रजत जयन्ती

—रजत जयन्ती के हर्षोत्सव को युग-निर्माण प्रेरणा का पुण्य पर्व मानकर भावना एवं श्रद्धापूर्वक मनाने वाले अपने परिजनों के प्रति “अखण्ड ज्योति” अपना आन्तरिक आभार प्रकट करती है।

—साथ ही यह भी आशा करती है कि इस महान् अभियान को सार्थक बनाने के लिए प्रत्येक परिजन बसन्त पंचमी के दिन से कुछ नियमित समय—दान आरम्भ करे।

—लक्ष्य की पूर्ति के लिए परिवार का विस्तार नितान्त आवश्यक है। अतएव नये सदस्य बनाने के लिए हम में से हर एक को शक्तिभर प्रयत्न करना चाहिए।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्

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वर्ष 25 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक 1

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तप से ही कल्याण होगा

“जिस प्रकार अग्नि में स्वर्ण को तपाने से उसके तमाम मल नष्ट हो जाते हैं, कान्ति अधिक आती है और मूल्य बढ़ जाता है, उसी प्रकार जो सत्य-रूपी अग्नि में प्रवेश करते हैं, उनका केवल शारीरिक बल ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक बल भी अहर्निश वृद्धि को प्राप्त होता है। सच्चा तप निर्बल को सबल, निर्धन को धनी, प्रजा को राजा, शूद्र को ब्राह्मण, दैत्य को देवता, दास को स्वामी और भिक्षुक को दाता बना देता है। सच्चे तप का भाव उस देश-भक्त में है जो अपने देश एवं अपनी जाति के गौरव और प्रतिष्ठा, कीर्ति और मान, सम्पत्ति और ऐश्वर्य की वृद्धि और उन्नति के लिए दृढ़ इच्छा रखता है। अनेक प्रकार के दुःखों, कष्टों और संकटों को सहन करने, कठिन से कठिन मेहनत और श्रम को उठाने और विघ्नों से मुकाबला करने के लिए उद्यत रहता है। सच्चे देश-प्रेमी और देशानुरागी कल्याण की इच्छा करते हुए तप का अनुष्ठान करके, आत्मा और मन को धर्माचरण-रूपी प्रचण्ड अग्नि में दग्ध करके, अपने और अपने देश की अपवित्रता, मलिनता और अन्य अशुद्धियों को दूर कर जाति को आरोग्यता एवं सुख-सम्पत्ति की योग्यता प्रदान करते हैं। जिन देशानुरागी पुरुषों में तपश्चर्या नहीं, जो मुसीबतों, विघ्नों और आफतों का मुकाबला करने से घबराते हैं, जो द्वन्द्वों को सहन नहीं कर सकते, जो भूख और प्यास, सर्दी और गर्मी धूप और छाँह, कोमल और कठोर, मीठा और खट्टा आदि द्वन्द्वों के दास हैं, ये संसार-रूपी युद्ध-पोत में कदापि कृत-कृत्य नहीं हो सकते।”

-महामना मदन मोहन मालवीय


कर्म का ब्रह्मार्पण

केनोपनिषद् में एक उपाख्यान है। उसमें बताया गया है कि जल, वायु, अग्नि आदि देवता अपने-अपने बल का बड़ा अभिमान करते थे। एक दिन इन्द्र सभा में सभी देवता अपनी शक्ति को बड़ा बताते हुए शेखी बघार रहे थे। इतने में ही एक देवी प्रकट हुई और उसने एक तिनका रखकर प्रत्येक देवता से उसे नष्ट करने के लिए कहा। बड़े-बड़े पहाड़ों को उड़ा देने वाले, प्रलयंकारी तूफान पैदा करने वाले पवन ने बड़े दर्प और उपेक्षा के साथ उस तिनके को उड़ाना चाहा जैसे वह उसके लिए सामान्य चीज हो। उसने धीरे-धीरे पूरी शक्ति लगा दी किन्तु तिनका टस से मस नहीं हुआ। अग्नि जो समस्त ब्रह्माण्ड को भस्म करने का गर्व करता था वह उस छोटे से तिनके को जला न सका। वरुण उसे बहा नहीं सका। इस तरह उस तिनके को नष्ट करने में सभी देवता असफल रहे। इतने में वह देवी अन्तर्ध्यान हो गई। सभी देवता बड़े असमंजस में थे। इन्द्र ने वस्तु-स्थिति के मर्म को समझते हुए कहा—”देवताओं ! तुम अपने कार्यों और बल का व्यर्थ ही अभिमान करते हो। यह बल तुम्हारा नहीं वरन् उस देवी का ही है। ब्रह्म ही उस देवी के रूप में आपकी परीक्षा लेने आये थे। संसार में जो कुछ भी हो रहा है उस ब्रह्म की प्रेरणा से ही हो रहा है। हम सब तो केवल माध्यम मात्र हैं।” इन्द्र की बात सुनकर देवताओं को अपनी-अपनी असलियत का पता चला।

मनुष्य की शक्ति सत्ता और सामर्थ्य सीमित है। वह विश्व-ब्रह्माण्ड की एक सामान्य इकाई है। मनुष्य जो सोचता है उसके विपरीत भी परिणाम मिल सकते हैं। जो कुछ मनुष्य करता है उसका अच्छा या बुरा परिणाम क्या-क्या होगा इसका सही-सही निर्णय वह नहीं कर पाता। विश्व नियम के अंतर्गत ही मनुष्य के जीवन का संचालन और नियमन होता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निष्काम कर्मयोग, कर्म फल में अनासक्ति का उपदेश देते हुए विराट स्वरूप का दर्शन कराते हुए बताया है कि—समस्त संसार के कर्मों का कारण विराट् स्वरूप परमात्मा ही है, तू नहीं।” आगे अर्जुन को केवल एक माध्यम, यन्त्र रूप में रह कर काम करने की शिक्षा दी है।

संसार के सभी धर्मों ने कर्मफल और कर्म के अभिमान के त्याग की शिक्षा दी है। अपने कर्म और कर्मफल ईश्वर को समर्पण करने, उस पर छोड़ने का आदेश दिया है।

उपनिषद् के ऋषि ने कहा है—

“यद्यत् कर्म प्रकुर्वीत तद् ब्रह्माँणि समर्पयेत।”

“जो जो कर्म करें वह सब ब्रह्म को समर्पित कर दें।”

कर्मफल को और अपने कर्म को ईश्वरीय सत्ता पर छोड़ देना जीवन का एक बहुत बड़ा समाधान है। अपने कर्म और उसके अच्छे, बुरे, अनुकूल, प्रतिकूल परिणामों का बोझा उठाये रखने वाला आदमी चैन, सुख, शान्ति, सन्तोष अनुभव नहीं कर सकता। उसकी स्थिति समुद्री लहर में पड़े उस दुर्बल मनुष्य जैसी हो जाती है जो कभी इधर कभी उधर थपेड़े खाता रहता है और हाँफता रहता है। कर्म और कर्मफल का ईश्वर को समर्पण कर देने पर मनुष्य एक बहुत बड़े बोझ से मुक्त हो जाता है।

डेल कार्नेगी ने अपना एक संस्मरण लिखा है कि “हेनरी फोर्ड के पास मैंने जाकर पूछा कि इतना कार्य-भार होते हुए भी आप स्वस्थ कैसे रहते हैं?” इस पर उन्होंने कहा, “मैं ईश्वर को अपने कार्यों का प्रबन्धक, स्वामी मानता हूँ और अपने आपको काम करने वाला श्रमिक। ईश्वर को अपने कार्यों का प्रबन्धक और स्वामी मानने से फिर मुझे कोई चिन्ता नहीं रहती और इसी निश्चिन्तता से मैं अधिक स्वस्थ और सन्तुष्ट रहता हूँ।”

कर्म और कर्मफल में आसक्ति रहने से मनुष्य को अनुकूल-प्रतिकूल स्थितियों से गुजरना पड़ता है और इसी के अनुसार आशा-निराशा का भी सामना करना पड़ता है और इससे मनुष्य की शक्ति यों का काफी क्षय होता है। अपने कर्म और कर्मफल को ईश्वर पर छोड़ देने से निराशा, चिन्ता, असन्तोष का कोई स्थान नहीं रह जाता, मनुष्य का आशावाद ही एकमेव अजर-अमर रहता है । तत्ववेत्ता अरस्तू ने लिखा है—”अपने कर्मों और उसके फल को ईश्वर पर छोड़ देने से आशावाद अजर-अमर बनता है। ईश्वर सभी तरह आशावाद का केन्द्र है। आशावाद और ईश्वरवाद एक ही है।” ईश्वर का अवलम्बन लेने पर, अपने कर्म और कर्मफल का समर्पण ईश्वर को कर देने से सफलता, असफलता मनुष्य को प्रभावित नहीं करती। अजर-अमर आशावाद के सहारे वह दोनों में सन्तुलित रहकर कर्म पथ पर अग्रसर होता रहता है।

स्वार्थ में ही नहीं वरन् परोपकार, रचनात्मक भले कामों में लगने पर भी यदि मनुष्य इनमें कर्तापन का अभिमान और फलासक्ति से ग्रस्त रहता है तो वे भी मनुष्य के बन्धन का कारण बन जायेंगे और बन्धन ही अशान्ति, क्लेश, असन्तोष का कारण बनता है। अच्छे काम करते हुए प्रतिकूल परिणाम, असफलता आदि मिलने पर ऐसा व्यक्ति पतित हो सकता है। अपने नैतिक बल को खोकर पुनः अनैतिक हो सकता है। फलासक्ति के कारण मनुष्य सुधार पथ पर बहुत दूर आगे बढ़कर भी फिर से लौट सकता है। ऐसी स्थिति में कोई विशेष सफलता, महानता विकास की आशा नहीं की जा सकती। जिनकी बड़ी-बड़ी आशायें, आकाँक्षायें थीं, कुछ अच्छे कार्य कर गुजरने की अभिलाषायें थीं, उन्होंने कार्य की प्रारम्भिक कठोरता या असफलताओं से निराश होकर सब कुछ छोड़ दिया। अतः फलासक्ति , कर्तापन का अभिमान एक बहुत बड़ी फिसलन है, जिससे गिरते चले जाते हैं।

प्रत्येक मनुष्य का आत्म-तत्व अनन्त विश्व-चेतना से जुड़ा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति का जीवन सार्वभौमिक विश्व नियम की प्रेरणा से चलता है। आत्मचेतना और विश्वचेतना की एकता, आत्मा और परमात्मा की एकात्मकता होने पर सामान्य व्यक्ति भी असाधारण अनन्त शक्तियों का केन्द्र बन जाता है। पानी की बूँद अपने आप में कुछ नहीं, यदि वह अपने रूप का अपनी संकीर्ण दुनिया का अस्तित्व ध्यान में रखकर विच्युत रहेगी तो उसकी कोई शक्ति सामर्थ्य नहीं रहेगी। किसी भी क्षण उसके अस्तित्व का ही लोप हो जायेगा। किन्तु यही बूँद विशाल महासागर के साथ एक रूप हो कर उतनी ही शक्ति सामर्थ्य सम्पन्न बन जायगी। मनुष्य की भी विश्व विराट् में यही स्थिति है। जब वह अपने अभिमान और कर्तापन, कर्मफल के अस्तित्व को लेकर चलेगा तो उसकी शक्ति सीमित क्षुद्र, संकीर्ण, नाशवान होगी। उसकी शक्ति सामर्थ्य बाह्य सफलता, असफलताओं से टकराकर ही नष्ट हो जायगी। किन्तु यही मानवीय शक्ति सामर्थ्य का सम्बन्ध विश्व विराट् के साथ हो जाय तो वह असीम और महान् बन जायगी। इसका मार्ग है- अपने समस्त जीवन, कर्म, कर्तापन, कर्म फलों का समर्पण उस विश्वात्मा को परब्रह्म परमात्मा को किया जाय। यही सच्ची पूजा, उपासना, अर्चना है। “यद्यत् कर्म प्रकुर्वीत तद् ब्रह्माँणि समर्पयेत्।” हम जो कुछ भी करें, हमारा जो कुछ भी है, सब कुछ परमात्मा को, परम प्रभु को समर्पण करें। विश्व भुवन की समस्त चेष्टाओं के प्रेरक परम प्रभु को अपनी सकल चेष्टाओं का समर्पण करके स्वयं को मुक्त बन्धनरहित, आनन्दमय बना सकेंगे तभी जीवन की चिरसाध पूरी होगी?


नील माधव बन्द्योपाध्याय

बंगाल के सुप्रसिद्ध जज नील माधव बन्द्योपाध्याय का मृत्यु काल जब निकट आया तो उनके कुटुम्बियों ने पूछा- इस अन्तिम संकट में आपको कुछ कहना हो तो कह दीजिए।

बन्धोपाध्याय ने कहा-बीमा कम्पनी के प्रतिनिधि को बुलाइए। वह बुलाया गया। बुलाने का कारण पूछा, तो उन्होंने कहा-- मेरी बीमा पॉलिसी रद्द करा दी जाय। क्योंकि पाँच वर्ष पूर्व मुझे मधुमेह हो चुका था पर मैंने उसकी सूचना कम्पनी को नहीं दी। ऐसी दशा में बीमा की रकम का वसूल करना अन्याय ही कहा जायेगा।

मैंने जीवन भर न कभी झूँठ बोला और न किसी को धोखा दिया। जीवन के अन्तिम समय में इस कलंक को सिर पर लेकर मैं मरना नहीं चाहता, इसलिए यह आवश्यक कार्य अभी ही करना उचित समझा गया।


सुख और दुःख क्या है?

सुख और दुःख का अपना कोई अस्तित्व नहीं है। इनका कोई सुनिश्चित, ठोस, सर्वमान्य आधार भी नहीं है। सुख-दुःख मनुष्य की अनुभूति के ही परिणाम हैं। उसकी मान्यता कल्पना एवं अनुभूति विशेष के ही रूप में सुख-दुख का स्वरूप बनता है। सुख-दुःख मनुष्य के मानस पुत्र हैं ऐसा कह दिया जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। मनुष्य की अपनी विशेष अनुभूतियां, मानसिक स्थिति में ही सुख-दुःख का जन्म होता है। बाह्य परिस्थितियों से इसका कोई सम्बन्ध नहीं। क्योंकि जिन परिस्थितियों में एक दुःखी रहता है तो दूसरा उनमें खुशियाँ मनाता है, सुख अनुभव करता है। वस्तुतः सुख-दुःख मनुष्य की अपनी अनुभूति के निर्णय हैं, और इन दोनों में से किसी एक के भी प्रवाह में बह जाने पर मनुष्य की स्थिति असन्तुलित एवं विचित्र-सी हो जाती है। उसके सोचने समझने तथा मूल्याँकन करने की क्षमता नष्ट हो जाती है। किसी भी परिस्थिति में सुख का अनुभव करके अत्यन्त प्रसन्न होना, हर्षातिरेक हो जाना तथा दुःख के क्षणों में रोना बुद्धि के मोहित हो जाने के लक्षण हैं। इस तरह की अवस्था में सही-सही सोचने और ठीक काम करने की क्षमता नहीं रहती। मनुष्य उल्टा-सीधा सोचता है। उल्टे-सीधे काम करता है।

कई लोग व्यक्ति विशेष को अपना अत्यन्त निकटस्थ मान लेते हैं। फिर अधिकार- भावनायुक्त व्यवहार करते हैं। विविध प्रयोजनों का आदान-प्रदान होने लगता है। एक दूसरे से कुछ न कुछ अपेक्षायें रखने लगते हैं। जब तक गाड़ी भली प्रकार चलती रहती है तो लोग सुख का अनुभव करते हैं। लेकिन जब दूसरों से अपनी अपेक्षायें पूरी न हों या जैसा चाहते हैं वैसा प्रतिदान उनसे नहीं मिले तो मनुष्य दुःखी होने लगता है।

अक्सर अनुकूलताओं में सुखी और प्रतिकूलताओं में दुःखी होना हमारा स्वभाव बन गया है। उन्नति के, लाभ के, फल-प्राप्ति के क्षणों में हमें बेहद खुशी होती है तो कुछ न मिलने पर, लाभ न होने पर दुःख भी कम नहीं होता। लेकिन इसका आधार तो स्वार्थ, प्रतिफल, लगाव अधिकार आदि की भावना है। इन्हें हटाकर देखा जाय तो सुख-दुःख का कोई अस्तित्व ही शेष न रहेगा। दोनों ही निःशेष हो जायेंगे।

सुख-दुःख का सम्बन्ध मनुष्य की भावात्मक स्थिति से मुख्य है। जैसा मनुष्य का भावना स्तर होगा उसी के रूप में सुख-दुःख की अनुभूति होगी। जिनमें उदार दिव्य सद्भावनाओं का समुद्र उमड़ता रहता है, वे हर समय प्रसन्न, सुखी, आनन्दित रहते हैं। स्वयं तथा संसार और इसके पदार्थों को प्रभु का मंगलमय उपवन समझने वाले महात्माओं को पद-पद पर सुख के सिवा कुछ और रहता ही नहीं। काँटों में भी वे फलों की तरह मुस्कुराते हुए सुखी रहते हैं। कठिनाइयों में भी उनका मुँह कभी नहीं कुम्हलाता।

इसके विपरीत संकीर्णमना हीन भावना वाले, रागद्वेष से प्रेरित स्वभाव वाले व्यक्तियों को यह संसार दुःखों का सागर मालूम पड़ेगा। ऐसे व्यक्ति कभी नहीं कहेंगे कि “हम सुखी हैं।” वे दुःख में ही जीते हैं और दुःख में ही मरते हैं। दुर्भावनायें ही दुःखों की जनक है। इसी तरह वे हैं जिनका पूरा ध्यान अपनेपन पर ही है। उनका भी दुःखी रहना स्वाभाविक है। केवल अपने को सुखी देखने वाले, अपना हित, अपना लाभ चाहने वाले, अपना ही एकमात्र ध्यान रखने वाले संकीर्णमना व्यक्तियों को सदैव मनचाहे परिणाम तो मिलते नहीं। अतः अधिकतर दुःख और रोना-धोना ही इस तरह के लोगों के पल्ले पड़ता है।

आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य का भावनास्तर सार्वभौमिक हो। अपनी सुख-दुःख की अनुभूति का आधार जितना व्यापक होगा उतना ही मनुष्य सुख-दुःख की मोहमयी माया से बचा रहेगा। सबके साथ सुखी रहना सबके साथ दुःखी, अर्थात् सबके सुख में अपना सुख देखना और सबके दुःख में अपना दुःख। इससे मनुष्य न तो सुख में पागल बनेगा न दुःख में रोयेगा।

सर्वे भवन्तु सुखिना, सर्वे सन्तु निरमयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख माप्नुयात॥

“सभी सुखी हों सभी नीरोग हों। सभी कल्याण प्राप्त करें कोई भी दुःखी न हों।” इस तरह की चाह ज्यों-ज्यों बढ़ती जायगी हमारे हृदय में स्थायी सुख शान्ति सन्तोष की भी वृद्धि होगी। इसी तरह सबके दुःखों को अपनी अनुभूति का आधार बनाने वाले व्यक्ति यों के स्वयं के दुःख, द्वन्द्व स्वतः तिरोहित हो जाते हैं। दुःख का भार जब मनुष्य अपनी ही पीठ पर लादे फिरता है तो उसका दुःखमय रह कर दुःख में ही अन्त होना स्वाभाविक है।

अति संवेदनशील व्यक्ति को भी सुख-दुःख की लहरों में अधिक थपेड़े खाने पड़ते हैं। क्षण-क्षण बदलने वाले, बनने और बिगड़ने वाले पदार्थ, संयोग-वियोग जब संवेदनशील व्यक्ति के मानस को झकझोर डालते हैं तो उसे संसार दुःखमय जान पड़ता है। वस्तुतः इस तरह के व्यक्ति एक अपनी काल्पनिक दुनिया बना लेते हैं। लेकिन जब कल्पना साकार नहीं होती और दूसरे अरुचि के परिणाम मिलते हैं तो संवेदनशील व्यक्ति दुःखी होता है। संसार यथार्थ की कठोर धरती है। यहाँ सभी तरह की परिस्थितियों के झोंके आते रहते हैं। पद-पद पर प्राप्त परिस्थिति का स्वागत कर दृढ़ता के साथ आगे बढ़ने वाले ही दुःख द्वन्द्वों पर काबू पा सकते हैं।

मानव जीवन दुहरी कार्य प्रणाली का संयोग स्थल है। मनुष्य लेता है और त्याग भी करता है निरन्तर श्वास लेता है और प्रश्वास छोड़ता है। भोजन करता है किन्तु दूसरे रूप में उसका त्याग भी करता है। इस तरह धनात्मक और ऋणात्मक दोनों क्रियाओं में ही मनुष्य जीवन की वास्तविकता है। दोनों में से एक का अभाव मृत्यु है। दोनों के सम्मिलित पर्याप्त से ही जीवन पुष्ट बनता है। बिजली का ऋण और धन दोनों धारायें चलती हैं तभी प्रयोजन सिद्ध होता है। अकेली एक धारा कुछ नहीं कर सकती। इसी तरह संसार में सुख भी है और दुःख भी। न्याय है और अन्याय भी। प्रकाश है और अन्धेरा भी। संसार सुन्दर उपवन है तो कठोर कारागार भी। जन्म के साथ मृत्यु और मृत्यु के साथ जन्म जुड़ा हुआ है। इस तरह विभिन्न धनात्मक और ऋणात्मक पक्ष मिलकर जीवन को पुष्ट करने का काम करते हैं, केवल मात्र सुख की चाह करना और दुःख द्वन्द्वों से बचने की लालसा रखना एकांगी है। प्रकृति का नियम तो बदलता नहीं इससे उल्टे मनुष्य में भीरुता, मानसिक दुर्बलता को पोषण मिलता है मनुष्य को निराशामय चिन्ता का सामना करना पड़ता।

जो कुछ भी जीवन में प्राप्त हो जैसी भी परिस्थिति आये उसे जीवन का वरदान मानकर सन्तुष्ट और प्रसन्न रहने में कंजूसी न की जाय। वस्तुतः सुख दुःख, अनुकूल-प्रतिकूल, धनात्मक-ऋणात्मक परिस्थितियों में जीवन बलिष्ठ और पुष्ट होता है। इनमें से निकल कर ही मनुष्य निरामय, अनावृत और निर्मल बन सकता है। वैसे इनसे बचने का कोई रास्ता भी नहीं है। फिर क्यों नहीं हर परिस्थिति में सहज भाव में स्थिर रहा जाय? जब संसार को चलाने वाले नियम परिवर्तनशील हैं, ऋणात्मक और धनात्मक हैं तो फिर अपनी एक सी दुनिया बसाने की कल्पना या सुखों के अरमानों को पोषण क्यों दिया जाय? इससे तो दुःख निराशा क्लान्ति ही मिलेगी। दृढ़ चट्टान की तरह जीवन में आने वाली विविध अनुकूल-प्रतिकूल हवाओं में तटस्थ भाव से सब कुछ देखते रहना और हर परिस्थिति में सन्तुष्ट रहना सुख-दुःख से मुक्त रहने का सरल उपाय है।

वस्तुतः सुख के सम्बन्ध में ही लोगों के विचार सही और पूर्ण नहीं होते। कई बार जिन्हें मनुष्य सुख मानकर चलता है वे ही घोर दुःख का कारण बन जाते हैं। बहुत से लोग शारीरिक सुखों को अपना आधार मान लेते हैं। आराम करना, प्रमादी जीवन बिताने में कई लोग सुख का अनुभव करते हैं किन्तु ये विषवत् दुःखकर होते हैं-

यवग्रे चानु बन्धे च सुखं मोहनमात्मनः।

निद्रालस्य प्रमादोत्यं तत्तामसमुदाह्रतम्॥

“भोग काल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला, निद्रा, आलस्य, प्रमाद आदि से उत्पन्न सुख तामसी-राक्षसी कहा गया है।” वस्तुतः निद्रा आलस्य प्रमाद में जीवन बिताने से मनुष्य के मन, बुद्धि,विवेक सुप्त हो जाते हैं। इससे मनुष्य की शारीरिक मानसिक क्षमतायें भी नष्ट हो जाती हैं। और फिर जीवन के संघर्षों में से मनुष्य की क्रियाशक्ति को मोरचा लग जाता है। हाथ पाँव बेकार और शरीर रुग्ण हो जाता है।

कई लोग अच्छा खाना, पीना, विषय भोग में रत रहना ही सुख का आधार मान कर चलते हैं। खाओ पीओ और मौज सुखकर लगने वाले परिणाम में विषवत् मालूम पड़ते हैं। गीताकार ने स्पष्ट लिखा है-

“विषयेन्द्रिय संयोगा द्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।

पणामें विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्॥”

“विषय और इन्द्रियों के संयोग से होने वाले सुख राजसिक सुख कहलाते हैं जिनका पणाम विष तुल्य ही होता है।” वस्तुतः संसार के भोगों में लिप्त रहना, विषयों में आसक्त रहना प्रारम्भ में तो सुखकर लगता है किन्तु परिणाम में मनुष्य पर हलाहल विष की तरह प्रभाव डालता है। मनुष्य तन, मन से हीन अस्वस्थ हो तड़प-तड़प कर प्राण देता है। जिस तरह पतंगा दीपक की लौ का स्पर्श-सुख प्राप्त करने की चेष्टा करके झुलस जाता है अपने पंखों से हाथ धो बैठता है और फिर तड़प-तड़प कर प्राण देता है उसी तरह विविध भोग, विषय वासना की पूर्ति पहले तो सुखकर लगती है किन्तु फिर अनेकों शारीरिक मानसिक कष्टों का कारण बन जाती है। साथ ही मनुष्य में अनेकों राजसिक भाव, अहंकार, दर्प, मान, बड़ाई, प्रतिष्ठा की भावना, दम्भ, विषय चिन्तन, शान शौकत आदि बढ़ जाते हैं जो सम्पूर्ण जीवन को विकारमय बना देते हैं और इनके कारण मनुष्य को अनेकों कष्टों का सामना करना पड़ता है।

साँसारिक पदार्थ, इन्द्रियाँ तथा इच्छाओं से सम्बन्ध रखने वाले सभी सुखों का अन्त दुःख में ही होता है। क्योंकि ये सभी नाशवान, क्षणभंगुर परिवर्तनशील होते हैं। संसार और मनुष्य की परिस्थितियाँ हर क्षण बदलती हैं। आज कोई धनवान है तो कल वह निर्धन बन सकता है। आज अनुकूल परिस्थिति है तो कल प्रतिकूलताओं का भी सामना करना पड़ सकता है। आज जो पदार्थ हमें सुख देते हैं ये कल दुःखदायी बन जाते हैं। आज जो अपने हैं वे कल पराये बन जाते हैं।

हाँ, यदि सुख का कोई स्थायी आधार हो सकता है तो वह है सत्य, सनातन, सार्वभौम मानवीय चेतना। अपनी चेतना, अन्तरात्मा में मन, बुद्धि चित्त को केन्द्रित करके तटस्थ निस्पृह अनासक्त भाव से संसार को देखते रहना आत्म स्थित हो जग में अपने कार्य व्यापार करते रहना, आत्मा में ही मस्त रहना, आत्मा में ही सुखी रहना। आत्मा को देखना, आत्मा को ही सुनना, आत्मा में ही रमण करना मनुष्य को सुख-दुःख की सीमाओं से मुक्त कर देता है।

किसी भी प्रकार के सुख की चाह के साथ दुःख का अभिन्न साथ है। उसे तिरोहित नहीं किया जा सकता। अस्तु सुख-दुःख की सीमा से ही परे हो जाना इसके रहस्य को जान लेना है। और यह आत्म केन्द्रित होने पर ही सम्भव है। आत्मस्थ व्यक्ति के लिए न कोई सुख होता है न कोई दुःख। हमें सुख दुःख की सीमा से ऊपर उठने के प्रयास प्रारम्भ कर देने चाहिए।


Quotation

शिष्यों के पास कुल मिलाकर पाँच रोटी और दो टुकड़े तरकारी निकली। गुरु ने उसे इकठ्ठा किया और मन्त्र बल से अन्नपूर्ण बना दिया। शिष्यों ने भर पेट खाया और जो भूखे भिखारी उधर से निकले वे भी उसी से तृप्त हो गये। सोलोमन नामक शिष्य ने पूछा-गुरु वर, इतनी कम सामग्री में इतने लोगों की तृप्ति का रहस्य क्या है?

ईसा ने कहा-हे शिष्यों। धर्मात्मा वह है जो खुद की नहीं सब की बात सोचता है। अपनी बचत सबके काम आये इस विचार से ही तुम्हारी पाँच रोटी अक्षय अन्नपूर्णा बन गई। जो जोड़ते हैं वे ही भूखे रहेंगे। जिनने देना सीख लिया है उनके लिए तृप्तता के साधन आप ही आ जुटते हैं।


अनुशासन का उल्लंघन न करें

सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा, एवं अन्य सभी ग्रह-उपग्रह एक ठीक-ठीक नियम, व्यवस्था और विधान के अनुसार काम करते हैं। पेड़ों का उगना, फलना-फूलना, ऋतुओं का परिवर्तन, जीवों का जन्म-मरण आदि भी एक विशेष नियम की प्रेरणा से नियत विधान के अनुसार होता है। संसार की प्रत्येक छोटी से लेकर बड़ी घटनाओं के पीछे एक नियामक विधान ही काम करता है। समस्त ब्रह्माण्ड का संचालन नियमन करने वाला विधान ही पिण्ड में अणु-अणु में गतिशील है, उसके भी चारों और कई परमाणु चक्कर लगाते हैं। मनुष्य का जीवन भी इस विश्व नियम से अलग नहीं है वरन् जीवन की प्रत्येक गति-विधि का नियमन भी इसी से होता है।

प्रसिद्ध दार्शनिक कान्ट ने लिखा है “आकाश के नक्षत्रों से लेकर अणु-परमाणु के कार्यकलाप और संसार की प्रत्येक घटना के पीछे, मनुष्य की प्रत्येक क्रिया के पीछे एक अमर चेतनसत्ता का नियमित विधान काम कर रहा है। जिस तरह किसी ग्रह के पथभ्रष्ट हो जाने पर सृष्टि में खलबली मच सकती है उसी तरह विश्व नियम नियति के विधान के विरुद्ध चलने पर मनुष्य के आन्तरिक जीवन में भी भयंकर संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। उसका परिणाम बाह्य जीवन में विनाश, हानि के रूप में ही प्राप्त होता है। विश्व नियम नियतिचक्र शान्ति और विकास का रास्ता है, जिसके अनुसार चलने पर मनुष्य के स्वास्थ्य, प्रतिभा का विकास होता है। जीवन में उत्कृष्टता प्राप्त होती है।”

संसार में काम करने वाला नैतिक विधान एक विवेकपूर्ण तथ्य है जो विभिन्न शक्तियों, पदार्थों, क्रियाओं में संतुलन पैदा करता है। प्रत्येक क्रिया और उसकी प्रतिक्रिया विश्व नियामक तथ्यों की प्रेरणा से ही होती है। मन के सूक्ष्म भाव, संकल्प-विकल्प उतार-चढ़ाव उनमें सन्तुलन-असन्तुलन भी इसी विश्व नियम की प्रतिक्रिया का अंग है।

एडिंगटन ने लिखा है “जिस तरह मनुष्य के कार्यकलापों के पीछे मन की शक्ति कार्य करती है ठीक इसी तरह सृष्टि के मूल में भी एक चेतनसत्ता कार्य करती है, जो पूर्ण व्यवस्थित और नियामक है पहले स्थूल दृष्टि से देखने पर जड़ जगत का कार्य भी एक मशीन की तरह दिखाई देता है किन्तु गम्भीर विचार, चिन्तन द्वारा देखा जाय तो मालूम पड़ता है कि जगत और इसके प्रत्येक कार्य-कलाप के पीछे एक चेतनसत्ता काम कर रही है जो नियामक है।” भारतीय मनीषियों ने तो बहुत पहले ही इस तथ्य की अनुभूति प्राप्त कर ली थी। भारतीय दर्शन तो पद-पद पर इस विश्व-विधायक सत्ता को स्वीकार करके ही आगे बढ़ता है।

नियति चक्र , विश्व नियम, नैतिक विधान एक विवेक पूर्ण, व्यवस्थित सुनियोजित तथ्य है जिसका स्वभाव सत्यं, शिवं, सुन्दरम् की रचना-सर्जना करना है। यह इतना ही सत्य है जितना विश्व और मानव शरीर में काम करने वाली अमर चेतना, साथ ही यह उतना ही सूक्ष्म और दुरूह भी है। इसे जानना समझना उसी तरह क्लिष्ट है जैसे शरीर में आत्मा को जानना। यही कारण है कि अधिकाँश लोग इसे समझ नहीं पाते। खास कर व्यक्ति अपने सीमित ज्ञान तुच्छ दृष्टिकोण से इस असीमित सर्वव्यापी तथ्य को बहुधा समझ नहीं पाते।

विश्व विधान, नियतिचक्र की अनुभूति के लिये विवेक युक्त निरपेक्ष बुद्धि की आवश्यकता है। अविवेकी अज्ञ मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं का हल ही नहीं निकाल सकता तो इस संसार के मूल नियम, विधान को समझने की बात और भी दुरूह है। इस तरह के अज्ञानी जन जीवन की बाह्य घटना और उनके अच्छे-बुरे परिणामों से ही सुखी-दुःखी होते रहते हैं। इसी तरह अच्छे कार्यों का परिणाम सुख, शान्ति, प्रफुल्लता, उल्लास, वरदान के रूप में मिलता है।

गम्भीर चिन्तन के द्वारा मनुष्य विचार करे तो उस भौतिक बाह्य जगत के प्रत्येक क्रिया-कलाप के अंतर्गत एक शक्ति काम करती हुई मालूम पड़ेगी। एक नियत विधान के अनुसार संसार के कार्यों का नियमन, संचालन होता दिखाई देगा। आग छूने पर जला देती है। पानी गीला कर देता है। विद्युत छूने पर प्राण हरण कर लेती है। बर्फ ठण्डी लगती है। कदाचित नक्षत्र टकरा जायँ तो विश्व में खलबली मच जाय। इसी तरह कई नियम देखें जा सकते हैं ये बाह्य जगत में काम करते हैं इसलिये इन्हें भौतिक नियम कहा जायेगा। सूक्ष्म जगत में काम करने वाले नैतिक नियम कहलाते हैं। प्रत्यक्ष रूप में किसी इन्द्रियों के संयोग से इनको नहीं जाना जा सकता, किन्तु गम्भीरतापूर्वक सूक्ष्म दृष्टि के साथ देखने पर इन्हें उसी तरह जाना जा सकता है जैसे किसी भौतिक नियम को।

नियतिचक्र की अनुकूल दिशा में चलकर ही व्यक्ति ओर समाज की उन्नति विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। इसके विपरीत चलना, विश्व नियम का उल्लंघन करना अपनी अवनति और पतन को निमंत्रण देना है। विद्युत का सदुपयोग करके उससे बड़े महत्वपूर्ण काम लिए जा सकते हैं। मशीनों, इंजनों, पंखे, रेडियो, तथा अन्य उपकरणों को गति मिलती है। सुन्दर सुरुचिपूर्ण प्रकाश प्राप्त किया जाता है। सचमुच विद्युत ने संसार का नक्शा ही बदल दिया है। इसी बिजली को गलत ढंग से छू लिया जाय तो यह प्राण-घातक बन जाती है। आग का उपयोग मनुष्य की बहुत-सी समस्याओं को हल कर देता है। अग्नि मनुष्य की जीवनदाता है, किन्तु गलत ढंग से नियम विरुद्ध होने पर यहाँ प्राणलेवा बन जाती है। परमाणु शक्ति संसार के अभाव, गरीबी, अनेकों समस्याओं का समाधान करने में समर्थ है किन्तु उसके गलत उपयोग से संसार का कुछ ही समय में नाश भी किया जा सकता है।

नियति चक्र, विश्व विधान भी ठीक इसी तरह है। इसके अनुरूप चलने पर मनुष्य की उन्नति विकास समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है और इसके विरुद्ध चलने पर मनुष्य को असीम दुःख परेशानी विपरीतताओं का सामना करना पड़ता है। विश्व नियम नियतिचक्र किसी के सुख-दुःख का ध्यान रखता वह एक नियम है जो सब पर लागू है। यह दुधारी तलवार है। सामने चलाकर जीवन रण में विजय पाई जा सकती है और विपरीत दिशा में चलाकर अपना ही नाश किया जा सकता है। बुरे-आचरण करना, बुरे कर्म करना, नियत स्थिति में सुखमय, शुभ, हितकर परिणामों की आशा करना व्यर्थ है। बुराई का परिणाम कालान्तर में बुरा ही होता है।

बबूल के बीज बोने पर काँटेदार वृक्ष का पैदा होना निश्चित है। किसी भी तरह का अनैतिक बुरा कार्य करने पर शारीरिक अथवा मानसिक रोग या किसी बाह्य दण्ड विपत्तियों का सामना करना पड़े तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। नियतिचक्र, नैतिक मर्यादाओं के विरुद्ध आचरण करने पर मनुष्य का मनोबल क्षीण हो जाता है। कई तरह के कुविचार कुकल्पनायें उसके मन में घुस जाती है जिनसे बाह्य जीवन भी प्रभावित होता है और उसके फलस्वरूप कई दुष्परिणाम मिलते हैं। मानसिक द्वन्द्वों में मनुष्य घुल-घुलकर विनाश को प्राप्त होने लगता है। अनैतिक आचरण से मनुष्य का विवेक, नैतिक बुद्धि प्रबल नहीं होती और उसे उचित-अनुचित का भी ध्यान नहीं रहता। फलस्वरूप गलत निर्णय होते हैं और इससे मनुष्य भयंकर दुःखद परिस्थितियों में पड़ जाता है।

इसका यह भी अर्थ नहीं कि विश्व नियामक विधान की मर्यादा तोड़ने वाले मनुष्यों से कोई दुश्मनी हो। यह सुधारात्मक, सन्तुलन पैदा करने वाला तत्व है। जिस तरह किसी रोग के बाह्य लक्षण उस रोग को प्रकृति द्वारा शरीर से बाहर निकालने का प्रयत्न है उसी तरह नियतिचक्र के विरुद्ध आचरण करने से मिलने वाला शारीरिक या मानसिक दण्ड अनैतिक कार्य करने वाले को उस ओर से विरत करने के लिये ही एक प्रयत्न है। अभिमानी दुराचारी अपनी असहाय दीन अवस्था में अपने अनैतिक कार्यों के लिये बहुत पश्चाताप करते हैं। नियति की ठोकर खाकर ही मनुष्य को कुछ होश आता है और वह अपने दुष्कर्मों के बारे में समझने लगता है। भविष्य में ऐसा न करने का संकल्प भी करता है खासकर परेशानी की स्थिति में तो यह दुष्कर्म नहीं ही करता। ऐसी स्थिति में कई सुधार भी किये जाते है, अनैतिक कार्य छोड़ देते है। विश्व नियामक सत्ता को अनुभव करने लगते हैं और उन्हें यह सोचने को बाध्य होना ही पड़ता है कि कोई सत्ता हमसे भी प्रबल है जो हमारे कर्मों का लेखा-जोखा लेती है। इतिहास साक्षी है कि जब नियति की ठोकर, लगी विश्व विधान के अनुसार प्रतिक्रिया पैदा हुई तो बड़े-बड़े महारथी, दिग्गज बलवानों को यह सोचने के लिये मजबूर होना पड़ा कि कोई हमसे भी शक्ति शाली सेना है जो हमारा लेखा-जोखा लेती है। उनका गर्व काफूर हो गया।

विश्वव्यापी नैतिक विधान एक अनिवार्य और अकाट्य नियम है, जो संसार के समस्त कार्य-कलापों का नियमन संचालन करता है। यह सर्वत्र व्याप्त एक नियम व्यवस्था है। जड़ पदार्थ और अविकसित प्राणियों का तो यह प्रकृति के माध्यम से सीधा नियमन करता है। पशु-पक्षी प्रकृति का प्रेरणाओं से ही जीवन व्यापार चलाते रहते हैं। मनुष्य का एक विकसित, बुद्धि प्रधान प्राणी होने के नाते

यह केवल नियमन करता है, संचालन नहीं। मनुष्य अच्छा-बुरा सब कुछ करने को स्वतन्त्र है किन्तु इन सबका परिणाम नियति-चक्र के अनुसार ही मिलता है। ठीक इसी तरह जैसे समाज में अच्छे कार्यों के लिये मनुष्य पुरस्कृत और प्रशंसित होता है तो बुरे कार्यों के लिये दण्डित और उपेक्षित।

मनुष्य अपनी चालाकी, चतुराई, कूटनीति के द्वारा भौतिक जगत के सामाजिक राजनैतिक दण्ड से बच सकता है किन्तु नियतिचक्र की निगाह से, विश्व-विधायक के दण्ड से वह नहीं बच सकता। यह दण्ड उसे भोगना ही पड़ता है। अनैतिक कार्यों के लिये अंतर्द्वन्द्व, आत्मभर्त्सना होने लगती है समय पर उसका दुष्परिणाम तो मिलता ही है। असंयमी, दुराचारी, शरीर के साथ ज्यादती करने वाले इन कामों के लिए स्वतन्त्र हैं। किन्तु नियति के दण्ड स्वरूप अस्वस्थता रोग, दुर्बलता का दण्ड उन्हें भोगना ही पड़ता है। संसार की कोई शक्ति उन्हें इससे नहीं बचा सकती। अत्याचार, अनाचार, स्वेच्छाचार का परिणाम विनाश, असफलता हानि के रूप में ही मिलते हैं, तो अच्छे कार्य, सदाचार, पुण्य परमार्थ कार्यों के परिणाम आत्म सन्तोष, प्रसन्नता शांति आदि वरदान के रूप में मिलते हैं। बुरे कार्यों के परिणाम बुरे, अच्छे के परिणाम अच्छे, रूप में ही मिलते है यह एक निश्चित तथ्य है। दुनिया की खुली पुस्तक में यह सहज ही पढ़ा जा सकता है।

संसार का सबसे विकसित और उत्कृष्ट प्राणी होने के नाते मनुष्य को कार्य करने की पूर्ण स्वतन्त्रता है। वह कुछ भी कर सकता है। किन्तु नैतिक तथ्य, नियतिचक्र और विश्व नियम के विरुद्ध आचरण करने की छूट नहीं है। इस पर तो उसे दण्ड मिलना अवश्यम्भावी ही है। वह इससे बच नहीं सकता। मनुष्य जैसा कर्म करेगा वैसा ही परिणाम उसे प्राप्त होकर रहेगा, यह ध्रुव सत्य है।


इन्द्र का पुण्य

इन्द्र का पुण्य घटने लगा तो उसका ऐश्वर्य भी क्षीण हो चला, इस पर वे चिन्तित होकर बृहस्पति के पास पहुँचे और पूछा-गुरु वर, ऐश्वर्य को क्षीण न होने देने का उपाय बताइए।

देवगुरु ने कहा-तुम राजर्षि प्रहलाद के पास जाओ और उनके पास ऐश्वर्य की प्राप्ति और रक्षा का उपाय सीखो। इन्द्र ने ब्राह्मण का वेष बनाया और प्रहलाद के पास पहुँचे और विनम्र जिज्ञासु की तरह पूछा-ऐश्वर्य की प्राप्ति का उपाय क्या है?

