(श्री अनिल पटेरिया निर्झर)
जब जब सौ सौ बाँह पसारे
खड़ा तिमिर हो बीच राह।
तुम दीपक से जलते जाओ।
उठती झंझाओं को आखिर इक दिन झुक जाना ही होगा।
बढ़े प्रलय तो, उसे सहम कर आखिर रुक जाना ही होगा॥
मंजिल दूर भले हो लेकिन उर में दृढ़ विश्वास यही है।
क्षुब्ध धरा के इस आँगन में सुख को फिर आना ही होगा॥
पग पग से तुम डगर नापते, अंगारों पर चलते जाओ॥ तुम.॥
ज्योति तुम्हारी बिखरे, जो भूतल से अम्बर तक छा जाये।
और सिसकती मानवता फिर विहसे मंगल मोद मनाये॥
पर यह भी सच है, इसमें तुमको तिल तिल कर जलना होगा।
हो सकता है, क्रूर काल तुमको ठोकर भी देता जाये॥
पर तुम गिर गिर कर फिर फिर, उठ उठ कर पुनः सँभलते जाओ॥ तुम.॥
जग में जीते वही, परिस्थितियों से जो टकराया करते।
चट्टानों को तोड़ लात से अपना मार्ग बनाया करते॥
उन सुमनों का ही सौरभ अब तक छाया सारे कानन में।
जो काँटों से बिंधते, लेकिन म्लान नहो मुस्काया करते॥
सौरभ का आगार ढूँढ़ना जो चाहो, तो काँटों में भी नी पलते जाओ॥ तुम.॥
महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने में कुछ दिन ही शेष थे। कौरव और पाण्डव दोनों पक्ष अपनी-अपनी तैयारियाँ कर रहे थे युद्ध के लिए। अपने-अपने पक्ष के राजाओं को निमंत्रित कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण को भी निमन्त्रित करने के लिए अर्जुन और दुर्योधन एक साथ पहुँचे। भगवान ने दोनों के समक्ष अपना चुनाव प्रश्न रखा। एक ओर अकेले शस्त्रहीन श्रीकृष्ण और दूसरी ओर श्रीकृष्ण की सारी सशस्त्र सेना-इन दोनों में से जिसे जो चाहिए वह माँग ले। दुर्योधन ने सारी सेना के समक्ष निरस्त्र कृष्ण को अस्वीकार कर दिया। किन्तु अपने पक्ष में अकेले निरस्त्र भगवान कृष्ण को देखकर अर्जुन मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ। अर्जुन ने भगवान को अपना सारथी बनाया। भीषण संग्राम हुआ। अन्ततः पाँडव जीते और कौरव हार गये। इतिहास साक्षी है कि बिना लड़े भगवान कृष्ण ने अर्जुन का सारथी मात्र बनकर पाण्डवों को जिता दिया और शक्ति शाली सेना प्राप्त करके भी कौरवों को हारना पड़ा। दुर्योधन ने भूल की जो स्वयं भगवान समक्ष सेना को ही महत्वपूर्ण समझा और सैन्य बल के समक्ष भगवान को ठुकरा दिया।
हम दुर्योधन न बनें-
किन्तु आज भी हम सब दुर्योधन बने हुए हैं और निरन्तर यही भूल करते जा रहे हैं। संसारी शक्तियों, भौतिक सम्पदाओं के बल पर ही जीवन संग्राम में विजय चाहते हैं ईश्वर की उपेक्षा करके हम भी तो भगवान और उनकी भौतिक स्थूल शक्ति दोनों में से दुर्योधन की तरह स्वयं ईश्वर की उपेक्षा कर रहे हैं और जीवन में संसारी शक्तियों को प्रधानता दे रहे हैं। किन्तु इससे तो कौरवों की तरह असफलता ही मिलेगी। वस्तुतः जीत उन्हीं की होती है जो भौतिक शक्तियों तक ही सीमित न रह कर परमात्मा को अपने जीवनरथ का सारथी बना लेते हैं। उसे ही जीवन का सम्बल बनाकर मनुष्य इस जीवन संग्राम में विजय प्राप्त कर लेता है। हम देखते हैं कि ईश्वर को भूलकर संसार का तानाबाना हम बुनते रहते हैं अपने मन में हवाई किले बनाते हैं, कल्पना की उड़ान से दुनिया का ओर छोर नापने की योजना बनाते हैं किन्तु हमें पद-पद पर ठोकरें खानी पड़ती हैं, स्वप्नों का महल एक ही झोंके से धराशायी हो जाता है, कल्पना के पर कट जाते हैं, सब कुछ बिगड़ जाता है, अन्त में पछताना पड़ता है। दुर्योधन, रावण, हिरण्यकशिपु, सिकन्दर आदि बड़ी-बड़ी हस्तियाँ पछताती चली गईं। भगवान के संसार में रहकर भगवान को भूलने और केवल संसारी शक्तियों को प्रधानता देने से और क्या मिल सकता है? संसार के रणांगण में उतरकर हम इतने अन्धे हो जाते हैं कि इस सारी सृष्टि के मालिक का आशीर्वाद लेना तो दूर उसका स्मरण तक हम नहीं करते और भौतिक स्थूल संसार को ही प्रधानता देकर जूझ पड़ते हैं। ऐसे अहंकारी व्यक्ति चाहे कितनी भी सफलता प्राप्त क्यों न कर लें उनकी विजय संदिग्ध ही रहती है।
आज मानव जीवन की जो करुण एवं दयनीय स्थिति है, जो सन्ताप, दुःख, असफलतायें मिल रही हैं, इन सबका मूल कारण है ईश्वर विश्वास की कमी, ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा करना और एकमात्र भौतिक साँसारिक शक्तियों को ही महत्व देना ।
श्रद्धा और विश्वास का समन्वय
ईश्वर विश्वास के लिये श्रद्धा का महत्वपूर्ण स्थान है। भौतिक जीवन तथा शारीरिक क्षेत्र में प्रेम की सीमा होती है। जब यही प्रेम आन्तरिक अथवा आत्मिक क्षेत्र में काम करने लगता है तो उसे श्रद्धा कहते हैं। यह श्रद्धा ही ईश्वर-विश्वास का मूल स्रोत है एवं श्रद्धा के माध्यम से ही उस विराट की अनुभूति सम्भव है। श्रद्धा समस्त जीवन नैय्या के चप्पू ईश्वर के हाथों सौंप देती है। जिसकी जीवन डोर प्रभु के हाथों में हो भला उसे क्या भय ! भय तो उसी को होगा जो अपने कमजोर हाथ पाँव अथवा संसार की शक्ति यों पर भरोसा करके चलेगा। जो प्रभु का आँचल पकड़ लेता है वह निर्भय हो जाता है, उसके सम्पूर्ण जीवन में प्रभु का प्रकाश भर जाता है। तब उसके जीवन व्यापार का प्रत्येक पहलू प्रभु प्रेरित होता है, उसका चरित्र दिव्य गुणों से सम्पन्न हो जाता है, वह स्वयं परम पिता का युवराज हो जाता है। फिर उसके समक्ष समस्त संसार फीका और निस्तेज बलहीन क्षुद्र जान पड़ता है। किन्तु यह सब श्रद्धा से ही सम्भव है।
परमात्मा की सत्ता, उसकी कृपा पर अटल विश्वास रखना ही श्रद्धा है। ज्यों-ज्यों इसका विश्वास होता जाता है, त्यों-त्यों प्रभु का विराट स्वरूप सर्वत्र भासमान होने लगता है। हमारे भीतर बाहर चारों ओर श्रद्धा के माध्यम से ही हमें परमात्मा का उस ईश्वर का अवलम्बन लेना चाहिए। श्रद्धा से ही उस परमात्मा-तत्व पर, जो हमारे बाहर भीतर व्याप्त है, विश्वास करना मुमुक्षु के लिये आवश्यक है और सम्भव भी है।
ईश्वरीय सत्ता और व्यवस्था :-
स्थूल जगत का समस्त कार्य व्यापार ईश्वरेच्छा एवं उसके विधान के अनुसार चल रहा है। वैज्ञानिक, दार्शनिक सभी इस तथ्य को एक स्वर से स्वीकार भी करते हैं। कहने के ढंग अलग-अलग हो सकते हैं, फिर भी यह निश्चित ही है। यह सारा कार्य व्यापार किसी अदृश्य सर्वव्यापक सत्ता द्वारा चल रहा है। हमारा जीवन भी ईश्वरेच्छा का ही रूप है। अतः जीवन में ईश्वर विश्वास के साथ-साथ समस्त कार्य व्यापार में उसकी इच्छा को ही प्रधानता देनी चाहिये। वह क्या चाहता है इसे समझना और उसकी इच्छानुसार ही जीवन रण में जूझना आवश्यक है। इसी तथ्य का संकेत करते हुए भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा था।
“तस्मात् सर्वेसुकालेषु मामनुस्मर युध्यच।” “हे अर्जुन तू निरन्तर मेरा स्मरण करता हुआ मेरी इच्छानुसार युद्ध कर।” परमात्मा सभी को यही आदेश देता है। ईश्वर का नाम लेकर उनकी इच्छा को जीवन में परिणत होने देकर जो संसार के रणांगण में उतरते हैं, उन्हें अर्जुन की ही तरह निराशा का , असफलता का सामना नहीं करना पड़ता। ईश्वरेच्छा को जीवन संचालन का केन्द्र बनाने वाले की हर साँस से यही आवाज निकलती रहती है। “हे ईश्वर तेरी इच्छापूर्ण हो।” “ईश्वर तेरी इच्छापूर्ण हो।” जीवन का यही मूलमंत्र है। महापुरुषों के जीवन इसके साक्षी हैं। स्वामी दयानन्द ने अन्तिम बार
शुद्धपक्षस्य हंसौघः सरसो यथा।
यस्माद् गुणौधो निर्याति जीवितं तस्यशोभते॥
योग वशिष्ठ 5। 39। 53
निर्मल जल भरे सरोवर में से जैसे सफेद हंसों का झुण्ड निकलते हुए शोभायमान होता है, वैसे ही जिसमें सद्गुणों का समूह दृष्टिगोचर होता है उसी का जीवन शोभा पाता है।
जहर खाते हुए भी कहा-ईश्वर तेरी इच्छा पूर्ण हो। महात्मा गाँधी ने गोली खाकर कहा-हे राम तेरी इच्छा पूर्ण हो। ईसा को क्रूस पर चढ़ाया गया तब उन्होंने भी प्रभु इच्छा को ही पूर्ण हो बताया। जीवन में हर साँस, हर धड़कन में हम ईश्वर की इच्छा को ही प्रधान समझें। जीवन को उसके हाथों सौंप दे तो अन्त में भी उसको पावन अंक में ही स्थान मिलेगा साथ ही हमारा भौतिक, जीवन भी दिव्य एवं महान बन जाएगा। भगवान कहत हैं।
“मत्मना भव मद भक्तो मद्याजी माँ नमस्कुरु।”
मेरा भक्त बन जा, सारे कर्म अकर्म मुझे अर्पित कर दे, मैं तुझे सर्व दुखों से पार कर दूँगा।
अहंकार का निराकरण-
अहंकार का पुतला मनुष्य प्रभु की इच्छा को उनकी आज्ञा को स्वीकार नहीं करता और अपने ही निर्बल कन्धों पर अपना बोझ उठाये फिरता है। इतना ही नहीं दुनिया का भार उठाने का दम भरता है। यही कारण है कि निराशा, चिंताएं, दुःख, रोग, असफलतायें उसे घेरे हुए हैं और रात-दिन व्याकुल-सा सिर धुनता हुआ मनुष्य अत्यन्त परेशान सा दिखाई देता है। अहंकारवश प्रभु की इच्छा के विपरीत चलकर कभी सुख शान्ति मिल सकती है? नहीं कदापि नहीं। हमें अपने हृदय मन्दिर में से अहंकार, वासना, राग द्वेष को निकाल कर रिक्त करना होगा और ईश्वरेच्छा को सहज रूप में काम करने देना होगा तभी जीवन यात्रा सफल हो सकेगी।
ईश्वर के प्रति विश्वास, श्रद्धा, उसकी इच्छा को जो समस्त स्थूल और सूक्ष्म संसार का संचालन कर रही है, सहज रूप में काम करने देना जीवन का मूलमंत्र है। मनुष्य की शक्ति अत्यन्त अल्प है, वह अहंकार की शक्ति है। बड़े-बड़े कौरव, बाणासुर रावण, हिरण्यकशिपु, अनेकों असुरों ने ईश्वरीय सत्ता को चुनौती दी थी अपने साँसारिक बल और अहंकार बल से किन्तु अन्त में पछताते गये। साधारण मनुष्य की तो बात ही क्या है। अपने जीवन की बागडोर उनके हाथों देकर निश्चिन्त हो जाने वाले ही उनके विराट रूप का दर्शन कर कृतार्थ हो जाते हैं। हमें सचेत होकर अपना रथ भगवान के हाथों में देना है परम पिता के संरक्षण में हमें अपनी विजय यात्रा पर चलने को तैयार हो जाना है। हमारी प्रत्येक साँस और धड़कन में प्रभु का अमर संगीत गूँजता रहे, हमारे हृदय मन्दिर में विराजमान प्रभु हमारे जीवन रथ का संचालन करते रहें और अन्त में उनके पावन अंक में ही हमें स्थान मिले ऐसी उनसे प्रार्थना है। वे ही हमारे बाहर भीतर एक रस से व्याप रहे हैं।
महात्मा गाँधी के आश्रम में एक प्रसिद्ध संन्यासी आये। आश्रम के वातावरण, बापू के कार्य-क्रम, विचारों से वह साधु बड़े प्रसन्न हुए और वहाँ ठहर गये। उनको आश्रम में मेहमान की तरह रखा गया। एक दिन साधु बापू से मिले और प्रार्थना करते हुए बोले-महात्माजी मैं भी आपके आश्रम में रहकर जीवन बिताना चाहता हूँ। इस जीवन का सदुपयोग राष्ट्र हित में हो तो वह मेरा महान सौभाग्य होगा।
बापू ने उनकी बातें सुनकर कहा-यह जानकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। आप जैसे विरक्त साधु पुरुषों के लिए ही तो आश्रम होते हैं। किन्तु यहाँ रहने से पूर्व आपको इन गेरुए वस्त्रों का त्याग करना पड़ेगा। महात्मा जी की बातें सुनकर स्वामी जी मन-ही-मन बड़े क्रोधित हुए। अपने क्रोध पर संयम रखते हुए वह बोले-महात्मा जी ऐसा कैसे हो सकता है, मैं संन्यासी जो हूँ।
बापू बोले आप अपने संन्यास को कभी न छोड़ें- इसमें दिनों दिन प्रगति करें। मैंने तो आपको गेरुए वस्त्र छोड़ने के लिये कहा है। इनके बिना सेवा नहीं हो सकती। बापू ने उन्हें समझाते हुए कहा-स्वामी जी, इन गेरुए वस्त्रों को देखते ही हमारे देशवासी इन वस्त्रों को पहनने वाले की ही सेवा पूजा शुरू कर देते हैं। दूसरों की सेवा के स्थान पर निज की सेवा स्तुति शुरू हो जाती है। इन वस्त्रों के कारण अन्य लोग आपकी सेवा भी स्वीकार नहीं करेंगे। जो वस्तु हमारे सेवा-कार्य में बाधा डाले उसे छोड़ देना चाहिये। फिर संन्यास तो मानसिक वस्तु है। पोशाक के छोड़ने से संन्यास नहीं जाता। गेरुए वस्त्र पहन कर आपको सफाई का काम कौन करने देगा?
महात्मा जी की बातें सुनकर उस साधु ने तत्काल गेरुए वस्त्र त्याग दिए।
इस संसार की बनावट कुछ ऐसी है कि मनुष्य को अपनी जीवन यात्रा के लिए दिन रात संघर्ष करना पड़ता है। उथल पुथल, खींचातानी, परेशानियों, राग द्वेष से संसार का वातावरण बहुत कटु मालूम पड़ने लगता है। वर्तमान में तो संसार की यह दौड़ और भी तेज हो गई है, मानव जाति भागी जा रही है बिना लक्ष्य के। उसका दम फल रहा है। चैन नहीं मिल रहा है मनुष्य को लाख प्रयत्न करने पर भी। वह अपने सुख के लिए तरह तरह के साधन जुटाता है किन्तु दुःखों, परेशानियों का क्रम एक के बाद एक नये रूप में आ रहा है। तो क्या इस संसार का और मनुष्य का निर्माण इसीलिए हुआ था? सम्भव है संसार को दुःखों का घर बताने का सिद्धान्त जिन्होंने बनाया उन्होंने यही निर्णय अपने जीवन में किया होगा। किन्तु मंगलमय प्रभु का अमंगल कार्य क्यों? मंगलमय भगवान ने तो अपनी मंगलमय इच्छा के फलस्वरूप ही इस सुन्दर संसार का निर्माण किया है।
प्रभु की मंगलमयी सत्ता-
जो चैतन्य सत्ता इस स्थूल संसार का धारण पोषण कर रही है, जो आत्मरूप में सब में व्याप्त है, वह प्रेम ही है। व्यष्टि और समष्टि में आत्मा का वह प्रेम प्रकाश ही ईश्वर की मंगलमयी रचना का सन्देश दे रहा है। जब मनुष्य आत्मा के उस प्रेम प्रकाश का अवलम्बन लेता है तभी वह संसार को आनन्द और सुखों का घर मानने लगता है और तभी उसे सच्चा सुख मिलता है। प्रेम ही आत्मा का प्रकाश है। जो इस प्रकाश में जीवन पथ पर अग्रसर होता है, उसे संसार शूल नहीं फूल नजर आता है, दुःखों का घर नहीं वरन् स्वर्ग मालूम होता है।
प्रेम ही एक ऐसा प्रकाश है जिसका अवलम्बन लेकर मनुष्य इस संघर्षमय संसार में जीवन यात्रा को सफल कर सकता है। प्रेम ही जीवन की सर्वोच्च प्रेरणा है। अन्य प्रेरणाएँ अन्धकार की जनक हैं। प्रेम प्रेरित कर्मों से संसार की रचना होती है। अन्य तो उसके विनाश और बुराई बढ़ाने के कारण बनते हैं। जीवन को समृद्ध बनाने, परम ध्येय की मंजिल तक ले जाने का एक ही रास्ता, एक ही नियम है, वह है प्रेम । आत्मा का प्रकाश प्रेम है, यही प्रभु का विधान मंगलमयी सृष्टि के लिए है। जो इसे जीवन में प्रधानता देता है उसके लिए संसार ही स्वर्ग है, प्रभु का मन्दिर है, जीवन क्रीड़ा का सुन्दर उद्यान है।
प्रभु का लक्ष्य और स्वरूप
प्रेम का लक्ष्य प्रेम स्वरूप की प्राप्ति के लिए है किन्तु हम तो जो कुछ कर रहे हैं सब अपने लिए, अपने अहम् की तुष्टि के लिए, स्वार्थ के लिए। जिस काम में हमारा स्वार्थ सधता हो वही काम तो हमें अच्छा लगता है। अपनी भूख, शान्ति, रक्षा, साज सामान इकट्ठा करने के लिए ही तो हमारी सारी कार्य प्रणाली चल रही है। किन्तु यह सब तो सौदेबाजी, लेन देन का कार्य है जिसका उद्देश्य कुछ पुरस्कार प्राप्ति ही है। यह तो दुनिया का साधारण नियम है। प्रेम का नियम इससे बिलकुल भिन्न है। प्रेम सौदा नहीं है। प्रेम कुछ पाने की इच्छा से नहीं किया जाता बल्कि देने की भावना से किया जाता है। प्रेम पुरस्कार नहीं लेता, बदला नहीं चाहता। प्रेम दान का नियम है जो निरन्तर देता रहता है, यदि लेता भी है तो केवल प्रेम ही। प्रेम की पूर्ति प्रेम से होती है। स्वयं के कृतार्थ होने के लिए प्रेम किया जाता है। प्रेम, प्रेम के लिए कीजिए। किसी स्वार्थ, लेने की भावना के लिए नहीं। जो कुछ भी आपके पास है, उन्मुक्त भाव से लुटाते रहिए प्रेम के लिए।
असीम और सार्वभौम-
प्रेम किन्हीं सीमा, मर्यादा, समय, रूप, रंग, जाति, वर्ण आदि के नियमों में बँधा नहीं रहता। वह हर समय एक रस, अचल, सब के लिए होता है। यह प्रेम साधना का दूसरा नियम है। हम किसी से सुबह प्रेम करें और शाम को न करें, यह धोखा है। मन्दिर में आँसू बहाने वाला प्रेम यदि दुःखी, क्लान्त भाइयों को देखकर द्रवित न हो तो वह प्रेम नहीं ढोंग है। दूसरों का खून करने वाला व्यक्ति अपने घर के सदस्यों से प्रेम करे तो वह प्रेम नहीं स्वार्थ है, भोग है। दूसरों के बच्चों से कटु व्यवहार करने वाले माँ बाप अपने बच्चों से प्रेम नहीं कर सकते। दूसरों के साथ धोखेबाजी, चालाकी, कूटनीति छल−कपट बरतने वाले व्यक्ति किन्हीं से प्रेम करें, यह कठिन है। सच्चा प्रेम वह है जो घर, बाहर, मन्दिर, मस्जिद, समस्त जाति वर्ण में एक रस समान व्याप्त होकर हमारी नस-नस में समा जाए, और जीवन का अंग बन जाए। वही प्रेम, प्रेम कहलाने का अधिकारी है। यदि इस कसौटी पर उतरने वाले प्रेम पूजकों की संख्या बढ़ जावे तो यह धरती ही स्वर्ग बन जावे।
प्रेम आत्मा का सहज प्रकाश है जो प्रत्येक जीवन में स्थित है। उसे प्राप्त करने के लिए धन दौलत कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता। प्रेम का अथाह समुद्र हमारे चारों ओर बाहर भीतर उमड़ रहा है, केवल आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी हृदय गगरी में जो मल विक्षेप, अहंकार, स्वार्थ, पद प्रतिष्ठा आदि भरे पड़े हैं उन्हें निकाल कर इस प्रेम समुद्र का मधुर अमृत भर लें। यह एक सहज और स्वाभाविक क्रिया है किन्तु खेद है मनुष्य की अमीरी, उसकी पद प्रतिष्ठा, अहंकार इस सहज कार्य को सफल नहीं होने देते। यदि हमें प्रभु के प्रकाश, प्रेम को प्राप्त करना है तो इन बनावटी चोलों का त्याग करना होगा। पीड़ित मानवता में, दुनमुखी भाइयों में, अन्य जीव पशु पक्षियों के बीच हृदय खोल कर आना होगा, उन्हीं की पंक्ति में खड़ा होना होगा। यहाँ कोई निर्बल सबल, गरीब अमीर, ऊँचा नीचा नहीं हैं। प्रभु के सब पुत्र समान हैं। हमें हृदय खोल कर अपने सारे भौतिक आवरणों को दूर उतार कर प्राणी मात्र से प्रेम करना है। सबके साथ सहानुभूति सहयोग करके अपना कर्तव्य निभाना है। प्रेम सारे भौतिक आकर्षणों से ऊपर रहता है, इनका त्याग किए बिना सच्ची प्रेम साधना सम्भव नहीं हो सकती।
सभी तो अपने हैं-
महात्मा गाँधी एक कोढ़ी की स्वयं पट्टी आदि करते थे, अपने हाथों से घाव धोते थे, जबकि अन्य लोग दूर भागने का प्रयत्न करते थे। ईसा मसीह, चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण आदि महापुरुषों के जीवन आज भी उनकी प्रेम साधना के ज्वलन्त उदाहरण हैं। उनके हृदयों से प्रेम की भागीरथी निरन्तर बहती रही, जिसमें प्राणीमात्र ने अपने आपको कृतार्थ किया। वहाँ कोई भेद भाव नहीं था। इस तरह जिसके हृदय में प्रेम का अखण्ड दीप जलता रहे, वस्तुतः वही सच्चा प्रेमी है। महर्षि रमण मनुष्यों से ही नहीं प्राणीमात्र से प्रेम करते थे। साँप, बिच्छू, पशु पक्षी, बन्दर, सिंह आदि उनके पास परिवार के सदस्यों की तरह आया करते थे और महर्षि उन्हें बड़े प्यार से खिलाया-पिलाया करते थे। प्रेम सर्वत्र व्याप्त है, किन्तु मनुष्य ने भेदभाव, स्वार्थ, अहंकार, रागद्वेष का जो रंगीन चश्मा चढ़ा रखा है, इसी के कारण उसके दर्शन नहीं हो पाते और इसीलिए वह रात दिन दुखी व्याकुल नजर आता है।
प्रेम के लिए अपने आपका उत्सर्ग करने वाला जीवन ही वस्तुतः जीवन कहलाने लायक रहता है। अवस्था विचार, परिस्थितियाँ, मनुष्यों का विश्वास, यहाँ तक कि यह देह भी बदलती है। इस परिवर्तन प्रधान संसार में यदि अजर अमर रहता है, तो वह है प्रेम।
प्रेरणा की प्रबल शक्ति-
प्रेम का मूल्य बलिदान से ही चुकाया जाता है। महात्मा गाँधी ने देश से, मानवता से प्रेम किया था। और अन्त में इसी के लिए अपने आपको बलिदान किया। देश प्रेम के मतवाले राणा प्रताप अरावली की पथरीली घाटियों में भूखे प्यासे फिरते रहे। धर्म से प्रेम करने वाले तेग बहादुर, गुरु गोविन्द सिंह के बच्चों ने मुगलों के हाथों सहर्ष अपना बलिदान स्वीकार किया था। आजादी और देश प्रेम के अनेकों मतवालों ने सूली फाँसी, गोली, तोपों को सहर्ष स्वीकार किया था। ऐसे प्रेम पथिकों की भारत में, साथ ही विदेशों में भी कमी नहीं रही, जिन्होंने अपने विश्वास ध्येय उद्देश्य लक्ष्य आदि के लिए प्रेम किया अपने को जीवित ही तिलतिल मिटाया और अन्त में इसी के लिए बलिवेदी पर सहर्ष चढ़े।
अपने आराध्य प्रेम में मतवाली मीरा गाती थी-हेरी मैं तो प्रेम दिवानी मेरो दरद न जाने कोय, सूली ऊपर सेज हमारी किसविध सोना होय। प्रेम के मार्ग में बेशक काँटे बिछे हुए हैं, किन्तु जब प्रेमी उन काँटों को अपने प्रेम स्वरूप के लिए फूल मान कर आगे बढ़ता है, उन्हें अपने प्रेमी के लिए दिल से लगाता है, तभी मीरा का जहर अमृत बन जाता है। गाँधी जी को लगी गोली उनके अमर जीवन का कारण बन गई। भटकते हुए प्रताप आज मेवाड़ के मुकुट बन गये। कृष्ण प्रेम के मतवाले अंधे सूरदास, राम प्रेम के मतवाले तुलसीदास आज घर-घर मानव हृदय में मूर्त रूप में विराजमान हैं। जब प्रेम काँटों पर चलकर भी मतवाला दृढ़ स्थिर बना रहता है, तभी उसका वास्तविक स्वरूप निखरता है। जो इन विपन्नताओं में परीक्षा काल में भी प्रेम पथ पर अविचल भाव से खड़ा रहता है अपने सत्य के लिए, वही प्रेम साधना की अन्तिम सिद्धि तक पहुँच जाता है। असफलताओं में जो स्थिर रहे वही प्रेम जीवित रहता है।
परीक्षा और कसौटी-
सत्य की उक्त कसौटियों पर अपनी प्रेम साधना के पथ पर आगे बढ़िये, तुच्छ स्वार्थों, आकर्षणों, लेन-देन के लिए प्रेम शब्द का दुरुपयोग और उसको कलंकित मत कीजिए। उन्मुक्त भाव से प्रेम कीजिए समस्त मानव जाति से, प्राणी मात्र से, समस्त वसुधा से। प्रेम में गरीब, अमीर, ऊँचा-नीचा, मेरा-तेरा, भाषावाद, प्रान्तीयता, जाति-पाँति आदि का कोई स्थान नहीं है। इन संकीर्ण बन्धनों को तोड़ कर जब आप प्रेम पथ पर अग्रसर होंगे तभी उस दिव्य प्रेम स्वरूप का पुण्य साक्षात्कार सम्भव हो सकेगा। ज्योतिर्मयी आत्मा के पुण्य प्रकाश में प्रेम का अवलम्बन कीजिए और जीवन लक्ष्य की ओर अग्रसर हूजिए।
देवों और असुरों में घोर युद्ध हो रहा था। राक्षसों के शस्त्र बल और युद्ध-कौशल के सन्मुख देवता टिक ही नहीं पाते थे। वे हार कर जान बचाने भागे, सब मिल कर महर्षि दत्तात्रेय के पास पहुँचे और उन्हें अपनी विपत्ति की गाथा सुनाई। महर्षि ने उन्हें धैर्य बँधाते हुए पुनः लड़ने को कहा। फिर लड़ाई हुई। किन्तु देवता फिर हार गये और फिर जान बचाकर भागे महर्षि दत्तात्रेय के पास। अबकी बार असुरों ने भी उनका पीछा किया। वे भी दत्तात्रेय के आश्रम में जा पहुँचे। असुरों ने दत्तात्रेय के आश्रम में उनके पास बैठी हुई एक नवयौवना स्त्री को देखा। बस, दानव लड़ना तो भूल गये और उस स्त्री पर मुग्ध हो गये। स्त्री जो रूप बदले हुए लक्ष्मीजी ही थी, असुर उन्हें पकड़ कर ले भागे। दत्तात्रेय जी ने देवताओं से कहा अब तुम तैयारी करके फिर से असुरों पर चढ़ाई करो। लड़ाई छिड़ी और देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। असुरों का पतन हुआ।
विजय प्राप्त करके देवता फिर दत्तात्रेय के पास आये और पूछने लगे-भगवन् दो बार पराजय और अंतिम बार विजय का रहस्य क्या है? महर्षि ने बताया-जब तक मनुष्य सदाचारी संयमी रहता है तब तक उसमें उसका पूर्ण बल विद्यमान बना रहता है और जब वह कुपथ पर कदम धरता है तो उसका आधा बल क्षीण हो जाता है। पर-नारी का अपहरण करने की कुचेष्टा में असुरों का आधा बल नष्ट हो गया था, तभी तुम उन पर विजय प्राप्त कर सके।
स्कूली शिक्षा के साथ, पुस्तकीय ज्ञान के साथ ही सबसे बड़ी आवश्यकता है, जीवन को सार्थक करने वाली उस जीवन विद्या की जो अनेक विचित्रताओं से भरे ऊबड़-खाबड़ जीवन पथ पर मनुष्य के पग बढ़ाने में सहायता दे। उच्च शिक्षा सम्पन्न, साक्षर जीवन की असफलताओं का प्रमुख कारण यही है। डिग्री डिप्लोमा रहित साधारण जीवन भी सार्थक बन जाता है जीवन विद्या के पारस का स्पर्श पाकर। संसार के अब तक के अधिकाँश महापुरुषों का अक्षर ज्ञान आज के अनेकों, उच्च शिक्षा सम्पन्न लोगों से कम ही था। उन्होंने किसी यूनिवर्सिटी से एम.ए.पी. एच.डी.की डिग्री प्राप्त नहीं की थी, फिर भी उन्होंने जीवन की सार्थकता के कठोर धरातल को छू कर समाज को नया मार्ग प्रदान किया, मानवता की बहुत बड़ी सेवायें की।
व्यावहारिक ज्ञान की आवश्यकता-
पुस्तकीय ज्ञान, जीवन का एक खाका बनाता है किन्तु सार्थकता का रंग भर कर ही उससे जीवन का नक्शा तैयार किया जा सकता है। शिक्षा द्वारा जीवन और संसार का एक काल्पनिक स्वरूप निर्धारित किया जा सकता है किन्तु यथार्थता की धरती पर उसे साकार करने के लिए जीवन विद्या की ही आवश्यकता होती है। बातों की कढ़ी और बातों के ही भात से पेट नहीं भरता, पोथी का कुआँ डुबोता भी नहीं तो पोथी की नैया तारती भी नहीं। इन शब्दों में परम सन्त विनोबा भावे ने अक्षर ज्ञान की सीमा निर्धारित की है। वस्तुतः पुस्तकों में अक्षर होते हैं, शब्द होते हैं। किन्तु उनका अर्थ जीन के धरातल पर, सृष्टि के रंचमंच पर ही प्राप्त किया जा सकता है। और तब ही कोई शिक्षा सजीव और सर्वांगीण बन पाती है। वही जीवन पथ पर मनुष्य का पूरा पूरा साथ देती है। साक्षरता और सार्थकता से मिल कर निर्मित शिक्षा ही जीवन विद्या है और वही मनुष्य की सफलता मूल आधार है।
जीवन का महत्व समझें-
श्री शंकराचार्य में अपने आठ वर्ष के जीवन में ही तीव्र प्रतिभा की जागृति हो गई थी। बिना संस्कृत पढ़े ही सन्त तुकाराम ने वेदों का अर्थ जान लिया था। सन्त ज्ञानेश्वर ने छोटी उम्र में ही कई ग्रन्थों की रचना की। सूर, मीरा, तुलसी, कबीर, नानक, रैदास, तुकाराम आदि की रचनाओं के साधारण शब्दों में ही भरा हुआ ज्ञान कितना असाधारण है। इसका कारण उनका सार्थक जीवन ही है। उन्होंने पहले जीवन में अर्थ ढूँढ़ा, फिर पुस्तकों में अक्षर। अक्षर ज्ञान, बाह्य शिक्षण तो केवल संस्कार मात्र छोड़ता है। पथ का शाब्दिक ज्ञान कराता है, किन्तु पथ पर चलना तो मनुष्य की अपनी शक्ति और क्षमता पर ही निर्भर करता है। अपनी क्षमता और स्थिति के अनुसार ही मनुष्य यथार्थता की धरती पर जीवन के भवन की रचना करता है। अतः बाह्य शिक्षा का मुख्य आधार आन्तरिक शिक्षण-जीवन विद्या ही होना आवश्यक है।
शिक्षण से सार्थकता -
मनुष्य अपनी शिक्षा और जीवन में समन्वय पैदा करके सफल हो सकता है। आन्तरिक शिक्षण, सार्थकता के अभाव में आज की बाह्य शिक्षा की असफलता सहज ही देखी जा सकती है। इस जीवन विद्या-आन्तरिक शिक्षण के अभाव में जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता सम्भव नहीं। लोक व्यवहार से लेकर, व्यक्तिगत सफलता, सेवा, भक्ति, परमार्थ के सभी क्षेत्रों में जीवन विद्या की आवश्यकता होती है।
परमार्थ की दुहाई देकर रात दिन श्रम कर वाले स्वार्थी बन जाते हैं। निष्काम सेवा के पथिक लोक संग्रह में-कामनाओं की पूर्ति में लग जाते हैं। भक्त अभक्त बन जाते हैं। जीवन विद्या, अन्तर ज्ञान के अभाव में निष्ठावन्त और शुभ कार्यों में भी मिश्रण होने लगता है। धीरे-धीरे शुभ के स्थान पर अशुभ,परमार्थ की जगह स्वार्थ, दूसरों की सेवा करने के स्थान पर अपनी सेवा, अच्छाई के स्थान पर बुराइयाँ घर कर लेती हैं। जीवन शिक्षा के अभाव और अन्तर ज्ञान के अभाव में लौकिक व्यवहार सम्बन्धी कार्यों की असफलता तो प्रायः निश्चित ही रहती है।
समस्या की जड़ तक पहुँचें-
आज की समस्यायें, दुःख, परेशानियाँ, कष्ट, उलझनें, संघर्ष, अशान्ति, शारीरिक मानसिक पीड़ाओं का मूल कारण जीवन विद्या का अभाव ही है। अशिक्षित, देहाती लोगों की अपेक्षा शिक्षितों का जीवन अधिक क्लिष्ट और परेशानी भरा होता है। जब कि शिक्षा का अर्थ जीवन को सरल और सुगम बनाना होता है। इन अर्थों में हमारी शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान तक ही सीमित है। अभी तक जीवन के यथार्थ धरातल से उसका सम्बन्ध नहीं होने के कारण ही आज शिक्षितों का जीवन अभिशाप बन रहा है।
जीवन विद्या कहाँ से कैसे प्राप्त हो? यह प्रश्न उतना ही सहज और सरल है, जितना सूर्य का प्रकाश, जो आँखें खोलकर देखने पर सहज ही मिल जाता है। शेक्सपीयर ने लिखा है, ‘बहते हुए झरनों में प्रासादिक ग्रन्थ संचित हैं।’ पत्थरों में दर्शन छिपे हुए हैं। संसार के जितने भी पदार्थ हैं सब में शिक्षा के सारे तत्व सन्निहित हैं। समस्त तत्वों से मनुष्य जीवन विद्या प्राप्त कर सकता है। सृष्टि उनके लिए एक खुली हुई पुस्तक है। अपनी पिछली पीढ़ियों द्वारा अर्जित विद्या-अनुभवों से भी इस मार्ग में पर्याप्त
लाभ उठाया जा सकता है। बुद्धि और कल्पना के क्षेत्र में बने हुए नक्शों के अनुसार पथ पर चलना कितना सहायक होता है तब कि अनजान लोग उसी पथ पर ठोकरें खाते, गिरते पड़ते सीखते चलने में भारी कष्ट उठाते हैं।
आधी दृष्टि भीतर आधी बाहर-
जीवन विद्या का स्कूल कालेजों की तरह कोई मर्यादित पाठ्यक्रम नहीं। यह समुद्र की तरह अमर्यादित है। न्यूटन से किसी ने उनकी ज्ञान गरिमा की प्रशंसा की, इस पर उन्होंने कहा-भाई- अभी तो मैंने समुद्र के किनारे पड़े कुछ कण ही प्राप्त किये हैं, विशाल विद्या वारिधि तो बहुत बड़ा है। जीवन विद्या का क्षेत्र व्यापक है। उसके लिए जीवन भर प्रयत्न चलते रहना आवश्यक है। आधा समय लौकिक जीवन के लिए और आधा जीवन विद्या के लिए होना आवश्यक है। लौकिक जीवन में अक्षर ज्ञान, पेशा, व्यापार, व्यवहार, पारिवारिक कर्तव्य आदि सभी आ जाते हैं। आधा समय जीवन विद्या के लिए लगाया जायगा तभी सफलता की मंजिल तय हो पाती है। योगी की अर्धोन्मीलित दृष्टि का यही रहस्य है। वह आधी नजर से सृष्टि को देखता और आधी से अन्तर ज्ञान, जीवन विद्या में लगा रहता है। इस तरह अन्तर्बाह्य जीवन के योग से पूर्णता प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त होता है। बाह्य शिक्षा का समन्वय आन्तरिक शिक्षा से होने पर ही शिक्षा की पूर्णता और सार्थकता सिद्ध होती है।
गुणाधिकान्मुदं लिप्से दनुकोशं गुणाधमात् मैत्रर समानादन्विच्छेन्न तायैरभि भूयते।
श्रीमद्भागवत् 4। 8। 34
अपने से अधिक गुण वालो से आनन्द प्राप्त करें, कम गुण वालों के प्रति दयाभाव रखे और समान, गुण वालों से मित्रता रखे, ऐसा मनुष्य सन्तापों से व्यथित नहीं होता।
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है मानव जीवन का ध्येय आत्म-तोष प्राप्त करना है, और आत्म-तोष की प्राप्ति का उपाय मानवीय सामर्थ्य का विकास करना है। सामर्थ्य का विकास साधना से होता है और साधना तप के बिना पूरी नहीं होती। अपने जीवन का तुम कुछ भी ध्येय बनाओ किन्तु उसके लिए तुम्हें गहरी साधना, निरन्तर परिश्रम का तप करना पड़ेगा।
जीवन के अपने ध्येय की पूर्ति के लिए तप की कठिन परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है। निरन्तर की साधना और परिश्रम ही तप के पुण्य-नाम से पुकारे जाते हैं। किन्तु तप के साथ ही त्याग का शब्द भी जुड़ा हुआ है। जो तप त्याग के लिए किया जाता है वही तप है। तप के लिए करना, तप नहीं कहा जा सकता। उससे शारीरिक और मानसिक विकारों का प्रादुर्भाव होता है। उससे आत्म परितोष का उद्देश्य भी प्राप्त नहीं हो सकता। तप के साथ संग्रह को कोई स्थान नहीं है। दीपक तपता जलता है, दूसरों को प्रकाश देने के लिए। प्रकृति स्वयं ग्रीष्म में तपती है, धरती पर पावस के आगमन के लिए। सूर्य तपता है लोकों में जीवन फूँकने के लिए। गाय जंगल -जंगल घूमती है लोगों को दूध देने के लिए। प्रकृति ने यह तप उसे सहज ही बता रक्खा है।
सर्व लोक हिताय-सर्वजन सुखाय-
यही नियम मानव जीवन में भी लागू होता है। जीवन की तपस्या सर्व लोक हिताय सर्व जन सुखाय हो तभी वह तप की श्रेणी में आती है। एक व्यापारी अपनी श्रीवृद्धि के लिए दिन रात कितनी दौड़ धूप करता है, एक मजदूर सुबह से शाम तक पसीना बहाता है, किन्तु उनकी अपेक्षा निस्वार्थ भाव से संसार के कल्याण की कामना का चिन्तन करने वाले, सबको सन्मार्ग दिखाने वाले लोकसेवी अधिक पूजनीय माने गये हैं। क्योंकि त्याग की व्यापक भावना रख कर श्रम करना, साधना करना ही तप कहलाता है। दूसरे लोगों के हितार्थ, दूसरों की सेवा के लिए अपने शरीर पर कष्ट सहना, समष्टि के लाभ की चिन्ता रख कर कोई भी दृढ़ प्रयत्न करना तप है। किन्तु शरीर को व्यर्थ कष्ट देकर आत्म कल्याण और दूसरों का हित चाहने वाले इस अमूल्य साधन को क्षीण करते हैं और वह तप नहीं कहला सकता। केवल शरीर के भरण-पोषण, आराम सुख के लिए ही सदैव प्रयत्न करना भी तप नहीं। मजदूर, व्यापारी, अन्य पेशेवर लोग क्या कम श्रम करते हैं? किन्तु उन्हें तपस्वी नहीं कहा गया।
निस्वार्थता और आत्मतुष्टि-
स्वार्थ के लिए अथवा तप को ही लक्ष्य बना कर किया गया तप आत्म तुष्टि नहीं कर सकता, उस से जीवन में सन्तोष नहीं मिलता। इससे तो अभिमान की वृद्धि होकर मनुष्य विकारग्रस्त हो जाता है। उस तपस्वी की कथा प्रसिद्ध है जिसके देखने पर चिड़िया जल कर भस्म हो गई थी, किन्तु गृहस्थ स्त्री, तुलाधार वैश्य, और माँस विक्रेता के यहाँ जाकर उसके तप का अभिमान नष्ट हुआ। विश्वामित्र को तप का अभिमान हुआ, जिससे उनका पतन हो गया। रावण के तप से उसकी श्री समृद्धि बढ़ी किन्तु स्वार्थ भाव के कारण उसका पतन हुआ।
महात्मा बुद्ध ने अपने राजभवनों के सुखोपभोग छोड़े। जंगल में जाकर तप किया। कई वर्षों तक कठोरता के साथ तप साधना की, सारा शरीर कृश हो गया किन्तु उन्हें आत्म शक्ति नहीं मिली। किन्तु जब उन्होंने ग्रामीण लड़की से खीर खाई और फिर मध्यम मार्ग का अनुसरण किया, लोक कल्याण के लिए उन्होंने अपने तपस्वी, एकाकी जीवन का त्याग किया तब उन्हें आत्म-तोष प्राप्त हुआ। उन्होंने तप और त्याग दोनों को ही लोक कल्याण के लिए किया। जब तक उन्हें अपने तप और त्याग का अभिमान रहा उन्हें आत्म शान्ति नहीं मिली। महाराजा शिखिध्वज ने अपना राजपाट छोड़ कर तप के लिए जंगल की शरण ली और कष्टों का वरण किया फिर भी उन्हें शान्ति नहीं मिली। जब उनकी स्त्री चूड़ाला ने ब्रह्मचारी के वेष में उन्हें उपदेश देकर सब प्रकार के अभिमान का त्याग कर लोक हित के लिए तप करने का उपदेश दिया तो उनकी ग्रन्थियाँ सुलझ गईं और वे राज काज करने लगे। तप का शुद्ध स्वरूप वह है जिसमें वह त्याग के लिए किया गया हो।
त्याग पर सृष्टि की निर्भरता-
विश्व विधान की माँग है प्रत्येक पदार्थ, वस्तु विश्व की विकास यात्रा में अपना योग दे। विकास के कार्यक्रम में अपने आपको खपा दे, बीज अपने आपको मिटा देता है विशाल वृक्ष निर्माण में वृक्ष अपनी जीवनी शक्ति असंख्य बीजों में, छोड़कर विकास की मंजिल में खप जाता है। सृष्टि का सौंदर्य बढ़ाये रखने तक ही पुष्प का जीवन है। प्रकृति का एक-एक पुर्जा, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, सृष्टि यन्त्र को विकास, सत्य, सौंदर्य, उन्नति की राह पर आगे बढ़ाने में अपना पूरा-पूरा योगदान दे रहा है। इसी में उसका महत्व और शक्ति निहित है।
जड़ अथवा जीव जगत के सभी पदार्थ विश्व की विकास यात्रा में अपना योगदान दे रहे हैं उत्सर्ग कर रहे हैं। यही बात मनुष्य पर लागू होती है। सृष्टि का सर्व श्रेष्ठ प्राणी होने से मनुष्य की तो और भी अधिक जिम्मेदारी है। जो मनुष्य इसे जीवन में स्थान देकर समष्टि के लिए अपना उत्सर्ग करते हैं, उनके विकार स्वतः ही धुलने लगते हैं और उन्हें नवीन जीवन शक्ति स्फूर्ति सामर्थ्य प्राप्त होती है। उन्हें जीवन में अहिर्निशि सन्तोष शान्ति प्रसन्नता का अनुभव होने लगता है।
व्यक्तिगत दृष्टिकोण का त्याग कर सार्वजनिक समष्टिगत भाव बनाकर तप श्रम किया जाए। अपने लिए नहीं वरन् विश्व यज्ञ में जीवन शक्ति की आहुति देकर आत्मयोग के रूप में यज्ञ का महान् पुण्य अधिक किया जा सकता है।
परमार्थ का पुण्य पथ-
दूसरों की सेवा, सहायता, समाज के उत्थान, मातृभूमि की सेवा, मानव जाति के कल्याण और विकास के लिए साहित्य, कला आदि की साधना से धरती पर परम सत्य, सौंदर्य शिव के सन्देश सुनाना आदि सभी माध्यमों में लग कर मनुष्य त्याग आत्मोत्सर्ग की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। छोटे से लेकर बड़े से बड़ा कार्य सभी सृष्टि के लिए अपना अपना महत्व रखते हैं। मेहतर का सफाई करना किसान मजदूर का श्रम, पूँजीपति का औद्योगिक कार्य, बुद्धिजीवी की विचार साधना, सरकारी नौकरी का कर्तव्य पालन सभी अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं यदि इन्हें समष्टि की भावना से पूरे पूरे प्रयास के साथ अनन्य भाव से किया जाय। इन सभी कार्यों से आत्म परितोष के उद्देश्य की पूर्ति होती है।
लौकिक जीवन को छोड़ना, धन सामग्री को छोड़ना त्याग नहीं है। दरिद्रों की सेवा के लिए स्वयं दरिद्र बनना मूर्खता है क्योंकि दरिद्रता और मूर्खता जुड़वाँ बहनें हैं। इसी तरह शरीर को कष्ट देना, सुखाना, क्षीण करना तप नहीं कहलाता। सब प्रकार के अभिमान का त्याग कर अपने शक्ति सामर्थ्य उपलब्धियों का उत्सर्ग करते रहना ही सच्चा त्याग है। दूसरों के हित कल्याण के लिए, स्वयं कष्ट सहना, शरीर और मन का उपयोग करना, दूसरे की सेवा में लगना, अपने सुख भोग स्वार्थ आदि में मन न जाने देना ही तप है। महाराज जनक, अशोक, बुद्ध, और इस युग में महात्मागाँधी, तिलक मालवीय जी आदि अनेकों महापुरुष इसी श्रेणी में आते हैं। भगवान राम का जीवन तप और त्याग की सजीव व्याख्या है। जन कल्याण के चिन्तक ऋषियों का आदर्श तप और त्याग के लिए प्रसिद्ध है।
सृष्टि की रचना हुए बहुत दिन बीत गये। मनुष्यों को प्रखर बुद्धि और अगणित साधन सुविधाएं प्राप्त हुईं, जिसके कारण वे प्रगति पथ पर तेजी से बढ़ने लगे और सुख शान्तिपूर्वक जीवन यापन करने लगे।
यह स्थिति देर तक न रही। वे अहंकार और स्वार्थ के वशीभूत होकर आपस में लड़ने झगड़ने लगे और उनकी प्रतिभा उन्हीं के लिए विपत्ति बन गई। इस नई विपत्ति से छुटकारा पाने के लिये वे बहुत सोचते और बहुत विचार करते रहे पर कोई सफलता न मिली। अन्त में उनने सृष्टिकर्ता विधाता के पास अपनी समस्या का हल पूछने के लिए जाने का निश्चय किया।
मनुष्य ब्रह्माजी के पास पहुँचे और अपनी सारी दुख गाथा कह सुनाई। विधाता ने ध्यान पूर्वक सब कुछ सुना और आश्वासन दिया कि तुम्हारी चिन्ता दूर होगी। हम अपने प्रतिनिधि धरती पर भेजेंगे, वे देवदूत तुम्हारा सब प्रकार कल्याण करेंगे।
प्रतिज्ञानुसार उन्होंने देवदूतों को धरती पर भेजा। वे अवतार धारण कर जहाँ-तहाँ विचरण करते रहे और सुधार के विविध प्रयत्न करते रहे। पर हाय री विडम्बना। उन बेचारों को मनुष्य के कोप ही भाजन बनना पड़ा। उपहास, निन्दा, व्यंग, विरोध और भर्त्सना के तीर उन पर छोड़े गये और किसी-किसी को तो जान से ही मार डाला गया। खिन्न मन से देवदूत वापस लौट गये और उन्होंने विधाता से अपनी असफलता की गाथा कह सुनाई। वे स्तब्ध होकर सब कुछ सुनते रहे और सोचते रहे, कैसा है यह विचित्र मानव प्राणी। बहुत दिन बीत गए। मर्त्यलोक की समस्या उलझती ही गई। पारस्परिक दुर्व्यवहार से सारी धरती नरक बन गई। मनुष्यों को कोई उपाय न सूझा तो वे पुनः ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। मनुष्य ने अभिवादन करने के उपरान्त प्रजापति से कहा-भगवन् आपने जो देवदूत भेजे थे, वे हमारा कुछ भला न कर सके, अब कोई दूसरा उपाय कीजिए। सृष्टिकर्ता ने कहा-तुम्हारा स्वार्थ और अहंकार जब तक न घटेगा तब तक हमारे पार्षद भी कुछ न कर सकेंगे। तुम्हारी शान्ति संदिग्ध ही बनी रहेगी। मनुष्य गिड़गिड़ाये और बोले-भगवन् आपकी सहायता हमें अपेक्षित है। इसके बिना हम शान्ति न प्राप्त कर सकेंगे।
ब्रह्माजी ने पुनः देवदूत भेजना स्वीकार कर लिया, पर यह शर्त लगा दी कि तुममें से जो स्वार्थ और अहंकार को घटा सकेगा उन्हीं की वे सहायता करेंगे।
मजबूरी में मनुष्य को यही स्वीकार करना पड़ा। देवदूत आते तो अभी भी हैं पर शान्ति उन्हीं को दे पाते हैं जो स्वार्थ और अहंकार छोड़कर उनकी बात सुनने को तैयार होते हैं। इस प्रकार मनुष्य की आकाँक्षा पूरी तो हुई पर आँशिक रूप में। जो अपना सुधार कर सके वे शान्ति पाते रहे और जिन्होंने केवल देवदूतों का सहारा तका, उन्हें कुछ न मिल सका। अपूर्ण मनुष्य की शान्ति आकाँक्षा इस प्रकार आज भी एक ऐच्छिक विषय बनी हुई है। विधाता की शर्त पर सहायता ही उसे प्राप्त हो रही हैं।
नम्रता नैतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र की वह भावना है, जो सब मनुष्यों में, सब प्राणियों में, स्थित शाश्वत सत्य से , ईश्वर से सम्बन्ध कराती है। इस तरह उसे जीवन के ठीक-ठीक लक्ष्य की प्राप्ति कराती है। जगत में उस शाश्वत चेतना का, ईश्वर का दर्शन कर, मनुष्य का मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है, वह आत्मविभोर हो कर कह उठता है-
“सिया राम मय सब जग जानी,
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी।”
घट घट वासी राम, परम सत्य के दर्शन कर, सन्तों ऋषियों ने उसे मस्तक नवाया। नम्रता का अर्थ ही है सर्वत्र आसीन शाश्वत ईश्वर की अनुभूति करना और उसे स्वीकार करना, महत्व देना।
आत्म विश्वास, शक्ति, सद्भावना, साहस, गम्भीरता, विनम्रता का ही दूसरा रूप है। जहाँ अनन्त शक्ति की उपस्थिति होती है वहाँ शाश्वत सत्य की अनुभूति होती है।
नम्रता की शक्ति-
नम्रता में शक्ति प्रियता और पदलोलुपता के लिये कोई स्थान नहीं है। क्योंकि ये सब अपने में, स्वार्थयुक्त, संकीर्णता से परिपूर्ण हैं जब कि नम्रता में सबका ध्यान, सबके पीछे अपने आपको गिनने का महत्व पूर्ण आदर्श है। जो अपनी शक्ति वृद्धि करेगा जो अपनी पदलोलुपता को चाहेगा, वह दूसरों को कुचलेगा, अपने लाभ के लिए। दूसरों का शोषण करेगा और विभिन्न प्रतिगामी कार्य करेगा जो नम्रता से मेल नहीं खाते। अतः स्वार्थ के लिये नम्रता में कोई स्थान नहीं। इसमें एकमात्र परमार्थ की ही गति है।
एक होती है हृदयहीन नम्रता, जिसमें अभिमानी मनुष्य अपने बड़प्पन को बनाये रखने अथवा बढ़ाते जाने के लिए झूठी नम्रता का स्वाँग करता है। ऐसी दिखावटी नम्रता का बाजार आज बहुत गर्म है। स्वार्थी, पदलोलुप, अभिमानी व्यक्ति ने नम्रता को भी अपने साधनों में से एक बना है। ऐसी दिखावटी नम्रता बड़ी खतरनाक है। सरल प्रकृति, सीधे स्वभाव के लोग अक्सर धोये जाते हैं।
मिथ्या भावुकता, आत्मविश्वास की कमी और हीन भाव युक्त गम्भीरता-विनम्रता भी नम्रता नहीं। इससे दूर रहा जाय।
पाप की परिभाषा-
विनोबा भावे ने कहा है-”संसार में दो तरह के पाप हैं। एक ही गर्दन जरूरत से ज्यादा तनी हुई है, घमण्ड के कारण अभिमान के कारण और दूसरे की जरूरत से ज्यादा झुकी हुई है। दीनता से दुर्बलता से। ये दोनों ही पाप हैं, एक उन्मत्त है दूसरा दबैल दुर्बल। गर्दन सीधी भी हो और लचीली भी लेकिन तनी हुई न हो और न झुकी हुई।”
यह स्थिति नम्रता में निहित है। अभिमान के लिए तो वहाँ कोई गुंजाइश ही नहीं है। नम्रता में दबैल होने का भाव इसलिए नहीं कि उसमें शाश्वत सत्य, ईश्वर की उपस्थिति का भाव रहता है।जिसकी सामर्थ्य के बल पर गर्दन सीधे रहती है और लचीली भी । क्यों कि वह सर्वत्र ईश्वर के दर्शन कर उसे स्वीकार करती है उसकी सामर्थ्य के समक्ष नतमस्तक होती है। लेकिन वह दीनता से झुकी हुई नहीं होती । वरन् सबमें स्थित ईश्वर के प्रति आदर सम्मान, विनय के लिए झुकी होती है।
