ईश्वर प्राप्ति कठिन नहीं, सरल है।

ईश्वर की प्राप्ति सरल है क्योंकि वह हमारे निकटतम है। जो वस्तु समीप ही विद्यमान है, उसे उपलब्ध करने में कोई कठिनाई क्यों होनी चाहिए? ईश्वर इतना निष्ठुर भी नहीं है जिसे बहुत अनुनय विनय के पश्चात् ही मनाया या प्रसन्न किया जा सके। जिस करुणामय प्रभु ने अपनी महत्ती कृपा का अनुदान पग-पग पर दे रखा है, वह अपने किसी पुत्र को अपना साक्षात्कार एवं सान्निध्य प्राप्त करने में वंचित रखना चाहे, उसकी आकाँक्षा में विघ्न उत्पन्न करे वह हो ही नहीं सकता।

हमारे और ईश्वर के बीच में संकीर्णता एवं तुच्छता का एक छोटा-सा पर्दा है। जिसे माया का अज्ञान कहते हैं- प्रभु प्राप्ति में एक मात्र अड़चन यही है। इस अड़चन को दूर कर लेना ही विविध आध्यात्म साधनाओं का उद्देश्य है। तृष्णा और वासनाओं के तूफान में मनुष्य की आध्यात्मिक आकाँक्षाएं धूमिल हो जाती हैं। अस्तु वह जीवन-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए न तो ध्यान दे पाता है और न प्रयत्न कर पाता है। आज के तुच्छ स्वार्थों में निमग्न लोभी मनुष्य भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए तत्पर नहीं होता। अहंकार और अदूरदर्शिता को यदि छोड़ा जा सके, अपने-पन का दायरा बड़ा बनाकर यदि लोक हित को अपना हित मानने का साहस किया जा सके तो इतने- से ही ईश्वर प्राप्ति हो सकती है। ओछी आकाँक्षाएँ और संकीर्ण कामनाओं से ऊँचे उठकर यदि इस विशाल विश्व में अपनी आत्मा का दर्शन किया जा सके-औरों को सुखी बनाने के लिये भी यदि आत्म-सुख की तरह प्रयत्नशील रहा जा सके तो ईश्वर की प्राप्ति किसी को भी हो सकती है कठिन आत्म-चिन्तन ही ईश्वर साक्षात्कार नहीं।

महर्षि रमण


ईश्वर है या नहीं?

कई व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार करते हैं और कहते हैं-इस सृष्टि को बनाने एवं चलाने वाली कोई चेतन सत्ता नहीं है। प्रकृति के परमाणु अपने आप अपना काम करते रहते हैं और उसी से जीवों का जन्म-मरण होता रहता है। वे आत्मा की सत्ता को भी नहीं मानते और कहते हैं कि पेड़-पौधों की तरह मनुष्य भी एक बोलने वाला पौधा मात्र है। वह रज-वीर्य के संयोग से जन्मता और रोग एवं बुढ़ापे की क्रिया से मर जाता है।

यह नास्तिकवादी विचारधारा दिन-दिन अधिक तेजी से बढ़ रही है। विज्ञानवेत्ताओं को अपनी प्रयोगशालाओं में ईश्वर के अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण किन्हीं यन्त्रों दुर्बीनों या खुर्दबीनों में नहीं मिल सका है। इसलिए वे यही कहते हैं कि वैज्ञानिक प्रमाणों के अभाव में हम ईश्वर के अस्तित्व का समर्थन नहीं कर सकते। विज्ञान की वर्तमान मान्यताओं को ही सब कुछ मानने वाले लोगों को इससे और भी अधिक प्रोत्साहन मिला है।

ईश्वर की मान्यता से नीति धर्म और सदाचार के बन्धनों में रहने के लिए मनुष्य को विवश होना पड़ता। उच्छृंखलतावादी ईश्वर की मान्यता रखने पर भी धर्म-कर्म के बन्धनों को तोड़ते रहते थे। अब उन्हें कम्युनिज्म और विकास का समर्थन मिल जाने से और भी अधिक छूट मिलती है। इस प्रकार उच्छृंखलता और अनैतिकता का मार्ग और भी अधिक प्रशस्त हो जाता है। यह मान्यताएं यदि इसी प्रकार बढ़ती और पनपती रहीं तो नैतिकता, श्रम और सदाचार के लिए एक विश्व-व्यापी संकट खड़ा होने का खतरा उत्पन्न हो जायेगा। इसलिए यह आवश्यक है कि अनीश्वरवादी विचारधारा के तर्कों का परीक्षण किया जाय और यह देखा जाय कि उनके कथन में कुछ सार भी है या नहीं?

अनीश्वरवादियों का कथन है कि-प्रकृति के जड़ परमाणु अपने आप अपनी धुरी पर घूमते हैं, बदलते और हलचल करते हैं, उसी से सृष्टि का क्रम चलता है तथा प्राणियों की उत्पत्ति होती है। ईश्वर की इसमें कुछ भी आवश्यकता नहीं है।

इस कथन पर विचार करते हुए हमें देखना होगा कि क्या चेतन की प्रेरणा बिना जड़ पदार्थों में एक क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित गति-विधि निरन्तर चलते रहना सम्भव हो सकता है? देखते हैं कि कोई रेल, मोटर, जहाज, मशीन, अस्त्र आदि कितना ही महत्वपूर्ण एवं शक्ति शाली क्यों न हो, उसे चलाने के लिए चालक की बुद्धि ही काम करती है। राकेट से लेकर उपग्रह तक स्वचालित यन्त्र तभी अपनी सक्रियता जारी रख पाते हैं, जब रेडियो सक्रियता के माध्यम से मनुष्य उन्हें किसी दिशा विशेष में चलाते हैं। चालक के अभाव में अपनी इच्छा और शक्ति से यदि वस्तुएँ अपने आप ही चलने और काम करने लगें तो फिर उन्हें जड़ ही क्यों कहा जाय?

मशीन से सम्बन्धित जितनी भी वस्तुएँ हैं वे सभी चालक की अपेक्षा रखती हैं। सञ्चालन करने एवं प्रयोग करने वाला न हो तो वे महत्वपूर्ण होते हुए भी किसी के कुछ काम नहीं आतीं। इससे प्रकट होता है कि जड़ पदार्थ किसी सञ्चालक की प्रेरणा से ही सक्रियता धारण करते हैं। विशाल सृष्टि के कार्यक्रम में जो सक्रियता, नियमितता और व्यवस्था दीख पड़ती है, उसके पीछे भी चेतन सत्ता का हाथ होना आवश्यक है। इतना बड़ा सृष्टि-साम्राज्य अपने आप इतने विवेकपूर्ण ढंग से नहीं चल सकता। हवा को बहाने वाली, ऋतुओं को बदलने वाली, पौधों को उगाने और सुखाने वाली, कोई शक्ति मौजूद है- यह मानना पड़ेगा। इसे प्रकृति कहें या परमेश्वर, इस नाम-भेद से कुछ बनता बिगड़ता नहीं।

पदार्थों में क्षमता मौजूद भले ही हो, पर उसे गतिशील बनाने वाली एक प्रेरक शक्ति का भी पृथक से अस्तित्व मौजूद है। अणु अपनी धुरी पर अपने आप नहीं घूमते, उन्हें घुमाने वाली भी कोई प्रेरक शक्ति होनी ही चाहिए। इतने नियमबद्ध, इतने विशाल विश्व ब्रह्माण्ड का ठीक प्रकार सञ्चालन होते रहना किसी चैतन्य-सत्ता के द्वारा ही सम्भव है। बुद्धिहीन जड़ पदार्थ अपने आप अपना कार्य नियमपूर्वक करते रहेंगे,यह कैसे सम्भव हो सकता है? सूर्य-चन्द्रमा ग्रह-नक्षत्र अपनी-अपनी धुरी तथा कक्षा में निर्धारित गति से घूमते हैं। यदि इसमें तनिक भी अन्तर आ जाय तो एक ग्रह दूसरे ग्रह से टकरा कर टूटने लगे और इसकी प्रतिक्रिया से अन्य ग्रह नक्षत्रों की भी गति-व्यवस्था बिगड़ जाय। पर होता ऐसा नहीं, क्योंकि इन सबका सञ्चालन एक सावधान सत्ता द्वारा हो रहा है।

जो भी वस्तुएं हमारे उपयोग में आती हैं वह किसी न किसी के द्वारा बनाई हुई होती हैं। रोटी, कपड़ा, दवा, मकान,चारपाई, बर्तन, लालटेन, पुस्तक, घड़ी आदि हमारे उपयोग की सभी चीजें किसी के द्वारा बनाई गई हैं। इनके मूल पदार्थ- अन्न, धातु, कपास आदि को तथा उनके भी मूल पञ्च-तत्वों को बनाने वाला भी कोई होना चाहिए। इसी निर्मात्री और सञ्चालन शक्ति का नाम ईश्वर है।

विश्व का सञ्चालन और नियन्त्रण करने वाली कोई विचारशील सत्ता है। उसका अनुमान उसकी कृतियों को ध्यानपूर्वक देखने से सहज ही लग जाता है। जिस प्राणी को जिस परिस्थिति में उत्पन्न किया है उसके अनुकूल ही उसे साधन भी दिये हैं। माँसाहारी जीवों के दाँत और नाखून ऐसे बनाये है कि वे शिकार को पकड़ और फाड़ कर खा सकें। इसी प्रकार शाकाहारी जीवों को उसी व्यवस्था के अनुरूप खाने और पचाने के यन्त्र मिले हैं। ठण्डे बर्फीले प्रदेशों में रहने वाले जानवरों के शरीर पर बड़े-बड़े बाल और गर्म भूमि पर रहने वालों के शरीर उष्णता सहन करने की क्षमता-सम्पन्न होते हैं।

प्राणियों के शरीर में खाद्य पदार्थों को रक्त माँस के रूप में परिणत करते रहने वाली पाचन-प्रणाली ऐसी आश्चर्यजनक है कि उसकी रासायनिक क्षमता देखते ही बनती है। रोगों की निरोधक शक्ति स्वयं ही बीमारियों से लड़ती और रोग-मुक्ति का साधन बनती है। चिकित्सकों से उपचारों द्वारा उसे थोड़ी सहायता ही मिलती है। इस प्रक्रिया की आश्चर्यजनक शक्ति को देखते हुए वैज्ञानिकों को दांतों तले उँगली दबाकर रह जाना पड़ता है। शरीर में लगा हुआ एक- एक कल पुर्जा इतना संवेदनशील और अद्भुत कारीगरी से भरा हुआ है कि उसे अपने आप बना हुआ, अपने आप काम करने वाला नहीं माना जा सकता।

प्राणियों की उत्पत्ति एवं विनाश की प्रक्रिया में सन्तुलन रहना एक ऐसा तथ्य है, जिसे किसी विचारवान् सत्ता का ही कार्य कहा जा सकता है। विभिन्न प्राणी अपनी सन्तानोत्पत्ति बड़ी तेजी से करते हैं। मनुष्य चार-छः बच्चे तो साधारणतः पैदा कर ही लेता है। सुअर और कुत्ते तो अपने जीवन काल में सौ-पचास बच्चे पैदा करते हैं। मक्खी,मच्छर, मछली, चींटी, दीमक आदि तो कई-कई सौ अण्डे देती है। मुर्गी को ही देखिए वह अपने जीवन में कई-सौ अण्डे देती होगी। यह उत्पादन-क्रम विश्व के लिए एक संकट सिद्ध हो सकता है। यदि एक भी प्राणी की यह वंश-वृत्ति निर्बाध गति से चले तो उसके बच्चे ही इस सारी धरती पर कुछ ही वर्षों में छा जावें और अन्य प्राणियों को खड़े रहने के लिए भी जगह न बचे। पर कोई सूक्ष्म सत्ता इस वृद्धि को नियन्त्रित करने के लिए रोग, युद्ध, दुर्भिक्ष, अभाव आदि पैदा करती रहती है और वे सीमित संख्या में उतने ही बने रहते हैं, जितने के लिए धरती पर गुंजाइश है। यदि ऐसा न होता तो करोड़ों वर्षों से चले आ रहे जीवधारी अब तक इतने हो गये होते कि उन्हें अन्य लोक में भेजने के अतिरिक्त और कोई मार्ग न रहता।

जिस ऋतु में जो रोग होता है, उसको शमन करने वाली जड़ी-बूटियाँ भी उसी ऋतु में होती हैं। फल, शाक और अन्नों के बारे में भी यही बात है। ऋतु की आवश्यकता के अनुसार ही पृथ्वी में से वनस्पति और फल-फूल पैदा होते हैं। जहाँ के निवासियों को वहीं की जलवायु और अन्न, शाक, औषधि अनुकूल पड़ती है। यह कार्य किसी विचारवान शक्ति का ही हो सकता है।

नियन्त्रण और सन्तुलन की यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया अपने आप होती रहे, ऐसा संभव नहीं। इसके पीछे कोई विचारशील चेतन सत्ता ही काम करती है। उस ज्ञानवान् चित्त-शक्ति को ईश्वर नाम दिया जाता है। उसके अस्तित्व से इन्कार करना, दिन रहते सूरज को न मानने जैसा दुराग्रह ही कहा जायेगा।


लक्ष्य ऊँचा हो और महान् भी

सामान्य व्यक्तियों के जीवनोद्देश्य बड़े निम्न निकृष्ट तथा दुर्बल स्तर के होते हैं। एक स्तर-सा बन गया है जिसमें मनुष्य की गतिविधियाँ अच्छा भोजन प्राप्त करने, अच्छे कपड़े पहने धन सत्ता आदि पर अधिक और बड़ा अधिकार पाने तक ही सीमित होती हैं। जीवन की सुख सुविधाओं के लिए यह क्रियायें उचित भी हैं किन्तु यह मनुष्य जीवन के उद्देश्य की पूरक मात्र हैं, स्वतः लक्ष्य नहीं। उन्हें ही जब अपनी आकाँक्षाओं का केन्द्र बिन्दु मान लेते हैं तो मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन में गतिरोध उत्पन्न होता है अर्थात् उसके धार्मिक तथा नैतिक जीवन में शिथिलता आ जाती है इसलिये आचारशास्त्र सदैव इस बात पर जोर देता रहा है कि मनुष्य का लक्ष्य और उसका जीवनोद्देश्य ऊँचा तथा महान् हो।

ऊँचे उठने के लिये हमारा उद्देश्य भी उतना ही ऊँचा होना चाहिये। रेल का ड्राइवर देखता है कि इंजन में भरे पानी का तापमान अभी 200 डिग्री फारेनहाइट है तो वह उसे स्टार्ट नहीं करता क्योंकि वह जानता है कि इतने तापमान से भाप बनना प्रारम्भ न होगी और न इंजन चलेगा। 210 डिग्री फारेनहाइट पर जब पानी उबलकर भाप बनने लगता है तो उस शक्ति से ही विशालकाय मालगाड़ी हजारों मील की दूरी तय करती हुई जाती है।

रेल के इंजन की तरह मनुष्य जीवन को भी शक्ति प्रदान करने वाली सत्ता का नाम है-उसका महान उद्देश्य। एक विद्यार्थी है जिसकी परिस्थितियाँ उसे विवश करती हैं, धन की कमी है, पुस्तकें नहीं हैं, ट्यूशन नहीं कर सकता, अच्छा फउन्टेनपेन भी उसके पास नहीं है, पर उसकी उत्कृष्ट अभिलाषा है कि वह शिक्षा प्राप्त करे तो वह हजार रास्ते ढूँढ़ लेता है। पुस्तकें कुछ अपने साथियों से उधार ले लेता है, कुछ पुस्तकालय से लेकर काम चलाता है। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर प्रकाश के अभाव में चौराहे की लालटेन के उजियाले में बैठकर पढ़ा करते थे और उत्तीर्ण भी अच्छे नम्बरों से होते थे। उनकी इस सफलता का श्रेय इस बात पर था कि उनकी पढ़ने की अभिलाषा इतनी प्रबल थी कि धन और किताब का अभाव उसके आगे कुछ नहीं कर पाते थे।

नेपोलियन बोनापार्ट, लिंकन, लेनिन, महात्मा गान्धी, लोकमान्य तिलक, महर्षि कर्वे आदि प्रमुख राजनीतिज्ञ तथा सामाजिक क्रान्तिकारियों ने जो सफलतायें पाई है उसका भी रहस्य यही है कि उन्होंने पहले उद्देश्य को जीवन्त, ज्वलन्त तथा प्रचण्ड बनाया था उनके फलस्वरूप उनमें वह शक्ति आई थी जो कोटियों विघ्न-बाधाओं को पद दलित करती चली गई और अन्त में उन्होंने अपने निश्चय को मूर्त रूप देने में सफलता प्राप्त की।

हम जो भी काम करें पूरे मन शरीर और इच्छा से करें। मामूली उत्साह से मनुष्य की शक्ति इंजन के पानी की तरह भाप नहीं बन पाती और थोड़ी सी चेष्टायें भी निष्फल होकर रह जाती हैं।

महान् उद्देश्य रखने वाले व्यक्ति का मन भी प्रचण्ड होता है। संचालक की शक्ति के अनुरूप ही उद्देश्य सफल होते हैं इसलिये जब केन्द्रित शक्ति से किसी काम में प्रवृत्त होते हैं तो सफलता स्वतः दौड़ी चली आती है। ढीले और पुरुषार्थविहीन कर्मों में किसी तरह की सजीवता नहीं होती है इसी से उनके परिणाम भी स्वल्प और स्वत्वहीन होते हैं। गीतकार ने बताया है-

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरु नन्दन।

बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्॥

अर्थात्-”निश्चयात्मक बुद्धि से ही कल्याणकारी परिणाम मिलते हैं किन्तु जिनकी बुद्धि कभी इधर कभी उधर दौड़ती रहती है वे पुरुष अज्ञानी हैं।”

यह सिद्धान्त ऐसे हैं जिन्हें भौतिक कर्मों में प्रयुक्त करके उनमें असाधारण प्रगति कर सकते हैं किन्तु अकेले उद्देश्य का महान् होना ही काफी नहीं है। उद्देश्य तो चोरी करना या औरों का धन अपहरण करना भी हो सकता है। दुष्ट दुरात्माओं के पक्के इरादों के आगे बड़े-बड़े सुरक्षा साधन भी हार मान लेते हैं। धन प्राप्त करना ही उद्देश्य हो तो अनेकों व्यवसाय चलाकर अपनी शक्ति तथा योग्यतानुसार बहुत-सा धन इकट्ठा कर सकते हैं किन्तु यह उद्देश्य बहिर्मुखी और चंचल हैं। इनमें वह स्थिरता नहीं होती जो परिस्थितियों को भी परास्त कर सके। अर्थात् बाह्य जीवन के सुख और साधन बहुत कुछ परिस्थितियों से भी प्रभावित होते हैं। अतः आज की सफलता असफलता में भी बदल सकती है इसलिये इन्हें टिकाऊ नहीं मानते और स्थिर लक्ष्यों की ओर दृष्टिपात करते हैं। अर्थात् उद्देश्य जितना हो उतना ही ऊँचा भी हो। निकृष्ट कोटि के उद्देश्य यदि प्रचण्ड हुये तो उनसे निज का जीवन तो दूषित होता ही है समाज में अनेकों बुराइयाँ, संघर्ष तथा मलिनतायें उत्पन्न होती हैं।

मनुष्य को अपना जीवन कार्य उस दृष्टि से देखना चाहिये जिस तरह कलाकार अपनी उत्कृष्ट रचना को देखता है। जिस रचना में कला और सौंदर्य का समन्वय रहेगा वह रचना निश्चय ही सर्वश्रेष्ठ सर्वप्रिय होगी। अकेले कला की दृष्टि से जीवन की रचना में सौंदर्य और मधुरता न रहेगी। आध्यात्मिक जीवन नीरस रहे तो संभवतः बहुत थोड़े व्यक्ति उधर अग्रसर हो सकेंगे। इसी तरह केवल सिद्धान्त या कलात्मक जीवन को भी पूर्ण और विकसित नहीं मान सकते। कर्म और भावना, कला और सौंदर्य के समन्वय से जिस तरह कलाकार की रचना उत्कृष्ट जान पड़ती है मनुष्य का जीवन भी उसी तरह भौतिक प्रगति और आध्यात्मिक विकास से सर्वांगपूर्ण बनता है। अकेली भौतिक प्रगति जिस तरह मनुष्य को सुखी नहीं रख सकती उसी तरह केवल धर्म पर स्थिर रहकर जीवन-रक्षा असम्भव है। ऋण और धन विद्युत धाराओं के संयोग से जिस प्रकार प्रकाश उत्पन्न होता है उसी तरह जीवन को सर्वांगपूर्ण बनाने के लिये हमारा जीवनोद्देश्य जितना महान् हो उतना ही उच्च आस्थाओं पर आधारित भी हो।

यह समन्वय ही मनुष्य को विशिष्ट और शक्तिवान् बनाता है। बाह्य उद्देश्यों में जो कमी है उसे आध्यात्मिक आस्थायें पूरी कर देती हैं इसलिये व्यक्तिगत जीवन को समुन्नत और सर्वांगपूर्ण बनाने के लिये जहाँ यह आवश्यक है कि हम पर्याप्त धन कमायें, परिवार बनायें, संगठन सहानुभूति सेवा और पुरुषार्थ द्वारा औरों की प्रगति में भी सहायता करें वहाँ यह भी आवश्यक है कि हमारा जीवन श्रद्धा और विश्वासमय हो। अखिल विश्व की नियामक सत्ता से विलगता का भाव ही मनुष्य के दुख और अस्थिरता का कारण है।

रसायनशास्त्र का यह सिद्धान्त है कि जब किसी ‘यौगिक’ को तोड़ा जाता है तो एक परमाणु अन्य परमाणुओं के आकर्षण से मुक्त हो जाता है, उस समय उसमें एक नई शक्ति आती है जिससे वह सजातीय तत्वों को आकर्षित करता है, किन्तु अकेला होने के कारण उसकी शक्ति कमजोर पड़ जाती है। मनुष्य भी उसी तरह जब तक अपने क्षुद्र स्वार्थों तक ही सीमित रहता है तब तक उसकी व्यक्ति तथा सामर्थ्य बिलकुल कमजोर बनी रहती है, यह कमजोरी ही मनुष्य को दुःख देती है किन्तु जब वह पूर्ण श्रद्धा तथा विश्वास के साथ अपने को विश्व सत्ता में समर्पित कर देता है तो उसका बल अनन्त हो जाता है उनकी प्रतिभा बहुमुखी हो जाती है तब जीवन में किसी तरह का अभाव शेष नहीं रहता।

यह जीवन बना ही कुछ इस तरह है कि इसमें सभी तरह के अभाव कष्ट देते हैं। भौतिक जीवन के अभाव व्यावहारिकता में और मनुष्य का अपने ही स्वार्थों तक निहित होना उसकी भावनाओं में ओछापन पैदा करता है इसलिये जीवन के किसी भी क्षेत्र में सुख का आभास नहीं होता। यह प्रक्रिया तब तक चलती रहती है जब तक मनुष्य एक निश्चित, महान और उत्कृष्ट लक्ष्य निर्धारित नहीं करता। सभी कसौटियों पर कसकर देख लिया जा सकता है सुखी जीवन का आधार समन्वय ही है। मनुष्य दूसरों के हितों को ध्यान में रखता हुआ भौतिक सम्पन्नता प्राप्त करे। इसके लिये उसमें खूब उत्साह हो, पर्याप्त लगन हो, पुरुषार्थ की क्षमता हो, पर साथ ही पारलौकिक जीवन के-सदुद्देश्य से भी वंचित न रहे। इसी तरह अपना जीवन सर्वांगपूर्ण बनता है इसी में मनुष्य का सच्चा सुख, चिर शान्ति सन्निहित है।


क्या सत्य, क्या असत्य?

संसार की प्रत्येक वस्तु और परिस्थितियों का स्वरूप सदैव बदलता रहता है। एक-सी स्थिति कभी भी नहीं रहती। छायापट के चित्रों की भाँति एक दृश्य बनता है दूसरा बिगड़ जाता है। ज्वालामुखी फटते हैं तो बड़े-बड़े पर्वत तराइयों में परिवर्तित हो जाते हैं। छोटे-छोटे द्वीप-समूहों का विस्तार होकर ही महाद्वीप बने हैं। वृक्ष-वनस्पति आदि सभी परिवर्तनशील हैं। प्रकृति अपने पञ्च-तत्वों से विविध खिलौने बनाती बिगाड़ती रहती है। इसी क्रम से सारा संसार चल रहा है। युग बीते, कल्प हुए और कई बार प्रलय हो चुकी किन्तु खेल रुका नहीं इसी भाँति सदैव दृश्यों का बनना और बिगड़ना जारी रहता है।

यह तथ्य सर्वमान्य है कि प्रत्येक क्रिया के पीछे कोई कारण या सिद्धान्त काम किया करता है। ऊपर से कोई वस्तु छोड़ते हैं तो पृथ्वी उस गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त से खींच लेती है। स्वर-कम्पनों को ईथर तत्व में गतिमान कर देने से यहाँ की आवाज सुदूर व्यक्ति तक पहुँचा देते हैं। संसार का क्रम भी किसी नियामक तत्व की इच्छा पर ही आधारित है। गीतकार ने इस बात को व्यक्त किया है :-

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।

उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥

अर्थात्- माया का अस्तित्व कभी रहता नहीं और सत्य तत्व (ब्रह्म) का कभी अभाव नहीं रहता। तत्वदर्शी इस अन्तर पर सम्यक् रूप से विचार करते हैं, और माया का परित्याग कर सत्य तत्व को धारण करते हैं।

माया का अर्थ, यहाँ परिवर्तनशील वस्तुओं के प्रति लगाव का भाव है। यह जानते हैं कि जन्म-मृत्यु यहाँ का नैसर्गिक क्रम है फिर भी दुःखी होते है, बाह्य अधिकार केवल जीवन धारण तक ही सीमित हैं, तो भी वस्तुओं के प्रति लोगों की आसक्ति इतनी प्रबल होती है कि उन पर अकारण लड़ते-झगड़ते रहते हैं। तत्व-ज्ञानियों ने इसीलिए इस रूप परिवर्तनीय माया को झूठा बताया है और उस अनादि तत्व ब्रह्म को जानने की प्रेरणा दी है।

विचार करते हैं तो स्पष्ट हो जाता है कि काम, क्रोध, लोभ और मोह तथा इनसे सम्बन्धित अन्य क्रिया व्यापार का जहाँ भी विस्तार होता है, वहाँ असत् वस्तुओं के प्रति व्यक्तियों का लगाव, रुचि और आकर्षण अधिक होता है। इसी कारण यहाँ की दुःखपूर्ण परिस्थितियों में भी सुख का-सा आभास हुआ करता है, परिणाम स्वरूप मनुष्य अपने को एक इकाई मान कर इतने से जीवन के क्षेत्र में ही चक्कर काटता रहता है। यह संसार और यहाँ की वस्तुएँ ही उसे प्रिय लगती हैं। पारलौकिक जीवन की चिन्ता तब तक नहीं होती, जब तक असत् का मोह मनुष्य के अन्तःकरण में छाया रहता है। इसलिये बार-बार कहा जाता है कि संसार और साँसारिक वस्तुओं से --उतना ही लगाव रखो, जितने में पारलौकिक जीवन की आवश्यकताओं पर आघात न लगे। अनावश्यक वस्तुओं का व्यामोह ही बार-बार जीवात्मा को खींच लाता है। जन्म मृत्यु का क्रम इसीलिए बना रहता है कि लोगों को असत् के प्रति अधिक आकर्षण होता है।

यह आकर्षण कभी स्वेच्छा से कम नहीं होता, वरन् एक से एक अधिक मोहक रूप सामने आते रहते हैं। एक बार के उपभोग से जितना सुख मिला था, दूसरी बार का सुख अपनी कल्पनाशक्ति और बढ़ा-चढ़ाकर लुभावने रूप में प्रस्तुत कर देती है। बस, दूसरे प्रयत्न में लग जाते हैं, हजार-पती होने की अपेक्षा लखपती होने में अधिक सुख, सम्मान और गौरव दिखाई पड़ता है, इसलिए उतने से भी तुष्टि नहीं होती। अधिक से अधिक प्राप्त करने की लोभ-वृत्ति छूटती नहीं। भगवान् कृष्ण ने कहा है :-

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णा संगसमुद्भवम्।

तन्निवघ्नाति कौन्तेय कर्म संगेनिदेहिनम्॥

अर्थात्-एक वस्तु का आकर्षण समाप्त नहीं होता कि दूसरी सामने आ उपस्थित हो जाती है, इस प्रकार संसार की वस्तुओं के प्रति आसक्ति और लोभ की वृत्ति ही मनुष्य को आवागमन के चक्कर में बाँधे रहती है।

मनुष्य की बुद्धि में जब स्वार्थ की संकीर्णता अधिक बढ़ जाती है तो उसकी प्रवृत्ति रजोगुण से तामसिक इच्छाओं की ओर बढ़ने लगती है। अर्थात् भोग ही जीवन का लक्ष्य बन जाता है। तब उचित और अनुचित का ध्यान भी नहीं रहता। ऐसी संकीर्णता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अहितकर होती है। आन्तरिक मलिनता के कारण व्यक्ति गत जीवन में क्षोभ, असन्तोष, कलह और पश्चाताप की निराशापूर्ण परिस्थितियाँ मनुष्य को प्रताड़ित करती हैं और समाज में भय, प्रतिहिंसा, प्रतिशोध और अन्याय का परिमाण बढ़ने लगता है। एक व्यक्ति के पाप और अपराध अनेक व्यक्तियों के जीवन में उतरते चले जाते हैं। फलस्वरूप समाज में नारकीय यन्त्रणायें भीषण रूप से बढ़ जाती हैं। इस तरह जीवन का सात्विक सुख भी विनष्ट हो जाता है। चारों ओर ये ही लक्षण परिलक्षित होने लगते हैं।

किसी भी अवस्था में बाह्य-जीवन की सफलता, साँसारिक सुख और उनके भोग की लालसा को जीवन का ध्येय नहीं मान सकते क्योंकि इनसे शारीरिक शक्तियों का पतन तीव्रता से होता है और वह समय जल्दी ही आ जाता है जिस समय मनुष्य के सम्पूर्ण दैहिक साधन अनुपयुक्त पड़ जाते है।

यह लगाव तभी तक सार्थक हो सकते हैं, जब तक देह है। मृत्यु के क्षणों में भी यह विचार संस्कार रूप से विद्यमान रहते हैं, इस कारण से जीवात्मा को घोर अशान्ति होती है, पर तब बनता कुछ नहीं। सत्य प्रकट होता है तो भारी पश्चाताप होता है, अपने विगत जीवन पर। किन्तु तब लाभ कुछ नहीं होता। हीरे का जीवन कौड़ियों के मोल बिक गया, फिर कैसी शान्ति और कैसा असन्तोष?

इसलिए जो समय रहते विचार करले, वही बुद्धिमान है। शास्त्रकार बार-बार कहता है :-

सत्यव्रतं सत्यपरं मिसत्यं सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये।

सत्यस्य सत्यमृत सत्यनेत्र सत्यात्मकं त्वाँ शरणं प्रपन्नाः॥

अर्थात्-हे मनुष्यों! यह संसार जिस सत्य के समावेश होने के कारण जीवनमय जान पड़ता है, उस सत्संकल्प, सत्यस्वरूप, त्रिकाल सत्य और सत्य का अधिष्ठान करने वाले परम पिता परमेश्वर को जानो।” अर्थात् मनुष्य को इस बात का सदैव ध्यान बनाये रखना चाहिए कि वह सत्य से विलग होकर केवल असत्य कर्मों में ही न लगा रहे।

यह बात और अधिक स्पष्ट होती है। जीवन और मृत्यु की अवस्थाओं पर एक क्षण विचार कीजिए। अपनी तुलना सामने पड़े शव से करिये, देखिए-क्या आप में, इसमें समानता नहीं है। वही हाथ, पाँव, कान, आँख सभी कुछ ठीक अपने जैसे ही हैं, किंतु उसमें चेष्टा का जो अभाव है उसके कारण ही देहधारी को “शव” का विशेषण दिया है। प्राण और शरीर की विलगता क्या यह सोचने का विवश नहीं करती कि यह संसार दो भागों में विभक्त है, जड़ और चेतन। असत्य और सत्य। साधन और विचार की इस निर्जीविता और चैतन्यता पर जो ध्यान देता है, उसे यह वैज्ञानिक तथ्य स्पष्ट दिखाई दे सकता है। इसी को जानने की चेष्टा का नाम सत्य की खोज करना और पा लेने को जीवन सिद्धि मानते हैं।

इस संसार में परमात्मा की ही सत्ता सर्वत्र व्याप्त है। उसी की प्राण प्रक्रिया के परिणाम में यह दृश्य जगत बना है। यह मनुष्य के उपभोग के लिए नहीं है यह कहना उद्देश्य नहीं है। इन पंक्तियों में निहित तथ्य यह है कि मनुष्य के समक्ष जो अकारण दुःख, शोक और निराशा के परिणाम में आता है वे ईश्वर-कृत नहीं हैं। मनुष्य के सत्यासत्य के ज्ञान के अभाव के कारण और साँसारिक वस्तु और परिस्थितियों के कारण ही ऐसी स्थिति आती है। सत्य के अनुशीलन से मनुष्य के मोह-बन्धन टूटते हैं, कुत्सित आचरण से भय पैदा होता है, स्वार्थ की संकीर्णता समाप्त होती है। इन दुर्गुणों के दूर होने से ही शाश्वत शान्ति की उपलब्धि होती है। आत्म-सन्तोष प्राप्त करने का और कोई रास्ता इस संसार में है ही नहीं।


धर्म ही रक्षा करेगा, और कोई नहीं!

यह जीवन इस तरह विनिर्मित हुआ है कि इसमें संघर्ष, परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव, दैन्यता, कुटिलता आदि के अप्रत्याशित आक्रमण सभी को सहन करने पड़ते हैं। परेशानियों, कष्ट और मुसीबतों की आँधी आती है तो मनुष्य को झकझोर कर रख देती है, उसकी शक्तियाँ कुण्ठित हो जाती हैं। बुद्धि ठीक तरह काम नहीं करती, निराशा आ घेरती है। ऐसे समय एक चाह उत्पन्न होती है- कौन हमारी रक्षा करे, कौन हमारा उद्धार करे, सही पथ का ज्ञान कौन कराये?

