजना को मैंने अच्छी तरह पढ़ा और समझा है। उसकी पृष्ठ भूमि में जो रहस्यमय शक्तियाँ काम कर रही हैं उनका भी कुछ परिचय मुझे प्राप्त हो चुका है। इसलिये मुझे इस बात से बड़ी प्रसन्नता होती है कि जनता को सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी बनाने का एक ठोस प्रयत्न किया जा रहा है। इसके द्वारा मनुष्यों के अनेक कष्ट, संताप तो मिट ही सकेंगे, पर सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भारत की महान निधि ‘अध्यात्म’ का सच्चा स्वरूप समझने और उसे अपने व्यवहारिक जीवन में स्थान देने का अलभ्य अवसर सर्व साधारण को प्राप्त हो सकेगा।
भारतवर्ष यदि अपनी समस्त कठिनाइयों को हल करके संसार का मार्गदर्शक बनना चाहे तो उसका एक मात्र आधार अध्यात्म ही है। इसी के द्वारा हमारा भूत काल महान बन सका था और इसी से भविष्य के उज्ज्वल बनने की आशा भी की जा सकती है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम व्यवहारिक अध्यात्म का स्वरूप सर्व साधारण को समझ सकें और उसके प्रत्यक्ष लाभों से लोगों को अवगत करा दें।
अशान्ति के दावानल में जलता हुआ समस्त संसार आज अध्यात्म के अमृत के लिये तरस रहा है। हमें आगे बढ़कर इसी महान तत्व ज्ञान का सच्चा स्वरूप प्रकट करने में अपनी शक्ति को लगाना है। युग-निर्माण योजना अध्यात्मवाद को जन-जन के जीवन में प्रविष्ट करने की व्यवहारिक विधि है। जितनी गहराई तक इसकी संभावनाओं पर विचार किया जाता है उतनी ही अधिक आशा बँधती है और लगता है कि यदि हम इस मार्ग पर दृढ़तापूर्वक चल सकें तो प्राचीन काल की तरह भारत पुनः ‘स्वर्ग’ कहलाने का गौरव प्राप्त कर सकेगा और संसार के अन्य भागों के निवासी यहाँ से सन्मार्ग पर चलने की शिक्षा प्राप्त करके इसे पुनः जगद्गुरु का सम्मान प्रदान करेंगे। खोये हुये अतीत को पुनः वापिस लाने का यह आध्यात्मिक प्रयत्न हमारे लिये आशा की किरण बनकर आया है और उसका हमें सादर अभिनन्दन करना चाहिये।
अपने शिष्यों को साथ लेकर महर्षि बोधायन एक बार बन विहार के लिए गये । मध्याह्न होते-होते वे लोग थक गये। वृक्षों की सघन छाया में विश्राम करने लगे तो सभी को नींद आ गई।
दिन ढल चुका था। महर्षि जगे और उनसे अपने सब शिष्यों को पुकारा। जागते, सोते और नींद ने सभी शिष्य गुरुदेव की आज्ञा सुनते ही उठ बैठे। पर गार्ग्य ज्यों का त्यों अब तक पड़ा रहा।
महर्षि को आश्चर्य हुआ और गार्ग्य के पास जाकर धीरे-धीरे उसे जगाने लगे। पर वह तो जागा पड़ा था। गार्ग्य ने कहा-भगवन्, एक महा भयंकर सर्प मेरे पैरों में लिपटा सोया पड़ा है। कुछ देर में जागेगा तब अपने रास्ते चला जायेगा। इतनी देर धैर्यपूर्वक मेरा अविचल पड़ा रहना ही उचित है।
गार्ग्य ज्यों का त्यों पड़ा रहा। दो घड़ी के बाद सर्प की नींद खुली और वह पास की गाड़ी की ओर अपने बिल में चला गया।
शिष्य उठा तो महर्षि ने उसे छाती से लगा लिया और उसके शील की भूरि-भूमि प्रशंसा की। दूसरे शिष्य मैत्रायण ने कहा-यह तो साहस का कार्य था, गुरु देव। आप गार्ग्य की साहसी क्यों नहीं कहते, शीलवान् क्यों कहते हैं?
महर्षि के होठों पर एक हलकी मुस्कान दौड़ गई। उनने कहा-भद्र। शील से ही साहस की शोभा है। जो शील के लिए साहस किया जाता है वही सराहनीय है। दुःशील के लिए दुस्साहस करने वाले निन्दनीय होते हैं। सराहा वही साहस जाता है जो विवेक, धैर्य और सदाचरण से संयुक्त हो।
(श्री रविशंकर करुणाशंकर औदीच्य)
आचार्य जी का विकसित जीवन गायत्री उपासना के साथ आरंभ होता है। अधेड़ आयु होने तक उनने अपना अधिकाँश समय इसी कार्य में लगाया है। उनके जीवन का विश्लेषण करें तो गायत्री उपासना गायत्री तत्व ज्ञान का अध्ययन, गायत्री उपासकों को खोजना और उनके अनुभवों का लाभ प्राप्त करना ही प्रमुख कार्य प्रतीत होते हैं। चालीस वर्ष के आयु के पीछे उनने आवश्यक आत्म-बल और आत्म-विश्वास प्राप्त करने के पश्चात गायत्री प्रचार आरम्भ किया और थोड़े ही वर्षों में उसे उच्च शिखर तक पहुँचा दिया। करोड़ों को उन्होंने यह तत्वज्ञान सिखाया और समझाया, लाखों ने उनके बताये मार्ग पर निष्ठापूर्वक कदम उठाये और अब तक वे उसी उपासनाक्रम को श्रद्धापूर्वक अपनाये हुए हैं। इस प्रकार विहंगम दृष्टि से देखा जाय तो आचार्य जी का जीवन गायत्रीमय ही दीखता है।
पिछले 15 वर्षों में अनेक बार मेरा उनसे मिलना हुआ। गायत्री उपासना में मेरी अत्यधिक श्रद्धा है, इसलिए तद्विषयक अपनी जिज्ञासाओं के समाधान के लिए मैं उन्हीं के पास दौड़ता हूँ। अन्यान्य बातों के साथ एक बात पर मैं सदा ही उनसे चर्चा करता हूँ कि- गायत्री उपासना का जो महात्म्य बताया जाता है, उसके द्वारा अनेक कामनाओं की पूर्ति, प्रस्तुत कठिनाइयों का समाधान, उज्ज्वल भविष्य की संभावना, पाप निवारण और परलोक की सद्गति का जो लाभ मिलना प्रतिपादित किया जाता है, वह कहाँ तक ठीक? इस संबंध में उनने अपने ग्रन्थों में बहुत कुछ लिखा है। मौखिक रूप से वे इतना कहते रहते थे- ‘यह असत्य नहीं, हम असत्य को प्रतिपादित नहीं करते। उपासना के द्वारा व्यक्ति का अन्तःकरण निर्मल बनता है और उसमें सुसंस्कारों के बीज आसानी से बोये तथा बढ़ाये जा सकते हैं। सुसंस्कारों, सत्कर्मों और सद्भावनाओं का फल मनुष्य के लिए सब प्रकार श्रेयस्कर ही होता है। इसलिए यदि गायत्री उपासक का भविष्य उज्ज्वल बने तो इसमें आश्चर्य की बात ही क्या है?
फिर भी मेरा समाधान न हो पा रहा था, क्योंकि मैं देखता हूँ कि कई व्यक्ति उपासना तो बहुत करते हैं पर उनमें मानवीय गुण निकृष्ट कोटि के ही बने रहते हैं। ऐसी दशा में यह कैसे माना जाय कि उनका भविष्य उज्ज्वल बनेगा। उपासना तो वही सार्थक मानी जा सकती है जो मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव को उत्कृष्ट बना सके। उत्कृष्टता के फलस्वरूप ही वह प्रतिभा और क्षमता प्राप्त होनी संभव है जिसके द्वारा उन्नति का सुयोग मिले, अनिष्ट हटे और जन-साधारण का स्नेह, विश्वास प्राप्त हो। उन्नति इन्हीं बातों पर निर्भर है। लोक और परलोक की सुख शान्ति का आधार भी यही तथ्य है। यदि यह स्थिति प्राप्त न हुई तो कोई व्यक्ति केवल गायत्री जप से ही कैसे उन्नतिशील बनेगा? और कैसे सुख शान्ति का अधिकारी बनेगा? यह बात मेरी समझ में ठीक तरह नहीं आ रही थी। इस सम्बन्ध में मेरा मन सदा संदिग्ध ही बना रहा। जप के द्वारा ही जब सारे काम हो सकते हैं तो फिर पुरुषार्थ का क्या महत्व रह जायगा? यह संदेह मन में बार-बार उठता ही रहा।
पिछली गायत्री जयन्ती के चांद्रायण शिविर में में जब मैं मथुरा गया और आचार्य जी ने जो नया रहस्योद्घाटन किया उससे मेरा संदेह तिरोहित हो गया। उनने कहा-पिछले दस वर्षों में उपासकों की मनोभूमि को जोता गया है, अब उसमें बीज बोया जा रहा है। कुसंस्कारी व्यक्ति न तो आत्मशोधन जैसे महान् कार्य का महत्व समझता है और न उसके लिए तैयार ही होता है। मंद दृष्टि के कारण उसे अपने दोष दीखते ही नहीं, कोई दूसरा बताता है तो उसे अहंकारवश अपना अपमान मानता है। आत्मशोधन के बिना व्यक्तित्व निखरता नहीं और इस निखार के बिना वह श्रेष्ठता उत्पन्न नहीं होती जिसके फलस्वरूप जीवन का हर क्षेत्र सफलता और सुख शान्ति से परिपूर्ण होता है। गायत्री उपासना के द्वारा मिलने वाले असंख्य लाभों का मूल कारण आत्म शोधन और आत्म परिष्कार ही है। जप, ध्यान, अनुष्ठान आदि द्वारा व्यक्ति की मनोभूमि को कोमल एवं उर्वर बनाया जाता है। उसके बाद उसमें सत्प्रवृत्तियों के बीज बोये जाते हैं। अब तक जप तक की प्रक्रिया बताकर उपासकों की भूमि का शोधन किया है अब उन्हें सत्प्रवृत्तियों की प्रेरणा देकर बीज बोया जा रहा है। यह बीज सत्कर्मों के रूप में उगेगा, हरा भरा होगा, फलेगा-फूलेगा, तब स्पष्ट हो जायगा कि गायत्री महामंत्र का जो महात्म्य बताया जाता है वह सही है या गलत। ऋषियों की वाणी कभी असत्य नहीं होती। गायत्री का जो महात्म्य लिखा मिलता है उसमें एक अक्षर भी असत्य नहीं है, यह अब कुछ ही दिन में स्पष्ट हो जायेगा। जो अनुष्ठान के माध्यम से केवल सनो-भूमि जोती जाती है, उतने मात्र को ही पूर्ण गायत्री उपासना नहीं मानना चाहिए। वह तो पूर्वार्ध मात्र है। अब उपासना का उत्तरार्ध सिखाया जायगा, जिसे जीवन निर्माण की साधना कहना चाहिए। उपासना और साधना के दो पहिये होने से ही आत्मिक उन्नति का रथ अग्रसर होता है और वही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। उन्हीं के द्वारा साधक सिद्धियों और विभूतियों का अधिकारी बनता है। हमने उपासना के साथ-साथ सेवा धर्म और आत्मशोधन को भी समान महत्व दिया है। त्रिपदा गायत्री का एक पाद सेवन करने से नहीं वरन् तीनों पादों की समुचित उपासना करने से ही पूर्णता प्राप्त होती हैं।
इस प्रवचन का सार यह निकला कि जप ध्यान अनुष्ठान आदि की उपासनात्मक पूजा प्रक्रिया साधना का पूर्वार्ध है। उसकी पूर्णता आत्म-शोधन करने वाली सद्बुद्धि का व्यवहारिक जीवन में व्यवहारिक प्रयोग करने से ही संभव होता है। ऐसी उपासना जिसमें भगवान् का स्मरण करने के साथ-साथ आन्तरिक दोष दुर्गुणों का शमन एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन का प्रयत्न भी चल रहा हो निश्चय ही सर्वांगपूर्ण साधना कहलायेगी। उसका फल मनुष्य को महापुरुष बनने के रूप में ही दृष्टि गोचर होगा। जमीन जोतने मात्र से किसी किसान को भरी पूरी फसल नहीं मिल सकती। उसे बीज बोने, सींचने, निराने, रखाने, काटने आदि की झंझट की क्रियाएं भी करनी पड़ती है तब कहीं उसके कोठे अन्न से भरते है। इसी प्रकार गायत्री उपासना में जप-अनुष्ठान के अतिरिक्त आत्म निर्माण का कार्य भी करना होता है। बिजली के दोनों तार मिलने पर जैसे बल्ब जलता है उसी प्रकार उपासना के साथ जीवन साधना का समन्वय होने पर मनुष्य अनेक विभूतियों का अधिकारी बन जाता है। इस सुनिश्चित तथ्य पर किसी को संदेह की गुँजाइश नहीं हो सकती। मेरा भी संदेह उस दिन के प्रवचन को भूलकर भली प्रकार दूर हो गया।
युग निर्माण योजना का सूक्ष्म परिचय कराते हुए उस दिन आचार्य जी ने कहा था- ‘यह गायत्री उपासना का ही विकसित रूप है। छोटे छात्रों को पहले अक्षर ज्ञान कराते हैं। जब उतना याद कर लेता है तो उसे अंक गणित सिखाना आरम्भ कर दिया जाता है। एक के बाद एक सिखाने की पद्धति हमें अच्छी लगी सो अब तक जप, ध्यान अनुष्ठान रूपी अक्षर ज्ञान सिखाते रहे। अब आत्म शोधन रूपी अंक गणित सिखाया जा रहा है। पूर्ण शिक्षा में अक्षरों की भाँति अंकों को भी सीखना पड़ता है। सच्चे उपासक को जप ध्यान के अतिरिक्त सद्बुद्धि की देवी गायत्री को अपने अन्तःकरण में बिठा कर उसे निर्मल, उज्ज्वल एवं प्रकाशवान भी बनाना पड़ता है। इसे युग-निर्माण योजना की अंक गणित कहा जा सकता है। जप ध्यान का अक्षर ज्ञान सीखने के साथ-साथ उसकी भी अनिवार्य आवश्यकता थी। सो अब प्रत्येक अध्यात्म प्रेमी को शेष आधी मंजिल पूरी करने के लिए भी कटिबद्ध होना चाहिए और इस कार्यक्रम में भी उसी श्रद्धा के साथ भाग लेना चाहिए जैसे कि गायत्री उपासना के जप, अनुष्ठान वाले प्रथम चरण में भाग लिया था।”
उसी प्रकार उसी दिन आचार्य जी ने यज्ञ की सूक्ष्म विवेचना करते हुए कहा “वायु शोधन, और अन्न वनस्पति प्राणियों का परिपोषण करने वाला अग्नि होत्र आत्म विकास की पहली मंजिल है जिसमें होता को अपना अन्न, घृत, शाकल्य चरु समिधा आदि धर्म से प्राप्त हो सकने वाली वस्तुएं होमनी पड़ती हैं। इसलिए अग्नि होत्रों को द्रव्य यज्ञ भी कहते हैं। इनमें द्रव्य संग्रह करना पड़ता है, और उसी का खर्च होता है। पंडितों को भी दक्षिणा में द्रव्य ही दिया जाता है। यज्ञ का यह दक्षिणा में द्रव्य ही दिया जाता है। यज्ञ का यह स्थूल रूप है। इसलिए इसका फल भी स्वास्थ्य संवर्धन जैसा स्थूल ही होता है। यह प्राथमिक शिक्षण है। परमार्थ के लिए, लोक सेवा के लिए हमें अपनी कमाई का एक अंश खर्च करना चाहिए। इसी प्रवृत्ति को विकसित करने के लिए समारोहपूर्वक या कार्यों का आयोजन किया जाता है। उसे भावनात्मक सूक्ष्म यज्ञ अभिनय का प्राथमिक अभ्यास कह सकते हैं। जिस प्रकार अभिनेता लोग एकान्त में अभिनय का अभ्यास करके उसमें प्रवीणता प्राप्त कर लेने के उपरान्त रंग मंच पर उतरते हैं उसी प्रकार अग्नि होत्र का द्रव्य यज्ञ कर लेने के बाद जब लोक हित के लिए एक सीमा तक स्वार्थ त्याग का अभ्यास हो जाता है तब अध्यात्म मार्ग का पथिक अपना समय, बुद्धि,
भावना और श्रद्धा को जनता जनार्दन की सेवा में अर्पण करने के लिए भली प्रकार अग्रसर होता है, यहाँ समग्र यज्ञ कहला सकता है। यही सर्वांगपूर्ण है और इसी का प्रतिफल वह होता है जो यज्ञों के महात्म्य का प्रतिपादन करते हुए धर्मशास्त्रों विस्तारपूर्वक बताया गया है।
युग निर्माण योजना का पूरा कार्यक्रम परमार्थ पूर्ण सेवा कार्यों से भरा हुआ है। इन 108 कार्यक्रमों को 108 कुण्डों का यज्ञ कह सकते हैं। आचार्य जी ने पहला गायत्री यज्ञ 108 कुण्डों का गायत्री तपोभूमि में किया था। उसमें साधक अपने-अपने उपयुक्त कुण्ड पर बैठे और होता बने थे। यह दूसरा गायत्री यज्ञ जो अब युग-निर्माण योजना के नाम से आरंभ किया गया है अधिक महत्वपूर्ण, अधिक शक्तिशाली है। उसमें बैठने वालो को घी सामग्री आदि की आहुतियाँ देनी पड़ती थीं, इसमें समय रूपी घृत और भावना रूपी सामग्री होमनी पड़ेगी। जिस प्रकार जप अनुष्ठान के बाद आचार्य जी ने गायत्री की उच्च स्तरीय साधना आत्म शोधन के रूप में प्रस्तुत की हैं इसी प्रकार जीवन यज्ञ का प्रखर स्वरूप धर्म अपनाने के रूप में सामने रखा है। युग-निर्माण योजना में यही सब कुछ भरा हुआ है कि जिसके माध्यम से जन मानस का स्तर भरा हुआ हैं जिसके माध्यम से जन मानस का स्तर ऊँचा उठे और एक व्यक्ति दूसरों को ऊँचा उठाने एवं आगे बढ़ाने में प्रसन्नता अनुभव करे।
आचार्य जी के आयोजन कितने महत्वपूर्ण हैं इसका आज मूल्याँकन नहीं हो सकता। उसका महत्व तो भावी इतिहासकार ही आँक सकेगा। गायत्री और यज्ञ के माध्यम से वे आत्म-शोधन और सेवा धर्म का व्यापक अभियान आरंभ कर रहे हैं उससे न केवल उसमें सम्मिलित होने वालों का ही महा-हित साधन होगा वरन् समस्त विश्व की सुख शान्ति बढ़ेगी। इस महान आयोजन की शतमुख से प्रशंसा कर सकना भी मेरे लिए संभव नहीं हो सकता।
वाराणसी नगरी के राजा एक दिन प्रजा के दुख-सुख को जानने के लिए राज पुरोहित के साथ राज्य में भ्रमण करने निकले। उन्होंने वेश बदल लिया ताकि कोई उन्हें पहिचान न सके।
भ्रमण करते-करते वे किसी उपनगर में पहुँचे। पुरोहित नित्य कर्म के लिए दूर गये थे। राजा पेड़ के नीचे सुस्ता रहे थे।
उधर से एक सद्गृहस्थ निकला तो सुन्दर आभा वाले इस तेजस्वी व्यक्ति को अतिथि समझ कर घर से भोजन लेने चला गया। लौटकर आया तो अनेक व्यंजनों से सुसज्जित थाल उसके हाथ में था। उसे अतिथि के आगे रख दिया।
तब तक पुरोहित भी वापिस आ चुके थे। राजा ने स्वयं भूखे होते हुए भी वह थाल पुरोहित को दे दिया। पुरोहित ने उसे खाया नहीं। वे कुछ देर सोते रहे और थोड़ी दूर तपश्चर्या में निरत एक तपस्वी को वह भोजन अर्पित कर दिया। तपस्वी ने चारों ओर दृष्टिपात किया तो उसे एक भिक्षु दिखाई दिया। तपस्वी ने थाल का भोजन भिक्षु के भिक्षा पात्र में डाल दिया। भिक्षु ने उसे सन्तोषपूर्वक खा लिया।
जो सद्गृहस्थ थाल लेकर आया था, उसने यह सब देखा और आश्चर्य चकित हो अतिथि से पूछा-”बन्धू। आपके लिये आगत भोजन को स्वयं न करके दूसरे को दे देने का क्या कारण है?”
अतिथि ने उत्तर दिया-”मैं साधारण गृहस्थ हूँ। मेरी उपयोगिता मेरे निज के जीवन तक ही सीमित है। किन्तु यह ब्राह्मण जिन्हें मैंने उपलब्ध भोजन दिया संसार के लिए अधिक उपयोगी है। इनका शरीर असंख्य मानवों को ज्ञान-दान करके उन्हें सन्मार्ग पर लगाता है, इनकी उपयोगिता अधिक है। इसलिए मैंने अपनी तुलना में उन्हें अधिक उपयोगी पाया और वह भोजन उन्हें दे दिया।
गृहस्थी ने ब्राह्मण से पूछा-भगवन्, भला आपने अपना भोजन दूसरे को क्यों दे दिया?
ब्राह्मण ने कहा-तपस्या का महत्व ब्रह्मकर्म से भी अधिक है। तप के द्वारा जो ब्रह्मतेज उत्पन्न होता है उससे ब्रह्मकर्म से भी अधिक लोक हित की संभावना रहती है। तपस्या का साहस कोई विरले ही करते हैं सो उस पुण्य परम्परा का पोषण आवश्यक है। मैंने स्वार्थ का नहीं उपयोगिता का ध्यान रखा और आगत भोजन तपस्वी को दे दिया।
गृहस्थ ने तपस्वी से पूछा-आपने वह भोजन भिक्षु को किस कारण दे डाला, भगवन्।”
तपस्वी ने शान्त स्वर से कहा- भद्र, मैं इन्द्रियों को जीतने की साधना कर रहा हूँ। इसके लिए हठपूर्वक उनका निरोध करना आवश्यक है। स्वादिष्ट व्यंजनों का आहार मेरी स्वादेन्द्रिय को विचलित करने वाला, बाधक सिद्ध होता सो मैंने यही उचित समझा कि अपने से अधिक सत्पात्र उस अपरिग्रही भिक्षु को दे दूँ।
गृहस्थ ने भिक्षु- आपने किस कारण वह भोजन स्वयं ही कर लिया? मैं विवेक को जागरण करने के लिए द्वार-द्वार पर परिभ्रमण करता हूँ ताकि व्यक्ति स्वार्थी न बने, उपयोगिता का ध्यान रखकर ही उपलब्ध साधनों का उपभोग किया जाय। यह प्रशिक्षण मेरे जीवन का व्रत है। इन तीनों में इस पुण्य परम्परा को फलित होते मैंने देखा और प्रेम-पूर्वक भोजन कर लिया।
अतिथि ने सद्गृहस्थ को और भी अधिक स्पष्टता से समझाते हुए कहा- विवेक ही इस संसार का मेरुदण्ड है। यदि मनुष्य स्वार्थ ही सोचे और उपयोगिता एवं लोकहित की बात को भुला दे तो फिर यहाँ नरक और अशान्ति के अतिरिक्त और कुछ शेष न रहेगा। यह धरती पुण्य के बल पर ही चलती है। सो हे सद्गृहस्थ। हम सबको श्रद्धा और विवेक की परमार्थिक पुण्य परम्पराओं को भूखे रह कर भी सींचते रहना चाहिए।
(श्री प्रेमप्रकाश वार्ष्णेय एम. ए.)
