सभी ईश्वर के पुत्र हैं और सब में परमात्मा का निवास है यह मानते हुए यदि हम परस्पर एकता, निश्छलता, प्रेम और उदारता का व्यवहार करने लगें तो जीवन में अजस्र पवित्रता का अवतरण होने लगे, सर्वत्र सद्व्यवहार के दर्शन होने लगें और आज जो कटुता, संकीर्णता और कलह का वातावरण दीख पड़ता है, उसका अन्त होने में देर न लगे।
हमें केवल अपने शरीर के लिए ही नहीं, आत्मा के लिए भी जीना चाहिए। यदि मनुष्य शरीर की सुविधा और सजावट का ताना-बाना बुनते रहने में ही इस बहुमूल्य जीवन को व्यतीत कर दें, तो उसे वह लक्ष्य कैसे प्राप्त होगा जिसके लिये जन्मा है। स्वार्थ में संलग्न व्यक्ति तो विघटन की ओर ही बढ़ेंगे। उनके व्यवहार एक दूसरे के लिए असन्तोषजनक और असमाधानकारक ही बनेंगे। ऐसी दशा में द्वेष और परायेपन की भावना बढ़कर आवरण को नारकीय क्लेश-कलह से भर देगी, और यह संसार अशांति एवं विनाश की काली घटाओं से घिरने लगेगा।
ईसा ने सोचा कि यदि ईश्वर का, पुत्र केवल शारीरिक सुखों के लिए जीवन धारण किये रहेगा तो इस संसार में धर्म का राज्य कभी उदय न होगा। यदि अपने लिए ही जिया गया तो मनुष्य की पशुओं की अपेक्षा श्रेष्ठता कैसे बनी रहेगी, यह अनुभव करते हुए वे इसी निर्णय पर पहुँचे कि हमें अपने लिए नहीं प्रभु के लिए जीना चाहिए। अस्तु ईसा मसीह घर छोड़ कर चल दिए और बन पर्वतों और ग्राम नगरों में धर्म का प्रचार करते हुए भ्रमण करने लगे। ईश्वर का पुत्र अपने लिए नहीं ईश्वर के लिए ही जी सकता है, इसके अतिरिक्त उसके पास और दूसरा मार्ग ही क्या है?
—टॉलस्टाय
मनुष्य का भी अपना एक लक्ष्य है। खाने-कमाने और मौज-मजा करने तक ही उसका जीवन सीमित नहीं। सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, राजनैतिक सीमा बन्धनों तक ही उसका जीवन बाँधा नहीं है। जन्म से मृत्यु तक की एक निश्चित अवधि, सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान की परिस्थितियाँ यह सोचने को विवश करती हैं कि मनुष्य जिस दिशा में चल रहा है यही उसकी दिशा नहीं है। उसकी सूक्ष्म बौद्धिक क्षमता यह बताती है कि मनुष्य कोई विशेष लक्ष्य लेकर इस धरती में अवतरित हुआ है। विशाल अन्तरिक्ष, गगनस्पर्शी पर्वत, सुदूर तक विस्तृत सागर, सूर्य-चन्द्रमा, ग्रह-नक्षत्र सभी इंगित करते हैं कि इस जीवन से भी आगे कुछ है। अशान्ति, दुःख और क्षोभ का कारण यही है कि हमें आत्मज्ञान नहीं, अपने लक्ष्य का भान नहीं है। यह अस्थिरता तब तक बनी रहती है जब तक मनुष्य अपना लक्ष्य नहीं जानता, अपने मौलिक स्वरूप को नहीं पहचानता।
इस संसार में अनेकों प्रकार के जीव-जन्तु, कीट-पतंगे, पशु-पक्षी और मनुष्येत्तर प्राणी विद्यमान हैं। कई शारीरिक शक्ति में बड़े हैं, कई सौंदर्य में। कितनों ने प्राणशक्ति के आधार पर अनेकों प्राकृतिक घटनाओं का पूर्व आभास पा लेने में अजीब क्षमता पाई तो कई स्वच्छन्द विचरण के क्षेत्र में आज के यान-युग से भी अधिक पटु हैं। किन्तु, एक साथ सारी विशेषतायें किसी को भी उपलब्ध नहीं। शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और अनेकों आत्मिक सम्पदायें मनुष्य में ही दिखाई देती हैं। मानव-जीवन की इस सुव्यवस्था को देखते हैं तो यह लगता है कि यह किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिये ही हुआ है। एक ही स्थान पर अनेकों शक्तियों का केन्द्रीकरण निश्चय ही अर्थपूर्ण है।
मनुष्य को औरों की अपेक्षा अधिक बुद्धि, विद्या, बल और विवेक मिला है, यह बात तो समझ में आती है किन्तु इन शक्तियों का संपूर्ण उपयोग बाह्य जीवन तक ही सीमित रखने में उसने बुद्धिमत्ता से काम नहीं लिया। अपने ज्ञान-विज्ञान को शारीरिक सुखोपभोग के निमित्त लगा देने में उसने धोखा ही खाया है। दुःखों का कारण भी यही है कि हम अपने शाश्वत स्वरूप को पहचानने का प्रयत्न नहीं करते। नाशवान् शरीर और इन्द्रियजन्य विषयों की पूर्ति के गोरख-धन्धे में ही अपना सारा समय बरबाद कर देते हैं और अन्त समय सारी भौतिक सम्पदायें यहीं छोड़कर चल देते हैं। इस कटु सत्य को अनुभव सभी करते हैं किन्तु अन्तरण-कक्षा में प्रवेश होने से दूर भागते हैं। कभी यह विचार तक नहीं करते कि इस विश्व-व्यापी प्रक्रिया का कारण क्या है। हम क्या हैं और जीवन धारण करने का हमारा लक्ष्य क्या है? ढेर सारी सम्पदायें मिली हैं इसलिए कि इनका उपयोग अंतर्दर्शन के लिए किया जाय। अपने को भी नहीं पहचान पाये तो इस शरीर का, बौद्धिक शक्तियों का क्या सदुपयोग रहा?
‘मैं’ और ‘मेरा शरीर’ दो भिन्न वस्तुयें हैं। एक कर्त्ता है दूसरा कर्म। एक क्रियाशील है दूसरा जड़। एक सवार है दूसरा वाहन। मानव-जीवन की लक्ष्य प्राप्ति के लिए शरीर आत्मा का वाहन मात्र है। दोनों की एकरूपता का कोई आधार समझ में नहीं आता। यदि ऐसा होता तो मृत्यु के उपरान्त भी यह शरीर क्रियाशील रहा होता। खाने-पीने उठने-बोलने चलने और जीवन के अनेकों व्यवसाय यह उसी तरह सम्पन्न करता जैसे जीवित अवस्था में। तब फिर उचित यही प्रतीत होता है कि अपने कर्त्तापन का ज्ञान प्राप्त करें। अपने वाहन को तरह-तरह के रंगीन लुभावने वस्त्राभूषणों से सजाते घूमें और आत्मतत्व उपेक्षित पड़ा रहे तो इसे कौन बुद्धिमत्ता की बात मानेगा? घोड़ा घास खाये और सवार को पानी भी न मिले तो फिर यात्रा का उद्देश्य कहाँ पूरा हुआ?
आत्मा की सिद्धियाँ अनन्त हैं। स्वर्ग-मुक्ति विराट के दर्शन का केन्द्र बिन्दु आत्मा है। वह अनन्त सामर्थ्यों का स्वामी है। इन्हें प्राप्त कर मनुष्य, अणु से विभु, लघु से महान, बन्धन-मुक्त बनता है, किन्तु आत्मानुभूति किये बिना यह सब कुछ सम्भव नहीं। अपने नीचे की जमीन में ही असंख्यों मन सोना, चाँदी हीरा, जवाहरात जमा हो और उसका ज्ञान न हों तो उस बहुमूल्य खजाने और मिट्टी के ठीकरों में भला क्या अन्तर रहा? अपनी तिजोरी में रखी हुई पिस्तौल दुश्मन को नहीं मार सकती। जिस शक्ति का हमें ज्ञान ही न हो उसको प्रयोग में कैसे लाया जा सकता है?
“आत्म-दर्शन” भारतीय संस्कृति का प्राण है। यहाँ समय-समय पर जो भी महान पुरुष हुये हैं उन्होंने आत्मज्ञान पर ही अधिक जोर दिया है। सम्पूर्ण वैदिक वाङ्मय इसी से ओत-प्रोत है। जीवन के प्रत्येक व्यवसाय में अंतर्दर्शन की बात अवश्य जोड़ दी गई है ताकि मनुष्य भौतिक जीवन जीते हुए भी आत्म-तत्व से विस्मृत न रहे। अपने जीवनोद्देश्य को कभी भी न भूले। इसी पर सब मनीषियों ने देशकाल और परिस्थितियों के अनुरूप भिन्न-भिन्न रूप में बल दिया है। सभी महापुरुषों, ऋषियों, सन्तों और लोकनायकों ने मनुष्य को दुःख और विनाश की परिस्थितियों से ऊँचा उठाने के लिए आत्मिक-ज्ञान पर ही अधिक बल दिया है। भारतीय जीवन में भौतिक सम्पदाओं की अवहेलना का भी यही धर्म है कि मानवीय-चेतना अपने मूल-स्वरूप में पहचानने की दिशा में सतत् आरुढ़ रहे।
आत्मा का स्वाभाविक स्वरूप अत्यन्त शुद्ध, पवित्र, अलौकिक और दिव्य है। उसकी अन्तिम अवस्था, धर्माचरण और ईश्वर साक्षात्कार है। यह शरीर के माध्यम से ज्ञान और प्रयत्न करने से मिलती है। शरीर को जब एक विशिष्ट उपकरण मानकर इन्द्रियों की दासता से ऊपर उठते हैं तो स्वयं ही आत्मानुभूति होने लगती है। जो आदमी इस सत्य को गहराई तक अपने हृदय में बिठा लेता है वह नाशवान् वस्तुओं के अनुचित मोह को त्याग कर आत्मिक पवित्रता की ओर अग्रसर होता है। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध आदि अनात्म तत्वों से उसकी रुचि हटने लगती है। विचारों और व्यवहारों में पवित्रता उत्पन्न होती है जितना वह आत्म-साक्षात्कार के समीप बढ़ता है उसी अनुपात से दैवी-गुणों का उसमें समावेश होता चलता है फलस्वरूप सच्चे सुख-शान्ति और संतोष के परिणाम भी सामने आते रहते हैं।
आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के लिए बड़े उपकरणों या अधिक से अधिक स्कूली शिक्षा की ही आवश्यकता नहीं। कोई भी व्यक्ति जो अपनी सामर्थ्यों या विवशताओं की विवेचना कर सके आत्म-ज्ञानी हो सकता है। इसके लिए आत्म-निरीक्षण की आदत बनानी पड़ती है। यह कार्य ऐसा नहीं जो हर किसी से किया न जा सके। अपनी भूलों, त्रुटियों और आदत में प्रवेश बुराइयों को अपने में दृढ़तापूर्वक खोजना और उन्हें दूर हटाना हर किसी के लिए सम्भव है। सन्मार्ग पर चलते हुए रास्ते में जो अड़चनें, बाधायें और मुसीबतें आती हैं उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करते रहने से अपनी समस्त चेतना का रुख आत्मा की ओर उन्मुख होने लगता है। जैसे बन्दूक की गोली को शक्तिपूर्वक दूर तक पहुँचाने के लिए उसे छोटे से छोटे दायरे से गुजारा जाता है वैसे ही अपनी समस्त चित्तवृत्तियों को एक ही दिशा में लगा देने से उधर ही आशातीत परिणाम दिखाई देने लगते हैं। जब तक अपनी मानसिक चेष्टायें बहुमुखी होती हैं तब तक विपरीत परिस्थितियों से टकराते रहते हैं किन्तु जब एक ही दिशा में दृढ़तापूर्वक चल पड़ते हैं तो ध्येय प्राप्ति की साधना भी सरल हो जाती है।
किसी विषय को जब तक मनुष्य भली-भाँति समझ नहीं लेता तब तक उससे झिझकता रहता है। घने अन्धकार में जाने से सभी को भय लगता है। किन्तु यदि उसी अन्धकार में जाने के लिए हाथ में मशाल दे दी जाय तो अज्ञानता का भय अपने आप दूर हो जाता है। आत्मिक-ज्ञान के प्रति भय की उपेक्षा और उदासीनता का कारण यही होता है कि अपना जीवन लक्ष्य निर्धारित नहीं करते। अनन्त शक्तियों का केन्द्र होते हुए भी मनुष्य इधर
बहु जापात् तथा होमात् कायक्लेशादि विस्तरैः
न भावेन बिना देव यन्त्र मन्त्राः फलप्रदाः।
—भाव चूड़ामणि
भावना विहीन जप, तप, होम उपवास आदि व्यर्थ हैं। भावना के बिना यंत्र, मंत्र तथा देवता फलप्रद नहीं होते।
से जितना उदासीन रहता है उतना ही दुःख और अभाव उसे घेरे रहते हैं।
साँसारिक ज्ञान प्राप्त करना ही अपना लक्ष्य रहा होता तो इसके लिए बुद्धि की चैतन्यता, एकाग्रता एवं जागरुकता ही पर्याप्त थे किन्तु आत्म-ज्ञान का संबंध समस्त प्राणि मात्र में स्वानुभूति करने से होता है। अपने क्रिया-व्यापार को जब तक अपने आप तक ही सीमित रखते हैं तब तक इस परम-तत्व का ज्ञान पाना असंभव है। स्वार्थ की संकीर्ण प्रवृत्ति ही है जो मनुष्य को सत्य का आभास नहीं होने देती किन्तु जब परमार्थ-बुद्धि का समावेश होता है तो सारी ग्रन्थियाँ स्वयमेव खुलने लग पड़ती हैं। जिस प्रकार अस्वच्छ शीशे में सूर्य की किरणों का परावर्तन नहीं होता वैसे ही स्वार्थपूर्ण अन्तःकरण बनाये रखने से आत्मानुभूति सम्भव नहीं। इसलिये अपने आपको दूसरों के हित एवं कल्याण के लिए विकसित होने दीजिए। दूसरों के दुःख दर्द जिस दिन से आपको अपने लगने लगें उसी दिन से आपकी महानता भी विकसित होने लगेगी। सभी के साथ प्रेम-मैत्री, सहयोग सहानुभूति का स्वभाव बनाने से आत्म-ज्ञान का प्रकाश परिवर्द्धित होने लगता है गीताकार ने लिखा है—
नैवतस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कच्चन।
च चास्य सर्वभतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥
अर्थात् आत्मवादी पुरुष का लक्षण है लोक-हितार्थ कर्म करना। क्योंकि सम्पूर्ण प्राणियों में स्वार्थ का कोई संबंध नहीं है। सभी विश्वचेतना के ही अंग हैं फिर किसी के प्रति परायेपन का भेदभाव क्यों करे? अपने ही सुखों को प्रधानता देने में जो क्षणिक आनन्द अनुभव कर इसी में लगे रहते हैं उनसे यह आशा नहीं रखी जा सकती कि वे आत्मोद्धार कर लेंगे। पर जिसे अपना मानव-जीवन सार्थक बनाना है, जिसने अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लिया है उसके लिए यही उचित है कि वह खुले मस्तिष्क से सभी में अपने आपको ही रमा हुआ देखे। ऐसी अवस्था में किसी को दुःख देने या उत्पीड़ित करने की भावना भला क्यों बनेगी।
आत्मज्ञान और आत्मानुभूति के मूल उद्देश्य को लेकर ही हम इस संसार में आये हैं। मानव-जीवन की सार्थकता भी इसी में है कि वह अपने गुण कर्म और स्वभाव में मानवोचित सदाचार का समावेश करे और लोकहित में ही अपना हित समझे। मनुष्य एक विषय है तो संसार उसकी व्याख्या। अपने आपको जानना है तो सम्पूर्ण विश्व के साथ अपनी आत्मीयता स्थापित करनी पड़ेगी। आत्मा विशाल है वह एक सीमित क्षेत्र में बंधी नहीं रह सकती। सम्पूर्ण संसार ही उसका क्रीड़ाक्षेत्र है। अपनी चेतना को भी विश्वचेतना के साथ जोड़ देने से आत्मज्ञान का प्रकाश स्वतः प्रस्फुटित होने लगता है।
इस प्रकार जब मनुष्य साँसारिक तथा इन्द्रियजन्य परतन्त्रता से मुक्त होने लगता है तो उसकी महानता विकसित होने लगती है। आत्मा की स्वतंत्रता परिलक्षित होने लगती है, आत्मबल का संचार होने लगता है। स्वाभाविक पवित्रता और प्रफुल्लता का वातावरण फूट निकलता है। आत्मा की गौरवपूर्ण महत्ता प्राप्त कर मनुष्य का इहलौकिक उद्देश्य पूरा हो जाता है। अपने लिये भी यही आवश्यक है कि हम अपनी इस प्रस्तुत महानता को जगायें, इसके लिये आज से और अभी से लग जायें। ताकि अपने अवशेष जीवन का सच्चा सदुपयोग हो सके।
स्वामी रामतीर्थ जब प्रोफेसर थे तब उनने एक दिन अपने छात्रों के सामने ब्लैक बोर्ड पर एक सीधी लाइन खींचकर पूछा—इसे बिना मिटाये छोटी करके दिखाओ।
एक कुशाग्र बुद्धि बालक ने उसी रेखा के समीप दूसरी बड़ी देखा खींच दी और पहले खींची हुई रेखा को बिना मिटाये ही छोटा करके दिखा दिया।
इस पर स्वामी रामतीर्थ बहुत प्रसन्न हुए उन्होंने कहा-छात्रों, यही क्रम तुम्हें अपने जीवन में अपनाना है। यदि तुम बड़े बनना चाहते हो तो इसके लिए अपने आस-पास के लोगों को पीछे धकेलने की जरूरत नहीं है। तुम को बड़े काम करो और बड़े बनो। दूसरे स्वतः ही तुमसे छोटे दिखने लगेंगे।
साँसारिक सुखों की उपलब्धि के लिये शरीर-बल आवश्यक है। धन हो तो प्रत्येक मनोवाँछित वस्तु सरलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं। जन-शक्ति के आधार पर अयोग्य व्यक्ति तक सत्तारूढ़ हुए हैं। चातुर्य, पद, सत्ता आदि से कोई भी व्यक्ति मनचाही इच्छाएँ पूरी कर सकता है, किन्तु ज्ञान के अभाव में यह सारी शक्तियाँ लघु प्रतीत होती हैं। ज्ञान संसार का सर्वोत्तम बल है। इसी के आधार पर दूसरी सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं। अज्ञानवश मनुष्य तन-धन-जन सभी का नाश कर लेता है। दुष्कर्म में लगे व्यक्ति का कहाँ तो शरीर ठीक रहेगा, कितने दिन धन ठहरेगा और कब तक दूसरों का सहयोग-सहानुभूति व आत्मीयता मिलेगी? मनुष्य ज्ञान के अभाव में ही बुरे कर्मों की ओर प्रेरित होता है। इसलिये संसार में ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ बल कहा गया है।
बुद्धिमान व्यक्ति कम-से-कम साधनों में भी सुखी दिखाई देते हैं। इसका कारण यह है कि अज्ञानता के दुष्परिणामों से वे बचे रहते हैं। उनके प्रत्येक कार्य में विवेक होता है, जो कुछ करते हैं उसे पहिले भली प्रकार सोच समझ लेते हैं। पूरी तरह विचार करने के बाद किये गये कार्यों से हानि की सम्भावना प्रायः समाप्त हो जाती है। और उस कार्य में पड़ने वाली बाधाओं, परेशानियों और मुसीबतों से बचने का रास्ता मिल जाता है। ज्ञान मनुष्य को जीवन का सही रास्ता प्रदर्शित करता है, जिससे उसे कठिनाईयाँ कम होती और सफलतायें अधिक मिलती हैं। कदाचित् परिस्थितिवश कोई विघ्न आ भी जाए तो अपनी दूरदर्शिता के कारण बुद्धिमान व्यक्ति उसे आसानी से हल कर लेते हैं।
ओछे कर्म करने वाले लोगों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि ऐसे कार्य वे अधिकाँश अज्ञानता-वश ही करते हैं। जीवन की सही दिशा निर्माण करने की क्षमता न तो धन में है, न पद और प्रतिष्ठा में। आत्म-निर्माण की प्रक्रिया सत्कर्मों से पूरी होती है। सन्मार्ग में भी कोई स्वतः प्रवृत्त होता हो यह भी नहीं कहा जा सकता । यह प्रेरणा हमें औरों से मिलती है। दूसरों की अच्छाइयों का अनुकरण करते हुए ही महानता की मंजिल तक पहुँचने का नियम बना हुआ है। ऐसी बुद्धि किसी को मिल जाए तो उसे यही समझना चाहिए कि परमात्मा की उन पर बड़ी कृपा है। ज्ञान से मनुष्य की ऐसी ही धर्मबुद्धि जागृत होती है, इसलिये ज्ञान को परमात्मा का सर्वोत्तम वरदान मानना पड़ता है।
अज्ञानता के दुष्परिणामों से बचने का यह तरीका सबसे अच्छा है कि हम अपनी मानसिक चेष्टाओं को संसार का रहस्य समझने में लगायें। विचार करने की शक्ति हमें इसीलिए मिली है कि हम सृष्टि की वस्तु स्थिति को समझें और इसका लाभ अपने सजातियों को भी दें, किन्तु यह सब कुछ तभी सम्भव है जब हमारा ज्ञान बढ़े। जब-तक हम ज्ञानवान् नहीं बनते, अज्ञानता का शैतान हमारे पीछे पड़ा रहेगा, ऐसी अवस्था में हमारी मोह-ग्रन्थियाँ ज्यों की ज्यों बंधी रहेंगी। अज्ञानता का अन्धकार और विश्व-रहस्य की जानकारी के लिये ज्ञान के प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है। इसी से भव-बन्धन टूटते हैं।
व्यक्ति के पात्रत्व की सच्ची कसौटी उसके ज्ञान से होती है। समाज में अधिक देर तक सम्मान व प्रतिष्ठा उन्हीं को मिलती है जो शीलवान, शिष्ट व विनम्र होते हैं उद्दण्ड दुराचारी व अशिष्ट व्यक्तियों को सभी जगह तिरस्कार ही मिलता है। इन आध्यात्मिक सद्गुणों का आन्तरिक प्रतिष्ठान ज्ञान से होता है इससे सदाचार में रुचि बढ़ती है। आप्त वचन है “विद्या ददाति विनयम् विनयम् ददाति पात्रत्ताम्” अर्थात् विद्या से, ज्ञान से विनयशीलता आती है। विनयशील ही पात्रत्व के सच्चे अधिकारी होते हैं।
मानवीय प्रतिभा का विकास ज्ञान से होता है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं उन सभी के महान् व्यक्तित्व का विकास ज्ञान से हुआ है। भगवान् राम, कृष्ण, गौतमबुद्ध, ईसामसीह, सुकरात आदि सभी महापुरुषों ने ज्ञान की श्रेष्ठता को स्वीकार किया है। साँसारिक दुखों से परित्राण पाने के लिये मानव जाति को सदैव ही इसकी आवश्यकता हुई है। शास्त्रकार ने ज्ञान की महत्ता प्रतिपादित करते हुए लिखा है—
मोक्षस्य न हि वासेऽस्ति न ग्रामान्तर मेव वा
अज्ञान हृदयग्रन्थिर्नाशो मोक्ष इति स्मृतः॥
(शिव-गीता)
अर्थात् मोक्ष किसी स्थान विशेष में उपलब्ध नहीं होता। इसे पाने के लिये गाँव-गाँव भटकने की भी आवश्यकता नहीं। हृदय की अज्ञान ग्रन्थि का नष्ट हो जाना ही मोक्ष है। दूसरे शब्दों में स्वर्ग, मुक्ति का साधन है ज्ञान। इसे पा लिया तो इसी जीवन में जीवन-मुक्ति मिल गई समझनी चाहिये।
इस युग में विज्ञान की शाखा-प्रशाखायें सर्वत्र फैली हैं। प्रकाश, ताप, स्वर, विद्युत चुम्बकत्व और पदार्थों की जितनी वैज्ञानिक शोध इस युग में हुई है उसी को ज्ञान मानने की आज परम्परा चल पड़ी है। इसी के आधार पर मनुष्य का मूल्याँकन भी हो रहा है। तथाकथित विज्ञान को ही ज्ञान मान लेने की भूल सभी कर रहे हैं किन्तु यह जान लेना नितान्त आवश्यक है कि ज्ञान, बुद्धि की उस सूक्ष्म क्रियाशीलता का नाम है जो मनुष्य को सन्मार्ग की दिशा में प्रेरित करती है। विज्ञान का फल है इहलौकिक कामना पूर्ति और ज्ञान का संबंध है अंतर्जगत से। ज्ञान वह है जो मनुष्य को आत्म-दर्शन में लगाए।
इसके लिए प्रमाद को त्यागकर विनम्र बनना पड़ता है। जो केवल अपनी ही अहंता प्रतिपादित करते रहते हैं, जिन्हें केवल अहंकार प्यारा है वे अपने संकुचित दृष्टिकोण के कारण ज्ञान के आनन्द और अनुभूति को जान नहीं पाते। छोटे-से-छोटा बन जाने पर ही महानता की पहचान की जाती है। गल्ले के भारी ढेर पसेरियों से तौले जाते हैं। कपड़ों के थान गजों से नापते हैं। अमुक स्थान कितनी दूर है, यह मील के पत्थर बताते हैं। ऐसे ही विराट के साथ संबंध स्थापित करने के लिए महानता से गठबन्धन करने के लिए—हमें विनम्र बनना पड़ता है। भय लज्जा और संकोच को त्यागकर तत्परतापूर्वक अपनी चेष्टाओं को उस ओर मोड़ना पड़ता है। तब कहीं ज्ञानवान् बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
अपने पास धन हो तो संसार की अनेकों वस्तुएँ क्रय की जा सकती हैं। शारीरिक शक्ति हो तो दूसरों पर रोब जमाया जा सकता है। इससे दूसरों पर शासन भी कर सकते हैं औरों के अधिकारों का अपहरण भी कोई बलशाली कर सकता है। किन्तु विद्या किसी से खरीदी नहीं जा सकती, दूसरों से छीन भी नहीं सकते। इसके लिये एकान्त में रहकर निरन्तर शोध, अध्ययन और पर्यवेक्षण की आवश्यकता पड़ती है। अपनी मानसिक चेष्टाओं को सरस व मनोरंजक कार्य-क्रमों से मोड़कर इसमें लगाना पड़ता है। ज्ञानार्जन एक महान् तप है। इसे प्राप्त करने के लिए दृढ़ता, मानसिकता और अध्ययनशीलता अपेक्षित है। इसे प्राप्त कर लेने के बाद खो जाने का भय नहीं रहता।
किन्हीं बालकों में किशोरावस्था में ही अलौकिक बौद्धिक क्षमता की प्रतिभा देखते हैं तो यह सोचने को विवश होना पड़ता है कि एक ही वय, स्थान व वातावरण में अनुकूल स्थिति प्राप्त होने पर भी दो बालकों की मानसिक शक्ति में यह अन्तर क्यों होता है? तब यह मानना पड़ता है कि एक में पूर्व जन्मों के ज्ञान के संस्कार प्रबल होते हैं दूसरे में क्षीण। भरत, ध्रुव, प्रहलाद, अभिमन्यु आदि में जन्म से ही प्रखर ज्ञान के उज्ज्वल संस्कार पड़े थे। जगद्गुरु शंकराचार्य ने थोड़ी ही अवस्था में पूर्णता प्राप्त कर ली थी। यह उनके पिछले जन्मों के परिपक्व ज्ञान के कारण ही हुआ मानना पड़ता है। इससे इस मत की पुष्टि होती है कि चिर-सहयोगी के रूप में जन्म-जन्मान्तरों तक साथ रहने वाला अपना ज्ञान ही है। ज्ञान का नाश नहीं होता। वह अजर है, अमर है।
सार्थक-जीवन की आधार-शिला ज्ञान है। बुद्धिमत्ता की सच्ची कसौटी यह है कि मनुष्य अपनी सच्ची जीवन-दिशा निर्धारित करे। कुछ न कुछ करता रहे चाहे वह अहितकर ही क्यों न हो, यह बात तर्क-संगत प्रतीत नहीं होती। कर्म का महत्व तब है जब उससे हमें अपना जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता मिलती है। यह प्रक्रिया मानव जीवन में सन्मार्ग पर चलने से पूरी होती है और सन्मार्ग पर देर तक टिके रहना ज्ञान-प्राप्ति से ही सम्भव है। इसे प्राप्त करने के लिये अपने जीवन को साधनामय बनाए तो ही ज्ञानवान् बनने का सच्चा सुख प्राप्त कर सकते हैं। ज्ञान ही इस संसार की सर्वोपरि सम्पत्ति है।
मनुष्य जीवन की सार्थकता उज्ज्वल और उद्दात्त चरित्र से होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के भागीदार वे होते हैं जिनमें चारित्रिक बल की न्यूनता नहीं पाई जाती। जिस पर सभी लोग विश्वास करते हों ऐसे ही लोगों की साख औरों पर पड़ती है। पर-उपदेश तो वाक् पटुता के आधार पर धूर्त व्यक्ति तक कर लेते हैं। किन्तु दूसरों को प्रभावित कर पाने की क्षमता, लोगों को सन्मार्ग का प्रकाश दिखाने की शक्ति चरित्रवान् व्यक्तियों में हुआ करती है। सद्-विचारों और सत्कर्मों की एकरूपता को ही चरित्र कहते हैं। जिसके विचार देखने में भले प्रतीत हों किन्तु आचार सर्वथा भिन्न हों, स्वार्थपूर्ण हों, अथवा जिनके विचार छल व कपट से भरे हों और दूसरे को धोखा देने, प्रपंच रचने के उद्देश्य से चिन्ह पूजा के रूप में सत्कर्म करने की आदत होती है उन्हें चरित्रवान् नहीं कहा जा सकता। सत्कर्मों का आधार इच्छा-शक्ति की प्रखरता है। जो अपनी इच्छाओं को नियन्त्रित रखते हैं और उन्हें सत्कर्मों का रूप देते हैं उन्हीं को चरित्रवान् कहा जा सकता है। संयत इच्छा-शक्ति से प्रेरित सदाचार का ही नाम चरित्र है।
विपुल धन सम्पत्ति, आलीशान मकान, घोड़े-गाड़ी, यश, कीर्ति आदि कमाने एवं विविध भोग भोगने की इच्छा आम लोगों में पाई जाती है बालकों का हित भी इसी में मानते हैं कि उनके लिए उत्तराधिकार में बहुत धन दौलत जमा करके रखी जाय। किन्तु वे यह भूल जाते हैं कि जिस धन से भावी-सन्तान आत्म-निर्माण न कर सके वह धन क्या? बिना श्रम उत्तराधिकार में मिला धन घातक होता है। सच्ची बपौती व्यक्ति का आदर्श चरित्र होता है, जिससे बालक अपनी प्रतिभा का स्वतः विकास करते हैं। उज्ज्वल चरित्र का आदर्श भावी-सन्तति के जीवन-निर्माण में प्रकाश स्तम्भ का कार्य करता है।
समाज का सौंदर्य, सुख और शान्ति चरित्रवान् व्यक्तियों के द्वारा स्थिर रहती है। दुश्चरित्र और दुराचारी लोगों से सभी भयभीत रहते हैं। उनके पास आने में लज्जा व संकोच अनुभव करते हैं। जो भी उनके संपर्क में आता है उसे ही वे अपने दुष्कर्मों की आग में लपेट लेते हैं। ऐसा समाज दुःख कलह और कटुता से झुलसकर रह जाता है। अनेकों प्रकार की भौतिक सम्पत्तियाँ व साँसारिक सुख सुविधाएँ होते हुए भी लोगों को शान्ति उपलब्ध नहीं होती। अधिकतर लोग कुढ़-कुढ़कर जीवन बिताते रहते हैं। यह सब चारित्रिक न्यूनता के कारण ही होता है।
समाज की सुव्यवस्था का आधार उज्ज्वल चरित्र के व्यक्तियों का बाहुल्य माना गया है। सुख-शान्ति और सन्तोष की परिस्थितियाँ नेक व्यक्तियों के आधार से बनती हैं। प्रेम, स्नेह, मैत्री दया, आत्मीयता और सहानुभूति का वातावरण जहाँ भी रहेगा वहीं स्वर्ग जैसे सुखों की रसानुभूति होने लगती है। जो मनुष्य स्वभावतः दूसरों के साथ उदारता का व्यवहार करते हैं स्नेह बरतते और परोपकार की भावना करते हैं वे अपने चरित्र की उज्ज्वल छाप दूसरों पर भी छोड़ते हैं। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है तो ऐसे स्थान विशेष में स्वर्गिक परिस्थितियों का उभार स्वयमेव होने लगता है। व्यक्ति के चरित्रवान् बनने से ही किसी समाज का सच्चा सुधार हो सकता है। इसलिए चरित्र की महान महत्ता को सभी महापुरुषों ने स्वीकार किया है।
यह देखा जाता है कि लोग अपने बच्चों के नाम रामकृष्ण, शिव-शंकर राणाप्रताप, रणजीत आदि रखना अधिक पसन्द करते हैं। रावण, कंस, या खरदूषण नाम रखना किसी को भी प्रिय नहीं। इससे प्रतीत होता है लोगों में चरित्रवान् की प्रतिष्ठा व सम्मान का भाव अधिक पाया जाता है। यह बात अपने यहाँ ही नहीं हर देश, जाति और संस्कृति में पाई जाती है। इससे चरित्र की महान् महत्ता प्रतिपादित होती है। मनुष्य की कीर्ति, यश और सम्मान का आधार बाह्यजगत की सफलताएँ नहीं हैं। उसकी आन्तरिक श्रेष्ठता के आधार पर युगों तक यश शरीर अमर रहता है। सोलहवीं सदी में सबसे बड़ा पहलवान कौन हुआ, ईसा के जन्म से दो शताब्दी पूर्व कौन व्यक्ति सर्वाधिक धनी हुआ है यह कोई भी न जानता होगा, इतिहास में भी इनका कहीं उल्लेख नहीं मिलता। किन्तु भगवान राम, कृष्ण, हरिश्चन्द्र शिव, दधीच, अर्जुन आदि चरित्रवान् महापुरुषों की जीवनियाँ आज भी लोगों को मुँह जबानी याद हैं।
दुराचारी व्यक्ति अपनी बाह्य-शक्तियों को भी देर तक बनाए नहीं रख सकते। कुकर्मों पर चलने से उनकी दुर्दशा स्वाभाविक है। फलतः उनका जीवन दिन-दिन पतित होता जाता है और उन्हें निरन्तर नारकीय यन्त्रणायें भोगनी पड़ती हैं किन्तु चरित्रवान् व्यक्तियों को बुरा-समय भी वरदान सिद्ध हुआ है। अपनी चारित्रिक विशेषता के कारण सत्यव्रती हरिश्चंद्र ने अपना खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त कर लिया, उर्वशी का श्राप कालान्तर में अर्जुन के लिए वरदान सिद्ध हुआ। रावण के दुष्कर्मों का फल विनाश के रूप में मिला और विभीषण की नेकी का परिणाम यह हुआ कि उसे लंका की राजगद्दी मिली। चरित्र मनुष्य को सदैव ही ऊँचे उठाता है। परिस्थितियाँ तो चरित्रवान् पुरुषों की चेरी कही गई हैं।
काम-विषयक सदाचार चरित्र की सर्वश्रेष्ठ विशेषता और कसौटी मानी गई है। कुछ अर्थों में “चरित्र” शब्द से मर्यादित कामोपभोग का ही अर्थ लगाया जाता है। जिन देशों में स्त्री-पुरुषों के बीच की शील मर्यादाएँ निश्चित नहीं वहाँ भारी विशृंखलन पैदा हुआ देखा जाता है। पाश्चात्य देश इस कुटिल प्रवंचना में ग्रसित होने के कारण अपना श्रेय खो चुके हैं। पाश्चात्य सिद्धान्तों पर आधारित इस घृणित दुष्प्रवृत्ति के कारण भारतीय संस्कृति और समाज कम अस्त-व्यस्त नहीं हुआ। इस विषैली कामुकता की दुर्भाग्यपूर्ण स्वच्छन्दता ने आज सारे सामाजिक ढाँचे को ही खोखला कर दिया है। इसके दुष्परिणाम भी बुरी तरह से लोगों को आहत बनाने में लगे हैं। स्वास्थ्य की दुर्दशा, अशक्तता, अपहरण, हत्या और आत्म-हत्याओं के आज जितने दृश्य दिखाई दे रहे हैं उन सबका अधिकाँश कारण मनुष्य का चारित्रिक पतन ही है। सदाचार की सीमाएं जब तक निर्धारित न होंगी और दुराचार पर जब-तक प्रतिबंध न लगेगा तब तक समाज में सुख शान्ति और व्यवस्था का स्थापित होना प्रायः असम्भव ही है।
भीतर-बाहर से पवित्र रहने, शुद्ध आचरण करने, श्रेष्ठ पुस्तकों के स्वाध्याय, सत्संग शक्ति पुरुषार्थ, आत्मिक-प्रसन्नता के आधार पर ही मनुष्य की उन्नति सम्भव है। आत्म-नियन्त्रण, संयम और सम्भाषण से न केवल अपने को वरन् अपने पास-पड़ोस और संपर्क में आने वालों को भी सुख मिलता है। मानवता का विकास भी इसी से सम्भव है कि दूसरों को भी अपने ही समान समझें और सबके साथ सद्व्यवहार करें। यह सब चरित्रवान् व्यक्ति के लक्षण हैं। जिनके द्वारा दूसरों को भी आत्म-कल्याण की प्रेरणा मिले वही चरित्र के सच्चे धनी कहे जा सकते हैं।
