प्रत्येक प्राणी में परमात्मा का निवास है। इस घट-घट वासी परमात्मा का जो दर्शन कर सके समझना चाहिए कि उसे ईश्वर का साक्षात्कार हो चुका। प्राणियों की सेवा करने से बढ़कर दूसरी ईश्वर भक्ति हो नहीं सकती। कल्पना के आधार पर धारणा-ध्यान द्वारा प्रभु को प्राप्त करने की अपेक्षा सेवा-धर्म अपना कर इसे साकार ब्रह्म-अखिल विश्व को सुन्दर बनाने के लिए संलग्न रहना-साधना का श्रेष्ठतम मार्ग है। अमुक भजन ध्यान से केवल ईश्वर को ही प्रसन्नता हुई या नहीं? इसमें सन्देह हो सकता है, पर दूसरों को सुखी एवं समुन्नत बनाने के लिए जिसने कुछ किया है उसे आत्म-सन्तोष, सहायता द्वारा सुखी हुए जीवों का आशीर्वाद और परमात्मा का अनुग्रह मिलना सुनिश्चित है।
प्रेम से बढ़कर इस विश्व में और कुछ भी आनन्दमय नहीं है। जिस व्यक्ति या वस्तु को हम प्रेम करते हैं वह हमें अतीव सुन्दर प्रतीत होने लगती है। इस समस्त विश्व को परमात्मा का साकार मान कर उसे अधिक सुन्दर बनाने के लिए यदि उदार बुद्धि से लोक मंगल के कार्यों में निरत रहा जावे तो यह ईश्वर के प्रति तथा उसकी पुण्य वृत्तियों के प्रति प्रेम प्रदर्शन करने का एक उत्तम मार्ग होगा। इस प्रकार की हुई ईश्वर उपासना कभी भी व्यर्थ नहीं जाती। इसकी सार्थकता के प्रमाणस्वरूप तत्काल आत्मसन्तोष मिलता है। श्रेय की भावनाओं से ओत-प्रोत उदार हृदय ही स्वर्ग है। जिसे स्वर्ग अभीष्ट हो उसे अपना अन्तःकरण प्रेम और सेवा धर्म से परिपूर्ण बना लेना चाहिए।
—ऋषि तिरुवल्लुवर
एक अनादि शक्ति का, जिसे हम अपनी भाषा में ब्रह्म, सृष्टिकर्ता, परमात्मा आदि विविध नामों से जानते हैं प्रकाश, उसकी प्रेरणा ही जगत को सब ओर से प्रकाशित किए हुए है। उसी से इस जगत और यहाँ के पदार्थों को हमारे ज्ञानक्षेत्र, कार्यक्षेत्र, सौंदर्य को स्फुरण मिल रहा है। वही अपने समग्र रूप में सर्वत्र ही अवतीर्ण होता रहता सत्य रूप में प्रतिष्ठित है। जगत् और इसके प्रेरक तत्व को जब हम एक करके देखते हैं तभी हमारे ध्यान की प्रक्रिया पूर्ण होती है। हमारे ध्यान-मन्त्र में “ॐ भू र्भुवः स्वः” के उच्चारण से ही सृष्टि का बोध होने लगता है और अखिल ब्रह्माण्ड के बीच जब उन्हें ही अपनी चेतना को, सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा तारागण आदि को प्रकाशित करते देखते हैं तभी हम सत्य का दर्शन करते हैं।
जगत और आध्यात्म का जहाँ परिपूर्ण सामंजस्य होता है वहीं सत्य की परिभाषा पूर्ण होती है। और यह सत्य जब हमारी जीवन यात्रा का आधार होता है तभी हम जगत और उसकी प्रेरक शक्ति का परिचय प्राप्त कर कृतार्थ होते हैं। इसीलिए सत्य ही जीवन का सहज दर्शन है। महात्मा गाँधी के शब्दों में “सत्य हमारे जीवन का नियम है।” महर्षि व्यास ने सत्य को ही सर्वोपरि धर्म बतलाया है। “सत्य तत्व को जानकर ही ऋषिगण देवयान मार्ग से परमात्मा तक पहुँचते हैं।” महात्मा गाँधी ने तो यहाँ तक कह दिया कि “सृष्टि में सत्य की ही एकमात्र सत्ता है। सत्य के ऊपर कोई ईश्वर नहीं सत्य स्वयं ही ईश्वर की अभिव्यक्ति है।”
सत्यदर्शी विश्वामित्र ने सत्य की महिमा का बखान करते हुये कहा है—
सत्येनार्कः प्रतपति सत्ये तिष्ठति में नी।
सत्यं चोक्तं परो धर्मः स्वर्गेः सत्ये प्रतिष्ठितः॥
“सत्य से ही सूर्य तप रहा है सत्य पर ही पृथ्वी टिकी हुई है। सत्य सबसे बड़ा धर्म है। सत्य पर ही स्वर्ग प्रतिष्ठित है।” एक अन्य शास्त्रकार ने भी इसी तथ्य को प्रतिपादित करते हुए कहा है—
सत्येनं धार्यते पृथ्वी सत्येन ताते रविः।
सत्ये न याति वाषुश्च सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
सत्य से ही पृथ्वी स्थिर है सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से ही वायु बहती है। सब सत्य में ही स्थिर है।
स्मरण रहे आध्यात्ममय जगत् ही सत्य का आधार है। पूर्व और पश्चिम जैसे एक ही अखण्ड क्षितिज में स्थित हैं ठीक इसी तरह जगत और आध्यात्म दृश्य और अदृश्य सत्ता एक ही सत्य के दो पहलू हैं। इनमें से एक का भी परिहार करने पर हम सत्य के समक्ष अपराधी होते हैं।
जब हम जगत की समस्त घटनाओं को केवल बाह्य घटनायें समझते हैं तो उनसे हमें कोई आनन्द नहीं मिलता। वे घटनायें और हमारा जीवन केवल एक रूखी मशीनी प्रक्रिया मात्र बनकर रह जाता है। जिस तरह पटरी पर रेल, सड़क पर मोटर, शिलाखण्डों पर नदी की धारा बहती है उसी तरह हमारे मन-पाषाण पर जगत की धारा बहती रहती है। चित्त पर उसका कोई प्रभाव नहीं होता। सब कुछ निर्जीव नीरस अरुचिकर व्यापार-सा लगता है। और तब हम कृत्रिम उपायों, व्यसनों द्वारा नाना वृथा कर्मों द्वारा आमोद प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं लेकिन फिर भी हमारी जीवन यात्रा एक बोझा-सी मालूम पड़ती है।
जब हम केवल जगत को यहाँ की घटनाओं को, ही देखते हैं तो हमें जीवन में कोई रस नहीं मिलता न उत्साह स्फूर्तिमय प्रेरणा ही। कुछ समय तक तो ये हमारे मन, इन्द्रियों को लुभाये रहते हैं किन्तु शीघ्र ही इनसे विरक्ति होने लगती है और फिर अपने स्वभाव के अनुसार अन्य पदार्थों में जीवन-रस ढूंढ़ते हैं और एक समय वहाँ से भी हमें हटना पड़ता है। गरज यह है कि हम वस्तु से वस्तु, पदार्थ से पदार्थ, घटना से घटनाओं में चक्कर लगाते रहते हैं लेकिन इस सबसे हमारी चेतना को कहीं भी स्फुरणता प्राप्त नहीं होती।
हमारी पदार्थवादी जगत प्रधान दृष्टि के कारण सूर्य के उगने में, नदी के कल-कल बहने में, पक्षियों के गुंजन में वृक्षों के फलने फूलने में भी कोई विशेष प्रेरणा नहीं मिलती और हम यत्र-तत्र भटकते रहते हैं। प्रतिदिन कहीं कुछ सहारा पाने को जहाँ हमारी चेतना को स्फुरण मन को आनन्द की प्रेरणा प्राप्त हो सके। लेकिन असत्य की छाया में सुख शाँति कहाँ? उल्टे ये सब हमारे लिए दुःखप्रद, कष्टदायी, क्लेशपूर्ण ही सिद्ध होते हैं।
इसी तरह ही हमारा अभ्यास कुछ ऐसा हो गया है कि आध्यात्म को भी हम एकांगी दृष्टि से देखते हैं। जगत की सीढ़ियाँ जिन पर चढ़कर सत्य दर्शन की यात्रा पूरी करते हैं उनकी ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता। और जिस तरह बिना सीढ़ी के छत पर पहुँचना सम्भव नहीं होता ठीक उसी तरह जगत को भुलाकर हमारे सत्य-दर्शन के प्रयास व्यर्थ सिद्ध होते हैं। जगत के साथ रहने में ही आध्यात्म की भी सार्थकता है अन्यथा वह एक कपोलकल्पना, मूढ़ विश्वास मात्र बनकर रह जाता है।
इस तरह असत्य का आचरण जिसके अंतर्गत हम जगत और आध्यात्म को अलग-अलग करके देखते हैं हमारे पतन का हमारी असफलता का कारण बनता है। जगत को, वस्तु पदार्थ के सृष्टिकर्ता को जब हम भिन्न-भिन्न, खण्ड-खण्ड करके देखते है तो सत्य से दूर होते हैं।
सत्य की साधना के लिये, सत्य का दर्शन करने के लिए, हमें जगत और आध्यात्म को, सृष्टि और सृष्टिकर्ता को, वस्तु पदार्थ और इनको प्रकाशित करने वाली विश्व-चेतना को समग्र रूप से जानना, समझना और देखना पड़ेगा। एवं इसे ही अपने चिन्तन का आधार बनाना पड़ेगा।
जब हम इस सत्य को आत्मसात कर लेंगे तो हमारी चेतना परितृप्त हो जायगी क्योंकि “सत्य चिर-नवीन है, उसका रस अक्षय है”। जगत के बीच, वस्तु पदार्थ, समस्त घटनावली के मध्य जब हम सृष्टिकर्ता के अंतर्तम स्वरूप का दर्शन करने लगते हैं तभी हमारी दृष्टि सार्थक होती है। फिर हमारा जीवन और समस्त जगत ही आनन्द विस्मय, महत्व और सार्थकता से परिपूर्ण हो जाता है। तब हमें नदी के बहने में, पक्षियों के गुंजन में, वृक्ष लताओं के फूलने में, मेघों के गर्जन-तर्जन में, समुद्र की उत्ताल तरंगों में, आनन्द सरसता, सौंदर्य, ‘आह्लाद’ का मधुर संगीत सुनाई पड़ने लगता है।
जीवन के परम सत्य का दर्शन होने पर जब हम विश्व व्यापार, समस्त घटनापुज्ज के मध्य जो मूल शक्ति है उसका दर्शन करते हैं तो जगत आवरण न रहकर उसी सत्य की प्रकाश किरणों के रूप में जो प्रति मुहूर्त उनसे विकीर्ण होती रहती है जान पड़ता है। और तब यह बन्धन न रहकर हमारे आनन्द का साधन बन जाता है।
जगत और उसको प्रकाशित करने वाली सत्ता का समग्र दर्शन ही हमारे ध्यान चिन्तन का आधार होना चाहिये। घटना-पदार्थों के मध्य भी अनन्त सत्य का दर्शन हमारे जीवन का ध्येय, हमारी साधना का लक्ष्य हो।
स्वामी रामतीर्थ अमेरिका पहुँचे; सेनफ्रांसिस्को बन्दरगाह पर जलयान ठहरा। सब यात्री उतरने की तैयारी करने लगे। पर स्वामी राम मस्ती से इधर-उधर डेक पर टहल रहे थे।
इस विचित्र मस्ती को देख कर एक अमेरिकन ने आश्चर्य से पूछा—श्रीमान, आपका सामान कहाँ है?
स्वामी राम ने कहा—जो शरीर पर है उतना ही मेरा सामान है और कुछ मेरे पास नहीं।
अमेरिका जैसे महंगे और व्यस्त देश में बिना धन, और सामान के कोई परदेशी व्यक्ति किस प्रकार रह सकता है? यह असम्भव जैसी बात देखकर जब अमेरिकन ने फिर पूछा—”तब क्या यहाँ कोई आपका घनिष्ठ मित्र या संबंधी रहता है?”
