जापान में जहाँ देवदारु के पेड़ तीन-चार सौ फीट तक ऊँचे होते है, वहाँ कुछ ऐसे भी होते हैं जो बहुत पुराने होने पर भी दो-चार फीट के ही रह जाते हैं। इन बौने पेड़ों के बारे में मुझे बड़ा अचम्भा हुआ और उनके न बढ़ने का कारण मालूम किया तो बताया गया कि जापानी लोग जान बूझकर कौतूहलवश इन्हें छोटा बनाये रहते हैं, अपनी कारिस्तानी से बढ़ने नहीं देते। कारिस्तानी यह कि वे पेड़ की टहनियाँ और पत्तों को जरा भी नहीं छेड़ते पर उसकी जड़ों को जमीन में बढ़ने नहीं देते और उनकी बराबर काट-छाँट करते रहते हैं।
इंसानों में से अनेकों ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत छोटा या ओछा कहा जाता है। जापान के देवदारु पेड़ों की तरह उनकी भी जड़ें भीतर ही भीतर कटती रहती हैं और वे बौनी जिन्दगी बिताते रहते हैं। जो पेड़ बढ़ना और फलना-फूलना चाहता है उसकी जड़ों को गहराई तक जाना जरूरी हैं। जो मनुष्य उन्नतिशील बनना चाहता है उसके लिए यही उचित है कि अन्तरात्मा की जमीन में सद्गुणों को जड़ों की निरन्तर बढ़ाता चले, जब तक जड़ें न बढ़ेंगी पेड़ के बढ़ने और फलने फूलने की आशा कैसे की जा सकती है?
स्वामी रामतीर्थ
प्रायः सभी धर्मों ने ईश्वर की सर्वव्यापक, सर्वसमर्थ, परम शक्तिमान सत्ता को अपनी श्रद्धा और विश्वास का आधार बनाया है। मनुष्य की अपनी शक्ति अल्प, सीमित और मर्यादित है। संसार और जीवन की विभीषिकाओं में मनुष्य अपनी “स्वः” शक्ति पर अपने आपको निरीह, असहाय अनुभव करता है। किन्तु जब वह ईश्वर की व्यापक शक्तिशाली सत्ता से अपने आपको जुड़ा हुआ पाता है तो उसके द्वन्द्व स्वतः ही तिरोहित हो जाते हैं। ईश्वर का संसर्ग पाकर स्व-शक्ति इतनी प्रबल हो जाती है कि द्वन्द्व उसके लिए द्वन्द्व नहीं रहते। कठिनाई, क्लेश, परेशानियों में भी मनुष्य सन्तुलित होकर आगे बढ़ता रहता है। ईश्वर पर दृढ़ आस्था और विश्वास मनुष्य को मानसिक सन्तुलन और शक्ति प्रदान करता है।
अपने को ईश्वरीय सत्ता से संयुक्त करने के लिए शरणागति आत्म निवेदन, प्रार्थनाओं को धर्म का रचनात्मक रूप माना गया है। चिन्तन, मनन धारणा, ध्यान, समाधि का आयोजन ईश्वरीय सत्ता से एकीभूत होने के लिए, शक्ति प्रेरणा पाने के लिए, मानसिक सन्तुलन प्राप्त करने के लिए हुआ। मन के अन्तर्द्वन्द्व शान्त होने पर मनुष्य को क्लेश पहुँचाने वाले अनेकों मनोभावों का सहज ही निवारण हो जाता है।
इस तरह धर्म के अनेकों कार्यक्रम, आस्था, व्यवस्थाओं का आदि काल से अबोध क्रम चलता रहा और समय-समय पर इनमें विकास, साथ ही परिवर्तन, नवीनीकरण भी होता रहा।
ईश्वर के विश्वास के साथ ही प्रार्थना धर्म की दूसरी देन है। प्रार्थना से मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य में बहुत बड़ी सहायता मिलती है। प्रार्थना एकान्त में स्वच्छ शान्त वातावरण में विभिन्न मुद्राओं के साथ की जाती है। प्रार्थना सामूहिक भी होती है। प्रार्थना की पूर्णता और विधि व्यवस्था के लिए शारीरिक पवित्रता, मन्दिर, मस्जिद, गिर्जाघर, मूर्तियाँ विभिन्न प्रतीकों को माध्यम लिया गया। अनेक प्रकार के कर्मकाण्डों का प्रादुर्भाव हुआ। संगीत और कला के समन्वय से उसे अधिक रोचक बनाया गया। सभी धर्मों में प्रार्थना का कोई न कोई रूप रखा गया है किन्तु सभी का एक ही उद्देश्य है, संसार के बाह्य जीवन से कुछ क्षणों के लिए विश्राम लेना। उत्तेजना, संघर्ष, अशान्ति, क्लेश आदि से कुछ समय उपराम लेकर अन्तर्मुखी बनना। असीम, अनन्त के साथ एकाकार होकर, आत्म निवेदन करके या आत्मानुभूति प्राप्त करके मानसिक सन्तुलन, आत्म प्रसाद, मानसिक दृढ़ता प्राप्त कराना प्रार्थना का मूल उद्देश्य है।
प्रार्थना से मानसिक सन्तुलन, आत्मानुभूति, ईश्वरीय सत्ता के साथ एकात्मकता के साथ ही शारीरिक तनाव भी दूर होता है। दिन-रात संसार के ताने-बाने में ही रत यहाँ के संघर्षों में लिप्त रहने से शरीर के स्नायु-संस्थान, पेशियों, नस नाड़ी, दिल, दिमाग, एवं अन्य अवयवों में एक तरह का तनाव, खिचाव सा पैदा हो जाता है। आज के युग में तो मानव जीवन की दौड़ भाग, संघर्ष आदि और भी अधिक बढ़ गये हैं। प्रार्थना के समय मनुष्य यदि प्रयत्नपूर्वक संसार से अपने आपको कुछ समय के लिए समेटकर एक सत्ता में केन्द्रित हो जाय तो उसे सहज ही उपराम मिले और उसका शारीरिक मानसिक स्नायविक तनाव दूर होकर पर्याप्त विश्राम मिलता रहे। प्रार्थना एक रूप में संसार की ओर से मानसिक शिथिलीकरण का आध्यात्मिक उपाय है जिससे मन के साथ−साथ शरीर को भी काफी आराम- उपराम मिलता है।
नदी की भयंकर लहरों में पड़ें हुए मनुष्य को कुछ क्षणों के लिए यदि किनारे पर लाकर शान्ति सुरक्षा की छाया में बिठा दिया जाय तो उसे कितना परितोष, शान्ति, आनन्द, आराम मिलेगा इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है, ठीक इसी तरह संसार सागर की विभीषिकाओं, संघर्षों से विरत हो मनुष्य कुछ क्षणों के लिए प्रार्थना के द्वीप पर असीम, अनन्त प्रभु की छत्रछाया में बैठकर उसकी अनुभूति करे तो वह सहज ही जीवन की क्लान्ति को दूर करके अधिक सक्षम हो जाय। संसार की ज्वालाओं से दग्ध उसका मानस पुनः हरा-भरा हो जाय। उसे सर्वत्र सौंदर्य शान्ति के दर्शन हों और वह फिर से नई ताजगी, नई शक्ति,साहस पाकर संसार में उतर कर अपना कर्तव्य पूरा कर सकता है। प्रार्थना मानव का अन्तर बाह्य सभी तरह से कल्प कर सकती हैं।
प्रार्थना से मनुष्य के निराशावादी, हीन दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाता है। उसे सर्वत्र शान्ति सौंदर्य, जीवन, माधुर्य के दर्शन होते हैं। संसार की विभीषिकायें गौण हो जाती हैं। उत्तेजनायें शान्त हो जाती हैं। प्रार्थना आन्तरिक और बाह्य जीवन में सन्तुलन और व्यवस्था पैदा करती है। एक दम बाह्य जगत में खो जाना यदि दुःख द्वन्द्वों से लिपटना है तो एक दम आन्तरिक जगत में रहना भी धरती और संसार के कर्तव्यों से दूर हटना है। योगी की अर्धोन्मीलित दृष्टि की तरह आधी से संसार और आधी से अन्तर को देखकर जीवन में समता, सन्तुलन व्यवस्था प्राप्त करना ही आध्यात्मिकता का सरल अर्थ है। प्रार्थना इसका एक महत्वपूर्ण उपाय है।
प्रार्थना आत्मविश्लेषण का एक वैज्ञानिक उपाय है जिसके अंतर्गत मनुष्य संसार स्वयं, और ईश्वरीय सत्ता के सम्बन्ध में अपने विचारों को सुलझा सकता हैं। सूक्ष्म तथ्यों का समाधान कर सकता है।
धर्म की मनुष्य को एक और महत्वपूर्ण देन है। वह है “आत्मा की अमरता का प्रतिपादन। कुछ नास्तिक मतों को छोड़कर संसार की अधिकाँश धर्मों में पुनर्जीवन, आत्मा की अमरता आदि को स्वीकार किया है। पूर्व जन्मों की बात बताने वाले अनेक बच्चों का प्रत्यक्ष प्रमाण, अन्य योगसाधनाओं से प्राप्त होने वाले सूक्ष्म रहस्यों से यह सब प्रयोगात्मक रूप में सिद्ध भी होते आये हैं।
जन्म और मृत्यु मनुष्य जीवन की दो महत्वपूर्ण घटनायें हैं। इनमें मृत्यु का नाम सुनकर प्राणी भयभीत हो जाता है। मृत्यु का भय अन्य सभी प्रकार के भयों से अधिक प्रभावशाली है, जो मनुष्य के मन में बहुत बड़ी प्रतिक्रिया पैदा करता है। इस प्रतिक्रिया के फलस्वरूप मनुष्य में एक तीव्र तनाव पैदा होता है और इस तनाव से मनुष्य की शक्ति और क्षमताओं का बहुत बड़े रूप में क्षय होता है। मृत्यु के भय से कई लोग तत्क्षण मरते देखे गये हैं। पागल हो जाते हैं। इसी मृत्यु भय को आदि काल से मनुष्य अनेकों प्रयत्नों से दूर करता आ रहा है। अमृत की खोज, “मृत्योर्माअमृत गमय” प्रार्थना और धर्म के द्वारा अमरता के वरदान की प्राप्ति के प्रयत्न सदा से होते रहे हैं-
मारर्णीयस्य कर्माणि तत्कतृणीति नेतरत्॥
-योगवशिष्ठ
“हे मृत्यु! तू किसी को अपनी शक्ति से नहीं मार सकती। मनुष्य किसी अन्य कारण से नहीं वरन् स्वयं अपने कर्मों से ही मरता है।”
***
बहवो यत्र नेतारः सर्वे पंडित-मानिनः।
सर्वेमहत्त्वमिच्छन्ति तद्वृन्द भवसीदति॥
“जहाँ बहुत से नेता होते हैं, सभी अपने को पंडित मानने वाले अहंकारी होते हैं, सभी अपनी बड़ाई चाहते हैं, वह समाज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
के वरदान की प्राप्ति के प्रयत्न सदा से होते रहे।
“न जायते म्रियते वा कदाचन्,
नायं भूत्वा भवि ता वा न भूया।
अजो नित्यं शाश्वतोयं पुराणो,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।”
आदि शब्दों में गीताकार ने अमरता का प्रतिपादन कर अर्जुन की भीति, संशय का छेदन किया। हिन्दू धर्म में तो आत्मा की अमरता बड़े ही ठोस और प्रभावशाली तथ्यों में प्रतिपादित की गई है।
अमरता से मृत्युभय का निवारण का मनुष्य के दृश्य जीवन को क्षणिक, नाशवान, अनित्य कहकर, धर्म ने मृत्यु के भयजनक प्रश्न और शरीर के मोह आसक्ति को दूर करने का प्रयत्न किया है। इतना ही नहीं जन्म-मृत्यु सामान्य सी घटनायें बताई हैं। नित्य चिरन्तन जीवन में जन्म−मृत्यु को केवल दिन-रात की संज्ञा दी गई है। इसी के कारण अनेक लोगों ने आत्मा की अमरता अनित्यता से प्रेरणा पाकर महान आदर्शों के लिए अपने तुच्छ अनित्य, क्षण भंगुर जीवन का त्याग किया, मृत्यु का वरण किया क्योंकि मृत्यु से उनकी अजर-अमर आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस तरह आत्मा की अमरता ने मनुष्य के समस्त भयों से भी ऊपर मृत्यु भय को दूर कर उसे निर्भय बनाया, जिससे उसकी जीवन यात्रा निर्बोध क्रम से चलती रहे।
ईश्वर पर विश्वास, प्रार्थना, आत्मा की अमरता इन तीनों ही धार्मिक आधारों के प्रति विज्ञान ने मनुष्य की आस्था विश्वास को नष्ट कर दिया है और वह आस्था और विश्वास का कोई नवीन आधार नहीं दे पाया। फलतः बेचारा मनुष्य आज निरीह, असहाय, उत्तेजनाओं से पीड़ित और परेशान है। जीवन की विभीषिकाओं, भय, संघर्षों में असन्तुलित हो गया है। मानव मन की शान्ति, प्रसन्नता आत्म प्रसाद, आनन्द तिरोहित हो गये हैं। इनकी पुनः प्रतिष्ठापना, आस्तिकता की व्यापक आस्था उत्पन्न करने से और धर्म का अवलम्बन लेने से ही सम्भव हो सकती है।
प्राचीन परम्पराओं की तुलना में विवेकशीलता को अधिक महत्वपूर्ण प्रतिपादित करने वाले सन्त सुकरात को वहाँ के कानून से मृत्यु दण्ड की आज्ञा दी गई।
सुकरात के शिष्य अपने गुरु के प्राण बचाना चाहते थे। उन्होंने जेल से भाग निकलने के लिए एक सुनिश्चित योजना बनाई और उसके लिए सारा प्रबन्ध ठीक कर लिया।
प्रसन्नता भरा समाचार देने और योजना समझाने को उनका एक शिष्य जेल में पहुँचा और सारी व्यवस्था उन्हें कह सुनाई। शिष्य को आशा थी कि प्राण -रक्षा का प्रबन्ध देखकर उनके गुरु प्रसन्नता अनुभव करेंगे।
सुकरात ने ध्यानपूर्वक सारी बात सुनी और दुखी होकर कहा- मेरे शरीर की अपेक्षा मेरा आदर्श श्रेष्ठ है। मैं मर जाऊँ और मेरा आदर्श जीवित रहे तो वही उत्तम है। किन्तु यदि आदर्शों को खोकर जीवित रह सका तो वह मृत्यु से भी अधिक कष्टकारक होगा। न तो मैं सहज विश्वासी जेल कर्मचारियों को धोखा देकर उनके लिए विपत्ति का कारण बनूँगा और न जिस देश की प्रजा है उसके कानूनों का उल्लंघन करूंगा। कर्तव्य मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है।
योजना रद्द करनी पड़ी । सुकरात ने हँसते हुए विष का प्याला पिया और मृत्यु का संतोषपूर्वक आलिंगन करते हुए कहा- हर भले आदमी के लिए यही उचित है कि वह आपत्ति आने पर भी कर्तव्य-धर्म से विचलित न हो।
योजना रद्द करनी पड़ी । सुकरात ने हँसते हुए विष का प्याला पिया और मृत्यु का संतोषपूर्वक आलिंगन करते हुए कहा- हर भले आदमी के लिए यही उचित है कि वह आपत्ति आने पर भी कर्तव्य-धर्म से विचलित न हो।
प्रेम, आत्मीयता मनुष्य की सहज स्वाभाविक वृत्तियाँ हैं, जिनके व्यक्त न होने पर मनुष्य जीवन में एक अभाव सा अनुभव करता है। लीबमैन ने लिखा है “अपने पड़ौसी से मैत्री भाव रखना, उससे प्रेम करना, स्वयं से प्रेम करने की आवश्यक सीढ़ी है।” दूसरों से प्रेम प्राप्ति की ही नहीं वरन् अपना प्रेम दूसरों को देने की भी प्रबल वृत्ति मनुष्य में काम करती है। जब तक इसकी पूर्ति नहीं होती मनुष्य को पूर्णतः सन्तोष, शान्ति प्राप्त नहीं होती, न उसका आन्तरिक विकास होता है।
जीवन में प्रेम एक महत्वपूर्ण स्वाभाविक आवश्यकता है। मनुष्य को जब तक किसी के प्रेम की प्राप्ति नहीं होती तब तक उसे जीवन में कुछ अभाव और अशान्ति का अनुभव होता है। प्रेम प्राप्ति की प्रबल भूख बचपन में अधिक पाई जाती है। जिन बच्चों को अपने माँ-बाप का प्रेम नहीं मिलता उनका व्यक्तित्व पुष्ट नहीं होता। कई मानसिक रोगों का कारण तो बचपन में माँ-बाप के प्यार का अभाव होना ही होता है। चिन्ता, घृणा, क्रोध, हीनता की भावना बहुत कुछ इसी कारणवश पैदा हो जाती है। दूसरों के स्नेह प्रेम से वंचित व्यक्तियों को संसार निर्दयी, क्रूर और क्लेशमय नजर आता है।
प्रेम प्राप्ति की तरह ही मनुष्य में प्रेम देने की भावना भी होती है। प्रेम लेने की भावना बचपन की निशानी है। प्रेम देने की भावना पुष्ट व्यक्तित्व और प्रौढ़ता का आधार है। प्रेम लेने की भावना स्वार्थ परावलम्बन का रूप है तो प्रेम देना परमार्थ और स्वावलम्बन है।
प्रेम देने की भावना की अभिव्यक्ति करने के लिए दूसरों की सेवा सहानुभूति, दूसरों के लिए उत्सर्ग का व्यावहारिक मार्ग अपनाना पड़ता है और इससे एक सुखद शान्ति, प्रसन्नता, सन्तोष की अनुभूति होती है। दूसरों की कठिनाईयाँ दूर करने के प्रयत्न में स्वयं की कठिनाइयाँ स्वतः दूर हो जाती हैं। दूसरों से आत्मीयता रखने पर आत्म-प्रेम आत्म-मैत्री सहज ही हो जाती है। मन की समस्त शक्तियाँ केन्द्रीभूत होकर काम करने लगती हैं। इस तरह प्रेम-मैत्री एक सहज और स्वाभाविक, आवश्यक वृत्ति है जिससे मनुष्य को विकास, उन्नति, आत्म संतोष की प्राप्ति होती है।
छोटा बच्चा सदैव दूसरों का प्यार चाहता है, चाह या स्वार्थ बचपन की स्थिति है, जिसमें दूसरों से सुख आराम प्रेम की आकाँक्षा रहती है। यह वृत्ति अधिक उम्र वालों में भी हो सकती है। बचपन से आगे की विकसित भावना है अपने आपके सुखोपभोग आवश्यक पदार्थों का दूसरों के लिए त्याग करना। यह प्रेम देने की वृत्ति है। जिसमें त्याग है, कष्ट सहिष्णुता है, वही आत्म विश्वास की सच्ची कसौटी है। त्याग से प्रेम के स्वरूप का निर्णय होता है। इस तरह प्रेम स्वार्थ के परमार्थ की साधना है। जो प्रेम के लिए- परमार्थ के लिए अपने आपको घुला देता है वही आत्म विकास की उच्च स्थिति प्राप्त करता है।
यज्ञाग्नि के दो स्वरूप माने गये हैं, एक “स्वाहा” दूसरा “स्वधा”। स्वाहा का अर्थ है आत्माहुति, देना, त्याग, उत्सर्ग करना और स्वधा के मानी है आत्मधारण करना। दोनों के संयुक्त स्वरूप में यज्ञाग्नि प्रकट होती है। प्रेम की आकांक्षा, इच्छा, प्रेम प्राप्ति का भाव, आत्म धारण करने के लिए है। प्रेम धारण नहीं किया जायगा तो फिर दिया कहाँ से जायगा। प्रेम प्राप्ति की लालसा सहज रूप में प्रेम यज्ञ का प्रारम्भिक कृत्य है। आम का पौधा सिंचाई सुरक्षा खाद सेवा आदि के रूप में जब स्वधा शक्ति प्राप्त करता है तभी उस शक्ति को कई गुना असंख्यों रूपों में उत्सर्ग कर सकता है। स्त्री अपने पति का अजस्र
प्रेम प्राप्त करके ही उसे बालकों को दे सकने में समर्थ होती है। जिसे किसी का प्रेम नहीं मिला वह दूसरे को भी शायद ही कुछ दे सके।
स्वधा शक्ति की प्राप्ति के अनन्तर मनुष्य के भावों का विकास होता है, और वह अपने आपको स्वाहा करने लगता है, त्याग, आत्मोत्सर्ग करता है और स्वार्थ की जगह परमार्थ-त्याग स्थान ले लेता है। जिससे प्रेम किया जाता है उसके लिए त्याग करने की इच्छा बढ़ जाती है। मनुष्य कष्ट उठाने लगता है। तब प्रेम का व्यावहारिक स्वरूप त्याग ही हो जाता है। त्याग, आत्मोत्सर्ग, बलिदान की स्थिति के अनुसार ही प्रेम कर सत्य स्वरूप विकसित होने लगता है। जब मनुष्य अपने आपको पूर्णतया स्वाहा कर देता है तब एक मात्र प्रेम की सत्ता ही सर्वत्र शेष रह जाती है।
जहाँ पुरस्कार की आकाँक्षा है वहाँ प्रेम नहीं रहता। प्रेम केवल उत्सर्ग करना ही जानता है। जहाँ बदले में लेने की भावना है वहाँ प्रेम नहीं स्वार्थ है। इससे मनुष्य की आत्मा को परितोष प्राप्त नहीं होता। मनुष्य के आन्तरिक बाह्य जीवन में अशान्ति क्लेश, असन्तोष ही बना रहेगा। स्त्री-पुरुष, माता-पिता और संतान, मित्र-मित्र, भक्त और भगवान, मनुष्य-मनुष्य के बीच जब स्वार्थमय प्रेम का आचरण होने लगता है तो सदैव विपरीत परिणाम ही मिलते हैं। गृहस्थ जीवन की अशान्ति, कलह, रागद्वेष, मनुष्य-मनुष्य के बीच की धोखेबाजी, चालाकी, माता-पिता के प्रति अनुशासनहीनता, क्रूरता, भगवान के प्रति नास्तिकता, अविश्वास मनुष्य के बनावटी प्रेम की आड़ में काम रह रहे स्वार्थ, लोभ, मोह आदि के ही परिणाम हैं - प्रेम के माध्यम से पुरस्कार प्राप्ति की लालसा के परिणाम हैं।
प्रेम दिव्य तत्व है। इसके परिणाम सदैव दिव्य ही मिलते हैं। किन्तु यह तब जबकि मनुष्य पुरस्कार की कामना से रहित होकर केवल प्रेम के लिए त्याग बलिदान, आत्मोत्सर्ग करता है। प्रेम का पुरस्कार तो स्वतः प्राप्त होता है और वह है आत्मसन्तोष, शान्ति, प्रसन्नता, जीवन में उत्साह आदि। प्रेम तो मनुष्य की चेतना का विकास कर उसे विश्व चेतना में प्रतिष्ठित करता है।
प्रेम प्रेरित त्याग से विचारों में एकाग्रता पैदा होती है। मानसिक स्थिरता से पूर्ण तादात्म्य और इससे आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति होती है। भक्तियोग का तत्वज्ञान हृदयंगम किया जाना ईश्वर प्राप्ति के लिए आवश्यक मार्ग है।
जब किसी काम से प्रेम नहीं होता तो उसमें कर्तव्य बुद्धि नहीं रहती। मनुष्य कई भूलें करता है, काम को बिगाड़ता है। वह उसे भार स्वरूप लगता है- दुखद बन्धन जैसा। मनुष्य अपने काम से जी चुराने लगता है। प्रेम की शक्ति से ही कर्तव्य पूर्ण होता है। इसके अभाव में जबरन कार्य करने पर मनुष्य को शारीरिक और मानसिक रोग सताने लगते हैं।
प्रेम के भाव में कठिन से कठिन काम भी सरल बन जाते है। उनमें कठिनाइयाँ होते हुए भी फूल चुनने जैसी सरलता महसूस होती है। प्रेम की अवस्था में कष्ट नाम की कोई स्थिति ही नहीं। प्रेम की धुन में कर्तापन और कर्मफल का ध्यान नहीं रहने से यह रोगी की सी स्थिति बन जाती है। केवल कर्तव्य ही सामने रहता है।
कर्तव्य के अभिमान और फल की आकाँक्षा के साथ ही क्षमताओं का विकास रुक जाता है। यही कारण है कि एक सरकारी नौकर को दफ्तर का चार छः घण्टे का काम ही “बोर” कर देता है, जब कि देश प्रेमी समाज सेवी, सेवानिष्ठ लोग अठारह घण्टे काम करके भी नहीं थकते। प्रेम एक व्यापक तत्व है। उसके साथ ही अनन्त शक्ति सामर्थ्य रहता है और असाधारण क्षमता का विकास हो जाता है। साधारण तौर से व्यक्ति महामानव बन जाता है।
प्रेम से प्रसन्नता और सहज आनंद मिलता है जिसमें शक्तियों का उद्भव उसी तरह होता है जैसे पर्वतराज हिमालय अपने हृदय के अवयवों को पिघला कर अनन्त नदी स्त्रोत बहा देता है। आत्मविश्वास, साहस, निष्ठा, लगन, आशा की प्रबल हिलोरें मनुष्य के हृदय में उठने लगती हैं, जो एक छोटे से पुतले को तरंगित कर ऊँचा उठा देती है। प्रेम के अभाव में मनुष्य थका-थका-सा रहता है। काम में मन नहीं लगता। फिर किसी भी क्षेत्र में सफलता मिलना दूर की बात है।
प्रेम गिरे हुए व्यक्तियों को उठाता है। क्योंकि गिरे हुए व्यक्तियों में वे होते हैं जिनके जीवन में प्रेम, स्नेह का अभाव रहा है। घर में परिजनों के प्रेम से वंचित लोग व्यसनी, परस्त्रीगामी, चरित्रहीन और पतित हो जाते हैं। पति अथवा सास-श्वसुर के अत्याचार से पीड़ित स्त्री घर से बाहर जाकर प्रेम की चाह करती है, जिससे उसे भ्रष्ट अथवा दूषित कहा जाता है। माँ बाप के प्रेम से वंचित बच्चे निराशावादी, क्रोधी, ईर्ष्यालु, घृणा करने वाले, अन्यमनस्क, चरित्रहीन बन जाते हैं। लोगों में फैली हुई बहुत बुराइयों का मुख्य कारण उन्हें जीवन में दूसरों के स्नेह प्रेम से वंचित होना ही होता है। कोई भी प्रेम मय व्यक्ति इन लोगों को अपना प्रेम देकर फिर से सुधार सकता है। हमारे ऋषियों में महात्मा बुद्ध, सुकरात, ईसा मुहम्मद, रामकृष्ण आदि ने अनेकों पतितों को अपना निश्छल सहज प्रेम देकर असंख्यों पतितों का उद्धार किया।
जब मनुष्य का दृष्टिकोण प्रेममय होता है तो उसे दूसरों के दुर्गुण न दिखाई देकर सद्गुण दिखाई देते हैं। इससे मनुष्य के दोषदर्शन का दुर्गुण-दूर हो जाता है। दूसरों के दुर्गुण न देखने से आलोचना में भी मन नहीं लगता। हिंसा, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, डाह की भावनायें प्रेम से घुल जाती हैं। प्रेम में हिंसा नहीं दया करुणा का निवास होता है। प्रेममय व्यक्ति अपना अहित करने वालों के प्रति भी दया क्षमा सहिष्णुता की भावना रखता है। उनके सुधार के लिए शुभकामना करता है।
मनुष्य का जैसा दृष्टिकोण, चिन्तन होता है वैसा ही उसके लिए यह संसार दिखाई देता है। मनुष्य दूसरों से प्रेम करता है तो दूसरे भी उसे प्रेम करते हैं। उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। संसार कुंए की आवाज है। मनुष्य संसार के प्रति जैसा आचरण करेगा संसार से उसे वैसा ही प्रत्युत्तर मिलेगा। प्रेम से ही प्रेम मिलता है। प्रेम मैत्री के विचार पहले व्यक्तिगत जीवन में ही आत्म प्रेम, आत्म-प्रसाद के रूप में मिल जाते है। इतना ही नहीं प्रेम एकात्मकता पैदा करता है। देखा जाता है कि जिन व्यक्तियों में परस्पर प्रेम होता है उनके रंग रूप स्वभाव विचार धीरे-धीरे एक से बन जाते हैं।
प्रेम एक तरह की मानसिक स्थिति है। इसका प्रवाह जिस ओर होगा उसी तरह के परिणाम भी प्राप्त होंगे। प्रेम का सहज और सरल प्रवाह नैसर्गिक कार्यों में होता है। पानी सदैव ऊपर से नीचे की ओर बहता है। किन्तु किसी पेड़ की जड़ों द्वारा सोख लिया जाता है तो वही मधुर फलों, सुँदर फूल और शीतल छाया में परिवर्तित हो जाता है। साँसारिक प्रवाह में प्रेम शक्ति के लगे रहने पर मनुष्य का जीवन पाशविक परिधियों में घिरा रहता है। प्रेम के प्रवाह का संचालन विवेक द्वारा होने पर वह जीवन में सत्यं शिवम् सुन्दरम् की प्राप्ति कराता है। जीवन विकास की ओर अग्रसर होता है। बार-बार अपने आदर्श के प्रति बाह्य और आन्तरिक क्षेत्र में प्रेम शक्ति का अभ्यास करने पर वैसा ही स्थाई भाव बन जाता है और फिर उसी की प्रेरणा से जीवन का संचालन होने लगता है। इस तरह के स्थायी भाव प्रारम्भ में अधिक भी हो सकते हैं किन्तु उन सब में समन्वय होना आवश्यक है। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ भावों की दिशा भी यदि अलग-अलग होगी तो वे आपस में टकरायेंगे और प्रेम की शक्ति नष्ट होगी।
एक बार काशी नरेश ने एक महोत्सव का आयोजन किया। उसमें अनेक सम्भ्रान्त अतिथियों के अतिरिक्त चार देव-पुरुष भी पधारे।
चारों के पास दिव्य पुष्पों से बनी मालाएं थी। वे इतनी महक रही थीं कि उनकी सुगन्ध से सारा नगर सुवासित हो गया उन मालाओं को देखने सारा नगर उमड़ पड़ा।
दर्शकों ने देव पुरुषों से अनुरोध किया कि यह मालाएं मनुष्यों को दे जायँ तो उस सुगन्ध का लाभ इस लोक के निवासियों को भी मिलता रहेगा। आप तो अपने लोक में ऐसी मालाएँ और भी प्राप्त कर लेंगे।
देव-पुरुषों ने लोगों को बताया कि इन्हें केवल गुणवान लोग ही धारण कर सकते हैं। सदाचरण से रहित होने पर भी जो इन्हें धारण करेगा वह अपार कष्ट भोगेगा।
लोभ के वशीभूत हो राज पुरोहित ने सोचा कि मैं अपने को भद्र पुरुष बता कर यह माला प्राप्त कर लूँ तो सब लोग मेरी प्रशंसा करेंगे और श्रेष्ठ भी मानेंगे। अज्ञात आचरणों को जानता भी कौन हैं?
राज पुरोहित ने देव पुरुषों से पूछा कि किन गुणों के होने पर मनुष्य यह माला प्राप्त कर सकते है?
जेष्ठ देव-पुरुष ने कहा-”जो किसी के अधिकारों का अपहरण नहीं करता, अपनी न्यायोपार्जित कमाई पर ही संतोष करता है, असत्य नहीं बोलता और ऐश्वर्यवान होने पर भी प्रमाद नहीं करता, वह माला ले सकता है।” राज पुरोहित ने अपने में वैसे ही गुण बताया और पहली माला लेली। दूसरे देव-पुरुष ने कहा-”जिसका चित्त धर्म में अविचल हो, जिसका हृदय श्रद्धा से भरा रहे जो दूसरों को बाँट कर अपनी कमाई खाता हो, वह मेरी माला भी ले सकता है।”
पुरोहित ने अपने को वैसा ही बताया और दूसरी माला भी लेली।
तीसरे देव-पुरुष ने कहा-”जो परनारी का चिन्तन न करता हो, दुखियों को देख दया से व्यथित हो उठता हो, सरलता और सज्जनता जिसमें कूट-कूट कर भरी हो वह मेरी भी माला ले सकता है।” पुरोहित ने अपने को वैसे ही बताया और वह तीसरी माला भी लेली।
तीसरे देव-पुरुष ने कहा-”जो परनारी का चिन्तन न करता हो, दुखियों को देख दया से व्यथित हो उठता हो, सरलता और सज्जनता जिसमें कूट-कूट कर भरी हो वह मेरी भी माला ले सकता है।” पुरोहित ने अपने को वैसे ही बताया और वह तीसरी माला भी लेली।
देव-पुरुष वह मालाएं देकर अपने लोक को चले गये। पुरोहित ने गर्वपूर्वक उन्हें धारण किया और विपुल कीर्ति का स्वामी बनने के लिए गर्व करता हुआ राज सभा में पहुँचा।
उन दिव्य मालाओं को धारण किये कुछ समय ही बीता होगा कि राज पुरोहित के सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी। ऐसा लगा मानों उसका मस्तक कोई कुल्हाड़ी से काट रहा हो। पाप उसके सिर पर चढ़कर बोलने लगा- “लोगों ! मैंने अधिकारी न होते हुए भी विपुल प्रशंसा प्राप्त करने का हठ किया और अब उसका मर्मान्तक प्रतिफल भोग रहा हूँ।”
मालायें उतारते न उतरती थी। वह इस तरह गले में लिपट गई मानों नाग-पाश ने कण्ठ को कस लिया हो। पुरोहित को सात दिन इसी भयंकर पीड़ा को सहते हो गये। देखने वालों से उसका दुख देखा नहीं जाता था।
अमात्यों के परामर्श से राजा ने फिर वैसा ही आयोजन किया जिसमें वे चारों देव-पुरुष पुनः आमन्त्रित किये गये। पाखण्डी पुरोहित पीड़ा से संत्रस्त उलटा मुँह किये पड़ा था। देव-पुरुषों ने करुणा से द्रवित होकर माला लौटा कर उसका दुख दूर किया और उपस्थित सभासदों से कहा- अयोग्य होते हुए भी जो विपुल प्रशंसा प्राप्त करने का लालच करते है उनकी दुर्गति ही होती है।
सामाजिक जीवन में व्यवहृत परम्परागत संस्कारों को ही संस्कृति कहते हैं। न जाने कब से, मानव के कर्म, रूप, वेश-भूषा, ग्रंथ आदि और प्रकृति से प्रभावित पारस्परिक सम्बन्धों का एक रूप चला आ रहा है और वही रूप उसकी संस्कृति को बनाता है।
संस्कृति के अनुसार ही राष्ट्रों का निर्माण होता हैं। संस्कृति के नष्ट होने पर राष्ट्र भी नष्ट हो जाते है। यह कथन मिथ्या है कि संस्कृति बनायी जाती है, बल्कि वह स्वयं बनती है। संस्कृति में समय के अनुसार परिवर्तन भी होता रहता है। परन्तु, वह परिवर्तन इतना धीरे होता है कि उसका तत्काल अनुभव नहीं हो पाता।
संसार की सभी संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति अत्यंत प्राचीन है। अनेक झंझावातों में भी हमारी संस्कृति ज्यों की त्यों बनी रही। युग बदल गये, राज्य बदल गये, कितने ही विधर्मी क्रूर शासकों ने तलवार के बल पर हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहा, परन्तु वे उसमें सफल न हो सके।
हमारी संस्कृति के मूल आधारों में आध्यात्मिकता का बहुत बड़ा स्थान है। हम अपने जीवन संबंधी सब कार्यों को आध्यात्मिक ढाँचे में ढाले हुए हैं। हमारे सब सामाजिक नियम आध्यात्मिक भित्ति पर ही खड़े हैं। हमारे स्वास्थ्य पर भी आध्यात्मिक का बड़ा प्रभाव पड़ा है। विभिन्न व्रत आदि का पालन जहाँ आध्यात्मिकता का अंग माना जाता है, वहाँ स्वास्थ्य के लिए भी अत्यन्त हितकर है।
हमारे सामाजिक नियमों में भौतिकवाद को अधिक महत्व नहीं दिया गया। चाहे किसी भी मत का अनुयायी क्यों न हो परमात्मा को सभी मानते हैं।-’आत्मा और परमात्मा एक है’ का सिद्धान्त हमारी संस्कृति को उत्कृष्ट बनाए हुए है। विभिन्न वादों के वर्तमान रहते हुए भी अद्वैतवाद की भावना का ही प्राबल्य है।
हमारी संस्कृति ने भोगादि विषयों को भी आध्यात्मिक रूप दिया। हमारी सुख-भोग की कामना भी निरे भौतिकवाद के सहारे नहीं रही। हमारा देश पारलौकिक उन्नति के साथ ही इहलौकिक उन्नति के लिए भी भले प्रकार कटिबद्ध रहा है। हमारे राजा दिग्विजय द्वारा अपना साम्राज्य स्थापित करते रहे हैं। हमारी संस्कृति का झंडा देश-विदेशों में फहराता रहा है परन्तु, सम्राट बनने की आकाँक्षा में भी हमारे यहाँ धर्म का हाथ था। इस कार्य में गर्व और धर्म समझा जाता था। इस प्रकार के कार्य यज्ञ और अनुष्ठानों के द्वारा आरंभ किये जाते थे।
हमारे यहाँ के सब शुभ कामों में यज्ञ की प्रधानता का रहना इस बात का प्रमाण है कि वे आध्यात्मिकता के आश्रय में भौतिक कार्यों को करते थे। परंतु यह आध्यात्मिक धारणा ही हमें दया और क्षमा की ओर भी प्रेरित करती रही है। शरणागत शत्रु पर हमने कभी भी हाथ नहीं उठाया, निर्बल पर हमने सदा ही दया-भाव रखा। जिसने क्षमा माँगी, उसे क्षमा देने में कभी देर नहीं की गई।
हमने दूसरों के धर्म और संस्कृति के प्रति कभी भी असम्मान प्रदर्शित नहीं किया। हमने विधर्मियों के गिर्जों और मस्जिदों को ढाने की कभी चेष्टा नहीं की। यद्यपि हमारे देवालय गिरा दिये गये उनके स्थान पर मस्जिद आदि बन गयी। परंतु, हमने जिस सहनशीलता का परिचय दिया, वैसा कोई अन्य धर्म वाला नहीं दे सका है।
कट्टर से कट्टर हिंदू भा अद्वैतवाद का पोषक होने के कारण आक्रमणात्मक विचारों का विरोधी रहा है। बलवान होते हुए भी वह नम्र रहता है। परंतु, तलवार के सामने उसने झुकना नहीं सीखा। धोखे से उसे वशीभूत भले ही कर लिया हो, परंतु मैदान में ‘विजय या बलिदान’ में ही उसका विश्वास रहा है।
हमारी संस्कृति में अपने कर्म पर बड़ा विश्वास है ‘हमने जैसा किया, वैसा भोगना ही पड़ेगा’ यह विचार हमारी मानसिक निर्बलता को दूर कर देता है। हम कभी विपत्तियों से विचलित नहीं होते। यद्यपि अपने भोगों की प्राप्ति के निमित्त विभिन्न देवी-देवताओं को मनाते और अनुकूल करने की चेष्टा करते हैं। परंतु, कार्य न बनने पर अपने कर्मों को दोष देते हैं, किसी देवी-देवता को नहीं कोसते।
इस जीवन में प्राप्त होने वाले दुःखों को पिछले जन्मों में किये कर्मों का फल मानते हुए, हम शुभ कर्म करने की प्रेरणा लेते हैं। हम भोगों में लिप्त रह कर भी यथासंभव बुरे काम नहीं करते। किसी के मन को दुखाना उचित न मानते हुए सबको प्रसन्न करने की चेष्टा करते रहते हैं। हमें अपने आत्मबल पर विश्वास रहता है और उससे सदा नवीन शक्ति प्राप्त होती है।
बुरे कर्मों से बचने का एक कारण परलोकवाद का विश्वास भी है। लोगों को नर्क का भय शुभ कर्मों के लिए प्रेरित करता है। इस लोक में किए गए अच्छे कार्यों से परलोक में शाँति मिलती है। जिसने पुण्य कर्मों को अर्जित किया, उसका परलोक सुधर गया।
वैराग्य को ऊँची वस्तु माना जाता है। वैरागी का सभी आदर करते हैं। इस देश में अनेकों तपस्वी, संन्यासी और साधक हुए हैं, जिन्होंने अपनी सिद्धि के बल से जनता का हित-साधन किया और स्वयं मुक्त हो गए। अद्वैत भाव वाले साधक ज्ञान-कर्म के द्वारा मुक्त होने के विश्वास रखते हैं। हमारे दर्शनशास्त्र इस विषय में एक मत हैं कि आत्मा उन्मुक्त होकर परमात्मा बन जाता है। गीता में स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।
आध्यात्मिक कर्म-व्यवस्था के अनुसार हमारे मन पर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संसार पड़ा है। हमारे ऋषियों ने कहा है कि धर्म, से ही अर्थ और काम की सम्पन्नता है अर्थात् अधर्मपूर्वक अर्थ संचय और विषय-सेवन अनुचित हैं और यदि धर्म में बुद्धि है तो मोक्ष प्राप्ति भी असंभव नहीं है।
हमारी संस्कृति ने नैतिकता को एक विशेष गुण माना है। जिसमें चारित्रिक दुर्बलता है, उसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता। कोई भी व्यक्ति उसे अपने पास बैठाना भी ठीक नहीं समझता। नारी निःसंदेह नारी है, परंतु उसके बहिन और माता वाले रूप को बनाए रखने के लिए सच्चरित्रता अत्यन्त आवश्यक है। सत्यवादिता, शिष्टता और नम्रता भी चरित्र सम्बन्धी गुण ही समझने चाहिए।
वर्णाश्रम व्यवस्था भी हमारी संस्कृति का एक प्रमुख अंग है। प्राचीन ऋषियों ने विभिन्न वर्ण बना कर उनके अनुकूल कार्यों का बटवारा किया। इससे समाज की दशा सुनियन्त्रित रही। आजीविका के अनुसार परस्पर सभी सब के लिए समान उपयोगी रहे।
एक शरीर से चारों वर्णों की उपमा देकर उनके सम्बन्धों को और भी दृढ़ कर दिया गया। ब्राह्मण की उत्पत्ति मुख से, क्षत्रिय की भुजाओं से वैश्य की कटि के, अधोभाग से और शूद्र की पाँवों से बताई गई है। जो महत्व मुख का है, वही पावों का है। समाज रूपी शरीर के इन चारों अंगों में से जिसकी उपेक्षा करोगे, वही कट जायगा। फिर वह शरीर कैसे बना रहेगा ?
भगवान् के जिन चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति बताई गई, उन्हीं चरणों से पतितपावनी गंगा जी का भी आविर्भाव हुआ हैं। वही चरण भक्तों की भक्ति के भी केन्द्र रहे हैं। तब शूद्रों में अधर्मता का दोष भी कहाँ ? इसी प्रकार सब वर्णों का, अपने-अपने स्थान पर समान महत्व है, सभी एक दूसरे के आश्रित हैं।
आश्रम व्यवस्था द्वारा मनुष्यों के इहलौकिक और पारलौकिक कृत्यों की सम्पन्नता सुलभता से होती है। इसके द्वारा मनुष्य का व्यक्तिगत जीवन सुव्यवस्थित हुआ। इसका प्रारंभ ब्रह्मचर्याश्रम से होता है, जिसके अनुसार अपने शिक्षा-दीक्षा काल में बालक ब्रह्मचर्यपूर्वक रहता हुआ युवावस्था तक पहुँचता है।
इसके पश्चात् गृहस्थाश्रम का प्रारम्भ होता है। उसमें रहकर मनुष्य धर्मपूर्वक एवं सदाचरण द्वारा अर्थ और काम की प्राप्ति करता है। फिर वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम द्वारा परहित साधना में लगता हुआ मोक्ष-मार्ग पर चल देता है।
हमारे यहाँ सभी कर्मों में संस्कार-विधि प्रयुक्त होती है। संस्कारों द्वारा हम पग-पग पर अपने को पवित्र बनाते रहते हैं। हमारे यहाँ पुँसवन, मुण्डन, विद्याध्ययन, यज्ञोपवीत, पाणिग्रहण आदि षोडश संस्कारों की महत्वपूर्ण व्यवस्था हैं।
गर्भाधान से लेकर मृतक तक के सभी संस्कारों में एक धार्मिक निष्ठा और कर्तव्य की भावना निहित है। यह संसार हमें अपने कर्मों की ओर प्रेरित करते हुए मुक्ति मार्ग की ओर खींच ले जाता है और हमारी निष्ठा हमें आध्यात्मिक कर्मों से संलग्न करती है।
अवतारवाद का सिद्धान्त भी हमारी संस्कृति का एक धार्मिक अंग रहा है। हमारा विश्वास है कि जब जब पृथ्वी पर अधर्म छा जाता और धर्म का लोप हो जाता है, तब-तब ईश्वर पृथ्वी पर प्रकट होकर हमारी रक्षा करते हैं।
हमारी संस्कृति में निराशा को कहीं कोई स्थान नहीं है। वह अपने अनुयायियों को आशावाद की ओर प्रेरित करती रही है। हम आपत्ति, विपत्तियों से कभी भयभीत नहीं होते, क्योंकि हम भगवान् पर भरोसा करके कर्मों में लग जाते हैं।
हमारे धर्म में ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ और
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना मनुष्येत्तर देहधारियों के प्रति भी प्रेम प्रदर्शित करती है। हम पशु, पक्षियों को भी दया-भाव से देखते हैं।
अतिथि-सत्कार का हमारे यहाँ बड़ा महत्व रहा है। सभी गृहस्थ पहले अतिथि को भोजन कराते और फिर स्वयं करते थे। अतिथि परिचित, अपरिचित कैसा भी हो, किसी का भी निरादर नहीं होता था।
मृतक कर्मों में अतिथि को भोजन कराने का विधान है। उसके लिए रोटियाँ निकाल कर दी जाती है। श्राद्धादि कर्मों में गौ, अतिथि, काक और श्वान को अन्न-भाग दिया जाता है। यह सब हमारे पशु-पक्षी प्रेम का ही प्रतीक है।
हिंदू धर्म में भी जैन और बौद्ध धर्म कुछ ऐसे चले जिनकी उपास्य और उपासना विधियों में विभिन्नता रही। परंतु परस्पर साम्प्रदायिक संघर्ष की नौबत कभी भी नहीं आई। बल्कि वे दोनों धर्म सनातन धर्मियों के सहयोग से उन्नत हुए। आज अनेक जन धर्मावलम्बी भी राम-कृष्ण और महावीर जी का साथ-साथ पूजन करते हैं।
हमारे धर्म में स्वार्थ भावना को प्रश्रय नहीं दिया गया। हमारी संस्कृति हिन्दुस्तान का ही नहीं, बल्कि अखिल विश्व की कल्याण-कामना करती है। वह मनुष्यों को ही नहीं, सभी प्राणियों को सुखी देखना चाहती है। उसने मानव जाति को प्रेम, विश्वास और उदारता का संदेश दिया है।
हमारे प्रेम-भाव का ही यह प्रभाव है कि यहाँ मुस्लिम शासन काल में ही मुसलमान कवियों ने राम और कृष्ण से सम्बन्धित कविताएं रचीं, मुस्लिम भक्तों ने भी कृष्ण की उपासना की। यहाँ राम और रहीम में कुछ भी अंतर नहीं माना जाता और अंत में गाँधीजी ने ‘ईश्वर अल्ला एक हि नाम’ वाला मंत्र देकर संसार की आंखें खोल दीं कि भारतीय संस्कृति में सम्प्रदायवाद को किंचित भी स्थान नहीं है।
दैवी-विधान और मनुष्य की स्थिति
संसार की प्रत्येक घटना, क्रिया-कलापों का संचालन एक नियत विधान के अनुसार ही होता है, जिसे प्राकृतिक, ईश्वरीय विधान, कुछ भी कहें। इस विधान की प्रेरणा से सृष्टि का जर्रा-जर्रा गतिशील है। इस विधान के अनुकूल चलने पर ही सुख सुविधा, सहयोग, प्रगति, विकास निश्चित है। इतना ही नहीं उस दिशा में मनुष्य प्रयत्न करके विशेष गति और स्थिति, प्राप्त कर सकता है। किंतु प्रतिकूल दिशा में चल कर तो संघर्ष, अशाँति, कष्ट, दुःख, पराजय के सिवा और कुछ नहीं मिलता। इससे उल्टी-अपनी शक्तियाँ व्यर्थ ही नष्ट होती हैं और मनुष्य-प्रगति की ओर न चलकर अवनति के गर्त में गिरता जाता है - पिछड़ जाता है। शास्त्रकारों ने इसी दैवी विधान के अनुकूल आचरण करना पुण्य और इसके प्रतिकूल चलना पाप कहा है। इसी तथ्य की कसौटी पर परीक्षण करने वाले जीवन विद्या विशारदों में-महापुरुषों ने कहा है “बुराई का परिणाम सदैव बुरा ही होता है। दुष्कर्म, कुचिन्तन, दुर्भावनाओं का परिणाम सदैव दुःखदायी ही होता है।” क्योंकि ये सब विश्व विधान के विरोधी, अनैतिक तत्व हैं।
विवेक-हीनता और अज्ञान से प्रेरित मनुष्य जब विश्व-प्रवाह, प्रकृति की विकास यात्रा के अनुकूल नहीं चलता तो प्रकृति उसे एक न एक दिन ठोक पीटकर उस ओर चलने को बाध्य कर ही देती है। जब मनुष्य बाह्य आकर्षणों में अपने लक्ष्य, पथ को भूल जाता है तो उसे प्रकृति के थपेड़े खाने ही पड़ते हैं। यह निश्चित तथ्य है कि स्वार्थ, क्षणिक सुखोपभोग, समृद्धि आदि अस्थायी, क्षणभंगुर हैं फलतः इनका पर्यवसान अनन्त दुःख में ही होता है। इन्द्रिय लोलुप व्यक्ति कई मानसिक और शारीरिक रोगों के शिकार हो जाते है, स्वार्थी लोभी, लालची लोग हृदय रोग उदर विकार, रक्त दोष आदि से पीड़ित हो जाते है। इसके साथ ही बाह्य जीवन की परिस्थितियों का गठन इस तरह हो जाता है जिसमें विश्व नियम के विरुद्ध चलने वाले को बार-बार ठोकरें लगती हैं, कष्टों से गुजरना पड़ता है। जनमन का, समाज का विरोध और तिरस्कार सहना पड़ता है। मनुष्य की समृद्धि शक्ति, उसका वैभव ऐश्वर्य सुख साधन उसे इन आन्तरिक एवं बाह्य प्रताड़ना, पीड़ा, झटकों से नहीं बचा सकते और बार-बार इस तरह की होने वाली शारीरिक मानसिक पीड़ा की अनुभूति-दुःख द्वन्द्वों की प्रतिक्रिया कालान्तर में मनुष्य की बुद्धि को स्थायी सुख नित्यानंद करने के लिए बाध्य कर ही देती है। और तब मनुष्य विश्व-नियम, दैवी-विधान, को समझने, सोचने और उसे जीवन में उतारने की दिशा में प्रयत्न करने लगता है। दुःख द्वन्द्वों की यह मार, कष्टानुभूति की यह कड़वी प्रतिक्रिया तब तक शान्त नहीं होती जब तक मनुष्य अपने जीवन के सही तथ्य को पाकर उस पर आचरण करना प्रारम्भ न कर दे। इस तरह विचारपूर्वक देखा जाय तो दुःख पीड़ायें, कष्टानुभूतियाँ कोई दण्ड नहीं हैं अपितु प्रकृति की, ईश्वरीय विधान की एक सुधार प्रक्रिया है।
मनुष्य के अनेकों मानसिक दोषों का मूल जिम्मेदार उसका अहंकार होता है। नीतिकारों ने अभिमान को समस्त पापों का मूल बताया है। अभिमान की छत्र-छाया में ही अनेकों मानसिक दोष पनपते हैं बढ़ते हैं और फैलकर मनुष्य के आन्तरिक जीवन को अस्त-व्यस्त असन्तुलित कर देते हैं और इसी की छाया स्वरूप जीवन के बाह्य पर्दे पर भी उल्टे काम, उल्टा व्यवहार, होने लगता है। किन्तु प्रकृति भी अभिमान को जड़ से खत्म किए बिना नहीं छोड़ती। देखा जाता है कि गिरे हुए उठते हैं और ऊपर चढ़े हुए गिरते हैं।
वैज्ञानिक अन्वेषणों से यह मालूम हुआ है कि हिमालय पहाड़ किसी समय समुद्र में डूबा हुआ था। ऊपर की चोटियों पर प्राप्त मछलियों, जलचरों के अवशेषों से यह सिद्ध भी हो गया है। इसी तरह हिन्द महासागर में एक पूरे का पूरा महाद्वीप ही डूबा हुआ है। स्थूल-जीवन, बाह्य संसार परिवर्तनशील हैं अभिमान का आधार भौतिक विशेषताओं में ही होता हैं। अतः एक न एक दिन भौतिक समृद्धि, सम्पन्नता शक्ति आदि पर खड़ा अभिमान का महल स्वतः ही धराशायी हो जाता है। आज जो गिरे हुए हैं कल उठेंगे। जो आज अपने को ऊपर उठे हुए जान रहे हैं उनका एक दिन गिरना भी निश्चित ही है। इस तरह उन्नति, अवनति, उत्थान पतन दोनों तरह की परिस्थितियों में समत्व रखने की शिक्षा प्रकृति देती रहती है। प्रकृति के इस रहस्य को समझने वाला व्यक्ति कभी अभिमान के मादक खुमार से मदहोश नहीं हो सकता।
शरीर के अंदर के विकारों का शमन करने के लिए प्रकृति शरीर में जो प्रतिक्रिया पैदा करती है उसके फलस्वरूप कई रोग फोड़े, फुन्सी, चेचक, बुखार, दस्त, उल्टी, दर्द आदि उत्पात होते हैं। वस्तुतः यह सब शरीर के विजातीय द्रव्यों को निकाल बाहर करने के प्रभाव मात्र हैं। किसी तरह का अत्यधिक कष्ट होने पर प्रकृति माता चेतना को ही शाँत कर देती है ताकि मनुष्य असहाय वेदना से पीड़ित न हो। किसी तरह का जबर्दस्त शारीरिक एवं मानसिक आघात लगने पर मनुष्य बेहोश, अचेत हो जाता है ! लोग इन सबको रोग, अभिशाप आदि समझते हैं, भगवान को कोसते है। किंतु हम यह नहीं सोचते कि यह सब प्रकृति माता का कितना बड़ा उपकार है हम लोगों पर, अन्यथा कष्टदायक वेदना और दोषों के भण्डार दूषित शरीर की क्या स्थिति होती इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है।
प्रकृति बहुत हद तक शरीर के दोषों को दूर करने का प्रयत्न करती है किंतु मनुष्य जब उससे कोई सहयोग नहीं करता और दूषित आचरण करके उसके नियमों का उल्लंघन ही करता जाता है तो वह जीर्ण-शीर्ण शरीर छीन लेती है और आत्मा को नया शरीर प्राप्त करने के लिए फिर से स्वतन्त्र कर देती है। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, क्या वह प्रकृति माता का अमूल्य वरदान नहीं है जिसमें हम जीर्ण-शीर्ण, असमर्थ, आरोग्य शरीर को त्यागकर नये शरीर की प्राप्ति के हकदार बन जाते है?
शारीरिक विकारों की तरह ही मानसिक विकार, चिन्ता कुढ़न कुविचार दुर्भाग्य आदि का भी प्रकृति अपने ढंग से निवारण करती है। मनुष्य जिस बात से चिन्तित अथवा भयभीत होने लगता है उसके जीवन में उसी तरह की परिस्थितियाँ बार बार रहकर मनुष्य उनका ऐसा अभ्यासी हो जाता है जिससे पूर्व भय और चिन्ता शेष नहीं रहते। इसी तरह स्वप्नों के माध्यम से भी मनुष्य के मानसिक भावों का रेचन हो जाता है। जैसे स्वप्न देखे जाते हैं वैसे भावों का रेचन भी हो जाता है। काम विकास जन्य दूषित भाव स्वप्न में व्यक्त होकर क्षीण हो जाते हैं। स्वप्न में भूत को बार-बार देखने वाले भूत के भय से मुक्त हो जाते हैं। हिंसक पशुओं के संपर्क में आने पर तज्जन्य भय का निवारण हो जाता है। गन्दे स्वप्न देखने पर गन्दे भावों का रेचन हो जाता है। स्वप्न में अपनी मृत्यु का दृश्य देखने वाले मृत्यु की चिन्ता से मुक्त हो जाते हैं। यदि सूक्ष्म निरीक्षण करके देखा जाय तो मालूम होगा मनुष्य जिस विषय के स्वप्न देखता है वह उठने पर उस विषय में अपने आपको हल्का, स्वस्थ महसूस करता है। प्रकृति माता मनुष्य की मानसिक गुत्थियों, विषमताओं को विभिन्न अनुभूतियों के माध्यम से सुलझाती रही है, चाहे यह कार्यक्रम दृश्य हो अथवा अदृश्य, बाह्य जगत में हो या स्वप्न जगत में।
बाह्य जीवन की परिस्थितियों, बीमारियों विषमताओं का स्वरूप ही प्रकृति की एक सुधारात्मक प्रक्रिया है। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में इस तरह की सुधारात्मक, दोष निवारक परिस्थितियाँ, वातावरण, परिणाम समयानुसार अवश्य ही मिलते हैं। यह सब एक ठीक-ठीक नियम, व्यवस्था, के अनुसार होता रहता है। अहंकारी, शक्तिशाली, गर्व में चूर दुर्योधन जब अपनी अनीतियों से बाज नहीं आया तो उसे अपनी ही आँखों अपना सर्वस्व नष्ट भ्रष्ट होते देखना पड़ा और बड़ी असहाय अवस्था में शरीर छोड़ना पड़ा। महाबली रावण का दर्प अहंकार उस समय नष्ट हो गया जब उसका सारा वैभव नष्ट हो गया और वह असहाय घायल अवस्था में रणभूमि में पड़ा था। जिसने बड़े−बड़े देवों पर विजय पाकर उन्हें बन्दी बना छोड़ा था, उसे दो क्षत्रिय पुत्रों ने कुल सहित नष्ट कर दिया। विश्व विजयी सिकन्दर महान अपनी अपार सम्पत्ति के होते हुए भी छटपटाता हुआ मरा और उसे कोई न बचा सका। उसका दर्प अहंकार मिट्टी में मिल गया। दुनिया की खुली पुस्तक में दैवी विधान की इस सुधार प्रक्रिया का पाठ सरलता से पढ़ा जा सकता है।
दुनिया से छिप कर अपने दुराचरण, पाप अन्याय, अनीति का खेल खेलने वाले, समाज और राजनीति की आँख में धूल झोंक सकते हैं। अदालतों में झूँठे प्रमाणों से अनुकूल न्याय प्राप्त कर सकते हैं। चमक-दमक पूर्ण कीमती पोशाक और समृद्धि की चकाचौंध से अपने असली स्वरूप को छिपा सकते हैं, दूसरों को चालाकी से अपना बड़प्पन जता सकते हैं। किन्तु विश्व विधायक की नजर से वे नहीं बच सकते। वहाँ उनका तर्क प्रमाण, बुद्धि, चातुर्य सब धरा ही रह जाता है। छलबल, दम्भ, समृद्धि आदि कोई भी उसे नहीं बचा पाते।
दुराचारी अपनी बाह्य सफलताओं के झूठे अभिमान से स्वयं ही ऐसी परिस्थितियों का निर्माण कर लेता है कि जिनमें कष्ट, मुसीबतों, दुःखों का सामना करना पड़ता है, उसका मनोबल नष्टप्रायः हो जाता है जिससे जीवन के विभिन्न पहलुओं में उसे पराजय का सामना करना पड़ता है। गुब्बारे की तरह फूला हुआ अभिमान तनिक सी कष्टकारक, अपमानजनक, परिस्थितियों की ठेस लगते ही फट जाता है और तब उसे अपनी असलियत का पता चलता है। स्वेच्छाचार दर्प अभिमान नष्ट होकर मनुष्य अपने को सामान्य श्रेणी में अनुभव करता है। यह सब ठीक उसी तरह नियमबद्ध होता है जैसे ऋतुओं का आना, दिन रात का होना आदि।
छिपे -छिपे पाप करने वाले कष्ट साध्य मानसिक रोगों से पीड़ित हो जाते हैं। उनके आसपास का वातावरण इस तरह का बन जाता है जिससे उन्हें दुःखदायी यन्त्रणायें सहन करनी पड़ती है। ऐसे लोग शान्ति से नहीं रह पाते। चैन से खा नहीं सकते न सुख की नींद सो सकते हैं। इस तरह अन्तर्बाह्य सर्वत्र दुःख क्लेश अशान्ति पीड़ादायी यन्त्रणायें मनुष्य को वास्तविक सुख और सत्य की खोज के लिए बाध्य कर देती हैं। जब मनुष्य दैवी विधान के अनुसार मिली ताड़ना, दण्ड कष्टों से भी नहीं सुधरता तो प्रकृति उसे चैन से जीने भी नहीं देती और एक दिन जीने का अधिकार भी उससे छीन लेती है।
संसार एक नियत विधान, नियम द्वारा संचालित और प्रेरित है। संसार का प्रत्येक कण, उसकी गतिशीलता, स्थिति, सम्वर्धन सब उसी नियम के अंतर्गत चलते हैं और यह विश्व नियम सदैव एक सा, अचल और सार्वभौम है। इसके प्रवाह की अनुकूल दिशा में बहकर मनुष्य विकास प्रगति की ओर अग्रसर हो सकता है। विशेष प्रयत्न करने पर वह विशेष स्थिति भी प्राप्त कर सकता है। जैसे नदी के प्रवाह में पड़ जाने पर मनुष्य उलटता-पुलटता बहता चला जायगा।
यदि वह हाथ पैर हिलाये तो अपनी विशेष स्थिति बना सकता है।
संक्षेप में विश्व नियम पुरोगामी, रचनात्मक सृजनात्मक, सत्य, प्रेम, न्याय पर आधारित है। संसार में फैली विकृतियाँ, विपरीतता, अन्याय आदि मनुष्य द्वारा पैदा किए गये हैं और इसी कारण मनुष्य सर्वाधिक दुखी परेशान भी है। आवश्यकता इस बात की है कि शाश्वत नियम, सिद्धान्तों, आदर्शों का अवलम्बन लेकर जीवन को पुरोगामी बनाया जाय तो मानव जीवन अनन्त आनन्द सुख का उद्गम बन जायगा। इसके विपरीत विश्व नियम की प्रतिकूल दिशा में चलना प्रकृति का कोपभाजन बनना है, जिससे जीवन में दुख, कष्ट, परेशानी, रोग, शोक, भय, ताप यन्त्रणाओं का सामना करना पड़ता है, जो वस्तुतः प्रकृति की एक सुधार प्रक्रिया ही है।
लक्ष्मी ने दर्प, व्यंग्य मिश्रित स्वर में कहा- “मेरी कृपा प्राप्त करने को सभी लालायित रहते है। मेरे बिना किसी का जीवन आनन्दमय नहीं हो सकता। इतना भी नहीं जानती तुम। मैं तुम्हारे पुत्रों को सुखी बनाने आई हूँ। उन्हें वरदान दूँगी। तुम्हारा मूर्खतापूर्ण अनुरोध मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं।”
धरती कुछ और कहती पर इसका अवसर दिये बिना ही लक्ष्मी जी ने अपन रथ बढ़ा दिया। वे जिधर से भी निकली उधर से ही वरदान बरसा, देखते - देखते लोगों के घर सोने चाँदी से भर गये।
अपने सौभाग्य की सराहना करते हुए लोग उल्लास भरे उत्सव मनाने लगे। विपुल धन पाकर उन्होंने आमोद प्रमोद के अनेक साधन जमा कर लिए। श्रम की ओर अब कौन ध्यान देता?
वर्षा आई, कोई खेतों को जोतने न गया। आमोद-प्रमोद से फुरसत ही किसे थी। न बीज बोया गया न काटा गया और न अन्न उपजा।
खेतों में खर-पतवार जम गये और घरों में भरे अन्न भंडार की इति श्री हो गई। भूख से व्याकुल लोग सोना-चाँदी लिए इधर उधर फिरने लगे। श्रम का अभ्यास छूट चुका था। दुर्भिक्ष ने विकराल रूप धारण किया। छाती से सोने की ईंट बाँधे क्षुधार्त लोग जहाँ तहाँ तड़प-तड़प कर प्राण त्यागने लगे।
धरती की आँखों में आँसू आ गये। उसने बचे खुचे पुत्रों से कहा- आकस्मिक लाभ का वरदान वस्तुतः अभिशाप जैसा दुर्भाग्यजनक ही होता है।
सृष्टि संचालन के सार्वभौम नियमों के अनुसार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन होते रहना एक स्वाभाविक बात है। दिन के बाद रात और रात के बाद दिन होता है। वर्षा के बाद शरद और इसके पश्चात् ग्रीष्म ऋतु का आना भी प्रायः निश्चित ही होता है। सूर्य चन्द्र एवं अन्य ग्रह भी एक नियमबद्ध गति में चलते हैं। इसी तरह मानव जीवन भी इन सार्वभौम नियमों के अंतर्गत सदैव एक सा नहीं रहता। मनुष्य की इच्छा हो या न हो जीवन में भी परिवर्तनशील परिस्थितियाँ आती ही रहती हैं। आज उतार है तो कल चढ़ाव। चढ़े हुए गिरते हैं और गिरे हुए उठते हैं। आज अँगुली के इशारे पर चलने वाले अनेकों अनुयायी हैं तो कल सुखदुःख की पूछने वाला एक भी नहीं रहता। रंक कहाने वाला एक दिन धनपति बन जाता है तो धनवान निर्धन बन जाता है। जीवन में इस तरह की परिवर्तनशील परिस्थितियाँ आते -जाते रहना नियतिचक्र का सहज स्वाभाविक नियम है। इनसे बचा नहीं जा सकता। इन्हें टाला नहीं जा सकता।
एकाँगी विचार प्रेरित मनुष्य इस नियति के विधान को नहीं समझ पाता। वह अपनी इच्छा कामना के अनुकूल परिस्थितियों में ही सुख अनुभव करता है तो विपरीत परिस्थितियों में दुखी हो जाता है। अधिकाँश व्यक्ति सुख, सुविधा, सम्पन्नता, लाभ, उन्नति आदि में प्रसन्न और सुखी रहते हैं किन्तु दुख, कठिनाई, हानि आदि में दुखी और उद्विग्न हो जाते हैं। किन्तु यह मनुष्य के एकाँगी दृष्टिकोण का परिणाम है और इसी के कारण कठिनाई, मुसीबत, कष्ट आदि शब्दों की रचना हुई। वस्तुतः परिवर्तन मानव-जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण, सहज और स्वाभाविक है जितना रात और दिन का होना - ऋतुओं का बदलना- आकाश में ग्रह नक्षत्रों का विभिन्न स्थितियों में गतिशील रहना। किन्तु केवल सुख, लाभ, अनुकूल परिस्थितियों की ही चाह के एकाँगी दृष्टिकोण के फलस्वरूप मनुष्य दुख कठिनाई और विपरीतताओं में रोता है। दूसरों को अथवा ईश्वर को अपनी विपरीतताओं के लिए कोसता है। शिकायत करता है, इनसे बचने के लिए असफल प्रयत्न करता हैं। किन्तु इससे तो उसकी समस्यायें बढ़ती ही जाती हैं। घटती नहीं। वस्तुतः कठिनाइयाँ जीवन का एक आवश्यक नियम है, जिसे स्वीकार करने में ही लाभ है।
कठिनाइयाँ जीवन की एक सहज स्वाभाविक स्थिति हैं, जिन्हें स्वीकार करके मनुष्य अपने लिए उपयोगी बना सकता है और कठिनाइयों को जीवन का विरोधी भाव, मानकर उनमें दुखी और परेशान होकर मनुष्य अपनी ही हानि भी कर लेता है। कठिनाइयों में रोना, हार मान लेना निराशा और अवसाद से ग्रस्त होना अपने विश्वास के मार्ग को छोड़ बैठना ही है। वस्तुतः कठिनाइयाँ इतनी भयंकर और कष्टदायक नहीं हैं जितना बहुत से लोग समझते हैं। जिन कठिनाइयों में कई व्यक्ति रोते हैं, हार बैठते है, मानसिक क्लेश अनुभव करते हैं उन्हीं कठिनाइयों में दूसरे व्यक्ति नवीन प्रेरणा, नव उत्साह पाकर सफलता का वरण करते हैं। इस तरह कठिनाइयाँ अपने आप में कुछ नहीं है वरन् मन की स्थिति से ही इनका स्वरूप बनता है। मन और कठिनाइयाँ सापेक्ष हैं। सबल मन वाला, व्यक्ति बड़ी से बड़ी कठिनाई को भी स्वीकार करके आगे बढ़ता है तो निर्बल मन वाला सामान्य सी कठिनाई से भी निश्चेष्ट हो जाता है। निर्बल मन तो अपनी कल्पना जन्य कठिनाइयों में ही अशान्त हो जाता है।
नियति के नियम अजेय एवं अपरिवर्तनीय हैं। मानव जीवन में होने वाले परिवर्तन भी इसी के अंतर्गत होने से ध्रुव सत्य हैं। जीवन में आपने वाली कठिनाइयों की जड़ में भी यही हैं इस तथ्य को हृदयंगम कर कठिनाइयों में भी सन्तुष्ट, सन्तुलित रहने वालों की जीवन यात्रा सहज गति में चलती रहती है। अनेकों विपरीतताएं भी उनका मार्ग नहीं रोक पाती। छोटी बड़ी कठिनाइयाँ उनके लिए इसी तरह महत्व रखती हैं, जैसे रात और दिन, सर्दी और गर्मी।
परीक्षा की कसौटी पर प्रतिष्ठित हुए बिना कोई भी वस्तु उत्कृष्टता प्राप्त नहीं कर सकती, न उसका कोई मूल्य ही होता है। सोना भीषण अग्नि में तप कर ही शुद्ध और उपयोगी होता है। बड़ी धूप में तपने पर ही खेतों में खड़ी फसल पकती है। आग की भयानक गोद में पिघल कर ही लोहा साँचे में ढलने के उपयुक्त बनता है। जनजन द्वारा पूजी जाने वाली मूर्ति पर पैनी-छैनी की असंख्यों चोटें पड़ती हैं। परीक्षा की अग्नि में तप कर ही वस्तु शक्तिशाली, सौंदर्य-युक्त और उपयोगी बनती है। मनुष्य भी कठिनाइयों में तप कर उत्कृष्ट, सौंदर्य युक्त प्रभावशाली और महत्वपूर्ण बनता है। जीवन को अधिक उत्कृष्ट और महत्वपूर्ण बनाने के लिए मनुष्य को उतनी ही अधिक कठिनाइयों और परेशानियों में से गुजरना पड़ेगा। वस्तुतः कठिनाइयाँ, दुख, परेशानियाँ, जीवन की कसौटी हैं, जिनमें मनुष्य के व्यक्तित्व का रूप निखरता है।
कठिनाइयाँ मनुष्य के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इन्हें खुले हृदय से स्वीकार करके मानसिक विकास प्राप्त किया जा सकता है। कठिनाइयों में खुलकर खेलने से इच्छा शक्ति प्रबल होती है और बड़े-बड़े काम करने की क्षमता प्राप्त होती है। कठिनाइयों में मनुष्य की आन्तरिक शक्तियाँ एकत्रित और संगठित होकर काम करती हैं जीवन की कोई भी साधना कठिनाइयों में होकर निकलने पर ही पूर्ण होती हैं। कठिनाइयों में ही जीवन दर्शन की परीक्षा होती है।
कठिनाइयाँ दुधारी तलवार हैं जो व्यक्ति इन से घबरा कर गिर पड़ा वह, हार बैठा। वह अपने जीवन की सभी सम्भावनाओं को नष्ट कर देता है इसके विपरीत जिसने कठिनाइयों को साध कर उन से समझौता, समन्वय कर लिया वह व्यक्ति कठिनाइयों को ही अपनी सफलता, उत्कृष्टता का साधन बना लेता है। कठिनाइयाँ एक ओर जीवन में कसौटी बन कर सुधार, नवनिर्माण, उत्थान की प्रेरणा देने में उत्साह और मनोबल को ऊँचा उठाने में सहायक होती हैं, तो दूसरी ओर मनुष्य को अकर्मण्य, निरुत्साह बना देती हैं। जीवन की आशा उमंगों को धराशायी कर देती हैं। दोनों ही स्थितियों का उत्तरदायी मनुष्य स्वयं ही होता हैं इसमें कठिनाइयों का कोई दोष या गुण नहीं है। जब मनुष्य कठिनाइयों की यथार्थता को नहीं समझता, उन्हें जीवन का स्वाभाविक अंग मानकर सहर्ष स्वीकार नहीं करता तो ये ही कठिनाइयाँ अपार दुख, अशान्ति, क्लेश का कारण बन जाती हैं भय और घबराहट पैदा हो जाते हैं। इससे मनुष्य का मानसिक सन्तुलन संगठन बिखर जाता है और अन्तर्द्वन्द्व पैदा हो जाते हैं। जब किसी राष्ट्र की आन्तरिक शक्तियाँ विघटित होकर उनमें अन्तर्द्वन्द्व, गृह, युद्ध पैदा हो जाता है तो उसका पतन होना स्वाभाविक ही है। उस पर बाह्य आक्रमण भी होने लगते हैं। इसी तरह अन्तर्द्वन्द्व से मानसिक शक्तियाँ नष्ट होने लगती है। फिर सामान्य सी कठिनाइयाँ भी मनुष्य की आशा, उमंग और धैर्य को घायल कर उसे निराशा, हीनता अवसाद की ओर ढकेलती हैं। मनुष्य की बड़ी-बड़ी आशायें, उमंगें, अभिलाषायें इस स्थिति में कठिनाइयों की चट्टान से टकराकर टूट-फूट जाती हैं, छिन्न-भिन्न हो जाती हैं।
इस तरह मनुष्य चाहे तो कठिनाइयों को वरदान बना सकता है और अभिशाप भी। आवश्यकता इस बात की है कि वह बार-बार प्रयत्न करके कठिनाइयों की कसौटी में सफल होने के प्रयास न छोड़े अपनी साधना जारी रखे। जीवन में आने वाली कठिनाइयों का समाधान मनुष्य कैसे करता है इसका प्रभाव उसके साथ-साथ समाज और वातावरण पर भी काफी पड़ता है। जो मनुष्य कठिनाइयों का खुले दिल से स्वागत करता है, उनके साथ खेलता है वह स्वयं तो उससे मिलने वाले लाभ प्राप्त करता ही है किन्तु दूसरों के लिए भी प्रेरणा और आदर्श बन जाता है। एक कायर सैनिक को रण से भागता देखकर कई सैनिक भाग निकलते हैं। इसके विपरीत एक योद्धा जो अपने कर्तव्य को सामने रखकर कठिनाइयों में भी लड़ता है, उसे देखकर अन्य सैनिक भी प्रेरणा और उत्साह प्राप्त कर लड़ते रहते हैं। उनमें वीरता के भाव जाग्रत होते हैं।
कठिनाइयों में निर्द्वन्द्व होकर आगे बढ़ने वालों की समाज के लिए बहुत बड़ी देन होती है। वे समाज के प्रेरणा केन्द्र बन जाते हैं। उनके पद चिन्हों पर दूसरे भी चलते हैं। मेजिनी ने जब इटली का स्वतन्त्रता आन्दोलन चलाया तो उसके केवल पाँच ही साथी थे। पाँच से बढ़कर दस, और दस से बीस, इस तरह उनकी संख्या बढ़ती ही गई। इसी तरह लोकमान्य तिलक ने भारत को स्वतन्त्रता के मंत्र की दीक्षा दी, गाँधीजी ने स्वाधीनता आन्दोलन चलाया तो असंख्यों भारतीयों ने अपने आपको सहर्ष कठिनाइयों की आग में डाल दिया।
यदि सबसे बड़ी कोई सहायता है तो यह है, कठिनाई के वक्त किसी की मदद करना और उसका एक मात्र सच्चा उपाय है उससे भी अधिक कठिनाइयों में पड़कर उसके समक्ष सन्तोष, सन्तुलन, धैर्य, शान्ति का आचरण करना। अन्य सभी भौतिक, बाह्य धन आदि की सहायतायें सामयिक होती हैं और उनसे गलत लाभ उठाकर मनुष्य पतित भी हो सकता है। किन्तु कठिनाइयों में अपने आपको डालकर दूसरों को बल देना सच्ची सहायता है। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को उसकी इच्छानुसार अपनी सेनायें, भौतिक सहायता प्रचुर मात्रा में दी, किन्तु अर्जुन के लिए निःशस्त्र होकर केवल सारथी का काम करना स्वीकार किया। अपने जीवन की परवाह किए बिना अपने आपको निम्न परिस्थितियों, कठिनाइयों में डालकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक आध्यात्मिक बल और मानसिक शक्ति प्रदान की। यदि किसी सहायता से कोई व्यक्ति परावलम्बन सीखता है तो वह अच्छी सहायता नहीं, इससे उसका पतन होना सम्भव है। सच्ची सहायता वह है जो मानसिक शक्ति की अभिवृद्धि करे।
सुकोमल पुष्प की छाती पर बैठी मधुमक्खी निर्दयता पूर्वक उसका जीवन रस चूसने में लगी थी।
फूल ने कराहते हुए पूछा- मैं भी इस दुनिया में जीने की लालसा लेकर आया हूँ। इस तरह चूसे जाने पर मैं भला कब तक जी सकूँगा?