सबकी सेवा का आधार-
सबमें ईश्वर की उपस्थिति देखकर उसे करने के साथ-साथ ही मनुष्य सब की सेवा के कटिबद्ध होता है । नम्रता मानसिक भाव है। उसका बाह्य, सक्रिय रूप सेवा है। सब की सेवा आध्यात्मिक एकता और समता का मूलाधार है। जहाँ जहाँ आध्यात्मिक अनुभूति-ईश्वरीय तत्व के दर्शन होंगे, मनुष्य वहीं सेवा के लिए अपने आपको प्रस्तुत करेगा। सेवा का मूलाधार है किसी व्यक्ति , पदार्थ में उत्कृष्टता, शाश्वत तत्व, अथवा किसी तरह की विशेषता के दर्शन करना और साथ ही उसे जीवन में स्वीकार करना।
सुधार की पुण्य प्रक्रिया-
आत्म सुधार की पहली आवश्यकता है अपने दोषों को स्वीकार करना, जो नम्रता से ही सम्भव है। अभिमानी आदमी अपने दोषों को कभी स्वीकार नहीं करता। फलतः उसके दोषों की जटिलता बढ़ती ही जाती है। नम्रता मनुष्य को उसकी सही स्थिति का ज्ञान कराती है। अपनी स्थिति का ज्ञान, अपने दोषों की स्वीकृति मनुष्य को आत्म सुधार के लिए पर्याप्त सामर्थ्य प्रदान करती है। महात्मा गाँधी ने जो नम्रता के एक बड़े उपासक थे, लिखा है-
“ऊँचे से ऊँचे वृक्ष भी आकाश को नहीं छू पाते। महानतम मनुष्य भी जब तक वे शरीर के बन्धन में हैं, दोषपूर्ण ही हैं। निर्दोष कोई मनुष्य नहीं, ईश्वर भक्त भी नहीं। पर इस कारण कि अपने दोषों को जानते हैं और अपने आपको सुधारने के लिए सदैव तैयार रहते हैं, वे ईश्वर के भक्त और महान पुरुष कहलाने के, निर्दोष होने के अधिकारी हैं।” इतना ही नहीं गाँधी जी ने फिर आगे सबके साथ अपनी समानता करते हुए लिखा है कि मैं उसी तरह दूषित हो जाने वाला शरीर का जामा पहने हूँ जैसा कि मेरे साथी मनुष्यों में दुर्बलतम पहने हुए हैं। और मैं उसी प्रकार भूलें कर सकता हूँ जैसे कि कोई और।
नम्रता मनुष्य को उसके निज स्वरूप का, दोषों का, स्थिति का ज्ञान कराती है, उन्हें स्वीकार करती है और सुधारने की प्रेरणा भी। मनुष्य के सुधार का, उन्नति का यही मूलाधार है। जहाँ अभिमान के कारण अपने दोषों की स्वीकृति नहीं, अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं, वहाँ सुधार के लिए कोई रास्ता नहीं, सिवाय इसके कि मनुष्य अपने दोषों को और भी जटिल बनाये।
प्रबल पुरुषार्थ का उद्गम-
नम्रता का अर्थ आलस, सुस्ती, हीनता का भाव नहीं,। नम्रता, प्रबल, तीव्रतम पुरुषार्थ है, वह पुरुषार्थ जो सबके कल्याण के लिए होता है। नम्रता का पुरुषार्थ किसी आक्रमणकारी सिकन्दर, नैपोलियन, डाकू या सेनापति का उद्दण्ड संकीर्ण पुरुषार्थ नहीं, यह है सार्वभौमिक पुरुषार्थ जिसके समक्ष इनकी कोई सत्ता ही नहीं। महात्मा बुद्ध की नम्रता के प्रबल पुरुषार्थ ने अंगुलिमाल जैसे खूँख्वार डाकू को भी भिक्षुक बना दिया। उन्होंने अपने प्रबल पुरुषार्थ से युग की गति को ही बदल दिया। प्रबल पुरुषार्थ था ईसामसीह का, जिसने उस समय के सशक्त रूढ़िवादी, साम्राज्यशाही, अन्धविश्वासों के विरुद्ध आवाज उठाई और लोगों को एक नई दिशा प्रदान की। सिकन्दर अपनी स्वाभाविक मृत्यु पर भी रोता हुआ मरा था। बड़े-बड़े शूरवीरों ने मृत्यु के समय आँसू बहाये। किन्तु एक वह था नम्रता का पुजारी ईसामसीह जिसने काँटों का ताज पहना था। क्रूस पर चढ़ाने पर भी विरोधियों के पाप क्षमा करने के लिए भगवान से प्रार्थना की थी।
नम्रता की महान् शक्ति थी महर्षि वशिष्ठ में जिन्होंने विश्वामित्र जैसे अभिमानी, अपने बच्चों के हत्यारे का भी हृदय बदला था, ब्रह्मर्षि बना दिया।
धीरता और वीरता का चिन्ह-
नम्रता एक प्रबल पुरुषार्थ है सबके हित के लिए जिसमें अन्यायी को मिटाने की नहीं वरन् उस अत्याचार को सहन करके उसे जीतने उसे सुधारने का, ठोस विज्ञान है। यह भूल सुधारने का एक साधन है, जिसमें दूसरों को कष्ट न देकर स्वयं कष्ट सहन करने की क्षमता है। हिंसात्मक प्रयास या दण्ड व्यक्ति पर आक्रमण करते हैं-बुराई पर नहीं, किन्तु नम्रता और सौजन्य सबके प्रति सेवा एकता की अनुभूति से बड़े-बड़े दोष, बुराइयां भी धुल जाते हैं। महात्मा गाँधी ने नम्रता की शक्ति और इसके प्रबल पुरुषार्थ से ब्रिटेन जैसे शक्ति शाली राष्ट्र को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया।
दुर्बल कौन? वही जो अपने सीमित शरीर साधन, वैभव, ऐश्वर्य को अपनी शक्ति का आधार मानते हैं। क्योंकि इस तरह की शक्ति का दायरा सीमित है, संकीर्ण हैं, देश काल पात्र की सीमा में मर्यादित है।
शक्ति शाली कौन? वही जो विश्वात्मा से, अनंत-शक्ति के केन्द्र से जुड़ा हुआ है। और नम्रता से ही, शाश्वत ईश्वर की अनुभूति सम्भव है। विश्वात्मा से सम्बन्धित बाह्य साधनों के अभाव में भी अनंत शक्तिशाली है, उसकी विजय निश्चित है। वही पुरुषार्थ है।
संघर्षों का समाधान-
सारे संघर्ष, लड़ाई, झगड़े, रागद्वेष, कलह इसी कारण हैं कि अभिमान ग्रस्त मनुष्य अपने आपको सबसे आगे देखने का यत्न करता है और दूसरे को पीछे। इस आगे-पीछे के संघर्ष से ही यह विषाक्त बातें फूट पड़ती हैं। किन्तु नम्रता इसका परिहार करती है। नम्रता का नियम है, सारे जीवों के अन्त में अपनी गिनती करना, पहिले नहीं। अपनी पहल-यह तो अभिमानी का नियम है। जब मनुष्य मात्र सबको आगे स्थान देकर अपने लिये पीछे गिनने लगेंगे तो यह सारे संघर्ष ही समाप्त हो जायेंगे। बड़प्पन का यही नियम भी है कि जो व्यक्ति बड़ा बनने की कोशिश करेगा, वह सबसे छोटा बनता दिखाई देगा।
अहंकार का उन्मूलन-
नम्रता का अर्थ है अहंता के बन्धन तोड़ देना और अहंता के बन्धन तोड़ना, नम्र होना, विश्वात्मा के साथ एकता स्थापित होना सब एक ही अर्थ रखते हैं। इस तरह नम्रता मुक्ति का सरल साधन है, नम्रता से ही आत्मसमर्पण की वृत्ति पैदा होती है। गीता का लम्बा चौड़ा उपदेश देने पर भी भगवान कृष्ण को अर्जुन से यही कहना पड़ा-
“सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
अहत्वा सर्व पापेभ्यो मोक्ष यिष्यामि माशुच।
“सब धर्मों को छोड़कर हे अर्जुन तू मेरी शरण में आ, मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा।” “और भी “योगक्षेमं वहाम्यहम्।”
नम्रता के मानी हैं विश्वात्मा की अनुभूति और उसके लिए आत्मसमर्पण का भाव, इसके फलस्वरूप जीवन में मुक्ति प्राप्त करना सम्भव है। आत्म समर्पण अर्थात् पूर्णतया अभिमान का त्याग, नम्रता का परिपूर्ण वरण।
स्वयं अपनी प्रचारक है-
नम्रता और इसके कार्य ही स्वयं सज्जनता के प्रचारक हैं। ये एक सार्वभौमिक नियम होने से स्वयं प्रकाशित हैं। नम्रता युक्त कार्य विरोधियों को ठण्डा करते हैं और अनुगामियों की संख्या बढ़ाते हैं। महात्मा बुद्ध के संपर्क में जो आ जाता वह उनका हो जाता था। उन्होंने किसी प्रेस, विज्ञापन, प्लेटफार्म की चिन्ता नहीं की थी। उनके संपर्क से जो लोग उनके अनुयायी बने यह उनकी नम्रता की शक्ति का आकर्षण था। उनके पिता राजा होते हुए भी उनके कोई अनुयायी बनने के घटना नहीं। बड़े-बड़े सम्राट, वैभवशाली व्यक्ति यों को लोग महत्व नहीं देते, किन्तु नम्रता युक्त महान् आत्माओं के लिए लोग अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए तैयार हो जाते हैं।
भगवान ने गीता में युग बदलने के लिए अवतार लेने की प्रतिज्ञा की है। यह अवतार जन-मानस में उत्साह और संकल्प के रूप में ही उत्पन्न होता है। भगवान निराकार है, सूक्ष्म है, इसलिए उनका अवतरण भी जन-मानस की सूक्ष्म चेतना भावना एवं प्रेरणा के क्षेत्र में ही हो सकता है। इस प्रेरणा से प्रेरित होकर कई अवतारी महापुरुष भी जन्म लेते हैं और उनके पीछे अनेकों अनुयायी उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सहयोग देने को तत्पर हो जाते हैं।
राजनैतिक स्वतन्त्रता की आकाँक्षा जब जनमानस में जागृत हुई तो उसकी पूर्ति के लिए अनेकों अवतारी महापुरुष निकल आये। गाँधी जी मालवीय जी, लोकमान्य तिलक, नेहरू, पटेल, सुभाष, आदि अगणित महान आत्माएं प्रस्फुटित हुईं और उनके प्रयत्न से जन-मानस में स्वाधीनता की आकाँक्षाएँ लहर मारने लगीं। जब तक यह आकांक्षाएं प्रबल नहीं हुई थीं तब तक गत 200 वर्षों में स्वराज्य का आन्दोलन किसी न किसी रूप में चल रहा था पर न तो उसका व्यापक रूप बन पाया था और न उतने प्रभावशाली नेता सामने आ पाये थे। उद्वेलित जन-मानस ही अवतारों का पिता है। भगवान का अवतार कब किस रूप में होने वाला है उसकी परीक्षा उद्वेलित जन-मानस का अनुमान लगाकर ही की जा सकती है।
असन्तोष और उसका प्रतिकार-
कंस के विरुद्ध अत्याचार पीड़ित जनता की, उसके शासन को हटा देने की आकाँक्षा ने ही कृष्ण को आगे लाकर खड़ा कर दिया था। गोप बालकों ने, गोपियों ने तथा असंख्य जनता ने, विविध प्रकार से भगवान कृष्ण को सहयोग देकर उन्हें विजेता और नेता के रूप में प्रस्तुत किया था। भगवान राम के अवतार की पृष्ठभूमि में असुरों के अत्याचार के प्रति छाया हुआ असंतोष ही काम कर रहा था। कथा प्रसिद्ध है कि ऋषियों ने शोक संतप्त होकर अपना-अपना रक्त संचय करके एक घड़ा भरा था और उससे सीता का जन्म होकर असुरों के विनाश की व्यवस्था बनी थी। राम अकेले ही रावण को कहाँ मार पाये थे? रीछ बन्दरों तक ने, गिलहरी और गिद्धों तक ने उनका सहयोग किया था। साधारण जनता की तो बात की ही क्या थी, वह तो प्राण-पण से उनके साथ ही थी। जन-मानस असुरता के अत्याचारों से मुक्ति पाना चाहता था तो राम-लक्ष्मण, हनुमान, अंगद, नल-नील आदि अनेक पराक्रमी प्रस्फुटित हो उठे। विभीषण जैसे सज्जन तो ऐन मौके पर उनसे आ मिले।
भगवान बुद्ध के साथ अगणित विद्वानों और भिक्षु भिक्षुणियों का सहयोग होना इस बात का चिन्ह है कि उस जमाने की धार्मिक विकृतियों और अनैतिकताओं से जनता क्षुब्ध हो उठी थी और जो भी अनुकूल नेता सामने आये उसका पूर्ण सहयोग करने लगी। लेनिन को रूस में साम्यवादी सत्ता स्थापित करने का श्रेय इसीलिए मिला कि वहाँ की जनता तात्कालिक जार के शासन से क्षुब्ध हो रही थी। वह स्वयं ही बगावत कर रही थी, साम्यवादियों को तो संयोगवश उनका नेतृत्व करके सत्ता हथिया लेने का अवसर मात्र मिल गया ।
जन-सहयोग के अभाव में कोई भी महापुरुष युग परिवर्तन जैसा महान कार्य कदापि प्रस्तुत नहीं कर सकता। जन-भावना की प्रबलता को ही भगवान की प्रेरणा कहते हैं, यही अवतार का सूक्ष्म रूप है, जो उसका स्थूल रूप से किन्हीं भी साधारण या असाधारण व्यक्ति यों के सिर पर सफलता का सेहरा बाँध देता है। इस तत्व के अभाव में बड़े से बड़े योग्य और प्रतिभाशाली व्यक्ति भी असफल रहते हैं और बहुत चाहते एवं करते हुए भी कृतकार्य नहीं हो पाते ।
अभद्रता, आलस्य और अनुदारता की भाँति ही आज अविवेक और असंयम भी जिस प्रकार बढ़ रहे है उनके कारण मानव जीवन दिन-दिन कठिन बनता चला जा रहा है। असुरता के यही पाँच लक्षण हैं। जिन व्यक्तियों में यह दुर्गुण होंगे वे असुर कहे जाएंगे और उनका समाज असुर-समाज कहलावेगा। असुरता का परिणाम आपत्ति, असन्तोष एवं अशान्ति ही हो सकती है। इतिहास साक्षी है कि संसार में जब जब असुरता बढ़ी है, तब -तब दुःख दारिद्र के पहाड़ टूटे हैं और मानव को देवत्व की स्थापना और असुरता के निवारण का सामूहिक प्रयत्न करना पड़ा है। इसी को अवतार भी कहते हैं। अवतार का उद्देश्य युग-निर्माण एवं युग-परिवर्तन ही होता है। स्मरण रखने की बात यही है कि यह अवतार धारण करने का आश्वासन मिलता रहा है।
एक बार देवता जब असुरता के त्रास से बहुत संत्रस्त हो गये तो सहायता के लिए ब्रह्माजी ने उन सब में से थोड़ी-थोड़ी शक्ति निकाली और उसे इकट्ठा करके एक नई देवी बना कर खड़ी कर दी, इसका नाम रखा और दुर्गा। इस दुर्गा ने अपना विकराल रूप धारण करके बात की बात में असुरों का सफाया कर दिया। दुर्गा-अर्थात् संघ-शक्ति । पृथक-पृथक रूप से देवताओं के समान सुयोग्य व्यक्ति भी दुर्बल ही रहते हैं, और उन्हें पराजय का मुँह देखना पड़ता है। पर संगठित होकर वे एक सजीव एवं प्रचंड शक्ति का दुर्गा रूप धारण कर लेते हैं। अवतार का यही रहस्य है। युग परिवर्तन के लिए भगवान की प्रतिज्ञा है कि जब धर्म घटेगा और अधर्म बढ़ेगा तो उसके प्रतिकार के लिए वे अवतार धारण करेंगे। भगवान का अवतार जल्दी ही हो, बढ़ा हुआ अधर्म नष्ट हो और घटा धर्म बढ़े, यह चाहना भी की जाती है। फिर भी अवतार नहीं होता। अवतार कितना जल्दी हो, कितना सशक्त हो, यह इस बात पर निर्भर है कि जनता के मन में अधर्म के प्रति विक्षोभ की प्रतिक्रिया कितनी तीव्र हुई, वह उस परिवर्तन के लिए कितनी अधीर और कितनी कटिबद्ध है। त्रेता में समुद्र बाँधने के समय गिलहरियों तक ने राम को सहयोग दिया था। वे अपने बालों में धूलि भर लाती और समुद्र में झाड़ जाती थी ताकि समुद्र जल्दी पट जाए। यह प्रवृत्ति जब हर योग्य, अयोग्य, समर्थ, असमर्थ में पैदा हो जाती है तो अवतार को तत्क्षण अवतरित होना पड़ता है और अधर्म के नाश एवं धर्म स्थापना की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करना पड़ता है।
स्मरण रखना चाहिए कि एक समय में अनेक अवतार एक साथ होते हैं। विशेष श्रेय भले ही एक को मिले पर उस कार्य की सफलता अनेकों द्वारा सम्पन्न होती है। राम के काल में लक्ष्मण, परशुराम, हनुमान आदि अनेकों अवतारों की आत्माएं काम कर रही थीं। कृष्ण के समय बलराम, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर आदि कितने ही अवतारी मौजूद थे। अब अनीति के विरुद्ध विद्रोह और नीति के प्रति बढ़ती हुई जन भावना जब पूर्ण रूप से प्रबल हो उठेगी, वह प्रबलता इतनी हो उठेगी कि उस कार्य में गिलहरी की तरह सहयोग दिये बिना किसी से रहा ही न जाए, तब तत्काल अवतार का अवतरण होगा और वर्तमान परिस्थितियाँ बदलते और धर्म राज्य आते देर न लगेगी।
जिन वस्तुओं से जितना अधिक काम लिया जाता है वह उतनी ही चमकीली बनती हैं। बेकार पड़ी हुई वस्तुओं तो को जंग लग जाती है। जो मशीन काम में आती रहती हैं वे जल्दी ही खराब नहीं होती। बेकार पड़ी हुई मशीन कुछ ही समय में बेकार हो जाती है। उनके बाह्य आकार से लेकर आन्तरिक सूक्ष्म पुर्जे तक खराब, अनुपयोगी हो जाते हैं। मानव शरीर तो अन्य मशीनों से बहुत ही महत्वपूर्ण चेतन और जड़ की सम्मिलित रचना का सर्वोपरि नमूना है। उद्योग के अभाव में, बेकारी में शरीर और मानसिक स्थितियाँ विकृत हो जाती हैं, मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रोगों को शिकार होना पड़ता है।
श्रम ही चमकता है
उद्यमशील व्यक्ति यों का मुख मण्डल सदैव चमकता हुआ दिखाई देता है और अकर्मण्य व्यक्ति सदैव क्लाँत, उद्विग्न, दुःखी और खोटी कल्पनाओं में फँसे देखे जाते हैं। परिश्रमी ही सबसे अधिक सुखी, प्रसन्न और सन्तुष्ट रहते हैं। वे भले ही भौतिक सम्पत्ति, समृद्धि में बड़े न हों किन्तु उनका आन्तरिक धन, जिसमें मानसिक सन्तोष, हल्केपन, और प्रसन्नता का वे अनुभव करते हैं वह संसार की सबसे बड़ी सम्पत्ति है।
परिश्रम से ही स्वास्थ्य में सुधार होता है। उद्यमी व्यक्ति थक कर अपनी शय्या में प्रवेश करता है और उसे स्वास्थ्यवर्धक उत्तम नींद आती है। प्रातः उठने पर वे तरोताजगी, प्रफुल्लता, व्यक्ति, प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। आलसी, अकर्मण्य ही दुःस्वप्नों, अनिद्रा में पड़े हुए सुबह भी आलस्य, चिन्ता-भार सा महसूस करते हुए उठते हैं।
परिश्रम, कर्म ही जीवन की स्थिति का कारण है। अकर्मण्यता, आलस्य मृत्यु की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न है। गति (स्पन्दन) हीन लाश को लोग जल्द ही नष्ट कर डालते हैं। जब तक सोना है तब तक सोते रहे किन्तु जागते हुए रह कर आलस्य में, उद्योगहीनता में समय बिताना पतन, मृत्यु को निमंत्रण देना है।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
परिश्रम, उद्योग जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति के बिना अन्य आवश्यकता के लिए कोई स्थान नहीं है। भोजन, वस्त्र और जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिए श्रम किया जाए, श्रम से ही इनकी प्राप्ति की जाए। बिना श्रम के अपनी आवश्यकता पूर्ण करना चोरी है। जिस तरह चोर किसी का धन, सम्पत्ति चुरा कर अपनी आवश्यकतायें पूर्ण करता है। वैसे ही श्रम के अभाव में जीवन की साधन सम्पत्ति जुटाना चोरी के साथ ही दूसरों का शोषण है। क्योंकि साधनों का अस्तित्व श्रम से ही है। दूसरों के श्रम से उपार्जित वस्तुओं का उपभोग, बिना श्रम का बदला चुकाये करना चारीडडडडडड शोषण तो है ही। अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी न किसी रूप में श्रम करना आवश्यक है।
रोटी के लिए श्रम सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए महात्मा और उनके पूर्व चिन्तकों ने एक नई प्रेरणा मानव जाति को दी है। भारतीय जीवन व्यवस्था में तो हमारे ऋषियों ने पहले ही इसका व्यवस्थित कार्यक्रम बनाया था, और उसके अभ्यास के लिए जीवन के प्रारम्भ के वर्षों में ब्रह्मचारी को गुरु के आश्रम में रहकर कठिन श्रम करना पड़ता था। महाराजा जनक जैसे ज्ञानी भी हल चला कर जीवन निर्वाह की वस्तु उपलब्ध करते थे। आध्यात्मिक साधनाओं में लीन ऋषि मुनि भी वन के कन्दमूल फल, अथवा खेत में बिखरे पड़े रहने वाले दानों से जीवन निर्वाह करके अपना सम्पूर्ण समय लोक कल्याणार्थ आध्यात्मिक साधनाओं में बिताते थे। महर्षि दुर्वासा, कणाद, पिप्पलाद आदि इसी आदर्श के प्रतिष्ठापक थे। किन्तु हम श्रम के इस महत्व को भूल गये और इसी कारण आलस्य, अकर्मण्यता से हमारा पतन हुआ।
ज्ञान और कर्म का सम्बन्ध
ज्ञानी, ज्ञान की बातें कहना मात्र अपना काम समझने लगे। ब्राह्मण दान, दक्षिणा, भिक्षा को अपना अधिकार-सा समझने लगे। राजा महाराजा अपने आपको धरती पर भगवान का रूप समझने लगे। वणिक वृत्ति के लोगों ने बिना श्रम के तिकड़म, चालाकी, बुद्धि के चातुर्य को अपना पेशा मान लिया । उत्पादन का सारा बोझ किसान पर पड़ गया । किसान का शोषण होने लगा और उसे समाज का निम्न अंग मान लिया गया। फलतः आज तक भी किसान अपनी दीनावस्था में पड़े हुए हैं। अकर्मण्यता, आलस्य आदि ने हमारे पौरुष को ही नष्ट कर दिया। पुरुषार्थ, स्वाभिमान, उत्साह को दबा दिया। बिना श्रम के हमारा उत्थान भी नहीं हो सकता। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, चोरी, बेईमानी मिलावट, धोखाधड़ी और इसके साथ ही फिजूलखर्ची, अपव्यय, फैशनपरस्ती का अस्तित्व उन कुसंस्कारों का परिणाम ही है जिनका परिष्कार श्रम की प्रतिष्ठा करने पर ही होगा।
पश्चिमी देशों ने श्रम के बल पर अपनी भौतिक और शारीरिक क्षमताओं में सर्वोपरि स्थान प्राप्त कर लिया। वे कुछ ही वर्षों में संसार के शक्ति -शाली समृद्ध राष्ट्र बन गये। यह हमारे लिए अनुकरणीय है।
दबाव से नहीं प्रेमपूर्वक
श्रम स्वेच्छापूर्वक किया जाना चाहिए। दबाव द्वारा अथवा किसी भय के कारण श्रम एक भार बन जाता है और जीवन के आकर्षण को नष्ट कर देता है। श्रम में जो सुखद आनन्द मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। दबाव से मनुष्य का शरीर काम में लगा रहता है किन्तु मन साथ नहीं देता। ऐसी अवस्था में काम को टालने अथवा उसको जैसे-तैसे पूरा करने की भावना, अथवा सुघड़ता से करने की लगन में अभाव से कार्य के उपयुक्त परिणाम की आशा नहीं की जा सकती।
श्रम से प्रेम करना ही श्रम का सही आधार है प्रेमपूर्वक खूब श्रम करना और श्रम से उत्पन्न आमदनी, उत्पादन का भाग अपनी जरूरी आवश्यकता की पूर्ति में लगा कर शेष को समाज की सेवा में, जन कल्याण में लगा देना और फिर श्रम करने के लिए तैयार रहना श्रम की प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन का संग्रह करते रहने से जब आवश्यकता पड़ने पर सरलता से उसकी पूर्ति हो जाती है तो श्रम की आवश्यकता महसूस नहीं होती और मनुष्य श्रम से जी चुराने लगता है। इसीलिए भारतीय जीवन दर्शन में परिग्रह का निषेध करके दान, त्याग परोपकार को आवश्यक धर्म कर्तव्य बताया गया है जिससे मनुष्य के पास कुछ संग्रह ही न हो और वह श्रम के लिए सदैव तैयार रहे।
इस तरह श्रम अस्तेय के सिद्धांत का निष्कर्ष है और अपरिग्रह की सिद्धि का साधन है। श्रम-शील चोर नहीं होता वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करता है। वही अपरिग्रही हो सकता है क्योंकि त्याग दान आदि के लिए उसके पास सच्ची कमाई है। हजारों आदमियों के श्रम से उत्पन्न साधन सम्पत्ति का मालिक बनने वाला एक करोड़पति यदि एक लाख रुपये समाज सेवा अथवा दान आदि में लगा देता है तो वह कोई बड़ी बात नहीं हुई। उसका पुण्य एक लोक दिखावा मात्र है, वास्तविक पुण्य नहीं। इसके विपरीत अपने श्रम से उत्पादन करने वाला एक किसान लोक कल्याण के कार्यों में कुछ रुपये भी लगा देगा तो सिद्धान्ततः वह बड़ा परोपकारी, समाज सेवक, परमार्थ प्रिय माना जाना चाहिए।
श्रम के वरदान
श्रम से जीवन में सुख शान्ति सन्तोष प्राप्त होता है क्योंकि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति का आधार मनुष्य स्वयं होता है। स्वावलम्बन, आत्म निर्भरता एवं श्रमशीलता ही मनुष्य को सच्ची आत्म शान्ति प्रदान करते हैं। शोषक, चोर, परावलम्बी सदैव असन्तुष्ट दुःखी परेशान क्लेश युक्त देखे जाते हैं। गाँव का एक किसान अधिक सीधा, सरल, उत्साही और प्रसन्न है, रहता बनिस्बत एक चोरबाजारी करने वाले, रिश्वतखोर, धोखाधड़ी करने वाले के। श्रम और स्वास्थ्य का तो अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। अकर्मण्य आलसी, दूसरों के श्रम पर जीने वाले सदैव रोगी, निर्बल, क्षीणकाय देखे जा सकते हैं। शहरी जीवन चाहे वह अन्धेरे में रहने से, लीपा पोती करने से, वायु भर जाने से कितना ही सफेद मोटा, ताजा आकर्षक दिखाई दे, किन्तु गाँव के दुबले पतले कृषक के सामने उसके स्वास्थ्य का खोखलापन सरलता से जाना जा सकता है। क्षय, बुखार, दमा, पेट के रोग, स्नायविक विकार, जितने शहरी जीवन में घुसे हुए हैं उतने देहाती जीवन में नहीं देखे जाते। देहात आज भी श्रमशीलता के मन्दिर बने हुए हैं जिनकी तीर्थ यात्रा करे बिना हमारे समाज और राष्ट्र का उत्थान नहीं हो सकता। श्रम-केन्द्र देहातों को महत्व देकर ही हम अपने अस्तित्व को कायम रख सकते हैं। शहरों में श्रम की उपेक्षा करके जो कृत्रिम वातावरण बना, फैशनपरस्ती बढ़ी विलासिता पनपी उसी ने वहाँ स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया।
सादगी और सरलता का मार्ग
श्रम और स्वास्थ्य की तरह नैतिक सद्गुण तथा सादगी का भी निकटतम सम्बन्ध है। जहाँ श्रम होगा, मिट्टी, खान, जंगल, और निर्माण केन्द्र काम होता होगा। वहाँ बनाव शृंगार की, फैशन परस्ती की कोई गुंजाइश नहीं है। ग्रामीण जनता को कहाँ फुरसत है इसके लिए। कभी देखा है किसी खेत, गौशाला, में काम करती ग्रामीण स्त्री को फैशन की चमक-दमक भरी साड़ी पहने, मुँह पर तरह-तरह के रंग पोते। किसी किसान को कभी देखा है मोजे चमकदार जूते चढ़ाये क्रीज्ड पैंट कोट टाई हैट लगाये आँखों पर चश्मा चढ़ाये , जब वह अपने हल पर काम करता है। वही सीधा साधा परिधान “चार रोटी-एक लंगोटी” और उस पर भी हँसता गाता प्रफुल्लतापूर्ण जीवन। बादलों को देख कर वह मस्ती, खेतों की हरियाली छटा में से नवरक्त का संचार ये श्रमदेव के अमूल्य वरदान उन्हें ही प्राप्त होते हैं।
स्वामी दयानन्दजी अपने गुरु के आश्रम की झाडू लगाते, आश्रम का पानी भरने से लेकर सभी काम वे स्वयं करते। एक दिन जल्दीबाजी में किसी दूसरे काम में लग जाने से झाडू तो निकाल दिया किन्तु कूड़े को एक ओर लगा दिया सोचा बाद में फेंक देंगे। बाहर से तो विरजानन्द जी अन्धे थे किन्तु उनकी अंतर्दृष्टि से दयानन्द जी की यह ढिलाई और बाद के लिए काम को टाल देने की बात कैसे छिप सकती थी? कुटिया में प्रवेश करते समय गुरुजी का पैर कूड़े के ही ढेर पर पड़ गया। अब तो दयानन्दजी पर वह मार पड़ी जिसका ठिकाना नहीं। उस समय लगी एक चोट का निशान हमेशा के लिए स्वामी जी के कन्धे पर बना रहा। किन्तु दयानन्दजी ने कहा- “गुरुदेव? मेरा शरीर कितना कठोर है आपके दुबले पतले कोमल हाथों में बड़ी चोट लगी होगी। आप इस तरह मुझे न मारा करें।” और वे गुरुदेव के पैर दबाने लगे।
विरजानन्दजी तो शिष्य को सहन शीलता का पाठ पढ़ा रहे थे। महर्षि की निगाह जब कभी अपने शरीर पर लगे उस चोट के निशान पर पड़ती अथवा कोई पूछता-”महाराज यह चोट कैसे लगी।” तो उनकी आँखें भर आतीं, गुरुदेव की याद करके और कहते-”यह गुरुदेव के उपकार की स्थूल निशानी हैं।”
स्वर्गीय लोकमान्य तिलक ने जब भारत की स्वतन्त्रता का नारा लगाया, “स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे” तब उनके साथ कुछ गिने-चुने व्यक्ति ही थे और दूसरी ओर संसार प्रसिद्ध ब्रिटिश शासन। किन्तु लोकमान्य का स्वर अनेकों का स्वर बना और एक दिन उस शक्ति शाली सत्ता को उखाड़ फेंका गया। भारत स्वतन्त्र हुआ। जोसेफ मेजनी ने भी इसी तरह इटली की स्वतन्त्रता का संकल्प किया और उस समय की तानाशाही, साम्राज्यवाद के विरुद्ध आन्दोलन उठाया जिसके लिए मौत की सजा निश्चित थी। किंतु मेजिनी का प्रेरणा मंत्र देशवासियों का प्रेरणा मन्त्र बना और इटली स्वतन्त्र हुआ। महर्षि दयानन्द ने सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज उठाई, धार्मिक अन्ध परम्पराओं पर आघात किया और इसके लिए उन्हें कई बार विष दिया गया और इसी से उनकी अन्त में मृत्यु भी हुई। ईसा मसीह को अपने सुधार कार्य के लिए सूली पर चढ़ाया गया। इस तरह के असंख्यों उदाहरण है जिनमें मनुष्य ने असम्भव से टक्कर ली और उसे सम्भव बनाया। मौत, पीड़ा, कष्ट युक्त यन्त्रणाओं को भी स्वीकार करके सत्य की आवाज बन गई।
मनुष्य जितना निर्भय होगा उतना ही वह महान कार्यों का सूत्रपात करेगा। निर्भयता उत्कृष्ट मानसिक स्थिति का परिणाम है। यह एक नैतिक सद्गुण है जो बड़े तप और त्याग से प्राप्त होता है। मन का जितना विकास होता जाएगा उसी अनुपात से निर्भयता की उपलब्धि होगी। उत्कृष्ट आदर्श सिद्धान्तों की रक्षा के लिए जितना उत्सर्ग, त्याग, कष्ट सहिष्णुता होगी उसी के अनुसार निर्भयता प्राप्त होती जाएगी।
तीन प्रकार की निर्भयता-
निर्भयता तीन प्रकार की होती है। विज्ञ निर्भयता, विवेकी निर्भयता और ईश्वरनिष्ठ निर्भयता।
विज्ञ निर्भयता-जीवन पथ पर आने वाले विभिन्न खतरों, विघ्न आदि की जानकारी, उनका परिचय प्राप्त कर मनुष्य जब उनके समाधान, इलाज का मार्ग जान लेता है तो वह उनके सम्बन्ध में निर्भय हो जाता है। किन्तु जिन खतरों के विषय में वह जानता नहीं उनका भय सदैव बना रहता है। सर्पों के सम्बन्ध में जानने वाले उनके साथ उसी तरह खेल सकते हैं जैसे बच्चा खिलौने के साथ। ऐसे लोगों के मन से सर्पों का भय दूर हो जाता है। किन्तु सिंह को देखकर वे भय से पीले पड़ जाते हैं। इसी तरह सरकस के खेल में इशारों पर सिंह को नचाने वाला कलाकार सर्प को देखकर भयभीत हो सकता है। इस तरह की निर्भयता मर्यादित है, सीमित है। जिन खतरों के बारे में मनुष्य जानकारी हासिल कर लेता है, उनसे निर्भय हो जाता है किन्तु अन्य से नहीं।
विवेकी निर्भयता-इसमें परिपक्व विवेक से बुद्धि नियन्त्रित और शान्त रहती है। मन की वृत्तियों पर शासन होता है। भयावह परिस्थितियों में बुद्धि अशान्त असन्तुलित नहीं होती। भय, शोक, चिंता, आदि मानसिक वृत्तियाँ मनुष्य पर हावी नहीं हो पातीं। ऐसी स्थिति में उन परिस्थितियों से बचाव के प्रयत्न सूझने की सम्भावना रहती है और मनुष्य बच जाता है। जिन परिस्थितियों में एक साधारण मनुष्य असन्तुलित हो उनसे हार बैठता है, निर्दिष्ट पथ से भटक जाता है उन्हीं में एक विवेकशील व्यक्ति अपना मार्ग निकाल कर आगे बढ़ जाता है। इससे मनुष्य अनावश्यक और ऊट-पटाँग साहस भी नहीं करता अतः फिजूल के खतरों में पड़ता भी नहीं।
ईश्वरनिष्ठ निर्भयता-इसके लिए किसी बाह्य सहायता, साधनों की आवश्यकता नहीं होती। जीवन में ईश्वर के प्रति उसकी सर्व व्यापकता, सर्वशक्ति सम्पन्नता आदि के प्रति दृढ़ निष्ठा, गहरी आस्था, अडिग विश्वास जितना बढ़ेगा उतना ही मनुष्य निर्भय होता जाएगा। ईश्वरनिष्ठ निर्भीकता के आधार पर ही संसार के अधिकाँश महत्वपूर्ण कार्य पूर्ण हुए हैं। यह मनुष्य को पूर्ण निर्भय बनाती है किन्तु यह दीर्घकालीन अभ्यास, पुरुषार्थ और भक्ति से ही प्राप्त होती है। अपने साधनों, चातुर्य आदि पर निर्भय व्यक्ति शत्रु से भी मिलने में बड़ी सावधानी बरतते हैं किन्तु ईश्वरनिष्ठ तो सभी से सीधा व्यवहार रखता है। दिखावट, बनावट को कोई जगह नहीं रहती। ईश्वर पर अनन्य, निष्ठा से मनुष्य पूर्णरूपेण निर्भय बन जाता है क्योंकि वह अनन्त व्यापक, निर्विकारी सत्य से परिचय कर लेता है।
आपत्ति से सच्ची सहायक-
निर्भयता मनुष्य की प्रगति और विकास का मार्ग खोल देती है। मनुष्य का विकास, और प्रगति इस बात पर निर्भर रहती है कि वह जीवन में आने वाली उलझनों, कठिनाइयों का समाधान किस तरह करता है। निर्भीकता इन परिस्थितियों में महान शक्ति उत्साह, आशा प्रेरणा की स्रोत बन जाती है। कठिनाई, उलझनों, अवरोध के बीहड़ पथ में यदि मनुष्य का कोई सहारा साथी है तो वह है निर्भीकता। निर्भीकता ही उसके पैरों को गति देती है, हृदय में उत्साह प्रसन्नता पैदा करती है, नेत्रों में आशा की चमक पैदा कर देती है। इतना ही नहीं एक ही निर्भीकता अनेकों का प्रेरणा सूत्र बन जाती है।
यूरोप में जहाँ पादरियों और उनकी अन्ध परम्पराओं का खण्डन करने पर जीवित जला देने की सजा थी, ‘लूथर’ नाम के एक निर्भीक सत्यान्वेषी पादरियों के अधार्मिक कृत्य और स्वर्ग के टिकट बेचने आदि के खिलाफ आवाज उठाई। इस पर उसे पोप का कोपभाजन बनना पड़ा। न्यायालय में उसे क्षमा माँगने को कहा गया किन्तु निर्भीक लूथर ने अपने सत्य पर अटल रहकर क्षमा माँगने से इन्कार कर दिया। उसे मरवाने का प्रयत्न किया गया किंतु लूथर बच गया। लूथर के निर्भीक विचार असंख्य लोगों के विचार बन गये और प्रोटेस्टेन्ट धर्म का प्रसार हुआ। धार्मिक अन्ध विश्वास के प्रति लोग सतर्क हो गये।
निर्भीकता का भाव संक्रामक होता है। नेपोलियन बोनापार्ट जब अपनी सेना के बीच रहता था तो उसकी सेना अजेय रहती थी। प्रत्येक सिपाही अपने आपको नेपोलियन के समान ही शक्ति शाली समझता था। नेपोलियन की सफलता का आधार निर्भीकता थी। वह विश्वासपूर्वक कहता था “वह गोली अभी नहीं बनी जो नेपोलियन को मारेगी।”
निर्भयता, व्यक्ति समाज तथा राष्ट्र की सबसे बड़ी सम्पत्ति है। आगामी पीढ़ियों के लिए बहुत बड़ी धरोहर है। महात्मा गाँधी ने लिखा है “सचमुच वह राष्ट्र महान है जहाँ के लोग मौत के तकिए पर अपना सिर रखकर सोते हैं।” जिसने मौत का डर तोड़ दिया उसे कोई डर नहीं।
कुएं ने शिकायत करते हुए समुद्र से कहा “पिता सभी नदी नाले आपके घर में जगह पाते हैं। आप प्रेम पूर्वक उन्हें अपने घर में स्थान देते हैं। मुझसे ही पक्षपात क्यों? पिता के लिए तो सभी बेटे बेटी एक से होते हैं।” समुद्र ने उत्तर दिया-”वत्स! अपने चारों ओर दीवार बनाकर बैठने पर ही तुम्हें अपने जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित रहना पड़ा है। असीम का, अनन्त का प्यार पाने के लिए स्वयं को भी असीम बनना पड़ता है। अपनी सीमाओं का त्याग करके उन्मुक्त रूप से अपने आपको व्यक्त करो, अपनी दीवारों को हटा दो। धरती को हरी भरी, तृप्त करती हुई तुम्हारी धारा जब बन्धनमुक्त हो उठेगी तब तुम सहज ही मुझमें आ समाओगे।”
बड़ी-बड़ी आशा, आकाँक्षाओं के साथ नवयुवक और नवयुवतियाँ दाम्पत्य जीवन के सूत्र में बँधते हैं। बड़ी-बड़ी रस्में अदा होती हैं। विवाह के रूप में बड़ा समारोह मनाया जाता है। गाजे-बाजे, रोशनी, दावतों, लेन-देन, बरात,जुलूस आदि के साथ दो प्राणी विवाह सूत्र में बँधते हैं। परस्पर के नये आकर्षण से प्रारम्भिक दिनों का जीवन बड़ा सुखद बीतता है। किन्तु यह स्थिति अधिक दिन नहीं रहती और दाम्पत्य जीवन कलह, अशाँति, द्वेष, असन्तोष की आग में जलने लगता है।
परिपाटी के तौर पर जो प्रतिज्ञायें धर्म पुरोहित उच्चारण कर देते हैं उनका व्यावहारिक जीवन में नाम भी नहीं रहता। दाम्पत्य जीवन एक दूसरे के लिए बोझा बन जाता है। इसका कोई बाह्य करण नहीं। अपितु पति-पत्नी दोनों के ही परस्पर व्यवहार, आचरणों में विकृति पैदा होने पर ही अक्सर ऐसा होता है। यदि इन छोटी-छोटी बातों में सुधार कर लिया जाए तो दाम्पत्य जीवन परस्पर सुख शाँति आनन्द का केन्द्र बन जाए।
दूसरे की भावना का आदर-
दाम्पत्य जीवन की सुख समृद्धि एवं शाँति के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यवहार में एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रक्खें। एक मोटा सा सिद्धान्त है कि “मनुष्य दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह स्वयं के लिए चाहता है।” पति पत्नी भी सदैव एक दूसरे की भावनाओं, विश्वासों का ध्यान रखें। किन्तु देखा जाता है कि अधिकांश लोग अपनी भावना, विचारों में इतना खो जाते हैं कि दूसरे के विचारों, भावों का कुछ भी ध्यान नहीं रखा जाता। वे उन्हें निर्ममता के साथ कुचल भी देते हैं। इस तरह दोनों की एकता, सहयोग के स्थान पर असंतोष का उदय हो जाता है। अपनी इच्छानुसार पत्नी को जबरदस्ती किसी काम के लिए मजबूर करना, उसकी इच्छा न होते हुए भी दबाव डालना पति के प्रति पत्नी के मन में असन्तोष की आग पैदा करना है। इसी तरह कई स्त्रियाँ अपने पति के स्वभाव, रुचि, आदेशों का ध्यान न रखकर अपनी छोटी-छोटी बातों में ही उन्हें उलझाये रखना चाहती हैं! फलतः उन लोगों को विवाह एक बोझा सा लगने लगता है। दाम्पत्य जीवन के प्रति उन घृणा, असन्तोष होने लगता है और यही असन्तोष उनके परस्पर के व्यवहार में प्रकट होकर दाम्पत्य जीवन को विषाक्त बना देता है। यदि किसी मानसिक स्थिति ठीक न हो तो परस्पर लड़ाई-झगड़े होने लगते हैं। एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करते रहते हैं।
पति पत्नी का सदैव एक दूसरे के भावों, विचारों एवं स्वतन्त्र अस्तित्व का ध्यान रख कर व्यवहार करना, दाम्पत्य जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है। इसी के अभाव में आज-कल दाम्पत्य जीवन एक अशाँति का केन्द्र बन गया है। पति की इच्छा न होते हुए, साथ ही आर्थिक स्थिति भी उपयुक्त न होने पर स्त्रियों की बड़े-बड़े मूल्य की साड़ियाँ, सौंदर्य प्रसाधन, सिनेमा, आदि की माँग पतियों लिए असंतोष का कारण बन जाती है। इसी तरह पति का स्वेच्छाचार, भी दाम्पत्य जीवन की अशाँति के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। यही कारण है कि कोई घर ऐसा नहीं दीखता जहाँ स्त्री पुरुषों में आपस में नाराजगी, असंतोष दिखाई न देता हो।
अशिक्षा का अभिशाप-
परस्पर एक दूसरे की भावनाओं में स्वतन्त्रता का ध्यान न रखने में एक मुख्य कारण अशिक्षा भी है। यह कमी अधिकतर स्त्रियों में पाई जाती है। पर्याप्त शिक्षा-दीक्षा के अभाव के कारण भी मानसिक विकास नहीं होता, जिसके कारण एक दूसरे की भावनाओं, व्यावहारिक जीवन की बातों के बारे में मनुष्य को जानकारी नहीं मिलती। इसके निवारण के लिए प्रत्येक पुरुष को कुछ न कुछ समय निकाल पत्नी को पढ़ाने, उसका ज्ञान बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। जीवन साथी का समकक्ष होना आवश्यक है। अपने साथी की ज्ञान वृद्धि विकास एवं कल्याण के लिए भी अन्य आवश्यक कार्यों की तरह की प्रयत्न करना आवश्यक है, तभी वह जीवन में सहयोग, एकता, सामंजस्य का आधार बन सकती है। किन्तु देखा जाता है अधिकाँश लोग इसमें दिलचस्पी नहीं लेते। मन, बुद्धि के विकास के अभाव में दाम्पत्य जीवन सुखी और समृद्ध नहीं बन सकता।
सहिष्णुता और उदारता-
योग्य होकर भी, एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए भी कभी-कभी स्वभावतया ऐसा व्यवहार हो जाता है जो पति-पत्नी में से एक दूसरे को अखरने लगता है। ऐसी स्थिति में किसी भी एक पक्ष को क्षमाशीलता, सहिष्णुता का परिचय देकर विक्षोभ उत्पन्न न होने देने का प्रयत्न करना आवश्यक है। साथ ही दूसरे पक्ष को भी अपने भूल को महसूस कर क्षमा माँगकर परस्पर मनों को साफ रखना चाहिए। अन्यथा परस्पर मनोमालिन्य बढ़ जाता है और दाम्पत्य जीवन में कटुता पैदा हो जाती है। महात्मा सुकरात, टॉलस्टाय, सन्त तुकाराम जैसे महापुरुषों ने अपनी फूहड़ और लड़ाका स्त्रियों को सहनशीलता, क्षमा, उदारता के साथ जीवन में निबाहा था।
स्त्रियाँ तो बेचारी सदा से ही अपने पतियों के कटु स्वभाव, व्यवहार, निर्दयता, स्वेच्छाचार को भी सहन करके दाम्पत्य जीवन की गाड़ी को चलाने में योग देती रही हैं। भारतीय नारी का महान् आदर्श इसी त्याग, सहिष्णुता और पतिव्रत धर्म से निर्मित रहा है। पति-पत्नी में से जब किसी एक में भी कोई स्वाभाविक कमजोरी दीखती हो तो उसका सहन-शीलता के द्वारा निराकरण करके गृहस्थ की गाड़ी को चलाने में पूरा-पूरा प्रयत्न करते रहना आवश्यक है।
पूर्णता के लिये अपूर्णता का मिलन-
पति-पत्नी दोनों का जीवन एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों में अभिन्नता है, ऐक्य है। भारतीय संस्कृति में तो पुरुष और स्त्री को आधा-आधा अंग मान कर एक शरीर की व्याख्या की गई है जिसमें पुरुष को अर्द्धनारीश्वर तथा स्त्री को अर्द्धांगिनी कहा गया है। दाम्पत्य जीवन स्त्री-पुरुष की अनन्यता का गठबन्धन है। अतः परस्पर किसी तरह का दुराव छिपाव, दिखावा, बनावटी व्यवहार करना परस्पर अविश्वास एक दूसरे के प्रति घृणा को जन्म देता है और इसी से दाम्पत्य जीवन नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। अपनी प्रत्येक चेष्टा में स्पष्टता, दुराव-छिपाव का अभाव रखकर अभिन्नता प्रकट करते हुए पति-पत्नी को एक दूसरे का विश्वास, मानसिक एकता प्राप्त करना चाहिए। वैसे जहाँ तक बने प्रत्येक व्यक्ति को अपने बाह्य जीवन में भी रहस्य, छल, बनाव, दिखावे से बचना चाहिए। क्योंकि इस बाहरी व्यवहार देखकर भी पति-पत्नी एक दूसरे पर सन्देह करने लगते हैं। वे सोचते हैं “हो सकता है यही व्यवहार हमसे किया जा रहा हो।” और सन्देह की भूल-भुलैया में ही अनेकों दम्पत्तियों का जीवन क्लिष्ट, उलझा हुआ, दुरूह बन जाता है।
परिवार का आधार -
पति-पत्नी दोनों अपने मानसिक क्षेत्र में बहुत बड़ा कुटुम्ब होते हैं। अपनी मानसिक आवश्यकताओं के आधार पर पति अपनी पत्नी से ही विभिन्न समय में, सलाहकार की तरह मंत्री की सी योग्यता, भोजन करते समय माँ की वात्सल्यता, आत्म सेवा के लिए आज्ञापालक नौकर, जीवन पथ में एक अभिन्न मित्र, गृहिणी, रमणी, आदि की आकाँक्षा रखता है। इसी तरह पत्नी भी पति से जीवन निबहि के क्षेत्र में माँ-बाप, दुःख दर्द में अभिन्न साथी, कल्याण और उन्नति के लिए सद्गुरु, कामनाओं की तृप्ति के लिए भर्तार, सुरक्षा संरक्षण के लिए भाई आदि जब परस्पर इन मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती है तो एक दूसरे में असंतोष, अशाँति पैदा हो जाती है जिससे दाम्पत्य जीवन में विकृति पैदा हो जाती है।
परस्पर संतुष्ट रहें-
एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए, एक दूसरे की योग्यता वृद्धि, खासकर पुरुषों द्वारा स्त्रियों के ज्ञानवर्द्धन में योग देकर, परस्पर, क्षमाशीलता, उदारता, सहिष्णुता, अभिन्नता एक दूसरे की मानसिक तृप्ति करते हुए दाम्पत्य जीवन को सुखी समृद्ध बनाया जा सकता है। अधिकतर इसके लिए पुरुषों को ही अधिक प्रयत्न करना आवश्यक है। वे अपने प्रयत्न और व्यवहार से गृहस्थ जीवन की कायापलट कर सकते हैं। अपने सुधार के साथ ही स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, ज्ञानवृद्धि, उनके कल्याण के लिए हार्दिक प्रयत्न करके दाम्पत्य जीवन को सफल बनाया जा सकता है। धैर्य और विवेक के साथ एक दूसरे को समझते हुए अपने स्वभाव, व्यवहार में परिवर्तन करके ही दाम्पत्य जीवन को सुख−शांति पूर्ण बनाया जा सकता है।
महात्मा ईसा कहीं जा रहे थे कि मार्ग में उन्होंने अपने मैथ्यू नामक शिष्य को देखा। उसके पिता की मृत्यु हो गई थी और वह उसे रो-रोकर दफन कर रहा था।
मैथ्यू ने जैसे ही ईसा को देखा, वैसे ही दौड़ कर उनके पास आया और आस्तीन चूम कर तुरन्त ही अपने पिता के शव की ओर लौट पड़ा।
ईसा ने समझा कि इसकी ममता नहीं मरी। अतः उन्होंने मैथ्यू को पुकार कर अपने पास बुलाया और उसे आज्ञा दी- ‘जिसकी मृत्यु हो गई वह भूत का साथी हुआ, तू उसकी लाश से मोह कर, वर्तमान दूर क्यों होना चाहता है?’
जब तक मैथ्यू कुछ समझे तब तक ईसा फिर बोल पड़े-’समय बड़ा बलवान है’ इसने अनेक लाशों को यत्नपूर्वक दफनाया है। उसके लिए तेरे पिता की लाश का दफनाना कुछ कठिन कार्य नहीं है।
मैथ्यू इस असमंजस में था कि वह इस समय क्या करे? तभी उसने ईसा की स्पष्ट आज्ञा सुनी-’भूत को भूत देखना रहेगा, तू यहाँ से मेरे साथ आ।’
शिष्य को गुरु की आज्ञा माननी पड़ी ओर वह लाश को वहीं पड़ी छोड़कर उनके साथ चल दिया।
संयोग की बात है कि जब यह दोनों आगे बढ़े तो ईसा का एक अन्य शिष्य भी उन्हें अपने पिता की लाश दफनाता हुआ मिला । परन्तु जैसे ही उसने अपने गुरु को देखा वैसे दौड़ कर उनके पास पहुँचा और उनके साथ चल दिया। ईसा ने उसे देखा तो बोले -’अरे, तू क्यों आ रहा है?’
शिष्य ने साथ चलने का हठ किया तो ईसा बोले- ‘ऐसी कोई जल्दी नहीं है। मैं आगे के गाँव में ठहरूंगा। तुम लाश को दफना कर वहीं चले आना।’
वह शिष्य तो चला गया, परन्तु एक समान घटनाओं पर दो प्रकार की व्यवस्था सुनकर मैथ्यू को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने अपने गुरु से पूछा-’इसका क्या कारण है गुरुदेव! अपने मुझे तो अपने पिता की लाश को दफनाने भी नहीं दिया और उसे अपने पिता को दफन करने की आपने स्वयं आज्ञा दी। एक प्रकार की घटनाओं पर ही दो प्रकार की आज्ञा क्यों?’
ईसा ने उसे समझाया-’मैथ्यू मैं जो कुछ कहता हूँ वही मेरे अन्तर की आवाज है। और वह आवाज एक निश्चित मत बना कर निकलती है। जीवन की धारा को एक घाट पर बाँधा जाना कभी सम्भव नहीं है। धर्म यह कहता है कि एक विचार पर दूसरे विचार को मत टिकने दो। परन्तु ऐसा करना लोहे के बंधन को दृढ़ करने के समान है और मनुष्य का यथार्थ बन्धन लौह-शृंखला नहीं, कच्चा सूत है!’