स्वामी राम ने पूछने वाले के कन्धे पर हाथ रखकर कहा-सारे अमेरिका में मेरा एक ही मित्र है—और वह हो तुम।
इस आत्मीयता का उस अमेरिकन पर जादू जैसा असर पड़ा और वह सचमुच ही उनका सच्चा मित्र बन गया। अमेरिका यात्रा में उनने स्वामी जी की भारी सहायता की।
महर्षि व्यास ने जीवन की सफलता का रहस्य बताते हुए कहा है—”जीवितं सफलं तस्य यः परार्योंद्यतः सदा।” उसी का जीवन सफल है जो परोपकार में प्रवृत्त रहता है। परमार्थ, अपने आपमें जीवन की बहुत बड़ी साधना है जो मनुष्य को क्रमशः उसके लक्ष्य तक पहुँचा देती है। पाश्चात्य विद्वान विक्टर-हयूगो ने लिखा है—”हम परोपकार के लिए जितना अपने आपको लुटाते हैं उतना ही हमारा हृदय भरता जाता है।” परमार्थ साधना से मनुष्य की चेतना असाधारण रूप से विकसित हो जाती है और वह महान् बन जाता है, जिससे जीवन में अपार और अनन्त आनन्द का लाभ प्राप्त होता है। जो परमार्थ में लीन हैं उनके लिए संसार में कुछ भी तो दुर्लभ नहीं है।
पर हित बस जिनके मन माहीं।
तिन कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
इतना ही नहीं सन्त तुलसीदास ने तो यहाँ तक कह दिया है—”पर हित सारिस धर्म नहिं भाई।” परमार्थ के समान संसार में कोई धर्म नहीं है। “परोपकारः पुण्याय” परोपकार ही पुण्य का जनक है।
जो परमार्थ में लीन हैं, मनसा, वाचा, कर्मणा जिनका जीवन परोपकार में लगा हुआ है वे ही सज्जन, सन्त महात्मा हैं।
पर उपकार वचन मन काया।
सन्त सहज सुभाव खगराया॥
सज्जनों की पहचान भी यही है उनका जीवन परमार्थमय होता है।
परमार्थ मानव जाति की सुरक्षा, विकास और शान्ति का साधन है। वही समाज सुख शान्ति और विकास के पथ पर आगे बढ़ सकता है जिसके सदस्यों में परस्पर सेवा, सहयोग का व्यवहार हो। ऐसी स्थिति में व्यक्ति में संकीर्ण स्वार्थपरता “मैं” का अस्तित्व नहीं रहता वरन् एक संयुक्त भावना “हम” का उदय होता है। इसमें किसी भी सदस्य के सुख-दुःख में दूसरे लोग भागीदार होते हैं और हाथ बंटाते हैं। कोई मर जाता है तो दूसरे लोग उसे उठाते हैं। मदद करते हैं। परमार्थवादी समाज में कोई व्यक्ति अपनी पृथक् इकाई नहीं रख सकता वरन् वह समाज के एक शक्तिशाली अंग के रूप में काम करता है। इससे जहाँ समाज के जीवन को गति मिलती है वहाँ व्यक्ति को भी सुरक्षा, सह-जीवन की गारन्टी मिलती है। वह अपने जीवन को उपयोगी और अर्थपूर्ण समझने लगता है और अपने कर्तव्य, भार, उत्तरदायित्वों का भी बड़ी प्रसन्नता से निर्वाह करता है वह। इस तरह परमार्थवाद व्यक्ति और समाज दोनों के विकास प्रगति, सुख और शान्ति, सुरक्षा और सहयोग को जन्म देता है।
वह समाज जीवित नहीं रह सकता जिसके सदस्यों के बीच परस्पर सेवा, सहयोग के आधार परमार्थ की भावना न हो। इसके प्रभाव में समाज के रोगी, अपंग, असहाय, वृद्ध व्यक्तियों का निर्वाह न हो सकेगा, उन्हें असमय मरने के लिए ही मजबूर होना पड़ेगा। स्वार्थवादी व्यक्ति क्यों कर इन अरुचिकर और अलाभकारी कामों में अपने आपको लगावेगा? बच्चों की देखभाल, उनकी सेवा, शिक्षा, योग्य बनाने का प्रयत्न अधिकाँशतया व्यक्ति के अपने जीवन में कई बार लाभकर नहीं होता तो फिर स्वार्थ प्रेरित व्यक्ति क्यों इसमें अपने आपको खपायेगा? पाश्चात्य देशों में ऐसा हो भी रहा है,जहाँ सन्तानहीन विवाहों का अनुपात कुछ कम नहीं है और इसी से वहाँ की जनसंख्या स्थिर-सी हो गई है। जिसमें स्वार्थपरायण व्यक्ति अधिक हों, वह समाज जीवित नहीं रह सकता। और न वह उन्नति और विकास की ओर अग्रसर हो सकेगा। क्योंकि केवल अपने स्वार्थ को महत्व देने वाले व्यक्ति अपने-अपने लाभ की छीना-झपटी में परस्पर संघर्ष-रत रहेंगे। एक दूसरे के प्रति षड़यन्त्र, सन्देह अविश्वास का बोलबाला होगा वहाँ। द्वेष, वैमनस्य उनका धर्म बन जायगा और “अन्ततोगत्वा” ऐसा समाज छिन्न-भिन्न होकर नष्ट भ्रष्ट हो जायगा।
इसीलिए सभी समाज व्यवस्थाओं धर्म परम्पराओं में परमार्थवाद को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। इसी पर समाज का अस्तित्व एवं उसका विकास निर्भर करता है।
परमार्थ के अंतर्गत मनुष्य दूसरों के कल्याण उनके लाभ, सुख, सुविधा के लिए प्रयत्न ही नहीं करता वरन् आवश्यकता पड़ने पर अपने वैध स्वार्थों का भी स्वेच्छापूर्वक बलिदान करने को उद्यत रहता है। वह कभी किसी का बुरा नहीं करता। किसी को कोई हानि नहीं पहुँचाता। स्मरण रहे परमार्थ की पद्धति केवल रचनात्मक है। इसमें बुरे के प्रति भी भलाई का ही रास्ता है। प्रतिक्रिया की उसमें कोई गुंजाइश नहीं है। यह साधना ज्यों-ज्यों उत्कृष्ट होती जाती है तदनुसार ही परमार्थ का स्वरूप भी निखरता जाता है।
किसी जोर जबर्दस्ती से नहीं वरन् स्वेच्छा से प्रेरित होता है परमार्थ। किसी लाभ या उपयोगिता का हेतु रख कर किया गया परोपकार झूठा है। ऐसे परमार्थ का कोई मूल्य नहीं होता। इतना ही नहीं उसमें किसी तरह के आनंद अथवा उपयोगिता की भावना भी नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि किसी लाभ अथवा उपयोगिता के हेतु पर टिकने वाले सामाजिक संबंध जल्दी ही तब छिन्न-भिन्न होकर अनुपयोगी सिद्ध हो जाते हैं, जब उक्त हेतुओं का स्रोत टूट जाता है।
ऐसी बात नहीं कि परमार्थ का विषय बिल्कुल रूखा, व्यक्ति के लिए हानिकारक या उपेक्षा करने वाला हो। इसमें आत्म-प्रसाद भी मिलता है और सुख भी। परमार्थ-जीवी को जन-सहयोग समाज का प्रतिनिधित्व, महानता आदि मिलते हैं उनका मूल्याँकन किसी भी भौतिक सम्पन्नता से नहीं हो सकता। किन्तु इन्हें गौण उत्पादन मानना चाहिए। इन्हें परमार्थ का लक्ष्य नहीं बनाना चाहिए। शुद्ध परमार्थ में न कोई लाभ का हेतु होता है न कोई इच्छा आकांक्षा। उसमें तो कर्ता को कुछ कष्ट या असुविधाओं का सामना करना पड़े- तो इनका भी सहर्ष स्वागत करना चाहिए।
परमार्थ के बदले यदि हमको कुछ मूल्य मिले चाहे वह-पैसे के रूप में, प्रभाव, प्रभुत्व या पद, प्रतिष्ठा के रूप में तो वह सच्चा परमार्थ नहीं है। इसे कर्तव्य पालन कह सकते हैं। सामाजिक कार्य-कर्त्ता, सरकारी नौकर, अधिकारी वर्ग इसी श्रेणी में आते हैं। इन्हें अपनी सेवा के बदले वेतन मिलता है। सच्चे अर्थों में परमार्थ वही है जिसका प्रतिमूल्य नहीं लिया जाता।
उपदेश या प्रचार भी परमार्थ की श्रेणी में नहीं आते। व्यवहार से परे इसका अस्तित्व नहीं है। उपदेश में, बातचीत में वाणी द्वारा परमार्थ की विशद व्याख्या की जाय लेकिन यदि वह व्यवहार में नहीं आता तो एक तरह का पाखण्ड, प्रपंच और सफेद झूठ है। परमार्थ की अभिव्यक्ति वाणी से नहीं व्यवहार से ही सिद्ध होती है।
परोपकारार्थ किये जाने वाले कर्म विवेक और मौलिक निर्णायक बुद्धि से प्रेरित होने चाहिएं। तभी वे सत्परिणाम पैदा करते हैं अपर पक्ष के लिए। मोह, द्वेष, अंध-विश्वास या किसी आसक्ति की प्रेरणा से किये गए कार्य दूसरों को हानि ही पहुँचाते हैं। मोहासक्त माँ-बाप अपने बच्चे की अनुचित माँगे पूरी करके उनमें बुरी आदतें डाल देते हैं जो उनके लिए अहितकर होती हैं।
परमार्थ एकांगी या देशीय नहीं होता, वह सार्वभौमिक होता है। किसी व्यक्ति, संस्था या समूह विशेष से ही उसका संबंध न हो। ऐसी स्थिति में मनुष्य का संबन्धित तत्वों से तो परोपकार का व्यवहार होगा किन्तु इतर पदार्थों से नहीं। केवल अपने बच्चों के लिए भला चाहने वाले दूसरों के बच्चों के प्रति रूखा-बुरा व्यवहार कर सकते हैं। कई लोग अपनी जाति, दल या समुदाय में परस्पर सेवाभावी और सहयोगी बन सकते हैं किन्तु अन्य जातियों, समाज दलों के प्रति उनका ऐसा व्यवहार नहीं होता। बड़े रूप में मनुष्य अपने देश के लिए सब कुछ लुटा सकता है किन्तु दूसरे देश पर आक्रमण कर उस पर कब्जा करने में उसे संकोच नहीं होगा। किसी संस्था का सदस्य बनकर उसके लिए मनुष्य अपने वैध हितों का भी उत्सर्ग कर सकता है किन्तु आवश्यकता पड़ने पर अन्य संस्थाओं को अपना सहयोग, सहायता देने में कंजूसी भी वह कर सकता है। लेकिन परमार्थ की ये पद्धतियाँ अधूरी हैं। संकुचित हैं। परमार्थजीवी का उद्देश्य सबकी सेवा, सबका भला, सबका कल्याण करना होना चाहिए। सर्वजन हिताय, जहाँ भी दूसरों के निस्तार के लिए आवश्यकता हो वहीं परमार्थ के पथिक को चाहिए कि बिना किसी आनाकानी के अपना कर्तव्य पूर्ण करे।
परमार्थवाद जन-जीवन की सुरक्षा समृद्धि, विकास का मार्ग है। इससे समाज के सभी अंगों को गति मिलती है। प्रत्येक इकाई अपने आपको, अकेली, निस्सहाय नहीं समझती। इस पद्धति में व्यक्ति और समुदाय दोनों ही का भला होता है। इसीलिए सन्त, महात्मा, महापुरुषों ने परमार्थ मानव जीवन का आवश्यक धर्म बताया है।
अज्ञानी और कम समझ लोग स्वार्थ में अपना लाभ मानते हैं। वे अपना घर भरते हैं। अपने स्वार्थ के लिए जो भी चाहें करने में नहीं चूकते। लेकिन वे नहीं समझते कि इससे सारा समाज क्षीण होकर नष्ट हो जायगा और समाज व्यवस्था के नष्ट होने पर ऐसे स्वार्थी व्यक्तियों को भी नष्ट होना पड़ता है। क्योंकि समुदाय में महान् शक्ति है वही व्यक्ति को संरक्षण प्रदान करती है।
संसार के कुशल समाचार जानने के लिए एक दिन भगवान ने नारद को पृथ्वी पर भेजा।
उन्हें सबसे पहले एक दीन दरिद्र वृद्ध पुरुष मिला जो अन्न वस्त्र के लिए तरस रहा था। नारदजी को उसने पहचाना तो अपनी कष्ट-कथा रो-रोकर सुनाने लगा और कहा, आप भगवान से मिलें तो मेरे गुजारे का प्रबन्ध उनसे करा दें।
नारद उदास मन आगे बड़े तो एक धनी से उनकी भेंट हो गई। उसने भी नारदजी को पहचाना तो उसने खिन्न होकर कहा—मुझे भगवान ने किस जंजाल में फँसा दिया। थोड़ा मिलता तो मैं शान्ति से रहता और कुछ भजन पूजन कर पाता, पर इतनी दौलत तो संभाले नहीं संभलती। ईश्वर से मेरी प्रार्थना करें कि इस जंजाल को घटावें।
यह विषमता देवर्षि को अखरी। वे आगे चल ही रहे थे कि साधुओं की एक जमात से भेंट हो गई। जमात वाले उन्हें चारों ओर से घेर कर खड़े हो गए और बोले—स्वर्ग में तुम अकेले ही मौज करते रहते हो। हम सबके लिए भी वैसे ही राजसी ठाठ जुटाओ। नहीं तो नारद बाबा चिमटे मार-मार कर तुम्हारा भूसा बना देंगे।
घबराए नारद ने उनकी माँगी वस्तुएं मँगा दीं और जान छुड़ाकर भगवान के पास वापिस लौट गए। जो कुछ देखा वही उनके लिए बहुत था और देखने की उन्हें इच्छा ही न रही।
भगवान् ने नारद से उस यात्रा का वृत्तान्त पूछा तो देवर्षि ने तीनों घटनाएं कह सुनाई। नारायण हँसे और बोले—देवर्षि, मैं कर्म के अनुसार ही किसी को कुछ दे सकने में विवश हूँ। जिसकी कर्मठता समाप्त हो चुकी उसे मैं कहाँ से दूँ। तुम अब की बार जाओ तो उस दीन-हीन वृद्ध से कहना—दरिद्रता के विरुद्ध लड़े—और सुविधा के साधन जुटाने का प्रयत्न करे तभी उसे दैवी सहायता मिल सकेगी। इसी प्रकार उस धनी से कहना—यह दौलत उसे दूसरों की सहायता के लिए दी गई है यदि वह संग्रही बना रहा तो जंजाल ही नहीं आगे चलकर वह विपत्ति भी बन जायगी।
नारदजी ने पूछा—और उस साधु मण्डली से क्या कहूँ? भगवान् के नेत्र चढ़ गये और बोले—इन दुष्टों से कहना कि स्थायी और परमार्थी का वेष बनाकर आलस्य और स्वार्थपरता की प्रवंचना इतनी असह्य है कि उन्हें नरक के निकृष्टतम स्थान में अनन्त काल तक पड़ना पड़ेगा।
संसार में कोई मनुष्य तब तक सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। जब तक कि उसके मन में यह दृढ़-विश्वास न हो कि मैं जिस काम को करना चाहता हूँ उस में अवश्य सफल बनूँगा।
वह मनुष्य कैसे विद्या प्राप्त कर सकता है, जिसके मन में निराशा का भाव छाया हुआ है। जो कहा करता है कि “हाय! मैं चाहता हूँ कि खूब लिख-पढ़कर विद्वान् बनूँ पर क्या करूं मैं निःसहाय हूँ। मुझे किसी तरह की सुविधा नहीं है। न मेरे पास पैसे हैं और न मेरा कोई सहायक ही है। ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति के कारण मैं लाचार हो गया हूँ। इसी से विद्या प्राप्ति के द्वार मेरे लिए बन्द हो गये हैं?”