मधुमक्खी पर कुछ असर न हुआ। रसपान का आनन्द छोड़ने की वह तैयार न हुई। फूल कराहता रहा, मक्खी अपना आनन्द लेती रही।
मधु की गंध पाकर एक दिन वन-बिलाव पेड़ पर जा पहुँचा। शहद पिया और छत्ते को तोड़कर टुकड़े-टुकड़े छितरा दिये।
मक्खी भिनभिनाई। वनबिलाव को भर पेट दुर्वचन कहे। पर वह अनसुनी किये अपनी तृप्ति का आनन्द लेता रहा।
रस-हीन फूल मुरझा गया। उसने मधुमक्खी का इस प्रकार अवसाद देखा तो लम्बी साँस खींची और कहा- यदि दूसरों का दुख समझ सकना हमारे लिए संभव रहा होता तो यह दुनिया कितनी सुन्दर होती ।
जीवन में पूर्णता प्राप्ति के लिए हमारे पूर्वज मनीषियों ने तीन मार्ग बताये हैं। ज्ञानयोग, भक्ति योग और कर्मयोग। ज्ञानयोग, उच्च बौद्धिक चेतना सम्पन्न, सूक्ष्मदर्शी, चिन्तन प्रधान भाव अर्जन करने की प्रेरणा देता है, और भक्तियोग में हृदय की शुद्धि, आत्म समर्पण की उत्कट भावना, अनन्य प्रेम को आवश्यक बताया गया है। किन्तु कर्मयोग का समावेश भी इन दोनों के साथ अनिवार्य माना गया है।
आज के संघर्षमय युग में तो कर्मयोग “युगधर्म” कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी क्योंकि इसकी साधना, आचरण, सरलता से किए जा सकते हैं। महाभारत का युद्ध शुरू होने को था, दोनों सेनायें आमने-सामने खड़ी थी। बीच में खड़े मोहग्रस्त विक्षिप्त मन अर्जुन को श्रीकृष्ण ने कहीं कन्दराओं में एकान्त में बैठकर तत्वज्ञान की साधना के लिए नहीं कहा था और न भाव भक्ति में विह्वल हो निज सुधि विसार कर परमात्मा को पुकारने के लिए ही कहा।
समस्त गीता का एक मात्र निष्कर्ष अर्जुन को निष्काम कर्मयोग की शिक्षा देकर महाभारत के युद्ध में प्रवृत्त करना था, जिसमें स्वयं अर्जुन की भी प्रतिष्ठा, कर्तव्य, परायणता, मुक्ति एवं पूर्णता सन्निहित थी। मनुष्य मात्र जीवन के महाभारत संग्राम में खड़ा है। दुविधा, संघर्ष, जीवन के कटु अनुभव, अवरोध, कठिनाइयों में मनुष्य जहाँ विपन्न सा खड़ा है वहाँ गीता का कर्मयोग ही उसे आगे बढ़ाने का मार्ग खोलता है। कर्मयोग से मनुष्य के आन्तरिक एवं बाह्य जीवन का परिष्कार होता है। अनेकों जन्मों की ग्रन्थियों का निराकरण हो जाता है। मन शक्तिशाली और शुद्ध बनता है। आन्तरिक जीवन के साथ ही बाह्य जीवन भी सफल और सुन्दर बनता है।
कर्मयोग में प्रवृत्त होने से मनुष्य और समाज के निकट संपर्क स्थापित होते हैं। जिससे मनुष्य में एकाकीपन की भावना, घबराहट, डर संकोच आदि की वृत्तियाँ दूर होकर मनुष्य की गति, एवं क्षमताओं में वृद्धि होती है। बहुधा कई लोगों को दूसरों से मिलने जुलने, बातचीत करने में एक प्रकार की घबराहट, बेचैनी सी होती है। जिसके लिए लोग दूसरों के संपर्क से बचने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु इससे मनुष्य का व्यक्तित्व अविकसित ही रह जाता है। लेकिन कार्य क्षेत्र में उतरने पर, कर्मयोग का अवलम्बन लेने पर तो मनुष्य को दूसरों से संपर्क स्थापित करना ही पड़ता है। दूसरों के साथ मिल जुलकर हम किस प्रकार काम करें, कैसे सोचें और चाहना करें? इसी विज्ञान को कर्मयोग कहा गया है।
अकर्मण्य न बैठकर अच्छे, रचनात्मक कार्यों में लगे रहना अपने मन को शक्तिशाली बनाने का एक सरल उपाय है। स्वयं बैठने पर ही मनुष्य के मन में निकम्मी बातें उठनी शुरू होती हैं जिनसे मानसिक कमजोरियाँ बढ़ती हैं। कुविचारों की बढ़ोतरी कुमार्ग की प्रेरणा देती है। इससे चरित्र बिगड़ता है, स्वभाव गंदा होता है और मनोबल क्षीण होने लगता है। मनुष्य तरह-तरह के शारीरिक और मानसिक रोगों से घिर जाता है। निरन्तर किसी काम में लगे रहने से खाली दिमाग शैतान की दुकान नहीं बन पाता, बुरे विचारों के आने जाने के लिए कोई समय ही नहीं रहता। इसके अतिरिक्त काम की सफलता से आत्म विश्वास बढ़ता है और इससे मनुष्य में आत्म नियन्त्रण की शक्ति बढ़ती है इस तरह काम में लगे रहने से मनुष्य की शारीरिक और मानसिक शक्तियों का विकास होता है और इनके फलस्वरूप ही बाह्य जीवन में सफलता मिलती है।
श्रद्धा, निष्ठा एवं लगन के साथ किया गया कोई भी काम मनुष्य को सद्भाव, उच्च, विचार, उत्साह, सन्तोष, शान्ति प्रदान करता है। किसी भी भले काम में लग कर मनुष्य बाह्य संसार में कुछ भी सफलता प्राप्त करें, किन्तु आन्तरिक लाभ शान्ति, आत्म प्रसाद, उच्च विचार सद्गुणावलोकन की दृष्टि तो प्राप्त होती ही है। मानसिक विकारों पर नियन्त्रण प्राप्त होकर नैतिक तथा बौद्धिक उन्नति होती है। कुल मिलाकर कर्मयोगी की अंतर्बाह्य जीवन में सफलता ही मिलती है।
कुविचारों और दुष्प्रवृत्तियों से बचने के लिए अपनी समस्त शक्ति को रचनात्मक कार्यों में लगा देना श्रेयस्कर होता है। इससे एक तो दुष्कर्मों के लिए समय ही नहीं मिलेगा साथ ही कुविचारों को फलित होने का मौका भी प्राप्त नहीं होगा। अकर्मण्यता की स्थिति में अनेकों दूषित मनोभाव उत्पन्न होते रहते हैं, बढ़ते हैं और भयंकर रूप धारण कर लेते हैं। काम में लगे रहने पर दूषित भावों की शक्ति रचनात्मक कार्यों में परिवर्तित हो जाती है। सक्रिय रहने पर मनुष्य के अच्छे बुरे दोनों तरह के भावों का समन्वय हो जाता है। सब मिलकर कार्य की पूर्णता में लग जाते हैं। अतः अन्तर्द्वन्द्व की नौबत ही नहीं आती।
चिन्ता से मुक्ति के लिए सक्रिय रहना आवश्यक है। इससे इच्छाशक्ति भी बढ़ेगी और दूषित भावों का भी शोधन होगा। कोई भी काम जो सरल एवं अपनी रुचि के अनुकूल हो उसमें लग जाना चाहिए। चिंता, क्रोध, शोक आदि हीन भावों से ग्रस्त व्यक्ति के लिए तो अकर्मण्य रहना बड़ा भारी कुपथ्य है, इससे रोग दिन दूना रात चौगुना बढ़ता ही जाता है। दूसरों की सेवा, घर का काम, अध्ययन, शिल्प, कला, साहित्य साधना आदि छोटे बड़े कार्यों में से अपनी रुचि के अनुसार निर्णय कर उसमें दत्त-चित्त होकर लग जाना चिन्ता, मानसिक विकार, उद्विग्नता आदि से बचने का सरल उपाय है । जो लोग अपने कार्यों में दत्तचित्त होकर नहीं लगे रहते बहुधा चिन्तायें उन्हें ही सताती हैं। जो व्यक्ति दृढ़ता के साथ अपने आपको काम में लगा सकता है वही विकारों से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकता है। कर्मशील व्यक्ति भूत भविष्य की उधेड़बुन में उलझा नहीं रहता, वरन् वर्तमान को महत्व देता है और अपने काम में लगा रहता है।
कर्मयोग जीवन में होने वाली क्षति, हानि आदि के लिए रोने, शोक करने, दुख भगाने की इजाजत नहीं देता। वहाँ तो पद-पद पर नव सृजन निर्माण के द्वारा क्षति, हानि के गढ्ढों को भर देने का विधान है और यह सच भी है कि किसी हानि, क्षति के लिए दुख मनाने, शोक करने से कोई लाभ नहीं होता वरन् उसकी पूर्ति करने में लग जाना ही उसका समाधान है, जो कर्मयोग, सक्रियता से ही सम्भव है। बिना क्रिया के तो सृजन और निर्माण के काम कैसे होंगे? और बिना सृजन के पूर्ति भी सम्भव न होगी। धन की क्षति के लिए धन कमाने के प्रयत्न करना, परीक्षा में असफल होने पर पढ़ाई की तैयारी में लग जाना, इसी तरह अन्य सभी
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्व सत्ये प्रतिष्ठतम्॥
-चाणक्य
“सत्य से पृथ्वी स्थिर है, सत्य से सूर्य प्रकाश देता है, सत्य ही से वायु बहती है, सब कुछ सत्य के बल से ही स्थिर है।”
***
मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं तु गच्छति।
अपि निवणिमायाति नानलयाति शीतताम्॥
- हितोदेपश
“उच्च मनोबल वाले मनस्वी व्यक्ति मर भले ही जायें पर कृपणता, कायरता नहीं करते, जैसे अग्नि भले बुझ जाय पर शीतल नहीं होती।”
क्षेत्रों में यही नियम लागू होता है। चिन्ता करते रहने या हानि का दुख मनाते रहने से वह क्षतिपूर्ति न हो सकेगी, वरन् इससे तो शारीरिक और मानसिक बल ही घटना आरम्भ हो जायेगा, जिससे उस क्षतिपूर्ति में और भी अधिक बाधा पड़ेगी। “बीती ताहि बिसारदे आगे की सुधि लेय” की नीति अपनाकर ही कोई व्यक्ति अपनी क्षतियों को पूर्ण कर सकता है। जो मनुष्य सतत अपने कर्तव्य कर्म में लगा रहता है उसे किसी दूसरे की निन्दा स्तुति करने का अवकाश नहीं रहता। कर्मरत के लिए एक क्षण भी इन बेकार बातों के निमित्त निकालना मुश्किल है। किसी भी व्यक्ति को अपने कार्य की सिद्धि के लिए दूसरों के गुणों को देखने, समझने और उनका अनुकरण करने की आवश्यकता होती है। कर्मयोगी को दूसरों के गुण अच्छाइयों को देखने की आदत बन जाती है और दोष दर्शन के लिए न उसे उत्साह रहता है और न अवकाश। छिद्रान्वेषण, परदोष दर्शन, असद्भाव विचार प्रायः उन्हीं लोगों में देखे जाते हैं जो अकर्मण्य होते हैं।
जल के बहते हुए प्रवाह में जिस प्रकार कूड़ा-करकट अपने आप बहता चला जाता है उसी प्रकार कर्तव्यपरायण व्यक्ति के मन में कुविचार भी टिक नहीं पाते। शरीर और मन की अनेकों विकृतियाँ उनमें पाई जाती है जिन्हें फालतू बैठे रहना पड़ता है। चिन्ता, शोक, उद्वेग के लिए जिन्हें अवसर ही नहीं मिलेगा वे कैसे इन झंझटों में पड़े रहेंगे? काम में थका हुआ मनुष्य गहरी नींद सो जाता है और फिर उसे रात भर जाग जाग कर कुकल्पनायें करते रहने का अवसर ही नहीं मिल पाता।
अच्छे आदर्श रचनात्मक उपयोगी और आत्मसंतोष देने वाले कार्यों में संलग्न रहकर मनुष्य को जो प्रफुल्लता मिलती है वह और किसी प्रकार उपलब्ध नहीं हो सकती। कामनाओं और लालसाओं को छोड़कर, खेल और अभिनय की तरह उदात्त बुद्धि से जो कार्य करते हैं उनके लिए तो यह जीवन ही नहीं सारा संसार और उसका प्रत्येक कार्य भी आनन्दमय बन जाता है। कर्म की महत्ता अनन्त है। इसीलिए उसे योग कहा गया है। अन्य योग साधनाओं की भाँति ही मनुष्य कर्मयोग की साधना से पूर्णता प्राप्त कर सकता है।
व्यभिचार के अपराध में एक स्त्री को पकड़ कर लाया गया। पंचों ने निश्चय किया कि पत्थर मार-मार कर उसका वध कर डाला जाय।
दर्शकों की भीड़ पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़े हाथ में लिए खड़ी थी। अपराधिनी का मस्तक लज्जा से झुका था, वह भय से थर-थर काँप रही थी।
ईसा उधर से निकले। लोगों ने उन्हें रोका और इस अपराध एवं दंड व्यवस्था पर अपना अभिमत प्रकट करने का अनुरोध किया।
लोगों को संबोधन करते हुए ईसा ने कहा- अपराधी को दंड देना उचित है, पर पत्थर उन्हें मारने चाहिए जिन्होंने कभी अपराध न किया हों। जो कभी व्यभिचार कर चुके हों उनके लिए तो ऐसा करना सरासर अनुचित है।
इस विवेक व्यवस्था को दर्शकों ने ध्यानपूर्वक सुना। हाथों में रखे पत्थर नीचे गिरने लगे भीड़ खिसकना आरम्भ हो गई। वध स्थली पर अपराधिनी और ईसा दो ही खड़े थे। ईसा ने कहा- भटकने वाली लड़की जा, प्रभु से क्षमा माँग और नेक जीवन व्यतीत कर।
जब मनुष्य अपने आपको सामान्य स्तर पर न समझकर असाधारण, विशेष बड़ा, महत्वपूर्ण समझने लगता है तभी अभिमान का अंकुर फूट निकलता है जो दिनों दिन बढ़ता हुआ विशाल रूप धारण कर लेता है। झूँठी प्रशंसा, उद्दंडता, स्वेच्छाचार, शेखीखोरी से भी मनुष्य अपनी वस्तुस्थिति को न समझकर अभिमान के परों से उड़ने लगता है। ऐसे लोगों के दिमाग की बागडोर अभिमान और इसे पोषण करने वाले तत्वों के हाथों में होती है। अविवेकी, अज्ञानी, अदूरदर्शी, मोटी बुद्धि के लोग ही अभिमान से ग्रस्त होते देखे जाते हैं। कुछ भी हो अभिमान वह विष बेल है जो जीवन की हरियाली, सौंदर्य, वृद्धि विस्तार, विकास को रोककर उसे सुखा देती है। यह ऐसी विष-बुझी दुधारी तलवार है जो अपने तथा दूसरों के जीवन में विनाश का सूत्रपात कर देती है। अभिमान का स्वभाव ही दमन, शोषण, पतन, क्रूरता आदि है, जिससे स्वयं व्यक्ति और उससे सम्बन्धित समाज प्रभावित हुए बिना नहीं रहता ।
किसी भी विषय, क्षेत्र में अभिमान हो जाने पर मनुष्य की प्रगति, विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। विद्या का अभिमान हो जाने पर विद्या नहीं बढ़ती वरन् वह घटती ही जाती है। प्रशंसा, प्रसिद्धि जिससे अभिमान को पोषण मिलता है, विकास उन्नति का पथ भुला देती है। न्यूटन महोदय ने अपने गणित की महत्वपूर्ण खोज काफी समय तक प्रकाशित ही नहीं की। किन्तु बहुत समय बीत जाने के बाद उन्होंने उस खोज को एक पत्र में प्रकाशित कर दिया तो अनेकों लोगों के धन्यवाद, अभिवादन, प्रशंसापत्र उनके पास आने लगे। इस पर उन्होंने दुखी होकर कहा था “ अब मेरी प्रसिद्धि तो खूब बढ़ेगी किन्तु विद्या जिसके लिए मैंने जीवन भर लगा दिया उसका विकास रुक जायगा।” प्रसिद्ध दार्शनिक कान्ट ने अपनी बड़ी उम्र तक अपने ज्ञान और सिद्धांतों को प्रकाश में नहीं आने दिया। उनकी जगत प्रसिद्ध पहली पुस्तक 12 वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुई। 40-45 वर्ष तक एक ही समस्या पर वे सोचते विचारते रहे। और जब उसके सभी पहलुओं पर उनका गम्भीर चिन्तन मनन पूर्ण होकर सही सही निष्कर्ष निकला तभी उस विचार को लोक कल्याणार्थ रखा। एक बार न्यूटन से किसी ने कहा था “आपने तो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है।” इस पर उस निरभिमानी वैज्ञानिक ने कहा “मेरे सामने ज्ञान का अथाह समुद्र फैला पड़ा है जिसके किनारे के कुछ ही रज कण मैं उठा पाया हूँ।” एक ओर ऐसे व्यक्तियों की स्थिति पर तरस आता है जो बेचारे कही से कुछ पढ़ सुनकर, थोड़ा बहुत अध्ययन कर अभिमानवश अपने आपको विद्या का धनी, पण्डित विद्वान मान बैठते हैं। अपनी विद्वता, पाण्डित्य की दुहाई देने वालों की स्थिति एक खोखले पोले ढोल की तरह ही होती है। अपनी होशियारी, अध्ययनशीलता का अभिमान रखने वाले विद्यार्थी दूसरों से पिछड़ जाते हैं। कला, विद्या, शक्ति, सामर्थ्य सभी क्षेत्रों में अभिमान सफलता और प्रगति का मार्ग बन्द कर देता है।
अभिमान की वृद्धि के साथ ही मनुष्य का पतन प्रारम्भ हो जाता है और अभिमान की पराकाष्ठा सर्वनाश करके ही छोड़ती है। रावण जब अभिमान से बुरी तरह ग्रस्त हो गया और उसने अमानवीय, अमर्यादित कृत्य शुरू कर दिए तो वह अपने कुटुम्ब के साथ विनाश को प्राप्त हुआ। अभिमानी दक्ष प्रजापति ने महादेव-शिवजी, जो उसके दामाद भी थे, के साथ विरोध ठान लिया। उन्हें अपमानित करने के लिए विशाल यज्ञ रचा और निमन्त्रण नहीं भेजा। सती के पितृ गृह में बिना बुलाये चले जाने पर उसका भी अपमान किया गया और सती विरुद्ध हो योगाग्नि में जल मरी। अन्ततः शिवजी ने यज्ञ सहित दक्ष को नष्ट -भ्रष्ट कर दिया। शृंगी ऋषि, नारदजी को जब अपने तप और काम विजय पर अभिमान हुआ तो वे पतित हुए और कामासक्त होकर उन्होंने निम्न कृत्य किए। दान का अभिमान करने वाला वलि पतित हुआ। तप के अभिमानी दुर्वासा ने निर्दोष अम्बरीष को श्राप दे दिया किन्तु उसका मूल्य उन्हें ही चुकाना पड़ा और क्षमा माँगनी पड़ी। अभिमानी कंस, दुर्योधन को वह दिन देखना पड़ा जिसकी उन्हें स्वप्न में भी सम्भावना नहीं थी। हिटलर, सिकन्दर, मुसोलिनी, नेपोलियन आदि को भी अपने बढ़ते हुए सामर्थ्य के अभिमान में पराभव और पतन का सामना करना पड़ा।
अपने रंग रूप, सामर्थ्य, शक्ति किन्हीं भी विशेषताओं का अभिमान मनुष्य के पतन का कारण बन जाता है। मनुष्य की विभिन्न क्रियायें, चेष्टायें अभिमान का नशा चढ़ने पर असन्तुलित और अव्यवस्थित हो जाती हैं वह कुछ का कुछ करने लगता है। उसकी विवेकशीलता, विचार, बुद्धि दूरदर्शिता मारी जाती है जिससे जीवन के सही पथ से भटककर दुष्प्रवृत्तियों, दुष्कर्मों के भयंकर बीहड़ों में भटक जाता है और अन्ततः विनाश को प्राप्त होता है।
अभिमान की वृद्धि के साथ ही मनुष्य में आत्म निरीक्षण, स्वदोष दर्शन की शक्ति और क्षमतायें नष्ट होने लगती हैं, जिससे वह अपना बुनियादी सुधार नहीं कर पाता। उसके व्यक्तित्व में अनेकों दोष रह जाते हैं, जो मनुष्य की असफलता और पतन का कारण बन जाते हैं।
अभिमानी व्यक्ति को सदैव अपनी प्रशंसा प्रिय लगती है। अतः उसे अपनी प्रशंसा करने वाले भी प्रिय लगते हैं और वह उनसे सामीप्य और निकटता रखना अच्छा समझता है। फलतः ऐसे अभिमानी व्यक्तियों के वातावरण में चापलूस, खुशामदी लोगों का गिरोह इकठ्ठा हो जाता है।
प्रशंसालोलुप अभिमानी व्यक्ति जब किसी से अपनी निन्दा सुन लेता है तो उससे व्यर्थ ही शत्रुता ठानकर उसे नेस्तनाबूद करने के प्रयत्न करने लगता है। उसका दम्भ इस कदर बढ़ जाता है कि अपनी इच्छा के विरुद्ध तनिक भी सुनना उसे अप्रिय लगता है। परिणाम यह होता है कि सच्ची राय देने वाले, स्पष्टवक्ता, अनुभवी, विचारशील लोगों का उसे साथ नहीं मिलता और चापलूस चालाक व्यक्ति ही उसके इर्द गिर्द रहते हैं जो अपना उल्लू सीधा करके उसे पतन और विनाश के मार्ग पर बढ़ावा देते रहते हैं।
अभिमानी व्यक्ति को अपने सामने दूसरे प्रगतिशील, उन्नति करने वाले, बढ़ने वाले व्यक्ति तनिक भी अच्छे नहीं लगते। वह नहीं चाहता कि कोई और भी दुनिया में ऊँचा उठे। अपनी उन्नति, अपनी बढ़ोत्तरी, अपनी अहं तुष्टि में ही उसे आनन्द आता है और अकारण ही वह प्रगतिशील तत्वों से ईर्ष्या द्वेष रखकर उन्हें हानि पहुँचाने के षड़यन्त्र रचता है। दूसरों को दुःख पहुँचाता है।
अभिमान ग्रस्त व्यक्ति अपने आपसे अच्छा किसी दूसरे को तो समझता ही नहीं। उसे दुनिया में सब बुरे और स्वयं अच्छा दिखाई देता है, एक बड़ी भारी सभा में कंस से पूछा गया “ उसे यहाँ कितने भले आदमी नजर आते हैं।” उसने कहा “ मुझे यहाँ एक भी भला आदमी नजर नहीं आता।”
अभिमान की वृद्धि के साथ-साथ मनुष्य के संघर्ष का क्षेत्र भी विस्तृत हो जाता है। अपने कार्य क्षेत्र में काम कर रहे अन्य लोगों से बड़ा बनने, अपने व्यक्तित्व को विशेष महत्व देने, अपनी विशेषता बड़प्पन का रौब दिखाने के प्रयत्न में अभिमानी व्यक्ति उनकी आलोचना निन्दा करता है। उन्हें हानि पहुँचाने, असफल बनाने के लिए तरह-तरह के षड़यन्त्र रचता है। इससे अनायास ही दूसरे लोग शत्रु बन जाते हैं। अपने उक्त व्यवहार के कारण दिनोंदिन उसके विरोधियों शत्रुओं की संख्या बढ़ जाती है और यही पतन, असफलता, विनाश का मार्ग है। उसकी सारी शक्ति विरोध, द्वेष, षड़यन्त्रों में नष्ट हो जाती है। रचनात्मक दृष्टि से वह कुछ भी नहीं कर पाता।
दुनिया में यदि कोई भयंकर बीमारी है तो वह है आलस्य की। आलस्य समस्त रोगों का राजा है, उसे मौत से भी अधिक भयंकर कह देना कोई अत्युक्ति न होगी। क्षय, टाइफ़ाइड, इन्फ्लुएंजा, बुखार, चेचक आदि रोग मनुष्य के शरीर को प्रभावित करते हैं। आवश्यक उपचार करने पर कुछ ही समय में ये ठीक हो जाते हैं और जीवनक्रम पूर्ववत् चलने लगता है। खासकर कई रोगों में तो शरीर की शुद्धि भी हो जाती है। इसी तरह मृत्यु भी जन्म, बचपन, यौवन, वृद्धावस्था की तरह ही जीवन की एक स्वाभाविक घटना है। जीवन की लम्बी यात्रा में असमर्थ, अयोग्य जर्जरित शरीर का त्याग और नव शरीर का धारण जन्म मरण की घटनाओं से ही सम्भव है। किन्तु आलस्य तो ऐसा भयंकर रोग है जो मनुष्य के तन, मन, धन, श्री समृद्धि, बुद्धि सबको चौपट कर उसे जड़ता के फौलादी जाल में जकड़ लेता है। यह जीवित होते हुए भी मनुष्य को मृतवत बना देता है। निष्क्रियता, प्रयत्नहीनता, जड़ता, मृत्यु का ही दूसरा नाम है। आश्चर्य की बात तो यह है कि आराम सुख मौज मजे, के लालच में मनुष्य स्वयं ही इसकी गोद में सोता है और फिर यह मायावी उसे उठने नहीं देता। अपना सम्मोहक आलस्य हावी हो जाता है। अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेता है।
आलस्य के प्रभाव में पड़ने पर मनुष्य की क्रिया शक्ति कुँठित होने लगती है। शरीर शिथिल हो जाता है। मानव मन की यह विशेषता है कि वह कुछ न कुछ करते रहने का आदी है। जब क्रिया के माध्यम से उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती तो वह विचार और बातूनी दुनिया में काम करने लगता है। बड़ी बड़ी गप्पे हाँकना, निरर्थक बातें करना, खयाली दुनिया में उड़ना आलसियों के काम रह जाते हैं। जिस तरह सोते समय मनुष्य स्वप्नों की दुनिया में तरह-तरह के दृश्य देखता है, कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी बड़ा धनी बन जाता है तो कभी गरीब दीन भिखारी, कभी दुखी होता है तो कभी सुख के गीत गाता हैं, इसी तरह आलसी व्यक्ति भी दिवास्वप्न देखने में व्यस्त और थका-थका सा मालूम पड़ता है। वह दिन भर कल्पना के पंख लगाकर उड़ता रहता है। इन कल्पनाओं की दुनिया में उसे उसी तरह अनुभूतियाँ होती हैं जैसे बाह्य संसार के रंग मंच पर सक्रिय व्यक्ति को। कल्पना की दुनिया में सुख-दुख के थपेड़े खात-खाते आलसी आन्तरिक एवं बाह्य जीवन में खोखला बन जाता है और हाथ पर हाथ धरे बड़ी वेदना, निराशा, काल्पनिक दुखों की पीड़ा का भारी बोझ उठाये असमय में ही काल कवलित हो जाता है। जीवन भर मरने की दुखद कल्पना से भयभीत आलसी को मृत्यु के समय भी कुछ कम कष्ट नहीं होता। इतना ही क्यों जीवन में आने वाले दुख कठिनाइयाँ भी उसकी कल्पना का संयोग पाकर सुरसा की तरह मुँह फाड़ उसे भयभीत करते रहते हैं। असंतोष, निराशा, घुटन, भय, संदेह, आशंका, चिन्ताओं से ग्रस्त आलसी का नारकीय जीवन एक अभिशाप ही होता है।
मनुष्य के विभिन्न रोगों की पहचान, निराकरण सरलता से किये जा सकते हैं। जीवन में आने वाली विभिन्न कठिनाई, समस्याओं, परिस्थितियों को समझकर उनका हल करना भी कोई कठिन बात नहीं है। किन्तु आलस्य का आक्रमण इन सबसे ज्यादा खतरनाक है। उसे समझना, हल करना आसान बात नहीं है क्योंकि सबसे पहले आलस्य अपने छल फरेब का जाल फैला कर मनुष्य की समझने बुझने, समाधान करने की शक्ति को नष्ट करता है। आलस्य, आराम, सुख का लालच देकर मनुष्य में ऐसी मादक खुमारी पैदा करता है, जिससे मनुष्य स्वतः ही इसकी शरण में चला जाता है, फिर यथार्थ की धरती पर कर्तव्य की कठोरता से बचने के लिए यह सरल रास्ता नजर आता है। यही कारण है कि बहुत से मनुष्य आलस्य के शिकार बन जाते हैं।
आशा, उमंग, उत्साह एवं चेतना की सात्विक उत्तेजना के फलस्वरूप मनुष्य कर्म रत रहकर सक्रिय जीवन बिताता है। जीवन में ऐसा भी समय, परिस्थितियाँ, वातावरण आ जाते हैं जब असफलता, निराशा, आकस्मिक दुर्घटना एवं चोट खाकर मनुष्य का उत्साह, उमंग, साहस, क्षत-विक्षत घायल हो जाते हैं। उत्तेजना ठण्डी पड़ जाती है। ठीक ऐसे ही अवसर पर आलस्य अपना आक्रमण करता है और मनुष्य पर अपना अधिकार करता है। ऐसे समय में जो सम्हल कर फिर उठ खड़े होते हैं अथवा धैर्य एवं सन्तोष के साथ साहस, शक्ति, उमंग की चिकित्सा कर समय की प्रतीक्षा के साथ अपना प्रयास जारी रखते हैं, आराम की चिन्ता जिन्हें नहीं होती वे आलस्य के आक्रमण से बच जाते हैं। जीवन की असफलता, विघ्न, बाधा, कठिनाइयाँ आलस्य के प्राथमिक हथियार हैं, इनके सामने घुटने टेक देना आलस्य की अधीनता स्वीकार करना हैं।
आलस्य के आक्रमण के प्रारम्भिक दौर में मनुष्य अपने काम को आगे के लिए टालने का प्रयत्न करता है। अपने कर्तव्य को छोड़ इधर उधर मन बहलाने अथवा भागने का मार्ग ढूंढ़ने लगता है। इधर-उधर के निरर्थक कामों में मन दौड़ाता है। ऐसी स्थिति में जरा कठोरता से काम लेना चाहिए और अपने सामने जो काम पड़ा है उसी को पूर्ण करने के लिए जुट जाना चाहिए मन को जबरन उस ओर लगा देना चाहिए।
आलस्य के प्रबल आक्रमण से मनुष्य की क्रिया शक्ति काफी कुँठित हो जाती है। एक तरह की शिथिलता उसे घेर लेती है। ऐसा व्यक्ति सब तरफ से हाथ पाँव समेट कर विक्षिप्त की तरह जड़वत् हो जाता है, अपने आवश्यक कार्यों को भूलने लगता है, उनसे उदासीन होने लगता है। ऐसी स्थिति में बुद्धि, विवेक भी इतने कुँठित हो जाते हैं कि अपनी स्थिति भी समझ में नहीं आती जिससे आलस्य का निराकरण कर उससे बचना सम्भव नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में किसी उत्साही, साहसी, व्यक्ति का संपर्क विशेष लाभदायक होगा। उत्साही, लगनशील, कर्मरत व्यक्ति के संपर्क से बड़े से बड़ा आलसी भी इस असाध्य रोग से छुटकारा पा सकता है। जिस तरह अग्नि के संपर्क में आने वाली वस्तुयें गर्म हो जाती हैं इसी तरह आलसी व्यक्ति भी उत्साही परिश्रमी व्यक्ति के संपर्क में आकर वैसा ही बनने लगता है।
आलस्य के कारण शरीर के समस्त अंग शिथिल हो जाते हैं। हाथ-पैर, दिमाग, पाचन-संस्थान, श्वास-प्रणाली सभी में विकृति पैदा हो जाती है और बैठे-बैठे शरीर अनेकों रोगों का घर बन जाता है। इतना ही नहीं आलसी व्यक्ति दूसरों की सहानुभूति, सहयोग पाने एवं बहाने बाजी के लिए साधारण रोगों को भी बहुत बड़ा-चढ़ा कर कहता है। साधारण सी बीमारी भी उसे बहुत भयानक लगती है। इस तरह आलसी व्यक्ति जीवित होते हुए भी मृतवत ही होता है। कर्मवीर के लिए मृत्यु कोई महत्व नहीं रखती उसके लिए वह एक देह परिवर्तन की शुभ बेला होती है। इसलिए मृत्यु से भयंकर, समस्त रोगों से भी भयानक आलस्य रोग से बचने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को सावधान रहना आवश्यक है।
आरभन्तेऽल्पमेवाज्ञाः कामं व्यग्रा भवन्ति च।
महारम्भाः कृतधियस्तिन्ठन्ति च निराकुलाः॥
“मूर्ख लोग कोई छोटा सा कार्य आरम्भ करते हैं और उसी में अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं, पर बुद्धिमान बड़े से बड़े आरम्भ करते हैं तब भी शान्त बने रहते हैं और सफल हो जाते हैं।”
भारत के महापुरुष-
भारतवर्ष के आधुनिक इतिहास में पिछली शताब्दी कई दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है। वर्तमान भारत के अधिकाँश निर्माणकर्ताओं का जन्म इसी शताब्दी में हुआ था और पिछले एक हजार वर्षों में देश के भीतर जो निर्बलता तथा त्रुटियाँ उत्पन्न हो गई थीं उनको दूर करके नवयुग की स्थापना करने वाले अधिकांश महापुरुषों ने इसी काल में अपनी प्रतिभा, विद्वता, त्याग, उदारता का परिचय देते हुये देश को उन्नति के मार्ग पर आरुढ़ किया था। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की गणना इन्हीं महापुरुषों में की जाती है।
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का जन्म अत्यन्त गरीब घर में हुआ था। उनके जन्म के समय उनके पिता श्री ठाकुरदास कलकत्ता में आठ रुपये की नौकरी करते थे। ईश्वरचन्द्र को भी अपना आरम्भिक जीवन बड़े अभाव की अवस्था में बिताना पड़ा। नौ वर्ष की आयु में वे अपने पिता के साथ कलकत्ता में रहकर संस्कृत पढ़ने लगे। वे पढ़ने में बहुत अधिक परिश्रम करते थे। साथ ही दो-तीन व्यक्तियों के लिये भोजन बनाना, बर्तन-माँजना, लकड़ी चीरना आदि काम भी अपने हाथ से करते थे। कभी-कभी उन्हें निराहार रहकर भी काम चलाना पड़ता था। जिस स्थान में वह रहते थे वह अत्यन्त गन्दा और बदबूदार था। जब ये पढ़ने बैठते तो बहुसंख्यक कीड़े-मकोड़े चारों ओर से रेंगकर इन्हें काटने लगते। पर ये इतने दृढ़ निश्चयी और आत्म संयमी थे कि इन सब कष्टों को सहकर भी निरन्तर शिक्षा में प्रगति करते गये और विद्यालय में सदा सबसे प्रतिभाशाली छात्र माने जाते रहे।
इक्कीस वर्ष की आयु में कलकत्ता के सरकारी संस्कृत विद्यालय की ऊँची-से-ऊँची परीक्षा सर्व प्रथम श्रेणी में पास करली जिससे उनको तुरन्त ही फोर्ट विलियम कालेज में नौकरी मिल गई। उसी समय अनेक बड़े-बड़े पंडितों ने मिलकर इनको ‘विद्यासागर’ की उपाधि सम्मानपूर्वक प्रदान की। सरकारी अधिकारी भी इनका बहुत अधिक मान करते थे, पर ये सत्य तथा स्वाभिमान का सदैव इतना ध्यान रखते थे कि जरा-सी अनुचित बात स्वीकार न करते थे। एक बार इनके कालेज के प्रिंसिपल मार्शल साहब ने इनसे अनुरोध किया कि इंग्लैण्ड से जो सिविलियन यहाँ भारतीय भाषाओं की परीक्षा देने आते हैं उनकी परीक्षा सुगम ढंग से ली जाय। इस पर विद्यासागर ने कहा कि - “मैं नौकरी छोड़ने के लिए तैयार हूँ परन्तु परीक्षा में किसी के साथ अन्याय नहीं कर सकता।”
विद्यासागर को धन का लोभ भी न था, यद्यपि उन्होंने आरम्भ से गरीबी के कष्ट सहन किये थे और ऐसी दशा में प्रायः मनुष्य धन को अधिक महत्व देने लग जाते हैं। विद्यासागर को नौकरी करते थोड़ा ही समय हुआ था कि संस्कृत कालेज में एक जगह 90 रु॰ मासिक की खाली हुई। उसके अध्यक्ष ने मार्शल साहब से सलाह करके विद्यासागर को उस पर रखने का निश्चय किया। फोर्ट विलियम कालेज में इनको 50) ही मिलते थे पर उन्होंने संस्कृत कालेज की जगह को अस्वीकार करते हुये मार्शल साहब से कहा कि मैं आपके साथ ही काम करना चाहता हूँ क्योंकि यहाँ मेरी ज्ञान वृद्धि का अधिक अवसर मिलता है।
उस समय तो बात टल गई, पर ऐसी प्रखर बुद्धि और उच्च योग्यता के व्यक्ति कहाँ तक पीछे रह सकते थे। सात आठ वर्ष के भीतर वे संस्कृत कालेज के मंत्री नियुक्त किये गये और तीन सौ रु. वेतन मिलने लगा। पाँच वर्ष बाद उनको स्कूलों का इन्सपेक्टर भी बना दिया गया और दोनों पदों के लिये 500 रु वेतन मिलने लगा। पर इतना वेतन मिलने पर भी उनकी आर्थिक अवस्था साधारण ही रही और उन पर कर्ज का भार भी प्रायः बना रहा। कारण यह था कि वे विद्यासागर के साथ दया के भी सागर थे। कोई भी दीन दुःखी, कष्टग्रस्त, विपत्ति में फँसा हुआ उनके सामने आता तो शक्ति भर उसकी पूरी-पूरी सहायता करते। वे न मालूम कितने अनाथ बालकों को भोजन, वस्त्र और पुस्तकों का खर्च दिया करते थे। अपने गाँव में उन्होंने एक अच्छा औषधालय खोला था जिसमें सबको मुफ्त औषधि दी जाती थी और वहाँ का डॉक्टर जब किसी को घर पर देखने जाता, तब भी किसी से एक पैसा फीस नहीं ली जाती थी। इसमें विद्यासागर को सौ रुपया मासिक खर्च करना पड़ता था। वहाँ उन्होंने एक स्कूल तथा कन्याशाला भी बनवाये थे। इनका सारा खर्च भी वे अपने पास से करते थे। इस प्रकार उनका सारा वेतन खर्च हो जाता था और एक पैसा भी नहीं बच पाता था। समय -समय पर किसी विशेष दीन-दुःखी के आ जाने पर वे हजारों रुपया सहायतार्थ दे डालते थे और ऐसे अवसर पर प्रायः उनको कर्ज लेकर काम चलाना पड़ता था। ऐसे ही एक अज्ञात ब्राह्मण के मकान को बचाने के लिए उन्होंने बिना अपना नाम प्रकट किये 2400 रु. चुका दिया था। बँगाली प्रसिद्ध कवि माइकेल मध्सूदन दत्त जब विदेश में भूखों मर रहे थे और कोई सहारा देने को तैयार न था तो विद्यासागर ने ही लगभग 3200 रु. भेजकर उनकी प्राणरक्षा की थी।
विधवा-विवाह और स्त्री शिक्षा
विद्यासागर के जीवन का सबसे महान कार्य था विधवाओं की दशा का सुधार और स्त्री शिक्षा का प्रचार। उस समय बंगाल में स्त्रियों की दुर्दशा अवर्णनीय थी और विधवा हो जाने पर तो उनको साखात् नरक के कष्ट सहन करने पड़ते थे। विद्यासागर के एक शिक्षक शम्भुचन्द्र वाचस्पति थे। स्त्री के मर जाने पर उनको गृह कार्यों में बहुत असुविधा सहन करनी पड़ती थी। कुछ लोगों ने उनको फिर से विवाह करने की सम्मति दी। वाचस्पति जी विद्यासागर को पुत्र-तुल्य मानते थे और सब बातों में उनसे सलाह ले लिया करते थे। इस सम्बन्ध में चर्चा करने पर विद्यासागर ने उनको स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया और कहा कि इस आयु में विवाह करने का अर्थ किसी निरपराध बालिका को आजीवन कष्टों की भट्टी में झोंक देना होगा। इन्होंने हर तरह से समझाया, पर वाचस्पति जी अन्य लोगों की बातों में आ चुके थे और उन्होंने एक दरिद्र ब्राह्मण की परम सुन्दरी बालिका से विवाह कर लिया।
विद्यासागर ने जब यह सुना तो उन्होंने वाचस्पति जी को अन्तिम प्रणाम करके कहाँ कि अब मैं कभी आपके यहाँ नहीं आऊँगा। कुछ समय बाद वृद्ध वाचस्पति जी का देहान्त हो गया और उस बालिका का जीवन सर्वथा निराधार और निस्सहाय बन गया।
इस घटना का प्रभाव विद्यासागर के ऊपर इतना पड़ा कि आपने विधवाओं का दुख दूर करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। वे जानते थे कि यदि वे विधवा- विवाह का आन्दोलन उठायेंगे तो भारत के अधिकाँश व्यक्ति उनका विरोध, निन्दा और अपमान ही करेंगे। पर वे परोपकार भावना से इस सबको सहन करने को प्रस्तुत हो गये। उन्होंने वर्षों तक सैकड़ों हिन्दू शास्त्रों का अध्ययन किया और उनमें से विधवा विवाह के अकाट्य प्रमाण एकत्रित करके ‘विधवा विवाह’ नाम का ग्रन्थ प्रकाशित कराया। जैसा उनका अनुमान था इस ग्रन्थ से समस्त देश में हलचल मच गई और लोग विद्यासागर जी पर तरह-तरह के आक्षेप करने लगे और गालियाँ देने लगे। पर वे अपने उद्योग में बराबर लगे रहे और सन् 1856 की 26 जुलाई को विधवा विवाह का कानून पास कर दिया गया। कानून पास कराने के तीन महीने के भीतर ही विद्यासागर जी ने एक प्रतिष्ठित घराने के युवक श्री-शचन्द्र विद्यारत्न का विवाह ब्रह्मानन्द मुखोपाध्याय की दस वर्षीय बाल विधवा कमलादेवी से करा दिया। बंगाल में यह पहला विधवा विवाह था।
इस प्रकार विद्यासागर ने अपनी समस्त शक्ति, विद्या, प्रतिभा और धन-सम्पत्ति भारतीय नारियों को दुर्दशा से मुक्त कराने में लगा दी। इनके सिवा उन्होंने हजारों अनाथों की तरह-तरह से सहायता करके उनको स्वावलम्बी बना दिया। इस प्रकार समस्त जीवन परोपकार करते और स्वयं गरीबी का जीवन बिताते हुये सन् 1891 की 29 जुलाई को उन्होंने अपनी जीवनलीला समाप्त की।
स्वाध्याय दोसंह-
“प्रारब्ध” और “ईश्वरेच्छा”
किसी कार्य या योजना का अनिष्ट परिणाम आने पर ‘ईश्वर की इच्छा ऐसी ही थी’ या ‘प्रारब्ध ही ऐसा था’ ऐसी कल्पनाओं से मन को समझा लेने के बाद मनुष्य का दुख या असंतोष कुछ हद तक हलका हो जाता है, अपने और दूसरे लोगों की ऐसी असफलताओं के अवसर पर ‘ईश्वरेच्छा’ और ‘प्रारब्ध’ की कल्पनाओं के कारण हताश और दुखी मन को जो आधार, आश्वासन और धैर्य मिलता है, उस पर से इन कल्पनाओं को सिद्धान्त का रूप प्राप्त हुआ है। दुखी और निराश मन शान्त होने के लिये किसी महान वस्तु का आधार खोजता है। ‘ईश्वरेच्छा’ और ‘प्रारब्ध’ की कल्पनायें यदि मनुष्य को किसी अनुभव के बाद सूझी हों, तो भी मनुष्य अधिकतर निराशा की स्थिति में ही उनका प्रयोग करते आये हैं। सुख सम्पत्ति में, या वैभव में इन मान्यताओं का श्रद्धा पूर्वक स्मरण करके ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का और अपने भीतर निरहंकारता का भाव बढ़ाने में इनका उपयोग शायद ही कोई करता हो।
“ईश्वरेच्छा या प्रारब्धानुसार सब कुछ होता है” “जिन्दगी दो दिन की है” - “ये दिन भी बीत जायेंगे” आदि उद्गार मनुष्यों के मुख या हृदय से समय-समय पर प्रसंगानुसार निकला करते हैं। बहुत से लोग समझते हैं कि इन्हीं उद्गारों में ज्ञान भरा है और ये ही जीवन के महान् सिद्धान्त हैं। इस मान्यता से वे जानबूझ कर उदासीनता का जीवन बिताने लग जाते हैं। परन्तु हमें ध्यान रखना चाहियें कि ऐसे उद्गारों को जीवन सूत्र बनाकर उनके अनुसार नित्य का जीवन चलाने का प्रयत्न करना ही गलत है। निराश या निरुत्साही बने हुये, व्याधिग्रस्त, गरीबी से दुखी, लोगों के छल−कपट के शिकार बने हुये, मौत के किनारे लगे हुये, किसी दुख के कारण भग्न हृदय बने हुये तथा जिनका जीवन लगभग असफल सिद्ध हो चुका है ऐसे व्यक्तियों के मुँह से परिस्थितिवश निकले उद्गारों को जीवन का सिद्धान्त मान लेना और सम्पूर्ण सत्य वाले मानकर जीवन को वैसा ही समझ उसे अपने जीवन का ध्येय ठहराना, सर्वथा अनिश्चित है। एकाँकी सत्य को सम्पूर्ण सत्य समझना सदा गलत ही माना जायेगा। इससे हमारे भीतर भ्रामक कल्पना की वृद्धि ही होगी और समाज आज तक जिस तरह अवनत होता आया है उसी तरह आगे भी अवनत होगा रहेगा।
-विचार दर्शन
‘न जाने कल क्या होगा?’
भविष्य में क्या होगा, हमारे ग्रह शुभ हैं या अशुभ, हमारे भाग्य में क्या है, हमारे ऊपर कोई आपत्ति तो नहीं आ रही है, हमारे शकुन, फल अच्छे हैं या बुरे, न जाने कल क्या होगा- ये एक प्रश्न है जो कितने ही व्यक्तियों की मानसिक शान्ति भंग किया करते हैं। भविष्यत् जानने के लिये कितने ही थोथी विचारधारा के व्यक्ति फकीरों, साधुओं और ज्योतिषियों के पास भटकते फिरते हैं। किसी ने उनके मन की बात कह दी तो वे फूल उठें। किसी ने कुछ भयानक बात बतला दी, बस मुरझा कर निरुत्साहित हो गये, अपने भाग्य को दोष देने लगे। सिर्फ अनिष्ट की कल्पना मात्र से वे झींकने लगते हैं, परेशान हो जाते है और यह मान बैठते हैं कि हम तुच्छ हैं, क्षुद्र हैं, हीन हैं। हमारे भाग्य में तंगी, कमजोरी, अयोग्यता, अकर्मण्यता ही है। हमें तो सदैव रूखी-सूखी रोटी बदी है।
मनुष्य अपने भविष्य की अच्छी बात सुनकर इतना प्रसन्न नहीं होता जितना कुत्सित बात सुनकर डर जाता है। हम लोगों की प्रकृति ही कुछ ऐसी होती है कि अशुभ, निकृष्ट, आधि-व्याधि के विचारों पर शीघ्र विश्वास कर लेते हैं। हमारे ऊपर इन अन्धकारमयी भावनाओं का प्रभाव बड़ी शीघ्रता से होता है और कभी-कभी तो यह विचार इतने स्थायी हो जाते हैं कि हम उन्हें जन्म भर तक नहीं भूल पाते। एक व्यक्ति के दिल में किसी भविष्यफल के कारण यह विचार जम गया कि मेरी मृत्यु पागल कुत्ते के काटने से होगी। बस वह मामूली कुत्ते को देखकर भी भागता, छिप जाता और जब तक कुत्ता चला न जाता जब तक बाहर न निकलता। एक बार एक साधारण कुत्ते ने उसे जरा सा पंजा लगा दिया जिससे कुछ खरोंच सी आ गई। वह बीमार पड़ा और लगभग एक मास चारपाई पर पड़े रह कर मृत्यु को प्राप्त हुआ। इसी प्रकार अनेक व्यक्तियों की यह धारणा बन जाती है कि हमारा आगामी समय बड़ा कठिन, संघर्ष पूर्ण और संकटों से भरा आ रहा है बस, वे बेसिर पैर की, निराशाजनक कल्पनाओं के द्वारा अपने जीवन को कठिन बना लेते है, घबरा कर व्यर्थ चिन्ताओं में ग्रस्त रहते है और पनपने नहीं पाते।
-आनन्दमय जीवन
भाग्यवाद को छोड़कर पुरुषार्थवादी बनिये
संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं एक भाग्यवादी और दूसरे पुरुषार्थवादी। पहले प्रकार के लोग अपने जीवन की सफलता और विफलता को भाग्य, ईश्वर, देवी, देवता की कृपा आदि बातों पर निर्भर कर देते हैं, दूसरे प्रकार के लोग अपने भविष्य का निर्माण करना अपने पुरुषार्थ की बात मानते हैं। जिस व्यक्ति का स्वभाव ढीला-ढाला है, जिसके मन में अनेक प्रकार के अन्तर्द्वन्द्व चलते रहते है, जो अपने आप पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ रहा हैं, वह भाग्यवादी हो जाता है। ऐसा किसी मनुष्य की सफलता और विफलता का कारण उसकी मनोवृत्तियों और कर्तव्य में न देखकर किसी बाहरी अज्ञात सत्ता में आरोपित करता है।
इस प्रकार वह अपनी असफलता के लिये अपने आपको दोषी न ठहरा कर किसी ऐसी शक्ति को दोषी ठहराता है जिस पर उसका कोई अधिकार नहीं। इस प्रकार वह अपनी कमजोरी के प्रति अपनी आँखें मूंद लेने की चेष्टा करता है और अपने आपको सुधारने से विमुख हो जाता है।
जब मनुष्य में काम करने की उत्कट भावना होती है तो वह उसके लिये उचित कल्पनाओं, योजनाओं और उन्हीं के अनुकूल विचारों का निर्माण करता है। इसके विपरीत जब उसमें निकम्मापन आता है, जब उसकी मानसिक शक्ति भीतरी झगड़ों में ही समाप्त हो जाती है तो उसकी कल्पनाएं निराशावादी योजनाएं अधूरी और विचार असफलता के लिये जब अपने भाग्य को दोष नहीं देते तो किसी अन्य व्यक्ति को दोष देते हैं। भाग्यवादिता और निराशावादिता एक दूसरे के सहगामी हैं। जिस व्यक्ति को भविष्य का जितना ही अधिक डर रहता हैं वह उतना ही अधिक ज्योतिषियों, हस्तरेखा, देखने वालों आदि के चंगुल में फँसता है।
मनुष्य के चारों ओर सदा विचारों का वातावरण रहता हैं। जैसे प्रत्येक मनुष्य का भौतिक वातावरण होता उसी तरह उसका विचारों का वातावरण रहता हैं। दूसरे लोगों के विचार अनेक प्रकार हमें प्रभावित करते रहते है। निराशावादी लोगों के पास चारों ओर से निराशावादी विचार आ जाते हैं। ऐसे लोगों को दूसरे लोग भी निराशावादी और भाग्यवादी ही मिलते हैं और ये उनके विचारों की पुष्टि कर देते हैं। भाग्यवादी व्यक्ति स्वतः प्रयत्न करना ही नहीं चाहतें है, वे दूसरों के भरोसे रहना चाहते हैं। फिर ऐसे लोगों का जीवन दुख में व्यतीत हो तो इसमें क्या आश्चर्य है?
-मनोविज्ञान जीवन
सौभाग्य और दुर्भाग्य आपकी कल्पनायें हैं।
बहुत से मनुष्य अपनी असफलता का दोष दुर्भाग्य के सिर मढ़ते हैं। वे यह समझते हैं कि हम भाग्य के अधीन है और उद्योग अथवा पुरुषार्थ द्वारा अपनी स्थिति को नहीं सुधार सकते। परन्तु वास्तव में बात यह है कि उनकी संकल्प शक्ति ही उनका भाग्य है। मनुष्य के जीवन का सुधार उसके भाग्य पर नहीं किन्तु उसके उद्योग पर निर्भर है। जिस मनुष्य की शक्ति बढ़ी-चढ़ी है, जिसकी योग्यता उच्च श्रेणी की है, जिसके संकल्प में दृढ़ता है वह अनेक दुर्घटनाओं का भी सामना कर सकता है। मनुष्य के भीतर ही वह शक्ति मौजूद है जिसके द्वारा वह उन आपत्तियों को दूर कर सकता है जिनको वह दुर्भाग्य के कारण आई हुई समझता है। जो मनुष्य उन्नति के अवसरों को काम में लाना जानता है और जो अपनी न्यूनताओं की पूर्ति संकल्प शक्ति द्वारा कर सकता है वह अपने जीवन का अवश्य ही सुधार कर सकता है।
क्या तुम ने कभी किसी दृढ़-प्रतिज्ञ व्यक्ति को अपने जीवन का कार्यक्रम निश्चित करते समय किसी बात को भाग्य के भरोसे छोड़ते हुये देखा है? जो मनुष्य भाग्य के भरोसे रहते हैं वे सफलता के लिये कभी भरपूर उद्योग करने में समर्थ नहीं होते। सफलता की प्राप्ति के लिये जितना मूल्य देना पड़ता है उतना वे नहीं देना चाहते। वे सस्ते सौदे की ताक में रहते हैं और सफलता तक पहुँचने का कोई छोटा मार्ग खोजते रहते हैं हमने किसी मनुष्य को उस समय तक कोई महत्वपूर्ण कार्य करते नहीं देखा जब तक कि उसने ‘सौभाग्य’ ‘दुर्भाग्य’ जैसे निरर्थक शब्दों को अपने कोश में से न निकाल दिया अथवा ‘मैं असमर्थ हूँ’ ऐसे विचारों को अपने मस्तिष्क से बहिष्कार न कर दिया।
हमारी भाषा के किसी शब्द का इतना दुरुपयोग नहीं हुआ है जितना कि ‘भाग्य’ का, बहुत से मनुष्य जिनको अपने कामों में असफलता होती है अपने भाग्य को दोषी ठहराते हैं। दुर्भाग्य के सिर जितने दोष, झूठमूठ मढ़े जाते हैं उतने और किसी बात के सर नहीं मढ़े जाते।
-सफलता का मार्ग
आसमान से गिर कर अपनी ओर आते हुए सितारे को देख पृथ्वी आश्चर्य चकित बोली “ तुम इतने उच्च स्थान पर थे नीचे क्यों आ गिरे।”
सितारे ने जवाब दिया “ देवी? तुम मुझे अपने स्थान से काफी ऊँची दिखाई देती थी। लम्बे समय से तुम्हें पाने के लिए मैं तपस्या कर रहा था आज वह शुभ दिन आया है।”
“आकाश में तो बहुत चमकीले दिखाई देते थे किन्तु अब तुम ऐसे नहीं लगते? पृथ्वी ने पूछा “यही मैं भी तुमसे जानना चाहता था, दूर से तो तुम जगमगाती हुई नजर आती थी सोचा था तुम से मिल कर मैं अपना कालापन छुड़ा लूँगा।” सितारा बोला।
आश्चर्यचकित हो धरती ने कहा “ सचमुच मैं तुम्हें चमकती नजर आती थी” यह कहकर उसने अपने आपको देखा किन्तु उसे चारों ओर अंधकार ही नजर आया। वह उदास हो गई।
सितारे ने कहा जब दूर से मुझे तुम जगमगाती नजर आती थी और तुम्हें मैं। तो फिर हम ऐसा ही क्यों नहीं मानलें कि दोनों ही उजले और जगमगाते हुए उच्च हैं।”
बात समझ की थी। दोनों को ही भा गई। आलिंगन पाश में बंधे हुए दोनों ही अपने चारों ओर का अनुभव कर रहे थे। अंधेरे की कलूटी कुरूपती ने यह देखा तो वहाँ से चुपचाप चल दी।
ऋषि जरुत्कार के गुरुकुल में समित्पाणि होकर एक छात्र विद्रुध ने प्रवेश किया और साष्टाँग दंडवत् करते हुए विद्या प्राप्ति के लिए विनयपूर्वक प्रार्थना की।
महर्षि ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- सौम्य! अक्षर ज्ञान को विद्या नहीं कहते, सद्गुणों का विकास ही अध्ययन का वास्तविक फल है। इस गुरुकुल में शिक्षण कम और स्तर को विकसित करने वाले साधन क्रम को विशेष महत्वपूर्ण समझा जाता है। अनुशासन और श्रद्धा के अभाव में विद्या विपत्तिकारक ही होती है। इसलिए यदि तुम इन गुणों को विकसित करने वाले कठोर साधना क्रम को अपना सको तो ही मेरे गुरुकुल में प्रवेश करने की बात सोचो।
बालक ने दृढ़ता भरे शब्दों में कहा- भगवान! मैं पोथी-पंडित बनने नहीं, श्रेष्ठ व्यक्तित्व प्राप्त करने को आपके चरणों में उपस्थित हुआ हूँ। आपका आदेश पालूँगा और जो करने को कहेंगे वही करूंगा।
छात्र के वचनों से संतुष्ट हुए उपाध्याय ने बालक को गुरुकुल में प्रविष्ट कर लिया। उसे आश्रम की चार सौ गौएं सौंपी गईं और कहा गया कि वह तब तक उन्हें चराते रहने में ही लगा रहे जब तक गौओं की संख्या एक सहस्र न हो जाय। उसका प्रथम अध्ययन यही होगा।
आश्रम की गौएं लेकर विद्रुध तड़के ही उठ जाता, उन्हें दिन भर चराता और सन्ध्या समय वापिस लाता। वन्य प्रदेश में गौओं के पीछे-पीछे प्रयाण करना और प्रकृति का अध्ययन करना यही उसकी दिनचर्या रहती। धीरे-धीरे समय बीतता गया। गौओं की संख्या चार सौ से बढ़कर एक सहस्र हो गई।
जरुत्कार छात्र के पास पहुँचे और उससे पूछा -सौम्य! तुम्हारा मुख मंडल ब्रह्म तेज से प्रदीप्त हो रहा है, यह ज्ञानी के लिए ही संभव है। कहो, तुम्हें ज्ञान किसने दिया?
छात्र ने विनयपूर्वक कहा- भगवन्! आपके अतिरिक्त और कौन मुझे ज्ञान देगा? यदि कुछ मिला होगा तो उसमें आपकी ही कृपा प्रधान रही होगी।
गुरुदेव ने पुनः कहा- वत्स! तुम्हारी विनयशीलता सराहनीय है। पर ज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकने वाला यह ब्रह्म तेज तुम्हें कही से तो प्राप्त हुआ होगा? सो तुम्हें यह बताना ही चाहिये कि उपलब्ध ज्ञान कहाँ से, किस प्रकार प्राप्त हुआ?
