मन ही सबसे प्रबल है। मन की प्रेरणा से मनुष्य की जीवन दिशा बनती है। मन की शक्तियों से वह बड़े काम करने में समर्थ होता है। मन ही नीचे गिराता है, मन ही ऊँचा उठाता है। असंयमी और उच्छृंखल मन से बढ़कर अपना और कोई शत्रु नहीं जिसका मन विवेक और कर्त्तव्य को ध्यान में रखते हुए सन्मार्ग पर चलने का अभ्यस्त हो गया तो वह देवताओं के सान्निध्य जैसा सुख कर होता है।
मन की गतिविधियों पर सूक्ष्म दृष्टि से निरंतर ध्यान रखे। उसे कुमार्गगामी न होने दे। दुर्भावनाओं को प्रवेश न करने दे। वासना और तृष्णा से चित्त वृत्तियों को हटावे। किसी का अहित न सोचे। अहंकार को न पढ़ने दें। पाप से मन को बचाये रहना और उसे पुण्य कार्यों में प्रवृत्त रखना यही मानव जीवन का सबसे बढ़ा पुरुषार्थ है।
-ब्रह्मर्षि वशिष्ठ
वर्ष 24 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 02
गढ़ फिर कोई दीप नया तू मिट्टी मेरे देश की।
अन्धी हुई दिशायें सारी यूँ अंधियारी छा रही,
किरण तोड़ती साँस रोशनी जीने की छटपटा रही।
ऐसा कुछ ठहराव आ गया आज विश्व की राह में,
पथ भूले बनजारे जैसी पीढ़ी चलती जा रही।
कोई बाँह पकड़ ऐसे में, सही दिशा का ज्ञान दे,
सख्त जरूरत आज जगत को एक सच्चे दरवेश की॥ गढ़ फिर कोई॰ ॥
देवभूमि ये जन्म दिये इसने अनगिन अवतार को।
ज्योति-स्तम्भ बन हरती आई, ये जग के अंधियार को॥
मुझको है विश्वास कि धरती बाँझ नहीं इस देश की,
फिर से कोई नया मसीहा देगी ये संसार को।
इसकी मिट्टी उड़ कर बैठी सूरज के भी भाल पर,
नित उभरी आवाज यहाँ से, शान्ति प्रेम सन्देश की ॥ गढ़ फिर कोई0॥
यद्यपि प्रलयंकारी घन से घिरा हुआ आकाश है,
फिर भी मानव के भविष्य से मेरा मन न निराश है।
शायद इसी मोड़ के आगे मानव का निज लक्ष्य हो?
इसी तिमिर के पीछे शायद कोई नया प्रकाश है।
जब तक मेरा देश, मनुजता होना नहीं उदास तू,
निकट जन्म-बेला है शायद किसी नये अवधेश की।
गढ़ फिर कोई दीप नया तू मिट्टी मेरे देश की! —चन्द्रसेन “विराट”
इस संसार में जो कुछ शुभ है, श्रेष्ठ है, मंगलमय है वह सब परमात्मा का ही वैभव है। गीता में अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए बताया है कि जो कुछ इस संसार में श्रेष्ठ दिखाई पड़ता है उसे भगवान की ही विभूति जानना चाहिये।
परमात्मा की समीपता—
परमात्मा के जितने ही समीप हम पहुँचते हैं उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती हैं। उसी अनुपात से आन्तरिक शान्ति की भी उपलब्धि होती चलती है।
हिमालय की ठण्डी हवाएँ उन लोगों को अधिक शीतलता प्रदान करती हैं जो उस क्षेत्र में रहते हैं। इसी प्रकार आग की भट्टियों के समीप काम करने वालों को गर्मी अधिक अनुभव होती है। जीव ज्यों-ज्यों परमात्मा के निकट पहुँचता जाता है, त्यों-त्यों उसे उन विभूतियों का अपने में अनुभव होने लगता है जो उस परम प्रभु में ओत प्रोत हैं।
उपासना का अर्थ है—पास बैठना। परमात्मा के पास बैठने से ही ईश्वर उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुएँ तथा प्राणी अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ते हैं तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा?
पुष्प वाटिका में जाते ही फूलों की सुगन्ध से चित्त प्रसन्न होता है। चन्दन के वृक्ष अपने समीपवर्ती वृक्षों को सुगन्धित बनाते हैं। सज्जनों के सत्संग से साधारण व्यक्तियों की मनोभावनाएँ सुधरती हैं, फिर परमात्मा अपनी महत्ता की छाप उन लोगों पर क्यों न छोड़ेगा जो उसकी समीपता के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
मिलन का प्रतिफल—
आत्मा को परमात्मा के निकट पहुँचने पर वही बात बनती है जो गरम लोहे और ठण्डे लोहे के एक साथ बाँधने पर होती है। गरम लोहे की गर्मी ठण्डे में जाने लगती है और थोड़ी देर में दोनों का तापमान एक सरीखा हो जाता है। दो तालाब जब तक अलग-अलग रहते हैं तब तक उनके पानी का स्तर नीचा-ऊँचा बना रहता है पर जब बीच में नाली निकालकर उन दोनों को आपस में संबन्धित कर दिया जाता है तो अधिक भरे हुए तालाब का पानी दूसरे कम पानी वाले तालाब में चलने लगता है और यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि दोनों का जल स्तर समान नहीं हो जाता।
दो जलाशयों का मिलना या गरम-ठण्डे लोहे का परस्पर मिलना जिस प्रकार एकरूपता की स्थिति उत्पन्न करता है उसी प्रकार उपासना द्वारा आत्मा और परमात्मा का मिलन होने पर जीव में दैवी गुणों की तीव्रगति से अभिवृद्धि होने लगती है।
पूजा और उपासना—
किसी व्यक्ति की उपासना सच्ची है या झूठी है उसकी एक ही परीक्षा है कि साधक की अन्तरात्मा में सन्तोष, प्रफुल्लता, आशा, विश्वास और सद्भावना का कितनी मात्रा में अवतरण हुआ। यदि यह गुण नहीं आये हैं और हीन वृत्तियाँ उसे घेरे हुए हैं तो समझना चाहिए कि वह व्यक्ति पूजा पाठ कितना ही करता हो उपासना से अभी दूर ही है।
पूजा पाठ अलग बात है, उपासना अलग। उपासना के लिए पूजा पाठ से कर्मकाण्ड की चिन्हपूजा करते रहने मात्र से उपासना का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता। जीव को जीवन धारण करने के लिये शरीर की आवश्यकता होती है पर शरीर ही जीवन
नहीं है। जीव विहीन शरीर देखा तो जा सकता है पर उसका कोई लाभ नहीं। इसी प्रकार उपासना विहीन पूजा भी होती तो है पर उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
आत्मा जब परमात्मा की गोदी में बैठता है तो उसे प्रभु की सहज करुणा और अनुकम्पा का लाभ मिलता है। उसे तुरन्त ही निर्भयता और निश्चिन्तता की प्राप्ति होती है। हानि, घाटा, रोग, शोक, विछोह, चिन्ता, असफलता और विरोध की विपन्न स्थितियों में भी उसे विचलित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसे इन प्रतिकूलताओं में भी अपने हित साधन का कोई विधान छिपा दिखाई पड़ता है। वस्तुतः विपन्नता हमारी त्रुटियों का शोधन करने और पुरुषार्थ को बढ़ाने के लिए ही आती है। आलस्य और प्रमाद को, अहंकार और मत्सर को मनोभूमि से हटाना ही प्रतिकूलताओं का उद्देश्य होता है। सच्चे आस्तिक को अपने प्रिय परमेश्वर पर सच्ची आस्था होती है और वह अनुकूलताओं की तरह प्रतिकूलताओं का भी खुले हृदय से स्वागत करता है।
कटु और मधु अनुभूतियाँ—
माता मधुर मिष्ठान्न भी खिलाती है और आवश्यकता पड़ने पर कड़ुई दवा भी खिलाती है। दुलार से गोदी में भी उठाये फिरती है और जब आवश्यकता समझती है डॉक्टर के पास सुई लगाने या आपरेशन कराने के लिए भी ले जाती है। माता की प्रत्येक क्रिया बालक के कल्याण के लिये ही होती है, परमात्मा की ममता जीवन के प्रति माता से भी अधिक है। प्रतिकूलताएं प्रस्तुत करने में उसकी उपेक्षा या निष्ठुरता नहीं, हितकामना ही छिपी रहती है।
अपनी कठिनाइयों को हल करने मात्र के लिए, अपनी सुविधाएँ बढ़ाने की लालसा मात्र से जो प्रार्थना पूजा करते हैं वे उपासना के तत्वज्ञान से अभी बहुत पीछे हैं। उन्हें उन बालकों में गिना जाना चाहिये जो प्रसाद के लालच से मन्दिर में जाया करते हैं। ऐसे बच्चे वह आनन्द कहाँ पाते हैं जो भक्तिरस में निमग्न एक भावनाशील आस्तिक को प्रभु के सम्मुख अपना हृदय खोलने और मस्तक झुकाने में आता है। प्रभु के चरणों पर अपनी अन्तरात्मा की अर्पण करने वाले भावविभोर भक्त और प्रसाद को मिठाई लेने के उद्देश्य में खड़े हुए भिखमंगे में जो अन्तर होता है वही सच्चे और झूठे उपासकों में होता है। एक का उद्देश्य परमार्थ है दूसरे का स्वार्थ। स्वार्थी को कहीं भी सम्मान नहीं मिलता। परमात्मा की दृष्टि में भी ऐसे लोगों का क्या कुछ मूल्य होगा?
हित-साधना के दो प्रयाग—
लुहार अपनी दुकान पर लोहे के टुकड़ों से तरह तरह की चीजें बनाता रहता है। उन टुकड़ों को वह कभी गरम करने के लिए भट्टी में तपाता है कभी पानी में डालकर ठण्डा कर लेता है। इन विसंगतियों को देखकर कोई भोला मनुष्य असमंजस में पड़ सकता है कि लुहार ने इस दुमुँही प्रक्रिया को क्यों अपना रखा है। पर वह कारीगर जानता है कि किसी लोहे के टुकड़े को बढ़िया उपकरण की शक्ल में परिणत करने के लिये दोनों ही प्रकार की ठण्डी-गरम प्रणालियों का प्रयुक्त होना आवश्यक है। मनुष्य के जीवन में भी सुख-दुख का, धूप-छाँह का अपना महत्व है। रात-दिन की अँधेरी, उजेली, विसंगतियाँ ही तो कालक्षेप का एक सर्वांगपूर्ण विधान प्रस्तुत करती हैं। यदि मनुष्य सदा सुखी और सम्पन्न ही रहे तो निश्चय ही उसकी आन्तरिक प्रगति रूप जाएगी। जो झटके प्रगति के लिए आवश्यक हैं उन्हें ही हम कष्ट कहते हैं। इन्हें सच्चा भक्त कड़ुई औषधि की तरह ही शिरोधार्य करता है। सन्निपात का मरीज जैसे डॉक्टर को गाली देता है वैसी भूल समझदार आस्तिक ईश्वर के प्रति नहीं कर सकता।
आशा और धैर्य का प्रकाश—
विपन्नताओं की स्थिति में धैर्य न छोड़ना, मानसिक सन्तुलन नष्ट न होने देना, आशा और पुरुषार्थ को न छोड़ना आस्तिकता का प्रथम चिन्ह है जिसे हम महात्मा जैसी अनन्त सामर्थ्यवान सत्ता के साथ बैठ का सौभाग्य प्राप्त है वह किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति से क्यों डरेगा? क्यों अधीर होगा? क्यों निराशा और कातरता प्रकट करेगा? धैर्य और साहस की अजस्र धारा उसके मनः क्षेत्र में से उठती ही रहनी चाहिए।
जो आस्तिक है उसकी आशा कभी क्षीण नहीं हो सकती। वह केवल उज्ज्वल भविष्य पर ही विश्वास रख सकता है। अन्धकार अनात्म तत्व है। आत्मपरायण व्यक्ति के चारों ओर प्रकाश-केवल प्रकाश रहना चाहिए। उसे झुँझलाने और खिन्न होने की आवश्यकता क्यों पड़ेगी? आस्तिकता माने—आत्म विश्वास। परमात्मा पर विश्वास करने वाले को अपना भविष्य सदा उज्ज्वल एवं प्रकाशवान ही दिखाई देगा।
श्रेष्ठता की अभिवृद्धि—
उपासना का दूसरा प्रतिफल है श्रेष्ठताओं की वृद्धि। चूँकि परमात्म का समस्त श्रेष्ठताओं का केन्द्र है, उसका सान्निध्य आत्मा को दिन दिन उत्कृष्ट बनाता चलता है। भक्त को अपना भगवान् सब में दिखाई पड़ता है इसलिए वह हर किसी की अच्छाइयाँ देखता है और उनकी चर्चा एवं विचारणा करते हुए अपने आनन्द और दूसरों का सद्भाव को बढ़ाता है। निन्दा और ईर्ष्या असुरता के दो प्रधान अस्त्र हैं। इनका प्रयोग उसी पर किया जा सकता है जिसके प्रति परायेपन का, शत्रुता का भाव रहे। जब सब अपने हैं तो अपनों की निन्दा कैसी? अपनों से ईर्ष्या कैसे?
बुराई को तोड़ने के लिए नहीं, अच्छाई को बढ़ाने के लिए उसके प्रयत्न होते हैं। अच्छाई को बढ़ाना ही वस्तुतः बुराई को तोड़ना है। बुराई तोड़ दी जाय और उसके स्थान पर अच्छाई की स्थापना न हो तो टूटी हुई बुराई फिर उपज आती है। आस्तिकता का दृष्टिकोण अच्छाई को बढ़ाना होता है ताकि बुराई के लिए कोई गुंजाइश ही न रहे। वह सदा अच्छाई की चर्चा करेगा। प्रेम से दुष्टता को परास्त करेगा। दुष्टता करके प्रेम के अँकुरों को जला देना असज्जनों का काम है। आस्तित्व असज्जन नहीं हो सकता।
उपासक का दृष्टिकोण—
प्रेम, करुणा, आत्मीयता और सौजन्य की अजर धारायें परमात्मा से प्रवाहित होती रहती है। प्राणिमात्र का पोषण संरक्षण एवं अभिवर्धन इन्हीं विशेषताओं के द्वारा तो वह करता है। ऐसे प्रभु के समीप बैठने वाले में—उपासना करने वाले में—यही विशेषताएँ अवतरित होती है। अपने भाई बहिनों में प्रति-प्राणिमात्र के प्रति अनन्त करुणा और आत्मीयता की भावनायें उपासक के अंतःकरण में उद्भूत होती हैं। उनको चरितार्थ करके वह अपने जीवन को यशस्वी बनाता है और मनः क्षेत्र में धारण किये रहकर अनन्त शान्ति का अनुभव करता है।
परमात्मा की उपासना का प्रतिफल पाने के लिये प्रतीक्षा उन्हें करनी पड़ती है जो पुरुषार्थ और प्रतिभा के मूल्य पर मिलने वाली भौतिक सम्पदाओं को परमात्मा से मुक्त में ही पाने की आशा लगाये हुए दीन-हीन भिक्षुक की तरह बैठे रहते हैं। जिन्हें प्रेम और उत्सर्ग की उच्च भावनाओं से प्रेरित होकर प्रभु के चरणों में बैइने की आकाँक्षा है उन्हें अपने प्रियतम का प्रेम प्रतिपादित, प्राप्त करने के लिए क्षणभर भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। उपासना वासना की आग को बुझाती है, तृष्णा की जलन को शान्त करती है। चिन्ता, भीति और घृणा की उन व्यथाओं को हटाती है, जो मानव-जीवन को निरन्तर अशान्त बनाये रहती हैं। उपासना और आत्मशांति एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। आत्मा अपनी उद्गम सत्ता परमात्मा की ओर उन्मुख होगी तो निश्चय ही उसे प्रकाश मिलेगा। परमात्मा का प्रकाश पड़ने पर आत्मा भी अपने सत्-चित आनन्दमय स्वरूप के साथ प्रकाशवान दीखता है। ऐसे प्रकाशवान जीवन में नर से नारायण की, पुरुष से पुरुषोत्तम की, आत्मा से परमात्मा की प्रत्यक्ष परिणति दृष्टिगोचर होती है। इसलिये उपासना को मानव-जीवन की सर्वोपरि बुद्धिमत्ता माना गया है।
सृष्टि संचालन का क्रीड़ा कौतुक रचने के लिए परमात्मा एक से बहुत बना। उसकी इच्छा हुई कि “मैं अकेला हूँ—एक से बहुत हो जाऊं” उसकी यह इच्छा ही मूर्तिमान होकर सृष्टि के रूप में प्रस्तुत हो गई। “एकोऽहं बहुस्यामि” का संकल्प साकार रूप धारण कर यह संसार बन गया। निर्माण होने के बाद उसका लक्ष और कार्यक्रम निर्धारित होना था सो इस प्रकार हुआ कि—बहुत भागों में विभक्त हुये ब्रह्म-विभाग पुनः एकता की ओर चले। अणु रूप में बिखरा हुआ जीवन पुनः विभु बना। बादल से छोड़ी हुई बूँदें अलग-अलग बरसें भले ही पर वे एकत्रित होकर पुनः समुद्र की रचना के लिए गतिशील भी बनी रहें। आत्माएँ अलग-अलग दीखते हुए भी उनकी गतिविधि पुनः इस अलगाव को मिटाकर एकता की ओर उन्मुख रहे। यही सृष्टि का लक्ष और कार्यक्रम बन गया। इस तथ्य के आधार पर जड़-चेतन सृष्टि की विविध विधि गति-विधियाँ चलती रहती हैं।
वियोग से संयोग की ओर—
बिछुड़ने की क्रिया के साथ इस सृष्टि की रचना तो हुई है पर आगे का कार्यक्रम मिलन और एकता पर आधारित है। समुद्र का पानी भाप बन कर अपने केन्द्र स्थल से बिछुड़ कर सुन्दर हिमि प्रदेशों में जाकर बर्फ बन जाता है। किन्तु वह बिछुड़ने की प्रक्रिया देर तक स्थिर नहीं रहती। जैसे ही अवसर मिलता है, थोड़ी गर्मी का सहारा पाकर बर्फ पिघलती है और वह पानी जैसे-तैसे अपना मार्ग खोजता हुआ नदी नालों में होता हुआ समुद्र की ओर दौड़ पड़ता है। बढ़ते हुए पानी की बेचैनी और दौड़ धूप तब तक समाप्त नहीं होती जब तक कि वह परिपूर्ण जलाशय समुद्र में मिलकर स्वयं भी उसी रूप में परिणत नहीं हो जाता। जल आरम्भ में भी पूर्ण था, भाप बन कर अपूर्णता उसे प्राप्त हुई तो उसे दूर करने का प्रयत्न अनेक हलचलों के रूप में दृष्टिगोचर होने लगा। इसी हलचल का नाम सृष्टि क्रम है। इसे अशान्ति भी कह सकते हैं। मिलन ही इस अशान्ति का उद्देश्य है और जब अपूर्णता दूर होकर पूर्णता की उपलब्धि हो जाती है तो दौड़ धूप भी समाप्त हो जाती है और अशान्ति भी।
मानव जीवन का यही क्रम है। नियति की व्यवस्था ने उसे केन्द्रीय परिपूर्णता से बिछुड़ा दिया है। अब उसके सामने एक ही कार्यक्रम रह जाता है कि तेजी के साथ पुनः केन्द्र की ओर दौड़े और अपनी अपूर्णता को समाप्त कर पूर्णता में विलय हो जाय। इसी को जीवन लक्ष कहते हैं। मुक्ति, पूर्णता, ब्रह्म निर्वाण आदि भी इसे ही कहा गया है।
प्रेम और आनन्द का उद्गम—
बिछुड़ने की कष्टकर प्रक्रिया इसलिए चली कि जीव मिलन के आनन्द का आस्वादन कर सके। माता अपने शरीर का रक्त माँस एकत्रित करके पेट में एक नन्हें शिशु की रचना करती है। जब तक वह शिशु रक्त माँस के रूप में था या भ्रूण बन रहा था, तब तक उसमें कोई विशेष आकर्षण न था पर जब वह गर्भ परिपक्व होकर शरीर से बाहर निकल गया, बिछुड़ गया और माँ-माँ कह कर पुनः अपनी माँ की गोद में आने के लिए विलाप करने लगा तो प्रेम भावना की लहरें उठने लगीं। माता उस बच्चे को छाती से लगा लेती है और उसके साथ मिलन का असीम आनन्द और प्रेम अनुभव करती है। बच्चे को भी माँ के बिना चैन नहीं पड़ता। बिछुड़न ने मिलन की प्रेरणा दी और जैसे ही उसका प्रयत्न आरम्भ हुआ कि प्रेम बरसने लगा।
आत्मीय जन जब कभी बिछुड़ने के बाद पुनः मिलते हैं तो उस मिलन बेला में अत्यधिक आनन्द अनुभव होता है। पति-पत्नी दूर-दूर रहते हों और बहुत दिन बाद वे मिलते हैं तो उनके आनन्द की सीमा नहीं रहती है। कोई भी प्रेम संबंधी हो परस्पर मिलते हुए सभी को प्रसन्नता होती है। कई बार तो यह आनन्द इतना बढ़ा-चढ़ा होता है कि इसके लिए लोग आवश्यक कार्यों को भी छोड़ कर उस सहचर-आनन्द में निमग्न बने रहते हैं। कई छात्र पढ़ाई छोड़ कर यार, दोस्तों के साथ मटरगश्ती में बहुत सारा समय लगा देते हैं। कारण एक ही है कि जहाँ कहीं भी प्रेम, एकता और आत्मीयता का दर्शन होगा वहीं मनुष्य शान्ति और सन्तोष प्राप्त करेगा।
ईश्वर प्राप्ति और ईश्वर भक्ति के लिए सच्चे मन से प्रयत्न करने वालों को असीम आनन्द की अनुभूति होती है। क्योंकि परमात्मा ही आत्मा का उद्गम केन्द्र, सजातीय और सच्चा स्नेही सम्बन्धी है। साँसारिक प्रियजनों के साथ उठने-बैठने में जीव को इतना आनन्द आता है तो आत्मिक और वास्तविक प्रिय-प्रेमी परमात्मा के सान्निध्य में आनन्द क्यों नहीं आना चाहिए? जिनका मन उपासना में लगता नहीं, या जिन्हें आनन्द नहीं आता समझना चाहिए कि इन्होंने उपासना के तत्वज्ञान, आदर्श और विधान को अभी समझा ही नहीं है। पूजा का कर्मकाण्ड तो कई व्यक्ति पूरा करते रहते हैं पर उपासना में आनन्द की अनुभूति उन भावनाओं पर निर्भर रहती है जो दो बिछुड़े हुओं को जोड़ने के लिए आवश्यक है।
लघु से महान बनने के लिए—
इस लेख माला के अंतर्गत आगे किसी अंक में यह बतावेंगे कि उपासना के समय अलौकिक आनन्द की अनुभूति का लाभ किस प्रकार मिल सकता है। अभी इन पंक्तियों में तो इतना ही बताना है कि इस संसार के जड़ चेतन प्रत्येक पदार्थ का कार्यक्रम वियोग दूर करके संयोग का आनन्दमय मिलन प्राप्त करना है। धातुओं की खानों का पता लगाने वाले अन्वेषक मिट्टी में मिले हुए धातु कणों की चाल और दिशा का हिसाब लगा कर यह निर्धारित करते हैं कि यहाँ से कितनी दूरी पर, किस दिशा में, किस धातु की कितनी बड़ी खान होनी चाहिए। बात यह है कि मिट्टी में हर धातु के कण मिले होते हैं। वे कण किसी सूक्ष्म आकर्षण शक्ति से खिंचते हुए धीरे-धीरे अपने आप किसी दिशा में सरकते रहते हैं। धातु की बड़ी खान जहाँ होती है वहाँ से अपने सजातीय कणों को खींचने की एक चुम्बकीय विद्युत धारा काम करती रहती है। उसी के खिंचाव से धातुओं के कण अपनी-अपनी जाति की धातुओं की ओर सरकते चले जाते हैं और उनके इकट्ठे होते रहने से खानों में धातुओं की मात्रा निरन्तर बढ़ती रहती है।
उन्नति और प्रगति के आधार—
आत्मा को मिट्टी में मिला हुआ धातु कण कहा जाय तो परमात्मा को एक विशाल खान कहा जायगा। छोटा अणु जब तक रेत में मिला रहता है, तब तक उसका कोई मूल्य और महत्व नहीं रहता, पर जब वह घिसटते-घिसटते खान में सम्मिलित हो जाता है तो उसका अस्तित्व सभी की दृष्टि में आता है और उस एकत्रित पदार्थ का उपयोग भी बहुत भारी होता है। आत्मा जब परमात्मा के समीप पहुँचती है, तो उसमें ईश्वरीय तत्वों की इतनी मात्रा बढ़ जाती है कि मनुष्य भी ईश्वर जैसा दीखता है। ऋषियों और महापुरुषों में इसी प्रकार की ईश्वरीय विशेषता रहती है। यह समीपता बढ़ते बढ़ते जीव अन्ततः जीवनमुक्ति का ही अधिकारी बन जाता है।
आत्मा और परमात्मा की एकता के साथ-साथ जिस परमानन्द एवं ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होती है, उसे पाकर जीवन धन्य बन जाता है। इस एकता के लिए जहाँ उपासना साधना और भावना का अवलम्बन करना आवश्यक होता है। वहाँ यह भी अनिवार्य है कि जीवन की गतिविधियाँ पृथकतावादी नहीं वरन् एकतावादी हों। आध्यात्म और अनात्मा, पुण्य और पाप, धर्म और अधर्म, उचित और अनुचित का निर्णय इसी आधार पर होता है कि उसके मूल में एकता की ओर बढ़ने न बढ़ने की कितनी भावना सन्निहित है। नीति, धर्म और आचार शास्त्र का समस्त विधि विधान इस एक तथ्य को ध्यान में रखकर ही रचा गया है।
विराट ब्रह्म का साक्षात्कार—
समाज को विराट ब्रह्म का स्वरूप माना गया है। गीता में अर्जुन को, रामायण में काकभुसुंडि और कौशल्या को, भागवत में यशोदा को भगवान ने अपना विराट् रूप दिखाया है। वह समस्त विश्व ब्रह्माण्ड ही तो है। यह सारा संसार भगवान का ही रूप है, इस मान्यता को अन्तरात्मा में स्थिर कर लेने पर हर घड़ी परमात्मा के दर्शन हो सकते हैं और साथ ही वह आनन्द उल्लास भी अनुभव हो सकता है जो परमात्मा का दर्शन करते हुए होना चाहिए। इस भावना के अनुसार व्यक्ति का यही कर्तव्य निर्धारित होता है कि वह हर पदार्थ और हर प्राणी के प्रति सद्भावना रखे और हरेक से सद्व्यवहार बरते। विचारणा और क्रिया का यह स्तर धर्म और सदाचार, पुण्य और परमार्थ ही कहलाता है।
संगठन और एकता से प्राप्त होने वाले लौकिक लाभों से सभी परिचित हैं। मिल-जुल कर काम करने से, प्रेम और आत्मीयता की भावना रखने से, संगठित और समूहबद्ध रहने से अगणित प्रकार के शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक लाभ प्राप्त होते हैं इसकी जानकारी हम सब को है ही। इसलिए हर मंच से, विचार-शील व्यक्ति यही कहते रहते हैं कि हमें संगठित होना चाहिए, एकता रखनी चाहिए। कलियुग में तो संघशक्ति को ही प्रधान माना गया है। “संघशक्ति कलौयुगे” का मंत्र सभी की विचारणा में मौजूद है। तिनके मिल कर मजबूत रस्सी और कमजोर सींकें मिलकर बुहारी बनने का उदाहरण देकर हम लोग एक दूसरे को समझाते रहते हैं कि फूट और पृथकता से हानि एवं संगठन और एकता से लाभ है। इस उद्देश्य के लिए अनेकों संस्थाएं भी काम करती हैं। प्राचीन काल में धर्म सम्प्रदायों का भी यही उद्देश्य था।
संगठन और एकता का आदर्श—
मानव जीवन को लौकिक सुविधा और सुरक्षा के लिए एकता की भावना जितनी आवश्यक है आत्मिक लक्ष को प्राप्त करने के लिए उसकी और भी आवश्यकता है। व्यक्ति जितना ही पृथकतावादी, संकीर्ण, स्वार्थी, होगा, उतनी ही पाप वृत्ति उसे घेरे रहेगी। जिसे अपना ही मतलब है, जो अपने ही लाभ और स्वार्थ की बात सोचता रहता है, उसे दूसरों के प्रति प्रेम और दर्द क्यों होगा? ऐसा व्यक्ति अपने लाभ के लिए दूसरों का कुछ भी अहित कर सकता है। माँसाहार, चोरी, ठगी, हत्या, बेईमानी, धोखेबाजी आदि पापकर्मों के पीछे कर्ता की स्वार्थपरता और संकीर्णता ही प्रधान रहती है। यदि दूसरे लोग भी अपने ही आत्मीय, स्वजन सम्बन्धी एवं भगवान के प्रतिनिधि दीखने लगें, सब में अपनी ही आत्मा दिखाई पड़े तो यह संभव नहीं कि मनुष्य कोई दुष्कर्म कर सके। संकीर्णता एवं स्वार्थपरता ही समस्त प्रकार के कुकर्म कराती है। लोभी और कंजूसों में एक ही दुर्गुण होता है कि वे केवल अपनी ही बात सोचते रहते हैं। कई आध्यात्मवादी कहलाने वाले सज्जन भी इसी श्रेणी में जा बैठते हैं, उनकी भावना भी संसार को भाड़ में जाने देकर अपनी मुक्ति प्राप्त करने की रहती है। ऐसे लोग मुक्ति तो दूर अपना लौकिक जीवन भी सफल बनाने में समर्थ नहीं हो सकते।
‘मैं’ नहीं ‘हम सब’—
समाजवाद और साम्यवाद के सिद्धान्तों में
इस बात पर जोर दिया गया है कि व्यक्ति की योग्यता एवं कमाई का लाभ सारा समाज उठावे। व्यक्तिगत प्रतिभा एवं क्षमता अधिक होने पर भी उससे उत्पन्न लाभों से वह व्यक्ति ही लाभान्वित न हो वरन् सारा समाज एक है इसलिए दूसरों को भी उसका लाभ मिले। अन्य बातों में इन वादों से मतभेद हो सकता है पर इतना अंश तो आध्यात्मिक आदर्शों की ही पुष्टि करता है कि व्यक्ति की सीमा उसके निज के छोटे दायरे में नहीं वरन् विश्व हित के व्यापक तथ्य से जुड़ी हुई है। व्यक्ति अपनी योग्यता चाहे जितनी बढ़ावे, उत्पादन चाहे जितना करे पर यह न सोचे कि इसका लाभ मुझे ही मिलना चाहिए। विचारणा और क्रिया आरम्भ करने से पूर्व यह सोचा जाना चाहिए कि इसका प्रभाव दूसरों पर क्या पड़ेगा? विश्व हित की दृष्टि से मेरे विचार और कार्यों की क्या प्रतिक्रिया होगी?
दुष्कर्मों का आधार व्यक्तिगत संकीर्णता और स्वार्थपरता ही है। जब तक यह दुष्प्रवृत्तियाँ मनोभूमि में जड़ जमाये रहेंगी तब तक मनुष्य प्रकट न सही तो गुप्त रूप से, एक प्रकार से न सही तो दूसरे प्रकार से दुष्कर्म करता रहेगा और उसकी गतिविधियाँ संसार में विक्षोभ एवं सन्ताप उत्पन्न करती रहेंगी।
शाँति और समृद्धि का राजमार्ग—
जीवन का लक्ष पृथकता, बिछुड़न से पीछा छुड़ा कर प्रेम और एकता की ओर अग्रसर होना है ताकि बिछुड़ा हुआ आत्मा अपने उद्गम परमात्मा के समीप पहुँच कर मिलन का आनन्द लाभ कर सके। इसके लिए वे उपासना उपयोगी होती हैं जो जीव और ईश्वर की एकता अनुभव कराने में समर्थ होती हैं। साथ ही यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति का जीवनक्रम एकता के आदर्शों के अनुकूल रहे। हम सब ईश्वर के अमर पुत्र आपस में भाई बहिन हैं। परस्पर प्रेम और एकता की भावना से ओत-प्रोत सामूहिक हित के सत्कार्य करने और सद्भाव रखने से ही तो वह स्वार्थपरता-हृदयों की वह दूरी समाप्त हो सकती है जो इस संसार में विभिन्न प्रकार के उपद्रव आये दिन खड़े करती रहती है।
शान्ति और सृष्टि के लिए, सद्गति और जीवन मुक्ति के लिए एक ही मार्ग है, ईश्वरीय सृष्टि विधान के अनुसार भगवत् इच्छा के अनुसार आचरण करना। भगवान ने अपने से जीवों को पृथक करके उन्हें तेजी से अपनी ओर दौड़ कर आने का खेल रचा है। इसी खेल को हम समझें। उसकी इच्छा पूर्ण करें। अपनी संकीर्णता छोड़ें। जो कुछ चारों ओर दिखाई पड़ता है उसके साथ एकता और आत्मीयता अनुभव करें और विश्व विराट के लिए अपनी अहंता और संकीर्णता का आध्यात्मिक उत्सर्ग करते चलें। यह उत्सर्ग ही जीवन लक्ष की प्राप्ति का मूल्य है। जो उसे चुकाने को तैयार है उसके लिए अभीष्ट वस्तु का प्राप्त कर सकना कुछ भी कठिन नहीं रह जाता है।
पेशवाओं के जमाने में एक न्यायाधीश थे—रामशास्त्री प्रभुण। राघोवा ने अपने भतीजे का खून किया, जो पेशवा था। रामशास्त्री पेशवाओं के न्यायाधीश थे। उनकी तनख्वाह पाते थे। राघोवा पेशवा ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया। पेशवा की रानी ने उनसे पूछा कि पेशवा ने प्रत्यक्ष खून किया है, अब तुम क्या करना चाहते हो? रामशास्त्री ने कहा कि न्यायासन पर बैठ कर मैं एक ही चीज सीखा हूँ कि इस राज्य में जो कोई दूसरे का खून करेगा, उसे देहान्त प्रायश्चित्त करना चाहिए। रानी ने दुबारा, तिबारा वही सवाल पूछा और उन्होंने हर बार देहान्त प्रायश्चित्त की ही बात कही। रानी ने कहा कि क्या तुम जानते हो कि हम तुम्हारी जीभ काट सकते हैं, तुम्हारे शरीर की बोटी-बोटी काट सकते हैं, तुम्हें काल-कोठरी में बन्द कर सकते हैं। राम शास्त्री ने जवाब दिया कि प्राणों के मोह के कारण मेरे मुँह से न्याय विरुद्ध कोई कमजोरी का शब्द निकलने से पहले अच्छा होगा कि आप इस जीभ को कटवा लें।
परमात्मा ने मनुष्य को अन्य प्राणियों की अपेक्षा विशेष बुद्धि शक्ति दी है। इस संसार में जितनी भी महत्वपूर्ण शक्तियाँ हैं उनमें बुद्धि, शक्ति, ही सर्वोपरि है। मानव जाति की अब तक की इतनी उन्नति के पीछे उसकी बौद्धिक विशेषता का चमत्कार ही सन्निहित है।
इतनी बड़ी शक्ति देकर मनुष्य को परमात्मा ने कुछ उत्तरदायित्वों में भी बाँधा है ताकि दी हुई शक्ति का दुरुपयोग न हो। इन उत्तरदायित्वों का नाम है—कर्तव्य-धर्म।
नियंत्रण की आवश्यकता—
रेलगाड़ी के एंजिन में विशेष शक्ति होती है, यह अपने मार्ग से भटक पड़े तो अनर्थ उत्पन्न कर सकता है। इसलिये जमीन पर दो पटरी बिछा दी गई हैं और ऐंजिन को उसी पर चलते रहने की व्यवस्था बनाई गई है। बिजली में बहुत शक्ति रहती है वह शक्ति इधर-उधर न बिखर पड़े इसलिये उसका नियंत्रण रखना आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह प्रबन्ध किया गया है कि बिजली तार में ही होकर प्रवाहित हो और वह तार भी ऊपर से ढका रहे। नहर में पानी की तेज धारा बहती है। उस पानी को नियंत्रण में न रखा जाए तो उससे गाँव के गाँव डूब सकते हैं। इस खतरे की सुरक्षा के लिए नहर की दोनों पटरियाँ काफी चौड़ी और काफी मजबूत बनाई जाती हैं। हर शक्तिशाली तत्व पर नियन्त्रण आवश्यक होता है। अनियन्त्रित रहने देने पर तो शक्तिशाली वस्तुएँ अनर्थ ही पैदा कर सकती हैं। मनुष्य को यदि परमात्मा ने नियन्त्रित न रखा होता, उस पर धर्म कर्तव्यों का उत्तरदायित्व न रखा होता तो निश्चय ही मानव प्राणी इस सृष्टि का सबसे भयंकर, सबसे अनर्थकारी प्राणी सिद्ध हुआ होता।
अशक्त या स्वल्प शक्ति वाले पदार्थ या जीव अनियन्त्रित रह सकते हैं। क्योंकि उनके द्वारा बहुत थोड़ी हानि की सम्भावना रहती है। फिर जिनकी वे हानि कर सकते हैं उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक शक्ति मिली होती है। इसलिए उस स्वच्छन्दता में नियन्त्रण और सन्तुलन का एक नियम काम करता रहता है। कीड़े, मकोड़े, मक्खी, मच्छर, कुत्ता, बिल्ली-प्रभृति छोटे जीवों पर कोई बन्धन नहीं रहते पर बैल, घोड़ा, ऊँट, हाथी, आदि बड़े जानवरों को नाक की रस्सी [नाथ], लगाम, नकेल, अंकुश आदि के आधार पर नियन्त्रण रखा जाता है, यदि यह प्रतिबन्ध न हो तो वह शक्तिशाली जानवर लाभकारक सिद्ध होने की अपेक्षा हानि ही उत्पन्न करेंगे।
उच्छृंखलता के दुष्परिणाम—
अनियन्त्रित मनुष्य कितना घातक हो सकता है इसकी कल्पना मात्र से सिहरन होती है। जिन असुरों, दानवों, दस्युओं, दुरात्माओं के कुकृत्यों से मानव सभ्यता कलंकित होती रही है वे शक्ल सूरत से तो मनुष्य ही थे पर उन्होंने स्वेच्छाचार अपनाया, मर्यादाओं को तोड़ा, न धर्म का विचार किया, न कर्तव्य का। शक्तियों के मद में जो कुछ उन्हें सूझा, जिसमें लाभ दीखा वही करते रहे फलस्वरूप उनका जीवन सब प्रकार घृणित और निकृष्ट बना। उनके द्वारा असंख्यों का उत्पीड़न हुआ और समाज की शाँति व्यवस्था से भारी व्यवधान उत्पन्न होता रहा। असुरता का अर्थ ही उच्छृंखलता है।
मर्यादाओं का उल्लंघन करने की घटनायें-दुर्घटना कहलाती है और उनके फल स्वरूप सर्वत्र विक्षोभ ही उत्पन्न होता हैं। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी सभी अपनी नियत कक्षा और धुरी पर घूमते हैं, एक दूसरे के साथ आकर्षण शक्ति में बँधे रहते हैं। और एक नियत व्यवस्था के अनुरूप अपना कार्यक्रम जारी रखते हैं। यदि वे नियत नियन्त्रण को तोड़कर स्वेच्छाचार बरतने की चेष्टा करें तो उसका परिणाम प्रलय हो सकता है। यह ग्रह मार्ग में भटक जायेंगे और एक दूसरे से टकराकर विनाश की प्रक्रिया उत्पन्न कर देंगे। मनुष्य भी जब अपने कर्तव्य मार्ग से भटकता है तो अपना ही नहीं दूसरे अनेकों का भी नाश करता है।
मार्गदर्शक अंतः चेतना—
परमात्मा ने हर मनुष्य की अन्तरात्मा में एक मार्गदर्शक चेतना की प्रतिष्ठा की है जो उसे उचित कर्म करने की प्रेरणा एवं अनुचित करने पर भर्त्सना करती रहती है। कर्तव्य पालन के कार्य धर्म या पुण्य कहलाते हैं, उनके करते ही तत्क्षण करने वाले को प्रसन्नता एवं शान्ति का अनुभव होता है। इसके विपरीत यदि स्वेच्छाचार बरता गया है, धर्म मर्यादाओं को तोड़ा गया है, स्वार्थ के लिए अनीति का आचरण किया गया है, तो अन्तरात्मा में लज्जा, संकोच, पश्चाताप, भय और ग्लानि का भाव उत्पन्न होगा। भीतर ही भीतर अशान्ति रहेगी और ऐसा लगेगा मानो अपना अन्तरात्मा ही अपने को धिक्कार रहा है। इस आत्मप्रताड़ना की पीड़ा को भुलाने के लिये अपराधी प्रवृत्ति के लोग नशेबाजी का सहारा लेते हैं। फिर भी चैन कहाँ, पाप वृत्तियाँ जलती हुई अग्नि की तरह हैं। जो पहले वहीं जलन पैदा करती है जहाँ उसे स्थान मिलता है।
शरीर में क्षय, उपदंश, दमा, गठिया, कुष्ठ लकवा आदि रोग हो जाने पर स्वास्थ्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। अशान्ति और बेचैनी बनी रहती है। रुग्ण शरीर को लेकर मनुष्य कुछ कर नहीं पाता घर वाले परेशान होते हैं, आर्थिक स्थिति बिगड़ती है और यदि रोग की स्थिति सुधरे नहीं तो जीवन भार रूप हो जाता है। शरीर की तरह ही मन में भी कई रोग उत्पन्न होते हैं और वे सारे मानसिक संस्थान की स्वस्थता को नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं। आत्म प्रताड़ना सबसे बड़ी मानसिक व्याधि है। जिसका मन अपने दुष्कर्मों के लिये अपने आपको धिक्कारता रहेगा वह कभी भी आन्तरिक दृष्टि से सशक्त न रह सकेगा। उसे अनेक मानसिक दोष दुर्गुण घेरेंगे और धीरे-धीरे अनेक मनोविकारों से ग्रस्त होता जायगा।
अनिद्रा, दुःस्वप्न, चिड़चिड़ापन, आवेश, उत्तेजना, क्रोध, चिन्ता, भय, ईर्ष्या, आशंका, संशय अविश्वास, आलस, निराशा आदि कितने ही मानसिक रोग आत्म प्रताड़ना की व्यथा से पीड़ित मनुष्य को लग जाते हैं। पाप कर्मों के लिए अपना अन्तरात्मा जिसे धिक्कारता और प्रताड़ित करता रहता है वह मनुष्य सोते जागते कभी चैन नहीं पा सकता। दमा और दर्द के रोगों की भाँति पापी को भी न रात में न दिन में कभी चैन मिलता है। भीतर ही भीतर अपने आप ही अपनी शान्ति को कुतरता रहता है।
आत्म प्रताड़ना और अशाँति—
मर्यादाओं का उल्लंघन करके लोग तात्कालिक थोड़ा लाभ उठाते देखे जाते हैं। दूरगामी परिणाम को न सोचकर लोग तुरन्त के लाभ को देखते हैं। बेईमानी से धन कमाने, दम्भ से अहंकार बढ़ाने और अनुपयुक्त भोगों के भोगने से जो क्षणिक सुख मिलता है वह परिणाम में भारी विपत्ति बनकर सामने आता है। मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर डालने और आध्यात्मिक महत्ता एवं विशेषताओं को समाप्त करने में सबसे बड़ा कारण आत्म प्रताड़ना है। ओले पड़ने से जिस प्रकार खेती की फसल नष्ट हो जाती है उसी प्रकार आत्म प्रताड़ना की चोटें पड़ते रहने से मन और अन्तःकरण के सभी श्रेष्ठ तत्व नष्ट हो जाते हैं और ऐसा मनुष्य प्रेत पिशाचों जैसी श्मशान मनो भूमि लेकर निरन्तर विक्षुब्ध विचरता रहता है।
धर्म कर्तव्यों की मर्यादा को तोड़ने वाले उच्छृंखल, कुमार्गगामी मनुष्य की गतिविधियों को रोकने के लिए उन्हें दण्ड देने के लिए समाज और शासन की ओर से जो प्रतिरोधात्मक व्यवस्था हुई है, उससे सर्वथा बचे रहना सम्भव नहीं। धूर्तता के बल पर आज कितने ही अपराधी प्रवृत्ति के लोग सामाजिक भर्त्सना से और कानूनी दण्ड से बच निकलने में सफल होते रहते हैं पर यही चाल सदा सफल होती रहेगी ऐसी बात नहीं है। असत्य का आवरण अनन्तः फटता ही है और अनीति अपनाने वाले के सामने न सही पीछे उसकी निन्दा होती ही है। जन-मानस में व्याप्त घृणा का सूक्ष्म प्रभाव उस मनुष्य पर अदृश्य रूप से पड़ता है जिससे अहितकर परिणाम ही सामने आते हैं। राजदण्ड से बचे रहने के लिये ऐसे लोग रिश्वत में बहुत खर्च करते हैं, निरन्तर डरे और दबे रहते हैं, उनका कोई सच्चा मित्र नहीं रहता। जो लोग उनसे लाभ उठाते हैं वे भी भीतर-ही-भीतर घृणा करते हैं और समय आने पर शत्रु बन जाते हैं। जिनकी आत्मा धिक्कारेगी उसके लिए देर सवेर में सभी कोई धिक्कारने वाले बन जायेंगे। ऐसी धिक्कार एकत्रित करके यदि मनुष्य जीवित रहा तो उसका जीवन न जीने की बराबर है।
कर्तव्य समझे, उत्तरदायित्व, निबाहें—
नियंत्रण में रहना आवश्यक है। मनुष्य के लिये यही उचित है कि वह ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करे। अपने उत्तरदायित्वों को समझे और कर्तव्यों को निबाहे। नीति, सदाचार और धर्म का पालन करते हुए सीमित लाभ में सन्तोष करना पड़ सकता है, गरीबी और सादगी का जीवन बिताना पड़ सकता है, पर उसमें चैन अधिक है। अनीति अपना कर अधिक धन एकत्रित कर लेना सम्भव है पर ऐसा धन अपने साथ इतने उपद्रव लेकर आता है कि उनसे निपटना भारी त्रासदायक सिद्ध होता है। दम्भ और अहंकार का प्रदर्शन करके लोगों के ऊपर जो रौब जमाया जाता है उससे आतंक और कौतूहल हो सकता है पर श्रद्धा और प्रतिष्ठा का दर्शन भी दुर्लभ रहेगा। विलासिता और वासना का अनुपयुक्त भोग भोगने वाला अपना शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सन्तुलन नष्ट करके खोखला ही बनता जाता है। परलोक और पुनर्जन्म को अन्धकारमय बनाकर आत्मा को असन्तुष्ट और परमात्मा को अप्रसन्न रखकर क्षणिक सुखों के लिये अनीति का मार्ग अपनाना किसी भी दृष्टि से दूरदर्शिता नहीं कहा जा सकता।
बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम धर्म का, कर्तव्य पालन का महत्व समझें, सदाचार की मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। स्वयं शान्तिपूर्वक जिएं और दूसरों को सुख पूर्वक जीने दें। यह सब नियंत्रण की नीति को अपनाने से ही सम्भव हो सकता है। कर्तव्य और धर्म का अंकुश परमात्मा ने हमारे ऊपर इसी लिए रखा है कि सन्मार्ग के भटके नहीं। इन नियंत्रणों को तोड़ने की चेष्टा करना अपने और दूसरे के लिये महती विपत्तियों को आमन्त्रित करने की मूर्खता करना ही गिना जायगा।
& & & मैं आपकी पत्नी हूँ, आपकी प्रेयसी हूँ, आपकी माता हूँ, आपकी बहन हूँ, आपकी मित्र हूँ & & & मैं इसलिए बनाई गयी थी कि मैं दुनिया की सौम्यता, आश्वासन, गम्भीरता, सुन्दरता और प्रेम दे सकूँ। लेकिन मैं देखती हूँ कि मेरे अस्तित्व के इस उद्देश्य की पूर्ति करना मेरे लिए उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है। सिनेमा और टेलीविजन वाले तथा विज्ञापनबाज मेरी जो अन्य विशेषताएँ और गुण है, उन सबको भुलाकर मेरा इस्तेमाल केवल एक ही काम के लिए कर रहे हैं—कामोत्तेजन के लिए & & & इसके कारण मैं अपमानित हुई हूँ, इसने मेरी आबरू को नष्ट कर दिया है, इसके कारण मैं वह बन सकने में असमर्थ हूँ, जो आप चाहते हैं कि मैं बनूँ—सुन्दरता, प्रेरणा और प्रेम का स्रोत। प्रेम की मूर्ति—मेरे बच्चों के लिये, मेरे पति के लिये, मेरे परमेश्वर के लिए! मैं & & & मैं फिर से मेरा सही स्थान प्राप्त करने में आपकी मदद चाहती हूँ, ताकि जिस उद्देश्य के लिए मेरा सर्जन हुआ है, उसको मैं पूरा कर सकूँ।
पौधा तब बढ़ता है जब उसे खाद और पानी दोनों ही उचित मात्रा में मिलते रहें। यदि बीज ऐसी जमीन में बोया जाय जिसमें उर्वरा शक्ति न हो, खाद का अंश न मिला हो तो अच्छा बीज होते हुए भी वह उगेगा नहीं। इसी प्रकार जमीन में खाद का आवश्यक अंश होने पर उगे हुए पौधे को यदि पानी न मिले तो भी वह बढ़ न सकेगा और मुरझा कर सूख जायगा। इसी प्रकार सुसंस्कारों का पौधा ज्ञान रूपी खाद और कर्म रूपी पानी पाकर बढ़ता है। दोनों में से एक की भी कमी रह जाय तो अन्तरात्मा में सन्निहित सुसंस्कारों को विकसित होने का अवसर न मिलेगा।
दोनों पैर ठीक हों तो चलने की क्रिया में बाधा नहीं पड़ती, दोनों हाथ ठीक हों तो प्रस्तुत कामों को ठीक तरह करते रहना बन पड़ता है। यदि एक या दोनों पैर न हों तो चलने में भारी बाधा पड़ेगी। इसी प्रकार जिसके एक या दोनों हाथ न हों तो काम-काज कठिनाई से ही कर सकेगा। आत्मिक उन्नति के लिए दान और कर्म का वही महत्व है जो चलने के लिए पैरों और करने के लिये हाथों का। लंगड़े लूले आदमी भी कुछ तो काम चलाते ही हैं पर सर्वांगपूर्ण स्वस्थ होने पर जो सम्भव था वह कहाँ हो पाता है? आत्मोन्नति की प्रक्रिया सद्ज्ञान और सत्कर्म के अभाव में अस्त-व्यस्त ही रहती है।
मानवीय चेतना में जो सत् तत्व है इसके विकास का विधिवत् प्रयत्न करना पड़ता है। इस प्रयत्न में कमी रहती है तो प्रगति का द्वार रुका ही पड़ा रहता है। दर्पण के आगे जिस प्रकार की आकृति आती है वैसा ही प्रतिबिम्ब दीखने लगता है। मानवीय चेतना को जैसे व्यक्तियों जैसी परिस्थितियों के सान्निध्य में रहना पड़ता है वह वैसा ही बन जाती है। कसाई के घर में उत्पन्न हुआ बालक बड़ा होते-होते अपने घर का व्यवसाय सीखकर बिना किसी लज्जा या घृणा के छुरी चलाने लगता है। पुजारी ब्राह्मण के बालक में सेवा पूजा के संस्कार पड़ते हैं और वयस्क होने पर उसके गुण, कर्म, स्वभाव अपने घर वालों जैसे ही ढलने लगते हैं। कसाई का बालक और पुजारी का बालक गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से परस्पर कितने विपरीत हैं! इसे देखकर यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि मनुष्य को जिन परिस्थितियों में रहना पड़ता है उधर ही उसकी प्रगति होने लगती है।
आन्तरिक प्रगति सही दिशा में होती रहे इसके लिये बहुत सावधानी के साथ प्रयत्न करने पड़ते हैं। तत्वदर्शी ऋषियों ने इस संदर्भ में एक साँगोपाँग जीवन दर्शन, नीति-शास्त्र एवं आचार संहिता का सुव्यवस्थित आधार निर्धारित किया है, उस निर्धारणा का नाम है—’संस्कृति’। संस्कृति का तात्पर्य ज्ञान और कर्म की उस व्यवस्था से है जो मानवीय चेतना को स्वस्थ दिशा से विकसित करने के लिए खाद पानी की तरह आवश्यक एवं उपयोगी सिद्ध होती है।
मनुष्य अपने मानवीय आदर्शों के अनुरूप व्यवस्थित एवं विकसित हो, इसके लिए उसे संस्कृति का आधार लेना पड़ता है। विभिन्न देशों और जातियों की अपनी विशेषताओं और परिस्थितियों के कारण, संस्कृति के बाह्य कलेवर में अन्तर देखा जाता है। पूर्व और पश्चिम के देशों में संस्कृति का बाह्य स्वरूप भिन्न देखा जाता है। रीति, रिवाज, पहनाव, उढ़ाव, पूजा, पाठ एवं रहन-सहन के तरीकों में अन्तर होते हुए भी विश्व संस्कृति का मूल आधार सर्वत्र एक ही देखा जाता है। सत्-ज्ञान और सत्-कर्म इन दो को प्रत्येक संस्कृति में वही स्थान प्राप्त है जो अनेक आकार प्रकार में बने हुए मकानों में ईंट चूने को। ईंट चूना हर इमारत का आधार होता है, उनके डिजाइन आवश्यकता और अभिरुचि के अनुरूप बदलते रहते हैं।
यदि सद् विचारों को मस्तिष्क और अन्तःकरण में स्थान देने के लिए प्रयत्न न किया जायगा तो अपने जन्म जन्मान्तरों के संग्रहीत कुसंस्कार और आस पास के अनैतिक आकर्षण प्रभाव डालते रहेंगे और मनोभूमि दिन-दिन दूषित होती चली जायगी। शरीर में मैल भीतर से भी निकलता है और बाहर से भी जमता है। यह प्रक्रिया हमें चाहे कितनी ही अप्रिय क्यों न लगे पर जो क्रम बना हुआ है वह तो रहेगा ही। उपाय केवल यही हो सकता है कि स्नान आदि से रोज-रोज उस मैल की सफाई की जाती रहे। मन पर भी शरीर की ही भाँति मैल जमता है। अपने संग्रहीत कुसंस्कार भीतर से जोर मारते हैं और बाहरी वातावरण में बुराइयों का आकर्षण कुछ कम प्रबल नहीं है। दोनों के सम्मिश्रण से दुर्बुद्धि की एक अच्छी खासी आसुरी शक्ति उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव मन पर धीरे-धीरे जमते रहने से आन्तरिक स्तर अधोगामी होने लगता है।
इस विपन्नता को रोकने के लिए हमें संस्कृति का अवलम्बन ग्रहण करना पड़ता है। जिस प्रकार पानी और साबुन की सहायता से कपड़े का मैल छूटता है उसी प्रकार मन पर जमे हुए मलिनता के परतों की सफाई सद्ज्ञान और सत्कर्म के आधार पर होती है।
यह सुनिश्चित है कि आन्तरिक उत्कृष्टता के आधार पर ही मनुष्य के स्वभाव में सद्गुणों को स्थान मिलता है और सद्गुणों द्वारा ही जीवन की विभिन्न दिशाओं में स्थायी प्रगति होती है। चोरी बेईमानी से कुछ लोग, कुछ समय तक, कुछ-कुछ लाभ उठा लेते हैं, पर किसी महान और चिरस्थायी सफलता का आधार यह बुराइयाँ कभी भी नहीं हो सकतीं। सज्जनता और सच्चाई में ही वह शक्ति है कि किसी व्यक्ति या व्यवसाय की उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचा जा सके और उसकी प्रतिष्ठा को चिर स्थायी बनाया जा सके। सुख, शाँति और श्री, समृद्धि की आधार शिला मनुष्य की आन्तरिक उत्कृष्टता ही होती है। इसी उपलब्धि को जीवन का सबसे बड़ा लाभ माना गया है। इस लाभ को प्राप्त करने की विधि व्यवस्था को संस्कृति कहते हैं। संस्कृति का अर्थ है—सद्ज्ञान और सत्कर्मों का संचय।
जल्दबाज लोग आत्म निर्माण की, जीवन निर्माण की प्रक्रिया को कष्टसाध्य समझकर उतावली में तत्काल लाभ देने वाली दुष्प्रवृत्तियों को अपना कर कुछ ही देर में भारी लाभ प्राप्त कर लेने की योजना बनाते रहते हैं। अनीति एवं धूर्तता के सहारे वे भारी सफलता प्राप्त कर लेने के सपने देखते हैं। पर होता यह है कि उनकी यह जल्दबाजी सफलता को ही संदिग्ध नहीं बनाती वरन् उनके व्यक्तित्व को भी नष्ट कर देती है। प्रगति का राज मार्ग एक ही है कि श्रम और सच्चाई को अपना कर धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ता रहा जाय। उसे छोड़कर जो पगडंडियाँ तलाश करते हैं वे खतरा उठाते हैं।
सच्ची प्रगति झूठे आधार अपनाने से उपलब्ध नहीं हो सकती। स्थायी सफलता और स्थिर समृद्धि के लिए उत्कृष्ट मानवीय गुणों का परिचय देना पड़ता है। जो इस कसौटी पर कसे जाने से बचना चाहते हैं, जो जैसे बने वैसे, तुरन्त, तत्काल बहुत कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, उनके सपने न सार्थक होते हैं न सफल। यदि अनुपयुक्त मार्ग से चिरस्थायी सफलता सम्भव रही होती तो दुष्ट दुराचारी लोग जेलखानों, पागलखानों, शफाखानों में बन्द न दीखते, वे अपनी चतुरता के आधार उन्नति के उच्च शिखर पर विराजमान रहते।
जिस प्रकार लौकिक उन्नति का आधार आन्तरिक उत्कृष्टता के आधार पर उत्पन्न हुए सद्गुण ही होते हैं उसी प्रकार आत्मिक उन्नति साँस्कृतिक अवलम्बन पर निर्भर रहती है। ज्ञान और कर्म के द्वारा ही अन्तः चेतना को निर्मल और सूक्ष्म बनाया जाता है, तभी वह उच्च स्तरीय प्राप्ति के योग्य बन पाती है। इस राजमार्ग को छोड़कर कई व्यक्ति जल्दबाजी का उपाय खोजते हैं, पगडंडियां खोजते हैं और मृगतृष्णा में अपना बहुमूल्य समय नष्ट करते हैं। कई व्यक्ति सोचते हैं आत्म-सुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्म-विकास का मार्ग श्रम-साध्य है, इसलिए कोई ऐसी तरकीब ढूँढ़नी चाहिए जिससे सहज ही आत्मिक-लक्ष की प्राप्ति हो जाय। गुरु कृपा, शक्तिपात, आशीर्वाद, देवता की प्रसन्नता, आदि जो साधन उन्हें सरल दीखते हैं उनकी ओर अधिक लालायित रहते हैं। इस उतावली में लाभ कम और हानि अधिक होने की सम्भावना ही बनी रहती है।
साधन, उपासना का राजमार्ग मनुष्य की अन्तः चेतना में ज्ञान और कर्म की आवश्यक प्रेरणा उत्पन्न करने के लिए ही है। ध्यान और जप के द्वारा साधक अपने स्वरूप को, आत्मा को, अपने उद्गम परमात्मा को समझने की चेष्टा करता है और दोनों की एकता का तारतम्य मिलाता है। जप के द्वारा उस विराट ब्रह्म के प्रति अपनी निष्ठा बढ़ाता है जो उच्च भूमिका में उपलब्ध होने वाली महान् अनुभूतियों का उद्गम है। जप और ध्यान के समय जिस परब्रह्म की धारणा की गई थी उसे पूजा के बाद व्यवहारिक जीवन में उतारना भी आवश्यक है। अन्यथा केवल एक नियत समय पर थोड़ा पूजा विधान या जप, ध्यान कर लेने मात्र से आत्मिक प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त न हो सकेगा। आध्यात्म केवल जप, पूजन या पढ़ने-सुनने तक सीमित न समझ जाना चाहिए। यह प्रक्रियाएँ आवश्यक हैं, पर यदि ज्ञान और कर्म का खाद पानी न मिला तो यह अध्यात्म भी फला-फूला न दिखाई देगा।
मनः क्षेत्र में सद्विचारों की मात्रा इतनी अधिक भरी रहनी चाहिए कि कुविचारों के लिए वहाँ स्थान ही न बचे। लोहे को लोहे से काटा जाता है। मनोभूमि को दूषित करने वाले विचारों का निराकरण प्रतिरोधी सद्विचारों द्वारा ही सम्भव है। इसलिए यह प्रयत्न रहना चाहिए कि स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन या जैसे भी सम्भव हो मन में केवल उत्कृष्ट कोटि की विचारधारा एवं भावना को स्थान मिले। इसी प्रकार अपने कार्यों को ऐसा निर्मल बनाया जाना चाहिए कि उनमें अनीति, छल, असत्य, पाप एवं अकर्म के लिए कोई स्थान न रहे।
भवन्तिनम्रास्तरवः फलागमै
र्नवाम्बुभिर्दूर विलम्बिनो घनः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥
वृक्ष फल आने पर झुक जाते हैं। जल भरे बादल भी नीचे हो जाते हैं। समृद्धि प्राप्त होने पर सत्पुरुष अभिमान नहीं करते, यही परोपकारियों का स्वभाव है।
ज्ञान की परिपक्वता कर्म द्वारा ही सम्भव है केवल विचार करते रहा जाय और कर्म में उन विचारों की परिणति न हो तो उससे मन बहलाव मात्र होगा। जस्ते और ताँबे के दो तारों में होकर गुजरती हुई विद्युत-धारा जब एकत्रित होती है, तो उसका चमत्कार दृष्टिगोचर होता है। ज्ञान और कर्म अलग-अलग रहें तो वे भार मात्र हैं। पर जब सद्विचार के साथ सत्कर्मों की प्रतिक्रिया बनती है तो वह कर्म-योग एक उत्तम योग साधना का रूप धारण करके आत्मकल्याण के लक्ष्य को पूर्ण करने में समर्थ हो जाता है।
हम सुसंस्कृत बनें। संस्कृति को अपनावें। जीवन लक्ष की ओर राजमार्ग में चलें। ज्ञान और कर्म की उपासना करें। आन्तरिक स्तर सुधारे और सत्प्रवृत्तियों को बढ़ावें तो ही हमारा कल्याण होगा तो ही जीवन-लक्ष की पूर्ति सम्भव बनेगी।
किसी मनुष्य के पास दूसरे को देने योग्य यदि कोई सबसे अधिक उत्कृष्ट एवं महत्वपूर्ण वस्तु हो सकती है तो वह है प्रेम—। यों आर्थिक या बौद्धिक सहायता देकर भी किसी का कुछ उपकार किया जा सकता है पर उसका लाभ स्वल्पकालीन रहता है; इसलिए उसकी प्रसन्नता भी क्षण भर ही टिकेगी। प्रेम और सद्भाव पाकर आत्मा जितनी प्रसन्नता अनुभव करती है उतनी और किसी वस्तु से नहीं करती। उपकार करने में जो त्याग करना पड़ता है उससे कई गुना प्रतिफल तब वसूल हो जाता है जब जिसके साथ उपकार किया गया था वह सच्चे हृदय से कृतज्ञता और प्रेम-भावना प्रकट करता है। यह कृतज्ञता और प्रेम भावना उपकारी को ही प्राप्त हो सकती है। इस संसार में पाप और दुष्टता की तरह प्रेम और सौजन्य भी परिपूर्ण मात्रा में भरा पड़ा है, पर उसे वे लोग प्राप्त नहीं कर सकते, जिनका मन कुटिलता और व्यवहार अनीति से भरा पड़ा है। सज्जनता, सरलता, सचाई और सहृदयता में ही वह गुण है कि सामने वाले पत्थर को भी अपने लिए मक्खन जैसा कोमल बना कर रख दे। सच्चा प्रेम प्राप्त करने के लिए सज्जनता की आवश्यकता है। सज्जन व्यक्ति को कई बार चालाक लोग ठग लेते हैं पर तो भी उसकी उदारता और भलमनसाहत के प्रति उन्हें नत-मस्तक ही होना पड़ता है। ठगाये जाने पर भी जिसने अपनी सज्जनता को नहीं छोड़ा है वह किसी भी बलिदानी वीर से कम प्रशंसनीय नहीं है।
जिसके मन में दूसरों के प्रति कोमल भावनाएं रहेंगी वे ही दूसरों का स्नेह और सम्मान प्राप्त कर सकेंगे। मतलब के लिए गधे को बाप बनाने की नीति हर कोई जानता है। खुशामद, चापलूसी, और भुलावा देने वाली मीठी बोली बोलने की कला को अब बहुत लोग जान गये हैं और दूसरों को उल्लू बना कर अपना मतलब निकालने के लिए कितने ही लोग इस हथियार का भरपूर प्रयोग भी करते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि हर व्यक्ति की आत्मा स्नेह, सम्मान और सद्भाव की प्यासी है। यदि वे नकली रूप में भी कहीं दिखाई पड़ते है तो भी उन्हें लुभाने के लिए उतना ही बहुत है। बहेलिये जिस प्रकार दाने डाल कर अपना जाल कबूतरों से भर लेते हैं, मछुए जिस प्रकार आटे की गोली दिखा कर मछलियाँ समेटते रहते हैं उसी प्रकार नकली प्रेम का प्रलोभन देकर कितने ही ठग दूसरों का सर्वस्व हरण कर लेते हैं इन हथकंडों के बीच एक ही सत्य छिपा हुआ है कि वह यह कि हर व्यक्ति प्रेम का प्यासा है, हर किसी सद्व्यवहार और सज्जनता की प्यास है। यह इतना प्रकट तथ्य है कि नकली प्रेम की विडम्बना बना कर वेश्याओं से लेकर प्रपंची ठगों तक सभी ने नकली मधुरता को अपने लिए एक सफलता का व्यावसायिक अस्त्र बनाया हुआ है।
इस भूतल का अमृत—
यह तो हुई नकलीपन की बात। असली रूप का आनन्द तो इतना उत्कृष्ट है कि उसकी एक बंद के बदले में मनुष्य अपना सर्वस्व निछावर कर सकता है। प्रेम की असफलता में अनेकों आत्म-हत्या करते रहते हैं, प्रेम की प्राप्ति के लिए लोग बड़े से बड़ा त्याग करते हैं। पति-पत्नी के प्रेम सम्बन्ध में तो यह बात स्पष्ट ही है। स्त्री-स्त्री और पुरुष-पुरुष में भी प्रेम भाव की गहनता होने पर एक दूसरे के लिए मर-मिटने के अवसर सहज ही आ सकते हैं। निस्सन्देह मनुष्य को अपना धन और प्राण प्रिय हैं, पर प्रेम की महानता इतनी ऊँची है कि उसके लिए इन दोनों को भी सहज ही तिलाञ्जलि दी जा सकती है।
यदि सच्चे स्नेह और सच्चे सद्भाव की कुछ बूँद मनुष्य को मिलती रहें तो वह रूखी रोटी खाकर और फटे चिथड़े पहन कर अमीरों और रईसों से अधिक आनन्द एवं गर्व अनुभव करता हुआ जीवन व्यतीत कर सकता है। परिवार के छोटे दायरे में जिसे धर्म-पत्नी की अनन्यता, बच्चों को श्रद्धा भाई का विश्वास, बहिन की ममता, माता का वात्सल्य, पिता का प्रेम, नौकर की वफादारी, प्राप्त है, उसे अगणित समस्यायें सामने रहते हुए भी अपना जीवन स्वर्गीय शान्ति से परिपूर्ण दिखाई देगा। फिर जिसके मित्र, स्वजन, परिजन, परिचित, सम्बन्धी, व्यवहारी भी ऐसा ही व्यवहार रखने लगें तब तो कहना ही क्या है। उस जीवन में हर दिशा से आनन्द ही निर्झरिणी बहती रहेगी।
हम बदलें तो दुनिया बदले-
ऐसी प्रेममयी-आत्म-भाव से परिपूर्ण परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकना हर किसी के लिए नितान्त सरल और सम्भव है। दुनिया में हर चीज की कीमत है यहाँ बिना कीमत चुकाये कुछ भी नहीं मिलता। दूसरों का सम्मान, स्नेह, सद्भाव और सहयोग प्राप्त करने के लिए हमें वही तत्व अपने भीतर पैदा करने पड़ेंगे और उसका उपयोग दूसरों के लिए करना पड़ेगा। चुम्बक अपने में आकर्षण शक्ति न हो तो पास में पड़े हुए लौह कण भी उपेक्षा का भाव दिखाते रहेंगे, उधर अभिमुख होने की कोई चेष्टा न करेंगे।
प्रेम, प्रेम की कीमत पर खरीदा जा सकता है। वह एकाँगी भी हो सकता है। एक का सच्चा प्रेम दूसरे को कभी न कभी अपने अनुगत बना ही लेता है। बुरे लोगों को भी यदि हम प्यार करने लगें तो उनका सुधार ही होगा। आज नहीं तो कल, हारे जितना न सही उससे कम, कुछ तो प्रेम भाव उनके मन में उपजेगा और बढ़ेगा ही। सच्चे मन से किया हुआ प्रेम कभी भी निरर्थक नहीं जाता। उसके द्वारा पत्थर की मूर्तियाँ और कागज के चित्र देवता बन कर हमें आनन्द से ओत-प्रोत कर सकते हैं तो फिर हाड़-माँस वाला सजीव प्राणी प्रत्युत्तर में सर्वथा प्रेम-विहीन कैसे बना रहेगा?