प्रहलाद ने कहा-”शीलवान व्यक्तित्व ही समस्त ऐश्वर्य का मूल है। चरित्रवान् का वैभव कभी क्षीण नहीं होता।” इन्द्र संतुष्ट हो गए। जब वे लौटने लगे तो प्रहलाद ने उचित आतिथ्य के साथ यह भी पूछा-मेरे योग्य कोई सेवा हो तो बताइए। लोलुप इन्द्र उनका शील ही माँग बैठे। प्रहलाद कुछ देर तो सोच में पड़े रहे फिर उनने उदारता को न छोड़ना ही उचित समझा और ब्राह्मण को अपना ‘शील’ दान कर दिया। जैसे ही शील दिया वैसे ही प्रहलाद के शरीर में से एक-एक करके चार तेज पुँज निकले और वे इन्द्र के शरीर में प्रवेश कर गए। प्रहलाद ने इन तेज पिण्डों से पूछा कि आप लोग कौन हैं और क्यों मेरे शरीर से निकल कर इनके शरीर में प्रवेश कर गये? उत्तर देते हुए एक तेज पुँज ने कहा-राजन् में शील हूँ। मेरे यह तीन साथी धर्म, सत्य और वैभव है। जहाँ मैं रहता हूँ वहीं यह तीन भी रहते हैं। इस ब्राह्मण वेशधारी इन्द्र ने छल से आपका शील माँग लिया तो अब धर्म, सत्य और वैभव से भी आपको वंचित होना पड़ेगा। प्रहलाद ने दुःख नहीं माना। उनने शील संग्रह के लिए पुनः प्रयत्न आरम्भ किया ताकि जो कुछ गँवाया है वह फिर प्राप्त हो सके।


हम शक्तिशाली भी तो बनें

जीवन और संसार की सतत क्रियाशीलता, कर्म की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ, सृष्टि का समस्त कार्य-व्यापार ‘शक्ति’ के संस्पर्श से ही संचालित है। शक्ति के बिना संसार और जीवन की कल्पना तक भी नहीं की जा सकती। दूसरे शब्दों में शक्ति ही जीवन है। शक्ति का अभाव ही मृत्यु है। शक्ति का स्पर्श पाकर जड़-तत्व भी महत्वपूर्ण बन जाते हैं। निर्जीव कोयला अग्नि के स्पर्श से उस का तेजोमय रूप धारण कर लेता है। ग्रह नक्षत्र सब अपनी-अपनी जगह पर आकाश में अधर लटकते हुए भी शक्ति के कारण ही स्थिर हैं। यदि शक्ति का असन्तुलन पैदा हो जाय तो एक दूसरे से टकरा जायं। समस्त ब्रह्माण्ड ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाय। शक्ति का सहारा लेकर जड़-वस्तुयें भी गतिशील बन जाती हैं। चेतन शक्ति के कारण पञ्च-तत्व का बना मानव शरीर-यन्त्र क्या-क्या गजब के काम कर दिखाता है। बिजली की शक्ति से लोहे, ताम्बे के बने पंखे, मोटर, रेल, बल्ब आदि कितने महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करते हैं? शक्ति असम्भव को भी सम्भव कर देती है।

सामान्य से सामान्य प्रतिभा भी शक्ति का संस्पर्श प्राप्त करके असाधारण बन जाती है। प्रकृति के प्रत्येक स्पन्दन में, संसार के प्रत्येक कार्य व्यापार में, मानव-जीवन के हर एक स्वर में, शक्ति के बोल सुनाई पड़ते हैं। वृक्षों की हरियाली, उनका फूलना-फलना, वर्षा का होना, मेघों का गर्जना, बिजली का चमकना, झरनों का कल−कल नाद, पक्षियों का कलरव, मनुष्य का प्रत्येक कार्य शक्ति का ही परिणाम है। शक्ति के अभाव में प्रकृति निर्मित महत्वपूर्ण मानव-शरीर यन्त्र भी बेकार हो जाता है।

मानव-जीवन में शक्ति एक नैतिक सद्गुण है जिसे प्राप्त किया जा सकता है, बढ़ाया जा सकता है और उसके द्वारा महत्वपूर्ण कार्यों का सम्पादन भी किया जा सकता है। इसी तरह शक्ति नष्ट भी हो जाती है। वैसे शक्ति का कोई स्थूल रूप तो है नहीं जो उसे पकड़ कर संग्रह कर लिया जाय। मूल-भूत शक्तियाँ सूक्ष्म ही होती हैं, जिन्हें न देखा जा सकता है, न पकड़ा जा सकता है। विद्युत देखी नहीं जा सकती, किन्तु बल्ब, पंखे एवं अन्य उपकरणों में उसका सक्रिय स्वरूप देखा जा सकता है। अभिव्यक्ति के माध्यम से कर्म के रूप में ही शक्ति का अस्तित्व प्रकाश में आता है। जहाँ गति है, कर्मशीलता है वहीं शक्ति का निवास है। मृत शरीर में कोई स्पन्दन नहीं होता, अतः वहाँ पर शक्ति नहीं है।

शक्ति का स्त्रोत गतिशीलता, कर्म में से ही फूटकर निकलता है। अकर्मण्यता, जड़ता से शक्ति के स्त्रोत अवरुद्ध हो जाते हैं, मन्द पड़ जाते हैं और एक दिन पूर्णतः बन्द भी हो जाते हैं। किन्तु कर्मरत मनुष्य नित्य नयी शक्ति प्राप्त करता जाता है। उसके शक्ति स्त्रोत अजस्र रूप से प्रवाहित होते रहते हैं। वह अपने बहुत से काम पूरे कर चुकता है तब तक अकर्मण्य व्यक्ति अपनी कठिनाइयों को ही चर्चा करता हुआ पड़ा रहता है। और कुछ नहीं कर पाता। अकर्मण्य के सोकर उठने से पूर्व ही कर्मवीर बहुत कुछ कर लेता है। उसकी शक्तियाँ अजय धारा की तरह नित्य निरन्तर बहती रहती है। बेकार पड़ी रहने वाली भूमि बंजर और अनुपजाऊ इसके विपरीत समय पर फसल उपजाते रहने पर वह उर्वर, उपजाऊ बनी रहती हैं। काम में आते रहने वाली मशीन काफी समय तक सक्षम बनी रहती है जबकि बेकार पड़ी रहने वाली कुछ ही समय में जंग आदि लग कर अनुपयोगी बन जाती है।

अकर्मण्य की अपेक्षा तो शक्ति का दुरुपयोग इतना बुरा नहीं है जितना उसका उपयोग ही नहीं करना, अकर्मण्य बने रहना। अकर्मण्यता, निष्क्रियता तो बंजर, शून्य, निष्फल,मृतवत् बनने का ही दूसरा नाम है। अकर्मण्यता जड़ता का निवास स्थान है जिसमें न कोई गुण होते हैं न दुर्गुण। वहाँ परिवर्तन, सृजन आदि के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रहती। शक्ति के दुरुपयोग से दुर्गुण, बुरे कार्यों को प्रोत्साहन मिल सकता है किन्तु कुछ महत्वपूर्ण गुण कर्मठता, सक्रियता, अध्यवसाय, आदि तो बने ही रहते हैं। इन गुणों के रहते हुए एक न एक दिन अच्छाई की ओर मुड़ जाने पर मनुष्य शक्तियों का सदुपयोग भी कर सकता है और महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है। झाड़-झंखाड़ जंगलों को काटकर एक दिन उस भूमि में फसल भी उगाई जा सकती है। बुराई की राह पर चलते रहने वाला व्यक्ति भी एक दिन अच्छा बन सकता है। एक भयंकर डाकू , लुटेरा व्यक्ति अपने दृष्टिकोण के बदलते ही पूर्व कर्मठता और सक्रियता के बल पर महर्षि बाल्मीकि के रूप में प्रकट हुआ। अंगुलिमाल डाकू बौद्ध भिक्षु बन गया। विजय के उन्माद में हजारों का रक्त बहाने वाला अशोक महान् अहिंसक बना। इतिहास में इस तरह के असंख्यों उदाहरण भरे पड़े हैं। बुराई को लेकर सक्रिय रहने वाले व्यक्ति के भी सुधरने की आशा की जा सकती है, किन्तु आदर्शों सिद्धान्तों को बघारने वाले उपदेश देने वाले अकर्मण्य, आलसी लोगों के सुधरने की कोई गुंजाइश नहीं। दरअसल वह व्यक्ति इतना बुरा नहीं कहा जा सकता जो बुरे कर्मों में लगा रहता है बुरा वह है जो अच्छाई के नाम पर अकर्मण्य और आलसी बना बैठा रहता है।

कर्मशीलता, कर्म साधना ही शक्ति संवर्द्धन का प्रमुख आधार है। कर्म कैसा भी क्यों न हो अन्ततः वह कर्म है। सैनिक, व्यापारी, लेखक, उपदेशक, श्रमिक, मजदूर सभी अपने-अपने स्थान पर कर्मशील हैं। किसी कार्य को दृढ़ लगन, निष्ठा, सचाई से साथ-साथ दिल खोल कर करना, ‘कर्म साधना’ है जिससे शक्तियों के स्त्रोत खुलते जाते है। ये शक्ति स्त्रोत ही जीवन में सिद्धियाँ बन जाते हैं। ये सिद्धि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के वरदान प्राप्त कराती हैं। मनुष्य को समर्थ, शक्तिवान बनाती हैं।

अपने कार्यों में सक्रियता का उद्देश्य, केन्द्र यदि अपनी व्यक्तिगत बातों तक सीमित रहेगा, तो शक्तियाँ भी सीमित और मर्यादित बनी रहेंगी। व्यापक उद्देश्य, विशाल दृष्टिकोण के साथ ही मनुष्य की शक्तियाँ भी व्यापक, सार्वभौम और समर्थ बन जाती हैं। उनका प्रवाह अजस्र और अनन्त बन जाता है। समष्टि के लिए सर्व-जन हिताय कार्य करने वाले महापुरुषों में गजब की शक्तियाँ होती हैं वे महान् कार्यों का सम्पादन करते हैं। चूँकि इन महापुरुषों के कार्यक्रमों का उद्देश्य अनेकों का हित साधन करना होता है अतः अदृश्य रूप से उन सब की शक्ति घनीभूत होकर काम करती है। यही कारण है कि महापुरुषों का काम एक व्यक्ति का न होकर अनेकों का हो जाता है। उनके एक इशारे पर जन-समूह उमड़ पड़ता है। मनुष्य के कार्य, उसकी भावनाओं, विचारों का जितना व्यापक आधार होगा, उतनी ही क्षमतायें शक्तियाँ भी व्यापक बनेंगी। उनके लिए असम्भव नाम का कोई शब्द नहीं रह जाता। प्रकृति भी अपने नियमों का व्यतिरेक कर उन्हें रास्ता देती है।

शक्तियों को सृजनात्मक, पारमार्थिक, रचनात्मक, लक्ष्य पूर्ति के कार्यक्रमों में लगा देना ही काफी नहीं होता उन्हें नियन्त्रित और सुरक्षित रखना भी आवश्यक है, जिस से उनका दुरुपयोग और अपव्यय न हो। मोटर को गन्तव्य स्थान की दिशा में गति दे देना ही काफी नहीं होता। मार्ग के घुमाव, उतार-चढ़ाव, दुर्घटना अन्य परिस्थितियों से बचाने आदि के लिए उस पर ड्राइवर का पूरा-पूरा नियन्त्रण होना आवश्यक है। इसके लिए उसका हाथ सदैव स्टीयरिंग ह्वील पर पैर ब्रेकों पर और निगाह मार्ग पर लगी रहती है। इनमें वह थोड़ी भी भूल-चूक कर दे, अथवा अपना नियन्त्रण खो बैठे तो ऐसी हालत में भयंकर दुर्घटना घटित होकर ड्राइवर और गाड़ी का भविष्य विनाश के रूप में ही परिणित होगा। ठीक इसी प्रकार प्रत्येक कार्य, प्रत्येक दिशा में लगी हुई शक्ति के नियन्त्रण और सुरक्षा का सदैव ध्यान रखना आवश्यक है।

शोर मचाना, जल्दबाजी करना, साधारण-सी बात को असाधारण महत्व देकर उसमें अन्धाधुन्ध लग पड़ना, बेतरतीब उल्टा सीधा काम करना अपनी शक्ति का अपव्यय और व्यर्थ नष्ट करना ही है। इस तरह के व्यक्ति अपनी शक्ति क्षमताओं को जल्दी ही नष्ट करके खोखले हो जाते हैं। फिर उनमें जीवन पक्ष पर आगे कदम रखने की सामर्थ्य भी नहीं रहती और पराजय, असफलता का जीवन बिताते हैं। जो सिपाही अपनी तैयारी करते हुए मौके पर पहुंचने तक में ही थक कर चूर हो गया वह क्या लड़ेगा?

शान्ति, तत्परता, व्यवस्था धैर्य के साथ ही शक्तियां अपना काम ठीक-ठीक करती हैं। हड़बड़ाहट, भाग-दौड़, उछल-कूद, जल्दबाजी से काम तो खराब होते ही हैं साथ ही शक्तियाँ भी व्यर्थ में नष्ट होती हैं। इंजिन में जो भाप काम करती है उसे आगे बढ़ाती है उसका शोर कभी नहीं सुना जाता। व्यर्थ में निकलने वाली भाप ही अधिक शोर करती है। अपने शक्ति भण्डार को अक्षुण्ण, अजय, समर्थ बनाये रखने के लिए उसका दुरुपयोग रोकना चाहिए।

संसार को चलाने वाली सार्वभौमिक शक्ति सर्वत्र अपना काम कर रही है । किन्तु उसकी आवाज कहीं सुनाई नहीं देती। जिस शक्ति की प्रेरणा से वर्षा होती है, सृजन और विनाश का चक्र चलता है, वृक्ष बनता है उसे कही देखा सुना नहीं जाता। गम्भीरता प्रशान्त भाव से बहने वाली नदी की तरह गहरी होती है। उथले पानी में सदैव आवाज होती रहती है। इसी तरह शक्ति का निवास भी धीर, वीर, गम्भीर, प्रशान्त, महामना व्यक्तियों में ही अधिक होता है। ओछे, छिछले स्वभाव के संकीर्णमना व्यक्ति ही अशक्त , निर्बल, सामर्थ्यहीन पाये जाते हैं। जिसका हृदय जितना बड़ा होगा। उसमें उतनी ही बढ़ी शक्ति यों का निवास होगा, अनुशासित, अनुभवी, ज्ञानवृद्ध, सबल मन वाले व्यक्तियों में शक्ति का निवास होता है। उनके प्रत्येक कार्य सुनियोजित, सन्तुलित, विवेकपूर्ण सही-सही परिणाम पैदा करने वाले होते हैं। उसमें ही दूर-दर्शिता, नियन्त्रण, सुरक्षा की गारण्टी होती है। ऐसे व्यक्ति विरोधी वातावरण को भी अनुकूलता में परिणित कर लक्ष्य प्राप्त कर ही लेते हैं।

शक्ति की उपलब्धि के लिए क्षमताओं के विकास के लिए सधे हुए काबू किए हुए, मन, आत्मानुशासित जीवन, उदार दृष्टिकोण, विशाल हृदय, विवेक बुद्धि की आवश्यकता है। इससे मनुष्य को वह सामर्थ्य प्राप्त होती है। जिससे प्रबल विरोध भी टकरा कर स्वयमेव चूर-चूर हो जाते हैं। आत्म संयम, मनोमय, मनोनिग्रह ही शक्ति प्राप्ति की साधना है।

शक्ति एक सामर्थ्य है जिससे दुनिया और जीवन की उपलब्धियां प्राप्त की जाती हैं। शक्ति का उपयोग शुभ कार्यों में करके सद्परिणाम भी प्राप्त किए जा सकते हैं और दुरुपयोग करके दुष्परिणाम भी। इन दानों के अतिरिक्त एक इस तरह के व्यक्ति भी होते हैं जो अपनी अशक्ति दुर्बलता या शिथिलता के कारण न कुछ अच्छा करते हैं न बुरा करते हैं। इससे कोई लाभ तो उन्हें नहीं होता फिर भी जन-साधारण इन्हें भले मान लेता है। किन्तु शक्तिशाली तो वस्तुतः वही है जो सामर्थ्य शक्ति रखते हुए भी दूसरों को हानि न पहुँचा कर लाभ पहुँचाते हैं और अपनी शक्तियों को सत्कर्मों, शुभ कार्यों में ही लगाते हैं। नैतिकता की रक्षा के लिए शुभ की स्थापना, न्याय का व्यवहार, सत्कर्मों के आयोजन के लिए शक्ति को लगाना ही शक्ति सम्पन्नता का आधार होना चाहिए।


धरती पर भी स्वर्ग

एक बार देवता मनुष्यों के किसी व्यवहार से क्रोधित हो गये। उन्होंने दुर्भिक्ष को पृथ्वी पर भेजा और मनुष्यों के होश दुरुस्त करने की आज्ञा दे दी।

दुर्भिक्ष ने अपना विकराल रूप बनाया। अन्न और जल के अभाव में असंख्य मनुष्य रोते कलपते मृत्यु के मुख में जाने लगे।

अपनी सफलता का निरीक्षण करने दुर्भिक्ष दर्पपूर्वक निकला तो उस भयंकर विनाश के बीच एक प्रेरक दृश्य उसने देखा।

एक क्षुभित मनुष्य कई दिन के बाद रोटी का छोटा टुकड़ा कहीं से पाता है पर वह उसे स्वयं नहीं खाता वरन् भूख से छटपटाकर प्राण त्यागने की स्थिति में पहुँचे हुए एक सड़े कुत्ते को वह रोटी खिला रहा है।

दृश्य को देखकर दुर्भिक्ष का हृदय उमड़ पड़ा और आंखें भर आई। उसने अपनी माया समेटी और स्वर्ग को वापिस लौट गया।

देवताओं ने उतनी जल्दी लौट आने का कारण पूछा तो उसने कहा-”जहाँ सहृदयता का आदर्श जीवित हो वहाँ देवलोक ही होता है। धरती पर भी मैंने स्वर्ग के दृश्य देखे और वहाँ से उलटे पाँवों लौटना पड़ा।”


प्रभावशाली व्यक्तित्व यों बनता है

एक उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति जिस काम में सफल नहीं होता उसमें दूसरा साधारण-सी शिक्षा पाकर भी अपना अधिकार कायम कर लेता है। इन्टरव्यू होता है, जिसमें कई बार देखा जाता है कि एम. ए. पास किए हुए लोग रह जाते हैं किन्तु कई एफ. ए. पास ले लिए जाते हैं। कई पण्डित, विद्वान दुनिया के एक कौने में पड़े-पड़े अपने भाग्य को कोसा करते हैं किन्तु सामान्य ज्ञान रखने वाले दूसरे लोग दुनिया के रंगमंच पर उतरते हैं अपना प्रभाव और महत्ता कायम करते हैं।

बाह्य साधन सुविधा सम्पन्न कई व्यक्ति समाज के एक कोने में स्थान पाते हैं जब कि दूसरे अभावग्रस्त, बाह्य साधन सुविधाओं से रहित व्यक्ति समाज में अपना आकर्षण और महत्व पैदा करते हैं, आगे बढ़कर समाज का नेतृत्व करते हैं। बहुत से लोग इस तरह के विरोधाभास को पक्षपात, भेदभाव, अन्धानुकरण आदि का कारण बताते हुए दूसरों को दोष देकर ही सन्तुष्ट हो लेते हैं। हालांकि कुछ अंशों में ये विषमतायें भी समाज में फैली हुई हैं जिनके कारण उक्त विपरीत परिणाम प्राप्त होते रहते हैं किन्तु अपनी असफलता का प्रमुख कारण मनुष्य का अपना अविकसित, संकीर्ण व्यक्तित्व ही होता है।

महात्मा सुकरात के पास एक व्यक्ति तत्वज्ञान की शिक्षा प्राप्त करने के लिए गया। किन्तु मिलते ही उन्होंने उस व्यक्ति को ठीक से बाल काढ़ने, कपड़े पहनने, उन्हें साफ रखने, शरीर को स्वस्थ बनाने का उपदेश दिया। वह हक्का-बक्का रह गया और तत्वज्ञान न देकर छोटी-छोटी बातें बताने की शिकायत की । इस पर महात्मा सुकरात ने बताया—”स्वस्थ, सबल, व्यवस्थित जीवन ही आध्यात्मिक साधना की प्राथमिक आवश्यकता है। इसके अभाव में कोई भी तत्वज्ञान, आध्यात्मिक अनुभूति का अधिकारी नहीं है।” जीवन में सामान्य बातों से लेकर असाधारण सफलताओं के लिए व्यक्तित्व का ठोस, सबल और सर्वांगपूर्ण विकसित होना आवश्यक है। इसके बिना सफलता की आशा करना दुराशा मात्र ही है। स्वास्थ्य, शिक्षा, रहन-सहन, बोल-चाल, काम करने का तरीका आदि विभिन्न बातें व्यक्तित्व के अंग हैं। इन सभी का व्यवस्थित, स्वस्थ, सुन्दर सुरुचिपूर्ण होना सबल एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व का आधार है।

किसी भी पदार्थ के स्वस्थ, सुन्दर, व्यवस्थित, निर्मल आचरण की ओर आकर्षित होना मानव स्वभाव की एक साधारण वृत्ति है। स्वास्थ्य, कपड़े, रहन-सहन के तरीके, बोल-चाल, भाव- भंगिमा आदि व्यक्तित्व के बाह्य प्रतिबिंब हैं जिनसे दूसरे लोग प्रभावित प्रेरित होते हैं। जिनके बाल अस्त-व्यस्त बिखरे हुए हों, वस्त्र गन्दे और बेतरतीब हों, जिनके पास जाने से ही बदबू आती हो इस तरह के लोगों का प्रथम प्रभाव ही बुरा पड़ेगा और समाज में लोग उनसे दूर हटने का प्रयत्न करेंगे। फिर ऐसे व्यक्ति कोई बड़ी सफलता मिलने की आशा कैसे रख सकते हैं?

संयमित और मर्यादित जीवन बिताकर सुन्दर स्वास्थ्य पाया जा सकता है। सुन्दर स्वास्थ्य प्रकृति का महत्वपूर्ण उपहार है जो प्रत्येक प्राणी को मिलता है। अपने दुष्कृत्यों, अमर्यादित, अनियमित जीवन, अप्राकृतिक रहन-सहन के कारण ही स्वास्थ्य खराब होता है। शरीर और वस्त्रों को साफ रखना भी कोई कठिन बात नहीं, केवल आलस्य के कारण ही मनुष्य तरह-तरह की बहाने बाजी लगाकर इनसे बचना चाहते हैं। कई लोग कहते है- “क्या किया जाय पैसों के अभाव में उनके लिए साफ-सुधरे रहना, स्वस्थ बनना सम्भव नहीं।” किन्तु यह अपनी कमी को छिपाने का प्रयत्न दुहरी भूल है। कोई भी व्यक्ति इतना गरीब नहीं होता जो कपड़े तो पहने किन्तु उन्हें साफ रखने को साबुन के पैसे खर्च न कर सके। उल्टे साफ न करने से कपड़े मैल और पसीने में गलकर अधिक फटते हैं, जिससे साबुन आदि के खर्चे से अधिक हानि हो जाती है।

जो खा सकता है वह स्वस्थ भी रह सकता है। जो कपड़े पहन सकता है वह उन्हें स्वच्छ भी रख सकता है। जो बाल रख सकता है, वह तेल और कंघी भी जुटा सकता है। जो जूते मोजे पहनता है, वह उनकी सफाई पालिश आदि भी कर सकता है। अपने बढ़े हुए नाखून काट सकता है। आँखों में जमी हुई कीचड़ धो सकता है। किन्तु मनुष्य लापरवाही और आलस्यवश अपने स्वास्थ्य और सफाई का उत्तरदायित्व पूरा नहीं करता, जिससे उसके व्यक्तित्व का बाह्य ढाँचा ही भद्दा, फूहड़ मालूम पड़ने लगता है और देखने वालों पर विपरीत प्रभाव डालता है। फिर नौकरी न मिले, इन्टरव्यू में असफल होना पड़े, दर-दर धक्के खाने पड़ें तो इसमें आश्चर्य और दुःख की क्या बात है? इतना ही नहीं अस्वस्थता, गन्दगी, अव्यवस्था से तो मनुष्य को आन्तरिक प्रफुल्लता, सन्तोष, शान्ति, उत्साह, स्फूर्ति आदि भी नहीं मिलते।

इस सम्बन्ध में एक बात और भी महत्व की है। व्यक्तित्व को सुघड़, स्वस्थ बनाने के लिए स्वास्थ्य, सफाई, स्वच्छता, व्यवस्था की तो आवश्यकता है ही किन्तु इसका उद्देश्य स्वास्थ्य संचय करने का अथवा बनाव शृंगार, फैशन, तड़क-भड़क को ही महत्व देने के लिए नहीं होना चाहिए। इससे यही बातें व्यक्तित्व के लिए हानिप्रद और विरोधी बन जाती हैं। अधिक टीम-टीम बनाना, चटक-मटक से रहने की आदत, गम्भीरता, स्वाधीनता, संजीदगी का नहीं वरन् छिछोरपन और बचकानी वृत्ति का परिचय देती है।

कई लोग प्रथम भेंट में ही लोगों पर ऐसा प्रभाव डालते हैं कि वे सहज ही उनसे आकर्षित और प्रभावित हो जाते हैं। ऐसे लोगों में एक तरह का जादू होता है। उनके चेहरे की आकर्षक मुद्रा, मुस्कराहट, नेत्रों में आशा भरी चमक, गजब की होती है। ऐसे व्यक्ति जहाँ होते हैं वहाँ अपने लिए अनुकूल वातावरण बना लेते हैं। उपयुक्त स्थान प्राप्त कर लेते हैं। इसका कारण होता है मनुष्य का आत्म-विश्वास, दृढ़ इच्छा शक्ति, चेहरे से निकलता हुआ जीवन, कार्य क्षमता का प्रकाश। ये ही तत्व दूसरों पर मनुष्य की अदम्य शक्ति की छाप देते हैं और जादू की तरह प्रभावित करते हैं।

संसार में अधिकतर प्रमाण-पत्र, सिफारिशों के बजाय व्यक्तित्व के ये खुले, प्रमाण-पत्र और आत्म-विश्वास की अचूक सिफारिश ही महत्वपूर्ण होती है, जो हर जगह मनुष्य को स्थान दिलाती है। व्यक्तित्व के इस सक्षम स्वरूप की उपलब्धि चरित्र और नैतिक बल की दृढ़ता पर ही सम्भव होती है। यह मन की सबलता का परिणाम है। व्यक्तित्व का प्रधान अंग, पुष्ट सशक्त मनोभूमि का होना, आत्म-शक्ति का विकसित होना ही है, जो बाह्य जीवन के सामान्य होने पर भी अप्रत्यक्ष रूप से दूसरों को प्रभावित करता है।

बौद्धिक सजगता, सतर्कता भी व्यक्तित्व के विकास और पुष्टि के लिए आवश्यक है। इनके अभाव में मनुष्य दूसरों द्वारा मूर्ख बनाया जा सकता है, अपने काम में धोखा खा सकता है, जीवन में आये उन्नति-विकास के महत्वपूर्ण अवसरों को खो सकता है। विभिन्न कार्यों में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का पर्याप्त ज्ञान, बौद्धिक विकास का होना आवश्यक है। इसके अभाव में व्यक्तित्व का महत्व, वजन प्रभाव नहीं होता। शक्ति और सामर्थ्य, उपयोगिता के आधार पर ही व्यक्तित्व का मूल्य, महत्व निर्धारित होता है।

कई लोगों की धारणा होती है कि बुद्धि एवं ज्ञान का विकास, सामर्थ्य शक्ति की वृद्धि साधन-सम्पन्न धनवानों को ही सम्भव और सुलभ है, किन्तु यह भूल है। संसार के अधिकाँश बुद्धिमानों का प्रादुर्भाव गरीबों में से ही हुआ है। विपरीत परिस्थितियों में भी कई लोगों ने असामान्य सफलतायें अर्जित की हैं। सचमुच बढ़ने वालों को, प्रगति के अग्र-दूतों को, साधन सुविधाओं की कमी रोक नहीं सकती। इसके लिए प्रबल जिज्ञासा, उत्कट इच्छा शक्ति और लगनशीलता, सक्रियता की आवश्यकता है, जिसके लिए सबको समान अधिकार मिले हैं।

बौद्धिक विकास, क्षमता, सामर्थ्य शक्ति आदि का सदुपयोग भी, विवेक- शीलता अनुभव, ज्ञान, सन्तुलित मनोभूमि के द्वारा ही सम्भव है अन्यथा लोग बुद्धिमान, समर्थ, सशक्त होकर भी खतरनाक,मूर्ख बेहया, भयानक, हानिकारक बन सकते हैं, जिससे व्यक्तित्व सुघड़, सुन्दर और पुष्ट होने के बजाय भयंकर, सन्देह-युक्त बन जाता है और लोग ऐसे व्यक्ति से बचने, दूर हटने की कोशिश करते हैं। शिक्षित, समर्थ, जानकार लोगों के द्वारा किए गये अपराध, बदमाशी, दुष्कृत्य साधारण लोगों से अधिक भयंकर होते हैं। अतः बौद्धिक विकास-शक्ति सामर्थ्य के साथ-साथ विवेक, विचार-शीलता, उत्कृष्ट मानसिक स्थिति का होना भी आवश्यक है।

व्यक्तित्व के विकास के लिए मनुष्य का दृष्टि-कोण सामूहिकता प्रधान, सामाजिक होना आवश्यक है। जो अपने व्यक्ति गत स्वार्थ को स्थान न देकर सामूहिक हितों का ध्यान रखते है। उन्हें समाज की बहुत बड़ी शक्ति का सहयोग मिल जाता है। उनके साथ अनेकों का सहयोग, सद्भावनायें आदि होती हैं। नेतृत्व करने वाले नेता महापुरुष, सुधारकों के व्यक्तित्व में यही विशेषता होती है। समग्रता में ही व्यक्तित्व की महानता, विशालता सन्निहित है।

व्यक्तित्व का एक अंग है मनो-विनोद की वृत्ति-हँसमुख, प्रसन्न रहने की आदत। इससे जीवन में रस पैदा होता है। नवीन स्फूर्ति, उत्साह पैदा होता है। मानसिक तनाव, थकावट दूर होकर कार्य-क्षमता का विकास होता है जिससे व्यक्ति अधिक कार्य कर सकने में समर्थ होता है। महापुरुषों को विनोद-वृत्ति, हँसी उनको कार्य-क्षमता, नवीन बल प्राप्त कराती है। किन्तु इस बात का ध्यान रखा जाय कि विनोद संयमित और मर्यादित हो। अन्यथा यही व्यक्तित्व के लिए एक खतरा बन जाता है और जीवन निष्प्रभाव, हल्का, एक मजाक बन कर रह जाता है। व्यक्तित्व का कोई वजन नहीं रहता। बात-बात में हँसी मजाक करना, काम के समय विनोद करना अपने व्यक्तित्व की कीमत और प्रभाव को कम करना है।

उत्तेजना, उद्वेगशीलता का अभाव होना व्यक्तित्व की सबलता का प्रमाण है। व्यवहार कुशल सहिष्णु, सन्तुलित निर्णय शक्ति वाले मनुष्य ही संसार की विचित्रता, विरोध, प्रतिकूलताओं में भी समन्वय समझौता करके रास्ता निकाल लेते हैं और आगे बढ़ते हैं। बात-बात में तुनकमिज़ाज, चिड़चिड़े, उत्तेजित, उद्वेग-शील होने वाले व्यक्ति यों से सभी बचने का, दूर रहने को प्रयत्न करते हैं, और ऐसे व्यक्ति अपने काम में भी सफल नहीं होते, न किसी का सहयोग ही प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए व्यक्तित्व के विकास में शान्त, गम्भीर, सहनशील और विनम्र होना सहायक एवं आवश्यक माना गया है।


विद्वान स्वामीजी

काशी से कुछ दूर गंगा तट पर एक सरल स्वभाव विद्वान स्वामीजी रहते थे। भजन, स्वाध्याय और छात्रों को संस्कृत पढ़ाना यही उनके प्रमुख कार्य थे।

एक दिन वेद विद्यालय के छात्रों को उन्हें छकाने की सूझी। आठ-दस विद्यार्थी स्वामीजी के पास पहुँचे और कहा—गंगा का पुल टूट गया है, टूट कर रूठा बैठा है। कहता है “मुझे पाँच हजार रुपया दो नहीं तो यहाँ से दस मील दूर जाकर रहूँगा।” हम लोगों ने जनता को कष्ट से बचाने के लिए उतना धन इक्क्ठे करके देने की सोची है सो आपके पास भी आये हैं जो बने सो दीजिए।

स्वामीजी ने पाँच रुपये निकाल कर उन्हें दे दिये।

जो छात्र महात्मा जी के पास पढ़ने आया करते थे उन्हें जब इस धूर्तता का पता लगा तो उनने स्वामी जी से कहा—आप भी बड़े भोले हैं। उनकी इतनी-सी धूर्तता को भी न समझ पाये। भला कहीं पुल भी दस मील हटने को रूठा करता है।

स्वामी जी ने कहा—ऐसी शंका तो मेरे मन में भी उठी थी, पर सोचा वेद विद्यालय के छात्रों पर अविश्वास करने और जनता के कष्ट को कम महत्व देने की बात सोचने से वेद और सेवा के प्रति मेरी श्रद्धा कम होगी। उसे कम होने देने की अपेक्षा पाँच रुपये गवाँ देना अच्छा है।


परिश्रमी बनिए—ऊँचे उठिए

श्रम के प्रति उपेक्षा की वृत्ति आज हममें दिनों-दिन बढ़ती जा रही है, जिससे हमारे जीवन में अनेकों विषमतायें और समस्यायें उठ खड़ी हुई हैं। जीवन में असंतुलन पैदा हो गया है। तथाकथित पढ़े लिखे, शिक्षित कहे जाने वाले वर्ग में तो यह वृत्ति और भी बढ़ती जा रही है। ऐसे लोग श्रम करना अपना अपमान समझते हैं। श्रम के प्रति उपेक्षा के भाव से अभावग्रस्तता, गरीबी को पोषण मिलता है। क्योंकि किसी भी क्षेत्र में उपार्जन उत्पादन का आधार श्रम ही है। जिस समाज में श्रम के प्रति दिलचस्पी न होगी वहाँ उपार्जन कैसे बढ़ेगा? और इसके फलस्वरूप अभावग्रस्तता का निवारण कैसे होगा? श्रम न करने से शारीरिक प्रणाली असन्तुलित अस्त−व्यस्त अक्षम बन जाती है और अस्वस्थता की समस्या उठ खड़ी होती है। श्रम के अभाव में मनुष्य जीवन के सहज स्वाभाविक सन्तोष, सुख, मानसिक शान्ति से वंचित रहता है क्योंकि श्रम जीवन का धर्म है स्वभाव है। श्रम और जीवन का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। श्रम के साथ जीवन है और जीवन के साथ श्रम। दोनों में से एक को विलग कर देने पर किसी का भी अस्तित्व शेष नहीं रहेगा।

किसी भी उपलब्धि का आधार श्रम है। बिना श्रम के किसी भी क्षेत्र में स्थायी और पूर्ण सफलता अर्जित कर लेना असम्भव है। श्रम की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए नीतिकार ने लिखा है—

“उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनौरथैः।

न हि सुप्तस्य सिहंस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥”

“उद्यम करने से ही कार्यों की सिद्धि प्राप्त होती है। इच्छा करने या सोचते-विचारते रहने से नहीं। सोते हुए सिंह के मुँह में पशुगण अपने आप ही नहीं चले जाते।”

इसमें कोई सन्देह नहीं कि बिना उद्यम किए, श्रम किए और बात तो दूर है पेट की तृप्ति करना ही कठिन होता है। श्रम से खाद्य पदार्थ उपार्जन करने होंगे फिर उन्हें पकाना पड़ेगा और हाथों से मुँह तक पहुँचाना पड़ेगा तभी क्षुधा निवृत्त हो सकेगी। इसी तरह किसी भी कार्य को श्रम कर मूल्य चुकाये बिना उसकी सफलता प्राप्त न हो सकेगी।

संसार में जो कुछ भी ऐश्वर्य, सम्पदायें, वैभव, उत्तम पदार्थ हैं केवल श्रम की ही देन है। श्रम में वह आकर्षण है कि विभिन्न पदार्थ सम्पदायें उसके पीछे-पीछे खिंचे चले आते हैं। श्रम मानव को परमात्मा द्वारा दी गई सर्वोपरि सम्पत्ति है। जहाँ श्रम की पूजा होगी वहाँ कोई भी कमी नहीं रहेगी। विनोबा के शब्दों में, “परिश्रम हमारा देवता है।” जो हमें अमूल्य वरदानों से सम्पन्न बनाता है। परिश्रम ही उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करता है।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारी अभाव-ग्रस्तता, गरीबी, दीनता का बहुत कुछ कारण पर्याप्त और सही ढंग से श्रम न करना ही है। सामने पड़ा हुआ काम जब श्रम का अंजाम चाहता है और हम हाथ पर हाथ धरे बैठे सोचते रहते हैं तो काम हमें श्राप देता है और उसके फलस्वरूप उसके लाभ से हम वंचित रह जाते है। प्रतिदिन उगता हुआ सूर्य हमारे लिए सक्रिय जीवन का, श्रमशीलता का सन्देश लेकर आता है किन्तु हम दिन भर गपशप में, खेल तमाशों में, आलस्य और प्रमाद की तन्द्रा में इस सन्देश की ओर ध्यान नहीं देते फलस्वरूप उस दिन मिलने वाली सफलता और उपलब्धियों से हमें वंचित रहना पड़ता है। हम कोई उन्नति नहीं कर पाते। यह निश्चित है कि बिना श्रम के कोई भी उन्नति प्राप्त नहीं कर सकता ।”

परिश्रम धरती पर मानव जीवन का आधार है। श्रम के अभाव में मनुष्य को दुखद परिस्थितियों में गिरने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। कार्लाईल ने कहा है—”श्रम ही जीवन है।” अकर्मण्य, निष्क्रिय व्यक्ति को विभिन्न पदार्थों की उपलब्धियों और वरदानों से वंचित रहना होता है जिससे अभाव, असहायता, दीनता को विषमयी घूँट पीने के लिये बाध्य होना पड़ेगा। इन परिस्थितियों में अपमानित, लाचार परतन्त्र जीवन मृत जीवन से भी बुरा है।

प्रकृति का नियम है कि जो वस्तु उपयोग में नहीं आती वह जल्दी ही नष्ट हो जाती है। विभिन्न पेचीदगियों से भरा मानव शरीर श्रम करने के लिये मिला हुआ है। लम्बे-लम्बे हाथ, पैर, बुद्धि, एवं विभिन्न अवयव निरन्तर किसी न किसी काम करने के लिए मिले हैं। जब इस शरीर यन्त्र का कोई उपयोग नहीं किया जाता तो यह उसी तरह विकृत और नष्ट होने के लिये बाध्य होता है जिस तरह बेकार पड़ी हुई मशीन जंग लगकर तथा खराब होकर अनुपयोगी हो जाती है। श्रम से शरीर यन्त्र सक्रिय रहता है, इससे इसके विभिन्न अवयव ठीक-ठीक काम करते हैं। उनमें जीवन और सजीव रक्त का दौरा होता रहता है। इसीलिये श्रमशील व्यक्ति सदैव स्वस्थ और प्रसन्नचित रहता है।

आजकल दिनों-दिन बढ़ती हुई स्वास्थ्य की शिकायत का एक बड़ा कारण हमारे दैनिक जीवन में कठोर श्रम का अभाव भी है।

परिश्रम दो प्रकार का होता है एक शारीरिक और दूसरा मानसिक। आवश्यकता इस बात की है कि शारीरिक और मानसिक श्रम का सन्तुलन बनाये रक्खा जाय। दोनों के सन्तुलन में ही श्रम की पूर्णता निहित है। अकेला मानसिक श्रम अपूर्ण है तो शारीरिक श्रम भी मानसिक योग के अभाव में अपूर्ण रह जाता है। विचार करने और कार्य करने की सम्मिलित शक्ति से ही श्रम का पूर्ण स्वरूप बनता है और उसी से किसी भी क्षेत्र में परिपूर्ण सफलता भी अर्जित की जा सकती है। लेकिन खेद है इस विषय में हमारे जीवन में दिनों-दिन असंगतता बढ़ती जा रही है। मानसिक शक्ति सम्पन्न शिक्षा प्राप्त लोग शारीरिक श्रम नहीं करना चाहते। उससे बचते हैं फलतः जीवन की सफलताओं में वे एकाँगी और अपूर्ण तो रहते ही हैं साथ ही उनकी शारीरिक स्थिति गड़बड़ हो जाती है।’ “स्वास्थ्य की शिकायत” का रोग इन तथाकथित शिक्षित कहे जाने वाले, केवल मानसिक श्रम करने वालों में अधिक फैला हुआ है।