नतमस्तक होकर विद्रुध ने कहा - तात! मैं वन प्रदेश में पशुओं, पक्षियों, कीट-पतंगों और वृक्ष वनस्पतियों के गुण कर्म स्वभाव को गंभीरतापूर्वक देखने और समझने का प्रयत्न करता रहा हूँ। जो देखा उसे समझा और यह निष्कर्ष निकाला कि संसार क्या है और इसमें किस प्रकार रहना और चलना- उचित है।
महर्षि पुलकित हो उठे, उनने शिष्य को छाती से लगा लिया और कहा- वत्स! ज्ञान का माध्यम यही है जो तुमने प्राप्त किया, पुस्तकों से नहीं, इस संसार के वास्तविक स्वरूप को समझने और उस जानकारी के आधार पर अपनी गतिविधियाँ विनिर्मित करने से ही जीवन को विकसित करने वाला ज्ञान प्राप्त होता है। जो मिलता था सो तुम्हें मिल चुका, अब अक्षर ज्ञान शेष है सो कुछ ही दिन में तुम उसमें भी निष्णात बनोगे।
गौओं की सेना का परिपूर्ण प्रतिफल प्राप्त कर विद्रुध अध्ययन कक्षाओं में बैठने लगा। कुछ ही दिनों में सत्-शिक्षण प्राप्त कर अपने देश लौट गया।
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है - “पवित्र नारी सृष्टि की सर्वोत्तम कृति है। सृष्टि में वात्सल्य, स्नेह, ममत्व, प्रेम की अमृत धारायें नारी हृदय से निकल कर संसार को अमृत दान कर रही हैं।” कवि रस्किन ने कहा है - “माता का हृदय एक स्नेह पूर्ण निर्झर है, जो सृष्टि के आदि से अनवरत झरता हुआ मानवता का सिंचन कर रहा है।” “मातृ देवो भव” कह कर उपनिषद् के ऋषि ने माता के लिए लोकोत्तर सम्मान प्रदान किया है। सचमुच साधारण प्राणियों से भरी इस धरती पर माता का हृदय एक दैवी विभूति ही है।
“माता धरित्री, जननी दयार्द्र हृदया शिवा।
देवी त्रिभुवन श्रेष्ठा निर्दोषा सर्व दुःखहा॥
आराधनीया परमादया शान्तिः क्षमा धृतिः।
स्वाहा स्वधा च गौरी च पद्मा च विजया जया॥
भगवान वेदव्यासजी ने नारी को उक्त इक्कीस नामों से सम्बोधित करते हुए गुणगान किया है और फिर आगे कहा है-
“नास्ति गंगा समंतीर्थ नास्ति विष्णु समः प्रभुः ।
नास्ति शम्भु समः पूज्यो नास्ति मातृ समो गुरु॥
“गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान कोई प्रभु नहीं, शिव के समान कोई पूजनीय नहीं तथा वात्सल्य स्रोतस्विनी मातृ हृदया नारी के बराबर कोई गुरु नहीं, जो इस लोक और परलोक में कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें।”
ब्रह्मा इस संसार की रचना करते हैं और विष्णु इसका धारण, पोषण संवर्धन करते हैं। इस सूक्ष्म आध्यात्मिक रहस्य को यदि स्थूल रूप में कहीं देखना हो तो उसकी झाँकी माता को देखकर की जा सकती है। ब्रह्मा और विष्णु की दैवी शक्तियाँ इस धरा पर नारी के मातृ रूप में अपना कार्य कर रही हैं। इसी की अनुभूति को आधार पर शास्त्रकार ने कहा है-
“या देवी सर्व भूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यैं नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः॥
संसार की रचना उसका पालन पोषण करने वाली देवी शक्ति इस स्थूल संसार में नारी के मातृ रूप में ही स्थित हो अपना कार्य कर रही है। इसलिए इस मातृ रूपा नारी को हम बार-बार नमन करते हैं।
इसी तथ्य के दृष्टा एक मनीषी ने कहा है- “ईश्वर के पश्चात् हम सर्वाधिक ऋणी नारी के हैं। प्रथम तो जीवन के लिए, पुनश्चः इसे जीने योग्य बनाने के लिए।” तात्पर्य यह है कि मनुष्य जीवन की सभी सम्भावनाओं के मूल में माँ का असीम प्यार उसका त्याग, उसकी महान सेवायें ही निहित हैं।
नारी जाति की इस महानता, उसके मानव-जाति के प्रति महान ऋण को देखते हुए बहुत पहले से ही मनुष्य ने इसको आदर पूजा का पात्र समझा और उसका समुचित आदर सत्कार किया। काली, सरस्वती, लक्ष्मी तथा अन्य देवी शक्तियों के रूप में नारी का पूजन उसके उच्च सम्मान के लिए ही किया गया।
नारी माँ के रूप में बच्चे की आदि गुरु है। जननी को विभिन्न विषयों में जो शिक्षा अनुभव प्राप्त होता है, वही बच्चे के जीवन में प्रभाव डालता है। जननी के उच्चारण, उसकी भाषा से ही वह भाषा-ज्ञान प्राप्त करता है, जो जीवन भर के भाषा ज्ञान का मूलाधार होता है। इस तरह बच्चे की शिक्षा-दीक्षा, उसे योग्य बनाने की नींव जननी ही लगाती है। उसी नींव पर बालक के सम्पूर्ण जीवन की योग्यता, शिक्षा-ज्ञान का महल खड़ा होता है। माँ का कर्तव्य केवल स्तन पान या स्नेह दान तक ही नहीं है, अपितु इसके साथ ही वह बच्चे को जीवन में विकसित होने उत्कर्ष की ओर बढ़ने के लिए एक तरह की सूक्ष्म शक्ति प्रेरणा भी देती है। माँ द्वारा कही गई उच्च आदर्श त्याग की कथायें, उपदेश, साधारण भाषा में दिया गया ज्ञान भी बालक के जीवन में ऐसा प्रभाव डालता है जो जीवन भर बड़ी बड़ी पुस्तकों को पढ़कर बड़ी बड़ी डिग्रियाँ प्राप्त करके भी नहीं मिलता। माँ द्वारा प्रदत्त प्रारम्भिक ज्ञान प्रेरणा को पाकर ही बालक आगे चलकर प्रकृतिज्ञान का अधिकारी होता है।
बच्चे के प्रति माता का स्नेह उसकी ममता, दयामय परमात्मा का प्रकाश है। शिशु के प्रति मातृ हृदय में उमड़ता हुआ स्नेह प्रकृति की ओर से जीवन रक्षा के लिए ईश्वरीय देन है। यह स्नेह, ममता, सहज ही जननी को बालक के पालन पोषण के लिए प्रयत्न पूर्वक लगाती है।
ऋषियों ने मातृ हृदया नारी का “मातृ ऋण मानव जाति पर सबसे बड़ा ऋण माना है। उन्होंने नारी को समाज में सम्माननीय पूजनीय स्थान देकर उसका आदर सत्कार करके मातृ ऋण चुकाया और इसी तरह के आदेश अपनी भावी सन्तानों को भी दिया। नारी के प्रतिष्ठा गौरव को चिरजीवित रखने के लिए सभी धर्म ग्रन्थों में स्थान है। महाराज मनु ने अपनी सन्तानों से कहा था-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।
यत्र तास्तु न पूज्यन्ते सर्वस्तत्राफलः क्रिया॥
जहाँ नारी की पूजा होगी वहाँ स्वर्ग बन जायेगा, देवता निवास करेंगे और जहाँ नारी की पूजा नहीं होगी वहाँ सारे फल, क्रियायें समाप्त हो जायेंगी और दुःखों का सामना करना पड़ेगा।
मातुश्च यद्वितं किंचित्कुरुते भक्तिनः पुमान।
तर्द्धम हि विजानीया देवं धर्म विदो विदुः॥
मातृशक्ति की भलाई के लिए पुरुष भक्ति पूर्वक जो कुछ भी कर्म करता है वही उसका धर्म है। गृहस्थ व्यक्ति की बड़ी तपस्या इसी में है कि वह नारी जाति की सेवा उसमें दैवी शक्ति के दर्शन करके करें।
भारतीय संस्कृति में नारी के प्रति यह केवल शाब्दिक प्रदर्शन मात्र नहीं है। वरन् पद-पद पर इसमें व्यावहारिकता की छाप है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी जाति के महान उपकारों को स्वीकार कर भारतीय जन -समाज ने मातृ जाति की यथोचित पूजा उसका सत्कार किया और समाज में उच्च स्थान दिया जिसके फलस्वरूप नारी के हृदय से सहज स्नेह, वात्सल्य, ममत्व की त्रिवेणी भारत भूति में बह निकली, जिसको पा कर भारतीय जीवन अजर अमर हो गया। भारतवासियों ने लौकिक और पारलौकिक जीवन में भारी प्रगति की, इतिहास इसका साक्षी है।
पत्नी, पुत्री और भगिनी के रूप में मातृत्त्व हमारे चारों ओर बिखरा पड़ा है। यह श्रद्धा एवं पूजा के योग्य है। देवत्व की इस प्रत्यक्ष प्रतिमा की गौरव- पूर्ण प्रतिष्ठा निरन्तर अभिनंदनीय है। इस रहस्य को मनुष्य जब तक समझता रहा अपने देवत्व को स्थिर रख सका। अब जबकि उसने नारी को वासना कामुकता की तृप्ति का साधन बनाना आरम्भ किया, क्रीत दासी के समान अपने पाशविक बन्धनों में जकड़ कर निरीह बनाने, मनमाने अत्याचार करने और अपनी सम्पत्ति-मात्र मानने का दृष्टिकोण बदला है तो फिर पुरुष-पुरुष नहीं रहा। उसका तप तेज चला गया और वह एक क्षुद्र प्राणों के समान अपने गौरव से पतित होकर निम्न श्रेणी का जीवन यापन कर रहा है।
इस पृथ्वी पर दैवी तत्व का एक मात्र प्रतीक मातृत्व है। उसके प्रति उच्चकोटी की श्रद्धा रखे बिना देवत्व की पूजा एवं साधना नहीं हो सकती। और इसके अभाव में पुरुष को देवत्व से वंचित रहना पड़ेगा। नारी कामधेनु है। जब उसे हम मातृ बुद्धि से देखते हैं तो वह हमें देवत्व प्रदान करती है, पर जब उसे वासना, सम्पत्ति, दासी की दृष्टि से देखा जाता है तो वह हमारे लिए अभिशाप बन जाती है।
न जाने हमारी दुर्बुद्धि कब टलेगी न जाने कब हम नारी की दिव्य-शक्ति को पहचान कर उसके चरणों में श्रद्धा के आँसू चढ़ाना सीखेंगे? न जाने इस अभाव के कारण हमें कब तक देवत्व से वंचित रह कर नारकीय स्थिति में पड़ा रहना पड़ेगा।
बुढ़ापा जीवन का परिपक्व फल है जिसमें पूर्णता, मिठास, उपयोगिता और अपनी एक विशिष्ट महत्ता होती है। वृद्धावस्था में ही मनुष्य स्वयं और संसार के अनुभव ज्ञान में समृद्ध होकर शत-शत प्रकाश किरणों से युक्त ज्योतिर्मय बन जाता है, जिससे अनेकों को मार्ग दर्शन की प्रकाश किरण, प्रेरणायें प्राप्त होती हैं। बर्नार्डशा ने कहा “बुढ़ापा एक सिद्धि है, पूर्णता की मंजिल है। वह एक सामाजिक धरोहर है। कल्पना कीजिए सभी वृद्ध लोगों को किसी ग्रह में भेज दिया जाए तो फुटबाल के खिलाड़ियों के सिवा दुनिया में बचेगा ही क्या ?” ब्रिटेन के भूतपूर्व प्रधान मंत्री चर्चिल ने एक बार कहा था “बुढ़ापा पके हुए फल की तरह है। उसका अपना एक महत्व है।” “जिन्दगी चालीस वर्ष से शुरू होती है” इस कहावत के अनुसार वृद्धावस्था जीवन का नवनीत है- सार भाग है। वस्तुतः संसार के अधिकाँश महान कार्य महापुरुषों के जीवन में चालीस वर्ष की उम्र के बाद ही प्रकाश में आया। बुढ़ापा मानव जीवन के विकास का अंतिम चरण है, जहाँ पहुँच कर प्रत्येक व्यक्ति गौरव, प्रतिष्ठा, समृद्धि, ज्ञान, सुलझे हुए प्रौढ़ विचारों से युक्त हो जीवन का वास्तविक लाभ ले सकता है।
किंतु अधिकांश लोग बुढ़ापे को मौत का पैगाम, जीवन की अनुपयोगिता का अवसर, अक्षमता अशक्ति का सूचक मानकर जिन्दगी के दिन गिन-गिन कर काटने लगते हैं। उन्हें अपनी शक्तियाँ धीरे-धीरे क्षीण होती जान पड़ती हैं। कोई महत्वपूर्ण कार्य करने का उत्साह मन में नहीं रहता। वरन् बुढ़ापे की पराधीनता, अंग शैथिल्य, बीमारी, रोग, क्लान्ति, असमर्थता आदि की कल्पनायें कुछ कम भयावह नहीं होती। इस रूप में बुढ़ापे की कल्पना करने वाले व्यक्ति के लिए सचमुच वृद्धावस्था एक अभिशाप और नारकीय यन्त्रणा ही सिद्ध होती हैं।
वृद्धावस्था अपने आप में इतनी नीरस और कटु नहीं है जितना लोग समझते हैं। बुढ़ापे में संसार के महापुरुषों ने महान् कार्यों का सूत्रपात किया है जीवन की महत्वपूर्ण सफलतायें अर्जित की हैं, अपने आप में नई प्रफुल्लता, सुख, संतोष, प्रसन्नता अनुभव की है। दूसरी ओर वृद्धावस्था को जीवन का अभिशाप, अशक्ति, पराधीनता का अवसर मान लेना मनुष्य के गलत दृष्टिकोण का ही परिणाम है।
मनुष्य की मनोभूमि का उसके जीवनक्रम पर भारी प्रभाव पड़ता है। चालीस वर्ष की उम्र के बाद जब लोग सोचने लगते हैं कि उनका बुढ़ापा शुरू हो गया है तो सचमुच ही वे वृद्ध होने लगते हैं। दूसरों को देखकर, पुरानी धारणाओं, मान्यताओं के आधार पर, निराशावादी जीवन-दर्शन की प्रेरणा से जब मनुष्य में यह विश्वास जम जाता है कि चालीस वर्ष के बाद मेरी शक्तियाँ घटने लग जायेंगी और बुढ़ापे का आरम्भ होकर साठ-सत्तर की उम्र तक जीवन का अंत हो जाएगा तो इसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बुढ़ापा मनुष्य के लिए मौत का पैगाम ही बन जाता है।
ऐसी अनेकों घटनायें घटित होती रहती हैं इतना ही नहीं असंख्यों लोग अपना इसी तरह की धारणाओं के कारण वृद्धावस्था में सड़ी-गली जिंदगी बिताते हैं। उनके विश्वास और निष्कर्षों के अनुसार शक्तियाँ नष्ट होने लगती हैं। दाँत गिरना, बालों की सफेदी, आंखों का जवाब दे जाना, इन्द्रियाँ निर्बल अशक्त होना, क्लान्ति के भार से दब जाना- ये सब उपद्रव मनुष्य की बुढ़ापे सम्बन्धी धारणा और विश्वास का ही परिणाम है। मनुष्य जितनी गिरती हुई बातें सोचेगा उतनी ही तीव्रता से वह गिरता चला जाएगा। जितना ही अपने को सामर्थ्य सम्पन्न समझेगा उतना ही वह सशक्त बना रहेगा, चाहे उसकी उमर कितनी ही क्यों न हो, महापुरुषों की अदम्य शक्ति का आधार उनकी प्रौढ़, प्रबल, पुरोगामी मानसिक शक्ति का होना ही है।
बुढ़ापे को दुखद और क्लेशमय बनाने का एक कारण है संसार और यहाँ के पदार्थों में आसक्ति का होना। 40-50 की उम्र तक पहुँचने पर मनुष्य के कई नाते रिश्ते जुड़ जाते हैं उसका सम्बन्ध व्यापक हो जाता है, कई नाती-पोते बेटों के बड़े परिवार का वह मुखिया बन जाता है। व्यापक क्षेत्र में संयोग-वियोग, सुख-दुःख, हानि-लाभ, अनुकूलता, प्रतिकूलताओं मोह की प्रेरणा से मनुष्य इनसे प्रभावित होने लगता है। सुखद परिस्थितियाँ कम ही आती हैं और आती हैं तो उन्हें बीतने में समय नहीं लगता। फलतः मोहग्रस्त आसक्त मनुष्य के मानस पर दुःखद स्मृतियाँ ही शेष रहती हैं। इनके कारण वह दुःखी होता है, रोता है, खिन्न होता है और जीवन के पुण्य अवसर बुढ़ापे को क्लेश एवं अशान्ति का आगार बना लेता है।
बहुत से लोग बुढ़ापे को अतीत की स्मृतियों और भविष्य की चिन्ता का अखाड़ा बना लेते हैं। वृद्धावस्था में अधिकाँश लोग भारी कार्यभार से मुक्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में बैठे-बैठे अतीत की स्मृतियों पर खेद पश्चाताप करने में और भविष्य की चिन्ता में उलझ जाते हैं और इसी उधेड़बुन में बुढ़ापे को कटु क्लेशपूर्ण, भार स्वरूप बना लेते हैं।
बहुत से लोग अपने बच्चों के बड़े हो जाने पर भी उनकी चिंता में उसी तरह परेशान रहते हैं जैसे उनके बचपन में रहा करते थे। फलस्वरूप ,वे बच्चों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करने लगते हैं जब कि स्वातन्त्र्यप्रिय युवक स्वच्छन्दता-पूर्वक जीवन जीना चाहतें हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें वृद्धजनों का हस्तक्षेप और अत्यधिक चिन्ता, भार लगने लगती है वे स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करने में वृद्धजनों को बाधा समझने लगते हैं जो परस्पर संघर्ष एवं गलत व्यवहार का कारण बनता है और इससे वृद्धजनों को ही उल्टा परिणाम मिलता है जिससे उन्हें दुखी होना पड़ता है। इसके अर्थ यह भी नहीं कि बच्चों के जीवन में दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिए किन्तु यह आवश्यकतानुसार और उतनी ही हो जो बच्चों के लिए सुपाच्य एवं पोषक रहे। देखा जाता है कि प्रौढ़ और सक्षम हो जाने पर पशु पक्षी भी अपने बच्चों के प्रति निश्चिन्त हो जाते है किन्तु मनुष्य ऐसा न करने के कारण उनके प्रति अधिक आसक्ति रहने से दुखी सन्तप्त एवं परेशान होता है।
बहुत से लोग वृद्धावस्था में मृत्यु के भय से त्रस्त रहते हैं। किन्तु यह अविवेक और अज्ञान का फल है। पका हुआ फल समय पर यदि डाली से अलग होने के बजाय डाल पर ही सड़ा गला जीवन बिताये जो क्या अच्छा रहेगा? मनुष्य भी आसक्ति और मोहवश असमर्थ सड़े गले, जीर्ण-शीर्ण, शरीर में चिपका रहे तो यह बुद्धिमानी नहीं होगी। जिसने बुढ़ापे में पहुँच करके जीवन के सुख दुःखों का मर्म जान लिया हो, जीवन में अनेकों सफलताएं अर्जित करली हों उसके लिए मौत से भयभीत होना अज्ञान ही माना जायेगा। नई जिन्दगी धारण करने के लिए, भावी जीवन यात्रा प्रारम्भ करने में जुट जाना ही वृद्धावस्था का सदुपयोग करना है।
वृद्धावस्था का सबसे सुन्दर सदुपयोग इसी में है कि जन कल्याणकारी परमार्थिक प्रवृत्तियों में अपनी समस्त शक्तियों को लगा दिया जाय। अपनी परमार्थिक रुचियों और प्रवृत्तियों का क्षेत्र व्यापक और विभिन्नताओं से युक्त बना लेना और उनमें निमग्न हो जाना चाहिए। इससे न तो मनुष्य को अपनी आयु के आँकड़े गिनने का अवसर रहता है न अतीत की स्मृतियों में डूबने का, न भविष्य की चिन्ताओं में खीजने का। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए भारतीय जीवन व्यवस्था में अन्तिम समय को वानप्रस्थ, संन्यासी के रूप में बिताने का विधान है।
वृद्धावस्था में मनुष्य के जीवन का प्रवाह एक नदी की तरह होना चाहिए जो हिमशिखरों से पतली धारा के रूप में तीव्र वेग से निकलती है, अनेकों धाराओं को अपनी अंक में समेटती है। सामने आये रोड़ों को टक्कर मारकर हटाती है तो कभी नया रास्ता ग्रहण करती है। फिर मैदान में बहती है, धरती की प्यास बुझाती है। अन्त में शत-शत धाराओं में विभक्त हो गंभीरता के साथ विराट समुद्र में प्रवेश करती है। मनुष्य वृद्धावस्था में पहुँचने तक पूर्ण रूपेण “स्वः” से मुक्त हो परमार्थ को जीवन का अंग बना लें और निस्पृह भाव से सर्वजन हिताय कार्य करें तो वृद्धावस्था सचमुच ही जीवन का स्वर्ण अवसर सिद्ध हो सकती है।
बुढ़ापा और यौवन की स्थिति का सम्बन्ध मनुष्य के मन से है, शरीर से नहीं। बुढ़ापे में भी कई लोग जवानों से अधिक सक्षम होते हैं तो कई लोग जवानी में वृद्ध जनों से गये-बीते निकलते हैं। मनुष्य का सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर और फिर आत्मा न कभी वृद्ध होते न मरते हैं। “न जायते म्रियते वा कदाचन्” मनुष्य का मूल अस्तित्व अजर अमर अविनाशी है। यह आध्यात्मिक दर्शन हमारे जीवन का केन्द्र बन जाये तो बुढ़ापा नाम ही न रहे। योगी इच्छा-आयु प्राप्त करते हैं। लम्बी उम्र पाकर भी वे सदैव जवान दिखाई देते हैं, वह इसी रहस्य का परिणाम होता है। वे शरीर के घटने-बढ़ने शिथिल होने को महत्व न देकर अजर अमर आत्मा में ही रमण करते हैं।
किन्हीं अंशों में बुढ़ापे में मनुष्य की शारीरिक शक्तियों का विकास रुक जाता है किन्तु मनुष्य की मानसिक शक्तियाँ इतनी प्रौढ़ और पुष्ट हो जाती हैं कि वह शारीरिक शक्तियों के कम हो जाने पर अपने ज्ञान अनुभव मानसिक सन्तुलन, आत्मिक स्थिरता के आधार पर अधिक सुखी, शान्त, सन्तोष का जीवन बिता सकता है।
बुढ़ापा संसार और जीवन के अनुभव, ज्ञान, संघर्षों का सार भाग-नवनीत है। बुढ़ापा जीवन दीप का परिपुष्ट, प्रौढ़, धूम्र, रहित, पुण्य प्रकाश है जो शत-शत किरणों में छिटक कर अनेकों को ज्योति दे सकता है। बुढ़ापा जीवन विद्या का परिपक्व फल है जिसके रस की एक-एक बूँद असंख्य लोगों को नव जीवन प्रदान कर सकती है। बुढ़ापा श्रद्धा, सम्मान का धवल पुँज है जिसकी छाया में बैठकर नई पीढ़ी नई राह पा सकती है।
एक चोर किन्हीं संत के पास जाया करता था और रोज ही उनसे ईश्वर दर्शन का उपाय पूछा करता था। महात्मा जी कभी अवसर आने पर बताने की बात कह कर उसे टाल दिया करते थे।
एक दिन चोर ने बहुत आग्रह किया तो महात्मा जी ने पहाड़ की ऊँची चोटी की ओर इशारा करते हुए कहा तुम वहाँ तक मेरे साथ छह पत्थर सिर पर रखकर चल सको तो वहाँ पहुँचकर मैं तुम्हें उपाय बता सकता हूँ!
चोर तैयार हो गया। संत जी ने छह पत्थर उसके शिर पर रख दिये और पीछे-पीछे चले आने का इशारा करके वे आगे चलने लगे।
कुछ ही दूर चला कि चोर हाँफने लगा, उसने महात्मा जी से कहा -भगवन्! बोझा बहुत है। इतने भार को लेकर मैं आगे नहीं चल सकता। संत ने एक पत्थर उतार दिया। चोर चलने लगा। पर कुछ दूर जाकर वह फिर लड़खड़ाने लगा। एक पत्थर और उतारना पड़ा। यही क्रम आगे भी चला। कुछ दूर चलने पर चोर थक जाता और संत जी को एक पत्थर उतारना पड़ता । अन्त में सभी पत्थर उतार देने पड़े तब कही वह चोटी तक साथ चल सकने में सफल हो सका।
चोटी पर पहुंच कर संत ने कहा भाई ! जिस प्रकार तुम छह पत्थर सिर पर रखकर चोटी तक पहुँच सकने में समर्थ न हुए उसी प्रकार जीव काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के छह मनो विकारों का भार ढोता हुआ ईश्वर दर्शन में सफल नहीं हो सकता। यदि ईश्वर तक पहुँचना हो तो यह मनोविकारों के पत्थर उतार कर फेंकने ही पड़ेंगे, इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं।
मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति मन है। मन के आधार पर ही उसका उत्थान और पतन निर्भर रहता है। उस महान शक्ति का महत्व हम समझें तो जीवन में स्वर्गीय सुख -शान्ति अवतरित हो सकती है। इस सम्बन्ध में शास्त्रकारों और ऋषियों ने बहुत ही मार्मिक निर्देश दिये हैं।
चित्तायत्त मिदं सव्र जगत्स्थिरचराचरात्मकम्।
चित्ताधीनवतो राम बन्धमोक्षावपिस्फुटम्॥
- योगवशिष्ठ 3 । 98। 3
यह सारा जड़ चेतन जगत चित्त के ही अधीन है। हे राम, बन्धन और मोक्ष भी चित्त के ही वश में हैं।
मन एव मनुष्याणाँ कारणं बन्ध मोक्षयोः।
चित्ते चलति संसारो निश्चले योग उच्यते॥
मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है। चित्त के चलने में ही यह सारा प्रपंच, संसार है और चित्त के स्थिर होने से मोक्ष है।
मनः सर्वमिदं राम तस्मिन्नन्तश्चिकित्सिते।
चिकित्सतो वै सकलो जगज्जालामयो भवेत्॥
-योग वशिष्ठ 4। 4। 6
हे राम, मन ही सब कुछ है। मन की चिकित्सा कर लेने पर संसार के सब रोगों की चिकित्सा हो जाती है।
पूर्ण मनसि सम्पूर्ण जगर्त्सव सुधा द्रवैः।
उपानद् गूढ़े पादस्य नानुचर्यास्तृतैव भूः॥
-योग वशिष्ठ 5। 121। 14
मन यदि पूर्ण हो गया तो सारा संसार अमृत से परिपूर्ण दीखेगा। पैर में जूता पहन लेने से सारी पृथ्वी चमड़े से ढकी हुई प्रतीत होती है।
सर्वेषामुत्तम स्थानाँ सर्वासाँचिर संपदाम्।
स्वमनो निग्रहो भूमिर्भूमिः सस्यश्रियामिव॥
-योग वशिष्ठ 5। 53। 35
सब उत्तम परिस्थितियाँ, सब श्रेष्ठ चिर संपदाएं मन के निग्रह से उसी प्रकार प्राप्त होती हैं जैसे अच्छी भूमि से अब अन्न प्राप्त होते हैं।
मनः प्रमादार्द्वधन्ते दुःखानि गिरि कूटवत्।
तद्वशादेव नश्यन्ति सूर्यस्याग्रे हिमं यथा॥
- योग वशिष्ठ 3। 99। 43
मन के प्रमाद से ही दुख पर्वत की चोटी के समान बढ़ते हैं और मन की विवेकशीलता से वे ऐसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य की धूप से बर्फ नष्ट होती है।
आनन्दी वर्धते देहे शुद्धे चेतसि राघव।
- योग वशिष्ठ 6। 81। 21
हे राम, चित्त शुद्ध होने से देह का आरोग्य, आनन्द भी बढ़ता है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत।
आत्मैवह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मनोजितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
-गीता
स्वयं ही अपना उद्धार करना चाहिए। अपने आपको गिरावे नहीं। मनुष्य स्वयं अपना शत्रु है। जिसने अपने आपको सँभाल लिया वह स्वयं ही अपना मित्र है और जिसने अपने आपको पतित किया वह स्वयं ही अपना शत्रु है।
यतोनिर्विषयस्यास्य मनसो मुक्ति रिष्यते।
अतो निर्विषयं नित्यं मनः कार्य मुमुक्षुणा॥
मन का निर्विषय होना मुक्ति है। इसलिए बंधन से मुक्ति की इच्छा करने वालों को अपना मन निर्विषय करना चाहिए।
तावदेव निरोद्धव्यं यावद्धदि गतं क्षयम्।
सतज् ज्ञानं च ध्यानं च शेषोऽन्यो ग्रन्थ विस्तरः॥
- विष्णु पुराण 6। 7। 28
मन का तब तक निरोध करे जब तक कि हृदय की वासनाएँ नष्ट न हो जायं। यही ज्ञान है, यही ध्यान है और तो सब शास्त्र विस्तार है।
बन्धाय विषययाक्ति मुक्तयै निर्विषयं मनः॥
विषयों में ग्रस्त मन बन्धन का आधार है और निर्विषय मन मुक्ति का हेतु है।
मनुष्य एक सामाजिक जीव है और इसलिये वह अन्य प्राणियों की तरह अपना जीवन कदापि अकेला अथवा बिना किसी प्रकार के सहयोग के गुजार नहीं सकता। यों नासमझ लोग प्रायः कह दिया करते हैं, “हमें क्या काम दुनिया से”, पर वास्तव में उनका काम दुनिया के बिना एक क्षण भी नहीं चल सकता। अगर किसी व्यक्ति को सर्वथा साधन-विहीन करके किसी बियाबान जंगल में छोड़ दिया जाय तो वह या तो दस-पाँच दिन में मर-खप जायगा या जानवरों की तरह जीवन बिताने को बाध्य होगा। यही कारण है कि मनुष्य ने जब से प्रगति-पथ पर कदम रखा है वह परिवार, कुटुम्ब, वंश, जाति, धर्म, देश आदि के नाम पर अपने दायरे को बढ़ाता जाता है। इसी उद्देश्य से वह विवाह करता है, बाल-बच्चे उत्पन्न करके, उनके पालन-पोषण का भार उठाता है, भाई, बहिन, चाचा, मामा, मामी आदि सम्बन्धियों की सहायता करता है, जाति के नियमों का पालन करके जाति बन्धुओं से हेल-मेल बढ़ाता है और प्रत्येक ऐसे काम को पूरा करने की चेष्टा करता है जिससे अन्य लोगों से उसका सम्बन्ध दृढ़ हो और जीवन निर्वाह में उसे उन सबका सहयोग मिलता रहे। हमारी यही मनोवृत्ति परिवार, जाति और समाज की स्थापना का मूल है।
भारतवर्ष में सम्मिलित-परिवार की प्रथा प्रचलित है। जिसमें केवल पति-पत्नी और उनके दो-चार बच्चों की गणना ही नहीं की जाती, वरन् माँ-बाप, छोटे-बड़े भाई, बहिन, चाचा, ताऊ, उनके स्त्री-पुत्र आदि सबका समावेश हो जाता है। अब भी गाँवों और छोटे कस्बों में ऐसे बहुसंख्यक परिवार मौजूद हैं, जिनके सदस्यों की संख्या चालीस और पचास तक पहुँच जाती है पर आधुनिक विचारों के लोग इस प्रथा का विरोध करते हैं और योरोप अमरीका के निवासी पृथक परिवार की प्रथा को ही लाभकारी बतलाते हैं। वास्तव में बात यह है कि सम्मिलित कुटुम्ब-प्रथा कृषि-जीवी समाज के लिए विशेष रूप से उपयोगी होती है और पृथक परिवार की प्रथा, उद्योग-धन्धों पर मुख्यतः आधार रखने वाले समाज में सुविधाजनक जान पड़ती है। पर यह विभाजन केवल आर्थिक दृष्टि से किया गया है। यदि नैतिकता, उदारता, सहयोग, परोपकार आदि अन्य मानवीय गुणों की दृष्टि से विचार किया जाय तो निःसंदेह सम्मिलित परिवार प्रथा ही श्रेष्ठ ठहरती है। उसमें मनुष्य की स्वार्थ-वृत्ति पर अंकुश लग कर वह समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ सद्व्यवहार और उदारता के व्यवहार को सीखता है। इस दृष्टि से परिवार ही समाज-संगठन की पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति अपना अनेक प्रकार से उपकार करने वाले माता-पिता, भाई-बहिन, सगे सम्बन्धियों की सहायता करने के आनाकानी करता है उससे समस्त जाति या समाज की सेवा, सहायता और उपकार की आशा किस प्रकार की जा सकती है ? इसका आशय यह भी नहीं समझ लेना चाहिये कि हम प्राचीन-प्रथा को जैसे को तैसा उपयोगी मानते हैं। समय बदल रहा है और परिस्थितियों के अनुसार हमारी सभी सामाजिक संस्थाओं और प्रथाओं में न्यूनाधिक परिवर्तन हो ही गया है। तब परिवार प्रथा ही उससे अछूती कैसे रह सकती है। अब पुराने जमाने की तरह सौ-सौ और पचास-पचास व्यक्तियों के परिवार न तो संभव हैं और न उपयोगी। वे तो शुद्ध कृषिजीवी समाज की चीज थे। पर अब हमारे यहाँ भी उद्योग-धन्धों और नौकरी का महत्व काफी बढ़ गया है और बहुत अधिक कृषि-भूमि न रख सकने का नियम भी बना दिया गया है, इसलिए परिवार-प्रथा में समयानुकूल सुधार तो करने ही पड़ेंगे।
जिस प्रकार समाज का उद्गम परिवार है, उसी तरह परिवार का उद्गम विवाह है। विवाह से दो स्त्री-पुरुष में ही संबंध स्थापित नहीं होता वरन् दो परिवार भी उससे जुड़ते हैं और फिर अन्य अनेक परिवार भी उस घेरे में आ जाते हैं। इस प्रकार सैकड़ों व्यक्तियों में पारस्परिक प्रेम, सहयोग और सहायता के भावों की वृद्धि होती है, जो अन्ततः समाज की सुदृढ़ता और कल्याण की दृष्टि से भी हितकारी सिद्ध होते हैं। इसलिए समाज और देश की भलाई के ख्याल से यह अत्यंत आवश्यक है कि हम विवाह-प्रथा में आवश्यक सुधार करके उसे ऐसा रूप दें जिससे वह दम्पत्ति के अतिरिक्त घर के सब सदस्यों और भावी पीढ़ी के लिए सब प्रकार से उपयुक्त सिद्ध हो सके। हमारे देश में विवाह को एक बहुत महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार माना गया है, जो कि अत्यन्त पवित्र और अविच्छेद होता है। पर अब समय के प्रभाव से उसमें अनेक विकृतियाँ आ गई है। बाल विवाह, वृद्ध-विवाह, अनमोल विवाह आदि की बुराइयाँ हम प्रायः सुनते रहते हैं। इनके फल-स्वरूप दम्पत्ति में जैसा चाहिये वैसा प्रेम और आत्मीयता का भाव उत्पन्न नहीं होता और उसका प्रभाव समस्त परिवार पर पड़ता है। इन सब से भी बढ़ कर दहेज कि कुप्रथा है जो दाम्पत्य-प्रेम की जड़ पर आरम्भ से ही कुठाराघात कर देती है और वर-वधू तथा दोनों के परिवारों के बीच ऐसा मनोमालिन्य का भाव उत्पन्न कर देती है कि विवाह से जो वास्तविक लाभ होना चाहिए वह अधिकाँश में नष्ट हो जाता है। चाहे ऐसे विवाह के द्वारा स्त्री को रोटी कपड़े का सहारा मिल जाय, पर उसे सच्चा जीवनसाथी धन के लोभ से अधिक से अधिक रकम पाने के लिये किसी मालदार आसामी को तलाश करते रहते हैं, तब कन्या और वर के गुणों का मिलान, उनका एक दूसरे के अनुकूल होने का ध्यान कैसे रखा जा सकता है ? एक लेखक के कथनानुसार इस प्रकार जो विवाह पुरुष की दृष्टि से काम-वासना की प्राप्ति के लिये और स्त्री की तरफ से आर्थिक सुरक्षा के लिये किया जाता है, उसका उद्देश्य ही गलत हो जाता है। विवाह कर लेने से कोई जीवन-साथी नहीं बन जाता। जो पति-पत्नी जीवन-साथी नहीं बनते और केवल अपनी सुविधा के लिए एक दूसरे के शरीर व मन का भोग करते हैं, उनका घर, घर नहीं नरक बन जाता है। घर को स्वर्ग बनाना हो तो पति-पत्नी को परस्पर अनुरूपता प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए।
पर इस प्रकार का दाम्पत्य-जीवन आजकल कठिन हो गया है। अधिकाँश विवाह या तो धन के लालच से होते हैं या फिर ऊपरी रंग रूप पर लट्टू होकर। अनेक नये नवयुवक तो सिनेमा में नायक-नायिका के प्रेम के खेल और उनकी चमक-दमक को देख कर उसे ही वैवाहिक जीवन का आदर्श समझ बैठते हैं। ऐसे मूर्ख युवक और युवतियों के संयोगान्तक और वियोगान्तक किस्से समाचार पत्रों में प्रायः पढ़ने में आया करते हैं। पर ऐसे स्वप्नों का अन्त शीघ्र हो ही जाता है और सिवाय बदनामी और हँसी के ऐसे मनचले लोगों के हाथ कुछ नहीं पड़ता। ऐसे लोगों से यह आशा करना कि वे परिवार और समाज के प्रति अपने वास्तविक उत्तरदायित्व को समझ कर उसका पालन करेंगे, निरर्थक बात है। इस तथ्य को दृष्टिगोचर रख कर एक अनुभवी लेखक ने कहा है-
“पारिवारिक जीवन को सफल बनाने के लिए त्याग, सहन शक्ति, मानसिक प्रौढ़त्व और समझदारी की जरूरत है। पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक हैं। इस नैसर्गिक सम्बन्ध को बनाये रखने के लिये समाज ने विवाह-प्रणाली को स्वीकार किया है। पर इस सम्बन्ध को केवल लोकापवाद के डर से निभाना असम्भव है। दाम्पत्य-जीवन की सफलता शारीरिक आकर्षण की अपेक्षा पति-पत्नी की मानसिक और आत्मिक एकरूपता पर अधिक निर्भर है।
यदि आप में मानवोचित गुण हैं तो आप जिसे अपनाते हैं उससे प्रेम करना भी सीख जाते हैं। प्रेम का दीपक लगन के साथ जलाया जाता है, उसे वासना रहित जल से सींचा जाता है और स्वार्थ, असहनशीलता, अविवेक आदि के रोगों से उसे बड़ी साधना, से यत्नों से बचाया जाता है, तब कहीं जाकर वह गृहस्थाश्रम और पारिवारिक जीवन को प्रकाश पूर्ण और आनन्दमय बना पाता है।
इस प्रकार दाम्पत्य और पारिवारिक जीवन उचित रीति से निर्वाह करने पर निजी स्वार्थ के त्याग और दूसरों की सेवा की भावना की वृद्धि होती है और हम समाज सेवा के महत्व को समझने लगते हैं। हमको अनुभव होने लगता है कि कोई व्यक्ति अकेले अपने स्वार्थ पर दृष्टि रख कर ही कदापि सुखी और संतुष्ट नहीं हो सकता। एक से दो और दो से चार यही तरीका साँसारिक दृष्टि से मनुष्य जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है। हम इस समय जितनी भी उन्नति और समृद्धि अपने चारों तरफ देख रहे हैं, उसका मूल समाज-संगठन और सामुदायिक भावना में ही निहित है। इसलिये जो मनुष्य इस परम्परा को कायम रखना चाहता है और पूर्ववर्ती पीढ़ियों के ऋण से अऋण होना चाहता है उसको अपना पारिवारिक जीवन उन्नत और सुदृढ़ बना कर समाज की प्रगति में अवश्य सहयोग देना चाहिए।
एक दिन कर्म और भावना दोनों एकत्रित हुए। बात-चीत में विवाद चल पड़ा कि दोनों में कौन बड़ा है।
दोनों ही अपनी-अपनी बड़ाई बखानने लगे। कोई छोटा बनने को तैयार न हुआ। जब विवाद बढ़ा तो निर्णय कराने इन्हें ब्रह्माजी के पास जाना पड़ा।
ब्रह्माजी ने दोनों की बात सुनी और मुस्काये। उनने कहा-परीक्षा से ही वास्तविकता का पता चलेगा। तुम दोनों आकाश छूने का प्रयत्न करो। जो पहले आकाश छू सकेगा वही बड़ा माना जाएगा।
भावना ने उछाल लगाई तो आकाश तक जा पहुँची। छूने में भी सफल हो गई। पर आकाश की ऊँचाई इतनी अधिक थी कि बेचारी को अधर में ही लटकना पड़ा। पैर धरती से बहुत ऊपर थे।
कर्म प्रयत्न में जुटा। उसने आकाश तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनानी शुरू कर दीं। कई दिनों वह लगातार लगा भी रहा। पर उत्साह न होने से वह सब थकाने वाला झंझट मात्र दीखने लगा। उदासी ने उसे घेरा और अपने औजार पटक का वह सुस्ताने सरोवर के तट पर चला गया।
ब्रह्माजी पता लगाने गये तो देखा कि भावना आकाश में अधर लटकी है। कर्म को देखा तो वह पाकर की छाया में औंधे मुँह पड़ा कराह रहा था। थकान और झूँझल से उसकी नस-नस दुख रही थी।
प्रजापति ने दोनों को बुला कर कहा- तुम दोनों ही अपूर्ण हो। बड़प्पन तभी बनता है जब दोनों मिलते हो। जाओ लड़ना मत, दोनों मिल-जुल साथ-साथ रहना, तभी तुम्हारी उपयोगिता अक्षुण्ण रह सकेगी।
बाबुल के सम्राट नमरुद ने ऐलान कराया कि वही ईश्वर है, उसी की पूजा की जाय। भयभीत प्रजा ने उसकी मूर्तियाँ बनाई और पूजा आरम्भ कर दी।
एक दिन राज-ज्योतिषियों ने नमरुद को बताया कि इस वर्ष एक ऐसा बालक जन्मेगा जो उसके ईश्वरत्व को चुनौती देने लगेगा।
सम्राट को यह बात अखरी और उसने उस वर्ष जन्मने वाले सब बालकों को मार डालने की आज्ञा राजकर्मचारियों को दे दी। बालक ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारे जाने लगे।
नमरुद की मूर्तियाँ गढ़ने वाले कलाकार आजर की धर्म-पत्नी को भी प्रसव हुआ और सुँदर पुत्र जन्मा। मातृ-हृदय बालक की रक्षा के लिये व्याकुल हो गया। वह उसे लेकर पहाड़ की एक गुफा में गई और वहीं उसका लालन-पालन करने लेगी।
बालक बन्द गुफा में बढ़ने लगा। धीरे-धीरे वह पाँच वर्ष का हो गया। एक दिन उसने माता से पूछा- हम लोग जहाँ रहते हैं क्या उससे बड़ा इस दुनिया में और कुछ है ?
माता ने बालक को संसार के विस्तार के बारे में बहुत कुछ बताया और कहा इस सबका निर्माता एक ईश्वर है। बालक ईश्वर के दर्शन करने के लिये व्यग्र रहने लगा।
एक दिन अवसर पाकर बालक गुफा से बाहर निकला। सबसे पहले उसने उन्मुक्त आकाश को देखा। रात्रि का अंधकार छाया हुआ था। सबसे पहले एक चमकता हुआ तारा दिखाई दिया। बालक ने सोचा, हो न हो यही ईश्वर होगा।
थोड़ी देर में तारा अस्त हो गया और चाँद निकला। बालक सोचने लगा कम प्रकाश वाला तारा नहीं, अधिक चमकने वाला यह चाँद ईश्वर होना चाहिये। थोड़ी देर में रात समाप्त हुई, चन्द्रमा डूबा और सूरज निकल आया, और दिन गुजरते-गुजरते उसके भी डूबने की तैयारी होने लगी।
बालक इब्राहीम के मन में भारी उथल-पुथल मची। उसने सोचा जो बार-बार डूबता और उदय होता है ऐसा ईश्वर नहीं हो सकता। वह तो ऐसा होना चाहिए जो न जन्में और न मरे। विचार ने विश्वास का रूप धारण किया। ईश्वर का स्वरूप उसकी समझ में आ गया। इब्राहीम ने ईश्वर चिन्तन का व्रत लिया और साधुओं की तरह न जन्मने और न मरने वाले ईश्वर की उपासना करने के लिए प्रचार करने लगा।
नमरुद को पता चला कि उसकी सत्ता को चुनौती देने वाला कोई फकीर पैदा हो गया है तो उसने इब्राहीम को पकड़ बुलाया और अनेक यंत्रणाएं देने लगा। जब इब्राहीम के विचार नहीं बदले तो उसे जलती आग में पटक कर मार डालने का आदेश हुआ।
अग्नि प्रकोप से बचाने में सहायता करने के लिए जब देवता इब्राहीम के पास पहुँचे तो उन्होंने यह कहकर वह सहायता अस्वीकार कर दी कि सत्य की निष्ठा कष्ट सहने से ही परिपक्व होती है और आत्मा का तेज परीक्षा के बाद ही निखरता है। मुझे अपनी निष्ठा की परीक्षा कष्ट सहने के द्वारा देने दीजिए। मेरा आत्म-बल विचलित न हो, यदि ऐसी सहायता कर सकें तो आपका इतना अनुग्रह ही पर्याप्त है।
अंत में सत्य ही जीता। नमरुद का गर्व गल गया। इब्राहीम अपनी सत्यनिष्ठा के कारण और अधिक चमके। नमरुद नहीं रहा पर इब्राहीम की ईश्वर विवेचना आज भी बहु-संख्यक मनुष्यों के हृदय में स्थान प्राप्त किए हुए है।
बल नहीं जीतता और न आतंक ही अंत तक ठहरता है। असत्य कितना ही साधन सम्पन्न क्यों न हो वह सत्य के आगे ठहर नहीं पाता। साधन हीन होते हुए भी सत्य, सुसम्पन्न असत्य से कहीं अधिक सामर्थ्यवान होता है। विजय असत्य की नहीं सत्य की ही होती है। इब्राहीम की विजय और नमरुद की पराजय ने इसी तथ्य का उद्घाटन किया है।
वेदों में मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष बताई गई है। “जीवेम शरदः शतम्” हम सौ वर्ष तक जिएँ। प्रकृति के नियमानुसार भी मनुष्य की आयु सौ वर्ष के ऊपर ही मानी गई है। प्रकृति का यह सामान्य नियम है कि जो प्राणी जितने समय में प्रौढ़ होता है उससे पाँच गुना जीवन जीता है। नियमानुसार घोड़ा पाँच वर्ष में युवा होता है तो घोड़े की उम्र 25 वर्ष से 30 वर्ष तक मानी गई है। ऊँट 8 वर्ष से प्रौढ़ होकर 40 वर्ष तक, कुत्ता 2 वर्ष में विकसित होकर 10 वर्ष तक और हाथी 50 वर्ष में युवा होकर 200 वर्ष तक जीवित रहता है। मनुष्य भी साधारणतया 25 वर्ष की उम्र में युवा होता है। अतः 100 से 150 वर्ष तक की उम्र मानी गई है उसकी।
शरीर और आयु विज्ञान के अमेरिकी विद्वान डॉ. कार्नसन ने कहा है यद्यपि प्रकृति के नियम और गणित के हिसाब से मनुष्य की आयु 150 वर्ष होती है फिर भी मोटे रूप में उसको 100 वर्ष तो मान ही लेनी चाहिए। यह आयु-सीमा केवल अनुमान मात्र ही नहीं है अपितु सही है। गोस्वामी तुलसीदास 100 वर्ष से अधिक जीवित रहे। इससे पूर्व महाभारत काल में श्रीकृष्ण की आयु 127 वर्ष और पितामह भीष्म को दो सौ वर्षों से भी अधिक मानी गई है। आधुनिक युग में भी अनेकों शतजीवी हुए हैं। भारत के महर्षि कर्वे, महान् इंजीनियर विश्वेश्वरैया शतायु हुए हैं। भारत में तो सौ वर्ष जीवन की स्वाभाविक आयु मर्यादा मानी गई है।
विदेशों में भी नारवे का क्रिश्चियन ड्रेकनवर्ग 146 वर्ष तक जीवित रहा। उसने 130 वर्ष की उम्र में अपना अन्तिम विवाह किया। इससे पूर्व 111 वर्ष की उम्र में एक 60 वर्षीय विधवा से विवाह किया था। सौ वर्ष की उम्र तक वह सिपाही के रूप में शत्रु देश से लड़ता रहा। प्रसिद्ध प्रकृतिवादी डेमोक्रेटिस जीवन भर स्वस्थ, निरोग रहकर 109 वर्ष तक जीवित रहे। जोसफ सूरिंगटन 160 वर्ष तक जीवित रहा। उसके सबसे बड़े पुत्र की आयु 108 वर्ष की थी तो छोटे की 9 वर्ष। हंगरी का बोविन 172 वर्ष तक जीवित रहा उसकी पत्नी 164 वर्ष की थी।
इस तरह के असंख्यों उदाहरण भरे पड़े हैं जो मनुष्य के शतजीवी अथवा सौ वर्ष से अधिक होने के प्रत्यक्ष प्रमाण है। इतना ही नहीं प्राणियों के जीवनकोषों का स्वभाव सदा-सदा जीवित रहने का प्रयत्न करना है। वैज्ञानिक खोजों से यह सिद्ध हो चुका है कि - “प्राकृतिक रूप में भी मृत्यु निश्चित नहीं है।” प्रसिद्ध जीवन शास्त्री डॉ. अलेक्सिस कैरेल ने एक मुर्गी के भ्रूण को 36 वर्षों तक तरल पोषक पदार्थ में सुरक्षित रखा। 36 वर्ष के पश्चात् उन्होंने अपना प्रयोग इस निष्कर्ष पर बन्द कर दिया कि वह भ्रूण इसी तरह सदा-सदा जीवित रखा जा सकता है।
पूर्व मनीषियों के अनुभवपूर्ण, निष्कर्षों वैज्ञानिकों के प्रयोग, प्रकृति की स्वाभाविक नियम मर्यादाओं के अनुसार मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष मान लेने में शंका की कोई गुंजाइश नहीं।
आज के तथाकथित वैज्ञानिक और विकसित युग में स्थिति कुछ इससे भिन्न है। अधिकाँश लोग सौ वर्ष के पूर्व ही जीवन समाप्त कर देते हैं और वह भी जीवन भर स्वास्थ्य की खराबी की चिन्ता नहीं करते हुए अनेकों रोग बीमारियों के शिकार बन कर। सुखपूर्ण स्वाभाविक और प्राकृतिक मृत्यु तो शायद ही किसी को प्राप्त होती हो। 50-60 वर्ष की उम्र काफी समझ ली जाती है।
कुछ समय पूर्व पश्चिमी जर्मनी में 30 देशों के लगभग 1000 वैज्ञानिक जीवनशास्त्री मानसरोग विशेषज्ञों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ था, जिसमें आधुनिक युग में गिरते जा रहे स्वास्थ्य, असामयिक बुढ़ापे और अकाल मृत्यु पर विचार−विमर्श किया गया था। इन सभी विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला कि “शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गड़बड़ी और अल्प जीवन की जड़ है आज का अप्राकृतिक, अस्वाभाविक, असन्तुलित जीवन।”
दीर्घ जीवन के लिए मुख्यता शारीरिक मानसिक और व्यावहारिक जीवन क्रम में सन्तुलन व्यवस्था बनाये रखना आवश्यक है। इसके साथ विजातीय तत्वों के प्रवेश से अपनी रक्षा करना भी अपेक्षित है।
इंग्लैण्ड के थामस पार साहब 152 वर्ष तक स्वस्थ हालत में जीवित रहे। वे साधारण भोजन करते थे। बादशाह चार्ल्स ने एक बार इन्हें मुलाकात के लिए बुलाया और बढ़िया भोजन की दावत भी दी किंतु इससे वे मर गये। डाक्टरी जाँच करने पर पता चला कि गरिष्ठ भोजन ने उनके पाचन को बिगाड़ दिया और उनके जीवन का अन्त कर दिया।
गलत खान-पान, अशुद्ध आहार, अनुपयुक्त वायु का सेवन करने वाले असंख्यों व्यक्ति अपने हाथों अपनी कब्र खोदते हैं। बहुत अधिक या अयुक्त खाद्य पदार्थ ग्रहण कर लेने पर शरीर के पाचन संस्थान पर भारी दबाव पड़ता है और उनकी क्रिया असन्तुलित, अस्त−व्यस्त हो जाती है। यही बात अशुद्ध वायु के संबंध में भी लागू होती है। दवा, इन्जेक्शन आदि के रूप में लिए जाने वाले विजातीय द्रव्य भी इसी में आते हैं। आजकल अनुपयुक्त खानपान रहने के गन्दे घुटे हुए स्थान, शरीर को जल्दी ही क्षीण करने में बहुत कुछ उत्तरदायी हैं। यदि हम उपयुक्त और आवश्यकतानुसार खाद्य पदार्थ लें शुद्ध स्वच्छ हवा में अधिकाधिक रहें, शरीर से दूषित पदार्थ मलों के निष्कासन का पूरा पूरा ध्यान रखें तो शरीर स्वस्थ सन्तुलित रहेगा और हम दीर्घ जीवी बन सकेंगे।
दूसरी महत्वपूर्ण बात है जीवन का बाह्य जगत के साथ तालमेल बैठाना। अपने कार्य, श्रम, विश्राम में संतुलन बना लेना दीर्घ जीवन का महत्वपूर्ण नियम है। शरीर की क्षमता, शक्ति के अनुसार अपना कार्य करना, आवश्यकतानुसार विश्राम करना शरीर को संतुलित बनाये रखने के लिए अपेक्षित है। किंतु वैज्ञानिक युग की घुड़दौड़ के मनुष्य अपनी आन्तरिक एवं बाह्य उत्तेजनाओं का संस्पर्श पाकर बेतहाशा जीवन में दौड़ लगा रहा है। मनुष्य की महत्वाकाँक्षाओं, प्रतिस्पर्धा, ऐषणायें, आकाश को चूमने लगी हैं। मनुष्य उनकी उत्तेजनाओं से प्रेरित हो कर दिन रात भागता दौड़ता है। तनाव पर तनाव पड़ने से बढ़ने चढ़ने की तृष्णा और एषणाओं की उन्मादी दौड़ में मनुष्य का जीवन क्रम बेसुरा हो जाता है। मनुष्य का स्नायु-संस्थान, हृदय मस्तिष्क जल्दी ही रोगग्रस्त, अक्षम, असमर्थ, हो जाते हैं और एक झटके के साथ उसका स्वास्थ्य गिर जाता है। अनिद्रा, आन्तरिक बेचैनी, चिन्तायें बढ़ जाती है, जिससे कई शारीरिक मानसिक गड़बड़ी उत्पन्न होकर मनुष्य के अल्प जीवन का कारण बनती हैं।
जीवन संबन्धी खोज विशेषज्ञ डॉक्टर कार्लसन का कहना है “अल्प मृत्यु और बुढ़ापे को रोकने के लिए सौ दवाओं की एक दवा है - सुविधाजनक जीवन। जिस कार्य से शरीर और मन पर अत्यधिक दबाव पड़े उसे छोड़ देना चाहिए। अपनी शक्ति, सामर्थ्य, क्षमता तथा उम्र के अनुसार अपने दैनिक कार्यक्रम में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करते रहना चाहिए। इसी सूत्र को पकड़कर मैंने लम्बी उम्र पायी है और अनेकों लोगों को जीवन के कष्टों, रोगों से मुक्ति दिलाई है।”
स्वास्थ्य आँकड़ा विशेषज्ञ लुई डबलिंग ने अपने आँकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि चिन्ता प्रधान बाल्य जीवन और दुःखी, संतप्त यौवन कभी भी दीर्घायु, सुन्दर स्वास्थ्य, सुखी जीवन नहीं बना सकता। दीर्घजीवन की नींव, मूलाधार है, चिन्ता और दुःखद अनुभूतियों से मुक्त बाल्य जीवन और उन्मुक्त, स्वच्छन्द, भार रहित यौवन। जर्मन विशेषज्ञ डॉ. बोहर का मत है कि दीर्घ जीवन व सुन्दर स्वास्थ्य के लिए 20 वर्ष तक का जीवन प्रसन्नता भरा हुआ और जीवन की विभीषिकाओं से रहित होना आवश्यक है। भारतीय जीवन विशारदों ने भी जीवन का प्रारम्भिक चौथाई काल 25 वर्ष की उम्र तक ऋषि कुलों में ब्रह्मचर्यपूर्वक उन्मुक्त बिताने का विधान रखा है।
किन्तु आज के तथाकथित सभ्य और विज्ञान के युग में बाल्यकाल से ही मनुष्य के जीवन में विभिन्न चिन्ता, परेशानी, उलझनों, समस्याओं का ताँता लग जाता है। बहुत कम लोगों को बचपन में यह सौभाग्य प्राप्त होता है। जिन्हें ऐसा अवसर मिलता भी है तो उनकी जीवन धारायें भौतिक आकर्षणों की मृगमरीचिका की ओर प्रभावित हो जाती हैं जहाँ जिससे जीवन का कोई उद्देश्य नहीं सधता। अन्ततः चिन्ता, निराशा, अवसाद, असफलता का ही सामना करना पड़ता है। इससे मानसिक संस्थान पर बुरा असर पड़ता है। साथ ही शारीरिक असन्तुलन भी। इससे मनुष्य अल्पायु में ही जीवन समाप्त कर देता है।
खेद की बात है कि हम सभ्यता और प्रगति के नाम पर जीवन के स्वाभाविक क्रम, प्रकृति की मर्यादाओं का उल्लंघन करके असन्तुलित जीवन बिताते हैं या किन्हीं कारणों से बिताने के लिए बाध्य होना पड़ता है। रहन-सहन, आहार-विहार, कार्य-क्रम विश्राम आदि में कोई तालमेल नहीं बैठाकर भौतिकता की अन्धी दौड़ में बेतहाशा भागे जा रहे हैं। और फिर स्वास्थ्य की गड़बड़ी अल्पायु रोग बीमारियों, अशान्ति क्लान्ति से पीड़ित हो नारकीय जीवन बिताते हैं। किन्तु इसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं कोई दूसरा नहीं। इस स्थिति से उबरने के लिए हमें इस गलत जीवन क्रम को बदलना होगा तभी दीर्घजीवन, सुन्दर स्वास्थ्य,सबल मनोभूमि के वरदानों से हम कृत-कृत्य हो सकेंगे।
दो शिष्य आपस में झगड़ पड़े। दोनों अपने-अपने को बड़ा सिद्ध करते थे। अपनी बड़ाई और दूसरे की मधुता सिद्ध करने के लिए दोनों ने ढेरों तर्क और प्रमाण उपस्थित कर दिये।
बात बढ़ी तो विवाद को लेकर दोनों गुरुदेव के पास पहुँचे और अपना अपना पक्ष उपस्थित करते हुए निर्णय देने की प्रार्थना करने लगे।
गुरुदेव ने हँसते हुए कहा- तुम इतना भी नहीं जानते कि जो अपने को छोटा और दूसरों को बड़ा कहता है उसी को बड़ा माना जाता है। तुममें से जो ऐसा आचरण कर रहा हो वही बड़ा है।
सन्त नानक एक गाँव में गये। वहाँ के निवासियों ने बड़ा आदर किया- चलते समय नानक जी ने आशीर्वाद दिया- ‘उजड़ जाओ।’
वे दूसरे गाँव में गये तो वहाँ के लोगों ने तिरस्कार किया, कटु वचन बोले और लड़ने झगड़ने पर उतारू हो गये। नानक जी ने आशीर्वाद दिया- ‘आबाद रहो।’
साथ में चल रहे शिष्यों ने पूछा- भगवन् ! आपने आदर करने वालों को ‘उजड़ जाओ’ और तिरस्कार करने वालों को ‘आबाद रहो’ का उलटा आशीर्वाद क्यों दिया?
नानक ने कहा- सज्जन लोग उजड़ेंगे तो वे बिखर कर जहाँ भी जायेंगे सज्जनता फैलावेंगे इसलिए उनका उजड़ना ही ठीक है। किन्तु दुर्जन सर्वत्र अशान्ति उत्पन्न न करें इसलिए उनके एक ही जगह रहने में भलाई है।
अभिभावकों, खासकर माता पिता के ऊपर बच्चों में अच्छी आदतें डालने, उन्हें सुयोग्य बनाने का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है और सभी माँ बाप यह चाहते भी हैं कि उनके बच्चे योग्य बनें। किन्तु बच्चों का निर्माण एक पेचीदा प्रश्न है। इसके लिए अभिभावकों में काफी विचारशीलता, विवेक संजीदगी एवं मनोवैज्ञानिक जानकारी का होना आवश्यक है।
बहुत से माँ बाप तो बच्चों को पैदा करने, खिलाने, पिलाने, स्कूल आदि में पढ़ने की व्यवस्था तक ही अपने उत्तरदायित्व को पूर्ण समझते हैं। किन्तु इससे बच्चों के निर्माण की सम्पूर्ण समस्या का हल नहीं होता, हालाँकि बच्चों के विकास में इनका भी अपना स्थान है। बच्चों में अच्छी आदतें डालना उनमें सद्गुणों की वृद्धि करके सुयोग्य बनाना एक महत्वपूर्ण बात हैं, यह असुरता से देवत्व उत्पन्न करने पशुत्व को मनुष्यता में बदलने की प्रक्रिया है, एक सूक्ष्म विज्ञान है। बच्चों को प्यार करना, खिलाना पिलाना, उनका संरक्षण करना तो पशुओं में भी पाया जाता हैं।
बच्चों में बढ़ती हुई उच्छृंखलता, अनुशासनहीनता, स्वेच्छाचार एवं अन्य बुराइयों की जिम्मेदारी बहुत कुछ माँ बाप, अभिभावकों के ऊपर ही होती है। उनकी सामान्य सी गलतियों, व्यवहार की छोटी सी भूलों के कारण बच्चों में बड़ी बड़ी बुराइयाँ पैदा हो जाती है। अनेकों बुरी आदतें बच्चों मैं पड़ जाती हैं। स्वयं माँ बाप जिसे सुधार समझते हैं वही बात बच्चों के बिगाड़ने कारण बन जाती है।
बच्चों में अनुशासन और आज्ञा पालन की आदत पैदा करने के लिए अधिकाँश माँ बाप फौजी नियमों का अनुसरण करते देखे जाते हैं। किसी भी काम के लिए अधिकार पूर्वक बच्चों को आदेश देते हैं। सैब दिखाकर, दबाव के द्वारा उनसे कोई काम कराना चाहते हैं। कदाचित बच्चों ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया अथवा अनसुना कर दिया तो उनकी मारपीट करना चीखना, चिल्लाना गाली देना शुरू हो जाता है। किन्तु वे माँ बाप यह नहीं जानते कि इससे बच्चों में विरोधी भावना, द्वेष-बुद्धि घर कर जाती है और बच्चे जानबूझ कर उपेक्षा टालमटोल करने वाले, किसी बात पर ध्यान न देने वाले अनुशासनहीन और उच्छृंखल बन जाते हैं।
किसी तरह की आज्ञा देते समय अथवा अनुशासन पालन की आदत के लिए यह जानना और समझना भी आवश्यक है कि बच्चा उस समय क्या कर रहा है। उदाहरणार्थ बच्चा अपने किसी दिलचस्प खेल में लग रहा है, एकाग्रता के साथ पढ़ रहा है अथवा अपने बाल मित्रों के साथ खेलकूद में मस्त है तो ऐसे समय उसे किसी तरह की आज्ञा नहीं देनी चाहिए। ऐसी स्थिति में प्रायः बच्चे आज्ञा नहीं माना करते। यदि उनके साथ जबरदस्ती और रौब दबाव का व्यवहार किया गया तो उनमें रूठने, चिल्लाने मचलने की आदतें पड़ जायेंगी और फिर हर बात में बच्चे विपरीतता अर्थात् आज्ञा उल्लंघन, अनुशासन हीनता का परिचय देंगे।
जब बच्चे माँ के पास शान्त तथा स्वस्थ मानसिक स्थिति में हों तो उन्हें आवश्यकतानुसार आदेश दिया जाय और जहाँ तक बने उस आदेश को खेल मनोरंजन के रूप में अथवा कोई नवीनता में परिणित कर देना अधिक श्रेष्ठ रहेगा। आदेश भी रचनात्मक होने चाहिए “अमुक करेगा”, “वह लावेगा”, “वहाँ जावेगा” आदि “यह काम मत कर”। “वहाँ मत जाना” “उसे मत छूना” आदि के रूप में नकारात्मक आदेश बच्चों में वैसा ही करने का कौतूहल पैदा कर देते हैं और वे उन्हें ही करने लगते हैं जिनके लिए मना किया जाता है।
अनुशासन, आज्ञापालन से सम्बन्धित बातों पर स्वयं बच्चों की राय लेना भी उत्तम होता है। इससे वे बड़े प्रसन्न होते है और तत्परता के साथ उनके लिए प्रयत्न भी करते हैं क्योंकि उन बातों में उनका भी एक अधिकारमय स्थान होता है। बच्चों को पुकार कर, दूर से चिल्लाकर कोई आदेश न दिये जायें बल्कि नजदीक बुलाकर और अच्छा तो यह हो कि उनके पास पहुँच कर ही उनसे कोई बात कही जाय। इससे बच्चे उसके मूल्य, महत्व को समझेंगे और उसी तत्परता, तन्मयता से उस पर अमल करेंगे।
अनावश्यक रूप से बच्चों को बार-बार टोकना अच्छा नहीं। वैसे बच्चे स्वतः ही किसी काम पर अधिक नहीं टिकते। थोड़े से समय में ही वे उससे विरत हो जाते हैं। टोकने से तो उनकी थोड़ी बहुत एकाग्रता, तन्मयता में विक्षेप पड़ता है। इतना ही नहीं आगे चलकर ऐसे बच्चे किसी भी काम पर एकाग्र एवं तन्मय नहीं हो पाते। अपने सामने आये हुए काम पर भी नहीं जम पाते जिससे जीवन में अनेकों असफलताओं का सामना करना पड़ता है।
बच्चे को किसी खेल आदि से विरत करने के लिए सीधी निषेधात्मक आज्ञा नहीं देनी चाहिए। वरन् उनके साथ लगकर सुझाव एवं प्रस्ताव रूप में अपनी बात रखकर उन्हीं से ऐसा निर्णय कराना उत्तम होता है।
बच्चों को दिए जाने वाले आदेश सरल एवं स्पष्ट भाषा में हों, साथ ही उनके साथ अपना प्रभावशाली वजन भी हो। किसी काम को करने की आज्ञा देने से पूर्व बच्चे से यह पूछना कि “ तुम अमुक काम करोगे” तो उससे “ना” में ही उत्तर मिलेगा और किसी की बात के लिए एक बार ना कह देने पर बच्चों से वह काम कराना और भी कठिन हो जाता है। बच्चों को आकर्षक एवं प्रभावशाली ढंग से आज्ञा देनी चाहिए “ हमारा मुन्ना अमुक काम करेगा फिर वहाँ जायगा, इसके बाद यह लायेगा” आदि। इस रूप में आदेश आकर्षक, रचनात्मक प्रभावशाली वजनदार होते हैं और वह काम बच्चों के लिए कौतूहल, मनोरंजन के रूप में भी बदल जाता है।
बहुत से माँ बाप बच्चों के लिए नियमित व्यवस्थित जीवन बिताने के लिए बड़े ही सख्त और रूखे नियम बना देते हैं किन्तु इससे अनुकूल परिणाम प्राप्त नहीं होते। बहुत से बच्चे उन नियमों के अनुसार चलेंगे नहीं या जो थोड़ा बहुत नियम पालन करेंगे उनकी मौलिकता, आत्मविश्वास की शक्ति कुन्द हो जायेगी। अतः बच्चों पर नियम लादे नहीं जाने चाहिए वरन् स्वयं उन्हीं की राय को महत्व, प्रोत्साहन देकर बच्चों के खाने पीने, सोने पढ़ने, खेलने आदि का समय निश्चित कर देना चाहिए। यदि किन्हीं नियमों के कारण बच्चों को किसी तरह की कठिनाई हो तो उन्हें सरल भी बना देना चाहिए। बच्चों को नियमानुवर्ती बनाने से पूर्व स्वयं माँ बाप को भी नियमित और बँधा हुआ जीवन बिताना आवश्यक है। जो माँ बाप स्वयं अनियमित जीवन बिताकर बच्चों को नियमानुवर्ती बनाना चाहते हैं वे भूल करते हैं। यदि बच्चे अभ्यासवश नियम पालन में कोई गड़बड़ी अथवा भूल करें तो उन्हें एक दम धमकाना नहीं चाहिए। बहुत बार एक सी भूल करने पर कह देना चाहिए।
केवल नियमादि बनाकर बच्चों पर कर्तव्य एवं जिम्मेदारी डालने से काम नहीं चलता। समय-समय पर बच्चों के साथ विचार विमर्श करना, उनकी बात पूछना, उनके कार्यक्रम जीवनक्रम आदि के बारे में दिलचस्पी प्रकट करना, अपनी सूझबूझ से बच्चों को नवीन तथ्यों का ज्ञान देना भी आवश्यक है।
कई माँ बाप बच्चों को नंगा ही घूमने फिरने देते हैं किन्तु यह आदत बुरी हैं। छोटे-छोटे बच्चे जब नंगे रहते हैं तो उनमें समय से पूर्व ही यौन-भावना जागृत हो उठती है। माता-पिता को अपने अबोध, छोटे से बच्चों के समक्ष भी परस्पर प्रेम प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। इससे बच्चों के अन्तर मन पर सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है। समझदार, बोध रखने वाले बालक को तो यह सब देखकर आश्चर्य करते हैं। उनके लिए एक कौतूहल की बात हो जाती है और फिर बच्चे भी परस्पर वैसा ही करने का प्रयास करते हैं। बच्चों में फैलती हुई अपराध प्रवृत्ति, यौन भावना- जन्य अपराधों के मूल में माँ-बापों की यह भूल भी एक मुख्य कारण है। असमय में ही उत्पन्न यौन भावना को बच्चे गलत तरीकों से व्यक्त करते है। बच्चों के समझदार हो जाने पर तो उन्हें हमेशा अलग कमरे में, अलग-अलग बिस्तरों पर सुलाना चाहिए। अभिभावकों को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि अपनी किसी भी चारित्रिक कमजोरी को भूल कर भी बच्चों के समझ प्रकट नहीं होने दिया जाय।
बच्चों में सद्गुणों, उत्कृष्ट आदतों की प्रतिष्ठापना के लिए स्वयं अभिभावकों को अपने आप में ही उनकी प्रतिष्ठापना करना आवश्यक है। अपना सुधार किए बिना बच्चों को सुधारने का प्रयत्न विडम्बना मात्र है। स्वयं बीड़ी पीते हुए बच्चों को धूम्रपान न करने का उपदेश देना क्या भूल नहीं है ? बच्चों से जिन गुणों की आशा की जाय उन्हीं से सम्बन्धित वातावरण आस-पास होना चाहिए। सच बोलना सिखाने के लिए घर का वातावरण भी सचाई से भरा हुआ होना चाहिए। दवा पिलाने, अस्पताल में फोड़ा चिरवाने अथवा इंजेक्शन लगाने के लिए बच्चों को बहाना करके या झूँठ बोल कर ले जाना, बच्चों को धोखा देना, उनमें वैसी ही आदतें पैदा करना है। बच्चे फिर उन्हीं बातों का अवलम्बन लेते हैं। उन्हें फिर माँ-बापों की आदर्श भरी बातों में भी संदेह होने लगता है और उन्हें झूँठ मानने लगते है।
चोरी की आदत से बचने के लिए बच्चों को जब से अपने-पराये का ज्ञान होने लगे तभी तो यह सिखला देना चाहिए कि “बिना माँगे किसी की वस्तु लेना चोरी है।” दूसरों की वस्तु बिना माँगे लेना एक बुराई और अपराध है। चोरी की आदत पड़ जाना बच्चों के लिए घातक है। चोरी से दरअसल बच्चे की मनचाही इच्छायें शीघ्र ही पूरी हो जाती हैं। माँ-बाप की सतर्कता से बच्चों में चोरी की आदत घर नहीं करती।
छोटी उम्र से ही बच्चों में कोमल भावनाओं का विकास करना चाहिए। बच्चों में सह भावना, सब के हित का ध्यान रखने की वृत्ति पैदा करना माँ-बाप के ऊपर ही है। जो माँ-बाप दूसरों तथा अपने बच्चों के बीच व्यवहार करते समय कोई भेद-भाव नहीं रखते और न किसी तरह का दुराव, छिपाव ही रखते हैं वे बच्चे अपना ही नहीं सब के अस्तित्व का एक साथ ध्यान रखते हैं। उनमें भेदभाव करने की भावना नहीं रहती।
बच्चों में अनुकरण करने की महत्वपूर्ण प्रवृत्ति होती है। माँ-बाप, अभिभावकों का जीवन उसके लिए निकटतम और आत्मभाव से भरा हुआ प्रतीक, आदर्शों का केन्द्र होता है। इस तरह माँ-बाप के ऊपर ही बच्चों के निर्माण का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है। माँ-बाप अपने इस उत्तरदायित्व को समझें और प्रयत्न करें तो इन खिलते हुए कुसुमों में सद्गुण, सद्भावों, अच्छी आदतें, सदाचार, शील पुरुषार्थ, साहस आदि का सौंदर्य और सुगन्धि भर जाय और सामान्य से बच्चों में ही अनेकों महापुरुष निकल सकते हैं। प्रकृति शरीर देती है किन्तु मनुष्य उसे व्यक्तित्व, मनुष्यता देता है।
यूँ तो जीने के लिए लोग जिया करते हैं,
लाभ जीवन का नहीं फिर भी लिया करते हैं,
मृत्यु से पहले भी मरते हैं हजारों, लेकिन-
जिन्दगी उनकी है जो मरके जिया करते हैं।
-सोम तिवारी
मैं चलता, मेरे साथ-साथ साहस चलता है,
मैं चलता, मेरे साथ हृदय का रस चलता है,
मैं चलता, मेरे साथ निराशा-आशा चलती
मैं चलता, मेरे साथ सृजन की भाषा चलती
मैं चलता, मेरे साथ ग्रहण, सर्जन चलता है
मैं चलता, मेरे साथ नया जीवन चलता है।
-उदय शंकर भट्ट
शक्ति हीन को हो पाती है लक्ष्मी प्राप्त नहीं?
अकर्मण्य जीवन क्या मानव के हित शाप नहीं?
सतत् परिश्रम करने वाले का सहचर ईश्वर!
चले चलो, बस चलो निरन्तर जीवन के पथ पर!
चलना ही देता चलने वाले के पद में बल,
आत्मा पाती तुष्टि कर्म को मिल जाता है फल,
पुरुषार्थी का पाप स्वेद बन बह जाता सत्वर!
चले चलो, बस चलो निरन्तर जीवन के पथ पर!
- विद्यावती मिश्र
जो साथ न मेरा दे पाये उनसे कब सूनी हुई डगर।
मैं भी न चलूँ यदि तोभी क्या राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं जो चलने का पा गए स्वाद।
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला, उस -उस राही को धन्यवाद॥
-शिव मंगलसिंह ‘सुमन’
मैं मुसाफिर हूँ कि जिसने है कभी रुकना न जाना,
है कभी सीखा न जिसने मुश्किलों में सिर झुकाना,
क्या मुझे मंजिल मिलेगी या नहीं- इसकी न चिन्ता-
क्योंकि मंजिल है डगर पर सिर्फ चलने का बहाना!
- नीरज
जो डर जाते बाधाओं से उनके पथ में-
ही फूल शूल बन कर चुभ जाया करते हैं।
पर जो रख जान हथेली पर आगे बढ़ते -
पथ दे उनकी पर्वत झुक जाया करते हैं!!
- रामस्वरूप खरे
एक तुम्हारा ही हो जाऊँ यह कैसा प्रतिबन्ध तुम्हारा,
जिसका जहाँ हुआ मैं अब तक वही हो गया रूप तुम्हारा।
एक तुम्हीं बनते अनेक जब, मैं एकाकी का एकाकी-
एक अनेकों पर बलि जाऊँ तो कैसा उपहास तुम्हारा।
- यमुनेश श्री वास्तव
ध्येय नया, ध्यान नया धर्म चाहिए,
गेय नया, गान नया मर्म चाहिए,
पेय नया, पान नया श्रेय चाहिए,
रीति नई नीति नई, नया कर्म चाहिए।
भावना नई, नये विचार चाहिए।
चेतना नवीन, नया ज्वार चाहिए॥
- विनोद रस्तोगी
जिसने मरना सीख लिया है जीने का अधिकार उसी को।
जो काँटों के पथ पर आया, फूलों का उपहार उसी को॥
जिसने गीत सजाये अपने,
तलवारों के झन-झन स्वर पर
जिसने विप्लव राग अलापे
रिमझिम गोली के वर्षण पर
जा बलिदानों का प्रेमी है, है जगती का प्यार उसी को। 1।
हँस - हँस कर इक मस्ती लेकर
जिसने सीखा है बलि होना,
अपनी पीड़ा पर मुस्काना
औरों के कष्टों पर रोना,
जिसने सहना सीख लिया है संकट है त्योहार उसी को । 2।
दुर्गमता लखा बीहड़ पथ की
जो न कभी भी रुका कही पर,
अनगिनती आघात सहे पर
जो न कभी भी झुका कहीं पर,
झुका रहा है मस्तक अपना, यह सारा संसार उसी को। 3।
जिसने मरना..................