यदि प्रेम के बदले प्रेम का प्रत्युत्तर न भी मिले, अपने को ठगे जाने और घाटे में रहने का अवसर आवे तो भी उसकी हानि केवल भौतिक हानि ही रहेगी। प्रेम की दिव्य अनुभूतियाँ अपने अन्तःकरण में जब उठती रहती है तो वहाँ पुष्प-वाटिका की तरह सौंदर्य और सुगन्ध का साम्राज्य छाया रहता है। उसका आनन्द तो अपने को मिलता ही है। आत्मा की सबसे प्रिय अनुभूति प्रेम है। उसका रसास्वादन होते रहने से आत्म-तृप्ति, आत्म-सन्तोष और आत्मोल्लास का जो हर घड़ी लाभ होता रहता है उसकी तुलना में यदि कुछ भौतिक हानि उठानी पड़े तो वह तुच्छ एवं नगण्य ही मानी जायगी।
प्रेम की एक-एक बूँद के लिए यह दुनिया तरस रही है। अनावृष्टि काल में पानी का जैसा अकाल रेगिस्तानों में पड़ता है वैसा ही प्रेम दुर्भिक्ष आज सर्वत्र छाया हुआ है। प्रेम के नाम पर ठगी, चापलूसी, वासना और शोषण की प्रवंचना तो खूब बढ़ी है पर सच्चा प्रेम-जिसमें आत्म-दान और निःस्वार्थ सेवा का ही समावेश होता है अब देखने को नहीं मिलता इस आध्यात्मिक विभूति के अभाव में जीवन नीरस ही बने रहते हैं। सब ओर कुछ खोया-खोया सा, सब ओर अभाव-अभाव सा ही दिखाई पड़ता है। यदि सच्चे प्रेम के कुछ कण भी किसी को प्राप्त हो जाते हैं तो सचमुच ही उसके सब अभाव पूर्ण हो जाते हैं।
हमें अपने भीतर सच्चे प्रेम की भावनाएँ जागृत करनी चाहिए, दूसरों को अपना मानना चाहिए, उन्हें आत्मीयता की दृष्टि से देखना चाहिए, फलस्वरूप हम भी सच्चे प्रेम के रसास्वादन से वंचित न रहेंगे। संसार के खेत में अपना प्रेम बीज बखेरते फिरें तो कोई-कोई पौधा उसका जरूर उगेगा और उसकी सुगंध से भी हमें आनंद और तृप्ति देने लायक बहुत कुछ मिल जायगा।
विश्व-शान्ति के दो आधार—
गहरी और स्थायी प्रसन्नता के आधार दो हैं, सत्कर्मों द्वारा उत्पन्न होने वाला अपने भीतर का आत्म सन्तोष और इससे आत्मजनों द्वारा किया हुआ अपने साथ सद्व्यवहार, आत्म सम्मान। यह मानसिक सुख है। मन का महत्व शरीर की अपेक्षा कहीं अधिक है, इसलिए इन सुखों की अनुभूति भी बहुत अधिक होती है। आत्मा की आकाँक्षा इन्हीं दो सुखों को प्राप्त करने की बनी रहती है और यदि उसकी पूर्ति नहीं होती तो उसे सब कुछ सूना-सूना लगता है और अन्तःप्रदेश में असन्तोष एवं खिन्नता की स्थिति बनी रहती है। आज उसी खिन्नता और असन्तोष से सारा मानव-समाज खिन्न बना बैठा है। आत्म सन्तोष के अभाव में जो अन्तर्द्वन्द्व चलते हैं और दूसरों के असद् व्यवहार के कारण जो विक्षोभ पैदा होते हैं वे इतने दुखदायी होते हैं कि कई बार तो उनको सहन करना कठिन हो जाता है। जो सहते हैं वे मर्मान्तक पीड़ा अनुभव करते हैं। आज ऐसी ही विपन्न मनोभूमि हम सब की बनी हुई है। हर कोई भीतर-ही-भीतर खिन्न और असन्तुष्ट दिखाई पड़ता है। भौतिक उन्नति के लिए बहुत कुछ प्रयत्न किये जाने पर, सुख सुविधा के अनेक साधन उपलब्ध कर लिये गये हैं, पर यह दुर्भाग्य की ही बात है कि मानव को स्थायी सुख शान्ति प्राप्त हो सके इस दिशा में सर्वत्र उपेक्षा ही दृष्टिगोचर होती है।
आत्म-हनन का पातक—
आत्म प्रताड़ना सबसे बड़ा दण्ड है। जिस व्यक्ति की आत्मा भीतर-ही-भीतर उसके दुष्कर्मों एवं कुविचारों के लिए कचोटती रहती है, जिसे कुमार्ग पर चलने के कारण आत्मा धिक्कारती रहती है, वह अपनी दृष्टि में आप ही पतित होता है। पतित अन्तरात्मा वाला व्यक्ति उन शक्तियों को खो बैठता है जिनके आधार पर वास्तविक उत्थान का समारम्भ सम्भव होता है। हम ऊँचे उठ रहे हैं या नीचे गिर रहे हैं इसकी एक ही परीक्षा, कसौटी हैं कि अपनी आँखों में हमारा अपना मूल्य घट रहा हैं या बढ़ रहा है। आत्म सन्तोष जिसे नहीं रहता, जो अपनी वर्तमान गतिविधियों पर खिन्न एवं असंतुलित है उसे उन्नतिशील नहीं कहा जा सकता। जिसने अपनी आन्तरिक शान्ति गँवा दी, उसे बाहर शान्ति कहाँ मिलने वाली है? धन कमा लेने से, कोई ऊँचा पद प्राप्त कर लेने से, कई प्रकार के सुख साधन खरीदे जा सकते हैं, पर उनसे आत्मसन्तोष कहाँ मिल पाता है?
सन्मार्ग पर पदार्पण—
मनुष्य की महान विचार शक्ति का यदि थोड़ा सा ही भाग आत्मसन्तोष के साधन ढूंढ़ने, और आत्म शान्ति के मार्ग को खोजने में लगे तो उसे वह रास्ता बड़ी आसानी से मिल सकता है जिस पर चलना आरम्भ करते ही उसका हर कदम आत्मिक उल्लास का रसास्वादन कराने लगे। संसार की सम्पदा भी तो लोग सन्तोष प्राप्त करने के लिए ही कमाया करते हैं फिर उस क्षणिक एवं तुच्छ सन्तोष की अपेक्षा यदि चिरस्थायी आत्मशान्ति उपलब्ध करने का अवसर जिसे मिल रहा होगा वह उल्लास, उत्साह और प्रफुल्लता का अनुभव क्यों न करेगा?
स्नेह, सद्भाव और सौजन्य—
विचार शक्ति का एक दूसरा मोड़ इस दिशा में भी दिया जाना चाहिये कि मनुष्य-मनुष्य के बीच में स्नेह, सद्भाव और सौजन्य की मात्रा निरन्तर बढ़ती रहे। हम एकाकी जीवनयापन नहीं कर सकते, हमारी आवश्यकताएँ ऐसी हैं जिनके लिए विवश होकर दूसरों से सम्बन्ध बनाना पड़ता है। एकान्त गुफाओं में रहने वाले वैरागियों को भी आसन, कमंडल, ईंधन, दियासलाई, माला, कोपीन, कम्बल, पुस्तक एवं भोजन की आवश्यकता पड़ती है। और इसके लिये उन्हें दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है। हर व्यक्ति समाज के साथ किसी-न-किसी रूप में जुड़ा हुआ है, इसलिए उसे सामाजिक सद्भाव की आवश्यकता पड़ेगी ही। द्वेष, कलह, अपमान, प्रवञ्चना, अशिष्टता, उद्दण्डता के व्यवहार की आशा हम दूसरों से नहीं करते हैं। हर किसी की स्वाभाविक इच्छा यही रहती है कि उसके साथ दूसरे लोग प्रेम सौजन्य, आदर, ईमानदारी, सम्मान, सज्जनता एवं उदारता का व्यवहार करें। प्रेम की भूख मानव-प्राणी की सबसे बड़ी भूख है। इस संसार में सबसे मधुर, सबसे आकर्षक एवं आनन्ददायक एक ही वस्तु है और वह है—प्रेम। जिसे किसी का सच्चा प्रेम नहीं मिला वह अभागा इस संसार में मरघट के ब्रह्मराक्षस की तरह अशान्त, उद्विग्न, तृषित और असंतुष्ट भ्रमण करता रहेगा। जिसे सच्चे प्रेम का एक कण भी मिल जाता है वह अपने भाग्य को सराहता है। अभाव और दरिद्रता के रहते हुए भी जिसे प्रेम के कुछ कण उपलब्ध हो जाते हैं वह अपने आपको किसी बड़े अमीर से कम सुखी नहीं मानता। माता का, पत्नी का, भाई का, मित्र का, जनता का प्रेम जिसे प्राप्त है उसे जीवन की सबसे बड़ी विभूति मिल गई यही मानना पड़ेगा।
आत्मीयता की गहराई—
प्रेम के मूल में आत्मीयता रहती है। स्वार्थ, मोह, रूप, यौवन, वासना, उपयोगिता, प्रतिभा, आदि के बाह्य आकर्षणों से भी कई बार प्रेम जैसी लगने वाली घनिष्ठता उत्पन्न हुई दिखाई देने लगती है, पर उसकी जड़ नहीं होती, इसलिये वे बाह्य कारण समाप्त होते ही वह तथाकथित प्रेम भी बालू की भीति की तरह ढह जाता है। प्रेम में गहराई, स्थिरता एवं आत्मत्याग की स्थिति तभी रहेगी जब आत्मीयता की निष्ठा का समावेश हो। जो अपना है उसके साथ त्याग, सेवा, सौजन्य, स्नेह और उदारता के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का व्यवहार नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार ईश्वर को घट-घट वासी सर्वव्यापी, निष्पक्ष और कर्मफल प्रदाता मानने वाला सच्चा आस्तिक मनुष्य कुविचारों और कुकर्मों से दूर ही रहेगा उसी प्रकार प्रेम की भावनाएँ जिसके मन में उमड़ेंगी वह दूसरों के साथ सौजन्य पूर्ण सद्व्यवहार ही करेगा, उदारता बरतेगा और स्वयं कष्ट में रहकर दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करता रहेगा। आस्तिकता और प्रेम की भावनाएँ
आयुषः क्षण एकोऽपिन लब्धः स्वर्ण कोटिभिः।
सवृथा नीयते येन तस्मै नृपशवेन मः
—व्यास
आयु का एक क्षण करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं में भी नहीं मिल सकता। ऐसे मूल्यवान् क्षणों को जो व्यर्थ ही गँवाते हैं उन नर पशुओं को नमस्कार।
सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्
सन्तोष मूलं हि सुखं दुःखं मूलं विपर्यघ्यः
—मनु 4। 12
सुख चाहने वाला सन्तोषी बने, और अपने आपको संयम में रखे। सन्तोष ही सुख की जड़ है। असन्तोष में तो दुख ही दुख है।
जब भी विकसित होती हैं तब सदाचार और सद्व्यवहार ही उनका बाह्यरूप प्रकाश में आता है।
आत्म-सन्तोष और आत्म-सम्मान यह दो ही आत्मा की प्रधान आवश्यकता, मुख्य क्षुधाएँ हैं। उनकी तृप्ति से—उनकी पूर्ति से ही आत्मा को सच्ची तृप्ति का अनुभव होता है और वह शान्ति तथा सन्तोष उपलब्ध करती है। इन दोनों की तृप्ति पूर्णतया अपने हाथ में है। शरीर से सत्कर्म करते हुए, मन में सद्भावनाओं की धारणा करते हुए जो कुछ भी काम मनुष्य करता है वे सब आत्मसन्तोष उत्पन्न करते हैं। सफलता की प्रसन्नता क्षणिक है पर सन्मार्ग पर चलते हुए कर्तव्य पालन का जो आत्म सन्तोष है उसकी सुखानुभूति शाश्वत एवं चिरस्थायी होती है। गरीबी और असफलता के बीच भी सन्मार्गगामी व्यक्ति गर्व और गौरव का अनुभव करता है।
आत्म-सम्मान का आधार दूसरों को सम्मान देने में है। गुम्बज वाले मकानों में होने वाली प्रतिध्वनि की तरह हमें वही आवाज सुनने को मिलती है जो हमने बोली थी। यदि गाली दें तो गाली और भजन गावें तो भजन वह गुंबज वाला मकान प्रति-ध्वनि के रूप में दुहरा देता है। दर्पण में हमें अपनी ही परछांई दिखाई देती है। अपना जैसा भी कुरूप या रूपवान चेहरा होता है वही लौटकर दिखाई पड़ता है। इस संसार का व्यवहार भी गुम्बजदार मकान या दर्पण जैसा ही होता है यदि हम दूसरों का सम्मान करते हैं तो बदले में हमें सम्मान मिलते हैं। अपने मन में यदि दूसरों के प्रति प्रेम एवं आत्मीयता भरी रहे तो बदले में दूसरी ओर से भी हमें यही सब मिलेगा।
दूसरे लोगों का व्यवहार हमें सन्तोष और सम्मान प्राप्त करने वाला हो यह हर किसी की इच्छा रहती है पर वह यह भूल जाता है कि इनको प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना होगा? मूल्य चुकाये बिना हमें संसार में कोई वस्तु नहीं मिलती। फिर परम आनन्द और तृप्ति प्रदान करने वाली यह विभूतियाँ भी हमें अनायास ही क्यों कर मिल सकेंगी? अपने कर्तव्यों द्वारा यदि उचित मूल्य चुकाने को—अपना आचरण सुधारने को तैयार रहा जाय तो कोई कारण नहीं कि आत्म-सन्तोष और आत्म सम्मान की समुचित मात्रा हमें प्राप्त न हो और आत्मा को तृप्ति की एवं प्रफुल्लता की परिपूर्ण अनुभूति का आनन्द न मिले।
=कहानी===================================================================
रूप गर्विता अप्सरा वपु अपनी पूर्ण साज-सज्जा के साथ चल दी महर्षि दुर्वासा को उनके तप से विचलित करने के लिए। वपु ने सोचा सर्वत्र मेरा ही प्रभुत्व क्यों न रहे?
सारा वन प्रान्त गूँज उठा उसके थिरकते गीत और पायलों की झंकारों से। दुर्वासा की कुटिया के समीप ही वह जा पहुँची। उन्मादकारी स्वर लहरी महर्षि के कर्ण कुहरों में प्रवेश करने लगी।
ऋषि का ध्यान भंग हुआ। उन्होंने योग-दृष्टि से देखा तो सब कुछ समझने में उन्हें देर न लगी। अप्सरा उन्हें लुभाने और पथभ्रष्ट करने आई है। तप को वासना परास्त करे, यह कल्पना उन्हें बुरी लगी। उन्हें क्षोभ हो आया, आँखें लाल हो गईं।
कुटी से बाहर निकलकर उस रूप गर्विता को थिरकन की एक क्षण के लिए ऋषि ने देखा और कहा— अभागी! तुझे तो सौरभ मिला था, उससे तू जगती की प्रसुप्त भक्ति भावना को जगा सकती थी, सरसता को अमृत की दिशा में मोड़ सकती थी, पर हाय री मूर्खा! तू तो उलटा ही करने को उद्यत हो गई। जा, अपने कर्म का फल भोग। तू पक्षी की योनि में मारी-मारी फिरेगी। तेरे चार पुत्र होंगे पर वे अपंग ही बने रहेंगे।
महर्षि का शाप मिथ्या कैसे होता। वपु अप्सरा का कलेवर छोड़, एक साधारण सी चिड़िया बन गई। अण्डे दिये, उनसे चार बच्चे निकले। पर वे चारों ही अपंग थे। रूप गर्विता अप्सरा के पास जब पश्चाताप ही शेष था। कला की देवी वपु अपने नृत्य संगीत से आज भी दुर्वासना को भड़काकर जन मानस में अपनी प्रभुता जमाने में संलग्न है। पर लक्ष्य भ्रष्ट होने के कारण निराश्रित पक्षी की तरह ही उसे इधर उधर मारी मारी फिरना पड़ रहा है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही बच्चे कला के गर्भ से उत्पन्न होते हैं। पर वासना का लक्ष बन जाने से तो वे भी अपंग ही रहेंगे।
कला की अप्सरा को आज भी शापित वपु की तरह पश्चाताप करना पड़ रहा है। वासना के लिए उसका किया हुआ नृत्य भला और किसी परिणाम पर पहुँचता भी कैसे?
कला की अप्सरा को आज भी शापित वपु की तरह पश्चाताप करना पड़ रहा है। वासना के लिए उसका किया हुआ नृत्य भला और किसी परिणाम पर पहुँचता भी कैसे?
मानव जीवन उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, हानि लाभ, अनुकूल-प्रतिकूल का चित्रपट है। एक समय जीवन में वह आता है जब मनुष्य हँसता है, खुशी के मारे बासों उछलता है। और एक समय वह भी आता है जीवन में जब मनुष्य रोता है निराश, चिन्तित और खिन्न रहता है, मानों हँसी खुशी कोई स्वप्न की बात थी। राजमहलों में खेलने, कूदने वाले राम और सीता को नंगे पैरों, वल्कल वस्त्र पहने चौदह वर्ष वन-वन भटकना पड़ा। श्रीकृष्ण, जिन्हें अवतार मानते हैं, उन्हें भी अपने वंश का पतन अपनी आँखों से देखना पड़ा। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का इतिहास इन दोनों ही पहलुओं से भरा पड़ा है।
जीवन क्या है—
क्या मानव जीवन इन दोनों पहलुओं की निरी क्रीड़ा मात्र है? क्या यह एक उस निर्जीव गेंद की तरह है जिसे दो खिलाड़ी इधर से उधर फेंकते हैं और इसमें ही उसका अस्तित्व है। अयोग्य हो जाने पर वह फेंक दी जाती है।
नहीं? ऐसी बात नहीं है। जीवन का अस्तित्व उस अनन्त काल, नित्य निरन्तर सत्य, अजर अमर तत्व की तरह है जिसके संदर्भ में रात दिन, सर्दी, गर्मी, रचना विनाश आदि के क्रम चलते रहते हैं, किन्तु उसकी आदि से चली आ रही यात्रा नहीं रुकती। अनन्त की यात्रा का लक्ष्य अनन्त ही हो सकता है। पूर्ण, पूर्ण की ओर ही जा सकता है। हमारा जीवन भी व्यक्त, अव्यक्त रूप से उस पूर्णता की राह का यात्री है। जीवन मरण, सुख दुख, हानि लाभ, प्रतिकूल अनुकूल तो मार्ग के टेढ़े सीधे, ऊँचे-नीचे पत्थर मात्र हैं।
जीवन पथ की इन विभिन्नताओं में आगे बढ़ने का एक सरल उपाय है, इनके प्रति अनासक्त होना, निस्पृह होना। एक निरपेक्ष की तरह रहकर अपने कर्तव्य पर आगे बढ़ते रहना। गीता में इसीलिए निष्काम कर्मयोग अनासक्ति का उपदेश दिया है।
मोह और आसक्ति की व्यर्थता—
संसार और इसके पदार्थों के प्रति जितनी आसक्ति होती है, लगाव होता है उतना ही मनुष्य का अभिमान बढ़ता जाता है। धन के प्रति, कुटुम्ब के प्रति अनावश्यक मोह रखने वाले अभिमान से ग्रसित होते देखे गये हैं। विद्या का अभिमान करने वाले अपने आपको असाधारण व्यक्ति समझने लगते हैं। उच्च पद पर काम करने वाले अपने आपको भाग्यशाली, शालीन समझते हैं। वे भूल जाते है कि हम भी दूसरे मनुष्यों की तरह ही साधारण मनुष्य हैं।
संसार और इसके आकर्षणों को सत्य मानने वाले पर अभिमान पूरी तरह अपनी सवारी करता है। किन्तु मिट्टी के घरौंदे की तरह टूटने-फूटने वाले पदार्थों की क्षणभंगुरता, नश्वरता, अनित्यता समझ में आ जाय तो इनके प्रति आसक्ति नष्ट हो जाती है। और आसक्ति नष्ट हो जाने पर अभिमान भी नहीं रहता। जब मनुष्य यह सोचता है अथवा परिस्थितियों द्वारा सोचने को मजबूर किया जाता है कि उसका यह यश वैभव का महल किसी भी क्षण तहस-नहस हो सकता है, उसकी यह बौद्धिक क्षमता कभी भी नष्ट होकर वह विक्षिप्त बन सकता है, अपनी धन सम्पत्ति को वह अपनी ही आँखों के सामने नष्ट-भ्रष्ट होते देख सकता है, अपने शक्तिशाली पहलवान शरीर को स्नायु रोगों से पीड़ित, धड़कन, गठिया से दुःखी देख सकता है, तो सहज ही मनुष्य का अभिमान काफूर हो जाता है।
संसार और इसके पदार्थों का अस्तित्व अनित्य है क्षणभंगुर है। ये कभी भी नष्ट हो सकते हैं। इनके प्रति अभिमान करना, इनमें लिप्त रह कर जीवन के आवश्यक कर्तव्यों को तिलाञ्जलि दे देना बड़ी भारी भूल है। इनकी अनित्यता, क्षणभंगुरता का अभ्यास करते रहने पर अभिमान और इन आकर्षणों से उत्पन्न विकारों का शमन हो जाता है। मानसिक ग्रन्थियों का निराकरण होता है।
अज्ञान और अभिमान—
मनुष्य, संसार और इसके पदार्थों के बारे में अनित्यता का अभ्यास करता है किन्तु सफलताओं का आकर्षण फिर उसे भुलावे में डाल देता है और उससे अभिमान की वृद्धि होने लगती है। उसे अपने सामर्थ्य क्षमताओं पर अभिमान होने लगता है। किन्तु जीवन की बाह्य सफलता तो आन्तरिक जीवन के विकास व उच्चता की सफलता परिणाम है, जो सहज और स्वाभाविक है। विकास के साथ सफलता, समृद्धि तो उस तरह है जैसे सिर पर बाल। यदि बालों को ही महत्व दिया जाय, उनकी सेवा की जाय, शरीर को भुला दिया जाय तो यह एक बड़ा भारी अज्ञान ही कहा जायगा। बाह्य सफलताओं का चिन्तन न करके अपने कर्तव्य में दत्तचित्त लगे रहना चाहिए इससे अभिमान की वृद्धि नहीं होगी। व्यक्ति, जीवन में अनासक्त और निरपेक्ष होकर अपनी जीवन यात्रा पूरी करेगा।
जब हथौड़ा पत्थर पर मारा जाता है तो पत्थर उसका प्रतिवाद करता है और इसलिए वह टूट जाता है। शीशे के जमीन पर पड़ते ही टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं, किन्तु गेंद को जोर से मारने पर भी वह ऊपर ही उछल जाती है। इसका कारण यह कि अपने टकराने वाले भाग को वह शिथिल कर देती है। इसी तरह जब विभिन्न कुसंस्कार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर मानसिक क्षेत्र में उथल-पुथल मचायें तो संसार की अनित्यता, पदार्थों की क्षणभंगुरता और परिस्थितियों की चञ्चलता का तत्वज्ञान समझना आरम्भ कर देना चाहिए। क्षण-क्षण में जलाशय में तरंगें उठती रहती हैं, एक जाती और दूसरी आती रहती है। इस संसार का भी यह क्रम है। आज लाभ तो कल हानि, आज सुख तो कल दुख। रात और दिन की तरह, धूप और छाँह की तरह प्रिय और अप्रिय परिस्थितियों का ताना-बाना भी जीवन भर बुनना पड़ता है। इससे किसी जीवधारी को आज तक छुटकारा नहीं मिला। कोई भी पूर्ण सुखी इस धरती पर नहीं हुआ। कुछ न कुछ चिन्ता हर किसी को भी लगी रहती है। फिर अपने लिए यदि हम यह अभिलाषा करें कि हमें पूर्ण सुख शान्ति निरन्तर बनी रहे तो यह कैसे सम्भव हो सकता है? इस परिवर्तनशील जगत में नित्य नया दृश्य दिखाई पड़ना स्वाभाविक है। यह बदलाव सदा सुखद ही नहीं हो सकता और प्रिय अप्रिय दोनों ही परिस्थिति के लिये हम को सदैव प्रस्तुत रहना चाहिए।
कामे दुग्धे विप्रकर्षत्यलक्ष्मीं,
कीर्ति सूते दुष्कृतं या हिनस्ति।
ताँचाप्येताँ मातरं मंगलानाँ,
धेनुः धीराः सूनृता वाच माहु॥
सब मंगलों की जननी सत्य मिश्रित मधुर वाणी को ही कामधेनु कहते हैं। वह मनुष्य की सब कामना पूरी करती है, दरिद्रता दूर करती है, यशस्वी बनाती है और पाप नष्ट करती है।
असंतुलित न हों—
सम्पत्ति और विपत्ति में मानसिक संतुलन को बनाये रहना, धीर पुरुषों का काम है। कायर ही हड़बड़ी मचाते हैं। हमें कायर नहीं, धीर वीर बनना चाहिए। जीवन में आती रहने वाले रंग-बिरंगी, कड़ुई मीठी, धूप छाँह को संतुलित मन से देखना चाहिए और उनकी ओर विशेष ध्यान न देकर अपने कर्तव्य पथ पर धैर्यपूर्वक अनासक्त रहते हुए जीवन की ओर साहस पूर्वक चलते रहना चाहिए।
धर्म पुराणों की कथा-गाथाएँ
नेक सलाह
महाभारत का युद्ध आरम्भ हो गया। दुर्योधन अपनी माता गान्धारी से आशीर्वाद लेने पहुँचा। गान्धारी ने कहा—पुत्र होने के नाते सहज स्नेह तो तुम्हारे लिए है पर आशीर्वाद तो उन्हीं के लिए है जिनके साथ सत्य और धर्म है।
आँखों पर पट्टी बाँध कर अपने अन्धे पति की स्थिति में आजीवन बनी रहने वाली गान्धारी के तप बल का मूल्य दुर्योधन समझता था। उसे आशा थी कि माता का आशीर्वाद मिलने पर मेरी विजय सुनिश्चित हो जायगी पर जब उसे गान्धारी का ऐसा उत्तर मिला तो वह उदास हो गया।
दूसरी बार दुर्योधन ने फिर पूछा—माता, आप आशीर्वाद नहीं दे सकतीं तो मुझे ऐसा उपाय ही बता दीजिए जिससे मेरी जीत हो जाय। गान्धारी ने कहा—बेटा, तुम धर्मराज युधिष्ठिर के पास जाओ और उनसे वह युक्ति पूछो। धर्मात्मा लोग सलाह माँगने वाले शत्रु को भी उसके लाभ की ही सम्मति देते हैं। अपने स्वार्थ के लिए तुम्हारा अहित करने वाली सलाह युधिष्ठिर कदापि न देंगे। तुम निस्संकोच उनके पास चले जाओ। सज्जन किसी के भी शत्रु नहीं होते। वस्तुतः वे हर किसी के लिए मित्र के समान ही उपयोगी होते हैं।
माता की बात मान कर दुर्योधन युधिष्ठिर के पास पहुँचा और अपनी विजय का उपाय पूछने लगा।
भ्राता दुर्योधन का उचित सम्मान करने के साथ युधिष्ठिर ने सलाह दी कि वह गान्धारी के सामने नग्न शरीर होकर उपस्थित हो, और उन्हें एक बार सारे शरीर पर दृष्टिपात करने के लिए मना ले। पति-भक्ति की भावना में आजीवन नेत्रों से पट्टी बाँधे रहने के कारण गान्धारी की दृष्टि में अब वह शक्ति आ गई है कि वह जिसे भी एक बार देख ले वह वज्र के समान सुदृढ़ हो जायगा और फिर कोई उसका कुछ बिगाड़ न सकेगा।
यह युक्ति दुर्योधन को बहुत पसंद आई और वह प्रसन्न मन घर लौट आया। माता को उसने इसके लिए मना लिया। दुर्योधन नग्न-बदन उपस्थित हुआ। गान्धारी ने आँखों से पट्टी खोली दुर्योधन का सारा शरीर देखा । देखते-देखते वह सचमुच वज्र जैसा सुदृढ़ हो गया।
दैव दुर्विपाक की प्रबलता ही कहिये कि दुर्योधन लज्जावश कटि वस्त्र पहन कर आया। उसका वह भाग गान्धारी की दृष्टि से छिपा रहा और दुर्बल रह गया। युद्ध में भीम ने उसी मर्म स्थल पर प्रहार करके दुर्योधन को परास्त किया ।
महाभारत समाप्त हुए हजारों वर्ष बीत गये परन्तु यह सनातन तथ्य अभी तक ज्यों का त्यों बना हुआ है कि श्रेष्ठ आत्माएं अपने पराये का भेद न कर के सत्य के प्रति ही गान्धारी की तरह शुभ कामना रखती हैं; और युधिष्ठिर की तरह शत्रु को भी केवल नेक सलाह ही देती हैं।
तप की सामर्थ्य
देवता और असुरों का युद्ध बहुत दिन चलता रहा। असुर तगड़े पड़े। देवता अपनी सज्जनता वश उतनी धूर्तता बरत न पाते थे जितने निश्शंक होकर असुर छल करते थे। वृत्रासुर के नेतृत्व में असुरों की विजय दुँदुभी बजने लगी।
निराश देवता ब्रह्माजी के पास पहुँचे और पूछा-भगवन्! विजय के लिए हम किस अस्त्र का प्रयोग करें?
ब्रह्माजी ने कहा—धातुओं से बने अस्त्र उतने प्रभावशाली नहीं हो सकते जितने तप और त्याग से बने आयुध प्रभावशाली होते हैं। तपस्वी की हड्डियों से ही वज्र बनाया जा सकता है। यदि तुम लोग तप त्याग विनिर्मित वज्र बना सको तो जीत तुम्हारी ही होगी। जाओ इसके लिए प्रयत्न करो।
देवता तपस्वी को तलाश करने लगे और उसकी हड्डियाँ प्राप्त करने का उपाय सोचने लगे। अभीष्ट वस्तु की तलाश में उन्होंने गिरि, कानन और कन्दराओं को तलाश करना आरंभ कर दिया।
महर्षि दधीचि अपनी दिव्य दृष्टि से इस कौतुक को देख रहे थे। उन्होंने देवताओं को पास बुलाया और प्रेमपूर्वक अपनी हड्डियाँ देने के लिए शरीर का परित्याग कर दिया।
तपस्वी दधीचि की अस्थियों से वज्र बना। वृत्रासुर मारा गया और उसकी सेना परास्त हुई। तब से देवताओं का सर्वश्रेष्ठ आयुध इन्द्र का वज्र का माना जाने लगा।
विजयोल्लास मनाने के लिए एकत्रित हुई देव सभा में गुरु बृहस्पति ने कहा-देवताओं, विजय का स्थायित्व शक्ति पर निर्भर है और शक्ति आयुधों से नहीं तप त्याग से भरी रहती है। यदि तुम सदैव अपराजित रहना चाहते हो तो तप और त्याग की शक्ति एकत्रित करो। इसमें प्रमाद करोगे तो फिर कभी कोई वृत्रासुर तुम्हें परास्त करने आ खड़ा होगा। दधीचि की माँगी हुई हड्डियों से कब तक काम चलेगा। तुम में हर एक को वज्र बनने के लिए दधीचि जैसा आत्म-बल एकत्रित करना चाहिए।
देवताओं ने वस्तुस्थिति को समझा और सुर गुरु के आदेशानुसार आत्मनिर्माण का प्रयत्न आरम्भ कर दिया।
मर्यादा का पालन-
शुक्राचार्य के पास जाकर कच संजीवनी विद्या का अध्ययन करने लगा। आचार्य ने छात्र को पुत्रवत् पाला और सांगोपांग ज्ञान देने में कोई कमी न रखी।
आचार्य की कन्या देवयायी कच के साथ ही पढ़ती थी। बहुत दिन साथ-साथ रहते-रहते स्नेह सौजन्य भी दोनों में बहुत बढ़ गया था।
अध्ययन पूरा करके कच जब चलने लगा तो देवयानी ने उसकी जीवन सहचरी बनने की अभ्यर्थना की। कच इस प्रस्ताव को सुनकर अवाक् रह गया। वह देवयान से भरपूर प्रेम करता था, पर प्रेम का अर्थ दाम्पत्य सम्बन्ध में ही परिणत होना चाहिए यह बात उसको समझ में कभी भी न आई थी। गुरु कन्या सगी बहिन की तरह होती है उसने सदा यही जाना और माना था। इस मान्यता को बदलने का कोई कारण भी उसे प्रतीत नहीं होता था।
कच ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। देवयानी की आकाँक्षाओं पर तुषारपात हुआ तो वह तिलमिला गई। उसने शप दिया कि मेरे पिता से जो कुछ तुमने पढ़ा है सो निष्फल हो जायगा।
इतने दिन के श्रम और अध्ययन के निष्फल चले जाने पर भी कच विचलित न हुआ वरन् उसके अधरों पर सन्तोष की एक लहर दौड़ गई। छात्र ने गुरु और गुरु कन्या का साष्टाँग अभिवन्दन करते हुए कहा- आदर्शों और मर्यादा की रक्षा आवश्यक है। इसके लिए किसी व्यक्ति का अहित होता है तो उसमें चिन्ता की कोई बात नहीं। मेरा अध्ययन निष्फल जाना और देवयानी का इच्छित पति न मिलना निश्चय ही कष्टकारक है। इस दुखान्त प्रकरण में हममें से कोई प्रसन्न नहीं। पर मनुष्य की प्रसन्नता तुच्छ है। आदर्शों की रक्षा के लिए आकाँक्षाओं का बलिदान होता हो तो उसे सुखान्त प्रक्रिया की तरह सहन ही किया जाना चाहिए।
शुक्राचार्य की आँखें भर आई। कच भी भारी हृदय लेकर वापिस लौटा। देवयानी का तो हृदय ही टूटा जा रहा था। तीनों अपना पराभव अनुभव कर रहे थे। पर मर्यादा को जीतती देखकर तीनों की अन्तरात्मा एक हलका-सा संतोष अनुभव कर रही थी।
ऐश्वर्य का मद
नहुष को पुण्य फल के बदले में इन्द्रासन प्राप्त हुआ। वे स्वर्गलोक में राज्य करने लगे।
ऐश्वर्य और सत्ता का मद जिन्हें न आवे ऐसे कोई विरले ही होते हैं। नहुष सत्ता मद से प्रभावित हुये बिना अछूते न रह सके।
उनकी दृष्टि रूपवती इन्द्राणी पर पड़ी। वे उसे अपने अन्तःपुर में लाने की विचारणा करने लगे। प्रस्ताव उनने इन्द्राणी के पास भेज ही तो दिया।
इन्द्राणी बहुत दुखी हुई। राजाज्ञा के विरुद्ध खड़े होने का साहस उसने अपने में न पाया तो एक दूसरी चतुरता बरती। नहुष के पास उनने सन्देश भिजवाया कि वह ऋषियों को पालकी में जोते और उस पर चढ़कर मेरे पास आवे तो प्रस्ताव स्वीकार कर लूँगी।
आतुर नहुष ने अविलम्ब वैसी व्यवस्था की। ऋषि पकड़ बुलाये गये। उन्हें पालकी में जोता गया। उस पर चढ़ा हुआ राजा जल्दी-जल्दी चलने की प्रेरणा करने लगा।
दुर्बलकाय ऋषि दूर तक इतना भार लेकर तेज चलने में समर्थ न हो सके। अपमान और उत्पीड़न से वे क्षुब्ध हो उठे। एक ने कुपित होकर शाप दे ही तो डाला—”दुष्ट! तू स्वर्ग से पतित होकर पुनः धरती पर जा गिर”। शाप सार्थक हुआ। नहुष स्वर्ग से पतित होकर मर्त्यलोक में दीन-हीन की नाईं विचरण करने लगे।
इन्द्र पुनः स्वर्ग के इन्द्रासन पर बैठे। उन्होंने नहुष के पतन की सारी कथा ध्यानपूर्वक सुनी और इन्द्राणी से पूछा—भद्रे, तुमने ऋषियों को पालकी में जोतने का प्रस्ताव किस आशय से किया था?
शची मुस्कराने लगीं। वे बोली-नाथ, आप जानते नहीं, सत्पुरुषों का तिरस्कार करने उन्हें सताने से बढ़कर सर्वनाश का कोई दूसरा कार्य नहीं। नहुष के अपनी दुष्टता समेत शीघ्र ही नष्ट करने वाला सबसे बड़ा उपाय मुझे यही सूझा। वह सफल भी तो हुआ।
देव सभा में सभी ने शची से सहमति प्रकट कर दी। सज्जनों को सताकर कोई भी नष्ट हो सकता है। बेचारा नहुष भी उसका अपवाद कैसे रहता!
साथी के प्रति कर्तव्य
धर्मराज युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण का समय आया। स्वर्गलोक का विमान उन्हें सशरीर परमधाम ले जाने के लिये आ पहुँचा।
हिमालय के उच्च शिखर पर युधिष्ठिर अकेले ही न थे उनका साथी कुत्ता भी था। धर्मराज ने देवगणों से कहा—स्वर्ग ही चलना होगा तो हम दोनों ही चलेंगे, नहीं तो यह धरती ही हमारे लिये क्या बुरी है?
देव सभा में प्रश्न की गम्भीरता पर विचार हुआ। स्वर्ग में तो केवल मनुष्यों को ही प्रवेश मिलता है पशुओं को वहाँ कैसे लाया जाय?
देव गुरु ने कहा मित्र का साथ निबाहने के लिए स्वर्ग तक का त्याग करने वाले महापुरुष का साथी भी उन भावनाओं वाला ही होगा। कुत्ता है तो क्या पर है तो युधिष्ठिर का साथी ही। उसे स्वर्ग बुलाने में संकोच न किया जाय।
कुत्ता समेत युधिष्ठिर स्वर्ग पहुँचे। साथी का साथ अन्त तक निबाहने का उनका आदर्श स्वर्गवासियों के लिए भी चर्चा का विषय बना रहा।
मौन की महत्ता
महाभारत का अन्तिम श्लोक पूर्ण हुआ। गणेश जी की अनवरत चलती रहने वाली लेखनी को विश्राम मिला।
महर्षि व्यास ने हँसते हुए गणेश जी से पूछा—भगवन्! मैं इतने श्लोक बोलता रहा। अनेक प्रसंग तथा अनेक व्यवधान बीच में आये पर आप मौन ही रहे। इसका क्या रहस्य है?
गणेश जी हँस पड़े, उनने कहा—व्यासजी, जानते नहीं शक्ति का स्रोत संयम ही तो है। मैंने मौन रह कर ही तो इतना बड़ा महाभारत लिख सकने का कार्य किया है। मौन की महत्ता किससे छिपी है। वाणी का संयम सबसे बड़ा संयम माना जाता है। जो मौन रहता है, कम बोलता है वही तो कुछ कर गुजरता है।
प्रसंग समाप्त होने ही वाला था कि अधूरी बात को पूरी करते हुए नन्दी ने कहा—सभी दीपों में तेल होता है किसी में कम किसी में ज्यादा। अक्षय तेल किसी में नहीं। प्राणियों में शक्ति तो रहती है पर वह विपुल नहीं, अक्षय नहीं। संयम द्वारा जो उसे नष्ट होने से बचा लेते हैं वे ही तो सिद्धि प्राप्त कर पाते हैं।
व्यास और गणेश दोनों ही इस तथ्य पर सहमत थे। महाभारत की रचना दोनों के सहयोग से इसी आधार पर हो सकी थी।
बड़ा धन क्यों न लूं?