अतः जो राग में फँसा है उसे वैराग्य का उपदेश दो, परन्तु जो राग-मुक्त है, उसे वैराग्य का उपदेश देने से कोई लाभ नहीं।
जब हम कुछ व्यक्ति यों को दीर्घजीवी रहते हुए सुनते हैं तो यह विचार सहज ही उत्पन्न हो जाता है कि क्या हम उतनी लम्बी आयु प्राप्त नहीं कर सकते? हम जानते हैं कि दीर्घ जीवन के लिए किन-किन उपायों का पालन करना चाहिए फिर भी हम उन उपायों की उपेक्षा करते हैं और दीर्घ जीवन के नियमों का पालन नहीं करते। हमारे पूर्वजों का तो यहाँ तक विश्वास था कि हम जब तक चाहें तब तक जीवित रह सकते हैं। इसके लिए भीष्म पितामह का उदाहरण प्रत्यक्ष है, जिन्हें इच्छा मृत्यु की सिद्धि प्राप्त थी।
दीर्घ जीवन के लिए हमारे मन में यह विश्वास होना आवश्यक है कि हम कम आयु में मृत्यु को प्राप्त नहीं होंगे। यदि आप यह आस्था बना लें कि हम सौ वर्ष से कम आयु में मृत्यु को प्राप्त नहीं होंगे तो विश्वास मानिये कि आपकी आयु सौ वर्ष तक अवश्य पहुँचेगी । आपका यह विश्वास जितना ही दृढ़ होता जाएगा, उतनी ही आयु बढ़ती जाएगी। परन्तु, यदि आप यही मान बैठें कि कल का भी पता नहीं, शायद मृत्यु कल ही आ घेरे तो आपका ऐसा विश्वास आपको जीवितावस्था में ही मृत्यु के गड्ढे में धकेल देगा। दूसरे शब्दों में आप जीते जी ही मृतक के समान हो जाएंगे। आपका आँतरिक संशय ही आपको मृत्यु के मुख तक पहुँचाने में सहायक होगा।
दूसरा विश्वास शरीर के निरोग होने का है। जो लोग यह मानते हैं कि हमें कोई रोग नहीं है, उनके रोग-ग्रस्त होने पर भी, रोग के कीटाणु शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। परन्तु, इसके विपरीत जो लोग निरोग होते हुए भी अपने रोग-ग्रस्त होने की शंका से त्रस्त रहते हैं, वे धीरे-धीरे रोगी होते जाते हैं। उनका वहम ही उन्हें रोगी बना देता है। जो लोग क्षय-ग्रस्त नहीं हैं, उन्हें आधुनिक चिकित्सक टी॰ बी॰ का रोगी बता दे, तो उन्हें टी॰ बी॰ हो ही जाती है। ऐसा कई रोगियों के सम्बन्ध में हो चुका है। कहते भी है कि वहम की दवा तो लुकमान के पास भी नहीं थी।
जहाँ आशंका नहीं, वहाँ रोग का क्या काम? जहाँ विश्वास नहीं वहाँ जीवन कैसा? साधारण सा रोग होने पर आप उसके बढ़ने की शंका मत कीजिए, परन्तु रोगशामक उपाय अवश्य करते रहिये। इससे आपका रोग निर्मूल हुए बिना न रहेगा।
दीर्घजीवी होने का तीसरा उपाय है चिन्ता से निवृत्ति। मन में किसी प्रकार की चिन्ता है तो सम्पूर्ण प्रसन्नता नष्ट हो जाती है और धीरे-धीरे स्वास्थ्य भी चौपट हो जाता है। जो व्यक्ति लम्बे सम तक जीवित रहना चाहते हैं, उन्हें ऐसे प्रयत्न करने चाहिएं कि वे चिन्ता से मुक्त रह सकें और यह तभी संभव है जब हम अपने कार्यों को परिश्रम पूर्वक और दत्तचित्त होकर करें। जो व्यक्ति न्यून प्राप्ति में अधिक संतोष अनुभव करता है, उसे चिन्ता का घुन नहीं लगता।
दीर्घजीवी होने के लिए खान-पान को भी नियमित रखना चाहिए। यह माना कि संसार में सभी वस्तुएं उपभोग के योग्य हैं, परन्तु किसी भी कार्य की अति हानिप्रद है। अधिक भोजन से बदहजमी होना संभव है ही। अधिक मीठा भी हानिप्रद है। बार-बार खाने की प्रवृत्ति भी मनुष्य को रोगी बनाती है। इसीलिए आचार्यों ने भोजन के समय निश्चित किये हैं। इसके अनुसार अधिक से अधिक प्रतिदिन तीन बार भोजन करना चाहिये।
शौच, स्नान, निद्रा, आहार, विहार सभी की सीमाएँ बाँधकर हमारे जीवन को सुव्यवस्थित कर दिया गया है, फिर भी हम नियमों का उल्लंघन कर रोगों को आमंत्रित करें तो इसमें हमारा अपना ही दोष समझा जाएगा। हमारे ऋषियों ने योगासनों द्वारा दीर्घजीवी होने के उपाय ढूँढ़ निकाले थे और आज भी आसन पद्धति से स्वास्थ्य लाभ किया जाता है। जो लोग आसन पद्धति को नहीं अपना सकते, उनके लिए विभिन्न व्यायामों की सृष्टि की गई है। प्राचीन भारतीय पद्धति के अनुसार दंड-कसरत का ऐसे ही व्यायामों में समावेश है। परन्तु आधुनिक प्रणाली के अनुसार विभिन्न खेलों को, भागदौड़, तैरना, कूदना आदि के रूप में व्यायामों को प्रश्रय दिया गया। यह सभी उपाय हमारे स्वस्थ रहने में सहायक सिद्ध होते हैं।
आज के युग में व्यायाम का एक सरल रूप टहलना है। अधिकाँश शहरी व्यक्ति टहलने जाते और स्वस्थ रहते हैं। इससे मन भी प्रफुल्लित रहता और ताजा वायु भी प्राप्त हो जाती है। प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ही भ्रमण कर लौट आया जाए तो मनुष्य को बहुत कुछ लाभ हो सकता है। जो लोग रोगी हैं, वे भी प्रातः भ्रमण द्वारा अपने शरीर को स्वस्थ बना सकते हैं।
पानी का भी हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। हल्का पानी शरीर को भारी नहीं होने देता, इसके विपरीत भारी पानी, मीठा होते हुए भी शरीर में भारीपन ला देता है और उससे मन की प्रसन्नता नष्ट हो जाती है। यदि अच्छा और हल्का कूप-जल पीने की आदत डाली जाए तो शरीर में रोग भी प्रायः उत्पन्न न हो। यह ध्यान रहे कि जल में कृमियाँ न पड़ें, इसके लिए दो-तीन महीने में एक बार कोई कीटाणुनाशक दवा कुएं में डाल देनी चाहिए।
इस प्रकार कुछ सावधान रहने, नियम पालन करने और मन को प्रसन्न रखने से दीर्घजीवन प्राप्त किया जाना संभव है।
सर्व सम्पन्न श्रावस्ती नगर में भयंकर अकाल पड़ा, पशु-पक्षी नर-नारी खाद्य के अभाव में कीड़ों की तरह मरने लगे। सारी नगरी मरघट सी दिखाई दे रही थी। महात्मा बुद्ध ने यह देखा तो बड़े दुःखी हुए। उन्होंने श्रावस्ती के धनीमानी व्यक्ति यों को बुलाया और ऐसे भीषण समय में देश की सहायता के लिए कहा किन्तु किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सब उठ उठकर चले गये। धनवानों को तो अपने भण्डार भरे रखने थे स्वयं के लिए, मानवता के लिए खर्च करना उन्हें अपव्यय लगता था। लोग कहीं जबरन उनसे खाद्य सामग्री न छीन लें इस भय से दरवाजे बन्द करके बैठ गये। महात्मा बुद्ध काफी निराश हुए। इतने में ही एक कुलीन घर की लड़की आई और बोली “महात्मन्! आज से मैं श्रावस्ती नगरी के अकाल पीड़ितों की सेवा की प्रतिज्ञा करती हूँ। सबके भोजन जुटाने के लिए मैं प्रयत्न करूंगी”। लोग एक छोटी सी बालिका के मुँह से ऐसी बात सुनकर दंग रह गये । कई मजाक भी करने लगे। “बेटा सुप्रिया! इतने बड़े राज्य का, नगर का भरण-पोषण कैसे करोगी? तुम्हारे घर वाले तो कुछ देंगे भी नहीं।” महात्मा बुद्ध ने पूछा।
“महाराज मुझे घरवालों के देने न देने की चिन्ता नहीं है। मैं घर-घर भिक्षा माँगूँगी, नगर-नगर जाकर लोगों को पीड़ितों की सहायता के लिए प्रेरणा दूँगी, जिससे ऐसे संकट में अनेकों का भला होगा। देश के लिए, मानवता के लिए मैं भीख माँगूँगी, घर-घर घूमूँगी। महाराज आप आशीर्वाद दें।” सुप्रिया ने कहा। महात्मा बुद्ध को एक आशा की चिनगारी नजर आई। बालिका के संकल्प से प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दिया।
बालिका घर-घर घूमकर क्षुन्धार्तों के लिए अन्न माँगने लगी। जिनके पास था वे मना न कर सके। देखते-देखते इतना अन्न जमा होने लगा कि भूख से प्राण त्यागने वालों की आसानी से जीवन रक्षा होने लगी।
तथागत ने शिष्यों को बुलाकर कहा - “संसार में सत्य बहुत है, धर्म बहुत है, पर उसका उद्बोधन करने वाले नहीं हैं। सुप्रिया ने घर-घर जाकर धर्म का उद्बोधन किया और लोगों की धर्म बुद्धि को जगाया तो आज सहज ही एक बड़ी कठिनाई हल हो गई। तुम भी इसी मार्ग को अपनाना, ऐसा ही आचरण करना।”
पुरुष विष्णु है स्त्री लक्ष्मी, पुरुष विचार हे स्त्री भाषा, पुरुष धर्म है स्त्री बुद्धि, पुरुष तर्क है स्त्री रचना, पुरुष धैर्य है स्त्री शान्ति, पुरुष प्रयत्न है स्त्री इच्छा, पुरुष दया है स्त्री दान, पुरुष मंत्र है स्त्री उच्चारण, पुरुष अग्नि है स्त्री ईंधन, पुरुष समुद्र है स्त्री किनारा, पुरुष धनी है स्त्री धन, पुरुष युद्ध है स्त्री शान्ति, पुरुष दीपक है स्त्री प्रकाश, पुरुष दिन है स्त्री रात्रि, पुरुष वृक्ष है स्त्री फल, पुरुष संगीत है स्त्री स्वर, पुरुष न्याय है स्त्री सत्य, पुरुष सागर है स्त्री नदी, पुरुष दण्ड है स्त्री पताका, पुरुष शक्ति है स्त्री सौंदर्य, पुरुष आत्मा है स्त्री शरीर।
उक्त भावों के साथ विष्णु पुराण में बताया है कि पुरुष और स्त्री की अपने-अपने स्थान पर महत्ता, एक से दूसरे के अस्तित्व की स्थिति, एक से दूसरे की शोभा आदि सम्भव है। एक के अभाव में दूसरा कोई महत्व नहीं रखता। स्त्री पुरुष की समान भूमिका का दर्शन वैदिक काल में बड़े ही व्यवस्थित रूप में था। पुरुषों की तरह ही स्त्रियाँ भी स्वतन्त्र थीं, साथ ही जीवन के सभी क्षेत्रों में भाग लेती थीं। राजनीति, समाज, धर्म सभी में नारी का महत्वपूर्ण स्थान था। कोई भी कार्य नारी के अभाव में पूर्ण नहीं माना जाता था। शिक्षा, संस्कृति में उनका समान अधिकार था। स्त्रियाँ यज्ञोपवीत धारण करती थीं, यज्ञ, वेदाध्ययन आदि में पूरा-पूरा भाग लेती थीं। इसी समय लोपा मुद्रा, धोबा, गार्गी, मैत्रेयी आदि वेदों की मन्त्र द्रष्टा, ब्रह्मवादिनी हुई।
इतना ही नहीं स्त्रियों को विशेष आदर सम्मान का अधिकार देते हुए मनु भगवान ने लिखा है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता”। जहाँ नारियों का सम्मान नहीं होता उन्हें पूज्य भाव से नहीं देखा जाता, वहाँ सारे फल, क्रियाएँ नष्ट हो जाती हैं।
“यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।”
दुर्व्यवहार की कुचेष्टा-
परिस्थितियों के बदलने के साथ ही नारी जीवन की दुर्दशा शुरू हो गई और कालान्तर में उसके स्वतन्त्रता, समानता, आदर के अधिकार छीन कर उसे घर की चहार दीवारी, पर्दों की ओट में बन्द कर दिया गया। बाह्य आक्रमणों के काल से भारतीय नारी जीवन की भारी दुर्दशा हुई और नारी का गौरव, सम्मान, अधिकार सब छीन लिए गये। नारी एक निर्जीव गुलाम की तरह पीड़ित की जाने लगी। उसका दमन होने लगा।
नारी का परिवार में जो गृहलक्ष्मी, गृहिणी का स्थान था, वहाँ उसे सास, ससुर, पति, देवर, नन्द, जिठानी के अत्याचारों का सामना करना पड़ा, पति के मर जाने पर उसे राक्षसी, कुलटा, दुराचारिणी कहा जाने लगा, अथवा जीवित ही ज्वाला में झोंक दिया गया सती के नाम पर। समाज में किसी व्यक्ति का देख लेना, बात चीत कर लेना उसके चरित्र का कलंक समझा जाने लगा। पुरुष ने साम दाम दण्ड भेद से मनचाहा नारी पर शासन किया, अत्याचार किये उस पर।
फलतः मानव जीवन का अर्द्धांग बेकार, हीन, अयोग्य बन गया। आधे शरीर में लकवा दौड़ जाने पर सारे शरीर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। ठीक यही बात हमारे जीवन के साथ हुई। हमारे सामाजिक पतन, का मुख्य कारण स्त्रियों की यह दुरवस्था भी रही है।
नारी का विकास आवश्यक-
राष्ट्र को विकास और स्वतन्त्रता की नई प्रेरणा देने वाले महापुरुषों ने इस कमी को अनुभव किया और समाज को सशक्त सबल बनाने के लिए स्त्रियों के अधिकारों की नई परिभाषा करनी पड़ी। उनकी दुरवस्था, शोषण, उत्पीड़न को बन्द करके पुरुष के समान अधिकार देने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई। महर्षि दयानन्द ने नारी के अधिकारों का व्यापक आन्दोलन ही चलाया। स्वामी विवेकानन्द के समाज को चेतावनी दी कि “जिस देश राष्ट्र में नारी की पूजा उसका सम्मान नहीं होगा, वह राष्ट्र, समाज कभी भी उन्नत और महान नहीं हो सकता। लाला लाजपतराय ने कहा “स्त्रियों का प्रश्न पुरुषों का प्रश्न है। दोनों का ही एक दूसरे के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। पुरुषों की उन्नति के लिए सदैव ही स्त्री के सहयोग की आवश्यकता है।” महामना मदन मोहन मालवीय ने विधिवत् विद्वानों का सम्मेलन करके स्त्रियों के लिए यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन, यज्ञ आदि सामाजिक कृत्यों में पूर्ण अधिकारों की घोषणा की। शारदा एक्ट, मैरेज एक्ट आदि बने। विवाह आदि की मर्यादायें निश्चित की गईं। भारतीय संविधान में लड़की को भी उत्तराधिकार, आर्थिक क्षेत्र में तथा अत्याचार के विरुद्ध बोलने का अधिकार देकर नारी जाति की स्वतन्त्रता, सुरक्षा, विकास और उसकी समानता का प्रयत्न किया गया।
लक्ष्य से बहुत पीछे-
इन सब प्रयत्नों के बावजूद अभी भारतीय नारी अपने लक्ष्य से बहुत पीछे है। पर्दा प्रथा, दहेज लड़के-लड़की में असमानता का भाव आदि कुछ कम अभिशाप नहीं हैं नारी के लिए। अब भी भारतीय स्त्रियों की बहुत बड़ी संख्या घर की चहार दीवारी के भीतर कैद है। उन्हें सदाचार शील आदि का बहाना लेकर पर्दे बुर्का आदि में बन्द कर रखा है। जिस पौधे को पर्याप्त प्रकाश, हवा नहीं मिलती वह मुरझा जाता है। अधिकाँश स्त्रियों में भी पीले चेहरे, बीमारियाँ, रोग, कुछ कम नहीं फैल रहे हैं। अब भी स्त्री को वासना तृप्ति का साधन समझा जाता है। एक स्त्री के मरने पर ही नहीं, उसके जीवित रहते दूसरे ब्याह, दूसरी स्त्रियों से संपर्क किए जाते हैं। बड़े-बड़े नगरों, शहरों में वेश्याओं के केन्द्र नारी जीवन की दुर्गति और समाज के कलंक के रूप में अब भी प्रकट अथवा अप्रकट रूप में स्थित हैं।
हमारे पारिवारिक जीवन में नारी पर घर वालों के द्वारा होने वाले अत्याचार अब भी बने हुए हैं। उन्हें सताया जाता है। ताड़ना दी जाती है। गुलामों की तरह रहने को बाध्य किया जाता है। अन्य लोगों को खाने को अच्छा मिलता है जबकि सारा काम करने वाली बहू रूखा सूखा खाकर पेट भरती है। यह उन चन्द शहरी या शिक्षित घरानों की बात नहीं वरन् भारत के अस्सी प्रतिशत परिवारों की कहानी है जो गाँवों में बसे हैं। दहेज क्या नारी का अपमान नहीं है?
प्राचीन सम्मान पुनः मिले-
सुधार के विभिन्न प्रयत्नों के बावजूद भी यथार्थ की धरती पर भारतीय नारी का जीवन अभी बहुत बड़े क्षेत्र में अविकसित पड़ा है । यह हमारे सामाजिक जीवन, पुरुष के अर्द्धांग की विकृति है जिसने सारी प्रगति को ही अवरुद्ध कर रखा है। अन्ध परम्परा, अन्ध विश्वास, रूढ़िवाद, संकीर्णता व्यर्थ के अभिमान को त्याग कर नारी को उसके उपयुक्त स्थान पर प्रतिष्ठित करना आवश्यक है। इसी में पुरुष और समाज तथा राष्ट्र को उन्नति निहित है नारी का उत्थान पुरुष का उत्थान है। नारी की प्रगति पुरुष की प्रगति है। दोनों का जीवन परस्पर आश्रित है।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उत्थान-पतन, कर्तव्य का कारण भाग्य, देवी देवता या किसी सत्ता को समझते हैं। इनके विश्वास के अनुसार, जीवन एक निर्जीव मशीन की तरह है जिसे भाग्य या प्रारब्ध रूपी ड्राइवर अपनी इच्छा से जिधर चाहे उधर चलाता है। इससे वे हाथ पर हाथ धरे, अकर्मण्य हो बैठे रहते हैं भाग्य देवता की आशा में।
दूसरे वे लोग होते हैं जो जीवन पथ पर परिश्रम के साथ एक-एक कदम आगे बढ़ते है। श्रम और पुरुषार्थ में ही जिनका विश्वास होता हैं। पुरुषार्थी किसी भी काम पर लगते समय सगुन-असगुन का, ग्रह नक्षत्रों का ख्याल ही नहीं करता । वह स्वयं अपने उन हाथों को देखता है जो काम करने के अमूल्य औजार प्रकृति ने दिए हैं और वह काम में जुट जाता है। अपने पुरुषार्थ के बल पर वह पद-पद पर नव सृजन, नव निर्माण के गीत गाता जाता है। जीवन में विभिन्न उपलब्धियों के स्मृति चिन्ह, पुरुषार्थ के प्रतीक छोड़ता जाता है।
जीवन की सभी प्रवृत्तियों को सन्मार्ग की ओर लगा कर उनसे ही सफलता, उत्साह आत्मविश्वास प्राप्त किया जा सकता है। इसके विपरीत उनका दुरुपयोग करके अथवा उन्हें निष्क्रिय बना कर घबराहट, अशान्ति, अनुत्साह में भी वृद्धि की जा सकती है। वृत्तियाँ जब व्यक्त नहीं होतीं तो परस्पर लड़ती हैं और मनुष्य का आन्तरिक जीवन ही नहीं इसके फलस्वरूप उसका बाह्य जीवन भी क्लेश, अशान्ति, अवसादपूर्ण बन जाता है।
मनुष्य का बाह्य जीवन उसके आन्तरिक जीवन की छाया है। अतः भाग्यवादी भी बाह्य जगत में अपने विश्वासों का कोई न कोई आधार अवश्य मान लेते हैं। पारिवारिक, सामाजिक, परिस्थितियाँ, प्रारब्ध, समय आदि का सहारा लेकर भाग्यवादी अपने विश्वास की पुष्टि करता है। तब वह स्थितियों को इतना ध्रुव सत्य मान लेता है अन्य किसी तरह का परिवर्तन ही स्वीकार नहीं करता ।
वस्तुतः मनुष्य की जैसी भावनायें और विचार होते हैं उन्हीं के अनुसार विश्वास, धारणा, और जीवन के प्रेरक दर्शन का निर्माण होता है। जिन स्वभाव ढीला ढाला होता है, जो अकर्मण्य होते उनके मन में अंतर्द्वंद्व चलने लगते हैं। उनकी सारी शक्ति अंतर्द्वंद्व में ही नष्ट हो जाती है, जिससे बाह्य जीवन में भी निराशा, पैदा होती है।
देखा जाए तो संसार के सफल व्यक्ति यों में पुरुषार्थी, कर्मवीरों का ही नाम है। जीवन व सफलताओं का कारण भी एकमात्र पुरुषार्थ ही है। यह बात अलग है कि मनुष्य अपनी सौजन्यता, सरलता, सद्गुणों से उसे ईश्वर की कृपा, अथवा अन्य कोई आधार पर बताये। धर्म, स्वास्थ्य, विद्या, भौतिक उपलब्धियाँ, सभी में तो पुरुषार्थ की आवश्यकता है। पुरुषार्थ असम्भव को भी सम्भव कर देता है। महापुरुषों की विभूतियाँ, महानता सब उनके पुरुषार्थ की ही देन हैं। पुरुषार्थ के बल पर साधारण-सी परिस्थितियों से उठ कर उन्होंने असाधारण काम किए।
हानिकारक आदतें, संस्कार, विचार, भावनाओं का पुरुषार्थ से निराकरण करके उनकी जगह अच्छाई पैदा की जा सकती है। मनुष्य स्वयं अपने भाग्य, चरित्र, जीवन का निर्माता है। क्योंकि विचार चरित्र और आचरणों से ही भाग्य का निर्माण होता है। आज की तदबीर कल की तकदीर है-यह प्रसिद्ध कहावत है। एक विश्व विख्यात मनीषी ने लिखा है-”किसी बालक से प्रकृति यह नहीं कहती कि तुम्हें अमुक तरह का सुखकर जीवन मिलेगा और दूसरे को कष्टकारक। भूतकाल की परिस्थितियाँ कुछ भी रही हों किन्तु मैं बता सकता हूँ कि एक सी परिस्थितियों में पले हुए दो मनुष्यों में एक महान पुरुष बना अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ, से दूसरा अकर्मण्य पतन की ओर गिरा।”
वस्तुतः मनुष्य जिस ओर बढ़ना चाहे बढ़ सकता है। वेद भगवान साक्षी है कि “ईश्वर पुरुषार्थी की सहायता करता है।” इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रकृति स्वयं पुरुषार्थी का मार्ग खोल देती है। मनुष्य विश्वास करे कि “मैं अमुक कार्य कर सकता हूँ” तो वह अवश्य कर लेगा। संसार का आज जो विकसित रूप है वह उन सब पुरुषार्थियों का है जिन्होंने जीवन में निरन्तर कर्म साधना की है।
उपासना, तपश्चर्या के द्वारा कई व्यक्ति कुछ दैवी वरदान प्राप्त करते हैं। कइयों को तपस्वी महापुरुषों की कृपा से भी कुछ विशेष लाभ प्राप्त होता है, पर इसमें भी भाग्य नहीं पुरुषार्थ ही प्रधान है। साधना को इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। उसमें शरीर, मन और आत्मा के तीनों क्षेत्रों को नियंत्रित करके एक विशेष दिशा में प्रयत्नपूर्वक चलाना पड़ता है। यह पुरुषार्थ ही कालान्तर में फलित होकर दैवी अनुग्रह या वरदान के रूप में वापस लौटता है। जो केवल मनौती मानते हैं, देवता की आकस्मिक, अहैतुकी कृपा की आशा लगाये बैठे रहते हैं ऐसे कुपात्रों को दैवी अनुग्रह से भी वंचित रहना पड़ता है। पात्र कुपात्र का अन्तर तो देवता भी करते हैं। आलसी, अकर्मण्य, कुपात्रों को नहीं, प्रयत्नशील, आशावादी और उद्योगी, सत्पात्रों की ही वे भी सहायता करते हैं।
महापुरुषों और तपस्वियों को सफल हो सकने वाला आशीर्वाद देने की शक्ति प्रचंड तपश्चर्या के आधार पर ही मिलती है। जिसके पास तपस्या की पूँजी नहीं, उसका न शाप फलित होता है और न वरदान। भिक्षा में कोई व्यक्ति कहीं से धन माँग लावे तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि धन उपार्जन का आधार भिक्षा ही होता है। उपार्जन तो श्रम का परिणाम है। चाहे वह आत्मिक सम्पदा हो। चाहे भौतिक, उनकी प्राप्ति श्रम प्रयत्न से ही होगी।
भाग्य और कुछ नहीं, कल के किए हुए पुरुषार्थ का आज का परिपक्व स्वरूप ही भाग्य है। जो आज भाग्यवान दीखते हैं उन्हें वह सौभाग्य अनायास ही नहीं मिला है। विधाता ने कोई पक्षपात भी उनके साथ नहीं किया है। उनके पूर्व पुरुषार्थ ही आज सौभाग्य के रूप में परिलक्षित हो रहे हैं।
हमें भाग्य के भरोसे नहीं बैठा रहना चाहिए वरन् पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। प्रयत्नशील व्यक्ति आज नहीं तो कल अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेता है।
स्वामी विवेकानन्द के जीवन की एक घटना है। भ्रमण एवं भाषणों से परिश्राँत स्वामी विवेकानन्द अपने निवास-स्थान पर लौटे। उन दिनों वे अमेरिका में एक महिला के यहाँ ठहरे थे। वे अपने ही हाथों भोजन बनाते थे। अपने स्वभाव के अनुसार वे भोजन करने की तैयारी ही कर रहे थे कि कुछ बच्चे पास में आकर खड़े हो गये। उनके पास बहुत बच्चे आया करते थे।
बच्चे भूखे थे। स्वामी जी ने अपनी सारी रोटियाँ एक-एक करके बच्चों में बाँट दीं। महिला वहीं बैठी सब देख रही थी। बड़ा आश्चर्य हुआ उसे। आखिर पूछ ही बैठी-”आपने सारी रोटियाँ तो उन बच्चों को दे डालीं, अब आप क्या खायेंगे? “
स्वामी जी के अनधरों पर मुस्कान दौड़ गयी। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा-”माता, रोटी तो पेट की ज्वाला शान्त करने वाली वस्तु है। यदि इस पेट में न सही, तो उस पेट में सही।” देने का आनन्द पाने के आनन्द से बड़ा है।
विचार और क्रिया दो तत्व हैं, जिनके आधार पर मनुष्य अपने जीवन को समुन्नत और उत्कृष्ट बना सकता है। छोटे से काम से लेकर जीवन लक्ष्य की प्राप्ति तक मनुष्य के विचार और आचार में समन्वय पर ही सम्भव है। विचार के अभाव में क्रिया एकाँगी और अधूरी है। उससे कोई प्रयोजन नहीं सधता। इसी तरह बिना आचार-क्रिया के विचार भी व्यर्थ ही है, लँगड़ा है, उससे कुछ सिद्ध नहीं होता। ख्याली पुलाव भले ही पकाये जाते रहें, यथार्थ में कुछ भी नहीं होता । दोनों के ठीक-ठीक समन्वय पर ही सफलता और उन्नति सम्भव है। व्यक्ति , समाज, राष्ट्र सभी का विकास इन दोनों के ऊपर है। जहाँ केवल विचार है या केवल क्रिया ही है अथवा दोनों का अभाव है वह व्यक्ति , समाज या राष्ट्र उन्नत नहीं हो सकता ।
आज के बुद्धिवाद और विज्ञान के युग में मानव समाज में इन दोनों ही तत्वों में असमानता पैदा हो गई है। जिनके पास क्रिया की शक्ति है उनके पास कोई उत्कृष्ट विचार ही नहीं। जीवन की भौतिक सफलता, चमक-दमक, भौतिक विज्ञान की घुड़ दौड़ में ही उनकी विचार शक्ति लगी हुई है और उससे प्रेरित होकर जो क्रिया होती है वह मानवता के विनाश, व्यापक संहार की सम्भावनायें अधिक व्यक्त करती है। इसी तरह जिनके पास उत्कृष्ट विचार है वहाँ क्रिया का अभाव है। फलतः कुछ भी लाभ नहीं होता । स्वयं उनको और समाज को विचारों से कुछ भी नहीं मिल पाता।
फिर भी आज विचारों की कमी नहीं है। युगों-युगों से महापुरुष, सन्त, महात्मा, आदि ने मानवता को उत्कृष्ट कोटि के विचार दिए। विचार ही नहीं उनकी क्रियात्मक प्रेरणा दी। कुल मिलाकर आज मानव जाति के पास उत्कृष्ट विचारों का बहुत बड़ा भण्डार है, किन्तु मानव की समस्यायें, उलझनें बढ़ती जा रही हैं। वे सुलझती नहीं ।
आज विचार और आचार का मेल नहीं हो रहा है। बड़े-बड़े वक्ता उपदेशक, प्रचारक, धर्म दुहाई देने वाले लोगों की कमी नहीं है। भाषा, उपदेश, प्रचार, आन्दोलन उमड़-घुमड़ कर समाज के ऊपर आते है, किन्तु वे उन रीते, सूखे बादलों की तरह समाज की शुष्कता को नहीं मिटा पाते। समाज की क्या वे अपने अन्तर की जलन को ही शाँत नहीं कर पाते। जीवन लक्ष्य की पूर्ति से दूर वे स्वयं ही परेशान देखे जा सकते हैं। उधर अकेले शंकराचार्य, दयानन्द, बुद्ध आदि भी थे जिन्होंने अपने प्रतिकूल युग में भी मानवता को नई राह दी, और आज असंख्यों लोगों के प्रचार, भाषण, उपदेशों के बावजूद भी उनका या समाज का कुछ भी अर्थ नहीं सधता कोई परिणाम पैदा नहीं होता। इसका एक ही कारण है कि हमारे विचारों का आचारों से मेल नहीं। हमारी कथनी और करनी में समन्वय नहीं।
जो विचार जीवन में नहीं उतरता, व्यवहार और क्रिया के क्षेत्र में व्यक्त नहीं होता उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होने का । वह तो केवल बौद्धिक कसरत मात्र है। किसी भी विषय पर खूब बोलने, खूब सुन्दर व्याख्या करने से विद्वत्ता प्रकट हो सकती है, निन्दा प्रशंसा हो सकती है, उपस्थित लोग अपनी वाह-वाह कर सकते हैं किन्तु वह वक्ता के जीवन में नहीं उतरता है, समाज में उससे कोई परिवर्तन नहीं आता। पाकशास्त्र पर खूब विवेचना और व्याख्यान करने से किसी का पेट नहीं भर सकता। बातों की रोटी, बातों की कढ़ी से किसका पेट भरा है? भूखे व्यक्ति के सामने, सुन्दर-सुन्दर मिठाइयों, मधुर पदार्थों का वर्णन करने से क्या उसकी वैसी भी तृप्ति हो सकती है जैसी सूखी रोटियों से होती है? प्यासे आदमी को मान-सरोवर की कथा सुनाने से क्या उसकी प्यास दूर हो सकेगी? आज चटपटे, उत्तेजक विचारों की असंख्यों पत्र पत्रिकायें निकलती हैं, लम्बे चौड़े भाषण सुनने को मिलते हैं, फिर भी कोई लाभ नहीं हो रहा है। यदि इन सब में से दस प्रतिशत भी क्रियात्मक रूप में उतरे तो समाज काफी उन्नत हो जाय। जहाँ व्याख्याता, उपदेशक, लेखक कहते कुछ और करते कुछ हैं, कुत्सित विचार, विकार दुष्प्रवृत्तियों को रख कर दूसरों को उपदेश देते हैं, शराब पीकर लोगों से शराब छोड़ने को कहते हैं, वहाँ कोई सत्परिणाम निकले इसकी बहुत ही कम सम्भावना है। समाज के कल्याण की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, किन्तु अपने जीवन के बारे में कभी कुछ सोचा है हमने ? जिन बातों को भाषण, उपदेश, लेखों में हम व्यक्त करते हैं क्या उन्हें कभी अपने अन्तर में देखा है। क्या उन आदर्शों को हम अपने परिवार, पड़ोस राष्ट्रीय जीवन में व्यवहृत करते हैं? यदि ऐसा होने लग जाय तो हमारे व्यक्ति गत और सामाजिक जीवन में महान् सुधार, व्यापक क्रान्ति सहज ही हो जाय। हमारे जीवन के आदर्श ही बदल जाएं। घर, समाज, पड़ोस, राष्ट्र का जीवन स्वर्गीय बन जाए।
उच्च विचार, अमूल्य साहित्य, तत्व ज्ञान की बातों का मानव जीवन में अपना एक स्थान है। इनसे ही चिन्तन और विचार की धारा को बल मिलता है। बड़े बड़े उपदेश, व्याख्यान, भाषण आदि का समाज पर प्रभाव अवश्य पड़ता है, किन्तु वह क्षणिक होता है। किसी भी भावी क्रान्ति सुधार रचनात्मक कार्यक्रम के लिये प्रारम्भ में विचार ही देने पड़ते हैं। किन्तु सक्रियता और व्यवहार का संस्पर्श पाये बिना उनका स्थायी और मूर्तरूप नहीं देखा जा सकता। प्रचार और विज्ञापन का भी अपना महत्व है किन्तु जब कर्तव्य और प्रयत्नों से दूर रहकर मनुष्य इन्हीं में उलझ जाता है तो वह लक्ष्य से दूर हटकर आत्म प्रवंचना की ओर अग्रसर होता है, पतन के मार्ग पर चलने लगता है।
विचार और क्रिया के समन्वय से ही युग निर्माण के महान कार्यक्रम की पूर्ति सम्भव है। उत्कृष्ट विचारों को जिस दिन हम क्रिया क्षेत्र में उतारने लगेंगे उसी दिन व्यक्ति और समाज का स्वस्थ निर्माण सम्भव होगा।
एक प्रसिद्ध सन्त मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग लोक पहुँचा। वहाँ द्वार पर चित्रगुप्त अपने हिसाब की बहियाँ लेकर बैठे थे। उन्होंने साधु का नाम पता ठिकाना पूछा। इस पर साधु गर्व सहित बोले “क्या आप नहीं जानते कि मैं धरती का प्रसिद्ध अमुक सन्त हूँ।”
“आपने जीवन में क्या किया?” चित्रगुप्त ने पूछा। “मैं जीवन के प्रारम्भिक आधे भाग में तो लोगों से प्रेम करता रहा, मेल जोल बढ़ाता रहा और दुनियादारी के चक्कर में डूबा रहा। जीवन के अन्तिम आधे भाग में मैंने सब कुछ छोड़कर तपस्या की और पुण्य लाभ किया।”
चित्रगुप्त अपनी बही में साधु का ब्यौरा देखने लगे। “अरे, आप पहले क्या देखते हैं मैंने पुण्य तो जीवन के अन्तिम भाग में किये गए हैं आप पहले न देखकर अन्त में देखो” साधु बीच में ही बोल उठे।
चित्रगुप्त ने अपनी बही का प्रारम्भ का भाग छोड़कर अन्तिम भाग देखना शुरू किया लेकिन वहाँ पुण्य के नाम पर कुछ भी नहीं मिला। चित्रगुप्त फिर बही के प्रारम्भ के हिस्से में देखने लगे। और बोले “भाई तुम्हारे पुण्य तो जीवन के प्रारम्भिक भाग में ही हुए हैं। पिछले भाग में तो कुछ भी नहीं है।”
“यह तो उल्टी बात है। प्रारम्भिक जीवन तो मैंने संसार से प्रेम करने में बिताया और अन्तिम जीवन में एकान्त में रहकर परमात्मा का आराधन किया, तपस्या की” सन्त ने कहा। “भाई! धरती पर प्रेम, आत्मीयता, दूसरों के हित में लगे रहना ही पुण्य है, पूजा है और उसी के कारण तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई है, चित्रगुप्त ने समझाते हुए सन्त से कहा ।
बच्चों का सबसे पहला और प्रमुख विद्यालय होता है घर। घर के वातावरण में मिली हुई शिक्षा ही बालक के सम्पूर्ण जीवन में विशेषतया काम आती है। माता बच्चे का पहला आचार्य बताई गई है, फिर दूसरा नम्बर पिता का और इसके उपरान्त शिक्षक, आचार्य, गुरु का स्थान है। मानव जीवन की दो तिहाई शिक्षा माँ बाप की छत्रछाया में घर के वातावरण की उपयुक्तता, श्रेष्ठता पर ही बच्चों के जीवन की उत्कृष्टता निर्भर करती है। और जीवन की उत्कृष्टता शाब्दिक-अक्षरीय ज्ञान पर नहीं वरन् जीवन जीने के अच्छे तरीके पर है।
अच्छा स्वभाव, अच्छी आदतें, सद्गुण, सदाचार ही उत्कृष्ट जीवन के आधार हैं जो पुस्तकों के पृष्ठों से, स्कूल कालेजों बोडिंग हाऊस की दीवारों से नहीं मिलते वरन् घर के वातावरण में ही सीखने को मिलते हैं। इन्हीं गुणों पर जीवन की सरसता, सफलता, विकास निर्भर होता है। जो माँ बाप इस उत्तरदायित्त्व को निभाते हुए घर का उपयुक्त वातावरण बनाते हैं वे अपने बच्चों को ऐसी चारित्रिक सम्पत्ति देकर जाते हैं जो सम्पत्तियों से बड़ी है, जिसके ऊपर सम्पूर्ण जीवन स्थिति निर्भर करती है।
परिस्थितियों का प्रभाव
घर में विपरीत वातावरण होने पर स्कूल कालेजों में चाहे कितनी अच्छी शिक्षा दी जाय वह प्रभावशाली सिद्ध नहीं होती। हालाँकि स्कूल के पाठ्य-क्रम में चरित्र, सदाचार, साधुता, सद्गुणों की बहुत-सी बातें होती हैं, पर वे केवल शाब्दिक और मौखिक ज्ञान का आधार रहती हैं अथवा परीक्षा के प्रश्नपत्रों में लिखने की बातें मात्र होती हैं। विद्यार्थी के जीवन में क्रियात्मक रूप से उनका कोई महत्व नहीं होता। इसका प्रमुख कारण घर के विपरीत वातावरण का होना ही होता है। बच्चों के नैतिक स्तर की जानकारी के लिए एक स्कूल में परीक्षा के उपरान्त बच्चों को ही अपनी कापियाँ जाँचने को कह दिया गया। बाद में जाँच करने पता चला कि बहुत से लड़कों ने अपने गलत सवालों में भी नम्बर दे दिए, कइयों ने फिर से नकल करके सही उत्तर लिख लिए। जिन्होंने अपने लिए अच्छे नम्बर दे दिए उनमें खाते-पीते, धनवान, अच्छे स्तर के कहे जाने वाले घरानों के बच्चे ही अधिक थे। गरीब अथवा साधारण स्थिति के घरों के बच्चे कम थे। ऐसा क्यों? अच्छे धनवान, सम्पत्तिशाली घरानों के बच्चे तो अच्छे होने चाहिएं? किन्तु यह भूल है। ऐसे घरों में प्रायः बड़प्पन, सफेदपोशी, चातुर्य की आड़ में सदाचार, नैतिकता, सद्गुणों पर केवल ऊपरी, मौलिक निष्ठा होती है। बाह्य सफलता प्राप्त करना ही इनका लक्ष्य होता है। उसके समक्ष जरूरत पड़ने पर वे सरलता से जीवन के नैतिक तत्वों का बलिदान कर देते हैं। धन, पद, प्रतिष्ठा, साधन सामग्री आदि जैसे उपलब्ध हो सके वैसा ही वे लोग आचरण करते हैं। इस तरह के अभिभावकों की छत्र छाया में पलने वाले बच्चे भी उनका अनुकरण करके अपनी सफलता के लिए अनैतिक तत्वों का आचरण करने में नहीं झिझकते।
अनुकरण की आदत-
जिन घरों में तनातनी, लड़ाई, झगड़े, कलह अशान्ति रहती है वहाँ बच्चों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता हैं। जो माँ बाप बच्चों के श्रद्धा स्नेह के केन्द्र होते है, उन्हें बच्चे जब परस्पर लड़ते-झगड़ते, तू-तू मैं-मैं करते, एक दूसरे को बुरा कहते देखते हैं तो बच्चों के कोमल हृदय पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। उन बच्चों में माँ-बाप के प्रति तुच्छता, अनादर, संकीर्णता के भाव पैदा हो जाते हैं जो आगे चलकर उनके स्वभाव और व्यक्तित्व के अंग बन जाते हैं। अतः कभी भूल कर भी बच्चों के सामने माता पिता को अपनी तकरार, लड़ाई-झगड़े की बात प्रकट नहीं होने देनी चाहिए। बच्चे सर्वत्र अपने माँ, बाप, भाई, रिश्तेदार, पड़ोसी सभी से प्यार और दुलार पाने की भावना रखते हैं। इसके विपरीत लड़ाई, झगड़े, क्लेश, अशान्ति से बच्चों के कोमल मानस पर आघात पहुँचता है।
अनुचित लाड़ प्यार-
कई माँ बाप अपने बच्चों की गलत आदतें तोड़ फोड़, सामान को बिखेरने, नुकसान करने आदि पर लाड़ प्यार वश कोई ध्यान नहीं देते, वरन् स्वयं उन्हें फिर से जुटा देते है। कोई चीज नष्ट हो जाने पर फिर उसे खरीद कर ला देते हैं। इस अनावश्यक उदारता और स्नेह, ममता का दूषित प्रभाव बच्चों में कई बुराइयां पैदा कर देता है। बच्चे इन गलत आदतों के अभ्यस्त हो जाते हैं, जो जीवन भर उनसे गलतियाँ और असावधानियाँ कराती हैं। सामान देना, अथवा कोई काम खुद कर लेना इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना अपने बच्चों में सजगता, चातुर्य, सदाचार अच्छी आदतें पैदा करना वस्तुतः माँ बाप के लिए यही कसौटी का आधार है। जो चीज बच्चे ने तोड़ी है उसका अभाव कुछ दिन बना रहने देना चाहिए ताकि वह अपनी भूल से उत्पन्न कठिनाई पर विचार कर सके।
बच्चों को किसी बात से रोकने अथवा उन्हें डराने धमकाने या कौतूहल पैदा करने के लिये भूत, चुड़ैल, हौवा आदि का डर दिखाना उनकी क्षमता, साहस, शक्ति , को कुँठित करना है। साथ ही भय की प्रबल भावना पैदा करना है जो जीवन भर उनका साथ नहीं छोड़ती। और यही भय की भावना उन्हें जीवन के किसी भी महत्वपूर्ण काम में हाथ नहीं डालने देती । ऐसे बच्चे बड़े होकर भी छोटे-छोटे बातों से भयभीत हो उठते हैं। इसका कारण बाह्य वातावरण नहीं अपितु बच्चों में घर की पैदा हुई भय की भावना ही होती है। घर में भूत, चुड़ैल आदि के भय की मान्यता रखना, इनमें विश्वास रख कर तरह-तरह के उपचार करना भी बच्चों में तत्सम्बन्धी भय की नींव लगा देता है। घर में किसी भी तरह के भय करा वातावरण होना बुरा है।
व्यक्तित्व की प्रतिच्छाया-
उदारता, प्रेम, आत्मीयता, बन्धुत्व आदि की अनुकूल-प्रतिकूल भावनाओं का अंकुर बच्चों के प्रारम्भिक जीवन में ही लग जाता है। जिन बच्चों को माँ बाप का पर्याप्त प्यार दुलार, मिलता हैं, जिन पर अभिभावकों की छत्रछाया बनी रहती है, जो माँ बाप बच्चों के जीवन में दिलचस्पी प्रकट करते है, उनके बच्चे मानसिक विकास प्राप्त करते हैं। उनका जीवन भी उन्हीं गुणों से ओत-प्रोत हो जाता है जिनमें वे पलते हैं। माता-पिता के व्यवहार आचरण से ही बच्चों का जीवन बनता है। साहस निर्भीकता, आत्म गौरव की भावना बचपन में घर के वातावरण से ही पनपती है।
माँ बापों के व्यसन, आदतों का अनुकरण बच्चे सबसे पहले करते हैं। माँ बाप का सिनेमा देखना, ताश खेलना, बीड़ी, सिगरेट, फैशन, बनाव, शृंगार का अनुकरण कर बच्चे भी वैसा ही करने लगते हैं। इसी तरह जो माँ बाप सदाचारी, संयमी, विचारशील, सद्गुणी होते हैं वैसा ही प्रभाव उनके बच्चों पर पड़ता है।
परिवार के वातावरण में बच्चों के संस्कार, भाव, विचार, आदर्श, गुण, आदतों का निर्माण होता है जो उनके समस्त जीवन को प्रभावित करते हैं। उपदेश, पुस्तकों से जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षा नहीं मिलती, यह तो घरों के वातावरण को स्वर्गीय, सुन्दर, उत्कृष्ट बनाने पर ही निर्भर करती हैं।
भारतमाता पर हुआ चीनी आक्रमण उसके प्रत्येक सपूत के लिए एक चुनौती है। माता को पद-दलित एवं अपमानित होते देख कर भी जिसका खून न खौलता हो, जिसके मन में क्षोभ और प्रतिकार की भावनाएं न उठती हों उसे मनुष्य शरीर में विचरण करने वाला नरपशु ही कहना चाहिए।
अलभ्य अवसर बार-बार नहीं-
कमाने, खाने और उलझनों को सुलझाने में लोग पूरी जिन्दगी ही समाप्त कर देते हैं। ऐसे अवसर किन्हीं विरलों के ही जीवन में आते हैं जिनमें जीवन की सार्थकता का सौभाग्य प्राप्त होता हो। मौत हर किसी की आती है, देर सवेर में सभी को मरना पड़ता है, पर लोक और परलोक को प्रशस्त करने वाली, यश को अमर बनाने वाली, कर्तव्य पालन के आदर्श संसार के सामने उपस्थित करने वाली मौत किसी भाग्यवान को ही मिलती है। जिनके नाम शहीदों की स्वर्णिम पंक्ति यों में इतिहास कारों ने लिखे हैं उन्हें पढ़ते समय हर भावनाशील अन्तःकरण में यह विचार उठते हैं कि काश, हमें भी ऐसा अवसर मिला होता, तो मनुष्य शरीर धारण करना सचमुच ही धन्य हो जाता। आज हमारा सौभाग्य ही है कि चीनी आक्रमण ने भारत के प्रत्येक सपूत के सामने त्याग और बलिदान की पुकार पर अपना शौर्य प्रदर्शित करने का अलभ्य अवसर प्रस्तुत कर दिया है।
अंधकारपूर्ण दुखद स्थिति-
इतिहास पढ़ते समय हम उस अँधेरी स्थिति का भी कहीं-कहीं परिचय पाते हैं जब थोड़े से विदेशियों ने आक्रमण करके हमारे इतने बड़े देश को पददलित किया था। इतना ही नहीं उन्होंने वे बर्बर अत्याचार भी किये थे जिनके सुनने मात्र से रोमाँच खड़े हो जाते हैं। भारत में उस समय भी शक्ति का, शौर्य का, साधनों का अभाव न था। राष्ट्र संगठित और भावनाशील रहा होता और उन नगण्य संख्या में आये हुए आक्रमणकारियों पर एक-एक मुट्ठी धूलि डाल दी जाती तो वे उसी में दब कर मर गये होते। किन्तु अपना दुर्भाग्य ही था कि आन्तरिक दुर्बलताओं में देश ग्रस्त रहा और आक्रमणकारी सैंकड़ों वर्षों तक मनचीती करते रहे। सन् 1857 में आजादी के लिए शस्त्र विद्रोह हुआ पर उसमें भी अपनी आन्तरिक दुर्बलताएं ही बाधक रहीं और वह राज्यक्रान्ति सफल न हो सकी।
इन दुखद पृष्ठों को पढ़ते समय उस समय उत्तरदायी लोगों की अकर्मण्यता पर क्षोभ होता है जो लोग प्रबुद्ध थे वे शिवाजी, राणा प्रताप,बन्दा बैरागी, गुरु गोविंद सिंह आदि की तरह राष्ट्र रक्षा को अपना जीवन लक्ष बनाकर यदि जुट गये होते तो असंख्य जनता उनके पीछे होती और भारत की एकता और वीरता के माथे पर कलंक का टिका न लगता। इन प्रसंगों पर विचार करते समय भावनाशील हृदयों में यह भाव भी उठते हैं कि यदि हम उस समय रहे होते तो कमाने खाने के गोरखधंधे में न लगे रह कर देश धर्म के लिए अपने प्राण देने वालो में-माता को पराधीनता के बन्धन से मुक्त करने में सबसे अग्रणी रहते । इस मार्ग पर चलने में जो भी कष्ट उठाने पड़ते उन्हें सहर्ष उठाते।
अरमान और पश्चाताप
इसी प्रकार जो लड़के अभी किशोरावस्था पार कर रहे हैं और पिछले स्वाधीनता संग्राम में त्याग बलिदान करने वालों की गौरवमयी गाथाएं पढ़ते सुनते हैं तो वे मन मसोस कर रह जाते हैं। ऐसा अवसर हमें अब मिलने वाला नहीं है। यदि स्वाधीनता संग्राम के दिनों में हम भी रहे होते तो किसी त्यागी और बलिदानी के कम जौहर न दिखाते। पिछली शताब्दियों में मातृभूमि में आन−बान–शान की रखवाली के लिए असंख्य देशभक्तों का रक्त बहा है। जिन्हें यह सौभाग्य मिला उनकी आत्मा स्वर्ग में अपनी कर्तव्यपरायणता के लिए गौरवान्वित हो रही होगी। और उन्हीं दिनों जो कमाने खाने और शौक मौज करने की लानत भरी जिन्दगी किसी प्रकार गुजार रहे थे, जो कुछ हो रहा था उसे देखने से आँखें बंद किये हुए थे वे जीते तो रहे होंगे, समय आने पर उन्हें भी आगे पीछे मरना तो पड़ा ही होगा, पर युग की पुकार अनसुनी करने के अपराध में उनका आत्मा धिक्कारते धिक्कारते ही मरा होगा। इतिहास तो उन पर कायरता और हीनता का घृणास्पद लाँछन सदा ही लगाता रहेगा। ऐसे व्यक्ति जहाँ कहीं भी होंगे उस समय की काहिली पर खेद और पश्चाताप की प्रकट कर रहे होंगे। वे सोचते होंगे कि हमने तुच्छ बातों में जिंदगी गुजारते हुए एक अलस्य अवसर हाथ से खो दिया।
चुनौती और कसौटी-
आज समय ने पुनः वही परिस्थितियाँ हमारे समाने पैदा कर दी हैं। वीरता और कायरता की प्रत्यक्ष चुनौती अनायास ही सामने आ खड़ी हुई है और हमें विवश कर दिया है कि किसी एक को चुन लें। चीन ने भारत पर आक्रमण करके उसी मनोवृत्ति को दुहराया है जिससे प्रेरित होकर पिछली शताब्दियों में आक्रमणकारी भारत पर हमले करते रहे हैं। लूट, शोषण और साम्राज्य ही उनका एक मात्र लक्ष्य था। चीन के लिए भारत पर आक्रमण का और कोई कारण न था। लाखों वर्षों से जहाँ कभी मनुष्यों का निवास नहीं रहा, घास पत्ता भी जहाँ नहीं जमता, पानी की ढलान के आधार पर प्रकृति ने जहाँ स्वयं ही सीमा रेखा बना दी है, इतिहास जिसके संबंध में साक्षी है उस भूमि को अपनी बनाने का बहाना करके छिपे हुए चीते की तरह शान्ति से चरती हुई गाय के ऊपर आक्रमण कर बैठने वाली नीति को अपना कर चीन ने जो कुछ किया है उसके पीछे बहाने वाला कारण तो प्रचार मात्र है, उसका वास्तविक उद्देश्य दूसरा ही है। भारत को अस्त−व्यस्त कर देना, उसे पद दलित बनाने की दुरभिसंधि ही इसका वास्तविक उद्देश्य हो सकता है।
हर नागरिक एक सैनिक-
क्या हमारे लिए उचित होगा कि इस आक्रमण को चुपचाप आँखें बन्द करके देखते रहें, और अखबार में खबरें मात्र पढ़ लेने से संतुष्ट हो जायें? अथवा यह सोचें कि लड़ाई का काम फौजी सिपाहियों का है। वे जानें, उनका काम जानें हम क्या कर सकते हैं? हम क्या करें? ऐसा सोचना किसी भी प्रकार उचित न होगा। क्योंकि अब युद्ध केवल सैनिकों से नहीं लड़े जाते। इस जमाने में गोला बारूद से ही विजय प्राप्त नहीं होती। वरन् युद्धरत देशों के हर नागरिक को लड़ाई में अपना योगदान देना होता है। इसी योगदान के ऊपर अन्तिम जीत हार निर्भर रहती है। द्वितीय महायुद्ध में जर्मनी इटली, जापान आदि देश गोला बारूद की दृष्टि से हारे थे पर वहाँ की जनता जागृत होने से उन पराजितों को भी गुलाम न बनाया जा सका। वे देश भी आज स्वाधीनों की ही पंक्ति में खड़े हैं। इसके विपरीत जहाँ की जनता प्रबुद्ध नहीं हुई है वह अफ्रीका महाद्वीप के अधिकाँश भाग पर गोरे उसी प्रकार शासन कर रहे हैं जैसा कि सामंतवादी जमाने में निरीह जनता पर किया जाया करता था।
युद्ध मोर्चे का व्यापक क्षेत्र--
देश भक्ति की भावनाओं से ओत प्रोत नागरिक भी आज के जमाने में युद्ध मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की तरह ही महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं। लड़ाई केवल मोर्चे पर ही नहीं जीती जाती वरन् वास्तविक युद्धस्थल खेतों-खलिहानों, कारखानों और जनता के हौंसले में सन्निहित होता है। आज के जमाने में युद्ध बड़े खर्चीले होते हैं। इसलिए उसका प्रभाव हर नागरिक पर पड़ता है। युद्ध साधनों को जुटाने के लिए हर नागरिक को अपने जरूरी खर्चो को घटा कर रक्षा व्यवस्था की पूर्ति करनी पड़ती है। यदि इसमें ढील रहे तो आर्थिक संतुलन अस्त−व्यस्त हो जाने से युद्ध मोर्चे पर उसका पड़ता है और जीत की संभावना घटती जाती है।
आर्थिक साधनों का युद्ध जीतने पर आज भारी प्रभाव पड़ता है, इसलिए नागरिकों को दान या टैक्स के रूप में उसे जुटाना ही पड़ता है। यह प्रक्रिया भार रूप समझ कर नहीं वरन् देशभक्ति की भावनाओं से ओतप्रोत होकर की जानी चाहिए। प्रसन्नता की बात है कि गरीब और मध्यम श्रेणी के नागरिक इस परीक्षा में अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। विदेशों से युद्ध सामग्री मँगाने के लिए स्वर्ण की आवश्यकता पड़ी है तो भारत की ललनाएं अपनी सजावट शोभा को देश की स्वाधीनता की तुलना में तुच्छ समझ कर प्रसन्नतापूर्वक आभूषणों का दान कर रही हैं। गरीब भी अपने रोटी कपड़े में कमी करके राष्ट्र रक्षा के लिए यथासंभव देने में कुछ कमी नहीं रहने दे रहे है।
धन और जन की माँग-
धन शक्ति के समान ही जन शक्ति की आवश्यकता युद्ध में रहती है। सैनिकों के द्वारा ही तो मोर्चे सँभाले जाते हैं और वे ही तो शत्रु की गोली के आगे सीना तानकर चलते हैं। दुश्मन के जहरीले दाँत तोड़ने का उत्तरदायित्व उन्हीं के भुज दंडों पर निर्भर रहता है। सेना की क्षमता, साहस और युद्ध कौशल द्वारा ही तो आक्रमणकारियों का मुँह मोड़ा जाता है। इस कार्य के लिए नारियाँ अपने सुहाग सर्वस्व पति को भारत माता के लिए अर्पित करती है। माताएँ अपने से अधिक पूज्य भारत माता की लाज बचाने के लिए अपने गोदी के खिलाये बच्चों को मंगल तिलक करके रणस्थल में भेजते हुए गर्व अनुभव करती हैं। जो लड़ाई पर नहीं जा पाते अपने शरीर का एक अंश-रक्त-घायल सैनिकों के शरीर में डालने के लिए देते हैं और मरणासन्नों को पुनः जीवन देकर उन्हें पुनः युद्ध मोर्चे पर जा सकने योग्य बनाते हैं।
व्यामोह में ही न पड़े रहें-
धन जन की, तन मन की सहायताएँ चारों ओर से जुटाये जाने पर राष्ट्र की युद्ध शक्ति सबल होती है और उसी के बल पर विजय की संभावना सुनिश्चित बनती है। आज प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए देशभक्ति की परीक्षा का समय है। ये समय जीवन में कभी-कभी आते हैं। इतिहास की पुनरावृत्ति के क्षण अब पुनः सामने आ पहुँचे हैं। मातृ भूमि की स्वाधीनता और प्रतिष्ठा बचाने के लिए शिवाजी, प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, लक्ष्मी बाई, नाना साहब, आदि बनने के लिए हममें से प्रत्येक को अवसर आज प्राप्त है। जो इस समय में स्वार्थ और व्यामोह में पड़े रहेंगे वे अवसर चूकेंगे और उन्हें पीछे पश्चाताप ही करते रहना पड़ेगा।
योगी अरविन्द की भविष्यवाणी
मदर इण्डिया के 11 नवम्बर 1950 के अंक में श्री अरविन्द ने अपने सम्पादकीय लेख में लिखा था कि चीन के तिब्बत के सम्बन्ध में जो नीति अपनायी है उसका बुनियादी उद्देश्य यह है कि चीन की सीमा को बिल्कुल भारत से मिला दिया जाय और वहाँ समय आने पर उपयुक्त राजनीति अपनाकर भारत पर हमला करने के लिए तैयार रहा जाय। इस स्थिति में तभी कुछ अंतर आयेगा यदि भारत रूसी गुट के साथ शामिल हो जाय। लेकिन माओ या स्तालिन के प्रकोप से बचने के लिए उनके साथ मिल जाना किसी दृष्टि से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। यह तो ऐसी बात होगी जिससे हमारे आदर्शों और महत्वकाँक्षाओं का खात्मा हो जायगा। वास्तव में जो तरीका हमारी रक्षा का हो सकता है वह यह है कि चीन के विरुद्ध कड़ाई का रुख अपनाया जाय, उसके घृणित इरादों की खुले शब्दों में निन्दा की जाय बिना किसी छिपाव दुराव के अमरीका के साथ शामिल हुआ जाय।
मदर इण्डिया के 11 नवम्बर 1950 के अंक में श्री अरविन्द ने अपने सम्पादकीय लेख में लिखा था कि चीन के तिब्बत के सम्बन्ध में जो नीति अपनायी है उसका बुनियादी उद्देश्य यह है कि चीन की सीमा को बिल्कुल भारत से मिला दिया जाय और वहाँ समय आने पर उपयुक्त राजनीति अपनाकर भारत पर हमला करने के लिए तैयार रहा जाय। इस स्थिति में तभी कुछ अंतर आयेगा यदि भारत रूसी गुट के साथ शामिल हो जाय। लेकिन माओ या स्तालिन के प्रकोप से बचने के लिए उनके साथ मिल जाना किसी दृष्टि से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। यह तो ऐसी बात होगी जिससे हमारे आदर्शों और महत्वकाँक्षाओं का खात्मा हो जायगा। वास्तव में जो तरीका हमारी रक्षा का हो सकता है वह यह है कि चीन के विरुद्ध कड़ाई का रुख अपनाया जाय, उसके घृणित इरादों की खुले शब्दों में निन्दा की जाय बिना किसी छिपाव दुराव के अमरीका के साथ शामिल हुआ जाय।
आये दिन लोग हमें पूछते रहते हैं कि चीन के युद्ध का क्या परिणाम होगा और यह कितने दिन चलेगा? प्रश्नकर्ताओं में से अधिकाँश लोग वे होते हैं जो अपने कमाने खाने की सरल व्यवस्था में लड़ाई के कारण विक्षेप उत्पन्न हुआ समझते हैं और उस झंझट को जल्दी ही सुलझा हुआ देखना चाहते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो डरते हैं कि लड़ाई बढ़ी तो हमें धन जन की हानि उठानी पड़ेगी। कुछ को कौतूहल और जिज्ञासा प्रधान होती है। कुछ लोग भविष्यवाणियों की सचाई को परखने के लिए ऐसा पूछते रहते हैं। इन लोगों में धैर्य और साहस उत्पन्न करने वाले उत्तर समय-समय पर हम देते भी रहते हैं। आज इस लेख में इस सम्बन्ध की सार्वजनिक चर्चा करेंगे।
लड़ाई कब तक चलेगी?-
हममें से प्रत्येक को यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि यह लड़ाई अभी 8॥ वर्ष और चलेगी। अज्ञातवास से लौटते ही हमने यह घोषणा की थी कि सूक्ष्मदर्शी तपस्वियों और योगियों के मतानुसार भारत के लिए आगे के दश वर्ष अग्नि परीक्षा के समान महत्वपूर्ण, और प्रसव वेदना के समान कष्टकारक होंगे। सहस्रपुटी मकरध्वज रसायन की तरह उसे अगिन संस्कार सहने और कच्ची धातु से भट्टी में अनेक शोधन संस्कार सहन कर परिपक्व धातु बनने जैसी कष्ट साध्य प्रक्रिया में होकर गुजरना पड़ेगा। अष्टग्रही योग का प्रभाव, या और भी जो चाहे सो इसे कहा जाय पर नियति की एक निश्चित व्यवस्था यह है कि हमें कठिनाइयों के एक बड़े दौर में होकर गुजरना पड़ेगा। उस बात को कहे हमें 1॥ वर्ष बीत गया, अभी 8॥ वर्ष और बाकी हैं। इतनी अवधि तक भारत के प्रत्येक नागरिक को एक शूरवीर सैनिक की तरह ढाल तलवार लेकर नियति का स्वागत करने के लिये तत्पर रहना चाहिए, रहना भी होगा।
गोलाबारी एक साधारण बात-
लड़ाई के मोर्चे पर अभी गोलाबारी बन्द है। यह फिर भड़केगी या नहीं, यदि भड़केगी तो कब मारकाट शुरू होगी? इसका कोई बड़ा महत्व नहीं है। गोलियाँ चलाने या बन्द होने से लड़ाई की स्थिति पर बहुत थोड़ा अन्तर पड़ता है। युद्ध के वास्तविक कारण यदि बने रहें और युद्धरत पक्ष अपने दाव घात के लिये कुछ दिन लड़ाई रोके रहें तो उसे युद्धबन्दी नहीं माना जा सकता। प्राचीन काल में सेनाएँ रात्रि के समय नहीं लड़ा करती थीं क्योंकि उस समय अन्धकार में लड़ना किसी भी पक्ष को सुविधाजनक न था। दिन निकलते ही लड़ाई फिर शुरू हो जाया करती थी। उस समय रात्रि की बन्दी को कोई भी लड़ाई की समाप्ति नहीं मानता था। उसे क्षणिक विराम ही समझा जाता था। आज भी वही स्थिति है। चीन थोड़े दिनों अपनी सुविधा और तैयारी के लिए कुछ समय लड़ाई बन्द रख सकता है। बीच बचाव कराने की कोशिश वाले लोगों को भी कुछ समय और गुजार देने का श्रेय मिल सकता है पर इससे वस्तु स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। लड़ाई की तैयारी फिर भी जारी रहेगी और युद्ध की स्थिति बराबर बनी रहेगी।
आक्रमणकारी के इरादे-
यह भली प्रकार समझ लेने की बात है कि चीन ने निर्जीव अनुपयोगी और उसके लिए सर्वथा अनावश्यक एक छोटे से भूखण्ड के लिए इतनी विपुल तैयारी के साथ युद्ध नहीं छेड़ा है। इतने नगण्य लाभ के लिये इतनी भारी जोखिम उठाने के लिये कोई बुद्धिमान कदापि तैयार न होगा। उसके इरादों में एक अत्यन्त क्रूर दुरभिसंधि छिपी हुई है। वह भारत को अपने साम्राज्य का अंग बनाकर संसार की सर्वोपरि शक्ति बनने के स्वप्न देख रहा है। उसकी यह रावण और भस्मासुर जैसी महत्वाकाँक्षा अब इतनी उग्र हो उठी है कि उसका समाधान तभी संभव है जब उसको मुँह कुचल देने की प्रतिपक्षी शक्ति का सामना करना पड़ेगा। भारत जब तक उतना समर्थ नहीं हो जाय कि सैनिक दृष्टि से उसके दाँत तोड़ सके जब तक चीन केवल अपने हथकण्डे बदलता रहेगा लड़ाई की तैयारी बन्द न करेगा। नेपोलियन और सिकन्दर की तरह आज तो उसे विश्वविजय की धुन है। इस नशे को उतारने की औषधि जब तक मिल न जाय तब तक उसका नशा ऐसा ही चढ़ा रहने वाला है। ऐसी दशा में शान्ति होने की आशा कैसे की जा सकती है?