शास्त्रकार समुद्यत हुआ, उसने बताया :-

यो धर्मा जगदाधारः स्वाचरणे तमानय।

मा विडम्बय तं स ते ह्येकामार्गे सहायकः॥

अर्थात् -हे मनुष्यों! जो धर्म सारे संसार का आधार है, तुम उसी का आचरण करो। धर्म से विमुख मत बनो। तुम्हारा एक मात्र सहायक धर्म ही है।”

यह सच है कि संसार के सम्पूर्ण क्रिया, व्यवसाय, धर्म के कारण ही टिके हैं। सुख और शान्ति की परिस्थितियों का जन्म-दाता धर्म है। लोक-जीवन में वह आज भी किसी न किसी रूप में विद्यमान है। जिस दिन धर्म का पूर्णतया लोप हो जायगा, उस दिन संसार को सर्वनाश से कोई बचा न सकेगा।

इस युग में जो अधर्माचरण बढ़ रहा है, उससे मनुष्य की नैतिक अवस्था, सुख और शान्ति में बड़ा व्याघात उत्पन्न हो रहा है। किसी के मन में सन्तोष नहीं हैं। मात्र स्वार्थ, भोग और शोषण का जाल फैला है। इस जंजाल में ग्रसित मनुष्य बुरी तरह छटपटा रहा है, पर त्राण का कोई रास्ता उसे सूझ नहीं रहा है।

राह एक ही है-धर्म। वेद, उपनिषद्, स्मृति, पुराण आदि धर्म शास्त्रों में इसी तत्व का निरूपण हुआ है। जिस युग में धर्म की प्रधानता रही, वह युग-’सतयुग‘ कहलाया। सतयुग में सुख और संपन्नता का आधार धर्म होता है। इसकी विकृति और विडम्बना ही कलियुग में दुःख, क्षोभ और अशान्ति का कारण बनती है।

कि सी भी अवस्था में मनुष्य की रक्षा धर्म ही करता है। भगवान् राम बन जाने के लिए तैयार हुए तो जीवन रक्षा की कामना से उन्होंने माता से आशीर्वाद माँगा। विदुषी कौशल्या ने कहा :-

यं पालयसि धर्मं त्वं प्रीत्या च नियमेन च।

स वै राघवशार्दूल धर्मस्तवामभिरक्षतु॥

अर्थात्-हे राम! तुमने जिस धर्म की प्रीति और नियम का पालन किया है, जिसके अनुसरण से तुम वन जाने को तत्पर हुए हो, वही धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा।’

धर्म शब्द “ध्वै” धातु से बना है, जिसका अर्थ है- धारण करना। अर्थात् जो मनुष्य को धारण करे, शुद्ध और पवित्र बना कर उसकी रक्षा करे, वही धर्म है। धार्मिक कर्मकाण्ड, दान-पुण्य, पूजा-पाठ, अर्घ्य-अंजलि आदि धर्म के साधन और बाह्य प्रतीक मात्र हैं, यथार्थ धर्म तो-परोपकार, दूसरों की सेवा, सचाई, संयम और कर्तव्य-पालन को कहते हैं। धर्म पर चलने का अर्थ है, इन बातों का पालन करना। इन्हें अपने व्यवहार और आचरण में आश्रय देना।

यह नियम ही सर्वश्रेष्ठ हैं, इनसे मनुष्य जीवन में एक प्रकार का विलक्षण आह्लाद भरा रहता है। धर्म मनुष्य जीवन की अग्नि शिखा है, जो प्रकाश भी उत्पन्न करती है और उसकी क्रियाशीलता भी जागृत रखती है। धर्मशील पुरुष के अन्तःकरण में वह बल होता है, जो हजारों, विघ्नों, कोटियों प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त कर देता है। भगवान् राम वन में अकेले थे, विपदायें आईं, विरोध उत्पन्न हुए, किन्तु उनकी मर्यादा पर कोई आँच नहीं आई। सत्य हरिश्चन्द्र ने धर्म की रक्षा के लिए स्त्री-पुत्र, राज्य आदि सर्वस्व परित्याग कर दिया, पर अन्त में महर्षि विश्वामित्र को उनके समक्ष घुटने टेकने ही पड़े। “यतोधर्मस्ततो कृष्णः” इस वचन का समर्थन स्वयं भगवान कृष्ण ने किया है :-

मम प्रतिज्ञाँ च निबोध सत्याँ,

वृणे धमंममृताज्जीविताच्च।

राज्य च पुत्राश्च यशो धनं च,

सर्बं न सत्यस्य कलामुपैति॥

अर्थात्—मेरी प्रतिज्ञा अटल है। मैं जीवन और मोक्ष से धर्म को श्रेष्ठ मानता हूँ। राज्य, पुत्र, यश और धन ये सब सत्य अर्थात् धर्म की एक कला के भी बराबर नहीं हैं।

किन्तु देखते हैं-इस युग में पाप और अधर्म ही अधिक बढ़ रहा है। धर्म के नाम पर जो अधर्माचरण का इन्द्रजाल फैला हुआ है, उससे धर्म का सही रूप ही विलुप्त हो चला है। इसे लोगों ने ठगी का मार्ग बना लिया है, पर इससे कुछ लाभ नहीं होता। धर्म का फल पाना है, तो इसे अपने जीवन में घुला डालो। आपके प्रत्येक रोम-रोम में, विचार और कर्म में सर्वत्र ही धर्म समाविष्ट हो तो आप एक अलौकिक आनन्द से प्रत्येक क्षण भरे-पूरे रहेंगे।

धर्म अनादि तत्व है। यह एक प्रकार का दैवी सन्देश है। जिस समय लोगों में भाषा, साहित्य और विचार-प्रदर्शन की क्षमता नहीं थी, उस समय मनुष्य के समक्ष धर्म-अधर्म का प्रश्न उपस्थित हुआ। तब लोग अपने अन्तःकरण की आध्यात्मिक प्रेरणा को प्रमाण मानते थे और उसी के अनुसार आचरण करते थे। इससे यह प्रकट होता है कि धर्म, मानव समाज के नियम या प्रतिबन्ध नहीं हैं, वरन् यह वह दृढ़तम विचार है, जो सम्पूर्ण संसार की भलाई को ध्यान में

रखकर परमात्मा द्वारा प्रस्फुटित किया गया है।

इसलिए उन नियमों को, जिनमें—सार्वभौमिकता की उदार-भावना सन्निहित हो, पालन करना ही धर्म माना जाता है। स्वार्थ और भय के कारण इन नियमों का उल्लंघन करना ही अधर्म है। परपीड़न, द्वेष, निन्दा, छल, कपट, झूठ, बेईमानी आदि बुराइयाँ मनुष्य की स्वार्थपूर्ण संकीर्णताओं के कारण होती हैं। इनसे “सर्वजन हिताय” की सामूहिक भावना का अतिक्रमण होता है। जिससे दूसरों को दुःख मिले या औरों के हितों पर आघात पहुँचे, वह धर्म नहीं कहा जा सकता। धर्म का श्रेष्ठ स्वरूप वह है, जिसमें मनुष्य सबके कल्याण के लिए अपने को घुलाता है। दूसरों को सुखी देखने के लिए अपने थोड़े-से सुखों का भी परित्याग कर देता है। सबकी रक्षा के लिए जो अपने प्राण हवन कर देता है, वह सच्चा धर्मनिष्ठ कहलाने का अधिकारी है।

धर्म परस्पर भेदभाव करना नहीं सिखाता। वह तो मनुष्य में प्रेम और प्रतीति उत्पन्न करता है। सबको भाई मानना और सबके साथ समानता का व्यवहार करना ही उसे प्रिय है। वह जाति-पाँति के, जीव-जीव के शारीरिक भेद को नहीं मानता। आत्मा सर्वत्र


Quotation

न काष्ठे विद्यते देवो न पाषाणे न मृन्मये।

भावे हि विद्यते देवस्तस्माद् भावस्तु कारणम्॥

देवता काष्ठ , पाषाण या मिट्टी में नहीं रहते।

उनका निवास तो भावना में है। इसलिए भावना ही प्रधान कारण है।

गेह मेवोपशान्तस्य विजनं दूर काननम्।

अशान्तस्याप्यख्यानि विजना सजनापुरी॥

शान्त मन वाले के लिए घर ही निर्जन वन है और अशान्त व्यक्ति के लिए निर्जन वन भी कौलाहलपूर्ण है।

प्रकाशमय है, वही सम्पूर्ण प्राणियों में समाया है फिर एक प्राणी की दूसरे प्राणी के साथ विलगता कैसी? यह दुराव क्यों हो, जब तात्विक दृष्टि से हममें कोई भेद नहीं है। धर्म एक आध्यात्मिक तत्व है, वह निर्मल है, पवित्र है और जिस मनुष्य के पास रहता है, उसे भी निर्मल अन्तःकरण वाला बना देता है। कहते हैं—सोहागे से सोने के रंग-रूप में निखार आता है, मनुष्य में निखार और तेजस्विता धर्म जगाता है। धर्म ही मनुष्य -जीवन का प्राण है।


अपनी संस्कृति की रक्षा कीजिए

आजकल संस्कृति का अर्थ बहुत सीमित रूप में लिया जाना लगा है। भारतीय जीवन,कला-कौशल, ज्ञान विज्ञान, हमारे सामाजिक जीवन, व्यापार, संगठनों, उत्सव, पर्व, त्यौहार आदि जिनके सम्मिलित स्वरूप से हमारी संस्कृति का बोध होता था वहाँ आज संस्कृति का अर्थ खुदाई में प्राप्त प्राचीन खण्डहरों के स्मृति-चिह्न, नृत्यांगनाओं के कार्य-क्रम, या कुछ प्राचीन तथ्यों के पढ़ने लिख लेने तक ही संस्कृति की सीमा समझ ली जाती है। प्राचीन ध्वंसावशेषों की खुदाई करके संस्कृति के बारे में तथ्य निर्णय करने के प्रयत्न पर्याप्त रूप में होते जा रहे हैं। यह सब प्राचीन इतिहास और हमारे साँस्कृतिक गौरव की जानकारी के लिए आवश्यक भी है लेकिन इन्हीं तथ्यों को संस्कृति मान लेना भारी भूल है। भारतीय संस्कृति तो एक निरन्तर विकासशील जीवनपद्धति रही है, उसे इन संकीर्णताओं में नहीं बाँधा जा सकता। इतिहास के रूप में उसे एक अंग अवश्य माना जा सकता है।

आजकल साँस्कृतिक कार्य-क्रमों के नाम पर नृत्य-संगीत के कार्य-क्रम होते देखे जाते है। यद्यपि नृत्य-संगीत कला, आमोद-प्रमोद भी हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग हैं लेकिन इन्हें ही साँस्कृतिक आदर्श मानकर चलना संस्कृति के बारे में अज्ञान प्रकट करना ही है। हमारी संस्कृति केवल नाच गाने तक ही सीमित नहीं है। इसमें जहाँ आनन्द उल्लास का जीवन बिताने की छूट है वहाँ जीवन के गम्भीर दर्शन से मनुष्य को महा-मानव बनने का विधान भी है। हमारे यहाँ का ऋषि कला का साधक भी होता था, तो जीवन और जगत के सूक्ष्मतम रहस्यों का उद्गाता-दृष्टा भी । पर्व त्यौहारों के रूप में सामूहिक आनन्द उल्लास का जीवन भी बताया जाता था तो सामाजिक, राजनैतिक सुधारों पर ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में गम्भीर विचार विमर्श भी होता था। ऐसी थी हमारी संस्कृति । उसे केवल नृत्य संगीत के कार्य -क्रमों तक सीमित रखना उसके महत्व को न समझना ही है। बहुत कुछ अर्थों में संस्कृति, इतिहास की तरह पढ़ने लिखने की वस्तु मान ली गई है। हमारे दैनिक जीवन में साँस्कृतिक मूल्य नष्ट होते जा रहे हैं। संस्कृति के सम्बन्ध में खोज करने वाले स्वयं साँस्कृतिक जीवन नहीं बिताते। उनका रहन-सहन आहार-विहार जीवन-क्रम सब विपरीत ही देखे जाते हैं।

भारतीय संस्कृति के लिये एक सबसे बड़ा खतरा है, वह है—पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार अभियान। इसकी शुरुआत तभी से हो गई थी जब से अंग्रेज यहाँ पर आए थे। अपने शासन काल में उन्होंने सभी प्रकार अपनी संस्कृति के प्रसार की नींव मजबूत करली। ईसाई मिशनरियों के द्वारा प्रचार और स्कूल कालेजों में शिक्षा के माध्यम से ईसाइयत का प्रसार भारत में शुरू किया और यह आज के स्वतन्त्र भारत में बढ़ा ही है कम नहीं हुआ है।

संस्कृति के इस प्रचार अभियान के कारण प्रतिवर्ष लाखों भारतीय ईसाई बन रहे हैं। स्वदेशी रहन-सहन, भाषा,भाव विचारों का परित्याग करके वे अपने साँस्कृतिक गौरव को भुला रहे हैं। उधर विदेशी लोग अपनी संस्कृति के प्रसार के लिए चलाए जाने वाले समस्त ईसाई चर्च, स्कूल, अस्पताल सेवा संस्थायें आदि मूल रूप में ईसाइयत के प्रचार संस्थान हैं। ये लोग भारतीयों की आस्थाओं को नष्ट करके, बहका-फुसलाकर, नौकरी, विवाह, शिक्षा तथा, अन्य वस्तुओं का लोभ देकर उन्हें अपनी संस्कृति में रंग रहे हैं। आसाम, बम्बई, महाराष्ट्र,बिहार, उड़ीसा, केरल, मध्य प्रदेश, मद्रास के आदिवासी क्षेत्रों में ईसाई मिशनरी पूरे जोर-शोर के साथ अपना काम कर रहे हैं। इस सम्बन्ध में जाँच,पड़ताल करने पर बड़े सनसनी पूर्ण तथ्य मिलते है।

ईसाई स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली बहुत सी पुस्तकों में हमारी संस्कृति के आदर्श नायक राम और कृष्ण के सम्बन्ध में घृणित विचार मिलते हैं। एक पुस्तक के अनुसार वह (श्रीकृष्ण ) चोर था, उसने निरपराध धोबी का वध किया। ऐसे देवताओं की पूजा करना मूर्खता है।” इसी तरह भगवान राम के बारे में-” राम बड़ा पापी था उसने रावण का वध किया।” फिर इस तरह हिन्दू-संस्कृति के आधारों के प्रति आस्था नष्ट करके वे ईसा के प्रति भक्ति जगाते हैं। उसे मानव का कल्याणकारी बताकर लोगों को उसकी पूजा करने, ईसाई बनने का कूटनीतिक प्रयत्न इन ईसाई मिशनरियों द्वारा हमारे देश में कम नहीं चल रहा। इससे हमारी संस्कृति की नींव ही खोखली होती जा रही है। भारतीय समाज का एक बहुत बड़ा भाग आज ईसाई बनकर अपनी प्रेरणा और जीवन-पद्धति का आधार पश्चिम को मानकर चलता है। ये लोग भारत में इस तरह रहते हैं मानो ये विदेशी हों। कैसी विडंबना है?

हमारी संस्कृति के लिए विदेशियों द्वारा जहाँ ईसाइयत के प्रचार का खतरा है, उससे कम खतरा अपने स्वयं के पश्चिम अनुकरण के प्रयास का भी नहीं है। हम लोग अपने रहन-सहन जीवन-पद्धति, विचारों की प्रेरणा के लिए पश्चिम की ओर देखते हैं। उनका अनुकरण करते हैं। जहाँ तक अपनी संस्कृति का सवाल है हम उसे भूलते जा रहे हैं । आज हमारी बोली भाषा वस्त्र, रहने का ढंग विदेशी बनता जा रहा है।

स्वच्छ और सादा ढीले वस्त्र जो हमारी भौगोलिक स्वास्थ्य सम्बन्धी परिस्थितियों के अनुकूल थे उनकी जगह पश्चिम का अनुकरण करके भारी गर्मी में भी कोट पैन्ट पहनते हैं। आज का शिक्षित समाज वस्त्रों की दृष्टि से पूरा पश्चिमी बन गया है। धोती-कुर्ता पहनने में बहुत से लोगों को शर्म और संकोच महसूस होती है। पढ़े लिखे लोगों में अँग्रेजी बोलना एक फैशन बन गया है। हिन्दी, संस्कृत या अन्य देशी भाषा बोलने में मानों अपना छोटापन मालूम होता है। दिवाली आदि पर्व त्योहारों पर, किन्हीं साँस्कृतिक मेलों पर, हममें वह उत्साह नहीं रहा, लेकिन ‘फर्स्ट अप्रैल फूल’ ‘बड़ा दिन’ जैसे पश्चिमी पर्व-त्यौहार मनाने में हम अपना बड़प्पन समझते हैं।

एक समय था जब विश्व के विचारक साहित्यकार भारत से प्रेरणा और मार्ग-दर्शन प्राप्त करते थे। इसे अपना आदिगुरु मानते थे। इसे सभी विदेशी विद्वानों ने स्वीकार किया है। लेकिन आज हमारे देश में इससे विपरीत हो रहा है। आज हम साहित्यिक विचार साधना, के क्षेत्र में पश्चिम का अनुकरण करते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि हमें वहाँ के साहित्य का अध्ययन नहीं करना चाहिए यह तो किसी भी विचारशील व्यक्ति के लिए आवश्यक है, किन्तु अपने मौलिक-साँस्कृतिक तथ्यों प्रेरणाओं को भुलाकर पश्चिम का अन्धानुकरण करना हमारी संस्कृति के लिए बड़ा खतरा है। इससे वह कमजोर होती है।

एक सबसे बड़ी बात यह है कि हममें भारतीयता का, अपनी संस्कृति का, गौरव नष्ट होता जा रहा है। भारतीय कहलाने में हमारा सीना तन नहीं जाता। अपनी संस्कृति के प्रति हममें भक्ति भावना, निष्ठा आज नहीं रही है, ऐसी निष्ठा, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने अनगिनत कष्ट सहे थे, बड़े-बड़े प्रलोभनों को ठोकर मार दी थी।

पाश्चात्य देशों ने जहाँ अपनी संस्कृति, सभ्यता के प्रचार के लिए करोड़ों रुपया बहाया है, अनेकों कष्ट सहे हैं, वहाँ हमने अपनी संस्कृति के प्रति पूरी-पूरी वफादारी भी नहीं निभायी है। काश! हमने इस सम्बन्ध में थोड़ा भी प्रयत्न किया होता तो आज संसार की स्थिति इससे भिन्न होती । ईसाइयत के स्थान पर आज भारतीय संस्कृति- मानव- संस्कृति का प्रभुत्व होता, जो संसार को तोड़ने के बजाय जोड़ती, विनाश के बजाय पालन पोषण के साधनों की खोज करती। विघटन के स्थान पर एक-सूत्रता पैदा करती। बुद्धि चातुर्य, छल छद्म कूटनीति के स्थान पर हार्दिकता बढ़ती।

आज के युग में हमारे लिए बहुत बड़ी चुनौती है कि हम अपनी संस्कृति को नष्ट होने से बचायें। इसके प्रति आस्थावान् बनें। साँस्कृतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारें। साथ ही इसका प्रचार- प्रसार भी करें।


वाणी का दुरुपयोग मत कीजिए

विश्व का संचालन करने वाली सार्वभौम शक्तियों का स्वर कभी सुनाई नहीं पड़ता और वे चुपचाप अपना कार्य करती रहती हैं, संसार में ऋतुयें आती हैं, मौसम बदलते हैं, ग्रह नक्षत्र अपनी-अपनी परिधि में चक्कर लगाते रहते हैं। सृजन पोषण नाश की लीला होती रहती है। संसार में अनेकों उथल-पुथल हलचलें होती हैं, किन्तु जिस शक्ति की प्रेरणा से यह सब होता रहता है उसका स्वर कभी सुनाई नहीं देता।

इंजन को गति देने वाली भाप चुपचाप बड़ी मुस्तैदी के साथ अपना काम करती है। लम्बी चौड़ी भारी भरकम रेलगाड़ी को मंजिल तक पहुँचाती है किन्तु उसकी आवाज कभी नहीं सुनाई पड़ती। व्यर्थ में बाहर निकलने वाली भाप अधिक शोर मचाती है।

मौन में अजेय शक्ति है। मौन से समस्त शक्तियों का केन्द्रीय करण होता है। जीवन के बाह्य पटल पर यत्र-तत्र बिखेरी हुई जीवनी-शक्ति मौन के बाँध में जब एकत्रित करली जाती है तो वह उसी तरह शक्ति शाली, घनीभूत हो जाती है जैसे बाँध में रोकी गई नदी। शक्ति और क्षमतायें सदैव मौन की गोद में ही पलती हैं। संसार के महापुरुषों ने जो भी महत्वपूर्ण काम किए हैं वे सब ठण्डे दिल और ठण्डे दिमाग से ही सम्पन्न हुए हैं। किसी भी महान् कार्य के सम्पादन के लिए समस्त अन्तर एवं बाह्य प्रवृत्तियों को एकत्रित करके उन्हें लक्ष्य पर लगाना पड़ता है। महत्वपूर्ण कार्य मौन से ही सम्भव होता है।

भौतिक विज्ञान का नियम है, जो वस्तु या जिस मशीन के पुर्जों में संघर्ष जितना कम होगा, वे जितनी समस्वरता से कार्य करेंगे उतनी ही वह मशीन टिकाऊ एवं शक्ति शाली होगी। मौन भी मनुष्य के जीवन में समस्वरता प्रदान कर उसे अधिक टिकाऊ प्रभावशाली महत्वपूर्ण बना देता है। जिस मनुष्य के अन्तर बाह्य जीवन में और आदर्शों में पर्याप्त सामञ्जस्य होगा, किसी तरह का संघर्ष, गतिरोध न होगा, वह व्यक्ति महत्वपूर्ण, शक्ति शाली सिद्ध होगा और सन्तुलित होगा। यह सब मौन की ही देन है।

मौन से जहाँ शक्ति , प्रवृत्तियों और मन की गति का नियन्त्रण होता है वहाँ स्वास्थ्य के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण वरदान है। मौन से मनुष्य के हृदय, मस्तिष्क स्नायु संस्थान और शरीर की पेशियाँ पर्याप्त विश्राम प्राप्त करती हैं। किसी तरह का तनाव दबाव न होने से वे तरोताजा कार्यक्षम एवं शक्ति शाली बने रहते हैं। जिस तरह विश्राम निद्रा आदि से शरीर और मन पर होने वाला तनाव दूर होता है उसी तरह मौन से मन, मस्तिष्क, शरीर आदि को पर्याप्त विश्राम मिलता है और उनमें यह शक्ति , स्फूर्ति तथा सजीवता बनी रहती है।

आध्यात्मिक विकास के लिए मौन को महत्वपूर्ण साधना माना गया है। समस्त वृत्तियों को एकाग्र करके जीवन की गति में सामञ्जस्य एवं समस्वरता प्राप्त कर जब मनुष्य चेतना की गहन अन्तरात्मा में प्रवेश करता है तो एक दिन वह विराट की उस परमसत्ता का साक्षात्कार करता है जिसे योगी, तपस्वी, मोक्षार्थी श्रेयार्थी सभी अपना लक्ष्य बनाकर कठिन साधनायें करते हैं। मौन मनुष्य के समक्ष जीवन, संसार और प्रकृति के रहस्यों को एक-एक कर खोल देता है। मौन की गति सर्वत्र ही होती है। इस तरह वह शीघ्र ही समस्त की अनुभूति, दर्शन प्राप्त कर लेता है। मौन से दुष्प्रवृत्तियों का संयम होकर शील सदाचार, सादगी, सौजन्यता, सदाशयता जैसे महत्वपूर्ण सद्गुणों की प्राप्ति होती है। इस तरह मौन की साधना से मनुष्य का अन्तर-बाह्य जीवन दिव्य बन जाता है।

अधिकाँश महत्वपूर्ण गम्भीर प्रश्नों का समाधान मौन से होता है क्योंकि मौन की अवस्था में मनुष्य को आत्मा की वाणी सुनाई पड़ती है। मुक्त चेतना के प्रतिबिम्ब में जब प्रश्न का समाधान निकल कर आता है तो उससे मनुष्य को सन्तोष प्राप्त होता है। मौन की स्थिति में मनुष्य को प्रकृति और विश्व- चेतना का स्पन्दन सुनाई देता है जिसमें वे सत् चित् आनन्द की मधुर ध्वनि सुन कृतार्थ हो जाते हैं, फिर और कुछ भी सुनने को शेष नहीं रह जाता।

मौन से वाणी की शक्ति प्रबल होती है। शाप और वरदान इसी शक्ति शाली वाणी के रहस्य हैं। नियमानुसार कोई भी शक्ति व्यय से जितनी रोकी जायगी उतनी ही अभ्यस्त और शक्ति शाली बन जायगी। अन्धे व्यक्तियों को देखा जाता है कि उनकी प्रज्ञा मेधा बड़ी तीव्र होती है। क्योंकि नेत्रों से मनुष्य की बहुत कुछ मानसिक शक्ति नष्ट होती रहती है। गान्धारी ने जीवन भर आँखों से पट्टी बाँधी रखी। जब दुर्योधन के शरीर पर जहाँ भी उसकी दृष्टि पड़ी वह वज्रवत मजबूत बन गया। यही बात वाणी के सम्बन्ध में भी लागू होती है। सदैव मौन रहकर चिन्तन-मनन करने वाले ऋषि महात्माओं के आशीर्वाद वरदान, का सत्य इसी मौन के निहित में रहा है। वाणी का संयम मौन वाणी में ओज, तेज, शक्ति , चैतन्य भर देता है।

दिन भर बकझक करते रहना, गप्पे लड़ाना अनावश्यक बोलते रहना, अपनी प्रवृत्तियों को नाना दिशाओं में स्वच्छन्द विचरण करने देना अपनी शक्ति को नष्ट करना है। अनावश्यक बोलते रहने से मनुष्य की शारीरिक मानसिक शक्तियाँ इतनी तेज से क्षीण होती हैं कि थोड़ी देर बाद ही थकावट महसूस होने लगती है। छिछली नदी बड़ी आवाज करती हुई बहती है, किन्तु उसका अन्त भी जल्दी ही आ जाता है। वह जल्दी ही सूख जाती है। वाचाल और असंयमी व्यक्ति की जीवनी शक्ति जल्दी ही नष्ट हो जाती है। उसके व्यक्तित्व में कोई वजन और जीवट शेष नहीं रहता।

मौन की उपेक्षा करने वाले असंयमी व्यक्ति उस मूर्ख किसान की तरह हैं जो रेतीली और बंजर अनुपजाऊ धरती में अपना कीमती बीज बिखेरते फिरते हैं। अन्त में उन्हें असफलता और पश्चाताप का सामना करना पड़ता है। व्यर्थ ही शब्दों के वाद-विवाद, गपशप, दलीलबाजी, निन्दा-स्तुति में दूसरों को बहकाने में अपनी शक्तियों को नष्ट करते रहने वाला व्यक्ति जीवन के महत्वपूर्ण लाभों से वंचित ही रहता है। सच तो यह है कि ऐसे व्यक्ति का जीवन भी एक शब्दों का खेल, दलीलबाजी, वाद-विवाद का अखाड़ा और थोथा- चना मात्र ही रह जाता है।

कई लोग जन कोलाहल और संसार के वातावरण से दूर एकान्त शान्त स्थान में रहना ही मौन समझते हैं। कुछ हद तक ऐसे स्थानों का उपयोग मौन की साधना में आवश्यक भी है। उसका प्रयोग करना भी चाहिए। एकान्त शान्त स्थानों में चित विक्षेप नहीं पड़ते। किन्तु मौन का आधार बाह्य वातावरण नहीं अपितु अपना अन्तर-प्रदेश है। मौन का सम्बन्ध अन्तर से अधिक है। अन्तर की नीरवता, शान्ति, स्तब्धता, स्थिरता हो, चित्तवृत्तियों का नियन्त्रण हो, तो अपार जन-कोलाहल के बीच भी हम मौन का अवलम्बन ले सकते है— मौन की साधना कर सकते हैं।

मौन की साधना का अर्थ घर छोड़कर एकान्त में जाना अथवा अपने कर्त्तव्यों से विमुख हो जाना नहीं है, अपितु अपना कर्त्तव्य पालन करते हुए दिन भर किए जाने वाले अनावश्यक प्रलाप, हा-हा ही-ही, पर नियन्त्रण किया जाय। वाचाल वाणी और उच्छृंखल गति-विधियों पर अंकुश रखा जाय। वही किया जाय, वही बोला जाय, जो आवश्यक, उपयोगी और सर्व हितकारी हो। सत्य और मधुर वचन बोले जाएं। इससे गृहस्थ जीवन में रहते हुए अपने कर्त्तव्य और उत्तरदायित्वों का पालन करते हुए भी मौन की साधना की जा सकती है। ऋषि परम्परा में इसी तरह मौन का पालन किया जाता रहा है। जिन्हें विशेष सुविधा अनुकूलता हो वे सप्ताह में माह में एक दिन या अधिक समय निश्चित समय मौन व्रत रख सकते हैं। मौनी अमावस्या का विधान तो इसी लिए रखा गया था। जिस किसी भी रूप में मौन की साधना हो सके अवश्य करनी चाहिए।

मौन शक्ति , क्षमताओं का आगार है। मौन जीवन के प्रश्नों का महत्वपूर्ण समाधान है। मौन -चिन्तन - सत्य की प्राप्ति का राज- मार्ग है, मौन— आध्यात्मिक विकास का सोपान है, मौन- जीवन में समस्वर सामञ्जस्य पैदा करने का मन्त्र है। मौन- जीवन, जगत, प्रकृति, परमेश्वर के रहस्यों की खुली किताब है। जगत के अपार कोलाहल के बीच, जीवन यात्रा के संघर्षमय क्षणों में ही हमें मौन की साधना करनी होगी, तभी वह अपने अमूल्य वरदानों से हमें कृतार्थ कर सकेगी।

स्वाध्याय सन्दोह


आत्म-बल और उसकी महत्ता

“तुम पृथ्वी के सबसे आवश्यक प्राणी हो।”

आत्म-शक्ति की दृढ़ता एवं सबलता सब जगह सफलता देती है। इसके लिए आपको अपने भीतर यह विश्वास दृढ़तापूर्वक बैठा लेना चाहिए कि आत्म-बल के बिना मनुष्य में स्वावलम्बन की प्रवृत्ति ही नहीं उठती और स्वावलम्बन के बिना वह अपना उत्थान करने में असमर्थ रहता है। महत्वाकाँक्षी व्यक्ति को आत्म- सत्ता में सर्वाधिक विश्वास करना चाहिए। आप में यह विश्वास होना चाहिए कि हमारा जीवन निरर्थक नहीं है, हममें कुछ विशेष शक्तियाँ हैं, तभी ईश्वर ने हमको मानव शरीर दिया है। अगर हम तुच्छ होते तो मानव शरीर न पाकर खटमल, झींगुर का शरीर पाते। यदि हमको अपना शरीर मनुष्य जैसा दिखाई देता है तो हमको निश्चित रूप से यह विश्वास कर लेना चाहिए कि हम भी वही हो सकते हैं, जो कोई अन्य मनुष्य शरीरधारी हो चुका है। हमको अपनी क्षण-भंगुरता पर नहीं, वरन् अपनी ईशता पर विश्वास करना चाहिए। यह विश्वास आत्म-स्फूर्ति देता है और मनुष्य के सोये हुए बल को जगाता है।

कोई कारण नहीं कि कोई व्यक्ति अपने को अनावश्यक समझे। जब तक वह स्वयं अपने को आवश्यक न मानेगा, तब तक दूसरे उसे कैसे आवश्यक मानेंगे? अतएव अपने साथ विश्वासघात न करना चाहिए। अपनी मनुष्यता को पहचानना चाहिए।

—आत्म-विकास

दूसरों के नहीं, अपने दोषों को ढूंढ़ो!

दूसरों के गुण दोष विवेचन में मनुष्य जितना समय खर्च करता है, उसका एक प्रतिशत भी यदि आत्म-निरीक्षण में लगाये तो आदर्श मनुष्य बन जाय। दूसरों के दोष आँख से दीख जाते हैं, पर अपने दोषों का चिन्तन मन को एकान्त में स्वयं करना पड़ता है। शरीर का दर्पण अभी तक कोई नहीं बना और न बनेगा। जो व्यक्ति छिद्रान्वेषण करते हैं, वे प्रायः छिप कर करते हैं। पीठ पीछे सब एक दूसरे को भला- बुरा कह लेते हैं, हमारी बात-चीत का विषय ही प्रायः पर-निन्दा होता है। मन में दुर्भावना रहते हुए अक्सर लोग चापलूसी भरी प्रशंसा करते रहते हैं। ऐसी प्रशंसा आपको सही आत्म-निरीक्षण से रोकती रहती है। मनुष्य चरित्र की यह सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह अपनी प्रशंसा का सदा भूखा रहता है। अन्तिम साँस तक भी मनुष्य की यह भूख नहीं जाती । इसलिए हमारा सब कुछ झूठ से भरा होता है। छल कपट की बातों से हमें प्रेम हो जाता है। सचाई प्रायः कड़वी लगती है। न कोई उसे कहता है, न सुनता है। पीठ पीछे ही वह कहीं सुनी जाती है। इसलिए सत्य शोधकों को पीठ पीछे की सच्ची बातें सुनने के लिए वेष बदलना पड़ता है। प्राचीनकाल में राजा लोग वेष बदल कर ही सच्चे लोक-मत की जाँच किया करते थे। आजकल गुप्तचरों द्वारा यह काम होता है। व्यक्तिगत जीवन में भी यदि हम गुप्त रूप से अपनी चर्चा सुनने का प्रयत्न करें, तो अपने दोषों को जान सकते हैं। किंतु ऐसी चर्चा भी प्रायः आर्त रंजित और पक्षपातपूर्ण होती है। सचाई तो वही है जो हमारे अन्तःकरण में छिपी है। अपना गुप्तचर आप बन कर ही हम उसका अनुसन्धान कर सकते हैं। यह आत्म परीक्षा ही हमें, हमारे चरित्र के असली स्वरूप को हमारे सामने प्रकट करेगी और तभी हम चरित्र में सुधार कर सकेंगे।

यदि हम अपने चरित्र को उज्ज्वल बनाना चाहते हैं तो सोने से पूर्व या सोकर उठने के बाद एकान्त में हमें प्रतिदिन आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। हमारा व्यवहार ही हमारे चरित्र का प्रतिनिधित्व करता है। विचारों में तो सभी आदर्शवादी हो सकते है। योग्य-अयोग्य का ज्ञान या पुण्य-पाप की अनुभूति तो कुछ न कुछ मूर्ख और पापी को भी होती है। किन्तु व्यावहारिक जीवन में हम उन आदर्शों को भूल जाते हैं हमारी प्रवृत्तियाँ हमारे ज्ञान की अनुयायी नहीं होतीं । हमें अपने को ज्ञान से नहीं, वरन् अपने व्यवहार से परखना चाहिए।

—चरित्र-निर्माण

आत्म- निरीक्षण कीजिए!