महर्षि याज्ञवलक्य ने संन्यास लेने की आकाँक्षा से अपनी गृह व्यवस्था का उचित प्रबंध कर देने की योजना बनाई।
उन्होंने ने अपनी दोनों धर्म पत्नियों को बुलाया और कहा—मेरे पास जो कुछ धन सम्पत्ति है उसे तुम दोनों आपस में बाँट लो और मुझे परिव्रज्या के लिए जाने दो।
कात्यायनी ने पूछा-भगवन्! आप गृह सुख छोड़ कर संन्यास क्यों ले रहे हैं? याज्ञवलक्य ने उत्तर दिया—भद्रे! गृहस्थ में शरीर सुख है पर संन्यासी होकर जो परमार्थ बन पड़ता है उसका आत्मिक सुख और भी अधिक आनन्ददायक है। इसलिए मैं बड़े सुख के लिए छोटे सुख का त्याग मात्र कर रहा हूँ। इसमें मेरी हानि नहीं लाभ ही है।
“तो फिर मैं ही बड़ा सुख छोड़कर छोटा सुख क्यों स्वीकार करूं? मैं भी आपके साथ परमार्थ साधन के लिये क्यों न चलूँ?” बड़ी पत्नी ने ऐसा ही सोचा और ऐसा ही किया। ऋषि की छोटी पत्नी मैत्रेयी को उत्तराधिकारी की पूरी धन सम्पत्ति देकर कात्यायनी महर्षि याज्ञवलक्य के साथ संन्यास लेकर आत्म कल्याण के लिए चल दी।
मैत्रेयी ने कहा—भगवन्! मैं भी कात्यायनी का अनुसरण कर आपके साथ ही क्यों न चलूँ? महर्षि ने कहा—भद्रे! ज्ञान की परिपक्वता बिना संन्यास व्यर्थ है। तुम अभी गृहस्थ में रह कर उस स्थिति के उपयुक्त अपने को बनाओ। समयानुसार ही हर कार्य ठीक होता है। जिस प्रकार एक स्थिति पर पहुँचे हुए लोगों के लिए संन्यास आवश्यक है उसी प्रकार एक स्थिति के लोगों के लिए गृहस्थ भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
याज्ञवलक्य का आदेश मैत्रेयी को स्वीकार करना ही उचित था, वैसा ही उसने किया भी।
स्कूल में अध्यापक बच्चों से गणित के सवाल हल करवा रहे थे। एक सवाल कुछ अधिक कठिन था। कक्षा का कोई छात्र उसे हल न कर सका। किन्तु एक छात्र ने उसे हल कर लिया और प्रशंसा तथा पुरस्कार प्राप्त किया।
दूसरे दिन वह बालक उस पुरस्कार को वापिस लेकर अध्यापक के पास आया और लौटाते हुए क्षमा याचना करने लगा। उसने वह प्रश्न अपनी समझ से नहीं किया था। किन्तु किसी दूसरे से पूछ कर लिख दिया था। इस प्रकार एक ओर चोरी करना दूसरी ओर पुरस्कार प्राप्त करना, इस दुहरे अपराध से बालक की अन्तरात्मा कोंचने लगी थी। रात भर वह सोया नहीं, वरन् रोता रहा था, प्रातःकाल उसने पाप का प्रायश्चित करना और उसे सबके सामने प्रकट कर देना ही उचित समझा।
अध्यापक के लिए यह अनोखा उदाहरण था। उन्होंने प्रश्न हल करने का पुरस्कार वापिस ले लिया और सच्चाई ईमानदारी के उपलक्ष में उससे बड़ा दूसरा पुरस्कार प्रदान किया।
वह बालक बड़ा होकर न्याय मूर्ति गोपाल कृष्ण गोखले कहलाया। गोखले भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के प्रवर्तकों और स्वाधीनता संग्राम के आरम्भ करने वालों में अग्रणी थे। नेकी और ईमानदारी की नीति को अपना कर सामान्य मनुष्य भी असामान्य स्तर तक ऊँचे उठते हैं।
उपवास मनुष्य के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि भोजन। हमारे आचार्यों ने एकादशी व्रत की पन्द्रहवें दिन व्यवस्था की थी और उसे धार्मिक रूप देकर दिनचर्या में सम्मिलित कर दिया था। परन्तु, आज उस एकादशी व्रत का जो रूप देखने में आता है, उससे लाभ की अपेक्षा हानि की ही अधिक संभावना रहती है, क्योंकि उपवास के स्थान पर फलाहार किया जाता है और वह कथित फलाहार भी पकौड़ियाँ, खोए की मिठाई आदि विभिन्न पकवानों के रूप में होता है।
आयुर्वेद के विद्वानों ने उपवास को मानसिक रोगों में अत्यंत लाभकारी बताया है। जब औषधि उपचार से लाभ नहीं होता तब उपवास का सहारा लेकर ही लाभ उठाया जा सकता है। आज के युग में भौतिक चमक-दमक से ऊबा हुआ व्यक्ति जैसे मदिरा-पान द्वारा अपने दुःखों को विस्मृत करने का यत्न करता है, वैसे ही हमारे पूर्वज अपनी मानसिक चिन्ताओं से उत्पन्न वेदनाओं को दूर करने के लिए उपवास का आश्रय लिया करते थे और यह बात ठीक थी कि उपवास से सच्ची शान्ति प्राप्त होती थी। परन्तु मदिरा पान से शान्ति तो क्या प्राप्ति होगी, शरीर का ढाँचा ही बिगड़ जाता है।
हमारी चिकित्सा-पद्धति में विभिन्न रोगियों को उपवास कराया जाता रहा है। ज्वर, मंथर ज्वर, शीतला, ग्रन्थीक्षत, अर्बुद, पक्षाघात आदि विभिन्न रोगों में वैद्य लोग उपवास कराते थे और उस चिकित्सा से स्थायी लाभ होता था। आज क्षणिक लाभ की चाह बढ़ने से रोग का विष दूर नहीं हो पाता। शरीर में जितने प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सभी का उपचार उपवास द्वारा किया जा सकता है।
औषधियों द्वारा उपचार से यह मान लिया जाय कि रोग के कीटाणु नष्ट हो गए, परन्तु औषधि की प्रतिक्रिया रूप जो नवीन विषाक्त पदार्थ शरीर को प्राप्त हुए, वे उपवास द्वारा ही शमन किये जा सकते हैं। अन्यथा कीटाणु मर तो गए परन्तु उनके मृत शरीर आपके शरीर में रहकर नवीन भोजन में मिलते जाएंगे और पेट में एकत्रित कचरा कभी भी साफ न हो सकेगा और शरीर का यन्त्र पुनः अवरुद्ध होकर रोगोत्पत्ति की आशंका रहेगी।
आप कहेंगे कि कचरा साफ करने के लिए पेट शोधन विरेचन लिये जा सकते हैं, परन्तु ध्यान रखिये कि शरीर के विभिन्न स्थानों में सूक्ष्म मल एकत्र होता रहता है और वह इन विरेचनों द्वारा निकल नहीं पाता। इनसे तो साधारण कचरा ही निकल पाता है। उस सूक्ष्म मल को उपवास ही निकाल सकता है। इससे बढ़कर कोई दवा कारगर नहीं होगी।
कुछ लोग कहते हैं कि जब हम अपने दैनिक भोजन में इस प्रकार के अनेक पदार्थ ग्रहण करते हैं, जिनसे शरीर की प्राकृतिक क्रिया में कोई गड़बड़ी पैदा हो और आवश्यकतानुसार सफाई होती रहे तब भी रोग उत्पन्न हो जाते हैं तो उपवास ही उन्हें कैसे रोक पायेगा? उन लोगों को विचार करना चाहिए कि दैनिक जीवन में शरीर को स्वच्छ करने वाले पदार्थों को हम अपने स्वाद के लिए कम-अधिक करते रहते हैं, जिससे उनकी मल-निस्सारक शक्ति में भी अन्तर पड़ता रहता है। इसके साथ हम कभी-कभी मिठाई आदि, पेट के लिए हानिकारक पदार्थों का भी अधिक सेवन कर बैठते हैं, इसी कारण हमें रोगों का शिकार होना पड़ता है। परन्तु, उपवास सभी स्थितियों में समान रूप से कार्य करता है, इसलिये उससे लाभ के बजाय हानि की कभी संभावना नहीं होती।
भोजन की गड़बड़ी और पाचन क्रिया के ठीक प्रकार न होने के कारण पेट भारी हो जाता है और दूषित वायु एकत्रित हो जाती है। उसी से पेट दर्द, कब्ज, भारीपन, सिरदर्द, घबराहट, जी मिचलाना आदि विकार प्रकट हो जाते हैं उनका शमन करने के लिए सब से अच्छा उपाय उपवास ही है। यदि इन बीमारियों को आरम्भ होते ही दबाया नहीं जाता तो विकार बढ़ कर यकृत में खराबी उत्पन्न होकर विभिन्न रोग उत्पन्न हो सकते हैं।
रुग्णावस्था में मनुष्य की भूख कम हो जाती है और मुख का स्वाद बिगड़ जाता है। प्रकृति का नियम है कि वह इस प्रकार भोजन-ग्रहण करने भार से रोगी को बचाती है जिससे कि भार के कारण व्यय होने वाली शक्ति का ह्रास न होने पावे। क्योंकि भोजन को पचाना, उसमें से उपादेय सार को लेकर रक्त के रूप में परिवर्तित करना और व्यर्थ मल को बाहर निकालना आदि कार्यों में बड़ी शक्ति व्यय होती है और यदि रोगी की यह शक्ति व्यय होती रहे तो क्षीणता भी अधिक बढ़ती चली जायगी।
इसी लिए उपवास के महत्व को स्वीकार करना आवश्यक है। उपवास ही एक ऐसी क्रिया है जो शरीर के पाचन यन्त्रों को विश्वास देने वाला है। यदि विश्राम नहीं मिलेगा तो यन्त्रों में शक्ति नहीं रहेगी और मनुष्य अपने उल्लास ताजगी और स्फूर्ति को खो बैठेगा।
उपवास जहाँ विभिन्न रोगों के लिए अमृत तुल्य उपचार है वहाँ दुर्घटना के कारण लगी चोट, मोच, फोड़ा अथवा आपरेशन से साध्य होने वाले मामलों में उससे हानि होना भी संभव है। ऐसी स्थिति में तो पौष्टिक और रक्त वर्द्धक पदार्थों का सेवन कराया जाना आवश्यक होता है।
यदि नियमित रूप से उपवास किया जाता रहे, जैसे एकादशी के दिन या और किसी दिन; तो यह मास में दो बार किये जाने वाला उपवास भी बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। उससे बदहजमी, कब्ज, पेट दर्द, हर्निया, अर्बुद आदि बीमारियाँ होंगी ही नहीं। परन्तु आवश्यकता इस बात की है कि उपवास के नाम पर पकवान न उड़ाये जाएं।
साधारणतः उपवास एक से तीन दिन तक किया जा सकता है और ऐसा उपवास कठिन नहीं होता। इसके लिए किसी चिकित्सक के परामर्श या निगरानी की भी आवश्यकता नहीं है। स्वाभाविक रूप से अन्न का परित्याग कर देना होता है। इसमें जल और फलों का रस आदि सेवन करना वर्जित नहीं है।
रोगों के उपचारार्थ किया जाने वाला उपवास लम्बे दिनों तक चलता है और उसके लिए किस योग्य चिकित्सक की देख-रेख भी अत्यन्त आवश्यक होती है। क्योंकि मनुष्य की विभिन्न अवस्थाओं का ज्ञान साधारण व्यक्तियों को नहीं होता, और चिकित्सकों का अपना अनुभव होने के कारण वे जब परामर्श दें, उसे मानना ही हितकारक है।
उपवास रखने से अधिक सावधानी उसके तोड़ने में रखनी होती है, उस समय जो भी खुराक दी जाय, वह भली प्रकार सोच-समझ कर देनी चाहिए। कभी-कभी चिकित्सक के अनुभव न होने के कारण रोगी के प्राणों पर बन आती है।
प्रायः यह समझा जाता है कि लम्बा उपवास बहुत कठिन कार्य है। मनुष्य एक दिन भी भूखा रहने में बड़ी कठिनाई अनुभव करता है, तो लम्बे समय तक उपवास कैसे किया जा सकेगा? ऐसे व्यक्तियों को यह सुनकर आश्चर्य होगा कि उपवास करने वाले को भूख 3-4 दिन ही परेशान करती है इसके बाद उसकी भूख शान्त हो जाती है, और उसे किसी परेशानी का अनुभव नहीं होता। हाँ, यदि शरीर कमजोर है तो उपवास से अधिक कमजोरी उत्पन्न हो जाना संभव है। इसी लिये उपवास प्रारंभ करने से पूर्व किसी चिकित्सक से परामर्श लिया जाना आवश्यक समझा जाता है।
हमारे भैषज्य ग्रन्थों में विभिन्न कल्पों का विधान है, जिनके द्वारा बुढ़ापा भी दूर किया सकता है। यह कल्प भी अन्न-त्याग करने पर विशिष्ट फलों के प्रयोग द्वारा ही साध्य होते हैं, जो कि लम्बे उपवासों के ही रूप समझे जाने चाहिएं।
प्रसन्नता, आन्तरिक पवित्रता, शुद्धि का बाह्य परिणाम है—बाह्य चिन्ह है। जब चित्त शुद्ध हो कर सत्वगुण सम्पन्न हो जाता है तभी प्रसन्नता की सहज वृत्ति जागृत हो जाती है। जब इस तरह के सत्वगुण सम्पन्न महापुरुष, जिनका अन्तर निर्मल पवित्र और स्वच्छ हो जाता है, जिन्होंने अपने अन्तर का समाधान कर लिया है वे हँसते हैं तो वातावरण में हँसी के स्रोत फूट पड़ते हैं। उनके चारों ओर प्रसन्नता साकार हो उठती है। दुःखी क्लेश-युक्त व्यक्ति भी उस प्रसन्नता के वातावरण में उस समय के लिए अपने दुःख क्लेशों को भूल जाता है।
महापुरुषों के सान्निध्य में रहने वाले इस तथ्य को जानते हैं। सचमुच उनके निर्मल हृदय से प्रसन्नता की सुरसरी प्रवाहित होती रहती है जैसे पावन हिमालय से गंगा। यह तो रही उन महान् आत्माओं की बात जिनके जीवन में प्रसन्नता एक रूप हो गई है। जन साधारण जो प्रसन्नता के अभाव में जीवन में क्लेश दुःख परेशानी अनुभव कर रहे हैं उनको प्रसन्नता को जीवन में उतारने के लिये निम्न बातों का ध्यान रखकर अपने अन्तर बाह्य जीवन में निर्मलता, स्वच्छता, माधुर्य, आन्तरिक समाधान आदि के लिए सतत् प्रयत्न करना आवश्यक है।
मनुष्य एक दूसरे पर अवलम्बित है। समाज के विशाल भवन में मनुष्यों का गठन उसी तरह है जैसे किसी माला के विभिन्न मनकों का। किसी भवन निर्माण में ईंटों को एक दूसरे से मिला कर एक निश्चित स्तर से रखना पड़ता है। उस भवन के निर्माण में प्रत्येक ईंट का अपना विशेष स्थान है। इतना ही नहीं नींव में निम्न स्तर पर लगी हुई ईंट का और भी अधिक महत्व है क्योंकि उसके ऊपर समस्त भवन का बोझा उठा हुआ है। ठीक इसी तरह मानव मात्र एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। सेन्टपाल के शब्दों में “हम सब एक दूसरे के साथी हैं” परस्पर अन्योन्याश्रयी है। अतः किसी का भी भले ही निम्नस्तर क्यों न हो हमें घृणा की दृष्टि से देखने का अधिकार नहीं है।
मनुष्यों के इस निकट सम्बन्ध में एक ही बात निश्चित है और वह है सबसे प्रेम करना, सबके अस्तित्व को अपनी तरह ही मान कर उसका पूरा-पूरा आदर करना। पड़ौसी से लेकर सबको प्रेम करना आवश्यक है। इससे आन्तरिक क्षेत्र से घृणा, अनुदारता, स्वार्थपरता आदि दोष दूर होंगे और प्रसन्नता का प्रकाश प्रकट होने लगेगा।
प्रत्येक व्यक्ति मूल से अच्छा है बुरा नहीं अतः किसी के गुण दोषों से बहुत अधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए। गुण और दोषों का संबंध उसी तरह है जैसे दीपक के प्रकाश में उस स्वयं की भी छाया। और यह निश्चित है दीपक की छाया के अभाव में प्रकाश का भी अस्तित्व नहीं दृढ़ निश्चयी व्यक्ति में कुछ न कुछ हठीलापन होना सम्भव है। कर्तव्य के साथ थोड़ा बहुत अहंकार होना स्वाभाविक है। इस तरह के दोष छाया दोष कहे जाते हैं, जिनका अस्तित्व भी स्वीकार करना आवश्यक है। गुण दोष विरहित मनुष्य मिलना दुर्लभ है। अव्यक्त के प्रकाश के लिए छाया-दोष, चेतन की अभिव्यक्ति के लिए जड़ तत्व का परिधान स्वाभाविक है। अतः गुण दोषों का ध्यान न रखकर सभी का आदर करना प्रसन्नता की अभिवृद्धि के लिए आवश्यक है।
दूसरे से अनादर, अविश्वास, मतभेद, विचार भेद रखना, प्रसन्नता की जगह राग, द्वेष, क्लेश, अनादर, और अन्य बुराई के बीज बोना है। संसार में आज की गुटबन्दी, दलबन्दी, भिन्न-भिन्न वाद प्रान्तीयता, और विभिन्न एकाँगी निर्णय आदि जिन से लोगों में परस्पर विनाश की तैयारी होने लगती है और हिंसा की भावना बढ़ती है वे सब प्रसन्नता को दूर करके मानवता को नष्ट-भ्रष्ट करने वाले हैं। यह सब एक दूसरे के लिए प्रेम, आदर के अभाव के कारण ही होता है।
विभिन्न विचारों, दृष्टि कोणों, स्वभावों के कारण भेद हो सकते हैं और यह उसी तरह स्वाभाविक है जैसे संसार और इसके पदार्थों की विभिन्नता विचित्रता। किन्तु इनके साथ द्वेष, कटुता के भाव न हों वरन् प्रेम, एक दूसरे को आदर की भावनायें हो, जिससे विचार का, बातचीत का, हृदयों की एकता का रास्ता खुला रहे और मनुष्य इन सबसे सत्य को पा सके। प्रसन्नता के लिए परस्पर बुनियादी प्रेम, आदर भावनायें होना आवश्यक है।
स्नेह में भी आसक्ति होती है। किन्तु निस्वार्थ प्रेम और आदर अन्तस्तल को शुद्ध कर उसे बल प्रदान करता है, समर्थ बनाता है।
सृष्टि प्रत्येक अणु अपने स्थान पर पूर्ण है। ‘जो ब्रह्माण्ड में वही पिण्ड में’ऐसा श्रुतियाँ एक स्वर से कहती हैं। पूर्णता का भाव प्रत्येक व्यक्ति में है। एक पिता भोजन करने बैठा उसके साथी ही उसका पुत्र भी। पिता की थाली में पूरा लड्डू परसा गया और उस बच्चे की थाली में चौथाई हिस्सा इस पर बच्चा जिद करने लगा और बोला मैं पूरा लड्डू ही लूँगा। पिता ने बहुत समझाया किन्तु उसने अपनी जिद नहीं छोड़ी। इतने में ही माँ आई और उसके चौथाई लड्डू को अन्दर उठाकर ले गई। उसे गोल बना कर फिर थाली में परस दिया। अब बच्चा प्रसन्नता से भोजन करने लगा।
बच्चे की जिद्द पूर्णता के भाव की द्योतक है। पिता की तुलना में वह बाह्य आकार में छोटा हो सकता है जैसे कि छोटे लड्डू से प्रसन्न होने से मालूम होता है किन्तु पूर्ण-पूरा-लड्डू उसे चाहिए। अपूर्णता अधूरापन, उसकी स्वाभाविक स्थिति के, पूर्णता के विरुद्ध है।
प्रत्येक चेतन में, प्रत्येक मनुष्य में पूर्ण भाव रखकर उसका उतना ही आदर सम्मान करना, छोटे बड़े की दृष्टि से भेद भाव न रखना प्रसन्नता के साधक के लिए आवश्यक है।
प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये उदार बनिये। संकीर्णता, मनहूसपन से युक्त हृदय में प्रसन्नता प्रकट नहीं होती, सबके लिए हृदय खोलकर रखें। हृदय खोलकर मिलें। मनहूस वही होता है जो दूसरों के प्रति संकीर्णता घृणा के विरोधी भाव रखता है। व्यवहार में बातचीत में रहन सहन में प्रत्येक बात में उदारता बरतें।
संसार में सभी का स्वागत मुस्कान के साथ करें। मुस्कान आपकी आन्तरिक प्रसन्नता, सद्भावना, आत्मीयता का सिगनल है। दुश्मन के साथ मुस्करा कर बातचीत करने से दुश्मनी के भाव नष्ट हो जाते हैं। मुस्कान के द्वारा दूषित भाव ग्रन्थियाँ सहज ही नष्ट हो जाती हैं।
महात्मा बुद्ध नित्य ही उपदेश देते थे कि “पापी के साथ स्वयं भी वैसा ही व्यवहार करके पापी न बनो। कीचड़ से कीचड़ कभी नहीं धुलता। जो कोई तुम्हारे साथ बुराई करे उसके साथ भी भलाई ही करो। अपकारी के साथ भी उपकार ही करो।” महात्मा बुद्ध की यह बातें सुनकर एक दुष्ट बुद्धि व्यक्ति ने उसका गलत अर्थ लगाया। वह जान बूझ कर महात्मा बुद्ध को गाली देने लगा। महात्मा बुद्ध शान्त और गम्भीर भाव से सब कुछ सहन करते रहे। जब वह गाली देता-2 थक कर चुप हो गया तब महात्मा बुद्ध ने प्रेम पूर्वक पूछा-”वत्स! यदि कोई किसी की दी हुई भेंट स्वीकार न करे तो वह किसकी रहती है?’ इस पर वह बोला - “देने वाले की ही’। तो फिर अपनी भेंट तुम अपने ही पास रखो। मुझे यह सब नहीं चाहिए। इन्हें स्वीकार करने और सुनने पर तो मुझे भी तुम्हारी ही तरह उद्विग्न होना पड़ेगा।”
अब नहीं मौन का समय रहा,
अब नहीं शान्ति की बेला है॥
गर हो सपूत सच्चे माँ के, मारो मरमिटो पर हटो नहीं,
दो शीश चढ़ा माँ के पग में॥ यह दो दिन का मेला है॥
दो मसल मेरु मन्दराचल को, अब नहीं मौन का समय रहा,
यदि आजाये तेरे मग में॥ अब नहीं शान्ति की बेला है॥
ललकार रहा पंचानन को, केशरिया बाना पहन पहन,
गीदड़ का खड़ा झमेला है। तरु वर के पत्ते डोल रहे॥
अब नहीं मौन का समय रहा, धरती का कण कण बोल रहा,
अब नहीं शान्ति की बेला है। अम्बर से तारे बोल रहे॥
राणा प्रताप की शान आज, दिखलानी है वह कला तुझे,
है तुम्हें बचाना धीर वीर॥ दिखलाया जो कर्ण अकेला है॥
भारत माता को दिखलाना है, अब नहीं मौन समय रहा,
तुम्हें कलेजा आज चीर॥ अब नहीं शान्ति की बेला है॥
बनना है तुमको सेनानी, गंगा यमुना की धारों से।
आचार्य द्रोण का चेला है॥ सागर के विमल किनारों से॥
अब नहीं मौन का समय रहा, आवाज यही आती पल पल
अब नहीं शान्ति की बेला है। झाँसी की उन तलवारों से॥
कहते अतीत सुन लो नभ से, बढ़ो बीर बाँधो तुणीर
पद्मनियाँ भारत की बोली॥यह महा-प्रलय का खेला है॥
इस वर्ष मनाओ नव जवान,अब नहीं मौन का समय रहा।
गोली बारूदों से होली॥ अब नहीं शान्ति की बेला है॥
श्री देवनाथ त्रिपाठी शर्मा
कौन चला आता मदान्ध हो हिमगिरि से टकराने को—
टूक-टूक हो बिखर जायगा गर्व न कर, ओ मतवाले!
मुँह पर राम छुरी ले करमें साथी कहलाने वाले।
“हिन्द-चीन भाई-भाई” का नारा दुहराने वाले।
डल-अलर कैलाश देख पानी मुँह में लाने वाले,
मानसरोवर पर कुदृष्टि रख योंही ललचाने वाले॥
कामदेव-सा क्यों आता है खुद ही तू जल जाने को—
प्रलयंकर त्रिनेत्र शिव बैठे समाधिस्थ भोले भाले!
तुम केशर की सुरभि और सेवों को देख चले आए,
पर रखना यह याद कि तक्षक तुम्हें न कहीं निगल जाए।
यह रावण-सा वेष बदल तुम सीता को छलने आए,
पर रखना यह ध्यान कि तेरी लंका कहीं न ढह जाए॥
यह चुशूल, जो तज उसूल आता-त्रिशूल बन जाता है—
सँभल, बढ़ाना पग—उठ बैठे-शिवा-धनंजय रखवाले!
एक फूल भी चुन न सकेगा तू इस अक्षय क्यारी का
ब्रह्मपुत्र-सुरसरि से सिंचित रक्षित नव-फुलवारी का
चाओ-माओ ‘मुझे बचाओ’ छोर न पा जब सारी का,
कह भागेंगे, वसन-रूप लख नटवर गिरिवर धारी का!!
तृणावर्त अघ असुर कंस-सा जो अन्यायी बन आए—
भारत-सारथि बन फकेंगे पाँचजन्य ओ मतवाले!
अस्तु, मानजा पंचशील के सबसे पहिले अनुयायी
मानवता तज क्यों बनता दुर्दान्त और आततायी
हम शिव-से भोले भाले भी हम मोहन के अनुयायी
शान्ति-सत्य के सदा समर्थक सारे जग के हैं भाई!
अभी न बाँधे कफन सिरों पर, चेत मढ़ तू रार न कर—
खेल, लौटे जा अपने घर को, ओ अफीम के मतवाले!
[श्री रामस्वरूप खरे]
चीन के आक्रमण ने हमारी स्वतन्त्रता, सामर्थ्य और प्रतिष्ठा को चुनौती दी है। इस प्रकार के अन्यायपूर्ण, आक्रमण कोई किसी पर तभी करने को उद्यत होता है जब वह समझता है कि छल बल के द्वारा प्रतिपक्षी को परास्त करके वह मनमानी कर सकता है। ऐसी मान्यता उसी के मन में जमती है जो प्रतिपक्षी को अपने से कमजोर समझता है। अन्यथा अकारण इतना अन्यायपूर्ण आक्रमण कोई मदान्ध ही करते हैं। कारण होने पर तो दुर्बल के भी लड़ने और प्रतिरोध करने की बात समझ में आती है, पर जिस बात का कोई आधार न हो ऐसे बहाने लेकर चढ़ दौड़ना कोई नृशंस ही कर सकता है। निस्संदेह भारत पर नृशंस और बर्बरता पूर्ण आक्रमण हुआ है। ऐसे कुकृत्य करने वाले को लज्जित होना चाहिए था किन्तु जिस धूर्तता और निर्लज्जता के साथ अपने पक्ष को भी सही सिद्ध करने की चीन चेष्टा कर रहा है उसे देखते हुए यही निष्कर्ष निकलता है कि निर्लज्जता की निकृष्ट भूमिका पर खड़े होकर सोच समझ कर तैयारी के साथ ही यह बर्बरता कार्यान्वित की गई है।
कपटी मित्र का विश्वासघात—
मित्र बन कर कपटी शत्रु सा व्यवहार करने का उदाहरण पुराणों के असुर उपाख्यानों में पढ़ने को मिलता था, अब हमारी आँखें वह सब देख रही हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों से हमें इतिहास से ही शिक्षा ग्रहण करनी होगी। असुर आक्रमण की पूर्व तैयारी में रहते हैं इसलिए आरम्भ में उन्हें सफलता मिलती है। देवता आक्रमण की नहीं शाँति की बात सोचते रहते हैं इसलिए स्वभावतः उनकी आक्रमण शक्ति न्यून रहती है। इसलिए उन्हें मात खानी पड़ती है। इसका उपाय एक ही रहा है। आगे भी वही होगा। वह है—प्रतिरोध के लिए आवश्यक शक्ति का संचय। चोट खाये हुए देवता जब भगवान के पास अपनी व्यथा और पुकार सुनाने गये हैं तो उन्हें उपाय रूप से शक्ति संचय का ही उपदेश मिला है। देवताओं ने वही किया है। देवताओं द्वारा देव आदर्शों को लेकर जो दिव्य शक्ति एकत्रित की जाती है वह निस्सन्देह बड़ी प्रबल होती है। असुरों के सारे छल−बल उसके सम्मुख तुच्छ सिद्ध होते हैं और तैयारी के बाद जो देवा पुर संग्राम होता है उसमें असुरता का विनाश होता है।
इस बार भी यही हो सकता है। यही होगा। यही होना चाहिए कि हम भारत भूमि के नागरिक अपने देव आदर्शों के अनुरूप प्रतिरोध की आवश्यक शक्ति का संचय करने में लग जावें। इसी एक उपाय से हमारा कल्याण होगा। इसी से हमें विजय मिलेगी। सतयुग में देवताओं की शक्तियों का एकीकरण करके ब्रह्मा जी ने दुर्गा का आविर्भाव किया था और उसने शुँभ, निशुँभ, महिषासुर, मधुकैटभ आदि असुरों को परास्त किया था। हमें संगठित रूप से अपनी उस प्रसुप्त दिव्य शक्ति को जागृत करना होगा, जो विजय के लिए नितान्त आवश्यक है।
लड़ाई समाप्त नहीं हुई—
इन दिनों मोर्चे पर गोली चलना बन्द है। बीच बचाव करने वाले समझौते की बातें भी चला रहे हैं। इससे किसी को यह नहीं समझ लेना चाहिए कि लड़ाई समाप्त हो गई और झगड़ा निपट गया। यह समर नीति मात्र है। अपनी तैयारी और प्रतिपक्षी को धोखे में डालने मात्र के लिए यह सब केवल पैंतरा बदलने मात्र की चालाकी है। हमारे सामने एक वास्तविक खतरा है। मोर्चे बदल सकते हैं पर अपनी परीक्षा की स्थिति जारी ही रहेगी। सामयिक समझौते का कोई मार्ग निकला भी तो उससे स्थिरता और भी नहीं होगी। उफनता हुआ पानी दूसरे रास्ते से कूदेगा। हममें से किसी को भी भूल में न आना चाहिये कि इस जमाने में गोली चलाना न चलाना कोई विशेष महत्व नहीं रखता। भय और आतंक उत्पन्न करके कूटनीति से लड़ाई भी लड़ी जाती है जिसे ‘शीत युद्ध’ कहते हैं। शीत युद्ध इस युग की राजनैतिक धूर्तता की एक नई देन है। गोली बन्द रहते हुए भी शीत युद्ध चलता रह सकता है और उससे भी वैसे ही भयंकर परिणाम होते रहते हैं, जैसे मार काट वाले गरम युद्ध के होते हैं।
हो सकता है कि गरम युद्ध शीत युद्ध में बदल जाय। पर यह निश्चित है कि चीन के इरादे हमारी सभ्यता और स्वतंत्रता को नष्ट करने के हैं। गोली चलाना भले ही उसने अपनी आवश्यकता के अनुसार बन्द किया हो पर भारतीय जनता को आतंकित करके अपने झंडे के नीचे ले आने की चाल और भी उग्र होती जा रही है। इसलिए हमें न तो बेखबर रहना चाहिए और न निश्चिन्त। आज का शीत युद्ध कल गरम युद्ध बन सकता है। आक्रमण- कारी को जब भी अपनी सुविधा दीखेगी तभी वह फिर पहले की तरह गोली बरसाने लग सकता है। दूसरे देशों के कंधे पर अपनी बंदूक रखकर दूसरे बहाने से आक्रमण के दृश्य उपस्थित कर सकता है। हमारी बेकसी और निश्चिन्तता देखकर तो उसकी हिम्मत और भी बढ़ सकती है। इससे आक्रमण की घड़ी और भी जल्दी हो सकती है। इसलिए हम में से हर एक को यही सोचना होगा कि लड़ाई चल रही है। हमारी प्रतिष्ठा और स्वाधीनता अभी भी दाँव पर लगी हुई है। हमारी मातृभूमि का हड़पा हुआ भाग जब तक वापिस नहीं मिल जाता तब तक किसी स्वाभिमानी भारतीय के लिए चैन से बैठने की, बेखबर रहने की, उपेक्षा करने की बात सोचना आत्मघातक ही होगा।
लम्बी तैयारी की आवश्यकता—
पिछले अंक में कहा गया था कि अभी साढ़े आठ वर्ष हमें इसी तरह की स्थिति में रहना होगा। हमारे राजनैतिक नेता भी यही कहते और सोचते हैं। पाकिस्तान की गतिविधियाँ जो इन दिनों चल रही हैं बहुत ही ध्यान देने योग्य हैं। अगले वर्ष काफी उथल पुथल का है। समय का तकाजा यह है कि बिना एक क्षण भी बर्बाद किए हमें शक्ति संचय में पूरी तत्परता और सतर्कता से संलग्न रहना चाहिए। हो सकता है कि गोली चलना देर तक रुका रहे और यदि समय रहते हम चेत गये और शत्रु के दाँत तोड़ने लायक आवश्यक शक्ति जुटा सके तो यह भी हो सकता है कि दूसरा आक्रमण करने से पूर्व शत्रु को कुछ अधिक सोचना और अधिक ठहरना पड़े। ऐसी स्थिति पैदा करना न करना हमारे हाथ की बात है। अपनी दुर्बलताओं को हटाने से लापरवाही करके और भी प्रचंड आक्रमण को आमंत्रित करना या शक्ति संचय में जुट कर उसकी संभावना तक को समाप्त कर देना बिलकुल हमारे अपने हाथ की बात है।
हमारी सीमा , स्वाधीनता, प्रतिष्ठा और सभ्यता पर जो आक्रमण हुआ है उससे प्रत्येक देशभक्त भारतीय का तिलमिला जाना स्वाभाविक है। ऐसे अवसरों पर भी जिसे आवेश नहीं आता और इतनी चोट लगाने पर भी प्रतिरोध के लिए कुछ करने की बात जो नहीं सोचता उसे जीवित-मुर्दा एवं भावना हीन पाषाण ही कहा जायगा। ऐसे धरती के ऊपर माता के कपूत होंगे तो सही, पर संभवतः उनकी संख्या देश में कम ही होगी। जिनमें देशभक्ति की भावना मौजूद है उनमें से प्रत्येक का कर्तव्य है कि राष्ट्रीय अग्नि परीक्षा की घड़ी में कुछ सोचें, और कुछ करें।
हम भी कुछ न कुछ तो करें ही—
हर व्यक्ति अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार इस धर्म युद्ध में, इस जन युद्ध में कुछ न कुछ आहुति दे सकते हैं। अंधे, कोढ़ी, अपंग, निर्धन तक उत्साहपूर्ण त्याग कर रहे हैं तो जिनके पास कुछ साधन हैं। वे तो बहुत कुछ कर सकते हैं। गत दिसम्बर और जनवरी के अंकों में हम इस संबंध में बहुत कुछ कह चुके हैं। धन, स्वर्ण, रक्त देने, सेना से भर्ती होने, नागरिक सुरक्षा सेना में भाग लेने, खेतों और कारखानों में अधिक काम करके उत्पादन बढ़ाने जैसे अनेकों कार्य सामने उपस्थित हैं, जिनमें हर कोई अपनी शक्ति, सामर्थ्य और स्थिति के अनुसार कुछ न कुछ कर ही सकता है।
अखंडज्योति परिवार के सब लोग हर 20 तारीख को रक्षा दिवस मनाया करें, सामूहिक प्रार्थना किया करें, रक्षा प्रयत्नों में सहयोग के लिए एक महीने का कार्यक्रम उस दिन बनाया करें, यह कहा जा चुका है। सप्ताह में एक समय उपवास रख कर अन्न बचाने और इस प्रकार प्रति सप्ताह चार आने, महीने में एक रुपया बचा कर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कोश’, ‘नई दिल्ली’ के पते पर भेजने के लिए जोरदार अपील की गई है। प्रसन्नता की बात है कि प्राप्त सूचनाओं के अनुसार अधिकाँश परिजन इस प्रक्रिया को उत्साह पूर्वक अपनाने लगे हैं। उपासना में प्रति दिन एक माता गायत्री मंत्र को सुरक्षा के लिए अतिरिक्त रूप से बढ़ा देने वाली बात तो प्रायः सभी पाठकों ने कार्यान्वित करनी और कर दी है, यह हर्ष और संतोष की बात है। पर यह याद रखना चाहिए कि यह सामयिक और बाह्य प्रयत्न मात्र स्थिर शक्ति का संचय करने के लिए हमें अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी अपनाने होंगे। राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए हमें और भी बहुत कुछ करना होगा।
सामयिक और स्थिर प्रयत्न—
सुरक्षा का प्रश्न आवश्यक है, सामयिक आवश्यकता की दृष्टि से तो वही सबसे महत्वपूर्ण है। उन्हें तत्काल पूरा करने में संलग्न रहते हुए भी हमें यह न भूल जाना चाहिए कि ठोस शक्ति ही सुरक्षा की स्थिर गारन्टी है। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक और नैतिक कर्म से शक्तिशाली नागरिकों के द्वारा ही कोई राष्ट्र शक्तिशाली बनता है। देश और कुछ नहीं उसके निवासियों का समूह ही तो समाज या राष्ट्र कहलाता है। नागरिक जिस स्तर के होंगे उसी स्तर की राष्ट्रीय शक्ति रहेगी। शक्ति का स्रोत जनता ही तो है। जन मानस में जितनी दुर्बलता या सशक्तता रहेगी उसी के अनुसार उसकी प्रगति होगी, वैसी ही सुख शान्ति रहेगी और उसी के अनुसार सुरक्षा सम्भव होगी। हमें जन मानस में रहने वाली शक्ति को समझना होगा, उसे जगाना और उठाना होगा। तभी हम शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में खड़े हो सकेंगे और तभी हमारे शत्रुओं को अपने कुचक्र छोड़ने के लिए विवश होना पड़ेगा।
सृष्टि के आरंभ की बात है पुलस्ति के पुत्र विश्रवा के एक ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ जो बहुत ही कुरूप और बेडौल था। हाथ तो उसके बहुत ही छोटे थे। उसे देखकर घर के सभी लोग खिन्न हुए और उसका नाम कुबेर-अर्थात् कुरूप रख दिया। बालक कुबेर जब बड़ा हुआ तो दूसरों द्वारा अपना उपहास उड़ाये जाते देख कर उसे लोगों की मूर्खता पर बड़ा क्षोभ हुआ। रूप को गुणों से अधिक महत्त्व दिया जाय यह बात उसे सहन नहीं हुई। कुबेर ने अपने पुरुषार्थ से अपनी योग्यता को बढ़ाने का निश्चय किया और कठोर तप करने लगा। बालक की ऐसी लगन देख कर घर के वे लोग भी द्रवित हो गये जो पहले उसका उपहास करते थे। बाबा पुलस्ति और पिता विश्रवा भी कुबेर की पुरुषार्थ साधना में सम्मिलित हो गये और तीनों का सम्मिलित प्रयत्न कुछ ही दिनों में आशाजनक रीति से सफल हुआ। देवताओं को प्रसन्न करके कुबेर धनाधीश और लोकपाल बन गये। और अलकापुरी में राज करने लगे।
जो लोग आरम्भ में कुबेर की कुरूपता देख कर उसका उपहास करते थे, उन्हें समृद्ध धनाधीश कुबेर के पुरुषार्थ के सामने नतमस्तक होना पड़ा। सबने स्वीकार किया कि रूप की अपेक्षा गुणों का महत्व अत्यधिक है।
सुरक्षा के लिए प्रगति की नितान्त आवश्यकता है। यह प्रगति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होनी चाहिए। शरीर, मन, धन, संगठन, शस्त्र, शिक्षण, आचरण आदि सभी क्षेत्रों में हमें आज की अपेक्षा कल अधिक प्रगतिशील और सशक्त बनना होगा। हम आज जिस स्थिति में हैं—जिस स्तर पर हैं उसे देखते हुए शत्रुओं को हमारी दुर्बलता भाँपने का अवसर मिलता है और वे भेड़िये की तरह ललचाई आँखों से हमारी ओर देखते हैं। शक्ति का सर्वतोमुखी आह्वान करने के लिए हमें तत्पर होना पड़ेगा। काल-पुरुष ने जिस अग्नि-परीक्षा में हमें डाला है उसमें होकर ठीक तरह से पार होने के लिए हमें अपने को सुधारना, सम्भालना और बदलना पड़ेगा।
भावना की जागृति—
सबसे प्रथम और सबसे आवश्यक कार्य है- भावनाओं का जागरण। सदियों की गुलामी के वातावरण में रहते हुए हमने बहुत कुछ खोया। उनमें से एक वस्तु भावनाओं की तेजस्विता को भी खोया है। यों पिछले स्वाधीनता संग्राम में और आज के ऐसे प्रयत्नों में जनता ने जो योगदान दिया है, जिस त्यागा और बलिदान का परिचय मिला है वह प्रशंसनीय है और आशा जनक भी। पर उतने से ही सन्तुष्ट नहीं रहा जा सकता। भारत माता के प्रत्येक सपूत का अन्तःकरण उन उच्च भावनाओं से तरंगित होना चाहिये जो हमारे प्राचीन आदर्श और गौरव के अनुरूप हैं। देशभक्ति, मानवता और आदर्शवाद के लिए बहुत कुछ करने की उत्कट अभिलाषा जब तक जन मानस में जागृत न होगी तब तक सुरक्षा और प्राप्ति का लक्ष कछुए की चाल से ही अग्रगामी होगा, उतने मात्र से सामने उपस्थित ज्वलन्त समस्याओं का समाधान समय रहते न हो सकेगा।
प्रखरता और तेजस्विता चाहिये—
राष्ट्रीय सशक्तता के लिए जिन साधनों की आवश्यकता है यदि हमारी भावना प्रखर हो उठे तो वे बात की बात में इकट्ठे हो सकते हैं। इस प्रखरता के अभाव में रो धो कर काम होगा तो सही पर उसमें तेजस्विता न रहेगी। आज सुरक्षा के लिए धन की आवश्यकता है। चालीस करोड़ देशवासी यदि प्रति सप्ताह एक समय का भोजन त्याग कर चार आने भी बचा लें और उस बचत को सुरक्षा कोष में जमा कर दें तो महीने की चार चवन्नियों का एक रुपया होता है। चवालीस करोड़ रुपया प्रतिमास सहज ही जमा हो सकता है। सप्ताह में एक टाइम का उपवास करना ना तो कुछ कठिन है और न हानिकारक। विदेशी से अनाज मंगाने में जो विपुल धन राशि खर्च करनी पड़ती है वह बच सकती है स्वास्थ्य समस्या सहज ही हल हो सकती है। स्वास्थ्य पर इस उपवास का अच्छा असर पड़ सकता है। उससे आध्यात्मिक लाभ भी होता ही है। भावना प्रखर हो तो इतना सा त्याग किसी को कुछ भी भारी नहीं पड़ेगा और हर महीने 44 करोड़ रुपया सहज ही प्राप्त होते रहेंगे। पर हम अखबारों पर नजर डालते हैं तो मन हर्ष और विषाद के झोंके खाने लगता है। हर्ष इस बात का कि असंख्यों निर्धनों और कठिनाइयों में रहने वाले लोगों ने भी अपना सर्वस्व देकर कितनी बड़ी देशभक्ति का परिचय दिया। विषाद इस बात का कि करीब 4 महीने लड़ाई चलते हो गये, कोष में 44 करोड़ रुपये भी अभी जमा नहीं हो पाये। हर व्यक्ति पीछे एक रुपया का औसत भी नहीं आया। इसका कारण लोगों की गरीबी नहीं भावना की कमी है। सोना कुछ खाने पीने की या किसी खास जरूरत को पूरा करने वाली चीज नहीं है। उसे लोग शृंगार के लिए ही पहनते हैं। ईर्ष्या, रखवाली, घिसट, टूट फूट, ब्याज न मिलना आदि कितने ही दोष भी उसके संग्रह में हैं। उसे यदि राष्ट्रीय सम्मान और सुरक्षा की आवश्यकता से अधिक महत्वपूर्ण हम न समझते तो अरबों रुपयों का सोना सरकार के पास होता और उसके बदले में मशीनें विदेश से मँगा ली गईं होती जो हथियार बनाने की आवश्यकता पूरा करतीं। लोगों की कंजूसी, संकीर्णता और स्वार्थपरता सोने को छिपाने में सहायक हो रही है और हमारे कर्णधार चिन्ताग्रस्त बैठे हैं। यदि हमारी देशभक्ति इस अवसर पर भामाशाह की भावनाओं की तरह उमड़ पड़ी होती तो आज दूसरे ही दृश्य सामने होते। हमें विदेशों की सहायता माँगनी नहीं पड़ती वरन् दूसरों को देने की स्थिति होती।
मरने से डरना क्या ?—
हर साल करोड़ों आदमी मौत बीमारी में सड़-सड़ कर मरते हैं। उनमें से लाखों नौजवान भी होते हैँ। मौत मनुष्य जीवन की एक बिलकुल स्वाभाविक स्थिति है और किसी के लिए भी, कभी भी आ सकती है। जिस तरह छींक कभी भी आ सकती है और उसे कोई रोक नहीं, इसी प्रकार मौत का भी क्या ठिकाना? कर्त्तव्य पालन करते हुए मौत मिलना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सफलता और सार्थकता मानी गई है। यदि यह भावना भारत के बच्चे-बच्चे में भर जाय तो युद्ध मोर्चे पर हम टिड्डी दलों की तरह पहुँचें और आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था के मोर्चे पर भी कोटि-कोटि नागरिक सेना उमड़ती हुई दृष्टिगोचर होने लगे। धर्मयुद्ध में जूझने वाले शिवाजी, प्रताप, लक्ष्मीबाई, भगतसिंह आदि का जयघोष करते समय जो उत्साह हमारे चेहरे पर आता है, यदि उसकी मात्रा थोड़ी और भर जाय तो हम स्वयं भी आज अनायास ही सामने आये हुए ठीक वैसे ही अवसर पर स्वयं को भी उन्हीं की पंक्ति में खड़ा कर सकते हैं। जरूरत केवल भावना की है। भावना नहीं तो मौत के डर से कायर और कातर की तरह अपनी ही बचत की बात सोची जायगी। ऐसे लोग स्वयं भी मरते हैं और साथ में राष्ट्र की सुरक्षा को भी ले डूबते हैं।
सुरक्षा प्रयत्नों में उतनी सहायक कोई साधन सामग्री नहीं हो सकती जितनी देशभक्ति और त्याग बलिदान की भावना। इस भावना का जागरण यदि परिपूर्ण मात्रा में हो सके तो 44 करोड़ लौह स्तम्भों का बना हमारा राष्ट्र-दुर्ग युग युगों तक अभेद्य ही रहेगा, कोई उसकी ओर आँख उठाकर भी न देख सकेगा। यदि हम अपना सर्वस्व मातृ-भूमि की बलिवेदी पर चढ़ाने के लिये उद्यत हों तो इतनी सम्पदा और साधन सामग्री आज हमारी अपनी ही इकट्ठी हो जायगी कि विदेशी सहायता की बात सोचना भी व्यर्थ प्रतीत होगा। भावना स्तर यदि प्रसुप्त पड़ा रहे, लोग देशभक्ति की बात एक फैशन या प्रदर्शन की तरह ही कहें और आचरण में स्वार्थ परता एवं कंजूसी को ही गले लगाते रहें तो हम कमजोर ही रहेंगे, वह कमजोरी प्रगति और सुरक्षा के दोनों मोर्चों को कमजोर बनाये रहेगी।
जन सहयोग की आवश्यकता—
प्रगति के मोर्चे पर अगणित रचनात्मक काम किये जाते हैं। वह सब सरकार नहीं कर सकती। सरकार करेगी तो टैक्स ही वसूल करके करेगी, उसमें जनता की विवशता रहेगी देशभक्ति नहीं। ऐसे रचनात्मक कार्य होते तो हैं और उन पर सरकारी कर्मचारी और सरकारी साधनों से प्रगति के लिये बहुत कुछ किया जा रहा है, पर उसमें वह सजीवता दृष्टिगोचर नहीं होती जो त्याग और बलिदान की भावना में ओतप्रोत उत्साह के वातावरण में जनता या जन सेवकों द्वारा कुछ किये जाने पर दीखती है। श्रमदान विनिर्मित छोटे-छोटे बाँध, रास्ते, पुल और स्कूल अपने में एक गौरव, गर्व, आदर्श और प्रेरणा का प्रकाश भरे रहते हैं। उन्हें देखते ही उत्साह और आशा की लहर दौड़ती है। दूसरों में वैसा ही अनुकरण करने की इच्छा जगती है। सच्ची प्रगति ऐसे ही उत्साहपूर्वक, भावनामय वातावरण में प्रस्तुत किये गये कार्यों पर निर्भर रहती है। सरकार द्वारा किये गये प्रयत्नों से काम तो चल जाता है पर त्याग और वातावरण का पुट रहने वाले कार्यों की बात ही कुछ दूसरी होती है।
वह चीन जो कल तक अफीम की पिनक में पड़ा हुआ संसार की गई गुजरी स्थिति के देशों में गिना जाता था आज भारत जैसे महान देश पर आक्रमण करने की शक्ति इकट्ठी कर सकता है। उसकी इस सफलता का श्रेय जन भावनाओं के जागरण में ही सम्मिलित है। चीन ने अपनी नदी बाढ़ समस्या को जिस अच्छे ढंग से सुलझाया उसका अध्ययन करने के लिए भारत सरकार ने सन् 1954 में एक शिष्ट मण्डल वहाँ भेजा था। उस शिष्ट मण्डल ने लौट कर जो रिपोर्ट दी उसमें कहा गया था कि “चीन ने नदियों की बाढ़ का प्रश्न हल करने के लिए बड़ी-बड़ी नहरें बनाई हैं। उसकी उत्तरी सिक्याँग की नहर सबसे बड़ी और लम्बी है जो 40 लाख एकड़ जमीन खींचती है और जहाज रानी का काम भी देती है। इसका निर्माण कार्य उच्च कोटि का हुआ है। उसके तल की चौड़ाई 420 फुट और लम्बाई 100 मील है। इसके बनाने में 247 करोड़ घन फुट मिट्टी खोदी गई। यह पूरी नहर केवल 80 दिन में बन कर तैयार हो गई। इस नहर को खोदने का सम्पूर्ण कार्य बिना मशीनों की सहायता के केवल जन शक्ति द्वारा ही सम्पन्न हुआ। याँग्सी नदी पर बना विशाल बाँध 75 दिन में और हुवाई नदी का बाँध 150 दिन में बना जब कि इसके लिए बालू पत्थर आदि 45 से 150 मील तक से लाना पड़ा।”
जो कार्य बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाने, बहुत समय और धन लगाने पर भी ठीक तरह नहीं हो सकते वे भावनाएँ जागृत होने पर जन शक्ति के सहयोग से सहज ही पूरे हो सकते हैं। भावनाओं का जागरण ही राष्ट्र का वास्तविक जागरण है। जब तक जनमानस में कर्तव्य बुद्धि और सामूहिकता के प्रति निष्ठा न होगी तब तक अन्य प्रयत्न उतने उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकते।
जन भावनाओं के अभाव में हम प्रदर्शनात्मक और प्रचारात्मक तो बहुत कुछ कर सकते हैं पर
न जातु कामः कामानामुपभोगे-शाम्यति।
हविष कृष्णावर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते॥
विषयों की लालसा भोगों के भोगने से शाँत नहीं होती। घृत की आहुति डालने से अग्नि शान्त नहीं हो सकती वरन् उत्तरोत्तर और भी प्रचण्ड होती है।
ठोस काम तभी होता है जब उसे करने वाले की भावनाएँ सच्चे मन से कार्य करती हैं।
हमारी समस्त दुर्बलताएँ तभी समाप्त होती है जब अन्तःकरण जगेगा। उस जागरण के साथ ही हमारा सर्वतोमुखी जागरण होगा। इस जागृति की स्थिति में कोई चोर हमारे घर में एक कदम भी रखने का साहस न करेगा, कोई लुटेरा लूट करने के मनसूबे न बाँध सकेगा। सुरक्षा के लिए जागरण आवश्यक है। राष्ट्रीय जागरण का अर्थ है—जन भावनाओं की प्रखरता, तेजस्विता और जागृति।
एक बार कस्तूरबा बीमार थीं। उनकी बीमारी के निवारण के लिए गाँधी जी ने उन्हें नमक छोड़ने को कही। कस्तूरबा इस बात पर झल्ला उठीं, बोली ‘कभी नमक भी छोड़ा जा सकता है। आप तो विचित्र विचित्र बात कह देते हैं।”
इस पर महात्मा गाँधी ने नमक छोड़ने का व्रत ही ले लिया। कस्तूरबा को अपनी हार माननी पड़ी।
राष्ट्र को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के लिए आदर्शवाद, नैतिकता, मानवता, परमार्थ, देशभक्ति एवं समाजनिष्ठा की भावनाओं की जागृति नितान्त आवश्यक है। इसके अभाव में अन्य साधन सामग्री चाहे कितने ही विपुल परिमाण में उपलब्ध क्यों न हो हमारी आन्तरिक दुर्बलता को दूर न कर सकेगी। आदर्शहीन, कपटी, दुष्ट, दुराचारी, कायर और स्वार्थी, लोगों के हाथ में साधन, सामग्री लग जाय तो इसके आधार पर उनकी बुराई ही अधिक बढ़ती है और उससे अहित ही अधिक होता है। इसलिए सुरक्षा और प्रगति के साधन जुटाते हुए इस बात का भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि अन्तःकरण में सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की भी अभिवृद्धि निरंतर होती रहे।
धैर्य और साहस का मूल्य तोप और तलवार से बढ़कर है। देशभक्ति और बलिदान की भावना से ओत-प्रोत नागरिक टैंकों और जहाजों से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं! इसके विपरीत कंजूस, मुनाफाखोर, जखीरेबाज, कायर , डरपोक, देशद्रोही, उत्पाती, अपराधी वृत्ति के लोग राष्ट्रीय संकट के समय शत्रु के बमों से अधिक हानिकारक और भयावह सिद्ध होते हैं। आस्तीन में छिपा बैठा हुआ छोटा-सा संपोला, जंगल में रहने वाले भयंकर विषधर से अधिक घातक होता है। जनता की मानसिक कमजोरी हथियारों की कमजोरी की अपेक्षा अधिक दुष्परिणाम प्रस्तुत करती है।
शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय क्षेत्रों में अनेक प्रकार की समस्याएँ और उलझनें आज अपने चारों ओर बिखरी हुई हमें दीखती हैं। इन सब का हल एक ही है, आन्तरिक संकीर्णता और दुर्बलता को मिटाना। बौद्धिक क्रान्ति ही समस्त क्रान्तियों की जननी है। विचार बदलते ही सारी परिस्थितियाँ बदल जाती हैं।
शारीरिक कमजोरी और बीमारी को दूर करने के लिए तात्कालिक रूप से कोई दवा-दारु, इलाज, उपचार कारगर हो सकता है, पर यदि स्थिर स्वास्थ्य पर चाहते हैं तो आहार विहार पर कठोर नियंत्रण रखे बिना काम नहीं चलेगा। मन की लिप्सा ही इन्द्रियों को ढीला छोड़ती है। यदि स्वभाव में संयम और नियमितता का समुचित समावेश हो जाय तो रोग मुक्त रहते हुए दीर्घजीवन का आनन्द लाभ किया जा सकता है। स्वास्थ्य के लिए किए जाने वाले बाहरी सारे प्रयत्न एक ओर रखे जायँ और मन का संयम एक ओर रहे तो संयम का ही पलड़ा भारी रहेगा।
बौद्धिक दृष्टि से अपने पिछड़ेपन का कारण, ज्ञान के महत्व को ठीक तरह न समझ पाना ही होता है। लोग स्वास्थ्य को बेकार समझते हैं, विद्याध्ययन का उद्देश्य नौकरी प्राप्त करना या प्रमाणपत्र लेना मात्र मानते हैं। यदि ज्ञान, संयम को आत्मा की भूख बुझाने वाला आवश्यक आहार मान लिया जाय तो मनुष्य अन्य आवश्यक कार्यों की तरह अध्ययन के लिए भी नित्य समय निकलता रहे। यह बात यदि आदत में सम्मिलित हो जाय तो विषम परिस्थितियों में रहते हुए भी ज्ञानोपार्जन की सुविधा मिलती रहती है और हर कोई अपनी मनोभूमि को उच्च भूमिका में विकसित कर सकता है। ज्ञान संसार का सर्वश्रेष्ठ धन है। जितनी दिलचस्पी धन उपार्जन में रहती है यदि उतनी ही अभिरुचि ज्ञान संचय में उत्पन्न हो जाय तो हमें सुसंस्कृत एवं प्रबुद्ध कहलाने की स्थिति प्राप्त होने में कोई कठिनाई न रहेगी।
स्वभाव और विचार सुधरें—
आर्थिक कठिनाइयों के बाहरी अनेक कारण भी होते हैं। कई बार मजबूरियाँ भी परेशानी का कारण होती हैं। पर आम तौर से आलस, पूरा मनोयोग न लगाना समय की बर्बादी और अपनी स्थिति से अधिक खर्च करने लगना ही अर्थ संकट का प्रधान हेतु पाया जाता है। जो लोग उपार्जन के लिए तत्परतापूर्वक श्रम करते हैं वे कम आमदनी होते हुए भी आनन्द से गुजारा करते हैं। इसके विपरीत जिन्हें फिजूलखर्ची की आदत है, और जो आवश्यक सतर्कता नहीं बरतते वे अधिक कमाने पर भी ऋणी और चिन्ताग्रस्त बने रहते हैं। आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए बाह्य साधनों की जितनी आवश्यकता है उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अपना मन काबू में रहे। वे दुर्गुण और व्यसन आदत में शामिल न होने पायें जो अर्थ-संकट उत्पन्न होने के प्रमुख कारण होते हैं।