वह नवयुवक कैसे धनवान हो सकता है जिसके विश्वास नहीं है कि मैं अपने पुरुषार्थ से धन पैदा कर सकता हूँ। जो ऐसा मानता है कि कुछ इने-गिने मनुष्यों के भाग्य में ही धन बदा है। अधिकतर आदमी गरीब ही होते हैं और मैं उनमें से एक हूँ।
हम व्यापार में प्रवेश की इच्छा करने वाले उस व्यक्ति से सफलता की किस प्रकार आशा रख सकते हैं, जिसका आरम्भ में ऐसा संदिग्ध मन होता है कि मैं व्यापार में सफलता प्राप्त कर सकूँगा या नहीं? कभी किसी मनुष्य को तब तक उसके कार्य में सफलता प्राप्त नहीं हो सकती, जब तक कि सफलता पर उसका दृढ़ विश्वास न हो। मनुष्य उसी काम को ठीक कर सकता है—उसी में सफलता प्राप्त कर सकता है, जिसकी सिद्धि में उसका हार्दिक विश्वास हो।
हम ऐसे बहुत से नवयुवकों को जानते हैं जिन्होंने अपने व्यवसाय को निश्चित करने में इतने उत्साह और दृढ़ निश्चय से काम लिया कि कोई उन्हें अपने उद्देश्य से हटा न सका और अन्ततः उन्होंने अपने व्यवसाय में आशातीत सफलता प्राप्त की। क्योंकि उन्होंने पूर्ण विश्वास के साथ इस बात को स्वीकार कर लिया था कि हमारा उद्देश्य हमसे अलग नहीं। वह हमारे व्यक्तित्व का एक अभिन्न अंग है। यदि हम अविचल साहस द्वारा सम्पादित किए हुए उन बड़े-बड़े कार्यों का और उनके कर्ताओं का विश्लेषण करें, तो उनमें दृढ़ आत्म-विश्वास ही सबसे प्रधान गुण मिलेगा। वह मनुष्य अवश्य ही सफलता प्राप्त करेगा, आगे बढ़ेगा, ऊँचा उठेगा, उन्नति पथ पर अग्रसर होगा, जिसको अपनी कार्य-सम्पादन शक्ति पर दृढ़-विश्वास हो। इस तरह के विश्वास का इष्ट मानसिक परिणाम केवल उन्हीं लोगों पर नहीं होता जो ऐसा विश्वास रखते हैं, बल्कि उन लोगों पर भी होता है जो उनके निकट संपर्क में आते हैं।
जितना हम अपनी योग्यता और कार्यक्षमता पर विश्वास करेंगे, उतना ही हमारा जीवन सफल होगा और जितना हम अपनी योग्यता पर अविश्वास करेंगे उतने ही हम विजय से—सफलता से दूर रहेंगे। चाहे हमारा पथ कितना ही कंटकाकीर्ण, संकटपूर्ण एवं अंधकारमय क्यों न हो, हमें चाहिये कि हम कभी अपने आत्म-विश्वास को तिलाँजलि न दें। हमारे कार्य की नींव हमारे आत्मविश्वास पर जमी हुई है। ‘हम अमुक कार्य अवश्य कर सकते हैं’ इस विचार में बड़ी अद्भुत शक्ति भरी हुई है। संसार में जो मनुष्य बड़े-बड़े काम करते हैं उन सब में ऊँचे दर्जे का आत्म-विश्वास होता है, अपनी शक्ति पर, अपनी योग्यता पर अपने कार्य पर।
दुनिया में जितने बड़े-बड़े आविष्कार हुए हैं—नई—नई बातें निकली हैं—अद्भुत कार्य हो रहे हैं—सब दृढ़-विश्वास लगन और अदम्य क्रियाशीलता के परिणाम हैं। क्या आप जानते हैं कि इन आविष्कारों के प्रणेताओं को कैसी-कैसी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा? क्या आपको मालूम है कि कई वर्षों तक उन्हें सफलता का कोई चिह्न ही न दीख पड़ा, बहुत वर्ष उनके अंधकारमय गुजरे पर उन्होंने अपने उद्दिष्ट को नहीं छोड़ा, आत्म-विश्वास से मुँह नहीं मोड़ा। अन्ततः उन्हें प्रकाश मिला वे सफल हुए। यदि वे अपना आत्म-विश्वास गँवा बैठते तो वे कभी सफलता प्राप्त न कर सकते। वे अपने महान अद्भुत आविष्कारों से संसार को आश्चर्यचकित न कर पाते।
हर काम तभी सफल होता है जब कि उसमें दृढ़ विश्वास का बल रहता है। दृढ़ आत्म-विश्वास ही हमें उस मार्ग को बताता है जो हमें अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुँचा देता है। आत्म-विश्वास ही कार्य का बल है। उसके द्वारा हम में शक्ति का ऐसा स्रोत फूट पड़ता है, जो कठिन से कठिन कार्य को भी आसानी से पूरा कर देता है।
आत्म-विश्वास में वह ताकत है, जो हजार विपत्तियों का सामना कर उन पर पूरी-पूरी विजय प्राप्त कर सकती है। यही मनुष्य का सच्चा मित्र और उसकी सबसे अच्छी पूँजी है। हमने देखा है कि साधनहीन पर या आत्म-विश्वासी मनुष्यों ने दुनिया में गजब के काम किए हैं। जब कि बहुत से साधन सम्पन्न व्यक्ति विश्वासहीनता के कारण बुरी तरह से असफल हुए हैं। यदि हम में यह दृढ़-विश्वास है कि हम बड़े-बड़े कार्य कर सकते हैं दुनिया में उलट-फेर कर सकते हैं, यदि हम में यह विश्वास है कि हम में एक महान दैवी तत्व मौजूद है—हममें पूर्णता भरी हुई है—अटूट शक्ति भंडार हम में भरा हुआ है—तो हम निःसंदेह दुनिया में बड़े-बड़े काम कर सकते हैं।
मनुष्य राजकुमार है अर्थात् राजराजेश्वर ईश्वर का पुत्र है, जब कि वह उसकी दैवी सम्पत्ति का उत्तराधिकारी है तो क्यों न उसे अपनी अटूट शक्ति पर दृढ़-विश्वास हो? बात यह है कि हमें अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं है, जिससे हम उसका ठीक-ठीक विकास नहीं कर पाते।
हम देखते हैं कि समाज में बहुत से व्यक्ति अवनत, हीन दशा में पड़े रहते हैं। समाज में सम्मान प्राप्त नहीं कर पाते। इसका कारण यही है कि वे अपने आपको हीन समझते हैं। उन्हें उन सद्गुणों की, उस शक्ति की पहिचान नहीं होती, जो उनकी आत्मा में स्थित है। यदि आप भारत की नीच जातियों, आदिवासियों पर दृष्टि डालेंगे तो आपको मालूम होगा कि शताब्दियों से नीच वातावरण में पलने के कारण वे इस बात को साफ भूले हुए हैं कि हम भी मनुष्य हैं—हम में भी वे दिव्य गुण मौजूद हैं, जो अन्य मनुष्यों में हैं। हम में भी वह शक्ति है जो अपना मानवोचित विकास करते हुए दुनिया में बड़े-बड़े काम कर सकती है। हम भी मनुष्य होने के नाते वे ही अधिकार रखते हैं, जो अन्य मनुष्य भोग रहे हैं और आत्म-सम्मान के हम भी वैसे ही पात्र हैं, जैसे अन्य मनुष्य।
जैसे हम अपने आपको मानेंगे, वैसा ही आदर्श हमारी आत्मा का बनेगा। हो नहीं सकता कि जैसा हम अपने आपको मानते हैं, उससे हम बढ़कर बन सकें। अल्प बुद्धि वाला आत्म-विश्वासी उस बल बुद्धि सम्पन्न व्यक्ति से अधिक कार्य कर सकता है, जिसे अपनी आत्मा में विश्वास नहीं है।
आप अपना एक उन्नतिशील एवं उच्च आदर्श निर्धारित कीजिए, और उस आदर्श को सिद्ध करने के लिए जी-जान से जुट जाइये। अवश्य आपको सफलता प्राप्त होगी। संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जो मनुष्य को ऊँचा उठावे, जो मनुष्यों की हीन प्रकृति से रक्षा करे जैसा कि दृढ़ आत्म-विश्वास है। अधिक क्या कहें इसी दिव्य शक्ति के द्वारा मनुष्य परमात्मा के ऐक्य का सुखानुभव तक करने लगता है। आत्म-विश्वास हमारी दूसरी शक्तियों को भी प्रोत्साहन देता रहता है। आत्म-विश्वास की जितनी अधिक मात्रा हममें होगी। उतना ही हमारा संबंध अनन्त जीवन और अनन्त शक्ति से गहरा होता जायगा।
अविश्वास ही हमारी कार्य सम्पादन शक्ति को पंगु बनाने वाला है। कार्य आरम्भ करने के पहले मनुष्य को यह दृढ़-विश्वास होना ही चाहिए कि मैं इस कार्य को अवश्य कर सकूँगा। जहाँ तक संशय का लेश भी उसमें बना रहेगा। वहाँ तक वह अपने कार्य में पूरी सफलता न पा सकेगा। वह मनुष्य जिसका मन दृढ़ आत्म-विश्वास और तीव्र अभिलाषा से भरा हुआ है, तब तक चैन नहीं पा सकता, संतोष प्राप्त नहीं कर सकता जब तक कि वह अपने उद्दिष्ट को पूरा न कर ले। अवश्य ही ऐसा मनुष्य अद्भुत सफलता प्राप्त करेगा। चाहे कितनी ही कठिनाईयाँ उसके मार्ग में बाधक हों।
किसी महान कार्य के लिए एकाग्रता की बड़ी आवश्यकता होती है। जिस मनुष्य का मन चिंता, भय और शंकाओं में भटक रहा हो, वह कभी अपनी उन्नति नहीं कर सकता। शंका एवं संदेह हमारी मानसिक एकाग्रता में बाधक होते हैं। जब कि एकाग्रता ही हमारी कार्य-शक्ति का रहस्य है। एकाग्रता और आत्म-विश्वास ही कार्यशक्ति के आधार स्तम्भ हैं। इनके बिना किसी कार्य में सफलता की आशा करना दुराशा मात्र है।
हमारी मानसिक शक्तियाँ हमारे आत्म-विश्वास और साहस पर निर्भर करती हैं। वे हमारी दृढ़ इच्छा शक्ति के पूर्णतया अधीन हैं। अतएव यदि हमारी इच्छा शक्ति कमजोर होगी तो हमारी मानसिक शक्तियों का कार्य भी वैसा ही होगा। जहाँ हमारे आत्म-विश्वास और धैर्य में कमजोरी आई कि हमारी कार्य सम्पादन शक्ति में भी कमजोरी आ जायगी। मनुष्य के लिये इससे कोई और अच्छी बात नहीं है कि वह हमेशा यह मानता रहे कि मेरे लिए सब कुछ अच्छा होगा। जो कार्य मैं हाथ में लूँगा उसमें अवश्य ही मुझे सफलता मिलेगी।
दृढ़ आत्म-विश्वास ही वह चीज है जो हमें भीतर से प्रेरित करती है कि हम अपने आदर्श की ओर तेजी से कदम बढ़ावें। यही हमारी आत्मा का बल है। वही हमारी आध्यात्मिक शक्ति है, वही हमारे मार्ग का पथ प्रदर्शक है, वही हमारी विघ्न−बाधाओं पर जय प्राप्त कर हमारे पथ को साफ करता है।
दृढ़ विश्वास ही वह चीज है, जो हमें उस दिव्यता का दर्शन कराती है, जो हमारे भीतर भरी हुई है। दृढ़ विश्वास ही वह कड़ी है जो ईश्वर से हमारे ऐक्य संबंध कराती है। विश्वास ही वह पदार्थ है जो हमारे हृदय कपाटों को खोल देता है और विश्वास ही वह शक्ति है, जो हमें अनन्त से मिला देती है, जिससे अनन्त शक्ति अनन्त ज्ञान एवं अनन्त दर्शन का हमें अनुभव होने लगता है। विश्वास ही हमारी अन्तरात्मा की ध्वनि है। वह एक आध्यात्मिक कार्य शक्ति है। दृढ़ विश्वास एवं श्रद्धा हमारे चित्त को ऊँचा उठाते हैं और उस दिव्यता-सफलता के दर्शन कराते हैं, जिसके लिए हमारी अन्तरात्मा रात-दिन व्याकुल रहती है।
किसी महापुरुष ने कहा है कि “मानवीय कर्तव्य केवल इस बात में समा गया है कि पहले हम ये जान लें कि हम कौन हैं? किसलिए संसार में आये हैं और हमें क्या करना है और फिर निरन्तर उसी का विचार करते हुए अपने उद्दिष्ट मार्ग पर दृढ़-विश्वास के साथ निडर होकर बढ़ते रहें। उसकी सफलता निश्चित है। दृढ़ आत्मविश्वास ही सफलता की एकमात्र कुँजी है।’
उस समय भारत में स्वतन्त्रता आन्दोलन जोर पकड़ रहा था। सरकारी शिक्षा संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने का भी बहिष्कार होना आवश्यक था। किन्तु उस समय आन्दोलनकारियों के पास न इतना धन था और न साधन ही जिससे महाविद्यालय चला सकें। कुछ रुपया इकट्ठा हुआ। महाविद्यालय की रूपरेखा बनाई गई। किन्तु उसके संचालन के लिए भी तो योग्य अनुभवी व्यक्ति की आवश्यकता थी, जो बिना काफी वेतन के सम्भव नहीं था। विद्यालय की ओर से केवल 75) रु0 मासिक वेतन पर संचालक का विज्ञापन किया गए। सभी ने सोच रक्खा था इतने-से वेतन पर कौन अच्छा आदमी आयेगा? सब निराश ही थे कि अचानक एक आवेदनपत्र आया और वह भी एक योग्य अनुभवी व्यक्ति का जिसकी स्वप्न में भी आशा नहीं की जा सकती थी। बड़ौदा कालेज के अध्यक्ष श्री अरविन्द घोष ने, जिन्हें उस समय अन्य सुविधाओं के साथ सात सौ रुपये मासिक वेतन मिलता था उसे छोड़कर बंगाल में स्थापित इस नव-राष्ट्रीय महाविद्यालय के लिए 75) रु0 मासिक वेतन पर काम करना स्वीकार कर लिया। जहाँ इतना त्याग आदर्श किसी संस्था का संचालक उपस्थित करे वहाँ छात्रों के चरित्र एवं भावनाओं पर क्यों प्रभाव न पड़ेगा? उस विद्यालय के छात्रों ने आगे चल कर स्वतन्त्रता आन्दोलन में भारी भाग लिया और उनमें से कितने ही चोटी के राजनैतिक नेता बने।