अपने स्वभाव, दृष्टिकोण, विचार और व्यवहार आदि की परीक्षा करने से मनुष्य को अपनी बहुत-सी कमजोरियों का पता चल जाता है। संसार को दोष देने के पूर्व अपने दोषों को भी देख लीजिए कि कहीं आपके हृदय-सदन में ही तो अँधेरा नहीं है? अपनी उस त्रुटि को ढूंढ़िये— जिसके कारण आपको हर्ष में भी विषाद की ही छाया दिखाई पड़ती है। यदि दुनिया धुँधली दिखाई पड़ती है तो उसे ही दोष मत दीजिए। सम्भव है, आपकी दृष्टि में ही धुँधलापन हो। अपने बुद्धि-दोष और कर्म-दोष पर भी विचार कीजिए। यह देखिए कि आपकी मति तो कुण्ठित नहीं है, आपकी मानसिक कायरता तो आपकी असफलता का कारण नहीं है? जो विकार आपको बाहर दिखाई पड़ता है, उसका मूल स्वयं आपके भीतर हो सकता है।

दूसरों के दृष्टिकोण को समझकर भी आप अपने दोषों का पता लगा सकते हैं। मान लीजिए—सब आपका तिरस्कार करते हैं। उस अवस्था में उन पर रोष करने से पहले अपने दोषों पर विचार कीजिए। अपनी उस गन्दगी की ओर ध्यान दीजिए , जिसके कारण लोग आप से नाक-भौं सिकोड़ते हैं। यह देखिए कि कहीं आप में ही तो शवान-वृत्ति अर्थात् काटने को दौड़ना, भूँकना, जीभ निकाले रहना, दूसरों के द्वार पर पड़े रहना, स्वार्थ वश सबके पीछे घूमना आदि दोष तो नहीं हैं? यदि आप में ऐसे लक्षण होंगे, तो आपका आदर कोई भला आदमी कैसे कर सकेगा? यदि कोई आपका विश्वास नहीं करता तो यह देखिए कि आपकी विश्वास-पात्रता में कहाँ कमी है? यदि आपको दूसरों से सम्मान नहीं मिलता, तो इस बात पर विचार कीजिए कि आपके गुण- चरित्र वास्तव में सम्मान के योग्य हैं भी या नहीं? भूख लगने से ही किसी को भोजन नहीं मिल जाता । जो अध्यापक यह कहते हैं कि आजकल के शिक्षक पूर्वकाल के छात्रों की भाँति गुरुभक्त नहीं होते और जो बाप यह कहते हैं कि आजकल के लड़के पिता को देवता तुल्य नहीं मानते, उन्हें यह भी देखना चाहिए कि स्वयं उनमें गुरुता और देवतापन का अभाव तो नहीं है? प्रतिष्ठा तो योग्यतानुसार ही मिल सकती है। यदि आप स्वयं अभद्रता की मूर्ति होंगे तो आपको भद्र-पुरुष मान कर क्यों पूजेगा? इस प्रकार कोई अपने दोषों का पता लगा कर और उनका सुधार करके आप अपने को इस योग्य बना सकेंगे कि दूसरे आपका सम्मान करने लगें।

—मनुष्य का विराट रूप

आत्म-विश्वास से जीवन का उत्कर्ष

जब हम अविचल साहस द्वारा सम्पादित हुए बड़े-बड़े कार्यों और उनके कर्त्ताओं का विश्लेषण करते हैं, तो उनका प्रधान गुण आत्म-विश्वास ही सिद्ध होता है। वह मनुष्य अवश्य ही सफलता प्राप्त करेगा— ऊँचा उठेगा—उन्नति पथ पर अग्रसर होगा, जिसको अपनी कार्य सम्पादन शक्ति पर विश्वास है, जो मानता है कि मुझमें वह योग्यता है कि मैं आरम्भ किये हुए कार्य को अवश्य ही पूरा कर सकूँगा। इस तरह के दृढ़ विश्वास का मानसिक परिणाम केवल उन्हीं लोगों पर नहीं होता, जो उन कार्यों को करते हैं, पर उन लोगों पर भी होता है, जो उनके पास उठते-बैठते हैं तथा उनसे सम्बन्ध रखते हैं।

आप अपनी योग्यता पर जितना अविश्वास करेंगे जितना ही आप भय और शंका को अपने हृदय में स्थान देंगे उतने ही आप विजय से — सफलता से दूर रहेंगे। चाहे हमारा पथ कितना ही कंटकाकीर्ण और अन्धकारमय क्यों न हो, पर हमें चाहिए कि हम अपने आत्म-विश्वास को —मानसिक धैर्य को तिलाँजलि न दें। हमारी शंकायें और भय दूसरों के विश्वास को अधिक नष्ट करते हैं, वैसा नष्ट और कोई बात नहीं करती। यदि तुम अपने आपको पतित समझोगे—यदि तुम समझोगे कि हम सामर्थ्यहीन मनुष्य हैं— हमारा कोई महत्व नहीं, तो दुनिया भी तुमको वैसा ही समझेगी। वह तुम्हारी बात की—तुम्हारी आवाज की कुछ भी कीमत न मानेगी। ऐसा कोई आदमी नहीं मिल सकता, जिसने अपने आपको तुच्छ, हीन और बेकाम समझते हुए कोई महान कार्य किया हो। जितनी योग्यता का हम अपने आपको समझेंगे, उतना ही महत्वपूर्ण कार्य भी कर सकेंगे।

-दिव्य-जीवन


मन मान जाता है, मनाइये तो सही

प्रायः लोगों की यह शिकायत होती है कि हमारा मन बुराई से हटता नहीं। इच्छा तो बहुत करते हैं, धर्मानुष्ठान भी चलाते हैं, जप और उपासना भी करते हैं किन्तु मन विषयों से हटता नहीं। बुराइयाँ हर क्षण मस्तिष्क में आती रहती हैं। जब ऐसी बातें सुनने को मिलती हैं तो लगता है मन ही सब कुछ है, वही जीवन की सम्पूर्ण गतिविधियों का सञ्चालन करता है।

यह बात अगर मान भी लें तो यह नहीं कह सकते कि मन स्वभावतया अधोमुखी है क्योंकि सन्त-सहृदय पुरुषों के मन की भी गति होती है। उनकी प्रवृत्तियाँ, रुचि और क्रिया व्यापार जब सदाचार मूलक होते हैं तो यह कैसे कह सकते हैं कि मन स्वतः बुराइयों की ओर चला जाता है।

वस्तुतः हमारी रुचि जिन विषयों में होती है उन्हीं का चिन्तन करते हैं और उन्हीं में तृप्ति अनुभव करते हैं। मन को जब किसी विषय में रुचि नहीं होती तभी वह अन्यत्र भागता है। विषयों की ओर भटकता हुआ मन ही दुख का कारण होता है। इस अवस्था से तब तक छुटकारा नहीं पा सकते जब तक मन की लगाम नहीं खींचते और उसे कल्याणकारी विषयों में नहीं लगाते। प्रसिद्ध दार्शनिक बर्क का यह कथन बिलकुल सत्य प्रतीत होता है— ‘मनुष्य पानी जैसी चञ्चलता से ऊपर नहीं उठता है’ इन शब्दों में मन के इधर-उधर भागते रहने के फलस्वरूप जो मनुष्य का पतन होता है उसी की ओर संकेत है।

मन तो आपकी इच्छानुसार रुचि लेता है। जिन व्यक्तियों को तरह-तरह की स्वादिष्ट वस्तुयें खाते रहने में रुचि होती रहती है वे इसी में भटकते रहते हैं। स्वादिष्ट चीजें बार-बार खाते रहते हैं पर किसी से तृप्ति ही नहीं होती। एक के बाद दूसरे पदार्थ में अधिक स्वाद प्रतीत होता है। इस स्वाद-स्वाद में उन्हें न तो अपने स्वास्थ्य का ध्यान रहता है, न भविष्य का। पाचन-प्रणाली बिगड़ जाती है, स्वास्थ्य खराब हो जाता है तो कहते हैं हम क्या करें, हमारा तो मन नहीं मानता। मन तो आपका सहायक मात्र है वह जिस वस्तु में आपकी रुचि देखता है उसी ओर कार्य किया करता है।

दूसरे व्यक्ति की स्वस्थ रहना अधिक पसन्द होता है। दंगल में कुश्तियाँ पछाड़ने, सेना में भरती होकर शौर्य प्रदर्शन की इच्छा होती है तो वह कसरत करता है, कुश्ती लड़ता है , मालिश और पौष्टिक पदार्थों के लिए समय और श्रम और धन जुटाता है। अनेकों क्रियायें केवल इसीलिए करता है कि उसे स्वास्थ्य अधिक प्रिय है। मन इस तरह आपकी रुचि आपकी इच्छाएँ पूर्ण करने का एक महत्वपूर्ण साधन है इसे शत्रु नहीं मित्र समझना चाहिए।

अतः मन को किसी उत्तम और उपयोगी विषय पर टिकाए रहना सुगम है। जिस विषय में आप अपनी उन्नति या श्रेय समझते हैं उसमें अपने मन को प्रवृत्त कीजिए मन आपको बताएगा कि आप उसकी सफलता के लिए क्या करें।

आपका मन कल्याणकारी विषयों में लगा रहता है इसका ध्यान रखिए। “हमारे किए कुछ न होगा।” ऐसा निराशापूर्ण दृष्टिकोण ही मनुष्य की असफलता का कारण है। जब हम यह मान लेते हैं कि इस कार्य को हम करके ही छोड़ेंगे तो वह कार्य जरूर सफल होता है। आशा और आत्म-विश्वास में बड़ी उत्पादक शक्ति है। आप इन्हें अपने जीवन में धारण कीजिए आपका मानसिक निरोध किसी प्रकार कामयाब नहीं होगा।

जिस विषय में ध्यान दीजिये उसके अच्छे बुरे पहलुओं का एक सर्वांगपूर्ण रेखाचित्र अपने मस्तिष्क में बनाते रहिए। जिधर कमी या अनुपयुक्तता दिखाई दे उधर ही मन की दीवार खड़ी कर दीजिए और अपनी रुचि की दिशा को सन्मार्ग की ओर मोड़े रहिए। निरन्तर अभ्यास से वह स्थिति बन जाती है जब मन स्वयं कोई विकल्प उत्पन्न नहीं करता। सत्संकल्पों में ही—अवस्थित बनने के लिए गीताकार ने भी यही प्रयोग बताया है।

लिखा है :—

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।

अभ्यासेनतुकौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥

हे अर्जुन! निश्चय ही यह मन चञ्चल और अस्थिर है। इसको वश में करना निश्चय ही कठिन है, किन्तु अभ्यास और वैराग्य भावना से वह भी वशवर्ती हो जाता है।

अभ्यास का अर्थ है आप जिस विषय में रुचि रखते हैं बारबार अपने मन को उसी में लगाइये। मान लीजिये आपको विद्याध्ययन करना है तो आपका ध्यान इस प्रकार रहे कि कहाँ से पुस्तकें प्राप्त करें? कौन सी पुस्तक अधिक उपयुक्त है? किसी से सहायता भी लेनी पड़ेगी। अच्छे नम्बर प्राप्त करने के लिये परिश्रम भी वैसा ही करना है। इससे आपके विचारों की आत्मनिर्भरता, सूझ और अनुभव बढ़ेंगे और उसी विषय में लगे रहने से आप को सफलता भी मिलेगी।

अपनी इस हीन प्रवृत्ति के कारण ही मनुष्य प्रायः अशुभ विचारों और अप्रिय अवस्थाओं का चिन्तन करते रहते हैं। इसी कारण उनके मस्तिष्क में निरन्तर द्वंद्व छिड़ा रहता है। कामुकतापूर्ण विचारों वाला व्यक्ति सदैव वैसे ही विचारों से घिरा रहता है, थोड़े से विचार आत्म-कल्याण के बनाता भी है तो अनिश्चयात्मक बुद्धि के कारण तरह-तरह के संशय उठते रहते हैं। जब तक एक तरह के विचार परिपक्व नहीं होते, तब तक उस दिशा में अपेक्षित प्रयास भी नहीं बन पाते। यही कारण है कि मनुष्य किसी भी क्षेत्र में प्रगति नहीं कर पाता।

सद्विचार जब जागृत होते हैं तो मनुष्य का जीवन स्वस्थ, सुन्दर और सन्तोषयुक्त बनता है। अपना संकल्प जितना बलवान् बनेगा उतना ही मन की चंचलता दूर रहेगी और संयम बना रहेगा। इससे शक्ति जो मनुष्य को उत्कृष्ट बनाती है विश्रृंखलित न होगी और मनुष्य दृढ़तापूर्वक अपने निश्चय पथ पर बढ़ता चला चलेगा।

आप सदैव ऐसे ही काम करें जिससे आपकी आत्मा की अभिव्यक्ति हो। जिन कार्यों में आपको सन्तोष न होता हो उन्हें अपने जीवन का अंग न बनाइये। जब तक मनुष्य अपने कार्यों में मानवोचित स्वतन्त्रता की भावना का विकास नहीं करता तब तक उसकी आत्मा व्यक्त नहीं होती। दूसरों के लिये सही मार्ग-दर्शन वही दे सकता है जिसमें स्वतन्त्र रूप से विचार करने की शक्ति हो। इस शक्ति का उद्रेक मनुष्य के नैतिक साहस और उसके प्रबुद्ध मनोबल से ही होता है। बलवान् मन जब किसी शुभकर्म में संलग्न होता है तो मनुष्य का जीवन सुख और सम्पदाओं से ओत-प्रोत कर देता है। उसकी भावनायें संकीर्णताओं के बन्धन तोड़कर अनन्त तक अपने सम्बन्धों का विस्तार करती हैं। वह लघु न रहकर महान बन जाता है। अपनी इस महानता का लाभ अनेक दूसरों को दे पाने का यश-लाभ प्राप्त करता है।

इसलिये जीवन साधना का प्रमुख कर्तव्य यही होना चाहिये कि हमारी मानसिक चेष्टायें पतनोन्मुख न हों। मन जितना उदात्त बनेगा, जीवन उतना ही विशाल बनेगा। सुख और शान्ति मनुष्य जीवन की इसके विशालता में ही सन्निहित हैं दुःख तो मनुष्य स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों के कारण पाता है।

अतः अपने आपको सुधारने का प्रयत्न कीजिए। वश में किया हुआ मन ही मनुष्य का सहायक है और उससे बढ़कर अपना उद्धारकर्त्ता संसार में शायद ही कोई हो। इस परम हितैषी मन पर अनुकूल न होने का दोषारोपण लगाना उचित नहीं लगता। जिस मन पर ही मनुष्य की उन्नति या अवनति आधारित है उसे सुसंस्कारित बनाने का प्रयत्न सावधानी से करते रहना चाहिये। मन को विवेकपूर्वक समझायें तो वह माना जाता है और कल्याणकारी विषयों में रुचि लेने लगता है। यह प्रक्रिया अपने जीवन में प्रारम्भ हो तो हम जीवन लक्ष्य प्राप्ति के सही मार्ग पर चल रहे हैं, यही मानना चाहिये।


स्वतन्त्र चिन्तन और उसकी आवश्यकता

हम किसी भी बात को इसलिए मानते हैं कि वह किसी प्राचीन या प्रसिद्ध ग्रन्थ में लिखी हुई है। हम किसी विचार का अवलंबन इसलिए लेते हैं कि वह किसी महापुरुष या विद्वान द्वारा कहा गया है, लेकिन ठीक इसके विपरीत स्वामी विवेकानन्द ने कहा है— “किसी बात को इसलिए मत मानो कि वह किसी पुरानी पुस्तक या धर्म-ग्रन्थ में लिखी हुई है, किसी भी बात को इसलिए मत मानो कि उसे किसी व्यक्ति विशेष ने कही हैं। लेकिन वही बात मानो उसी विचार का अनुसरण करो, जो तुम्हारी बुद्धि विवेक, स्वतन्त्र चिन्तन द्वारा स्वीकार कर लिया गया हो।”

प्रत्येक मनुष्य के अवतरण के साथ ही प्रकृति उसे एक मौलिक विचार क्षमता प्रदान करती है और इसीलिए प्रत्येक मनुष्य के मन में अपने ही ढंग से एक नये संसार की सृष्टि होती है। अपनी हर यात्रा में मनुष्य यहाँ कुछ नवीन शोध करता है, नये रहस्यों का पता लगाता है। लेकिन बहुत कम लोग इस मौलिक विचार क्षमता का उपयोग कर पाते हैं। अधिकाँश तो विचारों को गुलामी, परवशता का अवलम्बन लेकर अपने जीवन को भी गुलाम बना लेते हैं। जीवन के राजमार्ग से भटक जाते हैं। क्योंकि जग-पथ की यात्रा मनुष्य किसी भी रूप में दूसरों के कन्धों पर चढ़ कर पूरी नहीं कर सकता, चाहे वह विचार के क्षेत्र में हो या व्यवहार के क्षेत्र में।

स्वतन्त्र चिन्तन और मौलिक विचारों के आधार पर ही मनुष्य अपने मन का समाधान कर सकता है, अपने जीवन की समस्याओं को सुलझा सकता है, अपना सही मार्ग निर्धारण कर सकता है। हर नये पैदा होने वाले पौधे को स्वयं अपनी ही जड़ों पर खड़ा होना पड़ता है। धरती से स्वयं को ही जीवन-रस खींचना पड़ता है। जिस तरह शरीर के क्षेत्र में मनुष्य को स्वयं समर्थ होकर अपने ही ऊपर जीवन निर्वाह करना पड़ता है, उसी तरह विचार के क्षेत्र में भी स्वाधीन हुए बिना मनुष्य का समाधान नहीं होता। जीवन-निर्वाह के लिए दूसरों के सहारे रहना पराधीनता है, इसी तरह मन बुद्धि विवेक को ताला लगाकर किसी बात को, विचार को मान लेना भी मानसिक पराधीनता है, विचारों की गुलामी है।

उसका अर्थ यह नहीं कि पुस्तकें नहीं पढ़नी चाहिएं वा किसी की बात नहीं सुननी चाहिए। पढ़ना और सुनना आवश्यक है, विचारों की उर्वरता के लिए। पढ़ने से चिन्तन-क्रिया को खाद्य मिलता है। विचार करने के लिए आधार मिलते हैं। अतः पढ़ना अवश्य चाहिए, विद्वानों का सहयोग लेकर उनसे विचार-विमर्श भी करना ही चाहिए। लेकिन पढ़ी हुई या सुनी हुई, सभी बातों को ध्रुव-सत्य मान कर उसका अनुकरण करना भारी भूल होगी। इस तरह का अन्धानुकरण ही मानसिक गुलामी है, विचारों की पराधीनता है।

मनुष्य जितना स्वयं अपने बारे में समझ सकता है, उतना दूसरा नहीं समझता। अपने अनुकूल कोई समाधान जितना मनुष्य स्वयं ढूँढ़ सकता है, इतना दूसरा नहीं, यह नितान्त सत्य है। दूसरों के समाधान सहायक हो सकते हैं, किन्तु समस्या को पूर्ण रूप से सुलझा नहीं सकते। इसीलिए स्वतन्त्र चिन्तन की आवश्यकता होती है।

राजनैतिक, सामाजिक स्वतन्त्रतायें तो स्थूल और सामान्य हैं। किसी भी देश के स्वतंत्र होने पर भी वहाँ के नागरिक, मानसिक दृष्टि से गुलाम रह सकते हैं। मजहब के नाम पर, किसी वा दया सम्प्रदाय के नाम पर, किसी विचार धारा विशेष के नाम पर इस तरह की मानसिक गुलामी मानव समाज में फैली रहती है। आज राजनैतिक दृष्टि से स्वतन्त्र देशों में इस तरह की गुलामी कम नहीं फैली हुई है और इसी से संसार में संघर्ष एवं विकृतियाँ व्याप्त हैं।

धन-धरती, शासन-सत्ता के बाँट देने से ही मानव-समाज की स्वतन्त्रता सार्थक नहीं हो सकती। स्वतन्त्रता का मूल आधार ही मानसिक स्वतन्त्रता है। जब तक लोगों के दिमागों में किसी भी मजहब, वाद, सम्प्रदाय, भेद-भाव के विचारों की गुलामी बनी रहेगी, तब तक समाज परेशान रहेगा। समस्यायें बनी रहेंगी। युद्ध होते रहेंगे। संघर्ष बने रहेंगे।

धन-धरती या राज-काज सम्बन्धी गुलामी मिटा लेना तो गुलामी के केवल पत्ते, डालें ही तोड़ना है। गुलामी का विष-वृक्ष तो मनुष्य के मानसिक धरातल पर ही जीवित रहता है, यहीं से उसे पनपने की खुराक मिलती है। जब अपने बारे में सोचने, निर्णय करने का काम मनुष्य किसी ग्रन्थ विशेष अथवा किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर छोड़ देता है तो यहीं से गुलामी के विष-वृक्ष को खाद्य मिलने लगता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य कभी भी मानसिक पराधीनता से छुटकारा नहीं पा सकता।

निस्सन्देह हर व्यक्ति को अपने जीवन का धर्म-ग्रन्थ, स्वयं लिखना पड़ेगा, अपने जीवन का समाधान स्वयं ढूँढ़ना पड़ेगा, तभी वह स्वतंत्र, मुक्त - जीवन का अधिकारी बन सकता है। संसार में जिन्होंने भी मुक्ति प्राप्त की है, कुछ किया है, उन्होंने अपने जीवन की पोथी स्वयं लिखी है। अपना उपदेश स्वयं ग्रहण किया है।

आप यह बार-बार हृदयंगम कर लें-आपकी समस्याओं को, अपने जीवन को जितना आप समझ सकते हैं, उतना दूसरा कोई नहीं समझ सकता। जो समाधान आप स्वयं निकाल सकते हैं, वह दूसरा कोई भी नहीं निकाल सकता। और इसके लिए आपको स्वतन्त्र चिन्तन का स्वतन्त्र विचार क्षमता का अवलम्बन लेना पड़ेगा। इसके सिवाय अन्य कोई रास्ता नहीं है। अपनी प्रकृतिदत्त बुद्धि, विवेक, प्रतिभा से विचारों की गुलामी का पर्दा हटाना होगा, तभी आप स्वतन्त्र निर्णय शक्ति के अधिकारी बनेंगे।

इसका अर्थ यह नहीं कि लोगों के कहे या लिखे हुए विचार व्यर्थ होते हैं। नहीं, वे भी कुछ हद तक आपकी सहायता कर सकते हैं—स्वतन्त्र निर्णय करने में। लेकिन फिर भी किसी विचार को पढ़ या सुनकर ही उसे सत्य न मान लें। प्रत्येक विचार की प्रामाणिकता की एक कसौटी है, यह कि उसके मूल में सचाई अधिक हो। जिस विचार से व्यक्ति और समाज के धारण-पोषण, सत्व संशुद्धि का विरोध न होता हो, अर्थात् जिससे व्यक्ति और समाज का जीवन अधिक समर्थ, सम्पन्न निर्मल बने, जिससे किसी विकृति का उदय न हो वही विचार उत्तम होता है। लेकिन ऐसे विचार जिनसे किसी व्यक्ति या समूह विशेष का तो लाभ हो, किंतु इसके लिए दूसरों को घाटे में रहना पड़े। दूसरों का अहित हो तो समझिए—उस विचार में कहीं न कहीं कुछ दोष भूल अवश्य है। यह एक ऐसी कसौटी है, जिस पर किसी भी विचार का कस निकाला जा सकता है। बिना इस कसौटी पर कसे किसी भी विचार को आँख मींच कर गले न उतारें अन्यथा आप विचारों की गुलामी से बच नहीं सकेंगे।

कोई भी निर्णय करने में जल्दबाजी न करें। पर्याप्त सोच-विचार करके जो अपनी अन्तरात्मा को स्वीकार हो, उसे ही ग्रहण करें। जल्दबाजी में मनुष्य दूसरों के प्रभाव या विचारों के प्रवाह में बह जाता है। कोई भी निर्णय तब तक न करें, जब तक आप उसके सब पहलुओं पर पर्याप्त विचार न कर लें। चाहे आपके समक्ष स्वर्ग का वरदान आये या धरती के राज्य का। आपका बड़े से बड़ा लाभ भी क्यों न प्रस्तुत किया जाय, आप तब तक उसे स्वीकार न करें, जब तक कि पर्याप्त विचार उस पर करके सही समाधान ढूँढ़ न लें।

स्वतन्त्र चिन्तन के लिए मनुष्य को चरित्र-बल, नैतिक-बल की भी आवश्यकता होती है। चरित्र-हीन, अनैतिक व्यक्ति का मन, प्रतिभा, बुद्धि सब निर्बल अवस्था में होते हैं। स्वतन्त्र विचारों को ग्रहण करने की, साधना करने की क्षमता ही नहीं रहती, ऐसे लोगों में। इससे चरित्र की दृढ़ता, मन की सबलता स्वतन्त्र चिन्तन के लिए अत्यावश्यक है। जिस तरह गंगा को धारण करने के लिए—शिवजी जैसे सामर्थ्यवान् व्यक्तित्व की आवश्यकता हुई, ठीक इसी तरह अन्तराकाश से आने वाली वेगयुक्त विचार-गंगा को धारण करने के लिए सबल मस्तिष्क, सशक्त मन, बुद्धि की आवश्यकता होती है। चरित्रहीन व्यक्तियों को तो निस्संदेह दूसरों के विचारों का गुलाम बनना ही पड़ता है।

मौलिक चिन्तन के लिए—स्वतन्त्र विचारों की साधना के लिए सबसे आवश्यक और महत्वपूर्ण जो बात है,वह यह कि अपनी अन्तरात्मा की वाणी सुनें। हमारी आत्मा निरन्तर बोलती है, कहती है, हमें परामर्श देती है। उसे सुनने का यदि हम प्रयत्न करें तो कोई कारण नहीं कि हम अपनी समस्याओं और शंकाओं का समाधान न कर सकें, हम अपना मार्ग न ढूँढ़ सकें।


सद्भावना से हम दूसरों का हृदय जीत लेते हैं।

सबका प्रिय-पात्र बनने की, दूसरों से अधिक से अधिक स्नेह, प्रेम और आत्मीयता प्राप्त करने की कामना हर किसी को होती है। दुत्कार या ठुकराये जाने के बराबर संसार में और कोई दूसरा दुःख नहीं है। गोस्वामी तुलसी दास ने लिखा है—

यद्यपि जग दारुण दुःख नाना।

सब ते अधिक जाति अपमाना॥

अर्थात्—संसार में दुःखों की कमी नहीं किन्तु जातिगत अपमान और अवहेलना से मानव अन्तःकरण में कटु आघात लगता है। ऐसे समय मनुष्य आत्म-हत्या तक कर डालता है। जीवन को इस तरह नष्ट कर देने का अवसर दूसरों का स्नेह न मिलने से ही आता है।

प्रेम और आत्मीयता प्राप्त करने के लिये अनेक प्रयोग होते हैं। निष्ठुरता और तिरस्कार के बल पर भी लोग दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास करते हैं। भय और आतंक के कारण सम्भव है कुछ देर तक किसी को अपनी ओर मिलाये रखा जाय पर जो स्वाभाविक निश्छलता मधुर सम्बन्ध के लिये अपेक्षित है वह मिल न पायेगी। अधिकार और शक्ति का बल जैसे ही घटा, अपने कहलाने वाले व्यक्ति दूर चले जायेंगे। कई बार तो उनसे दुराव, दुत्कार और बहिष्कार भी मिलता है अतः यह निर्विवाद है कि आत्मीयता का आधार शक्ति , सत्ता या आतंक नहीं है।

कई व्यक्ति बाहरी बनावट और रूप-आकर्षण के बल पर धन और शृंगार के द्वारा भी दूसरों को आकर्षित करने का प्रयास करते हैं किन्तु यह उपहार क्षणिक होने के कारण प्रभावशील नहीं है। इनसे स्नेह और आत्मीयता का विकृत रूप ही सामने आता है। ओछी प्रवृत्ति के मनुष्य इन कारणों से अपना चरित्र और खो देते हैं। यह प्रयोग भी अन्ततः पतनकारी ही सिद्ध हुआ है।

स्पष्ट होता है कि बाह्य परिस्थितियाँ मनुष्य को स्नेह, प्रेम और सौहार्द का रसास्वादन नहीं करा सकती हैं। यह भाव आध्यात्मिक है। अतः आन्तरिक सद्गुणों के आधार पर ही दूसरों के हृदय मिलाये जा सकते हैं।

विद्वान् इमर्सन ने लिखा है “अपनी चमक से ही आपका अपना विकास होता है—अपना व्यक्तित्व ही दूसरों को आकर्षित करता है।”

सम्मोहन शक्ति मनुष्य के व्यक्तित्व में ही होती है, यह सूक्ष्म तत्व है, जिसका अनुभव तो सभी करते हैं पर व्यक्त नहीं कर सकते। किन्तु यह सर्वमान्य है कि जब भी किसी को सच्ची प्रीति मिलती है तो मनुष्य का जीवन कुछ से कुछ हो जाता है। मनुष्य प्रेम के प्रकाश में अपने जीवन के सारे अभाव भूल जाता है। सत्य तो यह है कि इसी आधार पर संसार आज तक टिका है और अनन्त काल तक चलता रहेगा।

व्यवहार की मधुरता, सरसता और निष्कपटता में वह शक्ति होती है जो दूसरों के बन्द द्वार खोल देती है। प्रारम्भिक मिलन में मनुष्य के मधुर व्यवहार से ही उसके व्यक्तित्व का पता चल जाता है। उसमें एक अलौकिक चुम्बक शक्ति होती है जो लोगों के बन्द हृदय का द्वार खोल देती है। मनुष्य की योग्यता बुद्धिमता और सामर्थ्य से भी अधिक सम्मोहन उसके विनीत स्वभाव में होता है। ऐसे व्यक्ति मिल जाते हैं तो उन्हें छोड़ने का जी नहीं करता। थोड़ी देर और बात करने का हर किसी मन का करता है। भाव और भाषा की विनयशीलता में वह रस, वह प्राण होता है जो अनजान आदमियों को भी अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। विनीत होना मनुष्य के पात्रत्व का लक्षण है। विनीत होना सहयोग प्राप्त करने का साधन है।

नम्रता के लिये हृदय में द्विधा नहीं होनी चाहिये। यह याद रखना है कि चालाक, स्वार्थ-बुद्धि और चाटुकार व्यक्ति भी अच्छी-अच्छी बात बनाकर तात्कालिक लाभ के लिये दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं, ऐसे व्यक्ति अपने मिथ्या व्यापार का अधिक देर तक लाभ नहीं उठा सकते। उनके अभद्र व्यवहार का पता चलेगा तो लोगों की भर्त्सना निंदा और अपमान के अतिरिक्त और कुछ न मिलेगा।

आपकी वाणी से जैसे शब्द निकलें वैसे ही मन में भाव भी हों। जिसके विचार और कर्म, व्यवहार तथा सिद्धान्त में एकता नहीं होगी उसे कभी भी औरों की आत्मीयता नहीं मिलेगी। यह वस्तुतः स्वार्थवादी दृष्टिकोण है जिससे अपने भी पराये हो जाते हैं और जीवन का सम्पूर्ण प्रेम-रस सूख जाता है।

वाणी की सरलता के साथ-साथ विचारों की सबलता भी अपेक्षित है। इसके बिना जीवन में स्थिरता नहीं आती, अधिक ऊँचा नहीं उठता। उद्दात्त चरित्र के व्यक्ति औरों को बड़ी आसानी से अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। विद्वान दार्शनिक जे हावेज का कथन है—”चरित्र एक शक्ति है, प्रभाव है। वह मित्र उत्पन्न करता हैं, सहायता और संरक्षण प्राप्त कराता है और धन, मान तथा सुख का निश्चित मार्ग खोल देता है।”

ऐसे प्रबल आकर्षण शक्ति वाले लोग कभी मिल जाते हैं तो बड़ी प्रेरणा मिलती है। लोग तत्काल ही उनके लिये अपनी भावनाओं का द्वार खोल देते हैं। बिना किसी हिचक या झिझक के उनके समक्ष लोग आत्म-समर्पण कर देते हैं उनके संपर्क में आने पर ऐसा प्रतीत होता है जैसे बाह्य जगत के सुखों से कुछ ऊपर उठ गये हों। हमारा दृष्टिकोण उनके लिये विस्तृत और विशाल बन जाता है आत्मीयता प्राप्त करना सचमुच कोई जादूगरी नहीं है वह विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक प्रशस्ति है। अर्थात् अपने पराये की भेद बुद्धि का जिस क्षण परित्याग कर देते हैं उसी समय दूसरे का हृदय द्वार हमारे लिये खुल जाता है, हम मैत्री पा लेते हैं, सहयोग और आत्मीयता प्राप्त कर लेते हैं।

ऐसी आत्मीयता के कारण अन्तःकरण में नये उत्साह और नई आशाओं का संचार होता है। अपने अन्दर भी सद्गुणों के विकास का संकल्प जागृत होता है। हम जब स्वयं दूसरों के साथ ऐसा ही मधुर व्यवहार करते हैं तो यही प्रतिक्रिया दूसरों के दिलों में उत्पन्न होकर उन्हें आत्मविभोर बना देती है। चरित्र की दृढ़ता और वाणी की सरलता के साथ अभिव्यक्त आत्मा ही सम्पूर्ण सुखों की जननी है। जिनका जीवन इस प्रकार का बन गया है, धन्य हैं वे लोग जो उनके संपर्क में रह रहे हों। उन्हें स्वर्गीय सुखों की अनुभूति इसी जीवन में होती रहती है।

आपके व्यक्तित्व की यह मोहक शक्ति आपको बल तो प्रदान करेगी ही साथ ही आपकी भौतिक सफलताओं की सम्भावनायें भी बढ़ेंगी। दूसरों को प्रसन्न करने की कला जिन्हें नहीं आती वे जीवन व्यापार में असफल ही रहते हैं। प्रसन्नता प्रदान करने का तात्पर्य यह नहीं कि केवल मीठी-मीठी बातें तो करें किन्तु उद्देश्य स्वार्थमय बना रहे। सच्ची प्रसन्नता अपनी स्नेह-शीलता, संवेदन-शीलता, सेवा सहानुभूति, उदारता, भद्रता, आदि नैतिक सद्गुणों के द्वारा विकसित होती है।

इस कार्य में बाह्य परिस्थितियाँ कभी भी बाधक नहीं हो सकतीं। कठिनाइयों में भी स्नेह और करुणा की ज्योति जगाई जा सकती है। आत्मिक सौंदर्य तो यथार्थतः मुसीबतों में ही निखारता है।

ऐसे गुणों का विकास करना जो सबको प्रिय हों, लोक-प्रिय बनने का मूल मन्त्र है। ईर्ष्या-द्वेष यह मनुष्य का दूषण है इसे कोई नहीं चाहता इसलिये हमें भी किसी से ईर्ष्या न करनी चाहिये। प्रेम की भावनायें और अपनी शुभ-कामनायें दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं इसलिये हमें भी स्वहित से उठकर सबसे प्यार पैदा करना चाहिये। जो दूसरों की सहायता नहीं कर सकता भला उससे भी कोई सहयोग करेगा?