दूसरी ओर हमारे देश में जो शारीरिक श्रम करते हैं उनका मानसिक विकास नहीं हुआ, वे प्रायः अपढ़ और निरक्षर हैं। अतः बहुत कुछ परिश्रम करके भी हमारे देश का श्रमिक विपन्न जीवन बिताता है। अन्न के ढेर लगा देने वाले किसान अभावग्रस्त जीवन बिताते हैं। कारण यह कि मानसिक विकास न होने के कारण अपने श्रम का सही-सही सदुपयोग वे नहीं कर पाते। दूसरी ओर ज्ञान-विज्ञान के आचार्य और जगद्गुरु कहला कर भी शरीर श्रम के अभाव में हम उन तथ्यों को व्यावहारिक रूप न दे सके। आज भी स्थिति यही है कि उच्च शिक्षा प्राप्त कर या किसी विषय के स्नातक भी बन कर निकलने वाले सरकारी नौकरियों के सिवा अपना कोई और लक्ष्य नहीं रखते। कृषि विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले फार्म या खेत में काम करते हुये न दिखाई देकर किसी दफ्तर में कर्मचारी होंगे कागजी महल की रचना कर रहे होंगे।

इस दृष्टि से पाश्चात्य देशों से हमें सीख लेनी चाहिये जहाँ लोग उच्च शिक्षा प्राप्त करके भी खेतों में काम करते हुए दिखाई देंगे। अफसर होकर भी अपने छोटे-छोटे कामों से लेकर बड़े कामों को चाहे वे शारीरिक हो या मानसिक बड़ी मुस्तैदी के साथ पूरा करते हैं।

पर्याप्त श्रम न करने से मनुष्य को एक आन्तरिक असंतोष, अशान्ति-सी अनुभव होती है। परमात्मा ने मानव-जीवन कुछ करने के लिये दिया है। जो प्रतिफल इस उत्तरदायित्व के प्रति सजग रहता है, परिश्रम के सम्बल से विश्व के विकास और निर्माण में योगदान देता रहता है उसे एक सुखद और आन्तरिक सहज सन्तोष प्राप्त होता है। आप प्रतिदिन अपने सामने आये हुए काम को पूरी दिलचस्पी और मुस्तैदी के साथ करें तो शाम को सोते समय आपको सुखद संतोष का अनुभव होगा। आप शान्ति के साथ विश्राम कर सकेंगे। आपको सुखद नींद आयेगी। इसके विपरीत आप एक दिन भी बिना कुछ किए नष्ट कर दें तो आपको उस दिन न भोजन अच्छा लगेगा न भलीप्रकार नींद आयेगी न शरीर स्वस्थ महसूस होगा। एक तरह का अभाव असंतोष अशान्ति-सी दिल को खटकती रहेगी। जो समस्त जीवन इसी तरह व्यर्थ नष्ट कर देते हैं कुछ श्रम नहीं करते उनका सम्पूर्ण जीवन अशाँति, असन्तोष, उद्विग्नता से भरा रहता है और वे जीवन की चिर सन्ध्या में भी अशान्त होकर प्रयाण करते हैं।

आवश्यकता इस बात की है कि हम जीवन में श्रम को स्थान दें। श्रम को जीवन मन्त्र बनायें। महात्मा गाँधी ने “शरीरश्रम” को एक व्रत मानकर मानव जीवन के लिये आवश्यक माना है। अपने प्रति और समाज के प्रति एक अधोमुखी प्रवृत्ति अकर्मण्यता, हरामखोरी, काम-चोरी, श्रम के प्रति उदासीनता ही है। व्यक्तिगत और सामाजिक सुख समृद्धि, विकास, उन्नति, कुशलता के लिए हमें जीवन में श्रम की प्रतिष्ठा करनी होगी।


कठिनाईयों का भी स्वागत करें

मानव-जीवन संघर्षपूर्ण है। जीवन में नित्य ही नये-नये उतार-चढ़ावों का सामना करना पड़ता है। सुख-दुःख, लाभ-हानि, प्रसन्नता-शोक, जन्म-मरण, आदि द्वन्द्व जीवन में आते-जाते रहते है। लेकिन हम केवल सुख, प्रसन्नता, लाभ, सफलता की ही आकाँक्षा रखते हैं। इसके विपरीत दुःख, कठिनाईयाँ, परेशानियाँ, समस्याओं से हम कतराते हैं। उनसे घबराकर उनकी कल्पना भी जीवन में नहीं करना चाहते, किन्तु हममें से प्रत्येक को अपनी इच्छा के विरुद्ध भी जीवन में इनका सामना करना ही पड़ता है। उस स्थिति में हममें से बहुत से रोने लगते हैं जो इन कठिनाईयों को ही अपने विकास, उत्थान, महानता तथा प्रगति का साधन बना लेते हैं। महर्षि व्यास ने कहा है - “क्षुद्रमना लोग ही दुःख के वशीभूत होकर अपना तप-तेज, शक्ति को नष्ट कर लेते हैं। किन्तु पुरुषार्थी, महामना लोग कष्टों को भी अपनी सफलता और विकास का आधार बना लेते हैं।”

रोना-धोना, शोक करना, चिन्ता, विषाद में खिन्न हो बैठना, हार मान लेना, कठिनाइयों, दुःखों का कोई समाधान नहीं है। ऐसी स्थिति में तो कठिनाइयाँ सुरसा की तरह बढ़कर समस्त जीवन को ही छिन्न-भिन्न कर देती हैं। यह भी निश्चित है जीवन के साथ दुःख और कठिनाइयाँ सदैव रहे हैं और रहेंगे। इनसे कभी छुटकारा नहीं पाया जाता है। उपनिषद्कार ने कहा है “न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोर पद्धति रस्ति।” (छान्दोग्य) निश्चय ही जब तक यह शरीर बना हुआ है तब तक सुख और दुःख निवारण नहीं हो सकता। कठिनाइयाँ, जीवन का उसी तरह एक अनिवार्य अंग है जिस तरह रात्रि का होना, ऋतुओं का बदलते रहना।

अतः आवश्यकता इस बात की है कि कठिनाइयों के रहते हुए भी आगे बढ़ा जाये। इन्हें जीवन को विकसित और महान् बनाने का आधार क्यों न बना लिया जाय? हार मान बैठने पर तो ये हमें मटियामेट ही कर देंगी।

दृढ़ साहस निष्ठा से काम लेने पर, अविचल भाव से अपने पथ पर बढ़ते रहने से ये समस्यायें ही मनुष्य की सहायक और सहयोगी बन जाती हैं। स्मरण रखिये उन्नति एवं सफलता का मार्ग कष्ट एवं मुसीबतों के कंकड़-पत्थरों से ही बना है। प्रत्येक महान् बनने वाले व्यक्ति को इसी मार्ग का अवलम्बन लेना पड़ता है। जिस तरह विष को शुद्ध करके अमृत के गुण प्राप्त कर लिये जाते हैं उसी प्रकार कठिनाइयों का भी शोधन कर इन्हें आत्मोत्थान का आधार बनाया जा सकता है।

कठिनाइयाँ एक रूप में उस स्थिति का नाम हैं जहाँ मनुष्य अपना पूरा-पूरा समाधान प्राप्त नहीं कर पाता। ‘क्या करूं? क्या न करूं’ का निर्णय नहीं कर पाता। ऐसी स्थिति में एक रास्ता तो उन लोगों का है जो रो-रोकर, शोक करके, चिन्ता विषाद में डूब कर अपना समय बिताते हैं। दूसरे प्रकार के व्यक्ति वे होते हैं जो समस्या के समाधान में अधिक मनोयोगपूर्वक विचारमग्न होते हैं। समाधान जल्दी ही मिले इसके लिये व्यस्त रहते हैं। यही मार्ग उत्तम है। कठिनाइयों में रोने के बजाय उनके समाधान का मार्ग ढूँढ़ना ही रोग का सही इलाज है। रोगी को औषधि न देकर, उसके इलाज की व्यवस्था न करके रोग और रोगी के लिये रोते रहने से तो संकट बढ़ेगा ही। इसलिये कष्ट के वक्त अपने समस्त बुद्धि, विवेक, और प्रयत्नों को, इनके हल करने में लगा देना चाहिये। इससे तीन लाभ होंगे। (1) जब समस्त शक्तियाँ एकाग्र होकर किसी क्षेत्र में काम करेंगी तो सन्तोषजनक समाधान भी मिलेगा। (2) साथ-ही शक्तियाँ अधिक सूक्ष्म और विकसित होंगी। (3) बुद्धि, विवेक, अनुभव, बढ़ेंगे। मनुष्य के व्यस्त रहने से कठिनाइयों के प्रति शोक, चिन्ता, एवं उद्विग्नता में डूबने के लिए कोई समय ही नहीं मिलेगा। स्वामी विवेकानन्द ने लिखा है - “व्यस्त मनुष्य को आँसू बहाने के लिये समय नहीं रहता।”

कठिनाइयाँ एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत व्यक्ति सुदृढ़, प्रबुद्ध एवं अनुभवी बनता है। प्रारंभिक कठिनाइयाँ मनुष्य को बहुत ही भयंकर जान पड़ती हैं। किन्तु धीरे-धीरे वही व्यक्ति कठिनाइयों में पलते-पलते इतना दृढ़ एवं परिपक्व हो जाता है कि जिन स्थितियों में वह भयभीत रहा करता था चिन्ता और विवाद में डूबा रहता था उन्हीं स्थितियों में वह बेधड़क हो जीवनपथ पर चलने लगता है।

आप कठिन परिस्थितियों से घबरावें नहीं न इनसे शोकातुर ही हों। ये तो आप के जीवन को विकसित और परिपुष्ट बनाने के लिये आती हैं। सोना तपकर ही निखरता है। इसी तरह मनुष्य का जीवन भी कठिनाइयों में पलकर ही खिलता है।

कठिनाइयाँ जीवन की कसौटी हैं, जिनमें हमारे आदर्श, नैतिकता एवं शक्तियों का मूल्याँकन होता है। दुःख और कठिनाइयाँ ही जीवन का एक ऐसा अवसर हैं जिसमें मनुष्य अपने आन्तरिक जीवन की ओर अभिमुख होता है। विपत्तियों में ही मनुष्य अपने जीवन, जगत, प्रकृति, आत्मा परमात्मा के बारे में सोचने को बाध्य होता है। सुखद् परिस्थितियों में और तो और मनुष्य अपना आपा भी भूल जाता है। नैतिकता, धर्म, ईश्वर आदर्शों के प्रति उदासीन हो जाता है। सुख की मादक मस्ती में मनुष्य के बुद्धि, विवेक, विचारशीलता नीति एवं सदाचार तिरोहित हो जाते हैं। इसलिये महाभारत में वेद-व्यासजी ने लिखा है “दुःख में ही दुःखियों के प्रति हमदर्दी पैदा होती है और मनुष्य भगवान का चिन्तन करता है। सुख में मनुष्य का हृदय संवेदना रहित कठोर बन जाता है और मनुष्य ईश्वर को भूल जाता है।” दुखों में ही अपने भले-बुरे विचार सकने का विवेक पैदा होता है। रहीम जी ने कहा है-

रहिमन विपदाहू भली जो थोड़ दिन होय।

हित अनहित या जगत में जान परत सब कोय॥

जब मनुष्य सुख की नींद में सोया रहता है तो और तो और अपने जीवन के शाश्वत लाभ तथा संसार में अपने कर्त्तव्य को भूला रहता है। किन्तु दुःख का झटका उसे इस नींद से जगाता है और मनुष्य को क्या करना है, वह किस लिये आया है, संसार में उसका क्या कर्त्तव्य धर्म है इसका पाठ मजबूरन सिखाता है। दुःख के झकझोर डालने पर जब हम अपने ध्येय और कर्त्तव्य में एकाग्र होकर लग जाते हैं, जीवन को सक्रिय बना लेते हैं तो वही दुःख कालान्तर में सुखद परिणाम लेकर आता है। आन्तरिक बाह्य जीवन में सुख का संचार होता है। दुःख, सुखों का सन्देश लेकर आता है यह कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी।

हम व्यर्थ ही दुखों में रोते हैं। अपने भाग्य या ईश्वर को कोसते हैं। दुःख तो प्रकृति माता की वह प्रक्रिया है ईश्वर का वह वरदान है जिसमें हम सचेष्ट होते हैं, जीवन की शक्तियों को उपयोग में लाते हैं और इससे हमारे सुन्दर और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण होता है।

सुख को हम प्यार करते हैं किन्तु दुःख में रोते हैं चिंता, शोक, में डूब जाते हैं। यह हमारे एकाँगी दृष्टिकोण और अज्ञान का परिणाम है। सुख की तरह ही दुःख भी जीवन का अभिन्न पहलू है। यदि दुःख न रहें तो हम सुख से ऊब जायेंगे। सुख के मादक नशे में एक दूसरे का नाश कर लेंगे। इतना ही नहीं हम सुख का मूल्य ही नहीं समझ सकेंगे। रात्रि के अस्तित्व में ही दिन का जीवन है। रात्रि न हो तो दिन महत्वहीन हो जायेगा। जिस तरह रात और दिन एक ही काल के दो पहलू हैं उसी तरह सुख दुःख भी हमारे जीवन के दो पहलू हैं। जिस तरह रात के बाद दिन और दिन के बाद रात आती है उसी तरह दुःख के बाद सुख और सुख के बाद दुःख का क्रम चलता ही रहता है। आवश्यकता इस बात की है कि सुख की तरह ही हम दुःख का भी स्वागत कर, उसमें शान्तमना, स्थिर, दृढ़ रहकर अपने कर्त्तव्य में लगे रहें।

स्मरण रखिये जीवन के शाश्वत मूल्यों को समझ लेने पर, कर्तव्य में जुट आने पर कठिनाई दुःख नाम की कोई वस्तु शेष नहीं रहती। सदा से धरती पर दुःख, द्वन्द्व, शोक है और आयेंगे। इनका सर्वथा निवारण नहीं हो सकता अतः इनमें रोने और शोक करने से, चिन्ता विषाद में डूबने से तो जीवन को पूर्ण विराम ही लग जायेगा। अतः हमें इन्हीं में आगे बढ़ना होगा।


इस जल्दबाजी से क्या फायदा

आतुरता और अधीरता की बुराई मनुष्य को बुरी तरह परेशान करती है। प्रायः हमें हर बात में बहुत जल्दी रहती है, जिस कार्य में जितना समय एवं श्रम लगना आवश्यक है उतना नहीं लगाना चाहते, अभीष्ट आकाँशा की सफलता तुर्त−फुर्त देखना चाहते हैं। बरगद का पेड़ उगने से लेकर फलने-फूलने की स्थिति में पहुँचने के लिए कुछ समय चाहता है, पर हथेली पर सरसों जमी देखने वाले बालकों को इसके लिए धैर्य कहाँ? यह आतुरता की बीमारी जन-समाज के मस्तिष्कों में बुरी तरह प्रवेश कर गई है और लोग अपनी आकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए ऐसा रास्ता ढूँढ़ना चाहते हैं जिसमें आवश्यक प्रयत्न न करना पड़े और जादू की तरह उनकी मनोकामना तुरन्त पूरी हो जाय।

राजमार्ग छोड़कर लोग पगडण्डी तलाश करते हैं, फलस्वरूप वे काँटों में भटक जाते हैं? हथेली पर सरसों जम तो जाती है पर उस सरसों का तेल डिब्बे में कोई नहीं भर पाया। बाजीगर रेत का रुपया बनाते हैं पर उन रुपयों से वे जायदाद नहीं खरीद पाते। कागज का महल खड़ा तो किया जा सकता है पर उसमें निवास करते हुए जिन्दगी काट लेने की इच्छा कौन पूरी कर पाता है? रेत की दीवार कितने दिन ठहरती है?

सुख-शान्ति के लक्ष्य तक धर्म और सदाचार के राजमार्ग पर चलते हुए पहुँच सकना ही सम्भव है। यह रास्ता इतना सीधा है कि इसमें शार्टकट की-पगडण्डी की गुंजाइश नहीं छोड़ी गई। हमारे तत्वदर्शी पूर्व पुरुषों ने मानव-जीवन को सफलता, समृद्धि, प्रगति और शान्ति से परिपूर्ण कर देने वाला जो मार्ग सबसे सरल पाया, उसी राज-पथ का नाम धर्म एवं सदाचार रखा। इस मार्ग के हर मील पर अधिकाधिक प्रफुल्लता भरा वातावरण मिलता जाता है।

सुख समृद्धि के लिए धैर्य-पूर्वक सदाचरण के मार्ग पर चलते रहना और अपने में जो दुर्बलताएँ हों उन्हें एक-एक करके हटाते चलना यही तरीका सही है। इस सुनिश्चित पद्धति को छोड़कर अधीर लोग बहुत जल्दी अत्यधिक प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं और जो कुछ उनके पास था उसे भी गँवा बैठते हैं। जल्दी ही बहुत धन कमा लेने और आर्थिक स्थिति सुधार लेने की कामना से प्रेरित होकर लोग चोरी, बेईमानी, ठगी, विश्वासघात, रिश्वत जैसे अनुपयुक्त मार्गों को अपनाते हैं। वे सोचते हैं सीधे मार्ग से बहुत जल्दी धन संचय करना सम्भव न होगा इसलिये अनीति के मार्ग पर चलते हुए जल्दी ही बहुत धन क्यों न कमा लिया जाय? ऐसा लगता है यह तर्क आज अधिकाँश लोगों को पसन्द आ गया है और वे किसी भी प्रकार जल्दी से जल्दी मनमाना धन प्राप्त करने के लिए धर्म और सदाचार के सारे आधारों को तिलाञ्जलि देकर अनीति की कमाई करने में लगे हुए हैं। व्यापार के बारे में यहाँ तक कहा जाने लगा है कि वह बिना झूठ और बेईमानी के चल ही नहीं सकता। रिश्वतखोरी एक आम बात बनी हुई है। मजदूर अपने कर्त्तव्य को पूरा न करके श्रम और समय की चोरी करते हैं। धर्म के नाम पर जो पाखण्ड और ठग विद्या चलती है उससे कौन अपरिचित है। इन दुष्प्रवृत्तियों के मूल में यही धारणा काम कर रही है कि सदाचार नहीं अनीति हमारे लिए अधिक लाभदायक है। उसी से जल्दी लाभ हो सकता है।

किन्तु यह बात सच कहाँ है ? अनीति की प्रवृत्ति के व्यापक रूप में फैल जाने पर प्रत्येक चोर भी अन्य चोरों द्वारा ठगा और सताया जाता है। एक व्यक्ति दूध में पानी मिलाकर अधिक पैसे कमा लेता है। जब उसका बच्चा बीमार पड़ता है तो उसकी मामूली-सी बीमारी को बहुत बड़ी बताकर डॉक्टर डराता है और इलाज में मनमाने पैसे वसूल करता है। फिर उस डॉक्टर को भी चैन कहाँ? बाजार में अपनी स्त्री के लिए जेवर खरीदने जाता है तो आधी पीतल मिला हुआ सोना उसके हाथ में थमा दिया जाता है। यह स्वर्णकार ‘इनकम टैक्स’ के अधिकारी द्वारा निचोड़ा जाता है और फिर “ऐन्टी करप्शन” वाले उस अधिकारी का भी तेल निकाल लेते हैं। यह सिलसिला चलते-चलते अंततः हर अनीति की कमाई करने वाला खाली हाथ रह जाता है। डाकू अक्सर बहुत धन लूटकर ले जाते हैं पर जहाँ वे चोरी का माल बेचते हैं वह आधे पैसे भी नहीं थमाता। कारतूस और बन्दूकें खरीदने में, लुके-छिपे खाद्य पदार्थ माँगने में कई गुने दाम उन्हें भी देने पड़ते हैं। इस प्रकार बहुत कमाई करने पर भी अन्ततः वे खाली हाथ ही रह जाते है। किसी चोर डाकू के महल बंगले खड़े होते कहाँ देखे जाते हैं?

शरीर को बलवान बनाने के लिए लोग आहार-विहार का संयम रखने, दिनचर्या और श्रमशीलता पर ध्यान देने ब्रह्मचर्य से रहने आदि आवश्यक नियमों का पालन करने के राजमार्ग पर चलने की अपेक्षा टानिक पीने, कुश्ते खाने और माँस, मछली, अण्डे निगलने की पगडण्डी ढूँढ़ते हैं। पर क्या किसी को इन खोटे रास्तों पर चलते हुए स्वास्थ्य सुधारने का अवसर मिला है? थोड़ी देर के लिये यह तरीके कुछ लाभ दिखा सकते हैं पर अंततः जीवनी शक्ति का नाश करने वाले इन टानिकों से अनेक बीमारियों के चंगुल में फँसना पड़ता है और अकाल मृत्यु असमय ही सामने आ खड़ी होती है।

मन की प्रसन्नता के लिए लोग विषय वासनाओं पर ऐसे टूटते हैं जैसे मछली-आटा लगे हुए काँटे की नोंक को निगलती है। कहा जाता है कि नशेबाजी इसलिए की जाती है कि उससे मन की प्रसन्नता और स्फूर्ति बढ़े। चाय सिगरेट, शराब, भाँग, गाँजा आदि पीने वाले अपनी आदत के समर्थन में यही बात कहते हैं। व्यभिचारी, वेश्यागामी और घृणित तरीकों से अपना जीवन-तत्व निचोड़ते रहने वाले व्यक्ति भी अपनी कुटेबों का समर्थन इसी आधार पर करते हैं। सिनेमा ताश, शतरंज आदि व्यसनों के बारे में भी ऐसा ही कुछ कहा जाता है। हो सकता है कि तत्काल कुछ देर के लिए इन कुटेबों-व्यसनों में फँसे हुए लोगों को कुछ प्रसन्नता मिलती हो। पर धीरे-धीरे उनका धन, समय, स्वास्थ्य और चरित्र गिरता ही जाता है। उनकी स्थिति दिन-दिन खोखली होती जाती है।

सम्मान प्राप्त करने के लिए लोग उद्धत तरीके काम में लाते हैं। विवाह-शादियों में गाढ़ी कमाई के महत्वपूर्ण पैसों की होली इसलिये जलाई जाती हैं कि देखने वाले हमें अमीर समझें और अमीरों को जो सम्मान मिलता है वह हमें भी मिले। दहेज की हत्यारी कुप्रथा के पीछे आर्थिक कमाई का भाव उतना नहीं होता जितना कि अपनी नाक ऊँची करने का। सोचा जाता है कि जिसे जितना अधिक दहेज मिलेगा वह उतना ही बड़ा आदमी समझा जायेगा। नेता बनने के लिए चुनाव में जीतने के लिए लोग कैसे-कैसे घृणित हथकण्डे काम में लाते है? इसके मूल में यही प्रवृत्ति काम कर रही होती है कि हमारा व्यक्तित्त्व लोगों की आँखों में चमके। अखबारों में झूठी नामवरी छपवाने के लिये लोग कितने आतुर रहते हैं। सोचने की बात है कि क्या कभी इन हथकंडों से किसी को स्थायी कीर्ति मिली है। भीतरी महानता को बढ़ाये बिना क्या कभी कोई व्यक्ति स्थाई सम्मान का अधिकारी बन सका है?

पर्चे नकल करके या अन्य बुरे तरीकों को अपनाकर कई लोग परीक्षा में उत्तीर्ण हो जाते हैं, पर उन्हें विद्या से प्राप्त होने वाली योग्यता कहाँ मिलती है? स्त्री, बच्चों और कर्मचारियों को डरा धमकाकर या उनकी मजबूरियों से लाभ उठाकर उन्हें अपना वशवर्ती रखा जा सकता है पर हृदय को जीत सकना बिना आत्म त्याग के, बिना सच्चे प्रेम के एवं बिना सौजन्य के कहाँ उपलब्ध होता है? अनुचित सहायता से कई लोग उच्च पदों पर जा पहुँचते हैं पर उस पद की शोभा और सफलता उन कुपात्रों के द्वारा कहाँ बन पाती है? सत्पात्रता का ही सदा महत्व रहा है और आगे भी रहेगा। जालसाजी के आधार पर मिली हुई सफलतायें कितने दिन ठहरती हैं, और उनसे क्या कोई प्रयोजन सिद्ध होता है?

आत्म कल्याण के लिए स्वर्ग और मुक्ति की प्राप्ति के लिए यह अनिवार्य है कि हम अपने कुविचारों और कुकर्मों को समाप्त करें, सहृदयता, प्रेम, सेवा और उदारता की भावनाओं का विकास करें। पर सस्ते तरीके ढूँढ़ने वाले इस झंझट में न पड़कर किन्हीं तीर्थ यात्रा, देव दर्शन, ब्रह्मभोज कथा वार्ता या ऐसे ही किन्हीं छोटे-मोटे कर्मकाण्डों को पर्याप्त मान बैठते हैं। उनकी वह आत्म वंचना कभी सार्थक भी हो सकेगी इसमें पूरा-पूरा सन्देह है। मुक्ति का सीधा रास्ता है वासनाओं और तृष्णाओं के बन्धनों से छुटकारा प्राप्त करना। आत्म-चिन्तन, आत्म-मनन, आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म-विकास की सीढ़ियों पर चढ़े बिना ही क्या किसी का आत्म-कल्याण के लक्ष्य तक पहुँच सकना संभव है? पर जल्दबाज लोग कुछ थोड़ा-सा पूजा, पाठ, दर्शन, झाँकी, दान, दक्षिणा मात्र का सस्ता आधार लेकर जल्दी ही स्वर्ग मुक्ति प्राप्त कर लेना चाहते हैं। इन बेचारों को भला क्या कुछ हाथ लगता होगा?

उन्नति और सफलता के लिए हर व्यक्ति बुरी तरह लालायित रहता है उसको अभीष्ट मात्रा में इच्छित सफलता तुर्त-फुर्त नहीं मिल जाती तो अत्यन्त निराश भी हो जाता है। लोग अनेक काम आरम्भ करते हैं और सफलता में देर लगती देखकर उसे छोड़ बैठते हैं और फिर नया काम शुरू करते हैं। इस प्रकार अपना धन, समय और श्रम बर्बाद करते रहते हैं। आतुर लोगों में आरम्भिक जोश बहुत होता है पर वे निराश भी उतनी ही जल्दी हो जाते हैं। जन्त्र-मन्त्र की, साधु-सन्तों के आशीर्वाद की, देवताओं के वरदान की भी ऐसे ही लोग बहुत तलाश करते हैं ताकि जल्द-से-जल्द उनका मनोरथ पूरा हो जाये।

हमें जानना चाहिये कि हर वस्तु समयसाध्य है और श्रमसाध्य भी। कोई मार्ग ऐसा नहीं जिसमें रुकावटें और बाधायें न हों। उन्हें हटाने के लिए प्रयत्न भी करना पड़ता है और धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा भी। आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, परिश्रमी और पुरुषार्थी को तो सफलता मिलती ही है। और यदि न भी मिले तो उसकी प्रतिभा और क्षमता तो बढ़ती रहती है। प्रयत्नशीलता से, पुरुषार्थ से, अध्यवसाय से, व्यक्तित्व निखरता है और उसके आधार पर प्रगति की ऊँची मंजिल पर चढ़ सकना सम्भव हो जाता है।

धैर्य और दूरदर्शिता हमें अपनानी चाहिए। सफलता और प्रगति के पथ पर बढ़ते हुए यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारा पूरा ध्यान अपने पुरुषार्थ पर रहे। फल कब मिलेगा? कितना मिलेगा? कैसा मिलेगा? इसका कुछ निश्चय नहीं। यह सब परिस्थितियों पर निर्भर है। और बड़े काम भी संयोगवश जल्दी हो सकते हैं। मनुष्य के हाथ में उसका प्रयत्न ही ईश्वर ने दिया है और फल का विधान अपने हाथ में रखा है। हमें अपना काम करना चाहिए और ईश्वर का काम उसे करना चाहिये। ईश्वर के काम पर हम कब्जा करें और अपना कर्त्तव्य ईश्वर से पालन कराने की इच्छा करें तो यह अनधिकार चेष्टा ही होगी।

फल की आतुरता, प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। धैर्य और साहसपूर्वक अपना कर्त्तव्य-पालन करते रहना और उचित मार्ग पर चलते रहना ही हमारे लिये श्रेयस्कर है। जल्दबाजी में लाभ तो कुछ नहीं होता, उल्टे सफलता का लक्ष्य दूर हट जाता है। साथ ही ऐसे उल्टे काम भी बन पड़ते हैं जो असफलता से भी अधिक कष्टकारक परिणाम उत्पन्न करने वाले सिद्ध होते हैं।


निर्विकल्प समाधि

निर्विकल्प समाधि की साधना में जब सफलता न मिली तो महर्षि उद्दालक ने सोचा- असफल होकर जीना क्या? निराहार रहकर मृत्यु का वरण करना चाहिए। उन्होंने अन्न-जल त्याग कर मरण की साधना आरम्भ कर दी।

जिस वट-वृक्ष के नीचे महर्षि का अनशन व्रत चल रहा था उसके कोटर में वीरुध नामक एक बूढ़ा तोता रहता था। उसने ऋषि को सन्तप्त दृष्टि से देखा और सजल नेत्रों से कहा- वाचालता क्षमा करें तो एक बात पूछूँ? उद्दालक ने आँखें खोली और तोते से बोले-कहो क्या कहना है। वीरुध बोला-शरीर तो मरणधर्मा है ही उसकी मृत्यु-योजना करने में क्या पुरुषार्थ हुआ? मृत्यु को अमरता में बदलने के लिए ऐसा ही दृढ़ निश्चय किया जाये और इतना ही त्याग किया जाये तो क्या अमृत की प्राप्ति न होगी?

उद्दालक देर तक सोचते रहे। शुक की वाणी उनके अन्तस्तल तक प्रवेश करती गई। अनशन त्यागकर ऋषि ने अमृत की प्राप्ति के लिए प्रबल पुरुषार्थ आरम्भ किया तो निर्विकल्प समाधि भी उनके सामने आ उपस्थित हुई।


आज के काम को कल पर मत टालिये

मनुष्य में एक बुरी आदत है काम को टाल देने की। अपनी इसी आदत के कारण हम कभी-कभी अपने बनते हुए कामों को बिगाड़ बैठते हैं, जिससे हमारी बड़ी भारी हानि हो जाती है और कभी-कभी तो अपनी मंजिल पर पहुँचते-पहुँचते रह जाते हैं।

जिन पत्रों का उत्तर हमें आज देना चाहिए, उन्हें कल पर टाल देते हैं और कल , फिर कल, इस प्रकार पत्र पुराना पड़ जाता है और हमारी ही दृष्टि में उसके उत्तर महत्व कुछ नहीं रह जाता। उधर पत्र-प्रेषक उत्तर की प्रतीक्षा करते-करते अंत में निराश हो जाता है।

जो काम हमें आज करने हैं, वह कल भी उतने ही महत्व के रहेंगे, यह नहीं कहा जा सकता। परिस्थितियाँ क्षण-क्षण पर बदलती रहती हैं और उनके अनुसार पिछड़े हुए कार्यों का कोई महत्व नहीं रह जाता।

संभव है आज किसी कार्य के सम्मुख आते ही हम उसे ताजा जोश में कर डालें, परन्तु कल पर टालते ही उस कार्य के प्रति दिलचस्पी भी कम हो सकती है और इस प्रकार वह कार्य सदा के लिए ही टल सकता है।

जिस व्यक्ति में टालमटोल का यह रोग लग जाता है वह अपने जीवन में अनेक काम नहीं कर पाता। बल्कि उसके सब काम अधूरे पड़े रह जाते हैं। यद्यपि ऐसे लोग हर समय व्यस्त रहते दिखाई पड़ते हैं, फिर भी अपना काम पूरा नहीं कर पाते। कामों का बोझ उनके सिर पर लदा रहता है और वे उससे डरते हुए कामों को धकेलने की कोशिश करते रहते हैं।

टालने की आदत वाला मनुष्य परिस्थितियों का शिकार भी हो सकता है। स्वास्थ्य का खराब होना, मस्तिष्क की निर्बलता, आर्थिक या दूसरे प्रकार की चिन्ता आदि कारण भी कार्य को टालना पड़ता है।

कार्य की अधिकता से भी कार्य शेष रह जाता है और वह दूसरे दिन को टालना पड़ता है। वह टाला हुआ कार्य यदि दूसरे दिन भी टल गया तो फिर दृष्टि से ओझल हो जाने के कारण सदा टलता जाता है।

यदि आप अपने कार्य को सुव्यवस्थित ढंग से और उत्साहपूर्वक करते रहें तो कार्य का भार अधिक प्रतीत नहीं होगा उसमें आपकी दिलचस्पी बनी रहेगी और उसके न होने से होने वाली हानि भी कम ही होगी।

काम का भार अधिक दिखाई पड़ने पर एक चिड़चिड़ापन उसके स्वभाव में आ जाता है, परन्तु हाथ ही हाथ काम को पूरा करने में वैसी स्थिति कभी उत्पन्न नहीं होती।

जो व्यक्ति दूसरों का काम करने को आश्वासन दे देते हैं, वे यदि उनका काम करने में टालमटोल करते हैं तो उनके प्रति किसी की श्रद्धा नहीं रहती। ऐसे व्यक्तियों पर कभी विश्वास नहीं किया जाता और जिस व्यक्ति का विश्वास उठा, उसकी प्रतिष्ठा भी समाप्त हो जाती है।

आपको अपनी कार्यक्षमता बढ़ानी चाहिए। अपने मन के उत्साह को जगाकर दृढ़ता से कार्य में जुट जाइये और पूरी शक्ति लगा कर टाले हुए कार्य को शीघ्र ही समाप्त कीजिये।

कठिन काम से निराश मत होइये। बड़े से बड़े काम भी मन लगा कर करने से शीघ्र संपन्न हो जाते हैं। आपके जो कार्य शेष पड़े हुए हैं, उनकी एक सूची तैयार कीजिये, उनमें से अत्यन्त आवश्यक कार्यों को प्राथमिकता दीजिये, कम आवश्यक कार्यों को पीछे करने के लिए रखिये। इस प्रकार बनाई गई सूची से आपको बड़ी सहायता मिलेगी।

अधिक कठिन कार्यों के सरल तरीके ढूंढ़िये और सरल तरीका न मिलने पर पूर्ववत् ढंग से उसमें लग जाइए। खाली बैठने से कुछ काम करना अच्छा है। अतः केवल विचार में ही समय नष्ट मत कीजिये।

किये हुए कामों पर गर्व अनुभव करिये। जो काम शेष हैं, उन्हें करने में पीछे न रहिए। यदि आप कार्यों के पीछे हाथ धोकर पड़ेंगे तो कोई कारण नहीं कि वे आपके काबू में न आ सकें।

हाथ धीमा मत रखिये। तेजी से किये जाने वाले काम शीघ्र पूरे होते हैं। यदि अपने कार्यों के लिए सहायक रखें तो वह भी फुर्तीला होना चाहिए, सुस्त सहायक आपके उत्साह को भी नष्ट कर डालेगा।

काम को बेगार समझ कर मत कीजिये। काम करते समय झुँझलाइये मत। अपने मन को कार्यों की जटिलता सुलझाने में लगाइये। इससे आपकी निर्णय शक्ति बढ़ेगी और आप जिस कार्य को करेंगे, वह बिना बाधा के ही सम्पन्न हो जायगा।


सादगी मे सुंदरता

लोपामुद्रा ने अपने पति अगस्त्य से कुछ आभूषणों की प्रार्थना की। ऋषि असमंजस में पड़े, पर अपनी पत्नी की कामना पूर्ण करने लिए उन्होंने अपने शिष्यों के पास जाने में हर्ज न समझा और दूसरे दिन कुछ शिष्यों के साथ लेकर श्रुतर्वा राजा के पास चल दिये।

राजा ने उसका समुचित सत्कार करके पधारने का कारण पूछा तो ऋषि ने अपना अभिप्राय सुनाया। साथ ही यह भी कहा कि जो धन धर्मपूर्वक कमाया है और उचित कर्मों के खर्च करने से बचा हो उसी को मैं लूँगा।

श्रुतर्वा ने महर्षि को कोषाध्यक्ष के पास भेज दिया ताकि वे हिसाब जाँच कर देख सकें कि उनका इच्छित धन है या नहीं?

अगस्त्य ने हिसाब जाँचा तो समस्त राज्य-कोष धर्म उपार्जित कमाई का ही पाया पर साथ ही उचित कार्यों का खर्च भी इतना रहा कि उसमें बचत कुछ भी न रही। जमा खर्च बराबर था।

ऋषि वहाँ से चल दिये और राजा धनस्व के यहाँ पहुँचे और उसी प्रकार अपना अभिप्राय कह सुनाया। उसने भी श्रुतर्वा की तरह हिसाब जाँचने की प्रार्थना की। जाँचा गया तो वहाँ भी सन्तुलन ही पाया गया। अगस्त्य वहाँ से भी बिना कुछ लिये ही चल दिये। इसी प्रकार वे अपने कई अन्य धनी समझे जाने वाले शिष्यों के यहाँ गये पर वे सभी धन की पवित्रता पर ध्यान रखने वाले निकले और उनके कोष में बचत कुछ भी न निकली।

अगस्त्य वापिस लौट रहे थे कि रास्ते में इल्वण नामक दैत्य मिला। उसने महर्षि का अभिप्राय जाना तो अनुरोध पूर्वक प्रार्थना की कि मेरे पास विपुल सम्पत्ति जमा है, आप जितनी चाहें प्रसन्नता पूर्वक ले जा सकते हैं।

ऋषि इल्वण के महल में पहुँचे और हिसाब जाँचना शुरू किया तो वहाँ सभी कुछ अनीति से उपार्जित पाया। उचित कार्यों में खर्च न करने की कंजूसी से ही वह धन जमा भी हो सका था। अगस्त्य ने पाप-संचय लेने में पत्नी का अहित ही देखा और वे वहाँ से भी खाली हाथ लौट आये।

प्रतीक्षा में बैठी हुई लोपामुद्रा को सांत्वना देते हुए महर्षि ने कहा—भद्रे, धर्म से कमाई करने और उदारता पूर्वक उचित खर्च करने वालो के पास कुछ बचता नहीं। अनीति से कमाने वाले कृपण लोगों के पास ही धन पाया जाता है, सो उसके लेने से हमारे ऋषि जीवन में बाधा ही पड़ेगी। अपवित्र धन से शोभायमान होने की अपेक्षा तुम्हारे लिए पवित्रता की रक्षा करते हुए अभावग्रस्त रहना ही उचित है।

लोपामुद्रा ने पति की शिक्षा का औचित्य समझा और शोभा सौंदर्य की कामना छोड़, सादगी के साथ सुख-पूर्वक रहने लगी।


स्वस्थ रहने के लिये विश्राम भी कीजिये

स्वास्थ्य को सन्तुलित बनाये रखने के लिए जीवन में भोजन पानी और वायु आदि की तरह ही विश्राम भी आवश्यक है। किसी भी व्यक्ति को बढ़िया से बढ़िया भोजन दिया जाय, शुद्ध जल वायु में रखा जाय, किन्तु उसे विश्राम न करने दिया जाय तो बहुत जल्दी ही उसका स्वास्थ्य गिरने लग जायगा। लगातार काम करते रहने से मनुष्य के शरीर और मस्तिष्क पर एक प्रकार का तनाव पैदा हो जाता है। जिस तरह काफी देर तक काम करते रहने पर इंजिन गर्म हो जाता है और उसे ठण्डा करने के लिए बन्द कर देने की आवश्यकता पड़ती है, उसी तरह जाग्रतावस्था में विभिन्न कार्यक्रमों में लगे रहने से मनुष्य के स्नायु- संस्थान, शरीर, दिमाग सभी पर दबाव पड़ता है। मनुष्य इस तरह लगातार काम करता ही रहे तो दो-तीन दिन में उसके स्वास्थ्य में असन्तुलन पैदा होकर उसका बीमार हो जाना स्वाभाविक है।

विश्राम की बहुत बड़ी आवश्यकता नींद से पूरी होती है। कार्यशील व्यक्ति के लिए निद्रा ही विश्राम का प्राकृतिक स्वरूप माना गया है। कितना सोना चाहिए, यह व्यक्ति की स्थिति और क्षमता पर निर्भर करता है। सामान्यतया औसतन व्यक्ति को 6-7 घण्टे की निद्रा पर्याप्त होती है। इसके विपरीत कुछ अपवाद होते हैं। कई लोग तीन-चार घण्टे की नींद में ही ताजगी प्राप्त कर लेते हैं।

कितना सोना चाहिए यह व्यक्ति की अपनी स्थिति और शरीर की आवश्यकता पर निर्भर है, किन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात है भली प्रकार नींद लेना। स्वस्थ नींद ही शरीर के विश्राम की आवश्यकता पूर्ण करती है। 8-9 घण्टे चारपाई पर पड़े रहने पर भी यदि नींद भली प्रकार नहीं आये, सारी रात करवट बदलने या स्वप्न देखने में ही बिता दी जाय तो नींद की आवश्यकता पूर्ण नहीं होती। इतनी देर चारपाई पर सोकर भी मनुष्य थका हुआ-सा आलस्य और अवसाद

लेकर ही उठेगा और दिन में कुछ कर भी न सकेगा। बहुतों को नींद ही नहीं आती। अनिद्रा की बीमारी आज के शिक्षित एवं तथाकथित ‘सभ्य’ जगत में दिनोदिन फैलती जा रही है।

स्वस्थ नींद के लिए आवश्यक है अपने काम और विश्राम के समय का ठीक-ठीक निर्धारण करना। दिन भर जितना काम करना है उतने समय खूब काम किया जाय और काम करके अपने अन्य आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर ठीक समय पर सो जाना चाहिए। सोने के समय फिर काम की कोई बात, चिन्ता परेशान न करे। लेकिन बहुत कम लोग इस पर ध्यान देते हैं। कई तो दिन भर पर्याप्त श्रम नहीं करते। निद्रा व विश्राम का पथ्य श्रम ही है। श्रमिकों को सहज ही गहरी नींद आ जाती है। कई लोगों को आवश्यक श्रम न करने पर गहरी नींद नहीं आती।

आज के युग में आवश्यकताएं, एषणा, कामना एवं इच्छा बढ़ जाने से मनुष्य के लिए अधिक कमाने की आवश्यकता भी बढ़ गई है। और इसी से प्रेरित होकर कई लोग अपने और विश्राम में सन्तुलन नहीं रख पाते। ‘ओवर टाइम वर्क’ आज के युग का एक स्वाभाविक क्रम-सा बन गया है। जब मनुष्य को विश्राम करना चाहिए उस समय वह काम में जुता रहता है। काम करना बुरा नहीं जितना बने काम करना ही चाहिए। किन्तु नींद एवं विश्राम के अभाव में अपने स्वास्थ्य को चौपट कर प्राप्त होने वाला बड़े से बड़ा लाभ भी मनुष्य के लिए घाटे का सौदा है। चाहे कितना ही लाभ मिलने वाला हो किन्तु प्रकृति के महत्वपूर्ण उपहार नींद, जिससे हम नव-जीवन पाते हैं, उसके साथ सौदा नहीं किया जाना चाहिए।

कई लोग जब निद्रा का विश्राम का, समय होता है तो सिनेमा, ताश, शतरंज, नाच गाने, खेल तमाशों आदि में लग कर अपनी नींद खराब करते रहते हैं। इसके अर्थ यह नहीं कि मनोरंजन न करना चाहिए। स्वस्थ और सभ्य मनोविनोद एक सीमा में आवश्यक भी हैं किन्तु उसे जीवन का एक व्यसन बना कर अपने निद्रा विश्राम के समय को नष्ट कर डालना बुद्धिमानी नहीं है। इस तरह जागते रहने से शरीर पर दबाव पड़ता रहे और स्वास्थ्य की हानि हो तो इस तरह के मनोरंजन से सदैव दूर ही रहना चाहिए।

भली प्रकार नींद न लेने, विश्राम न कर पाने का एक महत्वपूर्ण कारण मनुष्य की मानसिक स्थिति भी है। बहुत से लोग सोते समय अपने दिन भर की चिन्ता, परेशानियों का ताना-बाना बुनने लगते हैं। भूतकाल के पश्चाताप, सोच-विचार और भविष्य की चिन्ता में दबे हुए विश्राम के लिए लेटते हैं किन्तु उनका यह मानसिक जंजाल बढ़ता ही जाता है और मनुष्य को नींद नहीं आती। इधर की करवट उधर और उधर की करवट इधर बदलने में ही सारी रात चली जाती है। मानसिक असन्तुलन की बीमारी आज के युग में दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, फलस्वरूप अनिद्रा का रोग भी व्यापक रूप में बढ़ता जा रहा है।

मानसिक स्थिति की यह विषमता ऐसी कठिन नहीं है जिसे दूर न किया जा सके। संसार और इससे सम्बन्धित समस्याओं को अपने शयन कक्ष से बाहर ही छोड़कर अपने को एकाकी नित्य मुक्त समझकर विराट की छाया तले निद्रा देवी की गोद में सो जाना चाहिए। सोते समय कोई भी चिन्ता शेष नहीं रहने देनी चाहिए। मनुष्य की नींद हराम करने में आहार-विहार का भी अपना महत्वपूर्ण स्थान है। सात्विक, शुद्ध, हल्का, भोजन अच्छी नींद लाता है तो तामसी, उत्तेजक, उष्ण भारी पदार्थ निद्रा नाश करते हैं। जो लोग बीड़ी, सिगरेट, चाय, शराब तम्बाकू आदि उत्तेजक पदार्थों का सेवन करते हैं उनको अनिद्रा के रोग का शिकार होना पड़ता है। उत्तेजना पर उत्तेजना स्नायु, मस्तिष्क, हृदय आदि के मूल अंगों पर दूषित प्रभाव डालती है और मनुष्य को असमय में ही स्वास्थ्य की हानि उठानी पड़ती है। अनुपयुक्त गरिष्ठ आहार की वजह से मनुष्य को अच्छी नींद नहीं आती, दुःस्वप्न आते रहते हैं, मनुष्य तन्द्रा में पड़ा रहता है। काफी देर तक सोकर उठने पर भी आलस्य घेरे रहता है, बदन थका हुआ सा जान पड़ता है अतः भोजन सात्विक, हल्का, अल्प, शीघ्र ही पचने वाला लेना चाहिए।

निद्रा स्वास्थ्य स्फूर्ति, शक्ति , कार्यक्षमता, प्रसन्नता प्राप्ति के लिए प्रकृति का अमूल्य उपहार है। इसे किसी भी शर्त पर नष्ट नहीं करना चाहिए। प्रयत्नपूर्वक स्वस्थ नींद लेने का अभ्यास करना चाहिए। नव-जीवन प्राप्ति का आधार है नींद। आवश्यकतानुसार पर्याप्त विश्राम करना स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक है अनिवार्य है।


सच्ची तृप्ति

अपने परम तेजस्वी तमतमाते हुए रक्त वर्ण मुखारविन्द के साथ जब सूर्यदेव घर पहुंचे तो उनकी पत्नी संज्ञा ने आँखें बन्द कर ली।

कुपित होकर सूर्य ने कहा—क्यों? तुम्हें मेरा तेजस्वी स्वरूप रुचता नहीं?