पौराणिक गाथा के अनुसार भागीरथ के पूर्वजों को शाप लगा था और वे जलकर भस्म हो गये थे। मरने के उपराँत भी उन्हें सद्गति नहीं मिली। वे नरकगामी हुए। उपाय यह बताया गया कि स्वर्ग से गंगा अवतरित होकर आवे और उस स्थान पर होती हुई बहे—जहाँ वे भस्म हुए थे—तो उन पितरों की सद्गति संभव हो।
राजकुमार भागीरथ राजघरानों में उत्पन्न हुए अन्य विलासी लड़कों की तरह न थे, जिन्हें सुरा-सुन्दरी की नारकीय अग्नि में अपने चढ़ते यौवन को जला डालने की उतावली रहती है। यों बड़े आदमियों के पीछे कुसंग भी दुर्भाग्य की तरह पीछे पड़ा रहता है पर मनस्वी भागीरथ का संस्कारवान मन भटका नहीं, विचारशीलता ने उसे जीवन समस्याओं को ध्यान में रखने की प्रेरणा दी।
पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्य की बात भागीरथ सोचा करते। शाप से पितरों के भस्म होने के कारण उनके कुल का गौरव घट गया था, वे चाहते थे कि ऐसा आदर्श पथ अपनाया जाय जिससे वह खोया हुआ सम्मान पुनः प्राप्त हो। दुष्कर्म स्वतः ही एक शाप है, जो उन्हें करता है वह भस्म हुए बिना नहीं रहता। फिर अपयश का नरक तो उन्हें मिलता ही है। पूर्वज इस प्रकार की भूल कर चुके थे,अब बिगड़ी बात बनानी हो तो आदर्श सत्कर्म करने का—श्रेष्ठता के पथ पर चलने का मार्ग ही शेष था। यदि दुष्कर्मों का फल नरक है तो सत्कर्म स्वर्ग भी तो दे सकते हैं। गंगा को पृथ्वी पर लाने का पुण्य उन्हें ही नहीं उनके पूर्वजों को भी सद्गति प्रदान कर सकता है, तो जीवन उसी कार्य में क्यों न लगा दिया जाय, भागीरथ निरन्तर यही सोचते रहते।
सोचना बहुत कुछ और करना कुछ नहीं यह दुर्बल मनोभूमि के पुरुषों का मार्ग है। मनस्वी लोगों को जो उचित और उपयुक्त प्रतीत होता है उस पर वह चलने के लिये कटिबद्ध भी होते हैं। साहस के सामने बेचारी कठिनाइयाँ कितनी देर ठहर पाती हैं, उन्हें रास्ता देना ही पड़ता है। भागीरथ ने गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने का अपना निश्चय जब परिजनों को सुनाया तो वे अवाक् रह गये। इतना बड़ा काम, इतना छोटा लड़का कर सकेगा, इस पर उन्हें विश्वास न होता था। आरम्भ में सभी ने एक स्वर से असहमति प्रकट की, और मार्ग की बाधाओं को बताते हुए निरुत्साहित किया, पर जैसा कि सदा से होता आया है वह यहाँ भी हुआ। दृढ़-निश्चय के आगे सब झुकते हैं और अन्ततः समर्थन भी मिलता है और सहयोग भी।
भागीरथ घर से चल पड़े और हिमालय पर जाकर तप करने लगे। हिमि के देवता—शंकर का हृदय पसीजा। उन्होंने अपने मस्तक में निवास करने वाली गंगा को मरुभूमि में प्रवाहित होने की व्यवस्था कर दी। आधुनिक बुद्धिवादी कहते हैं कि शिवलिंग पर्वत के गर्भ में अपरिमेय जप की यह अजस्र-धारा-गंगा छिपी पड़ी थी। तपस्वी भागीरथ ने एक तपस्वी इंजीनियर के रूप में उसे खोजा और उसे मरुभूमि में ले आने के लिये अवरोध-भागों को तोड़-फोड़ कर भगवती जाह्नवी को मैदान में उतारने की सफलता प्राप्त करली।
जो हो, भागीरथ अपने लक्ष्य में सफल हुए। यह तप उन्हें बहुत लंबे समय तक करना पड़ा और दुर्गम प्रदेश की कठिनाइयों ने उनके शरीर को जीर्ण-शीर्ण भी कर डाला, पर इससे क्या? मनुष्य शरीर की सार्थकता बहुत दिन जीने या ऐश आराम करने में नहीं, वरन् इस बात में है कि यज्ञ को उज्ज्वल बनाने वाला कोई सत् कार्य उससे बन पड़े। युवावस्था का महत्वपूर्ण भाग गंगावतरण के पराक्रम में लगाकर भागीरथ ने खोया कुछ नहीं, पाया बहुत कुछ। शाप पीड़ित पूर्वजों को सद्गति मिली, वे स्वयं यशस्वी हुए, और सबसे बड़ी बात यह हुई कि उनके सत्प्रयत्न द्वारा अवतरित गंगा द्वारा अब तक कोटि-कोटि प्राणियों ने अपनी क्षुधा तृष्णा और अशाँति मिटाते हुए समृद्धि और शाँति का आनन्द लाभ किया।
भागीरथ आज हम लोगों के बीच मौजूद नहीं है। काल की कराल गति ने उन्हें भी नियति अवधि से अधिक यहाँ नहीं रहने दिया। फिर भी वे अमर हैं। भगवती भागीरथी अपने कल-कल नाद में उस महातपस्वी के पुरुषार्थ का निरन्तर गुणगान करती रहती है। जीवन ऐसे ही लोगों का धन्य है, यों वासना और तृष्णा के कीचड़ में कुलबुलाते हुए कीड़ों की तरह जिन्दगी तो हम लोग भी किसी तरह पूरी कर ही लेते हैं।
प्रगति का अर्थ है आगे बढ़ना। आगे बढ़ने का अर्थ है पीछे को छोड़ना, भूत को छोड़ कर हम वर्तमान में आते हैं तदुपरान्त भविष्य बनता है। पिछला पैर उठाने के बाद ही तो अगला कदम बढ़ा सकना संभव होता है। इस विश्व के जड़ चेतन क्षेत्रों में जो कुछ प्रगति हो रही है उसके मूल में यही तथ्य काम कर रहा है कि कुछ छोड़ो और कुछ ग्रहण करो। जो छोड़ने का साहस कर सकता है उसे ही ग्रहण की सामर्थ्य मिलती है, जिसे यह साहस नहीं बन पड़ता उसके लिए प्रगति का स्वप्न एक मनोरथ मात्र ही बन कर रह जाता है।
बादल समुद्र से जल प्राप्त करते हैं, उस जल को प्राप्त कर वे अपने को धनी, सौभाग्यवान, कमाऊ अनुभव कर सकते हैं पर यह संतोष थोड़ी देर कर लेने के उपरान्त उन्हें ध्यान आता है कि सृष्टि का क्रम ‘प्राप्त को त्यागने’ से ही चल सकता है, इसलिए वे आगे बढ़ते हैं और उस प्राप्त जल को धरती पर बरसा देते हैं। स्वयं खाली हो जाते हैं। वर्षा का जल नदी नालों में घूमता हुआ समुद्र में जा पहुँचता है और फिर नये बादल बनने का, नई वर्षा होने का क्रम चल पड़ता है।
यदि यह चक्र टूटने लगे इनमें से कोई स्वार्थी बन बैठे, जो कमाया है उसे अपने या बेटे-पोतों के लिए जमा कर रखने की नीति अपना ले तो सृष्टि का यह वर्षा-संतुलन बिगड़ जाय और सर्वत्र हाहाकार का दृश्य दिखाई देने लगे। समुद्र कहे कि मैं अपना जल बादलों को क्यों दूँ? बादल कहें कि जो हमने कमाया है उसे धरती पर क्यों बरसावें? धरती पर जो जल वर्षा है उसे वह दाब कर बैठ जाय, सोख ले, तो आगे का प्रवाह कैसे बढ़े? तालाब, नदी, नाले कैसे भरें? यदि नदी नाले उस जल को अपने भण्डार में जमा करने की बात सोचें तो समुद्र रीता हो जाय, और समुद्र के रीता हो जाने पर बादल बनने, वर्षा होने, नदी-नाले बहने का सुन्दर-सा सृष्टि-क्रम समाप्त ही हो जाय। स्वार्थपरता का दृष्टिकोण यदि इस वर्षा-चक्र के किसी घटक के मन में प्रवेश कर जाय तो संसार की कितनी दुर्दशा हो इसकी कल्पना करना भी कठिन है।
धरती अन्न उपजाती है, वनस्पति उगाती है। यह उपजी हुई वस्तुएं किसी का खाद्य बन कर या सड़ गल कर धरती के लिए खाद बनकर पुनः जा पहुँचती है। यदि खाद न मिले तो उसकी उर्वर शक्ति समाप्त हो जाय और फिर कुछ भी उगना सम्भव न हो। जो धरती से मिलता है उसे वापिस लौटाने में अड़चन उत्पन्न की जाय, खाद बनने के साधन रुक जायें तो फिर जो कोई इस उर्वर चक्र को रोकेगा वह भी जीवित न रहेगा, अन्य सब पर भी आपत्ति आवेगी।
प्राणी साँस में ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ते हैं। वृक्ष वनस्पति इस कार्बन डाइऑक्साइड को ग्रहण करते और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। इस प्रकार वृक्षों और प्राणियों के बीच एक सुन्दर आदान-प्रदान चलता रहता है। दोनों में से कोई स्वार्थी बन बैठे और जो मिला है उसे न छोड़ने की ठाने तो दोनों की ही विनाश वरण करना होगा। ऑक्सीजन के अभाव में प्राणी और कार्बन के अभाव में वनस्पतियों का अस्तित्व समाप्त होने लगेगा।
सौर मण्डल के सभी ग्रह एक दूसरे को अपनी आकर्षण शक्ति से सींचे रहते हैं और अपनी नियत कक्षा पर निरन्तर घूमते रहते हैं। यदि इनमें से किसी में स्वार्थ समाये कि मैं क्यों दूसरे ग्रहों को खींचे रहने के झंझट में पड़ूं और क्यों आराम की जिन्दगी छोड़कर परिक्रमा करने का शिर दर्द मोल लूँ? तो उसकी वह नीति सारे सौर मण्डल के लिए घातक सिद्ध होगी वह स्वार्थी ग्रह तो सबसे पहले निर्जीव एवं नष्ट भ्रष्ट होगा।
संसार में विभिन्न क्षमता, प्रतिभा और परिस्थितियों के मनुष्य पुरुषार्थ करके जो उपार्जित करते हैं उसे दूसरों को दे देते हैं। वस्तुएं एक से दूसरे के पास घूमती हैं, इस प्रकार हर व्यक्ति को अपनी आवश्यकता की सामग्री उपलब्ध हो जाती है। यदि मानव समाज में से यह प्रवृत्ति नष्ट हो जाय, जिसने जो कमाया है वह उसे अपने पास ही रोक रखे तो मानव समाज का वर्तमान स्वरूप ही नष्ट हो जायगा और उसे जंगली जानवरों जैसा अभावग्रस्त एवं एकाकी जीवन बिताना पड़ेगा। किसान अपना अन्न तो जमा किये रहेगा पर उसे कपड़ा कहाँ से मिलेगा? कपड़े वाले जो वस्त्र बनावें वे अपने लिए वस्त्र सुरक्षित रखें तो उन्हें अन्न कहाँ से मिलेगा? फिर तेली को जूता और मोची को तेल मिलने की बात कैसे बनेगी? कोई भी निर्माण अनेक वस्तुओं और व्यक्तियों द्वारा उपार्जित श्रम, ज्ञान एवं पदार्थों द्वारा विनिर्मित होता है। यह चक्र दूसरों के लिए त्यागने की प्रवृत्ति के कारण ही चलता है। मनुष्य ने प्रकृति के इस विधान को समझा और जीवन में उतारा है अतएव वह प्रगति का सौभाग्य प्राप्त कर सका। दूसरे जीव इस मर्म से अपरिचित रहे। फलस्वरूप वे अधिक सामर्थ्यवान होते हुए भी पिछड़ी स्थिति का अभावग्रस्त जीवन बिता रहे हैं।
हम अपने शरीर को ही देखें। प्रत्येक अंग और अवयव अपना-अपना काम करते हैं। पर अपने श्रम का लाभ स्वयं ही न उठा कर संबंधित अन्य अवयवों को प्रदान कर देते हैं। मुँह जो चबाता है वह पेट के लिए भेज देता है। पेट उसे पचा कर रक्त बनाता और हृदय को भेजता है। हृदय उसे नाड़ियों में बाँटता है। रक्त से माँस, माँस से अस्थि, अस्थि से मज्जा आदि क्रम चलता रहता है और जीवन धारण की गति निर्बाध रहती है। यदि इनमें से कोई अंग स्वार्थी बन बैठे। ‘अपनी कमाई आप खाई’ की संकीर्णता अपनाए तो जीवन धारण किये रहना कठिन हो जायगा। तब मुँह जो खायेगा गालों में ही भरा रखेगा। पेट के हाथ कुछ लग गया होगा तो वह वहीं जमा रखेगा तब फिर भूख ही न लगेगी। आँतें मल विसर्जित न करेंगी तो मल सड़ेगा और प्राण घातक विष उत्पन्न करेगा। फेफड़े यदि भीर वायु का त्याग न करें, हृदय रक्त भण्डार को जमा रखे, हाथ जो कमावें उसे मुँह को न दें तो उस दशा में वह स्वार्थी अंग तो मरेंगे ही शरीर के अन्य अंग भी अपनी जीवन लीला समाप्त करने के लिए विवश हो जावेंगे।