अपनी आत्मा को हम जिस वस्तु में मिला देने हैं वही वस्तु अतिशय प्रिय बन जाती है। अपना काला कलूटा बच्चा, दूसरे के गोरे खूबसूरत बच्चे से कहीं अधिक प्यारा लगता है इसलिये कि अपने बच्चे के साथ अपनी आत्मा संयुक्त होती है।

आत्मा का क्षेत्र व्यापक है विशाल है। इसे जितना अधिक विकसित करते हैं उतना ही अधिक सुख और आत्मसंतोष मिलता है। अपनी आत्मा जब फैलकर विश्वात्मा में फूट पड़ती है तो संसार के सम्पूर्ण प्राणियों में अपनी ही आकृति नजर आती है। जब ऐसी स्थिति आती है तो हमारे अन्तःकरण में सभी के लिये प्यार होता है, आत्मीयता होती है। अपना सर्वस्व न्यौछावर करते हैं तभी दूसरों के हृदय जीत लेते हैं। इस सिद्धान्त पर जिनके जीवन आधारित होंगे वे सचमुच इसी धरती में स्वर्ग-लोक के सुखों का उपभोग कर रहे होंगे।


अपना दृष्टिकोण दूरदर्शिता पूर्ण रहे

दूसरे जीव−जंतुओं की अपेक्षा मनुष्य में विचार, कल्पना, विवेक और अध्ययन की जो विशेषतायें दिखाई देती हैं वह निःसन्देह किसी विशेष प्रयोजन के लिये हैं। इन विशेषताओं को धारण करने वाला पुरुष भी यदि अपना जीवन केवल खाने पहनने और काम-क्रीड़ा में बिताता है तो इसमें उसकी बुद्धिमत्ता न मानी जायगी।

प्राप्त साधन ऐसे हैं जो मनुष्य को उसकी सही स्थिति का ज्ञान करा सकते हैं। ज्ञान के प्रकाश में मनुष्य आत्मा-परिचय प्राप्त कर सकता है। पर यह बड़े खेद की बात है कि मनुष्य के क्रिया-व्यवसाय जन्तुओं से कुछ ही परिमार्जित होते हैं। भिन्नता इतनी ही हो सकती है कि पास पास रहने वाले दो वन्य-पशु स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्राकृतिक प्रेरणा से बना लेते हैं, मनुष्य रास-उल्लास के साथ विवाह क्रिया पूरी करता है। ऐसे विवाह के पीछे जो सात्विक उद्देश्य निहित है उसे यदि न समझा जाय तो पशुओं का ही प्रणय अधिक अच्छा माना जायगा क्योंकि उनमें किसी प्रकार के जंजाल-बखेड़े भी तो नहीं होते।

मनुष्य की श्रेष्ठता उसकी दूरदर्शिता के कारण होती है। जीवन के जिस क्षेत्र में दूरदर्शिता से काम लेते हैं उसी में सफलता की सम्भावनायें बढ़ने लगती हैं। गृहस्थ को ही लीजिए। तत्काल सुख के आकर्षण में जो लोग अपने लिए अधिक अच्छा भोगने की लालसा रखते हैं उनके परिवार में सौहार्द नहीं रह पाता। गृहस्थी के सुख और उसकी समुन्नति इस बात पर निर्भर है कि परिजनों में दूरदर्शिता की पर्याप्त मात्रा है। बच्चा आज पढ़ लेगा तो वह कल श्रेष्ठ नागरिक बनेगा। आत्म-सम्मान बढ़ायेगा और वृद्धावस्था का पाथेय बनेगा। उसकी पढ़ाई में इतना धन इसी से लगाते हैं। यह उचित भी है। कल के निर्माण की नींव आज नहीं मजबूत करते तो यह इमारत तूफान और वर्षा के संघात कैसे सहन करेगी? माता-पिता की सेवा, स्त्रियों की शिक्षा और स्वावलम्बन, भविष्य के लिये निधि संचय-इन्हीं से तो परिवार में सुख शान्ति और सुरक्षा रहती है। परिणाम दूरगामी भले ही हों पर सन्तुष्ट जीवन का आधार यही है कि कर्म का आधार आज के सुख और तात्कालिक सफलता ही न रहें वरन् कल की सुन्दर व्यवस्था को ध्यान में रखकर आज का काम करें।

लोग कहते हैं कि आप बड़े लोभी हैं। एक

रुपया बचाने के लिए बिलकुल रूखा भोजन करते हैं। आप उनसे कृपया पूछिये कि कल यदि आपके बच्चे को चोट लग जाय तो वे आपके लिये दवा का प्रबन्ध कर देंगे? बच्चे की फीस के जवाबदार आप हैं। आपको लोभी बनाने वालों को भला क्या मतलब कि आपके बालक की फीस जमा करा दें। निर्जीव उपहास के लिये, भविष्य को अन्धकारमय बनाना उचित नहीं होता, जो कल की बात सोचता है वह अधिक बुद्धिमान माना जाता है। अभी की बात पर अधिक ध्यान देना असफलता का लक्षण है इससे बचने का प्रयत्न कीजिये।

दूरदर्शिता का अर्थ है संकीर्णता का परित्याग। जब तक मनुष्य के सोचने, करने का क्षेत्र संकुचित और स्वार्थपूर्ण रहता है तब तक वह असीम की अनुभूति से वंचित ही रहता है। छोटे दायरे में विचार करने का अर्थ यह होता है कि मनुष्य की चेतन प्रवृत्तियाँ विकसित नहीं हो रही। वह जड़ता के दुःख पूर्ण अन्धकार में ही—चक्कर लगाता रहता है। पारलौकिक ज्ञान से लोग वंचित रह जाते हैं इसका कारण यह नहीं होता कि उन्हें साधन और परिस्थितियाँ नहीं मिली होतीं। प्राकृतिक उपहार और दैवी अनुदान सभी को एक जैसे मिले हैं। दिन रात सबके लिये निकलते हैं, उसी से हमें प्रकाश मिलता है। वायु, जल, आकाश आदि की नैसर्गिक सुविधायें सबके लिये एक जैसी ही होती हैं। पर एक मनुष्य इन्हें देखकर भी नहीं देखता। वह अपने छोटे-छोटे उद्योगों में ही लगा रहता हैं। सवेरे उठना, काम पर चले जाना, खाना पहिनना आदि बाह्य सुख और सुविधाओं तक ही सीमित रहने वालों को यह घटनायें सामान्य-सी प्रतीत होती हैं किन्तु दूरदर्शी पुरुष इन विलक्षणताओं पर गम्भीरता से विचार करते हैं। उनके मर्म—भेद जानने का प्रयत्न करते हैं। ऊपर से दोनों व्यक्तियों को कार्यों में भले ही समानता दिखाई दे, पर इसमें सन्देह नहीं कि एक अपने संकुचित दृष्टिकोण के कारण क्षुद्र बनता जा रहा है और दूसरा जा रहा है—अनन्त की अनुभूति प्राप्त करने।

भारतीय संस्कृति के पतन का कारण यहाँ के सशक्त लोगों की अदूरदर्शिता ही माना गया है। जयचन्द ने व्यक्तिगत हितों के प्रवाह में इतना भी विचार नहीं किया कि बाह्य शक्ति और संस्कृति का हमारे धर्म और समाज पर कैसा असर पड़ेगा। एक व्यक्ति की संकुचित-वृत्ति से सम्पूर्ण भारत हजार वर्षों तक परतन्त्र बना रहा। इस अवधि में उसका धन, धर्म, संस्कृति और गौरव सब कुछ नष्ट हो गया। अदूरदर्शिता के कारण व्यक्ति और समाज सभी को दुःखमयी परिणाम भोगने पड़ते हैं। व्यक्ति गत जीवन में भी ऐसी ही घटनाएं आये दिन घटित हुआ करती हैं फिर भी लोग अपनी संकुचित-वृत्तियों का परित्याग नहीं करते। दुःख कलह और क्लेश का कारण मनुष्य की विचार निर्णय की अक्षमता ही है।

अपनी समस्याओं से भागने का प्रयत्न न कीजिए। उन्हें दूसरों पर आरोपित भी मत कीजिए। समस्याओं का हल अपने आप को समझने, अपनी शक्तियों को पहचानने और उन्हें बचाये रखने का साधन मात्र है। अपने विचारों में नियन्त्रण रखें और उन्हें अव्यवस्थित न होने दें, तो कठिनाइयों की खराद में मनुष्य का जीवन शुद्ध और सत्वमय बनता है। इनसे मनुष्य की शक्ति और सामर्थ्य का परिपाक होता है। कठिन परिस्थितियों में या जिन समस्याओं को अपने लिए अहितकर मानते हैं, उन पर विचारों को नियन्त्रित न रखने से मनुष्य की परिस्थितियाँ और भी विषम होती हैं और समस्याएं भयंकर रूप धारण कर लेती हैं। जीवन-निर्माण की सही पद्धति यह है कि किसी भी समस्या के अच्छे-बुरे दोनों पहलुओं पर पूरी गम्भीरता के साथ विचार कर लें, तब जो निष्कर्ष निकले, उसे क्रियान्वित करें। इसरोडडडडडड परिणाम की भयंकरता और समस्या की दुरुहता से बच जाते हैं।

जब मनुष्य परिस्थितियों का कारण स्वयं में नहीं ढूँढ़ता और भाग्य या वातावरण को दोष देने लगता है, तभी उसमें अकर्मण्यता आती है। दूसरों को दोषी ठहरा कर झूँठा सन्तोष प्राप्त करने से मानसिक क्लेश और भी अधिक बढ़ते हैं। कोई व्यक्ति निर्धन है, वह सदैव सोचता रहता है कि उसके पास साधन नहीं हैं, पड़ोसी बाधा उत्पन्न करते हैं, आदि। पर गम्भीरतापूर्वक देखे तो निर्धनता का कारण साधनों का अभाव कम और आलस्य अकर्मण्यता अधिक होती है। ईश्वरचन्द विद्यासागर ने एक भिखारी-बालक को एक रुपया देकर रोजगार करने को कहा। बालक में उत्साह था, लग्न थी, कर्मशीलता थी। एक रुपये की पूँजी उसने बढ़ाई तो एक दिन इलाहाबाद का ऊँचा दुकानदार बन गया। साधन कितने ही स्वल्प क्यों न हों, मनुष्य उनका विकास कर सकता है। दोषारोपण करना मनुष्य का निकम्मापन है, इससे उसमें स्वार्थपरायणता आती है। भय और चिन्ता का कारण भी यह स्वार्थपूर्ण प्रवृत्ति ही है।

इन दुःखों से छुटकारे का मार्ग आध्यात्मिक विचारों में है। आध्यात्मिकता का पहला पाठ है—दूरदर्शिता। अर्थात् हमारी बुद्धि इस प्रकार है कि हम उसे जिस वस्तु को जिस रूप में देखने की इच्छा करते हैं, वैसा ही रूप हमारे सामने आ जाता है। अपने संस्कार, कल्पना और विचार के अनुसार, जो वस्तु औरों की दृष्टि में अहितकर होती है, वह हमें प्रिय लगती है, इसका कारण सही विचार-परम्परा या दूरदर्शिता का अभाव मानते हैं। जुआ, शराब, माँसाहार, चोरी, छल, निन्दा आदि नैतिक अपराध हैं, पर इन्हें करने वाले भी पर्याप्त मात्रा में यहाँ मिल जाते हैं। इसका कारण यही है कि उन लोगों ने जो इन विषयों पर सम्यक् विचार नहीं किया, इससे उन्हें इनकी हानियाँ दिखाई नहीं दीं या दुष्परिणामों की उपेक्षा की गई। इन बुराइयों से उत्पन्न स्वास्थ्य की खराबी, धन का अपव्यय, सामाजिक बहिष्कार और भेद आदि बुराइयाँ मनुष्यों को उस समय नहीं दिखाई देतीं, इसलिए उस समय तो उन्हें कर डालता है, किन्तु बाद में उन्हें जब अनेक यातनाओं का सामना करना पड़ता है तब दुःखी होते, सिर धुनते और भाग्य को दोषी ठहराते हैं।


आप अकेले तो हैं नहीं?

अबोध मनुष्य दूसरों के ऊपर विश्वास रखकर उनके सहारे आशा के ऊँचे-ऊँचे महल बनाता है। कल्पना के सुनहले रंगों से स्वर्गीय भविष्य को सजाता सँवारता है। दूसरों के ऊपर अपने सुख-प्रसन्नता के महल बनाता है। उन्हें अपना मान कर चलता है और उनके बल पर न जाने क्या-क्या सोचता विचारता रहता है। लेकिन एक दिन मनुष्य के जीवन में ऐसा आता है कि उसके ये समस्त आशा-विश्वास सारहीन और खोखले सिद्ध हो जाते हैं। उसकी कल्पना के महल धराशायी हो जाते हैं, इनकी सुख-समृद्धि प्रसन्नता की योजनायें, मरीचिका मात्र हो जाते हैं । जब अपने कहने वाले लोग मनुष्य का साथ छोड़ देते हैं। वह जीवन पथ पर असहाय स्थिति में अकेला रह जाता है, तब अपनी अबोधता और अज्ञान पर रोने पछताने के सिवा कुछ भी उसके हाथ में नहीं होता।

कौन किसका प्रिय है? कौन किसका साथी है? इसका कोई सही, निश्चित उत्तर नहीं दिया जा सकता। फल और शीतल छाया के नष्ट होने पर पक्षीगण वृक्ष छोड़ जाते हैं, नदी-सरोवर के सूख जाने पर सारस उड़ जाते हैं, पशु-पक्षी जलते हुए वन को छोड़कर भाग जाते हैं, प्रभुता—श्री समृद्धि नष्ट होने पर सेवक स्वामी को छोड़ जाते हैं, परिजन भी स्वार्थ पूर्ति समाप्त हो जाने पर मनुष्य का साथ छोड़ देते हैं। वृद्ध माता-पिता सन्तान को भारस्वरूप मालूम होने लगते हैं। रुग्ण-अपाहिज, असुन्दर हो जाने पर प्रियतमा स्त्री मनुष्य को भार लगने लगती हैं तो कमाने में असमर्थ घर की आवश्यकता पूर्ण न करने वाला पति स्त्री को बुरा लगने लगता है। परिस्थितिवश आरोग्य-असमर्थ हो जाने वाला सेवक भी स्वामी को बोझा लगने लगता है।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में ऐसी स्थिति अवश्य आती है जब जिन्हें वह अपना कहकर चला वही उसकी उपेक्षा करने लगते हैं। जिनके ऊपर आशा आकाँक्षायें रखकर चला वही उसकी आशाओं आकाँक्षाओं, के लिए बाधक बन जाते हैं। हरेक मनुष्य के जीवन में एक ऐसा क्षण अवश्य आता है जब संसार में वह अपना स्वयं आपको ही पाता है।

कैसी विडम्बना है, कि हम अबोध होकर दूसरों के भरोसे अपनी आशा के स्वप्न संजोते रहते हैं। और फिर दूसरे ही दिन उनके कटु—असहानुभूतिपूर्ण, व्यवहार देखकर दुःखी होने लगते हैं, उनकी आलोचना करने लगते हैं। दोष देते हैं। यह दूसरी बड़ी भूल करते हैं।

हर मनुष्य को देर सवेर में यह हृदयंगम करना पड़ेगा कि वह संसार में अकेला आया है। अकेले ही उसे अपनी जीवनयात्रा पूर्ण करनी पड़ेगी। संसार के लोगों का साथ तो तभी तक मिलेगा जब तक आप उनके काम करने के योग्य हो, उनके स्वार्थों की पूर्ति में सहायक हो सकते हो या उनकी हाँ में हाँ मिलाकर उनके पीछे चलते रह सकते हो। जिस दिन आप काम के अयोग्य हो जायेंगे संसार वाले आपको अनावश्यक, कूड़ा समझकर दूर उठा फेंकने के लिए तैयार हो जाएंगे। आप उन्हें बुरा लगने लगेंगे। तब आपको, उपेक्षा, अपमान तिरस्कार के सिवा कुछ नहीं मिलेगा उन तथाकथित अपने लोगों से। संसार के लोग उसी की सराहना करेंगे उसे ही महत्व देंगे, यहाँ उसी का बोल बाला होगा जो उनकी स्वार्थ सिद्धि में सहायक होगा जो उनके काम आयेगा।

संयोगवश जब आप जीवन में अकेले और कठिन स्थिति में पड़ जायेंगे तब कोई आपकी ओर देखेगा भी नहीं। किसे समय है जो आपको आँसू पोंछेगा? कौन आपकी वेदनाओं को सुनेगा कौन आपकी सहायता कर सकेगा? इसका एक ही उत्तर है, कोई नहीं। आपको अकेले अपने आप ही अपनी वेदनाओं के कष्टों का हलाहल पीना पड़ेगा। स्वयं को ही अपनी समस्याएँ सुलझानी होंगी। स्वयं ही पथ पर चलना होगा चाहे आपके पैरों में असह्य वेदना ही क्यों न हो।

प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक बनावट होती है अपनी प्रकृति होती है। एक सी बनावट—रुचि, प्रकृति के व्यक्ति नहीं मिल सकते। इसलिए किसी भी रूप में हम अन्य किसी को अपना साथी नहीं समझ सकते। जीवन की अन्तिम यात्रा तक कोई भी अपना पूरा-पूरा साथ नहीं निभा पाता। कालान्तर में अपने कहे जाने वाले पराये बन जाते हैं। सहायक, बाधक बनकर निकलते हैं। पोषक, शोषक सिद्ध होते हैं। आपको स्वतन्त्र और सहज रूप में जीवन जीने दें, ऐसे साथी मिलना असम्भव है। साथ के नाम कर आपको किसी न किसी रूप में अपने स्वत्व का बलिदान करना पड़ेगा या दूसरे के स्वत्व का शोषण। और यह दोनों ही स्थितियाँ अधिक दिनों तक नहीं रहतीं, परिणाम स्वरूप मनुष्य को एक न एक दिन अकेले रहना ही पड़ता है। अकेलेपन का अनुभव करना ही पड़ता है।

सबको पाकर भी, असंख्यों मनुष्यों से घिर कर भी, आप अकेले हैं। क्योंकि यह साथ तो चन्द दिन का है। ये अल्प समय के सहयात्री हो सकते हैं लेकिन बहुत जल्दी ही पथ में आप अकेले छोड़ दिए जायेंगे। ये सहयात्री अपने-अपने स्थानों पर आपका साथ छोड़ देंगे।

जो लोग दूसरों के ऊपर अपनी सुख-शान्ति को निर्भर रखते हैं जो दूसरों के सहारे अपनी उन्नति की आशा रखते हैं, जो दूसरों के सहारे अपनी गाड़ी चलाना चाहते हैं उनकी ये समस्त आशायें अनुभव की यथार्थ चट्टान पर जाकर जब टकराती है तो चूर-चूर हो जाती हैं। मनुष्य के लिए शेष रह जाती है घोर वेदना, पश्चाताप असन्तोष और अशान्ति। जो व्यक्ति दूसरों के सहारे जीवन यात्रा तय करना चाहते हैं उन्हें बहुत जल्दी ही अकेला-असहाय रह जाना पड़ता है।

विचार कीजिए जिस व्यक्ति के सहारे आपने सुख-शान्ति के उन्नति-प्रगति के स्वप्न संजो रखे हैं यदि वह किसी बात पर आप से रुष्ट हो जाये-आपसे मुँह मोड़ ले चल बसे तो आपके स्वप्नों का क्या होगा? आपकी आशाओं के महलों का क्या होगा?

स्मरण रखिए आप सभी भाँति अकेले है। यदि आपका स्वास्थ्य खराब हो जाय तो उसके पूर्ति आपका दूसरा कोई भी साथी नहीं कर सकता। आपकी मानसिक उलझनों को कोई भी हल नहीं कर सकता। आपका दिमाग विकृत हो जाय तो उसके स्थान पर दूसरे का दिमाग आपके कोई काम नहीं आ सकता। आप जो पाप पुण्य का कार्य करते हैं उसमें दूसरा कोई आपका साझीदार नहीं हो सकता। इनका अच्छा या बुरा परिणाम आपको ही मिलेगा, दूसरे को नहीं।

जो व्यक्ति यह समझने की भूल करते हैं कि दूसरों के कन्धों पर चढ़कर वे जीवन की यात्रा पूरी कर लेंगे या कोई बड़ी सफलता हासिल कर लेंगे उन्हें एक दिन अपनी भूल का नुकसान उठाना पड़ेगा। प्रथम तो कोई भी व्यक्ति बिना समुचित मूल्य लिए आपको कोई लाभ नहीं पहुँचा सकता। और कई बार तो यह मूल्य इतना होता है कि यदि मनुष्य स्वतन्त्र रूप से प्रयत्न करे तो उससे अधिक सफलता प्राप्त कर सकता था। फिर दूसरे कृपा से प्राप्त लाभ में मनुष्य की मौलिक शक्तियाँ कुँठित हो जाती है। उनका स्वतन्त्र विकास रुक जाता है। मनुष्य की सबसे बड़ी थाती-उसका जन्मसिद्ध अधिकार है-जीवन की स्वतन्त्रता का अनुभव करना। जो किसी रूप में दूसरे के सहारे रहता है, उसे अपनी इस प्रवृत्त स्वतन्त्रता का हनन करना पड़ता है। दूसरे के सहारे रहने वाला कभी स्वतन्त्र रह ही नहीं सकता। उसे अपने विचार अपनी भावनाओं का बलिदान करना पड़ता है दूसरों के लिए। और यही सच्ची परतन्त्रता है। पराधीनता जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है पाप है।

कदाचित दूसरे की कृपा या सहारे से मनुष्य को बहुत बड़ा लाभ मिल भी जाय तो वह उस क्षमता से वंचित रह जाता है जिससे प्राप्त की रक्षा और उसका सदुपयोग कर सके। एक दिन ऐसा आता है जब उससे सब कुछ छीन लिया जाता है या वह उसे सम्हाल नहीं पाता और अन्त में वह अकेला रह जाता है जीवन की प्रारम्भिक सीढ़ी पर अपने पहले के साथियों से भी बहुत पीछे।

इस तरह हम देखते हैं कि मनुष्य के लिए यदि कोई साथी है तो वह है उसका अपना अकेलापन। जो जितनी जल्दी इस अकेलेपन की कद्र करके इसकी रक्षा करता है वह उतना ही सफल होता है जीवन की साधना में। सब सहारों की तरफ से दूसरों के सहयोग सहायता की आशा छोड़कर अपने आप पर भरोसा करें अपने अकेले को जीवन का आधार बनायें।


सुख की आकाँक्षा को बुरी मत कहिए!

इस संसार के सभी लोगों को सुख की आकाँक्षा होती है। धन, स्वास्थ्य, पद, प्रशंसा की कामना सभी करते हैं और इन्हें सुख का आधार मान कर लोग अपनी अपनी तरह से इन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न भी करते हैं। तरीके भिन्न हो सकते हैं, किन्तु सुख प्राप्ति की आकाँक्षा सभी को एक जैसी ही होती है। धन-सुख को प्रधान साधन माना जाता है। इसे कमाने और प्राप्त करने के लिए लोग कड़ी मेहनत, उद्योग-धन्धे, खेती, दुकान, नौकरी आदि करते हैं, कई लोग इसके लिए अनैतिक कर्म भी करते हैं। हम मानवों में कितनी ही भिन्नता हो, किन्तु धन कमाने का मूल-उद्देश्य जीवन के सुख प्राप्त करना ही है।

यह आकाँक्षा बुरी नहीं, आत्म विकास में इससे सुविधा प्राप्त कर सकते हैं। किन्तु यह तभी सम्भव है, जब सुख प्राप्ति की भावना का व्यतिक्रम न हो। संसार में जो कुछ भी परमात्मा ने बनाया है, उसका उचित रीति से उपभोग करें, तो यहाँ की कोई भी वस्तु मानवीय-विकास और आत्मिक प्रगति में बाधा उत्पन्न न करेगी। कामेच्छा आध्यात्मिक विकास के मार्ग में प्रमुख शत्रु मानी गई है। किन्तु इसका एक विशिष्ट महत्व भी है। काम की चेष्टा मनुष्य में न रही होती तो सृष्टि संचालन का क्रम कहाँ से चलता? राम, कृष्ण, गौतम, गान्धी, तिलक, मालवीय आदि महापुरुष कहाँ से आते? जीवन संचार का क्रम इसी भाँति आगे भी चलने देने की दृष्टि से कामोपभोग बुरी वस्तु नहीं कही जा सकती। बुराई तो तब उत्पन्न होती है, जब केवल वासना पूर्ति और क्षणिक सुख की आकाँक्षा से अपने शरीर का सार-तत्व अनुपयुक्त मात्रा में निचोड़ते रहते हैं।

क्रोध को ही लीजिए-यह न हो तो संग्राम में लड़ने वाले जवान दुश्मनों का सफाया कैसे करें? गुण्डे बदमाश आततायी व्यक्तियों पर क्रोध आये उन्हें दण्ड दिया जाय तो यह बुरी बात नहीं। भगवान् राम ने रावण पर कृष्ण ने कौरवों पर क्रोध किया। सत्य और संस्कृति की रक्षा के लिए क्रोध भी धर्म है। लोभ का भावी-जीवन की आकस्मिक घटनाओं के समय सञ्चित द्रव्य के उपयोग का महत्व है। मोह का तो महत्व और भी अधिक है। गृहस्थी की सुदृढ़ व्यवस्था बच्चों का पालन-पोषण श्रम-उद्योग और क्रियाशीलता का आधार सूत्र मोह होता है। इससे यह बात समझ में आती है कि अपनी मर्यादा के अन्दर संसार की कोई भी वस्तु बुरी नहीं है। सुख प्राप्ति की आकाँक्षा भी इसी प्रकार बुरी नहीं। यह स्वाभाविक एवं उचित भी है कि लोग सुखों की कामना करते हैं। जीवन के विभिन्न व्यापार इसी से तो चलते है।

सुख की आकाँक्षा न हो तो कौन परिश्रम करना चाहेगा? कड़ी धूप में अपनी चमड़ी कौन सुखाना चाहेगा? आठ घण्टे ड्यूटी बजाने में कौन-सा आनन्द रखा है? सुख की आकाँक्षा के पीछे संसार की एक बहुत बड़ी व्यवस्था सन्निहित है, किन्तु यह है तभी तक जब तक सुख की प्राप्ति के साधनों में व्युत्क्रम उत्पन्न न हो। इसे साध्य न मानें, आसक्ति न हो। शक्ति के रूप में ही सुख का महत्व है।

‘सुख’ एक दृष्टिकोण है -जो लोगों की रुचि के अनुरूप होता है। वस्तुतः संसार की किसी भी वस्तु में न सुख है, न दुःख। जिसके सन्तान नहीं होती है, वह इसके लिए बड़ा व्यग्र दुःखी तथा बेचैन रहता है, उसकी दृष्टि में पुत्र-प्राप्ति का सुख ही संसार का बड़ा भारी सुख होगा। पर जिसके कई सन्तानें पहले ही हैं, घर में धन का अभाव है, उन्हें सन्तान का होना दुर्भाग्य जान पड़ता है। सुख का प्रधान साधन और आकाँक्षा की प्रमुख वस्तु ऐसे लोगों के लिए धन होगी। धन और पुत्र दोनों अवस्थाओं में एक जैसे हैं। किन्तु भिन्न दृष्टि कोणों के कारण एक व्यक्ति धन को सुख का सार मानता है दूसरे के लिए ‘पुत्र’ सुख है।

इससे स्पष्ट हो जाता है कि संसार के किसी भी पदार्थ में सुख नहीं। रुचि के अनुकूल सुख का भाव अपने दृष्टिकोण में होता है। लोगों के दुःख का कारण पदार्थ के सुख की आसक्ति ही है। अधिकाँश लोग इसी कारण दुःखी रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों को दो श्रेणी में विभक्त कर सकते हैं—

(1)विचारों से दुःखी—ऐसे लोग 90 प्रतिशत होते हैं, जिन्हें केवल मानसिक दुःख होता है। भविष्य के प्रति गलत निर्णय कर लेने से लोग अकारण ही दुःखी बने रहते हैं। पुत्री की शादी की चिन्ता, तरक्की न मिलने का दुःख, लोगों का भय, हानि की आशा का, मित्रों से विश्वास-घात की आशंका, गृह-नक्षत्र द्वारा हानि पहुँचने के डर पाये जाते हैं। ऐसे दुःखों का कारण वस्तुतः इतना बड़ा नहीं होता। जितना कि वे उद्विग्न और संतप्त रहते हैं।

(2) शारीरिक दुःखी—इनके दुःख को दुःख कहा जा सकता है। शरीर रोगी है तो सुख कहाँ मिलेगा? पाचन-क्रिया खराब हो रही हो तो बहुस्वाद युक्त भोजन भी फीका जान पड़ेगा। ऐसे लोगों को एक हद तक वास्तविक दुःखी मान सकते हैं।

किन्तु यदि भावनाओं में परिष्कार किया जा सके तो अरुचिकर कारणों को भी सुख में बदला जा सकता है। तपस्वी लोग घर के सुखों को त्याग कर जंगल का जीवन अधिक व्यतीत करते हैं। देखने में वनवासी जीवन नितान्त अभावपूर्ण लगता है। आहार, विहार और आमोद-प्रमोद की जो सुविधायें गृहस्थ जीवन में सम्भव हैं वह भला वन के जीवन में कहाँ मिलेंगी? फिर भी एकान्त वासियों को आनन्दपूर्ण जीवन बिताते देखा जाता है, इसका कारण भावनाओं का परिष्कार ही है। स्वार्थी मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति को सुख मानते हैं किन्तु परमार्थी व्यक्तियों को परोपकार में सुख मिलता है। परोपकार देखने में घाटे का सौदा हैं। बाह्य दृष्टि से माप करें तो दूसरों के हित के लिये सदैव ही अपने हितों को होम देना होता है। समय, श्रम और कभी-कभी धन भी लगाना पड़ता है, किन्तु परोपकारी को अपनी उच्च भावनाओं में ही अतीव सुख प्राप्त होता है। देखने वाला उसे बेवकूफ मान सकता है किन्तु उसके आन्तरिक सुख को वह स्वयं ही जान सकता है। भावनाओं का सुख ही सच्चा है।

आध्यात्मिक अनुभूतियों से प्राप्त सुख ही जीवन का सच्चा सुख है। दयावान् व्यक्ति दूसरों के दुःख दूर करने में अलौकिक सुख का आनन्द लूटते हैं। असहाय व्यक्तियों की सहायता करने वाले शक्तिमान् व्यक्ति परमात्मा का ध्यान-सान्निध्य प्राप्त करने वाले योगी की ही तरह जीवन का सच्चा सुख प्राप्त करते हैं। जो इस जीवन में ऐसा सुख प्राप्त कर सका वह परलोक में भी सुख प्राप्त करेगा, ऐसा मानना चाहिये। कई लोगों की यह मान्यता है कि जितना यहाँ कष्ट भोग लें उतना ही स्वर्ग में सुख मिलता है। यह भावना नितान्त भ्रामक है। परलोक में स्वर्ग और मुक्ति का आधार यह है कि मनुष्य इस जीवन में भी सच्चा सुख—आध्यात्मिक सुख—प्राप्त करे। स्वर्ग की सद्गति उन्हें ही मिलती है जो उसे प्राप्त कर लेते हैं।

यहाँ यह समझ लेना नितान्त आवश्यक है कि सुख, चित्त का वह भाव है जो मनुष्य के हृदय में उसकी अभिलाषाओं के पूरा होने से या जिस कार्य में वह लगा हो उसमें सफलता प्राप्त कर ले या उद्देश्य की सफलता से उत्पन्न होता है। गणितज्ञ को सच्चा सुख किसी प्रमेय या साध्य को हल करने में मिलता है। अनुसन्धान कर्ताओं को सबसे बड़ी प्रसन्नता उस समय मिलती है जब वह कोई नया आविष्कार करता है। अपने विषय की सफलता को ही जीवन का सुख कह सकते हैं। आत्मा का विषय है—आनन्द की प्राप्ति। मानव-जीवन का उद्देश्य भी यही है। यह सुख अपने जीवन को समष्टि में घुलाने से होता है। सबके हित में अपना हित समाहित कर देने से जिस दिव्य-ज्योति के दर्शन होते हैं आत्मा को उससे बड़ा सुख अन्यत्र नहीं मिलता। इसलिये आध्यात्मिक-जीवन सुखों का मूल कहकर पुकारा गया है। लौकिक कामनाओं की पूर्ति से आँशिक सुख मिलता है किन्तु सबके कल्याण की भावना से सर्वांगपूर्ण सुख की अनुभूति होती है।

शास्त्रकार का कथन है :—

अपह्त्यार्तिमार्तानाम् सुखं यदुपजायते।

तस्य स्वर्गोपवर्गो वा कलाँ नहित षोडशीम्॥

अर्थात्—परोपकार से, दुःखियों के दुःख दूर करने से जो सुख मिलता है, वह चिरस्थायी और सच्चा होता है। इस सुख की कोई सीमा नहीं।


गृहस्थाश्रम भी एक योग साधना है।

गृहस्थ-जीवन बहुत बड़ी जिम्मेदारी और उत्तरदायित्वों का है। कौटुम्बिक एवं सामाजिक महत्व के कार्यों का प्रारम्भ गृहस्थाश्रम में ही होता है। इसी जीवन में मनुष्य अपने परिवार, पड़ोस, समाज के प्रति कर्त्तव्य-पालन करने की स्थिति में होता है। गृहस्थाश्रम तो मानो एक तपोभूमि है। सहनशीलता, संयम, उदारता, त्याग, आत्मीयता के सद्गुणों की साधना इसी में होती है। जो लोग गृहस्थ जीवन को मौजमजा उड़ाने, इन्द्रिय-जनित सुखों को भोगने, में थोड़ा बहुत धन, प्रतिष्ठा आदि कमा लेने का अवसर समझते हैं वे इसके महत्व को कम करते हैं। इसके प्रति लापरवाही प्रकट करते हैं।

गृहस्थाश्रम केवल पति-पत्नी के लिये ही नहीं है। उसकी तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति अथवा उनके अपने सुखों के लिए यह संस्था नहीं है। मनुष्य की दुर्दम्य, नैसर्गिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए भी गृहस्थ जीवन नहीं, वैसे ये बातें इसमें आ भी जाती हों तो भी यह मानव-जीवन को अधिकाधिक विकसित करने, महानता की ओर अग्रसर होने का राजमार्ग है। गृहस्थ-जीवन में पति-पत्नी एक दूसरे के सहायक, सहयोगी बनकर सामाजिक कर्त्तव्यों की पूर्ति में लगते हैं। अपने पूर्वजों से प्राप्त विरासत को बढ़ाकर उसे नई पीढ़ी को देने का—अधिक योग्य बनाने का भार गृहस्थी पर ही होता है। विकास की शृंखला में नव-पीढ़ी के नव-निर्माण का महान् उत्तरदायित्व गृहस्थाश्रम में ही है। यह मानवजाति के संस्करणों को क्रमशः उद्दात्त और मंगलमय स्थिति तक पहुँचाने की सीढ़ी है।

गृहस्थ-जीवन में पति-पत्नी का जीवन एक सूत्र में बंधता है। मानों दो शरीर में एक ही चैतन्य बहने लगता हो फिर इन दोनों से सम्बन्धित परिवार आत्मीयता के सूत्रों में जुड़ते हैं फिर उनसे सम्बन्ध रखने वाले अन्य परिवारों तक यह सम्बन्ध-सूत्र फैलने लगते हैं। परस्पर एक दूसरे को सहयोग, सद्भावनायें मिलने लगती हैं। और एक बहुत बड़ा समाज आत्मीय सम्बन्धों में जुड़ जाता है जिसका प्रत्येक सदस्य एक दूसरे के प्रति कर्तव्य तथा पारस्परिक अधिकारों से बँधा हुआ सा रहता है। इतने बड़े समाज में गृहस्थाश्रम द्वारा सबकी सेवा सत्कार करने का धर्म-कर्तव्य हमारे यहाँ माना गया है। गृहस्थाश्रम एवं पञ्चमहायज्ञ समाज के प्रति इस कर्तव्य-पालन करने के लिये ही बनाये गये हैं। जिनमें देवता, पितर, ज्ञानी, मनुष्य यहाँ तक कि जीवमात्र की सेवा आ जाती है। इतना बड़ा है, हमारा गृहस्थ-धर्म।

गृहस्थाश्रम की सफलता तीन बातों पर निर्भर करती है। पहला गृहस्थ-जीवन के पूर्व की तैयारी, दूसरे पति-पत्नी के दाम्पत्य-जीवन में आने का ध्येय-तीसरा गृहस्थ-जीवन में एक दूसरे का व्यवहार और उनका कर्तव्य-पालन।

ब्रह्मचर्याश्रम गृहस्थ-जीवन में पैर रखने की तैयारी करने का समय है। संसार में आवश्यक और उपयोगी ज्ञान प्राप्त करने के लिये ब्रह्मचर्य की आवश्यकता होती है। इसी समय में मनुष्य अनेक कलायें, ज्ञान, विद्यायें अर्जित करता है तरह-तरह के अच्छे अनुभव संस्कार अर्जित करता है। यह तैयारी ही गृहस्थ-जीवन की सफलता का आधार होती है। जिनका विवाह के पूर्व का जीवन सफल और उपयोगी होता है, वे गृहस्थ-जीवन को भी अधिक सफल बना सकते हैं। ब्रह्मचर्याश्रम का यद्यपि अब पूर्वस्वरूप तो नहीं रहा फिर भी आज का विद्यार्थी-काल गृहस्थ-जीवन का पूर्व समय ही है। इसे भावी-जीवन को भली प्रकार जीने का उपयोगी आधार बनाया जा सकता है। गृहस्थ-जीवन की बहुत कुछ सफलता इस पर निर्भर करती है कि दाम्पत्य-जीवन में प्रवेश करने से पहले मनुष्य ने उसके लिए क्या तैयारी की? शारीरिक, मानसिक , आत्मिक, दृष्टि से सामर्थ्यवान्, गुणवान बनकर गृहस्थ-जीवन में प्रविष्ट होने वाले दम्पत्ति अपना जीवन अधिक सफल बना सकते हैं। और इसकी तैयारी का समय, विवाह के पूर्व का समय ही है। जो अयोग्य, असमर्थ, अविकसित रहकर गृहस्थ में प्रवेश करते हैं उनका जीवन काफी पिछड़ा हुआ, कठिनाई और उलझनों से घिरा हुआ, हीन अवस्था में बीतता है। वे गृह-आश्रम का कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाते।

