जार्ज स्टेनले

हालेण्ड देश की पुरानी घटना है कि एक बार एक नदी का पुल बाढ़ के पानी के कारण टूट गया। उस पुल पर होकर रेल चलती थी। गाड़ी आती तो उस नदी में डूब जाती। स्टेशन तक खबर पहुँचाने का कोई साधन न था। एक लड़का जो वहाँ मौजूद था उसने आने वाली रेल को रोकने का उपाय सोचा। उसने अपना कुर्ता फाड़ा उसकी झण्डी बनाई। शरीर से खून निकाला उससे उसे लाल रंगा। लकड़ी में उसे लगा कर लाल झण्डी बनाली और दोनों हाथ ऊँचे करके पटरी पर खड़ा हो गया। समय पर रेल आई तो ड्राइवर ने लड़के को देख लिया और गाड़ी खड़ी कर दी। सब हाल मालूम हुआ तो रेल पीछे लौटाई गई और एक बहुत बड़ी दुर्घटना होते होते रुक गई। इस लड़के का नाम था-जार्ज स्टेनले।


महत्वाकांक्षाओं का पागलपन

वित्तेषणा, पुत्रेषणा और लोकेषणा की तृष्णा, वासना अहंता से विक्षुब्ध हुए मनुष्य उन उत्पाती पागलों का रूप धारण कर लेते हैं जो न स्वयं चैन से रहते हैं और न दूसरों को चैन से रहने देते हैं। महत्वाकाँक्षी व्यक्ति अपने लिए विशेष लाभ भले ही प्राप्त कर लेते हों, पर जन समाज के लिए वे संकट रूप हो बने रहते हैं। असंतुष्ट जीवन में जीने का कोई आनंद नहीं। जो कुछ हमें मिला है उस पर सन्तोष गर्व और उल्लास करते हुए यदि आज आनंद नहीं मना सकते हैं तो कल यदि आज से अधिक मिल जाय तो सुखी बन सकेंगे इसका क्या भरोसा? तृष्णा तो हर सफलता के बाद आग में घी डालने की तरह बढ़ती ही जाती है। इसलिए जिन्हें निरन्तर लालसाओं, कामनाओं की आग में झुलसना हो, उन्हीं को अपनी मनोभूमि में असन्तोष रूपी जीवित चिता सँजो लेनी चाहिए।

समाज सेवा, परमार्थ, आत्म-विकास, विद्याध्ययन, भौतिक उन्नति का प्रत्येक कार्य देर तक कर सकना उन्हीं के लिए संभव होता है जो धैर्यवान और स्थिर चित्त हैं और यह दोनों गुण केवल उन्हें प्राप्त हो सकते हैं जो अपनी आज की उपलब्धियों पर सन्तोष अनुभव करते हुए कल अधिक उन्नतिशील बनने का अपना एक सरल स्वाभाविक कर्तव्य मानते हैं। संसार में अनेक धन है पर सन्तोष का धन सबसे बड़ा धन है। कबीर की वह उक्ति बड़ी सार गर्भित हैं जिसमें कहा गया है,-”जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरि समान।” यह धन जहाँ भी होगा वहाँ आनंद की निर्झरिणी बहेगी। पति-पत्नी यदि आपस में संतुष्ट हैं तो उन्हें स्वर्गीय जीवन का रस इसी जीवन में उपलब्ध होगा। गाँव के लड़के पढ़-लिखकर शहरों को भागते हैं यदि उन्हें ग्राम्य जीवन में सन्तोष रख सकने का साहस हो तो वे शहरी तड़क-भड़क में अपने स्वास्थ्य की बर्बादी करने की अपेक्षा ग्रामीण समाज को और अधिक अच्छा बनाने के लिए उसी क्षेत्र में रहकर अपनी और अपने देहाती भाइयों की बहुत बड़ी सेवा कर सकते हैं।

हर व्यक्ति अपने गुण, कर्म, स्वभाव का अधिकाधिक विकास करे यह उचित है। अधिक विद्वान बनना, अधिक सेवा भावी होना अधिक चरित्रवान रहना, अधिक सभ्य सुसंस्कृत एवं आदर्शवादी होना किसी भी व्यक्ति के लिए कम गौरव की बात नहीं है। यही महत्वाकाँक्षाएँ उचित है और उपयोगी भी। उन्हीं की छूट हर आदमी को रहनी चाहिए। पर अधिक धन जमा करने की, अधिक ऐश करने की अधिक, वाहवाही लूटने के लिए उद्धत काम करने की छूट किसी व्यक्ति को न हो। इसके लिए कानूनी या नैतिक नियंत्रण रहे तो यह सर्वथा उचित ही होगा।

आध्यात्मिक दृष्टिकोण, सन्तोष का दृष्टिकोण है। उसमें हर व्यक्ति को धैर्य और औचित्य के साथ साथ प्रगति करते चलने की छूट है पर जन साधारण के मध्यम स्तर से बहुत अधिक ऊँचा बढ़ने का निषेध है। जिनमें जो योग्यताएं हों वे उन्हें अपने से छोटे या पिछड़े हुए साथियों को उन्नतिशील बनाने में खर्च करें। और जिस प्रकार फौजी सिपाही साथ-साथ कदम से कदम मिलाते हुए एक-सी पोशाक और वर्दी धारण करते हुए मार्च करते चलते हैं उसी प्रकार हमें भी अपने सारे समाज को एक समान विकसित करते हुए साथ-साथ आगे बढ़ने की बात सोचनी चाहिए।

भगवान बुद्ध जब मरने लगे और उनसे पूछा गया कि क्या आपको इस मृत्यु के बाद स्वर्ग या मुक्ति की प्राप्ति होगी तो उन्होंने हँसकर कहा-”जब तक एक भी व्यक्ति इस संसार के बंधन में बँधा हुआ है तब तक में अपनी व्यक्तिगत सुख आकाँक्षा की कामना नहीं कर सकता। मैं बार-बार जन्मूँगा और मनुष्य और हर प्राणी को अपने स्तर का बनाने के लिए सृष्टि के अन्त तक प्रयत्न करता रहूँगा।” यही है आध्यात्मिक साम्यवाद। सभ्य व्यक्ति का, सभ्य समाज का यही आदर्श होना चाहिए। व्यक्ति को क्षमता एवं प्रतिभा ईश्वर ने इसी उद्देश्य के लिए दिए हैं कि वह अपने से पिछड़े लोगों को कम से कम अपने स्तर तक ऊपर उठाने में उसका उपयोग करे। गुजर-बसर के बारे में जो जितना संयमी रहता है और स्वेच्छा से गरीबी का जीवन स्वीकार करता है वह उतना ही बड़ा माना जाता है। भारतीय संस्कृति का यही सनातन आदर्श रहा है। ऋषि, मुनि स्वेच्छा से गरीबी का जीवन व्यतीत करते रहे हैं। जन समाज में भी वहीं प्रशंसनीय है जो अपनी व्यक्तिगत भौतिक सुख सुविधाएँ इकट्ठी करने में नहीं, अपनी सामर्थ्य से दूसरों को सुखी बनाने में एक श्रेष्ठ सत्पुरुष की तरह संलग्न है। भारत की आत्मा एक ही स्वर में पुकारती रही है-

मत्वहं कामये राज्ये न सौख्यं न पुनर्भयम।

कामये दुःख तप्तानाँ प्राणिनामार्तनाशनम्॥

मैं अपने लिए राज्य की, सुख की, स्वर्ग की कामना नहीं करता मेरी एक मात्र आकाँक्षा यही है कि दुखियों के दुख दूर करने में अपने को घुला और गला सकूँ।

यह आदर्श जिन्होंने जीवन में धारण किया हुआ वे ही विश्व शान्ति के स्तम्भ बन सकते हैं। उन्हीं की संख्या बढ़ने से यह वसुधा अपने को धन्य मान सकती है। ऐसे ही नर रत्नों से यह संसार गुलाब के महकते फूलों से भरे बगीचे की तरह सुरक्षित हो सकता है। उन्हीं की परमार्थ बुद्धि का लाभ उठाकर छोटे-छोटे अनेकों को आगे बढ़ने का अवसर मिलता है। चंदन का वृक्ष अपनी सुगन्धि से अपने समीपवर्ती अनेक पौधों को सुवासित कर देता हैं। यही जीवन यापन की सर्वश्रेष्ठ नीति है। पर वह संभव उसी के लिए हो सकती है जो व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं की दृष्टि में अंधा और पागल नहीं हो रहा है।

जिसे दौलत ! दौलत!! दौलत!!! की निरन्तर रट लगी रहती है और इसी गोरख धंधे में मकड़ी के जाले की तरह दिन-रात उलझा हुआ ताना-बाना बुनता रहता हैं, उसे इतनी फुरसत नहीं मिलेगी जो अपने से गिरे हुओं की बात सोचे, जो अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं के सम्बन्ध में विचार करें जो आदर्शवादी जीवन-यापन करने के लिए अपने को संयमी और सीमित रखकर दूसरों को सुखी संतुष्ट बनाने के लिए कोई कदम बढ़ाने का साहस करें?

असंतोष भी सराहनीय हो सकता है पर यह होगा तभी, जब उसका उपयोग जाति-कल्याण, साधना, संयम, सेवा ज्ञानवृद्धि, परमार्थ जैसी दैवी सम्पदाओं को बढ़ाने के लिए, ज्ञानवृद्धि, परमार्थ जैसी दैवी सम्पदाओं को बढ़ाने के लिए हो। आसुरी सम्पदाएं बढ़ाने का असंतोष तो जितना ही बढ़ेगा उतनी ही अशान्ति उत्पन्न करेगा। संघर्षों की जड़ यही है। अधिकारों के लिए सब जागरुक हैं, कर्त्तव्यों की किसी को चिन्ता नहीं। हर व्यक्ति के मुँह से यही शिकायत सुनी जाती हैं कि मुझे यह नहीं मिला, यह नहीं दिया गया, इससे मैं वंचित हूँ। किसी फूटे मुँह में से यह शब्द सुनाई नहीं पड़ते कि मुझे दुनिया से इतना मिला, लोगों ने इतना दिया। हमें जो उपलब्ध है क्या वह लाखों करोड़ों की अपेक्षा कहीं अधिक नहीं है? ईश्वर ने, समाज ने, जितना हमें दिया है उसके प्रति क्या हम उपयुक्त कृतज्ञता के भाव धारण किये हुए हैं? मन में ऐसी भावना नहीं आती कि क्षणभर के लिए अपनी उपलब्धियों पर हर्ष मनाने, सन्तोष अवगत करने, कृतज्ञता प्रकट करने और धन्यवाद देने के लिए की गुंजाइश रहे। ऐसी श्मशान जैसी शुष्क मनोभूमि जिनकी बनी हुई हैं उन्हें अपने जीवन में भला कहाँ रस आ सकता है? जिन्हें हर घड़ी तृष्णा सताती रहती हैं वे उद्विग्न प्रेत, पिशाच की तरह इस मरघट से उस मरघट में भटकते रहते हैं। यह अभागे अपनी ही हीनता के मारे हुए हैं, अपनी ही अतृप्ति से दुःखी बने हुए हैं, भला इनके द्वारा किसी दूसरे का क्या हित साधन हो सकता है?

धन की तरह ही ख्याति और मान प्रतिष्ठा की महत्वाकांक्षा भी संसार में भारी विपत्ति उत्पन्न करने वाली सिद्ध होती है। पद सत्ता और अधिकार के लोभ में उतने ही अनर्थ होते हैं जितने धन लिप्सा से होते हैं। संस्थाओं के पदाधिकारी बनने के लिए, स्वयं श्रेय लाभ करने के लिए कितने ही व्यक्ति बुरी तरह लड़ते हैं, गुटबन्दी करते हैं और संस्था तथा आदर्श को भारी क्षति पहुँचाते हैं। संस्थाओं में भीतरी गुटबन्दी का कारण व्यक्तियों की श्रेय आकाँक्षा ही रहती हैं। सच बात यह है कि बिना पदाधिकारी बने कोई भी व्यक्ति किसी संस्था की अधिक ठोस सेवा कर सकता है। पर लोगों को सेवा की नहीं प्रतिष्ठा की भूख रहती है, फलस्वरूप सार्वजनिक संगठनों को कलह का अखाड़ा बनाते और दुर्गतिग्रस्त होते आये दिन देखा जाता है।

थोड़ा त्याग करके बहुत यश लूटने की लिप्सा बहुत लोगों में देखी जाती है। अखबारों में नाम और फोटो छपाने के लोभ में कई लोग सत्कर्मों का बहाना करते रहते हैं। यश मिलने की शर्त पर ही थोड़ी उदारता दिखाने वाले लोग बहुत होते हैं। कितने हो लोग इसके लिए बड़ी-बड़ी प्रवंचनाएं करते हैं, वे अपने साथी सहयोगियों के साथ विश्वासघात करने में भी नहीं चूकते। ठाठ-बाठ, फैशन, सजावट में भी यही महत्वाकाँक्षा काम करती है कि हमें बड़ा आदमी और अमीर समझा जाय। इसी उद्देश्य से लोग निरर्थक और खर्चीला आडम्बर बनाये रहते और उसके भार से दबे हुए भारी कठिनाई एवं चिन्ता सहन करते रहते हैं। भौतिक महत्वाकाँक्षाएं मनुष्य के लिए सदा ही विपत्ति साबित होती रही हैं। जो उन्हें जिस हद तक छोड़ सके उसे उतना ही बुद्धिमान मानना चाहिए।

महत्वाकाँक्षाएं यदि तृष्णा और वासना के लिए लगी हुई है तो वे व्यक्ति और समाज के लिए अहितकर ही सिद्ध होंगी। कोई व्यक्ति अधिक धनी बनकर अधिक ऐश आराम भोग कर अपनी दुष्प्रवृत्तियों को ही भड़का सकता हैं। उससे अन्ततः उसका पतन ही होगा। प्रगति और सन्तोष का एक ही सच्चा माध्यम है, वह है व्यक्तित्व का विकास। सद्गुणों को अपनाकर, संयम और सदाचार सेवा और सद्भावना की अधिकाधिक मात्रा जब अन्तःकरण में बढ़ती जाती है तो व्यक्तित्व का विकास होता है। दया, करुणा, त्याग और परमार्थ की भावनाओं को चरितार्थ करने की महत्वाकाँक्षाएं ही सच्ची और श्रेयस्कर महत्वाकाँक्षा की जा सकती है। दैवी सम्पदायें, सत्प्रवृत्तियां ही वह आध्यात्मिक विभूतियाँ हैं जिन्हें पाकर मनुष्य स्वयं भी आनंद और संतोष का लाभ करता हैं और अपने समीपवर्ती समाज को भी सुख शान्ति का आनंद देता है।

जीवन का स्तर ऊँचा उठाने का यह अर्थ गलत है कि भौतिक सुख सुविधाओं के ऐश आराम के साधनों को बढ़ाते चलें और मनुष्य जन्म की दुर्लभ विभूति को इसी में बर्बाद कर दें। जीवन जीने का आदर्श एवं दृष्टिकोण और ऊँचा उठे तो ही यह कहा जा सकेगा कि जीवन स्तर सच्चे अर्थों में ऊपर उठा है। व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं के अपने पन ने दुनिया का अनर्थ ही किया है पाप और विनाश को ही बढ़ाया है इन्हें त्याग ही जाना चाहिए। महत्वाकाँक्षाओं का सही अर्थ परमार्थ है। इसमें एक दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा यदि स्वस्थ रूप से चलती रहे तो इसमें अपना भी हित साधन है और समाज का भी।


अध्यात्म और प्रेम

“अध्यात्म में प्रेम का प्रमुख स्थान है पर यह प्रेम देश के प्रति, देश-वासियों के प्रति, देश के गौरव, उसकी महानता और जाति के सुख, दैवी आनन्द का, या अपने देशवासियों के प्रति आत्म-बलि देने, उसके कष्ट निवारण के लिए स्वयं कष्ट सहन करने, देश की स्वतन्त्रता के लिए अपना रक्त बहाने, जाति के जनकों के साथ-साथ मृत्यु का आलिंगन करने में, आनन्द की अनुभूति करने का हो। व्यक्तिगत सुख का प्रेम नहीं। मातृ-भूमि के स्पर्श से शरीर के पुलकित होने का आनन्द हो और हिन्द महासागर से जो हवायें बहती हैं, उनके स्पर्श से भी वहीं अनुभूति हो। भारतीय पर्वत माला से बहने वाली नदियों से भी वही सुख प्राप्त हो। भारतीय भाषा, संगीत , कविता, परिचित दृश्य, स्रोत, आदतें, वेश-भूषा जीवनक्रम आदि भौतिक प्रेम के मूल हैं। अपने अतीत के प्रति गर्व, वर्तमान के प्रति दुःख और भविष्य के प्रति अनुराग उसकी शाखायें हैं। आत्माहुति और आत्म-विस्मृति, महान सेवा, और देश के लिए महान सेवा, और देश के लिए अपार सहन शक्ति उसके फल हैं। और जो इसे जीवित रखता है, वह है देश में भगवान की, मातृ-भूमि की अनुभूति, माँ का दर्शन, माँ का ज्ञान, और उसका निरन्तर ध्यान एवं माँ की स्तुति तथा सेवा।”

-योगी अरविन्द


अन्तरात्मा की सच्ची प्रार्थना

प्रार्थना मनुष्य-जीवन का ध्रुव तारा है। उसे नितान्त आवश्यक नित्य कर्मों में भी सबसे आवश्यक समझा जाना चाहिए और शरीर निर्वाह के अन्य कार्यों की उपेक्षा करके भी प्रार्थना को प्रमुखता देनी चाहिए। भोजन न मिलने से शरीर को ही भूखा रहना पड़ेगा पर प्रार्थना का अभाव रहने से तो आत्मा की प्रगति ही रुक जायगी। हम शरीर नहीं आत्मा हैं। इसलिए शरीर की उपेक्षा करके भी आत्मा की आवश्यकताओं को प्रमुखता मिलनी चाहिए। शरीर की शुद्धि के लिए स्नान और वस्त्रों की सफाई के लिए साबुन जितना आवश्यक हैं उससे भी अधिक उपयोगिता आत्मिक शुद्धि के लिए प्रार्थना की है। उसमें ने तो आलस्य करना चाहिए और न प्रमोद। प्रार्थना की उपेक्षा जीवन के सर्वोत्कृष्ट स्वार्थ का तिरस्कार करने जैसी भूल हैं। इस भूल के लिए जितना पश्चाताप करना होता हैं उतना और किसी के लिए नहीं।

नियत निर्धारित समय पर शरीर, वस्त्र और स्थान शुद्धि के साथ, पूजा उपकरणों की सहायता से विधिवत उपासना की जा सके तो सर्वोत्तम है। पर यदि किसी कारणवश वैसा न बन पड़े तो प्रातः नींद खुलने से लेकर शैया त्याग तक का जो समय मिलता है, उसमें पूर्व-संध्या और रात को सोते समय शैया पर जाने से पहले निद्रामग्न होने तक का जो समय मिलता है उसमें उत्तर-संध्या की जा सकती है। यह दोनों समय हर व्यक्ति के पास सुविधा के रहते ही हैं। व्यस्तता का बहाना इन क्षणों के लिए तो बनाया भी नहीं जा सकता। प्रार्थना के लिए यह समय सर्वोत्तम है। नियमित उपासना करने वालों की भाव प्रार्थना तो इस समय भी होनी चाहिए। मानसिक उपासना बिना किसी पूजा उपकरण एवं शुद्धि के भी चारपाई पर पड़े-पड़े भी मनोभाव, श्रद्धा, विश्वास एवं ध्यान धारणा के आधार पर भी हो सकती है। इसे तो अनिवार्य ही मानना चाहिए। विधिवत उपासना जिनसे बन पड़े वे उसे भी किया ही करें।

प्रार्थना में भावना का प्रमुख स्थान है। भावना जितनी सच्ची गहरी और श्रद्धा पूर्ण होगी, उतना ही उसका सत्परिणाम भी होगा, इसलिए शब्दों को रटने की चिन्ह पूजा को नहीं वरन् समुचित श्रद्धा के साथ प्रार्थना की भावनाओं को अन्तःकरण में आन्दोलित करना चाहिए। दो निकटवर्ती आत्मीय जन जिस प्रकार हृदय खोल कर परस्पर वार्तालाप करते हैं उसी तरह भगवान को अपने अन्तःकरण में बैठा हुआ अनुभव करते हुए उसके सम्मुख अपने मनोभाव प्रस्तुत करने चाहिए। भगवान अपने रोम-रोम में समाया हुआ है, सांसों के साथ थिरकता हुआ बाहर आता और भीतर जाता रहता है। हृदय में उसी की धड़कन, वीर रक्त में उसी की गर्मी काम कर रही है। प्राण, चेता और भावना के रूप में वही तो अपनी प्रेरक शक्ति बना बैठा है। ऐसे अभिन्न हृदय मित्र से, स्वजन स्नेही से जी खोल कर बातें करने में संकोच ही क्यों होना चाहिए? उसके साथ जी खोलकर बातें करने में भय ही क्या है? प्रार्थना यदि भावनापूर्ण है तो वह बिना पूजा साधनों के भी उतनी ही प्रभावशाली हो सकती है जितनी विधि विधान के साथ किये गये पूजा पाठ की नियमित आराधना।

भगवान के निकट भावना का महत्व सर्वोपरि है विस्तृत कर्म काण्ड भी यदि अश्रद्धा के साथ चिन्ह पूजा की तरह भार उतारने के निमित्त किया गया है तो उसका जो फल होगा उससे वह भाव प्रार्थना श्रेष्ठ है, जो सच्चे हृदय से जी खोल कर की गई हो। नियमित उपासना का महत्व कम करने की बात किसी को सोचनी भी न चाहिए। यहाँ ऐसा कुछ नहीं कहा जा रहा है कि नियमित विधिवत् साधना बन्द करके केवल ध्यान प्रार्थना ही करते रहा जाय यह तो घाटे की बात होगी। नियमित साधना का अपने स्थान पर अपना महत्व है। उससे एक प्रकार का योगाभ्यास होता है। सूक्ष्म शरीर के चक्रों और उपत्यकावडडडडडडडडड का जागरण होता है और संस्कारों में दृढ़ता आती है। हमारे घरों में पूजा, आरती, योग प्रसाद जप, तप, और ध्यान का कार्यक्रम चलते ही रहने चाहिए। यह स्थान, जिसका, उल्लेख इन पंक्तियों में किया जा ऐसा है कि उसे प्रातः साँय उठते सोते तो करना ही चाहिए अन्य किसी अवकाश के समय में भी किया जा सकता है।

हम प्रार्थना करें :-

‘हे भगवन् आप सर्वत्र समाये हुए हैं, कोई स्थान आपकी उपस्थिति से रिक्त नहीं, जड़ चेतन में आपकी ही सत्ता प्रकाशवान हो रही है। अन्य प्राणियों की भाँति मेरे कण-कण में भी समाये हुए हैं। संसार भर में जो कुछ हो रहा है उससे आप परिचित हैं। अन्तःकरणों में बैठे हुए सब की भावनाओं को आप जानते हैं। मेरी प्रत्येक गतिविधि और भावना विचारणा का आपको भली भाँति परिचय है। इस विश्व में कुछ भी ऐसा नहीं जो आपसे छिपा हो।”

“आप निष्पक्ष और न्यायकारी हैं। आपको सभी मनुष्य, सभी प्राणी समान रूप से प्रिय हैं। आप सबके पिता हैं इसलिए सभी प्राणी आपको समान रूप से पुत्रवत् प्रिय होने स्वभाविक हैं। आप सब सुव्यवस्था के लिए न्याय तुला को आपने जो पुण्य विधान बनाया है वह सबके हित का होने से सब प्रकार उचित और उपयुक्त हैं। आप न्याय की रक्षा करने में तनिक भी विचलित नहीं होते। किसी के साथ पक्षपात नहीं करते। कर्म फल के अनुसार सबको दुःख सुख का उचित दंड, पुरस्कार देते हैं इसमें आपकी करुणा, न्यायशीलता और निष्पक्षता ही सन्निहित है।”

“सत्कर्म ही आपकी सबसे बड़ी पूजा है। सद्भावनाओं के पुण्य ही आपको प्रिय हैं। सद् विचारों में ही आपको अपनी सच्ची भक्ति की प्रतीत होती है। आपके बनाये हुए नियमों को कर्तव्यनिष्ठ होकर जो दृढ़तापूर्वक पालन करता है, लोभ और भय से विचलित होकर जो अपने कर्तव्य का त्याग नहीं करता, उसके सदाचार रूपी भजन को ही आप मान देते हैं। ऐसा भजन करने वाला भक्त ही आपकी विशेष कृपा का अधिकारी बनता है।”

“दूसरों को सताने या ठगने वाला वस्तुतः अपने आपको ही सताता और ठगता है, क्योंकि आप ही सबमें विद्यमान होने के कारण उस अनाचार के शिकार होते हैं। प्राणियों के प्रति सद्भाव रखना और सद्व्यवहार करना वस्तुतः आपकी ही अर्चना वन्दना करना है। अपने पुत्रों के साथ सज्जनता का व्यवहार करते देखकर ही आप किसी को अपना भक्त मानते हैं। ठीक भी है पिता उसी से तो विशेष प्रसन्न होगा जो उसके पुत्रों के प्रति कर्तव्य से भी अधिक बढ़कर उदारता की श्रेणी का सद्व्यवहार करने का साहस करेगा। प्राणियों के साथ दुर्व्यवहार करके जिसने नीचता का परिचय देते रहने का क्रम बना लिया हैं वह आपको शूल चुभाने वाला किस मुँह से यह आशा करेगा कि आप उस पर प्रसन्न होंगे।

“ख्याति और बड़प्पन या अन्य प्रकार का भौतिक प्रतिफल पाने के लिए किये गये धर्म आडम्बर आपको प्रिय नहीं। आप कर्ता की भावनाओं को परखते हैं। इसलिए परमार्थ केवल उसे ही मानते हैं जो निस्वार्थ एवं उद्दात्त भावनाओं से प्रेरित होकर किया गया है। ऐसे ही सत्कर्मों की आप पुण्य में गणना करते है और उसी आधार पर किसी को पुण्यात्मा मानकर सद्गति प्रदान करते हैं।”

“कर्तव्य पालन में चट्टान की तरह अडिग व्यक्ति आपको परम प्रिय हैं। प्रलोभनों में असंयम में पड़कर भी जो अपने शील को सुरक्षित रखता है उस आत्म विजेता से आप प्रसन्न रहते हैं। जो पाप के अतिरिक्त और किसी से नहीं डरता उस निर्भय को आप प्यार करते हैं। आपत्तियों से जो भयभीत नहीं होता, चिन्ता, निराशा और क्षोभ जिसे सताते नहीं, उस सज्जन और संतुलित व्यक्ति पर आपकी अनुकम्पा सहज ही होती है।”

