देने से ही मिलेगा

किसी को कुछ दीजिए या उसका किसी प्रकार का उपकार कीजिए तो बदले में उस व्यक्ति से किसी प्रकार की आशा न कीजिए। आपको जो कुछ देना हो दे दीजिए। वह हजार गुणा अधिक होकर आपके पास लौट आवेगा। परन्तु आपको उसके लौटने या न लौटने की चिन्ता ही न करनी चाहिए। अपने में देने की शक्ति रखिए, देते रहिए। देकर ही फल प्राप्त कर सकेंगे। यह बात सीख लीजिए कि सारा जीवन दे रहा है। प्रकृति देने के लिए आप को बाध्य करेगी। इसलिए प्रसन्नतापूर्वक दीजिए। आज हो या कल, आपको किसी न किसी दिन त्याग करना पड़ेगा ही।

जीवन में आप संचय करने के लिए आते हैं परन्तु प्रकृति आपका गला दबाकर मुट्ठी खुलवा लेती है। जो कुछ आपने ग्रहण किया है वह देना ही पड़ेगा, चाहे आपकी इच्छा हो या न हो। जैसे ही आपके मुँह से निकला कि ‘नहीं, मैं न दूँगा।’ उसी क्षण जोर का धक्का आता है। आप घायल हो जाते हैं। संसार में कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो जीवन की लम्बी दौड़ में प्रत्येक वस्तु देने, परित्याग करने के लिए बाध्य न हो। इस नियम के प्रतिकूल आचरण करने के लिए जो जितना ही प्रयत्न करता है वह अपने आपको उतना ही दुखी अनुभव करता है।

हमारी शोचनीय अवस्था का कारण यह है कि परित्याग करने का साहस हम नहीं करते इसी से हम दुखी हैं। ईंधन चला गया उसके बदले में हमें गर्मी मिलती है। सूर्य भगवान समुद्र से जल ग्रहण किया करते हैं उसे वर्षा के रूप में लौटाने के लिए आप ग्रहण करने और देने के यन्त्र हैं। आप ग्रहण करते हैं देने के लिए। इसलिए बदले में कुछ माँगिए नहीं। आप जितना भी देंगे, उतना ही लौटकर आपके पास आवेगा।

- स्वामी विवेकानन्द


ज्ञान का महत्व समझिए

जीवन की समस्त विकृतियों, अनुभव होने वाले सुख-दुख, उलझनों, अशान्ति आदि का बहुत कुछ, मूल कारण मनुष्य का अपना अज्ञान ही होता है। यही मनुष्य का परम शत्रु है। चाणक्य ने कहा है “अज्ञान के समान मनुष्य का और कोई दूसरा शत्रु नहीं हैं।” हितोपदेश में आया है :-

“आरम्भतेऽल्प मेवाज्ञाः कामं व्यग्रा भवन्ति च।”

“अज्ञानी लोग थोड़ा सा काम शुरू करते हैं किन्तु बहुत ज्यादा व्याकुल होते हैं” शेक्सपीयर ने लिखा है- “अज्ञान ही अन्धकार है।” प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो ने कहा है “अज्ञानी रहने से जन्म न लेना ही अच्छा है, क्योंकि अज्ञान ही समस्त विपत्तियों का मूल है।”

इस तरह अज्ञान जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है। यही जीवन की समस्त विकृतियों और कुरूपता का कारण है। कुरूपता का सम्बन्ध मनुष्य की शारीरिक बनावट से इतना नहीं है जितना अज्ञान और अविद्या से उत्पन्न होने वाली बुराइयों से। समस्त विकृतियों, बुराइयों, शारीरिक मानसिक अस्वस्थता का कारण अज्ञान और अविद्या ही है। सुख-सुविधापूर्ण जीवन बिताने के पर्याप्त साधन उपलब्ध होने पर भी कई लोग अपने अज्ञान और अविद्या के कारण सन्तप्त, उद्विग्नमना, अशान्त देखे जाते हैं। इसके विपरीत ज्ञान और विद्या के धनी सन्त, महात्मा ऋषि प्रवृत्ति के व्यक्ति सामान्य साधनों में, यहाँ तक कि अभावों में भी सुख-शान्ति सन्तोष का जीवन बिता लेते हैं। जीवन के सहज आनन्द को प्राप्त करते हैं।

अतः ज्ञान की उपलब्धि विद्यार्जन और अज्ञान का निवारण जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। ज्ञान संसार का सर्वोपरि उत्कृष्ट और पवित्र तत्व है।

न हि ज्ञानेन सद्वशं और पवित्र मिह विद्यते।

“इस संसार में ज्ञान के समान और कुछ भी पवित्र नहीं है।” (गीता)

“ज्ञान बहुमूल्य रत्नों से भी अधिक मूल्यवान है।”

ज्ञान ही जीवन का सार है, ज्ञान आत्मा का प्रकाश है, जो सदा एकरस और बन्धनों से मुक्त रहने वाला है।

सर डब्लू. टेम्पिल ने लिखा है - “ज्ञान ही मनुष्य का परम मित्र है और अज्ञान ही परम शत्रु है।” बेकन ने कहा है - “ज्ञान ही शक्ति है।”

इस तरह ज्ञान जीवन का सर्वोपरि तत्व है। ज्ञान, विद्या जीवन का बहुमूल्य धन है। सभी प्रकार की भौतिक सम्पत्तियाँ समय पर नष्ट हो जाती हैं किन्तु ज्ञान-धन हर स्थिति में मनुष्य के पास रहता है और दिनोंदिन विकास को प्राप्त करता है। ज्ञान अमोघ शक्ति है। जिसके समक्ष सभी इन्द्रियाँ निष्प्रभ हो जाती हैं। ज्ञान जीवन का प्रकाश बिन्दु है जो मनुष्य को सभी द्वन्द्वों, उलझनों, अन्धकारों की दीवारों से निकाल कर शाश्वत पथ पर अग्रसर करता है।

शुभाशुभ कर्मों से उत्पन्न होने वाले हर्ष-शोक, विक्षोभ, प्रसन्नता, मानसिक असन्तुलन मनुष्य के मन और शरीर में तीव्र प्रतिक्रिया पैदा करते हैं। हर्ष के प्रति आसक्ति, शोक से उत्पन्न होने वाली दुःखानुभूति दोनों ही मानव मन को मोहित कर उसे विवेकपूर्ण बना देते है और इसका परिणाम होता है गलत कार्य, गलत विद्या जिनका पर्ववसान दुख द्वन्द्व, क्लेश, शोक आदि में ही होता है। किन्तु ज्ञान का प्रकाश मनुष्य को इन दोनों ही प्रपंचों से मुक्तकर आत्मस्थिर, निस्पृह और मुक्त बना देता है। इसी तथ्य की पुष्टि करते हुए गीताकार ने लिखा है।

“यथैधाँसि” समिद्वोग्निर्भस्मसात्कुरुतेर्जुन।

ज्ञानाग्निः सर्व कर्माणि भस्मगात्कुरुते तथा॥”

“हे अर्जुन! जैसे प्रज्ज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मों को जलाकर नष्ट कर देती है।” ज्ञानी कर्म में लिप्त और आसक्त नहीं होता वरन् तटस्थ, निस्पृह, निष्काम भाव से अपने कर्त्तव्य में लगा रहता है। इसलिए वह कर्म बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

ज्ञान मनुष्य के चरित्र और व्यवहारिक जीवन को उत्कृष्ट बनाता है। ज्ञानी शुभ वीर्य, शुभाचरण करके अपने आन्तरिक बाह्य जीवन को पवित्र और उत्कृष्ट बना लेता है। महर्षि व्यास ने लिखा है-”ज्ञान जीवन के सत्य का दर्शन ही नहीं कराता वरन् वह मनुष्य को बोलना, व्यवहार करना सिखाता है।” सन्त बिनोवा भावे ने कहा है-”मनुष्य जितना ज्ञान में घुलता जाता है उतना ही वह कर्म के रंग में रंगता है। ज्ञानी अपने कर्मों को अधिक उत्कृष्टता के साथ कर सकता है बजाय एक अज्ञानी के ।” कर्म को पोषण देने वाला ज्ञान ही वस्तुतः सच्चा ज्ञान है। जो कर्म त्याग या अकर्मण्यता की ओर प्रेरित करे वह ज्ञान नहीं अज्ञान और अविद्या ही है।

ज्ञान का ध्येय सत्य है और सत्य ही आत्मा का लक्ष्य है। ज्ञान मनुष्य को सत्य के दर्शन कराता है। “बहूना जन्म नामन्ते ज्ञानवान् माम प्रपद्यते।” (गीता) अर्थात् बहुत जन्मों के अन्त में ज्ञानी ही मुझे पाता है।

स्वर्ग और नर्क मनुष्य के ज्ञान और अज्ञान का ही परिणाम है। ज्ञानी मनुष्य के लिए यह संसार स्वर्ग है। वह जहाँ भी रहता है स्वर्गीय वातावरण का सृजन कर लेता है तो अज्ञानी को पद-पद पर अपने दुष्कृत्य और कुविचारों के कारण नारकीय पीड़ाओं का सामना करना पड़ता है। इसीलिए अज्ञान से निकल कर ज्ञान प्रकाश को प्राप्त करने की प्रेरणा देते हुए वेद भगवान ने कहा है-

“आरोह तमसो ज्योतिः।”

“अज्ञानान्धकार से निकल कर ज्ञान प्रकाश की ओर बद़ो।”

“केतुँ कृण्वन्न केतवे पेशोमर्या आपेशसे। समुषद्भिरजायथाः॥”

“हे मनुष्यों! अज्ञानियों के लिए ज्ञान देते हुए, कुरूप को रूप देते हुए विद्यादि से प्रकाशित लोगों के साथ प्रसिद्धि प्राप्त करो।” इन शब्दों में मानव-जीवन के एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि जीवन में अज्ञान को हटकर ज्ञान की स्थापना की जाय और अपने अर्जित ज्ञान से उन लोगों को सहायता की जाय जिनका जीवन अज्ञान की विभीषिकाओं से कुरूप हो गया है और जो सदैव अपने आपको दुःखी पीड़ित असहाय महसूस करते हैं।

ज्ञान की साधना करना, और उसके अनुसार आचरण करना, अपने उपार्जित ज्ञान से दूसरों का मार्ग दर्शन करना ज्ञान-यज्ञ कहा गया है जिसे सर्वोत्कृष्ट बताते हुए गीताकार ने लिखा है-

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाऽज्ञान यज्ञः परंतप।

सर्व कर्मा खिलं पार्थ, जाने परिसमाप्यते।”

“हे परंतप! द्रव्यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि जितने भी कर्म हैं वे सब ज्ञान में ही समाप्त होते हैं। ज्ञानदान सर्वोपरि पुण्य है शुभ कार्य है।” पदार्थ, धन, सामग्री से किसी सीमा तक ही किसी की सहायता की जा सकती है और लेने वाला इनका दुरुपयोग करके उल्टी अपनी हानि भी कर सकता है। किन्तु ज्ञान-दान मनुष्य का स्थाई रूप से भला करता है उसे जीवन जीने से सहायक बनाता है। इसीलिए ज्ञानी को सबसे बड़ा, वृद्ध माना गया है चाहे वह कितनी ही उम्र का क्यों न हों।

नतेन स्थविरो भवति येनास्य पलितं शिरः।

बालोपि यः प्रजानिति तं देवा स्वविरं विदुः॥

(महर्षि व्यास)

“कोई सिर के बाल श्वेत होने से वृद्ध नहीं होता। बालक होकर भी यदि कोई ज्ञान सम्पन्न है तो वही वृद्ध माना जाता है।”

शास्त्रकारों, मनीषियों ने जिस ज्ञान और शिक्षा के संचय और प्रचार की आवश्यकता पर बल दिया है वह यह स्कूली-शिक्षा, दीक्षा नहीं है। इसे तो लौकिक जीवन को साधन सम्पन्न बनाने की दृष्टि से प्राप्त करना ही चाहिए। लोग अपने आप भी करते रहते हैं। इससे लौकिक आवश्यकताओं की ही एक अंश तक पूर्ति हो सकती है। पर अपनी आत्मा का कल्याण, आत्मतोष प्राप्त करने एवं दूसरों को अज्ञानान्धकार से छुड़ाकर सदाचार और शाँति के मार्ग पर ले चलने की शक्ति जिस ज्ञान में है वह लौकिक नहीं आध्यात्मिक ज्ञान है।

आत्मा की अमरता का, परमात्मा की न्यायशीलता का और मानव जीवन के कर्त्तव्यों की जिससे जानकारी प्राप्त होती हो और जिससे सुविचारों और दुष्कर्मों के प्रति घृणा एवं सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती हो, वही ज्ञान है। यह शिक्षा ऋषियों ने धर्मग्रन्थों के अक्षय भांडागारों में पर्याप्त मात्रा में भर कर अपने उत्तराधिकार के रूप में हमारे लिए छोड़ी है। इस धर्म ज्ञान का अधिकाधिक प्रसार करना प्रत्येक ज्ञानी का कर्त्तव्य है। जो स्वयं ऐसा नहीं कर सकते वे ज्ञान प्रसार साहित्य को जुटा के तथा अन्य तरह योग देकर सहायता कर सकते हैं।


अन्दर और भीतर की पवित्रता

पवित्रता, शुद्धता, स्वच्छता मानव-जीवन को ऊँचा उठाने के लिये एक महत्वपूर्ण सद्गुण है। अनेक लोग स्वच्छता अथवा सफाई का अर्थ केवल ऊपर की टीपटाप, आकर्षक शृंगार या बढ़िया फैशन बना लेना ही समझते हैं कुछ लोगों की दृष्टि में बढ़िया वस्त्र, आभूषण, प्रसाधन सामग्री का उपयोग करना सफाई और सौंदर्य का प्रमाण समझा जाता है। कुल लोग ऐसे भी हैं जो शरीर और वस्तुओं की अधिक सफाई सौंदर्य की वृद्धि आदि बातों को साँसारिक प्रपंच मानकर इनकी उपेक्षा करने में ही सफलता का अनुभव करते हैं। पर ये सभी दृष्टिकोण एकांगी हैं। यह हो सकता है कि कुछ लोग विलास-प्रियता का शृंगार के भाव से ही स्वच्छता और सफाई करते है यह भी हो सकता है कि अन्य लोग अपना वैभव, न प्रकट करने के दृष्टिकोण से सफाई पर ध्यान देते है। पर इससे स्वच्छता की प्रवृत्ति को अनावश्यक या अनुकरणीय नहीं माना जा सकता। वास्तव में स्वच्छता, एवं पवित्रता एक ही उच्च मनोवृत्ति के रूप हैं और दोनों का स्वस्थ, मन को प्रसन्न तथा आत्मा को शान्त करने में इनका बड़ा योग रहता है। बाह्य स्वच्छता और पवित्रता से अन्तःकरण की पवित्रता की भी वृद्धि होती है। मन में अशुद्ध भावों का उदय होना स्वयमेव कम पड़ता जाता है।

पवित्रता और स्वच्छता से मनुष्य की श्रेष्ठता अथवा सुखी होने का परिचय मिल जाता है। हमारे देश में ऐसे साधु पाये जाते हैं जो सब तरह से गन्दे और गन्दे काम करने में ही आध्यात्मिकता समझते हैं सर्वसाधारण भी उनको परम आत्मज्ञानी अवधूत आदि समझकर पूजनीय मान लेते हैं। पर यह उनका भ्रम या अज्ञान ही है। मनुष्य के विकास और आध्यात्मिकता का प्रमाण केवल ज्ञान और भक्ति की बातें करने से नहीं मिल सकता। मनुष्य जो कुछ कहता है उसका प्रमाण उसके व्यवहारिक जीवन से ही मिल सकता है। भक्ति तत्वज्ञान के नाम पर स्वच्छता को अनावश्यक बतलाते है, पर थोड़ी सी साँसारिक सामग्री या सम्पत्ति के लिये मरने मारने पर उतारू हो जाते है, अथवा किसी प्रकार का नीच कर्म करने लगते हैं, उनकी बात का विश्वास कौन कर सकता है?

संसार के लोग सुन्दरता के बड़े प्रेमी बनते हैं। क्या साधारण ग्रामीण और क्या नगर निवासी बाबूजी, सेठजी, और रईस, सभी सुन्दरता के प्रशंसक और चाहने वाले होते हैं। पर उनकी सुन्दरता की रुचि या कसौटी पृथक -पृथक होती है। तो भी एक बात सबको माननी पड़ती है कि सुन्दरता में स्वच्छता और निर्मलता का समावेश अवश्य होना चाहिए। ऐसा व्यक्ति शायद ही कोई होगा जो मलयुक्त वस्तु को सुन्दर बतलाता हो। इसी तथ्य को एक लेखक ने इन शब्दों में प्रकट किया है :-

“संसार में सभी सुन्दरता चाहते हैं। परन्तु वास्तविक सौंदर्य का ज्ञान तो किसी-किसी बुद्धिमान, विवेकी मानव को ही होता है। जो कुछ निर्मल है, निर्लिप्त है, हितकर है वही सुन्दर है। जो मलयुक्त है, दोषयुक्त है वही असुन्दर है। दोष के संग से सुन्दर भी असुन्दर बन जाता है और गुण के संग से असुन्दर भी सुन्दर लगने लग जाता है। जिस प्रकार सुन्दर वस्त्रों के संग से शरीर सुन्दर प्रतीत होता है और सुन्दर शरीर पर वस्त्राभूषण भी सजने लगते हैं, उसी प्रकार सुन्दर, मधुर शब्दों से वाणी सुन्दर होती है, सुन्दर भावों से मन सुन्दर बन जाता है, सुन्दर विचारों से बुद्धि सुन्दर होती है और अनन्त सौंदर्य निधि आत्मा-परमात्मा के संग से जीवात्मा सुन्दर होता हैं।”

वास्तविक सुन्दरता वही है जिससे मनुष्य का जीवन ही ऐसा सुन्दर बन जाय कि सब लोग उसकी तरफ आकर्षित हों, उसकी प्रशंसा करें और उससे प्रेम करने लगें पर ऐसी सुन्दरता तभी प्राप्त हो सकती है जब हमारा शरीर, मन, चरित्र, आचार-विचार आदि सब कुछ निर्मल और पवित्र हो। शारीरिक स्वच्छता और पवित्रता के बिना स्वास्थ्य का ठीक रह सकना सम्भव नहीं होता। जिस व्यक्ति का स्वास्थ्य गिरा हुआ रहेगा वह किसी भी साँसारिक कार्य में अच्छी सफलता न पा सकेगा। मन की शुद्धता के बिना मनुष्य सज्जनोचित व्यवहार नहीं कर सकता। संसार में सच्चे साथी, मित्र, हितैषी, सद्व्यवहार द्वारा ही मिल सकते है। स्वार्थी अथवा कपटी स्वभाव के मनुष्यों को कभी सच्चे मित्र नहीं मिल सकते और उनको अन्य सभी लोग दुर्जन और ठगने वाले ही दिखाई पड़ते हैं। चरित्र की पवित्रता से ही मनुष्य समाज में विश्वसनीय बनता है तथा अन्य लोग उसका सम्मान करते हैं। जिसके चरित्र पर दूसरे व्यक्तियों को सन्देह हो वह सब की निगाह में गिर जाता है और कभी सच्ची प्रतिष्ठा नहीं प्राप्त कर सकता।

सारांश यही है कि जिस प्रकार मनुष्य का अस्तित्व अन्योन्याश्रित है उसी प्रकार जीवन के विभिन्न अंग भी एक दूसरे से सम्बन्धित है। किसी एक विषय में उन्नति कर लेने से मानव-जीवन कभी सफल नहीं माना जा सकता। यदि केवल बाहरी सुन्दरता और रंग रूप को ही महत्वपूर्ण समझा जाय तो वह वेश्याओं में भी देखने में आता है, पर उनके जीवन को कौन प्रशंसनीय कह सकता है? इसी प्रकार स्वास्थ्य की निगाह से खूब मजबूत, तगड़े, शक्तिशाली, पहलवान, जिनका चरित्र यदि उत्तम नहीं होता और बोलचाल में भी अक्खड़पन प्रकट होता है कहाँ लोकप्रिय या सम्माननीय समझे जाते है। इसी प्रकार जो लोग पूजा-पाठ में विशेषकर लगे रहते हैं, पर जिनमें परोपकार, विनय, सज्जनता आदि गुणों का अभाव होता है, वे कैसे जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं? इसलिये हमको यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि मानव जीवन के अनेक पहलू हैं उन सभी की उन्नति करने से, उनको शुद्ध तथा पवित्र बनाकर ही हम अपने जीवन को वास्तव में सुन्दर, संसार के लिए उपयोगी, महत्वपूर्ण बना सकते हैं।

इस प्रकार के सर्वांगपूर्ण और सुन्दर जीवन की प्राप्ति तभी हो सकती है जब मनुष्य की आत्मा सुन्दर हो। यों प्रत्यक्ष में मनुष्य का शरीर भौतिक जान पड़ता है और अधिकाँश मनुष्य उसी को सब कुछ समझते भी हैं, पर वास्तव में मनुष्य एक आध्यात्मिक प्राणी है, और जब तक उसका अन्तरंग शुद्ध, पवित्र, सौंदर्यवान न होगा तब तक वह बाहरी दृष्टि से भी अपने जीवन को कदापि सुन्दर बनाने में समर्थ नहीं हो सकता। इसी तथ्य को समझकर भारत के प्राचीन मनीषियों ने मानव प्रकृति के तीन गुणों सात्विक, राजसिक और तामसिक की बड़े गम्भीर भाव से विवेचना की थी और प्रत्येक वस्तु, कार्य और मनुष्य की श्रेष्ठता अथवा निकृष्टता का आधार उसी में ढूंढ़ निकाला था। उनका कथन है कि प्राचीन संस्कारों, बाल्यावस्था के वातावरण और अपने व्यवहार तथा रुचि के द्वारा जिस मनुष्य की आत्मा का जैसा विकास होता है उसी के अनुसार उसे सफलता या असफलता प्राप्त होती है।

जिस मनुष्य ने अपना जीवन आलस्य, अकर्मण्यता में व्यतीत किया है, जिन उद्योग, परिश्रम, अध्यवसाय की रुचि नहीं है, जिनमें हरामखोरी, पराश्रित रहने की प्रवृत्ति ने जड़ जमा रही है, वह कभी श्रेष्ठ और सुन्दर जीवन प्राप्त करने की आशा नहीं रख सकता। चाहे भगवान ने जन्म से उसे सुन्दर शरीर दिया हो तो भी अपने आचरणों और गन्दे मनोविचारों के द्वारा वह उसे वीभत्स बना लेगा। ऐसे लोग सब जगह प्रायः तिरस्कार, लाँछना ओर अपमान ही पाते है और इसलिये उनकी दृष्टि में तमाम दुनिया ही दुःखपूर्ण, कुरूप, घृणा करने योग्य जान पड़ती है। फलतः वे स्वयं भी वैसे ही बनते चले जाते हैं। अन्तः और बाह्य मलीनता ऐसे लोगों में प्रत्यक्ष दिखलाई देती है, और उसके कारण वे सर्वत्र उपेक्षणीय और निकृष्ट ही सिद्ध होते हैं। ये मनुष्य तामसिक श्रेणी के होते हैं।

दूसरे राजसिक श्रेणी के मनुष्य साँसारिक दृष्टि से बहुत कुछ अग्रसर अथवा प्रगतिशील दिखाई पड़ते हैं। वे पर्याप्त परिश्रमी, क्रियाशील, हर तरह के उपायों से अपने उद्देश्य की पूर्ति करने वाले होते हैं। साथ ही वे शारीरिक सुखों के इच्छुक, तरह-तरह के शौकों में लगे हुये, स्वादिष्ट भोजन और सुन्दर वस्त्राभूषणों के प्रेमी भी होते हैं। इस कारण उनमें स्वार्थ की भावना प्रबल हो जाती है और वे तरह-तरह की चालों से काम लेने लग जाते हैं। ऐसे लोगों की दृष्टि में ईमानदारी या बेईमानी, सच्चाई या झूठ, उदारता या कठोरता, वास्तविकता या ढोंग आदि का कोई महत्व नहीं होता। जिस समय जिस उपाय से अपना स्वार्थ सिद्ध होता हो उसी से वे काम लेने को तैयार हो जाते है। यही कारण है कि ऐसे लोगों का जीवन अस्थिर होता है। कभी वे बड़े भद्र पुरुष जान पड़ते हैं, बड़ी सज्जनता की मीठी बातें करते है, और कभी स्थिति बदलते ही बड़े कठोर, अनुदार, लड़ाका और असभ्यता का व्यवहार करने वाले भी बन जाते है। इसका कारण यही है कि उनकी आत्मा का विकास बहुत कम हुआ होता है और वे इस संसार तथा इसके भौतिक पदार्थों को ही सबसे अधिक महत्व का समझते हैं। इसके फलस्वरूप ऐसे लोगों की बाह्य-सुन्दरता क्षणस्थायी और परिवर्तनशील बनी रहती है। उनकी स्वच्छता, शुद्धता, पवित्रता भी अधिकाँश में दिखावटी ही होती है और उसका वैसा ही परिणाम भी होता है।

इस दृष्टि से जीवन की स्थायी श्रेष्ठता, सच्ची सुन्दरता और वास्तविक उपयोगिता का मूल आधार सात्विक प्रकृति ही हो सकती है। ऐसे मनुष्य में जो शुद्धता, पवित्रता और निर्मलता की भावना होती है वह उसके आन्तरिक धर्म, कर्त्तव्य, आत्मोन्नति के विचारों द्वारा उत्पन्न होती है। वह केवल दिखाने के लिये ही सज्जनोचित व्यवहार नहीं करता वरन् उसके हृदय में दूसरे लोगों के लिये कल्याण-भावना होती है। वह केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये मधुर वाणी में सम्भाषण नहीं करता वरन् उसके भीतर दूसरों के लिये आत्म-भाव की भावना ही प्रबल रहती है। उसका बाह्य शौच, स्नान, ध्यान, व्यायाम, उचित आहार-विहार दिखावटी नहीं होते, वरन् ये उसकी आत्मिक पवित्रता, सत्यता से ही उत्पन्न होते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि चाहे आरम्भ में लोग ऐसे मनुष्य की तरफ आकर्षित न हों, पर धीरे-धीरे उसके गुण, उसका महत्व उनकी समझ में आता जाता है, और अन्त में वे उसके प्रशंसक, सम्मान करने वाले, उसका अनुकरण करने वाले बन जाते है।

इस प्रकार मानव-जीवन की सार्थकता-सफलता के लिये भीतरी और बाहरी दोनों प्रकार की सुन्दरता की आवश्यकता है। बाहरी सुन्दरता, श्रेष्ठता के बिना दुनिया जल्दी किसी का आदर-सम्मान नहीं करती और भीतरी उत्तमता के बिना बाहरी आकर्षण ज्यादा समय तक टिक नहीं सकता। इस प्रकार के भीतरी गुणों- दैवी स्वभाव के कारण बाहर से काले, कुरूप दिखाई पड़ने वाले व्यक्ति भी सुँदर बन जाते है, संसार उनकी तरफ बहुत अधिक आकर्षित हो जाता है। जिन महापुरुषों के नाम हम आज याद करते रहते है, जिनके उदाहरण देकर लोगों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जाती है, जिनकी पूजा और उपासना की जाती है, उनमें से बहुसंख्यक गोरे रंग के या नखशिख से बहुत सुँदर नहीं थे। कितने हों तो इस दृष्टि से कुरूप भी कहे जा सकते हैं। पर अपनी आत्मिक सुँदरता के कारण ये लोगों को सुँदर ही लगते थे और आज तक भी इसी कारण उनको स्मरण किया जाता है।

वास्तव में जिस मनुष्य की आत्मा शुद्ध होती है, जिसके विचार शुद्ध होते हैं, जिसका चरित्र पवित्र होता है, वह बाहर से भी कभी मलिन, गन्दा या अपवित्र नहीं रह सकता। उसकी शारीरिक स्वच्छता भी अन्य लोगों की अपेक्षा बढ़कर होती है और वह बाहर से भी वैसा ही स्वस्थ रहता है जैसा कि अन्तर में। चाहे वह अन्य दुनियादार लोगों की तरह बहुत अधिक शृंगार, फैशन, सजावट न करता हो, पर उसकी स्वच्छता, निर्मलता, सुन्दरता में सदैव एक पवित्रता की झलक दिखाई देती रहती है, जिससे लोगों की दृष्टि में उसका महत्व बहुत बढ़ जाता है।


उजड्ड ईर्ष्यालु

सुकरात ज्ञान चर्चा में लगे हुए थे कि एक उजड्ड ईर्ष्यालु ने उनकी पीठ पर लात मारी और वे औंधे मुँह गिर पड़े।

अपने को सँभाल कर सुकरात उठे और बात जहाँ से छूटी थी वहीं से फिर कहानी आरंभ कर दी।

अपमान का कुछ भी ख्याल न करते देख- उपस्थित लोगों ने कहा - इस दुष्ट को सजा क्यों न दी जाय?

सुकरात ने कहा- कोई गधा हमें लात मार दे तो क्या हमारे लिए यह शोभा की बात होगी कि हम भी उसे लात मारें ?


वाक्शक्ति का दुरुपयोग न करें

मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चरित्र का वर्णन करते हुए आदि कवि महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है “द्वि शरं नाभि झंवतें, रामों द्विरनाभि भापते” श्रीराम दो-बार बाण नहीं छोड़ते न दो-बार बोलते हैं। उनका एक ही बाण लक्ष्य को बेध डालता है इसलिए तो राम-बाण अचूक माना गया है। बाण की तरह ही राम का वचन भी एक ही होता है। एक बार कहा जाता है, उसी शब्द में काम पूरा हो जाता है अर्थात् एक बार कही हुई बात ही महत्वपूर्ण, तथ्यपरक, सही-सही होती है जिससे पुनः बोलने की आवश्यकता ही नहीं रहती।

वैज्ञानिक परीक्षणों से यह सिद्ध हो गया है कि शब्द की शक्ति अनन्त और महान् है। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि शब्द सम्पूर्ण शक्ति के साथ घनीभूत होकर निस्सृत होगा तो वह अपना दृश्य प्रभाव अवश्य ही पैदा करेगा। महर्षि वाल्मीकि में राम जन्म से कई वर्ष पूर्व रामायण लिखी किंतु बाद में राम ने उसी चरित्र का आचरण किया। महर्षि वशिष्ठ के शब्दों ने विश्वामित्र के हृदय की कालिमा, रागद्वेष को धोकर उन्हें ब्रह्मर्षि बना दिया ऋषियों की अमृत वाणी सुनकर क्रूर निर्दय डाकू भील महर्षि बन गये। महान् राजनीतिज्ञ, सर्वसमर्थ शक्तिमान श्रीकृष्ण को महासती गान्धारी के शाप वचनों से प्रभावित होकर अपने कुल को नष्ट होते हुए देखना पड़ा। जंगल के पशु की तरह शिकारी के हाथों मरना पड़ा। गुरु वचन से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के आख्यान भी कम नहीं है। वैदिक, पौराणिक, धार्मिक ऐतिहासिक आख्यानों में वरदान शाप आदि के असंख्यों उदाहरण भरे पड़े हैं। शस्त्र चूक सकता है। गोली का निशाना गलत हो सकता है क्योंकि वे स्थूल परिस्थितियों पर अधिक निर्भर होते है। किंतु शब्द की शक्ति अचूक होती है यदि वह ठीक-ठीक स्थिति में छोड़ा गया हो। शंकराचार्य, बुद्ध, राम, कृष्ण, गाँधी, दयानन्द आदि महापुरुषों के आह्वान पर असंख्यों लोग उमड़ पड़े थे। इनके शब्दों में वह जादू था कि लोग उसी के अनुरूप कार्य करने को विवश हो जाते थे।

दूसरी ओर ऐसे भी लोगों की बड़ी भारी भीड़ को देखा जा सकता है जो चिल्ला-चिल्लाकर पुकार-पुकार कर महत्वपूर्ण बाते कहते हैं, लम्बे-चौड़े व्याख्यान देते हैं, मानव समाज के उत्थान और कल्याण की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, किंतु अधिक दूर न जाकर उनके जीवन के निकटतम क्षेत्रों में भी कोई परिवर्तन नहीं हो पाता। इतना ही क्यों उनके व्यक्तिगत जीवन में भी वे तत्व दिखाई नहीं देते जिनके लिए वे कहते फिरते हैं, दूसरों को उपदेश देते हैं।

इसका प्रमुख कारण शब्द की शक्ति का ह्रास हो जाना है। बिना चेतना के शरीर यन्त्र बेकार होता है। ड्राइवर के अभाव में अच्छी से अच्छी मोटर भी यात्रा का प्रयोजन सिद्ध नहीं कर सकती। बिना ज्योति के तेलबाती-युक्त दीपक का कोई महत्व नहीं होता। ध्वनि-प्रेषक आकाशवाणी केंद्रों के अभाव में रेडियो का कोई महत्व नहीं रह जाता। बजाने की क्षमता के बिना अच्छे से अच्छा साज भी व्यर्थ है। बोलकर, लिखकर लोग अनेकों शब्द शृंखला व्यक्त करते है किंतु वे सर्वथा निर्जीव ही सिद्ध होती हैं, यदि उनके साथ शब्द में रहने वाली मूल शक्ति सन्निहित नहीं हो। भाषण, प्रवचन, उपदेश आदि में शब्दों की स्थूल प्रक्रिया जोड़ गाँठ, भयंकर रोमाँचकारी, मनोरंजक शब्दों का प्रयोग तो खूब हो किंतु शब्द के साथ रहने वाली आध्यात्मिक शक्ति, ओज, चैतन्य जीवन न हो तो उसका महत्व घुने हुए अनाज, चेतना रहित शरीर से अधिक नहीं होता जिसे लोग सुनने के बाद विस्मृति के गर्त में दफना देते हैं।

राकेट छोड़ने के लिए विशेष केन्द्र होते हैं, कारतूस भी छोड़ने के लिए लम्बी नली युक्त बन्दूक की आवश्यकता पड़ती है। राकेट को समतल जमीन पर रखकर यों ही छोड़ दिया जाय तो इससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा न लक्ष्य भेद ही। इसी तरह कारतूस को भी बिना बन्दूक के छोड़ देना कौतूहल मात्र बना रह जायगा। वरन् कभी तो हानि भी हो सकती है। ठीक इसी तरह शब्द का उच्चारण करने वाले केन्द्रों का भी उपयुक्त और महत्वपूर्ण होना आवश्यक है। इसके साथ ही शब्द भी शक्तिशाली, प्रभावकारी, उत्कृष्ट होने चाहिए। अपूर्ण राकेट, सड़ा गला कारतूस कितने ही अच्छे माध्यम से छोड़ा जाय उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा।

शब्द की शक्ति अल्प, निष्प्राण, कुँठित होने का एक प्रमुख कारण है उसका दुरुपयोग करना। बिना आवश्यकता के, बिना प्रसंग बोलना, जरूरत से अधिक बोलना, हर समय उल्टे-सीधे बकते रहना शब्द की शक्ति को नष्ट करना है। असंयम से कोई भी शक्ति क्षीण हो जाती है, निर्जीव और निष्प्राण बन जाती है। वाणी का असंयम ही शब्द शक्ति के कुँठित होने का एक बड़ा कारण है।

शब्द शक्ति को संग्रहीत करने, उसे घनीभूत बनाने के लिए मौन, मितभाषण का अवलम्बन लिया जाना चाहिए। ऋषि जीवन भर एक ही सूत्र अथवा मंत्र की साधना करता है और लम्बी साधना के बाद ब्रह्ममय शब्द की अपार शक्ति को अनुभूति कर उसका उद्घोष प्रथम बार वाणी से करता है। एक आज की स्थिति है कि मेले ठेले में, बाजार सड़कों पर सामान्य लोग ब्रह्मज्ञान और तत्वज्ञान की ऊंची-ऊंची बातें करते हैं। थोड़े बहुत पढ़-लिखकर या सुनकर अपने आपको विद्वान, ज्ञानी ध्यानी न जाने क्या-क्या समझने लग जाते हैं। स्टेज, माध्यमों में लोग बोलने की होड़ में व्यग्र रहते है। फलस्वरूप स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि लोगों को शब्दों के प्रति अविश्वास और संदेह होने लग गया है। कई लोग तो भाषण, प्रवचनकर्ताओं के नाम से ही चिढ़ते है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि शब्दों के अनावश्यक प्रयोग से आज हमारी शब्द शक्ति कुँठित, निर्जीव, निष्प्राण होती जा रही है। लोग अपनी स्वार्थ साधना, चालाकी, धूर्तता को छिपाने के लिये बड़े मीठे बोलते हैं। शब्दों के जाल में न मालूम क्या-क्या करते है। किस-किस को फँसाते हैं। किंतु इतना निश्चित है कि यह मनुष्य का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है। शब्द की शक्ति प्रतिष्ठा को नष्ट कर देना मनुष्य का बड़ा अहित है, जिसने एक गम्भीर समस्या खड़ी कर दी है। शब्द शक्ति के माध्यम से बोलचाल के द्वारा बड़े-बड़े काम, सहज की पूर्ण हो जाते हैं और बड़ी-बड़ी समस्याओं का समाधान भी। किंतु समाज में इसके सदुपयोग से शब्द शक्ति के प्रति अविश्वास संदेह घृणा पैदा हो जाना विघटन, द्वेष, संघर्ष को जन्म देता है। बातचीत की मर्यादा टूटने के बाद ही परस्पर प्रतिक्रिया संघर्ष याने हिंसा और ताकत का इस्तेमाल शुरू हो जाता है, जिसमें से विनाश की दावाग्नि फूट निकलती है। आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी बात कही जाय जो लंबे अनुभव ज्ञान की कसौटी पर खरी उतरी हो, सबके लिए उपयुक्त आवश्यक और मर्यादित हो उस सम्बन्ध में विचार सुलझे हुए हों तभी वह उपयोगी महत्वपूर्ण और हितकर सिद्ध हो सकेगी।

शब्द शक्ति के कुँठित होने का एक कारण उसे किसी निजी स्वार्थों से जोड़ देना भी है। आजकल विज्ञापन, प्रचार का युग कहा जाता है। प्रचार, विज्ञापन भी शब्द शक्ति के लिए एक महत्वपूर्ण माध्यम है, किसी तत्व को व्यापक बनाने के लिए इसकी आवश्यकता भी होती है। किन्तु जब वह किन्हीं स्वार्थ, निजी हितों एवं गलत दृष्टिकोण से ग्रस्त हो तो शब्द की शक्ति, महत्ता, प्रतिष्ठा को क्षीण कर देता है। आज व्यक्तिगत कार्य, व्यापार से लेकर दलगत संगठन के लिए प्रचार में विज्ञापन का आधार लिया जाता है और उसमें उल्टे-सीधे हथकण्डों को अपनाकर व्यक्तिगत या दलगत स्वार्थों की सिद्धि का मूल ध्येय भी रखा जाता है। किन्तु इससे शब्द की मूल प्रतिष्ठा शक्ति नष्ट होकर वह बाजारू बन जाता है। उससे किसी का कोई विशेष हित नहीं होता न लोगों पर अच्छा प्रभाव ही पड़ता है। यदि कुछ मानसिक उत्तेजना मिले तो वह अस्थायी और कौतूहलजनक ही होती है। इसके साथ ही संदेह, शंका आदि को पोषण मिलता है। समाज में विग्रह पैदा होता है। यही कारण है कि इस स्वार्थ भरी विज्ञापन-बाजी से समाज ऊबता जा रहा है, लोगों के दिल संदेहों से भर रहे हैं।

शब्दों में जीवन तभी होता है जब वे हृदय की अंतर्गुहा से आत्मा के संसर्ग से निस्सृत हो। शब्दों का और जीवन पद्धति का सुन्दर समन्वय हो। जो बात कही जाय पूरे दिल से कही जाय। वही बोला जाय जिसका प्रयोग जीवन में विवेक की कसौटी पर खरा उतर चुका है। उन शब्दों में फिर किसी को संदेह नहीं होगा। न उनके दो अर्थ ही निकलेंगे जिससे समाज में भ्रम शंका का वातावरण पैदा हो। शब्द की प्रतिष्ठा, शक्ति, जीवन इसी में निहित है।


इच्छा शक्ति की प्रचण्ड क्षमता

जीवन की सफलता-असफलता, उत्कर्ष, अपकर्ष, उन्नति, अवनति, उत्थान-पतन सब मनुष्य की इच्छाशक्ति की सबलता और निर्बलता के ही परिणाम हैं। सबल, दृढ़ इच्छा शक्ति सम्पन्न लोगों को अभद्र, विचार, कुकल्पनायें, भयानक परिस्थितियाँ उलझने भी विचलित नहीं कर सकती। वे अपने निश्चय पर दृढ़ रहते हैं। उनके विचार स्थिर और निश्चित होते हैं। उन्हें बार-बार नहीं बदलते। प्रबल इच्छाशक्ति से शारीरिक कष्ट भी उन्हें अस्थिर नहीं कर सकते। ऐसे व्यक्ति हर परिस्थितियों में अपना रास्ता निकाल कर आगे बढ़ते रहते हैं। अपने व्यक्तिगत हानि लाभ से भी प्रभावित नहीं होते।

दृढ़ इच्छाशक्ति मानसिक क्षेत्र का वह दुर्ग है जिसमें किसी भी बाह्य परिस्थिति, कल्पना, कुविचारों का प्रभाव नहीं हो सकता। दृढ़ इच्छाशक्ति सम्पन्न व्यक्ति जीवन के भयंकर झंझावातों में भी अजेय चट्टान की तरह अटल और स्थिर रहता है। ऐसा मनुष्य सदैव प्रसन्न और शान्त रहता है। जीवन का सुख स्वास्थ्य, सौंदर्य, प्रसन्नता, शान्ति उसके साथ रहते हैं।

पितामह भीष्म अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर सारे शरीर के बाणों से छिदे रहने पर भी छह माह तक शरशैय्या पर पड़े रहे और चेतन बने रहे। दूसरे इस तरह के व्यक्ति भी होते हैं जो अपने तनिक से घाव-चोट में चिल्लाने लगते हैं, बेहोश हो जाते हैं कई तो भय के कारण मर तक जाते हैं। सत्यव्रती हरिश्चन्द्र अपने जीवन की कठिन परिस्थितियों की परीक्षा की घड़ी में अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के कारण ही निभा सके थे। दूसरी ओर कई लोग जीवन की सामान्य सी परिस्थितियों में रो देते हैं। हार बैठते हैं। जीवन की सम्भावनाओं का अन्त कर डालते हैं।