यह सुनिश्चित तथ्य है कि व्यक्ति का चरित्रबल और मनोबल न बढ़ सका तो वह सब कुछ साधन रहते हुये भी दुर्बल ही रहेगा। लड़ाई में कायर लोग कीमती हथियारों को भी छोड़कर भाग खड़े होते हैं और बहादुर लोग लाठियों के बल पर ही विजय प्राप्त कर लेते हैं। सामान नहीं, साहस जीतता है। धन केवल रोजगार करने से ही नहीं मिल जाता वरन् उसके लिये चतुरता और योग्यता की भी आवश्यकता होती है। आरोग्य दवाओं से नहीं, संयम से मिलता है। दोस्त और दुश्मन बढ़ाने की जड़ मनुष्य के भले या बुरे स्वभाव में छिपी रहती है। ईश्वर को प्राप्त करने में पूजा, परिचर्या ही नहीं अन्तःकरण की श्रद्धा ही सफल होती है। किसी राष्ट्र की संपत्ति वहाँ का सोना-चाँदी नहीं वरन् उसके नागरिकों का व्यक्तित्व ही होता है। इसलिये ज्ञानी लोग सदा से यही उपदेश देते आये हैं कि यदि किसी समाज या राष्ट्र को बलवान बनाना हो तो केवल उसकी सुविधायें और सामग्री बढ़ाने से काम न चलेगा वरन् वहाँ के जन-साधारण के चरित्र और साहस को बढ़ाना होगा। आदर्शवादी व्यक्ति ही वह कार्य कर सकते हैं, जिसमें से अन्धकार को नष्ट करने वाली आशा की किरण उत्पन्न होती हैं।
लोकशिक्षण की जितनी उपयोगिता प्राचीन काल में थी, आज उससे कहीं अधिक है। क्योंकि जन-मानस में जितनी विकृति उस समय भी आज उससे अधिक ही है। इस बात को लोग समझ भी रहे हैं और सभी स्वीकार करते हैं। किसी मनुष्य का जीवन केवल धन या सुखोपभोग की सामग्री के आधार पर ही सफल नहीं बन सकता। उसके लिये एक उत्तम श्रेणी के व्यक्तित्त्व की भी आवश्यकता होती है। इसलिये सच्ची सुख-समृद्धि के लिये विभिन्न सामग्रियों के साथ ही मानवीय सद्गुणों के विकास की आवश्यकता होती है। ओछे स्वभाव के और हीन दृष्टि कोण रखने वाले मनुष्य अपार समृद्धि प्राप्त हो जाने पर भी उसका सदुपयोग नहीं कर सकते और हीन ही बने रहते हैं। इसलिये प्राचीन समय की भाँति वर्तमान काल में भी यह तथ्य ज्यों का त्यों विद्यमान है कि उन्नति करने के लिये जन साधारण की आन्तरिक स्थिति को उत्कृष्ट बनाया जाय। इसके बिना यदि किसी अन्य उपाय से प्रगति हो भी गई-समृद्धि बढ़ गई, तो भी वह ज्यादा दिन तक टिक न सकेगी। मानवीय दोष-दुर्गुणों की भट्टी में धन-वैभव का ईंधन कुछ ही देर में जल-बल कर भस्म हो जाता है।
मनुष्य की प्रकृति अनुकरण करने की है। जहाँ बुरी परम्परायें चल पड़ती हैं वहाँ लोग उनका ही अनुकरण करने लगते हैं, और जहाँ अच्छे रिवाज चल पड़ते वहाँ उन्हीं को पसन्द करने लग जाते हैं। बंगाल में अधिकाँश व्यक्ति मछली खाते हैं तो वहाँ मछली न खाने की बात सुनकर आश्चर्य किया जाता है और गुजरात में बहुसंख्यक जनता शाकाहारी हैं तो वहाँ माँस-मछली खाने की बात पर घृणा का भाव प्रकट किया जाता है। बुरे और भले और स्वभाव, आचरण, व्यवहार, एवं कार्यों के बारे में भी यही बात है। देखा-देखी से मनुष्य जाति में जितनी गतिविधियाँ बढ़ती और फैलती फूटती हैं उतनी और किसी प्रकार नहीं बढ़तीं।
धर्म शास्त्रों में अनेक अच्छी बातें लिखी हुई हैं। उन्हें कथा-प्रवचन और पाठ-स्वाध्याय के रूप में हम सुनते-समझते भी रहते हैं, पर वैसे आदर्श कार्यों के उदाहरण देखने को न मिल सकने से वे बातें सिद्धान्तों तक ही सीमित रह जाती हैं। व्यवहार में तो वे ही बातें सीखी जाती हैं जो अपने चारों ओर दिखाई पड़ती हैं। तमाखू पीने की बुरी आदत बेतरह बढ़ती जा रही है। उससे लाभ किसी प्रकार का कुछ भी नहीं, हानि अनेक प्रकार की है। इसका कारण देखा−देखी का भाव ही है। बाप को पीते देखकर बेटा और दोस्त को पीते देखकर दोस्त उस लत को सीखता है और यह बुराई छूत की बीमारी की तरह दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती चली जा रही है।
इसी प्रकार अन्य बुराइयाँ भी पनपती रहती हैं। किन्तु अच्छाइयों की कभी बढ़ती होती है तो उसमें भी यही नियम काम करता है। भगवान वृद्ध के उपदेशों से प्रभावित होकर जब कुछ स्त्री-पुरुषों ने संन्यास ग्रहण किया तो उनकी देखा−देखी अन्य सहस्रों व्यक्ति भी प्रव्रज्या के लिये तत्पर हो गये। देखते-देखते लाखों की संख्या में बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणी बौद्ध धर्म का प्रचार करते हुए देश देशान्तरों में दृष्टिगोचर होने लगे। महात्मा गान्धी द्वारा संचालित स्वराज्य-संग्राम में भी यही हुआ। नमक सत्याग्रह, धरना, झण्डा, जुलूस, हड़ताल आदि की लहर दौड़ी तो उसके प्रवाह में स्वराज्य आन्दोलन के सिद्धान्तों और लक्ष्य से अपरिचित लोग भी हजारों-लाखों की संख्या में जेल जाने को तैयार हो गये थे। दहेज, मृत्युभोज जैसी कुरीतियों को प्रायः हर समझदार आदमी हानिकारक मानता है, पर उनका प्रचलन इसीलिये बन्द नहीं होता कि दूसरे लोग वैसा करते हैं अपने को भी वैसा ही करना पड़ता है।
अच्छे कामों, अच्छी, बातों, अच्छी परम्पराओं का फलना-फूलना इस बात पर निर्भर है कि उनका प्रचार एक सुव्यवस्थित आन्दोलन के रूप में किया जाय और उनकी जानकारी अधिकाधिक लोगों को कराई जाती रहे। सत्कार्यों का आयोजन और उनका नियमपूर्वक प्रचार करने से वह वातावरण बन सकता है जिससे प्रभावित होकर लोग स्वयं भी उस मार्ग का अनुकरण करने लगें। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति का मूल्य और महत्व राजनीतिक क्रान्ति से कई गुना अधिक है। ऐसा व्यापक कार्यक्रम न तो व्यक्तिगत उपासना की तरह एकाकी उपायों से संभव है और न कथा-प्रवचनों द्वारा उसे प्रत्यक्ष रूप दिया जा सकता है। यह कार्य जब कभी सम्पन्न किया जायगा तभी यही प्रयत्न करना होगा कि अच्छे आचरणों तथा श्रेष्ठ परंपराओं को उत्साहपूर्ण वातावरण में एक सुनियोजित रूप में अग्रसर किया जाय।
युग-निर्माण योजना को मैंने इसी रूप में देखा और समझा है। शरीर, मन, परिवार और समाज के माध्यम से जीवन में प्रत्येक क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों का प्रचलन इस योजना का उद्देश्य प्रतीत होता है। संसार के इतिहास में क्राँतियाँ इसी प्रकार उत्पन्न, विकसित और सफल हुई है। योजना के 108 कार्यक्रमों पर गंभीरतापूर्वक विचार किया जाय तो यही प्रकट होता हैं कि सद्विचारों और सत्कार्यों को एक योजनाबद्ध आन्दोलन का रूप देकर उन्हें जन-स्वभाव में अभ्यस्त कराने के लिये यह प्रयत्न मजबूत हाथों द्वारा आरम्भ किया गया है। इसकी सफलता धर्म की, सदाचार की, संस्कृति की और मानवता के उच्च आदर्शों की विजय मानी जायगी। मुझे आशा है कि मानवीय विवेक और देवत्व की भावना का पूरा सहयोग इस ‘ज्ञान-यज्ञ’ में पर्याप्त मात्रा में प्राप्त होगा।
(स्वामी सन्तोषानन्द जी महाराज)
सभी क्षेत्रों में आज यह अनुभव किया जा रहा है कि एक ओर जितने प्रयत्न उन्नति के लिये किये जा रहे है उतना ही दूसरी ओर अवनति का द्वार प्रशस्त हो रहा है। आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिये उद्योग-धन्धे बढ़ाये जा रहे हैं, कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने की व्यवस्था की जा रही है, शिक्षा की प्रगति के लिये स्कूल-कालेजों की संख्या बढ़ रही है, चिकित्सा के लिये अस्पतालों और डाक्टरों की संख्या वृद्धि की जा रही है, अपराध रोकने के लिये कानून, पुलिस और अदालत पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, यातायात की सुविधा बढ़ाने के लिये रेल, मोटर, जहाज, स्कूटर, सड़कें आदि के निर्माण का विशाल कार्यक्रम चल रहा है। मनोरंजन के लिये सिनेमा, सर्कस, नाटक, खेल-कूद, पार्क आदि का विकास हो रहा है। इन्हें देखते हुये सहज ही यह अनुभव होता है कि प्रगति के इन भारी साधनों द्वारा मनुष्य जाति की सुख-सुविधाओं में अवश्य ही वृद्धि होगी।
लोक-शिक्षण के प्रयत्न भी स्वल्प नहीं हैं। सरकार अपनी योजनाओं और सफलताओं से जनता को परिचित करने के लिये भारी व्यय करके प्रदर्शनियाँ लगाती हैं, सिनेमा दिखाती हैं, ग्राम सेवक, ब्लॉक-कर्मचारी, कल्याण-विभाग के कार्य कर्ता भारी संख्या में काम कर रहे हैं। कृषि, स्वास्थ्य, सहयोग, शिक्षा आदि का प्रशिक्षण करने के लिये बड़े-बड़े विभाग बने हुये हैं और उनमें प्रचुर धन एवं जन शक्ति का उपयोग होता है। रेडियो द्वारा देश-भक्ति , सदाचार स्वास्थ्य आदि के अनेक प्रकार के कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं। राजनेता, मंत्री आदि के भाषणों की आये दिन धूम मची रहती है। राजनैतिक, सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र के कार्यकर्ता अपने-अपने ढंग से निरन्तर प्रवचन करते रहते हैं। उनके विशाल प्रयत्नों को देखते हुये यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जनता को अवश्य ही उच्च भावनाओं से ओत-प्रोत, कर्तव्य परायण, आदर्श प्रेमी और सुखी बन जाना चाहिये।
विकास और सुधार का, शिक्षा और समृद्धि का, चिकित्सा और सुविधाओं का जितना विशाल आयोजन आज हो रहा है उतना संसार के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। इसे देखते हुये जहाँ एक ओर बँधती हैं वहाँ दूसरी ओर देखते हैं तो निराशा से चित्त क्षुब्ध होने लगता है। इतनी चेष्टा करने पर भी स्थिति हर दिशा में बिगड़ती ही जा रही है। शारीरिक दृष्टि से लोग अपने को अशक्त , दुर्बल और रोगी ही अनुभव करते हैं। ऐसे भाग्यशाली विरले ही मिलेंगे जो अपने को पूर्ण निरोग होने का भरोसा कर सकें। श्रद्धा, विश्वास और आत्मीयता का गृहस्थ-जीवन कोई विरले ही बिता पा रहे हैं। दाम्पत्य और पारिवारिक जीवन जहाँ भी देखिये वहाँ विषाक्त बना दिखाई देता है। आमदनी से खर्च सबका बढ़ा हुआ है। सभी अपने को गरीब अभावग्रस्त अनुभव करते हैं। शिक्षितों को नौकरी न मिलने पर ठीक वेतन न मिलने की शिकायत रहती है। गुण्डागर्दी और अपराधों की तो बाढ़ ही आ गई है जिससे हर व्यक्ति सदैव सशंकित बना रहता है। सरकारी क्षेत्रों में रिश्वतखोरी और लापरवाही बेहिसाब बढ़ गई है जिससे न्याय और अधिकारों का प्राप्त होना दिन-दिन महंगा और कष्टसाध्य बनता चला जा रहा है। सार्वजनिक संस्थाओं के पोल खाते जब सामने आते है तब और भी अधिक निराशा होती हैं। जिनकी स्थापना लोगों को उच्च आदर्श सिखाने के लिये की गई हो, उसके संचालक और पदाधिकारी ही यदि आदर्शहीनता का परिचय देने लगें तो फिर कौन उनके उपदेशों को सुनेगा और कौन उन पर आचरण करेगा?
धार्मिक अनुष्ठानों की आये दिन धूम रहती है। कथा, हवन, कीर्तन, सम्मेलन रोज ही कहीं-न-कहीं होते रहते हैं। इन्हें देखते हुये यही जान पड़ता है कि धर्म का विस्तार हो रहा है। साधु-सन्तों की संख्या लाखों तक पहुँच जाने से एक सामान्य मनुष्य यही समझता है कि उनके द्वारा जनता में ज्ञान वृद्धि और धर्म की जागृति होती ही होगी। पर जब वास्तविक परिणाम का पता लगाया जाता है तो आँखों के आगे अँधेरा छा जाता हैं और यही प्रतीत होता है कि यहाँ तो मेंड़ ही खेत को खाये जा रही है।
प्रगति का बाह्य आवरण दिन-दिन बहुत बढ़ता चला जाता है, आडम्बर का घटाटोप बँध रहा है, पर भीतर सब कुछ खोखला हैं। मनुष्य का चरित्र, दृष्टिकोण एवं आदर्श पतित होने पर सभी ऊपरी उपचार निरर्थक सिद्ध होते है। रक्त-विकार से रुग्ण शरीर में जगह-जगह निकलते रहने वाले फोड़ों पर मरहम लगा देने मात्र से कोई स्थायी हल नहीं निकल सकता। जड़ के सींचे बिना केवल पत्तों पर छिड़काव कर देने से पेड़ की हरियाली कब तक बनी रहेगी?
संसार में दिन-दिन बढ़ती जाने वाली उलझनों का एक मात्र कारण मनुष्य के आन्तरिक स्तर, चरित्र, दृष्टिकोण एवं आदर्श का अधोगामी होना है। इस सुधार के बिना अन्य सारे प्रयत्न निरर्थक हैं। बढ़ा हुआ धन, बढ़े हुये साधन, बढ़ी हुई सुविधाएं कुमार्गगामी व्यक्ति को और भी अधिक दुष्ट बनायेगी। इन बढ़े हुये साधनों का उपयोग वह विलासिता, स्वार्थपरता, अहंकार की पूर्ति और दूसरों के उत्पीड़न में ही करेगा। असंयमी मनुष्य को कभी रोग-शोक से छुटकारा नहीं मिल सकता भले ही उसे स्वास्थ्य-सुधार के कैसे ही अच्छे अवसर क्यों न मिलते रहें।
कठिनाइयाँ, अभावों और विपत्तियों की जड़ मनुष्य के भीतर रहती हैं। जितना प्रयत्न संसार को सुखी और समृद्ध बनाने के लिये किया जा रहा है यदि उसका सौवाँ भाग भी मनुष्यों के आन्तरिक स्तर को ऊँचा उठाने के लिये किया जाता तो आज स्थिति कुछ और ही होती। जब तक हम वास्तविक दशा को न समझेंगे तब तक असफलता और निराशा के अतिरिक्त और क्या हाथ लगने वाला है। जिन लोगों के कन्धों पर जन सेवा का भार है वे ही यदि अपने कर्तव्य की उपेक्षा करके जैसे बने वैसे स्वार्थ साधने का ठान लें तो फिर उनके दिखावटी प्रयत्नों से किसी शुभ परिणाम की आशा कैसे की जा सकती है?
बाहरी आडम्बरों के बढ़ने से किसी समस्या का हल न होगा। मानव-जीवन की दिन-दिन बढ़ने वाली समस्त आपत्तियों का समाधान करने का केवल एक ही मार्ग है कि उठाया जाय और उसकी भावना, श्रद्धा तथा आकाँक्षाओं को धर्म एवं सदाचार से नियंत्रित रखा जाय। जब मनुष्य अपने आत्म गौरव, कर्तव्य और लक्ष्य को भली प्रकार अनुभव कर सकेगा तभी पशु प्रवृत्ति से ऊंचा उठ कर मनुष्य के योग्य यशस्वी पथ का पथिक बन सकता है।
रोग का ठीक निदान हो जाने पर चिकित्सा संबंधी आधी कठिनाई हल हो जाती है। पेट में कब्ज रहने पर अनेक रोग उठ खड़े होते हैं, स्वभाव में क्रोध की मात्रा बढ़ जाने से अनेकों विरोधी तथा शत्रु पैदा हो जाते हैं। इसी प्रकार मनुष्य का दृष्टिकोण दूषित और चरित्र पतित हो जाने पर उसे प्रत्येक दिशा में आपत्तियाँ दिखाई देने लगती हैं। इसी प्रकार जिस राष्ट्र की जनता स्वार्थी, विलासी, कायर, आलसी और दुर्गुणी हो जाती है, वहाँ अगणित प्रकार के शोक सन्ताप बढ़ने लगते हैं। बाहरी उपचारों से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता रोग के कारणों को हटाने से ही व्यथा दूर होती है। व्यक्तियों का आन्तरिक स्तर ऊँचा उठाने पर ही पतन का प्रत्येक दृश्य उन्नति में बदलने लगता है।
विश्वशान्ति की स्थिति उत्पन्न करने का कोई प्रयत्न तभी सफल होगा जब व्यक्तियों की भावनाओं को ऊँचा उठाने को सर्वोपरि महत्व की बात मान कर योजना बनाई जाय। मुझे युग-निर्माण योजना में ऐसा ही प्रयत्न प्रतीत होता है। उसके संयोजकों ने समस्या की जड़ ढूँढ़ने का प्रयत्न किया है और रोग के सही निदान के अनुरूप चिकित्सा आरम्भ की है। सही दिशा में उठाये हुये कदम ही सही परिणाम उत्पन्न कर सकते हैं। यदि इन प्रयत्नों को प्रोत्साहन मिला तो विश्वासपूर्वक यह आशा की जा सकती है कि संसारव्यापी अशान्ति की समस्या का हल निकलेगा और मानव जाति का भविष्य पुनः उज्ज्वल बनेगा।
(पं. जुगलकिशोर शर्मा शास्त्री एम. ए.)
भारतवर्ष में समय-समय पर क्राँतियाँ हुई हैं और उनके फल स्वरूप महापुरुषों ने इस देश को अधर्म के गर्त में गिरने से बचाया है। आध्यात्मिक उत्थान के साथ-साथ नैतिक, धार्मिक एवं सामाजिक उत्थान भी हुआ। इन क्रान्तियों से बहुत बड़ा लोकहित होता रहा है। पर यह सम्भव तभी हुआ जब उस परिवर्तन का आधार वैदिक परम्परायें रहीं। उन परम्पराओं की पुनर्जागृति ने भारत ही नहीं समस्त संसार को प्रकाशवान बनाया।
आज मानव-समाज जिन अभावों और संकटों की स्थिति में घिरा हुआ है उससे छुटकारा पाने के लिये वह प्रयत्नशील है। समय भी गतिशील है। संसार के सभी राष्ट्र अपने-अपने-ढंग से उन्नति कर रहे हैं। हम पिछड़ते हैं। दौड़ इतनी तेजी से चल रही है कि जो पिछड़ गया उसे बहुत पश्चात्ताप करना पड़ेगा। इसलिये समय रहते जागने और प्रगति पथ पर अग्रसर होने की आकाँक्षा हम भारतियों के मन में भी उठना स्वाभाविक है। ऐसी सामूहिक आकांक्षायें ही क्रान्तियाँ बनकर प्रकट होती हैं। कोई साधारण व्यक्ति भी पहले कदम उठाये तो जनता उसके पीछे चल पड़ने में संकोच नहीं करती।
हमारी वर्तमान शारीरिक, मानसिक, नैतिक, सामाजिक और आर्थिक स्थिति निस्सन्देह असंतोषजनक है और उसमें परिवर्तन की आवश्यकता स्पष्ट रूप से प्रतीत हो रही है। इस परिवर्तन के लिये अनेक प्रयास चल रहें हैं। पर देखना यह है कि उनमें साध्य के साथ साधनों की भी पवित्रता रहती है या नहीं। हमारी प्राचीन वैदिक परम्पराओं को फलने-फूलने का अवसर रहता है या नहीं? यदि राजनैतिक, आर्थिक सामाजिक परिवर्तन किसी उपाय से हो गये, पर साथ ही हमारी वे परम्परायें चली गईं जिन पर कि मानव जाति का भविष्य निर्भर है तो फिर वह सुधार भी अन्ततः बिगाड़ के समान ही दुखदायी होगा। आदर्शभ्रष्ट होकर हम कुछ उपार्जन या सुधार भी कर सके तो पथ से भटके हुये लोग देर तक उसका लाभ न उठा सकेंगे। दूसरे कारणों को लेकर परस्पर टकरावेंगे और जो कुछ कमाया था उसे गँवाने में देर न लगेगी।
इसलिये ध्यान में रखने की बात यह है कि उत्थान के लिये हम जो भी प्रयत्न करें उनमें वैदिक परम्पराओं का ही आधार रहे। नीति, धर्म और सदाचार के आधार पर ही सच्ची प्रगति संभव हो सकती है। जीवन में सत्य की प्रतिष्ठा को उचित स्थान देकर ही मनुष्य चिरस्थायी उन्नति कर सकता है। सात्विकता को अवलम्बन कर प्रगति के पथ पर चलते हुये सफलता प्राप्त करने में भले ही कुछ विलम्ब हो, पर विद्वेष, घृणा और हिंसा पर आधारित नाशकारी तूफान द्वारा कुछ प्राप्त कर लेने की अपेक्षा वह मन्द प्रगति अधिक कल्याणकारी सिद्ध होगी।
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ की युग-निर्माण योजना द्वारा वैदिक परम्पराओं के अनुरूप भारतीय समाज का स्तर ऊँचा उठाने का जो प्रयास हो रहा है उससे हमारी बाह्य जीवन की समस्यायें तथा उलझने तो सुलझेगी ही, साथ ही सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि आध्यात्मिक स्तर को ऊँचा उठाने में भी उससे भारी सहायता मिलेगी। सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण लाभ यही है। व्यक्ति का चरित्र ऊँचा उठे, आदर्शों के प्रति उसका अन्तःकरण निष्ठावान बने, धर्म और कर्तव्य को प्रधान मानकर चले तो फिर वे समस्याएँ जो पहाड़ सी विशाल और घटाओं सी भयंकर दीखती हैं बात ही बात में सरल हो सकती हैं।
बाह्य जीवन की समस्त कठिनाइयाँ आन्तरिक स्थिति की छाया ही होती हैं। पाप का फल दुःख और पुण्य का फल सुख के रूप में देखा जाता है। इसलिये यदि व्यक्तिगत या सामूहिक जीवन से दुख दारिद्र को हटाया हो तो उसका एक ही उपाय हो सकता है कि धर्म-बुद्धि के जागरण और धर्म प्रवृत्तियों के प्रोत्साहन के लिये हम सब तत्परतापूर्वक कटिबद्ध होकर काम करें।
अवसाद की स्थिति से ऊँचे उठकर हमें सच्ची चिरस्थायी प्रगति के लिये कार्य करना चाहिये। वह कार्य-पद्धति धर्म, नीति और सदाचार का वैदिक परम्पराओं के अनुरूप ही होनी चाहिये। प्राचीन काल में समय-समय पर ऐसी क्राँतियाँ होती रही हैं और उनने जन-जीवन की अनेक गुत्थियों को सुलझाते हुये धर्ममय सुख-शान्ति का वातावरण उत्पन्न किया था। युग-निर्माण योजना आदर्शवाद, धार्मिकता को लाने का एक दिव्य प्रयत्न है। इससे बाह्य जीवन की अपेक्षा भी आन्तरिक स्तर का उत्कर्ष अधिक होगा। विश्व-शान्ति के लिये ऐसी ही उन्नति और प्रगति अपेक्षित है। मैं इस योजना को एक आध्यात्मिक क्राँति मानता हूँ और इसकी सफलता के लिये परमात्मा से हार्दिक प्रार्थना करता हूँ।
कुरुक्षेत्र के सुविस्तृत मैदान में दूर-दूर तक महाभारत युद्ध में मरे योद्धाओं की लाशें बिछी पड़ी थीं। गिद्ध और कौए उन्हें नोंच-नोंच कर खा रहे थे। उस घमासान के कारण सब कुछ कुचला ही कुचला पड़ा था।
शिष्यों समेत शमीक ऋषि उधर से निकले तो इस महानाश के बीच दो पक्षी-शावकों को एक गज घंटा के पास चहचहाते देखा गया। शिष्यों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने महर्षि से पूछा-”भला, इस सब कुछ कुचल डालने वाले घमासान में ये बच्चे कैसे बच गये?”