“आप सत्य हैं आप शिव हैं, आप सुन्दर हैं। जो आपको अन्तरात्मा में धारण करता है उसकी प्रवृत्तियाँ सत्य से प्रेरित होती हैं, वह शिव, कल्याणकारक कार्य करता है और उसकी समस्त चेष्टाएं सुन्दर दीखती हैं। आप दिव्य हैं, आपको प्रेम करने वाला दिव्य गुणों वाला देवता बनता है। आप प्रेम हैं। आपकी किरण जिसके भीतर प्रतिभासित होंगी, वह सबको प्रेम की, मैत्री की, आत्मीयता एवं उदारता की ही दृष्टि से देखेगा। दूसरों के सुख-दुःख में उसे अपने ही सुख-दुख जैसी भली बुरी अनुभूति होगी।”

“आप जिस पर प्रसन्न होते हैं उसे सद्बुद्धि और सन्मार्ग पर चलने की साहसपूर्ण प्रेरणा प्रदान करते हैं। अपना स्वरूप गौरव और वर्चस्व समझ लेने पर मनुष्य विश्व विजयी बनता है। समस्त कठिनाइयों को पार कर लेना उसके लिए सरल हो जाता है। आपका प्रकाश पुरुषार्थ के रूप में जब प्रकट होता है तो मनुष्य आलस्य और प्रमाद को परास्त कर समय, धन, आहार व्यवहार, विचार आदि को नियमित एवं व्यवस्थित बना लेता है। आपका वरदान किसी के जीवन को नियमित व्यवस्था बनी हुई देखकर ही जाना जा सकता है।

“आप मानव शरीर देकर सृष्टि के समस्त प्राणियों की अपेक्षा अत्यधिक श्रेष्ठ उपहार हमें दे चुके, अब एक वस्तु विशेष उपहार हमें देने के लिए शेष है। उसे पाने का अधिकारी हमें बनाइये। ऐसी कृपा कीजिए कि हम मानव अन्तःकरण प्राप्त कर सकें। नर-पशु से ऊँचे उठकर गुण कर्ण स्वभाव की दृष्टि से सच्चे मनुष्य बन सकें। जिस दिन हम सच्चे मनुष्य बन सकेंगे उसी दिन आपकी कृपा मिलेगी और हम इसी जीवन में शरीरधारी रहते हुए भी जीवन-मुक्ति का आनन्द लेते हुए लक्ष्य की पूर्णता और इस जन्म की सार्थकता अनुभव करेंगे।”

“प्रभो। हमें सन्मति दीजिए साहस दीजिए, और सज्जनता के पथ पर ले चलिए। आप के पास यही सर्वश्रेष्ठ उपकार वरदान हमारे लिए हो सकता है, तो हमें इस योग्य बनने की शक्ति दीजिए कि अपने आचरणों से आप को प्रसन्न करके यह अनुग्रह प्राप्त कर सकें। भगवन्! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलिए, अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिए, मृत्यु से अमृत की ओर ले चलिए। हमारा कल्याण कीजिए और इस समस्त संसार का कल्याण कीजिए।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः


उपासना बिना कल्याण नहीं

चन्द्रमा तब चमकता है जब उस पर सूर्य चमकता है। जब वह चमक उसे प्राप्त नहीं होती है तो अमावस्या के दिन यथास्थान रहते हुए भी उसका अस्तित्व लुप्त प्रायः ही रहता है। होते हुए भी न होने जैसी स्थिति उसकी रहती है। पृथ्वी के उतने भाग में दिन रहता है जितने पर सूर्य की किरणें पड़ती हैं। जितने भाग पर वे नहीं चमकती वहीं घोर अन्धकार छाया रहता है, और हाथों-हाथ सूझ नहीं पड़ता। यही बात आत्मा के सम्बन्ध में है। उस पर जब परमात्मा का प्रकाश चमकता है जो उज्ज्वल और दीप्तिमान दीखता है और जब वह चमक बन्द हो जाती है तो मानव शरीर धारी एक निकृष्ट नर-पशु के रूप में एक घृणित एवं निकम्मा अस्तित्व मात्र ही दृष्टि गोचर होता है। परमात्मा से दूर रहने वालों मनुष्य बहुधा मनुष्यता से रहित ही पाये जाते हैं।

आत्मा, परमात्मा का एक अंश मात्र है। उसे जो कुछ शक्ति और प्रतिभा प्राप्त है ईश्वर की ही विभूति है। जिसमें वह विभूति जितनी कम पड़ जाती है वह उतना ही दीन-हीन बना रहता है। शक्ति का स्रोत जिस उद्गम से प्रवाहित होता है उसके साथ सम्बन्ध जोड़ लेने से सामान्य जीव को भी शक्ति का पुँज बनने में देर नहीं लगती। बिजलीघर के साथ जुड़े हुए पतले-पतले तार अपने भीतर इतनी शक्ति धारण कर लेते हैं कि उनके द्वारा सैकड़ों घोड़ों की शक्ति वाली मशीनें धड़-धड़ाती हुई चलने लगती हैं। उनको स्पर्श करने वाले बल्ब अन्धेरी रात को दिन जैसा प्रकाशवान बना देते हैं। बिजली घर से जब तक सम्बन्ध है तभी तक उन तारों में यह विभूति रहती है कि उनके स्पर्श से चमत्कार उत्पन्न हो सके जब वह सम्बन्ध कट जाता है, तारों को बिजली घर के विद्युत भण्डार की धारा का प्रवाह मिलना रुक जाता है तो फिर उनका कोई महत्व नहीं रह जाता। देखने से पहले जैसा लगने पर भी वे न प्रकाश उत्पन्न करते हैं और न मशीनें चला पाते हैं। तार का मूल्य बिजली घर से सम्बन्ध होने के कारण हो तो या, वह टूट गया तो फिर उसकी महत्ता कहाँ स्थिर रह सकती थीं?

आत्मा के द्वारा अनेक लौकिक और पारलौकिक प्रयोजन पूर्ण किये जाते हैं। अनेकों सफलता और समृद्धियों को प्राप्त करने का श्रेय आत्म-बल को ही दिया जा सकता है। शरीर की दृष्टि से सब मनुष्य लगभग समान होते हैं। देह के बल पुञ्जों में कोई विशेष अन्तर नहीं होता। फिर भी मनुष्य-मनुष्य के बीच जमीन आसमान का अन्तर पाया जाता है। एक भीरु है तो दूसरा दुस्साहसी। एक दुष्ट है तो दूसरा महात्मा। एक तृष्णा वासना की मृग मरीचिका में भटकता है, दूसरा आनन्द और उल्लास की परितृप्ति का रसास्वादन करता है। एक के उद्वेग और शोक सन्ताप का ठिकाना नहीं, दूसरे को सन्तोष की शान्ति आह्लादित किये रहती है। एक को सम्पूज्य और दूसरे को तिरस्कृत देखते हैं। एक प्रगति की ओर बढ़ रहा है तो दूसरा पतन के गर्त में गिरता ही चला जा रहा है। इस प्रकार के असाधारण अन्तर मनुष्य की आन्तरिक आत्मिक स्थिति की भिन्नता के कारण ही उत्पन्न होते हैं।

आत्म-बल संसार के सब बलों से श्रेष्ठ है। धन-बल, शरीर-बल, बुद्धि-बल, संख्याबल आदि अनेक बलों के द्वारा मनुष्यों को विविध प्रकार की सफलताएँ मिलती हैं पर उन सबके मूल में आत्म-बल की ही प्रधानता रहती है। उसके अभाव में अन्य सब बल बालू की भीत की तरह अस्थिर रहते हैं। जरा-सा आघात लगते ही उनके अस्त-व्यस्त होने में देर नहीं होती। जीवन की सार्थकता आत्म-बल पर ही निर्भर रहती है। अन्य बल तो छाया मात्र हैं।

आत्मा को जब भी स्थायी बल प्राप्त होता है तब उसे वह उपलब्धि परमात्मा से ही मिली होती है। मोती समुद्र से ही निकलते हैं। उनका उपयोग कहीं भी किसी कार्य के लिए भी किया जा सकता है पर उसकी उत्पत्ति समुद्र के अतिरिक्त और कहीं नहीं होती। इसी प्रकार आत्म-बल का वरदान भी परमात्मा से प्राप्त होता है। अन्धा लाठी के सहारे अपनी मंजिल पार करता हैं। जीव भी इस पाप-ताप के अन्धकार से भरे संसार से जीवन-लक्ष प्राप्त करने की यात्रा ईश्वर का अवलम्बन करके ही पूर्ण कर सकता हैं।

परमात्मा समस्त उच्च शक्तियों और संभावनाओं का केन्द्र है। उसी भण्डार से आत्मा अपनी अभीष्ट वस्तुएँ उपलब्ध करता है। इसी अमृत को पीकर उसकी प्यास बुझती है। पपीहा तब तक तृषित ही रहता है जब तक उसे स्वाति नक्षत्र की वर्षा का जल नहीं मिलता। आत्मा भी तब तक अतृप्त ही रहती है जब तक उसे प्रभु की शरणागति प्राप्त नहीं हो जाती। नव-जात शिशु अपनी माता का पय पान करके ही जीवन धारण कर सकने में समर्थ होता है। मानवीय महानताएँ भी परमात्मा के सान्निध्य से प्राप्त होती हैं।

प्रभु की अवज्ञा करके, अहंकार में परमात्मा को विस्मरण करके अपने पुरुषार्थ के आधार पर कुछ भौतिक सम्पदाएँ भी प्राप्त की जा सकती हैं पर आन्तरिक महानता, उदार दृष्टिकोण एवं प्राणी मात्र के प्रति आत्मीयता का वरदान केवल ईश्वर की अनुकम्पा से ही मिल पाता है। बिना डोरी के पतंग की तरह जीव निरुद्देश्य दिन काटता रहता है पर जब भगवान के साथ वह अपना सम्बन्ध बना लेता है तो उसे अपने स्वरूप और लक्ष का पता चल जाता है। तब मंजिल को पूरी करने का क्रम भी वह जान लेता है और दृढ़तापूर्वक नियत दिशा में चलते हुए उन सब विभूतियों को प्राप्त कर लेता है, जिन्हें प्राप्त करने के लिए उसे वह सुर दुर्लभ मानव शरीर मिला होता है।

पाप का प्रलोभन और आपत्तियों का भय मनुष्य को पग-पग पर पथ भ्रष्ट करता है। ऐसी परिस्थितियाँ सामने आती ही रहती हैं जिनके अनुसार अनुचित मार्ग को अपना कर आकर्षक लाभ उठाया जाना सम्भव होता है। ऐसे विघ्न भी आते ही रहते हैं जो सन्मार्ग छोड़कर कुपथ अपना लेने से टल सकते हैं। आधार विहीन व्यक्ति ऐसे अवसरों पर स्थिर नहीं रह सकते, उन्हें पथ भ्रष्ट होते देर नहीं लगती। छोटे से परीक्षा अवसर सामने आने पर भी वे अपनी प्रामाणिकता खो बैठते है। धर्म और नीति की पतवार हाथ से छूट जाती है और जमाने की बहती हुई धारा में डोलती हुई उनकी नाव भी भंवर में जा फँसती हैं। उस विपत्ति से छुड़ा सकने की सामर्थ्य केवल प्रभु आश्रय में ही है। भगवान का संबल पकड़े रहने से ही जीवन अपनी रक्षा पतनकारी आँधी तूफानों से कर सकता है। इसी आश्रय को लेकर भव निधि से पार उतर सकना सम्भव होता है।

जिसने सच्चे मन से भगवान का आश्रय लिया उसे सन्मति का वरदान मिला। मति का सही दिशा में लगना न लगना ही जीवन क्रम की सफलता असफलता का आधार होता है। जिसको जीवन के सदुपयोग की चिन्ता हो गई, जिसने सत्य का, धर्म और पवित्रता का अवलम्बन ग्रहण कर लिया उसे अपने भीतर आत्म सन्तोष और बाहर से सहयोग एवं सम्मान की तरंगें उठती दिखाई देंगी और वह उसी आनन्द से निमग्न होकर मानव-जीवन की सफलता का रसास्वादन कर रहा होगा। यह अवसर ईश्वर की कृपा से ही मिलता है। पुरुषार्थ से भौतिक वैभव भले ही हमले पर आत्म-विकास के साधन तो भगवान की कृपा से ही सम्भव होते हैं। जो प्रभु के आगे अपना हृदय खोल कर रखता है उनकी करुणा के लिए प्यासे की तरह पुकारता है उसे निश्चय ही अतृप्त नहीं रहना पड़ता।

कुतुबनुमा की सुई उत्तर की ओर ही मुँह करके स्थिर रहती है जब तक उसे दूसरी दिशाओं में घुमाया जाता रहेगा तब तक वह अस्थिर ही बनी रहेगी। स्थिरता तब आती है जब आधार का सही आश्रय मिल जाता है। आत्मा का लक्ष परमात्मा की प्राप्ति है, जब तक यह दिशा प्राप्त नहीं होती तब तक अस्थिरता, उद्विग्नता, चंचलता एवं अशान्ति नहीं बनी रहती है। पर जब लक्ष की दिशा में पग उठने लगते हैं, परमात्मा को प्राप्त करने की लगन लग लाती है, तब उस प्रयत्न का प्रत्येक चरण जीवात्मा के लिए शान्ति का सृजन करने लगता है।

जीव स्वयं तो निर्बल, तुच्छ है। उसे विशालता और महानता परमात्मा के सान्निध्य से ही उपलब्ध होती है। इसके लिए जो प्रयत्न करता है वही बुद्धिमान है। दूरदर्शिता की एकमात्र कसौटी यह है कि अपने सुदूर भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए भावना उठे, विचारणा चले और क्रिया आरम्भ हो। जानते, समझते और चाहते हुए भी वह हो नहीं पाता। पैर कदम-कदम पर डगमगाते हैं। विपन्नताएँ मार्ग रोक कर खड़ी होती हैं, विभीषिकाएँ निराश करती हैं और साँसारिक आकर्षणों का जाल अपने बन्धनों में कसकर बाँध लेता है। इस कुचक्र में फँसा हुआ जीव कुछ कर नहीं पाता। श्रेय प्राप्ति का उद्देश्य प्रेय की उलझन में ही फँसा रह जाता है। इस चक्रव्यूह से उद्धार केवल भगवान की कृपा से ही हो सकता है और यह सब मिलती है जब भक्त सच्चे मन से आतुर होकर भगवान को पुकारता है।

प्रार्थना में बड़ी शक्ति है। वह भगवान को भक्त के समीप खींच लाती है या भक्त को भगवान तक पहुँचा देती है। सच्चे मन से की हुई, अन्तरात्मा की आते पुकार कभी अनसुनी नहीं की जा सकती। भगवान उसे सुनते हैं और पूरा करते हैं। शर्त एक ही है-प्रार्थना सच्ची होनी चाहिए। सच्ची प्रार्थना का अर्थ हैं आत्म-कल्याण के लिए पाप-तापों से, प्रलोभन आकर्षणों से बचने और सन्मार्ग पर चलने की उत्कृष्ट आकांक्षा और उसकी अभिव्यक्ति । लौकिक कष्टों की निवृत्ति और सफलताओं की प्राप्ति के लिए भावनाशील भक्त अपने भगवान को कष्ट देना उचित न समझेगा इस सम्बन्ध में तो वह अधिक से अधिक इतना ही कह सकता है कि विपत्तियों से लड़ने, प्रारब्ध कर्मों को हँसते हुए सहने और पुरुषार्थ के बल पर आवश्यक साधनों को उपार्जित करने योग्य उसे आवश्यक साहस, धैर्य और स्वभाव मिल जाय तो उतना ही पर्याप्त है।


वस्तुओं का खिंचाव

एक मनुष्य ने कहीं सुना कि ‘रुपया, रुपये को खींचता है।’ उसमें इस बात के परखने का निश्चय किया।

सरकारी खजाने में रुपये का ढेर लगा था। वहीं खड़ा होकर वह अपना रुपया दिखाने लगा ताकि ढेर वाले रुपये खिंच कर उसके पास चले आयें।

बहुत चेष्टाएँ करने पर भी ढेर के रुपये तो न खिंचे वरन् असावधानी से उसके हाथ का रुपया छूट कर ढेर में गिर पड़ा।

खजांची का ध्यान इस खटपट की ओर गया तो उस व्यक्ति को संदिग्ध समझकर पकड़वा दिया। पूछताछ हुई तो उसने सारी बात कह सुनाई।

अधिकारी ने हँसते हुए कहा- जो सिद्धान्त तुमने सुना था वह ठीक था, पर इतनी बात तुम्हें और समझनी चाहिए कि ज्यादा चीजें थोड़ी को खींच लेती हैं। ज्यादा रुपये के आकर्षण में तुम्हारा एक रुपया खिंच गया। इस दुनिया में ऐसा ही होता है। बुराई या अच्छाई की शक्तियों में से जो अब भी बढ़ी-चढ़ी होती हैं जब प्रतिपक्षी विचार के लोग भी बहुमत के प्रवाह में बहने लगते।


आत्मा की पुकार अनसुनी न करें

आज सर्वत्र ज्ञान-विज्ञान की बड़ी लम्बी-चौड़ी बातें होती हैं। अटलाँटिक से लेकर एशिया, अफ्रीका तथा यूरोप आदि का सम्पूर्ण भूगोल पुस्तकालयों में भरा पड़ा है। पाषाण-युग से लेकर आज तक ही मानव-जाति का इतिहास मनुष्य रटे बैठा है। हजारों, लाखों ‘कार्बनिक’ एवं ‘अकार्बनिक’ रसायन तत्वों से प्रयोग-शालाओं की शीशियाँ भरी पड़ी हैं। कल-कारखानों के बोझ से धरती आसमान सभी परेशान से नजर आते हैं। जिधर आँख उठाकर देखो, साहित्य, कला, शल्य-चिकित्सा आदि के ढेरों ग्रन्थ, अगणित जानकार और असंख्य प्रयोग-शालायें आज खुली हैं। इन्हें देखते हुए मनुष्य की बौद्धिक क्षमता पर अपार आश्चर्य होता है। समझ में नहीं आता कि आखिर आदमी के दिमाग में कौन-सा जादू है जो अनेकों आश्चर्य-जनक उपकरण बनाता चला जाता है।

हजारों मील दूर तक उड़ जाने वाले पक्षियों की क्या मजाल कि एक छोटे-से हवाई जहाज को दौड़ में परास्त कर दें। जलयान निरन्तर-ही सागर की छाती पर कुहराम मचाते रहते हैं। इन्हें देखकर अन्य जलचर जीवों की क्षमता तुच्छ-सी जान पड़ने लगी है। अपने घर बैठे-बैठे हजारों मील की खबरें ऐसे सुन लेते हैं जैसे आपस में बैठे बात-चीत कर रहे हों। आज जैसी प्रकाशन आदि की सुविधायें यदि प्राचीन युग में भी सम्भव रही होती तो शायद उसी समय विश्व-फिरने तक, बोलने बात करने से लेकर गाने-बजाने तक के जो भी आविष्कार आज मनुष्य ने कर लिये हैं उन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबाना पड़ता हैं कि आखिर मनुष्य में इतनी बड़ी क्षमता का प्रादुर्भाव कहाँ से और कैसे हुआ?

किंतु जब एक क्षण इस मशीनी दुनिया से ध्यान हटाकर व्यावहारिक जगत की ओर देखते हैं, साधनों के साथ सुख और शाँति की तुलना करने बैठते हैं तो भारी निराशा होती है। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिये मनुष्य ने इतनी सारी सुविधायें जुटाई वह उद्देश्य अभी तक अधूरा पड़ा है। अभी तक इन्सान अपनी मंजिल की ओर सही कदम नहीं बढ़ा रहा है। आज एक ओर सभ्यता के विकास का प्रतिपादन किया जाता है किन्तु दूसरी ओर मनुजता आहें भरती है। नाना आभूषणों वस्त्रालंकारों से आदमी अपने शरीर को सजाता हैं पर दूसरी ओर वासना की महामारी फैली है। एक ओर आमोद-प्रमोद चलता है, दूसरी ओर शोषण अपहरण की चक्की में आदमी पिसा जा रहा है। शिक्षा सभ्यता के विकास के लिये हजारों स्कूल खोले जा रहे हैं किंतु दूसरी ओर वे ही सुशिक्षित उद्धतता एवं अनाचार का सृजन कर रहे होते हैं।

इससे अलग एक और संसार है। सत्य का संसार या आध्यात्मिक आस्था की दुनिया। मनुष्य सारा जीवन अपने अहंकार के पोषण में ही गँवाता रहता है पर जब मृत्यु उसके सामने उपस्थित होती है तो उसे इस आत्मिक संसार का पता चलता है। तब ज्ञान-विज्ञान की लम्बी-चौड़ी चौकड़ी भूल जाती है। इस समय पछतावा ही हाथ लगता है। जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिये यह जीवन मिला था वह तो तुच्छ बातों में गँवा दिया गया। सारा का सारा जीवन तुच्छ कामनाओं और साँसारिक गोरखधंधों में बिता दिया तो आखिरी समय क्या बन सकता है। मनुष्य भारी दिल लिये हुए इस संसार से विदा हो जाता है। यहाँ का सारा वैभव, व्यापार, वस्त्र, आभूषण, स्त्री, पुत्र सब यहीं रह जाते हैं। साथ में मात्र पश्चाताप जाता है। महान विजेता सिकन्दर ने अपनी मृत्यु के समय प्रमुख सचिव को बुलाकर एक ही आदेश दिया था “मृत्यु के बाद मेरे दोनों हाथ अर्थी से बाहर निकालकर रखना, ताकि दर्शक यह जान लें कि सिकन्दर अपने साथ कुछ नहीं ले गया।”मृत्यु अपने टेढ़े हाथ राजा-रंक सभी पर फैलाती है। उससे कोई बच नहीं पाता। पर कितने आश्चर्य की बात है कि उससे निरन्तर उपेक्षा ही बरती जाती हैं। लोग आने वाली मृत्यु का कभी विचार तक नहीं करते।

मनुष्य जितना समय अपनी भौतिक उन्नतियों के लिये लगाता है उसका आधार भी यदि अपनी आत्मिक प्रगति के लिये लगाता तो अपने जीवन लक्ष्य को जरूर समझ लेता। आध्यात्मिक जीवन के शुभ परिणाम भी उसे मिलते, आत्मा परमात्मा की सम्पदाओं से वह वञ्चित न रहता। पीछे भी ऐसा हुआ है और अब भी वह सभी सम्भव है किन्तु यह सब आत्मा की उपेक्षा करते रहने से नहीं होगा। इसके लिये भी अपनी बौद्धिक क्षमता को लगाना पड़ेगा। अपना पुरुषार्थ अर्पित करना पड़ेगा। आध्यात्मिक प्रगति के लिए भी उतनी ही लगन और तत्परता की आवश्यकता है जितने से आज की आश्चर्य जनक भौतिक सफलतायें मिल सकी हैं। आध्यात्म कोई जादू नहीं जो छड़ी घुमाते ही सारे सत्परिणाम उपस्थित कर देता है, इसके लिये भी विधिवत साधना करनी पड़ती है। सुखी जीवन का आधार है प्रेम, न्याय, अपरिग्रह, सच्चरित्रता, सौहार्द सौजन्य और विवेक। इन्हें धारण करने से ही व्यक्ति दूसरी दुनिया अर्थात् आध्यात्मिक जगत में देर तक टिक सकता है। उनका अनुशीलन करने से ही उस महान उद्देश्य की पूर्ति किया जाना सम्भव है जिसके लिये मनुष्य का जन्म हुआ है। विश्वानि देव सवितुर्दुरितानि’ की भावना बनाने उसी से ही यह सम्भव है कि आध्यात्मिक दिशा में कुछ प्रगति की जा सके।

मनुष्य ने जितनी प्रगति भौतिक जगत में की है उस से भी अधिक की सम्भावना अध्यात्म में है। उसकी स्वचेतना में वह शक्ति भरी पड़ी है जिसका उत्कर्ष-जागरण किया जा सके तो इस संसार के सारे वैभव विलास तुच्छ से लगेंगे। शास्त्रकार ने लिखा है :-

यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतनं महत्।

सुक्षात सूक्ष्मतरं नित्यम् सत्वमेव त्वमेवतत्॥

अर्थात् “सबकी आत्मा परब्रह्म परमात्मा जो विश्व से भी बड़ा है तथा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है वही नित्य तत्व तुम ही और तुम भी वही हो।” यहाँ आत्मा परमात्मा की एकरूपता दर्शाते हुए दैवज्ञ आप्त पुरुषों ने स्पष्ट बता दिया परमात्मा की संज्ञा के साथ जिन शक्तियों का बोध होता है वे सब दोष रूप से आत्मा में विद्यमान हैं। इतनी महत्वपूर्ण सत्ता का अधिकारी पुरुष इतना महान अवसर प्राप्त करके भी उसकी उपेक्षा करता है तो इसे उसका दुर्भाग्य ही माना जायेगा।

दुःख और निराशा की परिस्थितियों का निर्माण अपना भौतिकवादी दृष्टि-कोण बनाने में होता है। अपने दृष्टिकोण में यदि परिवर्तन कर सके होते तो आत्मिक जगत का भी ज्ञान अवश्य मिला होता। अपने गुण कर्म स्वभाव में सत्य का अनुशीलन किया जाय तो आध्यात्मिक जगत के सत्परिणामों से भी लाभान्वित हुआ जा सकता है। आत्मा की उपेक्षा करते रहने से भौतिक सम्पदायें कभी भी सुख नहीं दे सकती। शाश्वत शान्ति की प्राप्ति अथवा जीवन लक्ष्य की सिद्धि का एक ही मार्ग है-आध्यात्मवाद। इस पर चल पाना, देर तक टिके रहना तभी सम्भव है जब आत्मा के हित की उपेक्षा न करें। उसके महत्व की समझ और प्राप्ति के लिये आज से, अभी से लग जायँ।

इस संसार में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं दिखाई देती जो देर तक टिकती जान पड़ती हो। जो वस्तु आज हैं वह कल दिखाई भी नहीं देती। आज के पहाड़ इतिहास के पन्नों में किसी समय के सागर अंकित हैं। जो पेड़ आज खड़ा दिखाई देता है कल उसकी जड़ें तक दिखाई नहीं देती। समुद्र की लहरों की भाँति यह जगत बनता बिगड़ता रहता है। कुछ यदि अमृत है-अविनाशी है तो वह आत्मा है। मनुष्य-जन्म का उद्देश्य भी यही है कि वह आत्मा के माध्यम से चिन्मय परमात्मा की प्राप्ति करे। इसी को जीवन लक्ष्य आदि अनेकों नामों से पुकारा जाता है। इसी की प्राप्ति के लिये ऋषियों ने जोर दिया है। गीताकार ने भी इसी की पुष्टि करते हुये लिखा है।-

यं लब्ध्वा च परं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन, गुरुणापि विचाल्यते॥

अर्थात् “योगी परमेश्वर की प्राप्ति रूप लाभ से अधिक लाभ कुछ भी नहीं मानता। आत्मा को प्राप्त कर लेने से दुःख चलायमान नहीं करते।” इस परम तत्व को धारण करने से जाना जाता है कहने मात्र से नहीं। बाह्य ज्ञान बौद्धिक क्षमता को बड़ा कर तद्जन्य सुख दिला सकता है पर उससे इन्द्रिय निग्रह का सुख प्राप्त करना सम्भव नहीं। बाह्य ज्ञान मात्र से श्रेय पथ पर नहीं चला जा सकता। अतः विश्व-कल्याणार्थ आत्म-ज्ञान सम्पादन अत्यावश्यक है। इसी से मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति सम्भव है अन्य कोई चारा नहीं।


भौतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण

मानव-जीवन के दो स्तर हैं एक बाह्य दूसरा आन्तरिक, एक भौतिक दूसरा आत्मिक। इनमें से जिसकी प्रधानता होती है उसी के अनुसार जीवन का स्वरूप बनता है। भौतिकतावादी जीवन भौतिक-स्थूल दृष्टिकोण का प्रतिफल है और आध्यात्मिक जीवन मनुष्य की सूक्ष्म विवेक बुद्धि की प्रेरणा पर अवलम्बित है।

बाहर से देखने में भौतिक और आध्यात्मिक जीवन में कोई विशेष अन्तर दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि शरीर के पोषण एवं निकटवर्ती स्वजनों के प्रति कर्तव्य पालन के लिए गृही-विरक्त सभी को जीवनोपयोगी वस्तुओं का उपार्जन एवं संग्रह करना पड़ता है। उनकी मात्रा में न्यूनाधिकता हो सकती है पर उस अनिवार्य प्रक्रिया से छुटकारा किसी को भी नहीं मिल सकता।

गृहस्थ को आजीविका उपार्जन के लिए कृषि, व्यापार, मजदूरी, शिल्प आदि कार्य अपनाने पड़ते हैं तो विरक्त को भिक्षा, कंद मूल फल संग्रह, आदि के लिए उद्योग करना पड़ता है। सभी को वस्त्र चाहिए, सभी को निवास के लिए घर चाहिए। पात्र चाहे कमण्डलु हो, चाहे धातु का बना हो आवश्यक ही रहता है। माला, पुस्तक, आसन, वस्त्र, कंबल, झाडू, जल पात्र, दीपक, अग्नि साधन, कुटी, आश्रम, गुफा तो साधु को भी चाहिए। उनके टूटने-फूटने पर उन्हें बार-बार प्राप्त करना पड़ता है। भोजन और जल भी बार-बार चाहिए। इनके साधन जुटाने में काफी समय लगाना पड़ता है। गृहस्थों का जिस प्रकार अपना 4-6 आदमियों का परिवार होता है, साधुओं के भी उससे अधिक सहचर, शिष्य, स्नेही, मनुष्य या पशु-पक्षी बन जाते हैं। पूर्ण एकाकी जीवन किसी के लिए सम्भव नहीं। मनुष्य की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि उसकी भावनाओं का विकास दूसरों के सहचरत्व में ही सम्भव है। पूर्ण एकाकीपन तो जड़ता की ओर ही ले जाता है। सहचरों के साथ जो कर्तव्य एवं भाव-कुभाव गृहस्थ को रहते हैं लगभग वैसे ही साधु को भी बने रहते हैं।

वनवासी तपस्वी को सिंह का भय, व्याघ्र से घृणा, भोजन की इच्छा, साधन सामग्री की चिन्ता, मुक्ति की अभिलाषा, बन्धनों से घृणा, सज्जनों से राग, दुर्जनों से द्वेष एवं आन्तरिक कुसंस्कारों से संघर्ष करते रहना पड़ता है। सुविधाओं को जुटाने एवं असुविधाओं को मिटाने के लिए उन्हें भी बहुत कुछ सोचना और करना पड़ता है। लगभग ऐसी हो प्रक्रिया गृहस्थ जीवन में भी बनी रहती है। इस प्रकार विचारपूर्वक देखने से दोनों ही प्रकार के-सभी प्रकार के जीवन भौतिकवादी दीखते हैं। जीवित मनुष्य इनसे छुटकारा नहीं पा सकता क्योंकि उसका निर्माण ही इस ढंग से हुआ है कि प्रयत्न और पुरुषार्थ, साधन और सुविधा के लिए उसे एक निश्चित ढर्रे पर चलना ही पड़ेगा। मात्रा का अन्तर रहे तो भी वस्तु स्थिति में अन्तर नहीं आता। बाह्य जीवन हर व्यक्ति का भौतिकवादी ही होता हैं।

प्रश्न भीतरी स्थिति का है। अन्तर इतना ही रहता है कि एक श्रेणी के व्यक्ति भौतिक वस्तुओं के प्रति भावनाएं रखते हैं, उनसे प्रेरणा प्राप्त करते हैं, उनकी प्राप्ति से सुखी और दुखी होते हैं, अपना लक्ष इन भौतिक पदार्थों और परिस्थितियों को ही बनाये रहते हैं। ऐसे लोगों को भौतिकतावादी कहा जाता हैं। दूसरी श्रेणी के व्यक्ति वे हैं जो भावना को महत्ता देते हैं, वस्तु को उसका उपकरण मानते हैं। वस्तुओं की निस्सारता, जड़ता और क्षणभंगुरता को समझते हुए केवल उनके सदुपयोग की बात सोचते रहते है। विश्व-मानव की श्रेय साधना ही उनका लक्ष होता हैं। जीवन की गतिविधियों का और अपनी कार्य पद्धति का निर्माण वे इसी आधार पर करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को अध्यात्मवादी कह सकते हैं।

भौतिकवादी और अध्यात्मवादी का अन्तर प्रत्येक पदार्थ और स्थिति में बिलकुल भिन्न होता है। यह भिन्नता ही उनके उत्थान और पतन का कारण बनती है। एक युवा लड़की को दो व्यक्ति ध्यानपूर्वक देख रहे हैं। इनमें से एक वासना की दृष्टि से और एक आत्मा की सुरम्य आभा देखकर पुलकित होने के लिए देखे तो बाह्य दृष्टि में दोनों की क्रिया एक होते हुए भी उनका प्रतिफल एक दूसरे से सर्वथा भिन्न होगा।

मंदिर में दो व्यक्ति भगवान का दर्शन तन्मयतापूर्वक कर रहे हैं। एक भावनापूर्वक इस प्रतिमा में घट-घट वासी सर्वव्यापी भगवान की झाँकी करता हुआ गद्-गद् होता है। दूसरा मुकुट शृंगार का, पत्थर आदि का मूल्य आँकता हैं और दूसरी प्रतिमाओं के बाह्य साधनों के साथ तुलना करता है, उसको समग्र दृष्टि विलास तक सीमित है। ऐसी दशा में दोनों का देव दर्शन भिन्न परिणाम ही उत्पन्न करेगा। एक और तीसरा चोर व्यक्ति जो मूर्ति का कीमती शृंगार चुराने की घात लगा कर खड़ा है और उसके लिए अवसर खोजने में तत्पर है, उपरोक्त दोनों व्यक्तियों से भी भिन्न प्रकार की परिणित का अधिकारी होगा। एक को भगवान के दर्शन का लाभ मिलेगा, दूसरा शृंगार एवं मन्दिर की शोभा की आलोचना करके मनोरंजन करेगा, तीसरा पाप में प्रवृत्त होकर दुख भोगेगा, पकड़ा गया तो जेल जायगा। इस प्रकार एक ही प्रकार से देव-दर्शन कर रहे तीन व्यक्ति तीन तरह की गति को प्राप्त होंगे।

एक व्यक्ति धन-संजय में अपना गौरव मानता है, स्त्री को रमणी एवं दासी के रूप में सुखोपभोग की सामग्री मानता है, अहंकार की तृप्ति में प्रसन्न होता है, तो उसे स्थिति की अनुकूलता एवं प्रतिकूलता के अनुसार सुख-दुःख मिलेगा। सच तो यह है कि उसे हर समय दुःख ही दुःख रहेगा। क्योंकि जो छोटी-मोटी सफलता मिलेगी वह तृष्णा की तुलना में कम ही होगी। इसलिए और अधिक की आकाँक्षा में उपलब्ध साधन अपर्याप्त एवं असन्तोषजनक ही मालूम पड़ेंगे और वह निरन्तर खिन्न ही बना रहेगा। भौतिकवादी दृष्टिकोण में सदैव, असंतृप्ति, कुढ़न एवं खिन्नता ही बनी रहेगी क्योंकि इस संसार की सब वस्तुएं मिल कर भी एक व्यक्ति की तृष्णा को पूरी नहीं कर सकती।

दूसरा व्यक्ति जो धन को ईश्वर की अमानत एवं उच्च आदर्शों के लिए सदुपयोग की सामग्री मात्र मानता है उसे धन के सम्बन्ध में अकुलाहट क्यों होंगी? उचित साधनों से जितना कमाया जा सकता है उतने का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर लेने की कला यदि याद हो तो थोड़े से पैसे में भी उतना आनन्द एवं सत्परिणाम प्राप्त किया जा सकता है जितना धन कुबेरों के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता। संसार में इतिहास में जगमगाते हुए महापुरुषों में से अधिकाँश निर्धन श्रेणी के थे। जो कुछ पास था उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करते हुए वे प्रगति के आवश्यक साधन एकत्रित कर सके। किन्तु जिनके पास धन के अटूट भंडार भरे पड़े थे उनने उससे अपना नाश ही किया, अगणित दोष, एवं दुर्गुण खरीद लिये जो निर्धनों को कदाचित ही प्रभावित करते है स्वविवेकी धनवान जितनी तेजी से अपना और समस्त समाज का नाश करते है। उतना अविवेकी निर्धन नहीं कर पाता। इन बातों पर विचार करते हुए अध्यात्मवादी दृष्टिकोण वाला व्यक्ति जो उचित मार्ग से काम कर सकता है उतने का सदुपयोग करते हुए सुख रहता हैं। वह यह सोच भी नहीं पाता कि धन का जमा होना न होना भी किसी के गौरव को बढ़ाने-घटाने का कारण बन सकता है।

नारी के प्रति माता, बहिन और पुत्री की पवित्र भावनाएं रखने वाला व्यक्ति कितना शान्त और सन्तुलित रहता है इसकी कल्पना भी लम्पट प्रकृति के दुष्ट दुराचारी एवं वासनाओं के कीड़ों के लिए कठिन होती है। वे सदा हाथ मलते और अपनी दुर्बुद्धि की आग में जलते रहते हैं, यदाकदा जो थोड़ी सी सफलता प्राप्त कर लेते हैं उतनी में भी अपनी प्रतिष्ठा को तो वे खो ही बैठते हैं। भले लोगों के बीच उन्हें घृणा, आशंका और तिरस्कार की ही दृष्टि से देखा जाता है। अपनी पत्नी में रूप यौवन या अन्य आकर्षण को खोजने वाले और उसी आधार पर सन्तुष्टि-असंतुष्टि की बात सोचने वाले लोग दांपत्ति जीवन का आनन्द क्या उठा सकेंगे? उनमें से हर एक को असंतोष ही रहेगा, क्योंकि मनुष्य अपूर्ण है। दूर से कोई पूर्ण भले ही दीखे पास से हर वस्तु अपूर्ण दिखाई पड़ती है, ऐसी दशा में पत्नी भी किसे मनोवांछित मिलेगी? हाँ, जिसने पतिव्रत धर्म की तरह पत्नी व्रत को आदर्श मान लिया है और उस धर्म कर्तव्य को निवाहते हुए जैसी भी कुछ सहधर्मिणी मिली है उसे पूर्ण प्रेम प्रदान करते हुए, सन्तोष और स्नेह के साथ शिरोधार्य करते हुए, क्षमा उदारता ओर आत्मीयता की भावना से उसकी त्रुटियों को निवाहते हुए सुधारने का सौम्य प्रयत्न करते हुए- जो अपने गृहस्थ को स्वर्गीय बनाना चाहेगा, उसे त्रुटिपूर्ण नारी प्राप्त होने पर भी सदा सुख शान्ति का ही दर्शन होता रहेगा।

अहंकार की तृप्ति के लिए अनावश्यक अपव्यय, फैशन, ठाट-बाट पदवी, मान सम्मान की आकाँक्षा जिसे बनी रहेगी उसे दूसरों का गुलाम बनकर रहना होगा। दूसरे क्या पसन्द करते हैं, दूसरों को प्रभावित कैसे किया जा सकता है यही सोचने में उसे अपनी शक्ति और सामर्थ्य का बहुत बड़ा अंश खर्च कर देना पड़ेगा। किन्तु जिसने सादगी को ही सौंदर्य और सज्जनता का प्रतीक माना है वह मितव्ययिता बरतते हुए सीधे-साधे ढंग का कम खर्चीला जीवन बना लेगा और सदा सुखी रहेगा। सामाजिक प्रतिष्ठा का माध्यम ठाठ-बाठ को मानना वस्तुतः बहुत ही छिछोरपन है। यदि ऐसा रहा होता तो रंग-मच पर सजा-धजा राज का अभिनय करने वाले नटों को संसार में भारी मान मिलता। बनावट का खोखलापन और ओछापन दूर से ही दीखता है। और हर समझदार आदमी उसे व्यंग, उपहास और बचकानेपन का ही प्रमाण मान सकता है। एक ओर ठाठ-बाठ के नाम पर आवश्यक कार्यों से भी वंचित रहना और उसके आडम्बर पर बहुत धन एवं समय खर्च करना, दूसरी ओर विचारशील लोगों की दृष्टि में उपहासास्पद बनना यह दुहरी मार ढोंगी अहंकारग्रस्तों पर पड़ती है। सादगी की सज्जनता का महत्व जो, समझते हैं वे अपनी शक्तियों का सदुपयोग दूसरी बातों में करते हैं और प्रगति पथ पर तेजी से अग्रसर होते चले जाते हैं।

संसार की वस्तुओं में सौंदर्य और सुख को तलाश करते हुए उनके पीछे दौड़ते रहने वाले लोग भौतिकवादी कहे जाते है और उनका यह दृष्टिकोण इसलिए अनुपयुक्त माना जाता हैं कि उसे अपनाने वाले को मृग तृष्णा की तरह आजीवन भटकते रहते भी कभी शान्ति और सन्तोष का दर्शन नहीं हो पाता। धनी, मानी व्यक्ति भी कितने अशान्त, उद्विग्न, असंतुष्ट और खिन्न रहते हैं, उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य कितना जर्जर का चुका होता है, उसका अनुभव दूरवर्ती को नहीं समीपवर्ती को ही हो सकता है। बाहर के लोग उनका ठाठ-बाठ देखकर यह कल्पना करते हैं कि यह लोग सुखी होंगे पर सच बात यह है कि जिस मार्ग पर ये चल रहे हैं उसमें, जीवन का निरर्थक अपव्यय हो जाने के अतिरिक्त लाभ कुछ भी नहीं मिलता।

वस्तुओं के प्रति अत्यधिक आकर्षण, उनके प्रति अनावश्यक मोह, आत्मघात के समान ही हानिकारक है। नर-तन जैसा सुरदुर्लभ अवसर इन्हीं बाल क्रीड़ा में बिना ढंग और जो कुछ कमाया धमाया है उसे कूड़े करकट की तरह यों ही छोड़कर चलते बनना इसमें कौन-सी बुद्धिमानी है। आशा और तृष्णा के झूले में झूलते हुए एक अतृप्ति की चसक सी जब नशे बाजों के व्यसन की तरह पीछे लग जाती है तो छूटती भले ही न हो पर उसका परिणाम नशे बाजों के द्वारा पूर्ण बर्बादी के बाद किये जाने वाले पश्चाताप जैसा ही होता है।


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जालंधर-में तुलसी जयन्ती के अवसर पर महाकवि को श्रद्धाँजलि देते हुए पंजाब के राज्यपाल श्री गाडगिल ने रहस्योद्घाटन किया कि अब भगवान, ने निश्चय किया है कि वे अवतार धारण नहीं करेंगे, क्योंकि इतने अवतार होने के बाद भी संसार की स्थिति में कुछ अधिक परिवर्तन नहीं हुआ। अब भगवान प्रतिभाशाली साहित्यकारों और कवियों के रूप में संसार के सम्मुख प्रकट होंगे। तुलसीदास ऐसे ही प्रतिभाशाली कवि थे।

हमें यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि सुख पदार्थों में नहीं भावनाओं में सन्निहित है। भावनाओं को जितना ऊँचा उठाया जायगा, जितना परिष्कृत किया जायगा, जितना आदर्शवाद का पुट दिया जायगा उतनी ही आध्यात्मिकता बढ़ेगी और उस अध्यात्मवादी दृष्टि कोण के आधार पर हर वस्तु सुन्दर, सुरम्य एवं आनन्ददायक दृष्टिगोचर होने लगेगी। सूर्य का प्रकाश पड़ने पर हर वस्तु चमकती है। इसी प्रकार अध्यात्मवादी दृष्टिकोण अपनाने वाले के पास जो साधारण वस्तु होगी, जो सामान्य परिस्थितियाँ रहेगी, जो सामान्य श्रेणी के मनुष्य रहेंगे वे सब आनन्ददायक, सन्तोषजनक उत्साहवर्धक एवं शान्ति प्रदान करने वाले परिलक्षित होने लगेंगे।

सहिष्णुता-सुखी जीवन का सम्बल

संसार में अनेक प्रकार के मनुष्य हैं और उनमें सबके स्वभाव, रुचि, प्रकृति आदि अलग-अलग हैं। कई व्यक्तियों के गुण-धर्म एक दूसरे के विरोधी भी होते हैं। फलतः वे बहुधा टकरा जाते हैं और कष्ट भुगतने पड़ते हैं। इस स्थिति को टालने का एक मात्र उपाय हैं-सहिष्णुता। हम सहनशील बने और प्रकृति की प्रतिकूलताएँ एवं मनुष्य की प्रतिकूल भावनाओं को शाँति-पूर्वक सहन करने की आदत डालें तभी हम संसार में सुख-पूर्वक जीवन निर्वाह कर सकते हैं।

हमारे ऋषि-मुनियों ने भी सहिष्णुता को मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक ही नहीं अनिवार्य माना है। असहिष्णु व्यक्ति कभी अपनी उन्नति नहीं कर सकता। आध्यात्मिक जीवन की बात छोड़ दें, व्यावहारिक जीवन में भी सहनशील बनने की निताँत आवश्यकता है। इसके बिना हम अपना जीवन सुख-पूर्वक नहीं बिता सकते। प्रकृति भी हमें सहिष्णुता का पाठ पढ़ा रहीं है। गरमी, सर्दी, बरसात का ऋतुएँ, भूख, प्यास, निद्रा आदि के आवेग प्रकृति द्वारा निर्मित किये गये हैं, जिन्हें इच्छा या अनिच्छा से सहन किए बिना हमारा निर्वाह नहीं हो सकता। अतएव हमें इन सब प्रतिकूलताओं को स्वेच्छा से सहन करने की आदत डालनी चाहिए।

जैसा कि ऊपर कहा गया है सब मनुष्यों के आचार-विचार, स्वभाव, रुचि आदि में भेद हुआ करता है। परन्तु आचार-विचारों में मत-भेद होते हुए भी हमें किसी के साथ द्वेष-भाव नहीं रखना चाहिए। हमें यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि हमारे ही आचार-विचार सबसे श्रेष्ठ हैं और अन्य सब लोग गलत मार्ग पर जा रहे हैं। इस प्रकार की भावना हमारे अहंकार की सूचक और पोषक कहलायेगी। हमें यह मानकर कि दूसरे व्यक्तियों के विचारों में भी कुछ सचाई हो सकती है, नम्रतापूर्वक उन्हें सहन करने की क्षमता प्राप्त करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि कोई व्यक्ति किसी कारणवश या अज्ञानवश हमें कटु वचन कहता है, गाली-गलोज करता हैं या ताड़ना देता है, तो उसके प्रति क्षमा-भाव दर्शाते हुए उसे हमें सहन करना चाहिए। क्षमा-भाव के उदय से हृदय के भीतर आध्यात्मिक प्रकाश का उदय होता है और जीवन में सुख और शाँति की मात्रा बढ़ती है। जो व्यक्ति यह सोचना हैं कि अमुक व्यक्तियों ने उसका अपमान किया, अनादर किया जा उसको किसी प्रकार कष्ट दिया अतः हमें उसका बदला चुकाना चाहिए, वह व्यक्ति स्वप्न में भी मानसिक शाँति नहीं पा सकता और न आध्यात्मिक मार्ग में ही अग्रसर हो सकता है। जिसमें प्रतिहिंसा की भावना भरी हुई है, जो बदले की भावना के कारण अस्थिर एवं क्षुब्ध हैं, ऐसे विकारग्रस्त हृदय में सच्ची शाँति किस प्रकार रह सकती है?

दुष्ट, दुराचारी, उच्छृंखल, अनाचारी, आतताइयों को सुधारने के लिए प्रयत्न करना आवश्यक है। उनकी उपेक्षा करने या क्षमा करने से वे और भी अधिक उच्छृंखल बन जाते हैं और अपनी सफलता पर मदान्ध होकर आगे अपनी दुष्टता को और भी अधिक बढ़ा सकते हैं, इसलिए उनका प्रतिरोध करने के लिए राजसत्ता, सामाजिक सहयोग अथवा व्यक्तिगत संघर्ष का मार्ग अपनाना पड़ता है। यह कठोर कार्य हाथ में लेते हुए भी रोगी की चिकित्सा करने जैसी उदात्त भावनायें ही मन में रखनी चाहिए। घृणा और द्वेष,पापों से करना चाहिए पापी से नहीं। गन्दगी की सफाई करने जैसे स्वच्छ भाव से भी अनीति का प्रतिरोध किया जा सकता है। इसका उपाय गाँधीजी ने एक व्यापक आन्दोलन के रूप में आरम्भ किया था और इस शक्ति द्वारा उन्हें ब्रिटिश सरकार जैसे शक्ति-शाली शत्रु को परास्त करने में सफलता मिली।

घृणा और शत्रुता के, असहिष्णुता एवं विक्षोभ के भाव जितनी हानि प्रतिपक्षी को पहुँचाते हैं, उससे अधिक अपनी हानि करते हैं। आग जहाँ रहती है पहले उसी को जलाती है। दुर्भाव रखने वाला उससे अधिक हानि उठाता है जितना कि जिसके प्रति दुर्भाव है उसे हानि होती हैं। इसलिए संघर्ष भी यदि आवश्यक हो तो उसे उदारता और सहिष्णुता की भावनायें रखकर ही करना चाहिए।

हम सहिष्णुता से ही आत्मिक उन्नति कर सकते हैं। ईश्वर हमारी परीक्षा लेने के लिए ही प्रतिकूलताओं एवं कठिनाइयों को हमारे सम्मुख उपस्थित करता है। अतः हम प्रतिकूलतायें देखकर घबरायें नहीं वरन् उन्हें हिम्मत के साथ आनन्दपूर्वक सहन करने की आदत डालें। हमें कठिनाइयों के बीच रहने में, उन्हें सहर्ष झेलने में आनन्द आना चाहिए। जो व्यक्ति कष्ट, अपमान, पीड़ा, दुःख, हानि वियोग को हँसते हुए सहन कर सकता है वही सच्चा सहिष्णु है, वही सच्चा आध्यात्मिक है और वही सच्चा ईश्वर परायण है। हमें किसी के दुर्वचनों को सुनकर क्रोध नहीं करना चाहिए। बल्कि उस व्यक्ति का अशाँत एवं दया पात्र समझ कर उस पर क्षमा भाव दर्शाना चाहिए। हम अपने आत्म स्वरूप का विस्मरण न करते हुए मान-अपमान, सुख-दुख, हानि-लाभ और संयोग-वियोग में सदा समबुद्धि रखें और क्रोध को अपना महान शत्रु मानकर उससे अलग रहे तभी हमारा जीवन सुखी हो सकता है। बदला लेने की, प्रतिहिंसा की शक्ति न होने से अनिच्छा पूर्वक सहन कर लेना सच्ची सहिष्णुता नहीं है। यदि मन में प्रतिहिंसा की भावना बनी रही तो हमारी सहिष्णुता, सहिष्णुता नहीं निर्बलता या कायरता ही होगी और प्रतिहिंसा की भावना अन्दर ही अन्दर हमारे चित्त को विषाक्त बना देगी। इस प्रकार विकारयुक्त चित्त में वैरभाव अपना घर बना लेता है, जिसके कारण चित्त की सारी शुभ वृत्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। यह अटल सत्य है कि हिंसा को प्रतिहिंसा से नष्ट नहीं कर सकते, उसे प्रेम, सहिष्णुता और क्षमा द्वारा ही जीता जा सकता है। जहाँ प्रतिहिंसा घुटने टेक देती है, वहाँ सहिष्णुता, क्षमा और प्रेम सफल होते हैं, यह अनुभवजन्य सत्य है।

सब से खेद और परिताप की बात तो यह है कि जो धर्म हमें प्रेम, सहिष्णुता, दया, क्षमा, करुणा और मैत्री का पाठ पढ़ा रहे हैं, उन्हीं धर्मों को लेकर हम आपस में विरोध, निंदा और घोर असहिष्णुता का वातावरण बनाये हुए हैं। धर्म जो मनुष्य को शाँति प्रदान करने के लिए बनाये गये थे आपस में टकराकर अशाँति के आगार बने हुए हैं। आज पानी में ही आग लगी हुई दिखाई देती है। हम अपने ऊंचे आदर्श से पतन के गहरे गर्त में गिर रहे हैं और वह भी परम पवित्र धर्म के नाम का। कैसी लज्जा-जनक बात है। आज प्रत्येक परिवार, संस्था, संगठन, समाज में असहिष्णुता, दलबन्दी, फूट, ईर्ष्या, द्वेष आदि दुर्गुणों का बोलबाला है, जिससे न केवल हमारा वैयक्तिक, पारिवारिक जीवन ही छिन्न-भिन्न और अशाँत बना हुआ है बल्कि हमारा राष्ट्रीय जीवन भी पामालडडडडड हो गया है। सबके हृदय में, मस्तिष्क में घोर असहिष्णुता का ताँडव चल रहा है, जिसके कारण हमने इस स्वर्गसम वसुन्धरा को घेरकर-कुण्ड बना रखा है और सब से बड़ा आश्चर्य तो यह है कि असहिष्णुता के इन दुष्परिणामों को देखते हुए भी हमारी आंखें अब तक नहीं खुल पा रही हैं। हम यह जरा भी नहीं सोचते कि यह क्षण भंगुर, नश्वर देह क्या इसी कलह और ईर्ष्या की अग्नि में जलाने के लिए है? क्या इस देवदुर्लभ मानुष तन को जो अनेक पूर्व जन्मों के पुण्य से प्राप्त हुआ है, इन्हीं क्षुद्र बखेड़ों में लगाकर सारा जीवन अशाँति में ही व्यतीत करें? क्यों हम जीवन की इस अमूल्य निधि का यह दुरुपयोग कर रहे हैं? क्यों हम आनंदमय संसार को, इस प्रेम के नन्दनवन को असहिष्णुता की ज्वाला से जलाकर खाक कर रहे हैं?