महाराणा प्रताप जिन्होंने वर्षों जंगलों की खोहों में जीवन बिताया, बच्चों सहित नंगे भूखे प्यासे भटकते रहे, किन्तु इसके बावजूद भी दृढ़ इच्छाशक्ति के सहारे वह अजेय वीर शक्तिशाली मुगल सल्तनत को चुनौती देता रहा और झुका नहीं। थोड़ी ही संख्या में दुबले पतले क्रान्तिकारियों ने भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन को जो तूल दिया और विश्व-व्यापी ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी वह उन वीरों की दृढ़ इच्छा शक्ति का ही परिणाम था। फाँसी की सजा सुनने पर भी जिनका वजन बढ़ा, फाँसी के तख्ते पर पहुँचकर जिन्होंने अपनी मुस्कराहट से मौत के भावयुक्त स्वाँग का गर्व चूर कर दिया, यह सब उनकी दृढ़ इच्छा शक्ति की ही करामात थी।

संसार में जितने भी महान कार्य हुए, वे मनुष्य की प्रबल इच्छाशक्ति का संयोग पाकर ही हुए। दृढ़ इच्छाशक्ति सम्पन्न व्यक्ति ही महान कार्यों का संचालन करता है। वहीं नवसृजन, नवनिर्माण, नवचेतना का शुभारम्भ करता है। अपने और दूसरों के कल्याण विकास एवं उत्थान का मार्ग खोजता है।

निर्बल इच्छाशक्ति वाले मनुष्य अपने या दूसरों के लिए कोई उपयोगी कार्य नहीं कर सकते। ऐसे लोगों के मन में अनेकों सन्देह, कुकल्पनायें, कुविचार पैदा होने लगते हैं। उनके निश्चय बार-बार बदलते हैं। एक काम को अधूरा छोड़कर, दूसरे को हाथ में लेते हैं फिर दूसरे को छोड़कर तीसरे को करने लगते हैं। छोटी-छोटी कठिनाइयों में उलझ कर ही परेशान होने लगते हैं। निर्बल इच्छाशक्ति से अपने और दूसरों के अकल्याण की भावनाएं निर्बाध गति से आने-जाने लगती है। परीक्षा में बैठने पर असफलता का भय सताने लगता है। व्यापार करने पर घाटे के भय से चिन्तित एवं परेशान होने लगते हैं। अंधेरे में चलने पर भूत, चोर, गुण्डे का डर खाने लगता है। घर में कोई बीमार पड़ जाय तो सोचा जाता है कही मर नहीं जाय। इस तरह दुर्बल इच्छाशक्ति के कारण मनुष्य तरह-तरह की आशंका, शंका कल्पित भय, चिता परेशानियों से परेशान दुखी उद्विग्न एवं अशान्त रहता है। हीन भावनाओं से ग्रस्त हो निराशा, अवसाद, ईर्ष्या, घृणा, द्वेष से युक्त हो जाता है।

इच्छाशक्ति की दुर्बलता से कई लोग अपने आपको कल्पित रोगों से त्रस्त समझकर परेशान होने लगते हैं। और हर उपचार में कोई न कोई मीनमेख निकालते हैं। रोग घट रहा हो तो भी उन्हें कही फिर न बढ़ जाय यह डर लगा रहता है। यदि परीक्षण किया जाय तो वास्तविक रोगियों की संख्या कम मिलेगी और इस तरह के कल्पित रोगों से ग्रस्त लोग अधिक मिलेंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि इच्छा शक्ति की दुर्बलता से आज कल प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को किसी न किसी रोग से ग्रस्त ही समझता हैं। कई तो इतने परेशान रहते हैं मानो वे किसी भयंकर रोग से पीड़ित हैं और वस्तुतः बात ऐसी नहीं होती। दृढ़ इच्छाशक्ति के सहारे बड़े-बड़े रोगों के आक्रमण में से भी बचा जा सकता है और अपने स्वास्थ्य को सुरक्षित रखा जा सकता है।

मनुष्य के सभी विचार भाव क्रिया स्वयं उसी तक सीमित नहीं रहते। इनका प्रभाव समस्त वातावरण पर भी पड़ता है। रेडियो-स्टेशन के ट्रान्समीटर से छोड़ी हुई ध्वनि तरंगें सर्वत्र फैल जाती हैं ठीक इसी तरह व्यक्ति के क्रिया-कलाप, हाव-भावों का भी प्रसार होकर वातावरण पर प्रभाव पड़ता है। ये संक्रामक होते हैं और दृश्य या अदृश्य रूप में एक व्यक्ति से चलकर दूसरों तक फैल जाते हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति सम्पन्न व्यक्ति जिस समाज में होंगे वह समाज भी शक्तिशाली, दृढ़ और महत्वपूर्ण होगा। कायर डरपोक, दुर्बल इच्छाशक्ति वाले व्यक्ति समाज में अपनी दुर्बलताओं का संचार करते हैं।

नेपोलियन बोनापार्ट के सिपाही अपने आपको नेपोलियन समझकर लड़ते थे। प्रत्येक सिपाही में नेपोलियन की इच्छाशक्ति काम करती थी। नेता जी सुभाषचन्द्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिन्द फौज के तनिक से सैनिकों ने हथेली पर जान रखकर अंग्रेजी शासन से लड़ाई की। लोकमान्य तिलक ने भारत वर्ष को स्वराज्य मन्त्र की दीक्षा दी- “स्वतन्त्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर रहेंगे।” और यही नारा प्रत्येक भारतीय का प्रेरक मन्त्र बन गया। एक दिन इसी मन्त्र ने हमें स्वतन्त्रता रूपी सिद्धि प्रदान की। यह मन्त्र कोई शाब्दिक व्याख्या मात्र नहीं था वरन् इसमें तिलक की दृढ़ इच्छाशक्ति का अपार चैतन्य सन्निहित था। मनुष्य की इच्छाशक्ति का प्रभाव चेतन जगत पर ही नहीं वरन् अचेतन पदार्थों पर भी पड़ता है। अपनी इच्छाशक्ति के बल पर ही मनुष्य पत्थर, धातु आदि की मूर्ति में भगवान का साक्षात्कार करता है। प्रबल इच्छाशक्ति के द्वारा मनुष्य जड़ चेतन, प्रकृति को भी प्रभावित कर सकता है।

निर्बल इच्छा शक्ति वाले व्यक्ति समाज में भीरुता, कायरता, सन्देह, कुकल्पनाओं का संचार करते हैं। जिस देश के कर्णधार नेताओं की इच्छाशक्ति दुर्बल होगी तो वह वहाँ तक की प्रशासनिक मशीनरी और फिर जनता तक में फैल जायगी। जैसे अपने बारे में अहितकर बातें सोचने पर दुष्परिणाम पैदा होते हैं उसी तरह जिसके लिए बुरी बात सोची जायगी वह भी बुराई से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। यदि उसकी इच्छाशक्ति दुर्बल होगी तो वह सहज ही दूसरे द्वारा कुकल्पित दुर्भावनाओं का शिकार हो जायेगा। भूतों के भय से डरने वाले अपने संक्रामक विचारों से दूसरों में भी भूत के भय की भावना पैदा कर देते हैं। घृणा करने वाले दूसरों में भी घृणित विचारों का प्रसार कर देते हैं। लड़ाई के मैदान से भाग जाने वाला एक सिपाही कई सिपाहियों में मैदान छोड़ने की भावना पैदा कर देता है। इच्छाशक्ति की दुर्बलता भी उतनी ही संक्रामक है जितनी सबलता। जहाँ सबल इच्छाशक्ति के व्यक्तियों का बाहुल्य होगा वह समाज उन्नति-प्रगति की ओर सहज ही उठ जायेगा। जहाँ दुर्बल इच्छाशक्ति के लोग होंगे वह समाज पतन की ओर भी अग्रसर हो जायेगा।

हमें अपनी इच्छाशक्ति बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। साहस और धैर्य का अभ्यास करने से बड़ी बड़ी कठिनाइयाँ भी सहज हो जाती हैं और पराक्रमी व्यक्ति आसानी से उन पर विजय प्राप्त कर लेते है। भीरु पुरुष तो कठिनाइयों में जितने त्रस्त होते है उससे अधिक उनकी आन्तरिक दुर्बलता ही कष्ट देती रहती है। मानव जीवन में दृढ़ इच्छाशक्ति एक अत्यन्त मूल्यवान सम्पत्ति है और इसे हम अधिकाधिक मात्रा में सम्पादित करें यही उचित है।


हम एकता की ओर बढ़ें

अनेकता में एकता देखने की हमारी साँस्कृतिक उदारता दार्शनिक दृष्टि से सराहनीय ही मानी जा सकती है। परस्पर भारी मतभेद रखने वाले, यहाँ तक कि घोर मतभेद रखने वाले सम्प्रदाय और धर्म प्रचारक भी यहाँ अपना-अपना काम शान्तिपूर्वक करते रहे हैं और कर रहे हैं। अपनी इस विशेषता को कायम रखते हुए भी हमें यह ध्यान रखना ही होगा कि कोई समाज उतना ही संगठित रह सकता है जितनी कि उसमें एकता हो। भिन्नताएं जितनी ही बढ़ेंगी उतनी ही विश्रृंखलता उत्पन्न होगी। संसार के इतिहास पर दृष्टिपात करने से यही प्रतीत होता है कि भाषा, भेष और भाव की एकता ही लोगों को एक संगठन सूत्र में बाँध रही है। जहाँ जितनी भिन्नता बढ़ी है वहाँ उतना ही विघटन हुआ है। दार्शनिक दृष्टि से भिन्नता में एकता देखना एक प्रशंसनीय उदारता मानी जा सकती है पर सामाजिक दृष्टि से, मानवीय मनोविज्ञान की दृष्टि से विचार करने पर यही मानना पड़ेगा कि भिन्नता एक हद तक ही उपयोगी हो सकती है। यदि उसका विस्तार बढ़ेगा तो निश्चित रूप से विसंगठन ही बढ़ेगा और ऐसा समाज कभी भी सशक्त न हो सकेगा। विचार भिन्नता के कारण परस्पर उपेक्षा बढ़ेगी और अनैक्य एवं विरोध की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगेंगी।

भारतीय धर्म की उदारता ने अनेकता को जो छूट दी थी उसका व्यतिक्रम होने से हमें भारी सामाजिक क्षति उठानी पड़ी है। धर्म, सम्प्रदाय एवं जाति-पाति के नाम पर हमारा इतना विघटन हुआ है कि कई बार तो हिन्दू समाज को एक समाज मानने तक में संकोच होने लगता है। संसार के अन्य देशों पर दृष्टिपात करने से उनकी आन्तरिक एकता को बनाये रहने में कुछ मूलभूत तथ्य काम करते दीखते हैं। भाषा, भेष और भाव के बन्धनों में बंधे रहकर ही वे एकता का मधुर फल प्राप्त कर सकने में समर्थ हो रहे हैं। योरोपियन लोगों की एक ही पोशाक है। कोट, पेन्ट, टाई, टोप पहने ही सब लोग दिखाई पड़ेंगे। यों सिलाई में थोड़ा फर्क हो सकता है पर मोटे तौर पर सबकी पोशाक एक–सी होगी । रोमन लिपि और अंग्रेजी भाषा ने पृथ्वी के एक बड़े क्षेत्र को एकता के सूत्र में बाँधा है। ईसाई धर्म, बाइबिल, गिरजा, बपतिस्मा और ईश्वर पुत्र ईसा की मान्यता ने संसार के आधे भाग को जातीय भावनाओं में आबद्ध करके उनमें एकता और संगठन की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं।

इस्लामी संस्कृति की यही अपनी विशेषता है और उनकी धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताएं एक–सी होने के कारण संसार भर में जहाँ कहीं भी इस प्रकार के लोग है भ्रातृ भाव का उत्साह अनुभव करते हैं। चीन, रूस, जापान आदि प्रगतिशील राष्ट्रों में भी वहाँ की एकता का कारण तलाश करने पर यही तत्व काम करते दिखाई पड़ते हैं। भारत का जातीय विसंगठन उस भिन्नता के कारण हुआ जो उसके भीतर धर्म, सम्प्रदाय, जाति-पाति एवं पूजा पद्धतियों की भिन्नता के कारण पैदा हुई । दार्शनिक दृष्टि से यह भिन्नता भले ही उदारता का चिन्ह मानी जाय पर सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह हेय और हानिकारक ही सिद्ध होती है। ‘अति’ हर बात की बुरी होती है। विचार भिन्नता के, रुचि भिन्नता के आधार पर यदि सब लोग मनमानी करने लगें तो फिर एकता का स्थिर रह सकना कभी भी संभव न होगा।

पिछले एक हजार वर्ष का दुःखद इतिहास इसी तथ्य का प्रतिपादन करता है। मुसलमान और योरोपियन आक्रमणकारियों की संख्या बहुत थोड़ी थी। इतने बड़े देश में मुट्ठी भर आक्रमणकारियों की जादू जैसी सफलता का श्रेय हमारी आन्तरिक विसंगठनकारी प्रवृत्तियों को ही है। आक्रमणकारियों ने जिस राज्य पर हमला किया दूसरे लोग अपने सम्प्रदाय जाति या उपास्य की भिन्नता के कारण उस विजित की पराजय पर हर्ष मनाते रहे, उपेक्षा करते रहे। इसी क्रम से एक -एक करके सब राज्य विदेशी गुलामी के चंगुल से जकड़ते चले गये। नृशंस अत्याचारों को खून के आँसू पी-पीकर लोग देखते सहते रहे, पर संगठित प्रतिरोध की कोई व्यवस्था न हो सकी। भावनात्मक दृष्टि से विसंगठित राष्ट्र भला कर भी क्या सकता था, उसकी दुर्बलता स्वाभाविक थी। दुर्बल के सामने पराजित होने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं होता। मुसलमानी आक्रमणकारियों को उनकी सशक्तता ने नहीं, यहाँ की फूट और विश्रृंखलता ने सफलता की जयमाला पहनाई।

अंग्रेज, पुर्तगाली, फ्राँसीसी यहाँ व्यापारी बन कर आये थे। यहाँ की विविधता में उनने फूट को परखा और केवल कुटिलता के आधार पर इतने बड़े देश को चुटकी बजाते जितनी देर में हड़प लिया। धन्यवाद भगवान को इसी बात का है कि उसने जातीयता की चेतना दी और जब गाँधी जी ने संगठित राष्ट्र के रूप में यहाँ की जनता को खड़ा कर दिया तो उस एकता की शक्ति ने ही गुलामी से मुक्ति दिलाने का वातावरण बनाया। यदि उस प्रकार की चेतना उत्पन्न न हुई होती तो कौन जाने कितनी शताब्दियों तक हमें पराधीनता के बन्धनों में बँधा रहना पड़ता।

राजनैतिक स्वतन्त्रता का भी अपना महत्व है पर उसका वास्तविक लाभ उसी समाज को मिल सकता है जो आन्तरिक दृष्टि से सशक्त हों। सशक्तता का सर्वोपरि माध्यम एकता ही तो है। जिन लोगों में एकता होगी वे ही सशक्त होंगे जिनके भीतरी मतभेद बड़े-चढ़े होंगे, जिन्हें प्रेम और भ्रातृत्व पैदा करने वाले तत्वों की कमी का सामना करना पड़ रहा होगा वे धन, शस्त्र, व्यापार, उद्योग, शिक्षा आदि क्षेत्रों में कितने ही बढ़े चढ़े क्यों न हो जातीय दृष्टि से दुर्बल ही रहेंगे और यह दुर्बलता किसी छोटी सी कठिनाई के आने पर ही फिर गुलामी में परिणत हो सकती है।

इस युग में संगठन को ही शक्ति माना गया है और संगठन का तत्व ज्ञान यही है कि वह समान गुण धर्म वाले पदार्थों या मनुष्यों में संभव होता है। जिन्हें एकता का महत्व विदित है, जो एकता की शक्ति को जानते हैं और उसकी आवश्यकता अनुभव करते हैं उन्हें इस बात का प्रयत्न करना चाहिए कि भिन्नता उत्पन्न करने वाले तत्वों को जितना घटाया जा सकता हो घटाया जाय और समानता एवं एकता उत्पन्न करने वाली संभावनाओं को जितना बढ़ाया जा सकता हो उतना बढ़ाया जाय।

परस्पर प्रेम, सद्भाव, उदारता आदि आध्यात्मिक गुणों के कारण ही सच्ची एकता संभव होती है। इसलिए गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से जन मानस को ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ की ओर अग्रसर किया जाना चाहिए साथ ही यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक परिस्थितियाँ भी एकता में सहायता करने वाली ही उत्पन्न की जायें। भिन्नता का बाह्य वातावरण आन्तरिक एकता में सहायक नहीं बाधक ही सिद्ध होता है। भाषा-भेष-भाव की एकता बाहरी ही क्यों न कही जाय आन्तरिक एकता में बहुत सहायता पहुँचाती है। जातिवाद, भाषावाद, शान्तिवाद सम्प्रदायवाद का जो विकृत रूप आज देखा जाता है उसके मूल में भी समान लोगों का एकताबद्ध होकर दूसरे प्रकार के लोगों के साथ पक्षपात करने की नीति ही पाई जाती है पक्षपात की नीति की हमें निन्दा करनी चाहिए पर साथ ही मानव स्वभाव की इस विशेषता को भी समझ लेना चाहिए कि बाह्य समानता भी लोगों को परस्पर समीप लाने में बहुत सहायक होती है। अनेक भिन्नताएं होते हुए भी लोग जाति, भाषा, प्रान्त आदि के नाम पर जब गुटबन्दी कर लेते हैं तो इन तथ्यों को व्यापक बनाने पर व्यापक संगठन की संभावना क्यों न बनेगी?

अपना देश लम्बी गुलामी के बाद राजनैतिक स्वतन्त्रता प्राप्त करने में समर्थ हुआ है। प्रगति की ओर अनेक दिशाओं में अग्रसर होने का कार्य करना शेष है। इसके लिए आवश्यक शक्ति का संचय करते हुए यह ध्यान रखना ही चाहिए कि बाह्य साधनों की नहीं आन्तरिक एकता और पुरुषार्थ की प्रवृत्ति ही सर्वोपरि साधन हो सकती है, इसके बिना बाह्य उपकरणों के होते हुए भी भीतरी दुर्बलता के कारण प्रगति का कार्य अवरुद्ध ही बना रहेगा। परिश्रम और कल्पनापूर्वक बनाई गई योजनाएं भी सफल न हो सकेगी।

भारतीय राष्ट्र को एकता और समानता के लिए प्राणपण में प्रयत्न करना चाहिए। लोग अपनी प्रान्तीय और क्षेत्रीय भाषाओं का प्रसन्नतापूर्वक उपयोग करे पर राष्ट्र भाषा हिन्दी का प्रचलन अधिकाधिक बढ़ाने का भी ध्यान रखा जाय। कट्टरपंथी और संकीर्णता से दायरा छोटा रह जाता है। उदारता और व्यापकता को अपनाने से ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का लक्ष्य पूरा होगा। माया के माध्यम से ही हम सोचते-विचारते, विचारों का आदान-प्रदान करते और एक दूसरे को समझने में समर्थ होते हैं। एक राष्ट्र या एक समाज की दृढ़ता का महत्व मानने वालों को भाषा की एकता के लिए भी तेजी से कदम बढ़ाने होंगे। भारत का प्रत्येक नागरिक राष्ट्र भाषा हिन्दी को भली प्रकार बोल और समझ सके इसके लिए जो भी प्रयत्न संभव हो उन्हें करना चाहिए। सरकारी और गैर सरकारी दोनों ही प्रकार के प्रयत्न इस दिशा में किये जायें इसकी आज भारी आवश्यकता है।

राष्ट्रीय पोशाक जो यहीं की परम्पराओं के उपर्युक्त हो, धोती, कुर्ता, ऊपर से जवाहरकट या बन्द गले का कोट यही उपर्युक्त रह सकती है। जलवायु या परम्परा का ध्यान रखे बिना जल्दबाजी में कोई पोशाक राष्ट्रीय घोषित कर देने से उसका प्रचलन नहीं हो सकता। सरकार ने चूड़ीदार पाजामा और अचकन, शेरवानी को राष्ट्रीय पोशाक माना है। सरकारी कामों में उसका प्रयोग होता भी है। पर जन-मानस में वह अभी तक उतर नहीं सकी है। कारण कि भारतीय परम्पराओं और जलवायु का उसमें समुचित ध्यान नहीं रखा गया है। यह जन रुचि एवं भावनाओं का प्रश्न है इसका समाधान भी इसी आधार पर किया जा सकता है। विभिन्न प्रान्तों में जो अलग-अलग प्रकार की पोशाकें पहनी जाती हैं, उस अनेकता को धीरे-धीरे कम करना चाहिए और समानता के महत्व को समझना चाहिए। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता रहने से उनका निर्माण महंगा पड़ता है और शक्ति एवं साधनों का अनावश्यक अपव्यय होता है। वस्त्र, आभूषण, बर्तन आदि में समता रहे तो निर्माण कार्य व्यापक होने से सस्ता पड़ेगा और भावनात्मक एकता भी स्पष्ट बढ़ेगी।

भावनाओं में आध्यात्मिकता का अधिकाधिक समावेश होना चाहिए। संयम, सदाचार, पुरुषार्थ, श्रमशीलता, मधुरता, स्वच्छता, कर्त्तव्यनिष्ठा, समय का पालन, क्रियात्मकता, उदारता, शिष्टता जैसे सद्गुणों को हमारी भावनाओं में समुचित स्थान मिलना चाहिए। यही आध्यात्मिक गुण मनुष्य जाति के विकास में सच्ची सहायता कर सकते हैं। स्वार्थपरता और दुष्टता, आलस्य और असंयम का दोष किसी सशक्त राष्ट्र को भी अपंग बना सकता है फिर हम पिछड़ी स्थिति के लोगों के लिए तो यह नितांत आवश्यक है कि सहिष्णुता, सज्जनता, सामूहिकता एवं सहयोग भावना का अधिकाधिक विकास होता चले। मतभेदों को सुलझाने के लिए विचार-विनिमय, मध्यस्थता एवं पंच निर्णय जैसे महकमों को अपनाया जाय। सामाजिक रीति-रिवाजों में समानता उत्पन्न की जाय। कुछ दिन पहले विभिन्न देहातों में, प्रान्त एवं क्षेत्रों में तोल के बाँट अलग-अलग थे, कच्ची तोल, पक्का तोल के अनेक मापदण्ड प्रचलित थे। उनमें असुविधा ही रहती थी। अब जबकि हर जगह एक सी तोल नाप हो गई है तो उससे सुविधा ही रहती है। ईसाई, मुसलमान, बौद्ध आदि प्रधान धर्मों के अनुयायी प्रायः एक से ही रीति-रिवाज मानते हैं। देशों की अपनी-अपनी परम्पराएं भी एक-सी हैं। भारतवर्ष इसका अपवाद है, यहाँ इतनी अधिक भिन्नता युक्त प्रथा परम्पराएं प्रचलित हैं कि उनके कारण एकता में भारी बाधा पहुँचती है। हमें यह भी प्रयत्न करना चाहिए कि धार्मिक एवं सामाजिक मान्यताओं और प्रथा परम्पराओं में प्रचलित असमानताएं दूर करके समानता की ओर बढ़ा जाय। कुरीतियों का शमन और शोधन किया जाय। इस सम्बन्ध में धर्म पुरोहित एवं गुरुजन आदि दूरदर्शिता से काम लें तो परस्पर विचार-विनिमय द्वारा जातीय एकता का मार्ग बड़ी आसानी से प्रशस्त कर सकते हैं।

पूजा, उपासना, एवं कर्म-काण्ड, दर्शन, धर्म ग्रन्थ आदि की समानता भी जातीय एकता की दृष्टि से आवश्यक है। इनमें भिन्नता रहने से जातीयता की भावना दुर्बल होती है। मुसलमान और ईसाई धर्मों की शक्ति उनकी धार्मिक एकरूपता में सन्निहित है। एक पैगम्बर एक प्रकार का ईश्वर, एक धर्म-ग्रन्थ एक दर्शन, एक संहिता होने से थोड़े ही समय में इन धर्मों ने संसार में अपना भारी प्रभाव बढ़ाया है। हिन्दू धर्म की भिन्नताएं उनके अनुयायियों में भी अश्रद्धा एवं उपेक्षा की भावनाएं उत्पन्न कर रही है। नई पीढ़ी उन्हें ढोंग मानने लगी है और शिखा सूत्र जैसे आवश्यक प्रतीकों का भी परित्याग कर रही है, जबकि मुसलिम धर्म में सुन्नत जैसी कष्टकर प्रथा भी सहर्ष सर्वत्र श्रद्धापूर्वक अपनाई जाती है। सिक्ख धर्म के अनुयायी पंच केश रखने में अपना सौंदर्य नष्ट हुआ नहीं समझते पर हिन्दू के लिए चोटी के चार बाल रखना भी भारी पड़ता है। इसका दोष युवकों का नहीं उस विश्रृंखलता एवं अव्यवस्था का है जिसके कारण हिन्दू धर्म का कोई एक रूप नहीं बन पाता और उसकी मान्यताओं को बुद्धिवादी ढंग से समझना या समझाया जाना संभव नहीं होता।


Quotation

न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत्।

यं तु रक्षितु मिच्छन्ति बुद्धया संविभजन्तितम्॥

विदुर नीति 3। 40

देवता लोग किसी की रक्षा के लिए ग्वाले के समान लाठी लिए पीछे नहीं घूमते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते है उसे उत्तम बुद्धि दे देते हैं।

सशक्त समाज एवं राष्ट्र के रूप में अपने को परिणत देखने की आकाँक्षा करने वाले प्रत्येक देशभक्त एवं धर्म प्रेमी के लिए यह आवश्यक है कि इन त्रुटियों पर विचार करे, उनके कारण होने वाली क्षति को समझे और नव निर्माण के लिए कुछ करने की आवश्यकता अनुभव करे। वर्तमान स्थिति को ज्यों की त्यों बनाये रखकर हम प्रगति की ओर बढ़ न सकेंगे। मार्ग के रोड़ों को हटाये बिना और कोई गति नहीं। इसके लिए उपाय सोचना और उसे कार्यान्वित करने के लिए अग्रसर होना नितांत आवश्यक है। इस आवश्यकता की पूर्ति आज के प्रबुद्ध एवं विचारशील लोगों को ही करनी पड़ेगी।


स्वाध्याय-आत्मा का भोजन

मानव जीवन को सुखी, समुन्नत और सुसंस्कारी बनाने के लिये सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करना अत्यन्त आवश्यक है। स्वाध्याय मानव जीवन का सच्चा सुहृद एवं आत्मा का भोजन है। स्वाध्याय से हमें जीवन को आदर्श बनाने की सद्प्रेरणा मिलती है। स्वाध्याय हमारे जीवन विषयक सारी समस्याओं की कुञ्जी है। स्वाध्याय हमारे चरित्र-निर्माण में सहायक बनकर हमें प्रभु प्राप्ति की ओर अग्रसर करता है। स्वाध्याय स्वर्ग का द्वार और मुक्ति का सोपान है।

संसार में जितने भी महापुरुष, वैज्ञानिक, सन्त महात्मा, ऋषि, महर्षि आदि हुए हैं, वे सभी स्वाध्यायशील थे। स्वाध्याय का अर्थ सत्साहित्य एवं वेद, उपनिषद्, गीता आदि आर्ष-ग्रन्थ तथा महापुरुषों के जीवन वृत्तान्तों का अध्ययन तथा मनन करना है। कुछ भी पढ़ा जाय उसे स्वाध्याय नहीं कहा जा सकता। मनोरंजन प्रधान उपन्यास, नाटक एवं शृंगार-रस पूर्ण पुस्तकों को पढ़ना स्वाध्याय नहीं है। इस प्रकार का साहित्य पढ़ना तो वास्तव में समय का दुरुपयोग करना एवं अपनी आत्मा को कलुषित करना है। कुरुचिपूर्ण गन्दे साहित्य को छूना भी पाप समझना चाहिए।

सच्चा स्वाध्याय वही है, जिससे हमारी चिन्ताएँ दूर हों, हमारी शंका-कुशंकाओं का समाधान हो, मन में सद्भाव और शुभ संकल्पों का उदय हो तथा आत्मा को शाँति का अनुभव हो। हमारे शास्त्रों में स्वाध्याय का बड़ा महात्म्य बताया गया है। योग-शास्त्र में कहा गया है :-

स्वाध्यायाद् योग मासीत् योगात स्वाध्याय मामनेत।

स्वाध्याय योग सम्पत्या परमात्मा प्रकाशते॥

अर्थात्- “स्वाध्याय से योग की उपासना करे और योग से स्वाध्याय का अभ्यास करें। स्वाध्याय की सम्पत्ति से परमात्मा का साक्षात्कार होता है।”

छान्दोग्योपनिषद् का कथन है :-

त्रयो धर्म स्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति।

अर्थात् - “धर्म के तीन स्कन्ध हैं। यज्ञ, स्वाध्याय और दान।”

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं :-

स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाड्मयं तप उच्यते। 17। 15

अर्थात्-”स्वाध्याय करना ही वाणी का तप है।”

छान्दोग्य उपनिषद् में ही आगे और लिखा है :-

‘आचार्य कुलाद्वेद मघीत्य यथा विधानं गुरो कर्माति शेषेणाभि समावृत्य कुटुम्बे शुचौदेशे स्वाध्यायमधीयानो धार्मिकान् विदधात्मनि सर्वेन्द्रियाणि सम्प्रतिष्ठाप्याहिसन् सर्वभूतानि अन्यत्र तीर्येभ्यः सखल्वेषं वर्त्तयन् यावदायुषं ब्रह्म लोकमभि सम्पद्यते’। 8। 15। 1।

अर्थात्-”ब्रह्मचारी आचार्य कुल से आर्ष-ग्रन्थों को पढ़कर यथा-विधि सेवा सुश्रूषा आदि करता हुआ समावर्तन संस्कारयुक्त परिवार में रहकर पवित्र स्थान में स्वाध्याय द्वारा स्वयं अपने को, सन्तानों को एवं अन्य जनों को धार्मिक बनाता हुआ समस्त इन्द्रियों को, आत्मा के आधीन करता हुआ, तीर्थ-स्थानों के अन्यत्र भी प्राणियों की हिंसा न करता हुआ, समस्त आयु इस प्रकार बर्तता हुआ मोक्ष-पद का अधिकारी बन जाता है तथा जन्म-मरण के चक्र से छूट जाता है।”

इस प्रकार हम पवित्र ग्रन्थों एवं सुविचारपूर्ण सत्साहित्य के पठन-पाठन द्वारा सदा स्वाध्याय कर अपने मन और बुद्धि को सुसंस्कृत बनाकर अपने जीवन को पवित्र बनाने का संकल्प धारण करें। सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय से हमारी आत्मा की सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होकर हमारे जीवन को सरस समुन्नत एवं दिव्य बना देती हैं।

शरीर को स्वस्थ और सुदृढ़ बनाये रखने के लिए जिस प्रकार पौष्टिक आहार की आवश्यकता है उसी प्रकार मन और बुद्धि को स्वच्छ एवं स्वस्थ बनाये रखने के लिए उत्तमोत्तम ग्रन्थों का अध्ययन अनिवार्य है। अध्ययन एवं स्वाध्याय के लिए निम्न कोटि का साहित्य हानिकर होगा, उसी प्रकार जैसे अखाद्य एवं दूषित पदार्थों का सेवन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। अतएव हमें इस सम्बन्ध में पूर्ण सतर्कता और सावधानी से काम लेना होगा। सच्चा स्वाध्याय वही है, जिसके द्वारा हमारा मन बाह्य विषयों से अलिप्त रहकर आत्मा के अनुसंधानों में प्रवृत्त हो एवं हमारी मानसिक दुर्भावनाओं, दुर्बलताओं तथा दूषित मनोविकारों का दमन हो सके, और हमारा मन एक अनिर्वचनीय अलौकिक आनन्द से परिप्लावित हो उठे।

मनुस्मृति में कहा गया है :-

स्वाध्याये नित्य मुक्तः स्यादैवे चैवहे कर्मणा।

अर्थात् - “स्वाध्याय और शुभ कर्म में मनुष्य सदा तत्पर रहे।”


Quotation

जवानी फूल है और बुढ़ापा फल। दोनों की अपनी-अपनी खूबी है और अपना-अपना आनंद। एक को रंग की पिचकारी कहा जाय तो दूसरे को रस का कलश कहना चाहिए। फूल की यह चाहना व्यर्थ है कि यह फल न बने, जिस स्थिति में आज है सदा उसी में बना रहे। इसी प्रकार फल की यह आकाँक्षा बेकार है कि उसे सदा फूल ही बना रहना चाहिए था। कुदरत की हर करतूत में उसकी अपनी खूबी भरी हुई है।

-विन्स्टन चर्चिल

जिसके द्वारा ‘स्व’ आत्मा व परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किया जा सके और जिसके द्वारा अभ्युदय निःश्रेयस की प्राप्ति की जा सके वही सच्चा स्वाध्याय है। अतएव प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह अच्छे ग्रन्थों, सदाचार प्रवर्त्तक पत्र-पत्रिकाओं एवं सत्प्रेरणादायी पुस्तकों का सदैव स्वाध्याय करता रहे। महाभारत के शान्तिपर्व में कहा गया है-’नित्यं स्वाध्यायशीलश्च दुर्गाख्याति तरन्तिते’- नित्य स्वाध्याय करने वाला व्यक्ति दुःखों से पार हो जाता है।

स्वाध्याय ब्रह्मचर्य पालन में सहायक है। स्वाध्याय से चरित्र निर्माण से भी सहायता मिलती है। इसके द्वारा दुराचारी सदाचारी और व्यभिचारी भी ब्रह्मचारी बन जाता है। अतः यदि आप समुन्नत होना चाहते हैं अपने जीवन को पवित्र, शुद्ध और निर्मल बनाना चाहते हैं तो आलस्य और प्रमाद को छोड़कर नित्य सद्ग्रन्थों के स्वाध्याय का आज से ही संकल्प कीजिए और उसका दृढ़ता से पालन कीजिए।


धन का उपार्जन एवं उपयोग

पैसे में रचनात्मक शक्ति है। उसके द्वारा कितने ही उपयोगी कार्य हो सकते हैं और सदुद्देश्यों की पूर्ति में सहायता मिल सकती है। पर साथ ही यह भी न भूल जाना चाहिए कि उसकी मारक शक्ति उससे भी बढ़ी-चढ़ी है।

धन का महत्व तभी है जब वह नीतिपूर्वक कमाया गया हो और सदुद्देश्यों के लिए उचित मात्रा में खर्च किया गया हो। अनीति से कमाया तो जा सकता है, पर जिन लोगों के द्वारा वह कमाया गया है, जिनका शोषण या उत्पीड़न हुआ है उनका विक्षोभ सारी मानव-सभ्यता के लिए घातक परिणाम उत्पन्न करता है। शोषित एवं उत्पीड़ित व्यक्ति जब देखते हैं कि उन्हें ठगा या सताया गया है और जिसने सताया या ठगा है वह मौज कर रहा है तो उनका मन आस्तिकता एवं नैतिकता के प्रति विद्रोह भावना से भर जाता है।

यह विक्षोभ धर्म और ईश्वर पर से विश्वास डिगा सकता है और उस स्थिति में पड़ा हुआ मनुष्य अपने ढंग से- अपने से छोटों के साथ दुर्व्यवहार आरम्भ कर सकता है। इस प्रकार बुराई की बेल बढ़ती है और उसके विषैले फल संसार में अनेकों प्रकार के दुष्परिणाम पैदा करते हैं। इस प्रकार फैली हुई दुष्प्रवृत्तियों का कोई परिणाम उस पर भी हो सकता है जिसने अनीतिपूर्वक किसी का शोषण किया था।

बुराई से केवल बुराई बढ़ती है। धन यदि बुरे माध्यम से कमाया गया है तो उसका खर्च भी उचित रीति से नहीं हो सकता है। जिसने पसीना बहा कर गाढ़ी कमाई से पैसा कमाया है उसे खर्च करते समय दर्द लगेगा और बार-बार सोचेगा कि इसे किस कार्य के लिए कितनी मात्रा में खर्च करना उचित है ? किंतु जिसने बिना परिश्रम, धूर्ततापूर्वक कमाया है उसके लिए निरर्थक कामों में बहुत कुछ खर्च कर डालना भी बुरा न लगेगा। सच बात तो यह है कि हराम की कमाई आडम्बर बनाने, ढोंग रचने और विलासिता के प्रसाधन जमा करने में ही खर्च होती है। अनेकों व्यसन ऐसे लोगों के पीछे पड़ जाते है। जिनमें वह धन तो बर्बाद होता ही है साथ ही शरीर और मन को अस्त-व्यस्त कर देने वाली अनेकों बुराइयां भी अपने भीतर पैदा हो जाती हैं जिनके कारण अनेकों विपत्तियों और व्यथाओं का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार वह अनुचित कमाई अपना क्षणिक चमत्कार दिखाकर अन्ततः मनुष्य के भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाली ही सिद्ध होती है।

धन कमाने के लिए उचित प्रयत्न करना सराहनीय है। उपार्जन और उत्पादन के लिए प्रयत्नशील रहने से व्यक्ति और समाज की क्षमता बढ़ती है। प्रगति का पथ प्रशस्त करने वाले साधनों में एक महत्वपूर्ण वस्तु धन भी है। इस धन के उपार्जन का प्रयत्न करने में बुराई भी नहीं प्रशंसा की बात है। इससे राष्ट्र की आर्थिक क्षमता बढ़ती है और उसमें भौतिक उन्नति की संभावना बढ़ती है। भौतिक उन्नति भी आध्यात्मिक उन्नति में सहायक होती है। दरिद्रता ही मनुष्य की कोमल भावनाओं और मानवोचित आकाँक्षाओं को कुण्ठित ही करती रहती है। इसलिए दरिद्रता को सदा हेय ठहराया जाता है। धन को लक्ष्मी मानकर उसकी पूजा करने की प्रथा से ही यह स्पष्ट है कि वह स्वागत योग्य है - घृणास्पद नहीं।

धन की विधायक शक्ति सर्वविदित है इसलिए गृही विरक्त सभी धन प्राप्ति की आकाँक्षा मन में धारण किए रहते हैं और उसके लिए अपने-अपने ढंग से प्रयत्न भी करते रहते हैं। धन पाकर बाल-वृद्ध सभी को प्रसन्नता होती है। यह उचित भी है क्योंकि सभी श्रेणी के व्यक्ति अपनी-अपनी सुख सुविधा के प्रसाधन धन द्वारा ही प्राप्त कर सकते हैं। विचारणीय प्रश्न इतना ही है कि वह धन अनीतिपूर्वक कमाया हुआ न हों। यदि यह अनुचित, अन्यायोपार्जित होगा, बिना परिश्रम के अनायास ही प्राप्त कर लिया गया होगा, तो वह कमाई किसी के लिए भी श्रेयष्कर न होगी। वरन् जिससे कमाया गया है उसे और जिसने कमाया है उसे शोक सन्ताप देती हुई अन्ततः खेदजनक परिणाम प्रस्तुत करती हुई विनष्ट होगी।

अनुचित मार्ग से आया हुआ धन मौज-मजा करने की प्रवृत्ति उत्पन्न करता है। उस मार्ग पर थोड़ा भी झुकाव होने से बड़ी से बड़ी पूँजी कुछ ही दिनों में समाप्त हो जाती है। खर्च करने के अगणित साधन फैले पड़े है। उनमें कुछ ही समय में चाहे जितना पैसा उड़ाया जा सकता है। विलास प्रसाधनों में अपव्यय की आदत जिन्हें पड़ जाती है उन्हें वह भी एक आवश्यकता जैसी ही प्रतीत होने लगती है और फिर उस आदत को पूरा करने के लिए बहुत धन की आवश्यकता बनी रहती है। ऐसे लोग कर्ज लेकर, दूसरों को धोखा देकर, या जीवन को सुव्यवस्थित रखने वाली छोटी संचित पूँजी को नोच-नोचकर अपनी उड़ाऊ आदत को पूरा करते है और धीरे-धीरे अपराधी प्रवृत्तियाँ अपनाकर ऐसे दुष्कर्म करने पर उतर आते हैं जिनका परिणाम सर्वनाश के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता।

आज मनुष्य का मूल्याँकन उसके धन से किया जाता है। किसी व्यक्ति का परिचय पूछने पर आमतौर से लोग उसकी कमाई और सम्पत्ति का वर्णन करते हैं और उसी आधार पर किसी का छोटा या बड़ा होना माना जात है। यह दृष्टिकोण गलत है। इस गलती का एक परिणाम यह भी होता है कि लोग किसी भी प्रकार धनी बनना चाहते हैं और उसके लिए अनुचित तरीके अपनाने में भी नहीं हिचकते। कितने ही व्यक्ति जो वस्तुतः धनी नहीं है, दूसरों की आँखों में धनी प्रतीत होने के लिए आडम्बर बनाते हैं और उन खर्चीले आडम्बरों में बेचारों की आर्थिक कमर ही टूट जाती हैं भेद खुलने पर उपहास होता है सो अलग।

कंजूसी अपने ढंग की दुष्प्रवृत्ति है। पैसे को रोककर, दाबकर रखना, उसके लाभ से समाज को वंचित करने के समान है। सड़क चलने के लिए कोई व्यक्ति उसे रोककर बैठ जाय तो दूसरे को इससे असुविधा ही होगी। नदी में बहने वाला जल अनेकों का हित साधन करता है पर यदि कोई उस प्रवाह को रोक डाले तो उससे कहीं सूखा पड़ने और कहीं बाढ़ आने का खतरा रहेगा। इसी प्रकार रुका हुआ धन अनेकों की आजीविका का मार्ग बन्द कर देता है और जहाँ रुकता है वहाँ बाढ़ जैसी बर्बादी उत्पन्न होती है। कंजूस न अपने काम में लाता है और न दूसरों के काम में आने देता है ऐसी दशा में वह संचय एक प्रकार का दुर्भाग्य एवं अभिशाप ही सिद्ध होता है। चोर-डाकुओं की उत्पत्ति का एक कारण कंजूसों का लालचीपन भी होता है। मधुमक्खी की तरह उन्हें अपनी कमाई दूसरों के हाथ गँवाने का ही पश्चाताप हाथ लगता है।

विद्वानों का कथन है कि मनुष्य की श्रेष्ठता और निष्कृष्टता दो कसौटियों पर परखी जा सकती है और वे हैं (1) धन (2) नारी। इन दो के संबंध में जिनका दृष्टिकोण धर्मबुद्धि से संचालित होता है, जो इन दो प्रलोभनों के आगे ईमानदार बने रहते हैं वस्तुतः वे ही खरे आदमी हैं। जो परीक्षा की अग्नि में तपकर खरा सिद्ध हो सके उसी को प्रमाणिक माना जाता है। धर्मात्मा और सज्जन वही व्यक्ति कहा जा सकता है जिसने अनीति से उपार्जित, बिना परिश्रम का पैसा छुआ न हो। जिसे ईमानदारी की कमाई में ही संतोष है उसे संत कहा जा सकता है। जिसकी आँखें युवा नारी में अपनी वयस्क बहिन या पुत्री की छाया देखती है और नर नारी की आत्मा में जिसे अंतर नहीं दीखता उसी को ब्रह्मचारी या विरागी कह सकते हैं।