-’अज्ञात’
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना
(गायत्री महाविद्या की सामान्य जानकारी तथा उपासना विधि अब तक अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित होती रही है। इस मांग पर श्रद्धा रखने वाले जिज्ञासुओं को अधिक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण देने के लिए उच्चस्तरीय गायत्री साधना का उल्लेख इस स्तंभ के अंतर्गत भविष्य में नियमित रूप से किया जाता रहेगा।)
गायत्री की उच्चस्तरीय उपासना, पंचकोशी साधना के नाम से विख्यात है। साधारण प्राथमिक उपासना में एक मुखी और द्विभुजी गायत्री का ध्यान किया जाता है। सद्बुद्धि एक मुख है और जप, ध्यान-नाम रूप-उसकी दो भुजाएँ हैं। ज्ञान की प्रतीक, सद्भावनाओं की प्रेरक श्रद्धामयी गायत्री को हिन्दू-धर्म के प्रत्येक सदस्य का एकमात्र उपासना माध्यम माना गया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के सभी आस्थावान धर्मज्ञ गायत्री उपासना के माध्यम से साधना करते हुए जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए-आत्मोत्कर्ष के लिए-प्रयत्नशील रहे है।
गायत्री महामंत्र के 24 अक्षरों द्वारा परब्रह्म परमात्मा के सद्गुणों का ध्यान करते हुए उससे सद्बुद्धि की याचना की गई है। इसका तात्पर्य यह है कि हम परमात्मा के सद्गुणों को अपने जीवन में उतारें और अपने मस्तिष्क में सद्विचार एवं हृदय में सद्भावनाओं को अवतीर्ण करें। गायत्री उपासना का वैज्ञानिक आधार यह है कि इस शब्द-समूह का जप, ध्यान, चिन्तन, मनन करते रहने से अन्तःकरण में सत् तत्व की अभिवृद्धि होती हैं। इसलिये अन्तःकरण में आवश्यक सत्प्रेरणाएँ भी उद्भूत होने लगती हैं।
जप के साथ ध्यान करने से एकाग्रता बढ़ती है और तन्मयता की परिपुष्टि होती है। मन का निग्रह भी होता है और इस निग्रह के फल-स्वरूप आत्मबल का विकास सम्भव होता है। इस विकास से अनेक लौकिक और पारलौकिक सुख सुविधाएँ प्राप्त होने के अवसर मिलते हैं और आन्तरिक शक्ति सामर्थ्यों की अभिवृद्धि होने लगती है। इन्हीं को ऋषि-सिद्धि के नाम से भी पुकारते हैं। गायत्री उपासना मनुष्य की लौकिक और पारलौकिक प्रगति में निश्चय ही बहुत सहायक सिद्ध होती है। सर्व साधारण के लिए जिस गायत्री उपासना की आवश्यकता है, उसका उल्लेख गायत्री महा विज्ञान ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में किया जा चुका है। जप और ध्यान ही उसके प्रमुख आधार हैं। विशेष शक्ति प्राप्ति के लिए अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता हैं। किन्हीं विशेष अभाव या कष्टों की निवृत्ति के लिए बीज मंत्र समेत जप के विशेष विधान है। ऐसे विशेष आयोजनों के अन्त में हवन भी करना पड़ता है।
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना एक प्रकार का योगाभ्यास है। घर-गृहस्थी में रहते हुए, साधारण काम काज करते हुए, योगी और तपस्वियों की तरह आन्तरिक स्तर को उच्च भूमिका में विकसित करने के लिए श्रद्धावान साधक इस मार्ग को अपनाते हैं। इस विशेष उपासना क्रम को “पंचकोशी गायत्री साधना” इसलिए कहते हैं कि इसमें आत्मा के ऊपर वस्त्रों की तरह चढ़े हुए पाँच कोशों का अनावरण करना पड़ता है। प्रत्येक कोश की अपनी-अपनी विशेषता है उसके अनावरण एवं जागरण से आत्म-शक्ति की विशिष्ट अभिवृद्धि होती है और साधक साधारण मनुष्य न रह कर अनेक दृष्टियों से असाधारण बनने लगता है।
जिस प्रकार प्याज में एक के भीतर एक पर्त होते हैं। केले के तने में एक के ऊपर एक आवरण रहता है इसी प्रकार आत्मा के ऊपर भी (1) अन्न मय कोश, (2) मनोमय कोश, (3) प्राणमय कोश, (4) विज्ञानमय कोश, (5) आनन्दमय कोश-चढ़े हुए हैं। इनमें से एक-एक चक्र माना गया है। अन्नमय कोश का प्रतिनिधि आज्ञा-चक्र भू-मध्य भाग में उपस्थित है। मनोमय कोश का अधिष्ठाता शून्य-चक्र मस्तक के मध्य में, प्राणमय कोश का प्रतीक विशुद्ध-चक्र कण्ठ में, विज्ञानमय कोश का प्रतीक अनाहत-चक्र हृदय में और आनन्दमय कोश का प्रतिनिधि स्वाधिष्ठान-चक्र पेडू में रहता है। पाँच कोशों के अनावरण की साधना इन पाँच चक्रों को जागृत करती है और फिर योगाभ्यास का अन्तिम लक्ष्य “कुण्डलिनी जागरण” के लिए नितान्त सरल हो जाता है।
मल द्वारा और मूत्र द्वार के मध्य में जो थोड़ा-सा खाली स्थान रहता हैं जिसमें कपड़ों को मिला कर बनाई हुई सीवन की तरह जोड़ जैसा प्रतीत होता हैं, उसके मध्य भाग में मूलाधार-चक्र का निवास है। छठवाँ चक्र यही है। एक तिकोने कर्म परमाणु में इसी स्थान सर्पिणी की तरह साड़े तीन घेरे लगाती हुई कुण्डलिनी नामक विद्युत-शक्ति निवास करती है। जान वुडरफ नामक विद्वान ने इसका “सर्पेण्टल पावर” नाम से उल्लेख किया है। इस शक्ति के जागरण से आत्मिक क्षेत्र में पड़ी हुई अगणित प्रसुप्त शक्तियाँ भी जागृत हो उठती हैं। और साधक उन सभी विशेषताओं से सम्पन्न बन जाता है जो योगाभ्यासियों को पूर्णावस्था में उपलब्ध होती हैं।
पंचकोशी साधना करने से पाँच चक्र जागृत होते हैं। इसके अनन्तर छठवाँ चक्र कुण्डलिनी चक्र ही होता है। यह लक्ष्य का अन्तिम स्थल है। पाँच कोशों के, पाँच द्वार के खुल जाने के बाद यह छठवाँ लक्ष्य स्थान सामने आ उपस्थित होता है और फिर उसे साधारण प्राण प्रक्रिया से ही जागृत किया जा सकता है। कभी-कभी कोई कोई तेजस्वी सिद्ध पुरुष अपनी शक्तिपात करके किन्हीं साधकों की कुण्डलिनी जागृत कर देते हैं, पर वे सब होते वे ही हैं जिन्होंने इस जन्म में अथवा पूर्व जन्म में पाँचों को जागृत कर लिया होता है। नये साधक की कुण्डलिनी कोई तेजस्वी सिद्ध पुरुष भी अपने शक्तिपात से जागृत नहीं कर सकता। इसके लिए पूर्व पुरुषार्थ अपने को ही करना पड़ता है। पाँचकोशों की अनावरण उपासना प्रायः प्रत्येक आत्म-लक्ष्य की प्राप्ति करने के इच्छुक को करनी पड़ती है।
षटचक्रों के जागरण की अन्य विधियाँ भी हैं। हठ-योग अथवा तंत्र-योग के माध्यम से भी वैसा हो सकता है। पर उसमें कठिनाइयाँ अधिक हैं। इन मार्गों पर चलने वाले को विरक्त, ब्रह्मचारी, हठयोगी या अघोरी, कापालिक ऐसी गति-विधियों अपनानी पड़ती हैं और जीवन-क्रम उसी ढाँचे में ढालना पड़ता है। गायत्री उपासना के माध्यम से पंचकोशों का जागरण और चक्रों का बेधन सब से सरल है। उसे साधारण स्थिति का गृहस्थ, कामकाजी आदमी थोड़े से सरल नियमों का पालन करते हुए, एक-दो घन्टे रोज साधना के लिए निकालते हुए प्रायः दस वर्षों में पूरा कर लेता है जब कि हठयोग या तंत्र-योग के मार्ग पर चलते हुए सारा जीवन लगाना पड़ता है और कोई थोड़ी-सी भी असावधानी होने पर प्राणघातक परिणाम भी निकल सकता है पर गायत्री उपासना के माध्यम से पंचकोशी साधना का मार्ग सर्वथा निर्दोष है। इसमें लगातार भूलें होते रहने पर भी खतरे की रत्ती भर संभावना नहीं है। हानि इतनी ही हो सकती है कि अनियमितता करने वाले को लाभ कम मिले।
गायत्री की उपलब्ध प्रतिमाओं में एक वे मिलती है, जिनमें एक मुख दो भुजाओं का चित्रण है। दूसरी वे मिलती हैं जिनमें पाँच मुख और दस भुजाएं है। पाँच मुख अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय कोश ही हैं। इनके खुलते ही गायत्री की उच्च स्तरीय अनुभूतियाँ उपलब्ध होती हैं। दस भुजाओं, दसों इन्द्रियों के नियंत्रण द्वारा प्राप्त होने वाली प्रचण्ड-शक्ति का संकेत करती हैं। उपासना का पथ इस संयम से ही प्रशस्त होता है। पंचकोशी उपासना का मर्म संकेत एवं महत्व पंचमुखी गायत्री प्रतिमाओं में प्रदर्शित किया गया है। यह स्पष्ट है कि इस मार्ग में जिन्हें कुछ विशेष अनुभूतियाँ प्राप्त करनी होती है। यों साधारण गायत्री जप, ध्यान तो सब के लिए उपयोगी एवं आवश्यक है ही।
गत दो वर्षों से अखण्ड-ज्योति के अक्टूबर अंक में एक वर्ष का पंचकोशी गायत्री उपासना क्रम प्रकाशित किया जा रहा है। दस वर्ष में यह पाठ्यक्रम पूरा किया जाना है। दो वर्ष बीत गये। तीसरा वर्ष यह आरम्भ होता है। इस वर्ष का पाठ्यक्रम सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर के तीन अंकों में दिया जा रहा है। एक ही अंक एक विषय का बन जाने से उन लोगों को असुविधा रहती थी जिन्हें अन्य विषयों में विशेष अभिरुचि रहती है। इसलिए तीन अंकों में इस वर्ष का पंचकोशी पाठ्यक्रम दिया जा रहा है। आगे हर अंक में गायत्री विद्या का उच्च स्तरीय प्रशिक्षण देने वाले लेख रहा करें, ऐसी व्यवस्था की गई है।
प्रारम्भिक उपासकों को गायत्री जप और ध्यान के माध्यम से अपना भूमि-शोधन क्रम धैर्य-पूर्वक जारी रखना चाहिए। जमीन को जब तक ठीक प्रकार जोता न जायेगा तब तक उसमें अच्छी फसल उत्पन्न न हो सकेगी। इसलिये जोतने की क्रिया का अपना महत्व है। एक मुखी आरम्भिक उपासना का अपने स्थान पर काफी महत्व है परन्तु लक्ष्य तक पहुँचने के लिए वहीं तक सीमित रह जाना ठीक नहीं। आगे न बढ़ने से प्रगति रुकी ही रहेगी। सदा खेत जोतते रहने से भी क्या बनेगा? (1) बीज बोना, (2) सींचना, (3) नराना, (4) रखवाली करना, (5) काट मीड़ कर दाने निकालना - यह पाँच क्रियाएँ भी चतुर किसान को करनी ही होती हैं। इसके बिना अन्न उत्पादन का लक्ष्य पूरा नहीं होता। पंचकोशों की अनावरण प्रक्रिया किसान के उपरोक्त पाँच कर्मों के ही समान हैं जो साधक श्रद्धापूर्वक इन्हें अपनाते हुए आगे बढ़ते हैं वे गायत्री उपासना के महान महात्म्य का, जैसा शास्त्रों में वर्णन है, वैसा ही लाभ प्राप्त करते हैं।
अन्न से ही मन बनता है जैसा अन्न खाया जाता है वैसा ही मन बन जाता है। अध्यात्म का सारा क्रिया कलाप मन की स्थिति पर ही अवलम्बित रहता है। मन भी तमोगुण, रजोगुण में डूबा हुआ है, उस पर तृष्णा और वासना के मल-आवरण छाये हुए हों तो बाहरी उपायों से सुधार हो सकना कठिन है, हम देखते हैं कि रोज कथा-वार्ता कहने-सुनने वाले और धार्मिक कर्मकाण्डों में देर तक लगे रहने वाले व्यक्ति भी दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को चरितार्थ करते रहते हैं। यह आश्चर्य की ही बात है कि जिसे धर्म का पर्याप्त ज्ञान हैं, जो दूसरों को भी का उपदेश देता है वह अपने व्यावहारिक जीवन में अधर्म का आचरण करता रहता है। विचार करने पर उसका एक ही कारण प्रतीत होता है कि व्यक्ति का अन्तःकरण, मानसिक स्तर ही वह मर्म स्थल है जहाँ से प्रेरणायें और प्रवृत्तियाँ उसी दिशा में अग्रसर होंगी जैसी कि उसकी मनोभूमि बनी हुई होगी।
मनोभूमि के सुधारों में स्वाध्याय और सत्संग बहुत सहायक होता है, उपासना तथा दूसरे धार्मिक कर्मकाण्डों का भी बहुत कुछ असर होता है पर सबसे अधिक प्रभाव अन्न का होता है। जिस प्रकार का, जिस स्तर का आहार किया जाता है उसी तरह का मन बनता है। वस्तु जैसी कुछ बनी है उसका प्रधान गुण तो वही रहेगा। सुधार और संस्कार से उसकी प्रगति में कुछ न कुछ अन्तर तो आता है पर पूरा परिवर्तन नहीं होता। आज साधना मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति आहार पर उतना ध्यान नहीं देते जितना कि देना चाहिए। फलस्वरूप तमोगुणी और रजोगुणी प्रकृति की वस्तुएँ खाते रहने पर मन का मूल स्वभाव भी वैसा ही बन जाता है। स्वाध्याय-सत्संग में उस पर नियन्त्रण तो रहता है, पर जब कभी भीतर से कामना एवं वासना का प्रबल वेग उठता है तो उस बाह्य नियंत्रण को तोड़-फोड़ कर मनुष्य को दुष्कर्म में प्रवृत्त कर देता है। दुष्प्रवृत्तियाँ रुक नहीं पाती।
इस कठिनाई का एकमात्र हल यह है कि श्रेय पथ का पथिक अपने आहार पर सबसे अधिक ध्यान दे। पंचकोशी गायत्री उपासना का आरम्भ अन्नमय कोश की शुद्धि से ही होता है। नींव पक्की न हुई तो आगे ऊँची दीवार उठाने और उसे स्थायी बनाने का कार्यक्रम सफल न हो सकेगा ? जो व्यक्ति जिह्वा के गुलाम हैं, स्वादेन्द्रिय पर जो नियंत्रण नहीं कर सकते, शुद्ध आहार की प्राप्ति में जो कष्ट और असुविधा उठानी पड़ती है उसे सहन कर सकना जिनके वश की बात न हो, उन्हें योगाभ्यास, आत्मोत्कर्ष लक्ष्य की पूर्ति, स्वर्ग-मुक्ति जैसे स्वप्न नहीं ही देखने चाहिए। अध्यात्म शूरवीरों का मार्ग है। साधना को संग्राम कहा गया है। इसमें षडरिपुओं के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए घनघोर युद्ध करना पड़ता है। गीता में कृष्ण ने धनुर्धर अर्जुन को जिस महाभारत में प्रवृत्त किया है वह वस्तुतः आन्तरिक शत्रुओं से लड़ने का ही प्रशिक्षण है। अपनी दुर्बलता से लड़ पड़ने का प्रबल पुरुषार्थ किये बिना जीवन मुक्ति की विजय वैजयन्ती धारण कर सकना किसी के लिए भी संभव नहीं होता।
गायत्री उपासना की उच्चस्तरीय साधना में प्रवेश करने वाले योद्धा को सर्वप्रथम शिक्षण स्वादेन्द्रिय से लड़ने और आहार शुद्धि की सुव्यवस्था बनाने का ही है उसकी उपेक्षा करने से आगे का मार्ग अवरुद्ध ही पड़ा रहेगा, यह बात हर उच्चस्तरीय साधक को कान खोलकर सुन लेनी चाहिए और सुन समझकर गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि आहार को सात्विक बनाये बिना किसी भी प्रकार काम चलने वाला नहीं है। जो साधक मिष्ठान, पकवान और माल-मलाई विपुल परिमाण में चरते रहते हैं उन्हें वासनाएँ ऐसे ही पथ पर भ्रष्ट कर देती हैं जैसे मुर्गे की गर्दन को बिल्ली मरोड़ कर रख देती है। ऐसे साधकों को पग-पग पर आलस, प्रमाद सताता है और वासना तृष्णा की मृग मरीचिका उन्हें निरन्तर भ्रमाती, भटकाती रहती हैं।
हमारा अन्नमय कोश शुद्ध हो सके इसके लिए गत दो वर्षों में हमने अस्वाद-व्रत और उपवास का आरंभ करने के लिए साधकों को भली प्रकार समझाया है। बिना नमक और बिना शक्कर का अलौना फीका भोजन स्वास्थ्य की दृष्टि तो से हितकर है ही मन, को सतोगुणी बनाने में भी बहुत सहायक होता है। जो स्वाद पर काबू कर लेगा वही ब्रह्मचर्य भी पालन कर सकेगा, जिसकी जीभ चटोरी है उसके लिए काम वासना पर काबू पा सकना कभी संभव न होगा। इसलिए गत दो वर्षों से हम उच्च श्रेणी के साधकों को बराबर बताते रहे हैं कि उन्हें सप्ताह में एक दिन रविवार को या दो दिन रविवार और गुरुवार को अस्वाद व्रत करना चाहिए। उस दिन बिना नमक और बिना शक्कर का अलौना भोजन किया जाय। जिस दिन ऐसा आहार लिया जायेगा उस दिन मन की शक्ति बहुत कुछ बढ़ी रहेगी और अन्तःकरण में सात्विक सत्प्रवृत्तियों की ओर ही उत्साह उठता रहेगा। इस बात की परीक्षा करके कोई भी व्यक्ति परिणाम को प्रत्यक्ष देख सकता है।
गत दो वर्षों में अन्नमय कोश के साधकों को यह भी बताया गया है कि भोजन में वस्तुओं की संख्या कम से कम हो। एक बार में एक साथ अनेक प्रकार के, अनेक स्वाद और अनेक प्रकृति के भोजनों का खाया जाना न शरीर के लिए हितकर है और न अन्तःकरण की स्वस्थता को स्थिर रहने देता है। इसलिए रोटी के साथ एक या अधिक से अधिक दो वस्तुएं लेनी चाहिए। थाली में कटोरियों की संख्या का बढ़ाना साधना में प्रत्यक्ष विघ्न है।
हमें आशा है कि जो लोग पंचकोशी साधना में प्रवृत्त हैं वे इन दोनों नियमों को आचरण में ला रहे होंगे। जिनने इसमें ढील रखी हो उन्हें अब इन नियमों पर अधिक सावधानी और दृढ़ता के साथ आचरण करना आरंभ कर देना चाहिए। व्रत को पालन करने में ही कल्याण है। कभी करना कभी न करना यह शिथिलता संकल्पशक्ति को दुर्बल बनाती है और साहस घटता है। अतएव उचित यही है कि जो कुछ करना हो उसके संबंध में देर तक विचार किया जाय और जब भली प्रकार सोच समझ कर कोई निश्चय कर लिया जाय तो फिर दृढ़तापूर्वक उसे निभाया जाय। अस्वाद व्रत सप्ताह में दो दिन न बन पड़े तो भले ही एक दिन रखा जाय। रविवार असुविधाजनक पड़ता हो तो भले ही कोई दूसरा दिन रख लिया जाय, पर जो कुछ निश्चय किया जाय उस पर दृढ़ता से आरुढ़ रहा जाय, छोटे-मोटे बहाने मिलते ही अपने व्रत को तोड़ देना उचित नहीं। आस्थावान साधकों के लिए यह अशोभनीय है।
इस तीसरे वर्ष में आहार शुद्धि के लिए यह नया विधान आरंभ करना है कि भोजन दो बार ही लिया जाय। बार-बार खाते रहने और बकरी की तरह दिन भर मुँह चलाते रहने की आदत स्वास्थ्य को तो चौपट करने वाली है ही, जिह्वा की लोलुपता को भी भड़काती है और मन को असंयमी बनाती है। जो कुछ खाना हो दिन में दो बार ही खाया जाय। प्रातः जलपान में दूध, छाछ, नींबू, शहद का शरबत शाक का रसा जैसी पतली चीज ही ली जाय। भारी नाश्ता केवल कठोर श्रम करने वाले श्रमिकों के लिए उपयुक्त हो सकता है। तीसरे पहर नींबू का शरबत जैसी कोई चीज ली जा सकती है, जिन्हें चाय की आदत पड़ी हो वे गेहूँ का चोकर, अदरक, तुलसी के पत्ते उबालकर उसमें गुड़ एवं दूध डालकर देशी चाय बना लिया करें। यह बिना हानि का चाय का स्थानापन्न पेय है रात को सोते समय दूध लेने की अपेक्षा शाम को भोजन में पानी के स्थान पर दूध लेवे तो अच्छा है। बार-बार भोजन करने की आदत को घटाने के लिए इस वर्ष पंचकोशी साधना के साधकों को विशेष व्रत लेना चाहिए।
अन्नमय कोश के शोधन का दूसरा व्रत इस वर्ष यह लेना चाहिए कि सप्ताह में एक दिन अथवा कम से कम एक समय उपवास अवश्य किया जाय। अब तक अस्वाद व्रत ही पर्याप्त माना जाता था, उपवास अनिवार्य नहीं था। पर अब इस वर्ष से उच्चस्तरीय साधकों को सप्ताह में एक दिन या एक समय उपवास भी करना चाहिए। जिन्हें पूरे दिन उपवास करना हो वे फलाहार, शाक का रस, दूध, छाछ जैसी हलकी वस्तुएं लें। जिन्हें कठिन शारीरिक श्रम करना पड़ता है या शरीर से बहुत दुर्बल हैं उनके लिए एक समय का उपवास भी पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त दूध आदि आवश्यकतानुसार लिया जा सकता है। अस्वाद व्रत का अलौना आहार भी चल सकता है। जिसके लिए जैसी सुविधा हो उसे अपनी स्थिति के अनुसार निर्णय कर लेना चाहिए और उस पर दृढ़तापूर्वक आरुढ़ रहना चाहिए।
उपवास में बचाया हुआ अन्न या उसका मूल्य हर एक को ज्ञान-यज्ञ के लिए अपने पास सुरक्षित रखना चाहिए। पेट का हिस्सा काट कर आत्मा को भोजन देने में ही उसका उपयोग हो। घर में गायत्री ज्ञान मंदिर की स्थापना होनी चाहिए। यह छोटा-सा घरेलू पुस्तकालय निरन्तर बढ़ता रहे इसके लिए उपवास से बचाये हुए अन्न का मूल्य खर्च किया जाता रहे। नैतिक आध्यात्मिक एवं जीवन को ऊँचा उठाने वाले साहित्य का घरेलू पुस्तकालय एक छोटे गायत्री मंदिर के ही समान है। घर के प्रत्येक व्यक्ति के स्वाध्याय का अवसर मिलने लगे तो यह उपवास का क्रम साधक के लिए ही नहीं उसके सारे परिवार के लिए श्रेयष्कर सिद्ध हो सकता है।
इस तीसरे वर्ष में पंचकोशी साधना क्रम में (1) दो समय से अधिक बार भोजन न करना (2) साप्ताहिक उपवास और उसके बचे हुए अन्न से घरेलू ज्ञान मंदिर पुस्तकालय की अभिवृद्धि करना यह दो नये विधान सम्मिलित किये गये हैं। भोजन में वस्तुओं की संख्या का कम रहना और अस्वाद व्रत की पिछली परम्पराएँ तो साथ चलती रहेंगी ही, आहार के सम्बन्ध में अगले वर्षों में अपनी सात्विक कमाई का आहार, पकाने वाले का सात्विक स्वभावयुक्त, संस्कारवान होना आदि बातें बढ़ाई जायेंगी। अभी तो जो बताया गया है उसे ही अभ्यास में लाना और कार्य रूप में परिणत करना पर्याप्त है।
ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में गत वर्ष अपेक्षाकृत अधिक संयम रखने का निर्देश किया गया था उसमें क्रमशः हर वर्ष कुछ कड़ाई बढ़ाते ही चलना चाहिए। गृहस्थ होते हुए भी साधकों को अधिकाधिक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इससे आत्म-बल बढ़ता है, स्वास्थ्य, सुधरता है मानसिक शक्ति एवं बुद्धि में तीव्रता आती है, दीर्घ जीवन सुलभ होता है और सन्तान की संख्या बढ़ने से परिवार का अर्थ-संतुलन बिगड़ने से बच जाता है। पत्नी की सबसे बड़ी सेवा यही हो सकती है कि उसे अधिकाधिक ब्रह्मचर्य से रहने देकर निरोगिता एवं संतान-पालन के असहाय भार से बचने का लाभ प्राप्त करने दिया जाय। इस सुविधा के प्राप्त होने पर ही वह पति तथा परिवार की अधिक सेवा कर सकने में समर्थ हो सकती है।
ब्रह्मचर्य की लम्बी मर्यादाएं पालन करने वाले, असंयम से बचे रहने वाले पति-पत्नी ही सुयोग्य संतान उत्पन्न कर सकते हैं। युग-निर्माण के उपयुक्त नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए यह आवश्यक है कि गृहस्थ में भी वासनात्मक संयम का कड़ाई से पालन किया जाय और इन्द्रिय निग्रह की अवधि अधिकाधिक लम्बी बनाई जाती रहे। गायत्री उपासना में संलग्न पति पत्नी-स्वाध्याय और परस्पर विचार विनिमय द्वारा भावनात्मक उत्कर्ष करते रहें। साथ ही परमार्थिक कार्यों में भी आवश्यक अभिरुचि लेते रहें तो उनके शरीरों में वे तत्व उत्पन्न हो सकते हैं जिनके कारण नर रत्नों को जन्म दे सकना संभव होता है। हमारी हार्दिक इच्छा है कि गायत्री परिवार के सद्गृहस्थों के यहाँ उच्च कोटि की आत्माएँ जन्म लें। युग निर्माण के लिए वैसी ही विभूतियों की आवश्यकता भी पड़ेगी। दशरथ-कौशल्या, वसुदेव-देवकी, दुष्यन्त-शकुन्तला की तरह प्रबुद्ध दम्पत्ति ही यह सौभाग्य लाभ कर सकते हैं। पंचकोशी गायत्री उपासना में अन्नमय कोश को अनावरण करने का प्रयत्न करते हुए श्रद्धालु साधक यदि ब्रह्मचर्य को अधिकाधिक महत्व देते रहें और अपने साथ ही पत्नी का आत्मिक स्तर ऊंचा उठाने का प्रयत्न करते रहें तो गायत्री माता के अन्य वरदानों के साथ यह वरदान भी मिल सकता है कि इतिहास में अपना और पिता-माता का नाम अमर करने वाली सुसंतति उन्हें प्राप्त हो।
मनोमय कोश की द्वितीय भूमिका का ऐसा परिशोधन करना आवश्यक है जिससे उसमें रचनात्मक, सद्भावना युक्त प्रगतिशील विचारों के उठने का ही क्रम बना रहे। स्वार्थ-संकीर्णता, छिद्रान्वेषण, निराशा के विघटनात्मक विचार मनुष्य की मनोभूमि को विकृत कर देते हैं और उसमें आध्यात्मिक विकास के बीजाँकुर जम नहीं पाते।
मन के द्वारा ही शरीर का नियंत्रण होता है। यदि मन कुमार्गगामी एवं असंयमी हुआ तो उसका प्रभाव शरीर पर बहुत ही घातक पड़ेगा, स्वास्थ्य नष्ट होगा और अनेकों प्रकट-अप्रकट रोग उठ खड़े होंगे। जिसका मन उद्विग्न रहता है उसका शरीर भी विपन्न स्थिति में ही पड़ा रहेगा। कुकर्म उसी शरीर से बन पड़ते हैं, जिसके मन में पाप-बुद्धि का निवास होता है। आलसी वही शरीर होता है, जिसका मन अवसाद की भावनाओं से ग्रस्त होता है। हमें लौकिक ही नहीं आध्यात्मिक पुरुषार्थ भी शरीर के द्वारा ही करने पड़ते है। यदि शरीर आये दिन गड़बड़ी पैदा करता रहता है तो साधना का क्रम कैसे ठीक चलेगा? शरीर घोड़ा है मन सवार। सवार की इच्छानुसार ही तो घोड़े को चलना पड़ता है। अन्नमय कोश के परिशोधन के लिए मनोनिग्रह की भी नितान्त आवश्यकता मानी गई है।
गायत्री की उच्च स्तरीय पंचकोशी साधना के साधकों को मनोमय कोश की शुद्धि के लिए गत वर्षों में यह बताया गया है कि वे नित्य प्रति स्वाध्याय किया करें। विचारशील लोगों का सत्संग अब सुलभ नहीं रहा। जो निठल्ले लोग चेला मूँड़ने के लिए सत्संग के नाम पर अंट-संट बकते रहते हैं, उसे सुनने से लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। इसलिए जीवन की समस्याओं का व्यावहारिक हल सुझाने वाले सत्साहित्य को श्रद्धा और भावनापूर्वक एकाग्र चित्त से पढ़ना ही आज की स्थिति में सत्संग की आवश्यकता को भी पूरा करता है। संसार के श्रेष्ठ महापुरुष अपने विचार और अनुभव सुनाने के लिए पुस्तकों के माध्यम से हमारे लिये हर घड़ी प्रस्तुत रहते हैं। सत्साहित्य को सत्पुरुषों का मूर्तिमान हृदय एवं मस्तिष्क कहा जा सकता है। उसके साथ यदि हम ठीक तरह संपर्क बना सकें तो स्वाध्याय का प्रतिफल पारस पत्थर जैसा होता है। पारस द्वारा लोहे को सोना बना सकना भले ही कठिन कार्य हो पर स्वाध्याय के माध्यम से निष्कृष्ट मनोभूमि का उत्कृष्ट बन सकना सर्वथा सरल और सम्भव है।
युग-निर्माण-योजना के अधिकृत सत्संकल्प में वे सभी सिद्धान्त और आदर्श बीज रूप से मौजूद हैं जिनके आधार पर आध्यात्मिक मनोभूमि का विकसित होना सम्भव है। इसलिये सब शास्त्रों के निचोड़ स्वरूप सरल हिन्दी भाषा में जो ‘सत्संकल्प’ विनिर्मित किया है वह सितम्बर 62 के अंक में छापा जा चुका है और उसकी आवश्यकता विवेचना भी उस अंक में की जा चुकी है। वह सत्संकल्प साधकों के लिये दैनिक पाठ की आवश्यक वस्तु है। जैसे धार्मिक व्यक्ति किन्हीं गीता रामायण आदि का पाठ करते हैं, उसी श्रद्धा से सत्संकल्प का नित्य पाठ किया जाना चाहिए, क्योंकि धर्म शास्त्रों के समस्त बीज सिद्धान्तों का समावेश उसमें कर दिया गया है। मानसिक शुद्धि और उत्कर्ष के समस्त आधार उस थोड़ी-सी शब्दावली में सूत्र रूप से मौजूद हैं। इतना सरल और सुबोध, संक्षिप्त, और सारगर्भित, शास्त्र-स्वर दूसरा दृष्टिगोचर नहीं होता जितना कि अपना सत्संकल्प। इसलिये गत वर्ष मनोमय कोश के साधकों के लिए यह निर्देश किया गया था कि वे दैनिक स्वाध्याय के अतिरिक्त ‘सत्संकल्प’ का नित्य पाठ किया करें। उसका मनन और चिन्तन किया करें। यह विचार करें कि इन तथ्यों में से हमारे जीवन में कौन-कौन कितनी मात्रा में प्रयुक्त होता है। जो कमी रहती हो उसे कैसे पूरा किया जाय उसका उपाय सोचते रहना चाहिए। मनोभूमि को विधेयात्मक और परिष्कृत बनाने में यह दोनों ही साधन असाधारण रूप से उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
जिनने इन दोनों कार्यक्रमों को गत वर्षों में नियमित बना लिया हो, अपने स्वभाव को इस नियमितता का अभ्यस्त कर लिया हो वे ठीक प्रकार मनोभूमि को उत्कृष्ट बनाने में, मनोमय कोश के परिशोधन में सफल होते हुए आगे बढ़ रहे हैं। जिनने जप मात्र को ही पर्याप्त समझा है और जीवन शोधन ही अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं की उपेक्षा की है, उनकी गाड़ी एक प्रकार से रुक ही गई है। इस लिये इस मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक नैष्ठिक साधक के लिये यह अत्यंत आवश्यक है कि इन दोनों साधनों को -स्वाध्याय और सत्संकल्प पाठ को अपने दैनिक जीवन में अनिवार्य रूप से स्थान देना आरम्भ कर दे। जैसे भोजन, मलशोधन और शयन शरीर संतुलन के लिये आवश्यक माना जाता है उसी प्रकार मानसिक प्रगति के लिये इन दोनों साधनाओं को पूरी तत्परता और निष्ठा के साथ कार्यान्वित करते ही रहना चाहिए।
इस तीसरे वर्ष में दो साधन और भी नये बढ़ने हैं। (1) आत्म-निरीक्षण, (2) ज्ञान-विस्तार। प्रत्येक साधक को प्रातःकाल आँख खुलते ही सब से पहले पाँच मिनट गायत्री महामंत्र का मन ही मन जप करना चाहिये और इसके पश्चात् दिन भर का कार्यक्रम निर्धारित करना चाहिये कि कितने बजे क्या काम करना है। दिनचर्या निर्धारित करना समय के सदुपयोग की दृष्टि से आवश्यक है। क्रम-बद्ध काम करने से दूना काम होता है और अव्यवस्थापूर्वक कुछ न कुछ करते रहने से सब काम अधूरे रहते हैं और परिणाम भी बहुत स्वल्प मात्रा में हाथ लगता है। किन्तु निर्धारित प्रोग्राम बना कर दिन भर उसी के अनुसार चलते रहा जाय तो समय का आशाजनक सदुपयोग होता है और सफलता की ओर तेजी से बढ़ते चलने में भारी सहायता मिलती है।
हमें समय विभाजन तक ही सीमित नहीं रहना है, अपितु यह भी ध्यान रखना है कि उच्च भावनाओं और आदर्शों को कार्यान्वित करने की सुविधा भी हमारे दैनिक कार्यक्रमों में भरी रहे। साधारण कामकाज करते हुये भी उनके साथ उच्च भावनाओं को भी जोड़े रखें जिससे काम, साधारण काम मात्र न रह कर कर्मयोग जैसे बन जाय। अभ्यास करने से यह पूर्णतया सम्भव है। काम को बेगार भोगने, भार ढोने, विवशता अनुभव करने और झलाने के साथ यदि किया जायेगा तो वह थकान उत्पन्न करेगा और मन की खीज को भी बढ़ावेगा। पर यदि उसे ईश्वर पूजा, धर्म कर्तव्य का पालन एवं लोक-सेवा की मान्यता के साथ, हँसते, प्रसन्न होते पूरी ईमानदारी और दिलचस्पी के साथ किया जायेगा तो वही साधारण-सा काम हमारे लिये पुण्य और योगाभ्यास जैसा आध्यात्मिक सत्परिणाम उत्पन्न करेगा।
प्रातःकाल शैया-त्याग से पूर्व हमें मानसिक जप और ध्यान के अनन्तर दिन भर का ऐसा ही कार्यक्रम बनाना चाहिये। समय-विभाजन के साथ-साथ यह भी विचारना चाहिये कि उन कार्यों को करते हुये हम क्या बुद्धि, क्या भावना, क्या आकांक्षा और क्या मान्यता रखेंगे? उच्च भावनाओं के साथ यदि छोटा-सा साधारण काम किया जाय तो वह यज्ञ रूप बन जाता है। शास्त्रकारों ने-आध्यात्मिक मनीषियों ने पग-पग पर यही प्रतिपादित किया है कि हमें अपने दैनिक कार्यों को कर्मयोग में बदल देने की योजना प्रतिदिन प्रातःकाल शैया त्याग से पूर्व ही बना लेनी चाहिये और उसी योजना के साथ दिन भर का क्रम चलाना चाहिये।
जिस प्रकार प्रातःकाल शैया त्याग से पूर्व दिन भर का कार्यक्रम बनाना और जप ध्यान करना आवश्यक है उसी प्रकार रात को सोते समय बिस्तर पर जाने के बाद पुनः दो काम करने चाहिये। आज का दिन प्रातःकाल के निर्धारित क्रम से बीता कि नहीं? कार्य निर्धारित व्यवस्था के अनुसार पूरे हुए या नहीं? उच्च भावनाओं का आवश्यक सम्मिश्रण रहा या नहीं? जितनी सफलता मिली हो उसके लिये ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिये और जितनी गड़बड़ी हो उसके लिये यह देखना चाहिये कि उसमें अपना आलस्य, प्रमाद और संस्कार किस हद तक दोषी है? जो भूल अपनी हो उसे में आवश्यक सुधार करने की बात सोचनी चाहिये।
अन्त में सोते समय गायत्री माता का ध्यान और मंत्र का मानसिक जप करते हुए सोने का उपक्रम बनाना चाहिये। शैया पर जाने के बाद यदि कुछ अन्य कार्य करने हों तो इन दोनों कार्यों को अन्त में सोते समय के लिये ही रहना चाहिये। रात को निद्रा की गोद में जाते समय परमात्मा का ध्यान भजन करने का अभ्यास मृत्यु समय में उस स्थिति को प्राप्त करने का साधन है, जिसके लिए रामायण में कहा गया है कि “जन्म-जन्म मुनि-जतन कराहीं। अन्त राम कहि आवत नाहीं।” निद्रा भी एक प्रकार की दैनिक मृत्यु ही है। सोते समय भगवान का स्मरण करने वाला अन्त समय भी प्रभु का स्मरण ही करता है और उसकी सद्गति सुनिश्चित हो जाती है।
इस वर्ष का दूसरा नया कार्य है-ज्ञान विस्तार। शिक्षा का, पढ़ाई-लिखाई का विस्तार करने के लिये स्कूल, कालेज बराबर खुलते चले जा रहे हैं। इससे शिक्षा की प्रगति होती है, वह उचित है और आवश्यक भी। पर धन की वृद्धि के समान शिक्षा की वृद्धि भी तब तक निरर्थक और हानिकारक ही सिद्ध होगी, जब तक कि लोगों का आन्तरिक भावनात्मक स्तर ऊँचा न उठे। दुर्बुद्धि लोगों के हाथ में पहुँचने पर धन भी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है और शिक्षा भी। प्रगति के लिये सद्ज्ञान की नितान्त आवश्यकता है। खेद है कि आज सर्वत्र इसी तत्व की उपेक्षा हो रही है। फल-स्वरूप प्रगति के सारे कार्यक्रम उलटी उलझनें उत्पन्न करते चले जा रहे हैं।
हमें समाज सेवा की दृष्टि से भी और आत्म कल्याण की दृष्टि से भी ज्ञान-विस्तार को अत्यन्त पवित्र और आवश्यक धर्म कर्त्तव्य मानना चाहिये और उसके लिये नित्य ही कुछ न कुछ करना चाहिये। स्वाध्याय, संकल्प पाठ और चिन्तन, मनन द्वारा अपने लिये जो प्रकाश प्राप्त किया गया है, उसे दूसरों को भी देने का क्रम बनाना चाहिये। जो पढ़ा समझा है उसे लिखने सुनने से परिपक्वता आती है, इसे सभी छात्र और शिक्षक जानते हैं। जो कुछ हम समझते और सोचते हैं उसे दूसरों को ध्यान अध्यापक या परीक्षक मान कर सुनाने, समझाने लगें तो उससे अपना अभ्यास परिपक्व होगा और वह विचार गहराई तक मनोभूमि में प्रवेश करके संस्कार के रूप में सुदृढ़ भी होते चलेंगे। ज्ञान दान का पुण्य इस संसार के सबसे बड़े दान धर्मों में गिना गया है। उसे एकत्रित करते रहने से दैवी सम्पदाओं की पूँजी बढ़ती है और मनुष्य सच्चे अर्थों में अमीर बनता चला जाता है।
दूसरों को सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा करने वाले को लोकलाजवश भी अपने को अपेक्षाकृत श्रेष्ठ बनाना पड़ता है और बुराइयों से बचते रहना पड़ता है। यह लोकलाज भी आत्मोन्नति की दृष्टि से बहुत उपयोगी एवं आवश्यक है।
दैनिक परिवार गोष्ठी का इस वर्ष आवश्यक रूप से हमें आरम्भ कर देना चाहिए। अपने परिवार को-स्त्री-बच्चों को-पास बिठा कर उन्हें उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन को ढालने की शिक्षा देनी चाहिए और उसके लिये घर में आवश्यक वातावरण भी बनाना चाहिए। प्रत्येक गायत्री उपासक को इस बात का प्रयत्न करना चाहिए कि उसकी धर्मपत्नी सुशिक्षित बने। इसके लिए साक्षरता के साथ-साथ सद्ज्ञान भी उसे उपलब्ध होने लगे ऐसा प्रयत्न किया जाना चाहिए। मनोमय कोश की साधना करने वालों को अपने सम्बन्धी स्वजनों की मनोभूमि भी परिष्कृत करनी चाहिए ताकि उनकी दुर्बलताएँ अपनी मानसिक प्रगति में बाधक न बनें।
अपने निजी परिवार के अतिरिक्त स्वजन-सम्बन्धी, मित्र, परिचित एवं दूर भी रहने वाले सुहृदय सज्जनों को मौखिक रूप से अथवा पत्र-व्यवहार से प्रगतिशील जीवन बनाने का आवश्यक प्रेरणा देते रहना चाहिए। जिन लोगों से परिचय है उन्हें अपने घरेलू गायत्री ज्ञान मन्दिर, पुस्तकें तथा “अखण्ड-ज्योति” पढ़ने के लिए देते रहना चाहिए। पुस्तकें देने और फिर वापिस लेने के बहाने धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों के घर जाना और उनके साथ धर्म-चर्चा का अवसर निकालते रहना, ज्ञान विस्तार का एक श्रेष्ठ तरीका है। शिक्षा प्रसार के लिये स्कूल मौजूद हैं। पर ज्ञान तो चरित्र के द्वारा दिया जाता है। लेखनी और वाणी से ज्ञान का प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता है। पंचकोशी गायत्री उपासना का प्रत्येक साधक दूसरों की अपेक्षा आत्मिक दृष्टि से अधिक उत्कृष्ट होगा, इसलिए ज्ञान विस्तार का उत्तर-दायित्व भी स्वभावतः उसके कन्धे पर पड़ेगा। इस धर्म कर्तव्य से किसी को इन्कार नहीं करना चाहिए और न आलस, उपेक्षा ही दिखानी चाहिए।
मन शक्तियों का पुँज है। मन के शुद्ध, एकाग्र और सन्मार्गगामी बन जाने से मनुष्य शरीर में रहता हुआ भी जीव देवताओं के समान महान बन जाता है। इसकी शक्तियाँ इस शोधन के साथ ही असीम बनती चलती हैं। मनोमय कोश की साधना करते हुए प्रत्येक साधक को यही लक्ष्य ध्यान में रखना है कि मन हर घड़ी सत् चिन्तन करें। कुविचारों के अशुभ चिंतन के विरुद्ध तो निरन्तर संघर्ष ही जारी रखना चाहिए।
आश्विन की नव-रात्रि
आश्विन मास की नवरात्रि ता. 18 सितम्बर से लेकर 26 सितम्बर तक चलेगी। इस वर्ष एक तिथि बढ़ी है। पर नवरात्रि तो पूरी 9 रातों में सम्पन्न होती है। इस पर तिथियों के घटने बढ़ने का असर नहीं पड़ता। इसलिए सदा की भाँति गायत्री प्रेमियों को अपना नवरात्रि अनुष्ठान इन्हीं तिथियों में पूरा करना चाहिए।
प्रतिदिन 27 माला गायत्री मंत्र का जप करने में प्रायः 3 घंटे प्रतिदिन लगते हैं। अस्वाद व्रत या शाकाहार फलाहार का उपवास, ब्रह्मचर्य पालन, भूमि या तख्त पर सोना, हजामत, कपड़े धोना आदि अपनी सेवाएँ आप करना, चमड़े की बनी वस्तुओं का उपयोग न करना, इन पाँच तपश्चर्याग्रों के साथ साधना करनी चाहिए। अन्त में 240 आहुतियों का हवन, कन्या भोजन, गायत्री चालीसा, गायत्री चित्र आदि का प्रसाद स्वरूप वितरण करते हुए पूर्णाहुति करनी चाहिए। जो साधक अपने अनुष्ठान की सूचना मथुरा देंगे उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का संरक्षण और दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
प्रयत्न यह करना चाहिए कि जहाँ कई व्यक्ति नव रात्रि अनुष्ठान करने वाले हों वहाँ सब का सम्मिलित हवन सामूहिक समारोह आयोजन के साथ सम्पन्न हो। उपस्थित लोगों को गायत्री और यज्ञ का महत्व बताने वाले प्रवचन, भजन, कीर्तन आदि भी होने चाहिए। प्रत्येक सामूहिक आयोजन में “युग-निर्माण” का संकल्प दुहराया जाना चाहिए। जहाँ संभव हो वहाँ इन 9 दिनों में जीवन निर्माण सम्बन्धी आध्यात्मिक शिक्षण शिविर भी चलाने चाहिए। ऐसे आयोजनों के लिए नवरात्रि का पुण्य पर्व बहुत ही श्रेयष्कर है।
युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति
‘युग निर्माण योजना’ के अंतर्गत बताये गये 180 कार्यक्रमों को अखण्ड-ज्योति के हजारों पाठकों ने उत्साह-वर्धक तत्परता के साथ कार्यान्वित करना आरम्भ कर दिया है। उनके सब समाचारों को छापा जा सकना संभव नहीं। पर उस स्तंभ के अंतर्गत कुछ प्रेरणाप्रद विचार एवं दूसरों के लिए मार्ग-दर्शन सिद्ध होने वाले पत्र नियमित रूप से दिये जाते रहें ऐसी व्यवस्था की गई है।)
बहरायच जिले में सद्भावना यात्रा
प्राचीन काल में साधु ब्राह्मण परिव्राजक बनकर घर-घर, गाँव-गाँव धर्म बुद्धि जागृत करने के लिए भ्रमण करते थे। तीर्थ यात्राएँ पैदल होती थीं। तीर्थ यात्री जिन-जिन गाँवों में होकर जाते थे वहाँ धर्म उत्साह पैदा करते थे और जहाँ ठहरते थे, वहाँ धर्म समारोह के आयोजन होते रहते थे। इस प्रकार मानव अन्तःकरण की प्रसुप्त धर्म-बुद्धि को जागृत करने के लिए निरन्तर कार्य होता रहता था।
खेद है कि ये परम्पराएं आज भिन्न-भिन्न हो गई हैं और उनके अभाव में धर्म बुद्धि कुँठित होकर सन्मार्ग की ओर उपेक्षा वृत्ति बढ़ने लगी है। युग-निर्माण योजना में इन पुण्य प्रक्रियाओं को पुनर्जीवित करने पर बहुत जोर दिया गया है। विचारशील सत्पुरुषों की सामूहिक टोलियाँ सद्भावना प्रसार की यात्रा पर निकला करें और घर-घर जन-संपर्क स्थापित करते हुए धर्म बुद्धि जागृत करें तो इनसे इतना ठोस कार्य हो सकता है जितना अन्य उपायों से संभव नहीं। आचार्य जी धर्म फेरियों की प्रक्रिया को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। उनने व्यक्तिगत रूप से हमें अपने जिले में ऐसी पदयात्रा का आयोजन करने की प्रेरणा भी दी। तदनुसार गत जून में इसका एक सुन्दर सफल आयोजन हो सका। पूरा जून मास बहरायच जिले में इस प्रकार की पद यात्रा के लिए रखा गया। सर्व श्री शिवप्रसाद शुक्ल, कन्हैयालाल श्रीवास्तव, फूलप्रसाद, जगदेव सिंह, विनोदकुमार, आनन्दशंकर सिंह, टीकासिंह, अयोध्यासिंह इस टोली के सदस्य बने और तीस दिन में तीस गाँवों में कार्यक्रम रखे गये थे, वहाँ के निवासियों को पूर्व सूचना दे दी गई थी ताकि वे नियत दिन आवश्यक तैयारी रखें। क्या तैयारी करनी चाहिए यह उन्हें पहले ही विस्तारपूर्वक बता दिया गया था। प्रायः सभी जगह तैयारी पूर्ण मिली, ग्रामवासियों ने हमारी टोली का हार्दिक स्वागत किया, कार्यक्रम को सफल बनाने में पूरा-पूरा योग दिया, और टोली के प्रयत्नों से प्रभावित हो समुचित लाभ भी उठाया।
टोली के सदस्य शाम को 5-6 बजे तक निश्चित ग्राम में पहुँच जाते थे। नित्यकर्म से निवृत्त होकर आठ बजे तक भोजन कर लेते थे। फिर उस ग्राम की तथा समीपवर्ती गाँवों की जनता सत्संग के लिए इकट्ठी होने लगती थी। प्रार्थना, वंदना के बाद प्रवचन होते थे। श्री कन्हैयालाल जी उपासना पर, श्री गिरीश देव वर्मा रामायण के माध्यम से चरित्र निर्माण और श्री बद्रीप्रसाद जी दोष दुर्गुणों के निवारण पर जोर देते थे। आगे हमें क्या करना चाहिए, जीवन क्रम कैसा बनाना चाहिए इस विषय पर अन्य वक्ता बोलते थे। इस प्रकार सत्संग 10 बजे तक चलाने की बात सोची गई थी पर वह प्रायः 11-12 बजे तक ही बंद हो पाता था।
प्रातःकाल 5 बजे उठ सब लोग पुनः एकत्रित हो जाते थे। सामूहिक संध्या, एवं जप के बाद हवन आरंभ होता था जिसमें ग्रामवासी श्रद्धापूर्वक भाग लेते थे । नारियों का उत्साह और भी अधिक रहता था। यह क्रम नौ बजे तक चलता। इसके बाद गायत्री और यज्ञ की महत्ता पर एक घंटा प्रवचन होता और उपस्थित लोगों से नशा, माँस, आलस, असत्य, फूट, क्रोध, दहेज, मृत्युभोज, गाली देना आदि दोषों को छोड़ने और नित्य उपासना स्वाध्याय, करने, बड़ों के चरण स्पर्श, साप्ताहिक उपवास, नागरिकता, सामूहिकता आदि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रतिज्ञाएँ यज्ञ भगवान की साक्षी में कराई जातीं। यज्ञ कार्य प्रायः सभी जगह पं. शिवप्रसाद शुक्ल ने कराये । प्रातः काल का कार्यक्रम प्रायः दस बजे तक चलता था। दोपहर को भोजन, विश्राम और व्यक्तिगत परामर्श का कार्यक्रम चलता और तीसरे पहर अगले गाँव की यात्रा के लिए टोली रवाना हो जाती।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार रिसिया वंशपुरवा, बदैना बाजार, धुमनी, सधवापुर, एरिया, गदामार, कटघरा कलाँ, भिलौरा बाँसू, फरवटपुर मरबट, गौड़हिया, केसरगंज, नवाबगंज, नानपारा, पैडीहा, चिलपरिया, पहुँचकट्टा, इकौना तिलकपुर, आदि ग्रामों में यात्रा दलनें सफल आयोजन सम्पन्न किये। अन्तिम दिन बहरायच नगर में श्री बद्री प्रसाद जी के मकान पर सामूहिक सम्मेलन हुआ जिसमें जिले की शाखाओं के सदस्यगण भी सम्मिलित हुये। रात्रि के प्रवचनों के पश्चात् आगामी कार्यक्रमों पर विचार होता रहा। दूसरे दिन प्रातःकाल यज्ञ-कार्यक्रम के उपरान्त टोली के कार्यक्रम की समाप्ति घोषित की गई।
इस एक महीने में यात्रा दल को जहाँ शारीरिक कठिनाइयाँ और मानसिक दबाव अनुभव करने पड़े, वहाँ आत्मिक अपार आनन्द भी मिला। हजारों व्यक्तियों को धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा और उसके फलस्वरूप युग-निर्माण में योगदान की संभावना की कल्पना मात्र से हम सब को भारी संतोष प्राप्त होता है।
-गिरीश देव वर्मा, बहरायच
गायत्री मंदिर की नव रचना
युग निर्माण योजना में अभिरुचि रखने वाले व्यक्तियों का परस्पर मिलते-जुलते रहना, विचार विनिमय करना, निर्धारित कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना तथा प्रेम भाव की वृद्धि करना आवश्यक है। क्योंकि जो कार्य मिलजुल कर संगठित प्रयत्नों के द्वारा हो सकता है वह अकेले रह कर नहीं किया जा सकता। संगठन के लिए आचार्य जी सदा से जोर देते भी रहे हैं।
जून का अंक पढ़ कर निश्चय किया गया कि नागपुर में युग-निर्माण केन्द्र का अधिक सुव्यवस्थित कार्यक्रम बनाना चाहिए और यहाँ विधिवत् एक ज्ञान-मंदिर की स्थापना होनी चाहिए। तदनुसार गत गुरुपूर्णिमा से 24 लक्ष गायत्री मंत्र लेखन लोगों से कराने का कार्यक्रम आरंभ कर दिया गया है। इस आध्यात्मिक श्रमदान में कम से कम 108 व्यक्ति भाग लेंगे।
हम लोगों ने पुराने गायत्री उपासकों तथा ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों के घरों पर जा-जाकर, घूम कर अध्यात्म यज्ञ में भाग लेने की प्रेरणा दी है। मंत्र लेखन चालू हो गया है। जब यह कार्य पूरा हो जायेगा तब अन्त में सामूहिक गायत्री यज्ञ रखा जायगा, जिसमें मंत्र लेखन करने वाले व्यक्ति ही आहुतियाँ देंगे। उसी दिन सुसज्जित अलमारियों में मंत्र लेखन की जिल्ददार कापियाँ स्थापित की जायेंगी और गायत्री माता की बड़े साहज कर आइल पेन्ट जो चित्र बनेगा उसकी प्रतिष्ठा होगी। मूर्तियों की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा में पुजारी रखने और विधिवत् पूजा होने का बन्धन है पर चित्र के लिए यह अनिवार्य नहीं। इसलिए माता का चित्र एवं मन्त्र लेखन की सम्मिलित स्थापना से जो मन्दिर बनेगा वही सब के लिए सुविधाजनक रहेगा।
अभी मंदिर की निज की इमारत नहीं होगी। हम में से किसी सदस्य के मकान का एक कमरा ही इसके लिए प्रयुक्त होगा। स्थापना के पश्चात् दैनिक पूजन, हवन, कीर्तन, सत्संग आदि की व्यवस्था रहेगी। जिन लोगों ने मंत्र लेखन किया है वे इस केन्द्र के संचालक सदस्य माने जावेंगे, और उन्हें यहाँ के कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए विशेष आग्रह एवं सम्मानपूर्वक बुलाया जाता रहेगा। यों यहाँ से चलने वाली प्रवृत्तियों में कोई भी धार्मिक व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक भाग ले सकता है।
हम सब कार्यकर्ताओं के परस्पर मिलते-जुलते रहने के लिए यह गायत्री मन्दिर ही एक प्रकार से मिलन-मन्दिर रहेगा। युग-निर्माण योजना के लिए जिन क्लबों को बनाने का संकेत, प्रेरणा की गई है वहीं कार्य यह मिलन मन्दिर करेगा। यहीं से नागपुर नगर में उन सब प्रवृत्तियों का संचालन हुआ करेगा जो युग-निर्माण के लिए आवश्यक हैं। पर्व त्यौहार मनाने के लिए सदस्यगण यहीं इकट्ठे हुआ करेंगे। पुस्तकालय, वाचनालय, संगीत शिक्षा, पाठशाला आदि की जो भी प्रवृत्तियाँ संभव होंगी इस मंदिर में चला करेंगी। नागपुर शाखा का इसे केन्द्रीय कार्यालय भी कह सकते हैं।
आचार्य जी ने ऐसे ही बिना खर्च के बनने वाले, ईंट चूने से नहीं, श्रद्धा और श्रम के माध्यम से बनने वाले गायत्री मंदिरों के निर्माण पर जोर दिया है। हम लोगों ने उनके इसी आदेश का पालन करते हुए नागपुर में यह रचनात्मक कार्य आरम्भ किया है।
-मोरेश्वर रामचन्द्र पारघी, नागपुर
संगीत के माध्यम से भाव जागरण
जून के युग-निर्माण अंक में संगीत एवं कविताओं के माध्यम से जन भावनाओं को सन्मार्ग की ओर मोड़ने की योजना छपी है। गत जेष्ठ मास में जब मैं चान्द्रायण व्रत शिविर में सम्मिलित होने मथुरा गया था तब आचार्य जी ने इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक चर्चा की थी और कहा था कि गायन और वाद्य का जन भावनाओं को तरंगित करने से भारी महत्व है, इसलिए जिन्हें यह कला आती हो उन्हें अपनी इस प्रतिभा का उपयोग जन जागरण के लिए करना चाहिए। युग निर्माण के लिए यह कार्यक्रम एक अत्यन्त महत्व का माध्यम सिद्ध होगा। आचार्य जी की उस प्रेरणा से मैं बहुत प्रभावित हुआ था और उसी समय से निश्चय किया कि उस दशा में एक सुव्यवस्थित योजना बनाकर जीवन भर कार्यरत रहूँगा।
यों संगीत में मुझे आरम्भ से ही अभिरुचि रही है और उस दिशा में अध्ययन-अध्यापन का कार्य चिरकाल से कर रहा हूँ। संगीत मेरा प्रिय विषय होने के कारण इस कला की साधना में मेरे जीवन का अधिकाँश समय लगा है। शास्त्रीय विधि से संगीत की शिक्षा प्राप्त करके ‘संगीतालंकार’ की उपाधि प्राप्त की है। पर अब तक यह विषय कला की साधना की दृष्टि से करता रहा हूँ। युग-निमार्ण योजना ने मुझे एक नई दृष्टि दी है और यह प्रेरणा मिली है कि वाणी की उस महती शक्ति का उपयोग सद्भावनाओं के विकास का दृष्टिकोण रखकर ही करना उचित है।
गुरु पूर्णिमा के पश्चात् मैंने अपने घर पर एक संगीत, कक्षा प्रारम्भ कर दी है, जिसमें वाद्य-शिक्षण को गौण मानकर उच्च भावनाओं को विकसित करने वाली कविताओं का गाना सिखाया जाय। संगीत शिक्षा का माध्यम केवल उत्कृष्ट भावोत्पादक कविताएँ ही रहती हैं। गाने योग्य ऐसी कविताओं का एक अच्छा संग्रह भी अब तक मेरे पास हो गया है।
संगीत क्षेत्र के अपने अन्य मित्रों को भी मैंने ऐसी ही प्रेरणा दी है। उन्होंने इस नये सुझाव का हृदय से स्वागत किया है। पुराने ढंग के भजन कीर्तन ही उन्हें याद थे। इसलिए इच्छा रहते हुए भी वे कुछ न कर पा रहे थे। मैंने बहुत-सी जीवन संचारिणी कविताएँ सिखाई हैं और उनकी वरदन-प्रणाली का अभ्यास कराया है। अब हम लोगों का एक गायक परिवार दिन-दिन बढ़ता जाता है। जब कभी हमारी यह मित्र मंडली इकट्ठी होती है और गायन-वाद्य का क्रम चलता है तो पहले की तरह कला की मधुरता ही सीमित नहीं रह जाती वरन् श्रोताओं को जीवन का नव-निर्माण करने वाली भावनाओं से भी तरंगित करती हैं। अब हमारी गोष्ठियाँ, प्रेरणाएं और भावनाओं से पूरी भरी रहती हैं।
थोड़े दिनों से इस छोटे से अनुभव से मुझे विश्वास हो चला है कि ‘युग-निर्माण परिवार’ से सम्बन्धित हजारों संगीतज्ञ मेरी तरह अपनी कला भाव-निर्माण में उपयोग करेंगे तो उसका व्यापक प्रभाव होगा। गायन कला के माध्यम से जन-मानस को तरंगित करने की बात कितनी महत्वपूर्ण और प्रभावशाली है इसे मैं आज भली-भाँति अनुभव कर रहा हूँ। विश्वास है कि निकट भविष्य में देशव्यापी परिवार में इस माध्यम का उपयोग करके लोगों की मनोभूमि बदलने में भारी सफलता प्राप्त होगी।
-सुधाराम महाजन,
गुजरात में योजना का प्रकाश
‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम से ‘युग निर्माण योजना’ की जो प्रबुद्ध विचारधारा प्रसारित हो रही है उसे जब मैं ध्यानपूर्वक पढ़ता हूँ तो अन्तःकरण पुलकित हो उठता है। मनुष्य जाति आज जिस पतन पथ पर चलती हुई अपना सर्वनाश करने के लिए बढ़ रही है उसे रोकने के लिए ठोस और प्रभावशाली उपाय यही हो सकता है कि नैतिक विचारधारा को परी शक्ति के साथ जनमानस प्रवेश करने का एक सुसंगठित आन्दोलन किया जाय। ‘युग निर्माण योजना’ में इस उद्देश्य की पूर्ति की सभी संभावनाएँ बीज रूप से मौजूद हैं। जिन सुदृढ़ भुजाओं के द्वारा इस प्रवृत्ति का संचालन हो रहा है उनकी मजबूती को देखते हुए यह विश्वास होता है कि मानव जाति के भाग्य पुनः फिर और प्राचीनकाल जैसी मंगलमयी परिस्थितियाँ पुनः उत्पन्न होगी।
योजना को गत डेढ़ वर्ष से मैं बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ता चला आ रहा हूँ। जितना ही पढ़ता हूँ उतनी ही श्रद्धा और भी अधिक बढ़ती है। अब मेरा मन निरन्तर इस बात के लिए अकुलाता रहता है कि किस प्रकार इस योजना में सक्रिय भाग लूँ और अपनी आन्तरिक श्रद्धा, सद्भावना को चरितार्थ करने का सुअवसर प्राप्त करूं ?
जून अंक ने मुझे बहुत प्रकाश दिया है। अपनी परिस्थितियों के अनुसार मैं अब अपना अधिकाधिक समय इस कार्य में लगाऊँगा कि ‘अखण्ड-ज्योति’ में प्रकाशित विचारधारा को गुजराती-भाषी जनता के लिए सुलभ बनाऊँ। आचार्य जी जो कुछ लिखते हैं वह हिन्दी में होता है। हिन्दी राष्ट्र भाषा तो है पर प्रान्तों में वहाँ की क्षेत्रीय भाषाएँ ही अधिक प्रचलित हैं और अधिक सुबोध एवं लोकप्रिय हैं। इसलिए यह नितान्त आवश्यक है ‘युग निर्माण’ विचारधारा का लाभ केवल हिन्दी भाषा जनता तक ही सीमित न रहे वरन् उसे विश्व की नहीं तो कम से कम भारत की समस्त भाषाओं में तो प्रसारित किया ही जाय। यदि यह प्रयत्न न हो सका तो युग निर्माण आन्दोलन हिन्दी भाषी क्षेत्र की एक छोटी-सी प्रवृत्ति मात्र बनकर सीमित रह जायगा।
मैंने युग निर्माण विचारधारा को गुजराती में अनुवाद करते रहने के विशाल कार्य में अपनी अकिंचन सेवाएँ निरन्तर देते रहने का निश्चय किया है। अनुवादों को गुजराती पत्र पत्रिकाओं में छपाना ही होगा। सितम्बर के ‘अखण्ड ज्योति’ में युग-निर्माण सत् संकल्प की जो विस्तृत विवेचना छपी थी उसका धारावाहिक अनुवाद गुजराती की ‘गायत्री विज्ञान’ पत्रिका में प्रकाशित हो रहा है। ‘ज्ञान यज्ञ ग्रन्थ माला’ के नाम से मैंने एक छोटा सस्ता प्रकाशन स्वयं भी आरंभ किया है, जिसमें युग-निर्माण विचारधारा का ही विस्तार है।
आगे पूरी लगन से यह कार्य करूंगा। युग निर्माण की विचारधारा को गुजराती में अनुवादित करूंगा और उसे इस प्रान्त की पत्र पत्रिकाओं में भेजता रहूँगा। सस्ते ट्रैक्टों के रूप में भी यह साहित्य फैले ऐसा भी प्रयत्न करूंगा।
गुजरात बड़ा प्रान्त है। इसमें युग-निर्माण के लिए आवश्यक जागृति और जीवन उत्पन्न करने के लिए मेरी जैसी श्रद्धा भावना रखने वाले अनेकों साहित्यिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पड़ेगी। आशा करनी चाहिए कि ऐसे धर्म सेवकों की भी निकट भविष्य में कभी न रहेगी जो गुजरात में दीपक के समान जलने को तैयार होकर प्रकाश पाने को तैयार हों, तेल की प्रचुर मात्रा हमें ‘अखण्ड ज्योति’ से मिल ही जाती है।
-नटवरलाल नाथालाल जानी, राजकोट।
ज्ञानवृद्धि का सत्प्रयत्न
भारतवर्ष की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा यहाँ की निरक्षरता है। ज्ञान को मनुष्यता का प्रधान चिन्ह माना गया है। सत्ज्ञान के बिना मानवीय सत्प्रवृत्तियों का विकास संभव नहीं और सद्ज्ञान साक्षरता के माध्यम से ही उपलब्ध हो सकता है। आँखों के बिना जिस प्रकार हर समय अँधेरा ही रहता है, उसी प्रकार शिक्षा के अभाव में मनुष्य को लौकिक ज्ञान से, सांसारिक परिस्थितियों से भी वंचित रहना पड़ता है। ऐसे लोग आत्मा का कल्याण करने वाला सद्ज्ञान तो पावेंगे ही कैसे ?
शिक्षा को मैं मानव-जीवन की अत्यधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता मानता हूँ। युग-निर्माण योजना में भी उनके लिए बहुत जोर दिया गया है। मैंने निश्चय किया हैं कि मैं इस दिशा में अधिकाधिक प्रयत्न करूंगा। हमारा पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। उधर पिछड़ी जातियों के लोग अधिक रहते हैं। सवर्णों की अपेक्षा उनकी आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्थिति भी गिरी हुई है। इसलिए मैंने सोचा है कि इन लोगों की ओर अधिक ध्यान दिया जाय और इलाके के हर गाँव में एक प्रौढ़ पाठशाला चलाई जाय। इसके लिए सेवा भावना से पढ़ाने वाले व्यक्ति ढूंढ़ने में लग गया हूँ। कहीं-कहीं वेतन देकर भी अध्यापक नियुक्त करने होंगे। इसके लिए कुछ धन जनता के सहयोग से और कुछ सरकारी सहायता से प्राप्त करने की योजना बनी है। इस सम्बन्ध में काफी काम हो चुका है। कई प्रौढ़ पाठशालायें चालू हो गई हैं और आशा है कि इसी वर्ष इनकी संख्या कम से कम 20 अवश्य हो जायेगी। अवकाश के समय बड़ी आयु के स्त्री-पुरुष उनमें शिक्षण प्राप्त किया करेंगे। जो बच्चे स्कूल नहीं जा सकते उनकी पढ़ाई भी वहाँ हुआ करेगी।
साक्षरों के लिए उनकी ज्ञान-वृद्धि का माध्यम पुस्तकालय ही हो सकते हैं। जीवन निर्माण करने वाली पुस्तकें ही इन पुस्तकालयों में रहेंगी, चाहे उनकी संख्या कम ही क्यों न हो। ऐसी ही पत्र पत्रिकाएं भी उनमें मँगाई जायेंगी। एक व्यक्ति संचालक नियुक्त किया जायगा जो पुस्तकों और अखबारों को सँभाल कर रखे, नियत समय पर पुस्तकालय भी साक्षरों के लिए आवश्यक ज्ञानवृद्धि के एक उपकरण ही होंगे। इन्हें भी विद्यालय ही कहना चाहिए।
मेरा काम आसपास के गाँवों में भ्रमण करने और दौड़ धूप का रहता है। सो इस क्षेत्र में विद्या का आलोक फैलाने के लिए निरन्तर सचेष्ट रहने का मैंने निश्चय किया है और गत गुरु- पूर्णिमा से इस निश्चय को कार्यान्वित करना भी आरम्भ कर दिया है।
-दलीप कुमार दत्त, अमरपाटन
एकाकी शुभारम्भ
राष्ट्र-निर्माण के लिए कुछ सेवा कार्य करने की अपनी इच्छा सदा से रही है, पर यह सूझ नहीं पड़ता था कि अकेला आदमी किस प्रकार क्या करे? संगठित संस्थायें तो बहुत कुछ करती हैं पर अकेला व्यक्ति क्या कर सकता है, उसके छोटे प्रयत्न और थोड़े सामर्थ्य से क्या कुछ हो सकता है इसका कोई रास्ता विदित न था। जून का अंक पढ़ा तो आंखें खुल गई और समझ में आया कि केवल संस्थाओं या संगठनों के माध्यम से ही लोक सेवा नहीं की जाती। अकेला व्यक्ति अपने सीमित साधनों से भी कुछ-कुछ कर ही सकता है और इस प्रकार एकाकी प्रयत्न भी अनेक व्यक्ति करने लगें तो संस्थाओं के खर्चीले एवं प्रतिस्पर्धा पूर्ण आडम्बरों के बजाय ठोस और महत्वपूर्ण कार्य हो सकता है।
गत गुरु पूर्णिमा को युग-निर्माण योजना का विधिवत् उद्घाटन हुआ है। जो कुछ साधन मिले उन्हीं से पाठशाला आरंभ कर दी है। प्रथम दिन केवल 4 व्यक्ति पढ़ने आये, पर अब उनकी संख्या बढ़ती जाती है। आशा है कि संख्या की दृष्टि से भी हमारा शिक्षण कार्य कुछ दिन में काफी आगे बढ़ जायेगा।
शिक्षार्थियों को नित्य एक लेख अखण्ड-ज्योति का पढ़ कर सुनाया जाता है और फिर कुछ देर उस लेख की विवेचना की जाती है। इस प्रकार शिक्षा और दीक्षा के दोनों कार्यक्रम साथ-साथ चल रहे हैं। यह छोटा प्रयत्न देखने में साधारण-सा भले प्रतीत होता है पर युग-निर्माण योजना की पूर्ति में इस से सहायता मिलेगी इसका मुझे काफी संतोष है। स्वान्तः सुखाय सेवा-धर्म को अपने जीवन की शुभारंभ मुझे बहुत आनन्दमय प्रतीत हो रहा है।
-वीरसिंह चौहान, पारा
प्रौढ़ महिलाओं की शिक्षा व्यवस्था
छोटी आयु में विधवा हो जाने के बाद जीवन निरर्थक ही दिखता था। सब लोग मुझे अभाग की तकदीर को कोसते ही रहते थे। कभी ससुराल कभी माता के घर तिरस्कृत और भारभूत प्राण की तरह जिन्दगी के दिन किसी प्रकार दूर करती रही। मन तो न लगता था पर भगवान की पूजा में भी बैठती थी। इस प्रकार वैधव्य चौदह वर्ष कटे।
मेरी रिश्ते की मौसी स्कूल में अध्यापिका थी। वे बार-बार यही कहती रहती थीं कि तुम्हें पढ़ना चाहिए। इससे समय कटेगा, ज्ञान प्राप्त होगा और किसी की दया पर भार रूप जीने की हीन स्थिति न रहेगी। चौदह वर्ष तक तो उनकी बात पर ध्यान न दिया पर जब रिटायर हो गई और हमारे पड़ौस के मकान ही में रहने लगीं तो उनके आग्रह से मैंने पढ़ना शुरू किया। तीस वर्ष की आयु में पढ़ाई करना अटपटा तो लगा पर मौसीजी के आग्रह पर वह मुझे करना ही पड़ा। चार वर्ष में हिन्दी मिडिल पास कर लिया। नौकरी करने की आवश्यकता स्तर मौजूद थे।
पड़ौस में एक मास्टर साहब रहते हैं उनके अखण्ड-ज्योति आती थी। उनसे माँगकर मौसी पढ़ने लाया करती थी और उसके लेख मुझे सुनाया करती थीं। कुछ ही दिन के बाद में मुझे वे लेख बहुत रुचिकर लगने लगे और अपने पैसे भेज कर मंगाना शुरू कर दी। कुछ दिन के बाद जीवन का साथ कनेडडडडड के सम्बन्ध में आचार्य जी से परामर्श और पत्र-व्यवहार भी करना आरम्भ कर दिया। इससे मुझे बड़ी प्रेरणा मिली। दो वर्षों से युग- निर्माण की जो प्रौढ़ विचारधारा आ रही है। उसने मेरे जान पर यही छाप डालो के परमार्थ किये बिना मनुष्य का जीवन सार्थक नहीं हो सकता।
जून का युग-निमार्ण अंक पढ़ा उसमें मेरे उपयुक्त कार्यक्रम मौजूद थे। महिलाओं में शिक्षा प्रसार भारतवर्ष की सबसे बड़ी आवश्यकता है, इस तथ्य को हृदयंगम करते हुए मैंने गत गुरु पूर्णिमा के निश्चय किया कि मैं महिलाओं की प्रौढ़ पाठशाला चलाऊँगी। वृद्धा मौसी जी ने इस कार्य में मुझे पूरा सहयोग देने का वचन दिया। हम दोनों मुहल्ले भर में घर-घर घूमे और तीसरे पहर दो से पाँच बजे तक मेरे घर पढ़ने आने के लिए अनेक महिलाओं को समझाया। आरंभ में 12 महिलाएँ तैयार हुई। गुरु-पूर्णिमा को हवन कीर्तन के साथ हमारी युग-निमार्ण महिला प्रौढ़ पाठशाला का शुभारंभ हुआ। इस एक महीने में पढ़ने वाली महिलाओं की संख्या 19 हो गई है। लगता है कि कुछ दिनों में यह संख्या काफी बढ़ेगी और मेरे छोटे घर में पढ़ाई का स्थान न रहा तो दूसरी और कोई उपयुक्त जगह पाठशाला के लिए ढूँढ़नी पड़ेगी।
सरकारी जूनियर हाईस्कूल तथा प्रयाग महिला विद्यापीठ का कोर्स पढ़ाना चालू किया गया है। सिलाई और संगीत की कक्षाएँ भी साथ-साथ चल रही हैं। अभी मेरा हारमोनियम और सिलाई मशीन ही काम आ रही हैं। पर आगे इनकी और भी जरूरत पड़ेगी सो शिक्षार्थी महिलाओं ने थोड़ा-थोड़ा चंदा करके उसकी व्यवस्था करने का भी विचार व्यक्त किया है। यह प्रयत्न यदि थोड़ी-सी महिलाओं के जीवन में भी कुछ प्रकाश उत्पन्न कर सका तो मैं समझूँगी कि युग-निमार्ण के लिए मेरी भी कुछ उपयोगिता रही और उपेक्षित तिरस्कृत, एवं निरर्थक समझा जाने वाला जीवन किसी हद तक सार्थक हुआ।
-कमलेश कुमारी वर्मा, खड़गपुर
परिवार निर्माण का प्रयत्न
युग-निर्माण योजना को ध्यान पूर्वक पढ़ा तो प्रतीत हुआ कि समाज की ठोस सेवा अपने परिवार को सुधारने की पद्धति अपनाने से ही संभव हो सकती है। यह बात मुझे बिलकुल सही जँची। हर आदमी अपना और अपने परिवार का सुधार कर ले तो इसी आधार पर सारे समाज और संसार का सुधार हो सकता है। एक दूसरे को उपदेश करने की अपेक्षा अपना और अपने परिवार का सुधार कर सकना अधिक वास्तविक और अधिक उपयोगी है।
गुरु पूर्णिमा से मैंने अपने घर की विचारगोष्ठी आरम्भ कर दी है। रात को 8 से 9 बजे तक का समय इसी के लिए नियत कर लिया है। मनुष्य जीवन की विभिन्न समस्याओं की जानकारी अपने घर वालों को कराता है और यह बताता है कि जीवन को कैसे सुव्यवस्थित और प्रगतिशील बनाना चाहिए। कथा, कहानियाँ, ऐतिहासिक घटनायें तथा वर्तमान समाचार सुनाकर उनका मनोरंजन भी करता है और शिक्षा भी करता है जिसे सब रुचिपूर्वक सुनते हैं।
गोष्ठी में घर की समस्याओं पर छोटे-बड़े सभी अपने विचार और सुझाव प्रकट करते हैं, जिससे कई उलझनें सुलझती हैं तथा अच्छी व्यवस्था बनाने में योग मिलता है। घर में सब छोटे-बड़े परस्पर ‘तुम’ ‘आप’ का संबोधन करने लगे हैं, ‘तू’ कहना छोड़ दिया गया है। अपने से बड़ों के नित्य चरण स्पर्श पूर्वक प्रणाम करने की बात अब अभ्यास में आ गई है। पूजा स्थान पर बैठ कर सब नित्य गायत्री मंत्र की एक माला जपने लगे हैं। शाम को सामूहिक पूजा आरती होती है। युग निमार्ण का सत्संकल्प आरती के द्वारा दुहराया जाता है, एक लेख अखण्ड ज्योति का पढ़ा जाता है, जिसे घर के सभी सदस्य ऐसे प्रेम से सुनते हैं मानों आचार्य जी स्वयं ही अपना प्रवचन कर रहे हों। कपड़ों की सफाई, हर वस्तु को नियत स्थान पर रखना, समय का कार्यक्रम बना कर उसी के अनुसार दिनचर्या पूरा करना, दैनिक व्यायाम आदि कई अच्छी प्रथाएँ इस एक महीने में ही चल पड़ी हैं। इसे देखते हुए लगता है कि परिवार का सुधार संतोषजनक रीति से हो रहा है और आशा बँधती है कि हम लोग आगे चलकर अपना व्यक्तित्व ऐसा उत्तम गठित कर सकेंगे जिसके संपर्क में आने वाले भी सभ्य नागरिक बन सकेंगे।
-राधेश्याम वार्ष्णेय गिरिडीट
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना।
लोगे हैं तूफान कहीं पथ भूल न जाना॥
चलना है कण्टकाकीर्ण अति दुर्गम मथ पर।
लड़ना है बाधाओं से तुझको पग-पग पर॥
जाना है उस ठौर जहाँ मानवता रोती।
द्रुपद-सुता सी जहाँ सुसंस्कृति लज्जा खोती॥
लक्ष्य तुम्हारा धरती पर सज्जनता लाना।
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना॥
शक्ति! अरे तू शक्ति पुंज है अजर अमर है।
तेरे सम्मुख काल प्रबल कम्पित थर-थर है॥
आदि शक्ति का पुत्र कभी दुर्बल हो कैसे?
आत्म ज्ञान का धनी भला निर्धन हो कैसे?
ज्योति-पुंज तू तम का है अस्तित्व मिटाना।
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना॥
जीवन की निश्छलता है पाथेय तुम्हारा।
अन्तर की उज्ज्वलता सच्चा ध्येय तुम्हारा॥
दया क्षमा करुणा ममता शम दम ये सारे।
भव्य भाव विश्वास अटल, हैं शस्त्र तुम्हारे॥
धर्म एक बस ज्ञान मार्ग पर बढ़ते जाना।
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना॥
दूर नहीं मंजिल बस थोड़े कदम शेष है।
वही लक्ष्य पाते जो बढ़ते निर्निमेष हैं॥
पुरुष वही है जो पथ की पीड़ायें सहता।
हार मानता नहीं, निरन्तर चलता रहता॥
प्रतिबन्धों में कभी न अपना शीश झुकाना।
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना॥
-मुकुल कुकर्जी
*समाप्त*
जापान में जहाँ देवदारु के पेड़ तीन-चार सौ फीट तक ऊँचे होते है, वहाँ कुछ ऐसे भी होते हैं जो बहुत पुराने होने पर भी दो-चार फीट के ही रह जाते हैं। इन बौने पेड़ों के बारे में मुझे बड़ा अचम्भा हुआ और उनके न बढ़ने का कारण मालूम किया तो बताया गया कि जापानी लोग जान बूझकर कौतूहलवश इन्हें छोटा बनाये रहते हैं, अपनी कारिस्तानी से बढ़ने नहीं देते। कारिस्तानी यह कि वे पेड़ की टहनियाँ और पत्तों को जरा भी नहीं छेड़ते पर उसकी जड़ों को जमीन में बढ़ने नहीं देते और उनकी बराबर काट-छाँट करते रहते हैं।
इंसानों में से अनेकों ऐसे होते हैं जिन्हें बहुत छोटा या ओछा कहा जाता है। जापान के देवदारु पेड़ों की तरह उनकी भी जड़ें भीतर ही भीतर कटती रहती हैं और वे बौनी जिन्दगी बिताते रहते हैं। जो पेड़ बढ़ना और फलना-फूलना चाहता है उसकी जड़ों को गहराई तक जाना जरूरी हैं। जो मनुष्य उन्नतिशील बनना चाहता है उसके लिए यही उचित है कि अन्तरात्मा की जमीन में सद्गुणों को जड़ों की निरन्तर बढ़ाता चले, जब तक जड़ें न बढ़ेंगी पेड़ के बढ़ने और फलने फूलने की आशा कैसे की जा सकती है?