गृहस्थ-जीवन की सफलताएँ और असफलताएँ विवाह-संस्कार, स्त्री और पुरुष का दाम्पत्य-जीवन में प्रवेश करने के उद्देश्य, आदर्शों पर भी बहुत कुछ निर्भर करती हैं। जहाँ विवाह केवल शारीरिक सुख अथवा एक दूसरे के लुभावने आकर्षण या किसी क्षुद्र लोभ के कारण होता है वहाँ विवाह का आदर्श ही नष्ट हो जाता है। और ऐसे वैवाहिक सम्बन्ध अधिकतर असफल ही सिद्ध होते हैं। जिन विवाह सम्बन्धों के पीछे कोई महान् आदर्श, उद्दात्त ध्येय की भावना न हो तो गृहस्थ-जीवन में भी निम्न कोटि के भाव अर्थात् आकर्षण, लोभवृत्ति-आदि पर ही चलता है और फिर गृहस्थ-जीवन में कटुता, क्लेश, अशान्ति का बोलबाला हो जाता है। जो स्त्री पुरुष परस्पर के दैहिक आकर्षण से, धन-सम्पत्ति के लोभ से अथवा निरुद्देश्य या उनके अभिभावकों की ऐसी इच्छा से दाम्पत्य-जीवन में घुसते हैं उनके लिये आगे चलकर निर्वाह करना कठिन हो जाता है। तब वे भली प्रकार अपने गृहस्थ-धर्म को नहीं निभा पाते और जहाँ इस तरह के विवाह सम्बन्ध स्थापित होते हैं, वह समाज कभी उन्नत नहीं हो सकता क्योंकि गृहस्थाश्रम ही उसकी रीढ़ होती है। इतना तो स्पष्ट ही है कि धन, सुन्दरता या अन्य किसी आकर्षण के आधार पर स्थापित विवाह-सम्बन्ध चाहे वर-वधू की इच्छा से हों या उनके अभिभावकों की इच्छा पर, इनसे गृहस्थाश्रम की सफलता सम्भव नहीं होती। इस तरह की प्रवृत्तियाँ दम्पत्ति के साथ-साथ समाज और मानवता के लिये हानिकर सिद्ध होती हैं।

गृहस्थ-जीवन का आधार भौतिक लाभ तात्कालिक सुखोपभोग का दृष्टिकोण, दैहिक आकर्षण तो हो ही नहीं सकते। गृहस्थाश्रम जीवन के पवित्र और उद्दात्त ध्येय की पूर्ति के लिये है। तात्कालिक लाभ और वैयक्तिक सुख को लक्ष्य रखकर चलना गृहस्थ-जीवन की विडम्बना है। इनका परिणाम अन्ततः दुःख, क्लेश, असन्तोष, परेशानियों में ही प्राप्त होता है। गृहस्थाश्रम में ही समाज-संसार की उन्नति साधने का अवसर है। स्त्री-पुरुष एक दूसरे के प्रति व्रतशील बनकर एक निष्ठा के साथ अपने कर्तव्यों का मिलकर पालन करते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि इसमें संयम की उपासना करते हुए चञ्चलता एवं असंयम का पूर्णतया त्याग करके एक दिन गृहस्थ-जीवन को विशुद्ध बनाने की स्थिति में भी पहुँच जाना ही आवश्यक होता है।

आज गृहस्थाश्रम का कोई पवित्र उद्देश्य हमारे समक्ष नहीं रह गया है। अभिभावकों की इच्छा या दहेज के लोभ अथवा दैहिक वासनात्मक आकर्षण आदि से प्रेरित होकर विवाह सम्बन्ध स्थापित होते हैं। फिर गुजारा करने लायक कोई काम धन्धा कर लेना, बाल-बच्चों का जैसे-तैसे गुजारा कर लेना, थोड़ा बहुत पैसा या पद प्रतिष्ठा अर्जित कर लेना ही गृहस्थ-जीवन का उद्देश्य रह गया है। इससे परे कोई उच्च-उद्देश्य, उच्च-विचार, उत्तम संस्कार, उदात्त भावनाओं को कोई स्थान नहीं होता। अपनी इच्छा, वासना, कामनाओं से प्रेरित होकर आदर्शहीन जीवन बिताने की साधारण-सी जीवन-पद्धति होती है, आज के अधिकाँश गृहस्थियों की। लेकिन इससे व्यक्ति और समाज दोनों का कोई हित साधन नहीं होता। हर वर्ष लाखों दम्पत्ति गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते हैं और वे अपने से पहले की पीढ़ी की तरह गलतियों को दुहराकर निरुपयोगी जीवन बिताते हैं। इस गलत परिपाटी को सुधारने की आवश्यकता है। गृहस्थाश्रम को मनुष्य के विकास और उत्कर्ष का आधार बनाने के लिये हमें इसके महत्व को समझना चाहिये।


निराशा-जीवन का एक महान् अभिशाप

संघर्षमय जीवन पथ पर आगे बढ़ते समय मनुष्य को कई बार अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। रात और दिन, धूप-छाँव, सर्दी-गर्मी की तरह जीवन में सुख-दुख, हानि-लाभ, सफलता-असफलता आदि का संयोग चलता ही रहता है। लक्ष्य जितना बड़ा होगा विपरीततायें भी उसी अनुपात में आयेंगी। जीवन में न जाने कितने अवसर आते हैं जब मनुष्य को कड़ुवे घूँट पीने पड़ते हैं। कमल की प्राप्ति के लिए दल-दल और कीचड़ से होकर गुजरना पड़ता है। गुलाब का फूल तोड़ते समय काँटों का आघात लग जाना स्वाभाविक है। पहाड़ की चोटी तक पहुँचने में फिसलने, गिर पड़ने, ठोकर लगने की सम्भावनायें बनी रहती हैं।

इस तरह जीवन के सभी क्षेत्रों में मनुष्य को विपरीतताओं का सामना करना पड़ता है। लेकिन बहुत ही कम लोग जीवन पथ की इन सहज सम्भावनाओं को स्वीकार करके आगे बढ़ पाते हैं। अधिकाँश लोग इनसे हार मान कर बैठ जाते हैं, निराश हो जाते हैं, भविष्य के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण अपना लेते हैं। जीवन की समस्त सम्भावनाओं से मुँह मोड़ लेते हैं।

और भी कई कारण हैं, जिनसे जीवन में निराशा पैदा होती है। शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता भी हमारे जीवन में निराशा भर देती है। शारीरिक अवस्था का हमारी मानसिक स्थिति पर काफी प्रभाव पड़ता है। कहावत है “स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन निवास करता है।” किसी भी शारीरिक गड़बड़ी अथवा बीमारी से मानसिक संस्थान कमजोर हो जाता है। वह ठीक-ठीक काम नहीं कर पाता। कोई भी काम शुरू किया कि थकावट, बेचैनी परेशान करने लगती है। चिड़चिड़ाहट, मन न लगना, जीवन और इसके कार्यक्रमों में दिलचस्पी न रहना, उखड़ा-उखड़ा स्वभाव, इनका बहुत कुछ कारण शारीरिक अस्वस्थता ही रहता हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य जीवन को एक भार के रूप में समझने लगता है और निराशा-वादी बन जाता है।

कई बार वातावरण, परिस्थितियाँ भी मनुष्य को जीवन के प्रति निराश कर देती हैं। किसी आत्मीय व्यक्ति का निधन, मित्रों द्वारा धोखेबाजी या कोई घटना विशेष होने पर विवाद आदि से निराशा पैदा हो जाती है। लेकिन इन सामयिक घटनाओं से पैदा होने वाली निराशा अधिक समय तक नहीं टिकती वह जल्दी ही दूर भी हो जाती है।

इन बाह्य कारणों के अतिरिक्त कुछ आन्तरिक कारण भी होते हैं। अधिकाँश निराश व्यक्तियों की मनोस्थिति असन्तुलित और विकृत होती है। उनके सोचने, विचारने का तरीका रचनात्मक न होकर नकारात्मक होती है। उसमें निराशा और अवसाद घर कर लेते हैं तो चारों ओर असफलता ही दिखाई देती है। ऐसी स्थिति में मनुष्य का अपने ऊपर से विश्वास हट जाता है। विकृत मनोस्थिति के व्यक्ति जीवन में आने वाली सामान्य-सी दुर्घटनाओं, असफलताओं, कठिनाइयों को तूल देकर उनका भयावह स्वरूप गढ़ लेते हैं। और उनके भार को ढोते रहते हैं इनका मानसिक स्थिति पर इतना प्रभाव पड़ता है कि जीवन में सफलता, उत्साह, आशा की भावनायें ही नष्ट प्रायः हो जाती हैं। मनुष्य के जीवन में निराशा अवसाद ही शेष रहते हैं। खेल के मैदान में उतरने से पूर्व या कोई काम शुरू करते ही ऐसे लोग अपनी सफलता में सन्देह करने लगते हैं और इसी मनोस्थिति के कारण उन्हें निराश ही होना पड़ता है। असफलता की भावना लेकर परीक्षा में बैठने वालों की सफलता सन्देह-जनक ही रहती है।

इस तरह के विकृत मनोस्थिति के व्यक्ति जीवन और संसार को दुःखों का आधार समझने लगते हैं, वे जीवन के उज्ज्वल पक्ष को प्रायः भूल से जाते हैं।

निराशा चाहे किसी भी कारण से क्यों न पैदा हो जीवन के लिए एक अभिशाप है। यह मनुष्य के कर्तृत्व और पुरुषार्थ को जड़ता की जंजीरों में जकड़ लेती है। मुंशी प्रेमचन्द के शब्दों में “निराशा चारों ओर अन्धकार बनकर दिखाई देती है।” इसमें कोई सन्देह नहीं कि निराशा जीवन में अन्धकार पैदा कर देती है। सभी उज्ज्वल सम्भावनाओं को समाप्त कर देती है। यही जीवन की सारी प्रसन्नता, मस्ती, आनन्द को छीन लेती है। लोकमान्य तिलक ने कहा है “निराश व्यक्ति के जीवन में कोई भी वस्तु प्रसन्नता नहीं भर सकती उसे पग-पग पर मृत्यु दिखाई देती है।” स्वेट मार्डेन ने लिखा है “सभ्यता में उस व्यक्ति के लिए कोई स्थान नहीं जो जीवन से निराश हो बैठा है।”

निराशा, व्यक्ति को कर्तव्य और पुरुषार्थ से हटाकर भाग्यवादी बना देती है। उसकी गतिशीलता को कुण्ठित कर देती हैं। वह भाग्य की अदृश्य शक्ति को ही अपने जीवन का प्रेरक मानता है। उसी के भरोसे हाथ पर हाथ रखे बैठा रहता है। ऐसे निराशावादी व्यक्ति ही ज्योतिषी, भविष्यवक्ता आदि के पीछे चक्कर लगाते रहते हैं। अपने पुरुषार्थ के बल पर भाग्य-निर्माण करने की क्षमता को वे प्रायः भूल से जाते हैं।

निराशा, मनुष्य की शक्ति का बहुत बड़ा अंश खा जाती है। चेतना को हर लेती है। निराशा-जनक विचारों, कल्पनाओं के चिन्तन में मनुष्य की शक्ति बड़ी तेजी से जलने लगती है। यही कारण है कि निराश व्यक्ति जल्दी ही कमजोर, रुग्ण और अशक्त पाये जाते हैं। नियमानुसार रचनात्मक कार्य और विचारों से शक्तियाँ विकसित होती हैं। लेकिन निषेधात्मक विचार और हीन मान्यता से शक्ति का क्षय होने लगता है।

निराशा, मनुष्य की मानसिक स्थिति को भी अस्त-व्यस्त कर देती है। ऐसे व्यक्ति किसी भी काम में दृढ़ता के साथ नहीं लग सकते। यदि जैसे-तैसे काम शुरू भी करते हैं तो जल्दी ही उनका मन उससे उखड़ने लगता है। तनिक-सी कठिनाई, उलझन, आने पर वे अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। घबराहट और काल्पनिक भय उन्हें असन्तुलित बना देता है और वे जल्दी ही हाथ में लिए हुए काम को छोड़ बैठते हैं। इस तरह निराश व्यक्ति के जीवन में असफलता पर असफलतायें आती रहती हैं।

देखा जाय तो सबसे भयानक मौत भी अपने आप में इतनी भयंकर नहीं होती जितना हमारी कल्पना और भय उसे भयंकर बना देते हैं। जीवन में निराश व्यक्ति की मानसिक जटिलतायें इतनी बढ़ जाती हैं कि जीवन-पथ में आने वाली सामान्य-सी बातें भी उसके लिए पहाड़ जैसी कठिनाई के रूप में नजर आती हैं। जीवन जो खेल की तरह जिया जा सकता है, उनके लिए एक जंजाल-से लगने लगता है। भला, ऐसे व्यक्ति को जीवन में सफलता न मिले तो इसमें किसका दोष?

इसमें कोई सन्देह नहीं कि निराशा चाहे वह छोटे ही रूप में क्यों न हो, एक भयंकर मानसिक बीमारी है, जो बढ़ते-बढ़ते एक दिन समस्त जीवन को ही नष्ट-भ्रष्ट कर देती है। निराशा एक ऐसी भँवर है जो जीवन-नैया को सरलता से डुबा देती है। निराशा एक दल-दल है, जिसमें फँसे हुए व्यक्ति के लिए पश्चात्, दुःख, यन्त्रणा के सिवाय कुछ भी नहीं मिलता—

“निराशावादिनो मन्दा मोहावर्तेऽत्र दुस्तरे।

निमग्ना अवसीदन्ति पंके गावो यथावशाः॥”

निराशावादी लोग प्रगति की भावना से रहित होकर मोह के दुस्तर भंवर में पड़े हुए हैं। वे दलदल में फँसी विवश गायों की तरह दुःख पाते रहते हैं।

निराशा अपने तथा दूसरे लोगों में दुर्गुण बुराइयाँ देखने की प्रेरणा देती है। जीवन और संसार के उज्ज्वल पहलुओं से ऐसा व्यक्ति सदैव आँखें मूँदे रहता है। वह स्वयं को गन्दा समझता है साथ ही दूसरों को भी और इसी लिए वह सबसे घृणा करता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि निराशावाद एक भयंकर राक्षस है जो हमारे आन्तरिक और बाह्य-जीवन को नष्ट करने की ताक में बैठा रहता है।

मनुष्य के विकास, प्रगति और उज्ज्वल भविष्य की रचना में संसार की अन्य बाधायें सामान्य हैं, गौण हैं। ये हमारी गति को रोक नहीं सकतीं। जीवन-पथ का सबसे बड़ा अवरोध, सबसे बड़ी उलझन समस्या हमारी निराशा ही है जो हमारे पुरुषार्थ को पंगु बना देती है। हमारे मन मार देती है, प्रयत्न को जड़ता की जंग लगा देती है। अतः प्रगति के इस भयानक दुश्मन को दूर करने के लिए हमें सदैव प्रयत्न-शील रहना चाहिए।


मानसिक आवेशों का सदुपयोग करना सीखें

कि सी विद्वेष, कलह या झगड़े को मिटाने के लिए पहला उपाय तो यह हो सकता है कि उसके लिए हिंसात्मक द्वंद्व करें। इसमें शारीरिक, मानसिक तथा साधन-जन्य सभी शक्तियों का विनाश निश्चित है। क्रोध, घृणा और बल, प्रयोग से दोनों ही पक्षों की शक्तियाँ निश्चित रूप से पतित होती हैं। इस मार्ग से यदि किसी को विजय या सफलता मिल भी जाये तो उसे स्थायी विजय नहीं कह सकते। क्योंकि हिंसात्मक विजय, बल और साधनों की उपयुक्तता पर ही निर्भर हैं। इन साधनों में जैसे ही अपेक्षाकृत कमी आई अथवा विजित पक्ष की साहसिक और प्रतिरोधात्मक भावनायें बढ़ीं तो बार-बार नए-नए द्वंद्व उठते रहेंगे और शक्ति का पतन निरन्तर चलता रहेगा।

क्रोध, भय, उद्वेग, घृणा आदि मानसिक आवेगों के कारण शारीरिक व मानसिक शक्तियाँ गिरती हैं। कल्पना-शक्ति क्षीण होती है। आपकी सम्पूर्ण मनोगत चेष्टायें केवल बचाव की चिन्ता और प्रत्याक्रमण की विनाशकारी योजनाओं में ही लगी रहेंगी। आप उन परिस्थितियों को क्षणभर के लिए भी भुला न सकेंगे। उन्हीं विचारों में कुढ़ते रहेंगे। आपका अधिकाँश समय, जिसे आप अपने विकास-कार्यों में प्रयुक्त कर सकते थे, निष्प्रयोजन बर्बाद होता रहेगा।

लड़ाई-झगड़ों के बाद भी मानसिक आवेग बने रहते हैं। जो पक्ष हार गया है वह अधिक शक्ति से प्रतिशोध लेने की तैयारी कर रहा होगा। इस कार्य में उसके सम्बन्धी व मित्र-जन भी सहयोग दे रहे होंगे। यह काम कभी-कभी वंशानुगत भी हो जाता है। आल्हखण्ड में ऐसे वर्णन आते है—जब बाप, बाबा या उससे भी पूर्व अपने किसी परिजन का प्रतिकार लेने को लिए भयंकर संघर्ष हुए और भारी मारकाट तथा रक्तपात हुआ है। एक आवेश शान्त न होकर, अनेकों विद्रूप उत्पन्न करता है। इसलिए विचारवान महापुरुषों ने सदैव ही हिंसात्मक प्रतिशोधों को दूर करने को ही मानवीय—धर्म-कर्तव्य माना है। शान्ति और सुव्यवस्था के लिए यह आवश्यक भी प्रतीत होता है।

संघर्ष का अन्त किसी भी रूप में क्यों न हो उससे स्थायी शान्ति, सन्तोष और सुव्यवस्था कभी बन नहीं पाई। मृत्यु-दण्ड, सामूहिक दमन गिरफ्तारी, सैनिक आक्रमण, मारकाट, अदालत में धन और समय का अपव्यय आदि दुष्परिणाम अवश्य उत्पन्न हुए हैं और किसी भी पक्ष को सुख व शान्ति नहीं मिली। न ही किसी का विकास हो पाया। इसलिए क्रोध और कटुता के परिणाम कभी भी भले नहीं हो सकते। इसके व्यक्तिगत व सामूहिक परिणाम सदैव ही बड़े दुःखद हुए हैं। इसकी बड़ी दूषित प्रतिक्रिया जन-मानस में पड़ी है इसलिए बुराई की भावना विनाशक मानी जाती है।

पर जब प्रतिरोध की व्यवस्था विचारपूर्वक और शान्ति के साथ की जाती है तो अधिक दूरदर्शिता से काम लिया जाता है और परिणाम भी हितकर होते हैं। जब केवल तात्कालिक बातों पर ध्यान न देकर यह विचार किया जाता है कि यथार्थ में ऐसी घटना बनने का कारण क्या है? तो समस्या बिलकुल छोटी सी जान पड़ती है और उसे हँसकर टाल देना आसान हो जाता है। मुकाबले की शक्तिपूर्ण तैयारी की अपेक्षा साहस के साथ दूरगामी परिणामों पर विचार करते हुए, जो हिंसात्मक कार्रवाई की जाती है उससे शक्ति का अपव्यय उतना नहीं होता। किसी भी समस्या के स्थायी स्थायी विवेकपूर्ण समाधान निकल आते हैं और समस्या के तात्कालिक दुष्परिणाम रुक जाते हैं। इस अवस्था का नाम समझौता है। गान्धी जी इसे सत्याग्रह कहा करते थे। इसमें भी संघर्ष की तैयारी तो करनी पड़ती है किन्तु उसकी भूमिका अहिंसात्मक होने के कारण हानि और विनाश की सम्भावनायें शिथिल पड़ जाती हैं।

क्रोध और घृणा को जीतने के लिए उच्चस्तरीय भावना का नाम ‘प्रेम’ है। यह रचनात्मक पद्धति है जिसमें किसी भी पक्ष को न तो हानि उठानी पड़ती है न शक्तियों का अपव्यय होता है। सत्याग्रह के लिये प्रेम का प्रयोग अधिक प्रभावशाली होता है। परिणाम समय-साध्य हो सकते हैं किन्तु इसमें किसी भी पक्ष को किसी प्रकार का नुकसान नहीं उठाना पड़ता। जिस पक्ष से वस्तुतः अपराध हुआ उसकी अन्तःस्थिति पर भी इस का बड़ा सौम्य प्रभाव पड़ता है और स्थिर सुख शान्ति और सन्तोष के मंगलदायक परिणाम दिखाई देने लगते है। शक्तियों का यह पुनीत सम्मिलन जीवन में आनन्द पैदा करता है। इससे समाज और व्यक्ति का नैतिक उत्थान होता है।

कुछ व्यक्तियों के समक्ष प्रेम और सहयोग से, धैर्य पूर्वक सत्याग्रह अथवा मित्रतापूर्ण विचार रखने से भी समस्याओं का समाधान नहीं होता और बल प्रयोग की अहिंसात्मक कार्यवाई भी करनी पड़ती है तब कहीं जाकर परिस्थितियों का निबटारा होता है। यह मार्ग भी विचारों के विस्तार और मनोवैज्ञानिक पूर्णता के लिये आवश्यक जान पड़ता है। परन्तु अहिंसात्मक कार्य करते हुये भी कर्ता की भावना में दर्प का समावेश नहीं होना चाहिये। यह कार्य अन्त तक खोजपूर्ण दृष्टि से चलाना चाहिये। अपना उद्देश्य यही रहे कि किसी भी पक्ष में भय व्याप्त न हो, तो भी अनुचित पक्ष को अपनी हार स्वीकार करनी पड़े। इसके लिये प्रेम के साथ आपका साहस, आत्मविश्वास, स्वाभिमान और शक्ति -संगठन भी आवश्यक है। प्रेम एक निर्जीव साधन की भाँति प्रयुक्त न होना चाहिये।

मनुष्य में दूसरों की उन्नति देखकर ईर्ष्या करने की स्वाभाविक वृत्ति होती है। इस का परिणाम दूसरों को नीचा दिखाने और अकारण बैर मोल लेने तक ही सीमित नहीं रहता वरन् यह कभी-कभी मनुष्य की तीव्र घृणा और खतरे का कारण भी बन जाती है और जिससे ईर्ष्या की जा रही है उसे दण्ड दिलाने सताने की भावना पैदा होती है। जिस प्रकार पहली अवस्था में घृणा का परिणाम शक्तियों का अपव्यय ठहरा था उसी प्रकार ईर्ष्या और लड़ाकूपन की कुविचार पूर्ण स्थिति से भी निर्माण की सम्भावनायें समाप्त होती है और मानसिक आवेशों का दुरुपयोग होने लगता है।

मानसिक आवेश, चाहे वह प्रेम-मैत्री, सद्भावना या आत्मीयता के रूप में प्रस्फुटित हो अथवा क्रोध, घृणा और ईर्ष्या के रूप में दिखाई दे—वह एक प्रकार की मानसिक शक्ति ही होता है। मन का सम्बन्ध शरीर से है इसलिये जब कभी इस शक्ति का सदुपयोग अर्थात् प्रेम और मैत्री की भावनाओं का विकास करते हैं तो उससे मन के साथ शारीरिक शक्तियाँ भी विकसित होती हैं और जब ईर्ष्या, विद्वेष के कारण आवेश का दुरुपयोग होता है तो यह समझना चाहिये कि इस दुरुपयोग का हानिकारक प्रभाव मन और शरीर पर समान रूप से पड़ा है।

भय, काम, क्रोध तथा लोभ आदि आवेशों के कारण जीवन में अनेकों दुःखद घटनायें घटित हुआ करती हैं। मनुष्य का अहित करने वाली कोई बाह्य शक्ति उतनी प्रभावशाली नहीं हो सकती जितना ये मनोविकार मनुष्य को दुर्बल और पतित बनाते हैं। इन आवेशों को जब दमन पूर्वक जीतने का प्रयास करते हैं तो सम्भव है अपना प्रयत्न सफल हो किन्तु खीझ, ऊब, उत्तेजना के क्षणिक आवेश भी निश्चित रूप से उठेंगे और कम ही सही, किन्तु शक्तियों का अपव्यय अवश्य होता है। केवल इतना लाभ है कि संशोधन काल में हमें जीवन-विकास का सच्चा और अनुभूत ज्ञान प्राप्त हो जाता है। एक लाभ यह भी होता है कि लौकिक जगत के बन्धन और आध्यात्मिक जीवन के प्रति आस्था का भाव और भी प्रगाढ़ होता है। इसलिये निश्चेष्ट होने की अपेक्षा संघर्ष करना उचित है। यह प्रतिरोध व्यवहार जगत में हिंसात्मक न हो तो वहाँ भी थोड़े से प्रयास से सदाचरण की प्रतिष्ठा बढ़ती है। इस प्रकार अहिंसात्मक प्रतिरोध के भाव को मध्यम मार्ग मानते हैं।

किन्तु श्रेष्ठ जीवन और मानवता की सिद्धि का मार्ग सद्गुणों की पूर्णता है यह रचनात्मक पद्धति है जिसमें मध्यम मार्ग के छोटे संघर्ष भी उत्पन्न नहीं होते। सद्गुणों में एक प्रकार की सजीवता होती है जो मनुष्य के विचार और व्यवहार दोनों में सरसता पैदा करती है। बुद्धि और मन के विकास से ही मनुष्य में मानवता की प्रतिष्ठा होती है। प्रेम, आत्मीयता, करुणा, मैत्री, स्नेह, सहृदयता आदि का विकास करना ही मानव जीवन का चरम लक्ष्य है। इसी से मानवता का उत्कर्ष होता है और समाज में सुख और शान्ति की परिस्थितियाँ बढ़ती हैं।


हित भुक्, मित भुक्, ऋत् भुक्

महर्षि चरक की इच्छा थी कि वह आयुर्वेद का विस्तार सारे देश में करें ताकि लोग उसका अधिक से अधिक लाभ उठा सकें। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये उन्होंने आयुर्वेद के सारे ग्रन्थों का भाष्य किया और सर्वसाधारण के उपयोग के उपयुक्त बनाया। एक बार महर्षि जी के मन में बात आई कि देखें लोग उन नियमों पर चलते हैं या नहीं जिनका स्वास्थ्य से सम्बन्ध है।

महर्षि पक्षी का रूप बनाकर वैद्यों के बाजार में ‘कोडरुक्’ अर्थात्—”रोगी कौन नहीं” की आवाज लगाने लगे। वैद्यों ने सुना तो किसी ने कोई औषधि बताई, किसी ने कोई अवलेह बताया। किसी का मत था चूर्ण से, किसी का विचार था भस्मों से रोग दूर रहता है। पर इससे महर्षि को सन्तोष न हुआ। कुछ आगे बढ़कर वही आवाज लगाने लगे। वाग्भट्ट ने इसे सुना तो उत्तर दिया “हित भुक्”, “मित भुक्” ,”ऋत् भुक्।” उत्तर सारपूर्ण है यह समझ कर महर्षि नीचे उतरे और वाग्भट्ट को उनकी विद्या की सार्थकता पर धन्यवाद दिया।

स्वास्थ्य और आरोग्य के जो सर्वमान्य तथ्य हैं वे यही तीन हैं। शेष सब इन्हीं की शाखा-प्रशाखायें हैं। औषधियों का चयन केवल रोग के बाद उपचार की दृष्टि से हुआ है पर सही रूप में स्वास्थ्य का सुख और रोग से बचने के लिए हिताहार मिताहार और ऋताहार उपयोगी ही नहीं आवश्यक है। इन नियमों का उल्लंघन करने से कोई भी व्यक्ति अधिक देर तक स्वस्थ व नीरोग नहीं रह सकता। स्वास्थ्य साधन के जो विभिन्न उपाय बताये जाते हैं वे इन्हीं के अंतर्गत विकसित हुये हैं। अधिक गहराई और कष्ट पूर्ण प्रक्रियाओं में न जाकर इन नियमों का पालन करते हुये मनुष्य सरलता पूर्वक अपना स्वास्थ्य बनाये रख सकता है।

हित भुक् का अर्थ है मनुष्य वह आहार ग्रहण करे जो हितकारी हो। हितकर भोजन को शारीरिक विकास और आहार निषेध दो रूपों में विभक्त करते हैं। अर्थात् प्रथम विभाग के अनुसार वे बातें आती हैं जिनसे शरीर का पोषण और विकास होता हैं। इस कोटि में वह सभी खाद्य आते है जो शरीर में शक्ति बढ़ाते और अंगों को पुष्ट करते हैं। प्रोटीन, विटामिन चर्बी, लवण आदि शक्ति और अवयव विकास वाले पदार्थ अधिक से अधिक प्राकृतिक रूप में लेने से आहार की सरलता बनी रहती है। इसे ही हित कर आहार कहते हैं इस दृष्टि से स्वाद की कहीं कोई आवश्यकता दिखाई नहीं देती। स्वाद का सम्बन्ध जीभ से है पर आहार की आवश्यकता स्वास्थ्य संरक्षण और जीवन-शक्ति से है इसलिये आहार वही उपयोगी होता है जो कम से कम अप्राकृतिक और सादा हो। यह मानना गलत है कि शक्ति बढ़ाने के लिये घी, दूध आदि परमावश्यक हैं। रोटी, दाल, शाक और साधारण फलों से भी पूर्ण स्वस्थ रहा जा सकता है।

तात्पर्य यह है कि हितकर आहार उस आहार को मानना चाहिये जो कम से कम परिवर्तन और मिलावट से तैयार किया गया हो। यह बात इतनी जटिल नहीं है जिसे सर्व-साधारण भली प्रकार समझ न सकें। सरल और सात्विक आहार स्वास्थ्य की प्रथम आवश्यकता है।

इस दृष्टि से चाट, पकौड़े, चाय, मिठाई तथा इस युग में प्रचलित विभिन्न प्रकार के रासायनिक पेय स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होते हैं।

स्वास्थ्य-संरक्षण की दूसरी आवश्यकता है आहार को उचित परिमाण में लेना। इस सम्बन्ध में संसार के सभी स्वास्थ्य विशेषज्ञ एक मत हैं कि मनुष्य हिताहार द्वारा पूर्ण निरोगिता और दीर्घ आयुष्य प्राप्त कर सकता है। “भाव-प्रकाश” में इसी आशय को इस प्रकार व्यक्त किया है :—

कुक्षेभगिद्वये भोज्यैस्तृतीये वारिपूरियेत्।

यायो संचारणार्थाय चतुर्थमशेषयेत्॥

अर्थात्—पेट का आधा भाग अन्न और चौथाई भाग जल से भरे। शेष चौथाई भाग वायु अभिगमन के लिये सदैव खाली रखना चाहिये।

यथार्थ में स्वास्थ्य मनुष्य का तभी खराब होता है जब वह अनावश्यक मात्रा में कुछ न कुछ खाता रहता है। अभी चाट, अभी पकौड़ी, थोड़ा हलुआ फिर मलाई पूड़ी पकवान जो कुछ मिले उदरस्थ करते रहने से पेट में एक जंजाल खड़ा हो जाता है और पाचन संस्थान स्वाभाविक रूप से काम करना बन्द कर देता हैं। नियम यह है कि जो एक बार खा लिया उसके पच जाने और मल-निष्कासन के पहले भोजन नहीं करना चाहिये। अधिक मात्रा में खा लेने से आहार पेट में कई दिन तक दबा पड़ा रहता है, यदि इस आहार को पर्याप्त वायु न मिलती रहे तो पेट में एक प्रकार का विष उत्पन्न हो जाता है और अपच, अजीर्ण, थूक आना, जी मिचलाना, अनिद्रा, छटपटाहट सिर, दर्द, स्वप्नदोष आदि अनेकों विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं।

इन बातों से यह स्पष्ट होता है कि आहार का परिमाण निश्चित करना अधिक आवश्यक है। उपवास का महत्व इसीलिये अधिक है कि इससे पाचक संस्थान को पर्याप्त विश्राम मिल जाने से उसे दुबारा अधिक सुविधा पूर्वक कार्य करने की शक्ति और क्षमता मिल जाती है।

डाक्टरों का मत है कि प्रत्येक मनुष्य के पेट में मल का कुछ न कुछ संचय अवश्य होता है। मिताहार के कारण पाचन संस्थान की जो शक्ति शेष बच जाती है वह इस मल सञ्चय को निकालने में लग जाती है, इससे पेट की अधिक से अधिक सफाई बनी रहती है।

यदि इस मल को हटायें नहीं तो पौष्टिक आहार भी इसके साथ मिल जाता है जिससे उसकी शक्ति समाप्त हो जाती है साथ ही जो रक्त बनता है उसमें भी अस्वच्छता आ जाती है जिससे सारे शरीर का स्नायु मण्डल दुर्बल पड़ जाता है।

इन परेशानियों से बचाने के लिये प्रकृति ने भूख लगने पर खाने का नियम बना दिया है। चिड़ियाँ पेट भर जाने से अधिक कभी नहीं खातीं। गायें-भैंसें भूख मिट जाती है तो बैठकर जुगाली करने लगती हैं। पेट आहार की आवश्यकता भूख द्वारा व्यक्त करता हैं। इसी प्रकार खाने से जो तुरन्त तृप्ति मिलती है, एक प्रकार का सन्तोष प्राप्त होता है उससे प्राकृतिक तौर पर आहार का परिमाण निश्चित होता है। अर्थात् किसी को यह शिकायत नहीं हो सकती कि उसने भूल से अधिक खा लिया है। मानसिक समाधान हुआ और यों समझना चाहिये कि पेट को उसकी उचित और आवश्यकता मिल गई। फिर भी यदि कोई स्वादवश अधिक खा जाता है तो दोष उसी का है और इसका दण्ड भी अनिवार्यतः उसी को भुगतना पड़ता है।

खाने से शक्ति मिलती है इसमें किसी तरह का सन्देह नहीं है पर यह भी निर्विवाद सत्य है कि अधिक मात्रा में लिया गया आहार शरीर में विष ही उत्पन्न करता है इस लिये मात्रा में हलका और सुपाच्य भोजन करना स्वास्थ्य-रक्षा की दूसरी अनिवार्य शर्त हो जाती है। रोगमुक्त जीवन जीने के लिये इस दूसरे नियम का भी उल्लंघन नहीं किया जा सकता है।

स्वास्थ्य अक्षुण्ण रखने का तीसरा मनोवैज्ञानिक तथ्य है ऋत् आहार। आहार का सम्बन्ध मनुष्य के सूक्ष्म विचार और संस्कारों से भी होता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार का—अन्तःकरण चतुष्टय अन्न के सूक्ष्म संस्कारों को लेकर विनिर्मित होता है इसलिये हमारे पूर्वजों ने इस बात पर अधिक जोर दिया है कि मन को स्वस्थ और बलिष्ठ रखने के लिये ऐसा आहार ग्रहण करें जो ईमानदारी और परिश्रम से उपार्जित हो। मेहनत की कमाई में एक प्रकार की सात्विकता होती है जो सद्गुणों का विकास करती है और तामसी प्रवृत्तियों से बचाती है। पाप का अन्न मनुष्य को पापी बनाता है। कुसंस्कारों से प्रेरित मनुष्य दुष्कर्म ही करते हैं इससे उनके मनो-जगत में एक प्रकार की ऊब, उत्तेजना, भय, निराशा आदि मनोविकार छाये रहते हैं, इनका स्वास्थ्य पर बड़ा दूषित असर पड़ता है।

इन समस्याओं को दृष्टि में रखते हुये ही शास्त्रकारों ने प्रवचन किया है—

युक्त हार विहारस्य युक्त च्येष्टस्य कर्मसु।

हम जो भी ग्रहण करें उसमें “हित भुक्, मित भुक्, ऋत् भुक्” के सिद्धान्त को न भूलें। जो इस स्वास्थ्य मन्त्र को याद रखता है, उसी को आरोग्य प्राप्त होता है, वही दीर्घ-जीवन का सुख प्राप्त करता है।


अनावश्यक सत्य भी क्यों बोलें?