धन का जहाँ जीवन के भौतिक विकास में महत्वपूर्ण उपयोग है वहाँ आध्यात्मिक जीवन में भी एक भारी उपयोग है कि वह मनुष्य की वास्तविकता को परखकर रख देता है। लोभ को पाप का फल माना गया है। अनीति की कमाई एवं अनुपयुक्त अपव्यय, किसी भी मनुष्य के घृणित एवं पतित होने का सबसे बड़ा प्रमाण ही हो सकता है, भले ही वह लोगों की आँखों को झुठलाने के लिए कितना ही बड़ा आडम्बर ओढ़े क्यों न बैठा हो। धर्मात्मा की प्रथम परीक्षा यह है कि वह परिश्रम की कमाई पर संतोष करे, एक-एक पाई का सदुपयोग करे, और जो बचे उसे लोकहित के लिए लगाता रह कर स्वयं अपरिग्रही बना रहे।

पैसा जहाँ रुकता है वहाँ सड़ता है। उसकी बदबू चारों ओर फैलती है। कीचड़ या गंदी चीजों का ढेर लगने से उसमें सड़न पैदा होती है और उस गन्दगी की दुर्गन्ध समीपवर्ती सब लोगों को दुःख देती है। संग्रही व्यक्ति भले ही अमीर या पूँजीपति के नाम से पुकारे जायें वस्तुतः वे समाज के सम्मुख एक बुरा उदाहरण ही प्रस्तुत करते हैं। उनकी नकल करने की घुड़-दौड़ में कितने दुर्बल बुद्धि मनुष्य अपना मानसिक संतुलन को खो बैठते हैं और किसी प्रकार अमीर बनकर उन तथाकथित बड़े आदमियों जैसा ऐश्वर्य भोगना चाहते हैं। इस अवाँछनीय घुड़-दौड़ को जन्म देने वाले वे लोग हैं जो अपना व्यक्तिगत वैभव बढ़ाकर सर्वसाधारण की आँखों में चकाचौंध पैदा करते हैं और जल्दी अमीर बनने या असीम सुख साधन भोगने की कामनाओं को भड़काते हैं। उदाहरण सबसे बड़ी शिक्षा-पद्धति मानी गई है। अमीरी का ठाठ-बाठ प्रकारान्तर से लोगों को यही सिखाता है कि उन्हें भी इसी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इस घुड़दौड़ में शामिल हो जाना चाहिए। अविकसित लोग सही तरीके से उतना उपार्जन करने की स्थिति में नहीं होते, उन्हें उतना धैर्य भी नहीं होता, इसलिए आमतौर से धन और ऐश्वर्य की लालसा में निमग्न व्यक्तियों को अनीति का मार्ग ही अपनाना पड़ता है। आज यही घुड़दौड़ मची हुई है और हमारा नैतिक स्तर बुरी तरह गिरता हुआ चला जा रहा है।

जो अधिक उपार्जन कर सकते हैं उनका उत्तरदायित्व है कि सामान्य सामाजिक स्तर से बढ़-चढ़कर आडम्बर न बनावें, सादगी से रहें और उसी प्रकार का जीवन यापन करें जैसा कि उस देश के सामान्य नागरिकों को बिताना पड़ता है। थोड़ा अंतर रह सकता है पर वह उतना ही होना चाहिये जितना हाथ की पाँचों उंगलियों की लम्बाई में थोड़ा-सा अंतर रहता है। बहुत भारी राजा और रंक जैसा अंतर सामाजिक रहन-सहन में रहना केवल विद्वेष की आग ही भड़का सकता है और उससे अनाचार ही उत्पन्न हो सकता है।

अधिक उपार्जन की क्षमता की सार्थकता एवं प्रशंसा इस बात में है कि उसका उपयोग अपने से पिछड़े हुए लोगों को ऊँचा उठाने में किया जाय। दान उन लोगों का एक नैतिक कर्त्तव्य है जो अपने आवश्यक खर्चों के अतिरिक्त कुछ अधिक कमा या बचा सकते हैं। अपरिग्रह एक धर्म कर्त्तव्य माना गया है। जितनी अनिवार्य आवश्यकता है उतने से अधिक का संचय परिग्रह रूपी पाप की श्रेणी में गिना जाना चाहिए। किसे कितनी आवश्यकता है उसका निर्णय उस समाज की मध्यम श्रेणी के स्तर के आधार पर किया जाना चाहिए। अन्यथा कोई व्यक्ति अपनी फिजूलखर्ची एवं विलासिता को भी ‘आवश्यकता’ सिद्ध करने लगेगा।

आर्थिक उपार्जन की क्षमता का होना प्रशंसनीय है पर उस प्रशंसा की सार्थकता तभी है जब वह व्यक्तिगत विलासिता बढ़ाने की अपेक्षा लोक-कल्याण के काम आवें। धन को शक्ति का प्रतीक माना गया है, उसकी लक्ष्मी के रूप में पूजा भी की जाती है। यह मान्यताएं तभी सत्य मानी जा सकती है जब उसके उपार्जन एवं व्यय पर धर्मबुद्धि का समुचित नियंत्रण बना रहे। अनियंत्रित उपार्जन एवं खर्च दोनों ही पतन का कारण बनते हैं, उसके कारण व्यक्ति का नाश और समाज का पतन होता है। धन विधायक शक्ति अवश्य है पर उसकी विनाशक शक्ति और भी प्रचंड है। धन का अनियंत्रित उपयोग किसी भी समाज का सर्वनाश करने के लिए एक भयंकर संहारक अस्त्र सिद्ध हो सकता है।


नारी पुनरुत्थान

नारी पुनरुत्थान के पुनीत कर्म में लगे हुए महर्षि कर्वे ने अपने रिश्ते की एक बाल विधवा से शादी कर ली। उन दिनों रूढ़िवाद की जड़ों पर किसी ने चोट भी नहीं की थी और वे हिली भी नहीं थी।

पंचों ने कर्वे को जाति बहिष्कृत कर दिया। गाँव के देव मंदिर में जब उत्सव चल रहा था तो वे भी जा पहुँचे। बहिष्कृत को सामूहिक आयोजन में सम्मिलित क्यों होने दिया जाय? आवाजें उठी और उन्हें वहाँ से हटा दिया गया। कर्वे ने कहा यह तो भगवान का द्वार है। जब दूर से चाँडाल भी दर्शन कर लेता है तो मुझे क्यों रोकते हो? प्रसाद तो नीच लोगों को भी मिल जाता है फिर मुझे वंचित क्यों करते हो?

इतनी नम्रता का भी तिरस्कार ही हुआ। महर्षि के तर्क उन पाषाण हृदयों को प्रभावित न कर सकें। उन्हें प्रवेश न मिला। पर धैर्य और लगन का चमत्कार तो देखिए। उन्हीं महर्षि कर्णे के प्रयत्न से महाराष्ट्र आज नारी प्रगति में अग्रणी हैं। उनकी संस्था में सहस्रों नारियाँ उच्च शिक्षा प्राप्तकर समाज सुधार के आन्दोलन को गतिवान बनाने में संलग्न है।


सच्चे वेदान्ती-स्वामी रामतीर्थ

जन जीवन में नव-चेतना भरने के लिए समय-समय पर अनेक देवदूत अवतरित होते रहते हैं। भूले भटकों को राह दिखाना ही उनके अवतरण का उद्देश्य होता है। स्वामी रामतीर्थ इस शताब्दी के ऐसे ही युग-पुरुष थे।

आत्मवत् सर्वभूतेषुः का संदेश इनने मानव जाति को सुनाया और वेदान्त का शिक्षण देते हुए ‘सर्व खल्विदं ब्रह्म’ का प्रतिपादन किया। यह जो कुछ भी है, सब ब्रह्म है। सब में परमात्मा की झाँकी करना- उसे घट-घट वासी मानते हुए अपने आचरण और व्यवहार को ऐसा रखना जो मानव संस्कृति के अनुरूप हो, यही उनके धर्म प्रचार का सार था। इस मिशन को लेकर वे देश-विदेश में घूमे। मानव का कल्याण उनने इन्हीं भावनाओं में देखा और उन्हें व्यापक बनाने के लिए जो भी सम्भव था प्राणपण में किया।

स्वामी रामतीर्थ का वेदान्त संसार को मिथ्या मान कर सबसे उदासीन होकर निठल्ले बैठे रहने वालों जैसा न था। वे आत्मा को ब्रह्म मानते थे पर अपने दोष दुर्गुणों को हटाते हुए उस स्थिति के पात्र बनने के लिए भी प्रेरणा देते थे। वे जानते थे कि पाप तापों में डूबा हुआ, नारकीय जीवन बिताने वाला, नर-पशु यदि अपने लक्ष्य एवं उद्देश्य के लिए कठोर तप न करेगा तो अहं ब्रह्मास्मि का उद्घोष एक मिथ्या अहंकार मात्र बनेगा और उससे मनुष्य जाति का हित नहीं अनहित ही सम्भव होगा।

अपनी वेदान्त मान्यताओं की उनने कई स्थलों पर कई प्रकार की व्याख्या की है। एक स्थान पर उनने कहा-”वेदान्त का अर्थ है - आत्म निर्भरता।” जो सर्वतो भावेन आत्म निर्भर है, एक बार उनने अनासक्ति को, निष्कर्म भाव से सत्कर्म करते रहने को वेदान्त बताया और एक बार यह भी प्रतिपादित किया कि आध्यात्मिक उन्नति का प्रत्येक प्रयत्न वेदान्त की साधना के अंतर्गत आता है।

जापान यात्रा के समय वहाँ के लोगों के गुण, कर्म, स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उनने कहा- आप लोग निरन्तर हँसते, मुसकराते रहते और दिन भर कठोर परिश्रम में निमग्न रहते हैं। यह दोनों ही गुण वेदान्ती के हैं। इसलिए भले ही आप वेदान्त के दार्शनिक सिद्धान्तों से अपरिचित हों, आपको मैं व्यवहारिक वेदान्ती ही कहूँगा। अमेरिका जाने पर वहाँ के लोगों को उद्योगी, पुरुषार्थी और सचेत पाया तो इन विशेषताओं की प्रशंसा करते हुए कहा- आप लोगों की प्रगति का मूल कारण यह सद्गुण ही है। प्रत्येक सद्गुण वेदान्त सिद्धान्त का ही एक अंग मानना चाहिए।

अमेरिका में वे जिस व्यक्ति के यहाँ अतिथि रूप में ठहरें, वे उसके लिए कई बार जंगल से लकड़ियाँ काट कर लाया करते थे। तेज चलने की प्रतियोगिता उनने कई बार जीती पर पुरस्कार लेने के लिए कभी सहमत न हुए। एक अमेरिकन महिला अपने बच्चे की मृत्यु से दुखी होकर स्वामी रामतीर्थ के पास अपनी दुख निवारण की प्रार्थना लेकर आई। उनने उसे सुझाया कि एक अनाथ नीग्रो बालक गोद रख ले और उसका पालन करे। ममता को संकुचित न रखकर व्यापक बनायें तो उसका दुख दूर हो जायगा। महिला ने वही किया और उसका शोक नया पुत्र प्राप्त होने की प्रसन्नता एवं परोपकार के संतोष से सर्वथा जाता रहा।

कठिनाइयों और अभावों के बीच रहते हुए भी कोई तेजस्वी व्यक्तित्व किस प्रकार विकसित हो सकता है, इस तथ्य को उनने अपने जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करके नई पीढ़ी को सिखाया कि अभाव और दुर्भाग्य का रोना रोने से कुछ लाभ नहीं। जिन भी परिस्थितियों में तुम हो उसी में आगे बढ़ने के लिए प्रयत्न आरम्भ कर दो, बाधाओं को मार्ग देना ही पड़ेगा। स्वामी राम का छात्र जीवन अभावों और कठिनाइयों से आच्छादित रहा। दो पैसा रोज की रोटी खरीदकर उन्हें अपना पेट भरना पड़ता था। रात को एक पैसे की रोटी मुफ्त दाल देने में जब दुकानदार ने इनकार किया तो उनने एक समय भोजन करके ही काम चलाना शुरू कर दिया। एक बार उनके पुराने जूतों में से एक नाली में बह गया तो एक पुरानी जनानी जूती कहीं से ढूंढ़ कर लाये और उन दोनों का जोड़ा मिला कर कालेज गये। पीछे पैसे होने पर नौ आने का नया जूता उनने खरीदा। इस अभावग्रस्तता में रहते हुए उनने एम.ए. पास किया और प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। उनकी प्रतिभा को देखते हुए जब प्रिंसिपल ने सिविल सर्विस में भर्ती होने की सिफारिश कर दी तो उन्होंने ऊँची अफसरी के मोह को ठुकराते हुए कहा- इतनी कठिनाई से प्राप्त विद्या को मैं कौड़ी मोल बेचना नहीं चाहता। इसका उपयोग तो मानव-जाति की सेवा में ही होगा।

वेदान्त की विवेचना करते देख एक संस्कृत विद्वान ने उन्हें ताना मारा कि आप संस्कृत नहीं जानते फिर धर्म-शास्त्रों की विवेचना का आपको क्या अधिकार है? बात उन्हें चुभ गई और उसी दिन से संस्कृत पढ़ना आरम्भ कर दिया और कुछ ही दिन में इतनी विद्वता प्राप्त करली कि वे वेदों का भाष्य करने की तैयारी करने लगे। अध्ययन काल में भी उनकी प्रतिभा बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। उस समय मित्र उन्हें धर्म प्रचार की प्रेरणा देते थे पर वे सदा यही कहते कि जब तक वे धर्म के आदर्श पूर्णरूप से मेरे जीवन में उतर न जावेंगे तब तक मैं दूसरों को उपदेश देने का साहस कैसे कर सकता हूँ? जब उन्हें अपनी आन्तरिक पवित्रता पर विश्वास हो गया तभी उनने प्रवचन करना आरम्भ किया।

मानव समाज को स्वामी राम ने बहुत बड़ी देन दी। राजनैतिक दासता और दीनता से ग्रस्त जनमानस में उनने निर्भयता का संचार किया। वे कहते थे निडरता से शेर को भी सधाया जा सकता है पर डरपोक को बिल्ली भी खा जायगी। लालची लोगों को दुत्कारते हुए उनने कहा-वन एक प्रकार की तपैदिक की बीमारी है, इसके लोभ में पड़े रहने वाला अपनी आत्मिक प्रगति का अवसर हाथ से खोता है और निरर्थक बाल-क्रीड़ा में अपना बहुमूल्य जीवन बर्बाद करता है। उन्नति की व्याख्या करते हुए उनने कहा- धर्म, नीति, सदाचार और सद्गुणों की उन्नति को ही मनुष्य की सच्ची उन्नति कहा जा सकता है। दौलत की उन्नति कोई उन्नति नहीं। बड़प्पन बाहर की चीज नहीं, वह तो मनुष्य के दिल और दिमाग में रहता है।

छोटे से घर परिवार तक सीमित न रह कर उनने समस्त विश्व को अपना घर और सभी चेतन प्राणियों को अपना कुटुम्बी माना और जन-जीवन में नव-जागरण का प्रकाश उत्पन्न करने के लिए वे निरन्तर भ्रमण करते रहे। अपने मिशन को आगे बढ़ाने के लिए जब उनसे एक अलग संस्थान बनाने के लिए कहा गया तो उनने उत्तर दिया, सभी संस्थाएं मेरी हैं। इतनी संस्थाओं के रहते और नई बनाने की क्या आवश्यकता है? लोगों की तंगदिली पर उन्हें भारी दुख होता था और अक्सर कहा करते थे कि - बड़ी इमारतों में भी छोटे आदमी रहते हैं यह कितने अनर्थ की बात है। वे चाहते थे कि मनुष्य में मनुष्यों के प्रति प्रेम और सहयोग की भावना उत्पन्न हो और लोग सद्भावनाओं को अपनाते हुए खुशी का समुन्नत जीवन बितावें।

उनका व्यक्तित्व महान था। जो कुछ वे वाणी से कहते थे उससे अधिक उनका चरित्र और विश्वास बोलता था। अमेरिका में उनके भाषणों पर मुग्ध होकर उस समय के प्रसिद्ध दार्शनिक सन्त इमर्सन ने कहा था-”स्वामी राम का व्यक्तित्व इतने जोर से गरजता है कि उसके आगे इनके शब्दों को सुनने समझने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती। मैं उनके व्यक्तित्व पर इतना मुग्ध हो जाता हूँ कि यह सुन समझ नहीं पाता कि वे क्या कह रहे हैं।”

मृत्यु से कुछ ही घण्टे पहले उनने मौत के नाम एक पत्र लिखा था - जिसमें उनने कहा था-”ऐ मौत इस शरीर को ले जाओ, मेरे पास अनेकों शरीर मौजूद हैं। मैं तारों की चमक और चन्द्रमा की किरणों को पहन सकता हूँ, समुद्र की लहरों और बहती हवा के साथ दूर-दूर तक दौड़ सकता हूँ।” सबमें अपनी आत्मा को समाया देखने वाले ऋषि के लिए ऐसा दिव्य अनुभव कर सकना स्वाभाविक भी था।

तेतीस वर्ष की छोटी आयु में दिवाली के दिन वे गंगा माता की गोद में समाधिस्थ हो गये। इतनी ही आयु में ईसामसीह, शंकराचार्य और विवेकानन्द भी इस संसार से विदा हुए थे। जापान से विदा होने के बाद एक जापानी प्रोफेसर ने उनका संस्मरण लिखते हुए कहा-”वह तो चले गये हैं पर अपनी मुस्कराहट सदा के लिए हमारे पास छोड़ गये हैं। उस प्रोफेसर की वह उक्ति आज समस्त मानव जाति की भावनाओं को व्यक्त करती है। मनुष्य को मानवता का पाठ पढ़ाने वाले, देश धर्म और संस्कृति की सेवा के लिए निस्पृह भाव से अपना जीवन उत्सर्ग करने वाले वे देवदूत अपना काम करके चले गये पर उनकी मुस्कराहट, उनकी वाणी और प्रेरणा अभी भी हमारे बीच अपना काम कर रही है।

स्वाध्याय सन्दोह-


हमारा हर कार्य विवेकपूर्ण हो?

सत्कर्म से ईश्वर पूजा -

‘कार्य ही पूजा’ है। इस कथन पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो उसमें एक बहुत बड़ी सच्चाई सन्निहित जान पड़ती है। जब हम अपने कार्य को पूजा मानकर करते हैं, तब हमारे भीतर ईश्वरीय शक्ति द्वारा प्रकाशित अनुपम ईमानदारी, सहृदयता, पवित्रता, साधुता, सरलता, शक्ति, कार्यनिष्ठा जागृत हो जाती है। हमारे तन, मन, प्राण एक रस होकर काम में एकाग्र हो जाते हैं। एक गुप्त शक्ति हमारे कण -कण में काम के प्रति दिलचस्पी और एकरसता भर देती है। जिसने अपनी भावना का तार-तार ईश्वर से संयुक्त कर दिया है, वह जानता है कि दैवी शक्ति के तादात्म्य से हमारी कार्य सम्पादिका शक्ति की कैसी सुन्दर तथा महान अभिवृद्धि हो जाती है।

यदि हम अपने स्थान पर रहकर पूरा और खरा काम करते हैं, अनुचित रीति से आर्थिक लोभवश अपने मालिकों को धोखा नहीं देते हैं, तो हम कर्म मार्ग के पथिक बन जाते हैं। पूरे और खरे कार्य के समक्ष सब को झुकना पड़ता है। जो छोटे से छोटा कार्य निकम्मा, अधूरा अथवा आधे मन से किया जाता है, वही परमात्मा की सेवा, अपना कर्त्तव्य समझकर सम्पूर्ण चातुर्य और कला से अच्छा से अच्छा भी किया जा सकता है। किसी भी व्यक्ति के लिए इस से अधिक लज्जा की बात क्या होगी कि उसे एक कार्य को दुबारा करने को कहा जाय, क्योंकि उसने अपना कार्य आधे मन से किया है। जिस शैली या ढंग से कोई काम किया जाता है वही कार्य करने वाले व्यक्ति के चरित्र को प्रकट कर देता है। रिश्वत या ऊपरी आमदनी के मोह में फंसे हुए आदमी का दिल कार्य में नहीं होता वह आदमी चाहे किसी परिस्थिति में क्यों न हो, कम काम करके अधिक पैसा खींचने के लोभ में लगा रहता है। यह वृत्ति सर्वथा त्याज्य है। कुछ व्यक्ति मालिक की उपस्थिति में तो ठीक काम करते हैं, किन्तु अनुपस्थिति में कुछ नहीं करना चाहते । ऐसे व्यक्ति भी चोर हैं। हमें अपने जीवन को इतना पूर्ण और परिश्रमी बनाना चाहिए कि बेईमानी से कुछ प्राप्त करने की इच्छा ही मन में शेष न रहे

-स्वर्ण पथ

भाग्य नहीं पुरुषार्थ ही प्रधान है -

“ईश्वरेच्छा या प्रारब्धानुसार ही सब कुछ होता है।” “जिन्दगी दो दिन की है” “किसी की आशा रखना व्यर्थ है” “दुनिया में कोई किसी का नहीं” “ये दिन भी चले जायेंगे”- “शरीर रोग का भण्डार है”- “मौत किसी की नहीं टलती” - “यह जगत माया का बाजार है”- ऐसे अनेक उद्गार मनुष्यों के मुँह से निकलते रहते हैं। अनेक व्यक्ति इन उद्गारों में ज्ञान भरा हुआ समाप्त कर इन्हीं को जीवन का महान सिद्धान्त समझते हैं और जानबूझकर उदासीनता -विरक्तता का जीवन बिताने का प्रयत्न करते है। परन्तु हमें रखना चाहिये कि ऐसे उद्गार तात्विक दृष्टि से सत्य हो या न हों, फिर भी उनको जीवनसूत्र बनाकर उनके अनुसार नित्य का जीवन चलाने का प्रयत्न करना गलत है। निराश और निरुत्साहित बने हुये, रोगों में ग्रस्त, गरीबी से दुखी, लोगों के छल-कपट के शिकार बने हुये, मौत के किनारे लगे हुए, किसी-न-किसी दुःख में भग्न हृदय बने हुये तथा जिनका जीवन लगभग असफल सिद्ध हो चुका है ऐसे व्यक्तियों के मुँह से निकले हुए उद्गारों को जीवन का सिद्धान्त मानकर सारे मानव-जीवन के विषय में राय बनाना और उसे अपने जीवन का ध्येय ठहराना सर्वथा अनुचित है। एकांगी सत्य को सम्पूर्ण सत्य समझना सदा गलत ही माना जाएगा।

- विचार दर्शन

त्याग का अर्थ घर छोड़ना नहीं-

‘आत्मत्याग’ का सच्चा मतलब समझे बिना लोग उसके बदले में कई भिन्न प्रकार की क्रियाओं का आचरण करके संतुष्ट हो जाते हैं। यहाँ तक कि कई लोगों ने तो उसका मतलब आत्मघात तक समझ लिया है! कितनों का विश्वास है कि बाह्य-वस्तुओं -धन, कुटुम्ब, ऐश्वर्य तथा घर बार को छोड़कर जंगल में जा बैठना आत्म-त्याग है कितने नाना प्रकार की यातनाओं द्वारा शरीर को कष्ट देकर सुखा डालने को आत्म-त्याग समझते हैं। कितने साँसारिक यश की इच्छा से प्रेरित होकर अपने धन और प्राण को समाज और देश के नाम पर न्यौछावर कर देने को आत्म-त्याग मानते हैं। इस प्रकार जिसकी दृष्टि में जो काम महान और बड़ा जान पड़ता है उसी को वह आत्म त्याग के रूप में समझ लेता है।

वास्तव में आत्म त्याग स्वार्थत्याग का ही दूसरा नाम है और स्वार्थ कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो हृदय से बाहर फेंकी जा सके। वह तो मन की एक अवस्था विशेष है। जिसको दूसरे रूप में बदलने की आवश्यकता है। इसलिए आत्म त्याग का अर्थ आत्मा को नष्ट करना या अनावश्यक कष्ट देना नहीं, किन्तु वासनाओं और इच्छाओं से लिप्त आत्मा को परिवर्तित करना है । स्वार्थ का अर्थ है क्षणस्थायी सुखों में फँसकर सदाचरण और विवेक को भूल जाना। स्वार्थ हृदय की उस वासनात्मक और लोभपूर्ण अवस्था का नाम है जिसका त्याग किये बिना हमारे भीतर सत्य का उदय नहीं हो सकता और न शान्ति और सुख का ही हृदय में संचार हो सकता है।

- जीवन के महत्वपूर्ण प्रश्न

अन्धश्रद्धा अहितकर है-

हिन्दू धर्म सिखलाता है-”श्रद्धावान लभते ज्ञानम्” अर्थात् श्रद्धावान ही ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होता है। जब हिन्दू धर्म ज्ञानवादी है तो वह श्रद्धा से पृथक कैसे हो सकता है? परन्तु इस श्रद्धा और दासता में बड़ा अन्तर है। पैगम्बरवाद और गुरुडमवाद अन्धविश्वास सिखलाते हैं, पागल बनाते हैं और अपने सम्प्रदाय का गुलाम बनाते हैं। श्रद्धा होती है विवेक के साथ, जब भक्ति के साथ विवेक भी रहे तो उसका नाम श्रद्धा है। पर जब वही भक्ति अन्धविश्वास के साथ हो तो उसे दासता कहते हैं। हिन्दूधर्म श्रद्धावादी हैं, दासतावादी नहीं। श्रद्धा सात्विक गुण है, वह आत्मा को ऊँचा उठाता है, उसे उन्नत पथ दिखलाता है। इसके विपरीत अन्धभक्ति तमोगुणी वृत्ति है, यह दासता की जड़ और विकास की शत्रु होती है। हिन्दू धर्म माता, पिता, गुरु, आचार्य और वयोवृद्ध विद्वानों के प्रति विवेकपूर्ण भक्ति सिखलाता है और कहता है कि यदि तुम्हारा मत किसी विद्वान से न मिले तो भी तुम्हें श्रद्धाभाव से उसके गुणों को ग्रहण करना चाहिये।” हम है हंस, कौआ नहीं, हमें दूध लेना है और पानी छोड़ देना है। इस संसार से झगड़ा करने के लिए यहाँ नहीं आये हैं, हम तो ज्ञान संचय के लिये आये हैं। हम दूसरों के किसी सिद्धान्त का, किसी पैगम्बर का, किसी आचार्य अथवा गुरु का फीतदास बनने के लिये नहीं आये हैं, हम तो लोगों को ऐसा भ्रमर बनना सिखलाते हैं जो पुष्पों का रस ग्रहण करता है। विवेकपूर्ण श्रद्धा आत्मा का उत्थान करती है, व्यक्ति में भला-बुरा पहिचानने की शक्ति उत्पन्न करती है, उसे चिन्ताशील बनाती है और उसमें आत्मनिर्भरता भरती है।

- हिन्दू धर्म की विशेषता

सच्चे ज्ञान से ही कल्याण होगा-

सच पूछा जाय तो श्रद्धा ही हमारा श्रेष्ठ धर्म है। वर्तमान समय में जबकि पृथ्वी पर सच्चे ज्ञान का सर्वत्र अभाव दिखाई पड़ता है, और संकीर्णतायुक्त स्वार्थ का, अविद्या का अंधेरा छाया हुआ है, ऐसी परिस्थिति में हम केवल अपने श्रद्धा दीप की सहायता से ही जीवन के अन्तिम ध्येय तक पहुँच सकते हैं। परन्तु हमारी यह श्रद्धा ध्रुवतारा के जैसी अचल होनी चाहिए, बिजली के चमकने की तरह क्षणिक नहीं। अगर हमारे भीतर श्रद्धा, आत्मश्रद्धा हो तो हमको संसार में कोई भी बात भौतिक अथवा आधिभौतिक असंभव नहीं रह सकती। इस श्रद्धाबल से हम जो कुछ विचार करें जो कुछ चाहें वही कर सकते हैं। श्रद्धा और विश्वास के द्वारा हम अपार शक्ति प्राप्त कर सकते है। मनुष्य अपने को जैसा जानता है वैसा ही बन जाता है। एक महान दार्शनिक ने कहा है कि “मनुष्य किसी विशेष मान्यता के आधार पर ही जीवित रहता है। अगर उसको यह विश्वास न हो कि जीने के लायक कुछ है, तो वह जीवित रह नहीं सकता। जैसे-जैसे वह नश्वर जगत की अवास्तविकता को देखता और समझता जाता है वैसे-वैसे उसके भीतर अनन्त के प्रति श्रद्धा का आविर्भाव होता है। उसे श्रद्धा रखनी पड़ती है, क्योंकि श्रद्धा के बिना जीवन ही नहीं रह सकता।

विज्ञान और उसी प्रकार आत्मज्ञान के लिये श्रद्धा और धैर्य अत्यन्त आवश्यक सीढ़ियाँ है। सबसे पहले अपने में श्रद्धा रखो और उसके पश्चात् परमेश्वर में सच्ची श्रद्धा रखने से मुट्ठी भर मनुष्य संसार को हिला सकते हैं। परन्तु इसके लिये भावनायुक्त हृदय, विचारशील मन, कार्य करने की दृढ़ इच्छा, लगन और इन सबको स्थिर रखने वाली श्रद्धा की आवश्यकता है।

शास्त्र चर्चा-


पति और पत्नी का सम्बन्ध

सवै नैव रेमे, तस्मादेकाकी न रमते, स द्वितीय मैच्छत्। स हैतावानास। यथा स्त्री पुमाँसौ स परिष्वक्तौ स इम मेवात्मानं द्वेधापातयत्ततः तपिश्च पत्नी चा भवताम्।

वह ब्रह्म आनन्द नहीं कर सका क्योंकि अकेला कोई भी आनन्द नहीं कर सकता। उसने दूसरे की इच्छा की। वह ऐसा था जैसे स्त्री पुरुष मिले हुए होते हैं। उसने अपने इस रूप के दो भाग किये, जिनसे पति और पत्नी हो गये।

देववत् सततं साध्वी भर्तारमनुपश्यति।

दम्पत्यो रेष यै धर्मः सहधर्म कृतः शुभः॥

- विष्णु पुराण

पत्नी पति को देवता के समान और पति-पत्नी को देवी के समान समझे। दोनों का धर्म और कर्त्तव्य समान है।

भार्यापत्युर्व्रतं कुर्याद् भार्यायाश्च पतिर्वतम्।

संसारोऽपि हि सारः स्याद् दम्पत्योरेक कः।

यदि पति-पत्नी एक हृदय हों तो यह असार संसार भी सारवान बन जाता है।

पत्नी के पति के प्रति कैसे भाव रहें इसकी अभिव्यक्ति इस प्रकार है :-

न कामये भतृविनाकृता सूखं

न कामये भर्तू विनाकृतादिवम्

न कामये भर्तू विना कृता श्रियं

न भतृहीना व्यवसामि जीवितुम

“मैं पति के बिना सुख नहीं चाहती, बिना पति के स्वर्ग नहीं चाहती, बिना पति के धन नहीं चाहती, बिना पति के जीना भी नहीं चाहती।” ऐसे ही भाव पति भी पत्नी के प्रति रखें।

सव्र तीर्थ समो भर्ता सर्व धर्म मयः पति।

मलानाँ यजनात् पुण्यं यद् वै भवति दीक्षिते

तत् पुण्यं समवाप्नोति भर्तुश्चैव हि साम्प्रतम्।

- पघ. भूमि. 41 । 4-15

अर्थात् पति में सब तीर्थ समाये हुए हैं। पति ही सर्व धर्ममय हैं। यज्ञ और दीक्षा का जो पुण्य है वह स्त्री को पति की पूजा से तत्काल प्राप्त होता है।

स्त्री के लिए जो व्यवहार पति के लिए आवश्यक बताया गया है वही व्यवहार पति-पत्नी के साथ भी करे। कहा गया है-

नास्ति भार्यां समं तीर्थ नास्ति भार्यां समं सुखम्।

नास्ति भार्यां समं पुण्यं तारणाय हिताय च।

- पद्मपुराण

पत्नी के समान कोई तीर्थ नहीं, पत्नी के समान कोई सुख नहीं, पत्नी के समान कोई पुण्य नहीं। दुख से तरने और हित साधन करने के लिए पत्नी के समान और कोई नहीं हैं।

इन्हीं भावों की अभिव्यक्ति अपने शब्दों में महाकवि कालिदास ने इस प्रकार की है :-

गृहिणी सचिवः सखी मित्रः प्रिय शिष्या ललिते कला विधौ।

“पत्नी ही धर्म-मंत्री, मित्र, प्रिय तथा ललित कलाओं की शिष्या है।”

सन्तुष्टो भार्यया भर्त्ता भर्त्रा भार्या तथैव च।

यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याण तत्र वै ध्रवम्॥

स्त्रियाँ तु रोचमानायाँ सर्व तद्रोचते कुलम्।

तस्याँ त्वरोचमानायाँ सर्वमेय न रोचते।

मनुस्मृति 3 । 60 । 62

अर्थात् “ जिस कुल में पत्नी से पति और पति से पत्नी अच्छे प्रकार प्रसन्न रहते हैं, उसी कुल में सब सौभाग्य और ऐश्वर्य निवास करते हैं। जहाँ

उनमें कलह होता है वहाँ दुर्भाग्य और दारिद्रय स्थिर रहता है स्त्री की प्रसन्नता से ही सब कुल प्रसन्न रहता

है और उसकी अप्रसन्नता से सब अप्रसन्न और दुखदायक हो जाता है।


युग परिवर्तन निकट ही है

युग-निर्माण आन्दोलन की चर्चा सुनकर कई रूढ़िवादी यह कहते सुने जाते हैं कि अभी तो कलियुग बहुत दिन रहेगा और आगे इससे भी बुरी परिस्थितियाँ पैदा होंगी। कलियुग तो 4 लाख 32 हजार वर्ष का है। अभी से वह कैसे बदल जायगा?

इस संदर्भ में हमें यह विचार करना होगा कि कलियुग क्या है और कब तक वह रहेगा? एक-एक युग की इतनी लम्बी अवधि रखी गई है, उसके मूल में कोई आधार भी है या नहीं?

यदि इस दृष्टि से भारतीय प्राचीन साहित्य का अनुशीलन किया जाय तो विदित होता है कि ग्रन्थों में एक तरह के नहीं कई प्रकार के युगों का उल्लेख किया गया है। युगों का नाम सब से पहले वेदों की संहिताओं में आया है और उनके अनुसार यज्ञ करने के लिये वर्ष को तीन-तीन महीने के चार भागों में बाँट कर उनका नाम युग रखा था। फिर अन्य वैदिक ग्रन्थों में ही पाँच और बारह वर्षों के युगों का वर्णन किया गया है। इसके सिवा ज्योतिष संबंधी गणना के लिये और भी कई प्रकार के छोटे बड़े युग माने गये हैं जिनमें से एक ‘ब्रह्मगुप्त’ का कहा गया युग तो 43 लाख 20 हजार वर्ष का होता है। धार्मिक क्रियाओं के लिये युगों का परिमाण ‘मनुस्मृति’ आदि पुराने ग्रन्थों में 12 हजार वर्ष का बताया गया है- ब्रह्मास्यतु क्षपाहस्य यत्प्रमाणं समाप्तः।

एकं कशो युगानान्तु क्रमशस्तनिनबोधत॥ 68॥ चत्वार्याहुः सहस्त्राणि वर्षाणाँ तु कृतं युगं

तस्य तावत् शती संध्या संध्याशश्च तथाविधिः॥ 69 ॥

इतरेषु स संध्येषु संसध्याशेषु च त्रिषु।

एको पायेन वर्तन्ते सहस्त्राणि शतानिच ॥ 70 ॥

(मनु.- 1)

अर्थात् “ब्रह्मा के अहोरात्र में सृष्टि के पैदा होने और नाश होने तक जो युग माने जाते हैं उनका क्रम यहाँ बतलाते हैं। चार हजार वर्ष का सतयुग और उतने ही सकड़ेडडडडड की उसकी पूर्व-संधि तथा उतनी ही उत्तर-संधि। इसी प्रकार तीन हजार की तीन-तीन सौ की, दो हजार की दो-दो सौ की, एक हजार की एक-एक सौ की संधि होती है।”

‘लिंग पुराण’ में इसी विषय का विवेचन इस प्रकार मिलता है :-

चत्वारिच सहत्राणि मानुषाणि शिलासन।

आयुः कृतयुगे विद्धि प्रजानामिह सुव्रत॥ 9॥

ततः कृतयुगे तस्मिन सन्ध्याँशेव गतेतुवै ।

पादवशिष्टो भवति युगधर्म्मसु सुर्वतः ॥ 10॥ चतुर्भागं द्वापरं विद्धि-तदद्ध’ तिष्यमुच्यते ॥ 11 ॥

त्रिशती द्विशती सन्ध्या तथा चैक शतीमुने। सन्ध्याँश कंतीथाऽप्येव कल्पेष्वेवं युगे युगे॥ 12 ॥

अर्थात् “सतयुग मनुष्यों के चार हजार वर्ष का होता है। सतयुग का अन्तिम सन्ध्याँश बीत जाने पर धर्म का तीन हिस्सा रह जाता है। त्रेतायुग तीन हजार का द्वापर दो हजार का और कलियुग एक हजार वर्षों का होता है। इन सब की सन्ध्या और सन्ध्याँश मिल कर क्रम से आठ सौ, छः सौ, चार सौ और दो सौ वर्ष के होते है।”

भागवत पुराण का मत भी संक्षेप में इसी से मिलता-जुलता है :-

कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्पुगम्।

दिव्यैद्वदिशभिर्वर्षेः सावधानं निरुपितम्॥

चत्वारि त्रीणि द्वे चैके कृतादिषु यथाक्रमम्।

संक्ष्यातानि सहस्नाणि द्विगुणनि शतानिच॥

अर्थात् -”सतयुग, द्वापर, त्रेता और कलियुग चारों मिलकर 12 दिव्य वर्षों के होते हैं। इनका परिमाण क्रमशः चार, तीन, दो और एक हजार का होता है, जिसमें द्विगुण सैकड़े की संख्या और बढ़ा देनी चाहिए।”

जैसा हमने ऊपर बतलाया है धर्मग्रन्थों में तथा पुराणों में भी जगह-जगह चारों युगों का मान 12 हजार वर्ष का लिखा है, और कलियुग का परिमाण केवल 1200 वर्ष का बतलाया है पर जिन पण्डितों ने पुराणों की कथाओं में एक-एक राजा की आयु और शासनकाल हजारों वर्ष का लिखा, उनको यह काल - विभाग बहुत ही छोटा या अपर्याप्त जान पड़ा और इसलिये उन्होंने यह सिद्धान्त निकाला कि ये 12 हजार वर्ष देवताओं के हैं, जिनका एक दिन मनुष्यों के एक वर्ष के बराबर होता है। इस प्रकार उन्होंने 12 हजार से 360 का गुणा करके चारों युगों का परिणाम 43 लाख 20 हजार वर्ष का प्रतिपादित कर दिया। यही बात साहित्य के मर्मज्ञ लोकमान्य तिलक ने अपने “गीता रहस्य” में लिखी है :-

“युगों की काल-गणना इस प्रकार है- कृत युग में चार हजार वर्ष, त्रेतायुग में तीन हजार वर्ष, द्वापर में दो हजार और कलि में एक हजार वर्ष। परन्तु एक युग समाप्त होते ही दूसरा युग एकदम आरम्भ नहीं हो जाता, बीच में दो युगों के सन्धि काल के कुछ वर्ष बीत जाते हैं। इस प्रकार कृतयुग के आदि और अन्त में प्रत्येक ओर चार सौ वर्ष का, त्रेतायुग में आगे और पीछे प्रत्येक ओर तीन सौ वर्ष का, द्वापर के पहले और वाद प्रत्येक ओर दो सौ वर्ष का, और कलियुग के पूर्व तथा अनन्तर प्रत्येक ओर सौ वर्ष का सन्धि काल होता है। सब मिलाकर चारों युगों का आदि अन्त सहित सन्धि काल दो हजार वर्ष का होता है। ये दो हजार वर्ष और पहले बतलाये हुये साँख्य मतानुसार चारों युगों के दस हजार वर्ष को मिलाकर कुल बारह हजार वर्ष होते हैं। ये बारह हजार वर्ष मनुष्यों के हैं या देवताओं के?..................इस विरोध को मिटाने के लिये पुराणों में निश्चित किया है कि ये बारह हजार वर्ष मनुष्यों के तेतालीस लाख बीस हजार वर्षों के बराबर होते हैं।”

इस सम्बन्ध में कुछ अन्य विद्वानों तथा धार्मिक सज्जनों का यह भी मत है कि प्रत्येक युग के बीच में अन्य युगों की अन्तर और प्रत्यन्तर दशाएं आती रहती हैं। जिस प्रकार नवग्रहों की एक विंशोत्तरी दशा तो लम्बी अवधि की होती है पर उस अवधि में ही एक बार नौ ग्रहों की अंतर्दशा बदल जाती है। इसी प्रकार प्रत्येक युग में उसकी अवधि के भीतर चारों युगों की अंतर्दशाएं भी बदलती रहती है। वर्तमान परिवर्तन काल को कलियुग के बीच सतयुग की एक अंतर्दशा भी माना जा सकता है।

संयोग की बात है कलि संवत् का विचार भी अब से लगभग 1200 वर्ष पहले ही उठा था और कुछ लोग उसे व्यवहार में लाने लगे थे। श्री रावर्ट सिवेल नामक अंग्रेज विद्वान ने सन् 1924 में “सिद्धान्ताज एण्ड इण्डियन कलैण्डर” (सिद्धान्त और भारतीय पंचांग) नामक अंग्रेजी ग्रन्थ में भारतवर्ष में प्रचलित अनेक सम्वतों का जिक्र करते हुए कलि-संवत् के विषय में जो लिखा है, वह विशेष रूप से विचारणीय है :-

“कलि-संवत् का सबसे पुराना शिलालेख, जिससे हमें कलियुग का पता चलता है, वह राजा पुलकेशिन (द्वितीय) चालुक्य का है, जो एहोल नामक स्थान में पाया गया है। उसमें लिखा हुआ रामय ईसवी सन् के हिसाब से 634-635 होता है, दूसरा लेख सन् 770 और तीसरा 866 ई॰ का है। यह सब लेख दक्षिण भारत के है। उत्तर भारत में जो सब से प्राचीन लेख कलियुग संवत् का मिला है वह सन् 1169-70 ई॰ का है।”