स्वामी रामतीर्थ
प्रायः सभी धर्मों ने ईश्वर की सर्वव्यापक, सर्वसमर्थ, परम शक्तिमान सत्ता को अपनी श्रद्धा और विश्वास का आधार बनाया है। मनुष्य की अपनी शक्ति अल्प, सीमित और मर्यादित है। संसार और जीवन की विभीषिकाओं में मनुष्य अपनी “स्वः” शक्ति पर अपने आपको निरीह, असहाय अनुभव करता है। किन्तु जब वह ईश्वर की व्यापक शक्तिशाली सत्ता से अपने आपको जुड़ा हुआ पाता है तो उसके द्वन्द्व स्वतः ही तिरोहित हो जाते हैं। ईश्वर का संसर्ग पाकर स्व-शक्ति इतनी प्रबल हो जाती है कि द्वन्द्व उसके लिए द्वन्द्व नहीं रहते। कठिनाई, क्लेश, परेशानियों में भी मनुष्य सन्तुलित होकर आगे बढ़ता रहता है। ईश्वर पर दृढ़ आस्था और विश्वास मनुष्य को मानसिक सन्तुलन और शक्ति प्रदान करता है।
अपने को ईश्वरीय सत्ता से संयुक्त करने के लिए शरणागति आत्म निवेदन, प्रार्थनाओं को धर्म का रचनात्मक रूप माना गया है। चिन्तन, मनन धारणा, ध्यान, समाधि का आयोजन ईश्वरीय सत्ता से एकीभूत होने के लिए, शक्ति प्रेरणा पाने के लिए, मानसिक सन्तुलन प्राप्त करने के लिए हुआ। मन के अन्तर्द्वन्द्व शान्त होने पर मनुष्य को क्लेश पहुँचाने वाले अनेकों मनोभावों का सहज ही निवारण हो जाता है।
इस तरह धर्म के अनेकों कार्यक्रम, आस्था, व्यवस्थाओं का आदि काल से अबोध क्रम चलता रहा और समय-समय पर इनमें विकास, साथ ही परिवर्तन, नवीनीकरण भी होता रहा।
ईश्वर के विश्वास के साथ ही प्रार्थना धर्म की दूसरी देन है। प्रार्थना से मनुष्य के मानसिक स्वास्थ्य में बहुत बड़ी सहायता मिलती है। प्रार्थना एकान्त में स्वच्छ शान्त वातावरण में विभिन्न मुद्राओं के साथ की जाती है। प्रार्थना सामूहिक भी होती है। प्रार्थना की पूर्णता और विधि व्यवस्था के लिए शारीरिक पवित्रता, मन्दिर, मस्जिद, गिर्जाघर, मूर्तियाँ विभिन्न प्रतीकों को माध्यम लिया गया। अनेक प्रकार के कर्मकाण्डों का प्रादुर्भाव हुआ। संगीत और कला के समन्वय से उसे अधिक रोचक बनाया गया। सभी धर्मों में प्रार्थना का कोई न कोई रूप रखा गया है किन्तु सभी का एक ही उद्देश्य है, संसार के बाह्य जीवन से कुछ क्षणों के लिए विश्राम लेना। उत्तेजना, संघर्ष, अशान्ति, क्लेश आदि से कुछ समय उपराम लेकर अन्तर्मुखी बनना। असीम, अनन्त के साथ एकाकार होकर, आत्म निवेदन करके या आत्मानुभूति प्राप्त करके मानसिक सन्तुलन, आत्म प्रसाद, मानसिक दृढ़ता प्राप्त कराना प्रार्थना का मूल उद्देश्य है।
प्रार्थना से मानसिक सन्तुलन, आत्मानुभूति, ईश्वरीय सत्ता के साथ एकात्मकता के साथ ही शारीरिक तनाव भी दूर होता है। दिन-रात संसार के ताने-बाने में ही रत यहाँ के संघर्षों में लिप्त रहने से शरीर के स्नायु-संस्थान, पेशियों, नस नाड़ी, दिल, दिमाग, एवं अन्य अवयवों में एक तरह का तनाव, खिचाव सा पैदा हो जाता है। आज के युग में तो मानव जीवन की दौड़ भाग, संघर्ष आदि और भी अधिक बढ़ गये हैं। प्रार्थना के समय मनुष्य यदि प्रयत्नपूर्वक संसार से अपने आपको कुछ समय के लिए समेटकर एक सत्ता में केन्द्रित हो जाय तो उसे सहज ही उपराम मिले और उसका शारीरिक मानसिक स्नायविक तनाव दूर होकर पर्याप्त विश्राम मिलता रहे। प्रार्थना एक रूप में संसार की ओर से मानसिक शिथिलीकरण का आध्यात्मिक उपाय है जिससे मन के साथ−साथ शरीर को भी काफी आराम- उपराम मिलता है।
नदी की भयंकर लहरों में पड़ें हुए मनुष्य को कुछ क्षणों के लिए यदि किनारे पर लाकर शान्ति सुरक्षा की छाया में बिठा दिया जाय तो उसे कितना परितोष, शान्ति, आनन्द, आराम मिलेगा इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है, ठीक इसी तरह संसार सागर की विभीषिकाओं, संघर्षों से विरत हो मनुष्य कुछ क्षणों के लिए प्रार्थना के द्वीप पर असीम, अनन्त प्रभु की छत्रछाया में बैठकर उसकी अनुभूति करे तो वह सहज ही जीवन की क्लान्ति को दूर करके अधिक सक्षम हो जाय। संसार की ज्वालाओं से दग्ध उसका मानस पुनः हरा-भरा हो जाय। उसे सर्वत्र सौंदर्य शान्ति के दर्शन हों और वह फिर से नई ताजगी, नई शक्ति,साहस पाकर संसार में उतर कर अपना कर्तव्य पूरा कर सकता है। प्रार्थना मानव का अन्तर बाह्य सभी तरह से कल्प कर सकती हैं।
प्रार्थना से मनुष्य के निराशावादी, हीन दृष्टिकोण में परिवर्तन हो जाता है। उसे सर्वत्र शान्ति सौंदर्य, जीवन, माधुर्य के दर्शन होते हैं। संसार की विभीषिकायें गौण हो जाती हैं। उत्तेजनायें शान्त हो जाती हैं। प्रार्थना आन्तरिक और बाह्य जीवन में सन्तुलन और व्यवस्था पैदा करती है। एक दम बाह्य जगत में खो जाना यदि दुःख द्वन्द्वों से लिपटना है तो एक दम आन्तरिक जगत में रहना भी धरती और संसार के कर्तव्यों से दूर हटना है। योगी की अर्धोन्मीलित दृष्टि की तरह आधी से संसार और आधी से अन्तर को देखकर जीवन में समता, सन्तुलन व्यवस्था प्राप्त करना ही आध्यात्मिकता का सरल अर्थ है। प्रार्थना इसका एक महत्वपूर्ण उपाय है।
प्रार्थना आत्मविश्लेषण का एक वैज्ञानिक उपाय है जिसके अंतर्गत मनुष्य संसार स्वयं, और ईश्वरीय सत्ता के सम्बन्ध में अपने विचारों को सुलझा सकता हैं। सूक्ष्म तथ्यों का समाधान कर सकता है।
धर्म की मनुष्य को एक और महत्वपूर्ण देन है। वह है “आत्मा की अमरता का प्रतिपादन। कुछ नास्तिक मतों को छोड़कर संसार की अधिकाँश धर्मों में पुनर्जीवन, आत्मा की अमरता आदि को स्वीकार किया है। पूर्व जन्मों की बात बताने वाले अनेक बच्चों का प्रत्यक्ष प्रमाण, अन्य योगसाधनाओं से प्राप्त होने वाले सूक्ष्म रहस्यों से यह सब प्रयोगात्मक रूप में सिद्ध भी होते आये हैं।
जन्म और मृत्यु मनुष्य जीवन की दो महत्वपूर्ण घटनायें हैं। इनमें मृत्यु का नाम सुनकर प्राणी भयभीत हो जाता है। मृत्यु का भय अन्य सभी प्रकार के भयों से अधिक प्रभावशाली है, जो मनुष्य के मन में बहुत बड़ी प्रतिक्रिया पैदा करता है। इस प्रतिक्रिया के फलस्वरूप मनुष्य में एक तीव्र तनाव पैदा होता है और इस तनाव से मनुष्य की शक्ति और क्षमताओं का बहुत बड़े रूप में क्षय होता है। मृत्यु के भय से कई लोग तत्क्षण मरते देखे गये हैं। पागल हो जाते हैं। इसी मृत्यु भय को आदि काल से मनुष्य अनेकों प्रयत्नों से दूर करता आ रहा है। अमृत की खोज, “मृत्योर्माअमृत गमय” प्रार्थना और धर्म के द्वारा अमरता के वरदान की प्राप्ति के प्रयत्न सदा से होते रहे हैं-
मारर्णीयस्य कर्माणि तत्कतृणीति नेतरत्॥
-योगवशिष्ठ
“हे मृत्यु! तू किसी को अपनी शक्ति से नहीं मार सकती। मनुष्य किसी अन्य कारण से नहीं वरन् स्वयं अपने कर्मों से ही मरता है।”
***
बहवो यत्र नेतारः सर्वे पंडित-मानिनः।
सर्वेमहत्त्वमिच्छन्ति तद्वृन्द भवसीदति॥
“जहाँ बहुत से नेता होते हैं, सभी अपने को पंडित मानने वाले अहंकारी होते हैं, सभी अपनी बड़ाई चाहते हैं, वह समाज शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
के वरदान की प्राप्ति के प्रयत्न सदा से होते रहे।
“न जायते म्रियते वा कदाचन्,
नायं भूत्वा भवि ता वा न भूया।
अजो नित्यं शाश्वतोयं पुराणो,
न हन्यते हन्यमाने शरीरे।”
आदि शब्दों में गीताकार ने अमरता का प्रतिपादन कर अर्जुन की भीति, संशय का छेदन किया। हिन्दू धर्म में तो आत्मा की अमरता बड़े ही ठोस और प्रभावशाली तथ्यों में प्रतिपादित की गई है।
अमरता से मृत्युभय का निवारण का मनुष्य के दृश्य जीवन को क्षणिक, नाशवान, अनित्य कहकर, धर्म ने मृत्यु के भयजनक प्रश्न और शरीर के मोह आसक्ति को दूर करने का प्रयत्न किया है। इतना ही नहीं जन्म-मृत्यु सामान्य सी घटनायें बताई हैं। नित्य चिरन्तन जीवन में जन्म−मृत्यु को केवल दिन-रात की संज्ञा दी गई है। इसी के कारण अनेक लोगों ने आत्मा की अमरता अनित्यता से प्रेरणा पाकर महान आदर्शों के लिए अपने तुच्छ अनित्य, क्षण भंगुर जीवन का त्याग किया, मृत्यु का वरण किया क्योंकि मृत्यु से उनकी अजर-अमर आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। इस तरह आत्मा की अमरता ने मनुष्य के समस्त भयों से भी ऊपर मृत्यु भय को दूर कर उसे निर्भय बनाया, जिससे उसकी जीवन यात्रा निर्बोध क्रम से चलती रहे।
ईश्वर पर विश्वास, प्रार्थना, आत्मा की अमरता इन तीनों ही धार्मिक आधारों के प्रति विज्ञान ने मनुष्य की आस्था विश्वास को नष्ट कर दिया है और वह आस्था और विश्वास का कोई नवीन आधार नहीं दे पाया। फलतः बेचारा मनुष्य आज निरीह, असहाय, उत्तेजनाओं से पीड़ित और परेशान है। जीवन की विभीषिकाओं, भय, संघर्षों में असन्तुलित हो गया है। मानव मन की शान्ति, प्रसन्नता आत्म प्रसाद, आनन्द तिरोहित हो गये हैं। इनकी पुनः प्रतिष्ठापना, आस्तिकता की व्यापक आस्था उत्पन्न करने से और धर्म का अवलम्बन लेने से ही सम्भव हो सकती है।
प्राचीन परम्पराओं की तुलना में विवेकशीलता को अधिक महत्वपूर्ण प्रतिपादित करने वाले सन्त सुकरात को वहाँ के कानून से मृत्यु दण्ड की आज्ञा दी गई।
सुकरात के शिष्य अपने गुरु के प्राण बचाना चाहते थे। उन्होंने जेल से भाग निकलने के लिए एक सुनिश्चित योजना बनाई और उसके लिए सारा प्रबन्ध ठीक कर लिया।
प्रसन्नता भरा समाचार देने और योजना समझाने को उनका एक शिष्य जेल में पहुँचा और सारी व्यवस्था उन्हें कह सुनाई। शिष्य को आशा थी कि प्राण -रक्षा का प्रबन्ध देखकर उनके गुरु प्रसन्नता अनुभव करेंगे।
सुकरात ने ध्यानपूर्वक सारी बात सुनी और दुखी होकर कहा- मेरे शरीर की अपेक्षा मेरा आदर्श श्रेष्ठ है। मैं मर जाऊँ और मेरा आदर्श जीवित रहे तो वही उत्तम है। किन्तु यदि आदर्शों को खोकर जीवित रह सका तो वह मृत्यु से भी अधिक कष्टकारक होगा। न तो मैं सहज विश्वासी जेल कर्मचारियों को धोखा देकर उनके लिए विपत्ति का कारण बनूँगा और न जिस देश की प्रजा है उसके कानूनों का उल्लंघन करूंगा। कर्तव्य मुझे प्राणों से अधिक प्रिय है।
योजना रद्द करनी पड़ी । सुकरात ने हँसते हुए विष का प्याला पिया और मृत्यु का संतोषपूर्वक आलिंगन करते हुए कहा- हर भले आदमी के लिए यही उचित है कि वह आपत्ति आने पर भी कर्तव्य-धर्म से विचलित न हो।
योजना रद्द करनी पड़ी । सुकरात ने हँसते हुए विष का प्याला पिया और मृत्यु का संतोषपूर्वक आलिंगन करते हुए कहा- हर भले आदमी के लिए यही उचित है कि वह आपत्ति आने पर भी कर्तव्य-धर्म से विचलित न हो।
प्रेम, आत्मीयता मनुष्य की सहज स्वाभाविक वृत्तियाँ हैं, जिनके व्यक्त न होने पर मनुष्य जीवन में एक अभाव सा अनुभव करता है। लीबमैन ने लिखा है “अपने पड़ौसी से मैत्री भाव रखना, उससे प्रेम करना, स्वयं से प्रेम करने की आवश्यक सीढ़ी है।” दूसरों से प्रेम प्राप्ति की ही नहीं वरन् अपना प्रेम दूसरों को देने की भी प्रबल वृत्ति मनुष्य में काम करती है। जब तक इसकी पूर्ति नहीं होती मनुष्य को पूर्णतः सन्तोष, शान्ति प्राप्त नहीं होती, न उसका आन्तरिक विकास होता है।
जीवन में प्रेम एक महत्वपूर्ण स्वाभाविक आवश्यकता है। मनुष्य को जब तक किसी के प्रेम की प्राप्ति नहीं होती तब तक उसे जीवन में कुछ अभाव और अशान्ति का अनुभव होता है। प्रेम प्राप्ति की प्रबल भूख बचपन में अधिक पाई जाती है। जिन बच्चों को अपने माँ-बाप का प्रेम नहीं मिलता उनका व्यक्तित्व पुष्ट नहीं होता। कई मानसिक रोगों का कारण तो बचपन में माँ-बाप के प्यार का अभाव होना ही होता है। चिन्ता, घृणा, क्रोध, हीनता की भावना बहुत कुछ इसी कारणवश पैदा हो जाती है। दूसरों के स्नेह प्रेम से वंचित व्यक्तियों को संसार निर्दयी, क्रूर और क्लेशमय नजर आता है।
प्रेम प्राप्ति की तरह ही मनुष्य में प्रेम देने की भावना भी होती है। प्रेम लेने की भावना बचपन की निशानी है। प्रेम देने की भावना पुष्ट व्यक्तित्व और प्रौढ़ता का आधार है। प्रेम लेने की भावना स्वार्थ परावलम्बन का रूप है तो प्रेम देना परमार्थ और स्वावलम्बन है।
प्रेम देने की भावना की अभिव्यक्ति करने के लिए दूसरों की सेवा सहानुभूति, दूसरों के लिए उत्सर्ग का व्यावहारिक मार्ग अपनाना पड़ता है और इससे एक सुखद शान्ति, प्रसन्नता, सन्तोष की अनुभूति होती है। दूसरों की कठिनाईयाँ दूर करने के प्रयत्न में स्वयं की कठिनाइयाँ स्वतः दूर हो जाती हैं। दूसरों से आत्मीयता रखने पर आत्म-प्रेम आत्म-मैत्री सहज ही हो जाती है। मन की समस्त शक्तियाँ केन्द्रीभूत होकर काम करने लगती हैं। इस तरह प्रेम-मैत्री एक सहज और स्वाभाविक, आवश्यक वृत्ति है जिससे मनुष्य को विकास, उन्नति, आत्म संतोष की प्राप्ति होती है।
छोटा बच्चा सदैव दूसरों का प्यार चाहता है, चाह या स्वार्थ बचपन की स्थिति है, जिसमें दूसरों से सुख आराम प्रेम की आकाँक्षा रहती है। यह वृत्ति अधिक उम्र वालों में भी हो सकती है। बचपन से आगे की विकसित भावना है अपने आपके सुखोपभोग आवश्यक पदार्थों का दूसरों के लिए त्याग करना। यह प्रेम देने की वृत्ति है। जिसमें त्याग है, कष्ट सहिष्णुता है, वही आत्म विश्वास की सच्ची कसौटी है। त्याग से प्रेम के स्वरूप का निर्णय होता है। इस तरह प्रेम स्वार्थ के परमार्थ की साधना है। जो प्रेम के लिए- परमार्थ के लिए अपने आपको घुला देता है वही आत्म विकास की उच्च स्थिति प्राप्त करता है।
यज्ञाग्नि के दो स्वरूप माने गये हैं, एक “स्वाहा” दूसरा “स्वधा”। स्वाहा का अर्थ है आत्माहुति, देना, त्याग, उत्सर्ग करना और स्वधा के मानी है आत्मधारण करना। दोनों के संयुक्त स्वरूप में यज्ञाग्नि प्रकट होती है। प्रेम की आकांक्षा, इच्छा, प्रेम प्राप्ति का भाव, आत्म धारण करने के लिए है। प्रेम धारण नहीं किया जायगा तो फिर दिया कहाँ से जायगा। प्रेम प्राप्ति की लालसा सहज रूप में प्रेम यज्ञ का प्रारम्भिक कृत्य है। आम का पौधा सिंचाई सुरक्षा खाद सेवा आदि के रूप में जब स्वधा शक्ति प्राप्त करता है तभी उस शक्ति को कई गुना असंख्यों रूपों में उत्सर्ग कर सकता है। स्त्री अपने पति का अजस्र
प्रेम प्राप्त करके ही उसे बालकों को दे सकने में समर्थ होती है। जिसे किसी का प्रेम नहीं मिला वह दूसरे को भी शायद ही कुछ दे सके।
स्वधा शक्ति की प्राप्ति के अनन्तर मनुष्य के भावों का विकास होता है, और वह अपने आपको स्वाहा करने लगता है, त्याग, आत्मोत्सर्ग करता है और स्वार्थ की जगह परमार्थ-त्याग स्थान ले लेता है। जिससे प्रेम किया जाता है उसके लिए त्याग करने की इच्छा बढ़ जाती है। मनुष्य कष्ट उठाने लगता है। तब प्रेम का व्यावहारिक स्वरूप त्याग ही हो जाता है। त्याग, आत्मोत्सर्ग, बलिदान की स्थिति के अनुसार ही प्रेम कर सत्य स्वरूप विकसित होने लगता है। जब मनुष्य अपने आपको पूर्णतया स्वाहा कर देता है तब एक मात्र प्रेम की सत्ता ही सर्वत्र शेष रह जाती है।
जहाँ पुरस्कार की आकाँक्षा है वहाँ प्रेम नहीं रहता। प्रेम केवल उत्सर्ग करना ही जानता है। जहाँ बदले में लेने की भावना है वहाँ प्रेम नहीं स्वार्थ है। इससे मनुष्य की आत्मा को परितोष प्राप्त नहीं होता। मनुष्य के आन्तरिक बाह्य जीवन में अशान्ति क्लेश, असन्तोष ही बना रहेगा। स्त्री-पुरुष, माता-पिता और संतान, मित्र-मित्र, भक्त और भगवान, मनुष्य-मनुष्य के बीच जब स्वार्थमय प्रेम का आचरण होने लगता है तो सदैव विपरीत परिणाम ही मिलते हैं। गृहस्थ जीवन की अशान्ति, कलह, रागद्वेष, मनुष्य-मनुष्य के बीच की धोखेबाजी, चालाकी, माता-पिता के प्रति अनुशासनहीनता, क्रूरता, भगवान के प्रति नास्तिकता, अविश्वास मनुष्य के बनावटी प्रेम की आड़ में काम रह रहे स्वार्थ, लोभ, मोह आदि के ही परिणाम हैं - प्रेम के माध्यम से पुरस्कार प्राप्ति की लालसा के परिणाम हैं।
प्रेम दिव्य तत्व है। इसके परिणाम सदैव दिव्य ही मिलते हैं। किन्तु यह तब जबकि मनुष्य पुरस्कार की कामना से रहित होकर केवल प्रेम के लिए त्याग बलिदान, आत्मोत्सर्ग करता है। प्रेम का पुरस्कार तो स्वतः प्राप्त होता है और वह है आत्मसन्तोष, शान्ति, प्रसन्नता, जीवन में उत्साह आदि। प्रेम तो मनुष्य की चेतना का विकास कर उसे विश्व चेतना में प्रतिष्ठित करता है।
प्रेम प्रेरित त्याग से विचारों में एकाग्रता पैदा होती है। मानसिक स्थिरता से पूर्ण तादात्म्य और इससे आत्म साक्षात्कार की प्राप्ति होती है। भक्तियोग का तत्वज्ञान हृदयंगम किया जाना ईश्वर प्राप्ति के लिए आवश्यक मार्ग है।
जब किसी काम से प्रेम नहीं होता तो उसमें कर्तव्य बुद्धि नहीं रहती। मनुष्य कई भूलें करता है, काम को बिगाड़ता है। वह उसे भार स्वरूप लगता है- दुखद बन्धन जैसा। मनुष्य अपने काम से जी चुराने लगता है। प्रेम की शक्ति से ही कर्तव्य पूर्ण होता है। इसके अभाव में जबरन कार्य करने पर मनुष्य को शारीरिक और मानसिक रोग सताने लगते हैं।
प्रेम के भाव में कठिन से कठिन काम भी सरल बन जाते है। उनमें कठिनाइयाँ होते हुए भी फूल चुनने जैसी सरलता महसूस होती है। प्रेम की अवस्था में कष्ट नाम की कोई स्थिति ही नहीं। प्रेम की धुन में कर्तापन और कर्मफल का ध्यान नहीं रहने से यह रोगी की सी स्थिति बन जाती है। केवल कर्तव्य ही सामने रहता है।
कर्तव्य के अभिमान और फल की आकाँक्षा के साथ ही क्षमताओं का विकास रुक जाता है। यही कारण है कि एक सरकारी नौकर को दफ्तर का चार छः घण्टे का काम ही “बोर” कर देता है, जब कि देश प्रेमी समाज सेवी, सेवानिष्ठ लोग अठारह घण्टे काम करके भी नहीं थकते। प्रेम एक व्यापक तत्व है। उसके साथ ही अनन्त शक्ति सामर्थ्य रहता है और असाधारण क्षमता का विकास हो जाता है। साधारण तौर से व्यक्ति महामानव बन जाता है।
प्रेम से प्रसन्नता और सहज आनंद मिलता है जिसमें शक्तियों का उद्भव उसी तरह होता है जैसे पर्वतराज हिमालय अपने हृदय के अवयवों को पिघला कर अनन्त नदी स्त्रोत बहा देता है। आत्मविश्वास, साहस, निष्ठा, लगन, आशा की प्रबल हिलोरें मनुष्य के हृदय में उठने लगती हैं, जो एक छोटे से पुतले को तरंगित कर ऊँचा उठा देती है। प्रेम के अभाव में मनुष्य थका-थका-सा रहता है। काम में मन नहीं लगता। फिर किसी भी क्षेत्र में सफलता मिलना दूर की बात है।
प्रेम गिरे हुए व्यक्तियों को उठाता है। क्योंकि गिरे हुए व्यक्तियों में वे होते हैं जिनके जीवन में प्रेम, स्नेह का अभाव रहा है। घर में परिजनों के प्रेम से वंचित लोग व्यसनी, परस्त्रीगामी, चरित्रहीन और पतित हो जाते हैं। पति अथवा सास-श्वसुर के अत्याचार से पीड़ित स्त्री घर से बाहर जाकर प्रेम की चाह करती है, जिससे उसे भ्रष्ट अथवा दूषित कहा जाता है। माँ बाप के प्रेम से वंचित बच्चे निराशावादी, क्रोधी, ईर्ष्यालु, घृणा करने वाले, अन्यमनस्क, चरित्रहीन बन जाते हैं। लोगों में फैली हुई बहुत बुराइयों का मुख्य कारण उन्हें जीवन में दूसरों के स्नेह प्रेम से वंचित होना ही होता है। कोई भी प्रेम मय व्यक्ति इन लोगों को अपना प्रेम देकर फिर से सुधार सकता है। हमारे ऋषियों में महात्मा बुद्ध, सुकरात, ईसा मुहम्मद, रामकृष्ण आदि ने अनेकों पतितों को अपना निश्छल सहज प्रेम देकर असंख्यों पतितों का उद्धार किया।
जब मनुष्य का दृष्टिकोण प्रेममय होता है तो उसे दूसरों के दुर्गुण न दिखाई देकर सद्गुण दिखाई देते हैं। इससे मनुष्य के दोषदर्शन का दुर्गुण-दूर हो जाता है। दूसरों के दुर्गुण न देखने से आलोचना में भी मन नहीं लगता। हिंसा, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, डाह की भावनायें प्रेम से घुल जाती हैं। प्रेम में हिंसा नहीं दया करुणा का निवास होता है। प्रेममय व्यक्ति अपना अहित करने वालों के प्रति भी दया क्षमा सहिष्णुता की भावना रखता है। उनके सुधार के लिए शुभकामना करता है।
मनुष्य का जैसा दृष्टिकोण, चिन्तन होता है वैसा ही उसके लिए यह संसार दिखाई देता है। मनुष्य दूसरों से प्रेम करता है तो दूसरे भी उसे प्रेम करते हैं। उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। संसार कुंए की आवाज है। मनुष्य संसार के प्रति जैसा आचरण करेगा संसार से उसे वैसा ही प्रत्युत्तर मिलेगा। प्रेम से ही प्रेम मिलता है। प्रेम मैत्री के विचार पहले व्यक्तिगत जीवन में ही आत्म प्रेम, आत्म-प्रसाद के रूप में मिल जाते है। इतना ही नहीं प्रेम एकात्मकता पैदा करता है। देखा जाता है कि जिन व्यक्तियों में परस्पर प्रेम होता है उनके रंग रूप स्वभाव विचार धीरे-धीरे एक से बन जाते हैं।
प्रेम एक तरह की मानसिक स्थिति है। इसका प्रवाह जिस ओर होगा उसी तरह के परिणाम भी प्राप्त होंगे। प्रेम का सहज और सरल प्रवाह नैसर्गिक कार्यों में होता है। पानी सदैव ऊपर से नीचे की ओर बहता है। किन्तु किसी पेड़ की जड़ों द्वारा सोख लिया जाता है तो वही मधुर फलों, सुँदर फूल और शीतल छाया में परिवर्तित हो जाता है। साँसारिक प्रवाह में प्रेम शक्ति के लगे रहने पर मनुष्य का जीवन पाशविक परिधियों में घिरा रहता है। प्रेम के प्रवाह का संचालन विवेक द्वारा होने पर वह जीवन में सत्यं शिवम् सुन्दरम् की प्राप्ति कराता है। जीवन विकास की ओर अग्रसर होता है। बार-बार अपने आदर्श के प्रति बाह्य और आन्तरिक क्षेत्र में प्रेम शक्ति का अभ्यास करने पर वैसा ही स्थाई भाव बन जाता है और फिर उसी की प्रेरणा से जीवन का संचालन होने लगता है। इस तरह के स्थायी भाव प्रारम्भ में अधिक भी हो सकते हैं किन्तु उन सब में समन्वय होना आवश्यक है। उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ भावों की दिशा भी यदि अलग-अलग होगी तो वे आपस में टकरायेंगे और प्रेम की शक्ति नष्ट होगी।
एक बार काशी नरेश ने एक महोत्सव का आयोजन किया। उसमें अनेक सम्भ्रान्त अतिथियों के अतिरिक्त चार देव-पुरुष भी पधारे।
चारों के पास दिव्य पुष्पों से बनी मालाएं थी। वे इतनी महक रही थीं कि उनकी सुगन्ध से सारा नगर सुवासित हो गया उन मालाओं को देखने सारा नगर उमड़ पड़ा।
दर्शकों ने देव पुरुषों से अनुरोध किया कि यह मालाएं मनुष्यों को दे जायँ तो उस सुगन्ध का लाभ इस लोक के निवासियों को भी मिलता रहेगा। आप तो अपने लोक में ऐसी मालाएँ और भी प्राप्त कर लेंगे।
देव-पुरुषों ने लोगों को बताया कि इन्हें केवल गुणवान लोग ही धारण कर सकते हैं। सदाचरण से रहित होने पर भी जो इन्हें धारण करेगा वह अपार कष्ट भोगेगा।
लोभ के वशीभूत हो राज पुरोहित ने सोचा कि मैं अपने को भद्र पुरुष बता कर यह माला प्राप्त कर लूँ तो सब लोग मेरी प्रशंसा करेंगे और श्रेष्ठ भी मानेंगे। अज्ञात आचरणों को जानता भी कौन हैं?
राज पुरोहित ने देव पुरुषों से पूछा कि किन गुणों के होने पर मनुष्य यह माला प्राप्त कर सकते है?
जेष्ठ देव-पुरुष ने कहा-”जो किसी के अधिकारों का अपहरण नहीं करता, अपनी न्यायोपार्जित कमाई पर ही संतोष करता है, असत्य नहीं बोलता और ऐश्वर्यवान होने पर भी प्रमाद नहीं करता, वह माला ले सकता है।” राज पुरोहित ने अपने में वैसे ही गुण बताया और पहली माला लेली। दूसरे देव-पुरुष ने कहा-”जिसका चित्त धर्म में अविचल हो, जिसका हृदय श्रद्धा से भरा रहे जो दूसरों को बाँट कर अपनी कमाई खाता हो, वह मेरी माला भी ले सकता है।”
पुरोहित ने अपने को वैसा ही बताया और दूसरी माला भी लेली।
तीसरे देव-पुरुष ने कहा-”जो परनारी का चिन्तन न करता हो, दुखियों को देख दया से व्यथित हो उठता हो, सरलता और सज्जनता जिसमें कूट-कूट कर भरी हो वह मेरी भी माला ले सकता है।” पुरोहित ने अपने को वैसे ही बताया और वह तीसरी माला भी लेली।
तीसरे देव-पुरुष ने कहा-”जो परनारी का चिन्तन न करता हो, दुखियों को देख दया से व्यथित हो उठता हो, सरलता और सज्जनता जिसमें कूट-कूट कर भरी हो वह मेरी भी माला ले सकता है।” पुरोहित ने अपने को वैसे ही बताया और वह तीसरी माला भी लेली।
देव-पुरुष वह मालाएं देकर अपने लोक को चले गये। पुरोहित ने गर्वपूर्वक उन्हें धारण किया और विपुल कीर्ति का स्वामी बनने के लिए गर्व करता हुआ राज सभा में पहुँचा।
उन दिव्य मालाओं को धारण किये कुछ समय ही बीता होगा कि राज पुरोहित के सिर में भयंकर पीड़ा होने लगी। ऐसा लगा मानों उसका मस्तक कोई कुल्हाड़ी से काट रहा हो। पाप उसके सिर पर चढ़कर बोलने लगा- “लोगों ! मैंने अधिकारी न होते हुए भी विपुल प्रशंसा प्राप्त करने का हठ किया और अब उसका मर्मान्तक प्रतिफल भोग रहा हूँ।”
मालायें उतारते न उतरती थी। वह इस तरह गले में लिपट गई मानों नाग-पाश ने कण्ठ को कस लिया हो। पुरोहित को सात दिन इसी भयंकर पीड़ा को सहते हो गये। देखने वालों से उसका दुख देखा नहीं जाता था।
अमात्यों के परामर्श से राजा ने फिर वैसा ही आयोजन किया जिसमें वे चारों देव-पुरुष पुनः आमन्त्रित किये गये। पाखण्डी पुरोहित पीड़ा से संत्रस्त उलटा मुँह किये पड़ा था। देव-पुरुषों ने करुणा से द्रवित होकर माला लौटा कर उसका दुख दूर किया और उपस्थित सभासदों से कहा- अयोग्य होते हुए भी जो विपुल प्रशंसा प्राप्त करने का लालच करते है उनकी दुर्गति ही होती है।
सामाजिक जीवन में व्यवहृत परम्परागत संस्कारों को ही संस्कृति कहते हैं। न जाने कब से, मानव के कर्म, रूप, वेश-भूषा, ग्रंथ आदि और प्रकृति से प्रभावित पारस्परिक सम्बन्धों का एक रूप चला आ रहा है और वही रूप उसकी संस्कृति को बनाता है।
संस्कृति के अनुसार ही राष्ट्रों का निर्माण होता हैं। संस्कृति के नष्ट होने पर राष्ट्र भी नष्ट हो जाते है। यह कथन मिथ्या है कि संस्कृति बनायी जाती है, बल्कि वह स्वयं बनती है। संस्कृति में समय के अनुसार परिवर्तन भी होता रहता है। परन्तु, वह परिवर्तन इतना धीरे होता है कि उसका तत्काल अनुभव नहीं हो पाता।
संसार की सभी संस्कृतियों में भारतीय संस्कृति अत्यंत प्राचीन है। अनेक झंझावातों में भी हमारी संस्कृति ज्यों की त्यों बनी रही। युग बदल गये, राज्य बदल गये, कितने ही विधर्मी क्रूर शासकों ने तलवार के बल पर हमारी संस्कृति को नष्ट करना चाहा, परन्तु वे उसमें सफल न हो सके।
हमारी संस्कृति के मूल आधारों में आध्यात्मिकता का बहुत बड़ा स्थान है। हम अपने जीवन संबंधी सब कार्यों को आध्यात्मिक ढाँचे में ढाले हुए हैं। हमारे सब सामाजिक नियम आध्यात्मिक भित्ति पर ही खड़े हैं। हमारे स्वास्थ्य पर भी आध्यात्मिक का बड़ा प्रभाव पड़ा है। विभिन्न व्रत आदि का पालन जहाँ आध्यात्मिकता का अंग माना जाता है, वहाँ स्वास्थ्य के लिए भी अत्यन्त हितकर है।
हमारे सामाजिक नियमों में भौतिकवाद को अधिक महत्व नहीं दिया गया। चाहे किसी भी मत का अनुयायी क्यों न हो परमात्मा को सभी मानते हैं।-’आत्मा और परमात्मा एक है’ का सिद्धान्त हमारी संस्कृति को उत्कृष्ट बनाए हुए है। विभिन्न वादों के वर्तमान रहते हुए भी अद्वैतवाद की भावना का ही प्राबल्य है।
हमारी संस्कृति ने भोगादि विषयों को भी आध्यात्मिक रूप दिया। हमारी सुख-भोग की कामना भी निरे भौतिकवाद के सहारे नहीं रही। हमारा देश पारलौकिक उन्नति के साथ ही इहलौकिक उन्नति के लिए भी भले प्रकार कटिबद्ध रहा है। हमारे राजा दिग्विजय द्वारा अपना साम्राज्य स्थापित करते रहे हैं। हमारी संस्कृति का झंडा देश-विदेशों में फहराता रहा है परन्तु, सम्राट बनने की आकाँक्षा में भी हमारे यहाँ धर्म का हाथ था। इस कार्य में गर्व और धर्म समझा जाता था। इस प्रकार के कार्य यज्ञ और अनुष्ठानों के द्वारा आरंभ किये जाते थे।
हमारे यहाँ के सब शुभ कामों में यज्ञ की प्रधानता का रहना इस बात का प्रमाण है कि वे आध्यात्मिकता के आश्रय में भौतिक कार्यों को करते थे। परंतु यह आध्यात्मिक धारणा ही हमें दया और क्षमा की ओर भी प्रेरित करती रही है। शरणागत शत्रु पर हमने कभी भी हाथ नहीं उठाया, निर्बल पर हमने सदा ही दया-भाव रखा। जिसने क्षमा माँगी, उसे क्षमा देने में कभी देर नहीं की गई।
हमने दूसरों के धर्म और संस्कृति के प्रति कभी भी असम्मान प्रदर्शित नहीं किया। हमने विधर्मियों के गिर्जों और मस्जिदों को ढाने की कभी चेष्टा नहीं की। यद्यपि हमारे देवालय गिरा दिये गये उनके स्थान पर मस्जिद आदि बन गयी। परंतु, हमने जिस सहनशीलता का परिचय दिया, वैसा कोई अन्य धर्म वाला नहीं दे सका है।
कट्टर से कट्टर हिंदू भा अद्वैतवाद का पोषक होने के कारण आक्रमणात्मक विचारों का विरोधी रहा है। बलवान होते हुए भी वह नम्र रहता है। परंतु, तलवार के सामने उसने झुकना नहीं सीखा। धोखे से उसे वशीभूत भले ही कर लिया हो, परंतु मैदान में ‘विजय या बलिदान’ में ही उसका विश्वास रहा है।
हमारी संस्कृति में अपने कर्म पर बड़ा विश्वास है ‘हमने जैसा किया, वैसा भोगना ही पड़ेगा’ यह विचार हमारी मानसिक निर्बलता को दूर कर देता है। हम कभी विपत्तियों से विचलित नहीं होते। यद्यपि अपने भोगों की प्राप्ति के निमित्त विभिन्न देवी-देवताओं को मनाते और अनुकूल करने की चेष्टा करते हैं। परंतु, कार्य न बनने पर अपने कर्मों को दोष देते हैं, किसी देवी-देवता को नहीं कोसते।
इस जीवन में प्राप्त होने वाले दुःखों को पिछले जन्मों में किये कर्मों का फल मानते हुए, हम शुभ कर्म करने की प्रेरणा लेते हैं। हम भोगों में लिप्त रह कर भी यथासंभव बुरे काम नहीं करते। किसी के मन को दुखाना उचित न मानते हुए सबको प्रसन्न करने की चेष्टा करते रहते हैं। हमें अपने आत्मबल पर विश्वास रहता है और उससे सदा नवीन शक्ति प्राप्त होती है।
बुरे कर्मों से बचने का एक कारण परलोकवाद का विश्वास भी है। लोगों को नर्क का भय शुभ कर्मों के लिए प्रेरित करता है। इस लोक में किए गए अच्छे कार्यों से परलोक में शाँति मिलती है। जिसने पुण्य कर्मों को अर्जित किया, उसका परलोक सुधर गया।
वैराग्य को ऊँची वस्तु माना जाता है। वैरागी का सभी आदर करते हैं। इस देश में अनेकों तपस्वी, संन्यासी और साधक हुए हैं, जिन्होंने अपनी सिद्धि के बल से जनता का हित-साधन किया और स्वयं मुक्त हो गए। अद्वैत भाव वाले साधक ज्ञान-कर्म के द्वारा मुक्त होने के विश्वास रखते हैं। हमारे दर्शनशास्त्र इस विषय में एक मत हैं कि आत्मा उन्मुक्त होकर परमात्मा बन जाता है। गीता में स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है।
आध्यात्मिक कर्म-व्यवस्था के अनुसार हमारे मन पर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का संसार पड़ा है। हमारे ऋषियों ने कहा है कि धर्म, से ही अर्थ और काम की सम्पन्नता है अर्थात् अधर्मपूर्वक अर्थ संचय और विषय-सेवन अनुचित हैं और यदि धर्म में बुद्धि है तो मोक्ष प्राप्ति भी असंभव नहीं है।
हमारी संस्कृति ने नैतिकता को एक विशेष गुण माना है। जिसमें चारित्रिक दुर्बलता है, उसे अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता। कोई भी व्यक्ति उसे अपने पास बैठाना भी ठीक नहीं समझता। नारी निःसंदेह नारी है, परंतु उसके बहिन और माता वाले रूप को बनाए रखने के लिए सच्चरित्रता अत्यन्त आवश्यक है। सत्यवादिता, शिष्टता और नम्रता भी चरित्र सम्बन्धी गुण ही समझने चाहिए।
वर्णाश्रम व्यवस्था भी हमारी संस्कृति का एक प्रमुख अंग है। प्राचीन ऋषियों ने विभिन्न वर्ण बना कर उनके अनुकूल कार्यों का बटवारा किया। इससे समाज की दशा सुनियन्त्रित रही। आजीविका के अनुसार परस्पर सभी सब के लिए समान उपयोगी रहे।
एक शरीर से चारों वर्णों की उपमा देकर उनके सम्बन्धों को और भी दृढ़ कर दिया गया। ब्राह्मण की उत्पत्ति मुख से, क्षत्रिय की भुजाओं से वैश्य की कटि के, अधोभाग से और शूद्र की पाँवों से बताई गई है। जो महत्व मुख का है, वही पावों का है। समाज रूपी शरीर के इन चारों अंगों में से जिसकी उपेक्षा करोगे, वही कट जायगा। फिर वह शरीर कैसे बना रहेगा ?
भगवान् के जिन चरणों से शूद्रों की उत्पत्ति बताई गई, उन्हीं चरणों से पतितपावनी गंगा जी का भी आविर्भाव हुआ हैं। वही चरण भक्तों की भक्ति के भी केन्द्र रहे हैं। तब शूद्रों में अधर्मता का दोष भी कहाँ ? इसी प्रकार सब वर्णों का, अपने-अपने स्थान पर समान महत्व है, सभी एक दूसरे के आश्रित हैं।
आश्रम व्यवस्था द्वारा मनुष्यों के इहलौकिक और पारलौकिक कृत्यों की सम्पन्नता सुलभता से होती है। इसके द्वारा मनुष्य का व्यक्तिगत जीवन सुव्यवस्थित हुआ। इसका प्रारंभ ब्रह्मचर्याश्रम से होता है, जिसके अनुसार अपने शिक्षा-दीक्षा काल में बालक ब्रह्मचर्यपूर्वक रहता हुआ युवावस्था तक पहुँचता है।
इसके पश्चात् गृहस्थाश्रम का प्रारम्भ होता है। उसमें रहकर मनुष्य धर्मपूर्वक एवं सदाचरण द्वारा अर्थ और काम की प्राप्ति करता है। फिर वानप्रस्थाश्रम और संन्यासाश्रम द्वारा परहित साधना में लगता हुआ मोक्ष-मार्ग पर चल देता है।
हमारे यहाँ सभी कर्मों में संस्कार-विधि प्रयुक्त होती है। संस्कारों द्वारा हम पग-पग पर अपने को पवित्र बनाते रहते हैं। हमारे यहाँ पुँसवन, मुण्डन, विद्याध्ययन, यज्ञोपवीत, पाणिग्रहण आदि षोडश संस्कारों की महत्वपूर्ण व्यवस्था हैं।
गर्भाधान से लेकर मृतक तक के सभी संस्कारों में एक धार्मिक निष्ठा और कर्तव्य की भावना निहित है। यह संसार हमें अपने कर्मों की ओर प्रेरित करते हुए मुक्ति मार्ग की ओर खींच ले जाता है और हमारी निष्ठा हमें आध्यात्मिक कर्मों से संलग्न करती है।
अवतारवाद का सिद्धान्त भी हमारी संस्कृति का एक धार्मिक अंग रहा है। हमारा विश्वास है कि जब जब पृथ्वी पर अधर्म छा जाता और धर्म का लोप हो जाता है, तब-तब ईश्वर पृथ्वी पर प्रकट होकर हमारी रक्षा करते हैं।
हमारी संस्कृति में निराशा को कहीं कोई स्थान नहीं है। वह अपने अनुयायियों को आशावाद की ओर प्रेरित करती रही है। हम आपत्ति, विपत्तियों से कभी भयभीत नहीं होते, क्योंकि हम भगवान् पर भरोसा करके कर्मों में लग जाते हैं।
हमारे धर्म में ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ और
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना मनुष्येत्तर देहधारियों के प्रति भी प्रेम प्रदर्शित करती है। हम पशु, पक्षियों को भी दया-भाव से देखते हैं।
अतिथि-सत्कार का हमारे यहाँ बड़ा महत्व रहा है। सभी गृहस्थ पहले अतिथि को भोजन कराते और फिर स्वयं करते थे। अतिथि परिचित, अपरिचित कैसा भी हो, किसी का भी निरादर नहीं होता था।
मृतक कर्मों में अतिथि को भोजन कराने का विधान है। उसके लिए रोटियाँ निकाल कर दी जाती है। श्राद्धादि कर्मों में गौ, अतिथि, काक और श्वान को अन्न-भाग दिया जाता है। यह सब हमारे पशु-पक्षी प्रेम का ही प्रतीक है।
हिंदू धर्म में भी जैन और बौद्ध धर्म कुछ ऐसे चले जिनकी उपास्य और उपासना विधियों में विभिन्नता रही। परंतु परस्पर साम्प्रदायिक संघर्ष की नौबत कभी भी नहीं आई। बल्कि वे दोनों धर्म सनातन धर्मियों के सहयोग से उन्नत हुए। आज अनेक जन धर्मावलम्बी भी राम-कृष्ण और महावीर जी का साथ-साथ पूजन करते हैं।
हमारे धर्म में स्वार्थ भावना को प्रश्रय नहीं दिया गया। हमारी संस्कृति हिन्दुस्तान का ही नहीं, बल्कि अखिल विश्व की कल्याण-कामना करती है। वह मनुष्यों को ही नहीं, सभी प्राणियों को सुखी देखना चाहती है। उसने मानव जाति को प्रेम, विश्वास और उदारता का संदेश दिया है।
हमारे प्रेम-भाव का ही यह प्रभाव है कि यहाँ मुस्लिम शासन काल में ही मुसलमान कवियों ने राम और कृष्ण से सम्बन्धित कविताएं रचीं, मुस्लिम भक्तों ने भी कृष्ण की उपासना की। यहाँ राम और रहीम में कुछ भी अंतर नहीं माना जाता और अंत में गाँधीजी ने ‘ईश्वर अल्ला एक हि नाम’ वाला मंत्र देकर संसार की आंखें खोल दीं कि भारतीय संस्कृति में सम्प्रदायवाद को किंचित भी स्थान नहीं है।
दैवी-विधान और मनुष्य की स्थिति
संसार की प्रत्येक घटना, क्रिया-कलापों का संचालन एक नियत विधान के अनुसार ही होता है, जिसे प्राकृतिक, ईश्वरीय विधान, कुछ भी कहें। इस विधान की प्रेरणा से सृष्टि का जर्रा-जर्रा गतिशील है। इस विधान के अनुकूल चलने पर ही सुख सुविधा, सहयोग, प्रगति, विकास निश्चित है। इतना ही नहीं उस दिशा में मनुष्य प्रयत्न करके विशेष गति और स्थिति, प्राप्त कर सकता है। किंतु प्रतिकूल दिशा में चल कर तो संघर्ष, अशाँति, कष्ट, दुःख, पराजय के सिवा और कुछ नहीं मिलता। इससे उल्टी-अपनी शक्तियाँ व्यर्थ ही नष्ट होती हैं और मनुष्य-प्रगति की ओर न चलकर अवनति के गर्त में गिरता जाता है - पिछड़ जाता है। शास्त्रकारों ने इसी दैवी विधान के अनुकूल आचरण करना पुण्य और इसके प्रतिकूल चलना पाप कहा है। इसी तथ्य की कसौटी पर परीक्षण करने वाले जीवन विद्या विशारदों में-महापुरुषों ने कहा है “बुराई का परिणाम सदैव बुरा ही होता है। दुष्कर्म, कुचिन्तन, दुर्भावनाओं का परिणाम सदैव दुःखदायी ही होता है।” क्योंकि ये सब विश्व विधान के विरोधी, अनैतिक तत्व हैं।
विवेक-हीनता और अज्ञान से प्रेरित मनुष्य जब विश्व-प्रवाह, प्रकृति की विकास यात्रा के अनुकूल नहीं चलता तो प्रकृति उसे एक न एक दिन ठोक पीटकर उस ओर चलने को बाध्य कर ही देती है। जब मनुष्य बाह्य आकर्षणों में अपने लक्ष्य, पथ को भूल जाता है तो उसे प्रकृति के थपेड़े खाने ही पड़ते हैं। यह निश्चित तथ्य है कि स्वार्थ, क्षणिक सुखोपभोग, समृद्धि आदि अस्थायी, क्षणभंगुर हैं फलतः इनका पर्यवसान अनन्त दुःख में ही होता है। इन्द्रिय लोलुप व्यक्ति कई मानसिक और शारीरिक रोगों के शिकार हो जाते है, स्वार्थी लोभी, लालची लोग हृदय रोग उदर विकार, रक्त दोष आदि से पीड़ित हो जाते है। इसके साथ ही बाह्य जीवन की परिस्थितियों का गठन इस तरह हो जाता है जिसमें विश्व नियम के विरुद्ध चलने वाले को बार-बार ठोकरें लगती हैं, कष्टों से गुजरना पड़ता है। जनमन का, समाज का विरोध और तिरस्कार सहना पड़ता है। मनुष्य की समृद्धि शक्ति, उसका वैभव ऐश्वर्य सुख साधन उसे इन आन्तरिक एवं बाह्य प्रताड़ना, पीड़ा, झटकों से नहीं बचा सकते और बार-बार इस तरह की होने वाली शारीरिक मानसिक पीड़ा की अनुभूति-दुःख द्वन्द्वों की प्रतिक्रिया कालान्तर में मनुष्य की बुद्धि को स्थायी सुख नित्यानंद करने के लिए बाध्य कर ही देती है। और तब मनुष्य विश्व-नियम, दैवी-विधान, को समझने, सोचने और उसे जीवन में उतारने की दिशा में प्रयत्न करने लगता है। दुःख द्वन्द्वों की यह मार, कष्टानुभूति की यह कड़वी प्रतिक्रिया तब तक शान्त नहीं होती जब तक मनुष्य अपने जीवन के सही तथ्य को पाकर उस पर आचरण करना प्रारम्भ न कर दे। इस तरह विचारपूर्वक देखा जाय तो दुःख पीड़ायें, कष्टानुभूतियाँ कोई दण्ड नहीं हैं अपितु प्रकृति की, ईश्वरीय विधान की एक सुधार प्रक्रिया है।
मनुष्य के अनेकों मानसिक दोषों का मूल जिम्मेदार उसका अहंकार होता है। नीतिकारों ने अभिमान को समस्त पापों का मूल बताया है। अभिमान की छत्र-छाया में ही अनेकों मानसिक दोष पनपते हैं बढ़ते हैं और फैलकर मनुष्य के आन्तरिक जीवन को अस्त-व्यस्त असन्तुलित कर देते हैं और इसी की छाया स्वरूप जीवन के बाह्य पर्दे पर भी उल्टे काम, उल्टा व्यवहार, होने लगता है। किन्तु प्रकृति भी अभिमान को जड़ से खत्म किए बिना नहीं छोड़ती। देखा जाता है कि गिरे हुए उठते हैं और ऊपर चढ़े हुए गिरते हैं।
वैज्ञानिक अन्वेषणों से यह मालूम हुआ है कि हिमालय पहाड़ किसी समय समुद्र में डूबा हुआ था। ऊपर की चोटियों पर प्राप्त मछलियों, जलचरों के अवशेषों से यह सिद्ध भी हो गया है। इसी तरह हिन्द महासागर में एक पूरे का पूरा महाद्वीप ही डूबा हुआ है। स्थूल-जीवन, बाह्य संसार परिवर्तनशील हैं अभिमान का आधार भौतिक विशेषताओं में ही होता हैं। अतः एक न एक दिन भौतिक समृद्धि, सम्पन्नता शक्ति आदि पर खड़ा अभिमान का महल स्वतः ही धराशायी हो जाता है। आज जो गिरे हुए हैं कल उठेंगे। जो आज अपने को ऊपर उठे हुए जान रहे हैं उनका एक दिन गिरना भी निश्चित ही है। इस तरह उन्नति, अवनति, उत्थान पतन दोनों तरह की परिस्थितियों में समत्व रखने की शिक्षा प्रकृति देती रहती है। प्रकृति के इस रहस्य को समझने वाला व्यक्ति कभी अभिमान के मादक खुमार से मदहोश नहीं हो सकता।
शरीर के अंदर के विकारों का शमन करने के लिए प्रकृति शरीर में जो प्रतिक्रिया पैदा करती है उसके फलस्वरूप कई रोग फोड़े, फुन्सी, चेचक, बुखार, दस्त, उल्टी, दर्द आदि उत्पात होते हैं। वस्तुतः यह सब शरीर के विजातीय द्रव्यों को निकाल बाहर करने के प्रभाव मात्र हैं। किसी तरह का अत्यधिक कष्ट होने पर प्रकृति माता चेतना को ही शाँत कर देती है ताकि मनुष्य असहाय वेदना से पीड़ित न हो। किसी तरह का जबर्दस्त शारीरिक एवं मानसिक आघात लगने पर मनुष्य बेहोश, अचेत हो जाता है ! लोग इन सबको रोग, अभिशाप आदि समझते हैं, भगवान को कोसते है। किंतु हम यह नहीं सोचते कि यह सब प्रकृति माता का कितना बड़ा उपकार है हम लोगों पर, अन्यथा कष्टदायक वेदना और दोषों के भण्डार दूषित शरीर की क्या स्थिति होती इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है।
प्रकृति बहुत हद तक शरीर के दोषों को दूर करने का प्रयत्न करती है किंतु मनुष्य जब उससे कोई सहयोग नहीं करता और दूषित आचरण करके उसके नियमों का उल्लंघन ही करता जाता है तो वह जीर्ण-शीर्ण शरीर छीन लेती है और आत्मा को नया शरीर प्राप्त करने के लिए फिर से स्वतन्त्र कर देती है। जिसे हम मृत्यु कहते हैं, क्या वह प्रकृति माता का अमूल्य वरदान नहीं है जिसमें हम जीर्ण-शीर्ण, असमर्थ, आरोग्य शरीर को त्यागकर नये शरीर की प्राप्ति के हकदार बन जाते है?
शारीरिक विकारों की तरह ही मानसिक विकार, चिन्ता कुढ़न कुविचार दुर्भाग्य आदि का भी प्रकृति अपने ढंग से निवारण करती है। मनुष्य जिस बात से चिन्तित अथवा भयभीत होने लगता है उसके जीवन में उसी तरह की परिस्थितियाँ बार बार रहकर मनुष्य उनका ऐसा अभ्यासी हो जाता है जिससे पूर्व भय और चिन्ता शेष नहीं रहते। इसी तरह स्वप्नों के माध्यम से भी मनुष्य के मानसिक भावों का रेचन हो जाता है। जैसे स्वप्न देखे जाते हैं वैसे भावों का रेचन भी हो जाता है। काम विकास जन्य दूषित भाव स्वप्न में व्यक्त होकर क्षीण हो जाते हैं। स्वप्न में भूत को बार-बार देखने वाले भूत के भय से मुक्त हो जाते हैं। हिंसक पशुओं के संपर्क में आने पर तज्जन्य भय का निवारण हो जाता है। गन्दे स्वप्न देखने पर गन्दे भावों का रेचन हो जाता है। स्वप्न में अपनी मृत्यु का दृश्य देखने वाले मृत्यु की चिन्ता से मुक्त हो जाते हैं। यदि सूक्ष्म निरीक्षण करके देखा जाय तो मालूम होगा मनुष्य जिस विषय के स्वप्न देखता है वह उठने पर उस विषय में अपने आपको हल्का, स्वस्थ महसूस करता है। प्रकृति माता मनुष्य की मानसिक गुत्थियों, विषमताओं को विभिन्न अनुभूतियों के माध्यम से सुलझाती रही है, चाहे यह कार्यक्रम दृश्य हो अथवा अदृश्य, बाह्य जगत में हो या स्वप्न जगत में।
बाह्य जीवन की परिस्थितियों, बीमारियों विषमताओं का स्वरूप ही प्रकृति की एक सुधारात्मक प्रक्रिया है। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में इस तरह की सुधारात्मक, दोष निवारक परिस्थितियाँ, वातावरण, परिणाम समयानुसार अवश्य ही मिलते हैं। यह सब एक ठीक-ठीक नियम, व्यवस्था, के अनुसार होता रहता है। अहंकारी, शक्तिशाली, गर्व में चूर दुर्योधन जब अपनी अनीतियों से बाज नहीं आया तो उसे अपनी ही आँखों अपना सर्वस्व नष्ट भ्रष्ट होते देखना पड़ा और बड़ी असहाय अवस्था में शरीर छोड़ना पड़ा। महाबली रावण का दर्प अहंकार उस समय नष्ट हो गया जब उसका सारा वैभव नष्ट हो गया और वह असहाय घायल अवस्था में रणभूमि में पड़ा था। जिसने बड़े−बड़े देवों पर विजय पाकर उन्हें बन्दी बना छोड़ा था, उसे दो क्षत्रिय पुत्रों ने कुल सहित नष्ट कर दिया। विश्व विजयी सिकन्दर महान अपनी अपार सम्पत्ति के होते हुए भी छटपटाता हुआ मरा और उसे कोई न बचा सका। उसका दर्प अहंकार मिट्टी में मिल गया। दुनिया की खुली पुस्तक में दैवी विधान की इस सुधार प्रक्रिया का पाठ सरलता से पढ़ा जा सकता है।
दुनिया से छिप कर अपने दुराचरण, पाप अन्याय, अनीति का खेल खेलने वाले, समाज और राजनीति की आँख में धूल झोंक सकते हैं। अदालतों में झूँठे प्रमाणों से अनुकूल न्याय प्राप्त कर सकते हैं। चमक-दमक पूर्ण कीमती पोशाक और समृद्धि की चकाचौंध से अपने असली स्वरूप को छिपा सकते हैं, दूसरों को चालाकी से अपना बड़प्पन जता सकते हैं। किन्तु विश्व विधायक की नजर से वे नहीं बच सकते। वहाँ उनका तर्क प्रमाण, बुद्धि, चातुर्य सब धरा ही रह जाता है। छलबल, दम्भ, समृद्धि आदि कोई भी उसे नहीं बचा पाते।
दुराचारी अपनी बाह्य सफलताओं के झूठे अभिमान से स्वयं ही ऐसी परिस्थितियों का निर्माण कर लेता है कि जिनमें कष्ट, मुसीबतों, दुःखों का सामना करना पड़ता है, उसका मनोबल नष्टप्रायः हो जाता है जिससे जीवन के विभिन्न पहलुओं में उसे पराजय का सामना करना पड़ता है। गुब्बारे की तरह फूला हुआ अभिमान तनिक सी कष्टकारक, अपमानजनक, परिस्थितियों की ठेस लगते ही फट जाता है और तब उसे अपनी असलियत का पता चलता है। स्वेच्छाचार दर्प अभिमान नष्ट होकर मनुष्य अपने को सामान्य श्रेणी में अनुभव करता है। यह सब ठीक उसी तरह नियमबद्ध होता है जैसे ऋतुओं का आना, दिन रात का होना आदि।
छिपे -छिपे पाप करने वाले कष्ट साध्य मानसिक रोगों से पीड़ित हो जाते हैं। उनके आसपास का वातावरण इस तरह का बन जाता है जिससे उन्हें दुःखदायी यन्त्रणायें सहन करनी पड़ती है। ऐसे लोग शान्ति से नहीं रह पाते। चैन से खा नहीं सकते न सुख की नींद सो सकते हैं। इस तरह अन्तर्बाह्य सर्वत्र दुःख क्लेश अशान्ति पीड़ादायी यन्त्रणायें मनुष्य को वास्तविक सुख और सत्य की खोज के लिए बाध्य कर देती हैं। जब मनुष्य दैवी विधान के अनुसार मिली ताड़ना, दण्ड कष्टों से भी नहीं सुधरता तो प्रकृति उसे चैन से जीने भी नहीं देती और एक दिन जीने का अधिकार भी उससे छीन लेती है।
संसार एक नियत विधान, नियम द्वारा संचालित और प्रेरित है। संसार का प्रत्येक कण, उसकी गतिशीलता, स्थिति, सम्वर्धन सब उसी नियम के अंतर्गत चलते हैं और यह विश्व नियम सदैव एक सा, अचल और सार्वभौम है। इसके प्रवाह की अनुकूल दिशा में बहकर मनुष्य विकास प्रगति की ओर अग्रसर हो सकता है। विशेष प्रयत्न करने पर वह विशेष स्थिति भी प्राप्त कर सकता है। जैसे नदी के प्रवाह में पड़ जाने पर मनुष्य उलटता-पुलटता बहता चला जायगा।
यदि वह हाथ पैर हिलाये तो अपनी विशेष स्थिति बना सकता है।
संक्षेप में विश्व नियम पुरोगामी, रचनात्मक सृजनात्मक, सत्य, प्रेम, न्याय पर आधारित है। संसार में फैली विकृतियाँ, विपरीतता, अन्याय आदि मनुष्य द्वारा पैदा किए गये हैं और इसी कारण मनुष्य सर्वाधिक दुखी परेशान भी है। आवश्यकता इस बात की है कि शाश्वत नियम, सिद्धान्तों, आदर्शों का अवलम्बन लेकर जीवन को पुरोगामी बनाया जाय तो मानव जीवन अनन्त आनन्द सुख का उद्गम बन जायगा। इसके विपरीत विश्व नियम की प्रतिकूल दिशा में चलना प्रकृति का कोपभाजन बनना है, जिससे जीवन में दुख, कष्ट, परेशानी, रोग, शोक, भय, ताप यन्त्रणाओं का सामना करना पड़ता है, जो वस्तुतः प्रकृति की एक सुधार प्रक्रिया ही है।
लक्ष्मी ने दर्प, व्यंग्य मिश्रित स्वर में कहा- “मेरी कृपा प्राप्त करने को सभी लालायित रहते है। मेरे बिना किसी का जीवन आनन्दमय नहीं हो सकता। इतना भी नहीं जानती तुम। मैं तुम्हारे पुत्रों को सुखी बनाने आई हूँ। उन्हें वरदान दूँगी। तुम्हारा मूर्खतापूर्ण अनुरोध मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं।”
धरती कुछ और कहती पर इसका अवसर दिये बिना ही लक्ष्मी जी ने अपन रथ बढ़ा दिया। वे जिधर से भी निकली उधर से ही वरदान बरसा, देखते - देखते लोगों के घर सोने चाँदी से भर गये।
अपने सौभाग्य की सराहना करते हुए लोग उल्लास भरे उत्सव मनाने लगे। विपुल धन पाकर उन्होंने आमोद प्रमोद के अनेक साधन जमा कर लिए। श्रम की ओर अब कौन ध्यान देता?
वर्षा आई, कोई खेतों को जोतने न गया। आमोद-प्रमोद से फुरसत ही किसे थी। न बीज बोया गया न काटा गया और न अन्न उपजा।
खेतों में खर-पतवार जम गये और घरों में भरे अन्न भंडार की इति श्री हो गई। भूख से व्याकुल लोग सोना-चाँदी लिए इधर उधर फिरने लगे। श्रम का अभ्यास छूट चुका था। दुर्भिक्ष ने विकराल रूप धारण किया। छाती से सोने की ईंट बाँधे क्षुधार्त लोग जहाँ तहाँ तड़प-तड़प कर प्राण त्यागने लगे।
धरती की आँखों में आँसू आ गये। उसने बचे खुचे पुत्रों से कहा- आकस्मिक लाभ का वरदान वस्तुतः अभिशाप जैसा दुर्भाग्यजनक ही होता है।
सृष्टि संचालन के सार्वभौम नियमों के अनुसार जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन होते रहना एक स्वाभाविक बात है। दिन के बाद रात और रात के बाद दिन होता है। वर्षा के बाद शरद और इसके पश्चात् ग्रीष्म ऋतु का आना भी प्रायः निश्चित ही होता है। सूर्य चन्द्र एवं अन्य ग्रह भी एक नियमबद्ध गति में चलते हैं। इसी तरह मानव जीवन भी इन सार्वभौम नियमों के अंतर्गत सदैव एक सा नहीं रहता। मनुष्य की इच्छा हो या न हो जीवन में भी परिवर्तनशील परिस्थितियाँ आती ही रहती हैं। आज उतार है तो कल चढ़ाव। चढ़े हुए गिरते हैं और गिरे हुए उठते हैं। आज अँगुली के इशारे पर चलने वाले अनेकों अनुयायी हैं तो कल सुखदुःख की पूछने वाला एक भी नहीं रहता। रंक कहाने वाला एक दिन धनपति बन जाता है तो धनवान निर्धन बन जाता है। जीवन में इस तरह की परिवर्तनशील परिस्थितियाँ आते -जाते रहना नियतिचक्र का सहज स्वाभाविक नियम है। इनसे बचा नहीं जा सकता। इन्हें टाला नहीं जा सकता।
एकाँगी विचार प्रेरित मनुष्य इस नियति के विधान को नहीं समझ पाता। वह अपनी इच्छा कामना के अनुकूल परिस्थितियों में ही सुख अनुभव करता है तो विपरीत परिस्थितियों में दुखी हो जाता है। अधिकाँश व्यक्ति सुख, सुविधा, सम्पन्नता, लाभ, उन्नति आदि में प्रसन्न और सुखी रहते हैं किन्तु दुख, कठिनाई, हानि आदि में दुखी और उद्विग्न हो जाते हैं। किन्तु यह मनुष्य के एकाँगी दृष्टिकोण का परिणाम है और इसी के कारण कठिनाई, मुसीबत, कष्ट आदि शब्दों की रचना हुई। वस्तुतः परिवर्तन मानव-जीवन में उतना ही महत्वपूर्ण, सहज और स्वाभाविक है जितना रात और दिन का होना - ऋतुओं का बदलना- आकाश में ग्रह नक्षत्रों का विभिन्न स्थितियों में गतिशील रहना। किन्तु केवल सुख, लाभ, अनुकूल परिस्थितियों की ही चाह के एकाँगी दृष्टिकोण के फलस्वरूप मनुष्य दुख कठिनाई और विपरीतताओं में रोता है। दूसरों को अथवा ईश्वर को अपनी विपरीतताओं के लिए कोसता है। शिकायत करता है, इनसे बचने के लिए असफल प्रयत्न करता हैं। किन्तु इससे तो उसकी समस्यायें बढ़ती ही जाती हैं। घटती नहीं। वस्तुतः कठिनाइयाँ जीवन का एक आवश्यक नियम है, जिसे स्वीकार करने में ही लाभ है।
कठिनाइयाँ जीवन की एक सहज स्वाभाविक स्थिति हैं, जिन्हें स्वीकार करके मनुष्य अपने लिए उपयोगी बना सकता है और कठिनाइयों को जीवन का विरोधी भाव, मानकर उनमें दुखी और परेशान होकर मनुष्य अपनी ही हानि भी कर लेता है। कठिनाइयों में रोना, हार मान लेना निराशा और अवसाद से ग्रस्त होना अपने विश्वास के मार्ग को छोड़ बैठना ही है। वस्तुतः कठिनाइयाँ इतनी भयंकर और कष्टदायक नहीं हैं जितना बहुत से लोग समझते हैं। जिन कठिनाइयों में कई व्यक्ति रोते हैं, हार बैठते है, मानसिक क्लेश अनुभव करते हैं उन्हीं कठिनाइयों में दूसरे व्यक्ति नवीन प्रेरणा, नव उत्साह पाकर सफलता का वरण करते हैं। इस तरह कठिनाइयाँ अपने आप में कुछ नहीं है वरन् मन की स्थिति से ही इनका स्वरूप बनता है। मन और कठिनाइयाँ सापेक्ष हैं। सबल मन वाला, व्यक्ति बड़ी से बड़ी कठिनाई को भी स्वीकार करके आगे बढ़ता है तो निर्बल मन वाला सामान्य सी कठिनाई से भी निश्चेष्ट हो जाता है। निर्बल मन तो अपनी कल्पना जन्य कठिनाइयों में ही अशान्त हो जाता है।
नियति के नियम अजेय एवं अपरिवर्तनीय हैं। मानव जीवन में होने वाले परिवर्तन भी इसी के अंतर्गत होने से ध्रुव सत्य हैं। जीवन में आपने वाली कठिनाइयों की जड़ में भी यही हैं इस तथ्य को हृदयंगम कर कठिनाइयों में भी सन्तुष्ट, सन्तुलित रहने वालों की जीवन यात्रा सहज गति में चलती रहती है। अनेकों विपरीतताएं भी उनका मार्ग नहीं रोक पाती। छोटी बड़ी कठिनाइयाँ उनके लिए इसी तरह महत्व रखती हैं, जैसे रात और दिन, सर्दी और गर्मी।
परीक्षा की कसौटी पर प्रतिष्ठित हुए बिना कोई भी वस्तु उत्कृष्टता प्राप्त नहीं कर सकती, न उसका कोई मूल्य ही होता है। सोना भीषण अग्नि में तप कर ही शुद्ध और उपयोगी होता है। बड़ी धूप में तपने पर ही खेतों में खड़ी फसल पकती है। आग की भयानक गोद में पिघल कर ही लोहा साँचे में ढलने के उपयुक्त बनता है। जनजन द्वारा पूजी जाने वाली मूर्ति पर पैनी-छैनी की असंख्यों चोटें पड़ती हैं। परीक्षा की अग्नि में तप कर ही वस्तु शक्तिशाली, सौंदर्य-युक्त और उपयोगी बनती है। मनुष्य भी कठिनाइयों में तप कर उत्कृष्ट, सौंदर्य युक्त प्रभावशाली और महत्वपूर्ण बनता है। जीवन को अधिक उत्कृष्ट और महत्वपूर्ण बनाने के लिए मनुष्य को उतनी ही अधिक कठिनाइयों और परेशानियों में से गुजरना पड़ेगा। वस्तुतः कठिनाइयाँ, दुख, परेशानियाँ, जीवन की कसौटी हैं, जिनमें मनुष्य के व्यक्तित्व का रूप निखरता है।
कठिनाइयाँ मनुष्य के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। इन्हें खुले हृदय से स्वीकार करके मानसिक विकास प्राप्त किया जा सकता है। कठिनाइयों में खुलकर खेलने से इच्छा शक्ति प्रबल होती है और बड़े-बड़े काम करने की क्षमता प्राप्त होती है। कठिनाइयों में मनुष्य की आन्तरिक शक्तियाँ एकत्रित और संगठित होकर काम करती हैं जीवन की कोई भी साधना कठिनाइयों में होकर निकलने पर ही पूर्ण होती हैं। कठिनाइयों में ही जीवन दर्शन की परीक्षा होती है।
कठिनाइयाँ दुधारी तलवार हैं जो व्यक्ति इन से घबरा कर गिर पड़ा वह, हार बैठा। वह अपने जीवन की सभी सम्भावनाओं को नष्ट कर देता है इसके विपरीत जिसने कठिनाइयों को साध कर उन से समझौता, समन्वय कर लिया वह व्यक्ति कठिनाइयों को ही अपनी सफलता, उत्कृष्टता का साधन बना लेता है। कठिनाइयाँ एक ओर जीवन में कसौटी बन कर सुधार, नवनिर्माण, उत्थान की प्रेरणा देने में उत्साह और मनोबल को ऊँचा उठाने में सहायक होती हैं, तो दूसरी ओर मनुष्य को अकर्मण्य, निरुत्साह बना देती हैं। जीवन की आशा उमंगों को धराशायी कर देती हैं। दोनों ही स्थितियों का उत्तरदायी मनुष्य स्वयं ही होता हैं इसमें कठिनाइयों का कोई दोष या गुण नहीं है। जब मनुष्य कठिनाइयों की यथार्थता को नहीं समझता, उन्हें जीवन का स्वाभाविक अंग मानकर सहर्ष स्वीकार नहीं करता तो ये ही कठिनाइयाँ अपार दुख, अशान्ति, क्लेश का कारण बन जाती हैं भय और घबराहट पैदा हो जाते हैं। इससे मनुष्य का मानसिक सन्तुलन संगठन बिखर जाता है और अन्तर्द्वन्द्व पैदा हो जाते हैं। जब किसी राष्ट्र की आन्तरिक शक्तियाँ विघटित होकर उनमें अन्तर्द्वन्द्व, गृह, युद्ध पैदा हो जाता है तो उसका पतन होना स्वाभाविक ही है। उस पर बाह्य आक्रमण भी होने लगते हैं। इसी तरह अन्तर्द्वन्द्व से मानसिक शक्तियाँ नष्ट होने लगती है। फिर सामान्य सी कठिनाइयाँ भी मनुष्य की आशा, उमंग और धैर्य को घायल कर उसे निराशा, हीनता अवसाद की ओर ढकेलती हैं। मनुष्य की बड़ी-बड़ी आशायें, उमंगें, अभिलाषायें इस स्थिति में कठिनाइयों की चट्टान से टकराकर टूट-फूट जाती हैं, छिन्न-भिन्न हो जाती हैं।
इस तरह मनुष्य चाहे तो कठिनाइयों को वरदान बना सकता है और अभिशाप भी। आवश्यकता इस बात की है कि वह बार-बार प्रयत्न करके कठिनाइयों की कसौटी में सफल होने के प्रयास न छोड़े अपनी साधना जारी रखे। जीवन में आने वाली कठिनाइयों का समाधान मनुष्य कैसे करता है इसका प्रभाव उसके साथ-साथ समाज और वातावरण पर भी काफी पड़ता है। जो मनुष्य कठिनाइयों का खुले दिल से स्वागत करता है, उनके साथ खेलता है वह स्वयं तो उससे मिलने वाले लाभ प्राप्त करता ही है किन्तु दूसरों के लिए भी प्रेरणा और आदर्श बन जाता है। एक कायर सैनिक को रण से भागता देखकर कई सैनिक भाग निकलते हैं। इसके विपरीत एक योद्धा जो अपने कर्तव्य को सामने रखकर कठिनाइयों में भी लड़ता है, उसे देखकर अन्य सैनिक भी प्रेरणा और उत्साह प्राप्त कर लड़ते रहते हैं। उनमें वीरता के भाव जाग्रत होते हैं।
कठिनाइयों में निर्द्वन्द्व होकर आगे बढ़ने वालों की समाज के लिए बहुत बड़ी देन होती है। वे समाज के प्रेरणा केन्द्र बन जाते हैं। उनके पद चिन्हों पर दूसरे भी चलते हैं। मेजिनी ने जब इटली का स्वतन्त्रता आन्दोलन चलाया तो उसके केवल पाँच ही साथी थे। पाँच से बढ़कर दस, और दस से बीस, इस तरह उनकी संख्या बढ़ती ही गई। इसी तरह लोकमान्य तिलक ने भारत को स्वतन्त्रता के मंत्र की दीक्षा दी, गाँधीजी ने स्वाधीनता आन्दोलन चलाया तो असंख्यों भारतीयों ने अपने आपको सहर्ष कठिनाइयों की आग में डाल दिया।
यदि सबसे बड़ी कोई सहायता है तो यह है, कठिनाई के वक्त किसी की मदद करना और उसका एक मात्र सच्चा उपाय है उससे भी अधिक कठिनाइयों में पड़कर उसके समक्ष सन्तोष, सन्तुलन, धैर्य, शान्ति का आचरण करना। अन्य सभी भौतिक, बाह्य धन आदि की सहायतायें सामयिक होती हैं और उनसे गलत लाभ उठाकर मनुष्य पतित भी हो सकता है। किन्तु कठिनाइयों में अपने आपको डालकर दूसरों को बल देना सच्ची सहायता है। श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को उसकी इच्छानुसार अपनी सेनायें, भौतिक सहायता प्रचुर मात्रा में दी, किन्तु अर्जुन के लिए निःशस्त्र होकर केवल सारथी का काम करना स्वीकार किया। अपने जीवन की परवाह किए बिना अपने आपको निम्न परिस्थितियों, कठिनाइयों में डालकर श्रीकृष्ण ने अर्जुन को एक आध्यात्मिक बल और मानसिक शक्ति प्रदान की। यदि किसी सहायता से कोई व्यक्ति परावलम्बन सीखता है तो वह अच्छी सहायता नहीं, इससे उसका पतन होना सम्भव है। सच्ची सहायता वह है जो मानसिक शक्ति की अभिवृद्धि करे।
सुकोमल पुष्प की छाती पर बैठी मधुमक्खी निर्दयता पूर्वक उसका जीवन रस चूसने में लगी थी।
फूल ने कराहते हुए पूछा- मैं भी इस दुनिया में जीने की लालसा लेकर आया हूँ। इस तरह चूसे जाने पर मैं भला कब तक जी सकूँगा?