अज्ञान और अविवेक से तमसाच्छन्न मनोभूमि के रजोगुणी और तमोगुणी प्रकृति के मनुष्य ही आजकल संसार में अधिक मात्रा में देखने में आते हैं। वे सत्यवादी की भलमनसाहत का अनुचित लाभ उठाकर अपनी दुष्टता को और भी तीव्र कर सकते हैं और अपने दुष्ट मनोरथ में और भी अधिक आसानी से, सफल हो सकते हैं। इसलिए व्यावहारिक सत्यवादी को अपनी नीयत शुद्ध रखते हुए भी—सत्य के प्रति निष्ठा रखते हुए भी—यह ध्यान रखना पड़ता है कि उसकी सत्यवादिता का कहीं दुरुपयोग न हो। जहाँ ऐसा खतरा होता है वहाँ वह सोचकर समझकर मुँह खोलता है और नपी-तुली उतनी ही बात कहता है जिससे काम भी चल जाय और कुपात्रों को आवश्यक लाभ भी प्राप्त न हो।

व्यावहारिक सत्य भाषण के मूल में परहित की, विश्व-कल्याण की भावना रहनी चाहिए। कई बार ऐसे धर्म संकट सामने आ खड़े होते हैं कि बोलने से दुष्ट लोग उसका अनुचित लाभ उठाते हैं और निर्दोषों को सताने तथा अपनी स्वार्थ साधना का प्रयोजन सिद्ध करते हैं। ऐसे अवसरों पर भाषण को नहीं भावना को—उसके परिणाम को ही सत्य का आधार माना जाएगा।

योग दर्शन में इस गुत्थी को भी सुलझाया गया है। 2। 30 के व्यास भाष्य में कहा गया है कि—

ऐषा सर्वभूतो पकारार्थ प्रवृत्ता न भूतोपद्याताय यदि चैवमय्यमिधीय माना भूतोपद्यातरैव स्यात् न सत्यं भवेत् पाप मेव। तेन पुण्यासेन पुण्य प्रतिरुपकेण कष्टं तमः प्रान्पुयात्, तस्यात् परीक्ष्य सर्वभूत हितं सत्यं ब्रूयात्।

अर्थात्—सत्य का प्रयोग जीवों के हित के लिए करना चाहिए। अहित के लिए नहीं। जिसके बोलने से प्राणियों की हानि होती हो वह सत्य होते हुए भी असत्य एवं पाप ही माना जायगा। ऐसा अविवेक पूर्ण सत्य बोलने में दूसरे निर्दोषों को कष्ट उठाना पड़ता है और वक्ता को पाप लगता है। इसलिए परिस्थिति को भली प्रकार विचार कर विवेक का सहारा लेकर सबके लिए कल्याण कारक हो ऐसी वाणी ही बोलें।

कसाई के हाथ से छूट कर गाय भागी जा रही हो और पीछे ढूंढ़ता हुआ कसाई आ जाय। पूछे कि गाय किधर है? तो सत्य बोलने पर गौ-हत्या होती है और कसाई के पाप भार में और भी अधिक बढ़ोत्तरी होती है। गाय को वध की पीड़ा और भी अधिक नरक कष्ट मिलने का दुष्परिणाम। ऐसा सत्य बोलना किस काम का? इस लिए विवेक और परिणाम का ध्यान रखकर ही ऐसे अवसरों पर सत्य बोलना चाहिए।

उपरोक्त प्रकार का एक धर्म संकट आ पड़ने पर एक दर्शक ने बड़ी चतुरता पूर्वक जवाब दिया। वह सुनने ही लायक है—

या पश्यति न सा ब्रूते या ब्रूते सा न पश्यति।

अहो व्याध स्जकार्याधिन कि दृच्छसि पुनः पुनः॥

जिसने देखा है वह बोलती नहीं, जो बोलती है उसने देखा नहीं। स्वार्थी वधिक! फिर तू बार-बार क्यों पूछता है।

भागती हुई गाय को आँखों से देखा था सो आँखें तो बोलती नहीं। जीभ बोलती है। पर उसने देखा नहीं। इसलिए गाय किधर गई इसका कौन उत्तर दे? वाक् चातुर्य में असत्य भाषण का दोष बचाते हुए भी अधर्म न होने देना इसे एक बुद्धिमत्ता ही कहा जायगा।

ऐसे धर्म संकटों के अवसर पर शास्त्रकार भी भावना सन्निहित सत्य को ही प्रधानता देते हैं और शब्द सन्निहित सत्य की उपेक्षा करते हैं—

सत्यं न सत्यं बलु यत्र हिंसा,

दयान्वितं चानृत मेव सत्यम्।

हितं नराणाँ भवतीह येन,

तदेव सत्यं न चान्यथैव॥

जिससे हिंसा की वृद्धि होती हो वह सत्य, सत्य नहीं। जिससे दया धर्म का पोषण हो वह असत्य भी सत्य है। जिससे प्राणियों का हित होता हो वही सत्य है जिससे अहित होता हो वह सत्य होते हुए भी असत्य ही है।

नीतिकारों ने स्थान-स्थान पर इसी तथ्य की पुष्टि की है :-

ना पृष्टः कस्यचिद् ब्रूयान्नचन्यायेन पृच्छतः।

बिना पूछे या अनीतिपूर्ण उद्देश्य के लिए पूछने पर सत्य भी न कहना चाहिए।

कोई चोर पूछे कि आपके पास कितना धन है और वह कहाँ रखा है तो सत्य बोलने पर अपना धन चले जाने पर उसे चोर की दुष्टता का पोषण होने का खतरा है, इसी प्रकार सेना के गुप्त भेदों को कोई सैनिक यदि सत्य बोलने नाम पर प्रकट कर दें और उससे लाभ उठाकर शत्रु पक्ष आक्रमण कर दे तो यह सत्य भाषण अपराध एवं पाप की श्रेणी में ही माना जाएगा। इस प्रकार का सत्य बोलने वालों को सैनिक न्यायालय में कठोर दण्ड की व्यवस्था होती है। राजकीय गुप्तचर विभाग के कर्मचारी बड़े-बड़े पापों, अपराधों और षड़यन्त्रों का पत्ता लगाने के लिए छद्मवेश बनाकर , छद्म परिचय देकर भेदों का पता लगाते है। इन भेदों के मालुम होने से न्याय तथा धर्म की रक्षा होती है इसलिए इन्हें प्रशंसनीय ही ठहराया जाता है।

योगी अरविन्द ने लिखा है-

“जिन्हें हमारी प्रवृत्तियों एवं योजनाओं को जानने का कोई प्रयोजन नहीं है, जो उन्हें समझते भी नहीं, जो उस जानकारी को प्राप्त कर अपनी हानि ही करेंगे उन्हें अपनी प्रवृत्तियों एवं योजनाओं को बताने की क्या आवश्यकता? आध्यात्मिक रहस्यों को प्रायः गुप्त रखा जाता है यह उचित भी है। अपने आश्रम के क्रिया-कलापों के बारे में हम बाहरी लोगों को पता नहीं लगाने देते, इसका अर्थ यह नहीं कि कोई झूठ बोलते हैं। बहुधा योगी लोग अपने अपने आध्यात्मिक अनुभवों को- विशेष अधिकार व्यक्तियों के अतिरिक्त और किसी को नहीं बताते। यह गोपनियता आहयात् का एक चिर प्राचीन नियम है। ऐसा कोई धार्मिक या नैतिक नियम नहीं है जो अपनी हर बात को हर किसी के सामने प्रकट कर ही देने का आदेश देता है।”

असत्य नहीं हमें सदा सत्य ही बोलना चाहिए। पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि अपनी प्रत्येक बात हर किसी से कह ही देना चाहिए। आवश्यकतानुसार मौन रहकर या उत्तर देने में इन्कार करके आवश्यक तथ्यों को छिपाने की अनुमति है। क्योंकि जिनकी मनोभूमि का समुचित विकास नहीं हुआ वे उस गोपनीय तथ्य का दुरुपयोग कर सकते है उसे विकृत करके हानिकारक बना सकते है।

अणु-बम आदी के रहस्य प्रायः छिपा कर रखे जाते हैं। फौजी जानकारियां तो प्रायः गुप्त ही रखी जाती हैं। राजकीय बजट पैदा होने से पूर्व यदि उसका भेद फूट जाय तो चतुर लोग उस आधार पर व्यापार करके करोड़ों रुपया कमा सकते है, और जिन विचारों को उस प्रकार की पूर्ण सूचना उपलब्ध नहीं हुई हैं वे अकारण भारी हानि उठा सकते है। इसलिए बजट के भेद को समय से पूर्ण प्रकट किया जाना इसी प्रकार का अपराध माना जाता है।

महाभारत में भीष्म का एक कौशल अपराजेय था। पाण्डव उससे बहुत घबराये तब युधिष्ठिर ने किसी प्रकार बातों में चतुरता पूर्वक भीष्म से उनकी युद्ध नीति को पूँछ लिया। उन्होंने बता दिया कि - “मैं शस्त्र-त्यागी घायल होकर पृथ्वी पर बड़े हुए, भागते हुए, शरणार्थी, अंग-भंग, स्त्री तथा नपुँसक पर हथियार नहीं चलाता।” इस जानकारी का पांडवों ने पूरा-पूरा लाभ उठाया शिखण्डी नामक नपुंसक को भीष्म के सामने लड़ने खड़ाकर दिया। भीष्म उस पर शस्त्र चला नहीं रहे थे उधर अर्जुन ने शिखण्डी के पीछे छिपकर भीष्म पर बाण चलाये और उन्हें मार डाला। सत्य का अनावश्यक रूप से प्रकट कर देने पर कई बार सत्यवादी को इस प्रकार की हानि भी उठानी पड़ती है जैसी भीष्म को उठानी पड़ी।

असत्य वचन ही उचित है। सत्य का पालन ही उचित है। व्यावहारिक सत्य का यदा-कदा आवश्यक शब्द कौशल को छोड़कर शेष साधारण जीवन में सही सत्य ही बोलना चाहिए। सत्य में ही निष्ठा रखनी है। सत्य नारायण का रूप है जो सत्य का उपहास है वह प्रकारांतर में सत्यनारायण भगवान की ही आचारोक्त पूजा करता है जो केवल भावात्मक पूजा से कहीं अधिक श्रेष्ठ है, कहीं अधिक उच्च है।


श्रम का सम्मान कीजिए साथ ही श्रमिक का भी

रामायण में एक कथा प्रसंग है। भगवान राम शबरी से मिलने के लिए गए। जहाँ शबरी रहती थी उस बन में राम ने क्या देखा? बहुत ही सुन्दर फूल जो कभी कुम्हलाते नहीं थे। उनमें से मधुर भीनी-भीनी सुगन्ध हर समय निकला करती थी। जब राम ने जिज्ञासावश शबरी से इसका रहस्य पूछा तो व बोली “भगवान इसके पीछे एक घटना है।” वह क्या ? राम ने उत्सुकता पूर्वक पूछा, देव! यहाँ बहुत समय पूर्व मातंग ऋषि का आश्रम था। आश्रम में बहुत से विद्यार्थी रहते थे। दूर-दूर से ऋषि मुनि वहाँ आकर रहते थे। चतुमसि समीप था। आश्रम का ईंधन समाप्त होने को था। बरसात के लिए ईंधन लाना था। प्रमादवश विद्यार्थी जा नहीं रहे थे। एक दिन बड़े सवेरे ही वृद्ध मातंग अपने आप कन्धे पर कुल्हाड़ी रख कर लकड़ियाँ काटने चल दिए। गुरु को जाता देख विद्यार्थी भी उनके पीछे हो लिए और अतिथि भी। सूखी - सूखी लकड़ियां काटीं और उनका भार बाँध-बाँध कर आश्रम की ओर लौटने लगे। हे राम! वृद्ध आचार्य के शरीर से श्रम बिन्दु झलकने लगे। तो विद्यार्थी भी पसीने से तरबतर हो गये।

हे राम! जहाँ-जहाँ उन तपस्वियों के श्रम बिन्दु गिरे वहीं ये “धर्म जानि कुसुमानि” रहस्यमय फूल खिल उठे और बढ़ते-बढ़ते आज सारे वन में फैल गए।”

उक्त कथा अपने आप में कुछ अस्वाभाविक सी लगती है किन्तु उसकी सच्चाई को तिरोहित नहीं किया जा सकता।

इसी कथा के तथ्य की पुष्टि करते हुए पाश्चात्य विचारक सरले ने कहा- “भली प्रकार किए गए कार्य मधुर सुगन्ध देते है और मिट्टी में भी खिलते हैं।” धरती पर जो कुछ भी सुन्दर, नयनाभिराम, आह्लादकारी सुखप्रद जीवनदायी तत्व है वे राब श्रम की ही उपज है। कर्म की खेती से उत्पन्न परिणाम है। सचमुच श्रमजीवी के शरीर से निकलने वाला पसीना ही संसार का पोषण करता है, उसे जीवन जीने की अनुकूल स्थिति पैदा करता है।

किसान यदि अपने पसीने की बूँद खेत में न डालें तो अनाज कहाँ से पैदा होगा? लोगों को खाने के लिए क्या मिलेगा? बुनकर श्रम नहीं करेगा तो संसार नंगा रह जाएगा। हरिजन लोग गन्दगी साफ न करेंगे तो एक दिन सारा संसार नरक तुल्य बन जाएगा। ज्ञान के साधक बुद्धि जीवी ऋषि मनीषी समाज को जीने का सही-सही मार्ग प्रदर्शन और शुद्ध दृष्टि प्रदान न करेंगे तो समस्त समाज ही अस्त-व्यस्त हो जाएगा। कलाकार,गायक, कवि, चित्रकार जन जीवन में सौंदर्य, आनन्द, आह्लाद का सृजन न करेंगे तो सब कुछ नीरस भारस्वरूप लगने लगेगा। संसार के हजामत बनाने वाले लोग यदि एक साथ हड़ताल कर दें तो लोग लंगूर, भालुओं जैसी शक्ल लिए फिरेंगे। दर्जी कपड़ा सीना बन्द करदें तो अच्छे लगते वाले लोग बड़े फूहड़ से दिखाई दें।

प्रत्येक कार्य जिसमें मनुष्य को श्रम की बूँदें बहानी पड़ती है समाज के जीवन के आवश्यक हैं अनिवार्य हैं और सभी अपने-अपने स्थान पर खड़े हैं। महत्वपूर्ण है।

भगवान कृष्ण ने इसी तथ्य को समझाते हुए लोगों को स्वधर्म की शिक्षा दी और कहा अपना अपना कर्म करते हुए प्रत्येक व्यक्ति मोक्ष का अधिकार है चाहे वह कोई भी क्यों न हो। “स्त्रियों, वैश्यास्तणा शुद्रास्तेऽपियान्ति पराँ गत्म्।” उन्होंने सब तरह के कर्म करने वालों को मोक्ष का द्वार खोल दिया। इतना ही नहीं इस कर्म-धर्म की, श्रम की प्रतिष्ठा के लिए उन्होंने अपने जीवन में सब कर्म किए। ग्वाला बन कर गाय चराई। गोबर के उपयोग का आन्दोलन चलाया। सारथी बन कर रथ हाँका, जमीन साफ की झूँठी पत्तलें उठाई। अतिथियों के पैर भर धोए तो गीता का महान उपदेश भी दिया। शान्ति दूत बन कर कौरव पाण्डवों के बीच सन्धि कराने का प्रयत्न किया, तो योद्धा बन कर लड़े भी। गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए योगी भी बने रहे।

श्री कृष्ण ने सभी भाँती कर्म की, श्रम की प्रतिष्ठा की। श्रम की प्रतिष्ठा के लिए ही बूढ़े मातंग ऋषि ने भी कुल्हाड़ी उठा कर वन में लकड़ियाँ काटीं उनके शिष्य जिन्होंने अपने आपको केवल पुस्तकों तक ज्ञान चर्चा का ही अधिकारी समझ लिया होगा। उनको ऋषि ने अपने आचरण से श्रम की सीख दी।

समाज के जीवन के लिए सभी कर्म आवश्यक हैं और प्रत्येक अपने आप में महत्व पूर्ण हैं और किसी को ऊँचा और किसी को नीचा नहीं समझा जा सकता। ऐसी प्रतिष्ठा भगवान श्री कृष्ण, आधुनिक युगपुरुष महात्मा गाँधी, लोकमान्य तिलक आदि ने भी स्वतन्त्रता का उपदेश देने से पहले समाज में कर्म के प्रति जागृति पैदा की। कर्म के आधार पर जो भेद भाव हो गया, ऊँच नीच पैदा हो गई थी उसे मिटाया। स्वयं महात्मा गाँधी ने टट्टी पेशाब साफ करने से लेकर झाडू निकालने तक, सूत काटने, कपड़ा बुनने से लेकर खेती करने तक, स्वतन्त्रता आन्दोलन चलाने से लेकर लोगों को ज्ञान की सीख देने तक के सब कार्य किए थे। कर्म के आधार पर जो भेद-भाव हमारे यहाँ पैदा हो गया था उसे मिटाने के लिए वे आजीवन प्रयत्न करते रहे। अस्पृश्यता निवारण, हरिजनोद्धार के कार्य, माननीय एकता के लिए बापू आजीवन प्रयत्न करते रहे।

निःसंदेह प्रत्येक कर्म जिस से मानव समाज की सुव्यवस्था सुरक्षा-धारण-पोषण संवर्धन में सहायता मिले वह पवित्र है श्रेष्ठ है। समाज में भी उसका वैसा ही स्थान है जैसा दूसरे कर्म करने वालों का। क्षत्री, वैश्य, शूद्र, चाण्डाल, कसाई, माली, धोबी, नाई सब के सब अपना अपना कार्य करते हुए मोक्ष के अधिकारी हैं, कपड़ा बुनने वाले कबीर, गोरा कुम्हार, सेना नाई, सन्त रैदास, तुलाधार वैश्य ये सब सन्त हमारे यहाँ मोक्ष के अधिकारी माने गए हैं।

कर्म की दृष्टि से ऊँच-नीच की भावना रखना हमारे धर्म, नियम और पूर्वजों के सिद्धान्तों के विरुद्ध है। श्रीकृष्ण, गाँधी, राम की आत्मा इस तरह के भेद-भाव से कितनी दुखी होती होंगी जब एक व्यक्ति अपने आप को ज्ञानी पण्डित विद्वान कह कर सबसे ऊँचा समझता है तो दूसरे सफाई करने वाले, खेती करने वाले को नीचा। वस्तुओं के उत्पादनकर्ता को नीचा समझना और भव्य महलों में बैठ कर गद्दों पर आराम करके उसका उपभोग करने वाला बड़ा समझा जाना कितनी अधर्मयुक्त बात है और इस अधर्माचरण ने ही हमारे समाज को, हमारे देश को खोखला बनाया है। जिस दिन से हमने सामाजिक जीवन में श्रम की कद्र करना कम कर दिया है उसी दिन से हम कमजोर हो गए। टुकड़ों-टुकड़ों में बँट गए। एक दूसरे को नीच बताकर लड़ने लगे। सब कर्मों की, सब धर्मों की प्रतिष्ठा करने वाले श्रम को आदर देने वाले कृष्ण, ऋषि महर्षियों की, सन्तों की आत्मा क्या कहती होंगी हमारी इस दुर्दशा पर।

आवश्यकता इस बात की है कि हम सभी कर्मों को महत्व दें जो समाज के हित में और श्रम के साथ किए जाते हों। क्योंकि किसी एक भी कर्म-व्यवस्था के बन्द हो जाने से सम्पूर्ण समाज के लिए कठिन परिस्थिति पैदा हो सकती है। कर्म के आधार पर ऊँच-नीच, छोटे-बड़े की भावना का हमें त्याग करना होगा। ज्ञान देने वाला ऋषि विद्वान गन्दगी साफ करने वाले हरिजन को नीचा न समझेगा, और साहित्यकार किसी किसान को। न उद्योगपति अपने मजदूर को।

अपनी रुचि, वृत्ति, क्षमताओं के आधार पर कर्मों की भिन्नता हो सकती है। वर्ण व्यवस्था का आधार यह रुचि, वृत्ति, स्वभाव आदि ही मुख्यतया है। इनके अनुसार कोई भी व्यक्ति समाज के अनेकों कार्यों में से अपने लिए उपयुक्त कार्य चुन सकता है। और यह आवश्यक भी है। क्योंकि सभी व्यक्ति एक से कार्य नहीं कर सकते। सभी एक रंग के नहीं होते। धरती के आँगन में खिलने वाले सब फूल में ही अपनी-अपनी भिन्नतायें होती हैं। मानव समाज में भी यदि सभी ऋषि ही ऋषि बन जाएं या कलाकार, गायक या सफाई करने वाले कोई भी एक ही रुचि के व्यक्ति पैदा हो जाएं तो संसार का क्रम ही न चले। विविधता में ही सृष्टि का जीवन और आनन्द है। लेकिन यह विविधता ऊँच-नीच अच्छे-बुरे के रूप में गढ़ ली जाती है वहीं इसका सौंदर्य और आनन्द नष्ट हो जाता है। मानव समाज में अन्याय, अत्याचार, शोषण, उत्पीड़न आदि का दौर-दौरा चालू हो जाता है, संघर्ष होने लगते हैं।


स्वच्छता आपका मूल्य और सम्मान बढ़ाती है।

स्वस्थ जीवन जीने और आरोग्य-लाभ करने के लिये जितनी आवश्यकता आहार, ब्रह्मचर्य, श्रम, निद्रा आदि की है, स्वच्छता और सफाई की उससे कम नहीं। किसी को पौष्टिक पदार्थ बराबर मिलते रहें, आत्म-संयमी भी हो, श्रमशील भी हो पर्याप्त विश्राम व मनोरंजन के साधन भी उसे मिले हों तो भी वह स्वस्थ होगा ही यह नहीं कहा जा सकता । इसके लिए स्वच्छता व सफाई का महत्व कम नहीं है। इसके अभाव में गन्दगी का फूट पड़ना स्वाभाविक है। यह भी कहा जा सकता है कि रोग और दुर्बलता का प्रमुख कारण गन्दगी ही है। पेट साफ न रहे, शारीरिक मल का निष्कासन ठीक प्रकार न हो, तो कौन जाने कब कोई उपद्रव खड़ा हो जाय। त्वचा पर मल जमा हो जाय तो फोड़े-फुन्सियाँ होंगी ही।

सफाई जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यक है प्रतिदिन दातौन न करें तो दाँत गन्दे हो जाते हैं, बदबू आने लगती हैं और पायरिया हो जाता है। कपड़े साफ न रहें, तो कभी भी मन प्रसन्न न रहेगा। घर की गन्दगी से हर किसी का दम घुटने लगता है। अस्वच्छता सभी को बुरी लगती है। व्यक्ति का मूल्याँकन उसके शरीर पर पहिने बहुमूल्य वस्त्रों से नहीं, उनकी सफाई से आँका जाता है। इसमें दरिद्रता का कहीं भाव उत्पन्न नहीं होता। यह बड़ी ही सरल व सुविधाजनक प्रक्रिया है जिसे हर कोई थोड़ा-सा ध्यान देने, जीवन-चर्या पर दृष्टि दौड़ाने, से पूरी कर सकता है। पर खेद है कि इतना जानते हुए भी लोग सफाई पर पूरा ध्यान नहीं देते। दिखावे के लिए कभी-कभी धराऊ कपड़े भले ही पहन लेते हों अन्यथा दैनिक जीवन में समग्र स्वच्छता की प्रायः उपेक्षा की जाती है।

स्वास्थ्य-रक्षा के लिए सर्वप्रथम शारीरिक स्वच्छता और सफाई पर ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिये किसी बड़े खर्च या लम्बे उपकरण जुटाने की आवश्यकता नहीं पड़ती । प्रातः काल उठकर शौच जाने, नियमित रूप से मुँह दाँत कान-नाक की सफाई करने में न तो बहुत समय लगता है न बड़ा खर्च। जिन्हें दन्त-मंजन ब्रुश आदि उपलब्ध नहीं हैं वे भी दातौन सरलता पूर्वक प्राप्त कर सकते हैं। स्नान के लिए साबुन के स्थान पर मुल्तानी मिट्टी का प्रयोग सफाई की दृष्टि से भी अच्छा होता है और शरीर का विष खींच कर बाहर निकाल देने का लाभ भी मिलता है। नीम की दातौन से दाँत भी साफ रहते हैं, मुँह के तमाम रोग वर्द्धक कीटाणु भी मर जाते है। जीभ आदी की सफाई भी आसानी से कर सकते हैं।

इसी प्रकार वस्त्रों की स्वच्छता पर थोड़ा-सा ध्यान रखें तो खुद को भी प्रसन्नता होगी और देखने वालों पर भी इसका अच्छा प्रभाव पड़ता है। यह जरूरी नहीं कि इसके लिये साबुन ही हो। यह कार्य चाहे जैसी सुगमता से उपलब्ध मिट्टी से चलाया जा सकता है। राख को पानी में घोल देने पर मिट्टी नीचे बैठ जाय तो नितरा हुआ पानी भी कपड़े धोने के लिये साबुन की आवश्यकता पूरी कर सकता है। और इनसे भी ठीक साबुन वाली बात पूरी हो जाती है।

शरीर के दूसरे हिस्सों, जिनमें बालों को ठीक सँवार कर रखना, हाथों-पाँवों के नाखूनों को साफ रखना भी आवश्यक है। देखने में यह बातें छोटी प्रतीत होती हैं किन्तु इनका महत्व स्वास्थ्य-रक्षा की दृष्टि में बहुत है। इससे कोई भी उपेक्षणीय नहीं है।

शरीर की बाह्य सफाई के साथ आन्तरिक सफाई भी, जिसमें पेट प्रमुख है, होनी आवश्यक है। इसके लिये एनीमा सर्वसुलभ साधन है। जुलाब लेने की क्रिया हानि कारक होती है, इससे पाचन-क्रिया में भाग लेने वाले रसों का निरर्थक स्राव हो जाने का भय रहता है। यह क्रिया भोजन की सात्विकता और सरलता तथा एनीमा के द्वारा पूरी की जा सकती है। जहाँ एनीमा उपलब्ध न हो वहाँ उपवास द्वारा भी यह कार्य पूरा हो सकता है। अपनी सुविधानुसार एक या एक साथ दोनों का उपयोग हर किसी के लिये लाभदायक सिद्ध हो सकता है।

घर की स्वच्छता का मनुष्य की क्रिया-कुशलता पर प्रभाव पड़ता है। इससे विचारों का निर्माण भी होता है। गन्दे स्थान का दूषित वातावरण लोगों में हीन-भाव जागृत करता है। गन्दे स्थानों का सम्बन्ध बुरे लोगों के साथ लगाया जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि व्यक्तित्व के विकास के लिए स्वच्छ व साफ वातावरण आवश्यक है। अपना निवास ऐसा हो जहाँ स्वच्छ व खुली हवा का आवागमन बना रहे। पर्याप्त प्रकाश न मिलने से घरों में सीलन उत्पन्न हो जाती है, इसलिये खिड़की, जंगलेदार मकान हो तो अच्छा है। पास-पड़ोस का रहन-सहन भी साफ रहे, इस का भी ध्यान रहे।

परिस्थितिवश यदि ऐसा स्थान सबके लिए उपलब्ध न हो तो भी उतने स्थान को तो, जिसका अपने दैनिक जीवन में प्रयोग करते हैं, साफ -सुथरा रख ही सकते हैं। घर की प्रत्येक वस्तु ढंग से सुव्यवस्थित एवं सजाकर रखें। चीजें अस्त-व्यस्त व खुली न रहें। रसोई घर साफ रहें बर्तन ठीक प्रकार मिट्टी से धोये हुए रहें। खाने की वस्तुयें ढकी हुई रहें। पक्के मकानों को फिनायल तथा कच्चे रसोई घरों को पोतनी मिट्टी से धो डाला करें तो वह स्थान भी भला प्रतीत होता है और बीमारी के कीटाणु भी नष्ट हो जाते हैं।

दिन में कम से कम दो बार झाडू लगानी चाहिए। नाबदान में प्रतिदिन पानी डालकर उसकी सफाई करनी चाहिए। बच्चों को जगह-जगह पर टट्टी आदि कर देने से रोकें। कदाचित वे ऐसा कर भी दें तो उस स्थान को तुरन्त साफ कर दें। यह कार्य स्त्रियों का है कि वे घर को हर प्रकार से साफ-सुथरा बनाये रखें। जगह-जगह पर थूक देने की आदत अच्छी नहीं होती। शौच, पेशाब व थूकने आदि के स्थान ऐसी जगह हों जिससे शेष स्थान कम प्रभावित हों। इन्हें साफ भी रखें।

पाक-व्यवस्था में स्वच्छता की आवश्यकता और भी अधिक है। खाना बनाने व परोसने वाले हाथ-पाँव धोकर तथा साफ कपड़े से पोंछकर रसोई घर में जायें। जहाँ तक बन पड़े परोसने में चम्मच, कलछी आदि का प्रयोग करें। बार-बार खाने की चीजों को हाथ लगाना अच्छा नहीं होता। खाने पर मक्खियाँ न बैठने पावें इसका पूरा ध्यान रहे। परोसते समय भोजन जमीन में जरा भी न बिखेरें। इसकी सावधानी रखें। सब्जी रखने वाली टोकरियाँ साफ -सुथरी हों व भाजी साफ करने के पहले व बाद में अपने हाथ धो डालें। काम करते समय कम से कम बात करें।

पीने का पानी छाना हुआ तथा ढका रहे। इसका प्रयोग केवल पीने के लिये करें। बर्तन साफ करने व हाथ मुँह धोने की व्यवस्था अन्यत्र की जानी चाहिए। पीने का पानी निकालते समय यह ध्यान रहे कि बर्तन जिससे पानी निकाल रहे है भली प्रकार माँज कर साफ कर लिया गया है। पाकशाला के ये सामान्य नियम गृहस्थ को बरतने चाहिएं।

हमारे परिवारों में पशु-पालन की परम्परा बड़ी प्राचीन है। इससे लाभ भी होता है। स्वास्थ्य सुधारने वाली कई चीजें हमें पशुओं से भी मिलती हैं। दूध और गोबर के लाभ सर्व-विदित हैं, किन्तु अधिकाँश यह देखा जाता है कि इन जानवरों का स्थान भी मनुष्यों के बीच ही होता है। जिससे उनके मूत्र, गोबर की सड़न व उनके द्वारा निकाली गई गन्दी साँस भी हमारे स्वास्थ्य को प्रभावित करती है। कई लोगों के तो घूरे भी दरवाजे पर ही होते हैं। वर्षा के पानी से सड़कर ये बड़ी दुर्गन्ध पैदा करते हैं जिससे जन-स्वास्थ्य को खतरा बढ़ जाता है। इसलिए प्रयत्न यह होना चाहिए कि जानवरों के वार्ड आदमियों के निवास से दूर रखे जायें और खाद के लिए ‘कम्पोस्ट’ तरीका अपनाया जाय।

गन्दगी किसी भी क्षेत्र की हो उससे मनुष्य का जीवन प्रभावित होता है और रोग की परिस्थितियाँ सामने आती हैं। इससे बचने का—आसान तरीका यही है कि प्रत्येक दैनिक कार्य में स्वच्छता और सफाई का ध्यान रखें। इसकी उपेक्षा करने से स्वास्थ्य पर अहितकर प्रभाव पड़ सकता है अतः शरीर, वस्त्र, निवास आदि से सम्बन्धित प्रत्येक वस्तु, हर एक क्रिया में स्वच्छता का ध्यान बना रहना चाहिए। जितना ध्यान आहार आदि की व्यवस्था का रखते हैं उतना ही स्वच्छता और सफाई पर भी रखें तो ही स्वास्थ्य और आरोग्य लाभ की आशा रखी जा सकती है।

लघु कथायें

अनुचित लोभ से नाश

वाराणसी राज्य में एक ब्राह्मण वैदर्भ मन्त्र जानता था। नक्षत्रों का योग आने पर वह उस मन्त्र बल से स्वर्ण मुद्राओं की वर्षा करा लेता था। भगवान बुद्ध किसी पूर्व जन्म में इस ब्राह्मण के पास रहकर यह विद्या सीख रहे थे।

एक दिन वह ब्राह्मण भगवान बुद्ध को लेकर विन्ध्या-पर्वत की ओर किसी काम से चल पड़ा। मार्ग बड़ा विकट था। गहन वन में रहने वाले दस्युओं ने उन्हें पकड़ लिया। वे दस्यु इसी प्रकार यात्रियों को पकड़ते थे और एक को धन लाने के लिए भेज कर शेष को बन्दी बनाये रहते थे। जब धन मिलता तब बन्दियों को छोड़ते। यही नीति उन्होंने इन गुरु शिष्य के साथ भी बरती।

बोधिसत्व को धन के लिए भेजा गया और गुरु को बन्दी बना लिया। संयोग से इसी रात वह योग आने वाला था जिस दिन मन्त्र बल से स्वर्ण मुद्रायें बरस सकती थीं। चलते समय बौद्धिसत्व ने गुरु से कहा—कृपा कर इस मन्त्र का यहाँ प्रयोग न करें वरना आपके साथ-साथ इन पचास दस्युओं का भी नाश हो जायगा।

बन्धनों में बंधे पड़े ब्राह्मण ने सोचा जब तक बोधिसत्व लौटें तब तक मैं बन्धनों में बंधा क्या पड़ा रहूँ। आज ही स्वर्ण वर्षा कर इन दस्युओं से छुटकारा क्यों न प्राप्त कर लूँ शिष्य की बात उन्हें व्यर्थ प्रतीत हुई।

दस्युओं को बुलाकर ब्राह्मण ने उनसे कहा—मुझे छोड़ दो। मैं आज रात ही मन्त्र बल से प्रचुर धन देकर तुम्हें धनी बना दूँगा। वे सहमत हो गये। बन्धन खुलने पर ब्राह्मण ने अपना उपचार प्रारम्भ कर दिया।

नियत समय पर स्वर्ण मुद्राएं बरसीं और उस प्रचुर द्रव्य को समेट कर डाकू आगे बढ़ गये। आगे मार्ग विदित न था सो भोर होने तक ब्राह्मण भी उनके साथ ही चल दिया।

रास्ते में दूसरे दल के सौ डाकू मिले और उन्होंने इन पचास को धन लूटने के लिए पकड़ लिया। पकड़े डाकुओं ने कहा—इस ब्राह्मण के पास मन्त्र बल से धन बरसाने की शक्ति है। इससे आप लोग भी हमारी ही तरह धन प्राप्त करें।

धन बरसाने का मन्त्र योग निकल चुका था, ब्राह्मण का दूसरा प्रयत्न सफल न हुआ सो क्रुद्ध डाकुओं ने उसे मार डाला और पकड़े हुए पचास दस्युओं का वध करके उनका धन छीन लिया।

आगे चलकर प्रचुर धन के लाभ से उन डाकुओं में भी दलबन्दी हुई और युद्ध छिड़ गया। दो को छोड़ के शेष 98 घायल हुए और मर गये।

दोनों ने धन समेट कर एक झाड़ी में छिपा लिया और उस दिन सुस्ताकर दूसरे दिन बटवारा कर ले चलने की बात सोची। लोभ उन दोनों के मन में भी था। सो वे परस्पर एक दूसरे को मार कर एकाँकी पूरा धन लेने की बात सोचने लगे। एक ने विष मिश्रित चावल बनाया ताकि दूसरे को खिलाकर मार डाले। चावल पककर तैयार भी न होने पाया था कि साथी ने उस पकाने वाले पर तलवार से प्रहार कर दिया। और स्वयं उस विष मिश्रित चावल को खाकर मर गया।

बौधिसत्व धन लेकर वापिस लौटे और अपने गुरु को छुड़ाने के लिए निर्भचरित स्थान पर पहुँचे तो देखा कि आचार्य समेत एक सौ पचास डाकू भी मरे पड़े हैं। तथागत बहुत दुखी हुए और उदास मन से वापिस लौट आये।

एक प्रवचन में अपने शिष्यों को उपरोक्त प्रयोग सुनाते हुए तथागत ने कहा—अनुचित रीति से धन कमाने और अनुपयुक्त मार्ग से उन्नति की बात सोचने वाले व्यक्ति लाभ नहीं हानि ही उठाते हैं। अपने साथ-साथ और को भी ले डूबते हैं। बिना समुचित श्रम की उन्नति चाहे मन्त्र बल से हो या लूट पाट से अन्त में इसी प्रकार नाश का कारण बनती है जिस प्रकार विदर्भ मन्त्र जानने वाले ब्राह्मण और डेढ़ सौ दस्युओं का विनाश हो गया।

छोटी भूल का बड़ा दुष्परिणाम

कहते हैं कि कलिंग देश का राजा मधुपर्क खा रहा था। उसके प्याले में से असावधानी से थोड़ा सा शहद टपक कर जमीन पर गिर पड़ा।

उस शहद को चाटने मक्खियाँ आ गईं। मक्खियों को इकट्ठी देख छिपकली ललचाई और उन्हें खाने के लिए जा पहुँची। छिपकली को मारने बिल्ली पहुँची। बिल्ली पर दो-तीन कुत्ते टूटे। बिल्ली भाग गई और कुत्ते आपस में लड़कर घायल हो गये।

कुत्तों के मालिक अपने-अपने कुत्तों के पक्ष का समर्थन करने लगे और दूसरे का दोष बताने लगे। उस पर लड़ाई ठन गई। लड़ाई में दोनों और की भीड़ बढ़ी और आखिर सारे शहर में बलवा हो गया। दंगाइयों को मौका मिला तो सरकारी खजाना लूटा और राजमहल में आग लगा दी।

राजा ने इतने बड़े उपद्रव का कारण पूछा तो मन्त्री ने जाँचकर बताया कि भगवन् आपके द्वारा असावधानी से गिराया हुआ थोड़ा-सा शहद ही इतने बड़े दंगे का कारण बन गया है।

तब राजा ने समझा कि छोटी-सी असावधानी भी मनुष्य के लिए कितना बड़ा संकट उत्पन्न कर सकती है।

ईर्ष्या बहुत भारी दोष है।

भगवान ने मनुष्य को बड़ी रच-पच के साथ बनाया। अपनी सभी क्षमताएँ और सुन्दरताएँ उसमें भर दीं।

इस अद्भुत कृति को देखकर भगवती बहुत प्रसन्न हुईं। पर थोड़ी ही देर में उनका चेहरा उदास हो गया।

उदासी का कारण पूछते हुए भगवान बोले—प्रिये, इस कृति में क्या कुछ ऐसा देखा जिससे तुम्हें खिन्न होना पड़ा।

भगवती बोलीं—इस प्राणी की क्षमता और संभावना इतनी अधिक है कि कभी यह हमारे लोक पर भी अधिकार कर सकता है? तब हम लोग कहाँ रहेंगे?