संज्ञा की आँखें और भी नीची हो गई उसने बादलों के घूँघट में कोमल मुख को ढक लिया।

यह अभद्रता उन्हें और भी अखरी और वे लाल-पीले होकर अपना दर्प दिखाने लगे। बेचारी संज्ञा भयभीत होकर अपने पितृगृह कुरु प्रदेश चली गई और तपस्या में लीन हो गई।

सूर्य अपनी पत्नी के बिना उदास रहने लगे। वे एक योगी का रूप बना कर संज्ञा के पास पहुँचें और इस कठिन तपस्या का प्रयोजन पूछने लगे।

तपस्विनी ने कहा—तात! मेरे पति और भी अधिक तेजस्वी हों पर उनका स्वभाव इतना सरल हो कि मैं अपलक उसके दर्शन कर सकूँ।

सूर्य द्रवित हो गये। दर्प की प्रचण्डता को व्यर्थ मानते हुए उन्होंने अपनी सोलह कलाओं में से एक के साथ ही प्रकाशित होना आरम्भ कर दिया।

संज्ञा घर लौटी सूर्य को सौम्य पाया तो कहा—नाथ ! वैभव कितना ही क्यों न हो स्नेह तो सौम्यता ही ढूंढ़ेगा और उसी में तृप्ति मानेगा।


काना-कुरूप-सेम्युअल जॉनसन

सेम्युअल जॉनसन उस काले-कलूटे, भद्दे और बेढंगे, लड़के का नाम था जो इंग्लैंड के लिचफिल्ड गाँव में सन् 1709 में पैदा हुआ था। बचपन में चेचक निकली तो एक आँख फूट गई। फिर गण्डमाला की बीमारी ने घेर लिया। उसका बाप एक छोटा पुस्तक विक्रेता था। गरीबी में गुजर होती थी, रहने को घर भी न था सो उसकी माँ ने दुकान में ही प्रसव किया। जॉनसन किताबों के ढेर में जन्मा और अन्त भी कैसा विलक्षण कि वह पुस्तकों के ढेर में ही 77 वर्ष का होकर मर गया।

सेम्युअल जब तीन साल का था और बुरी तरह बीमारियों से घिरा हुआ था तो उसकी माता को किसी ने की दिया कि रानी का स्पर्श कराने से वह अच्छा हो सकता है। माँ की ममता देखिये—बेचारी चिथड़ों में लपेट कर अपने बच्चे को रानी के पास लंदन ले गई और किसी प्रकार स्पर्श कराने में सफल हो गई। इसका परिणाम तो क्या होना था पर माता की ममता की वह भी एक करुण कहानी थी जिसे जॉनसन जीवनभर नहीं भूला। उस उपचार में एक छोटी चाँदी की कटोरी तथा चम्मच खरीदा गया था उसे उस काने कुरूप लड़के ने अपनी माता की स्मृति में जीवनभर सँभालकर रखा।

बड़ा हुआ तो स्कूल में दाखिल किया गया। निर्धनता तो बाधक थी ही, कुरूपता ने भी उसे कम परेशान नहीं किया। स्कूल में लड़के उसे बुरी तरह चिढ़ाते, कभी-कभी मारपीट भी कर देते, बेचारा अपनी सुरक्षा के साधन भी घर से लेकर जाता। आखिर तंग आकर उसने स्कूल छोड़ दिया और अपने बाप की दुकान पर ही काम करने लगा। दुकान पर बैठे-बैठे ही उसने वहाँ जितनी भी किताबें थीं सब पढ़ डाली। उसके साथ ब्याह करने को भी कौन स्त्री तैयार होती? आखिर एक अधेड़ विधवा, जो जॉनसन से दूनी उम्र की थी, किसी प्रकार उससे शादी करने को तैयार हुई और उसकी गृहस्थी बसी।

साहित्य में उसे रुचि थी, लेख-लिखने का चस्का तो लगा, कुछ लिखा भी, पर उन रचनाओं का छपना मुश्किल था। उसने कुछ लेख और पुस्तकें लिखकर प्रकाशक के पास भेजे तो अस्वीकृत के उत्तर के साथ, एक सलाह भी मिली कि—”आप इस लेखन के झंझट में न पड़ें। इससे अच्छा तो कुली का काम रहेगा जिसमें कम-से-कम भर पेट रोटी तो मिल जाया करेगी।”

इन परिस्थितियों के बीच कोई साधारण युवक अपने जीवन को भार ही समझता, भाग्य को कोसता रहता और अपने मौत के दिन गिन-गिनकर पूरे करता रहता। सब ओर तिरस्कार लाँछना, असफलता और उपहास की ठोकरें लगने पर आमतौर से मनुष्य का दिल टूट जाता है, हिम्मत पस्त हो जाती है और आशा का दीपक बुझ जाता है। पर जॉनसन ने इस मानवीय दुर्बलता को पास भी न फटकने दिया। उसने कभी दिल छोटा न किया, कभी निराशा की बात न सोची, उसने अन्तर का आशा दीप जलाये रखा और इस विश्वास पर दृढ़ रहा कि वह अथक परिश्रम करेगा और कठिनाई के पहाड़ को काटकर भी आगे का रास्ता बनावेगा। अदम्य इच्छा शक्ति के बलबूते पर उसने जीवन के अन्त तक आगे बढ़ने की चेष्टा की। बार-बार ठोकरें लगीं, पर हर ठोकर के बाद वह और अधिक सावधानी के साथ—और अधिक दृढ़ता एवं उत्साह के साथ बढ़ा। पौरुष को चुनौती देने वाली हर बाधा का उसने हँसकर मुकाबला किया और अन्त में जीता भी वही।

सेम्युअल जॉनसन ने अंगरेजी भाषा का महान शब्दकोष बनाने का काम अपने हाथों में लिया और अधिक परिश्रम से सात वर्ष में उसे पूरा कर दिया। यह सात वर्ष उसने कितनी कठोर साधना के बिताये इसे कोई नहीं जानता। केवल लोग यह जानते हैं कि उसने शब्दकोष बनाकर बहुत बड़ा काम कर डाला। जब वह शब्दकोष प्रकाशित हुआ तो प्रकाशक ने उसका पारिश्रमिक बत्तीस हजार रुपया दिया जिसके उसकी आर्थिक स्थिति भी सुधरी और ख्याति भी प्राप्त हुई। सरकार ने भी उसके कार्य से प्रभावित होकर जीवन भर के लिए पेन्शन बाँध दी और रोटी की समस्या से छुटकारा मिल गया।

जॉनसन जब शब्दकोष तैयार करने में लगे हुए थे तब उन्हें पैसे की बहुत तंगी थी। उसने सुन रखा था कि अर्लचेस्टर फील्ड अपनी विशाल सम्पत्ति में से कला प्रेमियों की भी कुछ सहायता किया करते हैं। इसलिए वे भी उनके यहाँ जा पहुँचे। जॉनसन के दुर्भाग्य ने वहाँ भी उसका पीछा न छोड़ा। सहायता मिलना तो दूर—बेचारे को कमरे में से धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया। बहुत वर्षों के बाद जब वह कोष छप गया और उसकी कीर्ति चारों ओर फैल गई तो अर्लचेस्टर फील्ड ने उन्हें कुछ पुरस्कार देना चाहा। इस पर जॉनसन ने उत्तर दिया—”आपकी उदारता प्रकट होने में कुछ देर हो गई। अब मैं इस योग्य हूँ कि अपने पैरों पर स्वयं खड़ा हो सकूँ। ऐसी दशा में सहायता मेरे लिए निरर्थक है।”

जॉनसन की आर्थिक स्थिति सुधरी तो उसने मौज-मजा करने की बात न सोची, वरन् उसे जिन परिस्थितियों में होकर गुजरना पड़ा था, उन्हीं परिस्थितियों में पड़े हुए व्यक्तियों की सहायता में अपने धन का उपयोग करता रहा और अपना जीवन गरीबी में ही काटा। उसके घर में कई पागल, मूर्ख, झगड़ालू, फूहड़, बेवकूफ , कहलाने वाले लोग पड़े रहते थे और आश्रय पाते थे। लोग कहते थे कि ये सब बेकार हैं इन्हें क्यों पाल रखा है? तो भी वह यही कहता—आपकी दृष्टि में आज जो बेवकूफ है, हो सकता है वह वस्तुतः वैसा न हो। मैंने भी बहुत दिनों बेवकूफों की श्रेणी में रहकर दिन काटे हैं यदि जीवन के अन्तिम दिनों में अपनी इस बिरादरी की कुछ सेवा कर सकूँ तो इसमें बुरा भी क्या है?

यह ठीक है कि कठिनाइयाँ मनुष्य की प्रगति का रास्ता कुण्ठित करती हैं और सुविधाएँ मिलने से आगे बढ़ना सरल हो जाता है। पर यह भी ठीक है कि वे दोनों ही व्यक्ति के आत्मविश्वास के आगे तुच्छ हैं। यदि आत्म-विश्वास न हो, दिल छोटा हो, और जरा-सी कठिनाई को देखकर हिम्मत हार जाय तो फिर अनेक सुविधाएँ होते हुए भी उसकी गाड़ी रुकी ही पड़ी रहेगी। आशंकाओं, भयों और दुश्चिन्ताओं से ही उसका मन काँपता रहेगा और हर छोटी-बड़ी कठिनाई उसके उत्साह को ठण्डा करती रहेगी। ऐसी दशा में अच्छी परिस्थितियों के बीच रहकर भी कोई व्यक्ति अपने जीवन में कहने लायक सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। किन्तु यदि अपना मनोबल स्थिर है, कठिनाई को देखकर विचलित न होने और उसका मुकाबला करने के लिए साहस के साथ अड़ जाने का स्वभाव है तो बाधाओं को झक-मारकर रास्ता छोड़ना पड़ेगा। अदम्य उत्साह और प्रबल पुरुषार्थ को कुण्ठित कर सके ऐसी कोई शक्ति इस संसार में नहीं है।

काना, रोगी, गरीब, कुरूप जॉनसन की कब्र वेस्ट-मिनिस्टर एवे में बनी है, जहाँ इंग्लैंड के प्रतिष्ठा प्राप्त महापुरुष दफनाए जाते हैं। यह कब्र उस जगह से पास ही है जहाँ उसकी माँ रानी का स्पर्श कराने ले पहुँची थी। सेम्युअल अब नहीं रहे पर उसके जीवन से अनुभवसिद्ध शिक्षा अभी भी मौजूद है कि—यदि व्यक्ति में आत्मविश्वास, धैर्य और पुरुषार्थ समुचित मात्रा में हों तो बड़ी से बड़ी कठिनाइयाँ भी किसी की प्रगति का मार्ग अवरुद्ध नहीं कर सकतीं।


लोकमान्य तिलक

सन् 1905 में लोकमान्य तिलक का विचार विदेश जाने को हो रहा था। उन दिनों समुद्र यात्रा करना धर्म विरुद्ध माना जाता था और जो ऐसा करते थे जाति से निकाल दिये जाते थे। तिलक ने सोचा कि पण्डितों से व्यवस्था मिल जाय तो फिर अड़चन न रहेगी।

तिलक काशी पहुँचे और वहाँ के प्रमुख महामहोपाध्याय से प्रार्थना की कि समुद्र यात्रा से धर्म हानि न होने की व्यवस्था वे दे दें तो बड़ा अच्छा हो।

पण्डित जी ने कहा—”काम कठिन है। पर यदि आप पाँच हजार रुपया खर्च करें तो व्यवस्था मिल सकती है।” रिश्वत देकर धर्म को अपने पक्ष में करना लोकमान्य को उचित प्रतीत न हुआ। अधर्म से धर्म खरीदा जाय तो फिर उसका महत्व ही क्या रह जायगा। वे उल्टे पैरों वापिस लौट आये और बिना व्यवस्था के ही अपना काम चलाया।


वाणी का व्यभिचार रोका जाय

अपने मनोभाव, विचार, इच्छा आकाँक्षाओं की अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य शब्द का आश्रय लेता है। शब्द वाणी और लिपि के माध्यम से व्यक्त होता है। जब मनुष्य कुछ कहना चाहता है या अपने किन्हीं भावों को व्यक्त करना चाहता है तो उन्हें लिखकर अथवा बोलकर ही व्यक्त करता है। जहाँ तक बोलने की बात है यह वक्त और श्रोता के बीच विचार विनिमय का तत्कालिक किन्तु अस्थायी माध्यम है। लिपि के माध्यम से कही गई बात अधिक समय तक स्थायी रहने वाली होती है।

प्रयोग चाहे किसी भी रूप में हो मनुष्य के विचारों, भावों आदि की अभिव्यक्ति के लिए शब्द एक महत्वपूर्ण माध्यम है। मनुष्य ही नहीं इतर प्राणियों में भी अपनी भाषा, अपने शब्द होते हैं, जिनके माध्यम से वे परस्पर अपने भाव प्रकट करते हैं, एक बन्दर किसी विपत्ति में हो तो वह इस तरह चिल्लाता है कि उसे सुनकर दूसरे बन्दर एकत्र हो जाते हैं। इसी तरह चिड़ियाँ, कुत्ते, बिल्ली आदि प्राणी भी अपने विशेष शब्दों के माध्यम से अपने मनोभावों को व्यक्त करते हैं। इतना अवश्य है कि पशुओं की वाणी का दायरा सीमित और परम्परागत ही रहता है जबकि मनुष्य ने अपने बुद्धिबल से भाषा के महत्वपूर्ण विज्ञान को जन्म दिया है।

शब्द, वाणी मनुष्य के लिए ज्ञान का द्वार खोल देती है। भर्तृहरि ने लिखा है “संसार में शब्द के बिना ज्ञान प्राप्ति सम्भव नहीं।” बिना सुने पढ़े, ज्ञान प्राप्ति असम्भव है। बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया है “सर्वेषाँ वेदानाँ वागेबायतनम्।” “वाक् ही ज्ञान का एकमात्र अधिष्ठान है।” “शब्द-कामधेनुः” शब्द कामधेनु हैं जो मनुष्य के समक्ष अपार ज्ञानराशि का भण्डार खोल देते हैं।

किन्तु जिस तरह कल्प-वृक्ष के नीचे बैठकर मनुष्य महान् ऐश्वर्य का अधिकारी भी बन सकता है तो दुष्कल्पनाओं के द्वारा विनाश को भी प्राप्त हो सकता है, उसी तरह शब्द भी अपने अच्छे या बुरे परिणाम उपस्थित करता है। मनुष्य जो कुछ बोलता है उसका अच्छा या बुरा प्रभाव समाज पर पड़ता है और हृदयानुकूल ही बोलने वाले को परिणाम प्राप्त होते हैं। जिस तरह मनुष्य के अच्छे कार्यकलाप दूसरों को सुख देते हैं और उससे स्वयं को सन्तुष्ट करते हैं, बुरे कार्यों से दूसरों का अहित होता है स्वयं के जीवन में भी अशान्ति का कारण बनते हैं, उसी तरह अच्छे या बुरे शब्द भी परिणाम पैदा करते हैं। सन्त कबीर ने कहा है—

“शब्द शब्द सब कोई कहें शब्द के हाथ न पाँव।

एक शब्द औषधि करे एक शब्द करे घाव॥

एक शब्द सुखरास है एक शब्द दुखरास।

एक शब्द बन्धन कटें एक बनें गल फास॥

शब्दों का सदुपयोग करके भली प्रकार बोलकर दूसरों को सुख पहुँचाया जा सकता है, तो दुरुपयोग करके दुःख।

महाभारत के आदि पर्व में एक स्थान पर आया है कि “वाणी से भी बाण-वृष्टि होती है। जिस पर इसकी बौछारें पड़ती हैं वह दिन-रात दुःखी रहता है।” इसी मत को प्रतिपादित करते हुए सन्त कबीर ने कहा है—

मधुर वचन है औषधी कटुक वचन है तीर।

श्रवन द्वार पै संचरे साले सकल शरीर॥

मनुष्य की वाणी अमृत भी है और विष भी। औषधि भी है और विषबाण भी। शब्दों का सदुपयोग करके अपना और समाज का बहुत बड़ा हित साधन किया जा सकता है तो दुरुपयोग करके दूसरों को क्लेश हानि पहुँचाई जा सकती है और अपना अहित भी किया जाता है।

वाणी के दुरुपयोग करने को शास्त्रकारों ने वाचिक पाप कहकर उसकी भर्त्सना की है। महाराज मनु ने वाणी के दुरुपयोग की निन्दा करते हुए कहा है।

वाच्यार्या नियताः सर्वेवां मूला वाग्विनिसृता।

ताँ तु यः स्तेन वेद्वाचं सर्व स्तेय कृन्नरः॥

—मनुस्मृति 4। 256

मनुष्यों के सभी व्यवहार वाणी द्वारा ही होते हैं। हमारे विचारों के आदान-प्रदान के लिए वाणी के सिवा कोई अन्य माध्यम नहीं। जो मनुष्य वाणी का व्यभिचार करता है, उसका दुरुपयोग करता है वह सब पूँजी की ही चोरी करता है।”

वाणी का दुरुपयोग मनुष्य को जीवन के सभी पहलुओं में असफल बनाता है। झूँठ बोलकर धोखा देकर चालाकी भरे शब्दों का व्यवहार करके मनुष्य दूसरों को विश्वास से रहित बना देता है। ऐसे व्यक्ति यों का कोई साथ नहीं देता। धूर्त, चालाक, लम्पट, वाचाल व्यक्तियों से सभी बचने का प्रयत्न करते हैं।

खेद का विषय है आज के युग में भाषा विज्ञान का जितना विकास हुआ है, वाणी को प्रभावशाली वैज्ञानिक रूप देने में जितना अन्वेषण हुआ है उतना ही वाणी का व्यभिचार बढ़ गया है। आजकल शब्द ज्ञान के स्रोत न रहकर वाणी विलास, तथाकथित वाक्चातुरी या छल, दूसरों को उल्लू बनाने का साधन बनते जा रहे हैं। सच को झूठ और झूठ को सच बनाने के लिए किया जाने वाला शब्दों का जोड़ वाणी व्यभिचार नहीं तो क्या है? परस्पर बातचीत, संवाद, लेखन आदि में शब्दों का होने वाला दुरुपयोग आज कम नहीं है।

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो,

न च प्रमादात्तपसोवाप्यलिंगात्।

एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वाँ-

स्तस्यैव आत्मा विशतेब्रह्मधाम।

यह आत्मा बलहीनों को प्राप्त नहीं होता। न प्रमादियों को मिलता है। न अविधिपूर्वक तप वालों को उपलब्ध होता है। किन्तु जो विवेकवान् साधक उचित मार्ग से प्रयत्न करते हैं उन्हीं का आत्मा ब्रह्मधाम में प्रवेश पाता है।

अखबारों में दिए जाने वाले झूठे सनसनीखेज समाचार, भद्दी और दुष्प्रवृत्तियों को भड़काने वाली आकर्षक विज्ञापनबाजी, अश्लील साहित्य ने लिपि में शब्दों की दुर्दशा की है, तो परस्पर बोलचाल में बरती जाने वाली चालाकी, वाक्चातुरी, झूठ, छल, फरेब आदि ने सम्भाषण में। तात्पर्य यह है कि हर दिशा में वाणी व्यभिचार, शब्दों का दुरुपयोग काफी बढ़ गया है। शब्द जो मनुष्य के ज्ञानवर्द्धन और प्रेरणा देने का महत्वपूर्ण साधन हैं वह दुरुपयोग करने पर विषतुल्य बन जाता है। विभिन्न रूपों में होने वाला शब्दों का दुरुपयोग आज हमारा कुछ कम अहित नहीं कर रहा। विश्वास ही नहीं होता किसी के कहे या लिखे पर। इसमें कोई सन्देह नहीं कि दुष्ट दुराचारी व्यक्ति भी अपनी वाक्चातुरी से अपने को भला सिद्ध कर सकता है। कोई बदमाश लोग शब्दचातुरी के द्वारा ऐसा चकमा देते है कि अच्छों-अच्छों को भी धोखा खा जाना पड़ता है।

लोग बिना सोचे विचारे वृत्तियों की उत्तेजनावश चाहे कुछ बोल जाते हैं। किसी बात पर तनिक ताव आया कि दूसरों को गाली गलौच उल्टा-सीधा कहना शुरू किया। ऐसी स्थिति में बातचीत का उद्देश्य-अर्थ आवश्यकता को न समझकर मन चाहे बकते जाना भी वाणी व्यभिचार ही है। फ्रेंकलिन ने कहा है पैर फिसलने की गल्ती को ठीक किया जा सकता है किन्तु जबान फिसल जाने पर उसे ठीक करना सम्भव नहीं होता।” पता नहीं दिनभर में हमारी जबान कितनी बार फिसलती है, कभी इसका हमने ध्यान किया है?

अपनी ही बात को सब कुछ मान उसे सर्व सम्मत मान लेना वाणी का दुरुपयोग है। इसी तरह व्यवहार में अति चतुरता का होना शब्दों को निर्जीव बना देता है। ऐसी चतुराई से दूसरों के हृदय में अश्रद्धा उत्पन्न हो जाती है और श्रद्धा के अभाव में शब्दों का कोई महत्व नहीं होता।

इस तरह हम क्षण-क्षण, बोलकर, लिखकर तरह-तरह से शब्दों का दुरुपयोग करते हैं, और वाणी के महत्व, शक्ति को क्षीण करते हैं। तथाकथित वाणी व्यभिचार से हम अपना और समाज का इतना बड़ा अहित करते हैं कि बुरे कार्य करने पर भी इतना न हो। किसी भी रूप में शब्दों के इस दुरुपयोग, वाणी के व्यभिचार को रोका जाना चाहिये। बोलचाल में, लिखने पढ़ने में, व्यवहार में, जीवन के सभी क्षेत्रों में वाणी देवी को जनहितकारिणी, ज्ञानदायिनी, परस्पर सुख पहुँचाने वाली मानकर सच्चाई के आसन पर प्रतिष्ठित करना होगा, तब सचमुच वह हमारे लिए कामधेनु ही सिद्ध हो सकेगी।


मित्रता की आवश्यकता और उसका पोषण

अपनी राह पर एकाकी चलना कितना अखरता है? इस पर भी यदि मार्ग ऊबड़-खाबड़, लम्बा, भयावना हो तो राहगीर के लिए आगे बढ़ना और भी कठिन हो जाता है। कदाचित् ऐसे में राही को कुछ हमसफर साथी मिल जावें तो उसकी वह यात्रा कितनी सरल और सुखद बन जाय इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। जीवन यात्रा का लम्बा पथ जो अनेकों उतार-चढ़ाव, परिवर्तन, अनुकूल, प्रतिकूल, सुखद दुःखद परिस्थितियों से निर्मित होता है, इस पर एकाकी चल सकना जन साधारण के लिए सम्भव नहीं होता। मनुष्य अकेला तो सुख भी नहीं मना सकता। सुख की अनुभूति का माध्यम, उसे व्यक्त करने के लिये भी साथियों की आवश्यकता होती है। जीवन-पथ पर चलने के लिये अभिन्न संगी-साथी, सहयोगी की आवश्यकता मानव-जीवन का एक अनिवार्य पहलू है। विवाह का आधार तथा संसार के अन्य नाते रिश्तों का मूल कारण भी यही है। मानव-जीवन विभिन्न क्षेत्रों में बँटा हुआ है। इन सभी में पूर्णता, सफलता प्राप्त करने के लिए उसे साथी, सहयोगी, मित्रों की आवश्यकता पड़ती है। बिना मित्रों के सहयोग के जीवन के अधिकाँश कार्यक्रम असफल ही रहते हैं। प्रायः सभी क्षेत्रों में मित्रों की आवश्यकता रहती है।

जीवन की कटु, दुःखद, अनुभूतियों से मन में तरह-तरह के विचार, भाव एवं ग्रन्थियाँ अपना अस्तित्व गुप्त मन में कायम कर लेते हैं। और ये सब जहर की तरह प्रतिक्रिया पैदा कर मनुष्य को मन-ही-मन घुलाते रहते हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य यदि दिल खोल कर अपनी व्यथा किसी को कह सके, छिपे भावों को व्यक्त कर सके तो सहज ही उसका मन हल्का और स्वस्थ हो जाय, साथ ही अपने साथी से प्रेरणा प्रोत्साहन, पाकर मनुष्य फिर से आशा के साथ जीवन पर गतिशील हो जाय।

एकाकीपन के कष्ट से बचने के लिये, जीवन व्यापार में सहयोग देने के लिये, सुख-दुःख में अभिन्न साथ के लिये मनुष्य को मित्रों, दोस्तों, साथियों की आवश्यकता होती है। कोई भी व्यक्ति अपने आप में पूर्ण नहीं होता अतः अनेक व्यक्ति यों से संपर्क बनाकर मनुष्य पूर्ण बनने का प्रयत्न करता है। मनुष्य को जीवन में अभिन्न और योग्य मित्र मिल जाना एक दैवी वरदान है, संसार की सबसे बड़ी सम्पत्ति है और जीवन की सफलता का महत्वपूर्ण आधार है। सचमुच वे लोग भाग्यशाली हैं जिन्हें अभिन्न मित्र मिल जाते हैं।

सद्गुण, सहानुभूति, आत्मीयता, सज्जनता, उदारता, सदाचार आदि के आधार पर मित्रता के सम्बन्ध कायम होते हैं। मित्र, संगी, साथी, सहयोगी प्रयत्न करने पर मिल भी जाते हैं किन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात है मित्रता को स्थिर और जीवित रखना, उसे विकसित करना। संसार में सच्चे मित्रों की कमी नहीं किन्तु मित्रता को जीवित कैसे रखा जाय, उसे दिनों-दिन मधुर और गहरा कैसे बनाया जाय इस ज्ञान के अभाव में मिले हुये मित्र भी दूर हो जाते हैं। अपने भी पराये बन जाते हैं।

मैत्री सम्बन्धों में, संगी, साथी सहयोगियों के बीच में अभिमान के लिये कोई स्थान नहीं। दूसरे शब्दों में मित्रता, आत्मीय सम्बन्धों का प्रमुख शत्रु अहंकार है। अभिमानग्रस्त व्यक्ति सदैव अपनेपन को विजयी रखने का प्रयत्न करता है। ऐसी स्थिति में दूसरे के स्वाभिमान को नीचा होना पड़ेगा, जिसे कोई भी जीवन वाला, आत्मगौरव को समझने वाला व्यक्ति स्वीकार नहीं करेगा। वस्तुतः दो मित्रों में प्रत्येक का अपने-अपने स्थान पर एक सा स्थान है। उम्र में सम्पन्नता या ज्ञान में छोटे-बड़े होने पर भी मित्रता के नाते दोनों समान हैं। यह बात अलग है कि उनमें एक स्वेच्छा से दूसरे का सम्मान करता है उसे बड़ा समझता है। किन्तु अपने को बड़ा और दूसरे को छोटा समझना मित्रता के लिए घातक विष है। इस तरह की मित्रता अधिक दिन नहीं टिकती न उसमें असलियत ही रहती है। एक दूसरे को समान समझना, अपनेपन को प्रधानता न देना, मित्रता के लिये आवश्यक है। जो लोग अपनी ही बात को तरजीह देते हैं, अपने ही मत को यही मानते है उन्हें कभी सच्चे मित्र नहीं मिलते। ऐसे व्यक्ति यों के साथ स्वार्थलोलुप, चापलूस व्यक्ति ही मित्रता का स्वाँग रचकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। अभिमान घृणा को जन्म देता है। अभिमानी अपने को श्रेष्ठ समझता है, दूसरों को गिरा हुआ। इससे घृणा को प्रश्रय मिलता है और घृणा का तीव्र विष मित्रता को सदा के लिये नष्ट-भ्रष्ट कर देता है।

मित्रता, त्याग, बलिदान, और आत्मोत्सर्ग पर जीवित, रहती है। जहाँ स्वार्थ, लाभ की कामना रहती है वहाँ मित्रता टिक नहीं सकती। मनुष्य कितनी ही सावधानी बरते, किन्तु एक न एक दिन स्वार्थ की भाषा प्रकट हुए बिना नहीं रहती। साधारण से व्यवहार में भी स्वार्थपरता का दृष्टिकोण स्पष्ट हो जाता है।

आज-कल बाजार की मिलावट, सेल्समैनों की-सी हमदर्दी, व्यभिचारी के सेवा त्याग के स्वाँग की तरह ही मित्रता का भी रूप बन गया है। उपयोगी व्यक्ति , कुछ लाभ पहुँचाने वाले लोगों से ही मित्रता के झूँठे सम्बन्ध जोड़े जाते हैं—परस्पर बड़े-बड़े आदर्श, त्याग, सेवा, वायदों की लम्बी-लम्बी बातें की जाती हैं, किन्तु अफसोस है ऐसी मित्रता स्वार्थ की कठोर देहली से टकराकर कुछ ही समय में नष्ट-भ्रष्ट हो जाती हैं। ऐसे मित्र बाजार में मिल जाते हैं। दुनिया के बाजार में फैले हुए नकली माल की तरह ही आज-कल ऐसी नकली मित्रता का ही चारों ओर बोलबाला है। यदि कहीं सच्ची मित्रता है तो उसकी संख्या उसी तरह है जैसे कंकड़ों के पहाड़ में दो तीन हीरे के टुकड़े।

परस्पर निःस्वार्थ ही और इसके साथ ही एक-दूसरे की समस्याओं को समझते हुए बिना माँगे कहे स्वेच्छा से एक-दूसरे का उदारतापूर्वक सहयोग करना ही सच्ची मित्रता की परीक्षा होती है। मित्रता परस्पर एक आत्मिक समझौता है जिसमें एक की व्यथा दूसरे की व्यथा, एक-दुःख दूसरे का दुःख होता है।

मैत्री-सूत्रों से जहाँ तक हो किसी तरह की माँग-पेश न की जाय। स्पष्ट तौर पर तो माँगना सर्वथा वर्जित है। मित्रता के पीछे किसी तरह की आशा महत्वाकाँक्षायें नहीं रखनी चाहिये। क्योंकि सम्भव है वे पूर्ण न हों और फिर मनुष्य को निराशा का सामना करना पड़े। वैसे आशा-आकाँक्षा में सदैव स्वार्थ भाव निहित होता है। एक की पूर्ति हो जावे तो दूसरी उठ खड़ी होती है।

मित्रता आन्तरिक प्रसन्नता की वृद्धि, स्वान्तसुखाय मनोभूमि के लिये एक सामाजिक संयोग है। बाह्य लाभ, स्वार्थ, आशा, आकाँक्षाओं के लिये उसमें कोई गुंजाइश नहीं है। वस्तुतः मानसिक और नैतिक क्षेत्र में समानता, सामंजस्य, एकरसता का नाम ही मित्रता है। इनमें जितनी प्रगाढ़ स्थिति, और अनन्यता पैदा होगी उतना ही मित्रता का स्वरूप भी निखरता जायगा। बाह्य जीवन में ही नहीं अपितु मानसिक संयोग जितना अधिक होगा मित्रता भी उतनी ही सुखकर होगी।

मित्रता कोई सौदा अथवा जुए का दाव नहीं है जिसमें तकाजे किए जायें, हठ किया जाय। यह तो स्वेच्छा प्रेरित एक दूसरे से मानसिक सान्निध्य, अनन्यता, प्राप्त करने का आधार है। जब किसी बात के तकाजे किए जाते हैं, कोई बोझ डाला जाता है तो लोग ऐसी मित्रता से पीछा ही छुड़ाना चाहेंगे। एक दूसरे के मनोभावों का ध्यान रखते हुये यह प्रयत्न किया जाय जिससे एक दूसरे को इन्कार करने का कभी अवसर ही न आये। कभी इन्कार भी करना पड़े तो वह भी हार्दिक सचाई के साथ अपनी परिस्थिति बताते हुए। अवहेलना, घृणा, उकताहट का भाव न हो। इससे मित्रता में फर्क नहीं पड़ेगा।

बुरे स्वार्थों को रखकर की जाने वाली सन्धिबद्ध मित्रता एक बुरा व्यापार सिद्ध होती है। पृथ्वीराज चौहान से बदला लेने को जयचन्द ने मुहम्मदगौरी से मित्रता की, किन्तु वह भी अंत में पकड़ कर मार डाला गया। किसी भी पाप-कर्म, दुष्कर्म, अनीति के लिये होने वाली मैत्री मित्रता नहीं। डकैत, चोर, गुण्डे, शराबी, जुआरियों कि मित्रताएं प्रायः नष्ट-भ्रष्ट होती देखी जाती है। इस तरह के मित्र परस्पर एक दूसरे की जान ले बैठने पर भी उतारू हो जाते हैं।

मित्रता का अर्थ है पूरा भरोसा, पूर्ण विश्वास जिसने अंतर्गत एक दूसरे की गुप्त भावनायें विचार परस्पर मन में उतने ही रहें जितनी उनके स्वयं के मन में रहती हैं जब कोई व्यक्ति अपने मित्र की गुप्त बातें दूसरों से कहते फिरेगा तो वह उसका सबसे बड़ा दुश्मन बन जायगा। मित्रता दुश्मनी में बदल जाती है। अतः जब तक एक-दूसरे पर पूर्ण विश्वास न हो एक दूसरे से अभिन्न रूप में घुल न जायँ, दो हृदय मिलकर एक न बन जायँ तब तक अपने गुप्त भेद किसी को न बतायें जायें। रहस्यपूर्ण जीवन की बातें तो अक्सर छिपाकर ही रखी जायं। क्योंकि मनुष्य कमजोरियों का पुतला है। कभी न कभी भूल हो सकती है, उन्हें प्रकट किया जा सकता है कि जिन बातों को अपने मित्रों से छिपाकर रखना पड़े, उन्हें सर्वथा छोड़ ही देना चाहिये।

त्रुटियाँ सभी में होती हैं। सभी कुछ न कुछ भूल भी कर बैठते हैं। ऐसी स्थिति में अपनी ही भूल गल्ती मानकर उदारता क्षमा का परिचय देकर मित्र के लिये मार्गदर्शन देना चाहिए। शिकायत करना, रूठना, मनाना, आक्षेप करना मित्रता के लिये घातक विष है।

कभी-कभी गलतफहमी से कदाचित कुछ विरोध द्वेष की भावना पैदा भी हो जाय तो उससे विचलित नहीं होना चाहिये। न अपने को सही सिद्ध करने के लिए अन्य उपाय ही करने चाहिये। वरन् निश्छलता के साथ अपने स्थान पर स्थिर रहकर अपना भाव, दृष्टिकोण ठीक बनाए रखा जाय। स्वयं प्रभावित न हो हृदय से दूसरे पक्ष के प्रति हमदर्दी, सद्भावना, क्षमा, उदारता का व्यवहार किया जाय। इससे गलतफहमी भी जल्दी ही दूर होगी। भूलों को सुधारने, उन पर विचार करने को समय मिलेगा और मित्रता अपने वास्तविक रूप में फिर निखर उठेगी।

मित्रता के लिये एक महत्वपूर्ण गुण है हृदय की विशालता, उदारता और महानता। इसके कारण विपत्ति और गरीबी में भी मनुष्य को मित्रों की कमी नहीं रहती। हृदय की इस विकसित अवस्था से जंगल में भी मित्र मिल जाते हैं। पशु-पक्षी भी मित्र बन जाते हैं। राम वन में गये तो भील, बन्दर, भालू गिद्ध आदि पशु-पक्षी भी उनके अभिन्न मित्र बन गये। इसका मुख्य कारण उनके हृदय की महानता थी जिससे वे सभी को आत्मवत् मानकर निःस्वार्थ भाव से प्रेम करते थे।

उदारतापूर्वक एक दूसरे की सराहना, प्रोत्साहन मित्रता को सजीव और दृढ़ बनाता है। साथ ही इससे गिरे हुये उठते हैं और सफलता प्राप्त करते है। व्यंग विषभरे बाण की तरह हैं जो मनुष्य के हृदय के बीच की ठोस मित्रता को काट देते हैं। इनसे सदा दूर रहा जाय। सुकोमल व्यवहार उदारता आदरभाव मित्रता को चिरस्थायी बनाने के लिये आवश्यक है।


संयम

सम्राट पुष्यमित्र का अश्वमेध सानन्द सम्पन्न हुआ और दूसरी रात को अतिथियों की विदाई के उपलक्ष्य में नृत्योत्सव रखा गया।

यज्ञ के ब्रह्मा महर्षि पतंजलि उस उत्सव में सम्मिलित हुए। महर्षि के शिष्य चैत्र को उस आयोजन में महर्षि की उपस्थिति अखरी। उस समय तो उसने कुछ न कहा। पर एक दिन जब महर्षि योगदर्शन पढ़ा रहे थे तो चैत्र ने उपालम्भपूर्वक पूछा—गुरु वर ! क्या नृत्य गीत के रस-रंग चित वृत्तियों के निरोध में सहायक होते हैं?