सामाजिक क्षेत्र में लोगों के साथ अच्छे सम्बंध न होने, द्वेष, मनोमालिन्य और असहयोग रहने का केवल यही कारण नहीं है कि लोग बुरे हैं, जमाना खराब है। ऐसा होता तो सभी के साथ सभी का दुर्व्यवहार ही रहता। पर देखा यह भी जाता है कि अनेकों को अगणित मित्र, सहयोगी और प्रशंसक घेरे रहते हैं। परस्पर सहायता भी करते हैं और सहयोग पूर्वक आनन्द एवं उत्कर्ष से लाभान्वित होते हैं। यदि जमाना ही बुरा है तो वह सबके लिए बुरा होना चाहिए था। वस्तु स्थिति यह है कि हमारे अपने खोट और दोष ही मनोमालिन्य पैदा करते हैं।
अपने स्वभाव की खराबियाँ साधारणतः समझ में नहीं आतीं पर यदि अधिक ध्यानपूर्वक उन्हें ढूंढ़ा, खोजा जाय तो वे त्रुटियाँ पकड़ में आ सकती हैं जिनके कारण द्वेष, उपेक्षा और असहयोग का वातावरण उत्पन्न होता है। अपने स्वभाव को मधुर, आकर्षक, शिष्ट और उदार बना कर अपने सहयोगियों, प्रशंसकों और मित्रों की संख्या में आशातीत वृद्धि हो सकती है। भविष्य को उज्ज्वल बनाने में, प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने में, सन्मित्रों का भारी हाथ होता है और वे उन्हें ही मिलते हैं जिनने अपने स्वभाव में आवश्यक सुधार कर लिया है। क्रोधी, चिड़चिड़े, ईर्ष्यालु, निन्दक, स्वार्थी, छिद्रान्वेषी, एकाकी, डरपोक प्रकृति के लोगों को तो मित्रों से वंचित ही रहना पड़ता है।
कुरीतियों का उन्मूलन—
हमारी सामाजिक कुरीतियाँ आजकल आर्थिक कमर तोड़ डालने वाली और भारी परेशानी, उत्पन्न करने का माध्यम बनी हुई हैं। इन मूर्खताओं की जड़ हमारी मानसिक कमजोरी में गड़ी रहती है। विवाह शादियों में होली की तरह गाढ़ी कमाई के पैसे स्वाहा किये जाते हैं। इसमें केवल एक अन्धपरम्परा और मरणोन्मुख रिवाज ही कारण बनी हुई है।
समाज सुधार की अगणित समस्याओं का हल, भावना की जागृति पर ही संभव है। बाल विवाह के विरुद्ध कानून मौजूद है पर भारी संख्या में बाल-विवाह हर साल खुले आम होते हैं। दहेज के विरुद्ध कानून मौजूद है पर इतना लम्बा समय बीत जाने पर भी न तो दहेज विरोधी कोई मुकदमा सफल हुआ और न वह कुकर्म रुका। अस्पृश्यता विरोधी कानून के अनुसार छूतछात को दंडनीय अपराध मान गया पर वह बुराई अभी भी चिन्ताजनक रूप में विद्यमान है। जब हत्या, चोरी, डकैती या बलात्कार सरीखे कड़ी सजा वाले अपराधों को पूर्ण रूपेण कानून नहीं रोक पा रहा है तो फिर सामाजिक कुरीतियों को मिटाने वाले कमजोर कानून किस हद तक सफल होंगे यह विचारणीय है। वस्तुतः इस प्रकार के सुधार जन भावना की जागृति पर ही निर्भर हैं। कुरीतियों के विरुद्ध यदि मानस प्रखर हो उठे तो उनका दस दिन ठहर सकना भी संभव न रहे।
अधः पतन का मार्ग—
आत्मिक और चारित्रिक क्षेत्र में आज चोरी, बेईमानी, ठगी और दंभ की जो प्रवृत्तियाँ चल रही हैं वे न व्यक्ति के लिए लाभदायक हैं न समाज के लिए। इनसे अपराध बढ़ते हैं, अशान्ति और अव्यवस्था फैलती है। सरकार का काम और खर्च बढ़ता है जो जनता से ही टैक्स के रूप में वसूल होता है। अपराधी को भी इसमें स्थायी लाभ नहीं। धोखा देकर थोड़े दिन थोड़ा लाभ कमाया जाता है, उसके बदले में सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल जाती है और वह अविश्वासी आदमी उपेक्षित एवं घृणास्पद बन कर दरिद्रता, असफलता और परेशानी में फँसा रहता है। इसके विपरीत यदि ईमानदारी और सचाई की नीति पर दृढ़ता से अड़ा रहा जाय तो आरंभ में थोड़े दिन कठिनाई भले ही रहे पर जब लोग उसे परख लेते हैं तो जी−जान निछावर करने को तैयार हो जाते हैं। सज्जन व्यक्ति प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है, घाटे में भी नहीं रहता और शक्ति भी प्राप्त करता है। लोक और परलोक दोनों ही उज्ज्वल बनते हैं।
बेईमान इंजीनियर चाहे कितना ही सुयोग्य क्यों न हो रिश्वत लेने पर उतारू रहे तो उसके द्वारा बनवाये हुए काम, नासमझ लोगों द्वारा ईमानदारी के साथ बनाये हुए कामों से भी खराब सिद्ध होगा बेईमान व्यापारी निकम्मी मिलावटी, नाप तोल में कम, महंगी वस्तुएँ बेच कर जनता का अहित करेगा। रिश्वतखोर राज कर्मचारी शासन को नष्ट करते हैं और जनता में असंतोष फैलाते हैं। कोई कितना ही सुशिक्षित समुन्नत या समृद्ध, न हो यदि ईमानदार नहीं है तो उसके द्वारा सबका अहित ही होगा। दुराचारी पुरोहितों द्वारा धर्म की हानि ही होती है। कायर सैनिक शत्रु का ही मनोरथ पूर्ण करते हैं। कामचोर मजदूर उत्पादन और अच्छाई का स्तर घटा कर राष्ट्रीय समृद्धि को क्षति ही पहुँचाते हैं। किसी भी क्षेत्र में लीजिए यदि उसके कार्यकर्ता बेईमानी और अनीति को अपनाये होंगे तो उनकी बाहरी दौड़−धूप व्यर्थ सिद्ध होगी, उनके कार्यों का परिणाम अन्ततः दुखद और घातक ही होगा। बेईमान नेता अपने नेतृत्व की रक्षा के लिए देश को रसातल पहुँचा देने वाली करतूतें करते हुए संकोच नहीं करते।
इस बाधा को हटाया जाय—
प्रगति पथ की सब से बड़ी बाधा, बेईमानी, अनैतिकता स्वार्थपरता एवं संकीर्णता ही है। शारीरिक दुर्बलता, आन्तरिक अशान्ति, सामाजिक विद्वेष, आर्थिक कठिनाई की जड़ अनैतिकता है। अपराध, पतन, पाप, संघर्ष एवं संकट की बाढ़ का कारण केवल दुष्प्रवृत्तियाँ ही हैं। अगणित समस्याएं केवल इस एक ही विकृति के कारण उत्पन्न होती हैं और उनका समाधान भी इस एक समाधान के द्वारा ही हो जाता है। उत्कर्ष के लिए क्रान्तियाँ आवश्यक मानी जाती हैं। सबसे बड़ी-सब क्रान्तियों की जननी बौद्धिक एवं नैतिक क्रान्ति ही है। भावनाओं में परिवर्तन होते ही सब कुछ बदल जाता है।
हमारे सामने राष्ट्र की सुरक्षा का प्रश्न खड़ा हुआ है। उसे हल करने के लिए प्रगति और शक्ति चाहिए। इन दोनों का आधार है—भावनाओं का जागरण। साधन सामग्री भी बढ़नी चाहिए पर इसका सदुपयोग तो भावनाओं पर ही निर्भर है। सबल राष्ट्र की रचना के लिए उसके नागरिकों का सबल होना आवश्यक है। स्वास्थ्य, धन, विद्या, संगठन, शस्त्र आदि के माध्यम से राष्ट्र बलवान बनते हैं पर इनकी उपलब्धि के लिए प्रखर मनोबल अनिवार्य है। हम इस मूलभूत तथ्य की उपेक्षा न करें। जन-मानस की प्रसुप्त, उत्कृष्ट भावनाओं को जगाने का प्रयत्न करें तो उसके आधार पर जागृत हुई शक्ति हमारी ही नहीं सारी मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल कर सकती है। सुरक्षा समस्या को हल करना तो उस जन-जागृति के लिए नितान्त सरल और सहज है।
सुरक्षा का सशस्त्र मोर्चा सेना सम्भालती है और प्रगति का दूसरा मोर्चा प्रबुद्ध लोक सेवकों को सँभालना पड़ता है। प्रगति की सुरक्षा ही सबसे बड़ी गारंटी है। यदि जनता का मनोबल जागृत है और वह अपनी त्रुटियों का समाधान करती हुई प्रगति की दिशा में अग्रसर हो रही है तो यह विश्वास किया जा सकता है कि इसकी सुरक्षा सुस्थिर रहेगी, प्रतिष्ठा पर कोई आँच न आने पावेगी और सुख शान्ति की परिस्थितियाँ बढ़ेंगी। किन्तु यदि जन मानस का ढलाव पतनोन्मुख है, चरित्र मनोबल और प्रयत्न यदि शिथिल हो रहे हैं तो यही समझना चाहिये कि बाहर का शत्रु भले ही कोई न हो या कुछ बिगाड़ न सके या उसे शस्त्र बल से मार भगा दिया जाय पर भीतरी दुर्बलताएँ यदि बनी हुई हैं तो वे ही नाश का कारण बन जावेंगी।
अशान्ति और विनाश का कारण—
दुष्प्रवृत्तियाँ जहाँ कहीं भी रहती हैं वहीं अशाँति और विनाश का वातावरण उत्पन्न हो जाता है। श्रीकृष्ण जी का विशाल यदुकुल परस्पर ईर्ष्या-द्वेष में ही लड़ कट कर नष्ट हो गया था। मध्यकालीन सामन्तों और राजा रईसों की विलासिता ही उन्हें ले बैठी। आपसी फूट और सामाजिक कुरीतियों का दुष्परिणाम हम पिछले एक हजार वर्ष से बुरी तरह भुगतते आ रहे हैं। दूसरे को दोष देना व्यर्थ है, वास्तविक दोष तो हमारी दुर्बुद्धि और दुर्बलता का ही है। इतिहास से यदि हम कुछ सीख सकते हैं तो इतना सीख ही लेना चाहिये कि संगठित जागृत सच्चरित्र और प्रगतिशील जनता ही अपनी और अपने समाज की सुख शान्ति को सुरक्षित रख सकती है। हमें इस तथ्य पर हजार बार विचार करना चाहिये और जन मानस का स्तर ऊँचा उठाने के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए। कंधे पर इस अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के संदर्भ में कुछ विशेष उत्तरदायित्व आया है। युग निर्माण योजना के अंतर्गत हम सब इस प्रतिज्ञा में आबद्ध हैं कि जीवन का उपयोग केवल कमाने खाने तक ही सीमित न रखेंगे वरन् आत्म निर्माण और समाज-निर्माण की ओर भी समुचित ध्यान देंगे। यह भावना कागजी नहीं रहनी चाहिए। अपनी स्थिति, शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ प्रयत्न हर किसी के लिये संभव हो सकता है।
युग और कर्तव्य की पुकार—
अग्नि परीक्षा की इस महत्वपूर्ण वेला में भारत माता के सपूत अपने प्राण हथेली पर रखे देश की रक्षा के लिये खड़े हैं। कितने ही अपने प्राण विसर्जित कर चुके, कितने को ही करने हैं। कितने विकलांग और घायल पड़े हैं। यह राष्ट्र के प्रहरी हमें पूछते हैं कि “हम इतना कर रहे हैं, अपने हिस्से का कर्तव्य आप भी पूरा करते हैं या नहीं?” नीची आँखें करके लज्जा से सिर झुका कर भीरुता और हीनता की भाषा में नहीं, हमें उसका उत्तर प्रखर तेजस्विता के साथ देना चाहिये—आय सैन्य मोर्चे पर लड़ रहे हैं, आवश्यकता होने पर हम भी वहीं होंगे। जब तक वह अवसर नहीं आता तब तक राष्ट्र को सबल बनाने के लिये, दूसरी रक्षा पंक्ति मजबूत बनाने के लिए घर झोपड़ों में रहते हुए जो कुछ संभव है उसे हम भी कर रहे हैं।” यही उत्तर हमारे लिये उपयुक्त हो सकता है।
राम वनवास गये थे तो भरत ने अपना रहन-सहन वैसा ही बना लिया था और तपसी की भाँति राज-काज चलाते थे। हमें घर रहते हुए युद्ध सैनिकों की तरह ही सोचना और करना चाहिए। देश को सशक्त बनाने के लिए कुछ न कुछ करते रहने के लिए हमें कटिबद्ध हो ही जाना चाहिए।
एक कार्य जो हमें अब करना ही चाहिए वह है—रोजी-रोटी कमाने में चौबीसों घन्टे लगाने का विचार छोड़ देना चाहिए और सोचना चाहिए कि “जो केवल अपने लिए ही कमाता और आप ही खाता है वह शास्त्रों के अनुसार चोर है। हमें चोर नहीं बनना चाहिए।” जो लोकहित की बात सोचने के लिए-उस दिशा में कुछ करने के लिए-समय का सर्वथा अभाव बताता है उसे किन शब्दों में धिक्कारा जाय, यह समझ में नहीं आता। हम में से कोई इतना स्वार्थी और कंजूस नहीं जो यह कहे कि राष्ट्रीय निर्माण के लिए—युग निर्माण के लिए—मेरे पास बिलकुल भी समय नहीं है।
देश को सशक्त और प्रबुद्ध बनाने के लिए धन की नहीं—समय और मनोयोग की आवश्यकता है। भगवान ने 24 घन्टे का समय धन कमाने, और मौज-शौक करने और —संकीर्ण स्वार्थों में लगे रहने के लिए ही नहीं दिया है, उसमें से एक अंश परमार्थ कार्यों के लिए भी रहना चाहिए। आध्यात्मवाद की सुनिश्चित मान्यता यह है कि—”भजन की भाँति ही लोकहित के कार्यों में सेवा, प्रवृत्तियों में समय लगाया जाना आवश्यक है।” इसलिए परमार्थ कार्यों के लिए भजन के समान ही हमें श्रद्धान्वित होना चाहिए। उसके लिए हमारे दैनिक जीवन में कोई नियत स्थान होना ही चाहिए। समय-दान का कार्यक्रम हम उदारतापूर्वक चलाते रहें और उससे जीवन का एक आवश्यक धर्म-कर्तव्य मान कर कुछ न कुछ समय इसके लिए निर्धारित कर लें। निर्माण-श्रम, समय और मनोयोग लगाये बिना संभव नहीं होते। युग-निर्माण के लिए भी इन्हीं वस्तुओं की आवश्यकता है।
जन जागरण के लिए—
राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए अनेक माध्यम, साधनों और उपकरणों की आवश्यकता है, उसके प्रकार और कार्यक्रम भी कितने ही हैं। पर वह सब कुछ जिस आधार पर निर्भर है वह है—भावना। भावना के अभाव में प्रगति की सारी प्रक्रियाएँ निर्जीव और प्रदर्शन मात्र बनी रहती हैं। हमें जन मानस में कर्तव्य पालन की, नीति, धर्म और सदाचार की, आस्तिकता और परमार्थ की प्रचंड भावनाएँ उत्पन्न करनी चाहिएं। ज्ञान से कर्म और कर्म से समृद्धि की उपलब्धि होती है। जैसे विचार मन में उठेंगे शरीर से वैसे ही कर्म बन पड़ेंगे, और जैसे कर्म होंगे वैसा ही प्रतिफल सम्मुख उपस्थित होगा। इसलिए हमें ज्ञान का, भावना का, महत्व समझना चाहिए और उसके विकास का समुचित प्रयत्न करना चाहिए।
ज्ञानदान को सबसे बड़ा दान माना जाता है,उसे ही ब्रह्मदान कहते हैं। ब्राह्मण को इसीलिए ‘भूसुर’ पृथ्वी का देवता मानते हैं, कि उनके द्वारा जनसाधारण को सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है। विचारों की शक्ति प्रचंड है। यदि उत्तम विचारों को मनः क्षेत्र में समुचित स्थान मिल जाय तो साधारण स्थिति का मनुष्य महापुरुष, ऋषि, देवता और अवतार बन सकता है। संसार में जब कभी भले या बुरे परिवर्तन हुए हैं उनके मूल में विचार परिवर्तन की प्रक्रिया का ही प्रधान श्रेय रहा है। कार्लमार्क्स की साम्यवादी विचार धारा ने आज लगभग आधी दुनिया को उस विचार धारा से प्रभावित कर दिया है। ‘टाम काका की कुटिया’ पुस्तक की लेखिका ने अमेरिका में दास प्रथा के प्रश्न को लेकर गृहयुद्ध करा दिया और अन्त में उस घृणित प्रथा का अन्त ही होकर रहा। बुद्ध, महावीर, ईसा, मुहम्मद, गाँधी, दयानंद, की प्रखर विचार धाराओं का जब विस्तार हुआ तो उससे कितने लोग प्रभावित हुए? विचारधाराएँ तूफान की तरह होती हैं, मनुष्य उनके प्रवाह में सूखे पत्तों की तरह इधर-उधर उड़ते रहते हैं। हमें मनुष्य को मनुष्य बनाने की विचारधारा को जनमानस में गहराई तक प्रवेश करने का कार्य अपने हाथ में लेकर युग परिवर्तन की महान प्रक्रिया को सफल बनाना चाहिए।
नियमित समय दान—
शिक्षा और विद्या की उन्नति के लिए हम में से प्रत्येक को कुछ न कुछ समय नियमित रूप से देना ही चाहिए। अपने परिवार के कितने ही सदस्य अशिक्षित और अल्प शिक्षित होते हैं। उनकी साक्षरता बढ़ाने के लिए एक घण्टा घरेलू प्रौढ़ पाठशाला चलाई जा सकती है। पड़ौस में कितने ही निरक्षर लोग रहते हैं उन्हें भी पढ़ने की प्रेरणा देकर अपनी प्रौढ़ पाठशाला में सम्मिलित किया जा सकता है। इस प्रकार एक वर्ष में यदि पाँच निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाने की प्रतिज्ञा ली जा सके और यह उत्साह दूसरों में भी पैदा किया जा सके तो कुछ ही वर्षों में सारा देश साक्षर बन सकता है। जो कार्य सरकार करोड़ों रुपया खर्च करके भी नहीं कर सकती वह लोक सेवा की प्रवृत्ति को जागृत करके सहज ही पूरा हो सकता है।
गरीबी की तरह ही अशिक्षा भी दुर्बलता की निशानी है। अशिक्षा और गरीबी में अशिक्षा अधिक भयानक है क्योंकि इसी के कारण गरीबी, बीमारी, संकीर्णता आदि का जन्म होता है। यह कुछ भी मुश्किल काम नहीं, कि हम अपनी पत्नी, बहिन, माता, भाभी, चाची आदि को पढ़ाना शुरू करें, उन्हें साक्षर बनावें और इस पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें जीवन विद्या के, युग परिवर्तन विचार धारा के आवश्यक तथ्यों से भी परिचित कराते चलें। केवल इच्छा शक्ति की ही प्रधान कठिनाई है। यदि इसे दूर किया जा सके तो एक छोटी घरेलू पाठशाला चला सकना हम में से किसी के लिए संभव हो सकता है।
इसी प्रकार एक घरेलू पुस्तकालय, ज्ञान-मन्दिर भी आसानी से हर कोई चला सकता है। इसका आरम्भ अखण्ड ज्योति पत्रिका मात्र से ही हो सकता है। अपने घर का कोई भी साक्षर व्यक्ति ऐसा न बचे जो उसे आदि से अन्त तक न पढ़ता हो। इसी प्रकार पड़ौसी, मित्रों और समीपवर्ती विचारशील व्यक्तियों को अपने अंक पढ़ा देने और वापिस लेने का क्रम बनाना चाहिए। इस बहाने उनके घरों पर आने जाने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। इस बहाने संपर्क बढ़ाते हुए और प्रस्तुत अंक में छपे किन्हीं महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करते हुए सत्प्रवृत्तियों का, सद्भावनाओं का, प्रसार करना चाहिए।
विचार-विस्तार के माध्यम—
घरेलू प्रौढ़ पाठशाला और पुस्तकालय का कार्यक्रम अखण्डज्योति के प्रत्येक पाठक के लिए नितान्त सरल और सर्वथा संभव कार्य है। छुट्टी के दिन गोष्ठियाँ बुलाई जा सकती हैं। यदि लोग इकट्ठे न होते हों तो प्रति दिन एक-दो व्यक्तियों के घरों पर सद्विचार-प्रसार के उद्देश्य से जाकर धर्म फेरी की जा सकती है। इस प्रकार अपने संपर्क में आने वाले लोगों का एक छोटा विचार-परिवार बन सकता है। जैसे रानी मधुमक्खी छत्ता बनाती है और उस छत्ते में अनेकों अन्य मधु मक्खियाँ प्रश्रय पाती हैं उसी प्रकार ‘अखण्डज्योति’ का प्रत्येक सदस्य रानी मक्खी की तरह एक विचार-परिवार बनावे। उस परिवार में—पाठशाला और पुस्तकालय में कम से कम दस सदस्य तो होने ही चाहिएं। इस पद्धति को अपना कर हम लोग कुछ ही दिन में लाखों, करोड़ों, व्यक्तियों का प्रशिक्षण आरम्भ कर सकते हैं, और यह शिक्षा शृंखला यदि विधिवत् अग्रसर होती रहे तो साक्षरता और शिक्षा के साथ-साथ विचार परिवर्तन की, भावना जागरण की-युग- निर्माण की-समस्या सरलता पूर्वक हल हो सकती है।
देशव्यापी अगणित बुराइयों, दुर्बलताओं और कुरीतियों का उन्मूलन करने के लिए, मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने के लिए आगे चल कर हमें अनेकों विशाल कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे और जहाँ आवश्यक होगा वहाँ संघर्ष की भूमिका में भी उतरना पड़ेगा। पर सबसे पहला कार्य यह है कि लोग इस परिवर्तन की आवश्यकता समझें और उसके लिए आवश्यक त्याग करने की उद्यत हों। यह बौद्धिक पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए हमें आज ही प्रवृत्त हो जाना चाहिए। यह कार्य जितना सरल है उतना ही महत्वपूर्ण भी है। छोटे कार्य को आज आरम्भ करें, बड़े काम कल करने के लिए अपने आप ही सामने प्रस्तुत होंगे।
हमारा योगदान स्वल्प न रहे—
सुरक्षा और प्रगति के लिए हमें बहुत कुछ करना है। लोगों ने बहुत कुछ किया है और कर रहे हैं। हमें भी कुछ करने के लिए अग्रसर होना ही होगा। राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए हमारा योगदान कुछ भी नहीं रहा यह कहलाने का कलंक हम में से किसी को भी अपने सिर पर नहीं लेना चाहिए। सीमा का युद्ध मोर्चा जितना महत्वपूर्ण है उससे कम राष्ट्र की सफलता के प्रश्न को नहीं समझा जाना चाहिए। अखण्डज्योति परिवार इस दूसरे मोर्चे पर बलिदानी युद्ध सैनिकों की भाँति ही कटिबद्ध रहने की प्रतिज्ञा कर चुका है। आवश्यकता के समय रक्षा मंत्री द्वारा सौंपे गये किसी भी कार्य लिए कभी भी कहीं भी जाने की प्रतिज्ञा हम कर चुके हैं। ऐसे अवसर पर हमारे और भी अनेकों हमारे साथ रहेंगे ऐसा विश्वास है। जब तक समय नहीं आता तब तक हमें दूसरे मोर्चे पर राष्ट्र के विनम्र प्रहरी की तरह काम करना होगा। जन-भावनाओं के जागरण का कार्य नैतिकता, मानवता, कर्तव्य परायणता और देशभक्ति की प्रवृत्तियों, को अग्रगामी बनाने का कार्य हम तन्मयता पूर्वक कर रहे हैं। इस कार्य में प्रत्येक परिजन से सहयोग की हमें आशा है। पाठशाला, पुस्तकालय, गोष्ठी, और धर्म फेरी के माध्यम से सद्ज्ञान का प्रसार कर सकना प्रत्येक पाठक के लिये संभव है। अखण्डज्योति को पढ़ाने और सुनाने का कार्यक्रम अपना कर भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है।
नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति का कार्य सम्पन्न होने पर ही स्वतन्त्रता की सर्वांग पूर्ण झाँकी दृष्टिगोचर होगी। रामराज्य की—धर्मराज्य की स्थापना के लिए सरकारी प्रयत्नों में ही नहीं जन भावनाओं में भी परिवर्तन आवश्यक है। इस परिवर्तन के लिए ही अपना ‘युग परिवर्तन आन्दोलन’—युग निर्माण कार्यक्रम चल रहा है। इस ज्ञानयज्ञ में हम सबको श्रम रूपी घृत और समय रूपी साकल्य समर्पित करना ही चाहिए।
सिख सम्प्रदाय के चौथे गुरु श्री रामदास जी के अनेक शिष्य थे। सभी की अपनी-अपनी विशेषताएँ थीं। उनमें से एक शिष्य ऐसे थे जिनकी विशेषता श्रद्धा और आज्ञा पालन ही थी। इनका नाम था अर्जुनदेव।
अर्जुनदेव ने दीक्षा लेकर आश्रम में प्रवेश किया तो उन्हें बर्तन माँजने का काम सौंपा गया। वे शाम तक बर्तन माँजने में लगे रहते। अन्य शिष्य जब कि धर्म चर्चा और गुरु पूजा में लगते जब भी जा अर्जुनदेव अपने नियत कर्म के अतिरिक्त दूसरी बात न सोचते। बर्तन माँजना ही उनके लिए सब से बड़ी साधना बना हुआ था। गुरु ने यही तो आदेश उन्हें दिया था।
गुरु जी के अवसान का समय आया। सब शिष्य यह आशा लगाये हुए थे कि बढ़ी-चढ़ी योग्यता के कारण उन्हें ही उत्तराधिकार मिलेगा, वे गुरु की गद्दी पर बैठेंगे। गुरुदेव अपना घोषणापत्र लिख चुके थे। उनकी मृत्यु के बाद ही उसे खोला जाना था।
समय आया। गुरुदेव दिवंगत हुए। घोषणापत्र खुला। उसमें अर्जुन देव को उत्तराधिकारी माना गया था। सुनने वालों ने आश्चर्य किया कि इस सब से कम योग्य को यह पद कैसे मिला? समाधान करने वालों ने समझाया कि श्रद्धा और अनुशासन यही शिष्य की सबसे बड़ी योग्यता है। गुरु देव की परख ठीक ही थी और निर्णय भी ठीक ही है।
अर्जुनदेव सिख धर्म के पाँचवें गुरु हुए। उनने अपनी योग्यता के बल पर नहीं श्रद्धा के बल पर सिख धर्म की भारी सेवा की और प्रगति की।
जिस युग परिवर्तन के लिए अखण्ड ज्योति परिवार के लाखों सदस्य प्राणप्रण से कटिबद्ध हो रहे हैं वह न तो कठिन है और न असंभव। क्योंकि मानव अन्तरात्मा में सत्प्रवृत्तियों की, सद्भावनाओं की कोई कमी नहीं है। उपयुक्त अवसर आने पर वे सहज ही जाग पड़ती हैं। ‘सत्य की जीत’ सदा ही होती रही है। भारत की विजय सुनिश्चित है। प्रश्न केवल समय का है। आज यह श्रेय हमें मिलना है या कल, बात केवल इतनी भर है।
बाहरी आक्रमणकारियों को मार भगाने के लिए यदि जनमानस में तड़पन उठती है तो उसकी तड़प से शत्रु की छाती दहल जाती है, उसे गोली चलाना बन्द करना पड़ता है और पैर पीछे को लौटाने पड़ते हैं। भीतरी शत्रुओं के विरुद्ध, आन्तरिक षडरिपुओं के विरुद्ध, दुष्ट वृत्तियों और दुर्भावनाओं के विरुद्ध यदि इसी प्रकार का मोर्चा जम जाय, यदि उनके प्रति ऐसी ही घृणा-शत्रुता और प्रतिरोध की भावना जागृत हो जाय तो उनको भी चीनियों की तरह ही पराजित होना पड़ेगा।
छोटे लोगों के बड़े दिल—
बर्बरता और दुष्टता के विरुद्ध यदि क्षोभ उत्पन्न हो जाय तो अत्यन्त निर्धन, विपन्न परिस्थितियों में पड़े हुए दीन दुखी समझे जाने वाले लोग भी बहुत कुछ कर सकते हैं। चीनी आक्रमण से जिनकी अन्तरात्मा को चोट लगी उनने कठिन परिस्थितियों में रहते हुए भी बहुत कुछ किया है। इतना किया है जिसे देखकर कोई निराशावादी भी भविष्य के लिए आशान्वित हुए बिना नहीं रह सकता। इन पृष्ठों में हम कुछ ऐसी विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख कर रहे हैं जिनसे हमारे अनेक भाइयों के प्रयत्नों को देखकर सबको विशेष प्रेरणा होगी।
होशियारपुर के कोढ़ियों ने आय से 102) रु. रक्षा कोष में दिये हैं। यह रकम देते हुए उन्होंने कहा कि देश के किसी और काम तो वे आ नहीं सकते लेकिन उन्हें अपना देश अन्य लोगों की तरह ही प्यारा है, उनके नेत्र सजल थे। इसी प्रकार बुलन्द शहर जिले के राजघाट (गंगा तट) पर रहने वाले कोढ़ी अपनी बचत का सारा धन कोष में जमा कराने पहुँचे। छपरा के अन्धे भिखारी रतन ने अपने बचाये हुए पाँच रुपये जमा करा दिये। पजिम की एक भिखारिन ने कई दिन भीख माँग कर जो चावल प्राप्त किया था वह रक्षा कोष में दे दिया। रायसेन जिले के चुनेटिया गाँव के एक अंधे तथा लकवा से ग्रस्त 85 वर्षीय वृद्ध गणेशा ने अपनी जमा पूँजी के सारे डडडडडड कार्य के लिए सौंप दिये। दिल्ली स्थित आनन्दग्राम, ताहरपुर, शाहदरा की कुष्ठ-बस्तियों में रखने वाले प्रायः सभी कोढ़ियों ने राष्ट्र रक्षा के लिए अपनी सामर्थ्यानुसार धन भेजा है। उसकी पहली 251) रु0 की थी।
अमृतसर के क्षय अस्पताल के एक रोगी ने 100) रु॰ दिये हैं। दिल्ली के मूक-बधिर संघ ने झण्डा सप्ताह में 200 बक्सों में जो कुछ जमा हो सका सो रक्षा के लिये दे दिया। अल्मोड़ा के कुछ रोगियों ने अपने भोजन में कमी करके 301) बचाया और एक नाटक खेलकर 47) रुपये कमाये वह सब कोष में दे दिये। आगरा के अन्धे भिखारियों ने अपनी कमाई बेलनगंज की एक सुरक्षा सभा के अवसर पर अधिकारियों को सौंप दी। तेजपुर के एक धोबी ने अपना सारा सोना दे दिया। कोएम्बटुर अस्पताल में आँख पुत्री की सोने की चुड़ियाँ सुरक्षा के लिए दे दीं। दिल्ली के अन्ध विद्यार्थियों ने 500) रु॰ कोष के लिये भेजे हैं। पेंन्ड्रा के टी0 बी0 अस्पताल के मरीजों ने अपना भोजन घटा कर 175) दिये हैं।
जबलपुर जिले के खखरी गाँव के दो ग्रामीणों ने अपना खेत जोतने के काम आने वाले दो भैंसे राष्ट्र, रक्षा में दे दिए जिनमें से एक 47) में, दूसरा 40) में नीलाम करके कोष में जमा कर दिये गये। वाराणसी जिले के बहावनी गाँव के एक व्यक्ति ने अपनी बकरी और उसके बच्चे दे दिये। उत्तर काशी जिले के कोठियाल ग्राम के एक किसान श्री शालिग्राम ने अपने एक मात्र बैल को कोष में दे दिया जो 206) में बिका। सहारनपुर गन्ना विभाग के एक कर्मचारी ने अपनी दूध देती गाय रक्षा कोष में दी है। बीकानेर नगर से 10 मील दूर कनासर गाँव में एक दुर्भिक्ष पीड़ित किसान ने अपनी एकमात्र निधि 800 मन घास दान कर दी।
झुझनूँ के पास सूरतगढ़ के एक बूढ़े हरिजन डिंगाराम ने अपना घोड़ा सरकार को सौंपा है। जम्बू क्षेत्र के चानी गांव के सन्तराम, चौकीदार ने अपना पूरा 30) मासिक वेतन लड़ाई चलते तक देते रहने का निश्चय किया है। वह रात को कोई दूसरी मजूरी करके अपना पेट पालेगा। दलिया का एक गरीब कुली जिसे अपने 7 बच्चों का पालन करने में भारी कठिनाई पड़ती है 11) रु ॰ मासिक देता रहेगा। मालोट नहर विभाग के कुछ कर्मचारियों ने बस स्टेण्ड पर कुली का काम करके वह मजदूरी कोष में जमा करने का निश्चय किया है।
सामूहिक सत्प्रयत्नों की शक्ति—
सामूहिक उत्साह और सम्मिलित सत्प्रयत्नों से थोड़ा-थोड़ा करके भी बहुत हो जाता है। बूँद-बूँद से घट भरता है, छोटे-छोटे तिनके मिला कर मजबूत रस्सी बनती है। इस तथ्य का उपयोग जहाँ कहीं जब कभी होता है तभी आशाजनक सत्परिणाम सामने आते हैं।
सहारनपुर के नाइयों ने पंचायत करके महीने में एक दिन की कमाई रक्षा कोष में देते रहने का निश्चय किया है और पहली किस्त 607) की मनीआर्डर द्वारा भेज दी। नरसनेण्ट (बारंगल) के आदि वासियों की पंचायत समिति ने 81024 रुपये तथा तीन सौ ग्राम सोना भेजा है। कानपुर लाठी मुहाल की गायिका श्री प्रेमादेवी के मकान पर एकत्रित कानपुर की वेश्याओं में से प्रत्येक ने अपना एक निजी स्वर्ण आभूषण सुरक्षा कोष में देने का निश्चय किया है। अपनी पहली किस्त के रूप में 931) जमा किये और हर महीने एक हजार रुपये भेजने का प्रबन्ध किया। बेलूर जेल के कैदियों ने अपना भोज घटा कर रक्षा में रोज दान देते रहने का निश्चय किया है। चम्बल घाटी के डाकुओं ने मोर्चे पर जाने की इच्छा प्रकट की।
जबलपुर के केन्द्रीय कारागार में बन्दियों ने अपने भोजन से बचा कर 200) भेजे हैं। रक्तदान भी दिया है। उनमें से कितने ही युद्ध मोर्चे पर जाने तथा लौट कर फिर अपनी सजा काटने के लिये तैयारी कर रहे हैं। भोपाल के 63 बन्दियों ने अपना खून दिया है। सम्भलपुर जिले के कलामती गाँव में 250 परिवारों के 1400 स्त्री पुरुषों ने उपवास करके बचत का अन्न सुरक्षा के लिए भेजा।
शिवपुरी जिले के टोडा ग्राम के 640 निवासियों ने प्रति व्यक्ति एक रुपया भेजा है और प्रत्येक तरुण ने खून देने की इच्छा प्रगट की है। पिथौरागढ़ जिले की आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी हुई 2 लाख 60 हजार जनता ने हर व्यक्ति एक रुपये के हिसाब से उतना धन सुरक्षा कोष के लिये भेज दिया। उस जिले के सातलखेडी गाँव में हर व्यक्ति पीछे छः रु0 एक आना की औसत से सुरक्षा कोष में सहायता पहुँचाई गई है। देश भर में विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी कार्यालय एवं उद्योग संस्थाओं के कर्मचारियों ने अपने वेतन में कटौती करा कर अतिरिक्त श्रम करके रक्षा कोष में जो बड़ी-बड़ी रकमें भेजी हैं उन्हें देखते हुए यह सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि संघ शक्ति का प्रवाह जिधर भी मुड़ पड़ उधर आश्चर्यजनक सत्परिणाम प्रस्तुत होता है।
महिलाएँ और बच्चे भी पीछे नहीं—
भारत में महिलाओं को एक लम्बे समय से जिस अशिक्षा, संकीर्णता और बन्धनों की दयनीय स्थिति में रहना पड़ रहा है उसमें उनकी शारीरिक, मानसिक स्थिति का गया गुजरा बन जाना स्वाभाविक है। आज वे अपंग जैसी लगती हैं, फिर भी जब धर्म कर्तव्य का, त्याग, बलिदान का, प्रतिकार और प्रतिरोध का समय आया तो वे भी किसी से पीछे नहीं रहीं।
झाँसी में रोटी बनाकर पेट पालने वाली महिलाओं ने अपनी गाढ़ी कमाई में से उदारतापूर्वक दान दिया है। ललितपुर नगरपालिका की महतरानियों ने जाड़े में मिलने वाली ऊनी जर्सियाँ जिनकी कीमत 800) है रक्षा निधि में लौटा दी हैं। बिजनौर जिले के बसेड़ा गाँव की एक विधवा राजपति देवी ने रोज चर्खा कातकर उसकी आमदनी कोष में देते रहने का निश्चय किया है। उसके पास जो एकमात्र आभूषण कानों की बाली थीं सो भी उसने प्रसन्नतापूर्वक दे दीं।
देहली रेलवे स्टेशन पर मजदूरों और कुलियों की रोटी पकाकर गुजारा करने वाली 81 वर्षीय विस्थापित महिला फूलोदारी ने अपनी जीवन भर की कमाई 140 रु॰ जो कहीं जमीन में गढ़े रखे थे, लेकर कोष में दे दिये। मेरठ जिले के बहादुरपुर की एक महिला कृपादेवी ने अपनी 25 बीघा और बढ़का गाँव की सोमलता देवी ने 20 बीघा जमीन दान दी है। परभनी जिले के हिंगोली गाँव की एक नव वधू ने विवाह के कुछ घंटे बाद ही अपने समस्त कीमती स्वर्ण आभूषण उतार कर रक्षा कार्य के लिए ग्राम पंचायत के प्रधान को सौंप दिए। बुलन्दशहर जिले के सरतरा गाँव की एक महिला कस्तूरी ने हर वर्ष 12 मन गेहूँ और नेहरू जी के वजन की बराबर घी सेना के जवानों को देते रहने की घोषणा की है।
काश्मीर सचिवालय के एक कर्मचारी का विवाह सम्बंध जिस लड़की से पक्का हुआ था उसके दो भाई युद्ध मोर्चे पर लड़ रहे थे। लड़की ने अपनी शादी ऐसे व्यक्ति से करने की इच्छा प्रकट की जो युद्ध मोर्चे पर लड़े। इस पर उस कर्मचारी की भावना उमड़ी और फौज में भर्ती हो गया। उसने यह भी घोषणा की है कि युद्ध मोर्चे से लौटने पर ही शादी करेगा। लड़की भी तब तक अविवाहित रहेगी और रक्षा कार्यों में निरन्तर संलग्न रहेगी।
कानपुर जिलाधीश के पास एक ग्रामीण वृद्धा अपने इकलौते बेटे को लेकर उसे सेना में भर्ती कराने पहुँची। उसने कहा-गत युद्ध में मेरे पति ने लड़कर वीर गति पाई और मेरा यह बेटा भी अब देश की जरूरत के वक्त काम आये तो इसमें हमें प्रसन्नता ही होगी। वटाला (पंजाब) की कोष महिलाओं ने युद्ध मोर्चे पर जाने की अर्जी दी है।
यह तो व्यक्तिगत प्रयत्नों की एक झाँकी हुई महिलाओं ने सामूहिक रूप से धन, स्वर्ण, रक्त एकत्रित करने और जवानों को भर्ती कराने में जो भारी कार्य किया है उसे देखते हुए अनुमान होता है कि यदि यह सिंहनियाँ जाग पड़ें तो कायापलट होने में देर न लगे।
छोटे बच्चे और विद्यार्थियों का योग रक्षा कार्यों में कम नहीं रहा। स्कूलों के छात्र और छात्राओं ने अपना जेब खर्च बचाकर, बचत की गुल्लकें खोल कर, स्कूलों में मिलने वाला नाश्ता बन्द कर डडडडडड छात्रावासों में उपवास रख कर, मजदूरी द्वारा कुछ कमा कर रक्षा कार्य के लिए भारी योग दान दिया है। लड़कियों ने अपने नाक, कान के छोटे-छोटे आभूषणों को बड़े उत्साहपूर्वक दिया है। बच्चों के श्रमदान से कितनी ही आवश्यक सड़कों के बनने में भारी सहायता मिली है। अपने पिता और भाइयों के युद्ध मोर्चे पर जाने के या मरने के पश्चात् उनके उत्तराधिकारी अल्प वयस्कों ने प्रतिज्ञा की है कि राष्ट्र रक्षा के लिए वे भी अपना प्राण देकर दुष्टता के प्रतिकार में कटिबद्ध रहेंगे।
भारतीय विश्व विद्यालयों की राष्ट्रीय परिषद् के तत्वावधान में आयोजित एक पत्रकार गोष्ठी में विद्यार्थी नेताओं ने घोषणा की कि परिषद् के अंतर्गत 23 विश्व विद्यालयों के 50 हजार छात्र सैनिक या किसी भी प्रकार की सेवा के लिए तैयार हैं। वे 50 करोड़ सी0 सी0 रक्त भी जवानों को भेजेंगे।
दधीचि और भामाशाह के आदर्श—
धर्म और कर्तव्य की वेदी पर प्राणों की बलि चढ़ाने वाले शूरवीरों की कमी इस देश में कभी नहीं रही और न अब है। सेना में भर्ती होने के लिए आतुर हो रहे नवयुवकों की भारी भीड़ जो भरती दफ्तरों में लगी रहती है उसे देखते हुए यह अनुमान सहज ही लग जाता है कि कर्तव्य की तुलना में प्राणों को तुच्छ समझने वाले लोग अभी भी बहुत हैं, और ऐसे लोग जब युद्ध मोर्चे की तरह राष्ट्र निर्माण महत्व भी समझ लेंगे और समय आने पर उस कार्य में भी लगेंगे तो बाहरी शत्रुओं की ही तरह शत्रुओं को भी परास्त करके छोड़ेंगे।
उत्तर प्रदेश के मुख्य मन्त्री को एक वृद्ध ने पत्र लिखा है कि मेरे सातों बेटे मोर्चे पर आक्रमणकारी से लड़ रहे है। मैं बूढ़ा समझा जाता हूँ पर वस्तुतः इतना बूढ़ा नहीं हूँ कि राइफल का बोझ न सँभाल सकूँ। कृपया दिया मुझे सेना में भर्ती होने का मौका दें। इसी प्रकार एक अंधे ने उन्हें लिखा है—”अपनी बेबसी पर इस जिन्दगी भर में कभी इतना दुख नहीं हुआ जितना आज है। मैं युद्ध में भाग लेने से वंचित हूँ पर मेरा रक्त तो जवानों के लिए ले ही लिया जाय।”
भिण्ड जिले के एक छोटे गाँव रानीपुर के हर परिवार से औसतन 3 व्यक्ति सेना में हैं। गाँव की कुल आबादी 700 है जिसमें से 200 फौज में चले गये और 45 अभी और जाने वाले हैं।
राजस्थान के मुख्य मंत्री को जयपुर के निकट गोविन्दगढ़ निवासी एक 60 वर्षीय वृद्ध कान्हसिंह ने अपने सबसे छोटे 23 वर्षीय पुत्र को भी मोर्चे पर भेजने के लिए अर्पित कर दिया। वृद्ध के बड़े तीन पुत्रों में से एक शहीद हो चुका-दो लड़ रहे हैं और चौथा अब भर्ती करा दिया गया। बेटों के साथ-साथ वृद्ध ने अपनी कुल जमा पूँजी 700 रु. भी कोष में दे दी।
झुँझनू जिले के मारदाना खुर्द गाँव के 25 परिवारों ने फैसला किया है कि चीनी आक्रमणकारियों के विरुद्ध लड़ाई के लिए हर परिवार एक जवान मोर्चे पर जाने के लिए देगा। गाँव के सरपंच ने यह प्रार्थना-पत्र पं0 नेहरू के जन्म दिन पर उन्हें समर्पित किया।
रोहतक जिले के वहारन गाँव के चौधरी रूप चन्द के चार पुत्र मोर्चे पर लड़ रहे हैं। उनमें एक पुत्र के शहीद होने पर चौधरी ने अपना अन्तिम पाँचवाँ पुत्र भी सेना में भर्ती करा दिया ताकि मृत के स्थान की कमी न पड़ने पावे।
इतिहास के पृष्ठों पर अपना सर्वस्व देने वाले भामाशाह आदि के वर्णन मिलते हैं। वाजिश्रवा आदि ऐसे भी अगणित त्यागी हुए जिनने अपना सब कुछ समाज के लिये अर्पित करके सर्वमेध यज्ञ किया और अपने पास कुछ भी न रखा। आज अनीति के प्रतिरोध और राष्ट्र रक्षा के धर्म कर्तव्य को सामने उपस्थित देख कर अनेकों भावनाशील व्यक्तियों ने स्वयं साधनहीन बनना स्वीकार कर अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों पर अर्पण किया है। प्रश्न यह नहीं कि किसने कितना दिया धन की संख्या से नहीं मानवता की उत्कृष्टता से और जो पास में था उसका कितना अंश दिया इस आधार पर त्याग का मूल्याँकन किया जाता है। इस दृष्टि से अगणित सर्वमेधी आत्मदानी आज सामने प्रस्तुत दीखते हैं। इन व्यक्तियों में से किसी ने इस बात की चिन्ता भी नहीं की कि भविष्य में उनका निर्वाह कैसे होगा।
लखीम पुर जिले के पटेला गाँव में एक व्यक्ति चौ0 साइसिंह ने अपनी समस्त सम्पत्ति सुरक्षा के लिए दान दी है। उनकी सम्पत्ति में 20 एकड़ सीरदारा भूमि, 23) हजार रुपये को गन्ने की खड़ी फसल दो भैंसें तथा अन्य घर गृहस्थी का सामान है। यह सब कुछ बेच कर सुरक्षा कोष में जमा किया जायगा। बुलन्द शहर से 13 मील दूर शिकारपुर में एक 70 वर्षीय निर्धन वृद्धा गंगा देवी ने अपनी जीवन भर की बचत एक मैली सी पोटली निकाल कर अधिकारियों को देदी। इसमें 50 वर्ष पुराने सिक्के, खेरीज रुपये आदि कुल मिला कर 525) रु. निकले। इस दान को स्वीकार करते हुए आँखों में आँसू भरे प्राप्तकर्ता ने कहा—जिस देश में इतनी उत्कट त्याग भावना हो वह किसी आक्रमण से पददलित नहीं हो सकता।
देहरादून का समाचार है कि नेफा मोर्चे पर शहीद होने वाले जगजीत सिंह की मृत्यु का समाचार जब उसकी माता को मिला तो उसने तत्काल अपनी सारी सम्पत्ति और भूमि राष्ट्र रक्षा कोष में देते हुए अधिकारियों को लिखा कि इसे बेच कर राष्ट्र के लिए शस्त्रास्त्र खरीद लिये जायं।
अकबरपुर की एक वृद्धा हरनाम कौर ने अपनी सारी सम्पत्ति 60 बीघा भूमि जिसका मूल्य 12 हजार रुपये है रक्षा कोष में दे दी। वृद्धा का एक मात्र पुत्र हाल ही में नेफा के युद्ध में शहीद हुआ है।
शाजापुर के एक रजिस्ट्री क्लर्क श्री चन्द्रमोहन सिंह और उसके परिवार के सदस्यों ने कुल मिलाकर 51 हजार रुपये दान किये हैं। यह दान भूमि, मकान, बागों, बीमा पालिसियों, प्रोविडेण्ट फण्डों और आभूषणों के रूप में है। इन लोगों के पास नकद भी 55) रु0 जमा था वह भी पूरे का पूरा उन्होंने दे दिया। परिवार के सब सदस्यों ने ब्लड बैंक में खून देने का भी फैसला किया है।
दिल्ली दरीबा कलाँ के एक छोटे से व्यापारी धनसिंह ने अपनी कुल पूँजी 11 हजार रुपया तथा एक मात्र पुत्र को राष्ट्र रक्षा के लिए अर्पण किया है।
रक्त और शरीर के विविध अंग घायल सैनिकों की जीवन रक्षा के लिए दान करने वाले सूरमा राजा शिवि की उस उदारता का स्मरण दिलाते हैं जिसमें उनने शरीर का माँस काटकर कबूतर के बदले में दे दिया था। राजा दिलीप ने भी गौ की प्राण रक्षा के लिए अपना शरीर सिंह को सौंपा था। आज अनेकों व्यक्ति इस प्रकार के दिखाई देते हैं जो अपने रक्त और शरीर के अंगों को राष्ट्र रक्षक सैनिकों की आवश्यकता के लिए प्रसन्नतापूर्वक देने को तैयार हैं।
रायपुर जिले के राजिम गाँव से एक युवक ने अपनी आँखें किसी सैनिक की आवश्यकता के लिए दान कर दी हैं। अम्बाला छावनी के महन्त नरेन्द्रदास ने किसी घायल सैनिक के प्रयोग के लिए अपनी एक आँख दी है। बर्धा के चरणदास नामक सज्जन ने भारतीय सेना के जवानों के लिए उनके शरीर का कोई भी अंग विशेष तौर से बायाँ हाथ, बायाँ आँख, बायाँ फेफड़ा आदि लेने की प्रार्थना सरकार से की है।
जालन्धर में रक्तदान करने के इतिहास में एक नया रिकार्ड स्थापित हुआ है। 25 दिसम्बर से 1 जनवरी तक राधास्वामी सम्प्रदाय के वार्षिक भंडारे में इस सम्प्रदाय के हजारों अनुयायिओं ने अपने गुरु की अपील पर 3 मन 10 सेर रक्त और 3 लाख रुपया सुरक्षा के लिए प्रदान किया।
राष्ट्रपति श्री राधा कृष्णन ने अपने एक वक्तव्य में बताया कि अकेले पंजाब राज्य से 20 लाख जवान सेना में भर्ती होने को तैयार हैं। भारत के भूतपूर्व सैनिकों के संघ ने घोषणा की है कि अवकाश प्राप्त सैनिकों में से तीस हजार व्यक्ति मोर्चे पर जाने के लिए बिलकुल तैयार हैं। द्वितीय रक्षा पंक्ति के रूप में देश के भीतर जो होम गार्ड भर्ती किये जा रहे हैं उसमें हर प्रान्त से लाखों नर नारी भारी उत्साह पूर्वक भर्ती हो रहे हैं। कर्तव्य की तुलना इन सबने प्राणों का मूल्य नगण्य माना है
कुरीतियों और आडम्बरों का बहिष्कार—
उच्च आदर्शों की ओर अमुख मनोभूमि में कुरीतियों और आडम्बरों की ओर घृणा भी सहज ही जागृत होती है। जब कोई महत्वपूर्ण काम सामने होता है तो तुच्छ बातों की उपेक्षा सहज ही बन पड़ती है। राष्ट्रीय अग्नि परीक्षा की इन घड़ियों में सामाजिक कुरीतियों और आडम्बरों का बहिष्कार करने के लिये जन साधारण की इच्छा स्वतः ही जागृत होने लगी है।
गोहाटी (आसाम) की एक विधवा गंध-मोनी देवी ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए संचित एक हजार रुपया सुरक्षा में दे दिया और विवाह को फिर कभी के लिये टाल दिया। वाराणसी के मदनलाल कपूर ने अपने लड़के की शादी में होने वाला संभावित खर्च 11 हजार रुपया कोष में जमा किया और विवाह की रस्म बड़ी सादगी से पूरी की । सुजनागढ के एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ ने अपनी पुत्री के विवाह में राष्ट्रीय संकट को देखते ढाई हजार खर्च करना पर्याप्त समझा। आगरा बेलनगंज के एक जैन परिवार ने विवाह में पैसे की होली फूँकने की बजाय 3100) सुरक्षा में देना श्रेयस्कर समझा। इस वर्ष दिवाली का उत्सव प्रायः सभी जगह स्थगित रहा। लोगों ने दीपदान तथा उत्सव कार्यों खर्च होने वाला धन बचा कर रक्षा कार्यों के लिए भेजा। दावतें, समारोह, प्रीतिभोज आदि में जो अन्न और धन की बर्बादी होती है उसे रोकने की लोगों के मनों में स्वयं ही प्रेरणा उत्पन्न हुई और ऐसे हजारों उत्सव या तो पूर्णतया स्थगित कर दिये गये या उन्हें बहुत किफायतशारी के साथ संक्षेप में सम्पन्न किया गया। बरातों में आने वाले लोग आये तो जरूर ही पर कम गए। ताकि समय और पैसे की बर्बादी बचे।
उज्ज्वल भविष्य की आशा—
कर्तव्य के प्रति इस प्रकार जागरुक और कटिबद्ध भारतीय जनता के लिए समस्त विश्व के भावना शील राष्ट्रों और व्यक्तियों ने अपनी आन्तरिक सहानुभूति, नैतिक सहायता और प्रचुर साधन सामग्री की वर्षा की है। मित्र राष्ट्रों ने बिना शर्त हथियार और सलाहकार दिए हैं। जगह-जगह से धन, रक्त तथा अन्यान्य प्रकार के भावना प्रतीक उपहार भेजे हैं और हमारी विजय की कामना की है। युद्ध के दूसरे मोर्चे पर लड़ने वाले, नैतिक सामाजिक एवं भावनात्मक क्षेत्रों में घुसे हुए शत्रुओं से-कुसंस्कारों से लड़ने के लिए कटिबद्ध-कर्तव्य-निष्ठों के लिए भी इसी प्रकार ऋषियों, महापुरुषों, देवताओं, भावनाशील विचारकों और परमेश्वर का आशीर्वाद मिलेगा। कर्त्तव्यपथ पर चलने वालों को बाहरी सहायता भी मिलती ही है।
यह सच है कि अनेकों साधन सम्पन्न लोगों ने इस अग्नि परीक्षा की घड़ी में भी कंजूसी और निष्ठुरता का परिचय दिया है। उनकी ओर न देखकर हमें भावनाशील जन-मानस की निष्ठा को ही महत्व देना चाहिए। इस युद्ध ने जन-मानस के भावनास्तर को कर्तव्य पालन की ओर अभिमुख किया है, उसके फल स्वरूप सतयुग जैसे सहस्रों आदर्श हमें आँखों के सामने दिखाई देते हैं। यह उज्ज्वल भविष्य के लिए एक आशाजनक चिन्ह है। लड़ाई अभी बन्द नहीं होने वाली है। चीनी हार सकते हैं पर हमारे घर के कोने-कोने में छिपकर बैठे हुए आलस्य, अनाचार, असंयम, स्वार्थपरता, फूट, फैशन, अपव्यय, ढोंग, विलासिता , पाप, कुसंस्कार आदि शत्रुओं से लड़ना तो अभी बाकी ही पड़ा है। यह युद्ध देर तक चलेगा। 8॥ वर्ष तो अभी लगने ही हैं। इसलिए आज जो सत्प्रवृत्तियाँ दुष्टता का प्रतिकार करने के लिए जागृत हुई हैं उन्हें दूने चौगुने उत्साह से जगाना चाहिए। असुरता का बाहरी ही नहीं भीतरी विनाश करके ही हम सच्चे विजयी बनेंगे। प्रगति और सुख शान्ति के राम राज्य की स्थापना के—युग निर्माण के स्वप्न साकार न होने तक हमें अभी तो युद्ध सैनिक की तरह कटिबद्ध ही रहना होगा।
सुनो पार्श्व में खड़ा शिखंडी कब से तुम्हें पुकार रहा।
भीम गदा को लिए हाथ में तेरी ओर निहार रहा॥
लिये सुदर्शन चक्र कृष्ण भी खड़े तुम्हारी पाली में।
महाकाल भैरव, चामुण्डा सब तेरी रखवाली में॥
उठो, धनंजय की संतानों!
मामनुस्मर युद्ध, आज से निखिल राष्ट्र का नारा है।
‘स्वर्गादपि गरौयसी’ माँ का कण-कण हमको प्यारा है।
आज अहिंसा कायरता का भेद तुम्हें बतलाना है॥
बलिवेदी पर आज तुम्हें फिर अपना शीश चढ़ाना है॥
उठो, धनंजय की संतानों!
नहीं अभी सूखा है पानी राजपूती तलवारों का।
खौल उठा है खून आज फिर सीमा के सरदारों का॥
यह अफीम का नहीं नशा है, कालकूट है, ज्वाला है।
उसे विश्व में एक अकेला भारत पीने वाला है॥
खाँड़-खड्ग का भेद भूलकर यदि हमसे टकरायेंगे।
तो यह चीनी धराधाम से अपना चिन्ह मिटायेंगे॥
उठो, धनंजय की संतानों!
आज राष्ट्र की रक्षा के हित वानप्रस्थ, संन्यास जगो।
ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य, युवा शिशुः वर्ग वर्ण विन्यास जगो॥
जगो कि जैसा क्राँतिकुमारी ज्यालमाल लेकर जगती।
जगो कि जैसे दुर्गा चण्डी महाकाल लेकर जगती॥
जगो कि जैसे प्रलयकाल का सागर तूफानी जगता।
जगो कि जैसे क्राँतिवाहिनी सरिता का पानी जगता॥
चलो कि जैसे चल पड़ता है शंकर प्रलयंकर मतवाला।
जलो कि जैसे जल उठा है युगमादिति यौवन की ज्वाला॥
उठो, धनंजय की संतानों!