इससे यह प्रकट होता है कि वास्तव में कलियुग की भावना का प्रसार उसी समय से अधिक बढ़ा है जब से मुसलमानों का इस देश में आगमन होने लगा है। मुसलमानों का प्रथम आक्रमण सिन्ध पर मुहम्मद बिन कासिम द्वारा सन् 800 के आस-पास ही हुआ था और उसके कुछ ही समय पश्चात महमूद गजनवी ने भारतवर्ष पर 17 बार आक्रमण करके मनमानी लूट और हिन्दू धर्म को नष्ट करने की चेष्टा की। उस कुसमय को सर्वसाधारण ने कलियुग कह कर और समझ कर संतोष धारण किया और संत लोगों ने भी उसी का आधार लेकर लोगों को विधर्मियों से पृथक और सावधान रहने की शिक्षा दी। इस समय से पहले के ग्रन्थों में कलियुग का जिक्र बहुत कम आया है और वहाँ भी किसी जगह यह प्रकट नहीं किया गया है कि कलियुग इतने लाख वर्ष तक रहेगा और उसमें लोग दिन पर दिन अधिकाधिक पापी बनते जायेंगे। वास्तव में ऐसी धारणा का प्रचार कोई भी संज्ञान, सुयोग्य, समाज- हितैषी नहीं कर सकता। इसलिये हम को एक विद्वान की इस बात के बहुत कुछ तथ्य जान पड़ता है कि मुसलमानी शासन काल में ही उनसे प्रभावित होकर, उनकी खुशामद करने की दृष्टि से अथवा कहीं -कहीं उनके द्वारा लालच दिये जाने पर भी लोगों ने हिन्दू’- धर्मशास्त्रों में ऐसे हीनता के विचारों का समावेश किया और जनता में उनका प्रचार भी किया गया। ऐसे पंडित नामधारी लेखकों ने अनेक समाजोपयोगी बातों को ‘कलिवर्ज्य’ कहकर हिन्दू-समाज की प्रगति में एक रोड़ा लगा दिया, स्त्रियों को हीन तथा अकर्मण्य दशा में रहने को बाध्य कर दिया और बहुसंख्यक जातियों और पेशों को अछूत ठहरा कर हिन्दू जाति को निर्बल तथा विश्रृंखलित करने का मार्ग खोल दिया।

इन बातों पर विचार करने से कलियुग के अभी चिरस्थायी रहने और युगनिर्माण की बात न बन पड़ने की आशंका अनुचित है। ऐसी निराशा मन में लाना किसी भी प्रकार उचित नहीं कि कलियुग नव-निर्माण के प्रयत्नों को सफल न होने देगा।

“ऐतरेय ब्राह्मण” में इस सम्बन्ध में एक प्रकरण बड़ा ही भावपूर्ण और शिक्षाप्रद है। एक ऋषि को हतोत्साहित और निराश देखकर इन्द्र उपदेश देता है।

कलिःशयानों भवति संजिहानस्तु द्वापरः।

उत्तिष्ठन्त्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरन्॥

चरैवेति, चरेवैति, चरेवैति

अर्थात् -”जिस समय समाज या व्यक्ति निद्रावस्था में बेखबर पड़े रहते हैं अर्थात् अज्ञानावस्था में रहते हैं उस समय कलियुग होता है। जब निद्राभंग होकर वे जँभाई लेते हैं (चैतन्य जान पड़ते हैं) तब द्वापर होता है। फिर जब वे उठकर बैठ जाते हैं तब त्रेता समझना चाहिए। जब वे खड़ा होकर चलने लग जायें, तब कृतयुग अथवा सतयुग समझ लेना चाहिए। इसलिये निरन्तर चलते रहो।

इससे विदित होता है कि आरम्भ में सतयुग- त्रेता आदि युगों की कल्पना समय के लाखों वर्षों के विभागों का विचार रखकर नहीं की गई थी, वरन् समाज तथा व्यक्ति की कर्मशील अथवा अकर्मण्य अवस्था को प्रकट करने के लिये उसका प्रयोग किया गया था। ऐसा ही एक उदाहरण हमको महाभारत में दिखाई पड़ता है। उसमें भगवान कृष्ण ने युद्ध को रोकने के लिये कर्ण को समझाते हुये कहा था-

यदा द्रक्षसि संग्रामे श्वेतश्वं कृष्ण सारथीम्।

एन्द्रमस्त्रं विकुर्वाणाभुवं चाप्याग्नि मारुते॥ 6॥

गाँडीवस्य च निर्धोयं विस्फूर्जितिभिवाशनेः।

न तदा भविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च ॥ 7। ।

यदा द्रक्षासि संग्रामे कुँतिपुत्र युधिष्ठिरम्।

जप होम समायुक्तं स्वं रक्षन्तं महा चमूम्॥ 8॥

आदित्यमिव दुर्धर्ष तपंतं शत्रुवाहिनीम्।

न तदा भाविता त्रेता न कृतं द्वापरं न च ॥ 9॥

अर्थात्-”जब संग्राम में श्वेत घोड़ों के सारथी कृष्णा को आग-बबूले की तरह होते और महावीर अर्जुन को गाँडीव धनुष से वज्राघात की सी टंकार करते देखोगे, तब न तो त्रेता ही रहेगा न कृतयुग और न द्वापर।”

“ जब जप होम आदि किये हुये सूर्य के समान प्रखर तेज वाले कुंती पुत्र युधिष्ठिर को अपनी सेना की रक्षा करते और शत्रु की सेना को जलाते देखोगे, तब न त्रेता रहेगा न कृतयुग और न द्वापर।”

महाभारत के शान्तिपर्व में युधिष्ठिर को राजनीति का उपदेश देते हुये भीष्म पितामह ने कहा था-

कालं वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्।

इति ते संशयो माभूत् राजा कालस्य कारणम्॥ 79॥

ततो कृतयुगी धर्मो न धर्मो विद्यते क्वचित्।

सर्वेषामेव वर्णानाँ नाधर्मे रमते मनः॥ 82॥

अर्थात् -”हे युधिष्ठिर! काल के वशवर्ती होकर राजा ही कर्ता हुआ करता हैं अथवा यह भी कह सकते है कि राजा के वश में ही काल रहता है- इस विषय में आप कुछ भी संशय न करें। क्योंकि जब राजा- धर्मानुकूल शासन और दण्ड नीति का प्रयोग करता है तो कहीं अधर्म नहीं रहने पाता, चारों वर्ण अपने धर्म का पालन कृत युग (सतयुग) के अनुसार ही करने लगते हैं।”

शास्त्र के अनुसार भी कलियुग समाप्त हो चला फिर मानवीय पुरुषार्थ के सामने उसका ठहर सकना भी किस प्रकार हो सकता है। सामने प्रस्तुत लक्षणों को देखते हुए युग-परिवर्तन का समय निकट ही है।


साहसी बुँचे

डॉ. एफ. बुँचे का नाम संसार के सभी विचारशील लोगों की आँखों के सामने उस समय आया जब उन्होंने अरबों और इसराइलों के बीच चलने वाले युद्ध में मध्यस्थ का कार्य सफलतापूर्वक सम्पन्न किया और लड़ाई की आग बुझाकर आशंकाओं को सान्त्वना में बदल दिया।

अमेरिकी प्रशासन में वे प्रथम नीग्रो थे जिन्होंने औपनिवेशिक मामलों में विशेषज्ञ का महत्वपूर्ण पद संभाला। सैनिक सूचना कार्यालय के बड़े पदाधिकारी रहे और विदेश विभाग के सलाहकार नियुक्त हुए। सन् 1949 में उनको अमेरिकी सरदार के सहायक विदेश सचिव का पद लेने के लिए आमंत्रित किया पर वे निजी कारणों में उस समय उसे स्वीकार न कर सके।

जिस प्रकार भारत में हरिजनों के प्रति ऊँच-नीच का भेद-भाव बरता जाता था वैसे ही अमेरिका में आमतौर से नीग्रो नस्ल के लोगों को गोरे लोग हेय दृष्टि से देखते हैं और उन्हें अपनी समानता के स्तर तक नहीं आने देते। कानून ने सुविधायें उन्हें दी हैं, पर व्यवहार में तो अभी भी उन पर बहुत थोड़ा अमल हो पाता है। कालेज में नीग्रो छात्रों के प्रवेश के प्रश्न को लेकर वहाँ अभी भी सत्याग्रह और प्रदर्शन करने पड़ते है। फिर जिस जमाने में डॉ. बुँचे को काम करना पड़ा, वह भेदभाव की दृष्टि से और भी बुरा समय था। उनकी प्रगति के मार्ग हर प्रकार अवरुद्ध थे। फिर भी अपनी प्रतिभा- लगन और अध्यवसाय के बल पर कोई व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी किस प्रकार प्रगति कर सकता है उसका उदाहरण उन्होंने उपस्थित कर ही दिया।

डॉ. बुँचे सन् 1904 में एक अत्यन्त निर्धन परिवार में जन्में। उनके पिता नाई का काम करके मुश्किल से रोटी कमाते थे। पितामह को तो गुलाम का जीवन बिताना पड़ा। अमेरिका में उस समय मनुष्यों को भी पशुओं की तरह खरीदा बेचा जाता था और वैसा ही उनसे काम लिया जाता था। इन शोषकों के शिकार जो लाखों नीग्रो बने थे उन्हीं में से एक बुँचे के पितामह भी थे। ऐसे घर में जन्मा लड़का नाई के अतिरिक्त और कोई ऊँचा काम कर भी कैसे सकता था।

दुर्भाग्य ने ‘बुँचे’ को गुलाम, और नाई का काम करने वाले पिछड़े वर्ग में अभावग्रस्त जन्म तो दिया ही, पर आगे भी अपना खिलवाड़ बन्द न क्रिया। तेरह वर्ष की आयु होने से पहले माँ-बाप दोनों ही गुजर गये। बेचारा अनाथ बालक सर्वथा असहाय रह गया। पेट की ज्वाला को शान्त करना और जीवित रहना उसके लिए उन दिनों अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न थे। जीवन-मरण से युद्ध की घड़ी सामने आ पहुँचने पर भी बालक हारा नहीं, उसने अपना साहस समेटा और गली कूँचो में अखबार बेचकर किसी प्रकार रोटी भर के लिये पैसे कमाता रहा। कुछ और बड़ा हुआ तो छोटी मोटी वैसी ही नौकरी करने लगा जैसी कि इस स्थिति के बच्चों को मिला करती है।

‘बुँचे’ का दुर्भाग्य प्रचण्ड प्रकोप करके पीछे पड़ा था। अनेक कठिनाइयों का सामना उन्हें रोज ही करना पड़ता था। जो सोचते और करते उसमें आये दिन बाधाएं उत्पन्न हो जाती, फिर भी साहस का धनी यह नीग्रो युवक निराश न हुआ। आशा का संबल पकड़े और परिश्रम, के सहारे उसने अपनी जीवन यात्रा जारी रखी। बचे समय में विद्याध्ययन जारी रखना उसका नित्य नियम था। ज्ञान की साधना को उसने अपना लक्ष्य माना और अध्ययन को प्राण प्रिय विषय मानकर उसके साधन जैसे भी जुट सकें जुटाता ही रहा।

समय बहुत लगा पर एक दिन वह आ ही पहुँचा, जब बुँचे ग्रेजुएट बने और इसके पश्चात उन्होंने हारवार्ड विश्वविद्यालय से राजनीति में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त कर ली। इतनी ऊँची शिक्षा प्राप्त करने वाले संसार के प्रथम नीग्रो थे डॉ. एफ. बुँचे।

जातीय हीनता और काली चमड़ी के कारण पग-पग पर मिलने वाले उपहास और तिरस्कार की रत्तीभर भी परवा न करते हुए उनने अपना कार्यक्रम जारी रखा। समाज सेवा के लिए एक निस्पृह परमार्थी का जीवन बिताते रहे। अपने वर्ग और देश के लिये ही नहीं समस्त संसार के लिए उनने सराहनीय सेवा कार्य किये उनकी चर्चा का न तो इन पंक्तियों में स्थान है और न उपयोग। महत्व कार्यों का नहीं उन गुणों का है जिनके कारण मनुष्य आगे बढ़ता है। बड़ी से बड़ी कठिनाइयों को परास्त करता हुआ अपने लिए प्रगति और आशा का मार्ग प्रशस्त करता है।

परिस्थितियों का महत्व है या गुणों का? इस प्रश्न का सही उत्तर देने के लिए डॉ. बुँचे का जीवन एक चमचमाता उदाहरण है। उनने असंख्य पिछड़े और अविकसित लोगों के सामने एक प्रेरणा के रूप में अपना जीवन रखा और मूक वाणी से यह प्रतिपादित किया कि दुर्भाव का अस्तित्व आशा और अध्यवसाय की तुलना में नगण्य के बराबर है। साहस और सद्गुणों को अपनाकर कोई भी व्यक्ति विघ्न बाधाओं को कुचलते हुए कितना भाग्य निर्माण कर सकता है। इसका एक जीवित प्रमाण डॉ. बुँचे के जीवन को पढ़ समझ कर सहज ही ज्ञात किया जा सकता है।

सन् 50 में उन्हें शान्ति प्रयत्नों के लिए विश्व-विख्यात “नोबेल पुरस्कार” मिला और उन्हें राष्ट्र संघ के अण्डर सेक्रेटरी पद में सम्मिलित किया गया। बुँचे का जीवन -आदर्श सज्जनता, श्रमशीलता, और आशा के रूप में निरन्तर बना रहा एक क्षण के लिये उनने इन विभूतियों से अपने को प्रथक न होने दिया।


अहेंकारी कबूतर

बात उस जमाने की है जब कबूतर झाड़ियों में बच्चे दिया करते थे। लोमड़ी आती और उनके अण्डे खा जाती। रखवाली का कोई ठीक प्रबन्ध न बन पड़ा तो कबूतरों ने दूसरी चिड़ियों से बचाव का उपाय पूछा। उनने कहा पेड़ पर घोंसला बनाने के अलावा और कोई चारा नहीं।

कबूतर ने घोंसला बनाया पर वह ठीक तरह बन न सका। आखिर उसने तय किया कि दूसरी चिड़ियों की सहायता से घोंसला बनाने का काम पूरा किया जाय।

चिड़ियों को बुलाया तो वे खुशी खुशी आई और कबूतर को अच्छा घोंसला बनाना सिखाने लगी। अभी बनना शुरू ही हुआ था कि कबूतर ने कहा- ऐसा बनाना तो हमें आता हैं यों तो हमीं बना लेंगे। चिड़ियां वापिस चली गई।

कबूतर ने बहुत कोशिश की पर घोंसला ठीक से बना नहीं। वह फिर चिड़ियों के पास गया। लीजती हुई वे फिर आई और तिनके ठीक तरह जमाना सिखाने लगी। आधा भी काम पूरा न हो पाया था कि कबूतर उचका। उसने कहा- “ऐसे तो मैं जानता ही हूँ।”

चिड़ियाँ वापिस चली गई। कबूतर लगा रहा पर वह बना फिर भी न सका। चिड़ियों के पास फिर पहुँचा तो उन्होंने साफ इनकार कर दिया और कहा - जो जानता कुछ नहीं और मानता है कि मैं सब कुछ जानता हूँ, ऐसे मूर्ख को कोई कुछ नहीं सिखा सकता।

नासमझ कबूतर अपने ओछे अहंकार में किसी से कुछ न सीख सका और अभी तक उसका घोंसला अन्य चिड़ियों की बनिस्बत भौंड़ा ही बनता है।


सन्त-समागम

पहले अपने को बदलो

सम्पूर्ण भारत के उद्धार का भार बिना कारण सिर पर मत लो। अपना निज का उद्धार करो। इतना भार काफी है। सब कुछ अपने व्यक्तित्व पर ही लागू करना चाहिए। हम स्वयं ही भारतवर्ष हैं। बस, यही मानने में आत्मा का बड़प्पन है। तुम्हारा उद्धार ही भारतवर्ष का उद्धार है शेष सब व्यर्थ है। ढोंग है। तुम में सच्चे आत्म-प्रेम का रस उत्पन्न हो, इसी में तुम डूबे रहो।

-महात्मा गाँधी

अपना स्वरूप पहचानो

यदि तुम अपने आपको समस्त वस्तुओं का मालिक और अधिकारी बनाना चाहते हो तो उठो, अपने स्वरूप में झण्डे गाड़ो, अपने असली स्वरूप में लीन हो जाओ। तुम्हारा अपने स्वरूप में लीन होना ही तुम्हें सारे संसार का सम्राट बना देगा। अपने इस वास्तविक साम्राज्य का सिंहासन सम्भालने पर तुम समस्त धरती और आकाश अर्थात् लोक और परलोक के स्वामी और अधिकारी हो जाओगे। आवश्यकता उस असली साम्राज्य पाने की है। सुधार के इच्छुक जितना ही अपने वास्तविक स्वरूप से नीचे रहेंगे, शेष लोग उससे भी निचली सीढ़ी पर खड़े रहेंगे। इसलिए ये संसार का उद्धार करने की इच्छा करने वालो! यदि सचमुच ही तुम संसार का कल्याण चाहते हो तो अपने स्वरूप को पहचानो, उसी में स्थित हो जाओ। संसार के समस्त पदार्थ आदि तो अपने आप तुम्हारी सेवा को तत्पर हो जायेंगे। तुम्हें उनकी इच्छा करने की भी आवश्यकता न होगी। अतः उठो। अपने स्वरूप को पहचानो और विराट स्वरूप के सिंहासन पर आरुढ़ हो। फिर तो तुम्हारे केवल एक संकेत से भी सारे संसार के काम पूरे होते चले जायेंगे। -स्वामी रामतीर्थ

साँसारिक लोगों की प्रकृति

कमानीदार गद्दे पर बैठने से वह नीचे को दब जाता है, परन्तु उठने के साथ ही फिर पूर्ववत् ऊपर उठ जाता है। इसी तरह साँसारिक पुरुष जब तक धर्म की बातें सुनते हैं, तब-तक उनके विचार धार्मिकता से पूर्ण रहते हैं परन्तु साँसारिक व्यवहारों में लगने के साथ ही वे इन श्रेष्ठ और ऊंचे आदर्शों को भूल कर फिर पूर्ववत् अपवित्र विचार वाले हो जाते हैं।

लोहा जब तक भट्टी में रहता है, लाल रहता है, भट्टी से बाहर निकालते ही फिर काला हो जाता है। साँसारिक मनुष्य की भी यही हालत है, वह पूजा के स्थान में या साधुओं के सत्संग में रहने के समय धार्मिक भावों से भरा रहता है, पर इनसे अलग होते ही सारे श्रेष्ठ भावों को खो बैठता है।

मक्खियाँ हलवाई की दुकान पर बिक्री के लिए रखी हुई मिठाइयों पर आकर बैठती हैं, परन्तु मैले से भरी हुई टोकरी देखते ही तुरन्त वे उड़ कर उसी पर जा बैठती है। मधुमक्खी ऐसा नहीं करती, वह सर्वदा फूलों के मधु-आस्वादन में ही लगी रहती है।

संसार में फँसे हुए मनुष्य उन मक्खियों की तरह ही कभी-कभी दिव्यानन्द का क्षणिक आस्वाद पाने पर भी, विषय रूपी मैले की तरफ स्वाभाविक प्रवृत्ति होने के कारण फिर इसी तरफ लौट आते हैं। पर साधु-पुरुष उन मधुमक्खियों की तरह सदा सर्वकाल दिव्य मूर्ति के आनंददायक ध्यान ही में मग्न रहते हैं।

मछली पकड़ने के लिए बने हुए, बाँस के जाल में चमकते हुए पानी को जाते देखकर, छोटी-छोटी मछलियाँ उसमें बड़ी प्रसन्नता से चली जाती हैं, परन्तु जाने के बाद वे बाहर नहीं निकल सकती, फँस जाती है। इसी तरह संसार की मिथ्या चमक-दमक से मोहित हुए मूर्ख मनुष्य इस संसार में चले आते हैं, पर लौट जाने का रास्ता उतना सहज न होने के कारण उन छोटी मछलियों की तरह यही फँस जाते है और सदा के लिए बँध जाते हैं।

-रामकृष्ण परमहंस

श्रद्धा नष्ट न करें

‘यह धारण मिथ्या है कि श्रद्धा अन्धी है और तर्क के आँख हैं। श्रद्धा सुकुमारता लिए हुए है और तर्क कर्कगता। श्रद्धा में यह विशेषता है कि वह कल्पना द्वारा बनाई हुई अपने श्रद्धेय की मूर्ति को साक्षात् मान लेती है जब कि तर्क साक्षात् दीखने वाले श्रद्धेय पुरुष को भी संदेह भरी दृष्टि से देखता है।

हजारों बूंदें आकाश से गिरती हैं पर उन्हें झेलने वाला ही झेलता है चिकने घड़े पर जिस प्रकार उनका कोई असर नहीं पड़ता उसी प्रकार कितनी ही कल्पना और श्रद्धा से हम प्रवचन और भाषण सुनें परन्तु यथार्थता तो जब तक नहीं आएगी, तब तक कुछ हो नहीं सकता। आवश्यकता है श्रोता सुनने वाला गुणग्राही बने, न कि सरौता-कतरने वाला, फूट पैदा करने वाला।

शिक्षा का स्तर कितना गिर गया है। न शिष्य मास्टर का आदर करता है और न मास्टर शिष्य की परवाह। शिक्षा वही पा सकता है जो विनीत है जो अनुशासित है। राष्ट्र में अनुशासनहीनता बढ़ी है, इसका कारण है कि लोगों में विनय-भावना नहीं है, जब तक विनय-भावना नहीं होगी, विचारों में क्रान्ति नहीं आयेगी, श्रद्धा नहीं जगेगी, तब तक उनका समाधान नहीं हो सकेगा और जब तक समाधान नहीं होगा तब तक इसी प्रकार की नाना भ्रांतियां लोगों के सामने रहेंगी और राष्ट्र अनेकानेक चिन्ताओं में ग्रस्त रहेगा।

-आचार्य तुलसी

आत्म-चिन्तन

शास्त्र का आदेश है उत्थाय-उत्थाय बोद्धव्यं किमद्य सुकृतं कृंत।” अर्थात् उठ-उठ कर सोचना चाहिए कि आज मैंने कौन सा भला काम किया। क्योंकि “आयुष्य खण्डं आदाय रवि अस्तं गमिष्यति।” अर्थात् सूर्य हमारी आयु का एक टुकड़ा लेकर अस्त हो जायगा, इसलिये बार-बार सोचना चाहिये कि हमने क्या भला किया। रोज-रोज इस पर विचार करने की आवश्यकता है। इसलिए शास्त्र-वचन है-”अहरहः सन्ध्याँ उपासित” प्रतिदिन सन्ध्योपासना करनी चाहिये। सन्धिकाल दो हैं। सन्ध्या में उषा भी आ जाती है। ये दोनों ध्यान करने के काल हैं। सन्ध्या यानी सम्यक् ध्यान-उत्तम ध्यान। अर्थ से भरा हुआ यह शब्द है। सन्ध्या-समय जो विविध रंगों का चित्र फूट पड़ता है, उसी का ध्यान करने की बात नहीं है। वह तो एक प्रतीक है। हमें इस समय भगवान का व अपनी कृति का भी ध्यान करना चाहिए। इसी प्रकार पूर्णिमा-अमावस्या के पूर्व भी ध्यान के लिए है। ‘पर्व’ यानी एक मुकाम, जहाँ हमें चिन्तन करना चाहिए। इसी तरह उत्सव के दिन भी होते हैं- जैसे शरदोत्सव, वसन्तोत्सव। पिछले काल में हमने किया, इसको सोचने के ये मौके हैं। इनमें एक मौका जन्म दिन का भी है।

-सन्त बिनोवा

साक्षात् प्रेम स्वरूप

जो प्रेमी स्वार्थपरता और भय के परे हो गया है, जो फलाकाँक्षा शून्य हो गया है, उसका आदर्श क्या है ? वह परमेश्वर से भी यही कहेगा, “तुम्हें अपना सर्वस्व अर्पण करता हूँ, मैं तुमसे कोई चीज नहीं चाहता। वास्तव में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे मैं अपना कह सकूँ।” जब मनुष्य इस प्रकार की अवस्था प्राप्त कर लेता है, तब उसका आदर्श-पूर्ण प्रेम का आदर्श हो जाता है, वह प्रेम-जनित पूर्व निर्भीकता के आदर्श में परिणत हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति के सर्वोच्च आदर्श में किसी प्रकार की संकीर्णता नहीं रह जाती, वह किसी विशेष भाव द्वारा सीमित नहीं रहता। वह आदर्श तो सार्वभौमिक प्रेम, अनन्त और असीम प्रेम, पूर्ण स्वतन्त्र प्रेम का आदर्श होता है, यही क्यों, वह साक्षात् प्रेम-स्वरूप होता है। तब प्रेम धर्म के इस महान् आदर्श की उपासना किसी प्रतीक के सहारे नहीं करनी पड़ती, वरन् तब तो यह आदर्श के रूप में ही उपासित होता है। इस प्रकार के एक सार्वभौमिक आदर्श की आदर्श-रूप से उपासना सबसे उत्कृष्ट प्रकार की पराभक्ति है।

कलिःशयानो भवति संजहानस्तु द्वापरः।

उत्तिष्ठन्त्रेता भवति कृपं सम्पद्यते चरन्॥

चरैवेति, चरैवेति, चरंवेति।

-स्वामी विवेकानन्द


हमारे समाज में नारी की स्थिति

जिन मनीषियों ने मानव समाज की रचना और नृतत्व विज्ञान पर गंभीरतापूर्वक विचार किया है उन्होंने नर-नारी की स्थिति एवं महत्ता समान बतलायी है-दोनों को एक बराबर महत्व दिया है। क्योंकि दोनों में से एक के बिना भी समाज का अस्तित्व कायम नहीं रह सकता और न जीवन सुविधापूर्वक व्यतीत हो सकता है। पर वास्तविक स्थिति में यह विचार कार्य रूप में परिणित होता दिखाई नहीं देता, वरन् समाज की गति इसके विपरीत ही दिखाई पड़ती है। दुर्भाग्य से हमारे देश की हालत यह है कि नारी को पुरुष की अपेक्षा सब प्रकार से हीन और उसके आश्रित मान लिया गया है। यद्यपि मनु जैसे प्राचीन विचारक और स्मृतिकार स्त्रियों को बहुत पूजनीय बतला गये और उनका सदैव आदर सम्मान करते रहने की आज्ञा दे गये है पर आज उन बातों पर किसी को अमल करते नहीं देखा जाता। नर और नारी दोनों अपनी वास्तविक स्थिति और कर्त्तव्यों को भुला बैठे हैं और इसलिये दुःख तथा कठिनाइयों में फँसकर अवनति के पाश में जकड़े हुये हैं।

भारत के प्राचीन अध्यात्म-विज्ञान के अनुसार आत्मा की पूर्णता प्राप्त करने के लिये ही नर-नारी का आविर्भाव हुआ है और दोनों में कुछ ऐसे पृथक-पृथक गुणों का विकास किया गया है कि जिनके सम्मिलन से सर्वोच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त की जा सकती है। शास्त्रों के मतानुसार पुरुष में जिन शक्तियों का विकास हुआ है उनमें ज्ञान, बल, तेज की प्रधानता है और नारी को जो शक्तियाँ प्रदान की गई हैं उनमें श्रद्धा, भक्ति, सेवा की प्रमुखता है। ये दोनों ही प्रकार की गुण मानव-समाज के प्रगति और उन्नति के लिए अनिवार्य हैं। यही कारण है कि जब तक स्त्री और पुरुष अपने-अपने कर्त्तव्यों का यथोचित रीति से पालन करते रहते हैं तब तक समाज में सुख, संतोष, शक्ति, प्रगति के दृश्य दिखाई देते रहते हैं और सब प्रकार की अमंगलजनक परिस्थितियाँ टलती रहती हैं। पर इसके विपरीत जहाँ वे अपने स्वाभाविक कर्त्तव्यों को भूल जाते हैं और एक दूसरे के अधिकारों का अन्यायपूर्वक अपहरण करने की चेष्टा करते हैं वहाँ तरह-तरह की कठिनाइयाँ आपत्तियाँ और क्लेश ही उत्पन्न होते हैं और समाज अवनति की ओर अग्रसर होने लगता है।

जिस प्रकार नर और नारी में पारस्परिक प्रतियोगिता एक दूसरे के अधिकारों तथा कर्त्तव्यों पर हस्तक्षेप अप्राकृतिक और समाज हित के लिये घातक है उसी प्रकार नारी को नर की अपेक्षाहीन अथवा घटिया समझने की प्रवृत्ति भी असत्य और सर्वथा त्याज्य है। यह ठीक है कि बहुत समय से संसार के एक बड़े भाग में पुरुष का कार्यक्षेत्र घर के बाहर रहा है और स्त्री को घर के भीतर ही रह कर अपने कर्त्तव्य का पालन करना पड़ा है। इसके परिणाम स्वरूप पुरुष में शारीरिक शक्ति, साहस, पुरुषार्थ, सूझबूझ, बुद्धिमता का विशेष रूप से विकास हो गया है। इसके विपरीत नारी का मुख्य कार्य सन्तानोत्पादन तथा शिशु-पालन रहा है, जिसमें उसे एक प्रकार की साधना और तपस्या का जीवन बिताना पड़ा है। सन्तान के लिये माता को कितना त्याग करना पड़ता है और अनेक बार आत्म-बलिदान तक कर देना पड़ता है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। नारी का केवल यही एक गुण इतने महत्व का है जिनके कारण पुरुष को उसके सामने सदैव नतमस्तक रहना चाहिए और कभी उसके हीनत्व की भावना का मन में उठाना भी न चाहिये। यदि नारी आज शारीरिक शक्ति, विद्या, बुद्धि में कुछ पिछड़ी हुई दिखाई देती है तो इसका कारण यही है कि उसने अपनी समस्त शक्ति और साधनों को पुरुष के उच्च निर्माण में लगा दिया है। इस स्थिति में उसमें हीनात्मा की कल्पना करना विवेक शून्यता के सिवाय और कुछ नहीं कहा जा सकता।

साथ ही यह भी प्रत्यक्ष है कि जहाँ कहीं अवसर मिला है, आवश्यकता पड़ी है, अनेक नारियों ने बड़े से बड़े कार्यों को पूर्ण योग्यता से कर दिखाया है। उस समय उनकी शक्ति, प्रतिभा और योग्यता का लोहा पुरुषों को भी मानना पड़ा है। विदेशों को बात को छोड़ दीजिये, जहाँ किसी समय नारियों के राज्य भी कायम थे और वे पुरुषों को अपने नियंत्रण में उसी प्रकार रखती थीं और अब तक भी रखती हैं, जिस प्रकार हमारे यहाँ स्त्रियों को रखा जाता है। हमारे देश में भी समय-समय पर ऐसी नारियाँ होती आई हैं जिन्होंने आवश्यकता पड़ने पर पुरुषों से भी अधिक शौर्य, वीरता, बुद्धिमता, आध्यात्मिकता का परिचय दिया है, और इस प्रकार यह सिद्ध कर दिया है कि वास्तव में नारी किसी दृष्टि से हीन नहीं है, वरन् उसने समाज के कल्याण, हित, सुव्यवस्था के लिये वर्तमान स्थिति को स्वीकार किया है। इसके लिये समाज को उनका सदैव कृतज्ञ होना चाहिये, उनके दर्जे को किसी प्रकार नीचा समझने की बात तो घोर मूर्खता और अज्ञान की परिचायक ही है।

फिर भी संयोग और परिस्थितियों के कारण वर्तमान समय में हमारे देश में नारियों की जो स्थिति है वह न तो उनके लिये शोभनीय और सुखप्रद है और न समाज के लिये सम्मानजनक और कल्याणकारी है। आज अधिकांश पुरुषों की यही धारणा बन गई है कि नारी का स्थान केवल घर के भीतर है और उसका काम पुरुष की कामुकता की भूख को शान्त करना, सन्तान पालन, भोजन बनाना तथा अन्य घर की सेवा के कामों को करना है। वे यह भी समझते हैं कि चूँकि पुरुष धन कमाकर लाता है, इसलिये स्त्री उसकी आश्रित है और उसे उसकी प्रत्येक आज्ञा को बिना ननुमन किये मानना चाहिए। कितने ही लोग तो स्त्री का धर्म ही यह बतलाते है कि सब प्रकार के सुख-दुख, मान-अपमान तथा कष्टों को सहकर पति और परिवार की सेवा में पूर्णतया संलग्न रहे। ऐसे पुरुषों की भी कमी नहीं है जो स्त्रियों को बहुत दबाकर, कठोर नियंत्रण में रखने के पक्षपाती है जिससे उनमें अपने अधिकारों का अथवा आत्मसम्मान का भाव पैदा न हो जाय और वे उनके अन्यायों का विरोध करने लगें।

इस प्रकार की विचारधारा का परिणाम यह हुआ है कि इस देश की बहुसंख्यक स्त्रियाँ अत्यन्त दुर्दशा को प्राप्त हो गई है। उनको सैकड़ों वर्षों से पर्दे के भीतर कैदी की तरह रखा जाता है, उनको पढ़ाना-लिखाना बुरा समझा जाता है और अवसर पड़ने पर ये अपने आवश्यक कामों को ठीक ढंग से पूरा करने में असमर्थ रहती हैं। यदि पति की असामयिक मृत्यु हो जाय तो ऐसी स्त्रियाँ उनके चलते हुये कारबार, व्यापार, जायदाद आदि की स्वयं व्यवस्था नहीं कर सकती। उनको विवश होकर किसी पास के या दूर के पुरुष सम्बन्धों का सहारा लेना पड़ता है जो प्रायः उनको लूटकर अपना घर भरने का ही प्रयत्न करते हैं। इतना ही नहीं समयोचित ज्ञान के अभाव और मानसिक संकीर्णता के कारण वे अपने परिवार तथा घर की उचित व्यवस्था भी नहीं कर पाती। प्रायः पारस्परिक झगड़ों, वस्त्राभूषणों में अन्य लोगों की प्रतियोगिता, दिखावटी रीति रस्मों में अन्धाधुन्ध खर्च करके वे घर की आर्थिक स्थिति को निर्बल बना देती हैं। अज्ञान और अविद्या के कारण वे ही सब प्रकार के अन्ध-विश्वासों में अधिक फंसती है तथा पंडित, पुजारी, स्याने, ओझा आदि के चक्कर में पड़कर हर तरह से ठगी जाती हैं। इस प्रकार वे स्वयं तो दुःखी पीड़ित होती ही हैं साथ ही सब घर की हानि और कष्टों में भी वृद्धि करती हैं। पर जिस अज्ञान तथा अन्धकार की दशा में उनको रखा गया है उसमें इसके सिवा उनसे अन्य प्रकार की आशा भी कैसे की जा सकती है।

समाज के उत्थान और राष्ट्र को शक्तिमान बनाने के लिये इस परिस्थिति में परिवर्तन करना अनिवार्य है। देश की जनसंख्या में से आधा भाग नारियों का है। यदि वह ऐसी अविकसित, पिछड़ी हुई, कर्त्तव्य ज्ञान से रहित अवस्था में पड़ा रहेगा तो हम संसार के अन्य उन्नतिशील देशों के मुकाबले में कभी न टिक सकेंगे और हमको पुनः किसी न किसी शक्तिशाली का आश्रित या अधीन ही होना पड़ेगा। प्रकृति ने स्त्री को पुरुष का पूरक, सहायक बनाया है, पर ऐसी परिस्थिति में वे उसके लिये भारस्वरूप, बाधास्वरूप और उसकी प्रगति को रोकने वाली सिद्ध होती है।

नर और नारी का दर्जा समानता का है। जीवात्मा और प्रकृति की दृष्टि से उनमें छोटे-बड़े का कोई भेदभाव नहीं किया गया है। अब यह हमारा काम है कि हम दोनों को उपर्युक्त कार्यों में नियोजित करके उन्हें उपयोगी बनावें - समाज के सुख और समृद्धि का साधन होने का अवसर दें। अब तक की गलती का सुधार करके नारी को उसका उचित और उच्च स्थान देना परमावश्यक है जिससे वह अपने समाजोत्थान के महान कर्त्तव्य को भली प्रकार पूरा कर सकें।


वयोवृद्ध और उनका आदेश

वृद्धावस्था सम्मान और गौरव की स्थिति है। यौवन समाप्त हो जाने पर इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और शरीर अशक्त बनता जाता है, इसलिए शारीरिक दृष्टि से उसे कष्टकारक भी माना जाता है। पर ज्ञान और अनुभव की दृष्टि से बुढ़ापे तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य की स्थिति काफी अच्छी हो जाती है। जवानी में जोश तो रहता है पर होश की कमी पाई जाती है। अनुभव के अभाव में नवयुवक प्रायः असंगत मार्ग अपना लेते है और पीछे उसका परिणाम भोगते है। अपने तथा दूसरों के जीवन में घटित होती रहने वाली बहुमुखी घटनाओं का अनुभव एकत्रित करके वृद्धावस्था तक मनुष्य बौद्धिक दृष्टि से बहुत कुछ सीख लेता है, इसलिए उनकी सलाह ओर शिक्षा आमतौर से श्रेयस्कर मानी जाती है। बच्चों और नवयुवकों को सदा से यही शिक्षा दी जाती रही है कि वृद्धजनों का आदर करना चाहिए उनकी सलाह को मानना और आदेश का पालन करना चाहिए।

आदर का आधार -

आदर इसलिए करना चाहिए कि अधिक आयु हो जाने पर मनुष्य अधिक सत्कर्म कर लेता है। मानव-जीवन सत्कर्मों के लिए ही तो मिला है। सन्मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति आयु वृद्धि के साथ-साथ सत्कर्मों की पूँजी भी बढ़ाता चलेगा। आज आमतौर से धनी लोगों का जिस प्रकार समाज में सम्मान होता है उसी प्रकार विचारशीलों की दृष्टि में अनुभवी, लोक-सेवी और धर्म-परायण लोगों को भी प्रतिष्ठा होती है। जो कोई वृद्ध पुरुष अपने जीवन में सन्मार्ग-गामी रहा है और विवेक की दृष्टि से अपनी मनोभूमि को परिमार्जित करता रहता है तो स्वभावतः उसका सर्वत्र आदर होना चाहिए। छोटी आयु के लोगों को उसका आदेश मानना ही चाहिए। गुरुजनों का, वयोवृद्धों का आदर करना, सुख पहुँचाना शास्त्रों में एक श्रेष्ठ धर्म कर्त्तव्य माना गया है। पारिवारिक सुव्यवस्था की दृष्टि से तो यह पद्धति और भी अधिक उपयोगी है। जहाँ वृद्ध-जन आदरपूर्वक जीते हैं और सुख पाते हैं वह घर सदा फलता-फूलता ही रहता है।

अपवादों की सम्भावना-

इस व्यवस्था में कई बार अपवाद भी उत्पन्न होते है। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्होंने भ्रष्ट-जीवन व्यतीत किया है। वृद्धावस्था में अनेक कुसंस्कार और भी अधिक विकृत रूप में उपस्थित होते है। स्वयं तो शरीर और मन की दुर्बलता से कुकर्म नहीं कर पाते पर दूसरों को खोटी सलाह देते रहते है। उनकी बात न मानी जाय तो नाराज होते हैं, और हठ करते है। धर्म की दुहाई देकर, बड़ों की आज्ञा पालन करना उचित बता कर अपनी अनुपयुक्त रीति-नीति पर छोटों को चलने के लिए विवश करते है। ऐसी दशा में उनके लिए एक धर्म-संकट उपस्थित हो जाता है, जो बड़ों की आज्ञा मानने उनका आदर करने के साथ-साथ उचित, अनुचित एवं कर्त्तव्य, अकर्त्तव्य का भी विचार करते हैं और सन्मार्ग को प्रधानता देना चाहते है।

एक ओर वृद्ध पुरुष हठ करते हैं कि उन्हें ऐसा करना चाहिए, दूसरी ओर औचित्य यह कहता है कि यह आदेश गलत है। धर्म और कर्त्तव्य के विपरीत है। ऐसी दशा में दो में से एक का चुनाव करना पड़ता है। गुरुजनों की बात मानें या औचित्य को शिरोधार्य करें? ऐसा धर्म संकट उपस्थित होने पर धर्म, औचित्य एवं कर्त्तव्य को ही प्रधानता दी जानी चाहिए।

गोस्वामी तुलसीदास जी का एक पद्य इस प्रसंग में अच्छा मार्गदर्शन करता है। कहा गया है कि :-

“जा के प्रिय न राम वैदेही।

त्जिये ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम स्नेही।

पिता तज्यो प्रहलाद, विभीषण बन्धु, भरत महतारी।

गुरु बलि तज्यो, कंत ब्रज वनितन भेंमुद मंगलकारी॥

प्रहलाद ने अपने पिता हिरण्यकश्यपु की आज्ञा का उल्लंघन किया, विभीषण ने भाई रावण को त्यागा, भरत ने माता कैकेयी के आदेश को न माना, राजा बलि ने गुरु शुक्राचार्य की धर्म विरोधी सलाह ठुकराई, गोपियों ने कृष्ण भक्ति के लिए पतियों की अप्रसन्नता पर ध्यान न दिया। उतना होते हुए भी यह सब अवस्थाएं मंगलमय ही मानी गईं।

संकीर्णता का वातावरण-

कई बार आदर्शमय जीवन की महत्ता से अपरिचित होने और जिस संकीर्ण वातावरण में जीवन भर रहने का अवसर मिला है उसी से प्रभावित होने के कारण वृद्धजन उसी छोटी सीमा में रहने की सलाह अपने से छोटों को देते हैं। इसमें उनका अज्ञान और मोह ही प्रधान कारण होता है। शिक्षा की कमी, सीमित दायरा और दूर-दृष्टि के अभाव में कई बार वृद्धजन ऐसी सलाह देते देखे गये हैं ऐसे हठ करते देखे गये हैं कि यदि उनकी बात मानी जाय तो उससे केवल भयंकर दुष्परिणाम ही निकल सकते है। बाल-हठ, त्रिया-हठ, राज-हठ की तरह एक वृद्ध-हठ भी होती है जिसमें वे हर सलाह को अपने सम्मान का प्रश्न बना लेते हैं। और उसके न माने जाने पर अपना अपमान अनुभव करते हैं। विचार-विनिमय की, और उचित-अनुचित का विवेचन करने की गुंजाइश न छोड़कर केवल आदेश को ही सर्वोपरि मानना किसी भी प्रकार उपयुक्त नहीं कहा जा सकता।

क्या यह उचित है?