मधुमक्खी पर कुछ असर न हुआ। रसपान का आनन्द छोड़ने की वह तैयार न हुई। फूल कराहता रहा, मक्खी अपना आनन्द लेती रही।
मधु की गंध पाकर एक दिन वन-बिलाव पेड़ पर जा पहुँचा। शहद पिया और छत्ते को तोड़कर टुकड़े-टुकड़े छितरा दिये।
मक्खी भिनभिनाई। वनबिलाव को भर पेट दुर्वचन कहे। पर वह अनसुनी किये अपनी तृप्ति का आनन्द लेता रहा।
रस-हीन फूल मुरझा गया। उसने मधुमक्खी का इस प्रकार अवसाद देखा तो लम्बी साँस खींची और कहा- यदि दूसरों का दुख समझ सकना हमारे लिए संभव रहा होता तो यह दुनिया कितनी सुन्दर होती ।
जीवन में पूर्णता प्राप्ति के लिए हमारे पूर्वज मनीषियों ने तीन मार्ग बताये हैं। ज्ञानयोग, भक्ति योग और कर्मयोग। ज्ञानयोग, उच्च बौद्धिक चेतना सम्पन्न, सूक्ष्मदर्शी, चिन्तन प्रधान भाव अर्जन करने की प्रेरणा देता है, और भक्तियोग में हृदय की शुद्धि, आत्म समर्पण की उत्कट भावना, अनन्य प्रेम को आवश्यक बताया गया है। किन्तु कर्मयोग का समावेश भी इन दोनों के साथ अनिवार्य माना गया है।
आज के संघर्षमय युग में तो कर्मयोग “युगधर्म” कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी क्योंकि इसकी साधना, आचरण, सरलता से किए जा सकते हैं। महाभारत का युद्ध शुरू होने को था, दोनों सेनायें आमने-सामने खड़ी थी। बीच में खड़े मोहग्रस्त विक्षिप्त मन अर्जुन को श्रीकृष्ण ने कहीं कन्दराओं में एकान्त में बैठकर तत्वज्ञान की साधना के लिए नहीं कहा था और न भाव भक्ति में विह्वल हो निज सुधि विसार कर परमात्मा को पुकारने के लिए ही कहा।
समस्त गीता का एक मात्र निष्कर्ष अर्जुन को निष्काम कर्मयोग की शिक्षा देकर महाभारत के युद्ध में प्रवृत्त करना था, जिसमें स्वयं अर्जुन की भी प्रतिष्ठा, कर्तव्य, परायणता, मुक्ति एवं पूर्णता सन्निहित थी। मनुष्य मात्र जीवन के महाभारत संग्राम में खड़ा है। दुविधा, संघर्ष, जीवन के कटु अनुभव, अवरोध, कठिनाइयों में मनुष्य जहाँ विपन्न सा खड़ा है वहाँ गीता का कर्मयोग ही उसे आगे बढ़ाने का मार्ग खोलता है। कर्मयोग से मनुष्य के आन्तरिक एवं बाह्य जीवन का परिष्कार होता है। अनेकों जन्मों की ग्रन्थियों का निराकरण हो जाता है। मन शक्तिशाली और शुद्ध बनता है। आन्तरिक जीवन के साथ ही बाह्य जीवन भी सफल और सुन्दर बनता है।
कर्मयोग में प्रवृत्त होने से मनुष्य और समाज के निकट संपर्क स्थापित होते हैं। जिससे मनुष्य में एकाकीपन की भावना, घबराहट, डर संकोच आदि की वृत्तियाँ दूर होकर मनुष्य की गति, एवं क्षमताओं में वृद्धि होती है। बहुधा कई लोगों को दूसरों से मिलने जुलने, बातचीत करने में एक प्रकार की घबराहट, बेचैनी सी होती है। जिसके लिए लोग दूसरों के संपर्क से बचने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु इससे मनुष्य का व्यक्तित्व अविकसित ही रह जाता है। लेकिन कार्य क्षेत्र में उतरने पर, कर्मयोग का अवलम्बन लेने पर तो मनुष्य को दूसरों से संपर्क स्थापित करना ही पड़ता है। दूसरों के साथ मिल जुलकर हम किस प्रकार काम करें, कैसे सोचें और चाहना करें? इसी विज्ञान को कर्मयोग कहा गया है।
अकर्मण्य न बैठकर अच्छे, रचनात्मक कार्यों में लगे रहना अपने मन को शक्तिशाली बनाने का एक सरल उपाय है। स्वयं बैठने पर ही मनुष्य के मन में निकम्मी बातें उठनी शुरू होती हैं जिनसे मानसिक कमजोरियाँ बढ़ती हैं। कुविचारों की बढ़ोतरी कुमार्ग की प्रेरणा देती है। इससे चरित्र बिगड़ता है, स्वभाव गंदा होता है और मनोबल क्षीण होने लगता है। मनुष्य तरह-तरह के शारीरिक और मानसिक रोगों से घिर जाता है। निरन्तर किसी काम में लगे रहने से खाली दिमाग शैतान की दुकान नहीं बन पाता, बुरे विचारों के आने जाने के लिए कोई समय ही नहीं रहता। इसके अतिरिक्त काम की सफलता से आत्म विश्वास बढ़ता है और इससे मनुष्य में आत्म नियन्त्रण की शक्ति बढ़ती है इस तरह काम में लगे रहने से मनुष्य की शारीरिक और मानसिक शक्तियों का विकास होता है और इनके फलस्वरूप ही बाह्य जीवन में सफलता मिलती है।
श्रद्धा, निष्ठा एवं लगन के साथ किया गया कोई भी काम मनुष्य को सद्भाव, उच्च, विचार, उत्साह, सन्तोष, शान्ति प्रदान करता है। किसी भी भले काम में लग कर मनुष्य बाह्य संसार में कुछ भी सफलता प्राप्त करें, किन्तु आन्तरिक लाभ शान्ति, आत्म प्रसाद, उच्च विचार सद्गुणावलोकन की दृष्टि तो प्राप्त होती ही है। मानसिक विकारों पर नियन्त्रण प्राप्त होकर नैतिक तथा बौद्धिक उन्नति होती है। कुल मिलाकर कर्मयोगी की अंतर्बाह्य जीवन में सफलता ही मिलती है।
कुविचारों और दुष्प्रवृत्तियों से बचने के लिए अपनी समस्त शक्ति को रचनात्मक कार्यों में लगा देना श्रेयस्कर होता है। इससे एक तो दुष्कर्मों के लिए समय ही नहीं मिलेगा साथ ही कुविचारों को फलित होने का मौका भी प्राप्त नहीं होगा। अकर्मण्यता की स्थिति में अनेकों दूषित मनोभाव उत्पन्न होते रहते हैं, बढ़ते हैं और भयंकर रूप धारण कर लेते हैं। काम में लगे रहने पर दूषित भावों की शक्ति रचनात्मक कार्यों में परिवर्तित हो जाती है। सक्रिय रहने पर मनुष्य के अच्छे बुरे दोनों तरह के भावों का समन्वय हो जाता है। सब मिलकर कार्य की पूर्णता में लग जाते हैं। अतः अन्तर्द्वन्द्व की नौबत ही नहीं आती।
चिन्ता से मुक्ति के लिए सक्रिय रहना आवश्यक है। इससे इच्छाशक्ति भी बढ़ेगी और दूषित भावों का भी शोधन होगा। कोई भी काम जो सरल एवं अपनी रुचि के अनुकूल हो उसमें लग जाना चाहिए। चिंता, क्रोध, शोक आदि हीन भावों से ग्रस्त व्यक्ति के लिए तो अकर्मण्य रहना बड़ा भारी कुपथ्य है, इससे रोग दिन दूना रात चौगुना बढ़ता ही जाता है। दूसरों की सेवा, घर का काम, अध्ययन, शिल्प, कला, साहित्य साधना आदि छोटे बड़े कार्यों में से अपनी रुचि के अनुसार निर्णय कर उसमें दत्त-चित्त होकर लग जाना चिन्ता, मानसिक विकार, उद्विग्नता आदि से बचने का सरल उपाय है । जो लोग अपने कार्यों में दत्तचित्त होकर नहीं लगे रहते बहुधा चिन्तायें उन्हें ही सताती हैं। जो व्यक्ति दृढ़ता के साथ अपने आपको काम में लगा सकता है वही विकारों से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकता है। कर्मशील व्यक्ति भूत भविष्य की उधेड़बुन में उलझा नहीं रहता, वरन् वर्तमान को महत्व देता है और अपने काम में लगा रहता है।
कर्मयोग जीवन में होने वाली क्षति, हानि आदि के लिए रोने, शोक करने, दुख भगाने की इजाजत नहीं देता। वहाँ तो पद-पद पर नव सृजन निर्माण के द्वारा क्षति, हानि के गढ्ढों को भर देने का विधान है और यह सच भी है कि किसी हानि, क्षति के लिए दुख मनाने, शोक करने से कोई लाभ नहीं होता वरन् उसकी पूर्ति करने में लग जाना ही उसका समाधान है, जो कर्मयोग, सक्रियता से ही सम्भव है। बिना क्रिया के तो सृजन और निर्माण के काम कैसे होंगे? और बिना सृजन के पूर्ति भी सम्भव न होगी। धन की क्षति के लिए धन कमाने के प्रयत्न करना, परीक्षा में असफल होने पर पढ़ाई की तैयारी में लग जाना, इसी तरह अन्य सभी
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।
सत्येन वाति वायुश्च सर्व सत्ये प्रतिष्ठतम्॥
-चाणक्य
“सत्य से पृथ्वी स्थिर है, सत्य से सूर्य प्रकाश देता है, सत्य ही से वायु बहती है, सब कुछ सत्य के बल से ही स्थिर है।”
***
मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं तु गच्छति।
अपि निवणिमायाति नानलयाति शीतताम्॥
- हितोदेपश
“उच्च मनोबल वाले मनस्वी व्यक्ति मर भले ही जायें पर कृपणता, कायरता नहीं करते, जैसे अग्नि भले बुझ जाय पर शीतल नहीं होती।”
क्षेत्रों में यही नियम लागू होता है। चिन्ता करते रहने या हानि का दुख मनाते रहने से वह क्षतिपूर्ति न हो सकेगी, वरन् इससे तो शारीरिक और मानसिक बल ही घटना आरम्भ हो जायेगा, जिससे उस क्षतिपूर्ति में और भी अधिक बाधा पड़ेगी। “बीती ताहि बिसारदे आगे की सुधि लेय” की नीति अपनाकर ही कोई व्यक्ति अपनी क्षतियों को पूर्ण कर सकता है। जो मनुष्य सतत अपने कर्तव्य कर्म में लगा रहता है उसे किसी दूसरे की निन्दा स्तुति करने का अवकाश नहीं रहता। कर्मरत के लिए एक क्षण भी इन बेकार बातों के निमित्त निकालना मुश्किल है। किसी भी व्यक्ति को अपने कार्य की सिद्धि के लिए दूसरों के गुणों को देखने, समझने और उनका अनुकरण करने की आवश्यकता होती है। कर्मयोगी को दूसरों के गुण अच्छाइयों को देखने की आदत बन जाती है और दोष दर्शन के लिए न उसे उत्साह रहता है और न अवकाश। छिद्रान्वेषण, परदोष दर्शन, असद्भाव विचार प्रायः उन्हीं लोगों में देखे जाते हैं जो अकर्मण्य होते हैं।
जल के बहते हुए प्रवाह में जिस प्रकार कूड़ा-करकट अपने आप बहता चला जाता है उसी प्रकार कर्तव्यपरायण व्यक्ति के मन में कुविचार भी टिक नहीं पाते। शरीर और मन की अनेकों विकृतियाँ उनमें पाई जाती है जिन्हें फालतू बैठे रहना पड़ता है। चिन्ता, शोक, उद्वेग के लिए जिन्हें अवसर ही नहीं मिलेगा वे कैसे इन झंझटों में पड़े रहेंगे? काम में थका हुआ मनुष्य गहरी नींद सो जाता है और फिर उसे रात भर जाग जाग कर कुकल्पनायें करते रहने का अवसर ही नहीं मिल पाता।
अच्छे आदर्श रचनात्मक उपयोगी और आत्मसंतोष देने वाले कार्यों में संलग्न रहकर मनुष्य को जो प्रफुल्लता मिलती है वह और किसी प्रकार उपलब्ध नहीं हो सकती। कामनाओं और लालसाओं को छोड़कर, खेल और अभिनय की तरह उदात्त बुद्धि से जो कार्य करते हैं उनके लिए तो यह जीवन ही नहीं सारा संसार और उसका प्रत्येक कार्य भी आनन्दमय बन जाता है। कर्म की महत्ता अनन्त है। इसीलिए उसे योग कहा गया है। अन्य योग साधनाओं की भाँति ही मनुष्य कर्मयोग की साधना से पूर्णता प्राप्त कर सकता है।
व्यभिचार के अपराध में एक स्त्री को पकड़ कर लाया गया। पंचों ने निश्चय किया कि पत्थर मार-मार कर उसका वध कर डाला जाय।
दर्शकों की भीड़ पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़े हाथ में लिए खड़ी थी। अपराधिनी का मस्तक लज्जा से झुका था, वह भय से थर-थर काँप रही थी।
ईसा उधर से निकले। लोगों ने उन्हें रोका और इस अपराध एवं दंड व्यवस्था पर अपना अभिमत प्रकट करने का अनुरोध किया।
लोगों को संबोधन करते हुए ईसा ने कहा- अपराधी को दंड देना उचित है, पर पत्थर उन्हें मारने चाहिए जिन्होंने कभी अपराध न किया हों। जो कभी व्यभिचार कर चुके हों उनके लिए तो ऐसा करना सरासर अनुचित है।
इस विवेक व्यवस्था को दर्शकों ने ध्यानपूर्वक सुना। हाथों में रखे पत्थर नीचे गिरने लगे भीड़ खिसकना आरम्भ हो गई। वध स्थली पर अपराधिनी और ईसा दो ही खड़े थे। ईसा ने कहा- भटकने वाली लड़की जा, प्रभु से क्षमा माँग और नेक जीवन व्यतीत कर।
जब मनुष्य अपने आपको सामान्य स्तर पर न समझकर असाधारण, विशेष बड़ा, महत्वपूर्ण समझने लगता है तभी अभिमान का अंकुर फूट निकलता है जो दिनों दिन बढ़ता हुआ विशाल रूप धारण कर लेता है। झूँठी प्रशंसा, उद्दंडता, स्वेच्छाचार, शेखीखोरी से भी मनुष्य अपनी वस्तुस्थिति को न समझकर अभिमान के परों से उड़ने लगता है। ऐसे लोगों के दिमाग की बागडोर अभिमान और इसे पोषण करने वाले तत्वों के हाथों में होती है। अविवेकी, अज्ञानी, अदूरदर्शी, मोटी बुद्धि के लोग ही अभिमान से ग्रस्त होते देखे जाते हैं। कुछ भी हो अभिमान वह विष बेल है जो जीवन की हरियाली, सौंदर्य, वृद्धि विस्तार, विकास को रोककर उसे सुखा देती है। यह ऐसी विष-बुझी दुधारी तलवार है जो अपने तथा दूसरों के जीवन में विनाश का सूत्रपात कर देती है। अभिमान का स्वभाव ही दमन, शोषण, पतन, क्रूरता आदि है, जिससे स्वयं व्यक्ति और उससे सम्बन्धित समाज प्रभावित हुए बिना नहीं रहता ।
किसी भी विषय, क्षेत्र में अभिमान हो जाने पर मनुष्य की प्रगति, विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। विद्या का अभिमान हो जाने पर विद्या नहीं बढ़ती वरन् वह घटती ही जाती है। प्रशंसा, प्रसिद्धि जिससे अभिमान को पोषण मिलता है, विकास उन्नति का पथ भुला देती है। न्यूटन महोदय ने अपने गणित की महत्वपूर्ण खोज काफी समय तक प्रकाशित ही नहीं की। किन्तु बहुत समय बीत जाने के बाद उन्होंने उस खोज को एक पत्र में प्रकाशित कर दिया तो अनेकों लोगों के धन्यवाद, अभिवादन, प्रशंसापत्र उनके पास आने लगे। इस पर उन्होंने दुखी होकर कहा था “ अब मेरी प्रसिद्धि तो खूब बढ़ेगी किन्तु विद्या जिसके लिए मैंने जीवन भर लगा दिया उसका विकास रुक जायगा।” प्रसिद्ध दार्शनिक कान्ट ने अपनी बड़ी उम्र तक अपने ज्ञान और सिद्धांतों को प्रकाश में नहीं आने दिया। उनकी जगत प्रसिद्ध पहली पुस्तक 12 वर्ष की उम्र में प्रकाशित हुई। 40-45 वर्ष तक एक ही समस्या पर वे सोचते विचारते रहे। और जब उसके सभी पहलुओं पर उनका गम्भीर चिन्तन मनन पूर्ण होकर सही सही निष्कर्ष निकला तभी उस विचार को लोक कल्याणार्थ रखा। एक बार न्यूटन से किसी ने कहा था “आपने तो पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया है।” इस पर उस निरभिमानी वैज्ञानिक ने कहा “मेरे सामने ज्ञान का अथाह समुद्र फैला पड़ा है जिसके किनारे के कुछ ही रज कण मैं उठा पाया हूँ।” एक ओर ऐसे व्यक्तियों की स्थिति पर तरस आता है जो बेचारे कही से कुछ पढ़ सुनकर, थोड़ा बहुत अध्ययन कर अभिमानवश अपने आपको विद्या का धनी, पण्डित विद्वान मान बैठते हैं। अपनी विद्वता, पाण्डित्य की दुहाई देने वालों की स्थिति एक खोखले पोले ढोल की तरह ही होती है। अपनी होशियारी, अध्ययनशीलता का अभिमान रखने वाले विद्यार्थी दूसरों से पिछड़ जाते हैं। कला, विद्या, शक्ति, सामर्थ्य सभी क्षेत्रों में अभिमान सफलता और प्रगति का मार्ग बन्द कर देता है।
अभिमान की वृद्धि के साथ ही मनुष्य का पतन प्रारम्भ हो जाता है और अभिमान की पराकाष्ठा सर्वनाश करके ही छोड़ती है। रावण जब अभिमान से बुरी तरह ग्रस्त हो गया और उसने अमानवीय, अमर्यादित कृत्य शुरू कर दिए तो वह अपने कुटुम्ब के साथ विनाश को प्राप्त हुआ। अभिमानी दक्ष प्रजापति ने महादेव-शिवजी, जो उसके दामाद भी थे, के साथ विरोध ठान लिया। उन्हें अपमानित करने के लिए विशाल यज्ञ रचा और निमन्त्रण नहीं भेजा। सती के पितृ गृह में बिना बुलाये चले जाने पर उसका भी अपमान किया गया और सती विरुद्ध हो योगाग्नि में जल मरी। अन्ततः शिवजी ने यज्ञ सहित दक्ष को नष्ट -भ्रष्ट कर दिया। शृंगी ऋषि, नारदजी को जब अपने तप और काम विजय पर अभिमान हुआ तो वे पतित हुए और कामासक्त होकर उन्होंने निम्न कृत्य किए। दान का अभिमान करने वाला वलि पतित हुआ। तप के अभिमानी दुर्वासा ने निर्दोष अम्बरीष को श्राप दे दिया किन्तु उसका मूल्य उन्हें ही चुकाना पड़ा और क्षमा माँगनी पड़ी। अभिमानी कंस, दुर्योधन को वह दिन देखना पड़ा जिसकी उन्हें स्वप्न में भी सम्भावना नहीं थी। हिटलर, सिकन्दर, मुसोलिनी, नेपोलियन आदि को भी अपने बढ़ते हुए सामर्थ्य के अभिमान में पराभव और पतन का सामना करना पड़ा।
अपने रंग रूप, सामर्थ्य, शक्ति किन्हीं भी विशेषताओं का अभिमान मनुष्य के पतन का कारण बन जाता है। मनुष्य की विभिन्न क्रियायें, चेष्टायें अभिमान का नशा चढ़ने पर असन्तुलित और अव्यवस्थित हो जाती हैं वह कुछ का कुछ करने लगता है। उसकी विवेकशीलता, विचार, बुद्धि दूरदर्शिता मारी जाती है जिससे जीवन के सही पथ से भटककर दुष्प्रवृत्तियों, दुष्कर्मों के भयंकर बीहड़ों में भटक जाता है और अन्ततः विनाश को प्राप्त होता है।
अभिमान की वृद्धि के साथ ही मनुष्य में आत्म निरीक्षण, स्वदोष दर्शन की शक्ति और क्षमतायें नष्ट होने लगती हैं, जिससे वह अपना बुनियादी सुधार नहीं कर पाता। उसके व्यक्तित्व में अनेकों दोष रह जाते हैं, जो मनुष्य की असफलता और पतन का कारण बन जाते हैं।
अभिमानी व्यक्ति को सदैव अपनी प्रशंसा प्रिय लगती है। अतः उसे अपनी प्रशंसा करने वाले भी प्रिय लगते हैं और वह उनसे सामीप्य और निकटता रखना अच्छा समझता है। फलतः ऐसे अभिमानी व्यक्तियों के वातावरण में चापलूस, खुशामदी लोगों का गिरोह इकठ्ठा हो जाता है।
प्रशंसालोलुप अभिमानी व्यक्ति जब किसी से अपनी निन्दा सुन लेता है तो उससे व्यर्थ ही शत्रुता ठानकर उसे नेस्तनाबूद करने के प्रयत्न करने लगता है। उसका दम्भ इस कदर बढ़ जाता है कि अपनी इच्छा के विरुद्ध तनिक भी सुनना उसे अप्रिय लगता है। परिणाम यह होता है कि सच्ची राय देने वाले, स्पष्टवक्ता, अनुभवी, विचारशील लोगों का उसे साथ नहीं मिलता और चापलूस चालाक व्यक्ति ही उसके इर्द गिर्द रहते हैं जो अपना उल्लू सीधा करके उसे पतन और विनाश के मार्ग पर बढ़ावा देते रहते हैं।
अभिमानी व्यक्ति को अपने सामने दूसरे प्रगतिशील, उन्नति करने वाले, बढ़ने वाले व्यक्ति तनिक भी अच्छे नहीं लगते। वह नहीं चाहता कि कोई और भी दुनिया में ऊँचा उठे। अपनी उन्नति, अपनी बढ़ोत्तरी, अपनी अहं तुष्टि में ही उसे आनन्द आता है और अकारण ही वह प्रगतिशील तत्वों से ईर्ष्या द्वेष रखकर उन्हें हानि पहुँचाने के षड़यन्त्र रचता है। दूसरों को दुःख पहुँचाता है।
अभिमान ग्रस्त व्यक्ति अपने आपसे अच्छा किसी दूसरे को तो समझता ही नहीं। उसे दुनिया में सब बुरे और स्वयं अच्छा दिखाई देता है, एक बड़ी भारी सभा में कंस से पूछा गया “ उसे यहाँ कितने भले आदमी नजर आते हैं।” उसने कहा “ मुझे यहाँ एक भी भला आदमी नजर नहीं आता।”
अभिमान की वृद्धि के साथ-साथ मनुष्य के संघर्ष का क्षेत्र भी विस्तृत हो जाता है। अपने कार्य क्षेत्र में काम कर रहे अन्य लोगों से बड़ा बनने, अपने व्यक्तित्व को विशेष महत्व देने, अपनी विशेषता बड़प्पन का रौब दिखाने के प्रयत्न में अभिमानी व्यक्ति उनकी आलोचना निन्दा करता है। उन्हें हानि पहुँचाने, असफल बनाने के लिए तरह-तरह के षड़यन्त्र रचता है। इससे अनायास ही दूसरे लोग शत्रु बन जाते हैं। अपने उक्त व्यवहार के कारण दिनोंदिन उसके विरोधियों शत्रुओं की संख्या बढ़ जाती है और यही पतन, असफलता, विनाश का मार्ग है। उसकी सारी शक्ति विरोध, द्वेष, षड़यन्त्रों में नष्ट हो जाती है। रचनात्मक दृष्टि से वह कुछ भी नहीं कर पाता।
दुनिया में यदि कोई भयंकर बीमारी है तो वह है आलस्य की। आलस्य समस्त रोगों का राजा है, उसे मौत से भी अधिक भयंकर कह देना कोई अत्युक्ति न होगी। क्षय, टाइफ़ाइड, इन्फ्लुएंजा, बुखार, चेचक आदि रोग मनुष्य के शरीर को प्रभावित करते हैं। आवश्यक उपचार करने पर कुछ ही समय में ये ठीक हो जाते हैं और जीवनक्रम पूर्ववत् चलने लगता है। खासकर कई रोगों में तो शरीर की शुद्धि भी हो जाती है। इसी तरह मृत्यु भी जन्म, बचपन, यौवन, वृद्धावस्था की तरह ही जीवन की एक स्वाभाविक घटना है। जीवन की लम्बी यात्रा में असमर्थ, अयोग्य जर्जरित शरीर का त्याग और नव शरीर का धारण जन्म मरण की घटनाओं से ही सम्भव है। किन्तु आलस्य तो ऐसा भयंकर रोग है जो मनुष्य के तन, मन, धन, श्री समृद्धि, बुद्धि सबको चौपट कर उसे जड़ता के फौलादी जाल में जकड़ लेता है। यह जीवित होते हुए भी मनुष्य को मृतवत बना देता है। निष्क्रियता, प्रयत्नहीनता, जड़ता, मृत्यु का ही दूसरा नाम है। आश्चर्य की बात तो यह है कि आराम सुख मौज मजे, के लालच में मनुष्य स्वयं ही इसकी गोद में सोता है और फिर यह मायावी उसे उठने नहीं देता। अपना सम्मोहक आलस्य हावी हो जाता है। अपना नियन्त्रण स्थापित कर लेता है।
आलस्य के प्रभाव में पड़ने पर मनुष्य की क्रिया शक्ति कुँठित होने लगती है। शरीर शिथिल हो जाता है। मानव मन की यह विशेषता है कि वह कुछ न कुछ करते रहने का आदी है। जब क्रिया के माध्यम से उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती तो वह विचार और बातूनी दुनिया में काम करने लगता है। बड़ी बड़ी गप्पे हाँकना, निरर्थक बातें करना, खयाली दुनिया में उड़ना आलसियों के काम रह जाते हैं। जिस तरह सोते समय मनुष्य स्वप्नों की दुनिया में तरह-तरह के दृश्य देखता है, कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी बड़ा धनी बन जाता है तो कभी गरीब दीन भिखारी, कभी दुखी होता है तो कभी सुख के गीत गाता हैं, इसी तरह आलसी व्यक्ति भी दिवास्वप्न देखने में व्यस्त और थका-थका सा मालूम पड़ता है। वह दिन भर कल्पना के पंख लगाकर उड़ता रहता है। इन कल्पनाओं की दुनिया में उसे उसी तरह अनुभूतियाँ होती हैं जैसे बाह्य संसार के रंग मंच पर सक्रिय व्यक्ति को। कल्पना की दुनिया में सुख-दुख के थपेड़े खात-खाते आलसी आन्तरिक एवं बाह्य जीवन में खोखला बन जाता है और हाथ पर हाथ धरे बड़ी वेदना, निराशा, काल्पनिक दुखों की पीड़ा का भारी बोझ उठाये असमय में ही काल कवलित हो जाता है। जीवन भर मरने की दुखद कल्पना से भयभीत आलसी को मृत्यु के समय भी कुछ कम कष्ट नहीं होता। इतना ही क्यों जीवन में आने वाले दुख कठिनाइयाँ भी उसकी कल्पना का संयोग पाकर सुरसा की तरह मुँह फाड़ उसे भयभीत करते रहते हैं। असंतोष, निराशा, घुटन, भय, संदेह, आशंका, चिन्ताओं से ग्रस्त आलसी का नारकीय जीवन एक अभिशाप ही होता है।
मनुष्य के विभिन्न रोगों की पहचान, निराकरण सरलता से किये जा सकते हैं। जीवन में आने वाली विभिन्न कठिनाई, समस्याओं, परिस्थितियों को समझकर उनका हल करना भी कोई कठिन बात नहीं है। किन्तु आलस्य का आक्रमण इन सबसे ज्यादा खतरनाक है। उसे समझना, हल करना आसान बात नहीं है क्योंकि सबसे पहले आलस्य अपने छल फरेब का जाल फैला कर मनुष्य की समझने बुझने, समाधान करने की शक्ति को नष्ट करता है। आलस्य, आराम, सुख का लालच देकर मनुष्य में ऐसी मादक खुमारी पैदा करता है, जिससे मनुष्य स्वतः ही इसकी शरण में चला जाता है, फिर यथार्थ की धरती पर कर्तव्य की कठोरता से बचने के लिए यह सरल रास्ता नजर आता है। यही कारण है कि बहुत से मनुष्य आलस्य के शिकार बन जाते हैं।
आशा, उमंग, उत्साह एवं चेतना की सात्विक उत्तेजना के फलस्वरूप मनुष्य कर्म रत रहकर सक्रिय जीवन बिताता है। जीवन में ऐसा भी समय, परिस्थितियाँ, वातावरण आ जाते हैं जब असफलता, निराशा, आकस्मिक दुर्घटना एवं चोट खाकर मनुष्य का उत्साह, उमंग, साहस, क्षत-विक्षत घायल हो जाते हैं। उत्तेजना ठण्डी पड़ जाती है। ठीक ऐसे ही अवसर पर आलस्य अपना आक्रमण करता है और मनुष्य पर अपना अधिकार करता है। ऐसे समय में जो सम्हल कर फिर उठ खड़े होते हैं अथवा धैर्य एवं सन्तोष के साथ साहस, शक्ति, उमंग की चिकित्सा कर समय की प्रतीक्षा के साथ अपना प्रयास जारी रखते हैं, आराम की चिन्ता जिन्हें नहीं होती वे आलस्य के आक्रमण से बच जाते हैं। जीवन की असफलता, विघ्न, बाधा, कठिनाइयाँ आलस्य के प्राथमिक हथियार हैं, इनके सामने घुटने टेक देना आलस्य की अधीनता स्वीकार करना हैं।
आलस्य के आक्रमण के प्रारम्भिक दौर में मनुष्य अपने काम को आगे के लिए टालने का प्रयत्न करता है। अपने कर्तव्य को छोड़ इधर उधर मन बहलाने अथवा भागने का मार्ग ढूंढ़ने लगता है। इधर-उधर के निरर्थक कामों में मन दौड़ाता है। ऐसी स्थिति में जरा कठोरता से काम लेना चाहिए और अपने सामने जो काम पड़ा है उसी को पूर्ण करने के लिए जुट जाना चाहिए मन को जबरन उस ओर लगा देना चाहिए।
आलस्य के प्रबल आक्रमण से मनुष्य की क्रिया शक्ति काफी कुँठित हो जाती है। एक तरह की शिथिलता उसे घेर लेती है। ऐसा व्यक्ति सब तरफ से हाथ पाँव समेट कर विक्षिप्त की तरह जड़वत् हो जाता है, अपने आवश्यक कार्यों को भूलने लगता है, उनसे उदासीन होने लगता है। ऐसी स्थिति में बुद्धि, विवेक भी इतने कुँठित हो जाते हैं कि अपनी स्थिति भी समझ में नहीं आती जिससे आलस्य का निराकरण कर उससे बचना सम्भव नहीं हो पाता। ऐसी स्थिति में किसी उत्साही, साहसी, व्यक्ति का संपर्क विशेष लाभदायक होगा। उत्साही, लगनशील, कर्मरत व्यक्ति के संपर्क से बड़े से बड़ा आलसी भी इस असाध्य रोग से छुटकारा पा सकता है। जिस तरह अग्नि के संपर्क में आने वाली वस्तुयें गर्म हो जाती हैं इसी तरह आलसी व्यक्ति भी उत्साही परिश्रमी व्यक्ति के संपर्क में आकर वैसा ही बनने लगता है।
आलस्य के कारण शरीर के समस्त अंग शिथिल हो जाते हैं। हाथ-पैर, दिमाग, पाचन-संस्थान, श्वास-प्रणाली सभी में विकृति पैदा हो जाती है और बैठे-बैठे शरीर अनेकों रोगों का घर बन जाता है। इतना ही नहीं आलसी व्यक्ति दूसरों की सहानुभूति, सहयोग पाने एवं बहाने बाजी के लिए साधारण रोगों को भी बहुत बड़ा-चढ़ा कर कहता है। साधारण सी बीमारी भी उसे बहुत भयानक लगती है। इस तरह आलसी व्यक्ति जीवित होते हुए भी मृतवत ही होता है। कर्मवीर के लिए मृत्यु कोई महत्व नहीं रखती उसके लिए वह एक देह परिवर्तन की शुभ बेला होती है। इसलिए मृत्यु से भयंकर, समस्त रोगों से भी भयानक आलस्य रोग से बचने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को सावधान रहना आवश्यक है।
आरभन्तेऽल्पमेवाज्ञाः कामं व्यग्रा भवन्ति च।
महारम्भाः कृतधियस्तिन्ठन्ति च निराकुलाः॥
“मूर्ख लोग कोई छोटा सा कार्य आरम्भ करते हैं और उसी में अत्यन्त व्याकुल हो जाते हैं, पर बुद्धिमान बड़े से बड़े आरम्भ करते हैं तब भी शान्त बने रहते हैं और सफल हो जाते हैं।”
भारत के महापुरुष-
भारतवर्ष के आधुनिक इतिहास में पिछली शताब्दी कई दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण मानी गई है। वर्तमान भारत के अधिकाँश निर्माणकर्ताओं का जन्म इसी शताब्दी में हुआ था और पिछले एक हजार वर्षों में देश के भीतर जो निर्बलता तथा त्रुटियाँ उत्पन्न हो गई थीं उनको दूर करके नवयुग की स्थापना करने वाले अधिकांश महापुरुषों ने इसी काल में अपनी प्रतिभा, विद्वता, त्याग, उदारता का परिचय देते हुये देश को उन्नति के मार्ग पर आरुढ़ किया था। ईश्वर चन्द्र विद्यासागर की गणना इन्हीं महापुरुषों में की जाती है।
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर का जन्म अत्यन्त गरीब घर में हुआ था। उनके जन्म के समय उनके पिता श्री ठाकुरदास कलकत्ता में आठ रुपये की नौकरी करते थे। ईश्वरचन्द्र को भी अपना आरम्भिक जीवन बड़े अभाव की अवस्था में बिताना पड़ा। नौ वर्ष की आयु में वे अपने पिता के साथ कलकत्ता में रहकर संस्कृत पढ़ने लगे। वे पढ़ने में बहुत अधिक परिश्रम करते थे। साथ ही दो-तीन व्यक्तियों के लिये भोजन बनाना, बर्तन-माँजना, लकड़ी चीरना आदि काम भी अपने हाथ से करते थे। कभी-कभी उन्हें निराहार रहकर भी काम चलाना पड़ता था। जिस स्थान में वह रहते थे वह अत्यन्त गन्दा और बदबूदार था। जब ये पढ़ने बैठते तो बहुसंख्यक कीड़े-मकोड़े चारों ओर से रेंगकर इन्हें काटने लगते। पर ये इतने दृढ़ निश्चयी और आत्म संयमी थे कि इन सब कष्टों को सहकर भी निरन्तर शिक्षा में प्रगति करते गये और विद्यालय में सदा सबसे प्रतिभाशाली छात्र माने जाते रहे।
इक्कीस वर्ष की आयु में कलकत्ता के सरकारी संस्कृत विद्यालय की ऊँची-से-ऊँची परीक्षा सर्व प्रथम श्रेणी में पास करली जिससे उनको तुरन्त ही फोर्ट विलियम कालेज में नौकरी मिल गई। उसी समय अनेक बड़े-बड़े पंडितों ने मिलकर इनको ‘विद्यासागर’ की उपाधि सम्मानपूर्वक प्रदान की। सरकारी अधिकारी भी इनका बहुत अधिक मान करते थे, पर ये सत्य तथा स्वाभिमान का सदैव इतना ध्यान रखते थे कि जरा-सी अनुचित बात स्वीकार न करते थे। एक बार इनके कालेज के प्रिंसिपल मार्शल साहब ने इनसे अनुरोध किया कि इंग्लैण्ड से जो सिविलियन यहाँ भारतीय भाषाओं की परीक्षा देने आते हैं उनकी परीक्षा सुगम ढंग से ली जाय। इस पर विद्यासागर ने कहा कि - “मैं नौकरी छोड़ने के लिए तैयार हूँ परन्तु परीक्षा में किसी के साथ अन्याय नहीं कर सकता।”
विद्यासागर को धन का लोभ भी न था, यद्यपि उन्होंने आरम्भ से गरीबी के कष्ट सहन किये थे और ऐसी दशा में प्रायः मनुष्य धन को अधिक महत्व देने लग जाते हैं। विद्यासागर को नौकरी करते थोड़ा ही समय हुआ था कि संस्कृत कालेज में एक जगह 90 रु॰ मासिक की खाली हुई। उसके अध्यक्ष ने मार्शल साहब से सलाह करके विद्यासागर को उस पर रखने का निश्चय किया। फोर्ट विलियम कालेज में इनको 50) ही मिलते थे पर उन्होंने संस्कृत कालेज की जगह को अस्वीकार करते हुये मार्शल साहब से कहा कि मैं आपके साथ ही काम करना चाहता हूँ क्योंकि यहाँ मेरी ज्ञान वृद्धि का अधिक अवसर मिलता है।
उस समय तो बात टल गई, पर ऐसी प्रखर बुद्धि और उच्च योग्यता के व्यक्ति कहाँ तक पीछे रह सकते थे। सात आठ वर्ष के भीतर वे संस्कृत कालेज के मंत्री नियुक्त किये गये और तीन सौ रु. वेतन मिलने लगा। पाँच वर्ष बाद उनको स्कूलों का इन्सपेक्टर भी बना दिया गया और दोनों पदों के लिये 500 रु वेतन मिलने लगा। पर इतना वेतन मिलने पर भी उनकी आर्थिक अवस्था साधारण ही रही और उन पर कर्ज का भार भी प्रायः बना रहा। कारण यह था कि वे विद्यासागर के साथ दया के भी सागर थे। कोई भी दीन दुःखी, कष्टग्रस्त, विपत्ति में फँसा हुआ उनके सामने आता तो शक्ति भर उसकी पूरी-पूरी सहायता करते। वे न मालूम कितने अनाथ बालकों को भोजन, वस्त्र और पुस्तकों का खर्च दिया करते थे। अपने गाँव में उन्होंने एक अच्छा औषधालय खोला था जिसमें सबको मुफ्त औषधि दी जाती थी और वहाँ का डॉक्टर जब किसी को घर पर देखने जाता, तब भी किसी से एक पैसा फीस नहीं ली जाती थी। इसमें विद्यासागर को सौ रुपया मासिक खर्च करना पड़ता था। वहाँ उन्होंने एक स्कूल तथा कन्याशाला भी बनवाये थे। इनका सारा खर्च भी वे अपने पास से करते थे। इस प्रकार उनका सारा वेतन खर्च हो जाता था और एक पैसा भी नहीं बच पाता था। समय -समय पर किसी विशेष दीन-दुःखी के आ जाने पर वे हजारों रुपया सहायतार्थ दे डालते थे और ऐसे अवसर पर प्रायः उनको कर्ज लेकर काम चलाना पड़ता था। ऐसे ही एक अज्ञात ब्राह्मण के मकान को बचाने के लिए उन्होंने बिना अपना नाम प्रकट किये 2400 रु. चुका दिया था। बँगाली प्रसिद्ध कवि माइकेल मध्सूदन दत्त जब विदेश में भूखों मर रहे थे और कोई सहारा देने को तैयार न था तो विद्यासागर ने ही लगभग 3200 रु. भेजकर उनकी प्राणरक्षा की थी।
विधवा-विवाह और स्त्री शिक्षा
विद्यासागर के जीवन का सबसे महान कार्य था विधवाओं की दशा का सुधार और स्त्री शिक्षा का प्रचार। उस समय बंगाल में स्त्रियों की दुर्दशा अवर्णनीय थी और विधवा हो जाने पर तो उनको साखात् नरक के कष्ट सहन करने पड़ते थे। विद्यासागर के एक शिक्षक शम्भुचन्द्र वाचस्पति थे। स्त्री के मर जाने पर उनको गृह कार्यों में बहुत असुविधा सहन करनी पड़ती थी। कुछ लोगों ने उनको फिर से विवाह करने की सम्मति दी। वाचस्पति जी विद्यासागर को पुत्र-तुल्य मानते थे और सब बातों में उनसे सलाह ले लिया करते थे। इस सम्बन्ध में चर्चा करने पर विद्यासागर ने उनको स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया और कहा कि इस आयु में विवाह करने का अर्थ किसी निरपराध बालिका को आजीवन कष्टों की भट्टी में झोंक देना होगा। इन्होंने हर तरह से समझाया, पर वाचस्पति जी अन्य लोगों की बातों में आ चुके थे और उन्होंने एक दरिद्र ब्राह्मण की परम सुन्दरी बालिका से विवाह कर लिया।
विद्यासागर ने जब यह सुना तो उन्होंने वाचस्पति जी को अन्तिम प्रणाम करके कहाँ कि अब मैं कभी आपके यहाँ नहीं आऊँगा। कुछ समय बाद वृद्ध वाचस्पति जी का देहान्त हो गया और उस बालिका का जीवन सर्वथा निराधार और निस्सहाय बन गया।
इस घटना का प्रभाव विद्यासागर के ऊपर इतना पड़ा कि आपने विधवाओं का दुख दूर करने का दृढ़ निश्चय कर लिया। वे जानते थे कि यदि वे विधवा- विवाह का आन्दोलन उठायेंगे तो भारत के अधिकाँश व्यक्ति उनका विरोध, निन्दा और अपमान ही करेंगे। पर वे परोपकार भावना से इस सबको सहन करने को प्रस्तुत हो गये। उन्होंने वर्षों तक सैकड़ों हिन्दू शास्त्रों का अध्ययन किया और उनमें से विधवा विवाह के अकाट्य प्रमाण एकत्रित करके ‘विधवा विवाह’ नाम का ग्रन्थ प्रकाशित कराया। जैसा उनका अनुमान था इस ग्रन्थ से समस्त देश में हलचल मच गई और लोग विद्यासागर जी पर तरह-तरह के आक्षेप करने लगे और गालियाँ देने लगे। पर वे अपने उद्योग में बराबर लगे रहे और सन् 1856 की 26 जुलाई को विधवा विवाह का कानून पास कर दिया गया। कानून पास कराने के तीन महीने के भीतर ही विद्यासागर जी ने एक प्रतिष्ठित घराने के युवक श्री-शचन्द्र विद्यारत्न का विवाह ब्रह्मानन्द मुखोपाध्याय की दस वर्षीय बाल विधवा कमलादेवी से करा दिया। बंगाल में यह पहला विधवा विवाह था।
इस प्रकार विद्यासागर ने अपनी समस्त शक्ति, विद्या, प्रतिभा और धन-सम्पत्ति भारतीय नारियों को दुर्दशा से मुक्त कराने में लगा दी। इनके सिवा उन्होंने हजारों अनाथों की तरह-तरह से सहायता करके उनको स्वावलम्बी बना दिया। इस प्रकार समस्त जीवन परोपकार करते और स्वयं गरीबी का जीवन बिताते हुये सन् 1891 की 29 जुलाई को उन्होंने अपनी जीवनलीला समाप्त की।
स्वाध्याय दोसंह-
“प्रारब्ध” और “ईश्वरेच्छा”
किसी कार्य या योजना का अनिष्ट परिणाम आने पर ‘ईश्वर की इच्छा ऐसी ही थी’ या ‘प्रारब्ध ही ऐसा था’ ऐसी कल्पनाओं से मन को समझा लेने के बाद मनुष्य का दुख या असंतोष कुछ हद तक हलका हो जाता है, अपने और दूसरे लोगों की ऐसी असफलताओं के अवसर पर ‘ईश्वरेच्छा’ और ‘प्रारब्ध’ की कल्पनाओं के कारण हताश और दुखी मन को जो आधार, आश्वासन और धैर्य मिलता है, उस पर से इन कल्पनाओं को सिद्धान्त का रूप प्राप्त हुआ है। दुखी और निराश मन शान्त होने के लिये किसी महान वस्तु का आधार खोजता है। ‘ईश्वरेच्छा’ और ‘प्रारब्ध’ की कल्पनायें यदि मनुष्य को किसी अनुभव के बाद सूझी हों, तो भी मनुष्य अधिकतर निराशा की स्थिति में ही उनका प्रयोग करते आये हैं। सुख सम्पत्ति में, या वैभव में इन मान्यताओं का श्रद्धा पूर्वक स्मरण करके ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का और अपने भीतर निरहंकारता का भाव बढ़ाने में इनका उपयोग शायद ही कोई करता हो।
“ईश्वरेच्छा या प्रारब्धानुसार सब कुछ होता है” “जिन्दगी दो दिन की है” - “ये दिन भी बीत जायेंगे” आदि उद्गार मनुष्यों के मुख या हृदय से समय-समय पर प्रसंगानुसार निकला करते हैं। बहुत से लोग समझते हैं कि इन्हीं उद्गारों में ज्ञान भरा है और ये ही जीवन के महान् सिद्धान्त हैं। इस मान्यता से वे जानबूझ कर उदासीनता का जीवन बिताने लग जाते हैं। परन्तु हमें ध्यान रखना चाहियें कि ऐसे उद्गारों को जीवन सूत्र बनाकर उनके अनुसार नित्य का जीवन चलाने का प्रयत्न करना ही गलत है। निराश या निरुत्साही बने हुये, व्याधिग्रस्त, गरीबी से दुखी, लोगों के छल−कपट के शिकार बने हुये, मौत के किनारे लगे हुये, किसी दुख के कारण भग्न हृदय बने हुये तथा जिनका जीवन लगभग असफल सिद्ध हो चुका है ऐसे व्यक्तियों के मुँह से परिस्थितिवश निकले उद्गारों को जीवन का सिद्धान्त मान लेना और सम्पूर्ण सत्य वाले मानकर जीवन को वैसा ही समझ उसे अपने जीवन का ध्येय ठहराना, सर्वथा अनिश्चित है। एकाँकी सत्य को सम्पूर्ण सत्य समझना सदा गलत ही माना जायेगा। इससे हमारे भीतर भ्रामक कल्पना की वृद्धि ही होगी और समाज आज तक जिस तरह अवनत होता आया है उसी तरह आगे भी अवनत होगा रहेगा।
-विचार दर्शन
‘न जाने कल क्या होगा?’
भविष्य में क्या होगा, हमारे ग्रह शुभ हैं या अशुभ, हमारे भाग्य में क्या है, हमारे ऊपर कोई आपत्ति तो नहीं आ रही है, हमारे शकुन, फल अच्छे हैं या बुरे, न जाने कल क्या होगा- ये एक प्रश्न है जो कितने ही व्यक्तियों की मानसिक शान्ति भंग किया करते हैं। भविष्यत् जानने के लिये कितने ही थोथी विचारधारा के व्यक्ति फकीरों, साधुओं और ज्योतिषियों के पास भटकते फिरते हैं। किसी ने उनके मन की बात कह दी तो वे फूल उठें। किसी ने कुछ भयानक बात बतला दी, बस मुरझा कर निरुत्साहित हो गये, अपने भाग्य को दोष देने लगे। सिर्फ अनिष्ट की कल्पना मात्र से वे झींकने लगते हैं, परेशान हो जाते है और यह मान बैठते हैं कि हम तुच्छ हैं, क्षुद्र हैं, हीन हैं। हमारे भाग्य में तंगी, कमजोरी, अयोग्यता, अकर्मण्यता ही है। हमें तो सदैव रूखी-सूखी रोटी बदी है।
मनुष्य अपने भविष्य की अच्छी बात सुनकर इतना प्रसन्न नहीं होता जितना कुत्सित बात सुनकर डर जाता है। हम लोगों की प्रकृति ही कुछ ऐसी होती है कि अशुभ, निकृष्ट, आधि-व्याधि के विचारों पर शीघ्र विश्वास कर लेते हैं। हमारे ऊपर इन अन्धकारमयी भावनाओं का प्रभाव बड़ी शीघ्रता से होता है और कभी-कभी तो यह विचार इतने स्थायी हो जाते हैं कि हम उन्हें जन्म भर तक नहीं भूल पाते। एक व्यक्ति के दिल में किसी भविष्यफल के कारण यह विचार जम गया कि मेरी मृत्यु पागल कुत्ते के काटने से होगी। बस वह मामूली कुत्ते को देखकर भी भागता, छिप जाता और जब तक कुत्ता चला न जाता जब तक बाहर न निकलता। एक बार एक साधारण कुत्ते ने उसे जरा सा पंजा लगा दिया जिससे कुछ खरोंच सी आ गई। वह बीमार पड़ा और लगभग एक मास चारपाई पर पड़े रह कर मृत्यु को प्राप्त हुआ। इसी प्रकार अनेक व्यक्तियों की यह धारणा बन जाती है कि हमारा आगामी समय बड़ा कठिन, संघर्ष पूर्ण और संकटों से भरा आ रहा है बस, वे बेसिर पैर की, निराशाजनक कल्पनाओं के द्वारा अपने जीवन को कठिन बना लेते है, घबरा कर व्यर्थ चिन्ताओं में ग्रस्त रहते है और पनपने नहीं पाते।
-आनन्दमय जीवन
भाग्यवाद को छोड़कर पुरुषार्थवादी बनिये
संसार में दो प्रकार के लोग होते हैं एक भाग्यवादी और दूसरे पुरुषार्थवादी। पहले प्रकार के लोग अपने जीवन की सफलता और विफलता को भाग्य, ईश्वर, देवी, देवता की कृपा आदि बातों पर निर्भर कर देते हैं, दूसरे प्रकार के लोग अपने भविष्य का निर्माण करना अपने पुरुषार्थ की बात मानते हैं। जिस व्यक्ति का स्वभाव ढीला-ढाला है, जिसके मन में अनेक प्रकार के अन्तर्द्वन्द्व चलते रहते है, जो अपने आप पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ रहा हैं, वह भाग्यवादी हो जाता है। ऐसा किसी मनुष्य की सफलता और विफलता का कारण उसकी मनोवृत्तियों और कर्तव्य में न देखकर किसी बाहरी अज्ञात सत्ता में आरोपित करता है।
इस प्रकार वह अपनी असफलता के लिये अपने आपको दोषी न ठहरा कर किसी ऐसी शक्ति को दोषी ठहराता है जिस पर उसका कोई अधिकार नहीं। इस प्रकार वह अपनी कमजोरी के प्रति अपनी आँखें मूंद लेने की चेष्टा करता है और अपने आपको सुधारने से विमुख हो जाता है।
जब मनुष्य में काम करने की उत्कट भावना होती है तो वह उसके लिये उचित कल्पनाओं, योजनाओं और उन्हीं के अनुकूल विचारों का निर्माण करता है। इसके विपरीत जब उसमें निकम्मापन आता है, जब उसकी मानसिक शक्ति भीतरी झगड़ों में ही समाप्त हो जाती है तो उसकी कल्पनाएं निराशावादी योजनाएं अधूरी और विचार असफलता के लिये जब अपने भाग्य को दोष नहीं देते तो किसी अन्य व्यक्ति को दोष देते हैं। भाग्यवादिता और निराशावादिता एक दूसरे के सहगामी हैं। जिस व्यक्ति को भविष्य का जितना ही अधिक डर रहता हैं वह उतना ही अधिक ज्योतिषियों, हस्तरेखा, देखने वालों आदि के चंगुल में फँसता है।
मनुष्य के चारों ओर सदा विचारों का वातावरण रहता हैं। जैसे प्रत्येक मनुष्य का भौतिक वातावरण होता उसी तरह उसका विचारों का वातावरण रहता हैं। दूसरे लोगों के विचार अनेक प्रकार हमें प्रभावित करते रहते है। निराशावादी लोगों के पास चारों ओर से निराशावादी विचार आ जाते हैं। ऐसे लोगों को दूसरे लोग भी निराशावादी और भाग्यवादी ही मिलते हैं और ये उनके विचारों की पुष्टि कर देते हैं। भाग्यवादी व्यक्ति स्वतः प्रयत्न करना ही नहीं चाहतें है, वे दूसरों के भरोसे रहना चाहते हैं। फिर ऐसे लोगों का जीवन दुख में व्यतीत हो तो इसमें क्या आश्चर्य है?
-मनोविज्ञान जीवन
सौभाग्य और दुर्भाग्य आपकी कल्पनायें हैं।
बहुत से मनुष्य अपनी असफलता का दोष दुर्भाग्य के सिर मढ़ते हैं। वे यह समझते हैं कि हम भाग्य के अधीन है और उद्योग अथवा पुरुषार्थ द्वारा अपनी स्थिति को नहीं सुधार सकते। परन्तु वास्तव में बात यह है कि उनकी संकल्प शक्ति ही उनका भाग्य है। मनुष्य के जीवन का सुधार उसके भाग्य पर नहीं किन्तु उसके उद्योग पर निर्भर है। जिस मनुष्य की शक्ति बढ़ी-चढ़ी है, जिसकी योग्यता उच्च श्रेणी की है, जिसके संकल्प में दृढ़ता है वह अनेक दुर्घटनाओं का भी सामना कर सकता है। मनुष्य के भीतर ही वह शक्ति मौजूद है जिसके द्वारा वह उन आपत्तियों को दूर कर सकता है जिनको वह दुर्भाग्य के कारण आई हुई समझता है। जो मनुष्य उन्नति के अवसरों को काम में लाना जानता है और जो अपनी न्यूनताओं की पूर्ति संकल्प शक्ति द्वारा कर सकता है वह अपने जीवन का अवश्य ही सुधार कर सकता है।
क्या तुम ने कभी किसी दृढ़-प्रतिज्ञ व्यक्ति को अपने जीवन का कार्यक्रम निश्चित करते समय किसी बात को भाग्य के भरोसे छोड़ते हुये देखा है? जो मनुष्य भाग्य के भरोसे रहते हैं वे सफलता के लिये कभी भरपूर उद्योग करने में समर्थ नहीं होते। सफलता की प्राप्ति के लिये जितना मूल्य देना पड़ता है उतना वे नहीं देना चाहते। वे सस्ते सौदे की ताक में रहते हैं और सफलता तक पहुँचने का कोई छोटा मार्ग खोजते रहते हैं हमने किसी मनुष्य को उस समय तक कोई महत्वपूर्ण कार्य करते नहीं देखा जब तक कि उसने ‘सौभाग्य’ ‘दुर्भाग्य’ जैसे निरर्थक शब्दों को अपने कोश में से न निकाल दिया अथवा ‘मैं असमर्थ हूँ’ ऐसे विचारों को अपने मस्तिष्क से बहिष्कार न कर दिया।
हमारी भाषा के किसी शब्द का इतना दुरुपयोग नहीं हुआ है जितना कि ‘भाग्य’ का, बहुत से मनुष्य जिनको अपने कामों में असफलता होती है अपने भाग्य को दोषी ठहराते हैं। दुर्भाग्य के सिर जितने दोष, झूठमूठ मढ़े जाते हैं उतने और किसी बात के सर नहीं मढ़े जाते।
-सफलता का मार्ग
आसमान से गिर कर अपनी ओर आते हुए सितारे को देख पृथ्वी आश्चर्य चकित बोली “ तुम इतने उच्च स्थान पर थे नीचे क्यों आ गिरे।”
सितारे ने जवाब दिया “ देवी? तुम मुझे अपने स्थान से काफी ऊँची दिखाई देती थी। लम्बे समय से तुम्हें पाने के लिए मैं तपस्या कर रहा था आज वह शुभ दिन आया है।”
“आकाश में तो बहुत चमकीले दिखाई देते थे किन्तु अब तुम ऐसे नहीं लगते? पृथ्वी ने पूछा “यही मैं भी तुमसे जानना चाहता था, दूर से तो तुम जगमगाती हुई नजर आती थी सोचा था तुम से मिल कर मैं अपना कालापन छुड़ा लूँगा।” सितारा बोला।
आश्चर्यचकित हो धरती ने कहा “ सचमुच मैं तुम्हें चमकती नजर आती थी” यह कहकर उसने अपने आपको देखा किन्तु उसे चारों ओर अंधकार ही नजर आया। वह उदास हो गई।
सितारे ने कहा जब दूर से मुझे तुम जगमगाती नजर आती थी और तुम्हें मैं। तो फिर हम ऐसा ही क्यों नहीं मानलें कि दोनों ही उजले और जगमगाते हुए उच्च हैं।”
बात समझ की थी। दोनों को ही भा गई। आलिंगन पाश में बंधे हुए दोनों ही अपने चारों ओर का अनुभव कर रहे थे। अंधेरे की कलूटी कुरूपती ने यह देखा तो वहाँ से चुपचाप चल दी।
ऋषि जरुत्कार के गुरुकुल में समित्पाणि होकर एक छात्र विद्रुध ने प्रवेश किया और साष्टाँग दंडवत् करते हुए विद्या प्राप्ति के लिए विनयपूर्वक प्रार्थना की।
महर्षि ने प्रसन्नता प्रकट करते हुए कहा- सौम्य! अक्षर ज्ञान को विद्या नहीं कहते, सद्गुणों का विकास ही अध्ययन का वास्तविक फल है। इस गुरुकुल में शिक्षण कम और स्तर को विकसित करने वाले साधन क्रम को विशेष महत्वपूर्ण समझा जाता है। अनुशासन और श्रद्धा के अभाव में विद्या विपत्तिकारक ही होती है। इसलिए यदि तुम इन गुणों को विकसित करने वाले कठोर साधना क्रम को अपना सको तो ही मेरे गुरुकुल में प्रवेश करने की बात सोचो।
बालक ने दृढ़ता भरे शब्दों में कहा- भगवान! मैं पोथी-पंडित बनने नहीं, श्रेष्ठ व्यक्तित्व प्राप्त करने को आपके चरणों में उपस्थित हुआ हूँ। आपका आदेश पालूँगा और जो करने को कहेंगे वही करूंगा।
छात्र के वचनों से संतुष्ट हुए उपाध्याय ने बालक को गुरुकुल में प्रविष्ट कर लिया। उसे आश्रम की चार सौ गौएं सौंपी गईं और कहा गया कि वह तब तक उन्हें चराते रहने में ही लगा रहे जब तक गौओं की संख्या एक सहस्र न हो जाय। उसका प्रथम अध्ययन यही होगा।
आश्रम की गौएं लेकर विद्रुध तड़के ही उठ जाता, उन्हें दिन भर चराता और सन्ध्या समय वापिस लाता। वन्य प्रदेश में गौओं के पीछे-पीछे प्रयाण करना और प्रकृति का अध्ययन करना यही उसकी दिनचर्या रहती। धीरे-धीरे समय बीतता गया। गौओं की संख्या चार सौ से बढ़कर एक सहस्र हो गई।
जरुत्कार छात्र के पास पहुँचे और उससे पूछा -सौम्य! तुम्हारा मुख मंडल ब्रह्म तेज से प्रदीप्त हो रहा है, यह ज्ञानी के लिए ही संभव है। कहो, तुम्हें ज्ञान किसने दिया?
छात्र ने विनयपूर्वक कहा- भगवन्! आपके अतिरिक्त और कौन मुझे ज्ञान देगा? यदि कुछ मिला होगा तो उसमें आपकी ही कृपा प्रधान रही होगी।
गुरुदेव ने पुनः कहा- वत्स! तुम्हारी विनयशीलता सराहनीय है। पर ज्ञान के द्वारा प्राप्त हो सकने वाला यह ब्रह्म तेज तुम्हें कही से तो प्राप्त हुआ होगा? सो तुम्हें यह बताना ही चाहिये कि उपलब्ध ज्ञान कहाँ से, किस प्रकार प्राप्त हुआ?