पर-निन्दा छिद्रान्वेषण, झूठ, छल, कपट, व्यभिचार, लोलुपता ये सब आसुरी प्रवृत्तियाँ हैं। इनसे विनाशकारी परिणाम ही उपस्थित होते हैं। पर आत्म-संयम और स्वत्वाभिमान के द्वारा वैयक्तिक या सामाजिक सभी प्रकार की श्रेष्ठताओं का उदय होता है। चरित्र-साधना का मूलाधार मानसिक पवित्रता है। जीवन के प्रत्येक छोटे-मोटे व्यवसाय व क्रिया-कलापों में मानसिक स्थिति का प्रभाव पड़ता ही है। आत्मिक पवित्रता का परिणाम सदाचरण है जिससे सुख मिलता है। कुविचारों से कुकर्म उठ खड़े होते हैं, जिससे कष्ट, क्लेश और मुसीबतें आ उपस्थित होती हैं। इसलिए छोटे-से-छोटे कार्य में भी पवित्रता का भाव बनाये रखने से चारित्रिक-विकास होता है। प्रातःकाल सोकर उठने से दिनभर कार्यरत रहने और सायंकाल निद्रा-माता की गोद में जाने तक जितने कर्म हमें करने पड़े उनमें पवित्रता का भाव बना रहे तो ही किसी को चरित्रवान कहलाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। यह एक साधना है जिसकी सिद्धियाँ अनन्त हैं।
चरित्र का आधार धर्म है। मन वचन और कर्म से धार्मिक कृत्यों के निर्वाह को सदाचार कहा जाता है। इससे चरित्र बनता है। मानवता से ओत-प्रोत भावनाओं से चरित्र की रक्षा सम्भव है। अतएव अपने जीवन में उदारतापूर्वक धार्मिक भावनाओं को धारण किए रहने से चारित्रिक-बल प्रगाढ़ बना रहता है। बुद्धि, धन या शरीर बल तब तक सुख नहीं दे सकते जब तक चरित्र में मानवता बुद्धि में धर्मभाव और शरीर से सत्कर्म नहीं बन पड़ते।
चरित्रवान् बनने के लिये अपनी आत्मिक शक्ति-जगाने की आवश्यकता होती है। तप, संयम और धैर्य से आत्मा बलवान बनती है। कामुकता, लोलुपता व इन्द्रिय-सुखों की बात सोचते रहने से ही आत्म-शक्ति का ह्रास होता है। अपने जीवन में कठिनाइयों और मुसीबतों को स्थान न मिले तो आत्म-शक्ति जागृत नहीं होती। जब तक कष्ट और कठिनाइयों से जूझने का भाव हृदय में नहीं आता तब तक चरित्रवान् बनने की कल्पना साकार रूप धारण नहीं कर सकती।
चरित्र-निर्माण के लिये साहित्य का बड़ा महत्व है। महापुरुषों की जीवन कथायें पढ़ने से स्वयं भी वैसा बनने की इच्छा होती है। विचारों को शक्ति व दृढ़ता प्रदान करने वाला साहित्य आत्म-निर्माण में बड़ा योग देता है। इससे आन्तरिक विशेषताएँ जागृत होती हैं। अच्छी पुस्तकों से प्राप्त प्रेरणा सच्चे मित्र का कार्य करती है इससे जीवन की सही दिशा का ज्ञान होता है। इसके विपरीत अश्लील साहित्य अधःपतन का कारण बनता है। जो साहित्य इन्द्रियों को उत्तेजित करे उससे सदा सौ कोस दूर रहें। इनसे चरित्र दूषित होता है। साहित्य का चुनाव करते समय यह देख लेना अनिवार्य है कि उसमें मानवता के अनुरूप विषयों का सम्पादन हुआ है अथवा नहीं? यदि कोई पुस्तक ऐसी मिल जाय तो उसे ही सच्ची रामायण, गीता, उपनिषद् मानकर वर्णित आदर्शों से अपने जीवन को उच्च बनाने का प्रयास करें तो चारित्रिक संगठन की बात स्वतः पूरी होने लगती है।
हमारी वेषभूषा व खानपान भी हमारे विचारों तथा रहन-सहन को प्रभावित करते हैं। भड़कीले चुस्त व अजीब फैशन के वस्त्र मस्तिष्क पर अपना दूषित प्रभाव डालने से चूकते नहीं। इनसे हर घड़ी सावधान रहें। वस्त्रों में सादगी और सरलता मनुष्य की महानता का परिचय है। इससे किसी भी अवसर पर कठिनाई नहीं पड़ती। मन और बुद्धि की निर्मलता पवित्रता पर इनका बड़ा सौम्य प्रभाव पड़ता है। यही बात खान-पान के संबंध में भी है। आहार की सादगी और सरलता से विचार भी वैसे ही बनते हैं। मादक द्रव्य मिर्च, मसाले, माँस जैसे उत्तेजक पदार्थों से चरित्र-बल क्षीण होता है और पशुवृत्ति जागृत होती है। खान पान की आवश्यकता स्वस्थ रहने के लिए होती है न कि विचार-बल को दूषित बनाने को। आहार में स्वाद-प्रियता से मनोविकार उत्पन्न होते हैं अतः भोजन जो ग्रहण करें वह जीवन रक्षा के उद्देश्य से हो तो भावनायें भी ऊर्ध्वगामी बनती हैं।
चरित्र-रक्षा प्रत्येक मूल्य पर की जानी चाहिये। इसके छोटे-छोटे कार्यों की भी उपेक्षा करना ठीक नहीं। उठना, बैठना, वार्तालाप, मनोरञ्जन के समय भी मर्यादाओं का पालन करने से उक्त आवश्यकता पूरी होती है। सभ्यता का चिन्ह सच्चरित्र सादा जीवन और उच्च विचारों की माना गया है। इससे जीवन में मधुरता और स्वच्छता का समावेश होता है। जीवन की सम्पूर्ण मलिनतायें नष्ट होकर नये प्रकाश का उदय होता है जिससे लोग अपना जीवन लक्ष्य तो पूरा करते ही हैं औरों को भी सुवासित तथा लाभान्वित करते हैं। जीवन सार्थकता की साधना चरित्र है। सच्चे सुख का आधार भी यही है। इसलिए प्रयत्न यही रहे कि हमारा चरित्र सदैव उज्ज्वल रहे, उद्दात्त रहे।
छात्रों की एक सभा में प्रसिद्ध उपन्यासकार मुंशी प्रेमचन्द का प्रवचन हो रहा था, वे हंस मुख स्वभाव के थे, भाषण में छात्रों को हँसाते जा रहे थे।
जब भाषण समाप्त हो गया तो एक छात्र ने पूछा—”आपको सबसे अधिक पसन्द क्या है?” उत्तर देते हुए उन्होंने तपाक से कहा—हँसी-खुशी का वातावरण। मुँह लटकाए रहने वाले मनहूसों के बीच में तो मेरा दम ही घुटने लगता है।
इस विश्व में जो भी श्रेष्ठता सौंदर्य और महानता दिखाई पड़ती है वह मनुष्य के सद्विचारों और सत्कर्मों का ही परिणाम है। अपनी अच्छी बुरी भावनाओं के अनुसार ही जीवन में क्रियाशीलता उत्पन्न होती है। जो सोचते हैं वही करते हैं, इसी के अनुरूप अच्छे बुरे कर्मों का दण्ड या पुरस्कार मिलता है। कर्म का महत्व जो जी में आये करने से नहीं होता वरन् उसके भले या बुरे प्रतिफल से होता है। आम का पेड़ लगाना या बबूल बोना दोनों क्रियायें एक जैसी हैं। शक्ति, उद्यम व साधन दोनों को एक समान ही जुटाने पड़ते हैं किन्तु आम रोपने का प्रतिफल सुन्दर स्वादयुक्त फल, सुखद घनी छाया है और बबूल से न तो छाँव मिलती है न मीठे फल। काँटे बिखेर कर दूसरों को दुःख पीड़ा पहुँचाने का अपकार ही बबूल से बन सकता था इसके लिए उसकी सर्वत्र निन्दा व भर्त्सना ही की जाती है।
मनुष्य स्वतः अच्छा या बुरा नहीं है। यह ढलाव तो विचारों के साँचे में होता है। गीली मिट्टी को विभिन्न प्रकार के साँचे में दबाकर भाँति-भाँति के खिलौने बनाते हैं। विचारों के साँचे में व्यक्ति का निर्माण होता है। दूषित स्वार्थपूर्ण विचारों से मनुष्य हीन बनता है। दुष्टता-पूर्ण, दुष्कर्मों के कारण वह दुःख और त्रास पाता है। मंगल-चिन्तन व शुभकर्मों से आन्तरिक सौंदर्य के दर्शन होते हैं श्री, समृद्धि और सफलता का सुख मिलता है।
बुरे विचारों की कीचड़ में फँसा हुआ व्यक्ति अपना प्रभाव खो देता है। यद्यपि उसकी नैसर्गिक पवित्रता नष्ट नहीं हुई, उसकी शक्ति ज्यों की त्यों बनी हुई है किन्तु मान गिर गया, कीमत गिर गई। कुविचार और कुकर्म सदैव मनुष्य को अधोगामी ही बनाते हैं।
देखने में आता है कि लोग प्रायः दूसरों के ऐब निकालते रहते हैं। यह क्रोधी है, वह निकम्मा है। दृढ़तापूर्वक न्यायिक दृष्टि से निरीक्षण करने पर हमें अपने आप में ही अनेकों दोष दिखाई दे जाते हैं, नहीं तो यह छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति ही किस अपराध से कम है। निरन्तर बुरे विचार करते रहने से अशुभ कर्म ही बन सकते हैं। कटुता, कलह, द्वेष, दुर्भाव, विभाजन तथा असहयोग ही इसके परिणाम हो सकते हैं।
पाप-पुण्य की व्याख्या करते हुए महाभारतकार ने लिखा है—
अष्टादशपुराणानाँ सारं सारं समुद्धृतम।
परोपकारः पुण्याय पापाय पर पीड़नम्॥
न तत्परस्य संदध्यात् प्रतिकूलं यदात्मनः।
एव संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते॥
“ दूसरों के प्रति उपकार करना ही पुण्य और दूसरों को पीड़ा देना ही पाप है। यही समस्त पुराणों का सार है। दूसरों के साथ वह व्यवहार न करें जो स्वयं अपने को ही प्रतिकूल जान पड़े। यही समस्त धर्म का सार है। इसके अतिरिक्त दूसरे कर्मों का आधार तो केवल स्वार्थ हैं।”
स्वभावतः मनुष्य की इच्छाओं में बहुत कुछ समानता होती है। दूसरों से प्रेम स्नेह आत्मीयता सहयोग और सहानुभूति की अपेक्षा सभी रखते हैं। पर जब व्यवहारिक रूप में हम दूसरों के साथ ऐसा बर्ताव नहीं करते तो इसे कुविचार माना जाता है। अपने अहंकार को श्रेष्ठ मानना और अपनी इच्छाओं की उचित अनुचित किसी भी तरह से पूर्ति करने को ही पाप माना गया है। अपकार, को पाप कहते हैं क्योंकि यह दुर्भावनाओं के कारण होता है। परोपकार पुण्य है क्योंकि यह सद्भावना का प्रतीक है। संक्षेप में मंगलमय कामनाएं पुण्य और स्वार्थपूर्ण भावनाओं को ही कहा जा सकता है।
अपने में जो थोड़ी बहुत गुणों की पूँजी है इसी पर प्रसन्नता अनुभव करें और उसे विकसित करें तो मनुष्य एक दिन महानता की मंजिल तक पहुँच जाता है। विचारों के अनुसार ही चेष्टायें जागृत होती हैं। सत्कर्मों के विस्तार से आत्मा-विकसित होती है। आत्म-विकास से स्वर्गीय सुख की रसानुभूति होती है। पुण्य को प्रोत्साहन और पाप की उपेक्षा आत्मानुभूति के सदुद्देश्य से प्रेरित होकर की गई है। आध्यात्म की पहली शिक्षा यह है कि मनुष्य निरन्तर मंगलमय कामनाएँ करे और सदाचारी बने।
यह तभी सम्भव है जब सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिले।
किसी भी अवस्था में मनुष्य की आन्तरिक पवित्रता का पूर्णतया नाश नहीं होता। वह अज्ञान के अंधेरे में ढंकी-सी रहती है। जैसे अग्नि को राख ढक लेती है, वैसे ही दुष्कर्मों की मलिनता में यह आन्तरिक निर्मलता दबी रहती है। इस पवित्रता को पुनः जागृत करने के लिए प्रशंसा और प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है। आत्मनिरीक्षण द्वारा अपनी शक्ति श्रद्धा और विश्वास को जगाये रखें और प्रेरणा व प्रोत्साहन देकर दूसरों की पवित्रता पुनरुज्जीवित करने में सहयोग दें तो इसे महान् शुभ-कर्म मानना पड़ेगा। सामाजिक सुव्यवस्था की नीति यही है कि सब मिल जुलकर एक दूसरे को महानता की ओर अग्रसर करने में सहयोग देते रहें। यह कार्य सद्-विचारों और सत्कर्मों द्वारा सहज ही में पूरा हो जाता है।
मानव-जीवन की सार्थकता के लिए विचार-पवित्रता अनिवार्य है। केवल मात्र-ज्ञान भक्ति और पूजा से मनुष्य का विकास एवं उत्थान नहीं हो सकता। पूजा भक्ति और ज्ञान की उच्चता व श्रेष्ठता का व्यावहारिक रूप से प्रमाण देना पड़ता है। जिसके विचार गन्दे होते हैं उससे सभी घृणा करते हैं। जो वातावरण गन्दा है वहाँ जाने से सभी को झिझक होती है। शरीर गंदा रहे तो स्वस्थ रहना जिस प्रकार कठिन हो जाता है उसी प्रकार मानसिक पवित्रता के अभाव में सज्जनता, प्रेम और सद्-व्यवहार के भाव नहीं उठ सकते। आचार-विचार की पवित्रता से ही व्यक्ति का सम्मान व प्रतिष्ठा होती है।
सतोगुणी विचारों से प्रेरित मनुष्य का खान-पान, रहन-सहन, वेषभूषा भी पवित्र होती है। मन, वचन, कर्म में सर्वत्र शुचिता के दर्शन होते हैं। ऐसा व्यक्ति सभी के हित व कल्याण की बात सोचता है। सभी की भलाई में अपनी भलाई मानता है। इससे दैवी सम्पत्तियों का विस्तार होता है और सुख की परिस्थितियाँ बढ़ने लगती हैं। पूर्व काल में लोग अधिक सुखी होते थे इसका कारण लोगों के आचार-विचार में पर्याप्त पवित्रता थी। अनैतिक कर्मों के बाहुल्य के कारण इस समय दुःखों का बाहुल्य हो रहा है। समय सदा एक सा रहता है किन्तु आचरण और विचारों की भिन्नता के फलस्वरूप एक समय की परिस्थितियाँ सुखद बन जाती हैं और इससे प्रतिकूल परिस्थितियाँ कष्ट व क्लेशदायक रहती हैं।
इन परिस्थितियों को सुधार लेना भी सम्भव है। अपने जीवन को सेवामय बनने दें। इसके लिए अपने हृदय में चाह तथा उत्साह बनाये रखें। सहानुभूति, प्रेम उदारता सहनशीलता और नम्रता से मन की पवित्रता स्थिर बनी रहती है। उसी प्रकार परमात्मा को अन्तर्यामी घट-घटवासी मानने से किसी के प्रति पाप का भाव पैदा न होगा। सामने कोतवाल खड़ा हो तो चोर को तिजोरी में हाथ लगाने की हिम्मत भी न पड़ेगी। “परमात्मा हर घड़ी हमारे साथ रहता है” यह मान्यता जितनी अधिक दृढ़ होती जाती है उतना ही दुष्कर्मों से छुटकारा मिलता जाता है। इससे अपना दृष्टिकोण निर्दोष बनता है।
सच्चे हृदय से जो आत्म कल्याण की बात सोचते हैं उन्हें इसके लिये आवश्यक प्रयत्न भी करने पड़ते हैं। नम्र उदार दयालु उपकारी और दूसरों का सहायक बनना पड़ता है। इन सद्गुणों का विकास एक आदेश में यथावकाश कर लेना ही पर्याप्त नहीं होता वरन् अपने सम्पूर्ण जीवन में इन सद्गुणों का अभ्यास करते रहना पड़ता है। सात्विकता की वृद्धि के साथ-साथ आत्मा में असाधारण शाँति, सन्तोष, प्रसन्नता, उल्लास और आनन्द छाया रहता है। उसका प्रत्येक विचार और कार्य पुण्यमय होता है।
आत्मा की दृष्टि से संसार के सम्पूर्ण प्राणी एक समान हैं। शरीर, धन, मान, पद और प्रतिष्ठा की बहुरूपता आत्मागत् नहीं होती है। इस दृष्टि से ऊँच नीच, वर्णभेद छोटे-बड़े, अशक्त, बलवान धनी या निर्धन का कोई भेदभाव नहीं उठता। परमात्मा के दरबार में सब एक समान हैं, कोई ऊँच-नीच, छोटा-बड़ा, राजा या फकीर नहीं है। जो यह समझकर सबके साथ सदैव पूर्ण भावनायें रखता है वही सच्चा आध्यात्मवादी है।
सम्राट अशोक को कलिंग का भयानक युद्ध लड़ना पड़ा। विजय उन्हीं की हुई पर उसमें जो नरसंहार हुआ, सहस्रों बालकों और विधवाओं को जो व्यथा वेदनाएँ सहनी पड़ीं उनसे सम्राट की अन्तरात्मा रो पड़ी। उनने सोचा जितना श्रम, जितना धन, जितने साधन, जितना पुरुषार्थ, अहंकार और स्वार्थ की पूर्ति के लिये आरम्भ किये गए इन निकृष्ट कार्यों में व्यय किया जाता है उतना यदि रचनात्मक कार्यों में लगाया जा सके तो उससे मानवीय सुख-शान्ति प्रगति और समृद्धि में कितना बड़ा योग मिल सकता है?
वास्तविकता भरे विचार अशोक की श्रद्धा के रूप में परिणत होते गये और अन्त में उनने यही निश्चय किया कि उन्हें जो शक्ति और स्थिति मिली है उसे व्यर्थ कामों में नहीं, स्वार्थपूर्ण कार्यों में भी नहीं, केवल विश्व-मानव की सेवा में ही प्रयुक्त करेंगे। परमात्म का का दिया हुआ वैभव उन्हीं के चरणों में समर्पित कर देना, सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। इसी से वह अनुदान चिरस्थायी हो सकता है।
राज्य प्राप्त होने के नौवें वर्ष में उन्होंने बौद्ध धर्म की महत्ता को समझा और उसी के प्रसार में अपने सभी साधन प्रयुक्त करने आरम्भ कर दिये। यों लोग अपने धन, वैभव का एक छोटा अंश दान देकर यश लूट लेते हैं और पुण्य कमा लेने का सन्तोष भी कर लेते हैं वस्तुतः वह विडम्बना मात्र ही होती है। जिस कार्य को मनुष्य श्रेष्ठ समझे उसके लिए सर्वतोभावेन लगे, निर्वाह मात्र की अपने लिए व्यवस्था करके शेष को अपने प्रिय लक्ष्य के लिए समर्पित करे तो ही किसी को आस्थावान कहा जा सकता है। संसार में जितने आस्थावान महापुरुष हुए हैं उनने अपने प्रिय लक्ष्य के लिए सर्वस्व अर्पण करके ही सन्तोष प्राप्त किया है। सच्चे आदर्शवादी की तरह अशोक के सामने भी वही मार्ग शेष था।
जिस धर्म के प्रति अशोक की आस्था थी वह भले ही बौद्ध धर्म के रूप में अशोक के सामने आया हो पर था वस्तुतः मानवधर्म ही। उनके शिला लेखों में धर्म की विवेचना इस प्रकार मिलती है—अपासिनये। (सदाचरण) बहुकयाने (बहुजन कल्याण) सचे (सत्य) सोचये (पवित्रता) मादवे (मृदुता) अनिरभो प्राणाँन (प्राणियों को पीड़ा न देना) अविहिंसा भूतानं (जीवमात्र के साथ अहिसा का व्यवहार) मातरि पितरि सुश्रूषा (माता पिता की सेवा) गुरुनं अपचिति (गुरुजनों का समादर) मित संस्तुत नातिकानं, सम्बंधियों, ब्राह्मण और साधुओं की सहायता) अपव्ययता (कम खर्च करना) तथा अपमाडता (संग्रह न करना) इन्हीं सिद्धान्तों को बौद्धधर्म के अवतरण के पीछे अशोक ने देखा और उनका आरम्भ कर दिया।
यों सभी धर्मों के मूल में थोड़े हेर-फेर के साथ यही आदर्श सन्निहित हैं पर मानव जाति का दुर्भाग्य ही कहिए कि बाह्य कर्मकाण्ड और रीति रिवाजों को ही लोग धर्म समझते रहते हैं और उसमें भिन्नता देखकर परस्पर लड़ने झगड़ने लगते हैं। यदि बाह्य आवरणों को देशकाल पात्र की सुविधा व्यवस्था के रूप में देखा जाय और उन्हें गौण समझा जाय तो सभी धर्मों के मूल में एक ही तत्व—सदाचार अवस्थित मिलेगा। वस्तुतः सदाचार का दूसरा नाम ही धर्म है। अशोक इसी धर्म के प्रति आस्थावान् थे और उसी का उन्होंने प्रसार किया।
अशोक ने अपने राज्य में धर्म भावनाओं को बढ़ाने सदाचारी जीवन बिताने की प्रजाजनों को प्रबल प्रेरणा की और अधार्मिक अवाँछनीय तत्वों के उन्मूलन में तनिक भी शिथिलता न दिखाई। इतिहास मर्मज्ञ एच0जी0वेल्स ने लिखा है—संसार के सर्वश्रेष्ठ सम्राट तथा इनके 28 वर्ष के राज्यकाल को मानव-जाति के क्लेशपूर्ण इतिहास का सर्वोत्तम समय कहा जा सकता है।’ उन्होंने मनुष्यों के लिए ही नहीं पशु-पक्षियों के लिए भी न्याय का अधिकार पाने की व्यवस्था की।
कालसी (देहरादून) चितालद्रुग (मैसूर) वेर्रागुदी (मद्रास) मानमेहरा (हजारा) शहबाजगढ़ी (पेशाबर) जूनागढ़ (सौराष्ट्र) धौली (पुरी) ज्यौगडा (गंजाम) आदि स्थानों में जो शिलालेख मिले हैं उनसे प्रतीत होता है कि अशोक ने धर्म और सदाचार के प्रति मानव प्रवृत्तियों को मोड़ने के लिए भारत ही नहीं संसार भर में विद्वान धर्म प्रचारक भेजे, उनका व्यय-भार वहन किया, धर्म-ग्रन्थ लिखाये, पुस्तकालय स्थापित किये, विद्यालय खोले, सम्मेलन बुलाये और वे सब काम बड़ी रुचि-पूर्वक किए जिनसे धर्म-बुद्धि अपनाने की जन-प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिले। राज्य-कोष का विपुल धन उन्होंने इन्हीं कार्यक्रमों में लगाया।
सिकन्दर सरीखे अनेकों राजा और कारुँ जैसे धन कुबेर अनेकों इस पृथ्वी पर हो चुके हैं पर लोभवश वे अपने प्राप्त साधनों को स्वार्थ की संकीर्ण परिधि में ही बाँधे रहे। फलस्वरूप न अपना हित कर सके न दूसरों का, अशोक ने परमार्थ बुद्धि का आश्रय लेकर अपने शासन के केवल 28 वर्षों में वह कार्य कर दिखाया जिससे अनन्त काल तक उनकी धर्मबुद्धि को सराहा जाता रहेगा।
अशोक को यात्राओं का शौक था। प्रथम आठ वर्षों में ये विनोद यात्राएँ, विलासिता, हास परिहास, जिह्वा स्वाद मद्य माँस नृत्य वाद्य, जादू कौतुक, आखेट आदि के कार्य-क्रमों के साथ चलती थीं। धर्म दीक्षित सम्राट ने अब इन यात्राओं को धर्म प्रचार के निमित्त की जाने वाली तीर्थ यात्राओं में बदल दिया। वे बोधि वृक्ष दर्शन के लिए गये। साँची स्तूप के पूर्व द्वार पर रानी तिष्यरक्षिता समेत अशोक की बोधियात्रा का उल्लेख अंकित है। उनने अपने सभी प्रधान शासकों को आदेश दिया कि अपने क्षेत्रों में दौरा करके एक धर्म प्रचारक की तरह उपदेश दिया करें तथा धर्म बुद्धि एवं अधर्म-उन्मूलन के लिए आवश्यकतानुसार स्थानीय व्यवस्था किया करें। धर्म सेवकों की निर्वाह व्यवस्था पर पूरा ध्यान दिये जाने को वे राज्य कर्तव्य मानते थे, अतएव उन दिनों उच्चकोटि के धर्म सेवी भारत में मौजूद थे और वे अपने प्रकाश को एशिया के विभिन्न देशों तक फैलाने में लगे हुए थे।
उस काल की उपलब्ध जानकारी से विदित होता है कि अशोक ने माँसाहार को निषिद्ध ठहराकर प्राणिमात्र की हिंसा बन्द कर दी थी। पशु एवं मनुष्यों के लिए चिकित्सालय खुलवाये। रास्तों के सहारे वृक्ष लगवाए, कुँए खुदवाए, जेलों की दशा सुधारी, न्याय सरलतापूर्वक मिल सके ऐसी व्यवस्था की। प्रजाजनों में परस्पर सद्-भाव पैदा करने के लिए उन्होंने निरन्तर प्रयत्न किया।
अशोक के धर्म प्रचार से प्रभावित होकर भारत और लंका में ही नहीं मिश्र, सीरिया, मेसीडोनिया, ऐपिरस, किरीन गान्धार, तिब्बत, बर्मा, मलाया, जावा, सुमात्रा वाली, इन्डोनेशिया, जापान, चीन, रूस, ईरान आदि देशों की जनता ने भी उत्साहपूर्वक बौद्धधर्म स्वीकार किया। प्रत्येक देश में एक मुख्य प्रचारक चार उप प्रचारक और उनके साथ तीस-तीस धर्म प्रचारकों के दल भेजे गये थे। महेन्द्र, संघमित्रा, मज्झिम, कस्सपगोत्र, दुण्डुमिस्सर आदि धर्म प्रचारकों के अवशेष पुरातत्ववेत्ता कनिंघम को सोनी के समीप मिले थे, साथ में जो अंकन उपलब्ध हुए उनसे विदित होता है कि वे विदेशों में धर्म प्रचार करते थे।
कितने ही चक्रवर्ती शासकों ने अपने राज्य संसार में दूर-दूर तक फैलाने में सफलता प्राप्त की पर अशोक की धर्मराज्य विस्तार योजना सबसे अनुपम थी। राजाओं के राज्य उनके मरते ही बिखर गये पर अशोक द्वारा स्थापित किया हुआ धर्मराज्य आज भी बौद्धधर्म के रूप में संसार में विद्यमान है। ईसाई और मुसलमानों के अतिरिक्त आज भी जनसंख्या की दृष्टि से बौद्ध-धर्म का ही तीसरा नम्बर है। हिन्दू तो चौथे नम्बर पर आते हैं।
अशोक की नीति का थोड़ा-सा अनुगमन करके ईसाई धर्मावलम्बियों ने गत एक हजार वर्षों में लगभग आधी दुनिया को अपने धर्म में दीक्षित कर लिया है पर हिन्दू—अभागे हिन्दू—अभी भी कुम्भकर्णी निद्रा में पड़े हैं। वे संसार को धर्मराज्य के अंतर्गत लाने की बात सोचना तो दूर स्वधर्मावलम्बियों को भी दूर-दूर कर पराये बनाने में अपना बड़प्पन समझते हैं। अशोक की आत्मा इन्हें न जाने क्या-क्या कहकर कोसती होगी।
प्रत्येक कार्य जीवन में महान् सम्भावनाएँ लेकर आता है। छोटे-से-छोटा काम भी जीवन-विकास के लिये उसी तरह महत्वपूर्ण है जिस तरह एक छोटा बीज, जो कालान्तर में विशाल वृक्ष बन जाता है। किसी मनुष्य का मापदण्ड उसकी आयु नहीं वरन् उसके काम ही हैं जो उसने जीवन में किये हैं। इसलिए कर्मवीरों ने काम को ही जीवन का आधार बनाया। एक मनीषी ने तो यहाँ तक कह दिया “हे कार्य? तुम्हीं मेरी कामना हो, तुम्हीं मेरी प्रसन्नता हो, तुम्हीं मेरा आनन्द हो।”
इसमें कोई सन्देह नहीं कि तुच्छ से महान्, असहाय से समर्थ—शक्तिशाली, रंक से राजा, मूर्ख से विद्वान् सामान्य से असामान्य बनाने वाले वे छोटे से लेकर बड़े सभी कार्य हैं जो समय-समय पर हमारे सामने आकर उपस्थित होते हैं। किन्तु एक हम हैं जो अनेकों शिकायतें करके अपने कर्मदेव का अपमान करते हैं और वह लौट जाता है हमारे द्वार से। तब पश्चाताप करने और हाथ मलने के लिए ही विवश होना पड़ता है हमको।
कभी-कभी हम शिकायत करते हैं “यह काम तो बहुत छोटा है, यह मेरे व्यक्तित्व के अनुकूल नहीं है, मैं इन तुच्छ कामों के लिए नहीं हूँ” आदि-आदि। लेकिन हमने कभी यह भी सोचा है उद्गम से आरम्भ होने वाली नदी प्रारम्भ में इतनी छोटी होती है कि उसे एक बालक भी पारकर सकता है। एक विशाल वृक्ष जो बहुतों को छाया दे सकता है, मीठे फलों से तृप्त कर सकता है, अनेकों पक्षियों का बसेरा होता है, आरम्भ में एक छोटा-सा बीज ही था, जो तनिक सी हवा के झोंके से उड़ सकता था। एक छोटी-सी चिड़िया भी उसे निगल सकती थी, एक चींटी उसे उठाकर ले जा सकती थी। बहुमूल्य मोती प्रारम्भ में एक साधारण सा-बालू का कण ही होता है।
यही स्थिति हमारे सामने आने वाले कार्यों की भी है। प्रत्येक महान् और असाधारण बनाने वाला काम भी प्रारम्भ में छोटा, सामान्य लगता है। किन्तु कर्मवीर जब उसमें एकाग्र होकर लगते हैं वे ही महान् असाधारण महत्व के कार्य बन जाते हैं।
क्या आपको याद है कि उस वैज्ञानिक बनने की आकाँक्षा रखने वाले बालक एडीसन को उसके शिक्षक ने पहले घर में झाडू लगाने का काम सौंपा था और जब शिक्षक ने देखा कि इस कार्य में भी बालक की वैज्ञानिक प्रतिभा और गहरी दिलचस्पी काम कर रही है तो उसे विज्ञान की शिक्षा देनी प्रारम्भ की और वह अपने इस सद्गुण को विकसित करता हुआ महान् वैज्ञानिक बना। प्रत्येक महान् बनने वाले व्यक्ति के जीवन का प्रारम्भ उन छोटे-छोटे कार्य-क्रमों से ही होता है जिन्हें हम छोटे, तुच्छ समझकर मुँह फेर लेते हैं। उन छोटे-छोटे कार्यों का जिन्हें हम छोटे, महत्वहीन, सामान्य कहकर टाल देते हैं हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। उन पर ही हमारे जीवन की महानताओं का भवन खड़ा होता है। एक-एक कण मिलाकर ही वस्तु का आकार प्रकार बनाते हैं। विशालकाय इञ्जन में एक कील का भी अपना महत्व होता है। उसे निकाल दीजिए सारा इञ्जन बेकार हो जायगा। बड़े भवन में एक छोटे से पत्थर को भी अस्थिर और ढीला-ढाला छोड़ दिया जाय तो उसके गिर जाने का खतरा रहेगा। हमारे जीवन में आने वाले छोटे-छोटे कार्य मिलकर ही महान् जीवन का सूत्रपात करते हैं लेकिन जब हम अपने कामों को छोटे और महत्व-हीन समझकर उन्हें भली प्रकार नहीं करते तो वे हमें बहुत बड़ा शाप देते हैं, जिससे हमारे जीवन की सफलता अधूरी और अपंग रह जाती है।
काम जो सामने खड़ा है उसमें रुचि अरुचि का प्रश्न उठाना उसी तरह अनुपयुक्त है जिस तरह गर्मी के दिनों में सर्दी की कामना करना। गर्मी है तो इसी में रहने का अभ्यास डालना पड़ेगा जो काम हमारे सामने हैं उसे पूरा करने में जुट जाना ही हमारा वर्तमान धर्म है। महत्वाकाँक्षा या रुचि के अनुसार सब कुछ तुर्त-फुर्त नहीं हो जाता है। धीरे-धीरे ऐसी भी परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं जब मनुष्य को अपनी रुचि के अनुसार काम करने को मिले किन्तु यह तभी संभव है जब हम वर्तमान में जो काम सामने है उसे पूरा करने में लगे रहें। रुचि के अनुकूल काम कब मिलेगा यह भविष्य पर निर्भर है किन्तु जो आवश्यक ओर अनिवार्य है , वह है अपने प्रत्येक काम से प्यार करना, उसमें रस लेना और बड़ी तन्मयता लगन के साथ उसे पूर्ण करना। इसी से हमारा उद्धार हो सकेगा।
इच्छानुसार काम की प्रतीक्षा में मनुष्य को सम्पूर्ण जीवन ही बिता देना पड़े तो कोई सन्देह नहीं कि ऐसे व्यक्ति के लिए जीवन में कभी भी ऐसा काम नहीं आयेगा। बिना रुचि के किए गये काम न पूर्ण होते हैं न उसका कोई ठोस परिणाम ही मिलता है।
अपने काम में रुचि अरुचि का प्रश्न उठाना अनुपयुक्त है। यह एक तरह से अपनी अकर्मण्यता और आलस्य को प्रोत्साहन देना है। मानव मन की यह विशेषता है कि वह जिस प्रकार के भावों से प्रभावित होता है वैसा ही बनता जाता है। काम में रुचि अरुचि का अभ्यस्त मन आगे चलकर ऐसा बन जाता है कि उसे किसी भी काम में रुचि नहीं रहती और वे उसे अधूरा छोड़ देते हैं। ऐसे व्यक्ति एक काम को हाथ में लेते हैं। नये-नये काम आरम्भ करते रहते हैं और थोड़े समय बाद उससे भी अरुचि हो जाती है तो दूसरे में लगते हैं। तात्पर्य यह है कि वे किसी भी काम में दृढ़ स्थिर नहीं रह पाते। दूसरी ओर जब उपस्थित काम में हम प्रयत्नपूर्वक लग जाते हैं तो थोड़े समय में रुचि भी वैसी ही बन जाती है। इसलिये रुचि-अरुचि का प्रश्न उठाना असन्तुलित मनोभूमि का कारण है। आलस्य प्रमाद की प्रेरणा से ही मनुष्य इस तरह की मीनमेख निकालता रहता है।
कई बार अपने काम में धैर्य और निष्ठा का अभाव हमें सफलता के द्वार से वापिस लौटा देता है। तब हमारी शिकायत होती है “कब तक करते रहेंगे।” मनुष्य की यह एक स्वाभाविक कमजोरी होती है कि वह तुर्त फुर्त अपने काम का परिणाम देख लेना चाहता है। जिस तरह बच्चे खेल खेलने में आम की गुठली मिट्टी में गाड़ते हैं और उसे जल्दी-जल्दी बार-बार उखाड़ कर देखते हैं कि कहीं आम का पेड़ उग तो नहीं आया? वे भोले बालक यह नहीं जानते कि कहीं कुछ मिनट में ही आम का पौधा कभी उगता है? अपने काम के परिणाम के बारे में जल्दी-जल्दी सोचना इसी तरह की बचकाना प्रवृत्ति है। यह निश्चित है कि अच्छे उद्देश्य से भली प्रकार किया गया काम समय पर अपने परिणाम अवश्य प्रदान करता है लेकिन किसी काम का फल कब मिलेगा इसका ठीक-ठीक समाधान सामान्य व्यक्ति नहीं कर सकता। इसलिये अपने काम के परिणाम के बारे में अधिक सोच विचार न करके कर्मवीर के सामने एक ही मार्ग है कि वह जब तक सफलता न मिले अपने काम में डूबा रहे। हम तन्मय होकर काम में लगे रहें। उसमें हमको गहरी निष्ठा हो अपने काम के सिवा दूसरी बात हम न सोचें तो कोई सन्देह नहीं कि एक दिन सफलता स्वयं हमारा दरवाजा खटखटायेगी।
वस्तुतः काम को व्यापार न माना जाय काम तो काम है। जिस तरह कलाकार अपनी कला से प्यार करता है उसमें तन्मय होकर निष्ठा के साथ साधना करता है उसी तरह काम भी कला समझ कर किया जाय। हम अनुभव करेंगे कि जिस तरह कलाकार को अपनी कला साधना से मिलने वाला आनन्द, स्फूर्ति प्रसन्नता, कृति के भौतिक मूल्य से कहीं अधिक मूल्यवान होती है उसी तरह कर्म-साधना हमें वह आनन्द प्रसन्नता, चेतना प्रदान करेगी जो उसके भौतिक परिणाम से कहीं अधिक कीमती होंगे।
आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने काम से प्यार करें, उसकी इज्जत करें। कर्म साधना में पूर्ण तन्मय हो जाएँ। काम के प्रति छोटे बड़े, रुचि-अरुचि, “कब तक करेंगे” आदि शिकायतें न करें। तभी हम देखेंगे कि हमारा काम ही हमें जीवन के महान् वरदानों से परिपूर्ण कर देगा। वस्तुतः काम करना हमारे स्वभाव का आवश्यक अंग होना चाहिए। जो काम हमारे सामने हैं यदि हम भली प्रकार उसे करने को तत्पर हो जाते हैं तो कोई सन्देह नहीं कि एक दिन वह भी आयेगा जब हमें अपनी रुचि के अनुसार बड़े-बड़े काम मिलेंगे और उनसे हमारी महानता का पथ प्रशस्त हो सकेगा।
स्वाध्याय सन्दोह-
मानवता की सेवा सबसे बड़ा धर्म है