एक पिता अपनी कन्या का विवाह सम्बन्ध किसी प्रलोभन के वशीभूत हो कर अनुपयुक्त व्यक्ति के साथ पक्का कर आते हैं। कन्या, उसके भाई, बहिन तथा माता इस अत्याचार के विरुद्ध हैं पर पिता महोदय गृह स्वामी होने के कारण अपनी ही बात पर अड़े हैं और उस अनुचित कार्य को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनायें हुए हैं। आप सोचें कि ऐसी स्थिति में वयोवृद्ध का आदेश माना जाने योग्य है या नहीं ?

एक युवक का विवाह हुए कई वर्ष हो गये। संतान नहीं हुई। पिताजी पोते का मुँह जल्दी देखने के लिए आतुर हैं और अपने बेटे का दूसरा विवाह करने की तैयारी में लगे हैं। आप ही बतायें कि उस पिता की इच्छा उचित है या अनुचित है ?

पिछले स्वाधीनता संग्राम में भाग लेने वालों को घर के बढ़े बूढ़ों का विरोध सहना पड़ता था। आज भी राष्ट्र रक्षा के लिए जो सैनिक भर्ती हुए है उन सब को अपने बड़े-बूढ़ों की सहमति कहाँ प्राप्त हो सकती है? मोह की प्रबलता भला इतने बड़े त्याग की बात सहन भी कैसे कर सकती है?

एक पिता मिलावट और बेईमानी का व्यापार करते हैं। टैक्स की चोरी करते हैं। जवान लड़का इससे सहमत नहीं होता। पिताजी इसमें घर की आर्थिक हानि की सम्भावना सोचते हैं और लड़के पर दबाव डालते हैं। बड़ों की आज्ञा आंखें बन्द करके मानने वाले धर्मोपदेश सुनाते हैं। लड़का सोचता है क्या करूं? आप उसे क्या सलाह देंगे?

अनुपयुक्त का मोह -

कितनी ही माताएं अपने बच्चों को आँखों के आगे रखना चाहती हैं। घर से दूर गाँव में पढ़ने नहीं भेजना चाहतीं। बच्चा अशिक्षित रह जाता है। क्या यह दृष्टिकोण उचित था? छोटे बच्चों की जल्दी शादी करने के व्यामोह में कितने ही माता-पिता अपने बच्चों की जिन्दगी बर्बाद करते हैं। क्या उनका यह निर्माण बुद्धिमता पूर्ण होता है? उसी प्रकार समाजिक कुरीतियों के अन्ध-विश्वासी होने के कारण कई वृद्धजन हठवश कोई खर्चीला कार्यक्रम घर वालों पर थोप देते हैं और उससे परिवार की अर्थव्यवस्था ही नष्ट हो जाती है। कई वृद्धाएं पर्दा प्रथा की कट्टर पक्षपाती होने के कारण अपनी बहू बेटियों को पढ़ने नहीं देती, घर से बाहर पैर नहीं रखने देती, अपने शासन के आगे दूसरों की इच्छा और आवश्यकता की परवाह नहीं करतीं। ऐसी स्थिति में उनका आदेश चलता भी रहे तो क्या भीतर ही भीतर घोर असंतोष न सुलगता रहेगा और उसका दुष्परिणाम उत्पन्न न होगा ?

पिता अपने ही व्यवसाय में अपने बच्चों को लगायें रखना चाहता है पर बच्चों की प्रतिभा एवं अभिरुचि दूसरी दिशा में सुविधा खोजती है। क्या यह उचित होगा कि बच्चों की आकांक्षा को निरस्त करके बड़ों की व्यवस्था ही प्रधान रहे ? यदि ऐसा ही किया जाता रहता तो संसार के लगभग सभी महापुरुष अपने पिता के आशाकारी बेटे और उन्हीं के छोटे-मोटे व्यवसायों को चलाते रहने वाले तुच्छ व्यक्ति बने रहते।

महापुरुषों की परम्परा-

संसार के प्रायः सभी महान व्यक्तियों ने अपने घर वालों के मत से भिन्न दिशा में कदम उठाया है और वह उनके लिए कुछ अशुभ नहीं हुआ। भगवान बुद्ध, महावीर, गान्धी, शंकराचार्य, दयानन्द, मीरा, नानक आदि किसी भी महापुरुष को उनके कार्यों के लिए घर वालों का प्रोत्साहन कहाँ प्राप्त था? घर की परम्पराओं से जरा भी भिन्न बात सोचने पर आमतौर से वृद्धजनों का विरोध सहना पड़ता है। छोटी-सी सामाजिक कुरीति की उपेक्षा करने की बात तक पर घर में कुहराम मच जाता है। ऐसी दशा में इन वयोवृद्धों को ही सब कुछ मान लिया जाय तो प्रगति की सम्भावना ही समाप्त हो जायेगी।

संसार में समझदार और वृद्ध पुरुषों की कमी नहीं। उनके अनुभव तथा ज्ञान से नई पीढ़ी का भारी मार्गदर्शन होता है। इसीलिए उनकी महत्ता को सदा से अक्षुण्य रखा जाता रहा है। गुरुजनों की सेवा, शिक्षा और आज्ञा का समुचित ध्यान रखना कर्त्तव्य माना गया है। वैसा ही हमें करना भी चाहिए। उनके शारीरिक सुख और सुविधा का तो पूरा-पूरा ही ध्यान रखा जाना चाहिए और यदि उनका कोई सुझाव या आदेश व्यवहारिक न हो तो कम से कम अपमान के शब्दों में प्रत्युत्तर तो नहीं ही देना चाहिए। ऐसे प्रसंगों पर चुप हो जाने से तात्कालिक कटुता उत्पन्न होने से रोकी जा सकती है।

औचित्य ही सर्वोपरि है-

औचित्य और आज्ञा के धर्म संकट में जो उचित है, जो धर्म है जो कर्त्तव्य है उसे ही प्रधानता दी जानी चाहिए। वृद्ध पुरुष बड़े है पर धर्म कर्त्तव्य उससे भी बड़ा हैं। बड़ों का आदेश पालन किया जाना चाहिए पर विवेक की पुकार उससे भी पहले सुनी जानी चाहिए। व्यामोह यदि वृद्धों के कलेवर में प्रवेश करके बोले तो उसे सुनने से पूर्व औचित्य का ध्यान आवश्यक है फिर चाहे वह बालक के मुख से ही उच्चारित हुआ हो। आयु-वृद्ध से ज्ञान- वृद्ध बड़ा है। आयु का महत्व निश्चय ही बहुत है पर विवेक से बढ़कर उसकी महत्ता स्वीकार नहीं की जा सकती। बड़ों की सभी बातें हम मानें, उनको सब प्रकार सुखी संतुष्ट बनाने का प्रयत्न करें पर जब वे अनैतिक, असंगत, अविवेक पूर्ण आदेश देने लगें तो उसकी पूर्ति के लिए तत्परता दिखाना आवश्यक नहीं। वृद्धावस्था की प्रतिष्ठा, ज्ञान, विवेक, धर्म और दूरदर्शिता के कारण ही होती है यदि यह तत्व उसमें न रहे तो वृद्ध पुरुष गुरुजन न रहकर बूढ़े आदमी मात्र रह जाते हैं। हमें वृद्ध पुरुषों और गुरुजनों का परिपूर्ण अनुगमन करना चाहिए पर यह जरूरी नहीं कि सफेद बालों के कारण विवेक-हीन बूढ़े आदमी भी हमारे मार्ग-दर्शक बनें ही।


सच्चा जन-नेता

सन् 1919 की बात है। रूस के जन नेता लेनिन पर उसके शत्रुओं ने घातक आक्रमण किया और वे घायल होकर रोग शय्या पर गिर पड़े। अभी ठीक तरह अच्छे भी नहीं हो पाये थे कि एक महत्वपूर्ण रेलवे लाइन टूट गई। उसकी तुरन्त मरम्मत किया जाना आवश्यक था। देशभक्त लोगों ने वैतनिक मजदूरों पर निर्भर रहना पर्याप्त न समझा और वे बहुत बड़ी संख्या में अवैतनिक रूप में इस मरम्मत को जल्दी पूरा करने में लग गये। काम बड़ा था फिर भी जल्दी पूरा हो गया।

काम पूरा होने पर जब हर्षोत्सव हुआ तो देखा कि लेनिन मामूली कुली की तरह उन्हीं मजदूरों की पंक्ति में बैठे थे। रुग्णता के कारण दुर्बल रहते हुए भी लठ्ठे ढोने का कड़ा काम बराबर करते रहे और अपने साथियों में उत्साह की भावना भरते रहे।

आश्चर्यचकित लोगों ने पूछा-आप जैसे जन-नेता को अपने स्वास्थ्य की चिन्ता करते हुए इतना कठिन काम नहीं करना चाहिए था। लेनिन ने हँसते हुए कहा-जो इतना भी न कर सके उसे जन-नेता कौन कहेगा?


हमारी संकीर्णताजन्य दुष्प्रवृत्ति

वैदिक-कालीन समाज में और उसके पश्चात् जब चार आश्रमों वाली समाज की स्थापना हुई तो यहाँ के मनुष्यों के सामने संभवतः एक ऊँचा सामूहिक आदर्श था कि प्रत्येक को अपनी शक्ति, बल, प्रतिभा, विद्वता का उपयोग समाज की प्रगति के लिये करना चाहिए। ब्रह्मचारी का उपनयन संस्कार किये जाने के अवसर पर उस मानव की आध्यात्मिकता और व्यापकता का उपदेश दिया जाता था और उसे सदैव उसे उपदेश का ध्यान बना रहे उसके चिह्न स्वरूप यज्ञोपवीत धारण कराया जाता था। जब तक वह प्रथा जीवनयुक्त रही यहाँ के सभी महान पुरुष अपनी शक्तियों को समस्त समाज के लिये उपयोग में लाते रहे। जो ऋषि-महर्षि एकान्त में रहकर वर्षों तक कठोर तपस्या करते थे वे भी शक्ति को प्राप्त करके फिर से लोकालय में आकर उसका उपयोग समाज की प्रगति और सेवा के लिये ही करते थे। इसी प्रवृत्ति के कारण उस समय भारतीय-संस्कृति की इतनी तीव्र गति से उन्नति हुई और थोड़े ही समय में उसका प्रभाव समस्त विश्व में फैल गया जिसके कुछ चिह्न अब भी खोज करने पर मिला करते है।

पर जब इस दृष्टिकोण में विकृति उत्पन्न होकर लोगों में व्यक्तिवाद की भावना बढ़ने लगी और वेदान्त सिद्धान्त का विपरीत अर्थ किया जाने लगा तब मनुष्यों के सामने सबसे बड़ा उद्देश्य अपनी ‘मोक्ष’ का ही रह गया। संसार को एक बंधन या मायाजाल समझा जाने लगा और उसे काटकर, संसार से पृथक होना, अपने लिये मुक्ति का प्रयत्न करना सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया। लोगों को उपदेश दिया जाने लगा कि “तू यहाँ अकेला आया है और अकेला ही जायेगा दुनिया में कोई किसी का नहीं है।” ऐसे उपदेशों के फल से अधिकाँश लोग त्यागी के बजाय महास्वार्थी बन गये।

यहाँ के जो साधू-संन्यासी बड़े त्यागी और ईश्वर-भक्त समझे जाते थे, वे समाज की कमाई से जीवन-धारण करते हुए उसी की निन्दा करने लगे और अन्य लोगों को भी अपनी ही तरह ‘निकम्मा’ बनने का उपदेश देने लगे। एक त्यागी तो इंग्लैंड का वह डॉक्टर था जिसने शाहजहाँ बादशाह की पत्री जहाँआरा को रोग मुक्त करने और उसके उपरान्त बादशाह के यह कहने पर कि तुम चाहे जो माँग लो, अपने लिये किसी तरह की याचना न करके अपने देश के माल पर से चुँगी हटा देने की माँग की थी। उसके ‘त्याग’ का लाभ उसके समस्त समाज को मिला और वह शीघ्र ही इस देश का शासक बन जाने में समर्थ हो गया। और एक यहाँ के त्यागी हुये जो समाज के धन से पाले पोसे जाकर, शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करके, अनेक प्रकार की विशेष शक्तियों और योग्यता प्राप्त करने के उपरान्त कहने लगे कि “यह संसार मिथ्या है, यहाँ कोई किसी का नहीं, इसलिये साँसारिक कार्यों को त्यागकर एकान्त में बैठकर अपनी मोक्ष के लिये प्रयत्न करो।”

इस प्रकार परमार्थ-अध्यात्म के क्षेत्र में भी यहाँ स्वार्थ का उपदेश दिया जाने लगा। जिसके प्रभाव से सामूहिकता की भावना बिल्कुल जाती रही और प्रत्येक व्यक्ति जो कुछ भी भला या बुरा काम करने लगा उसका लक्ष्य एकमात्र अपनी भलाई ही रह गया। जिस “अद्वैत” का अर्थ परायेपन का विचार त्यागकर सब मनुष्यों को आत्म-स्वरूप समझना, उनके दुःख-सुख की हर तरह से चिन्ता करना था, उसी के नाम पर लोग जगत को मिथ्या बताकर उससे परान्मुख होने को सबसे बड़ा आदर्श मानने लगे। इसी मनोवृत्ति को देख कर स्वामी विवेकानन्द ने पृथकता की भावना का उल्लेख करते हुए कहा था-”हिन्दू-धर्म के समान उदार तत्वों को बताने वाला कोई दूसरा धर्म नहीं है और हिन्दू लोगों के समान प्रत्यक्ष आचरण में जैसे अनुदार लोग भी दूसरी जगह नहीं मिलेंगे।”

वास्तव में यह एक आश्चर्य की घटना ही है कि एक ओर तो मनुष्य ज्ञान, विज्ञान, आवागमन, व्यापार, शिक्षा आदि विषयों में इतनी उन्नति कर रहा है कि विभिन्न राष्ट्रों और जातियों को पृथक करने वाले सब अवरोध नष्ट होते जाते हैं ओर एक ‘विश्व-मानव’ अथवा ‘विश्व-सभ्यता’ की स्थापना का समय निकट दिखलाई पड़ता है। एक भारतीय विद्वान के ही शब्दों में “विभाजन के बड़े-बड़े कारण महासागर और पर्वत अब प्रभाव-हीन हो गये हैं। परिवहन और संचरण की इस समय उपलब्ध सुविधाओं के कारण संसार एक छोटा-सा पड़ोस बन गया हैं धर्म और प्रथाओं के विपरीत, जो अधिकाँश में स्थानीय ढंग की होती है, आधुनिक-विज्ञान राजनीतिक या सामाजिक सीमाओं को अमान्य करता है और एक ऐसी भाषा में बात करता है जिसे सब समझते है।”

औद्योगिक क्रान्ति ने आर्थिक सम्बन्धों को इतना बदल दिया हैं कि अब हम एक विश्व-समाज बन गये है। विज्ञान ने मानव-जीवन का आधार एक ही ब्रह्माण्डीय-तत्व को बतलाया है और यह भी कल्पना की है कि प्रकृति और मानवता के पीछे एक सार्वभौम चेतना है। “इस प्रकार मानवता की जड़े गहरी पहुँचने के साथ-साथ ही विभिन्न देशों में एक ऐसी संकीर्ण राष्ट्रीयता का उदय हो रहा है जिससे मनुष्य एक दूसरे के साथी और सहयोगी होने के बजाय एक दूसरे को अपना प्रतिद्वन्दी शत्रु समझते हैं और विनाश की तैयारी में संलग्न है। ऐसी ही भावना ने हिटलर जैसे मनुष्यों को जन्म दिया जिसने बिना किसी संकोच के कहा-”बनने दो हमें अमानव। यदि हम जर्मनी की रक्षा कर पायेंगे, तो समझो हमने संसार का सबसे महान कार्य कर लिया है। होने दो हमें अनैतिक, यदि हम अपने देशवासियों की रक्षा कर सके, तो समझो हमने नैतिकता की पुनः स्थापना के लिये द्वार खोल दिया है।” भारतवर्ष में बहुसंख्यक मनुष्य हिटलर से भी कहीं अधिक संकीर्णतावादी बन गये हैं और वह जिस मार्ग को अपने राष्ट्रीय हित की दृष्टि से उचित बतलाता था यहाँ के मनुष्य केवल अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिये उन सब बातों को ठीक मान लेते हैं। ऐसे लोग स्वप्न में भी यह विचार नहीं करते कि देश और जाति किस चिड़िया का नाम है। उनका तो आजकल यही सिद्धान्त हो रहा है कि “आप मरे तो जग डूबा”। देश भाड़ में जाय और जाति चूल्हे में पड़े, केवल हम हर तरह से मौज और सुख को जिन्दगी व्यतीत करते रहें। और तारीफ की बात यह है कि इतने पर भी इनमें से कितने ही लोग दूसरों को ‘एकोबह्म द्वितीयो नास्ति’ का उपदेश भी देते रहते हैं।

इस प्रकार हमारा वर्तमान जीवन आर्य-जाति के प्राचीन निष्काम कर्म के आदर्श से सर्वथा विपरीत चल रहा है। हममें सामूहिकता का, सच्ची-भावना का सर्वथा अभाव हो गया है। थोड़े से लोगों में समय-समय पर राष्ट्रीयता की भावना का उदय हो जाता है पर जन-समूह में व्याप्त व्यक्तिवाद के कारण वे भी अपने स्थान पर ज्यादा देर तक टिके नहीं रह पाते। ऐसी दशा में विश्व मानव की भावना और तदनुसार आचरण जो कि भारतीय-संस्कृति का सच्चा आदर्श है-की आशा कैसे की जा सकती है। यही कारण है कि शंकराचार्य जैसे महापुरुष ने यद्यपि अपनी अद्वैत-गर्जना से द्वैत-सिद्धान्त रूपी स्यारों को भगा दिया, लेकिन हमारे समाज में से द्वैत भावना नहीं भागी। ऊँच-नीच का भेद, छूत-अछूत का भेद, ब्राह्मण-शूद्र का भेद, गरीब-अमीर का भेद, स्वामी-दास का भेद आदि बातें तब भी बनी रहीं और अब तक जीवित बनी हैं।

ऐसी ही हीनता और संकीर्णता की भावनायें इस समय जन-मानस में उत्पन्न होती रहती हैं, जिनके कारण, सब कुछ साधन पा जाने और अभूतपूर्व वैज्ञानिक प्रगति होने पर भी लोगों को चैन, शान्ति नहीं है और सब हाय-हाय करते हुये भगवान और प्रकृति को कोसते रहते हैं। पर उनकी समझ में यह नहीं आता कि हम जो कुछ दुःख भोग रहे हैं वह हमारी करतूतों का, स्वार्थपरता का परिणाम है। यदि हम केवल अपनी भलाई का ही विचार छोड़कर दूसरों की भलाई का भी ध्यान रखें, सबके हित में अपना हित समझें, अपने सामने सामूहिक अभ्युदय और प्रगति का आदर्श रखें तो कोई कारण नहीं कि वर्तमान जगत ही हमारे लिये सुख और शान्ति का आवास-स्वर्गीय आनन्द का स्थान न बन जाय।


जुआ समाज का बड़ा शत्रु है

मानव-प्रकृति में जो कई प्रकार के दुर्गुण पाये जाते हैं उनमें अपहरण की वृत्ति भी सामान्यतः सर्वत्र देखने में आती है। यद्यपि शास्त्रकारों ने अति प्राचीन काल से इस बात का उपदेश दिया है कि “पर द्रव्येपु लोष्टवत्” अर्थात् कभी दूसरे के धन की आकाँक्षा मत करो और उसे मिट्टी के ढेले के समान उपेक्षणीय मानो परन्तु इस उपदेश पर आचरण करने वाले सदा उंगलियों पर गिनने योग्य रहे हैं। उस समय की बात तो छोड़ दीजिये कि जब मनुष्य पाशविक अवस्था में था और दूसरे को मारकर उसका सर्वस्व अपहरण कर लेने में भी कोई दोष नहीं समझता था, पर बाद में जब वह ‘सभ्य’ और ‘धार्मिक’ बन गया तब भी दूसरों की सम्पत्ति ठगने या छीन लेने की प्रवृत्ति बहुसंख्यक लोगों में पाई जाती थी।

फिर भी जहाँ तक प्राचीन साहित्य का अध्ययन करने से पता चलता है उस समय सिक्कों का अधिक प्रचलन न होने और खरीदने बेचने की प्रथा के बहुत सीमित होने के कारण सम्पत्ति का रूप आजकल के समान न था और सामान्य लोगों को वर्तमान समय की तरह छीन-झपट करने की सुविधा न थी। पर जब संसार में सिक्कों का प्रचार बढ़ा और रुपया, अशर्फी और आजकल नोटों के रूप में धन के सहज ही हस्तांतरण होने की-एक के पास से दूसरे के पास पहुँच सकने की सुविधा हो गई तब से यह प्रवृत्ति दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ रही है। इस समय मनुष्य का लक्ष्य ही यह हो गया है कि किसी भी तरह धन संग्रह किया जाय, क्योंकि हर प्रकार के सुखोपभोग का, सुख सामग्री प्राप्त करने का प्रत्यक्ष साधन वही दिखलाई पड़ रहा है। इसलिये नीति और धर्म के सिद्धान्तों का इतना विकास और प्रचार हो जाने पर भी चोरी, डाका, लूटमार, ठगी आदि के द्वारा दूसरों का धन अपहरण करने में संकोच नहीं करते। पर इन सब कामों में खतरा जरूर रहता है, शासन संस्था इनको रोकने के लिये नियम बनाती रहती है और जो कोई उनके अनुसार दोषी सिद्ध हो जाता है वह दण्डित होता है। इसलिये चतुर और सावधान लोग ऐसी तरकीब से काम लेने की कोशिश करते हैं जिससे दूसरे के धन का अपहरण भी किया जा सके और सरकारी कायदे, कानूनों के चक्कर से भी बचा जा सके। जुआ की प्रवृत्ति का बढ़ना इसी परिस्थिति का परिणाम है।

अनेक लोग समझते हैं कि जुआ केवल वही है जो किसी फड़ पर बैठकर कोड़ियों, गोटों या पासों द्वारा खेला जाय। यह ठीक है कि जुआ का पुराना रूप वह है और अब भी पुराने ढंग के साधारण व्यक्ति उसी तरह का जुआ खेला करते हैं। पर उसे भी कानून द्वारा अवैध घोषित कर दिया है और जो लोग उस तरह का जुआ खेलते पकड़े जाते हैं वे राज्य नियमों द्वारा जुर्माने या कैद का दण्ड पाते हैं। जिनको इस दुर्व्यसन की लत पड़ गई ऐसे लोग तो जब कभी मौका लगता है तभी जुआघर में पहुँच जाते है, पर अन्य लोग जो सदा जुआ नहीं खेलते दिवाली के अवसर पर इस प्रकार जुआ खेलना आवश्यक समझते है। उन्होंने इसे भी एक ‘धर्म’ मान लिया है। सच पूछा जाय तो यह धर्म भी घोर अधर्म है, क्योंकि अधिकाँश जुआरियों को जुआ की लत इस दिवाली के दिन खेले जाने वाले जुए से ही लगती है,

पर इस प्रकार का कौड़ियों और गोटों से खेला जाने वाला जुआ अब साधारण अशिक्षित अथवा असभ्य लोगों का काम समझा जाता है। शिक्षित, सभ्य और चतुर-चालाक समझे जाने वाले लोगों ने अब इस दुष्कर्म को भी अपनी विद्या-बुद्धि के बल से ऐसा परिष्कृत रूप दे दिया है कि जिससे न तो उसको निन्दनीय कहा जाय और न वह सरकारी कानूनों के फन्दे में आ सकें। सट्टा, लाटरी, घुड़दौड़, फीचर, दड़ा, प्रतियोगिता आदि विविध नामों और नये-नये तरीकों से जुआ खेला और खिलाया जाता है। इसमें बेवकूफ लोग ही हमेशा फँसते हैं, अपना धन खोते हैं और चालाक लोग नफा कमाते रहते हैं। कार्नीवाल आदि में गेंद फेंककर या निशाना लगाकर जुआ खिलाया जाता है जिसको बुद्धि का खेल कहकर निर्दोष सिद्ध करने की कोशिश की जाती है, पर वहाँ अनेक मनुष्य घण्टे, आधे घण्टे के भीतर हजारों रुपया हार जाते हैं। घुड़दौड़ को भी कानूनन जुआ नहीं माना जाता पर उसमें अनेकों लखपती, करोड़पती देखते-देखते दरिद्री बन गये। दड़ा का जुआ जो आजकल पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नगरों में जोर पकड़े हुये है गरीबों का गला काट रहा है। इसमें बिल्कुल छोटे मजदूर, खौंचे वाले, इक्के, ताँगे, रिक्शे वाले, तरकारी और लकड़ी तथा घास बेचने वाले तक दो-चार आना फेंककर ही चले जाते है। कभी-कभी किसी को सौ-पचास मिल जाता है तो उसे देखकर अन्य सैकड़ों लोग आकर्षित होकर दड़ा लगाते हैं, पर सौ में से निन्यानवे व्यक्ति अपना पैसा गँवाकर ही आते हैं।

जुआ का व्यसन हर तरह से हानिकारक और पतनकारी है। जो हारता है वह तो तरह-तरह की आपत्तियों में फँस जाता ही है, पर जो जीतता है वह भी उसे मुफ्त का माल समझकर तरह-तरह के दुर्व्यसनों और खराब कामों में खर्च कर देता है। इससे उसकी आदत बिगड़ती है और बाद में अपनी कमाई को भी हानिकारक व्यसनों में खर्च करने लग जाता है। एक जुआ ही नहीं जितना भी धन किसी प्रकार के अनीति के कामों द्वारा कमाया जाता है वह प्रायः इसी प्रकार बर्बाद होता है। यही कारण है कि चोर, डाकू, उठाईगीर, ठग, जेबकतरे यद्यपि काफी धन पा जाते हैं पर दो-चार दिन बाद पहले की तरह ही भूखे-नंगे दिखाई पड़ते हैं। एक साधारण गृहस्थ सौ-पचास रुपया मासिक में भी सुखपूर्वक जीवन निर्वाह कर लेता है पर ऐसे दुष्कर्म वाले सैकड़ों रुपया पा जाने पर भी अभावग्रस्त ही बने रहते हैं।

समाज और देश की दृष्टि से भी यह दुष्प्रवृत्ति बड़ी हानिकारक है। जुआरी व्यक्ति कभी अच्छा नागरिक और समाज का उपयोगी सदस्य नहीं बन सकता। वह तरह-तरह से समाज में अनाचार का बीज वपन ही करेगा। बड़े जुआरी, जो बड़े-बड़े नगरों में शानदार दुकानों पर बैठकर सट्टे का काम करते हैं और सेठजी कहलाते हैं प्रायः बाजार के भावों में उथल-पुथल पैदा करते रहते है। उनकी दिखावटी खरीद फरोख्त के कारण जीवनोपयोगी वस्तुओं का मूल्य व्यर्थ ही बढ़ जाता है, जिससे उनकी जेब तो भर जाती है पर सर्वसाधारण को घोर असुविधा सहन करनी पड़ती है। लोग इसे व्यापार कहते है, पर समाज के हित की दृष्टि से विचार किया जाये तो यह साफ तौर पर जुआ-चोरी है, जिसकी कोई न्यायशील और जनकल्याण का ध्यान रखने वाली सरकार कभी चलने नहीं दे सकती, समाज हितैषी व्यक्तियों का कर्त्तव्य है कि इन तमाम बड़े और छोटे जुओं को समझा बुझाकर और आन्दोलन द्वारा बन्द कराने की चेष्टा करें और समाज में इस धारणा का प्रचार करें कि किसी प्रकार की हराम की कमाई नहीं वरन् ईमानदारी का पैसा ही मनुष्य को सुख और शान्ति प्रदान कर सकता है।


घबराहट की कीमत

किसी समय एक जंगल में गधे ही गधे रहते थे। पूरी आजादी से रहते, भर पेट खाते पीते और मौज करते थे।

एक लोमड़ी को मजाक सुझा। उसने मुंह लटकाकर गधों से कहा- मैं चिन्ता से मरी जा रही हूँ और तुम इस तरह मौज कर रहे हो। तुम्हें पता नहीं कितना बड़ा संकट सिर पर आ पहुँचा है?

गधों ने कहा-दीदी, भला हुआ क्या, बात तो बताओ। लोमड़ी ने कहा-मैं अपने कानों सुनकर और आँखों देखकर आई हूँ। मछलियों ने एक बड़ी सेना बना ली है और वे अब तुम्हारे ऊपर चढ़ाई करने ही वाली हैं। उनके सामने तुम्हारा ठहर सकना कैसे संभव होगा?

गधे असमंजस में पड़ गये। उन्होंने सोचा व्यर्थ जान गँवाने के क्या लाभ? चलो कहीं ओर चलो। जंगल छोड़कर वे गाँव की ओर चल पड़े।

इस प्रकार घबराये हुए गधों को देखकर गाँव के धोबी ने उनका खूब सत्कार किया। अपने छप्पर में आश्रय दिया और गले में रस्सी डालकर खूँटे में बाँधते हुए कहा-डरने की जरा भी जरूरत नहीं। मछलियों से मैं भुगत लूँगा। तुम मेरे बाड़े में निर्भयतापूर्वक रहो। केवल मेरा थोड़ा-सा बोझा ढोना पड़ा करेगा।

गधों की घबराहट दूर तो हुई पर उसकी कीमत महंगी चुकानी पड़ी।


मधु संचय


मधु संचय (Kavita)

तेरी जय मानव की जय है, हार न कर स्वीकार,

निज पौरुष से तोड़ नियति का दृढ़तर कारागार,

आत्म-चेतना से तू निर्भय पग को रख गतिवान!

यदि निश्चित है इष्ट-पन्थ तो भय न किसी का मान!-विद्यावती मिश्र

जीवन एक श्लोक है जिसका-

सबसे सीधा भाष्य प्यार है।

प्राण-प्राण जिसकी धड़कन में-

कण्ठ-कण्ठ जिसकी पुकार है॥

प्रथम शब्द पर्याय जनम का

और अन्तिम संदर्भ मरण का।

एक यही है मन्त्र कि जिसको-

दुहराता जग बार-बार हैं॥

लेकिन दुहराया जब मैंने तेरा नाम न जाने तो क्यों?

नीरज तो बदनाम हो गया-प्रीति मगर सरनाम हो गई!

-नीरज

दिव्य ध्येय की ओर तपस्वी,

जीवन भर अविचल चलता है।

सज-धज कर आवें आकर्षण,

पग-पग पर झूमते प्रलोभन,

होकर सबसे विमुख बटोही,

पथ पर सम्हल-सम्हल बढ़ता है।

अमर-तत्व की अमिट साधना,

प्राणों में उत्सर्ग कामना,

जीवन का शाश्वत व्रत लेकर,

साधक हँस कण-कण गलता है।

सफल-विफल और आशा-निराशा,

इनकी ओर कहाँ जिज्ञासा,

बीहड़ता में राह बनाता,

हारी मचल-मचल चलता है।

पतझर हो झंझावातों में,

जग के घातों प्रतिघातों में,

सुमन लुटाता सुमन सिहरती

निर्जनता में भी खिलता है।

-अज्ञात

सिद्धि से पहले कभी जो बीच में रुकते नहीं,

जो कभी दबकर किसी के सामने झुकते नहीं,

जो हिमालय से अटल हैं, सत्य पर हिलते नहीं,

आग पर चलते हुए भी, जो चरण जलते नहीं,

उन पगों के रज-कणों का, नाम केवल जिंदगी है।

विश्व में परिवर्तनों का, नाम केवल जिंदगी है॥

-रामवतार त्यागी

अब जाग उठो, अब जाग उठो,

युग-युग से सोये ओ मानव!

खिल चुकों होलियाँ शोणित की,

विध्वंस हो चुके देव-भवन।

लुट चुकीं रमणियाँ सुत-पति की,

रोती बिलखाती भरे नयन॥

माँ आज कर रहीं मूक-रुदन,

बँध कारा में जंजीरों सें।

तुम देख रहे हँस रहे किन्तु,

वह माँग रहीं कुछ वीरों से॥

कर मुक्त, तोड़ यह सब बन्धन,

युग-युग से सोये ओ मानव।

-रामस्वरूप खरे

लायेंगे, सतयुग लायेंगे।

पाप-ताप का नाश करेंगे, पुण्य प्रभा प्रकटायेंगें॥

दुनिया हुई पुरानी, इसको फिर से नई बसायेंगे।

सत्य प्रेम की लिये पताका, घर-घर अलख जगायेंगे॥

काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह को, अब हम दूर भगायेंगे।

स्वार्थ भावना नष्ट करेंगे, सेवा पथ अपनायेंगे॥

दुराचार, दुर्भाव, द्वेष का, नाम निशान मिटायेंगे।

दानवता का दमन करेंगे, मानवता फैलायेंगे॥

तम निद्रा में सोई जनता को, झकझोर जगायेंगे।

अन्धकार को दूर करेंगे, ज्ञान सूर्य चमकायेंगे।।

भ्रम में भटक रहीं दुनिया को, सच्ची राह दिखायेंगे।

अन्य स्वर्ग की नहीं कामना, यहीं स्वर्ग ले आयेंगे॥

-रामकुमार भारतीय


उद्धरेदात्मनाऽत्मानम्

आत्म-निर्माण द्वारा युग-निर्माण

अपना उद्धार करना संसार का उद्धार करने का प्रथम चरण है। समाज या संसार कोई अलग वस्तु नहीं, व्यक्तियों का समूह ही समाज या संसार कहलाता है। यदि हम संसार का उद्धार या कल्याण करना चाहते हैं तो वह कार्य अपने आप से आरम्भ करना चाहिए। क्योंकि अपना आपा ही सबसे निकट है। अपने को सुधारना सबसे अधिक सरल एवं संभव हो सकता है। दूसरे लोग कहना मानें या न मानें, बताये हुए रास्ते पर चलें या न चलें यह संदिग्ध है, पर अपने ऊपर तो अपना नियन्त्रण है ही। अपने को तो अपनी मर्जी के अनुसार बना या चला सकते ही हैं। इसीलिए विश्वकल्याण का कार्य सबसे प्रथम आत्मकल्याण का कार्य हाथ लेते हुए ही आरम्भ करना चाहिए।

संसार का एक अंश हम भी है। अपना जितना ही सुधार हम कर लेते है उतने ही अंशों में संसार सुधर जाता है। अपनी सेवा भी संसार की ही सेवा हैं। एक बुरा व्यक्ति अनेकों तक अपनी बुराई का प्रभाव फैलाता है और लोगों के पाप तापों एवं शोक सन्तापों में अभिवृद्धि करता है। इसी प्रकार एक अच्छा व्यक्ति अपनी अच्छाई से स्वयं ही लाभान्वित नहीं होता वरन् दूसरे अनेकों लोगों की सुख-शान्ति बढ़ाने में सहायक होता हैं। सामाजिक होने के कारण मनुष्य स्वभावतः अपना प्रभाव दूसरों पर छोड़ता है। फिर जो जितना ही मनस्वी होगा वह अपनी अच्छाई या बुराई का भला-बुरा प्रभाव भी उसी अनुपात से संसार में फैलावेगा। इस प्रकार मनुष्य अपना सुधार करने में लग जाय तो वह संसार का बहुत भारी सुधार कर सकता है। अपनी सच्ची सेवा भी विश्वसेवा का ही एक अंग मानी जा सकती है। संकुचित भौतिक स्वार्थों की इसीलिए ऋषियों ने निंदा की है कि उनमें ग्रस्त होकर मनुष्य अपने धर्म कर्त्तव्यों की उपेक्षा करने लगता है।

दूरदर्शितापूर्ण स्वार्थ भी परमार्थ ही होता है। आत्मा का स्वार्थ जिन विचारों और कार्यों द्वारा सिद्ध होगा उन्हीं के माध्यम से संसार का हित साधन भी बनेगा उत्कृष्ट स्तर का स्वार्थ वस्तुतः परमार्थ ही बन जाता है। अपना आत्म-सन्तोष, आत्म-कल्याण, सद्भावनाओं के अपनाने एवं सत्कर्म करने से ही संभव होता है। यही प्रक्रिया लोकहित का माध्यम बन जाती है। सत्कर्म स्वतः ही परोपकार होते हैं। आत्म-कल्याण उन्हीं गतिविधियों को अपनाने से संभव है जिनसे जन-साधारण का हित साधन होता हो।

मानव-जीवन का सदुपयोग परमार्थ से है। परमार्थ का तात्पर्य है, सच्चे, स्वार्थ की साधना। झूठा स्वार्थ वासनाओं और तृष्णा से ग्रसित होकर अकर्म या कुकर्म करने से माना गया है। ऐसे मार्ग पर चलने वाला क्षणिक लाभ भले ही प्राप्त कर ले अन्ततः उसे लोकनिन्दा, अविश्वास, घृणा, असन्तोष, राजदण्ड, आत्म-प्रताड़ना, विक्षोभ, असंतोष, नरक एवं पतन के रूप से ही भोगना पड़ता है। इसलिए मनीषियों ने उसे निन्दित एवं हेय ठहराया है। परमार्थ की प्रशंसा इसलिए की है कि वह प्रारम्भ में थोड़ा कष्ट साध्य भले ही हो, वासना और तृष्णा की सीमित पूर्ति ही उससे भले होती है पर अन्ततः सब प्रकार की प्रगति के द्वार उसी से खुलते हैं। परमार्थी व्यक्ति अपनी सच्चरित्रता, कर्त्तव्य परायणता एवं उदारता के कारण दूसरों के हृदय में अपने लिए स्थान बनाता है और उनका सद्भाव सहयोग पाकर लौकिक दृष्टि से भी लाभ में रहता है, और आध्यात्मिक दृष्टि से तो आत्मसन्तोष का सुख हमें निरन्तर मिलता ही रहता है।

अपने जीवन को सार्थक बनाने की दृष्टि से भी और विश्वहित साधन का पुण्य परमार्थ करने की दृष्टि से भी हमें सबसे पहले यह प्रयत्न करना चाहिए कि अपना व्यक्तित्व निर्दोष, निर्मल एवं निष्पाप हो। दोष, पाप और मल ही हमारी प्रगति में सबसे बड़े बाधक हैं। उन्हें जितना ही हटाया या मिटाया जायेगा उतनी ही अंतर्ज्योति प्रदीप्त होती चलेगी और उसके प्रकाश में जीवन का प्रत्येक पहलू प्रकाशवान बनता चलेगा। उस प्रकाश में भौतिक एवं आत्मिक प्रगति की सभी समस्याएँ अपने आप ही सुलझती चलेंगी।

अध्यात्म विद्या का प्रथम सूत्र यह है कि प्रत्येक भली-बुरी परिस्थितियों का उत्तरदायी हम अपने आपको माने बाह्य समस्याओं का बीज अपने में ढूंढ़े और जिस प्रकार का सुधार बाहरी घटनाओं व्यक्तियों एवं परिस्थितियों में चाहते हैं उसी के अनुरूप अपने गुण कर्म स्वभाव में हेर-फेर प्रारम्भ कर दे। भीतरी सुधार बाहरी समस्याओं को सुधारने में सबसे बड़ा, सबसे प्रभावशाली उपाय सिद्ध होता है। माना कि दूसरों की गलतियों और बुराइयाँ भी हमें परेशान करती हैं और अनेक प्रकार की बाधाएं खड़ी करके प्रगति का द्वार रोकती हैं। संसार में बुरे लोग हैं और उनमें बुराइयाँ भी कम नहीं हैं इस बात से कोई इनकार नहीं करता, पर साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि कोई वस्तु सजातीय एवं अनुकूल परिस्थितियों से ही बढ़ती एवं पनपती है। बुराई को अपना रूप प्रकट करने का अवसर तभी मिलेगा जब वैसी ही बुराई अपने अन्दर भी हो। अपना स्वभाव उत्कृष्ट हो तो बुरे लोगों को भी झक-मारकर निरस्त होना पड़ता है।

क्रोधी मनुष्य को आक्रमण करने का अवसर उसी पर मिलता है जो स्वयं भी क्रोधी हो। क्रोध से क्रोध बढ़ता है और उसकी क्रिया−प्रतिक्रिया द्वन्द्वयुद्ध का रूप धारण कर लेती है। यदि एक व्यक्ति नम्र, सहनशील, हंस-मुख, क्षमाशील और दूरदर्शी हो तो क्रोधी स्वभाव का मनुष्य भी उसे उत्तेजित नहीं कर पाता। वह अपनी नम्रता और सज्जनता से उसे शान्त कर देता है और क्रोध का जो मूल कारण था उसके समाधान का भी उपाय सोच लेता है। इसके विपरीत यदि दोनों ही क्रोधी हुए तो कोई बड़ा कारण न होते हुए भी केवल शब्दों की उच्छृंखलता लेकर परस्पर लड़ मरते हैं और मित्रता शत्रुता में बदल जाती है।

दुराचारी की दाल वहीं गलती है जहाँ सदाचार का पक्ष दुर्बल हो। ठग हमेशा लोभी पर हाथ साफ करते है। दरिद्रता, आलसी के घर आती है, बीमारियाँ असंयमी पर हावी होती हैं, भय डरपोक को सताता है, अदूरदर्शी एवं जल्दबाज को चिन्ताएं घेरती हैं। यदि अपना व्यक्तित्व सदा खरा और मजबूत हो तो इन बाहरी विकृतियों को उलटे पाँवों लौटना पड़ेगा। पत्थर पर तलवार का प्रहार क्या सफल होगा ? ताली दोनों हाथों से बजती है। मक्खी गन्दगी पर बैठती है। घाव होगा तो उससे कीड़े भी पड़ेंगे। यदि अपना पक्ष पहले से ही स्वच्छ रखा जाय तो सारे संसार के दोष मिलकर भी व्यक्ति का कुछ नहीं बिगाड़ सकते। चन्दन के पेड़ से लिपटे रहने वाले अनेकों सर्प उसे विषैला नहीं बन सकते। दुष्टों की दुष्टता सज्जनों की खरोच भले ही पहुँचावे पर उन्हें परास्त नहीं कर सकती। इतिहास का पन्ना-पन्ना इस बात का साक्षी है कि सज्जनता को नहीं दुर्जनता को ही परास्त होना पड़ा है।