सहिष्णुता का ही दूसरा नाम तप है। यदि कोई प्रशंसा करे तो फूलकर कुप्पा न होना और यदि कोई गालियाँ दे तो गुस्से से लाल न हो जाना, दोनों अवस्थाओं में एक समान रहना, यह है सच्ची सहिष्णुता। जिसमें यह सहनशक्ति होती है, उसके जीवन में एक अनोखी मिठास, अपूर्व शाँति, अद्भुत सन्तोष और एक दिव्य अनुभूति का संचार होता है। सहन-शीलता में वह जादू की शक्ति है कि वह बुरे से बुरे व्यक्तियों को बदल देती है। महात्मा सुकरात का नाम तो आप ने सुना ही होगा। बड़े ऊँचे दर्जे के सन्त पुरुष थे वे, परन्तु दुर्भाग्य से उनका विवाह एक ऐसी स्त्री के साथ हो गया जो बड़ी ताड़का थी। सदैव क्रुद्ध रहती थी। बिना गाली कभी सीधे मुँह से बात नहीं करती थीं। सुकरात के शिष्यों ने कई बार कहा-’गुरुजी। यह कैसा संकट आपने पल्ले बाँध रखा है, इसे छोड़िये। हम आपका दूसरा विवाह करा देते हैं।” सन्त सुकरात कहते-”नहीं, ऐसी बात अब भूल कर भी मत कहना। यह मेरी परीक्षा का साधन है। यह मेरी सहिष्णुता की परीक्षा है कि मैंने क्रोध पर विजय पाई या नहीं?”

स्वाध्याय-सन्दोह-

आपत्तियों से डरिये नहीं-लड़िये

कठिनाइयों से लड़ने का अभ्यास कीजिये

मनुष्य का विकास सदा कठिनाइयों से लड़ते रहने से होता है। जो व्यक्ति कठिनाइयों से जितना ही भागता है, वह अपने आपको उतना ही निकम्मा बनाता है और जो उन्हें जितना ही आमन्त्रित करता है वह अपने आपको उतना योग्य बनाता है। मनुष्य के जीवन में सफलता उसकी इच्छा-शक्ति के बल पर निर्भर करती है। जो व्यक्ति जितना ही यह बल रखता है वह उतना ही सफल होता है। जिस व्यक्ति को कठिनाइयों से लड़ने का अभ्यास होता है, वह नई कठिनाइयों के आने पर उनसे भयभीत नहीं होता, वरन् जम कर उनका सामना करता है। कायरता की मनोवृत्ति ही मनुष्य के अधिक दुःखों का कारण होती है। निर्बल मन का व्यक्ति सदा बुरी कल्पनायें अपने मन में लाया करता है। वह अपने आपको चारों और आपत्तियों से ही घिरा पाता है। अतएव जीवन को सुखी बनाने का सर्वोत्तम उपाय कठिनाइयों का सामना करने को सदा तत्पर रहना ही है।

मनुष्य की कठिनाइयाँ दो प्रकार की होती हैं-एक बाहरी और दूसरी आभ्यन्तरिक अर्थात् भीतरी। साधारण मनुष्य की दृष्टि बाहरी कठिनाइयों की ओर ही जाती है, विरले ही मनुष्य की दृष्टि भीतरी कठिनाइयों को देखने की क्षमता रखती है। परन्तु वास्तव में मनुष्य की सच्ची कठिनाइयाँ आन्तरिक ही होती है, बाहरी तो आन्तरिक कठिनाइयों का आरोपण मात्र हैं। किसी भी प्रकार की परिस्थिति मनुष्य को लाभ अथवा हानि दोनों पहुँचाने की शक्ति रखती हैं। जो परिस्थिति मनुष्य को भयभीत करती है वही वास्तव में उसकी हानि करती है। यदि परिस्थिति कठिन हुई और उससे मनुष्य भयभीत न हुआ तो वह मनुष्य की हानि न करके लाभ ही करती है।

जिस व्यक्ति को अपने कर्तव्य पर पूरी श्रद्धा होती है और जो उसे पूरा करने के लिये सब कुछ करने को तैयार रहता है, उसे कोई भी परिस्थिति भयभीत नहीं करती। मनुष्य के मन में अपार शक्ति है। वह जितनी शक्ति की आवश्यकता अनुभव करता है उतनी शक्ति उसे अपने ही भीतर मिल जाती है।

-मनोविज्ञान और जीवन

हर समस्या हल हो सकती है

विचारों की शक्ति से ही संसार के सब काम होते हैं। यह जगत भी विचार से ही उत्पन्न हुआ है। जिस वस्तु से यह संसार बना है वह भी विचार ही है, जिसे वस्तु का जामा पहना दिया गया है। मनुष्य की सब सिद्धियाँ पहले विचार में आई और फिर वस्तु रूप में प्रकट हुई। ईश्वरीय कानून के आधार पर व्यवस्था के साथ जब विचारों का प्रयोग होता है तो रचनात्मक काम होते है, और उनसे हमको लाभ पहुँचता है किन्तु जब इनका दुरुपयोग होता है तो उनसे हमारा विनाश होता है और हमको हानि पहुँचती है।

ऐसी कोई कठिनाई नहीं है, चाहे वह कितनी ही बड़ी क्यों न हो, जिसे दृढ़ विचारों के सामने झुकना न पड़े और ऐसा कोई व्यावहारिक विषय नहीं है जो बुद्धि और आत्मिक बल से सफल न बनाया जा सके। जब आप बहुत गहराई के साथ और ध्यानपूर्वक अपने हृदय की परख करते हैं और काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि उसके चारों और घूमने वाले शत्रुओं को अपने वश में करते हैं तब कहीं आप विचारों की शक्ति को समझ पाते हैं। उस समय आपको मालूम होता है कि इन विचारों में जादू-सा कितना बल हैं और इसका प्रभाव अनिवार्य रूप से हमारी बाहरी अन्य बातों पर कितना पड़ता है? उस समय आपको यह बात समझ में आ जाती है कि यदि इन विचारों का उचित उपयोग किया जाय तो जीवन में परिवर्तन हो सकता है और उसे सुखी बनाया जा सकता है।

-’नर से नारायण’

जीवन में दुःखों का भी उपयोग है

हम दुःख से छुटकारा पाने का उपाय करें इसमें तो कोई बुराई नहीं, परन्तु दुःख का नाम लेते ही अधीर हो जाना, आपत्ति के आने पर कि कर्तव्य विमूढ़ होकर दूसरों पर अकारण दोषारोपण करना आदि ऐसी बातें हैं जिन पर हमको अवश्य विचार करना चाहिये। दुःख सर्वथा घृणास्पद ही है अथवा उसमें कई अंश भले भी मौजूद हैं, उसमें मनुष्य जाति का अहितसाधन करने के सिवाय कुछ अच्छाई भी है या नहीं, इस विषय में हमको विवेक-पूर्वक विचार करना चाहिये।

दुःख के परिणामों की ओर दृष्टि डालने से जान पड़ेगा कि वह कई अंशों में मनुष्य का शिक्षक और उन्नति का मार्गदर्शक है। शूरता और धैर्य की शिक्षा तो आपातकाल में ही प्राप्त हो सकती है। जिस मनुष्य ने बाल्यावस्था से ही आपत्तियाँ सहन की हो उसका अनुभव बहुत विस्तीर्ण हो जाता है। इसके विपरीत जन्म से ही लाड़-प्यार और सुख में रहने वाला मनुष्य प्रायः डरपोक हो जाता है। दुःख का नाम सुनते ही उसका चित्त व्यथित हो जाता है। इतिहास में सैंकड़ों दृष्टान्त ऐसे मिलेंगे जिनमें कि आपत्ति उठाने वाले मनुष्यों ने अपने अनुभव के सहारे बहुत कुछ कर दिखाया है।

-’जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्न’

धैर्यवान पुरुष संकटों की परवा नहीं करते

जीवन को सुख के साथ व्यतीत करने के लिये ही नहीं बल्कि अपने कर्तव्य कर्मों को उचित रीति से सम्पादन करके सफलता प्राप्त करने के लिये भी धैर्य की आवश्यकता होती है। कर्तव्य पथ में विघ्न आ जाने पर डरपोक मनुष्य लोगों की अप्रसन्नता का खयाल करके आगा-पीछा करने लगता है। किसी काम का निश्चय कर लेने के बाद यदि कभी उसे ऐसी आशंका होती है कि इस काम के करने से मेरी लोक-प्रियता नष्ट हो जायगी, या धन की हानि हो जायगी, अथवा किसी बड़े श्रीमान या अधिकारी का कोपभाजन होना पड़ेगा तो वह तुरन्त डर कर उससे पीछे पैर हटा लेता है। पर वास्तव में ऐसे ही समय पर नीतिमत्ता और सिद्धाँत-प्रियता की परीक्षा हुआ करती है। ऐसे अवसर पर धैर्यवान पुरुष संकटों की परवाह न करके अपने सिद्धान्तों की रक्षा करता है और अपने विवेक के आदेश के सम्मुख किसी की अन्याय युक्त आज्ञा को स्वीकार नहीं करता है। जब अच्छी तरह सोच विचार कर एक बार किसी कार्य का निश्चय कर लेता है, तो फिर चाहे उसके मार्ग में कितने ही विघ्न आवें वह अपने मार्ग से इधर-उधर नहीं हटता। वह अपने निज के तथा ईश्वर के भरोसे सब विघ्न बाधाओं को तिनके के समान तुच्छ समझता हैं। ऐसे दृढ़, धैर्यशाली उच्चकोटि के पुरुषों को लक्ष्य करके ही भर्तृहरि ने कहा है-”न्यायात्पयः प्रविचलन्ति पदं न धीरः।” ऐसे ही नीति धर्मयुक्त कर्तव्य पथ पर स्थिर रहने वाले सज्जन पुरुषों की कीर्ति सर्वत्र व्याप्त होती है और सर्व-साधारण उसे विश्वास की दृष्टि से देखने लगते हैं। यही साँसारिक सफलताओं का रहस्य है। विशेषकर जो व्यक्ति सार्वजनिक क्षेत्र में काम करते है और जनता को किसी उच्च-आदर्श के पीछे अग्रसर करना चाहते है, उनको इसके बिना कदापि सफलता प्राप्त नहीं हो सकती।

-’जीवन संग्राम’

दृढ़ निश्चय का सत्परिणाम

महाकवि कालिदास ने एक स्थान पर लिखा है कि “इस वस्तु की प्राप्ति के लिये दृढ़ संकल्प करने वाले मन को और नीचे की तरफ बहने वाले जल की चाल को कौन रोक सकता है?” निस्सन्देह जो मनुष्य आत्म-विश्वास की शक्ति के आधार पर किसी काम में हाथ लगाता है उसे सफलता अवश्य होती है। ऐसा मनुष्य न तो दूसरों के उपहास की परवा करता है, न अपने शत्रुओं से भयभीत होता है और न मित्रों के साथ छोड़ देने से घबड़ाता है। उसे अपने मार्ग से कोई विचलित नहीं कर सकता।

यह देखकर आश्चर्य होता है कि दृढ़प्रतिज्ञ मनुष्य के लिये संसार में कैसी सुगमता से मार्ग निकल आता हैं और पक्के निश्चय वाले के सामने से समस्त कठिनाइयाँ किस प्रकार गायब हो जाती हैं। जो मनुष्य पहले ही यह कल्पना करने लगता है कि मैं इस काम को नहीं कर सकता वह उस काम को वास्तव में कभी न कर सकेगा। पर उस दृढ़ मनुष्य को कौन परस्त कर सकता है जिसको अपने ऊपर पूरा भरोसा है और जो किसी उपहास अथवा विपरीत मत प्रकट करने की कुछ भी परवा नहीं करता। उसको अपने इष्ट मार्ग पर चलने से न तो निर्धनता रोक सकती है, न विपत्ति हतोत्साह कर सकती है, न कठिनाई विचलित कर सकती है। वह अपनी दृष्टि सदा अपने लक्ष्य पर रखता है और निरन्तर उसकी और बढ़ता चला जाता है।

-’सफलता का मार्ग’

शक्तियों का अपव्यय रोका जाय

शक्तियों के अपव्यय को रोकने से उनका संग्रह होता है और वह संचय बढ़ते-बढ़ते कुछ ही समय में समृद्धि का रूप धारण कर लेता है। उन्नतिशील लोगों के कार्य-क्षेत्र भिन्न-भिन्न भले ही रहे हो पर तरीका सभी ने एक ही अपनाया है- अपनी क्षमता को दुरुपयोग से बचाकर सदुपयोग में लगाना। उस मंत्र की साधना को जो कोई भी कर सकेगा उसे सिद्धियाँ मिले बिना रहेंगी नहीं। लक्ष्य भौतिक हो चाहे आध्यात्मिक तरीका यही अपनाना पड़ता है। जिन्हें भौतिक प्रगति अभीष्ट है वे अपनी भौतिक क्षमताओं का अपव्यय रोक कर उस कार्य में संलग्न करते हैं जिससे लाभ होने की आशा हो। इसी प्रकार आध्यात्मिक लक्ष्य वाले व्यक्ति निरन्तर यह ध्यान रखते हैं कि उनकी सामर्थ्य का प्रतिकूल दिशा में तनिक भी प्रयोग हो रहा हो तो उसे रोक कर अभीष्ट मार्ग पर लगाये जाने में पूरी-पूरी सावधानी बरती जाय।

संसार के प्रगतिशील देशों ने जो भौतिक प्रगति की है उसमें किसी देवता का वरदान नहीं वरन् उनकी यह सतर्कता ही प्रधान कारण बनी हुई है कि अपनी सामर्थ्य का उचित उपयोग किया जाय। इन सतर्कताओं से समय का सदुपयोग, धन का सदुपयोग, वाणी का सदुपयोग, विचारों का सदुपयोग व्यवहार का सदुपयोग, इन्द्रियों का सदुपयोग, भावनाओं का सदुपयोग, आदि का जिनने जितना ध्यान रखा है उन्हें उतनी ही मात्रा में प्रगति के पथ पर बढ़ चलने में, सफलता प्राप्त कर सकने में सुविधा हुई है।

समय को ही लीजिए वह मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति है। समय का उपयोग जिस दिशा में भी किया जाय उसी में आशातीत प्रगति होने लगती है। हम भारतवासी अपने समय में से एक चौथाई का भी सदुपयोग मुश्किल से कर पाते हैं, शेष तीन चौथाई आलस्य, प्रमाद, मटरगस्ती ओर फूहड़ ढंग से काम करने में बर्बाद होता रहता है। लोग समझते यह हैं कि हम सारे दिन काम में लगे रहते हैं, हमें फुरसत नहीं मिलती, पर जब यह जाँचा जाता है कि उनने इतने व्यस्त रहकर भी कितना काम कर लिया तो परिणाम बहुत ही स्वल्प और निराशाजनक दीखता है। व्यवस्था, कार्य-विभाजन, नियमितता के आधार पर पूरी दिलचस्पी एवं मनोयोग के साथ जो कार्य किये जाते हैं वे थोड़े समय में अधिक मात्रा में एवं उत्तम स्तर के बन पड़ते है। पर जो भार ढोने की तरह अधूरे मन से, अस्त-व्यस्त क्रम के साथ किये जाते हैं, उनमें सारा दिन गुजार देने पर भी प्रतिफल बहुत ही स्वल्प और घटिया स्तर का सामने आता है।

आमतौर से आजीविकोपार्जन में आठ घण्टे लगते हैं। आठ घण्टे सोने आराम के लिए निकाल दें तो शेष आठ घण्टे ऐसे बच जाते हैं जिनकी बर्बादी रोक कर यदि उन्हें व्यवस्थित कर लिया जाय तो एक नया जीवन किसी भी उन्नति के लिए मिल सकता है। आठ घण्टे के परिश्रम में आमतौर से रोजी रोटी की इतनी बड़ी समस्या जिस पर जीवन का सारा दारोमदार निर्भर रहता है हल हो सकती है तो सोने के बाद बचे हुए आठ घण्टे में किसी भी दिशा में आशाजनक प्रगति की जा सकती है। संसार में सभी उन्नतिशील लोगों ने इस बचे हुए समय का शिक्षा, स्वास्थ्य, उपासना, परमार्थ कला आदि की साधना में उपयोग किया है, और इतना लाभ उठाया है जितना सामान्य व्यक्ति पूरे समय उसी कार्य में लगे रहने पर उठा सकते है।

समय का मूल्य और महत्व ठीक तरह न समझने के कारण हम उसका सदुपयोग नहीं कर पाते। घड़ी तो कितने ही व्यक्ति बाँधे फिरते हैं पर एक-एक मिनट का कार्य-विभाजन और सदुपयोग करने वाले लोग उनमें से बहुत ही कम होते हैं। घड़ी का वास्तविक लाभ वही उठाता है जो अपने एक-एक क्षण का सदुपयोग करने की व्यवस्था ठीक रखने के लिए घण्टे मिनटों पर ध्यान रखे रहता है। आलस्य और प्रमाद ही हमारे दारिद्र और पतन का प्रमुख कारण हैं। जब तक उन्हें न छोड़ा जायगा, श्रमशीलता, फुर्ती, नियमितता, समय ही पाबन्दी अपने काम में पूरी दिलचस्पी रखने की आदत हम न डालेंगे तब तक इसी हीन दिशा में पड़ा रहना पड़ेगा। व्यवस्थित पुरुषार्थ ही भौतिक जीवन की समस्त सफलताओं का प्रधान कारण है। इसी देवता का अनुष्ठान करने से लोग तुच्छ परिस्थितियों से ऊँचे उठकर महानता का गौरव प्राप्त करने से समर्थ हुए हैं। हमें अपने समाज और देश को सुखी, सम्पन्न और समृद्ध बनाना, हो तो इन सद्गुणों को जन-जीवन में प्रवेश कराना पड़ेगा। धन सम्पत्ति आमदनी या सुख साधन किसी अन्य प्रकार से बढ़ जाने पर भी समय को गँवाते रहने वाले प्रमादी लोग दीन दरिद्र ही बने रहेंगे। उनकी बढ़ी हुई आमदनी निरर्थक अपव्यय में ही नष्ट होती रहेगी।

समय के सदुपयोग की भाँति ही धन का सदुपयोग अपना महत्व रखता है। धन कमाना कितने ही लोग जानते है पर उसका खर्च करना किन्हीं विरलों को ही आता है। जो पैसा स्वास्थ्य संवर्धन के उपयुक्त सात्विक आहार-बिहार की व्यवस्था में, मानसिक विकास के लिए न संवर्धन में, परिवार को प्रगतिशील बनाने के साधन जुटाने में, लोकहित के परमार्थकारी सत्कर्मों में खर्च किया जाना चाहिए, वह नशेबाजी, सिनेमा, शौकीनों, यारबाशी, फैशन एवं विलासिता के ठाठ-बाठ जमा करने जैसी निकम्मी बातों में बर्बाद होता रहता है। उपयोगी कार्य रुक जाते है। और निरर्थक बेहूदगियाँ सारा पैसा खा जाती हैं। आर्थिक तंगी, कर्जदारी बेहूदगियाँ सारा पैसा खा जाती हैं। आर्थिक तंगी, कर्जदारी के कष्ट से हमारा सारा समाज कराह रहा है इसका प्रधान कारण भी एक ही है खर्च का क्रम आमदनी के अनुरूप सन्तुलित न रखना। गरीब और कम आमदनी के अनुरूप सन्तुलित न रखना। गरीब और कम आमदनी वाले व्यक्ति भी जब तथा कथित ‘स्टेंडर्ड’ बनाने के फेर में न पड़कर अपनी औकात और हैसियत के अनुसार केवल उपयोगिता के लिए ही खर्च करने की नीति बना लेते हैं और अपव्यय की मूर्खता करना छोड़ देते हैं तो सीमित साधनों से भी उन्हें व्यवस्थित जीवन का आनन्द मिलने लगता है।

आर्थिक उन्नति के जितने भी महत्वपूर्ण उपाय हो सकते हैं उनमें सबसे प्रभावशाली यह है कि हर व्यक्ति पैसे का महत्व समझे और उसे केवल सदुद्देश्य के लिए, सद्व्यय करने की नीति का कठोरतापूर्वक पालन करने लगे। बेकार कामों में होने वाली धन की बर्बादी के लिए रोका जा सके और उसे जीवन विकास के कार्यों में विवेकपूर्वक प्रयुक्त किया जा सके तो वर्तमान आमदनी से भी हमें विकसित जीवन का लाभ मिल सकता है। यदि हमें अपने समाज को धनी बनाना हो तो कृषि, उद्योग, शिल्प, वाणिज्य आदि का संवर्धन करने के साथ ही यह और भी नितान्त आवश्यक है कि हर व्यक्ति के स्वभाव में मितव्ययिता और धन के सदुपयोग की बात गहराई तक बिठा दी जाय।


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-श्री अरविन्द

वाणी का सदुपयोग करना हम सीख जायें तो प्रिय-’हित और मित’ ही बोला करें। दूसरों की प्रसन्नता और हिम्मत बढ़ाने वाली आदर, विनय और मधुरता से भरी हुई वाणी सबको मधु से भी अधिक मधुर लगती है। उसे सुनने के लिए हर किसी के कान प्यासे रहते हैं। जिससे दूसरों का हित साधन होता हो ऐसी सन्मार्ग की प्रेरणा देने वाली उपयोगी बातें ही करने के लिए वाणी उपयोग किया जाय करे तो वह कितनी सार्थक बन सकती है? कोयल और कौवे की वाणी का अन्तर और उसका प्रतिफल जानते हुए भी हमारे स्वभाव में कटु-भाषण ही समाया रहता है। निन्दा, चुगली, व्यंग, उपहास, कठोरता, कर्कशता, अहंकार, दोषी, जैसी बुराइयों से भरी हुई दूसरों का दिल दुखाने वाली वाणी ही अक्सर हम लोग बोला करते हैं, कतरनी की तरह लबड़-लबड़ बेकार में जीभ चलाते रहने वाले बातूनी लोग अपना और दूसरों का समय बर्बाद करते है और बात का बतंगड़ बनाने के लिए कुछ न कुछ ऐसे प्रसंग उठाते हैं जिससे दुर्भावनाएँ बढ़ चलें। ‘खरी बात कहने’ के नाम पर तीर सी चुभने वाली कटु-भाषा बोलने वाले असंख्य लोग अन्ततः अपने चारों ओर शत्रुता का वातावरण बना लेते हैं। वाणी का सदुपयोग यदि सीख लिया जाय तो चारों और प्रेम की धारा बहने लगे और सहयोग एवं सद्भाव का स्वर्गीय वातावरण इस धरती पर सर्वत्र फैला-फैला दीख पड़ने लगे। क्लेश, कलह और द्वेष दुर्भाग्य वाणी के दुरुपयोग से बढ़ते हैं। सुसंस्कृत अभिभाषण का सद्गुण यदि व्यापक रूप से अपनाया जा सके तो सतयुग जैसी स्नेह सौजन्य भरी परिस्थितियाँ आज भी चारों और लक्षित हो सकती हैं।

इन्द्रियों के दुरुपयोग के कारण ही हमारा शरीर खोखला होता है। शाक-पात खाकर भी मनुष्य सौ वर्ष जी सकता है, पर जीभ का चटोरापन, कामेन्द्रिय की विषय वासना तथा अन्य इन्द्रियों का अपनी-अपनी मर्यादाओं का व्यतिक्रम करना अस्वस्थता एवं दुर्बलता का कारण बन जाता है। आम शिकायत है कि लोगों का स्वास्थ्य दिन-दिन गिरता चला जाता है और विविध विधि रोगों का आक्रमण तीव्रता के साथ बढ़ता जाता है। इनके कारण और निवारण ढूंढ़ने के लिए प्रयोगशालाओं में बड़े-बड़े अन्वेषण होते रहते हैं। इससे कुछ भी प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है। जिह्वा इन्द्रिय और कामेन्द्रिय पर अंकुश लगाये बिना, आहार और विहार में सात्विकी एवं संयम का समावेश किये बिना जीवनी शक्ति का क्षरण रोका न जा सकेगा और उसके बिना दुर्बलता, अस्वस्थता एवं अकाल मृत्यु का बढ़ता हुआ प्रकोप और किसी प्रकार रोका न जा सकेगा। असंयम ही हमारे स्वास्थ्य का प्रधान शत्रु है, उसे परास्त किये बिना शारीरिक सुख की आशा-दुराशा मात्र ही बनी रहेगी।

शिष्टाचार, नागरिकता की मर्यादाओं का पालन एवं कर्तव्य परायणता का नियन्त्रण स्वीकार न करके उच्छृंखलता की प्रवृत्ति बुरी तरह बढ़ती चली जा रही है। वासनाओं और तृष्णाओं में ग्रसित मनुष्य अनैतिक एवं उद्धत गतिविधियाँ अपनाते हैं और अपराधों की बढ़ोतरी होती जाती है। आवेशों पर नियंत्रण न रहने से लोग छोटे-छोटे कारणों को लेकर आपे से बाहर हो जाते हैं और न करने लायक उद्धत कृत्य कर डालते हैं। छुरेबाजी, हत्याएं, आत्महत्याएँ, मुकदमेबाजी, पार्टीबन्दी, षड़यन्त्र आदि की दुर्घटनाओं के पीछे मनुष्य की गलत ढंग से सोचने की आदत ही प्रधान कारण रही होती है। यदि लोग गम्भीरता पूर्ण सोचने, दूसरों की परिस्थिति समझने और उलझनों को शान्तिपूर्ण ढंग से सुलझाने का प्रयत्न करें, सहिष्णुता, सहनशीलता एवं सद्भावना से काम ले तो पेचीदा दीखने वाली उलझने भी सहज ही सुलझ जाया करें और भिन्नता के बीच एकता बनाये रहने का रास्ता निकला आया करे।

विचारों का असंयम मानव-जाति के लिए एक-भयंकर अभिशाप एवं दुर्भाग्य बना हुआ है। हम मानवोचित उत्कृष्ट आदर्शवादी विचारधारा परित्याग कर पशुओं एवं पिशाचों के ढंग से सोचते है। आकाँक्षाओं का स्तर बहुत ही निकृष्ट रहता है। साहस के अभाव में चिन्ता, भय, निराशा, शौक, क्षोभ से चित्त निरन्तर उद्विग्न बना रहता है। कलह और संघर्षों का, द्वेष और दुर्भावनाओं का विस्तार, विचारधारा का स्तर अधोगामी होने के कारण ही होता है। यदि लोग ऊँचे ढंग से सोच अपने मानवीय गौरव का स्मरण रहे और मनुष्यता की प्रतिष्ठा एवं मर्यादा के अनुरूप सोचे तो निकृष्ट गति विधियाँ अपनाने का अवसर ही न आवे। कुकर्मों की सृष्टि कुविचारों से ही होती है। दीनता-दरिद्रता और पतन के लिए निष्कृष्ट कोटि की विचारधारा ही उत्तरदायी है। यदि विचारशक्ति का संयम और सदुपयोग कर हम ध्यान देने लगें तो नर को नारायण और जीव को ब्रह्म के रूप से परिणत होते हुए देर न लगे।

जीवन अविकसित एवं निम्न स्तर का बना इसलिए पड़ा रहता है कि हम अपनी शक्तियों के महत्व को पहिचानते नहीं, उनको कुमार्ग से हटाने और सन्मार्ग पर लगाने का प्रयत्न नहीं करते। यह उपेक्षा जब तक बनी रहेगी तब बाह्य साधनों के द्वारा सुखी बनने के लिए किये गये प्रयत्न निष्फल ही जाते रहेंगे। मनुष्य अपने भीतर उतनी प्रचण्ड शक्ति और सामर्थ्य भरा बैठा है कि उसके सदुपयोग का संकल्प एवं साहस कर लेने से प्रगति का प्रत्येक द्वार खुल सकता है और मनुष्य ऊँचे से ऊँचे यहाँ तक की परमात्मा की समीपता प्राप्त करने तक की स्थिति उपलब्ध कर सकता है।