शमीक ने कहा-शिष्यों, युद्ध के समय आकाश में उड़ती हुई चिड़िया को तीर लगने से वह भूमि पर गिर पड़ी और उसने दो अण्डे प्रसव किये। संयोगवश एक हाथी के गले का घण्टा टूट कर अण्डों पर गिरा जिससे उनकी रक्षा हो गई। जब परिपक्व होकर वे बच्चे के रूप में घण्टे के नीचे की मिट्टी हटाकर बाहर निकले हैं, सो तुम इन्हें उठा लो और आश्रम में ले जाकर इनका पालन पोषण-करो।
एक शिष्य ने पूछा-”जिस देव ने इन बच्चों की, ऐसे महासमर में रक्षा की क्या वह इनका पोषण न करेगा?” महर्षि ने कहा-”प्रिय, जहाँ दैव का काम समाप्त हो जाता है वहाँ से मनुष्य का कार्य आरम्भ होता है। दैव ने मनुष्य को दया और सामर्थ्य का वरदान इसीलिए दिया है कि उनके द्वारा दैव के छोड़े हुये शेष कार्य को पूरा किया जाय।”
(श्री गुरुचरण दत्त शास्त्री, काव्यतीर्थ)
मनुष्य की जिन्दगी इस पृथ्वी की सब से बड़ी विभूति है। परमात्मा यदि आत्मा को सब से बड़ा उपहार दे सकता है तो वह यही है कि उसे मनुष्य शरीर में निवास करने का सौभाग्य प्रदान कर। बोलने, हँसने, पढ़ने, लिखने, सोचने, करने के जितने साधन मनुष्य शरीर में प्राप्त है उतने चौरासी लाख योनियों में से किसी को प्राप्त नहीं हैं। हमें जो मनुष्य का जीवन प्राप्त हुआ हैं, इसे साधारण नहीं, असाधारण सौभाग्य मानना चाहिये और इस सुअवसर का पूरा लाभ उठाने का प्रयत्न करना चाहिये।
पर हममें से अधिकाँश मनुष्य न तो इस जीवन का महत्व समझते हैं और जीने की ठीक विधि जानते हैं। उल्टे-सीधे ढंग से किया हुआ कोई कार्य वैसा ही परिणाम भी उत्पन्न करता है। जिन्दगी जीना न आता हो तो यह सौभाग्य भी दुर्भाग्य के समान सिद्ध होता है। हम प्रायः देखते हैं कि बहुसंख्यक व्यक्ति मानव जीवन पाकर भी दयनीय स्थिति में पड़े रहते और दुःख, दरिद्रता की पीड़ा, कष्ट सहन करते रहते हैं। इसका कारण यही है कि उन्हें जीना नहीं आता। यदि वे जीवन को ठीक ढंग से व्यतीत करने की कला सीख लें तो फिर रोग-शोक और दुःख-दारिद्र का कोई कारण नहीं रह सकता।
किसी के पास मोटर गाड़ी तो बहुत बढ़िया हो पर ठीक चलाना न आवे तो वह उसके द्वारा संकट ही पैदा करेगा। तैरना न जानने वाले के लिये तालाब में घुस कर मनोरंजन करना विपत्ति का कारण ही बनेगा। बिजली सम्बन्धी जानकारी जिसे न हो, और वह उसकी उधेड़बुन करने लगे तो खतरे का सामना ही करना पड़ेगा। अनाड़ी चिकित्सक अस्पताल में रखी कीमती दवाओं से भी रोगी का अहित ही करेगा। सरकस में काम करने वाले खिलाड़ी यदि अपने-अपने खेलों में अभ्यस्त न हों तो अपनी जान के हाथ धो बैठेंगे और सरकस वाले की भी बदनामी करेंगे। इस संसार को हम भगवान का सरकस कह सकते हैं। इससे कुछ योग्य खिलाड़ी तो स्वयं यश प्राप्त करते हैं और मालिक का गौरव भी बढ़ाते हैं और कुछ ऐसे फूहड़ होते हैं कि स्वयं चोट खाते हैं और परमात्मा की निन्दा के कारण भी बनते हैं।
वस्तुतः यह संसार बहुत सरल और सुरम्य है। हमें वह क्षमता और योग्यता भी प्राप्त है जिससे आनन्दमय जीवन व्यतीत करने लायक सामग्री उत्पन्न कर ले अथवा जो कुछ उपलब्ध है उसे ही अपने अनुकूल ढाल लें। इस संसार की तथा मनुष्य जीवन की रचना ऐसे सुन्दर ढंग से हुई है कि यहाँ आनन्द और उल्लास के अतिरिक्त और कुछ देखने को मिल ही नहीं सकता। इतना होते हुये भी जब यह जान पड़ता है कि अधिकाँश मनुष्य अपने जीवन से असंतुष्ट और खिन्न हैं तो यही निकलता है कि वे जीवन को सही रास्ते से जीने की विद्या नहीं जानते।
मनीषियों का कथन है कि ‘जिओ और जीने दो।’ सचमुच बुद्धिमान वही माना जा सकता है जो जिन्दगी ठीक तरह से जी सके और सज्जन वह है जो दूसरों को भी जी सकने की सुविधा मिलने में सहायक बन सके। पर स्थिति यह है कि हम न तो जीते हैं और न दूसरों को जीने देते हैं। जिन विचारों, जिन विश्वासों, जिन आकाँक्षाओं और जिन आदर्शों को ग्रहण करने से हमें जिन्दगी के जीने का सही रास्ता मिल सकता हैं उनको न तो हम अपनाते हैं और न उनकी आवश्यकता समझते हैं। इसके विपरीत उन निरंकुश, अदूरदर्शिता पूर्ण एवं निरर्थक विचारों को अपना लेते हैं जो पग-पग पर चिन्ता, असफलता और तनाव पैदा करते हैं।
थोड़ी और साधारण श्रेणी की साधन-सामग्री द्वारा भी बड़ी प्रसन्नता के साथ जिया जा सकता है। अपने साथियों का स्तर यदि बहुत ऊँचा न हो तो भी उन्हें निभाया जा सकता है और हँस-खेल कर काम चल सकता है। जैसी भी स्थिति हमें प्राप्त है उसी को सुव्यवस्थित बना लिया जाय तो हँसी-खुशी का जीवन बिताने की उसी में गुँजाइश हो सकती है। यह सोचने की बजाय कि अमुक लाभ प्राप्त होने से हम प्रसन्न हो सकते हैं हम को यह विचार करना चाहिये कि अपना कर्तव्य ठीक तरह से पालन करना ही पर्याप्त है और उसी से हमको सदैव प्रसन्नता प्राप्त होती रहेगी। संयमी और संतोषी के लिये रोग-शोक और चिन्ताओं की कहीं गुँजाइश ही नहीं रहती। जो इस संसार को एक नाट्य शाला की तरह मानकर अपना अभिनय ठीक तरह करने में ही सफलता मान लेता है उसे प्रिय-अप्रिय घटनाओं का बहुत चिन्ता नहीं रहती। एक ही व्यक्ति नाटक में कभी राजा कभी रंक, कभी स्त्री कभी पुरुष, कभी पंडित कभी मूर्ख बनता रहता है और जब खेल समाप्त हो जाता है तो अपने को नाटक कम्पनी का एक साधारण कर्मचारी मात्र समझकर संतोष की साँस लेता हुआ गहरी नींद सो जाता है। यही जिन्दगी जीने का ठीक तत्व-दर्शन है। पग-पग पर आने वाली भली बुरी स्थितियों को जो धूप-छाँह की तरह समझता है और उनको निरन्तर परिवर्तनशील मानता है उसे न कभी निराशा होगी और न मदोन्मत्तता। मनोरंजन के लिये खेलने वाले खिलाड़ी जिस तरह हार-जीत को विशेष महत्व नहीं देते उसी तरह जिन्दगी का स्वरूप ठीक तरह समझ सकने वाले व्यक्ति भी अपना मन हर स्थिति में प्रसन्न बनाये रहते हैं।
अपने गुण-कर्म-स्वभाव में आवश्यक संतुलन रखने वाले व्यक्ति की जीवन-नौका आसानी से तैरती चली जाती है। जिसने अपने में निरालस्यपन, नियमितता, एकाग्रता लगन धैर्य, साहस जैसे सद्गुण पैदा कर लिये जिसने अपना मार्ग सदाचार और मानवीय मर्यादाओं के अनुरूप चुन लिया, जिसने अपने स्वभाव में प्रसन्नता, प्रफुल्लता, मधुरता शिष्टाचार, सेवा, उदारता, आदि सत्प्रवृत्तियों को सम्मिलित कर लिया उसको सदा और सर्वत्र सफलता ही प्राप्त हुआ करेगी। ऐसा व्यक्ति जहाँ भी रहेगा उसे लोग सिर-आँखों पर रखेंगे। घटिया और घृणित व्यक्तित्व के मनुष्य ही जहाँ-तहाँ दुत्कारे जाते हैं। उन्हें ही उपहास और तिरस्कार का भाजन बनना पड़ता है। शोषण भी कायरों का होता है। जिसमें आवश्यक शौर्य और साहस मौजूद है उसको न तो सताया जा सकता हैं और न गिराया। चट्टान जैसे सुदृढ़ व्यक्तित्व परिस्थितियों के आगे झुकते नहीं वरन् उन्हें झुका लेते हैं। उन्हें कोई बिगाड़ नहीं सकता वरन् वे बिगड़ों को भी सुधारने में कृतकार्य होते हैं।
जिसने जिन्दगी जीने की विद्या सीख ली उसने सब कुछ सीख लिया। जिसको यह नहीं आता, उसको चाहे और बहुत सी बातें आती हों तो भी यही कहना पड़ेगा कि अभी वह कुछ भी नहीं जानता। युग निर्माण योजना में मुझे सबसे बड़ी विशेषता यही जान पड़ी कि उसमें जिन्दगी को ठीक ढंग से जीने की एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे मानव जाति के विकास में अड़ी हुई सभी बाधाओं का समाधान हो जाता हैं। जितनी प्रचार की शिक्षायें और कला कौशल की तालीम दी जा रही है उन सबकी अपेक्षा आवश्यक और महत्वपूर्ण शिक्षा यही है कि मनुष्य जिन्दगी को इस तरह जिये कि जिससे पशु स्थिति से निकल कर मनुष्य-योनि में जन्म लेने का सच्चा आनन्द और लाभ प्राप्त कर सके। ऐसा प्रशिक्षण मानव जाति के लिये कितना उपकारी हो सकता है, जब मैं उसकी विस्तृत संभावनाओं पर विचार करता हूँ तो मेरा मन आशा और उल्लास से भर जाता है।
हम न तो स्वयं ही जीना जानते हैं और न दूसरों को ही जीने देते हैं। दाम्पत्य जीवन का स्वर्गीय आनन्द ले सकने लायक न तो हमारा स्वभाव ही सुविकसित होता है और न स्त्रियों को हम इस बात का अवसर देते हैं कि वे शिक्षा और लोक व्यवहार का ज्ञान प्राप्त करके अपना समुचित विकास कर सकें। घर के भीतर साधनहीन, तिरस्कृत और उपेक्षित स्थिति में पड़ी रहने के कारण वे बेचारी अपने व्यक्तित्व का विकास कर सकने में असमर्थ रहती हैं और पति के कामों में सहयोग देकर उनकी त्रुटियों का संतुलन भी नहीं कर सकतीं। स्त्री और पुरुष दोनों का व्यक्तित्व यदि गिरा हुआ रहे तो उससे उनकी गृहस्थी नरक के सदृश्य बन जाती है और उनकी सन्तान भी दुर्गुणों की खान बन निकृष्ट जीवन व्यतीत करती है।
पिछड़ी हुई जाति वालों के साथ भी हमारा व्यवहार बर्बरतापूर्ण होता है। किसी वंश विशेष में जन्म लेने के कारण मनुष्य को नीच माना जाय और उसके नागरिक अधिकारों का अपहरण किया जाय अथवा उसे हेय माना जाय तो इस तिरस्कृत स्थिति में बने रहने से उसका विकास रुक ही जायगा। अस्वर्णों को आज कैसी गिरी हुई स्थिति में जीवन बिताना पड़ रहा हैं यह हम अपनी आँखों से प्रत्यक्ष देख रहे हैं। ‘जियो और जीने दो’ सिद्धान्त की आज सर्वत्र अवहेलना हो रही है। जीने की कला सीखकर न तो हम स्वयं विकास करने का प्रयत्न करते हैं और न दूसरों को वह अवसर मिलने देना चाहतें हैं जिससे वे विकसित बन कर मानवीय अधिकारों को प्राप्त कर सकें।
ईर्ष्या की दुष्प्रवृत्ति आज जन मानस में एक भयानक महामारी बन कर घुसी हुई है। दूसरों को उन्नति करते देख जल-भुनकर खाक हो जाना और उसे नीचा दिखाने के लिये अपनी हानि भी सह लेना आज की एक साधारण रीति-नीति बनी हुई है। इससे कितने ही विकासोन्मुख व्यक्तियों को अकारण ही पद दलित स्थिति में ही पड़े रहने को विवश होना पड़ता हैं। यदि लोग ईर्ष्या को त्याग कर दूसरों की उन्नति में प्रसन्न होने और सहायता करने की प्रवृत्ति को अपनावें तो उससे सभी को लाभ पहुँच सकता है और मानव जाति की शक्ति का एक भारी अपव्यय रुक सकता है।
युग-निर्माण योजना का साराँश मैंने तो यही समझा है कि वह जिन्दगी जीने की विद्या है। ‘जियो और जीने दो’ की शिक्षा का प्रसार करने के लिये ही यह कार्यक्रम बनाया गया है। इस प्रशिक्षण द्वारा मानव जाति की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति होगी। पृथ्वी पर स्वर्ग को अवतरित करने के इस महान कार्यक्रम की जितनी प्रशंसा की जाय कम है।
(श्री गौरीशंकर वाजपेयी)
शिक्षा को मनुष्य का ज्ञान-नेत्र कहा गया है। इन दो चर्म-नेत्रों से हम अपने आस-पास की वस्तुओं को देखते हैं, पर शिक्षा के माध्यम से समस्त संसार को देख और समझ सकते हैं। ज्ञान और विज्ञान का अक्षय भंडार पुस्तकों में भरा पड़ा है। महापुरुषों ने अपनी विद्या का सार निकाल कर पुस्तकों में सुरक्षित रख दिया है। शिक्षित व्यक्ति वह सब जानकारी आसानी से घर बैठे प्राप्त कर सकते हैं। संसार भर की गति-विधियों, रीति-नीतियों, विचार-धाराओं, ऐतिहासिक अनुभवों की जानकारी प्राप्त करने के लिये बहुमूल्य सामग्री पुस्तकों में मौजूद है। मानव जीवन की महत्ता, स्थिति उद्देश्य, समस्या और ठीक तरह जी सकने की कला सीखने के लिये भी हमें सत्साहित्य का सहारा लेना पड़ता हैं। जो शिक्षित नहीं उसके लिये ये सारे द्वार बन्द ही समझने चाहिये।
अशिक्षित को एक प्रकार से अंधा ही माना गया है, क्योंकि वह पशु-पक्षियों की तरह आँखों के आगे आने वाले पदार्थों को ही देख सकता है। अनुभूतियों और संवेदनाओं का रसास्वादन करने वाली कोमल वृत्तियाँ जो संगीत, साहित्य, कला के माध्यम से विकसित होती हैं, उस बेचारे के लिये दुर्लभ ही बनी रहती हैं। संसार के इतिहास को समझने और उसकी घटनाओं से शिक्षा ग्रहण करने में वह व्यक्ति कैसे समर्थ हो सकता है जो पढ़ना ही नहीं जानता? जहाँ वह रहता है वहाँ की स्थिति और समस्याएँ ही उसे सारी दुनिया प्रतीत होती हैं। उसे क्या पता कि हमारी स्थिति से सर्वथा भिन्न रीति-नीति अपनाये हुये व्यक्ति भी इस संसार में रहते हैं। तुलनात्मक अध्ययन किये बिना कोई कैसे जान सकता है कि हमारी गति विधियाँ ठीक हैं या उनमें सुधार की आवश्यकता है?
जो व्यक्ति कभी समाचार पत्रों को हाथ नहीं लगाता, उसे क्या मालूम कि दुनिया कितनी बड़ी है और उसमें प्रतिदिन कैसी-कैसी घटनायें हो रही हैं? संसार में उथल-पुथल मचा देने वाली और मौजूदा परिस्थिति में घोर उलट फेर करने वाली प्रचंड विचारधाराओं का रहस्य अशिक्षित व्यक्ति को कैसे विदित हो सकता है? चाहे इन्हीं क्रान्तिकारी परिवर्तनों के कारण उसका जीवन-क्रम सर्वथा बदल रहा हो तो भी वह उनके स्वरूप और परिणाम से अनजान ही बना रहता है। सभ्यतापूर्वक बैठना-उठना, पहनना-ओढ़ना, बोलना-चालना भी अब शिक्षा पर ही निर्भर हैं। आजीविका कमाने में अब शिक्षा भी पूँजी की ही तरह आवश्यक बन गई है। हिसाब रखने पत्र व्यवहार करने, सरकारी टैक्सों का उचित भुगतान करने आदि में शिक्षा की आवश्यकता पड़ती है। जो लोग नौकरी से गुजारा करते हैं उनके लिये तो शिक्षा एक प्रकार से अनिवार्य ही है। बिना पढ़े व्यक्ति को कठिन शारीरिक श्रम करने पर भी बहुत थोड़े पैसे मिलते हैं जब कि शिक्षित व्यक्ति कम समय में और कम श्रम में अधिक कमा सकता है।
यों शिक्षा की आवश्यकता सदा से रही है, पर अब तो उसके बिना काम चल सकना ही कठिन हो गया है। अपनी गिनती सभ्य लोगों में कराने के लिये यह आवश्यक है कि मनुष्य शिक्षा प्राप्त करे। अशिक्षा को मनुष्यता का कलंक और राष्ट्र का दुर्भाग्य ही कहना चाहिये। जो देश शिक्षा की दृष्टि से जितना पिछड़ा हुआ होगा वह उतना ही गिरा हुआ माना जायगा। इसलिये समझदार नेता और दूरदर्शी समाज-संचालक इस बात के लिये प्राणपण से चेष्टा करते रहते हैं कि उनका राष्ट्र जितना जल्दी संभव हो सके अशिक्षा रूप अभिशाप के पंजे से छुटकारा पा जाय। इस कार्य में जितनी देर लगती है प्रगति के कार्य में उतनी ही बाधा पड़ती रहती है।
संसार के सभी उन्नतिशील देशों ने सब से अधिक ध्यान और सबसे अधिक महत्व अपनी शिक्षा समस्या को दिया है और उसको हल करने में उन्होंने हर संभव उपाय से काम लिया है। प्रगति पथ तभी प्रशस्त हुआ है जब कि शिक्षा का विकास किया गया है। छोटे बच्चों का शिक्षण स्कूलों में हो सकता है पर जब तक वे पढ़ लिखकर योग्य बनेंगे और देश के रचनात्मक कार्यों में सहयोग देने लायक हो सकेंगे तब तक राष्ट्र के विकास कार्यों को स्थगित नहीं रखा जा सकता। इसलिये जिस देश में अशिक्षितों की संख्या अधिक हो वहाँ प्रौढ़ शिक्षा पर सबसे अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होती है। हमारी सरकार ने इस दिशा में जो प्रयत्न किया है उसे अपर्याप्त और असंतोषजनक ही कहा जा सकता है। उत्तर-प्रदेश में बच्चों को स्कूलों में जगह मिल सकना ही एक समस्या बना हुआ है। जब उन्हीं के लिये पूरी व्यवस्था नहीं है तो बेचारे प्रौढ़ों की खबर कौन लें? आर्थिक तंगी, विभागीय कर्मचारियों का प्रमाद, जनता की उपेक्षा आदि कितनी ही बाधायें ऐसी हैं, जिनके कारण प्रौढ़-शिक्षा का प्रबन्ध किया जा सकना संभव नहीं हो रहा है। सरकार कुछ सोचती और करती भी है तो उसका उचित परिणाम निकलने में अनेकों बाधायें उपस्थित हो जाती हैं।
हमारे देश में शिक्षित व्यक्तियों की संख्या 23 प्रतिशत बताई गई है। सौ में से 77 व्यक्ति निरक्षर ही हैं। यदि हमको अपने देश को शीघ्र प्रगति करनी हो तो उसके लिये प्रौढ़-शिक्षा की समस्या का शीघ्र हल करना भी अनिवार्य है। वयस्क स्त्री-पुरुषों को साक्षर बनाने के लिये एक व्यापक आन्दोलन चलाया जाना आवश्यक है और जब तक यह समस्या हल न हो तब तक निरन्तर प्रयत्न करते रहना हम सबका परम कर्तव्य है।
क्यूबा में प्रौढ़ शिक्षा की समस्या को इस प्रकार हल किया गया था कि वहाँ प्रत्येक शिक्षित को देशभक्ति का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के लिये कहा गया और उसके लिये यह शर्त रखी गई कि वह सेवा भावना से कम से कम 5 प्रतिशत व्यक्तियों को शिक्षित बना कर दिखावे। जिनके पास इस प्रकार देशभक्ति के प्रमाणपत्र नहीं होते थे उनको राष्ट्रीय हित के प्रति उपेक्षा करने वाला समझा जाता था और सरकार से मिलने वाली सुविधाओं से उनको वंचित रहना पड़ता था। चुनाव में खड़े होने वालों को ऐसे प्रमाणपत्र आवश्यक रूप से प्रस्तुत करने पड़ते हैं। इसी प्रकार सरकारी ऋण, अनुदान या विशेष प्रोत्साहन प्राप्त करने के लिये इन प्रमाणपत्रों को प्राथमिकता दी जाती है। इन लाभों के कारण वहाँ कि शिक्षितों ने उत्साहपूर्वक शिक्षा-प्रसार के कार्य को अपनाया और 4-5 वर्ष के भीतर अशिक्षा का पूरी तरह उन्मूलन हो गया। उपयुक्त आयु का एक भी व्यक्ति निरक्षर न बचा। हमारी सरकार भी इस प्रकार का कोई कदम उठा कर इस समस्या को बहुत कुछ हल कर सकती है।
सरकार क्या करेगी और कब करेगी, इसकी प्रतीक्षा न करके यदि सेवाभावी संस्थाएँ और व्यक्ति भी इस समस्या को हल करने के लिये उठ खड़े हों तो बहुत काम हो सकता है। हमारे देश में धर्म के नाम पर धन और समय पर्याप्त मात्रा में व्यय किया जाता है। कथा, ब्रह्मभोज, तीर्थ यात्रा, देवाराधन के लिये अरबों रुपया खर्च होता रहता है। 56 लाख व्यक्ति तो साधुओं के रूप में धर्म-कार्य के व्रतधारी माने ही जाते हैं। फिर ऐसे लोगों की संख्या भी कम नहीं है जो अपनी आजीविका कमाने के साथ-साथ धर्म-कार्यों में काफी समय लगाते हैं। यदि इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों को एक करोड़ भी मान लिया जाय और उनमें से एक चौथाई भी ऐसे निकल सकें जो साक्षरता प्रचार का कार्य करने योग्य हों तो 25-30 लाख व्यक्ति तो इस कार्य के लिये धार्मिक क्षेत्र में से ही मिल सकते हैं। यदि ये लोग इस बात का अनुभव कर सकें कि विद्या-दान भी धर्म का एक बहुत बड़ा अंग है और उसके लिये नियमित रूप से समय देने लग जाये तो यह एक बहुत बड़ा काम हो सकता है। यदि प्रत्येक व्यक्ति एक वर्ष में दस व्यक्तियों को साक्षर बनाने की प्रतिज्ञा ले तो 25 लाख व्यक्ति प्रति वर्ष ढाई करोड़ व्यक्तियों को साक्षर बना सकते हैं।