माँ-बाप बच्चों को पालते हैं, बच्चे बड़े होकर अपने बच्चों को पालते और उनके लिए कष्ट उठाते हैं। यदि यह क्रम टूट जाय, हर किसी को अपनी सुविधा का ही ध्यान रहे, शिशु पालन का खर्चीला और कष्टसाध्य उत्तरदायित्व ग्रहण न करें तो वंश परम्परा का चलना कठिन हो जाय।
वैज्ञानिक सृष्टि की मूल शक्ति ‘परमाणु’ में देखते हैं। एटम के इलेक्ट्रॉन, न्यूट्रोन आदि भाग एक नियम गति से अविश्रान्त श्रम करते हुए क्रिया संलग्न रहते हैं। यदि वे अपनी गतिशीलता छोड़ दें तो विश्व की गतिशीलता का अन्त होने में देर न लगे।
नियति की प्रत्येक क्रिया परस्पर आदान-प्रदान के आधार पर चलती है। हर पदार्थ कुछ छोड़ता है तब उसे कुछ मिलता है। ‘त्याग से प्राप्ति’ का नियम इतना सुनिश्चित है कि इसे तोड़ने की बात सोचने का जो कोई भी दुस्साहस करेगा वह अपनी प्रगति और स्थिति के लिए संकट ही उत्पन्न करेगा। नियति की इस सुनिश्चित व्यवस्था को हमें ध्यानपूर्वक देखना और समझना चाहिए। साथ ही प्रयत्न यह भी करना चाहिए कि हम अपनी नीति, विचारणा, आस्था एवं क्रिया का निर्माण इसी आधार पर करते रहें। संकीर्णता और स्वार्थ के लिए मानवीय जीवन पद्धति में कोई स्थान नहीं हो सकता। स्वार्थ, लालच, संग्रह और परिग्रह यह अनित्य तत्व हैं। जिस किसी के जीवन में इन्हें जितना स्थान मिलेगा, उसके लिए उतनी ही अवनति एवं आपत्ति की सम्भावना बनी रहेगी।
दूसरों के सहयोग से ही हम स्वास्थ्य, शिक्षा, धन, पद, मनोरंजन आदि की सुखद स्थिति प्राप्त करते हैं। किसी के लिए भी यह सम्भव नहीं हो सकता कि वह एकाँगी रहकर इन विभूतियों को प्राप्त कर सके। ऐसी दशा में प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य हो जाता है कि दूसरों ने उसके विकास में जो सहयोग दिया है उसका बदला चुकाने के लिए अपने पास जो कुछ है उसे दूसरों को समुचित बनाने में प्रयुक्त करता रहे। इसके विपरीत जिसकी तृष्णा यह रहती है कि जहाँ से, जितना कुछ भी प्राप्त किया जा सके उतना संग्रह कर ले और उसका उपयोग स्वयं ही करे अथवा संकीर्ण दायरे के थोड़े से लोगों, कुटुम्बियों भर को करने दे तो यह नीति स्वार्थपरता ही कही जायगी, और उससे जो लाभ सोचा गया था, उसका मिलना तो दूर उल्टे अपना तथा अपने परिवार का अहित ही होगा।
कुटुम्बियों के लिए बहुत साधन-सामग्री जमा करके उससे उन्हें बैठे बिठाये आराम से दिन काटने की व्यवस्था बनाना बहुत ही गलत है। इस नीति से अपनी तथा अपने परिजनों की हानि ही होती है। निरन्तर श्रम द्वारा उपार्जन करने से बहती हुई नदी की तरह अर्थ शुद्धि रहती है। रुकी हुई पोखर का पानी सड़ जाता है। इसी प्रकार बिना श्रम के जिस किसी को भी धन मिलता है। वह उसका ठीक उपयोग न तो समझ सकता है और न कर सकता है। अमीरों के लड़के आम तौर से दुर्गुणी होते और तबाही में फँसते देखे गये हैं, कारण एक ही है कि उन्हें उत्तराधिकार में जो साधन सामग्री मिली—उसका वे न तो मूल्य समझ सके और न उसके सदुपयोग की बात वे जान पाये। बिना श्रम के प्राप्त धन का सदुपयोग आम तौर से किसी के लिए भी सम्भव नहीं होता।
आराम तलबी से और निष्क्रियता से बढ़कर अनैतिक बात और दूसरी कोई नहीं हो सकती। भले ही कानून में उसे दण्डनीय अपराध न माना गया हो, नियति की परंपराएं उसके पूर्णतया विरुद्ध हैं। ऐसे अपराधियों को प्रकृति का दण्ड भी बराबर मिलता रहता है। जो श्रम से जी चुराते हैं उनकी देह निकम्मी बन जाती है और नाना प्रकार के रोग आ घेरते हैं। मनुष्य का कर्तव्य है कि अपनी पीढ़ियों के लिए धन सम्पत्ति जमा करके न रखे। वरन् उनकी प्रतिभा और क्षमता को बढ़ाने में खर्च करे ताकि वे अपने भुज बल से आवश्यक आजीविका उपार्जित करते हुए उसके सदुपयोग का आनन्द ले सकें। जो कुछ हम कमायें उसका एक अंश समाज को समुन्नत बनाने के लिए सुनिश्चित रूप से निकालते रहें। खर्च का स्तर उतना रखें—जितना अपने देशवासियों का औसत स्तर है। जिस समाज में हम रहते हैं उसके औसत स्तर से बहुत अधिक ऊँचा, बहुत अधिक खर्चीला जीवन यापन करना निश्चित रूप से अनैतिक है। इसमें समाज के प्रति उपेक्षा निष्ठुरतापूर्ण मनोभाव छिपा हुआ है। इसकी प्रतिक्रियाएं बहुत ही बुरी होती हैं। चोर, डाकू, लुटेरे, हत्यारे, गुण्डे, दुराचारी व्यक्तियों की उत्पत्ति अमीरों के प्रति लोभ या द्वेष के कारण ही होती है। उतने आकर्षक ठाठ-बाठ देखकर कमजोर तबियत के आदमी मचल पड़ते हैं और जल्दी ही वैसी ऐयाशी के साधन प्राप्त करने के लिए अपराधी कार्य-पद्धति अपना लेते हैं। जिनसे ईर्ष्या, द्वेष, या रोष होता है वे उन्हें हानि पहुँचाने की बात सोचते हैं। इस प्रकार अमीरी का ठाटबाट बनाने वाला, समाज के सामान्य स्तर से बढ़ी-चढ़ी स्थिति बनाने वाला समाज में अनेक विक्षोभों और दुष्प्रवृत्तियों को जन्म देता रहता है।
स्वार्थ और लालच की संकीर्णताओं में पड़े हुए अमीरों और अध्यापकों का जीवन व्यतीत करते हुए वस्तुतः हम नियति की परम्पराओं को ही तोड़ते हैं। इससे सारे समाज की हानि होती है और अपना बहुमूल्य जीवन ओछेपन की बात सोचते और स्वार्थियों की रीति-नीति अपनाते हुए बर्बाद हो जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि नियति का विधान समझा जाय और स्वार्थ, संग्रह, लालच और विलासिता को अमानवीय, अनैतिक दुर्गुण मानते हुए उनका परित्याग किया जाय। अपनी क्षमता और प्रतिभा का समाज को अधिकाधिक लाभ देना—सौ हाथों से कमाने और हजार हाथों से देने की नीति अपनाना—यह बुद्धिमत्तापूर्ण दृष्टिकोण है। धन, समय, श्रम, शिक्षा, प्रतिभा आदि जो कुछ हमें प्राप्त है उसका उपयोग संकीर्ण दायरे में नहीं, वरन् मानव समाज को सुविकसित करने के लिए त्याग भावना की प्रवृत्ति को अक्षुण्य बनाये रखने के लिए ही किया जाना चाहिए। जो इस रीति-नीति को अपनाते हैं वे ही महापुरुष कहलाते हैं और उन्हीं का जीवन सफल कहे जाने लायक बनता है।
बालक नारायण के विवाह की तैयारी पूरी हो चुकी। पुरोहित ने धर्म-कृत्य के नियमानुसार पुकारा—’सावधान’। किशोर नारायण की प्रसुप्त चेतना सचमुच सावधान हो गई। उसका जीवन लक्ष्य पराधीनता के बन्धनों में बँधी हुई मातृभूमि को मुक्त करना था, यदि स्वयं विवाह बन्धन में बँध जायगा तो सारी शक्ति उसी जंजाल में खर्च हो जायगी, फिर अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए उसके पास क्षमता बच ही कहाँ से रहेगी? प्रश्न महत्वपूर्ण था। निर्णय का अन्तिम क्षण सामने खड़ा था। असावधानी और सावधानी में से एक स्थिति को चुनना था। नारायण ने ‘सावधानी’ को चुना। पुरोहित क्या जानता था कि कर्मकाण्ड के साधारण विधान के प्रयोजन की पूर्ति के लिए उच्चारण किया गया ‘सावधान’ शब्द वर की अन्तरात्मा तक जा पहुँचेगा और उसे सचमुच ही सावधान कर देगा।
नारायण क्षण भर चुप रहा उसने साहस पूर्वक अपना अन्तिम निर्णय कर डाला। सिर पर रक्खा हुआ सेहरा-मण्डप में ही पटक कर वह भाग खड़ा हुआ। यह गया—वह गया—लोग ढूँढ़ते ही रह गये पर वह आँखों से ओझल हुआ सो हुआ।
आत्म-चिन्तन करता हुआ नारायण एक देवालय में निवास करने लगा। यवन शासन में फैले अनाचार को मिटाकर धर्म संस्थापना की भावना आँखों में से आँसू बन कर उमड़ रही थी। वह यही सोचने में लगा रहता कि आखिर करे तो क्या करे? जो सन्त-महात्मा उधर रहते थे वे संसार को माया और मिथ्या बताकर दुनिया को अपने भाग्य पर मरने के लिए छोड़ने और आनन्द से भजन करने का उपदेश देते। पर ऐसी स्वार्थपरता उन्हें कहाँ पसन्द आती। बहुत दिनों विचारशील मनीषियों के साथ वे परामर्श करते रहे, अन्त में इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि आत्मबल बढ़ाने के लिए साधना और तपस्या का जीवन बिताते हुए उन्हें जन-कल्याण के लिए प्रबल प्रयत्नों में संलग्न होना चाहिये। लक्ष्य स्थिर होते ही उन्होंने संन्यास ले लिया क्योंकि लोक-सेवा में निरत परमार्थी लोगों के लिए वही जीवनक्रम उपयुक्त पड़ता है। जब उनका नाम नारायण से बदल कर रामदास हो गया।
उन दिनों अत्याचारी शासन की नृशंसता से जनता में त्राहि-त्राहि मची हुई थी। न्याय का नाम निशान न था। शासक जो चाहते वही प्रजा को मानना पड़ता। बहू-बेटियों का शील तक आँखों के आगे लुटते हुए देखना पड़ता। हिन्दू धर्म और संस्कृति को बुरी तरह कुचला जा रहा था। जनता हताश होकर प्रतिरोध की शक्ति खोती चली जा रही थी, देश के सामने जीवन-मरण की समस्या उत्पन्न हो रही थी। ऐसे समय में रामदास को साधना उपासना किस प्रकार की होनी चाहिये यह निर्णय करते देर न लगी। जब कि दूसरे संत, महात्माजन जीवन की दुर्दशा की ओर से आँख बन्द करके भजन, ध्यान में अपनी मुक्ति का प्रयोजन पूर्ण करने के लालच में लगे थे, रामदास ने दूसरा मार्ग चुना। अपनी आत्मा को अधिकाधिक बल सम्पन्न बनाने वाली तपश्चर्या करते हुए अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने के लिए जनता में साहस भरते हुए गाँव-गाँव घूमने लगे।
अभी पूरे बीस वर्ष के भी वे न हो पाये थे कि उन्होंने सारा महाराष्ट्र छान डाला और ऐसे युवकों का संगठन आरम्भ कर दिया जिनमें उनकी ही तरह देश धर्म के लिए दर्द था। यों हतोत्साह वातावरण में शौर्य और त्याग का साहस भी मन्द पड़ जाता है और लोग कायरता, भीरुता एवं दीनता से ग्रस्त होकर किसी प्रकार जीवित रहने में ही अपनी भलाई मानने लगते हैं। फिर भी मानवता के मूल गुण पूर्णतया कभी भी नष्ट नहीं होते। उस गये गुजरे जमाने में भी ऐसे भावनाशील नवयुवक मौजूद थे जो देश−धर्म के उद्धार के लिए कष्ट उठाने और त्याग करने का साहस कर सके। स्वामी रामदास ऐसे ही रत्नों को परखने और उन्हें संगठित करने के लिए महाराष्ट्र का कोना-कोना छानते रहे और अन्त में उनकी झोली तेजस्वी नर-रत्नों से भर ही गई।
नव-जीवन का प्राण फूँकने वाले इस तेजस्वी महापुरुष को लोग समर्थ गुरु की सम्भावनास्पद उपाधि के साथ विभूषित करने लगे। उन्हें समर्थ गुरु रामदास कहा जाने लगा। अनेक प्रतिभाशील युवक उनके साथ रहते और धर्म की रक्षा करने की योजनाएं बनाते। इन्हीं में एक मराठा युवक शिवाजी भी थे। समर्थ गुरु ने उनकी नस-नस में उत्साह भर दिया और वे योजनाबद्ध रूप से अत्याचारी शासकों के विरुद्ध अपने साथियों के साथ संघर्ष करने लगे। छत्रपति शिवाजी ने हिन्दू-धर्म की रक्षा के लिये उन भयावह परिस्थितियों में जो कुछ किया उसका मार्मिक शब्दों में उल्लेख करते हुए महाकवि भूषण ने कहा है—”शिवाजी न होते तो सुन्नत होती सब की।” ऐसे सहस्रों प्रख्यात और अप्रख्यात युवाओं का निर्माण समर्थ रामदास के सत्संगों द्वारा ही संभव हुआ।