कोई आध्यात्मवादी यह स्वीकार नहीं कर सकता कि उसे ग्रहदशा ने, भाग्य ने, परिस्थितियों ने या दूसरों ने सताया है। वह सदा यही मानेगा कि अपने भीतर कोई कमी रह गई जिसके कारण दुष्टता को सफल होने का अवसर मिल गया। प्रत्येक बाह्य आघात या असफलता का कारण वह अपने अन्दर ढूंढ़ता है और जो त्रुटियाँ सूझ पड़ती हैं उन्हें सुधारने के लिए जुट जाता है। इस तरीके को अपनाने से तीन चौथाई समस्याएं हल हो जाती हैं। एक चौथाई जो अनिवार्यतः बनी रहती हैं उन्हें वह उपेक्षा में अपनी सहन-शीलता के बलबूते हँसते खेलते भुगत लेता है। कठिनाई के कारण दूसरे लोग जिस पर उद्विग्न रहते और रोते चिल्लाते हैं वैसी परिस्थिति उसकी गम्भीरता उत्पन्न ही नहीं होने देती। तितिक्षा और सहन-शीलता के बल पर बड़े से बड़े अभाव एवं कष्टों को हँसते हुए भुलाया या भुगता जा सकता है।

इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं कि बाहर से जो बाधाएँ उपस्थित होती हैं उन्हें हटाने का कोई प्रयत्न न किया जाय। वह तो करना ही चाहिए। संघर्ष में ही जीवन है। प्रत्येक पुरुषार्थी को मार्ग की बाधाएँ हटाकर ही उनसे छूटकर ही अपना मार्ग बनाना पड़ता है। पर छूटने की शक्ति भी तो आत्मनिर्माण से ही, प्राप्त होती है, यदि मनुष्य अस्त−व्यस्त मनोभूमि का हुआ तो उसके लिए बाधाओं से लड़कर प्रगति का मार्ग बना सकना तो दूर होगा, उल्टे उनकी कल्पना और आशंका से ही भयभीत होकर वह मानसिक सन्तुलन खो देगा और चिन्ता एवं परेशानी से अपना स्वास्थ्य तक गँवा देगा।

अपने स्वभाव और दृष्टिकोण को सुधारने की ओर जिसका ध्यान है जो अपनी त्रुटियों को ढूंढ़ने और हटाने में सचेष्ट है उसे बुद्धिमान और दूरदर्शी कहना चाहिए। अपनी परिस्थितियों जिन्हें सुधारती हों अपने भाग्य और भविष्य को जो उज्ज्वल देखना चाहते हों उनके लिए एकमात्र उपाय यही है कि अपनी दुर्बलता पर अधिकाधिक ध्यान दिया जाय और यह पता लगाया जाय कि अब की अपेक्षा हम किन श्रेष्ठताओं को और भी बढ़ा सकते हैं और किन त्रुटियों का किस सीमा तक किस प्रकार संशोधन कर सकते हैं। यह आकाँक्षा जितनी ही तीव्र होगी, जितना ही इस दिशा में प्रयत्न बढ़ेगा उतना ही उत्थान का मार्ग प्रशस्त होगा।

आहार और विहार के असंयम की कठोर समीक्षा करते हुए यदि अपना रहन-सहन सुव्यवस्थित करने पर ध्यान किया जाय, जिह्वा और कामेन्द्रिय पर काबू रखा जाय, अनियमितता को हटाकर दिनचर्या को सुव्यवस्थित बनाया जाय, आलस्य को छोड़कर समय के एक-एक क्षण को मनोयोगपूर्वक निर्धारित कार्यक्रम में संलग्न रखा जाय तो शरीर का बिगड़ा हुआ ढंग देखते-देखते कुछ ही दिनों में ठीक हो सकता है और बीमारी कमजोरी के कारण जो आये दिन चिकित्सकों के दरवाजे पर नाक रगड़नी पड़ती है उससे सहज ही छुटकारा मिल सकता है। दवाई का खर्च, अस्वस्थता के कारण पीड़ा एवं परेशानी, काम का हर्ज, सम्बन्धियों का तिरस्कार, कुरूपता, बुढ़ापा एवं अकाल मृत्यु की छाया इन सब विपत्तियों का तीन चौथाई निवारण मनुष्य स्वयं कर सकता है। यदि वह असंयम से छुटकारा पा सके तो अस्वस्थता भी पीछा जरूर छोड़ देगी।

मानसिक दृष्टि से अगणित व्यक्ति चिन्ता, भय, शोक, लोभ, आवेश, उत्तेजना, ईर्ष्या, द्वेष, निराशा, आशंका आदि से ग्रस्त होकर उद्विग्न जीवन बिताते हुए नारकीय यंत्रणाएं सहते रहते हैं। इनके कारणों के तलाश करने पर वस्तुस्थिति बहुत ही सामान्य होती है। आत्म-हत्या तक कर बैठने वालों के संक्षोभ का कारण तलाश करने पर बात बहुत ही सामान्य सी निकलती है, कई बार तो इतनी छोटी होती है कि उसे उपेक्षा से गुजारा जा सकता था, या कोई दूसरा उपाय उस क्षोभ से बच निकलने का आसानी से ढूंढ़ा जा सकता था, पर उतावली एवं आवेश में वे किंकर्तव्यविमूढ़ होकर अपनी विवेकशीलता खो बैठे और न करने लायक कर गुजरे। ऐसे उत्पाती, अधीर और आवेशग्रस्त मनुष्य साधारण घटनाओं को लेकर विक्षुब्ध बने फिरते हैं और अपने लिए तथा अपने सम्बन्धित लोगों के लिए अशाँति की ज्वाला प्रज्वलित करते रहते हैं। यदि इस स्थिति की भयानकता को मनुष्य समझे और अपनी धैर्यवान गम्भीर, विचारशील एवं हंस खेलकर कठिनाई को काट देने को आदत बना ले तो निश्चय ही उसका मन सदा सन्तुलित और प्रसन्न बना रहे। कुढ़ने की अपेक्षा समस्या का हल वह अधिक आसानी से सोच सके और गई गुजरी परिस्थितियों में आशा एवं उत्साह की कोई किरण उपलब्ध कर ले।

मन को सन्तुलित करने के लिए किया हुआ प्रयत्न जीवन के सारे स्वरूप को बदल देता है। नरक को स्वर्ग में परिवर्तित करने को ही कुँजी मनुष्य के हाथ में है। सोचने का तरीका यदि बदल डाले, खिलाड़ी की भावना रखकर जिन्दगी का खेल खेले, नाटक के पात्रों की तरह अभिनय का आनन्द लेते हुए दिन गुजारे, बुराई में से भलाई और निराशा में से आशा की किरणें ढूंढ़ने का अभ्यास करे तो कोई कारण नहीं कि रोता रहने वाला मनुष्य हँसते खिलते गुलाब के रूप में परिणित होकर न केवल अपनी ही मानसिक समस्या हल कर ने वरन् पड़ौसियों और सम्बन्धियों के लिए भी प्रसन्नता, आशा एवं प्रेरणा का केन्द्र बन जाय।

हमें अपना उद्धार करना चाहिए, आज की अपेक्षा कल अधिक निर्मल और अधिक उत्कृष्ट बनने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि इस मार्ग को अपना सकना हमारे लिए सम्भव हो सका तो न केवल अपना वरन् सारे समाज का सारे विश्व का भी हित साधन करने का श्रेय प्राप्त करेंगे। युग निर्माण का कार्य व्यक्ति निर्माण से ही आरम्भ होता है। संसार की सेवा करने का व्रत लेने वाले प्रत्येक परमार्थी को अपने आपकी सेवा करने का व्रत लेकर विश्व मानव की उतने अंश में सेवा करने को तत्पर होना चाहिए जितने का कि उत्तरदायित्व अपने ऊपर है। समस्त संसार की सेवा कर सकना कठिन है। अपनी सेवा तो आप कर ही सकते हैं। समस्त संसार को सुखी बनाना और सन्मार्ग पर चलाना यदि अपने लिए कठिन हो तो अपने को सुखी-सन्तुलित एवं सन्मार्गगामी तो बना ही सकते हैं। दूसरों का उद्धार कर सकना उसी के लिये सम्भव होता है जो अपना उद्धार आप कर सकने में समर्थ होता है।


आत्म-शोधन-अध्यात्म का श्री गणेश

कहावत है कि अपनी अकल और दूसरों की सम्पत्ति, चतुर को चौगुनी और मूर्ख को सौ गुनी दिखाई पड़ती रहती है। संसार में व्याप्त इस भ्रम को महामाया का मोहक जाल ही कहना चाहिए कि हर व्यक्ति अपने को पूर्ण निर्दोष और पूर्ण बुद्धिमान मानता है। न तो उसे अपनी त्रुटियाँ सूझ पड़ती हैं और न अपनी समझ में दोष दिखाई पड़ता है। इस एक ही दुर्बलता ने मानव-जाति की प्रगति में इतनी बाधा पहुँचाई है, जितनी संसार की समस्त अड़चनों ने मिलकर भी न पहुँचाई होगी।

अपनी निर्दोषिता के बारे में फैले हुए व्यापक भ्रम को देखते हुए मानव-जाति की मूर्खता की जितनी भर्त्सना की जाय उतनी ही कम है। सृष्टि के सब प्राणियों से अधिक बुद्धिमान माना जाने वाला मनुष्य जब यह सोचता है कि- “दोष तो दूसरों में ही है, उन्हीं की निन्दा करनी हैं, उन्हें ही सुधारना चाहिए। हम स्वयं तो पूर्ण निर्दोष हैं, हमें सुधरने की जरूरत नहीं।” तब यह कहना पड़ता है कि उसकी तथाकथित बुद्धिमत्ता अवास्तविक है। चौरासी लाख योनियों में अनेकों दोष और कुसंस्कार जीव पर चढ़े रहते हैं, मनुष्य योनि में उसे यह अवसर मिलता है कि उन पिछली त्रुटियों और गन्दगियों का परिष्कार कर सके-अपने को शुद्ध बनाने का प्रयत्न करे इस शरीर का सबसे बड़ा उद्देश्य यह है कि उन मल-विक्षेप और आवरणों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर देखे जो पिछले जन्मों की दुरवस्था में उसके गले बँधे चले आये हैं। इस ढूँढ़-खोज के पश्चात् इस बात का प्रबल प्रयत्न करे कि इन कुसंस्कारों को किस प्रकार हटा कर अपने को अधिक स्वच्छ, निर्मल एवं प्रगतिशील बनायें।

प्रगति की स्वाभाविक गति में सबसे बड़ा व्यवधान यह है कि मार्ग को रोकने वाली सबसे बड़ी बाधा का स्वरूप वह समझा नहीं पाता और न उसको हटाने का प्रयत्न करता है। पेट में दर्द है और सिर पर दवा मली जाय तो कष्ट कैसे दूर होगा? अपने दोष दुर्गुणों के कारण जीवन क्रम अस्त-व्यस्त बना रहता है पर उसका कसूर दूसरों के मत्थे मढ़ते रहा जाय तो इससे झूठा आत्म-सन्तोष भले ही कर लिया जाय, समस्या का हल कहाँ सम्भव हो सकेगा? कहते हैं कि भगवान ने अक्ल की कुल डेढ़ मात्रा पैदा की है जिसमें से एक तो हर मनुष्य अपने में मानता है और शेष आधी में सारे संसार का काम चलता हुआ देखता है। इस दृष्टि दोष के कारण अपनी गलतियों का सुधार कर सकना तो दूर उलटे जब कोई उस ओर इशारा भी करता है तो हमें अपना अपमान दिखाई पड़ता है। दोष दिखाने वाले को अपना शुभ-चिन्तक मानकर उसका आभार मानने की अपेक्षा मनुष्य जब उल्टे उस पर क्रुद्ध होता है, शत्रुता मानता है और अपना अपमान अनुभव करता है तो यह कहना चाहिए कि उसने सच्ची प्रगति की ओर चलने का अभी एक पैर उठाना भी नहीं सीखा।

स्कूली शिक्षा के मूल्य पर कई व्यक्तियों को ऊँची नौकरी मिल जाती है। पूँजी होने पर ब्याज भाड़े से या किसी ढेर के व्यापार को अपनाये रहने से धन कमाते रहना भी सरल हो जाता है। शरीर और मस्तिष्क की अच्छी बनावट होने से सुन्दरता, चतुरता एवं कला-कौशल में निपुणता मिल जाती है। संयोग एवं परिस्थितियों भी किसी को सम्मानास्पद स्थिति पर ले जाकर बिठा देती है। इन माध्यमों से कितने ही लोग बड़े बन जाते हैं और सफलता का गर्व-गौरव अनुभव करते रहते है। पर यह संसार आधार बाहरी दिखावा मात्र है। संयोगवश या दुर्भाग्य से किसी कारण यह परिस्थितियों बदल जायँ और सम्मान सौभाग्य छिन जाय तो ऐसे व्यक्ति सर्वथा निस्तेज और दीन-हीन दिखाई पड़ते हैं। अपने निज के सद्गुण न होने के कारण परिस्थितियों के आधार पर बड़े बने रहने वाले व्यक्तियों को ही राजा से रंक और अमीर से भिखारी होते देखा जाता है। जिसमें अपने गुण होंगे वह गई गुजरी परिस्थिति में से भी अपने लिए रास्ता निकालेगा और नरक में जायगा तो वहाँ भी जमादार बनकर रहेगा।

सरकारी ऊँचे पदों पर काम करने वाले व्यक्ति जब सेवा निवृत्त होते हैं तो उनमें से कितने ही मौत के दिन पूरे करते हुए शेष जीवन नीरस, निस्तेज और निकम्मा ही व्यतीत करते हैं। पद ने इन्हें जो गौरव दिया था वह पद छिनते ही चला गया। व्यक्तिगत सद्गुणों के अभाव में अब वे एक निकम्मे निरर्थक मनुष्य की तरह ही बन हुए रहते हैं, जिनकी कहीं कोई पूछ नहीं। किन्तु यदि उनमें वैयक्तिक सद्गुण रहे होते तो सेवा निवृत्त होकर अपनी स्वतन्त्र प्रतिभा के आधार पर जहाँ भी रहते वहीं नवीन चेतना उत्पन्न करते ।

प्राचीन-काल में वानप्रस्थी और संन्यासी लोग गृहत्याग देने के पश्चात् भी समाज की असाधारण सेवा करते थे पर आज तो लाखों साधु महात्मा समाज के लिए भारभूत होकर निरर्थक जीवन बिताते हैं। इसका एकमात्र कारण इतना ही होता है कि उनमें अपने व्यक्तित्व का विकास नहीं हुआ होता। गुण-कर्म-स्वभाव की दृष्टि से वे पिछड़े हुए या अविकसित होते हैं। ऐसी दशा में जब तक वे गृहस्थ या उद्योग के किसी ढर्रे में फिट थे तब तक कुछ काम कर भी सकते थे पर वे साधन न रहने पर एकाकी विरक्त जीवन में उन्हें शून्यता के अतिरिक्त और कुछ दिखाई ही नहीं पड़ता।

प्रगति की जड़ व्यक्तित्व को विकसित करने वाले सद्गुणों की मात्रा पर निर्भर रहती है। वह जितनी ही अधिक हो गई उतना ही व्यक्ति सुदृढ़ या उपयोगी हो सकेगा। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी, जिस परिस्थिति में भी रहते हैं वहीं अपनी उपयोगिता और आवश्यकता देखते हैं। हर स्थिति में उनका स्वागत और सम्मान होता है। अन्धे, अपाहिज और दरिद्रों में भी कितने लोग ऐसे होते हैं जिनकी समीपता को लोग अपना सौभाग्य समझते हैं। इसके विपरीत कितने ही साधन सम्पन्न लोगों से वे भी मन ही मन घोर घृणा करते हैं जो उनसे निरन्तर लाभ उठाते रहते हैं। सद्गुण तो वह जादू है जिसकी प्रशंसा शत्रु को भी करनी पड़ती हैं।

किसने कितनी उन्नति की इसकी सच्ची कसौटी यह है कि उस मनुष्य के दृष्टिकोण और स्वभाव में कितना परिष्कार हुआ? किसी की बाह्य स्थिति के देखते हुए उसकी उन्नति अवनति का अन्दाज नहीं किया जा सकता। कितने बेवकूफ और बदतमीज आदमी परिस्थितियों के कारण शहंशाह बने होते हैं, कितने ही लुच्चे-लफंगे षड़यन्त्रों के बल पर सम्मान के स्थानों पर अधिकार जमाये बैठे होते हैं। कई ऐसे लोग जिन्हें धर्म का क, ख, ग, घ सीखना बाकी है धर्मगुरु के पद पर पुजते देखे जाते हैं। यह संसार विडम्बनाओं से भरा है। कितने ही व्यक्ति अनुचित रीति से सफलता प्राप्त करते हैं और अयोग्यताओं से भरे रहते हुए भी सुयोग्यों पर हुकूमत चलाते हैं। इस विडम्बना के रहते हुए भी व्यक्तित्व के विकास का, सुसंस्कारिता और श्रेष्ठता का मूल्य किसी भी प्रकार कम नहीं होता। वह जहाँ कहीं भी होगा अपना प्रकाश फैला रहा होगा, अपनी मनोरम सुगन्ध फैला रहा होगा। गई गुजरी परिस्थितियों में भी उसने अपने उत्कृष्ट दृष्टिकोण के कारण उस छोटे से क्षेत्र में एक नये स्वर्ग की रचना कर रखी होगी। मानवीय स्वभाव की श्रेष्ठता गुलाब के फूल की तरह महकती है उसे मनुष्य ही नहीं, भौंरे, तितली और छोटे-छोटे नासमझ कीड़े तक पसन्द कर रहे होते हैं।

बाहरी उन्नति की जितनी चिन्ता की जाती है, उतनी ही भीतरी उन्नति के बारे में की जाय तो मनुष्य दुहरा लाभ उठा सकता है। आध्यात्मिक दृष्टि से तो वह ऊँचा उठेगा ही साथ ही लौकिक सम्मान एवं भौतिक सफलताओं की दृष्टि से भी वह किसी से पीछे न रहेगा। किन्तु यदि आन्तरिक स्थिति को गया बीता रखा गया और बाहरी उन्नति के लिए ही निरन्तर दौड़ धूप होती रही तो कुछ साधन सामग्री भले ही इकट्ठी कर ली जाय पर उसमें भी उसे शान्ति न मिलेगी। कई धनी मानी और बड़े कारोबारी व्यक्ति सामान्य स्तर के लोगों की अपेक्षा भी अधिक चिन्तित और दुःखी देखे जाते हैं। कारण यही है कि कार्य विस्तार के साथ उनकी उलझने तो बढ़ती हैं पर उन्हें सुलझाने का उचित दृष्टिकोण ने होने से उन्हें अधिक उद्विग्न रहना पड़ता है। ऐसे लोग आमतौर से निरन्तर उद्विग्न रहते कुढ़ते और झुँझलाते देखे जाते हैं। सम्पन्नता का सुख भी केवल उन्हें मिलता हैं जिनने अपना आन्तरिक परिष्कार कर लिया होता है। धन का सदुपयोग करके तथा पद एवं मान द्वारा उपलब्ध प्रभाव को परमार्थ में, लगाकर ऐसे ही लोग ईश्वर प्रदत्त सुविधाओं का समुचित लाभ उठाया करते हैं। दूसरे लोग तो सर्प की तरह चौकीदारी करते हुए निरन्तर उद्विग्न रहने का उलटा भार वहन करते हैं।

आन्तरिक परिष्कार की ओर समुचित ध्यान देना यही बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता का प्रथम चरण है। अध्यात्म का पहला शिक्षण यही है कि मनुष्य अपने स्वरूप को समझे। यह सोचे कि मैं कौन हूँ? क्या हूँ? और क्या बना हुआ हूँ? आत्म-चिन्तन ही साधना का प्रथम सोपान कहा जाता है। यह चिन्तन ईश्वर जीव-प्रकृति की उच्च से आरम्भ नहीं किया जा सकता। कदम तो क्रमशः ही उठाये जाते हैं। नीचे की सीढ़ियों को पार करते हुए ही ऊपर को चढ़ा जा सकता है। सोऽहम्, शिवोऽहम् की ध्वनि करने से पूर्व, अपने को सच्चिदानन्द ब्रह्म मानने से पूर्व हमें साधारण जीवन पर विचार करने की आवश्यकता पड़ेगी और यह देखना पड़ेगा कि ईश्वर का पुत्र-जीव आज कितने दोष दुर्गुणों से ग्रसित होकर पामरता का उद्विग्न जीवन-यापन कर रहा है। माया के बन्धनों ने उसे कितनी बुरी तरह जकड़ रखा है और षडरिपु पग-पग पर कैसा त्रास कर रहे हैं। माया का अर्थ है वह अज्ञान जिससे ग्रसित होकर मनुष्य अपने को निर्दोष और सारी परिस्थितियों के लिए दूसरों को उत्तरदायी मानता है। भव-बन्धनों का अर्थ है-कुविचारों कुसंस्कारों और कुकर्म से छुटकारा पाना। अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बड़ा प्रमाद इस संसार में और कोई नहीं हो सकता, इसका मूल्य जीवन की असफलता का पश्चात्ताप करते हुए ही चुकाना पड़ता है।

आध्यात्म मार्ग पर पहला कदम बढ़ाते हुए साधक को सबसे पहले आत्म-चिन्तन की साधना करनी पड़ती है। ब्रह्मचर्य, तप, त्याग, सत्य, अहिंसा आदि उच्चतम आध्यात्मिक तत्वों को अपनाने से पहले उसे छोटी-छोटी त्रुटिओं को संभालना होता है। परीक्षार्थी पहले सरल प्रश्नों को हाथ में लेते हैं और कठिन प्रश्नों को अन्त के लिए छोड़ रखते हैं। लड़कियाँ गृहस्थ की शिक्षा गुड़ियों के खेल से आरम्भ करती हैं। युद्ध में शस्त्र चलाने की निपुणता पहले साधारण खेल के रूप में उसका अभ्यास करके ही की जाती है। सबसे पहले एम. ए. की परीक्षा देने की योजना बनाना गलत है। पहले बाल कक्षा, फिर मिडिल, मैट्रिक, इण्टर, बी. ए. पास करते हुए एम. ए. का प्रमाण-पत्र लेने की योजना ही क्रमबद्ध मानी जाती है। सुधार के लिए सब से पहले सत्य, ब्रह्मचर्य या त्याग को ही हाथ में लेना अनावश्यक है। आरम्भ छोटे-छोटे दोष दुर्गुणों से करना चाहिए। उन्हें ढूंढ़ना और हटाना चाहिए। इस क्रम से आगे बढ़ने वाले को जो छोटी-छोटी सफलतायें मिलती हैं उनसे उसका सहारा बढ़ता चलता है। उस सुधार के जो प्रत्यक्ष लाभ मिलते हैं उन्हें देखते हुए बड़े कदम उठाने का साहस भी होता है और उन्हें पूरा करने का मनोबल भी संचित हो चुका होता है।

जो असंयम, आलस, आवेश, अनियमितता और अव्यवस्था की साधारण कमजोरियों को जीत नहीं सका वह षडरिपुओं, असुरता के आक्रमणों का मुकाबला क्या करेगा? सन्त, ऋषि और देवता बनने से पहले हमें मनुष्य बनना चाहिए। जिसने मनुष्यता की शिक्षा पूरी नहीं की, वह महात्मा क्या बनेगा?

जप-तप आवश्यक है। आत्म-कल्याण के लिए उनकी भी आवश्यकता है। पर यह ध्यान रखना चाहिए कि गुण कर्म स्वभाव में आवश्यक सुधार किये बिना न आत्मा की प्रगति हो सकती है न परमात्मा की। इसलिए आत्मकल्याण के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को आत्म-चिन्तन की साधना भी आरम्भ करनी चाहिए और उसका श्रीगणेश तप-त्याग जैसे उच्च आदर्शों से नहीं, गुण-धर्म स्वभाव का मानवोचित परिष्कार करते हुए व्यक्तित्व को सुविकसित करने में संलग्न होकर करना चाहिए।


गायत्री की उच्चस्तरीय साधना

भारतीय तत्व-ज्ञान का सार और संदेश

गायत्री उपासना हिन्दू-धर्म के एक अंग विशेष की नहीं वरन् वह भारत की राष्ट्रीय उपासना है। राष्ट्रीय ही क्यों उसे सार्वभौम भी कहा जा सकता है। सद्भावनाओं में ईश्वर की स्थिति और आभा का दर्शन कराने वाला कोई मंत्र ही मानव-जाति के भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाला हो सकता है। गायत्री के 24 अक्षरों में जिस तत्वज्ञान को कूट-कूटकर भरा गया है उसे मानवीय धर्म-कर्त्तव्य की ईश्वरीय प्रेरणा ही मानना चाहिए। ऐसे तत्व-ज्ञान की उपासना ही मनुष्य जाति के भाग्य का निर्माण करने में प्रमुख आधार बन सकती है।

मुसलिम-धर्म में जिस प्रकार ‘कलमा’ मूल मन्त्र माना जाता है वैसे ही हिन्दू-धर्म का अनादि गुरुमन्त्र गायत्री है। चारों वेद भारतीय-संस्कृति के आदि उद्गम हैं। उन चारों वेदों का प्रादुर्भाव गायत्री के चार चरणों से हुआ है। गायत्री के एक-एक चरण की व्याख्या स्वरूप एक-एक वेद बना है। वेदों की ऋचाओं में जिस ज्ञान-विज्ञान का अक्षय भंडार भरा पड़ा है वह बीज रूप से गायत्री में मौजूद है। समस्त भारतीय सभ्यता, भावना और विचारणा को यदि अत्यन्त संक्षिप्त रूप में कहना चाहें तो उसे गायत्री के 24 अक्षरों में व्यक्त किया जा सकता हैं। इसलिए ऋषियों ने यह आवश्यक समझा कि भारतीय धर्म और संस्कृति में आस्था रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति गायत्री को अपना उपास्य माने और उससे जीवन का मार्गदर्शन करने वाली ईश्वरीय प्रेरणा का अनुभव

करते हुए आत्म-कल्याण की ओर जीवन की सार्थकता के लिए निष्ठापूर्वक अग्रसर होता रहे।

शास्त्रकारों ने गायत्री रहित को हेय एवं तिरस्कृत माना है, उसकी कटु शब्दों में भर्त्सना की है और उसे धर्म कृत्यों में सम्मिलित होने का अनाधिकारी बताया है। प्राचीनकाल में जो लोग इस राष्ट्रीय उपासना की उपेक्षा करके धर्म अनुशासन की उपेक्षा करते थे उन्हें समाज से बहिष्कृत कर अछूत बना दिया जाता था। यह एक सामाजिक दंड विधान था और इसलिए बनाया गया था कि लोग इस प्रकार की अवज्ञा एवं उपेक्षा का साहस न करें। अब तो वह दंड-विधान अधिकार-अनाधिकार का प्रश्न बन बैठा है और इसी आधार पर यह कहा जाता है कि अमुक जाति में उत्पन्न हुए लोग उसे जप सकते हैं, अमुक जाति में जन्में नहीं। इस भेदभाव का स्वरूप आज विकृत रूप में भले ही समझा जाय प्राचीनकाल में यह अवज्ञाकारियों के लिए भर्त्सना भरी दंड व्यवस्था मात्र थी। यों प्रत्येक ईश्वरीय कृति पर उसके सभी पुत्रों का अधिकार रहता है। पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा, हवा, वर्षा, शीत, ग्रीष्म, अन्न, जल आदि का उपभोग सभी धर्म और वर्ण के लोग करते हैं तो उसी प्रभु की महान प्रेरणा गायत्री पर देश-धर्म, जाति के आधार पर प्रतिबंध हो ही कैसे सकता है?

यह चर्चा यहाँ इसलिए की जा रही है कि यह समझ लिया जा सके कि गायत्री-मंत्र हमारा अनिवार्य उपास्य है और उसकी उपेक्षा ऋषियों की दृष्टि में एक धर्म अपराध माना गया है। नित्यकर्म में इस उपासना को इतनी कठोरता के साथ सम्मिलित करने का उद्देश्य यह है कि मनुष्य नित्य ही इस बात का अनुभव करता रहे कि उसके उत्थान पतन का हेतु केवल उसकी आस्था, विचारणा एवं भावना ही है। उसे उत्कृष्ट बनाने में ही मानव-जीवन की सार्थकता है और उसे अपनाकर ही भौतिक क्षेत्र में सुख एवं आत्मिक क्षेत्र में शान्ति को प्राप्त किया जा सकता है। इसके विपरीत जिसकी मनोभूमि कुविचारों और दुर्भावनाओं से भरी रहेगी उसे दुख दारिद्र्य के शोक-सन्ताप के अधःपतन रूप गर्त में गिरकर नष्ट ही होना होगा।

इस अकाट्य जीवन-दर्शन को समझ लेने और हृदयंगम कर लेने से जीवन नीति का उचित निर्धारित कर सकना सरल हो जाता है। जिसने विचारों का महत्व न समझा, जो भावना की शक्ति से अपरिचित है, जिसे अपनी मनोभूमि के परिष्कार एवं निर्माण की चिन्ता नहीं उसे बिना पतवार के नाव चलाने वाले मल्लाह की तरह अनाड़ी ही मानना होगा। उसे पग-पग पर आपत्तियों की संभावना का सामना करना पड़ेगा। अधिकाँश व्यक्ति ऐसा ही निरुद्देश्य जीवन व्यतीत करते हैं और रोते-कलपते हुए भव-बंधनों की यंत्रणा सहते हुए नर्तन का लाभ उठाने के स्थान पर हाथ मल-मलकर पछताते हुए यहाँ से विदा होते हैं। ऋषि नहीं चाहते कि भारतीय धर्म के अनुयायी इस प्रकार का असफल जीवन व्यतीत करें। इसीलिए उन्होंने प्रत्येक विचारशील मानव के लिए गायत्री उपासना को अनिवार्य ठहराया और उसकी उपेक्षा करने वाले की भरपेट भर्त्सना की।

भारतीय धर्म की अनुयायियों को द्विज कहा जाता है। द्विज का अर्थ है दो बार जन्म होना। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य द्विज माने जाते हैं। एक जन्म माता-पिता के द्वारा उत्पन्न शरीर का माना जाता है। इस में पाशविक वृत्तियाँ ही प्रधान होती हैं। दूसरा जन्म यज्ञोपवीत संस्कार के समय गायत्री माता और यज्ञ पिता द्वारा होता है। इसे आदर्शवाद, धर्म, सदाचार, परमार्थ एवं देवत्व का प्रवेश द्वार कह सकते हैं। इस संस्कार में मनुष्य को यही शिक्षा दी जाती है कि उसे स्वार्थी, असंयमी, निरुद्देश्य, पाश्विक दृष्टिकोण का परित्याग कर वह सोचना चाहिए, वह करना चाहिए जो मानव के महान गौरव को समुज्ज्वल बना सके। इस प्रकार के व्रत-बंध के साथ यज्ञोपवीत धारणा करने वाला व्यक्ति एक प्रकार से दिव्य-जीवन जीने की प्रतिज्ञा करता है। उस समय मार्गदर्शक गुरु का काम गायत्री मन्त्र ही करता है। सनातन धर्म और आर्य-समाज दोनों की ही संस्कार विधियों में गायत्री को गुरुमंत्र कहा गया है। प्रत्येक यज्ञोपवीतधारी को गायत्रीमंत्र को जीवन सूत्र मानकर कंधे पर, हृदय पर, कलेजे पर और पीठ पर- अन्तःकरण को आवृत करते हुए धारण करना पड़ता है।

यज्ञोपवीत गायत्री की ही प्रतिमूर्ति है। नौ शब्दों को लेकर नौ धागे लिए गए हैं। त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों की प्रतीक तीन लड़े हैं। भूर्भुवः स्वः इन तीन व्याहृतियों से तीन गाठें लगाई जाती हैं और ॐ का प्रतिनिधि ब्रह्म के रूप में ब्रह्म-ग्रंथि को माना गया है। इस प्रकार यज्ञोपवीत को गायत्री की ही प्रतिमा कहा जाता है। उसे धारण करने वाले की यही भावना रहती है कि भारतीय-धर्म के मूल उपास्य गायत्री मन्त्र को शरीर रूपी मन्दिर पर देवता के रूप में स्थापित किया और उसकी नित्य उपासना का, उस भावना को हृदयंगम किये रहने का व्रत लिया। जो लोग इस सुसंस्कार का तिरस्कार करते थे उच्छृंखल बनकर इस आध्यात्मिक अनुशासन को अस्वीकार करते थे उन्हें सामाजिक बहिष्कार के रूप में शूद्र बनना पड़ता था।

शिखा और सूत्र यह दो प्रतीक हिन्दू धर्म के हैं। सिर पर चोटी के बालों के रूप में भी गायत्री की ही ध्वजा फहराई जाती है। जिस प्रकार राष्ट्रीय झंडा पार्लियामेंट भवन पर सदा फहराता ही रहता है उसी प्रकार मस्तिष्क रूपी किले पर सदुद्देश्य के लिए जीवन जीने की प्रतिज्ञा का उद्घोष करने वाली धर्म-पताका-शिखा को भी फहराये रखना पड़ता है। चोटी का वर्णन शास्त्रकारों ने धर्मध्वजा के रूप में ही किया है और गायत्री का उसे प्रतीक बनाया है। इस प्रकार प्रत्येक शिखा-सूत्रधारी हिन्दू अनिवार्यतः गायत्री का उपासक बनता है। ईश्वर प्रार्थना के रूप में पूजा अर्चना को अनिवार्य माध्यम मानने के अतिरिक्त उसे यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि मेरा जीवन क्रम इस गुरु मन्त्र में सन्निहित भावनाओं के अनुरूप ढलता चले। उपासना की अधिकृत विधि को ‘सन्ध्या’ कहते है। संध्या की कई विधियाँ प्रचलित हैं, पर गायत्री का जप प्रत्येक में अनिवार्य है। ऐसी कोई संध्या विधि नहीं जिसमें गायत्री की उपेक्षा की गई हो। शिखा-सूत्र धारण करने वाला-संध्या-वन्दन में विश्वास रखने वाला कोई भी भारतीय धर्मानुयायी स्वभावतः गायत्री उपासक बनता है।

हमारा देश दार्शनिकों और कवियों का देश है। यहाँ वस्तुओं और भावनाओं को भी प्रतीक रूप से देवता के अलंकारिक रूप दिये गये हैं। चेतन जगत की सूक्ष्म-शक्तियों और स्थूल-जगत के पंच-तत्वों में जो गुह्य आत्मा रहती है उसे भावनापूर्वक देवत्व के रूप में प्रकल्पित किया गया है। यों ईश्वर एक अत्यन्त सूक्ष्म एवं निराकार व्यापक शक्ति है, पर उपासना का आयोजन पूरा करने के लिए उसे मानव-रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। शिव, विष्णु, गणेश, सूर्य, सरस्वती, दुर्गा, राम, कृष्ण आदि को ईश्वर के रूप में इसीलिए प्रतिष्ठित करना पड़ा कि नाम, रूप के बिना कल्पना एवं ध्यान की गति नहीं बनती। और इसके बिना उपासना का कोई स्वरूप ही नहीं बन पाता। उपासना के बिना न मन एकाग्र होता है और न परम तत्व की उपलब्धि संभव होती है। इसलिए संसार में सर्वत्र ईश्वर को मानव रूप में, मानव गुणकर्म स्वभाव में परिकल्पित करके उसके पूजा विधान का प्रचलन किया है। इन स्वरूपों में गायत्री का ध्यान सर्वोत्तम है क्योंकि उसमें माता का स्नेह वात्सल्य, महत्व एवं पवित्रता की अनुभूति साधक को पग-पग पर होती चलती है।

नारी की गरिमा और पवित्रता को भारतीय धर्म में अत्युच्च स्थान प्राप्त हैं। भगवान के नामों में उसकी पत्नी को भी सम्मिलित रखा गया है, सम्मिलित ही नहीं रखा गया वरन् प्रथम स्थान भी दिया गया है। लक्ष्मीनारायण, सीताराम, राधेश्याम, गोरीशंकर आदि ईश्वर के नामों में इसी तथ्य का प्रतिपादन होता है। माता, बहिन और पुत्री के रूप में नारी को अत्यंत पवित्र, पूज्य और उच्च स्थान प्रदान किया गया है। विवाहिता पत्नी को भी विलास एवं विकार के लिए नहीं धर्म वृद्धि के लिए ग्रहण किया जाता है। इसलिए उसे धर्म-पत्नी कहते है। स्मरणी का नारकीय स्वरूप यहाँ सर्वथा निन्दनीय माना गया है और उसकी कटु से कटु शब्दों में निन्दा करते हुए उस मृग मरीचिका से बचने पर निरन्तर जोर दिया गया है। सन्त साहित्य में नारी निन्दा का बहुत वर्णन है। उसका तात्पर्य कामिनी रुक्मणी को विकारग्रस्त भावना का परित्याग करना मात्र है।

देखा जाता है कि मनुष्य की निकृष्ट वृत्तियाँ धन और नारी के प्रति लोलुपता का परिचय देती रहती है। इनका दमन किये बिना मानवीय महानता की उपलब्धि संभव नहीं। नारी में पवित्र एवं पूज्य भाव रखने से ही आध्यात्मिक-ब्रह्मचर्य के द्वारा ब्रह्म तेज की प्राप्ति, शारीरिक जीवनी-शक्ति का संरक्षण, गृहस्थ जीवन की सफलता, दाम्पत्य-निष्ठा की परिपक्वता, सुसन्तति, परिवार का आर्थिक एवं स्नेह संतुलन, समाज में सुख-शान्ति गृहस्थ की सार्थकता संभव होती है। इस तथ्य को जीवनचर्या में उतारने के लिए यह एक महत्वपूर्ण उपाय है कि ईश्वर को नारी के रूप में पूजा जाय। गायत्री को माता के रूप से आराध्य मानने का भी यही रहस्य है।

यों ईश्वर एक सूक्ष्म शक्ति है। न वह पुरुष है न नारी। अपनी उपासनात्मक आवश्यकता के लिए ही उसे विभिन्न रूपों में कल्पित और प्रतिष्ठित करते हैं। “त्वमेव माता च पिता त्वमेव, भ्रातश्च सखा त्वमेव” की उक्ति में उस परमात्मा को माता, पिता, भ्राता सखा आदि के रूप में मान्यता दी है।

जिस स्वरूप या रिश्ते से उपासना में सुविधा हो उसी से उसका ध्यान, पूजन किया जा सकता है। इस संदर्भ में नारी के रूप में या माता के रूप में परमात्मा की उपासना अधिक श्रेयस्कर है क्योंकि नारी को निरंतर पुण्य वृत्ति में ध्यान करने पर लौकिक जीवन में भी वही प्रवृत्ति विकसित होती है और व्यक्ति सच्चे अध्यात्म की ओर द्रुत-गति से अग्रसर होता है। दूसरा लाभ यह भी है कि जिस स्वरूप में प्रभु का ध्यान किया जाता है उसी भावना के अनुरूप प्रत्युत्तर एवं प्रतिध्वनि भी लौटकर साधक को मिलती है। माता का रिश्ता सबसे अधिक उत्कृष्ट प्रेम का परिचायक है। वात्सल्य से अधिक मधुर और कोई रस नहीं। माता के रूप में प्रभु की आराधना करने से उसका प्रत्युत्तर साधक को वात्सल्य स्नेह के रूप में प्राप्त होता है और वह उस अनुभूति से कृत-कृत्य हो उठता है। यह लाभ पुरुष प्रतीकों की उपासना में संभव नहीं। पिता से माता का स्नेह स्वभावतः अधिक होता है। इसलिये परमात्मा की अधिक उच्च-स्तरीय वात्सल्य प्राप्त करने के लिए गायत्री शक्ति का माता के रूप में ध्यान करना ही अधिक श्रेयस्कर माना गया है और ऋषियों एवं शास्त्रकारों ने वैसी ही प्रतिष्ठा एवं भावना करने का हमें आदेश किया है। गायत्री का मातृ-मूर्ति के रूप में ध्यान, स्तवन, पूजन, करने का प्रायः सभी उपासना ग्रन्थों में निर्देश मिलता है। इस स्थापना के पीछे उपरोक्त तथ्यों का तो स्पष्ट समाधान है ही और भी कितने अज्ञात एवं रहस्यमय कारण हो सकते हैं।

रुचि भिन्नता के लिये भारतीय धर्म में उदार स्थान दिया गया है। कोई साधक अपनी अभिरुचि एवं आकाँक्षा के अनुरूप किसी भी देवता, मंत्र या दृष्ट की उपासना कर सकता है। इतनी छूट होते हुए भी गायत्री को अनिवार्य उपास्य माना गया है। समस्त भारतीय समाज को एकता के भावना सूत्र में पिरोये रखने के लिये गायत्री को एक जातीय जीवन तत्व का स्थान प्राप्त है। इसे राष्ट्रीय संगठन मन्त्र भी कह सकते हैं। भिन्नताओं में एकता की अनुभूति हम गायत्री को सार्वभौम-सर्वजनीन बना कर ही कर सकते हैं। भारतीय दर्शन की व्यापकता इसी माध्यम से परिपुष्ट हो सकती हैं। कोई व्यक्ति अपनी विशेष उपासना किसी भी विधि या माध्यम से करे पर उसे तत्वदर्शन के रूप में गायत्री को तो प्रथम स्थान देना ही चाहिए। विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय, संस्थान, संगठन अपने-अपने अलग-अलग झंडे रखें तो हर्ज नहीं पर राष्ट्रीय ध्वज तो उनसे भी ऊँचा माना जाना चाहिए। इसी प्रकार भिन्न उपासना विधियों को काम में लाने वालों को भी गायत्री उपासना तो करनी ही चाहिए। शास्त्रकारों ने कहा है “जो गायत्री उपासना नहीं करता उसके अन्य मंत्र भी निष्फल चले जाते है” इस निर्देश के पीछे एक महत्व का तथ्य छिपा हुआ है और उसे हम सबको गंभीरतापूर्वक समझना चाहिए और श्रद्धापूर्वक अपनाना भी चाहिए।


जीवन सार्थकता की साधना

उन साधकों को जो गायत्री को अपना इष्ट उपास्य मानते हैं, यह जानना ही चाहिए कि इस संसार की सर्वोपरि सर्वोत्कृष्ट विभूति सद्बुद्धि एवं सत्प्रवृत्ति ही है। इसे प्राप्त किये बिना कोई व्यक्ति संसार में अब तक न तो महापुरुष बन सका है और न आगे बन सकेगा। न किसी का जीवन सफल हुआ है और न आगे हो सकेगा। जिसे यह तत्व मिल गया उसका जीवन सब प्रकार सार्थक बना और जिसे उस लाभ से वंचित रहना पड़ा वह विक्षोभ की आग में निरन्तर जलता-भुनता रहा और ध्यान देने योग्य बात यह है कि हमें किसी प्रकार सद्बुद्धि प्राप्त हो, सत्प्रवृत्तियों से मनोभूमि को परिपूर्ण बनाया जाय। इस आस्था को संकल्प पूर्ण अन्तःकरण में दृढ़ता-पूर्वक जमा लेने का नाम ही गायत्री-भक्ति है। जिसने इस तथ्य को सच्चे हृदय से स्वीकार कर लिया वही गायत्री उपासक है।