राजकुमार पाण्डेय ‘कुमार’
*समाप्त*
मन ही सबसे प्रबल है। मन की प्रेरणा से मनुष्य की जीवन दिशा बनती है। मन की शक्तियों से वह बड़े काम करने में समर्थ होता है। मन ही नीचे गिराता है, मन ही ऊँचा उठाता है। असंयमी और उच्छृंखल मन से बढ़कर अपना और कोई शत्रु नहीं जिसका मन विवेक और कर्त्तव्य को ध्यान में रखते हुए सन्मार्ग पर चलने का अभ्यस्त हो गया तो वह देवताओं के सान्निध्य जैसा सुख कर होता है।
मन की गतिविधियों पर सूक्ष्म दृष्टि से निरंतर ध्यान रखे। उसे कुमार्गगामी न होने दे। दुर्भावनाओं को प्रवेश न करने दे। वासना और तृष्णा से चित्त वृत्तियों को हटावे। किसी का अहित न सोचे। अहंकार को न पढ़ने दें। पाप से मन को बचाये रहना और उसे पुण्य कार्यों में प्रवृत्त रखना यही मानव जीवन का सबसे बढ़ा पुरुषार्थ है।
-ब्रह्मर्षि वशिष्ठ
वर्ष 24 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 02
गढ़ फिर कोई दीप नया तू मिट्टी मेरे देश की।
अन्धी हुई दिशायें सारी यूँ अंधियारी छा रही,
किरण तोड़ती साँस रोशनी जीने की छटपटा रही।
ऐसा कुछ ठहराव आ गया आज विश्व की राह में,
पथ भूले बनजारे जैसी पीढ़ी चलती जा रही।
कोई बाँह पकड़ ऐसे में, सही दिशा का ज्ञान दे,
सख्त जरूरत आज जगत को एक सच्चे दरवेश की॥ गढ़ फिर कोई॰ ॥
देवभूमि ये जन्म दिये इसने अनगिन अवतार को।
ज्योति-स्तम्भ बन हरती आई, ये जग के अंधियार को॥
मुझको है विश्वास कि धरती बाँझ नहीं इस देश की,
फिर से कोई नया मसीहा देगी ये संसार को।
इसकी मिट्टी उड़ कर बैठी सूरज के भी भाल पर,
नित उभरी आवाज यहाँ से, शान्ति प्रेम सन्देश की ॥ गढ़ फिर कोई0॥
यद्यपि प्रलयंकारी घन से घिरा हुआ आकाश है,
फिर भी मानव के भविष्य से मेरा मन न निराश है।
शायद इसी मोड़ के आगे मानव का निज लक्ष्य हो?
इसी तिमिर के पीछे शायद कोई नया प्रकाश है।
जब तक मेरा देश, मनुजता होना नहीं उदास तू,
निकट जन्म-बेला है शायद किसी नये अवधेश की।
गढ़ फिर कोई दीप नया तू मिट्टी मेरे देश की! —चन्द्रसेन “विराट”
इस संसार में जो कुछ शुभ है, श्रेष्ठ है, मंगलमय है वह सब परमात्मा का ही वैभव है। गीता में अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए बताया है कि जो कुछ इस संसार में श्रेष्ठ दिखाई पड़ता है उसे भगवान की ही विभूति जानना चाहिये।
परमात्मा की समीपता—
परमात्मा के जितने ही समीप हम पहुँचते हैं उतनी ही श्रेष्ठताएँ हमारे अन्तःकरण में उपजती तथा बढ़ती हैं। उसी अनुपात से आन्तरिक शान्ति की भी उपलब्धि होती चलती है।
हिमालय की ठण्डी हवाएँ उन लोगों को अधिक शीतलता प्रदान करती हैं जो उस क्षेत्र में रहते हैं। इसी प्रकार आग की भट्टियों के समीप काम करने वालों को गर्मी अधिक अनुभव होती है। जीव ज्यों-ज्यों परमात्मा के निकट पहुँचता जाता है, त्यों-त्यों उसे उन विभूतियों का अपने में अनुभव होने लगता है जो उस परम प्रभु में ओत प्रोत हैं।
उपासना का अर्थ है—पास बैठना। परमात्मा के पास बैठने से ही ईश्वर उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुएँ तथा प्राणी अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ते हैं तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा?
पुष्प वाटिका में जाते ही फूलों की सुगन्ध से चित्त प्रसन्न होता है। चन्दन के वृक्ष अपने समीपवर्ती वृक्षों को सुगन्धित बनाते हैं। सज्जनों के सत्संग से साधारण व्यक्तियों की मनोभावनाएँ सुधरती हैं, फिर परमात्मा अपनी महत्ता की छाप उन लोगों पर क्यों न छोड़ेगा जो उसकी समीपता के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
मिलन का प्रतिफल—
आत्मा को परमात्मा के निकट पहुँचने पर वही बात बनती है जो गरम लोहे और ठण्डे लोहे के एक साथ बाँधने पर होती है। गरम लोहे की गर्मी ठण्डे में जाने लगती है और थोड़ी देर में दोनों का तापमान एक सरीखा हो जाता है। दो तालाब जब तक अलग-अलग रहते हैं तब तक उनके पानी का स्तर नीचा-ऊँचा बना रहता है पर जब बीच में नाली निकालकर उन दोनों को आपस में संबन्धित कर दिया जाता है तो अधिक भरे हुए तालाब का पानी दूसरे कम पानी वाले तालाब में चलने लगता है और यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि दोनों का जल स्तर समान नहीं हो जाता।
दो जलाशयों का मिलना या गरम-ठण्डे लोहे का परस्पर मिलना जिस प्रकार एकरूपता की स्थिति उत्पन्न करता है उसी प्रकार उपासना द्वारा आत्मा और परमात्मा का मिलन होने पर जीव में दैवी गुणों की तीव्रगति से अभिवृद्धि होने लगती है।
पूजा और उपासना—
किसी व्यक्ति की उपासना सच्ची है या झूठी है उसकी एक ही परीक्षा है कि साधक की अन्तरात्मा में सन्तोष, प्रफुल्लता, आशा, विश्वास और सद्भावना का कितनी मात्रा में अवतरण हुआ। यदि यह गुण नहीं आये हैं और हीन वृत्तियाँ उसे घेरे हुए हैं तो समझना चाहिए कि वह व्यक्ति पूजा पाठ कितना ही करता हो उपासना से अभी दूर ही है।
पूजा पाठ अलग बात है, उपासना अलग। उपासना के लिए पूजा पाठ से कर्मकाण्ड की चिन्हपूजा करते रहने मात्र से उपासना का उद्देश्य प्राप्त नहीं हो सकता। जीव को जीवन धारण करने के लिये शरीर की आवश्यकता होती है पर शरीर ही जीवन
नहीं है। जीव विहीन शरीर देखा तो जा सकता है पर उसका कोई लाभ नहीं। इसी प्रकार उपासना विहीन पूजा भी होती तो है पर उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
आत्मा जब परमात्मा की गोदी में बैठता है तो उसे प्रभु की सहज करुणा और अनुकम्पा का लाभ मिलता है। उसे तुरन्त ही निर्भयता और निश्चिन्तता की प्राप्ति होती है। हानि, घाटा, रोग, शोक, विछोह, चिन्ता, असफलता और विरोध की विपन्न स्थितियों में भी उसे विचलित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसे इन प्रतिकूलताओं में भी अपने हित साधन का कोई विधान छिपा दिखाई पड़ता है। वस्तुतः विपन्नता हमारी त्रुटियों का शोधन करने और पुरुषार्थ को बढ़ाने के लिए ही आती है। आलस्य और प्रमाद को, अहंकार और मत्सर को मनोभूमि से हटाना ही प्रतिकूलताओं का उद्देश्य होता है। सच्चे आस्तिक को अपने प्रिय परमेश्वर पर सच्ची आस्था होती है और वह अनुकूलताओं की तरह प्रतिकूलताओं का भी खुले हृदय से स्वागत करता है।
कटु और मधु अनुभूतियाँ—
माता मधुर मिष्ठान्न भी खिलाती है और आवश्यकता पड़ने पर कड़ुई दवा भी खिलाती है। दुलार से गोदी में भी उठाये फिरती है और जब आवश्यकता समझती है डॉक्टर के पास सुई लगाने या आपरेशन कराने के लिए भी ले जाती है। माता की प्रत्येक क्रिया बालक के कल्याण के लिये ही होती है, परमात्मा की ममता जीवन के प्रति माता से भी अधिक है। प्रतिकूलताएं प्रस्तुत करने में उसकी उपेक्षा या निष्ठुरता नहीं, हितकामना ही छिपी रहती है।
अपनी कठिनाइयों को हल करने मात्र के लिए, अपनी सुविधाएँ बढ़ाने की लालसा मात्र से जो प्रार्थना पूजा करते हैं वे उपासना के तत्वज्ञान से अभी बहुत पीछे हैं। उन्हें उन बालकों में गिना जाना चाहिये जो प्रसाद के लालच से मन्दिर में जाया करते हैं। ऐसे बच्चे वह आनन्द कहाँ पाते हैं जो भक्तिरस में निमग्न एक भावनाशील आस्तिक को प्रभु के सम्मुख अपना हृदय खोलने और मस्तक झुकाने में आता है। प्रभु के चरणों पर अपनी अन्तरात्मा की अर्पण करने वाले भावविभोर भक्त और प्रसाद को मिठाई लेने के उद्देश्य में खड़े हुए भिखमंगे में जो अन्तर होता है वही सच्चे और झूठे उपासकों में होता है। एक का उद्देश्य परमार्थ है दूसरे का स्वार्थ। स्वार्थी को कहीं भी सम्मान नहीं मिलता। परमात्मा की दृष्टि में भी ऐसे लोगों का क्या कुछ मूल्य होगा?
हित-साधना के दो प्रयाग—
लुहार अपनी दुकान पर लोहे के टुकड़ों से तरह तरह की चीजें बनाता रहता है। उन टुकड़ों को वह कभी गरम करने के लिए भट्टी में तपाता है कभी पानी में डालकर ठण्डा कर लेता है। इन विसंगतियों को देखकर कोई भोला मनुष्य असमंजस में पड़ सकता है कि लुहार ने इस दुमुँही प्रक्रिया को क्यों अपना रखा है। पर वह कारीगर जानता है कि किसी लोहे के टुकड़े को बढ़िया उपकरण की शक्ल में परिणत करने के लिये दोनों ही प्रकार की ठण्डी-गरम प्रणालियों का प्रयुक्त होना आवश्यक है। मनुष्य के जीवन में भी सुख-दुख का, धूप-छाँह का अपना महत्व है। रात-दिन की अँधेरी, उजेली, विसंगतियाँ ही तो कालक्षेप का एक सर्वांगपूर्ण विधान प्रस्तुत करती हैं। यदि मनुष्य सदा सुखी और सम्पन्न ही रहे तो निश्चय ही उसकी आन्तरिक प्रगति रूप जाएगी। जो झटके प्रगति के लिए आवश्यक हैं उन्हें ही हम कष्ट कहते हैं। इन्हें सच्चा भक्त कड़ुई औषधि की तरह ही शिरोधार्य करता है। सन्निपात का मरीज जैसे डॉक्टर को गाली देता है वैसी भूल समझदार आस्तिक ईश्वर के प्रति नहीं कर सकता।
आशा और धैर्य का प्रकाश—
विपन्नताओं की स्थिति में धैर्य न छोड़ना, मानसिक सन्तुलन नष्ट न होने देना, आशा और पुरुषार्थ को न छोड़ना आस्तिकता का प्रथम चिन्ह है जिसे हम महात्मा जैसी अनन्त सामर्थ्यवान सत्ता के साथ बैठ का सौभाग्य प्राप्त है वह किसी भी व्यक्ति या परिस्थिति से क्यों डरेगा? क्यों अधीर होगा? क्यों निराशा और कातरता प्रकट करेगा? धैर्य और साहस की अजस्र धारा उसके मनः क्षेत्र में से उठती ही रहनी चाहिए।
जो आस्तिक है उसकी आशा कभी क्षीण नहीं हो सकती। वह केवल उज्ज्वल भविष्य पर ही विश्वास रख सकता है। अन्धकार अनात्म तत्व है। आत्मपरायण व्यक्ति के चारों ओर प्रकाश-केवल प्रकाश रहना चाहिए। उसे झुँझलाने और खिन्न होने की आवश्यकता क्यों पड़ेगी? आस्तिकता माने—आत्म विश्वास। परमात्मा पर विश्वास करने वाले को अपना भविष्य सदा उज्ज्वल एवं प्रकाशवान ही दिखाई देगा।
श्रेष्ठता की अभिवृद्धि—
उपासना का दूसरा प्रतिफल है श्रेष्ठताओं की वृद्धि। चूँकि परमात्म का समस्त श्रेष्ठताओं का केन्द्र है, उसका सान्निध्य आत्मा को दिन दिन उत्कृष्ट बनाता चलता है। भक्त को अपना भगवान् सब में दिखाई पड़ता है इसलिए वह हर किसी की अच्छाइयाँ देखता है और उनकी चर्चा एवं विचारणा करते हुए अपने आनन्द और दूसरों का सद्भाव को बढ़ाता है। निन्दा और ईर्ष्या असुरता के दो प्रधान अस्त्र हैं। इनका प्रयोग उसी पर किया जा सकता है जिसके प्रति परायेपन का, शत्रुता का भाव रहे। जब सब अपने हैं तो अपनों की निन्दा कैसी? अपनों से ईर्ष्या कैसे?
बुराई को तोड़ने के लिए नहीं, अच्छाई को बढ़ाने के लिए उसके प्रयत्न होते हैं। अच्छाई को बढ़ाना ही वस्तुतः बुराई को तोड़ना है। बुराई तोड़ दी जाय और उसके स्थान पर अच्छाई की स्थापना न हो तो टूटी हुई बुराई फिर उपज आती है। आस्तिकता का दृष्टिकोण अच्छाई को बढ़ाना होता है ताकि बुराई के लिए कोई गुंजाइश ही न रहे। वह सदा अच्छाई की चर्चा करेगा। प्रेम से दुष्टता को परास्त करेगा। दुष्टता करके प्रेम के अँकुरों को जला देना असज्जनों का काम है। आस्तित्व असज्जन नहीं हो सकता।
उपासक का दृष्टिकोण—
प्रेम, करुणा, आत्मीयता और सौजन्य की अजर धारायें परमात्मा से प्रवाहित होती रहती है। प्राणिमात्र का पोषण संरक्षण एवं अभिवर्धन इन्हीं विशेषताओं के द्वारा तो वह करता है। ऐसे प्रभु के समीप बैठने वाले में—उपासना करने वाले में—यही विशेषताएँ अवतरित होती है। अपने भाई बहिनों में प्रति-प्राणिमात्र के प्रति अनन्त करुणा और आत्मीयता की भावनायें उपासक के अंतःकरण में उद्भूत होती हैं। उनको चरितार्थ करके वह अपने जीवन को यशस्वी बनाता है और मनः क्षेत्र में धारण किये रहकर अनन्त शान्ति का अनुभव करता है।
परमात्मा की उपासना का प्रतिफल पाने के लिये प्रतीक्षा उन्हें करनी पड़ती है जो पुरुषार्थ और प्रतिभा के मूल्य पर मिलने वाली भौतिक सम्पदाओं को परमात्मा से मुक्त में ही पाने की आशा लगाये हुए दीन-हीन भिक्षुक की तरह बैठे रहते हैं। जिन्हें प्रेम और उत्सर्ग की उच्च भावनाओं से प्रेरित होकर प्रभु के चरणों में बैइने की आकाँक्षा है उन्हें अपने प्रियतम का प्रेम प्रतिपादित, प्राप्त करने के लिए क्षणभर भी प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। उपासना वासना की आग को बुझाती है, तृष्णा की जलन को शान्त करती है। चिन्ता, भीति और घृणा की उन व्यथाओं को हटाती है, जो मानव-जीवन को निरन्तर अशान्त बनाये रहती हैं। उपासना और आत्मशांति एक ही वस्तु के दो पहलू हैं। आत्मा अपनी उद्गम सत्ता परमात्मा की ओर उन्मुख होगी तो निश्चय ही उसे प्रकाश मिलेगा। परमात्मा का प्रकाश पड़ने पर आत्मा भी अपने सत्-चित आनन्दमय स्वरूप के साथ प्रकाशवान दीखता है। ऐसे प्रकाशवान जीवन में नर से नारायण की, पुरुष से पुरुषोत्तम की, आत्मा से परमात्मा की प्रत्यक्ष परिणति दृष्टिगोचर होती है। इसलिये उपासना को मानव-जीवन की सर्वोपरि बुद्धिमत्ता माना गया है।
सृष्टि संचालन का क्रीड़ा कौतुक रचने के लिए परमात्मा एक से बहुत बना। उसकी इच्छा हुई कि “मैं अकेला हूँ—एक से बहुत हो जाऊं” उसकी यह इच्छा ही मूर्तिमान होकर सृष्टि के रूप में प्रस्तुत हो गई। “एकोऽहं बहुस्यामि” का संकल्प साकार रूप धारण कर यह संसार बन गया। निर्माण होने के बाद उसका लक्ष और कार्यक्रम निर्धारित होना था सो इस प्रकार हुआ कि—बहुत भागों में विभक्त हुये ब्रह्म-विभाग पुनः एकता की ओर चले। अणु रूप में बिखरा हुआ जीवन पुनः विभु बना। बादल से छोड़ी हुई बूँदें अलग-अलग बरसें भले ही पर वे एकत्रित होकर पुनः समुद्र की रचना के लिए गतिशील भी बनी रहें। आत्माएँ अलग-अलग दीखते हुए भी उनकी गतिविधि पुनः इस अलगाव को मिटाकर एकता की ओर उन्मुख रहे। यही सृष्टि का लक्ष और कार्यक्रम बन गया। इस तथ्य के आधार पर जड़-चेतन सृष्टि की विविध विधि गति-विधियाँ चलती रहती हैं।
वियोग से संयोग की ओर—
बिछुड़ने की क्रिया के साथ इस सृष्टि की रचना तो हुई है पर आगे का कार्यक्रम मिलन और एकता पर आधारित है। समुद्र का पानी भाप बन कर अपने केन्द्र स्थल से बिछुड़ कर सुन्दर हिमि प्रदेशों में जाकर बर्फ बन जाता है। किन्तु वह बिछुड़ने की प्रक्रिया देर तक स्थिर नहीं रहती। जैसे ही अवसर मिलता है, थोड़ी गर्मी का सहारा पाकर बर्फ पिघलती है और वह पानी जैसे-तैसे अपना मार्ग खोजता हुआ नदी नालों में होता हुआ समुद्र की ओर दौड़ पड़ता है। बढ़ते हुए पानी की बेचैनी और दौड़ धूप तब तक समाप्त नहीं होती जब तक कि वह परिपूर्ण जलाशय समुद्र में मिलकर स्वयं भी उसी रूप में परिणत नहीं हो जाता। जल आरम्भ में भी पूर्ण था, भाप बन कर अपूर्णता उसे प्राप्त हुई तो उसे दूर करने का प्रयत्न अनेक हलचलों के रूप में दृष्टिगोचर होने लगा। इसी हलचल का नाम सृष्टि क्रम है। इसे अशान्ति भी कह सकते हैं। मिलन ही इस अशान्ति का उद्देश्य है और जब अपूर्णता दूर होकर पूर्णता की उपलब्धि हो जाती है तो दौड़ धूप भी समाप्त हो जाती है और अशान्ति भी।
मानव जीवन का यही क्रम है। नियति की व्यवस्था ने उसे केन्द्रीय परिपूर्णता से बिछुड़ा दिया है। अब उसके सामने एक ही कार्यक्रम रह जाता है कि तेजी के साथ पुनः केन्द्र की ओर दौड़े और अपनी अपूर्णता को समाप्त कर पूर्णता में विलय हो जाय। इसी को जीवन लक्ष कहते हैं। मुक्ति, पूर्णता, ब्रह्म निर्वाण आदि भी इसे ही कहा गया है।
प्रेम और आनन्द का उद्गम—
बिछुड़ने की कष्टकर प्रक्रिया इसलिए चली कि जीव मिलन के आनन्द का आस्वादन कर सके। माता अपने शरीर का रक्त माँस एकत्रित करके पेट में एक नन्हें शिशु की रचना करती है। जब तक वह शिशु रक्त माँस के रूप में था या भ्रूण बन रहा था, तब तक उसमें कोई विशेष आकर्षण न था पर जब वह गर्भ परिपक्व होकर शरीर से बाहर निकल गया, बिछुड़ गया और माँ-माँ कह कर पुनः अपनी माँ की गोद में आने के लिए विलाप करने लगा तो प्रेम भावना की लहरें उठने लगीं। माता उस बच्चे को छाती से लगा लेती है और उसके साथ मिलन का असीम आनन्द और प्रेम अनुभव करती है। बच्चे को भी माँ के बिना चैन नहीं पड़ता। बिछुड़न ने मिलन की प्रेरणा दी और जैसे ही उसका प्रयत्न आरम्भ हुआ कि प्रेम बरसने लगा।
आत्मीय जन जब कभी बिछुड़ने के बाद पुनः मिलते हैं तो उस मिलन बेला में अत्यधिक आनन्द अनुभव होता है। पति-पत्नी दूर-दूर रहते हों और बहुत दिन बाद वे मिलते हैं तो उनके आनन्द की सीमा नहीं रहती है। कोई भी प्रेम संबंधी हो परस्पर मिलते हुए सभी को प्रसन्नता होती है। कई बार तो यह आनन्द इतना बढ़ा-चढ़ा होता है कि इसके लिए लोग आवश्यक कार्यों को भी छोड़ कर उस सहचर-आनन्द में निमग्न बने रहते हैं। कई छात्र पढ़ाई छोड़ कर यार, दोस्तों के साथ मटरगश्ती में बहुत सारा समय लगा देते हैं। कारण एक ही है कि जहाँ कहीं भी प्रेम, एकता और आत्मीयता का दर्शन होगा वहीं मनुष्य शान्ति और सन्तोष प्राप्त करेगा।
ईश्वर प्राप्ति और ईश्वर भक्ति के लिए सच्चे मन से प्रयत्न करने वालों को असीम आनन्द की अनुभूति होती है। क्योंकि परमात्मा ही आत्मा का उद्गम केन्द्र, सजातीय और सच्चा स्नेही सम्बन्धी है। साँसारिक प्रियजनों के साथ उठने-बैठने में जीव को इतना आनन्द आता है तो आत्मिक और वास्तविक प्रिय-प्रेमी परमात्मा के सान्निध्य में आनन्द क्यों नहीं आना चाहिए? जिनका मन उपासना में लगता नहीं, या जिन्हें आनन्द नहीं आता समझना चाहिए कि इन्होंने उपासना के तत्वज्ञान, आदर्श और विधान को अभी समझा ही नहीं है। पूजा का कर्मकाण्ड तो कई व्यक्ति पूरा करते रहते हैं पर उपासना में आनन्द की अनुभूति उन भावनाओं पर निर्भर रहती है जो दो बिछुड़े हुओं को जोड़ने के लिए आवश्यक है।
लघु से महान बनने के लिए—
इस लेख माला के अंतर्गत आगे किसी अंक में यह बतावेंगे कि उपासना के समय अलौकिक आनन्द की अनुभूति का लाभ किस प्रकार मिल सकता है। अभी इन पंक्तियों में तो इतना ही बताना है कि इस संसार के जड़ चेतन प्रत्येक पदार्थ का कार्यक्रम वियोग दूर करके संयोग का आनन्दमय मिलन प्राप्त करना है। धातुओं की खानों का पता लगाने वाले अन्वेषक मिट्टी में मिले हुए धातु कणों की चाल और दिशा का हिसाब लगा कर यह निर्धारित करते हैं कि यहाँ से कितनी दूरी पर, किस दिशा में, किस धातु की कितनी बड़ी खान होनी चाहिए। बात यह है कि मिट्टी में हर धातु के कण मिले होते हैं। वे कण किसी सूक्ष्म आकर्षण शक्ति से खिंचते हुए धीरे-धीरे अपने आप किसी दिशा में सरकते रहते हैं। धातु की बड़ी खान जहाँ होती है वहाँ से अपने सजातीय कणों को खींचने की एक चुम्बकीय विद्युत धारा काम करती रहती है। उसी के खिंचाव से धातुओं के कण अपनी-अपनी जाति की धातुओं की ओर सरकते चले जाते हैं और उनके इकट्ठे होते रहने से खानों में धातुओं की मात्रा निरन्तर बढ़ती रहती है।
उन्नति और प्रगति के आधार—
आत्मा को मिट्टी में मिला हुआ धातु कण कहा जाय तो परमात्मा को एक विशाल खान कहा जायगा। छोटा अणु जब तक रेत में मिला रहता है, तब तक उसका कोई मूल्य और महत्व नहीं रहता, पर जब वह घिसटते-घिसटते खान में सम्मिलित हो जाता है तो उसका अस्तित्व सभी की दृष्टि में आता है और उस एकत्रित पदार्थ का उपयोग भी बहुत भारी होता है। आत्मा जब परमात्मा के समीप पहुँचती है, तो उसमें ईश्वरीय तत्वों की इतनी मात्रा बढ़ जाती है कि मनुष्य भी ईश्वर जैसा दीखता है। ऋषियों और महापुरुषों में इसी प्रकार की ईश्वरीय विशेषता रहती है। यह समीपता बढ़ते बढ़ते जीव अन्ततः जीवनमुक्ति का ही अधिकारी बन जाता है।
आत्मा और परमात्मा की एकता के साथ-साथ जिस परमानन्द एवं ब्रह्मानन्द की प्राप्ति होती है, उसे पाकर जीवन धन्य बन जाता है। इस एकता के लिए जहाँ उपासना साधना और भावना का अवलम्बन करना आवश्यक होता है। वहाँ यह भी अनिवार्य है कि जीवन की गतिविधियाँ पृथकतावादी नहीं वरन् एकतावादी हों। आध्यात्म और अनात्मा, पुण्य और पाप, धर्म और अधर्म, उचित और अनुचित का निर्णय इसी आधार पर होता है कि उसके मूल में एकता की ओर बढ़ने न बढ़ने की कितनी भावना सन्निहित है। नीति, धर्म और आचार शास्त्र का समस्त विधि विधान इस एक तथ्य को ध्यान में रखकर ही रचा गया है।
विराट ब्रह्म का साक्षात्कार—
समाज को विराट ब्रह्म का स्वरूप माना गया है। गीता में अर्जुन को, रामायण में काकभुसुंडि और कौशल्या को, भागवत में यशोदा को भगवान ने अपना विराट् रूप दिखाया है। वह समस्त विश्व ब्रह्माण्ड ही तो है। यह सारा संसार भगवान का ही रूप है, इस मान्यता को अन्तरात्मा में स्थिर कर लेने पर हर घड़ी परमात्मा के दर्शन हो सकते हैं और साथ ही वह आनन्द उल्लास भी अनुभव हो सकता है जो परमात्मा का दर्शन करते हुए होना चाहिए। इस भावना के अनुसार व्यक्ति का यही कर्तव्य निर्धारित होता है कि वह हर पदार्थ और हर प्राणी के प्रति सद्भावना रखे और हरेक से सद्व्यवहार बरते। विचारणा और क्रिया का यह स्तर धर्म और सदाचार, पुण्य और परमार्थ ही कहलाता है।
संगठन और एकता से प्राप्त होने वाले लौकिक लाभों से सभी परिचित हैं। मिल-जुल कर काम करने से, प्रेम और आत्मीयता की भावना रखने से, संगठित और समूहबद्ध रहने से अगणित प्रकार के शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक लाभ प्राप्त होते हैं इसकी जानकारी हम सब को है ही। इसलिए हर मंच से, विचार-शील व्यक्ति यही कहते रहते हैं कि हमें संगठित होना चाहिए, एकता रखनी चाहिए। कलियुग में तो संघशक्ति को ही प्रधान माना गया है। “संघशक्ति कलौयुगे” का मंत्र सभी की विचारणा में मौजूद है। तिनके मिल कर मजबूत रस्सी और कमजोर सींकें मिलकर बुहारी बनने का उदाहरण देकर हम लोग एक दूसरे को समझाते रहते हैं कि फूट और पृथकता से हानि एवं संगठन और एकता से लाभ है। इस उद्देश्य के लिए अनेकों संस्थाएं भी काम करती हैं। प्राचीन काल में धर्म सम्प्रदायों का भी यही उद्देश्य था।
संगठन और एकता का आदर्श—
मानव जीवन को लौकिक सुविधा और सुरक्षा के लिए एकता की भावना जितनी आवश्यक है आत्मिक लक्ष को प्राप्त करने के लिए उसकी और भी आवश्यकता है। व्यक्ति जितना ही पृथकतावादी, संकीर्ण, स्वार्थी, होगा, उतनी ही पाप वृत्ति उसे घेरे रहेगी। जिसे अपना ही मतलब है, जो अपने ही लाभ और स्वार्थ की बात सोचता रहता है, उसे दूसरों के प्रति प्रेम और दर्द क्यों होगा? ऐसा व्यक्ति अपने लाभ के लिए दूसरों का कुछ भी अहित कर सकता है। माँसाहार, चोरी, ठगी, हत्या, बेईमानी, धोखेबाजी आदि पापकर्मों के पीछे कर्ता की स्वार्थपरता और संकीर्णता ही प्रधान रहती है। यदि दूसरे लोग भी अपने ही आत्मीय, स्वजन सम्बन्धी एवं भगवान के प्रतिनिधि दीखने लगें, सब में अपनी ही आत्मा दिखाई पड़े तो यह संभव नहीं कि मनुष्य कोई दुष्कर्म कर सके। संकीर्णता एवं स्वार्थपरता ही समस्त प्रकार के कुकर्म कराती है। लोभी और कंजूसों में एक ही दुर्गुण होता है कि वे केवल अपनी ही बात सोचते रहते हैं। कई आध्यात्मवादी कहलाने वाले सज्जन भी इसी श्रेणी में जा बैठते हैं, उनकी भावना भी संसार को भाड़ में जाने देकर अपनी मुक्ति प्राप्त करने की रहती है। ऐसे लोग मुक्ति तो दूर अपना लौकिक जीवन भी सफल बनाने में समर्थ नहीं हो सकते।
‘मैं’ नहीं ‘हम सब’—
समाजवाद और साम्यवाद के सिद्धान्तों में
इस बात पर जोर दिया गया है कि व्यक्ति की योग्यता एवं कमाई का लाभ सारा समाज उठावे। व्यक्तिगत प्रतिभा एवं क्षमता अधिक होने पर भी उससे उत्पन्न लाभों से वह व्यक्ति ही लाभान्वित न हो वरन् सारा समाज एक है इसलिए दूसरों को भी उसका लाभ मिले। अन्य बातों में इन वादों से मतभेद हो सकता है पर इतना अंश तो आध्यात्मिक आदर्शों की ही पुष्टि करता है कि व्यक्ति की सीमा उसके निज के छोटे दायरे में नहीं वरन् विश्व हित के व्यापक तथ्य से जुड़ी हुई है। व्यक्ति अपनी योग्यता चाहे जितनी बढ़ावे, उत्पादन चाहे जितना करे पर यह न सोचे कि इसका लाभ मुझे ही मिलना चाहिए। विचारणा और क्रिया आरम्भ करने से पूर्व यह सोचा जाना चाहिए कि इसका प्रभाव दूसरों पर क्या पड़ेगा? विश्व हित की दृष्टि से मेरे विचार और कार्यों की क्या प्रतिक्रिया होगी?
दुष्कर्मों का आधार व्यक्तिगत संकीर्णता और स्वार्थपरता ही है। जब तक यह दुष्प्रवृत्तियाँ मनोभूमि में जड़ जमाये रहेंगी तब तक मनुष्य प्रकट न सही तो गुप्त रूप से, एक प्रकार से न सही तो दूसरे प्रकार से दुष्कर्म करता रहेगा और उसकी गतिविधियाँ संसार में विक्षोभ एवं सन्ताप उत्पन्न करती रहेंगी।
शाँति और समृद्धि का राजमार्ग—
जीवन का लक्ष पृथकता, बिछुड़न से पीछा छुड़ा कर प्रेम और एकता की ओर अग्रसर होना है ताकि बिछुड़ा हुआ आत्मा अपने उद्गम परमात्मा के समीप पहुँच कर मिलन का आनन्द लाभ कर सके। इसके लिए वे उपासना उपयोगी होती हैं जो जीव और ईश्वर की एकता अनुभव कराने में समर्थ होती हैं। साथ ही यह भी आवश्यक है कि व्यक्ति का जीवनक्रम एकता के आदर्शों के अनुकूल रहे। हम सब ईश्वर के अमर पुत्र आपस में भाई बहिन हैं। परस्पर प्रेम और एकता की भावना से ओत-प्रोत सामूहिक हित के सत्कार्य करने और सद्भाव रखने से ही तो वह स्वार्थपरता-हृदयों की वह दूरी समाप्त हो सकती है जो इस संसार में विभिन्न प्रकार के उपद्रव आये दिन खड़े करती रहती है।
शान्ति और सृष्टि के लिए, सद्गति और जीवन मुक्ति के लिए एक ही मार्ग है, ईश्वरीय सृष्टि विधान के अनुसार भगवत् इच्छा के अनुसार आचरण करना। भगवान ने अपने से जीवों को पृथक करके उन्हें तेजी से अपनी ओर दौड़ कर आने का खेल रचा है। इसी खेल को हम समझें। उसकी इच्छा पूर्ण करें। अपनी संकीर्णता छोड़ें। जो कुछ चारों ओर दिखाई पड़ता है उसके साथ एकता और आत्मीयता अनुभव करें और विश्व विराट के लिए अपनी अहंता और संकीर्णता का आध्यात्मिक उत्सर्ग करते चलें। यह उत्सर्ग ही जीवन लक्ष की प्राप्ति का मूल्य है। जो उसे चुकाने को तैयार है उसके लिए अभीष्ट वस्तु का प्राप्त कर सकना कुछ भी कठिन नहीं रह जाता है।
पेशवाओं के जमाने में एक न्यायाधीश थे—रामशास्त्री प्रभुण। राघोवा ने अपने भतीजे का खून किया, जो पेशवा था। रामशास्त्री पेशवाओं के न्यायाधीश थे। उनकी तनख्वाह पाते थे। राघोवा पेशवा ने उन्हें अपने दरबार में बुलाया। पेशवा की रानी ने उनसे पूछा कि पेशवा ने प्रत्यक्ष खून किया है, अब तुम क्या करना चाहते हो? रामशास्त्री ने कहा कि न्यायासन पर बैठ कर मैं एक ही चीज सीखा हूँ कि इस राज्य में जो कोई दूसरे का खून करेगा, उसे देहान्त प्रायश्चित्त करना चाहिए। रानी ने दुबारा, तिबारा वही सवाल पूछा और उन्होंने हर बार देहान्त प्रायश्चित्त की ही बात कही। रानी ने कहा कि क्या तुम जानते हो कि हम तुम्हारी जीभ काट सकते हैं, तुम्हारे शरीर की बोटी-बोटी काट सकते हैं, तुम्हें काल-कोठरी में बन्द कर सकते हैं। राम शास्त्री ने जवाब दिया कि प्राणों के मोह के कारण मेरे मुँह से न्याय विरुद्ध कोई कमजोरी का शब्द निकलने से पहले अच्छा होगा कि आप इस जीभ को कटवा लें।
परमात्मा ने मनुष्य को अन्य प्राणियों की अपेक्षा विशेष बुद्धि शक्ति दी है। इस संसार में जितनी भी महत्वपूर्ण शक्तियाँ हैं उनमें बुद्धि, शक्ति, ही सर्वोपरि है। मानव जाति की अब तक की इतनी उन्नति के पीछे उसकी बौद्धिक विशेषता का चमत्कार ही सन्निहित है।
इतनी बड़ी शक्ति देकर मनुष्य को परमात्मा ने कुछ उत्तरदायित्वों में भी बाँधा है ताकि दी हुई शक्ति का दुरुपयोग न हो। इन उत्तरदायित्वों का नाम है—कर्तव्य-धर्म।
नियंत्रण की आवश्यकता—
रेलगाड़ी के एंजिन में विशेष शक्ति होती है, यह अपने मार्ग से भटक पड़े तो अनर्थ उत्पन्न कर सकता है। इसलिये जमीन पर दो पटरी बिछा दी गई हैं और ऐंजिन को उसी पर चलते रहने की व्यवस्था बनाई गई है। बिजली में बहुत शक्ति रहती है वह शक्ति इधर-उधर न बिखर पड़े इसलिये उसका नियंत्रण रखना आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह प्रबन्ध किया गया है कि बिजली तार में ही होकर प्रवाहित हो और वह तार भी ऊपर से ढका रहे। नहर में पानी की तेज धारा बहती है। उस पानी को नियंत्रण में न रखा जाए तो उससे गाँव के गाँव डूब सकते हैं। इस खतरे की सुरक्षा के लिए नहर की दोनों पटरियाँ काफी चौड़ी और काफी मजबूत बनाई जाती हैं। हर शक्तिशाली तत्व पर नियन्त्रण आवश्यक होता है। अनियन्त्रित रहने देने पर तो शक्तिशाली वस्तुएँ अनर्थ ही पैदा कर सकती हैं। मनुष्य को यदि परमात्मा ने नियन्त्रित न रखा होता, उस पर धर्म कर्तव्यों का उत्तरदायित्व न रखा होता तो निश्चय ही मानव प्राणी इस सृष्टि का सबसे भयंकर, सबसे अनर्थकारी प्राणी सिद्ध हुआ होता।
अशक्त या स्वल्प शक्ति वाले पदार्थ या जीव अनियन्त्रित रह सकते हैं। क्योंकि उनके द्वारा बहुत थोड़ी हानि की सम्भावना रहती है। फिर जिनकी वे हानि कर सकते हैं उन्हें अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक शक्ति मिली होती है। इसलिए उस स्वच्छन्दता में नियन्त्रण और सन्तुलन का एक नियम काम करता रहता है। कीड़े, मकोड़े, मक्खी, मच्छर, कुत्ता, बिल्ली-प्रभृति छोटे जीवों पर कोई बन्धन नहीं रहते पर बैल, घोड़ा, ऊँट, हाथी, आदि बड़े जानवरों को नाक की रस्सी [नाथ], लगाम, नकेल, अंकुश आदि के आधार पर नियन्त्रण रखा जाता है, यदि यह प्रतिबन्ध न हो तो वह शक्तिशाली जानवर लाभकारक सिद्ध होने की अपेक्षा हानि ही उत्पन्न करेंगे।
उच्छृंखलता के दुष्परिणाम—
अनियन्त्रित मनुष्य कितना घातक हो सकता है इसकी कल्पना मात्र से सिहरन होती है। जिन असुरों, दानवों, दस्युओं, दुरात्माओं के कुकृत्यों से मानव सभ्यता कलंकित होती रही है वे शक्ल सूरत से तो मनुष्य ही थे पर उन्होंने स्वेच्छाचार अपनाया, मर्यादाओं को तोड़ा, न धर्म का विचार किया, न कर्तव्य का। शक्तियों के मद में जो कुछ उन्हें सूझा, जिसमें लाभ दीखा वही करते रहे फलस्वरूप उनका जीवन सब प्रकार घृणित और निकृष्ट बना। उनके द्वारा असंख्यों का उत्पीड़न हुआ और समाज की शाँति व्यवस्था से भारी व्यवधान उत्पन्न होता रहा। असुरता का अर्थ ही उच्छृंखलता है।
मर्यादाओं का उल्लंघन करने की घटनायें-दुर्घटना कहलाती है और उनके फल स्वरूप सर्वत्र विक्षोभ ही उत्पन्न होता हैं। सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी सभी अपनी नियत कक्षा और धुरी पर घूमते हैं, एक दूसरे के साथ आकर्षण शक्ति में बँधे रहते हैं। और एक नियत व्यवस्था के अनुरूप अपना कार्यक्रम जारी रखते हैं। यदि वे नियत नियन्त्रण को तोड़कर स्वेच्छाचार बरतने की चेष्टा करें तो उसका परिणाम प्रलय हो सकता है। यह ग्रह मार्ग में भटक जायेंगे और एक दूसरे से टकराकर विनाश की प्रक्रिया उत्पन्न कर देंगे। मनुष्य भी जब अपने कर्तव्य मार्ग से भटकता है तो अपना ही नहीं दूसरे अनेकों का भी नाश करता है।
मार्गदर्शक अंतः चेतना—
परमात्मा ने हर मनुष्य की अन्तरात्मा में एक मार्गदर्शक चेतना की प्रतिष्ठा की है जो उसे उचित कर्म करने की प्रेरणा एवं अनुचित करने पर भर्त्सना करती रहती है। कर्तव्य पालन के कार्य धर्म या पुण्य कहलाते हैं, उनके करते ही तत्क्षण करने वाले को प्रसन्नता एवं शान्ति का अनुभव होता है। इसके विपरीत यदि स्वेच्छाचार बरता गया है, धर्म मर्यादाओं को तोड़ा गया है, स्वार्थ के लिए अनीति का आचरण किया गया है, तो अन्तरात्मा में लज्जा, संकोच, पश्चाताप, भय और ग्लानि का भाव उत्पन्न होगा। भीतर ही भीतर अशान्ति रहेगी और ऐसा लगेगा मानो अपना अन्तरात्मा ही अपने को धिक्कार रहा है। इस आत्मप्रताड़ना की पीड़ा को भुलाने के लिये अपराधी प्रवृत्ति के लोग नशेबाजी का सहारा लेते हैं। फिर भी चैन कहाँ, पाप वृत्तियाँ जलती हुई अग्नि की तरह हैं। जो पहले वहीं जलन पैदा करती है जहाँ उसे स्थान मिलता है।
शरीर में क्षय, उपदंश, दमा, गठिया, कुष्ठ लकवा आदि रोग हो जाने पर स्वास्थ्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। अशान्ति और बेचैनी बनी रहती है। रुग्ण शरीर को लेकर मनुष्य कुछ कर नहीं पाता घर वाले परेशान होते हैं, आर्थिक स्थिति बिगड़ती है और यदि रोग की स्थिति सुधरे नहीं तो जीवन भार रूप हो जाता है। शरीर की तरह ही मन में भी कई रोग उत्पन्न होते हैं और वे सारे मानसिक संस्थान की स्वस्थता को नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं। आत्म प्रताड़ना सबसे बड़ी मानसिक व्याधि है। जिसका मन अपने दुष्कर्मों के लिये अपने आपको धिक्कारता रहेगा वह कभी भी आन्तरिक दृष्टि से सशक्त न रह सकेगा। उसे अनेक मानसिक दोष दुर्गुण घेरेंगे और धीरे-धीरे अनेक मनोविकारों से ग्रस्त होता जायगा।
अनिद्रा, दुःस्वप्न, चिड़चिड़ापन, आवेश, उत्तेजना, क्रोध, चिन्ता, भय, ईर्ष्या, आशंका, संशय अविश्वास, आलस, निराशा आदि कितने ही मानसिक रोग आत्म प्रताड़ना की व्यथा से पीड़ित मनुष्य को लग जाते हैं। पाप कर्मों के लिए अपना अन्तरात्मा जिसे धिक्कारता और प्रताड़ित करता रहता है वह मनुष्य सोते जागते कभी चैन नहीं पा सकता। दमा और दर्द के रोगों की भाँति पापी को भी न रात में न दिन में कभी चैन मिलता है। भीतर ही भीतर अपने आप ही अपनी शान्ति को कुतरता रहता है।
आत्म प्रताड़ना और अशाँति—
मर्यादाओं का उल्लंघन करके लोग तात्कालिक थोड़ा लाभ उठाते देखे जाते हैं। दूरगामी परिणाम को न सोचकर लोग तुरन्त के लाभ को देखते हैं। बेईमानी से धन कमाने, दम्भ से अहंकार बढ़ाने और अनुपयुक्त भोगों के भोगने से जो क्षणिक सुख मिलता है वह परिणाम में भारी विपत्ति बनकर सामने आता है। मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर डालने और आध्यात्मिक महत्ता एवं विशेषताओं को समाप्त करने में सबसे बड़ा कारण आत्म प्रताड़ना है। ओले पड़ने से जिस प्रकार खेती की फसल नष्ट हो जाती है उसी प्रकार आत्म प्रताड़ना की चोटें पड़ते रहने से मन और अन्तःकरण के सभी श्रेष्ठ तत्व नष्ट हो जाते हैं और ऐसा मनुष्य प्रेत पिशाचों जैसी श्मशान मनो भूमि लेकर निरन्तर विक्षुब्ध विचरता रहता है।
धर्म कर्तव्यों की मर्यादा को तोड़ने वाले उच्छृंखल, कुमार्गगामी मनुष्य की गतिविधियों को रोकने के लिए उन्हें दण्ड देने के लिए समाज और शासन की ओर से जो प्रतिरोधात्मक व्यवस्था हुई है, उससे सर्वथा बचे रहना सम्भव नहीं। धूर्तता के बल पर आज कितने ही अपराधी प्रवृत्ति के लोग सामाजिक भर्त्सना से और कानूनी दण्ड से बच निकलने में सफल होते रहते हैं पर यही चाल सदा सफल होती रहेगी ऐसी बात नहीं है। असत्य का आवरण अनन्तः फटता ही है और अनीति अपनाने वाले के सामने न सही पीछे उसकी निन्दा होती ही है। जन-मानस में व्याप्त घृणा का सूक्ष्म प्रभाव उस मनुष्य पर अदृश्य रूप से पड़ता है जिससे अहितकर परिणाम ही सामने आते हैं। राजदण्ड से बचे रहने के लिये ऐसे लोग रिश्वत में बहुत खर्च करते हैं, निरन्तर डरे और दबे रहते हैं, उनका कोई सच्चा मित्र नहीं रहता। जो लोग उनसे लाभ उठाते हैं वे भी भीतर-ही-भीतर घृणा करते हैं और समय आने पर शत्रु बन जाते हैं। जिनकी आत्मा धिक्कारेगी उसके लिए देर सवेर में सभी कोई धिक्कारने वाले बन जायेंगे। ऐसी धिक्कार एकत्रित करके यदि मनुष्य जीवित रहा तो उसका जीवन न जीने की बराबर है।
कर्तव्य समझे, उत्तरदायित्व, निबाहें—
नियंत्रण में रहना आवश्यक है। मनुष्य के लिये यही उचित है कि वह ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करे। अपने उत्तरदायित्वों को समझे और कर्तव्यों को निबाहे। नीति, सदाचार और धर्म का पालन करते हुए सीमित लाभ में सन्तोष करना पड़ सकता है, गरीबी और सादगी का जीवन बिताना पड़ सकता है, पर उसमें चैन अधिक है। अनीति अपना कर अधिक धन एकत्रित कर लेना सम्भव है पर ऐसा धन अपने साथ इतने उपद्रव लेकर आता है कि उनसे निपटना भारी त्रासदायक सिद्ध होता है। दम्भ और अहंकार का प्रदर्शन करके लोगों के ऊपर जो रौब जमाया जाता है उससे आतंक और कौतूहल हो सकता है पर श्रद्धा और प्रतिष्ठा का दर्शन भी दुर्लभ रहेगा। विलासिता और वासना का अनुपयुक्त भोग भोगने वाला अपना शारीरिक, मानसिक और सामाजिक सन्तुलन नष्ट करके खोखला ही बनता जाता है। परलोक और पुनर्जन्म को अन्धकारमय बनाकर आत्मा को असन्तुष्ट और परमात्मा को अप्रसन्न रखकर क्षणिक सुखों के लिये अनीति का मार्ग अपनाना किसी भी दृष्टि से दूरदर्शिता नहीं कहा जा सकता।
बुद्धिमत्ता इसी में है कि हम धर्म का, कर्तव्य पालन का महत्व समझें, सदाचार की मर्यादाओं का उल्लंघन न करें। स्वयं शान्तिपूर्वक जिएं और दूसरों को सुख पूर्वक जीने दें। यह सब नियंत्रण की नीति को अपनाने से ही सम्भव हो सकता है। कर्तव्य और धर्म का अंकुश परमात्मा ने हमारे ऊपर इसी लिए रखा है कि सन्मार्ग के भटके नहीं। इन नियंत्रणों को तोड़ने की चेष्टा करना अपने और दूसरे के लिये महती विपत्तियों को आमन्त्रित करने की मूर्खता करना ही गिना जायगा।
& & & मैं आपकी पत्नी हूँ, आपकी प्रेयसी हूँ, आपकी माता हूँ, आपकी बहन हूँ, आपकी मित्र हूँ & & & मैं इसलिए बनाई गयी थी कि मैं दुनिया की सौम्यता, आश्वासन, गम्भीरता, सुन्दरता और प्रेम दे सकूँ। लेकिन मैं देखती हूँ कि मेरे अस्तित्व के इस उद्देश्य की पूर्ति करना मेरे लिए उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है। सिनेमा और टेलीविजन वाले तथा विज्ञापनबाज मेरी जो अन्य विशेषताएँ और गुण है, उन सबको भुलाकर मेरा इस्तेमाल केवल एक ही काम के लिए कर रहे हैं—कामोत्तेजन के लिए & & & इसके कारण मैं अपमानित हुई हूँ, इसने मेरी आबरू को नष्ट कर दिया है, इसके कारण मैं वह बन सकने में असमर्थ हूँ, जो आप चाहते हैं कि मैं बनूँ—सुन्दरता, प्रेरणा और प्रेम का स्रोत। प्रेम की मूर्ति—मेरे बच्चों के लिये, मेरे पति के लिये, मेरे परमेश्वर के लिए! मैं & & & मैं फिर से मेरा सही स्थान प्राप्त करने में आपकी मदद चाहती हूँ, ताकि जिस उद्देश्य के लिए मेरा सर्जन हुआ है, उसको मैं पूरा कर सकूँ।
पौधा तब बढ़ता है जब उसे खाद और पानी दोनों ही उचित मात्रा में मिलते रहें। यदि बीज ऐसी जमीन में बोया जाय जिसमें उर्वरा शक्ति न हो, खाद का अंश न मिला हो तो अच्छा बीज होते हुए भी वह उगेगा नहीं। इसी प्रकार जमीन में खाद का आवश्यक अंश होने पर उगे हुए पौधे को यदि पानी न मिले तो भी वह बढ़ न सकेगा और मुरझा कर सूख जायगा। इसी प्रकार सुसंस्कारों का पौधा ज्ञान रूपी खाद और कर्म रूपी पानी पाकर बढ़ता है। दोनों में से एक की भी कमी रह जाय तो अन्तरात्मा में सन्निहित सुसंस्कारों को विकसित होने का अवसर न मिलेगा।
दोनों पैर ठीक हों तो चलने की क्रिया में बाधा नहीं पड़ती, दोनों हाथ ठीक हों तो प्रस्तुत कामों को ठीक तरह करते रहना बन पड़ता है। यदि एक या दोनों पैर न हों तो चलने में भारी बाधा पड़ेगी। इसी प्रकार जिसके एक या दोनों हाथ न हों तो काम-काज कठिनाई से ही कर सकेगा। आत्मिक उन्नति के लिए दान और कर्म का वही महत्व है जो चलने के लिए पैरों और करने के लिये हाथों का। लंगड़े लूले आदमी भी कुछ तो काम चलाते ही हैं पर सर्वांगपूर्ण स्वस्थ होने पर जो सम्भव था वह कहाँ हो पाता है? आत्मोन्नति की प्रक्रिया सद्ज्ञान और सत्कर्म के अभाव में अस्त-व्यस्त ही रहती है।
मानवीय चेतना में जो सत् तत्व है इसके विकास का विधिवत् प्रयत्न करना पड़ता है। इस प्रयत्न में कमी रहती है तो प्रगति का द्वार रुका ही पड़ा रहता है। दर्पण के आगे जिस प्रकार की आकृति आती है वैसा ही प्रतिबिम्ब दीखने लगता है। मानवीय चेतना को जैसे व्यक्तियों जैसी परिस्थितियों के सान्निध्य में रहना पड़ता है वह वैसा ही बन जाती है। कसाई के घर में उत्पन्न हुआ बालक बड़ा होते-होते अपने घर का व्यवसाय सीखकर बिना किसी लज्जा या घृणा के छुरी चलाने लगता है। पुजारी ब्राह्मण के बालक में सेवा पूजा के संस्कार पड़ते हैं और वयस्क होने पर उसके गुण, कर्म, स्वभाव अपने घर वालों जैसे ही ढलने लगते हैं। कसाई का बालक और पुजारी का बालक गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से परस्पर कितने विपरीत हैं! इसे देखकर यह निष्कर्ष सहज ही निकाला जा सकता है कि मनुष्य को जिन परिस्थितियों में रहना पड़ता है उधर ही उसकी प्रगति होने लगती है।
आन्तरिक प्रगति सही दिशा में होती रहे इसके लिये बहुत सावधानी के साथ प्रयत्न करने पड़ते हैं। तत्वदर्शी ऋषियों ने इस संदर्भ में एक साँगोपाँग जीवन दर्शन, नीति-शास्त्र एवं आचार संहिता का सुव्यवस्थित आधार निर्धारित किया है, उस निर्धारणा का नाम है—’संस्कृति’। संस्कृति का तात्पर्य ज्ञान और कर्म की उस व्यवस्था से है जो मानवीय चेतना को स्वस्थ दिशा से विकसित करने के लिए खाद पानी की तरह आवश्यक एवं उपयोगी सिद्ध होती है।
मनुष्य अपने मानवीय आदर्शों के अनुरूप व्यवस्थित एवं विकसित हो, इसके लिए उसे संस्कृति का आधार लेना पड़ता है। विभिन्न देशों और जातियों की अपनी विशेषताओं और परिस्थितियों के कारण, संस्कृति के बाह्य कलेवर में अन्तर देखा जाता है। पूर्व और पश्चिम के देशों में संस्कृति का बाह्य स्वरूप भिन्न देखा जाता है। रीति, रिवाज, पहनाव, उढ़ाव, पूजा, पाठ एवं रहन-सहन के तरीकों में अन्तर होते हुए भी विश्व संस्कृति का मूल आधार सर्वत्र एक ही देखा जाता है। सत्-ज्ञान और सत्-कर्म इन दो को प्रत्येक संस्कृति में वही स्थान प्राप्त है जो अनेक आकार प्रकार में बने हुए मकानों में ईंट चूने को। ईंट चूना हर इमारत का आधार होता है, उनके डिजाइन आवश्यकता और अभिरुचि के अनुरूप बदलते रहते हैं।
यदि सद् विचारों को मस्तिष्क और अन्तःकरण में स्थान देने के लिए प्रयत्न न किया जायगा तो अपने जन्म जन्मान्तरों के संग्रहीत कुसंस्कार और आस पास के अनैतिक आकर्षण प्रभाव डालते रहेंगे और मनोभूमि दिन-दिन दूषित होती चली जायगी। शरीर में मैल भीतर से भी निकलता है और बाहर से भी जमता है। यह प्रक्रिया हमें चाहे कितनी ही अप्रिय क्यों न लगे पर जो क्रम बना हुआ है वह तो रहेगा ही। उपाय केवल यही हो सकता है कि स्नान आदि से रोज-रोज उस मैल की सफाई की जाती रहे। मन पर भी शरीर की ही भाँति मैल जमता है। अपने संग्रहीत कुसंस्कार भीतर से जोर मारते हैं और बाहरी वातावरण में बुराइयों का आकर्षण कुछ कम प्रबल नहीं है। दोनों के सम्मिश्रण से दुर्बुद्धि की एक अच्छी खासी आसुरी शक्ति उत्पन्न होती है जिसका प्रभाव मन पर धीरे-धीरे जमते रहने से आन्तरिक स्तर अधोगामी होने लगता है।
इस विपन्नता को रोकने के लिए हमें संस्कृति का अवलम्बन ग्रहण करना पड़ता है। जिस प्रकार पानी और साबुन की सहायता से कपड़े का मैल छूटता है उसी प्रकार मन पर जमे हुए मलिनता के परतों की सफाई सद्ज्ञान और सत्कर्म के आधार पर होती है।
यह सुनिश्चित है कि आन्तरिक उत्कृष्टता के आधार पर ही मनुष्य के स्वभाव में सद्गुणों को स्थान मिलता है और सद्गुणों द्वारा ही जीवन की विभिन्न दिशाओं में स्थायी प्रगति होती है। चोरी बेईमानी से कुछ लोग, कुछ समय तक, कुछ-कुछ लाभ उठा लेते हैं, पर किसी महान और चिरस्थायी सफलता का आधार यह बुराइयाँ कभी भी नहीं हो सकतीं। सज्जनता और सच्चाई में ही वह शक्ति है कि किसी व्यक्ति या व्यवसाय की उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचा जा सके और उसकी प्रतिष्ठा को चिर स्थायी बनाया जा सके। सुख, शाँति और श्री, समृद्धि की आधार शिला मनुष्य की आन्तरिक उत्कृष्टता ही होती है। इसी उपलब्धि को जीवन का सबसे बड़ा लाभ माना गया है। इस लाभ को प्राप्त करने की विधि व्यवस्था को संस्कृति कहते हैं। संस्कृति का अर्थ है—सद्ज्ञान और सत्कर्मों का संचय।
जल्दबाज लोग आत्म निर्माण की, जीवन निर्माण की प्रक्रिया को कष्टसाध्य समझकर उतावली में तत्काल लाभ देने वाली दुष्प्रवृत्तियों को अपना कर कुछ ही देर में भारी लाभ प्राप्त कर लेने की योजना बनाते रहते हैं। अनीति एवं धूर्तता के सहारे वे भारी सफलता प्राप्त कर लेने के सपने देखते हैं। पर होता यह है कि उनकी यह जल्दबाजी सफलता को ही संदिग्ध नहीं बनाती वरन् उनके व्यक्तित्व को भी नष्ट कर देती है। प्रगति का राज मार्ग एक ही है कि श्रम और सच्चाई को अपना कर धैर्य और साहस के साथ आगे बढ़ता रहा जाय। उसे छोड़कर जो पगडंडियाँ तलाश करते हैं वे खतरा उठाते हैं।
सच्ची प्रगति झूठे आधार अपनाने से उपलब्ध नहीं हो सकती। स्थायी सफलता और स्थिर समृद्धि के लिए उत्कृष्ट मानवीय गुणों का परिचय देना पड़ता है। जो इस कसौटी पर कसे जाने से बचना चाहते हैं, जो जैसे बने वैसे, तुरन्त, तत्काल बहुत कुछ प्राप्त करना चाहते हैं, उनके सपने न सार्थक होते हैं न सफल। यदि अनुपयुक्त मार्ग से चिरस्थायी सफलता सम्भव रही होती तो दुष्ट दुराचारी लोग जेलखानों, पागलखानों, शफाखानों में बन्द न दीखते, वे अपनी चतुरता के आधार उन्नति के उच्च शिखर पर विराजमान रहते।
जिस प्रकार लौकिक उन्नति का आधार आन्तरिक उत्कृष्टता के आधार पर उत्पन्न हुए सद्गुण ही होते हैं उसी प्रकार आत्मिक उन्नति साँस्कृतिक अवलम्बन पर निर्भर रहती है। ज्ञान और कर्म के द्वारा ही अन्तः चेतना को निर्मल और सूक्ष्म बनाया जाता है, तभी वह उच्च स्तरीय प्राप्ति के योग्य बन पाती है। इस राजमार्ग को छोड़कर कई व्यक्ति जल्दबाजी का उपाय खोजते हैं, पगडंडियां खोजते हैं और मृगतृष्णा में अपना बहुमूल्य समय नष्ट करते हैं। कई व्यक्ति सोचते हैं आत्म-सुधार, आत्मनिर्माण एवं आत्म-विकास का मार्ग श्रम-साध्य है, इसलिए कोई ऐसी तरकीब ढूँढ़नी चाहिए जिससे सहज ही आत्मिक-लक्ष की प्राप्ति हो जाय। गुरु कृपा, शक्तिपात, आशीर्वाद, देवता की प्रसन्नता, आदि जो साधन उन्हें सरल दीखते हैं उनकी ओर अधिक लालायित रहते हैं। इस उतावली में लाभ कम और हानि अधिक होने की सम्भावना ही बनी रहती है।
साधन, उपासना का राजमार्ग मनुष्य की अन्तः चेतना में ज्ञान और कर्म की आवश्यक प्रेरणा उत्पन्न करने के लिए ही है। ध्यान और जप के द्वारा साधक अपने स्वरूप को, आत्मा को, अपने उद्गम परमात्मा को समझने की चेष्टा करता है और दोनों की एकता का तारतम्य मिलाता है। जप के द्वारा उस विराट ब्रह्म के प्रति अपनी निष्ठा बढ़ाता है जो उच्च भूमिका में उपलब्ध होने वाली महान् अनुभूतियों का उद्गम है। जप और ध्यान के समय जिस परब्रह्म की धारणा की गई थी उसे पूजा के बाद व्यवहारिक जीवन में उतारना भी आवश्यक है। अन्यथा केवल एक नियत समय पर थोड़ा पूजा विधान या जप, ध्यान कर लेने मात्र से आत्मिक प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त न हो सकेगा। आध्यात्म केवल जप, पूजन या पढ़ने-सुनने तक सीमित न समझ जाना चाहिए। यह प्रक्रियाएँ आवश्यक हैं, पर यदि ज्ञान और कर्म का खाद पानी न मिला तो यह अध्यात्म भी फला-फूला न दिखाई देगा।
मनः क्षेत्र में सद्विचारों की मात्रा इतनी अधिक भरी रहनी चाहिए कि कुविचारों के लिए वहाँ स्थान ही न बचे। लोहे को लोहे से काटा जाता है। मनोभूमि को दूषित करने वाले विचारों का निराकरण प्रतिरोधी सद्विचारों द्वारा ही सम्भव है। इसलिए यह प्रयत्न रहना चाहिए कि स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन या जैसे भी सम्भव हो मन में केवल उत्कृष्ट कोटि की विचारधारा एवं भावना को स्थान मिले। इसी प्रकार अपने कार्यों को ऐसा निर्मल बनाया जाना चाहिए कि उनमें अनीति, छल, असत्य, पाप एवं अकर्म के लिए कोई स्थान न रहे।
भवन्तिनम्रास्तरवः फलागमै
र्नवाम्बुभिर्दूर विलम्बिनो घनः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः
स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥
वृक्ष फल आने पर झुक जाते हैं। जल भरे बादल भी नीचे हो जाते हैं। समृद्धि प्राप्त होने पर सत्पुरुष अभिमान नहीं करते, यही परोपकारियों का स्वभाव है।
ज्ञान की परिपक्वता कर्म द्वारा ही सम्भव है केवल विचार करते रहा जाय और कर्म में उन विचारों की परिणति न हो तो उससे मन बहलाव मात्र होगा। जस्ते और ताँबे के दो तारों में होकर गुजरती हुई विद्युत-धारा जब एकत्रित होती है, तो उसका चमत्कार दृष्टिगोचर होता है। ज्ञान और कर्म अलग-अलग रहें तो वे भार मात्र हैं। पर जब सद्विचार के साथ सत्कर्मों की प्रतिक्रिया बनती है तो वह कर्म-योग एक उत्तम योग साधना का रूप धारण करके आत्मकल्याण के लक्ष्य को पूर्ण करने में समर्थ हो जाता है।
हम सुसंस्कृत बनें। संस्कृति को अपनावें। जीवन लक्ष की ओर राजमार्ग में चलें। ज्ञान और कर्म की उपासना करें। आन्तरिक स्तर सुधारे और सत्प्रवृत्तियों को बढ़ावें तो ही हमारा कल्याण होगा तो ही जीवन-लक्ष की पूर्ति सम्भव बनेगी।
किसी मनुष्य के पास दूसरे को देने योग्य यदि कोई सबसे अधिक उत्कृष्ट एवं महत्वपूर्ण वस्तु हो सकती है तो वह है प्रेम—। यों आर्थिक या बौद्धिक सहायता देकर भी किसी का कुछ उपकार किया जा सकता है पर उसका लाभ स्वल्पकालीन रहता है; इसलिए उसकी प्रसन्नता भी क्षण भर ही टिकेगी। प्रेम और सद्भाव पाकर आत्मा जितनी प्रसन्नता अनुभव करती है उतनी और किसी वस्तु से नहीं करती। उपकार करने में जो त्याग करना पड़ता है उससे कई गुना प्रतिफल तब वसूल हो जाता है जब जिसके साथ उपकार किया गया था वह सच्चे हृदय से कृतज्ञता और प्रेम-भावना प्रकट करता है। यह कृतज्ञता और प्रेम भावना उपकारी को ही प्राप्त हो सकती है। इस संसार में पाप और दुष्टता की तरह प्रेम और सौजन्य भी परिपूर्ण मात्रा में भरा पड़ा है, पर उसे वे लोग प्राप्त नहीं कर सकते, जिनका मन कुटिलता और व्यवहार अनीति से भरा पड़ा है। सज्जनता, सरलता, सचाई और सहृदयता में ही वह गुण है कि सामने वाले पत्थर को भी अपने लिए मक्खन जैसा कोमल बना कर रख दे। सच्चा प्रेम प्राप्त करने के लिए सज्जनता की आवश्यकता है। सज्जन व्यक्ति को कई बार चालाक लोग ठग लेते हैं पर तो भी उसकी उदारता और भलमनसाहत के प्रति उन्हें नत-मस्तक ही होना पड़ता है। ठगाये जाने पर भी जिसने अपनी सज्जनता को नहीं छोड़ा है वह किसी भी बलिदानी वीर से कम प्रशंसनीय नहीं है।
जिसके मन में दूसरों के प्रति कोमल भावनाएं रहेंगी वे ही दूसरों का स्नेह और सम्मान प्राप्त कर सकेंगे। मतलब के लिए गधे को बाप बनाने की नीति हर कोई जानता है। खुशामद, चापलूसी, और भुलावा देने वाली मीठी बोली बोलने की कला को अब बहुत लोग जान गये हैं और दूसरों को उल्लू बना कर अपना मतलब निकालने के लिए कितने ही लोग इस हथियार का भरपूर प्रयोग भी करते हैं। क्योंकि वे जानते हैं कि हर व्यक्ति की आत्मा स्नेह, सम्मान और सद्भाव की प्यासी है। यदि वे नकली रूप में भी कहीं दिखाई पड़ते है तो भी उन्हें लुभाने के लिए उतना ही बहुत है। बहेलिये जिस प्रकार दाने डाल कर अपना जाल कबूतरों से भर लेते हैं, मछुए जिस प्रकार आटे की गोली दिखा कर मछलियाँ समेटते रहते हैं उसी प्रकार नकली प्रेम का प्रलोभन देकर कितने ही ठग दूसरों का सर्वस्व हरण कर लेते हैं इन हथकंडों के बीच एक ही सत्य छिपा हुआ है कि वह यह कि हर व्यक्ति प्रेम का प्यासा है, हर किसी सद्व्यवहार और सज्जनता की प्यास है। यह इतना प्रकट तथ्य है कि नकली प्रेम की विडम्बना बना कर वेश्याओं से लेकर प्रपंची ठगों तक सभी ने नकली मधुरता को अपने लिए एक सफलता का व्यावसायिक अस्त्र बनाया हुआ है।
इस भूतल का अमृत—
यह तो हुई नकलीपन की बात। असली रूप का आनन्द तो इतना उत्कृष्ट है कि उसकी एक बंद के बदले में मनुष्य अपना सर्वस्व निछावर कर सकता है। प्रेम की असफलता में अनेकों आत्म-हत्या करते रहते हैं, प्रेम की प्राप्ति के लिए लोग बड़े से बड़ा त्याग करते हैं। पति-पत्नी के प्रेम सम्बन्ध में तो यह बात स्पष्ट ही है। स्त्री-स्त्री और पुरुष-पुरुष में भी प्रेम भाव की गहनता होने पर एक दूसरे के लिए मर-मिटने के अवसर सहज ही आ सकते हैं। निस्सन्देह मनुष्य को अपना धन और प्राण प्रिय हैं, पर प्रेम की महानता इतनी ऊँची है कि उसके लिए इन दोनों को भी सहज ही तिलाञ्जलि दी जा सकती है।
यदि सच्चे स्नेह और सच्चे सद्भाव की कुछ बूँद मनुष्य को मिलती रहें तो वह रूखी रोटी खाकर और फटे चिथड़े पहन कर अमीरों और रईसों से अधिक आनन्द एवं गर्व अनुभव करता हुआ जीवन व्यतीत कर सकता है। परिवार के छोटे दायरे में जिसे धर्म-पत्नी की अनन्यता, बच्चों को श्रद्धा भाई का विश्वास, बहिन की ममता, माता का वात्सल्य, पिता का प्रेम, नौकर की वफादारी, प्राप्त है, उसे अगणित समस्यायें सामने रहते हुए भी अपना जीवन स्वर्गीय शान्ति से परिपूर्ण दिखाई देगा। फिर जिसके मित्र, स्वजन, परिजन, परिचित, सम्बन्धी, व्यवहारी भी ऐसा ही व्यवहार रखने लगें तब तो कहना ही क्या है। उस जीवन में हर दिशा से आनन्द ही निर्झरिणी बहती रहेगी।
हम बदलें तो दुनिया बदले-
ऐसी प्रेममयी-आत्म-भाव से परिपूर्ण परिस्थितियाँ प्राप्त कर सकना हर किसी के लिए नितान्त सरल और सम्भव है। दुनिया में हर चीज की कीमत है यहाँ बिना कीमत चुकाये कुछ भी नहीं मिलता। दूसरों का सम्मान, स्नेह, सद्भाव और सहयोग प्राप्त करने के लिए हमें वही तत्व अपने भीतर पैदा करने पड़ेंगे और उसका उपयोग दूसरों के लिए करना पड़ेगा। चुम्बक अपने में आकर्षण शक्ति न हो तो पास में पड़े हुए लौह कण भी उपेक्षा का भाव दिखाते रहेंगे, उधर अभिमुख होने की कोई चेष्टा न करेंगे।
प्रेम, प्रेम की कीमत पर खरीदा जा सकता है। वह एकाँगी भी हो सकता है। एक का सच्चा प्रेम दूसरे को कभी न कभी अपने अनुगत बना ही लेता है। बुरे लोगों को भी यदि हम प्यार करने लगें तो उनका सुधार ही होगा। आज नहीं तो कल, हारे जितना न सही उससे कम, कुछ तो प्रेम भाव उनके मन में उपजेगा और बढ़ेगा ही। सच्चे मन से किया हुआ प्रेम कभी भी निरर्थक नहीं जाता। उसके द्वारा पत्थर की मूर्तियाँ और कागज के चित्र देवता बन कर हमें आनन्द से ओत-प्रोत कर सकते हैं तो फिर हाड़-माँस वाला सजीव प्राणी प्रत्युत्तर में सर्वथा प्रेम-विहीन कैसे बना रहेगा?