कठिनाइयाँ आपकी सहायक भी तो हैं।

अध्यात्म मार्ग पर चलते हुये पग-पग पर कठिनाइयों का समाना करना पड़ता है। जीवन-यापन के पर्याप्त साधनों का अभाव, परिजनों को वह व्यवस्थायें न जुटा पाना जिसकी वे हमसे अपेक्षा रखते हैं, दूसरे लोगों के विद्वेष व उपहास भरे व्यंग आदि, अनेकों कठिनाइयाँ हैं जो मनुष्य को उसके लक्ष्य से विचलित करती रहती हैं। इनसे भी बढ़कर अपना निज का आलस्य, मिथ्याभिमान, काम, क्रोध, भय व प्रलोभन ये भी तो वैसी ही कठिनाइयाँ हैं जैसी औरों द्वारा उत्पन्न की गई। इनके आते ही व्यक्ति का उत्साह घट जाता है और जिस लक्ष्य की ओर वह बढ़ा था उसे बीच में ही अधूरा छोड़ देता है और यह मान लेता है कि यह उसके बस की बात नहीं।

किंतु यह बात जानने की है कि कठिनाइयाँ मनुष्य की बाधक बनकर नहीं आती हैं वरन् उसके लक्ष्य को आसान बनाने के लिये ही आती हैं। किसी शायर ने इसी की भावाभिव्यक्ति करते हुये लिखा है :-

रंज से खूँगर हुआ ईंसाँ तो मिट जाता है जरा।

मुश्किलें मुझ पर पड़ी इतनी कि आसाँ हो गईं।

निरन्तर सफलता से तो संसार का केवल एक पक्ष समझ में आता है। कठिनाइयाँ हमें दूसरे भाग का भी बोध करा देती हैं। वे हमें यथार्थ में जीवन जीने की कला सिखा देती हैं। इनके बिना किसी भी प्रयोजन की सिद्धि, चाहे वह आध्यात्मिक हो अथवा साँसारिक सम्भव न होगी।

सुख और दुःख संसार रथ के दो पहिये हैं। एक का अस्तित्व दूसरे पर टिका है। एक दिन है तो दूसरा रात। एक शरीर है दूसरा प्राण। दोनों के मध्य से ही जीवन की सरिता का प्रवाह बहता हैं। यदि अन्धकार न हो तो फिर प्रकाश की महत्ता ही क्या रहेगी। तात्पर्य यह है कि जीवन को क्रियाशील बनाये रखने के लिये दोनों ही आवश्यक हैं। इनसे बचा भी नहीं जा सकता। जब तक शरीर है तब तक सुख-दुःख का निवारण नहीं हो सकता।

सुख प्राप्ति के मार्ग में जो परिस्थितियाँ बाधा उत्पन्न करती हैं उन्हें कठिनाइयाँ मानते हैं। धन-क्षय, शारीरिक व्याधियाँ, अप्रिय पुरुषों का संग, प्रियजनों से विछोह इन्हें ही मोटे तौर पर कठिनाइयाँ मानते है। आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति में मनोविकारों व स्वभावजन्य कुकृत्यों को कठिनाई माना जाता है। इन्हीं के कारण मनुष्य दुःखी रहता है। किन्तु यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो यही परिस्थितियाँ ही महान परिणामों की जननी हैं। उपनिषद्कार ने लिखा हैं “दिवमारुतह तपसा तपस्वी”। तप से ही आत्मोत्थान सम्भव है। तप का अर्थ कड़कती धूप में बैठ कर जप ध्यान करना, गहन शीत में स्नान करना अथवा शारीरिक तितीक्षा नहीं। इसका सर्वमान्य अर्थ यही है फिर मनुष्य मार्ग में आई हुई कठिनाइयों से निरन्तर संघर्ष करें। इनसे लड़ते हुये अपने लक्ष्य की प्राप्ति करें। हीरा बिना रगड़ लाये चमकता नहीं। मनुष्य बिना परीक्षा दिये पूर्णता प्राप्त नहीं कर सकता। कठिनाइयाँ और कुछ नहीं, वे एक कसौटी मात्र हैं जो आगे के लिये सचेष्ट करती हैं।

कोई विद्यार्थी यह कहे कि छमाही परीक्षा से न तो मैं उत्तीर्ण होता हूँ न ही अनुत्तीर्ण फिर क्यों कलम, दावात, कापी और कागजों में व्यर्थ खर्च करूं? कई बीमारी आदि का बहाना बनाकर उसे टाल भी देते हैं। किंतु चतुर अध्यापक उन्हें ऐसा करने से रोकते हैं और उन्हें बताते हैं कि यदि यह परीक्षा न दी तो यह कैसे अनुमान लगा पायेंगे कि वार्षिक परीक्षा में किन-किन विषयों में कितना परिश्रम करना है। पहली स्थिति में तो फेल होने की ही अधिक आशंका रहती है। ऐसे विद्यार्थियों की तरह अपने लिये भी यह उचित है कि अपनी प्रगति के लिये कठिनाइयों को जीवन का आवश्यक अंग मान लें।

बिना विपत्ति की ठोकर लगे विवेक की आँखें नहीं खुलती। सच्चे ज्ञान की कसौटी यह है कि उसे कठिनाइयों में प्राप्त किया गया हो। प्रसिद्ध उपन्यासकार श्री प्रेमचन्द्र ने लिखा हैं “विपत्तियों से बढ़कर तजुर्बा दिलाने वाला विद्यालय आज तक नहीं खुला।” कठिनाइयाँ मनुष्य के विकास का साधन हैं। जिस तरह आग की तेज भट्टी में तपाने पर सोने का रंग निखर आता है वैसे ही सच्चे व्यक्ति का जीवन कठिनाइयों की आग से परिपक्व बनता है। महात्मा गांधी, बुद्ध, ईसा, आदि महापुरुष पग-पग पर कठिनाइयों से लड़े थे तब महान सामाजिक व राजनैतिक क्राँतियों का उन्नयन कर सके थे।

विपत्ति में मानसिक शक्तियाँ अंतर्मुखी हो जाती हैं। इससे मनुष्य को सत्य असत्य, अपने पराये का यथार्थ ज्ञान होता है। आत्मीय स्वजनों की पहिचान भी कठिन समय आ पड़ने पर ही होती है-

कहि रहीम संपत्ति सगे बनत बहुत बहुरीति।

विपति कसौटी जे कसे तेई साँचे मीत॥

सच्चे मित्र की, आत्मीय की पहिचान कठिनाइयों में होती है। इसे और भी स्पष्ट शब्दों में व्यक्त करते हुये कवि ने लिखा है :-

रहिमन विपदा हूँ भली जो थोड़े दिन होय।

हित अनहित या जगत में जानि पड़े सब कोय॥

अपना हितैषी कौन है और कौन कपटपूर्वक धूर्तता का, धोखेबाजी का व्यवहार कर रहा है इसकी परीक्षा मुसीबत पड़ने पर ही होती है। सुखी जीवन के तो हजार साथी होते हैं पर मुसीबत पड़ने पर कोई सच्चा सगा ही काम देगा।

सन्मार्ग पर चलने वाले व्यक्ति की सच्ची परीक्षा कठिनाइयों में ही होती है। ऐसे अवसरों पर बहुधा लोगों को यह कहते सुना जाता है कि उन पर परमात्मा रूठा है। उनके दुर्दिन चल रहे हैं। पर स्थिति ठीक इससे विपरीत है। महात्मा स्वेट मार्डेन ने लिखा है-”जितने दुःख, जितनी विपत्तियाँ हमें प्राप्त होती हैं उनका कारण यही है कि अनन्त ऐश्वर्यशाली एवं सर्व-शक्तिमान परमात्मा से हम अलगाव का भाव बनाये हैं।” कठिनाइयाँ वह वरदान हैं जिन्हें देकर परमात्मा हमें अपने पास बुलाना अपनी पवित्र गोद में बिठाना चाहता है। सच्चे आध्यात्मवादी की पहिचान मुसीबतों में होती है। मुसीबतों में तपे बिना व्यक्ति अपने आप को ब्रह्मवादी घोषित करने का अधिकार नहीं पाता है, सच्चा ईश्वर-वादी वह है जो कहता है ‘मालिक मुझे सुख नहीं दुःख दे। सुविधायें नहीं मुसीबतें दे, ताकि तुम से विलग न होऊँ।’

विपत्ति वह खराद है जिससे परमात्मा अपने रत्नों की चमक बढ़ाता है। इसलिये आप देखिए कि आप के जीवन में भी कठिनाइयों है अथवा नहीं। आप आध्यात्मवादी हैं आपके जीवन में निरी कठिनाइयाँ बाघ की भाँति मुँह बाये खड़ी हैं। आप इसने विचलित तो नहीं हो रहे। यदि आप के पाँव लड़खड़ाते हैं तो सम्हल कर खड़े होइये। धर्म और अव्यवसाय का अवलम्बन कीजिये। जिसे धीरज है जो परिश्रम से पाँव पीछे हटाना नहीं जानता सफलता की देवी उसी के गले विजय-माला पहनाती है। धैर्य प्रारम्भ में कंकआडडडडडडड भले ही लगे किंतु उसका फल मधुर होता है।

आत्म-निर्भर बनने का और अपने में आत्म-विश्वास जागृत करने का एक ही गुरु-मंत्र है कि-आप अपने जीवन में कठिनाइयों को आने दीजिये, दूसरों के दुःख तकलीफ और मुसीबतों में हाथ बटाइये। दूसरों की सहायता कीजिए और परमात्मा आपकी सहायता करेगा। दूसरों के दुःखों को समझिए और अनुभव कीजिए कि आप असंख्यों से सुखी हैं, ऐसा दृष्टि-कोण बना लेने से कठिनाई और दुःख की परिस्थितियाँ टल जायेंगी और अपने पीछे सफलता की राह बना जायेगी। किसी कवि ने कहा है-

गम राह नहीं कि साथ दीजे।

दुःख बोझ नहीं कि बाँट लीजे॥

कठिनाइयाँ छोटे मनुष्यों को निस्तेज निष्प्राण बना सकती हैं किंतु महान वे हैं जो दुःखों की छाया में पलते हैं, औरों के दुःखों, मुसीबतों में हाथ बंटाते हैं। पुरुषार्थ भी इसी का नाम है कि व्यक्ति परिस्थितियों से संघर्ष करे। स्वयं उनका पराया न हो वरन् उन्हें वशवर्ती करें।

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एलफ्रेड एडलर का मत है कि भयभीत और हीन-भावनाओं के व्यक्ति वे होते हैं जिनके जीवन में कभी कठिनाइयाँ नहीं आई होती अथवा जो कठिनाइयों से कतराते या बचते रहते हैं ऐसे व्यक्तियों का मानसिक विकास रुक जाता है। ऐसे व्यक्ति छोटे-छोटे कार्यों में भी सफलता नहीं पाते। कठिनाइयाँ अपने आप में उतनी भयावह नहीं होती जितनी उनकी भयोत्पादक कल्पना। जब कभी किसी कठिनाई का आभास हो, आत्म-विश्वास जगाइये, निश्चय ही उससे आप को हितकर परिणाम प्राप्त होंगे।

पूर्व-काल में शैक्षणिक व्यवस्था ऐसा बनाई गई थीं जिसमें अनिवार्य रूप से छोटे-बड़े बालकों को गुरुकुल में रखकर अक्षर ज्ञान कम और व्यावहारिक जीवन में कठिनाइयों का अधिक से अधिक पाठ पढ़ाने का क्रम रखा जाता था। जब तक यह पद्धति चलती रही इस देश में साहसी, पुरुषार्थी, चरित्रवान और प्रतिभाशाली नररत्नों की कमी नहीं रही। किंतु जब से कठिन परिस्थितियों में रहकर जीवन बिताने का ह्रास हुआ तब से निर्बल निस्तेज और दुराचारी व्यक्तियों का ही बाहुल्य होता चला जा रहा है।

इन परिस्थितियों के रहते हुये किसी व्यक्ति, समाज, राष्ट्र का उत्थान सम्भव नहीं। कठिनाइयों से न जूझने का अर्थ यह है कि व्यक्ति सत्य की अवहेलना कर रहा है और मिथ्याचार को प्रोत्साहन दे रहा है। साहस सदाचार आदि नैतिक सद्गुण कठिनाइयों से विमुख होते ही पलायन कर जाते हैं तब फिर व्यक्तित्व के विकास का मार्ग अवरुद्ध होना ही निश्चित मानिये। एक व्यक्ति ने अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के लिये साधना उपासना का क्रम बनाया। पड़ोस वालों ने देखा तो लगे उपहास करने। बस उसका उत्साह ढीला पड़ गया। ऐसी अवस्था में सत्य की खोज करना एवं अपनी दुर्बलताओं से जूझना कहाँ बन पड़ेगा? पर दूसरे वे होते हैं जो यह मानते हैं कि उपहास करने वाले व्यक्ति हमें बुराइयों से सावधान रखने वाले पहरुये हैं। जो लोग उपहास और अवरोध की परवा न करते हुये अपने रास्ते पर चलते रहते हैं वे स्वयं सफलता प्राप्त करते हैं और दूसरों के लिये प्रेरणा का स्रोत भी बनते हैं। ऐसे ही व्यक्ति समाज का उत्थान कर सकते हैं। उन्हीं से आध्यात्मिक प्रगति का आशा की जा सकती है।

जीवन के विभिन्न व्यवसायों में चाहे वह लौकिक हो अथवा आत्मा परमात्मा की भक्ति से सम्बन्ध रखने वाले हो सब में कठिनाइयों के मार्ग से ही गुजरना पड़ेगा, शरीर मिला है तो रोग, शोक, बीमारी आदि आयेंगी ही। जीवनयापन के लिये कोई भी उद्योग करें, उसमें सब ओर लाभ ही लाभ हो यह संभव नहीं। सुख सुविधाओं की सामान्य इच्छा सभी को होती है फिर सारी सुख-सुविधायें आपको ही मिल जायेंगी इसकी कोई गारन्टी नहीं है। अतएव आप ऐसे समय में भी संतोष और धैर्य की वृत्ति बनाये रहें और अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति में लगे रहें तो आपका जीवन सफल माना जायेगा।

दुःख और कठिनाइयों में ही सच्चे हृदय से परमात्मा की याद आती है। सुख सुविधाओं में तो भोग और तृप्ति की ही भावना बनी रहती है। परमात्मा की याद तब आती है जब व्यक्ति असहाय-सा चारों ओर से अपने आपको कठिनाइयों से घिरा पाता है। इसलिये उचित यही है कि विपत्तियों का सच्चे हृदय से स्वागत करें। परमात्मा से माँगने लायक एक ही वरदान है कि वह कष्ट दे, मुसीबतें दे ताकि मनुष्य अपने लक्ष्य के प्रति सावधान व सजग बना रहे। कृष्ण के समक्ष अपनी इच्छा-व्यक्त करते हुये कुन्ती ने ऐसी ही कामना की थी-

विपदःसन्तु नः शाश्वत तत्र तत्र जगद्गुरो।

भवतो वर्शनम यत्स्पाद पुनर्भव दर्शनम्॥


Quotation

सत्योदका शीलतटा दयोर्मिः।

तत्रामिषेकं कुरु पाँडपुस

न वारिका शुध्यति चान्तरात्मा॥

महाभारत

हे पाँडुपुत्र। आत्मा ही नदी है। संयम का ही दूसरा नाम तीर्थ हैं। सत्य पानी है, शील तट है और दयापूर्ण व्यवहार लहरे हैं। ऐसी आत्म नदी में स्नान करके पुण्यभागवन। केवल तीर्थयात्रा से क्या लाभ। अंतरात्मा पानी से शुद्ध नहीं होती।

जगद्गुरो! हमारे जीवन में सदैव पग-पग पर विपत्तियाँ आती रहें क्योंकि विपत्तियों में ही निश्चित रूप से आप के दर्शन हुआ करते हैं और आपके दर्शन हो जाने पर फिर जन्म मृत्यु के चक्कर में नहीं आना पड़ता।” अपने अन्तःकरण की कुन्ती भी यदि ऐसी ही कामना करने लगे तो लक्ष्य प्राप्ति की आधी सफलता आप पा गये समझिये। पूर्णता की प्राप्ति कराने में कठिनाइयाँ आपकी बाधक नहीं सहायक ही होती हैं। उनके होने से ही तो संघर्ष करने का पौरुष प्रकट होता है और सुविकसित व्यक्तित्व के द्वारा किया हुआ प्रबल पुरुषार्थ कभी निरर्थक नहीं जाता। उससे लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में निरन्तर प्रगति ही होती जाती।

दान की सार्थकता

कोई किसान बीज बोने से पहले यह देख लेता है कि जिस जमीन में वह अपना अन्न बिखेरेगा वह उपजाऊ है या नहीं? यदि उसे विश्वास होता है कि यह जमीन इस लायक है कि बोया हुआ अन्न ठीक तरह उगेगा और एक दाने के हजार दाने पैदा होने में कोई अड़चन न आवेगी तो ही वह बोने का कार्य आरम्भ करता है। यदि उसे यह सन्देह है कि जमीन खराब है और बोया हुआ बीज निरर्थक चला जाएगा तो कोई किसान ऐसी गलती न करेगा कि अपना अन्न और श्रम नष्ट करे। बुवाई का कार्य चतुर किसान तभी आरम्भ करते हैं जब वे जमीन के उपजाऊ होने का पूरा भरोसा कर लेते हैं।

दान देना भी बिलकुल बीज बोने की तरह है। धर्म का पोषण करने के लिए ही हम दान देते हैं। धर्म से पुण्य और पुण्य से सुख मिलता है, इस मान्यता के आधार पर ही हम दान धर्म की प्रक्रिया अपनाते हैं। अन्यथा कोई व्यक्ति अपनी गाढ़ी कमाई का पैसा ऐसे कार्यों में क्यों खर्च करेगा जिसके बदले में उसे कोई लाभ नहीं होता। धर्म के लिए दान का महत्व है। इसलिए जिस कार्य के लिए भी दान किया जाय पहले उसे भली भाँति परख लिया जाय और यह अच्छी तरह जान लिया जाय कि इसके फल-स्वरूप पुण्य की उत्पत्ति होगी या नहीं?

उपजाऊ जमीन में ही बीज बोना बुद्धिमानी है। इसी प्रकार केवल उन्हीं कार्यों के लिए दान दिया जाना चाहिए जिनके फलस्वरूप संसार में सद्ज्ञान एवं सत्कर्म की अभिवृद्धि होने की सम्भावना दिखाई पड़े। किसान तभी एक दाना बोता है जब उसे सौ दाने उपजने की आशा होती है। दान भी ऐसे कार्यों के लिए करना चाहिए जो सौ गुने, अनेक गुने उत्पन्न होते सम्भव दिखाई पड़े। जो कार्य देश, धर्म, समाज और व्यक्ति की प्रगति में सहायक सिद्ध होते हैं-उन्हीं के लिए दान देना सार्थक कहा जा सकता है।

व्यक्ति के समाज के प्रति कुछ कर्तव्य हैं। सामाजिक प्राणी होने के कारण उसका व्यक्तिगत स्वार्थ भी सबके सम्मिलित स्वार्थ के साथ जुड़ा हुआ है। समाज की जैसी भली या बुरी स्थिति होती है। उसका फल उसमें रहने वाले व्यक्ति को भी भोगना पड़ता है। बुरे व्यक्तियों के बीच रहकर कोई अच्छा मनुष्य भी सुख शान्ति प्राप्त नहीं कर सकता है। अच्छे व्यक्तियों का समूह अपने किसी पिछड़े या गिरे हुए व्यक्ति को भी सहारा देकर ऊँचा उठा लेता है। इन तथ्यों पर ध्यान देते हुए मनीषियों ने ऐसी उदार व्यवस्था बनाई है कि हर व्यक्ति समाज को सुखी एवं समुन्नत बनाने के लिए अपनी कमाई का एक अंश समाज की स्थिति को उच्च बनाने के लिए लगाता रहे। इस कर्तव्य पालन का नाम ही दान है। दान समाज को समुन्नत बनाने वाली एक वैज्ञानिक प्रणाली ही है।

अस्तु, दान को केवल भावना का ही माध्यम न माना जाय वरन् देते समय यह भली प्रकार देख लिया जाय कि जिस कार्य के लिए यह दिया जा रहा है वह समाज के लिए उपयोगी है या नहीं? कार्य की जितनी उपयोगिता होगी उतना ही पुण्य फल कर्ता को मिलेगा। उसके विपरीत यदि अनुपयुक्त कार्य के लिए दान दिया गया है तो इससे जो बुराई बढ़ेगी उसका पाप भी देने वाले को लगेगा।

प्राचीन काल में ब्राह्मण वर्ग एक तपा हुआ, परखा हुआ, चरित्रवान एवं लोक सेवी जन समुदाय था। उसका सारा समय लोक हित के कार्यों में लगता था। अपने व्यक्तिगत खर्च की वे न्यूनतम सीमा रखते थे और अपने सारे प्रयत्न लोक हित की योजनाएं संजोने में लगाये रहते थे। उस जमाने में दान के लिए पात्रता-कुपात्रता की, उपयोगिता अनुपयोगिता की चिन्ता किसी को नहीं करनी पड़ती थी। जो कुछ देना हो ब्राह्मण के हाथ में दे दिया जाय, तो देने वाला पूर्ण निश्चित रहता था कि इस दिये हुए धन का उपयोग केवल समाज हित के कार्यों में ही होगा। जीवन निर्वाह का स्वल्प ध्येय लेकर अपरिग्रही ब्राह्मण सारा धन जन हित का योजना में ही लगाया करते थे। तब ब्राह्मण को देने का अर्थ, समाज के लिए-धर्म के लिए, सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए देना ही माना जाता था।

आज वैसी स्थिति नहीं रही। अब ऐसे ब्राह्मण कोई बिरले ही होंगे जैसे पूर्व काल में। अब दिया हुआ दान, प्राप्त करने वाले ब्राह्मण के व्यक्तिगत उपयोग की वस्तु बन जाती है। ऐसी दशा में यह सोचना ही होगा कि उस व्यक्ति का जीवन सत्प्रवृत्तियों के बढ़ाने में किस सीमा तक सहायक होता है। यही बात साधु-सन्तों के बारे में भी है। ब्राह्मण और साधु की क्रिया पद्धति एक ही थी केवल आश्रम भेद से, गृहस्थ, वानप्रस्थ संन्यास का अन्तर था। आज इनमें से कोई वर्ग ऐसा नहीं रह गया हैं जिसे आशंका एवं सन्देह की दृष्टि से न देखा जाय? व्यक्तिगत जीवन में अत्यन्त मितव्ययी, पूर्ण अपारग्रही, सामाजिक सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए अथवा सब कुछ उत्सर्ग किये रहने के गुण आदि न हो तो फिर उन्हें दान देने मात्र से पूर्वकाल की भाँति यह नहीं माना जा सकता कि इस दिये हुए दान का समाजहित के लिए सदुपयोग ही होगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि दान सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए-विशेषतया जनता की मानसिक, आत्मिक एवं नैतिक स्थिति को सुविकसित करने के लिये, विश्वस्त व्यक्तियों या संगठनों के हाथ में दिया जाय और उनके द्वारा होने वाले कार्यों का मूल्याँकन भली प्रकार करते रहा जाय कि उपयोग करने वाले उसे किस तरह व्यय करते हैं और उसका क्या परिणाम निकलता है? इन बातों का ध्यान न रखा जायगा तो दान का उद्देश्य ही नष्ट हो जायगा। कुपात्रों के हाथ में गया हुआ, कुकर्मों के लिये लगा हुआ पैसा भले ही वह दान पुण्य की धर्म भावना से दिया गया हो, दानी के लिये पाप का ही कारण बनेगा। समाज का जो अहित उस दान से होगा उसका उत्तरदायित्व भी उस पर है, जिसने अविवेकपूर्वक दान देकर दुष्प्रवृत्तियों के पोषण में प्रत्यक्ष रूप से सहायता की।

कितने ही निठल्ले, आलसी, ढोंगी, व्यसनी, नशेबाज एवं दुराचारी व्यक्ति धर्म का आडम्बर ओढ़कर भोले भावुक व्यक्तियों से दान प्राप्त करते हैं और उस उपलब्ध धन को दुष्कर्मों में खर्च करते हैं। ऐसा दान आलस, व्यसन, दम्भ, दुराचार एवं नशेबाजी की अभिवृद्धि का कारण बनता है। पोषण पाकर वे दुष्प्रवृत्तियाँ तेजी से बढ़ती है और उनका बुरा परिणाम सारे समाज को भोगना पड़ता है। यदि ऐसे कुपात्रों को निराश होना पड़ा होता, उन्हें सहायता न मिली होती तो सम्भव था कि ठोकर खाकर वे सुधरने या बदलने का प्रयत्न करते। पर जिनने इन निकम्मे और अवांछनीय व्यक्तियों को उन्हें पतनकारी स्थिति में पड़े, रहने के लिये सुविधा प्रदान कर दी वस्तुतः वे ही उस पाप के निमित्त हुए और अविवेकी दाताओं की तरह उन्हें भी उस अव्यवस्था को उत्पन्न करने का पाप भुगतना पड़ेगा।

दीन, दुःखी, पीड़ित, परेशान, भूखे, रोगी, अपंग स्थिति में पड़े हुए व्यक्तियों को दान देना आवश्यक है। यह उदारता और दयालुता की माँग है कि कष्ट में पड़े हुए लोगों को सुविधा देने के लिये जहाँ तक सम्भव हो दूसरे लोग सहायता करें। पर यह सहायता भी ऐसी होनी चाहिये जो उन्हें आलसी, या परावलम्बी न बना दे। मनुष्य में एक दोष यह रहता है कि जब उसे बिना परिश्रम किये सुविधाएँ मिलने लगती हैं तो वह उत्तरदायित्व एवं पुरुषार्थ के झंझट से बचने का अभ्यस्त बनने लगता हैं। दान को व्यवसाय बना लेने वाले और उसे अपना अधिकार मानने वाले लाखों व्यक्ति हमारे देश में मौजूद हैं, यह एक दुर्भाग्य की ही बात मानी जा सकती है।

जो सर्वथा अपंग असमर्थ हैं उनको जीवित रखने के लिये निर्वाह की आवश्यक व्यवस्था की जानी चाहिये। यह व्यवस्था नियमित और क्रमबद्ध होनी चाहिये ताकि कभी अधिक कभी कम की विपन्नता उन्हें न सहनी पड़े। हर घड़ी चिन्तित या व्यग्र न रहना पड़े। ऐसी संस्थाएँ बनानी चाहिये जो अधिकारी अपंग लोगों के भरण पोषण का दायित्व अपने सिर पर लें। भिक्षुकों के निरन्तर माँगते रहने की आदत से उनका अधिक पतन होता है और कई भिक्षुक अनुपयुक्त कार्यों में भी उस पैसे का दुरुपयोग करते हैं, कई तो भिक्षा से ही जोड़-जोड़कर धन जमा कर लेते हैं जो पीछे निरर्थक चला जाता है। इसके विपरीत दुर्बल संकोची या अधिक असमर्थ अपंगों को अभावग्रस्त स्थिति में जीवन समाप्त करना पड़ता है। इस दुविधा से अपंगों को बचाने के लिए ऐसी सामाजिक संस्थाओं को विकसित होना चाहिए जो असमर्थों का उचित उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर उठाती हुई मानवता की एक सुव्यवस्थित सेवा कर सकें।