कल्पवृक्ष की इसलिए प्रशंसा की जाती है कि उसके नीचे बैठकर की हुई कामनापूर्ण होती हैं। पारस का महत्व इसलिए माना जाता है कि उसे छूने से घटिया दर्जे की लोह धातु सोना बन जाती है। अमृत का गौरव इसलिए है कि उसे पीने वाला जरा मृत्यू से छूटकर अमरता का सुख प्राप्त करता है। यह तीनों अद्भुत पदार्थ किम्वदन्तियों के रूप में मौजूद हैं पर इनका लाभ जिसने प्राप्त किया हो ऐसा मनुष्य अभी तक देखा नहीं गया। इसकी तुलना में सद्बुद्धि एवं सत्प्रवृत्तियों का गायत्री प्रतिपादित तथ्य अधिक वास्तविक है जिसे प्राप्त करने से उपरोक्त तीनों किम्वदंतियों का लाभ प्रत्यक्ष ही मिल सकता है। अन्तरात्मा में यदि सत्प्रेरणा की दिव्य ज्योति जलने लगे तो उसके प्रकाश में अंधकार जैसा काला कलूटा जीवन सहज ही प्रकाशमान हो सकता है। सुख और शान्ति की समस्त कामनाएँ पूर्ण हो सकती हैं। नर पशु की तरह दिन काटने वाला व्यक्ति पुरुष से पुरुषोत्तम, नर से नारायण बन सकता हैं। अपनी सुगंध को विश्व मानव के लिए बिखेरता हुआ इतिहास के पृष्ठों पर अमर बने रहने का गौरव प्राप्त कर सकता है। गायत्री में प्रतिपादित सत् प्रेरणा, सद्बुद्धि, सद्भावना का तनिक भी लाभ जिसे मिला वह सब प्रकार धन्य हो जाता है। इसी तत्व को ध्यान में रखते हुए गायत्री को प्राण संजीवनी कहा गया है। ‘जप’ कहते है प्राण को, ‘त्री’ कहते है त्राण करने वाली को। गायत्री का सच्चा उपासक अपने प्राण का त्राण ही करता है-भवबन्धनों से मुक्ति प्राप्त करता हुआ, आनंद का रसास्वादन करते हुए जीवन को सब प्रकार धन्य ही बनाता है।

गायत्री सद्बुद्धि की उपासना का मंत्र है। ‘धियो यो नः प्रचोदयात्’ पद में ईश्वर से एक ही प्रार्थना की गई है कि आप हमारी बुद्धि एवं प्रवृत्ति को सन्मार्ग पर लगा दीजिए। ईश्वर के पास मनुष्य शरीर प्रदान करने के बाद एक ही महत्वपूर्ण उपहार जीव को देने के लिए यही बचा भी है। यदि यह मिल जाय तो नर से नारायण बनते देर नहीं लगती। मनुष्य शरीरधारी जीव को अन्तरात्मा जब परमात्मा को पुकारती है कि ‘हे परम पिता, आधा आनंद तूने दिया है तो शेष आधे को भी प्रदान कर और हमें पूर्णता का आनंद लेने दें। हमको मनुष्य शरीर ही नहीं, मानवीय प्रवृत्ति भी चाहिए। आत्मा की इसी गुहार को वेद के ऋषि ने छंदबद्ध कर दिया है और उसका ‘गायत्री’ ऐसा नामकरण किया है।

गायत्री को इष्ट मानने का अर्थ है-सत्प्रवृत्ति की सर्वोत्कृष्टता पर आस्था। गायत्री उपासना का अर्थ है-सत्प्रेरणा को इतनी प्रबल बनाना, जिसके कारण सन्मार्ग पर चले बिना रहा ही न जा सके। गायत्री उपासना का लक्ष्य यही है। यह प्रयोजन जिसका जितनी मात्रा में जब सफल हो रहा हो तब समझना चाहिए कि हमें उतनी मात्रा में सिद्धि प्राप्त हो गई। इस सिद्धि का प्रतिफल, भौतिक जीवन में सुख और आध्यात्मिक जीवन में शान्ति बनकर सब और बिखरे-बिखरे पड़े दीखता रहता है।

यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि मनुष्य का आन्तरिक स्तर जैसा कुछ भी होगा बाह्य परिस्थितियों बिलकुल उसी के उपयुक्त सामने प्रस्तुत रहेंगी। क्रोधी, आलसी, उतावले, असंयमी, अदूरदर्शी मनुष्य अपने इन्हीं दुर्गुणों के कारण पग-पग पर कठिनाइयों और आपत्तियों के पहाड़ सामने खड़े पाते हैं। पर जिनकी अन्तःभूमि स्नेह, सौजन्य, उदारता, सहिष्णुता, श्रमशीलता, उत्साह एवं संयम को दृढ़ता पूर्वक अपने भीतर धारण कर चुकी होगी उसके लिए शत्रु भी मित्र बने बिना न रह सकेंगे। प्रगति के अवरुद्ध मार्ग भी उनके लिए खुलेंगे और आपत्तियों एवं अड़चनों के समाधान का कोई मार्ग सहज ही निकलेगा, इस तथ्य को जिसने समझ लिया उसने जिन्दगी जीने की विद्या को जान लिया यही मानना चाहिए, गायत्री उपासना का तात्पर्य साधक को इसी रहस्य से अवगत कराना है।

चौबीस अक्षर के इस छोटे से मंत्र में जीवन की सफलता का रहस्य कूट-कूट कर भरा हुआ है। अध्यात्म विद्या का सार भी इसी को समझना चाहिए। योग्यताएं, विशेषताएँ, क्षमताएँ, सम्पदाएँ, एवं विभूतियाँ कितनी ही अधिक क्यों न हों यदि भावना स्तर का परिष्कृत निर्माण नहीं हुआ है तो मनुष्य को हर घड़ी किसी न किसी बहाने विक्षोभ एवं असंतोष की आग में ही जलते रहना पड़ेगा। इसके विपरीत यदि गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से किसी का व्यक्तित्व सुविकसित है तो उसे अभाव और कठिनाइयों के बीच रहते हुए भी हँसते हुए दिन बिताने और संतोषपूर्वक रात काटने में कोई अड़चन अनुभव न होगी। गायत्री का प्रत्येक अक्षर इसी शिक्षा से ओत-प्रोत है और जो भी व्यक्ति भावनापूर्वक उच्च-स्तरीय गायत्री साधना के लिए तत्पर होता है उसे अपने इस इष्ट-मंत्र का स्वरूप समझने के साथ-साथ उपरोक्त तथ्य एवं रहस्य को भी हृदयंगम करना पड़ता है। जिसने इस तत्वज्ञान को समझा और जीवन में उतारा उसका सारा वातावरण ही बदल गया। यह परिवर्तन जहाँ भी संभव हुआ वहाँ निश्चित रूप में आनंद एवं उल्लास का स्त्रोत फूटा। सच्चे गायत्री उपासक का जीवन सब प्रकार धन्य हुए बिना रह ही नहीं सकता।

वेद मंत्रों की अद्भुत रचना ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण है। मंत्रों का साधारण अर्थ शिक्षा एवं ज्ञान के लिए प्रयुक्त होता है। हर वेद मंत्र में ऐसी महत्वपूर्ण शिक्षाएँ भरी पड़ी हैं जिनके द्वारा मानव जीवन प्रगति की ओर सहज ही अग्रसर हो सकता है। इसके अतिरिक्त इन मंत्रों में वैज्ञानिक रहस्य भी छिपा पड़ा है। उनमें शब्दों का चयन स्वर विज्ञान के मर्मज्ञ ऋषियों ने इस ढंग से किया है कि उनके उच्चारण मात्र से शरीर और मन में विशेष प्रकार के ध्वनि-कम्पन तरंगित होने लगते है और वे तरंगें मनुष्य के अंतर्मन में वैसी प्रेरणाएँ प्रवाहित करती हैं, जिससे व्यक्ति उसी दिशा में सोचने, करने, बढ़ने और ढलने के लिए अनायास ही उत्तेजित होता है। वेद मंत्रों में सन्मार्ग दर्शन कराने वाला जितना ज्ञान भरा पड़ा है उससे कहीं अधिक शक्तिशाली वह विज्ञान है जिसके माध्यम से अन्तः प्रदेश में समस्त सूक्ष्म विकृत होकर उन्हीं मधुर ध्वनि तरंगों का प्रादुर्भाव करते है जिनके लिए वह मंत्र बना था। गायत्री मंत्र को वेद का बीज मंत्र कहा जाता है। उसी के चार चरणों की व्याख्या स्वरूप चारों वेद बने है। वेदों में जो कुछ भी ज्ञान विज्ञान है वह बीज रूप में गायत्री में मौजूद है। इसलिए उसकी गरिमा चारों वेदों के समतुल्य ही समझी जाती है।

गायत्री का उच्चारण, पाठ एवं जप करने का एक अत्यन्त ही शक्तिशाली सूक्ष्म प्रभाव होता है। उस प्रभाव से प्रभावित मनुष्य उसी मार्ग पर चलने के लिए विवश होता है जो मंत्र का मूल प्रयोजन था। गायत्री का मूल उद्देश्य सत्प्रेरणाओं और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन है। देखा यही जाता है कि जो लोग भावना पूर्वक इस मार्ग पर बढ़ते है उन्हें कोई अज्ञात् शक्ति सद्भावनाओं को अपनाने के लिए प्रेरणा देती रहती है और मनुष्य कितना ही कठोर क्यों न ही उस प्रेरणा को पूर्णतया ठुकरा नहीं सकता। न्यून मात्रा में ही सही पर उसका सुधार अवश्य होता है और जिसकी मनोभूमि जितनी सुधरी उसका कल्याण भी उतना ही निकट आया। गायत्री को कल्याणी इसीलिए कहा जाता है कि उसका अंचल श्रद्धापूर्वक पकड़ने वाला व्यक्ति कल्याण की ओर ही चलता है और अन्ततः कल्याण का लक्ष्य प्राप्त भी कर लेता है।

शब्द-विज्ञान अपने आप में एक परिपूर्ण शास्त्र है। जिह्वा से उच्चारण किये हुए शब्द मनुष्य के मन पर भारी प्रभाव डालते हैं और उनका प्रभाव तुरन्त ही दृष्टिगोचर होता है। कटु-वचन बोलने का प्रतिफल क्रोध एवं लड़ाई के रूप में सामने आता है। किसी प्रेमी का शोक-समाचार सुनते ही भूख प्यास भाग जाती है और मनुष्य अर्ध मृतक जैसा बन जाता है। भय एवं आशंका की संभावना सुनकर दिल धड़कने लगता हैं। व्यंग उपहास के थोड़े से शब्द द्रौपदी ने कहे थे और उसका प्रतिफल महाभारत के रूप में सामने आया। परीक्षा में उत्तीर्ण होने की खबर सुनकर छात्रों को कितनी प्रसन्नता होती है। रोदन एवं क्रंदन के शब्द सुनकर अपना भी हृदय फटने लगता है। प्रेम और सहानुभूति के वचन कितने मधुर लगते है। कामुकता और वासना के प्रस्ताव शरीर में कैसी हलचल मचा देते हैं। शब्द की शक्ति का हम पग-पग पर अनुभव करते हैं। संगीत के माध्यम से रोगों का निवारण, भावनाओं का अभिवर्धन, गौओं का अधिक दूध देना, मृग और साँप का स्थिर मुग्ध होने पर पकड़ा जाना प्रसिद्ध है। किसी को गलत सलाह या गलत आज्ञा देकर दुष्कर्म कराने वाला भी अपराधी मान जाता है और दंड भुगतता है। असत्य शब्द पाप ही तो है जिसे प्रधान दूषणों में गिना गया है। शब्दों का कुप्रभाव कई बार जीवन-मरण की विभीषिका के रूप में सामने आता देखा गया है।

गायत्री मंत्र के 24 अक्षर शक्ति बीज के नाम से विख्यात हैं। इनका उच्चारण सूक्ष्म शरीर के सारे ढाँचे को प्रभावित करता है। टाइप राइटर की अक्षर-कुँजियों पर उँगली रखने से ऊपर लगे हुए कागज पर वही अक्षर छप जाता है। कुँजी पर दबाव पड़ते ही मशीन के भीतर लगी हुई तीली अपनी जगह से चलती है और कागज पर अक्षर छापकर फिर अपनी जगह वापिस आ जाती है। उसी प्रकार गायत्री मंत्र में उच्चारित हुए शब्द मुख-कंठ-ओष्ठ-तालु-जिह्वा आदि संस्थानों में संलग्न ज्ञान तंतुओं को तरंगित करते हैं और उनका प्रभाव षट्चक्रों एवं 54 उपत्यिकाओं पर पड़ता है। इन रहस्यमय संस्थानों में अनेक शक्तियाँ गुप्त रूप से प्रसुप्त अवस्था में छिपी पड़ी रहती है। उन्हें जगाने का क्रम गायत्री जप द्वारा आरम्भ किया जाता है तो वे सक्रिय होने लगती हैं और धीरे-धीरे साधक अपने में आशाजनक उत्साहवर्धक परिवर्तन हुआ अनुभव करने लगता है। गायत्री उपासना के अनेक लाभ बताये गये है। उसका ऐसा आश्चर्यजनक महात्म्य शास्त्रों में मिलता है जिसे पढ़ सुनकर सहसा यह विश्वास नहीं होता हूँ कि थोड़े से अक्षरों को बार-बार दुहराने मात्र से जप करने मात्र से कैसे उतना बड़ा लाभ संभव हो सकता है। पर अनुभव यही बताता है कि जिसने परीक्षा के लिए भी इस मार्ग पर थोड़े से कदम बढ़ाये उसे निराश नहीं होना पड़ा वरन् आशा से अधिक ही उसने पाया।


भव्य समाज की नव्य रचना

विवाहों में अपव्यय की कुप्रथा

प्राचीन काल की गौरवमयी परम्पराओं को अपनाकर ही हम अपने खोये अतीत को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। हिन्दू समाज की वर्णाश्रम व्यवस्था किसी समय समाज के ढाँचे को सुगठित बनाये रखने में बड़ी सहायक हुई है पर आज उसका जो विकृत स्वरूप है उसके कारण हमारा समाज दिन-दिन अधःपतन की ओर गिरता चला जा रहा है। कितनी ही ऐसी कुरीतियों ने हमारी समाज व्यवस्था में प्रवेश कर लिया है जिसके कारण अन्य समाजों की तुलना में हमारा समाज दिन-दिन हेय और घृणित बनता चला जा रहा है। इन विकृतियों की और हमें ध्यान देना होगा और समय रहते सुधार के लिए आवश्यक कदम बढ़ाना होगा। अन्यथा एक दिन वह आवेगा कि लोग अपने को हिन्दू कहलाना भी अपमान की बात समझेंगे।

हमारे समाज की सब से बड़ी कुरीति है-विवाह शादियों के समय होने वाला अपव्यय। बेटे वाला चाहता है कि लड़की वाले का घर-घूरा बिकवा कर जो कुछ उसके पास हो वह तथा कर्ज लेकर जितना भी वह इकट्ठा कर सके, दहेज के नाम पर वसूल कर ले। बेटी वाला भी कम नहीं, वह चाहता है कि लड़के की पढ़ाई में जिसने अपना घर खाली कर लिया है वह सेठ साहूकारों की तरह सोने, चाँदी, हीरे, मोती के बहुमूल्य जेवर और रेशम, मखमल के रईसों, अमीरों जैसे कपड़े लड़की के लिए चढ़ा कर अपनी आर्थिक स्थिति को नष्ट कर दे।

दोनों ही पक्ष अपनी शतरंज की चाल चलते रहते हैं। बेटे वाला चाहता है कि अधिक से अधिक दहेज मिले, ऐसा सम्बन्ध पक्का किया जाय और लड़की वाला उस घर को तलाश करता है जो अधिक जेवर चढ़ा सके। इस प्रतिस्पर्धा में दोनों पर भारी आर्थिक दबाव पड़ता है और एक-दो ब्याह शादियों में ही आर्थिक दृष्टि से खोखले ही जाते हैं।

विवाह के उत्सव का व्यय भार भी तो कम नहीं होता। बरात सजाने और ले जाने में बेटे वाले को और स्वागत सत्कार में बेटी वाले को कमर तोड़ आर्थिक दबाव सहना पड़ता हैं। बराती अपना काम छोड़ते है, सजधज के कपड़े, लत्ते बनवाने में पैसे खर्च करते हैं और जो बारात में ले गया है उस पर अहसान जताते है। बेटे वाला भी अपनी शोभा बनी देख कर बराती का उपकार मानता है और उसे ले जाने में सवारी एवं अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करता है। बेटी वाला अपनी सामर्थ्य भर प्रयत्न करते हुए भी उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाता तो उसका चित्त भी दुखी ही रहता है। बरात को ठहराने, खिलाने एवं स्वागत सुविधा के साधन जुटाने में उसे कितनी चिन्ता और भाग दौड़ करनी पड़ती है उसे भुक्तभोगी ही जानता है।

बहुमूल्य मिष्ठान्न पकवानों की लम्बी-चौड़ी दावतें इस महंगाई के जमाने में कम पैसा नहीं काटती। बाजे गाजे, आतिशबाजी, उपहार, अलन-चलन, नेग-जोग का ढोंग जितना निरर्थक होता है उतना ही खर्चीला भी। दोनों पक्ष से ऐसे उपहार भेजे जाते हैं जिनमें पैसा तो अन्धाधुन्ध खर्च होता है पर वे जगह घेरने और बेकार पड़े रहने के अतिरिक्त और किसी काम नहीं आते। विवाह से पहले और बाद में बेकार के इतने रस्म रिवाज पूरे करने पड़ते है जिनमें विवाह के बराबर नहीं तो कुछ ही कम-बढ़ खर्च पड़ जाता है। बरात, दावत, उपहार, अलन-चलन, दहेज, जेवर, गाजे-बाजे आदि का खर्च इतना बढ़ जाता है कि उन्हें पूरा करने में दोनों ही पक्ष दिवालिया हो जाते हैं।

प्रचलित रूढ़ियों के कारण हिन्दू के लिए ‘विवाह’ एक इतना बड़ा भार है कि उसे जीवन का अधिकाँश भाग इसी की चिन्ता में घुलते हुए बिताना पड़ता है। सभी के घर में बच्चे होते हैं और सभी को विवाह करने पड़ते हैं। कोई गृहस्थ ऐसा नहीं जिसके कन्या, पुत्र न होते हों। लड़के के विवाह में तो ऐसा भी हो सकता है कि जेवर एक बहू का उतार कर दूसरी पर और दूसरी का तीसरी पर चढ़ा दिया जाय तो वक्त की शोभा हो जाती है और उसमें होने वाले खर्च की बचत हो जाती है। पर कन्या वाले को वह लाभ भी नहीं मिलता। लड़के वाला दहेज पाकर उस समय थोड़ा नफे में रहे तो भी उसे प्रथा से कुछ विशेष लाभ नहीं होता क्योंकि उसके घर में भी तो कन्या होती है, उसके विवाह में उसे भी अपना घर खोखला करना पड़ता है।

उँगलियों पर गिनने लायक चन्द अमीरों की बात छोड़िये। अधिकाँश लोग निम्न या मध्यम श्रेणी के होते हैं। उनके लिए इस महंगाई और बेकारी के जमाने में अपनी गुजर करना ही कठिन पड़ता है। भोजन, वस्त्र, दवा, फीस, मकान किराया, अतिथि सत्कार, तीज-त्यौहार जैसी दैनिक आवश्यकताओं को ही लोग मुश्किल से पूरा कर पाते है। ऐसी दशा में जब कई कन्या, पुत्र विवाह के योग्य हो जाते हैं और उस कार्य के लिए बहुत धन जुटाने की आवश्यकता पड़ती है तब अभिभावकों की चिन्ता और परेशानी का कोई ठिकाना नहीं रहता।

कर्ज लेकर, जीवनोपयोगी वस्तुओं को बेचकर, बेईमानी, ठगी आदि जो भी उपाय संभव हो उसे अपना कर विवाहों का खर्च अनिवार्यतः जुटाना पड़ता है। हिन्दू सारा जिन्दगी अपने बच्चों के विवाह शादी की चिन्ता में घुलता रहता है। उसका आधे से अधिक जीवन समस्याओं को सुलझाने में लग जाता है। आमदनी का प्रायः आधा खर्च उसी मद में चला जाता है। मजबूरी हर काम कराती है। ईमानदारी से पैसा नहीं मिलता तो बेईमानी करनी पड़ी है। हमारी समाज में फैली हुई और स्वार्थपरता का एक कारण यह भी है कि हर हिन्दू को अपने बच्चों के विवाह में खर्च करने के लिए बहुत पैसा चाहिए। ईमानदारी से तो गुजारे के लायक सीमित आमदनी ही हो सकती है। अतिरिक्त धन जमा करना है तो चोरी, बेईमानी, ठगी, अनीति एवं शरीर और मन को घुला डालने वाली किफायतशारी के अतिरिक्त और कोई तरीका नहीं रह जाता। इस कुचक्र में पड़े हुए हम अपना शारीरिक, मानसिक, नैतिक एवं सामाजिक स्वास्थ्य संतुलन बुरी तरह खोते चले जा रहे हैं। विवाह की चिन्ता हर अभिभावक को चिता की तरह जलाती रहती है।

विवाहों में होने वाले अपव्यय को जुटाने के लिए जो तरीके अपनाने पड़ते हैं वे प्रायः अनुचित ही होते है। कर्ज लेना और फिर उसे न चुका सकना, मकान, जमीन, जेवर, बर्तन आदि बेच देना, बेईमानी करके पैसे कमाना यही तो अतिरिक्त आमदनी के स्त्रोत हो सकते हैं। इनके कारण मनुष्य अपना लोक, परलोक, धर्म, ईमान, यश, सम्मान, सभी कुछ खो बैठता है और अपराधी जैसी दुर्गति भोगते हुए निष्कृष्ट जीवन अपनाने के लिए विवश होता है। जो लोग इस प्रकार भी इस समस्या को नहीं सुलझा पाते उन्हें अयोग्य वरों के हाथों अपनी सुयोग्य कन्याएँ सौंपनी पड़ती है जिससे उन बच्चियों का सारा जीवन दुःखमय बीतता है। कम दहेज दे सकने पर कितने ही लड़के वाले बहुओं को बुरी तरह सताते हैं ताकि उनके पिता से और भी अधिक पैसा मिले। कितनी ही घटनाएँ ऐसी भी होती रहती हैं कि एक बहू को अत्याचारों द्वारा या विष देकर मार डाला जाता है और लड़के का दूसरा विवाह करके फिर दहेज कमाया जाता है। अभिभावकों को चिन्ताग्रस्त देखकर कई भावुक लड़कियाँ आत्महत्या तक कर बैठती हैं, घर छोड़कर भाग खड़ी होती हैं या आजीवन कुमारी रह जाती हैं। असफल अभिभावकों का भी कई बार ऐसा दुःखद अन्त देखा जाता है कि उसका स्मरण मात्र करने से आँसू भर आते हैं। लाखों, करोड़ों अभिभावकों और बच्चे-बच्चियों को, इन कुरीतियों के कारण घुल-घुल जो अप्रत्यक्ष आत्महत्याएं करनी पड़ती हैं उनका करुण चित्र कोई चित्रकार यदि खींच सके तो पता चले कि हिन्दू समाज को भीतर ही भीतर कितनी घुटन और पीड़ा घुन की तरह खाये जा रही है।

कन्या और पुत्र में अन्तर इस विवाद में होने वाले अपव्यय ने ही प्रस्तुत किया है अन्यथा बच्चे और बच्ची में से किसी को सौभाग्य और किसी को दुर्भाग्य माने जाने का कोई कारण नहीं। लड़की की शिक्षा, दीक्षा, पालन-पोषण एवं मान सम्मान में इसलिए अन्तर किया जाता है, क्योंकि वह विवाह की खर्चीली प्रथा के कारण घर के लिए भार या कंटक सिद्ध होती है। किसी जमाने में तो पैदा होते ही लड़कियों को गला घोंटकर या विष देकर मार डाला जाता था। इस व्यापक कुप्रथा के विरुद्ध अंग्रेजी सरकार ने एक ‘दुख्तर कुशी’, कानून ही बनाया था। अब वैसा तो कम ही होता है पर लड़कियाँ जिस उपेक्षा से पलती और शिक्षा, दीक्षा से वंचित रहती हैं उसे देखते हुए उनकी आधी हत्या तो अभी भी हो जाती है। सुयोग्य कन्याओं को सुयोग्य पति प्राप्त करने से इसलिए वंचित रह जाना पड़ता है कि उनके अभिभावक सुयोग्य लड़कों द्वारा की गई दहेज की माँग पूरी नहीं कर सकते। इसके विपरीत अयोग्य कन्याएं सुयोग्य लड़कों के गले केवल पैसे के बल पर आसानी से मढ़ दी जाती हैं।

संसार भर के समस्त देशों और समाजों पर दृष्टिपात कीजिए, कहीं भी विवाह के नाम पर होने वाला अपव्यय दिखाई न पड़ेगा। विवाह एक साधारण-सी मानव-जीवन की स्वाभाविक घटना है। इस अवसर पर प्रसन्नता की अभिव्यक्ति के लिए छोटा उत्सव समारोह हो सकता है। सभ्य संसार में ऐसा ही होता भी है। असभ्य जंगली जातियों में भी इसे खर्चीला नहीं बनाया जाता। यह अभागी हिन्दू जाति ही है जिसमें विवाह के समय होने वाले थोड़े अमीरी के स्वाँग को इतना महत्व दे रखा है, जिसके कारण उसका जातीय-जीवन बुरी तरह नष्ट-भ्रष्ट हुआ जा रहा है। इसी देश में ईसाई, मुसलमान, बौद्ध आदि अन्य समुदाय के लोग रहते और विवाह शादी करते हैं पर उनमें इसे कमर तोड़ आर्थिक दबाव का रूप नहीं दिया जाता। हम अपने को सभ्य कहें या असभ्य? विवेकशील कहें या अविवेकी? यह समझ में नहीं आता। इतनी भयंकर कुरीतियों को जो समाज छाती से चिपकाये बैठा है, इतना त्रास सहकर भी जिसे सुधार एवं परित्याग का साहस न होता हो उस समाज को मृतक नहीं तो अर्धमृत कहना ही चाहिए। ऐसे निष्प्राण लोग सभ्य संसार की प्रगति के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकेंगे और अपना पिछड़ापन दूर कर सकेंगे इसकी आशा नहीं बंधती।

संसार के सभी धर्म और समाज प्रगति कर रहे हैं। ईसाई धर्म को जन्मे पूरे दो हजार वर्ष भी नहीं हुए कि उसने विश्व की आधी जनसंख्या को दीक्षित कर लिया। इस्लाम को 1300 वर्ष हुए हैं और वे धर्मों की दृष्टि से दूसरे नम्बर की जनसंख्या को अपने में समेटे हुए हैं। भगवान बुद्ध को दो हजार वर्ष हुए है और उनका धर्म भी संसार के तीसरे नम्बर पर है। यह अभागी हिन्दू जाति ही है जो सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक का इतना भव्य इतिहास और दर्शन होते हुए भी दिन-दिन स्तर की दृष्टि से भी घट रही है और संख्या की दृष्टि से भी। संसार के अन्य देशों की बात तो कौन कहे हिन्दू अपने देश में भी उस गति से नहीं बढ़ रहे जिस गति से ईसाई, मुसलमान बढ़ रहे हैं। इसके कई कारणों में सब से प्रमुख कारण यह है कि इसके भीतर रहने से लोगों की आत्मा विद्रोह करने लगी है। विवाह में होने वाले विवाह की कुप्रथा एक के तोड़े टूटती तो है नहीं, मजबूरी से उसी ढर्रे पर चलना पड़ता है। किन्तु प्रतिफल में जो दुखद दुष्परिणाम भोगते पड़ते हैं उससे विक्षोभ तो उत्पन्न होता ही है। जिस जाति में आत्मविक्षोभ भरा होगा, वह कभी फल-फूल नहीं सकेगी वरन् विनाश की ओर ही चलेगी। आज हो भी यही रहा है। अपने धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा रखने वालो की संख्या अब दिन-दिन घट रही है। आज हकीकतराय, बैरागी, शिवाजी और गुरु गोविन्दसिंह मुश्किल से ही निकलेंगे। लोग स्वेच्छा से अपनी चोटी कटाते चले जा रहे है, जनेऊ पहनना बेवकूफी समझते है, धर्म परम्पराओं का उपहास उड़ाते है। ऐसे समाज के बढ़ने और फलने-फूलने की क्या आशा की जा सकती है? इस अश्रद्धा के उत्पन्न होने में हमारी सामाजिक बुराइयों का भी एक बड़ा कारण है, जिनने अपने अनुयायियों को केवल त्रास ही दिया है।

इन कुरीतियों का शोधन करना हमारे जातीय जीवन की जीवन-मरण समस्या है। इस पर गंभीरतापूर्वक विचार करना होगा और यदि अपनी महान संस्कृति को उपहासास्पद एवं घृणित होने से बचाना है, उसे मरणोन्मुख नहीं होने देना है तो हमें इसके लिए कुछ करना ही चाहिए। वैवाहिक अपव्यय जैसी सत्यानाशी कुरीतियों का काला मुँह करने के लिए तो बिना एक क्षण भी प्रतीक्षा किए तत्काल कटिबद्ध होना चाहिए।


इसका उन्मूलन इस प्रकार होगा

विवाह शादियों में होने वाले अपव्यय की हानि और बुराई को लोग समझते न हो सो बात नहीं है। किसी भी विचारशील से पूछा जाय तो वह उस कुप्रथा की भर पेट निन्दा करेगा और जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी उसे समाप्त करने की बात कहेगा। लेखों द्वारा, भाषणों द्वारा, प्रस्तावों द्वारा इसका बहुत समय से विरोध होता चला आ रहा है। पर कोई कारण ऐसा बना हुआ है जो इतने विरोध एवं इतने त्रास के बावजूद भी वह बुराई को ज्यों-का-त्यों कायम रखे हुये है। घटने के बजाय उसकी वृद्धि ही होती चलती है। हर नये साल पिछले वर्ष की अपेक्षा यह बुराई और भी भयंकर रूप से दृष्टिगोचर होती है। आइए इस कारण को ढूंढ़े जो इसे न हटने देने, न घटने देने का प्रमुख कारण बना हुआ है।

कारण यह है कि एक पक्ष सादगी का विवाह करना चाहता है पर उसे अपनी जैसी विचारधारा और परिस्थिति का दूसरा पक्ष नहीं मिलता। यदि कोई ऐसा उपाय हो कि समान परिस्थिति और विचारधारा के दोनों पक्ष मिल जायें तो दहेज तथा अन्य आडम्बर छोड़कर मितव्ययितापूर्वक विवाह करने की प्रक्रिया सहज ही चल पड़े। इसलिए एक कारण यह है कि दोनों पक्ष एक समान नहीं मिलते और मजबूरी में इच्छा के विरुद्ध फिजूलखर्ची का तरीका अपनाना पड़ता है।

दूसरा कारण है समाज में अप्रतिष्ठा का भय। सोचा जाता है कि यदि सादगी का विवाह किया गया तो लोग हमें गरीब या कंजूस समझेंगे। हँसी उड़ायेंगे, अपमानित करेंगे। घर की स्त्रियाँ विरोध करेंगी और रिश्तेदार ताना मारेंगे। इसलिये इस झंझट में क्यों पड़ा जाय? कई व्यक्ति लड़की के विवाह में देकर उसी स्टैंडर्ड से लड़के के विवाह में पाने की आशा लगाये रहते है। और इस प्रकार वही चरखा चलता रहता है। यदि सादगी का विवाह करने से अधिक सम्मान मिलने लगे, जमाने का स्तर ऐसा हो जाय कि फिजूलखर्ची करने वालों को भर्त्सना की जाय और सादगी अपनाने वालों को यश एवं सम्मान मिले तो निश्चय ही लोग यह पसन्द करेंगे कि उन्हें मितव्ययिता और प्रशंसा का मार्ग ही अपनाना चाहिए। हमें ऐसा प्रयत्न करना चाहिये कि एक समान विचारधारा एवं परिस्थितियों के घर-घर ढूंढ़ने की सुविधा हो जाय और ऐसे प्रगतिशील जो भी विवाह हो वे ऐसे सुव्यवस्थित ढंग से हों कि उनके संयोजकों को जनता का समर्थन एवं सम्मान भी भरपूर प्राप्त हो।

लड़के ढूंढ़ने में एक कठिनाई यह भी है कि एक सीमित क्षेत्र में एक सीमित जाति में ही वह ढूंढ़-खोज करनी पड़ती है। हर आदमी की जानकारी सीमित होती है इसलिये वह तलाश भी छोटे दायरे में ही कर सकता है। जब उतनी परिधि में अनुकूल अवसर नहीं मिलता तो उसे वर्तमान ढर्रे पर ही चलने को विवश होना पड़ता है। इसलिये हमें ऐसे साधन भी जुटाने पड़ेंगे कि हर स्थिति के व्यक्ति को अपनी आवश्यकता के अनुरूप लड़का प्रगतिशील सुधारवादी लोगों में से ही मिल जाय। यदि यह साधन बन पड़ा तो फिर आदर्श विवाहों का ताँता लगने में देर न लगेगी।

आमतौर से हमारे समाज में अपनी उपजातियों में ही विवाह करने की प्रथा थी। उस दायरे से बाहर रोटी-बेटी व्यवहार करना हेय माना जाता है। उपजातियों के सीमित दायरे में अच्छे लड़के ढूंढ़ना काफी कठिन पड़ता है। जहाँ अच्छे घर-वर, होते हैं वहाँ नीलामी बोली इतनी ऊँची हो जाती है कि उस खरीद में सफल होना हर लड़की वाले का काम नहीं होता। ‘जो बढ़े सो पावे’ की नीति जहाँ अपना ली गई है वहाँ तो अमीर ही बाजी मार सकते हैं। यदि उपजातियों का दायरा बड़ा होकर उस पूरी जाति तक बढ़ सका होता तो लड़के ढूंढ़ने की समस्या का आधा हल अपने आप हो जाता। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह चार ही जातियाँ ब्रह्माजी ने बनाई थीं। वेद-शास्त्रों में इन चार का ही वर्णन मिलता है। उपजातियाँ तो उनके निवास-स्थान को लेकर बन गई। मालवा में रहने वाले-मालवीय, कन्नौज के आस पास रहने वाले कन्नोजिया, (कान्य-कुब्ज) सरयू किनारे रहने वाले सरयू पारीण, मिथिला प्रान्त में रहने वाले मैथिल कहलाते। इसी प्रकार अन्य कारणों को लेकर एक ही जाति की अनेक उपजातियाँ का भेद छोड़कर यदि एक वर्ण के लोग अपने वर्ण में विवाह करने लगें तो इसमें किसी रूढ़ि का उल्लंघन भले ही होता हो धर्म और शास्त्र के अनुसार इसमें कुछ भी अनुचित नहीं है। ब्राह्मण यदि अन्य ब्राह्मणों में शादी करने लगे तो इसमें नया अधर्म होगा? इसी प्रकार यदि क्षत्रिय, वैश्य, कायस्थ, स्वर्णकार आदि अपनी पूरी जाति में विवाह, शादियों का दायरा बढ़ा लें तो उन्हें अच्छे लड़के बहुत जल्दी ढूंढ़ने में भारी सुविधा हो सकती है और उस विशाल क्षेत्र में सुधारवादी एवं प्रगतिशील ऐसे लोग भी आसानी से मिल सकते हैं जो आदर्श विवाहों के लिये खुशी-खुशी तैयार हो जायें।

विवाह को दहेज, जेवर और फिजूलखर्ची से मुक्त बनाने के लिये हमें एक संघर्ष करना पड़ेगा। इस संघर्ष की पूर्ण सफलता उपजातियों के विस्तार पर ही निर्भर है। पर दोनों-दोनों मोर्चों पर संघर्ष छेड़ना असामयिक होगा इसलिये अभी प्रारम्भ में इतना हो सके तो भी कम नहीं कि उपजातियों में ही प्रगतिशील लोगों को अपने विचार और परिस्थितियों के सम्बन्ध ढूंढ़ने की सुविधा हो जाय। यदि यह सुविधा संभव हो सकी तो आधा मोर्चा फतह हो जाने का साधन बन जायेगा।

हमने पिछले दिनों इस सम्बन्ध में काफी प्रयत्न किया है। कितने आदर्श विवाह कराये भी हैं। और समय-समय पर उपस्थित स्वजनों को इसकी प्रेरणा भी दी है। उन आदेशों को लोगों ने स्वीकार भी किया है। पर पता लगाने पर यही विदित हुआ कि उन सहमति प्रकट करने वालों में से भी कोई आदर्श विवाह न कर सका। कारण यही था कि उन्हें अपने अनुरूप विचार एवं स्थिति के लोग अपनी जाति में न मिले और एक पक्षीय व्यवस्था बन नहीं सकती थी इसलिये विवश होकर उन्हें अपना मत बदलना पड़ा। ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के स्वजनों में से अधिकाँश हमारी ही विचारधारा के हैं वे खुशी-खुशी आदर्श विवाह करने को तैयार हैं पर दूसरा पक्ष भी उन्हें वैसा ही मिले तब तो बात आगे बढ़े। जिसकी कन्या सयानी हो गई है उसे तो जल्दी रहती है, जहाँ अवसर मिल जाता है वहीं सम्बन्ध करना पड़ता है। अपने परिवार की हर शाखाओं में भी अनेकों सदस्य होते हैं पर जाति का बन्धन रहने से उनमें भी विवाह होने का योग जम नहीं सकता। ऐसी दशा में अब तक के हमारे सब प्रयत्न निष्फल होते रहे हैं।

दहेज और वैवाहिक अपव्यय का विकास इतना भयानक है कि इसे रावण और कंस की उपमा दी जाय तो भी कम है। रावण प्रायः ऋषियों को मारता था और कंस ने बालकों का वध कराया था। पर यह असुर तो बाल-वृद्ध का अन्तर किये बिना हिन्दू-जाति के प्रत्येक सदस्य को चिन्ता की चिता में तिल-तिल कर जलाता रहता है। हमारे जातीय जीवन को इसी ने नष्ट किया है। सदाचार और धर्म के पथ में यही सबसे बड़ा बाधक है। कन्या और पुत्र में अन्तर कराने का, नारी को नर से निकृष्ट समझे जाने का प्रधान कारण उसी को मानना चाहिए। इस समय हिन्दू-जाति की आत्मा इसी दुष्ट के उत्पीड़न से नारकीय यन्त्रणा भुगत रही है। यदि इस वृत्रासुर, महिषासुर, बाणासुर, भस्मासुर से भी अधिक भयंकर महाराक्षस को परास्त किया जा सके तो ही हिन्दू-जाति के जीवन एवं उत्थान की बात सोची जा सकती है।

युग-निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाते हुए हमें इन विकृतियों और कुरीतियों का शोधन करने के लिए सुव्यवस्थित मोर्चाबन्दी करनी पड़ेगी। इसके बिना हम अपने सामयिक उत्तरदायित्वों से उऋण नहीं हो सकते। यों कहने को दहेज विरोधी कानून बन गया है और दहेज लेने तथा देने वाले दोनों ही अपराधी माने जा सकते हैं और राज दण्ड के अधिकारी बन सकते हैं। पर कानून से ही सब कुछ नहीं हो सकता। कानून तो खाद्य-पदार्थों में मिलावट, रिश्वत, बालविवाह, छुआछूत, नाली और सड़कों पर गंदगी फैलाना, कम तोलना, कम नापना आदि सभी बुराइयों के विरुद्ध बना हुआ है पर उनसे कितनी रोकथाम होती है यह हम सब जानते ही हैं। इसलिये उस पर निर्भर न रह कर हमें प्रभावशाली कदम उठाने होंगे जिनसे समस्या का वास्तविक हल निकाल सके।

आमतौर से दहेज के खिलाफ बहुत कुछ कहा जाता है। उसकी भर पेट निन्दा की जाती है। पर इतने मात्र से काम नहीं चल सकता। दहेज की जड़ जेवर में है। लड़की वाला जेवर की माँग करेगा तो लड़के वाला दहेज भी जरूर माँगेगा। यदि बन्द होने होंगे तो दोनों एक साथ बन्द होंगे और यदि बने रहेंगे तो दोनों साथ-साथ चलेंगे। इस तथ्य को भली प्रकार समझते हुए हमें आदर्श विवाहों की भूमिका में इन दोनों ही कुप्रथाओं का उन्मूलन करने की बात लेकर चलना चाहिए। लड़के वाला न तो दहेज माँगे और न उसे दिया जाये। लड़की वाले को कुछ देना हो तो वह अपनी कन्या को स्त्री-धन के रूप में दे। उसका न तो दिखावा किया जाये और न चर्चा का विषय चलाया जाये। यह तो लड़की और उसके अभिभावकों के बीच निजी बात है उसमें लड़की के ससुराल वालों को कोई दिलचस्पी न होनी चाहिए। जो दिया गया है वह गुप्त रहे और उसे लड़की की निजी सम्पत्ति माना जाय। इसी प्रकार विवाह के अवसर पर लड़के वाला खादी की साड़ी और अंगूठी लेकर आवे। पीछे उन्हें अपनी वधू को कोई जेवर आदि देना हो तो विदा कराने पर अपने घर ले जा कर दे। लड़की वाले के दरवाजे पर उसका प्रदर्शन करने की कोई आवश्यकता न हो। शकुन के रूप में जहाँ आवश्यकता हो वहाँ एक रुपये का प्रयोग किया जाय।

बारात में कम से कम आदमी जाये। इनकी संख्या इतनी कम हो जिसके बिना काम ही न चले। अधिक से अधिक वे 25 हो सकते हैं। बेटे वाले के सम्बन्धी, व्यवहारी, मित्र बहुत हों तो उनका सम्मान एवं प्रीतिभोज अपने घर पर वधू के घर आने पर उसके सम्मान में करना चाहिए। बेटी वालों के यहाँ उन्हें ले जाने की क्या जरूरत है? हर कार्य में सादगी बरती जाय, मितव्ययिता का पूरा ध्यान रखा जाय और विवाह संस्कार शिक्षाप्रद एवं प्रेरणा देने वाले धर्म संस्कार के रूप में उत्साह एवं आनन्द के वातावरण में सम्पन्न किया जाये। छोटी-मोटी अन्य आवश्यक बातें स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तय कर ली जायें। उनके दिल में यही भावना रहनी चाहिए कि विवाह को अधिक से अधिक सादा और सस्ता बनाया जाय।

चूँकि इन आदर्श विवाहों को सारे समाज में व्यापक बनाना है इसलिए उनका स्वरूप ऐसा बनाना होगा जिससे इस कदम उठाने वालों को आवश्यक सम्मान मिले। एवं अधिक लोगों को उसमें भाग लेने एवं प्रेरणा ग्रहण करने का अवसर मिले। विवाह का मंडप आकर्षक बनाया जाय, उसे खुले स्थान पर रखा जाय, संस्कार बहुत ही प्रभावशाली ढंग से सुविज्ञ व्यक्तियों द्वारा कराया जाय, स्थानीय विचारशील लोगों को आशीर्वाद देने के लिए विशेष रूप से आमंत्रित किया जाय, उपस्थित लोग पुष्प मालाएँ और अपनी भावना के अनुरूप उपहार लेकर आवें। संभव हो तो छोटा जलपान भी रखा जाय। आशीर्वादों का क्रम प्रवचन एक हृदयग्राही रूप में रहे। दूर-दूर से शुभ कामना संदेश मंगाये जाएं और बन पड़े तो अखबारों और पर्चों द्वारा इस आयोजन की जानकारी अधिकतर लोगों को कराई जाय। ऐसे कई विवाह मिलकर एक बड़ा सामूहिक आयोजन बन पड़े तो और भी उत्तम। इस प्रकार कुशल मस्तिष्क के लोग स्थानीय परिस्थिति के अनुसार इस विवाह कृत्य की ऐसा आकर्षक बनायें कि सादगी एवं मितव्ययिता को पूर्ण रक्षा होते हुए भी उस प्रेरणा को अधिक व्यापक क्षेत्र में सम्मानित एवं प्रसारित किया जा सके।

आज की परिस्थितियों में हिन्दू जाति की अन्तरात्मा पुकार-पुकार कर यह कह रही है कि विवाह में होने वाले अपव्यय के कारण उत्पन्न होने वाले उत्पीड़न से उसकी रक्षा की जाय। समय की पुकार को हमें सुनना समझना चाहिए और उसकी पूर्ति के लिए युग प्रहरी की तरह हमें साहसपूर्वक कुछ करने के लिए अग्रसर होना चाहिए।


प्रगतिशील जातीय संगठनों की आवश्यकता

दिव्य समाज की नव-रचना करने के लिए हमें दूसरों को उपदेश देने की अपेक्षा आदर्श विवाहों के सजीव आन्दोलन अपने परिवार से ही आरम्भ कर देने चाहिए। गत वर्ष रजत-जयन्ती को युग-निर्माण योजना का प्रेरणापर्व मान कर स्वजनों ने जैसी श्रद्धा अभिव्यक्त की है उसे देखते हुए कुछ ही दिनों में यह संख्या एक लाख तक पहुँच जाना स्वाभाविक है। इतने बड़े संगठन को एक बड़ी जाति बिरादरी भी कहा जा सकता है। एक लाख सदस्यों के स्त्री, बच्चे, माता, पिता, परिजन एवं प्रभाव में चलने वाले लोगों की संख्या दस लाख से कम किसी भी प्रकार नहीं होगी। इतने लोगों की बिरादरी हिन्दुस्तान में थोड़ी-सी ही होंगी। अधिकाँश तो इससे बहुत कम है।

“अखण्ड-ज्योति” परिवार एक आध्यात्मिक एवं साँस्कृतिक संगठन है और उसका लक्ष केवल वही रहेगा। पर वैवाहिक कुरीतियों की असुरता से निपटने के लिए उसका एक सामयिक दूसरा मोर्चा भी खोला जाना आवश्यक हो गया है। परिवार की एक दूसरी पंक्ति जातीय संगठनों के रूप में भी रहे तो इसमें कुछ हर्ज नहीं। हमारा विचार है कि अखण्ड-ज्योति संगठन बनाने का भी एक काम सौंप दें और सहायक आन्दोलन के रूप में हम सब उस कार्य को भी चलाते रहें। विवाहों को जाति के अन्दर ही करने की मान्यता जब तक प्रचलित है तब तक इस प्रकार के संगठन भी तात्कालिक समस्या हल करने में, उपयुक्त सम्बन्ध तलाश कराने में बहुत सहायक बन सकते हैं

स्पष्ट है कि हम गुण, कर्म, स्वभाव को जाति का आधार मानते हैं। पर प्रचलित वंश परम्परा के अनुसार जाति में शादियों की समस्या जब तक बनी हुई है तब तक प्रगतिशील लोगों के जातीय संगठन बना लिए जाय तो उसमें कुछ हर्ज नहीं। ऐसे संगठनों में संकीर्णता बढ़ने और फूट फैलने का खतरा रहता है पर उसकी सावधानी आरंभ में रखी जाय तो उससे बचते हुए लाभ का अंश प्राप्त किया जा सकता है। विष को भी शोधित करके बलवर्धक औषधियाँ बना ली जाती हैं। जातीय संगठनों में भी हम अनेकता से एकता की ओर बढ़ने का लक्ष्य ऊँचा हो तो फिर बुरे परिणाम हो ही कैसे सकते हैं?