पड़ौसी पाकिस्तान भी तो अपनी करतूतों से पीछे नहीं हट रहा है। उसे समझाने के लिए भी शक्ति की ही जरूरत पड़ेगी। हमें दुर्बल समझकर दोनों ही अपने-अपने ढंग से लाभ उठाने की सोच रहे हैं। और भी ऐसे अनेकों होंगे या हो सकते हैं जो हमें कमजोर समझने का अनुमान लगाते हों और अपने दाव घात तैयार कर रहे हों। भारत के सिर पर जिस प्रकार की अप्रत्याशित लड़ाई आकर सवार हो गई है, वैसा तभी हुआ करती है जब दूसरे लोग सामने वाले की कमजोरी का अनुमान लगाते हैं और उसे किसी भी बहाने दबाकर अनुचित लाभ उठा लेना सरल समझते हैं।
शक्ति की परीक्षा का प्रयत्न-
सम्भव है हमारे पड़ौसियों ने हमें ऐसा ही समझा हो और उसी की आजमायश के लिये पहली टक्कर इस लड़ाई के रूप में देकर शक्ति परीक्षा का प्रयास किया हो। हो सकता है कि इस प्रथम परीक्षा में आक्रमणकारी को अपना अनुमान गलत साबित होने का अवसर मिले और वह दूसरी टक्कर को अलाभकारी समझ कर पीछे हट जाय। और फिर किसी अन्य अवसर का प्रतीक्षा करे। यह शत्रु का अपना दृष्टिकोण हो सकता है कि वह क्या सोचे और क्या करे इससे अपना कोई वास्ता नहीं। हमें तो अब विवश होकर शक्ति संग्रह में लगना होगा और अपने को इतना मजबूत बनाना होगा कि दुर्बलता से अनुचित लाभ उठाने का लालच किसी पड़ौसी को न आवे। अपनी शक्ति और सुरक्षा के लिये हमें युद्ध स्तर पर ही तैयारी करते रहनी पड़ेगी और चाहे गोली चले या न चले हमें उसी तैयारी में प्रवृत्त रहना होगा जैसी कि युद्धकाल में होती है। हमारे लिये आठ वर्ष छह मास तक युद्ध की ही स्थिति बनी रहनी है। तीसरे महायुद्ध का-अणु शक्ति से मानव सभ्यता के विनाश का समीप आता खतरा भी अब जा रहा है। उस समय के लिये भी हमें शक्ति चाहिये। इस संग्रह का कार्यक्रम युद्ध स्तर की तैयारी से किसी भी प्रकार कम नहीं हो सकता।
यह भी हो सकता है-
इन बातों का ध्यान रखते हुए अब गोली चलने या या चलने का विचार छोड़कर भारत की आत्मरक्षा के लिये अपने को सैनिक और नागरिक दृष्टि से सबल बनाने के लिए युद्ध स्तर पर ही तैयारी जारी करनी होगी। और जन साधारण को उसी तप, त्याग की वृत्ति का परिचय देते रहना होगा जैसा कि युद्ध के समय में दिया जाता है। शीत ऋतु की प्रतिकूलता कम होते ही सम्भव है चीन फिर आक्रमण करे। ऐसी दशा में हममें से प्रत्येक को घरेलू काम काजों की दूसरी व्यवस्था बनाकर सैनिक मोर्चे पर जाने के लिये और बड़ी से बड़ी कुर्बानी करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमने स्वयं भारत सरकार के रक्षा मन्त्री को लिखा है कि “आवश्यकता के समय कभी भी किसी भी काम के लिए, कहीं भी जाने के लिये हमें बुलाया जा सकता है। राष्ट्र रक्षा के लिये हर क्षण हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी के लिए तैयार हैं।’ हमें भरोसा है कि इस प्रकार प्राण दान करने वालों में हम अकेले ही नहीं, हमारे साथ और भी बहुत से होंगे। पिछले चालीस वर्षा में स्वाधीनता संग्राम की प्रत्येक प्रवृत्ति में हमने जी खोलकर भाग लिया है। सालों जेल खाने की यंत्रणाएं सही हैं और त्याग बलिदान के भयंकर से भयंकर अवसरों का हँसते हुए स्वागत किया है । यदि पुनः मातृ-भूमि की रक्षा के लिए प्राणदान का अवसर आता है तो उसे हम सौभाग्य के अतिरिक्त और क्या समझ सकते है? मृत्यु का सब से श्रेष्ठ स्वरूप यही है कि वह उच्च आदर्श की रक्षा करते हुए, कर्तव्य पालन की वेदी पर किसी मनुष्य को प्राप्त हो। ऐसी मृत्यु हमारे लिये सबसे अधिक आनन्द और प्रसन्नता का वरदान बनेगी।
दूसरा महत्वपूर्ण युद्ध-मोर्चा -
किन्तु यदि ऐसा अवसर न भी आये तो भी हमें आगामी 8॥ वर्षों तक अग्नि परीक्षा में हर घड़ी तपते रहने के लिए प्रस्तुत ही रहना चाहिए। किसी भी समाज या राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी उसके नागरिकों की आत्मिक दुर्बलता हुआ करती है। यह दुर्बलता जहाँ होगी वहाँ सारे साधन होते हुए भी शोक, सन्ताप, क्लेश, कलह, अभाव, दारिद्र का ही वातावरण बना रहेगा। धन और शस्त्रों की समुचित व्यवस्था होते हुए भी यदि आत्मबल का अभाव रहे तो यह सारे साधन व्यर्थ ही सिद्ध होंगे। कायर सैनिक घबराहट, और बुज़दिली के कारण जीती बाजी को हार में बदल सकते हैं। शत्रु के सहायक बन सकते हैं और अपने हथियारों का लाभ शत्रु को दे सकते हैं। इसके विपरीत यदि सैनिकों की नस-नस में उच्च आदर्श भरा हो तो वे स्वल्प साधनों से भी मरते दम तक शत्रु से लोहा लेते रह सकते हैं। यही बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है। बेईमान स्वार्थी, कायर और दुर्बुद्धि मनुष्य अपने लिये ही नहीं और सब के लिये भी विपत्ति का कारण बनता है। ऐसे लोगों की संख्या जहाँ अधिक होगी वहाँ चारों ओर कमजोरी और अशान्ति ही छाई रहेगी। इस स्थिति को सुधारना और सँभालना भी रक्षा कार्यों का एक महत्वपूर्ण अंग होता है।
यह सरकार करे और यह हम करें-
कारखाने लगाकर अस्त्र-शस्त्र बनाये जा सकते हैं। ऊँचे वेतन देकर सैनिक भर्ती किये जा सकते हैं। टैक्स लगाकर धन प्राप्त किया जा सकता है। यह कार्य सरकार के लिये बहुत कठिन नहीं है। चतुर युद्ध विद्या विशारद मोर्चे पर ठीक रणनीति के द्वारा दुश्मन के दाँत खट्टे कर सकते हैं। पर जन-मानस में प्रविष्ट हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटा सकना सरकार के बस बूते की बात नहीं है। यह कार्य धर्म, नीति और सदाचार की प्रेरणा दे सकने वाले व्यक्ति ही कर सकते हैं। हम लोग अब आगामी 8॥ वर्ष तक इस मोर्चे को सँभाले रहेंगे और राष्ट्र को सच्चे अर्थों में मजबूत बनाने के लिए- जन-मानस में कर्तव्यनिष्ठा, सदाचार, पराक्रम एवं आदर्शवाद को गहराई तक
न स्फूर्जति न च गर्जति न च करकाः किरति सृजति न च तडितः। न च विनि मुञ्चति वात्याँ, वर्षति निभृतं महामेघः
महामेघ (झर बादल, न भड़कते हैं, न गरजते हैं, और ओले फेंकते हैं, न बिजली कौंधाते हैं, न तूफान घहराते हैं, वे चुप चाप बरसते रहते हैं।
प्रविष्ट कराने के लिए कार्य करेंगे। भौतिक और आत्मिक दोनों ही दृष्टियों से सबल बना हुआ राष्ट्र सच्चे अर्थों में बलवान कहा जा सकता है और वही इस योग्य बन सकता है कि किसी भी दुर्दान्त दुष्ट के आक्रमणकारी इरादों को धूलि में मिला सके।
व्यक्ति निर्माण का, चरित्र निर्माण का, समाज निर्माण का, युग निर्माण का कार्यक्रम युद्ध मोर्चे की सफलता के लिए ही है। उसे रक्षा प्रयत्न का ही एक अंग मानकर चला जायगा। अज्ञातवास से लौटने के बाद 10 वर्ष का हमारा कार्यक्रम इसी दृष्टि से बना है। शेष 8॥ वर्ष इसी मोर्चे पर लड़ना है। परिवार के प्रत्येक स्वजन को इस मोर्चे पर हमारे साथ रहना चाहिये।
जब किसी मनुष्य का शरीर कमजोर हो जाता है तो उस पर नाना प्रकार की बीमारियाँ आक्रमण करने लगती हैं। मन कमजोर हो जाय तो चिन्ता, भय, शोक, घबराहट, वासना आदि का प्रकोप होने लगता है। आर्थिक कमजोरी में अभाव अपमान और अव्यवस्था का सामना करना होता है। इस संसार में कमजोरी सबसे बड़ा अपराध है। कमजोरी को मिटा डालने के लिए प्रकृति के विविध विधि कुचक्र चलते रहते हैं। यहाँ देर तक वे ही ठहर पाते हैं जो अपने को सुदृढ़, सफल एवं समर्थ सिद्ध कर सकते हैं। कमजोरी का पता चलने पर उसका शोषण करने के लिए आस-पास के दुष्ट दुरात्माओं के मन में अनायास ही लालच पैदा होता है, दुर्बल को हड़प जाने के लिए दुरभिसंधियाँ बनने लगती हैं।
आन्तरिक दुर्बलता की भयंकरता-
पिछली शताब्दियों में भारत को अपनी आन्तरिक कमजोरियों का भारी दंड भुगतान पड़ा है। आंतरिक फूट और पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष का पता जब पड़ोसियों को लगा तो डाकुओं के छोटे-छोटे गिरोह हमलावर हो गये और उन्होंने बात की बात में देखते-देखते इतने बड़े देश को लूटने और पैरों तले दबाने में सफलता प्राप्त कर ली। यदि आन्तरिक फूट न होती, एकता, देशभक्ति और संगठन की शक्तियाँ जागृत रही होतीं तो इतने वर्षों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहने की अनहोनी बात हो सकने का कोई कारण न था।
इतनी बड़ी संख्या में जो मुसलमान आज दिखाई पड़ते हैं उनके पूर्वजों ने जान बूझ कर धर्म त्याग नहीं किया था। उनमें से किसी को झूठा पानी पिला दिया, छुआ खिला दिया तो उसका धर्म भ्रष्ट मान लिया गया, तो उसे जाति बहिष्कृत करके विधर्मी बने रहने को विवश किया गया। स्त्रियों से कोई चूक हो गई तो उन्हें विधर्मियों की ही शरण में स्थल मिल सका। जहाँ संसार में सब धर्म, दूसरे धर्म वालों को अपने में मिलाने का सहर्ष स्वागत करते हैं वहाँ हमने इसके लिए द्वार बन्द रखे, इतना ही नहीं अपनों को भी धकेल-धकेल कर विधर्मियों की गोद में पटकते रहे। उनकी संख्या बढ़ते-बढ़ते इतनी पहुँच गई कि देश का दिया गुल हो गया। छोटी सी संकीर्णता का कितना बड़ा दंड हमें भुगतना पड़ रहा है।
आक्रमण का प्रलोभन-
चीन का आक्रमण उसकी इसी कल्पना पर आधारित था कि भारत आज भी आन्तरिक दृष्टि से अत्यन्त दुर्बल देश है। इसे छोटे से आक्रमण में ही झकझोरा, परास्त किया और अपने पैरों तल रौंदा जा सकता है। सौभाग्य से उसका मनचीता नहीं हो पाया। सामरिक संतुलन की दृष्टि से जो कमी थी वह मित्र राष्ट्रों की उदार सहायता से पूरी हो गई और देश में भी अनेकों कारखाने आधुनिक अस्त्र शस्त्रों का निर्माण करने में लगे हुए हैं। इस प्रकार शस्त्र बल की कमी जल्दी ही पूरी हो जायगी। पर इतने से ही काम चलने वाला नहीं है। हमें अपनी दुर्बलताओं पर भी ध्यान देना होगा जिनके कारण भीतर ही भीतर हम खोखले होते चले जा रहे हैं। यदि ये कमियाँ पूरी न की गईं तो स्थायी रूप से आजादी कायम रखना और समय की प्रतिस्पर्धा में खड़े रह सकना अन्ततः दुर्लभ ही हो जायगा।
सामाजिक कुरीतियाँ
सामाजिक कुरीतियाँ को ही लीजिए- जाति पाँति के नाम पर हम कितने अधिक खंडों में, उपराष्ट्रों में बंटे हुए हैं? अलगाव की यह मान्यतायें कभी एक जाति एक समाज के रूप में हमें सोचने नहीं देतीं। चुनावों में, नौकरियों में, संस्थाओं में भीतर ही भीतर जातीय पक्षपात काम करता रहता है। जातियों के बीच परस्पर घृणा और फूट के बीज पनपते रहते हैं। प्रान्तीयता, भाषावाद, सम्प्रदायवाद अनेक निमित्तों को लेकर फूट के बीज हमारे मनों में घुसे बैठे रहते हैं और वे कोई न कोई ऐसे अवसर उत्पन्न करते रहते हैं जिनसे परस्पर लड़ाई झगड़ों में, ईर्ष्या द्वेष में शक्ति का एक बड़ा भाग बर्बाद होता रहे। एक उदीयमान राष्ट्र के नागरिकों में जो परस्पर प्रेम, एकता, सौजन्य, सहयोग और मिलजुल कर आगे बढ़ने का उत्साह होना चाहिए, उसे पूर्ण रूप से जागृत करना आवश्यक है। इसके बिना हम सच्चे अर्थों में एक राष्ट्र न बन सकेंगे।
महिलाओं को पर्दे में रखने की, शिक्षा और स्वावलम्बन की दृष्टि से उन्हें पिछड़ा रखने की कुरीति हमारे आधे राष्ट्र को पक्षाघात की बीमारी होने के समान है। आधी जनसंख्या कैदी की तरह पराधीन, परमुखापेक्षी, परावलम्बी, अशिक्षित और अविकसित स्थिति में पड़ी रहे तो राष्ट्र के लिए वे भारभूत ही रहेंगी। ये न तो अच्छा पारिवारिक जीवन निर्माण कर सकेंगी और न संस्कारवान नई पीढ़ी पैदा कर सकने की क्षमता उनमें होगी। यह बुराई राष्ट्र को दुर्बल बनाने वाली एक प्रमुख कमजोरी है।
अपव्यय की विभीषिका -
विवाह शादियों में अन्धाधुन्ध अपव्यय दहेज प्रथा, जेवर , चढ़ाव आदि की कुरीतियों में हिन्दू गृहस्थ की प्रायः आधी कमाई खर्च हो जाती है। इससे जीवन विकास का आवश्यक क्रम टूटता है। कर्जदारी बढ़ती है और चोरी बेईमानी करने के लिए लोगों को विवश होना पड़ता है। झूठी शेखी-खोरी की लत पड़ती है। अपव्यय से अनुपयोगी कार्यों को प्रोत्साहन मिलता है। विवाह शादी आज हमारे लिए आर्थिक स्थिति को अस्त−व्यस्त करने वाली कुरीतियों के केन्द्र बने हुए हैं। आर्थिक उन्नति के छोटे मोटे प्रयत्नों से देश की स्थिति जितनी सुधरने की आशा की जाती है उससे कई गुनी तो इन कुरीतियों में ही नष्ट हो जाती है। यदि समाज सुधारकों के प्रयत्न से अथवा कानूनी प्रतिबंध से विवाह एक हल्की सी महत्वहीन बात मान ली जाय तो देश की आर्थिक स्थिति उससे अधिक सुधर सकती है जितनी पंचवर्षीय योजनाओं से भी नहीं बढ़ सकती। अपव्यय होने वाला यह धन यदि उत्पादन कार्यों में लगे तो बिना विदेशी मुद्रा के हम आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध और सम्पन्न हो सकते हैं।
नशेबाजी में बेहिसाब धन बर्बाद होता है। प्रायः कई लाख रुपया प्रतिदिन का हम तमाखू पीते हैं। अन्य नशे इतनी ही कीमत के माने जायें तो दस पाँच लाख प्रतिदिन की बचत, वर्ष में 10-15 करोड़ रुपया वार्षिक की बचत और स्वास्थ्य की बर्बादी की रक्षा दोनों मिला कर इतनी बड़ी बचत बन सकती है जिसका उपयोग यदि कृषि और उद्योग धन्धों के बढ़ाने में किया जाय तो धन समृद्धि की कोई कमी देश में न रहे।
यह भी उपेक्षणीय नहीं-
अशिक्षा का प्रश्न बहुत बड़ा मालूम पड़ता है। पर यदि प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति देशभक्ति की दृष्टि से एक वर्ष में पाँच प्रौढ़ों को शिक्षित बनाने का उत्तर दायित्व अपने कंधे पर ले ले तो दो वर्ष में एक भी भारतीय नागरिक अशिक्षित न रहे और इसके लिए सरकार पर किसी प्रकार का आर्थिक बोझ भी न पड़े।
धार्मिक क्षेत्र में एक निठल्ली पलटन मुफ्त का माल चरती है। यह देश की आर्थिक कमर तोड़े डालती है। 56 लाख भिक्षुकों का पालन पोषण इस गरीब देश को करना पड़ता है। फिर वे मुफ्त का माल खाने वाले लोग अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के लिए नाना प्रकार के प्रपंच रचते और बुद्धि-भ्रम फैलाते है जिसके कारण जनता की अपार हानि होती है। 56 लाख सेना तो भारत और चीन दोनों की मिल कर भी नहीं हैं। फिर इतनी बड़ी निठल्लों की सेना पर होने वाला खर्च और उनके काम की क्षति देश की भारी बर्बादी का कारण बनी हुई है। इन लोगों को कुछ उपयोगी काम करने में लगाया जा सके और धर्म के लिए व्यय होने वाले धन को लोक हित के कार्यों में लगाया जा सके तो यह आन्तरिक दुर्बलता दूर करने वाली एक बहुत बड़ी बात हो सकती है।
स्वार्थपरता और दुष्प्रवृत्तियाँ-
सामूहिक हित की परवा न करके व्यक्ति गत स्वार्थ के लिए उत्सुक रहना यह हमारी एक आम प्रवृत्ति बनी हुई है। सभी वर्गों के लोग यह सोचते हैं कि मेरा व्यक्ति गत स्वार्थ किसी भी प्रकार पूरा हो भले ही उससे दूसरों को या सारे समाज को कितनी ही बड़ी क्षति पहुँचे। खाद्य पदार्थों में मिलावट, नकली औषधियाँ, रिश्वतखोरी, धोखेबाजी, हराम खोरी आदि बेईमानी आदतें हर क्षेत्र में पनपती दिखाई पड़ी हैं। उससे परस्पर अविश्वास और विक्षोभ बढ़ता है। सामूहिक उन्नति में भारी बाधा पड़ती है और इन दुष्प्रवृत्तियों में लगे हुए लोगों का आत्म बल दिन-दिन क्षीण होते चले जाने से वे अपराधी और कायर मनोवृत्ति के बन जाते हैं। ऐसे लोगों की बुरी आदतें अन्य अनेकों प्रकार के अनैतिक कार्यों को जन्म देती हैं। बुरे रास्ते से कमाया हुआ पैसा सदा ही कोई न कोई कुकर्म करने की प्रेरणा करता है। जुआ, सट्टा, लाटरी आदि के द्वारा या चोरी, बेईमानी, छल, शोषण आदि के आधार पर इकट्ठा हुआ बिना मेहनत का धन जहाँ कहीं भी रहेगा वहाँ दुष्टता ही पनपेगी। इसलिए श्रमपूर्वक, ईमानदारी के साथ, उचित आवश्यकताओं की पूर्ति भर के लिए, सीमित मात्रा में धन कमाने की आदत यदि लोगों को पड़ेगी तो ही राष्ट्रीय चरित्र का विकास होगा। समाज को हानि पहुँचा कर व्यक्ति गत स्वार्थ के लिए किये जाने वाले कार्यों से जब लोग हृदय से घृणा करना सीखेंगे तो ही हम स्वस्थ विकास के द्वारा होने वाले लाभों से लाभान्वित हो सकेंगे।
उच्च चरित्र की महान शक्ति-
आदर्शवादी विचार धाराओं का अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित होना मनुष्य का सबसे बड़ा बल है। सत्य, धर्म, आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता की भावनाओं से ओतप्रोत दया, मैत्री, उदारता प्रेम परोपकार और संयम पर आस्था रखने वाला व्यक्ति हजार हाथियों से अधिक बलवान होता है। इसके विपरीत स्वार्थी, कायर, लोभी और दुर्गुणी व्यक्ति चाहे कितना ही धनी, बली या साधन सम्पन्न क्यों न हो वस्तुतः अत्यन्त दुर्बल रहेगा। अवसर आने पर उसकी स्थिति तिनके के समान तुच्छ सिद्ध होगी। चरित्रवान नागरिकों के निर्माण का प्रयत्न बारूद और हथियारों के कारखाने बनाने समान ही युद्ध विजय की दृष्टि से आवश्यक है।
चीन के बर्बर आक्रमण ने हमारा ध्यान उन आन्तरिक दुर्बलताओं की ओर आकृष्ट किया है जिनके कारण हमें पिछली शताब्दियों में यंत्रणाओं और लाँछनाओं का शिकार होना पड़ा। इनसे छुटकारा पाने के लिए भी हमें शत्रु से लड़ने के समान ही संघर्ष करना होगा। यह भीतरी चाओ माओ और भी अधिक घृणित हैं क्योंकि बाहरी शत्रु तो अवसर पर ही आक्रमण करते हैं यह भीतरी शत्रु तो चौबीसों घंटे अपनी जड़ खोखली करते रहते हैं।
उपरोक्त पंक्तियों में कुछ थोड़े से आन्तरिक शत्रुओं की चर्चा की गई है। ऐसों अनेकों दुर्बलताएँ हमारे वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में घुसी हुई हैं। इन्हें बारीकी से देखना और समझना होगा और उनके उन्मूलन का भी युद्ध स्तर पर ही प्रयत्न करना होगा। अखंड ज्योति की युग निर्माण योजना इसी आधार पर अग्रसर होने जा रही है।
राष्ट्र को सबल, सक्षम, एवं समृद्ध, प्रबुद्ध बनाने के जिए जो कार्य किये जाए वे चीनी आक्रमण को समाप्त करने की दृष्टिं से ही नहीं, सदा के लिए सुरक्षा की निश्चिन्तता होने की दृष्टि से आवश्यक हैं। इन कार्यों की ओर हमें अपने व्यक्ति गत कमाने खाने के कामों की तरह ही ध्यान देना चाहिये। निजी कामों में ही सारा समय, शक्ति और मनोयोग लगता रहे तो यह मानव जीवन के उच्च सिद्धान्तों के प्रतिकूल बात ही होगी। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह समाज का ही एक अंग है। सुख सुविधाओं के सभी साधन उसे समाज से मिलते हैं। इन सब बातों का विस्मरण करके यदि हम निजी कामों में ही निरन्तर संलग्न रहते हैं निजी बातें ही सोचते हैं और समाज, राष्ट्र के हित की समस्याओं को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं तो यह एक निकृष्ट जीवन का घृणित उदाहरण ही होगा।
स्वार्थ ही नहीं परमार्थ भी-
हमारे समय, साधन और मनोयोग का एक महत्वपूर्ण अंश लोकहित के कार्यों में लगे तो ही जीवन को आदर्श, कर्तव्यपरायण एवं आध्यात्मिक माना जा सकता है। सब लोग सेना में भर्ती नहीं हो सकते हैं, सब के पास सोना और विपुल मात्रा में धन भी नहीं है, पर समय, श्रम और मनोयोग सबके पास समान रूप से मौजूद है, इसे प्रचुर मात्रा में अमीर गरीब सभी दे सकते हैं। युद्ध का दूसरा मोर्चा-आन्तरिक सामर्थ्य को जागृत करने का है। इसी का नामकरण हम लोगों ने सुविधा की दृष्टि से युग-निर्माण योजना रख लिया है। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपना समय इस कार्य के लिए भी उसी तरह निकालना चाहिये जैसी अपने निजी जरूरी कामों के लिए निकालते हैं।
राष्ट्र रक्षा का उत्तरदायित्व-
पिछले अंक में पृष्ठ 50 पर छपे “अग्नि परीक्षा के घड़ी में हमारा कर्तव्य” शीर्षक लेख में स्वजनों से राष्ट्र रक्षा के लिये शक्ति भर प्रयत्न करने की अपील की गई है। रक्षा कोष में धन, स्वर्ण, रक्त और सैनिक देने के लिये जो कुछ प्रयत्न सम्भव हो सो हम सबको करना चाहिए। उत्पादन बढ़ाने में कोई कमी न रहने देनी चाहिए। असामाजिक राष्ट्र विरोधी तत्वों की दाल न गलने पावे इसके लिये पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए। फिजूलखर्ची एकदम बन्द करके बचत का एक-एक पैसा राष्ट्रहित में लगे ऐसी चेष्टा रहनी चाहिए। जनता का उत्साह और मनोबल गिरने न दिया जाय। यह भावना जन मानस में मजबूती से भर देनी चाहिए कि सत्य भारत के साथ है इसलिए अंततः विजय उसी की होगी। लम्बी लड़ाई के लिए तैयारी की जानी चाहिए। तात्कालिक गोलीबन्दी तैयारी की एक चाल मात्र है।
शत्रु का दाव बदला है मन नहीं। भारत की सीमा में युद्ध उस दिन समाप्त होगा जिस दिन वह भीतरी और बाहरी दृष्टि से पूर्ण सबल हो जायगा और इस कार्य में अभी 8॥ वर्ष तो लगने ही हैं। इसलिए इस अवधि में प्रत्येक देशभक्त प्रबुद्ध आत्मा को एक संकटकालीन स्थिति बनी रहने की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत योजनाओं और महत्वाकाँक्षाओं को उठाकर ताक में रख देना चाहिए। गुजारे की सामान्य व्यवस्था चलाते हुए अधिकाधिक समय देश को बलवान बनाने में लगा देना चाहिए। आज समय, युग और कर्तव्य की यही पुकार है उसे अनसुना न किया जाना चाहिए।
आध्यात्मिक प्रयत्न भी-
गत अंक में राष्ट्र रक्षा के लिए एक आध्यात्मिक प्रयोग की भी अपील की गई है। प्रतिदिन गायत्री महामन्त्र की एक माला इस धर्म युद्ध की सफलता के लिए नियत साधना से अतिरिक्त जपते रहना चाहिए। सामूहिक आयोजनों एवं सत्संगों में पाँच मिनट मौन रहकर राष्ट्र रक्षा के लिए ईश्वर प्रार्थना की जाया करे। सामूहिक यज्ञ अनुष्ठान भी हों पर उनमें मितव्ययिता का पूरा ध्यान रखा जाय। हर महीने को 20 तारीख को रक्षा दिवस मनाया जाया करे। उस दिन सामूहिक आयोजनों के द्वारा जनता की कर्तव्य भावनाएं जागृत की जाया करें और सामूहिक प्रार्थना का भी कार्यक्रम रहा करे। इस प्रक्रिया का जहाँ आरम्भ अभी न हो पाया हो वहाँ अब तुरन्त ही आरम्भ हो जाना चाहिए।
युग निर्माण योजना के अंतर्गत आत्म-निर्माण के लिए व्यक्ति गत प्रयत्नों की दृष्टि से 10 सूत्री कार्यक्रम सितम्बर अंक में पृष्ठ 46 पर छपा है। जब कभी बड़ी संख्या में परिजन संगठित हो जायें तो वहाँ सामूहिक योजनाएँ भी चल पड़नी चाहिएं। इसके लिए दिसम्बर अंक में पृष्ठ 47 पर बीस सूत्री कार्य-क्रम छपा है। यही सभी बातें ध्यान रखने योग्य हैं। इस विचारधारा का व्यापक विस्तार होना सबसे पहला कार्य है। क्योंकि अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य तो मुट्ठीभर हैं, कुछ हजार लोग इतने बड़े देश को, इतने बड़े संसार को नहीं बदल सकते। इसके लिए अधिक व्यापक जनजागृति एवं प्रयत्नशीलता की आवश्यकता है। इसलिए अपनी विचारधारा से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराना युग निर्माण योजना की सफलता के लिए सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कार्य-क्रम माना जा सकता है।
उपयुक्त भावनाओं का जागरण-
अखण्ड ज्योति जिस विचारधारा और प्रेरणा का सृजन कर रही है, वह राष्ट्र निर्माण की, युग निर्माण की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। इससे विशाल जन समूह को परिचित कराया जाना चाहिये। आगे चलकर इस पसार-कार्य के लिए दूसरे उपाय भी काम में लाए जावेंगे पर अभी तो फिलहाल एक ही उपाय हाथ में है और वह यह है कि अखण्ड ज्योति को अधिकाधिक लोग पढ़े। जिनके पास पत्रिका पहुँचती है उन्हें यह निश्चय कर लेना चाहिए कि अपने घर के पढ़े लिखे सदस्यों को उसे पढ़ने के लिए विवश करेंगे, और जो पढ़े नहीं हैं उन्हें पढ़कर सुनाया करेंगे। आजकल हम अपनी अन्तरात्मा की सारी भावनाएं समेटकर अखण्ड ज्योति के पृष्ठ लिखते हैं। यदि हममें कोई कसक और सचाई होगी तो उसका प्रभाव पढ़ने या सुनने वाले पर अवश्य पड़ेगा।
युग निर्माण कार्य पहले अपने से ही आरम्भ हो, फिर उसका विस्तार घर, परिवार में, फिर समाज में किया जाय। अपना कुछ समय आत्म-सुधार और लोक सेवा के लिए लगाने का निश्चय कर लेना व्यक्तिगत कार्य-क्रम की दृष्टि से आवश्यक है। परिवार निर्माण के लिए घर का हर सदस्य हर महीने अखण्ड ज्योति की विचार धारा को पढ़ या सुन लिया करे, इतना आरम्भ तो हो ही जाना चाहिए।
उदेति सविता रक्तो रक्त एवस्त मेति च सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेक रुपता।
सूर्य उदय होते हुए भी लाल रहता है और अस्त होते हुए भी। महान पुरुष सम्पत्ति और विपत्ति में एक से रहते हैं।
समय दान में कंजूसी न करें-
हम जो समय युग निर्माण योजना में सहयोग देने के लिए दें उसमें से आधा तो अपने घर के लोगों को अखण्ड ज्योति की प्रेरणाओं को समझाने के लिए लगाया जाय और आधा अपने मित्र, पड़ोसी, स्वजन सम्बन्धी, परिचित, अपरिचित, धर्मप्रेमी लोगों से मिलने जुलने के लिए-धर्म फेरी के लिए-सुरक्षित रखा जाय। इसका आरम्भ भी अखण्ड ज्योति पढ़ने की प्रक्रिया के साथ हो सकता है। जिनके पास धर्म प्रेरणा देने के लिए जाया जाय उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति पढ़ने देने और फिर एक दो दिन बाद वापिस लेने जाने के निमित्त को लेकर महीने में दो बार मिलने जाया जा सकता है और योजना में सन्निहित विषयों पर चर्चा की जा सकती है। उस प्रकार अपना समयदान, परिवार का शिक्षण और सत्प्रवृत्तियों को व्यापक बनाने की प्रक्रिया में इस छोटे-से अत्यन्त सरल कार्यक्रम के अनुसार लग सकता है।
अगले वर्ष इतना तो करें ही?-
एक वर्ष हम इस कार्यक्रम को चलावें। सन् 63 अत्यन्त जागरुकता का, त्याग और बलिदान की तैयारी का वर्ष है। संकटकालीन स्थिति आ जाने पर हममें से प्रत्येक को अपने प्राणों की आहुति देने के लिए भी तैयार होना चाहिए। हमने स्वयं इसकी तैयारी पूरी कर ली है। पर यदि वैसा नहीं होता है, जैसा कि अप पक्ष में दैवी शक्तियों का समर्थन होने से सम्भावना कम ही है, तो भी अग्नि परीक्षा में होकर हमें विशेष रूप से अगले वर्ष और साधारणतया 8॥ वर्ष तक गुजरते रहना पड़ेगा। इसलिए अगले वर्ष युग निर्माण योजना के सक्रिय कार्यक्रम तो शायद ही कार्यान्वित हो सकें पर इस विचारधारा को अधिकाधिक व्यापक बनाने की प्रक्रिया आसानी से चलती रह सकती है। अखण्ड-ज्योति को पढ़ाने सुनाने की प्रक्रिया द्वारा हमारा कार्यक्षेत्र सहज ही अत्यन्त व्यापक बनाया जा सकता है।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सन् 62 के सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर के अंक बहुत ही आवश्यक पाठ्य-सामग्री से परिपूर्ण हैं। इन चारों अंकों का सैट एक रुपया मूल्य का है। प्रत्येक पाठक को इनके कुछ सैट मँगाकर अपने पास रख लेने चाहिएं और उन्हें अपने सभी परिचितों को एक वर्ष में पढ़ा देना चाहिए। इस वर्ष जो नये ग्राहक अखण्ड ज्योति के बन रहे हों उन्हें भी उपरोक्त चार अंक प्राप्त कर लेने चाहिएं। ताकि युग निर्माण योजना की आवश्यक जानकारी से वे वंचित न रहें। स्वजन संबंधियों को प्रेमोपहार में यह चार अंक भिजवाने की प्रक्रिया इस वर्ष भी जारी रहनी चाहिए। ज्ञान दान का यह एक बहुत ही आदर्श एवं उत्कृष्ट तरीका है।
लक्ष की ओर अग्रसर ही रहें
एक से दस के क्रम के साथ बढ़ने की प्रक्रिया एक आदर्श परिपाटी है। हममें से हर एक अपने समान ही दस प्रबुद्ध लोकसेवी बनाने का लक्ष्य सामने रखे तो निश्चय ही बहुत काम हो सकता है। दस व्यक्ति यों को प्रेरणा देते रहने की जिम्मेदारी उठाना हममें से किसी के लिए भी भार रूप नहीं हो सकता। न वह कठिन है न असुविधापूर्ण । न उसके लिए फुरसत चाहिए न कुछ खर्च ही करना पड़ता है। हममें से हर एक का दूसरों के साथ मिलना जुलना किसी न किसी प्रयोजन को लेकर बना ही रहता है। उसी समय उनसे युग निर्माण विचारधारा के संबंध में भी थोड़ी चर्चा कर दी जाया करे तो इतने मात्र से एक ठोस कार्य होता रह सकता है और अन्त में बूँद-बूँद से घट भरने की उक्ति के अनुसार हम सबके थोड़े-थोड़े प्रयत्नों से देश में एक महत्वपूर्ण, स्वस्थ, एवं प्रेरणाप्रद ऐसा वातावरण बन सकता है जो जन-मानस की दिशा ही बदल दे और हमारे स्वप्नों का संसार जल्दी ही प्रत्यक्ष एवं साकार दिखाई देने लगे।
भारत के इतिहास में हम सबके जीवन में यह वर्तमान समय एक अग्नि परीक्षा की घड़ी की तरह सामने आया है। इस अवसर पर हमें कायर कलंकी के रूप में नहीं, कर्मठ योद्धा के रूप में अपने आपको खरा सिद्ध करना है। राष्ट्र रक्षा और राष्ट्र निर्माण दोनों ही मोर्चों पर जूझने के लिये हमें भारत माता के सच्चे सपूत की तरह ही कटिबद्ध होना चाहिए।
उत्तरी अमरीका में नाइग्रा नामक एक प्रपात है। इसमें पानी की एक बहुत चौड़ी धार 160 फीट ऊँचाई से गिरती है। यदि प्रपात के पास कोई खड़ा हो तो जल का कल-कल शब्द बहुत ही भयानक प्रतीत होता है। यदि कोई प्रपात के पानी में गिर पड़े तो जीवित रहने की कोई आशा नहीं हैं।
अभी कुछ वर्षों की बात है एक अमरीकन पहलवान ने यह घोषणा की कि वह एक तार पर चलकर नाइग्रा प्रपात पार करेगा। नाइग्रा प्रपात के एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक हवाई जहाज की सहायता से ठीक प्रपात के ऊपर से तार फैलाया गया।
पहलवान ने जो दिन निश्चित किया था उस दिन उसके इस कौशल को देखने को बहुत भीड़ इकट्ठी हुई। ईश्वर का नाम लेकर उसने तार पर चलना प्रारम्भ किया। भीड़ की आँखें उस पहलवान की ओर लगी थीं। वह धीरे-धीरे चलकर उस पार कुशलता से पहुँच गया। ज्यों−ही उस पार पहुँचा भीड़ उसकी प्रशंसा में चिल्ला उठी। बहुतों ने उसको इनाम दिया।
उस समय उसने लाउडस्पीकर पर ईश्वर का धन्यवाद दिया और भीड़ से पूछा, “क्या आपने मुझे तार पर चलकर प्रपात पार करते देखा?” भीड़ ने उत्तर दिया “हाँ।”
उसने दूसरा प्रश्न पूछा, “क्या मैं इस पार से फिर उस पर तक इसी प्रकार पार कर सकता हूँ?” भीड़ ने उत्तर दिया “हाँ।”
उसने तीसरा प्रश्न किया, “क्या आप लोगों में से कोई मेरे कन्धे पर बैठ सकता है, जब मैं इस प्रपात को पार करूं?” इस प्रश्न पर भीड़ में सन्नाटा छा गया। कोई भी उसके कन्धे पर पार करते समय बैठने को तैयार नहीं हुआ। फिर उसने अपने 16 वर्षीय इकलौते बेटे को कन्धे पर बैठने को कहा। पुत्र पिता के कहने पर कन्धे पर बैठ गया। पिता ने धीरे-धीरे तार पर चलना आरम्भ किया। भीड़ की आँखें उनकी ओर लगी हुई थीं। कोई कहता था “अभी दोनों गिरते है-अब मरे इत्यादि।” परन्तु ईश्वर की कृपा से पहलवान अपने पुत्र सहित सरलता से पार हो गया।
भीड़ ने इस बार पहिले से अधिक उसकी प्रशंसा की और बहुत से इनाम दिये। उसने लाउडस्पीकर से ईश्वर की महिमा पर छोटा-सा भाषण दिया। उसने कहा, “आप लोगों में से किसी को मेरी सफलता या योग्यता पर विश्वास न था। इस कारण आप लोगों में से कोई मेरे कन्धे पर बैठने को तैयार नहीं था।
कन्दुको भित्ति निक्षित्र इव प्रतिफलन्मुहुः। आप्तत्यात्मनि प्रायो दोषोऽन्यस्यचिकीषितः।
जैसे दीवाल पर फेंकी गेंद अपने ऊपर ही लौट कर आती है, वैसे ही दूसरे के लिए की हुई हानि की योजना भी अपना ही अनिष्ट करती है।
मेरे पुत्र को मुझ पर विश्वास था और इस कारण वह मेरे कन्धे पर बैठने को तैयार हो गया, और मैं उसे लेकर इस पार आ गया हूँ। हम सबका पिता ईश्वर है। जिस प्रकार से मेरे बेटे को मुझ पर विश्वास था ठीक उसी प्रकार से यदि आपका विश्वास उस परम पिता परमात्मा पर हो तो आप साँसारिक कठिनाइयों को ठीक उसी प्रकार पार कर सकते हैं जैसे मेरे बेटे ने मेरे कन्धों पर नाइग्रा प्रपात पार किया है। ईश्वर पर दृढ़ विश्वास रखिये और परिश्रम करिये। मुझे ईश्वर पर पूर्ण विश्वास था कि वह मेरी इस कठिनाई के समय सहायता करेगा और उसने सहायता की।”
--बृजभूषणलाल श्रीवास्तव
लघु कथायें-
भारतेन्दु हरिशचन्द्र बड़े दानी थे। असीम दानशीलता और उदारता से वे निर्धन हो चुके थे। उनकी स्थिति ऐसी हो गयी थी कि आने वाले पत्रों का जवाब भी वे कंगाली के कारण नहीं दे सकते थे। वे लिख-लिख कर उसे लिफाफे में बन्द करके मेज पर प्रतिदिन रख देते । टिकट के अभाव में उन्हें नहीं भेज पाते। एक दिन उनका एक मित्र उनसे मिलने आया। उसने भारतेन्दुजी की मेज पर पत्रों का ढेर देखकर पाँच रुपये के टिकट मंगवाये और उन पत्रों को पोस्ट आफिस पहुँचाया।
कुछ समय बाद भारतेन्दु जी की स्थिति सुधरी। आर्थिक समस्या सुलझी। अब उनके वे मित्र जब भी आते भारतेन्दु जी उनकी जेब में एक पाँच का नोट चुपके से रख देते और पूछने पर कहते आपने मुझे पाँच रुपये ऋण दिये थे वे हैं ।
यही क्रम कई बार चलता रहा। एक दिन वह मित्र बोला-अब मुझे आपके यहाँ आना बन्द करना पड़ेगा।
इस पर भारतेन्दु जी ने आँखें डबडबाते हुए कहा- मित्र आपने मुझे ऐसे समय सहायता दी थी जिसे मैं जीवन भर नहीं भूल सकता । यदि मैं प्रति दिन भी एक पाँच रुपये का नोट आपको देता रहूँ तो भी आपके ऋण से उऋण नहीं हो सकता।
कुछ ब्राह्मण गंगा स्नान करने को आये थे। पानी बहुत गहरा था जिससे धार में उतर कर स्नान करने में उन्हें डर लग रहा था। उनके पास कोई पात्र भी नहीं था जिससे पानी ले लेकर वे नहाते। सभी बड़े असमंजस में थे।
उसी तट पर सन्त कबीर दास जी भी स्नान कर रहे थे। उन्होंने अपना लोटा माँजकर एक व्यक्ति को देते हुये कहा-इसे इन लोगों को दे दो, बेचारे स्नान कर लेंगे। इनके पास कोई पात्र भी नहीं है। यह सुन कर सभी ब्राह्मण एक दम चिल्ला उठे- नहीं भाई इस जुलाहे का लोटा लेकर हमें अपवित्र नहीं होना है इसे हमारे पास न लाओ।
“क्यों भाइयो जब यह लोटा भी कई बार मिट्टी लगाकर साफ करने पर इस गंगा जल से पवित्र नहीं हुआ तो दुर्भावनाओं से भरे इस मानव शरीर की पवित्रता कैसे होगी। स्नान से” सभी ब्राह्मण एक दूसरे का मुँह देखने लगे, उत्तर उन्हें कुछ भी न सूझ पड़ा।
“बेटा ले ये दो टुकड़े मिठाई के हैं। इनमें से यह बड़ा टुकड़ा तू स्वयं खा लेना और छोटा टुकड़ा अपने साथी को दे देना।”
“अच्छा माँ” और वह बालक दोनों टुकड़े लेकर बाहर आ गया अपने साथी के पास। साथी को मिठाई का बड़ा टुकड़ा देकर छोटा स्वयं खाने लगा। माँ यह सब जंगले में से देख रही थी। उसने आवाज देकर बालक को बुलाया।
“क्यों रे! मैंने तुझसे बड़ा टुकड़ा खुद खाने और छोटा उस बच्चे को देने के लिये कहा था, किन्तु तूने छोटा स्वयं खाकर बड़ा उसे क्यों दिया? “
वह बालक सहज बोली में बोला-”माताजी दूसरों को अधिक देने और अपने लिये कम से कम लेने में मुझे अधिक आनन्द आता है।”
माता जी गंभीर हो गई । वह बहुत देर विचार करती रहीं बालक की इन उदार भावनाओं के संबंध में। उसे लगा सचमुच यही मानवीय आदर्श है और इसी पर विश्व शाँति की सारी संभावनाएँ निर्भर हैं। मनुष्य अपने लिए कम चाहे और दूसरों को अधिक देने का प्रयत्न करे तो समस्त संघर्षों की समाप्ति और स्नेह, सौजन्य की स्वर्गीय परिस्थितियां सहज ही उत्पन्न हो सकती हैं।
(श्री पद्मकान्त मालवीय)
आज चीनियों ने मद में अपने हमको ललकारा है।
विजय या कि बस मौत यही अब एक हमारा नारा है।
प्रायश्चित किया है तिब्बत में हमसे जो भूल हुई।
करके स्नान रक्त-गंगा में मिली जिन्दगी हमें नई।
जोरावर सिंह को भूले चीनी नादानी है उनकी।
आज खून से ताजा करनी याद पुरानी है उनकी।
गंगोत्री का खोल रहा है जल, हिम जलता अंगारा है।
विजय या कि बस मौत यही अब एक हमारा नारा है।
भूमि-सुत्ता सीता-सीमा चीनी-रावण ने हर ली है।
राम प्रतिज्ञा हमने भी रावण - विनाश की कर ली है।
रावण का कर अन्त, हमें सीता को वापस लाना है।
और विभीषण को उनकी गद्दी पर फिर बिठलाना है।
“लंका-दहन, मरण-रावण” बस एक यही अब नारा है।
आज चीनियों ने मद में अपने हमको ललकारा है।
रावण रहा न कंस, न चाओ-माओ ही रह जायेंगे।
काली करतूतों, चालों का, इनको मजा चखाएंगे।
इके लख पूत, सवा लख नाती, रावण के न काम आए।
बानर भालू की सेना ले लंका में जब राम आए।
बच्चा बच्चा मातृभूमि का राम बना, असिधारा है।
विजय या कि बस मौत यही अब एक हमारा नारा है।
प्यारी जान जिन्हें हो, चूड़ी पहनें लौट जाएं घर को ।
आजादी हो जिनको प्यारी, वह सब साथ चलें रण को।
आज देश का कोई भी, यदि काम नहीं उसके आया ।
भारतमाता का कलंक वह, व्यर्थ जन्म उसने पाया।
वीर भोग्या वसुन्धरा ऋषियों ने सदा उचारा है।
आज चीनियों ने मद में अपने हमको ललकारा है।
-दैनिक हिन्दुस्तान से
*समाप्त*
(श्री अनिल पटेरिया निर्झर)
जब जब सौ सौ बाँह पसारे
खड़ा तिमिर हो बीच राह।
तुम दीपक से जलते जाओ।
उठती झंझाओं को आखिर इक दिन झुक जाना ही होगा।
बढ़े प्रलय तो, उसे सहम कर आखिर रुक जाना ही होगा॥
मंजिल दूर भले हो लेकिन उर में दृढ़ विश्वास यही है।
क्षुब्ध धरा के इस आँगन में सुख को फिर आना ही होगा॥
पग पग से तुम डगर नापते, अंगारों पर चलते जाओ॥ तुम.॥
ज्योति तुम्हारी बिखरे, जो भूतल से अम्बर तक छा जाये।
और सिसकती मानवता फिर विहसे मंगल मोद मनाये॥
पर यह भी सच है, इसमें तुमको तिल तिल कर जलना होगा।
हो सकता है, क्रूर काल तुमको ठोकर भी देता जाये॥
पर तुम गिर गिर कर फिर फिर, उठ उठ कर पुनः सँभलते जाओ॥ तुम.॥
जग में जीते वही, परिस्थितियों से जो टकराया करते।
चट्टानों को तोड़ लात से अपना मार्ग बनाया करते॥
उन सुमनों का ही सौरभ अब तक छाया सारे कानन में।
जो काँटों से बिंधते, लेकिन म्लान नहो मुस्काया करते॥
सौरभ का आगार ढूँढ़ना जो चाहो, तो काँटों में भी नी पलते जाओ॥ तुम.॥
महाभारत का युद्ध प्रारम्भ होने में कुछ दिन ही शेष थे। कौरव और पाण्डव दोनों पक्ष अपनी-अपनी तैयारियाँ कर रहे थे युद्ध के लिए। अपने-अपने पक्ष के राजाओं को निमंत्रित कर रहे थे। भगवान श्रीकृष्ण को भी निमन्त्रित करने के लिए अर्जुन और दुर्योधन एक साथ पहुँचे। भगवान ने दोनों के समक्ष अपना चुनाव प्रश्न रखा। एक ओर अकेले शस्त्रहीन श्रीकृष्ण और दूसरी ओर श्रीकृष्ण की सारी सशस्त्र सेना-इन दोनों में से जिसे जो चाहिए वह माँग ले। दुर्योधन ने सारी सेना के समक्ष निरस्त्र कृष्ण को अस्वीकार कर दिया। किन्तु अपने पक्ष में अकेले निरस्त्र भगवान कृष्ण को देखकर अर्जुन मन-ही-मन बड़ा प्रसन्न हुआ। अर्जुन ने भगवान को अपना सारथी बनाया। भीषण संग्राम हुआ। अन्ततः पाँडव जीते और कौरव हार गये। इतिहास साक्षी है कि बिना लड़े भगवान कृष्ण ने अर्जुन का सारथी मात्र बनकर पाण्डवों को जिता दिया और शक्ति शाली सेना प्राप्त करके भी कौरवों को हारना पड़ा। दुर्योधन ने भूल की जो स्वयं भगवान समक्ष सेना को ही महत्वपूर्ण समझा और सैन्य बल के समक्ष भगवान को ठुकरा दिया।
हम दुर्योधन न बनें-
किन्तु आज भी हम सब दुर्योधन बने हुए हैं और निरन्तर यही भूल करते जा रहे हैं। संसारी शक्तियों, भौतिक सम्पदाओं के बल पर ही जीवन संग्राम में विजय चाहते हैं ईश्वर की उपेक्षा करके हम भी तो भगवान और उनकी भौतिक स्थूल शक्ति दोनों में से दुर्योधन की तरह स्वयं ईश्वर की उपेक्षा कर रहे हैं और जीवन में संसारी शक्तियों को प्रधानता दे रहे हैं। किन्तु इससे तो कौरवों की तरह असफलता ही मिलेगी। वस्तुतः जीत उन्हीं की होती है जो भौतिक शक्तियों तक ही सीमित न रह कर परमात्मा को अपने जीवनरथ का सारथी बना लेते हैं। उसे ही जीवन का सम्बल बनाकर मनुष्य इस जीवन संग्राम में विजय प्राप्त कर लेता है। हम देखते हैं कि ईश्वर को भूलकर संसार का तानाबाना हम बुनते रहते हैं अपने मन में हवाई किले बनाते हैं, कल्पना की उड़ान से दुनिया का ओर छोर नापने की योजना बनाते हैं किन्तु हमें पद-पद पर ठोकरें खानी पड़ती हैं, स्वप्नों का महल एक ही झोंके से धराशायी हो जाता है, कल्पना के पर कट जाते हैं, सब कुछ बिगड़ जाता है, अन्त में पछताना पड़ता है। दुर्योधन, रावण, हिरण्यकशिपु, सिकन्दर आदि बड़ी-बड़ी हस्तियाँ पछताती चली गईं। भगवान के संसार में रहकर भगवान को भूलने और केवल संसारी शक्तियों को प्रधानता देने से और क्या मिल सकता है? संसार के रणांगण में उतरकर हम इतने अन्धे हो जाते हैं कि इस सारी सृष्टि के मालिक का आशीर्वाद लेना तो दूर उसका स्मरण तक हम नहीं करते और भौतिक स्थूल संसार को ही प्रधानता देकर जूझ पड़ते हैं। ऐसे अहंकारी व्यक्ति चाहे कितनी भी सफलता प्राप्त क्यों न कर लें उनकी विजय संदिग्ध ही रहती है।
आज मानव जीवन की जो करुण एवं दयनीय स्थिति है, जो सन्ताप, दुःख, असफलतायें मिल रही हैं, इन सबका मूल कारण है ईश्वर विश्वास की कमी, ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा करना और एकमात्र भौतिक साँसारिक शक्तियों को ही महत्व देना ।
श्रद्धा और विश्वास का समन्वय
ईश्वर विश्वास के लिये श्रद्धा का महत्वपूर्ण स्थान है। भौतिक जीवन तथा शारीरिक क्षेत्र में प्रेम की सीमा होती है। जब यही प्रेम आन्तरिक अथवा आत्मिक क्षेत्र में काम करने लगता है तो उसे श्रद्धा कहते हैं। यह श्रद्धा ही ईश्वर-विश्वास का मूल स्रोत है एवं श्रद्धा के माध्यम से ही उस विराट की अनुभूति सम्भव है। श्रद्धा समस्त जीवन नैय्या के चप्पू ईश्वर के हाथों सौंप देती है। जिसकी जीवन डोर प्रभु के हाथों में हो भला उसे क्या भय ! भय तो उसी को होगा जो अपने कमजोर हाथ पाँव अथवा संसार की शक्ति यों पर भरोसा करके चलेगा। जो प्रभु का आँचल पकड़ लेता है वह निर्भय हो जाता है, उसके सम्पूर्ण जीवन में प्रभु का प्रकाश भर जाता है। तब उसके जीवन व्यापार का प्रत्येक पहलू प्रभु प्रेरित होता है, उसका चरित्र दिव्य गुणों से सम्पन्न हो जाता है, वह स्वयं परम पिता का युवराज हो जाता है। फिर उसके समक्ष समस्त संसार फीका और निस्तेज बलहीन क्षुद्र जान पड़ता है। किन्तु यह सब श्रद्धा से ही सम्भव है।
परमात्मा की सत्ता, उसकी कृपा पर अटल विश्वास रखना ही श्रद्धा है। ज्यों-ज्यों इसका विश्वास होता जाता है, त्यों-त्यों प्रभु का विराट स्वरूप सर्वत्र भासमान होने लगता है। हमारे भीतर बाहर चारों ओर श्रद्धा के माध्यम से ही हमें परमात्मा का उस ईश्वर का अवलम्बन लेना चाहिए। श्रद्धा से ही उस परमात्मा-तत्व पर, जो हमारे बाहर भीतर व्याप्त है, विश्वास करना मुमुक्षु के लिये आवश्यक है और सम्भव भी है।
ईश्वरीय सत्ता और व्यवस्था :-
स्थूल जगत का समस्त कार्य व्यापार ईश्वरेच्छा एवं उसके विधान के अनुसार चल रहा है। वैज्ञानिक, दार्शनिक सभी इस तथ्य को एक स्वर से स्वीकार भी करते हैं। कहने के ढंग अलग-अलग हो सकते हैं, फिर भी यह निश्चित ही है। यह सारा कार्य व्यापार किसी अदृश्य सर्वव्यापक सत्ता द्वारा चल रहा है। हमारा जीवन भी ईश्वरेच्छा का ही रूप है। अतः जीवन में ईश्वर विश्वास के साथ-साथ समस्त कार्य व्यापार में उसकी इच्छा को ही प्रधानता देनी चाहिये। वह क्या चाहता है इसे समझना और उसकी इच्छानुसार ही जीवन रण में जूझना आवश्यक है। इसी तथ्य का संकेत करते हुए भगवान कृष्ण ने अर्जुन से कहा था।
“तस्मात् सर्वेसुकालेषु मामनुस्मर युध्यच।” “हे अर्जुन तू निरन्तर मेरा स्मरण करता हुआ मेरी इच्छानुसार युद्ध कर।” परमात्मा सभी को यही आदेश देता है। ईश्वर का नाम लेकर उनकी इच्छा को जीवन में परिणत होने देकर जो संसार के रणांगण में उतरते हैं, उन्हें अर्जुन की ही तरह निराशा का , असफलता का सामना नहीं करना पड़ता। ईश्वरेच्छा को जीवन संचालन का केन्द्र बनाने वाले की हर साँस से यही आवाज निकलती रहती है। “हे ईश्वर तेरी इच्छापूर्ण हो।” “ईश्वर तेरी इच्छापूर्ण हो।” जीवन का यही मूलमंत्र है। महापुरुषों के जीवन इसके साक्षी हैं। स्वामी दयानन्द ने अन्तिम बार
शुद्धपक्षस्य हंसौघः सरसो यथा।
यस्माद् गुणौधो निर्याति जीवितं तस्यशोभते॥
योग वशिष्ठ 5। 39। 53
निर्मल जल भरे सरोवर में से जैसे सफेद हंसों का झुण्ड निकलते हुए शोभायमान होता है, वैसे ही जिसमें सद्गुणों का समूह दृष्टिगोचर होता है उसी का जीवन शोभा पाता है।
जहर खाते हुए भी कहा-ईश्वर तेरी इच्छा पूर्ण हो। महात्मा गाँधी ने गोली खाकर कहा-हे राम तेरी इच्छा पूर्ण हो। ईसा को क्रूस पर चढ़ाया गया तब उन्होंने भी प्रभु इच्छा को ही पूर्ण हो बताया। जीवन में हर साँस, हर धड़कन में हम ईश्वर की इच्छा को ही प्रधान समझें। जीवन को उसके हाथों सौंप दे तो अन्त में भी उसको पावन अंक में ही स्थान मिलेगा साथ ही हमारा भौतिक, जीवन भी दिव्य एवं महान बन जाएगा। भगवान कहत हैं।
“मत्मना भव मद भक्तो मद्याजी माँ नमस्कुरु।”
मेरा भक्त बन जा, सारे कर्म अकर्म मुझे अर्पित कर दे, मैं तुझे सर्व दुखों से पार कर दूँगा।
अहंकार का निराकरण-
अहंकार का पुतला मनुष्य प्रभु की इच्छा को उनकी आज्ञा को स्वीकार नहीं करता और अपने ही निर्बल कन्धों पर अपना बोझ उठाये फिरता है। इतना ही नहीं दुनिया का भार उठाने का दम भरता है। यही कारण है कि निराशा, चिंताएं, दुःख, रोग, असफलतायें उसे घेरे हुए हैं और रात-दिन व्याकुल-सा सिर धुनता हुआ मनुष्य अत्यन्त परेशान सा दिखाई देता है। अहंकारवश प्रभु की इच्छा के विपरीत चलकर कभी सुख शान्ति मिल सकती है? नहीं कदापि नहीं। हमें अपने हृदय मन्दिर में से अहंकार, वासना, राग द्वेष को निकाल कर रिक्त करना होगा और ईश्वरेच्छा को सहज रूप में काम करने देना होगा तभी जीवन यात्रा सफल हो सकेगी।
ईश्वर के प्रति विश्वास, श्रद्धा, उसकी इच्छा को जो समस्त स्थूल और सूक्ष्म संसार का संचालन कर रही है, सहज रूप में काम करने देना जीवन का मूलमंत्र है। मनुष्य की शक्ति अत्यन्त अल्प है, वह अहंकार की शक्ति है। बड़े-बड़े कौरव, बाणासुर रावण, हिरण्यकशिपु, अनेकों असुरों ने ईश्वरीय सत्ता को चुनौती दी थी अपने साँसारिक बल और अहंकार बल से किन्तु अन्त में पछताते गये। साधारण मनुष्य की तो बात ही क्या है। अपने जीवन की बागडोर उनके हाथों देकर निश्चिन्त हो जाने वाले ही उनके विराट रूप का दर्शन कर कृतार्थ हो जाते हैं। हमें सचेत होकर अपना रथ भगवान के हाथों में देना है परम पिता के संरक्षण में हमें अपनी विजय यात्रा पर चलने को तैयार हो जाना है। हमारी प्रत्येक साँस और धड़कन में प्रभु का अमर संगीत गूँजता रहे, हमारे हृदय मन्दिर में विराजमान प्रभु हमारे जीवन रथ का संचालन करते रहें और अन्त में उनके पावन अंक में ही हमें स्थान मिले ऐसी उनसे प्रार्थना है। वे ही हमारे बाहर भीतर एक रस से व्याप रहे हैं।
महात्मा गाँधी के आश्रम में एक प्रसिद्ध संन्यासी आये। आश्रम के वातावरण, बापू के कार्य-क्रम, विचारों से वह साधु बड़े प्रसन्न हुए और वहाँ ठहर गये। उनको आश्रम में मेहमान की तरह रखा गया। एक दिन साधु बापू से मिले और प्रार्थना करते हुए बोले-महात्माजी मैं भी आपके आश्रम में रहकर जीवन बिताना चाहता हूँ। इस जीवन का सदुपयोग राष्ट्र हित में हो तो वह मेरा महान सौभाग्य होगा।
बापू ने उनकी बातें सुनकर कहा-यह जानकर हमें बड़ी प्रसन्नता हुई है। आप जैसे विरक्त साधु पुरुषों के लिए ही तो आश्रम होते हैं। किन्तु यहाँ रहने से पूर्व आपको इन गेरुए वस्त्रों का त्याग करना पड़ेगा। महात्मा जी की बातें सुनकर स्वामी जी मन-ही-मन बड़े क्रोधित हुए। अपने क्रोध पर संयम रखते हुए वह बोले-महात्मा जी ऐसा कैसे हो सकता है, मैं संन्यासी जो हूँ।
बापू बोले आप अपने संन्यास को कभी न छोड़ें- इसमें दिनों दिन प्रगति करें। मैंने तो आपको गेरुए वस्त्र छोड़ने के लिये कहा है। इनके बिना सेवा नहीं हो सकती। बापू ने उन्हें समझाते हुए कहा-स्वामी जी, इन गेरुए वस्त्रों को देखते ही हमारे देशवासी इन वस्त्रों को पहनने वाले की ही सेवा पूजा शुरू कर देते हैं। दूसरों की सेवा के स्थान पर निज की सेवा स्तुति शुरू हो जाती है। इन वस्त्रों के कारण अन्य लोग आपकी सेवा भी स्वीकार नहीं करेंगे। जो वस्तु हमारे सेवा-कार्य में बाधा डाले उसे छोड़ देना चाहिये। फिर संन्यास तो मानसिक वस्तु है। पोशाक के छोड़ने से संन्यास नहीं जाता। गेरुए वस्त्र पहन कर आपको सफाई का काम कौन करने देगा?