महर्षि ने शिष्य का अभिप्राय समझा। उन्होंने कहा—सौम्य! आत्मा का स्वरूप रसमय है। रस में उसे आनन्द मिलता है और तृप्ति भी। वह रस विकृत न होने पावे और अपने शुद्ध स्वरूप में बना रहे, इसी सावधानी का नाम ‘संयम’ है। विकार की आशंका से रस का परित्याग कर देना उचित नहीं। क्या कोई किसान पशुओं द्वारा खेत चर लिए जाने के भय से कृषि करना छोड़ देता है? यह तो संयम नहीं पलायन रहा। रस रहित जीवन बनाकर किया गया संयम प्रयत्न ऐसा ही है जैसे जल को तरलता और अग्नि को ऊष्मा से वंचित करना। सो हे भद्र! भ्रम मत करो, रस को नहीं उसकी विकृति को ही हेय माना जाता है।

स्वाध्याय सन्दोह


परस्पर सहयोग से ही प्रगति होगी

सहयोग और सेवा का उच्च आदर्श

यदि इस पृथ्वी पर हमारा सामाजिक जीवन पारस्परिक प्रतियोगिता के स्थान में परस्पर सहायता के तत्व पर स्थापित हो जाय तो यही भूमण्डल स्वर्ग से भी उच्च कोटि का स्थान बन जाय। जब तक मानव-समाज में प्रतियोगिता तथा संघर्ष का सम्बन्ध है तब तक सामाजिक जीवन यथार्थ नरक ही तो है। इसमें निम्न स्वार्थ तथा मारधाड़ के सिवा और कुछ नहीं है। किन्तु पारस्परिक प्रतियोगिता के जंगली नियम को छोड़कर व्यक्ति तथा समाज परस्पर सहायता तथा सेवा को ही मानवीय जीवन का नियम मानकर जीना आरम्भ कर दें तो सर्वत्र मिलाप तथा सहकारिता ही दिखाई देंगे और तब यही दुःख तथा संकटपूर्ण संसार परम लोक बन जायगा।

मानवता का आविर्भाव ही पृथ्वी पर स्वर्ग के निर्माण तथा अवस्थिति के लिए हुआ है। स्वर्ग क्या है? आदर्श तथा नित्य प्रगतिशील जगत की मानवीय योजना ही स्वर्ग है। किन्तु धर्म के नाम पर दुकान खोलने वालों ने सर्वसाधारण को यह पट्टी पढ़ा रखी है कि इस संसार में दुःख तथा अमंगल के सिवा कुछ नहीं है। हाँ, यदि सुख प्राप्ति की आशा की जा सकती है तो मरणोपरान्त स्वर्ग जाने पर ही। यह आलोक सिद्धान्त प्राचीनकाल से मानव-सभ्यता तथा प्रगति में बाधक होता चला आता है। अब बहुत समय तक ठोकरें खाने के बाद मनुष्य समझने लगा है कि वह अन्ध तथा परम्परागत मिथ्या रूढ़ियों से मुक्त होकर अपने लिये एक नये संसार की रचना कर सकता है और सदाचार तथा प्रेम का आचरण करके यहीं पूर्ण शान्ति और आनन्द लाभ कर सकता है। —”चरित्र का विकास”

आप अनिवार्य रूप से एक सामाजिक प्राणी है

सामाजिक-चेतना जाग्रत होने की पहली शर्त यह है कि आप यह बात अच्छी तरह समझ लें कि आपके जीवन का प्रयोजन केवल अपने मनोरथों की सिद्धि करना है। आप अनिवार्य रूप से सामाजिक प्राणी है। दूसरा सुख-दुःख में भाग लेते हुए ही आपको जीना है। एक चेतना जाग्रत होने के बाद आपका दृष्टिकोण सर्वथा बढ़ जायगा। आपकी दिलचस्पी सार्वजनिक हित के काम में होगी। आप केवल मनोरञ्जक उपन्यासों में समय नष्ट न करके सामाजिक समस्याओं को सुलझाने के विषय पुस्तकें पढ़ना शुरू कर देंगे। आपको यह चिन्ता होने लगे कि अशिक्षितों को शिक्षित किस तरह बनाया जाय रोगियों की चिकित्सा का प्रबन्ध कैसे किया जाय? अभावग्रस्त लोगों का दुःख दारिद्रय दूर करने का सबसे अच्छा उपाय कौन-सा है?

इस चिन्ता के जागृत होते ही आपकी इच्छा होगी कि आप इन समस्याओं का स्वयं अध्ययन करें। अध्ययन बिना निरीक्षण के नहीं होता। निरीक्षण के लिए आपको गरीबों, अनपढ़ लोगों और बीमारों में जाना पड़ेगा। उनसे मिलकर आप उनको सांत्वना देंगे, उनके दुःख की वेदना सुनकर आँसू बहा देंगे। उन आँसुओं से आपकी आत्मा की मलिनता धुल जायगी। आपकी आँखों की दृष्टि विमलप हो जायगी।

अपने से गरीब लोगों में जाकर आपको अनुभव होगा कि ईश्वर के वरद पुत्रों को अधिक उदार होने की आवश्यकता है। लाखों का दुर्भाग्य थोड़े से लोगों की उदारता से सौभाग्य में बदल सकता है। आप देखेंगे कि किस तरह कुछ लोग चुपचाप जीवन की असह्य यंत्रणाओं को बर्दाश्त कर रहे हैं। बलिदान केवल ऊँचे ध्येय के लिये, बड़ी-बड़ी विज्ञप्तियों के साथ नहीं किया जाता; छोटी-छोटी बातों में भी मौन रहकर कितना ही समर्पण किया जा सकता है। तब आपको यह सोचकर पश्चाताप होगा कि जब आप बड़ी आसानी से किसी का भार हलका कर सकते थे, उस समय आप केवल अपने आँचल में मुँह छिपाये क्यों बैठे रहे? स्मरण रखिए कि उच्च कोटि का चरित्र पर्वत की गुफाओं में बैठकर प्राप्त नहीं किया जा सकता। सामाजिक चेतना से शून्य आत्मा हमारी प्रवृत्तियों का नेतृत्व कभी नहीं कर सकती।

—”चरित्र निर्माण”

समस्त संसार ही हमारा परिवार है

वास्तव में समस्त संसार एक परिवार है। जो मनुष्य जितना बड़ा है उसका परिवार भी उतना ही बड़ा होगा और जो मनुष्य जितना छोटा है उसका परिवार भी उतना ही छोटा होता है। जिसके जीवन का जितना अधिक विकास होता है उसका परिवार उतना ही विशाल होता चला जाता है। इस परिवार की कोई सीमा नहीं है। किसी का परिवार दस-बीस व्यक्ति यों का होता है, किसी का परिवार सौ, दो सौ से बनता है और किसी के परिवार की संख्या लाखों-करोड़ों तक पहुँच जाती है। इसीलिए परिवार की कोई सीमा नहीं हो सकती। संसार में छोटे-से-छोटे परिवार भी हैं और बड़े-से-बड़े परिवार भी हैं। इसीलिए कहा जाता है कि जो मनुष्य जितना ही बड़ा है उसका उतना ही बड़ा परिवार है। ईसा, बुद्ध और गाँधी के परिवार की सीमा विस्तृत होकर सम्पूर्ण संसार तक पहुँच गई थी।

जिसके निकट सारा संसार एक परिवार बन जाता है उसके निकट अपने और पराये में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं रह जाता। वह सभी को अपना समझता है, सभी के साथ स्नेह को संसार के महान पुरुषों ने अधिक-से-अधिक महत्व दिया है। इनका महत्व बढ़ाने के लिए ही उन महापुरुषों ने इन्हें विश्वबन्धुत्व का नाम दिया है। इस नाम में बहुत अधिक मधुरता और स्नेह है। हम समस्त संसार के मनुष्यों के साथ भ्रातृ-स्नेह का अनुभव करें और उनके दुःख को अपना दुःख एवं उनके सुख को अपना सुख समझें, यह एक बहुत ऊँची भावना है। संसार के सभी स्त्री-पुरुष एक ही परिवार के सदस्य हैं। संसार के किसी भी बच्चे को हम अपने परिवार का एक बच्चा समझें और संसार के किसी भी मनुष्य के साथ हम वही स्नेह करें जो अपने किसी निजी सम्बन्धी से किया करते हैं, तो यह एक बहुत बड़े कर्त्तव्य-धर्म का पालन करना समझा जायगा।

—”विचार और विज्ञान”

मनुष्यों का हित अन्योन्याश्रित है।

जीवन की सबसे बड़ी श्रेष्ठता इसी में है कि एक मनुष्य अन्य मनुष्यों को अपना समझे और उनके काम आवे। इस प्रकार दूसरों को प्रसन्न बनाने की भावना में वह स्वयं अधिक प्रसन्न और सुखी हो सकेगा। यही भावना प्रकृति का आदेश है। इस प्रकृति के द्वारा न जाने कितने पुरुष दूसरों की सेवा और सहायता करके महापुरुष बन गये। परन्तु जिन लोगों ने दूसरों के साथ घृणा करना सीखा उनका भयानक पतन हुआ। मालूम नहीं कि मनुष्य जाति में परस्पर द्वेष की भावना किस आधार पर उत्पन्न की गई? विश्व की सम्पूर्ण मनुष्य जाति एक शरीर के रूप में है और अगणित व्यक्ति उसके संख्यातीत अंग-प्रत्यंग हैं। ये छोटे भी हैं और बड़े भी परन्तु उनमें किसी की आवश्यकता कम और किसी की अधिक नहीं है। सम्पूर्ण शरीर की रक्षा के लिए सब की आवश्यकता समान रूप से है। इस सत्य को अनुभव करके मनुष्य मात्र के शुभ-चिन्तक, सेवक और सहायक महात्मा पाल ने कहा है—

“आँखें हाथों से नहीं कह सकती कि हमको तुम्हारी आवश्यकता नहीं और न मस्तक पैरों से कह सकता है कि हमको तुम्हारी जरूरत नहीं है। यदि शरीर का एक अंग पीड़ित होता है तो सम्पूर्ण शरीर पीड़ित और अस्त-व्यस्त हो जाता है। यही मानव प्रकृति है और यदि उसका कोई एक अंग स्वास्थ्य प्राप्त करता है तो उसका लाभ सम्पूर्ण शरीर को मिलता है।” महात्मा पाल के कथनानुसार “एक मनुष्य दूसरे को उसी दशा में हानि और पीड़ा पहुँचा सकता है जब वह स्वयं पीड़ित होता है और हानि उठाता है; और कोई एक देश अथवा राष्ट्र किसी दूसरे देश अथवा राष्ट्र को उसी दशा में क्षति पहुँचा सकता है, जब वह स्वयं क्षति उठाता है।” जब यह सत्य है कि एक मनुष्य दूसरे को हानि पहुँचाने के साथ-साथ स्वयं भी हानि उठाता है तो यह भी निश्चय है कि एक मनुष्य दूसरे को उन्नत बनाकर स्वयं भी उन्नति करता है। अब यह समझना हमारा काम है कि हम उन्नत होना चाहते हैं अथवा पतित, लाभ उठाना चाहते हैं या हानि?

—”सादगी से श्रेष्ठता”


अश्लीलता और कामुकता का अभिशाप

भारतवर्ष के प्राचीन मनीषी चरित्र की महिमा को भली प्रकार समझते थे और इसलिये उन्होंने धन और बल के बजाय अधिकाँश में सदाचार, तप, त्याग, परोपकार आदि की ही महिमा गाई है, क्योंकि ये ही सब चरित्र के लक्षण हैं। इसीलिये यहाँ के राजा-महाराजा और धन, कुबेर लोग कुटियों में रहने वाले मुनियों के सामने नतमस्तक होते थे और किसी विषय में उनकी आज्ञा उल्लंघन करने का साहस नहीं करते थे।

यद्यपि चरित्र की व्याख्या बहुत विस्तृत है और सत्य, न्याय, क्षमा आदि अनेकों गुणों का उसमें समावेश होता है, पर ब्रह्मचर्य, पर-स्त्री का सर्वथा त्याग, नारी मात्र को पवित्र दृष्टि से देखने को उसका विशेष अंग माना गया है। इसका कारण यही है कि जिस व्यक्ति में इस प्रकार का दोष पाया जायगा, जो इन्द्रियलोलुप होगा, उसमें से अन्य गुणों का भी लोप हो जायगा। कामी और कुत्तों की तरह पर-स्त्रियों के पीछे दौड़ने वाले मनुष्य में आत्म-सम्मान, आत्म-शक्ति, आत्म-तेज आदि का रहना असम्भव है और इनके बिना त्याग, उदारता, परोपकार की भी सम्भावना नहीं की जा सकती। इतना ही क्यों कामासक्त पुरुषों का पूर्ण रूप से विश्वास भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे लोगों को कोई भी सुन्दरी तथा हाव-भाव में निपुण रमणी अपने फन्दे में फँसाकर कर्तव्यच्युत कर सकती है। इसी तथ्य को दृष्टिगोचर रखकर प्राचीन काल से ही बड़े-बड़े शासक और राष्ट्रों के सूत्रधार अपने गुप्तचर विभाग में सुन्दर और भ्रष्ट-चरित्र नारियों को भी सम्मिलित करते रहे हैं ताकि उनके द्वारा विपक्षी राष्ट्र के कामासक्त अधिकारियों को जाल में फँसाकर वहाँ का भेद हस्तगत किया जा सके। इसका आशय यही है कि कामुक व्यक्तियों का चरित्र निर्बल पड़ जाता है और वे किसी उच्च कार्य के योग्य नहीं रहते।

कामुकता और अश्लीलता का अर्थ इतना ही नहीं है कि मनुष्य प्रत्यक्ष रूप से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करे। मन के विचारों और भावना का भी महत्व कम नहीं है। जो लोग किसी कारण या अभाव-वश शारीरिक-सम्बन्ध से वंचित रहकर मन से विषयों का ध्यान किया करते हैं वे और भी दूषित होते हैं और गीता में ऐसे ही लोगों को ‘विमूढ़ात्मा’ कहकर पुकारा गया है और यह भी कहा गया है कि वे शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं। कारण यही है कि विषय वासना के वेग की किसी रूप में पूर्ति कर लेने वाला तो कुछ समय के लिये शान्त हो जाता है और कुछ समय ऐसा जीवन व्यतीत करने के पश्चात् संयम का जीवन भी बिता सकता है, पर जो सदा मन से ही विषयों का चिन्तन करता रहता है और उनकी पूर्ति में असमर्थ रहता है उसकी विचारधारा दिन पर दिन भ्रष्ट और निकृष्ट होती जाती है और उसका पतन होना और भी अधिक संभव और सुगम होता है।

कामुकता के विचारों और निरन्तर उनका चिन्तन करते रहने से मनुष्य का मानसिक तथा आत्मिक बल खोखला हो जाता है। शारीरिक दृष्टि से चाहे वह बलवान और आकर्षक जान पड़े, पर नैतिकता, साहस, धैर्य आदि का सर्वथा अभाव हो जाता है। ब्रह्मचर्य और संयम के द्वारा मनुष्य के भीतर से एक प्रकार की शक्ति विद्युत या चुम्बक की-सी पैदा होती है वह इस प्रकार के निकृष्ट विचारों तथा आचार द्वारा जाती रहती है। ऐसे व्यक्ति अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ नहीं रह सकते और न किसी कठिन परिस्थिति में धैर्यपूर्वक उसका मुकाबला कर सकते हैं। चिन्ता, निराशा, आशंका, अविश्वास आदि की भावनायें सदैव उनमें उत्पन्न हुआ करती हैं।

वर्तमान समय में मनुष्यों का दृष्टिकोण बहुत बदल गया है और बहुसंख्यक साधारण मनुष्य ही नहीं अनेकों विद्वान और चतुर व्यक्ति भी ऐसी बातों को निजी या ‘प्राइवेट’ कह कर उन पर आचरण करना आवश्यक नहीं समझते। निम्न कोटि के लोग तो इसको फैशन का एक अंग समझ बैठे हैं। पुराने ढंग के लोग भी इसको मर्दानगी का चिह्न बतलाते हैं। इस प्रकार आज कल नैतिकता तथा चरित्र की लगाम बहुत कुछ ढीली हो गई है और लोगों के आचरणों में बहुत शिथिलता आ गई है। इसके फलस्वरूप जाति की जीवनी शक्ति का ह्रास हो रहा है और लोगों की आन्तरिक शक्ति तेजी से विनष्ट होती जाती है। यों ऊपर से वे चमक-दमक के कपड़े पहिन कर और पौडर, क्रीम, साबुन, तेल आदि से चिकने-चुपड़े बन कर अपना काम चलाते रहते हैं, पर जिसको मनुष्यत्व कहा जाता है, उससे वे प्रायः रिक्त हो जाते हैं।

लोगों की इस हीन मनोवृत्ति के कारण आज कल गन्दे साहित्य और अश्लीलतापूर्ण चित्रों की बाढ़-सी आ गई है। सामान्य श्रेणी के युवक प्रायः ऐसी ही कहानियाँ और उपन्यास पढ़ना पसन्द करते हैं, जिनमें यौन-विषयों की गन्दी चर्चा पाई जाती है। उनको कोई सुरुचिपूर्ण नैतिक, सामाजिक या देशभक्ति का उपन्यास दे दीजिये तो वे दस-पाँच पन्ने पढ़ कर ही उसे अलग रख देंगे, पर कामुकता की बातों से भरे उपन्यासों को ढूंढ़-ढूँढ़ कर और माँग कर भी पढ़ते हैं। इसी प्रकार कितने ही लोग बहुत ही गन्दे चित्रों की पुस्तकें भी प्रकाशित करते रहते हैं। कानून के भय से इनकी गुप्त रूप से ही छापना पड़ता है, पर बड़े-बड़े नगरों में अनेक व्यक्ति इनको खुले तौर पर बेचते देखे जाते हैं।

सिनेमा तो इस घृणित मनोवृत्ति का सबसे बड़ा पृष्ठपोषक है। सच पूछा जाय तो गन्दे साहित्य और चित्रों की जो बढ़ोतरी इन दिनों हुई है उसका मूल यह सिनेमा ही है। वर्षों से यह प्रेम (शारीरिक) के गीत गा रहा है और कामुकता को भड़काने वाले दृश्य दिखला रहा है। धीरे-धीरे इन बातों ने समाज के एक बड़े भाग के दिमाग को प्रभावित कर दिया है और आज युवक ही नहीं छह और आठ वर्ष के बच्चे सिनेमा के शृंगार-रस के गाने गाते दिखाई पड़ते हैं। बहुत थोड़े घर ऐसे हैं जो सत्यानाशी लहर के प्रभाव से बचे हैं। नहीं तो क्या जवान स्त्री-पुरुष और क्या लड़के और बूढ़े सब सिनेमा के दीवाने हो रहे हैं। यह स्थिति देश तथा समाज के कल्याण की दृष्टि से अत्यन्त घातक और अहितकर है और राष्ट्र के कर्णधारों तथा शुभाकाँक्षियों को इसके निराकरण का प्रयत्न अवश्यमेव करना कर्त्तव्य है।


पूर्णता का अहंकार

बाप ने बेटे को भी मूर्ति कला ही सिखाई। दोनों हाट में जाते और अपनी-अपनी मूर्तियाँ बेच कर आते। बाप की मूर्ति डेढ़-दो रुपये की बिकती पर बेटे की मूर्तियों का मूल्य आठ-दस आने से अधिक न मिलता।

हाट से लौटने पर बेटे को पास बिठा कर बाप उसकी मूर्तियों में रही हुई त्रुटियों को समझाता और अगले दिन उन्हें सुधारने के लिए समझाता।

यह क्रम वर्षों तक चलता रहा। लड़का समझदार था, उसने पिता की बात ध्यान से सुनी और अपनी कला में सुधार करने का प्रयत्न करता रहा। कुछ समय बाद लड़के की मूर्तियों में रहने वाले दोषों की ओर उसका ध्यान खींचता। बेटे ने और भी अधिक ध्यान दिया तो कला भी अधिक निखरी। मूर्तियाँ पाँच-पाँच रुपये की बिकने लगीं।

सुधार के लिए समझाने का काम बाप ने तब भी बन्द न किया। एक दिन बेटे ने झुँझला कर कहा—आप तो दोष निकालने की बात बन्द ही नहीं करते। मेरी कला अब तो आप से भी अच्छी है, मुझे पाँच रुपये मिलते हैं जब कि आपको दो ही रुपये।

बाप ने कहा—पुत्र! जब मैं तुम्हारी उम्र का था तब मुझे अपनी कला की पूर्णता का अहंकार हो गया और फिर सुधार की बात सोचना छोड़ दिया। तब से मेरी प्रगति रुक गई और दो रुपये से अधिक मूल्य की मूर्तियाँ न बना सका। मैं चाहता हूँ वह भूल तुम न करो। अपनी त्रुटियों को समझने और सुधारने का काम सदा जारी रखो ताकि बहुमूल्य मूर्तियाँ बनाने वाले कलाकारों की श्रेणी में पहुँच सको।


गृहस्थ की दुर्दशा का महत्वपूर्ण कारण

बच्चों के बढ़ने के साथ ही माँ बाप के हृदय में उनका विवाह करके घर बसाने की, सुखी समृद्ध बनाने की बड़ी-बड़ी कल्पनायें उठने लगती हैं। माँ सोचती है “ नयी बहू का मुँह देखकर कब सौभाग्यवान बनूँगी।” उधर पिता भी सोचते हैं “नयी बहू आकर घर को स्वर्ग बनायेगी।” घर का प्रत्येक सदस्य नयी बहू के लिए किसी न किसी सुखद कल्पना में अवश्य खोया रहता है। स्वयं लड़के-लड़कियाँ भी संसार के अनुभवों से शून्य अपनी मधुर कल्पनाओं में कुछ कम खोये-खोये नहीं रहते। कई तो इस सम्बन्ध में अनजान भी रहते हैं। माँ-बाप की लालसा तीव्र हुई कि झट से सम्बन्ध तय हो जाते हैं। बाज-बजते हैं। उत्सव मनाया जाता है। शहनाइयाँ गूँजती हैं और धूमधाम के साथ विवाह आयोजन सम्पन्न होते हैं। नयी बहू घर में आती है।

समय के बीतने के साथ ही नयी बहू का आकर्षण भी कम होने लगता है। कुछ ही समय बीतता है कि कई बातें ऐसी पैदा हो जाती हैं जिनसे सास-बहू में खटकने लगती है। परस्पर ताने, फटकारें, दुर्वचनों का व्यवहार होने लगता है। घर की बेटी भी अपनी माँ का पक्ष लेकर भावज पर बरसती है।

रात दिन घर में होने वाली चख-चख जो पहले नहीं होती थी, उसका कारण बहू को समझकर कुल-पति श्वसुर भी बहू और उसके कुल की बुराइयाँ बखानने लगते हैं। स्त्री और बेटी द्वारा कान भर देने पर तो उनकी स्थिति और भी असन्तुलित हो जाती है!

गृह कलह, माँ बाप द्वारा आरोप-प्रत्यारोप, उधर बहू द्वारा अपने कष्टों की शिकायत सुन कर युवक भी परेशान हो जाता है। वह दोनों ही पक्षों से अनन्यता के नाते कुछ कह नहीं सकता। समय के बीतने के साथ ही रात दिन की अशान्ति से वह और भी अधिक असन्तुलित हो जाता है। माँ-बाप अथवा बहू पर अपनी अशान्ति प्रकट करता है।

उधर बहू भी जो अपने माता-पिता, भाई, बहन, घर वालों से बिछुड़ कर पति गृह में सुख के स्वर्णिम स्वप्न लेकर आई थी वह यह सब देखकर घबड़ा जाती है। पति- गृह में चारों ओर से बरसने वाली गालियाँ, तिरस्कार, आरोप, प्रत्यारोप, आलोचनायें आदि उसके धैर्य को विचलित कर देते है। संसार की कठोरता से अनजान, अज्ञ, कोमल, भावनाशील युवती इन परिस्थितियों में अधिक दिन सन्तुलित नहीं रह पाती और एक ना एक दिन उसका मानस उद्वेलित हो उठता है। अपने स्वतंत्र, मौलिक अधिकार, माँ-बाप के गौरव, स्वाभिमान पर चोट पड़ने से उसकी कोमल भावनायें कठोर और विद्रोही बन जाती हैं और फिर उसका उद्वेलित मानस गृह कलह की आग में घी का काम देता है। कई तेज मिज़ाज बहुएं तो बड़ी लड़ाका और रौद्र रूप बन जाती हैं। सारे घर की शान्ति काफूर हो जाती है। जो बहुएं बहुत ही संकोची और सुशीला होती हैं वे चिन्ता, क्लेश, अवसाद मानसिक घुटन में घुल-घुल कर अपना जीवन नष्ट कर लेती हैं। कई विक्षिप्त हो जाती हैं तो कई अन्य माध्यमों से अपने जीवन की इतिश्री तक कर लेती हैं। इन सभी परिस्थितियों में हमारे गृहस्थ जीवन की दुर्दशा, पतन, विनाश निश्चित है। अनेकों गृहस्थियाँ इसी कारणवश उजड़ती नष्ट भ्रष्ट होती देखी जा सकती हैं।

गृहस्थ जीवन की इस दुर्दशा से अधिकाँश परिवार ग्रस्त हैं। परस्पर कलह, लड़ाई-झगड़े, मनमुटाव, परस्पर आरोप-प्रत्यारोप, दोषारोपण, मतभेद आदि की विष-बेल ने परिवार के सभी सदस्यों को जकड़ लिया है। जिससे हमारे पारिवारिक जीवन की सुख समृद्धि उन्नति, प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो गया है। गृहस्थ जीवन की इस दुर्दशा ने व्यक्ति की शक्तियों को नष्ट कर उसे पंगु बना दिया है। जीवित होते हुए भी वह गृह कलह के विष-दंश से पीड़ित होकर निर्जीव-सा बनता जा रहा है। निराशा, उदासी, मानसिक घुटन में घुल-घुल कर उसका जीवन सत्व नष्ट होता जा रहा है।

व्यक्ति से ही समाज और समाज से ही राष्ट्र बनते हैं। ऐसा व्यक्ति समाज और राष्ट्र के निर्माण में क्या योग दे सकता है? गृहस्थ जीवन, जिसके ऊपर व्यक्ति समाज और राष्ट्र की स्थिति निर्भर है उसकी इस दुर्दशा का समाधान किए बिना सुख शान्ति उत्पत्ति विकास की कल्पना करना एक विडम्बना होगी। जो व्यक्ति गृहस्थ जीवन की दुर्घटना ग्रस्त गाड़ी के मलबे में दबा हुआ सिसक रहा है, वेदना से छटपटा रहा है वह समाज अथवा राष्ट्र के कल्याण के लिए सोच ही क्या सकता है? और क्या कर सकता है?

गृहस्थ जीवन की इस दुर्दशा के लिए प्रायः परिवार के सभी सदस्य किसी न किसी रूप में जिम्मेदार होते हैं। कोई कम कोई अधिक। बहू के घर में आ जाने पर दरअसल सास के व्यक्तित्व और अधिकारों में कुछ कमी अवश्य हो जाती है। पहले अकेली सास ही घर की मालकिन कर्ता-धर्ता थी अब उसमें बहू का व्यक्तित्व भी हिस्सेदार बन गया। घर के सदस्यों का, खासकर लड़का जिसका स्नेह केन्द्र माँ ही थी अब उसका ध्यान पत्नी की ओर भी बटने लग जाता है। घर के अन्य लोगों का भी आकर्षण केन्द्र नयी बहू बन जाती है। इस तरह अपने अधिकार और व्यक्तित्व का क्षेत्र घट जाने का कारण बहू को समझ कर सास उसे विभिन्न तौर तरीकों से तंग करने लगती है। बात-बात में जबरन अपना अधिकार जताने लगती है। ताने, फटकार, अपमान करके अपना असन्तोष कई बहानों से प्रकट करने लगती है। सब जगह बहू की बुराई शिकायत करती है। उधर माँ-बाप के घर में लाड़ प्यार स्वतन्त्रता का मधुर जीवन बिता कर आयी हुई बहू को यह सब असह्य होने लगता है और परस्पर संघर्ष की जड़ें और गहरी होने लगती हैं।

कई घरों में जहाँ बहू को बच्चे नहीं होते तो उसे तिरस्कार अपमान का भागी बनना पड़ता है। उसे बाँझ कहकर अपमानित किया जाता है। गालियाँ दी जाती है। इतना ही नहीं लड़के का दूसरा विवाह करने की तैयारी तक भी की जाती है। ऐसी स्थिति में उस बहू का क्या हाल होगा जो बेचारी अपने माँ बाप, भाई बहन, को छोड़ कर पति गृह में आई है? बहुएं भी कोई दूध की धुली नहीं होती। बहुओं में बढ़ता हुआ स्वच्छन्दतावाद, अनुशासनहीनता, मनमर्जी, बड़ों के प्रति आदर भाव में कमी लापरवाही, नारी सुलभ लज्जा शील का त्याग जो भारतीय परिवार के प्रतिकूल हैं, गृह कलह के लिए बहुत कुछ जिम्मेदार हैं। आज पारिवारिक जीवन की विशृंखलता और टूटने का एक कारण यह भी है। जो बहू अपनी सहन-शीलता, सेवा त्याग से सारे परिवार को स्नेह सूत्रों में बाँधे रहती थी वह परिवार का तनिक भी बोझ उठाने को तैयार नहीं होती, आने के साथ ही पति को बहका कर अपना न्यारा घर बसाने की योजना बनाती है।

पारिवारिक जीवन की गाड़ी सदस्यों के त्याग, प्रेम, स्नेह, उदारता, सेवा, सहिष्णुता और परस्पर आदर भाव पर चलती है। परिवार सहअस्तित्व, सामूहिक जीवन, सेवा और सहिष्णुता की पाठशाला मानी गई है। किन्तु परस्पर के सम्बन्ध स्वार्थपूर्ण-आपापूती, संकीर्णता, असहिष्णुता से भर जाते हैं तो परिवार नरक की साक्षात् अभिव्यक्ति के रूप में परिणित हो जाते हैं।

देखा जाता है बहू-बेटे के योग्य और वयस्क हो जाने पर भी बहुत से घरों में उन्हें परतन्त्र की तरह रखी जाता है, अभिभावक गण जिन्हें गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ युवा वर्गों को सौंपकर उच्च आदर्शों के लिए अपने आपको लगाना चाहिए वे अन्त तक भी घर के वातावरण में स्थित रहते हैं। युवा बहू बेटों को परतन्त्रता का जीवन अच्छा नहीं लगता। इससे पुरानी पीढ़ी में परस्पर मनोमालिन्य, अनादर के भाव पैदा हो जाते हैं।

पारिवारिक जीवन की दुर्दशा का मुख्य कारण है व्यावहारिक जीवन की शिक्षा का अभाव। लड़के और लड़कियों को अनुभवी वृद्ध गुरुजनों के संपर्क में रहकर व्यावहारिक जीवन में जीने की जो शिक्षा मिलनी चाहिए उसका आज कल सर्वथा अभाव है। विवाह से पहले कन्या को यह शिक्षा नहीं मिलती कि उसे पति-गृह में जाकर कैसे जीवनयापन करना है? उसका कर्त्तव्य उत्तरदायित्व क्या है? उसे किन-किन सद्गुणों के द्वारा परिवार की गाड़ी को चलना है? यही बात लड़कों के सम्बन्ध में भी है। पारिवारिक जीवन की शिक्षा का अभाव, गृहस्थ जीवन की दुर्दशा का मूल कारण है।


संतान पालन की शिक्षा भी चाहिये

मानव-जीवन के अनेक कर्त्तव्यों में संतान उत्पन्न करने और उसे यथायोग्य पालने का कार्य भी अत्यन्त महत्वपूर्ण है। यद्यपि यह एक प्राकृतिक नियम है इसलिये अनेक व्यक्ति इसके विषय में अधिक सोच-विचार करना आवश्यक नहीं समझते पर यह उनकी बड़ी भूल है। मनुष्य इस समय प्रकृति नियमानुकूल नहीं रहता वरन् उसने अपनी बुद्धि से अनेक नये नियमों का आविष्कार किया है और उसका रहन-सहन प्राकृतिक के बजाय कृत्रिम ही अधिक कहा जा सकता है। इसलिये सन्तानोत्पत्ति और सन्तान-पालन को प्राकृतिक कार्य समझकर उपेक्षा करना किसी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता। संसार के जीवन-क्षेत्र में जो दृढ़ता के साथ स्थिर रह सके और सफलता प्राप्त कर सके ऐसी सन्तान समाज को देना हमारा बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है।

पर आज अवस्था इसके प्रायः विपरीत दिखाई पड़ रही है। लोग सब से अधिक महत्व खाने कमाने की समस्या को देते हैं, इसके पश्चात तरह-तरह के शौकों को पूरा करने, समाज में प्रतिष्ठा और ऊँचा पद प्राप्त करने, भविष्य के लिये कुछ धन-सम्पत्ति जोड़ने आदि बातों की तरफ ध्यान जाता है। पर संतान पालन, जो समाज की प्रगति और उत्कर्ष का प्रधान साधन है, उस पर कोई ध्यान नहीं देता, छोटे और साधारण श्रेणी के लोगों में ही नहीं, बड़े-बड़े शिक्षित और बुद्धिमान लोगों में भी यही वृत्ति देखी जाती है। इसी को लक्ष्य करके इंग्लैंड के एक बहुत बड़े ज्ञानी व्यक्ति श्री हर्बर्ट स्पेन्सर ने अपने ‘शिक्षा’ नामक ग्रन्थ में कहा है—”वास्तव में बच्चों के पालन-पोषण के तरीके पर ही उनका जीना-मरना और उनका नैतिक उत्थान या पतन निर्भर करता है, पर उन लोगों को जो कुछ समय बाद माता-पिता बनने वाले हैं इस विषय का एक शब्द भी नहीं सिखाया जाता। क्या यह एक बड़ी भयंकर बात नहीं है कि एक नई पीढ़ी का भाग्य बुद्धिहीन प्रथाओं, रुचि, विचार आदि के भरोसे छोड़ दिया जाय या उसके सम्बन्ध में मूर्ख दाइयों या पुरानी बुढ़ियाओं की सलाहों पर ही भरोसा कर लिया जाय। अगर कोई व्यापारी बिना हिसाब-किताब सीखे व्यापार करना शुरू कर दे तो हम उसकी मूर्खता पर आश्चर्य करते हैं और शीघ्र उसका दिवाला निकलने का अनुमान लगाने लग जाते हैं। इसी प्रकार यदि कोई व्यक्ति शरीर-शास्त्र का अध्ययन किये बिना ही डाक्टरी शुरू कर दें तो हम उसकी धृष्टता पर आश्चर्य करेंगे और उसके मरीजों पर तरस खायेंगे। पर माता-पिता संतान पालन की किसी प्रकार की शारीरिक, नैतिक और बौद्धिक शिक्षा प्राप्त किये बिना ही सन्तानोत्पादन के महत्वपूर्ण कार्य का भार उठा लेते हैं, तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं जान पड़ता।”

इस महान दार्शनिक ने जो बातें अब से काफी समय पहले लिखी थीं वे आज हमारे देश पर पूरी तरह लागू हो रही हैं। यहाँ के अधिकाँश माता-पिता संतान-पालन के विषय में सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं और फिर भी छोटी अवस्था से एक सन्तान पर दूसरी सन्तान उत्पन्न करते चले जाते हैं। उनको न संतानोत्पत्ति के पूर्व की जाने वाले तैयारी का कुछ पता होता है और न वे जरा भी उसके पालन पोषण की ठीक विधि को जानते हैं। इस प्रकार यहाँ के 95 प्रतिशत बच्चों का निर्माण संयोग पर निर्भर रहता है। अधिकाँश मातायें आरम्भ से बच्चों की नियमित आदतें डालने का प्रयत्न नहीं करतीं और नतीजा यह होता है कि थोड़े समय बाद ही बच्चा बार-बार रोने और समय कुसमय खाने को माँगने लग जाता है। माता भी बिना यह विचार किये कि वह भूख से रो रहा है या प्यास से या किसी प्रकार की शारीरिक अस्वस्थता के कारण, झट से उसके मुँह में स्तन या दूध की शीशी दे देती है। इससे बच्चे का उस समय का रोना तो बन्द हो जाता है, पर आगे चलकर यह आदत और भी बढ़ने लगती है। ऐसे बालक की पाचन शक्ति शीघ्र ही खराब हो जाती है और बड़ा होने पर वह कब्ज जैसे रोग का शिकार हो जाता है, जिससे सदैव नये-नये रोगों का जन्म होता रहता है। इसी प्रकार जिस बच्चे को बचपन में मुँह ढक कर सुलाया जाता है और खुली हवा से सदैव पृथक रखा जाता है उसे आगे चलकर खाँसी, दमा आदि दुखदायी रोगों को सहन करना पड़ता है। ऐसे अभागे बालक अपने घर वालों के लिये ही भार स्वरूप नहीं बन जाते पर निःसत्व और शक्तिहीन बनकर वे बड़े होने पर समाज और देश के प्रति भी अपने कर्त्तव्यों का पालन नहीं कर सकते। इस प्रकार अज्ञानी माता-पिता अपने लिये तरह-तरह के कष्टों की जड़ जमाकर देश और जाति के प्रति भी शत्रुता का आचरण करते हैं।

भारतीय स्त्रियाँ सन्तान पालन में जो सफल नहीं हो पातीं उसका एक कारण यह भी है कि यहाँ बालिकाओं का विवाह प्रायः अपरिपक्व अवस्था में ही कर दिया जाता है और उस स्थिति में सन्तानोत्पत्ति होने से उनको जननेन्द्रिय सम्बन्धी अनेक शिकायतें उत्पन्न हो जाती हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य गिर जाता है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है और वे कोई परिश्रम साध्य कार्य करने के अयोग्य हो जाती हैं। फिर उनकी सन्तान भी प्रायः चिर रोगी ही बनी रहती है। बड़े खेद का विषय है कि हमारी स्त्रियों को नये-नये फैशनों और विदेशी शृंगार सामग्री की रुचि तो शीघ्र ही लग जाती है, उनके पति भी मेमों की तरह स्वतन्त्रता पूर्वक संग घुमाने में गौरव और प्रसन्नता का अनुभव करते हैं, पर संतान पालन जैसी गृहस्थी को सफल बनाने वाली बात का ज्ञान भी उसे प्राप्त कराया जाय इसका किसी को स्वप्न में भी विचार नहीं आता। यह बात नहीं कि उनको अपने बच्चों से प्रेम नहीं होता, अथवा वे उनके लिये हर तरह का स्वार्थ त्याग नहीं करते, पर अज्ञानवश वे मोह के नाम पर स्वयं अपने बच्चों का अहित करने वाले बन जाते हैं। इसलिये हमारे देश की शिक्षा में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिये कि लड़के-लड़कियों को आरम्भ से ही इस आवश्यक विषय का महत्व प्रतीत होने लगे और विवाह होने के पहले तो उनको निजी तौर पर या तत्सम्बन्धी ग्रन्थों द्वारा इसका ठीक ज्ञान करा ही देना चाहिये। यह राष्ट्र के उत्थान-पतन से सम्बन्ध रखने वाली बात है और इसकी अवहेलना स्वयं अपना ही अनिष्ट करना कहा जायगा—


गुस्से का परिणाम

एक साँप को बहुत गुस्सा आया। उसने फन फैलाकर गरजना और फुंसकारना शुरू किया और कहा—मेरे जितने भी शत्रु हैं आज उन्हें खा कर ही छोड़ूंगा। उनमें से एक को भी जिन्दा न रहने दूँगा।

मेंढक, चूहे, केंचुए और छोटे-छोटे जानवर उसके उस गुस्से को देखकर डर गये और छिप कर देखने लगे, देखें आखिर होता क्या है?