साधारण जन समाज के समक्ष ऊँचा तत्वज्ञान या वेदान्त रखने की आवश्यकता नहीं है। यह विशेष श्रेणी के जिज्ञासुओं का विषय है। हम सब जो तत्वज्ञान के पीछे पड़ गये हैं उससे लाभ की अपेक्षा हानि ही अधिक जान पड़ती है। वेदान्त का उपदेश सुनकर लोग सुख की उपेक्षा करने वाले, सुख-दुख को समान समझने वाले तो नहीं बने, उल्टा वेदान्त-सिद्धान्तों की आड़ में भ्रम, दम्भ, प्रमाद, आलस्य आदि दुर्गुण ही बढ़े हैं। इसलिए जैसा महात्मा बुद्ध ने कहा था वही हमको ठीक जान पड़ता है कि आत्मा है या नहीं, वह अविनाशी है या नाशवान, अथवा जगत अनन्त है अथवा सान्त इस तरह के वाद-विवाद में पड़ना अनावश्यक है। हमारा शरीर नाशवान् है यह तो हम अपने प्रतिदिन के अनुभव से जानते ही हैं, उसके परिणाम बाह्य-जगत में क्या होते हैं यह भी हम देखते हैं। उसके आधार पर प्रत्येक मनुष्य को यही विचार करना चाहिये कि मैं अपना कर्तव्य ऐसे उत्तम ढंग से पूरा करूं जिससे मेरे चित्त को शान्ति मिले, जगत में शान्ति बनी रहे और सबके सुख में वृद्धि हो। इस प्रकार सम्पूर्ण जीवन बिताकर मृत्यु के बाद जो भी हो उसे भोगने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। ऐसा विचार और तदनुसार कार्य हम करने लगे तो उससे लोक और परलोक सर्वत्र हमारा कल्याण ही होगा। साधारण जन-मानस इससे ज्यादा गहरी बातें नहीं पचा सकता। इसलिए जिन बातों पर वह आचरण कर सके और कुटुम्ब, समाज आदि के प्रति अपना कर्तव्य-पालन कर सके उतना ही उसे हित-दृष्टि से समझाना चाहिए।
लोगों के मन में परलोक और स्वर्ग-नर्क के विषय में काल्पनिक आशायें अथवा भय पैदा करने की जरूरत नहीं। ईसामसीह ने कहा है—”जैसे व्यवहार की आशा तू दूसरों से रखता है, वैसा ही व्यवहार तू दूसरों के साथ कर।’ इसके सिवा अन्य कल्पनाओं से व्यक्ति या समाज का हित नहीं हो सकता। उनसे हमको ऐसी कोई प्रेरणा नहीं मिलती जिससे वे अपने आस-पास के गरीब लोगों का दुःख दूर करने के लिये, सान्त्वना देने के लिए कटिबद्ध हो सकें। धर्म संबन्धी ये कल्पनाएँ उन्हें मानवता की शिक्षा नहीं देतीं, वरन् संकीर्णता और स्वार्थपरता की ही वृद्धि करती हैं। इसलिए यदि मनुष्य, ज्ञान और भक्ति के अव्यावहारिक और साधारण लोगों की पहुँच से बाहर सिद्धान्तों की अपेक्षा विवेकयुक्त रह कर अपने मानवीय कर्तव्य का पालन करते रहें तो यह एक श्रेष्ठ धर्म होगा।
-‘सुसंवाद’
धर्म और उसका उद्देश्य
मतों और धर्मों की विभिन्नता बाह्य परिस्थितियों तथा भौगोलिक और सामाजिक परम्पराओं से उत्पन्न होती है। समस्त धर्मों का उद्गम तो आध्यात्मिक भावना ही है और उसी पर धर्म का आधार भी होता है। असहनशीलता अबोधता का परिणाम है। बुद्धि समुचित आधार माँगती है, किन्तु जनसाधारण भावना से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं और सहज ही उसका नेतृत्व स्वीकार कर लेते हैं, जिन्हें वे योग्य समझते हैं। महत्वपूर्ण कार्य नेता का अनुसरण करना नहीं है बल्कि स्वयं को परिष्कृत करना है। इस प्रकार जो लोग स्वयं में ही अपने जीवन के संचालन के लिए यह आस्था पाते हैं, वे धन्य हैं। पर बहुत से लोग ऐसे हैं जिनकी बुद्धि और भावनाओं के बीच गहरी खाई है जिसके कारण वे दुःखी रहते हैं। अज्ञानी मनुष्य व्यर्थ ही अपने चारों और अज्ञान का जाल खड़ाकर उस आध्यात्मिकता को असत्य कहने लगते हैं, जिसने अब तक मनुष्य का मार्ग-दर्शन किया है।
—’मनुष्य का भाग्य’
धर्म का सार्वभौमिक स्वरूप
धर्म—सार्वभौमिक धर्म का अर्थ यह नहीं है कि सब लोगों को किसी एक ही सार्वभौमिक दार्शनिक तत्व, या पौराणिक तत्व या आचार-पद्धति को मानकर चलना पड़ेगा। इसका कारण यह है कि यह विश्वरूपी यन्त्र तरह-तरह के अनेक चक्रों से गठित और बहुत विशाल तत्व है। यह सदैव इसी प्रकार बना रहेगा। हम इतना ही कर सकते हैं कि इसके सब चक्रों को साफ रखकर उनका घर्षण-वेग कम कर दें जिससे यह यन्त्र भली प्रकार चलता रहे। इसके लिए हमको मानवमात्र के एकत्व की तरह वैषम्य को भी स्वीकार करना पड़ेगा। हमको यह शिक्षा लेनी होगी की एक ही सत्य का प्रकाश लाखों प्रकाश से होता है और प्रत्येक भाव अपनी निर्दिष्ट सीमा के अन्दर प्रकृत सत्य है। हमको यह सीखना होगा कि किसी भी विषय को सैंकड़ों प्रकार की विभिन्न दृष्टि से देखने पर भी वह एक ही वस्तु रहती है। मान लीजिए कोई मनुष्य पृथ्वी पर खड़ा होकर सूर्योदय को देख रहा है। उसको पहले एक गोलाकृति वस्तु दिखाई देगी। अब मान लीजिए कि उसने एक फोटो लेने का कैमरा लेकर किसी यंत्र में आकाश की यात्रा की और लाखों मील तक विभिन्न स्थानों से सूर्य के चित्र लेता चला गया। ये चित्र साधारण दृष्टि से देखने पर ऐसे जान पड़ेंगे कि भिन्न-भिन्न सूर्यों के चित्र हैं, पर हम अच्छी तरह जानते हैं कि वे सब एक ही सूर्य के हैं। धर्म और ईश्वर के संबंध में भी ऐसा ही होता है।
—’धर्म रहस्य’
सम्प्रदायवादियों के मतभेद निराधार हैं
धर्म का समूल ध्वंस करने के इच्छुक रूसी साम्यवादियों से यदि पूछा जाय कि क्या तुम दया, सत्य, सन्तोष, त्याग, प्रेम, क्षमा आदि गुणों का (जो धर्म के प्रधान लक्षण माने जाते हैं।) नाश करना चाहते हो, तो वे क्या उत्तर देंगे? साम्यवादियों का कट्टर से कट्टर विरोधी इस बात को सिद्ध नहीं कर सकता कि वे उपर्युक्त गुणों का विनाश करना चाहते हैं। दूसरी तरफ भारत के धर्म प्राण कहलाने वाले किसी पन्थ के धार्मिक सज्जनों से प्रश्न किया जाय कि क्या वे असत्य, दम्भ, क्रोध, हिंसा, अनाचार आदि दुर्गुणों का पोषण करना चाहते हैं, या सत्य, मैत्री आदि सद्गुणों के समर्थक हैं, तो निश्चय ही वे भी यही कहेंगे कि वे एक भी दुर्गुण का पक्ष नहीं करते वरन् सभी सद्गुणों की वृद्धि करने के इच्छुक हैं। अब यदि धार्मिक कहलाने वाले कट्टरपंथी हिन्दू और धर्म के शत्रु माने जाने वाले साम्यवादी दोनों ही सद्गुणों का समर्थन करने और दुर्गुणों को दूर करने के विषय में एक मत हैं, तो यह सवाल उठता है कि रूढ़ि पंथी और सुधारवादी इन दोनों के बीच धर्म-रक्षा और धर्म-विच्छेद के नाम पर जो भारी विवाद, खींचतान और मारामारी दिखलाई देती है उसका कारण क्या है? यह मतभेद, यह तकरार ‘धर्म’ नाम की किस वस्तु के विषय में है? सत्य यही है कि विभिन्न मतों या सम्प्रदायों में जो मतभेद अथवा विचार संघर्ष दिखलाई पड़ता है, उसका कोई ठोस आधार नहीं और वह केवल बाह्य क्रियाकाण्डों के विषय में ही होता है।
—’धर्म और समाज’
धर्म बाहर नहीं भीतर रहता है
तीर्थ या मन्दिर में जाने से, तिलक लगाने अथवा विशेष प्रकार के वस्त्र पहनने से धर्म की प्राप्ति नहीं होती। तुम चाहे अपने समस्त शरीर को तिलक और छापों से रंग डालो, पर जब तक आत्मा का दर्शन नहीं करते सब व्यर्थ है। अगर हृदय रंग गया तो बाहर से रंगने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती। बाहर के रंग—क्रिया काण्ड जब तक हमारे धार्मिक जीवन में सहायता करते हैं, तब तक उनकी उपयोगिता है, तब तक वे रहें, कोई हानि नहीं। किन्तु जब वे केवल अनुष्ठान मात्र ही होते हैं तब वे धर्म जीवन में सहायक नहीं होते, बल्कि विघ्न डालने वाले होते हैं। लोग इस बाह्य अनुष्ठानों को ही धर्म का स्वरूप समझ लेते हैं। तब मन्दिर चले जाना और पुरोहित को कुछ देना ही धर्म-जीवन का प्रधान अंग बन जाता है। यह अनिष्टकर है, इसे रोकने का यथाशक्ति प्रयत्न करना चाहिये। हमारे शास्त्री बार-बार कहते हैं कि धर्म कभी बाह्य इन्द्रियों के ज्ञान द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। धर्म वही है जिसके पालन करने से हम आत्मा के स्वरूप का अनुभव कर सकें।
ऐसे ही अनुभव करने वाले प्राचीनकाल में ऋषि कहे जाते थे। हम भी जब तक ऋषि नहीं बनते, जब तक धर्म-जीवन को प्राप्त नहीं कर सकते, तब तक हमारे भीतर धर्म का प्रकाश नहीं हो सकता।
—’जागृति का सन्देश’
डर का सबसे बड़ा कारण है अज्ञान। जिसे हम ठीक तरह नहीं जानते उससे प्रायः डरा करते हैं। सृष्टि के आरम्भ में आदिम मनुष्य सूर्य, चन्द्र, समुद्र, बादल, बिजली, नदी, पर्वत, आँधी, आग, सर्प का स्वरूप ठीक तरह समझ न पाया था, इसलिए चेतना विकास के प्रथम चरण में उनकी स्थिति शक्ति और मर्यादा की समुचित जानकारी न थी, फलस्वरूप उनसे डर लगा। देवता के रूप में उन्हें कल्पित किया गया और अनेक पूजा विधाओं से उन्हें संतुष्ट करने का प्रयत्न किया गया ताकि वे अपना कोई अहित न करें। मृत्यु के उपराँत का जीवन अभी भी रहस्यमय है पर पूर्वकाल में वह और भी रहस्य बना हुआ था। इस अज्ञान ने प्रत्येक मृतक को भूत प्रेत की मान्यता प्रदान कर दी और आकस्मिक दुर्घटनाओं विपत्तियों एवं बीमारियों का मूल कारण विदित न होने से उन्हें भूत की करतूत समझ लिया गया। प्रागैतिहासिक काल में मनुष्य की मनोभूमि का अधिकाँश भाग इन देवताओं और भूतों का सन्तोष समाधान करने में ही व्यतीत होता था।
ज्ञान का जैसे-जैसे विकास हुआ वे भय छूट गए। बीमार होते ही भूत को बलि चढ़ाने की तैयारी ही जिनके मस्तिष्क में एकमात्र उपाय सूझता हो ऐसे लोग अब बहुत थोड़े हैं, जो हैं वे सभ्य समाज में उपहासास्पद माने जाते हैं। इसी प्रकार अलग-अलग सत्ता वाले, एक दूसरे से लड़ने झगड़ने और ईर्ष्या, द्वेष करने वाले देवताओं के स्थान पर अब इन्हें एक ही ईश्वरीय शक्ति के विभिन्न काम माना जाने लगा है। ग्रह-नक्षत्रों की विद्या की सही जानकारी जैसे-जैसे बढ़ रही है वैसे-वैसे शनि और राहु की अनिष्टकर ग्रह दशा का आतंक समाप्त होता चला जा रहा है।
अधिकाँश भय अवास्तविक होते हैं। साँप से आमतौर से लोग डरा करते हैं पर सही बात यह है कि केवल सत्तरह प्रतिशत साँप ही ऐसे होते हैं जिनमें मारक विष रहता है। यह वास्तविकता जिन्हें विदित होती है, जो साँपों के स्वभाव की गहरी जानकारी रखते हैं वे उनसे जरा भी नहीं डरते वरन् कई बार तो उनसे अपना मनोरंजन लाभ भी करते हैं। सरकस के कर्मचारी खूँखार जानवरों के बारे में अधिक जानकारी होने के कारण उनसे डरना तो दूर उलटा अचरज भरे काम कराते रहते हैं। घने जंगलों में सिंह व्याघ्रों के बीच निवास करने वाले आदिवासी उनसे जरा भी नहीं डरते बल्कि आँख-मिचौनी खेलते रहते हैं जब कि सामान्य लोगों को सिंह, व्याघ्र की बात सुनने से ही डर लगने लगता है।
अजनबी आदमी को देखकर तरह-तरह की आशंकायें मन में उठती हैं पर जब उसका पूरा परिचय हो जाता है। तो पूर्व आशंका मित्रता में बदल जाती है। अन्धेरे में जाते हुए डर केवल इसलिए लगता है कि वहाँ क्या हुआ होगा इसकी जानकारी न होने से चित्त में अनेक तरह की डरावनी बातें उठती हैं। नदी में थोड़ा पानी होने पर भी अनजान आदमी उसमें प्रवेश करते हुए दुर्घटना से सशंकित रहता है। सही जानकारी होने पर डर सहज ही दूर होता है। प्रकाश में तो सुनसान में जाते हुए और नदी के उथले पानी का सही पता लगाते हुए उसमें प्रवेश करते हुए किसी को कोई झिझक नहीं होती।
इस संसार में लगभग सारे डर अज्ञानमूलक हैं। हानि, घाटा, दुर्घटना, असफलता, आक्रमण, दुर्भाग्य, ग्रहदशा, भूत आदि की आशंका से जितना डरा जाता है वस्तुतः उसका सौवाँ भाग भी वास्तविक नहीं होता। अज्ञान ही कायरता या भीरुता का रूप धारण कर मनुष्य को भयभीत करता रहता है। जिसे जितना वास्तविक ज्ञान है वह उतना ही निर्भय रहेगा। तत्वज्ञानी की पहचान यह है कि वह पूर्णतया निर्भय हो। ज्ञान की उपासना को आध्यात्म मार्ग का प्रथम सोपान इसीलिए माना गया है कि उसके आधार पर मनुष्य सब प्रकार के भय और संशयों से छुटकारा पाकर अभीष्ट लक्ष्य की ओर अपनी मानसिक शक्तियों को लगा सकने में समर्थ होता है। वह अज्ञानी जिसे अनेक प्रकार के भय सताते रहते हैं अपनी मानसिक क्षमता का अधिकाँश भाग उसी गोरख-धन्धे में खो बैठता है फिर आत्म-कल्याण जैसे श्रेष्ठ कार्य के लिए उसके पास मनोबल बचेगा ही कैसे?
ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होने से मनुष्य संसार की हर वस्तु का स्वरूप समझ जाता है, तब उसे उनमें डरने लायक कुछ भी कारण दिखाई नहीं पड़ता। निर्भीक लोग उन परिस्थितियों में भी हँसते, प्रसन्नचित्त रहते ओर मानसिक सन्तुलन बनाये रहते देखे जाते हैं, जिनमें कि साधारण मनुष्य आशंकाओं और कुकल्पनाओं से भयभीत होकर किंकर्तव्यविमूढ़ बन जाते हैं। संसार के महापुरुष एवं राजनेता अगणित महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों और अशुभ संभावनाओं से घिरे रहते हैं। समस्याओं का हल वे सोचते हैं और जो सम्भव है वह करते हैं पर यह होता तभी है जब मानसिक संतुलन को सही रखने की, उत्तेजित न होने की क्षमता विद्यमान हो। श्रेष्ठ और निकृष्ट व्यक्तियों में धैर्य और अधीरता का ही अन्तर रहता है। जिसने इस संसार को एक नाटक मात्र समझ लिया है वह अपना सर्वोत्कृष्ट अभिनय करने मात्र का ध्यान रखता है। जैसी परिस्थितियाँ आती हैं उनके अनुरूप परिवर्तन करने और ढलने की क्षमता जिसने संपादित कर ली वे संसार को, समस्त परिजनों को, एक क्रीड़ा कौतुक मात्र समझते हैं। डरना उन्हें मानवीय दुर्बलता और अज्ञान का एक उपहासास्पद कारण प्रतीत होता है। जो डरते हैं वे कर कुछ नहीं पाते। डर के मारे अधमरे बने रहने वाले, आशंकाओं और संशयों से उद्विग्न रहने वाले व्यक्ति तो अर्ध मूर्छित, अर्ध मृतक स्थितियों में पड़े हुए निकृष्ट और असफल जीवन ही किसी प्रकार पूरा करते हैं।
जिसे अपनी शक्ति का सही ज्ञान होता है वह उतने बड़े कदम उठाता है जो अपनी सामर्थ्य और मर्यादा के अंतर्गत हो। शेखचिल्ली इसलिए असफल हुआ कि वह अपनी अर्थ-व्यवस्था के क्रमिक विकास और योजनाओं की पूर्ति में लगने वाले समय और श्रम के बारे में भ्रम-ग्रस्त बना रहा। किस सफलता के लिए कितनी तैयारी, मेहनत और प्रतीक्षा करनी पड़ेगी यह जानकर कोई व्यक्ति अपनी गतिविधियों को निर्धारित करे तो उसे कदाचित ही कभी असफलता का मुंह देखना पड़े।
बड़े से बड़ा भय मृत्यु का होता है पर यदि उसे वस्त्र परिवर्तन जैसी जीव के लिए भूत काल में करोड़ों बार घटित हुई एक सामान्य प्रक्रिया मान लिया जाय तो मरने का अवसर आने पर भी मनुष्य अपना साहस बनाये रह सकता है। मृत्यु के संघर्ष में भी देर तक लड़ सकता है। कम से कम शान्तचित्त से ईश्वर का नाम लेते हुए तो मर ही सकता है। मृत्यु के संघर्ष में भी देर तक लड़ सकता है। कम से कम शान्तचित्त से ईश्वर का नाम लेते हुए तो मर ही सकता है। मृत्यु का स्वरूप ठीक तरह समझ में न आने से ही त्रास मिलता है अन्यथा मृत्युदण्ड की आज्ञा सुनकर फाँसी लगने के दिन तक खुशी से सत्तरह पौण्ड वजन बढ़ा लेने वाले क्रान्तिकारियों के उदाहरण सुनने को क्यों मिलते ?
उचित अनुचित का विवेक जागृत होने पर भी मनुष्य निश्चिंत हो सकता है। उसके सामने लक्ष्य और मार्ग स्पष्ट रहने से न तो उलझन रहती है और न परेशानी। हवा में उड़ते हुए पत्ते की तरह जो चारों ओर मन डुलाता है उसे सफलता असफलता का भय बना ही रहता है। सच्ची निर्भयता उसे मिलती है जिसके सामने अपनी कर्तृत्व ही प्रधान है। परिणाम को अधिक महत्व देने वाला व्यक्ति असफलता को न तो अधिक महत्व देता है और न उससे डरता है।
ईश्वर विश्वास निर्भयता का सर्वोपरि उपाय है। पुलिस गारद के पहरे से रहने वाले को जब आक्रमणकारी शत्रुओं से निश्चिन्तता मिल जाती है, सुरक्षा अनुभव होती है तो सर्वशक्तिमान परमात्मा को अपना साथी सहचर बना लेने वाले के लिए डरने की गुंजाइश कहाँ रह जाती है? जिसने धर्म को अपना आधार बना लिया उसका भविष्य अन्धकारमय हो ही नहीं सकता फिर किसी से भी डरने की ऐसे व्यक्ति के लिए बात ही क्या रह जाती है।
एक बार राजा जनमेजय ने महर्षि शुकदेव से पूछा—भगवन् किसी मनुष्य के भले-बुरे भविष्य को कैसे जाना जाय? महर्षि ने उत्तर दिया—’जिसके विचार अधोगामी और आचरण निकृष्ट कोटि के होने लगें समझना चाहिये कि उसका दुर्दिन समीप है। श्रेष्ठ गुणों को अपनाने के लिए अपने को सुधारने के लिए जो लोग प्रयत्न कर रहे हों समझना चाहिए कि इनका भविष्य जल्दी ही उज्ज्वल होगा।’
मनुष्य लोहे पत्थर से नहीं, भावना से बना परिवर्तनशील प्राणी है। मनोभूमि बदले तो उसे बदलते देर नहीं लगती। आलसी और उद्योगी, सज्जन और दुर्जन, दुर्गुणी और सद्गुणी, घृणित और सम्मानास्पद स्थिति मनुष्य की आदतों पर निर्भर रहती है और ये आदतें यदि चाहें तो कोई भी मनुष्य आसानी से बदल सकता है।
सन्त नामदेव का आरम्भिक जीवन कुत्सित प्रकार का था। डाकू और लुटेरे की तरह वे अपना जीवन-यापन करते थे। उनका आतंक चारों ओर रहता था, लोग नामदेव का नाम सुनते ही काँपने लगते थे। इनके उपद्रवों की शिकायत से सरकार भी क्षुब्ध हुई और उन्हें पकड़ने के लिए अस्सी घुड़सवार भेजे। कहते हैं कि इन सबका उन अकेले ने सफाया कर दिया।
दुर्दान्त दस्युओं में भी अन्तरात्मा रहती है और वह जब कभी पलटती है तब बुरे से बुरे आचरण के व्यक्ति को सुधरते देर नहीं लगती। पूर्वकाल में बाल्मीकि, बिल्वमंगल, अम्बपाली, अजामिल, सदन आदि पतित जीवन व्यतीत करने वाले लोगों ने अपनी अन्तरात्मा की पुकार पर दुर्जनता का मार्ग छोड़कर सज्जनता अपनाई तो वे देखते-देखते दुरात्मा से महात्मा बन गये। नामदेव का परिवर्तन भी इसी प्रकार आत्मा की पुकार सुनने वाले लोगों की शृंखला का एक उदाहरण माना जा सकता है।
ईश्वर विश्वास और आस्तिकता की भावना जब मन में जमी तो दुष्टता के लिए जीवन में स्थान ही कैसे रहता? जो ईश्वर को घट-घट वासी मानेगा वह सब में समाये हुए परमात्मा के साथ दुर्व्यवहार कैसे कर सकेगा? यों झूठे भक्त ‘मुख में राम बगल में छुरी’ का बानक भी बना लेते हैं। पाप निर्भय होकर करते हैं और कुछ पूजा पाठ करके यह आशा लगाये रहते हैं कि यह सब कुछ तो भजन के प्रताप से छूट ही जायगा फिर अनीति का लाभ उठाने से डरें क्यों? यह मान्यता तो झूठे और बहके हुए भक्तों की रहती है। जिसके अन्तःकरण में एक कण भी सच्ची ईश्वर भक्ति का उत्पन्न हो जायगा वह सब में अपने प्रभु की झाँकी देखेगा और उसके साथ प्रेम एवं सज्जनता का व्यवहार करेगा। नामदेव जब ईश्वर भक्ति की ओर सच्चे मन से झुके तो उन्हें अनीति का मार्ग छोड़ना ही पड़ा। आस्तिक के लिए दुरात्मा बने रहना संभव नहीं, नामदेव की ईश्वर भक्ति ने उन्हें न तो दुष्ट रहने दिया और न डाकू।
गुरु की तलाश में नामदेव भटक रहे थे तो भगवान पाण्डुरंग ने उन्हें निर्देश किया कि विसोवा खेचर नामक कोढ़ी को वे गुरु बनायें। नामदेव ने वैसा ही क्रिया। वे कोढ़ी को गुरु मानकर उसकी सच्चे मन से सेवा करने लगे। आरम्भ में तो उन्हें यह निर्देश अटपटा लगा पर पीछे कुछ ही दिन में इस ईश्वरीय आज्ञा का रहस्य उनकी समझ में आ गया। पीड़ितों, उपेक्षितों और तिरस्कृतों की सेवा के बिना किसी का अन्तःकरण पवित्र नहीं हो सकता और जिसका हृदय पवित्र न होगा वह न तो गुरु ज्ञान का अधिकारी बन सकेगा और न उसे ईश्वरीय प्रकाश का अनुभव ही होगा। सेवा भावना की अधिकता सन्त हृदय की पहली विशेषता है। गुरु-दीक्षा के रूप में भगवान पाण्डुरंग ने विसोवा कोढ़ी की सेवा करने का आदेश दिया और सेवा धर्म को अपनाते हुए नामदेव ने जो ज्ञान पाया वह जीवन के सार्थक बनाने में अत्यन्त उपयोगी भी सिद्ध हुआ। मनोरंजन के लिए या कोई स्वार्थ सिद्ध करने के लिए आज के लोगों की तरह यदि उनने भी गुरु दीक्षा ली होती तो संभवतः उनको भी खाली हाथ रहना पड़ता और निराशा के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ न लगता।
नामदेव धान्य-कुधान्य का बड़ा ध्यान रखते थे। अभाव-ग्रस्त जीवन व्यतीत करते हुए भी वे किसी का दान स्वीकार न करते थे। उनकी धर्मपत्नी परिश्रमपूर्वक जो कमाती उसी में से वे जो दे जातीं उसी से रूखा-सूखा खाकर फटा-टूटा पहन कर काम चलाते। कई उदार लोग उनकी निर्धनता का पता चलने पर सहायता भेजते पर वे किसी का भी दान स्वीकार न करते और कहते जिसका अन्न खाया जाता है उनके लिये अपना भजन भी चला जाता है। फिर यदि किसी की अनीति की कमाई हुई तो उसे खान पर अपना मन भी कलुषित होगा।
प्राणी मात्र में भगवान की झाँकी करना और प्रत्येक के साथ प्रेम एवं आत्मीयता का व्यवहार करना यही तो ईश्वर भक्ति की कसौटी है। इस कसौटी पर भक्त नामदेव सदा खरे उतरते रहे। एक दिन वे रोटी बना रहे थे कि अचानक एक कुत्ता आया और उनकी बनाई हुई रोटियाँ मुँह में दबा कर भागा। नामदेव उसके पीछे चुपके से घी की कटोरी लेकर जा पहुँचे और कुत्ते से कहा—’मेरे भगवान! आपको भोग लगाने के लिए यह घी भी मैंने रखा था फिर आप रूखी रोटी क्यों खाते हैं? नामदेव ने कुत्ते को प्रेमपूर्वक खिलाया और उसकी रोटियाँ घी में चुपड़ दीं।’ यह तो एक घटना मात्र है, उनके जीवन की प्रत्येक गतिविधि प्राणीमात्र में भगवान देखने और उनके साथ आत्मीयता का व्यवहार करने की नीति पर चलती थी। सच्चे सन्तों की अनादि परम्परा रही भी यही है।
जाति के दर्जी होने के कारण दूसरे लोग उन्हें समय-समय पर तिरस्कृत करते रहते थे पर इससे वे कभी खिन्न न हुए। ‘जो भूल करता है उसे दुःखी होना चाहिए, मेरी मान्यता तो प्राणिमात्र में एक आत्मा देखने की है’ जो इस सत्य के विपरीत जाति वंश के आधार पर किसी को छोटा माने तो यह उनका अविवेक है। किसी की भूल का दण्ड मैं क्यों सहूँ यह कहकर उन तिरस्कार करने वालों की बात को उपहास में उड़ा देते थे और अपने मन को कभी छोटा न होने देते थे। लोग कुछ भी कहते रहें उनने न अपने को किसी से ऊँच माना और न नीच। सन्तों की उपयुक्त समता पर उनकी अगाध आस्था थी वह जीवन भर वैसी ही बनी रही।
सन्त नामदेव ने धर्म-प्रसार को अपना आवश्यक धर्म कर्तव्य बनाया और वे महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक भागवत धर्म का उपदेश जन-साधारण को करते रहे। तत्कालीन पण्डित लोग दान-पुण्य, पाठ-पूजा, कथा-कीर्तन और स्नान-दर्शन मात्र से ही भगवान की प्राप्ति होने का प्रतिपादन करते थे। सदाचार और कर्तव्य-पालन को उनने व्यर्थ मान रखा था और कहते थे कि इन कर्मकाण्डों से ही जब पाप नष्ट हो सकते हैं तो उन्हें छोड़कर घाटे में रहने की क्या आवश्यकता है? नामदेव की प्रतिपादना में यह अन्तर था कि वे कर्मकाण्ड को उपयोगी और आवश्यक तो मानते थे पर सदाचार एवं कर्तव्य-पालन को प्रथम स्थान देते थे और स्पष्ट कहते थे कि दुरात्मा का भजन विडम्बना मात्र रह जाता है। भागवत धर्म में उनका प्रयोजन उसी आस्था से था जो उपासना के साथ-साथ सच्चरित्रता एवं परमार्थ की प्रेरणा भी देती हो।
सच्चे भगवद् भक्त की तरह नामदेव ने भागवत धर्म को अपने जीवन में उतारा और उसी की शिक्षा दूसरों को भी दी। संसार में अधिक संख्या निहित स्वार्थों से ग्रसित संकीर्ण लोगों की होती है, वे ऐसे सत्य को सहन नहीं कर पाते जो उनकी मान्यताओं से भिन्न हो। सत्य का प्रतिपादन करने के अपराध में उन्हें विरोध और निन्दा का सामना करते रहना पड़ा। शूद्र समझे जाने वाले वंश में उत्पन्न होना भी एक जन्मजात अपराध की तरह उन्हें तथाकथित पण्डितों का कोप भाजन बनाये रहा। पर इससे क्या? सचाई का सूर्य चमकता ही रहा। उस पर धूलि उड़ाने वाले अपनी दुरभिसन्धियों में कृतकार्य न हो सके। विवेकशील जौहरियों ने उनकी परख तब भी की थी और सन्त नामदेव ऊँचे सन्त महात्माओं की श्रेणी में अब भी विद्यमान हैं। वे आज शरीर समेत भले ही न हों पर यह सन्देश तो देते ही रहेंगे कि आदमी बदल सकता है, उसे बदलना चाहिए। जब दुर्दान्त दस्यु से कोई व्यक्ति उच्च श्रेणी का सन्त बन सकता है तो गुण कर्म स्वभाव के साधारण परिवर्तनों में तो किसी मनस्वी व्यक्ति को कुछ भी कठिनाई न होनी चाहिए।
“मुझे यदि दूसरा जन्म मिला तो परमात्मा से कहूँगा मालिक! तुम मुझे किसी कल-कारखाने का मजदूर या खेत-खलिहान का किसान बनाना। तू ने मुझे निर्धन बनाया तो समझूँगा वरदान मिला धन का अभिशाप तो इसी जीवन में भोग रहा हूँ।” उक्त शब्द संसार के प्रथम धनपति अमेरिका निवासी हेनरी फोर्ड ने अपनी डायरी में लिखे हैं। इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए उसने आगे लिखा है कि धन की अधिकता के कारण सारा जीवन अनियमित वासनाओं और कामनाओं में बिताने के फलस्वरूप आज मेरी स्थिति ऐसी हो गई है कि विपुल सम्पत्ति होते हुए भी चाय और सिगरेट के अतिरिक्त और कुछ भी लेने के लिए डाक्टरों ने मना कर दिया है।
इस बात से यह मानने के लिए विवश होना पड़ता है कि इस संसार में सुखी और सन्तुष्ट जीवन जीने का आधार धन नहीं है। यदि मनुष्य का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है, उसका चरित्र दूषित है तो धन मात्र से सुख की कल्पना नहीं की जा सकती है। किसी अंश तक क्षणिक सुखोपभोग कर लिया गया थोड़ी देर के लिए, उठने वाली इन्द्रियों की हुड़क को पूरा कर लिया गया, फिर शेष जीवन अभावों दुःखों और तकलीफों का जीवन जिया गया तो कौन ऐसे धन का सम्मान करेगा, उसी को जीवन की सुख सुविधाओं का आधार मानेगा।
जीवित रहने के लिये धन की इतनी उपयोगिता तो समझ में आती है कि आहार, वस्त्र, निवास आदि की सुविधाएं बनी रहें। आध्यात्मिक प्रगति, सामाजिक सुव्यवस्था और मंगलमय जीवन के लिए भी अर्थ-व्यवस्था आवश्यक जान पड़ती है। शरीर और मन की आवश्यकताओं की पूर्ति भी इसी से सम्भव है। इस दृष्टि से जीविकोपार्जन सभी को करना पड़ता है किन्तु यदि भोजन, घर, वस्त्र और गृहस्थी की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाय तो इससे बढ़कर भौतिक सुखों के लिये अधिक धन की क्या आवश्यकता है? इसके लिए तो दुष्कर्मों का ही आश्रय लेना पड़ेगा। परिस्थितिवश किसी को वैध तरीके से उत्तराधिकार आदि में अधिक धन की उपलब्धि हो जाय यह बात अलग है अन्यथा अधिकाँश धन-संचय के लिए दूसरों के अधिकारों का ही हनन करना पड़ता है। अनिवार्य आवश्यकताओं से आगे बढ़ जाने पर धन, जीवन का साधन न रहकर ध्येय बन आता है जिसके लिये अनुचित तरीकों का ही इस्तेमाल हो सकता है। समाज की अव्यवस्था और व्यक्ति के विकास में यहीं से व्यतिक्रम उत्पन्न होता है।
योरोपियन लेखक विद्वान पीटर ने “निर्धन का वकील” (क्कशशह्द्वड्डठ्ठज्ह्य ्नस्रक्शष्ड्डह्लद्ग) में बड़े ही मार्मिक शब्दों में लिखा है “गरीब, गरीब न होते यदि धनवान् ईमानदार होते और निर्धनों को अपनी वस्तुओं का उचित मूल्य चुका देते। धन का वैभव और कुछ नहीं केवल अनैतिक-विजय-भेंट है जो गरीबों का स्वत्व अपहरण करने से मिलती है।”
उचित रीति से कमाया धन चाहे वह कितना ही थोड़ा हो श्रेष्ठ है। सत्य और ईमानदारी से कमाया धन पवित्र होता है इसे उत्तम रीति से खर्च करें, अपने जीवन के उपयोग में लायें तो ही अपना भौतिक लक्ष्य और जीवनोद्देश्य सरलता से पूरे किये जा सकते हैं। ऐसे ही मर्यादित खर्च पूर्ति से शरीर और आत्मा विकसित होती है। आध्यात्मिक लक्ष्य-प्राप्ति की सम्भावना भी इसी से बढ़ती है। उच्च विचारों से ओत-प्रोत सरल जीवन-जीने के लिये अर्थात् भाव बाधक नहीं कहा जा सकता अपनी आवश्यकताएं होती ही कितनी हैं जिनके लिये लंबी दौड़−धूप और अनियमित तरीकों से धन संग्रह करना पड़े।
गरीबी एक अवस्था है जिसमें परमात्मा हमारी महानताओं की निरख-परख करता है। इसमें मनुष्य को धैर्य श्रम एवं सन्तोष की परीक्षा देनी पड़ती है। सम्पन्नता में अपने आपको इस कसौटी में कसने का नम्बर ही नहीं आता। महानता के समानान्तर होकर गुजर जाते हैं, केवल अहंकार, दम्भ, छल और प्रदर्शन में ही अपने जीवन की इतिश्री मान बैठते हैं। और अपनी आत्मा तो काषाय-कल्मषों में ही फँसी रह जाती है। परमात्मा का सान्निध्य सुख तो निर्धनता में ही मिलता है। सच्चे अध्यात्म का विकास व्यक्ति के अभावों में होता है। अमरीका के प्रेसीडेण्ट अब्राहम लिंकन ने अपने देशवासियों को सम्बोधन करते हुए अपनी सादगी का समर्थन इन शब्दों में किया था “गरीब लोग परमात्मा के अधिक सन्निकट होते हैं इसलिए मुझे वैभव पसन्द नहीं।”
धन का उपयोग और दुरुपयोग उसकी प्राप्ति और उपयोग पर आधारित है। धन स्वतः बुरी वस्तु नहीं है किन्तु उपार्जन और उपयोग में तरह-तरह के कुत्सित ढंग अपनाये जाते हैं। अनुचित मोह और दासतापूर्ण लगाव रखा जाता है वह बुरा है। इसका अभाव रहे तो सम्भव है कष्टदायक परिस्थितियाँ आयें किन्तु जीव-निर्माण की शिक्षा भी मनुष्य को इन्हीं से मिलती है। आत्म-विश्वास और अध्यवसाय में निर्धनता बाधक नहीं कही जा सकती। उससे उसकी मानसिक चेष्टाओं का झुकाव उस ओर हो जाता है जिसका सम्पन्नता वैभव और विलास में कदाचित ही ध्यान आता। जीवन-निर्माण की बात खुले मस्तिष्क से कोई तभी सोच समझ सकता है जब वह अर्थ सञ्चय की अनावश्यक आपाधापी से मुक्त हो। जिसे इन्हीं परेशानियों से फुरसत न मिली वह क्या तो अंतर्जगत की महानता पर दृष्टिपात करेगा और क्या जीवन-मुक्त स्वर्ग और मोक्ष की कामना करेगा। निर्धनता इसलिए श्रेष्ठ है कि वह व्यक्ति की अंतर्दृष्टि जागृत करती है। महान् दार्शनिक लूथर का कथन है “हे परमात्मा मैं तेरा आभारी हूँ जो तूने मुझे निर्धन बनाने की कृपा की, ऐसा न करता तो तेरी उपस्थिति का मुझे ज्ञान मिलना दुर्लभ था।”
ऐसे व्यक्ति जिनके पास जीवन रक्षा के प्रचुर साधन होते हुए भी जो अपने को निर्धन मानते हैं, उन्हें अभागा, अविचारी ही कहा जा सकता है।