भगवान हँस पड़े। इतनी छोटी बात के लिए खिन्न क्यों हों। मैं एक त्रुटि इसमें रखे देता हूँ जिसके कारण यह अपनी शक्तियों को परस्पर लड़-झगड़ कर बर्बाद करता रहेगा और एक छोटी सीमा से आगे न बढ़ सकेगा।

त्रुटि ईर्ष्या के रूप में रख दी गई। ईर्ष्यालु मनुष्य एक दूसरे की बढ़ोत्तरी में प्रसन्न होने की अपेक्षा जलने झगड़ने लगे। उनकी ईश्वर प्रदत्त सारी क्षमता इसी में नष्ट होने लगी।

साहस नहीं तो कुछ नहीं

बिल्ली के भय से परेशान चूहे ने एक दिन विधाता से प्रार्थना की “मुझे बिल्ली बना दो।” विधाता ने दया करके उसे बिल्ली बना दिया। लेकिन अब उसे कुत्ते का डर लगने लगा। फिर प्रार्थना की तो कुत्ता, कुत्ते से लकड़बग्घा बना दिया, इसी तरह फिर शेर तक बना दिया विधाता ने चूहे को। किन्तु अब उसे शिकारी के डर के मारे नींद नहीं आई। वह फिर प्रार्थना करने लगा। इस बार विधाता को बड़ी घृणा हुई। उसने कहा—”कायर! तुझे चूहे से बिल्ली, बिल्ली से कुत्ता, कुत्ते से लकड़बग्घा और लकड़बग्घा से शेर बना दिया। किन्तु अपने डरपोक मन से तू शेर के शरीर में भी चूहा ही रहा। जा फिर से चूहा हो जा।”

साहस के अभाव में मनुष्य की आधी शक्ति , प्रतिभा-बल चले जाते हैं और आधे उपयोग के अभाव में नष्ट हो जाते हैं।

सत्य और असत्य

एक दिन छाया ने मनुष्य से कहा—लो देखो, तुम जितने थे उतने ही रहे और मैं तुम से कई गुनी बढ़ गई।

मनुष्य मुसकराया उसने कहा—सत्य और असत्य में यही तो अन्तर है। सत्य जितना है, उतना ही रहता है और असत्य पल-पल में घटता-बढ़ता रहता है।

खतरनाक कौन है?

दार्शनिक डायोनीज से एक दिन पूछा गया कि जानवरों में सबसे ज्यादा खतरनाक कौन होते हैं? सो उन्होंने मनुष्यों की ओर इशारा करते हुए कहा—जंगलियों में निन्दक और घरेलुओं में चापलूस।


पैसे को ही परमेश्वर मत मानते रहिये

एक समय था जब लोग जीवन में परमेश्वर को ही सर्वोपरि समझते थे उसकी प्राप्ति के लिए लोग धन-वैभव सम्पत्तियों का त्याग करने में नहीं चूकते थे। सारे जीवन की बाजी परमात्मा के लिए लगा देते थे। आज स्थिति इससे भिन्न है। लोग पैसे को ही परमेश्वर समझने लगे हैं। वैसे कुछ सत्पुरुष ऐसे भी हैं जो अब भी ईश्वर को ही सब कुछ समझते हैं। लेकिन बहुमत पैसा वादियों का ही अधिक है। तथा कथित मुद्रा आज के संसार की सर्वोपरि उपासनीय वस्तु बन गई है। पैसे के लिए मनुष्य सब कुछ करने को तैयार रहता है।

पैसा कमाना कैसे भी हो चाहे नीति से या अनीति से, हमारे स्वभाव का एक अंग बन गया है। पैसे के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। चोरी, रिश्वत, ठगी, धोखा-धड़ी, मिलावट, गिरहकटी, अनैतिक मुनाफा खोरी, काला बाजार सब पैसे के लिए ही तो होते हैं। पैसे के लिए लोग अपना धर्म-ईमान बेचते हैं। आज का मनुष्य सिर्फ एक लक्ष्य बना रहा है वह है—पैसे के लिए ही शिक्षा पाई जाती है। ज्ञान-विज्ञान कला-कौशल पाण्डित्य, राजनीति सब पैसे के इर्द-गिर्द घूम रहे हैं। पैसे के प्रश्न को लेकर संसार दो खण्डों में बँट गया है, पूँजीवाद और साम्यवाद। हमारे धर्म, पूजा, उपासना, कर्म-काण्ड यहाँ तक कि लोगों ने स्वयं भगवान के नाम को भी पैसा कमाने का साधन बना लिया है। जगद्गुरु आजकल कौन हैं? जिनके पास बड़े-बड़े मठ हैं, जो सोने, चाँदी के बर्तनों का उपयोग करते हैं, बहुत से नौकर हैं, रेशम पहनते हैं, बड़े ठाट-बाट के साथ जिनकी हाथी, मोटरों पर सवारियाँ निकलती हैं। समाज में बड़ा किसको माना जाता है? जिसके पास पैसा है। निर्धन किन्तु भले आदमियों की कहाँ पूछ होती है? घर में या बाहर देश में या विदेश में, जन-समाज में या वन में। मनुष्य के पास पैसा न हो तो उसे हर जगह तिरस्कृत होना पड़ेगा। इस सच्चाई से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि सर्वत्र पैसे का ही राज्य है।

तथाकथित जन-सेवी, समाज-सेवी संस्थाओं के लिये केवल पैसा ही युग-धर्म बन गया है। जिस तत्व को बहुमत का समर्थन मिल जाता है तो वही युग का प्रधान बन जाता है। इतना ही नहीं उससे सम्बन्धित अन्य बुराइयाँ भी गौण बन जाती हैं। हम भूल गये हैं जहाँ से हम पैसे को जीवन का महत्वपूर्ण अंग मानने लगते हैं वहीं से हमारे पतन का प्रारम्भ हो जाता है। पाश्चात्य विद्वान् फील्डिगं ने लिखा है—”पैसे को आपने परमेश्वर माना कि वह शैतान बनकर आपको नष्ट करने में जुट गया।” एक अन्य विद्वान् ने लिखा है—”पैसा आपका दास है। जब आप उसका उपयोग करते हैं लेकिन वह आपका स्वामी बन जाता है, जब आप उसकी तलाश में चक्कर काटते हैं।” महर्षि व्यास ने भी कहा है—”अपने पास इकट्ठा किया धन पाले हुए शत्रु के समान है जिससे पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता।” पैसे को परमेश्वर मानने वाला व्यक्ति वास्तविक परमात्मा से उतना ही दूर होता जाता है—ईसा मसीह ने कहा था—”जैसे कोई व्यक्ति एक साथ दो व्यक्ति की सेवा नहीं कर सकता उसी तरह चाहे परमात्मा की उपासना कर लो या धन की।” घर में बढ़ा हुआ धन मनुष्य को उसी तरह नष्ट कर सकता है, जैसे नाव में बढ़ा हुआ जल, इसीलिए सन्त कबीरदास जी ने कहा है—

पानी बाढ़े, नाव में, घर में, बाढ़े दाम।

दोनों हाथ उलीचिए यही सयानो काम॥

मुंशी प्रेमचन्द के शब्दों में “जब घर में अधिक धन संग्रह हो जाता है तो वह अपने निकास का मार्ग ढूँढ़ता है। यों न निकल पायेगा तो जुए में जायगा, घुड़ दौड़ में जायगा, ईंट पत्थर में जायगा या ऐयाशी में।” आदमी कितना ही प्रयत्न करे वह चंचला को स्थिर नहीं रख सकता और इसके चले जाने पर शोक पश्चाताप में ही जीवन बिताना पड़ता है।

पैसे का आकर्षण दिनों दिन बढ़ता ही जाता है। जिसने जीवन में पैसे को प्रधानता दी है, वह कभी भी सन्तोष-शान्ति का अनुभव नहीं कर सकेगा। महर्षि व्यास ने कहा है—”धन की प्यास कभी नहीं बुझती उसकी ओर से मुँह मोड़ लेने में ही परम सुख है।” पैसा दिन-रात जब मनुष्य को बचाता है तो उसका खाना, पीना, सोना हराम हो जाता है।

यद्यपि धन जीवन की विविध आवश्यकताओं की पूर्ति का एक साधन है। इसका अर्जन भी करना चाहिए और उपयोग भी। तथापि पैसे को सर्वोपरि महत्व देना समाज के लिये बहुत घातक है। कल्पना कीजिए उस समाज की जहाँ पैसे को ही सर्वोपरि स्थान दिया जाता है। क्या उसके सदस्य कोल्हू के बैल की तरह पैसे के इर्द-गिर्द चक्कर काटते नहीं मिलेंगे? क्या पैसे के लिए कुत्तों की तरह एक दूसरे पर छीना झपटी करते हुए नहीं देखा जायगा। उन्हें एक दूसरे के लिए प्रेम, सहानुभूति, आत्मीयता की जगह उसमें स्वार्थ, डाह, सूखापन का व्यवहार न होगा। सचमुच “पैसे की कसौटी पर आत्मिक नाते की कौन कहे, शारीरिक खून का नाता तक टूट जाता है।” पैसा समाज के मधुर सम्बन्धों में एक कठोर, निर्मम, दीवार बन जाता है।

धन ही सर्वेसर्वा बनकर जब हमारे जीवन का प्रेरणा मन्त्र बन जाता है तो हमारी स्थिति ठीक उस लद्दू पशु जैसी बन जाती है जिसका मालिक उस पर मन चाहे बोझ लादता है, न दिन देखता है न रात। क्या धन की लालसा में हम भी उसकी आज्ञाओं पर नहीं नाचते? हमें जो धन मिलता है उसे बढ़ाने में—कई गुना करने में लगना पड़ता है। जो हजार पति हैं वे लखपति, जो करोड़ पति हैं वे अरब पति बनने के पीछे, क्या दिन रात परेशान नहीं रहते? धन की लालसा में हम उन शुभ कर्मों की ओर से आँखें मींचे रहते हैं जिनके द्वारा हमको सुख-शान्ति तथा सन्तोष का अनुभव हो सके और एक दिन सब कुछ छोड़ना पड़ता है। जिस धन को खून पसीना बहाकर कमाया था वह कुपात्र के हाथों पड़ कर नष्ट हो जाता है।

अपार सम्पत्ति ही क्यों न हो, लेकिन व्यक्ति के जीवन में उसका कोई उपयोग नहीं है तो वह कंकड़-पत्थर के समान है। जो धन हमारी तथा दूसरों की आवश्यकता पूर्ति के काम न आवे, जिससे हम किसी का भला नहीं कर सकें, वह धन हमारे जीवन में एक भार है। उसका सम्बन्ध हम से इतना ही रहता है कि जितना एक गधे का और उस पर लादे जाने वाले सामान का। गधा अपनी पीठ पर स्वर्ण-खण्ड लदने से समझने लगे कि वह धनवान बन गया है यह तो उसका दुर्भाग्य ही होता है कि जब उसकी बोझ के साथ-साथ उसकी रगड़ से बेचारे की पीठ छिल जाती है।


Quotation

नित्यं प्रबुद्ध चित्तास्तु कुर्वन्तोऽपि जगत्कियाः।

आत्मैकतत्व सन्निष्ठाः सदैव सुसमाधमः॥

-योग वाशिष्ठ। 5।62। 5

जिसका मन प्रबुद्ध है, जो संसार के कर्म करते हुए भी आत्मा में स्थिर रहता है वह सदा समाधि में ही है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि धन को सर्वोपरि स्थान देने पर मनुष्य का वैयक्तिक, सामाजिक, नैतिक जीवन दूषित हो जाता है। जिस व्यक्ति में धन की लालसा घर कर लेती है, उसका सचाई के मार्ग को छोड़कर अनीति का मार्ग ग्रहण कर लेना उतना ही सत्य है जितना कमल को तोड़ने के प्रयत्न में जल-कीचड़ में उतरना। हमारे सामाजिक जीवन में फैली हुई बुराइयाँ, रिश्वत, भ्रष्टाचार, अनीति, अन्याय, चोरी, डकैती, लूट, हत्या आदि अपराधों के मूल में पैसे का महत्व ही काम कर रहा है। कितने ही कानून बना दें, दण्ड की व्यवस्थायें कर दें, लेकिन जब तक हमारे जीवन की कसौटी पैसा है तब तक अपराध, विग्रह बुराइयाँ मिट नहीं सकतीं क्योंकि यह भी इनके मूल में एक बहुत बड़ा कारण है।

मनुष्य का जीवन अमूल्य है, सुर दुर्लभ है। यह इसका मूल्य रुपये पैसे में करना, इसे पैसे के लिए ही खपा देना, बुद्धिमानी नहीं वरन् बहुत बड़ी मूर्खता है। जीवन निर्वाह और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए धनोपार्जन आवश्यक है अनिवार्य भी। लेकिन इसे ही जीवन का एक मात्र लक्ष्य बना देना तो बुद्धिमानी नहीं है। मनुष्य पैसे के लिए नहीं है, पैसा मनुष्य के लिए है। हम अपने मूल्याँकन के आधार को समझें, पैसे को बड़प्पन का आधार मानना बुजुर्वा प्रणाली है, असभ्यता की निशानी है। चरित्र में बट्टा लगाकर प्राप्त किया गया धन नैतिकता के समक्ष अपराधी बनकर कमाया गया, दो कौड़ी का है।


स्वास्थ्य का मनोरंजन श्रेष्ठ साधन-संगीत

शारीरिक अथवा मानसिक कोई भी विकृति ऐसी नहीं जिसकी चिकित्सा संगीत की स्वर लहरियों द्वारा न हो सके, यह बात बड़े-बड़े वैज्ञानिकों तथा स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने विभिन्न प्रकार के रोगियों पर, पागलखानों आदि में प्रयोग करके सिद्ध कर दिया है। उनका कहना है कि सम्पूर्ण शरीर में जो तनाव या विकृति पैदा होती है, उसका मूल आधार मस्तिष्क के ज्ञान-तन्तु हैं। संगीत से कानों पर लगी नैसर्गिक झिल्ली प्रकम्पित होती है जो सीधा मस्तिष्क को प्रभावित करती है। मस्तिष्क स्नायु-तन्तुओं के सजग होने से सम्पूर्ण शरीर में चेतना दौड़ जाती है और शक्ति प्रदान करती है जिससे सरलता पूर्वक आरोग्य लाभ मिलने लगता है। संगीताभ्यास के समय चित्त को न केवल विश्रान्ति मिलती है वरन् आत्मिक शक्तियाँ भी जागृत होती हैं।

संगीत तीन उपविभागों में विभक्त हैं। 1.गायन, 2.वादन और 3. नृत्य। ये तीनों ही शरीर, मन और आत्मा को प्रभावित करते हैं। गायन और वादन के स्वर कम्पन विशेष रूप से प्राणियों को प्रभावित करते हैं। सर्प, मोर, हिरण, कोयल आदि तक संगीत के सुमधुर स्वर कम्पनों से मस्त होकर सुध-बुध खो बैठते हैं, मनुष्य पर उस की प्रतिक्रिया का कहना ही क्या। साम-शास्त्रों में तो इसे उत्पत्ति स्थिति और प्रलय का भी कारण माना है।

गायन एक उच्चकोटि का मृदु व्यायाम है। कुश्ती, दौड़ आदि से फेफड़ों की कभी मन्द उत्तेजना उठती है जो हानिकारक भी हो सकती है। किन्तु गाने से हल्की-हल्की मालिश जैसी क्रिया फेफड़ों में होती है, इससे रुधिर में प्राकृतिक विद्युत का अनुपम संचार होने लगता है। डॉ॰ लीक का मत है कि “शारीरिक अवयवों को प्रभावित करने वाली संगीत से बढ़कर कोई दूसरी वस्तु नहीं।”

प्रसिद्ध स्वास्थ्य-विशेषज्ञ श्री बर्नर मैकफैड़ेन ने लिखा है “गाने से शरीर के विभिन्न अवयवों को श्रम करना पड़ता है जिससे रक्त संचार में वृद्धि होती है। पाचन-क्रिया में सुधार होता है। इससे पेट और छाती की माँस पेशियाँ फैलती हैं। यही क्रिया फेफड़ों में भी होती है जिससे नियमित और बिना रुकावट फेफड़ों का प्रभावशाली व्यायाम हो जाता है। वस्ति-प्रदेश के सभी अवयवों को इससे स्फूर्ति, चैतन्यता और मर्दन प्राप्त होता है।”

न्यूयार्क के प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ॰ एडवर्ड पोडोलास्की ने भी अनेकों प्रयोगों से स्वास्थ्य पर पड़ने वाली सूक्ष्म-प्रतिक्रियाओं का गम्भीर अध्ययन किया। उन्होंने लिखा है “गाने से रक्त-सञ्चालन में तीव्रता आती है, शिराओं में नव-जीवन का संचार होता है। शरीर के विषैले पदार्थ व मल दूर होते हैं। गाने से फेफड़ों और कलेजे की कोई भी बीमारी नहीं होती। जिगर सम्बन्धी रोग ठीक करने में इससे बड़ी मदद मिलती है।” पहले रोगी को बेहोश करके इलाज करने की हानिकारक पद्धति के बजाय अब रूस और अमेरिका के डॉक्टर तक यह कार्य संगीत द्वारा पूरा कर देते हैं और आसानी से बड़े-बड़े आपरेशन तक कर डालने में सफल हुए हैं। डॉ. वाल्टर एच वालसे का कथन है कि पाण्डु, यकृत तथा अपच में संगीत का मंत्रवत् प्रभाव पड़ता है।” आमेलिटा गलि कुर्से नामक एक अंगरेज युवती ने लिखा है कि “वह गाने के प्रयोग के कारण निरन्तर 18 वर्ष तक पूर्ण स्वस्थ व निरोग रही। इस अवधि में उसे कोई भी रोग नहीं हुआ। उसने सभी स्वास्थ्य चाहने वालों को यह सलाह दी है कि वे नियमित रूप से गाने का अभ्यास किया करें।” यदि आपका गला सुरीला नहीं है तो भी कोई बात नहीं, आप एकान्त में सिर्फ आन्तरिक अवयवों के व्यायाम एवं मालिश के लिए ही गा लिया करें तो स्वास्थ्य पर इसका प्रभाव पड़े बिना न रहेगा।

स्वास्थ्य दरअसल उत्तम चरित्र और आत्म संयम पर आधारित है। संगीत का चुनाव यदि इसके अनुरूप किया जाय तो निःसन्देह इससे हर कोई लाभान्वित हो सकता है। पाईथागोरस ने एक स्थान पर लिखा है “संगीत रोगों से छुटकारा दिलाता है वह चरित्र निर्माण में सहायक है आत्मोन्नति का प्रबल कारण है।”

स्नायु-दौर्बल्य, बहुमूत्र, सिर-सर्द, क्षय, अतिसार, तन्द्रा, दाह, विष का प्रभाव, अनिद्रा, हृदय की बीमारियाँ, कुष्ठ, पाण्डु, रक्तचाप, मूर्छा व मानसिक अशान्ति आदि प्रायः सभी रोगों में गायन से तत्काल शान्ति मिलती है। दुखी मन ही रोग-शोक का कारण होता है, उसे संगीत से प्रसन्नता मिलती है जिससे शारीरिक स्वास्थ्य स्थिर बना रहता है। इससे जीभ, कण्ठ और जबड़ों तथा श्वास प्रश्वास की क्रिया से फेफड़ों विशेष रूप से मजबूत बनते हैं।

वाद्य-संगीत यद्यपि उतना प्रभाव शील नहीं होता जितना गायन, किन्तु इससे भी हाथों, छाती व हृदय का व्यायाम हो जाता है। इनमें कुछ वाद्य-यन्त्र ऐसे भी होते हैं, जिनसे मानसिक अशान्ति व चित्त-विभ्रम आदि ऐसे ही दूर होते हैं जैसे गाने से। वीणा, तानपूरा, सितार की स्वर-लहरियाँ बड़ी ही मधुर होती हैं। हारमोनियम, बाँसुरी आदि से चित्त बड़ा प्रसन्न होता है। मुँह से फूँक कर बजाये जाने वाले यन्त्र जैसे बाँसुरी आदि से भी छाती की माँसपेशियाँ फैलती हैं और उससे भी फेफड़ों का व्यायाम होता है।

गायन के साथ यदि वाद्य की संगति कर दी जाय तो और भी अच्छा हो। इससे दोनों के सम्मिश्रण का आनन्द भी मिलता है और अवयवों का व्यायाम भी हो जाता है। कुछ रोगों का तो सम्बन्ध ही वाद्यों से है। आसावरी रोग से सिर दर्द दूर होने, वीणा पर जैजैवन्ती राग से लकवे की शिकायत दूर होने के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। कई स्थानों पर अभी भी माली लोग एक विशेष प्रकार से ताल वाला “पचड़ा” राग गा कर चेचक रोगियों को अच्छा कर देते हैं। यह राग ढोल, झाँझ और मजीरा बजा कर गाया जाता है। इसमें वाद्य-यन्त्रों से उत्पन्न हुई स्वर लहरियाँ ही काम करती हैं। साँप के काटे पर काँसे की थाली बजा कर उपचार करने की पद्धति अभी भी गाँवों में प्रचलित है। विषैले फोड़े भी इस पद्धति में अच्छे किये जाते हैं।

गायन और वाद्य मिलकर भोजन पचाने की अभूतपूर्व क्षमता रखते हैं। पौष्टिक से पौष्टिक आहार भी इससे सुगमता से पच जाते हैं इसलिये भोजन के उपरान्त संगीत का आयोजन रखना विशेष लाभदायक होता है। बच्चों में इससे भूख बढ़ती है। एक डॉक्टर का तो यह मत है कि “इससे बच्चों को घोड़ों जैसी भूख लगती है।”

नृत्य भी गायन-वादन के समान ही मृदु-व्यायाम माना जाता है। इसमें शारीरिक अंग सञ्चालन की आवश्यकता पड़ती है उसी से शरीर का पूर्ण व्यायाम हो जाता है। भारतीय नृत्यों में कत्थक, मणिपुरी, लास्य, ताण्डव आदि बड़े महत्वपूर्ण हैं। इनका प्रभाव न केवल बाह्य-शरीर पर पड़ता है अपितु इससे आत्म-जगत भी क्रियाशील होता है।

शरीर की सम्पूर्ण माँस पेशियों का एक साथ व्यायाम नृत्य से पूरा होता है। इससे शरीर बढ़ता है और माँस पेशियाँ मजबूत होती है। श्वास-प्रश्वास की क्रिया में तीव्रता आती है जिससे रक्त सञ्चालन बढ़ जाता है। फेफड़ों और हृदय का पूर्ण व्यायाम हो जाता है। नृत्य से भूख खूब खुलकर लगती है। आहार ठीक प्रकार पच जाता है। इससे हाथ, पाँव, वक्ष, उदर, नेत्र, ग्रीवा, कण्ठ, कमर आदि का पूर्ण व्यायाम हो जाता है और किसी एक स्थान पर चर्बी जमा नहीं होने पाती जिससे शरीर सुडौल बना रहता है।

इस प्रकार संगीत मानव-जीवन के लिए अत्यन्त उपयोगी वस्तु है। शरीर गत पंच-वायु पर भी इसका प्रभाव होता है जिससे विष निकालने की क्रिया तीव्र होती है और प्राण-विद्युत बढ़ती है। संगीत का सम्बन्ध आत्मा के सूक्ष्म जगत के साथ होने से उसका प्रभाव सर्वोपरि माना गया है। डॉ॰ जार्ज स्टीवेन्सन ने लिखा है “क्रोध उत्पन्न हो तो शारीरिक श्रम में लगें।” “विक्षिप्त मन स्वाध्याय से शान्त होता है।” “शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए व्यायाम की आवश्यकता अनिवार्य है।” इन तीनों के लिए एक और सार्थक उपाय संगीत है। इससे मानसिक तनाव दूर होता है, शान्ति मिलती है और स्वास्थ्य स्थिर रहता है। अतएव अपने जीवन को संगीतमय बनाने का प्रयत्न सभी को करना चाहिये।


मधु-संचय


मधु-संचय (Kavita)

भूतल स्वर्ग एक करने को बहे कर्म की गंगा, श्याम घनों में निकले प्यारा इन्द्र धनुष बहुरंगा। जीवन में हो ज्योति-ज्योति में प्रतिभा जगमग जागे, प्रतिभा कर दिग्विजय झूमती आये अपने आगे। सुगम हमें हो हिम बरसाती तूफानों की राह। जन-जन में उमड़े भारत माँ के प्रति प्रेम प्रवाह॥

नानाथ ‘दिनेश’

सत्कर्मों पर चलना ही तुम,

अपना जीवन जानो।

जितना चले कि चरण चूमने,

स्वर्ग आ गया मानो॥

मन से, वचन,कर्म से जिसने,

सद् पथ को अपनाया।

उसने निज चरणों के नीचे,

सौ स्वर्गों को पाया॥

—रामेश्वर दयाल ‘दुबे’

जिस तरफ उठे नजर उधर धुआँ,

और रोशनी बहुत उदास है।

जिस तरफ बढ़े कदम उधर कुआँ,

शान्ति का न ठाँव आस-पास है।

तुम बना रहे महल टिकाव के,

स्वार्थ की प्रकृति उन्हें कुचल रही।

प्यार का दिया न जब जला यहाँ,

व्योम का उदर वहाँ निरख रहे।

दृष्टि के लिये मिली न मंजिलें,

सृष्टि के लिये जगा अलख रहे।

सूर्य चन्द्र थे जहाँ, रहे वहीं,

पर धरा निसर्ग को निगल रहे॥

—वीरेन्द्र ‘सरल’

अन्धकार दूर हो, प्रकाश आज चाहिये। प्रेम और प्रतीति का विकास आज चाहिये। जो मिटा सके सड़ांध दैन्य और दुराव की, सत्य और धर्म की सुवास आज चाहिये। जाग इसलिये सपूत कर्म है बुला रहा। खोल वक्ष डर न आज मर्म है बुला रहा। ज्ञान का प्रवाह जो बहा सके त्रिलोक में, आज फिर वही तुझे स्वधर्म है बुला रहा॥ —सुमित्रा देवी ‘परिहार’

लो जागो! अब उठो! मनस्वी,

नव-युग का निर्माण करो।

अकर्मण्यता छोड़ प्रगति के पथ पर पाँव बढ़ाना है। वैभव और विजय का सूचक धर्म केतु फहराना है। फिर लेना आनन्द सुधा का प्रथम गरल का पान करो। नव-युग का निर्माण करो॥

—दुर्गेश ‘दीक्षित’

दुर्दिन में भी जो पीछे पाँव न धरते,

सह स्वयं कष्ट औरों की पीड़ा हरते।

काँटों की सेज बनाकर जो सोते हैं-

वे पुरुष सिंह मरकर भी कभी न मरते। लिखते हैं वे इतिहास समय के पट पर।

लाते जो मोती बीन मृत्यु के तट पर॥

—वीरसिंह ‘राठौर’

आरुढ़ सत्य पर शूर-वीर होते हैं। कायर तो जग का अधम भार ढोते हैं। चट्टानों को जो तोड़ बना दें पानी- ऐसे इस जग में विरले ही होते हैं। है रही सदा वीरों की यही निशानी। पत्थर को भी जो तोड़ बना दें पानी॥ —जगतनारायण शर्मा

युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति

हमारे प्रतिनिधि एवं उत्तराधिकारी

अब हर जगह अपने उत्तरदायित्व सँभाल लें

धर्म प्रचार करते हुए—जन-जागरण का शंख बजाते हुए—’अखण्ड-ज्योति’ को पूरे पच्चीस वर्ष बीत गये। इस अंक के साथ ‘अखण्ड-ज्योति’ अपने जीवन-काल के पूरे पच्चीस वर्ष समाप्त करती है।

पच्चीस वर्ष की एक अवधि पूरी करके उसने प्रचार एवं संगठन का कार्य पूरा किया है। भारतीय संस्कृति के अनुरूप जन-मानस विनिर्मित करने के लिए उसने अपने स्वल्प साधनों के द्वारा घनघोर प्रयत्न किया है। लाखों नहीं, करोड़ों व्यक्तियों तक अपना सन्देश पहुँचाया है। नव-निर्माण की विचारधारा से प्रभावित किया है। अगणित व्यक्तियों की जीवन दिशाओं को मोड़ा है। लोक-निर्माण के लिए सहस्रों जन-सेवी उत्पन्न किये हैं और एक ऐसे सुसंगठित परिवार की रचना की है जिसमें तीस हजार व्यक्ति मधु-मक्खियों के छत्ते में रहने वाले अण्डे-बच्चों की तरह एक सुदृढ़ आस्था अपना कर, बहुत कुछ करने की तैयारी में संलग्न हैं।

किन्तु हमारा-इन पंक्तियों के लेखक का-शरीर दिन-दिन थकता जाता है। कार्य करने के सात वर्ष -जो और शेष हैं वे अब धीरे-धीरे घटते चले जा रहे हैं। आगे हमें राष्ट्र को नई शक्ति दे सकने वाली प्रचण्ड तपश्चर्या भी करनी है। ऐसी दशा में अब वह समय आ पहुँचा जब कि हम अपना उत्तरदायित्व उन कन्धों पर डालना आरम्भ कर दें जिन्हें समर्थ और सामर्थ्यवान् देखे हैं। हम अपनी आँखों से यह देखकर सन्तुष्ट एवं आश्वस्त होना चाहते हैं कि जो मशाल जलाई गई थी, उसे आगे से चलने का क्रम ठीक प्रकार चल रहा है। अगले सात वर्ष इसी प्रक्रिया को पूर्ण करने में लगाने का निश्चय कर लिया है। इसे ‘सत्ता हस्तान्तरण कार्यक्रम’ कह सकते हैं। दूसरे शब्दों में इसे ‘उत्तराधिकार घोषणा’ भी कह सकते हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ के जीवन के पच्चीस वर्ष इसी दिसम्बर में पूरे हो रहे हैं। रजत-जयन्ती की शानदार अवधि उसने पूरी कर ली। अब वह स्वर्ण-जयन्ती वाले दूसरे अध्याय में प्रवेश करती है। अतएव इस सन्धि-वेला में उसे तदनुरूप कार्यक्रम भी बनाना पड़ रहा है। इन पंक्तियों में उसी की चर्चा की जा रही है।

युग-निर्माण-योजना, शत सूत्री कार्यक्रमों में बँटी हुई है। वे यथा-स्थान, यथा-स्थिति, यथासम्भव कार्यान्वित भी किये जा रहे हैं पर एक कार्यक्रम अनिवार्य है और वह यह कि इस विचारधारा को जन-मानस में अधिकाधिक गहराई तक प्रविष्ट कराने—उसे अधिकाधिक व्यापक बनाने—का कार्यक्रम पूरी तत्परता के साथ जारी रखा जाय। हम थोड़े व्यक्ति युग को बदल डालने के लिए पर्याप्त नहीं—धीरे-धीरे समस्त मानव समाज को सद्भावना सम्पन्न एवं सन्मार्ग मार्गी बनाना होगा और यह तभी सम्भव है जब यह विचारधारा गहराई तक जन मानस में प्रविष्ट कराई जा सके। इसलिए अपने आस-पास के क्षेत्र में इस प्रकाश को व्यापक बनाये रखने का कार्य तो परिवार के प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति को करते ही रहना होगा। अन्य कोई कार्यक्रम कहीं चले या न चले पर यह कार्य तो अनिवार्य है कि इस विचारधारा से अधिकाधिक लोगों को प्रभावित करने के लिए निरन्तर समय, श्रम, तन एवं मन लगाया जाता रहे। जो ऐसा कर सकते हैं, जिनमें ऐसा करने की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गई है, उन्हें हम अपना उत्तराधिकारी कह सकते हैं। धन नहीं, लक्ष्य हमारे हाथ में है, उसे पूरा करने का उत्तरदायित्व भी हमारे उत्तराधिकार में किसी को मिल सकता है। उसे लेने वाले भी कोई बिरले ही होंगे। इसलिए उनकी खोज तलाश आरम्भ करनी पड़ रही है।

जन-साधारण को विचारणा एवं प्रेरणा नियमित रूप से देते रहने का कार्य सब से पहला है। यह प्रबन्ध हो जाता है, तो अन्य सार्वजनिक प्रवृत्तियाँ पनपती रहती हैं। जिनमें स्वयं का स्थायी उत्साह हो वे ही दूसरे शिथिल लोगों में नव-जीवन संचार करते रह सकते हैं। जो स्वयं ही शिथिल हो रहे हैं उन्हें दूसरों की शिथिलता के कारण प्रगति रुक जाने का बहाना ढूँढ़ना व्यर्थ है। एक वेश्या सारे मुहल्ले में दुर्बुद्धि पैदा कर देती है, तो एक प्रेरणाशील प्राणवान् व्यक्ति भी दीपक की तरह अपने क्षेत्र को प्रकाशवान बनाये बिना नहीं रह सकता। आग जहाँ रहेगी, वहाँ गर्मी पैदा करेगी ही। भावनाशील व्यक्ति जहाँ भी रहें वे वहाँ भावनाओं का प्रवाह करने ही लगेंगे। इसमें न तो सन्देह की गुंजाइश है और न आश्चर्य की। प्राणवान् व्यक्तियों द्वारा दूसरों में प्राण फूँका जाता है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।