उन्होंने सारे महाराष्ट्र में लगभग 800 मठ स्थापित किये, जिनमें उन धर्म-सैनिकों के निवास, एवं निर्वाह की व्यवस्था रहती। वहाँ भजन कीर्तन, पूजा, प्रवचन की व्यवस्था रहती, साथ ही मठों में रहने वाले टोलियाँ बना कर गाँवों में निकल जाते और भजन गाकर देश, धर्म, संस्कृति एवं समाज के प्रति जनता की कर्तव्य भावना जागृत करते। महाराष्ट्र की एक झोंपड़ी भी ऐसी न बची जिनमें इन 800 मठों में रहने वाले धर्म सैनिक नव युग का सन्देश सुनाने के लिए पहुँचे न हों। इस प्रकार उन्होंने उस बड़े प्रान्त को बड़े उत्तम ढंग से संगठित कर लिया। धीरे-धीरे महाराष्ट्र से बाहर भी यह प्रवाह फैला और अन्य प्रान्तों में भी लगभग चार-सौ ऐसे ही मठ स्थापित हो गये। आचार्य केशव नायक राव आदि कर्मठ विद्वान उनके साथ थे। इस मण्डली का निश्चित मत था कि जब तक जनता संगठित और अनुशासित न हो जायगी, अत्याचारों भरी पराधीनता से मुक्ति न मिलेगी। वे संगठन को जातीय जीवन का प्राण समझते और उसे एक धर्मानुष्ठान की तरह पूरा करने में संलग्न रहते।
समर्थ गुरु रामदास ने ‘दासबोध’ नामक एक मार्मिक काव्य-ग्रन्थ लिखा है, जिसमें 2741 छन्द चरण हैं। मानव-जीवन के प्रत्येक पहलू पर जितना सार गर्भित विवेचन इस ग्रंथ में हुआ है उतना भारतीय भाषाओं के और किसी काव्य ग्रंथ में नहीं हुआ। महाराष्ट्र में घर-घर में ‘दासबोध’ मिलेगा और उसके छन्द शिक्षित-अशिक्षित सभी की जिह्वा पर नाच रहे होंगे। कहते हैं कि इसके अतिरिक्त समर्थ ने लगभग 30 हजार अन्य कवितायें भी लिखी हैं जिनमें से कम ही इस समय उपलब्ध होती हैं।
भारतीय स्वाधीनता संग्राम में सन् 1847 से पूर्व और उसके पश्चात् जो लड़ाई लड़ी गई है वह स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है। इतना ओज और शौर्य, साहस और प्राण जन-मानस में भर देने का बहुत कुछ श्रेय समर्थ गुरु रामदास को है। ये युग-पुरुष थे, सच्चे महात्मा, सच्चे योगी थे। उनकी सचाई ने उन्हें सच्ची तपस्या करने की प्रेरणा दी। उपासना के द्वारा आत्मबल बढ़ाते हुए उसका लाभ जनता-जनार्दन के चरणों में, विश्व-मानव शोभायमान बनने में, अर्पण कर देना यही तो त्याग का सच्चा मर्म है। आध्यात्म की बकवास करने वाले यों गली कूचों के मक्खी मच्छरों की तरह हर जगह भरे पड़े हैं धर्म और ज्ञान की दुकानें भी हर बाजार में खुली पड़ी हैं पर जो अपने उज्ज्वल चरित्र और विवेकयुक्त विचारणा से जन-जीवन को उत्कृष्ट बनाने के लिये मर मिटें ऐसे आध्यात्मिक पुरुषों का प्रायः अभाव ही रहता है। समर्थ गुरु रामदास उसी अभाव की पूर्ति करने आये थे। भारत-माता के बन्धन काटने में इस महान् योगी का योगदान अनन्त काल तक भुलाया न जा सकेगा। पुरोहित ने विवाह के अवसर पर उन्हें सावधान किया था, वे जीवन भर भारतीय जनता को सावधान करते रहे। और यह सावधानी ही परिष्कृत होकर आज राजनैतिक स्वाधीनता के रूप में हमें मिली है। आगे के कर्तव्यों के लिए सावधान रहने पर ही उसका सदुपयोग हो सकना सम्भव है।
उपनिषद्कार ने कहा है “कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीबिषेच्छतं समा।” कर्म करते हुए हम सौ वर्ष जीने की इच्छा करें। आराम करते हुए सुख भोगते हुए, आनन्द मनाते हुए, सौ वर्ष जीने के लिए क्यों नहीं कहा उपनिषद् के ऋषि ने? इसीलिए कि श्रम के अभाव में आराम, आनन्द, यहाँ तक सौ वर्ष जीने का अधिकार भी छिन जाता है हम से। श्रम के साथ ही जीवन अपनी महानता और समृद्धियों के पर्दे खोलता है। जीवन की पूर्णता प्राप्त करनी है तो परिश्रम करना पड़ेगा।
स्वामी विवेकानन्द ने कहा है, ‘श्रम ही जीवन है जिस समाज में श्रम को महत्व नहीं मिलता वह जल्दी ही नष्ट हो जाता है।”
अमेरिका के धनकुबेर हेनरीफोर्ड ने लिखा है—”हमारा काम हमें जीने के साधन ही प्रदान नहीं करता वरन् स्वयं जीवन प्रदान करता है।”
पण्डित नेहरू ने अपनी आत्म-कथा में एक स्थान पर लिखा है—”काम के भार से ही मैं अपने शरीर और मस्तिष्क की स्फूर्ति तथा क्षमता कायम रख पाता हूँ।”
हमारा काम ही हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। जीवन में महान सम्भावनाओं के द्वार खोलता है। श्रम ही उन्नत जीवन और उज्ज्वल भविष्य का ठोस आधार है। बार्टन ने कहा है—”श्रम एक शक्तिशाली चुम्बक है जो श्रेष्ठताओं को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है।
श्रम ही आनन्द और प्रसन्नता का जनक है। डॉ0 विश्वैश्वरैया ने कहा है—”श्रम से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है और उससे सन्तोष एवं प्रसन्नता।” श्रम का अर्थ है आनन्द और अकर्मण्यता का अर्थ है—दुःख परेशानी। श्रमशील व्यक्ति ही अधिक सन्तुष्ट और आनन्दित रह सकता है। इसके विपरीत अकर्मण्यता मनुष्य को बुराइयों तथा नीरसता की ओर ले जाती है। प्रयोग के लिए किसी भी व्यक्ति को सुखी परिस्थितियों में अकर्मण्य रखा जाय तो वह जल्दी ही तरह-तरह की परेशानियाँ, असन्तोष अनुभव करने लगेगा। वह सुख भी उसे दुःखदायी बन जायगा। वह जल्दी ही ऊब जायगा। जो परिश्रम नहीं करते बेकार बैठे रहते हैं उनसे समय न कटने की शिकायत प्रायः सुनी जा सकती है। समय उनके लिए एक तरह का बोझ लगता है। लेकिन जो प्रतिक्षण व्यस्त रहते हैं उन्हें समय भार नहीं लगता। वे प्रतिक्षण नव-जीवन और नव-स्फूर्ति प्राप्त करते हैं।
प्रकृति का प्रत्येक तत्व, उसे सौंपे गये काम में लगा रहता है। उसका प्रत्येक पदार्थ गतिशील है। इस गतिशीलता में ही उनका जीवन है। जो रुक जाता है प्रकृति उसे नष्ट कर देती है। जो अपने दिए हुए काम को नहीं करता प्रकृति उसे जीवित भी नहीं रहने देती। यही कारण है कि अकर्मण्य व्यक्ति जिन्दगी के दिन बोझ की तरह काटता है। वह कई शारीरिक और मानसिक रोगों से ग्रस्त हो जाता है। चिन्ता, भय, घबराहट, द्वेष, कुढ़न, अनिद्रा, रक्तचाप, हृदयरोग, स्थूलता, कोष्ठबद्धता और अनेकों तरह के रोग आ घेरते हैं उसे। इतना ही नहीं काम के अभाव से मनुष्य की शक्तियाँ कुँठित हो जाती हैं। जीवन का विकास क्रम अवरुद्ध हो जाता है। अकर्मण्य जीवन बिताने से मनुष्य का मन भी असन्तुलित हो जाता है। वह किसी भी पहलू पर ठीक से सोच नहीं, सकता, न निर्णय कर सकता है। उसका स्वभाव झगड़ालू, चिड़चिड़ा, क्रोधी, लड़ाकू बन जाता है। असन्तोष और अधीरता बनी रहती है।
इसलिए ठीक तरह जीवित रहना है तो श्रम करना पड़ेगा। क्योंकि अकर्मण्यता मृत्यु का ही दूसरा नाम है। जीवित रहने के लिए, विकास की ओर अग्रसर होने के लिए, हमें कुछ न कुछ काम करते रहना होगा अन्यथा हम ऐसी वस्तु बन जायेंगे—जिसका प्रकृति के लिए कोई उपयोग नहीं रहता और वह हमें नष्ट होने के लिए मजबूर कर देगी। काम न करना प्रकृति के विरुद्ध विद्रोह है और जीवन का अपमान भी। जिसकी कीमत हमें नष्ट होकर ही चुकानी पड़ती है।
चिकित्सा शास्त्रियों के सामने यह एक विचित्र समस्या मौजूद है कि शरीर में रोग के अमुक कीटाणु न होने पर भी उस रोग से रोगी ग्रसित क्यों बना रहता है? कई बार ऐसे रोगी देखने को मिलते हैं जिनको समस्त परीक्षणों के उपरान्त भी किसी रोग से ग्रसित नहीं पाया गया। रोगी बहुत कष्ट पीड़ित होते हैं पर चिकित्सक यह समझ नहीं पाते कि वस्तुतः उन्हें क्या रोग है और उसकी क्या चिकित्सा की जाय?
कई बार ऐसे रोगी भी देखने में आते हैं जिनका आहार-विहार संयम-नियम सब कुछ ठीक होता है फिर भी उन्हें बीमारी ने घेरे रखा होता है। कई बार उत्तम से उत्तम चिकित्सा करने पर भी, यहाँ तक कि पीड़ित अंगों की शल्य-क्रिया करने पर भी कष्ट से छुटकारा नहीं होता। कितनी ही बार आपरेशन से पूर्व जिस अंग के खराब होने की कल्पना की गई थी वह फाड़-चीर करते समय बिल्कुल निर्दोष पाया गया है और डाक्टरों को अपनी भूल का पश्चाताप करना पड़ा है।
‘मैन्स प्रिजम्पशस ब्रेन’ नामक ग्रन्थ के प्रणेता डॉक्टर साइमन्स ने ऐसे सैकड़ों उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि ऐसे रोगी वस्तुतः मानसिक कारणों से रुग्ण होते हैं और उनकी चिकित्सा औषधि विज्ञान या शल्य क्रिया द्वारा संभव नहीं होती। उन पागलों या अर्ध विक्षिप्तों की बात छोड़ भी दें जिन्हें प्रत्यक्ष मानसिक रोगी कहा जा सकता है तो भी असंख्य रोगी ऐसे मिलेंगे जो अपनी किन्हीं अनुपयुक्त विचारणाओं एवं भावनाओं के फलस्वरूप शारीरिक दृष्टि से रोगी बने हैं और निरन्तर कष्ट सहते रहते हैं। उनका कष्ट निवारण तभी संभव है जब उनकी मानसिक व्यथाओं और द्विविधाओं का निराकरण हो सके।
रक्तचाप बढ़ने के संबंध में अब तक जितनी शोधें हुई हैं उनकी चर्चा करते हुए फ्राँसीसी मेडीकल ऐसोसिएशन के प्रधान डॉ. ब्लैवस्की ने लिखा है—इस रोग के तीन चौथाई पीड़ितों ने चिन्ताओं से ग्रसित रहकर अपने शरीर में इस व्यथा को आमन्त्रित किया होता है। मद्यपान एवं अनुपयुक्त रहन-सहन के कारण रक्तचाप से पीड़ित होने वालों की अपेक्षा चिन्ताग्रस्त कई गुने अधिक होते हैं। उन्होंने हृदय रोगों की चर्चा करते हुए लिखा है क्रोधी और ईर्ष्यालु स्वभाव के लोगों को बहुधा यह व्यथा आ दबोचती है। जिन्हें छोटी-छोटी बातों पर डर बहुत लगता है, तरह-तरह की आशंकाएं किया करते हैं और दुःखद भविष्य के बुरे चित्र मस्तिष्क में बनाया करते हैं उनकी रक्त वाहिनी नाड़ियाँ सकुच जाती हैं, खून गाढ़ा हो जाता है और उसमें बढ़ी हुई फुटकियाँ हृदय की धड़कन तथा अन्य बीमारियाँ पैदा करती हैं।
जो महिलाएं गर्भ धारण नहीं करना चाहतीं पर वे वैसी विपत्ति में फँस जाती हैं तो उनकी पश्चाताप भरी उद्विग्न मनोदशा जन्मने वाले बालक के शरीर और मस्तिष्क पर बहुत बुरा असर छोड़ती है, इतना ही नहीं वे महिलाएं रक्ताल्पता तथा बहुमूत्र की शिकार बनती हैं। शिकागो विश्वविद्यालय स्वास्थ्य अन्वेषण विभाग ने दाम्पत्ति विद्वेष के कारण जुकाम और गठिया का प्रकोप होना सिद्ध किया है। अन्वेषकों का कथन है कि ऐसे लोगों की मानसिक उलझन जब तक हल न होगी तब तक उत्तम से उत्तम चिकित्सा से भी उन्हें कुछ लाभ न पहुँचेगा। भीतर ही भीतर घुटने वाले, अपनी मन की व्यथा किसी से न कह सकने वाले लोगों को बहुधा दमा साँस फूलना, फेफड़ों की जलन, प्लूरिसी जैसी बीमारियाँ प्रकट होती देखी गई हैं।