सम्पत्ति से इच्छाओं की पूर्ति होती है। पद-प्रतिष्ठा व समाज में गौरव बढ़ता है किन्तु ये सब बाह्य विकास के ही लक्षण हैं—मनुष्य की आन्तरिक प्रगति गुण, कर्म स्वभाव की शुद्धता से होती है। दाम्पत्य-जीवन में प्रेम नहीं है तो धन बेचारा क्या सुख देगा? परिवार में पारस्परिक आत्मीयता का अभाव है तो धन कलह को बढ़ावा ही दे सकता है, बच्चे आदि सदाचारी नहीं है तो अर्जित धन का दुरुपयोग ही सम्भव है। धन सद्गुणों का आधार नहीं हो सकता और सुखी-जीवन के लिये नैतिक सद्गुणों के विकास की आवश्यकता होती है। यह आत्मिक-विकास निर्धनता में भी भली प्रकार निभ सकता है। जिन व्यक्तियों के आचरण अच्छे होते हैं वे गरीबी में भी स्वर्गीय सुख का रसास्वादन करते रहते हैं। किन्तु दुराचारी और दुराग्रही व्यक्ति अपार सम्पत्ति से भी सुख प्राप्त नहीं कर पाते। कारण सुख का मूल सद्गुणों का विकास है। प्रेम, स्नेह उदारता, आत्मीयता सहिष्णुता आदि से धनी व्यक्ति ही इस संसार में सच्चा सुख पाते हैं।
आज की हमारी सामाजिक व्यवस्था इस बात का प्रमाण है। बाह्य-जीवन की सुख-सम्पत्तियाँ बढ़ रही हैं इनके साथ ही धन की लालसा का बढ़ना भी स्वाभाविक है। क्योंकि बाह्य-सुखों की पूर्ति इसी से सम्भव है, ऐसी अवस्था में आत्मा खोयी हुई जान पड़ती है। मनुष्य का नैतिक विकास न हुआ तो धन सुख नहीं दे सकता। आज जो अपनी अर्जित आय का दशाँश शराब-खोरी, जुआ-बाजी, सिनेमा-थियेटरों में बरबाद करते हैं वे कल आय बढ़ जाने, पर पच्चीस प्रतिशत करने लगते हैं। उसी अनुपात में आज के झगड़े बखेड़ों में भी अभिवृद्धि होगी ही। ऐसी अवस्था में लोगों की सुख की कल्पना निर्मूल ही बनी रहेगी। इससे चारों तरफ सामाजिक अस्तव्यस्तता के ही दृश्य बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि धन जिसे हमारी सुख-सुविधाओं में सहायक होना था वह विषम परिस्थितियाँ ही उत्पन्न किये जा रहा है।
तब फिर यह निश्चय है कि धन को आज जिस रूप में देखते हैं इस दृष्टिकोण में परिवर्तन करें अपने जीवन यापन के लिये यदि पर्याप्त मात्रा में उसे अर्जित कर लिया है तो अधिक-से-अधिक धन हो ही इस बात की उतनी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती जितनी अपने जीवन-निर्माण की। सुख की परिस्थितियाँ अपने गुण कर्म स्वभाव में श्रेष्ठता उत्पन्न करने से बढ़ती हैं। यह साधन ऐसे हैं जिन पर किसी प्रकार के व्यय की आवश्यकता नहीं पड़ती है। अपनी अभिरुचि ऐसी हो जाय तो यह निर्धनता भी आपके लिए वरदान सिद्ध हो सकती है।
सर्वतोमुखी प्रतिभा सम्पन्न वेञ्जामिन फ्रेंकलिन को अमेरिका में ही नहीं सारे विश्व में एक जिन्दादिल व्यक्ति के रूप में स्मरण किया जाता है। वह बड़ा हंसोड़, अलमस्त, परिश्रमी और हर काम को पूरी दिलचस्पी से करने वाला मनुष्य था। जीवन की कला को उसने समझा और अपने व्यवहार में उतारा। जेब में एक रुपया भी शेष न हो तो भी वह अपनी तबियत को अमीरों की अपेक्षा गिरी हुई न होने देता था। यद्यपि अन्य व्यक्तियों की तरह अगणित बाधाएं उसे घेरे रहीं और आये दिन विचलित करने वाली समस्याओं का सामना करना पड़ा उसने उन्हें खूबी के साथ सुलझाया भी, पर चेहरे पर नाचने वाली अलमस्ती, बेफिक्री और जिन्दादिली में कभी कुछ कमी न आने दी। निराशा या खिन्न उसे कभी किसी ने नहीं देखा।
अमेरिका के स्वतन्त्रता युद्ध में जार्ज वाशिंगटन का वह दाहिना हाथ माना जाना था। युद्धस्थल में कुशल सेनानी की तरह वह जूझा और जब सन्धि का अवसर आया तो उसने एक विलक्षण कूटनीतिज्ञ की तरह उस कार्य को भी बड़ी बुद्धिमता के साथ पूरा किया।
छोटी स्थिति में वह जन्मा, गरीबी में पला। आगे बढ़ने और ऊपर उठने के लिए उसने पग-पग पर संघर्ष किया, उन्नति के अवसर पाए पर उनका पूरा-पूरा मूल्य चुका कर ही आगे बढ़ सका। लुहार, ठठेरा, बढ़ई, मोची, राज जैसे कठिन परिश्रम के कामों को करते हुए अपनी गुजर का साधन जुटाया। साबुन और मोमबत्ती बनाने का गृह उद्योग अपनाया, तब कहीं जीवन की गाड़ी का पहिया लुढ़क सका। ऐसी स्थिति में दिन काटने वाले व्यक्ति से कौन आशा कर सकता था कि यह किसी दिन अमेरिका के भाग्य-निर्माण में बढ़-चढ़ कर योगदान देने वाला बनेगा और सफल जन-नेता बनने का गौरव प्राप्त करेगा।
फ्रेंकलिन की सबसे बड़ी विशेषता थी जीवन-कला की अभिज्ञता। वे जिन दिनों अमेरिका के भाग्य-आकाश में प्रकाशवान नक्षत्र की तरह चमक रहे थे तब उनके मित्र पूछा करते कि इतनी गई गुजरी स्थिति से उठते हुए इतने आगे बढ़ सकने में किस प्रकार समर्थ हुए? तो वह एक ही उत्तर देते मेरे छह दैवी सहायक हैं और वे इतने सामर्थ्यवान हैं कि उनकी कृपा प्राप्त करके कोई भी साधारण-सा व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में प्रगति कर सकता है। मित्रगण उन दैवी सहायकों के नाम पूछते तो वह गिनाते—(1) आशा (2) उत्साह (3) साहस, (4) व्यवस्था (5) मनोयोग और (6) प्रसन्नता।
वेञ्जामिन इन्हीं सद्गुणों के सहारे अभाव और विफलताओं को चीरते हुए आगे बढ़े थे। जो काम भी उनके सामने आता उससे वे प्राणप्रिय मित्र की तरह लिपट जाते। पूरे मनोयोग से उसे करते और यह सोचते कि उसे अधिक सुन्दर, अधिक उत्कृष्ट किस प्रकार बनाया जा सकता है। बारीकी से उसके हर पहलू को समझने की कोशिश करते और ऐसी तरकीब सोचते कि उसमें अपनी कला और कुशलता का समावेश कैसे कर डालें जिससे उनकी वह प्रतिकृति एक आदर्श के रूप में प्रशंसित हो। उनकी एक ही आकाँक्षा रहती कि उनके कार्य उनकी उत्कृष्टता के प्रमाण बन कर प्रशंसा और प्रतिष्ठा प्राप्त करें। यह आकाँक्षा उनकी कृतियों को सर्वांग सुन्दर बनाने में बड़ा काम करती और उन्हें देख-देखकर अपने श्रम को सार्थकता अनुभव करते। यह क्रम निर्बाध गति से चलता रहा और वे अन्ततः संसार के अग्रिणी व्यक्तियों की श्रेणी में गिने जाने लगे।
एक ही व्यक्ति कृषक, श्रमिक, लेखक, वक्ता, पत्रकार, राजनीतिक, दार्शनिक, सेनानी, प्रशासक, संगीतज्ञ और खिलाड़ी कैसे हो सकता है, इस बात पर लोग आश्चर्य करते थे। पर वे कहा करते —इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। समय का निर्धारण और नियत समय पर नियत कार्य में पूरे मनोयोग के साथ लग जाने की आदत जिसे भी होगी वह समयानुसार अपने प्रिय विषयों में निष्ठावान बन सकेगा। अधूरे मन, अधूरे श्रम और अनियमित ढंग से काम करना ही असफलताओं का कारण होता है। जो थोड़े से कार्य में भी प्रगति नहीं कर पाते उसका कारण केवल उनका आलस और अन्यमनस्क ढंग की मानसिक स्थिति ही होती है। फ्रेंकलिन इन दुर्गुणों से लड़कर अपने जीवन क्रम को सुव्यवस्थित बनाने में सफल हुए तो अनेक दिशाओं में उनकी सफलता भी खिल पड़ी।
अमेरिका के उपनिवेशों का उन्हें पोस्ट मास्टर जनरल बनाया गया तो उनने उस पद्धति में भी क्रान्तिकारी सुधार उपस्थित कर दिये। पत्रों पर टिकट चिपकाने की वर्तमान पद्धति उन्होंने चलाई। पुरानी हरकाना प्रथा के स्थान पर आधुनिक डाक वितरण का क्रम उन्होंने चलाया। इस पद पर रहते हुए उन्होंने पत्रकारों से संपर्क बनाये रखा, उनमें लेख लिखे और विज्ञापन छापने का नया तरीका ढूंढ़ निकाला जिससे समाचार पत्र और विज्ञापनदाता दोनों ही लाभान्वित होने लगे। उनकी सूझ-बूझ काम की होती थी। जीवन में जितने भी काम उन्होंने किये, उनमें कोई न कोई क्रान्तिकारी सुधार प्रस्तुत किये बिना उनसे रहा ही न जा सका। लोग उनमें यह प्रतिभा असाधारण जन्म-जात या दैवी होने की बात कहते तो वे उसे अस्वीकार करते और यही कहते मनुष्य शक्तियों का भण्डार है। यदि वह उन्हें काम में लाने की पद्धति जान ले तो हर साधारण समझा जाने वाला व्यक्ति असाधारण बन सकता है। जन्मजात कुछ विशेषतायें हो सकती हैं पर उन्हें विकसित या कुण्ठित करना हर व्यक्ति के अपने हाथ की बात है।
84 वर्ष की आयु में वे 17 अप्रैल 1790 को परलोक सिधारे पर जीवन के अन्तिम दिनों तक बुढ़ापा उन्हें छू भी न पाया था। जवानों की तरह सोचते और जवानी की उमंगों को लेकर काम करते। प्रकृति के नियमों के अनुसार बुढ़ापे ने उनके शरीर को जराजीर्ण कर दिया था, इन्द्रियाँ साथ छोड़ने लगीं थीं, स्वास्थ्य ठीक काम न करता था और जल्दी थकान भी आती थी पर इससे क्या? फ्रेंकलिन कहते—बूढ़ा वह है जो निराश हो गया, बूढ़ा वह है जिसने पुरुषार्थ छोड़ दिया, बूढ़ा वह है जिसकी आकाँक्षायें मर गई। मैं बूढ़ा न कभी हुआ और न बुढ़ापा मेरे पास फटक सकेगा। वयोवृद्ध नवयुवक के नाम से वे विख्यात थे। उनके मित्र उसी उपाधि से उन्हें विभूषित करके सम्बोधन करते। वे वस्तुतः युवक थे और 84 वर्ष की भरी जवानी में ही अपनी जीवन लीला समाप्त करके चले गये।
लोग जिन्दगी जीते तो हैं पर जीना उन्हें आता नहीं। वेञ्जामिन फ्रेंकलिन ने मस्ती, फुर्ती, तत्परता के साथ व्यवस्थापूर्वक जिन्दगी को जिया और हर स्थिति में हँसते रहने की आदत को अपने अनुयायियों एवं प्रशंसकों के लिए एक बहुमूल्य वसीयत के रूप में छोड़ गये।
एक बार कुछ तपस्वी एक वट वृक्ष के नीचे बैठे यह विचारने लगे कि तप के फलस्वरूप क्या वरदान माँगा जाय?
एक ने कहा—विपुल अन्न माँगना चाहिए ताकि जीवन आनन्द से कटे। दूसरे ने कहा—बल माँगा जाय, क्योंकि बल बिना कैसे उपजाया जा सकेगा? तीसरा बोला—बुद्धि क्यों न माँगे? बुद्धि बिना बल भी किस काम का? चौथे ने कहा—शान्ति माँगनी चाहिए। अन्यथा अशान्त की बुद्धि भी कुण्ठित हो जाती है।
विवाद लंबा हो गया। पर किसी निर्णय पर न पहुँच सके। तब वट वृक्ष ने कहा—उलझन में समय नष्ट करने की अपेक्षा आप लोग अपनी-अपनी अभिरुचि का वरदान माँग लें तो भी क्या बुरा?
भौतिक जीवन में राजनीति का स्थान प्रमुख है। जनसाधारण की अभिरुचि आज राजनीति में इसलिए है कि उसके द्वारा जनसाधारण की अनेकों गुत्थियों का सुलझाया जाना सम्भव हो सकता है। जीवन के हर क्षेत्र में अब राजनीति का नियंत्रण होता जाता है इसलिये यह आशा करना उचित ही है कि यदि सरकार अच्छी हो और उसकी कार्य-पद्धति ठीक रहे तो उससे जनता के दुःखों की निवृत्ति और सुखों की अभिवृद्धि में भारी योगदान मिल सकता है।
अच्छी सरकार बने और उसकी अच्छी कार्य पद्धति रहे, यह आकाँक्षा स्वभावतः प्रत्येक प्रजाजन को रहती है। क्योंकि उसकी प्रगति एवं सुरक्षा बहुत कुछ सुशासन पर ही निर्भर रहती है। चाहे व्यक्तिगत सुख सुविधा की दृष्टि से विचार किया जाय, चाहे समाज के सामूहिक उत्कर्ष की दृष्टि से, हर हालत में सुशासन की आवश्यकता दृष्टि-गोचर होती है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए विविध प्रकार के प्रयत्न भी किए जाते हैं। अनेक राजनैतिक पार्टियाँ बनती हैं, चुनाव लड़ती हैं, घोषणा पत्र प्रकाशित करती हैं। देखने में यह प्रयत्न बड़े उपयुक्त और आकर्षक प्रतीत होते हैं। जिस पार्टी का कार्यक्रम और घोषणा-पत्र ध्यानपूर्वक देखते हैं उसमें केवल जनहित की बात दृष्टिगोचर होती है और यही लगता है कि इनमें से कोई भी कार्यक्रम अपना लिया जाय तो देश और जाति का अवश्य हित होगा।
पर देखा यह जाता है कि चुनावों में जीती हुई सत्तारूढ़ पार्टी भी वह कर नहीं पाती जो करने के लिए उसने अपने चुनाव घोषणा-पत्रों में वचन दिया था। कारण यह है कि जिन लोगों के हाथों शासन का कार्य चलता है वे उन आदर्शों को अपने जीवन में शामिल नहीं करते जो शासन तन्त्र के प्रत्येक कल-पुर्जों के लिए नितान्त आवश्यक है। उच्च चरित्र के बिना कोई व्यक्ति कितना ही योग्य एवं परिश्रमी क्यों न हो किसी का कोई हित साधन नहीं कर सकता। प्रदर्शन और प्रचार के लिये उसके कार्य कुछ समय तक प्रभावशाली दिखाई पड़ सकते हैं पर अन्ततः वे सब कार्य खोखले ही सिद्ध होते हैं।
राजनीति की शक्ति निश्चय ही बड़ी महत्वपूर्ण है। उसका सुसंचालन जनता के हित के लिए सब प्रकार श्रेयस्कर ही हो सकता है। संसार के जिन देशों का इन दिनों उत्कर्ष हुआ है उसमें वहाँ की सुयोग्य सरकारों का बड़ा श्रेय है। राजनीतिज्ञों में सूझ-बूझ, कुशलता, क्षमता और योग्यता का होना आवश्यक है इसके बिना शासन-तंत्र ठीक प्रकार नहीं चल सकता। पर इससे भी अधिक आवश्यक है शासकों की ईमानदारी। यदि वे आदर्शों के प्रति निष्ठावान होंगे। व्यक्तिगत जीवन में पवित्रता और सेवा का व्रत धारण किए हुए होंगे तो कम योग्यता होने पर भी उनके कार्यों से जनता का अत्यधिक हित साधन होता चलेगा। इसके विपरीत यदि वे आलसी, प्रमादी, लालची, अहंकारी और स्वार्थी हैं तो फिर उनकी बड़ी से बड़ी योग्यता भी निरर्थक सिद्ध होगी। इतना ही नहीं, उनका व्यक्तित्व जनता के लिए हानिकर और भारस्वरूप ही सिद्ध होगा। सुशासन की छाया में किसी भी देश का आशाजनक विकास होना स्वाभाविक है। सुशासन की सबसे बड़ी कसौटी शासकों की सच्चरित्रता और आदर्शों के प्रति गहन-निष्ठा हो सकती है। जहाँ इस तथ्य में कमी रहेगी वहाँ प्रकाशित घोषणायें एवं नीतियाँ कितनी ही आकर्षक क्यों न हों, उनके विपरीत ही काम होता रहेगा और उससे जनहित को हानि ही पहुँचती रहेगी।
जिन लोगों की दिलचस्पी राजनीति में है उनका कर्तव्य है कि प्रशासन के हर क्षेत्र में ईमानदारी ओर आदर्शवादिता उत्पन्न करने का प्रयत्न करें। राजनैतिक दलों में से प्रत्येक की नीतियाँ और घोषणायें उत्तम हैं। इनमें से किसी का भी सहारा ईमानदारी के साथ किया जाय तो उससे देश का उत्थान ही हो सकता है। नीतियाँ किसी भी पार्टी की बुरी नहीं कही जा सकतीं। संसार के विभिन्न देशों ने विभिन्न प्रकार के कार्य-क्रम अपना कर उन्नति की है। इस उत्कर्ष में वे नीतियाँ नहीं वरन् शासन तन्त्र की पवित्रता ही प्रधान कारण रही है। आदर्शों से भ्रष्ट लोग किसी भी शासन पद्धति को अपनावें, किसी भी रीति-नीति की घोषणा करें, परिणाम कुछ भी न निकलेगा।
इसलिये आवश्यकता तो इस बात की है कि राजनीति के मर्म स्थल पर हमारा ध्यान हो। नेतृत्व उन लोगों के हाथ सौंपा जाय जो आदर्शवाद से अपने जीवन का हर पहलू ओत-प्रोत किए हुए रह सकें। सार्वजनिक जीवन और व्यक्तिगत जीवन में इस प्रकार के दो भेद करना उचित नहीं। कहा यह जाता है कि सार्वजनिक जीवन में मनुष्य कर्तव्य पालन करता है तो उसके व्यक्तिगत जीवन की अनैतिकताओं की ओर क्यों ध्यान दिया जाय? यह तर्क निरर्थक है। वस्तुतः चरित्र की सच्ची परीक्षा व्यक्तिगत जीवन में ही होती है। जो मनुष्य व्यक्तिगत जीवन में दुराचार करता होगा और भ्रष्ट परम्पराएँ अपनाता होगा वह सार्वजनिक जीवन में ईमानदार रह सके यह कदापि सम्भव नहीं। आदर्शों के प्रति गहन आस्था जिसके जीवन में नहीं है उसके अनाचार व्यक्तिगत जीवन तक ही सीमित रहेंगे इसकी कोई गारण्टी नहीं हो सकती।
शासन तन्त्र को चलाने वाले व्यक्ति चाहे मिनिस्टर हों चाहे अधिकारी, चाहे चपरासी उनकी सच्चरित्रता अक्षुण्य होनी चाहिए। प्रत्येक प्रजाजन को पूरी सतर्कता उसी ओर रखनी चाहिए। और देखते रहना चाहिए कि हमारे शासक अपनी दुष्प्रवृत्तियों से सारे समाज को दुष्परिणाम भुगतने के लिए विवश न करने लगें। जिनके हाथ में सरकार की बागडोर हो उन्हें अपना पूरा-पूरा ध्यान इस तथ्य पर केन्द्रित करना चाहिए कि शासनतन्त्र को चलाने वाले व्यक्ति जन-साधारण के स्तर से ऊँचे हैं या नहीं। जन-नेतृत्व और जनहित करने के लिए राज-तन्त्र का उत्तरदायित्व आज इतना बढ़ा-चढ़ा है कि उसका ठीक तरह निबाहा जाना तभी सम्भव होगा जब उसके संचालक और कार्य-कर्ता प्राचीन काल के ब्राह्मण और साधुओं की तरह पवित्र हों।
यह तर्क सही नहीं है कि कम वेतन के लोग इसलिए रखने पड़ते हैं कि जनता अधिक टैक्स नहीं देना चाहती है। कम वेतन के लोग अपनी बढ़ी-चढ़ी जरूरतें पूरी करने के लिए भ्रष्टाचार फैलाते हैं। यदि ऐसा ही हो तो जनता को खुशी-खुशी अधिक टैक्स देना चाहिये और शासकों की उचित आवश्यकताएँ पूरी करने लायक भरपूर वेतन अवश्य देना चाहिए। इस प्रकार यदि अधिक टैक्स बढ़े तो भी भ्रष्टाचारी सस्ते कर्मचारी रखने की अपेक्षा जनता लाभ में ही रहेगी। पर वस्तुस्थिति दूसरी ही है। बढ़ा-चढ़ा भ्रष्टाचार अधिकतर वे लोग करते हैं जिन्हें भरपूर वेतन मिलता है और जिन्हें अनेक प्रकार की सुविधाएँ प्राप्त हैं। दुराचार वस्तुतः एक मानसिक रोग है जो गरीबों को भी हो सकता है और अमीरों को भी। उसमें चपरासी भी ग्रसित हो सकते हैं और अफसर भी। हर स्तर पर से इसका उन्मूलन होना चाहिए।
शत्रु के साथ या दुष्ट दुरात्मा और अपराधियों के साथ कूटनीति का बरता जाना किसी आवश्यकता के समय उपयुक्त हो सकता है। किन्तु वह भी जनहित की दृष्टि से होना चाहिए। व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए तो किसी से भी, यहाँ तक कि दुष्टों से भी दुर्व्यवहार न किया जाना चाहिए। जनता के प्रति सर्वसाधारण के लिए सरकारी नीति सेवा न्याय और सद्भावनाओं पर आधारित होनी चाहिए। किसी वर्ग का अनुचित शोषण और किसी का पक्षपात—ऐसी राजनीति जहाँ कहीं भी चल रही होगी वहाँ क्षोभ और विद्रोह की भावनाएँ ही पनपेंगी। शासन का कर्तव्य यह है कि सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देने में कोई कमी न रखे। साथ ही दुष्टता और अपराधी प्रवृत्ति के दमन में उग्र कठोरता बरती जाय। जहाँ सज्जनों की सत्प्रवृत्तियों को निरुत्साहित किया जाता हो और अपराधों की ओर उपेक्षा बरती जाती हो वहाँ प्रजा की सुरक्षा और समृद्धि सम्भव नहीं हो सकती।
शासन की पवित्रता उतनी ही आवश्यक है जितनी धर्म पुरोहितों की सदाचारिता। जो जितना महत्वपूर्ण कार्य है उसे उठाने के लिए उतने ही उत्तरदायी एवं परखे हुए व्यक्तित्व अभीष्ट हैं। प्रजातंत्र पद्धति के शासन में हर मतदाता का परम पवित्र कर्तव्य है कि वोट देते समय किसी लोभ या पक्षपात से प्रेरित होकर मतदान न करे वरन् आदर्शवादी व्यक्तियों को ही सर्वोपरि स्थान दे। और यह भी देख-रेख रखे कि शासन तन्त्र में चरित्र भ्रष्टता तो बढ़ने नहीं लगी है। यदि यह बुराई बढ़ रही होगी तो अच्छी से अच्छी योजनाएँ और नीतियाँ निष्फल चली जाएँगी। भ्रष्टाचारी लोग अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए जनता का भारी अहित करने में भी संकोच नहीं करते। इसलिए यदि किसी राष्ट्र को अपना स्वस्थ विकास करना हो तो शासन तन्त्र की सच्चरित्रता का पूरा ध्यान रखे। प्रजा की ओर से अधिकारियों को प्रलोभन देकर कोई अनुचित कार्य कराने का प्रयत्न न किया जाय और कर्मचारी जनता को परेशान करने की शक्ति का दुरुपयोग करके जनता के शोषण की विवशता उत्पन्न न करने पायें ऐसी व्यवस्था बनाना उन लोगों का कार्य है जिनके कन्धे पर शासन-तंत्र चलाने का उत्तरदायित्व पड़ा हुआ है।
खेद है हमारे देश में इस संबंध में भारी अव्यवस्था फैली हुई है। इसका दुष्प्रभाव जनता के नैतिक स्तर पर पड़ता है। यह किसी भी राष्ट्र की भारी हानि है। भले ही लोग गरीब बने रहें पर यदि उनका चरित्र ऊँचा है तो वे अपने कठिन परिश्रम से गरीबी को अमीरी में बदल लेंगे। किन्तु यदि चरित्र नष्ट हो गया तो अमीरी भी धीरे-धीरे नारकीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करेगी। शासकों का कर्तव्य प्रजा की सुख शान्ति को बढ़ाना है इसलिए उन्हें अन्य प्रकार की प्रगति का आयोजन करने से पूर्व राष्ट्र की सच्चरित्रता को सुरक्षित रखने एवं विकसित करने का ध्यान रखना चाहिए। अनीति का आश्रय पाकर कोई भी समृद्धि चिरस्थायी नहीं हो सकती। गलत उपायों से कोई तात्कालिक हल निकाल भी लिया जाय तो पीछे उसकी प्रतिक्रिया अत्यन्त भयावह होती है और जो लाभ उपार्जित किया गया था वह किसी अन्य रास्ते बर्बाद हो जाता है।
‘स्वराज्य’ असफल ही माना जायगा यदि हमारी चारित्रिक उत्कृष्टता उसके द्वारा बढ़ न सकी। यदि जनमानस में समाई हुई स्वार्थ-परता और संकीर्णता को हटाया न जा सका तो प्रगति के सारे सपने एक विडम्बना मात्र ही बनकर रह जावेंगे। प्रगति मनुष्यों की पारस्परिक सद्भावना, सहायता, सज्जनता और आत्मीयता पर निर्भर रहती है। सुरक्षा हथियारों से नहीं साहसी, बलिदानी और निष्ठावान नागरिकों की मनोभूमि के द्वारा ही सम्भव होती है। किसी देश का बल वहाँ की समृद्धि से नहीं वरन् वहाँ के नागरिकों के चरित्र से आँका जाता है। हमारा राष्ट्र बलशाली बने, समृद्ध बने, समुन्नत हो इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें जन-मानस की भावनात्मक उत्कृष्टता को बढ़ाने के लिए तत्पर होना चाहिए।
राजनैतिक दृष्टि से हम सफल हुए या असफल? इसका एक ही प्रमाण हो सकता है कि शासनतंत्र के संचालकों और नागरिकों में कर्तव्य परायणता एवं नैतिकता कितनी बढ़ी। इस कसौटी पर जो शासन खरा उतर सकेगा उसे ही यह राजनैतिक सफलता का श्रेय मिलेगा। इतिहास साक्षी है कि जब भी, जहाँ भी, नैतिक दिवालिया-पन बढ़ा है तब उसका परिणाम सर्वनाश के रूप में ही प्रस्तुत हुआ है। इसलिए यदि राजनीति की प्रचण्ड शक्ति से राष्ट्र को लाभान्वित करना अभीष्ट हो तो एक ही काम पर सर्वोपरि ध्यान रखें—वह है शासकीय कर्मचारियों की सज्जनता और उसके फलस्वरूप जनता में उत्पन्न होने वाली उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया। राष्ट्र इसी नीति पर चलते हुए उठते और बढ़ते हैं। हमारे लिए भी इसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
जार्ज बर्नार्ड शा से एक विदेशी साहित्यकार मिलने गये। उनने अपने देश, इतिहास और पूर्वजों की कीर्ति बखाननी आरम्भ कर दी।
शा, सुनते-सुनते ऊब गये। उनने कहा—इस प्रकार पूर्वजों का वर्णन करते करते तो आप आदिम काल के बन्दरों तक जा पहुंचेंगे। आप आज क्या हैं, इतना ही बता सकें तो वह पर्याप्त होगा।
जिस समाज में लोग एक दूसरे के दुःख, दर्द में सम्मिलित रहते हैं, सुख सम्पत्ति को बाँट कर रखते हैं और परस्पर स्नेह, सौजन्य का परिचय देते हुए स्वयं कष्ट सहकर दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हैं उसे देव-समाज कहते हैं। जब जहाँ जन समूह इस प्रकार पारस्परिक संबंध बनाये रहता है तब वहाँ स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनी रहती हैं। पर जब कभी लोग न्याय अन्याय का, उचित अनुचित का, कर्तव्य अकर्तव्य का विचार छोड़कर उपलब्ध सुविधा या सत्ता का अधिकाधिक प्रयोग स्वार्थ साधन में करने लगते हैं तब क्लेश, द्वेष और असन्तोष की प्रबलता बढ़ने लगती है। शोषण और उत्पीड़न का बाहुल्य होने से वैमनस्य और संघर्ष के दृश्य दिखाई पड़ने लगते हैं। पाप, दुराचार, अनीति, छल एवं अपराधों की प्रवृत्तियाँ जहाँ पनप रही होंगी। वहाँ प्रगति का मार्ग रुक जायगा और पतन की व्यापक परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगेंगी। चातुर्य, विज्ञान एवं श्रम के बल पर आर्थिक स्थिति सुधारी जा सकती है पर उससे उपभोग के साधन मात्र बढ़ सकते हैं। मनुष्य की वास्तविक प्रगति एवं शाँति तो पारस्परिक स्नेह सौजन्य एवं सहयोग पर निर्भर रहती है, यदि वह प्राप्त न हो सके तो विपुल साधन सामग्री पाकर भी सुख शान्ति के दर्शन दुर्लभ ही रहेंगे।
अच्छे व्यक्तित्व अच्छे समाज में ही जन्मते, पनपते और फलते फूलते हैं। जिस समाज का वातावरण दूषित तत्वों से भरा होता है उसकी पीढ़ियाँ क्रमशः अधिक दुर्बल एवं पतित बनती चली जाती हैं। प्राचीन काल में जब भारत का सामाजिक स्तर ऊँचा था तो यहाँ घर-घर में नर-रत्न जन्मते थे और हर क्षेत्र में महापुरुषों का बाहुल्य दृष्टिगोचर होता था। आज जब कि नीचता और दुष्टता की परिस्थितियाँ जोर पकड़ रही हैं तो संतानें भी उच्छृंखल, अशिष्ट, अस्वस्थ, अर्ध विक्षिप्त एवं अनैतिक मनोभूमि लेकर ही जन्मती हैं। बड़े होने पर उनमें से अधिकाँश निकृष्ट स्तर का जीवन ही व्यतीत करते हैं। धन कमाने, पद प्राप्त करने या चातुर्य दिखाने में कोई व्यक्ति सफल हो जाय तो भी यदि वह भावना और कर्तृत्व की दृष्टि से गिरा हुआ है तो उसे सामाजिक दृष्टि से अवाँछनीय व्यक्ति ही माना जायगा। उसकी सफलतायें उसके निज के लिए सुविधाजनक हो सकती हैं पर उनसे देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति का कुछ भी भला नहीं हो सकता।
नम्रता, सज्जनता, कृतज्ञता, नागरिकता एवं कर्तव्यपरायणता की भावना से ही किसी का मन ओत-प्रोत रहे ऐसे पारस्परिक व्यवहार का प्रचलन हमें करना चाहिए। दूसरों के दुःख-सुख को लोग अपना दुःख-सुख समझें और एक दूसरे की सहायता के लिए तत्परता प्रदर्शित करते हुए सन्तोष अनुभव करें, ऐसा जनमानस निर्माण किया जाना चाहिए। आदर्शवादी आवरण में एक दूसरे से आगे बढ़ने का प्रयत्न करें यह प्रतिस्पर्धा तीव्र की जानी चाहिए। पशु प्रवृत्तियों का उन्मूलन और मानवीय सभ्यता का अभिवर्धन निरन्तर होता रहे ऐसी योजनायें, प्रचलित करने पर ही हम नव-निर्माण का लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे। संस्कृति पर ही सम्पन्नता निर्भर रहती है यह हमें कभी भी भूलना नहीं चाहिए।
नशेबाजी, फैशन-परस्ती, सिनेमा, शान-शौकत तथा विलासिता की अनेक वस्तुओं में लोग पैसे को पानी की तरह बहाते हैं और पीछे आर्थिक तंगी का रोना रोते रहते हैं। आमदनी बढ़ाने के लिए सरकारी और गैर सरकारी योजनायें बन रही हैं, वेतन वृद्धि की माँग जोरों पर है पर जब तक मितव्ययिता और एक-एक पैसे के सदुपयोग की प्रवृत्ति न पनपेगी तब तक आर्थिक संकट का निवारण किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा। अपव्ययी लोगों के लिए तो कुबेर जितनी सम्पदा भी कम ही पड़ती रहेगी।
अमीरों का सम्मान यह हमारा एक ऐसा दूषित सामाजिक दृष्टिकोण है जिसके कारण लोग अनुचित रीति से भी धन कमाने में संकोच नहीं करते। यदि लोग अपने धन के द्वारा सुख भोगें इसमें हर्ज नहीं पर उन्हें इसी कारण सम्मान गौरव मिले कि वे धनी हैं तो यह अनुचित है। सम्मान केवल परमार्थी सदाचारी लोगों के लिए सुरक्षित रहना चाहिए। उन बेचारों को यदि वह भी न मिल सका तो उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए तथा नये लोगों का श्रेष्ठता की ओर आकर्षण उत्पन्न करने के लिए कोई माध्यम न रह जायगा। जिस समाज में मनुष्य की महत्ता का मूल्याँकन धन के आधार पर होता है वह कभी उच्चस्तरीय प्रगति कर सकने में समर्थ नहीं हो सकता। आज हमारे समाज में लोक सेवी, आदर्शवादी मान नहीं पा रहे हैं और जिनके पास धन है वे उसकी मनमानी लूट मचा रहे हैं, इस स्थिति से समाज का स्तर गिर जाने का भारी खतरा विद्यमान है। हमें समय रहते इस ओर से सावधान हो जाना चाहिए।
समाज का छोटा रूप परिवार है। परिवार के रूप में समाज के एक छोटे अंग को सुविकसित करने का उत्तर-दायित्व प्रत्येक गृहस्थ के कंधे पर रक्खा हुआ है। इसलिए जहाँ परिवार का भरण-पोषण करने का ध्यान रखा जाता है वहाँ उसके गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने का प्रयत्न भी गृहपति को करना ही चाहिए। आज इसी की सबसे अधिक उपेक्षा की जाती है। समाज के नव-निर्माण के लिए यह निताँत आवश्यक है कि अपने-अपने परिवार के नव-निर्माण कार्य में प्रत्येक गृहस्थ पूरी-पूरी रुचि लेने लगे। इसके लिए सर्वप्रथम पति-पत्नी को पतिव्रत और पत्नीव्रत की शपथ लेनी पड़ेगी। दोनों को दो शरीर एक प्राण होकर इतना आदर्श, इतना प्रेमपूर्ण, इतना सहयोग भरा जीवन बनाना पड़ेगा कि परिवार निर्माण की गाड़ी ठीक तरह लुढ़कने लगे। अपने अनुकरणीय आदर्श से ही पति-पत्नी सारे परिवार को प्रगतिशील बना सकते हैं। बालकों में भी सुसंस्कार पैदा करने हैं पहले माता-पिता को उन्हें स्वभाव का अंग बनाना होगा तभी तो बच्चे उनका अनुसरण करते हुए वास्तविक प्रशिक्षण प्राप्त कर सकेंगे। समाज की नवरचना दाम्पत्ति जीवन को परिष्कृत करने से होगी और इसके लिए पत्नी को सुधारने से पूर्व अपने को सुधारना होगा। इस प्रकार आत्मनिर्माण की प्रक्रिया आरंभ करके परिवार, समाज एवं आगामी पीढ़ी को सुसंस्कृत समुन्नत बना सकना संभव होगा, यह विचार हमें जन-मानस में भली प्रकार हृदयंगम करा देना चाहिए। समाज के नवनिर्माण का मूल आधार यही है।
समय की पाबन्दी, वचन का पालन, पैसे का विवेकपूर्ण सद्व्यय, सज्जनता और सहिष्णुता, श्रम का सम्मान, शिष्टाचारपूर्ण व्यवहार, ईमानदारी की कमाई, अनैतिकता से घृणा, प्रसन्नतापूर्ण मुखाकृति, आहार और विहार का संयम, समूह के हित में स्वार्थ का परित्याग, न्याय और विवेक का सम्मान, स्वच्छता और सादगी यह हमारे सामाजिक गुण होने चाहिएं। जिस समुदाय में यह सद्प्रवृत्तियाँ राष्ट्रीय गुण का रूप धारण कर लेती हैं उनका विकास स्वल्प साधनों से ही होता है किन्तु यदि इनका अभाव रहा तो प्रगति के अगणित साधन उपलब्ध होते हुए भी वह समाज दिन-दिन दुर्गति की ओर ही खिसकता जाता है।
सभ्य समाज वह है जिसमें हर नागरिक को अपना व्यक्तित्व विकसित करने एवं प्रगति पथ पर बढ़ने के लिए समान रूप से अवसर मिले। इस मार्ग में जितनी भी बाधायें हों उन्हें हटाया जाना चाहिए। लिंग भेद के कारण स्त्रियों को, जाति भेद के कारण शूद्रों को, आर्थिक असमानता के कारण गरीबों को मन मारकर आगे बढ़ने की क्षमता होते हुए भी विवश रुक बैठना पड़ता है। हमें सामाजिक न्याय का ऐसा प्रबन्ध करना होगा कि हर व्यक्ति निर्बाध गति से प्रगति का समान अवसर प्राप्त कर सके। धन का वितरण इस प्रकार होना चाहिए कि किसी को न तो मुफ्तखोरी या आलस्य में पड़े-पड़े गुलछर्रे उड़ाने की सुविधा मिले और न कोई श्रम की चक्की में पिस जाने पर भी भोजन वस्त्र से वंचित रह जाया करे। शोषक और शोषित का वर्ग भेद मिटना चाहिए और हर व्यक्ति को अपने श्रम का उचित लाभ मिलने की सुविधा रहनी चाहिए। ऐसा समाज ही सभ्य समाज कहलाने का अधिकारी बन सकता है।