साँप दिन भर फुसकारता रहा और दुश्मनों पर हमला करने के लिए दिन भर इधर-उधर बेतहाशा भागता रहा।

फुंसकारते-फुंसकारते उसके गले में दर्द होने लगा शत्रु तो कोई हाथ न आया पर कंकड़ पत्थरों की खरोंचों से उसकी सारी देह जख्मी हो गई शाम होते-होते थकान से चकनाचूर होकर वह एक तरफ जा बैठा।

साँप की परछांई ने पूछा, समझे न गुस्सा करने वाला शत्रुओं से पहले अपने को ही नुकसान पहुँचाता है।


अन्ध-विश्वास और ठगी की व्याधि

हमारा देश अन्ध-विश्वास के लिये बदनाम है। यों तो संसार में अभी तक सैकड़ों जंगली जातियाँ पाई जाती हैं जो अन्ध-विश्वास के नाम पर देवता के आगे नर-बलि देती हैं, अपनी ही संतान का बलिदान कर देती हैं तथा अन्य भी अनेक प्रकार के रोमाँचक कृत्य करती हैं। उनकी गिनती मनुष्यों में भी नहीं की जाती है, उनको बबंर या अर्द्ध-पशु की तरह माना जाता है। पर भारतवर्ष की बात निराली है। एक तरफ तो यह परमात्मा, ईश्वर और जीवात्मा के गूढ़ से गूढ़ रहस्यों को प्रकट करता है, अध्यात्म के ऊंचे से ऊँचे सिद्धान्तों की विवेचना करता है, जिससे पश्चिमी देशों के महान् विद्वान भी इसके सामने नतमस्तक हो जाते हैं, और दूसरों तरफ यही भूत,प्रेत, बैताल, ब्रह्मराक्षस, जिन्द, दई-देवता, कुआँ वाला, जखैया आदि न जाने कितने ऐसे अन्ध-विश्वास फैले हुए हैं, जिनको जंगली लोगों के उपयुक्त ही कहा जा सकता है। इस अन्धविश्वास की इतिश्री इन प्रचलित काल्पनिक अदृश्य शक्तियों पर ही नहीं हो जाती, वरन् इनके अतिरिक्त प्रति वर्ष चाहे जहाँ कोई देवी प्रकट हो जाती है, कहीं किसी कुएं का जल सब रोगों की राम-बाण दवा बन जाता है, कहीं किसी सर्वरोग विनाशिनी जड़ी-बूटी के नाम पर हजारों लोग इकट्ठे हो जाते हैं, कहीं भगवान का साक्षात् अवतार ही उत्पन्न हो जाता है और लोग उसी की पूजा करने लग जाते हैं। ऐसी बातों में विश्वास रखने वाले और उनके पीछे दौड़ने वाले अशिक्षित, सभ्य, सुसंस्कृत समझने वाले भी इन कार्यों में भाग लेते हैं और उनके प्रसार में सहायक बनते हैं।

यहाँ हम इस विवाद में नहीं पड़ना चाहते कि शास्त्रों में जिस भूत-योनि का जिक्र किया गया है उसकी वास्तविकता क्या है। अर्थात् वह कोई वायवीय अथवा सूक्ष्म देह धारिणी चैतन्य सत्ता है अथवा ‘भूत’ (गुजरी हुई घटना)में ही लोगों ने एक काल्पनिक प्राणी का रूप दे दिया है। हमारे देश में अगर कोई चाहे तो घर-घर और गली-गली में भूतों के किस्से सुन सकता है। जिसके ‘प्रत्यक्ष’ और ‘सर्वथा सत्य’ होने का लोग दावा करते हैं। पर जब कोई विचारशील व्यक्ति उनकी जाँच करने लगता है तो परिणाम शून्य ही निकलता है। उन लोगों की तो बात ही मत पूछिये जिनको पिछड़े हुए या छोटी जाति वाला कहा जाता है। उनमें तो सब प्रकार की विपत्तियां, रोग, बीमारी, हानि, लाभ तक का कर्ता-धर्ता भूतों को माना जाता है। किसी स्त्री, पुरुष, बालक को किसी तरह की तकलीफ हो गई और साधारण उपाय करने से दो-बार दिन में वह ठीक नहीं हो पाई तो फौरन उसका दोष भूत के सिर मढ़ दिया जाता है, और स्याने, ओझा, झाड़ने वाले के पास पहुँच कर रोग निवारण का उपाय पूछा जाता है। इन लोगों का तो व्यवसाय ही भूतों को भगाना ठहरा, जिस प्रकार कोई स्वस्थ व्यक्ति भी डॉक्टर के पास जाय तो वह उसे कोई न कोई रोग बतला देता हैं उसी प्रकार से ओझा और स्याने प्रत्येक आगंतुक की विपत्ति का कारण भूतों से जोड़ देते है और उसके लिये भेंट-पूजा लेकर कोई ने कोई उपाय भी बतला देते हैं। ऐसे लोग प्रायः देवता के आने का सप्ताह या महीने में कोई खास दिन नियत कर लेते हैं और उसी दिन तरह-तरह के रोगियों की भीड़ आटा, चावल, अनाज, घी, तेल, रुपया, पैसा लेकर उसके पास पहुँचती है। उस दिन उनके सिर पर देवता आता है, जो खूब झूम-झूम कर और विचित्र प्रकार की आकृति बनाकर लोगों के रोगों तथा गृह आपत्तियों का निदान करता है और भूत-प्रेतों तथा गृह देवताओं की पूजा दान या किसी को खिलाने-पिलाने के द्वारा सब रोगों का इलाज बतलाता चला जाता है । इस प्रकार भूत ने एक अच्छे रोजगार का रूप ग्रहण कर लिया है जिससे बहुसंख्यक लोग आराम के साथ जीवन निर्वाह कर लेते हैं।

इस प्रकार के ओझा, स्याने आदि चरित्र की दृष्टि से भी प्रायः हीन कोटि के होते हैं और उनके पास अधिकाँश अशिक्षित मूढ़ स्त्रियाँ ही जाती हैं। इसलिये वे उनको सहज ही बहका कर, भ्रम में डाल कर पतन के रास्ते पर ले आते हैं। इस तरह हमारा अन्ध-विश्वास धन, धर्म और इज्जत तीनों को नष्ट करने वाला सिद्ध हो रहा है। इस प्रकार की बहुसंख्यक घटनायें प्रकाश में आती रहती हैं और अनेकों बार झगड़ा पैदा हो जाने से मुकदमे भी चल जाते हैं। वहाँ इस भूत-विद्या की कलई भली प्रकार खुल जाती है। पर अन्ध-विश्वास की यही महिमा है कि फिर भी लोगों की आँखें नहीं खुलती और वे घूम फिर कर पुनः इन्हीं लोगों के पास जा पहुँचते हैं।

किसी प्रकार की बीमारी के लिये भूत को दोष देना और उसके निवारण के लिये स्थानों की शरण लेना ऐसी मूर्खता की बात है कि इसके सम्बन्ध में अधिक प्रमाण देना या बहस करना असंगत जान पड़ता है। बीमारी तो प्रायः असंयम या किसी प्रकार की गलती, आकस्मिक घटना-वश होती है। उसका निवारण उस गलती का सुधार करने से ही हो सकता है। इसीलिये अधिकाँश समझदार लोग बीमार होने पर असंयम का त्याग कर संयम पालन करते हैं और किसी अच्छे चिकित्सक की दवा का सेवन करते हैं। इसी से समयानुसार उनका रोग दूर हो जाता है। इसमें ‘भूत’ कहाँ से आ गया और उसकी क्या आवश्यकता है, यह हमारी समझ में नहीं आया। बहुत सी बीमारियाँ कठिन और पेचीदा भी होती हैं और सहज ही वश में नहीं आतीं। ऐसी हालत में दवा या उपाय को असर न करते देखकर यह ख्याल कर लेना कि इसका कारण कोई भूत-प्रेत होगा कहाँ की बुद्धिमत्ता है। योरोप, अमरीका के लोग इस प्रकार किसी रोग को भूत से उत्पन्न नहीं मानते और न किसी स्याने-दिवाने के पास जाते हैं, तो क्या उनके रोग अच्छे नहीं होते ? हम तो देखते हैं कि वे हमसे कहीं अधिक शीघ्र रोगमुक्त हो जाते हैं और उनका स्वास्थ्य भी फिर से जल्दी ही सुधर जाता है। पर भूत से बीमारी मानने वालों का रोग अनेक बार आजन्म वैसे ही बना रहता है।

भूतों के सम्बन्ध में शंका पैदा होने का दूसरा कारण कभी-कभी किसी घर में गुप्त रूप से उपद्रव होना होता है, जैसे ईंट-पत्थर फेंके जाना, कपड़ों का जल जाना, भोजन में गन्दगी पैदा हो जाना आदि। यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाणों के अभाव में हम प्रत्येक घटना को तो झूँठी नहीं कह सकते, पर इतना हम जानते हैं कि ऐसे सुने जाने वाले भौतिक-काण्डों में से अनेक काल्पनिक होते हैं, बहुत बढ़ा-चढ़ा कर कहे जाते हैं और बहुत सों की तह में किसी प्रकार का षड़यन्त्र, दुरभिसन्धि होती है। पर चूँकि जिन लोगों के दिमाग में पहले से ही भूत की धारणा, उसका भय बद्धमूल रहता है, वे किसी प्रकार की जाँच पड़ताल तो कर नहीं सकते बस तुरन्त भयाक्रान्त होकर किसी भूत विद्या विशारद की शरण लेते हैं। उनका काम तो इस तरह के दस किस्से और सुनाकर उनके विश्वास पर मुहर लगा देना होता ही है। बस इस प्रकार यह अन्ध-विश्वास अपने नये-नये शिकार ढूंढ़ता रहता है और उसकी जड़ जमती जाती है।


Quotation

करिप्यामि कयिष्यामि करिष्यामीति चिन्तया।

मरिष्यामि मरिष्यामि मरिष्यामिति विस्मृताम्॥

करूंगा, करूंगा, करूंगा इस चिन्ता में मनुष्य

यह भूल जाता है कि मरूंगा, मरूंगा, मरूंगा।

सहस्रमपि चेद् वाचो अनर्थ पद संहिताः।

एकमर्थ पदं श्रेयो यच्छ त्वोप शाम्यति॥

बकवाद भरे बहुत भाषण प्रवचन व्यर्थ हैं। वह एक ही शब्द पर्याप्त हैं जिससे किसी को शान्ति प्राप्त हो।

बहुत से लोग तो जान बूझकर ऐसे जाल और ढोंग रचते हैं और सर्व-साधारण को उसमें फँसा लेते हैं। उदाहरणार्थ अनेक व्यक्ति घोषणा कर देते हैं कि हमको अमुक देवता ने स्वप्न दिया है कि —”मैं फलाँ स्थान पर गड़ा हूँ, तुम मुझे बाहर निकाल कर मेरी पूजा करो। अगर इस कार्य की उपेक्षा की जायगी तो बड़ी आपत्ति आयेगी, गाँव भर का नाश हो जायगा।” ऐसी बातें सुनकर लोग खोदते हैं तो वहाँ पहले से ही रखी हुई मूर्ति निकल आती है। यह देख कर लोगों की श्रद्धा-भक्ति उमड़ पड़ती है, खूब भेंट-पूजा आती है और देवता का मन्दिर बन जाता है। बस, स्वप्न देखने वाले को एक रोजगार मिल जाता है, जिससे आजन्म भरण-पोषण हो सकता है।

अनेक साधू महात्मा और फकीर अपने कुछ एजेन्ट इधर-उधर के गाँवों में भेज कर प्रचार कराते हैं कि अमुक साधू बाबा बड़े पहुँचे हुए और सब प्रकार के रोगों को एक चुटकी भभूत या किसी जड़ी बूटी से अच्छा कर देते हैं। ये एजेन्ट दूर-दूर के लोगों के अच्छे होने के किस्से भी गढ़ कर सुनाते रहते हैं। परिणाम यह होता है कि रोग दूर कराने वालों या पुत्र, धन आदि की अभिलाषा रखने वालों की भीड़ साधू बाबा के पास इकट्ठा होने लगती है और वे काफी धन इकट्ठा कर लेते हैं। यह सच है कि ऐसी जालसाजी ज्यादा दिन नहीं चलती। दो-चार महीने में उसका भण्डाफोड़ हो जाता है। पर तब तक वे दो-चार हजार रुपया इकट्ठा करके फिर किसी दूरवर्ती स्थान में जा बैठते हैं और फिर कोई नया जाल फैलाने लग जाते हैं।

इस तरह की वहम, मूर्खता, ठगी की बातों से धन तो लूटा ही जाता है, पर इससे भी एक बड़ी बुराई यह होती है कि इससे देश-समाज का नैतिक पतन भी होता है और विदेशों में हमारे देश की बदनामी होती है। जब बाहर के लोग यहाँ के बहुसंख्यक लोगों को ऐसी मूढ़ता की बातों में फँसे हुये और बिना जड़-मूल की बातों पर विश्वास करते हुये देखते हैं तो उनको यहाँ की संस्कृति के प्रति जो सम्मान और श्रद्धा होती है उसमें कमी आ जाती है। वे समझने लगते है कि इनकी आध्यात्मिक बातें कहने-सुनने तक की हैं, पर उन्होंने इनके भीतर प्रवेश नहीं किया है, वास्तव में ये अर्ध-सभ्य जातियों की तरह ही कुसंस्काराछन्न हैं।

दूसरी बड़ी हानि यह भी है कि ऐसे ठगों के कारण सच्चे लोगों पर से भी विश्वास हट जाता है और उनकी उपेक्षा होने लगती है। इसमें सन्देह नहीं कि कुछ साधू सच्चे त्यागी, सदाशय भी होते हैं और परोपकार की इच्छा भी रखते हैं। पर ठगों की करतूतें और धूर्तता देखकर लोग उनको भी ठग और जालसाज समझ कर पास से हटा देते हैं। इस प्रकार ढोंगी और ठग भिखारियों के कारण हम अनेक बार उन लोगों की सहायता से भी विमुख हो जाते हैं, जो वास्तव में संकट में पड़े होते हैं और जिनकी सहायता करना एक मनुष्य का कर्त्तव्य है। इस प्रकार अन्ध-विश्वास और ठगी की प्रवृत्ति समाज के लिये कई प्रकार से घातक सिद्ध होती है, जिसका निराकरण प्रत्येक समाज हितैषी का कर्त्तव्य है।


राज-काज के सच्चे अधिकारी

एक बार काशी नरेश ने कौशल नगरी पर आक्रमण किया और वहाँ के राजा को परास्त करके अपना अधिकार जमा लिया।

राज्यच्युत कौशल नरेश अपने प्राण बचाते हुए वन-जंगलों में छिपे फिरने लगे। इनको पकड़ लेने वाले को एक सहस्र स्वर्ण मुद्राएं पुरस्कार देने की घोषणा काशी नरेश ने कर रखी थी।

वन प्रदेश के जिस गाँव में कौशल नरेश छिपे थे उसमें नदी की बाढ़ आने से भारी क्षति हुई। ग्रामीणों का सब कुछ बाढ़ में बह गया। उनमें से अनेक भूखे तड़प-तड़प कर मरने लगे।

सहृदय कौशल नरेश से अपने पड़ौसियों का यह करुण दृश्य देखा न गया। वे कुछ ग्रामीणों को राजा से अर्थ-सहायता दिलाने के लिए अपने साथ लेकर काशी नरेश के दरबार में जा पहुँचे और कहा— घोषणा के अनुसार एक सहस्र स्वर्ण मुद्रा इन ग्रामीणों को दी जायँ, मैं पकड़े जाने के लिए उपस्थित हूँ।

काशी नरेश को जब सारी बात मालूम हुई तो वे इस मानवता की मूर्तिमान प्रतिमा को देख कर पानी-पानी हो गये। उन्होंने ग्रामीणों की सहस्र स्वर्ण मुद्रा और कौशल नरेश का राज्य वापिस करते हुए कहा—वस्तुतः आप जैसे सहृदय व्यक्ति ही राज-काज के सच्चे अधिकारी हो सकते हैं।

उद्धरेदात्मनाऽत्मानम्


अध्यात्म और उसकी महान उपलब्धि

प्राचीन काल के मंगलमय वातावरण को पुनः वापिस लाने के जिन पुण्य प्रयत्नों में अखण्ड-ज्योति संलग्न है उनका प्रमुख आधार अध्यात्म ही है। सतयुग में मनुष्य को अगणित सुख सुविधाएं प्राप्त थी, उसकी शक्ति सामर्थ्य प्रत्येक दिशा में बहुत बढ़ी-चढ़ी थी। इस सुयोग का कारण और कुछ नहीं केवल एक ही था-जीवन का अध्यात्म प्रेरणा से अनुप्राणित एवं प्रेरित होना। उस समय सब लोग अपनी भावनाएं और क्रियाएं अध्यात्म मान्यताओं एवं मर्यादाओं के अनुसार ढालते थे, फलस्वरूप उन्हें बाह्य जीवन में किसी प्रकार की असुविधा न रहती थी। जहाँ चन्दन का वृक्ष होगा वहाँ सुगन्ध बहेगी ही, जहाँ अध्यात्म को आश्रय मिलेगा वहाँ शक्ति , समृद्धि और सुख शान्ति की परिपूर्णता रहनी ही चाहिए।

अध्यात्म भारत की महानतम सम्पत्ति है। उसे मानवता का मेरु दण्ड कहा जा सकता है। मनुष्य के भौतिक एवं अध्यात्मिक चिरस्थायी उत्कर्ष का एक मात्र आधार यही है। मनुष्य जाति की अगणित समस्याओं को हल करने और सुख शान्तिपूर्वक जीने के लिए अध्यात्म ही एक मात्र उपाय है। इस जीवन तत्व की उपेक्षा करने से पतन और विनाश का ही मार्ग प्रशस्त होता है। दुख और दारिद्र, शोक और सन्ताप इसी उपेक्षा के कारण उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाला निमित्त इस उपेक्षा से बढ़कर और कोई नहीं हो सकता।

अध्यात्म मानव-जीवन के श्रेष्ठतम सदुपयोग की एक वैज्ञानिक पद्धति है। उसे जीवन जीने की विद्या भी कहा जा सकता है। छोटे-छोटे कार्यों की भी कोई प्रणाली एवं पद्धति होती है। उसी ढंग से चलने पर सफलता मिलती है। अस्त-व्यस्त ढंग से कार्य किया जाय तो लाभ के स्थान पर हानि ही होगी। मानव-जीवन इस संसार का सर्वोत्कृष्ट वरदान है। भगवान के पास जो कुछ विभूतियाँ है वे सभी उसने मनुष्य शरीर में बीज रूप में भर दी हैं। ऐसे बहुमूल्य संयंत्र का सुसंचालन एवं सदुपयोग यदि ज्ञात न हो तो उसे एक दुर्भाग्य ही कहा जायगा।

कृषि, रसायन, शिल्प, चिकित्सा, व्यापार, संगीत आदि सामान्य कार्यों के लिए उनकी निर्धारित पद्धति को अपनाना पड़ता है। राज्य व्यवस्था, संविधान एवं कानून पद्धति के अनुसार चलती है। उन व्यवस्थाओं की अज्ञानता एवं उपेक्षा करने वाले व्यक्ति मनमानी करते हुए चलने लगें तो उन्हें असफलता एवं निराशा का ही मुँह देखना पड़ेगा। मानव-जीवन तो एक अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं मूल्यवान प्रक्रिया है उसका विज्ञान एवं विधान जाने बिना या जानकर उस पर चले बिना वह आनन्द एवं श्रेय नहीं मिल सकता, जो मनुष्य जीवन जीने वाले को मिलना ही चाहिए।

मानव-जीवन के दो पहलू हैं एक आत्मा दूसरा शरीर। एक आन्तरिक दूसरा बाह्य। दोनों में एक से एक बढ़कर विभूतियां एवं समृद्धियाँ भरी पड़ी हैं। आत्मिक क्षेत्र में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार चारों ही क्रमशः एक से एक बढ़ कर शक्ति-संस्थान है। पाँच कोश, एवं छह चक्र, अपने गर्भ में अगणित ऋद्धि- सिद्धियाँ छिपाये बैठे हैं। मस्तिष्क के मध्य भाग ब्रह्मरंध्र में अवस्थित शत-दल कमल, हृदय संस्थान का सूर्य चक्र, नाभिदेश में प्रतिष्ठित ब्रह्म ग्रन्थि, मूलाधार वासिनी महासर्पिणी कुण्डलिनी का जो विवेचन योग शास्त्रों में मिलता है उससे स्पष्ट है कि विश्व की अत्यन्त महत्वपूर्ण शक्तियाँ बीज रूप से इन छोटे से केंद्रों में भरी पड़ी हैं। योगाभ्यास द्वारा इन्हें जागृत करके साधन मार्ग के पथिक अपने को आलौकिक सामर्थ्यों से सुसम्पन्न सिद्ध पुरुषों की श्रेणी में पहुँचा देते हैं। ऋषि मुनियों ने आध्यात्म विद्या के गूढ़ रहस्यों का अवगाहन कर प्रकृति की उन विस्मयकारी शक्ति यों पर आधिपत्य प्राप्त कर लिया था जो भौतिक विद्या के वैज्ञानिकों के लिए अभी भी रहस्यमय बनी हुई है।

खेदपूर्वक यह स्वीकार करना होगा कि हमारे आलस्य और प्रमाद ने योग की उन उच्चस्तरीय विद्याओं को गँवा दिया। वैज्ञानिक शोध जैसी निष्ठा में संलग्न होने वाले साधक आज कहाँ है? योगी का वेष बनाकर पूजा और आजीविका कमाने वाले रंगे सियार बहुत मिलेंगे पर सूक्ष्म प्रदेशों को जागृत और परिमार्जित करने के लिए कठोर तपश्चर्या का साहस करने वाले निष्ठावान् पुरुषार्थी नहीं के बराबर दिखाई पड़ते हैं। जो हैं उन्हें बहुत कुछ मिलता भी है। जिनके आशीर्वाद प्राप्त करके मनुष्य अपना जीवन धन्य और सफल बना सकें ऐसे ऋषिकल्प सत्पुरुष अभी भी मौजूद हैं।

प्राचीनकाल में ऋषि मुनियों के संरक्षण में सारा विश्व ही स्वर्गीय सुख-शान्ति का उपभोग कर रहा था। आत्मबल की महत्ता का उच्चस्तरीय प्रकरण रहस्यमय है। कठिन और कष्टसाध्य भी है। उस मार्ग पर कम ही लोग चल पाते हैं फिर भी यह तथ्य सुनिश्चित ही रहेगा कि आत्मा के सूक्ष्म संस्थानों की साधना, रहस्यमयी एवं चमत्कारी प्रतिफल उत्पन्न करती है। उसका अवलम्बन लेकर मनुष्य अपना जीवनलक्ष्य प्राप्त करने के अतिरिक्त संसार की भी इतनी बड़ी सेवा कर सकता है जितनी बड़ी से बड़ी भौतिक क्षमता सम्पन्न व्यक्ति यों की सम्मिलित शक्ति यों के द्वारा भी सम्भव नहीं।

उच्चस्तरीय सूक्ष्म साधना का फल आकर्षक चमत्कारी एवं आश्चर्यजनक तो अवश्य है पर उसकी साधना भी उसी अनुपात से समयसाध्य और कष्टसाध्य है बाल-बुद्धि के लोग यह आशा किया करते हैं कि कुछ ही दिन छोटा-मोटा कर्मकाण्ड करके उस स्थिति की सफलता प्राप्त कर लेंगे। बरगद का पेड़ बड़ा समृद्धिशाली और चिरस्थायी माना गया है पर उसके उगने, बढ़ने और फलने-फूलने की स्थिति तक पहुँचने में भी देर लगती है। उतावली में हथेली पर सरसों जमाने की बालक्रीड़ा उपहासास्पद ही सिद्ध होती है। योगाभ्यास की साधन विधियाँ भले ही बहुत कठिन न हों, पर उनके फलित होने लायक साधक की पूर्व भूमिका तो शुद्ध हो चुकनी ही चाहिये। यदि साधक का बाह्य जीवन-दूषित कलुषित, निष्कृष्ट एवं अस्त−व्यस्त रहा होगा तो उसे लौकिक समृद्धि सफलता एवं सुख-शान्ति भी प्राप्त न हो सकेगी, ऐसी दशा में आत्मबल एवं उच्च विभूतियों की उपलब्धि की आशा तो की ही कैसे जा सकती है?

नियम यह है कि पहले बाह्य जीवन में अध्यात्म तत्व-ज्ञान का समावेश करके उसे सुख-शान्तिमय बनाया जाय। इस प्रकरण में जितनी उपासना अभीष्ट है उतनी करते रहा जाय पर अधिक जोर बाह्य जीवन को सुसंगत बनाने के लिए ही दिया जाय। लौकिक-जीवन को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बना लेना भी एक आध्यात्मिक साधना ही है। उसका प्रतिफल भी लौकिक सफलताओं एवं सुसंबद्धताओं के रूप में ही उपलब्ध होता है। इस सफलता के बाद उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधनाएँ सरल हो जाती हैं और उनकी सफलता में भी कठिनाई नहीं आती। जो साधक जप-तप तो बहुत करते है किन्तु लौकिक जीवन निकृष्ट बनाये रहते हैं उनको प्रायः निराश ही रहना पड़ता है।

कई व्यक्ति अपनी पात्रता बढ़ाने पर ध्यान न देकर समर्थ शक्तियों के उपहार स्वरूप विविध विधि वरदान प्राप्त करने के फेर में पड़े रहते हैं। देवताओं की पूजा वे इसी उद्देश्य से करते हैं कि कम समय,कम श्रम, कम खर्च करके बड़ा लाभ प्राप्त कर लें। लाटरी लगाने वालों एवं जुआ खेलने वालों का भी यही उद्देश्य रहता है। ऐसे लोग थोड़ा खर्च करके बिना श्रम एवं क्षमता के ही विपुल धन राशि प्राप्त करने के सपने देखते हैं। इनमें से किसी विरले की ही कामनापूर्ण होती है अधिकाँश तो निराश ही रहते हैं। देवताओं का वरदान वस्तुतः इतना सस्ता नहीं है जितना लोगों ने समझ रखा है। वे ‘दर्शन’ करने मात्र से प्रसन्न हो जायेंगे या अक्षत, पुष्प जैसी छोटी चीजें पाकर अपना अनुग्रह हमारे ऊपर उड़ेल देंगे ऐसा सोचना उचित नहीं। पूजा का भी अपना महत्व है, उसका भी लाभ होता है। पर मूल तथ्य पात्रता है। अनधिकारी की-कुपात्र की- प्रार्थना भी सफल नहीं होती। देवता या भगवान को प्रसन्न करने का, उनका अनुग्रह उपलब्ध करने का, सुनिश्चित मार्ग अपनी पात्रता बढ़ाना ही हो सकता है।

किन्हीं सिद्ध पुरुषों का समर्थ आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए भी यह आवश्यक है कि वे अपना तप या पुण्य दान देकर हमारी सहायता करें, पर उसके लिए हम उपयुक्त अधिकारी भी सिद्ध तो हों। आशीर्वाद वाणी की क्रीड़ा नहीं है। उसके पीछे पुण्य या तप का अनुदान लगाया गया हो तो उसका कुछ प्रतिफल दृष्टिगोचर हो सकता है। इस सृष्टि में कोई वस्तु मुफ्त नहीं मिलती। हर वस्तु का मूल्य निर्धारित है। उसे चुकाने पर ही कुछ प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है। सुख और समृद्धि की प्राप्ति पुण्य फल की मात्रा पर निर्भर रहती है। दुख हमारी त्रुटियों और विकृतियों के फलस्वरूप प्राप्त होते हैं। सुख प्राप्त करने और दुःख निवारण के लिए पुण्य एवं तप की अभीष्ट मात्रा चाहिए। वस्तु तो कीमत देने से ही मिलेगी। अपने पास वह कीमत न हो तो दूसरा भी अपनी जेब से उसकी पूर्ति कर सकता है। मूल्य हर हालत में चुकाना पड़ेगा। आशीर्वाद के साथ कोई सिद्ध पुरुष अपना तप भी देने को तैयार हो जायँ तो ही यह आशा की जा सकती है कि उससे कोई लाभ होगा। अन्यथा वाणी से निकले हुए केवल शब्द-भले ही वह आशीर्वाद की भाषा में कहे गये हो -किसी के लिए विशेष उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकते।

जब सामान्य बुद्धि के लोग पात्र-कुपात्र का ध्यान रखते हैं, अधिकारी-अनधिकारी के भेद को समझते हैं और उसी के अनुसार निष्ठुरता एवं उदारता बरतते हैं तो देवता और सिद्ध पुरुषों को इतना नासमझ क्यों माना जाय कि वे पात्रता की परख किये बिना, अन्धाधुन्ध प्रार्थनाओं की पूर्ति दर्शन पूजन जैसे बहकावे में आकर करने लगेंगे? स्कूलों में छात्रवृत्ति उन्हें मिलती है जो प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होते हैं। उन्हीं खिलाड़ियों को पुरस्कार मिलता है जो अपने को अधिक पुरुषार्थी सिद्ध करते हैं। ऊँचे पदों पर उनकी नियुक्ति होती हैं जो अन्य साथी प्रत्याशियों की अपेक्षा अपनी विशेषता सिद्ध करते हैं। देवता और सिद्ध पुरुष वरदान तो देते हैं, कृपा तो करते हैं, पर इससे पहले लेने वाले की पात्रता को भी परख लेते हैं। दान का यदि दुरुपयोग होने लगे तो उसका पाप दाता पर पड़ता है, इस तथ्य को वे उच्च शक्तियाँ भी जानती हैं, इसलिए प्रार्थना करने वाले की -वरदान या आशीर्वाद माँगने वाले की पात्रता को ही वे सबसे पहले परखती हैं। अनधिकारी के प्रति उनका रुख भी निष्ठुरतापूर्ण ही बना रहता है। यह उक्ति प्रसिद्ध है कि ‘ईश्वर उनकी सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं।” इस छोटे से वाक्य में ईश्वर की नीति और कार्यपद्धति का मर्म बिल -कुल ही स्पष्ट रूप से प्रतिपादित कर दिया गया है।

ईश्वर की इस सुव्यवस्थित सृष्टि का कण-कण नियम बन्धनों में बंधा हुआ है। इतना बड़ा शासन तंत्र बिना नियत व्यवस्था के चल भी नहीं सकता। सूर्य और चन्द्रमा नियत समय पर उदय होते हैं, पृथ्वी नियम मार्ग पर नियत चाल से चलती है। ऋतुएँ समय पर आती हैं। बीज अपने नियम और क्रम से उगते और बढ़ते हैं। यहाँ अव्यवस्था के लिए तनिक भी गुंजाइश नहीं। ईश्वर भी अपना काम तभी कर पा रहा है जब उसने अपने आपको नियम और व्यवस्था के अंतर्गत बाँध लिया है। प्राणियों को उनके शुभ-अशुभ कर्मों के आधार पर उन्नति और अवनति के प्रतिफल प्रदान करता है। यदि वह इसमें अव्यवस्था उत्पन्न करे तो सृष्टि का सारा क्रम ही बिगड़ जाय। प्रार्थना करने मात्र से मनमाने उपहार देने लगे तो फिर प्रयत्न और पुरुषार्थ करने के लिए किसी को क्या आकर्षण रह जायगा? फिर कर्मफल का तथ्य तो एक उपहास की बात बन जायगा। कोई न्यायाधीश वस्तुस्थिति पर ध्यान दिये बिना प्रार्थियों की अर्जी-मर्जी के अनुरूप फैसले करने लगे, सुविधायें देने लगे तो उसे पागल ही कहा जायगा। ईश्वर ऐसा पागल नहीं है। देवता या सिद्ध पुरुषों को भी इतना नासमझ नहीं मान जाना चाहिए कि हर किसी की उचित अनुचित सहायता के लिए घर दौड़ और पात्रता, अधिकार एवं कर्मफल के सुनिश्चित तथ्यों को मटियामेट करके सृष्टि में घोर अव्यवस्था फैला देने के दोषी बनें।

गुरुजन कृपा अवश्य करते हैं और उनके आशीर्वाद से लोगों का भला भी अवश्य होता है, पर वह कृपा विशुद्ध रूप से प्रार्थी की पात्रता पर निर्भर रहती हैं। देवता वरदान देते है। ऐसे असंख्य उपाख्यान पुराणों में मिलते है पर यह स्मरण रखना चाहिये कि वे वरदान भी अन्धाधुन्ध नहीं,किसी आधार पर ही मिलते हैं। असुरों ने बड़े-बड़े आश्चर्यजनक वरदान पाये थे पर उनका मूल्य उन्होंने घोर तपश्चर्या के रूप में चुकाया भी था। हमारी तरह यदि वे भी दर्शन करके या चन्दन अक्षत चढ़ाकर थोड़ी-सी पूजा-पत्री से बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाए बैठे रहते तो उन्हें भी हमारी ही तरह निराशा के अतिरिक्त और क्या हाथ लग सकता था?

दैवी अनुग्रह हमारी पात्रता के आधार पर ही उपलब्ध हो सकता है अतएव उसके लिए बहुत चिन्ता या बहुत खोज-बीन करने की अपेक्षा अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। सत्पात्रों की उचित सहायता एवं मार्गदर्शन करने के लिए ईश्वरीय नियम अपने आप काम करता रहता है और उसकी पूर्ति अनायास ही होती रहती है। गुरु ढूंढ़ने नहीं पड़ते, अधिकारी को वे अनायास ही मिल जाते हैं। पुष्प खिलते ही बिना निमंत्रण के भौंरे उसके आगे गुजार करने स्वतः ही जा पहुँचते हैं। जहाँ पर जितना गहरा गड्ढा होता है वहाँ उतना जल भर जाता है। कम गहरा गड्ढा, बड़े सरोवर के बराबर जल कैसे प्राप्त कर सकेगा? बादलों पर ‘कम देने’ का दोष भले ही वह लगाया करे पर वस्तुस्थिति यही है कि गड्ढे के उथलेपन ने ही उसे प्रचुर जल राशि संग्रह करने के लाभ से वंचित रखा। बादलों को सरोवर और गड्ढ़े में से किसी के साथ पक्षपात नहीं था, उनने समान वर्षा की पर लाभ उन्हें अपनी पात्रता के अनुरूप ही मिल सका। ईश्वर, देवता या सिद्ध पुरुषों से विविध विधि वरदानों की कामना एवं प्रार्थना करने के साथ-साथ हमें अपनी पात्रता भी देखनी चाहिये और उसे बढ़ाने के लिए प्रयत्न भी करना चाहिए।

अध्यात्म की महिमा का पारावार नहीं, उसके द्वारा प्राप्त हो सकने वाले लाभों की गणना नहीं हो सकती। मानव-जीवन की सर्वोत्कृष्ट विभूति वही है। अन्तःप्रदेश में सन्निहित रहस्यमयी शक्तियों के जागरण से मनुष्य की परिणति देवत्व में हो सकती है। पर उस मार्ग पर चलने वाले को इतना तो ध्यान रखना ही चाहिए कि उपासना विधानों की तरह व्यवहारिक जीवन को उत्कृष्ट एवं परिष्कृत बनाना भी आवश्यक है। इसके बिना कठोर साधना भी निरर्थक सिद्ध होती है।


बाह्य जीवन में आदर्शवाद का प्रयोग

औषधि कैसी ही उत्तम क्यों न हो उसका समुचित लाभ तब तक नहीं मिल सकता जब तक कि रोगी पथ्य, परिचर्या एवं आहार-विहार का समुचित ध्यान न रखे। साधना विधि का महत्व औषधि के समान माना जाये तो जीवन को सुव्यवस्थित एवं सन्तुलित बनाये रखने की सावधानी को पथ्य कहा जा सकता है। पथ्य से रहने वाला, आहार-विहार की सावधानी बरतने वाला बिना औषधि के भी प्राकृतिक प्रयत्नों के आधार पर रोगमुक्त हो सकता है। किन्तु बहुमूल्य औषधि लेते रहने पर भी यदि कुपथ्य से रहा जाय तो रोग घटेगा नहीं, औषधि का लाभ निष्फल चला जायगा और कुपथ्य के कारण रोग उलटा बढ़ता चलेगा। इसलिए चिकित्साशास्त्री सदा से यही कहते आये हैं कि पथ्य मुख्य और औषधि गौण है। कोई चमत्कारी औषधि तत्काल कुछ लाभ दिखा भी दे तो भी कुछ समय बाद वह असर समाप्त होते ही फिर रोग घेर लेंगे। कुपथ्य पर चलने वाला स्थायी रूप से रोग मुक्ति का लाभ न ले सकेगा।

भव-रोगों की निवृत्ति के लिये अध्यात्म मार्ग का अवलम्बन लेने वालों पर भी यही नियम काम करता है। व्यावहारिक जीवन की अव्यवस्था एवं अस्त-व्यस्तता अच्छी साधनाओं को भी निष्फल बना देती है। साधना के द्वारा आत्मबल प्राप्त करते हुए जीवन-लक्ष प्राप्त करने की स्थिति तक पहुँच सकना केवल उन्हीं के लिए सम्भव हो सकता है जिन्होंने उसकी प्रारम्भिक भूमिका के रूप में बाह्य जीवन को संतुलित बनाने में आवश्यक सफलता प्राप्त कर ली है। शरीर और मन को सुसंतुलित बना लेना, सूक्ष्म आध्यात्मिक शक्ति यों को जागृत करके अलौकिक शक्तियाँ प्राप्त करने की अपेक्षा कहीं सरल है। सरल कार्य में सफलता प्राप्त करने के उपरान्त ही कठिन कार्यों का बोझ उठा सकना संभव होता है। प्राथमिक और माध्यमिक कक्षाओं की पढ़ाई बिना कालेज में प्रवेश कैसे मिलेगा? कोई जबरदस्ती घुस भी पड़े तो उसे एम.ए. की परीक्षा देते समय अपनी अनधिकार चेष्टा पर पश्चाताप करना पड़ेगा। उच्चकोटि की आध्यात्मिक कक्षाओं में क्रमिक विकास करते हुए ही आगे बढ़ा जा सकता है। ऊँची छत पर चढ़ने के लिए नीचे की सीढ़ी पर पैर रखते हुए ऊपर चढ़ना होता है। कोई उतावला व्यक्ति जमीन से उछल कर तुर्त-फुर्त छत पर पहुँचने का प्रयत्न करेगा तो उसे निराशा ही हाथ लगेगी। रक्त में पहुँचाने के लिये इंजेक्शन लगाने वाले डॉक्टर की सुई पहले चमड़ी और माँस में छेद करके तब रक्त स्तर तक पहुँचती है। कोई व्यक्ति यह चाहे कि रक्त माँस को छुए बिना सीधी रक्त में सुई पहुँचा दी जाय तो डॉक्टर के लिए उस माँग को पूरा कर सकना कठिन होगा। शरीर और मन का क्षेत्र जब तक अध्यात्म-साधन के अनुरूप सुधारा न जाय तब तक ईश्वर-दर्शन, आत्म-साक्षात्कार, समाधि, कुण्डलिनी जागरण यदि ऋद्धि-सिद्धियों की बात सोचना असंगत ही माना जायगा।

पातंजलि योग के आठ अंगों में यम, नियम, आसन, प्राणायाम यह पूर्वार्द्ध शरीर और मन का शोधन करने के लिए है। तत्पश्चात प्रत्याहार धारणा, ध्यान, समाधि का उत्तरार्ध योग-साधन सम्भव होता है। हठयोग में भी नेति, धोति, वस्ति, न्यौलि, कपालभाति के षट्कर्म बाह्य-जीवन की परिशुद्धि के लिये आवश्यक माने गये हैं, उसके उपरान्त ही षट्चक्र वेधन और कुण्डलिनी जागरण का प्रकरण खुलता है। चार आश्रमों की व्यवस्था इसी दृष्टि से बनी है ब्रह्मचर्य में रहते हुए गृहस्थ का भार उठाने की तैयारी , गृहस्थ में रहकर वानप्रस्थ की क्षमता एवं वानप्रस्थ द्वारा संन्यास का अभ्यास करने का प्रयत्न करते हुए ही मनुष्य आगे बढ़ता है और क्रमशः पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचता है। कुछ अपवादों की बात अलग है, पर इस व्यवस्था को बिगाड़ कर जो छलाँग मारते हैं वह घाटे में ही रहते हैं। युवा संन्यासियों की अन्तः स्थिति कितनी घुटन भरी होती है उसका अनुभव उनके संपर्क में रहते हुए हमें भली प्रकार प्राप्त है। उस घुटन से बचने के लिए कई युवा साधुओं को हमने गृहस्थ धर्म अपनाने और क्रमिक विकास करते हुए आगे बढ़ने की प्रेरणा दी है। व्यतिक्रम करने वाले अति उत्साही व्यक्ति आत्मिक प्रगति करना तो दूर उलटे अनाचार के चंगुल में फँसते देखे गए हैं।

जिस प्रकार उच्चस्तरीय आध्यात्मिक प्रगति के साथ-साथ अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों की प्राप्ति होती है उसी प्रकार लौकिक जीवन में भी यदि अध्यात्म आदर्शों को प्रतिष्ठापित करने की साधना की जाय तो उससे भी अनेक सुख सुविधाओं की प्राप्ति सम्भव हो सकती है। आरम्भ हमें इन्हीं साधनाओं से करना चाहिए। सामाजिक, शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में भी अध्यात्म का प्रयोग उसी प्रकार हो सकता है जैसे धर्म एवं उपासना के क्षेत्र में उस प्रयोग की प्रथा आजकल प्रचलित है। प्रकाश जिस चीज पर भी पड़ेगा वही चमकने लगेगी। आग के संपर्क में जो भी चीज आवेगी वही गरम हो जायगी। बर्फ का स्पर्श जिससे भी कराया जायगा वही ठण्डा होगा। रंग से जो भी चीज रंगी जायगी उसका वर्ण उसी प्रकार का दीखने लगेगा। ठीक उसी प्रकार अध्यात्म का स्पर्श जीवन के जिस पहलू से भी करेंगे वहीं आनन्द, सौंदर्य एवं प्रगति का प्रत्यक्ष दर्शन होने लगेगा। इत्र जहाँ भी लगा देंगे वहीं से सुगन्ध आने लगेगी। आदर्शवाद का स्पर्श करके कोई भी पदार्थ अपने निखरे हुए स्वरूप में ही प्रकट होता है।

शरीर के आहार-विहार, रहन-सहन, खान-पान, शयन, जागरण, श्रम, संयम, ब्रह्मचर्य, आदि का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाय, प्रकृति की मर्यादाओं का उल्लंघन न किया जाय, तो निरोगिता एवं दीर्घजीवन की सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त हो सकती हैं। जबकि सृष्टि का कोई भी प्राणी रोगों की पीड़ा सहते हुए कष्टमय जीवनयापन नहीं करता तो वह अभिशाप मनुष्य को ही क्यों भोगना चाहिए? अन्धकार कोई वस्तु नहीं, प्रकाश के अभाव का नाम ही अन्धकार है, इसी प्रकार इस संसार में रोग शोक जैसा कोई तत्व नहीं। हमारा असंयम ही फलित होकर रोग का रूप धारण करता है। जब बुद्धिहीन अन्य प्राणी अपना पूर्ण आयुष्य प्राप्त करते हैं, निर्धारित अवधि तक जीते हैं, तो मनुष्य को ही अकाल मृत्यु का ग्रास क्यों होना चाहिये? किसी आकस्मिक दुर्घटना या प्रारब्ध भोग की बात दूसरी है पर साधारणतया हम प्रकृति की मर्यादाओं का उल्लंघन करके ही, स्वेच्छाचारिता एवं भ्रष्ट गतिविधियों को अपना कर ही अपने आपको भीतर ही भीतर खोखला बनाते रहते हैं और प्रतिकूलता का जरा-सी आघात लगने पर औंधे मुँह गिर पड़ते हैं। अकालमृत्यु हमें धर दबोचती है।

शरीर को भगवान का मन्दिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता का यदि दृढ़तापूर्वक पालन करने के लिए कटिबद्ध हो जायं तो समझना चाहिए कि बीमारियों से छुटकारा मिल गया। मानना चाहिए कि अकालमृत्यु का खतरा टल गया। प्राचीन काल में स्वस्थ, सुडौल एवं परिपुष्ट शरीर लेकर हमारे पूर्वज दीर्घ जीवन का आनन्द भोगते थे इसका कारण किन्हीं पौष्टिक खाद्य पदार्थ का बाहुल्य नहीं वरन् संयम को ही समझना चाहिए। आज खाद्य पदार्थों के कारण नहीं असंयम के कारण लोगों के स्वास्थ्य चौपट पड़े हैं। इन्हें सुधारना निश्व्रत रूप से संभव है। अध्यात्म का दृष्टिकोण अपनाकर ही हम अपना शरीर सुन्दर, स्वस्थ, सुडौल, निरोग एवं चिरस्थायी बना सकते हैं। यदि रोगों ने घेर रखा होगा तो भी सुधरा हुआ दृष्टि-कोण अपनाकर उससे छुटकारा पाया जा सकता है। यह विभूति क्या कुछ कम आनन्ददायक होगी?