यह तो केवल धर्म-क्षेत्र के व्यक्तियों की बात हुई। अब सरकारी कार्यों में, शिक्षा संस्थाओं में सामाजिक सेवा कार्यों में लगे हुये व्यक्ति भी यदि इस ओर ध्यान देने लगे तो करीब इतने ही व्यक्ति और भी निकल सकते हैं और इस प्रकार प्रति वर्ष पाँच करोड़ व्यक्तियों को साक्षर बनाने का कार्य हो सकता है। इस गति से चलते हुये 5-6 वर्षों में निरक्षरता उन्मूलन का लक्ष्य पूरी तरह सहज में ही प्राप्त किया जा सकता है।
यों देखने में यह कार्य बहुत बड़ा मालूम पड़ता और कठिन भी। पर वास्तव में बात ऐसी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति के भीतर कुछ न कुछ त्याग, उदारता, पुण्य, परमार्थ के भाव रहते ही है। जब उनको जागृत कर दिया जाता है तो मनुष्य बड़े से बड़े त्याग और बलिदान का परिचय देने में नहीं चूकता। यदि जन-मानस की कोमल भावनाओं को जागृत करने के लिये व्यापक ज्ञान-यज्ञ आरम्भ किया जाय तो विश्वास है कि वह प्रयत्न निरर्थक नहीं जायगा। आचार्यजी ने सन् 1958 में एक हजार कुण्डों का गायत्री महायज्ञ मथुरा में किया था। उसमें प्रायः 5 लाख व्यक्ति भारत के कोने-कोने से पहुँचे थे। इनमें से प्रत्येक व्यक्ति के किराये-भाड़े तथा काम हर्ज करके यात्रा करने में औसत हिसाब से 40-50 रुपया अवश्य खर्च हुआ होगा। भावनाओं के जागृति करने से ही इतना समय और धन खर्च कर सकना लोगों के लिये सम्भव हुआ। यदि वे भावनाएं शिक्षा-प्रसार की दशा में जागृत कर हो जायँ और आचार्य जी के यज्ञ में आने वाले वे लाख व्यक्ति ही प्रौढ़ शिक्षा में लग पड़े तो इतना बड़ा काम हो सकता है कि लोग आश्चर्य चकित वह जावें और अन्य संस्थायें भी इसी का अनुकरण करने लगें।
जून की ‘अखण्ड-’ में जो योजना सम्बन्धी कार्यक्रम छपा है उसे मैंने ध्यानपूर्वक पढ़ा है। वैसे ही उसमें जितने कार्यक्रम बतलाये गये हैं सभी महत्वपूर्ण हैं पर मुझे सबसे अधिक सामयिक और उपयोगी प्रौढ़ शिक्षा वाला आन्दोलन ही जान पड़ा। प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति अपना ‘ज्ञान-ऋण’ चुकाने के लिये कुछ समय और कुछ धन नियमित रूप से खर्च करने लगे तो घर-घर में, मुहल्ले-मुहल्ले प्रौढ़-पाठशालाएं चल सकती हैं। पुरुष, पुरुषों को पढ़ायें और महिला, महिलाओं को। इस प्रकार हट शिक्षित के लिये एक धर्मभावना युक्त श्रेष्ठ पुण्य परमार्थ और देशभक्ति से पूर्ण मनोरंजक कार्यक्रम मिल सकता हैं। जो शिक्षित स्वयं न करना चाहें, वे ज्ञान-ऋण चुकाने के लिये कुछ धन हर महीने देने लगें तो ऐसे कुछ व्यक्तियों के सम्मिलित रुपयों से अध्यापकों को नौकर रखकर भी यह कार्य किया जा सकता है। अन्य कार्यों में लगे रहने वाले व्यक्तियों की ज्ञान-वृद्धि के लिये ऐसी रात्रि पाठशालाओं की भी भारी आवश्यकता है जिनके माध्यम से लोग अपनी विद्या और योग्यता को निरन्तर बढ़ाते चलें। स्कूलों में बालक जितनी शिक्षा प्राप्त कर लेते हैं उतनी ही पर्याप्त नहीं समझी नहीं चाहिये। काम से लग जाने के बाद भी शिक्षा का क्रम जारी रह सके, इसके लिये विभिन्न प्रकार का रात्रि पाठशालाएं खोली जाने आवश्यक हैं। जहाँ जैसी आवश्यकता हो वहाँ वैसे प्रयत्न आरम्भ किये जानी चाहिये और शिक्षा का स्तर बढ़ता ही रहना चाहिये। देश जितना सुशिक्षित और सुसंस्कृत होगा उतना ही उसका गौरव बढ़ता जायगा।
शतं दद्यान्न विवदेदिति विज्ञस्य संमतम्।
बिना हेतुमपि द्वन्द्वमेतन्मूर्खस्य लक्षणम्॥
-हितोपदेश
अपनी सैकड़ों की हानि सहन करले पर झगड़े को बचावे यह बुद्धिमानों का मार्ग है और बिना किसी कारण ही कलह कर बैठना मूर्ख का लक्षण है।
‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों में से प्रत्येक को अपने परिवार के निरक्षरों को साक्षर बनाने के लिये परिवार-विद्यालय चलाने पर बहुत जोर दिया है। वास्तव में प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य का आरम्भ अपने घर से होना चाहिये। घर में शिक्षा का प्रसार करने के बाद स्वभावतः मनुष्य का उत्साह बढ़ेगा और वह उसके लिये समय तथा धन भी खर्च करने लगेगा। आचार्य जी का व्यक्तिगत प्रभाव लाखों लोगों पर है, उनके चलाये आन्दोलनों में सहज ही वे लोग आगे बढ़कर भाग ले सकते हैं। इस आन्दोलन से देश का महान कल्याण होगा इसमें कोई सन्देह नहीं।
लघु कथा-
सफलता का श्रेय किसे मिले इस प्रश्न पर एक दिन विवाद उठ खड़ा हुआ। ‘संकल्प’ ने अपने को, ‘बल’ ने अपने को और ‘बुद्धि’ ने अपने को अधिक महत्वपूर्ण बताया। तीनों अपनी-अपनी बात पर अड़े हुये थे। अन्त में तय हुआ कि ‘विवेक’ को पंच बना इस झगड़े का फैसला कराया जाय।
तीनों को साथ लेकर विवेक चल पड़ा। उसने एक हाथ में लोहे की टेढ़ी कील ली और दूसरे में हथौड़ा। चलते-चलते वे लोग ऐसे स्थान पर पहुँचे जहाँ एक सुन्दर बालक खेल रहा था। विवेक ने बालक से कहा कि-”बेटा, इस टेढ़ी कील को अगर तुम हथौड़ा से ठोंक कर सीधी कर दो तो मैं तुमको भर पेट मिठाई खिलाऊँ खिलौनी से भरी एक पिटारी भी दूँ।”
बालक की आँखें चमक उठीं। वह बड़ी आशा और उत्साह से प्रयत्न करने लगा। पर कील को सीधा कर सकना तो दूर उससे हथौड़ा उठा तक नहीं। भारी औजार को उठाने लायक उसके हाथों में बल नहीं था। बहुत प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिली तो बालक खिन्न होकर चला गया।
इससे उन लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला कि सफलता प्राप्त करने को अकेला ‘संकल्प’ अपर्याप्त है।
चारों आगे बढ़े तो थोड़ी दूर जाने पर एक श्रमिक दिखाई दिया। वह खर्राटे लेता हुआ सो रहा था। विवेक ने उसे झकझोर कर जगाया और कहा कि “इस कील को हथौड़ा मार कर सीधा कर दो तो मैं तुम्हें दस रुपया दूँगा। उनींदी आँखों से श्रमिक ने कुछ प्रयत्न भी किया, पर वह आँखों से श्रमिक ने कुछ प्रयत्न भी किया, पर वह नींद की खुमारी में ही बना रहा। उसने हथौड़ा एक ओर रख दिया और वहीं लेट कर खर्राटे भरने लगा।
निष्कर्ष निकला कि अकेला ‘बल’ भी काफी नहीं है। सामर्थ्य रखते हुये भी संकल्प न होने से श्रमिक जब कील को सीधी न कर सका तो इसके सिवाय और क्या कहा जा सकता था।
चारों आगे बढ़े। सामने से एक सुसज्जित वेश-भूषा वाला कलाकार आता दिखाई दिया। विवेक ने प्रार्थना की कि “अगर आप इस कील को सीधी कर सको तो एक अशर्फी आपको भेंट की जायगी।”
कलाकार तैयार हो गया। उसने रेतीली जमीन पर कील को रखा और जोर से हथौड़े की चोट मारी। धमाके के साथ धूल ऊपर उड़ी और पाँचों की आँखों में भर गई। अब वे कील का सीधा करना तो भूल गये और आँखों के बचाव की चिन्ता करने लगे। कलाकार हथौड़ा पटक कर अपनी राह चला गया। विवेक ने कहा कि हमें लौट चलना चाहिये, क्योंकि जिस बात को हम जानना चाहते थे वह मालूम पड़ गई। संकल्प, बल और बुद्धि का सम्मिलित रूप ही सफलता का श्रेय प्राप्त कर सकता है। एकाकी रूप में आप लोग तीनों अधूरे-अपूर्ण हैं।
एक बार एक डरपोक खरगोश अपनी झाड़ी के पास बहुत चिन्तित होकर बैठा था। पास में रहने वाले दूसरे जानवर उसकी व्यथा जानने के लिये इकट्ठे हो गये और पूछने लगे कि वह किस कारण इतना परेशान हो रहा है?
खरगोश ने कहा-विपत्ति के बादल सिर पर मँडरा रहे हैं, क्या तुम इस बात को समझते नहीं। किसी भी क्षण मुसीबत हमारे ऊपर बिजली की तरह गिर सकती है। तुम को इस बात पर खूब विचार करना चाहिये और उससे बचने के उपायों पर ध्यान देना चाहिये।
सभी जानवर गम्भीर हो गये और किसी भारी विपत्ति की कल्पना करके डरने लगे। उन्होंने खरगोश से कहा- आखिर बात क्या है? कुछ बतलाओ तो सही।
खरगोश की छाती धड़क रही थी। उसने किसी प्रकार अपने को संभालकर कहना आरम्भ किया-यह इतना बड़ा आकाश हमारे सिरों के ऊपर फैला हुआ है। इसके वजन का कुछ ठिकाना नहीं। असंख्य तारों समेत इस भारी आसमान का कभी भी हमारे ऊपर गिर पड़ना संभव है। यदि ऐसा हुआ तो हम बात की बात में कुचल जायेंगे। क्या यह कोई कम डर की बात है?
उसने फिर कहा-यह धरती बिना किसी सहारे के अधर में लटक रही है। क्या पता कभी नीचे धसकने लग जाय। यदि ऐसा हुआ तो हम न जाने किस गर्त में जा गिरेंगे। और तुम देखते नहीं कि धरती पर प्राणियों की संख्या बढ़ रही है और खाद्य घट रहा है। यदि ऐसा ही क्रम रहा तो एक दिन भूखों मन जाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहेगा।
वहाँ पर मौजूद जानवरों को ये बातें व्यर्थ की जान पड़ी और उन्होंने उन्हें अनसुनी कर दिया। कई जानवर कहने लगे कि विपत्ति का समय आने पर उसका कोई न कोई उपाय कर लिया जायगा, अभी से इस प्रकार का भय करके सदा डरते रहना मूर्खता की बात है।
पर कोई-कोई जानवर बहुत शंकाशील निकले। वे भी खरगोश की तरह डर गये और अपने बचाव का उपाय सोचने लगे। टिटहरी आकाश की ओर पैर करके सोने लगी ताकि ऊपर से इतना भारी बोझा गिरे तो वह उसे अपने पैरों पर रोक ले। बन्दर पेड़ से कई-कई बार उतर कर यह देखने लगा कि कहीं धरती धसक तो नहीं रही है। केंचुए ने मिट्टी खाने की आदत डाली ताकि भोजन समाप्त होने पर भी वह अपना गुजारा कर सके।
कहते हैं कि खरगोश को यह तीन ही अनुयायी मिले और वे तीनों उसी चाल पर अब तक चले जा रहे हैं।
सूरज आकाश में होकर गुजर रहा था तो उसने सुना कि कुछ लोग इकट्ठा होकर उसे देवता न कह कर आग का गोला मात्र बता रहे हैं। इस पर सूरज को बड़ा बुरा जान पड़ा और उसने दूसरे दिन अपने रथ पर चढ़कर जाने से इनकार कर दिया।
संसार में हलचल मच गई। प्रभात होने में देर होते देखकर सभी देव-दानव चिन्ता में डूब गये। कारण जानने और बाधा को हटाने के लिये प्राची से कहा गया। प्राची ने सूरज की बहुत कुछ प्रशंसा और अभ्यर्थना की और उसे सदा की भाँति रथ पर चढ़कर जाने के लिये मनाया।
सूरज बोला-जिन लोगों का अनादि काल से मैं इतना उपकार कर रहा हूँ वे मुझ आग का गोला कहें, तो ऐसे कृतघ्नों का अब मैं मुँह भी न देखूँगा। अब मैं यात्रा पर जाना नहीं चाहता।
प्राची ने उसे समझाया-लोक-दृष्टि तो बालकों द्वारा फेंके गये पत्थरों के समान है। विचारशील समुद्र की तरह गम्भीर होते है, फेंके हुये पत्थर उसके गर्भ में विलीन हो जाती है। पर अहंकारी कच्चे घड़े के समान होता है जो छोटे से आघात को भी सहन नहीं कर सकता और जरा-सी चोट से टूट कर छितरा जाता है। आपको क्षुद्र कच्चे घड़े की तरह नहीं वरन् गम्भीर समुद्र की तरह की व्यवहार करना चाहिये।
सूरज विचारों में डूब गया और उसे यात्रा के लिये रथ पर सवार होकर जाना ही उचित जान पड़ा।
(श्री जानकीनन्दन शरण गार्ग्य)
गुणों का अभ्यास क्रियाओं के द्वारा किया जाता है। तैरना सीखने के लिये तालाब में उतरना पड़ता है। पहलवानी सीखने वाले अखाड़े का आश्रय लेते हैं। संगीत सीखने वाले बाजों की सहायता लेते हैं। ईश्वर-भक्ति की भावना बढ़ाने के लिये पूजा-उपासना में संलग्न होना पड़ता है। शिक्षार्थी को कापी, पुस्तक, कलम, दवात का उपयोग करने की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिकों को अपने अन्वेषण कार्य में अनेक प्रकार के यन्त्रों, रासायनिक द्रव्यों और प्रयोगशालाओं की जरूरत होती है। सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिये सत्कर्मों में लगे रहने का कार्यक्रम बनाना पड़ता है। केवल चाहने या सोचने से सद्गुणों का अभ्यास नहीं हो सकता, लिये जो सद्गुणों की उपयोगिता और महत्व का अनुभव करते हों, उनको अपने भीतर जमा हुआ देखना चाहते हों, उनके लिये आवश्यक है कि अपने दैनिक जीवन में किसी न किसी रूप में सत्कार्यों का व्यवहार अवश्य करते रहें। जो विचार उपयोगी प्रतीत होते हैं उन्हें कार्यान्वित करने के लिये भी तत्पर रहें।
युग-निर्माण योजना एक आध्यात्मिक आन्दोलन है। मनुष्य यदि सच्चे अर्थों में मनुष्य बनना चाहता हो, आध्यात्मिकता को वचन मात्र की वस्तु न रख कर उसे अपने जीवन में उतारना चाहता हो, तो यह नितान्त आवश्यक है कि वह आध्यात्मिक गुणों को अपने स्वभाव का एक अंग बनाने का प्रयत्न करें। इस महान तत्वज्ञान का प्रयोजन यही है कि पूजा, स्वाध्याय, ध्यान, भजन, कथा-कीर्तन, व्रत, उपवास द्वारा अपने स्वभाव को ऐसा बनावे जिससे आध्यात्मिक आदर्शों के अनुकूल गति-विधियाँ स्वाभाविक रूप से अपनाने लगे। सत्कर्मों के पुण्यफल से ही तो सुख शान्ति की प्राप्ति होती है और सत्कर्म तभी होने लगते हैं जब कि मन में सद्गुणों का निवास हो जाय। इसलिये शास्त्रों में सद्विचारों और सद्गुणों को ही समस्त सुख-शान्ति का मूल बतलाया है और उनके निरन्तर अभ्यास तथा वृद्धि पर अत्यधिक जोर दिया है।
सत्कर्मों को अभ्यास में लाते हुए मनुष्य अपने सद्गुणों को बढ़ाये और सद्भावनाओं की दैवी सम्पत्ति को संचित करता हुआ जीवन-लक्ष्य की पूर्ति में सफल हो, यही उद्देश्य युग-निर्माण योजना में सन्निहित है। उसके कार्यक्रमों में इस बात का ध्यान रखा गया है कि मनुष्य अपने स्वार्थ और संकीर्णता को कम करता हुआ परमार्थ समझने लगे। हमारा पतन तभी से आरम्भ हुआ जब से व्यक्तिगत स्वार्थ का भाव बढ़ने लगा। जब हर व्यक्ति अपने मतलब की बात ही सुनना और करना चाहता है तो स्वभावतः नीचे की ओर गिरने लगता है। उसके विचार और कार्य दिन-दिन अधिक घृणित और निकृष्ट होते जाते हैं। ऐसे व्यक्तियों का समाज सदैव क्लेश और द्वेष की नारकीय भावनाओं में ग्रस्त रहता है और पीड़ा तथा कष्टों से कराहता रहता है। पिछले दिनों हमारा सबसे बड़ा दोष व्यक्तिवाद रहा है। उसी के कारण हम एक हजार वर्ष तक दूसरों के गुलाम बने रहे हैं। अब भी वह हमारे राष्ट्र और समाज की प्रगति में एक बड़ा रोड़ा सिद्ध हो रहा है।
जब तक स्वार्थपरता का दायरा कम नहीं होता तब तक व्यक्ति कितना ही योग्य और कार्यकुशल क्यों न हो वह समाज के लिये अभिशाप एवं संकट बन कर ही रहेगा। किसी समाज की उन्नति और सुख-शान्ति इसी बात पर निर्भर है कि उसके सदस्य-व्यक्तिगत लाभ को कम और समूहगत लाभ को अधिक महत्व दें। आध्यात्मिकता का लक्ष्य भी यही है। पर इस लक्ष्य के अनुसार लोगों को व्यवहार न करते देखकर साम्यवादी सिद्धान्त के अनुयाइयों ने बलपूर्वक मनुष्य को परमार्थी और संयमी बनने के लिये विवश किया है। रास्ता एक ही है, चाहे उसे आध्यात्मिक मार्ग पर चलते हुए आत्म सन्तोष, पुण्य एवं आन्तरिक लाभ उठाते हुए पूरा किया जाय अथवा डंडे के बल पर साम्यवादी व्यवस्था द्वारा रोते कलपते स्वीकार किया जाय। करना यही पड़ेगा। मनुष्य को स्वार्थ की संकीर्णता से ऊँचा उठकर परमार्थ की श्रेष्ठता को ही स्वीकार करना होगा। इस परिवर्तन के बिना एक भी उलझन सुलझेगी नहीं। इसलिये हमको यही प्रयत्न करना चाहिये कि मनुष्य का अन्तःकरण तृष्णा वासना की गन्दी कीचड़ से बाहर निकले और पुण्य-परमार्थ की मलय मारुत का रसास्वादन करते हुए अपने को धन्य बनावे।
युग-निर्माण योजना का निर्माण इन्हीं तथ्यों को दृष्टिगोचर रखकर किया गया है। उसमें प्रयत्न यह किया गया है कि मनुष्य (1) उपासना (2) आत्मशोधन और (3) परमार्थ के त्रिविधि कार्यक्रम को अपनाता हुआ आत्मकल्याण का लक्ष्य भी पूरा करे और संसार की सुख-शांति बढ़ाने में योगदान देता हुआ यशस्वी बने। अपनी क्षमता और रुचि के अनुसार हममें से प्रत्येक को निश्चय कर लेना चाहिये और उसे पूर्ण करते हुये तथा अपने सद्गुणों को बढ़ाते हुए प्रगति-मार्ग पर बढ़ना चाहिये। लोक कल्याण तो इस प्रकार होता ही रहेगा।
अपने से छोटों को भी ‘तू’ न कहकर तुम या आप कहा जाय तो उसकी प्रतिक्रिया स्वभावतः होगी ही। दूसरे भी वैसा ही कहने लगेंगे। बड़ों के चरण स्पर्श करने की पद्धति चल पड़े तो अनुशासनहीनता की भावना मिटकर गुरुजनों के प्रति श्रद्धा भावना स्वभावतः पनपेगी। एक व्यक्ति दूसरों का सम्मान करे तो उसे भी दूसरे व्यक्तियों से सम्मान प्राप्त होगा। परस्पर शिष्टाचार, सम्मान, सद्भाव और श्रद्धा को बढ़ाने का अभ्यास करते हुए हम सज्जनता और सौजन्य की ही वृद्धि करेंगे। इससे हमारा आन्तरिक स्तर ऊँचा उठेगा और संसार में सद्भावना की एक श्रेष्ठ परम्परा का विकास होगा।
परिवार-निर्माण का कार्यक्रम अपनाकर यदि हम रोज अपने घर वालों को सभ्यता और सज्जनता की शिक्षा देंगे तो स्वभावतः हमें भी वैसा ही बनना पड़ेगा। बाहर वालों के आगे लम्बी-चौड़ी बातें हाँकी जा सकती हैं, पर घर वालों को तो अपनी सारी बातें मालूम होती हैं, इसलिये उन्हें जो कुछ सिखाना हो उसे अपने जीवन में भी ढालना पड़ता है। अन्यथा उपहास ही होगा। परिवार के लोग अपनी दैनिक विचार गोष्ठी से लाभ न भी उठावें या उन पर थोड़ा-सा ही प्रभाव पड़े पर हमको तो उनके सामने अपना वैसा सुधरा हुआ रूप रखना ही पड़ेगा, जो एक शिक्षक के उपयुक्त हो। ऐसी दशा में अपना सुधार तो होगा ही।
दीवारों पर शिक्षाप्रद वाक्य लिखने से जहाँ अपनी कृति पर संतोष होता है वहाँ वे विचार मन में गूँजते भी रहते हैं। उन विचारों के प्रति अपना आकर्षण और झुकाव बढ़ता है और फलस्वरूप एक मनोवैज्ञानिक प्रभाव हमें वैसा ही बनने या ढलने के लिये विवश करने लगता है।
‘एक से दस योजना’ के अनुसार जिन दस व्यक्तियों तक युग-निर्माण योजना की उत्कृष्ट विचारधारा पहुँचाने का उत्तरदायित्व हम अपने ऊपर लेंगे उनकी दृष्टि में अपना स्वरूप निश्चय ही एक परमार्थी और लोकसेवक का होगा। जो परामर्श बार-बार उन्हें देते रहेंगे उस पर स्वयं भी अमल करना होगा। इस प्रकार एक प्रकार की लोक-लाज के बंधन बँधेंगे और विवश होकर अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा के लिये वैसा ही बनना पड़ेगा जैसा कि दूसरों से बार-बार कहते हैं। किसी से सम्बन्ध न रखने वाला कुछ भी करता रह सकता है, पर धर्म-प्रचारक का रूप, चाहे 10 व्यक्तियों तक ही सीमित क्यों न हो, जब बन गया तो एक ऐसी लोक-लाज सम्मुख आ जाती है जो कुमार्ग पर जाने से बलपूर्वक रोके रखती है और दूसरों की अपेक्षा अपने को अधिक आदर्शवादी रहने की प्रेरणा करती है। संजीवन-विद्या की शिक्षा दूसरों को देने का साहस करने वाला व्यक्ति क्या उन आदर्शों से अपने आपको अछूता रख सकता है? मेंहदी पीसने वाले के हाथ जिस प्रकार अपने आप ही लाल हो जाते हैं उसी प्रकार सद्ज्ञान प्रचार का थोड़ा-सा भी कार्य अपने हाथ में लेने से उसका लाभ अपने को तो मिलेगा ही।