यदि प्रेम के बदले प्रेम का प्रत्युत्तर न भी मिले, अपने को ठगे जाने और घाटे में रहने का अवसर आवे तो भी उसकी हानि केवल भौतिक हानि ही रहेगी। प्रेम की दिव्य अनुभूतियाँ अपने अन्तःकरण में जब उठती रहती है तो वहाँ पुष्प-वाटिका की तरह सौंदर्य और सुगन्ध का साम्राज्य छाया रहता है। उसका आनन्द तो अपने को मिलता ही है। आत्मा की सबसे प्रिय अनुभूति प्रेम है। उसका रसास्वादन होते रहने से आत्म-तृप्ति, आत्म-सन्तोष और आत्मोल्लास का जो हर घड़ी लाभ होता रहता है उसकी तुलना में यदि कुछ भौतिक हानि उठानी पड़े तो वह तुच्छ एवं नगण्य ही मानी जायगी।
प्रेम की एक-एक बूँद के लिए यह दुनिया तरस रही है। अनावृष्टि काल में पानी का जैसा अकाल रेगिस्तानों में पड़ता है वैसा ही प्रेम दुर्भिक्ष आज सर्वत्र छाया हुआ है। प्रेम के नाम पर ठगी, चापलूसी, वासना और शोषण की प्रवंचना तो खूब बढ़ी है पर सच्चा प्रेम-जिसमें आत्म-दान और निःस्वार्थ सेवा का ही समावेश होता है अब देखने को नहीं मिलता इस आध्यात्मिक विभूति के अभाव में जीवन नीरस ही बने रहते हैं। सब ओर कुछ खोया-खोया सा, सब ओर अभाव-अभाव सा ही दिखाई पड़ता है। यदि सच्चे प्रेम के कुछ कण भी किसी को प्राप्त हो जाते हैं तो सचमुच ही उसके सब अभाव पूर्ण हो जाते हैं।
हमें अपने भीतर सच्चे प्रेम की भावनाएँ जागृत करनी चाहिए, दूसरों को अपना मानना चाहिए, उन्हें आत्मीयता की दृष्टि से देखना चाहिए, फलस्वरूप हम भी सच्चे प्रेम के रसास्वादन से वंचित न रहेंगे। संसार के खेत में अपना प्रेम बीज बखेरते फिरें तो कोई-कोई पौधा उसका जरूर उगेगा और उसकी सुगंध से भी हमें आनंद और तृप्ति देने लायक बहुत कुछ मिल जायगा।
विश्व-शान्ति के दो आधार—
गहरी और स्थायी प्रसन्नता के आधार दो हैं, सत्कर्मों द्वारा उत्पन्न होने वाला अपने भीतर का आत्म सन्तोष और इससे आत्मजनों द्वारा किया हुआ अपने साथ सद्व्यवहार, आत्म सम्मान। यह मानसिक सुख है। मन का महत्व शरीर की अपेक्षा कहीं अधिक है, इसलिए इन सुखों की अनुभूति भी बहुत अधिक होती है। आत्मा की आकाँक्षा इन्हीं दो सुखों को प्राप्त करने की बनी रहती है और यदि उसकी पूर्ति नहीं होती तो उसे सब कुछ सूना-सूना लगता है और अन्तःप्रदेश में असन्तोष एवं खिन्नता की स्थिति बनी रहती है। आज उसी खिन्नता और असन्तोष से सारा मानव-समाज खिन्न बना बैठा है। आत्म सन्तोष के अभाव में जो अन्तर्द्वन्द्व चलते हैं और दूसरों के असद् व्यवहार के कारण जो विक्षोभ पैदा होते हैं वे इतने दुखदायी होते हैं कि कई बार तो उनको सहन करना कठिन हो जाता है। जो सहते हैं वे मर्मान्तक पीड़ा अनुभव करते हैं। आज ऐसी ही विपन्न मनोभूमि हम सब की बनी हुई है। हर कोई भीतर-ही-भीतर खिन्न और असन्तुष्ट दिखाई पड़ता है। भौतिक उन्नति के लिए बहुत कुछ प्रयत्न किये जाने पर, सुख सुविधा के अनेक साधन उपलब्ध कर लिये गये हैं, पर यह दुर्भाग्य की ही बात है कि मानव को स्थायी सुख शान्ति प्राप्त हो सके इस दिशा में सर्वत्र उपेक्षा ही दृष्टिगोचर होती है।
आत्म-हनन का पातक—
आत्म प्रताड़ना सबसे बड़ा दण्ड है। जिस व्यक्ति की आत्मा भीतर-ही-भीतर उसके दुष्कर्मों एवं कुविचारों के लिए कचोटती रहती है, जिसे कुमार्ग पर चलने के कारण आत्मा धिक्कारती रहती है, वह अपनी दृष्टि में आप ही पतित होता है। पतित अन्तरात्मा वाला व्यक्ति उन शक्तियों को खो बैठता है जिनके आधार पर वास्तविक उत्थान का समारम्भ सम्भव होता है। हम ऊँचे उठ रहे हैं या नीचे गिर रहे हैं इसकी एक ही परीक्षा, कसौटी हैं कि अपनी आँखों में हमारा अपना मूल्य घट रहा हैं या बढ़ रहा है। आत्म सन्तोष जिसे नहीं रहता, जो अपनी वर्तमान गतिविधियों पर खिन्न एवं असंतुलित है उसे उन्नतिशील नहीं कहा जा सकता। जिसने अपनी आन्तरिक शान्ति गँवा दी, उसे बाहर शान्ति कहाँ मिलने वाली है? धन कमा लेने से, कोई ऊँचा पद प्राप्त कर लेने से, कई प्रकार के सुख साधन खरीदे जा सकते हैं, पर उनसे आत्मसन्तोष कहाँ मिल पाता है?
सन्मार्ग पर पदार्पण—
मनुष्य की महान विचार शक्ति का यदि थोड़ा सा ही भाग आत्मसन्तोष के साधन ढूंढ़ने, और आत्म शान्ति के मार्ग को खोजने में लगे तो उसे वह रास्ता बड़ी आसानी से मिल सकता है जिस पर चलना आरम्भ करते ही उसका हर कदम आत्मिक उल्लास का रसास्वादन कराने लगे। संसार की सम्पदा भी तो लोग सन्तोष प्राप्त करने के लिए ही कमाया करते हैं फिर उस क्षणिक एवं तुच्छ सन्तोष की अपेक्षा यदि चिरस्थायी आत्मशान्ति उपलब्ध करने का अवसर जिसे मिल रहा होगा वह उल्लास, उत्साह और प्रफुल्लता का अनुभव क्यों न करेगा?
स्नेह, सद्भाव और सौजन्य—
विचार शक्ति का एक दूसरा मोड़ इस दिशा में भी दिया जाना चाहिये कि मनुष्य-मनुष्य के बीच में स्नेह, सद्भाव और सौजन्य की मात्रा निरन्तर बढ़ती रहे। हम एकाकी जीवनयापन नहीं कर सकते, हमारी आवश्यकताएँ ऐसी हैं जिनके लिए विवश होकर दूसरों से सम्बन्ध बनाना पड़ता है। एकान्त गुफाओं में रहने वाले वैरागियों को भी आसन, कमंडल, ईंधन, दियासलाई, माला, कोपीन, कम्बल, पुस्तक एवं भोजन की आवश्यकता पड़ती है। और इसके लिये उन्हें दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है। हर व्यक्ति समाज के साथ किसी-न-किसी रूप में जुड़ा हुआ है, इसलिए उसे सामाजिक सद्भाव की आवश्यकता पड़ेगी ही। द्वेष, कलह, अपमान, प्रवञ्चना, अशिष्टता, उद्दण्डता के व्यवहार की आशा हम दूसरों से नहीं करते हैं। हर किसी की स्वाभाविक इच्छा यही रहती है कि उसके साथ दूसरे लोग प्रेम सौजन्य, आदर, ईमानदारी, सम्मान, सज्जनता एवं उदारता का व्यवहार करें। प्रेम की भूख मानव-प्राणी की सबसे बड़ी भूख है। इस संसार में सबसे मधुर, सबसे आकर्षक एवं आनन्ददायक एक ही वस्तु है और वह है—प्रेम। जिसे किसी का सच्चा प्रेम नहीं मिला वह अभागा इस संसार में मरघट के ब्रह्मराक्षस की तरह अशान्त, उद्विग्न, तृषित और असंतुष्ट भ्रमण करता रहेगा। जिसे सच्चे प्रेम का एक कण भी मिल जाता है वह अपने भाग्य को सराहता है। अभाव और दरिद्रता के रहते हुए भी जिसे प्रेम के कुछ कण उपलब्ध हो जाते हैं वह अपने आपको किसी बड़े अमीर से कम सुखी नहीं मानता। माता का, पत्नी का, भाई का, मित्र का, जनता का प्रेम जिसे प्राप्त है उसे जीवन की सबसे बड़ी विभूति मिल गई यही मानना पड़ेगा।
आत्मीयता की गहराई—
प्रेम के मूल में आत्मीयता रहती है। स्वार्थ, मोह, रूप, यौवन, वासना, उपयोगिता, प्रतिभा, आदि के बाह्य आकर्षणों से भी कई बार प्रेम जैसी लगने वाली घनिष्ठता उत्पन्न हुई दिखाई देने लगती है, पर उसकी जड़ नहीं होती, इसलिये वे बाह्य कारण समाप्त होते ही वह तथाकथित प्रेम भी बालू की भीति की तरह ढह जाता है। प्रेम में गहराई, स्थिरता एवं आत्मत्याग की स्थिति तभी रहेगी जब आत्मीयता की निष्ठा का समावेश हो। जो अपना है उसके साथ त्याग, सेवा, सौजन्य, स्नेह और उदारता के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का व्यवहार नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार ईश्वर को घट-घट वासी सर्वव्यापी, निष्पक्ष और कर्मफल प्रदाता मानने वाला सच्चा आस्तिक मनुष्य कुविचारों और कुकर्मों से दूर ही रहेगा उसी प्रकार प्रेम की भावनाएँ जिसके मन में उमड़ेंगी वह दूसरों के साथ सौजन्य पूर्ण सद्व्यवहार ही करेगा, उदारता बरतेगा और स्वयं कष्ट में रहकर दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करता रहेगा। आस्तिकता और प्रेम की भावनाएँ
आयुषः क्षण एकोऽपिन लब्धः स्वर्ण कोटिभिः।
सवृथा नीयते येन तस्मै नृपशवेन मः
—व्यास
आयु का एक क्षण करोड़ों स्वर्ण मुद्राओं में भी नहीं मिल सकता। ऐसे मूल्यवान् क्षणों को जो व्यर्थ ही गँवाते हैं उन नर पशुओं को नमस्कार।
सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्
सन्तोष मूलं हि सुखं दुःखं मूलं विपर्यघ्यः
—मनु 4। 12
सुख चाहने वाला सन्तोषी बने, और अपने आपको संयम में रखे। सन्तोष ही सुख की जड़ है। असन्तोष में तो दुख ही दुख है।
जब भी विकसित होती हैं तब सदाचार और सद्व्यवहार ही उनका बाह्यरूप प्रकाश में आता है।
आत्म-सन्तोष और आत्म-सम्मान यह दो ही आत्मा की प्रधान आवश्यकता, मुख्य क्षुधाएँ हैं। उनकी तृप्ति से—उनकी पूर्ति से ही आत्मा को सच्ची तृप्ति का अनुभव होता है और वह शान्ति तथा सन्तोष उपलब्ध करती है। इन दोनों की तृप्ति पूर्णतया अपने हाथ में है। शरीर से सत्कर्म करते हुए, मन में सद्भावनाओं की धारणा करते हुए जो कुछ भी काम मनुष्य करता है वे सब आत्मसन्तोष उत्पन्न करते हैं। सफलता की प्रसन्नता क्षणिक है पर सन्मार्ग पर चलते हुए कर्तव्य पालन का जो आत्म सन्तोष है उसकी सुखानुभूति शाश्वत एवं चिरस्थायी होती है। गरीबी और असफलता के बीच भी सन्मार्गगामी व्यक्ति गर्व और गौरव का अनुभव करता है।
आत्म-सम्मान का आधार दूसरों को सम्मान देने में है। गुम्बज वाले मकानों में होने वाली प्रतिध्वनि की तरह हमें वही आवाज सुनने को मिलती है जो हमने बोली थी। यदि गाली दें तो गाली और भजन गावें तो भजन वह गुंबज वाला मकान प्रति-ध्वनि के रूप में दुहरा देता है। दर्पण में हमें अपनी ही परछांई दिखाई देती है। अपना जैसा भी कुरूप या रूपवान चेहरा होता है वही लौटकर दिखाई पड़ता है। इस संसार का व्यवहार भी गुम्बजदार मकान या दर्पण जैसा ही होता है यदि हम दूसरों का सम्मान करते हैं तो बदले में हमें सम्मान मिलते हैं। अपने मन में यदि दूसरों के प्रति प्रेम एवं आत्मीयता भरी रहे तो बदले में दूसरी ओर से भी हमें यही सब मिलेगा।
दूसरे लोगों का व्यवहार हमें सन्तोष और सम्मान प्राप्त करने वाला हो यह हर किसी की इच्छा रहती है पर वह यह भूल जाता है कि इनको प्राप्त करने के लिए हमें क्या करना होगा? मूल्य चुकाये बिना हमें संसार में कोई वस्तु नहीं मिलती। फिर परम आनन्द और तृप्ति प्रदान करने वाली यह विभूतियाँ भी हमें अनायास ही क्यों कर मिल सकेंगी? अपने कर्तव्यों द्वारा यदि उचित मूल्य चुकाने को—अपना आचरण सुधारने को तैयार रहा जाय तो कोई कारण नहीं कि आत्म-सन्तोष और आत्म सम्मान की समुचित मात्रा हमें प्राप्त न हो और आत्मा को तृप्ति की एवं प्रफुल्लता की परिपूर्ण अनुभूति का आनन्द न मिले।
=कहानी===================================================================
रूप गर्विता अप्सरा वपु अपनी पूर्ण साज-सज्जा के साथ चल दी महर्षि दुर्वासा को उनके तप से विचलित करने के लिए। वपु ने सोचा सर्वत्र मेरा ही प्रभुत्व क्यों न रहे?
सारा वन प्रान्त गूँज उठा उसके थिरकते गीत और पायलों की झंकारों से। दुर्वासा की कुटिया के समीप ही वह जा पहुँची। उन्मादकारी स्वर लहरी महर्षि के कर्ण कुहरों में प्रवेश करने लगी।
ऋषि का ध्यान भंग हुआ। उन्होंने योग-दृष्टि से देखा तो सब कुछ समझने में उन्हें देर न लगी। अप्सरा उन्हें लुभाने और पथभ्रष्ट करने आई है। तप को वासना परास्त करे, यह कल्पना उन्हें बुरी लगी। उन्हें क्षोभ हो आया, आँखें लाल हो गईं।
कुटी से बाहर निकलकर उस रूप गर्विता को थिरकन की एक क्षण के लिए ऋषि ने देखा और कहा— अभागी! तुझे तो सौरभ मिला था, उससे तू जगती की प्रसुप्त भक्ति भावना को जगा सकती थी, सरसता को अमृत की दिशा में मोड़ सकती थी, पर हाय री मूर्खा! तू तो उलटा ही करने को उद्यत हो गई। जा, अपने कर्म का फल भोग। तू पक्षी की योनि में मारी-मारी फिरेगी। तेरे चार पुत्र होंगे पर वे अपंग ही बने रहेंगे।
महर्षि का शाप मिथ्या कैसे होता। वपु अप्सरा का कलेवर छोड़, एक साधारण सी चिड़िया बन गई। अण्डे दिये, उनसे चार बच्चे निकले। पर वे चारों ही अपंग थे। रूप गर्विता अप्सरा के पास जब पश्चाताप ही शेष था। कला की देवी वपु अपने नृत्य संगीत से आज भी दुर्वासना को भड़काकर जन मानस में अपनी प्रभुता जमाने में संलग्न है। पर लक्ष्य भ्रष्ट होने के कारण निराश्रित पक्षी की तरह ही उसे इधर उधर मारी मारी फिरना पड़ रहा है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही बच्चे कला के गर्भ से उत्पन्न होते हैं। पर वासना का लक्ष बन जाने से तो वे भी अपंग ही रहेंगे।
कला की अप्सरा को आज भी शापित वपु की तरह पश्चाताप करना पड़ रहा है। वासना के लिए उसका किया हुआ नृत्य भला और किसी परिणाम पर पहुँचता भी कैसे?
कला की अप्सरा को आज भी शापित वपु की तरह पश्चाताप करना पड़ रहा है। वासना के लिए उसका किया हुआ नृत्य भला और किसी परिणाम पर पहुँचता भी कैसे?
मानव जीवन उतार-चढ़ाव, सुख-दुख, हानि लाभ, अनुकूल-प्रतिकूल का चित्रपट है। एक समय जीवन में वह आता है जब मनुष्य हँसता है, खुशी के मारे बासों उछलता है। और एक समय वह भी आता है जीवन में जब मनुष्य रोता है निराश, चिन्तित और खिन्न रहता है, मानों हँसी खुशी कोई स्वप्न की बात थी। राजमहलों में खेलने, कूदने वाले राम और सीता को नंगे पैरों, वल्कल वस्त्र पहने चौदह वर्ष वन-वन भटकना पड़ा। श्रीकृष्ण, जिन्हें अवतार मानते हैं, उन्हें भी अपने वंश का पतन अपनी आँखों से देखना पड़ा। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का इतिहास इन दोनों ही पहलुओं से भरा पड़ा है।
जीवन क्या है—
क्या मानव जीवन इन दोनों पहलुओं की निरी क्रीड़ा मात्र है? क्या यह एक उस निर्जीव गेंद की तरह है जिसे दो खिलाड़ी इधर से उधर फेंकते हैं और इसमें ही उसका अस्तित्व है। अयोग्य हो जाने पर वह फेंक दी जाती है।
नहीं? ऐसी बात नहीं है। जीवन का अस्तित्व उस अनन्त काल, नित्य निरन्तर सत्य, अजर अमर तत्व की तरह है जिसके संदर्भ में रात दिन, सर्दी, गर्मी, रचना विनाश आदि के क्रम चलते रहते हैं, किन्तु उसकी आदि से चली आ रही यात्रा नहीं रुकती। अनन्त की यात्रा का लक्ष्य अनन्त ही हो सकता है। पूर्ण, पूर्ण की ओर ही जा सकता है। हमारा जीवन भी व्यक्त, अव्यक्त रूप से उस पूर्णता की राह का यात्री है। जीवन मरण, सुख दुख, हानि लाभ, प्रतिकूल अनुकूल तो मार्ग के टेढ़े सीधे, ऊँचे-नीचे पत्थर मात्र हैं।
जीवन पथ की इन विभिन्नताओं में आगे बढ़ने का एक सरल उपाय है, इनके प्रति अनासक्त होना, निस्पृह होना। एक निरपेक्ष की तरह रहकर अपने कर्तव्य पर आगे बढ़ते रहना। गीता में इसीलिए निष्काम कर्मयोग अनासक्ति का उपदेश दिया है।
मोह और आसक्ति की व्यर्थता—
संसार और इसके पदार्थों के प्रति जितनी आसक्ति होती है, लगाव होता है उतना ही मनुष्य का अभिमान बढ़ता जाता है। धन के प्रति, कुटुम्ब के प्रति अनावश्यक मोह रखने वाले अभिमान से ग्रसित होते देखे गये हैं। विद्या का अभिमान करने वाले अपने आपको असाधारण व्यक्ति समझने लगते हैं। उच्च पद पर काम करने वाले अपने आपको भाग्यशाली, शालीन समझते हैं। वे भूल जाते है कि हम भी दूसरे मनुष्यों की तरह ही साधारण मनुष्य हैं।
संसार और इसके आकर्षणों को सत्य मानने वाले पर अभिमान पूरी तरह अपनी सवारी करता है। किन्तु मिट्टी के घरौंदे की तरह टूटने-फूटने वाले पदार्थों की क्षणभंगुरता, नश्वरता, अनित्यता समझ में आ जाय तो इनके प्रति आसक्ति नष्ट हो जाती है। और आसक्ति नष्ट हो जाने पर अभिमान भी नहीं रहता। जब मनुष्य यह सोचता है अथवा परिस्थितियों द्वारा सोचने को मजबूर किया जाता है कि उसका यह यश वैभव का महल किसी भी क्षण तहस-नहस हो सकता है, उसकी यह बौद्धिक क्षमता कभी भी नष्ट होकर वह विक्षिप्त बन सकता है, अपनी धन सम्पत्ति को वह अपनी ही आँखों के सामने नष्ट-भ्रष्ट होते देख सकता है, अपने शक्तिशाली पहलवान शरीर को स्नायु रोगों से पीड़ित, धड़कन, गठिया से दुःखी देख सकता है, तो सहज ही मनुष्य का अभिमान काफूर हो जाता है।
संसार और इसके पदार्थों का अस्तित्व अनित्य है क्षणभंगुर है। ये कभी भी नष्ट हो सकते हैं। इनके प्रति अभिमान करना, इनमें लिप्त रह कर जीवन के आवश्यक कर्तव्यों को तिलाञ्जलि दे देना बड़ी भारी भूल है। इनकी अनित्यता, क्षणभंगुरता का अभ्यास करते रहने पर अभिमान और इन आकर्षणों से उत्पन्न विकारों का शमन हो जाता है। मानसिक ग्रन्थियों का निराकरण होता है।
अज्ञान और अभिमान—
मनुष्य, संसार और इसके पदार्थों के बारे में अनित्यता का अभ्यास करता है किन्तु सफलताओं का आकर्षण फिर उसे भुलावे में डाल देता है और उससे अभिमान की वृद्धि होने लगती है। उसे अपने सामर्थ्य क्षमताओं पर अभिमान होने लगता है। किन्तु जीवन की बाह्य सफलता तो आन्तरिक जीवन के विकास व उच्चता की सफलता परिणाम है, जो सहज और स्वाभाविक है। विकास के साथ सफलता, समृद्धि तो उस तरह है जैसे सिर पर बाल। यदि बालों को ही महत्व दिया जाय, उनकी सेवा की जाय, शरीर को भुला दिया जाय तो यह एक बड़ा भारी अज्ञान ही कहा जायगा। बाह्य सफलताओं का चिन्तन न करके अपने कर्तव्य में दत्तचित्त लगे रहना चाहिए इससे अभिमान की वृद्धि नहीं होगी। व्यक्ति, जीवन में अनासक्त और निरपेक्ष होकर अपनी जीवन यात्रा पूरी करेगा।
जब हथौड़ा पत्थर पर मारा जाता है तो पत्थर उसका प्रतिवाद करता है और इसलिए वह टूट जाता है। शीशे के जमीन पर पड़ते ही टुकड़े-टुकड़े हो जाते हैं, किन्तु गेंद को जोर से मारने पर भी वह ऊपर ही उछल जाती है। इसका कारण यह कि अपने टकराने वाले भाग को वह शिथिल कर देती है। इसी तरह जब विभिन्न कुसंस्कार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर मानसिक क्षेत्र में उथल-पुथल मचायें तो संसार की अनित्यता, पदार्थों की क्षणभंगुरता और परिस्थितियों की चञ्चलता का तत्वज्ञान समझना आरम्भ कर देना चाहिए। क्षण-क्षण में जलाशय में तरंगें उठती रहती हैं, एक जाती और दूसरी आती रहती है। इस संसार का भी यह क्रम है। आज लाभ तो कल हानि, आज सुख तो कल दुख। रात और दिन की तरह, धूप और छाँह की तरह प्रिय और अप्रिय परिस्थितियों का ताना-बाना भी जीवन भर बुनना पड़ता है। इससे किसी जीवधारी को आज तक छुटकारा नहीं मिला। कोई भी पूर्ण सुखी इस धरती पर नहीं हुआ। कुछ न कुछ चिन्ता हर किसी को भी लगी रहती है। फिर अपने लिए यदि हम यह अभिलाषा करें कि हमें पूर्ण सुख शान्ति निरन्तर बनी रहे तो यह कैसे सम्भव हो सकता है? इस परिवर्तनशील जगत में नित्य नया दृश्य दिखाई पड़ना स्वाभाविक है। यह बदलाव सदा सुखद ही नहीं हो सकता और प्रिय अप्रिय दोनों ही परिस्थिति के लिये हम को सदैव प्रस्तुत रहना चाहिए।
कामे दुग्धे विप्रकर्षत्यलक्ष्मीं,
कीर्ति सूते दुष्कृतं या हिनस्ति।
ताँचाप्येताँ मातरं मंगलानाँ,
धेनुः धीराः सूनृता वाच माहु॥
सब मंगलों की जननी सत्य मिश्रित मधुर वाणी को ही कामधेनु कहते हैं। वह मनुष्य की सब कामना पूरी करती है, दरिद्रता दूर करती है, यशस्वी बनाती है और पाप नष्ट करती है।
असंतुलित न हों—
सम्पत्ति और विपत्ति में मानसिक संतुलन को बनाये रहना, धीर पुरुषों का काम है। कायर ही हड़बड़ी मचाते हैं। हमें कायर नहीं, धीर वीर बनना चाहिए। जीवन में आती रहने वाले रंग-बिरंगी, कड़ुई मीठी, धूप छाँह को संतुलित मन से देखना चाहिए और उनकी ओर विशेष ध्यान न देकर अपने कर्तव्य पथ पर धैर्यपूर्वक अनासक्त रहते हुए जीवन की ओर साहस पूर्वक चलते रहना चाहिए।
धर्म पुराणों की कथा-गाथाएँ
नेक सलाह
महाभारत का युद्ध आरम्भ हो गया। दुर्योधन अपनी माता गान्धारी से आशीर्वाद लेने पहुँचा। गान्धारी ने कहा—पुत्र होने के नाते सहज स्नेह तो तुम्हारे लिए है पर आशीर्वाद तो उन्हीं के लिए है जिनके साथ सत्य और धर्म है।
आँखों पर पट्टी बाँध कर अपने अन्धे पति की स्थिति में आजीवन बनी रहने वाली गान्धारी के तप बल का मूल्य दुर्योधन समझता था। उसे आशा थी कि माता का आशीर्वाद मिलने पर मेरी विजय सुनिश्चित हो जायगी पर जब उसे गान्धारी का ऐसा उत्तर मिला तो वह उदास हो गया।
दूसरी बार दुर्योधन ने फिर पूछा—माता, आप आशीर्वाद नहीं दे सकतीं तो मुझे ऐसा उपाय ही बता दीजिए जिससे मेरी जीत हो जाय। गान्धारी ने कहा—बेटा, तुम धर्मराज युधिष्ठिर के पास जाओ और उनसे वह युक्ति पूछो। धर्मात्मा लोग सलाह माँगने वाले शत्रु को भी उसके लाभ की ही सम्मति देते हैं। अपने स्वार्थ के लिए तुम्हारा अहित करने वाली सलाह युधिष्ठिर कदापि न देंगे। तुम निस्संकोच उनके पास चले जाओ। सज्जन किसी के भी शत्रु नहीं होते। वस्तुतः वे हर किसी के लिए मित्र के समान ही उपयोगी होते हैं।
माता की बात मान कर दुर्योधन युधिष्ठिर के पास पहुँचा और अपनी विजय का उपाय पूछने लगा।
भ्राता दुर्योधन का उचित सम्मान करने के साथ युधिष्ठिर ने सलाह दी कि वह गान्धारी के सामने नग्न शरीर होकर उपस्थित हो, और उन्हें एक बार सारे शरीर पर दृष्टिपात करने के लिए मना ले। पति-भक्ति की भावना में आजीवन नेत्रों से पट्टी बाँधे रहने के कारण गान्धारी की दृष्टि में अब वह शक्ति आ गई है कि वह जिसे भी एक बार देख ले वह वज्र के समान सुदृढ़ हो जायगा और फिर कोई उसका कुछ बिगाड़ न सकेगा।
यह युक्ति दुर्योधन को बहुत पसंद आई और वह प्रसन्न मन घर लौट आया। माता को उसने इसके लिए मना लिया। दुर्योधन नग्न-बदन उपस्थित हुआ। गान्धारी ने आँखों से पट्टी खोली दुर्योधन का सारा शरीर देखा । देखते-देखते वह सचमुच वज्र जैसा सुदृढ़ हो गया।
दैव दुर्विपाक की प्रबलता ही कहिये कि दुर्योधन लज्जावश कटि वस्त्र पहन कर आया। उसका वह भाग गान्धारी की दृष्टि से छिपा रहा और दुर्बल रह गया। युद्ध में भीम ने उसी मर्म स्थल पर प्रहार करके दुर्योधन को परास्त किया ।
महाभारत समाप्त हुए हजारों वर्ष बीत गये परन्तु यह सनातन तथ्य अभी तक ज्यों का त्यों बना हुआ है कि श्रेष्ठ आत्माएं अपने पराये का भेद न कर के सत्य के प्रति ही गान्धारी की तरह शुभ कामना रखती हैं; और युधिष्ठिर की तरह शत्रु को भी केवल नेक सलाह ही देती हैं।
तप की सामर्थ्य
देवता और असुरों का युद्ध बहुत दिन चलता रहा। असुर तगड़े पड़े। देवता अपनी सज्जनता वश उतनी धूर्तता बरत न पाते थे जितने निश्शंक होकर असुर छल करते थे। वृत्रासुर के नेतृत्व में असुरों की विजय दुँदुभी बजने लगी।
निराश देवता ब्रह्माजी के पास पहुँचे और पूछा-भगवन्! विजय के लिए हम किस अस्त्र का प्रयोग करें?
ब्रह्माजी ने कहा—धातुओं से बने अस्त्र उतने प्रभावशाली नहीं हो सकते जितने तप और त्याग से बने आयुध प्रभावशाली होते हैं। तपस्वी की हड्डियों से ही वज्र बनाया जा सकता है। यदि तुम लोग तप त्याग विनिर्मित वज्र बना सको तो जीत तुम्हारी ही होगी। जाओ इसके लिए प्रयत्न करो।
देवता तपस्वी को तलाश करने लगे और उसकी हड्डियाँ प्राप्त करने का उपाय सोचने लगे। अभीष्ट वस्तु की तलाश में उन्होंने गिरि, कानन और कन्दराओं को तलाश करना आरंभ कर दिया।
महर्षि दधीचि अपनी दिव्य दृष्टि से इस कौतुक को देख रहे थे। उन्होंने देवताओं को पास बुलाया और प्रेमपूर्वक अपनी हड्डियाँ देने के लिए शरीर का परित्याग कर दिया।
तपस्वी दधीचि की अस्थियों से वज्र बना। वृत्रासुर मारा गया और उसकी सेना परास्त हुई। तब से देवताओं का सर्वश्रेष्ठ आयुध इन्द्र का वज्र का माना जाने लगा।
विजयोल्लास मनाने के लिए एकत्रित हुई देव सभा में गुरु बृहस्पति ने कहा-देवताओं, विजय का स्थायित्व शक्ति पर निर्भर है और शक्ति आयुधों से नहीं तप त्याग से भरी रहती है। यदि तुम सदैव अपराजित रहना चाहते हो तो तप और त्याग की शक्ति एकत्रित करो। इसमें प्रमाद करोगे तो फिर कभी कोई वृत्रासुर तुम्हें परास्त करने आ खड़ा होगा। दधीचि की माँगी हुई हड्डियों से कब तक काम चलेगा। तुम में हर एक को वज्र बनने के लिए दधीचि जैसा आत्म-बल एकत्रित करना चाहिए।
देवताओं ने वस्तुस्थिति को समझा और सुर गुरु के आदेशानुसार आत्मनिर्माण का प्रयत्न आरम्भ कर दिया।
मर्यादा का पालन-
शुक्राचार्य के पास जाकर कच संजीवनी विद्या का अध्ययन करने लगा। आचार्य ने छात्र को पुत्रवत् पाला और सांगोपांग ज्ञान देने में कोई कमी न रखी।
आचार्य की कन्या देवयायी कच के साथ ही पढ़ती थी। बहुत दिन साथ-साथ रहते-रहते स्नेह सौजन्य भी दोनों में बहुत बढ़ गया था।
अध्ययन पूरा करके कच जब चलने लगा तो देवयानी ने उसकी जीवन सहचरी बनने की अभ्यर्थना की। कच इस प्रस्ताव को सुनकर अवाक् रह गया। वह देवयान से भरपूर प्रेम करता था, पर प्रेम का अर्थ दाम्पत्य सम्बन्ध में ही परिणत होना चाहिए यह बात उसको समझ में कभी भी न आई थी। गुरु कन्या सगी बहिन की तरह होती है उसने सदा यही जाना और माना था। इस मान्यता को बदलने का कोई कारण भी उसे प्रतीत नहीं होता था।
कच ने प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। देवयानी की आकाँक्षाओं पर तुषारपात हुआ तो वह तिलमिला गई। उसने शप दिया कि मेरे पिता से जो कुछ तुमने पढ़ा है सो निष्फल हो जायगा।
इतने दिन के श्रम और अध्ययन के निष्फल चले जाने पर भी कच विचलित न हुआ वरन् उसके अधरों पर सन्तोष की एक लहर दौड़ गई। छात्र ने गुरु और गुरु कन्या का साष्टाँग अभिवन्दन करते हुए कहा- आदर्शों और मर्यादा की रक्षा आवश्यक है। इसके लिए किसी व्यक्ति का अहित होता है तो उसमें चिन्ता की कोई बात नहीं। मेरा अध्ययन निष्फल जाना और देवयानी का इच्छित पति न मिलना निश्चय ही कष्टकारक है। इस दुखान्त प्रकरण में हममें से कोई प्रसन्न नहीं। पर मनुष्य की प्रसन्नता तुच्छ है। आदर्शों की रक्षा के लिए आकाँक्षाओं का बलिदान होता हो तो उसे सुखान्त प्रक्रिया की तरह सहन ही किया जाना चाहिए।
शुक्राचार्य की आँखें भर आई। कच भी भारी हृदय लेकर वापिस लौटा। देवयानी का तो हृदय ही टूटा जा रहा था। तीनों अपना पराभव अनुभव कर रहे थे। पर मर्यादा को जीतती देखकर तीनों की अन्तरात्मा एक हलका-सा संतोष अनुभव कर रही थी।
ऐश्वर्य का मद
नहुष को पुण्य फल के बदले में इन्द्रासन प्राप्त हुआ। वे स्वर्गलोक में राज्य करने लगे।
ऐश्वर्य और सत्ता का मद जिन्हें न आवे ऐसे कोई विरले ही होते हैं। नहुष सत्ता मद से प्रभावित हुये बिना अछूते न रह सके।
उनकी दृष्टि रूपवती इन्द्राणी पर पड़ी। वे उसे अपने अन्तःपुर में लाने की विचारणा करने लगे। प्रस्ताव उनने इन्द्राणी के पास भेज ही तो दिया।
इन्द्राणी बहुत दुखी हुई। राजाज्ञा के विरुद्ध खड़े होने का साहस उसने अपने में न पाया तो एक दूसरी चतुरता बरती। नहुष के पास उनने सन्देश भिजवाया कि वह ऋषियों को पालकी में जोते और उस पर चढ़कर मेरे पास आवे तो प्रस्ताव स्वीकार कर लूँगी।
आतुर नहुष ने अविलम्ब वैसी व्यवस्था की। ऋषि पकड़ बुलाये गये। उन्हें पालकी में जोता गया। उस पर चढ़ा हुआ राजा जल्दी-जल्दी चलने की प्रेरणा करने लगा।
दुर्बलकाय ऋषि दूर तक इतना भार लेकर तेज चलने में समर्थ न हो सके। अपमान और उत्पीड़न से वे क्षुब्ध हो उठे। एक ने कुपित होकर शाप दे ही तो डाला—”दुष्ट! तू स्वर्ग से पतित होकर पुनः धरती पर जा गिर”। शाप सार्थक हुआ। नहुष स्वर्ग से पतित होकर मर्त्यलोक में दीन-हीन की नाईं विचरण करने लगे।
इन्द्र पुनः स्वर्ग के इन्द्रासन पर बैठे। उन्होंने नहुष के पतन की सारी कथा ध्यानपूर्वक सुनी और इन्द्राणी से पूछा—भद्रे, तुमने ऋषियों को पालकी में जोतने का प्रस्ताव किस आशय से किया था?
शची मुस्कराने लगीं। वे बोली-नाथ, आप जानते नहीं, सत्पुरुषों का तिरस्कार करने उन्हें सताने से बढ़कर सर्वनाश का कोई दूसरा कार्य नहीं। नहुष के अपनी दुष्टता समेत शीघ्र ही नष्ट करने वाला सबसे बड़ा उपाय मुझे यही सूझा। वह सफल भी तो हुआ।
देव सभा में सभी ने शची से सहमति प्रकट कर दी। सज्जनों को सताकर कोई भी नष्ट हो सकता है। बेचारा नहुष भी उसका अपवाद कैसे रहता!
साथी के प्रति कर्तव्य
धर्मराज युधिष्ठिर के स्वर्गारोहण का समय आया। स्वर्गलोक का विमान उन्हें सशरीर परमधाम ले जाने के लिये आ पहुँचा।
हिमालय के उच्च शिखर पर युधिष्ठिर अकेले ही न थे उनका साथी कुत्ता भी था। धर्मराज ने देवगणों से कहा—स्वर्ग ही चलना होगा तो हम दोनों ही चलेंगे, नहीं तो यह धरती ही हमारे लिये क्या बुरी है?
देव सभा में प्रश्न की गम्भीरता पर विचार हुआ। स्वर्ग में तो केवल मनुष्यों को ही प्रवेश मिलता है पशुओं को वहाँ कैसे लाया जाय?
देव गुरु ने कहा मित्र का साथ निबाहने के लिए स्वर्ग तक का त्याग करने वाले महापुरुष का साथी भी उन भावनाओं वाला ही होगा। कुत्ता है तो क्या पर है तो युधिष्ठिर का साथी ही। उसे स्वर्ग बुलाने में संकोच न किया जाय।
कुत्ता समेत युधिष्ठिर स्वर्ग पहुँचे। साथी का साथ अन्त तक निबाहने का उनका आदर्श स्वर्गवासियों के लिए भी चर्चा का विषय बना रहा।
मौन की महत्ता
महाभारत का अन्तिम श्लोक पूर्ण हुआ। गणेश जी की अनवरत चलती रहने वाली लेखनी को विश्राम मिला।
महर्षि व्यास ने हँसते हुए गणेश जी से पूछा—भगवन्! मैं इतने श्लोक बोलता रहा। अनेक प्रसंग तथा अनेक व्यवधान बीच में आये पर आप मौन ही रहे। इसका क्या रहस्य है?
गणेश जी हँस पड़े, उनने कहा—व्यासजी, जानते नहीं शक्ति का स्रोत संयम ही तो है। मैंने मौन रह कर ही तो इतना बड़ा महाभारत लिख सकने का कार्य किया है। मौन की महत्ता किससे छिपी है। वाणी का संयम सबसे बड़ा संयम माना जाता है। जो मौन रहता है, कम बोलता है वही तो कुछ कर गुजरता है।
प्रसंग समाप्त होने ही वाला था कि अधूरी बात को पूरी करते हुए नन्दी ने कहा—सभी दीपों में तेल होता है किसी में कम किसी में ज्यादा। अक्षय तेल किसी में नहीं। प्राणियों में शक्ति तो रहती है पर वह विपुल नहीं, अक्षय नहीं। संयम द्वारा जो उसे नष्ट होने से बचा लेते हैं वे ही तो सिद्धि प्राप्त कर पाते हैं।
व्यास और गणेश दोनों ही इस तथ्य पर सहमत थे। महाभारत की रचना दोनों के सहयोग से इसी आधार पर हो सकी थी।
बड़ा धन क्यों न लूं?