इसके अतिरिक्त जो लोग बेकारी या मानसिक दीनता के कारण भिक्षा माँगते हैं उन्हें किसी उद्योग में लगाने की सुविधा मात्र देकर उन्हें उपार्जन कार्य में लगाना चाहिए। छोटी-छोटी शारीरिक या मानसिक कमी के रहते हुए भी यदि उसे सुविधा प्राप्त हो तो अपने गुजारे के लिए स्वयं उपार्जन कर सकता है। इससे उसमें स्वावलम्बन एवं स्वाभिमान बना रहेगा और साथ ही किसी के दान का दुरुपयोग भी न होगा। कुछ संगठन ऐसे भी होने चाहिए जो अर्ध-असमर्थों को काम में लगाने के लिए गठित हो और दान न देकर उन्हें सुविधापूर्वक श्रम प्रदान करें। अनाथों, विधवाओं, वृद्धों या अन्य प्रकार के अभावग्रस्त लोगों के लिए यदि उपार्जन साधनों का कोई प्रबन्ध हो सके तो वह छुट-पुट दान की अपेक्षा कही अधिक महत्वपूर्ण हो सकता है।

ऐसे संगठित प्रयत्न जब तक विकसित न हों तब तक व्यक्तिगत रूप से भी उन्हीं बातों का ध्यान रखते हुए अपंग असमर्थों की सहायता करनी चाहिए। दान की मात्रा अधिकाधिक हो यह प्रसन्नता की ही बात होगी। बात केवल इतनी-सी विचारणीय है कि उसका सदुपयोग हुआ या नहीं। सदुपयोग पर ही तो दान की सार्थकता निर्भर रहती है।

पीड़ितों और असमर्थों की सहायता जिस प्रकार आवश्यक है उसी प्रकार समाज में सद्ज्ञान एवं सद्भावों की वृद्धि भी आवश्यक है। दुष्प्रवृत्तियाँ अपने आप बढ़ती और फैलती हैं पर सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए बहुत प्रयत्न और पुरुषार्थ करना पड़ता है तब कहीं थोड़ी-सी अभिरुचि उधर मुड़ती है। मनुष्य कुविचारों को छोड़कर सद्विचारों का अभ्यासी बने, कुमार्ग छोड़कर सन्मार्ग पर प्रवृत्त हो, ऐसी प्रेरणा देने वाले भावनात्मक प्रयत्नों का होना और बढ़ना किसी भी समाज का स्तर ऊंचा उठाने के लिए आवश्यक है। ऐसी प्रवृत्तियाँ सहयोग एवं साधनों के अभाव में मुरझाई पड़ी रहती हैं उन्हें सींचा जा सके तो वे मानवीय दृष्टिकोण को व्यापक बनाने में बहुत सहायता कर सकती हैं। आवश्यकता इसी बात की है कि ऐसे सद्ज्ञान प्रसाधनों को आरम्भ करने और सींचने में दान वृत्ति को सार्थक बनाने वाले विचारशील आगे बढ़ कर दूसरे दान देने वालों का मार्ग-दर्शन करते रहें।

हमारे देश में दान बहुत होता है। दान को धर्म का एक आवश्यक अंग बना कर हिन्दू-धर्म के आविष्कर्ता ऋषियों ने एक बहुत ही सुन्दर परम्परा को जन्म दिया है। पर उसकी सार्थकता तभी मानी जा सकती है जब उसमें विवेक का पूरा समन्वय रहे। पात्र-कुपात्र का ध्यान रखा जाय और यह देखते रहा जाय कि दान का उद्देश्य पूरा हुआ कि नहीं। दान ठीक उसी प्रकार का एक वैज्ञानिक कार्य है जैसा किसान का बीज बोना। बीज बोते समय भूमि की परीक्षा जिस प्रकार कर ली जाती है उसी प्रकार दान देने से पूर्व जिस व्यक्ति या जिस कार्य के लिए दिया जा रहा हैं उसकी उपयुक्तता को भली प्रकार परख लिया जाना भी आवश्यक है।


सन्त की सरल प्रकृति

सन्त तुकाराम को कहीं से कुछ गन्ने प्राप्त हुए। वे उन्हें लेकर घर आ रहे थे। रास्ते में बच्चे मिलते गये। बालक सन्त की सरल प्रकृति को जानते थे। वे गन्ने माँगते गये और सन्त उन्हें एक-एक बाँटते। पर पहुँचते-पहुँचते केवल एक गन्ना शेष रहा। शेष रास्ते में बालकों को ही बँट गये।

तुकाराम की पत्नी को गन्ने घर आने की पूर्व सूचना मिल चुकी थी। वह बहुत गन्ने घर आने की आशा लगाये बैठी थी। हाथ में केवल एक ही देख कर उसका कर्कश स्वभाव और भी उग्र हो गया। कारण पूछा तो तुकाराम ने सारी बात सरलतापूर्वक बता दी। क्रुद्ध पत्नी ने वह एक गन्ना भी उनकी पीठ पर दे मारा। गन्ने के दो टुकड़े हो गये।

हँसते हुए सन्त तुकाराम ने कहा-देवि, तुमने ठीक बँटवारा कर दिया। इन दो टुकड़ों में एक तुम ले लो, दूसरा मुझे दे दो। जो कुछ थोड़ा बहुत भगवान ने दिया है उसे मिल बाँट कर खाना ही ठीक है।


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ऋजुँ पश्यत मा वज्रं डस्यं षडत माक्तम। दीर्ध पश्यत मा हस्वं परं षश्यत नापरम॥

अपनी दृष्टि सरल रखो, कुटिल नहीं। सत्य बोलो, अनृत नहीं। दीर्घदर्शी बनो, अल्पदर्शी नहीं। परमतत्व को देखो, क्षुद्र वस्तु को नहीं।

हमने पाश्चात्य लोगों के दोष दुर्गुण सब सीख लिए उनका अन्धानुकरण करने में बन्दर को भी मास्त कर दिया पर वे सद्गुण न सीखे जिनके कारण वे आज स्वास्थ्य धन, विद्या, विज्ञान एवं प्रसन्न रहने और सुखमय जीवन यापन कर सकने की सफलता प्राप्त कर सकने में समर्थ हुए हैं। सीखना ही हो तो आज के पाश्चात्य जगत से हमें उनके वे सद्गुण सीखने चाहिएं जिनके कारण वे अपनी निर्धारित दिशा में सफलता पर सफलता प्राप्त करते हुए आगे बढ़ते चले जा रहे हैं। हमें न केवल व्यावहारिक सद्गुणों में ही पाश्चात्य लोगों से आगे बढ़ना है वरन् आध्यात्मिक उच्च आदर्शों से अपनी वाणी ही नहीं क्रिया को भी इतना सशक्त बनाना हैं जिसका अनुकरण करने के लिए हमारा विश्व आह्लादित हो और अन्तर्राष्ट्रीय जगत में जो सर्वनाश की भयानक संभावनाएं दिखाई पड़ रहीं हैं वे स्नेह, सहयोग में बदल कर सच्ची विश्व शान्ति की भूमिका सम्पन्न कर सकें।

प्रगतिशील-विद्यासागर

बंगाल के प्रसिद्ध विद्वान ईश्वर चंद्र विद्यासागर अपने जीवन के अंतिम दिनों में भारत के आकाश में उज्ज्वल नक्षत्र की तरह चमकने लगे थे। उनने संस्कृत में उच्च परीक्षाएं पास की। सैंकड़ों को विद्या दान दिया। संस्कृत कालेज के प्रिंसिपल हुए, अनेक ग्रन्थ लिखे। संस्कृत सीखने की सरल विधि निकाली। तथा नारी उत्थान के लिए बहुत काम किया।

बंगाल में उन दिनों विधवाओं की बड़ी दुर्दशा थी। कुलीनता के नाम पर वयोवृद्ध पुरुष भी कई-कई लड़कियों से विवाह कर लेते थे और उन्हें विधवा छोड़कर चले जाते थे। ऐसी विधवाओं की एक बहुत बड़ी संख्या बंगाल में थी। उनकी हृदयस्पर्शी दुर्दशा से द्रवित होकर विद्यासागर ने विधवा विवाह आन्दोलन चलाया। ‘बोधिनी’ पत्रिका निकाली और विधवा विवाह के समर्थन में एक बड़ा ग्रन्थ लिखा जिसमें शास्त्र पुराणों के द्वारा अपने मत की पुष्टि की गई थी। इस आन्दोलन से पुरातत्व पंथियों में बड़ा बावैला मचा और वे उन्हें जान से मार देने तक की धमकियाँ देने लगे। पर वे जरा भी विचलित नहीं हुए और उस आन्दोलन को दृढ़तापूर्वक चलाते रहें। उन्होंने अपने खर्चें से सौ से अधिक विधवाओं के विवाह कराये। उन्हीं के प्रयत्न का फल था कि समाज का इस ओर ध्यान गया है और कुलीन कहलाने वाले हिन्दुओं में भी विधवा विवाह की प्रथा चल पड़ी। उनने जोर डालकर सरकार से एक कानून भी पास करवाया जिसके अनुसार विधवा विवाह उचित ठहराया गया और विधवाओं तथा उनके बच्चों को भी उत्तराधिकार प्राप्त हुआ। उनके द्वारा किये हुए कार्यों को देखते हुए सरकार ने उन्हें सी. आई. ई. की उपाधि दी।

इन महापुरुष की सादगी विलक्षण थी। एकबार एक युवक थोड़ा सामान लिए स्टेशन पर कुली की प्रतीक्षा कर रहा था, कुली न मिलने से परेशान था। विद्यासागर उधर से निकल रहे थे। उनने युवक की परेशानी का कारण मालूम किया और उसका बोझा सिर पर रखकर उसे यथा, स्थान पहुँचा दिया। युवक पैसे देने लगा तो उनने अपना परिचय दिया और कहा अपना काम आप करने की आदत डालो यही मेरी मजदूरी हैं। युवक बहुत शर्मिन्दा हुआ और क्षमा माँगने लगा।

उनकी आमदनी अच्छी थी पर वे अपने लिए कुछ भी न रखते थे। जो कमाते गरीबों विद्यार्थियों और मुसीबत ग्रस्त लोगों में बाँट देते थे। यह सहायता कार्य वे गुप्त रूप से करते थे ताकि किसी को उनकी प्रशंसा करने या कृतज्ञता प्रकट करने का अवसर न मिले।


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धन नहीं, मानव

पं. मोतीलाल अपने पीछे धन नहीं, एक मानव छोड़ना चाहते थे, और उन्होंने वैसा ही किया भी।

यह सुनने पर कि मोतीलालजी अपने लड़के जवाहरलाल को शिक्षा के लिए विदेश भेजना चाहते हैं, मोतीलाल जी के समकालीन तथा इलाहाबाद के प्रसिद्ध वकील श्री सुन्दरलाल ने उनसे पूछा-विदेश में जवाहरलाल की शिक्षा पर कितना व्यय होगा? मोतीलाल जी ने कहा- अनुमानतः एक लाख रु.।

श्री सुन्दरलाल ने सोचा कि यह धन का अपव्यय है। उन्होंने मोतीलालजी से कहा कि अगर आप यह राशि सुरक्षित रखे दें तो जवाहरलाल के जीवन भर काम आयेगी।

मोतीलालजी ने तुरन्त उत्तर दिया मैं अपने पीछे धन नहीं, एक मानव छोड़ना चाहता हूँ।

यह ईश्वरचंद्र विद्यासागर बहुत ही गरीब घर में जन्में थे। इनके पिता दो रुपया मासिक पर नौकरी करते थे। इतने से पैसों में उनके सारे परिवार को गुजर करनी पड़ती थी। रोशनी के अभाव में उन्हें कई बार सड़क की बत्तियों के नीचे खड़े होकर अपना पाठ याद करना पड़ता था। इतनी कठिन स्थितियों को पार करता हुआ वह बालक आगे बढ़ा और जीवन के अन्त तक जब तक कि उसकी अन्तः स्फूर्ति जागृत रही तब तक बढ़ता ही रहा। औरों के लिए भी वह रास्ता खुला हुआ ही है।

कृपया बहुत झूठ मत बोला कीजिए

गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है “नहिं असत्य सम पातक पुँजा।” असत्य के समान पापों का समूह ओर कोई नहीं है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि समस्त पाप-समूह की जड़ असत्य ही हैं तो कोई अत्युक्ति न होगी। ऋषि, मुनियों, सन्तों, श्रुति, स्मृतिकार सभी ने एक स्वर से असत्य की निन्दा की हैं। सभी धर्मों ने असत्य को पाप माना हैं, और इसे समस्त पापों की जड़ बताया है।

आज के बुद्धिवादी और वैज्ञानिक युग में प्रत्येक बात चाहे वह किसी भी महापुरुष की लिखी या कही क्यों न हो वह जब तक वैज्ञानिक परीक्षा में खरी नहीं उतरती तब तक उसे सही मानने के लिए लोग तैयार नहीं होते। किन्तु विज्ञान ने भी असत्य को मनुष्य के शारीरिक और मानसिक क्षेत्र पर दूषित प्रभाव डालने वाला, असाधारण प्रतिक्रिया पैदा करने वाला सिद्ध कर दिया है। असत्य, या झूठ बोलने से मनुष्य के मन, शरीर पर ही नहीं उसकी समस्त क्रिया, चिन्तन-प्रणाली, भावनाओं पर गहरी प्रति-क्रिया उत्पन्न होती है। इनमें असन्तुलन अव्यवस्था पैदा हो जाती है, जिससे अनेकों दुष्प्रवृत्तियों को पोषण मिलता है, बुरे कहे जाने वाले कार्यों की वृद्धि होती है। तात्पर्य यही है कि अनेकों पाप कर्मों का सूत्रपात हो जाता है और उनसे पैदा होने वाले दुष्परिणाम स्वरूप मनुष्य को नारकीय कष्ट यन्त्रणाओं का पात्र बनना पड़ता है। झूँठ के सम्बन्ध में दूरदर्शी तत्वज्ञ, जीवन विज्ञान विशारद ऋषियों की वाणी, मानव जाति को उनके निर्देश, विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरे हैं।

प्रसिद्ध मानस रोग विशेषज्ञ डॉक्टर क्रुक्स ने अपने प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध कर दिया कि “अपने काम धन्धे अथवा किसी अन्य कारणवश लगने वाले कर अथवा जुर्माने को झूठ बोलकर बचा लेने वाले, दूसरे के लिए हुए पैसे को हजम कर जाने वाले व्यक्ति अपने लिए मानसिक, स्नायविक रोगों को निमन्त्रण देते हैं। इस तरह झूठ बोलने से मानसिक स्नायविक संस्थान में बड़ी गड़बड़ी और असन्तुलन पैदा हो जाता है जिससे शारीरिक स्थिति पर भी भारी प्रभाव पड़ता हैं।” विशेषज्ञ ने लिखा है कि इस तरह की चालाकी, धोखेबाजी से कुछ पैसा बचाया जा सकता है किन्तु इसके बदले होने वाली शारीरिक और मानसिक गड़बड़ी इससे कहीं अधिक हो जाती है। इन व्यक्तियों की शारीरिक अथवा मानसिक चिकित्सा की जाय तो असत्य के द्वारा कमाये हुए धन की अपेक्षा कहीं अधिक खर्च करना पड़ता है। “पाप की कमाई मूल को भी ले जाती है” “असत्य द्वारा अर्जित धन नष्ट हो जाता है” आदि ऋषि वाक्य, महापुरुषों के उपदेश भी खूब रूप में उक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करते हैं।

मिथ्या भाषण, मिथ्याचार से शरीर और मन पर बहुत दूषित प्रभाव पड़ता है। झूठ जितना बड़ा होगा उतने ही बड़े वह दुष्परिणाम भी पैदा करता है। झूठ बोलने से मनुष्य के रक्तचाप, नाड़ी, श्वास क्रिया, पाचन प्रणाली, मस्तिष्क आदि प्रमुख अंगों पर बहुत भारी प्रभाव पड़ता है। इनमें अव्यवस्था और व्यतिक्रम पैदा हो जाता है जिससे कई शारीरिक और मानसिक रोगों को जन्म मिलता है। झूठ बोलने से मनुष्य के मानसिक क्षेत्र में द्वन्द्व पैदा हो जाते हैं। उसकी नैतिक सत्ता जो हर व्यक्ति में मूल रूप से निवास करती है, के साथ असत्य बोलने की अनैतिक क्रिया का द्वन्द्व होने लगता है। इस द्वन्द्वात्मक स्थिति में कई लोग विक्षिप्त और स्थायी मानसिक रोगी बन जाते हैं। कई बार झूठ बोलने पर मनुष्य में स्थायी रूप से असत्य बोलने की आदत बन जाती है और इससे प्रेरित हो वह अपने निकटतम सूत्रों परिवार के सदस्यों मित्रों तक से झूठा व्यवहार करने लगता है, जिससे सभी को सन्देह और विरक्ति हो जाती हैं। झूठे व्यक्ति का कोई सच्चा सहयोगी संगी साथी नहीं रहता फलतः उसका बाह्य जीवन नीरस, शुष्क, कृत्रिमता प्रधान बन जाता है जिससे वह असन्तुष्ट उद्विग्न अशान्त रहता है। इस तरह झूठ बोलने से मनुष्य का आन्तरिक एवं बाह्य जीवन असफल, झूठा प्रपंच मात्र बनकर रह जाता है।

यह भी ध्रुव सत्य है कि चाहे कितना ही छिपाकर अन्धेरे में, दीवारों के घेरे के भीतर, या चिकनी चुपड़ी लपेट कर, झूठ बोला जाय, झूठा व्यवहार किया जाय किन्तु वह एक न एक दिन अवश्य प्रकट होकर रहता ही है। विष को कितने ही शहद या गुड़ में मिलाकर दिया जाय किन्तु वह अपना दुष्प्रभाव अवश्य पैदा करता है। समाज राजनीति की बाह्य व्यवस्था से असत्य को बड़े यत्नपूर्वक छिपाया जा सकता है किन्तु विश्व नियामक सर्वव्यापी सूक्ष्म सत्ता से वह कभी नहीं छिपता और एक न एक दिन उसके दुष्परिणाम मनुष्य को स्वयं ही भोगने पड़ते हैं। जिन्होंने झूठ बोलकर दूसरों के घर बरबाद किए, उनके बसे बसाये घर भी कालान्तर में उजड़ते देखे जाते हैं। जिन्होंने झूठ बोलकर दूसरों को जाल में फँसाया वे समय आने पर स्वयं ही किसी षड़यन्त्र के शिकंजे में जकड़ लिए गये। इस तरह के उदाहरण इसी धरती पर अपने आस-पास सहज ही देखे जा सकते हैं। इतिहास इसकी मूक गवाही है।

झूठ बोलना, अपने मित्र, सम्बन्धी, सहयोगियों को अपने से दूर कर लेना है। झूठी बात झूठा व्यवहार अधिक दिनों तक नहीं छिपता वह एक न एक दिन अवश्य प्रकट हो ही जाता है और इसके साथ ही लम्बे समय की मित्रता, आत्मीयता मधुर सम्बन्धों की डोरी एक क्षणमात्र में टूट जाती है। इतना ही नहीं इस तरह की झूठ परस्पर शत्रुता, द्वेष, प्रतिशोध, तिरस्कार का कारण भी बन जाती है।

झूठ बोलने वाले व्यक्तियों का स्वभाव चिड़चिड़ा, उत्तेजित, शंकाशील हो जाता है। जितना बड़ा असत्य होगा उतना ही मानसिक स्नायविक संस्थान में तनाव पैदा हो जाता है और तनाव की स्थिति में ही उत्तेजना, चिड़चिड़ाहट, भय, सन्देह की क्रिया होने लगती है। एक परीक्षण के अनुसार अस्सी प्रतिशत चिड़चिड़े, उत्तेजित ,क्रोधी व्यक्ति वे निकले जो झूठ बोलते थे। धोखादेही करते थे। इनमें भी जिन्हें घबराहट, भय, शंका, उद्विग्नता अधिक थी वे अधिक झूठ बोलने वाले थे, परीक्षण में जो शान्त गम्भीर सन्तुलित व्यक्तित्व वाले लोग निकले वे सत्यानुरागी, निश्छल और सरल हृदय थे।

मनुष्य की सन्तुलित और सुव्यवस्थित स्थिति तभी रहती है जब वह अन्तर और बाह्य जीवन का सामञ्जस्य बनाये रखे। अन्तर में जो स्वीकार करे उसे ही बाह्य जीवन में व्यक्त करना चाहिए। मनुष्य यदि अपनी अन्तरात्मा से असत्य के लिए पूछे तो वह इसे कभी स्वीकार नहीं करेगी। प्रत्युत बार-बार रोकेगी। इस तरह आन्तरिक प्रकृति और बाह्य जीवन की गति में विरोधावस्था पैदा हो जायगी और इसी से मनुष्य अस्वस्थ, असन्तुलित, अशान्त, उद्विग्न बना रहेगा जिससे जीवन की सभी सम्भावना नष्ट हो जायगी और असफलता तथा शारीरिक मानसिक पीड़ाओं में ही अन्ततः जीवन बिताना पड़ेगा।

झूठ बोलने का एक प्रमुख कारण है कि सी सजा, दण्ड अथवा नुकसान से अपने आपको बचाने के लिए असत्य का अवलम्बन लेना। कानून के विरुद्ध चलने पर मिलने वाला दण्ड, असामाजिक कृत्यों के लिए मिलने वाली सामाजिक अथवा राजनैतिक प्रताड़ना, दुराचार, पापाचार से मिलने वाला अपमान, दण्ड, सजा आदि से बचने के लिए मनुष्य झूठ का अवलम्बन लेता है। बच्चों में भी झूठ बोलने की आदत बाप के द्वारा दिए गये दण्ड अथवा सजा से बचने के लिए ही पड़ती है और यही आदत आगे चलकर बड़े-बड़े दुष्परिणाम पैदा कर देती है।

इसके बाद झूठ बोलने का दूसरा कारण है अनुचित लाभ की आकाँक्षा का होना। लोग अपने फायदे के लिए झूठ बोलते हैं धोखाधड़ी, छल, ठगी, चालाकी, बस इसी के अंतर्गत आती है। अपना काम बनाने अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए लोग झूठ का आश्रय लेते हैं। व्यापार में अनुचित नफा कमाने, टैक्स बचाने, अधिक उपभोग करने को, समृद्धि की अधिकाधिक वृद्धि करने के लिए लोग झूठ का आश्रय लेते हैं।

कई लोग अपनी प्रशंसा, बड़ाई, कीर्ति, प्रतिष्ठा के लिए झूठ, शेखी खोरी का अवलम्बन लेते हैं। अपने बारे में बड़े-बड़े पुल बाँधते हैं। लोगों में अपने को बड़ा सिद्ध करने के लिए जो भी कहना, करना, बताना आवश्यक समझते हैं वह सब बिना अपनी स्थिति को ध्यान में रखे ही निस्संकोच कहने में नहीं चूकते।

अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी लेने से बचने के लिए अथवा एकाकी वृत्ति के कारण कोई बुराई मोल न लेने, परेशानी से बचने के लिए लोग झूठ का अवलम्बन लेते हैं। कोई मनुष्य बदमाशी करता है कोई समाजिक, नैतिक नियमों की अवहेलना करता है और उसके बारे में कोई जाँच पड़ताल हो तो सरासर देखने वाले भी झूठ बोले देते हैं। लोग सोचते हैं क्यों परेशानी में पड़ें।

स्त्रियों की अपेक्षा मनुष्य अधिक झूठ बोलते हैं। ढलती उम्र और वृद्धता के साथ ही मनुष्य झूठ कम बोलने लगता है। जिन्हें जीवन व्यवहार सीखने का, शिक्षा दीक्षा का अवसर नहीं मिला वे लोग भी अधिक झूठ बोलते है। इनमें से अधिकाँश लोग वे होते हैं जो हानि लाभ का कोई ध्यान नहीं रखते वरन् आदतन स्वभाव से ही वे झूठ बोलते हैं। इतना ही नहीं उन्हें झूठ बोलने में एक तरह का आनंद-सा आता है। ऐसे लोग जितना अधिक झूठ बोलते हैं उतने ही अधिक सन्तुष्ट और प्रसन्न दिखाई देते हैं और यह भी सच है कि उनका झूठ एक तरह का मनोरंजन जैसा होता है, जिससे किसी को विशेष हानि लाभ नहीं होता। फिर भी इतना तो होता ही है कि इस तरह के लोग कोई सुघड़ प्रभावशाली व्यक्तित्व नहीं बना पाते। उनकी जिन्दगी भी एक झूठा मजाक बनकर रह जाती है और जीवन की साँझ में उन्हें खाली हाथ पछताना पड़ता है।

इस तरह के विभिन्न कारणों से झूठ बोलने की दुष्प्रवृत्ति समाज में फैली हुई है। झूठ किसी भी तरह, किसी भी बहाने से, किसी भी कारण क्यों न बोला जाय आखिर वह झूठ ही है और उससे व्यक्ति तथा समाज का जीवन प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। झूठ के दुष्परिणाम व्यक्ति और समाज दोनों को ही भुगतने पड़ते है। जिस समाज में झूठ का बोलबाला जितना अधिक होगा वह उतना ही पतित और अविकसित होता जायगा। असत्य के इस सर्वनाशी घातक मर्ज से हमें पूरी तरह बचने और सत्य का अवलम्बन लेने, भीतर बाहर की एकता पैदा करने का प्रयत्न करना आवश्यक है तभी जीवन का वास्तविक लक्ष्य प्राप्त किया जा सकेगा।


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बौद्ध धर्म की नास्तिकवादी विचारधारा का खण्डन करने के लिए कुमारिल भट्ट ने प्रतिज्ञा की और उसे पूरा करने के लिए उन्होंने तक्षशिला के विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन पूरा किया। उन दिनों की प्रथा के अनुसार छात्रों को आजीवन बौद्ध धर्म के प्रति आस्थागत रहने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी तभी उन्हें विद्यालय में प्रवेश मिलता था। कुमारिल ने झूठी प्रतिज्ञा ली और शिक्षा समाप्त होते ही बौद्ध मत का खण्डन और वैदिक धर्म का प्रसार आरम्भ कर दिया।