अपनी निश्चित आजीविका में से एक निश्चित अंश ज्ञान-दान के लिये लगाते रहने से उस पैसे से समीपवर्ती क्षेत्र में पाठशालाएं, पुस्तकालय, नवयुग केन्द्र, प्रचार-सामग्री वितरण, शिविर-सम्मेलन आदि की व्यवस्था में उसे लगाया जाय तो दूसरे लोग सच्चे अध्यात्म का-जीवन विद्या का-प्रकाश प्राप्त कर सकेंगे और उसका पुण्यफल भी हमको प्राप्त होगा। दान के माध्यम से सेवा और सेवा कार्यों में दान का उपयोग नित्य ही होते रहने से यह स्वर्ण-सुयोग अपनी आत्मा को निरन्तर परोपकारी बनाये रखने में सहायक होगा। ऐसे कार्यों में धन और समय दोनों का सम्मिलित प्रयोग होता रहे, तो मनुष्य की परमार्थ भावनाएँ धीरे-धीरे अवश्य विकसित होंगी। जिन व्यक्तियों के परिवार की जिम्मेदारी उनके पुत्र और अन्य घर के लोग उठाने लग गये हैं वे वानप्रस्थ के समान घर से अवकाश लेकर उपासना और सेवा कार्यों में अधिकाधिक समय लगाते हुये गृहस्थ में रहकर भी संन्यास का सा सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।
सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन में जो अविवेकी जनता से टक्कर लेनी पड़ती है उससे अपना आत्मबल और साहस बढ़ता है। अनीति और अविवेक का प्रतिकार करने में जो कष्ट उठाना पड़ता है-उपहास, तिरस्कार, विरोध, आक्रमण, प्रतिशोध सहना पड़ता है उससे सत्यनिष्ठ व्यक्ति का धैर्य, शौर्य, तेज, ओज और आत्मबल निरंतर बढ़ता है।
दहेज, मृत्युभोज, पशु-बलि, बाल-विवाह, अनमेल विवाह, कन्या विक्रय, नशेबाजी, माँसाहार, भिक्षा-व्यवसाय, छूतछात, पर्दा, जेवरों में धन की बरबादी, भूत-पलीत की पूजा, अन्न की जूठन छोड़ना, अश्लीलता, जुआ, सट्टा आदि अनेकों सामाजिक कुरीतियाँ हमारे यहाँ प्रचलित हैं, उनको हटाकर स्वस्थ परम्परायें स्थापित करने में रूढ़िवादियों के साथ पग-पग पर टकराना पड़ सकता है। यह भी संभव है कि इस टकराव में अपने को क्षति उठानी पड़े। धर्म के लिये कष्ट उठाने का अवसर आने से मनुष्य के शौर्य और साहस की परीक्षा होती है, और उसका चरित्र उज्ज्वल बनता है।
वृक्ष, वनस्पति, शाक-भाजी, फल-फूल, जड़ी-बूटी की हरियाली लगाने से नेत्रों की शीलता और रोशनी बढ़ती है। ऑक्सीजन अधिक उत्पन्न होने से आरोग्य लाभ होता है। सात्विक खाद्य द्वारा सात्विक बुद्धि भी उत्पन्न होती है। सुगंध से मस्तिष्क को बल मिलता है। देश में अन्न की जो कमी पड़ रही है उसकी कुछ पूर्ति शाकों के उत्पादन से हो सकती है। जड़ी-बूटियों की कृषि होने लगे तो आयुर्वेद का खोया हुआ गौरव पुनः स्थापित होने लगे। आज कल जो सड़ी, गली, नकली, जड़ी-बूटियाँ बाजार में मिलती हैं उनका प्रभाव भी वैसा ही नाम मात्र का होता है। तुलसी का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगे और घर-घर में उसकी पूजा करने का नियम हो जाय तो भी आरोग्य और सात्विकता की बहुत वृद्धि हो। जहाँ वृक्ष अधिक होते हैं वहाँ वर्षा भी अधिक होने का प्रतिपादन वैज्ञानिकों ने किया है। पशु पालन के लिये भी हरियाली की वृद्धि आवश्यक है। भवन निर्माण, जलावन, फर्नीचर आदि सभी कार्यों में लकड़ी चाहिये। पशुओं की भाँति वृक्ष भी हमारा बहुत उपकार करते हैं, इसलिये उनका उत्पादन और वृद्धि करने के लिये भी युग-निर्माण योजना में विशेष रूप से बल दिया गया है। इस कार्यक्रम को अपनाने की जिनकी स्थिति हो वे सचमुच पुण्य प्राप्ति के साथ-साथ समाज की बड़ी सेवा भी कर सकते हैं। जिनके पास कृषि योग्य भूमि है उन्हें तो इस ओर अवश्य ध्यान देना चाहिये। गाँवों में शाक-भाजी की भारी कमी देखी जाती है उसका कारण हमारी उपेक्षा बुद्धि हो है। भारत भूमि को हरी-भरी शस्य-श्यामला बनाने के लिये हमें इस पुण्य कार्य के लिये अवश्य अपनी स्थिति के अनुसार प्रयत्न करना चाहिये।
गौ, भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिये मेरुदण्ड के समान है। गोबर की खाद और बैल की शक्ति के बिना इस गरीब देश का काम ट्रैक्टरों और रासायनिक खाद से पूरा नहीं हो सकता। दूध के आवश्यक गुण गौ-दुग्ध में ही होते हैं। संसार भर में इसे ही उपयोगी माना गया है और हर जगह दूध के लिये गाय ही पाली जाती है। भैंस के दूध में घी भले ही ज्यादा हो पर गुण की दृष्टि से वह बहुत ही गया-बीता है। धर्म कार्यों में भी गौघृत का ही विधान है। हमारा दुर्भाग्य है कि गौ-वंश का स्तर भी गिरता जा रहा है और उसकी हत्या भी तीव्र गति से हो रही है। हमें गौ-पालन और गौ-संरक्षण के लिये ठोस कदम उठाने चाहिये, जिससे कृषि और दूध की समस्या का हल निकल सके। गाय में जो आध्यात्मिक सूक्ष्म विशेषताएँ हैं वे हमारे भावना स्तर एवं अन्तःकरण को सन्मार्ग पर प्रेरित करने में बड़ी सहायक होती हैं। भगवान कृष्ण ने गोपाल बनकर, गोवर्द्धन का कार्यक्रम ऊँचा उठाकर संसार का भारी उपकार किया था। इस उपकारी कार्यक्रम में हमें भी शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिये।
मनुष्य के सोलह संस्कार यदि ठीक प्रकार मनाये जा सकें तो उसके अन्तःकरण में श्रेष्ठता की ओर अग्रसर करने वाली छाप पड़ेगी। पर्व-त्यौहारों को मिल-जुलकर मनाया जा सके तो उससे सामाजिक जीवन को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा मिलेगी। जन्मदिन मनाने से मनुष्य गौरव और सम्मान का अनुभव करता है और शेष जीवन का सदुपयोग करने की प्रेरणा मिलती है। इन समारोहों को धार्मिक कर्मकाण्ड के साथ किया जाय और साथ ही सद्-विचार, प्रेरणा, जीवन-विद्या, धर्म, नीति आदि को भी माध्यम बनाया जाय तो सर्व साधारण में श्रेष्ठ भावनाओं की वृद्धि करने में काफी सहायता मिल सकती हैं।
मंदिर, मठों का सदुपयोग होने लगे तो वे साँस्कृतिक पुनरुत्थान, युग-परिवर्तन और समाज की नव रचना के महत्वपूर्ण केन्द्र बन सकते हैं। गायत्री-मंत्र लेखन संग्रह करके नये युग-निर्माण-मन्दिर स्थापित किये जा सकते हैं। जहाँ अपनी विचारधारा के दस-पाँच व्यक्ति भी हों, वहाँ वे मिल-जुलकर ‘युग-निर्माण मित्र-मण्डल’ चला सकते हैं और उसके द्वारा उस क्षेत्र में प्रेरणा और प्रकाश प्रदान करने का बहुत काम हो सकता है। नव रात्रि में 8 दिन के शिक्षण शिविर चलाये जा सकते हैं। उनमें व्यवहारिक जीवन को आध्यात्मवादी बनाने का प्रशिक्षण दिया जाया करे तो बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति के लिये पृष्ठभूमि तैयार हो सकती है।
साहित्यकार नवयुग के अनुरूप धर्म और व्यवहार का समन्वय सिखाने वाला साहित्य लिखें। प्रकाशक इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये छापने और बेचने की व्यवस्था करे, चित्रकार ऐसे ही सद्प्रेरणाप्रद चित्र बनावे, कवि और गायक अपनी कला द्वारा जन साधारण में आदर्शवाद और कर्तव्य-परायणता की उमंगे उठावे, अभिनेता ऐसे श्रेष्ठ और मनोरंजक साधन प्रस्तुत करें जो जन-मानस को ऊँचा उठावे। इसी प्रकार व्यापारी अपना व्यापार ऐसी सच्चाई और जन हित की भावना से करें कि उससे जनता का स्तर ऊँचा हो सके। ऐसे प्रेस हर शहर में होने चाहिये जो युग-निर्माण कार्यक्रम के केन्द्र रहें और इसी विषय का साहित्य प्रकाशित करते रहें। सदियों की गुलामी के बाद जगी हुई भारतीय जनता की बौद्धिक भूख को बुझाने के लिये ज्ञान-उपकरणों की बड़ी मात्रा में आवश्यकता है। विज्ञ जनों को इसकी पूर्ति के लिये तत्पर होना चाहिये।
अध्यापक और चिकित्सक इस सम्बन्ध में सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं। उनके पास जो रोगी आते हैं उन्हें वे औषधि के साथ-साथ पथ्य-रूप में उपासना, आत्म शोधन और सेवा कार्य करते रहने की भी शिक्षा दे सकते हैं। यह उनके पूर्व कर्मों का निराकरण करने वाला एक प्रायश्चित होगा, जिससे आगामी जीवन सुखी बन सकेगा। अध्यापक अपने छात्रों को शिक्षा के साथ-साथ चारित्रिक और नैतिक शिक्षा भी दे सकते हैं। बच्चों के अभिभावकों से भी उनका कुछ न कुछ संपर्क और प्रभाव भी रहता है। इस परिचय के आधार पर वे अभिभावकों को भी यह प्रेरणा दे सकते हैं कि बच्चों को सुधारने की दृष्टि वे स्वयं भी अपनी प्रवृत्तियों में सुधार करें। बड़े अधिकारी अपने छोटे मातहतों को, पुरोहित अपने यजमानों को, दुकानदार अपने ग्राहकों को, मालिक मजदूरों को अपने परिचय और प्रभाव का उपयोग करके सुधारने का प्रयत्न करते रहें तो इससे बहुत लाभ हो सकता है। इससे उनके दोष घटेंगे, और सद्गुणों का विकास होगा।
जैसे पीछे बतलाया जा चुका है युग-निर्माण योजना तीन भागों में विभक्त है-उपासना आत्मशोधन और सेवा। इनमें से गायत्री उपासना की शिक्षा आचार्य जी पिछले पन्द्रह वर्षों से देते आ रहे हैं। गत दो वर्षों से उसकी उच्चस्तरीय शिक्षा भी पंचकोशी साधना के रूप में चल रही है। योजना में सर्व साधारण के लिये सामान्य उपासना क्रम बतलाया गया है। इसे कार्यक्रम का एक अनिवार्य अंग मानना चाहिये। विशेष उपासना की विधि ‘गायत्री महा विज्ञान’ में मौजूद है और उसकी शिक्षा भी अधिकार भेद से दी जा रही है। शेष आत्मशोधन और सेवा कार्यों से अधिकाँश कार्यक्रम सम्बन्धित हैं। आत्म-कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये इन तीनों को ही पूर्ण करना पड़ता है। मुझे जान पड़ता हैं कि समाज की स्थिति को सुधारने और व्यक्ति को अपना जीवन लक्ष्यपूर्ण करने के लिये एक सन्तुलित और समन्वयपूर्ण कार्यक्रम युग-निर्माण-योजना के रूप में जनता के सामने रखा गया है, जिसके लिये निर्माता हमारे धन्यवाद के पात्र हैं।
महाप्राज्ञ का जब अन्तकाल निकट आया तो उसने अत्यन्त के द्वारा प्राप्त ‘सूर्यकान्त मणि’ अपने पुत्र सौमनस को दी और कहा- यह कामधेनु के समान मनोवाञ्छा प्रदान करने वाली है। इसको संभाल कर रखना। इससे तुम्हारी सब आवश्यकताएँ सहज में पूर्ण हो सकेंगी और तुम्हें कभी किसी चीज का अभाव नहीं हो सकेगा।
सौमनस ने मणि तो ले ली पर पिता के उपदेशों पर कुछ ध्यान नहीं दिया। रात्रि के समय दीपक के स्थान पर वह उसका उपयोग करने लगा। एक दिन उसकी प्रेयसी वेश्या ने उपहार में वह मणि माँगी और सौमनस ने उसे बिना किसी संकोच के दे डाला।
वेश्या ने कुछ समय बाद एक जौहरी के हाथ उसे बेच दिया और उस धन से शृंगार की सामग्री खरीद ली। जौहरी ने मणि की परीक्षा की और रासायनिक प्रयोगों द्वारा उसकी सहायता से बहुत-सा सोना बना लिया। इससे वह बड़ा वैभवशाली बन गया और अपना जीवन राजा-महाराजाओं की तरह व्यतीत करने लगा। अनेक दीन-दुखियों की भी उसने उस स्वर्ग राशि से बहुत सहायता की।
आनन्द ने अपने शिष्य विद्रुध को यह कथा सुनाते हुये कहा- वत्स। यह जीवन सूर्यकान्त मणि के समान है। इसका सदुपयोग करना कोई-कोई पारखी जौहरी ही जानते हैं, अन्यथा सौमनस और गणिका की तरह उसे कौड़ी मोल गँवा देने वाले ही बहुत होते हैं।
मानव नर और नारी के दो भागों में विभक्त है। गुठली के भीतर दो दल रहते है और दोनों के सम्मिश्रण से ही उसका अस्तित्व रहता है। इसी प्रकार नर-नारी का सम्मिलित स्वरूप ही मनुष्य नाम का अधिकारी होता है। नारी को अर्द्धांगिनी कहते हैं। आधा अंग पुरुष है, आधा नारी, दोनों ही अपूर्ण हैं। इस अपूर्णता की पूर्ति उनके पारस्परिक सहयोग से ही होता है।
जिस प्रकार शरीर में दो हाथ, दो पैर, दो आँखें, दो नथुने, दो कान, दो फेफड़े, दो गुर्दे, दो कंधे होते हैं और दोनों की उपयोगिता एवं स्थिति समान हैं, उसी प्रकार मानव जाति के दो अंग नर और नारी ईश्वर के यहाँ से अपनी अपनी विशेषता उपयोगिता एवं महत्ता लेकर आये हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक तो हैं, पर कोई, किसी से हेय सा हीन नहीं है। दोनों के कर्तव्य और अधिकार समान हैं। सुविधा की दृष्टि से प्राचीन काल में ऐसी व्यवस्था की गई कि एक घर की देखभाल करे और दूसरा बाहर जाकर उपार्जन का प्रयत्न करे। इस प्रकार का कार्य विभाजन कर लेने से दोनों को सुविधा और निश्चिन्तता रहती है। संसार के अधिकाँश भागों में बहुत करके पुरुष बाहर का काम सँभालना है और स्त्रियाँ गृह कार्य करती हैं। पर वह नियम भी कोई पत्थर की लकीर नहीं। भारत के पर्वतीय प्रदेशों में सैंकड़ों स्थान ऐसे हैं जहाँ स्त्रियाँ उपार्जन करती हैं और पुरुष गृह-प्रबन्ध संभालते हैं। टिम्बकटू (अफ्रीका) में तो ऐसा रिवाज है कि पुरुषों को स्त्रियों के आगे घूँघट निकाल कर रहना पड़ता है।
सुविधा की दृष्टि से संसार के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी रीति-रिवाजों के अनुसार नर-नारी के कार्य-क्षेत्र बँट गये हैं। फिर भी इसके कारण दोनों के नागरिक अधिकारों में कोई अन्तर नहीं आता। जो मानवीय अधिकार पुरुष को प्राप्त है वही स्वभावतः नारी को भी प्राप्त होने चाहिये। दोनों के लिये सामाजिक और नैतिक व्यवस्था एक सी होनी चाहिए। दोनों के ऊपर एक से नियम कानून और बंधन लागू होने चाहिये। प्राचीन काल में ऐसी ही न्यायोचित व्यवस्था प्रचलित भी थी। नर और नारी समान रूप से मानवीय अधिकारों का उपभोग करते थे। पर मध्यकालीन सामंतीयुग में जब कि ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ का जंगली कानून जोर पकड़ रहा था, नारी की शारीरिक निर्बलता का अनुचित लाभ उठा कर ऐसे प्रतिबंध लगा दिये गये जिससे उसकी स्थिति मनुष्य की न रह कर पशु की-सी हो गई। पुरुष को स्त्री के ऊपर इतना अधिक स्वामित्व प्रदान किया गया कि वह उसे अचल सम्पत्ति की तरह खरीद और बेच भी सकता था। मारने पीटने का भी उसे वैसा ही अधिकार मिला जैसा पशु-पालक अपने पशुओं के साथ किया करते हैं।
नारी की दुर्दशा पिछले दिनों इतनी बढ़ी कि उसे तिनके की तरह दीन-हीन और पराधीन बना दिया गया। पिंजड़े में बन्द रहने वाले पक्षी को कम से कम मुँह ढक कर तो नहीं रहना पड़ता, पर भारतीय स्त्रियों की स्थिति उनसे भी गई बीती हो गई। घर की चहार दीवारी के भीतर भी उन्हें पर्दे में मुँह ढके रहने को विवश होना पड़ा। शिक्षा के नाम पर शून्य, स्वावलम्बन के नाम पर अपाहिज, अनुभव के नाम पर सर्वथा अज्ञान जिस दृष्टि से भी देखा जाय उनकी स्थिति गई गुजरी हो गई। कभी वैधव्य का दुर्भाग्य सहन करना पड़े तो बेचारी का जीवन घोर तिरस्कृत और कष्टपूर्ण हो जाता है। जिनके बच्चों के लिये पतिदेव कुछ संपत्ति न छोड़ गये हों, उनके लिये तो अपना और बच्चों का पेट भर सकना भी महा-कठिन हो जाता है।
इस उत्पीड़न का फल नारी के लिये तो त्रासदायक हुआ ही, पुरुष भी अर्धांग पक्षाघात से पीड़ित रोगी तरह लुंज-पुंज हो गये। जिसकी अर्धांगिनी बौद्धिक दृष्टि से गई बीती स्थिति में पड़ी हो, जिसकी गृहलक्ष्मी ज्ञानशून्य अवस्था में हो वहाँ प्रगतिशील घरों की तरह उत्तम व्यवस्था रह सके इसकी आशा नहीं की जा सकती। ऐसे घरों में सद्गुणी सन्तानें भी कहाँ से आवेंगी? बच्चे का शरीर माता के ही शरीर में से बनता है। उसको छाती का रस-दूध पीकर ही तो वह बड़ा होता है। माता के पास जैसे कुछ संस्कार होंगे वैसे ही बालक में आयेंगे। जब कि माता शिक्षा, दीक्षा, अनुभव से हीन है, गुण कर्म, स्वभाव की दृष्टि से अविकसित अवस्था में पड़ी है, तो यह आशा करना कि उससे उत्पन्न होने वाली संतान श्रेष्ठ-सत्पुरुषों की श्रेणी गिने जा सकने लायक बन सकेगी, दुराशा मात्र ही है। शिक्षा के द्वारा भले ही वे कोई बड़ी या छोटी नौकरी प्राप्त कर लें, पर सद्गुणों से रहित माता द्वारा उत्पन्न बालक आदर्श-वान नहीं हो सकते। हम देखते हैं कि हमारी आगामी पीढ़ियाँ दिन पर दिन घटिया किस्म की बनती चली जा रही है। इसका मुख्य कारण नारी का अविकसित स्थिति में पड़ा रहना ही है।
नारी के प्रति सामन्तवादी-अन्यायपूर्ण दृष्टि कोण रखते हुये पुरुष कभी सच्ची प्रगति का अधिकारी नहीं हो सकता। जो किसी को सताता है उसे ईश्वर सताता है। जो दूसरों को गुलाम रखना चाहता है उसे कोई और गुलाम बना लेता है। हम पिछले एक हजार वर्ष तक राजनैतिक गुलामी में रहे हैं। और इस कारण भली प्रकार जानते हैं कि पराधीनता कितनी कष्टकारक होती हैं। नारी को जैसी पराधीनता सहनी पड़ती है वह तो राजनैतिक पराधीनता से भी अनेक गुनी अधिक कठोर और कष्टकारक है। जो लोग परम्पराओं के नाम पर, शास्त्रों के नाम पर इस अनीति का समर्थन करते हैं वे ईश्वर की दृष्टि में अपराधी ही माने जायेंगे और अपने अपराध का दण्ड भी उनको भोगना पड़ेगा।
युग-निर्माण योजना की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि उसमें नारी के उत्थान पर बहुत अधिक जोर दिया गया है। नारी के लिये जिस प्रकार पति-व्रत धर्म माना जाता है उसी प्रकार युग-निर्माण योजना में पत्नी-व्रत को भी एक अनिवार्य धर्म-कर्तव्य माना गया है। नारी के प्रति नर का भी वही कर्तव्य है जिसका पालन नारी नर के प्रति करती है। दोनों को समान नियमों, धर्मों का पालन करना चाहिये। जो कुछ सुविधा या छूट एक पक्ष चाहे, वही दूसरे पक्ष को भी मिलना चाहिये। इस न्यायोचित मान्यता को युग-निर्माण योजना और स्वतन्त्रता के ईश्वर प्रदत्त अधिकारों का दोनों ही उपभोग करे और सच्चाई प्रेम तथा वफादारी के बंधनों में दाम्पत्य-जीवन को स्वर्गीय आनन्द से परिपूर्ण बनावें तो योजना के अनुसार नर-नारी एक दूसरे के सच्चे मित्र बनकर अपने परिवारों को देवताओं का निवास स्थान बना सकते हैं। योजना के सदस्यों से आग्रह-पूर्वक यह कहा गया है कि अपने-अपने घरों में स्त्री शिक्षा की अनिवार्य रूप से व्यवस्था करें। जो स्त्रियाँ साक्षर नहीं हैं उन्हें साक्षर बनावें, साथ ही उनके बौद्धिक विकास के लिये एक घरेलू विद्यालय चलाया जाय। पारिवारिक ज्ञान गोष्ठियों का कार्यक्रम इसी दृष्टि से बनाया गया है। पुस्तकें पढ़कर सुनाना, ऐतिहासिक घटनायें, कहानियाँ, समाचार एवं प्रश्नोत्तर के माध्यम से जीवन को विकसित करने वाली विचारधारा स्त्रियों को निरन्तर देते रहने पर योजना में बहुत जोर दिया गया है। इसका फल यह होगा कि नारी अपने गौरव को समझेगी, जीवन की बहुमूल्यता और उसके सदुपयोग की तरफ ध्यान देगी।
लड़कियों को नियमित रूप से स्कूल भेजने और स्त्रियों की तीसरे पहर चलने वाली प्रौढ़ पाठशालाओं की ओर यदि हम भली प्रकार ध्यान दें तो
स्त्री-शिक्षा का आवश्यक विकास होगा। शिक्षा के साथ-साथ उन्हें कला कौशल की, उद्योग-धन्धों की ऐसी शिक्षा भी दी जानी चाहिये जिससे आवश्यकतानुसार वे कुछ आर्थिक स्वावलम्बन भी प्राप्त कर सकें। परिवार की नैतिक, सामाजिक आर्थिक दृष्टि से उत्तम व्यवस्था करना नारी की प्रवीणता पर ही निर्भर है। एक व्यापक पाठ्यक्रम बनाकर घर-घर में शिक्षा-व्यवस्था का विस्तार करके नारी को प्राचीन काल की तरह सब तरह से योग्य और समर्थ बनाना ही युग-निर्माण योजना का उद्देश्य है। यह लक्ष्य जितना ही पूर्ण होगा उतना ही हमारे घरों का वातावरण स्वर्गीय बनता चला जायगा।