हमारी सामाजिक क्राँति का अर्थ हिन्दू जाति में प्रचलित कुछ कुरीतियों को हटा देने मात्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए वरन् एक सभ्य, सुविकसित एवं सुसंस्कृत समाज की रचना होनी चाहिये। यदि अनैतिक दुष्प्रवृत्तियां प्रचलित रहीं तो कोई कुरीतियाँ मिटा भी दी जाय तो अन्य प्रकार की अन्य तरीके की बुराइयाँ फिर उठ खड़ी होंगी किन्तु यदि सज्जनता को जन-मानस का सहज स्वभाव बनाया जा सका तो आज की भयंकर दिखाई देने वाली कुरीतियाँ अनायास ही नष्ट हो जाएंगी।
कवि कई तरह के होते हैं। कुछ ऐसे तुक्कड़ होते हैं जिनका काम छन्द गढ़ कर लोगों को सुना देना और अपनी विशेषता की वाहवाही लूट लेना मात्र होता है। कुछ ऐसे होते हैं जो मनुष्य के भीतर रहने वाले पशु को उभार-उभार कर बाहर लाते हैं और उस बदबू से वातावरण को गन्दा करते रहते हैं। अनियन्त्रित उच्छृंखल काम वासना अनेक गन्दी नालियों में होकर बहती है उन्हीं में से एक नाली ऐसी कविता भी है। विकार और वासनाएं भड़काने के अनेक हेय मार्ग मनुष्य ने ढूँढ़ निकाले हैं, विचारशील लोग उन्हें अश्लील और घृणित ठहराते हैं। कविताएं भी इस श्रेणी की होती हैं। फूहड़ लोग गन्दी भाषा में अपने भाव व्यक्त करते हैं। इसलिए उन्हें कुत्सित और बाजारू कहते हैं। पर कुछ सुशिक्षित ऐसे भी होते हैं जो अच्छे शब्दों की आड़ में यही काम करते हैं और अपनी कृतियों को ‘कला’ बताते हैं। कह नहीं सकते यदि वासनाओं को भड़काने वाली इन कुत्सित रचनाओं को भी माता सरस्वती की साधना, कला मान लिया जाय तो फिर वाणी का व्यभिचार किसे कहा जा सकेगा? मध्य काल के सामन्तवादी युग में भारत की तरह अन्य देशों में भी रीति-काव्य और नायिका-भेद का बोलबाला रहा है पर जब मानवीय चेतना ने सत्य को खोजने और उपयुक्त को ग्रहण करने की आकाँक्षा जागृत की तो इस तरह की कृतियाँ अनुपयुक्त ही मानी जाएंगी।
कवि मानवता का प्रतिनिधि होता है, वह सत्यं शिवं सुन्दरम् की आराधना करता है और यही कहता लिखता एवं गाता है जिससे अनुचित का शमन और उचित का अभिवर्धन हो। जो घृणित है उसी को उछालने से विश्व मानव को कुरूप ही बनाया जा सकता है कोई सच्चा कवि ऐसी धृष्टता नहीं कर सकता। करेगा भी तो कम से कम उसे ‘कला’ तो नहीं ही कहेगा। जो ‘कला’ मानवता के शृंगार में प्रयुक्त हो उसी को तो सार्थक माना जा सकता है। रूस के महाकवि ‘पुश्किन’ ऐसे ही कलाकार थे। उनने अपने युग की पीड़ा को छन्दबद्ध करके मानवीय अन्तःकरण तक पहुँचाने का प्रयत्न किया है। कोई ईमानदार कलाकार इसके अतिरिक्त और कर भी क्या सकता है।
रूस उन दिनों नेपोलियन के आक्रमण के विरुद्ध आत्मरक्षा की लड़ाई लड़ रहा था। सेन्ट पीटर्सबर्ग में शिक्षा पाने वाले इस युवक पर तत्कालीन परिस्थितियों का प्रभाव पड़ा और उसने अपने देश को अधिक समर्थ एवं बलवान बनाने की ठानी। पुश्किन ने देखा उसमें कवित्व मौजूद है और मनुष्य अपनी उपलब्ध किसी भी विशेषता को समाज के लिए समर्पित करके मानवता की बहुमूल्य सेवा कर सकता है उन्होंने अपने कवित्व को समाज सेवा में लगा डालने की योजना बनाई और नियमित रूप से रचनात्मक कविताएं लिखने लगे।
पुश्किन ने देश भ्रमण किया और देखा कि निरंकुश शासन के विरुद्ध जनता में घोर असन्तोष व्याप्त है। और वह अपने मानवीय अधिकारों की प्राप्ति के लिए बेचैन हो रही है। उत्साही युवक शासन का तख्ता पलट कर जनता की सरकार बनाने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। इन परिस्थितियों में पुश्किन ने अपना स्थान शोषित और संघर्षशील लोगों के बीच ही उपयुक्त समझा। वे कुलीन कहलाने वाले घराने में जन्मे थे। ऐसे लोग आमतौर से राज्य समर्थक होते हैं पर उनने सत्य को प्रधान समझा और कुलीनता के घेरे से निकल कर जनता के खेमे में जा मिले। अब उनकी रचनाओं में जनता का—पीड़ित और शोषित जनता का दर्द रहने लगा। उनकी कविताएं गाई जाने लगीं और जनता ने उनसे आवश्यक प्रेरणा प्राप्त की।
उन्होंने देखा कि एकाकी प्रयत्न काफी न होगा। संगठित रूप से कवि और साहित्यकार कुछ काम करें तो ही विशाल देश का जन-मानस प्रबुद्ध बनाया जा सकेगा। अस्तु वे साहित्यिकों के संगठन कार्य में लगे और कवियों तथा लेखकों की एक संस्था ‘ग्रीनलेम्प’ बनाई। व्यवस्थित संगठित रूप से होने वाले सभी कार्यों की तरह नव-चेतना का साहित्यिक निर्माण करने में आशाजनक सफलता मिलने लगी। ‘रोड टू लिबर्टी’ तथा ‘दी विलेज’ नामक उनके दो काव्य बहुत लोक-प्रिय हुए जिनमें राजनीतिक उत्पीड़न के विरुद्ध जनता को संघर्ष करने के लिए प्रेरणा दी गई थी।
पुश्किन जार सरकार की आँखों में खटकने लग गये। उन्हें देश-निकाला देकर साइबेरिया भेज देने की धमकी दी गई। उस समय तो कुछ प्रभावशाली मित्रों ने मध्यस्थता करके उन्हें बचा लिया और जुर्माना देकर ही पीछा छुड़वा दिया पर आखिर ऐसे कब तक चलता। उनके प्रयत्न उग्र होते जा रहे थे। सरकार ने उन्हें निर्वासित करके दक्षिणी रूस भेज दिया। चार वर्ष के निर्वासन काल में वे काकेशस, क्रीमिया, किसेनेव तथा ओडेसा में रहे, वहाँ उन्होंने पीड़ित जनता के दुःख दर्द को और भी अच्छी तरह समझा तथा अपना कर्तव्य और भी दृढ़तापूर्वक निश्चित कर लिया। वे न तो विलासिता के लिए ललचाये और न अत्याचारों से डरे। एक ईमानदार और बहादुर इन्सान की तरह अपने समाज के पुनरुत्थान के लिए पीड़ित पद-दलित मानवता को ऊपर उठाने के लिए वे और भी अधिक दृढ़ता के साथ लग गये। हमले से कोई भी योद्धा नहीं दबता तो फिर पुश्किन ही कैसे दबते?
इस निर्वासन काल में भी उन्होंने साहित्य साधना छोड़ी नहीं, वरन् ‘दि रावर ब्रदर्स’ दी जिरासीज’ जैसे काव्य लिखे, उनमें ‘काकेशस का कैदी’ तो बहुत अधिक प्रसिद्ध हुआ। उन दिनों के शासक अलेक्जेण्डर प्रथम ने उन्हें उनके जन्म ग्राम ‘मिखाइ लोवस्कोय’ में कैद कर दिया ताकि उस छोटे दायरे में रहकर जन-संपर्क से वंचित रह जावें। इस एकान्त-वास में वे चिन्तन और मनन में संलग्न रहकर अधिक मनोबल संग्रह करते रहे और वहाँ भी उनने कुछ ग्रन्थों की रचना कर डाली।
छोटे बड़े दर्जनों महा-काव्य और साधारण कविता की पुस्तकें उन्होंने लिखी हैं। नाटक और उपन्यास भी कई लिखे हैं। इन सभी रचनाओं में वह ओज आदर्श और अभाव मौजूद है जो अनाचार के विरुद्ध संघर्ष करने और मानवीय पुण्यों की स्थापना में आवश्यक स्फूर्ति एवं प्रेरणा दे सके। उनके जीवन काल में भले ही उन रचनाओं को उतना सम्मान न मिला हो पर पीछे रूस ही नहीं विश्वभर में उन्हें मानवता की वकालत के रूप में सम्मान मिला। महर्षि टॉलस्टाय ने लिखा है—’पुश्किन की रचनाएं प्रत्येक लेखक को पढ़नी ही चाहिएं ताकि वह अपने लिए सही दिशा निर्धारित कर सके।”
जीवन के अन्तिम दिनों में उन्होंने ‘दी कन्टैम्परेरी’ नामक पत्रिका भी निकाली जिससे न केवल प्रेरक विचारों का ही विस्तार हुआ वरन् पत्रिका-कला का भी एक आदर्श उपस्थित हुआ। पुश्किन आदर्श के प्रतीक थे उनका जीवन भौतिक आकाँक्षाओं से नहीं उत्कृष्टता की भावनाओं से अति ओत-प्रोत हो रहा था, ऐसी दशा में उनकी कृतियाँ भी विश्व मानव का शृंगार ही बन सकती थीं। वे रूस के नहीं समस्त विश्व के कवि माने जाते हैं और उन्हें किसी क्रान्ति के ही प्रेरक नहीं वरन् अनैतिकता के विरुद्ध छेड़े गये विश्व युद्ध का अग्रिणी नेता समझा जाता है।
महाकवि अलेक्जेण्डर पुश्किन 6 जून 1799 को मास्को में जन्मे और 10 फरवरी 1837 में एक द्वन्द्व युद्ध में मारे गये। 38 वर्ष का उनका जीवन मानवता के अमर गायक का जीवन है। इस थोड़ी-सी आयु में उनकी ज्वलंत भावनाओं ने उनसे इतना करा लिया जितना कि मुर्दों की तरह जीने वाले दस जिंदगियों में भी कर नहीं पाते।
भारत माता को पुश्किन जैसे सपूतों की आवश्यकता है। सामाजिक कुरीतियों, बौद्धिक भ्रम जंजालों, नैतिक अनास्थाओं से जर्जरित यह पवित्र भूमि आशा भरे नेत्रों से देखा करती है कि कोई अग्नि-गान का गायक इन विडम्बनाओं को भस्म कर डालने वाले गीत गाये, पर यहाँ तो ‘कला’ के नाम पर वासना, भड़काने वाली और अबूझ पहेलियाँ जैसी जंजाल भरी तुकबंदी लिखने से ही फुरसत नहीं। कवि हों तो कविता भी हो। हृदय हो तो उसमें दर्द भी उठे। निम्न स्तर के लोगों के मन की बात कहकर तुकबंदी की वाहवाही लूटने वालों को कवि के कर्तव्यों का ज्ञान कहाँ? भारत माता पुश्किन जैसे कवियों को न जाने कब अपनी कोख में जन्म देगी और न जाने उनकी कृतियों से भारतीय साहित्य को गर्व से मस्तक ऊँचा उठाने का अवसर कब मिलेगा?
जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने के लिए तत्संबंधी योग्यता, अनुभव के साथ-साथ मानसिक सन्तुलन, शान्त मस्तिष्क की भी अधिक आवश्यकता होती है। कोई व्यक्ति कितना ही योग्य, अनुभवी, गुणी क्यों न हो, यदि बात-बात पर उसका मन आँधी तूफान की तरह उद्वेलित, अशान्त हो जाता हो तो वह जीवन में कुछ भी नहीं कर पायेगा। उसकी शक्तियाँ व्यर्थ ही नष्ट हो जायेंगी और भली प्रकार वह अपने काम पूरे नहीं कर सकेगा।
प्रत्येक छोटे से लेकर बड़े कार्यक्रम शान्त और सन्तुलित मस्तिष्क द्वारा ही पूरे किए जा सकते हैं। संसार में मनुष्य ने अब तक जो कुछ भी उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं उनके मूल में धीर-गम्भीर, शान्त मस्तिष्क ही रहे हैं। कोई भी साहित्यकार, वैज्ञानिक कलाकार-शिल्पी, यहाँ तक कि बढ़ई, लुहार, सफाई करने वाला श्रमिक तक अपने कार्य तब तक भली-भाँति नहीं कर सकते, जब तक उनकी मनोस्थिति शान्त न हो। कोई भी साधना स्वस्थ सन्तुलित मनोभूमि में ही फलित हो सकती है। जो क्षण-क्षण में उत्तेजित हो जाता हो, सामान्य सी घटनायें जिसे उद्वेलित कर देती हों, ऐसा व्यक्ति कोई भी कार्य भली प्रकार नहीं कर सकेगा। न वह अपने काम के बारे में ठीक-ठीक सोच समझ ही सकेगा।
शान्त और सन्तुलित अवस्था में ही मन कार्य करने तथा भली प्रकार सोचने समझने की सहज स्थिति में होता है। ऐसी ही दशा में वह कोई रचनात्मक, उपयोगी बात सोच सकता है और उसे पूरी कर सकता है। सन्तुलित स्थिति में ही मनुष्य की शक्तियाँ एकाग्र केन्द्रित और परस्पर सहयोगी होकर काम करती हैं। अशान्त स्थिति में, आवेग, उद्वेगों में शक्तियाँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। वे अपनी मनचाही दिशाओं में दौड़ने लगती हैं।
अशान्त और उद्वेलित मनः स्थित में सम्पूर्ण शरीर एक प्रकार के कम्पन से थरथराने लगता है। स्नायु संस्थान पर तीव्र आघात पैदा होता है, रक्तचाप बढ़ जाता है, पेशियाँ तन जाती हैं, क्रोध, भय, निराशा, काल्पनिक चिन्तायें आदि मनोवेग प्रबल हो जाते हैं, बुद्धि भ्रमित हो जाती है। इस तरह उद्वेगों में तन और मन दोनों ही असन्तुलित हो जाते हैं। अनेकों शारीरिक एवं मानसिक बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। उद्वेगों के अधिक बने रहने पर मनुष्य का चित्त भी विक्षिप्त सा हो जाता है।
उत्तेजित विक्षुब्ध मनःस्थिति में कोई भी दुष्कृत्य, दुर्घटनाएँ होना सम्भव है। आये दिन समाचार-पत्रों में छपती रहने वाली हत्याओं, आत्म-हत्याओं तथा कई उपद्रवों एवं दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण उद्विग्न मनोभूमि ही होती है। जब मनुष्य के बुद्धि विवेक कुण्ठित हो जाते हैं तब वह अच्छे बुरे का निर्णय नहीं कर पाता। आवेग में जैसी भी सनक उठ जाती है वह वैसा ही कर बैठता है।
मन में उठने वाले उद्वेगों का मुख्य कारण शारीरिक एवं मानसिक अस्वस्थता ही है। पाचन-क्रिया की गड़बड़ी जीर्णरोग, अनिद्रा, दुर्बलता आदि के कारण भी मानसिक सन्तुलन बिगड़ जाता है। अच्छे-भले आदमी का मन भी बीमार पड़ने पर अस्त-व्यस्त और उद्विग्न बन जाता है। शरीर में कोई गड़बड़ी हो, कोई कष्ट हो तो प्रायः चिड़चिड़ाहट, अधीरता, मानसिक अशान्ति और अतृप्ति पैदा हो जाती है जो मन को असन्तुलित बना देती है। कहावत है “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है।” सन्तुलित और शान्त मनोदशा के लिए हमें अपने स्वास्थ्य को सुधारना होगा। रोगग्रस्त, जीर्ण-शीर्ण, कमजोर शरीर में सुदृढ़ मनोभूमि का होना असम्भव है। शरीर की रुग्णावस्था में जीवन के कोई महत्वपूर्ण निर्णय भी नहीं करने चाहिएं। क्योंकि उस समय मनःस्थिति असन्तुलित होती है जिससे सही निर्णय भी नहीं हो पाता।
ऐसा वातावरण और संगत, जिसमें हमें बार-बार उद्विग्न होना पड़े, मनोभूमि असन्तुलित हो जावे, उनसे बचते रहना चाहिए। पवित्र स्थान और शान्त वातावरण में सहज ही पुनः स्थिति सन्तुलित बनी रहती है। भले, सज्जन, साधु-महात्मा, पुण्यजीवी व्यक्तियों के संपर्क में रहने पर मन भी सरलता से शान्त और उद्वेगहीन बन जाता है। यह सर्वप्रसिद्ध सत्य है कि सन्त महात्माओं, ऋषियों मनीषियों के पास जाने पर मन की अशान्ति एवं उद्वेग शान्त हो जाते हैं। क्योंकि उनके शान्त गम्भीर उद्वेगहीन अन्तःकरण से शान्ति की सूक्ष्म किरणें निकलती रहती हैं उनका स्पर्श प्राप्त कर अशान्त व्यक्ति भी शान्त हो जाते हैं। इसके विपरीत झगड़ालू, कलहकारी, विक्षुब्ध, दुष्ट प्रकृति लोगों के संपर्क में रहने पर उद्वेग और अशान्ति के अवसर अधिक आते हैं। एक भला आदमी भी इस तरह के संग दोष से प्रभावित होकर उद्विग्न-प्रकृति का बन जाता है। यद्यपि व्यावहारिक जीवन में सर्वथा भले आदमियों का संग और अनुकूल वातावरण ही मिलता रहे यह सम्भव नहीं होता, तथापि बुरे व्यक्तियों, बुरे वातावरण से बचने का जितना बने प्रयत्न करना चाहिए। साथ ही अच्छे वातावरण और भले आदमियों की संगत के लिए भी जीवन में पर्याप्त समय देना चाहिए।
हम जो भी कुछ खाते-पीते हैं उससे हमारा शरीर ही नहीं बनता वरन् मन भी बनता है। कहावत है “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन।” भोजन का हमारे स्वभाव निर्माण में बहुत बड़ा हाथ होता है। अभक्ष्य, बासी, दूषित खराब, अन्याय अनीति से उपार्जित भोजन से क्रोध, उत्तेजना, मानसिक, अशान्ति, आवेग, उद्वेग अधिक पैदा होते हैं। माँस, मदिरा, तंबाकू, सिगरेट, बीड़ी अत्यधिक मीठे, चटपटे, मसालेदार पदार्थ मनुष्य की तृष्णा, वासना, मानसिक गर्मी को बढ़ाते हैं और ये सब मन को विक्षुब्ध तथा अशान्त बना देते हैं। इसके विपरीत दूध, फल, शाक-सब्जी, सात्विक भोजन, श्रम और ईमानदारी की कमाई से मन में सात्विक भावनायें, सद्विचार उत्पन्न होते हैं। शाकाहार, सात्विक भोजन करने वाले साधक सहज ही मन के विक्षोभ और उद्वेग को जीत लेते हैं। इतना ही नहीं उपयुक्त भोजन से सन्तोष, शान्ति, क्षमा धैर्य, संयम सदाचार आदि सत्प्रवृत्तियाँ पैदा होती हैं और इनसे मनः स्थिति पुष्ट तथा दृढ़ बनती है, जिसे आवेग उद्वेगों की आँधी भी विचलित नहीं कर सकती। आवश्यकता इस बात की है कि जो अशुद्ध अखाद्य पदार्थ हैं, जो अपवित्र हैं, उन्हें त्यागकर सात्विक भोजन करना चाहिए।
आवेगों उद्वेगों से बचने के लिए मन को सुसंस्कृत, बनाने की भी अत्यन्त आवश्यकता है। असंस्कृत, अनगढ़, नादान मन ही बात-बात पर उद्वेलित हो जाता है। आवेगों से बचने के लिए मन को विवेकशील धैर्यवान सहिष्णु बनाना आवश्यक है। कोई भी बुरी-से-बुरी बात या घटना सामने आ जाएं लेकिन उनसे तत्काल प्रभावित न होकर उनके बारे में भली प्रकार सोच विचार करना चाहिए। ऐसे व्यक्ति बहुत कम होते हैं जो कोई सही निर्णय तत्काल कर सकें।
आवेगों से बचने के लिए सहिष्णुता आवश्यक है। जीवन में सभी तरह के अवसर आते हैं। जीवन पथ पर सीधी पगडण्डी भी आती है तो ऊबड़ खाबड़ चट्टानें भी। नदी, नाले, काटे सभी तो जीवन की राह में आते हैं लेकिन चट्टानों से सर टकराने पर या नदी में कूद पड़ने पर या काँटों को पैरों से मसलने पर तो इनसे बचा नहीं जा सकता । उल्टे हानि ही होती है। इन सबमें होकर एक ही रास्ता है जीवन पथ पर आगे बढ़ने का, वह है सबको धैर्य-पूर्वक सहन किया जाय, बचकर अपना रास्ता बना लिया जाय। सहिष्णुता समुद्र की-सी गम्भीरता है। इसमें कठिनाइयों का बड़ा पर्वत भी डाल दिया जाय तो गर्भ में समा जायगा, लेकिन उसकी स्थायी शान्ति गम्भीरता को नष्ट नहीं कर सकेगा। जीवन में आने वाले उद्वेगों में, घटनाओं में अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रखने के लिये सहिष्णुता एक महत्वपूर्ण साधन है।
अपने स्वास्थ्य में सुधार करके, उपयुक्त भोजन का क्रम बनकर, अच्छी सत्संगति और पवित्र वातावरण में रहकर, सत् साहित्य का क्रम बनाकर उद्वेगों से बचने का प्रयत्न कीजिए। सन्तुलित मनोभूमि ही सफलता का महत्वपूर्ण आधार है। शान्त और सन्तुलित मन ही कोई रचनात्मक महान् कार्य करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
पाचन संस्थान की गड़बड़ी से उत्पन्न मल-विकार को ही विश्व के सभी स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने रोग और स्वास्थ्य की खराबी का प्रमुख कारण माना है। शरीर की आन्तरिक शक्ति का स्रोत भी पेट है। जैसे रेलगाड़ी के इंजन से उत्पन्न भाप ही सारी गाड़ी को खींचती है वैसे ही शरीर की सभी गतिविधियों के लिए पेट ही शक्ति प्रदान करता है। यह शक्ति उसे बाहरी साधनों से प्राप्त करनी पड़ती है। इस शक्ति को यदि भली भाँति नियन्त्रित न करें, एक तरफ विजातीय द्रव्य बढ़ता रहे और दूसरी ओर से अन्धाधुन्ध आहार पहुँचाते रहें तो शरीर में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है।
आहार के संबंध में सादगी और सरलता का ध्यान रखा जाय तो स्वास्थ्य और जीवन रक्षा का प्रश्न उतना जटिल नहीं रह सकता। विटामिन्स, क्षार लवण चर्बी, शकर, प्रोटीन आदि की दृष्टि से आहार सन्तुलित है अथवा नहीं, इस बात पर अधिक विचार की आवश्यकता नहीं। थाली में सजाई गई कटोरियों में यह सारे तत्व आ गये या नहीं इस पर अधिक परेशान होने की अपेक्षा यह जान लेना अधिक बुद्धिमानी की बात है कि किस प्रकार खायें जिससे स्वास्थ्य स्थिर बना रहे। प्रकृति ने खाद्य-पदार्थों का निर्माण करते समय यह चतुरता बरती है कि कम से कम आहार और उसमें थोड़े से फेर परिवर्तन से भी काम चल सकता है। वन के जीव−जंतु अपने एक प्रकार के चारे से ही सारे पोषण तत्व प्राप्त कर लेते हैं। सूखा भूसा और रूखे पत्ते चबा कर जब गाय, बैल,भैंस और दूसरे पशु बलिष्ठ हो सकते हैं तो अन्न जैसी शक्तिदायक वस्तु खाकर मनुष्य स्वस्थ क्यों नहीं बन सकता?
आहार लेने से मुख्यतया शरीर के दो उद्देश्य पूरे होते हैं (1) शारीरिक अवयवों का संवर्द्धन और पोषण। (2) श्रम से खोयी हुई शक्ति को पुनः प्राप्त करना। इस दृष्टि से आहार में चटोरेपन की कहीं भी उपयोगिता नजर नहीं आती। एक बार में कई प्रकार का मिश्रित आहार लेने से ही उक्त आवश्यकताएं पूरी होती हों सो बात भी नहीं। इनसे तो लाभ की अपेक्षा हानि की अधिक सम्भावना रहती है। यह जानने के लिए आहार की रासायनिक प्रतिक्रिया पर एक क्षण विचार कर लेना अधिक उपयुक्त जान पड़ता है।
खाद्य को मुँह में ले जाने पर दाँत और जीभ के कार्य प्रारम्भ होते हैं। दाँत उसे चबाकर पतला बनाते और जीभ लार स्रवित कर उस अन्न को तरल बनाकर गले से नीचे उतार देते हैं, जहाँ उसका पाचन प्रारम्भ होता, खून बनता और अवशेष मल के रूप में बाहर निकल जाता है। आहार में अधिक तीखे, मीठे, नमकीन और कसैले पदार्थ लेने से जीभ से स्रावित होने वाली अमूल्य लार व्यर्थ ही अनावश्यक मात्रा में क्षरित हो जाती है, जिससे पूरी तरह कुचले बिना ही आहार गले से नीचे उतर जाता है। यहाँ पाचक अम्ल मिलते तो हैं किन्तु उनकी सारी शक्ति अधकुचले आहार को ही तरल बनाने में समाप्त हो जाती है फिर आंतें भी अत्यन्त सुकुमार होती हैं वे भी इसमें से बहुत थोड़ा अंश ग्रहण कर पाती हैं और अधिकाँश आहार मल में परिवर्तित हो जाता है जो अपनी स्वाभाविक क्रिया के अभाव के कारण और छोटी आँतों की अशक्तता के कारण पूरी तौर पर बाहर नहीं निकल पाता। भीतर ही सड़न, दुर्गन्ध उत्पन्न करता रहता है। यह मल दुर्बल व्यक्तियों के शरीर में 3 सेर से 5 सेर तक जमा हो जाता है। धीरे-धीरे इसमें विषैले कृमि पैदा होकर शरीर के दूसरे अवयवों में चले जाते और रोग पैदा कर देते हैं। अनिद्रा, दुःस्वप्न, जी मिचलाना आदि इसी कारण से होते हैं। धीरे-धीरे यह मल भी सूखने लगता है और कठोर होकर आँतों में चिपक कर रह जाता है। पेट जिसे शरीर को शक्ति प्रदान करना था एक तरह से मल-विकारों का खलिहान और रोगों का मुहाना बन कर रह जाता है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से रूखी रोटियों का अत्यधिक महत्व है। भोजन मुँह में डालते ही पेट में सीधा नहीं चला जाता। जब तक वह पूरी तरह से तरल नहीं हो जाता उसमें लार मिलती रहती है और दाँतों को श्रम करते रहना पड़ता है। पूरी तरह रस बन जाने के बाद आहार में दूसरे अम्ल मिलकर उसे और भी हल्का बना देते हैं। आँतें बिना किसी असुविधा के सार-तत्व ग्रहण कर मल को बाहर निकाल देती हैं। इस क्रिया में अधिक खा जाने का भी उतना भय नहीं रहता क्योंकि थोड़े से ही आहार में मुँह और कनपटी के रुधिर संस्थानों का पूरा श्रम हो जाता है और ये अपने आप अधिक चबाने की असमर्थता प्रकट कर देते हैं। फलतः थोड़े आहार से पाचन संस्थान का भी काम सरलता से पूरा हो जाता है।
यह कहना भी भूल है कि ऐसा आहार खाने में असुविधाजनक होता है और किसी प्रकार का आनन्द नहीं आता। ऐसा वे ही कहते हैं जिन्होंने इसे कभी प्रयोग में नहीं लाया होता। बार-बार ठूँसा-ठूँसी करने की बात और है। अन्यथा परिपक्व भूख में खाने बैठिए ओर खूब ध्यानपूर्वक देखिए कि सूखी रोटियों में कैसा अभूतपूर्व स्वाद आता है। पकाये हुए आहार का स्वाद सिर्फ मुँह में डालने के क्षण होता है, पीछे उसका स्वाद बिल्कुल नीरस हो जाता है और उसे नीचे उतारने की ही जल्दी पड़ती है। कई व्यक्तियों को इसके लिए बीच-बीच में पानी की भी सहायता लेनी पड़ती है किन्तु रूखी रोटियों में विलक्षण स्वाद होता है। मुँह में कौर डालने के बाद आप जितना अधिक उसे चबाइये उतना ही मिठास और आकर्षण बढ़ता जाता है। कुछ दिन यह प्रयोग करने पर तो दूसरी प्रकार का आहार लेने की इच्छा ही नहीं होती।
इसमें एक विशेषता यह भी होती है कि रुधिर के आगे जो शरीर को अन्न की विद्युत या तेजस् शक्ति प्राप्त होती है वह एक ही प्रकार के अणुओं से विनिर्मित होने के कारण अधिक सशक्त होती है। खून नितान्त लाल होता है, जिससे शरीर में कान्ति व स्फूर्ति बढ़ती है। रुधिर के तापमान और दबाव में हलचल नहीं होती। ये सामान्य बने रहते हैं, जिससे चित्त प्रसन्न रहता है, आनन्द, उत्साह और उल्लासपूर्ण भावनायें मस्तिष्क में उठती रहती हैं।
अधिकाँश बीमारियों तथा पेट की खराबी में ऊपर से मिले हुए नमक का बड़ा हाथ रहता है। प्रकृति ने यह पदार्थ अन्न, सब्जी और फलों में इतनी सूक्ष्मता से पहले ही रख दिया है कि ऊपर से नमक खाने की बिल्कुल भी आवश्यकता नहीं है। प्राचीन काल में हमारे पूर्वज कन्द-मूल-फल खाकर भी शतायु होते थे। तब इन वस्तुओं का आविष्कार भी नहीं हुआ था। आज भी यह स्थिति ऐसी ही है। ऊपर से नमक न लें तो इससे स्वास्थ्य अच्छा रह सकता है। रक्त संबंधी समस्त विकार शरीर में नमक की अधिक मात्रा हो जाने से ही होता है, इसलिए भी इसकी उपयोगिता समझ में नहीं आती।
शरीर के प्रत्येक अंग को पर्याप्त रस व रक्त मिलता रहे इसके लिए शुद्ध जल की आवश्यकता होती है। जल की मात्रा को शरीरस्थ कोशिकायें चूस-चूस कर शरीर में धारण करती रहती हैं। सौंदर्य का हेतु प्रधानतया जल को ही माना गया है। जैसे फलों का प्राकृतिक सौंदर्य उनमें पर्याप्त मात्रा में जल बने रहने से होता है, वैसे ही शरीर में जल की पर्याप्त मात्रा होने से ही शरीर सौंदर्ययुक्त, कान्तिवान तथा प्राणवान लगता है। बिना जलतत्व के जिस प्रकार खीरे, खरबूजे, सन्तरे, मौसम्मियाँ सूखी निर्जीव दिखाई देती हैं, वैसे ही इसके अभाव में शरीर शुष्क बना रहता है।
आहार में नमक या शक्कर की मात्रा बढ़ा देने से कोशिकायें एक विशेष प्रकार के तत्व से आच्छादित हो जाती हैं, जिससे जल चूसने की क्रिया में शिथिलता पड़ जाती है और ये पर्याप्त मात्रा में दूसरे अवयवों को जल प्रदान नहीं कर पातीं। देखा गया है कि नमक की तीव्रता से लिया हुआ जल शरीर में भारीपन पैदा करता है जब कि स्वाभाविक तौर पर लिया हुआ पानी सरलता से पहुँच कर उक्त क्रिया उत्पन्न कर देता है।
रूखी रोटियों के साथ लार की पर्याप्त मात्रा मिल जाने के कारण जल चूसने वाला तन्तु-जाल बिना किसी रुकावट के अपना काम पूरा कर देता है। जिससे खून की सफाई में बड़ी सुविधा हो जाती है। सशक्त जीवाणुओं से सम्पन्न खून उन्हीं व्यक्तियों का होता है, जो आहार में नमक, शक्कर आदि की मात्रा को बिलकुल घटा देते हैं। आज की स्थिति में यह कहा जा सकता है कि नमक की आवश्यकता पूरी करने वाली साग-सब्जियाँ महँगी पड़ती हैं इसलिए ऊपर से नमक लिया जाना चाहिए। ऐसी अवस्था में सेंधा नमक अल्प मात्रा में ले लें तो भी हानि नहीं। पर अस्वाद व्रत करते समय अकेले रोटी ही खायें तो इससे अधिक लाभ की आशा की जा सकती है।
जिन्हें इसमें विशेष असुविधा समझ पड़ती हो वे ऐसा भी कर सकते हैं कि रोटी के साथ कोई एक ही वस्तु लगा लें किन्तु उसमें नमक शक्कर कोई वस्तु मिली न हो। नींबू, टमाटर, दही या हल्की आँच में उबाले हुए शाक जैसे पालक, बथुआ या लौकी तोरई आदि से भी काम चल सकता है। रूखे का अर्थ है जो सरलता से गले के नीचे न चला जाय, जिसे गले से नीचे उतारने में मुँह, दाँत आदि को पर्याप्त श्रम करना पड़े। अतः किसी एक ही लगावन से लिये हुए आहार के द्वारा बिगड़े हुए पाचन संस्थान को सुधारा और सुधरी पाचन क्रिया को मजबूत बनाया जा सकता है। पर इसके लिये सर्वप्रथम ऐसे आहार के प्रति अपनी रुचि जरूर जागृत करनी पड़ेगी। इच्छा शक्ति के अभाव में तो अनेक बहाने ही बनाये जा सकते हैं।
ऐसे आहार का संबंध मानसिक स्वास्थ्य से भी है। अनेकों आरोग्य-विद्या-विशारदों का तो यह मत है कि स्वास्थ्य की खराबी का 70 प्रतिशत कारण मानसिक स्वास्थ्य का गिर जाना होता है। केवल स्वादप्रियता को ही प्रमुख स्थान देने से आहार के प्रति आसक्ति हो जाना स्वाभाविक है। ऐसी अवस्था में स्वास्थ्य संतुलन की बात सोची भी नहीं जाती। इसलिए अपनी जिह्वेन्द्रिय पर नियन्त्रण रखना आवश्यक है। एक बार में ही रोटी सब्जी, दाल, मिर्च मसालों से भरे पकवान, चाट-पकौड़े, अनावश्यक मात्रा में उदरस्थ करते रहें तो बेचारा पेट भी कब तक भार को स्वीकार करता रहेगा। तीखे पदार्थों के बार-बार सेवन से सभी पाचक रसों का अनावश्यक स्राव हो जाय—पीछे पाचन क्रिया में शिथिलता आ जाय तो इसमें पेट का क्या कसूर? अपने स्वास्थ्य को स्थिर रखना हो तो आहार के संबंध में संयम करना पड़ेगा। चटोरेपन की आदत को छोड़कर रूखे भोजन में रुचि उत्पन्न करनी होगी। तभी स्वास्थ्य की समस्या में किसी प्रकार के सुधार की आशा की जा सकती है।
एक बार पाँच असमर्थ और अपंग लोग इकट्ठे हुए और कहने लगे, यदि भगवान ने हमें समर्थ बनाया होता तो बहुत बड़ा परमार्थ करते। अन्धे ने कहा—यदि मेरी आँखें होतीं तो जहाँ कहीं अनुपयुक्त देखता वहीं उसे सुधारने में लग जाता। लंगड़े ने कहा—पैर होते तो दौड़-दौड़ कर भलाई के काम करता। निर्बल ने कहा—बल होता तो अत्याचारियों को मजा चखा देता। निर्धन ने कहा—धनी होता तो दीन दुखियों के लिए सब कुछ लुटा देता। मूर्ख ने कहा—विद्वान होता तो संसार में ज्ञान की गंगा बहा देता।
वरुण देव उनकी बातें सुन रहे थे। उनकी सचाई को परखने के लिए उनने आशीर्वाद दिया और इन पाँचों को उनकी इच्छित स्थिति मिल गई। अन्धे ने आँखें, लंगड़े ने पैर, निर्बल ने बल, निर्धन ने धन और मूर्ख ने विद्या पाई और वे फूले न समाये। परिस्थिति बदलते ही उनके विचार भी बदल गये। अन्धा सुन्दर वस्तुएँ देखने में लगा रहता और अपनी इतने दिन की अतृप्ति बुझाता। लंगड़ा सैर-सपाटे के लिए निकल पड़ा। धनी ठाठ-बाठ जमा करने में लगा। बलवान ने दूसरों को आतंकित करना शुरू कर दिया। विद्वान ने अपनी चतुरता के बल पर जमाने को उल्लू बना दिया। बहुत दिन बाद वरुण देव उधर से लौटे और उन असमर्थों की प्रतिज्ञा निभी या नहीं, यह देखने के लिए रुक गये। पता लगाया तो वे पाँचों अपने-अपने स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए थे।
वरुण देव बहुत खिन्न हुए और अपने दिये हुए वरदान वापिस ले लिए। वे फिर जैसे के तैसे हो गये। अन्धे की आँखों का प्रकाश चला गया। लँगड़े के पैर जकड़ गये। धनी निर्धन हो गया। बलवान को निर्बलता ने जा घेरा। अब उन्हें अपनी पुरानी प्रतिज्ञायें याद आईं और पछताने लगे कि पाये हुए सुअवसर को उन्होंने इस प्रकार प्रमाद में क्यों खो दिया। समय निकल चुका था, अब पछताने से बनता भी क्या था?