लोगों की मनोभूमियाँ आज कुचली-मसली पड़ी हैं। आधे से अधिक व्यक्ति ऐसे मिलेंगे जिन्हें अर्द्ध-विक्षिप्त कहा जा सकता है। सोचने का सही तरीका जिन्हें मालूम हो, विचारों पर जो नियन्त्रण कर सकें, आवेशों का परिष्कार करते हुए जो औचित्य एवं दूरदर्शिता के आधार पर ही दैनिक जीवन की समस्याओं को सुलझाया करें ऐसे व्यक्ति कितने हैं? तनिक-सा प्रलोभन सामने आते ही आदर्शों से विचलित हो जाने वाले, जरा-सा भय सामने आते ही कर्त्तव्यपथ को छोड़कर भाग खड़े होने वाले, पल-पल में मति बदलने वाले, अस्थिर चित्त लोगों का ही सर्वत्र बाहुल्य दीखता है। जीवन का कोई लक्ष्य बनाकर उस पर अविचल भाव से दृढ़ रहने वाले मनुष्य ढूंढ़े नहीं मिलते। जिन्हें अपना गौरव, धर्म और कर्त्तव्य प्राणों से प्यारा हो ऐसे लोग कहा है? नगण्य-सी प्रतिकूलताएँ, कठिनाइयाँ, असफलताएं सामने आते ही क्षोभ, आवेश, निराशा, शोक में उद्विग्न होकर मानसिक सन्तुलन खो बैठने वाले व्यक्ति यों की संख्या दिन-दिन बढ़ रही है। स्वार्थी, ईर्ष्यालु, लालची, कामुक, निष्ठुर, असहिष्णु, आलसी, प्रमादी, व्यसनी एवं अस्त-व्यस्त प्रकृति के लोग न सोचने योग्य सोचते हुए और न करने योग्य करते हुए सर्वत्र फैले पड़े दीखते हैं।

सिर दर्द, जुकाम, अनिद्रा, रक्त चाप,हृदय की धड़कन, स्मरण-शक्ति की कमी, सहनशीलता का अभाव अदूरदर्शिता, जल्दबाजी, अधीरता, चंचलता जैसे रोगों से अगणित व्यक्ति रुग्ण हो रहे हैं। चिन्ता, भय, निराशा और विक्षोभ की चिन्ता में जीते जी जलते रहने वाले लोग मरघटों में नहीं घरों में अपने अस्तित्व का अन्त करते देखे जा सकते हैं। कचहरी, जेल, अस्पताल और पागलखानों में यही वर्ग भरा पड़ा रहता है। जड़ता, मूढ़ता, दुराग्रह, दीनता, आशंका, अविश्वास, अन्धविश्वास जैसे मनोविकारों में ग्रस्त व्यक्ति अपने को बर्बादी की ओर निरन्तर धकेलते ले जाते हैं।

मानसिक रुग्णता एवं दुर्बलता बाहर से दिखाई नहीं पड़ती पर यदि उसका विधिवत् परीक्षण किया जाय तो वे शारीरिक रोगों से भी अधिक मानसिक रोग फैले हुए हैं और बीमारियों के कारण जितनी क्षति मनुष्य को उठानी पड़ती है उससे अनेक गुनी इन मनोविकारों के कारण उठानी पड़ती है। शारीरिक रोगों से घिरे रहकर भी मनस्वी व्यक्ति जीवन लाभ लेता रह सकता है पर जिसका मानसिक स्तर नष्ट हो गया, वह शरीर से निरोग रहने पर भी पशु से अधिक अच्छी जिन्दगी व्यतीत न कर सकेगा। अन्य बातों में पशुओं से गया गुजरा मानव प्राणी अपनी मानसिक विशेषताओं के कारण ही उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचा है। यदि उस महानता को वह खो बैठे और खाने-पहनने से अधिक आगे उसकी समझ लड़खड़ाने लगे तो यही कहा जायगा कि उसने मनुष्य जीवन जैसे सौभाग्य का कोई लाभ प्राप्त नहीं किया।

मन एक अत्यन्त सामर्थ्यवान उपकरण है। शरीर को विधिवत् काम में लाने की तरह मन का ठीक उपयोग भी हमें आना चाहिए। जिसे मोटर चलाना नहीं आता ऐसा अनाड़ी व्यक्ति यदि ड्राइवर बन बैठे तो वह दुर्घटनाएँ ही करेगा। हमारे जीवन आज पग-पग पर दुर्घटना ग्रस्त हो रहे हैं। जिस मानव-जीवन को आनन्द और सफलताओं के लिए ही परमात्मा ने बनाया है उसमें पग-पग पर असन्तोष और विक्षोभ ही अनुभव हों तो समझना चाहिए हमें जीवन जीना नहीं आता। शरीर को ठीक तरह काम में लेने की विधि जो जानता होगा उसे बीमार क्यों पड़ना पड़ेगा? जिसे मन का स्वरूप, उसके संचालन का विज्ञान एवं विधान मालूम है उसे मनोविकारों से ग्रस्त होकर रोते कलपते हुए, पतन का एवं दुर्दशाग्रस्त जीवन क्यों जीना पड़ेगा?

अपने दोष दूसरों पर थोपने से कुछ काम न चलेगा। हमारी शारीरिक एवं मानसिक दुर्दशाओं के लिए दूसरे उत्तरदायी नहीं, वरन् हम स्वयं ही है। दूसरे व्यक्ति यों, परिस्थितियों एवं प्रारब्ध योगों का भी कुछ प्रभाव होता है पर तीन चौथाई जीवन तो हमारे आज के दृष्टिकोण एवं कर्त्तव्य का ही प्रतिफल होता है। अपने को सुधारने का काम हाथ में लेकर हम अपनी शारीरिक और मानसिक परेशानियों को आसानी से हल कर सकते हैं।

अध्यात्म के आदर्शों को अपनाकर यदि हम अपना शरीर और मन निरोग बना लेते हैं और उन दोनों यंत्रों में छिपी हुई शक्ति यों का सदुपयोग रचनात्मक दिशा में करने लगते हैं, तो ऐतिहासिक महापुरुषों की तरह अभीष्ट लक्ष्य की ओर निरन्तर प्रगति करते हुए जीवन का सच्चा लाभ प्राप्त कर सकना किसी के लिए भी कठिन नहीं हो सकता। इन लौकिक विभूतियों को व्यवहारिक जीवन में अध्यात्म का समावेश करते हुए यदि हम प्राप्त कर सकें तो यह एक बड़ी बात होगी। अध्यात्म के प्रति हमारी श्रद्धा बढ़ेगी और इस सफलता से प्राप्त साहस के बल पर उच्च-कोटि की आध्यात्मिक सफलताएँ प्राप्त कर सकना भी सम्भव बन सकेगा।


समृद्धि और सुसम्पन्नता का मार्ग

शायद ही कोई व्यक्ति अपनी आर्थिक स्थिति से संतुष्ट मिलेगा। कारण एक ही है कि धन के सम्बन्ध में हमारा दृष्टिकोण अनात्मकारी बना हुआ है। अध्यात्म सिद्धान्तों का यदि इस क्षेत्र में प्रवेश हो सके तो आज ही अर्थ-संकट का हल निकल सकता है और सर्वत्र सुसम्पन्नता एवं समृद्धि का वातावरण उत्पन्न हो सकता है। कौन खर्च जीवनोत्कर्ष के लिए और कौन विलासिता के लिए किया जा रहा है इसका उपयोगिता और अनुपयोगिता की कसौटी पर परखते हुए परीक्षण किया जाय जो प्रतीत होगा कि हमारा अधिकाँश धन निरर्थक कामों में खर्च होता है। रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा जैसी आवश्यक बातों में जितना व्यय होना चाहिए उसकी अपेक्षा उन्हीं चीजों में विलासिता एवं आडम्बर जुड़ जाने से खर्चे की बहुत अधिक वृद्धि हो जाती है। बीड़ी, पान, तमाखू, सिनेमा, शृंगार-प्रसाधन, कीमती पोशाकें, फैशन के उपकरण, सजावट, मनोरंजन, अन्ध-विश्वास, ढकोसले, मटरगस्ती, विवाह-शादी आदि के जंजालों में कितना खर्च बढ़ता है इसका हिसाब लगाया जाय तो प्रतीत होगा कि जीवनोपयोगी कार्यों की अपेक्षा इन बेकार बातों में पैसे की बर्बादी कहीं अधिक होती है। अध्यात्म का सिद्धान्त है कि पैसे को लक्ष्मी का प्रतीक मानकर उसे केवल जीवनोत्कर्ष के आवश्यक कामों में ही खर्च किया जाय। अपव्यय के नाम पर एक फटी-कौड़ी भी बर्बाद न होने दी जाय। यदि इस आदर्श के आधार पर अपव्यय को कठोरतापूर्वक रोका जा सके तो आधे से अधिक अर्थ-संकट देखते-देखते दूर हो सकता है। उचित आवश्यकताओं की पूर्ति भर के लिए आसानी से कमाया जा सकता है। तंगी तो अपव्यय के कारण ही पड़ती है। इसकी रोक-थाम तभी संभव है जब मनुष्य अपनी अर्थ-नीति को अध्यात्म तत्व-ज्ञान के आदर्शों के अनुरूप निर्धारित करते हुए उस पर चलने का प्रयत्न करें।

अपव्यय, अपनी हैसियत से अधिक खर्च करना एक ऐसी घृणित बुराई है जिससे अन्य अनेकों दोष, दुर्गुण पैदा होते हैं। अधिकाँश पाप प्रवृत्तियों का जन्म इसी अत्याचार के कारण होता है। जुआ, चोरी, ठगी, बेईमानी, व्यभिचार, अनीति, अपहरण, रिश्वत, लूट, हत्या आदि के कुकर्म बहुतों को अपव्यय की आदत के कारण उत्पन्न हुई तंगी को पूरा करने के लिए ही करने पड़ते हैं। यदि मनुष्य अपने खर्चे को सीमित रखे, अनावश्यक बातों में एक पाई भी नष्ट न होने दे, सादा सात्विक एवं सरल जीवन-क्रम बना कर रहे तो वह अर्थ-संकट जिसके कारण सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई है सहज ही दूर हो सकता है।

आलस्य और उपेक्षा वृत्ति छोड़कर यदि लोग परिपूर्ण श्रम एवं मनोयोगपूर्वक अपना कार्य सर्वोत्तम बनाने की भावना लेकर करें तो निश्चय ही उपार्जन की क्षमता भी बढ़ेगी। खरे काम का सर्वत्र स्वागत किया जाता है और उसका उचित मूल्य भी मिलता है। अपनी योग्यता एवं क्षमता बढ़ाते चलने के लिए जो भी प्रयत्न करेगा उसकी उपार्जन शक्ति भी निश्चित रूप से बढ़ेगी। उपार्जन बढ़ाने और अपव्यय रोकने का जिसे ध्यान है उसे आर्थिक तंगी अनुभव करने का कभी अवसर ही न आयेगा। ईमानदारी का पैसा फलता-फूलता है। वह चोरी, बीमारी, मुकदमेबाजी, ऐय्याशी एवं फिजूल-खर्ची में बर्बाद न होगा। पसीने की कमाई खर्च करते हुए दर्द लगता है। ईश्वर भी ऐसे पैसे में ‘बरकत’ देता है। यदि हम अपनी नीति को ईमानदारी और सादगी की बनाते हुए आर्थिक अध्यात्म को अपनाने का प्रयत्न करें तो आर्थिक तंगी जैसी कठिनाई का दुःख भुगतने का अवसर ही सामने न आवेगा।

सामाजिक दृष्टि से देखें तो व्यक्तिगत धन-संग्रह एवं विलास करने की प्रवृत्ति ने समाज में गरीबी, बेकारी, तंगी, अपव्यय की प्रवृत्ति, ईर्ष्या एवं अनाचार को जन्म दिया है। यदि समानता और सदुपयोग का आध्यात्मिक दृष्टिकोण रखते हुए संचय के स्थान पर वितरण की, संविभाजन की भावना काम करे तो जितनी वस्तुएं आज संसार में मौजूद हैं उन्हीं से सबका गुजारा आनन्दपूर्वक हो सकता है। संचय, स्वामित्व एवं अपव्यय की बुराइयों ने धन को एक समस्या बना रखा है। अर्थ-तंत्र को आत्मिक दृष्टिकोण से जब तक चलाया न जायगा तब तक उसकी उलझन सुलझेगी भी नहीं। कोई थोड़ा अधिक भी कमाने लगा या कुछ आकस्मिक लाभ हो गया तो उससे भी क्या बनने वाला है? व्यक्ति एवं संसार की निजी तथा सामूहिक समस्या का हल अध्यात्म सिद्धान्तों के अनुसार ही होगा। कम आमदनी में भी स्वर्गीय आनन्द जैसा सुख प्राप्त करते हुए जी सकने का प्रत्यक्ष उदाहरण ऋषियों ने अपनी जीवन-चर्या के रूप में प्रस्तुत किया था। वह मार्ग हम सब के लिए आज भी खुला पड़ा है। अध्यात्म हमें आर्थिक तंगी से छुड़ा सकता है और कम आमदनी होते हुए भी धनकुबेरों से बढ़ी-चढ़ी प्रसन्नता का रसास्वादन दे सकने में समर्थ हो सकता है।

स्वजन-परिजनों का सहयोग भी हमारी सज्जनता पर निर्भर है। सद्गुणों के आकर्षण से दूसरों को अपने वशवर्ती बना सकने से बढ़ा-चढ़ा वशीकरण मन्त्र इस संसार में और कोई नहीं है। मिठाई को बच्चों से लेकर बूढ़े तक सभी पसन्द करते हैं। मधुरता, प्रेम, नम्रता, सज्जनता एवं उदारता का व्यवहार करना जिसे आता है उसे सहयोग देने के लिए अपने-पराये सभी तत्पर रहेंगे। सज्जनता मिठाई से अधिक मीठी होती है और उसकी सुगंध प्राप्त करने के लिए हर मनुष्य लालायित फिरता रहता है। यह मिठास यदि हम अपने स्वभाव में सम्मिलित कर लें तो यह शिकायत करने का कोई कारण न रह जायगा कि दूसरे लोग हमें सहयोग नहीं देते या हमें दूसरों के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है। माना कि संसार में बुरे लोग बहुत हैं फिर भी सज्जनता के आगे बुराई को भी नरम बनना पड़ता है। प्रकाश की शक्ति अंधकार से अधिक है। बुराई को परास्त करने की परिपूर्ण सामर्थ्य भलाई में मौजूद है। यदि अपने गुण, कर्म और स्वभाव में अध्यात्म का, सज्जनता का —समुचित अंश विद्यमान रहे तो दूसरों का विरोध असहयोग एवं दुर्भाव अपने लिए तो कम हो ही सकता है। प्रेम की प्रतिक्रिया अन्ततः सुखद परिणाम साथ लेकर ही वापिस लौटती है।

हम अपने आपको सुधारकर अपनी समस्त अस्त-व्यस्तताओं को सुव्यवस्था एवं सुसम्पन्नता में बदल सकते हैं। यह कैसे संभव होगा उसकी विस्तृत विवेचना इसी स्तंभ के अंतर्गत अगले महीनों में प्रस्तुत की जाती रहेगी। अभी तो हमें इतना ही समझ लेना पर्याप्त है कि हमारे सूक्ष्म एवं स्थूल शरीर में अगणित शुभ संभावनाएं ओत-प्रोत हैं। पर वे प्रसुप्त पड़ी हैं। अध्यात्म का प्रकाश पड़ने से वे जागृत हो सकती हैं और हमें नर से नारायण बना सकती हैं।

गायत्री की उच्चस्तरीय साधना


प्रभावशाली साधना की पृष्ठभूमि

साधना क्षेत्र में प्रगति करने की वास्तविक इच्छा करने वालों के लिए शरीर और मन का शोधन आवश्यक है। धुले कपड़े पर ही ठीक तरह रंग चढ़ता है। तेल से चिकना, कालिख से गन्दा बना हुआ वस्त्र कीमती रंगों से भी ठीक तरह रंगा न जा सकेगा। यही नियम अध्यात्म मार्ग में भी चरितार्थ होता है। अन्नमयकोश, मनोमयकोश, विज्ञानमयकोश, आनन्दमयकोश के अनावरण की पञ्चकोशी उच्चस्तरीय गायत्री उपासना का प्रशिक्षण गत तीन वर्षों से किया जा रहा है। इस आधार पर अनेकों साधकों ने आशाजनक प्रगति की है। उन्हें घर में रहते हुए एक-दो घण्टा नित्य लगाकर की जा सकने वाली इस साधना से ऐसे उत्साहवर्धक अनुभव हुए हैं जैसे गिरि गुफाओं में दीर्घकाल से रहने वाले योगीजनों को भी नहीं हो पाते। किन्तु साथ ही ऐसे भी अनेक साधक हैं जिन्हें मन को एकाग्र करने की समस्या का हल भी अभी तक नहीं मिला है। लकीर पीटने की तरह वे कुछ करते तो रहते हैं पर न तो उन्हें प्रकाश मिलता है और न आनन्द ही आता है।

एक ही विधि विधान को अपनाने वाले साधकों की प्रगति में इस प्रकार का आकाश-पाताल का अन्तर होने का कारण उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति ही होती है। एक ही रोग के कई रोगियों को एक ही दवा दी जाय तो सब पर समान असर नहीं होता। रोगियों की शारीरिक स्थिति, पथ्य-कुपथ्य, रहन-सहन, संकल्प-विकल्प के आधार पर रोग के अच्छे होने न होने में बहुत अन्तर बना रहता है यही बात साधना क्षेत्र में भी लागू होती है। उपासना विधि एक-सी रहने पर भी प्रगति में बहुत भारी अन्तर पाया जाता है।

अस्वस्थता, आध्यात्मिक प्रगति में एक भारी बाधा है। रोगी शरीर में रहने वाला मन भी रोगी हो जाता है। रोग के कारण शरीर में होते रहने वाले कष्टों की तरह विक्षुब्ध मन में भी अनेक प्रकार के उद्वेग उठते रहते हैं। उछलते हुए पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब दीख नहीं पाता, उसी प्रकार अशान्त मन में स्थिरता, एकाग्रता और स्थिरता नहीं रह पाती। ऐसी दशा में साधनात्मक आनन्द एवं प्रगति से वञ्चित रहना पड़े तो इसमें कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।

शरीर के समस्त रोगों की जड़ अपच है। पाचन तन्त्र में गड़बड़ी आने से पेट में सड़न उत्पन्न होती, वायु का प्रकोप बढ़ता है और रक्त में अशुद्धता भर जाती है। यह अशुद्धता जिस अंग में जड़ जमा लेती है वहीं रोग के लक्षण प्रकट होने लगते हैं। बीमारी किसी भी अंग में क्यों न हो, उसका नाम रूप कुछ भी क्यों न हो वस्तुतः वह अपच की ही प्रतिक्रिया होती है। बिगड़े हुए पाचन तन्त्र का सुधार करने में संसार की समस्त चिकित्सा-प्रणालियों की अपेक्षा प्राकृतिक चिकित्सा सिद्धान्त का अत्यन्त उत्कृष्ट स्वरूप है। उसमें मनोविज्ञान और अध्यात्म का भी समावेश होने से न केवल शरीर का वरन् मन एवं अन्तःकरण का भी परिशोधन होता है।

चान्द्रायण व्रत की पद्धति को हम और भी अधिक वैज्ञानिक बना रहे हैं। उपवास के साथ-साथ ऐनेमा, मिट्टी की पट्टी, वाष्प-स्नान, कटि-स्नान, सूर्य किरण-चिकित्सा, मृतिका-लेपन आदि पञ्चकर्मों द्वारा पेट ही नहीं वरन् शरीर के अन्य अंगों का भी शोधन होता है और देखा यह गया है कि एक वर्ष तक किसी सुयोग्य चिकित्सक की औषधि चिकित्सा करने की अपेक्षा एक महीने के चांद्रायणव्रत से कहीं अधिक लाभ होता है। गायत्री तपोभूमि में गत दो वर्षों से यह प्रयोग चल रहा है। दो-सौ से अधिक व्यक्ति वैज्ञानिक पद्धति का चान्द्रायण कर चुके हैं, उन्हें जितना लाभ हुआ है उसे देखते हुए इसे आरोग्य की दृष्टि से एक जादू ही कहा जा सकता है।

इन्द्रियों पर संयम चान्द्रायण-व्रत में अनिवार्य है। आस्वादन, ब्रह्मचर्य आदि नियमों का पालन करने से मन की चञ्चलता दूर होती है। आत्म-निरीक्षण करते हुए अपने गुण-कर्म-स्वभाव में घुसी हुई त्रुटियों को देखना-समझना, भूलों पर पछताना, उनके लिए आत्म-प्रताड़ना एवं प्रायश्चित करना मन की शुद्धि का सर्वोत्तम उपाय है। चान्द्रायण व्रत में पूरे एक महीने यही मानसिक क्रिया करनी पड़ती है। जो पाप बने हैं उनसे हुई सामाजिक क्षति पूर्ति के लिए कोई पुण्य प्रयत्न सोचना पड़ता है, जिससे उत्साह एवं सन्तोष से पाप का दुख एवं असन्तोष दूर हो सकें। इस प्रक्रिया को अपनाने से मनोभूमि की शुद्धि अवश्यंभावी है। चान्द्रायण व्रत करने वाले का मन भी शरीर की भाँति ही निरोग बनता है। अशुद्ध मन में अनेकों मानसिक बीमारियाँ एवं विकृतियाँ भरी रहती हैं जिनके कारण लोग प्रायः मूर्खतापूर्ण कार्य करते हैं और आधे पागल जैसे बने रहते हैं। चान्द्रायणव्रत करने के उपरान्त प्राप्त होने वाली मानसिक निरोगिता से अनेक व्यक्ति यों के स्वभाव एवं दृष्टिकोण बदलते देखे गये हैं। सिरदर्द, जुकाम, अनिद्रा, दुःस्वप्न, चिड़चिड़ापन, आवेश, उत्तेजना, चिन्ता, भय, निराशा, घबराहट आदि अनेक

मानसिक रोगों की सरल प्रभावशाली चिकित्सा चान्द्रायण व्रत के अतिरिक्त दूसरी हो नहीं सकती। विशेष प्रकार की मानसिक दुर्बलताओं का निवारण करने के लिए मनोविज्ञान चिकित्सा के सिद्धान्तों का आश्रय लेकर हम चान्द्रायण व्रत की अवधि में दूसरी प्रकार के उपचारों का भी समावेश करते रहते हैं। इसलिए वह न केवल एक आध्यात्मिक तप मात्र रहता है वरन् शरीर-शोधन के साथ-साथ मनोविकारों के समाधान का एक श्रेष्ठ उपचार भी बन जाता है। पिछले दिनों इस प्रकार के सैकड़ों प्रयोगों में सफलता प्राप्त करने के उपरान्त हमारा सुनिश्चित विश्वास यह हो गया है कि आत्मिक प्रगति के लिए, आन्तरिक भूमिका की आवश्यक तैयारी के लिए चान्द्रायणव्रत जितना आवश्यक है उतना ही वह शारीरिक और मानसिक दोषों को सुधारने हुए लौकिक-जीवन में सुख-शान्ति का मार्ग प्रशस्त करने की दृष्टि से भी उपयोगी है।

उच्चस्तरीय गायत्री उपासना का आवश्यक लाभ उठाने के लिये अधिक नहीं तो एक चान्द्रायण व्रत करने का अवसर निकालना चाहिए। यों उसे पूरी जानकारी के उपरान्त अपने घरों पर भी किया जा सकता है। पर अच्छा यही है कि अपने स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की समग्र परिशुद्धि की दृष्टि से किसी अनुभवी व्यक्ति के सान्निध्य में ही उसे किया जाय। अखण्ड-ज्योति के अगले अंकों में चान्द्रायणव्रत सम्बन्धी पेचीदगियों का वर्णन किया जायगा जिसे पूरी तरह समझ लेने के उपरान्त ही किसी को अपने आप करने की बात सोचनी चाहिए। लाभ की बात सोचकर अविधिपूर्वक कदम उठाने लगने की जल्दबाजी कई बार अहितकर भी सिद्ध होती है। चान्द्रायण व्रत के साथ-साथ किया गया गायत्री अनुष्ठान सोने में सुगन्ध का काम करता है।


कृच्छ और मृदु चान्द्रायण

चान्द्रायण व्रत के विधि विधान अनेक ग्रन्थों में मिलते हैं। विभिन्न शारीरिक और मानसिक स्थिति के व्यक्तियों लिए—विभिन्न पापों के प्रायश्चितों के लिए— आत्म-बल को विभिन्न दिशाओं में बढ़ाने के लिए शास्त्रकारों ने अनेक विधानों के चान्द्रायण व्रतों का उल्लेख किया है। देश-काल-पात्र के भेद से भी इस प्रकार के अन्तर बताये गये हैं। किसी युग में लोगों की शारीरिक स्थिति बहुत अच्छी होती थी, वे देर तक कठोर उपवास एवं तप साधन कर सकते थे। इसलिए उन परिस्थितियों को देखते हुए उस प्रकार के कठोर विधानों का बनाया जाना स्वाभाविक भी था। प्राचीन ग्रन्थों के अनुसार कृच्छ और मृदु भेद से दो प्रकार के चान्द्रायण व्रत माने गये हैं। कृच्छ चान्द्रायण व्रत का विधान उन लोगों के लिए है जिनसे कोई बड़े पाप बन पड़े हैं, अथवा तीव्र तपश्चर्या कर सकने की सामर्थ्य जिनमें है। बहुत कर इनका उपयोग सतयुग आदि पूर्व युगों में होता था जब मनुष्य की सहन-शक्ति पर्याप्त थी।

मृदु चान्द्रायण-शारीरिक और मानसिक दुर्बलता वाले व्यक्ति यों के लिए है। इसे स्त्री-पुरुष, बाल, वृद्ध सभी कर सकते हैं। छोटे पापों के शमन और थोड़ा आत्म-बल बढ़ाने में भी इस व्रत से बहुत सहायता मिलती है। आरोग्य की दृष्टि से यह एक प्रभावशाली चिकित्सा का काम देता है। विशेषतया उदर रोगों के लिए यह चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करता है। मृदु चान्द्रायण को कई ग्रन्थों में शिशु चान्द्रायण भी कहा गया है क्योंकि वह कठोर चान्द्रायण की तुलना में बालक ही है।

स्कन्द पुराण में चान्द्रायण व्रत की चर्चा के संदर्भ में युधिष्ठिर और कृष्ण का संवाद मिलता है। युधिष्ठिर पूछते हैं :—

चक्रायुध नमस्तेऽस्तु देवेश गरु णध्वज।

चान्द्रारण विधिं पुण्यमाख्याहि भगवन मम॥

अर्थात्—”चक्रायुध और गरुणध्वज धारण करने वाले भगवान कृष्ण को नमस्कार करके युधिष्ठिर ने पवित्र चान्द्रायण व्रत का वर्णन करने की प्रार्थना की।”

भगवान ने इस महाव्रत का महात्म्य बताते हुए कहा—

चान्द्रायणेन चीर्णेन यत् कृतं तेन दुष्कृतम्।

तत् सर्व तत्क्षणादेव भस्मी भवति काष्ठवत्॥

अर्थात्—”चान्द्रायण व्रत करने से मनुष्य के किये हुए पाप उसी प्रकार दूर हो जाते हैं जैसे जलती हुई अग्नि में काष्ठ जल जाता है।”

अनेक घोर पापानि उपपातक मेवच।

चान्द्रायर्णन नश्यन्ति वायुना पाँसवो यथा॥

अर्थात् “अनेकों घोर पाप तथा सामान्य पाप चान्द्रायण व्रत से उसी प्रकार उड़ जाते हैं जैसे आँधी चलने पर धुलि के कण।”

कृच्छ चान्द्रायण के विधान-भाग का कुछ अंश इस प्रकार है :—

शोधयेत् तु शरीरं स्वं पंचगव्येन मन्त्रितः।

स शिरः कृष्ण पक्षस्य तत् प्रकुर्वीत वापनम्।

शुक्ल वासाः शुचिर्भूखा मौञ्जों वन्धीत मेखलाम्

पलाश दण्डमादाय ब्रह्मचर्य व्रते स्थितः।

कृ तोपवासः पूर्व तु शुक्ल प्रतिपादे द्विजः।

नदी संगम तीर्थेषु शुचौ देशे गृहेऽपिवा।

अर्थात्—”शरीर को (दश स्नान-विधान से) शुद्ध करें। अभिमन्त्रित करके पंचगव्य पीवे। सिर को मुँड़ाकर कृष्ण पक्ष में व्रत आरम्भ करे। श्वेत वस्त्र पहने, पवित्र रहे, कटि प्रवेश में मेखला (लँगोट) धारण किये रहें। पलास की लाठी लिये रहे और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करे। नदी के संगम, तीर्थ एवं पुष्प प्रदेशों में अथवा घर में रहकर भी शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा में चान्द्रायण व्रत आरम्भ करें।

नदीं गत्वा विशुद्धात्मा सोमाय वरु णाय च।

आदित्याय नमस्कृत्वा ततः स्नायात् समाहितः।

उतीर्योदक माचम्य च स्थित्वा पूर्वतो मुखः।

प्राणायामं ततः कृत्वा पवित्रेरभिसेचनम्।

वीरघ्न मृषभं वापि तथा चाप्यधमर्वषम्।

गायत्री मम देवीं या सावित्रीं वा जपेत् ततः।

अर्थात्—”शुद्ध मन से नदी में स्नान करे। सोम, वरुण और सूर्य को नमस्कार करें। पूर्व को मुख करके बैठे। आचमन, प्राणायाम, पवित्री कारण, अभिसिंचन, अधमर्षण आदि संध्या-कृत्यों को करता हुआ सावित्री-गायत्री का जप करें।”

आधारा वाज्य भागो च प्रणवं व्याहतिस्तथा।

वारु णं चैव पञ्चैव हुत्वा सर्वान् यथा क्रमम्।

प्रणम्य धाग्निं सोमं च भस्य धृत्वा यथा विधि।

“आधार होम, आज्य भाग, प्रणव, व्याहृति, वरुण आदि का विधिपूर्वक हवन करें और अग्नि तथा सोम को प्रणाम करके मस्तक पर भस्म धारण करें।”

अंगुल्थग्रे स्थितं पिण्डं गायञ्याचाभिमन्त्रयेत्।

अंगुलीभिस्त्रिभि पिण्डं प्राश्नीयात् प्रां शुचिः।

यथा च वर्धते सोमो ह्रसते च यथा पुनः।

तथा पिण्डाश्च वर्धन्ते ह्रसन्ते च दिने दिने।

अर्थात्—”तीन अँगुलियों पर आ सके इतना अन्न का पिण्ड गायत्री से अभिमन्त्रित करके पूर्व की ओर मुख करके खाये। जिस प्रकार कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा घटता है उसी प्रकार भोजन घटाये और शुक्ल पक्ष में जैसे चन्द्रमा बढ़ता है वैसे-वैसे बढ़ावे।

कृच्छ चान्द्रायण के चार भेद माने गये हैं। (1) पिपीलिका मध्य चान्द्रायण। (2) यव मध्य चान्द्रायण। (3) यति चान्द्रायण। (4) शिशु चान्द्रायण। इन चारों में ही 240 ग्रास भोजन एक महीने में करना पड़ता है। पिपीलिका मध्य चान्द्रायण वह है जिसमें पूर्णमासी का 15 ग्रास खाकर क्रमशः एक-एक ग्रास घटाते हैं और अमावस्या व प्रतिपदा को निराहार रहकर दोज से एक-एक ग्रास बढ़ाते हुए पूर्णिमा को पुनः 15 ग्रासों पर जा पहुँचते हैं।

यव मध्य चान्द्रायण शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होता है। अमावस्या के दिन उपवास करके शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को एक ग्रास लेवे इसके पश्चात् पूर्णिमा तक एक-एक ग्रास बढ़ाता हुआ 15 ग्रास तक पहुँचे। इसके बाद कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से एक-एक ग्रास घटाते हुए अमावस्या को निराहार की स्थिति तक जा पहुँचे।

यति चान्द्रायण में मध्याह्न को प्रतिदिन आठ-आठ ग्रास खाता रहे। न किसी दिन कम करे न अधिक।

शिशु चान्द्रायण में प्रातः 4 ग्रास और सायंकाल 4 ग्रास खाए जाते हैं और यही क्रम नित्य रहता है।

इस प्रकार इन सभी कृच्छ चान्द्रायणों में एक महीने में 240 ग्रास भोजन किया जाता है। ग्रास के दो अर्थ किये गये हैं। वीद्धायन का कथन है—

“पिण्डान् प्रकृति स्थात प्राश्नति”

अर्थात्—साधारणतया मनुष्य जितना बड़ा ग्रास खाता है वही ग्रास का परिमाण है। महर्षि अत्रि ने इस संदर्भ में अपना मत भिन्न व्यक्त किया है। उनने लिखा है :—

कुम्कुटाण्ड प्रमाणं स्याद् यावद् वास्य मुख विशेत्।

एतं ग्रासं विजानीयुः शुद्ध्यर्थे काय शोधनम्॥

अर्थात्—”मुर्गी के अण्डे की बराबर ग्रास माना जाय अर्थात् जितना मुँह में समा सके उसे ग्रास कहा जाय।”

शास्त्रकारों ने जहाँ अनेक विधि-विधानों का वर्णन किया है वहाँ देश, काल, पात्र की परिस्थितियों का ध्यान रखने का भी निर्देश दिया है। कृच्छ चान्द्रायण व्रत की कुछ बातें ऐसी हैं जो आज की स्थिति में सर्वसाधारण के लिए उपयुक्त नहीं। सिर का मुण्डन कराना किसी समय साधारण बात रही होगी। आज कोई व्यक्ति समाज में इस प्रकार रहे तो उस पर व्यंग-बाण छोड़े जायेंगे और मूर्ख ठहराया जायगा। सधवा महिलाओं के लिए तो यह एक प्रकार से असम्भव ही होगा। इसी प्रकार पूरे भोजन में जितने ग्रासों की सीमा नियत है उतने मात्र से गुजारा भी कठिन है। जप तथा होम, दान आदि का जो विस्तृत वर्णन है, उतना भी सबसे नहीं निभ सकता। इसलिए वर्तमान परिस्थितियों में मृदु चान्द्रायण व्रत ही सर्वसाधारण के लिए उपयोगी हो सकता है।

मृदु चान्द्रायण करते हुए भी गायत्री पुरश्चरण करने से अन्तःकरण में सात्विकता एवं आत्म-बल की असाधारण वृद्धि होती देखी गई है। इस एक महीने की अवधि में मनोभूमि में आशाजनक परिवर्तन होता है। कुविचारों और कुकर्मों की ओर से मन में घृणा उत्पन्न होती है और भविष्य में शुद्ध जीवन व्यतीत करने की भावना स्वयमेव जागृत होने लगती हैं। पिछले किये हुए पापों के प्रति आत्म-ग्लानि और प्रायश्चित की आकाँक्षा जागृत होने से मनुष्य का अन्तरात्मा अपने को धिक्कारता है और जो हानि समाज को पहुँचाई है उसे उस रूप में ज्यों की त्यों न सही किसी दूसरी प्रकार से पूर्ण करने की योजना बनाता है। शरीर से कष्ट सहकर उपवास करना, मन से आत्म-निरीक्षण करते हुए अपनी भूलों को ढूँढ़ना, हटाना और जो अशुभ अब तक बन पड़ा है उसकी क्षतिपूर्ति के लिए किन्हीं पुण्य कर्मों का आयोजन करना यही चान्द्रायण व्रत का मूल आधार है। यदि आधार स्थिर रहे तो चान्द्रायण व्रत का पूरा-पूरा लाभ साधक को मिल सकता है, भले ही आहार तथा आकार सम्बन्धी विषयों में थोड़ी ढील भी रखी जाय। वृहद् चान्द्रायण का विधान कठिन और मृदु चान्द्रायण का सुगम है। स्थिति के अनुसार ही इनमें से एक का चुनाव करना चाहिए। आज की स्थिति मृदु चान्द्रायण की ही है पर उसमें भी भावनात्मक उत्कृष्टता बनी रहे तो प्रतिफल में कोई विशेष अन्तर नहीं आता।


मृदु चान्द्रायण की साधना विधि

मृदु चान्द्रायणव्रत सरल होते हुए भी परिणाम की दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं है। शारीरिक कष्ट उतना ही उठाया जाना चाहिए जितने से स्वास्थ्य का सन्तुलन बिगड़ने की आशंका उत्पन्न न हो जाय। करना तो कठिन ही करना, न करना तो बिल्कुल छोड़ देना—यह नीति ठीक नहीं। औचित्य मध्यम मार्ग का ही है। बीच का काम चलाऊ मार्ग निकाल लेने से सत्कर्मों की ओर मनुष्य की प्रवृत्ति बनी रहती है। बौद्धधर्म में मध्यम मार्ग की ही प्रतिष्ठा मानी गई है। साधारण जीवन का तारतम्य न बिगड़ने देते हुए जो शुभ कर्म बन पड़े वे उत्साहवर्धक रहते हैं और उस मार्ग पर चलने का साहस बना रहता है। चान्द्रायण व्रत के आशाजनक लाभों को देखते हुए मन उसे करना तो चाहता है पर विधान की कठोरता को देखते हुए वैसा साहस नहीं होता। ऐसी दशा में मृदु चान्द्रायणव्रत का मध्यम मार्ग अपनाना ही बुद्धिमत्तापूर्ण रहेगा।

मृदु चान्द्रायणव्रत किसी भी मास की पूर्णिमा से आरम्भ करके अगली पूर्णिमा को समाप्त करना चाहिए। यों जेष्ठ, श्रावण, आश्विन, मार्गशीर्ष और माघ इसके लिए विशेष शुभ माने गये हैं पर निषेध किसी भी महीने का नहीं है।

लिखा यह है कि मनुष्य का पूर्ण आहार जितना हो उसका एक आहार-पिण्ड बनाना चाहिए। पूर्णिमा के दिन वह पूरा पिण्ड खाया जाय। फिर कृष्ण पक्ष में चन्द्रमा की एक-एक कला जिस प्रकार घटती है उसी प्रकार एक अंश घटाते चलना चाहिए। पूर्ण पिण्ड को तोलकर उसका चौदहवाँ अंश प्रतिदिन घटाते रहा जाय। इस प्रकार घटाते-घटाते कृष्णपक्ष की चतुर्दशी को एक अंश मान लिया जाय और अमावस्या को पूर्ण निराहार रहा जाय।

शुक्लपक्ष की प्रतिपदा, को भी निराहार रहना चाहिए। चन्द्रमा, अमावस्या और प्रतिपदा दो दिन दिखाई नहीं पड़ता इसलिए दोनों दिन आहार न लेने का विधान है। फिर जिस क्रम से एक-एक चौदहवाँ अंश कृष्णपक्ष में घटाया गया था, उसी प्रकार शुक्लपक्ष में चन्द्रमा की कलाओं की तरह भोजन भी बढ़ाते रहा जाये। कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के दिन जितना आहार लिया था उतना ही दौज को लिया जाय और जितना कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को लिया गया था उतना शुक्लपक्ष की तीज को। इस प्रकार पूर्णिमा को उतने ही पूरे अहार तक पहुँच जाना चाहिए जितना कि आरम्भ करते समय पिछले मास की पूर्णिमा को लिया गया था। किसी-किसी पक्ष में विधियाँ घट या बढ़ जाती हैं। पञ्चांग में देखकर उसी क्रम से आहार के अंशों को भी घटा या बढ़ा लेना चाहिए। यदि किसी पक्ष में एक तिथि बढ़े तो चौदह के स्थान पर पन्द्रहवें अंश को घटाने या बढ़ाने का क्रम रखना चाहिए और यदि एक तिथि घट जाय तो तेरह का क्रम घटाना या बढ़ाना उचित है। चन्द्रमा की कलाओं पर इस व्रत का आधार रहने से आहार के घटाने या बढ़ाने का क्रम भी उन्हीं के अनुसार बदलना पड़ता है।

आहार के लिए ‘पिण्ड’ शब्द प्रयोग होने से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में खिचड़ी, दलिया, सत्तू या ऐसी ही कोई चीज पकाकर उसका एक गोला बना लिया जाता होगा और उस गोले का भार प्रतिदिन घटाया बढ़ाया जाता रहता होगा। इससे यह भी प्रतीत होता है कि आहार में भिन्न-भिन्न प्रकार की वस्तुएँ न रहती होंगी। एक या कई वस्तुओं को मिलाकर एक ही जगह पका लिया जाता होगा। इस व्यवस्था में अनेक खाद्य पदार्थों के द्वारा अनेक स्वाद प्राप्त करने वाली स्वाद-लोलुपता का निषेध है। अनेक प्रकार की वस्तुएँ एक समय में खाना वैज्ञानिक दृष्टि से भी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता है। यह प्रथा तो केवल जिह्वा की लोलुपता पूरी करने के लिए ही चली है। चूँकि चान्द्रायणव्रत में स्वास्थ्य सुधार और लोलुपता पर नियन्त्रण का इन्द्रियसंयम भी जुड़ा हुआ है इसलिए आहार-पिण्ड की व्यवस्था का महत्व भी सहज ही समझ में आ जाता है।

‘पिण्ड’ शब्द से एक और बात भी प्रकट होती है कि आहार एक बार ही लिया जाय। यदि दोनों समय लेने का विधान रहा होता तो चौदह के स्थान पर अट्ठाईस भागों में पूर्ण भोजन को विभाजित करने की व्यवस्था रही होती।