महात्मा जी की बातें सुनकर उस साधु ने तत्काल गेरुए वस्त्र त्याग दिए।
इस संसार की बनावट कुछ ऐसी है कि मनुष्य को अपनी जीवन यात्रा के लिए दिन रात संघर्ष करना पड़ता है। उथल पुथल, खींचातानी, परेशानियों, राग द्वेष से संसार का वातावरण बहुत कटु मालूम पड़ने लगता है। वर्तमान में तो संसार की यह दौड़ और भी तेज हो गई है, मानव जाति भागी जा रही है बिना लक्ष्य के। उसका दम फल रहा है। चैन नहीं मिल रहा है मनुष्य को लाख प्रयत्न करने पर भी। वह अपने सुख के लिए तरह तरह के साधन जुटाता है किन्तु दुःखों, परेशानियों का क्रम एक के बाद एक नये रूप में आ रहा है। तो क्या इस संसार का और मनुष्य का निर्माण इसीलिए हुआ था? सम्भव है संसार को दुःखों का घर बताने का सिद्धान्त जिन्होंने बनाया उन्होंने यही निर्णय अपने जीवन में किया होगा। किन्तु मंगलमय प्रभु का अमंगल कार्य क्यों? मंगलमय भगवान ने तो अपनी मंगलमय इच्छा के फलस्वरूप ही इस सुन्दर संसार का निर्माण किया है।
प्रभु की मंगलमयी सत्ता-
जो चैतन्य सत्ता इस स्थूल संसार का धारण पोषण कर रही है, जो आत्मरूप में सब में व्याप्त है, वह प्रेम ही है। व्यष्टि और समष्टि में आत्मा का वह प्रेम प्रकाश ही ईश्वर की मंगलमयी रचना का सन्देश दे रहा है। जब मनुष्य आत्मा के उस प्रेम प्रकाश का अवलम्बन लेता है तभी वह संसार को आनन्द और सुखों का घर मानने लगता है और तभी उसे सच्चा सुख मिलता है। प्रेम ही आत्मा का प्रकाश है। जो इस प्रकाश में जीवन पथ पर अग्रसर होता है, उसे संसार शूल नहीं फूल नजर आता है, दुःखों का घर नहीं वरन् स्वर्ग मालूम होता है।
प्रेम ही एक ऐसा प्रकाश है जिसका अवलम्बन लेकर मनुष्य इस संघर्षमय संसार में जीवन यात्रा को सफल कर सकता है। प्रेम ही जीवन की सर्वोच्च प्रेरणा है। अन्य प्रेरणाएँ अन्धकार की जनक हैं। प्रेम प्रेरित कर्मों से संसार की रचना होती है। अन्य तो उसके विनाश और बुराई बढ़ाने के कारण बनते हैं। जीवन को समृद्ध बनाने, परम ध्येय की मंजिल तक ले जाने का एक ही रास्ता, एक ही नियम है, वह है प्रेम । आत्मा का प्रकाश प्रेम है, यही प्रभु का विधान मंगलमयी सृष्टि के लिए है। जो इसे जीवन में प्रधानता देता है उसके लिए संसार ही स्वर्ग है, प्रभु का मन्दिर है, जीवन क्रीड़ा का सुन्दर उद्यान है।
प्रभु का लक्ष्य और स्वरूप
प्रेम का लक्ष्य प्रेम स्वरूप की प्राप्ति के लिए है किन्तु हम तो जो कुछ कर रहे हैं सब अपने लिए, अपने अहम् की तुष्टि के लिए, स्वार्थ के लिए। जिस काम में हमारा स्वार्थ सधता हो वही काम तो हमें अच्छा लगता है। अपनी भूख, शान्ति, रक्षा, साज सामान इकट्ठा करने के लिए ही तो हमारी सारी कार्य प्रणाली चल रही है। किन्तु यह सब तो सौदेबाजी, लेन देन का कार्य है जिसका उद्देश्य कुछ पुरस्कार प्राप्ति ही है। यह तो दुनिया का साधारण नियम है। प्रेम का नियम इससे बिलकुल भिन्न है। प्रेम सौदा नहीं है। प्रेम कुछ पाने की इच्छा से नहीं किया जाता बल्कि देने की भावना से किया जाता है। प्रेम पुरस्कार नहीं लेता, बदला नहीं चाहता। प्रेम दान का नियम है जो निरन्तर देता रहता है, यदि लेता भी है तो केवल प्रेम ही। प्रेम की पूर्ति प्रेम से होती है। स्वयं के कृतार्थ होने के लिए प्रेम किया जाता है। प्रेम, प्रेम के लिए कीजिए। किसी स्वार्थ, लेने की भावना के लिए नहीं। जो कुछ भी आपके पास है, उन्मुक्त भाव से लुटाते रहिए प्रेम के लिए।
असीम और सार्वभौम-
प्रेम किन्हीं सीमा, मर्यादा, समय, रूप, रंग, जाति, वर्ण आदि के नियमों में बँधा नहीं रहता। वह हर समय एक रस, अचल, सब के लिए होता है। यह प्रेम साधना का दूसरा नियम है। हम किसी से सुबह प्रेम करें और शाम को न करें, यह धोखा है। मन्दिर में आँसू बहाने वाला प्रेम यदि दुःखी, क्लान्त भाइयों को देखकर द्रवित न हो तो वह प्रेम नहीं ढोंग है। दूसरों का खून करने वाला व्यक्ति अपने घर के सदस्यों से प्रेम करे तो वह प्रेम नहीं स्वार्थ है, भोग है। दूसरों के बच्चों से कटु व्यवहार करने वाले माँ बाप अपने बच्चों से प्रेम नहीं कर सकते। दूसरों के साथ धोखेबाजी, चालाकी, कूटनीति छल−कपट बरतने वाले व्यक्ति किन्हीं से प्रेम करें, यह कठिन है। सच्चा प्रेम वह है जो घर, बाहर, मन्दिर, मस्जिद, समस्त जाति वर्ण में एक रस समान व्याप्त होकर हमारी नस-नस में समा जाए, और जीवन का अंग बन जाए। वही प्रेम, प्रेम कहलाने का अधिकारी है। यदि इस कसौटी पर उतरने वाले प्रेम पूजकों की संख्या बढ़ जावे तो यह धरती ही स्वर्ग बन जावे।
प्रेम आत्मा का सहज प्रकाश है जो प्रत्येक जीवन में स्थित है। उसे प्राप्त करने के लिए धन दौलत कुछ भी खर्च नहीं करना पड़ता। प्रेम का अथाह समुद्र हमारे चारों ओर बाहर भीतर उमड़ रहा है, केवल आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी हृदय गगरी में जो मल विक्षेप, अहंकार, स्वार्थ, पद प्रतिष्ठा आदि भरे पड़े हैं उन्हें निकाल कर इस प्रेम समुद्र का मधुर अमृत भर लें। यह एक सहज और स्वाभाविक क्रिया है किन्तु खेद है मनुष्य की अमीरी, उसकी पद प्रतिष्ठा, अहंकार इस सहज कार्य को सफल नहीं होने देते। यदि हमें प्रभु के प्रकाश, प्रेम को प्राप्त करना है तो इन बनावटी चोलों का त्याग करना होगा। पीड़ित मानवता में, दुनमुखी भाइयों में, अन्य जीव पशु पक्षियों के बीच हृदय खोल कर आना होगा, उन्हीं की पंक्ति में खड़ा होना होगा। यहाँ कोई निर्बल सबल, गरीब अमीर, ऊँचा नीचा नहीं हैं। प्रभु के सब पुत्र समान हैं। हमें हृदय खोल कर अपने सारे भौतिक आवरणों को दूर उतार कर प्राणी मात्र से प्रेम करना है। सबके साथ सहानुभूति सहयोग करके अपना कर्तव्य निभाना है। प्रेम सारे भौतिक आकर्षणों से ऊपर रहता है, इनका त्याग किए बिना सच्ची प्रेम साधना सम्भव नहीं हो सकती।
सभी तो अपने हैं-
महात्मा गाँधी एक कोढ़ी की स्वयं पट्टी आदि करते थे, अपने हाथों से घाव धोते थे, जबकि अन्य लोग दूर भागने का प्रयत्न करते थे। ईसा मसीह, चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण आदि महापुरुषों के जीवन आज भी उनकी प्रेम साधना के ज्वलन्त उदाहरण हैं। उनके हृदयों से प्रेम की भागीरथी निरन्तर बहती रही, जिसमें प्राणीमात्र ने अपने आपको कृतार्थ किया। वहाँ कोई भेद भाव नहीं था। इस तरह जिसके हृदय में प्रेम का अखण्ड दीप जलता रहे, वस्तुतः वही सच्चा प्रेमी है। महर्षि रमण मनुष्यों से ही नहीं प्राणीमात्र से प्रेम करते थे। साँप, बिच्छू, पशु पक्षी, बन्दर, सिंह आदि उनके पास परिवार के सदस्यों की तरह आया करते थे और महर्षि उन्हें बड़े प्यार से खिलाया-पिलाया करते थे। प्रेम सर्वत्र व्याप्त है, किन्तु मनुष्य ने भेदभाव, स्वार्थ, अहंकार, रागद्वेष का जो रंगीन चश्मा चढ़ा रखा है, इसी के कारण उसके दर्शन नहीं हो पाते और इसीलिए वह रात दिन दुखी व्याकुल नजर आता है।
प्रेम के लिए अपने आपका उत्सर्ग करने वाला जीवन ही वस्तुतः जीवन कहलाने लायक रहता है। अवस्था विचार, परिस्थितियाँ, मनुष्यों का विश्वास, यहाँ तक कि यह देह भी बदलती है। इस परिवर्तन प्रधान संसार में यदि अजर अमर रहता है, तो वह है प्रेम।
प्रेरणा की प्रबल शक्ति-
प्रेम का मूल्य बलिदान से ही चुकाया जाता है। महात्मा गाँधी ने देश से, मानवता से प्रेम किया था। और अन्त में इसी के लिए अपने आपको बलिदान किया। देश प्रेम के मतवाले राणा प्रताप अरावली की पथरीली घाटियों में भूखे प्यासे फिरते रहे। धर्म से प्रेम करने वाले तेग बहादुर, गुरु गोविन्द सिंह के बच्चों ने मुगलों के हाथों सहर्ष अपना बलिदान स्वीकार किया था। आजादी और देश प्रेम के अनेकों मतवालों ने सूली फाँसी, गोली, तोपों को सहर्ष स्वीकार किया था। ऐसे प्रेम पथिकों की भारत में, साथ ही विदेशों में भी कमी नहीं रही, जिन्होंने अपने विश्वास ध्येय उद्देश्य लक्ष्य आदि के लिए प्रेम किया अपने को जीवित ही तिलतिल मिटाया और अन्त में इसी के लिए बलिवेदी पर सहर्ष चढ़े।
अपने आराध्य प्रेम में मतवाली मीरा गाती थी-हेरी मैं तो प्रेम दिवानी मेरो दरद न जाने कोय, सूली ऊपर सेज हमारी किसविध सोना होय। प्रेम के मार्ग में बेशक काँटे बिछे हुए हैं, किन्तु जब प्रेमी उन काँटों को अपने प्रेम स्वरूप के लिए फूल मान कर आगे बढ़ता है, उन्हें अपने प्रेमी के लिए दिल से लगाता है, तभी मीरा का जहर अमृत बन जाता है। गाँधी जी को लगी गोली उनके अमर जीवन का कारण बन गई। भटकते हुए प्रताप आज मेवाड़ के मुकुट बन गये। कृष्ण प्रेम के मतवाले अंधे सूरदास, राम प्रेम के मतवाले तुलसीदास आज घर-घर मानव हृदय में मूर्त रूप में विराजमान हैं। जब प्रेम काँटों पर चलकर भी मतवाला दृढ़ स्थिर बना रहता है, तभी उसका वास्तविक स्वरूप निखरता है। जो इन विपन्नताओं में परीक्षा काल में भी प्रेम पथ पर अविचल भाव से खड़ा रहता है अपने सत्य के लिए, वही प्रेम साधना की अन्तिम सिद्धि तक पहुँच जाता है। असफलताओं में जो स्थिर रहे वही प्रेम जीवित रहता है।
परीक्षा और कसौटी-
सत्य की उक्त कसौटियों पर अपनी प्रेम साधना के पथ पर आगे बढ़िये, तुच्छ स्वार्थों, आकर्षणों, लेन-देन के लिए प्रेम शब्द का दुरुपयोग और उसको कलंकित मत कीजिए। उन्मुक्त भाव से प्रेम कीजिए समस्त मानव जाति से, प्राणी मात्र से, समस्त वसुधा से। प्रेम में गरीब, अमीर, ऊँचा-नीचा, मेरा-तेरा, भाषावाद, प्रान्तीयता, जाति-पाँति आदि का कोई स्थान नहीं है। इन संकीर्ण बन्धनों को तोड़ कर जब आप प्रेम पथ पर अग्रसर होंगे तभी उस दिव्य प्रेम स्वरूप का पुण्य साक्षात्कार सम्भव हो सकेगा। ज्योतिर्मयी आत्मा के पुण्य प्रकाश में प्रेम का अवलम्बन कीजिए और जीवन लक्ष्य की ओर अग्रसर हूजिए।
देवों और असुरों में घोर युद्ध हो रहा था। राक्षसों के शस्त्र बल और युद्ध-कौशल के सन्मुख देवता टिक ही नहीं पाते थे। वे हार कर जान बचाने भागे, सब मिल कर महर्षि दत्तात्रेय के पास पहुँचे और उन्हें अपनी विपत्ति की गाथा सुनाई। महर्षि ने उन्हें धैर्य बँधाते हुए पुनः लड़ने को कहा। फिर लड़ाई हुई। किन्तु देवता फिर हार गये और फिर जान बचाकर भागे महर्षि दत्तात्रेय के पास। अबकी बार असुरों ने भी उनका पीछा किया। वे भी दत्तात्रेय के आश्रम में जा पहुँचे। असुरों ने दत्तात्रेय के आश्रम में उनके पास बैठी हुई एक नवयौवना स्त्री को देखा। बस, दानव लड़ना तो भूल गये और उस स्त्री पर मुग्ध हो गये। स्त्री जो रूप बदले हुए लक्ष्मीजी ही थी, असुर उन्हें पकड़ कर ले भागे। दत्तात्रेय जी ने देवताओं से कहा अब तुम तैयारी करके फिर से असुरों पर चढ़ाई करो। लड़ाई छिड़ी और देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। असुरों का पतन हुआ।
विजय प्राप्त करके देवता फिर दत्तात्रेय के पास आये और पूछने लगे-भगवन् दो बार पराजय और अंतिम बार विजय का रहस्य क्या है? महर्षि ने बताया-जब तक मनुष्य सदाचारी संयमी रहता है तब तक उसमें उसका पूर्ण बल विद्यमान बना रहता है और जब वह कुपथ पर कदम धरता है तो उसका आधा बल क्षीण हो जाता है। पर-नारी का अपहरण करने की कुचेष्टा में असुरों का आधा बल नष्ट हो गया था, तभी तुम उन पर विजय प्राप्त कर सके।
स्कूली शिक्षा के साथ, पुस्तकीय ज्ञान के साथ ही सबसे बड़ी आवश्यकता है, जीवन को सार्थक करने वाली उस जीवन विद्या की जो अनेक विचित्रताओं से भरे ऊबड़-खाबड़ जीवन पथ पर मनुष्य के पग बढ़ाने में सहायता दे। उच्च शिक्षा सम्पन्न, साक्षर जीवन की असफलताओं का प्रमुख कारण यही है। डिग्री डिप्लोमा रहित साधारण जीवन भी सार्थक बन जाता है जीवन विद्या के पारस का स्पर्श पाकर। संसार के अब तक के अधिकाँश महापुरुषों का अक्षर ज्ञान आज के अनेकों, उच्च शिक्षा सम्पन्न लोगों से कम ही था। उन्होंने किसी यूनिवर्सिटी से एम.ए.पी. एच.डी.की डिग्री प्राप्त नहीं की थी, फिर भी उन्होंने जीवन की सार्थकता के कठोर धरातल को छू कर समाज को नया मार्ग प्रदान किया, मानवता की बहुत बड़ी सेवायें की।
व्यावहारिक ज्ञान की आवश्यकता-
पुस्तकीय ज्ञान, जीवन का एक खाका बनाता है किन्तु सार्थकता का रंग भर कर ही उससे जीवन का नक्शा तैयार किया जा सकता है। शिक्षा द्वारा जीवन और संसार का एक काल्पनिक स्वरूप निर्धारित किया जा सकता है किन्तु यथार्थता की धरती पर उसे साकार करने के लिए जीवन विद्या की ही आवश्यकता होती है। बातों की कढ़ी और बातों के ही भात से पेट नहीं भरता, पोथी का कुआँ डुबोता भी नहीं तो पोथी की नैया तारती भी नहीं। इन शब्दों में परम सन्त विनोबा भावे ने अक्षर ज्ञान की सीमा निर्धारित की है। वस्तुतः पुस्तकों में अक्षर होते हैं, शब्द होते हैं। किन्तु उनका अर्थ जीन के धरातल पर, सृष्टि के रंचमंच पर ही प्राप्त किया जा सकता है। और तब ही कोई शिक्षा सजीव और सर्वांगीण बन पाती है। वही जीवन पथ पर मनुष्य का पूरा पूरा साथ देती है। साक्षरता और सार्थकता से मिल कर निर्मित शिक्षा ही जीवन विद्या है और वही मनुष्य की सफलता मूल आधार है।
जीवन का महत्व समझें-
श्री शंकराचार्य में अपने आठ वर्ष के जीवन में ही तीव्र प्रतिभा की जागृति हो गई थी। बिना संस्कृत पढ़े ही सन्त तुकाराम ने वेदों का अर्थ जान लिया था। सन्त ज्ञानेश्वर ने छोटी उम्र में ही कई ग्रन्थों की रचना की। सूर, मीरा, तुलसी, कबीर, नानक, रैदास, तुकाराम आदि की रचनाओं के साधारण शब्दों में ही भरा हुआ ज्ञान कितना असाधारण है। इसका कारण उनका सार्थक जीवन ही है। उन्होंने पहले जीवन में अर्थ ढूँढ़ा, फिर पुस्तकों में अक्षर। अक्षर ज्ञान, बाह्य शिक्षण तो केवल संस्कार मात्र छोड़ता है। पथ का शाब्दिक ज्ञान कराता है, किन्तु पथ पर चलना तो मनुष्य की अपनी शक्ति और क्षमता पर ही निर्भर करता है। अपनी क्षमता और स्थिति के अनुसार ही मनुष्य यथार्थता की धरती पर जीवन के भवन की रचना करता है। अतः बाह्य शिक्षा का मुख्य आधार आन्तरिक शिक्षण-जीवन विद्या ही होना आवश्यक है।
शिक्षण से सार्थकता -
मनुष्य अपनी शिक्षा और जीवन में समन्वय पैदा करके सफल हो सकता है। आन्तरिक शिक्षण, सार्थकता के अभाव में आज की बाह्य शिक्षा की असफलता सहज ही देखी जा सकती है। इस जीवन विद्या-आन्तरिक शिक्षण के अभाव में जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता सम्भव नहीं। लोक व्यवहार से लेकर, व्यक्तिगत सफलता, सेवा, भक्ति, परमार्थ के सभी क्षेत्रों में जीवन विद्या की आवश्यकता होती है।
परमार्थ की दुहाई देकर रात दिन श्रम कर वाले स्वार्थी बन जाते हैं। निष्काम सेवा के पथिक लोक संग्रह में-कामनाओं की पूर्ति में लग जाते हैं। भक्त अभक्त बन जाते हैं। जीवन विद्या, अन्तर ज्ञान के अभाव में निष्ठावन्त और शुभ कार्यों में भी मिश्रण होने लगता है। धीरे-धीरे शुभ के स्थान पर अशुभ,परमार्थ की जगह स्वार्थ, दूसरों की सेवा करने के स्थान पर अपनी सेवा, अच्छाई के स्थान पर बुराइयाँ घर कर लेती हैं। जीवन शिक्षा के अभाव और अन्तर ज्ञान के अभाव में लौकिक व्यवहार सम्बन्धी कार्यों की असफलता तो प्रायः निश्चित ही रहती है।
समस्या की जड़ तक पहुँचें-
आज की समस्यायें, दुःख, परेशानियाँ, कष्ट, उलझनें, संघर्ष, अशान्ति, शारीरिक मानसिक पीड़ाओं का मूल कारण जीवन विद्या का अभाव ही है। अशिक्षित, देहाती लोगों की अपेक्षा शिक्षितों का जीवन अधिक क्लिष्ट और परेशानी भरा होता है। जब कि शिक्षा का अर्थ जीवन को सरल और सुगम बनाना होता है। इन अर्थों में हमारी शिक्षा केवल अक्षर ज्ञान तक ही सीमित है। अभी तक जीवन के यथार्थ धरातल से उसका सम्बन्ध नहीं होने के कारण ही आज शिक्षितों का जीवन अभिशाप बन रहा है।
जीवन विद्या कहाँ से कैसे प्राप्त हो? यह प्रश्न उतना ही सहज और सरल है, जितना सूर्य का प्रकाश, जो आँखें खोलकर देखने पर सहज ही मिल जाता है। शेक्सपीयर ने लिखा है, ‘बहते हुए झरनों में प्रासादिक ग्रन्थ संचित हैं।’ पत्थरों में दर्शन छिपे हुए हैं। संसार के जितने भी पदार्थ हैं सब में शिक्षा के सारे तत्व सन्निहित हैं। समस्त तत्वों से मनुष्य जीवन विद्या प्राप्त कर सकता है। सृष्टि उनके लिए एक खुली हुई पुस्तक है। अपनी पिछली पीढ़ियों द्वारा अर्जित विद्या-अनुभवों से भी इस मार्ग में पर्याप्त
लाभ उठाया जा सकता है। बुद्धि और कल्पना के क्षेत्र में बने हुए नक्शों के अनुसार पथ पर चलना कितना सहायक होता है तब कि अनजान लोग उसी पथ पर ठोकरें खाते, गिरते पड़ते सीखते चलने में भारी कष्ट उठाते हैं।
आधी दृष्टि भीतर आधी बाहर-
जीवन विद्या का स्कूल कालेजों की तरह कोई मर्यादित पाठ्यक्रम नहीं। यह समुद्र की तरह अमर्यादित है। न्यूटन से किसी ने उनकी ज्ञान गरिमा की प्रशंसा की, इस पर उन्होंने कहा-भाई- अभी तो मैंने समुद्र के किनारे पड़े कुछ कण ही प्राप्त किये हैं, विशाल विद्या वारिधि तो बहुत बड़ा है। जीवन विद्या का क्षेत्र व्यापक है। उसके लिए जीवन भर प्रयत्न चलते रहना आवश्यक है। आधा समय लौकिक जीवन के लिए और आधा जीवन विद्या के लिए होना आवश्यक है। लौकिक जीवन में अक्षर ज्ञान, पेशा, व्यापार, व्यवहार, पारिवारिक कर्तव्य आदि सभी आ जाते हैं। आधा समय जीवन विद्या के लिए लगाया जायगा तभी सफलता की मंजिल तय हो पाती है। योगी की अर्धोन्मीलित दृष्टि का यही रहस्य है। वह आधी नजर से सृष्टि को देखता और आधी से अन्तर ज्ञान, जीवन विद्या में लगा रहता है। इस तरह अन्तर्बाह्य जीवन के योग से पूर्णता प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त होता है। बाह्य शिक्षा का समन्वय आन्तरिक शिक्षा से होने पर ही शिक्षा की पूर्णता और सार्थकता सिद्ध होती है।
गुणाधिकान्मुदं लिप्से दनुकोशं गुणाधमात् मैत्रर समानादन्विच्छेन्न तायैरभि भूयते।
श्रीमद्भागवत् 4। 8। 34
अपने से अधिक गुण वालो से आनन्द प्राप्त करें, कम गुण वालों के प्रति दयाभाव रखे और समान, गुण वालों से मित्रता रखे, ऐसा मनुष्य सन्तापों से व्यथित नहीं होता।
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है मानव जीवन का ध्येय आत्म-तोष प्राप्त करना है, और आत्म-तोष की प्राप्ति का उपाय मानवीय सामर्थ्य का विकास करना है। सामर्थ्य का विकास साधना से होता है और साधना तप के बिना पूरी नहीं होती। अपने जीवन का तुम कुछ भी ध्येय बनाओ किन्तु उसके लिए तुम्हें गहरी साधना, निरन्तर परिश्रम का तप करना पड़ेगा।
जीवन के अपने ध्येय की पूर्ति के लिए तप की कठिन परिश्रम की आवश्यकता पड़ती है। निरन्तर की साधना और परिश्रम ही तप के पुण्य-नाम से पुकारे जाते हैं। किन्तु तप के साथ ही त्याग का शब्द भी जुड़ा हुआ है। जो तप त्याग के लिए किया जाता है वही तप है। तप के लिए करना, तप नहीं कहा जा सकता। उससे शारीरिक और मानसिक विकारों का प्रादुर्भाव होता है। उससे आत्म परितोष का उद्देश्य भी प्राप्त नहीं हो सकता। तप के साथ संग्रह को कोई स्थान नहीं है। दीपक तपता जलता है, दूसरों को प्रकाश देने के लिए। प्रकृति स्वयं ग्रीष्म में तपती है, धरती पर पावस के आगमन के लिए। सूर्य तपता है लोकों में जीवन फूँकने के लिए। गाय जंगल -जंगल घूमती है लोगों को दूध देने के लिए। प्रकृति ने यह तप उसे सहज ही बता रक्खा है।
सर्व लोक हिताय-सर्वजन सुखाय-
यही नियम मानव जीवन में भी लागू होता है। जीवन की तपस्या सर्व लोक हिताय सर्व जन सुखाय हो तभी वह तप की श्रेणी में आती है। एक व्यापारी अपनी श्रीवृद्धि के लिए दिन रात कितनी दौड़ धूप करता है, एक मजदूर सुबह से शाम तक पसीना बहाता है, किन्तु उनकी अपेक्षा निस्वार्थ भाव से संसार के कल्याण की कामना का चिन्तन करने वाले, सबको सन्मार्ग दिखाने वाले लोकसेवी अधिक पूजनीय माने गये हैं। क्योंकि त्याग की व्यापक भावना रख कर श्रम करना, साधना करना ही तप कहलाता है। दूसरे लोगों के हितार्थ, दूसरों की सेवा के लिए अपने शरीर पर कष्ट सहना, समष्टि के लाभ की चिन्ता रख कर कोई भी दृढ़ प्रयत्न करना तप है। किन्तु शरीर को व्यर्थ कष्ट देकर आत्म कल्याण और दूसरों का हित चाहने वाले इस अमूल्य साधन को क्षीण करते हैं और वह तप नहीं कहला सकता। केवल शरीर के भरण-पोषण, आराम सुख के लिए ही सदैव प्रयत्न करना भी तप नहीं। मजदूर, व्यापारी, अन्य पेशेवर लोग क्या कम श्रम करते हैं? किन्तु उन्हें तपस्वी नहीं कहा गया।
निस्वार्थता और आत्मतुष्टि-
स्वार्थ के लिए अथवा तप को ही लक्ष्य बना कर किया गया तप आत्म तुष्टि नहीं कर सकता, उस से जीवन में सन्तोष नहीं मिलता। इससे तो अभिमान की वृद्धि होकर मनुष्य विकारग्रस्त हो जाता है। उस तपस्वी की कथा प्रसिद्ध है जिसके देखने पर चिड़िया जल कर भस्म हो गई थी, किन्तु गृहस्थ स्त्री, तुलाधार वैश्य, और माँस विक्रेता के यहाँ जाकर उसके तप का अभिमान नष्ट हुआ। विश्वामित्र को तप का अभिमान हुआ, जिससे उनका पतन हो गया। रावण के तप से उसकी श्री समृद्धि बढ़ी किन्तु स्वार्थ भाव के कारण उसका पतन हुआ।
महात्मा बुद्ध ने अपने राजभवनों के सुखोपभोग छोड़े। जंगल में जाकर तप किया। कई वर्षों तक कठोरता के साथ तप साधना की, सारा शरीर कृश हो गया किन्तु उन्हें आत्म शक्ति नहीं मिली। किन्तु जब उन्होंने ग्रामीण लड़की से खीर खाई और फिर मध्यम मार्ग का अनुसरण किया, लोक कल्याण के लिए उन्होंने अपने तपस्वी, एकाकी जीवन का त्याग किया तब उन्हें आत्म-तोष प्राप्त हुआ। उन्होंने तप और त्याग दोनों को ही लोक कल्याण के लिए किया। जब तक उन्हें अपने तप और त्याग का अभिमान रहा उन्हें आत्म शान्ति नहीं मिली। महाराजा शिखिध्वज ने अपना राजपाट छोड़ कर तप के लिए जंगल की शरण ली और कष्टों का वरण किया फिर भी उन्हें शान्ति नहीं मिली। जब उनकी स्त्री चूड़ाला ने ब्रह्मचारी के वेष में उन्हें उपदेश देकर सब प्रकार के अभिमान का त्याग कर लोक हित के लिए तप करने का उपदेश दिया तो उनकी ग्रन्थियाँ सुलझ गईं और वे राज काज करने लगे। तप का शुद्ध स्वरूप वह है जिसमें वह त्याग के लिए किया गया हो।
त्याग पर सृष्टि की निर्भरता-
विश्व विधान की माँग है प्रत्येक पदार्थ, वस्तु विश्व की विकास यात्रा में अपना योग दे। विकास के कार्यक्रम में अपने आपको खपा दे, बीज अपने आपको मिटा देता है विशाल वृक्ष निर्माण में वृक्ष अपनी जीवनी शक्ति असंख्य बीजों में, छोड़कर विकास की मंजिल में खप जाता है। सृष्टि का सौंदर्य बढ़ाये रखने तक ही पुष्प का जीवन है। प्रकृति का एक-एक पुर्जा, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, सृष्टि यन्त्र को विकास, सत्य, सौंदर्य, उन्नति की राह पर आगे बढ़ाने में अपना पूरा-पूरा योगदान दे रहा है। इसी में उसका महत्व और शक्ति निहित है।
जड़ अथवा जीव जगत के सभी पदार्थ विश्व की विकास यात्रा में अपना योगदान दे रहे हैं उत्सर्ग कर रहे हैं। यही बात मनुष्य पर लागू होती है। सृष्टि का सर्व श्रेष्ठ प्राणी होने से मनुष्य की तो और भी अधिक जिम्मेदारी है। जो मनुष्य इसे जीवन में स्थान देकर समष्टि के लिए अपना उत्सर्ग करते हैं, उनके विकार स्वतः ही धुलने लगते हैं और उन्हें नवीन जीवन शक्ति स्फूर्ति सामर्थ्य प्राप्त होती है। उन्हें जीवन में अहिर्निशि सन्तोष शान्ति प्रसन्नता का अनुभव होने लगता है।
व्यक्तिगत दृष्टिकोण का त्याग कर सार्वजनिक समष्टिगत भाव बनाकर तप श्रम किया जाए। अपने लिए नहीं वरन् विश्व यज्ञ में जीवन शक्ति की आहुति देकर आत्मयोग के रूप में यज्ञ का महान् पुण्य अधिक किया जा सकता है।
परमार्थ का पुण्य पथ-
दूसरों की सेवा, सहायता, समाज के उत्थान, मातृभूमि की सेवा, मानव जाति के कल्याण और विकास के लिए साहित्य, कला आदि की साधना से धरती पर परम सत्य, सौंदर्य शिव के सन्देश सुनाना आदि सभी माध्यमों में लग कर मनुष्य त्याग आत्मोत्सर्ग की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। छोटे से लेकर बड़े से बड़ा कार्य सभी सृष्टि के लिए अपना अपना महत्व रखते हैं। मेहतर का सफाई करना किसान मजदूर का श्रम, पूँजीपति का औद्योगिक कार्य, बुद्धिजीवी की विचार साधना, सरकारी नौकरी का कर्तव्य पालन सभी अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं यदि इन्हें समष्टि की भावना से पूरे पूरे प्रयास के साथ अनन्य भाव से किया जाय। इन सभी कार्यों से आत्म परितोष के उद्देश्य की पूर्ति होती है।
लौकिक जीवन को छोड़ना, धन सामग्री को छोड़ना त्याग नहीं है। दरिद्रों की सेवा के लिए स्वयं दरिद्र बनना मूर्खता है क्योंकि दरिद्रता और मूर्खता जुड़वाँ बहनें हैं। इसी तरह शरीर को कष्ट देना, सुखाना, क्षीण करना तप नहीं कहलाता। सब प्रकार के अभिमान का त्याग कर अपने शक्ति सामर्थ्य उपलब्धियों का उत्सर्ग करते रहना ही सच्चा त्याग है। दूसरों के हित कल्याण के लिए, स्वयं कष्ट सहना, शरीर और मन का उपयोग करना, दूसरे की सेवा में लगना, अपने सुख भोग स्वार्थ आदि में मन न जाने देना ही तप है। महाराज जनक, अशोक, बुद्ध, और इस युग में महात्मागाँधी, तिलक मालवीय जी आदि अनेकों महापुरुष इसी श्रेणी में आते हैं। भगवान राम का जीवन तप और त्याग की सजीव व्याख्या है। जन कल्याण के चिन्तक ऋषियों का आदर्श तप और त्याग के लिए प्रसिद्ध है।
सृष्टि की रचना हुए बहुत दिन बीत गये। मनुष्यों को प्रखर बुद्धि और अगणित साधन सुविधाएं प्राप्त हुईं, जिसके कारण वे प्रगति पथ पर तेजी से बढ़ने लगे और सुख शान्तिपूर्वक जीवन यापन करने लगे।
यह स्थिति देर तक न रही। वे अहंकार और स्वार्थ के वशीभूत होकर आपस में लड़ने झगड़ने लगे और उनकी प्रतिभा उन्हीं के लिए विपत्ति बन गई। इस नई विपत्ति से छुटकारा पाने के लिये वे बहुत सोचते और बहुत विचार करते रहे पर कोई सफलता न मिली। अन्त में उनने सृष्टिकर्ता विधाता के पास अपनी समस्या का हल पूछने के लिए जाने का निश्चय किया।
मनुष्य ब्रह्माजी के पास पहुँचे और अपनी सारी दुख गाथा कह सुनाई। विधाता ने ध्यान पूर्वक सब कुछ सुना और आश्वासन दिया कि तुम्हारी चिन्ता दूर होगी। हम अपने प्रतिनिधि धरती पर भेजेंगे, वे देवदूत तुम्हारा सब प्रकार कल्याण करेंगे।
प्रतिज्ञानुसार उन्होंने देवदूतों को धरती पर भेजा। वे अवतार धारण कर जहाँ-तहाँ विचरण करते रहे और सुधार के विविध प्रयत्न करते रहे। पर हाय री विडम्बना। उन बेचारों को मनुष्य के कोप ही भाजन बनना पड़ा। उपहास, निन्दा, व्यंग, विरोध और भर्त्सना के तीर उन पर छोड़े गये और किसी-किसी को तो जान से ही मार डाला गया। खिन्न मन से देवदूत वापस लौट गये और उन्होंने विधाता से अपनी असफलता की गाथा कह सुनाई। वे स्तब्ध होकर सब कुछ सुनते रहे और सोचते रहे, कैसा है यह विचित्र मानव प्राणी। बहुत दिन बीत गए। मर्त्यलोक की समस्या उलझती ही गई। पारस्परिक दुर्व्यवहार से सारी धरती नरक बन गई। मनुष्यों को कोई उपाय न सूझा तो वे पुनः ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। मनुष्य ने अभिवादन करने के उपरान्त प्रजापति से कहा-भगवन् आपने जो देवदूत भेजे थे, वे हमारा कुछ भला न कर सके, अब कोई दूसरा उपाय कीजिए। सृष्टिकर्ता ने कहा-तुम्हारा स्वार्थ और अहंकार जब तक न घटेगा तब तक हमारे पार्षद भी कुछ न कर सकेंगे। तुम्हारी शान्ति संदिग्ध ही बनी रहेगी। मनुष्य गिड़गिड़ाये और बोले-भगवन् आपकी सहायता हमें अपेक्षित है। इसके बिना हम शान्ति न प्राप्त कर सकेंगे।
ब्रह्माजी ने पुनः देवदूत भेजना स्वीकार कर लिया, पर यह शर्त लगा दी कि तुममें से जो स्वार्थ और अहंकार को घटा सकेगा उन्हीं की वे सहायता करेंगे।
मजबूरी में मनुष्य को यही स्वीकार करना पड़ा। देवदूत आते तो अभी भी हैं पर शान्ति उन्हीं को दे पाते हैं जो स्वार्थ और अहंकार छोड़कर उनकी बात सुनने को तैयार होते हैं। इस प्रकार मनुष्य की आकाँक्षा पूरी तो हुई पर आँशिक रूप में। जो अपना सुधार कर सके वे शान्ति पाते रहे और जिन्होंने केवल देवदूतों का सहारा तका, उन्हें कुछ न मिल सका। अपूर्ण मनुष्य की शान्ति आकाँक्षा इस प्रकार आज भी एक ऐच्छिक विषय बनी हुई है। विधाता की शर्त पर सहायता ही उसे प्राप्त हो रही हैं।
नम्रता नैतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र की वह भावना है, जो सब मनुष्यों में, सब प्राणियों में, स्थित शाश्वत सत्य से , ईश्वर से सम्बन्ध कराती है। इस तरह उसे जीवन के ठीक-ठीक लक्ष्य की प्राप्ति कराती है। जगत में उस शाश्वत चेतना का, ईश्वर का दर्शन कर, मनुष्य का मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है, वह आत्मविभोर हो कर कह उठता है-
“सिया राम मय सब जग जानी,
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी।”
घट घट वासी राम, परम सत्य के दर्शन कर, सन्तों ऋषियों ने उसे मस्तक नवाया। नम्रता का अर्थ ही है सर्वत्र आसीन शाश्वत ईश्वर की अनुभूति करना और उसे स्वीकार करना, महत्व देना।
आत्म विश्वास, शक्ति, सद्भावना, साहस, गम्भीरता, विनम्रता का ही दूसरा रूप है। जहाँ अनन्त शक्ति की उपस्थिति होती है वहाँ शाश्वत सत्य की अनुभूति होती है।
नम्रता की शक्ति-
नम्रता में शक्ति प्रियता और पदलोलुपता के लिये कोई स्थान नहीं है। क्योंकि ये सब अपने में, स्वार्थयुक्त, संकीर्णता से परिपूर्ण हैं जब कि नम्रता में सबका ध्यान, सबके पीछे अपने आपको गिनने का महत्व पूर्ण आदर्श है। जो अपनी शक्ति वृद्धि करेगा जो अपनी पदलोलुपता को चाहेगा, वह दूसरों को कुचलेगा, अपने लाभ के लिए। दूसरों का शोषण करेगा और विभिन्न प्रतिगामी कार्य करेगा जो नम्रता से मेल नहीं खाते। अतः स्वार्थ के लिये नम्रता में कोई स्थान नहीं। इसमें एकमात्र परमार्थ की ही गति है।
एक होती है हृदयहीन नम्रता, जिसमें अभिमानी मनुष्य अपने बड़प्पन को बनाये रखने अथवा बढ़ाते जाने के लिए झूठी नम्रता का स्वाँग करता है। ऐसी दिखावटी नम्रता का बाजार आज बहुत गर्म है। स्वार्थी, पदलोलुप, अभिमानी व्यक्ति ने नम्रता को भी अपने साधनों में से एक बना है। ऐसी दिखावटी नम्रता बड़ी खतरनाक है। सरल प्रकृति, सीधे स्वभाव के लोग अक्सर धोये जाते हैं।
मिथ्या भावुकता, आत्मविश्वास की कमी और हीन भाव युक्त गम्भीरता-विनम्रता भी नम्रता नहीं। इससे दूर रहा जाय।
पाप की परिभाषा-
विनोबा भावे ने कहा है-”संसार में दो तरह के पाप हैं। एक ही गर्दन जरूरत से ज्यादा तनी हुई है, घमण्ड के कारण अभिमान के कारण और दूसरे की जरूरत से ज्यादा झुकी हुई है। दीनता से दुर्बलता से। ये दोनों ही पाप हैं, एक उन्मत्त है दूसरा दबैल दुर्बल। गर्दन सीधी भी हो और लचीली भी लेकिन तनी हुई न हो और न झुकी हुई।”
यह स्थिति नम्रता में निहित है। अभिमान के लिए तो वहाँ कोई गुंजाइश ही नहीं है। नम्रता में दबैल होने का भाव इसलिए नहीं कि उसमें शाश्वत सत्य, ईश्वर की उपस्थिति का भाव रहता है।जिसकी सामर्थ्य के बल पर गर्दन सीधे रहती है और लचीली भी । क्यों कि वह सर्वत्र ईश्वर के दर्शन कर उसे स्वीकार करती है उसकी सामर्थ्य के समक्ष नतमस्तक होती है। लेकिन वह दीनता से झुकी हुई नहीं होती । वरन् सबमें स्थित ईश्वर के प्रति आदर सम्मान, विनय के लिए झुकी होती है।
सबकी सेवा का आधार-
सबमें ईश्वर की उपस्थिति देखकर उसे करने के साथ-साथ ही मनुष्य सब की सेवा के कटिबद्ध होता है । नम्रता मानसिक भाव है। उसका बाह्य, सक्रिय रूप सेवा है। सब की सेवा आध्यात्मिक एकता और समता का मूलाधार है। जहाँ जहाँ आध्यात्मिक अनुभूति-ईश्वरीय तत्व के दर्शन होंगे, मनुष्य वहीं सेवा के लिए अपने आपको प्रस्तुत करेगा। सेवा का मूलाधार है किसी व्यक्ति , पदार्थ में उत्कृष्टता, शाश्वत तत्व, अथवा किसी तरह की विशेषता के दर्शन करना और साथ ही उसे जीवन में स्वीकार करना।
सुधार की पुण्य प्रक्रिया-
आत्म सुधार की पहली आवश्यकता है अपने दोषों को स्वीकार करना, जो नम्रता से ही सम्भव है। अभिमानी आदमी अपने दोषों को कभी स्वीकार नहीं करता। फलतः उसके दोषों की जटिलता बढ़ती ही जाती है। नम्रता मनुष्य को उसकी सही स्थिति का ज्ञान कराती है। अपनी स्थिति का ज्ञान, अपने दोषों की स्वीकृति मनुष्य को आत्म सुधार के लिए पर्याप्त सामर्थ्य प्रदान करती है। महात्मा गाँधी ने जो नम्रता के एक बड़े उपासक थे, लिखा है-
“ऊँचे से ऊँचे वृक्ष भी आकाश को नहीं छू पाते। महानतम मनुष्य भी जब तक वे शरीर के बन्धन में हैं, दोषपूर्ण ही हैं। निर्दोष कोई मनुष्य नहीं, ईश्वर भक्त भी नहीं। पर इस कारण कि अपने दोषों को जानते हैं और अपने आपको सुधारने के लिए सदैव तैयार रहते हैं, वे ईश्वर के भक्त और महान पुरुष कहलाने के, निर्दोष होने के अधिकारी हैं।” इतना ही नहीं गाँधी जी ने फिर आगे सबके साथ अपनी समानता करते हुए लिखा है कि मैं उसी तरह दूषित हो जाने वाला शरीर का जामा पहने हूँ जैसा कि मेरे साथी मनुष्यों में दुर्बलतम पहने हुए हैं। और मैं उसी प्रकार भूलें कर सकता हूँ जैसे कि कोई और।
नम्रता मनुष्य को उसके निज स्वरूप का, दोषों का, स्थिति का ज्ञान कराती है, उन्हें स्वीकार करती है और सुधारने की प्रेरणा भी। मनुष्य के सुधार का, उन्नति का यही मूलाधार है। जहाँ अभिमान के कारण अपने दोषों की स्वीकृति नहीं, अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान नहीं, वहाँ सुधार के लिए कोई रास्ता नहीं, सिवाय इसके कि मनुष्य अपने दोषों को और भी जटिल बनाये।
प्रबल पुरुषार्थ का उद्गम-
नम्रता का अर्थ आलस, सुस्ती, हीनता का भाव नहीं,। नम्रता, प्रबल, तीव्रतम पुरुषार्थ है, वह पुरुषार्थ जो सबके कल्याण के लिए होता है। नम्रता का पुरुषार्थ किसी आक्रमणकारी सिकन्दर, नैपोलियन, डाकू या सेनापति का उद्दण्ड संकीर्ण पुरुषार्थ नहीं, यह है सार्वभौमिक पुरुषार्थ जिसके समक्ष इनकी कोई सत्ता ही नहीं। महात्मा बुद्ध की नम्रता के प्रबल पुरुषार्थ ने अंगुलिमाल जैसे खूँख्वार डाकू को भी भिक्षुक बना दिया। उन्होंने अपने प्रबल पुरुषार्थ से युग की गति को ही बदल दिया। प्रबल पुरुषार्थ था ईसामसीह का, जिसने उस समय के सशक्त रूढ़िवादी, साम्राज्यशाही, अन्धविश्वासों के विरुद्ध आवाज उठाई और लोगों को एक नई दिशा प्रदान की। सिकन्दर अपनी स्वाभाविक मृत्यु पर भी रोता हुआ मरा था। बड़े-बड़े शूरवीरों ने मृत्यु के समय आँसू बहाये। किन्तु एक वह था नम्रता का पुजारी ईसामसीह जिसने काँटों का ताज पहना था। क्रूस पर चढ़ाने पर भी विरोधियों के पाप क्षमा करने के लिए भगवान से प्रार्थना की थी।
नम्रता की महान् शक्ति थी महर्षि वशिष्ठ में जिन्होंने विश्वामित्र जैसे अभिमानी, अपने बच्चों के हत्यारे का भी हृदय बदला था, ब्रह्मर्षि बना दिया।
धीरता और वीरता का चिन्ह-
नम्रता एक प्रबल पुरुषार्थ है सबके हित के लिए जिसमें अन्यायी को मिटाने की नहीं वरन् उस अत्याचार को सहन करके उसे जीतने उसे सुधारने का, ठोस विज्ञान है। यह भूल सुधारने का एक साधन है, जिसमें दूसरों को कष्ट न देकर स्वयं कष्ट सहन करने की क्षमता है। हिंसात्मक प्रयास या दण्ड व्यक्ति पर आक्रमण करते हैं-बुराई पर नहीं, किन्तु नम्रता और सौजन्य सबके प्रति सेवा एकता की अनुभूति से बड़े-बड़े दोष, बुराइयां भी धुल जाते हैं। महात्मा गाँधी ने नम्रता की शक्ति और इसके प्रबल पुरुषार्थ से ब्रिटेन जैसे शक्ति शाली राष्ट्र को भारत छोड़ने के लिए विवश कर दिया।
दुर्बल कौन? वही जो अपने सीमित शरीर साधन, वैभव, ऐश्वर्य को अपनी शक्ति का आधार मानते हैं। क्योंकि इस तरह की शक्ति का दायरा सीमित है, संकीर्ण हैं, देश काल पात्र की सीमा में मर्यादित है।
शक्ति शाली कौन? वही जो विश्वात्मा से, अनंत-शक्ति के केन्द्र से जुड़ा हुआ है। और नम्रता से ही, शाश्वत ईश्वर की अनुभूति सम्भव है। विश्वात्मा से सम्बन्धित बाह्य साधनों के अभाव में भी अनंत शक्तिशाली है, उसकी विजय निश्चित है। वही पुरुषार्थ है।
संघर्षों का समाधान-
सारे संघर्ष, लड़ाई, झगड़े, रागद्वेष, कलह इसी कारण हैं कि अभिमान ग्रस्त मनुष्य अपने आपको सबसे आगे देखने का यत्न करता है और दूसरे को पीछे। इस आगे-पीछे के संघर्ष से ही यह विषाक्त बातें फूट पड़ती हैं। किन्तु नम्रता इसका परिहार करती है। नम्रता का नियम है, सारे जीवों के अन्त में अपनी गिनती करना, पहिले नहीं। अपनी पहल-यह तो अभिमानी का नियम है। जब मनुष्य मात्र सबको आगे स्थान देकर अपने लिये पीछे गिनने लगेंगे तो यह सारे संघर्ष ही समाप्त हो जायेंगे। बड़प्पन का यही नियम भी है कि जो व्यक्ति बड़ा बनने की कोशिश करेगा, वह सबसे छोटा बनता दिखाई देगा।
अहंकार का उन्मूलन-