आजकल हम ऐसे ही अपने प्राणवान् उत्तराधिकारी ढूँढ़ने में लगे हैं। जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य हैं उन सभी स्थानों में अपने प्रतिनिधि नियुक्त करना चाहते हैं। इन प्रतिनिधियों पर युग-निर्माण के अनुरूप चेतना उत्पन्न करते रहने का उत्तरदायित्व रहेगा। हमारे जीवन का बाह्य कार्यक्रम भी यही रहा है। हमारे उत्तराधिकारी भी अपनी परिस्थितियों के अनुसार इन्हीं गतिविधियों को अपनायेंगे। वे अपनी रोजी-रोटी कमाते हुए भी अपने निजी आवश्यक कार्यों की तरह जन-जीवन में चेतना उत्पन्न करने के लिए यदि थोड़ा भी प्रयास करते रहेंगे तो निश्चय ही उस क्षेत्र में आशा-जनक प्रकाश जलता और बढ़ता रहेगा।

इन दिनों जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ जाती है उन स्थानों में हम अपने प्रतिनिधि नियुक्त कर रहे हैं। एक प्रधान प्रतिनिधि और दो सहायक प्रतिनिधि होने से तीन व्यक्तियों की वह मण्डली पर्याप्त हो सकती है। जहाँ अधिक सक्रिय लोग है, वहाँ यह संख्या पाँच तक भी बढ़ सकती है। जहाँ परिवार के लोग बहुत कम है, वहाँ एक प्रतिनिधि से भी काम चल सकता है। नव-निर्माण की विचारधारा को प्रसारित करने और उस प्रभाव-क्षेत्र में आये हुए लोगों को संगठित रखने तथा सक्रिय बनाने के लिए इन प्रतिनिधियों को विशेष रूप से प्रयत्न करना होगा ताकि जहाँ अपना बीजाँकुर पहुँच चुका है, वह सूखने न पावे वरन् खाद पानी प्राप्त करके बढ़े, विस्तार करे, फले-फले और धीरे-धीरे सुरम्य उद्यान के रूप में परिणत हो जाय। इस भावना को जो हृदयंगम कर सके, इस प्रयास में जो सक्रिय सहयोग दे सके, वही हमारे प्रतिनिधि बनने का अधिकारी हो सकता है।

यों अनेक स्थानों पर युग-निर्माण की शाखाएँ स्थापित हैं। उनके कार्यकर्त्ता भी चुने और बदले जाते रहते हैं। यह चलता ही रहना चाहिए। नये-नये लोगों को काम सिखाना, उन्हें पदाधिकारी बनाकर अनुभव एवं श्रेय देना आवश्यक है। उनमें हेर-फेर होते रहने में हर्ज नहीं। लगन के निष्ठावान् व्यक्ति कहीं-कहीं कोई बिरले ही होते हैं और उन्हीं के बलबूते पर सारी गतिविधियाँ सजीव रहती हैं। स्थिर गति और प्रगति निष्ठा हर किसी में नहीं होती, जिनमें होती है, वे ही कुछ चिरस्थायी कार्य कर सकते हैं। हमें ऐसे ही लोगों की तलाश है।

कष्ट पीड़ित, कामनाग्रस्त, ऋद्धि सिद्धि के आकाँक्षी, स्वर्ग मुक्ति के फेर में पड़े हुए, विरक्त , निराश व्यक्ति भी हमारे संपर्क में आते रहते हैं। ऐसे कितने ही लोगों से हमारे सम्बन्ध भी हैं, पर उनसे कुछ आशा हमें नहीं रहती। जो अपने निजी गोरखधन्धे में इतने अधिक उलझे हुए हैं कि ईश्वर, देवता, साधु, गुरु किसी का भी उपयोग अपने लाभ के लिए करने का ताना-बाना बुनते रहते हैं, वे बेचारे सचमुच दयनीय हैं। जो लेने के लिए निरन्तर लालायित हैं, उन गरीबों के पास देने के लिए है ही क्या? देगा वह—जिसका हृदय विशाल है, जिसमें उदारता और परमार्थ की भावना विद्यमान है। समाज, युग, देश, धर्म, संस्कृति के प्रति अपने उत्तरदायित्व की जिसमें कर्तव्य-बुद्धि जम गई होगी—वही लोक-कल्याण की बात सोच सकेगा और वही वैसा कुछ कर सकेगा। आज के व्यक्ति वादी, स्वार्थ परायण युग में ऐसे लोग चिराग लेकर ढूँढ़ने पड़ेंगे। पूजा उपासना के क्षेत्र में अनेक व्यक्ति अपने आपको अध्यात्म-वादी कहते मानते रहते हैं पर उनकी सीमा अपने आप तक ही सीमित है। इसलिए तत्वतः वे भी संकीर्ण व्यक्ति वादी ही कहे जा सकते हैं।

हमारी परम्परा पूजा उपासना की अवश्य है पर व्यक्ति बाद की नहीं। अध्यात्म को हमने सदा उदारता, सेवा और प्रस्ताव की कसौटी से कसा है और स्वार्थी को खोटा एवं परमार्थी को खरा कहा है। अखण्ड-ज्योति परिवार में दोनों ही प्रकार के खरे-खोटे लोग मौजूद हैं। अब इनमें से उन खरे लोगों की तलाश की जा रही है जो हमारे हाथ में लगी हुई मशाल को जलाये रखने में अपना हाथ लगा सकें, हमारे कंधे पर लदे हुए बोझ को हलका करने में अपना कंधा लगा सकें। ऐसे ही लोग हमारे प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी होंगे। इस छाँट में जो लोग आ जावेंगे उनसे हम आशा लगाये रहेंगे कि मिशन का प्रकाश एवं प्रवाह आगे बढ़ाते रहने में उनका श्रम एवं स्नेह अनवरत रूप से मिलता रहेगा। हमारी आशा के केन्द्र यही लोग हो सकते हैं। और उन्हें ही हमारा सच्चा वात्सल्य भी मिल सकता है। बातों से नहीं काम से ही किसी की निष्ठा परखी जाती है और जो निष्ठावान् हैं उनको दूसरों का हृदय जीतने में सफलता मिलती है। हमारे लिए भी हमारे निष्ठावान् परिजन ही प्राणप्रिय हो सकते हैं।

लोक सेवा की कसौटी पर जो खरे उतर सकें, ऐसे ही लोगों को परमार्थी माना जा सकता है। आध्यात्मिक पात्रता इसी कसौटी पर परखी जाती है। हमारे उस देव ने अपनी अनन्त अनुकम्पा का प्रसाद हमें दिया है। अपनी तपश्चर्या और आध्यात्मिक पूँजी का भी एक बड़ा अंश हमें सौंपा है। अब समय आ गया जब कि हमें भी अपनी आध्यात्मिक कमाई का वितरण अपने पीछे वालों को वितरित करना होगा। पर यह क्रिया अधिकारी पात्रों में ही की जायगी, यह पात्रता हमें भी परखनी है और वह इसी कसौटी पर परख रहे हैं कि किस के मन में लोक सेवा करने की उदारता विद्यमान है। इसी गुण का परिचय देकर किसी समय हमने अपनी पात्रता सिद्ध की थी अब यही कसौटी उन लोगों के लिए काम आयेगी जो हमारी आध्यात्मिक पूँजी के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करना चाहेंगे।

आगामी बसन्त-पंचमी से गायत्री उपासना की कुछ प्रक्रिया कुछ विशेष व्यक्तियों को आरम्भ कराने जा रहे हैं। इसमें हमारा व्यक्तिगत सहयोग और अनुदान भी उन साधकों को मिलेगा। यों साधारण साधना सभी उपासक करते हैं। पंचकोशी उपासना भी कितने ही लोग कर रहे हैं। यह शास्त्रीय विधान है जिसे बताना हमारे लिए आवश्यक ही था। कुछ विशेष उपलब्धियाँ इस क्षेत्र में ऐसी भी हैं जिन्हें प्राप्त करने के लिए साधकों को स्वयं तो प्रयत्न करना ही होगा, साथ ही हमारा प्रयास भी कम न होगा। दोनों मिलकर ही उसे सफलता एवं पूर्णता की मंजिल तक पहुँचा सकेंगे। इस साधना प्रयास में लगे हुए व्यक्ति हमारे आध्यात्मिक प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी कहे जा सकेंगे।

सेवा और साधना दोनों ही हमारे कार्य क्षेत्र रहे हैं। हम जानते हैं कि जिनके कन्धों पर हम अपनी परम्परा को आगे ले चलने का उत्तरदायित्व सौंपें वे दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से निष्ठावान् हों। उपासना की भाँति ही उन्हें लोकसेवा में भी अभिरुचि हो। एकाँगी अभिरुचि वाले व्यक्ति हमारी दृष्टि से आधे अध्यात्मवादी हैं उन्हें एक टाँग का, एक हाथ का, एक आँख का, अर्धांग, बात पीड़ित ही कहा जायगा। फौज में डाक्टरी मुआयने में ‘फिट’ युवक ही भर्ती होते हैं। हमारा उत्तराधिकार उन्हें मिलेगा, हमारे प्रतिनिधि वे होंगे जो साधना में ही नहीं लोक सेवा में भी समुचित अभिरुचि लेंगे। युग-निर्माण योजना इसी प्राथमिक परीक्षा के रूप में हमने अपने परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत की है। उस कसौटी पर खरे-खोटे सहज में परख में और पकड़ में आते चले जा रहे हैं।

इन दिनों उसका अन्तिम निराकरण होने जा रहा है। हमने अपने लोक सेवा कार्य काल के ‘अखण्ड-ज्योति’ के जीवन के पच्चीस वर्ष पूरे करते ही यह कदम उठाया है कि अपने सहयोगी विशिष्ट कार्यकर्ताओं की अन्तरंग गोष्ठी अलग से विनिर्मित करना आरम्भ कर दें और जो परिपक्व लोग हों उनके कन्धों पर वह सब कुछ सौंपना आरम्भ करदें जो आज हमें करना है। प्रश्न केवल कुपात्र की परख का है। सो उसके लिए आरम्भिक जाँच की जा रही है। जो उपयुक्त सिद्ध होते जायेंगे उन्हें अपनी व्यक्ति गत अभिरुचि के साथ आध्यात्मिक प्रगति के क्षेत्र में बढ़ना उतनी तत्परता के साथ आरम्भ कर देंगे जितनी कि संभव होगी।

इस प्रयोजन के लिए ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों से आवश्यक पूछ-ताछ आरम्भ कर दी है। अलग से परिपत्र भेजकर यह मालूम किया जा रहा है कि किस स्थान पर किन्हें प्रतिनिधि नियुक्त किया जाय। जहाँ भी ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती होगी वहाँ हमें अपने प्रतिनिधियों की नियुक्ति करनी है। कम से कम एक तो हर जगह होगा। जहाँ अधिक संख्या में सदस्य हैं वहाँ तीन जहाँ बहुत अधिक सदस्य हैं वहाँ पाँच तक का एक प्रतिनिधि मण्डल रह सकेगा। अपने स्थानों में वे नवनिर्माण के लिए हमारे प्रतिनिधि के रूप में कार्य करेंगे। और अपनी व्यक्ति गत उपासना को बढ़ाते हुए उसी प्रकार आध्यात्मिक मार्ग पर तेजी से आगे बढ़ने का अवसर प्राप्त करेंगे जैसा कि हमें प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता रहा है।


आगामी माघ का अति महत्वपूर्ण शिक्षण शिविर

साधना एवं सम शिक्षा के लिए अनुपम अवसर

आश्विन के चान्द्रायण व्रत शिविर की सफलता को आशातीत कहा जा सकता है। उसमें सम्मिलित होने वाले साधकों का यह एक महीने का समय कितना सार्थक हुआ इसका पता उनके द्वारा भेजे गये पत्रों से चलता है। घर जाकर उनमें क्या सुधार एवं परिवर्तन हुआ इसका जो विवरण उन लोगों ने भेजा है उससे विदित होता है कि इस एक महीने के सुअवसर को वे अपने जीवन का एक अनुपम सौभाग्य मानते हैं। जो शिक्षा एवं प्रेरणा लेकर वे गये हैं वह सुनने मात्र की नहीं रही वरन् अन्तःकरण में उतरती चली गई और उसने शिविर में सम्मिलित होने वालों की जीवन पद्धति में असाधारण हेर-फेर उपस्थित कर दिया। इस परिवर्तन से उनकी अनेकों समस्यायें सुलझी हैं और उज्ज्वल भविष्य का पथ प्रशस्त हुआ है।

चान्द्रायण व्रत का अध्यात्मिक महत्व शास्त्रकारों ने बहुत ही उच्च श्रेणी का बताया है। कलियुग की उसे एक मात्र तपश्चर्या कहा गया है। सोने को तपाकर जिस प्रकार उसका मलीनता शुद्ध की जाती है। ईंट को पकाकर जैसे उसे सुदृढ़ बनाया जाता है। अन्न को पकाकर जैसे रसायन बनते हैं उसी प्रकार चान्द्रायण व्रत की अग्नि में पकाने पर मनुष्य शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकृतियों से छुटकारा पाकर अपने उज्ज्वल स्वरूप में पहुँचने का लाभ प्राप्त करता है। आत्मा पर चढ़े हुये मल आवरण एवं विक्षेपों के समाधान करने वाली, इस जीवन में बन पड़े पापों का प्रायश्चित कराकर आँतरिक पवित्रता का प्रकाश उत्पन्न करने वाली यह एक अनुपम साधना है। शास्त्रों में इसे

आत्मकल्याण की साधनाओं में सर्वश्रेष्ठ घोषित किया है।

गायत्री उपासना आदि भजन साधनाओं को सफलता में सबसे बड़ी बाधा आत्मिक मलीनता की ही होती है। चान्द्रायणव्रत का आश्रय लेने पर अन्य उपासनाओं की सफलता वैसे ही अधिक संभावित हो जाती है जैसे खेत को भली प्रकार जोतने के बाद बोये गये बीज के उगने का विश्वास रहता है। जो लोग लम्बे समय में अपनी उपासना करते रहे हैं और आवश्यक लाभ न मिलने की शिकायत करते रहते हैं उन्हें चान्द्रायणव्रत के साथ वह साधना करने के उपराँत वैसी निराशा का कोई कारण नहीं रहता। गायत्री तपोभूमि जैसे पुण्य तीर्थ में रहकर की हुई गायत्री उपासना सोने में सुगन्ध का काम करती है फिर उसके साथ चान्द्रायणव्रत का समन्वय हो जाने पर तो उसे शुद्ध स्वर्ण के रत्नजटित आभूषण की तुलना दी जा सकती है। ऐसी साधना किसी के लिए भी सन्तोष-जनक सिद्ध हो सकती है।

कई प्रकार की साधना उपासनाओं और व्रत तप साधनों के माहात्म्य धर्म ग्रन्थों में लिखे मिलते हैं। इनकी ओर हमारा उतना ध्यान नहीं जा पाता था पर अज्ञात वास से लौटने के बाद तपोभूमि में आने वाले साधकों की शारीरिक चिकित्सा में थोड़ी अभिरुचि लेनी जब शुरू की और प्राकृतिक चिकित्सा के संदर्भ में कुछ रोगियों को चान्द्रायणव्रत कराये तो उसके प्रतिफल को देखकर यह विश्वास बहुत बढ़ा कि यह तपश्चर्या आध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं शारीरिक दृष्टि से भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। आध्यात्मिक लोगों के विषय में तो अप्रत्यक्ष होने के कारण उन्हें संदेहास्पद भी कहा जा सकता है पर शारीरिक लाभ तो पूर्ण प्रत्यक्ष होने के कारण उनमें किसी प्रकार के सन्देह की भी गुंजाइश नहीं है। शरीर-शोधन की उसे एक अनुपम पद्धति कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

लगातार बहुत दिन विचार करने और कई तरह के प्रयोग करने के पश्चात् पिछले तीन वर्षों से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा है कि पेट के रोगों में चान्द्रायणव्रत को एक प्रकार से कल्प-चिकित्सा का रूप भी दिया जा सकता है। प्राकृतिक चिकित्सा के सिद्धान्तों से इसका पूरा-पूरा ताल-मेल खाता है। यों प्राकृतिक चिकित्सालयों में आमतौर से पेट के रोगियों को चार-छः महीने रहना पड़ता है। पर चान्द्रायणव्रत चिकित्सा से एक महीने की निर्धारित अवधि में इतना लाभ मिल जाता है कि उससे काम चलाऊ स्थिति प्राप्त हो जाय और यदि वह बताये हुए नियम साधनों से रहना आरम्भ कर दे तो कुछ ही दिनों में अपनी कब्ज सम्बन्धी उदर-व्यथाओं से स्थायी छुटकारा प्राप्त कर ले। इतने स्वल्प समय में इतने कम खर्च की सफल उदर चिकित्सा, शायद ही कोई दूसरी हो सके।

यह प्रसिद्ध है कि समस्त रोगों की जड़ पेट में रहती है। खाया भोजन जब पचता नहीं तो उससे उचित मात्रा में शुद्ध रक्त भी नहीं बनता। रक्त की कमी और अशुद्धता शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्न प्रकार की दुर्बलता एवं रुग्णता उत्पन्न करती है। रोगों के नाम, रूप और लक्षण अनेक होते हुए भी वस्तुतः उनका मूल एक ही होता है। पेट में बिना पचा अन्न जब सड़ता है तो वह वायु-विकारों से लेकर विष-वृद्धि तक के ऐसे संकट उत्पन्न करता है जिसके विश्लेषण में इतना बड़ा चिकित्सा शास्त्र बनकर खड़ा हो गया है। यदि कब्ज पर काबू प्राप्त कर लिया जाय, पाचन यन्त्र ठीक काम करने लगे तो अन्य बीमारियों पर सहज ही विजय प्राप्त की जा सकती है। चान्द्रायणव्रत इसी आवश्यकता को पूरा करता है।

शास्त्रीय पद्धति के अतिरिक्त हमने चाँद्रायणव्रत में आरोग्य-शास्त्र सम्मत अन्य प्रक्रियाओं को भी सम्मिलित कर दिया है। जिससे वह और भी अधिक विज्ञान सम्पन्न बन गई है। ‘कृच्छ्र’ चाँद्रायणव्रत केवल समर्थ और बलवान् व्यक्ति ही कर सकते हैं पर ‘मृदु’ चान्द्रायणव्रत जो इन शिविरों में कराया जाता है वह इतना सरल है कि छोटे बालकों से लेकर गर्भिणी स्त्रियों एवं वृद्ध पुरुषों के सभी दुर्बल प्रकृति के लोग बड़ी आसानी से हँसते-खेलते उसे पूरा कर लेते हैं।

मनोविकारों के शोधन की महत्वपूर्ण प्रक्रिया इस तपश्चर्या से पूर्ण होती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर के तूफानी प्रवाह रुकते हैं। दुर्बुद्धि और दुर्भावना पर नियन्त्रण करने की क्षमता उपलब्ध होती है। साथ ही निराशा, चिन्ता, आशंका, कायरता, आत्महीनता, अस्तव्यस्तता जैसे मनोविकारों के समाधान का अवसर मिलता है। आलस्य, कटुभाषण, उत्तेजना, आवेश, इन्द्रिय व्यसन, लिप्सा, इन्द्रिय लोलुपता, असंयम जैसे गुण, कर्म, स्वभाव में घुसे हुए विकारों को परास्त करने योग्य आत्मबल बढ़ जाता है। इस दृष्टि से चान्द्रायणव्रत—एक प्रकार की मानसिक चिकित्सा -भी कहा जा सकता है।

साधना, तपश्चर्या एवं चिकित्सा की दृष्टि से चान्द्रायणव्रत-साधना का अपना विशेष महत्व है। उसे शरीर, मन और आत्मा को निर्मल बनाने का एक प्रभावशाली उपाय कहा जा सकता है। तपोभूमि में चलने वाले शिविरों में जीवन विद्या के प्रशिक्षण की जो व्यवस्था की गई है, वह इस व्रत साधना के महत्व को दूना चौगुना कर देती है। मोटर चलाने वाले उसकी मशीन तथा गतिविधियों के बारे में आवश्यक जानकारी सीखते हैं, पर कितने खेद की बात है कि मनुष्य शरीर जैसे बहुमूल्य यन्त्र को ठीक तरह प्रयोग करने की विद्या से प्रायः अनभिज्ञ ही बने रहते हैं। अनाड़ी ड्राइवर के हाथ में बढ़िया मोटर भी जिस प्रकार दुर्घटना-ग्रस्त होती रहती है, उसी प्रकार हम जीवन में भी पग-पग पर असफलताओं एवं व्यथाओं की दुर्घटना देखते—सहते रहते हैं। यदि हमें जीना होता तो शरीर और मन का ठीक उपयोग जानते होते। गुण, कर्म, स्वभाव को व्यवस्थित बना सके होते तो निश्चय ही स्थिति उससे बहुत भिन्न होती जैसी कि आज है।

छोटे-छोटे उद्योगों और यन्त्र चलाने की ट्रेनिंग प्राप्त करने के अनेक व्यवस्थित अव्यवस्थित शिक्षा माध्यम मौजूद हैं पर इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जिन्दगी जीने की कला सीखने का कोई व्यवस्थित केन्द्र कहीं नहीं है। तपोभूमि में इस भारी कमी की पूर्ति के लिए जो अभिनव प्रयास आरम्भ किया गया है, उसे मानवीय आवश्यकताओं की एक अभूतपूर्व पूर्ति ही कहनी चाहिए। विगत जून के तथा उससे पीछे के कई शिक्षण-शिविरों में संजीवन विद्या सम्बन्धी अपनी जानकारी के आधार पर जो सिखाया गया है, जो सीखा गया है, वह आशातीत प्रतिफल उत्पन्न कर सका है। अब उस ज्ञान को और भी अधिक विकसित एवं व्यवस्थित किया जा रहा है। प्रशिक्षण की पद्धति में उत्तरोत्तर सुधार किया जा रहा है तो उसकी उपयोगिता भी बढ़ती चल रही है। जीवन-विकास के अवरोधों को मनुष्य समझ ले और उनका उचित हल मालूम कर ले तो प्रगति का पथ प्रशस्त हो जाता है और सामान्य स्थिति के व्यक्ति को भी असामान्य बनने का अवसर मिल जाता है। इस सम्बन्ध में व्यक्तिगत परामर्श प्राप्त करना प्रायः कठिन होता है, क्योंकि सुलझे हुए अनुभवी मस्तिष्कों की सलाह कहीं-कहीं ही उपलब्ध हो सकती है। जीवन विद्या के शिविर इन आवश्यकताओं की कमी को सहज ही पूरी कर देते हैं। यही कारण है कि पिछले दिनों जो भी इन शिविरों में आया है, अपने भाग्य को सराहते हुए उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना लेकर गया है।

चान्द्रायणव्रत की तपश्चर्या एवं संजीवन विद्या की शिक्षा, दोनों का सम्मिश्रित स्वरूप जिन शिविरों में सम्मिलित रहता है उनका लाभ ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सौभाग्यशाली सदस्य प्राप्त कर रहे हैं। जो इन शिविरों में रहकर गये हैं, उनके परिवर्तित एवं विकसित जीवन-क्रम को देखकर अन्य अनेकों के मन में भी वैसी ही आकाँक्षा जग रही है। तपोभूमि में ठहरने एवं प्रवचनों के लिए स्वल्प स्थान होने के कारण आश्विन शिविर में 50 व्यक्तियों को आने की स्वीकृति दी गई थी पर वह रोकते-रोकते भी 75 हो गई और धीरे-धीरे वह संख्या 100 से ऊपर निकल गई। स्थान की कमी के कारण कठिनाई तो सभी को पड़ी, पर किसी प्रकार काम चल गया।

आश्विन के शिविर में आने वालों ने श्रमदान से नया प्रवचन कक्ष आरम्भ कर दिया था। वह किसी प्रकार धीरे-धीरे बनने की ओर खिसकता चलता है। 1000 ईंटें लगने में जमीन, चूना, लोहा, लकड़ी आदि का कुल खर्च 100) आता है। सो दो-चार व्यक्तियों ने वह भी भेजा है। यह सहयोग दूसरों ने भी दिया तो प्रवचन-कक्ष जिसे ‘गीता विद्यालय’ नाम दे दिया गया है, कुछ समय में बन कर तैयार हो जायगा और तब 100 शिक्षार्थियों की व्यवस्था एक समय में भी रहने लगेगी।

गत अंक में शिविरों के कार्यक्रम में परिवर्तन की सूचना छपी थी। लगातार हर महीने शिविर चलाने की बात तो आवश्यक है क्योंकि ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के 30 हजार सदस्यों को अगले 7 वर्ष में इस शिक्षा एवं तपश्चर्या का लाभ देने एक महीने अपने सान्निध्य में रखने की हमारी अभिलाषा है। उसकी पूर्ति लगातार हर महीने शिविर चलाकर ही की जा सकती है। पर इन दिनों समुचित व्यवस्था न बन पड़ने के कारण उस क्रम में हेर-फेर करने को विवश होना पड़ा है। अब अगला शिविर माघ में होगा। ता. 17 जनवरी 65 से आरम्भ होकर उसकी समाप्ति 15 फरवरी को होगी।

इस माघ शिविर में गीता प्रशिक्षण की योजना भी सम्मिलित है। धर्म प्रचारकों का गीता के प्रेमियों को शिविर अलग से लगाये जाने की योजना थी सो अब बदल कर माघ से इकट्ठी ही कर दी है। जीवन विद्या की शिक्षा गीता के माध्यम से ही दी जाएंगी। 30 दिनों में गीता के 700 श्लोकों का मर्म समझाया जायगा और वह सब योजनायें भी समझाई जायेंगी जिनके आधार पर गीता सप्ताह को व्यापक योजना के अनुसार मोह ग्रस्त भारतीय समाज को पुनः धनुर्धारी अर्जुन की तरह किस प्रकार कर्मयोद्धा के रूप में परिणत किया जा सके। भारतीय समाज को पाँचजन्य बजाते हुए गाँडीव पर प्रत्यंचा टंकारते हुए नव निर्माण के संग्राम में आगे बढ़ाना ही होगा। उसकी सामर्थ्य और प्रेरणा उसे गीता से ही मिलती है। सो हमें गीता सप्ताहों को योजनानुसार लोक शिक्षण का अभियान भी आरम्भ करना होगा। इसके लिये कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण करना ही ठहरा। यह आवश्यकता भी इस बार माघ में ही पूरी कर रहे हैं। गीता शिक्षार्थियों को, षोडश संस्कार, पर्व, त्यौहार, गायत्री, यज्ञ आदि धर्मानुष्ठान कराने का उनके द्वारा लोक शिक्षण करने की शैली का ज्ञान कराया जाना है सो भी इन्हीं शिविरों से होगा।

माघ शिविर में आने वाले (1) चाँद्रायणव्रत (2) संजीवन विद्या (3) गीता प्रचारक प्रशिक्षण इन तीनों लाभों को उठा सकते हैं। जिनमें चान्द्रायणव्रत न बन पड़े वे शेष दो लाभ ले सकते हैं। जिन्हें आना हो उन्हें दिसम्बर मास में स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। और 14 जनवरी की शाम तक मथुरा पहुँच जाना चाहिए।

पिछले शिविर में सम्मिलित भोजन व्यवस्था का प्रयोग किया गया था जो उतना सफल नहीं रहा। अब की बार अपना-अपना या अपने-अपने गुणों का मिल जुलकर भोजन बनाने का प्रयोग चलाया जायगा। भोजन बनाने की कला जानना भी जीवन विद्या का एक अंग है सो भी सब को सीखना चाहिए। इस बार ऐसी ही व्यवस्था सोची गई है। इससे यह लाभ भी है कि विभिन्न व्यक्तियों की शारीरिक या मानसिक स्थिति के अनुसार भोजन क्रम सुझाया जा सकेगा। दूध कल्प, छाछ कल्प, दही कल्प, शाक कल्प, फल कल्प, अन्न कल्प जैसे विशिष्ट उपचार बनाये जा सकेंगे। लोग अपनी रुचि के अनुसार सस्ता या महंगा भोजन कर सकेंगे। स्वयं बना लेने से पकाने वाले की मजूरी बच जायगी। बनाने में थोड़ा समय लगेगा, एवं झंझट रहेगा। पर इसके बदले सुविधायें अनेक हैं। अतएव आने वाले यथा संभव भोजन पकाने खाने के काम चलाऊ बर्तन अपने साथ लेते आवें। यों जो न ला सकेंगे उनकी व्यवस्था यहाँ से भी की जा सकती है पर अच्छा यही है कि अपनी वस्तुयें स्वयं लेकर चलें। जाड़े की ऋतु रहने से बिस्तर भी पूरा ही लेकर आना चाहिए।

माघ मास धार्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ महीना माना जाता है। उस समय इस प्रकार की शिक्षा साधना का कुछ विशेष महत्व भी है। इसलिये जिन्हें सुविधा हो वे इस अवसर पर मथुरा आ सकते हैं। इसके बाद 10-10 दिन के तीन शिविर ज्येष्ठ में भी होंगे। माघ से ज्येष्ठ के बीच में कोई शिविर नहीं है। लगातार हर महीने शिविर चलाने की व्यवस्था तो संभवतः अगले वर्ष से ही बन सकेगी।

गीता प्रशिक्षण के उद्देश्य से आने वाले यदि माघ से बैसाख तक 4 महीने ठहर सकेंगे तो उन्हें कर्मकाँड, भाषण, संगीत का व्यावहारिक अनुभव भी हो जायगा, वे अपने हाथ से उन क्रियाओं को कर सकेंगे। एक महीने में तो सुनने का ही अवसर मिल सकता है। स्वयं कथा कहना, भाषण शैली का निखार, कथा कीर्तन के योग्य संगीत बजाना, यज्ञ, संस्कार, एवं पर्वों के आयोजन स्वयं करा सकने का अभ्यास, मंत्रों को याद करना आदि बातें समय साध्य हैं। इनके लिए कम-से-कम तीन महीने अभ्यास के लिए भी होने चाहिएं। इसलिए जिन्हें धर्म प्रचार में विशेष अभिरुचि हो उन्हें आगे भी तीन महीने ठहरने की तैयारी करके आना चाहिए।


युग निर्माण योजना, हर सदस्य पढ़े

‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक का देश भर में असाधारण स्वागत हुआ है। चार मास का स्वल्प समय ही अभी उसे निकलते हुए हुआ कि उसकी चर्चा चारों ओर फैली। इस थोड़ी अवधि में उसके जितने ग्राहक बने हैं उतने ‘अखण्ड-ज्योति’ के अपने आरम्भिक जीवन में दस वर्ष के लगातार प्रयत्न के बाद बन पाये थे। ऐसा सुन्दर, सुसंपादित, विविध विषय विभूषित सस्ता पाक्षिक अब तक हिन्दी में नहीं निकला ऐसा लोगों को कहना है। जिस आदर्श और उद्देश्य को लेकर यह प्रयास आरम्भ हुआ है उसकी विचारशील क्षेत्र में एक स्वर से भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है।

योजना को व्यापक बनाने के लिए ऐसे पत्र की भारी आवश्यकता अनुभव की जा रही थी जो नव-निर्माण के बहुमुखी आँदोलन को अग्रसर बनाने के लिए आवश्यक उत्साह एवं प्रकाश उत्पन्न कर सके। तीस हजार व्यक्तियों ने व्यक्तिगत चरित्र एवं सामाजिक सद्भाव उत्पन्न करने के लिए जो ऐतिहासिक आँदोलन आरम्भ किया है उसकी जानकारी दूसरों को होनी ही चाहिए ताकि उसका अनुकरण करने के लिए अन्यत्र से भी प्रोत्साहन प्राप्त हो सके।

संसार के कोने-कोने में जो रचनात्मक सत् प्रवृत्तियाँ चल रही हैं उन्हें प्रकाश में लाना आवश्यक है। दुष्प्रवृत्तियों से संघर्ष भी अपेक्षित है। इस प्रकार की प्रेरणायें व्यापक बनाने के लिये जहाँ ठोस कार्यक्रमों की नींव डालना, उन्हें मजबूत करना और बढ़ाना अभीष्ट है, वहाँ उन्हें प्रकाशित किया जाना भी आवश्यक है। आज की परिस्थितियों में किसी महत्वपूर्ण आँदोलन का संचालन बिना प्रभावशाली समाचार पत्र के कठिन है। उपयोगिता को देखते हुए इस आवश्यकता की पूर्ति के लिये ‘युग-निर्माण’ योजना मासिक का निकालना जब अनिवार्य प्रतीत हुआ तभी उसका प्रकाशन आरम्भ किया गया। हर्ष की बात है कि वह सफलता पूर्वक गतिशील हो रहा है।

‘अखण्ड-ज्योति’ के प्रत्येक सदस्य को इसे पढ़ना चाहिए। ताकि उसे अपने परिवार द्वारा चल रही महत्वपूर्ण प्रवृत्तियों की जानकारी रह सके। जो प्रेरणायें परिवार को दी गई हैं उन्हें किस प्रकार कार्यान्वित किया जा रहा है, या किया जाना चाहिए, उसका व्यावहारिक स्वरूप प्रस्तुत पाक्षिक पत्रिका से ही सामने आता है। जो विचार ‘अखण्ड-ज्योति’ द्वारा दिये जा रहे हैं उन्हें कहाँ किस प्रकार किसने, कब, किसको कार्यान्वित किया और उसके क्या परिणाम निकले, उसकी जानकारी हम सब को होनी ही चाहिए। अपने निजी परिवार के बारे में हमें जितनी दिलचस्पी रहती है उतनी ही इस धर्म परिवार के बारे में भी रहनी चाहिए। अन्यथा संकीर्णता के दायरे में सीमाबद्ध रहने का, समाज विमुख स्वार्थी होने का दोष अपने ऊपर आवेगा। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना कम-से-कम अपने धर्म परिवार ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार तक तो बढ़ानी ही चाहिए। और उसकी उन्नति अवनति के सम्बन्ध में, क्रिया प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में दिलचस्पी भी लेनी ही चाहिए।

बेशक ‘अखण्ड-ज्योति’ पीढ़ियों तक संग्रह करने की चिरस्थायी वस्तु है। उसका प्रत्येक अंक एक पुस्तक है जो सैंकड़ों वर्षों तक बेटे पोतों के लिये भी संजोकर रखी जानी चाहिए। मासिक पत्रिका के सम्बन्ध में यह बात नहीं कही जा सकती क्योंकि वह सामाजिक है। पर इसे पढ़ना तो आवश्यक है ही। इसलिए हर जगह ऐसी व्यवस्था की जा सकती है कि सम्मिलित रूप में एक दो अंक उपलब्ध करा लिये जाएं और उन्हें बारी-बारी सब सदस्य पढ़ लिया करें। जो साधन सम्पन्न हैं, वे अकेले ही वार्षिक चन्दा का छः रुपया भेजकर उसे मँगाने एवं अन्य सदस्यों तक उसे पहुँचाने का श्रेय लाभ कर सकते हैं। तरीका जो भी हो हर नगर में जहाँ ‘अखण्ड-ज्योति’ पहुँचती है वहाँ युग पत्रिका का पहुँचना भी आवश्यक है। जहाँ अभी तक व्यवस्था नहीं है। वहाँ अखण्ड ज्योति पत्रिका पहुंचाने की व्यवस्था कर ली जानी चाहिये। ‘अखण्ड-ज्योति’ का नये वर्ष का चंदा भेजते समय साथ ही ‘युग-निर्माण’का चन्दा भेजने की बात का भी स्मरण रक्खा जाना चाहिए। पत्रिका के नये ग्राहक बढ़ाते समय युग-निर्माण की भी पाठक संख्या बढ़ती रहे, ऐसी चेष्टा करते रहना चाहिए।

जहाँ जो रचनात्मक प्रवृत्तियाँ चल रही हैं उनके समाचार भी छपने के लिए भेजते रहने चाहिये। जन जागरण के लिये, सत्य वृत्तियों के अभिवर्धन के लिये, चारित्रिक उत्कृष्टता प्रतिपादित करने के लिए अनौचित्य से संघर्ष करने के लिए जहाँ जो कुछ किया जा रहा हो, उसका विवरण इस मासिक में छपने के लिए भेजते रहना चाहिए।

*समाप्त*