अपने प्रयत्न में उन्हें लड़खड़ाती हुई वैदिक मान्यताएं फिर मजबूत बनायीं।

कार्य में सफलता मिली पर कुमारिल का अन्तःकरण विक्षुब्ध ही रहा। गुरु के सामने की हुई प्रतिज्ञा एवं उन्हें दिलाये हुए विश्वास का घात करने के पाप से उनकी आत्मा हर घड़ी दुःखी रहने लगी। अन्त में उन्होंने इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए अग्नि में जीवित जल जाने का निश्चय किया। इस प्रायश्चित्य के करुण दृश्य को देखने देश के अगणित विद्वान पहुँचे उन्हीं में आदि शंकराचार्य भी थे। उन्होंने कुमारिल को प्रायश्चित न करने के लिए समझाते हुए कहा-’आपने तो जन हित के लिए वैसा किया था फिर प्रायश्चित क्यों करें?’ इस पर कुमारिल ने कहा-अच्छा काम भी अच्छे मार्ग से ही किया जाना चाहिए। कुमार्ग पर चलकर श्रेष्ठ काम करने की परम्परा गलत है। मैंने आपत्ति धर्म के रूप में वह छल किया पर उसकी परंपरा आरंभ नहीं करना चाहता दूसरे लोग मेरा अनुकरण करते हुए अनैतिक मार्ग पर चलते हुए अच्छे उद्देश्य के लिए प्रयत्न करने लगेंगे तो इससे धर्म और सदाचार ही नष्ट होगा और तब प्राप्त हुए लाभ का कोई मूल्य न रह जायगा। अतएव सदाचार की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित करने के लिए मेरा प्रायश्चित करना ही उचित है।

कुमारिल प्रायश्चित की अग्नि में जल गये, उनकी प्रतिपादित आस्था सदा अमर रहेगी।

काम करने का सही तरीका

जीवन की विभिन्न सफलता असफलताएँ मनुष्य के कर्म कौशल पर निर्भर करती हैं। मनुष्य अपने काम को कैसे करता है? इसी में उसका परिणाम छिपा रहता है। प्रयत्नपूर्वक ढूंढ़ने पर सभी को कोई न कोई काम इस संसार में मिल ही जाता है। अच्छा काम मिल जाने पर भी सफल होना मनुष्य की कर्म-साधना पर निर्भर करता है। कई लोग अच्छा काम पाकर भी उसमें कोई लाभ नहीं उठा पाते और असफल ही रहते हैं। इसके साथ ही ऐसे भी व्यक्ति होते हैं जो अपने साधारण से कार्यों से जीवन में असाधारणता प्राप्त कर लेते। सभी छोटे-बड़े काम अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं किन्तु उन्हें करने की कुशलता पर ही उनका महत्व निर्भर करता है। अपने कार्य में की जाने वाली छोटी-छोटी भूलों से मनुष्य बड़े और महत्वपूर्ण कार्यों द्वारा भी जीवन में विशेष लाभ नहीं उठा सकता।

अपने काम को टालने की प्रवृत्ति, काम से बचने, जी चुराने की आदत कार्यकर्त्ता की महत्वपूर्ण बुराई हैं। यह एक तरह की चोरी ही हैं। काम की वर्तमान आवश्यकता को निमन्त्रण देना है। अपने दफ्तर के काम को आगे के लिए टालने वाले आलसी कर्मचारी जब कुछ ही दिन में अपने सामने काम का बहुत बड़ा ढेर इकट्ठा कर लेते है। तो वही उनके लिए सरदर्द बन जाता है। इस पर भी ऑफीसर की फटकार नाराजगी सहन करना यहाँ तक कि अपने काम से भी हाथ धो बैठने की नौबत आ जाती है। अपने वायदे, सौदे, लेन-देन आदि को आगे के लिए टालने वाले व्यापारी का काम-धन्धा चौपट हो जाय तो इसमें कोई सन्देह की बात नहीं है। फसल की सामयिक आवश्यकताओं को तत्काल पूरा न कर आगे के लिए टालने वाले किसान को फसल का चौपट होना स्वभाविक ही है।

जो विद्यार्थी वर्ष के अन्त तक अपनी परीक्षा की तैयारी का प्रश्न टालते रहते हैं, सोचते हैं “अभी काफी समय पड़ा हैं फिर पढ़ लेंगे” वे परीक्षा-काल के नजदीक आते ही बड़े भारी क्रम को देखकर घबरा जाते हैं और कुछ भी नहीं कर पाते फलतः उनकी सफलता की आशा दुराशा मात्र बनकर रह जाती है। कुछ भाग दौड़ करके सफल भी हो जाये तो भी वे दूसरों से निम्न श्रेणी में ही रहते हैं। उन्हें सफलता का वास्तविक आनन्द नहीं मिलता। सफलता का सन्तोष आनन्द तो उस काम को पूरी-पूरी दिलचस्पी और लगन के साथ करने में ही मिलता है।

कई लोगों में अच्छी प्रतिभा, बुद्धि होती है शक्ति सामर्थ्य भी होती है, उन्हें जीवन में उचित अवसर भी मिल जाते हैं किन्तु कार्य को टालने की गन्दी आदत से वे अपनी इन विशेषताओं से कोई लाभ नहीं उठा पाते और वे अपनी हीन अवस्था में ही पड़े रहते हैं। जिन्दगी को बोझे की तरह ढोते रहते हैं। व्यापारी कलाकार साहित्यकार, किसान आदि स्वतन्त्र पेशे के लोगों के लिए तो काम को आगे के लिए टालते रहना तत्काल ही दुष्परिणाम पैदा कर देता है। व्यापारी को हानि उठानी पड़ती है। कलाकार का गया हुआ समय जिसमें वह नव रचना, नव सृजन करके जीविका उपार्जन करता, प्रसिद्धि प्राप्त करता, वह लौटकर फिर कभी नहीं आता। किसान को टालने और कामचोरी की आदत से अपनी चौपट फसल को देखकर रोना पड़ता है, जब कि उसके दूसरे साथी पकी फसल को उल्लास के साथ काटते हैं और ‘प्रसन्न हो उठते हैं।

कई काम ऐसे भी होते हैं जिन्हें नहीं भी करना पड़ता। किन्तु उनके लिए भी दूसरे लोगों की तरह कल, परसों करने का बहाना लेना, फिर न कर पाना और आग के लिए टाल देना अपनी तथा दूसरों की बड़ी हानि करता है। जो नहीं करना है उसके लिए स्पष्ट मना ही कर देना चाहिए। टालमटूल, बहाने वाली, अपनी आदत को खराब करना और दूसरों को परेशान करना ही है, जिससे सदैव बचा जाना चाहिए। कार्य की उपयोगिता और महत्ता की दृष्टि से कुछ काम पहले किये जा सकते हैं। कम महत्व के कामों को बाद में भी किया जा सकता है। किन्तु काम को आगे के लिए टालना, जी चुराना, बचना ऐसी बुरी आदत है जिससे प्रभावित होकर मनुष्य जीवन में आने वाले महत्वपूर्ण क्षणों को भी टालने लगता है। वस्तुतः आलस्य और अकर्मण्यता का ही संशोधित रूप काम को टालना है, जिससे सफलता की आकाँक्षा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बचना ही चाहिए।

काम को टालने की आदत की तरह ही दूसरों के ऊपर अपने काम को छोड़ बैठना भी मनुष्य की असफलता का कारण बन जाता है। जो व्यक्ति अपने छोटे बड़े कामों की पूर्ति की आशा अपने नौकरों तथा सहयोगियों से ही रखते हैं उनके काम कभी अच्छे और सम्पूर्ण नहीं होते। अधिकाँश नौकर काम को एक बोझ-सा समझकर, उसे उल्टा सीधा करके अपना वक्त गुजारने की धुन में रहते हैं। अथवा मालिक को बहकाया करते हैं। नौकरों की ही तरह सच्चे सहयोगियों का मिलना आज के समय में दुर्लभ है। इस तरह नौकरों और सहयोगियों पर छोड़े जाने वाले काम अच्छी तरह सम्पन्न नहीं हो पाते। इसके साथ ही स्वयं मालिक को अपने कामों के बारे में ही जानकारी नहीं होती जिससे मौका पड़ने पर नौकरों का ही मुँह देखना पड़ता है। कुल मिलाकर दूसरों पर छोड़े जाने वाले काम अच्छी तरह सम्पन्न नहीं होते और इसी से उनसे मिलने वाला लाभ भी नहीं मिलता। नौकरों से खेती कराने वाले किसान को अपनी आधी उपज से भी कम ही हाथ लगती है। नौकरों पर सर्वथा काम छोड़ देने वाले व्यापारी का व्यापार एक दिन चौपट हो जाय तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं है। वस्तुतः एक नौकर अथवा दूसरे व्यक्ति में काम के प्रति वह हमदर्दी, आत्मीयता अपनेपन की भावना नहीं होती जो स्वयं मालिक में होती है और अपनेपन की भावना, हमदर्दी से ही काम ठीक-ठीक तरह से सम्पन्न होता है।

अपने पैरों पर चलकर ही सफलता की मञ्जिल मिलती है और उसी से सफलता का आनन्द सन्तोष लाभ उठाया जा सकता है। स्वयं काम करने की आदत से विभिन्न विषयों का ज्ञान होता है। क्रियाशक्ति जाग्रत होती है। श्रम का प्रफुल्लता प्रदायक गौरव, महत्व मनुष्य में नव-उत्साह नव-शक्ति का संचार कर देता है। छोटे बड़े सभी कामों का महत्व मालूम पड़ता है। काम में लगे रहने पर शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का विकास होता है जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व पुष्ट होता है। मनुष्य की विभिन्न प्रवृत्तियाँ भी कर्म के द्वारा निरोधित होकर उनका संशोधन होता है। मनुष्य की शक्तियाँ रचनात्मक कार्यों में लगने की अभ्यस्त हो जाती है।

शारीरिक और मानसिक क्षमता के ऊपर भी कार्यभार निर्भर करता है। असाधारण क्षमता शक्ति सम्पन्न व्यक्ति अनेकों कार्यों में उलझे हुए रहकर भी उन्हें ठीक-ठीक तरह से सम्पन्न कर सकते हैं। सामान्य क्षमता वालों को जहाँ तक बने एक समय में एक ही काम पूरा करना चाहिए। इसी तरह एक काम के करते हुए दूसरे काम की चिन्ता फिक्र भी नहीं करनी चाहिए। इससे वर्तमान काम ठीक-ठीक तरह नहीं किया जा सकता साथ ही चिन्ता आदि से मनुष्य की क्षमतायें नष्ट हो जाती हैं। इस तरह कोई भी काम भली-भाँति सम्पन्न नहीं होता। इस तरह कामों के बिगड़ने से झुँझलाहट, घबराहट, चिड़चिड़ापन पैदा हो जाते हैं। एक समय एक ही काम किया जाय और वह भी पूर्ण एकाग्रता तथा उत्तमता के साथ।

दैनिक-जीवन में जहाँ तक बने एक ही काम को बहुत देर तक न किया जाय। एक ही काम लगातार काफी समय तक करते रहने पर उसमें दिलचस्पी कम होने लगती है। थकावट भी पैदा होती है। जिससे काम का भली-भाँति सम्पादन रुक जाता है। काम में गड़बड़ी पैदा होने लगती है। अतः दिनभर के कामों का एक क्रम-अन्तर रखना चाहिए। जैसे लिखने पढ़ने के बाद बाजार से सामान आदि लाना, कोई हल्के श्रम का काम चुन लेना चाहिए या सफाई व्यवस्था आदि। इस तरह दिनभर के कामों का एक क्रम और व्यवस्था बनाकर काम करने वाला सोते समय तक ताजा और तन्दुरुस्त, स्वरूप रहता है। जो उठते ही बिना सोचे समझे अन्धाधुन्ध अपने सामने आये उसी श्रम में पिल पड़ते हैं उनके कई महत्वपूर्ण कार्य अधूरे ही पड़े रह जाते हैं और बहुत से किये ही नहीं जाते। जल्दी ही थकावट, उकताहट, मानसिक क्लेश घबराहट आदि पैदा हो जाते हैं।

दासी का पुत्र-जार्ज कार्वर

नीग्रो वैज्ञानिक जार्ज वाशिंगटन कार्वर ने कृषि और वनस्पतियों के सम्बन्ध में जो गवेषणाएं की हैं वे विज्ञान-जगत में चिरस्मरणीय रहेंगी। संसार भर में उनकी खोजों को बड़े आदर के साथ देखा गया और कृषि क्षेत्र में भारी लाभ उठाया गया। इंग्लैण्ड की ‘लायल सोसाइटी’ ने उन्हें अपना ‘फैलो’ बनाया और उनकी सेवाओं के उपलक्ष में ‘स्पिगार्न पदक’ प्रदान किया। अमेरिका की सरकार ने उन्हें संयुक्त कृषि अधिकारी नियुक्त किया।

एक नीग्रो बालक को अमेरिका में उन्नति का इतना अवसर मिल जाना आश्चर्यजनक है। जिस प्रकार भारत के सवर्ण हिन्दू अछूतों से घृणा करते हैं उसी प्रकार अमेरिकी गोरों में भी काले नीग्रो लोगों के प्रति घृणा भाव मौजूद है। ये उनकी उन्नति की सहन नहीं कर पाते। मनुष्य के अहंकार का यह कैसा विचित्र रूप है कि वह स्वयं तो अच्छी स्थिति में रहना चाहता है पर दूसरों को उस स्थिति में आने की बात सुनकर कुढ़ता है और केवल इतनी-सी बात पर आग बबूला होकर उन पिछड़े लोगों को तरह-तरह के त्रास देता है। हिन्दू सवर्णों की तरह अमेरिकी गोरे भी इस मानवीय दुर्बलता के शिकार थे। वे सुधर तो रहे हैं पर प्रगति अभी भी बहुत मन्द है।

जार्ज कार्वर अमेरिका के डायमण्ड ग्रोव गाँव में जन्मा। उसकी माता दासी थी। जिस गोरे के यहाँ कार्वर की माता गुलाम थी उसने कार्वर को भी एक घोड़े के बदले खरीदा था। पर इतनी बात अच्छी थी कि मालिक अन्य गोरों की तरह निर्दय न था। वह उनसे काम तो लेता पर उदारता का बर्ताव भी करता। एक टीन के टुकड़े पर बालक कार्वर को अक्षर ज्ञान कराया गया वह कुछ पढ़ने लिखने लायक भी हो गया। उन दिनों दूर-दूर तक नीग्रो बालकों के लिए पाठशाला न थी। बहुत दूर के एक नगर न्योशो में नीग्रो लोगों की एक पाठशाला थी। गोरों के साथ कोई काला बच्चा वहाँ पढ़ नहीं सकता था, अलग नीग्रो लोगों की पाठशालाएं सारे अमेरिका में उँगलियों पर गिनने लायक थी। उन्हें पढ़ने भी कौन देता था? वे पढ़ते भी कैसे? सामाजिक दबाव ने उनके व्यक्तित्व को चूर-चूर कर रखा था।

बालक कार्वर पढ़ना चाहता था। वह अपने मालिक के पास सतृष्ण नेत्रों से यह आशा लेकर गया कि उसे पढ़ने की स्वीकृति मिल जाय। पहले तो उसका मालिक झल्लाया पर पीछे उसका दिल पिघल गया और घर छोड़ कर चले जा सकने की इजाजत दे दी। उनके आनन्द का ठिकाना न रहा। माता का आशीर्वाद लेकर वे न्योशो चल दिये। छोटी-सी पाठशाला थी-सिर्फ एक कमरा। उसमें बन्दरों की तरह लड़के भरे हुए थे, वहाँ भर्ती तो हो गये पर खर्च कहाँ से आता। उनने धोबी का काम शुरू कर दिया। पढ़ाई के बाद बचे हुए समय में लोगों के मैले कपड़े धोने ले जाते और उससे जो मजदूरी मिलती उसी से अपना काम चलाते। उस पाठशाला में थोड़ी-सी पढ़ाई थी। जहाँ अधिक पढ़ाई की कक्षाएं यों दुष्ट गोरों की भी कमी न थी, पर ऐसे सहृदय लोग भी कुछ न कुछ होते ही हैं, जो आगे बढ़ने वालों को देखकर कुढ़ते नहीं, प्रसन्न होते हैं। उनके मार्ग में रोड़ा नहीं बनते वरन् सहायता करते हैं। ऐसे लोग कार्वर को हर जगह मिलते रहे और उसको ज्ञान पिपासा की परितृप्ति का मार्ग मिलता ही रहा।

इस भटकते विद्यार्थी ने स्कूली शिक्षा पूर्ण कर ली, अब उसे कालेज में पढ़ने की आकाँक्षा थी। हाईलेण्ड विश्व-विद्यालय में उसने दाखिला लेने के लिए अर्जी दी। वहाँ प्रवेश अधिकारी के सामने वह उपस्थित हुआ तो उसने काले नीग्रो बालक को भर्ती करने से इन्कार कर दिया। कई जगह टक्कर खाने के बाद इण्डिया बोला के सिम्पशन कालेज में कई शर्तों के साथ असमंजसपूर्ण दाखिला मिला। उनकी शिष्टता, प्रतिभा और लगन से सभी अध्यापक सन्तुष्ट थे। गोरे लड़के जो आरम्भ में उन्हें चिड़ाया करते थे वे भी धीरे-धीरे उदार हो गये और उनके साथ भलमनसाहत का व्यवहार करने लगे।

कार्वर ने अपनी पढ़ाई जारी रखी। सिम्पशन कालेज की शिक्षा पूरी करके वे कृषि विज्ञान के आइओवा स्टेट कालेज में भर्ती हुए और यहाँ की शिक्षा पूरी करने के बाद वे वहीं अध्यापक भी हो गये। अब उन्हें अवकाश भी था। उन्होंने कृषि सम्बन्धी अनेक गवेषणाएं आरम्भ कर दीं। घूम कर किसानों को समझाते। साथ ही उन बातों को कार्यान्वित कराने के लिए स्वयं भी किसानों के खेतों में मजदूर की भाँति जुट जाते। इनकी गवेषणाओं से उस क्षेत्र के किसानों ने बहुत लाभ उठाया। वे कहा करते थे कि यदि किसान वैज्ञानिक जानकारियों से लाभ उठावें तो दो महीने के परिश्रम से साल भर के खर्च लायक अन्न उत्पादन कर सकते हैं।

मूँगफली के सम्बन्ध में उन्होंने विशेष खोज की। उन्हें अपनी खोजों के सम्बन्ध में काँग्रेस को जानकारी देने के लिए बुलाया गया। जब वे अपने बड़े-बड़े थैले बाँधे हुए सदन में उपस्थित हुए तो उनकी वेश-भूषा और रंग-ढंग को देख कर उन्हें कोई झक्की एवं सनकी समझा गया और बोलने के लिए केवल दस मिनट दिये गये। पर जब उनने अपनी बात कहनी शुरू की और उन अद्भुत खोजों का परिचय दिया तो पौने दो घण्टे तक सभी सदस्य उनकी बात को बड़े ध्यानपूर्वक सुनते रहे और बहुत प्रभावित हुए। उनकी खोजों से अमेरिका के कृषि-विभाग ने बहुत लाभ उठाया।

कार्वर एक ऋषि थे-पक्के आदर्शवादी। लोगों ने उनसे कहा- अपनी खोजों को वे पेटेण्ट करालें और उससे लाभ उठावें, तो उन्हें प्रचुर धन मिल सकता है। पर उन्होंने ज्ञान के लाभ को इस प्रकार सीमाबद्ध करना अस्वीकार कर दिया। ऊँचे वेतन के लिए कई जगहों से निमन्त्रण आये पर उन्होंने अपने अनुसन्धान क्षेत्र को छोड़ कर कहीं अन्यत्र जाने से भी साफ इन्कार कर दिया और जीवन भर नीग्रो जाति की सामाजिक स्थिति सुधारने तथा सर्वसाधारण को कृषि विज्ञान की आर्थिक जानकारी उपलब्ध कराने के अपने मिशन में दत्तचित्त होकर लगे रहे। यही उनकी आकाँक्षा थी और इसी में उन्हें सन्तोष था।

जार्ज कार्वर जब मरे तब उनने अपनी बचत की जीवन भर की कमाई का एक ट्रस्ट बना दिया जिसका नाम था-’कार्वर फाउण्डेशन’ इस संस्था के द्वारा नीग्रो युवकों को विज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने में सुविधा तथा सहायता उपलब्ध होती है।

एक दासी पुत्र का जो घोड़े के बदले खरीदा गया था, उस समाज में जहाँ उसकी जाति को अस्पर्श समझा जाता हो, इतनी उन्नति कर सकना साधारणतः आश्चर्यजनक और बहुत कठिन लगता है। पर जो लोग जानते हैं कि अन्तःकरण की प्रबल आकाँक्षा, सच्ची लगन और उसके अनुरूप क्रियाशीलता में कितना बल होता है वे कार्वर के जीवन को एक साधारण घटना मानते हैं। व्यक्ति का अस्तित्व महान है वह अपनी महानता को पहिचाने तो महान कार्य भी कर ही सकता है।


ईश्वर का साक्षात्कार

एक चोर किसी साधु के पास जाया करता था और उससे ईश्वर साक्षात्कार का उपाय पूछा करता था ‘फिर कभी’ बताने की बात कहकर साधु अकसर उसे टाल देता। पर एक दिन चोर का आग्रह बहुत बढ़ गया उसने अतीव आग्रह ठाना और उपाय बताने के लिए हठ पकड़ ली।

साधु ने दूसरे दिन प्रातः आने को कहा। चोर ठीक समय पर पहुँचा। साधु ने कहा सिर पर कुछ पत्थर रखकर ऊपर पहाड़ी पर चढ़ना होगा। वहाँ पहुँचने पर ईश्वर दर्शन की व्यवस्था हो जायगी।

चोर के सिर पाँच पत्थर लाद दिये गये और साधु ने उसे अपने पीछे-पीछे चले आने को कहा। इतना भार लेकर वह कुछ दूर चला तो उस बोझ से उसकी गर्दन दुखने लगी। उसने अपना कष्ट कहा तो साधु ने एक पत्थर फिंकवा दिया। थोड़ी ढेर चलने पर शेष भार भी असहाय प्रतीत हुआ तो चोर की प्रार्थना पर साधु के दूसरा पत्थर फिंकवा दिया।

यह क्रम आगे भी चला। ज्यों-ज्यों ऊँचे चढ़ रहे थे त्यों-त्यों थोड़े पत्थरों को ले चलना भी कठिन हो रहा था। चोर अपनी थकान को व्यक्त करता गया। अंत में सब पत्थर फेंक दिये गये ओर चोर सुगमतापूर्वक पर्वत पर चढ़ता हुआ, ऊँचे शिखर पर जा पहुँचा।

साधु ने कहा-जब तक तुम्हारे सिर पर पत्थरों का बोझ रहा तब तक पर्वत के ऊँचे शिखर पर चढ़ सकना संभव न हो सका। पर जैसे ही पत्थर फेंके वैसे ही चढ़ाई सरल हो गई। पापों का बोझ सिर पर लाद कर कोई मनुष्य ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता।

चोर ने साधु का वक्तव्य समझा और चोरी, बुराई को त्याग ईश्वर प्राप्ति के एकमात्र उपाय, पवित्र आचरण और परमार्थ साधन में अपना समय लगाने लगा।


नासमझ वनवासी

एक राजा वन भ्रमण के लिए गया। रास्ता भूल जाने पर भूख प्यास से पीड़ित वह एक वनवासी की झोपड़ी पर जा पहुँचा। वहाँ उसे आतिथ्य मिला तो जान बची।

चलते समय राजा ने उस वनवासी से कहा-हम इस राज्य के शासक हैं। तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर अमुक नगर का चंदन बाग तुम्हें प्रदान करते हैं। उसके द्वारा जीवन आनंदमय बीतेगा।

वनवासी उस परवाने को लेकर नगर अधिकारी के पास गया और बहुमूल्य चंदन का उपवन उसे प्राप्त हो गया। चंदन का क्या महत्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है उसकी जानकारी न होने से वनवासी चंदन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर शहर में बेचने लगा। इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था चलने लगी।

धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गये। एक अंतिम पेड़ बचा। वर्षा होने के कारण कोयला न बन सका तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया। लकड़ी का गट्ठा लेकर जब बाजार में पहुँचा तो सुगंध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया। आश्चर्य चकित वनवासी ने इसका कारण पूछा तो लोगों ने कहा- यह चंदन काष्ट है।

बहुत मूल्यवान है। यदि तुम्हारे पास ऐसी ही ओर लकड़ी हो तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो।

वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चात्ताप करने लगा कि उसने इतना बड़ा बहुमूल्य चंदन वन कौड़ी मोल कोयले बनाकर बेच दिया। पछताते हुए नासमझ को सान्त्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा- मित्र, पछताओ मत, यह सारी दुनिया तुम्हारी ही तरह नासमझ है। जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदले कौड़ी मोल में गँवाते रहते हैं। तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है उसी का सदुपयोग करलो तो कम नहीं। बहुत गंवाकर भी अन्त में यदि कोई मनुष्य सँभल जाता है तो वह भी बुद्धिमान ही माना जाता है।


ब्राह्मण का कर्तव्य

राजा जनक अपनी साज-सज्जा के साथ मिथिलापुरी के राजपथ पर होकर गुजर रहे थे। उनकी सुविधा के लिए सारा रास्ता पथिकों से शून्य बनाने में राज कर्मचारी लगे हुए थे। राजा की शोभा यात्रा निकल जाने तक यात्रियों को अपने आवश्यक काम छोड़कर जहाँ-तहाँ रुका रहना पड़ रहा था।

अष्टावक्र को हटाया गया तो उन्होंने हटने से इन्कार कर दिया और कहा प्रजाजनों के आवश्यक कार्यों को रोककर अपनी सुविधा का प्रबंध करना राजा के लिए उचित नहीं। राजा अनीति करे तो ब्राह्मण का कर्तव्य है कि उसे रोके और समझावे। तो +आप राज्याधिकारी गण राजा तक मेरा संदेश पहुँचावें और कहें कि अष्टावक्र ने अनुपयुक्त आदेश मानने से इन्कार कर दिया है। वे हटेंगे नहीं और राज-पथ पर ही चलेंगे।

राज्याधिकारी कुपित हुए और अष्टावक्र को बन्दी बनाकर राजा के पास ले पहुँचे। जनक ने सारा किस्सा सुना तो वे बहुत प्रभावित हुए और कहा-”इतने तेजस्वी ब्राह्मण जहाँ वे मौजूद हैं जो राजा तक को ताड़ना कर सकें वह देश धन्य है। नीति और न्याय के पक्ष में आवाज उठाने वाले सत्पुरुषों के द्वारा ही जन-मानस की उत्कृष्टता स्थिर रह सकती है। ऐसे निर्भीक ब्राह्मण राष्ट्र की सच्ची सम्पत्ति हैं। उन्हें दंड नहीं सम्मान दिया जाना चाहिए।

राजा जनक ने अष्टावक्र से क्षमा माँगी और कहा-मूर्खतापूर्ण आज्ञा से, चाहे राजा ही क्यों न हो, तिरस्कार के योग्य है। आपकी निर्भीकता ने हमें अपनी गलती समझने और सुधारने का अवसर दिया। आज से आप राजगुरु रहेंगे और इसी निर्भीकता से सदा न्याय पक्ष का समर्थन करते रहने की कृपा करेंगे।

अष्टवक्र ने वह प्रार्थना जनहित की दृष्टि से स्वीकार कर ली।


Quotation

क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधो मित्रमुखो रिपुः।

क्रोधो ह्यसिर्महातीक्ष्णः सर्व क्रोयोऽपकर्वति॥

क्रोध प्राणों को लेने वाला शत्रु है। यह मित्र

के रूप में आने वाला शत्रु है। क्रोध तीव्र तीक्ष्ण तलवार के समान है। क्रोध सबकी अवनति करने वाला है।

इस मार्ग में रूढ़िवादिता से भारी संघर्ष करना पड़ेगा। संकीर्णतावादी विचार धाराओं से नम्रता किन्तु दृढ़ता के साथ निपटना पड़ेगा। नारी को पददलित, अशिक्षित और उपेक्षित बनाये रहने के हामी रूढ़िवादी तत्वों के साथ चतुरता के साथ इस प्रकार सुलझना पड़ेगा ताकि अनावश्यक उद्वेग उत्पन्न किये बिना नारी को समर्थ, सशक्त और सुसंस्कृत बनाया जा सके।

नये समाज की नई रचना का आदर्श और आवाज प्राचीन भारत की महान सभ्यता को ही बनाया जाना है। हमारी क्रान्तियों का उद्देश्य विकृतियों को हटाकर उसके स्थान पर सनातन आदर्शों की स्थापना करना है। उसमें नारी की अध्यात्मवादी विशेषताओं को अग्रिणी बनाना पड़ेगा। भारत माता की जय-घोष करते हुए स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया है। बौद्धिक और सामाजिक स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए हम गायत्री माता की जय बोलते हुए आगे बढ़ते रहेंगे।


मधु संचय


मधु संचय (Kavita)

मेघ-सा झर-झर बरस जो नेह से जग सिक्त कर दे, फूल-सा खिल, सुरभि बिखरा जो स्वयं को रिक्त कर दे,

देवता पत्थर नहीं हैं, मनुज में ही देवता है,

आंसुओं के अर्घ्य से जो मनुज को अभिषिक्त कर दे, चीर कर चट्टान जो आगे बढ़ा निर्झर वही है।

जो हिमालय-सा उठे जीवन-धरा पर नर वही॥

-नर्मदा प्रसाद खरे

श्रेय होगा मनुज का समता-विधायक ज्ञान,

स्नेह सिंचित न्याय पर नव-विश्व का निर्माण।

एक नर में अन्य का निःशंक, दृढ़ विश्वास,

धर्मदीप्त मनुष्य का उज्ज्वल नया इतिहास।

साम्य की वह रश्मि, स्निग्ध, उदार,

कब खिलेगी,कब खिलेगी विश्व में भगवान?