युग-निर्माण योजना में पर्दा प्रथा को मिटाने का पूर्णतः समर्थन किया गया है। बड़ों के सम्मान में सिर ढकने की परम्परा को शिष्टाचार की दृष्टि से स्वीकार किया जा सकता है, पर ऐसा पर्दा जिसमें किसी से बोलने और मुँह को पेट तक घूँघट से ढके रहने का प्रतिबंध हो किसी दृष्टि से उचित या लाभदायक नहीं कहा जा सकता। उसे हटाने का प्रयत्न अवश्य किया जाना चाहिये ताकि नारी भी अपने मानवीय अधिकारों और व्यक्तित्त्व का अनुभव कर सकें।
दहेज को युग-निर्माण योजना में हिन्दू-समाज का गलित-कोढ़ माना है और यह प्रयत्न किया जा रहा है कि इस अनीति का जल्दी से जल्दी अन्त हो। युग-निर्माण योजना के सदस्य सबसे पहले इस संबंध में श्रीगणेश करेंगे। वे बिना दहेज के विवाहों का आदर्श जनता के सामने रखेंगे तो निश्चय ही उसका प्रभाव दूसरों पर पड़ेगा। अब तक दहेज के विरुद्ध प्रस्ताव पास करके ही हम उसका विरोध किया करते थे, जिससे उसका फल भी नाम मात्र का दिखाई पड़ता था। पर जब प्रत्यक्ष और सक्रिय रूप से उसके उन्मूलन का प्रयत्न किया जायगा तो इस घृणित प्रथा का अन्त अवश्य निकट आ जायगा, ऐसी आशा है।
गायत्री-उपासना के द्वारा आचार्य जी ने नारी को भगवान की सर्वश्रेष्ठ प्रतिमा सिद्ध किया है। उसके प्रति पूज्य और पवित्र भाव रखने, श्रद्धा और सत्कार का व्यवहार करने की शिक्षा गायत्री की प्रतिमा पूजा के रूप में देनी आरम्भ की है। यज्ञ-अनुष्ठानों के बाद कन्या-भोजन की परम्परा इसी दृष्टिकोण को व्यावहारिक रूप देने के विचार से प्रचलित हुई है। नारी मात्र को माता गायत्री का प्रतिनिधि मानकर जब उसका समुचित सत्कार होने लगेगा तो मनु भगवान की वह उक्ति सार्थक होकर रहेगी जिसमें कहा गया है “जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं।”
अश्लीलता की वह दुष्प्रवृत्ति जिसके अनुसार नारी को कामिनी एवं रमणी माना जाता है और उसे विलासिता के भाव से देखा जाता है युग-निर्माण योजना के अनुसार अत्यन्त घृणित है। युवा स्त्रियों के अर्ध नग्न चित्रों को इसलिये टाँगना और देखते रहना कि पाशविक वृत्तियाँ भड़के मनुष्य की शील मर्यादा के बाहर की वस्तु है। गन्दे उपन्यास, कहानियाँ, तस्वीरें, फिल्में, गन्दे गाने, जिनसे नारी के प्रति विकार बुद्धि भड़के मानव जाति के लिये निश्चय ही अहितकर बात है। नारी का सम्मान गिराने वाले इन कुकृत्यों को यदि हम त्यागने का निश्चय कर लें और उनसे घृणा की जाने लगे तो सर्वत्र पवित्रता का वातावरण दृष्टिगोचर हो सकता है। योजना में लड़कियों को यह विशेष रूप से समझाया गया है कि वे अपने गौरव का ध्यान रखते हुये ऐसी पोशाक न पहिने, ऐसा वेश विन्यास और शृंगार न करें जो उन्हें रमणी या ओछे स्तर की सिद्ध करता हो। शील, लज्जा और शिष्टता ही नारी का भूषण है, जो उनकी पोशाक, वाणी, दृष्टि एवं चेष्टा से सदैव प्रकट होते रहना चाहिये।
आन्दोलन के रूप में नारी-उत्थान का जो महान कार्यक्रम लेकर युग-निर्माण-योजना चल रही है उसमें सतयुग के अवतरण की सम्भावनाएँ निहित जान पड़ती हैं। ऐसे आन्दोलन सफल हों तभी हम प्राचीन भारत की संस्कृति को पुनः जीवित, जागृत होते देख सकते हैं और तभी नारी को उसका वह गौरवान्वित पद प्राप्त हो सकता है, जिस पर मनुष्य जाति का भाग्य और भविष्य निर्भर है।
गन्ध-विहीन फूल है जैसे, चन्द्र चन्द्रिका-हीन
यों ही फीका है मनुष्य का, जीवन प्रेम-विहीन,
प्रेम स्वर्ग है, स्वर्ग प्रेम है, प्रेम अशंक अशोक,
ईश्वर का प्रतिबिम्ब प्रेम है, प्रेम हृदय आलोक॥
-रामनरेश त्रिपाठी
होगा नहीं निराश, प्राप्ति को यदि न मुझे अभिलाष,
कहा विफलता यदि फल का है तुम्हें नहीं विश्वास,
हानि-लाभ, यश-अपयश, सुख-दुख इस विधि उलझे साथ,
अलग-अलग कर नहीं सकेंगे, यह मानव के हाथ।
विष की प्याली ढुल जायेगी, वे अमृत-घट फोड़।
तू सुख से मुख मोड़, तुझे फिर देगा दुख भी छोड़।
-विद्यावती मिश्र
लालच किया मुक्ति का जिसने,
वह ईश्वर पूजना नहीं है।
बनकर वेद मन्त्र-सा मुझ को,
मन्दिर में गूँजना नहीं है॥
संकटग्रस्त किसी नाविक को, निज पतवार थमा देने से-
मैंने अक्सर यह देखा है, मेरी नौका तर जाती है।
-रामावतार त्यागी
अभय रहेंगे हम इस जग में, प्रेम बीज को बोना है।
देशभक्ति की बहती सुरसरि में, अपने कर धोना है॥
है ‘स्वरूप’ जग को बतलाना-मौत सदैव खिलौना है।
भारत माँ के हृदय-हार में, शीश प्रसून पिरोना है॥
-रामस्वरूप खरे
सँभलना गिरकर जगत का ही नियम है,
माना जाना रूठकर भी सहज क्रम है,
किन्तु गिरकर रूठकर जो और भूले-वह सखे।
बस एक मेरा विवश मन है।
-यमुनेश श्रीवास्तव
जो आँधियों में बुझ नहीं सका वहीं चिराग तू।
जो बारिसों में दब नहीं सकी वही है आग तू॥
कदम-कदम पर बिजलियाँ उछालता चला है तू॥
बढ़ा जा बाबरे। दिखा न अपने दिल के दाग तू॥
-विनोद रस्तोगी
डिगो न अपने पथ से तो सब कुछ पा सकते हो प्यारे।
तुम भी ऊँचे उठ सकते हो, छू सकते हो नभ के तारे॥
अटल रहा जो अपने पथ पर, लाख मुसीबत आने में।
मिली सफलता उसको जग में, जीने में मर जाने में॥
-मैथिलीशरण गुप्त
नवीन पर्व के लिए, नवीन प्राण चाहिए।
स्वतन्त्र देश हो गया,
प्रभत्वमय दिशा मही,
निशा कराल टल चली,
स्वतन्त्र माँ, विभामयी,
मुक्त मातृ-भूमि को नवीन मान चाहिए॥
चढ़ रहा निकेत है कि,
स्वर्ग छू गया सरल,
दिशा-दिशा पुकारती कि,
साधना करो सफल,
मुक्त गीत ही रहा नवीन राग चाहिए॥
युवक कमर कसो कि,
कष्ट कंटकों की राह है,
प्राण-दान का समय,
उमंग है, उछाह है,
पगों में आँधियाँ भरे प्रयाण-गान चाहिए॥ नवीन पर्व
के लिए --------
-‘अज्ञात’
(श्री भवानीदत्त आयुर्वेदाचार्य)
मैं छोटा ही था तब कहीं से एक विचित्र पत्र मेरे पिताजी के नाम से आया। उसमें लिखा था कि आगामी कुम्भ पर्व पर प्रयोग में शाकलद्वीपीय ब्राह्मणों का ‘अखिल-भारतीय-सम्मेलन’ होगा उसमें सब विचारशील स्वजातिबन्धु अवश्य पधारें। इस संदेश के साथ उसमें यह भी लिखा था कि इस पत्र की दस नकल करके जाति बन्धुओं को भेजनी चाहिये, जो भेजेगा उसे ब्रह्मयज्ञ का फल मिलेगा जो आलस या उपेक्षा करेगा वह जाति द्रोह के पाप से नरक में पड़ेगा। ऐसी ही एक चिट्ठी कुछ दिन बाद और भी देखने में आई “हरे राम-हरे कृष्ण” वाक्य 108 बार लिखा था और साथ ही यह संदेश भी था कि इसकी दस प्रतियाँ करके दूसरों को देनी चाहिये। जो देगा उसे सुख, सौभाग्य, धन संतान की प्राप्ति होगी और जो उपेक्षा करेगा उसे ईश्वरीय कोप का भागी बनना पड़ेगा।
उन दिनों तो इस प्रकार के पत्रों की उपयोगिता मैं न समझ सका, पर पीछे जब विचार किया जो जान पड़ा कि प्राचीन काल में जब प्रचार के आधुनिक साधन न थे तब किसी संदेश को व्यापक रूप से फैलाने के लिये एक से दस की पद्धति बहुत उपयोगी थी। इस उपाय से कोई भी संदेश या विचार देश-देशान्तरों तक सहज ही पहुँचाया जा सकता था। व्यक्ति के साधन सीमित होते हैं, पर जब सब लोग सम्मिलित साधनों से किसी बात को फैलाने में सहयोग देने लगें तो उसके व्यापक बन सकने की सम्भावना बहुत बढ़ जाती है।
आज प्रचार के अनेक साधन उत्पन्न हो गये हैं फिर भी ‘एक से दस’ वाली प्राचीन पद्धति की उपयोगिता अब भी इसलिये बहुत अधिक है कि उसमें व्यक्तियों का व्यक्तित्व और प्रभाव भी प्रचार के साथ जुड़ा रहता है। उस बात को दस आदमियों तक फैलाने का प्रयत्न जो व्यक्ति करता है उसका मनोबल, मस्तिष्क साथ में जुड़ जाने से उसमें एक नवीन शक्ति उत्पन्न हो जाती है। वह व्यक्ति लोगों को अपनी ओर से भी समझाता है और पूछी हुई शंकाओं का उत्तर भी देता है। परिचित व्यक्ति जब अपनी जान पहिचान वालों के पास कोई सन्देश भेजता है तो उसे अधिक विश्वस्त भी माना जाता हैं। इसलिये चाहे वह पद्धति आज प्रचलित न हो पर उपयोगिता की दृष्टि से उसकी महत्ता आज ही नहीं सदैव अक्षुण्ण रहेगी।
देखते हैं कि ‘युग-निर्माण-योजना’ में सत्प्रवृत्तियों के प्रसार के लिये उसी ‘एक से दस’ वाली चिर पुरातन और परीक्षित मनोवैज्ञानिक पद्धति को आधार बनाया गया है। जो संदेश सूत्र−संचालक द्वारा प्राप्त हो उसे हर सदस्य अपने प्रभाव क्षेत्र के दस व्यक्तियों को कहें, समझावें और उसी मार्ग पर चलने के लिये तैयार करने में अपने प्रभाव का उपयोग करें तो यह निस्सन्देह एक महत्वपूर्ण एवं ठोस कार्य हो सकता है। सीमा विस्तार की दृष्टि से भी यह पद्धति इतनी तेजी से बढ़ने और फैलने वाली है कि कुछ ही समय में समस्त विश्व में उसका विस्तार हो सकता संभव जान पड़ता है।
स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की नव रचना का जो आध्यात्मिक कार्यक्रम इस योजना द्वारा प्रसारित और कार्यान्वित किया जा रहा है उसे विश्वव्यापी बनाया जाना आवश्यक है। हजार, दो हजार व्यक्तियों तक कोई अच्छी परम्परा सीमित रह जाय तो करोड़ों में फैली हुई बुराई की तुलना में उसका क्या महत्व है? इसलिये इतनी बड़ी योजना के लिये उसकी व्यापकता का ध्यान रखना ही पड़ेगा। यह संभावना एक से दस वाली पद्धति से जैसी सरलतापूर्वक सफल हो सकती है उतनी और किसी प्रकार नहीं हो सकती।
‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के हम 30 हजार सदस्य आचार्य जी की प्रेरणा से आत्म निर्माण और समाज-निर्माण की पुण्य-प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिये कटिबद्ध हुये हैं। इस योजना को हमें दस-दस व्यक्तियों तक फैलाना है। इस प्रकार पहले ही प्रयास में हम 30 हजार से 3 लाख बनेंगे। दूसरे प्रयास में 3 लाख के दस गुने अर्थात् 30 लाख होंगे। तीसरे में यह संख्या दस गुनी होकर 3 करोड़ तक पहुँचेगी। चौथी मंजिल पर पहुँचकर 30 करोड़ और पाँचवीं मंजिल पर दस गुने के क्रम से 3 अरब हो सकती है। इतनी ही जनसंख्या इस पृथ्वी पर रहती है। पाँच बार प्रयास करके-पाँच मंजिलें पार करके “एक से दस” की योजना के अनुसार हम इस पुण्य प्रक्रिया को देशव्यापी ही नहीं विश्व-व्यापी भी बना सकते हैं।
माना कि इस संसार में आलसी, प्रमादी, नास्तिक, अपराधी प्रकृति के, अच्छे कामों में रोड़ा अटकाने वाले व्यक्ति भी कम नहीं हैं, जो सहयोग देना तो दूर उल्टा उपहास करेंगे और जहाँ तक बन पड़ेगा बाधा डालेंगे। कुछ शिक्षा के अभाव से इसे समझ भी न सकेंगे और कुछ समझेंगे तो अहंकार-वश उसका अनुसरण न करेंगे। इतना होते हुये भी यदि दसवाँ अंश सफलता मिल सके तो भी कम महत्व की बात नहीं है। पाप में आकर्षण तो बहुत होता है तो भी वह किसी तरह पुण्य की बराबरी नहीं कर सकता। डाकू , हत्यारे, पापी, ठग व्यभिचारी, शराबी बहुत कोशिश करने पर अपने जैसे 10-20 व्यक्ति ही नये पैदा कर सकते हैं। पर गाँधी, बुद्ध, ईसा और महावीर जैसी आत्माएं अपने असंख्यों अनुयायी बनाने में समर्थ हो गईं। निश्चय ही यदि सत्प्रवृत्तियाँ सच्चे व्यक्तियों द्वारा श्रेष्ठ साधनों से प्रसारित की जायें तो वे भी गतिशील होती हैं और उनका भारी प्रभाव जन-मानस पर पड़ता है। अधिक समय नहीं हुआ कि भारतीय-स्वाधीनता संग्राम में लाखों व्यक्तियों ने देशभक्ति की उद्दात्त भावनाओं से प्रेरित होकर अपना तन-मन-धन मातृभूमि की बलिवेदी पर प्रसन्नतापूर्वक अर्पण कर दिया था। यदि कोई वैसा ही सारयुक्त और वस्तुतः उपयोगी आन्दोलन पुनः सामने आवे तो जनता का पर्याप्त सहयोग फिर मिल सकता है। इसलिये निराश होने की जरा भी आवश्यकता नहीं कि बहुत से लोग इस कार्य की उपेक्षा या उपहास करेंगे। यदि थोड़े लोग भी साहस प्रदर्शित कर सकें तो लक्ष्य की पूर्ति आसानी से हो सकेगी। दुष्प्रवृत्तियों की तरह सत्प्रवृत्तियाँ भी छूत की तरह लोगों पर असर करती हैं और जो प्रयत्न हृदय से किये जाते हैं वे कभी निष्फल नहीं होते।
हर व्यक्ति को अपने प्रभाव क्षेत्र में सेवा का स्वतन्त्र उत्तरदायित्व सौंप कर लोगों को संस्थावाद को उस बुराई से बचा लिया गया है जिसके कारण आये दिन राग-द्वेष उत्पन्न होते हैं, नामवरी और यश के लिये सिर फूटते हैं, और धन-संग्रह करके हड़पने का अवसर मिलता है। राजनीति में या आर्थिक विषयों से सम्बन्धित संस्थाओं में चुनाव पद्धति की आवश्यकता हो सकती है, पर आध्यात्मिक कार्यक्रमों में तो व्यक्ति की उत्कृष्टता ही सर्वोपरि रहती है। सुचारक को अकेला एक ओर खड़ा होना होता है और सारी दुनिया उसका विरोध करती है। उसे जमाने को पलटना पड़ता है और यह कार्य पग-पग पर विरोध और तिरस्कार सहते हुये भी करना होता है। यदि ऐसे कार्य जनमत द्वारा चुनाव के आधार पर चला करे, तो बहुमत जैसा कुछ हैं-अथवा अधिकाँश लोग जैसे हैं, वैसी ही रीति-नीति युग-निर्माताओं को भी स्वीकार करनी पड़ेगी।
आर्ष आदर्शों को जीवन में उतारने और उन्हें अपने परिचित लोगों में- अपने प्रभाव क्षेत्र में फैलाने का कार्य ऐसा हैं जिसे बिना किसी संगठन के भी चलाया जा सकता है। संसार के सभी धर्म इसी प्रकार चलाये गये है। पीछे तो हर अच्छी वस्तु में भी विकृति आ जाती है, पर अपने-अपने समय पर सभी धर्मों ने जनता की बड़ी सेवा की है और जन-जीवन को आवश्यक मोड़ दिये हैं। हिन्दू धर्म, बौद्ध धर्म, ईसाई, मुसलमान, पारसी जैन आदि कोई भी धर्म संस्था बनाकर आगे नहीं बढ़ा है। श्रेष्ठ लोगों ने अपनी श्रेष्ठता को फैलाकर ही इन धर्मों का विस्तार किया था। युग-निर्माण योजना भी मानव-धर्म पर आधारित है और यह हरी दूब की भाँति स्वयं ही फैलेगी। एक दीपक से दूसरा चलने वाली पद्धति ही इसमें सफल होगी।
अनेक दोषों से इस योजना को बचाये रखने के लिये इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्य का ध्यान रखा गया है। यह कार्यक्रम आँधी-तूफान के ढंग का नहीं है। आत्मोन्नति की पुण्य-प्रक्रिया शान्ति और सुव्यवस्था के आधार पर ही अग्रसर होती है। युग-निर्माण योजना के मुख्य सिद्धान्तों को समझने के बाद उसके प्रचार का उत्तरदायित्व विचारशील प्रबुद्ध आत्माओं पर छोड़ दिया गया है। इसको जो जितने अंशों में कार्यान्वित कर सकेगा वह अपना और दूसरों का उतना ही हित साधन करेगा।
योजना में दिये गये छोटे-छोटे कार्यक्रमों को देखकर कोई सज्जन कदाचित यह सोचने लगे होंगे कि इसमें तो खाने पीने पौधे उगाने, पाठशालायें चलाने जैसे साधारण कार्यक्रम हैं, इनसे युग परिवर्तन कैसे संभव होगा? आध्यात्मिक लक्ष्य प्राप्त करना जैसा महान कार्य इसके द्वारा कैसे हो सकेगा? ऐसा सन्देह करने वालों को महात्मा गाँधी के चर्खा और खादी आन्दोलन का स्मरण करना चाहिये। बापू सदा यह कहते रहते थे कि “चर्खे से ही स्वराज्य मिल सकता है, खादी के बिना आजादी संभव नहीं।” लोग उनकी हँसी उड़ाते थे और कहते थे कि इतनी बड़ी और शक्तिशाली अंगरेजी सल्तनत चर्खा चलाकर कैसे हटाई जा सकती है, इसके लिये तो मारधाड़ उखाड़-पछाड़ से भरी हुई कोई तूफानी योजना बननी चाहिये। गान्धी जी कहते थे-”मारधाड़ में हम हार जायेंगे, क्योंकि इसके साधन अँग्रेजों के पास अधिक हैं। हमको जन-मानस में आजादी, आत्म गौरव और स्वावलम्बन के प्रति तड़पन पैदा करनी है। वह तड़पन जिस दिन उत्पन्न हो गई उसी दिन अंग्रेजों को भागना पड़ेगा।” उस तड़पन को उत्पन्न करने के लिये गाँधी ने छोटे-छोटे प्रतीक रूप कार्यक्रम सामने रखे थे। चर्खा को आत्म निर्भरता, स्वावलम्बन और देशभक्ति का प्रतीक बनाकर गाँधी जी ने राष्ट्र के सम्मुख उपस्थित किया था। खादी से इन्हीं भावनाओं का उद्भव पहनने वाले के अन्तःकरण में होता था। नमक सत्याग्रह छेड़कर उन्होंने विदेशी कानून के प्रति व्यापक अवज्ञा उत्पन्न की थी। यों नमक का प्रश्न कोई बहुत बड़ी बात न थी। उससे प्रति वर्ष केवल दो-चार पैसा टैक्स प्रत्येक आदमी का बचाया जा सकता था। इतनी सी बात अंग्रेज सरकार आसानी से मान सकती थी और गाँधीजी के कहने से नमक टैक्स छोड़ सकती थी। पर बात इतनी ही नहीं थी। उसके पीछे प्रचण्ड प्रेरणा देने वाले भावनात्मक तथ्य छिपे थे। नमक सत्याग्रह द्वारा प्रत्येक व्यक्ति को तत्कालीन सरकार के कानूनों के प्रति बगावत करने की प्रेरणा दी गई थी। विशुद्ध रूप से वह एक मनोवैज्ञानिक आन्दोलन था।
खादी की बात भी ऐसी ही थी। चर्खा के सम्बन्ध में देश के बड़े-बड़े आदमी कहते थे कि हमारा वक्त कीमती है, इस छोटे काम में हम उसे खर्च क्यों करें? इससे जितनी देर में दो-चार पैसे का उपार्जन होगा उतनी देर में हम सैकड़ों रुपये कमा कर स्वराज्य आन्दोलन में दे सकते हैं। पर गाँधीजी ने ऐसे लोगों को समझाया कि प्रश्न पैसे का नहीं हैं, भावना का है। भावना न जगे तो पैसा व्यर्थ है। बिना पैसे के भावनाशील व्यक्ति सब कुछ कर डालते है, पर भावना से शून्य पैसा धूल के समान है। उससे कोई महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिये कार्य का असीम भार होते हुये भी गान्धी जी नियमित रूप से स्वयं चर्खा चलाते थे और अपने साथियों से भी चलवाते थे। भावनायें किसी प्रतीक का आश्रय लेकर ही जग सकती हैं। कोरी कल्पना करते रहने से मनोरंजन भले ही हो जाय पर उससे स्वभाव और संस्कारों का निर्माण नहीं हो सकता। यही कारण है कि प्राचीन काल में भी भावनाओं को जागृत करने के लिये भाँति-भाँति के कर्मकाण्डों की व्यवस्था की गई थी, चाहे वे तर्कशील व्यक्तियों को अनावश्यक ही क्यों न जान पड़ते हों। ईश्वर के प्रति भक्ति -भावना और श्रद्धा विश्वास जागृत करने के लिये प्रतिमा पूजन, आरती, नैवेद्य, धूप, चन्दन आदि के उपचार करने आवश्यक होते हैं। इनकी सहायता से ही क्रमशः जन-मानस में भावना का उदय हो जाता है।