नम्रता का अर्थ है अहंता के बन्धन तोड़ देना और अहंता के बन्धन तोड़ना, नम्र होना, विश्वात्मा के साथ एकता स्थापित होना सब एक ही अर्थ रखते हैं। इस तरह नम्रता मुक्ति का सरल साधन है, नम्रता से ही आत्मसमर्पण की वृत्ति पैदा होती है। गीता का लम्बा चौड़ा उपदेश देने पर भी भगवान कृष्ण को अर्जुन से यही कहना पड़ा-
“सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
अहत्वा सर्व पापेभ्यो मोक्ष यिष्यामि माशुच।
“सब धर्मों को छोड़कर हे अर्जुन तू मेरी शरण में आ, मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा।” “और भी “योगक्षेमं वहाम्यहम्।”
नम्रता के मानी हैं विश्वात्मा की अनुभूति और उसके लिए आत्मसमर्पण का भाव, इसके फलस्वरूप जीवन में मुक्ति प्राप्त करना सम्भव है। आत्म समर्पण अर्थात् पूर्णतया अभिमान का त्याग, नम्रता का परिपूर्ण वरण।
स्वयं अपनी प्रचारक है-
नम्रता और इसके कार्य ही स्वयं सज्जनता के प्रचारक हैं। ये एक सार्वभौमिक नियम होने से स्वयं प्रकाशित हैं। नम्रता युक्त कार्य विरोधियों को ठण्डा करते हैं और अनुगामियों की संख्या बढ़ाते हैं। महात्मा बुद्ध के संपर्क में जो आ जाता वह उनका हो जाता था। उन्होंने किसी प्रेस, विज्ञापन, प्लेटफार्म की चिन्ता नहीं की थी। उनके संपर्क से जो लोग उनके अनुयायी बने यह उनकी नम्रता की शक्ति का आकर्षण था। उनके पिता राजा होते हुए भी उनके कोई अनुयायी बनने के घटना नहीं। बड़े-बड़े सम्राट, वैभवशाली व्यक्ति यों को लोग महत्व नहीं देते, किन्तु नम्रता युक्त महान् आत्माओं के लिए लोग अपना सर्वस्व निछावर करने के लिए तैयार हो जाते हैं।
भगवान ने गीता में युग बदलने के लिए अवतार लेने की प्रतिज्ञा की है। यह अवतार जन-मानस में उत्साह और संकल्प के रूप में ही उत्पन्न होता है। भगवान निराकार है, सूक्ष्म है, इसलिए उनका अवतरण भी जन-मानस की सूक्ष्म चेतना भावना एवं प्रेरणा के क्षेत्र में ही हो सकता है। इस प्रेरणा से प्रेरित होकर कई अवतारी महापुरुष भी जन्म लेते हैं और उनके पीछे अनेकों अनुयायी उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सहयोग देने को तत्पर हो जाते हैं।
राजनैतिक स्वतन्त्रता की आकाँक्षा जब जनमानस में जागृत हुई तो उसकी पूर्ति के लिए अनेकों अवतारी महापुरुष निकल आये। गाँधी जी मालवीय जी, लोकमान्य तिलक, नेहरू, पटेल, सुभाष, आदि अगणित महान आत्माएं प्रस्फुटित हुईं और उनके प्रयत्न से जन-मानस में स्वाधीनता की आकाँक्षाएँ लहर मारने लगीं। जब तक यह आकांक्षाएं प्रबल नहीं हुई थीं तब तक गत 200 वर्षों में स्वराज्य का आन्दोलन किसी न किसी रूप में चल रहा था पर न तो उसका व्यापक रूप बन पाया था और न उतने प्रभावशाली नेता सामने आ पाये थे। उद्वेलित जन-मानस ही अवतारों का पिता है। भगवान का अवतार कब किस रूप में होने वाला है उसकी परीक्षा उद्वेलित जन-मानस का अनुमान लगाकर ही की जा सकती है।
असन्तोष और उसका प्रतिकार-
कंस के विरुद्ध अत्याचार पीड़ित जनता की, उसके शासन को हटा देने की आकाँक्षा ने ही कृष्ण को आगे लाकर खड़ा कर दिया था। गोप बालकों ने, गोपियों ने तथा असंख्य जनता ने, विविध प्रकार से भगवान कृष्ण को सहयोग देकर उन्हें विजेता और नेता के रूप में प्रस्तुत किया था। भगवान राम के अवतार की पृष्ठभूमि में असुरों के अत्याचार के प्रति छाया हुआ असंतोष ही काम कर रहा था। कथा प्रसिद्ध है कि ऋषियों ने शोक संतप्त होकर अपना-अपना रक्त संचय करके एक घड़ा भरा था और उससे सीता का जन्म होकर असुरों के विनाश की व्यवस्था बनी थी। राम अकेले ही रावण को कहाँ मार पाये थे? रीछ बन्दरों तक ने, गिलहरी और गिद्धों तक ने उनका सहयोग किया था। साधारण जनता की तो बात की ही क्या थी, वह तो प्राण-पण से उनके साथ ही थी। जन-मानस असुरता के अत्याचारों से मुक्ति पाना चाहता था तो राम-लक्ष्मण, हनुमान, अंगद, नल-नील आदि अनेक पराक्रमी प्रस्फुटित हो उठे। विभीषण जैसे सज्जन तो ऐन मौके पर उनसे आ मिले।
भगवान बुद्ध के साथ अगणित विद्वानों और भिक्षु भिक्षुणियों का सहयोग होना इस बात का चिन्ह है कि उस जमाने की धार्मिक विकृतियों और अनैतिकताओं से जनता क्षुब्ध हो उठी थी और जो भी अनुकूल नेता सामने आये उसका पूर्ण सहयोग करने लगी। लेनिन को रूस में साम्यवादी सत्ता स्थापित करने का श्रेय इसीलिए मिला कि वहाँ की जनता तात्कालिक जार के शासन से क्षुब्ध हो रही थी। वह स्वयं ही बगावत कर रही थी, साम्यवादियों को तो संयोगवश उनका नेतृत्व करके सत्ता हथिया लेने का अवसर मात्र मिल गया ।
जन-सहयोग के अभाव में कोई भी महापुरुष युग परिवर्तन जैसा महान कार्य कदापि प्रस्तुत नहीं कर सकता। जन-भावना की प्रबलता को ही भगवान की प्रेरणा कहते हैं, यही अवतार का सूक्ष्म रूप है, जो उसका स्थूल रूप से किन्हीं भी साधारण या असाधारण व्यक्ति यों के सिर पर सफलता का सेहरा बाँध देता है। इस तत्व के अभाव में बड़े से बड़े योग्य और प्रतिभाशाली व्यक्ति भी असफल रहते हैं और बहुत चाहते एवं करते हुए भी कृतकार्य नहीं हो पाते ।
अभद्रता, आलस्य और अनुदारता की भाँति ही आज अविवेक और असंयम भी जिस प्रकार बढ़ रहे है उनके कारण मानव जीवन दिन-दिन कठिन बनता चला जा रहा है। असुरता के यही पाँच लक्षण हैं। जिन व्यक्तियों में यह दुर्गुण होंगे वे असुर कहे जाएंगे और उनका समाज असुर-समाज कहलावेगा। असुरता का परिणाम आपत्ति, असन्तोष एवं अशान्ति ही हो सकती है। इतिहास साक्षी है कि संसार में जब जब असुरता बढ़ी है, तब -तब दुःख दारिद्र के पहाड़ टूटे हैं और मानव को देवत्व की स्थापना और असुरता के निवारण का सामूहिक प्रयत्न करना पड़ा है। इसी को अवतार भी कहते हैं। अवतार का उद्देश्य युग-निर्माण एवं युग-परिवर्तन ही होता है। स्मरण रखने की बात यही है कि यह अवतार धारण करने का आश्वासन मिलता रहा है।
एक बार देवता जब असुरता के त्रास से बहुत संत्रस्त हो गये तो सहायता के लिए ब्रह्माजी ने उन सब में से थोड़ी-थोड़ी शक्ति निकाली और उसे इकट्ठा करके एक नई देवी बना कर खड़ी कर दी, इसका नाम रखा और दुर्गा। इस दुर्गा ने अपना विकराल रूप धारण करके बात की बात में असुरों का सफाया कर दिया। दुर्गा-अर्थात् संघ-शक्ति । पृथक-पृथक रूप से देवताओं के समान सुयोग्य व्यक्ति भी दुर्बल ही रहते हैं, और उन्हें पराजय का मुँह देखना पड़ता है। पर संगठित होकर वे एक सजीव एवं प्रचंड शक्ति का दुर्गा रूप धारण कर लेते हैं। अवतार का यही रहस्य है। युग परिवर्तन के लिए भगवान की प्रतिज्ञा है कि जब धर्म घटेगा और अधर्म बढ़ेगा तो उसके प्रतिकार के लिए वे अवतार धारण करेंगे। भगवान का अवतार जल्दी ही हो, बढ़ा हुआ अधर्म नष्ट हो और घटा धर्म बढ़े, यह चाहना भी की जाती है। फिर भी अवतार नहीं होता। अवतार कितना जल्दी हो, कितना सशक्त हो, यह इस बात पर निर्भर है कि जनता के मन में अधर्म के प्रति विक्षोभ की प्रतिक्रिया कितनी तीव्र हुई, वह उस परिवर्तन के लिए कितनी अधीर और कितनी कटिबद्ध है। त्रेता में समुद्र बाँधने के समय गिलहरियों तक ने राम को सहयोग दिया था। वे अपने बालों में धूलि भर लाती और समुद्र में झाड़ जाती थी ताकि समुद्र जल्दी पट जाए। यह प्रवृत्ति जब हर योग्य, अयोग्य, समर्थ, असमर्थ में पैदा हो जाती है तो अवतार को तत्क्षण अवतरित होना पड़ता है और अधर्म के नाश एवं धर्म स्थापना की अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करना पड़ता है।
स्मरण रखना चाहिए कि एक समय में अनेक अवतार एक साथ होते हैं। विशेष श्रेय भले ही एक को मिले पर उस कार्य की सफलता अनेकों द्वारा सम्पन्न होती है। राम के काल में लक्ष्मण, परशुराम, हनुमान आदि अनेकों अवतारों की आत्माएं काम कर रही थीं। कृष्ण के समय बलराम, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर आदि कितने ही अवतारी मौजूद थे। अब अनीति के विरुद्ध विद्रोह और नीति के प्रति बढ़ती हुई जन भावना जब पूर्ण रूप से प्रबल हो उठेगी, वह प्रबलता इतनी हो उठेगी कि उस कार्य में गिलहरी की तरह सहयोग दिये बिना किसी से रहा ही न जाए, तब तत्काल अवतार का अवतरण होगा और वर्तमान परिस्थितियाँ बदलते और धर्म राज्य आते देर न लगेगी।
जिन वस्तुओं से जितना अधिक काम लिया जाता है वह उतनी ही चमकीली बनती हैं। बेकार पड़ी हुई वस्तुओं तो को जंग लग जाती है। जो मशीन काम में आती रहती हैं वे जल्दी ही खराब नहीं होती। बेकार पड़ी हुई मशीन कुछ ही समय में बेकार हो जाती है। उनके बाह्य आकार से लेकर आन्तरिक सूक्ष्म पुर्जे तक खराब, अनुपयोगी हो जाते हैं। मानव शरीर तो अन्य मशीनों से बहुत ही महत्वपूर्ण चेतन और जड़ की सम्मिलित रचना का सर्वोपरि नमूना है। उद्योग के अभाव में, बेकारी में शरीर और मानसिक स्थितियाँ विकृत हो जाती हैं, मनुष्य को मानसिक और शारीरिक रोगों को शिकार होना पड़ता है।
श्रम ही चमकता है
उद्यमशील व्यक्ति यों का मुख मण्डल सदैव चमकता हुआ दिखाई देता है और अकर्मण्य व्यक्ति सदैव क्लाँत, उद्विग्न, दुःखी और खोटी कल्पनाओं में फँसे देखे जाते हैं। परिश्रमी ही सबसे अधिक सुखी, प्रसन्न और सन्तुष्ट रहते हैं। वे भले ही भौतिक सम्पत्ति, समृद्धि में बड़े न हों किन्तु उनका आन्तरिक धन, जिसमें मानसिक सन्तोष, हल्केपन, और प्रसन्नता का वे अनुभव करते हैं वह संसार की सबसे बड़ी सम्पत्ति है।
परिश्रम से ही स्वास्थ्य में सुधार होता है। उद्यमी व्यक्ति थक कर अपनी शय्या में प्रवेश करता है और उसे स्वास्थ्यवर्धक उत्तम नींद आती है। प्रातः उठने पर वे तरोताजगी, प्रफुल्लता, व्यक्ति, प्रसन्नता का अनुभव करते हैं। आलसी, अकर्मण्य ही दुःस्वप्नों, अनिद्रा में पड़े हुए सुबह भी आलस्य, चिन्ता-भार सा महसूस करते हुए उठते हैं।
परिश्रम, कर्म ही जीवन की स्थिति का कारण है। अकर्मण्यता, आलस्य मृत्यु की ओर अग्रसर होने का प्रयत्न है। गति (स्पन्दन) हीन लाश को लोग जल्द ही नष्ट कर डालते हैं। जब तक सोना है तब तक सोते रहे किन्तु जागते हुए रह कर आलस्य में, उद्योगहीनता में समय बिताना पतन, मृत्यु को निमंत्रण देना है।
आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
परिश्रम, उद्योग जीवन की प्राथमिक आवश्यकता है, जिसकी पूर्ति के बिना अन्य आवश्यकता के लिए कोई स्थान नहीं है। भोजन, वस्त्र और जीवन की सभी आवश्यकताओं के लिए श्रम किया जाए, श्रम से ही इनकी प्राप्ति की जाए। बिना श्रम के अपनी आवश्यकता पूर्ण करना चोरी है। जिस तरह चोर किसी का धन, सम्पत्ति चुरा कर अपनी आवश्यकतायें पूर्ण करता है। वैसे ही श्रम के अभाव में जीवन की साधन सम्पत्ति जुटाना चोरी के साथ ही दूसरों का शोषण है। क्योंकि साधनों का अस्तित्व श्रम से ही है। दूसरों के श्रम से उपार्जित वस्तुओं का उपभोग, बिना श्रम का बदला चुकाये करना चारीडडडडडड शोषण तो है ही। अपनी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किसी न किसी रूप में श्रम करना आवश्यक है।
रोटी के लिए श्रम सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए महात्मा और उनके पूर्व चिन्तकों ने एक नई प्रेरणा मानव जाति को दी है। भारतीय जीवन व्यवस्था में तो हमारे ऋषियों ने पहले ही इसका व्यवस्थित कार्यक्रम बनाया था, और उसके अभ्यास के लिए जीवन के प्रारम्भ के वर्षों में ब्रह्मचारी को गुरु के आश्रम में रहकर कठिन श्रम करना पड़ता था। महाराजा जनक जैसे ज्ञानी भी हल चला कर जीवन निर्वाह की वस्तु उपलब्ध करते थे। आध्यात्मिक साधनाओं में लीन ऋषि मुनि भी वन के कन्दमूल फल, अथवा खेत में बिखरे पड़े रहने वाले दानों से जीवन निर्वाह करके अपना सम्पूर्ण समय लोक कल्याणार्थ आध्यात्मिक साधनाओं में बिताते थे। महर्षि दुर्वासा, कणाद, पिप्पलाद आदि इसी आदर्श के प्रतिष्ठापक थे। किन्तु हम श्रम के इस महत्व को भूल गये और इसी कारण आलस्य, अकर्मण्यता से हमारा पतन हुआ।
ज्ञान और कर्म का सम्बन्ध
ज्ञानी, ज्ञान की बातें कहना मात्र अपना काम समझने लगे। ब्राह्मण दान, दक्षिणा, भिक्षा को अपना अधिकार-सा समझने लगे। राजा महाराजा अपने आपको धरती पर भगवान का रूप समझने लगे। वणिक वृत्ति के लोगों ने बिना श्रम के तिकड़म, चालाकी, बुद्धि के चातुर्य को अपना पेशा मान लिया । उत्पादन का सारा बोझ किसान पर पड़ गया । किसान का शोषण होने लगा और उसे समाज का निम्न अंग मान लिया गया। फलतः आज तक भी किसान अपनी दीनावस्था में पड़े हुए हैं। अकर्मण्यता, आलस्य आदि ने हमारे पौरुष को ही नष्ट कर दिया। पुरुषार्थ, स्वाभिमान, उत्साह को दबा दिया। बिना श्रम के हमारा उत्थान भी नहीं हो सकता। भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, चोरी, बेईमानी मिलावट, धोखाधड़ी और इसके साथ ही फिजूलखर्ची, अपव्यय, फैशनपरस्ती का अस्तित्व उन कुसंस्कारों का परिणाम ही है जिनका परिष्कार श्रम की प्रतिष्ठा करने पर ही होगा।
पश्चिमी देशों ने श्रम के बल पर अपनी भौतिक और शारीरिक क्षमताओं में सर्वोपरि स्थान प्राप्त कर लिया। वे कुछ ही वर्षों में संसार के शक्ति -शाली समृद्ध राष्ट्र बन गये। यह हमारे लिए अनुकरणीय है।
दबाव से नहीं प्रेमपूर्वक
श्रम स्वेच्छापूर्वक किया जाना चाहिए। दबाव द्वारा अथवा किसी भय के कारण श्रम एक भार बन जाता है और जीवन के आकर्षण को नष्ट कर देता है। श्रम में जो सुखद आनन्द मिलना चाहिए वह नहीं मिलता। दबाव से मनुष्य का शरीर काम में लगा रहता है किन्तु मन साथ नहीं देता। ऐसी अवस्था में काम को टालने अथवा उसको जैसे-तैसे पूरा करने की भावना, अथवा सुघड़ता से करने की लगन में अभाव से कार्य के उपयुक्त परिणाम की आशा नहीं की जा सकती।
श्रम से प्रेम करना ही श्रम का सही आधार है प्रेमपूर्वक खूब श्रम करना और श्रम से उत्पन्न आमदनी, उत्पादन का भाग अपनी जरूरी आवश्यकता की पूर्ति में लगा कर शेष को समाज की सेवा में, जन कल्याण में लगा देना और फिर श्रम करने के लिए तैयार रहना श्रम की प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन का संग्रह करते रहने से जब आवश्यकता पड़ने पर सरलता से उसकी पूर्ति हो जाती है तो श्रम की आवश्यकता महसूस नहीं होती और मनुष्य श्रम से जी चुराने लगता है। इसीलिए भारतीय जीवन दर्शन में परिग्रह का निषेध करके दान, त्याग परोपकार को आवश्यक धर्म कर्तव्य बताया गया है जिससे मनुष्य के पास कुछ संग्रह ही न हो और वह श्रम के लिए सदैव तैयार रहे।
इस तरह श्रम अस्तेय के सिद्धांत का निष्कर्ष है और अपरिग्रह की सिद्धि का साधन है। श्रम-शील चोर नहीं होता वह अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति स्वयं करता है। वही अपरिग्रही हो सकता है क्योंकि त्याग दान आदि के लिए उसके पास सच्ची कमाई है। हजारों आदमियों के श्रम से उत्पन्न साधन सम्पत्ति का मालिक बनने वाला एक करोड़पति यदि एक लाख रुपये समाज सेवा अथवा दान आदि में लगा देता है तो वह कोई बड़ी बात नहीं हुई। उसका पुण्य एक लोक दिखावा मात्र है, वास्तविक पुण्य नहीं। इसके विपरीत अपने श्रम से उत्पादन करने वाला एक किसान लोक कल्याण के कार्यों में कुछ रुपये भी लगा देगा तो सिद्धान्ततः वह बड़ा परोपकारी, समाज सेवक, परमार्थ प्रिय माना जाना चाहिए।
श्रम के वरदान
श्रम से जीवन में सुख शान्ति सन्तोष प्राप्त होता है क्योंकि अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति का आधार मनुष्य स्वयं होता है। स्वावलम्बन, आत्म निर्भरता एवं श्रमशीलता ही मनुष्य को सच्ची आत्म शान्ति प्रदान करते हैं। शोषक, चोर, परावलम्बी सदैव असन्तुष्ट दुःखी परेशान क्लेश युक्त देखे जाते हैं। गाँव का एक किसान अधिक सीधा, सरल, उत्साही और प्रसन्न है, रहता बनिस्बत एक चोरबाजारी करने वाले, रिश्वतखोर, धोखाधड़ी करने वाले के। श्रम और स्वास्थ्य का तो अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। अकर्मण्य आलसी, दूसरों के श्रम पर जीने वाले सदैव रोगी, निर्बल, क्षीणकाय देखे जा सकते हैं। शहरी जीवन चाहे वह अन्धेरे में रहने से, लीपा पोती करने से, वायु भर जाने से कितना ही सफेद मोटा, ताजा आकर्षक दिखाई दे, किन्तु गाँव के दुबले पतले कृषक के सामने उसके स्वास्थ्य का खोखलापन सरलता से जाना जा सकता है। क्षय, बुखार, दमा, पेट के रोग, स्नायविक विकार, जितने शहरी जीवन में घुसे हुए हैं उतने देहाती जीवन में नहीं देखे जाते। देहात आज भी श्रमशीलता के मन्दिर बने हुए हैं जिनकी तीर्थ यात्रा करे बिना हमारे समाज और राष्ट्र का उत्थान नहीं हो सकता। श्रम-केन्द्र देहातों को महत्व देकर ही हम अपने अस्तित्व को कायम रख सकते हैं। शहरों में श्रम की उपेक्षा करके जो कृत्रिम वातावरण बना, फैशनपरस्ती बढ़ी विलासिता पनपी उसी ने वहाँ स्वास्थ्य संकट पैदा कर दिया।
सादगी और सरलता का मार्ग
श्रम और स्वास्थ्य की तरह नैतिक सद्गुण तथा सादगी का भी निकटतम सम्बन्ध है। जहाँ श्रम होगा, मिट्टी, खान, जंगल, और निर्माण केन्द्र काम होता होगा। वहाँ बनाव शृंगार की, फैशन परस्ती की कोई गुंजाइश नहीं है। ग्रामीण जनता को कहाँ फुरसत है इसके लिए। कभी देखा है किसी खेत, गौशाला, में काम करती ग्रामीण स्त्री को फैशन की चमक-दमक भरी साड़ी पहने, मुँह पर तरह-तरह के रंग पोते। किसी किसान को कभी देखा है मोजे चमकदार जूते चढ़ाये क्रीज्ड पैंट कोट टाई हैट लगाये आँखों पर चश्मा चढ़ाये , जब वह अपने हल पर काम करता है। वही सीधा साधा परिधान “चार रोटी-एक लंगोटी” और उस पर भी हँसता गाता प्रफुल्लतापूर्ण जीवन। बादलों को देख कर वह मस्ती, खेतों की हरियाली छटा में से नवरक्त का संचार ये श्रमदेव के अमूल्य वरदान उन्हें ही प्राप्त होते हैं।
स्वामी दयानन्दजी अपने गुरु के आश्रम की झाडू लगाते, आश्रम का पानी भरने से लेकर सभी काम वे स्वयं करते। एक दिन जल्दीबाजी में किसी दूसरे काम में लग जाने से झाडू तो निकाल दिया किन्तु कूड़े को एक ओर लगा दिया सोचा बाद में फेंक देंगे। बाहर से तो विरजानन्द जी अन्धे थे किन्तु उनकी अंतर्दृष्टि से दयानन्द जी की यह ढिलाई और बाद के लिए काम को टाल देने की बात कैसे छिप सकती थी? कुटिया में प्रवेश करते समय गुरुजी का पैर कूड़े के ही ढेर पर पड़ गया। अब तो दयानन्दजी पर वह मार पड़ी जिसका ठिकाना नहीं। उस समय लगी एक चोट का निशान हमेशा के लिए स्वामी जी के कन्धे पर बना रहा। किन्तु दयानन्दजी ने कहा- “गुरुदेव? मेरा शरीर कितना कठोर है आपके दुबले पतले कोमल हाथों में बड़ी चोट लगी होगी। आप इस तरह मुझे न मारा करें।” और वे गुरुदेव के पैर दबाने लगे।
विरजानन्दजी तो शिष्य को सहन शीलता का पाठ पढ़ा रहे थे। महर्षि की निगाह जब कभी अपने शरीर पर लगे उस चोट के निशान पर पड़ती अथवा कोई पूछता-”महाराज यह चोट कैसे लगी।” तो उनकी आँखें भर आतीं, गुरुदेव की याद करके और कहते-”यह गुरुदेव के उपकार की स्थूल निशानी हैं।”
स्वर्गीय लोकमान्य तिलक ने जब भारत की स्वतन्त्रता का नारा लगाया, “स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे” तब उनके साथ कुछ गिने-चुने व्यक्ति ही थे और दूसरी ओर संसार प्रसिद्ध ब्रिटिश शासन। किन्तु लोकमान्य का स्वर अनेकों का स्वर बना और एक दिन उस शक्ति शाली सत्ता को उखाड़ फेंका गया। भारत स्वतन्त्र हुआ। जोसेफ मेजनी ने भी इसी तरह इटली की स्वतन्त्रता का संकल्प किया और उस समय की तानाशाही, साम्राज्यवाद के विरुद्ध आन्दोलन उठाया जिसके लिए मौत की सजा निश्चित थी। किंतु मेजिनी का प्रेरणा मंत्र देशवासियों का प्रेरणा मन्त्र बना और इटली स्वतन्त्र हुआ। महर्षि दयानन्द ने सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध आवाज उठाई, धार्मिक अन्ध परम्पराओं पर आघात किया और इसके लिए उन्हें कई बार विष दिया गया और इसी से उनकी अन्त में मृत्यु भी हुई। ईसा मसीह को अपने सुधार कार्य के लिए सूली पर चढ़ाया गया। इस तरह के असंख्यों उदाहरण है जिनमें मनुष्य ने असम्भव से टक्कर ली और उसे सम्भव बनाया। मौत, पीड़ा, कष्ट युक्त यन्त्रणाओं को भी स्वीकार करके सत्य की आवाज बन गई।
मनुष्य जितना निर्भय होगा उतना ही वह महान कार्यों का सूत्रपात करेगा। निर्भयता उत्कृष्ट मानसिक स्थिति का परिणाम है। यह एक नैतिक सद्गुण है जो बड़े तप और त्याग से प्राप्त होता है। मन का जितना विकास होता जाएगा उसी अनुपात से निर्भयता की उपलब्धि होगी। उत्कृष्ट आदर्श सिद्धान्तों की रक्षा के लिए जितना उत्सर्ग, त्याग, कष्ट सहिष्णुता होगी उसी के अनुसार निर्भयता प्राप्त होती जाएगी।
तीन प्रकार की निर्भयता-
निर्भयता तीन प्रकार की होती है। विज्ञ निर्भयता, विवेकी निर्भयता और ईश्वरनिष्ठ निर्भयता।
विज्ञ निर्भयता-जीवन पथ पर आने वाले विभिन्न खतरों, विघ्न आदि की जानकारी, उनका परिचय प्राप्त कर मनुष्य जब उनके समाधान, इलाज का मार्ग जान लेता है तो वह उनके सम्बन्ध में निर्भय हो जाता है। किन्तु जिन खतरों के विषय में वह जानता नहीं उनका भय सदैव बना रहता है। सर्पों के सम्बन्ध में जानने वाले उनके साथ उसी तरह खेल सकते हैं जैसे बच्चा खिलौने के साथ। ऐसे लोगों के मन से सर्पों का भय दूर हो जाता है। किन्तु सिंह को देखकर वे भय से पीले पड़ जाते हैं। इसी तरह सरकस के खेल में इशारों पर सिंह को नचाने वाला कलाकार सर्प को देखकर भयभीत हो सकता है। इस तरह की निर्भयता मर्यादित है, सीमित है। जिन खतरों के बारे में मनुष्य जानकारी हासिल कर लेता है, उनसे निर्भय हो जाता है किन्तु अन्य से नहीं।
विवेकी निर्भयता-इसमें परिपक्व विवेक से बुद्धि नियन्त्रित और शान्त रहती है। मन की वृत्तियों पर शासन होता है। भयावह परिस्थितियों में बुद्धि अशान्त असन्तुलित नहीं होती। भय, शोक, चिंता, आदि मानसिक वृत्तियाँ मनुष्य पर हावी नहीं हो पातीं। ऐसी स्थिति में उन परिस्थितियों से बचाव के प्रयत्न सूझने की सम्भावना रहती है और मनुष्य बच जाता है। जिन परिस्थितियों में एक साधारण मनुष्य असन्तुलित हो उनसे हार बैठता है, निर्दिष्ट पथ से भटक जाता है उन्हीं में एक विवेकशील व्यक्ति अपना मार्ग निकाल कर आगे बढ़ जाता है। इससे मनुष्य अनावश्यक और ऊट-पटाँग साहस भी नहीं करता अतः फिजूल के खतरों में पड़ता भी नहीं।
ईश्वरनिष्ठ निर्भयता-इसके लिए किसी बाह्य सहायता, साधनों की आवश्यकता नहीं होती। जीवन में ईश्वर के प्रति उसकी सर्व व्यापकता, सर्वशक्ति सम्पन्नता आदि के प्रति दृढ़ निष्ठा, गहरी आस्था, अडिग विश्वास जितना बढ़ेगा उतना ही मनुष्य निर्भय होता जाएगा। ईश्वरनिष्ठ निर्भीकता के आधार पर ही संसार के अधिकाँश महत्वपूर्ण कार्य पूर्ण हुए हैं। यह मनुष्य को पूर्ण निर्भय बनाती है किन्तु यह दीर्घकालीन अभ्यास, पुरुषार्थ और भक्ति से ही प्राप्त होती है। अपने साधनों, चातुर्य आदि पर निर्भय व्यक्ति शत्रु से भी मिलने में बड़ी सावधानी बरतते हैं किन्तु ईश्वरनिष्ठ तो सभी से सीधा व्यवहार रखता है। दिखावट, बनावट को कोई जगह नहीं रहती। ईश्वर पर अनन्य, निष्ठा से मनुष्य पूर्णरूपेण निर्भय बन जाता है क्योंकि वह अनन्त व्यापक, निर्विकारी सत्य से परिचय कर लेता है।
आपत्ति से सच्ची सहायक-
निर्भयता मनुष्य की प्रगति और विकास का मार्ग खोल देती है। मनुष्य का विकास, और प्रगति इस बात पर निर्भर रहती है कि वह जीवन में आने वाली उलझनों, कठिनाइयों का समाधान किस तरह करता है। निर्भीकता इन परिस्थितियों में महान शक्ति उत्साह, आशा प्रेरणा की स्रोत बन जाती है। कठिनाई, उलझनों, अवरोध के बीहड़ पथ में यदि मनुष्य का कोई सहारा साथी है तो वह है निर्भीकता। निर्भीकता ही उसके पैरों को गति देती है, हृदय में उत्साह प्रसन्नता पैदा करती है, नेत्रों में आशा की चमक पैदा कर देती है। इतना ही नहीं एक ही निर्भीकता अनेकों का प्रेरणा सूत्र बन जाती है।
यूरोप में जहाँ पादरियों और उनकी अन्ध परम्पराओं का खण्डन करने पर जीवित जला देने की सजा थी, ‘लूथर’ नाम के एक निर्भीक सत्यान्वेषी पादरियों के अधार्मिक कृत्य और स्वर्ग के टिकट बेचने आदि के खिलाफ आवाज उठाई। इस पर उसे पोप का कोपभाजन बनना पड़ा। न्यायालय में उसे क्षमा माँगने को कहा गया किन्तु निर्भीक लूथर ने अपने सत्य पर अटल रहकर क्षमा माँगने से इन्कार कर दिया। उसे मरवाने का प्रयत्न किया गया किंतु लूथर बच गया। लूथर के निर्भीक विचार असंख्य लोगों के विचार बन गये और प्रोटेस्टेन्ट धर्म का प्रसार हुआ। धार्मिक अन्ध विश्वास के प्रति लोग सतर्क हो गये।
निर्भीकता का भाव संक्रामक होता है। नेपोलियन बोनापार्ट जब अपनी सेना के बीच रहता था तो उसकी सेना अजेय रहती थी। प्रत्येक सिपाही अपने आपको नेपोलियन के समान ही शक्ति शाली समझता था। नेपोलियन की सफलता का आधार निर्भीकता थी। वह विश्वासपूर्वक कहता था “वह गोली अभी नहीं बनी जो नेपोलियन को मारेगी।”
निर्भयता, व्यक्ति समाज तथा राष्ट्र की सबसे बड़ी सम्पत्ति है। आगामी पीढ़ियों के लिए बहुत बड़ी धरोहर है। महात्मा गाँधी ने लिखा है “सचमुच वह राष्ट्र महान है जहाँ के लोग मौत के तकिए पर अपना सिर रखकर सोते हैं।” जिसने मौत का डर तोड़ दिया उसे कोई डर नहीं।
कुएं ने शिकायत करते हुए समुद्र से कहा “पिता सभी नदी नाले आपके घर में जगह पाते हैं। आप प्रेम पूर्वक उन्हें अपने घर में स्थान देते हैं। मुझसे ही पक्षपात क्यों? पिता के लिए तो सभी बेटे बेटी एक से होते हैं।” समुद्र ने उत्तर दिया-”वत्स! अपने चारों ओर दीवार बनाकर बैठने पर ही तुम्हें अपने जन्मसिद्ध अधिकार से वंचित रहना पड़ा है। असीम का, अनन्त का प्यार पाने के लिए स्वयं को भी असीम बनना पड़ता है। अपनी सीमाओं का त्याग करके उन्मुक्त रूप से अपने आपको व्यक्त करो, अपनी दीवारों को हटा दो। धरती को हरी भरी, तृप्त करती हुई तुम्हारी धारा जब बन्धनमुक्त हो उठेगी तब तुम सहज ही मुझमें आ समाओगे।”
बड़ी-बड़ी आशा, आकाँक्षाओं के साथ नवयुवक और नवयुवतियाँ दाम्पत्य जीवन के सूत्र में बँधते हैं। बड़ी-बड़ी रस्में अदा होती हैं। विवाह के रूप में बड़ा समारोह मनाया जाता है। गाजे-बाजे, रोशनी, दावतों, लेन-देन, बरात,जुलूस आदि के साथ दो प्राणी विवाह सूत्र में बँधते हैं। परस्पर के नये आकर्षण से प्रारम्भिक दिनों का जीवन बड़ा सुखद बीतता है। किन्तु यह स्थिति अधिक दिन नहीं रहती और दाम्पत्य जीवन कलह, अशाँति, द्वेष, असन्तोष की आग में जलने लगता है।
परिपाटी के तौर पर जो प्रतिज्ञायें धर्म पुरोहित उच्चारण कर देते हैं उनका व्यावहारिक जीवन में नाम भी नहीं रहता। दाम्पत्य जीवन एक दूसरे के लिए बोझा बन जाता है। इसका कोई बाह्य करण नहीं। अपितु पति-पत्नी दोनों के ही परस्पर व्यवहार, आचरणों में विकृति पैदा होने पर ही अक्सर ऐसा होता है। यदि इन छोटी-छोटी बातों में सुधार कर लिया जाए तो दाम्पत्य जीवन परस्पर सुख शाँति आनन्द का केन्द्र बन जाए।
दूसरे की भावना का आदर-
दाम्पत्य जीवन की सुख समृद्धि एवं शाँति के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यवहार में एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रक्खें। एक मोटा सा सिद्धान्त है कि “मनुष्य दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह स्वयं के लिए चाहता है।” पति पत्नी भी सदैव एक दूसरे की भावनाओं, विश्वासों का ध्यान रखें। किन्तु देखा जाता है कि अधिकांश लोग अपनी भावना, विचारों में इतना खो जाते हैं कि दूसरे के विचारों, भावों का कुछ भी ध्यान नहीं रखा जाता। वे उन्हें निर्ममता के साथ कुचल भी देते हैं। इस तरह दोनों की एकता, सहयोग के स्थान पर असंतोष का उदय हो जाता है। अपनी इच्छानुसार पत्नी को जबरदस्ती किसी काम के लिए मजबूर करना, उसकी इच्छा न होते हुए भी दबाव डालना पति के प्रति पत्नी के मन में असन्तोष की आग पैदा करना है। इसी तरह कई स्त्रियाँ अपने पति के स्वभाव, रुचि, आदेशों का ध्यान न रखकर अपनी छोटी-छोटी बातों में ही उन्हें उलझाये रखना चाहती हैं! फलतः उन लोगों को विवाह एक बोझा सा लगने लगता है। दाम्पत्य जीवन के प्रति उन घृणा, असन्तोष होने लगता है और यही असन्तोष उनके परस्पर के व्यवहार में प्रकट होकर दाम्पत्य जीवन को विषाक्त बना देता है। यदि किसी मानसिक स्थिति ठीक न हो तो परस्पर लड़ाई-झगड़े होने लगते हैं। एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करते रहते हैं।
पति पत्नी का सदैव एक दूसरे के भावों, विचारों एवं स्वतन्त्र अस्तित्व का ध्यान रख कर व्यवहार करना, दाम्पत्य जीवन की सफलता के लिए आवश्यक है। इसी के अभाव में आज-कल दाम्पत्य जीवन एक अशाँति का केन्द्र बन गया है। पति की इच्छा न होते हुए, साथ ही आर्थिक स्थिति भी उपयुक्त न होने पर स्त्रियों की बड़े-बड़े मूल्य की साड़ियाँ, सौंदर्य प्रसाधन, सिनेमा, आदि की माँग पतियों लिए असंतोष का कारण बन जाती है। इसी तरह पति का स्वेच्छाचार, भी दाम्पत्य जीवन की अशाँति के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। यही कारण है कि कोई घर ऐसा नहीं दीखता जहाँ स्त्री पुरुषों में आपस में नाराजगी, असंतोष दिखाई न देता हो।
अशिक्षा का अभिशाप-
परस्पर एक दूसरे की भावनाओं में स्वतन्त्रता का ध्यान न रखने में एक मुख्य कारण अशिक्षा भी है। यह कमी अधिकतर स्त्रियों में पाई जाती है। पर्याप्त शिक्षा-दीक्षा के अभाव के कारण भी मानसिक विकास नहीं होता, जिसके कारण एक दूसरे की भावनाओं, व्यावहारिक जीवन की बातों के बारे में मनुष्य को जानकारी नहीं मिलती। इसके निवारण के लिए प्रत्येक पुरुष को कुछ न कुछ समय निकाल पत्नी को पढ़ाने, उसका ज्ञान बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। जीवन साथी का समकक्ष होना आवश्यक है। अपने साथी की ज्ञान वृद्धि विकास एवं कल्याण के लिए भी अन्य आवश्यक कार्यों की तरह की प्रयत्न करना आवश्यक है, तभी वह जीवन में सहयोग, एकता, सामंजस्य का आधार बन सकती है। किन्तु देखा जाता है अधिकाँश लोग इसमें दिलचस्पी नहीं लेते। मन, बुद्धि के विकास के अभाव में दाम्पत्य जीवन सुखी और समृद्ध नहीं बन सकता।
सहिष्णुता और उदारता-
योग्य होकर भी, एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए भी कभी-कभी स्वभावतया ऐसा व्यवहार हो जाता है जो पति-पत्नी में से एक दूसरे को अखरने लगता है। ऐसी स्थिति में किसी भी एक पक्ष को क्षमाशीलता, सहिष्णुता का परिचय देकर विक्षोभ उत्पन्न न होने देने का प्रयत्न करना आवश्यक है। साथ ही दूसरे पक्ष को भी अपने भूल को महसूस कर क्षमा माँगकर परस्पर मनों को साफ रखना चाहिए। अन्यथा परस्पर मनोमालिन्य बढ़ जाता है और दाम्पत्य जीवन में कटुता पैदा हो जाती है। महात्मा सुकरात, टॉलस्टाय, सन्त तुकाराम जैसे महापुरुषों ने अपनी फूहड़ और लड़ाका स्त्रियों को सहनशीलता, क्षमा, उदारता के साथ जीवन में निबाहा था।
स्त्रियाँ तो बेचारी सदा से ही अपने पतियों के कटु स्वभाव, व्यवहार, निर्दयता, स्वेच्छाचार को भी सहन करके दाम्पत्य जीवन की गाड़ी को चलाने में योग देती रही हैं। भारतीय नारी का महान् आदर्श इसी त्याग, सहिष्णुता और पतिव्रत धर्म से निर्मित रहा है। पति-पत्नी में से जब किसी एक में भी कोई स्वाभाविक कमजोरी दीखती हो तो उसका सहन-शीलता के द्वारा निराकरण करके गृहस्थ की गाड़ी को चलाने में पूरा-पूरा प्रयत्न करते रहना आवश्यक है।
पूर्णता के लिये अपूर्णता का मिलन-
पति-पत्नी दोनों का जीवन एक सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों में अभिन्नता है, ऐक्य है। भारतीय संस्कृति में तो पुरुष और स्त्री को आधा-आधा अंग मान कर एक शरीर की व्याख्या की गई है जिसमें पुरुष को अर्द्धनारीश्वर तथा स्त्री को अर्द्धांगिनी कहा गया है। दाम्पत्य जीवन स्त्री-पुरुष की अनन्यता का गठबन्धन है। अतः परस्पर किसी तरह का दुराव छिपाव, दिखावा, बनावटी व्यवहार करना परस्पर अविश्वास एक दूसरे के प्रति घृणा को जन्म देता है और इसी से दाम्पत्य जीवन नष्ट-भ्रष्ट हो जाते हैं। अपनी प्रत्येक चेष्टा में स्पष्टता, दुराव-छिपाव का अभाव रखकर अभिन्नता प्रकट करते हुए पति-पत्नी को एक दूसरे का विश्वास, मानसिक एकता प्राप्त करना चाहिए। वैसे जहाँ तक बने प्रत्येक व्यक्ति को अपने बाह्य जीवन में भी रहस्य, छल, बनाव, दिखावे से बचना चाहिए। क्योंकि इस बाहरी व्यवहार देखकर भी पति-पत्नी एक दूसरे पर सन्देह करने लगते हैं। वे सोचते हैं “हो सकता है यही व्यवहार हमसे किया जा रहा हो।” और सन्देह की भूल-भुलैया में ही अनेकों दम्पत्तियों का जीवन क्लिष्ट, उलझा हुआ, दुरूह बन जाता है।
परिवार का आधार -
पति-पत्नी दोनों अपने मानसिक क्षेत्र में बहुत बड़ा कुटुम्ब होते हैं। अपनी मानसिक आवश्यकताओं के आधार पर पति अपनी पत्नी से ही विभिन्न समय में, सलाहकार की तरह मंत्री की सी योग्यता, भोजन करते समय माँ की वात्सल्यता, आत्म सेवा के लिए आज्ञापालक नौकर, जीवन पथ में एक अभिन्न मित्र, गृहिणी, रमणी, आदि की आकाँक्षा रखता है। इसी तरह पत्नी भी पति से जीवन निबहि के क्षेत्र में माँ-बाप, दुःख दर्द में अभिन्न साथी, कल्याण और उन्नति के लिए सद्गुरु, कामनाओं की तृप्ति के लिए भर्तार, सुरक्षा संरक्षण के लिए भाई आदि जब परस्पर इन मानसिक आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती है तो एक दूसरे में असंतोष, अशाँति पैदा हो जाती है जिससे दाम्पत्य जीवन में विकृति पैदा हो जाती है।
परस्पर संतुष्ट रहें-
एक दूसरे की भावनाओं का ध्यान रखते हुए, एक दूसरे की योग्यता वृद्धि, खासकर पुरुषों द्वारा स्त्रियों के ज्ञानवर्द्धन में योग देकर, परस्पर, क्षमाशीलता, उदारता, सहिष्णुता, अभिन्नता एक दूसरे की मानसिक तृप्ति करते हुए दाम्पत्य जीवन को सुखी समृद्ध बनाया जा सकता है। अधिकतर इसके लिए पुरुषों को ही अधिक प्रयत्न करना आवश्यक है। वे अपने प्रयत्न और व्यवहार से गृहस्थ जीवन की कायापलट कर सकते हैं। अपने सुधार के साथ ही स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, ज्ञानवृद्धि, उनके कल्याण के लिए हार्दिक प्रयत्न करके दाम्पत्य जीवन को सफल बनाया जा सकता है। धैर्य और विवेक के साथ एक दूसरे को समझते हुए अपने स्वभाव, व्यवहार में परिवर्तन करके ही दाम्पत्य जीवन को सुख−शांति पूर्ण बनाया जा सकता है।
महात्मा ईसा कहीं जा रहे थे कि मार्ग में उन्होंने अपने मैथ्यू नामक शिष्य को देखा। उसके पिता की मृत्यु हो गई थी और वह उसे रो-रोकर दफन कर रहा था।
मैथ्यू ने जैसे ही ईसा को देखा, वैसे ही दौड़ कर उनके पास आया और आस्तीन चूम कर तुरन्त ही अपने पिता के शव की ओर लौट पड़ा।
ईसा ने समझा कि इसकी ममता नहीं मरी। अतः उन्होंने मैथ्यू को पुकार कर अपने पास बुलाया और उसे आज्ञा दी- ‘जिसकी मृत्यु हो गई वह भूत का साथी हुआ, तू उसकी लाश से मोह कर, वर्तमान दूर क्यों होना चाहता है?’
जब तक मैथ्यू कुछ समझे तब तक ईसा फिर बोल पड़े-’समय बड़ा बलवान है’ इसने अनेक लाशों को यत्नपूर्वक दफनाया है। उसके लिए तेरे पिता की लाश का दफनाना कुछ कठिन कार्य नहीं है।
मैथ्यू इस असमंजस में था कि वह इस समय क्या करे? तभी उसने ईसा की स्पष्ट आज्ञा सुनी-’भूत को भूत देखना रहेगा, तू यहाँ से मेरे साथ आ।’
शिष्य को गुरु की आज्ञा माननी पड़ी ओर वह लाश को वहीं पड़ी छोड़कर उनके साथ चल दिया।
संयोग की बात है कि जब यह दोनों आगे बढ़े तो ईसा का एक अन्य शिष्य भी उन्हें अपने पिता की लाश दफनाता हुआ मिला । परन्तु जैसे ही उसने अपने गुरु को देखा वैसे दौड़ कर उनके पास पहुँचा और उनके साथ चल दिया। ईसा ने उसे देखा तो बोले -’अरे, तू क्यों आ रहा है?’
शिष्य ने साथ चलने का हठ किया तो ईसा बोले- ‘ऐसी कोई जल्दी नहीं है। मैं आगे के गाँव में ठहरूंगा। तुम लाश को दफना कर वहीं चले आना।’
वह शिष्य तो चला गया, परन्तु एक समान घटनाओं पर दो प्रकार की व्यवस्था सुनकर मैथ्यू को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने अपने गुरु से पूछा-’इसका क्या कारण है गुरुदेव! अपने मुझे तो अपने पिता की लाश को दफनाने भी नहीं दिया और उसे अपने पिता को दफन करने की आपने स्वयं आज्ञा दी। एक प्रकार की घटनाओं पर ही दो प्रकार की आज्ञा क्यों?’
ईसा ने उसे समझाया-’मैथ्यू मैं जो कुछ कहता हूँ वही मेरे अन्तर की आवाज है। और वह आवाज एक निश्चित मत बना कर निकलती है। जीवन की धारा को एक घाट पर बाँधा जाना कभी सम्भव नहीं है। धर्म यह कहता है कि एक विचार पर दूसरे विचार को मत टिकने दो। परन्तु ऐसा करना लोहे के बंधन को दृढ़ करने के समान है और मनुष्य का यथार्थ बन्धन लौह-शृंखला नहीं, कच्चा सूत है!’