कब सुकोमल ज्योति से अभिषिक्त-

हो, सरस होंगे जली-सूखी रसा के प्राण?

-रामधारी सिंह दिनकर

क्यों न बुझे दीप रात भर का जो स्नेह सजाए।

नश्वर है वह दीप स्नेह के बल पर जो लहराए। बंधता है कब लीक विभा की बाती के बन्धन में,

अग्नि-शिक्षा कब बंधती कर रहती अँगारों के तन में। दीपक बढ़ते हैं, प्रकाश केवल फैला करता है।

बुझ जाते हैं दीप, कभी आलोक नहीं मरता है॥

-अञ्चल

युगनायक, प्रतिभा-विभूतिनय,

तुम न कठिन पथ अपना छोड़ो,

सस्ती तृप्ति करने की,

दुर्बलता से तुम मुख मोड़ों।

तोड़ो मोह-शृंखला, छोड़ो,

मिथ्या, स्वप्न-सृष्टि का चित्रण,

जग मन की जागरण-ज्योति में,

करो सत्य का उज्ज्वल दर्शन। -जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’

-जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’

कौन कहता है कि अपना पाव कर सकते नहीं हो,

बल थका, अब विश्व का कल्याण कर सकते नहीं हो, हम उन्हें देते चुनौती भ्रम जिन्हें यह हो गया है,

और जो कहते कि ‘युग-निर्माण’ कर सकते नहीं है।

यदि किया साहस दनुजता-

- के घरौंदे तोड़ डाले-

तो असुरता का सभी श्रम दूर होकर ही रहेगा।

पाँव पाये है, चलो, जब तक न मंजिल पास आये, हाथ पाये हैं सृजन के हेतु, जो जग को हँसाये,

क्या मिला यदि चार दिन के सौख्य के साथी बने तो, व्यर्थ ही जीवन गया जिसने न गति के गीत गाये।

हो अकेले तो हुआ क्या-

दो अगर दस को उजाला-

तो अँधेरी रात का तुम दूर होकर ही रहेगा,

-बलरामसिंह सरदार

मिली राह में मुझे सफलता, बोली-कवि रुक जाओ। पहिना कर जयमाल तुम्हें-वर लूँ, यदि कुछ झुक जाओ।

सुमन समर्पित करने चरणों में वह झुकी, लजाई। पूजा-थाल उठा कर उसने फिर आरती सजाई॥ यौवन ने बचपन को पाया, थी ऐसी निधि पाई।

भरना चाहा जब बाहों में सहसा यह ध्वनि आई॥ साथ नहीं झुक सकता चाहे तुम मंजिल बन आओ। असफलता है मेरी सहचरी, बन पाओ तो आओ॥

-रामस्वरूप खरे

आँधियाँ चाहे उठाओ, बिजलियां चाहे गिराओ,

जल गया है दीप तो अंधियार ढलकर ही रहेगा।

रोशनी पूँजी नहीं है जो तिजोरी में समाये,

वह खिलौना भी न जिसका दाम हर ग्राहक लगाये,

वह पसीने की हँसी है वह शहीदों की उमर है,

जो नया सूरज उगाए, जब तड़प कर तिलमिलाए,

उग रही लौ को न टोको, ज्योति के रथ को न रोको,

यह सुबह, का दूत हर तम को निगल कर ही रहेगा।

-नीरज

गायत्री की उच्चस्तरीय साधना


चान्द्रायणव्रत द्वारा शरीर-शोधन


युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति

जून में तीन परामर्श शिविर-

जेष्ठ का महीना प्रायः सभी के लिये अवकाश का रहता है। इसलिये प्रायः हर वर्ष कोई, शिक्षण-शिविर गायत्री-तपोभूमि में होता रहता है। इस वर्ष दस-दस दिन के तीन ‘परामर्श शिक्षण शिविर’ किये जा रहे हैं।

बैसाख सुदी पूर्णिमा 26 मई की है उसी दिन से प्रथम शिविर आरम्भ होगा और जेष्ठ वदी 6 गुरुवार ता. 4 जून को समाप्त होगा।

द्वितीय शिविर जेष्ठ वदी 10 शुक्रवार ता0 5 से आरम्भ हो कर 14 जून रविवार जेष्ठ सुदी 5 को समाप्त होगा।

तीसरा शिविर जेष्ठ सुदी 6 चन्द्रवार ता0 15 जून से आरम्भ हो कर, जेष्ठ सुदी 15 बुधवार ता0 24 जून को समाप्त होगा।

जिन्हें आना हो शिविर से एक दिन पूर्व सायंकाल तक मथुरा आ जाना चाहिये जिससे दूसरे दिन प्रातःकाल से आरम्भ होने वाले कार्यक्रम में सम्मिलित हो सकनी सम्भव हो सके। प्रथम शिविर में आने वालों को 24 मई, द्वितीय शिविर में आने वालों को जून और तीसरे शिविर में सम्मिलित होने वालों को 14 जून की शाम तक मथुरा पहुँच जाना चाहिए।

इन तीन शिविरों में जीवन विद्या के सभी प्रमुख सिद्धान्तों का संक्षिप्त एवं किन्तु सार-गर्भित प्रशिक्षण होगा। व्यक्तिगत जीवन की कठिनाइयों को हल करने तथा सुख, शान्ति एवं प्रगति की उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिये व्यावहारिक योजनाएं इस प्रकार प्रस्तुत की जावेंगी कि उन्हें अपनाने वाले व्यक्ति को अपना भावी जीवन आशाजनक एवं प्रगतिशील बना सकना सम्भव हो सकेगा।

प्रत्येक व्यक्ति की समस्याएं अलग-अलग प्रकार की होती हैं, शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, आध्यात्मिक उलझनों में हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में फँसा होता है, प्रत्येक मनुष्य की समस्याओं का स्वरूप एवं हल भी भिन्न-भिन्न तरह को हो सकता है। इन शिविरों में आने वालों की व्यक्तिगत समस्याओं की विस्तृत जानकारी प्राप्त करके उन्हें उनकी स्थिति के अनुरूप ऐसे परामर्श दिये जा सकेंगे, जिनसे वे आज की अपेक्षा कल अधिक सुविधा एवं शान्ति की स्थिति प्राप्त कर सके। व्यक्तिगत परामर्शों का कार्यक्रम प्रधान रहने से इन शिविरों को ‘परामर्श शिविर’ नाम दिया गया है।

युग-निर्माण योजनाओं में कौन, कितना, किस प्रकार भाग ले, यह भी परामर्श का एक विषय होगा। सामाजिक क्रान्ति के लिए-दहेज जैसी कुरीतियों के उन्मूलन के लिए-जातीय संगठनों की जो योजना बनाई गई है उसका ढाँचा भी इन तीन शिविरों में ही खड़ा कर दिया जायगा और जिन्हें जो उत्तर-दायित्त्व ग्रहण करना तथा सौंपा जाना है उसकी व्यवस्था भी इसी अवसर पर हो जायगी।

24 हजार गायत्री-अनुष्ठान शिविर काल में सभी लोग कर लेंगे। गायत्री-तपोभूमि के वातावरण में रह कर 24 हजार का लघु अनुष्ठान भी घर रह कर सवालक्ष का पुरश्चरण करने से भी अधिक श्रेष्ठ रहेगा। इसी अवधि में मथुरा, वृन्दावन, गोवर्धन, नंदगांव, बरसाना, गोकुल, महावन, दाऊजी आदि ब्रज के सभी प्रमुख तीर्थों के दर्शन करने की सामूहिक व्यवस्था रहेगी।

इन शिविरों में पुरुषों को ही आना चाहिए। जिनकी गोदी में छोटे बच्चे नहीं हैं और जो युग-निर्माण योजना में सक्रिय भाग लेती हैं, ऐसी महिलाओं को उनके विशेष अनुरोध पर ही स्वीकृति दी जा सकेगी। महिलाओं समेत एक महीने के शिविरों में आने और रहने के लिये प्रबन्ध किया जा रहा है पर दस दिन के इन शिविरों में उनके लिए प्रबन्ध नहीं किया गया है। इसलिए स्त्री बच्चे समेत तीर्थयात्रा को प्रधान मान कर चलने वाले व्यक्ति इन शिविरों में सम्मिलित होना चाहे तो उन्हें शहर में अन्यत्र अपने ठहरने आदि की स्वतन्त्र व्यवस्था करना चाहिए।

चूँकि इन तीनों शिविरों में तपोभूमि में निर्धारित स्थान की अपेक्षा कहीं अधिक संख्या में आने के लिए लोग इच्छुक रहेंगे, इसलिए यह कठिनाई हो सकती है कि किसी शिविर में बहुत अधिक लोग आना चाहें और किसी में कम। ऐसी दशा में संतुलन बनाये रखने के लिये यह हो सकता है कि जिस शिविर में आना चाहते हैं उसमें स्थान भर जाने से अन्य शिविर में स्थान दिया जा सके। जो आना चाहते हों उन्हें अभी से सूचना देकर स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। बिना स्वीकृति के आने वालों को प्रवेश न मिल सकेगा। प्रार्थनापत्र भेजते समय यह भी लिख देना चाहिए कि किस शिविर में आना चाहते हैं और यदि उसमें स्थान न मिल सके तो दूसरा कौन-सा शिविर सुविधाजनक रहेगा। ऐसे प्रार्थना-पत्र अप्रैल में ही भेज देने चाहिए ताकि स्वीकृति-अस्वीकृति का निर्णय समय रहते हो सके।

‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक-पत्र-

गत वर्ष जून में 108 कार्यक्रमों की युग-निर्माण योजना का स्वरूप परिजनों के सम्मुख रखा गया था और गुरु पूर्णिमा 6 जुलाई से उन्हें कार्य रूप में परिणित करने का विधिवत उद्घाटन हुआ था। प्रसन्नता की बात है कि इन 6 महीनों में इतनी अधिक प्रगति हुई है जिसकी आशा भी न थी। व्यक्ति निर्माण और सामाजिक उत्कर्ष की दृष्टि से इस आन्दोलन को इस शताब्दी का सब से बड़ा अभियान कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।

इतने बड़े आन्दोलन का अभी तक कहीं कोई प्रचार नहीं हो पा रहा है। इससे ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार से बाहर के व्यक्ति न तो उससे परिचित हो पाते हैं और न प्रकाश ग्रहण करने या सहयोगी बनने की स्थिति में होते हैं। यह एक बड़ी कमी है जो सभी को खटकती है। ‘अखण्ड-ज्योति’ विचार-पत्रिका है। उसमें समाचार छपें तो उसका सारा कलेवर इसी से घिर जाया करे, इसलिए हर महीने हजारों प्रेरणा-प्रद रचनात्मक प्रयत्नों में से कभी-कभी दो चार की हो चर्चा उसमें हो पाती है। दूसरे अखबार प्रायः राजनैतिक दृष्टि से निकलते हैं, उनमें राजनीति की बातें ही प्रधान रहती हैं। युग-निर्माण योजना जैसे रचनात्मक कार्यों को वे तुच्छ मानते हैं और उसके समाचारों के स्थान प्रायः नहीं दे पाते। हत्या, लूट, डकैती, बलात्कार, ठगी के समाचार मोटे हैडिंग लगा कर प्रमुख स्थानों पर छपते हैं, पर रचनात्मक कार्यों के समाचारों को कभी-कभी ही किसी कोने में स्थान मिल पाता है।

आरम्भ में बिना प्रचार के ही योजना का कार्य चलाते रहने का विचार था पर परिवार के प्रायः विचार-शील लोगों ने यह आवश्यकता अनुभव की है कि आन्दोलन को व्यापक स्वरूप देना हो तो उसकी प्रेरणाओं के प्रसार के लिए एक अच्छे स्तर का समाचार-पत्र अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जातीय-संगठनों के माध्यम से दहेज और विवाहों के अपव्यय पर हमें नारी मोर्चा खड़ा करना है। इसका प्रचार न हुआ तो वे प्रवृत्तियाँ आगे कैसे बढ़ेंगी और नये लोगों को उत्साह कैसे मिलेगा? बात उचित है इसलिए इस आवश्यकता की वास्तविकता को अनुभव करते हुए ‘युग-निर्माण’ नामक मासिक-पत्र 1 जून से निकालने की व्यवस्था की गई है।

सब की सलाह साप्ताहिक निकालने की थी पर सीमित साधनों के कारण अभी हम उतना प्रबन्ध न करे सकेंगे। अभी बड़े साइज का, 20 पृष्ठों का, सर्वांग सुन्दर सचित्र मासिक शुरू किया जा रहा है। यदि इससे काम न चला तो एक क्या कई भी साप्ताहिक चल सकते हैं, दैनिक भी निकल सकते हैं पर अभी तो पाक्षिक द्वारा ही काम चलाना होगा। देश-विदेशों में युग-निर्माण के लिए जो विशाल परिमाण में कार्य हो रहा है उसकी जानकारी इस पत्र से सर्व साधारण को हो सकेगी और बौद्धिक एवं सामाजिक क्रान्ति में, अभियान में-आर्ष आध्यात्मिक की प्रतिष्ठापना में-नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान में इससे भारी सहायता मिलेगी ऐसी आशा है।

गत एक वर्ष में जहाँ जो रचनात्मक कार्य हुआ है परिजन उसकी सूचना समय-समय पर देते रहे हैं, पर उनके छपने की संभावना न होने से उन्हें सुरक्षित नहीं रखा गया। रजत-जयंती के समय पर आये हुए समाचार भी इसी प्रकार अस्त-व्यस्त हो गये। अब समाचार-पत्र की व्यवस्था बनने से वे समाचार उपयोगी तथा अनेकों के लिए उत्साहवर्धक एवं प्रेरणाप्रद हो सकते हैं। इसलिए परिजन अपनी रचनात्मक प्रवृत्तियों का विवरण 6 महीने की रिपोर्ट पूरी भेज दें, उसमें से जितना आवश्यक होगा, छप जायेगा।

युग-निर्माण योजना समाचार-पत्र होगा । उसका पढ़ना तो सभी स्वजनों के लिए आवश्यक है पर मँगाना नहीं। अखण्ड-ज्योति पीढ़ियों तक सुरक्षित रखी जा सकने वाली, जीवन में क्रान्ति उपस्थित करने वाली प्रेरणा से परिपूर्ण पुस्तिका है उसे हर सदस्य एक धर्म ग्रन्थ की तरह जीवन की बहुमूल्य निधि के रूप में सुरक्षित रखता है, इसलिए इसे इस युग-निर्माण योजना के हर सदस्य के लिए मँगाना आवश्यक है, पर यह बात इस पाक्षिक पत्र के बारे में लागू नहीं होती। इसकी एक पत्रिका कई व्यक्ति पढ़ कर भी काम चला सकते हैं।

एक से दस योजना के अंतर्गत दस परिजन मिलकर भी इस एक पत्रिका को मँगा सकते हैं और उनमें से एक-एक दिन के हिसाब से सभी उसे पढ़ सकते हैं। साप्ताहिक सत्संगों में उसे सब के पढ़ने के लिए रखा जा सकता है। इस पाक्षिक-पत्र का वार्षिक चन्दा 6) होगा। 1 जुलाई से इसका निकलना आरम्भ हो जायगा। सक्रिय कार्यक्रम-शाखा संचालक-अपने संपर्क के अन्य अखण्ड-ज्योति सदस्यों से यह पैसा इकट्ठा कर लें, उसे मथुरा भेज दें और ऐसी व्यवस्था बनायें कि एक पत्रिका का लाभ दस सदस्यों को मिल जाया करे। जिन्हें अधिक रुचि हो ये अपनी प्रत्येक भी मँगा सकते हैं। जो भी उपाय संभव हो, युग-निर्माण प्रवृत्तियों की जानकारी एवं प्रेरणा देने वाले इस मासिक-पत्र को भी सब स्वजन पढ़ सकें ऐसी व्यवस्था हर जगह होनी चाहिए।

फार्म भर कर भेजना न भूलें-

इस अंक के अन्त में ‘कार्य विवरण और सूचना पत्रक’ लगा है। अखण्ड-ज्योति के सभी पाठकों को इसे भर कर अप्रैल के अन्त तक मथुरा भेज देना चाहिए।

विवरण में प्राप्त सूचनाओं के आधार पर तीनों प्रकार की शिक्षा व्यवस्थाओं की तैयारी की जायगी, जून के परामर्श शिविर का कार्यक्रम बनेगा, तथा युग-निर्माण योजना सम्बन्धी अन्य अनेकों गति-विधियों की आधार-शिला रखी जायगी। सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन करने के लिये जातीय-संगठनों का जो ढांचा खड़ा किया जाना है उसका आधार भी पत्रक में लगी हुई सूचनाएं ही होंगी।

अतएव प्रत्येक परिजन से अनुरोध है कि इस सम्बन्ध में आलस्य या उपेक्षा न करें और अप्रैल के अन्त तक अपना पत्रक भर कर निश्चित रूप से मथुरा भेज दें।

शिक्षार्थियों की भोजन व्यवस्था-

युग-निर्माण के आगामी कार्यक्रमों में संजीवन विद्या के-व्यावहारिक अध्यात्म के-प्रशिक्षण की व्यवस्था को प्रमुख स्थान है। मथुरा में भी और शाखा केन्द्रों में अन्यत्र भी निरन्तर प्रशिक्षण शिविरों की प्रक्रिया पर अधिक ध्यान दिया जायेगा। प्रयत्न यह होगा कि जन-मानस को प्रबुद्ध, एवं सुसंस्कृत बनाने के लिये आवश्यक सद्ज्ञान की अधिकाधिक मात्रा उपलब्ध कराई जा सके।

विविध प्रशिक्षण की योजना इस अंक में छपी है। जून में तीन शिविर दस-दस दिन के होने ही वाले हैं। इन सभी में सम्मिलित होने के लिये अधिकाधिक स्वजनों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजन स्वयं भी इसके लिये बहुत उत्सुक हैं।

इस संदर्भ में एक बात स्पष्ट है कि शिक्षार्थियों को अपना भोजन व्यय शिक्षा काल में स्वयं ही उठाना होगा। दूसरों के दान पर यह विशाल योजना चलाई नहीं जा सकती। दान का धन खाने की बात हर किसी को अपने स्वाभिमान के विरुद्ध समझनी चाहिये। तपोभूमि में जो शिक्षार्थी आयें वे अपने मार्ग व्यय एवं भोजन व्यय का प्रबन्ध स्वयं ही करके लायें। बिना इस प्रकार का प्रबंध किये शिक्षण के लिये किसी को भी नहीं चल पड़ना चाहिये। शिक्षण, निवास, बिजली, पानी का प्रबन्ध ही संस्था की ओर से किया जाता है, व्यक्तिगत व्यय भार हर किसी को स्वयं ही उठाना चाहिये।

शास्त्र-मन्थन का नवनीत

क्रोधो नाशयते धैर्य क्रोधो नामायते श्रुतम्।

क्रोधो नाशयते सर्व नास्ति क्रोध समो रिपुः॥

क्रोध को परम शत्रु मानकर उससे बचना चाहिये क्योंकि क्रोध से धैर्य, विवेक, ज्ञान, अनुभव सब कुछ नष्ट हो जाता है।

यस्तु क्रोधं समुत्पन्न प्रज्ञया प्रति बाधते।

तेजस्जिवन्तं विद्वाँसो मन्यन्ते तत्वदर्शिनः॥

उत्पन्न हुये क्रोध को जो अपनी विवेक बुद्धि से शाँत कर लेते हैं वही तत्वदर्शी विद्वान माने जाते हैं।

जायते यत्र स क्रोधस्तन्दहेदेव सर्वतः।

विषयश्च क्वचित्क्रोधः सफलो निर्दहेदयम्॥

जिस शरीर में क्रोध उत्पन्न होगा उसे सर्वथा नष्ट कर देगा। इस क्रोध से अग्नि तथा विद्युतशक्ति के समान बचना चाहिए।

अपकारिणि कोपश्चेत्कोपे कोपः कर्थ न ते।

धर्माथं काम मोक्षाणं प्रसह्म परिपन्थिनि॥

अपकारी पर क्रोध करने की अपेक्षा क्रोध पर ही क्षुभित होना चाहिये क्योंकि यही धर्म, अर्ध, काम, मोक्ष की प्राप्ति में बाधक है इसी को अपना परम शत्रु मानकर वशवर्ती बनाना चाहिये।

न द्विषन्तः क्षयं यान्ति यावज्जीवमपिघ्नतः।

क्रोधमेव तु यो हन्ति तेन सर्वे द्विषो हताः॥

जीवन पर्यन्त प्रयत्न करने पर भी शत्रु रहित नहीं बन सकते पर जिस ने क्रोध को पराजित कर दिया उसका कोई शत्रु कुछ नहीं बिगाड़ सकता। क्रोध पर विजय पाना शत्रुओं को समाप्त कर देना है।

ये क्रोधं सनियच्छन्ति क्रद्धान संशमयन्ति च।

न च कुप्यन्ति भूतानाँ दुर्गाण्यतितरन्ति ते॥

जो मनुष्य मात्र पर कभी क्रोध नहीं करते, क्रोधियों को शान्त करते हैं तथा क्रोध को अपने नियन्त्रण में रखते हैं वही संसार के सम्पूर्ण दुस्सह दुःखों से छुटकारा पा जाते हैं।

सत्यं मृदु प्रियं वाणी धीरो हितकरं वदेत।

आत्मोत्कर्ष तथा निन्दा परेषाँ परिवर्जयेत॥

अपनी प्रशंसा और दूसरों की निन्दा न करने वाले, सदा सत्य, मधुर, प्रिय बोलने वाले ही धीर बुद्धिमान कहे जाते हैं।

अनित्यानि शरीराणि विभवो नैब शाश्वतः।

नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्म संग्रहः॥

यह शरीर अनित्य, नाशवान, क्षण-भंगुर है इससे सम्बन्धित धन, वैभव, ऐश्वर्य भी स्थाई नहीं। मृत्यु अवश्यम्भावी है। यह विचार कर धर्म संचय करते रहना चाहिये क्योंकि धर्म नित्य और शाश्वत है।

अद्रोह सर्वभूतेषु कर्मणा मनसा गिरा।

अनुग्रहश्च दानश्च सताँ धर्म, सनातनः॥

सब प्राणियों पर मन, वचन, कर्म से द्रोह न रखना तथा दया, दान, प्रेम करना ही सज्जनों का सनातन धर्म है।

सत्यं ब्रूयात्प्रियं ब्रूयान्न ब्रूयात्सत्यमप्रियम।

प्रियन्च नानृतं ब्रूवादेश धर्मः सनातनाः॥

सदा सच, प्रिय बोलना, अप्रिय सत्य भी न बोलना और प्रिय झूठ भी न बोलना श्रेष्ठ सनातन धर्म माना गया है ।

अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थच चिन्तयेत्।

ग्रहीत इव केशेषु मृत्युना धर्मामाचरेत्॥

बुद्धिमान मनुष्य वही है जो धर्म और अर्थ का चिन्तन अजर-अमर की तरह करते हैं तथा मृत्यु का भय प्रशिक्षण स्मरण रखते हुये धर्माचरण करते हैं।

उत्थायोत्थाय बोद्धव्यं किमद्य सुकृतं कृतम्।

आयुषः खण्ड मादाय रविरस्तं गमिष्यति॥

प्रातः काल उठते ही यह सोचना चाहिये कि मुझे आज क्या सुकर्म करना है, क्या सत्कर्म मैंने किया है क्योंकि प्रतिदिन ही आयु का एक भाग क्षीण हो जाता है।


Kavita

नर की परख


नर की परख (Kavita)

(1)

जो हिमालय-सा उठे जीवन-धरा पर नर वही है।

आपदा के अग्नि-पथ पर जो कभी रुकना न जाने,

देव्य के अभिशाप में भी जो कभी झुकना न जाने,

प्रलय-झंझावात में भी भँवर में फँसना न जाने,

गीतमय जीवन बनाले गति को ही धर्म माने,

गा सके संघर्ष में हँसकर सदा जो स्वर वही है।

(2)

मेघ-सा झर-झर बरस जो नेह से जग सिक्त कर दे,

फूल-सा खिल सुरभि बिखरा, जो स्वयं को रिक्त कर दे,

देवता पत्थर नहीं है, मनुज में ही देवता है।

आँसुओं के अर्घ्य से जो मनुज को अभिषिक्त कर दे,

चीर कर चट्टान जो आगे बढ़े निर्झर वही है।

(3)

जो सदा श्रम-सीकरों से मोतियों को तोलता हो,

स्वयं हँसकर पी हलाहल, निज सुधा-रस घोलता हो,

तप्त सूरज की किरण से जागरण की ज्योति लेकर,

मौन करुणा के स्वरों में मनुजता से बोलता हो,

युग-युगों की मरु पिपासा सोखले सागर वही है।

(4)

तारकों की झिलमिली से सुख कभी मिलता नहीं है,

बिना रवि का ताप झेले सुमन मन खिलता नहीं है,

तारकों की छाँह तज जो धूप में आँखें पसारे

कर्म के गाँडीव से जो स्वर्ग को भू-पर उतारे,

वज्र-सा टूटे सदा निज लक्ष्य पर जो शेर वहीं है।

-नर्मदा प्रसाद खरे

*समाप्त*