नतमस्तक होकर विद्रुध ने कहा - तात! मैं वन प्रदेश में पशुओं, पक्षियों, कीट-पतंगों और वृक्ष वनस्पतियों के गुण कर्म स्वभाव को गंभीरतापूर्वक देखने और समझने का प्रयत्न करता रहा हूँ। जो देखा उसे समझा और यह निष्कर्ष निकाला कि संसार क्या है और इसमें किस प्रकार रहना और चलना- उचित है।
महर्षि पुलकित हो उठे, उनने शिष्य को छाती से लगा लिया और कहा- वत्स! ज्ञान का माध्यम यही है जो तुमने प्राप्त किया, पुस्तकों से नहीं, इस संसार के वास्तविक स्वरूप को समझने और उस जानकारी के आधार पर अपनी गतिविधियाँ विनिर्मित करने से ही जीवन को विकसित करने वाला ज्ञान प्राप्त होता है। जो मिलता था सो तुम्हें मिल चुका, अब अक्षर ज्ञान शेष है सो कुछ ही दिन में तुम उसमें भी निष्णात बनोगे।
गौओं की सेना का परिपूर्ण प्रतिफल प्राप्त कर विद्रुध अध्ययन कक्षाओं में बैठने लगा। कुछ ही दिनों में सत्-शिक्षण प्राप्त कर अपने देश लौट गया।
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है - “पवित्र नारी सृष्टि की सर्वोत्तम कृति है। सृष्टि में वात्सल्य, स्नेह, ममत्व, प्रेम की अमृत धारायें नारी हृदय से निकल कर संसार को अमृत दान कर रही हैं।” कवि रस्किन ने कहा है - “माता का हृदय एक स्नेह पूर्ण निर्झर है, जो सृष्टि के आदि से अनवरत झरता हुआ मानवता का सिंचन कर रहा है।” “मातृ देवो भव” कह कर उपनिषद् के ऋषि ने माता के लिए लोकोत्तर सम्मान प्रदान किया है। सचमुच साधारण प्राणियों से भरी इस धरती पर माता का हृदय एक दैवी विभूति ही है।
“माता धरित्री, जननी दयार्द्र हृदया शिवा।
देवी त्रिभुवन श्रेष्ठा निर्दोषा सर्व दुःखहा॥
आराधनीया परमादया शान्तिः क्षमा धृतिः।
स्वाहा स्वधा च गौरी च पद्मा च विजया जया॥
भगवान वेदव्यासजी ने नारी को उक्त इक्कीस नामों से सम्बोधित करते हुए गुणगान किया है और फिर आगे कहा है-
“नास्ति गंगा समंतीर्थ नास्ति विष्णु समः प्रभुः ।
नास्ति शम्भु समः पूज्यो नास्ति मातृ समो गुरु॥
“गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान कोई प्रभु नहीं, शिव के समान कोई पूजनीय नहीं तथा वात्सल्य स्रोतस्विनी मातृ हृदया नारी के बराबर कोई गुरु नहीं, जो इस लोक और परलोक में कल्याण का मार्ग प्रशस्त करें।”
ब्रह्मा इस संसार की रचना करते हैं और विष्णु इसका धारण, पोषण संवर्धन करते हैं। इस सूक्ष्म आध्यात्मिक रहस्य को यदि स्थूल रूप में कहीं देखना हो तो उसकी झाँकी माता को देखकर की जा सकती है। ब्रह्मा और विष्णु की दैवी शक्तियाँ इस धरा पर नारी के मातृ रूप में अपना कार्य कर रही हैं। इसी की अनुभूति को आधार पर शास्त्रकार ने कहा है-
“या देवी सर्व भूतेषु मातृ रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यैं नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमोनमः॥
संसार की रचना उसका पालन पोषण करने वाली देवी शक्ति इस स्थूल संसार में नारी के मातृ रूप में ही स्थित हो अपना कार्य कर रही है। इसलिए इस मातृ रूपा नारी को हम बार-बार नमन करते हैं।
इसी तथ्य के दृष्टा एक मनीषी ने कहा है- “ईश्वर के पश्चात् हम सर्वाधिक ऋणी नारी के हैं। प्रथम तो जीवन के लिए, पुनश्चः इसे जीने योग्य बनाने के लिए।” तात्पर्य यह है कि मनुष्य जीवन की सभी सम्भावनाओं के मूल में माँ का असीम प्यार उसका त्याग, उसकी महान सेवायें ही निहित हैं।
नारी जाति की इस महानता, उसके मानव-जाति के प्रति महान ऋण को देखते हुए बहुत पहले से ही मनुष्य ने इसको आदर पूजा का पात्र समझा और उसका समुचित आदर सत्कार किया। काली, सरस्वती, लक्ष्मी तथा अन्य देवी शक्तियों के रूप में नारी का पूजन उसके उच्च सम्मान के लिए ही किया गया।
नारी माँ के रूप में बच्चे की आदि गुरु है। जननी को विभिन्न विषयों में जो शिक्षा अनुभव प्राप्त होता है, वही बच्चे के जीवन में प्रभाव डालता है। जननी के उच्चारण, उसकी भाषा से ही वह भाषा-ज्ञान प्राप्त करता है, जो जीवन भर के भाषा ज्ञान का मूलाधार होता है। इस तरह बच्चे की शिक्षा-दीक्षा, उसे योग्य बनाने की नींव जननी ही लगाती है। उसी नींव पर बालक के सम्पूर्ण जीवन की योग्यता, शिक्षा-ज्ञान का महल खड़ा होता है। माँ का कर्तव्य केवल स्तन पान या स्नेह दान तक ही नहीं है, अपितु इसके साथ ही वह बच्चे को जीवन में विकसित होने उत्कर्ष की ओर बढ़ने के लिए एक तरह की सूक्ष्म शक्ति प्रेरणा भी देती है। माँ द्वारा कही गई उच्च आदर्श त्याग की कथायें, उपदेश, साधारण भाषा में दिया गया ज्ञान भी बालक के जीवन में ऐसा प्रभाव डालता है जो जीवन भर बड़ी बड़ी पुस्तकों को पढ़कर बड़ी बड़ी डिग्रियाँ प्राप्त करके भी नहीं मिलता। माँ द्वारा प्रदत्त प्रारम्भिक ज्ञान प्रेरणा को पाकर ही बालक आगे चलकर प्रकृतिज्ञान का अधिकारी होता है।
बच्चे के प्रति माता का स्नेह उसकी ममता, दयामय परमात्मा का प्रकाश है। शिशु के प्रति मातृ हृदय में उमड़ता हुआ स्नेह प्रकृति की ओर से जीवन रक्षा के लिए ईश्वरीय देन है। यह स्नेह, ममता, सहज ही जननी को बालक के पालन पोषण के लिए प्रयत्न पूर्वक लगाती है।
ऋषियों ने मातृ हृदया नारी का “मातृ ऋण मानव जाति पर सबसे बड़ा ऋण माना है। उन्होंने नारी को समाज में सम्माननीय पूजनीय स्थान देकर उसका आदर सत्कार करके मातृ ऋण चुकाया और इसी तरह के आदेश अपनी भावी सन्तानों को भी दिया। नारी के प्रतिष्ठा गौरव को चिरजीवित रखने के लिए सभी धर्म ग्रन्थों में स्थान है। महाराज मनु ने अपनी सन्तानों से कहा था-
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।
यत्र तास्तु न पूज्यन्ते सर्वस्तत्राफलः क्रिया॥
जहाँ नारी की पूजा होगी वहाँ स्वर्ग बन जायेगा, देवता निवास करेंगे और जहाँ नारी की पूजा नहीं होगी वहाँ सारे फल, क्रियायें समाप्त हो जायेंगी और दुःखों का सामना करना पड़ेगा।
मातुश्च यद्वितं किंचित्कुरुते भक्तिनः पुमान।
तर्द्धम हि विजानीया देवं धर्म विदो विदुः॥
मातृशक्ति की भलाई के लिए पुरुष भक्ति पूर्वक जो कुछ भी कर्म करता है वही उसका धर्म है। गृहस्थ व्यक्ति की बड़ी तपस्या इसी में है कि वह नारी जाति की सेवा उसमें दैवी शक्ति के दर्शन करके करें।
भारतीय संस्कृति में नारी के प्रति यह केवल शाब्दिक प्रदर्शन मात्र नहीं है। वरन् पद-पद पर इसमें व्यावहारिकता की छाप है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी जाति के महान उपकारों को स्वीकार कर भारतीय जन -समाज ने मातृ जाति की यथोचित पूजा उसका सत्कार किया और समाज में उच्च स्थान दिया जिसके फलस्वरूप नारी के हृदय से सहज स्नेह, वात्सल्य, ममत्व की त्रिवेणी भारत भूति में बह निकली, जिसको पा कर भारतीय जीवन अजर अमर हो गया। भारतवासियों ने लौकिक और पारलौकिक जीवन में भारी प्रगति की, इतिहास इसका साक्षी है।
पत्नी, पुत्री और भगिनी के रूप में मातृत्त्व हमारे चारों ओर बिखरा पड़ा है। यह श्रद्धा एवं पूजा के योग्य है। देवत्व की इस प्रत्यक्ष प्रतिमा की गौरव- पूर्ण प्रतिष्ठा निरन्तर अभिनंदनीय है। इस रहस्य को मनुष्य जब तक समझता रहा अपने देवत्व को स्थिर रख सका। अब जबकि उसने नारी को वासना कामुकता की तृप्ति का साधन बनाना आरम्भ किया, क्रीत दासी के समान अपने पाशविक बन्धनों में जकड़ कर निरीह बनाने, मनमाने अत्याचार करने और अपनी सम्पत्ति-मात्र मानने का दृष्टिकोण बदला है तो फिर पुरुष-पुरुष नहीं रहा। उसका तप तेज चला गया और वह एक क्षुद्र प्राणों के समान अपने गौरव से पतित होकर निम्न श्रेणी का जीवन यापन कर रहा है।
इस पृथ्वी पर दैवी तत्व का एक मात्र प्रतीक मातृत्व है। उसके प्रति उच्चकोटी की श्रद्धा रखे बिना देवत्व की पूजा एवं साधना नहीं हो सकती। और इसके अभाव में पुरुष को देवत्व से वंचित रहना पड़ेगा। नारी कामधेनु है। जब उसे हम मातृ बुद्धि से देखते हैं तो वह हमें देवत्व प्रदान करती है, पर जब उसे वासना, सम्पत्ति, दासी की दृष्टि से देखा जाता है तो वह हमारे लिए अभिशाप बन जाती है।
न जाने हमारी दुर्बुद्धि कब टलेगी न जाने कब हम नारी की दिव्य-शक्ति को पहचान कर उसके चरणों में श्रद्धा के आँसू चढ़ाना सीखेंगे? न जाने इस अभाव के कारण हमें कब तक देवत्व से वंचित रह कर नारकीय स्थिति में पड़ा रहना पड़ेगा।
बुढ़ापा जीवन का परिपक्व फल है जिसमें पूर्णता, मिठास, उपयोगिता और अपनी एक विशिष्ट महत्ता होती है। वृद्धावस्था में ही मनुष्य स्वयं और संसार के अनुभव ज्ञान में समृद्ध होकर शत-शत प्रकाश किरणों से युक्त ज्योतिर्मय बन जाता है, जिससे अनेकों को मार्ग दर्शन की प्रकाश किरण, प्रेरणायें प्राप्त होती हैं। बर्नार्डशा ने कहा “बुढ़ापा एक सिद्धि है, पूर्णता की मंजिल है। वह एक सामाजिक धरोहर है। कल्पना कीजिए सभी वृद्ध लोगों को किसी ग्रह में भेज दिया जाए तो फुटबाल के खिलाड़ियों के सिवा दुनिया में बचेगा ही क्या ?” ब्रिटेन के भूतपूर्व प्रधान मंत्री चर्चिल ने एक बार कहा था “बुढ़ापा पके हुए फल की तरह है। उसका अपना एक महत्व है।” “जिन्दगी चालीस वर्ष से शुरू होती है” इस कहावत के अनुसार वृद्धावस्था जीवन का नवनीत है- सार भाग है। वस्तुतः संसार के अधिकाँश महान कार्य महापुरुषों के जीवन में चालीस वर्ष की उम्र के बाद ही प्रकाश में आया। बुढ़ापा मानव जीवन के विकास का अंतिम चरण है, जहाँ पहुँच कर प्रत्येक व्यक्ति गौरव, प्रतिष्ठा, समृद्धि, ज्ञान, सुलझे हुए प्रौढ़ विचारों से युक्त हो जीवन का वास्तविक लाभ ले सकता है।
किंतु अधिकांश लोग बुढ़ापे को मौत का पैगाम, जीवन की अनुपयोगिता का अवसर, अक्षमता अशक्ति का सूचक मानकर जिन्दगी के दिन गिन-गिन कर काटने लगते हैं। उन्हें अपनी शक्तियाँ धीरे-धीरे क्षीण होती जान पड़ती हैं। कोई महत्वपूर्ण कार्य करने का उत्साह मन में नहीं रहता। वरन् बुढ़ापे की पराधीनता, अंग शैथिल्य, बीमारी, रोग, क्लान्ति, असमर्थता आदि की कल्पनायें कुछ कम भयावह नहीं होती। इस रूप में बुढ़ापे की कल्पना करने वाले व्यक्ति के लिए सचमुच वृद्धावस्था एक अभिशाप और नारकीय यन्त्रणा ही सिद्ध होती हैं।
वृद्धावस्था अपने आप में इतनी नीरस और कटु नहीं है जितना लोग समझते हैं। बुढ़ापे में संसार के महापुरुषों ने महान् कार्यों का सूत्रपात किया है जीवन की महत्वपूर्ण सफलतायें अर्जित की हैं, अपने आप में नई प्रफुल्लता, सुख, संतोष, प्रसन्नता अनुभव की है। दूसरी ओर वृद्धावस्था को जीवन का अभिशाप, अशक्ति, पराधीनता का अवसर मान लेना मनुष्य के गलत दृष्टिकोण का ही परिणाम है।
मनुष्य की मनोभूमि का उसके जीवनक्रम पर भारी प्रभाव पड़ता है। चालीस वर्ष की उम्र के बाद जब लोग सोचने लगते हैं कि उनका बुढ़ापा शुरू हो गया है तो सचमुच ही वे वृद्ध होने लगते हैं। दूसरों को देखकर, पुरानी धारणाओं, मान्यताओं के आधार पर, निराशावादी जीवन-दर्शन की प्रेरणा से जब मनुष्य में यह विश्वास जम जाता है कि चालीस वर्ष के बाद मेरी शक्तियाँ घटने लग जायेंगी और बुढ़ापे का आरम्भ होकर साठ-सत्तर की उम्र तक जीवन का अंत हो जाएगा तो इसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप बुढ़ापा मनुष्य के लिए मौत का पैगाम ही बन जाता है।
ऐसी अनेकों घटनायें घटित होती रहती हैं इतना ही नहीं असंख्यों लोग अपना इसी तरह की धारणाओं के कारण वृद्धावस्था में सड़ी-गली जिंदगी बिताते हैं। उनके विश्वास और निष्कर्षों के अनुसार शक्तियाँ नष्ट होने लगती हैं। दाँत गिरना, बालों की सफेदी, आंखों का जवाब दे जाना, इन्द्रियाँ निर्बल अशक्त होना, क्लान्ति के भार से दब जाना- ये सब उपद्रव मनुष्य की बुढ़ापे सम्बन्धी धारणा और विश्वास का ही परिणाम है। मनुष्य जितनी गिरती हुई बातें सोचेगा उतनी ही तीव्रता से वह गिरता चला जाएगा। जितना ही अपने को सामर्थ्य सम्पन्न समझेगा उतना ही वह सशक्त बना रहेगा, चाहे उसकी उमर कितनी ही क्यों न हो, महापुरुषों की अदम्य शक्ति का आधार उनकी प्रौढ़, प्रबल, पुरोगामी मानसिक शक्ति का होना ही है।
बुढ़ापे को दुखद और क्लेशमय बनाने का एक कारण है संसार और यहाँ के पदार्थों में आसक्ति का होना। 40-50 की उम्र तक पहुँचने पर मनुष्य के कई नाते रिश्ते जुड़ जाते हैं उसका सम्बन्ध व्यापक हो जाता है, कई नाती-पोते बेटों के बड़े परिवार का वह मुखिया बन जाता है। व्यापक क्षेत्र में संयोग-वियोग, सुख-दुःख, हानि-लाभ, अनुकूलता, प्रतिकूलताओं मोह की प्रेरणा से मनुष्य इनसे प्रभावित होने लगता है। सुखद परिस्थितियाँ कम ही आती हैं और आती हैं तो उन्हें बीतने में समय नहीं लगता। फलतः मोहग्रस्त आसक्त मनुष्य के मानस पर दुःखद स्मृतियाँ ही शेष रहती हैं। इनके कारण वह दुःखी होता है, रोता है, खिन्न होता है और जीवन के पुण्य अवसर बुढ़ापे को क्लेश एवं अशान्ति का आगार बना लेता है।
बहुत से लोग बुढ़ापे को अतीत की स्मृतियों और भविष्य की चिन्ता का अखाड़ा बना लेते हैं। वृद्धावस्था में अधिकाँश लोग भारी कार्यभार से मुक्त हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में बैठे-बैठे अतीत की स्मृतियों पर खेद पश्चाताप करने में और भविष्य की चिन्ता में उलझ जाते हैं और इसी उधेड़बुन में बुढ़ापे को कटु क्लेशपूर्ण, भार स्वरूप बना लेते हैं।
बहुत से लोग अपने बच्चों के बड़े हो जाने पर भी उनकी चिंता में उसी तरह परेशान रहते हैं जैसे उनके बचपन में रहा करते थे। फलस्वरूप ,वे बच्चों के जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप करने लगते हैं जब कि स्वातन्त्र्यप्रिय युवक स्वच्छन्दता-पूर्वक जीवन जीना चाहतें हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें वृद्धजनों का हस्तक्षेप और अत्यधिक चिन्ता, भार लगने लगती है वे स्वतन्त्रतापूर्वक कार्य करने में वृद्धजनों को बाधा समझने लगते हैं जो परस्पर संघर्ष एवं गलत व्यवहार का कारण बनता है और इससे वृद्धजनों को ही उल्टा परिणाम मिलता है जिससे उन्हें दुखी होना पड़ता है। इसके अर्थ यह भी नहीं कि बच्चों के जीवन में दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिए किन्तु यह आवश्यकतानुसार और उतनी ही हो जो बच्चों के लिए सुपाच्य एवं पोषक रहे। देखा जाता है कि प्रौढ़ और सक्षम हो जाने पर पशु पक्षी भी अपने बच्चों के प्रति निश्चिन्त हो जाते है किन्तु मनुष्य ऐसा न करने के कारण उनके प्रति अधिक आसक्ति रहने से दुखी सन्तप्त एवं परेशान होता है।
बहुत से लोग वृद्धावस्था में मृत्यु के भय से त्रस्त रहते हैं। किन्तु यह अविवेक और अज्ञान का फल है। पका हुआ फल समय पर यदि डाली से अलग होने के बजाय डाल पर ही सड़ा गला जीवन बिताये जो क्या अच्छा रहेगा? मनुष्य भी आसक्ति और मोहवश असमर्थ सड़े गले, जीर्ण-शीर्ण, शरीर में चिपका रहे तो यह बुद्धिमानी नहीं होगी। जिसने बुढ़ापे में पहुँच करके जीवन के सुख दुःखों का मर्म जान लिया हो, जीवन में अनेकों सफलताएं अर्जित करली हों उसके लिए मौत से भयभीत होना अज्ञान ही माना जायेगा। नई जिन्दगी धारण करने के लिए, भावी जीवन यात्रा प्रारम्भ करने में जुट जाना ही वृद्धावस्था का सदुपयोग करना है।
वृद्धावस्था का सबसे सुन्दर सदुपयोग इसी में है कि जन कल्याणकारी परमार्थिक प्रवृत्तियों में अपनी समस्त शक्तियों को लगा दिया जाय। अपनी परमार्थिक रुचियों और प्रवृत्तियों का क्षेत्र व्यापक और विभिन्नताओं से युक्त बना लेना और उनमें निमग्न हो जाना चाहिए। इससे न तो मनुष्य को अपनी आयु के आँकड़े गिनने का अवसर रहता है न अतीत की स्मृतियों में डूबने का, न भविष्य की चिन्ताओं में खीजने का। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए भारतीय जीवन व्यवस्था में अन्तिम समय को वानप्रस्थ, संन्यासी के रूप में बिताने का विधान है।
वृद्धावस्था में मनुष्य के जीवन का प्रवाह एक नदी की तरह होना चाहिए जो हिमशिखरों से पतली धारा के रूप में तीव्र वेग से निकलती है, अनेकों धाराओं को अपनी अंक में समेटती है। सामने आये रोड़ों को टक्कर मारकर हटाती है तो कभी नया रास्ता ग्रहण करती है। फिर मैदान में बहती है, धरती की प्यास बुझाती है। अन्त में शत-शत धाराओं में विभक्त हो गंभीरता के साथ विराट समुद्र में प्रवेश करती है। मनुष्य वृद्धावस्था में पहुँचने तक पूर्ण रूपेण “स्वः” से मुक्त हो परमार्थ को जीवन का अंग बना लें और निस्पृह भाव से सर्वजन हिताय कार्य करें तो वृद्धावस्था सचमुच ही जीवन का स्वर्ण अवसर सिद्ध हो सकती है।
बुढ़ापा और यौवन की स्थिति का सम्बन्ध मनुष्य के मन से है, शरीर से नहीं। बुढ़ापे में भी कई लोग जवानों से अधिक सक्षम होते हैं तो कई लोग जवानी में वृद्ध जनों से गये-बीते निकलते हैं। मनुष्य का सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर और फिर आत्मा न कभी वृद्ध होते न मरते हैं। “न जायते म्रियते वा कदाचन्” मनुष्य का मूल अस्तित्व अजर अमर अविनाशी है। यह आध्यात्मिक दर्शन हमारे जीवन का केन्द्र बन जाये तो बुढ़ापा नाम ही न रहे। योगी इच्छा-आयु प्राप्त करते हैं। लम्बी उम्र पाकर भी वे सदैव जवान दिखाई देते हैं, वह इसी रहस्य का परिणाम होता है। वे शरीर के घटने-बढ़ने शिथिल होने को महत्व न देकर अजर अमर आत्मा में ही रमण करते हैं।
किन्हीं अंशों में बुढ़ापे में मनुष्य की शारीरिक शक्तियों का विकास रुक जाता है किन्तु मनुष्य की मानसिक शक्तियाँ इतनी प्रौढ़ और पुष्ट हो जाती हैं कि वह शारीरिक शक्तियों के कम हो जाने पर अपने ज्ञान अनुभव मानसिक सन्तुलन, आत्मिक स्थिरता के आधार पर अधिक सुखी, शान्त, सन्तोष का जीवन बिता सकता है।
बुढ़ापा संसार और जीवन के अनुभव, ज्ञान, संघर्षों का सार भाग-नवनीत है। बुढ़ापा जीवन दीप का परिपुष्ट, प्रौढ़, धूम्र, रहित, पुण्य प्रकाश है जो शत-शत किरणों में छिटक कर अनेकों को ज्योति दे सकता है। बुढ़ापा जीवन विद्या का परिपक्व फल है जिसके रस की एक-एक बूँद असंख्य लोगों को नव जीवन प्रदान कर सकती है। बुढ़ापा श्रद्धा, सम्मान का धवल पुँज है जिसकी छाया में बैठकर नई पीढ़ी नई राह पा सकती है।
एक चोर किन्हीं संत के पास जाया करता था और रोज ही उनसे ईश्वर दर्शन का उपाय पूछा करता था। महात्मा जी कभी अवसर आने पर बताने की बात कह कर उसे टाल दिया करते थे।
एक दिन चोर ने बहुत आग्रह किया तो महात्मा जी ने पहाड़ की ऊँची चोटी की ओर इशारा करते हुए कहा तुम वहाँ तक मेरे साथ छह पत्थर सिर पर रखकर चल सको तो वहाँ पहुँचकर मैं तुम्हें उपाय बता सकता हूँ!
चोर तैयार हो गया। संत जी ने छह पत्थर उसके शिर पर रख दिये और पीछे-पीछे चले आने का इशारा करके वे आगे चलने लगे।
कुछ ही दूर चला कि चोर हाँफने लगा, उसने महात्मा जी से कहा -भगवन्! बोझा बहुत है। इतने भार को लेकर मैं आगे नहीं चल सकता। संत ने एक पत्थर उतार दिया। चोर चलने लगा। पर कुछ दूर जाकर वह फिर लड़खड़ाने लगा। एक पत्थर और उतारना पड़ा। यही क्रम आगे भी चला। कुछ दूर चलने पर चोर थक जाता और संत जी को एक पत्थर उतारना पड़ता । अन्त में सभी पत्थर उतार देने पड़े तब कही वह चोटी तक साथ चल सकने में सफल हो सका।
चोटी पर पहुंच कर संत ने कहा भाई ! जिस प्रकार तुम छह पत्थर सिर पर रखकर चोटी तक पहुँच सकने में समर्थ न हुए उसी प्रकार जीव काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के छह मनो विकारों का भार ढोता हुआ ईश्वर दर्शन में सफल नहीं हो सकता। यदि ईश्वर तक पहुँचना हो तो यह मनोविकारों के पत्थर उतार कर फेंकने ही पड़ेंगे, इसके सिवा और कोई रास्ता नहीं।
मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति मन है। मन के आधार पर ही उसका उत्थान और पतन निर्भर रहता है। उस महान शक्ति का महत्व हम समझें तो जीवन में स्वर्गीय सुख -शान्ति अवतरित हो सकती है। इस सम्बन्ध में शास्त्रकारों और ऋषियों ने बहुत ही मार्मिक निर्देश दिये हैं।
चित्तायत्त मिदं सव्र जगत्स्थिरचराचरात्मकम्।
चित्ताधीनवतो राम बन्धमोक्षावपिस्फुटम्॥
- योगवशिष्ठ 3 । 98। 3
यह सारा जड़ चेतन जगत चित्त के ही अधीन है। हे राम, बन्धन और मोक्ष भी चित्त के ही वश में हैं।
मन एव मनुष्याणाँ कारणं बन्ध मोक्षयोः।
चित्ते चलति संसारो निश्चले योग उच्यते॥
मन ही मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण है। चित्त के चलने में ही यह सारा प्रपंच, संसार है और चित्त के स्थिर होने से मोक्ष है।
मनः सर्वमिदं राम तस्मिन्नन्तश्चिकित्सिते।
चिकित्सतो वै सकलो जगज्जालामयो भवेत्॥
-योग वशिष्ठ 4। 4। 6
हे राम, मन ही सब कुछ है। मन की चिकित्सा कर लेने पर संसार के सब रोगों की चिकित्सा हो जाती है।
पूर्ण मनसि सम्पूर्ण जगर्त्सव सुधा द्रवैः।
उपानद् गूढ़े पादस्य नानुचर्यास्तृतैव भूः॥
-योग वशिष्ठ 5। 121। 14
मन यदि पूर्ण हो गया तो सारा संसार अमृत से परिपूर्ण दीखेगा। पैर में जूता पहन लेने से सारी पृथ्वी चमड़े से ढकी हुई प्रतीत होती है।
सर्वेषामुत्तम स्थानाँ सर्वासाँचिर संपदाम्।
स्वमनो निग्रहो भूमिर्भूमिः सस्यश्रियामिव॥
-योग वशिष्ठ 5। 53। 35
सब उत्तम परिस्थितियाँ, सब श्रेष्ठ चिर संपदाएं मन के निग्रह से उसी प्रकार प्राप्त होती हैं जैसे अच्छी भूमि से अब अन्न प्राप्त होते हैं।
मनः प्रमादार्द्वधन्ते दुःखानि गिरि कूटवत्।
तद्वशादेव नश्यन्ति सूर्यस्याग्रे हिमं यथा॥
- योग वशिष्ठ 3। 99। 43
मन के प्रमाद से ही दुख पर्वत की चोटी के समान बढ़ते हैं और मन की विवेकशीलता से वे ऐसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे सूर्य की धूप से बर्फ नष्ट होती है।
आनन्दी वर्धते देहे शुद्धे चेतसि राघव।
- योग वशिष्ठ 6। 81। 21
हे राम, चित्त शुद्ध होने से देह का आरोग्य, आनन्द भी बढ़ता है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत।
आत्मैवह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मनोजितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥
-गीता
स्वयं ही अपना उद्धार करना चाहिए। अपने आपको गिरावे नहीं। मनुष्य स्वयं अपना शत्रु है। जिसने अपने आपको सँभाल लिया वह स्वयं ही अपना मित्र है और जिसने अपने आपको पतित किया वह स्वयं ही अपना शत्रु है।
यतोनिर्विषयस्यास्य मनसो मुक्ति रिष्यते।
अतो निर्विषयं नित्यं मनः कार्य मुमुक्षुणा॥
मन का निर्विषय होना मुक्ति है। इसलिए बंधन से मुक्ति की इच्छा करने वालों को अपना मन निर्विषय करना चाहिए।
तावदेव निरोद्धव्यं यावद्धदि गतं क्षयम्।
सतज् ज्ञानं च ध्यानं च शेषोऽन्यो ग्रन्थ विस्तरः॥
- विष्णु पुराण 6। 7। 28
मन का तब तक निरोध करे जब तक कि हृदय की वासनाएँ नष्ट न हो जायं। यही ज्ञान है, यही ध्यान है और तो सब शास्त्र विस्तार है।
बन्धाय विषययाक्ति मुक्तयै निर्विषयं मनः॥
विषयों में ग्रस्त मन बन्धन का आधार है और निर्विषय मन मुक्ति का हेतु है।
मनुष्य एक सामाजिक जीव है और इसलिये वह अन्य प्राणियों की तरह अपना जीवन कदापि अकेला अथवा बिना किसी प्रकार के सहयोग के गुजार नहीं सकता। यों नासमझ लोग प्रायः कह दिया करते हैं, “हमें क्या काम दुनिया से”, पर वास्तव में उनका काम दुनिया के बिना एक क्षण भी नहीं चल सकता। अगर किसी व्यक्ति को सर्वथा साधन-विहीन करके किसी बियाबान जंगल में छोड़ दिया जाय तो वह या तो दस-पाँच दिन में मर-खप जायगा या जानवरों की तरह जीवन बिताने को बाध्य होगा। यही कारण है कि मनुष्य ने जब से प्रगति-पथ पर कदम रखा है वह परिवार, कुटुम्ब, वंश, जाति, धर्म, देश आदि के नाम पर अपने दायरे को बढ़ाता जाता है। इसी उद्देश्य से वह विवाह करता है, बाल-बच्चे उत्पन्न करके, उनके पालन-पोषण का भार उठाता है, भाई, बहिन, चाचा, मामा, मामी आदि सम्बन्धियों की सहायता करता है, जाति के नियमों का पालन करके जाति बन्धुओं से हेल-मेल बढ़ाता है और प्रत्येक ऐसे काम को पूरा करने की चेष्टा करता है जिससे अन्य लोगों से उसका सम्बन्ध दृढ़ हो और जीवन निर्वाह में उसे उन सबका सहयोग मिलता रहे। हमारी यही मनोवृत्ति परिवार, जाति और समाज की स्थापना का मूल है।
भारतवर्ष में सम्मिलित-परिवार की प्रथा प्रचलित है। जिसमें केवल पति-पत्नी और उनके दो-चार बच्चों की गणना ही नहीं की जाती, वरन् माँ-बाप, छोटे-बड़े भाई, बहिन, चाचा, ताऊ, उनके स्त्री-पुत्र आदि सबका समावेश हो जाता है। अब भी गाँवों और छोटे कस्बों में ऐसे बहुसंख्यक परिवार मौजूद हैं, जिनके सदस्यों की संख्या चालीस और पचास तक पहुँच जाती है पर आधुनिक विचारों के लोग इस प्रथा का विरोध करते हैं और योरोप अमरीका के निवासी पृथक परिवार की प्रथा को ही लाभकारी बतलाते हैं। वास्तव में बात यह है कि सम्मिलित कुटुम्ब-प्रथा कृषि-जीवी समाज के लिए विशेष रूप से उपयोगी होती है और पृथक परिवार की प्रथा, उद्योग-धन्धों पर मुख्यतः आधार रखने वाले समाज में सुविधाजनक जान पड़ती है। पर यह विभाजन केवल आर्थिक दृष्टि से किया गया है। यदि नैतिकता, उदारता, सहयोग, परोपकार आदि अन्य मानवीय गुणों की दृष्टि से विचार किया जाय तो निःसंदेह सम्मिलित परिवार प्रथा ही श्रेष्ठ ठहरती है। उसमें मनुष्य की स्वार्थ-वृत्ति पर अंकुश लग कर वह समाज के अन्य व्यक्तियों के साथ सद्व्यवहार और उदारता के व्यवहार को सीखता है। इस दृष्टि से परिवार ही समाज-संगठन की पहली सीढ़ी है। जो व्यक्ति अपना अनेक प्रकार से उपकार करने वाले माता-पिता, भाई-बहिन, सगे सम्बन्धियों की सहायता करने के आनाकानी करता है उससे समस्त जाति या समाज की सेवा, सहायता और उपकार की आशा किस प्रकार की जा सकती है ? इसका आशय यह भी नहीं समझ लेना चाहिये कि हम प्राचीन-प्रथा को जैसे को तैसा उपयोगी मानते हैं। समय बदल रहा है और परिस्थितियों के अनुसार हमारी सभी सामाजिक संस्थाओं और प्रथाओं में न्यूनाधिक परिवर्तन हो ही गया है। तब परिवार प्रथा ही उससे अछूती कैसे रह सकती है। अब पुराने जमाने की तरह सौ-सौ और पचास-पचास व्यक्तियों के परिवार न तो संभव हैं और न उपयोगी। वे तो शुद्ध कृषिजीवी समाज की चीज थे। पर अब हमारे यहाँ भी उद्योग-धन्धों और नौकरी का महत्व काफी बढ़ गया है और बहुत अधिक कृषि-भूमि न रख सकने का नियम भी बना दिया गया है, इसलिए परिवार-प्रथा में समयानुकूल सुधार तो करने ही पड़ेंगे।
जिस प्रकार समाज का उद्गम परिवार है, उसी तरह परिवार का उद्गम विवाह है। विवाह से दो स्त्री-पुरुष में ही संबंध स्थापित नहीं होता वरन् दो परिवार भी उससे जुड़ते हैं और फिर अन्य अनेक परिवार भी उस घेरे में आ जाते हैं। इस प्रकार सैकड़ों व्यक्तियों में पारस्परिक प्रेम, सहयोग और सहायता के भावों की वृद्धि होती है, जो अन्ततः समाज की सुदृढ़ता और कल्याण की दृष्टि से भी हितकारी सिद्ध होते हैं। इसलिए समाज और देश की भलाई के ख्याल से यह अत्यंत आवश्यक है कि हम विवाह-प्रथा में आवश्यक सुधार करके उसे ऐसा रूप दें जिससे वह दम्पत्ति के अतिरिक्त घर के सब सदस्यों और भावी पीढ़ी के लिए सब प्रकार से उपयुक्त सिद्ध हो सके। हमारे देश में विवाह को एक बहुत महत्वपूर्ण धार्मिक संस्कार माना गया है, जो कि अत्यन्त पवित्र और अविच्छेद होता है। पर अब समय के प्रभाव से उसमें अनेक विकृतियाँ आ गई है। बाल विवाह, वृद्ध-विवाह, अनमोल विवाह आदि की बुराइयाँ हम प्रायः सुनते रहते हैं। इनके फल-स्वरूप दम्पत्ति में जैसा चाहिये वैसा प्रेम और आत्मीयता का भाव उत्पन्न नहीं होता और उसका प्रभाव समस्त परिवार पर पड़ता है। इन सब से भी बढ़ कर दहेज कि कुप्रथा है जो दाम्पत्य-प्रेम की जड़ पर आरम्भ से ही कुठाराघात कर देती है और वर-वधू तथा दोनों के परिवारों के बीच ऐसा मनोमालिन्य का भाव उत्पन्न कर देती है कि विवाह से जो वास्तविक लाभ होना चाहिए वह अधिकाँश में नष्ट हो जाता है। चाहे ऐसे विवाह के द्वारा स्त्री को रोटी कपड़े का सहारा मिल जाय, पर उसे सच्चा जीवनसाथी धन के लोभ से अधिक से अधिक रकम पाने के लिये किसी मालदार आसामी को तलाश करते रहते हैं, तब कन्या और वर के गुणों का मिलान, उनका एक दूसरे के अनुकूल होने का ध्यान कैसे रखा जा सकता है ? एक लेखक के कथनानुसार इस प्रकार जो विवाह पुरुष की दृष्टि से काम-वासना की प्राप्ति के लिये और स्त्री की तरफ से आर्थिक सुरक्षा के लिये किया जाता है, उसका उद्देश्य ही गलत हो जाता है। विवाह कर लेने से कोई जीवन-साथी नहीं बन जाता। जो पति-पत्नी जीवन-साथी नहीं बनते और केवल अपनी सुविधा के लिए एक दूसरे के शरीर व मन का भोग करते हैं, उनका घर, घर नहीं नरक बन जाता है। घर को स्वर्ग बनाना हो तो पति-पत्नी को परस्पर अनुरूपता प्राप्त करने का यत्न करना चाहिए।
पर इस प्रकार का दाम्पत्य-जीवन आजकल कठिन हो गया है। अधिकाँश विवाह या तो धन के लालच से होते हैं या फिर ऊपरी रंग रूप पर लट्टू होकर। अनेक नये नवयुवक तो सिनेमा में नायक-नायिका के प्रेम के खेल और उनकी चमक-दमक को देख कर उसे ही वैवाहिक जीवन का आदर्श समझ बैठते हैं। ऐसे मूर्ख युवक और युवतियों के संयोगान्तक और वियोगान्तक किस्से समाचार पत्रों में प्रायः पढ़ने में आया करते हैं। पर ऐसे स्वप्नों का अन्त शीघ्र हो ही जाता है और सिवाय बदनामी और हँसी के ऐसे मनचले लोगों के हाथ कुछ नहीं पड़ता। ऐसे लोगों से यह आशा करना कि वे परिवार और समाज के प्रति अपने वास्तविक उत्तरदायित्व को समझ कर उसका पालन करेंगे, निरर्थक बात है। इस तथ्य को दृष्टिगोचर रख कर एक अनुभवी लेखक ने कहा है-
“पारिवारिक जीवन को सफल बनाने के लिए त्याग, सहन शक्ति, मानसिक प्रौढ़त्व और समझदारी की जरूरत है। पुरुष और स्त्री एक दूसरे के पूरक हैं। इस नैसर्गिक सम्बन्ध को बनाये रखने के लिये समाज ने विवाह-प्रणाली को स्वीकार किया है। पर इस सम्बन्ध को केवल लोकापवाद के डर से निभाना असम्भव है। दाम्पत्य-जीवन की सफलता शारीरिक आकर्षण की अपेक्षा पति-पत्नी की मानसिक और आत्मिक एकरूपता पर अधिक निर्भर है।
यदि आप में मानवोचित गुण हैं तो आप जिसे अपनाते हैं उससे प्रेम करना भी सीख जाते हैं। प्रेम का दीपक लगन के साथ जलाया जाता है, उसे वासना रहित जल से सींचा जाता है और स्वार्थ, असहनशीलता, अविवेक आदि के रोगों से उसे बड़ी साधना, से यत्नों से बचाया जाता है, तब कहीं जाकर वह गृहस्थाश्रम और पारिवारिक जीवन को प्रकाश पूर्ण और आनन्दमय बना पाता है।
इस प्रकार दाम्पत्य और पारिवारिक जीवन उचित रीति से निर्वाह करने पर निजी स्वार्थ के त्याग और दूसरों की सेवा की भावना की वृद्धि होती है और हम समाज सेवा के महत्व को समझने लगते हैं। हमको अनुभव होने लगता है कि कोई व्यक्ति अकेले अपने स्वार्थ पर दृष्टि रख कर ही कदापि सुखी और संतुष्ट नहीं हो सकता। एक से दो और दो से चार यही तरीका साँसारिक दृष्टि से मनुष्य जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है। हम इस समय जितनी भी उन्नति और समृद्धि अपने चारों तरफ देख रहे हैं, उसका मूल समाज-संगठन और सामुदायिक भावना में ही निहित है। इसलिये जो मनुष्य इस परम्परा को कायम रखना चाहता है और पूर्ववर्ती पीढ़ियों के ऋण से अऋण होना चाहता है उसको अपना पारिवारिक जीवन उन्नत और सुदृढ़ बना कर समाज की प्रगति में अवश्य सहयोग देना चाहिए।
एक दिन कर्म और भावना दोनों एकत्रित हुए। बात-चीत में विवाद चल पड़ा कि दोनों में कौन बड़ा है।
दोनों ही अपनी-अपनी बड़ाई बखानने लगे। कोई छोटा बनने को तैयार न हुआ। जब विवाद बढ़ा तो निर्णय कराने इन्हें ब्रह्माजी के पास जाना पड़ा।
ब्रह्माजी ने दोनों की बात सुनी और मुस्काये। उनने कहा-परीक्षा से ही वास्तविकता का पता चलेगा। तुम दोनों आकाश छूने का प्रयत्न करो। जो पहले आकाश छू सकेगा वही बड़ा माना जाएगा।
भावना ने उछाल लगाई तो आकाश तक जा पहुँची। छूने में भी सफल हो गई। पर आकाश की ऊँचाई इतनी अधिक थी कि बेचारी को अधर में ही लटकना पड़ा। पैर धरती से बहुत ऊपर थे।
कर्म प्रयत्न में जुटा। उसने आकाश तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ बनानी शुरू कर दीं। कई दिनों वह लगातार लगा भी रहा। पर उत्साह न होने से वह सब थकाने वाला झंझट मात्र दीखने लगा। उदासी ने उसे घेरा और अपने औजार पटक का वह सुस्ताने सरोवर के तट पर चला गया।
ब्रह्माजी पता लगाने गये तो देखा कि भावना आकाश में अधर लटकी है। कर्म को देखा तो वह पाकर की छाया में औंधे मुँह पड़ा कराह रहा था। थकान और झूँझल से उसकी नस-नस दुख रही थी।
प्रजापति ने दोनों को बुला कर कहा- तुम दोनों ही अपूर्ण हो। बड़प्पन तभी बनता है जब दोनों मिलते हो। जाओ लड़ना मत, दोनों मिल-जुल साथ-साथ रहना, तभी तुम्हारी उपयोगिता अक्षुण्ण रह सकेगी।
बाबुल के सम्राट नमरुद ने ऐलान कराया कि वही ईश्वर है, उसी की पूजा की जाय। भयभीत प्रजा ने उसकी मूर्तियाँ बनाई और पूजा आरम्भ कर दी।
एक दिन राज-ज्योतिषियों ने नमरुद को बताया कि इस वर्ष एक ऐसा बालक जन्मेगा जो उसके ईश्वरत्व को चुनौती देने लगेगा।
सम्राट को यह बात अखरी और उसने उस वर्ष जन्मने वाले सब बालकों को मार डालने की आज्ञा राजकर्मचारियों को दे दी। बालक ढूंढ़-ढूंढ़ कर मारे जाने लगे।
नमरुद की मूर्तियाँ गढ़ने वाले कलाकार आजर की धर्म-पत्नी को भी प्रसव हुआ और सुँदर पुत्र जन्मा। मातृ-हृदय बालक की रक्षा के लिये व्याकुल हो गया। वह उसे लेकर पहाड़ की एक गुफा में गई और वहीं उसका लालन-पालन करने लेगी।
बालक बन्द गुफा में बढ़ने लगा। धीरे-धीरे वह पाँच वर्ष का हो गया। एक दिन उसने माता से पूछा- हम लोग जहाँ रहते हैं क्या उससे बड़ा इस दुनिया में और कुछ है ?
माता ने बालक को संसार के विस्तार के बारे में बहुत कुछ बताया और कहा इस सबका निर्माता एक ईश्वर है। बालक ईश्वर के दर्शन करने के लिये व्यग्र रहने लगा।
एक दिन अवसर पाकर बालक गुफा से बाहर निकला। सबसे पहले उसने उन्मुक्त आकाश को देखा। रात्रि का अंधकार छाया हुआ था। सबसे पहले एक चमकता हुआ तारा दिखाई दिया। बालक ने सोचा, हो न हो यही ईश्वर होगा।
थोड़ी देर में तारा अस्त हो गया और चाँद निकला। बालक सोचने लगा कम प्रकाश वाला तारा नहीं, अधिक चमकने वाला यह चाँद ईश्वर होना चाहिये। थोड़ी देर में रात समाप्त हुई, चन्द्रमा डूबा और सूरज निकल आया, और दिन गुजरते-गुजरते उसके भी डूबने की तैयारी होने लगी।
बालक इब्राहीम के मन में भारी उथल-पुथल मची। उसने सोचा जो बार-बार डूबता और उदय होता है ऐसा ईश्वर नहीं हो सकता। वह तो ऐसा होना चाहिए जो न जन्में और न मरे। विचार ने विश्वास का रूप धारण किया। ईश्वर का स्वरूप उसकी समझ में आ गया। इब्राहीम ने ईश्वर चिन्तन का व्रत लिया और साधुओं की तरह न जन्मने और न मरने वाले ईश्वर की उपासना करने के लिए प्रचार करने लगा।
नमरुद को पता चला कि उसकी सत्ता को चुनौती देने वाला कोई फकीर पैदा हो गया है तो उसने इब्राहीम को पकड़ बुलाया और अनेक यंत्रणाएं देने लगा। जब इब्राहीम के विचार नहीं बदले तो उसे जलती आग में पटक कर मार डालने का आदेश हुआ।
अग्नि प्रकोप से बचाने में सहायता करने के लिए जब देवता इब्राहीम के पास पहुँचे तो उन्होंने यह कहकर वह सहायता अस्वीकार कर दी कि सत्य की निष्ठा कष्ट सहने से ही परिपक्व होती है और आत्मा का तेज परीक्षा के बाद ही निखरता है। मुझे अपनी निष्ठा की परीक्षा कष्ट सहने के द्वारा देने दीजिए। मेरा आत्म-बल विचलित न हो, यदि ऐसी सहायता कर सकें तो आपका इतना अनुग्रह ही पर्याप्त है।
अंत में सत्य ही जीता। नमरुद का गर्व गल गया। इब्राहीम अपनी सत्यनिष्ठा के कारण और अधिक चमके। नमरुद नहीं रहा पर इब्राहीम की ईश्वर विवेचना आज भी बहु-संख्यक मनुष्यों के हृदय में स्थान प्राप्त किए हुए है।
बल नहीं जीतता और न आतंक ही अंत तक ठहरता है। असत्य कितना ही साधन सम्पन्न क्यों न हो वह सत्य के आगे ठहर नहीं पाता। साधन हीन होते हुए भी सत्य, सुसम्पन्न असत्य से कहीं अधिक सामर्थ्यवान होता है। विजय असत्य की नहीं सत्य की ही होती है। इब्राहीम की विजय और नमरुद की पराजय ने इसी तथ्य का उद्घाटन किया है।
वेदों में मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष बताई गई है। “जीवेम शरदः शतम्” हम सौ वर्ष तक जिएँ। प्रकृति के नियमानुसार भी मनुष्य की आयु सौ वर्ष के ऊपर ही मानी गई है। प्रकृति का यह सामान्य नियम है कि जो प्राणी जितने समय में प्रौढ़ होता है उससे पाँच गुना जीवन जीता है। नियमानुसार घोड़ा पाँच वर्ष में युवा होता है तो घोड़े की उम्र 25 वर्ष से 30 वर्ष तक मानी गई है। ऊँट 8 वर्ष से प्रौढ़ होकर 40 वर्ष तक, कुत्ता 2 वर्ष में विकसित होकर 10 वर्ष तक और हाथी 50 वर्ष में युवा होकर 200 वर्ष तक जीवित रहता है। मनुष्य भी साधारणतया 25 वर्ष की उम्र में युवा होता है। अतः 100 से 150 वर्ष तक की उम्र मानी गई है उसकी।
शरीर और आयु विज्ञान के अमेरिकी विद्वान डॉ. कार्नसन ने कहा है यद्यपि प्रकृति के नियम और गणित के हिसाब से मनुष्य की आयु 150 वर्ष होती है फिर भी मोटे रूप में उसको 100 वर्ष तो मान ही लेनी चाहिए। यह आयु-सीमा केवल अनुमान मात्र ही नहीं है अपितु सही है। गोस्वामी तुलसीदास 100 वर्ष से अधिक जीवित रहे। इससे पूर्व महाभारत काल में श्रीकृष्ण की आयु 127 वर्ष और पितामह भीष्म को दो सौ वर्षों से भी अधिक मानी गई है। आधुनिक युग में भी अनेकों शतजीवी हुए हैं। भारत के महर्षि कर्वे, महान् इंजीनियर विश्वेश्वरैया शतायु हुए हैं। भारत में तो सौ वर्ष जीवन की स्वाभाविक आयु मर्यादा मानी गई है।
विदेशों में भी नारवे का क्रिश्चियन ड्रेकनवर्ग 146 वर्ष तक जीवित रहा। उसने 130 वर्ष की उम्र में अपना अन्तिम विवाह किया। इससे पूर्व 111 वर्ष की उम्र में एक 60 वर्षीय विधवा से विवाह किया था। सौ वर्ष की उम्र तक वह सिपाही के रूप में शत्रु देश से लड़ता रहा। प्रसिद्ध प्रकृतिवादी डेमोक्रेटिस जीवन भर स्वस्थ, निरोग रहकर 109 वर्ष तक जीवित रहे। जोसफ सूरिंगटन 160 वर्ष तक जीवित रहा। उसके सबसे बड़े पुत्र की आयु 108 वर्ष की थी तो छोटे की 9 वर्ष। हंगरी का बोविन 172 वर्ष तक जीवित रहा उसकी पत्नी 164 वर्ष की थी।
इस तरह के असंख्यों उदाहरण भरे पड़े हैं जो मनुष्य के शतजीवी अथवा सौ वर्ष से अधिक होने के प्रत्यक्ष प्रमाण है। इतना ही नहीं प्राणियों के जीवनकोषों का स्वभाव सदा-सदा जीवित रहने का प्रयत्न करना है। वैज्ञानिक खोजों से यह सिद्ध हो चुका है कि - “प्राकृतिक रूप में भी मृत्यु निश्चित नहीं है।” प्रसिद्ध जीवन शास्त्री डॉ. अलेक्सिस कैरेल ने एक मुर्गी के भ्रूण को 36 वर्षों तक तरल पोषक पदार्थ में सुरक्षित रखा। 36 वर्ष के पश्चात् उन्होंने अपना प्रयोग इस निष्कर्ष पर बन्द कर दिया कि वह भ्रूण इसी तरह सदा-सदा जीवित रखा जा सकता है।
पूर्व मनीषियों के अनुभवपूर्ण, निष्कर्षों वैज्ञानिकों के प्रयोग, प्रकृति की स्वाभाविक नियम मर्यादाओं के अनुसार मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष मान लेने में शंका की कोई गुंजाइश नहीं।
आज के तथाकथित वैज्ञानिक और विकसित युग में स्थिति कुछ इससे भिन्न है। अधिकाँश लोग सौ वर्ष के पूर्व ही जीवन समाप्त कर देते हैं और वह भी जीवन भर स्वास्थ्य की खराबी की चिन्ता नहीं करते हुए अनेकों रोग बीमारियों के शिकार बन कर। सुखपूर्ण स्वाभाविक और प्राकृतिक मृत्यु तो शायद ही किसी को प्राप्त होती हो। 50-60 वर्ष की उम्र काफी समझ ली जाती है।
कुछ समय पूर्व पश्चिमी जर्मनी में 30 देशों के लगभग 1000 वैज्ञानिक जीवनशास्त्री मानसरोग विशेषज्ञों का एक बड़ा सम्मेलन हुआ था, जिसमें आधुनिक युग में गिरते जा रहे स्वास्थ्य, असामयिक बुढ़ापे और अकाल मृत्यु पर विचार−विमर्श किया गया था। इन सभी विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला कि “शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को गड़बड़ी और अल्प जीवन की जड़ है आज का अप्राकृतिक, अस्वाभाविक, असन्तुलित जीवन।”
दीर्घ जीवन के लिए मुख्यता शारीरिक मानसिक और व्यावहारिक जीवन क्रम में सन्तुलन व्यवस्था बनाये रखना आवश्यक है। इसके साथ विजातीय तत्वों के प्रवेश से अपनी रक्षा करना भी अपेक्षित है।
इंग्लैण्ड के थामस पार साहब 152 वर्ष तक स्वस्थ हालत में जीवित रहे। वे साधारण भोजन करते थे। बादशाह चार्ल्स ने एक बार इन्हें मुलाकात के लिए बुलाया और बढ़िया भोजन की दावत भी दी किंतु इससे वे मर गये। डाक्टरी जाँच करने पर पता चला कि गरिष्ठ भोजन ने उनके पाचन को बिगाड़ दिया और उनके जीवन का अन्त कर दिया।
गलत खान-पान, अशुद्ध आहार, अनुपयुक्त वायु का सेवन करने वाले असंख्यों व्यक्ति अपने हाथों अपनी कब्र खोदते हैं। बहुत अधिक या अयुक्त खाद्य पदार्थ ग्रहण कर लेने पर शरीर के पाचन संस्थान पर भारी दबाव पड़ता है और उनकी क्रिया असन्तुलित, अस्त−व्यस्त हो जाती है। यही बात अशुद्ध वायु के संबंध में भी लागू होती है। दवा, इन्जेक्शन आदि के रूप में लिए जाने वाले विजातीय द्रव्य भी इसी में आते हैं। आजकल अनुपयुक्त खानपान रहने के गन्दे घुटे हुए स्थान, शरीर को जल्दी ही क्षीण करने में बहुत कुछ उत्तरदायी हैं। यदि हम उपयुक्त और आवश्यकतानुसार खाद्य पदार्थ लें शुद्ध स्वच्छ हवा में अधिकाधिक रहें, शरीर से दूषित पदार्थ मलों के निष्कासन का पूरा पूरा ध्यान रखें तो शरीर स्वस्थ सन्तुलित रहेगा और हम दीर्घ जीवी बन सकेंगे।
दूसरी महत्वपूर्ण बात है जीवन का बाह्य जगत के साथ तालमेल बैठाना। अपने कार्य, श्रम, विश्राम में संतुलन बना लेना दीर्घ जीवन का महत्वपूर्ण नियम है। शरीर की क्षमता, शक्ति के अनुसार अपना कार्य करना, आवश्यकतानुसार विश्राम करना शरीर को संतुलित बनाये रखने के लिए अपेक्षित है। किंतु वैज्ञानिक युग की घुड़दौड़ के मनुष्य अपनी आन्तरिक एवं बाह्य उत्तेजनाओं का संस्पर्श पाकर बेतहाशा जीवन में दौड़ लगा रहा है। मनुष्य की महत्वाकाँक्षाओं, प्रतिस्पर्धा, ऐषणायें, आकाश को चूमने लगी हैं। मनुष्य उनकी उत्तेजनाओं से प्रेरित हो कर दिन रात भागता दौड़ता है। तनाव पर तनाव पड़ने से बढ़ने चढ़ने की तृष्णा और एषणाओं की उन्मादी दौड़ में मनुष्य का जीवन क्रम बेसुरा हो जाता है। मनुष्य का स्नायु-संस्थान, हृदय मस्तिष्क जल्दी ही रोगग्रस्त, अक्षम, असमर्थ, हो जाते हैं और एक झटके के साथ उसका स्वास्थ्य गिर जाता है। अनिद्रा, आन्तरिक बेचैनी, चिन्तायें बढ़ जाती है, जिससे कई शारीरिक मानसिक गड़बड़ी उत्पन्न होकर मनुष्य के अल्प जीवन का कारण बनती हैं।
जीवन संबन्धी खोज विशेषज्ञ डॉक्टर कार्लसन का कहना है “अल्प मृत्यु और बुढ़ापे को रोकने के लिए सौ दवाओं की एक दवा है - सुविधाजनक जीवन। जिस कार्य से शरीर और मन पर अत्यधिक दबाव पड़े उसे छोड़ देना चाहिए। अपनी शक्ति, सामर्थ्य, क्षमता तथा उम्र के अनुसार अपने दैनिक कार्यक्रम में आवश्यकतानुसार परिवर्तन करते रहना चाहिए। इसी सूत्र को पकड़कर मैंने लम्बी उम्र पायी है और अनेकों लोगों को जीवन के कष्टों, रोगों से मुक्ति दिलाई है।”
स्वास्थ्य आँकड़ा विशेषज्ञ लुई डबलिंग ने अपने आँकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि चिन्ता प्रधान बाल्य जीवन और दुःखी, संतप्त यौवन कभी भी दीर्घायु, सुन्दर स्वास्थ्य, सुखी जीवन नहीं बना सकता। दीर्घजीवन की नींव, मूलाधार है, चिन्ता और दुःखद अनुभूतियों से मुक्त बाल्य जीवन और उन्मुक्त, स्वच्छन्द, भार रहित यौवन। जर्मन विशेषज्ञ डॉ. बोहर का मत है कि दीर्घ जीवन व सुन्दर स्वास्थ्य के लिए 20 वर्ष तक का जीवन प्रसन्नता भरा हुआ और जीवन की विभीषिकाओं से रहित होना आवश्यक है। भारतीय जीवन विशारदों ने भी जीवन का प्रारम्भिक चौथाई काल 25 वर्ष की उम्र तक ऋषि कुलों में ब्रह्मचर्यपूर्वक उन्मुक्त बिताने का विधान रखा है।
किन्तु आज के तथाकथित सभ्य और विज्ञान के युग में बाल्यकाल से ही मनुष्य के जीवन में विभिन्न चिन्ता, परेशानी, उलझनों, समस्याओं का ताँता लग जाता है। बहुत कम लोगों को बचपन में यह सौभाग्य प्राप्त होता है। जिन्हें ऐसा अवसर मिलता भी है तो उनकी जीवन धारायें भौतिक आकर्षणों की मृगमरीचिका की ओर प्रभावित हो जाती हैं जहाँ जिससे जीवन का कोई उद्देश्य नहीं सधता। अन्ततः चिन्ता, निराशा, अवसाद, असफलता का ही सामना करना पड़ता है। इससे मानसिक संस्थान पर बुरा असर पड़ता है। साथ ही शारीरिक असन्तुलन भी। इससे मनुष्य अल्पायु में ही जीवन समाप्त कर देता है।
खेद की बात है कि हम सभ्यता और प्रगति के नाम पर जीवन के स्वाभाविक क्रम, प्रकृति की मर्यादाओं का उल्लंघन करके असन्तुलित जीवन बिताते हैं या किन्हीं कारणों से बिताने के लिए बाध्य होना पड़ता है। रहन-सहन, आहार-विहार, कार्य-क्रम विश्राम आदि में कोई तालमेल नहीं बैठाकर भौतिकता की अन्धी दौड़ में बेतहाशा भागे जा रहे हैं। और फिर स्वास्थ्य की गड़बड़ी अल्पायु रोग बीमारियों, अशान्ति क्लान्ति से पीड़ित हो नारकीय जीवन बिताते हैं। किन्तु इसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं कोई दूसरा नहीं। इस स्थिति से उबरने के लिए हमें इस गलत जीवन क्रम को बदलना होगा तभी दीर्घजीवन, सुन्दर स्वास्थ्य,सबल मनोभूमि के वरदानों से हम कृत-कृत्य हो सकेंगे।
दो शिष्य आपस में झगड़ पड़े। दोनों अपने-अपने को बड़ा सिद्ध करते थे। अपनी बड़ाई और दूसरे की मधुता सिद्ध करने के लिए दोनों ने ढेरों तर्क और प्रमाण उपस्थित कर दिये।
बात बढ़ी तो विवाद को लेकर दोनों गुरुदेव के पास पहुँचे और अपना अपना पक्ष उपस्थित करते हुए निर्णय देने की प्रार्थना करने लगे।
गुरुदेव ने हँसते हुए कहा- तुम इतना भी नहीं जानते कि जो अपने को छोटा और दूसरों को बड़ा कहता है उसी को बड़ा माना जाता है। तुममें से जो ऐसा आचरण कर रहा हो वही बड़ा है।
सन्त नानक एक गाँव में गये। वहाँ के निवासियों ने बड़ा आदर किया- चलते समय नानक जी ने आशीर्वाद दिया- ‘उजड़ जाओ।’
वे दूसरे गाँव में गये तो वहाँ के लोगों ने तिरस्कार किया, कटु वचन बोले और लड़ने झगड़ने पर उतारू हो गये। नानक जी ने आशीर्वाद दिया- ‘आबाद रहो।’
साथ में चल रहे शिष्यों ने पूछा- भगवन् ! आपने आदर करने वालों को ‘उजड़ जाओ’ और तिरस्कार करने वालों को ‘आबाद रहो’ का उलटा आशीर्वाद क्यों दिया?
नानक ने कहा- सज्जन लोग उजड़ेंगे तो वे बिखर कर जहाँ भी जायेंगे सज्जनता फैलावेंगे इसलिए उनका उजड़ना ही ठीक है। किन्तु दुर्जन सर्वत्र अशान्ति उत्पन्न न करें इसलिए उनके एक ही जगह रहने में भलाई है।
अभिभावकों, खासकर माता पिता के ऊपर बच्चों में अच्छी आदतें डालने, उन्हें सुयोग्य बनाने का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है और सभी माँ बाप यह चाहते भी हैं कि उनके बच्चे योग्य बनें। किन्तु बच्चों का निर्माण एक पेचीदा प्रश्न है। इसके लिए अभिभावकों में काफी विचारशीलता, विवेक संजीदगी एवं मनोवैज्ञानिक जानकारी का होना आवश्यक है।
बहुत से माँ बाप तो बच्चों को पैदा करने, खिलाने, पिलाने, स्कूल आदि में पढ़ने की व्यवस्था तक ही अपने उत्तरदायित्व को पूर्ण समझते हैं। किन्तु इससे बच्चों के निर्माण की सम्पूर्ण समस्या का हल नहीं होता, हालाँकि बच्चों के विकास में इनका भी अपना स्थान है। बच्चों में अच्छी आदतें डालना उनमें सद्गुणों की वृद्धि करके सुयोग्य बनाना एक महत्वपूर्ण बात हैं, यह असुरता से देवत्व उत्पन्न करने पशुत्व को मनुष्यता में बदलने की प्रक्रिया है, एक सूक्ष्म विज्ञान है। बच्चों को प्यार करना, खिलाना पिलाना, उनका संरक्षण करना तो पशुओं में भी पाया जाता हैं।
बच्चों में बढ़ती हुई उच्छृंखलता, अनुशासनहीनता, स्वेच्छाचार एवं अन्य बुराइयों की जिम्मेदारी बहुत कुछ माँ बाप, अभिभावकों के ऊपर ही होती है। उनकी सामान्य सी गलतियों, व्यवहार की छोटी सी भूलों के कारण बच्चों में बड़ी बड़ी बुराइयाँ पैदा हो जाती है। अनेकों बुरी आदतें बच्चों मैं पड़ जाती हैं। स्वयं माँ बाप जिसे सुधार समझते हैं वही बात बच्चों के बिगाड़ने कारण बन जाती है।
बच्चों में अनुशासन और आज्ञा पालन की आदत पैदा करने के लिए अधिकाँश माँ बाप फौजी नियमों का अनुसरण करते देखे जाते हैं। किसी भी काम के लिए अधिकार पूर्वक बच्चों को आदेश देते हैं। सैब दिखाकर, दबाव के द्वारा उनसे कोई काम कराना चाहते हैं। कदाचित बच्चों ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया अथवा अनसुना कर दिया तो उनकी मारपीट करना चीखना, चिल्लाना गाली देना शुरू हो जाता है। किन्तु वे माँ बाप यह नहीं जानते कि इससे बच्चों में विरोधी भावना, द्वेष-बुद्धि घर कर जाती है और बच्चे जानबूझ कर उपेक्षा टालमटोल करने वाले, किसी बात पर ध्यान न देने वाले अनुशासनहीन और उच्छृंखल बन जाते हैं।
किसी तरह की आज्ञा देते समय अथवा अनुशासन पालन की आदत के लिए यह जानना और समझना भी आवश्यक है कि बच्चा उस समय क्या कर रहा है। उदाहरणार्थ बच्चा अपने किसी दिलचस्प खेल में लग रहा है, एकाग्रता के साथ पढ़ रहा है अथवा अपने बाल मित्रों के साथ खेलकूद में मस्त है तो ऐसे समय उसे किसी तरह की आज्ञा नहीं देनी चाहिए। ऐसी स्थिति में प्रायः बच्चे आज्ञा नहीं माना करते। यदि उनके साथ जबरदस्ती और रौब दबाव का व्यवहार किया गया तो उनमें रूठने, चिल्लाने मचलने की आदतें पड़ जायेंगी और फिर हर बात में बच्चे विपरीतता अर्थात् आज्ञा उल्लंघन, अनुशासन हीनता का परिचय देंगे।
जब बच्चे माँ के पास शान्त तथा स्वस्थ मानसिक स्थिति में हों तो उन्हें आवश्यकतानुसार आदेश दिया जाय और जहाँ तक बने उस आदेश को खेल मनोरंजन के रूप में अथवा कोई नवीनता में परिणित कर देना अधिक श्रेष्ठ रहेगा। आदेश भी रचनात्मक होने चाहिए “अमुक करेगा”, “वह लावेगा”, “वहाँ जावेगा” आदि “यह काम मत कर”। “वहाँ मत जाना” “उसे मत छूना” आदि के रूप में नकारात्मक आदेश बच्चों में वैसा ही करने का कौतूहल पैदा कर देते हैं और वे उन्हें ही करने लगते हैं जिनके लिए मना किया जाता है।
अनुशासन, आज्ञापालन से सम्बन्धित बातों पर स्वयं बच्चों की राय लेना भी उत्तम होता है। इससे वे बड़े प्रसन्न होते है और तत्परता के साथ उनके लिए प्रयत्न भी करते हैं क्योंकि उन बातों में उनका भी एक अधिकारमय स्थान होता है। बच्चों को पुकार कर, दूर से चिल्लाकर कोई आदेश न दिये जायें बल्कि नजदीक बुलाकर और अच्छा तो यह हो कि उनके पास पहुँच कर ही उनसे कोई बात कही जाय। इससे बच्चे उसके मूल्य, महत्व को समझेंगे और उसी तत्परता, तन्मयता से उस पर अमल करेंगे।
अनावश्यक रूप से बच्चों को बार-बार टोकना अच्छा नहीं। वैसे बच्चे स्वतः ही किसी काम पर अधिक नहीं टिकते। थोड़े से समय में ही वे उससे विरत हो जाते हैं। टोकने से तो उनकी थोड़ी बहुत एकाग्रता, तन्मयता में विक्षेप पड़ता है। इतना ही नहीं आगे चलकर ऐसे बच्चे किसी भी काम पर एकाग्र एवं तन्मय नहीं हो पाते। अपने सामने आये हुए काम पर भी नहीं जम पाते जिससे जीवन में अनेकों असफलताओं का सामना करना पड़ता है।
बच्चे को किसी खेल आदि से विरत करने के लिए सीधी निषेधात्मक आज्ञा नहीं देनी चाहिए। वरन् उनके साथ लगकर सुझाव एवं प्रस्ताव रूप में अपनी बात रखकर उन्हीं से ऐसा निर्णय कराना उत्तम होता है।
बच्चों को दिए जाने वाले आदेश सरल एवं स्पष्ट भाषा में हों, साथ ही उनके साथ अपना प्रभावशाली वजन भी हो। किसी काम को करने की आज्ञा देने से पूर्व बच्चे से यह पूछना कि “ तुम अमुक काम करोगे” तो उससे “ना” में ही उत्तर मिलेगा और किसी की बात के लिए एक बार ना कह देने पर बच्चों से वह काम कराना और भी कठिन हो जाता है। बच्चों को आकर्षक एवं प्रभावशाली ढंग से आज्ञा देनी चाहिए “ हमारा मुन्ना अमुक काम करेगा फिर वहाँ जायगा, इसके बाद यह लायेगा” आदि। इस रूप में आदेश आकर्षक, रचनात्मक प्रभावशाली वजनदार होते हैं और वह काम बच्चों के लिए कौतूहल, मनोरंजन के रूप में भी बदल जाता है।
बहुत से माँ बाप बच्चों के लिए नियमित व्यवस्थित जीवन बिताने के लिए बड़े ही सख्त और रूखे नियम बना देते हैं किन्तु इससे अनुकूल परिणाम प्राप्त नहीं होते। बहुत से बच्चे उन नियमों के अनुसार चलेंगे नहीं या जो थोड़ा बहुत नियम पालन करेंगे उनकी मौलिकता, आत्मविश्वास की शक्ति कुन्द हो जायेगी। अतः बच्चों पर नियम लादे नहीं जाने चाहिए वरन् स्वयं उन्हीं की राय को महत्व, प्रोत्साहन देकर बच्चों के खाने पीने, सोने पढ़ने, खेलने आदि का समय निश्चित कर देना चाहिए। यदि किन्हीं नियमों के कारण बच्चों को किसी तरह की कठिनाई हो तो उन्हें सरल भी बना देना चाहिए। बच्चों को नियमानुवर्ती बनाने से पूर्व स्वयं माँ बाप को भी नियमित और बँधा हुआ जीवन बिताना आवश्यक है। जो माँ बाप स्वयं अनियमित जीवन बिताकर बच्चों को नियमानुवर्ती बनाना चाहते हैं वे भूल करते हैं। यदि बच्चे अभ्यासवश नियम पालन में कोई गड़बड़ी अथवा भूल करें तो उन्हें एक दम धमकाना नहीं चाहिए। बहुत बार एक सी भूल करने पर कह देना चाहिए।
केवल नियमादि बनाकर बच्चों पर कर्तव्य एवं जिम्मेदारी डालने से काम नहीं चलता। समय-समय पर बच्चों के साथ विचार विमर्श करना, उनकी बात पूछना, उनके कार्यक्रम जीवनक्रम आदि के बारे में दिलचस्पी प्रकट करना, अपनी सूझबूझ से बच्चों को नवीन तथ्यों का ज्ञान देना भी आवश्यक है।
कई माँ बाप बच्चों को नंगा ही घूमने फिरने देते हैं किन्तु यह आदत बुरी हैं। छोटे-छोटे बच्चे जब नंगे रहते हैं तो उनमें समय से पूर्व ही यौन-भावना जागृत हो उठती है। माता-पिता को अपने अबोध, छोटे से बच्चों के समक्ष भी परस्पर प्रेम प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। इससे बच्चों के अन्तर मन पर सूक्ष्म प्रभाव पड़ता है। समझदार, बोध रखने वाले बालक को तो यह सब देखकर आश्चर्य करते हैं। उनके लिए एक कौतूहल की बात हो जाती है और फिर बच्चे भी परस्पर वैसा ही करने का प्रयास करते हैं। बच्चों में फैलती हुई अपराध प्रवृत्ति, यौन भावना- जन्य अपराधों के मूल में माँ-बापों की यह भूल भी एक मुख्य कारण है। असमय में ही उत्पन्न यौन भावना को बच्चे गलत तरीकों से व्यक्त करते है। बच्चों के समझदार हो जाने पर तो उन्हें हमेशा अलग कमरे में, अलग-अलग बिस्तरों पर सुलाना चाहिए। अभिभावकों को इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि अपनी किसी भी चारित्रिक कमजोरी को भूल कर भी बच्चों के समझ प्रकट नहीं होने दिया जाय।
बच्चों में सद्गुणों, उत्कृष्ट आदतों की प्रतिष्ठापना के लिए स्वयं अभिभावकों को अपने आप में ही उनकी प्रतिष्ठापना करना आवश्यक है। अपना सुधार किए बिना बच्चों को सुधारने का प्रयत्न विडम्बना मात्र है। स्वयं बीड़ी पीते हुए बच्चों को धूम्रपान न करने का उपदेश देना क्या भूल नहीं है ? बच्चों से जिन गुणों की आशा की जाय उन्हीं से सम्बन्धित वातावरण आस-पास होना चाहिए। सच बोलना सिखाने के लिए घर का वातावरण भी सचाई से भरा हुआ होना चाहिए। दवा पिलाने, अस्पताल में फोड़ा चिरवाने अथवा इंजेक्शन लगाने के लिए बच्चों को बहाना करके या झूँठ बोल कर ले जाना, बच्चों को धोखा देना, उनमें वैसी ही आदतें पैदा करना है। बच्चे फिर उन्हीं बातों का अवलम्बन लेते हैं। उन्हें फिर माँ-बापों की आदर्श भरी बातों में भी संदेह होने लगता है और उन्हें झूँठ मानने लगते है।
चोरी की आदत से बचने के लिए बच्चों को जब से अपने-पराये का ज्ञान होने लगे तभी तो यह सिखला देना चाहिए कि “बिना माँगे किसी की वस्तु लेना चोरी है।” दूसरों की वस्तु बिना माँगे लेना एक बुराई और अपराध है। चोरी की आदत पड़ जाना बच्चों के लिए घातक है। चोरी से दरअसल बच्चे की मनचाही इच्छायें शीघ्र ही पूरी हो जाती हैं। माँ-बाप की सतर्कता से बच्चों में चोरी की आदत घर नहीं करती।
छोटी उम्र से ही बच्चों में कोमल भावनाओं का विकास करना चाहिए। बच्चों में सह भावना, सब के हित का ध्यान रखने की वृत्ति पैदा करना माँ-बाप के ऊपर ही है। जो माँ-बाप दूसरों तथा अपने बच्चों के बीच व्यवहार करते समय कोई भेद-भाव नहीं रखते और न किसी तरह का दुराव, छिपाव ही रखते हैं वे बच्चे अपना ही नहीं सब के अस्तित्व का एक साथ ध्यान रखते हैं। उनमें भेदभाव करने की भावना नहीं रहती।
बच्चों में अनुकरण करने की महत्वपूर्ण प्रवृत्ति होती है। माँ-बाप, अभिभावकों का जीवन उसके लिए निकटतम और आत्मभाव से भरा हुआ प्रतीक, आदर्शों का केन्द्र होता है। इस तरह माँ-बाप के ऊपर ही बच्चों के निर्माण का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है। माँ-बाप अपने इस उत्तरदायित्व को समझें और प्रयत्न करें तो इन खिलते हुए कुसुमों में सद्गुण, सद्भावों, अच्छी आदतें, सदाचार, शील पुरुषार्थ, साहस आदि का सौंदर्य और सुगन्धि भर जाय और सामान्य से बच्चों में ही अनेकों महापुरुष निकल सकते हैं। प्रकृति शरीर देती है किन्तु मनुष्य उसे व्यक्तित्व, मनुष्यता देता है।
यूँ तो जीने के लिए लोग जिया करते हैं,
लाभ जीवन का नहीं फिर भी लिया करते हैं,
मृत्यु से पहले भी मरते हैं हजारों, लेकिन-
जिन्दगी उनकी है जो मरके जिया करते हैं।
-सोम तिवारी
मैं चलता, मेरे साथ-साथ साहस चलता है,
मैं चलता, मेरे साथ हृदय का रस चलता है,
मैं चलता, मेरे साथ निराशा-आशा चलती
मैं चलता, मेरे साथ सृजन की भाषा चलती
मैं चलता, मेरे साथ ग्रहण, सर्जन चलता है
मैं चलता, मेरे साथ नया जीवन चलता है।
-उदय शंकर भट्ट
शक्ति हीन को हो पाती है लक्ष्मी प्राप्त नहीं?
अकर्मण्य जीवन क्या मानव के हित शाप नहीं?
सतत् परिश्रम करने वाले का सहचर ईश्वर!
चले चलो, बस चलो निरन्तर जीवन के पथ पर!
चलना ही देता चलने वाले के पद में बल,
आत्मा पाती तुष्टि कर्म को मिल जाता है फल,
पुरुषार्थी का पाप स्वेद बन बह जाता सत्वर!
चले चलो, बस चलो निरन्तर जीवन के पथ पर!
- विद्यावती मिश्र
जो साथ न मेरा दे पाये उनसे कब सूनी हुई डगर।
मैं भी न चलूँ यदि तोभी क्या राही मर लेकिन राह अमर।
इस पथ पर वे ही चलते हैं जो चलने का पा गए स्वाद।
जिस जिससे पथ पर स्नेह मिला, उस -उस राही को धन्यवाद॥
-शिव मंगलसिंह ‘सुमन’
मैं मुसाफिर हूँ कि जिसने है कभी रुकना न जाना,
है कभी सीखा न जिसने मुश्किलों में सिर झुकाना,
क्या मुझे मंजिल मिलेगी या नहीं- इसकी न चिन्ता-
क्योंकि मंजिल है डगर पर सिर्फ चलने का बहाना!
- नीरज
जो डर जाते बाधाओं से उनके पथ में-
ही फूल शूल बन कर चुभ जाया करते हैं।
पर जो रख जान हथेली पर आगे बढ़ते -
पथ दे उनकी पर्वत झुक जाया करते हैं!!
- रामस्वरूप खरे
एक तुम्हारा ही हो जाऊँ यह कैसा प्रतिबन्ध तुम्हारा,
जिसका जहाँ हुआ मैं अब तक वही हो गया रूप तुम्हारा।
एक तुम्हीं बनते अनेक जब, मैं एकाकी का एकाकी-
एक अनेकों पर बलि जाऊँ तो कैसा उपहास तुम्हारा।
- यमुनेश श्री वास्तव
ध्येय नया, ध्यान नया धर्म चाहिए,
गेय नया, गान नया मर्म चाहिए,
पेय नया, पान नया श्रेय चाहिए,
रीति नई नीति नई, नया कर्म चाहिए।
भावना नई, नये विचार चाहिए।
चेतना नवीन, नया ज्वार चाहिए॥
- विनोद रस्तोगी
जिसने मरना सीख लिया है जीने का अधिकार उसी को।
जो काँटों के पथ पर आया, फूलों का उपहार उसी को॥
जिसने गीत सजाये अपने,
तलवारों के झन-झन स्वर पर
जिसने विप्लव राग अलापे
रिमझिम गोली के वर्षण पर
जा बलिदानों का प्रेमी है, है जगती का प्यार उसी को। 1।
हँस - हँस कर इक मस्ती लेकर
जिसने सीखा है बलि होना,
अपनी पीड़ा पर मुस्काना
औरों के कष्टों पर रोना,
जिसने सहना सीख लिया है संकट है त्योहार उसी को । 2।
दुर्गमता लखा बीहड़ पथ की
जो न कभी भी रुका कही पर,
अनगिनती आघात सहे पर
जो न कभी भी झुका कहीं पर,
झुका रहा है मस्तक अपना, यह सारा संसार उसी को। 3।
जिसने मरना..................