जातीय जीवन का विकास सामाजिक सुव्यवस्था और उसके श्रेष्ठ संस्कारों पर निर्भर है। भौतिक सम्पदायें और बाह्य-जीवन की सफलतायें मिलकर ही शान्ति व सुव्यवस्था स्थापित नहीं कर सकतीं। आन्तरिक स्वच्छता के अभाव में किसी भी देश जाति या संस्कृति में सुख, शान्ति की परिस्थितियाँ देर तक टिक नहीं सकतीं। ऊपर से बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत हों और अंतर्मन दूषित विचारों की सडाँद से भर रहा हो तो कौन जाने कब कोई न कोई विग्रह उत्पन्न हो जाय?
समाज की अन्तः चेतना गृहस्थाश्रम को माना गया है। गृहस्थ का आधार-सूत्र स्त्री पुरुष की मिली जुली इकाई को मानते हैं। इस प्रकार जब कभी समाज संस्कार की आवश्यकता प्रतीत होती है तो समाज के इसी मूलाधार गृहस्थ-जीवन को ही अधिक दृढ़ सुसंस्कृत और सुव्यवस्थित बनाने की आवश्यकता प्रतीत होती है।
ब्रह्मचर्य और उत्तम चरित्र का निर्माण संस्कारवान् गृहस्थ-जीवन में होता है। कर्मशीलता, दृढ़ता और नैतिक जागृति भी—पारिवारिक सौमनस्यता पर अवलम्बित है। देश जाति और संस्कृति इसी से प्रभावित होते हैं। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पुरुष की जागृति मात्र पर्याप्त नहीं है। नारी की विशेषतायें भी उतनी ही अनिवार्य हैं। बाह्य-व्यवस्था और आन्तरिक सद्भाव मिलकर ही गृहस्थ जीवन को निर्मल पवित्र एवं उद्दात्त बनाते हैं। इसके लिए स्त्रियों के संस्कारवान् होने की भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी पुरुष की।
आज की अनियन्त्रित अन्ध-परम्पराओं के कारण हमारे गृहस्थ जीवन में बड़ी गहराई तक कुसंस्कारों ने जड़ें जमा ली हैं। मनोबल की हीनता, चारित्रिक-पतन, भय, क्रोध, कलह और कटुता के कारण पारिवारिक जीवन बुरी तरह अस्त−व्यस्त हो चुका है। हमारी अविवेकपूर्ण परम्परायें ही इसकी जवाबदार हैं। स्त्री शिक्षा इनमें प्रमुख है। गृहस्थ की दुर्दशा का कारण आज नारियों की अशिक्षा ही है। ज्ञान के अभाव में उनका न तो बौद्धिक विकास हो पाता है न नैतिक। इसका प्रभाव सम्पूर्ण गृहस्थी पर पड़ता है। जहाँ सुख और शान्ति की निर्झरिणी प्रवाहित होनी चाहिए थी वहाँ नारकीय नैराश्य छाया रहता है। इस अन्धकार में जातीय-विकास की गाड़ी मुश्किल से आगे बढ़ पाती है।
पुरुष का सम्पूर्ण जीवन स्त्री पर आधारित रहता है। पुरुष की निर्माणकर्ती नारी है। उसके कल्याण-अकल्याण, ऊँच-नीच, सुख-दुःख, पतन और उत्थान का सम्पूर्ण भार स्त्री पर है। बच्चा जब जन्म लेता है उसके बाद किशोरावस्था में आने तक वह अधिकाँश माता के संसर्ग में ही रहता है। माता का अर्थ यहाँ उन सभी नारियों से होता है जो एक घर, एक आँगन में रहती हैं। इस बीच बालक में संस्कार पड़ते हैं। अच्छे या बुरे संस्कारों का अनुकरण वह अपनी समीपवर्ती माताओं से ही करता है। यदि स्त्रियों में श्रेष्ठ संस्कार न हुए तो बच्चे का स्वभाव भी मलिन बनने लगता है। इसलिये स्त्रियों को संस्कारवान् बनाने के लिए उनकी शिक्षा उपयोगी ही नहीं आवश्यक है, अनिवार्य है।
इस संबंध में आज का समाज अनेक तर्क व भ्रान्ति मूलक दुर्बल धारणायें बनाए बैठा है। लोगों की यह मान्यता है कि स्त्री शिक्षा से अनर्थ अनाचार और उपद्रव खड़े होते हैं और पढ़ी-लिखी स्त्रियों से संचालन, सन्तान पालन, भोजन व्यवस्था व पुरुषों की देख रेख नहीं हो पाती। इस प्रकार की आशंका प्रकट करने वाले व्यक्तियों का ध्यान हम संसार के प्रगतिशील देशों की ओर ले जाना चाहते हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्राँस, आस्ट्रेलिया, रूस, जापान, देशों की उन्नति का अधिकाँश श्रेय वहाँ की नारी शिक्षा को ही है। क्या कोई कह सकता है कि उनके बच्चों का लालन पालन ठीक प्रकार नहीं होता? क्या वहाँ के पुरुषों की प्रगति रुकी है?
सच बात तो यह है बौद्धिक विकास के अभाव में हमारी मातायें न तो ठीक प्रकार बच्चों का लालन-पालन कर पाती हैं न पतियों की समुचित व्यवस्था। घर के कामों में कोई भी फूहड़पन देखा जा सकता है। पर्दे के अन्दर घुटती हुई नारियों को यह भी पता नहीं होता कि मानव-जीवन की समस्यायें क्या हैं? और उन्हें किस प्रकार सुलझाया जा सकता है? अशिक्षित पति-पत्नी तो किसी प्रकार रोते झींकते गृहस्थ की गाड़ी धकेलते रहते हैं।
एक अशान्ति एवं अतृप्ति आज हर सद्गृहस्थ अनुभव कर रहा है। किसी को भी पारिवारिक-जीवन में सुख व चैन नहीं मिल पा रहा है। इसका एक ही कारण है कि हमारी बेटियों को खुले वातावरण में रहकर बौद्धिक विकास नहीं करने दिया जाता। कुँए के मेंढक की तरह बेचारी जेवर, कपड़ों, चूल्हे-चौके तक ही सीमित रह जाती है। दुर्भाग्य से यदि किसी को वैधव्य मिल गया तब तो उसकी यन्त्रणाओं की सीमा ही टूट जाती है। अपने हाथों कमाकर खा सकने जितनी शक्ति भी नहीं रहने दी, इस अभागिन अशिक्षा ने। फिर भी हम हैं जो इस आवश्यकता को समझ नहीं पा रहे और स्त्री-शिक्षा से मुँह छिपाये बैठे हैं।
स्त्रियाँ अपने आवश्यक कर्तव्यों का पालन करते हुए भी अपनी रुचि, इच्छा-शक्ति और सुविधानुसार साहित्य, संगीत गृह-कला और कला-कौशल का ज्ञान प्राप्त करके गृहस्थ-जीवन को समुन्नत बना सकती हैं। मानसिक और नैतिक शक्ति के विकास से मनुष्य-जीवन को सफल बनाने में अपना अमूल्य सहयोग दे सकती हैं। जिस स्त्री को बौद्धिक विकास करने का अवकाश न मिला हो उसके व्यवहार में कभी सरसता न आ सकेगी। हम जिस अभिव्यक्ति की उनसे कामना करते हैं यह शिक्षा की कमी के कारण वे दे नहीं पायेंगी और गृहस्थ-जीवन शुष्क नीरस एवं निष्प्राण ही बना रहेगा।
यह सरसता प्राप्त करने के लिए और स्त्रियों को अपना दायित्व कुशलतापूर्वक निभाते रहने देने के लिए उनको स्वावलम्बी बनाना आवश्यक है। अशिक्षा के कारण वे गृहस्थी की उन्नति न कर पायेंगी। केवल कठपुतली की भाँति पुरुष की दासी बनी हुई दासी जैसे कर्तव्यों का ही निर्वाह कर सकती हैं। जिस स्नेह प्रेम, आत्मीयता सरसता की उससे अपेक्षा की गई थी उसे वह बेचारी कहाँ से दे पायेगी।
भारतीय संस्कृति का संगठन ऋषियों ने इस प्रकार किया है कि इसमें स्त्री शिक्षा से किञ्चित मात्र हानि की आशंका नहीं। यदि पुरुष अपना कर्तव्य उचित रीति से चलाते रहें तो जिस स्त्री शिक्षा को स्वच्छन्द बनाने वाली या ऑफिसों की ओर दौड़ने वाली अर्थकारी विद्या मानते हैं वह वैसी सचमुच में सिद्ध न हो।
जो शिक्षा पुरुष में मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक गुणों का प्रकाश करती है उससे स्त्रियों के भी मन और हृदय उन्नत और विशाल बनते हैं। इससे वह पुरुष को विवेकवान बनाती है। उसकी महानता बढ़ाकर पुरुषार्थ जगाती है। गृह व्यवस्था, सन्तान पालन का कार्य और भी बुद्धिमत्तापूर्ण चला पाने की क्षमता उसे मिलती है, जिससे सुख सन्तोष और शान्ति की परिस्थितियाँ बढ़ती हैं। शिक्षित नारियाँ हर प्रकार पुरुषों को सहयोग दे सकती हैं।
गृहस्थ-जीवन की दुर्दशा सुधारने के लिये स्त्री को, शिक्षित बनाने में तनिक भी देर नहीं की जानी चाहिये, यद्यपि एक लंबी पराधीनता के बाद आज हमारी संस्कृति में नयी चेतना का सञ्चार हुआ है। यह प्रसन्नता की ही बात है कि अब लोग जीवन के प्रत्येक पहलू पर सही सोचने लगे हैं। अब नारी-शिक्षा की भ्रान्त धारणाओं का अन्त हो चला है और इसे सामाजिक-शक्ति का आधार माना जाने लगा है। जातीय जीवन के जीर्णोद्धार के लिए हमें स्त्री शिक्षा के शुभ-कार्य को पूर्ण उत्साह लगन व तत्परता के साथ आगे बढ़ाना चाहिए। हमारे सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन में सुख और शान्ति की हरियाली इसी प्रयत्न के आधार पर लहलहाती दिखाई पड़ने लगेगी।
हिन्दी आज जिस परिष्कृत रूप में बोली और लिखी जाती है उसका बहुत कुछ श्रेय श्री महावीर प्रसाद द्विवेदी को है। उनके समय से पूर्व हिन्दी का प्रचलन तो हो चला था और कई मनीषी गद्य और पद्य द्वारा उसे सुविकसित करने के लिए प्रयत्न भी कर रहे थे, पर जिन्होंने भारत की भावी राष्ट्रभाषा को सर्वांगपूर्ण बनाने के लिए अपना जीवन ही खपा दिया हो ऐसे मनीषी उस समय तक ढूँढ़े नहीं मिल रहे थे।
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी युगदृष्टा थे। वे जानते थे कि कोई देश एक राष्ट्र भाषा के बिना न तो भावनात्मक एकता प्राप्त कर सकता है और न शिक्षा तथा संस्कृति की दृष्टि से सुसम्पन्न ही बन सकता है। उन दिनों भारत की अनेक भाषाओं की तरह हिन्दी भी एक भाषा थी, उसमें राष्ट्रीय भाषा के उपयुक्त प्रखरता उत्पन्न न हो पाई थी। इस कमी को पूरा करना आवश्यक था। राजनैतिक स्वतन्त्रता उन दिनों नहीं थी, अँग्रेजी शासन अपना पंजा मजबूती के साथ जमाये हुए था। पर आशा की ऊषा अपना आभास प्रकट करने लगी थी और यह बात दिन-दिन स्पष्ट होती जा रही थी कि भारत आज नहीं तो कल राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करेगा। तब सबसे पहली आवश्यकता एक समृद्ध राष्ट्रभाषा की पड़ेगी, यह गुण केवल हिन्दी में था। पर उसके प्रखरता प्राप्त करने में अभी लम्बी मंजिल पार करनी थी। द्विवेदी जी राष्ट्र की इस महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए एक चतुर शिल्पी तरह की लगे और आजीवन उसी व्रत को पूरा करने में एक कर्मठ आदर्शवादी की तरह अविचल श्रद्धा और परिपूर्ण उत्साह के साथ संलग्न रहे।
उत्तर प्रदेश में राय बरेली जिले के दौलतपुर ग्राम में वे संवत् 1961 में जन्मे। उनके पिता दस रुपया मासिक की एक छोटी नौकरी करते थे। पढ़ने का कोई ठीक प्रबन्ध गाँव में न था। आटा, दाल पीठ पर लाद कर दूर के जिन गाँवों में स्कूल थे वहाँ पढ़ने जाते । 13 वर्ष की आयु में रोटी बनाना सीख न पाये थे सो पकती दाल में आटे की टिकिया पकाकर उससे भूख शाँत करते, और शिक्षा की साधना में लगे रहते। इस प्रकार पुरवा, फतेहपुर, उन्नाद के स्कूलों में उन्होंने चार वर्ष काटे । घर की आर्थिक दुरवस्था ने आगे पढ़ने की सम्भावना नष्ट कर दी। स्कूली शिक्षा यहीं समाप्त हो गई।
गुजारे के लिए उन्हें नौकरी करनी पड़ी । रेलवे में उन्हें जगह मिल गई । अपने परिश्रम और अध्यवसाय से उन्होंने अपनी योग्यता बढ़ाई । प्रतिभा के साथ-साथ उनका वेतन और पद भी बढ़ता गया। सिगनेलर, टिकट बाबू, मालबाबू, स्टेशन मास्टर, प्लेटियर, टेलीग्राम इन्सपेक्टर, चीफ क्लर्क ये छोटे बड़े पदों पर उन्होंने संवत् 1903 तक काम किया। इस अवधि में उनका अन्तःकरण यही कहता रहा कि उन्हें पेट भरने मात्र से सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिए। समाज के लिए कुछ रचनात्मक काम किए बिना कोई प्रगतिशील आत्मा सन्तुष्ट नहीं हो सकती। उनकी आत्मा इस प्रकार दिन काटने के विरुद्ध विद्रोह करती रही और उस अन्तर्द्वन्द्व ने एक दिन उन्हें नौकरी छोड़कर रचनात्मक काम करने के लिये विवश कर दिया।
आठ घण्टे नौकरी ओर आहार निद्रा आदि नित्य कर्म के दस घण्टे निकल कर 6 घण्टे आसानी से बच जाते हैं। बुद्धिमान लोग उस समय का ठीक उपयोग करते और अपनी विशेषताओं को बढ़ाते रहते हैं। आलसी और प्रमादी उसे बर्बाद करके जहाँ के तहाँ पड़े दिन गुजारते रहते हैं। द्विवेदी जी न तो आलसी थे और न प्रमादी । उन्होंने बुद्धिमानों की तरह अपना जीवन क्रम बनाए रक्खा। बचे हुए समय में साहित्य साधना करते रहे। उन्होंने विशाल ज्ञान राशि इकट्ठी कर ली। नौकरी के दिनों में ही उनकी संचित साहित्यिक विद्वता का परिचय लोगों को मिलने लगा था रेलवे की नौकरी छोड़ने पर उन्हें नया काम मिलने में देर न लगी। मातृ-भाषा की सेवा करना चाहते थे। हर सच्चे मन से चाहने वाले की तरह उन्हें भी उनका अभीष्ट माध्यम मिल गया। वे इलाहाबाद की सुप्रसिद्ध मासिक पत्रिका ‘सरस्वती’ का सम्पादन करने लगे।
सरस्वती के सम्पादन कार्य में उन्हें हर महीने 20) वेतन और 3) डाक खर्च कुल 23) मिलते थे। रेलवे की नौकरी में उन्हें ऊँचा वेतन मिलता था। आमदनी एक दम घट जाने का उन्हें तनिक भी दुःख न हुआ। वे कहा करते मैंने रेलवे की नौकरी 15) मासिक से शुरू की थी। अब तो 23) अर्थात् ड्योढ़े मिलते हैं। मुझ जैसे मितव्ययी देहाती के लिए यह भी क्या कम है।
अधिक आमदनी और अधिक खर्च के कुचक्र में फँसे हुए लोगों के पास न तो महान कार्यों के उपयुक्त समय रहता है और न मन। उन्हें इसी गोरखधन्धे को सुलझाने से फुरसत नहीं मिलती, फिर कोई बड़ा काम वे कर ही कहाँ से पावें? आवश्यकताएँ घटा कर ब्राह्मण जीवन जीने वाला व्यक्ति ही आदर्शवाद के लिए कुछ ठोस कदम उठा सकने में समर्थ हो सकता है। द्विवेदी जी बड़े थे, बड़ा काम करना चाहते थे, इसलिए उन्हें बड़प्पन की कसौटी पर खरा भी उतरना ही था, व्यक्तिगत जीवन में संयम और सादगी अपनाते हुए बची हुई शक्तियों को लोकहित में समर्पित करना यही तो किसी श्रेष्ठ पुरुष की जीवन पद्धति हो सकती है। प्राचीन काल के ऋषियों की तरह प्रसन्नता-पूर्वक उन्होंने इस आदर्श को शिरोधार्य किया और गरीबी का जीवन बिताते हुए लोक मंगल के लिए सच्ची तपश्चर्या करने में लग गए। कमण्डल त्रिपुण्ड भले ही उन्होंने धारण न किया हो पर जिस निस्पृहता का जीवन वे जी रहे थे उसे देखते हुए उन्हें त्यागी ही कहा जा सकता है। उपलों की आग जलाकर वे तथाकथित तपस्या भले ही न करते हों, पर राष्ट्र-भाषा का भविष्य उज्ज्वल करने के लिए जिस निष्ठा के साथ वे तत्पर हो रहे थे उसे देखते हुए उन्हें तपस्वी कहने में कोई अत्युक्ति न मानी जायगी।
अन्य सम्पादकों की तरह इधर-उधर के लेखों को छाँटकर अखबार के पन्ने भर देने की बेगार टाल देने वाले द्विवेदी जी न थे। पत्रिका में छपने के लिए आये हुए लेखों के एक-एक शब्द को वे ध्यानपूर्वक देखते और अपने हाथों उसे दुबारा लिखते। इस प्रकार उनकी लेखनी की खराद पर चढ़कर निखरा हुआ प्रत्येक लेख भाषा और भाव की दृष्टि से राष्ट्र-भाषा के गौरव के उपयुक्त ही बन जाता। सरस्वती में छपी प्रत्येक रचना, साहित्यिक दृष्टि से सब प्रकार खरी और परिष्कृत मानी जाती थी।
उन्होंने स्वयं बहुत कुछ किया है। दूसरों के लिखे को मनोचित और परिष्कृत किया है। साथ ही सबसे बड़ा काम यह किया है कि अगणित नवोदित लेखकों को मार्ग दर्शन एवं प्रोत्साहन देकर उन्हें नौसिखिये से आगे बढ़ते हुए महान साहित्यकार बनाया। पारस को छूकर लोहा सोना बनता है पर द्विवेदी जी ऐसे पारस थे कि उनके संपर्क में जो आया वह भी पारस बन गया। पदुमलाल पुन्नालन बक्शी ने अपनी पुस्तक विश्व साहित्य में लिखा है—यदि कोई मुझसे पूछे कि द्विवेदी जी ने क्या किया, तो मैं उसे समग्र आधुनिक साहित्य दिखलाकर कह सकता हूँ कि यह सब उन्हीं की सेवा का फल है। कुछ लेखक ऐसे होते हैं जिनकी रचना पर ही उनकी महत्ता निर्भर है। कुछ ऐसे होते हैं जिनकी महत्ता उनकी रचनाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है। द्विवेदी जी की साहित्य सेवा उनकी रचनाओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। उनके व्यक्तित्व का प्रभाव समग्र साहित्य पर पड़ा है। मेघ की तरह विश्व से ज्ञान राशि संचित करके और उसकी वर्षा करके उन्होंने समग्र साहित्योद्यान को हरा भरा कर दिया। वर्तमान साहित्य उन्हीं की साधना का सुफल है।”
उन्होंने लगातार अठारह वर्ष तक सरस्वती का सम्पादन किया। अवकाश ग्रहण करने के बाद भी वे सात-आठ वर्षों तक नियमित रूप से लेखन-कार्य करते रहे। अपनी निज की रचनायें लिखने की अपेक्षा उनका प्रधान कार्य दूसरों की कृतियों को परिष्कृत कर उन्हें उपेक्षित से उत्कृष्ट बनाना रहता था। रद्दी में डाले जा सकने वाले लेखों को अपनी कलम से दुबारा लिखकर उन्हें साहित्य में ऊँचा स्थान मिलने योग्य बनाया करते और उनके लेखकों को व्यावहारिक रूप से यह बताया करते थे कि उनसे कहाँ भूल हुई, क्या कमी रही, ओर किन बातों का समावेश आवश्यक था। इस प्रकार वे बिना विद्यालय खोले हुए भी ‘सरस्वती’ के दफ्तर में बैठ कर सहस्रों नव-युवकों को राष्ट्र के भावी साहित्य निर्माता बनाने में लगे रहे। उनकी यह देन इतनी बड़ी है कि भारत का साहित्य जगत उसे कभी भी भुला न सकेगा।
उनकी सेवाओं के प्रति अपनी अगाध श्रद्धा को भी संस्थाओं के माध्यम से जनता ने समय-समय पर प्रकट किया गया है। काशी नागरी प्रचारणी सभा ने उन्हें हिन्दी के सर्वप्रथम ‘आचार्य’ की उपाधि से विभूषित किया। और इसके दो वर्ष बाद ही उन्हें अपूर्व ‘द्विवेदी अभिनन्दन ग्रंथ’ भेंट किया गया सन् 1933 में डॉ. गंगानाथ की अध्यक्षता में प्रयाग में ‘द्विवेदी मेला’ का आयोजन हुआ। उनके कर्त्तव्य और व्यक्तित्व पर “महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनका युग“ शीर्षक थीसिस लिखकर डॉ. उदयभानसिंहजी ने पी. एच. डी. प्राप्त की। संक्षिप्त में यों भी कहा जा सकता है कि द्विवेदी जी के समान सम्मान भारत के और किसी साहित्यकार का अभी तक नहीं हुआ। गद्य लेखकों की तरह ही उन्होंने पद्य रचयिता कवियों का भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन किया यों वे कवियों में गिने नहीं जाते पर कविताओं के संशोधन में उनकी क्षमता गद्य संशोधन से किसी प्रकार कम न थी। उन्होंने अनेक कवियों को रचनात्मक कवितायें लिखने के लिए प्रबल प्रेरणा दी। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की ‘भारत-भारती’ उन्हीं की प्रेरणा का फल है।
मध्य-युग की परम्परा का अनुसरण करते हुये उन दिनों भी श्रंगारी कविताओं और कवियों का बाहुल्य था ऐसे लोगों का वे सदा निरुत्साहित करते रहे और उस प्रवृत्ति को राष्ट्र-निर्माण के लिये अनुपयुक्त बताकर उससे दूर रहने की शिक्षा देते रहे। उन्होंने इन कवियों से पूछा है “चींटी से लेकर हाथी पर्यन्त पशु, भिक्षुक से लेकर राजा तक मनुष्य, बिन्दु से लेकर समुद्र पर्यन्त, अनन्त आकाश, अनन्त पृथ्वी, अनन्त पर्वत सभी पर कवितायें हो सकती हैं। सभी से उपदेश मिल सकता है। फिर क्या कारण है कि इन विषयों को छोड़कर कोई कवि स्त्रियों की चेष्टाओं का वर्णन करना ही कविता समझे?”