यही कारण है कि किसी भी विषय में यदि हम छोटे से छोटा नियम भी स्वीकार कर लें और उस पर सच्चाई के साथ चलें तो कुछ ही समय में हमारे भीतर एक नवीन परिवर्तन हो जाता है। जातकों में एक कथा है कि एक बार एक बहेलिया भगवान बुद्ध के पास आकर मुक्ति का उपाय पूछने लगा। बुद्ध ने उसे अहिंसा धर्म का उपदेश दिया कि जो मन वचन कर्म से किसी प्राणी को कष्ट पहुँचायेगा वह भव-बन्धन से अवश्य छुटकारा पा जायगा। बहेलिया ने कहा-”भगवन्। यह बात तो मेरे लिये असम्भव है, क्योंकि मेरी जीविका का साधन तो पशु-पक्षियों का मारना, पकड़ना ही है। यदि मैं अहिंसा-धर्म को स्वीकार करूंगा तो फिर मेरा निर्वाह कैसे हो सकेगा? मुझे तो इसके सिवाय और काम आता भी नहीं।” बुद्ध जी ने कुछ देर सोच कर कहा-पूर्ण अहिंसा पालन संभव न हो तो जितना बन पड़े उतने अंश में ही पालन करो। कबूतर, चिड़िया, खरगोश, लोमड़ी जैसे निर्बल और निरीह प्राणियों का मारना त्याग का अहिंसा व्रत का पालन करो। बहेलिया ने उत्तर दिया-भगवन्। मैं ऐसे साधारण, छोटे जीवों को पकड़ कर ही तो अपना गुजारा करता हूँ। सिंह, व्याघ्र आदि का शिकार करने की न मेरी सामर्थ्य है और न उसके साधन ही मुझे प्राप्त हैं। बुद्ध ने कहा- अच्छा, तब तुम अपनी इच्छा से किसी एक जीव को कभी न मारने का व्रत ग्रहण कर लो और फिर जैसे-जैसे सुविधा हो अन्य जीवों के सम्बन्ध में भी प्रतिज्ञा करते रहना। बहेलिया ने बहुत सोच विचार कर केवल एक जीव को अपने लिये अनावश्यक समझा और उसने भगवान बुद्ध के सामने कौआ को न मारने का व्रत लिया। इसके फलस्वरूप अहिंसाव्रत की महत्ता उसके हृदय में जम गई और समयानुसार वह स्वयमेव अधिकाधिक विकसित होती चली गई। अन्त में वह बहेलिया पूर्ण रूप से अहिंसक बन गया और बुद्ध का शिष्य बनकर एक बहुत बड़े महात्मा के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
यही कार्य पद्धति युग-निर्माण योजना में व्यवहार में लाई गई है। सर्व साधारण के सामने छोटे-छोटे कार्यक्रम रखकर उनकी मनोवृत्ति को आध्यात्मिक तत्वों की ओर प्रेरित करने का प्रयत्न किया गया है। उपासना की विधि एक नहीं हजारों है। साधारण जप, नाम स्मरण से लेकर कठिन योगाभ्यास तक का विधान विभिन्न मनोवृत्तियों के व्यक्तियों के लिये किया गया है। कोई व्यक्ति जो आरंभ में केवल एक माला जपने से उपासना आरम्भ करता है। धीरे-धीरे बहुत बड़ी साधनाओं तक पहुँच जाता है और अन्त में परमहंसों के समान संसार से पूर्णतः निर्लिप्त होकर परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। उस समय उसे सभी ईश्वरीय शक्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं और लोग उसे साक्षात भगवान स्वरूप ही मानने लगते हैं। पर यह भगवान केवल बाहरी नहीं अन्तःकरण की होनी चाहिये। परमात्मा मनुष्य के मन और अन्तर की भावनाओं को देखता है। उसकी दृष्टि में महत्व इस बात का है कि मनुष्य धार्मिक सिद्धान्तों पर कहाँ तक सचाई के साथ आचरण करता है। गुण-कर्म-स्वभाव की शुद्धि हुये बिना, भावना और चरित्र का परिमार्जन हुये बिना, साधना निरर्थक ही बनी रहती है। भ्रष्ट चरित्र वाला व्यक्ति कितना भी जप, ध्यान क्यों न करे वह सब निष्फल है। अन्तःकरण का स्तर ऊँचा हो, हृदय में ईश्वर-भक्ति के अंकुर मौजूद हों तो साधारण उपासना द्वारा भी केवट, शबरी, विदुर गोपी द्रौपदी, नरसी, नाई की तरह परमात्मशक्ति की कृपा उपलब्ध की जा सकती है।
जीवन की शुद्धि का सबसे बड़ा साधन परमार्थ ही माना गया है। दूसरों के दुःख में अपना दुख और दूसरों के सुख में अपना सुख समझने से उदार बुद्धि जागृत होती है। ऐसे व्यक्ति की आत्मा स्वभावतः पुण्य-कर्मों की ओर अग्रसर होती है और उसके फलस्वरूप लोक-परलोक का सुख भी मिलता है और ईश्वर का अनुग्रह भी प्राप्त होता है। जीवन-शोधन और परमार्थ की भावनायें किस प्रकार मन में उठें, किस तरह उनका विकास हो यह समस्या भी आध्यात्मिकता की वृद्धि के लिये विचारणीय है। प्राचीन काम लें उस समय की स्थिति और आवश्यकता को देखते हुये परमार्थ के कार्यक्रम बनाये गये थे। आज की स्थिति में लोक कल्याण और व्यक्ति का आत्मविकास जिस प्रकार हो सके उस पर विचार करके युग-निर्माण-योजना बनाई है। इसके कार्यक्रम छोटे-छोटे दीखते हुये भी इनके पीछे जो महान तथ्य छिपा पड़ा है वह निश्चय ही असाधारण है। इस योजना में व्यक्ति के कल्याण के साथ समाज का व्यापक हित भी दिखाई पड़ता है।
(श्री प्रेमचन्द सारस्वत)
युग-निर्माण योजना में जिन कार्यक्रमों को लेकर जागरण की शंखध्वनि की गई है वे ऐसे है कि उनके आधार पर ही मनुष्य का आत्मिक और भौतिक कल्याण हो सकता है। आहार-शुद्धि पर ध्यान दिया जाना आत्मोन्नति का एक आवश्यक अंग है। हम जैसा अन्न खाते है वैसा ही मन बनता है। यदि हमारा आहार राजसी और तामसी हुआ तो फिर उससे उत्पन्न होने वाला मानसिक स्तर मलीन ही रहेगा। उस मलीनता पर कथा, प्रवचनों का भी कोई रंग न चढ़ेगा। हम देखते है कि अनेक व्यक्ति जो नित्य धर्म-शास्त्रों को पढ़ते या सुनते रहते हैं आचरणों की दृष्टि से निम्न श्रेणी के होते हैं। इसका कारण उनके आहार का दोषयुक्त होना ही होता है। यदि हमारा आहार शुद्ध रहे आस्वाद व्रत का पालन करते हुये सतोगुणी पदार्थों का भोजन किया जाय, नियत समय पर भगवान का भोग लगाकर आहार ग्रहण करने का नियम पालन होता रहे तो उसके फल से मन शान्त रहेगा, सभी इन्द्रियाँ वश में रहेंगी और चित्त भी डाँवाडोल न होगा। सतोगुणी मन से विचार भी सतोगुणी उत्पन्न होंगे और उससे सद्भावनायें भी उठेंगी। ऐसी स्थिति जहाँ होगी वहाँ थोड़ा-सा प्रवचन या स्वाध्याय भी बहुत प्रेरणा प्रदान कर सकेगा और मनुष्य को सन्मार्ग पर काफी दूर तक बढ़ा सकेगा।
ब्रह्मचर्य का महत्व तो सबको विदित ही हैं। जीवन-शक्ति और ओज का मूल यही है। इसी से मनुष्य की प्रतिभा और स्मरण शक्ति का विकास होता है और उसकी गिनती विद्वानों में की जा सकती है। हमारे दीर्घजीवन और आरोग्य का आधार भी अधिकाँश में ब्रह्मचर्य पर ही रहता है। असंयमी मनुष्य शारीरिक और मानसिक रोगों के शिकार हुआ करते हैं, वे प्रायः अल्पायु होते हैं और उनकी सन्तान भी दुर्बल और दुर्गुणी देखी जाती है। ब्रह्मचर्य के अभाव से ही जन-संख्या वृद्धि की समस्या भारत ही नहीं समस्त संसार को परेशान किये हुये है। इसी के फल स्वरूप करोड़ों स्त्री-पुरुष यौन रोगों से पीड़ित रहते हैं। रक्त चाप, हृदय की धड़कन, मधुमेह क्षय जैसे रोग प्रायः असंयमी लोगों को ही होते हैं। अगर मन में काम-वासना सम्बन्धी विचार आते रहें तो उससे भी शरीर और मनका बहुत पतन होता है। इस प्रकार के विचारों की वृद्धि होती है जिससे अनेक व्यक्तियों और परिवारों की सुख-शान्ति नष्ट हो जाती है और वे तरह-तरह की आपत्तियों और दुर्भाग्य में फंस जाते हैं। इन बुराइयों के कारण समाज भी खोखला बन जाता हैं और उसकी श्रेष्ठता हुये युग-निर्माण योजना में सर्व साधारण को यथासंभव अधिक समय तक ब्रह्मचर्य पालन के कार्यक्रम पर अमल करने को कहा गया है। यह नियम विवाहित और अविवाहित दोनों पर लागू होता है। गृहस्थ को भी इस सम्बन्ध में पूरी सावधानी रखनी चाहिये। अमर्यादित काम सेवन एक प्रकार की आत्म-हत्या है।
सादगी का रहन-सहन और सामान्य वेश-भूषा सज्जनता और बड़प्पन का चिन्ह है। जिस तरह फौजी पोशाक पहिन लेने से उसी तरह की भावनायें और चेष्टायें बनने लग जाती हैं, साधु-सन्त जैसी पोशाक धारण करने से कुछ न कुछ उसी तरह के विचार और काम करने लग जाता है, उसी प्रकार सज्जनों की तरह सादा और आडम्बर शून्य वेषभूषा में रहने से मनुष्य के मन में सौम्य भावनायें और विचारों का उदय होता रहता है। इससे विनय, नम्रता, निरहंकारिता की वृद्धि होती है।
श्रम की महत्ता को स्वीकार करना, सब काम समय पर करना, आलस्य और प्रमाद से बचे रहना भी इस योजना के मुख्य अंग में आशा, उत्साह, प्रसन्नता आदि सद्गुणों का आविर्भाव होता है और उसका व्यक्तित्व दिन पर दिन श्रेष्ठ बनता जाता है। जो मनुष्य सदैव किसी उपयोगी कार्य में संलग्न रहता है, सबके साथ नम्रता, मधुरता, उदारता का व्यवहार करता है, वह सबको प्रिय लगने लगता है, दूसरे लोगों का सहयोग उसे सहज ही प्राप्त होता रहता है और इस प्रकार उसे हर एक कार्य में सफलता प्राप्त होती रहती है।
यद्यपि आजकल बहुसंख्यक व्यक्ति किसी प्रकार बहुत-सा पैसा इकट्ठा करके अमीर वन जाने को ही सफलता का सबसे बड़ा चिन्ह मानते है, पर यह कोरा भ्रम है। सच्ची सम्पत्ति तो ईमानदारी, मितव्ययिता और कर्तव्यपरायणता ही है। जिसमें ये गुण होगे उसे कभी किसी प्रकार का अभाव अनुभव नहीं हो सकता और यही सच्ची अमीरी का लक्षण है। जो दूसरों के दुःख में स्वयं भी दुःख अनुभव करता है और दूसरों के सुख को देखकर आनन्दित होता है वही परमार्थी कहा जाता है, अन्य लोग उसका हृदय से सम्मान करते हैं, उससे प्रेम रखते हैं। इस भावना की वृद्धि के लिये योजना में चमड़े का उपयोग, रेशम का व्यवहार और जीवों की हिंसा करके या उनको कष्ट पहुँचाकर प्राप्त की जाने वाली वस्तुएं या औषधियों को त्यागने आदेश दिया गया है। माँसाहार तो स्पष्ट ही सहृदयता की भावना को नष्ट करने वाला है। जीव-दया मनुष्यता का एक बहुत बड़ा लक्षण है। इस दृष्टि से पक्षियों को पिंजड़े में बन्द रख कर उनको कष्ट देना, पशुओं से उनकी सामर्थ्य से अधिक काम लेना, घोड़ों और बैलों को घायल होने पर भी गाड़ी ताँगों में जोतना उनको निर्दयतापूर्वक मारना-पीटना आदि कार्य अमानुषिक ही माने जायेंगे। इन कार्यों को छोड़ने से मानवता के भाव की वृद्धि होती है और आत्मोत्थान में बड़ी सहायता मिलती है।
स्वाध्याय को पूजा का ही एक अंग माना गया है। उत्तम और सदुपदेशपूर्ण ग्रंथों के पढ़ते रहने से विचारो की शुद्धि और उन्नति होती है। इसके लिये युग-निर्माण-योजना में कथा, पुराण और धर्म शास्त्रों के साथ-साथ वर्तमान समय में रची गई सद्विचारयुक्त और जीवन-निर्माण में सहायक बन सकने वाली पुस्तकों को स्वाध्याय योग्य बतलाया गया है। पूजा और उपासना की तरह जीवन की स्थूल समस्याओं और मानसिक उलझनों को समझना तथा उनको हल करने का ठीक मार्ग जानना आवश्यक है। जो पुस्तकें इस उद्देश्य की पूर्ति करने वाली हों उनमें से किसी न किसी को नित्य नियमपूर्वक पढ़ते रहना और उसके उपदेशों को मनन और चिन्तनपूर्वक व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना ही सच्चा स्वाध्याय कहा जा सकता है। इससे हम उन भूलों से भी बच सकते हैं जो संसार की उलझनों के कारण समय-समय पर पैदा होती है और जिनमें फंसकर मनुष्य मार्गच्युत हो जाता है।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये योजना में एक बहुत बढ़िया उपाय बताया है कि हम प्रति दिन सोते समय दिन भर के कार्यों का लेखा-जोखा लें। जो भूलें हुई हों उनके लिये आगे के लिये कान पकड़ कर सावधान रहने की प्रतिज्ञा करें और अच्छी बातों को निरन्तर करते रहने का संकल्प करें। युग-निर्माण योजना के सदस्यों को सोने से पर्व इस प्रकार का आत्म निरीक्षण अवश्य करना चाहिये और आत्मशोधन तथा आत्मविकास की दृष्टि से आगामी दिन का कार्यक्रम बनाना चाहिये। प्रातः काल उठकर रात्रि के समय किये हुये निश्चय पर पुनः विचार करना और आज दिन भर विशेष सावधानी के साथ व्यवहार करने की तैयारी करनी आवश्यक है। प्रातःकाल युग-निर्माण के संकल्प का पढ़ना भी प्रत्येक सदस्य का अनिवार्य कर्तव्य है जिससे योजना का लक्ष्य सदैव ध्यान में बना रहे और उससे अपने चरित्र और आचरण की उन्नति होती रहे।
अपने परिवार को उत्तम शिक्षा देते रहना, आन्तरिक दाम्पत्य प्रेम, पतिव्रत की तरह पत्नीव्रत का भी पालन, ब्रह्मचर्य का अधिकाधिक पालन आदि के कार्यक्रमों का एक बहुत बड़ा रहस्य यह है कि नई पीढ़ी में होनहार तथा दिव्यगुण-सम्पन्न बालक पैदा किये जा सके। बालक का शरीर और मन माता के शरीर और मन का ही एक अंश होता है। जहाँ माताएँ सुयोग्य और सन्तुष्ट मनोवृत्ति रखेंगी और ज्ञान तथा सद्गुणों की दृष्टि से श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाली होंगी वहीं सद्गुणी बालक उत्पन्न हो सकेंगे। युग-निर्माण के लिये जन्मजात सुसंस्कार लेकर उत्पन्न होने वाले बालकों की आवश्यकता होगी। यह कार्य स्कूलों की पढ़ाई से पूरा नहीं हो सकता, वरन् सुसंस्कारी माताओं द्वारा ही संभव हो सकता है। पत्नी का मानसिक विकास बहुत कुछ उसके पति की मनोभूमि का निर्भर रहता है। इसी तथ्य को समझकर योजना में इस बात पर बहुत जोर दिया गया है कि प्रत्येक पुरुष पत्नीव्रत धारण करे, अपनी धर्मपत्नी के प्रति पूर्ण निष्ठावान, सहृदय और उदार रहे और साथ ही उसके सर्वांगीण विकास की उचित व्यवस्था का भी ध्यान रखे। पुरुष यदि योजना के अनुरूप अपने में इस प्रकार का परिवर्तन कर सकेंगे तो इसका फल उन्हें सच्चे दाम्पत्य-प्रेम, सुव्यवस्थित गृहस्थी और होनहार बालकों के रूप में प्राप्त होगा।
इसी प्रकार के अनेक कार्यक्रम व्यक्तिगत सुधार और जीवन-शोधन के लिये युग-निर्माण योजना में रखे गये हैं। इन्हें पालन करने वाले व्यक्ति का जीवन अवश्य ही सुख शान्तिमय बन सकता है। समाज का कल्याण भी इसके द्वारा होगा। इस दृष्टि से यह योजना निस्सन्देह एक दैवी वरदान की तरह ही समझी जायगी।
लघु कथा-
किसी राजा ने एक बिलाव पाल रखा था। वह उसे बहुत प्यार करता था और दुलार से उसका नाम रख दिया था ‘व्याघ्र’।
एक दिन दरबार में ‘व्याघ्र’ नाम पर चर्चा होने लगी। किसी दरबारी ने कहा कि व्याघ्र से अच्छा नाम तो वनराज ‘सिंह’ का है। इसे सिंह क्यों न कहा जाय। यह बात राजा को पसन्द आ गई और उसे सिंह के नाम से बुलाया जाने लगा।
कुछ दिन बाद एक मंत्री ने बातचीत करते-करते यह सम्मति दी कि सिंह से तो मेघ बड़ा होता है जिसकी गर्ज को सुन कर सब जानवर डर जाते हैं। इसलिये इसका नाम मेघ रखा जाना उचित है। राजा ने भी इसको ठीक बतलाया और उस दिन से उसका नाम ‘मेघ’ पड़ गया।
एक दिन कोई विद्वान कवि राजा के दरबार में आये। उन्हें मेघ नाम अच्छा न लगा। पवन के वेग से मेघ जरा-सी देर में छिन्न-भिन्न हो जाते हैं, इसलिये राजा के बिलाव को पवन क्यों न कहा जाय? राजा इससे सहमत हो गये। उन्होंने बिलाव को पवन कहना आरम्भ कर दिया। कुछ समय पश्चात प्रसंगवश किसी मंत्री ने कहा-”महाराज। दुर्ग, पवन को भी रोक देते हैं। आँधी और तूफान भी उसे हिला नहीं सकते। इस बिलाव का नाम ‘दुर्ग’ रखना बहुत ठीक होगा और लोगों ने भी इसका समर्थन किया और बिलाव ‘दुर्ग’ के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
पर अभी इस नाम-चर्चा का अन्त नहीं आया था। एक दिन कोई अन्य देशीय अतिथि वहाँ आया। उसने ‘दुर्ग’ नाम की कथा सुनकर कहा कि-चूहा बड़े-बड़े दुर्गों में छेद कर देते हैं। इस दृष्टि से यदि इसे ‘चूहा’ कहा जाय तो अधिक उपयुक्त होगा। कुछ दरबारियों ने भी उसकी हाँ में हाँ मिला दी और बिलाव का नाम बदल कर ‘चूहा’ रख दिया गया।
बहुत दिन तक ‘चूहा’ नाम ही चलता रहा। फिर एक दिन जब नाम की चर्चा चल पड़ी तो प्रधान अमात्य ने कहा कि यह बिलाव तो स्वयं चूहा का शिकार करता है और चूहे इसे देखते ही अन्तर्धान हो जाते हैं। तब चूहा की बजाय बिलाव नाम ही क्या बुरा है? यह बात सब की समझ में आ गई और बिलाव अपने असली नाम से ही पुकारा जाने लगा। अब नाम बदलने की समस्या सदा के लिये समाप्त हो गई।
राज पुरोहित ने इसकी चर्चा करते हुये एक समय कहा-अपना यथार्थ व्यक्तित्व ही सबसे श्रेष्ठ है। हम जैसे हैं वैसे ही कहे जायँ तो कोई हर्ज नहीं। जो अपनी स्थिति नहीं है वैसा बनने में अनिश्चितता और विडम्बना ही रहती है और उससे कोई लाभ भी नहीं निकलता।
एक बार एक उल्लू ने सपना देखा कि वह कल्पवृक्ष के रम्य उपवन के बिलकुल समीप जा पहुँचा और वह देवदुर्लभ स्थान उससे कुछ ही दूरी पर रह गया है। उतने में उसकी आँख खुल गई।
उल्लू तेजी से उस सपने वाले उपवन की ओर बेतहाशा उड़ चला। आकाश में उड़ते एक सारस ने इतनी तेजी से भागने का कारण पूछा तो उल्लू ने कल्पतरु का उपवन समीप ही होने की बात को सुनाई। सारस भी लोभ संवरण न कर सका, वह भी उल्लू के साथ उड़ चला।
दूसरे पक्षियों ने दोनों की इस दौड़ का कारण पूछा तो वे भी उधर ही उड़ चले। अब तो मोर, पपीहा, बाज, बतख, कौआ, कोयल, तीतर, बटेर, सभी उसी दिशा में भागे। उस दिन कोई पक्षी ऐसा न बचा जो इस उड़न-प्रतियोगिता में सम्मिलित न हुआ हो।
एक बूढ़ा गिद्ध पाकर के पेड़ पर अपने कोटर में बैठा हुआ यह कौतुक देख रहा था। उसके छोटे बच्चे ने उस दौड़ धूप का कारण पूछा तो बूढ़े गिद्ध ने समाधान करते हुए कहा-दुःस्वप्नों के पीछे दौड़ की अन्धी प्रवृत्ति अब मनुष्यों से हटकर पक्षियों में भी लग गई प्रतीत होती है, तो हे पुत्र। अब भगवान ही हम लोगों का रक्षक है।
परोपकार की महत्ता
किसी जिज्ञासु ने ईरान के दार्शनिक कवि शेख सादी से प्रश्न किया-”भगवन्। परोपकारी बड़ा होता है या ताकतवर?” पहले तुम मेरे एक प्रश्न का उत्तर दो तो मैं तुम्हारी जिज्ञासा का समाधान कर दूँगा। यह बताओ कि हातिम के समय में सबसे बड़ा पहलवान कौन था।”
जिज्ञासु ने बहुत सोचा-विचारा पर उसे पर्याप्त समय तक प्रयत्न करने पर भी इसका उत्तर न सूझ पड़ा। अन्त में, उसने कहा-”हातिम के उपकार तो विख्यात हैं और उनकी कथा सबको याद है। पर उस जमाने के किसी पहलवान ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसके कारण उसे आज तक याद रखा जाता।”
शेख सादी ने उसे समझाया कि “तुम ने ठीक कहा हैं। इस कथन में ही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी मौजूद हैं।” पूछने वाला संतुष्ट होकर चला गया। उसने परोपकार की महत्ता को समझ लिया।
भट्टी और धौंकनी
लुहार की भट्टी और हवा भरने की धौंकनी में एक बार लड़ाई हो पड़ी।
भट्टी ने आग बबूला होकर कहा-मरे जानवर की घृणित खाल से बनी कुरूप धौंकनी, तेरी बदबू भरी साँस मुझे बहुत खलती है, हट, मेरे सामने से।
धौंकनी क्रुद्ध नहीं हुई। उसने शान्त स्वर से कहा-बहिन, भूल गई कि तुम्हारे चेहरे की लालिमा मेरे ही निरन्तर श्वासोच्छासों की परिणित है। मेरे विरत हो जाते ही तुम काली कलूटी कोयल की राख बनकर रह जाओगी।
क्रोध नाश का मूल है
सृष्टि का निर्माण कार्य पूर्ण हो गया। मनुष्य, पशु, पक्षी, कीट, पतंग, देव, दानव सभी ने अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को समझा और अपने-अपने क्षेत्र में काम करने के लिए चल दिये।
अन्त के लिए शैतान बच गया। उसने भगवान से प्रार्थना की कि मुझे भी कोई काम और क्षेत्र सौंप दीजिए।