-’अज्ञात’
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना
(गायत्री महाविद्या की सामान्य जानकारी तथा उपासना विधि अब तक अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित होती रही है। इस मांग पर श्रद्धा रखने वाले जिज्ञासुओं को अधिक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण देने के लिए उच्चस्तरीय गायत्री साधना का उल्लेख इस स्तंभ के अंतर्गत भविष्य में नियमित रूप से किया जाता रहेगा।)
गायत्री की उच्चस्तरीय उपासना, पंचकोशी साधना के नाम से विख्यात है। साधारण प्राथमिक उपासना में एक मुखी और द्विभुजी गायत्री का ध्यान किया जाता है। सद्बुद्धि एक मुख है और जप, ध्यान-नाम रूप-उसकी दो भुजाएँ हैं। ज्ञान की प्रतीक, सद्भावनाओं की प्रेरक श्रद्धामयी गायत्री को हिन्दू-धर्म के प्रत्येक सदस्य का एकमात्र उपासना माध्यम माना गया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के सभी आस्थावान धर्मज्ञ गायत्री उपासना के माध्यम से साधना करते हुए जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए-आत्मोत्कर्ष के लिए-प्रयत्नशील रहे है।
गायत्री महामंत्र के 24 अक्षरों द्वारा परब्रह्म परमात्मा के सद्गुणों का ध्यान करते हुए उससे सद्बुद्धि की याचना की गई है। इसका तात्पर्य यह है कि हम परमात्मा के सद्गुणों को अपने जीवन में उतारें और अपने मस्तिष्क में सद्विचार एवं हृदय में सद्भावनाओं को अवतीर्ण करें। गायत्री उपासना का वैज्ञानिक आधार यह है कि इस शब्द-समूह का जप, ध्यान, चिन्तन, मनन करते रहने से अन्तःकरण में सत् तत्व की अभिवृद्धि होती हैं। इसलिये अन्तःकरण में आवश्यक सत्प्रेरणाएँ भी उद्भूत होने लगती हैं।
जप के साथ ध्यान करने से एकाग्रता बढ़ती है और तन्मयता की परिपुष्टि होती है। मन का निग्रह भी होता है और इस निग्रह के फल-स्वरूप आत्मबल का विकास सम्भव होता है। इस विकास से अनेक लौकिक और पारलौकिक सुख सुविधाएँ प्राप्त होने के अवसर मिलते हैं और आन्तरिक शक्ति सामर्थ्यों की अभिवृद्धि होने लगती है। इन्हीं को ऋषि-सिद्धि के नाम से भी पुकारते हैं। गायत्री उपासना मनुष्य की लौकिक और पारलौकिक प्रगति में निश्चय ही बहुत सहायक सिद्ध होती है। सर्व साधारण के लिए जिस गायत्री उपासना की आवश्यकता है, उसका उल्लेख गायत्री महा विज्ञान ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में किया जा चुका है। जप और ध्यान ही उसके प्रमुख आधार हैं। विशेष शक्ति प्राप्ति के लिए अनुष्ठानों का आयोजन किया जाता हैं। किन्हीं विशेष अभाव या कष्टों की निवृत्ति के लिए बीज मंत्र समेत जप के विशेष विधान है। ऐसे विशेष आयोजनों के अन्त में हवन भी करना पड़ता है।
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना एक प्रकार का योगाभ्यास है। घर-गृहस्थी में रहते हुए, साधारण काम काज करते हुए, योगी और तपस्वियों की तरह आन्तरिक स्तर को उच्च भूमिका में विकसित करने के लिए श्रद्धावान साधक इस मार्ग को अपनाते हैं। इस विशेष उपासना क्रम को “पंचकोशी गायत्री साधना” इसलिए कहते हैं कि इसमें आत्मा के ऊपर वस्त्रों की तरह चढ़े हुए पाँच कोशों का अनावरण करना पड़ता है। प्रत्येक कोश की अपनी-अपनी विशेषता है उसके अनावरण एवं जागरण से आत्म-शक्ति की विशिष्ट अभिवृद्धि होती है और साधक साधारण मनुष्य न रह कर अनेक दृष्टियों से असाधारण बनने लगता है।
जिस प्रकार प्याज में एक के भीतर एक पर्त होते हैं। केले के तने में एक के ऊपर एक आवरण रहता है इसी प्रकार आत्मा के ऊपर भी (1) अन्न मय कोश, (2) मनोमय कोश, (3) प्राणमय कोश, (4) विज्ञानमय कोश, (5) आनन्दमय कोश-चढ़े हुए हैं। इनमें से एक-एक चक्र माना गया है। अन्नमय कोश का प्रतिनिधि आज्ञा-चक्र भू-मध्य भाग में उपस्थित है। मनोमय कोश का अधिष्ठाता शून्य-चक्र मस्तक के मध्य में, प्राणमय कोश का प्रतीक विशुद्ध-चक्र कण्ठ में, विज्ञानमय कोश का प्रतीक अनाहत-चक्र हृदय में और आनन्दमय कोश का प्रतिनिधि स्वाधिष्ठान-चक्र पेडू में रहता है। पाँच कोशों के अनावरण की साधना इन पाँच चक्रों को जागृत करती है और फिर योगाभ्यास का अन्तिम लक्ष्य “कुण्डलिनी जागरण” के लिए नितान्त सरल हो जाता है।
मल द्वारा और मूत्र द्वार के मध्य में जो थोड़ा-सा खाली स्थान रहता हैं जिसमें कपड़ों को मिला कर बनाई हुई सीवन की तरह जोड़ जैसा प्रतीत होता हैं, उसके मध्य भाग में मूलाधार-चक्र का निवास है। छठवाँ चक्र यही है। एक तिकोने कर्म परमाणु में इसी स्थान सर्पिणी की तरह साड़े तीन घेरे लगाती हुई कुण्डलिनी नामक विद्युत-शक्ति निवास करती है। जान वुडरफ नामक विद्वान ने इसका “सर्पेण्टल पावर” नाम से उल्लेख किया है। इस शक्ति के जागरण से आत्मिक क्षेत्र में पड़ी हुई अगणित प्रसुप्त शक्तियाँ भी जागृत हो उठती हैं। और साधक उन सभी विशेषताओं से सम्पन्न बन जाता है जो योगाभ्यासियों को पूर्णावस्था में उपलब्ध होती हैं।
पंचकोशी साधना करने से पाँच चक्र जागृत होते हैं। इसके अनन्तर छठवाँ चक्र कुण्डलिनी चक्र ही होता है। यह लक्ष्य का अन्तिम स्थल है। पाँच कोशों के, पाँच द्वार के खुल जाने के बाद यह छठवाँ लक्ष्य स्थान सामने आ उपस्थित होता है और फिर उसे साधारण प्राण प्रक्रिया से ही जागृत किया जा सकता है। कभी-कभी कोई कोई तेजस्वी सिद्ध पुरुष अपनी शक्तिपात करके किन्हीं साधकों की कुण्डलिनी जागृत कर देते हैं, पर वे सब होते वे ही हैं जिन्होंने इस जन्म में अथवा पूर्व जन्म में पाँचों को जागृत कर लिया होता है। नये साधक की कुण्डलिनी कोई तेजस्वी सिद्ध पुरुष भी अपने शक्तिपात से जागृत नहीं कर सकता। इसके लिए पूर्व पुरुषार्थ अपने को ही करना पड़ता है। पाँचकोशों की अनावरण उपासना प्रायः प्रत्येक आत्म-लक्ष्य की प्राप्ति करने के इच्छुक को करनी पड़ती है।
षटचक्रों के जागरण की अन्य विधियाँ भी हैं। हठ-योग अथवा तंत्र-योग के माध्यम से भी वैसा हो सकता है। पर उसमें कठिनाइयाँ अधिक हैं। इन मार्गों पर चलने वाले को विरक्त, ब्रह्मचारी, हठयोगी या अघोरी, कापालिक ऐसी गति-विधियों अपनानी पड़ती हैं और जीवन-क्रम उसी ढाँचे में ढालना पड़ता है। गायत्री उपासना के माध्यम से पंचकोशों का जागरण और चक्रों का बेधन सब से सरल है। उसे साधारण स्थिति का गृहस्थ, कामकाजी आदमी थोड़े से सरल नियमों का पालन करते हुए, एक-दो घन्टे रोज साधना के लिए निकालते हुए प्रायः दस वर्षों में पूरा कर लेता है जब कि हठयोग या तंत्र-योग के मार्ग पर चलते हुए सारा जीवन लगाना पड़ता है और कोई थोड़ी-सी भी असावधानी होने पर प्राणघातक परिणाम भी निकल सकता है पर गायत्री उपासना के माध्यम से पंचकोशी साधना का मार्ग सर्वथा निर्दोष है। इसमें लगातार भूलें होते रहने पर भी खतरे की रत्ती भर संभावना नहीं है। हानि इतनी ही हो सकती है कि अनियमितता करने वाले को लाभ कम मिले।
गायत्री की उपलब्ध प्रतिमाओं में एक वे मिलती है, जिनमें एक मुख दो भुजाओं का चित्रण है। दूसरी वे मिलती हैं जिनमें पाँच मुख और दस भुजाएं है। पाँच मुख अन्नमय, मनोमय, प्राणमय, विज्ञानमय, आनंदमय कोश ही हैं। इनके खुलते ही गायत्री की उच्च स्तरीय अनुभूतियाँ उपलब्ध होती हैं। दस भुजाओं, दसों इन्द्रियों के नियंत्रण द्वारा प्राप्त होने वाली प्रचण्ड-शक्ति का संकेत करती हैं। उपासना का पथ इस संयम से ही प्रशस्त होता है। पंचकोशी उपासना का मर्म संकेत एवं महत्व पंचमुखी गायत्री प्रतिमाओं में प्रदर्शित किया गया है। यह स्पष्ट है कि इस मार्ग में जिन्हें कुछ विशेष अनुभूतियाँ प्राप्त करनी होती है। यों साधारण गायत्री जप, ध्यान तो सब के लिए उपयोगी एवं आवश्यक है ही।
गत दो वर्षों से अखण्ड-ज्योति के अक्टूबर अंक में एक वर्ष का पंचकोशी गायत्री उपासना क्रम प्रकाशित किया जा रहा है। दस वर्ष में यह पाठ्यक्रम पूरा किया जाना है। दो वर्ष बीत गये। तीसरा वर्ष यह आरम्भ होता है। इस वर्ष का पाठ्यक्रम सितम्बर, अक्टूबर, नवम्बर के तीन अंकों में दिया जा रहा है। एक ही अंक एक विषय का बन जाने से उन लोगों को असुविधा रहती थी जिन्हें अन्य विषयों में विशेष अभिरुचि रहती है। इसलिए तीन अंकों में इस वर्ष का पंचकोशी पाठ्यक्रम दिया जा रहा है। आगे हर अंक में गायत्री विद्या का उच्च स्तरीय प्रशिक्षण देने वाले लेख रहा करें, ऐसी व्यवस्था की गई है।
प्रारम्भिक उपासकों को गायत्री जप और ध्यान के माध्यम से अपना भूमि-शोधन क्रम धैर्य-पूर्वक जारी रखना चाहिए। जमीन को जब तक ठीक प्रकार जोता न जायेगा तब तक उसमें अच्छी फसल उत्पन्न न हो सकेगी। इसलिये जोतने की क्रिया का अपना महत्व है। एक मुखी आरम्भिक उपासना का अपने स्थान पर काफी महत्व है परन्तु लक्ष्य तक पहुँचने के लिए वहीं तक सीमित रह जाना ठीक नहीं। आगे न बढ़ने से प्रगति रुकी ही रहेगी। सदा खेत जोतते रहने से भी क्या बनेगा? (1) बीज बोना, (2) सींचना, (3) नराना, (4) रखवाली करना, (5) काट मीड़ कर दाने निकालना - यह पाँच क्रियाएँ भी चतुर किसान को करनी ही होती हैं। इसके बिना अन्न उत्पादन का लक्ष्य पूरा नहीं होता। पंचकोशों की अनावरण प्रक्रिया किसान के उपरोक्त पाँच कर्मों के ही समान हैं जो साधक श्रद्धापूर्वक इन्हें अपनाते हुए आगे बढ़ते हैं वे गायत्री उपासना के महान महात्म्य का, जैसा शास्त्रों में वर्णन है, वैसा ही लाभ प्राप्त करते हैं।
अन्न से ही मन बनता है जैसा अन्न खाया जाता है वैसा ही मन बन जाता है। अध्यात्म का सारा क्रिया कलाप मन की स्थिति पर ही अवलम्बित रहता है। मन भी तमोगुण, रजोगुण में डूबा हुआ है, उस पर तृष्णा और वासना के मल-आवरण छाये हुए हों तो बाहरी उपायों से सुधार हो सकना कठिन है, हम देखते हैं कि रोज कथा-वार्ता कहने-सुनने वाले और धार्मिक कर्मकाण्डों में देर तक लगे रहने वाले व्यक्ति भी दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को चरितार्थ करते रहते हैं। यह आश्चर्य की ही बात है कि जिसे धर्म का पर्याप्त ज्ञान हैं, जो दूसरों को भी का उपदेश देता है वह अपने व्यावहारिक जीवन में अधर्म का आचरण करता रहता है। विचार करने पर उसका एक ही कारण प्रतीत होता है कि व्यक्ति का अन्तःकरण, मानसिक स्तर ही वह मर्म स्थल है जहाँ से प्रेरणायें और प्रवृत्तियाँ उसी दिशा में अग्रसर होंगी जैसी कि उसकी मनोभूमि बनी हुई होगी।
मनोभूमि के सुधारों में स्वाध्याय और सत्संग बहुत सहायक होता है, उपासना तथा दूसरे धार्मिक कर्मकाण्डों का भी बहुत कुछ असर होता है पर सबसे अधिक प्रभाव अन्न का होता है। जिस प्रकार का, जिस स्तर का आहार किया जाता है उसी तरह का मन बनता है। वस्तु जैसी कुछ बनी है उसका प्रधान गुण तो वही रहेगा। सुधार और संस्कार से उसकी प्रगति में कुछ न कुछ अन्तर तो आता है पर पूरा परिवर्तन नहीं होता। आज साधना मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति आहार पर उतना ध्यान नहीं देते जितना कि देना चाहिए। फलस्वरूप तमोगुणी और रजोगुणी प्रकृति की वस्तुएँ खाते रहने पर मन का मूल स्वभाव भी वैसा ही बन जाता है। स्वाध्याय-सत्संग में उस पर नियन्त्रण तो रहता है, पर जब कभी भीतर से कामना एवं वासना का प्रबल वेग उठता है तो उस बाह्य नियंत्रण को तोड़-फोड़ कर मनुष्य को दुष्कर्म में प्रवृत्त कर देता है। दुष्प्रवृत्तियाँ रुक नहीं पाती।
इस कठिनाई का एकमात्र हल यह है कि श्रेय पथ का पथिक अपने आहार पर सबसे अधिक ध्यान दे। पंचकोशी गायत्री उपासना का आरम्भ अन्नमय कोश की शुद्धि से ही होता है। नींव पक्की न हुई तो आगे ऊँची दीवार उठाने और उसे स्थायी बनाने का कार्यक्रम सफल न हो सकेगा ? जो व्यक्ति जिह्वा के गुलाम हैं, स्वादेन्द्रिय पर जो नियंत्रण नहीं कर सकते, शुद्ध आहार की प्राप्ति में जो कष्ट और असुविधा उठानी पड़ती है उसे सहन कर सकना जिनके वश की बात न हो, उन्हें योगाभ्यास, आत्मोत्कर्ष लक्ष्य की पूर्ति, स्वर्ग-मुक्ति जैसे स्वप्न नहीं ही देखने चाहिए। अध्यात्म शूरवीरों का मार्ग है। साधना को संग्राम कहा गया है। इसमें षडरिपुओं के चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए घनघोर युद्ध करना पड़ता है। गीता में कृष्ण ने धनुर्धर अर्जुन को जिस महाभारत में प्रवृत्त किया है वह वस्तुतः आन्तरिक शत्रुओं से लड़ने का ही प्रशिक्षण है। अपनी दुर्बलता से लड़ पड़ने का प्रबल पुरुषार्थ किये बिना जीवन मुक्ति की विजय वैजयन्ती धारण कर सकना किसी के लिए भी संभव नहीं होता।
गायत्री उपासना की उच्चस्तरीय साधना में प्रवेश करने वाले योद्धा को सर्वप्रथम शिक्षण स्वादेन्द्रिय से लड़ने और आहार शुद्धि की सुव्यवस्था बनाने का ही है उसकी उपेक्षा करने से आगे का मार्ग अवरुद्ध ही पड़ा रहेगा, यह बात हर उच्चस्तरीय साधक को कान खोलकर सुन लेनी चाहिए और सुन समझकर गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि आहार को सात्विक बनाये बिना किसी भी प्रकार काम चलने वाला नहीं है। जो साधक मिष्ठान, पकवान और माल-मलाई विपुल परिमाण में चरते रहते हैं उन्हें वासनाएँ ऐसे ही पथ पर भ्रष्ट कर देती हैं जैसे मुर्गे की गर्दन को बिल्ली मरोड़ कर रख देती है। ऐसे साधकों को पग-पग पर आलस, प्रमाद सताता है और वासना तृष्णा की मृग मरीचिका उन्हें निरन्तर भ्रमाती, भटकाती रहती हैं।
हमारा अन्नमय कोश शुद्ध हो सके इसके लिए गत दो वर्षों में हमने अस्वाद-व्रत और उपवास का आरंभ करने के लिए साधकों को भली प्रकार समझाया है। बिना नमक और बिना शक्कर का अलौना फीका भोजन स्वास्थ्य की दृष्टि तो से हितकर है ही मन, को सतोगुणी बनाने में भी बहुत सहायक होता है। जो स्वाद पर काबू कर लेगा वही ब्रह्मचर्य भी पालन कर सकेगा, जिसकी जीभ चटोरी है उसके लिए काम वासना पर काबू पा सकना कभी संभव न होगा। इसलिए गत दो वर्षों से हम उच्च श्रेणी के साधकों को बराबर बताते रहे हैं कि उन्हें सप्ताह में एक दिन रविवार को या दो दिन रविवार और गुरुवार को अस्वाद व्रत करना चाहिए। उस दिन बिना नमक और बिना शक्कर का अलौना भोजन किया जाय। जिस दिन ऐसा आहार लिया जायेगा उस दिन मन की शक्ति बहुत कुछ बढ़ी रहेगी और अन्तःकरण में सात्विक सत्प्रवृत्तियों की ओर ही उत्साह उठता रहेगा। इस बात की परीक्षा करके कोई भी व्यक्ति परिणाम को प्रत्यक्ष देख सकता है।
गत दो वर्षों में अन्नमय कोश के साधकों को यह भी बताया गया है कि भोजन में वस्तुओं की संख्या कम से कम हो। एक बार में एक साथ अनेक प्रकार के, अनेक स्वाद और अनेक प्रकृति के भोजनों का खाया जाना न शरीर के लिए हितकर है और न अन्तःकरण की स्वस्थता को स्थिर रहने देता है। इसलिए रोटी के साथ एक या अधिक से अधिक दो वस्तुएं लेनी चाहिए। थाली में कटोरियों की संख्या का बढ़ाना साधना में प्रत्यक्ष विघ्न है।
हमें आशा है कि जो लोग पंचकोशी साधना में प्रवृत्त हैं वे इन दोनों नियमों को आचरण में ला रहे होंगे। जिनने इसमें ढील रखी हो उन्हें अब इन नियमों पर अधिक सावधानी और दृढ़ता के साथ आचरण करना आरंभ कर देना चाहिए। व्रत को पालन करने में ही कल्याण है। कभी करना कभी न करना यह शिथिलता संकल्पशक्ति को दुर्बल बनाती है और साहस घटता है। अतएव उचित यही है कि जो कुछ करना हो उसके संबंध में देर तक विचार किया जाय और जब भली प्रकार सोच समझ कर कोई निश्चय कर लिया जाय तो फिर दृढ़तापूर्वक उसे निभाया जाय। अस्वाद व्रत सप्ताह में दो दिन न बन पड़े तो भले ही एक दिन रखा जाय। रविवार असुविधाजनक पड़ता हो तो भले ही कोई दूसरा दिन रख लिया जाय, पर जो कुछ निश्चय किया जाय उस पर दृढ़ता से आरुढ़ रहा जाय, छोटे-मोटे बहाने मिलते ही अपने व्रत को तोड़ देना उचित नहीं। आस्थावान साधकों के लिए यह अशोभनीय है।
इस तीसरे वर्ष में आहार शुद्धि के लिए यह नया विधान आरंभ करना है कि भोजन दो बार ही लिया जाय। बार-बार खाते रहने और बकरी की तरह दिन भर मुँह चलाते रहने की आदत स्वास्थ्य को तो चौपट करने वाली है ही, जिह्वा की लोलुपता को भी भड़काती है और मन को असंयमी बनाती है। जो कुछ खाना हो दिन में दो बार ही खाया जाय। प्रातः जलपान में दूध, छाछ, नींबू, शहद का शरबत शाक का रसा जैसी पतली चीज ही ली जाय। भारी नाश्ता केवल कठोर श्रम करने वाले श्रमिकों के लिए उपयुक्त हो सकता है। तीसरे पहर नींबू का शरबत जैसी कोई चीज ली जा सकती है, जिन्हें चाय की आदत पड़ी हो वे गेहूँ का चोकर, अदरक, तुलसी के पत्ते उबालकर उसमें गुड़ एवं दूध डालकर देशी चाय बना लिया करें। यह बिना हानि का चाय का स्थानापन्न पेय है रात को सोते समय दूध लेने की अपेक्षा शाम को भोजन में पानी के स्थान पर दूध लेवे तो अच्छा है। बार-बार भोजन करने की आदत को घटाने के लिए इस वर्ष पंचकोशी साधना के साधकों को विशेष व्रत लेना चाहिए।
अन्नमय कोश के शोधन का दूसरा व्रत इस वर्ष यह लेना चाहिए कि सप्ताह में एक दिन अथवा कम से कम एक समय उपवास अवश्य किया जाय। अब तक अस्वाद व्रत ही पर्याप्त माना जाता था, उपवास अनिवार्य नहीं था। पर अब इस वर्ष से उच्चस्तरीय साधकों को सप्ताह में एक दिन या एक समय उपवास भी करना चाहिए। जिन्हें पूरे दिन उपवास करना हो वे फलाहार, शाक का रस, दूध, छाछ जैसी हलकी वस्तुएं लें। जिन्हें कठिन शारीरिक श्रम करना पड़ता है या शरीर से बहुत दुर्बल हैं उनके लिए एक समय का उपवास भी पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त दूध आदि आवश्यकतानुसार लिया जा सकता है। अस्वाद व्रत का अलौना आहार भी चल सकता है। जिसके लिए जैसी सुविधा हो उसे अपनी स्थिति के अनुसार निर्णय कर लेना चाहिए और उस पर दृढ़तापूर्वक आरुढ़ रहना चाहिए।
उपवास में बचाया हुआ अन्न या उसका मूल्य हर एक को ज्ञान-यज्ञ के लिए अपने पास सुरक्षित रखना चाहिए। पेट का हिस्सा काट कर आत्मा को भोजन देने में ही उसका उपयोग हो। घर में गायत्री ज्ञान मंदिर की स्थापना होनी चाहिए। यह छोटा-सा घरेलू पुस्तकालय निरन्तर बढ़ता रहे इसके लिए उपवास से बचाये हुए अन्न का मूल्य खर्च किया जाता रहे। नैतिक आध्यात्मिक एवं जीवन को ऊँचा उठाने वाले साहित्य का घरेलू पुस्तकालय एक छोटे गायत्री मंदिर के ही समान है। घर के प्रत्येक व्यक्ति के स्वाध्याय का अवसर मिलने लगे तो यह उपवास का क्रम साधक के लिए ही नहीं उसके सारे परिवार के लिए श्रेयष्कर सिद्ध हो सकता है।
इस तीसरे वर्ष में पंचकोशी साधना क्रम में (1) दो समय से अधिक बार भोजन न करना (2) साप्ताहिक उपवास और उसके बचे हुए अन्न से घरेलू ज्ञान मंदिर पुस्तकालय की अभिवृद्धि करना यह दो नये विधान सम्मिलित किये गये हैं। भोजन में वस्तुओं की संख्या का कम रहना और अस्वाद व्रत की पिछली परम्पराएँ तो साथ चलती रहेंगी ही, आहार के सम्बन्ध में अगले वर्षों में अपनी सात्विक कमाई का आहार, पकाने वाले का सात्विक स्वभावयुक्त, संस्कारवान होना आदि बातें बढ़ाई जायेंगी। अभी तो जो बताया गया है उसे ही अभ्यास में लाना और कार्य रूप में परिणत करना पर्याप्त है।
ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में गत वर्ष अपेक्षाकृत अधिक संयम रखने का निर्देश किया गया था उसमें क्रमशः हर वर्ष कुछ कड़ाई बढ़ाते ही चलना चाहिए। गृहस्थ होते हुए भी साधकों को अधिकाधिक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इससे आत्म-बल बढ़ता है, स्वास्थ्य, सुधरता है मानसिक शक्ति एवं बुद्धि में तीव्रता आती है, दीर्घ जीवन सुलभ होता है और सन्तान की संख्या बढ़ने से परिवार का अर्थ-संतुलन बिगड़ने से बच जाता है। पत्नी की सबसे बड़ी सेवा यही हो सकती है कि उसे अधिकाधिक ब्रह्मचर्य से रहने देकर निरोगिता एवं संतान-पालन के असहाय भार से बचने का लाभ प्राप्त करने दिया जाय। इस सुविधा के प्राप्त होने पर ही वह पति तथा परिवार की अधिक सेवा कर सकने में समर्थ हो सकती है।
ब्रह्मचर्य की लम्बी मर्यादाएं पालन करने वाले, असंयम से बचे रहने वाले पति-पत्नी ही सुयोग्य संतान उत्पन्न कर सकते हैं। युग-निर्माण के उपयुक्त नई पीढ़ी को जन्म देने के लिए यह आवश्यक है कि गृहस्थ में भी वासनात्मक संयम का कड़ाई से पालन किया जाय और इन्द्रिय निग्रह की अवधि अधिकाधिक लम्बी बनाई जाती रहे। गायत्री उपासना में संलग्न पति पत्नी-स्वाध्याय और परस्पर विचार विनिमय द्वारा भावनात्मक उत्कर्ष करते रहें। साथ ही परमार्थिक कार्यों में भी आवश्यक अभिरुचि लेते रहें तो उनके शरीरों में वे तत्व उत्पन्न हो सकते हैं जिनके कारण नर रत्नों को जन्म दे सकना संभव होता है। हमारी हार्दिक इच्छा है कि गायत्री परिवार के सद्गृहस्थों के यहाँ उच्च कोटि की आत्माएँ जन्म लें। युग निर्माण के लिए वैसी ही विभूतियों की आवश्यकता भी पड़ेगी। दशरथ-कौशल्या, वसुदेव-देवकी, दुष्यन्त-शकुन्तला की तरह प्रबुद्ध दम्पत्ति ही यह सौभाग्य लाभ कर सकते हैं। पंचकोशी गायत्री उपासना में अन्नमय कोश को अनावरण करने का प्रयत्न करते हुए श्रद्धालु साधक यदि ब्रह्मचर्य को अधिकाधिक महत्व देते रहें और अपने साथ ही पत्नी का आत्मिक स्तर ऊंचा उठाने का प्रयत्न करते रहें तो गायत्री माता के अन्य वरदानों के साथ यह वरदान भी मिल सकता है कि इतिहास में अपना और पिता-माता का नाम अमर करने वाली सुसंतति उन्हें प्राप्त हो।
मनोमय कोश की द्वितीय भूमिका का ऐसा परिशोधन करना आवश्यक है जिससे उसमें रचनात्मक, सद्भावना युक्त प्रगतिशील विचारों के उठने का ही क्रम बना रहे। स्वार्थ-संकीर्णता, छिद्रान्वेषण, निराशा के विघटनात्मक विचार मनुष्य की मनोभूमि को विकृत कर देते हैं और उसमें आध्यात्मिक विकास के बीजाँकुर जम नहीं पाते।
मन के द्वारा ही शरीर का नियंत्रण होता है। यदि मन कुमार्गगामी एवं असंयमी हुआ तो उसका प्रभाव शरीर पर बहुत ही घातक पड़ेगा, स्वास्थ्य नष्ट होगा और अनेकों प्रकट-अप्रकट रोग उठ खड़े होंगे। जिसका मन उद्विग्न रहता है उसका शरीर भी विपन्न स्थिति में ही पड़ा रहेगा। कुकर्म उसी शरीर से बन पड़ते हैं, जिसके मन में पाप-बुद्धि का निवास होता है। आलसी वही शरीर होता है, जिसका मन अवसाद की भावनाओं से ग्रस्त होता है। हमें लौकिक ही नहीं आध्यात्मिक पुरुषार्थ भी शरीर के द्वारा ही करने पड़ते है। यदि शरीर आये दिन गड़बड़ी पैदा करता रहता है तो साधना का क्रम कैसे ठीक चलेगा? शरीर घोड़ा है मन सवार। सवार की इच्छानुसार ही तो घोड़े को चलना पड़ता है। अन्नमय कोश के परिशोधन के लिए मनोनिग्रह की भी नितान्त आवश्यकता मानी गई है।
गायत्री की उच्च स्तरीय पंचकोशी साधना के साधकों को मनोमय कोश की शुद्धि के लिए गत वर्षों में यह बताया गया है कि वे नित्य प्रति स्वाध्याय किया करें। विचारशील लोगों का सत्संग अब सुलभ नहीं रहा। जो निठल्ले लोग चेला मूँड़ने के लिए सत्संग के नाम पर अंट-संट बकते रहते हैं, उसे सुनने से लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। इसलिए जीवन की समस्याओं का व्यावहारिक हल सुझाने वाले सत्साहित्य को श्रद्धा और भावनापूर्वक एकाग्र चित्त से पढ़ना ही आज की स्थिति में सत्संग की आवश्यकता को भी पूरा करता है। संसार के श्रेष्ठ महापुरुष अपने विचार और अनुभव सुनाने के लिए पुस्तकों के माध्यम से हमारे लिये हर घड़ी प्रस्तुत रहते हैं। सत्साहित्य को सत्पुरुषों का मूर्तिमान हृदय एवं मस्तिष्क कहा जा सकता है। उसके साथ यदि हम ठीक तरह संपर्क बना सकें तो स्वाध्याय का प्रतिफल पारस पत्थर जैसा होता है। पारस द्वारा लोहे को सोना बना सकना भले ही कठिन कार्य हो पर स्वाध्याय के माध्यम से निष्कृष्ट मनोभूमि का उत्कृष्ट बन सकना सर्वथा सरल और सम्भव है।
युग-निर्माण-योजना के अधिकृत सत्संकल्प में वे सभी सिद्धान्त और आदर्श बीज रूप से मौजूद हैं जिनके आधार पर आध्यात्मिक मनोभूमि का विकसित होना सम्भव है। इसलिये सब शास्त्रों के निचोड़ स्वरूप सरल हिन्दी भाषा में जो ‘सत्संकल्प’ विनिर्मित किया है वह सितम्बर 62 के अंक में छापा जा चुका है और उसकी आवश्यकता विवेचना भी उस अंक में की जा चुकी है। वह सत्संकल्प साधकों के लिये दैनिक पाठ की आवश्यक वस्तु है। जैसे धार्मिक व्यक्ति किन्हीं गीता रामायण आदि का पाठ करते हैं, उसी श्रद्धा से सत्संकल्प का नित्य पाठ किया जाना चाहिए, क्योंकि धर्म शास्त्रों के समस्त बीज सिद्धान्तों का समावेश उसमें कर दिया गया है। मानसिक शुद्धि और उत्कर्ष के समस्त आधार उस थोड़ी-सी शब्दावली में सूत्र रूप से मौजूद हैं। इतना सरल और सुबोध, संक्षिप्त, और सारगर्भित, शास्त्र-स्वर दूसरा दृष्टिगोचर नहीं होता जितना कि अपना सत्संकल्प। इसलिये गत वर्ष मनोमय कोश के साधकों के लिए यह निर्देश किया गया था कि वे दैनिक स्वाध्याय के अतिरिक्त ‘सत्संकल्प’ का नित्य पाठ किया करें। उसका मनन और चिन्तन किया करें। यह विचार करें कि इन तथ्यों में से हमारे जीवन में कौन-कौन कितनी मात्रा में प्रयुक्त होता है। जो कमी रहती हो उसे कैसे पूरा किया जाय उसका उपाय सोचते रहना चाहिए। मनोभूमि को विधेयात्मक और परिष्कृत बनाने में यह दोनों ही साधन असाधारण रूप से उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
जिनने इन दोनों कार्यक्रमों को गत वर्षों में नियमित बना लिया हो, अपने स्वभाव को इस नियमितता का अभ्यस्त कर लिया हो वे ठीक प्रकार मनोभूमि को उत्कृष्ट बनाने में, मनोमय कोश के परिशोधन में सफल होते हुए आगे बढ़ रहे हैं। जिनने जप मात्र को ही पर्याप्त समझा है और जीवन शोधन ही अन्य आवश्यक प्रक्रियाओं की उपेक्षा की है, उनकी गाड़ी एक प्रकार से रुक ही गई है। इस लिये इस मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक नैष्ठिक साधक के लिये यह अत्यंत आवश्यक है कि इन दोनों साधनों को -स्वाध्याय और सत्संकल्प पाठ को अपने दैनिक जीवन में अनिवार्य रूप से स्थान देना आरम्भ कर दे। जैसे भोजन, मलशोधन और शयन शरीर संतुलन के लिये आवश्यक माना जाता है उसी प्रकार मानसिक प्रगति के लिये इन दोनों साधनाओं को पूरी तत्परता और निष्ठा के साथ कार्यान्वित करते ही रहना चाहिए।
इस तीसरे वर्ष में दो साधन और भी नये बढ़ने हैं। (1) आत्म-निरीक्षण, (2) ज्ञान-विस्तार। प्रत्येक साधक को प्रातःकाल आँख खुलते ही सब से पहले पाँच मिनट गायत्री महामंत्र का मन ही मन जप करना चाहिये और इसके पश्चात् दिन भर का कार्यक्रम निर्धारित करना चाहिये कि कितने बजे क्या काम करना है। दिनचर्या निर्धारित करना समय के सदुपयोग की दृष्टि से आवश्यक है। क्रम-बद्ध काम करने से दूना काम होता है और अव्यवस्थापूर्वक कुछ न कुछ करते रहने से सब काम अधूरे रहते हैं और परिणाम भी बहुत स्वल्प मात्रा में हाथ लगता है। किन्तु निर्धारित प्रोग्राम बना कर दिन भर उसी के अनुसार चलते रहा जाय तो समय का आशाजनक सदुपयोग होता है और सफलता की ओर तेजी से बढ़ते चलने में भारी सहायता मिलती है।
हमें समय विभाजन तक ही सीमित नहीं रहना है, अपितु यह भी ध्यान रखना है कि उच्च भावनाओं और आदर्शों को कार्यान्वित करने की सुविधा भी हमारे दैनिक कार्यक्रमों में भरी रहे। साधारण कामकाज करते हुये भी उनके साथ उच्च भावनाओं को भी जोड़े रखें जिससे काम, साधारण काम मात्र न रह कर कर्मयोग जैसे बन जाय। अभ्यास करने से यह पूर्णतया सम्भव है। काम को बेगार भोगने, भार ढोने, विवशता अनुभव करने और झलाने के साथ यदि किया जायेगा तो वह थकान उत्पन्न करेगा और मन की खीज को भी बढ़ावेगा। पर यदि उसे ईश्वर पूजा, धर्म कर्तव्य का पालन एवं लोक-सेवा की मान्यता के साथ, हँसते, प्रसन्न होते पूरी ईमानदारी और दिलचस्पी के साथ किया जायेगा तो वही साधारण-सा काम हमारे लिये पुण्य और योगाभ्यास जैसा आध्यात्मिक सत्परिणाम उत्पन्न करेगा।
प्रातःकाल शैया-त्याग से पूर्व हमें मानसिक जप और ध्यान के अनन्तर दिन भर का ऐसा ही कार्यक्रम बनाना चाहिये। समय-विभाजन के साथ-साथ यह भी विचारना चाहिये कि उन कार्यों को करते हुये हम क्या बुद्धि, क्या भावना, क्या आकांक्षा और क्या मान्यता रखेंगे? उच्च भावनाओं के साथ यदि छोटा-सा साधारण काम किया जाय तो वह यज्ञ रूप बन जाता है। शास्त्रकारों ने-आध्यात्मिक मनीषियों ने पग-पग पर यही प्रतिपादित किया है कि हमें अपने दैनिक कार्यों को कर्मयोग में बदल देने की योजना प्रतिदिन प्रातःकाल शैया त्याग से पूर्व ही बना लेनी चाहिये और उसी योजना के साथ दिन भर का क्रम चलाना चाहिये।
जिस प्रकार प्रातःकाल शैया त्याग से पूर्व दिन भर का कार्यक्रम बनाना और जप ध्यान करना आवश्यक है उसी प्रकार रात को सोते समय बिस्तर पर जाने के बाद पुनः दो काम करने चाहिये। आज का दिन प्रातःकाल के निर्धारित क्रम से बीता कि नहीं? कार्य निर्धारित व्यवस्था के अनुसार पूरे हुए या नहीं? उच्च भावनाओं का आवश्यक सम्मिश्रण रहा या नहीं? जितनी सफलता मिली हो उसके लिये ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिये और जितनी गड़बड़ी हो उसके लिये यह देखना चाहिये कि उसमें अपना आलस्य, प्रमाद और संस्कार किस हद तक दोषी है? जो भूल अपनी हो उसे में आवश्यक सुधार करने की बात सोचनी चाहिये।
अन्त में सोते समय गायत्री माता का ध्यान और मंत्र का मानसिक जप करते हुए सोने का उपक्रम बनाना चाहिये। शैया पर जाने के बाद यदि कुछ अन्य कार्य करने हों तो इन दोनों कार्यों को अन्त में सोते समय के लिये ही रहना चाहिये। रात को निद्रा की गोद में जाते समय परमात्मा का ध्यान भजन करने का अभ्यास मृत्यु समय में उस स्थिति को प्राप्त करने का साधन है, जिसके लिए रामायण में कहा गया है कि “जन्म-जन्म मुनि-जतन कराहीं। अन्त राम कहि आवत नाहीं।” निद्रा भी एक प्रकार की दैनिक मृत्यु ही है। सोते समय भगवान का स्मरण करने वाला अन्त समय भी प्रभु का स्मरण ही करता है और उसकी सद्गति सुनिश्चित हो जाती है।
इस वर्ष का दूसरा नया कार्य है-ज्ञान विस्तार। शिक्षा का, पढ़ाई-लिखाई का विस्तार करने के लिये स्कूल, कालेज बराबर खुलते चले जा रहे हैं। इससे शिक्षा की प्रगति होती है, वह उचित है और आवश्यक भी। पर धन की वृद्धि के समान शिक्षा की वृद्धि भी तब तक निरर्थक और हानिकारक ही सिद्ध होगी, जब तक कि लोगों का आन्तरिक भावनात्मक स्तर ऊँचा न उठे। दुर्बुद्धि लोगों के हाथ में पहुँचने पर धन भी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है और शिक्षा भी। प्रगति के लिये सद्ज्ञान की नितान्त आवश्यकता है। खेद है कि आज सर्वत्र इसी तत्व की उपेक्षा हो रही है। फल-स्वरूप प्रगति के सारे कार्यक्रम उलटी उलझनें उत्पन्न करते चले जा रहे हैं।
हमें समाज सेवा की दृष्टि से भी और आत्म कल्याण की दृष्टि से भी ज्ञान-विस्तार को अत्यन्त पवित्र और आवश्यक धर्म कर्त्तव्य मानना चाहिये और उसके लिये नित्य ही कुछ न कुछ करना चाहिये। स्वाध्याय, संकल्प पाठ और चिन्तन, मनन द्वारा अपने लिये जो प्रकाश प्राप्त किया गया है, उसे दूसरों को भी देने का क्रम बनाना चाहिये। जो पढ़ा समझा है उसे लिखने सुनने से परिपक्वता आती है, इसे सभी छात्र और शिक्षक जानते हैं। जो कुछ हम समझते और सोचते हैं उसे दूसरों को ध्यान अध्यापक या परीक्षक मान कर सुनाने, समझाने लगें तो उससे अपना अभ्यास परिपक्व होगा और वह विचार गहराई तक मनोभूमि में प्रवेश करके संस्कार के रूप में सुदृढ़ भी होते चलेंगे। ज्ञान दान का पुण्य इस संसार के सबसे बड़े दान धर्मों में गिना गया है। उसे एकत्रित करते रहने से दैवी सम्पदाओं की पूँजी बढ़ती है और मनुष्य सच्चे अर्थों में अमीर बनता चला जाता है।
दूसरों को सत्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा करने वाले को लोकलाजवश भी अपने को अपेक्षाकृत श्रेष्ठ बनाना पड़ता है और बुराइयों से बचते रहना पड़ता है। यह लोकलाज भी आत्मोन्नति की दृष्टि से बहुत उपयोगी एवं आवश्यक है।
दैनिक परिवार गोष्ठी का इस वर्ष आवश्यक रूप से हमें आरम्भ कर देना चाहिए। अपने परिवार को-स्त्री-बच्चों को-पास बिठा कर उन्हें उच्च आदर्शों के अनुरूप जीवन को ढालने की शिक्षा देनी चाहिए और उसके लिये घर में आवश्यक वातावरण भी बनाना चाहिए। प्रत्येक गायत्री उपासक को इस बात का प्रयत्न करना चाहिए कि उसकी धर्मपत्नी सुशिक्षित बने। इसके लिए साक्षरता के साथ-साथ सद्ज्ञान भी उसे उपलब्ध होने लगे ऐसा प्रयत्न किया जाना चाहिए। मनोमय कोश की साधना करने वालों को अपने सम्बन्धी स्वजनों की मनोभूमि भी परिष्कृत करनी चाहिए ताकि उनकी दुर्बलताएँ अपनी मानसिक प्रगति में बाधक न बनें।
अपने निजी परिवार के अतिरिक्त स्वजन-सम्बन्धी, मित्र, परिचित एवं दूर भी रहने वाले सुहृदय सज्जनों को मौखिक रूप से अथवा पत्र-व्यवहार से प्रगतिशील जीवन बनाने का आवश्यक प्रेरणा देते रहना चाहिए। जिन लोगों से परिचय है उन्हें अपने घरेलू गायत्री ज्ञान मन्दिर, पुस्तकें तथा “अखण्ड-ज्योति” पढ़ने के लिए देते रहना चाहिए। पुस्तकें देने और फिर वापिस लेने के बहाने धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों के घर जाना और उनके साथ धर्म-चर्चा का अवसर निकालते रहना, ज्ञान विस्तार का एक श्रेष्ठ तरीका है। शिक्षा प्रसार के लिये स्कूल मौजूद हैं। पर ज्ञान तो चरित्र के द्वारा दिया जाता है। लेखनी और वाणी से ज्ञान का प्रयोजन सिद्ध नहीं हो सकता है। पंचकोशी गायत्री उपासना का प्रत्येक साधक दूसरों की अपेक्षा आत्मिक दृष्टि से अधिक उत्कृष्ट होगा, इसलिए ज्ञान विस्तार का उत्तर-दायित्व भी स्वभावतः उसके कन्धे पर पड़ेगा। इस धर्म कर्तव्य से किसी को इन्कार नहीं करना चाहिए और न आलस, उपेक्षा ही दिखानी चाहिए।
मन शक्तियों का पुँज है। मन के शुद्ध, एकाग्र और सन्मार्गगामी बन जाने से मनुष्य शरीर में रहता हुआ भी जीव देवताओं के समान महान बन जाता है। इसकी शक्तियाँ इस शोधन के साथ ही असीम बनती चलती हैं। मनोमय कोश की साधना करते हुए प्रत्येक साधक को यही लक्ष्य ध्यान में रखना है कि मन हर घड़ी सत् चिन्तन करें। कुविचारों के अशुभ चिंतन के विरुद्ध तो निरन्तर संघर्ष ही जारी रखना चाहिए।
आश्विन की नव-रात्रि
आश्विन मास की नवरात्रि ता. 18 सितम्बर से लेकर 26 सितम्बर तक चलेगी। इस वर्ष एक तिथि बढ़ी है। पर नवरात्रि तो पूरी 9 रातों में सम्पन्न होती है। इस पर तिथियों के घटने बढ़ने का असर नहीं पड़ता। इसलिए सदा की भाँति गायत्री प्रेमियों को अपना नवरात्रि अनुष्ठान इन्हीं तिथियों में पूरा करना चाहिए।
प्रतिदिन 27 माला गायत्री मंत्र का जप करने में प्रायः 3 घंटे प्रतिदिन लगते हैं। अस्वाद व्रत या शाकाहार फलाहार का उपवास, ब्रह्मचर्य पालन, भूमि या तख्त पर सोना, हजामत, कपड़े धोना आदि अपनी सेवाएँ आप करना, चमड़े की बनी वस्तुओं का उपयोग न करना, इन पाँच तपश्चर्याग्रों के साथ साधना करनी चाहिए। अन्त में 240 आहुतियों का हवन, कन्या भोजन, गायत्री चालीसा, गायत्री चित्र आदि का प्रसाद स्वरूप वितरण करते हुए पूर्णाहुति करनी चाहिए। जो साधक अपने अनुष्ठान की सूचना मथुरा देंगे उनकी साधना में रही हुई त्रुटियों का संरक्षण और दोष परिमार्जन यहाँ होता रहेगा।
प्रयत्न यह करना चाहिए कि जहाँ कई व्यक्ति नव रात्रि अनुष्ठान करने वाले हों वहाँ सब का सम्मिलित हवन सामूहिक समारोह आयोजन के साथ सम्पन्न हो। उपस्थित लोगों को गायत्री और यज्ञ का महत्व बताने वाले प्रवचन, भजन, कीर्तन आदि भी होने चाहिए। प्रत्येक सामूहिक आयोजन में “युग-निर्माण” का संकल्प दुहराया जाना चाहिए। जहाँ संभव हो वहाँ इन 9 दिनों में जीवन निर्माण सम्बन्धी आध्यात्मिक शिक्षण शिविर भी चलाने चाहिए। ऐसे आयोजनों के लिए नवरात्रि का पुण्य पर्व बहुत ही श्रेयष्कर है।
युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति
‘युग निर्माण योजना’ के अंतर्गत बताये गये 180 कार्यक्रमों को अखण्ड-ज्योति के हजारों पाठकों ने उत्साह-वर्धक तत्परता के साथ कार्यान्वित करना आरम्भ कर दिया है। उनके सब समाचारों को छापा जा सकना संभव नहीं। पर उस स्तंभ के अंतर्गत कुछ प्रेरणाप्रद विचार एवं दूसरों के लिए मार्ग-दर्शन सिद्ध होने वाले पत्र नियमित रूप से दिये जाते रहें ऐसी व्यवस्था की गई है।)
बहरायच जिले में सद्भावना यात्रा
प्राचीन काल में साधु ब्राह्मण परिव्राजक बनकर घर-घर, गाँव-गाँव धर्म बुद्धि जागृत करने के लिए भ्रमण करते थे। तीर्थ यात्राएँ पैदल होती थीं। तीर्थ यात्री जिन-जिन गाँवों में होकर जाते थे वहाँ धर्म उत्साह पैदा करते थे और जहाँ ठहरते थे, वहाँ धर्म समारोह के आयोजन होते रहते थे। इस प्रकार मानव अन्तःकरण की प्रसुप्त धर्म-बुद्धि को जागृत करने के लिए निरन्तर कार्य होता रहता था।
खेद है कि ये परम्पराएं आज भिन्न-भिन्न हो गई हैं और उनके अभाव में धर्म बुद्धि कुँठित होकर सन्मार्ग की ओर उपेक्षा वृत्ति बढ़ने लगी है। युग-निर्माण योजना में इन पुण्य प्रक्रियाओं को पुनर्जीवित करने पर बहुत जोर दिया गया है। विचारशील सत्पुरुषों की सामूहिक टोलियाँ सद्भावना प्रसार की यात्रा पर निकला करें और घर-घर जन-संपर्क स्थापित करते हुए धर्म बुद्धि जागृत करें तो इनसे इतना ठोस कार्य हो सकता है जितना अन्य उपायों से संभव नहीं। आचार्य जी धर्म फेरियों की प्रक्रिया को बहुत महत्वपूर्ण मानते हैं। उनने व्यक्तिगत रूप से हमें अपने जिले में ऐसी पदयात्रा का आयोजन करने की प्रेरणा भी दी। तदनुसार गत जून में इसका एक सुन्दर सफल आयोजन हो सका। पूरा जून मास बहरायच जिले में इस प्रकार की पद यात्रा के लिए रखा गया। सर्व श्री शिवप्रसाद शुक्ल, कन्हैयालाल श्रीवास्तव, फूलप्रसाद, जगदेव सिंह, विनोदकुमार, आनन्दशंकर सिंह, टीकासिंह, अयोध्यासिंह इस टोली के सदस्य बने और तीस दिन में तीस गाँवों में कार्यक्रम रखे गये थे, वहाँ के निवासियों को पूर्व सूचना दे दी गई थी ताकि वे नियत दिन आवश्यक तैयारी रखें। क्या तैयारी करनी चाहिए यह उन्हें पहले ही विस्तारपूर्वक बता दिया गया था। प्रायः सभी जगह तैयारी पूर्ण मिली, ग्रामवासियों ने हमारी टोली का हार्दिक स्वागत किया, कार्यक्रम को सफल बनाने में पूरा-पूरा योग दिया, और टोली के प्रयत्नों से प्रभावित हो समुचित लाभ भी उठाया।
टोली के सदस्य शाम को 5-6 बजे तक निश्चित ग्राम में पहुँच जाते थे। नित्यकर्म से निवृत्त होकर आठ बजे तक भोजन कर लेते थे। फिर उस ग्राम की तथा समीपवर्ती गाँवों की जनता सत्संग के लिए इकट्ठी होने लगती थी। प्रार्थना, वंदना के बाद प्रवचन होते थे। श्री कन्हैयालाल जी उपासना पर, श्री गिरीश देव वर्मा रामायण के माध्यम से चरित्र निर्माण और श्री बद्रीप्रसाद जी दोष दुर्गुणों के निवारण पर जोर देते थे। आगे हमें क्या करना चाहिए, जीवन क्रम कैसा बनाना चाहिए इस विषय पर अन्य वक्ता बोलते थे। इस प्रकार सत्संग 10 बजे तक चलाने की बात सोची गई थी पर वह प्रायः 11-12 बजे तक ही बंद हो पाता था।
प्रातःकाल 5 बजे उठ सब लोग पुनः एकत्रित हो जाते थे। सामूहिक संध्या, एवं जप के बाद हवन आरंभ होता था जिसमें ग्रामवासी श्रद्धापूर्वक भाग लेते थे । नारियों का उत्साह और भी अधिक रहता था। यह क्रम नौ बजे तक चलता। इसके बाद गायत्री और यज्ञ की महत्ता पर एक घंटा प्रवचन होता और उपस्थित लोगों से नशा, माँस, आलस, असत्य, फूट, क्रोध, दहेज, मृत्युभोज, गाली देना आदि दोषों को छोड़ने और नित्य उपासना स्वाध्याय, करने, बड़ों के चरण स्पर्श, साप्ताहिक उपवास, नागरिकता, सामूहिकता आदि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रतिज्ञाएँ यज्ञ भगवान की साक्षी में कराई जातीं। यज्ञ कार्य प्रायः सभी जगह पं. शिवप्रसाद शुक्ल ने कराये । प्रातः काल का कार्यक्रम प्रायः दस बजे तक चलता था। दोपहर को भोजन, विश्राम और व्यक्तिगत परामर्श का कार्यक्रम चलता और तीसरे पहर अगले गाँव की यात्रा के लिए टोली रवाना हो जाती।
निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार रिसिया वंशपुरवा, बदैना बाजार, धुमनी, सधवापुर, एरिया, गदामार, कटघरा कलाँ, भिलौरा बाँसू, फरवटपुर मरबट, गौड़हिया, केसरगंज, नवाबगंज, नानपारा, पैडीहा, चिलपरिया, पहुँचकट्टा, इकौना तिलकपुर, आदि ग्रामों में यात्रा दलनें सफल आयोजन सम्पन्न किये। अन्तिम दिन बहरायच नगर में श्री बद्री प्रसाद जी के मकान पर सामूहिक सम्मेलन हुआ जिसमें जिले की शाखाओं के सदस्यगण भी सम्मिलित हुये। रात्रि के प्रवचनों के पश्चात् आगामी कार्यक्रमों पर विचार होता रहा। दूसरे दिन प्रातःकाल यज्ञ-कार्यक्रम के उपरान्त टोली के कार्यक्रम की समाप्ति घोषित की गई।
इस एक महीने में यात्रा दल को जहाँ शारीरिक कठिनाइयाँ और मानसिक दबाव अनुभव करने पड़े, वहाँ आत्मिक अपार आनन्द भी मिला। हजारों व्यक्तियों को धर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा और उसके फलस्वरूप युग-निर्माण में योगदान की संभावना की कल्पना मात्र से हम सब को भारी संतोष प्राप्त होता है।
-गिरीश देव वर्मा, बहरायच
गायत्री मंदिर की नव रचना
युग निर्माण योजना में अभिरुचि रखने वाले व्यक्तियों का परस्पर मिलते-जुलते रहना, विचार विनिमय करना, निर्धारित कार्यक्रमों को आगे बढ़ाना तथा प्रेम भाव की वृद्धि करना आवश्यक है। क्योंकि जो कार्य मिलजुल कर संगठित प्रयत्नों के द्वारा हो सकता है वह अकेले रह कर नहीं किया जा सकता। संगठन के लिए आचार्य जी सदा से जोर देते भी रहे हैं।
जून का अंक पढ़ कर निश्चय किया गया कि नागपुर में युग-निर्माण केन्द्र का अधिक सुव्यवस्थित कार्यक्रम बनाना चाहिए और यहाँ विधिवत् एक ज्ञान-मंदिर की स्थापना होनी चाहिए। तदनुसार गत गुरुपूर्णिमा से 24 लक्ष गायत्री मंत्र लेखन लोगों से कराने का कार्यक्रम आरंभ कर दिया गया है। इस आध्यात्मिक श्रमदान में कम से कम 108 व्यक्ति भाग लेंगे।
हम लोगों ने पुराने गायत्री उपासकों तथा ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों के घरों पर जा-जाकर, घूम कर अध्यात्म यज्ञ में भाग लेने की प्रेरणा दी है। मंत्र लेखन चालू हो गया है। जब यह कार्य पूरा हो जायेगा तब अन्त में सामूहिक गायत्री यज्ञ रखा जायगा, जिसमें मंत्र लेखन करने वाले व्यक्ति ही आहुतियाँ देंगे। उसी दिन सुसज्जित अलमारियों में मंत्र लेखन की जिल्ददार कापियाँ स्थापित की जायेंगी और गायत्री माता की बड़े साहज कर आइल पेन्ट जो चित्र बनेगा उसकी प्रतिष्ठा होगी। मूर्तियों की स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा में पुजारी रखने और विधिवत् पूजा होने का बन्धन है पर चित्र के लिए यह अनिवार्य नहीं। इसलिए माता का चित्र एवं मन्त्र लेखन की सम्मिलित स्थापना से जो मन्दिर बनेगा वही सब के लिए सुविधाजनक रहेगा।
अभी मंदिर की निज की इमारत नहीं होगी। हम में से किसी सदस्य के मकान का एक कमरा ही इसके लिए प्रयुक्त होगा। स्थापना के पश्चात् दैनिक पूजन, हवन, कीर्तन, सत्संग आदि की व्यवस्था रहेगी। जिन लोगों ने मंत्र लेखन किया है वे इस केन्द्र के संचालक सदस्य माने जावेंगे, और उन्हें यहाँ के कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए विशेष आग्रह एवं सम्मानपूर्वक बुलाया जाता रहेगा। यों यहाँ से चलने वाली प्रवृत्तियों में कोई भी धार्मिक व्यक्ति प्रसन्नतापूर्वक भाग ले सकता है।
हम सब कार्यकर्ताओं के परस्पर मिलते-जुलते रहने के लिए यह गायत्री मन्दिर ही एक प्रकार से मिलन-मन्दिर रहेगा। युग-निर्माण योजना के लिए जिन क्लबों को बनाने का संकेत, प्रेरणा की गई है वहीं कार्य यह मिलन मन्दिर करेगा। यहीं से नागपुर नगर में उन सब प्रवृत्तियों का संचालन हुआ करेगा जो युग-निर्माण के लिए आवश्यक हैं। पर्व त्यौहार मनाने के लिए सदस्यगण यहीं इकट्ठे हुआ करेंगे। पुस्तकालय, वाचनालय, संगीत शिक्षा, पाठशाला आदि की जो भी प्रवृत्तियाँ संभव होंगी इस मंदिर में चला करेंगी। नागपुर शाखा का इसे केन्द्रीय कार्यालय भी कह सकते हैं।
आचार्य जी ने ऐसे ही बिना खर्च के बनने वाले, ईंट चूने से नहीं, श्रद्धा और श्रम के माध्यम से बनने वाले गायत्री मंदिरों के निर्माण पर जोर दिया है। हम लोगों ने उनके इसी आदेश का पालन करते हुए नागपुर में यह रचनात्मक कार्य आरम्भ किया है।
-मोरेश्वर रामचन्द्र पारघी, नागपुर
संगीत के माध्यम से भाव जागरण
जून के युग-निर्माण अंक में संगीत एवं कविताओं के माध्यम से जन भावनाओं को सन्मार्ग की ओर मोड़ने की योजना छपी है। गत जेष्ठ मास में जब मैं चान्द्रायण व्रत शिविर में सम्मिलित होने मथुरा गया था तब आचार्य जी ने इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक चर्चा की थी और कहा था कि गायन और वाद्य का जन भावनाओं को तरंगित करने से भारी महत्व है, इसलिए जिन्हें यह कला आती हो उन्हें अपनी इस प्रतिभा का उपयोग जन जागरण के लिए करना चाहिए। युग निर्माण के लिए यह कार्यक्रम एक अत्यन्त महत्व का माध्यम सिद्ध होगा। आचार्य जी की उस प्रेरणा से मैं बहुत प्रभावित हुआ था और उसी समय से निश्चय किया कि उस दशा में एक सुव्यवस्थित योजना बनाकर जीवन भर कार्यरत रहूँगा।
यों संगीत में मुझे आरम्भ से ही अभिरुचि रही है और उस दिशा में अध्ययन-अध्यापन का कार्य चिरकाल से कर रहा हूँ। संगीत मेरा प्रिय विषय होने के कारण इस कला की साधना में मेरे जीवन का अधिकाँश समय लगा है। शास्त्रीय विधि से संगीत की शिक्षा प्राप्त करके ‘संगीतालंकार’ की उपाधि प्राप्त की है। पर अब तक यह विषय कला की साधना की दृष्टि से करता रहा हूँ। युग-निमार्ण योजना ने मुझे एक नई दृष्टि दी है और यह प्रेरणा मिली है कि वाणी की उस महती शक्ति का उपयोग सद्भावनाओं के विकास का दृष्टिकोण रखकर ही करना उचित है।
गुरु पूर्णिमा के पश्चात् मैंने अपने घर पर एक संगीत, कक्षा प्रारम्भ कर दी है, जिसमें वाद्य-शिक्षण को गौण मानकर उच्च भावनाओं को विकसित करने वाली कविताओं का गाना सिखाया जाय। संगीत शिक्षा का माध्यम केवल उत्कृष्ट भावोत्पादक कविताएँ ही रहती हैं। गाने योग्य ऐसी कविताओं का एक अच्छा संग्रह भी अब तक मेरे पास हो गया है।
संगीत क्षेत्र के अपने अन्य मित्रों को भी मैंने ऐसी ही प्रेरणा दी है। उन्होंने इस नये सुझाव का हृदय से स्वागत किया है। पुराने ढंग के भजन कीर्तन ही उन्हें याद थे। इसलिए इच्छा रहते हुए भी वे कुछ न कर पा रहे थे। मैंने बहुत-सी जीवन संचारिणी कविताएँ सिखाई हैं और उनकी वरदन-प्रणाली का अभ्यास कराया है। अब हम लोगों का एक गायक परिवार दिन-दिन बढ़ता जाता है। जब कभी हमारी यह मित्र मंडली इकट्ठी होती है और गायन-वाद्य का क्रम चलता है तो पहले की तरह कला की मधुरता ही सीमित नहीं रह जाती वरन् श्रोताओं को जीवन का नव-निर्माण करने वाली भावनाओं से भी तरंगित करती हैं। अब हमारी गोष्ठियाँ, प्रेरणाएं और भावनाओं से पूरी भरी रहती हैं।
थोड़े दिनों से इस छोटे से अनुभव से मुझे विश्वास हो चला है कि ‘युग-निर्माण परिवार’ से सम्बन्धित हजारों संगीतज्ञ मेरी तरह अपनी कला भाव-निर्माण में उपयोग करेंगे तो उसका व्यापक प्रभाव होगा। गायन कला के माध्यम से जन-मानस को तरंगित करने की बात कितनी महत्वपूर्ण और प्रभावशाली है इसे मैं आज भली-भाँति अनुभव कर रहा हूँ। विश्वास है कि निकट भविष्य में देशव्यापी परिवार में इस माध्यम का उपयोग करके लोगों की मनोभूमि बदलने में भारी सफलता प्राप्त होगी।
-सुधाराम महाजन,
गुजरात में योजना का प्रकाश
‘अखण्ड ज्योति’ के माध्यम से ‘युग निर्माण योजना’ की जो प्रबुद्ध विचारधारा प्रसारित हो रही है उसे जब मैं ध्यानपूर्वक पढ़ता हूँ तो अन्तःकरण पुलकित हो उठता है। मनुष्य जाति आज जिस पतन पथ पर चलती हुई अपना सर्वनाश करने के लिए बढ़ रही है उसे रोकने के लिए ठोस और प्रभावशाली उपाय यही हो सकता है कि नैतिक विचारधारा को परी शक्ति के साथ जनमानस प्रवेश करने का एक सुसंगठित आन्दोलन किया जाय। ‘युग निर्माण योजना’ में इस उद्देश्य की पूर्ति की सभी संभावनाएँ बीज रूप से मौजूद हैं। जिन सुदृढ़ भुजाओं के द्वारा इस प्रवृत्ति का संचालन हो रहा है उनकी मजबूती को देखते हुए यह विश्वास होता है कि मानव जाति के भाग्य पुनः फिर और प्राचीनकाल जैसी मंगलमयी परिस्थितियाँ पुनः उत्पन्न होगी।
योजना को गत डेढ़ वर्ष से मैं बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ता चला आ रहा हूँ। जितना ही पढ़ता हूँ उतनी ही श्रद्धा और भी अधिक बढ़ती है। अब मेरा मन निरन्तर इस बात के लिए अकुलाता रहता है कि किस प्रकार इस योजना में सक्रिय भाग लूँ और अपनी आन्तरिक श्रद्धा, सद्भावना को चरितार्थ करने का सुअवसर प्राप्त करूं ?
जून अंक ने मुझे बहुत प्रकाश दिया है। अपनी परिस्थितियों के अनुसार मैं अब अपना अधिकाधिक समय इस कार्य में लगाऊँगा कि ‘अखण्ड-ज्योति’ में प्रकाशित विचारधारा को गुजराती-भाषी जनता के लिए सुलभ बनाऊँ। आचार्य जी जो कुछ लिखते हैं वह हिन्दी में होता है। हिन्दी राष्ट्र भाषा तो है पर प्रान्तों में वहाँ की क्षेत्रीय भाषाएँ ही अधिक प्रचलित हैं और अधिक सुबोध एवं लोकप्रिय हैं। इसलिए यह नितान्त आवश्यक है ‘युग निर्माण’ विचारधारा का लाभ केवल हिन्दी भाषा जनता तक ही सीमित न रहे वरन् उसे विश्व की नहीं तो कम से कम भारत की समस्त भाषाओं में तो प्रसारित किया ही जाय। यदि यह प्रयत्न न हो सका तो युग निर्माण आन्दोलन हिन्दी भाषी क्षेत्र की एक छोटी-सी प्रवृत्ति मात्र बनकर सीमित रह जायगा।
मैंने युग निर्माण विचारधारा को गुजराती में अनुवाद करते रहने के विशाल कार्य में अपनी अकिंचन सेवाएँ निरन्तर देते रहने का निश्चय किया है। अनुवादों को गुजराती पत्र पत्रिकाओं में छपाना ही होगा। सितम्बर के ‘अखण्ड ज्योति’ में युग-निर्माण सत् संकल्प की जो विस्तृत विवेचना छपी थी उसका धारावाहिक अनुवाद गुजराती की ‘गायत्री विज्ञान’ पत्रिका में प्रकाशित हो रहा है। ‘ज्ञान यज्ञ ग्रन्थ माला’ के नाम से मैंने एक छोटा सस्ता प्रकाशन स्वयं भी आरंभ किया है, जिसमें युग-निर्माण विचारधारा का ही विस्तार है।
आगे पूरी लगन से यह कार्य करूंगा। युग निर्माण की विचारधारा को गुजराती में अनुवादित करूंगा और उसे इस प्रान्त की पत्र पत्रिकाओं में भेजता रहूँगा। सस्ते ट्रैक्टों के रूप में भी यह साहित्य फैले ऐसा भी प्रयत्न करूंगा।
गुजरात बड़ा प्रान्त है। इसमें युग-निर्माण के लिए आवश्यक जागृति और जीवन उत्पन्न करने के लिए मेरी जैसी श्रद्धा भावना रखने वाले अनेकों साहित्यिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पड़ेगी। आशा करनी चाहिए कि ऐसे धर्म सेवकों की भी निकट भविष्य में कभी न रहेगी जो गुजरात में दीपक के समान जलने को तैयार होकर प्रकाश पाने को तैयार हों, तेल की प्रचुर मात्रा हमें ‘अखण्ड ज्योति’ से मिल ही जाती है।
-नटवरलाल नाथालाल जानी, राजकोट।
ज्ञानवृद्धि का सत्प्रयत्न
भारतवर्ष की प्रगति में सबसे बड़ी बाधा यहाँ की निरक्षरता है। ज्ञान को मनुष्यता का प्रधान चिन्ह माना गया है। सत्ज्ञान के बिना मानवीय सत्प्रवृत्तियों का विकास संभव नहीं और सद्ज्ञान साक्षरता के माध्यम से ही उपलब्ध हो सकता है। आँखों के बिना जिस प्रकार हर समय अँधेरा ही रहता है, उसी प्रकार शिक्षा के अभाव में मनुष्य को लौकिक ज्ञान से, सांसारिक परिस्थितियों से भी वंचित रहना पड़ता है। ऐसे लोग आत्मा का कल्याण करने वाला सद्ज्ञान तो पावेंगे ही कैसे ?
शिक्षा को मैं मानव-जीवन की अत्यधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता मानता हूँ। युग-निर्माण योजना में भी उनके लिए बहुत जोर दिया गया है। मैंने निश्चय किया हैं कि मैं इस दिशा में अधिकाधिक प्रयत्न करूंगा। हमारा पिछड़ा हुआ क्षेत्र है। उधर पिछड़ी जातियों के लोग अधिक रहते हैं। सवर्णों की अपेक्षा उनकी आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्थिति भी गिरी हुई है। इसलिए मैंने सोचा है कि इन लोगों की ओर अधिक ध्यान दिया जाय और इलाके के हर गाँव में एक प्रौढ़ पाठशाला चलाई जाय। इसके लिए सेवा भावना से पढ़ाने वाले व्यक्ति ढूंढ़ने में लग गया हूँ। कहीं-कहीं वेतन देकर भी अध्यापक नियुक्त करने होंगे। इसके लिए कुछ धन जनता के सहयोग से और कुछ सरकारी सहायता से प्राप्त करने की योजना बनी है। इस सम्बन्ध में काफी काम हो चुका है। कई प्रौढ़ पाठशालायें चालू हो गई हैं और आशा है कि इसी वर्ष इनकी संख्या कम से कम 20 अवश्य हो जायेगी। अवकाश के समय बड़ी आयु के स्त्री-पुरुष उनमें शिक्षण प्राप्त किया करेंगे। जो बच्चे स्कूल नहीं जा सकते उनकी पढ़ाई भी वहाँ हुआ करेगी।
साक्षरों के लिए उनकी ज्ञान-वृद्धि का माध्यम पुस्तकालय ही हो सकते हैं। जीवन निर्माण करने वाली पुस्तकें ही इन पुस्तकालयों में रहेंगी, चाहे उनकी संख्या कम ही क्यों न हो। ऐसी ही पत्र पत्रिकाएं भी उनमें मँगाई जायेंगी। एक व्यक्ति संचालक नियुक्त किया जायगा जो पुस्तकों और अखबारों को सँभाल कर रखे, नियत समय पर पुस्तकालय भी साक्षरों के लिए आवश्यक ज्ञानवृद्धि के एक उपकरण ही होंगे। इन्हें भी विद्यालय ही कहना चाहिए।
मेरा काम आसपास के गाँवों में भ्रमण करने और दौड़ धूप का रहता है। सो इस क्षेत्र में विद्या का आलोक फैलाने के लिए निरन्तर सचेष्ट रहने का मैंने निश्चय किया है और गत गुरु- पूर्णिमा से इस निश्चय को कार्यान्वित करना भी आरम्भ कर दिया है।
-दलीप कुमार दत्त, अमरपाटन
एकाकी शुभारम्भ
राष्ट्र-निर्माण के लिए कुछ सेवा कार्य करने की अपनी इच्छा सदा से रही है, पर यह सूझ नहीं पड़ता था कि अकेला आदमी किस प्रकार क्या करे? संगठित संस्थायें तो बहुत कुछ करती हैं पर अकेला व्यक्ति क्या कर सकता है, उसके छोटे प्रयत्न और थोड़े सामर्थ्य से क्या कुछ हो सकता है इसका कोई रास्ता विदित न था। जून का अंक पढ़ा तो आंखें खुल गई और समझ में आया कि केवल संस्थाओं या संगठनों के माध्यम से ही लोक सेवा नहीं की जाती। अकेला व्यक्ति अपने सीमित साधनों से भी कुछ-कुछ कर ही सकता है और इस प्रकार एकाकी प्रयत्न भी अनेक व्यक्ति करने लगें तो संस्थाओं के खर्चीले एवं प्रतिस्पर्धा पूर्ण आडम्बरों के बजाय ठोस और महत्वपूर्ण कार्य हो सकता है।
गत गुरु पूर्णिमा को युग-निर्माण योजना का विधिवत् उद्घाटन हुआ है। जो कुछ साधन मिले उन्हीं से पाठशाला आरंभ कर दी है। प्रथम दिन केवल 4 व्यक्ति पढ़ने आये, पर अब उनकी संख्या बढ़ती जाती है। आशा है कि संख्या की दृष्टि से भी हमारा शिक्षण कार्य कुछ दिन में काफी आगे बढ़ जायेगा।
शिक्षार्थियों को नित्य एक लेख अखण्ड-ज्योति का पढ़ कर सुनाया जाता है और फिर कुछ देर उस लेख की विवेचना की जाती है। इस प्रकार शिक्षा और दीक्षा के दोनों कार्यक्रम साथ-साथ चल रहे हैं। यह छोटा प्रयत्न देखने में साधारण-सा भले प्रतीत होता है पर युग-निर्माण योजना की पूर्ति में इस से सहायता मिलेगी इसका मुझे काफी संतोष है। स्वान्तः सुखाय सेवा-धर्म को अपने जीवन की शुभारंभ मुझे बहुत आनन्दमय प्रतीत हो रहा है।
-वीरसिंह चौहान, पारा
प्रौढ़ महिलाओं की शिक्षा व्यवस्था
छोटी आयु में विधवा हो जाने के बाद जीवन निरर्थक ही दिखता था। सब लोग मुझे अभाग की तकदीर को कोसते ही रहते थे। कभी ससुराल कभी माता के घर तिरस्कृत और भारभूत प्राण की तरह जिन्दगी के दिन किसी प्रकार दूर करती रही। मन तो न लगता था पर भगवान की पूजा में भी बैठती थी। इस प्रकार वैधव्य चौदह वर्ष कटे।
मेरी रिश्ते की मौसी स्कूल में अध्यापिका थी। वे बार-बार यही कहती रहती थीं कि तुम्हें पढ़ना चाहिए। इससे समय कटेगा, ज्ञान प्राप्त होगा और किसी की दया पर भार रूप जीने की हीन स्थिति न रहेगी। चौदह वर्ष तक तो उनकी बात पर ध्यान न दिया पर जब रिटायर हो गई और हमारे पड़ौस के मकान ही में रहने लगीं तो उनके आग्रह से मैंने पढ़ना शुरू किया। तीस वर्ष की आयु में पढ़ाई करना अटपटा तो लगा पर मौसीजी के आग्रह पर वह मुझे करना ही पड़ा। चार वर्ष में हिन्दी मिडिल पास कर लिया। नौकरी करने की आवश्यकता स्तर मौजूद थे।
पड़ौस में एक मास्टर साहब रहते हैं उनके अखण्ड-ज्योति आती थी। उनसे माँगकर मौसी पढ़ने लाया करती थी और उसके लेख मुझे सुनाया करती थीं। कुछ ही दिन के बाद में मुझे वे लेख बहुत रुचिकर लगने लगे और अपने पैसे भेज कर मंगाना शुरू कर दी। कुछ दिन के बाद जीवन का साथ कनेडडडडड के सम्बन्ध में आचार्य जी से परामर्श और पत्र-व्यवहार भी करना आरम्भ कर दिया। इससे मुझे बड़ी प्रेरणा मिली। दो वर्षों से युग- निर्माण की जो प्रौढ़ विचारधारा आ रही है। उसने मेरे जान पर यही छाप डालो के परमार्थ किये बिना मनुष्य का जीवन सार्थक नहीं हो सकता।
जून का युग-निमार्ण अंक पढ़ा उसमें मेरे उपयुक्त कार्यक्रम मौजूद थे। महिलाओं में शिक्षा प्रसार भारतवर्ष की सबसे बड़ी आवश्यकता है, इस तथ्य को हृदयंगम करते हुए मैंने गत गुरु पूर्णिमा के निश्चय किया कि मैं महिलाओं की प्रौढ़ पाठशाला चलाऊँगी। वृद्धा मौसी जी ने इस कार्य में मुझे पूरा सहयोग देने का वचन दिया। हम दोनों मुहल्ले भर में घर-घर घूमे और तीसरे पहर दो से पाँच बजे तक मेरे घर पढ़ने आने के लिए अनेक महिलाओं को समझाया। आरंभ में 12 महिलाएँ तैयार हुई। गुरु-पूर्णिमा को हवन कीर्तन के साथ हमारी युग-निमार्ण महिला प्रौढ़ पाठशाला का शुभारंभ हुआ। इस एक महीने में पढ़ने वाली महिलाओं की संख्या 19 हो गई है। लगता है कि कुछ दिनों में यह संख्या काफी बढ़ेगी और मेरे छोटे घर में पढ़ाई का स्थान न रहा तो दूसरी और कोई उपयुक्त जगह पाठशाला के लिए ढूँढ़नी पड़ेगी।
सरकारी जूनियर हाईस्कूल तथा प्रयाग महिला विद्यापीठ का कोर्स पढ़ाना चालू किया गया है। सिलाई और संगीत की कक्षाएँ भी साथ-साथ चल रही हैं। अभी मेरा हारमोनियम और सिलाई मशीन ही काम आ रही हैं। पर आगे इनकी और भी जरूरत पड़ेगी सो शिक्षार्थी महिलाओं ने थोड़ा-थोड़ा चंदा करके उसकी व्यवस्था करने का भी विचार व्यक्त किया है। यह प्रयत्न यदि थोड़ी-सी महिलाओं के जीवन में भी कुछ प्रकाश उत्पन्न कर सका तो मैं समझूँगी कि युग-निमार्ण के लिए मेरी भी कुछ उपयोगिता रही और उपेक्षित तिरस्कृत, एवं निरर्थक समझा जाने वाला जीवन किसी हद तक सार्थक हुआ।
-कमलेश कुमारी वर्मा, खड़गपुर
परिवार निर्माण का प्रयत्न
युग-निर्माण योजना को ध्यान पूर्वक पढ़ा तो प्रतीत हुआ कि समाज की ठोस सेवा अपने परिवार को सुधारने की पद्धति अपनाने से ही संभव हो सकती है। यह बात मुझे बिलकुल सही जँची। हर आदमी अपना और अपने परिवार का सुधार कर ले तो इसी आधार पर सारे समाज और संसार का सुधार हो सकता है। एक दूसरे को उपदेश करने की अपेक्षा अपना और अपने परिवार का सुधार कर सकना अधिक वास्तविक और अधिक उपयोगी है।
गुरु पूर्णिमा से मैंने अपने घर की विचारगोष्ठी आरम्भ कर दी है। रात को 8 से 9 बजे तक का समय इसी के लिए नियत कर लिया है। मनुष्य जीवन की विभिन्न समस्याओं की जानकारी अपने घर वालों को कराता है और यह बताता है कि जीवन को कैसे सुव्यवस्थित और प्रगतिशील बनाना चाहिए। कथा, कहानियाँ, ऐतिहासिक घटनायें तथा वर्तमान समाचार सुनाकर उनका मनोरंजन भी करता है और शिक्षा भी करता है जिसे सब रुचिपूर्वक सुनते हैं।
गोष्ठी में घर की समस्याओं पर छोटे-बड़े सभी अपने विचार और सुझाव प्रकट करते हैं, जिससे कई उलझनें सुलझती हैं तथा अच्छी व्यवस्था बनाने में योग मिलता है। घर में सब छोटे-बड़े परस्पर ‘तुम’ ‘आप’ का संबोधन करने लगे हैं, ‘तू’ कहना छोड़ दिया गया है। अपने से बड़ों के नित्य चरण स्पर्श पूर्वक प्रणाम करने की बात अब अभ्यास में आ गई है। पूजा स्थान पर बैठ कर सब नित्य गायत्री मंत्र की एक माला जपने लगे हैं। शाम को सामूहिक पूजा आरती होती है। युग निमार्ण का सत्संकल्प आरती के द्वारा दुहराया जाता है, एक लेख अखण्ड ज्योति का पढ़ा जाता है, जिसे घर के सभी सदस्य ऐसे प्रेम से सुनते हैं मानों आचार्य जी स्वयं ही अपना प्रवचन कर रहे हों। कपड़ों की सफाई, हर वस्तु को नियत स्थान पर रखना, समय का कार्यक्रम बना कर उसी के अनुसार दिनचर्या पूरा करना, दैनिक व्यायाम आदि कई अच्छी प्रथाएँ इस एक महीने में ही चल पड़ी हैं। इसे देखते हुए लगता है कि परिवार का सुधार संतोषजनक रीति से हो रहा है और आशा बँधती है कि हम लोग आगे चलकर अपना व्यक्तित्व ऐसा उत्तम गठित कर सकेंगे जिसके संपर्क में आने वाले भी सभ्य नागरिक बन सकेंगे।
-राधेश्याम वार्ष्णेय गिरिडीट
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना।
लोगे हैं तूफान कहीं पथ भूल न जाना॥
चलना है कण्टकाकीर्ण अति दुर्गम मथ पर।
लड़ना है बाधाओं से तुझको पग-पग पर॥
जाना है उस ठौर जहाँ मानवता रोती।
द्रुपद-सुता सी जहाँ सुसंस्कृति लज्जा खोती॥
लक्ष्य तुम्हारा धरती पर सज्जनता लाना।
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना॥
शक्ति! अरे तू शक्ति पुंज है अजर अमर है।
तेरे सम्मुख काल प्रबल कम्पित थर-थर है॥
आदि शक्ति का पुत्र कभी दुर्बल हो कैसे?
आत्म ज्ञान का धनी भला निर्धन हो कैसे?
ज्योति-पुंज तू तम का है अस्तित्व मिटाना।
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना॥
जीवन की निश्छलता है पाथेय तुम्हारा।
अन्तर की उज्ज्वलता सच्चा ध्येय तुम्हारा॥
दया क्षमा करुणा ममता शम दम ये सारे।
भव्य भाव विश्वास अटल, हैं शस्त्र तुम्हारे॥
धर्म एक बस ज्ञान मार्ग पर बढ़ते जाना।
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना॥
दूर नहीं मंजिल बस थोड़े कदम शेष है।
वही लक्ष्य पाते जो बढ़ते निर्निमेष हैं॥
पुरुष वही है जो पथ की पीड़ायें सहता।
हार मानता नहीं, निरन्तर चलता रहता॥
प्रतिबन्धों में कभी न अपना शीश झुकाना।
राह कठिन है पथिक कहीं घबरा मत जाना॥
-मुकुल कुकर्जी
*समाप्त*