उपरोक्त व्यवस्था की भावना को ध्यान में रखते हुए आज की परिस्थितियों में कुछ ढील भी रखी जा सकती है। पिण्ड न बनाकर भले ही रोटी-शाक, दाल-भात, जैसी वस्तुएँ अलग-अलग बना ली जायें पर उनकी संख्या दो ही रहे तो उत्तम है। अधिक वस्तुओं का भोजन में होना आहार संबंधी विलासिता है, इसमें रजोगुण या तमोगुण की प्रधानता हो जाती है। आहार में खाद्य-पदार्थों की संख्या जितनी कम रहेगी उतना ही वह सात्विक माना जायगा। संयमी सन्त-महात्मा भिक्षा में कई प्रकार की वस्तुएँ भिन्न-भिन्न घरों से प्राप्त करते हैं तो उन्हें मिलाकर इकट्ठा कर लेते हैं ताकि जिह्वा की लोलुपता को पनपने का अवसर न मिले। चान्द्रायणव्रत करने वालों को इतना नियम रखना ही चाहिये कि आहार में दो प्रकार की वस्तुओं से अधिक संख्या न हो। मिर्च-मसाले छोड़ देने ही उचित हैं। अस्वाद-व्रत पालन करते हुए नमक और शक्कर छोड़कर अलौना भोजन बन पड़े तो सर्वोत्तम है, अन्यथा नमक काम में ले सकते हैं। सेंधा नमक सात्विक माना गया है। मिर्च के बिना काम न चले तो कालीमिर्च, अदरक, या सोंठ ली जा सकती है। आँवला या नींबू की खटाई ग्रहण की गई है। अन्य खटाई वर्जित हैं। हींग लाल मिर्च और गरम मसाले सर्वथा त्याज्य हैं। हल्दी, जीरा, धनिया इन तीन का निषेध नहीं है।

आरम्भ करते समय पूर्णिमा को लिए गये एक समय के भोजन का ही चौदहवाँ अंश घटाना पड़ता है। इस प्रकार दिनभर के भोजन का आधा अंश तो पहले ही कम हो जाता है और शेष आधे में भी प्रतिदिन कमी होती चलती है। इतना कठिन अल्पाहार एक महीने तक चलाने में दुर्बल स्वभाव या शरीर वाले व्यक्ति घबराते हैं। इसलिये मध्यम मार्ग यह हो सकता है कि सायंकाल को भी थोड़ा दूध, दही, शाक का रसा या फलों का रस-इनमें से कोई एक चीज ले ली जाया करे। इससे भूख भी असहनीय न रहेगी और शरीर भी अधिक दुर्बल न होगा। इसी प्रकार प्रातःकाल भी इन्हीं में से कोई पेय पदार्थ लिया जा सकता है। नींबू और शहद मिला हुआ पानी आवश्यकतानुसार दिन में कई बार भी लिया जा सकता है। अन्नाहार दोपहर को एक बार ही लेना चाहिये।

आहार को घटाने और बढ़ाने का यह क्रम मानसिक और आत्मिक पवित्रता की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, साथ ही पेट के पाचन यन्त्रों को विश्राम देकर उनकी नष्ट हुई शक्तियों को पुनः सजीव बनाने के लिए भी उपयोगी सिद्ध होता है। पर आहार की न्यूनाधिकता मात्र ही चान्द्रायण व्रत नहीं है। इसका मूल उद्देश्य अन्तःकरण पर चढ़े हुए मल-आवरण और विक्षेपों का समाधान तथा किये हुए पापों का प्रायश्चित करना भी है। आन्तरिक पवित्रता की अभिवृद्धि के लिए ही चान्द्रायण व्रत किये जाते हैं। शारीरिक लाभ तो एक गौण बात है।

इसलिए व्रतकाल के एक महीने में गायत्री उपासना का भी एक नियमित कार्यक्रम बना लेना चाहिये। तीस दिनों में सवालक्ष गायत्री का जप अनुष्ठान करने के लिए प्रतिदिन 42 माला जप करना पड़ता है। उसमें प्रायः 4 घण्टे लगते हैं। प्रातः ढाई-तीन घण्टे सायंकाल एक-डेढ़ घण्टा लगाने से यह उपासना आसानी से पूर्ण हो जाती है।

ब्रह्मचर्य, भूमि या तख्त पर सोना, अपने शरीर की सेवा स्वयं करना —हजामत, कपड़े धोना आदि कार्य स्वयं करने चाहिये। भोजन पकाने में अपना अभ्यास न हो तो माता या पत्नी से सहायता ली जा सकती है। पर चाहे जिसके हाथ का बना हुआ भोजन भी उन दिनों नहीं करना चाहिये। क्योंकि पकाने वाले व्यक्ति के संस्कार यदि अच्छे न हुये तो उसका प्रभाव अपनी मनोभूमि पर पड़ेगा और व्रत का जो लाभ मिलना चाहिये वह न मिलेगा। दूसरों की शारीरिक सेवा लेना तो वैसे भी उन दिनों वर्जित रहता है। चमड़े का उपयोग भी वर्जित है। क्योंकि आजकल 99 प्रतिशत चमड़ा हत्या करके ही उपलब्ध किया जाता है और उसका उपयोग करने वाले के सिर पर भी कुछ हत्या का आसुरी प्रभाव पड़ता है। लकड़ी, रबड़, या कपड़े के जूते इस व्रत काल में प्रयोग करने चाहिये।

अच्छा तो यह है कि घर के साधारण वातावरण को छोड़कर किसी साधना के उपयुक्त पवित्र स्थान में यह व्रत किया जाय। वह स्थान आध्यात्मिक भावनाओं से परिपूर्ण होना चाहिए। अपनी दिनचर्या उन दिनों मौन, आत्म-चिन्तन, मनन, ध्यान, स्वाध्याय, सत्संग जैसे कार्यक्रमों में व्यस्त रहे। मनोभूमि पर विक्षोभजन्य प्रभाव उत्पन्न न हो तो ही व्रत का पूरा लाभ मिलता है। व्यवसायिक कार्यों में प्रायः झूठ, चोरी, कर्त्तव्य में ढील, राग-द्वेष, लोभ तृष्णा क्रोध-वासना जैसे दोषों का समावेश बना रहता है। इसलिये अच्छा यही है कि व्रत के उपयुक्त स्थान तलाश किया जाय और उन दिनों छुट्टी लेकर आध्यात्मिक जीवन का लाभ लिया जाय।

जिनके लिये यह संभव न हो वे साधारण कार्यक्रम चलाते हुए घर पर ही चान्द्रायण व्रत कर सकते हैं। पर प्रयत्न ऐसा ही करना चाहिए कि अपना मन अधिक समय सात्विक विचारधारा में ही व्यस्त रहे। पापकर्म कम-से-कम बन पड़ें। क्रोध और क्षोभ के अवसर कम-से-कम आवें। चित्त की शाँति और समस्वरता नष्ट न होने पावे। दैनिक जीवन में दान, सेवा, परोपकार, स्वाध्याय, मौन आदि शुभ कर्मों के लिए कुछ न कुछ अवसर साधारण दैनिक कार्यक्रम चलाते हुए भी निकाल ही लेना चाहिये।


अखण्ड ज्योति की रजत जयन्ती

उद्देश्य और रहस्य

उद्देश्य ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यगण मिलकर प्रत्येक रविवार को साप्ताहिक सत्संग चलाते हैं—सदस्यों का जन्मदिन जब होता है तब उनके घरों पर हवन एवं पारिवारिक सत्संग का आयोजन चलता है। इस प्रकार परस्पर मिल-जुलकर आत्मीयता बढ़ाने और विचार विनिमय करने के बार-बार अवसर प्राप्त होते रहते हैं। कुछ वर्ष पूर्व भी यहाँ हवन, जप, कीर्तन आदि के माध्यम से सत्संग होते थे, पर उन लोगों में अधिकाँश अन्धविश्वासी और अविकसित मनोभूमि के लोग थे। गायत्री माता से तरह-तरह की कामनायें पूरी करने के लालच से जप, हवन करते थे। जब जिन्होंने चमत्कार नहीं देखा तो वे खिसक गये इस प्रकार वह उत्साह ठण्डा पड़ गया। पर इस बात का संगठन बड़े ठोस आधार पर रक्खा गया है। निष्काम उपासना, जीवन-शोधन एवं युग-निर्माण के लिए कुछ रचनात्मक कार्य करने का उद्देश्य लेकर ही हम लोग मिलते-जुलते हैं और इसी आधार पर विचार विनिमय भी होता है।

किसी सत्संग में हवन नहीं हो पाता तो घृतदीप तथा अगरबत्ती जलाकर यज्ञ, भगवान की प्रतीक पूजा कर लेते हैं और आदर्श एवं उद्देश्य की प्राप्ति के लिए मिल-जुलकर विचार करते हैं, कार्यक्रम बनाते हैं और एक दूसरे को प्रोत्साहन देते हुए आगे बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं। इस प्रकार थोड़े ही दिनों में हमारे सत्संग ठोस कार्य करने लगे हैं। यहाँ का जैसा क्रम यदि अन्यत्र भी चल रहा होगा तो उससे युग-निर्माण का लक्ष्य निकट आने में कितनी सहायता मिल रही होगी, इसकी कल्पना से हम लोगों को बड़ा सन्तोष और आनन्द होता रहता है।

दिसम्बर अंक में रजत जयन्ती का कार्यक्रम पढ़ा, और तुरन्त ही सत्संग में इस विषय पर चर्चा हुई तो हम सबने अपनी ज्ञान-माता ‘अखण्ड-ज्योति’ की शान के अनुरूप वसन्त-पंचमी के दिन एक प्रभावशाली उत्सव मनाने का निश्चय कर डाला। उसकी तैयारी की योजना बनी और कार्य विभाजन हो गया। जो पाँच बातें जयन्ती के सम्बन्ध में कही गई हैं उनके लिये हम में से प्रत्येक व्यक्ति अलग-अलग यह विचार कर रहा है कि वह इस दिशा व्यक्ति गत रूप से क्या करे? दस दिन में सब लोग अपना निश्चय कर लेंगे तब उनके संकल्पों का सम्मिलित स्वरूप बनाकर एक सुव्यवस्थित योजना बनाई जायगी और इस आधार पर हम सन् 64 के रजत-जयन्ती वर्ष का कार्यक्रम निर्धारित करेंगे।

उत्सव आयोजन पर गहरी दृष्टि डालने से हम लोग समझ गये कि यह युग-निर्माण आन्दोलन को प्रगति देने का निमित्त मात्र है। ‘अखण्ड-ज्योति’ का हर दिन दिवाली है। उसका प्रत्येक अंक हर्षोत्सव जैसा है। उसका स्वागत या अभिनन्दन उसकी लक्ष्य पूर्ति द्वारा ही संभव भी है। और किसी प्रकार के स्वागत अभिनन्दन की न तो उसे आवश्यकता है और न वैसा कुछ प्रबन्ध किया गया है। दूसरे संस्थानों की तरह कोई केन्द्रीय बड़ा आयोजन न रखना यही बताता है कि अब उत्सवों का स्वरूप प्रदर्शनात्मक नहीं ठोस कार्यों के रूप में होना चाहिए। इसी लक्ष्य को ध्यान में रखकर जयन्ती की योजना छपी है। इस रहस्य से अवगत होकर हम परिजनों को गर्व एवं गौरव का ही अनुभव हुआ।

हम लोग रजत जयन्ती मनावेंगे ही, देश में अन्यत्र भी यह समारोह छोटे-बड़े रूप में मनेगा ही। इस बहाने युग-निर्माण योजना के अग्रसर होने में कितनी सहायता मिलेगी इसकी कल्पनामात्र से मन पुलकित हो उठता है। इस उत्सव को हम योजना का विशेष प्रेरणा दिवस मान रहे हैं और उसके भूल उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ही उसे मनाने की तैयारी में लग पड़े हैं।

—ज्वालासिंह राठौर, गोविन्दगढ़


आनन्द का अनुपम अवसर

‘अखण्ड-ज्योति’ की रजत-जयन्ती का शुभ अवसर उसके प्रत्येक पाठक के लिये हर्ष, गर्व, और गौरव का दिन हैं। जिस प्रकाश प्रेरणा को पाकर हम में से हजारों लाखों ने अपनी जीवन दिशायें निर्माण की हैं, अस्त-व्यस्त गतिविधियों को छोड़ कर महापुरुषों के पद-चिन्हों पर चल सकने का बल प्राप्त किया है वह अवलम्बन दैवी वरदान की तरह ही हमारे लिये उपयोगी सिद्ध हुआ है।

इस पुण्य प्रकाश का पच्चीसवें वर्ष में प्रवेश करना मानवता को गौरवान्वित करने वाला एक शुभ अवसर ही माना जा सकता है। इस पर्व का धर्म, संस्कृति, एवं मानवता के भविष्य निर्माण की दृष्टि से भारी महत्व है। फिर ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों के लिये तो वह व्यक्तिगत आनंद का सबसे अधिक महत्वपूर्ण अवसर है। पच्चीस वर्ष की रजत-जयंती पर जो हम लोग मौजूद हैं, उनमें से आधे भी स्वर्ण जयंती मनाने के लिये जीवित न रहेंगे। इस प्रकार हम में से अधिकाँश के जीवन में ऐसा अवसर दुबारा आने वाला नहीं है। इस अनुपम आनन्द के अवसर पर अपनी कृतज्ञता, श्रद्धा, आत्मीयता एवं सद्भावना प्रकट करने का जो अवसर आया है उसकी उपेक्षा कोई भी भावनाशील व्यक्ति नहीं कर सकता।

वसन्त-पंचमी का शुभ-मुहूर्त स्वतः ही इतना मंगलमय है कि मनुष्य ही नहीं अन्य जीव-जन्तुओं एवं वृक्ष वनस्पतियों तक में प्रकृति की प्रेरणा से नव-जीवन संचार होता है। प्रकृति अपनी विशेष चेतना एवं प्रेरणा धरती के कण-कण में संचारित करती हैं जिसका प्रत्यक्ष परिचय जड़-चेतन वसन्त-ऋतु का आरम्भ होते हो वृक्षों में नये कोंपल फूटते हैं, पुष्प खिलते है। हरियाली आती है, कोकिल, भ्रमर सरीखे पक्षी मधुर गुँजार करते हैं। प्रत्येक मनुष्य के मन में एक नव-यौवन जैसा उत्साह उमड़ने लगता है। प्रकृति के इस संकेत को समझते हुये मनीषियों ने वसन्त का स्वागत पर्व वसन्त-पंचमी का बनाया है।

भगवती सरस्वती का जन्म-दिन वसन्त-पंचमी है। मनुष्य जीवन की सर्वोत्कृष्ट सम्पदा ज्ञान है। ज्ञान का इस सृष्टि में जिस दिन उदय हुआ उसे बसन्त-पंचमी माना गया। प्रज्ञा-पूजन एवं सरस्वती जयन्ती के रूप में इस पर्व को मनाने की परम्परा चिरकाल से चली आ रही है।

‘अखण्ड-ज्योति’ की आचार्य जी की, साधना के अखण्ड घृत-दीप की प्रतीक पूजा इसी दिन स्थापित हुई थी। ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका भी उन्होंने इसी दिन निकाली।

गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास इसी दिन हुआ। शत कुण्डी गायत्री महायज्ञ के लिए एक वर्ष का अनेक यज्ञ शृंखला वाला कार्यक्रम भी इसी दिन प्रारंभ हुआ। और भी अनेकों महत्वपूर्ण प्रसंग ऐसे हैं जो आचार्य जी ने इसी दिन आरंभ किये हैं। इस प्रकार उनके जीवन में प्रत्येक महत्वपूर्ण शुभ कार्य आरम्भ करने का दिन वसन्त-पंचमी ही है। अब की बार रजत-जयन्ती मनाये जाने का ऐतिहासिक सुअवसर भी इसी तिथि को मनाया जा रहा है यह कितने आनन्द की बात है। हमारे नगर में लगभग 50 ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य हैं। दिसम्बर के अंक में जब रजत-जयन्ती मनाने का पंचसूत्री कार्यक्रम छपा तो सभी का मन-मयूर नाचने लगा। यों एक व्यक्ति को पचासों के नाम और स्थान मालूम न थे पर एक ने दूसरे से पता लगा कर लगभग सभी को तलाश कर लिया और ता.10 दिसम्बर को एक मीटिंग विल्वेश्वर महादेव के मन्दिर पर बुलाई गई। एक दो को छोड़ कर प्रायः सभी सदस्य इकट्ठे हुये। वसन्त-पंचमी के दिन जयन्ती मनाने का प्रभावशाली कार्यक्रम बनाया गया। आवश्यक खर्च के लिए सदस्यों ने उसी स्थान पर करीब तीन सौ रुपये इकट्ठे कर लिए। पाँचों कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने के लिये हममें से प्रत्येक क्या-क्या करेगा इसकी संक्षिप्त रूप-रेखा उस मीटिंग में ही बन गई और निश्चय किया गया कि इस पुण्य पर्व को केवल साधारण हर्षोत्सव न रहने देकर युग-निर्माण की वृत्तियों को व्यापक बनाने का माध्यम बनाया जाय।

मीटिंग में जो रूप-रेखा बनी थी उसे कार्यान्वित करने में हम सभी जुट गये हैं। वसन्त-पंचमी के अवसर पर हम लोगों का आन्तरिक आनन्द और उत्साह जो सम्मिलित रूप से प्रकट होगा, तो उस समय मात्र से चित्त पुलकित हो उठता है। रजत-जयन्ती कैसी मनी यह तो समय पर ही विदित होगा पर उसकी तैयारी में ही अभी से हमें जो आनन्द मिल रहा है उसे जीवन के अनुपम अवसर रूप में ही अनुभव करते हैं।

गुरु शरणदत्त, होशियारपुर


रजत जयन्ती की तैयारी

रजत जयन्ती का कार्यक्रम अखण्ड-ज्योति में पढ़कर हम लोगों के हर्ष का पारावार न रहा। ‘अखण्ड-ज्योति’ हमारी माता है उसने अपना ज्ञान और स्नेह पिलाकर हमें क्या से क्या दिया इसका मूल्याँकन करते हैं तो कृतज्ञता से अन्तरात्मा पुलकित हो उठती है। यहाँ हम 32 व्यक्ति ‘अखण्ड-ज्योति’ मँगाते हैं। सभी परस्पर परिचित हैं और समय-समय पर सामूहिक आयोजन भी करते रहते हैं। दिसम्बर का अंक पढ़ते ही सबका मन अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए आकुल हो उठा। श्री गणेश दत्त पंड्या के यहाँ मीटिंग रक्खी गई और वसन्त-पंचमी के दिन क्या करना चाहिए इसका कार्यक्रम बनाया गया।

निश्चय हुआ कि सभी के यहाँ तारीख 13 से 19 जनवरी तक आठ दिन घरों में सब लोग एक घण्टा नित्य गायत्री जप किया करेंगे और अन्तिम दिन सब जप करने वाले हवन में सम्मिलित होंगे। अखण्ड-दीप का पूजन, प्रवचन तथा प्रसाद वितरण का कार्यक्रम रखा गया है। विचारशील लोगों को भेंट करने के लिये मथुरा से सितम्बर 62 तथा जून 63 के 108-108 अंक तथा सर्वसाधारण में बाँटने के लिए युग-निर्माण का संकल्प 1000 रेलवे पार्सल से मँगाये गये हैं। सायंकाल दीपदान सभी सदस्यों के घरों पर होगा ही।

तारीख 13 से तक 7 दिन ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्य बढ़ाने के लिए तीन-तीन व्यक्ति यों की दस टोली बना दी गई हैं। प्रत्येक टोली ने प्रतिज्ञा की है कि वह रजत -जयंती के पच्चीसवें वर्ष के उपलक्ष में 25 ग्राहक अवश्य बनाएंगी देंगी। इस प्रकार 10 टोलियों द्वारा 250 सदस्य बन जाना निश्चित है। इस संख्या में कोई कमी रही तो हम वर्तमान सदस्य अपने पास से पैसा देकर किन्हीं सार्वजनिक संस्थाओं, लोकसेवकों, या अपने मित्रों को पत्रिका चालू करावेंगे। ‘अखण्ड-ज्योति’ का विस्तार हमारे सत्संकल्प की सफलता का एक मात्र आधार है। आचार्य जी ने संजीवन विद्या के शिक्षण करने को एक लाख छात्र माँगे हैं तो उनका एक भाग हमें भी पूरा करना ही चाहिए था। 250 की संख्या बड़ी नहीं है। क्योंकि दूसरे लोग स्वाँग-तमाशे के लिए हजारों रुपया चन्दा कर लेते हैं और लोग माँगने वालों के व्यक्तिगत प्रभाव में आकर बड़ी-बड़ी रकमें भी दे देते है। तो हम लोग जिनकी प्रतिष्ठा इस शहर में गिरी हुई नहीं है, 250 व्यक्ति यों से पत्रिका का चन्दा प्राप्त न कर सकेंगे ऐसी कोई आशंका नहीं है।

व्यक्तिगत जीवन को निर्मल बनाने के लिए कौन क्या कदम उठावेगा और सार्वजनिक सेवा के लिए कौन कितना समय देता रहेगा इसका निश्चय हम सब लोग वसन्त-पंचमी तक कर लेंगे और जिसे जो करना होगा उसका लिखित प्रतिज्ञा-पत्र बनाकर वसन्त-पंचमी के दिन मथुरा भेजेंगे। ऐसी भावनायें तो पहले से ही उठ रही थीं पर उन्हें चरितार्थ करने का कोई विशेष अवसर सामने न था। अब रजत-जयन्ती से हम लोगों को झकझोर कर रख दिया है ओर प्रेरणा दी है कि केवल पढ़ते-सुनते रहना ही काफी नहीं है अब कुछ करके भी दिखाना चाहिये।

अपने परिवार के तीन वयोवृद्ध व्यक्ति अब घरेलू उत्तरदायित्वों से मुक्त हो चुके हैं। वसन्त-पंचमी को वे विधिवत वानप्रस्थ की दीक्षा लेंगे और नित्य पाँच घण्टे का समय धर्म प्रचार के लिए लगाया करेंगे। इन तीनों की मण्डली अपनी संचित प्रतिष्ठा के कारण जब श्रेष्ठता का वातावरण बनाने के लिए अपनी कुशाग्र बुद्धि का उपयोग करेगी तो इसके कारण इस नगर में ही नहीं आस-पास के विस्तृत क्षेत्र में काफी हलचल उत्पन्न होकर रहेगी।

हम लोगों को इतना उत्साह घर की ब्याह-शादियों में भी नहीं होता जितना रजत-जयन्ती के

सम्बन्ध में है। पच्चीस वर्ष बाद नहीं हर साल जयन्ती

हो, ऐसी ईश्वर से प्रार्थना है।

—सनत्कुमार गर्ग, तेजपुर


एकाकी प्रयत्न का प्रतिफल

रेलवे की नौकरी से रिटायर्ड होकर जब गत वर्ष स्थायी रूप से घर वापिस आया तो तलाश किया कि इस नगर में कोई और भी ‘अखण्ड-ज्योति’ का ग्राहक है या नहीं? पता चला कि मैं अकेला ही हूँ। गत गुरु पूर्णिमा पर युग-निर्माण योजना का उद्घाटन हुआ तो जी में आया कि मेरे पास समय तो रहता ही है, क्यों न इस नगर में इस महान कार्य में संलग्न होकर देश, धर्म और अध्यात्म की सेवा करता हुआ जीवन को सार्थक बनाऊँ?

इस वर्ष मैंने अपने निजी पैसे से 10 प्रतियाँ ‘अखण्ड-ज्योति’ की अपने नाम से मँगानी आरम्भ कर दी हैं। आते ही इन पर जिल्द चढ़ा लेता हूँ और थैले में भर कर जन संपर्क के लिए धर्म फेरी पर निकलता हूँ। नगर के धार्मिक वृत्ति के शिक्षित व्यक्तियों के नाम तलाश करके अपनी डायरी में नोट कर लिए हैं। प्रतिदिन तीन चार व्यक्तियों से मिल लेता हूँ। अपना तथा अपनी योजना का परिचय देने के बाद ‘अखण्ड-ज्योति’ की युग-परिवर्तन करने वाली विचारधारा का परिचय देता हूँ, जो प्रभावित होते हैं उन्हें पत्रिका का एकाध लेख तथा स्थल पढ़ने के लिए देता हूं और कहता हूँ कि यदि आप को रुचिकर होगी तो स्वतः आपके घर आकर उसे पढ़ने देने तथा लेने आया करूंगा। इसके लिए आपको कुछ भी खर्च न करना पड़ेगा।

इस प्रस्ताव को आमतौर से स्वीकार कर लिया जाता है। बस पीछे कोई एक ही ऐसा निकलता है जो इस प्रस्ताव को अस्वीकार करे। प्रतिदिन 3-4 व्यक्तियों से इस प्रकार मिलना होते रहने से दो महीने में 200 से अधिक व्यक्ति यों से संपर्क बना लिया। उन्हें पढ़ाने के लिये 10 पत्रिकायें कम पड़ी तो अपने पैसे से ही दस और मँगाई। अब 20 अंक मँगाता हूँ और लोगों को पढ़ाने का क्रम चालू रखता हूँ।

जितने भी व्यक्तियों ने इस जादू भरी पत्रिका को पढ़ा है उसने भूरि-भूरी प्रशंसा की है। लगभग 40 ने दो ही अंक पढ़कर उसका चन्दा भेज दिया और अपनी पत्रिका मँगानी आरम्भ कर दी। युग-निर्माण योजना के अंतर्गत व्यक्तिगत सुधार एवं लोकहित के जो कार्य बताये गये हैं, उनका आरम्भ भी कितने ही घरों में आरम्भ हो गया है। देखता हूँ मेरा समयदान सार्थक हो रहा है। स्वयं तो दूसरों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देने में सामर्थ्य नहीं था, पर जो शक्ति उसके लिये समर्थ है, उसका प्रसार करने के लिये संलग्न रहकर लगभग वही कार्य कर लेता हूँ जो कोई सुयोग्य धर्मसेवक कर सकता है। मेरे रिश्तेदार और कुटुम्बी सभी नौकरी पर हैं और मुझ से दूर रहते हैं। उन सब को व्यक्तिगत पत्र लिखकर पत्रिका पढ़ने की प्रेरणा दी है, और एक वर्ष का चन्दा अपने पास से भेजते हुए लिख दिया है कि इस उपहार को घर भर के सब लोग पढ़ें और आगे अपना चन्दा स्वयं भेज कर मँगाया करें। इस उपहार के लिये इन सब लोगों ने उपकार माना है और ध्यानपूर्वक पढ़ते रहने का वचन दिया है।

पेन्शन के 107 रु. मिलते हैं। घर में हम पति-पत्नी दो ही हैं। सत्तर-अस्सी रुपये में काम चल जाता है। बीस रुपया महीना युग-निर्माण का साहित्य मँगाने और पढ़ाने के लिए मैंने निश्चित कर लिया है। जीवन विद्या की अच्छी पुस्तकें उस पैसे से मँगाता रहता हूँ, उससे धीरे-धीरे घर में एक पुस्तकालय बनता जा रहा है। इन पुस्तकों को भी घर-घर पढ़ाने का क्रम चलाऊँगा और चलता-फिरता, पुस्तकालय बनकर लोक जीवन में ज्ञान विस्तार की पुनीत सेवा में लगा रहूँगा।

अब रजत-जयंती का कार्यक्रम सामने आया है तो उसकी चर्चा अपने ज्ञान-परिवार के सभी लोगों में कर दी है। इस समाचार से सब बहुत प्रसन्न हैं। वसन्त-पंचमी को एक अच्छा आयोजन होगा और इसके बाद रचनात्मक कार्यों की भी योजना चल पड़ेगी। सोचता हूँ अकेला व्यक्ति भी धर्म सेवा में लगा रहे तो मेरी ही तरह युग-निर्माण के लिए बहुत कुछ कार्य कर सकता है।

—गंगादीन प्रमोद, सकतिलपुर


परिवार की दस प्रतिज्ञायें

मैं साधु वेश में विचरण करता हूँ। अपनी व्यक्तिगत उपासना में संलग्न रहते हुए शास्त्र की आज्ञानुसार परिव्राजक रूप में घूमता रहता हूँ। तीन दिन से अधिक एक स्थान पर नहीं ठहरता। धर्म-शिक्षा संन्यासी के लिए एक धर्म कर्त्तव्य मानी गई है इसलिए जब से कषाय वस्त्र धारण किये हैं तब से इसी गतिविधि को अपनाये हुए हूँ। हिन्दी भाषी चारों ही प्रान्त उत्तर-प्रदेश, बिहार, मध्य-प्रदेश और राजस्थान मेरे भ्रमण क्षेत्र हैं। ‘अखण्ड-ज्योति’ का गत बीस वर्ष से पाठक हूँ। भ्रमण में भी किसी-न-किसी प्रकार उसे प्राप्त कर ही लेता हूँ।

रजत-जयन्ती मनाये जाने के समाचार से मुझे भारी प्रसन्नता है। एक स्थान पर ठहरना नहीं होता इसलिए कोई सामूहिक आयोजन तो न बन सकेगा पर सन् 64 का पूरा वर्ष ‘रजत-जयन्ती वर्ष’ होने से मैं जहाँ भी जाऊँगा वहीं पर निम्नलिखित दस कार्यों के लिये निरन्तर प्रयत्न करता रहूँगा। इस प्रयत्न को मैं ईश्वर-पूजा का ही एक प्रकार मानूँगा।

(1) हर हिन्दू को आत्मबल की प्रेरक शक्ति गायत्री की उपासना के लिए अनुरोध करूंगा। समय चाहे कम ही लगे, भले ही अविधिपूर्वक मानसिक जप और ध्यान कर लिया जाय, पर गायत्री उपासना का स्थान प्रत्येक हिन्दू के जीवन में हो, ऐसा निरन्तर प्रयास करूंगा। अन्य धर्मावलम्बी अपने ढंग से ईश्वर का नाम ले पर उपासना को दैनिक जीवन का अंग ही माना करें ऐसी आस्था जमाने के लिए जो संभव होगा सो सब कुछ करूंगा। जीवन-शोधन और परमार्थ की दिशा में उत्साह पैदा करने के जो प्रयत्न करने पड़ेंगे उनमें कमी न रहने दूँगा। सर्वांगपूर्ण अध्यात्म अपनाने से इसी जीवन में स्वर्गीय आनन्द और सन्तोष का अनुभव हो सकता है यह समझाने के लिये घर-घर भ्रमण करूंगा।

(2) नकली और असली अध्यात्म का अन्तर लोगों को समझाऊँगा। असली अध्यात्म को अपनाने से प्राचीन काल में भारत जगद्गुरु चक्रवर्ती शासक, स्वर्ण सम्पदाओं का स्वामी और नर-रत्नों की खान था। आज नकली अध्यात्म अपनाने से सर्वत्र दुष्प्रवृत्तियाँ पनप रही हैं और बर्बादी के सरंजाम से जुटे हुए हैं। लोगों में कहूँगा कि असली अध्यात्म का सच्चा स्वरूप समझने के लिये ‘अखण्ड-ज्योति’ पढ़ा करें और अध्यात्म को व्यावहारिक जीवन में उतारते हुए स्वर्गीय जीवन का मार्गदर्शन प्राप्त करते रहें।

(3) आचार्यजी के मतानुसार हिन्दू-जाति की भयंकर कुप्रथा विवाह-शादियों में होने वाला अपव्यय तथा दहेज है। वे इस प्रथा का उन्मूलन करके अत्यन्त सादगी के साथ विवाहों की परम्परा आरम्भ करना चाहते हैं। इसके लिए प्रत्येक जाति में सुधारवादी व्यक्तियों का आगे बढ़ना आवश्यक है। विवाह अपनी जातियों में ही लोग करते है। इसलिये यह सुधार जातीय स्तर पर ही सम्भव हैं। आचार्यजी की योजना है कि प्रत्येक जाति की अपनी-अपनी सभायें हों और उनका संगठन बढ़ाकर सुधारक विचारकों की टोली बिना खर्च के विवाहों का आदर्श उपस्थित करते हुए अपनी जाति में वैसा ही उत्साह उत्पन्न करें। अन्य जातीय कुरीतियों तथा संकीर्णताओं का भी यह जातीय सभायें पंचायतें करके उन्मूलन कर सकती हैं। इसलिए जातीय सभाओं के संगठन की भारी आवश्यकता है। अगले वर्ष आचार्यजी ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों में से छाँट कर 100 जातीय सभाओं का संगठन उन्हीं लोगों द्वारा आरंभ करने वाले हैं, उस विस्तृत योजना के लिए मैं अभी से हिन्दी भाषा-भाषी प्रान्तों में पूर्व भूमिका तैयार करूंगा।

(4) हिन्दी भाषी लोगों तक ही ‘अखण्ड-ज्योति’ की आवाज सीमित रहे तो 46 करोड़ आबादी के 14 भाषा-भाषी भारत में युग-निर्माण की आवाज कैसे पहुँचेगी? और उन कार्यक्रमों का आयोजन कैसे संभव होगा? इसलिये भारत की अन्य भाषाओं में ‘अखण्ड-ज्योति’ के संस्करण प्रकाशित होने आवश्यक हैं। मैं यह प्रयत्न करूंगा कि गुजराती, मराठी, बंगला और अँग्रेजी भाषाओं के संस्करण जल्दी ही सामने आवें। इसके लिये सेवाभावी अनुवादकों तथा अपने क्षेत्र में कुछ ग्राहक बना सकने की क्षमता वाले लोगों को विशेष रूप से प्रेरणा दूँगा, ताकि यह कठिन कार्य सरल हो सके।

(5) युग निर्माण सत्संकल्प का पाठ उपासना के साथ-साथ स्वाध्याय रूप में सर्वत्र होने लगे उसके लिए शक्तिभर प्रयत्न करूंगा। 25 हजार संकल्प पुस्तकों के बेचने तथा वितरण कराने का कार्य अगले वर्ष में अकेला पूरा करूंगा। सत्संकल्प के प्रत्येक वाक्य की व्याख्या स्वरूप आचार्यजी एक-एक सर्वांग सुन्दर सस्ता ट्रैक्ट तैयार कर रहे हैं। इन ट्रैक्टों को युग-निर्माण की पाठ्य पुस्तक की तरह पढ़ा समझा और मनन किया जाय इसके लिये हर जगह पूर्व सूचना एवं प्रेरणा देकर लोगों में उसकी प्रतीक्षा करने की उत्सुकता पैदा करूंगा।

(6) ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के जो भी लोग मिलेंगे उन्हें समयदान देते रहकर युग-निर्माण जैसी महान योजना में भागीदार बनने के लिये कहूँगा। इस विचारधारा को व्यापक बनाने के लिये ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है साथ ही यह और भी महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक अंक को कई-कई अशिक्षित सुनें और कई-कई शिक्षित पढ़े। समय दान देने वाले सदस्य सबसे पहले इसी कार्य को हाथ में लें और योजना का क्षेत्र बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहें। आचार्यजी अपना प्रशिक्षण इस वर्ष लाख व्यक्तियों तक विस्तृत करना चाहते हैं, यह संख्या अधूरी न रहने पावे इसके लिये प्रयत्न से उन सब को तत्पर करूंगा, जो परिवार का तनिक भी उत्तरदायित्व अनुभव करते होंगे।

(7) ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी पत्नी समेत कम से कम एक महीना आचार्यजी के सान्निध्य में संजीवन विद्या का प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा। अभी नहीं तो कुछ दिन बाद प्रत्येक सदस्य को इसका निमंत्रण मिलेगा। इस शिक्षण में कितने ही जीवन विद्या के ज्ञान-सुयोग्य एवं वयोवृद्ध शिक्षकों की आवश्यकता होगी। उच्चशिक्षा प्रातः उच्च परिस्थितियों में रहे हुये सुसंस्कृत ऐसे रिटायर्ड लोग उस कार्य के लिये चाहिए जो आजीविका सम्बन्धी चिन्ता में मुक्त हों। मैं ऐसे सेवा भावी लोग तलाश करूंगा और उन्हें कहूँगा कि वृद्धावस्था का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए वे इस प्रकार की धर्म सेवा के लिये कटिबद्ध हों।

(8) युग-निर्माण के उपयुक्त गाये जाने योग्य कविताओं का भारी अभाव है। उस अभाव की पूर्ति के लिये मैं हर जगह कवियों से मिलूंगा और उन्हें जन-गायन की आवश्यकता पूर्ण करने लायक युग-निर्माण के आदर्श की शिक्षा देने वाली कवितायें लिखने को कहूँगा। ऐसी कवितायें खड़ी बोली में तो हैं, और अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में भी लिखी जायँ। काव्य के अभाव में युग-निर्माण प्रेरणा पंगु न रहने पावे इसलिये इस ओर जहाँ भी जाऊँगा कवियों से अनुरोध करता रहूँगा।

(9) प्रौढ़ पाठशालाएँ, रात्रि पाठशालाएँ व्यायामशालायें, रामायण कथा, परिवार गोष्ठियाँ, वृक्षारोपण, दीवारों पर वाक्य लेखन, युग-साहित्य के पुस्तकालय, प्राकृतिक चिकित्सालय आदि जहाँ जो सत्कार्य आरम्भ कराये जा सकते होंगे उनका कोई अवसर हाथ से न जाने दूँगा। जो व्यक्ति इन कार्यों के लिए उपयुक्त होंगे उन्हें विशेष रूप से इस दिशा में प्रवृत्त करूंगा।

(10) महिलाओं में जागरण उत्पन्न करने, उनकी मानसिक एवं सामाजिक स्थिति ऊँचा उठाने के लिये सेवाव्रत लेने वाली वयोवृद्ध महिलाओं को सेवा-क्षेत्र में उतरने के लिये कहूँगा। जहाँ ऐसी महिलाएँ मिलेंगी उन्हें कुछ कार्य आरम्भ करने के लिये विशेष अनुरोध करूंगा।

रजत-जयन्ती के अवसर पर अपना पूरा एक वर्ष का समय-दान युग-निर्माण योजना के लिए संकल्प कर रहा हूँ। कोई और भी साथी परिव्राजक इस विचार के मिल सकें तो उन्हें भी उस प्रयत्न से सम्मिलित रहने को कहूँगा।

—शंकरानन्द सरस्वती, अमरकण्टक


हमारा युग-निर्माण सत्संकल्प

—हम आस्तिकता और कर्त्तव्य-परायणता को मानव जीवन का धर्म कर्त्तव्य मानेंगे।

—शरीर को भगवान् का मन्दिर समझकर आत्मसंयम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।

—मन को जीवन का केन्द्र-बिन्दु मानकर उसे सदा स्वच्छ रखेंगे।

—कुविचारों और दुर्भावनाओं से इसे बचाये रखने के लिए स्वाध्याय एवं सत्संग की व्यवस्था रखे रहेंगे।

—अपने आपको समाज का एक अभिन्न अंग मानेंगे और सबके हित में अपना हित समझेंगे।

—व्यक्ति गत स्वार्थ एवं सुख को सामूहिक स्वार्थ एवं सामूहिक हित से अधिक महत्व न देंगे।

—नागरिकता, नैतिकता, मानवता सच्चरित्रता, शिष्टता, उदारता, आत्मीयता, समता, सहिष्णुता, श्रमशीलता जैसे सद्गुणों को सच्ची संपत्ति समझकर इन्हें व्यक्तिगत जीवन में निरन्तर बढ़ाते रहेंगे।

—साधना, स्वाध्याय संयम एवं सेवा कार्यों में आलस्य और प्रमाद न होने देंगे।

—चारों ओर मधुरता, स्वच्छता, सादगी एवं सज्जनता का वातावरण उत्पन्न करेंगे।

—परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्व देंगे।

—अनीति से प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हुए असफलता को शिरोधार्य करेंगे।

—मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी उसकी सफलताओं, योग्यताओं एवं विभूतियों को नहीं उसके सद्विचारों और सत्कर्मों को मानेंगे।

—हमारा जीवन स्वार्थ के लिए नहीं परमार्थ के लिए होगा।

—संसार में सत्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार के लिये अपने समय, प्रभाव, ज्ञान, पुरुषार्थ एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाते रहेंगे।

—दूसरों के साथ वह व्यवहार न करेंगे जो हमें अपने लिये पसंद नहीं।

—ईमानदारी और परिश्रम की कमाई ही ग्रहण करेंगे।

—पत्नीव्रत और पतिव्रत धर्म का परिपूर्ण निष्ठा के साथ पालन करेंगे।

—’मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है’ इस विश्वास के आधार पर हमारी मान्यता है कि हम उत्कृष्ट बनेंगे और दूसरों को श्रेष्ठ बनायेंगे तो युग अवश्य बदलेगा।

—हमारा युग निर्माण संकल्प अवश्य पूर्ण होगा।


कृपा की किरण


कृपा की किरण (Kavita)

दिव्य आलोक -सा प्राण में भर गई—

यह अयाचित तुम्हारी कृपा की किरण!

गीत की टेक को अन्तरा मिल गये—

टूटते कंठ को कुछ सहारा मिला।

भाव भीनी तरी को लहर की शरण—

सुप्त मझधार को था किनारा मिला ॥

पग स्वयं राह अपनी समझने लगे

लक्ष्य की ओर उन्मुख प्रगति के चरण।

कामना बेलि पर आश की पंखुरी—

भावना वृत पर कुछ विहंसते सुमन।

मौनता ही स्वयं अब मुखर हो गयी—

गुञ्जरित मोद से मुग्ध वातावरण ॥

व्योम की कालिमा ज्योति की रेख बन

कर रही है तिमिर सिन्धु का संचरण!

एक आवेश नूतन हृदय में जगा —

कर्म के प्रति सबल चेतना मिल गयी।

मैं जिसे खोजती थी मिला वह नहीं—

खोजने को नयी प्रेरणा मिल गयी॥

प्राप्तिमय तुष्टि की अब नहीं चाहु है—

तुष्टिमय प्यास का कर चुकी है वरण!

विद्यावती मिश्र

*समाप्त*