महर्षि याज्ञवलक्य ने संन्यास लेने की आकाँक्षा से अपनी गृह व्यवस्था का उचित प्रबंध कर देने की योजना बनाई।
उन्होंने ने अपनी दोनों धर्म पत्नियों को बुलाया और कहा—मेरे पास जो कुछ धन सम्पत्ति है उसे तुम दोनों आपस में बाँट लो और मुझे परिव्रज्या के लिए जाने दो।
कात्यायनी ने पूछा-भगवन्! आप गृह सुख छोड़ कर संन्यास क्यों ले रहे हैं? याज्ञवलक्य ने उत्तर दिया—भद्रे! गृहस्थ में शरीर सुख है पर संन्यासी होकर जो परमार्थ बन पड़ता है उसका आत्मिक सुख और भी अधिक आनन्ददायक है। इसलिए मैं बड़े सुख के लिए छोटे सुख का त्याग मात्र कर रहा हूँ। इसमें मेरी हानि नहीं लाभ ही है।
“तो फिर मैं ही बड़ा सुख छोड़कर छोटा सुख क्यों स्वीकार करूं? मैं भी आपके साथ परमार्थ साधन के लिये क्यों न चलूँ?” बड़ी पत्नी ने ऐसा ही सोचा और ऐसा ही किया। ऋषि की छोटी पत्नी मैत्रेयी को उत्तराधिकारी की पूरी धन सम्पत्ति देकर कात्यायनी महर्षि याज्ञवलक्य के साथ संन्यास लेकर आत्म कल्याण के लिए चल दी।
मैत्रेयी ने कहा—भगवन्! मैं भी कात्यायनी का अनुसरण कर आपके साथ ही क्यों न चलूँ? महर्षि ने कहा—भद्रे! ज्ञान की परिपक्वता बिना संन्यास व्यर्थ है। तुम अभी गृहस्थ में रह कर उस स्थिति के उपयुक्त अपने को बनाओ। समयानुसार ही हर कार्य ठीक होता है। जिस प्रकार एक स्थिति पर पहुँचे हुए लोगों के लिए संन्यास आवश्यक है उसी प्रकार एक स्थिति के लोगों के लिए गृहस्थ भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
याज्ञवलक्य का आदेश मैत्रेयी को स्वीकार करना ही उचित था, वैसा ही उसने किया भी।
स्कूल में अध्यापक बच्चों से गणित के सवाल हल करवा रहे थे। एक सवाल कुछ अधिक कठिन था। कक्षा का कोई छात्र उसे हल न कर सका। किन्तु एक छात्र ने उसे हल कर लिया और प्रशंसा तथा पुरस्कार प्राप्त किया।
दूसरे दिन वह बालक उस पुरस्कार को वापिस लेकर अध्यापक के पास आया और लौटाते हुए क्षमा याचना करने लगा। उसने वह प्रश्न अपनी समझ से नहीं किया था। किन्तु किसी दूसरे से पूछ कर लिख दिया था। इस प्रकार एक ओर चोरी करना दूसरी ओर पुरस्कार प्राप्त करना, इस दुहरे अपराध से बालक की अन्तरात्मा कोंचने लगी थी। रात भर वह सोया नहीं, वरन् रोता रहा था, प्रातःकाल उसने पाप का प्रायश्चित करना और उसे सबके सामने प्रकट कर देना ही उचित समझा।
अध्यापक के लिए यह अनोखा उदाहरण था। उन्होंने प्रश्न हल करने का पुरस्कार वापिस ले लिया और सच्चाई ईमानदारी के उपलक्ष में उससे बड़ा दूसरा पुरस्कार प्रदान किया।
वह बालक बड़ा होकर न्याय मूर्ति गोपाल कृष्ण गोखले कहलाया। गोखले भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के प्रवर्तकों और स्वाधीनता संग्राम के आरम्भ करने वालों में अग्रणी थे। नेकी और ईमानदारी की नीति को अपना कर सामान्य मनुष्य भी असामान्य स्तर तक ऊँचे उठते हैं।
उपवास मनुष्य के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि भोजन। हमारे आचार्यों ने एकादशी व्रत की पन्द्रहवें दिन व्यवस्था की थी और उसे धार्मिक रूप देकर दिनचर्या में सम्मिलित कर दिया था। परन्तु, आज उस एकादशी व्रत का जो रूप देखने में आता है, उससे लाभ की अपेक्षा हानि की ही अधिक संभावना रहती है, क्योंकि उपवास के स्थान पर फलाहार किया जाता है और वह कथित फलाहार भी पकौड़ियाँ, खोए की मिठाई आदि विभिन्न पकवानों के रूप में होता है।
आयुर्वेद के विद्वानों ने उपवास को मानसिक रोगों में अत्यंत लाभकारी बताया है। जब औषधि उपचार से लाभ नहीं होता तब उपवास का सहारा लेकर ही लाभ उठाया जा सकता है। आज के युग में भौतिक चमक-दमक से ऊबा हुआ व्यक्ति जैसे मदिरा-पान द्वारा अपने दुःखों को विस्मृत करने का यत्न करता है, वैसे ही हमारे पूर्वज अपनी मानसिक चिन्ताओं से उत्पन्न वेदनाओं को दूर करने के लिए उपवास का आश्रय लिया करते थे और यह बात ठीक थी कि उपवास से सच्ची शान्ति प्राप्त होती थी। परन्तु मदिरा पान से शान्ति तो क्या प्राप्ति होगी, शरीर का ढाँचा ही बिगड़ जाता है।
हमारी चिकित्सा-पद्धति में विभिन्न रोगियों को उपवास कराया जाता रहा है। ज्वर, मंथर ज्वर, शीतला, ग्रन्थीक्षत, अर्बुद, पक्षाघात आदि विभिन्न रोगों में वैद्य लोग उपवास कराते थे और उस चिकित्सा से स्थायी लाभ होता था। आज क्षणिक लाभ की चाह बढ़ने से रोग का विष दूर नहीं हो पाता। शरीर में जितने प्रकार की बीमारियाँ उत्पन्न होती हैं, उन सभी का उपचार उपवास द्वारा किया जा सकता है।
औषधियों द्वारा उपचार से यह मान लिया जाय कि रोग के कीटाणु नष्ट हो गए, परन्तु औषधि की प्रतिक्रिया रूप जो नवीन विषाक्त पदार्थ शरीर को प्राप्त हुए, वे उपवास द्वारा ही शमन किये जा सकते हैं। अन्यथा कीटाणु मर तो गए परन्तु उनके मृत शरीर आपके शरीर में रहकर नवीन भोजन में मिलते जाएंगे और पेट में एकत्रित कचरा कभी भी साफ न हो सकेगा और शरीर का यन्त्र पुनः अवरुद्ध होकर रोगोत्पत्ति की आशंका रहेगी।
आप कहेंगे कि कचरा साफ करने के लिए पेट शोधन विरेचन लिये जा सकते हैं, परन्तु ध्यान रखिये कि शरीर के विभिन्न स्थानों में सूक्ष्म मल एकत्र होता रहता है और वह इन विरेचनों द्वारा निकल नहीं पाता। इनसे तो साधारण कचरा ही निकल पाता है। उस सूक्ष्म मल को उपवास ही निकाल सकता है। इससे बढ़कर कोई दवा कारगर नहीं होगी।
कुछ लोग कहते हैं कि जब हम अपने दैनिक भोजन में इस प्रकार के अनेक पदार्थ ग्रहण करते हैं, जिनसे शरीर की प्राकृतिक क्रिया में कोई गड़बड़ी पैदा हो और आवश्यकतानुसार सफाई होती रहे तब भी रोग उत्पन्न हो जाते हैं तो उपवास ही उन्हें कैसे रोक पायेगा? उन लोगों को विचार करना चाहिए कि दैनिक जीवन में शरीर को स्वच्छ करने वाले पदार्थों को हम अपने स्वाद के लिए कम-अधिक करते रहते हैं, जिससे उनकी मल-निस्सारक शक्ति में भी अन्तर पड़ता रहता है। इसके साथ हम कभी-कभी मिठाई आदि, पेट के लिए हानिकारक पदार्थों का भी अधिक सेवन कर बैठते हैं, इसी कारण हमें रोगों का शिकार होना पड़ता है। परन्तु, उपवास सभी स्थितियों में समान रूप से कार्य करता है, इसलिये उससे लाभ के बजाय हानि की कभी संभावना नहीं होती।
भोजन की गड़बड़ी और पाचन क्रिया के ठीक प्रकार न होने के कारण पेट भारी हो जाता है और दूषित वायु एकत्रित हो जाती है। उसी से पेट दर्द, कब्ज, भारीपन, सिरदर्द, घबराहट, जी मिचलाना आदि विकार प्रकट हो जाते हैं उनका शमन करने के लिए सब से अच्छा उपाय उपवास ही है। यदि इन बीमारियों को आरम्भ होते ही दबाया नहीं जाता तो विकार बढ़ कर यकृत में खराबी उत्पन्न होकर विभिन्न रोग उत्पन्न हो सकते हैं।
रुग्णावस्था में मनुष्य की भूख कम हो जाती है और मुख का स्वाद बिगड़ जाता है। प्रकृति का नियम है कि वह इस प्रकार भोजन-ग्रहण करने भार से रोगी को बचाती है जिससे कि भार के कारण व्यय होने वाली शक्ति का ह्रास न होने पावे। क्योंकि भोजन को पचाना, उसमें से उपादेय सार को लेकर रक्त के रूप में परिवर्तित करना और व्यर्थ मल को बाहर निकालना आदि कार्यों में बड़ी शक्ति व्यय होती है और यदि रोगी की यह शक्ति व्यय होती रहे तो क्षीणता भी अधिक बढ़ती चली जायगी।
इसी लिए उपवास के महत्व को स्वीकार करना आवश्यक है। उपवास ही एक ऐसी क्रिया है जो शरीर के पाचन यन्त्रों को विश्वास देने वाला है। यदि विश्राम नहीं मिलेगा तो यन्त्रों में शक्ति नहीं रहेगी और मनुष्य अपने उल्लास ताजगी और स्फूर्ति को खो बैठेगा।
उपवास जहाँ विभिन्न रोगों के लिए अमृत तुल्य उपचार है वहाँ दुर्घटना के कारण लगी चोट, मोच, फोड़ा अथवा आपरेशन से साध्य होने वाले मामलों में उससे हानि होना भी संभव है। ऐसी स्थिति में तो पौष्टिक और रक्त वर्द्धक पदार्थों का सेवन कराया जाना आवश्यक होता है।
यदि नियमित रूप से उपवास किया जाता रहे, जैसे एकादशी के दिन या और किसी दिन; तो यह मास में दो बार किये जाने वाला उपवास भी बहुत लाभदायक सिद्ध हो सकता है। उससे बदहजमी, कब्ज, पेट दर्द, हर्निया, अर्बुद आदि बीमारियाँ होंगी ही नहीं। परन्तु आवश्यकता इस बात की है कि उपवास के नाम पर पकवान न उड़ाये जाएं।
साधारणतः उपवास एक से तीन दिन तक किया जा सकता है और ऐसा उपवास कठिन नहीं होता। इसके लिए किसी चिकित्सक के परामर्श या निगरानी की भी आवश्यकता नहीं है। स्वाभाविक रूप से अन्न का परित्याग कर देना होता है। इसमें जल और फलों का रस आदि सेवन करना वर्जित नहीं है।
रोगों के उपचारार्थ किया जाने वाला उपवास लम्बे दिनों तक चलता है और उसके लिए किस योग्य चिकित्सक की देख-रेख भी अत्यन्त आवश्यक होती है। क्योंकि मनुष्य की विभिन्न अवस्थाओं का ज्ञान साधारण व्यक्तियों को नहीं होता, और चिकित्सकों का अपना अनुभव होने के कारण वे जब परामर्श दें, उसे मानना ही हितकारक है।
उपवास रखने से अधिक सावधानी उसके तोड़ने में रखनी होती है, उस समय जो भी खुराक दी जाय, वह भली प्रकार सोच-समझ कर देनी चाहिए। कभी-कभी चिकित्सक के अनुभव न होने के कारण रोगी के प्राणों पर बन आती है।
प्रायः यह समझा जाता है कि लम्बा उपवास बहुत कठिन कार्य है। मनुष्य एक दिन भी भूखा रहने में बड़ी कठिनाई अनुभव करता है, तो लम्बे समय तक उपवास कैसे किया जा सकेगा? ऐसे व्यक्तियों को यह सुनकर आश्चर्य होगा कि उपवास करने वाले को भूख 3-4 दिन ही परेशान करती है इसके बाद उसकी भूख शान्त हो जाती है, और उसे किसी परेशानी का अनुभव नहीं होता। हाँ, यदि शरीर कमजोर है तो उपवास से अधिक कमजोरी उत्पन्न हो जाना संभव है। इसी लिये उपवास प्रारंभ करने से पूर्व किसी चिकित्सक से परामर्श लिया जाना आवश्यक समझा जाता है।
हमारे भैषज्य ग्रन्थों में विभिन्न कल्पों का विधान है, जिनके द्वारा बुढ़ापा भी दूर किया सकता है। यह कल्प भी अन्न-त्याग करने पर विशिष्ट फलों के प्रयोग द्वारा ही साध्य होते हैं, जो कि लम्बे उपवासों के ही रूप समझे जाने चाहिएं।
प्रसन्नता, आन्तरिक पवित्रता, शुद्धि का बाह्य परिणाम है—बाह्य चिन्ह है। जब चित्त शुद्ध हो कर सत्वगुण सम्पन्न हो जाता है तभी प्रसन्नता की सहज वृत्ति जागृत हो जाती है। जब इस तरह के सत्वगुण सम्पन्न महापुरुष, जिनका अन्तर निर्मल पवित्र और स्वच्छ हो जाता है, जिन्होंने अपने अन्तर का समाधान कर लिया है वे हँसते हैं तो वातावरण में हँसी के स्रोत फूट पड़ते हैं। उनके चारों ओर प्रसन्नता साकार हो उठती है। दुःखी क्लेश-युक्त व्यक्ति भी उस प्रसन्नता के वातावरण में उस समय के लिए अपने दुःख क्लेशों को भूल जाता है।
महापुरुषों के सान्निध्य में रहने वाले इस तथ्य को जानते हैं। सचमुच उनके निर्मल हृदय से प्रसन्नता की सुरसरी प्रवाहित होती रहती है जैसे पावन हिमालय से गंगा। यह तो रही उन महान् आत्माओं की बात जिनके जीवन में प्रसन्नता एक रूप हो गई है। जन साधारण जो प्रसन्नता के अभाव में जीवन में क्लेश दुःख परेशानी अनुभव कर रहे हैं उनको प्रसन्नता को जीवन में उतारने के लिये निम्न बातों का ध्यान रखकर अपने अन्तर बाह्य जीवन में निर्मलता, स्वच्छता, माधुर्य, आन्तरिक समाधान आदि के लिए सतत् प्रयत्न करना आवश्यक है।
मनुष्य एक दूसरे पर अवलम्बित है। समाज के विशाल भवन में मनुष्यों का गठन उसी तरह है जैसे किसी माला के विभिन्न मनकों का। किसी भवन निर्माण में ईंटों को एक दूसरे से मिला कर एक निश्चित स्तर से रखना पड़ता है। उस भवन के निर्माण में प्रत्येक ईंट का अपना विशेष स्थान है। इतना ही नहीं नींव में निम्न स्तर पर लगी हुई ईंट का और भी अधिक महत्व है क्योंकि उसके ऊपर समस्त भवन का बोझा उठा हुआ है। ठीक इसी तरह मानव मात्र एक दूसरे से सम्बन्धित हैं। सेन्टपाल के शब्दों में “हम सब एक दूसरे के साथी हैं” परस्पर अन्योन्याश्रयी है। अतः किसी का भी भले ही निम्नस्तर क्यों न हो हमें घृणा की दृष्टि से देखने का अधिकार नहीं है।
मनुष्यों के इस निकट सम्बन्ध में एक ही बात निश्चित है और वह है सबसे प्रेम करना, सबके अस्तित्व को अपनी तरह ही मान कर उसका पूरा-पूरा आदर करना। पड़ौसी से लेकर सबको प्रेम करना आवश्यक है। इससे आन्तरिक क्षेत्र से घृणा, अनुदारता, स्वार्थपरता आदि दोष दूर होंगे और प्रसन्नता का प्रकाश प्रकट होने लगेगा।
प्रत्येक व्यक्ति मूल से अच्छा है बुरा नहीं अतः किसी के गुण दोषों से बहुत अधिक प्रभावित नहीं होना चाहिए। गुण और दोषों का संबंध उसी तरह है जैसे दीपक के प्रकाश में उस स्वयं की भी छाया। और यह निश्चित है दीपक की छाया के अभाव में प्रकाश का भी अस्तित्व नहीं दृढ़ निश्चयी व्यक्ति में कुछ न कुछ हठीलापन होना सम्भव है। कर्तव्य के साथ थोड़ा बहुत अहंकार होना स्वाभाविक है। इस तरह के दोष छाया दोष कहे जाते हैं, जिनका अस्तित्व भी स्वीकार करना आवश्यक है। गुण दोष विरहित मनुष्य मिलना दुर्लभ है। अव्यक्त के प्रकाश के लिए छाया-दोष, चेतन की अभिव्यक्ति के लिए जड़ तत्व का परिधान स्वाभाविक है। अतः गुण दोषों का ध्यान न रखकर सभी का आदर करना प्रसन्नता की अभिवृद्धि के लिए आवश्यक है।
दूसरे से अनादर, अविश्वास, मतभेद, विचार भेद रखना, प्रसन्नता की जगह राग, द्वेष, क्लेश, अनादर, और अन्य बुराई के बीज बोना है। संसार में आज की गुटबन्दी, दलबन्दी, भिन्न-भिन्न वाद प्रान्तीयता, और विभिन्न एकाँगी निर्णय आदि जिन से लोगों में परस्पर विनाश की तैयारी होने लगती है और हिंसा की भावना बढ़ती है वे सब प्रसन्नता को दूर करके मानवता को नष्ट-भ्रष्ट करने वाले हैं। यह सब एक दूसरे के लिए प्रेम, आदर के अभाव के कारण ही होता है।
विभिन्न विचारों, दृष्टि कोणों, स्वभावों के कारण भेद हो सकते हैं और यह उसी तरह स्वाभाविक है जैसे संसार और इसके पदार्थों की विभिन्नता विचित्रता। किन्तु इनके साथ द्वेष, कटुता के भाव न हों वरन् प्रेम, एक दूसरे को आदर की भावनायें हो, जिससे विचार का, बातचीत का, हृदयों की एकता का रास्ता खुला रहे और मनुष्य इन सबसे सत्य को पा सके। प्रसन्नता के लिए परस्पर बुनियादी प्रेम, आदर भावनायें होना आवश्यक है।
स्नेह में भी आसक्ति होती है। किन्तु निस्वार्थ प्रेम और आदर अन्तस्तल को शुद्ध कर उसे बल प्रदान करता है, समर्थ बनाता है।
सृष्टि प्रत्येक अणु अपने स्थान पर पूर्ण है। ‘जो ब्रह्माण्ड में वही पिण्ड में’ऐसा श्रुतियाँ एक स्वर से कहती हैं। पूर्णता का भाव प्रत्येक व्यक्ति में है। एक पिता भोजन करने बैठा उसके साथी ही उसका पुत्र भी। पिता की थाली में पूरा लड्डू परसा गया और उस बच्चे की थाली में चौथाई हिस्सा इस पर बच्चा जिद करने लगा और बोला मैं पूरा लड्डू ही लूँगा। पिता ने बहुत समझाया किन्तु उसने अपनी जिद नहीं छोड़ी। इतने में ही माँ आई और उसके चौथाई लड्डू को अन्दर उठाकर ले गई। उसे गोल बना कर फिर थाली में परस दिया। अब बच्चा प्रसन्नता से भोजन करने लगा।
बच्चे की जिद्द पूर्णता के भाव की द्योतक है। पिता की तुलना में वह बाह्य आकार में छोटा हो सकता है जैसे कि छोटे लड्डू से प्रसन्न होने से मालूम होता है किन्तु पूर्ण-पूरा-लड्डू उसे चाहिए। अपूर्णता अधूरापन, उसकी स्वाभाविक स्थिति के, पूर्णता के विरुद्ध है।
प्रत्येक चेतन में, प्रत्येक मनुष्य में पूर्ण भाव रखकर उसका उतना ही आदर सम्मान करना, छोटे बड़े की दृष्टि से भेद भाव न रखना प्रसन्नता के साधक के लिए आवश्यक है।
प्रसन्नता की प्राप्ति के लिये उदार बनिये। संकीर्णता, मनहूसपन से युक्त हृदय में प्रसन्नता प्रकट नहीं होती, सबके लिए हृदय खोलकर रखें। हृदय खोलकर मिलें। मनहूस वही होता है जो दूसरों के प्रति संकीर्णता घृणा के विरोधी भाव रखता है। व्यवहार में बातचीत में रहन सहन में प्रत्येक बात में उदारता बरतें।
संसार में सभी का स्वागत मुस्कान के साथ करें। मुस्कान आपकी आन्तरिक प्रसन्नता, सद्भावना, आत्मीयता का सिगनल है। दुश्मन के साथ मुस्करा कर बातचीत करने से दुश्मनी के भाव नष्ट हो जाते हैं। मुस्कान के द्वारा दूषित भाव ग्रन्थियाँ सहज ही नष्ट हो जाती हैं।
महात्मा बुद्ध नित्य ही उपदेश देते थे कि “पापी के साथ स्वयं भी वैसा ही व्यवहार करके पापी न बनो। कीचड़ से कीचड़ कभी नहीं धुलता। जो कोई तुम्हारे साथ बुराई करे उसके साथ भी भलाई ही करो। अपकारी के साथ भी उपकार ही करो।” महात्मा बुद्ध की यह बातें सुनकर एक दुष्ट बुद्धि व्यक्ति ने उसका गलत अर्थ लगाया। वह जान बूझ कर महात्मा बुद्ध को गाली देने लगा। महात्मा बुद्ध शान्त और गम्भीर भाव से सब कुछ सहन करते रहे। जब वह गाली देता-2 थक कर चुप हो गया तब महात्मा बुद्ध ने प्रेम पूर्वक पूछा-”वत्स! यदि कोई किसी की दी हुई भेंट स्वीकार न करे तो वह किसकी रहती है?’ इस पर वह बोला - “देने वाले की ही’। तो फिर अपनी भेंट तुम अपने ही पास रखो। मुझे यह सब नहीं चाहिए। इन्हें स्वीकार करने और सुनने पर तो मुझे भी तुम्हारी ही तरह उद्विग्न होना पड़ेगा।”
अब नहीं मौन का समय रहा,
अब नहीं शान्ति की बेला है॥
गर हो सपूत सच्चे माँ के, मारो मरमिटो पर हटो नहीं,
दो शीश चढ़ा माँ के पग में॥ यह दो दिन का मेला है॥
दो मसल मेरु मन्दराचल को, अब नहीं मौन का समय रहा,
यदि आजाये तेरे मग में॥ अब नहीं शान्ति की बेला है॥
ललकार रहा पंचानन को, केशरिया बाना पहन पहन,
गीदड़ का खड़ा झमेला है। तरु वर के पत्ते डोल रहे॥
अब नहीं मौन का समय रहा, धरती का कण कण बोल रहा,
अब नहीं शान्ति की बेला है। अम्बर से तारे बोल रहे॥
राणा प्रताप की शान आज, दिखलानी है वह कला तुझे,
है तुम्हें बचाना धीर वीर॥ दिखलाया जो कर्ण अकेला है॥
भारत माता को दिखलाना है, अब नहीं मौन समय रहा,
तुम्हें कलेजा आज चीर॥ अब नहीं शान्ति की बेला है॥
बनना है तुमको सेनानी, गंगा यमुना की धारों से।
आचार्य द्रोण का चेला है॥ सागर के विमल किनारों से॥
अब नहीं मौन का समय रहा, आवाज यही आती पल पल
अब नहीं शान्ति की बेला है। झाँसी की उन तलवारों से॥
कहते अतीत सुन लो नभ से, बढ़ो बीर बाँधो तुणीर
पद्मनियाँ भारत की बोली॥यह महा-प्रलय का खेला है॥
इस वर्ष मनाओ नव जवान,अब नहीं मौन का समय रहा।
गोली बारूदों से होली॥ अब नहीं शान्ति की बेला है॥
श्री देवनाथ त्रिपाठी शर्मा
कौन चला आता मदान्ध हो हिमगिरि से टकराने को—
टूक-टूक हो बिखर जायगा गर्व न कर, ओ मतवाले!
मुँह पर राम छुरी ले करमें साथी कहलाने वाले।
“हिन्द-चीन भाई-भाई” का नारा दुहराने वाले।
डल-अलर कैलाश देख पानी मुँह में लाने वाले,
मानसरोवर पर कुदृष्टि रख योंही ललचाने वाले॥
कामदेव-सा क्यों आता है खुद ही तू जल जाने को—
प्रलयंकर त्रिनेत्र शिव बैठे समाधिस्थ भोले भाले!
तुम केशर की सुरभि और सेवों को देख चले आए,
पर रखना यह याद कि तक्षक तुम्हें न कहीं निगल जाए।
यह रावण-सा वेष बदल तुम सीता को छलने आए,
पर रखना यह ध्यान कि तेरी लंका कहीं न ढह जाए॥
यह चुशूल, जो तज उसूल आता-त्रिशूल बन जाता है—
सँभल, बढ़ाना पग—उठ बैठे-शिवा-धनंजय रखवाले!
एक फूल भी चुन न सकेगा तू इस अक्षय क्यारी का
ब्रह्मपुत्र-सुरसरि से सिंचित रक्षित नव-फुलवारी का
चाओ-माओ ‘मुझे बचाओ’ छोर न पा जब सारी का,
कह भागेंगे, वसन-रूप लख नटवर गिरिवर धारी का!!
तृणावर्त अघ असुर कंस-सा जो अन्यायी बन आए—
भारत-सारथि बन फकेंगे पाँचजन्य ओ मतवाले!
अस्तु, मानजा पंचशील के सबसे पहिले अनुयायी
मानवता तज क्यों बनता दुर्दान्त और आततायी
हम शिव-से भोले भाले भी हम मोहन के अनुयायी
शान्ति-सत्य के सदा समर्थक सारे जग के हैं भाई!
अभी न बाँधे कफन सिरों पर, चेत मढ़ तू रार न कर—
खेल, लौटे जा अपने घर को, ओ अफीम के मतवाले!
[श्री रामस्वरूप खरे]
चीन के आक्रमण ने हमारी स्वतन्त्रता, सामर्थ्य और प्रतिष्ठा को चुनौती दी है। इस प्रकार के अन्यायपूर्ण, आक्रमण कोई किसी पर तभी करने को उद्यत होता है जब वह समझता है कि छल बल के द्वारा प्रतिपक्षी को परास्त करके वह मनमानी कर सकता है। ऐसी मान्यता उसी के मन में जमती है जो प्रतिपक्षी को अपने से कमजोर समझता है। अन्यथा अकारण इतना अन्यायपूर्ण आक्रमण कोई मदान्ध ही करते हैं। कारण होने पर तो दुर्बल के भी लड़ने और प्रतिरोध करने की बात समझ में आती है, पर जिस बात का कोई आधार न हो ऐसे बहाने लेकर चढ़ दौड़ना कोई नृशंस ही कर सकता है। निस्संदेह भारत पर नृशंस और बर्बरता पूर्ण आक्रमण हुआ है। ऐसे कुकृत्य करने वाले को लज्जित होना चाहिए था किन्तु जिस धूर्तता और निर्लज्जता के साथ अपने पक्ष को भी सही सिद्ध करने की चीन चेष्टा कर रहा है उसे देखते हुए यही निष्कर्ष निकलता है कि निर्लज्जता की निकृष्ट भूमिका पर खड़े होकर सोच समझ कर तैयारी के साथ ही यह बर्बरता कार्यान्वित की गई है।
कपटी मित्र का विश्वासघात—
मित्र बन कर कपटी शत्रु सा व्यवहार करने का उदाहरण पुराणों के असुर उपाख्यानों में पढ़ने को मिलता था, अब हमारी आँखें वह सब देख रही हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों से हमें इतिहास से ही शिक्षा ग्रहण करनी होगी। असुर आक्रमण की पूर्व तैयारी में रहते हैं इसलिए आरम्भ में उन्हें सफलता मिलती है। देवता आक्रमण की नहीं शाँति की बात सोचते रहते हैं इसलिए स्वभावतः उनकी आक्रमण शक्ति न्यून रहती है। इसलिए उन्हें मात खानी पड़ती है। इसका उपाय एक ही रहा है। आगे भी वही होगा। वह है—प्रतिरोध के लिए आवश्यक शक्ति का संचय। चोट खाये हुए देवता जब भगवान के पास अपनी व्यथा और पुकार सुनाने गये हैं तो उन्हें उपाय रूप से शक्ति संचय का ही उपदेश मिला है। देवताओं ने वही किया है। देवताओं द्वारा देव आदर्शों को लेकर जो दिव्य शक्ति एकत्रित की जाती है वह निस्सन्देह बड़ी प्रबल होती है। असुरों के सारे छल−बल उसके सम्मुख तुच्छ सिद्ध होते हैं और तैयारी के बाद जो देवा पुर संग्राम होता है उसमें असुरता का विनाश होता है।
इस बार भी यही हो सकता है। यही होगा। यही होना चाहिए कि हम भारत भूमि के नागरिक अपने देव आदर्शों के अनुरूप प्रतिरोध की आवश्यक शक्ति का संचय करने में लग जावें। इसी एक उपाय से हमारा कल्याण होगा। इसी से हमें विजय मिलेगी। सतयुग में देवताओं की शक्तियों का एकीकरण करके ब्रह्मा जी ने दुर्गा का आविर्भाव किया था और उसने शुँभ, निशुँभ, महिषासुर, मधुकैटभ आदि असुरों को परास्त किया था। हमें संगठित रूप से अपनी उस प्रसुप्त दिव्य शक्ति को जागृत करना होगा, जो विजय के लिए नितान्त आवश्यक है।
लड़ाई समाप्त नहीं हुई—
इन दिनों मोर्चे पर गोली चलना बन्द है। बीच बचाव करने वाले समझौते की बातें भी चला रहे हैं। इससे किसी को यह नहीं समझ लेना चाहिए कि लड़ाई समाप्त हो गई और झगड़ा निपट गया। यह समर नीति मात्र है। अपनी तैयारी और प्रतिपक्षी को धोखे में डालने मात्र के लिए यह सब केवल पैंतरा बदलने मात्र की चालाकी है। हमारे सामने एक वास्तविक खतरा है। मोर्चे बदल सकते हैं पर अपनी परीक्षा की स्थिति जारी ही रहेगी। सामयिक समझौते का कोई मार्ग निकला भी तो उससे स्थिरता और भी नहीं होगी। उफनता हुआ पानी दूसरे रास्ते से कूदेगा। हममें से किसी को भी भूल में न आना चाहिये कि इस जमाने में गोली चलाना न चलाना कोई विशेष महत्व नहीं रखता। भय और आतंक उत्पन्न करके कूटनीति से लड़ाई भी लड़ी जाती है जिसे ‘शीत युद्ध’ कहते हैं। शीत युद्ध इस युग की राजनैतिक धूर्तता की एक नई देन है। गोली बन्द रहते हुए भी शीत युद्ध चलता रह सकता है और उससे भी वैसे ही भयंकर परिणाम होते रहते हैं, जैसे मार काट वाले गरम युद्ध के होते हैं।
हो सकता है कि गरम युद्ध शीत युद्ध में बदल जाय। पर यह निश्चित है कि चीन के इरादे हमारी सभ्यता और स्वतंत्रता को नष्ट करने के हैं। गोली चलाना भले ही उसने अपनी आवश्यकता के अनुसार बन्द किया हो पर भारतीय जनता को आतंकित करके अपने झंडे के नीचे ले आने की चाल और भी उग्र होती जा रही है। इसलिए हमें न तो बेखबर रहना चाहिए और न निश्चिन्त। आज का शीत युद्ध कल गरम युद्ध बन सकता है। आक्रमण- कारी को जब भी अपनी सुविधा दीखेगी तभी वह फिर पहले की तरह गोली बरसाने लग सकता है। दूसरे देशों के कंधे पर अपनी बंदूक रखकर दूसरे बहाने से आक्रमण के दृश्य उपस्थित कर सकता है। हमारी बेकसी और निश्चिन्तता देखकर तो उसकी हिम्मत और भी बढ़ सकती है। इससे आक्रमण की घड़ी और भी जल्दी हो सकती है। इसलिए हम में से हर एक को यही सोचना होगा कि लड़ाई चल रही है। हमारी प्रतिष्ठा और स्वाधीनता अभी भी दाँव पर लगी हुई है। हमारी मातृभूमि का हड़पा हुआ भाग जब तक वापिस नहीं मिल जाता तब तक किसी स्वाभिमानी भारतीय के लिए चैन से बैठने की, बेखबर रहने की, उपेक्षा करने की बात सोचना आत्मघातक ही होगा।
लम्बी तैयारी की आवश्यकता—
पिछले अंक में कहा गया था कि अभी साढ़े आठ वर्ष हमें इसी तरह की स्थिति में रहना होगा। हमारे राजनैतिक नेता भी यही कहते और सोचते हैं। पाकिस्तान की गतिविधियाँ जो इन दिनों चल रही हैं बहुत ही ध्यान देने योग्य हैं। अगले वर्ष काफी उथल पुथल का है। समय का तकाजा यह है कि बिना एक क्षण भी बर्बाद किए हमें शक्ति संचय में पूरी तत्परता और सतर्कता से संलग्न रहना चाहिए। हो सकता है कि गोली चलना देर तक रुका रहे और यदि समय रहते हम चेत गये और शत्रु के दाँत तोड़ने लायक आवश्यक शक्ति जुटा सके तो यह भी हो सकता है कि दूसरा आक्रमण करने से पूर्व शत्रु को कुछ अधिक सोचना और अधिक ठहरना पड़े। ऐसी स्थिति पैदा करना न करना हमारे हाथ की बात है। अपनी दुर्बलताओं को हटाने से लापरवाही करके और भी प्रचंड आक्रमण को आमंत्रित करना या शक्ति संचय में जुट कर उसकी संभावना तक को समाप्त कर देना बिलकुल हमारे अपने हाथ की बात है।
हमारी सीमा , स्वाधीनता, प्रतिष्ठा और सभ्यता पर जो आक्रमण हुआ है उससे प्रत्येक देशभक्त भारतीय का तिलमिला जाना स्वाभाविक है। ऐसे अवसरों पर भी जिसे आवेश नहीं आता और इतनी चोट लगाने पर भी प्रतिरोध के लिए कुछ करने की बात जो नहीं सोचता उसे जीवित-मुर्दा एवं भावना हीन पाषाण ही कहा जायगा। ऐसे धरती के ऊपर माता के कपूत होंगे तो सही, पर संभवतः उनकी संख्या देश में कम ही होगी। जिनमें देशभक्ति की भावना मौजूद है उनमें से प्रत्येक का कर्तव्य है कि राष्ट्रीय अग्नि परीक्षा की घड़ी में कुछ सोचें, और कुछ करें।
हम भी कुछ न कुछ तो करें ही—
हर व्यक्ति अपनी सामर्थ्य और शक्ति के अनुसार इस धर्म युद्ध में, इस जन युद्ध में कुछ न कुछ आहुति दे सकते हैं। अंधे, कोढ़ी, अपंग, निर्धन तक उत्साहपूर्ण त्याग कर रहे हैं तो जिनके पास कुछ साधन हैं। वे तो बहुत कुछ कर सकते हैं। गत दिसम्बर और जनवरी के अंकों में हम इस संबंध में बहुत कुछ कह चुके हैं। धन, स्वर्ण, रक्त देने, सेना से भर्ती होने, नागरिक सुरक्षा सेना में भाग लेने, खेतों और कारखानों में अधिक काम करके उत्पादन बढ़ाने जैसे अनेकों कार्य सामने उपस्थित हैं, जिनमें हर कोई अपनी शक्ति, सामर्थ्य और स्थिति के अनुसार कुछ न कुछ कर ही सकता है।
अखंडज्योति परिवार के सब लोग हर 20 तारीख को रक्षा दिवस मनाया करें, सामूहिक प्रार्थना किया करें, रक्षा प्रयत्नों में सहयोग के लिए एक महीने का कार्यक्रम उस दिन बनाया करें, यह कहा जा चुका है। सप्ताह में एक समय उपवास रख कर अन्न बचाने और इस प्रकार प्रति सप्ताह चार आने, महीने में एक रुपया बचा कर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कोश’, ‘नई दिल्ली’ के पते पर भेजने के लिए जोरदार अपील की गई है। प्रसन्नता की बात है कि प्राप्त सूचनाओं के अनुसार अधिकाँश परिजन इस प्रक्रिया को उत्साह पूर्वक अपनाने लगे हैं। उपासना में प्रति दिन एक माता गायत्री मंत्र को सुरक्षा के लिए अतिरिक्त रूप से बढ़ा देने वाली बात तो प्रायः सभी पाठकों ने कार्यान्वित करनी और कर दी है, यह हर्ष और संतोष की बात है। पर यह याद रखना चाहिए कि यह सामयिक और बाह्य प्रयत्न मात्र स्थिर शक्ति का संचय करने के लिए हमें अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रम भी अपनाने होंगे। राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए हमें और भी बहुत कुछ करना होगा।
सामयिक और स्थिर प्रयत्न—
सुरक्षा का प्रश्न आवश्यक है, सामयिक आवश्यकता की दृष्टि से तो वही सबसे महत्वपूर्ण है। उन्हें तत्काल पूरा करने में संलग्न रहते हुए भी हमें यह न भूल जाना चाहिए कि ठोस शक्ति ही सुरक्षा की स्थिर गारन्टी है। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक और नैतिक कर्म से शक्तिशाली नागरिकों के द्वारा ही कोई राष्ट्र शक्तिशाली बनता है। देश और कुछ नहीं उसके निवासियों का समूह ही तो समाज या राष्ट्र कहलाता है। नागरिक जिस स्तर के होंगे उसी स्तर की राष्ट्रीय शक्ति रहेगी। शक्ति का स्रोत जनता ही तो है। जन मानस में जितनी दुर्बलता या सशक्तता रहेगी उसी के अनुसार उसकी प्रगति होगी, वैसी ही सुख शान्ति रहेगी और उसी के अनुसार सुरक्षा सम्भव होगी। हमें जन मानस में रहने वाली शक्ति को समझना होगा, उसे जगाना और उठाना होगा। तभी हम शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में खड़े हो सकेंगे और तभी हमारे शत्रुओं को अपने कुचक्र छोड़ने के लिए विवश होना पड़ेगा।
सृष्टि के आरंभ की बात है पुलस्ति के पुत्र विश्रवा के एक ऐसा पुत्र उत्पन्न हुआ जो बहुत ही कुरूप और बेडौल था। हाथ तो उसके बहुत ही छोटे थे। उसे देखकर घर के सभी लोग खिन्न हुए और उसका नाम कुबेर-अर्थात् कुरूप रख दिया। बालक कुबेर जब बड़ा हुआ तो दूसरों द्वारा अपना उपहास उड़ाये जाते देख कर उसे लोगों की मूर्खता पर बड़ा क्षोभ हुआ। रूप को गुणों से अधिक महत्त्व दिया जाय यह बात उसे सहन नहीं हुई। कुबेर ने अपने पुरुषार्थ से अपनी योग्यता को बढ़ाने का निश्चय किया और कठोर तप करने लगा। बालक की ऐसी लगन देख कर घर के वे लोग भी द्रवित हो गये जो पहले उसका उपहास करते थे। बाबा पुलस्ति और पिता विश्रवा भी कुबेर की पुरुषार्थ साधना में सम्मिलित हो गये और तीनों का सम्मिलित प्रयत्न कुछ ही दिनों में आशाजनक रीति से सफल हुआ। देवताओं को प्रसन्न करके कुबेर धनाधीश और लोकपाल बन गये। और अलकापुरी में राज करने लगे।
जो लोग आरम्भ में कुबेर की कुरूपता देख कर उसका उपहास करते थे, उन्हें समृद्ध धनाधीश कुबेर के पुरुषार्थ के सामने नतमस्तक होना पड़ा। सबने स्वीकार किया कि रूप की अपेक्षा गुणों का महत्व अत्यधिक है।
सुरक्षा के लिए प्रगति की नितान्त आवश्यकता है। यह प्रगति जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में होनी चाहिए। शरीर, मन, धन, संगठन, शस्त्र, शिक्षण, आचरण आदि सभी क्षेत्रों में हमें आज की अपेक्षा कल अधिक प्रगतिशील और सशक्त बनना होगा। हम आज जिस स्थिति में हैं—जिस स्तर पर हैं उसे देखते हुए शत्रुओं को हमारी दुर्बलता भाँपने का अवसर मिलता है और वे भेड़िये की तरह ललचाई आँखों से हमारी ओर देखते हैं। शक्ति का सर्वतोमुखी आह्वान करने के लिए हमें तत्पर होना पड़ेगा। काल-पुरुष ने जिस अग्नि-परीक्षा में हमें डाला है उसमें होकर ठीक तरह से पार होने के लिए हमें अपने को सुधारना, सम्भालना और बदलना पड़ेगा।
भावना की जागृति—
सबसे प्रथम और सबसे आवश्यक कार्य है- भावनाओं का जागरण। सदियों की गुलामी के वातावरण में रहते हुए हमने बहुत कुछ खोया। उनमें से एक वस्तु भावनाओं की तेजस्विता को भी खोया है। यों पिछले स्वाधीनता संग्राम में और आज के ऐसे प्रयत्नों में जनता ने जो योगदान दिया है, जिस त्यागा और बलिदान का परिचय मिला है वह प्रशंसनीय है और आशा जनक भी। पर उतने से ही सन्तुष्ट नहीं रहा जा सकता। भारत माता के प्रत्येक सपूत का अन्तःकरण उन उच्च भावनाओं से तरंगित होना चाहिये जो हमारे प्राचीन आदर्श और गौरव के अनुरूप हैं। देशभक्ति, मानवता और आदर्शवाद के लिए बहुत कुछ करने की उत्कट अभिलाषा जब तक जन मानस में जागृत न होगी तब तक सुरक्षा और प्राप्ति का लक्ष कछुए की चाल से ही अग्रगामी होगा, उतने मात्र से सामने उपस्थित ज्वलन्त समस्याओं का समाधान समय रहते न हो सकेगा।
प्रखरता और तेजस्विता चाहिये—
राष्ट्रीय सशक्तता के लिए जिन साधनों की आवश्यकता है यदि हमारी भावना प्रखर हो उठे तो वे बात की बात में इकट्ठे हो सकते हैं। इस प्रखरता के अभाव में रो धो कर काम होगा तो सही पर उसमें तेजस्विता न रहेगी। आज सुरक्षा के लिए धन की आवश्यकता है। चालीस करोड़ देशवासी यदि प्रति सप्ताह एक समय का भोजन त्याग कर चार आने भी बचा लें और उस बचत को सुरक्षा कोष में जमा कर दें तो महीने की चार चवन्नियों का एक रुपया होता है। चवालीस करोड़ रुपया प्रतिमास सहज ही जमा हो सकता है। सप्ताह में एक टाइम का उपवास करना ना तो कुछ कठिन है और न हानिकारक। विदेशी से अनाज मंगाने में जो विपुल धन राशि खर्च करनी पड़ती है वह बच सकती है स्वास्थ्य समस्या सहज ही हल हो सकती है। स्वास्थ्य पर इस उपवास का अच्छा असर पड़ सकता है। उससे आध्यात्मिक लाभ भी होता ही है। भावना प्रखर हो तो इतना सा त्याग किसी को कुछ भी भारी नहीं पड़ेगा और हर महीने 44 करोड़ रुपया सहज ही प्राप्त होते रहेंगे। पर हम अखबारों पर नजर डालते हैं तो मन हर्ष और विषाद के झोंके खाने लगता है। हर्ष इस बात का कि असंख्यों निर्धनों और कठिनाइयों में रहने वाले लोगों ने भी अपना सर्वस्व देकर कितनी बड़ी देशभक्ति का परिचय दिया। विषाद इस बात का कि करीब 4 महीने लड़ाई चलते हो गये, कोष में 44 करोड़ रुपये भी अभी जमा नहीं हो पाये। हर व्यक्ति पीछे एक रुपया का औसत भी नहीं आया। इसका कारण लोगों की गरीबी नहीं भावना की कमी है। सोना कुछ खाने पीने की या किसी खास जरूरत को पूरा करने वाली चीज नहीं है। उसे लोग शृंगार के लिए ही पहनते हैं। ईर्ष्या, रखवाली, घिसट, टूट फूट, ब्याज न मिलना आदि कितने ही दोष भी उसके संग्रह में हैं। उसे यदि राष्ट्रीय सम्मान और सुरक्षा की आवश्यकता से अधिक महत्वपूर्ण हम न समझते तो अरबों रुपयों का सोना सरकार के पास होता और उसके बदले में मशीनें विदेश से मँगा ली गईं होती जो हथियार बनाने की आवश्यकता पूरा करतीं। लोगों की कंजूसी, संकीर्णता और स्वार्थपरता सोने को छिपाने में सहायक हो रही है और हमारे कर्णधार चिन्ताग्रस्त बैठे हैं। यदि हमारी देशभक्ति इस अवसर पर भामाशाह की भावनाओं की तरह उमड़ पड़ी होती तो आज दूसरे ही दृश्य सामने होते। हमें विदेशों की सहायता माँगनी नहीं पड़ती वरन् दूसरों को देने की स्थिति होती।
मरने से डरना क्या ?—
हर साल करोड़ों आदमी मौत बीमारी में सड़-सड़ कर मरते हैं। उनमें से लाखों नौजवान भी होते हैँ। मौत मनुष्य जीवन की एक बिलकुल स्वाभाविक स्थिति है और किसी के लिए भी, कभी भी आ सकती है। जिस तरह छींक कभी भी आ सकती है और उसे कोई रोक नहीं, इसी प्रकार मौत का भी क्या ठिकाना? कर्त्तव्य पालन करते हुए मौत मिलना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सफलता और सार्थकता मानी गई है। यदि यह भावना भारत के बच्चे-बच्चे में भर जाय तो युद्ध मोर्चे पर हम टिड्डी दलों की तरह पहुँचें और आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था के मोर्चे पर भी कोटि-कोटि नागरिक सेना उमड़ती हुई दृष्टिगोचर होने लगे। धर्मयुद्ध में जूझने वाले शिवाजी, प्रताप, लक्ष्मीबाई, भगतसिंह आदि का जयघोष करते समय जो उत्साह हमारे चेहरे पर आता है, यदि उसकी मात्रा थोड़ी और भर जाय तो हम स्वयं भी आज अनायास ही सामने आये हुए ठीक वैसे ही अवसर पर स्वयं को भी उन्हीं की पंक्ति में खड़ा कर सकते हैं। जरूरत केवल भावना की है। भावना नहीं तो मौत के डर से कायर और कातर की तरह अपनी ही बचत की बात सोची जायगी। ऐसे लोग स्वयं भी मरते हैं और साथ में राष्ट्र की सुरक्षा को भी ले डूबते हैं।
सुरक्षा प्रयत्नों में उतनी सहायक कोई साधन सामग्री नहीं हो सकती जितनी देशभक्ति और त्याग बलिदान की भावना। इस भावना का जागरण यदि परिपूर्ण मात्रा में हो सके तो 44 करोड़ लौह स्तम्भों का बना हमारा राष्ट्र-दुर्ग युग युगों तक अभेद्य ही रहेगा, कोई उसकी ओर आँख उठाकर भी न देख सकेगा। यदि हम अपना सर्वस्व मातृ-भूमि की बलिवेदी पर चढ़ाने के लिये उद्यत हों तो इतनी सम्पदा और साधन सामग्री आज हमारी अपनी ही इकट्ठी हो जायगी कि विदेशी सहायता की बात सोचना भी व्यर्थ प्रतीत होगा। भावना स्तर यदि प्रसुप्त पड़ा रहे, लोग देशभक्ति की बात एक फैशन या प्रदर्शन की तरह ही कहें और आचरण में स्वार्थ परता एवं कंजूसी को ही गले लगाते रहें तो हम कमजोर ही रहेंगे, वह कमजोरी प्रगति और सुरक्षा के दोनों मोर्चों को कमजोर बनाये रहेगी।
जन सहयोग की आवश्यकता—
प्रगति के मोर्चे पर अगणित रचनात्मक काम किये जाते हैं। वह सब सरकार नहीं कर सकती। सरकार करेगी तो टैक्स ही वसूल करके करेगी, उसमें जनता की विवशता रहेगी देशभक्ति नहीं। ऐसे रचनात्मक कार्य होते तो हैं और उन पर सरकारी कर्मचारी और सरकारी साधनों से प्रगति के लिये बहुत कुछ किया जा रहा है, पर उसमें वह सजीवता दृष्टिगोचर नहीं होती जो त्याग और बलिदान की भावना में ओतप्रोत उत्साह के वातावरण में जनता या जन सेवकों द्वारा कुछ किये जाने पर दीखती है। श्रमदान विनिर्मित छोटे-छोटे बाँध, रास्ते, पुल और स्कूल अपने में एक गौरव, गर्व, आदर्श और प्रेरणा का प्रकाश भरे रहते हैं। उन्हें देखते ही उत्साह और आशा की लहर दौड़ती है। दूसरों में वैसा ही अनुकरण करने की इच्छा जगती है। सच्ची प्रगति ऐसे ही उत्साहपूर्वक, भावनामय वातावरण में प्रस्तुत किये गये कार्यों पर निर्भर रहती है। सरकार द्वारा किये गये प्रयत्नों से काम तो चल जाता है पर त्याग और वातावरण का पुट रहने वाले कार्यों की बात ही कुछ दूसरी होती है।
वह चीन जो कल तक अफीम की पिनक में पड़ा हुआ संसार की गई गुजरी स्थिति के देशों में गिना जाता था आज भारत जैसे महान देश पर आक्रमण करने की शक्ति इकट्ठी कर सकता है। उसकी इस सफलता का श्रेय जन भावनाओं के जागरण में ही सम्मिलित है। चीन ने अपनी नदी बाढ़ समस्या को जिस अच्छे ढंग से सुलझाया उसका अध्ययन करने के लिए भारत सरकार ने सन् 1954 में एक शिष्ट मण्डल वहाँ भेजा था। उस शिष्ट मण्डल ने लौट कर जो रिपोर्ट दी उसमें कहा गया था कि “चीन ने नदियों की बाढ़ का प्रश्न हल करने के लिए बड़ी-बड़ी नहरें बनाई हैं। उसकी उत्तरी सिक्याँग की नहर सबसे बड़ी और लम्बी है जो 40 लाख एकड़ जमीन खींचती है और जहाज रानी का काम भी देती है। इसका निर्माण कार्य उच्च कोटि का हुआ है। उसके तल की चौड़ाई 420 फुट और लम्बाई 100 मील है। इसके बनाने में 247 करोड़ घन फुट मिट्टी खोदी गई। यह पूरी नहर केवल 80 दिन में बन कर तैयार हो गई। इस नहर को खोदने का सम्पूर्ण कार्य बिना मशीनों की सहायता के केवल जन शक्ति द्वारा ही सम्पन्न हुआ। याँग्सी नदी पर बना विशाल बाँध 75 दिन में और हुवाई नदी का बाँध 150 दिन में बना जब कि इसके लिए बालू पत्थर आदि 45 से 150 मील तक से लाना पड़ा।”
जो कार्य बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाने, बहुत समय और धन लगाने पर भी ठीक तरह नहीं हो सकते वे भावनाएँ जागृत होने पर जन शक्ति के सहयोग से सहज ही पूरे हो सकते हैं। भावनाओं का जागरण ही राष्ट्र का वास्तविक जागरण है। जब तक जनमानस में कर्तव्य बुद्धि और सामूहिकता के प्रति निष्ठा न होगी तब तक अन्य प्रयत्न उतने उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकते।
जन भावनाओं के अभाव में हम प्रदर्शनात्मक और प्रचारात्मक तो बहुत कुछ कर सकते हैं पर
न जातु कामः कामानामुपभोगे-शाम्यति।
हविष कृष्णावर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते॥
विषयों की लालसा भोगों के भोगने से शाँत नहीं होती। घृत की आहुति डालने से अग्नि शान्त नहीं हो सकती वरन् उत्तरोत्तर और भी प्रचण्ड होती है।
ठोस काम तभी होता है जब उसे करने वाले की भावनाएँ सच्चे मन से कार्य करती हैं।
हमारी समस्त दुर्बलताएँ तभी समाप्त होती है जब अन्तःकरण जगेगा। उस जागरण के साथ ही हमारा सर्वतोमुखी जागरण होगा। इस जागृति की स्थिति में कोई चोर हमारे घर में एक कदम भी रखने का साहस न करेगा, कोई लुटेरा लूट करने के मनसूबे न बाँध सकेगा। सुरक्षा के लिए जागरण आवश्यक है। राष्ट्रीय जागरण का अर्थ है—जन भावनाओं की प्रखरता, तेजस्विता और जागृति।
एक बार कस्तूरबा बीमार थीं। उनकी बीमारी के निवारण के लिए गाँधी जी ने उन्हें नमक छोड़ने को कही। कस्तूरबा इस बात पर झल्ला उठीं, बोली ‘कभी नमक भी छोड़ा जा सकता है। आप तो विचित्र विचित्र बात कह देते हैं।”
इस पर महात्मा गाँधी ने नमक छोड़ने का व्रत ही ले लिया। कस्तूरबा को अपनी हार माननी पड़ी।
राष्ट्र को समृद्ध और शक्तिशाली बनाने के लिए आदर्शवाद, नैतिकता, मानवता, परमार्थ, देशभक्ति एवं समाजनिष्ठा की भावनाओं की जागृति नितान्त आवश्यक है। इसके अभाव में अन्य साधन सामग्री चाहे कितने ही विपुल परिमाण में उपलब्ध क्यों न हो हमारी आन्तरिक दुर्बलता को दूर न कर सकेगी। आदर्शहीन, कपटी, दुष्ट, दुराचारी, कायर और स्वार्थी, लोगों के हाथ में साधन, सामग्री लग जाय तो इसके आधार पर उनकी बुराई ही अधिक बढ़ती है और उससे अहित ही अधिक होता है। इसलिए सुरक्षा और प्रगति के साधन जुटाते हुए इस बात का भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि अन्तःकरण में सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की भी अभिवृद्धि निरंतर होती रहे।
धैर्य और साहस का मूल्य तोप और तलवार से बढ़कर है। देशभक्ति और बलिदान की भावना से ओत-प्रोत नागरिक टैंकों और जहाजों से अधिक महत्वपूर्ण होते हैं! इसके विपरीत कंजूस, मुनाफाखोर, जखीरेबाज, कायर , डरपोक, देशद्रोही, उत्पाती, अपराधी वृत्ति के लोग राष्ट्रीय संकट के समय शत्रु के बमों से अधिक हानिकारक और भयावह सिद्ध होते हैं। आस्तीन में छिपा बैठा हुआ छोटा-सा संपोला, जंगल में रहने वाले भयंकर विषधर से अधिक घातक होता है। जनता की मानसिक कमजोरी हथियारों की कमजोरी की अपेक्षा अधिक दुष्परिणाम प्रस्तुत करती है।
शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय क्षेत्रों में अनेक प्रकार की समस्याएँ और उलझनें आज अपने चारों ओर बिखरी हुई हमें दीखती हैं। इन सब का हल एक ही है, आन्तरिक संकीर्णता और दुर्बलता को मिटाना। बौद्धिक क्रान्ति ही समस्त क्रान्तियों की जननी है। विचार बदलते ही सारी परिस्थितियाँ बदल जाती हैं।
शारीरिक कमजोरी और बीमारी को दूर करने के लिए तात्कालिक रूप से कोई दवा-दारु, इलाज, उपचार कारगर हो सकता है, पर यदि स्थिर स्वास्थ्य पर चाहते हैं तो आहार विहार पर कठोर नियंत्रण रखे बिना काम नहीं चलेगा। मन की लिप्सा ही इन्द्रियों को ढीला छोड़ती है। यदि स्वभाव में संयम और नियमितता का समुचित समावेश हो जाय तो रोग मुक्त रहते हुए दीर्घजीवन का आनन्द लाभ किया जा सकता है। स्वास्थ्य के लिए किए जाने वाले बाहरी सारे प्रयत्न एक ओर रखे जायँ और मन का संयम एक ओर रहे तो संयम का ही पलड़ा भारी रहेगा।
बौद्धिक दृष्टि से अपने पिछड़ेपन का कारण, ज्ञान के महत्व को ठीक तरह न समझ पाना ही होता है। लोग स्वास्थ्य को बेकार समझते हैं, विद्याध्ययन का उद्देश्य नौकरी प्राप्त करना या प्रमाणपत्र लेना मात्र मानते हैं। यदि ज्ञान, संयम को आत्मा की भूख बुझाने वाला आवश्यक आहार मान लिया जाय तो मनुष्य अन्य आवश्यक कार्यों की तरह अध्ययन के लिए भी नित्य समय निकलता रहे। यह बात यदि आदत में सम्मिलित हो जाय तो विषम परिस्थितियों में रहते हुए भी ज्ञानोपार्जन की सुविधा मिलती रहती है और हर कोई अपनी मनोभूमि को उच्च भूमिका में विकसित कर सकता है। ज्ञान संसार का सर्वश्रेष्ठ धन है। जितनी दिलचस्पी धन उपार्जन में रहती है यदि उतनी ही अभिरुचि ज्ञान संचय में उत्पन्न हो जाय तो हमें सुसंस्कृत एवं प्रबुद्ध कहलाने की स्थिति प्राप्त होने में कोई कठिनाई न रहेगी।
स्वभाव और विचार सुधरें—
आर्थिक कठिनाइयों के बाहरी अनेक कारण भी होते हैं। कई बार मजबूरियाँ भी परेशानी का कारण होती हैं। पर आम तौर से आलस, पूरा मनोयोग न लगाना समय की बर्बादी और अपनी स्थिति से अधिक खर्च करने लगना ही अर्थ संकट का प्रधान हेतु पाया जाता है। जो लोग उपार्जन के लिए तत्परतापूर्वक श्रम करते हैं वे कम आमदनी होते हुए भी आनन्द से गुजारा करते हैं। इसके विपरीत जिन्हें फिजूलखर्ची की आदत है, और जो आवश्यक सतर्कता नहीं बरतते वे अधिक कमाने पर भी ऋणी और चिन्ताग्रस्त बने रहते हैं। आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए बाह्य साधनों की जितनी आवश्यकता है उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि अपना मन काबू में रहे। वे दुर्गुण और व्यसन आदत में शामिल न होने पायें जो अर्थ-संकट उत्पन्न होने के प्रमुख कारण होते हैं।