अतः जो राग में फँसा है उसे वैराग्य का उपदेश दो, परन्तु जो राग-मुक्त है, उसे वैराग्य का उपदेश देने से कोई लाभ नहीं।
जब हम कुछ व्यक्ति यों को दीर्घजीवी रहते हुए सुनते हैं तो यह विचार सहज ही उत्पन्न हो जाता है कि क्या हम उतनी लम्बी आयु प्राप्त नहीं कर सकते? हम जानते हैं कि दीर्घ जीवन के लिए किन-किन उपायों का पालन करना चाहिए फिर भी हम उन उपायों की उपेक्षा करते हैं और दीर्घ जीवन के नियमों का पालन नहीं करते। हमारे पूर्वजों का तो यहाँ तक विश्वास था कि हम जब तक चाहें तब तक जीवित रह सकते हैं। इसके लिए भीष्म पितामह का उदाहरण प्रत्यक्ष है, जिन्हें इच्छा मृत्यु की सिद्धि प्राप्त थी।
दीर्घ जीवन के लिए हमारे मन में यह विश्वास होना आवश्यक है कि हम कम आयु में मृत्यु को प्राप्त नहीं होंगे। यदि आप यह आस्था बना लें कि हम सौ वर्ष से कम आयु में मृत्यु को प्राप्त नहीं होंगे तो विश्वास मानिये कि आपकी आयु सौ वर्ष तक अवश्य पहुँचेगी । आपका यह विश्वास जितना ही दृढ़ होता जाएगा, उतनी ही आयु बढ़ती जाएगी। परन्तु, यदि आप यही मान बैठें कि कल का भी पता नहीं, शायद मृत्यु कल ही आ घेरे तो आपका ऐसा विश्वास आपको जीवितावस्था में ही मृत्यु के गड्ढे में धकेल देगा। दूसरे शब्दों में आप जीते जी ही मृतक के समान हो जाएंगे। आपका आँतरिक संशय ही आपको मृत्यु के मुख तक पहुँचाने में सहायक होगा।
दूसरा विश्वास शरीर के निरोग होने का है। जो लोग यह मानते हैं कि हमें कोई रोग नहीं है, उनके रोग-ग्रस्त होने पर भी, रोग के कीटाणु शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। परन्तु, इसके विपरीत जो लोग निरोग होते हुए भी अपने रोग-ग्रस्त होने की शंका से त्रस्त रहते हैं, वे धीरे-धीरे रोगी होते जाते हैं। उनका वहम ही उन्हें रोगी बना देता है। जो लोग क्षय-ग्रस्त नहीं हैं, उन्हें आधुनिक चिकित्सक टी॰ बी॰ का रोगी बता दे, तो उन्हें टी॰ बी॰ हो ही जाती है। ऐसा कई रोगियों के सम्बन्ध में हो चुका है। कहते भी है कि वहम की दवा तो लुकमान के पास भी नहीं थी।
जहाँ आशंका नहीं, वहाँ रोग का क्या काम? जहाँ विश्वास नहीं वहाँ जीवन कैसा? साधारण सा रोग होने पर आप उसके बढ़ने की शंका मत कीजिए, परन्तु रोगशामक उपाय अवश्य करते रहिये। इससे आपका रोग निर्मूल हुए बिना न रहेगा।
दीर्घजीवी होने का तीसरा उपाय है चिन्ता से निवृत्ति। मन में किसी प्रकार की चिन्ता है तो सम्पूर्ण प्रसन्नता नष्ट हो जाती है और धीरे-धीरे स्वास्थ्य भी चौपट हो जाता है। जो व्यक्ति लम्बे सम तक जीवित रहना चाहते हैं, उन्हें ऐसे प्रयत्न करने चाहिएं कि वे चिन्ता से मुक्त रह सकें और यह तभी संभव है जब हम अपने कार्यों को परिश्रम पूर्वक और दत्तचित्त होकर करें। जो व्यक्ति न्यून प्राप्ति में अधिक संतोष अनुभव करता है, उसे चिन्ता का घुन नहीं लगता।
दीर्घजीवी होने के लिए खान-पान को भी नियमित रखना चाहिए। यह माना कि संसार में सभी वस्तुएं उपभोग के योग्य हैं, परन्तु किसी भी कार्य की अति हानिप्रद है। अधिक भोजन से बदहजमी होना संभव है ही। अधिक मीठा भी हानिप्रद है। बार-बार खाने की प्रवृत्ति भी मनुष्य को रोगी बनाती है। इसीलिए आचार्यों ने भोजन के समय निश्चित किये हैं। इसके अनुसार अधिक से अधिक प्रतिदिन तीन बार भोजन करना चाहिये।
शौच, स्नान, निद्रा, आहार, विहार सभी की सीमाएँ बाँधकर हमारे जीवन को सुव्यवस्थित कर दिया गया है, फिर भी हम नियमों का उल्लंघन कर रोगों को आमंत्रित करें तो इसमें हमारा अपना ही दोष समझा जाएगा। हमारे ऋषियों ने योगासनों द्वारा दीर्घजीवी होने के उपाय ढूँढ़ निकाले थे और आज भी आसन पद्धति से स्वास्थ्य लाभ किया जाता है। जो लोग आसन पद्धति को नहीं अपना सकते, उनके लिए विभिन्न व्यायामों की सृष्टि की गई है। प्राचीन भारतीय पद्धति के अनुसार दंड-कसरत का ऐसे ही व्यायामों में समावेश है। परन्तु आधुनिक प्रणाली के अनुसार विभिन्न खेलों को, भागदौड़, तैरना, कूदना आदि के रूप में व्यायामों को प्रश्रय दिया गया। यह सभी उपाय हमारे स्वस्थ रहने में सहायक सिद्ध होते हैं।
आज के युग में व्यायाम का एक सरल रूप टहलना है। अधिकाँश शहरी व्यक्ति टहलने जाते और स्वस्थ रहते हैं। इससे मन भी प्रफुल्लित रहता और ताजा वायु भी प्राप्त हो जाती है। प्रातःकाल सूर्योदय से पहले ही भ्रमण कर लौट आया जाए तो मनुष्य को बहुत कुछ लाभ हो सकता है। जो लोग रोगी हैं, वे भी प्रातः भ्रमण द्वारा अपने शरीर को स्वस्थ बना सकते हैं।
पानी का भी हमारे शारीरिक स्वास्थ्य पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। हल्का पानी शरीर को भारी नहीं होने देता, इसके विपरीत भारी पानी, मीठा होते हुए भी शरीर में भारीपन ला देता है और उससे मन की प्रसन्नता नष्ट हो जाती है। यदि अच्छा और हल्का कूप-जल पीने की आदत डाली जाए तो शरीर में रोग भी प्रायः उत्पन्न न हो। यह ध्यान रहे कि जल में कृमियाँ न पड़ें, इसके लिए दो-तीन महीने में एक बार कोई कीटाणुनाशक दवा कुएं में डाल देनी चाहिए।
इस प्रकार कुछ सावधान रहने, नियम पालन करने और मन को प्रसन्न रखने से दीर्घजीवन प्राप्त किया जाना संभव है।
सर्व सम्पन्न श्रावस्ती नगर में भयंकर अकाल पड़ा, पशु-पक्षी नर-नारी खाद्य के अभाव में कीड़ों की तरह मरने लगे। सारी नगरी मरघट सी दिखाई दे रही थी। महात्मा बुद्ध ने यह देखा तो बड़े दुःखी हुए। उन्होंने श्रावस्ती के धनीमानी व्यक्ति यों को बुलाया और ऐसे भीषण समय में देश की सहायता के लिए कहा किन्तु किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। सब उठ उठकर चले गये। धनवानों को तो अपने भण्डार भरे रखने थे स्वयं के लिए, मानवता के लिए खर्च करना उन्हें अपव्यय लगता था। लोग कहीं जबरन उनसे खाद्य सामग्री न छीन लें इस भय से दरवाजे बन्द करके बैठ गये। महात्मा बुद्ध काफी निराश हुए। इतने में ही एक कुलीन घर की लड़की आई और बोली “महात्मन्! आज से मैं श्रावस्ती नगरी के अकाल पीड़ितों की सेवा की प्रतिज्ञा करती हूँ। सबके भोजन जुटाने के लिए मैं प्रयत्न करूंगी”। लोग एक छोटी सी बालिका के मुँह से ऐसी बात सुनकर दंग रह गये । कई मजाक भी करने लगे। “बेटा सुप्रिया! इतने बड़े राज्य का, नगर का भरण-पोषण कैसे करोगी? तुम्हारे घर वाले तो कुछ देंगे भी नहीं।” महात्मा बुद्ध ने पूछा।
“महाराज मुझे घरवालों के देने न देने की चिन्ता नहीं है। मैं घर-घर भिक्षा माँगूँगी, नगर-नगर जाकर लोगों को पीड़ितों की सहायता के लिए प्रेरणा दूँगी, जिससे ऐसे संकट में अनेकों का भला होगा। देश के लिए, मानवता के लिए मैं भीख माँगूँगी, घर-घर घूमूँगी। महाराज आप आशीर्वाद दें।” सुप्रिया ने कहा। महात्मा बुद्ध को एक आशा की चिनगारी नजर आई। बालिका के संकल्प से प्रसन्न होकर उसे आशीर्वाद दिया।
बालिका घर-घर घूमकर क्षुन्धार्तों के लिए अन्न माँगने लगी। जिनके पास था वे मना न कर सके। देखते-देखते इतना अन्न जमा होने लगा कि भूख से प्राण त्यागने वालों की आसानी से जीवन रक्षा होने लगी।
तथागत ने शिष्यों को बुलाकर कहा - “संसार में सत्य बहुत है, धर्म बहुत है, पर उसका उद्बोधन करने वाले नहीं हैं। सुप्रिया ने घर-घर जाकर धर्म का उद्बोधन किया और लोगों की धर्म बुद्धि को जगाया तो आज सहज ही एक बड़ी कठिनाई हल हो गई। तुम भी इसी मार्ग को अपनाना, ऐसा ही आचरण करना।”
पुरुष विष्णु है स्त्री लक्ष्मी, पुरुष विचार हे स्त्री भाषा, पुरुष धर्म है स्त्री बुद्धि, पुरुष तर्क है स्त्री रचना, पुरुष धैर्य है स्त्री शान्ति, पुरुष प्रयत्न है स्त्री इच्छा, पुरुष दया है स्त्री दान, पुरुष मंत्र है स्त्री उच्चारण, पुरुष अग्नि है स्त्री ईंधन, पुरुष समुद्र है स्त्री किनारा, पुरुष धनी है स्त्री धन, पुरुष युद्ध है स्त्री शान्ति, पुरुष दीपक है स्त्री प्रकाश, पुरुष दिन है स्त्री रात्रि, पुरुष वृक्ष है स्त्री फल, पुरुष संगीत है स्त्री स्वर, पुरुष न्याय है स्त्री सत्य, पुरुष सागर है स्त्री नदी, पुरुष दण्ड है स्त्री पताका, पुरुष शक्ति है स्त्री सौंदर्य, पुरुष आत्मा है स्त्री शरीर।
उक्त भावों के साथ विष्णु पुराण में बताया है कि पुरुष और स्त्री की अपने-अपने स्थान पर महत्ता, एक से दूसरे के अस्तित्व की स्थिति, एक से दूसरे की शोभा आदि सम्भव है। एक के अभाव में दूसरा कोई महत्व नहीं रखता। स्त्री पुरुष की समान भूमिका का दर्शन वैदिक काल में बड़े ही व्यवस्थित रूप में था। पुरुषों की तरह ही स्त्रियाँ भी स्वतन्त्र थीं, साथ ही जीवन के सभी क्षेत्रों में भाग लेती थीं। राजनीति, समाज, धर्म सभी में नारी का महत्वपूर्ण स्थान था। कोई भी कार्य नारी के अभाव में पूर्ण नहीं माना जाता था। शिक्षा, संस्कृति में उनका समान अधिकार था। स्त्रियाँ यज्ञोपवीत धारण करती थीं, यज्ञ, वेदाध्ययन आदि में पूरा-पूरा भाग लेती थीं। इसी समय लोपा मुद्रा, धोबा, गार्गी, मैत्रेयी आदि वेदों की मन्त्र द्रष्टा, ब्रह्मवादिनी हुई।
इतना ही नहीं स्त्रियों को विशेष आदर सम्मान का अधिकार देते हुए मनु भगवान ने लिखा है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवता”। जहाँ नारियों का सम्मान नहीं होता उन्हें पूज्य भाव से नहीं देखा जाता, वहाँ सारे फल, क्रियाएँ नष्ट हो जाती हैं।
“यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते, सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।”
दुर्व्यवहार की कुचेष्टा-
परिस्थितियों के बदलने के साथ ही नारी जीवन की दुर्दशा शुरू हो गई और कालान्तर में उसके स्वतन्त्रता, समानता, आदर के अधिकार छीन कर उसे घर की चहार दीवारी, पर्दों की ओट में बन्द कर दिया गया। बाह्य आक्रमणों के काल से भारतीय नारी जीवन की भारी दुर्दशा हुई और नारी का गौरव, सम्मान, अधिकार सब छीन लिए गये। नारी एक निर्जीव गुलाम की तरह पीड़ित की जाने लगी। उसका दमन होने लगा।
नारी का परिवार में जो गृहलक्ष्मी, गृहिणी का स्थान था, वहाँ उसे सास, ससुर, पति, देवर, नन्द, जिठानी के अत्याचारों का सामना करना पड़ा, पति के मर जाने पर उसे राक्षसी, कुलटा, दुराचारिणी कहा जाने लगा, अथवा जीवित ही ज्वाला में झोंक दिया गया सती के नाम पर। समाज में किसी व्यक्ति का देख लेना, बात चीत कर लेना उसके चरित्र का कलंक समझा जाने लगा। पुरुष ने साम दाम दण्ड भेद से मनचाहा नारी पर शासन किया, अत्याचार किये उस पर।
फलतः मानव जीवन का अर्द्धांग बेकार, हीन, अयोग्य बन गया। आधे शरीर में लकवा दौड़ जाने पर सारे शरीर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाता है। ठीक यही बात हमारे जीवन के साथ हुई। हमारे सामाजिक पतन, का मुख्य कारण स्त्रियों की यह दुरवस्था भी रही है।
नारी का विकास आवश्यक-
राष्ट्र को विकास और स्वतन्त्रता की नई प्रेरणा देने वाले महापुरुषों ने इस कमी को अनुभव किया और समाज को सशक्त सबल बनाने के लिए स्त्रियों के अधिकारों की नई परिभाषा करनी पड़ी। उनकी दुरवस्था, शोषण, उत्पीड़न को बन्द करके पुरुष के समान अधिकार देने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया। राजा राममोहन राय ने सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई। महर्षि दयानन्द ने नारी के अधिकारों का व्यापक आन्दोलन ही चलाया। स्वामी विवेकानन्द के समाज को चेतावनी दी कि “जिस देश राष्ट्र में नारी की पूजा उसका सम्मान नहीं होगा, वह राष्ट्र, समाज कभी भी उन्नत और महान नहीं हो सकता। लाला लाजपतराय ने कहा “स्त्रियों का प्रश्न पुरुषों का प्रश्न है। दोनों का ही एक दूसरे के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। पुरुषों की उन्नति के लिए सदैव ही स्त्री के सहयोग की आवश्यकता है।” महामना मदन मोहन मालवीय ने विधिवत् विद्वानों का सम्मेलन करके स्त्रियों के लिए यज्ञोपवीत, वेदाध्ययन, यज्ञ आदि सामाजिक कृत्यों में पूर्ण अधिकारों की घोषणा की। शारदा एक्ट, मैरेज एक्ट आदि बने। विवाह आदि की मर्यादायें निश्चित की गईं। भारतीय संविधान में लड़की को भी उत्तराधिकार, आर्थिक क्षेत्र में तथा अत्याचार के विरुद्ध बोलने का अधिकार देकर नारी जाति की स्वतन्त्रता, सुरक्षा, विकास और उसकी समानता का प्रयत्न किया गया।
लक्ष्य से बहुत पीछे-
इन सब प्रयत्नों के बावजूद अभी भारतीय नारी अपने लक्ष्य से बहुत पीछे है। पर्दा प्रथा, दहेज लड़के-लड़की में असमानता का भाव आदि कुछ कम अभिशाप नहीं हैं नारी के लिए। अब भी भारतीय स्त्रियों की बहुत बड़ी संख्या घर की चहार दीवारी के भीतर कैद है। उन्हें सदाचार शील आदि का बहाना लेकर पर्दे बुर्का आदि में बन्द कर रखा है। जिस पौधे को पर्याप्त प्रकाश, हवा नहीं मिलती वह मुरझा जाता है। अधिकाँश स्त्रियों में भी पीले चेहरे, बीमारियाँ, रोग, कुछ कम नहीं फैल रहे हैं। अब भी स्त्री को वासना तृप्ति का साधन समझा जाता है। एक स्त्री के मरने पर ही नहीं, उसके जीवित रहते दूसरे ब्याह, दूसरी स्त्रियों से संपर्क किए जाते हैं। बड़े-बड़े नगरों, शहरों में वेश्याओं के केन्द्र नारी जीवन की दुर्गति और समाज के कलंक के रूप में अब भी प्रकट अथवा अप्रकट रूप में स्थित हैं।
हमारे पारिवारिक जीवन में नारी पर घर वालों के द्वारा होने वाले अत्याचार अब भी बने हुए हैं। उन्हें सताया जाता है। ताड़ना दी जाती है। गुलामों की तरह रहने को बाध्य किया जाता है। अन्य लोगों को खाने को अच्छा मिलता है जबकि सारा काम करने वाली बहू रूखा सूखा खाकर पेट भरती है। यह उन चन्द शहरी या शिक्षित घरानों की बात नहीं वरन् भारत के अस्सी प्रतिशत परिवारों की कहानी है जो गाँवों में बसे हैं। दहेज क्या नारी का अपमान नहीं है?
प्राचीन सम्मान पुनः मिले-
सुधार के विभिन्न प्रयत्नों के बावजूद भी यथार्थ की धरती पर भारतीय नारी का जीवन अभी बहुत बड़े क्षेत्र में अविकसित पड़ा है । यह हमारे सामाजिक जीवन, पुरुष के अर्द्धांग की विकृति है जिसने सारी प्रगति को ही अवरुद्ध कर रखा है। अन्ध परम्परा, अन्ध विश्वास, रूढ़िवाद, संकीर्णता व्यर्थ के अभिमान को त्याग कर नारी को उसके उपयुक्त स्थान पर प्रतिष्ठित करना आवश्यक है। इसी में पुरुष और समाज तथा राष्ट्र को उन्नति निहित है नारी का उत्थान पुरुष का उत्थान है। नारी की प्रगति पुरुष की प्रगति है। दोनों का जीवन परस्पर आश्रित है।
कुछ लोग ऐसे होते हैं जो उत्थान-पतन, कर्तव्य का कारण भाग्य, देवी देवता या किसी सत्ता को समझते हैं। इनके विश्वास के अनुसार, जीवन एक निर्जीव मशीन की तरह है जिसे भाग्य या प्रारब्ध रूपी ड्राइवर अपनी इच्छा से जिधर चाहे उधर चलाता है। इससे वे हाथ पर हाथ धरे, अकर्मण्य हो बैठे रहते हैं भाग्य देवता की आशा में।
दूसरे वे लोग होते हैं जो जीवन पथ पर परिश्रम के साथ एक-एक कदम आगे बढ़ते है। श्रम और पुरुषार्थ में ही जिनका विश्वास होता हैं। पुरुषार्थी किसी भी काम पर लगते समय सगुन-असगुन का, ग्रह नक्षत्रों का ख्याल ही नहीं करता । वह स्वयं अपने उन हाथों को देखता है जो काम करने के अमूल्य औजार प्रकृति ने दिए हैं और वह काम में जुट जाता है। अपने पुरुषार्थ के बल पर वह पद-पद पर नव सृजन, नव निर्माण के गीत गाता जाता है। जीवन में विभिन्न उपलब्धियों के स्मृति चिन्ह, पुरुषार्थ के प्रतीक छोड़ता जाता है।
जीवन की सभी प्रवृत्तियों को सन्मार्ग की ओर लगा कर उनसे ही सफलता, उत्साह आत्मविश्वास प्राप्त किया जा सकता है। इसके विपरीत उनका दुरुपयोग करके अथवा उन्हें निष्क्रिय बना कर घबराहट, अशान्ति, अनुत्साह में भी वृद्धि की जा सकती है। वृत्तियाँ जब व्यक्त नहीं होतीं तो परस्पर लड़ती हैं और मनुष्य का आन्तरिक जीवन ही नहीं इसके फलस्वरूप उसका बाह्य जीवन भी क्लेश, अशान्ति, अवसादपूर्ण बन जाता है।
मनुष्य का बाह्य जीवन उसके आन्तरिक जीवन की छाया है। अतः भाग्यवादी भी बाह्य जगत में अपने विश्वासों का कोई न कोई आधार अवश्य मान लेते हैं। पारिवारिक, सामाजिक, परिस्थितियाँ, प्रारब्ध, समय आदि का सहारा लेकर भाग्यवादी अपने विश्वास की पुष्टि करता है। तब वह स्थितियों को इतना ध्रुव सत्य मान लेता है अन्य किसी तरह का परिवर्तन ही स्वीकार नहीं करता ।
वस्तुतः मनुष्य की जैसी भावनायें और विचार होते हैं उन्हीं के अनुसार विश्वास, धारणा, और जीवन के प्रेरक दर्शन का निर्माण होता है। जिन स्वभाव ढीला ढाला होता है, जो अकर्मण्य होते उनके मन में अंतर्द्वंद्व चलने लगते हैं। उनकी सारी शक्ति अंतर्द्वंद्व में ही नष्ट हो जाती है, जिससे बाह्य जीवन में भी निराशा, पैदा होती है।
देखा जाए तो संसार के सफल व्यक्ति यों में पुरुषार्थी, कर्मवीरों का ही नाम है। जीवन व सफलताओं का कारण भी एकमात्र पुरुषार्थ ही है। यह बात अलग है कि मनुष्य अपनी सौजन्यता, सरलता, सद्गुणों से उसे ईश्वर की कृपा, अथवा अन्य कोई आधार पर बताये। धर्म, स्वास्थ्य, विद्या, भौतिक उपलब्धियाँ, सभी में तो पुरुषार्थ की आवश्यकता है। पुरुषार्थ असम्भव को भी सम्भव कर देता है। महापुरुषों की विभूतियाँ, महानता सब उनके पुरुषार्थ की ही देन हैं। पुरुषार्थ के बल पर साधारण-सी परिस्थितियों से उठ कर उन्होंने असाधारण काम किए।
हानिकारक आदतें, संस्कार, विचार, भावनाओं का पुरुषार्थ से निराकरण करके उनकी जगह अच्छाई पैदा की जा सकती है। मनुष्य स्वयं अपने भाग्य, चरित्र, जीवन का निर्माता है। क्योंकि विचार चरित्र और आचरणों से ही भाग्य का निर्माण होता है। आज की तदबीर कल की तकदीर है-यह प्रसिद्ध कहावत है। एक विश्व विख्यात मनीषी ने लिखा है-”किसी बालक से प्रकृति यह नहीं कहती कि तुम्हें अमुक तरह का सुखकर जीवन मिलेगा और दूसरे को कष्टकारक। भूतकाल की परिस्थितियाँ कुछ भी रही हों किन्तु मैं बता सकता हूँ कि एक सी परिस्थितियों में पले हुए दो मनुष्यों में एक महान पुरुष बना अपने प्रयत्न और पुरुषार्थ, से दूसरा अकर्मण्य पतन की ओर गिरा।”
वस्तुतः मनुष्य जिस ओर बढ़ना चाहे बढ़ सकता है। वेद भगवान साक्षी है कि “ईश्वर पुरुषार्थी की सहायता करता है।” इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रकृति स्वयं पुरुषार्थी का मार्ग खोल देती है। मनुष्य विश्वास करे कि “मैं अमुक कार्य कर सकता हूँ” तो वह अवश्य कर लेगा। संसार का आज जो विकसित रूप है वह उन सब पुरुषार्थियों का है जिन्होंने जीवन में निरन्तर कर्म साधना की है।
उपासना, तपश्चर्या के द्वारा कई व्यक्ति कुछ दैवी वरदान प्राप्त करते हैं। कइयों को तपस्वी महापुरुषों की कृपा से भी कुछ विशेष लाभ प्राप्त होता है, पर इसमें भी भाग्य नहीं पुरुषार्थ ही प्रधान है। साधना को इस संसार का सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। उसमें शरीर, मन और आत्मा के तीनों क्षेत्रों को नियंत्रित करके एक विशेष दिशा में प्रयत्नपूर्वक चलाना पड़ता है। यह पुरुषार्थ ही कालान्तर में फलित होकर दैवी अनुग्रह या वरदान के रूप में वापस लौटता है। जो केवल मनौती मानते हैं, देवता की आकस्मिक, अहैतुकी कृपा की आशा लगाये बैठे रहते हैं ऐसे कुपात्रों को दैवी अनुग्रह से भी वंचित रहना पड़ता है। पात्र कुपात्र का अन्तर तो देवता भी करते हैं। आलसी, अकर्मण्य, कुपात्रों को नहीं, प्रयत्नशील, आशावादी और उद्योगी, सत्पात्रों की ही वे भी सहायता करते हैं।
महापुरुषों और तपस्वियों को सफल हो सकने वाला आशीर्वाद देने की शक्ति प्रचंड तपश्चर्या के आधार पर ही मिलती है। जिसके पास तपस्या की पूँजी नहीं, उसका न शाप फलित होता है और न वरदान। भिक्षा में कोई व्यक्ति कहीं से धन माँग लावे तो उसे यह नहीं सोचना चाहिए कि धन उपार्जन का आधार भिक्षा ही होता है। उपार्जन तो श्रम का परिणाम है। चाहे वह आत्मिक सम्पदा हो। चाहे भौतिक, उनकी प्राप्ति श्रम प्रयत्न से ही होगी।
भाग्य और कुछ नहीं, कल के किए हुए पुरुषार्थ का आज का परिपक्व स्वरूप ही भाग्य है। जो आज भाग्यवान दीखते हैं उन्हें वह सौभाग्य अनायास ही नहीं मिला है। विधाता ने कोई पक्षपात भी उनके साथ नहीं किया है। उनके पूर्व पुरुषार्थ ही आज सौभाग्य के रूप में परिलक्षित हो रहे हैं।
हमें भाग्य के भरोसे नहीं बैठा रहना चाहिए वरन् पुरुषार्थ करते रहना चाहिए। प्रयत्नशील व्यक्ति आज नहीं तो कल अपने निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेता है।
स्वामी विवेकानन्द के जीवन की एक घटना है। भ्रमण एवं भाषणों से परिश्राँत स्वामी विवेकानन्द अपने निवास-स्थान पर लौटे। उन दिनों वे अमेरिका में एक महिला के यहाँ ठहरे थे। वे अपने ही हाथों भोजन बनाते थे। अपने स्वभाव के अनुसार वे भोजन करने की तैयारी ही कर रहे थे कि कुछ बच्चे पास में आकर खड़े हो गये। उनके पास बहुत बच्चे आया करते थे।
बच्चे भूखे थे। स्वामी जी ने अपनी सारी रोटियाँ एक-एक करके बच्चों में बाँट दीं। महिला वहीं बैठी सब देख रही थी। बड़ा आश्चर्य हुआ उसे। आखिर पूछ ही बैठी-”आपने सारी रोटियाँ तो उन बच्चों को दे डालीं, अब आप क्या खायेंगे? “
स्वामी जी के अनधरों पर मुस्कान दौड़ गयी। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा-”माता, रोटी तो पेट की ज्वाला शान्त करने वाली वस्तु है। यदि इस पेट में न सही, तो उस पेट में सही।” देने का आनन्द पाने के आनन्द से बड़ा है।
विचार और क्रिया दो तत्व हैं, जिनके आधार पर मनुष्य अपने जीवन को समुन्नत और उत्कृष्ट बना सकता है। छोटे से काम से लेकर जीवन लक्ष्य की प्राप्ति तक मनुष्य के विचार और आचार में समन्वय पर ही सम्भव है। विचार के अभाव में क्रिया एकाँगी और अधूरी है। उससे कोई प्रयोजन नहीं सधता। इसी तरह बिना आचार-क्रिया के विचार भी व्यर्थ ही है, लँगड़ा है, उससे कुछ सिद्ध नहीं होता। ख्याली पुलाव भले ही पकाये जाते रहें, यथार्थ में कुछ भी नहीं होता । दोनों के ठीक-ठीक समन्वय पर ही सफलता और उन्नति सम्भव है। व्यक्ति , समाज, राष्ट्र सभी का विकास इन दोनों के ऊपर है। जहाँ केवल विचार है या केवल क्रिया ही है अथवा दोनों का अभाव है वह व्यक्ति , समाज या राष्ट्र उन्नत नहीं हो सकता ।
आज के बुद्धिवाद और विज्ञान के युग में मानव समाज में इन दोनों ही तत्वों में असमानता पैदा हो गई है। जिनके पास क्रिया की शक्ति है उनके पास कोई उत्कृष्ट विचार ही नहीं। जीवन की भौतिक सफलता, चमक-दमक, भौतिक विज्ञान की घुड़ दौड़ में ही उनकी विचार शक्ति लगी हुई है और उससे प्रेरित होकर जो क्रिया होती है वह मानवता के विनाश, व्यापक संहार की सम्भावनायें अधिक व्यक्त करती है। इसी तरह जिनके पास उत्कृष्ट विचार है वहाँ क्रिया का अभाव है। फलतः कुछ भी लाभ नहीं होता । स्वयं उनको और समाज को विचारों से कुछ भी नहीं मिल पाता।
फिर भी आज विचारों की कमी नहीं है। युगों-युगों से महापुरुष, सन्त, महात्मा, आदि ने मानवता को उत्कृष्ट कोटि के विचार दिए। विचार ही नहीं उनकी क्रियात्मक प्रेरणा दी। कुल मिलाकर आज मानव जाति के पास उत्कृष्ट विचारों का बहुत बड़ा भण्डार है, किन्तु मानव की समस्यायें, उलझनें बढ़ती जा रही हैं। वे सुलझती नहीं ।
आज विचार और आचार का मेल नहीं हो रहा है। बड़े-बड़े वक्ता उपदेशक, प्रचारक, धर्म दुहाई देने वाले लोगों की कमी नहीं है। भाषा, उपदेश, प्रचार, आन्दोलन उमड़-घुमड़ कर समाज के ऊपर आते है, किन्तु वे उन रीते, सूखे बादलों की तरह समाज की शुष्कता को नहीं मिटा पाते। समाज की क्या वे अपने अन्तर की जलन को ही शाँत नहीं कर पाते। जीवन लक्ष्य की पूर्ति से दूर वे स्वयं ही परेशान देखे जा सकते हैं। उधर अकेले शंकराचार्य, दयानन्द, बुद्ध आदि भी थे जिन्होंने अपने प्रतिकूल युग में भी मानवता को नई राह दी, और आज असंख्यों लोगों के प्रचार, भाषण, उपदेशों के बावजूद भी उनका या समाज का कुछ भी अर्थ नहीं सधता कोई परिणाम पैदा नहीं होता। इसका एक ही कारण है कि हमारे विचारों का आचारों से मेल नहीं। हमारी कथनी और करनी में समन्वय नहीं।
जो विचार जीवन में नहीं उतरता, व्यवहार और क्रिया के क्षेत्र में व्यक्त नहीं होता उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होने का । वह तो केवल बौद्धिक कसरत मात्र है। किसी भी विषय पर खूब बोलने, खूब सुन्दर व्याख्या करने से विद्वत्ता प्रकट हो सकती है, निन्दा प्रशंसा हो सकती है, उपस्थित लोग अपनी वाह-वाह कर सकते हैं किन्तु वह वक्ता के जीवन में नहीं उतरता है, समाज में उससे कोई परिवर्तन नहीं आता। पाकशास्त्र पर खूब विवेचना और व्याख्यान करने से किसी का पेट नहीं भर सकता। बातों की रोटी, बातों की कढ़ी से किसका पेट भरा है? भूखे व्यक्ति के सामने, सुन्दर-सुन्दर मिठाइयों, मधुर पदार्थों का वर्णन करने से क्या उसकी वैसी भी तृप्ति हो सकती है जैसी सूखी रोटियों से होती है? प्यासे आदमी को मान-सरोवर की कथा सुनाने से क्या उसकी प्यास दूर हो सकेगी? आज चटपटे, उत्तेजक विचारों की असंख्यों पत्र पत्रिकायें निकलती हैं, लम्बे चौड़े भाषण सुनने को मिलते हैं, फिर भी कोई लाभ नहीं हो रहा है। यदि इन सब में से दस प्रतिशत भी क्रियात्मक रूप में उतरे तो समाज काफी उन्नत हो जाय। जहाँ व्याख्याता, उपदेशक, लेखक कहते कुछ और करते कुछ हैं, कुत्सित विचार, विकार दुष्प्रवृत्तियों को रख कर दूसरों को उपदेश देते हैं, शराब पीकर लोगों से शराब छोड़ने को कहते हैं, वहाँ कोई सत्परिणाम निकले इसकी बहुत ही कम सम्भावना है। समाज के कल्याण की बड़ी-बड़ी बातें होती हैं, किन्तु अपने जीवन के बारे में कभी कुछ सोचा है हमने ? जिन बातों को भाषण, उपदेश, लेखों में हम व्यक्त करते हैं क्या उन्हें कभी अपने अन्तर में देखा है। क्या उन आदर्शों को हम अपने परिवार, पड़ोस राष्ट्रीय जीवन में व्यवहृत करते हैं? यदि ऐसा होने लग जाय तो हमारे व्यक्ति गत और सामाजिक जीवन में महान् सुधार, व्यापक क्रान्ति सहज ही हो जाय। हमारे जीवन के आदर्श ही बदल जाएं। घर, समाज, पड़ोस, राष्ट्र का जीवन स्वर्गीय बन जाए।
उच्च विचार, अमूल्य साहित्य, तत्व ज्ञान की बातों का मानव जीवन में अपना एक स्थान है। इनसे ही चिन्तन और विचार की धारा को बल मिलता है। बड़े बड़े उपदेश, व्याख्यान, भाषण आदि का समाज पर प्रभाव अवश्य पड़ता है, किन्तु वह क्षणिक होता है। किसी भी भावी क्रान्ति सुधार रचनात्मक कार्यक्रम के लिये प्रारम्भ में विचार ही देने पड़ते हैं। किन्तु सक्रियता और व्यवहार का संस्पर्श पाये बिना उनका स्थायी और मूर्तरूप नहीं देखा जा सकता। प्रचार और विज्ञापन का भी अपना महत्व है किन्तु जब कर्तव्य और प्रयत्नों से दूर रहकर मनुष्य इन्हीं में उलझ जाता है तो वह लक्ष्य से दूर हटकर आत्म प्रवंचना की ओर अग्रसर होता है, पतन के मार्ग पर चलने लगता है।
विचार और क्रिया के समन्वय से ही युग निर्माण के महान कार्यक्रम की पूर्ति सम्भव है। उत्कृष्ट विचारों को जिस दिन हम क्रिया क्षेत्र में उतारने लगेंगे उसी दिन व्यक्ति और समाज का स्वस्थ निर्माण सम्भव होगा।
एक प्रसिद्ध सन्त मृत्यु के उपरान्त स्वर्ग लोक पहुँचा। वहाँ द्वार पर चित्रगुप्त अपने हिसाब की बहियाँ लेकर बैठे थे। उन्होंने साधु का नाम पता ठिकाना पूछा। इस पर साधु गर्व सहित बोले “क्या आप नहीं जानते कि मैं धरती का प्रसिद्ध अमुक सन्त हूँ।”
“आपने जीवन में क्या किया?” चित्रगुप्त ने पूछा। “मैं जीवन के प्रारम्भिक आधे भाग में तो लोगों से प्रेम करता रहा, मेल जोल बढ़ाता रहा और दुनियादारी के चक्कर में डूबा रहा। जीवन के अन्तिम आधे भाग में मैंने सब कुछ छोड़कर तपस्या की और पुण्य लाभ किया।”
चित्रगुप्त अपनी बही में साधु का ब्यौरा देखने लगे। “अरे, आप पहले क्या देखते हैं मैंने पुण्य तो जीवन के अन्तिम भाग में किये गए हैं आप पहले न देखकर अन्त में देखो” साधु बीच में ही बोल उठे।
चित्रगुप्त ने अपनी बही का प्रारम्भ का भाग छोड़कर अन्तिम भाग देखना शुरू किया लेकिन वहाँ पुण्य के नाम पर कुछ भी नहीं मिला। चित्रगुप्त फिर बही के प्रारम्भ के हिस्से में देखने लगे। और बोले “भाई तुम्हारे पुण्य तो जीवन के प्रारम्भिक भाग में ही हुए हैं। पिछले भाग में तो कुछ भी नहीं है।”
“यह तो उल्टी बात है। प्रारम्भिक जीवन तो मैंने संसार से प्रेम करने में बिताया और अन्तिम जीवन में एकान्त में रहकर परमात्मा का आराधन किया, तपस्या की” सन्त ने कहा। “भाई! धरती पर प्रेम, आत्मीयता, दूसरों के हित में लगे रहना ही पुण्य है, पूजा है और उसी के कारण तुम्हें स्वर्ग की प्राप्ति हुई है, चित्रगुप्त ने समझाते हुए सन्त से कहा ।
बच्चों का सबसे पहला और प्रमुख विद्यालय होता है घर। घर के वातावरण में मिली हुई शिक्षा ही बालक के सम्पूर्ण जीवन में विशेषतया काम आती है। माता बच्चे का पहला आचार्य बताई गई है, फिर दूसरा नम्बर पिता का और इसके उपरान्त शिक्षक, आचार्य, गुरु का स्थान है। मानव जीवन की दो तिहाई शिक्षा माँ बाप की छत्रछाया में घर के वातावरण की उपयुक्तता, श्रेष्ठता पर ही बच्चों के जीवन की उत्कृष्टता निर्भर करती है। और जीवन की उत्कृष्टता शाब्दिक-अक्षरीय ज्ञान पर नहीं वरन् जीवन जीने के अच्छे तरीके पर है।
अच्छा स्वभाव, अच्छी आदतें, सद्गुण, सदाचार ही उत्कृष्ट जीवन के आधार हैं जो पुस्तकों के पृष्ठों से, स्कूल कालेजों बोडिंग हाऊस की दीवारों से नहीं मिलते वरन् घर के वातावरण में ही सीखने को मिलते हैं। इन्हीं गुणों पर जीवन की सरसता, सफलता, विकास निर्भर होता है। जो माँ बाप इस उत्तरदायित्त्व को निभाते हुए घर का उपयुक्त वातावरण बनाते हैं वे अपने बच्चों को ऐसी चारित्रिक सम्पत्ति देकर जाते हैं जो सम्पत्तियों से बड़ी है, जिसके ऊपर सम्पूर्ण जीवन स्थिति निर्भर करती है।
परिस्थितियों का प्रभाव
घर में विपरीत वातावरण होने पर स्कूल कालेजों में चाहे कितनी अच्छी शिक्षा दी जाय वह प्रभावशाली सिद्ध नहीं होती। हालाँकि स्कूल के पाठ्य-क्रम में चरित्र, सदाचार, साधुता, सद्गुणों की बहुत-सी बातें होती हैं, पर वे केवल शाब्दिक और मौखिक ज्ञान का आधार रहती हैं अथवा परीक्षा के प्रश्नपत्रों में लिखने की बातें मात्र होती हैं। विद्यार्थी के जीवन में क्रियात्मक रूप से उनका कोई महत्व नहीं होता। इसका प्रमुख कारण घर के विपरीत वातावरण का होना ही होता है। बच्चों के नैतिक स्तर की जानकारी के लिए एक स्कूल में परीक्षा के उपरान्त बच्चों को ही अपनी कापियाँ जाँचने को कह दिया गया। बाद में जाँच करने पता चला कि बहुत से लड़कों ने अपने गलत सवालों में भी नम्बर दे दिए, कइयों ने फिर से नकल करके सही उत्तर लिख लिए। जिन्होंने अपने लिए अच्छे नम्बर दे दिए उनमें खाते-पीते, धनवान, अच्छे स्तर के कहे जाने वाले घरानों के बच्चे ही अधिक थे। गरीब अथवा साधारण स्थिति के घरों के बच्चे कम थे। ऐसा क्यों? अच्छे धनवान, सम्पत्तिशाली घरानों के बच्चे तो अच्छे होने चाहिएं? किन्तु यह भूल है। ऐसे घरों में प्रायः बड़प्पन, सफेदपोशी, चातुर्य की आड़ में सदाचार, नैतिकता, सद्गुणों पर केवल ऊपरी, मौलिक निष्ठा होती है। बाह्य सफलता प्राप्त करना ही इनका लक्ष्य होता है। उसके समक्ष जरूरत पड़ने पर वे सरलता से जीवन के नैतिक तत्वों का बलिदान कर देते हैं। धन, पद, प्रतिष्ठा, साधन सामग्री आदि जैसे उपलब्ध हो सके वैसा ही वे लोग आचरण करते हैं। इस तरह के अभिभावकों की छत्र छाया में पलने वाले बच्चे भी उनका अनुकरण करके अपनी सफलता के लिए अनैतिक तत्वों का आचरण करने में नहीं झिझकते।
अनुकरण की आदत-
जिन घरों में तनातनी, लड़ाई, झगड़े, कलह अशान्ति रहती है वहाँ बच्चों पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता हैं। जो माँ बाप बच्चों के श्रद्धा स्नेह के केन्द्र होते है, उन्हें बच्चे जब परस्पर लड़ते-झगड़ते, तू-तू मैं-मैं करते, एक दूसरे को बुरा कहते देखते हैं तो बच्चों के कोमल हृदय पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। उन बच्चों में माँ-बाप के प्रति तुच्छता, अनादर, संकीर्णता के भाव पैदा हो जाते हैं जो आगे चलकर उनके स्वभाव और व्यक्तित्व के अंग बन जाते हैं। अतः कभी भूल कर भी बच्चों के सामने माता पिता को अपनी तकरार, लड़ाई-झगड़े की बात प्रकट नहीं होने देनी चाहिए। बच्चे सर्वत्र अपने माँ, बाप, भाई, रिश्तेदार, पड़ोसी सभी से प्यार और दुलार पाने की भावना रखते हैं। इसके विपरीत लड़ाई, झगड़े, क्लेश, अशान्ति से बच्चों के कोमल मानस पर आघात पहुँचता है।
अनुचित लाड़ प्यार-
कई माँ बाप अपने बच्चों की गलत आदतें तोड़ फोड़, सामान को बिखेरने, नुकसान करने आदि पर लाड़ प्यार वश कोई ध्यान नहीं देते, वरन् स्वयं उन्हें फिर से जुटा देते है। कोई चीज नष्ट हो जाने पर फिर उसे खरीद कर ला देते हैं। इस अनावश्यक उदारता और स्नेह, ममता का दूषित प्रभाव बच्चों में कई बुराइयां पैदा कर देता है। बच्चे इन गलत आदतों के अभ्यस्त हो जाते हैं, जो जीवन भर उनसे गलतियाँ और असावधानियाँ कराती हैं। सामान देना, अथवा कोई काम खुद कर लेना इतना महत्वपूर्ण नहीं जितना अपने बच्चों में सजगता, चातुर्य, सदाचार अच्छी आदतें पैदा करना वस्तुतः माँ बाप के लिए यही कसौटी का आधार है। जो चीज बच्चे ने तोड़ी है उसका अभाव कुछ दिन बना रहने देना चाहिए ताकि वह अपनी भूल से उत्पन्न कठिनाई पर विचार कर सके।
बच्चों को किसी बात से रोकने अथवा उन्हें डराने धमकाने या कौतूहल पैदा करने के लिये भूत, चुड़ैल, हौवा आदि का डर दिखाना उनकी क्षमता, साहस, शक्ति , को कुँठित करना है। साथ ही भय की प्रबल भावना पैदा करना है जो जीवन भर उनका साथ नहीं छोड़ती। और यही भय की भावना उन्हें जीवन के किसी भी महत्वपूर्ण काम में हाथ नहीं डालने देती । ऐसे बच्चे बड़े होकर भी छोटे-छोटे बातों से भयभीत हो उठते हैं। इसका कारण बाह्य वातावरण नहीं अपितु बच्चों में घर की पैदा हुई भय की भावना ही होती है। घर में भूत, चुड़ैल आदि के भय की मान्यता रखना, इनमें विश्वास रख कर तरह-तरह के उपचार करना भी बच्चों में तत्सम्बन्धी भय की नींव लगा देता है। घर में किसी भी तरह के भय करा वातावरण होना बुरा है।
व्यक्तित्व की प्रतिच्छाया-
उदारता, प्रेम, आत्मीयता, बन्धुत्व आदि की अनुकूल-प्रतिकूल भावनाओं का अंकुर बच्चों के प्रारम्भिक जीवन में ही लग जाता है। जिन बच्चों को माँ बाप का पर्याप्त प्यार दुलार, मिलता हैं, जिन पर अभिभावकों की छत्रछाया बनी रहती है, जो माँ बाप बच्चों के जीवन में दिलचस्पी प्रकट करते है, उनके बच्चे मानसिक विकास प्राप्त करते हैं। उनका जीवन भी उन्हीं गुणों से ओत-प्रोत हो जाता है जिनमें वे पलते हैं। माता-पिता के व्यवहार आचरण से ही बच्चों का जीवन बनता है। साहस निर्भीकता, आत्म गौरव की भावना बचपन में घर के वातावरण से ही पनपती है।
माँ बापों के व्यसन, आदतों का अनुकरण बच्चे सबसे पहले करते हैं। माँ बाप का सिनेमा देखना, ताश खेलना, बीड़ी, सिगरेट, फैशन, बनाव, शृंगार का अनुकरण कर बच्चे भी वैसा ही करने लगते हैं। इसी तरह जो माँ बाप सदाचारी, संयमी, विचारशील, सद्गुणी होते हैं वैसा ही प्रभाव उनके बच्चों पर पड़ता है।
परिवार के वातावरण में बच्चों के संस्कार, भाव, विचार, आदर्श, गुण, आदतों का निर्माण होता है जो उनके समस्त जीवन को प्रभावित करते हैं। उपदेश, पुस्तकों से जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षा नहीं मिलती, यह तो घरों के वातावरण को स्वर्गीय, सुन्दर, उत्कृष्ट बनाने पर ही निर्भर करती हैं।
भारतमाता पर हुआ चीनी आक्रमण उसके प्रत्येक सपूत के लिए एक चुनौती है। माता को पद-दलित एवं अपमानित होते देख कर भी जिसका खून न खौलता हो, जिसके मन में क्षोभ और प्रतिकार की भावनाएं न उठती हों उसे मनुष्य शरीर में विचरण करने वाला नरपशु ही कहना चाहिए।
अलभ्य अवसर बार-बार नहीं-
कमाने, खाने और उलझनों को सुलझाने में लोग पूरी जिन्दगी ही समाप्त कर देते हैं। ऐसे अवसर किन्हीं विरलों के ही जीवन में आते हैं जिनमें जीवन की सार्थकता का सौभाग्य प्राप्त होता हो। मौत हर किसी की आती है, देर सवेर में सभी को मरना पड़ता है, पर लोक और परलोक को प्रशस्त करने वाली, यश को अमर बनाने वाली, कर्तव्य पालन के आदर्श संसार के सामने उपस्थित करने वाली मौत किसी भाग्यवान को ही मिलती है। जिनके नाम शहीदों की स्वर्णिम पंक्ति यों में इतिहास कारों ने लिखे हैं उन्हें पढ़ते समय हर भावनाशील अन्तःकरण में यह विचार उठते हैं कि काश, हमें भी ऐसा अवसर मिला होता, तो मनुष्य शरीर धारण करना सचमुच ही धन्य हो जाता। आज हमारा सौभाग्य ही है कि चीनी आक्रमण ने भारत के प्रत्येक सपूत के सामने त्याग और बलिदान की पुकार पर अपना शौर्य प्रदर्शित करने का अलभ्य अवसर प्रस्तुत कर दिया है।
अंधकारपूर्ण दुखद स्थिति-
इतिहास पढ़ते समय हम उस अँधेरी स्थिति का भी कहीं-कहीं परिचय पाते हैं जब थोड़े से विदेशियों ने आक्रमण करके हमारे इतने बड़े देश को पददलित किया था। इतना ही नहीं उन्होंने वे बर्बर अत्याचार भी किये थे जिनके सुनने मात्र से रोमाँच खड़े हो जाते हैं। भारत में उस समय भी शक्ति का, शौर्य का, साधनों का अभाव न था। राष्ट्र संगठित और भावनाशील रहा होता और उन नगण्य संख्या में आये हुए आक्रमणकारियों पर एक-एक मुट्ठी धूलि डाल दी जाती तो वे उसी में दब कर मर गये होते। किन्तु अपना दुर्भाग्य ही था कि आन्तरिक दुर्बलताओं में देश ग्रस्त रहा और आक्रमणकारी सैंकड़ों वर्षों तक मनचीती करते रहे। सन् 1857 में आजादी के लिए शस्त्र विद्रोह हुआ पर उसमें भी अपनी आन्तरिक दुर्बलताएं ही बाधक रहीं और वह राज्यक्रान्ति सफल न हो सकी।
इन दुखद पृष्ठों को पढ़ते समय उस समय उत्तरदायी लोगों की अकर्मण्यता पर क्षोभ होता है जो लोग प्रबुद्ध थे वे शिवाजी, राणा प्रताप,बन्दा बैरागी, गुरु गोविंद सिंह आदि की तरह राष्ट्र रक्षा को अपना जीवन लक्ष बनाकर यदि जुट गये होते तो असंख्य जनता उनके पीछे होती और भारत की एकता और वीरता के माथे पर कलंक का टिका न लगता। इन प्रसंगों पर विचार करते समय भावनाशील हृदयों में यह भाव भी उठते हैं कि यदि हम उस समय रहे होते तो कमाने खाने के गोरखधंधे में न लगे रह कर देश धर्म के लिए अपने प्राण देने वालो में-माता को पराधीनता के बन्धन से मुक्त करने में सबसे अग्रणी रहते । इस मार्ग पर चलने में जो भी कष्ट उठाने पड़ते उन्हें सहर्ष उठाते।
अरमान और पश्चाताप
इसी प्रकार जो लड़के अभी किशोरावस्था पार कर रहे हैं और पिछले स्वाधीनता संग्राम में त्याग बलिदान करने वालों की गौरवमयी गाथाएं पढ़ते सुनते हैं तो वे मन मसोस कर रह जाते हैं। ऐसा अवसर हमें अब मिलने वाला नहीं है। यदि स्वाधीनता संग्राम के दिनों में हम भी रहे होते तो किसी त्यागी और बलिदानी के कम जौहर न दिखाते। पिछली शताब्दियों में मातृभूमि में आन−बान–शान की रखवाली के लिए असंख्य देशभक्तों का रक्त बहा है। जिन्हें यह सौभाग्य मिला उनकी आत्मा स्वर्ग में अपनी कर्तव्यपरायणता के लिए गौरवान्वित हो रही होगी। और उन्हीं दिनों जो कमाने खाने और शौक मौज करने की लानत भरी जिन्दगी किसी प्रकार गुजार रहे थे, जो कुछ हो रहा था उसे देखने से आँखें बंद किये हुए थे वे जीते तो रहे होंगे, समय आने पर उन्हें भी आगे पीछे मरना तो पड़ा ही होगा, पर युग की पुकार अनसुनी करने के अपराध में उनका आत्मा धिक्कारते धिक्कारते ही मरा होगा। इतिहास तो उन पर कायरता और हीनता का घृणास्पद लाँछन सदा ही लगाता रहेगा। ऐसे व्यक्ति जहाँ कहीं भी होंगे उस समय की काहिली पर खेद और पश्चाताप की प्रकट कर रहे होंगे। वे सोचते होंगे कि हमने तुच्छ बातों में जिंदगी गुजारते हुए एक अलस्य अवसर हाथ से खो दिया।
चुनौती और कसौटी-
आज समय ने पुनः वही परिस्थितियाँ हमारे समाने पैदा कर दी हैं। वीरता और कायरता की प्रत्यक्ष चुनौती अनायास ही सामने आ खड़ी हुई है और हमें विवश कर दिया है कि किसी एक को चुन लें। चीन ने भारत पर आक्रमण करके उसी मनोवृत्ति को दुहराया है जिससे प्रेरित होकर पिछली शताब्दियों में आक्रमणकारी भारत पर हमले करते रहे हैं। लूट, शोषण और साम्राज्य ही उनका एक मात्र लक्ष्य था। चीन के लिए भारत पर आक्रमण का और कोई कारण न था। लाखों वर्षों से जहाँ कभी मनुष्यों का निवास नहीं रहा, घास पत्ता भी जहाँ नहीं जमता, पानी की ढलान के आधार पर प्रकृति ने जहाँ स्वयं ही सीमा रेखा बना दी है, इतिहास जिसके संबंध में साक्षी है उस भूमि को अपनी बनाने का बहाना करके छिपे हुए चीते की तरह शान्ति से चरती हुई गाय के ऊपर आक्रमण कर बैठने वाली नीति को अपना कर चीन ने जो कुछ किया है उसके पीछे बहाने वाला कारण तो प्रचार मात्र है, उसका वास्तविक उद्देश्य दूसरा ही है। भारत को अस्त−व्यस्त कर देना, उसे पद दलित बनाने की दुरभिसंधि ही इसका वास्तविक उद्देश्य हो सकता है।
हर नागरिक एक सैनिक-
क्या हमारे लिए उचित होगा कि इस आक्रमण को चुपचाप आँखें बन्द करके देखते रहें, और अखबार में खबरें मात्र पढ़ लेने से संतुष्ट हो जायें? अथवा यह सोचें कि लड़ाई का काम फौजी सिपाहियों का है। वे जानें, उनका काम जानें हम क्या कर सकते हैं? हम क्या करें? ऐसा सोचना किसी भी प्रकार उचित न होगा। क्योंकि अब युद्ध केवल सैनिकों से नहीं लड़े जाते। इस जमाने में गोला बारूद से ही विजय प्राप्त नहीं होती। वरन् युद्धरत देशों के हर नागरिक को लड़ाई में अपना योगदान देना होता है। इसी योगदान के ऊपर अन्तिम जीत हार निर्भर रहती है। द्वितीय महायुद्ध में जर्मनी इटली, जापान आदि देश गोला बारूद की दृष्टि से हारे थे पर वहाँ की जनता जागृत होने से उन पराजितों को भी गुलाम न बनाया जा सका। वे देश भी आज स्वाधीनों की ही पंक्ति में खड़े हैं। इसके विपरीत जहाँ की जनता प्रबुद्ध नहीं हुई है वह अफ्रीका महाद्वीप के अधिकाँश भाग पर गोरे उसी प्रकार शासन कर रहे हैं जैसा कि सामंतवादी जमाने में निरीह जनता पर किया जाया करता था।
युद्ध मोर्चे का व्यापक क्षेत्र--
देश भक्ति की भावनाओं से ओत प्रोत नागरिक भी आज के जमाने में युद्ध मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की तरह ही महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं। लड़ाई केवल मोर्चे पर ही नहीं जीती जाती वरन् वास्तविक युद्धस्थल खेतों-खलिहानों, कारखानों और जनता के हौंसले में सन्निहित होता है। आज के जमाने में युद्ध बड़े खर्चीले होते हैं। इसलिए उसका प्रभाव हर नागरिक पर पड़ता है। युद्ध साधनों को जुटाने के लिए हर नागरिक को अपने जरूरी खर्चो को घटा कर रक्षा व्यवस्था की पूर्ति करनी पड़ती है। यदि इसमें ढील रहे तो आर्थिक संतुलन अस्त−व्यस्त हो जाने से युद्ध मोर्चे पर उसका पड़ता है और जीत की संभावना घटती जाती है।
आर्थिक साधनों का युद्ध जीतने पर आज भारी प्रभाव पड़ता है, इसलिए नागरिकों को दान या टैक्स के रूप में उसे जुटाना ही पड़ता है। यह प्रक्रिया भार रूप समझ कर नहीं वरन् देशभक्ति की भावनाओं से ओतप्रोत होकर की जानी चाहिए। प्रसन्नता की बात है कि गरीब और मध्यम श्रेणी के नागरिक इस परीक्षा में अनुपम उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। विदेशों से युद्ध सामग्री मँगाने के लिए स्वर्ण की आवश्यकता पड़ी है तो भारत की ललनाएं अपनी सजावट शोभा को देश की स्वाधीनता की तुलना में तुच्छ समझ कर प्रसन्नतापूर्वक आभूषणों का दान कर रही हैं। गरीब भी अपने रोटी कपड़े में कमी करके राष्ट्र रक्षा के लिए यथासंभव देने में कुछ कमी नहीं रहने दे रहे है।
धन और जन की माँग-
धन शक्ति के समान ही जन शक्ति की आवश्यकता युद्ध में रहती है। सैनिकों के द्वारा ही तो मोर्चे सँभाले जाते हैं और वे ही तो शत्रु की गोली के आगे सीना तानकर चलते हैं। दुश्मन के जहरीले दाँत तोड़ने का उत्तरदायित्व उन्हीं के भुज दंडों पर निर्भर रहता है। सेना की क्षमता, साहस और युद्ध कौशल द्वारा ही तो आक्रमणकारियों का मुँह मोड़ा जाता है। इस कार्य के लिए नारियाँ अपने सुहाग सर्वस्व पति को भारत माता के लिए अर्पित करती है। माताएँ अपने से अधिक पूज्य भारत माता की लाज बचाने के लिए अपने गोदी के खिलाये बच्चों को मंगल तिलक करके रणस्थल में भेजते हुए गर्व अनुभव करती हैं। जो लड़ाई पर नहीं जा पाते अपने शरीर का एक अंश-रक्त-घायल सैनिकों के शरीर में डालने के लिए देते हैं और मरणासन्नों को पुनः जीवन देकर उन्हें पुनः युद्ध मोर्चे पर जा सकने योग्य बनाते हैं।
व्यामोह में ही न पड़े रहें-
धन जन की, तन मन की सहायताएँ चारों ओर से जुटाये जाने पर राष्ट्र की युद्ध शक्ति सबल होती है और उसी के बल पर विजय की संभावना सुनिश्चित बनती है। आज प्रत्येक भारतीय नागरिक के लिए देशभक्ति की परीक्षा का समय है। ये समय जीवन में कभी-कभी आते हैं। इतिहास की पुनरावृत्ति के क्षण अब पुनः सामने आ पहुँचे हैं। मातृ भूमि की स्वाधीनता और प्रतिष्ठा बचाने के लिए शिवाजी, प्रताप, गुरु गोविंद सिंह, लक्ष्मी बाई, नाना साहब, आदि बनने के लिए हममें से प्रत्येक को अवसर आज प्राप्त है। जो इस समय में स्वार्थ और व्यामोह में पड़े रहेंगे वे अवसर चूकेंगे और उन्हें पीछे पश्चाताप ही करते रहना पड़ेगा।
योगी अरविन्द की भविष्यवाणी
मदर इण्डिया के 11 नवम्बर 1950 के अंक में श्री अरविन्द ने अपने सम्पादकीय लेख में लिखा था कि चीन के तिब्बत के सम्बन्ध में जो नीति अपनायी है उसका बुनियादी उद्देश्य यह है कि चीन की सीमा को बिल्कुल भारत से मिला दिया जाय और वहाँ समय आने पर उपयुक्त राजनीति अपनाकर भारत पर हमला करने के लिए तैयार रहा जाय। इस स्थिति में तभी कुछ अंतर आयेगा यदि भारत रूसी गुट के साथ शामिल हो जाय। लेकिन माओ या स्तालिन के प्रकोप से बचने के लिए उनके साथ मिल जाना किसी दृष्टि से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। यह तो ऐसी बात होगी जिससे हमारे आदर्शों और महत्वकाँक्षाओं का खात्मा हो जायगा। वास्तव में जो तरीका हमारी रक्षा का हो सकता है वह यह है कि चीन के विरुद्ध कड़ाई का रुख अपनाया जाय, उसके घृणित इरादों की खुले शब्दों में निन्दा की जाय बिना किसी छिपाव दुराव के अमरीका के साथ शामिल हुआ जाय।
मदर इण्डिया के 11 नवम्बर 1950 के अंक में श्री अरविन्द ने अपने सम्पादकीय लेख में लिखा था कि चीन के तिब्बत के सम्बन्ध में जो नीति अपनायी है उसका बुनियादी उद्देश्य यह है कि चीन की सीमा को बिल्कुल भारत से मिला दिया जाय और वहाँ समय आने पर उपयुक्त राजनीति अपनाकर भारत पर हमला करने के लिए तैयार रहा जाय। इस स्थिति में तभी कुछ अंतर आयेगा यदि भारत रूसी गुट के साथ शामिल हो जाय। लेकिन माओ या स्तालिन के प्रकोप से बचने के लिए उनके साथ मिल जाना किसी दृष्टि से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। यह तो ऐसी बात होगी जिससे हमारे आदर्शों और महत्वकाँक्षाओं का खात्मा हो जायगा। वास्तव में जो तरीका हमारी रक्षा का हो सकता है वह यह है कि चीन के विरुद्ध कड़ाई का रुख अपनाया जाय, उसके घृणित इरादों की खुले शब्दों में निन्दा की जाय बिना किसी छिपाव दुराव के अमरीका के साथ शामिल हुआ जाय।
आये दिन लोग हमें पूछते रहते हैं कि चीन के युद्ध का क्या परिणाम होगा और यह कितने दिन चलेगा? प्रश्नकर्ताओं में से अधिकाँश लोग वे होते हैं जो अपने कमाने खाने की सरल व्यवस्था में लड़ाई के कारण विक्षेप उत्पन्न हुआ समझते हैं और उस झंझट को जल्दी ही सुलझा हुआ देखना चाहते हैं। कुछ ऐसे भी होते हैं जो डरते हैं कि लड़ाई बढ़ी तो हमें धन जन की हानि उठानी पड़ेगी। कुछ को कौतूहल और जिज्ञासा प्रधान होती है। कुछ लोग भविष्यवाणियों की सचाई को परखने के लिए ऐसा पूछते रहते हैं। इन लोगों में धैर्य और साहस उत्पन्न करने वाले उत्तर समय-समय पर हम देते भी रहते हैं। आज इस लेख में इस सम्बन्ध की सार्वजनिक चर्चा करेंगे।
लड़ाई कब तक चलेगी?-
हममें से प्रत्येक को यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि यह लड़ाई अभी 8॥ वर्ष और चलेगी। अज्ञातवास से लौटते ही हमने यह घोषणा की थी कि सूक्ष्मदर्शी तपस्वियों और योगियों के मतानुसार भारत के लिए आगे के दश वर्ष अग्नि परीक्षा के समान महत्वपूर्ण, और प्रसव वेदना के समान कष्टकारक होंगे। सहस्रपुटी मकरध्वज रसायन की तरह उसे अगिन संस्कार सहने और कच्ची धातु से भट्टी में अनेक शोधन संस्कार सहन कर परिपक्व धातु बनने जैसी कष्ट साध्य प्रक्रिया में होकर गुजरना पड़ेगा। अष्टग्रही योग का प्रभाव, या और भी जो चाहे सो इसे कहा जाय पर नियति की एक निश्चित व्यवस्था यह है कि हमें कठिनाइयों के एक बड़े दौर में होकर गुजरना पड़ेगा। उस बात को कहे हमें 1॥ वर्ष बीत गया, अभी 8॥ वर्ष और बाकी हैं। इतनी अवधि तक भारत के प्रत्येक नागरिक को एक शूरवीर सैनिक की तरह ढाल तलवार लेकर नियति का स्वागत करने के लिये तत्पर रहना चाहिए, रहना भी होगा।
गोलाबारी एक साधारण बात-
लड़ाई के मोर्चे पर अभी गोलाबारी बन्द है। यह फिर भड़केगी या नहीं, यदि भड़केगी तो कब मारकाट शुरू होगी? इसका कोई बड़ा महत्व नहीं है। गोलियाँ चलाने या बन्द होने से लड़ाई की स्थिति पर बहुत थोड़ा अन्तर पड़ता है। युद्ध के वास्तविक कारण यदि बने रहें और युद्धरत पक्ष अपने दाव घात के लिये कुछ दिन लड़ाई रोके रहें तो उसे युद्धबन्दी नहीं माना जा सकता। प्राचीन काल में सेनाएँ रात्रि के समय नहीं लड़ा करती थीं क्योंकि उस समय अन्धकार में लड़ना किसी भी पक्ष को सुविधाजनक न था। दिन निकलते ही लड़ाई फिर शुरू हो जाया करती थी। उस समय रात्रि की बन्दी को कोई भी लड़ाई की समाप्ति नहीं मानता था। उसे क्षणिक विराम ही समझा जाता था। आज भी वही स्थिति है। चीन थोड़े दिनों अपनी सुविधा और तैयारी के लिए कुछ समय लड़ाई बन्द रख सकता है। बीच बचाव कराने की कोशिश वाले लोगों को भी कुछ समय और गुजार देने का श्रेय मिल सकता है पर इससे वस्तु स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। लड़ाई की तैयारी फिर भी जारी रहेगी और युद्ध की स्थिति बराबर बनी रहेगी।
आक्रमणकारी के इरादे-
यह भली प्रकार समझ लेने की बात है कि चीन ने निर्जीव अनुपयोगी और उसके लिए सर्वथा अनावश्यक एक छोटे से भूखण्ड के लिए इतनी विपुल तैयारी के साथ युद्ध नहीं छेड़ा है। इतने नगण्य लाभ के लिये इतनी भारी जोखिम उठाने के लिये कोई बुद्धिमान कदापि तैयार न होगा। उसके इरादों में एक अत्यन्त क्रूर दुरभिसंधि छिपी हुई है। वह भारत को अपने साम्राज्य का अंग बनाकर संसार की सर्वोपरि शक्ति बनने के स्वप्न देख रहा है। उसकी यह रावण और भस्मासुर जैसी महत्वाकाँक्षा अब इतनी उग्र हो उठी है कि उसका समाधान तभी संभव है जब उसको मुँह कुचल देने की प्रतिपक्षी शक्ति का सामना करना पड़ेगा। भारत जब तक उतना समर्थ नहीं हो जाय कि सैनिक दृष्टि से उसके दाँत तोड़ सके जब तक चीन केवल अपने हथकण्डे बदलता रहेगा लड़ाई की तैयारी बन्द न करेगा। नेपोलियन और सिकन्दर की तरह आज तो उसे विश्वविजय की धुन है। इस नशे को उतारने की औषधि जब तक मिल न जाय तब तक उसका नशा ऐसा ही चढ़ा रहने वाला है। ऐसी दशा में शान्ति होने की आशा कैसे की जा सकती है?