औषधि चिकित्सा उन्हीं रोगों पर सफल होती है जो शारीरिक विकारों के कारण उत्पन्न हुए होते हैं। दवाओं के कितने ही रोगों पर असफल होने का एक बड़ा कारण यह है कि उन बीमारियों की जड़ मन में होती है। मन का विक्षोभ शरीर को प्रभावित करता है और जहाँ अवसर देखता है वहीं कोई रोग खड़ा कर देता है। गन्दगी को रोगों का बड़ा कारण माना जाता है और कहा जाता है जो स्वच्छता का ध्यान नहीं रखते थे अधिक बीमार पड़ते हैं पर यह मान्यता अब पुरानी हो चली है। नवीन शोधों ने यह सिद्ध किया है कि निश्चिंत और प्रसन्न चित्त रहने वाले लोग सबसे अधिक निरोग रहते हैं। निम्न स्तर के समाजों में सफाई का ध्यान नहीं रखा जाता, वहाँ गन्दगी भी बहुत रहती है और स्वास्थ्य के सर्वमान्य नियमों की भी वे लोग उपेक्षा करते रहते हैं फिर भी मानसिक उलझनों से बचे रहने के कारण वे उन लोगों से कहीं अच्छा स्वास्थ्य बनाये रहते हैं जो सफाई तो बहुत रखते हैं पर मनोविकारों से निरन्तर भावनात्मक उत्तेजना बनाये रखते हैं।
हालैण्ड के डॉ0 रेमाण्ड इलियन ने अपने 40 वर्षीय मनोविज्ञान अनुसंधानों का निष्कर्ष प्रकाशित करते हुए लिखा है—छल, कपट और दुराव का व्यवसाय करने वाले—बाहर से कुछ और भीतर से कुछ और बने रहने वाले मनुष्यों में दुहरे व्यक्तित्व पनपते हैं और वे दोनों परस्पर विरोधी होने के कारण निरन्तर संघर्ष करते हुए एक ऐसी विषाक्त मनोभूमि प्रस्तुत करते हैं जिससे कितने ही शारीरिक और मानसिक रोग उपज पड़े। एक कोट को एक समय में दो आदमी पहनने का प्रयत्न करें या एक म्यान में दो तलवारें ठूँसी जायें तो उन आवरणों में टूट-फूट होकर रहेगी। इसी प्रकार जो लोग बाहर से अपने को बहुत अच्छा दिखाने का प्रयत्न करते हैं और भीतर बहुत बुरे होते हैं वे अपने आरोग्य के लिए एक स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करते हैं। इससे यह अच्छा है कि वे जैसे भी कुछ हों भीतर बाहर से एक-सा रहने का प्रयत्न करें।
झूठ और कपट को नैतिक दृष्टि से पाप माना गया है और इससे ईश्वरीय दण्ड मिलने की बात कही गई है। शारीरिक दण्ड तो प्रत्यक्ष ही है। असत्यवादी एवं धोखेबाज लोग प्रपञ्च भरी धूर्तता से अपना ही अहित सबसे अधिक करते हैं। उनके भीतर जो अंतर्द्वंद्व चलता है वह मानसिक संस्थान को एक प्रकार से क्षत-विक्षत कर डालता है। फलस्वरूप का शरीर रोगी रहना आरम्भ हो जाता है।
इस शरीर पर मन का पूर्णतया अधिकार है। क्रोध शोक एवं हर्ष उल्लास में चेहरे की आकृति एवं शरीर की स्थिति बदलते हम बराबर देखते रहते हैं। कोई बड़ा मानसिक आघात लगने पर, पागल हो जाने या मर जाने पर की घटनाएं अक्सर घटित होती रहती हैं। क्रोध में उन्मत्त हुए व्यक्ति ऐसे नृशंस कार्य कर बैठते हैं जिससे उन्हें आजीवन पछताना पड़ता है। शोक में उद्विग्न हुए व्यक्ति आत्महत्या तक कर बैठते हैं। प्रसन्नता और प्रतिष्ठा मिलने पर दुर्बल एवं रुग्ण व्यक्तियों का स्वास्थ्य भी तेजी से सुधरने लगता है। मिथ्या भय से भी मनुष्य थर-थर काँपने लगता है और आपत्ति की सम्भावना का समाचार सुनते ही भूख, प्यास एवं नींद के विदा होते देर नहीं लगती। इन प्रत्यक्ष तथ्यों से हर कोई सहज ही यह जान सकता है कि मन की स्थिति का कितनी जल्दी और कितना गहरा प्रभाव पड़ता है।
ज्ञान तन्तुओं में प्रवाहित होने वाली विद्युत धारा का केन्द्र मस्तिष्क ही तो है। मन की जैसी स्थिति होती है उसी स्तर का यह विद्युत प्रवाह भी रोम-रोम में दौड़ता रहता है। रक्त के निर्मल और विषाक्त होने का स्वास्थ्य पर जैसा प्रभाव पड़ता है उससे भी अधिक परिणाम मस्तिष्क द्वारा ज्ञान तन्तुओं में प्रवाहित विद्युत धारा के गुण दोषों पर होता है। जो मस्तिष्क मनोविकारों के कारण उत्तेजित रहते हैं उनकी वह विकृति सारे शरीर में फैलती है और विविध रोगों का सृजन करती है। शान्त मन एकाग्र चित्त, नियमित विचारों का अभ्यास करके योगीजन जो आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त करते हैं उसमें अशान्ति जन्य अपव्यय रोक कर शान्ति के कारण सुविकसित बनी हुई मानसिक स्थिति का सदुपयोग ही प्रधान आधार होता है। मन को निर्मल करने से आध्यात्मिक प्रगति तो होती है साथ ही मानसिक विकृतिजन्य अधिकाँश रोगों के निराकरण और सुदृढ़ स्वास्थ्य का वरदान भी मिलता है। मनोविकारों से बचे रहना स्वास्थ्य की सुरक्षा का सर्वोपरि आधार माना जा सकता है।
लुकमान का कथन है कि “आदमी में कोई रोग नहीं होता, हाँ रोगी आदमी अवश्य देखे जाते हैं।” आहार-विहार के सुधार द्वारा स्वास्थ्य ठीक होता है। पौष्टिक और बलवर्धक पदार्थ शरीर को पुष्ट करते हैं। इतना जानना ही पर्याप्त नहीं, हमें यह भी जानना चाहिए कि मन को शान्त निश्चिन्त, निर्मल और प्रसन्न रखने से स्वास्थ्य की तीन चौथाई समस्या हल हो सकती है। जिसका मन निरोग होगा शरीर उसी का निरोग रहेगा।
गत महायुद्ध से संत्रस्त असंख्यों शरणार्थी बेल्जियम के विभिन्न भागों में फैले पड़े थे। इनकी निर्वाह व्यवस्था बड़ी दयनीय थी। युद्ध के राक्षस ने जिन परिवारों के कमाऊ लोगों को छीन लिया था, जिनके घर, खेत उजड़ गये थे, जिन्हें अपना वतन छोड़ कर अन्यत्र चले जाने को विवश होना पड़ा था उन्हें नये स्थान में जाकर साधारण जीवन क्रम जमाने में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा था।
मानव की यह दयनीय दुर्दशा फादर जार्जेज पियरे से न देखी गई। वे सच्चे पादरी हैं। प्रभु ईशु की भक्ति का सर्वोत्तम मार्ग उन्हें यही लगा कि जिस प्रकार लोक-मंडल के लिए ईसा ने क्रूस को चूमते हुए अपना बलिदान दे दिया। उसी प्रकार उनके अनुयायियों को भी दुःखियों की सहायता के लिए भी कुछ करते ही रहना चाहिए। अपनी आँखों के सामने उपस्थित विस्थापितों की समस्या को वे आँखें बन्द करके उपेक्षा भाव से देखते न रह सके वरन् उनने उसे सुलझाने के लिए जो संभव हो सो करने के लिए प्रयत्न आरम्भ कर दिया।
आरम्भ में उन्होंने असहाय और अशक्तों के लिए एक शरणार्थी शिविर खोल कर उनकी सहायता आरम्भ की। ऐसे ही अपंग लोगों को जब पता चला तो वे दूर-दूर से चल कर पियरे के कैम्प में आ पहुँचे। भरती करने से इनकार करना उनसे न बन पड़ा। फल-स्वरूप तीन नगरों में बड़े-बड़े शिविर उन्हें खोलने पड़े और उनका भारी व्यय भिक्षा द्वारा बड़ी कठिनाई से जुटाना संभव हो सका।
फादर निराश नहीं हुए वरन् उन्होंने दूने उत्साह से मानवता की सेवा का काम करना आरम्भ कर दिया। विस्थापितों के लिए अन्न, वस्त्र ही नहीं, प्रेम, शिक्षा, चिकित्सा, निवास और रोजी का प्रबन्ध करने के लिए उन्होंने अधिक प्रयत्न आरम्भ किया और दूसरे उदारमना लोगों की सहायता से लाखों मनुष्यों की समस्याओं को खूबी के साथ सुलझाया। इस प्रकार के अनेकों शिविर उन्हें विभिन्न उद्देश्यों के लिए खोलने पड़े थे। अब वे शिविर ग्राम और नगरों के रूप में परिणत हो गये हैं और उनमें रहने वाले स्वावलंबी जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
असहायों की सहायता करना, संत्रस्तों को गले लगा कर सच्ची मानवता का परिचय देना इस सच्चे पादरी का दैनिक धर्म कृत्य बन गया। युद्ध के दुष्परिणामों से जन-साधारण को सचेत करने के लिए इस महामानव ने अपने देश के ग्राम-ग्राम में जाकर शान्ति और प्रेम का संदेश सुनाया। इस संदर्भ में उन्होंने प्रायः साढ़े तीन लाख मील की यात्रा की है और वह अभी भी जारी है। ये चाहते हैं लोग द्वेष एवं युद्ध की भाषा में सोचना छोड़ें और प्रेम सहानुभूति का अवलंबन करते हुए शान्ति के साथ जियें और जीने दें।
सन् 1958 में उनके सत् प्रयत्न के लिए “नोबेल शान्ति पुरस्कार” मिला। इस समाचार को सुनकर जार्जेज पियरे के छोटे से गाँव ‘हुइ’ में हजारों नागरिक बधाई देने पहुँचे तो उसने आँखों में आँसू भर कर कहा—एक ईमानदार मनुष्य को पीड़ित मानवता की सेवा के लिए बहुत कुछ करना चाहिए—एक सच्चे पादरी के लिए लोक सेवा ही ईश्वर भक्ति हो सकती है। मैंने तो अभी इस दिशा में थोड़े से कदम ही उठा पाये हैं। मैं कब इतने बड़े सम्मान का अधिकारी था, जिन लोगों ने ऐसा निर्णय किया यह तो उनकी उदारता मात्र है। आप मेरा नहीं, उन्हीं का अभिनन्दन करें।
यह सारी सृष्टि एक दैवी अनुशासन पर चलती है। जिस प्रकार सूर्य, चन्द्र, आकाश, समुद्र, पर्वत और हमारे चतुर्दिक् नक्षत्रगण एक अनुशासन पर चल कर अपनी-अपनी मर्यादा पर कायम रहते हैं, वैसे ही मनुष्य को भी अपने चतुर्दिक् के सभी कामों में अनुशासन का पालन अचूक और नियमित रूप से करना चाहिए।
—महात्मा गाँधी
मित्रता मानव हृदय की एक स्वाभाविक वृत्ति है। प्रत्येक व्यक्ति ऐसे साथी की खोज में रहता है जिसके समक्ष वह अपने हृदय को खोल कर रख सके। अपने अंतर में छिपे हुए भावों को निःशंक हो कर व्यक्त कर सके। जो कष्ट मुसीबत के समय हार्दिक सहयोग दे सके। मित्रता का संबंध मनुष्य के लिए वह वातावरण पैदा करता है जहाँ वह अपने आन्तरिक और बाह्य जीवन की अभिव्यक्ति सरलता से कर सके, जहाँ मनुष्य अपने आपको अकेला महसूस नहीं करता। मित्रों के सहयोग से मनुष्य की जीवन यात्रा सहज सरल और निरापद हो जाती है। प्रसिद्ध दार्शनिक सिसरो ने लिखा है—”इस संसार में मित्रता से अधिक कुछ भी मूल्यवान नहीं है मनुष्य के लिए।” महात्मा गाँधी के शब्दों में “सच्चे मित्र मिल जाना मनुष्य के लिए दैवी वरदान है।”
मित्रता जितनी बहुमूल्य है उतना ही इसे पैदा करना, स्थिर रखना और जीवित रखना, सदा-सदा कायम-रखना भी कठिन है। मित्रता भी एक व्यवहारिक साधना है। मित्रता हृदय के निर्बाध आदान-प्रदान पर टिकती है। मैत्रीपूर्ण संबंध एक परिवार के सदस्यों में भी नहीं हो सकते हैं और हो अनजान व्यक्तियों में दो सकते हैं।
मित्रता दो व्यक्तियों के बीच स्नेह, सौजन्य के आदान प्रदान और आन्तरिक ऐक्य पर निर्भर करती है। मित्रता का और कोई मूल्य नहीं हो सकता वह परस्पर स्नेह, प्रेम, सद्भाव पर निर्भर करती है। कोई स्वार्थ साधन या व्यापार नहीं है मैत्री। स्वार्थ पूर्ति के लिए, अपना उल्लू सीधा करने या कोई लाभ के लिए मैत्री जोड़ने वाले ढेरों मिल जाते हैं लेकिन सच्चे मित्र इस दुनिया में बिरले भाग्यशालियों को ही मिल पाते हैं।
मित्र जीवन में साथी ही नहीं मार्गदर्शक सहायक भी होता है इसलिए मैत्री स्थापित करने के लिए मनस्वी, सदाचारी, सद्गुणी व्यक्ति ढूँढ़ना चाहिए। बुरे मित्र मनुष्य को पतित भी कर सकते हैं। इसीलिए कन्फ्यूशियस ने कहा है—”ऐसे मनुष्य से मित्रता न करो जो तुमसे श्रेष्ठ न हो।” भले और सज्जन व्यक्तियों से की गई मित्रता ही स्थिर और हितकारी सिद्ध होती है। सिसरो ने कहा है—”केवल सज्जनों में ही मित्रता कायम रह सकती है। दुष्ट और असाधु प्रकृति के व्यक्तियों की मित्रता कभी भी हितकर नहीं होगी। पञ्चतन्त्र में कहा गया है—