सामाजिक क्षेत्र में लोगों के साथ अच्छे सम्बंध न होने, द्वेष, मनोमालिन्य और असहयोग रहने का केवल यही कारण नहीं है कि लोग बुरे हैं, जमाना खराब है। ऐसा होता तो सभी के साथ सभी का दुर्व्यवहार ही रहता। पर देखा यह भी जाता है कि अनेकों को अगणित मित्र, सहयोगी और प्रशंसक घेरे रहते हैं। परस्पर सहायता भी करते हैं और सहयोग पूर्वक आनन्द एवं उत्कर्ष से लाभान्वित होते हैं। यदि जमाना ही बुरा है तो वह सबके लिए बुरा होना चाहिए था। वस्तु स्थिति यह है कि हमारे अपने खोट और दोष ही मनोमालिन्य पैदा करते हैं।
अपने स्वभाव की खराबियाँ साधारणतः समझ में नहीं आतीं पर यदि अधिक ध्यानपूर्वक उन्हें ढूंढ़ा, खोजा जाय तो वे त्रुटियाँ पकड़ में आ सकती हैं जिनके कारण द्वेष, उपेक्षा और असहयोग का वातावरण उत्पन्न होता है। अपने स्वभाव को मधुर, आकर्षक, शिष्ट और उदार बना कर अपने सहयोगियों, प्रशंसकों और मित्रों की संख्या में आशातीत वृद्धि हो सकती है। भविष्य को उज्ज्वल बनाने में, प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने में, सन्मित्रों का भारी हाथ होता है और वे उन्हें ही मिलते हैं जिनने अपने स्वभाव में आवश्यक सुधार कर लिया है। क्रोधी, चिड़चिड़े, ईर्ष्यालु, निन्दक, स्वार्थी, छिद्रान्वेषी, एकाकी, डरपोक प्रकृति के लोगों को तो मित्रों से वंचित ही रहना पड़ता है।
कुरीतियों का उन्मूलन—
हमारी सामाजिक कुरीतियाँ आजकल आर्थिक कमर तोड़ डालने वाली और भारी परेशानी, उत्पन्न करने का माध्यम बनी हुई हैं। इन मूर्खताओं की जड़ हमारी मानसिक कमजोरी में गड़ी रहती है। विवाह शादियों में होली की तरह गाढ़ी कमाई के पैसे स्वाहा किये जाते हैं। इसमें केवल एक अन्धपरम्परा और मरणोन्मुख रिवाज ही कारण बनी हुई है।
समाज सुधार की अगणित समस्याओं का हल, भावना की जागृति पर ही संभव है। बाल विवाह के विरुद्ध कानून मौजूद है पर भारी संख्या में बाल-विवाह हर साल खुले आम होते हैं। दहेज के विरुद्ध कानून मौजूद है पर इतना लम्बा समय बीत जाने पर भी न तो दहेज विरोधी कोई मुकदमा सफल हुआ और न वह कुकर्म रुका। अस्पृश्यता विरोधी कानून के अनुसार छूतछात को दंडनीय अपराध मान गया पर वह बुराई अभी भी चिन्ताजनक रूप में विद्यमान है। जब हत्या, चोरी, डकैती या बलात्कार सरीखे कड़ी सजा वाले अपराधों को पूर्ण रूपेण कानून नहीं रोक पा रहा है तो फिर सामाजिक कुरीतियों को मिटाने वाले कमजोर कानून किस हद तक सफल होंगे यह विचारणीय है। वस्तुतः इस प्रकार के सुधार जन भावना की जागृति पर ही निर्भर हैं। कुरीतियों के विरुद्ध यदि मानस प्रखर हो उठे तो उनका दस दिन ठहर सकना भी संभव न रहे।
अधः पतन का मार्ग—
आत्मिक और चारित्रिक क्षेत्र में आज चोरी, बेईमानी, ठगी और दंभ की जो प्रवृत्तियाँ चल रही हैं वे न व्यक्ति के लिए लाभदायक हैं न समाज के लिए। इनसे अपराध बढ़ते हैं, अशान्ति और अव्यवस्था फैलती है। सरकार का काम और खर्च बढ़ता है जो जनता से ही टैक्स के रूप में वसूल होता है। अपराधी को भी इसमें स्थायी लाभ नहीं। धोखा देकर थोड़े दिन थोड़ा लाभ कमाया जाता है, उसके बदले में सारी प्रतिष्ठा धूल में मिल जाती है और वह अविश्वासी आदमी उपेक्षित एवं घृणास्पद बन कर दरिद्रता, असफलता और परेशानी में फँसा रहता है। इसके विपरीत यदि ईमानदारी और सचाई की नीति पर दृढ़ता से अड़ा रहा जाय तो आरंभ में थोड़े दिन कठिनाई भले ही रहे पर जब लोग उसे परख लेते हैं तो जी−जान निछावर करने को तैयार हो जाते हैं। सज्जन व्यक्ति प्रतिष्ठा भी प्राप्त करता है, घाटे में भी नहीं रहता और शक्ति भी प्राप्त करता है। लोक और परलोक दोनों ही उज्ज्वल बनते हैं।
बेईमान इंजीनियर चाहे कितना ही सुयोग्य क्यों न हो रिश्वत लेने पर उतारू रहे तो उसके द्वारा बनवाये हुए काम, नासमझ लोगों द्वारा ईमानदारी के साथ बनाये हुए कामों से भी खराब सिद्ध होगा बेईमान व्यापारी निकम्मी मिलावटी, नाप तोल में कम, महंगी वस्तुएँ बेच कर जनता का अहित करेगा। रिश्वतखोर राज कर्मचारी शासन को नष्ट करते हैं और जनता में असंतोष फैलाते हैं। कोई कितना ही सुशिक्षित समुन्नत या समृद्ध, न हो यदि ईमानदार नहीं है तो उसके द्वारा सबका अहित ही होगा। दुराचारी पुरोहितों द्वारा धर्म की हानि ही होती है। कायर सैनिक शत्रु का ही मनोरथ पूर्ण करते हैं। कामचोर मजदूर उत्पादन और अच्छाई का स्तर घटा कर राष्ट्रीय समृद्धि को क्षति ही पहुँचाते हैं। किसी भी क्षेत्र में लीजिए यदि उसके कार्यकर्ता बेईमानी और अनीति को अपनाये होंगे तो उनकी बाहरी दौड़−धूप व्यर्थ सिद्ध होगी, उनके कार्यों का परिणाम अन्ततः दुखद और घातक ही होगा। बेईमान नेता अपने नेतृत्व की रक्षा के लिए देश को रसातल पहुँचा देने वाली करतूतें करते हुए संकोच नहीं करते।
इस बाधा को हटाया जाय—
प्रगति पथ की सब से बड़ी बाधा, बेईमानी, अनैतिकता स्वार्थपरता एवं संकीर्णता ही है। शारीरिक दुर्बलता, आन्तरिक अशान्ति, सामाजिक विद्वेष, आर्थिक कठिनाई की जड़ अनैतिकता है। अपराध, पतन, पाप, संघर्ष एवं संकट की बाढ़ का कारण केवल दुष्प्रवृत्तियाँ ही हैं। अगणित समस्याएं केवल इस एक ही विकृति के कारण उत्पन्न होती हैं और उनका समाधान भी इस एक समाधान के द्वारा ही हो जाता है। उत्कर्ष के लिए क्रान्तियाँ आवश्यक मानी जाती हैं। सबसे बड़ी-सब क्रान्तियों की जननी बौद्धिक एवं नैतिक क्रान्ति ही है। भावनाओं में परिवर्तन होते ही सब कुछ बदल जाता है।
हमारे सामने राष्ट्र की सुरक्षा का प्रश्न खड़ा हुआ है। उसे हल करने के लिए प्रगति और शक्ति चाहिए। इन दोनों का आधार है—भावनाओं का जागरण। साधन सामग्री भी बढ़नी चाहिए पर इसका सदुपयोग तो भावनाओं पर ही निर्भर है। सबल राष्ट्र की रचना के लिए उसके नागरिकों का सबल होना आवश्यक है। स्वास्थ्य, धन, विद्या, संगठन, शस्त्र आदि के माध्यम से राष्ट्र बलवान बनते हैं पर इनकी उपलब्धि के लिए प्रखर मनोबल अनिवार्य है। हम इस मूलभूत तथ्य की उपेक्षा न करें। जन-मानस की प्रसुप्त, उत्कृष्ट भावनाओं को जगाने का प्रयत्न करें तो उसके आधार पर जागृत हुई शक्ति हमारी ही नहीं सारी मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल कर सकती है। सुरक्षा समस्या को हल करना तो उस जन-जागृति के लिए नितान्त सरल और सहज है।
सुरक्षा का सशस्त्र मोर्चा सेना सम्भालती है और प्रगति का दूसरा मोर्चा प्रबुद्ध लोक सेवकों को सँभालना पड़ता है। प्रगति की सुरक्षा ही सबसे बड़ी गारंटी है। यदि जनता का मनोबल जागृत है और वह अपनी त्रुटियों का समाधान करती हुई प्रगति की दिशा में अग्रसर हो रही है तो यह विश्वास किया जा सकता है कि इसकी सुरक्षा सुस्थिर रहेगी, प्रतिष्ठा पर कोई आँच न आने पावेगी और सुख शान्ति की परिस्थितियाँ बढ़ेंगी। किन्तु यदि जन मानस का ढलाव पतनोन्मुख है, चरित्र मनोबल और प्रयत्न यदि शिथिल हो रहे हैं तो यही समझना चाहिये कि बाहर का शत्रु भले ही कोई न हो या कुछ बिगाड़ न सके या उसे शस्त्र बल से मार भगा दिया जाय पर भीतरी दुर्बलताएँ यदि बनी हुई हैं तो वे ही नाश का कारण बन जावेंगी।
अशान्ति और विनाश का कारण—
दुष्प्रवृत्तियाँ जहाँ कहीं भी रहती हैं वहीं अशाँति और विनाश का वातावरण उत्पन्न हो जाता है। श्रीकृष्ण जी का विशाल यदुकुल परस्पर ईर्ष्या-द्वेष में ही लड़ कट कर नष्ट हो गया था। मध्यकालीन सामन्तों और राजा रईसों की विलासिता ही उन्हें ले बैठी। आपसी फूट और सामाजिक कुरीतियों का दुष्परिणाम हम पिछले एक हजार वर्ष से बुरी तरह भुगतते आ रहे हैं। दूसरे को दोष देना व्यर्थ है, वास्तविक दोष तो हमारी दुर्बुद्धि और दुर्बलता का ही है। इतिहास से यदि हम कुछ सीख सकते हैं तो इतना सीख ही लेना चाहिये कि संगठित जागृत सच्चरित्र और प्रगतिशील जनता ही अपनी और अपने समाज की सुख शान्ति को सुरक्षित रख सकती है। हमें इस तथ्य पर हजार बार विचार करना चाहिये और जन मानस का स्तर ऊँचा उठाने के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए। कंधे पर इस अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के संदर्भ में कुछ विशेष उत्तरदायित्व आया है। युग निर्माण योजना के अंतर्गत हम सब इस प्रतिज्ञा में आबद्ध हैं कि जीवन का उपयोग केवल कमाने खाने तक ही सीमित न रखेंगे वरन् आत्म निर्माण और समाज-निर्माण की ओर भी समुचित ध्यान देंगे। यह भावना कागजी नहीं रहनी चाहिए। अपनी स्थिति, शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ प्रयत्न हर किसी के लिये संभव हो सकता है।
युग और कर्तव्य की पुकार—
अग्नि परीक्षा की इस महत्वपूर्ण वेला में भारत माता के सपूत अपने प्राण हथेली पर रखे देश की रक्षा के लिये खड़े हैं। कितने ही अपने प्राण विसर्जित कर चुके, कितने को ही करने हैं। कितने विकलांग और घायल पड़े हैं। यह राष्ट्र के प्रहरी हमें पूछते हैं कि “हम इतना कर रहे हैं, अपने हिस्से का कर्तव्य आप भी पूरा करते हैं या नहीं?” नीची आँखें करके लज्जा से सिर झुका कर भीरुता और हीनता की भाषा में नहीं, हमें उसका उत्तर प्रखर तेजस्विता के साथ देना चाहिये—आय सैन्य मोर्चे पर लड़ रहे हैं, आवश्यकता होने पर हम भी वहीं होंगे। जब तक वह अवसर नहीं आता तब तक राष्ट्र को सबल बनाने के लिये, दूसरी रक्षा पंक्ति मजबूत बनाने के लिए घर झोपड़ों में रहते हुए जो कुछ संभव है उसे हम भी कर रहे हैं।” यही उत्तर हमारे लिये उपयुक्त हो सकता है।
राम वनवास गये थे तो भरत ने अपना रहन-सहन वैसा ही बना लिया था और तपसी की भाँति राज-काज चलाते थे। हमें घर रहते हुए युद्ध सैनिकों की तरह ही सोचना और करना चाहिए। देश को सशक्त बनाने के लिए कुछ न कुछ करते रहने के लिए हमें कटिबद्ध हो ही जाना चाहिए।
एक कार्य जो हमें अब करना ही चाहिए वह है—रोजी-रोटी कमाने में चौबीसों घन्टे लगाने का विचार छोड़ देना चाहिए और सोचना चाहिए कि “जो केवल अपने लिए ही कमाता और आप ही खाता है वह शास्त्रों के अनुसार चोर है। हमें चोर नहीं बनना चाहिए।” जो लोकहित की बात सोचने के लिए-उस दिशा में कुछ करने के लिए-समय का सर्वथा अभाव बताता है उसे किन शब्दों में धिक्कारा जाय, यह समझ में नहीं आता। हम में से कोई इतना स्वार्थी और कंजूस नहीं जो यह कहे कि राष्ट्रीय निर्माण के लिए—युग निर्माण के लिए—मेरे पास बिलकुल भी समय नहीं है।
देश को सशक्त और प्रबुद्ध बनाने के लिए धन की नहीं—समय और मनोयोग की आवश्यकता है। भगवान ने 24 घन्टे का समय धन कमाने, और मौज-शौक करने और —संकीर्ण स्वार्थों में लगे रहने के लिए ही नहीं दिया है, उसमें से एक अंश परमार्थ कार्यों के लिए भी रहना चाहिए। आध्यात्मवाद की सुनिश्चित मान्यता यह है कि—”भजन की भाँति ही लोकहित के कार्यों में सेवा, प्रवृत्तियों में समय लगाया जाना आवश्यक है।” इसलिए परमार्थ कार्यों के लिए भजन के समान ही हमें श्रद्धान्वित होना चाहिए। उसके लिए हमारे दैनिक जीवन में कोई नियत स्थान होना ही चाहिए। समय-दान का कार्यक्रम हम उदारतापूर्वक चलाते रहें और उससे जीवन का एक आवश्यक धर्म-कर्तव्य मान कर कुछ न कुछ समय इसके लिए निर्धारित कर लें। निर्माण-श्रम, समय और मनोयोग लगाये बिना संभव नहीं होते। युग-निर्माण के लिए भी इन्हीं वस्तुओं की आवश्यकता है।
जन जागरण के लिए—
राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिए अनेक माध्यम, साधनों और उपकरणों की आवश्यकता है, उसके प्रकार और कार्यक्रम भी कितने ही हैं। पर वह सब कुछ जिस आधार पर निर्भर है वह है—भावना। भावना के अभाव में प्रगति की सारी प्रक्रियाएँ निर्जीव और प्रदर्शन मात्र बनी रहती हैं। हमें जन मानस में कर्तव्य पालन की, नीति, धर्म और सदाचार की, आस्तिकता और परमार्थ की प्रचंड भावनाएँ उत्पन्न करनी चाहिएं। ज्ञान से कर्म और कर्म से समृद्धि की उपलब्धि होती है। जैसे विचार मन में उठेंगे शरीर से वैसे ही कर्म बन पड़ेंगे, और जैसे कर्म होंगे वैसा ही प्रतिफल सम्मुख उपस्थित होगा। इसलिए हमें ज्ञान का, भावना का, महत्व समझना चाहिए और उसके विकास का समुचित प्रयत्न करना चाहिए।
ज्ञानदान को सबसे बड़ा दान माना जाता है,उसे ही ब्रह्मदान कहते हैं। ब्राह्मण को इसीलिए ‘भूसुर’ पृथ्वी का देवता मानते हैं, कि उनके द्वारा जनसाधारण को सद्ज्ञान की प्राप्ति होती है। विचारों की शक्ति प्रचंड है। यदि उत्तम विचारों को मनः क्षेत्र में समुचित स्थान मिल जाय तो साधारण स्थिति का मनुष्य महापुरुष, ऋषि, देवता और अवतार बन सकता है। संसार में जब कभी भले या बुरे परिवर्तन हुए हैं उनके मूल में विचार परिवर्तन की प्रक्रिया का ही प्रधान श्रेय रहा है। कार्लमार्क्स की साम्यवादी विचार धारा ने आज लगभग आधी दुनिया को उस विचार धारा से प्रभावित कर दिया है। ‘टाम काका की कुटिया’ पुस्तक की लेखिका ने अमेरिका में दास प्रथा के प्रश्न को लेकर गृहयुद्ध करा दिया और अन्त में उस घृणित प्रथा का अन्त ही होकर रहा। बुद्ध, महावीर, ईसा, मुहम्मद, गाँधी, दयानंद, की प्रखर विचार धाराओं का जब विस्तार हुआ तो उससे कितने लोग प्रभावित हुए? विचारधाराएँ तूफान की तरह होती हैं, मनुष्य उनके प्रवाह में सूखे पत्तों की तरह इधर-उधर उड़ते रहते हैं। हमें मनुष्य को मनुष्य बनाने की विचारधारा को जनमानस में गहराई तक प्रवेश करने का कार्य अपने हाथ में लेकर युग परिवर्तन की महान प्रक्रिया को सफल बनाना चाहिए।
नियमित समय दान—
शिक्षा और विद्या की उन्नति के लिए हम में से प्रत्येक को कुछ न कुछ समय नियमित रूप से देना ही चाहिए। अपने परिवार के कितने ही सदस्य अशिक्षित और अल्प शिक्षित होते हैं। उनकी साक्षरता बढ़ाने के लिए एक घण्टा घरेलू प्रौढ़ पाठशाला चलाई जा सकती है। पड़ौस में कितने ही निरक्षर लोग रहते हैं उन्हें भी पढ़ने की प्रेरणा देकर अपनी प्रौढ़ पाठशाला में सम्मिलित किया जा सकता है। इस प्रकार एक वर्ष में यदि पाँच निरक्षर व्यक्तियों को साक्षर बनाने की प्रतिज्ञा ली जा सके और यह उत्साह दूसरों में भी पैदा किया जा सके तो कुछ ही वर्षों में सारा देश साक्षर बन सकता है। जो कार्य सरकार करोड़ों रुपया खर्च करके भी नहीं कर सकती वह लोक सेवा की प्रवृत्ति को जागृत करके सहज ही पूरा हो सकता है।
गरीबी की तरह ही अशिक्षा भी दुर्बलता की निशानी है। अशिक्षा और गरीबी में अशिक्षा अधिक भयानक है क्योंकि इसी के कारण गरीबी, बीमारी, संकीर्णता आदि का जन्म होता है। यह कुछ भी मुश्किल काम नहीं, कि हम अपनी पत्नी, बहिन, माता, भाभी, चाची आदि को पढ़ाना शुरू करें, उन्हें साक्षर बनावें और इस पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें जीवन विद्या के, युग परिवर्तन विचार धारा के आवश्यक तथ्यों से भी परिचित कराते चलें। केवल इच्छा शक्ति की ही प्रधान कठिनाई है। यदि इसे दूर किया जा सके तो एक छोटी घरेलू पाठशाला चला सकना हम में से किसी के लिए संभव हो सकता है।
इसी प्रकार एक घरेलू पुस्तकालय, ज्ञान-मन्दिर भी आसानी से हर कोई चला सकता है। इसका आरम्भ अखण्ड ज्योति पत्रिका मात्र से ही हो सकता है। अपने घर का कोई भी साक्षर व्यक्ति ऐसा न बचे जो उसे आदि से अन्त तक न पढ़ता हो। इसी प्रकार पड़ौसी, मित्रों और समीपवर्ती विचारशील व्यक्तियों को अपने अंक पढ़ा देने और वापिस लेने का क्रम बनाना चाहिए। इस बहाने उनके घरों पर आने जाने का कार्यक्रम बनाना चाहिए। इस बहाने संपर्क बढ़ाते हुए और प्रस्तुत अंक में छपे किन्हीं महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करते हुए सत्प्रवृत्तियों का, सद्भावनाओं का, प्रसार करना चाहिए।
विचार-विस्तार के माध्यम—
घरेलू प्रौढ़ पाठशाला और पुस्तकालय का कार्यक्रम अखण्डज्योति के प्रत्येक पाठक के लिए नितान्त सरल और सर्वथा संभव कार्य है। छुट्टी के दिन गोष्ठियाँ बुलाई जा सकती हैं। यदि लोग इकट्ठे न होते हों तो प्रति दिन एक-दो व्यक्तियों के घरों पर सद्विचार-प्रसार के उद्देश्य से जाकर धर्म फेरी की जा सकती है। इस प्रकार अपने संपर्क में आने वाले लोगों का एक छोटा विचार-परिवार बन सकता है। जैसे रानी मधुमक्खी छत्ता बनाती है और उस छत्ते में अनेकों अन्य मधु मक्खियाँ प्रश्रय पाती हैं उसी प्रकार ‘अखण्डज्योति’ का प्रत्येक सदस्य रानी मक्खी की तरह एक विचार-परिवार बनावे। उस परिवार में—पाठशाला और पुस्तकालय में कम से कम दस सदस्य तो होने ही चाहिएं। इस पद्धति को अपना कर हम लोग कुछ ही दिन में लाखों, करोड़ों, व्यक्तियों का प्रशिक्षण आरम्भ कर सकते हैं, और यह शिक्षा शृंखला यदि विधिवत् अग्रसर होती रहे तो साक्षरता और शिक्षा के साथ-साथ विचार परिवर्तन की, भावना जागरण की-युग- निर्माण की-समस्या सरलता पूर्वक हल हो सकती है।
देशव्यापी अगणित बुराइयों, दुर्बलताओं और कुरीतियों का उन्मूलन करने के लिए, मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने के लिए आगे चल कर हमें अनेकों विशाल कार्यक्रम बनाने पड़ेंगे और जहाँ आवश्यक होगा वहाँ संघर्ष की भूमिका में भी उतरना पड़ेगा। पर सबसे पहला कार्य यह है कि लोग इस परिवर्तन की आवश्यकता समझें और उसके लिए आवश्यक त्याग करने की उद्यत हों। यह बौद्धिक पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए हमें आज ही प्रवृत्त हो जाना चाहिए। यह कार्य जितना सरल है उतना ही महत्वपूर्ण भी है। छोटे कार्य को आज आरम्भ करें, बड़े काम कल करने के लिए अपने आप ही सामने प्रस्तुत होंगे।
हमारा योगदान स्वल्प न रहे—
सुरक्षा और प्रगति के लिए हमें बहुत कुछ करना है। लोगों ने बहुत कुछ किया है और कर रहे हैं। हमें भी कुछ करने के लिए अग्रसर होना ही होगा। राष्ट्र को शक्तिशाली बनाने के लिए हमारा योगदान कुछ भी नहीं रहा यह कहलाने का कलंक हम में से किसी को भी अपने सिर पर नहीं लेना चाहिए। सीमा का युद्ध मोर्चा जितना महत्वपूर्ण है उससे कम राष्ट्र की सफलता के प्रश्न को नहीं समझा जाना चाहिए। अखण्डज्योति परिवार इस दूसरे मोर्चे पर बलिदानी युद्ध सैनिकों की भाँति ही कटिबद्ध रहने की प्रतिज्ञा कर चुका है। आवश्यकता के समय रक्षा मंत्री द्वारा सौंपे गये किसी भी कार्य लिए कभी भी कहीं भी जाने की प्रतिज्ञा हम कर चुके हैं। ऐसे अवसर पर हमारे और भी अनेकों हमारे साथ रहेंगे ऐसा विश्वास है। जब तक समय नहीं आता तब तक हमें दूसरे मोर्चे पर राष्ट्र के विनम्र प्रहरी की तरह काम करना होगा। जन-भावनाओं के जागरण का कार्य नैतिकता, मानवता, कर्तव्य परायणता और देशभक्ति की प्रवृत्तियों, को अग्रगामी बनाने का कार्य हम तन्मयता पूर्वक कर रहे हैं। इस कार्य में प्रत्येक परिजन से सहयोग की हमें आशा है। पाठशाला, पुस्तकालय, गोष्ठी, और धर्म फेरी के माध्यम से सद्ज्ञान का प्रसार कर सकना प्रत्येक पाठक के लिये संभव है। अखण्डज्योति को पढ़ाने और सुनाने का कार्यक्रम अपना कर भी इस दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है।
नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति का कार्य सम्पन्न होने पर ही स्वतन्त्रता की सर्वांग पूर्ण झाँकी दृष्टिगोचर होगी। रामराज्य की—धर्मराज्य की स्थापना के लिए सरकारी प्रयत्नों में ही नहीं जन भावनाओं में भी परिवर्तन आवश्यक है। इस परिवर्तन के लिए ही अपना ‘युग परिवर्तन आन्दोलन’—युग निर्माण कार्यक्रम चल रहा है। इस ज्ञानयज्ञ में हम सबको श्रम रूपी घृत और समय रूपी साकल्य समर्पित करना ही चाहिए।
सिख सम्प्रदाय के चौथे गुरु श्री रामदास जी के अनेक शिष्य थे। सभी की अपनी-अपनी विशेषताएँ थीं। उनमें से एक शिष्य ऐसे थे जिनकी विशेषता श्रद्धा और आज्ञा पालन ही थी। इनका नाम था अर्जुनदेव।
अर्जुनदेव ने दीक्षा लेकर आश्रम में प्रवेश किया तो उन्हें बर्तन माँजने का काम सौंपा गया। वे शाम तक बर्तन माँजने में लगे रहते। अन्य शिष्य जब कि धर्म चर्चा और गुरु पूजा में लगते जब भी जा अर्जुनदेव अपने नियत कर्म के अतिरिक्त दूसरी बात न सोचते। बर्तन माँजना ही उनके लिए सब से बड़ी साधना बना हुआ था। गुरु ने यही तो आदेश उन्हें दिया था।
गुरु जी के अवसान का समय आया। सब शिष्य यह आशा लगाये हुए थे कि बढ़ी-चढ़ी योग्यता के कारण उन्हें ही उत्तराधिकार मिलेगा, वे गुरु की गद्दी पर बैठेंगे। गुरुदेव अपना घोषणापत्र लिख चुके थे। उनकी मृत्यु के बाद ही उसे खोला जाना था।
समय आया। गुरुदेव दिवंगत हुए। घोषणापत्र खुला। उसमें अर्जुन देव को उत्तराधिकारी माना गया था। सुनने वालों ने आश्चर्य किया कि इस सब से कम योग्य को यह पद कैसे मिला? समाधान करने वालों ने समझाया कि श्रद्धा और अनुशासन यही शिष्य की सबसे बड़ी योग्यता है। गुरु देव की परख ठीक ही थी और निर्णय भी ठीक ही है।
अर्जुनदेव सिख धर्म के पाँचवें गुरु हुए। उनने अपनी योग्यता के बल पर नहीं श्रद्धा के बल पर सिख धर्म की भारी सेवा की और प्रगति की।
जिस युग परिवर्तन के लिए अखण्ड ज्योति परिवार के लाखों सदस्य प्राणप्रण से कटिबद्ध हो रहे हैं वह न तो कठिन है और न असंभव। क्योंकि मानव अन्तरात्मा में सत्प्रवृत्तियों की, सद्भावनाओं की कोई कमी नहीं है। उपयुक्त अवसर आने पर वे सहज ही जाग पड़ती हैं। ‘सत्य की जीत’ सदा ही होती रही है। भारत की विजय सुनिश्चित है। प्रश्न केवल समय का है। आज यह श्रेय हमें मिलना है या कल, बात केवल इतनी भर है।
बाहरी आक्रमणकारियों को मार भगाने के लिए यदि जनमानस में तड़पन उठती है तो उसकी तड़प से शत्रु की छाती दहल जाती है, उसे गोली चलाना बन्द करना पड़ता है और पैर पीछे को लौटाने पड़ते हैं। भीतरी शत्रुओं के विरुद्ध, आन्तरिक षडरिपुओं के विरुद्ध, दुष्ट वृत्तियों और दुर्भावनाओं के विरुद्ध यदि इसी प्रकार का मोर्चा जम जाय, यदि उनके प्रति ऐसी ही घृणा-शत्रुता और प्रतिरोध की भावना जागृत हो जाय तो उनको भी चीनियों की तरह ही पराजित होना पड़ेगा।
छोटे लोगों के बड़े दिल—
बर्बरता और दुष्टता के विरुद्ध यदि क्षोभ उत्पन्न हो जाय तो अत्यन्त निर्धन, विपन्न परिस्थितियों में पड़े हुए दीन दुखी समझे जाने वाले लोग भी बहुत कुछ कर सकते हैं। चीनी आक्रमण से जिनकी अन्तरात्मा को चोट लगी उनने कठिन परिस्थितियों में रहते हुए भी बहुत कुछ किया है। इतना किया है जिसे देखकर कोई निराशावादी भी भविष्य के लिए आशान्वित हुए बिना नहीं रह सकता। इन पृष्ठों में हम कुछ ऐसी विशिष्ट घटनाओं का उल्लेख कर रहे हैं जिनसे हमारे अनेक भाइयों के प्रयत्नों को देखकर सबको विशेष प्रेरणा होगी।
होशियारपुर के कोढ़ियों ने आय से 102) रु. रक्षा कोष में दिये हैं। यह रकम देते हुए उन्होंने कहा कि देश के किसी और काम तो वे आ नहीं सकते लेकिन उन्हें अपना देश अन्य लोगों की तरह ही प्यारा है, उनके नेत्र सजल थे। इसी प्रकार बुलन्द शहर जिले के राजघाट (गंगा तट) पर रहने वाले कोढ़ी अपनी बचत का सारा धन कोष में जमा कराने पहुँचे। छपरा के अन्धे भिखारी रतन ने अपने बचाये हुए पाँच रुपये जमा करा दिये। पजिम की एक भिखारिन ने कई दिन भीख माँग कर जो चावल प्राप्त किया था वह रक्षा कोष में दे दिया। रायसेन जिले के चुनेटिया गाँव के एक अंधे तथा लकवा से ग्रस्त 85 वर्षीय वृद्ध गणेशा ने अपनी जमा पूँजी के सारे डडडडडड कार्य के लिए सौंप दिये। दिल्ली स्थित आनन्दग्राम, ताहरपुर, शाहदरा की कुष्ठ-बस्तियों में रखने वाले प्रायः सभी कोढ़ियों ने राष्ट्र रक्षा के लिए अपनी सामर्थ्यानुसार धन भेजा है। उसकी पहली 251) रु0 की थी।
अमृतसर के क्षय अस्पताल के एक रोगी ने 100) रु॰ दिये हैं। दिल्ली के मूक-बधिर संघ ने झण्डा सप्ताह में 200 बक्सों में जो कुछ जमा हो सका सो रक्षा के लिये दे दिया। अल्मोड़ा के कुछ रोगियों ने अपने भोजन में कमी करके 301) बचाया और एक नाटक खेलकर 47) रुपये कमाये वह सब कोष में दे दिये। आगरा के अन्धे भिखारियों ने अपनी कमाई बेलनगंज की एक सुरक्षा सभा के अवसर पर अधिकारियों को सौंप दी। तेजपुर के एक धोबी ने अपना सारा सोना दे दिया। कोएम्बटुर अस्पताल में आँख पुत्री की सोने की चुड़ियाँ सुरक्षा के लिए दे दीं। दिल्ली के अन्ध विद्यार्थियों ने 500) रु॰ कोष के लिये भेजे हैं। पेंन्ड्रा के टी0 बी0 अस्पताल के मरीजों ने अपना भोजन घटा कर 175) दिये हैं।
जबलपुर जिले के खखरी गाँव के दो ग्रामीणों ने अपना खेत जोतने के काम आने वाले दो भैंसे राष्ट्र, रक्षा में दे दिए जिनमें से एक 47) में, दूसरा 40) में नीलाम करके कोष में जमा कर दिये गये। वाराणसी जिले के बहावनी गाँव के एक व्यक्ति ने अपनी बकरी और उसके बच्चे दे दिये। उत्तर काशी जिले के कोठियाल ग्राम के एक किसान श्री शालिग्राम ने अपने एक मात्र बैल को कोष में दे दिया जो 206) में बिका। सहारनपुर गन्ना विभाग के एक कर्मचारी ने अपनी दूध देती गाय रक्षा कोष में दी है। बीकानेर नगर से 10 मील दूर कनासर गाँव में एक दुर्भिक्ष पीड़ित किसान ने अपनी एकमात्र निधि 800 मन घास दान कर दी।
झुझनूँ के पास सूरतगढ़ के एक बूढ़े हरिजन डिंगाराम ने अपना घोड़ा सरकार को सौंपा है। जम्बू क्षेत्र के चानी गांव के सन्तराम, चौकीदार ने अपना पूरा 30) मासिक वेतन लड़ाई चलते तक देते रहने का निश्चय किया है। वह रात को कोई दूसरी मजूरी करके अपना पेट पालेगा। दलिया का एक गरीब कुली जिसे अपने 7 बच्चों का पालन करने में भारी कठिनाई पड़ती है 11) रु ॰ मासिक देता रहेगा। मालोट नहर विभाग के कुछ कर्मचारियों ने बस स्टेण्ड पर कुली का काम करके वह मजदूरी कोष में जमा करने का निश्चय किया है।
सामूहिक सत्प्रयत्नों की शक्ति—
सामूहिक उत्साह और सम्मिलित सत्प्रयत्नों से थोड़ा-थोड़ा करके भी बहुत हो जाता है। बूँद-बूँद से घट भरता है, छोटे-छोटे तिनके मिला कर मजबूत रस्सी बनती है। इस तथ्य का उपयोग जहाँ कहीं जब कभी होता है तभी आशाजनक सत्परिणाम सामने आते हैं।
सहारनपुर के नाइयों ने पंचायत करके महीने में एक दिन की कमाई रक्षा कोष में देते रहने का निश्चय किया है और पहली किस्त 607) की मनीआर्डर द्वारा भेज दी। नरसनेण्ट (बारंगल) के आदि वासियों की पंचायत समिति ने 81024 रुपये तथा तीन सौ ग्राम सोना भेजा है। कानपुर लाठी मुहाल की गायिका श्री प्रेमादेवी के मकान पर एकत्रित कानपुर की वेश्याओं में से प्रत्येक ने अपना एक निजी स्वर्ण आभूषण सुरक्षा कोष में देने का निश्चय किया है। अपनी पहली किस्त के रूप में 931) जमा किये और हर महीने एक हजार रुपये भेजने का प्रबन्ध किया। बेलूर जेल के कैदियों ने अपना भोज घटा कर रक्षा में रोज दान देते रहने का निश्चय किया है। चम्बल घाटी के डाकुओं ने मोर्चे पर जाने की इच्छा प्रकट की।
जबलपुर के केन्द्रीय कारागार में बन्दियों ने अपने भोजन से बचा कर 200) भेजे हैं। रक्तदान भी दिया है। उनमें से कितने ही युद्ध मोर्चे पर जाने तथा लौट कर फिर अपनी सजा काटने के लिये तैयारी कर रहे हैं। भोपाल के 63 बन्दियों ने अपना खून दिया है। सम्भलपुर जिले के कलामती गाँव में 250 परिवारों के 1400 स्त्री पुरुषों ने उपवास करके बचत का अन्न सुरक्षा के लिए भेजा।
शिवपुरी जिले के टोडा ग्राम के 640 निवासियों ने प्रति व्यक्ति एक रुपया भेजा है और प्रत्येक तरुण ने खून देने की इच्छा प्रगट की है। पिथौरागढ़ जिले की आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी हुई 2 लाख 60 हजार जनता ने हर व्यक्ति एक रुपये के हिसाब से उतना धन सुरक्षा कोष के लिये भेज दिया। उस जिले के सातलखेडी गाँव में हर व्यक्ति पीछे छः रु0 एक आना की औसत से सुरक्षा कोष में सहायता पहुँचाई गई है। देश भर में विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी कार्यालय एवं उद्योग संस्थाओं के कर्मचारियों ने अपने वेतन में कटौती करा कर अतिरिक्त श्रम करके रक्षा कोष में जो बड़ी-बड़ी रकमें भेजी हैं उन्हें देखते हुए यह सहज ही स्पष्ट हो जाता है कि संघ शक्ति का प्रवाह जिधर भी मुड़ पड़ उधर आश्चर्यजनक सत्परिणाम प्रस्तुत होता है।
महिलाएँ और बच्चे भी पीछे नहीं—
भारत में महिलाओं को एक लम्बे समय से जिस अशिक्षा, संकीर्णता और बन्धनों की दयनीय स्थिति में रहना पड़ रहा है उसमें उनकी शारीरिक, मानसिक स्थिति का गया गुजरा बन जाना स्वाभाविक है। आज वे अपंग जैसी लगती हैं, फिर भी जब धर्म कर्तव्य का, त्याग, बलिदान का, प्रतिकार और प्रतिरोध का समय आया तो वे भी किसी से पीछे नहीं रहीं।
झाँसी में रोटी बनाकर पेट पालने वाली महिलाओं ने अपनी गाढ़ी कमाई में से उदारतापूर्वक दान दिया है। ललितपुर नगरपालिका की महतरानियों ने जाड़े में मिलने वाली ऊनी जर्सियाँ जिनकी कीमत 800) है रक्षा निधि में लौटा दी हैं। बिजनौर जिले के बसेड़ा गाँव की एक विधवा राजपति देवी ने रोज चर्खा कातकर उसकी आमदनी कोष में देते रहने का निश्चय किया है। उसके पास जो एकमात्र आभूषण कानों की बाली थीं सो भी उसने प्रसन्नतापूर्वक दे दीं।
देहली रेलवे स्टेशन पर मजदूरों और कुलियों की रोटी पकाकर गुजारा करने वाली 81 वर्षीय विस्थापित महिला फूलोदारी ने अपनी जीवन भर की कमाई 140 रु॰ जो कहीं जमीन में गढ़े रखे थे, लेकर कोष में दे दिये। मेरठ जिले के बहादुरपुर की एक महिला कृपादेवी ने अपनी 25 बीघा और बढ़का गाँव की सोमलता देवी ने 20 बीघा जमीन दान दी है। परभनी जिले के हिंगोली गाँव की एक नव वधू ने विवाह के कुछ घंटे बाद ही अपने समस्त कीमती स्वर्ण आभूषण उतार कर रक्षा कार्य के लिए ग्राम पंचायत के प्रधान को सौंप दिए। बुलन्दशहर जिले के सरतरा गाँव की एक महिला कस्तूरी ने हर वर्ष 12 मन गेहूँ और नेहरू जी के वजन की बराबर घी सेना के जवानों को देते रहने की घोषणा की है।
काश्मीर सचिवालय के एक कर्मचारी का विवाह सम्बंध जिस लड़की से पक्का हुआ था उसके दो भाई युद्ध मोर्चे पर लड़ रहे थे। लड़की ने अपनी शादी ऐसे व्यक्ति से करने की इच्छा प्रकट की जो युद्ध मोर्चे पर लड़े। इस पर उस कर्मचारी की भावना उमड़ी और फौज में भर्ती हो गया। उसने यह भी घोषणा की है कि युद्ध मोर्चे से लौटने पर ही शादी करेगा। लड़की भी तब तक अविवाहित रहेगी और रक्षा कार्यों में निरन्तर संलग्न रहेगी।
कानपुर जिलाधीश के पास एक ग्रामीण वृद्धा अपने इकलौते बेटे को लेकर उसे सेना में भर्ती कराने पहुँची। उसने कहा-गत युद्ध में मेरे पति ने लड़कर वीर गति पाई और मेरा यह बेटा भी अब देश की जरूरत के वक्त काम आये तो इसमें हमें प्रसन्नता ही होगी। वटाला (पंजाब) की कोष महिलाओं ने युद्ध मोर्चे पर जाने की अर्जी दी है।
यह तो व्यक्तिगत प्रयत्नों की एक झाँकी हुई महिलाओं ने सामूहिक रूप से धन, स्वर्ण, रक्त एकत्रित करने और जवानों को भर्ती कराने में जो भारी कार्य किया है उसे देखते हुए अनुमान होता है कि यदि यह सिंहनियाँ जाग पड़ें तो कायापलट होने में देर न लगे।
छोटे बच्चे और विद्यार्थियों का योग रक्षा कार्यों में कम नहीं रहा। स्कूलों के छात्र और छात्राओं ने अपना जेब खर्च बचाकर, बचत की गुल्लकें खोल कर, स्कूलों में मिलने वाला नाश्ता बन्द कर डडडडडड छात्रावासों में उपवास रख कर, मजदूरी द्वारा कुछ कमा कर रक्षा कार्य के लिए भारी योग दान दिया है। लड़कियों ने अपने नाक, कान के छोटे-छोटे आभूषणों को बड़े उत्साहपूर्वक दिया है। बच्चों के श्रमदान से कितनी ही आवश्यक सड़कों के बनने में भारी सहायता मिली है। अपने पिता और भाइयों के युद्ध मोर्चे पर जाने के या मरने के पश्चात् उनके उत्तराधिकारी अल्प वयस्कों ने प्रतिज्ञा की है कि राष्ट्र रक्षा के लिए वे भी अपना प्राण देकर दुष्टता के प्रतिकार में कटिबद्ध रहेंगे।
भारतीय विश्व विद्यालयों की राष्ट्रीय परिषद् के तत्वावधान में आयोजित एक पत्रकार गोष्ठी में विद्यार्थी नेताओं ने घोषणा की कि परिषद् के अंतर्गत 23 विश्व विद्यालयों के 50 हजार छात्र सैनिक या किसी भी प्रकार की सेवा के लिए तैयार हैं। वे 50 करोड़ सी0 सी0 रक्त भी जवानों को भेजेंगे।
दधीचि और भामाशाह के आदर्श—
धर्म और कर्तव्य की वेदी पर प्राणों की बलि चढ़ाने वाले शूरवीरों की कमी इस देश में कभी नहीं रही और न अब है। सेना में भर्ती होने के लिए आतुर हो रहे नवयुवकों की भारी भीड़ जो भरती दफ्तरों में लगी रहती है उसे देखते हुए यह अनुमान सहज ही लग जाता है कि कर्तव्य की तुलना में प्राणों को तुच्छ समझने वाले लोग अभी भी बहुत हैं, और ऐसे लोग जब युद्ध मोर्चे की तरह राष्ट्र निर्माण महत्व भी समझ लेंगे और समय आने पर उस कार्य में भी लगेंगे तो बाहरी शत्रुओं की ही तरह शत्रुओं को भी परास्त करके छोड़ेंगे।
उत्तर प्रदेश के मुख्य मन्त्री को एक वृद्ध ने पत्र लिखा है कि मेरे सातों बेटे मोर्चे पर आक्रमणकारी से लड़ रहे है। मैं बूढ़ा समझा जाता हूँ पर वस्तुतः इतना बूढ़ा नहीं हूँ कि राइफल का बोझ न सँभाल सकूँ। कृपया दिया मुझे सेना में भर्ती होने का मौका दें। इसी प्रकार एक अंधे ने उन्हें लिखा है—”अपनी बेबसी पर इस जिन्दगी भर में कभी इतना दुख नहीं हुआ जितना आज है। मैं युद्ध में भाग लेने से वंचित हूँ पर मेरा रक्त तो जवानों के लिए ले ही लिया जाय।”
भिण्ड जिले के एक छोटे गाँव रानीपुर के हर परिवार से औसतन 3 व्यक्ति सेना में हैं। गाँव की कुल आबादी 700 है जिसमें से 200 फौज में चले गये और 45 अभी और जाने वाले हैं।
राजस्थान के मुख्य मंत्री को जयपुर के निकट गोविन्दगढ़ निवासी एक 60 वर्षीय वृद्ध कान्हसिंह ने अपने सबसे छोटे 23 वर्षीय पुत्र को भी मोर्चे पर भेजने के लिए अर्पित कर दिया। वृद्ध के बड़े तीन पुत्रों में से एक शहीद हो चुका-दो लड़ रहे हैं और चौथा अब भर्ती करा दिया गया। बेटों के साथ-साथ वृद्ध ने अपनी कुल जमा पूँजी 700 रु. भी कोष में दे दी।
झुँझनू जिले के मारदाना खुर्द गाँव के 25 परिवारों ने फैसला किया है कि चीनी आक्रमणकारियों के विरुद्ध लड़ाई के लिए हर परिवार एक जवान मोर्चे पर जाने के लिए देगा। गाँव के सरपंच ने यह प्रार्थना-पत्र पं0 नेहरू के जन्म दिन पर उन्हें समर्पित किया।
रोहतक जिले के वहारन गाँव के चौधरी रूप चन्द के चार पुत्र मोर्चे पर लड़ रहे हैं। उनमें एक पुत्र के शहीद होने पर चौधरी ने अपना अन्तिम पाँचवाँ पुत्र भी सेना में भर्ती करा दिया ताकि मृत के स्थान की कमी न पड़ने पावे।
इतिहास के पृष्ठों पर अपना सर्वस्व देने वाले भामाशाह आदि के वर्णन मिलते हैं। वाजिश्रवा आदि ऐसे भी अगणित त्यागी हुए जिनने अपना सब कुछ समाज के लिये अर्पित करके सर्वमेध यज्ञ किया और अपने पास कुछ भी न रखा। आज अनीति के प्रतिरोध और राष्ट्र रक्षा के धर्म कर्तव्य को सामने उपस्थित देख कर अनेकों भावनाशील व्यक्तियों ने स्वयं साधनहीन बनना स्वीकार कर अपना सर्वस्व भारत माता के चरणों पर अर्पण किया है। प्रश्न यह नहीं कि किसने कितना दिया धन की संख्या से नहीं मानवता की उत्कृष्टता से और जो पास में था उसका कितना अंश दिया इस आधार पर त्याग का मूल्याँकन किया जाता है। इस दृष्टि से अगणित सर्वमेधी आत्मदानी आज सामने प्रस्तुत दीखते हैं। इन व्यक्तियों में से किसी ने इस बात की चिन्ता भी नहीं की कि भविष्य में उनका निर्वाह कैसे होगा।
लखीम पुर जिले के पटेला गाँव में एक व्यक्ति चौ0 साइसिंह ने अपनी समस्त सम्पत्ति सुरक्षा के लिए दान दी है। उनकी सम्पत्ति में 20 एकड़ सीरदारा भूमि, 23) हजार रुपये को गन्ने की खड़ी फसल दो भैंसें तथा अन्य घर गृहस्थी का सामान है। यह सब कुछ बेच कर सुरक्षा कोष में जमा किया जायगा। बुलन्द शहर से 13 मील दूर शिकारपुर में एक 70 वर्षीय निर्धन वृद्धा गंगा देवी ने अपनी जीवन भर की बचत एक मैली सी पोटली निकाल कर अधिकारियों को देदी। इसमें 50 वर्ष पुराने सिक्के, खेरीज रुपये आदि कुल मिला कर 525) रु. निकले। इस दान को स्वीकार करते हुए आँखों में आँसू भरे प्राप्तकर्ता ने कहा—जिस देश में इतनी उत्कट त्याग भावना हो वह किसी आक्रमण से पददलित नहीं हो सकता।
देहरादून का समाचार है कि नेफा मोर्चे पर शहीद होने वाले जगजीत सिंह की मृत्यु का समाचार जब उसकी माता को मिला तो उसने तत्काल अपनी सारी सम्पत्ति और भूमि राष्ट्र रक्षा कोष में देते हुए अधिकारियों को लिखा कि इसे बेच कर राष्ट्र के लिए शस्त्रास्त्र खरीद लिये जायं।
अकबरपुर की एक वृद्धा हरनाम कौर ने अपनी सारी सम्पत्ति 60 बीघा भूमि जिसका मूल्य 12 हजार रुपये है रक्षा कोष में दे दी। वृद्धा का एक मात्र पुत्र हाल ही में नेफा के युद्ध में शहीद हुआ है।
शाजापुर के एक रजिस्ट्री क्लर्क श्री चन्द्रमोहन सिंह और उसके परिवार के सदस्यों ने कुल मिलाकर 51 हजार रुपये दान किये हैं। यह दान भूमि, मकान, बागों, बीमा पालिसियों, प्रोविडेण्ट फण्डों और आभूषणों के रूप में है। इन लोगों के पास नकद भी 55) रु0 जमा था वह भी पूरे का पूरा उन्होंने दे दिया। परिवार के सब सदस्यों ने ब्लड बैंक में खून देने का भी फैसला किया है।
दिल्ली दरीबा कलाँ के एक छोटे से व्यापारी धनसिंह ने अपनी कुल पूँजी 11 हजार रुपया तथा एक मात्र पुत्र को राष्ट्र रक्षा के लिए अर्पण किया है।
रक्त और शरीर के विविध अंग घायल सैनिकों की जीवन रक्षा के लिए दान करने वाले सूरमा राजा शिवि की उस उदारता का स्मरण दिलाते हैं जिसमें उनने शरीर का माँस काटकर कबूतर के बदले में दे दिया था। राजा दिलीप ने भी गौ की प्राण रक्षा के लिए अपना शरीर सिंह को सौंपा था। आज अनेकों व्यक्ति इस प्रकार के दिखाई देते हैं जो अपने रक्त और शरीर के अंगों को राष्ट्र रक्षक सैनिकों की आवश्यकता के लिए प्रसन्नतापूर्वक देने को तैयार हैं।
रायपुर जिले के राजिम गाँव से एक युवक ने अपनी आँखें किसी सैनिक की आवश्यकता के लिए दान कर दी हैं। अम्बाला छावनी के महन्त नरेन्द्रदास ने किसी घायल सैनिक के प्रयोग के लिए अपनी एक आँख दी है। बर्धा के चरणदास नामक सज्जन ने भारतीय सेना के जवानों के लिए उनके शरीर का कोई भी अंग विशेष तौर से बायाँ हाथ, बायाँ आँख, बायाँ फेफड़ा आदि लेने की प्रार्थना सरकार से की है।
जालन्धर में रक्तदान करने के इतिहास में एक नया रिकार्ड स्थापित हुआ है। 25 दिसम्बर से 1 जनवरी तक राधास्वामी सम्प्रदाय के वार्षिक भंडारे में इस सम्प्रदाय के हजारों अनुयायिओं ने अपने गुरु की अपील पर 3 मन 10 सेर रक्त और 3 लाख रुपया सुरक्षा के लिए प्रदान किया।
राष्ट्रपति श्री राधा कृष्णन ने अपने एक वक्तव्य में बताया कि अकेले पंजाब राज्य से 20 लाख जवान सेना में भर्ती होने को तैयार हैं। भारत के भूतपूर्व सैनिकों के संघ ने घोषणा की है कि अवकाश प्राप्त सैनिकों में से तीस हजार व्यक्ति मोर्चे पर जाने के लिए बिलकुल तैयार हैं। द्वितीय रक्षा पंक्ति के रूप में देश के भीतर जो होम गार्ड भर्ती किये जा रहे हैं उसमें हर प्रान्त से लाखों नर नारी भारी उत्साह पूर्वक भर्ती हो रहे हैं। कर्तव्य की तुलना इन सबने प्राणों का मूल्य नगण्य माना है
कुरीतियों और आडम्बरों का बहिष्कार—
उच्च आदर्शों की ओर अमुख मनोभूमि में कुरीतियों और आडम्बरों की ओर घृणा भी सहज ही जागृत होती है। जब कोई महत्वपूर्ण काम सामने होता है तो तुच्छ बातों की उपेक्षा सहज ही बन पड़ती है। राष्ट्रीय अग्नि परीक्षा की इन घड़ियों में सामाजिक कुरीतियों और आडम्बरों का बहिष्कार करने के लिये जन साधारण की इच्छा स्वतः ही जागृत होने लगी है।
गोहाटी (आसाम) की एक विधवा गंध-मोनी देवी ने अपनी पुत्री के विवाह के लिए संचित एक हजार रुपया सुरक्षा में दे दिया और विवाह को फिर कभी के लिये टाल दिया। वाराणसी के मदनलाल कपूर ने अपने लड़के की शादी में होने वाला संभावित खर्च 11 हजार रुपया कोष में जमा किया और विवाह की रस्म बड़ी सादगी से पूरी की । सुजनागढ के एक प्रसिद्ध संगीतज्ञ ने अपनी पुत्री के विवाह में राष्ट्रीय संकट को देखते ढाई हजार खर्च करना पर्याप्त समझा। आगरा बेलनगंज के एक जैन परिवार ने विवाह में पैसे की होली फूँकने की बजाय 3100) सुरक्षा में देना श्रेयस्कर समझा। इस वर्ष दिवाली का उत्सव प्रायः सभी जगह स्थगित रहा। लोगों ने दीपदान तथा उत्सव कार्यों खर्च होने वाला धन बचा कर रक्षा कार्यों के लिए भेजा। दावतें, समारोह, प्रीतिभोज आदि में जो अन्न और धन की बर्बादी होती है उसे रोकने की लोगों के मनों में स्वयं ही प्रेरणा उत्पन्न हुई और ऐसे हजारों उत्सव या तो पूर्णतया स्थगित कर दिये गये या उन्हें बहुत किफायतशारी के साथ संक्षेप में सम्पन्न किया गया। बरातों में आने वाले लोग आये तो जरूर ही पर कम गए। ताकि समय और पैसे की बर्बादी बचे।
उज्ज्वल भविष्य की आशा—
कर्तव्य के प्रति इस प्रकार जागरुक और कटिबद्ध भारतीय जनता के लिए समस्त विश्व के भावना शील राष्ट्रों और व्यक्तियों ने अपनी आन्तरिक सहानुभूति, नैतिक सहायता और प्रचुर साधन सामग्री की वर्षा की है। मित्र राष्ट्रों ने बिना शर्त हथियार और सलाहकार दिए हैं। जगह-जगह से धन, रक्त तथा अन्यान्य प्रकार के भावना प्रतीक उपहार भेजे हैं और हमारी विजय की कामना की है। युद्ध के दूसरे मोर्चे पर लड़ने वाले, नैतिक सामाजिक एवं भावनात्मक क्षेत्रों में घुसे हुए शत्रुओं से-कुसंस्कारों से लड़ने के लिए कटिबद्ध-कर्तव्य-निष्ठों के लिए भी इसी प्रकार ऋषियों, महापुरुषों, देवताओं, भावनाशील विचारकों और परमेश्वर का आशीर्वाद मिलेगा। कर्त्तव्यपथ पर चलने वालों को बाहरी सहायता भी मिलती ही है।
यह सच है कि अनेकों साधन सम्पन्न लोगों ने इस अग्नि परीक्षा की घड़ी में भी कंजूसी और निष्ठुरता का परिचय दिया है। उनकी ओर न देखकर हमें भावनाशील जन-मानस की निष्ठा को ही महत्व देना चाहिए। इस युद्ध ने जन-मानस के भावनास्तर को कर्तव्य पालन की ओर अभिमुख किया है, उसके फल स्वरूप सतयुग जैसे सहस्रों आदर्श हमें आँखों के सामने दिखाई देते हैं। यह उज्ज्वल भविष्य के लिए एक आशाजनक चिन्ह है। लड़ाई अभी बन्द नहीं होने वाली है। चीनी हार सकते हैं पर हमारे घर के कोने-कोने में छिपकर बैठे हुए आलस्य, अनाचार, असंयम, स्वार्थपरता, फूट, फैशन, अपव्यय, ढोंग, विलासिता , पाप, कुसंस्कार आदि शत्रुओं से लड़ना तो अभी बाकी ही पड़ा है। यह युद्ध देर तक चलेगा। 8॥ वर्ष तो अभी लगने ही हैं। इसलिए आज जो सत्प्रवृत्तियाँ दुष्टता का प्रतिकार करने के लिए जागृत हुई हैं उन्हें दूने चौगुने उत्साह से जगाना चाहिए। असुरता का बाहरी ही नहीं भीतरी विनाश करके ही हम सच्चे विजयी बनेंगे। प्रगति और सुख शान्ति के राम राज्य की स्थापना के—युग निर्माण के स्वप्न साकार न होने तक हमें अभी तो युद्ध सैनिक की तरह कटिबद्ध ही रहना होगा।
सुनो पार्श्व में खड़ा शिखंडी कब से तुम्हें पुकार रहा।
भीम गदा को लिए हाथ में तेरी ओर निहार रहा॥
लिये सुदर्शन चक्र कृष्ण भी खड़े तुम्हारी पाली में।
महाकाल भैरव, चामुण्डा सब तेरी रखवाली में॥
उठो, धनंजय की संतानों!
मामनुस्मर युद्ध, आज से निखिल राष्ट्र का नारा है।
‘स्वर्गादपि गरौयसी’ माँ का कण-कण हमको प्यारा है।
आज अहिंसा कायरता का भेद तुम्हें बतलाना है॥
बलिवेदी पर आज तुम्हें फिर अपना शीश चढ़ाना है॥
उठो, धनंजय की संतानों!
नहीं अभी सूखा है पानी राजपूती तलवारों का।
खौल उठा है खून आज फिर सीमा के सरदारों का॥
यह अफीम का नहीं नशा है, कालकूट है, ज्वाला है।
उसे विश्व में एक अकेला भारत पीने वाला है॥
खाँड़-खड्ग का भेद भूलकर यदि हमसे टकरायेंगे।
तो यह चीनी धराधाम से अपना चिन्ह मिटायेंगे॥
उठो, धनंजय की संतानों!
आज राष्ट्र की रक्षा के हित वानप्रस्थ, संन्यास जगो।
ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य, युवा शिशुः वर्ग वर्ण विन्यास जगो॥
जगो कि जैसा क्राँतिकुमारी ज्यालमाल लेकर जगती।
जगो कि जैसे दुर्गा चण्डी महाकाल लेकर जगती॥
जगो कि जैसे प्रलयकाल का सागर तूफानी जगता।
जगो कि जैसे क्राँतिवाहिनी सरिता का पानी जगता॥
चलो कि जैसे चल पड़ता है शंकर प्रलयंकर मतवाला।
जलो कि जैसे जल उठा है युगमादिति यौवन की ज्वाला॥
उठो, धनंजय की संतानों!
राजकुमार पाण्डेय ‘कुमार’
*समाप्त*