प्रश्न मार्मिक है। जिनने निम्न स्तर की मलीन प्रवृत्तियों को ही कुरेदने को ‘कला’ नहीं समझा है उन्हें उपरोक्त प्रश्न के उत्तर में अपनी कविताओं को रचनात्मक दिशा निर्धारित करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता।
राष्ट्र-भाषा के अमर शिल्पी—द्विवेदी जी ने—21 दिसम्बर 1639 को महाप्रयाण किया पर उनकी श्रद्धा और तत्परता त्याग और तपस्या ने हिन्दी साहित्य का जो गौरव बढ़ाया उसे देखते हुए उन्हें अजर-अमर ही माना जाता रहेगा।
काँग्रेस कार्यकारिणी की मीटिंग में सम्मिलित होने, एक बार गाँधीजी इलाहाबाद आये और पं0 मोती लाल नेहरू के यहाँ आनन्द भवन में ठहरे। सवेरे नित्य कर्म से निवृत्त होकर गाँधीजी हाथ मुँह धो रहे थे और जवाहरलाल नेहरू पास खड़े कुछ बातें कर रहे थे। कुल्ला करने के लिए गाँधीजी जितना पानी लिया करते थे वह समाप्त हो गया तो उन्हें दूसरी बार फिर पानी लेना पड़ा।
इस पर गाँधीजी बड़े खिन्न हुए और बात चीत का सिलसिला टूट गया। जवाहरलालजी ने इसका कारण पूछा तो उन्होंने कहा—ध्यान न रहने से मैंने पहला पानी अनावश्यक रूप से खर्च कर दिया और अब मुझे दुबारा फिर लेना पड़ रहा है। यह मेरा प्रमाद है।
पं0 नेहरू हंसे और कहा—यहाँ तो गंगा-जमुना दोनों बहती हैं। रेगिस्तान की तरह पानी कम थोड़े ही है आप थोड़ा अधिक पानी खर्च कर लें तो क्या चिन्ता की बात है।
गाँधी जी ने कहा—गंगा-जमुना मेरे लिए ही तो नहीं बहतीं। प्रकृति में कोई चीज कितनी ही उपलब्ध हो, मनुष्य को उसमें से उतना ही खर्च करना चाहिए जितना उसके लिए अनिवार्यतः आवश्यक हो। ऐसा न करने से दूसरों के लिए कमी पड़ेगी और वह प्रकृति की एक चोरी मानी जायगी।
घर बच्चे की प्रारंभिक पाठशाला है जहाँ वह जीवन के महत्वपूर्ण पाठ सीखता है। स्कूल, कालेज, विद्यालयों में तो बालक का बौद्धिक विकास ही होता है, एक निश्चित पाठ्य-क्रम पूरा कर देना ही उसका ध्येय होता है जिसका जीवन में सीमित उपयोग है, लेकिन घर की पाठशाला में सीखी हुई बातें तो बालक के जीवन का अंग ही बन जाती हैं। वस्तुतः बालक के चरित्र, स्वभाव, उसके व्यक्तित्व की निर्णयशाला है घर, जब कि शिक्षालयों में एक स्तर तक बौद्धिक विकास ही हो पाता है।
जिस तरह अनुकूल जलवायु मिट्टी एवं योग्य माली की देख−रेख में छोटा-सा पौधा बड़ा होकर फलने फूलने लगता है उसी तरह घर के उपयुक्त वातावरण में कुशल माँ-बाप के सान्निध्य में रहकर बालक का स्वभाव और उसका व्यक्तित्व, चरित्र उत्कृष्ट बनता है। लेकिन घर के गन्दे वातावरण, माँ-बाप का पापमय जीवन बच्चे को बुराइयों की ओर प्रेरित करता है। घर के वातावरण में घटने वाली सामान्य घटनाएँ अभिभावकों के व्यवहार, रहन-सहन, आचरणों का बच्चे के मानस-पटल पर बड़ा स्थायी प्रभाव पड़ता है।
जिस घर का वातावरण बड़ा सौम्य, शान्त और मधुर होता है, जहाँ लोगों के परस्पर प्रेम, सेवामय जीवन सद्भावनापूर्ण संबंध होंगे वहाँ बालक के मानसिक विकास में बड़ा योग मिलता है। जहाँ बच्चे को उन्मुक्त होकर सहज जीवन बिताने दिया जाता है, जहाँ उसे सबका स्नेह मिलता है, जहाँ बालक निर्भय-जीवन बिताता है, ऐसा वातावरण बालक के व्यक्तित्व का चतुर्मुखी विकास करने में बड़ा ही सहायक सिद्ध होता है।
लेकिन उस घर में जहाँ नित्य कलह, अशान्ति, परस्पर तनातनी, झगड़ा होता रहता है, जहाँ बालक को स्नेह शून्य सखा विहीन जीवन बिताना पड़ता है, और कठोर व्यवहार का सामना करना पड़ता है वहाँ उसका विकास होना तो दूर उल्टे मानसिक क्षमतायें, बौद्धिक प्रतिभा, व्यक्तित्व सब कुण्ठित हो जाते हैं।
जो माँ-बाप या अभिभावकगण परस्पर “तू तू” “ मैं मैं” करते रहते हैं जिनमें परस्पर आये दिन लड़ाई झगड़े मारपीट होती रहती है, जो एक दूसरे को मूर्ख एवं नीच सिद्ध करने के प्रयत्न करते रहते हैं, भद्दे आक्षेप करते हैं उनके इस व्यवहार का बालकों के कोमल मस्तिष्क पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। बच्चे का अपरिपक्व मस्तिष्क इस तरह के व्यवहार को समझ नहीं पाता। इससे उसके मन पर विपरीत प्रभाव पड़ता है, जिसके फलस्वरूप माँ-बाप अथवा घर के अन्य सदस्यों के प्रति उसके मन में आदर भाव कम हो जाता है। सम्मान की भावना घट जाने से बच्चों में अश्रद्धा भी पैदा हो जाती है। श्रद्धा के बिना विश्वास स्थिर नहीं रहता। अश्रद्धालु और विश्वास रहित ये बच्चे माँ-बाप की अवहेलना करने लगते हैं अनुशासनहीन बन जाते हैं। यह स्थिति परिवार तक ही सीमित नहीं रहती वरन् सम्पूर्ण समाज की मर्यादाओं के प्रति ही ये बालक आगे चलकर आवारा और उच्छृंखल बन जाते हैं।
घर का कलह, परिवार के सदस्यों का परस्पर दुर्व्यवहार, बच्चों में अश्रद्धा, अविश्वास, अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता आदि बुराइयों को जन्म देता है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि पति-पत्नी के बीच होने वाली तकरार अथवा परिवार में होने वाला कलह सर्वथा दूर करने का प्रयास किया जाय। यदि कुछ इस तरह की बात हो भी जाय तो बच्चों के सामने उसे न आने दें। जिस तरह किसी मेहमान के सामने अपने घर की लड़ाई को छिपा लिया जाता है उसी तरह बच्चों के समक्ष भी ऐसा ही करना चाहिए। अपने घर के कलह की बात तो दूर रिश्तेदार अथवा पड़ौसियों के झगड़े की बात को बच्चों तक नहीं आने देना चाहिए।
अभिभावकों को चाहिये कि बच्चों के समक्ष अपनी कोई चारित्रिक कमजोरी प्रकट न होने दे। बच्चा कितना ही अबोध क्यों न हो उसके समक्ष परस्पर प्रेम प्रदर्शन, अश्लील हाव-भाव अथवा गलत आचरण कभी न किया जाय। बच्चों की मनोभूमि इतनी ग्रहणशील होती है कि जाने अनजाने वह इनको सहज ही अपना लेती है। जहाँ तक बने दुर्व्यसनों को तिलाञ्जलि दे देनी चाहिये, फिर भी कोई बुराई न छूटे तो इतना तो ध्यान रखाना चाहिये कि बच्चों के समक्ष उसे व्यक्त न होने दें। बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू आदि कोई भी व्यसन एकान्त में पूरा किया जाय बच्चों के समक्ष नहीं।
बच्चों के समझदार और कुछ बड़े हो जाने पर उनके लिए सोने की व्यवस्था अलग कर देनी चाहिए। समझदार बच्चों को एक ही कमरे में लेकर न सोया जाय। क्योंकि पति-पत्नी के गुह्य संबंधों का बच्चे पर बुरा असर पड़ता है। इसके साथ-साथ बच्चों को नंगा नहीं रखना चाहिए। इससे असमय में ही बच्चों में यौन-भावनायें जाग्रत हो सकती हैं जो उन्हें कई बुराइयों की ओर प्रवृत्त कर देती हैं।
अभिभावकों माता-पिताओं को चाहिए कि बच्चों की विधिवत् दिनचर्या बनाकर उसके अनुसार उन्हें चलाने की व्यवस्था करें। बच्चों के खाने पीने, सोने, पढ़ने, खेलने आदि का समय नियम कर देना चाहिए। लेकिन इसके साथ-ही अभिभावकों का स्वयं का जीवन भी व्यवस्थित, नियमित होना चाहिए। उनका आदर्श ही बच्चों को नियमित जीवन बिताने के लिये प्रेरणादायी होगा। बच्चे अपने नियमित कार्यक्रम में गफलत करें तो उसे टोककर नियमानुसार जीवन बिताने को कहना चाहिए। लेकिन सोने के समय पढ़ने अथवा खेलने के समय घर का काम करने की आज्ञा देने की भूल नहीं करनी चाहिये। बच्चे को उसकी नियम, व्यवस्था के अनुसार चलने देना चाहिए। यदि कोई आवश्यक काम ही आ पड़े तो बात दूसरी है अन्यथा बच्चों के कार्य-क्रम में यथासंभव व्यवधान पैदा नहीं करना चाहिए।
किसी तरह के भय, अन्धविश्वास या गलत धारणा का आश्रय लेकर बच्चों को निर्देश नहीं देना चाहिए भले ही वह उनके हित में ही क्यों न हों। भूत, चुड़ैल, कीड़े, मकोड़े या हौवा आदि का भय बच्चों को नहीं दिखाना चाहिये। बचपन में जमी हुई भय की भावना जीवन भर नहीं निकल पाती है। बचपन के समय अवचेतन मन में समाया हुआ इस तरह का भय तगड़े तन्दुरुस्त, मोटे-ताजे व्यक्तियों को भी अन्धेरे में, एकान्त में, कोई छोटा-मोटा जानवर देख लेने पर परेशान करता है। स्वयं अभिभावकों को भी इस तरह के भय प्रदर्शन से बच्चों के समक्ष बचना चाहिए।
माता-पिता या अभिभावकों की भावनाओं का, उनके व्यवहार का भी बच्चों के जीवन पर बहुत बड़ा असर पड़ता है। वस्तुतः घर की पाठशाला में अभिभावकों का जीवन ही बच्चों की प्रथम पुस्तक होती है। बच्चों के साथ ही नहीं, माँ बाप दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं इसका बाल मन पर भारी प्रभाव पड़ता है। इस संबंध में एक घटना बड़ी महत्वपूर्ण है। एक धनिक व्यक्ति लेन देन के मामले में एक गरीब व्यक्ति को बड़ी गालियाँ दे रहा था, उसने उसे नौकरों से पिटवाया और धक्के देकर बाहर निकाल दिया, उसका गिरवी रखा हुआ जेवर धनिक ने हड़प लिया। गरीब बेचारा रोता चिल्लाता चला गया। यह सारी घटना पास ही खड़ा धनिक का पुत्र देख रहा था। बालक का बाल हृदय यह सब सहन नहीं कर सका और अपने पिता के प्रति उसके हृदय में कटुता और घृणा की भावना पैदा हो गई। वह विद्रोही बन गया। बाप का कहना सुनना उसे बुरा लगता। ऐसे काम वह करता जिससे धनी पिता को क्लेश होता, पिता की परेशानी से उसे प्रसन्नता होती। अन्त में परिस्थिति यहाँ तक आ गई कि बड़ा
सजातो भूतान्य व्यैख्यत् किमिहा-
न्यं वावदिषदिति स एतमेव
पुरुषं ब्रह्म ततमम पश्यत् इदम्
मदर्शमिति। 3।
ऐतरेयोपनिषद् 1। 3। 13
जीवन ने मनुष्य रूप में जन्म लेकर इस समस्त विश्व को चारों ओर से देखा और कहा—यह विश्व ही सर्वव्यापी ब्रह्म है। अहो! अत्यन्त प्रसन्नता और आश्चर्य की बात है कि मैंने इस परब्रह्म को आँखों से देख लिया।
होने पर उसने सारे धन पर कब्जा कर लिया और पिता को बीमारी में तड़पकर प्राण छोड़ने पड़े लेकिन उसके हृदय पर कोई प्रभाव नहीं हुआ।
उस बहू की कहावत प्रसिद्ध है जो अपने अन्धे श्वसुर को मिट्टी के पात्र में भोजन देती थी। एक दिन मिट्टी का पात्र फूट गया तो बहू बहुत झल्लाई कई गालियाँ दीं। उसने लकड़ी का पात्र मँगवा दिया और चौके से बाहर भोजन दे दिया। उसका अबोध बालक यह सब देख रहा था। दूसरे दिन ही बालक एक लकड़ी के तख्ते को पत्थर से ठोक पीट रहा था। माँ ने पूछा बेटा क्या कर रहा है? बालक ने अपनी बालसुलभ भाषा में कहा—”अम्मा मैं लकड़ी की थाली बना रहा हूँ। जब तू बूढ़ी हो जायेगी तो इसी में भोजन परसा करूंगा। वह स्त्री हक्की-बक्की रह गई और उसे दिन से वृद्ध श्वसुर को अच्छे पात्रों में आदर सहित भोजन देने लगी।
माता-पिता द्वारा नौकर, पड़ौसी, संबंधी, दुकानदार, जन-साधारण से किया जाने वाला व्यवहार बच्चे के कोमल मस्तिष्क पर बहुत बड़ा प्रभाव डालता है। आवश्यकता इस बात की है कि हमें अपने सम्पूर्ण जीवनक्रम में, व्यवहार में पर्याप्त सुधार करना होगा। कोई ऐसा दुर्व्यवहार न बन पड़े जिससे बच्चे पर विपरीत असर पड़े, इसका पूरा-पूरा ध्यान रखना होगा, यदि हमें अपने बच्चों के चरित्र स्वभाव व्यक्तित्व को उत्तम बनाना है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि बच्चे पैदा होने पर माँ-बाप के ऊपर एक बहुत बड़ी जिम्मेदार आ जाती है, वह है बच्चों को उत्कृष्ट व्यक्तित्व प्रदान करना, उनके स्वभाव और चरित्र को उत्तम बनाना और वह सब घर की पाठशाला में व्यवहारिक शिक्षा से ही सम्भव है।
बहुत से माता-पिता अपने बच्चे को किसी बोर्डिंग हाउस या अपने से दूर किसी प्रसिद्ध स्कूल में भेजते हैं इसलिए कि बच्चा घर पर भली प्रकार नहीं पढ़ता। समय पर स्कूल नहीं पहुँचता। अपनी पढ़ने की पुस्तकें तथा अन्य वस्तुयें खो देता है। आवारा लड़कों में घूमता है। घर वालों की आज्ञा का पालन नहीं करता। कई लोग तो बच्चे के हित की दृष्टि से नहीं वरन् उससे पीछा छुड़ाने, उसकी आदतों से परेशान होकर अपना सर-दर्द दूर करने की दृष्टि से बालक को अन्यत्र भेज देते हैं। कई अभिभावक अपने पास अधिक धन होने के कारण बच्चे को बहुत छोटी उम्र में ही अपने से दूर पढ़ने और योग्य बनने के लिए भेज देते हैं। कुछ भी कारण हों लेकिन बच्चों को कच्ची उम्र में जब तक वह समझने-बूझने लायक नहीं हो पाता है अपनी छत्रछाया से दूर करना अभिभावकों की बड़ी भारी भूल है। किसी भी संस्था स्कूल, विद्यालय बोर्डिंग आदि में बच्चों के पढ़ने लिखने, नियमित जीवन बिताने तथा सदाचार की बाह्य शिक्षा व्यवस्था भले ही हो किन्तु उन्हें उत्कृष्ट व्यक्तित्व प्रदान करने, सफल जीवन बिताने का मार्ग प्रशस्त करने के लिए माता-पिता अभिभावकगण जो कुछ कर सकते हैं वह कहीं भी नहीं हो सकता। सचमुच अपने परिवार के सदस्यों से अधिक बच्चों के भविष्य की चिन्ता और उस दिशा में आवश्यक प्रयत्न अन्य कोई भी नहीं कर सकता अतः यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि बच्चे को एक निश्चित आयु तक, जब तक उसका मस्तिष्क, प्रौढ़ और परिपक्व न हो जाय, घर की सीमा से बाहर नहीं भेजना चाहिए।
बच्चों के जीवन को उत्कृष्ट बनाने की जिम्मेदारी जिस तरह माता-पिता निभा सकते हैं उससे अधिक दूसरा नहीं निभा सकता। इसके अतिरिक्त बाह्य वातावरण में बच्चे को भले ही कितनी ही अच्छी शिक्षा क्यों न मिले वह मौखिक होने से अस्थायी होती है। स्थायी और सच्ची शिक्षा तो बच्चा अभिभावकों के संरक्षण में, उनके व्यावहारिक जीवन में ही सीख पाता है। वैसे स्कूल, बोर्डिंग, शिक्षा, संस्थायें उपयोगी होती हैं किन्तु बच्चों के जीवन निर्माण का पूरा-पूरा उत्तरदायित्व इन पर नहीं छोड़ा जा सकता। वस्तुतः बच्चों के चरित्र निर्माण में माता-पिता के स्नेह से युक्त शान्त सुखदायी घरेलू वातावरण का बहुत बड़ा महत्व है।
यह कहीं अवश्य लिखा होगा कि माता का सदाचार कभी न कभी बालकों पर जरूर आता है, साथ ही वह भी लिखा होगा कि पिता के पाप भी बालकों पर आते हैं।
-डिकेन्स
स्वास्थ्य में खराबी का प्रमुख कारण आमाशय में दूषित मल का ढेर जमा हो जाना है। आहार के असंयम और पेट की आवश्यक सफाई के अभाव में आँतों में काफी बड़ी मात्रा में सञ्चित मले एकत्रित हो जाता है। इससे पाचन क्रिया शिथिल पड़ जाती है। दूसरे यही मल-विकार शरीर के दूसरे अंगों में चला जाता है तो किसी न किसी रोग के रूप में फूट निकलता है। चाहे पाचन प्रणाली की कमजोरी हो अथवा दूसरा रोग, स्वास्थ्य की खराबी का पहला कारण पेट की खराबी या पेट में दूषितमल का इकट्ठा हो जाना ही है।
“दि न्यू हाइजिन” में विद्वान लेखक जे. डब्ल्यू विल्सन ने अपनी पुस्तक में एक दृष्टान्त प्रस्तुत किया है, इससे कोष्ठबद्धता या आँतों में मल जमा हो जाने का सही अनुमान हो जाता है।
पुस्तक में लिखा है “एक बार अमेरिका के डाक्टरों ने मलाधार में सञ्चित मल की अवस्था की पूर्ण तत्परता के साथ खोज की। इसके लिए उन्होंने पर्याप्त समय लगाकर 284 शवों की परीक्षा की। यह शव विभिन्न रोग के रोगियों के थे। डाक्टरों ने देखा कि इनमें से 256 शवों की बड़ी आँतें सड़े हुए मल से भरी हुई थीं। उनमें से कई का मलाधार मल से भरकर फूल जाने के कारण दुगुना तक हो गया था। कई शवों में यह मल इतना सूख गया था कि मलाधार के साथ चिपककर स्लेट के समान कठोर हो गया था। इससे किसी भी रोगी का मलत्याग स्थगित नहीं हुआ था यह बड़े आश्चर्य की बात है। इस सूखे हुए मल को तराशा गया तो उसके अन्दर छोटे बड़े कई प्रकार के रोगों के कीड़े पाये गए। कहीं-कहीं, इन कीटाणुओं के अण्डे भी मिले। कई जगह ऐसा हुआ था कि इन कीटाणुओं ने मल की दीवार पार कर ली थी और माँस में प्रवेश कर गये थे जिससे वहाँ घाव पड़ गये थे।”
यही कीटाणु जब उन घावों से होकर माँस या रुधिर-संचार के मार्ग में पहुँच जाते हैं तो वह सारे शरीर का दौरा करते हुए जहाँ अनुकूल स्थिति देखते हैं वहीं अपना अड्डा जमा लेते हैं। यह स्थल प्रायः शरीर के मर्म स्थल होते हैं जहाँ खून के जीवाणु बड़े हल्के होते हैं। इन जीवाणुओं को परास्त कर रोग के कीटाणु जहाँ अपना अड्डा जमा लेते हैं वहीं किसी बीमारी के लक्षण दिखाई देने लगते हैं।
जो नियमित रूप से मलत्याग करते रहते हैं उन्हें यह न समझ लेना चाहिए कि उनका पेट इन कीटाणुओं से अथवा इस सड़े मल से सुरक्षित है। डाक्टरों का मत है कि सामान्य अवस्था में भी तीन सेर से लेकर पाँच सेर तक यह संचित मल लोगों के पेट में होता है। जिसकी प्रायः सभी लोग उपेक्षा ही किया करते हैं।
इससे स्नायविक दुर्बलता तथा पेडू के विभिन्न रोग उठ खड़े होते हैं। मूत्राशय की सूजन तथा मधुमेह आदि का कारण यह कोष्ठबद्धता ही है। विषैले रक्त प्रवाह के कारण त्वचा और शरीर के दूसरे रोग भी इसी के कारण होते हैं। सर्दी, सन्धिवात, अकाल, वार्धक्य, मधुमेह, गठिया, दृष्टिहीनता, बहरापन, अन्त्रपुच्छ, बवासीर, प्रदाह अन्तड़ी का घाव, आँत के आँव की संयुक्त अवस्था, स्त्रियों में शीघ्र वृद्धापन—मासिक धर्म की गड़बड़ी, रजमष्ट और श्वेतप्रदर आदि की बीमारियाँ भी इसी कारण से होती हैं। वास्तव में रोग का कारण अनेक नहीं एक ही है। और वह यह संचित मल की सड़ाँद से उत्पन्न विजातीय पदार्थ है। स्थान, अवस्था और शारीरिक स्थिति के अनुसार ही वह अनेकों रूपों में परिलक्षित होता है। जैसे आटे से रोटी, पूड़ी, हलुवा आदि कई प्रकार के व्यंजन बना लेते हैं उसी प्रकार प्रत्येक अवस्था में रोग और स्वास्थ्य की खराबी का कारण भी यही कोष्ठबद्धता है।
स्थायी तौर पर इस बात का पता लगाने के लिए एक बार डाक्टरों ने 80 घण्टे तक एक व्यक्ति को टट्टी नहीं जाने दिया। फलस्वरूप उसका पेट फूलने लगा, सिरदर्द जी मिचलाना, चक्कर आना, निद्रा आदि के अनेक उपद्रव उठ खड़े हुए। बाद में डूस देकर जब उसका मल साफ किया गया तो उसे पुनः पहले जैसी स्वच्छ अवस्था प्राप्त हुई। विषैली प्रतिक्रिया मल संचय से होती है।
बाजार की औषधियों से भी जुलाब लेने पर यही हानि होती है। दवाओं का प्रभाव सीधे पाचक रसों और अम्लों पर पड़ता है जिससे पेट की सशक्तता मारी जाती है यहाँ तक कि कुछ दिनों के नियमित जुलाब लेने से फिर जुलाब भी एक आवश्यक कर्म बन जाता है अर्थात् स्वाभाविक तौर पर मलत्याग की क्रिया बहुत शिथिल पड़ जाती है।
कोष्ठबद्धता का सबसे सरल उपचार कटिस्नान है। किसी टब में पानी भर नाभि के नीचे और मोटी जाँघ का तक हिस्सा कुछ देर नियमित रूप से शीतल जल में रखने से सारे शरीर का खून आँतों की ओर खिंच जाता है जिससे आँतें सशक्त होती हैं और मल-त्याग की स्वाभाविक क्षमता प्राप्त कर लेती हैं। कई व्यक्तियों के पेडू में बड़ी गर्मी होती है। इससे मल में जो रस होता है वह पेडू सोख लेता है और मल सूखकर आँतों से चिपक जाता है। कटिस्नान से पेडू की गर्मी जल में चली जाती है और मल सरलतापूर्वक निकल जाने में आसानी हो जाती है। इसके लिये कटिस्नान करते समय पेट को दाँये से बाँये रगड़ते रहना चाहिये ताकि मल हलका होकर मलद्वार की ओर खिसक जाय। मूत्राशय, जरायु, कोष्ठ कठोरता, बवासीर आदि में यह स्नान बड़ा लाभदायक होता है।
पेट की सफाई का दूसरा साधन एनिमा है। दूसरी सभी क्रियाओं से एनिमा की क्रिया अधिक सरल है। मुँह से जो पानी पेट में पहुँचाया जाता है उसका सीधा प्रवाह होता है जिससे यह जल मल के बीच से होकर गुजर जाता है और बहुत ही थोड़े भाग को प्रभावित कर पाता है। किन्तु विपरीत दिशा से जल पहुँचाने से यह जल मल की गाँठों को काटता हुआ ऊपर को चढ़ता है। इससे सरलतापूर्वक मल आँतों को छोड़ देता है। कुछ दिन नियमित रूप से एनिमा का प्रयोग करने से पुराना बहुत दिन का जमा हुआ सूखा मल भी कोमल बनकर बाहर निकल जाता है। इससे आँतों को कटि-स्नान वाली शीतलता भी आसानी से प्राप्त हो जाने से दोहरा लाभ होता है। इस दृष्टि से एनिमा का उपयोग अधिक लाभदायक माना जाता है। इसमें पाचन रसों के क्षय की आशंका नहीं रहती।
एनिमा का प्रयोग करते समय दायें बाँये और उकड़ूं तीनों प्रकार से पेट में जल पहुँचाने से सभी तरफ का मल आँतों को छोड़ कर पानी के साथ मिलकर सुविधापूर्वक बाहर निकल जाता है। नींबू जैसी कोई क्षार-युक्त वस्तु मिलाने से इस क्रिया में और भी लाभ होता है।
प्राकृतिक तौर पर कोष्ठबद्धता निवारण और पेट की सफाई के लिये उपवास एक बड़ा ही महत्वपूर्ण साधन है। एक या दो उपवास, रहने से यह देखा जाता है कि मुख में थूक आना, जी मिचलाना, चक्कर अनिद्रा, मुँह से बाहर निकलने वाली साँस में बदबू आदि तीव्रता से उठने लगती है। इससे यह पता चलता है कि पेट की सारी पाचन प्रणाली उपवास के समय अपनी सफाई की क्रिया प्रारम्भ कर देती है। इससे जमी हुई गन्दगी उखड़ती है। यही दुर्गन्ध और सड़न ही मुँह, नाक थूक आदि के द्वारा बाहर निकलती है।
शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से उपवास का महत्व इसलिए अधिक है कि इससे मल स्वाभाविक तौर पर बाहर निकल जाता है और कुछ दिन के विश्राम से पाचन प्रणाली फिर से प्रचण्ड हो जाती है। इस शक्ति में इतनी नवीनता आ जाती है कि उपवास के बाद स्वास्थ्य का बड़ी शीघ्रता से सुधार होता है। किन्तु यह उपवास सदैव ही विवेकपूर्ण होने चाहिएं।
अपनी शारीरिक स्थिति के अनुसार ही लंबे या आँशिक उपवास लाभदायक होते हैं। उपवास-भंग के समय भी पर्याप्त सावधानी की आवश्यकता करनी पड़ती है। उतावली और जल्दबाजी से इसका अहितकर प्रभाव पड़ सकता है इसलिए उपवास के लिये सबसे पहले किसी जानकार व्यक्ति से पूरी सलाह लेकर ही इसका उपयोग करना अच्छा होता है। पर एक-दो दिन के सरल उपवास-एक पहर के आँशिक उपवासों का लाभ सभी लोग आसानी से प्राप्त कर सकते हैं।
सत्य के प्रहरी उठो, तारुण्य जागो!
परशुधर के नेत्र के आरुण्य जागो!
हर कलम पर दासता की जंग चढ़ती जा रही है,
हर किरन की ज्योति पल-पल मन्द पड़ती जा रही है।
सत्य का पावक रुपहली राझ ने फिर ढ़क लिया है,
और निर्भय चेतना को नीति ने कीलित किया है।
हर सबल व्यक्तित्व झुकता जा रहा है,
हर हठीला श्वाँस रुकता जा रहा है,
बिक रहा ईमान सुविधा की तराजू पर,
रह गई है आज प्रज्ञा क्रीतदासी भर।
गीत को सौंपा गया है काम केवल आरती का,
बस रिझान भर बचा है भाग केवल भारती का।
बीन पाँचाली कला की,
राजनीतिक हाट में परवश नचाई जा रही है,
और संस्कृति-किन्नरी है,
अर्थ के संकेत पर बेताल गाए जा रही है,
उठो मेरे राष्ट्र के अभिज्ञान जागो?
सुस्त भारत के अबोध विहान जागो?
मर रही है ज्योति, इसमें स्नेह डालो,
यह तुम्हारा दीप है इसको सम्हालो?
—प्रभुदयाल अग्निहोत्री
तुम उनके चरण धुलाओ, जो आगे जाते;
मैं तो उनका हूँ, जो पीछे रह गये आज।
तुम निरख-निरख अकाश-तारिकाएँ गिन लो;
मैं धूल-भरों से पूछूँ-”कैसे गिरी गाज?”
ऋषियों के चरण पखारो, तुम्हें सुहाता है;
मैं, धारा में गिर गए गीत, सो गाता हूँ।
तुम चन्दन, अक्षत, धूप, दीप, लेकर बैठो;
मैं बाढ़ों में, “बायें आओ” चिल्लाता हूँ।
तुम को प्रणाम, मैं कीचड़ में लथपथ-सा हूँ;
किसकी शय्या, संध्या तो आँख-मिचौनी है।
तुम होनी पर बलि हो जाने का रंग रचो;
मेरी होनी, मत कहो कि यह अनहोनी है।
—माखनलाल चतुर्वेदी
आज अपने कण्ठ के स्थर से न मोहो
गीतकारो! अग्नि अंगारे उगल दो
वादकों! संगीत के स्वर ताल तजकर
मातृ-भू रक्षार्थ, रणभेरी बजाओ
अब न भामाशाह! तुम थैली समेटो
मातृ-भू-हित आज निज कर्तव्य पालो
भगतसिंह आजाद, लक्ष्मी, शिवा, राणा, की
शपथ है तुमको—तिजोरी मत सम्हालो
शिक्षकों ! दो आज शिक्षा इस तरह की
देश का प्रत्येक नर राणा, शिवा हो
आज कौशिक! माँग लो अवधेश से सुत
असुर-बध करवा स्वयं का प्रण निबाहो
आज कौशल्या! सुतों को, देश के हित
दान कर दो, और निज कर्तव्य पालो
और बहनों! आज अपनी राखियों के
तार गिनकर भाइयों से मोल माँगो
जड़ कहाँ कब विनय कोई मानता है?
यज्ञ की कीमत-असुर कब जानता है?
अग्रजो! अनुनय विनय का अब न अवसर
लषन को आदेश दो-निज धनुष तानें
आज भारत का हरेक बालक भरत बन
दाँत की बनराज के गणना करेगा
दो बता ऐ बन्धुओं! तुम आज रिपु को
रिपु-दमन फिर सिंहनी का थन दुहेगा, ॥
—श्री सत्यदेव सिंह
आँदोलन का द्वितीय वर्ष और हमारे उत्तरदायित्व
गत 24 जुलाई (गुरु पूर्णिमा) से युग-निर्माण आँदोलन का प्रथम वर्ष पूरा होकर द्वितीय वर्ष आरम्भ हुआ है। प्रथम वर्ष में इस महान विचारधाराओं का भारतवर्ष में ही नहीं, 17 अन्य देशों में भी, जहाँ अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, उत्साहवर्धक प्रसार हुआ है। इस सत्प्रयास का विचारशील क्षेत्रों में सर्वत्र जैसा आशाजनक स्वागत हुआ है, उसे देखते हुए स्पष्ट है कि यह युग की पुकार—अनसुनी एवं उपेक्षित नहीं रह सकती। जिस दिव्य प्रेरणा के आधार पर इस पुण्य प्रकाश का अवतरण हुआ है उसकी सामर्थ्य को देखते हुए यह निश्चित है कि यह महान अभियान अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा करके रहेगा।
ज्येष्ठ के तीन शिविरों में आये हुए ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के विचारशील सक्रिय सदस्यों के परामर्श से अगले वर्ष के कार्यक्रम की रूप-रेखा निर्धारित कर ली गई है। जुलाई अंक में इसे विस्तारपूर्वक छाप भी दिया गया है। आत्म-निर्माण की जीवन साधना के लिए हम में से प्रत्येक को 10 कार्यक्रम अपनाने आरम्भ कर देने चाहिएं। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन, और सभ्य समाज की अभिनव रचना हमारे लक्ष्य की आवश्यक माध्यम है। इसके संदर्भ में आरोग्य के लिए 10 और मनोबल बढ़ाने के लिए 10 कार्यक्रम निर्धारित किये गए हैं। इस बीस सूत्री योजना के आधार पर हम में से प्रत्येक को अपना निज का निर्माण करना है। अपना निर्माण करने से ही युग-निर्माण आरम्भ होगा। दूसरों को उपदेश करने से नहीं अपने परिवर्तन करने से यह पुण्य प्रक्रिया गतिशील बनेगी। इसलिए हम सबको आत्म-निर्माण के पथ पर अधिक तत्परता से अग्रसर होना है।
सभ्य समाज की रचना के लिए 10 सूत्री कार्यक्रम सामने है। पुण्य परमार्थ की भावना जिनके भी मन में उठती हो उन्हें समाज के नये निर्माण में अपनी शक्ति लगानी चाहिए। क्योंकि आज की अगणित समस्यायें तब तक नहीं सुलझेंगी जब तक समाज का वर्तमान स्वरूप और ढाँचा बदल न जाय। पत्तों को खींचने की अपेक्षा जड़ में पानी देने से ही मुरझाये पेड़ के हरे होने की आवश्यकता पूर्ण होगी।
विवाहों में अनावश्यक अपव्यय हिन्दू समाज की अत्यन्त घातक कुप्रथा है। अपने परिवार को इस ओर विशेष ध्यान देना है और ऐसी परम्पराओं को जन्म देने में अग्रणी बनना है जिससे दूसरे लोगों को अनुकरणीय प्रकाश मिल सके। दहेज आदि कुरीतियों को कोसते रहने का समय चला गया अब हमें रचनात्मक कदम उठाने होंगे आदर्श विवाहों की परम्परा हमीं लोग स्थापित न कर सके तो फिर सर्व साधारण से क्या आशा की जा सकेगी। जुलाई अंक में 12 सूत्री कार्यक्रम दहेज उन्मूलन की रूप रेखा का छपा है। इस ओर आवश्यक ध्यान दिया जाना है और अपने परिवार में ऐसे अनेक विवाह सम्पन्न किए जाने हैं जिनका स्वरूप देखकर दूसरों को प्रकाश एवं प्रोत्साहन मिले।
आदर्श विवाहों का स्वरूप क्या हो? इस संबंध में समाज विज्ञान के ज्ञाता मनीषियों से परामर्श चल रहा है। अगले महीने उसकी एक आचार-पद्धति प्रकाशित कर दी जावेगी। उस आधार पर हमें अपने लड़की लड़कों के विवाह की विधि व्यवस्था बनाने के लिए आवश्यक साहस एकत्रित करना पड़ेगा। नन्हीं मुन्नी बच्चियों के गले में कालपाश की तरह लिपटे हुए इस विषधर दहेज और अपव्यय को रोकना ही अभीष्ट है। हम अग्रिम पंक्ति में चलने वालों को भी प्राथमिक कठिनाइयों का सामना करना है। पीछे वालों के लिए रास्ता साफ करने की अपनी ही तो जिम्मेदारी है। यदि हम लोग यह सब कर सके तो निःसन्देह यह सुधार एक ऐतिहासिक घटना के रूप में स्मरण किया जाता रहेगा।
आदर्श विवाहों में सबसे बड़ी कठिनाई समान विचारों के समान स्थिति के संबंधों के न मिलने से ही होती है। चूँकि अपनी जाति उपजाति में ही विवाह संबंध तय करने पड़ते हैं इसलिए प्रत्येक जाति में ऐसे प्रगतिशील वर्ग का निर्माण होना आवश्यक है जो अपनी लड़कियों का ही नहीं लड़कों का विवाह भी आदर्शवादिता का ध्यान रखते हुए करने को तैयार हों। इसके लिए प्रगतिशील जातीय संगठनों की रचना आरम्भ करने के अतिरिक्त वर्तमान परिस्थितियों में और कोई मार्ग नहीं। ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों की संख्या बहुत बड़ी है। इन सदस्यों के प्रभाव में जो परिवार हैं, उनकी संख्या लाखों तक पहुँचती है। इन्हें प्रगतिशील जातीय संगठनों में संगठित करके आदर्शवादी दोनों पक्ष मिल सकना सरल हो सकता है। अपने परिवार के अंतर्गत यह संगठन आरम्भ करके पीछे उसका स्वतन्त्र जातीय संगठन चलता रह सकता है। पर अभी आरम्भ तो हमीं लोगों को करना है।
उपरोक्त कार्यक्रमों को आवश्यक प्रगति मिल सके इसके लिए निताँत आवश्यक यह है कि ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार का नियमित और व्यवस्थित स्वरूप एक सुसंगठित परिवार के रूप में बन जाय। यों इस संगठन को किसी सभा, सोसाइटी के ढंग से गठित करके पार्टीबन्दी और व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं का अखाड़ा नहीं बनने देना है। फिर भी जिस प्रकार हर कुटुम्ब अपने आप में एक व्यवस्थिति इकाई होता है उसी प्रकार हम भी एक संगठित इकाई के रूप में रहकर ही कुछ कहने लायक प्रगति कर सकेंगे। संगठन के बिना युग-निर्माण जैसे महान अभियान की सफलता संभव नहीं। इसलिए यह कार्य इसी महीने पूरा कर लिया जाना चाहिए ताकि आगे का कार्य क्रमबद्ध रूप में चलने लगे।
हर जगह यह प्रयत्न होना चाहिए कि जहाँ ‘अखण्ड-ज्योति’ के जितने सदस्य हैं वे परस्पर इकट्ठे होकर एक कौटुम्बिक संगठन बना लें। बहुत स्थानों पर यह कार्य गुरु-पूर्णिमा के पुनीत पर्व पर पूर्ण कर लिया गया है। जहाँ अभी यह नहीं हुआ है वह इस अगस्त मास में पूरा कर लिया जाना चाहिए। इससे भी आगे के लिए इस काम को पड़ा नहीं रहने देना चाहिए। यों दस सदस्यों की एक शाखा मानी गई है पर जहाँ उतने नहीं है वहाँ आरम्भिक काम चलाऊ दृष्टि से पाँच सदस्यों पर भी एक शाखा संगठन बन जाना चाहिए।
सब सदस्यों को इकट्ठे करके उन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के युग-निर्माण योजना की सदस्यता का—उत्तरदायित्व समझाना चाहिये। केवल पत्रिका मंगा लेना ही पर्याप्त नहीं वरन् उनके लिए यह भी आवश्यक है कि समय-समय पर इकट्ठे होने एवं मिल बैठ कर विचार विनिमय करते रहने में भी आवश्यक उत्साह रक्खें। परिवार के हर सदस्य को युग-निर्माण संगठन का एक अंग होकर रहना चाहिए।
पाँच व्यक्तियों की एक कार्यकारी समिति चुन लेनी चाहिए और उनमें से एक को शाखा संचालक बना देना चाहिए। शाखा का कार्यालय स्थान नियम हो जाना चाहिए। इसके लिए एक कमरा किसी भी सज्जन का उपयोग के लिए लिया जा सकता है। इस पर युग-निर्माण केन्द्र का बोर्ड रहे और छह छोटे रजिस्टर रहें, जिनमें (1) मीटिंगों की कार्यवाही, (2) हिसाब (3) पुस्तकालय विवरण (4) किए गये कार्यों का ब्यौरा (5) विचारशील लोगों द्वार मिलते रहने वाले सुझावों का उल्लेख (6) पत्र व्यवहार का ब्यौरा लिखा जाता रहे।