भगवान चिन्ता में पड़ गये। यदि शैतान को शरीर मिल गया तो फिर इसके द्वारा उत्पन्न हुए उपद्रवों का पारावार न रहेगा। इसलिए इसे शरीर तो नहीं दिया जा सकता, पर कुछ न कुछ काम तो बताना ही पड़ेगा।
बहुत सोच कर भगवान ने शैतान से कहा-तुम्हें क्रोध का रूप दिया गया। इस संसार में जिन्हें तुम नष्ट होने वाला समझो, उनके सिर पर चढ़ जाया करना।
तब से लेकर अब तक शैतान मारा मारा फिरता है। उसे कोई निश्चित स्थान और काम तो नहीं मिला। पर जिसकी दुर्गति होने वाली भवितव्यता उसे दीखती है उसी के सिर पर क्रोध बन कर चढ़ जाता है।
यह तथ्य सर्व विदित है कि जिसे क्रोध आता है उसका सर्वनाश होकर रहता है। शैतान के कानून को कोई तो जानते हैं और कोई नहीं भी जानते।
अज्ञातवास से लौटते ही हमने अपने मार्गदर्शक के आदेश से ‘युग-निर्माण-योजना’ को विचारधारा का परिचय देना आरम्भ कर दिया था। दो वर्ष तक सैद्धान्तिक प्रशिक्षण अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों द्वारा देकर अब गत गुरु पूर्णिमा (6 जुलाई) से उसे व्यवहारिक कार्यरूप में प्रस्तुत कर दिया गया है। उस पुनीत पर्व पर इसका उद्घाटन हो गया और योजना अब कार्यरूप में अग्रसर हो रही है।
हमारे अनुरोध को परिजनों ने पूरे ध्यान से सुना और समझा है और उसी दिन तदनुसार व्यवहार भी आरम्भ कर दिया है। प्राप्त समाचारों के अनुसार तीन चौथाई परिजनों ने उस दिन उपवास रखा, विशेष जप-हवन किया और जहाँ जितने सदस्य थे उनने इकट्ठे होकर प्रतिज्ञा ली कि आज के दिन से अपनी उपासना को अधिक निष्ठापूर्वक आरम्भ करेंगे, जीवन शोधन पर पूरा ध्यान देंगे और जन-जागृति के लिए सेवा-बुद्धि से कुछ न कुछ समय नियमित रूप से लगाते रहेंगे। परमार्थ का सबसे श्रेष्ठ तरीका किसी को सन्मार्ग की प्रेरणा देना ही हो सकता है। अपना सुधार करके ही कोई मनुष्य आपत्तियों और कठिनाइयों से छुटकारा प्राप्त कर सकता है। दूसरों की भौतिक सहायता तो उसे तत्कालिक थोड़ा लाभ भले ही पहुँचा दे पर स्थायी हित साधन तो अपने सुधार से ही होता है। इसलिये युग-निर्माण कार्यक्रम में जन-भावनाओं को उत्कृष्ट बनाने को ही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ माना गया है। प्रसन्नता की बात है कि योजना को कार्यान्वित करते हुये प्रत्येक सदस्य ने उपासना और जीवन शोधन के साथ-साथ परमार्थ को भी आवश्यक महत्व दिया है। ज्ञान-यज्ञ के लिए सभी परिजन अपनी भावना समय, एवं श्रद्धा अर्पित करेंगे, हमारे लिए यह सबसे अधिक प्रसन्नता और सन्तोष की बात है।
अनुमान यह था कि समाचार थोड़े आवेंगे इस लिये उनमें से अधिक प्रभावशाली समाचारों को अगस्त अंक में पाठकों की जानकारी और उत्साह वृद्धि के लिये प्रकाशित करेंगे। यह अंक दस दिन लेट भी इसी कारण किया गया है। पर जो समाचार 30 हजार परिजनों ने भेजे वे इतनी अधिक संख्या में और ऐसे महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें संक्षिप्त करके एक-एक दो-दो पंक्ति में भी छापा जाय तो साधारण अखंड-ज्योति से तिगुने पृष्ठों की आवश्यकता पड़ेगी। इस विवशता से समाचार नहीं छापे जा रहे हैं। इस अंक में केवल वे लेख ही दिये गये हैं जिनमें प्रबुद्ध मनीषियों ने युग-निर्माण-योजना के सम्बन्ध में अपने-अपने दृष्टिकोण उपस्थित किये हैं। इनसे पाठकों को योजना का स्वरूप समझने में सहायता मिलेगी।
समाचारों का साराँश यह है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रायः प्रत्येक पाठक ने गुरुपूर्णिमा के दिन निश्चय किया है। इस परिवर्तन को ही हम युग-निर्माण की आधारशिला मानते है। हम बदलेंगे तो हमारी दुनिया भी बदलेगी यह निश्चित है। उपासना अध्यात्म का मूल है। गायत्री उपासना को तो हिन्दू-संस्कृति की गंगोत्री माना गया है। इसलिए नवीन प्रेरणा के अनुसार पुराने उपासकों ने अपना जप-साधन अधिक श्रद्धा-भावना से परिपूर्ण बनाने का निश्चय किया है। जो इस मार्ग पर आगे बढ़ चुके हैं उन्होंने पंचकोशी गायत्री-साधना के माध्यम से अपने अन्नमयकोश, मनोमयकोश, प्राणमयकोश विज्ञानमयकोश, आनन्दमयकोश का परिष्कार करते हुये आत्म-साक्षात्कार की स्थिति तक पहुँचने का प्रण किया है। जो लोग अभी नये-नये ही इस परिवार में सम्मिलित हुए हैं, उन्होंने गुरुपूर्णिमा से अपनी साधना किसी न किसी रूप से प्रारम्भ कर दी है। साथ ही सबने यह आश्वासन दिया है कि अपने कुटुम्बी, सम्बन्धी और मित्रों को उपासना मार्ग में लगाने का शक्तिभर प्रयत्न करेंगे। स्त्रियों की उपासना पर अधिक जोर दिया गया था, ताकि नई पीढ़ी को प्रबुद्ध बनाने में सहायता मिले। इस सुझाव का प्रायः सभी ने स्वागत किया है और तदनुसार प्रयत्न भी आरम्भ कर दिया है। जैसा कि आश्वासन मिला है यदि ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों की धर्मपत्नियाँ निष्ठापूर्वक गायत्री-उपासना में सम्मिलित हो सकीं तो इसमें सन्देह नहीं कि अगली पीढ़ी के लिए सहस्रों महापुरुष और महा नारियाँ भारतमाता का गौरव बढ़ाने वाले पैदा हो सकेंगे। पारिवारिक ज्ञान गोष्ठियाँ इस दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक हैं। इस सम्बन्ध में भी उत्साहवर्धक सूचनाएँ मिली हैं। आधे से अधिक पाठक ऐसे हैं जिन्होंने अपने घरों में एक घण्टा रोज ज्ञानचर्चा और शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था में प्रतिदिन लगाना आरम्भ कर दिया है। परिवार सुधरेंगे तो सारा समाज ही सुधरेगा और इसी क्रम से समस्त संसार का सुधार संभव हो सकेगा। अपने परिवारों में हमें नम्रता, शिष्टाचार, उदारता, प्रेम, न्याय, एकता और सहिष्णुता की परम्परा कायम करनी है। ‘अखण्ड ज्योति परिवार’ को इस दिशा में सब से पहले और सबसे प्रभावशाली कदम उठाना है। प्राप्त समाचारों से विदित होता है कि यह कदम हजारों विचारशील पाठकों ने इसी गुरुपूर्णिमा से उठा दिया है और शेष कुछ ही दिनों में उठाने जा रहे हैं।
रात को जल्दी सोना, प्रातः जल्दी उठना, दिन भर की दिनचर्या का प्रोग्राम सबेरे ही बना लेना और फिर उसी के अनुसार काम करना चाहिए। प्रातः बहुत हल्का जलपान करना, दिन में दो बार भोजन करना, सप्ताह में एक दिन उपवास रखना, थाली में जूठन न छोड़ना, भगवान को भोग लगाकर खाना जैसी आहार शुद्धि की योजना दो तिहाई लोगों ने स्वीकार कर ली है। कितने ही ऐसे भी हैं जिन्होंने आजीवन नमक मसाले छोड़ देने का व्रत लिया है। ब्रह्मचर्य सम्बन्धी सूचनाओं से पता चलता है कि लोगों का जो क्रम अब तक रहा है उससे संयम नियम की मात्रा दूनी हो जायगी। असंयम आधा घट जायगा।
नशा, माँस, फैशन, फिजूलखर्ची, सिनेमा, पान, चाय आदि छोड़ने वालों की संख्या पाँच हजार से ऊपर है। वृक्षारोपण में सैकड़ों लोगों ने भाग लिया है। तुलसी और फूल घर-घर में बोये जा रहे हैं। सेवा-भावना से सैकड़ों प्रौढ़ पाठशालाएँ जगह-जगह पारस्परिक सहयोग के आधार पर स्थापित हुई है, जिनमें साक्षरता के साथ-साथ जीवन-विद्या के प्रत्येक पहलू पर भी प्रशिक्षण की व्यवस्था रहेगी। इसी प्रकार प्रेरणाप्रद पुस्तकें संग्रह करके उन्हें घर-घर पढ़ाये जाने का कार्यक्रम बनाकर लगभग पचास उत्साही व्यक्तियों ने छोटे-छोटे पुस्तकालय स्थापित किये हैं। महिलाओं को गृहविज्ञान तथा सिलाई की शिक्षा के साथ-साथ प्रयोग महिला विद्यापीठ की परीक्षाएँ दिलाने वाले सात केन्द्र विभिन्न नगरों में स्थापित हुए हैं।
मृत्युभोज, पशुबलि, बाल विवाह, अनमेल विवाह कन्या विक्रय, पर्दा प्रथा आदि सामाजिक कुरीतियों और अंधविश्वासों को हटाने के लिये जगह-जगह आन्दोलन आरम्भ कर दिया गया है। दहेज उन्मूलन की ओर सबसे ज्यादा ध्यान दिया है। प्रयत्न यह किया जा रहा है कि अपने परिवार में ऐसे आदर्श विवाहों की परम्परा चल पड़े जिनमें वरपक्ष दहेज न ले और कन्यापक्ष जेवर न चढ़ने दे। बिना धूमधाम और लम्बी चौड़ी बरात के बहुत ही सादी रीति से विवाह हुआ करे। विवाह योग्य लड़के और लड़कियों में यह हस्ताक्षर आन्दोलन आरम्भ कर दिया गया है कि यदि उनके अभिभावक दहेज और फिजूलखर्ची से भरा विवाह करना चाहेंगे तो उसे स्वीकार न करेंगे और आजीवन कुँवारे ही बने रहेंगे। इस प्रकार की कुरीतियों के विरुद्ध जन-भावनाएँ जागृत करने के लिये कितने ही विचार-शील लोगों ने टोली बनाकर निकालना और घर-घर जाकर अपन अभिप्राय समझाना आरम्भ कर दिया है। आदर्श वाक्य दीवारों पर लिखने का आन्दोलन बहुत जोर पकड़ेगा ऐसा लगता है, क्योंकि इसे कार्यान्वित करने की सूचनाएँ आधे के लगभग परिजनों ने भेजी हैं।
परिवार के जो सदस्य चिकित्सा-कार्य कर रहे हैं उन्होंने अपने रोगियों को सात्विक आहार-विहार तथा जप-स्वाध्याय की आवश्यकता समझाना शुरू कर दिया है। कितने ही अध्यापक अपने छात्रों को अतिरिक्त रूप से नैतिकता और मानवता की शिक्षा भी देने लगे हैं। पुरोहितों ने अपने यजमानों को धर्म शिक्षा देनी आरंभ कर दी है। जिन लोगों के पास अवकाश है उनमें से कई वयोवृद्ध सज्जनों ने रामायण, गीता की कथाएँ कहना और पाठशालाएँ चलाना आरम्भ कर दिया है। सन्त-महात्मा भी इधर आकर्षित हुये हैं और उन्होंने भी शिक्षा-प्रसार के कार्यक्रम में सहयोग देना आरम्भ कर दिया है। एक महात्मा ने तो छः गाँवों में कन्या पाठशालाएँ स्थापित कराई है जिनका खर्च इस वर्ष ग्रामवासी चन्दा करके चलायेंगे और अगले वर्ष उन्हें सरकारी सहायता प्राप्त हो जायगी। छोटे गाँवों में जहाँ स्कूल नहीं थे वहाँ इस वर्ष कितनी ही प्राइमरी पाठशालायें इसी प्रकार के प्रयत्नों द्वारा खुली हैं।
सवालक्ष गायत्री मंत्र लिखाकर सामूहिक गायत्री-मन्दिर स्थापित करने का कार्यक्रम बहुत जगह आरम्भ हुआ है। अहमदाबाद शाखा ने सवा करोड़ मंत्र लिखाये हैं और उन मंत्रों का एक मंदिर युग-निर्माण केन्द्र के रूप में शीघ्र ही स्थापित होने वाला है। इन केन्द्रों में ही परिवार का कार्यालय रहेगा और वहाँ समय-समय पर कीर्तन-भजन तथा जप-स्वाध्याय के आयोजन होते रहेंगे। इनमें गायत्री माता का एक बड़ा चित्र भी स्थापित किया जायगा। पुराने मंदिरों में धर्म प्रवृत्तियाँ आरंभ कराने का भी कितनी ही जगह प्रयत्न चल रहा है। कुछ टूटे मंदिरों की मरम्मत करके उन्हें पूजा-उपासना और सत्संग आदि के कार्यक्रमों के उपयुक्त बनाया जा रहा हैं।
साप्ताहिक सत्संगों की प्रक्रिया शिथिल पड़ गई थी। अब उसमें पुनः जागृति आई है और प्रति सप्ताह किसी एक सदस्य के घर पर सत्संग होते रहने का क्रम फिर से आरम्भ कर दिया गया है। इन सत्संगों में एक तिहाई समय हवन में और दो तिहाई प्रवचनों में लगा करेगा। आगामी आश्विन में नवरात्रि प्रायः सभी शाखाओं में सामूहिक अनुष्ठानों और शिक्षण शिविरों के रूप में मनाई जायगी। पर्व और त्यौहारों का सामूहिक आयोजन करने की विधिवत पद्धति बनाने की सभी जगह से माँग आई है और आशा है कि वह जल्दी ही बन जायगी। षोडश संस्कारों में से प्रमुख संस्कारों को सरल विधि से कर सकना लोग सीखना चाहते हैं, जिससे परस्पर मिल-जुलकर बिना खर्च के ऐसे आयोजन कर लिया जाया करे। ऐसी सरल, संक्षिप्त और सर्व साधारण के लिये उपयोगी पद्धति भी शाखाओं की आवश्यकता पूरी करने के लिये जल्दी ही बन जायगी। एक छोटी पुस्तक जन्म-दिन मनाने की भी बनाई जानी है। जन्म दिन मनाने की प्रथा उत्साहपूर्वक चलाई जानी चाहिये ताकि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन की महत्ता और उपयोगिता पर आवश्यक विचार करते हुये भावी-जीवन का सदुपयोग करने के लिये विशेष प्रेरणा प्राप्त कर सके।
कई व्यक्तियों के ऐसे पत्र आये हैं जो अपनी-अपनी जातियों या उपजातियों में कुरीतियों का उन्मूलन तथा सत्प्रवृत्तियों की वृद्धि करने के लिये जातीय-संगठन बनाना चाहते हैं। यह कार्य हमें उपयोगी ही प्रतीत हुआ है और ऐसे लोगों को स्वीकृति देते हुये हमने उन्हें व्यवहारिक मार्ग दर्शन के लिये मथुरा भी बुलाया है। ऐसे छोटे-छोटे प्रयत्नों से भी सामाजिक उत्कर्ष में बहुत योगदान मिल सकता है।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आये हुये हजारों समाचारों को छापना संभव न हो सका, परिजन व्यक्तियों ने विशेष रचनात्मक कार्य किये हैं, उन्हें वे कार्य करने की प्रेरणा कैसे मिली, प्रयत्न कैसे किये, कठिनाई क्या आई और प्रगति कैसे हुई, इसको आवश्यक जानकारों दूसरों का मार्ग-दर्शन करने के उद्देश्य से छोटे-छोटे लेखों के रूप में छापी जाया करेगी। कोई सज्जन आत्मश्लाघा की दृष्टि से ऐसे समाचार न भेजे। वरन् विशुद्ध रूप से जन-मार्ग दर्शन ही उसका उद्देश्य हो तो अच्छा है। इसमें व्यक्तियों के नाम रहे ही नहीं। यदि अत्यन्त आवश्यकतावश कहीं उनका उल्लेख करना ही हो तो अत्यन्त संक्षेप में किया जाय। स्मरण रहे कि नाम छपाने की मनोवृत्ति लोकेषणा-अहंकार को उत्पन्न करती है, जो कि सच्चे लोक सेवकों के लिये विष के तुल्य त्याज्य मानी गई है। इससे पुण्य क्षीण होते चले जाते हैं और परस्पर ईर्ष्या-द्वेष उत्पन्न होते हैं सो अलग।
यह स्पष्ट है कि युग-निर्माण का उद्देश्य जन-मानस में अध्यात्म तत्वों का समावेश करना है। उपासना, जीवन-शोधन और परमार्थ के त्रिविध कार्यक्रमों को अपनाते हुये हमें जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिये ही अग्रसर होना है। योजना में सन्निहित कार्यक्रम हमारे आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति हो सहायक या साधन-मात्र ही हो सकते हैं। हमें लक्ष्य को प्रधानता देते हुये उसकी पूर्ति के लिये ही इन कार्यों को करना है। लक्ष्य को भूल कर दूसरी संस्थाओं की तरह लोकरंजन, दिखावट, यश की कामना या तुच्छ स्वार्थ की प्राप्ति के लिये कार्य करने से तो वही दुर्गति हमारी भी होगी जो दूसरी की हो रही है।
राजा-भोज अपने मन्त्री के साथ कहीं दूर यात्रा कर रहे थे। रास्ते में उन्होंने एक किसान को ऊबड़-खाबड़ जमीन पर गहरी नींद में सोते देखा। राजा ने मन्त्री से पूछा-ऐसी ऊँची-नीची, ढेले और कंकड़ों से भरी हुई जमीन में इस किसान को गहरी नींद क्यों कैसे आ गई? हमें तो थोड़ी अड़चन होने पर निद्रा उचट जाती है।
मन्त्री ने कहा-महाराज। यह सब अभ्यास और परिस्थितियों पर निर्भर है। मनुष्य से अधिक कोई कठोर नहीं और न उससे अधिक कोई कोमल होता है। परिस्थितियाँ मनुष्य को अपने अनुकूल बना लिया करती हैं।
पर यह बात राजा को पूरी तरह नहीं जँची। मन्त्री ने कहा-”तब इसकी परीक्षा कर ली जाय।” दोनों ने सलाह करके उस किसान को राजमहलों में रखने का निर्णय किया जिससे उसे कुछ दिन तक राजसी ठाठ-बाट से रखकर उसकी जाँच की जाय। महलों में पहुँचने पर उसके खाने, पीने और सोने का बढ़िया-से- बढ़िया इन्तजाम किया गया और उसे खूब आराम से रखा जाने लगा। इस प्रकार कई महीने बीत गये और किसान वैसे ही राजसी जीवन का अभ्यस्त हो गया।
प्रयोग का अन्तिम दिन आ पहुँचा। मन्त्री ने किसान के पलंग पर बिछे गद्दे से भीतर कुछ पत्ते और तिनके चुपके रखवा दिये। राजा छिपकर देखने लगा कि देखें इस परिवर्तन का क्या परिणाम होता है।
किसान रात भर करवटें बदलता रहा। उसे नींद नहीं आई। सबेरे राजा उसके पास पहुँचे तो उसने शिकायत की गद्दे में कुछ गढ़ने वाली चीज मालूम पड़ती है, जिसने नींद हराम कर दी।
मन्त्री ने कहा-यह वही किसान है जो ढेले और कंकड़ों पर धूप में पड़ा सो रहा था। आज इसे पलंग पर बिछे रुई के गद्दे में तिनके भी चुभते हैं। यह अभ्यास का ही अन्तर है। कठोरता और कोमलता की जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़े कुछ ही दिनों में मनुष्य उन्हीं का अभ्यस्त हो जाता है।
उठो, तरुण विक्षुब्ध न हो तुम नव-युग के आधार हो
युग-निर्माण-योजना की तुम सबल सुदृढ़ पतवार हो
(1)
युग-प्रेरक दृढ़ वक्ष तुम्हारा साहस से सम्पन्न हो।
आयें बाधाएँ ही कितनी पर न कभी तुम खिन्न हो॥
सदा हँसो जैसे हँसते हैं सुमन कटीली डाल पर।
ब्रह्मचर्य का तेज झलकता रहे अपरिमित, भाल पर॥
चलो स्वयं ही पथ प्रशस्त कर कितना ही अँधियार हो
ऐसी ज्योति जलाओ जिससे धरती पर उजियार हो
(2)
तुम्हें न रोक सकें आकर्षण और प्रलोभन बड़े-बड़े।
रहो देखते बन तटस्थ सब, दिव्य-लक्ष्य -हित सदा अड़े॥
जिधर बढ़ें युग-चरण तुम्हारे प्रलय उधर ही मच जाए।
छूलें जिसे भुजाएँ, दुस्तर-कार्य पूर्ण वह हो जाए॥
नई क्रान्ति की नई चुनौती, तुम्हें सहज स्वीकार हो!
अटल-साधना, श्रम-संयम के तुम्हीं दिव्य अवतार हो!!
(3)
जग में कार्य असम्भव क्या यदि लगन सत्य-शुभ-सुन्दर हो।
उर में हो विश्वास अमित, चरणों में गति-शाश्वत-स्वर हो।
क्योंकि जगत में जी सकता वह जिसकी भुज-दंडों में बल।
उसका क्या जीवन जो जर्जर चिन्तित-कायर अति निर्बल॥
अस्तु अभय बन बिचरो साथी, तुम्हें सभी से प्यार हो!
बढ़ो सदा तूफानों में तुम, चाहे भीषण ज्वार हो!!
-रामस्वरूप खरे
वेदान्त साधारण लोगों को इसलिए अपनी ओर खींचता है कि वह उनके धर्मग्रन्थ वेद की शिक्षा है। शिक्षित व्यक्ति को वह इसलिए आकर्षित करता है कि सूर्य के तले दर्शन कहलाने योग्य कोई भी ऐसा दार्शनिक ज्ञान नहीं है जो वेदान्तिक अद्वैतवाद का समर्थन न करता हो और न ऐसा कोई विज्ञान ही है जो वेदान्त अथवा सत्य के पक्ष की पुष्टि और उन्नति न करता हो। पर वह वेदान्त काल्पनिक नहीं व्यावहारिक होना चाहिए। पुस्तकों में छपे हुये और कीड़ों के आहार के लिए अलमारियों में रखे हुये वेदान्त से काम न चलेगा। लाभ प्राप्त करने के लिए तुमको इसे आचरण में लाना होगा। जो वेदान्त तुम्हारी ठण्ड (अकर्मण्यता) को दूर नहीं करता जो आपको प्रसन्नता प्रदान नहीं करता जो आपके बोझ को नहीं उतारता, तो ऐसे वेदान्त को ठुकरा कर अलग कर दो। सच्चा वेदान्त बतलाता है कि आपका कर्म सफल हो इसके लिये आपको उसके परिणाम पर ध्यान नहीं देना चाहिए, आपको उसके फल की परवाह नहीं करनी चाहिए। साधन और उद्देश्य को मिलाकर एक कर दो तो काम ही आपका उद्देश्य या लक्ष्य बन जायगा। बस, परिणाम और फल की परवाह मत करो। सफलता अथवा असफलता मेरे लिए कुछ नहीं है, मुझे काम जरूर करना होगा, क्योंकि मुझे काम प्यारा लगता है, मुझे केवल काम के लिए ही काम करना चाहिए। काम करना मेरा उद्देश्य है, कर्म में प्रवृत्त रहना ही मेरा जीवन है। वही मेरा स्वरूप, मेरी असली आत्मा और शक्ति है। अतः मुझे काम करना ही होगा।
-स्वामी रामतीर्थ
*समाप्त*