पड़ौसी पाकिस्तान भी तो अपनी करतूतों से पीछे नहीं हट रहा है। उसे समझाने के लिए भी शक्ति की ही जरूरत पड़ेगी। हमें दुर्बल समझकर दोनों ही अपने-अपने ढंग से लाभ उठाने की सोच रहे हैं। और भी ऐसे अनेकों होंगे या हो सकते हैं जो हमें कमजोर समझने का अनुमान लगाते हों और अपने दाव घात तैयार कर रहे हों। भारत के सिर पर जिस प्रकार की अप्रत्याशित लड़ाई आकर सवार हो गई है, वैसा तभी हुआ करती है जब दूसरे लोग सामने वाले की कमजोरी का अनुमान लगाते हैं और उसे किसी भी बहाने दबाकर अनुचित लाभ उठा लेना सरल समझते हैं।
शक्ति की परीक्षा का प्रयत्न-
सम्भव है हमारे पड़ौसियों ने हमें ऐसा ही समझा हो और उसी की आजमायश के लिये पहली टक्कर इस लड़ाई के रूप में देकर शक्ति परीक्षा का प्रयास किया हो। हो सकता है कि इस प्रथम परीक्षा में आक्रमणकारी को अपना अनुमान गलत साबित होने का अवसर मिले और वह दूसरी टक्कर को अलाभकारी समझ कर पीछे हट जाय। और फिर किसी अन्य अवसर का प्रतीक्षा करे। यह शत्रु का अपना दृष्टिकोण हो सकता है कि वह क्या सोचे और क्या करे इससे अपना कोई वास्ता नहीं। हमें तो अब विवश होकर शक्ति संग्रह में लगना होगा और अपने को इतना मजबूत बनाना होगा कि दुर्बलता से अनुचित लाभ उठाने का लालच किसी पड़ौसी को न आवे। अपनी शक्ति और सुरक्षा के लिये हमें युद्ध स्तर पर ही तैयारी करते रहनी पड़ेगी और चाहे गोली चले या न चले हमें उसी तैयारी में प्रवृत्त रहना होगा जैसी कि युद्धकाल में होती है। हमारे लिये आठ वर्ष छह मास तक युद्ध की ही स्थिति बनी रहनी है। तीसरे महायुद्ध का-अणु शक्ति से मानव सभ्यता के विनाश का समीप आता खतरा भी अब जा रहा है। उस समय के लिये भी हमें शक्ति चाहिये। इस संग्रह का कार्यक्रम युद्ध स्तर की तैयारी से किसी भी प्रकार कम नहीं हो सकता।
यह भी हो सकता है-
इन बातों का ध्यान रखते हुए अब गोली चलने या या चलने का विचार छोड़कर भारत की आत्मरक्षा के लिये अपने को सैनिक और नागरिक दृष्टि से सबल बनाने के लिए युद्ध स्तर पर ही तैयारी जारी करनी होगी। और जन साधारण को उसी तप, त्याग की वृत्ति का परिचय देते रहना होगा जैसा कि युद्ध के समय में दिया जाता है। शीत ऋतु की प्रतिकूलता कम होते ही सम्भव है चीन फिर आक्रमण करे। ऐसी दशा में हममें से प्रत्येक को घरेलू काम काजों की दूसरी व्यवस्था बनाकर सैनिक मोर्चे पर जाने के लिये और बड़ी से बड़ी कुर्बानी करने के लिए तैयार रहना चाहिए। हमने स्वयं भारत सरकार के रक्षा मन्त्री को लिखा है कि “आवश्यकता के समय कभी भी किसी भी काम के लिए, कहीं भी जाने के लिये हमें बुलाया जा सकता है। राष्ट्र रक्षा के लिये हर क्षण हम बड़ी से बड़ी कुर्बानी के लिए तैयार हैं।’ हमें भरोसा है कि इस प्रकार प्राण दान करने वालों में हम अकेले ही नहीं, हमारे साथ और भी बहुत से होंगे। पिछले चालीस वर्षा में स्वाधीनता संग्राम की प्रत्येक प्रवृत्ति में हमने जी खोलकर भाग लिया है। सालों जेल खाने की यंत्रणाएं सही हैं और त्याग बलिदान के भयंकर से भयंकर अवसरों का हँसते हुए स्वागत किया है । यदि पुनः मातृ-भूमि की रक्षा के लिए प्राणदान का अवसर आता है तो उसे हम सौभाग्य के अतिरिक्त और क्या समझ सकते है? मृत्यु का सब से श्रेष्ठ स्वरूप यही है कि वह उच्च आदर्श की रक्षा करते हुए, कर्तव्य पालन की वेदी पर किसी मनुष्य को प्राप्त हो। ऐसी मृत्यु हमारे लिये सबसे अधिक आनन्द और प्रसन्नता का वरदान बनेगी।
दूसरा महत्वपूर्ण युद्ध-मोर्चा -
किन्तु यदि ऐसा अवसर न भी आये तो भी हमें आगामी 8॥ वर्षों तक अग्नि परीक्षा में हर घड़ी तपते रहने के लिए प्रस्तुत ही रहना चाहिए। किसी भी समाज या राष्ट्र की सबसे बड़ी कमजोरी उसके नागरिकों की आत्मिक दुर्बलता हुआ करती है। यह दुर्बलता जहाँ होगी वहाँ सारे साधन होते हुए भी शोक, सन्ताप, क्लेश, कलह, अभाव, दारिद्र का ही वातावरण बना रहेगा। धन और शस्त्रों की समुचित व्यवस्था होते हुए भी यदि आत्मबल का अभाव रहे तो यह सारे साधन व्यर्थ ही सिद्ध होंगे। कायर सैनिक घबराहट, और बुज़दिली के कारण जीती बाजी को हार में बदल सकते हैं। शत्रु के सहायक बन सकते हैं और अपने हथियारों का लाभ शत्रु को दे सकते हैं। इसके विपरीत यदि सैनिकों की नस-नस में उच्च आदर्श भरा हो तो वे स्वल्प साधनों से भी मरते दम तक शत्रु से लोहा लेते रह सकते हैं। यही बात जीवन के हर क्षेत्र में लागू होती है। बेईमान स्वार्थी, कायर और दुर्बुद्धि मनुष्य अपने लिये ही नहीं और सब के लिये भी विपत्ति का कारण बनता है। ऐसे लोगों की संख्या जहाँ अधिक होगी वहाँ चारों ओर कमजोरी और अशान्ति ही छाई रहेगी। इस स्थिति को सुधारना और सँभालना भी रक्षा कार्यों का एक महत्वपूर्ण अंग होता है।
यह सरकार करे और यह हम करें-
कारखाने लगाकर अस्त्र-शस्त्र बनाये जा सकते हैं। ऊँचे वेतन देकर सैनिक भर्ती किये जा सकते हैं। टैक्स लगाकर धन प्राप्त किया जा सकता है। यह कार्य सरकार के लिये बहुत कठिन नहीं है। चतुर युद्ध विद्या विशारद मोर्चे पर ठीक रणनीति के द्वारा दुश्मन के दाँत खट्टे कर सकते हैं। पर जन-मानस में प्रविष्ट हुई दुष्प्रवृत्तियों को हटा सकना सरकार के बस बूते की बात नहीं है। यह कार्य धर्म, नीति और सदाचार की प्रेरणा दे सकने वाले व्यक्ति ही कर सकते हैं। हम लोग अब आगामी 8॥ वर्ष तक इस मोर्चे को सँभाले रहेंगे और राष्ट्र को सच्चे अर्थों में मजबूत बनाने के लिए- जन-मानस में कर्तव्यनिष्ठा, सदाचार, पराक्रम एवं आदर्शवाद को गहराई तक
न स्फूर्जति न च गर्जति न च करकाः किरति सृजति न च तडितः। न च विनि मुञ्चति वात्याँ, वर्षति निभृतं महामेघः
महामेघ (झर बादल, न भड़कते हैं, न गरजते हैं, और ओले फेंकते हैं, न बिजली कौंधाते हैं, न तूफान घहराते हैं, वे चुप चाप बरसते रहते हैं।
प्रविष्ट कराने के लिए कार्य करेंगे। भौतिक और आत्मिक दोनों ही दृष्टियों से सबल बना हुआ राष्ट्र सच्चे अर्थों में बलवान कहा जा सकता है और वही इस योग्य बन सकता है कि किसी भी दुर्दान्त दुष्ट के आक्रमणकारी इरादों को धूलि में मिला सके।
व्यक्ति निर्माण का, चरित्र निर्माण का, समाज निर्माण का, युग निर्माण का कार्यक्रम युद्ध मोर्चे की सफलता के लिए ही है। उसे रक्षा प्रयत्न का ही एक अंग मानकर चला जायगा। अज्ञातवास से लौटने के बाद 10 वर्ष का हमारा कार्यक्रम इसी दृष्टि से बना है। शेष 8॥ वर्ष इसी मोर्चे पर लड़ना है। परिवार के प्रत्येक स्वजन को इस मोर्चे पर हमारे साथ रहना चाहिये।
जब किसी मनुष्य का शरीर कमजोर हो जाता है तो उस पर नाना प्रकार की बीमारियाँ आक्रमण करने लगती हैं। मन कमजोर हो जाय तो चिन्ता, भय, शोक, घबराहट, वासना आदि का प्रकोप होने लगता है। आर्थिक कमजोरी में अभाव अपमान और अव्यवस्था का सामना करना होता है। इस संसार में कमजोरी सबसे बड़ा अपराध है। कमजोरी को मिटा डालने के लिए प्रकृति के विविध विधि कुचक्र चलते रहते हैं। यहाँ देर तक वे ही ठहर पाते हैं जो अपने को सुदृढ़, सफल एवं समर्थ सिद्ध कर सकते हैं। कमजोरी का पता चलने पर उसका शोषण करने के लिए आस-पास के दुष्ट दुरात्माओं के मन में अनायास ही लालच पैदा होता है, दुर्बल को हड़प जाने के लिए दुरभिसंधियाँ बनने लगती हैं।
आन्तरिक दुर्बलता की भयंकरता-
पिछली शताब्दियों में भारत को अपनी आन्तरिक कमजोरियों का भारी दंड भुगतान पड़ा है। आंतरिक फूट और पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष का पता जब पड़ोसियों को लगा तो डाकुओं के छोटे-छोटे गिरोह हमलावर हो गये और उन्होंने बात की बात में देखते-देखते इतने बड़े देश को लूटने और पैरों तले दबाने में सफलता प्राप्त कर ली। यदि आन्तरिक फूट न होती, एकता, देशभक्ति और संगठन की शक्तियाँ जागृत रही होतीं तो इतने वर्षों तक गुलामी की जंजीरों में जकड़े रहने की अनहोनी बात हो सकने का कोई कारण न था।
इतनी बड़ी संख्या में जो मुसलमान आज दिखाई पड़ते हैं उनके पूर्वजों ने जान बूझ कर धर्म त्याग नहीं किया था। उनमें से किसी को झूठा पानी पिला दिया, छुआ खिला दिया तो उसका धर्म भ्रष्ट मान लिया गया, तो उसे जाति बहिष्कृत करके विधर्मी बने रहने को विवश किया गया। स्त्रियों से कोई चूक हो गई तो उन्हें विधर्मियों की ही शरण में स्थल मिल सका। जहाँ संसार में सब धर्म, दूसरे धर्म वालों को अपने में मिलाने का सहर्ष स्वागत करते हैं वहाँ हमने इसके लिए द्वार बन्द रखे, इतना ही नहीं अपनों को भी धकेल-धकेल कर विधर्मियों की गोद में पटकते रहे। उनकी संख्या बढ़ते-बढ़ते इतनी पहुँच गई कि देश का दिया गुल हो गया। छोटी सी संकीर्णता का कितना बड़ा दंड हमें भुगतना पड़ रहा है।
आक्रमण का प्रलोभन-
चीन का आक्रमण उसकी इसी कल्पना पर आधारित था कि भारत आज भी आन्तरिक दृष्टि से अत्यन्त दुर्बल देश है। इसे छोटे से आक्रमण में ही झकझोरा, परास्त किया और अपने पैरों तल रौंदा जा सकता है। सौभाग्य से उसका मनचीता नहीं हो पाया। सामरिक संतुलन की दृष्टि से जो कमी थी वह मित्र राष्ट्रों की उदार सहायता से पूरी हो गई और देश में भी अनेकों कारखाने आधुनिक अस्त्र शस्त्रों का निर्माण करने में लगे हुए हैं। इस प्रकार शस्त्र बल की कमी जल्दी ही पूरी हो जायगी। पर इतने से ही काम चलने वाला नहीं है। हमें अपनी दुर्बलताओं पर भी ध्यान देना होगा जिनके कारण भीतर ही भीतर हम खोखले होते चले जा रहे हैं। यदि ये कमियाँ पूरी न की गईं तो स्थायी रूप से आजादी कायम रखना और समय की प्रतिस्पर्धा में खड़े रह सकना अन्ततः दुर्लभ ही हो जायगा।
सामाजिक कुरीतियाँ
सामाजिक कुरीतियाँ को ही लीजिए- जाति पाँति के नाम पर हम कितने अधिक खंडों में, उपराष्ट्रों में बंटे हुए हैं? अलगाव की यह मान्यतायें कभी एक जाति एक समाज के रूप में हमें सोचने नहीं देतीं। चुनावों में, नौकरियों में, संस्थाओं में भीतर ही भीतर जातीय पक्षपात काम करता रहता है। जातियों के बीच परस्पर घृणा और फूट के बीज पनपते रहते हैं। प्रान्तीयता, भाषावाद, सम्प्रदायवाद अनेक निमित्तों को लेकर फूट के बीज हमारे मनों में घुसे बैठे रहते हैं और वे कोई न कोई ऐसे अवसर उत्पन्न करते रहते हैं जिनसे परस्पर लड़ाई झगड़ों में, ईर्ष्या द्वेष में शक्ति का एक बड़ा भाग बर्बाद होता रहे। एक उदीयमान राष्ट्र के नागरिकों में जो परस्पर प्रेम, एकता, सौजन्य, सहयोग और मिलजुल कर आगे बढ़ने का उत्साह होना चाहिए, उसे पूर्ण रूप से जागृत करना आवश्यक है। इसके बिना हम सच्चे अर्थों में एक राष्ट्र न बन सकेंगे।
महिलाओं को पर्दे में रखने की, शिक्षा और स्वावलम्बन की दृष्टि से उन्हें पिछड़ा रखने की कुरीति हमारे आधे राष्ट्र को पक्षाघात की बीमारी होने के समान है। आधी जनसंख्या कैदी की तरह पराधीन, परमुखापेक्षी, परावलम्बी, अशिक्षित और अविकसित स्थिति में पड़ी रहे तो राष्ट्र के लिए वे भारभूत ही रहेंगी। ये न तो अच्छा पारिवारिक जीवन निर्माण कर सकेंगी और न संस्कारवान नई पीढ़ी पैदा कर सकने की क्षमता उनमें होगी। यह बुराई राष्ट्र को दुर्बल बनाने वाली एक प्रमुख कमजोरी है।
अपव्यय की विभीषिका -
विवाह शादियों में अन्धाधुन्ध अपव्यय दहेज प्रथा, जेवर , चढ़ाव आदि की कुरीतियों में हिन्दू गृहस्थ की प्रायः आधी कमाई खर्च हो जाती है। इससे जीवन विकास का आवश्यक क्रम टूटता है। कर्जदारी बढ़ती है और चोरी बेईमानी करने के लिए लोगों को विवश होना पड़ता है। झूठी शेखी-खोरी की लत पड़ती है। अपव्यय से अनुपयोगी कार्यों को प्रोत्साहन मिलता है। विवाह शादी आज हमारे लिए आर्थिक स्थिति को अस्त−व्यस्त करने वाली कुरीतियों के केन्द्र बने हुए हैं। आर्थिक उन्नति के छोटे मोटे प्रयत्नों से देश की स्थिति जितनी सुधरने की आशा की जाती है उससे कई गुनी तो इन कुरीतियों में ही नष्ट हो जाती है। यदि समाज सुधारकों के प्रयत्न से अथवा कानूनी प्रतिबंध से विवाह एक हल्की सी महत्वहीन बात मान ली जाय तो देश की आर्थिक स्थिति उससे अधिक सुधर सकती है जितनी पंचवर्षीय योजनाओं से भी नहीं बढ़ सकती। अपव्यय होने वाला यह धन यदि उत्पादन कार्यों में लगे तो बिना विदेशी मुद्रा के हम आर्थिक दृष्टि से काफी समृद्ध और सम्पन्न हो सकते हैं।
नशेबाजी में बेहिसाब धन बर्बाद होता है। प्रायः कई लाख रुपया प्रतिदिन का हम तमाखू पीते हैं। अन्य नशे इतनी ही कीमत के माने जायें तो दस पाँच लाख प्रतिदिन की बचत, वर्ष में 10-15 करोड़ रुपया वार्षिक की बचत और स्वास्थ्य की बर्बादी की रक्षा दोनों मिला कर इतनी बड़ी बचत बन सकती है जिसका उपयोग यदि कृषि और उद्योग धन्धों के बढ़ाने में किया जाय तो धन समृद्धि की कोई कमी देश में न रहे।
यह भी उपेक्षणीय नहीं-
अशिक्षा का प्रश्न बहुत बड़ा मालूम पड़ता है। पर यदि प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति देशभक्ति की दृष्टि से एक वर्ष में पाँच प्रौढ़ों को शिक्षित बनाने का उत्तर दायित्व अपने कंधे पर ले ले तो दो वर्ष में एक भी भारतीय नागरिक अशिक्षित न रहे और इसके लिए सरकार पर किसी प्रकार का आर्थिक बोझ भी न पड़े।
धार्मिक क्षेत्र में एक निठल्ली पलटन मुफ्त का माल चरती है। यह देश की आर्थिक कमर तोड़े डालती है। 56 लाख भिक्षुकों का पालन पोषण इस गरीब देश को करना पड़ता है। फिर वे मुफ्त का माल खाने वाले लोग अपनी उपयोगिता सिद्ध करने के लिए नाना प्रकार के प्रपंच रचते और बुद्धि-भ्रम फैलाते है जिसके कारण जनता की अपार हानि होती है। 56 लाख सेना तो भारत और चीन दोनों की मिल कर भी नहीं हैं। फिर इतनी बड़ी निठल्लों की सेना पर होने वाला खर्च और उनके काम की क्षति देश की भारी बर्बादी का कारण बनी हुई है। इन लोगों को कुछ उपयोगी काम करने में लगाया जा सके और धर्म के लिए व्यय होने वाले धन को लोक हित के कार्यों में लगाया जा सके तो यह आन्तरिक दुर्बलता दूर करने वाली एक बहुत बड़ी बात हो सकती है।
स्वार्थपरता और दुष्प्रवृत्तियाँ-
सामूहिक हित की परवा न करके व्यक्ति गत स्वार्थ के लिए उत्सुक रहना यह हमारी एक आम प्रवृत्ति बनी हुई है। सभी वर्गों के लोग यह सोचते हैं कि मेरा व्यक्ति गत स्वार्थ किसी भी प्रकार पूरा हो भले ही उससे दूसरों को या सारे समाज को कितनी ही बड़ी क्षति पहुँचे। खाद्य पदार्थों में मिलावट, नकली औषधियाँ, रिश्वतखोरी, धोखेबाजी, हराम खोरी आदि बेईमानी आदतें हर क्षेत्र में पनपती दिखाई पड़ी हैं। उससे परस्पर अविश्वास और विक्षोभ बढ़ता है। सामूहिक उन्नति में भारी बाधा पड़ती है और इन दुष्प्रवृत्तियों में लगे हुए लोगों का आत्म बल दिन-दिन क्षीण होते चले जाने से वे अपराधी और कायर मनोवृत्ति के बन जाते हैं। ऐसे लोगों की बुरी आदतें अन्य अनेकों प्रकार के अनैतिक कार्यों को जन्म देती हैं। बुरे रास्ते से कमाया हुआ पैसा सदा ही कोई न कोई कुकर्म करने की प्रेरणा करता है। जुआ, सट्टा, लाटरी आदि के द्वारा या चोरी, बेईमानी, छल, शोषण आदि के आधार पर इकट्ठा हुआ बिना मेहनत का धन जहाँ कहीं भी रहेगा वहाँ दुष्टता ही पनपेगी। इसलिए श्रमपूर्वक, ईमानदारी के साथ, उचित आवश्यकताओं की पूर्ति भर के लिए, सीमित मात्रा में धन कमाने की आदत यदि लोगों को पड़ेगी तो ही राष्ट्रीय चरित्र का विकास होगा। समाज को हानि पहुँचा कर व्यक्ति गत स्वार्थ के लिए किये जाने वाले कार्यों से जब लोग हृदय से घृणा करना सीखेंगे तो ही हम स्वस्थ विकास के द्वारा होने वाले लाभों से लाभान्वित हो सकेंगे।
उच्च चरित्र की महान शक्ति-
आदर्शवादी विचार धाराओं का अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित होना मनुष्य का सबसे बड़ा बल है। सत्य, धर्म, आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता की भावनाओं से ओतप्रोत दया, मैत्री, उदारता प्रेम परोपकार और संयम पर आस्था रखने वाला व्यक्ति हजार हाथियों से अधिक बलवान होता है। इसके विपरीत स्वार्थी, कायर, लोभी और दुर्गुणी व्यक्ति चाहे कितना ही धनी, बली या साधन सम्पन्न क्यों न हो वस्तुतः अत्यन्त दुर्बल रहेगा। अवसर आने पर उसकी स्थिति तिनके के समान तुच्छ सिद्ध होगी। चरित्रवान नागरिकों के निर्माण का प्रयत्न बारूद और हथियारों के कारखाने बनाने समान ही युद्ध विजय की दृष्टि से आवश्यक है।
चीन के बर्बर आक्रमण ने हमारा ध्यान उन आन्तरिक दुर्बलताओं की ओर आकृष्ट किया है जिनके कारण हमें पिछली शताब्दियों में यंत्रणाओं और लाँछनाओं का शिकार होना पड़ा। इनसे छुटकारा पाने के लिए भी हमें शत्रु से लड़ने के समान ही संघर्ष करना होगा। यह भीतरी चाओ माओ और भी अधिक घृणित हैं क्योंकि बाहरी शत्रु तो अवसर पर ही आक्रमण करते हैं यह भीतरी शत्रु तो चौबीसों घंटे अपनी जड़ खोखली करते रहते हैं।
उपरोक्त पंक्तियों में कुछ थोड़े से आन्तरिक शत्रुओं की चर्चा की गई है। ऐसों अनेकों दुर्बलताएँ हमारे वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में घुसी हुई हैं। इन्हें बारीकी से देखना और समझना होगा और उनके उन्मूलन का भी युद्ध स्तर पर ही प्रयत्न करना होगा। अखंड ज्योति की युग निर्माण योजना इसी आधार पर अग्रसर होने जा रही है।
राष्ट्र को सबल, सक्षम, एवं समृद्ध, प्रबुद्ध बनाने के जिए जो कार्य किये जाए वे चीनी आक्रमण को समाप्त करने की दृष्टिं से ही नहीं, सदा के लिए सुरक्षा की निश्चिन्तता होने की दृष्टि से आवश्यक हैं। इन कार्यों की ओर हमें अपने व्यक्ति गत कमाने खाने के कामों की तरह ही ध्यान देना चाहिये। निजी कामों में ही सारा समय, शक्ति और मनोयोग लगता रहे तो यह मानव जीवन के उच्च सिद्धान्तों के प्रतिकूल बात ही होगी। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह समाज का ही एक अंग है। सुख सुविधाओं के सभी साधन उसे समाज से मिलते हैं। इन सब बातों का विस्मरण करके यदि हम निजी कामों में ही निरन्तर संलग्न रहते हैं निजी बातें ही सोचते हैं और समाज, राष्ट्र के हित की समस्याओं को उपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं तो यह एक निकृष्ट जीवन का घृणित उदाहरण ही होगा।
स्वार्थ ही नहीं परमार्थ भी-
हमारे समय, साधन और मनोयोग का एक महत्वपूर्ण अंश लोकहित के कार्यों में लगे तो ही जीवन को आदर्श, कर्तव्यपरायण एवं आध्यात्मिक माना जा सकता है। सब लोग सेना में भर्ती नहीं हो सकते हैं, सब के पास सोना और विपुल मात्रा में धन भी नहीं है, पर समय, श्रम और मनोयोग सबके पास समान रूप से मौजूद है, इसे प्रचुर मात्रा में अमीर गरीब सभी दे सकते हैं। युद्ध का दूसरा मोर्चा-आन्तरिक सामर्थ्य को जागृत करने का है। इसी का नामकरण हम लोगों ने सुविधा की दृष्टि से युग-निर्माण योजना रख लिया है। अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपना समय इस कार्य के लिए भी उसी तरह निकालना चाहिये जैसी अपने निजी जरूरी कामों के लिए निकालते हैं।
राष्ट्र रक्षा का उत्तरदायित्व-
पिछले अंक में पृष्ठ 50 पर छपे “अग्नि परीक्षा के घड़ी में हमारा कर्तव्य” शीर्षक लेख में स्वजनों से राष्ट्र रक्षा के लिये शक्ति भर प्रयत्न करने की अपील की गई है। रक्षा कोष में धन, स्वर्ण, रक्त और सैनिक देने के लिये जो कुछ प्रयत्न सम्भव हो सो हम सबको करना चाहिए। उत्पादन बढ़ाने में कोई कमी न रहने देनी चाहिए। असामाजिक राष्ट्र विरोधी तत्वों की दाल न गलने पावे इसके लिये पूरी सतर्कता बरतनी चाहिए। फिजूलखर्ची एकदम बन्द करके बचत का एक-एक पैसा राष्ट्रहित में लगे ऐसी चेष्टा रहनी चाहिए। जनता का उत्साह और मनोबल गिरने न दिया जाय। यह भावना जन मानस में मजबूती से भर देनी चाहिए कि सत्य भारत के साथ है इसलिए अंततः विजय उसी की होगी। लम्बी लड़ाई के लिए तैयारी की जानी चाहिए। तात्कालिक गोलीबन्दी तैयारी की एक चाल मात्र है।
शत्रु का दाव बदला है मन नहीं। भारत की सीमा में युद्ध उस दिन समाप्त होगा जिस दिन वह भीतरी और बाहरी दृष्टि से पूर्ण सबल हो जायगा और इस कार्य में अभी 8॥ वर्ष तो लगने ही हैं। इसलिए इस अवधि में प्रत्येक देशभक्त प्रबुद्ध आत्मा को एक संकटकालीन स्थिति बनी रहने की सम्भावना को ध्यान में रखते हुए व्यक्तिगत योजनाओं और महत्वाकाँक्षाओं को उठाकर ताक में रख देना चाहिए। गुजारे की सामान्य व्यवस्था चलाते हुए अधिकाधिक समय देश को बलवान बनाने में लगा देना चाहिए। आज समय, युग और कर्तव्य की यही पुकार है उसे अनसुना न किया जाना चाहिए।
आध्यात्मिक प्रयत्न भी-
गत अंक में राष्ट्र रक्षा के लिए एक आध्यात्मिक प्रयोग की भी अपील की गई है। प्रतिदिन गायत्री महामन्त्र की एक माला इस धर्म युद्ध की सफलता के लिए नियत साधना से अतिरिक्त जपते रहना चाहिए। सामूहिक आयोजनों एवं सत्संगों में पाँच मिनट मौन रहकर राष्ट्र रक्षा के लिए ईश्वर प्रार्थना की जाया करे। सामूहिक यज्ञ अनुष्ठान भी हों पर उनमें मितव्ययिता का पूरा ध्यान रखा जाय। हर महीने को 20 तारीख को रक्षा दिवस मनाया जाया करे। उस दिन सामूहिक आयोजनों के द्वारा जनता की कर्तव्य भावनाएं जागृत की जाया करें और सामूहिक प्रार्थना का भी कार्यक्रम रहा करे। इस प्रक्रिया का जहाँ आरम्भ अभी न हो पाया हो वहाँ अब तुरन्त ही आरम्भ हो जाना चाहिए।
युग निर्माण योजना के अंतर्गत आत्म-निर्माण के लिए व्यक्ति गत प्रयत्नों की दृष्टि से 10 सूत्री कार्यक्रम सितम्बर अंक में पृष्ठ 46 पर छपा है। जब कभी बड़ी संख्या में परिजन संगठित हो जायें तो वहाँ सामूहिक योजनाएँ भी चल पड़नी चाहिएं। इसके लिए दिसम्बर अंक में पृष्ठ 47 पर बीस सूत्री कार्य-क्रम छपा है। यही सभी बातें ध्यान रखने योग्य हैं। इस विचारधारा का व्यापक विस्तार होना सबसे पहला कार्य है। क्योंकि अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्य तो मुट्ठीभर हैं, कुछ हजार लोग इतने बड़े देश को, इतने बड़े संसार को नहीं बदल सकते। इसके लिए अधिक व्यापक जनजागृति एवं प्रयत्नशीलता की आवश्यकता है। इसलिए अपनी विचारधारा से अधिकाधिक लोगों को परिचित कराना युग निर्माण योजना की सफलता के लिए सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण कार्य-क्रम माना जा सकता है।
उपयुक्त भावनाओं का जागरण-
अखण्ड ज्योति जिस विचारधारा और प्रेरणा का सृजन कर रही है, वह राष्ट्र निर्माण की, युग निर्माण की दृष्टि से अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण है। इससे विशाल जन समूह को परिचित कराया जाना चाहिये। आगे चलकर इस पसार-कार्य के लिए दूसरे उपाय भी काम में लाए जावेंगे पर अभी तो फिलहाल एक ही उपाय हाथ में है और वह यह है कि अखण्ड ज्योति को अधिकाधिक लोग पढ़े। जिनके पास पत्रिका पहुँचती है उन्हें यह निश्चय कर लेना चाहिए कि अपने घर के पढ़े लिखे सदस्यों को उसे पढ़ने के लिए विवश करेंगे, और जो पढ़े नहीं हैं उन्हें पढ़कर सुनाया करेंगे। आजकल हम अपनी अन्तरात्मा की सारी भावनाएं समेटकर अखण्ड ज्योति के पृष्ठ लिखते हैं। यदि हममें कोई कसक और सचाई होगी तो उसका प्रभाव पढ़ने या सुनने वाले पर अवश्य पड़ेगा।
युग निर्माण कार्य पहले अपने से ही आरम्भ हो, फिर उसका विस्तार घर, परिवार में, फिर समाज में किया जाय। अपना कुछ समय आत्म-सुधार और लोक सेवा के लिए लगाने का निश्चय कर लेना व्यक्तिगत कार्य-क्रम की दृष्टि से आवश्यक है। परिवार निर्माण के लिए घर का हर सदस्य हर महीने अखण्ड ज्योति की विचार धारा को पढ़ या सुन लिया करे, इतना आरम्भ तो हो ही जाना चाहिए।
उदेति सविता रक्तो रक्त एवस्त मेति च सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेक रुपता।
सूर्य उदय होते हुए भी लाल रहता है और अस्त होते हुए भी। महान पुरुष सम्पत्ति और विपत्ति में एक से रहते हैं।
समय दान में कंजूसी न करें-
हम जो समय युग निर्माण योजना में सहयोग देने के लिए दें उसमें से आधा तो अपने घर के लोगों को अखण्ड ज्योति की प्रेरणाओं को समझाने के लिए लगाया जाय और आधा अपने मित्र, पड़ोसी, स्वजन सम्बन्धी, परिचित, अपरिचित, धर्मप्रेमी लोगों से मिलने जुलने के लिए-धर्म फेरी के लिए-सुरक्षित रखा जाय। इसका आरम्भ भी अखण्ड ज्योति पढ़ने की प्रक्रिया के साथ हो सकता है। जिनके पास धर्म प्रेरणा देने के लिए जाया जाय उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति पढ़ने देने और फिर एक दो दिन बाद वापिस लेने जाने के निमित्त को लेकर महीने में दो बार मिलने जाया जा सकता है और योजना में सन्निहित विषयों पर चर्चा की जा सकती है। उस प्रकार अपना समयदान, परिवार का शिक्षण और सत्प्रवृत्तियों को व्यापक बनाने की प्रक्रिया में इस छोटे-से अत्यन्त सरल कार्यक्रम के अनुसार लग सकता है।
अगले वर्ष इतना तो करें ही?-
एक वर्ष हम इस कार्यक्रम को चलावें। सन् 63 अत्यन्त जागरुकता का, त्याग और बलिदान की तैयारी का वर्ष है। संकटकालीन स्थिति आ जाने पर हममें से प्रत्येक को अपने प्राणों की आहुति देने के लिए भी तैयार होना चाहिए। हमने स्वयं इसकी तैयारी पूरी कर ली है। पर यदि वैसा नहीं होता है, जैसा कि अप पक्ष में दैवी शक्तियों का समर्थन होने से सम्भावना कम ही है, तो भी अग्नि परीक्षा में होकर हमें विशेष रूप से अगले वर्ष और साधारणतया 8॥ वर्ष तक गुजरते रहना पड़ेगा। इसलिए अगले वर्ष युग निर्माण योजना के सक्रिय कार्यक्रम तो शायद ही कार्यान्वित हो सकें पर इस विचारधारा को अधिकाधिक व्यापक बनाने की प्रक्रिया आसानी से चलती रह सकती है। अखण्ड-ज्योति को पढ़ाने सुनाने की प्रक्रिया द्वारा हमारा कार्यक्षेत्र सहज ही अत्यन्त व्यापक बनाया जा सकता है।
इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए सन् 62 के सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर के अंक बहुत ही आवश्यक पाठ्य-सामग्री से परिपूर्ण हैं। इन चारों अंकों का सैट एक रुपया मूल्य का है। प्रत्येक पाठक को इनके कुछ सैट मँगाकर अपने पास रख लेने चाहिएं और उन्हें अपने सभी परिचितों को एक वर्ष में पढ़ा देना चाहिए। इस वर्ष जो नये ग्राहक अखण्ड ज्योति के बन रहे हों उन्हें भी उपरोक्त चार अंक प्राप्त कर लेने चाहिएं। ताकि युग निर्माण योजना की आवश्यक जानकारी से वे वंचित न रहें। स्वजन संबंधियों को प्रेमोपहार में यह चार अंक भिजवाने की प्रक्रिया इस वर्ष भी जारी रहनी चाहिए। ज्ञान दान का यह एक बहुत ही आदर्श एवं उत्कृष्ट तरीका है।
लक्ष की ओर अग्रसर ही रहें
एक से दस के क्रम के साथ बढ़ने की प्रक्रिया एक आदर्श परिपाटी है। हममें से हर एक अपने समान ही दस प्रबुद्ध लोकसेवी बनाने का लक्ष्य सामने रखे तो निश्चय ही बहुत काम हो सकता है। दस व्यक्ति यों को प्रेरणा देते रहने की जिम्मेदारी उठाना हममें से किसी के लिए भी भार रूप नहीं हो सकता। न वह कठिन है न असुविधापूर्ण । न उसके लिए फुरसत चाहिए न कुछ खर्च ही करना पड़ता है। हममें से हर एक का दूसरों के साथ मिलना जुलना किसी न किसी प्रयोजन को लेकर बना ही रहता है। उसी समय उनसे युग निर्माण विचारधारा के संबंध में भी थोड़ी चर्चा कर दी जाया करे तो इतने मात्र से एक ठोस कार्य होता रह सकता है और अन्त में बूँद-बूँद से घट भरने की उक्ति के अनुसार हम सबके थोड़े-थोड़े प्रयत्नों से देश में एक महत्वपूर्ण, स्वस्थ, एवं प्रेरणाप्रद ऐसा वातावरण बन सकता है जो जन-मानस की दिशा ही बदल दे और हमारे स्वप्नों का संसार जल्दी ही प्रत्यक्ष एवं साकार दिखाई देने लगे।
भारत के इतिहास में हम सबके जीवन में यह वर्तमान समय एक अग्नि परीक्षा की घड़ी की तरह सामने आया है। इस अवसर पर हमें कायर कलंकी के रूप में नहीं, कर्मठ योद्धा के रूप में अपने आपको खरा सिद्ध करना है। राष्ट्र रक्षा और राष्ट्र निर्माण दोनों ही मोर्चों पर जूझने के लिये हमें भारत माता के सच्चे सपूत की तरह ही कटिबद्ध होना चाहिए।
उत्तरी अमरीका में नाइग्रा नामक एक प्रपात है। इसमें पानी की एक बहुत चौड़ी धार 160 फीट ऊँचाई से गिरती है। यदि प्रपात के पास कोई खड़ा हो तो जल का कल-कल शब्द बहुत ही भयानक प्रतीत होता है। यदि कोई प्रपात के पानी में गिर पड़े तो जीवित रहने की कोई आशा नहीं हैं।
अभी कुछ वर्षों की बात है एक अमरीकन पहलवान ने यह घोषणा की कि वह एक तार पर चलकर नाइग्रा प्रपात पार करेगा। नाइग्रा प्रपात के एक किनारे से दूसरे किनारे तक एक हवाई जहाज की सहायता से ठीक प्रपात के ऊपर से तार फैलाया गया।
पहलवान ने जो दिन निश्चित किया था उस दिन उसके इस कौशल को देखने को बहुत भीड़ इकट्ठी हुई। ईश्वर का नाम लेकर उसने तार पर चलना प्रारम्भ किया। भीड़ की आँखें उस पहलवान की ओर लगी थीं। वह धीरे-धीरे चलकर उस पार कुशलता से पहुँच गया। ज्यों−ही उस पार पहुँचा भीड़ उसकी प्रशंसा में चिल्ला उठी। बहुतों ने उसको इनाम दिया।
उस समय उसने लाउडस्पीकर पर ईश्वर का धन्यवाद दिया और भीड़ से पूछा, “क्या आपने मुझे तार पर चलकर प्रपात पार करते देखा?” भीड़ ने उत्तर दिया “हाँ।”
उसने दूसरा प्रश्न पूछा, “क्या मैं इस पार से फिर उस पर तक इसी प्रकार पार कर सकता हूँ?” भीड़ ने उत्तर दिया “हाँ।”
उसने तीसरा प्रश्न किया, “क्या आप लोगों में से कोई मेरे कन्धे पर बैठ सकता है, जब मैं इस प्रपात को पार करूं?” इस प्रश्न पर भीड़ में सन्नाटा छा गया। कोई भी उसके कन्धे पर पार करते समय बैठने को तैयार नहीं हुआ। फिर उसने अपने 16 वर्षीय इकलौते बेटे को कन्धे पर बैठने को कहा। पुत्र पिता के कहने पर कन्धे पर बैठ गया। पिता ने धीरे-धीरे तार पर चलना आरम्भ किया। भीड़ की आँखें उनकी ओर लगी हुई थीं। कोई कहता था “अभी दोनों गिरते है-अब मरे इत्यादि।” परन्तु ईश्वर की कृपा से पहलवान अपने पुत्र सहित सरलता से पार हो गया।
भीड़ ने इस बार पहिले से अधिक उसकी प्रशंसा की और बहुत से इनाम दिये। उसने लाउडस्पीकर से ईश्वर की महिमा पर छोटा-सा भाषण दिया। उसने कहा, “आप लोगों में से किसी को मेरी सफलता या योग्यता पर विश्वास न था। इस कारण आप लोगों में से कोई मेरे कन्धे पर बैठने को तैयार नहीं था।
कन्दुको भित्ति निक्षित्र इव प्रतिफलन्मुहुः। आप्तत्यात्मनि प्रायो दोषोऽन्यस्यचिकीषितः।
जैसे दीवाल पर फेंकी गेंद अपने ऊपर ही लौट कर आती है, वैसे ही दूसरे के लिए की हुई हानि की योजना भी अपना ही अनिष्ट करती है।
मेरे पुत्र को मुझ पर विश्वास था और इस कारण वह मेरे कन्धे पर बैठने को तैयार हो गया, और मैं उसे लेकर इस पार आ गया हूँ। हम सबका पिता ईश्वर है। जिस प्रकार से मेरे बेटे को मुझ पर विश्वास था ठीक उसी प्रकार से यदि आपका विश्वास उस परम पिता परमात्मा पर हो तो आप साँसारिक कठिनाइयों को ठीक उसी प्रकार पार कर सकते हैं जैसे मेरे बेटे ने मेरे कन्धों पर नाइग्रा प्रपात पार किया है। ईश्वर पर दृढ़ विश्वास रखिये और परिश्रम करिये। मुझे ईश्वर पर पूर्ण विश्वास था कि वह मेरी इस कठिनाई के समय सहायता करेगा और उसने सहायता की।”
--बृजभूषणलाल श्रीवास्तव
लघु कथायें-
भारतेन्दु हरिशचन्द्र बड़े दानी थे। असीम दानशीलता और उदारता से वे निर्धन हो चुके थे। उनकी स्थिति ऐसी हो गयी थी कि आने वाले पत्रों का जवाब भी वे कंगाली के कारण नहीं दे सकते थे। वे लिख-लिख कर उसे लिफाफे में बन्द करके मेज पर प्रतिदिन रख देते । टिकट के अभाव में उन्हें नहीं भेज पाते। एक दिन उनका एक मित्र उनसे मिलने आया। उसने भारतेन्दुजी की मेज पर पत्रों का ढेर देखकर पाँच रुपये के टिकट मंगवाये और उन पत्रों को पोस्ट आफिस पहुँचाया।
कुछ समय बाद भारतेन्दु जी की स्थिति सुधरी। आर्थिक समस्या सुलझी। अब उनके वे मित्र जब भी आते भारतेन्दु जी उनकी जेब में एक पाँच का नोट चुपके से रख देते और पूछने पर कहते आपने मुझे पाँच रुपये ऋण दिये थे वे हैं ।
यही क्रम कई बार चलता रहा। एक दिन वह मित्र बोला-अब मुझे आपके यहाँ आना बन्द करना पड़ेगा।
इस पर भारतेन्दु जी ने आँखें डबडबाते हुए कहा- मित्र आपने मुझे ऐसे समय सहायता दी थी जिसे मैं जीवन भर नहीं भूल सकता । यदि मैं प्रति दिन भी एक पाँच रुपये का नोट आपको देता रहूँ तो भी आपके ऋण से उऋण नहीं हो सकता।
कुछ ब्राह्मण गंगा स्नान करने को आये थे। पानी बहुत गहरा था जिससे धार में उतर कर स्नान करने में उन्हें डर लग रहा था। उनके पास कोई पात्र भी नहीं था जिससे पानी ले लेकर वे नहाते। सभी बड़े असमंजस में थे।
उसी तट पर सन्त कबीर दास जी भी स्नान कर रहे थे। उन्होंने अपना लोटा माँजकर एक व्यक्ति को देते हुये कहा-इसे इन लोगों को दे दो, बेचारे स्नान कर लेंगे। इनके पास कोई पात्र भी नहीं है। यह सुन कर सभी ब्राह्मण एक दम चिल्ला उठे- नहीं भाई इस जुलाहे का लोटा लेकर हमें अपवित्र नहीं होना है इसे हमारे पास न लाओ।
“क्यों भाइयो जब यह लोटा भी कई बार मिट्टी लगाकर साफ करने पर इस गंगा जल से पवित्र नहीं हुआ तो दुर्भावनाओं से भरे इस मानव शरीर की पवित्रता कैसे होगी। स्नान से” सभी ब्राह्मण एक दूसरे का मुँह देखने लगे, उत्तर उन्हें कुछ भी न सूझ पड़ा।
“बेटा ले ये दो टुकड़े मिठाई के हैं। इनमें से यह बड़ा टुकड़ा तू स्वयं खा लेना और छोटा टुकड़ा अपने साथी को दे देना।”
“अच्छा माँ” और वह बालक दोनों टुकड़े लेकर बाहर आ गया अपने साथी के पास। साथी को मिठाई का बड़ा टुकड़ा देकर छोटा स्वयं खाने लगा। माँ यह सब जंगले में से देख रही थी। उसने आवाज देकर बालक को बुलाया।
“क्यों रे! मैंने तुझसे बड़ा टुकड़ा खुद खाने और छोटा उस बच्चे को देने के लिये कहा था, किन्तु तूने छोटा स्वयं खाकर बड़ा उसे क्यों दिया? “
वह बालक सहज बोली में बोला-”माताजी दूसरों को अधिक देने और अपने लिये कम से कम लेने में मुझे अधिक आनन्द आता है।”
माता जी गंभीर हो गई । वह बहुत देर विचार करती रहीं बालक की इन उदार भावनाओं के संबंध में। उसे लगा सचमुच यही मानवीय आदर्श है और इसी पर विश्व शाँति की सारी संभावनाएँ निर्भर हैं। मनुष्य अपने लिए कम चाहे और दूसरों को अधिक देने का प्रयत्न करे तो समस्त संघर्षों की समाप्ति और स्नेह, सौजन्य की स्वर्गीय परिस्थितियां सहज ही उत्पन्न हो सकती हैं।
(श्री पद्मकान्त मालवीय)
आज चीनियों ने मद में अपने हमको ललकारा है।
विजय या कि बस मौत यही अब एक हमारा नारा है।
प्रायश्चित किया है तिब्बत में हमसे जो भूल हुई।
करके स्नान रक्त-गंगा में मिली जिन्दगी हमें नई।
जोरावर सिंह को भूले चीनी नादानी है उनकी।
आज खून से ताजा करनी याद पुरानी है उनकी।
गंगोत्री का खोल रहा है जल, हिम जलता अंगारा है।
विजय या कि बस मौत यही अब एक हमारा नारा है।
भूमि-सुत्ता सीता-सीमा चीनी-रावण ने हर ली है।
राम प्रतिज्ञा हमने भी रावण - विनाश की कर ली है।
रावण का कर अन्त, हमें सीता को वापस लाना है।
और विभीषण को उनकी गद्दी पर फिर बिठलाना है।
“लंका-दहन, मरण-रावण” बस एक यही अब नारा है।
आज चीनियों ने मद में अपने हमको ललकारा है।
रावण रहा न कंस, न चाओ-माओ ही रह जायेंगे।
काली करतूतों, चालों का, इनको मजा चखाएंगे।
इके लख पूत, सवा लख नाती, रावण के न काम आए।
बानर भालू की सेना ले लंका में जब राम आए।
बच्चा बच्चा मातृभूमि का राम बना, असिधारा है।
विजय या कि बस मौत यही अब एक हमारा नारा है।
प्यारी जान जिन्हें हो, चूड़ी पहनें लौट जाएं घर को ।
आजादी हो जिनको प्यारी, वह सब साथ चलें रण को।
आज देश का कोई भी, यदि काम नहीं उसके आया ।
भारतमाता का कलंक वह, व्यर्थ जन्म उसने पाया।
वीर भोग्या वसुन्धरा ऋषियों ने सदा उचारा है।
आज चीनियों ने मद में अपने हमको ललकारा है।
-दैनिक हिन्दुस्तान से
*समाप्त*