इस शाखा केन्द्र को आरम्भ में एक छोटे पुस्तकालय का रूप दिया जा सकता है। जिसमें जीवन निर्माण प्रेरणा का युग-निर्माणकारी तेजस्वी साहित्य ही रक्खा जाय। सदस्यों का यह कर्तव्य हो कि वे इस साहित्य को स्वयं पढ़ें, घर वालों को पढ़ायें, सुनायें और दूसरे नये लोगों में इन विचारों को पढ़ने की अभिरुचि उत्पन्न करने के लिए अपने प्रभाव, बुद्धिबल और उत्साह का पूरा-पूरा उपयोग करें। यह निश्चित है कि इस अभियान में अन्त तक केवल वे ही लोग डटे रह सकेंगे जिन्हें इस विचारधारा के पढ़ने सुनने में रस आने लगा होगा। जिनकी इस ओर उपेक्षा बुद्धि बनी रही वे थोड़ा बहुत भजन भले ही कर लें, नव-निर्माण की दृष्टि से दो कौड़ी के ही सिद्ध होंगे। निरन्तर प्रेरणा मिलते रहने से ही धर्म मार्ग पर चलने का साहस स्थिर रहता है। यह कर्म स्वाध्याय और सत्संग से ही सम्भव है। ‘अखण्ड-ज्योति’ स्वाध्याय की सामग्री विनिर्मित करती है पर उसको हृदयंगम करने एवं मूर्तरूप मिलने का उद्देश्य तो सत्संग से ही संभव होगा। युग-निर्माण शाखाओं में सत्संग को मूर्तिमान ज्ञान मन्दिरों का रूप दिया जाना है जहाँ सदस्यगण एकत्रित होकर परस्पर एक दूसरे को प्रेरणा उत्साह एवं मार्ग-दर्शन प्रदान करते रह सकें।
‘अखण्ड-ज्योति’ केवल प्रेरणा प्रस्तुत कर सकती है। फिर भी वह कागज के पन्नों का पुलिन्दा मात्र है। उसकी प्रेरणाओं को कौन व्यक्ति, किस प्रकार, कब, किस सीमा तक कार्यान्वित करे, और किस की शिथिलता कैसे दूर हो? किन परिस्थितियों में कहाँ क्या प्रगति संभव हो सकती है यह सब विचार करना व्यक्तियों का काम है और वे व्यक्ति संगठित शाखा के रूप में जब एकत्रित हों तभी कुछ काम बनेगा। माना कि ऐसी प्रवृत्तियों को चलाने वाले कुछ ही लोग होते हैं और उन्हीं के प्रयत्न से सारा ढाँचा खड़ा रहता है फिर भी उन्हें संगठन के रूप में कार्य करते हुए सुविधा रहती है। यदि विचार निर्माण तक की ही बात होती तो उसे ‘अखण्ड-ज्योति’ के पृष्ठ भी एक हद तक पूरा कर सकते थे, पर चूँकि योजना के साथ-साथ अनेक—108 कार्यक्रम भी जुड़े हुए हैं, उन्हें अग्रगामी बनाने के लिए व्यक्तियों का प्रत्यक्ष सहयोग समय दान एवं संगठन ही सफल बना सकता है। इसलिये पिछले वर्ष बलपूर्वक यह अनुरोध किया जाता रहा कि जहाँ जिन नगरों, कस्बों और गाँवों में थोड़ी-थोड़ी भी ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती हो, वहाँ युग-निर्माण परिवार का नियमित संगठन बन जाना चाहिए।
अब वह समय आ गया , जब कि बिना विलम्ब लगाये यह संगठन कार्य पूरा कर लेना चाहिये। आशा यह की जायगी कि अगस्त में हर जगह मीटिंग बुलाकर एक विधिवत् संगठन बना लिया जाय। और उसकी सूचना मथुरा भेज दी जाय ताकि नये पाक्षिक पत्र ‘युग-निर्माण योजना’ में उसे छापा जा सके।
‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्य हमारे वैसे ही आत्मीय एवं निकटवर्ती हैं जैसे कि किसी पर- कुटुम्ब के सदस्य घनिष्ठ एवं निकटवर्ती होते हैं। अपने परिजनों तक जीवन को ऊँचा उठाने वाली प्रेरणायें एवं अनुभूतियाँ पहुँचाने की हमारी आन्तरिक अभिलाषा है। जो कुछ ‘उत्तम’ जाना है और जो कुछ ‘श्रेष्ठ’ इस जीवन में पाया है उसको अपने स्वजनों को दे जाने की इच्छा बहुत दिन से उठती रहती थी। अब वह सुयोग और अवसर आ गया जब कि यह आकाँक्षा पूरी होने का एक व्यवस्थित क्रम बन गया है।
गत अंक में जीवन निर्माण का मासिक प्रशिक्षण’ और गीता-माध्यम से जन-जागरण की शिक्षा” शीर्षक दो लेख छपे हैं। इन्हें ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों के लिये एक खुला निमन्त्रण समझा जाना चाहिये। दो आधारों पर स्वजनों को एक-एक महीना मथुरा आने के लिये आह्वान किया गया है। इन शिविरों में क्या सिखाया जायेगा यह स्पष्टीकरण उन पृष्ठों पर छप चुका है। वह भी कम उपयोगी नहीं है। पर इस सुशिक्षण पद्धति के पीछे हमारी व्यक्तिगत आकाँक्षा यह है कि स्वजनों को अपने साथ रखने का अवसर हमें मिले और भावनाशील आत्मीय जनों के साथ-साथ रहने में जो अलौकिक आनन्द मिलता है उसका रसास्वादन किया जाय। सामान्यतया अपने कुटुम्बियों और सम्बन्धियों की समीपता लोगों को बहुत प्रिय लगती है, भले ही उनमें दोष दुर्गुण भरे पड़े हों। फिर हमारा परिवार तो देश जैसे दुर्बल आधार पर नहीं भावना एवं आदर्शों के आधार पर विनिर्मित होने के कारण साधारण परिवारों की अपेक्षा कहीं अधिक महत्वपूर्ण—प्रगाढ़ता पूर्ण—है। ऐसे परिजनों के साथ रहने में कौटुम्बिक मोह ही नहीं, श्रेष्ठता एवं सद्भावनाओं का मिलन भी एक बहुत बड़ा कारण है जिसमें आनन्द की अविरल धारा बहती है। स्वजनों की समीपता, फिर वह भी आध्यात्मिक उच्च आधार पर यदि मिले तो उससे कौन लाभान्वित न होना चाहेगा। हमारे मन में भी ऐसी ही भाव तरंग उठती रहती है और व्यक्तिगत रूप से वही हमारी तृप्ति का एक बहुत बड़ा कारण है।
यों यह दोनों प्रशिक्षण व्यवस्थायें व्यक्ति निर्माण एवं समाज निर्माण की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण भी हैं और इन्हें बहुत सोच समझकर बनाया गया है। शरीर और मन के रुग्ण रहने पर मनुष्य अपने लिये—अपने परिवार के लिये—भार रूप ही बना रहता है। फिर उसके लिये भौतिक सफलताओं या आध्यात्मिक विभूतियों को प्राप्त कर सकना तो संभव ही कैसे हो सकता है? शरीर और मन यही तो दो साधन जीवात्मा के पास हैं जिनके आधार पर वह सभी लौकिक पारलौकिक सफलतायें प्राप्त करता है। यह दोनों पहिये यदि टूटे-फूटे हों तो प्रगति का रथ आगे बढ़ ही कैसे सकेगा? इसलिये मनुष्य की प्रथम आवश्यकता यह है कि उसका शरीर और मन निरोग हो। शरीर की बीमारियाँ स्थूल होने से उन्हें दर्द, ताप, बेचैनी अशक्तता, जकड़न आदि के रूप में आसानी से पहचाना जा सकता है और उनका उपचार भी हो सकता है। पर संशय, भ्रम, आवेश, उद्वेग, चिन्ता निराशा, जल्दबाजी, उदासीनता, आलस, दुर्भावना, इन्द्रिय लालसा, लालच, संकीर्णता, असहिष्णुता जैसी अनेकों मानसिक बीमारियाँ ऐसी होती हैं जो होश-हवास दुरुस्त रहते हुये भी हमें पागल जैसा बनाये रहती हैं। प्रगति की संभावनाओं को नष्ट करके जीवन को असफल, अशाँत और दुःखी बनाने के लिए यह अदृश्य मानसिक बीमारियाँ वह दुष्परिणाम उत्पन्न करती हैं जो बेचारी शारीरिक बीमारियाँ तो कर ही क्या सकेंगी। शरीर रोग तो अधिक से अधिक शरीर नष्ट कर सकते हैं पर मानसिक रोग तो जन्म-जन्मान्तरों के लिए हमारा भविष्य अन्धकारमय बना कर रख देते हैं। इन दुष्टों की एक भारी भयंकरता यह है कि रोगी को इनका पता तक नहीं चल पाता, ऐसी दशा में उनसे मुक्त होने की इच्छा भी नहीं उठती। कोई दूसरा बताये तो बुरा लगता है, आत्म निरीक्षण का अभ्यास न होने से स्वयं उन्हें पहचान नहीं पाते। अस्तु यह व्यथायें बढ़ती ही रहती हैं और मनुष्य इनसे भी दर्द ताप आदि की तरह अशाँत एवं विक्षुब्ध बना रहता है।
तात्कालिक कष्ट दूर करने के लिए दवा दारु उपयोगी हो सकती है पर दुर्बलता और रुग्णता से स्थायी छुटकारा तो आहार विहार एवं रहन-सहन का क्रम बदलने से ही संभव हो सकता है। जीवन-निर्माण के मासिक प्रशिक्षण में उपयुक्त रहन-सहन का अभ्यास कराया जायगा। यों स्वास्थ्य रक्षा के नियमों को जानते सभी हैं पर उन्हें अभ्यास में ला सकना नहीं बन पड़ता। इस कठिनाई का समाधान इस एक मास की अवधि में संभव हो सकेगा ऐसी आशा है। पाचन क्रिया का ठीक न रहना ही समस्त बीमारियों की जड़ होता है। पुराने संग्रहीत मल को एनीमा द्वारा बाहर निकाल कर, उपवास द्वारा थके हुए पाचन तंत्र में विश्राम देकर, मिट्टी उपचार, जल चिकित्सा वाष्प स्नान, सूर्य रश्मि विज्ञान, मालिश आदि प्राकृतिक माध्यमों से दुर्बल पाचन प्रणाली पुनः सतेज हो सकती है और स्वास्थ्य का लड़खड़ाता हुआ ढाँचा फिर संभल सकता है। शरीर यात्रा चला सकने में असमर्थ छूत के रोगी, एवं साथ रहने में दूसरों को असुविधा उत्पन्न करने वाले रोगों के रोगी अभी नहीं लिये जाते हैं। अभी तो पाचन क्रिया की मन्दता की ही चिकित्सा में हाथ लगाया है। इसलिये चिकित्सा की दृष्टि से केवल मन्दाग्नि का रोग ही हाथ में लिया गया है। पर यह निश्चित है कि यदि यह एक रोग ठीक हो जाय तो समयानुसार अन्य रोग भी पलायन कर ही जावेंगे। प्राकृतिक चिकित्सा की विधि की काम चलाऊ शिक्षा इस एक महीने में ही प्राप्त हो जाय और कोई व्यक्ति अपने तथा अपने समीपवर्ती लोगों की चिकित्सा करने योग्य इस एक महीने में ही बन जाय, इतना ज्ञान प्राप्त कर लेने की दृष्टि से भी यह एक महीना बहुत महत्वपूर्ण है।
चान्द्रायणव्रत करते हुए गायत्री अनुष्ठान करने का आध्यात्मिक कार्य-क्रम शरीर शोधन की ही तरह मानसिक एवं आध्यात्मिक दोष दुर्गुणों का भी समाधान करता है। चान्द्रायणव्रत का व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप सरल रूप भी बना दिया जाता है, जिसे दुर्बल शरीर के लोग भी आसानी से कर सकें जो चान्द्रायण नहीं कर सकते उनके लिए दूध कल्प, छाछ-कल्प, शाक-कल्प, फल-कल्प, एवं अन्न-कल्प जैसी विधियों से दूसरे प्रकार के उपवासों का क्रम बना दिया जाता है। मनोविकारों की निवृत्ति के अन्य आध्यात्मिक उपचार भी होते हैं और सुझाव भी। प्राणायाम की विविध क्रियाओं द्वारा विविध मनोविकारों पर काबू प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है। यही सब शरीर और मन को शोधन करने में उपचार जीवन-निर्माण के मासिक प्रशिक्षण में होता रहेगा।
अपने सान्निध्य में रखकर अपने संग्रहीत ज्ञान अनुभव एवं प्रकाश का लाभ स्वजनों को दे सकने की तथा उन्हें अपने समीप पाकर प्रमुदित होने की जो आकाँक्षा है वह भी उस अवधि में पूरी हो जायेगी। प्रेम का अर्थ देना ही तो है। इस एक महीने की अवधि में शरीर और मन के स्वास्थ्य को सुधारने की दृष्टि से जो सेवा बन पड़ेगी वह तथा और भी जो विशेष आध्यात्मिक उपहार दे सकना सम्भव होगा वह देने का प्रयत्न करेंगे।
यों इस समय हर कोई बहुत व्यस्त है। महंगाई की मार और जीवनक्रम में उलझन भरी अड़चनें किसी को सहज ही बाहर जाने की, सो भी एक महीने के लिए बाहर रहने की, सहज ही इजाजत नहीं दे सकती। फिर भी हमारा अनुरोध है कि जैसे बीमार पड़ने पर हजार हर्ज होते हुए भी मनुष्य को चारपाई पर पड़ा ही रहना पड़ता है, उसी प्रकार इस एक महीने के प्रशिक्षण में आने के लिए भी मथुरा आने की बात सोचनी चाहिए।
इस वर्ष आश्विन (21 सितम्बर से 21 अक्टूबर) मार्गशीर्ष (19 नवम्बर से 18 दिसम्बर। माघ (17 जनवरी से 15 फरवरी) चैत्र (17 मार्च से 16 अप्रैल) यह चार शिविर जीवन निर्माण साधना के होंगे। इनमें जो सज्जन अपनी पत्नी या अन्य कुटुम्बियों समेत जाना चाहें आ सकते हैं। किन्तु इसकी पूर्व स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। यहाँ जितना स्थान है, जितनों की चिकित्सा परिचर्या आदि कर सकना सम्भव होगा उतने ही व्यक्तियों को स्वीकृति मिलेगी। बिना स्वीकृति आने वालों के लिये तत्काल व्यवस्था न हो सकेगी।
एक मास की जीवन निर्माण शिक्षा में सम्मिलित होने के लिए एक खुला निमन्त्रण इन पंक्तियों द्वारा अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों के सम्मुख उपस्थित है, जिन्हें सुविधा हो वे इसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर सकते हैं।
गीता के द्वारा भगवान कृष्ण ने कायरता और शोक संताप से घिरे हुए किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को पुनः कर्तव्यरत बनाया था। इसी महान् ज्ञान को प्राप्त करके वह पाञ्च-जन्य बजाता हुआ, गाँडीव को टंकारता हुआ कर्तव्य-धर्म के महाभारत में प्रविष्ट हुआ था। उसका सत्साहस देखकर भगवान स्वयं उसका जीवन रथ चलाने के लिए सारथी बने थे। आज हमारे व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक वातावरण की स्थिति मोहग्रस्त अर्जुन जैसी ही बनी हुई है। इसे वीरोचित कर्तव्य पथ पर अग्रसर करने के लिए आज फिर गीता का सहारा उसी प्रकार आवश्यक हो गया है जैसा कि आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व उस महत्वपूर्ण युग परिवर्तन की सन्धि बेला में आवश्यक हुआ था। आज के अन्धकारमय वातावरण में गीता से हमें समुचित प्रकाश मिल सकता है। गायत्री उपासना द्वारा आत्म-बल और गीता द्वारा कर्तव्य-दर्शन प्राप्त करके हम आज की सभी समस्याओं को हल कर सकते हैं। गायत्री और गीता हमारे ज्ञान-योग और कर्मयोग को परिपूर्ण कर सकती हैं ताकि ईश्वर प्राप्ति की पुण्य प्रक्रिया भक्ति का सच्चा मार्ग हमें मिल सके।
यों दस पैसे वाली गीता का पाठ लाखों व्यक्ति रोज ही करते हैं। हजारों व्यक्ति ऐसे भी मिलेंगे जिन्हें गीता कण्ठाग्र याद होगी। यह पाठ पूजा की प्रणाली भी उत्तम है पर इतने मात्र से कुछ विशेष प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है। गीता की उस तेजस्विता को हमें ढूँढ़ना पड़ेगा जिससे अकर्मण्य अर्जुन की भुजाएं फड़फाने लगी थीं और ‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्’ का उभय पक्षीय लाभ देखकर ‘युद्धय कृत निश्चयः’ के परिणाम पर पहुँच गया था। जो दीनता और हीनता का जीवन बिता रहे हैं वे गीता का नित्य पाठ भले ही करते रहें उसके प्रकाश से लाख कोस दूर पड़े हैं यही मानना पड़ेगा। जिस औषधि को खाकर अर्जुन कर्तव्य परायण हुआ था उसे हम खावें तभी काम चलेगा। मीठा-मीठा रटने से मुँह मीठा नहीं हो सकता। मिठास का आनन्द तो उसे मिलेगा जो उसे खाने लगेगा। गीता पूजा-पाठ की पुस्तक नहीं, जीवन का मार्ग दर्शन उसमें भरा पड़ा है। आवश्यकता इस बात की है कि हम ठीक तरह उसे समझें और जो समझ सकते हों वे उसे जीवन में उतारने की विधि बनायें। ऐसा ही तेजस्वी गीता परायण युग-निर्माण की पुण्य बेला में आज के अर्जुन को अभीष्ट है।
‘गीता माध्यम से नव-जागरण की शिक्षा’ शीर्षक लेख में गत मास विस्तारपूर्वक यह बताया जा चुका है कि गीता-सप्ताह में परायण और गायत्री यज्ञ का समन्वय होकर एक सुन्दर धर्मानुष्ठान किस प्रकार बन सकता है? जेष्ठ के तीन शिविरों में जीवन-निर्माण की, युग-निर्माण की प्रेरणाप्रद शिक्षा और कार्यपद्धति इस बार मथुरा में समझाई गई थी। उस तेजस्वी शिक्षण में सम्मिलित होने वाले व्यक्ति एक नया जीवन, नया प्रकाश, नया कार्यक्रम और नया उत्साह लेकर यहाँ से गये हैं और उनमें से अधिकाँश की जीवन दिशा में नया मोड़ आया है। प्रयत्न यह है कि ऐसे ही तेजस्वी प्रशिक्षण की व्यवस्था गाँव-गाँव में होती रहे। दस दिन न सही सात दिन में भी काम चल सकता है। गीता सप्ताह के माध्यम से धर्मानुष्ठान के वातावरण में जीवन निर्माण की युग-निर्माण की शिक्षा यदि जनता को मिले तो निस्सन्देह उसका परिणाम सब प्रकार श्रेयस्कर ही होगा और उससे अपने लक्ष्य की पूर्ति में भारी सहायता मिलेगी।
जिस प्रकार पिछले दिनों जगह-जगह गायत्री यज्ञ हुआ करते थे और उनके माध्यम से नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान की भावनाएं प्रसारित की जाती थीं, उसी प्रकार अब आगे गीता सप्ताहों का कथा अनुष्ठान जगह-जगह चलेगा। हर शाखा इसी माध्यम से अपना वार्षिकोत्सव कर लिया करेगी। सात दिन तक योजनाबद्ध प्रशिक्षण चलेगा। अन्तिम दिन ही गायत्री यज्ञ होगा। सीमन्त, नामकरण, अन्न-प्राशन, विद्यारम्भ, मुण्डन, यज्ञोपवीत आदि संस्कार भी जिनको कराने होंगे वे भी एक-एक दिन एक-एक संस्कार के लिए निर्धारित रहने से सात दिन में वे भी पूरे हो जायेंगे। गीता पारायण को पद्यानुवाद के साथ सामूहिक गायन के माध्यम से चलाने पर वह भजन कीर्तन जैसा संगीतमय एवं आकर्षक बन जायगा। गीता के श्लोकों के साथ रामायण की चौपाइयों का समन्वय अपना एक अलग ही रस उत्पन्न करेगा फिर प्रत्येक श्लोक की व्याख्या में अनेकों पौराणिक कथाएँ, ऐतिहासिक गाथाएं महापुरुषों के स्मरण तथा मनोरंजक दृष्टान्तों का समन्वय हो जाने से वह इतनी मधुर बन जायगी कि सुनने वालों को अधिक से अधिक देर उस प्रसंग को सुनने में अभिरुचि रहेगी। इस प्रकार का प्रशिक्षण-बाल-वृद्ध, शिक्षित-अशिक्षित सभी के-लिए प्रेरणाप्रद ही नहीं मनोरंजक भी रहेगा।
इस प्रकार की गीता कथा कहने और षोडश संस्कार कराने की पद्धति द्वारा लोक शिक्षण एवं जन उद्देश्यों की पूर्ति होगी। इन सात दिनों में नगर में अनेकों रचनात्मक प्रवृत्तियों के जन्म से सुधारात्मक उत्साह को अग्रसर करने का प्रयत्न किया जायगा जिससे जिस शाखा में ऐसी कथाएं होंगी वहाँ एक उत्साह और नया जीवन उत्पन्न होना स्वाभाविक है।
यह गीता सप्ताह के धर्मानुष्ठान आर्थिक दृष्टि से भी बहुत सस्ते रहेंगे। पैंतीस से लेकर पचास रुपये तक कथा वाचक का पारिश्रमिक, लगभग आठ-दस रुपया मार्ग व्यय, अन्तिम दिन सामूहिक हवन का खर्च 30) रुपया, व्यवस्था खर्च 20) रु0 अन्त में प्रसाद वितरण और कन्या भोजन 50)रु0 इस प्रकार करीब 150) रु0 खर्च पड़ेगा। इसे कम किया जाय तो 100) रु0 में भी काम चल सकता है और बढ़ाया जाय तो 200) रु0 पर्याप्त हो सकते हैं। इतना पैसा सात दिन तक चलने वाले इस धर्मानुष्ठान के लिए कहीं भी आसानी से इकट्ठा हो सकता है और हर साल यह उत्सव आनंदपूर्वक चलता रह सकता है।
कार्यकर्त्ताओं की आजीविका का प्रश्न भी इससे हल हो सकता है। भोजन मार्ग व्यय आदि खर्च की सुविधा रहने पर महीने में तीन आयोजन सम्पन्न कर लेने पर सौ डेढ़ सौ रुपया घर भेजने के लिए बच जाय तो मध्यम श्रेणी का कोई व्यक्ति धर्म प्रचार का कार्यक्रम नियमित रूप से चलाता रह सकता है। जिनके पास अपनी घर की आजीविका पेन्शन आदि मौजूद है, उन्हें दक्षिणा लेने की आवश्यकता नहीं। वे इस पैसे को शाखा का कार्य चलाने के लिए जहाँ धर्मानुष्ठान हो वहीं दान कर सकते हैं।
गीता सप्ताह के धर्मानुष्ठान के अतिरिक्त प्रतिदिन सायंकाल को थोड़ी-थोड़ी गीता कथा कहने की नियमित व्यवस्था चल सकती है। सप्ताह में एक दिन सत्संग के रूप में यह भी क्रम चल सकता है। पूरी गीता का साराँश लेकर दो-ढाई घण्टे का एक आयोजन सत्यनारायण व्रत कथा की तरह भी रखा जा सकता है। इस प्रकार कितने ही तरीकों से जहाँ जैसी सम्भावना हो वहाँ व्यवस्था बनाई जा सकती है। भगवान कृष्ण का सन्देश और गीता का तत्व ज्ञान बिलकुल वही है जो युग-निर्माण आन्दोलन का है। अस्तु भगवान और उनकी वाणी गीता में से लेकर इस महान् विचारधारा को जन-साधारण तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है। इस दृष्टि से युग निर्माण पद्धति नये युग का सूत्रपात करने में बड़ी उपयोगी सिद्ध होगी।
गीता प्रवचन की इस अभिनव शैली और षोडश संस्कारों के द्वारा व्यक्तिगत जीवन को सुसंस्कृत करने की पद्धति का तेजस्वी शिक्षण एक महीने का रखा गया है। इसी अवधि में गायत्री यज्ञ कराने की परिपूर्ण प्रक्रिया भी सिखा दी जायगी। कार्तिक (21 अक्टूबर से 19 नवम्बर ) पौष (18 दिसम्बर से 17 जनवरी तक), फाल्गुन (15 फरवरी से 17 मार्च तक) बैसाख (16 अप्रैल से मई तक) इस वर्ष ये चार शिविर एक-एक महीने के लिए धार्मिक प्रशिक्षण के होंगे। युग-निर्माण की रचनात्मक प्रवृत्तियों एवं सुधारात्मक आन्दोलनों को किस प्रकार आगे बढ़ाएं जा सकता है इसके उतार-चढ़ावों का मनोविज्ञान एवं समाज विज्ञान के अनुरूप समाधान बताते हुए शिक्षार्थी को एक व्यवहारवादी ऐसा कार्यकर्ता बनाने का प्रयत्न किया जायगा कि वह युग-निर्माण के इस ऐतिहासिक अभियान में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत कर सके।
इस प्रशिक्षण के लिए परिवार के उन सभी स्वजनों को इन पंक्तियों द्वारा आमन्त्रित किया जा रहा है जो सामाजिक एवं नैतिक क्रान्ति के सम्पन्न करने में अपना योगदान देना चाहते हों। राजनीति आज सर्वोपरि बन गई है। पर कल समाज-निर्माण के कार्य को महत्व मिलने वाला है। इस दिशा में उचित नेतृत्व कर सकने वाले तेजस्वी व्यक्तियों की अगले दिनों भारी आवश्यकता पड़ेगी। पोथी-पत्री पड़ना आज तिरस्कृत कार्य इसलिए है कि उसे घटिया श्रेणी के लोग अपने हाथ में लिये हुए हैं। जब विधवायें ही चरखा काता करती थीं तब बेचारा चरखा हेम बना हुआ था। पर जब गाँधीजी जैसे नेताओं और राज पुरुषों ने उसे अपना लिया तो वही स्वराज्य का प्रमुख अस्त्र-चक्र सुदर्शन के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करने लगा। धार्मिक मञ्च से जन-जागरण का काम ऐसा छोटा या हेय नहीं है जिसे करने में किसी को झिझक या संकोच की आवश्यकता पड़े।
जिन लोगों के यहाँ पौरोहित्य कर्म होता चला आया है, ऐसे सज्जनों के लिए तो यह शिक्षण अतीव उपयोगी है। जिनके ऊपर गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ नहीं हैं वे आत्मकल्याण के लिए भी यह शिक्षण प्राप्त कर सकते हैं। जिनमें प्रतिभा है और जन नेतृत्व करने के लिये उत्सुक हैं वे भी इस ज्ञान के आधार पर बहुत बड़ा काम कर सकते हैं। गृहस्थ के गुजारे की सम्भावना भी इस शिक्षण के पीछे मौजूद है। शाखाएँ अपने प्रतिनिधि भेजकर उन्हें यह प्रशिक्षण प्राप्त करा सकती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से भी यह ज्ञान कम महत्वपूर्ण नहीं है। जिन्हें उपयुक्त ढाँचे वे उपरोक्त चार महीनों में अपनी सुविधानुसार आने की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं। पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना हर शिक्षार्थी के लिए अनिवार्यतः आवश्यक है।
युग-निर्माण योजना पाक्षिक के जुलाई मास के दोनों अंक निकल गये। यों उसकी निश्चित तारीख 7 और 22 है। पर आरम्भिक अंक प्राथमिक असुविधाओं के कारण 8 दिन लेट निकला ता0 15 को भेजा जा सका और दूसरा अंक 22 की बजाय 26 को गया। इस महीने लेट होने की अंगचन पड़ी। अगले महीने से ठीक समय पर हर पन्द्रहवें दिन निकलता रहेगा ऐसी आशा है।
यह दोनों अंक जिसने भी देखे हैं उनने मुक्तकण्ठ से प्रशंसा की है। अपने ढंग का यह अनोखा पत्र है। उसने पत्रकारिता के क्षेत्र में नई शैली और नई परम्परा को जन्म दिया है। पाठकों ने इसे बहुत पसन्द किया है और परिवार के विचारकों ने इस प्रयास की महत्ता को स्वीकार करते हुए कहा है कि युग-निर्माण आन्दोलन को सफल बनाने में इस प्रकार के पत्र की नितान्त आवश्यकता थी। इसके बिना नव-निर्माण के कार्य में एक भारी असुविधा और अड़चन बनी रहती।
अखण्ड ज्योति विचार पत्रिका है। उसके द्वारा स्वाध्याय और सत्संग की महान आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। इतना बड़ा कार्य वह करती है कि दूसरे अन्य प्रयोजनों की आशा उससे नहीं की जा सकती। युग-निर्माण आन्दोलन के लिए प्रचार पत्र की आवश्यकता थी। उसके लिए एक स्वतन्त्र पत्र ही अपेक्षित था। प्रसन्नता की बात है कि उस आवश्यकता की पूर्ति आरम्भ हो गई। बड़े साइज के 20 पृष्ठों का यह पत्र कलेवर सौंदर्य और पाठ्य सामग्री की दृष्टि से ऐसा सर्वांगपूर्ण निकला है कि अपने मिशन से तनिक भी सहानुभूति रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इसे देखकर भारी प्रसन्नता अनुभव हुई है।
अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक ग्राहक को इसे मँगाना आवश्यक नहीं, पर पढ़ना आवश्यक है। कई सज्जन मिल जुलकर उसकी एक प्रति मँगा सकते हैं और एक-एक दिन एक-एक घर में पहुँचाने की व्यवस्था करके 10—15 सदस्य उससे लाभ उठा सकते हैं। अखण्ड-ज्योति पीढ़ियों तक संग्रह करने की वस्तु है, इसलिये उसे दो सगे भाई भी अलग-अलग मँगावें तो उचित है पर इस पाक्षिक के बारे में वैसी बात नहीं, इसे मिलजुल कर मँगाया जा सकता है। इसे जो अपने पैसे से मँगाये वे अपनी प्रति अन्य सदस्यों को पढ़ने दे सकते हैं। हर हालत में इतना तो होना ही चाहिए कि अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को किसी न किसी प्रकार यह पत्रिका पढ़ने को मिलती रहे।
परिवार के सक्रिय कार्यकर्ताओं, शाखा सञ्चालकों और नव-निर्माण आन्दोलन में अभिरुचि रखने वाले प्रत्येक भावनाशील परिजन के लिए यह एक आवश्यक साधन एवं उपकरण की तरह है। इसके सहारे वे अपनी तथा अपने क्षेत्र की गतिविधियों को सुसंचालित रख सकेंगे। इसलिए बिना अनावश्यक विलम्ब लगाये 6) चन्दा भेजकर इसे मँगाना आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। परिवार की अग्रिम पंक्ति में गिना जाने वाला कोई भी सदस्य इसे मँगाये बिना रहेगा नहीं ऐसा हमारा विश्वास है।
पाक्षिक में किस प्रकार की पाठ्य सामग्री रहा करेगी, इसका अनुमान जुलाई के दो अंकों को देखकर आसानी से लगाया जा सकता है। इस प्रकार के समाचार, विवरण एवं सुझाव छपने के लिए बराबर भेजे जाते रहने चाहिए। सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाले समाचारों का उसमें बाहुल्य रहेगा। इसलिए पाठक अपने क्षेत्र में हों रही इस प्रकार की प्रवृत्तियों का विवरण समय-समय पर भेजते रह सकते हैं।
(1) सामूहिक रूप से किये गए जन-कल्याण प्रयत्न। (2) आदर्शवाद की प्रेरणा देने वाले विभिन्न व्यक्तिओं के शुभ कर्म। (3) लोक सेवी व्यक्तियों की समाज सेवाओं के कार्यों का वर्णन। (4) युग-निर्माण योजना 108 कार्य-क्रमों में से जहाँ जो प्रवृत्तियाँ चल रही हों उनकी सूचना तथा कार्य पद्धति। (5) कुरीतियों तथा अन्ध-विश्वासों के फेर में उठाई जाने वाली हानियों के समाचार। (6) कुरीतियों के उन्मूलन के लिए उठाए गए साहसपूर्ण कदम। (7) विवाहों में होने वाले अपव्यय तथा दहेज की मार के कारण होने वाले दुःखद दुष्परिणामों की सूचना। (8) धार्मिक समारोहों की संक्षिप्त सूचनायें। (9) गोष्ठियों या समारोहों में किन्हीं मनीषियों द्वारा व्यक्त किये गए मार्मिक विचारों के महत्वपूर्ण अंश। (10) जन समाज की समस्याओं को सुलझाने के लिये उपयुक्त सुझाव।
उपरोक्त प्रकार के समाचार कागज के एक ओर, हाशिया छोड़कर, स्पष्ट अक्षरों में अलग कागज पर भेजने चाहिए। पत्र व्यवहार में ही समाचार लिख देना ठीक नहीं। इससे वह पत्र ही सम्पादन विभाग में पहुँचेगा और समाचार वाला अंश ढूंढ़ने में असुविधा रहेगी।
युग-निर्माण पत्रिका के प्रत्येक सदस्य को उसका संवाद-दाता भी बनकर रहना चाहिए। उस क्षेत्र में जो भी प्रेरणाप्रद, उत्साह वर्धक और दूसरों के लिए मार्गदर्शक कार्य हुए हों या हो रहे हों उनकी सूचना छपने भेजनी चाहिए ताकि वैसे ही कार्य करने के लिए अन्य लोगों को प्रोत्साहन मिले। जिन व्यक्तियों ने अपना जीवन लोकहित के कार्यों में उत्सर्ग किया हो या आदर्श उपस्थित करने वाला कोई विशेष कार्य किया हो उसके समाचार भी इस पत्रिका में भेजे जाने चाहिए। सत्कर्मों की चर्चा पढ़ या सुनकर वैसे ही प्रयास करने के लिए दूसरों को भी प्रोत्साहन मिलता है इसलिये इस पाक्षिक में उसी प्रकार के कार्यों और घटनाओं का विशेष रूप से उल्लेख रहा करेगा।
अच्छे समाचारों के साथ संबन्धित व्यक्तियों के फोटो भी छपते रहें ऐसी व्यवस्था की गई है। अस्तु जहाँ संभव है वहाँ छोटे साइज के बढ़िया कैमरे से खिंचे साफ फोटो भी भेजने चाहिए। घटिया कैमरे से छपे धुंधले फोटो ब्लाक बनाने के काम नहीं आते। अपने सभी सक्रिय कार्य-कर्ताओं के फोटो पत्रिका के कार्यालय में सुरक्षित रखने का विचार किया गया है ताकि समयानुसार उन्हें छापा भी जा सके। इसलिए जब अवसर मिले युग-निर्माण योजना के सदस्यों को अपने पासपोर्ट साइज के छोटे फोटो भिजवा देने चाहिए।
यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी बात को अत्युक्ति के ढंग से, घटा या बढ़ाकर अथवा किसी की निन्दा स्तुति के प्रयोजन से न लिखा गया हो। घटनाओं की सचाई और प्रामाणिकता का ध्यान रखकर ही समाचार भेजा जाय।
व्यक्तिगत साधना या व्यक्तिगत हवन आदि सबका नित्य कर्तव्य है उसके समाचार भेजने की आवश्यकता नहीं है। केवल सामूहिक धर्मानुष्ठानों का प्रकाशन होना ही उचित है। छोटे साप्ताहिक हवन सत्संग जो हर शाख में होते ही रहते हैं उनके समाचार बार-बार भेजने की भी आवश्यकता नहीं, कोई विशेष महत्वपूर्ण बात जिन आयोजनों में हुई हो उन्हीं का समाचार प्रकाशित होना उचित है।
जहाँ-जहाँ अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वहाँ उसके ग्राहकों का एक संगठन बन जाना आवश्यक है। इसे युग-निर्माण शाखा संगठन कहा जायगा। इस मास इस तरह के संगठन हर जगह बन जाने चाहिएं। उसके लिए पिछले पृष्ठों पर विशेष रूप से अनुरोध किया जा चुका है। जहाँ संगठन बन जायँ और उसकी सञ्चालक समिति बन जाय, उसकी सूचना छपने के लिये भेज देनी चाहिए।
राष्ट्र का नव-निर्माण करने के लिए—नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिए—हमें संगठित होना चाहिए और व्यक्तिगत रोजी-रोटी के कार्यों की तरह ही समाज निर्माण के लिए भी कुछ समय लगाना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन को सुसंस्कृत बनाने की साधना सबसे अधिक आवश्यक है। इसे हममें से प्रत्येक व्यक्ति अपना धर्म कर्तव्य समझ कर आरम्भ करे इसी तरह सामूहिक सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने के लिए भी नियमित रूप से कुछ समय देना आरम्भ करें। पिछले जुलाई अंग में इस संबंध में सर्वांगपूर्ण कार्यक्रम छपा है। जेष्ठ के शिविर में हुआ निश्चय अखण्ड-ज्योति परिवार का अगले वर्ष का कार्यक्रम है। उसे पूरा करने के लिए आवश्यक वातावरण बनाने के उद्देश्य से यह पाक्षिक निकालना पड़ा है। अखण्ड-ज्योति के पाठकों को उसे एक व्यावहारिक मार्ग दर्शन के रूप में अपनाना चाहिए।
आशा है युग-निर्माण योजना पाक्षिक नियमित रूप से पढ़ने के लिए प्रत्येक अखण्ड-ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य इस महीने अपनी कोई व्यवस्था ठीक तरह बना लेगा। अखण्ड-ज्योति और ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक दोनों को एक दूसरे की पूरक होने से अपने महान मिशन की पूर्ति में आवश्यक योग-दान मिलेगा, ऐसा विश्वास है।
गत भव्य, अनागत जो भविष्य होगा उज्ज्वल इसमें शक क्या?
यदि वर्तमान तुम बना सको, सुमधुर प्रेरक-शुभ सुन्दरतम्॥
देखा न जिसे उसकी चिन्ता, कैसा वह दीवानापन है।
जो प्राप्त-घृणा उससे, अप्राप्त को चाह रहा कैसा मन है॥
लगता जो मन को प्रिय सुन्दर, सहसा वह छोड़ चला जाता।
जिससे जग आशा करता वह,अपना मुख मोड़ चला जाता॥
गिरता, जो चलता बार-बार, दृढ़ता आ जाती है, शक क्या?
बिन गिरे, सीख लूँगा चलना, जो कहता, यह केवल है भ्रम॥
उर में अदस्य साहस जिनके, वे ही तो निर्भय होकर के—
सागर के तल से लाते हैं मोती, अपना सब खो करके॥
तट पर जो बातें बना-बना निजमन बहलाया हैं करते
कैसे पायें अपना अभीष्ट? जो मंझ धारा से हैं डरते॥
गिरि शृंगों को छूने वाले, काँटों पर सो लेंगे, शक क्या?
पर देखे नहीं शूल जिसने, कहता—चल लूँगा, है अक्षम॥
यह मानव का विश्वास कि सागर की छाती को चीर-चीर।
जलयान अनेकों ले जाते, चालक हँस-हँस गम्भीर धीर॥
निःसीम नील, नभ में भी तो उड़ते हैं अनगिन वायुयान—
दृढ़ लगन अमिट जिज्ञासा ही, तो बन जाती रचना विधान॥
जिनके उर में है चाह, राह निर्मित कर लेंगे ही, शक क्या?
पर जिनकी कोई राह नहीं, पाएंगे कैसे लक्ष्य शुभम्॥
मनु पुत्र! उठो, जागो॥ अपने स्वर्णिम अतीत पर गर्वित हो।
कर आगत का स्वागत अनुपम, उर नव-भावों से पूरित हो॥
ले मन उमंग उत्साह आज फिर से नव-युग निर्माण करो।
रोती जो मानवता, उसका तुम दानवता से त्राण करो॥
अभ्यास जिन्हें पीने का वे, बे-होश नहीं होते, शक क्या?
पर हित जो विष पीते आये, ठुकरा देते अमृत अनुपम॥
—रामस्वरूप खरे
*समाप्त*