कुँए में गिरे हुए को निकालने के लिए कुंए में घुसना पड़े तो दोनों की क्रियाएँ एक सी दीखते हुए भी परिणाम भिन्न ही होंगे। एक अपने प्राण बचाने के लिए नीचे उतरा तो उनके कृत्य और परिणाम में अन्तर मानना ही पड़ेगा। जातीय संगठनों के आधार पर भी हम विवाह में होने वाले अपव्यय को ही नहीं, अन्य प्रकार की अनेक कुरीतियों को मिटाने एवं सत्वृत्तियों को बढ़ाने में बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

सन् 64 की प्रथम छमाही में अखण्ड-ज्योति की रजतजयन्ती से सम्बन्धित पंच-सूत्री कार्यक्रम में सभी परिजन लगे हैं। वसंत-पंचमी को यों रजत-जयन्ती का हर्षोत्सव मनाया गया है पर उसके साथ ही जो अनेक कार्यक्रम जुड़े हुए हैं उनमें भी तो क्रियान्वित करना है, इसके बिना उस उत्सव का कोई मूल्य नहीं रह जाता। अखण्ड-ज्योति परिवार की संख्या वृद्धि, उसे एक लाख बना देने की बात भी सामने है। इसके बिना युग-निर्माण का कोई ठोस कदम उठ भी नहीं सकेगा। थोड़े आदमी महान कार्य का सम्पादन करने में समर्थ कैसे हो सकते हैं? इसलिए परिवार के हर व्यक्ति को यह प्रेरणा दी गई है कि वह अपने सम्बन्धित और परिचित क्षेत्र में युग-निर्माण का संदेश पहुँचाने के लिए अखण्ड-ज्योति का प्रवेश कराने का प्रयत्न करे और उसमें आलस्य एवं उपेक्षा की तनिक भी गुंजाइश न रहने दें।

वर्ष की दूसरी छमाही में जुलाई से अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को प्रगतिशील जातीय संगठनों के रूप में एक दूसरा सामाजिक मोर्चा बनाने के लिए संगठित करेंगे। जून की पत्रिका में एक फार्म लगा कर प्रत्येक परिजन से यह पूछेंगे कि वह किस वर्ण के अंतर्गत किस जाति या किस उपजाति का है। उसकी विवाह शादी अपनी ही उपजाति में होती है या अन्य उपजातियों में भी। इन प्रश्नों का उत्तर मिल जाने पर जिनमें परस्पर विवाह शादियाँ होती है उनके क्षेत्रीय संगठन बना देंगे। उनके संचालकों की नियुक्ति कर दी जायगी और उनसे कहा जायगा कि अपने समान प्रगतिशील विचार के लोगों को उस संगठन के अंतर्गत भर्ती करने और अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाने की तैयारी में लग जावें।

लोग अपने आस-पास के क्षेत्र में ही विवाह शादी करना पसंद करते हैं, इसलिए प्रत्येक प्रान्त को दस-दस क्षेत्रों में बाँटकर उन क्षेत्रों की प्रगतिशील जातीय सभाएँ बनाई जायेगी। उनके प्रतिनिधियों का संगठन प्रान्तीय एवं प्रांतियों का अखिल भारती भी बन जायगा। प्रत्येक क्षेत्र की प्रत्येक उपजातियों की सभाएं रहेंगी और उनके कार्यालय में उस क्षेत्र की सभी ग्राम सभाओं के विवाह योग्य लड़के और लड़कियों के सम्बन्ध में पूरे विवरण सहित आवश्यक जानकारी रहेगी। ग्राम सभाएं अपनी क्षेत्रीय सभा के कार्यालय में प्रतिवर्ष अपने यहाँ के विवाह योग्य लड़के-लड़कियों की सूचनाएं भेजा करेंगी। जिन्हें लड़कों की जानकारी प्राप्त करनी हुआ करेगी वे उसी क्षेत्रीय कार्यालय में आवश्यक जानकारी प्राप्त करके खोज-बीन करेंगे। वर-कन्या की पसंदगी एवं आवश्यक जानकारी परस्पर दोनों पक्ष करेंगे। केवल आदर्श विवाह कराने के लिए आवश्यक बल देने का कार्य क्षेत्रीय सभा का होगा।

यों जातीय सभाएं पहले से भी मौजूद हैं, पर उनके और इन अपनी सभाओं के उद्देश्य में आकाश-पाताल का अन्तर है। इसलिए इनके नाम के आगे “प्रगतिशील कायस्थ सभा”, प्रगतिशील अग्रवाल सभा, प्रगतिशील चौहान सभा, प्रगतिशील सनाढ्य सभा आदि। इन सभाओं में सम्मिलित होने वाले नये सदस्यों को उस प्रतिज्ञापत्र पर हस्ताक्षर करने होंगे, जिसमें दहेज, जेवर, बरात एवं अपव्यय का परित्याग करके विवाह करने की बात पर सहमति एवं स्वीकृति होगी। ऐसे सदस्यों की संख्या बढ़ाने का प्रत्येक सभा शक्ति भर प्रयत्न करेगी। प्रचारक रखेगी। सम्मेलन करेगी और अभिभावकों को व्यक्तिगत प्रेरणा देगी कि वे अपने बच्चों का विवाह आदर्शवादी पद्धति से ही करें विवाहों के अतिरिक्त जो अन्य कुरीतियाँ इस जाति के उस क्षेत्र में फैली हुई होंगी, उनका भी यह सभाएं विरोध करेंगी और संध्या, गायत्री, यज्ञोपवीत, सदाचार, शिष्टाचार, शिक्षा, व्यायाम, स्नेह, सद्भाव एवं जो अन्य सत्प्रवृत्तियाँ सम्भव होंगी, उनका भी प्रसार करेंगी। बाल विवाह, अनमेल विवाह, कन्या विक्रय आदि का विरोध करेंगी। बड़ों के चरण स्पर्श, तू न कहकर तुम या आपका संबोधन करना, प्रौढ़ शिक्षा, कन्या शिक्षा आदि जिन अच्छाइयों को जहाँ बढ़ाने का अवसर होगा वहाँ उनके लिए प्रयत्न करेंगी।

इन प्रगतिशील सभाओं में परस्पर पूर्ण सहयोग रहेगा। एक जाति के अंतर्गत जितनी उपजातियाँ होंगी, उनका एक वार्ड बना दिया जायेगा जो इस बात का प्रयत्न करता रहेगा कि जहाँ उपर्युक्त वातावरण हो वहाँ एक जाति के अंतर्गत जो उपजातियाँ हैं उनमें परस्पर विवाह शादी होने लगे। संकीर्णता को बढ़ाना नहीं वरन् उदारता एवं आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ाना ही इनका उद्देश्य रहेगा। यह प्रगतिशीलता ही तो उनकी उपयोगिता का मेरुदण्ड है अन्यथा संकीर्णता की अभिवृद्धि करने वाले संगठनों से तो उनका न बनना ही अच्छा।

जून के अंत में जो फार्म लगाया जायेगा उसका उत्तर आने पर प्रत्येक क्षेत्र में किस उपजाति के कितने सदस्य हैं उसका पता चल जायेगा। उनके संचालकों की नियुक्ति यहाँ से कर दी जायेगी और उन्हें उस प्रान्त के सदस्यों की सूची भेजकर उनका संगठन सुव्यवस्थित करने की प्रेरणा की जायेगी। आरम्भ में इन प्रगतिशील जातीय सभाओं का निर्माण हम कर देंगे, पीछे वे अपना क्षेत्र एवं कार्यक्रम स्वयं बढ़ाती रहेंगी।

एक उपजाति में प्रगतिशीलता लाना भी उतने अंश में राष्ट्र को प्रगतिशील बनाना ही है। एक गाँव को न सही- एक उपजाति को सही, आदर्शवादी बनाने के लिए यदि कुछ प्रयत्न किया जाता है तो उससे राष्ट्र का हित साधन ही होगा।

दहेज एवं विवाहों में होने वाले अपव्यय को मिटाकर सादगीपूर्ण मितव्ययी विवाहों की प्रथा प्रचलित होने से हिन्दू जाति की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सेवा होगी। इस अपव्यय से बचा हुआ पैसा बच्चों के स्वास्थ्य एवं शिक्षा के विकास में लगाया जा सकेगा और अभिभावकों को नारकीय चिन्ता की चिता में जलते रहने से छुटकारा मिलेगा। मजबूरी में जो अनीति का आश्रय लेना पड़ता है, विवाह की सरलता हो जाने पर उससे भी पीछा छूटेगा और सरल सदाचारी जीवन बिताने की सम्भावना बढ़ेगी। इन कुरीतियों का उन्मूलन देश, धर्म और संस्कृति की सच्ची सेवा है, उसके लिए हम सब को कुछ करना ही चाहिए। इस परिवर्तन की पुण्यबेला में भारतीय धर्म के पुनरुत्थान का जो महान प्रयत्न किया जा रहा है उस गोवर्धन को उठाने में हमारा भी योगदान रहना ही चाहिए।


अखण्ड ज्योति की रजत-जयन्ती

रजत-जयन्ती उत्सव आयोजन

‘अखण्ड-ज्योति’ का रजत-जयन्ती पर्व ता.19 जनवरी (वसन्त-पंचमी) को भारतवर्ष तथा विदेशों में बड़े भावनापूर्ण वातावरण में मनाया गया। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार केवल 2 हजार सदस्य ही ऐसे हैं जिनने या तो सूचना नहीं भेजी या वे इस आयोजन को कारणवश मना नहीं सके। शेष 28 हजार ने अपनी ज्ञान-माता ‘अखण्ड- ज्योति’ के प्रति श्रद्धाँजलि अर्पित करने में जो उत्साह दिखाया उसके प्राप्त समाचारों से स्पष्ट होता है कि परिवार के प्रत्येक परिजन का मन अपने इस प्रकाशपूर्ण प्रेरणा केन्द्र के प्रति कितना अधिक श्रद्धा एवं सद्भावना से ओतप्रोत है।

ता. 13 से 19 तक के रजत-जयन्ती सप्ताह में प्रायः सभी परिजनों ने कम से कम एक घण्टा और अधिक से अधिक पाँच घण्टा समय नित्य लगाकर ‘अखण्ड ज्योति’ का मिशन सफल होने के लिये ईश्वर उपासना की। लगभग आधे व्यक्ति ऐसे रहे जिनने गायत्री जप अनुष्ठान किये और अपने परिवार तथा परिचय के लोगों से कराये। शेष आधे लोगों ने अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुरूप उपासना इसी उद्देश्य के लिए की। कुछ समय पूर्व अपना संगठन गायत्री उपासकों तक ही सीमित था पर अब उसका क्षेत्र व्यापक बना दिया गया है। इसलिए गायत्री को प्रधान रखते हुये भी अन्य विधियों से उपासना करने को भी अपने ही कार्यक्षेत्र का एक अंग माना जाता है। इस सप्ताह में गायत्री जप तो 10 अरब के करीब ही हो सका पर अन्य मन्त्रों द्वारा ईश्वर उपासना की गणना 20 अरब से ऊपर निकल गई। इसी बहाने भगवान के भजन का इतना बड़ा आयोजन हो सका। यह बड़ी प्रसन्नता की बात है। इससे संसार के सूक्ष्म वातावरण में अधिक सात्विकता, पवित्रता, एवं सद्भावना की सृष्टि होना सुनिश्चित है।

वसन्त पंचमी ता. 19 जनवरी को लगभग 7000 स्थानों में सामूहिक हवन हुए। जिनमें ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों और पाठकों ने पच्चीस-पच्चीस आहुतियाँ दी। अखण्ड धृत दीप उस दिन इन सभी जगह रखा गया। दीपक को अपने मिशन का प्रतीक मानकर सभी स्वजनों ने उसके आगे पुष्पाँजलि अर्पित की और श्रद्धा से मस्तक झुकाया। रात्रि को उत्सव स्थान पर सामूहिक रूप में दिवाली की गई और परिजनों ने अपने-अपने घरों पर कम से कम 25-25 दीपक जलाये। प्रवचनों द्वारा उपस्थित जनता को ‘अखण्ड-ज्योति’ की प्रकाश प्रेरणा- युगनिर्माण योजना का उद्देश्य, स्वरूप एवं कार्यक्रम समझाया गया। ‘युग-निर्माण सत्संकल्प’ को एक प्रमुख व्यक्ति ने पढ़ा और उपस्थित लोगों ने दुहराया। युग-निर्माण सत्संकल्प की करीब एक लाख प्रतियाँ लोगों ने वितरित की। सितम्बर 62 का संकल्प व्याख्या अंक और जून 63 का कार्यक्रम अंक दोनों का सेट संभ्रान्त लोगों को भेंट कर युग-निर्माण योजना का परिचय उन्हें कराया।

उस दिन अपने व्यक्तिगत जीवन का आदर्श बनाने के लिए परिवार के प्रत्येक परिजन ने अपने अन्दर कोई नया विचार या कार्यक्रम आरम्भ किया। नशेबाजी, जुआ, माँसाहार, व्यभिचार, बेईमानी जैसे पाप ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठक बहुत पहले ही छोड़ चुके हैं। निषेधात्मक आन्दोलन गायत्री परिवार के दिनों से ही चल रहा है। अब निर्माणात्मक आन्दोलन का शुभारम्भ है। (1) मीठा बोलने, (2) धैर्य और आशा को अपनाकर सदैव मुस्कराते रहने, (3) अपकारों को भुलाने और उपकारों को स्मरण रखने, (4) आलस्य त्यागकर निश्चित दिनचर्या के अनुरूप उत्साहपूर्वक संलग्न रहने (5) रात को जल्दी सोने और प्रातः जल्दी उठने नित्य व्यायाम करने (6) अधिकार की उपेक्षा और कर्त्तव्य की तत्परता का ध्यान रखने (7) शरीर, वस्त्र, घर और सामान को स्वच्छ सुव्यवस्थित रखने (8) जीवन निर्माण की प्रेरणा एवं मार्गदर्शन करने वाले साहित्य का नित्य स्वाध्याय करने (9) नित्य सोते समय दिन भर के कार्यों और विचारों का लेखा-जोखा लेकर दूसरे दिन उसमें सुधार करने की व्यवस्था बना कर सोने (10) पतिव्रत धर्म और पत्नीव्रत का परिपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करने (11) किसी के प्रति द्वेष दुर्भाव रखकर आत्मीयता की दृष्टि रखने जैसी अनेक सत्प्रवृत्तियों का अभ्यास उसी दिन से आरम्भ कर देने की प्रतिज्ञा ली। विश्वास है कि यह प्रतिज्ञायें निभेंगी और परिजनों का जीवन इन आदर्शों के अनुरूप दिन-दिन अधिक उत्कृष्ट बनता चला जायगा।

रचनात्मक कार्यक्रमों का व्यक्तिगत और सामूहिक कार्यक्रम लोगों ने अपनी स्थिति के अनुरूप बनाया। व्यक्तिगत रचनात्मक कार्यों में परिवार निर्माण का कार्यक्रम प्रधान था (1) अपने घर में पूजा-कक्ष की स्थापना और घर के सब लोगों को कम से कम पाँच मिनट उपासना करने के लिये तैयार करने का प्रयत्न (2) छोटों को भी ‘तू’ न कहकर ‘तुम’ या ‘आप’ शब्दों में संबोधन (3) बड़ों के नित्य चरणस्पर्श की परम्परा का आरम्भ (4) नित्य परिवार गोष्ठी का आयोजन जिसमें अशिक्षितों को शिक्षा, शिक्षितों को उसके शिक्षण की पूछताछ तथा कहानी एवं समाचारों के आधार पर नैतिक शिक्षण। पारिवारिक समस्याओं का हल खोजने के लिए विचार विनिमय (5) घर में शिक्षितों को जीवन निर्माण साहित्य नियमित रूप से पढ़ने की अभिरुचि एवं आदत उत्पन्न करना, अशिक्षितों को सुनाने की व्यवस्था करना (6) अन्न की बर्बादी को रोकना, थाली में झूठन न छोड़ना, सप्ताह में एक दिन उपवास (7) सप्ताह में एक दिन घर की भली प्रकार सफाई और नित्य हर वस्तु को यथा स्थान स्वच्छ ढंग से रखने की आदत (8) सादगी, मितव्ययिता व्यवस्था नियमितता, सामूहिकता, सहिष्णुता, श्रमशीलता और मधुरता को स्वभाव में सम्मिलित करने का परिवार के प्रत्येक परिजन को अभ्यास रखना (9) आहार में सात्विकता की अभिवृद्धि, ब्रह्मचर्य का अधिकाधिक पालन (10) संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुष्प प्रसार के लिए अपनी आमदनी का एक अंश नियमित रूप से धर्म पेटी में जमा करना। इन दस कार्यक्रमों के आधार पर परिवार निर्माण के रचनात्मक कार्यक्रमों में जो लोग लगे हैं उनके परिवार का निश्चय ही कायाकल्प होगा। वे यदि धैर्य और प्रेमपूर्वक उत्साह के साथ इस कार्यक्रम को चलाते रहेंगे तो उनके घरों में जल्दी ही स्वर्णीय वातावरण परिलक्षित होने लगेगा।

सामूहिक रचनात्मक कार्यों में (1) प्रौढ़ पाठशालाओं और रात्रि पाठशालाओं की स्थापना (2) घरों पर सत्साहित्य पहुँचाने और वापिस लाने की व्यवस्था और इस माध्यम से लोगों तक युग निर्माण की विचारधारा को फैलाना (3) रामायण कथा का नियमित क्रम आरम्भ करके श्रोताओं को जीवन निर्माण की शिक्षा देना (4) प्रेरणा प्रद कविता, संगीत, कीर्तन, भजन एवं गायत्री का प्रसार (5) नगर की दीवारों को आदर्श वाक्यों से बोलती पुस्तक का रूप देना (6) शाक, फल और फूलों के पेड़-पौधे उगाने का आन्दोलन (7) ‘एक से दस’ की योजना के अनुसार प्रत्येक परिजन द्वारा दस व्यक्तियों को निरन्तर प्रेरणा देते रहने का उत्तरदायित्व निभाना (8) व्यायाम, शारीरिक श्रम, आसन, प्राणायाम एवं प्राकृतिक चिकित्सा शिक्षण (9) सादगी एवं स्वच्छता का प्रसार (10) परिवार के सदस्यों का जन्मदिन, संस्कार एवं पर्व मनाने के सामूहिक आयोजनों की व्यवस्था। वसन्त पंचमी, गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा एवं दोनों नवरात्रियों के अवसर पर कुछ विशेष, धर्मानुष्ठान, उत्सव आयोजन का प्रबन्ध।

यह छोटे रचनात्मक कार्यक्रम प्रायः सभी शाखा केन्द्रों ने किसी न किसी रूप में आरम्भ कर दिये हैं। आरम्भ में छोटा अभ्यास करते हुए परिजनों को सार्वजनिक कार्यक्रमों का अभ्यास हो जायगा तो फिर बड़े कार्यक्रमों और आन्दोलनों को हाथ में लिया जायगा। हत्यारी, दहेज प्रथा, और विवाहों के समय फूँकी जाने वाली धन की होली हिन्दू जाति को जर्जर करने वाली सब से भयंकर तपेदिक एवं कोढ़ जैसी बीमारी है। बाल-विवाह, पर्दा, ऊँच-नीच, मृत्यु भोज, पशुबलि, अन्धविश्वास जैसी कितनी ही सामाजिक कुप्रथायें मौजूद हैं इनका उन्मूलन करने के लिए हमें बहुत कुछ करना होगा। नशेबाजी, असंयम, आलस्य बेईमानी, निष्ठुरता, स्वार्थपरता, कृतघ्नता, अशिष्टता नास्तिकता जैसे अगणित पाप दोष, व्यक्तिगत जीवन में गहराई तक प्रविष्ट हो चुके हैं उनको उखाड़ फेंकने के लिए भी बड़े कदम उठाने पड़ेंगे। प्रत्येक कार्य शक्ति के आधार पर ही संभव होता है। इसलिए शक्ति संचय और अभ्यास अनुभव की दृष्टि से छोटे रचनात्मक कार्यक्रमों पर ही अभी जोर दिया जा रहा है सो ठीक है। प्रसन्नता की बात है कि लगभग 5 हजार युग -निर्माण केन्द्रों ने इस प्रकार के छोटे-छोटे सामूहिक रचनात्मक कार्यक्रम आरम्भ कर दिये हैं।

रजत-जयन्ती को साधारण धर्मोत्सव का रूप न देकर उसे युग निर्माण आन्दोलन की नव जीवन संचार की पुण्य प्रक्रिया का रूप दिया गया यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। हर्षोत्सव आये दिन मनाये जाते रहते है पर उनका मूल्य तात्कालिक मनोरंजन एवं प्रसन्नता की अभिव्यक्ति मात्र होती हुई ‘अखण्ड ज्योति’ की रजत-जयन्ती का स्वरूप बिखरा हुआ रहा, किसी एक स्थान पर बहुत बड़ा सम्मेलन समारोह नहीं हुआ, फिर भी उसके माध्यम से जो ठोस कार्य बन पड़ा वह भारी से भारी उत्सव द्वारा भी संभव न था। इस दृष्टि से इस आयोजन को पूर्ण सफल माना जा सकता है।

मान, प्रतिष्ठा, यश और नामवरी, की आपाधापी सार्वजनिक आन्दोलनों और कार्यक्रमों को नष्ट करने में सबसे घातक विष का काम करती है। आरम्भ में थोड़ी प्रशंसा के लालच से लोग कुछ काम करते देखे जाते हैं। पर जब वह नशा उन्हें नहीं मिलता तो हाथ-पाँव शिथिल कर बैठते हैं। कई बार तो ईर्ष्या वश उस मिशन को हानि भी पहुँचाते हैं जिनने उन्हें आरम्भ में प्रशंसा प्रदान की थी। इन कटु अनुभव के कारण युग-निर्माण आन्दोलन को मान-बड़ाई, नामवरी, एवं नेतागीरी से सर्वथा मुक्त रखा गया है। प्रशंसा के लालच से कोई व्यक्ति इसमें न आने पावे- आदर्श के प्रति आस्था रखते हुए मूक सेवकों की तरह लोग इस धर्म प्रवृत्ति में भाग ले। इस उद्देश्य से यह व्यवस्था की गई है कि इस आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर काम करने वालों की भी प्रशंसा न छापी जाय। इसी कारण लगभग 7 हजार केन्द्रों में 28 हजार परिजनों द्वारा आयोजित जो विशाल कार्यक्रम रजत-जयन्ती के अवसर पर संपन्न हुआ उसके अलग-अलग समाचार नहीं छापे जा रहे हैं। छापना संभव भी नहीं था। एक-एक लाइन में भी एक केन्द्र का कार्य छापा जाय तो ‘अखण्ड-ज्योति’ के वर्तमान कलेवर से दूने पृष्ठ उसी के लिए चाहिये। इतना कागज मंगाने की अपेक्षा काम की बात ही ‘अखण्ड-ज्योति’ में छपे इस दृष्टि से जयन्ती समारोह के सम्बन्ध में ज्ञात सूचनाओं का साराँश उपरोक्त पंक्तियों में छाप दिया गया है।


श्रद्धा अभिव्यक्ति की कसौटी

युग-निर्माण योजना की सफलता-असफलता इस बात पर निर्भर है कि इस विचारधारा एवं कार्यपद्धति को अपनाने के लिए कितने व्यक्ति अग्रसर होते हैं। संसार की आबादी 3 अरब के करीब है। विभिन्न देशों में निवास करने वाले विभिन्न भाषा-भाषी एवं धर्मावलम्बी लोगों तक इस महान मिशन का विस्तार करना है तो उसके लिए जनशक्ति की आवश्यकता पड़ेगी ही। बुद्ध धर्म का सारे एशिया में प्रसार उस समय के लाखों भिक्षुकों द्वारा ही सम्पन्न हुआ था। आज ईसाई धर्म संसार की लगभग आधी जनसंख्या को अपने आँचल में ढंक चुका है इसका श्रेय भी क्रिश्चियन मिशन के लाखों धर्म प्रचारकों और कार्य-कर्ताओं को ही है। युग-निर्माण का मिशन भी यदि सफल होना होगा तो उसे भी निश्चित रूप से प्रबुद्ध मनः क्षेत्र के आदर्श वादी नर-नारायणों की ही जरूरत पड़ेगी।

इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए कई उपायों का अवलम्बन करना पड़ेगा पर सबसे प्रारम्भिक उपाय यह है कि इस विचारधारा से अधिकाधिक लोग परिचित हों, उसका महत्व समझें और प्रस्तुत मार्ग पर चलने के लिए आवश्यक प्रेरणा एवं उत्साह प्राप्त करें। यह आवश्यकता पूरी करने का इस समय एकमात्र उपाय ‘अखण्ड-ज्योति’ का विस्तार ही सामने है। अखण्ड-ज्योति के सदस्य गत वर्ष 30 हजार थे। अब इस वर्ष उस संख्या को एक लाख तक पहुँचा देने का लक्ष्य रखा गया है। एक लाख परिवार यदि नियमित रूप से इस विचारधारा को अपनाने लगे तो यह आशा की जा सकती है कि हम प्रगति को ओर सचमुच ही चल रहे हैं। युग-निर्माण एक कल्पना न रहकर वस्तुस्थिति बन रहा है या नहीं, इसका प्रमाण हम उसके सदस्यों की संख्या को देखकर भी प्राप्त कर सकते हैं।

रजत-जयन्ती कार्यक्रमों में दो कार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण माने गये हैं। (1) परिवार की संख्या वृद्धि, (2) कर्मठ सदस्यों का नियमित रूप से समयदान। अन्य समस्त गतिविधियाँ इन दोनों से ही सम्बन्धित हैं। वसन्त-पंचमी का आयोजन वहाँ बहुत ही सफल रहा, जहाँ स्वजनों ने उसके लिए उत्साहपूर्वक समयदान दिया। जो आलस्य में बैठे रहे, संकोच और झेंप से ग्रसित रहे वे बहुत समर्थ होते हुए भी कुछ न कर सके। आगे भी जो होना जाना है वह इस बात पर निर्भर रहेगा कि इस महान अभियान में किसने कितना समय दिया। यह कार्य धन से चलने वाला नहीं है। इसलिए धन की कोई अपील भी किसी से नहीं की जा रही है। युग-निर्माण के लिए एक ही आवश्यकता है - “भावनाशील लोगों का समय।” यह मिल गया तो समझना चाहिए कि सारे साधन जुट गये।

प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रायः सभी विचारशील लोगों ने कुछ समय दान नियमित रूप से युग-निर्माण यज्ञ के लिए देते रहने का संकल्प किया है। एक से दस योजना के अंतर्गत लोगों के घरों पर जा जा कर साहित्य एवं वाणी के माध्यम से योजना का संदेश सुनाना भी उनने आरम्भ कर दिया है। पर यह कार्य अभी मन्द उत्साह के साथ ही अग्रसर हो रहा है। हमारी इच्छा है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य थोड़ा-बहुत समय नियमित रूप से लगाने की बात सोचे और अपने व्यस्त कार्यक्रम में से भी कुछ समय इस पुनीत कार्य में लगाने के लिए त्याग, उदारता और साहसपूर्वक कदम बढावें। हम तीस हजार व्यक्ति यदि एक घण्टा भी नित्य इस कार्य के लिए समय दिया करें तो लगभग 4 हजार पूरा दिन पूरा समय देने वाले कार्यकर्ताओं को उद्देश्य पूर्ण हो सकता है। हमारे थोड़े उत्साह पर 4 हजार अवैतनिक प्रगतिशील कार्यकर्ताओं की एक बड़ी सेना खड़ी हो सकती है। पर यदि आलस्य और अवसाद ही छाया रहा तो युग-निर्माण योजना भी कागज की नाव ही सिद्ध होगी। समस्या बहुत ही गम्भीर और आवश्यक है। हमारे एक-दो घण्टा नित्य देने न देने पर इस महान अभियान का भविष्य बनना-बिगड़ना निर्भर है। हम में से प्रत्येक को विचार करना चाहिए कि युग की- विश्व मानव की- अत्यन्त जटिल एवं महत्वपूर्ण समस्या को सुलझाने के लिए हम इतना-सा त्याग कर सकने में समर्थ होते हैं या नहीं? यह उत्तर ही योजना के भाग्य का निर्णायक होगा।

दूसरी बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का- युग-निर्माण योजना के सदस्यों का विस्तार। यदि इस एक बात की ही उपेक्षा कर दी जाय तो रजत-जयन्ती का तीन चौथाई महत्व समाप्त हो जाएगा। हम जितने थोड़े से लोग इस समय संगठन के अंतर्गत हैं यदि उतने ही बने रहे तो युग-निर्माण एवं विश्व-कल्याण की बात सोचना भी मूर्खतापूर्ण होगा। अपना परिवार इस वर्ष तीन गुना तो हो ही जाना चाहिए। इस महत्वपूर्ण तथ्य की गरिमा का अनुभव करते हुए कितने ही भावनाशील परिजन 250, 108, 25 अखण्ड-ज्योति के नये सदस्य बनाने की प्रतिज्ञा लेकर उसे पूरा करने के लिए उत्साहपूर्वक जुट गये हैं। कई व्यक्तियों ने 25 व्यक्तियों एवं संस्थाओं की लिस्ट भेजकर उनका चन्दा अपने पास से दिया है और एक वर्ष के लिए उपहार में पत्रिकाएं भिजवाई हैं। कई ने अपने स्वजन, सम्बन्धी, कन्या, जामाता, पुत्र, मित्र आदि को सुविकसित, सुसंस्कृत बनाने की कामना से उन्हें अपने पास के पत्रिकाएं चालू कराई हैं। दान का यही श्रेष्ठ तरीका है। कई सम्पन्न एवं प्रभावशाली लोग मिल-जुल कर एक डेपुटेशन के रूप में अपने-अपने नगरों और समीपवर्ती क्षेत्रों में भ्रमण कर रहे हैं। उन्हें आशा है कि वे आशा-जनक संख्या में नये सदस्य बना सकेंगे। पुराने सदस्यों से भी वे लोग पत्रिका का चंदा वसूल करते आ रहे हैं। इस प्रकार की सूचनाएं भारी संख्या में मिल रही है।

आशा यह की गई है कि प्रत्येक भावनाशील परिवार को संपर्क में आने वाले व्यक्तियों में से कम से कम 10 ग्राहक बनाने का प्रयत्न करना चाहिए और रजत-जयन्ती की सार्थक श्रद्धांजलि का मूल्यवान प्रमाण प्रस्तुत करना चाहिए। कार्य की सुविधा के लिए 10-10 पन्ने की ग्राहक बनाने की रसीद-बहियों छपा ली गई हैं, जो कुछ थोड़े से स्वजनों को गतमास भेज दी गई थी। जिन्हें उत्साह हो वे सभी परिजन इस प्रकार की रसीद बहियाँ मंगा सकते हैं और उनके आधार पर ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य बनाने के कार्यक्रम में निष्ठा एवं उत्साहपूर्वक लग सकते हैं। यह कार्य इस पूरे वर्ष चलता रहना चाहिए। सन् 64 रजत-जयन्ती वर्ष है। इसमें निरन्तर प्रयत्न करते रहा जाय और हर महीने एकादो नए सदस्य बनाने में भी सफलता मिलती रहे तो इस वर्ष में अपना परिवार बहुत विस्तृत एवं सुदृढ़ हो सकता है। यह सफलता युग-निर्माण की प्रत्यक्ष सफलता ही मानी जा सकती है। इस प्रगति के आधार पर युग-निर्माण आन्दोलन की समस्त प्रगतियों की व्यवस्था सहज ही बन सकती है।

जहाँ वसन्त-पंचमी के दिन रजत-जयन्ती नहीं मनाई जा सकी, वहाँ इस वर्ष की प्रथम छमाही में उसे मना लेना चाहिए। अगले किसी महीने की शुक्लपक्ष की पंचमी या अन्य किसी शुभ दिन वैसा ही सामूहिक आयोजन किया जाना चाहिए जैसा अधिकाँश स्थानों पर गत वसन्त-पंचमी को मना लिया गया। हमें विश्वास है कि अखण्ड-ज्योति का एक भी सदस्य न बचेगा जो रजत-जयन्ती का आयोजन किसी न किसी रूप में मना कर अपनी श्रद्धा अभिव्यक्त न करे।

इस वर्ष परिवार को कई महत्वपूर्ण कार्य करने हैं, अपने परिवार की संख्या वृद्धि इनमें से प्रमुख कार्य है। क्योंकि आध्यात्मिक क्रान्ति को विश्व-व्यापी बनाने के लिए उसके लिए समर्थक और सहायक तो चाहिए ही। इसलिए जनवरी से जून तक सभी सदस्यों को अपनी सामर्थ्य भर यह प्रयत्न करते रहना चाहिए। इसके उपरान्त सामाजिक क्रान्ति का सूत्रपात करने के लिए, विवाहों में होने वाले अपव्यय का उन्मूलन करने के लिए सुगठित एवं व्यापक आँदोलन की व्यवस्था बनाई जायगी। पिछले पृष्ठों पर इस सम्बन्ध में कुछ चर्चा की गई है। इस सम्बन्ध में अगले अंकों में, और भी प्रकाश डाला जायगा और परिजनों को इसके लिए प्रेरणा दी जायगी कि वे अगले तीन-चार महीनों में अपनी मनोभूमि इस योग्य तैयार कर लें कि उनके सहयोग से हिंदू-समाज को कलंकित और विपन्न बनाने वाली इस हत्यारी प्रथा का पूतना, ताड़का और सूर्पणखा की तरह काला मुँह किया जा सके। अखण्ड-ज्योति परिवार के लोग इस आदर्श का मार्ग-दर्शन करके सारे देश को एक नई दिशा देंगे और संघर्ष में जो कष्ट उठाना पड़ता है उसके लिए त्याग और बलिदान करके भव्य-समाज की नव्य रचना की भूमिका प्रस्तुत करेंगे। राजनैतिक क्रान्ति की- स्वराज्य की- लड़ाई में त्यागी, बलिदानी वीरों की तरह सामाजिक क्रान्ति की दिशा में प्रथम मोर्चा अपने परिवार के जिम्मे ही रहने वाला है। गान्धी जी के 79 साथियों ने धरसाना पर नमक बनाने की चढ़ाई करते हुए स्वतन्त्रता-सत्याग्रह का आरम्भ किया था आगे वह देश-व्यापी बना और अन्ततः स्वराज्य लेकर ही पूर्ण हुआ। इतिहास की वही पुनरावृत्ति अपना परिवार आदर्श विवाहों का नया स्वरूप समाज के सामने रखते हुए प्रस्तुत करेगा। उसकी मानसिक तैयारी हमें इसी छमाही में कर लेनी चाहिए। जून से इसे क्रियात्मक रूप दिया जाने लगेगा।

रजत-जयन्ती एक दिन मनाये जाने वाला त्यौहार मात्र न माना जाय। उससे हर परिजन प्रेरणा प्राप्त करे। नियमित रूप से युग-निर्माण के लिए समय देते रहने का व्रत लेना ही इस पुण्य-पर्व को मनाने की सच्ची श्रद्धांजलि माना जा सकता है। जयन्ती उत्सव तो छोटे-बड़े रूप में इस छमाही में किसी-न-किसी दिन प्रत्येक परिजन को मना ही लेना चाहिए।


मैं अनन्त पथ का राही हूँ!


मैं अनन्त पथ का राही हूँ (Kavita)

युगों-युगों से चलता आया, और युगों तक फिर चलना है।

जीवन-मरण नहीं कुछ मेरा, यह केवल झूठी छलना है।

‘अथ’ से पूर्व चला हूँ मैं तो, चला चलूँगा ‘इति’ के आगे।

धरा-व्योम क्षिति पर थम जाते, मेरी राह क्षितिज के धागे।

मेरे सम्मुख इस दुनिया की रात और ये प्रातः नहीं है।

मैं अनन्त पथ का राही हूँ, रुकने की बात कुछ नहीं है।

मेरी मंजिल का न ठिकाना, यह तो मंजिल हीन डगर है।

मुझे मृत्यु का तनिक न डर है, मेरा अणु-अणु अजर अमर है।

धरती की हर मंजिल मेरे पथ के रज-कण के समान है।

पारावार नहीं है उसका, वह असीमता मूर्तिमान है।

मेरे आगे काल - व्याल का चल सकता उत्पात नहीं हैं।

मैं अनन्त पथका राही हूँ, रुकने की कुछ बात नहीं हैं।

अरे एक चरण में जाने कितनी मंजिल तय हो जाती,

लक्ष-लक्ष में चरण चल चुका, क्या उनकी गणना हो पाती।

हार गया नक्षत्र लोक भी, लगा-लगा अनगिनती चक्कर,

क्या शताब्दियाँ गिनूँ कल्प भी जब बन गए मील के पत्थर।

नहीं बाँध सकते युग मुझको, उनकी कुछ औकात नहीं है।

मैं अनन्त पथ का राही हूँ, रुकने की कुछ बात नहीं है।

मेरे आगे आदि अन्त ने कितने खेल तमाशे खेले,

लगे और उठ गए यहाँ से कई सम्यताओं के मेले।

मैंने देखी है मानवता पशुता को भी लज्जित करते,

और कहीं देखा है उसको दिव्य भव्य भावा को भरते।

यह तो नियति-चक्र की गति है, कही दिवस है, रात कहीं है।

मैं अनन्त पत्र का राही हूँ, रुकने की कुछ बात नहीं है।

पल-छिन धूप-छाँह के सम ही रहे जमाने बनते मिटते।

राम-कृष्ण के अवतारों को देखा अन्तिम घड़ियाँ गिनते।

बुद्ध, मुहम्मद ईसा सबको मैंने आते-जाते देखा।

कोई नहीं बचा आखिर में, बचा हुआ है केवल लेखा।

दृष्टा बनकर देखा करता, कहीं हर्ष संघात नहीं है।

मैं अनन्त पथ का राही हूँ, रुकने की कुछ बात नहीं है।

-डॉ. राजकुमार पाण्डेय ‘कुमार’

*समाप्त*