“आरम्भगर्थी क्षयिणी क्रमेण लब्धी पुरा वृद्धिमती च पञ्चान्। दि स्य पूर्वार्ध परार्ध भिन्ना छायेव मैत्री अल प्रज्जनात्॥”
“दुष्ट की मित्रता सूर्य उदय के पीछे की छाया के सदृश्य पहले तो लंबी चौड़ी होती है फिर क्रम से घटती जाती है और सज्जनों की मित्रता तीसरे पहर की छाया के सदृश्य पहले छोटी और फिर क्रमशः बढ़ती जाती है।
स्थायी और फलदायी मित्रता सज्जनों और भले आदमियों के बीच ही स्थिर रहती है। दुष्टों की मित्रता क्षणिक अस्थायी और बनावटी होती है।
मित्रता को स्थिर और दृढ़ रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है सहिष्णुता और उदारता की। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ कमी रहती ही है। पूर्ण निर्दोष और गुण संपन्न व्यक्ति कोई नहीं होता। आपने जिनसे मित्रता की है वे अपवाद स्वरूप कैसे हो सकते हैं। मित्रता को स्थिर रखने के लिए एक दूसरे के व्यक्तिगत, स्वाभाविक दोषों को गौण समझना पड़ेगा। अन्यथा दोष दर्शन और उससे प्रेरित छींटाकशी, आरोप-प्रत्यारोप से तो मित्रता की मूर्ति ही टूट-फूट जायगी।
मित्रता के संबंध में दूसरी महत्वपूर्ण बात है—एक दूसरे के मतभेदों को मैत्री संबन्धों के बीच दरार उत्पन्न नहीं करने दी जाय। समस्त विश्व और मानव प्रकृति अनन्त रहस्यों से भरी पड़ी है। प्रत्येक व्यक्ति के अपने विश्वास होते हैं, अपना-अपना दृष्टिकोण। दो व्यक्तियों में चाहे वे कितने ही अभिन्न हों किसी भी विषय पर मतभेद हो सकता है। इस तरह के व्यक्तिगत मतभेदों को मित्रता के प्रसंगों से दूर रखना चाहिए अपनी ही सीमा तक। अन्यथा वर्षों से चली आई मित्रता क्षण भर में नष्ट हो जाती है। ऐसे प्रसंगों को आने ही न दिया जाय जिससे मतभेदों को प्रोत्साहन मिले व्यर्थ की बहस छिड़े।
मित्रता को स्थिर रखने का महत्वपूर्ण आधार है मित्र के सद्गुणों की खोज करना। उन्हें प्रोत्साहन देना। एक दूसरे के सद्गुणों को ढूँढ़ना, उनकी प्रशंसा करना ऐसा गुण है जिससे दूसरों का विश्वास प्राप्त होता है। सबसे अधिक और व्यापक रूप से लोकप्रियता प्राप्त करने वाले वे ही व्यक्ति होते हैं जो दूसरों में अच्छी बातें देखते और उन्हें प्रोत्साहन देने की कला जानते हैं। इससे न केवल मित्रता ही जीवित रहती है वरन् मनुष्य को जीवन में उन्नति पथ पर आगे बढ़ने में भी सहायता मिलती है। मनुष्य दूसरों का समर्थन, प्रशंसा पाकर उत्साहित होता है। उसमें आत्मविश्वास पैदा होता है। प्रत्येक व्यक्ति में कुछ न कुछ ऐसी विशेषता होती है, ऐसा गुण होता है जिसे बढ़ाकर वह सामान्य से असामान्य बन सकता है। कई बार वह स्वयं अपनी इन शक्तियों के बारे में अनभिज्ञ रहता है। यदि कोई इसे पहचान कर प्रोत्साहित करे तो यह उसके विकास में बड़ी सहायता होगी। मित्र का कर्तव्य है कि वह अपने साथी के गुणों को प्रोत्साहन दे, उनकी सराहना करे।
मैत्री संबंधों में परस्पर का व्यवहार, बर्ताव इतना खुला हुआ होना चाहिए कि किसी को भी एक दूसरे पर सन्देह शंका न हो सके। किन्हीं विशेष व्यक्तिगत बातों, जीवन के रहस्यों को गुप्त रख कर व्यवहार जितना खुला और उदार होगा उतना ही मित्रता को बल मिलेगा। परस्पर संशय उत्पन्न करने वाले, मतभेद करा देने वाले बर्ताव को छोड़ा जाय। कदाचित् किसी भूल या गलतफहमी से कोई संशय शंका पैदा हो भी जाय तो उसे जल्दी ही मिलकर अपना मन्तव्य बताकर दूर कर देना चाहिए। मित्रता के संबंधों में मन चाहे व्यवहार की गुंजाइश नहीं है। ऐसी स्थिति में तो सदाचार, शिष्टाचार का और भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। ऐसा व्यवहार मित्रता के लिए घातक है जो किसी को बुरा लगे। मैत्री संबंधों के लिए अनादर, उद्दण्डता, लापरवाही का व्यवहार, मर्मभेदी वचन वर्जित हैं।
यद्यपि मैत्री संबंध को दृढ़ और स्थायी बनाने के लिए हृदय का निर्बाध आदान-प्रदान, परस्पर आन्तरिक ऐक्य होना आवश्यक है। किसी तरह का दुराव, छिपाव भी न होना चाहिए मैत्री के लिए। किन्तु यह मित्रता की उत्कृष्ट स्थिति के लक्षण हैं। जब मैत्री संबंध स्थायी और परिपक्व हो जाते हैं, एक दूसरे का पूरा-पूरा भरोसा और विश्वास अर्जित कर लिया जाय तभी अपने भेद मित्र के समक्ष खोलने चाहिएं अन्यथा मित्रता के नाम पर धोखेबाजी, चालाकी का शिकार होना पड़ेगा। वस्तुतः दुष्ट, दुराचारी, ठग और विश्वासघाती अक्सर प्रत्यक्ष में मित्र बन कर ही आते हैं, मित्रता के नाम पर होने वाली धोखेबाजी, बेईमानी, धूर्तता के शिकार होकर बहुत से सीधे-सादे व्यक्ति अक्सर हानि ही उठाते हैं। इसलिए मित्र को परखने, समझने के लिए काफी धैर्य से काम लेना चाहिए। अचानक किसी को भावुकता में आकर मित्र मान लेना, उससे अपने सारे भेद खोल देना, खतरे से खाली नहीं होता। अक्सर दुष्ट लोग मित्र बनकर ही अपना दूषित मन्तव्य पूरा करते हैं।
यदि आपने अपने मित्र या उसके किसी संबंधी आदि के बारे में कोई बुरी बात निन्दा आदि भी सुनी है तो उसे तत्काल भोंड़े ढंग से प्रकट मत कीजिए। स्मरण रहे बुरे व्यक्ति भी अपनी बुराइयों के बारे में सुनना पसन्द नहीं करते। यदि उपयुक्त परिस्थिति हो तो एकान्त में अपने मित्र से उसकी चर्चा कर देनी चाहिए कि उसको (स्वयं) इन बातों में कोई महत्व नहीं मालूम पड़ता। मित्र की गुप्त बातों को कभी भी दूसरों के समक्ष प्रकट न कीजिए। यह मित्रता के लिए बहुत ही घातक है।
ऐसे कार्य और व्यवहार से सर्वथा बचना चाहिए जिनसे मित्र की भावनाओं को आघात लगे या उसे मजबूरी का सामना करना पड़े। चाणक्य ने लिखा है—
“इच्छेच्चेद विपुलाँ मैत्री त्रीणि तत्रन कारयेत।
वाग्वादमर्थ संबंध तत्पत्नी परिभाषणम्॥”
“मित्र से बहस करना, उधार लेना-देना, उसकी स्त्री से बात-चीत करना छोड़ देना चाहिए। ये तीनों बातें मित्रता में बिगाड़ पैदा कर देती हैं।” मित्र के काम के समय और व्यस्तता को ध्यान में न रखकर उसका समय बरबाद करना, घर आने पर उसको कोई महत्व न देना, बिना मतलब किसी भरोसे में रखना, व्यवहार में उपेक्षा रखना आदि ऐसी छोटी-छोटी बातें हैं जो मित्रता के लिए घातक सिद्ध हो सकती हैं।
साँसारिक कार्य, व्यवहार, जीवन क्रम में मित्रता का एक शरीर में दो हाथों का-सा संबंध होता है। मित्र की आड़े समय पर सब तरह की सहायता करना, उसे मुसीबत में सान्त्वना और धीरज देना, मित्र की खुशी और रंज में साथ-साथ रहना मित्र के लिए आवश्यक है। मित्रता दो व्यक्तियों का हार्दिक संगम है। उनका आन्तरिक जीवन अत्यन्त नजदीक होता है तो उससे प्रेरित बाह्य जीवन भी। “किसी भी व्यक्ति की मित्रता पूर्ण नहीं होती जब तक कि वह अपने मित्र की अनुपस्थिति, गरीबी और आपत्ति में सहायता नहीं करता एवं मृत्यु के उपरान्त भी उसके अधिकारों की रक्षा नहीं करता।”
हमें अच्छे मित्र ढूँढ़ने चाहिए। उनसे मैत्री संबन्धों को स्थायी और स्थिर बनाने के लिए पूरा-पूरा प्रयास करना चाहिए। सच्चे और आत्मीय मित्रों का पाना वास्तव में सच्ची सम्पत्ति है।
आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व बंगाल के हुगली जिले में राजा राममोहनराय उन दिनों पैदा हुए थे जब कि हिन्दू-धर्म पर अज्ञान का अंधकार अपने प्रबल प्रकोप के साथ छाया हुआ था। देर से कोई सुधारक जन्मा न था और विकृतियों ने अविवेकपूर्ण रूढ़ियों के रूप में जनमानस को बुरी तरह आच्छादित कर रखा था। भारतीय सभ्यता के उच्च आदर्श केवल पुस्तकों में लिखने-पड़ने भर की चीज रह गये थे, व्यवहार में अनुपयुक्त अंधपरंपराएं ही धर्म का रूप बनाये बैठी थीं।
अंग्रेजी शासन की जड़ जम चुकी थी। राज्य-आश्रय पाकर ईसाई धर्म तेजी से फैल रहा था। मुसलमानी धर्म भी शताब्दियों से शासकों की छाया में पनप रहा था। इन धर्मों में बुद्धिवादी और प्रतिभाशील लोग पर्याप्त संख्या में मौजूद थे जो अपने धर्मों की विशेषता बताने और हिन्दू मान्यताओं का मखौल उड़ाने में कुछ कमी न रखते। इस प्रचार से प्रभावित हो कर शिक्षित युवक तेजी से विधर्मी बनते चले जा रहे थे। विचारशील लोग अपने धर्म को छोड़ते जा रहे थे, केवल कट्टरपन्थियों पर ही उसका आधार स्थिर रह रहा था।
अरबी, संस्कृत और अंग्रेजी का अध्ययन पूरा कर राजा राममोहनराय ने हिन्दू धर्म-शास्त्रों का गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया और भारतीय संस्कृति के प्राचीन आदर्शों को अत्यन्त प्रेरणाप्रद एवं प्रगतिशील पाया, पर साथ ही यह भी देखा कि उन दिनों चौका, चूल्हा, छूत-छात, भाग्यवान, मन्दिरों में होने वाले अनाचार और अपव्यय जैसी संकीर्णताएं जो धर्म का प्रधान अंग समझी जाती थीं, उनके लिए प्राचीन धर्म-शास्त्र में कोई स्थान नहीं है। इनके समर्थन में तो तत्कालीन संस्कृत के पण्डितों ने कुछ श्लोक गढ़कर प्राचीन ग्रन्थों में मिला देने की धृष्टता मात्र की है। जैसे-जैसे वे इस संबंध में अधिक विचार करते गये उन्हें यह ही निश्चय होता गया कि प्राचीन आदर्शों पर चलने से भी अपने समाज का कल्याण हो सकता है। वर्तमान रूढ़ियां तो हर दृष्टि से अहित ही करती चली जायेंगी, इसलिए उन को बदलना और सुधारना आवश्यक है।
राजा राममोहनराय को हिन्दू-धर्म से लगाव प्रेम था, वे उसे विचारशील लोगों की दृष्टि में सशक्त, प्रबुद्ध, आदर्श और आकर्षक रूप में प्रस्तुत करना चाहते थे और जिन अनुपयुक्त रूढ़ियों के कारण अपना उपहास होता था उन्हें अशास्त्रीय और अनावश्यक समझ कर हटाना चाहते थे। वे जानते थे कि विचारशील नई पीढ़ी को हिन्दू-धर्म की महत्ता का प्रतिपादन करके ही विधर्मी होने से बचाया जा सकता है। उन्हें लगा कि विधर्मी आक्रमणकारी हिन्दूधर्म को भले ही मिटा न सके हों, पर उसकी मूर्खतापूर्ण रूढ़ियां उसे बर्बाद करके ही छोड़ेंगी, इसलिए उन्हें सुधारने और प्राचीन आदर्शों के अनुरूप हिन्दू-धर्म को बनाने के लिए प्रबल प्रयत्न किये जाने चाहिए। इस निष्कर्ष पर पहुँच कर राजा राममोहन ने एक समाज सुधारक के रूप में काम करना आरम्भ कर दिया।
मन्दिरों में होने वाली अपार धन राशि का अपव्यय, अलग-अलग मन्दिरों में अलग-अलग प्रकृति के देवता, मनौती मानने पर बुरे काम में भी देवता से सहायता पाने की मान्यता, पशुबलि जैसी नृशंसता, देव दासी प्रथा के नाम पर मन्दिरों में वेश्यावृत्ति, पुजारियों का अहंकार और शोषण उन्हें तनिक भी पसन्द न आया। वे आस्तिक थे, भगवान को मानते थे और उसकी उपासना की उपयोगिता भी स्वीकार करते थे पर यह नहीं मानते थे कि—उसे पूजा, प्रलोभन देकर अनुचित कार्यों में सहायता करने के लिए भी राजी किया जा सकता है। अपने विचारों को उनने तत्कालीन समाचार-पत्रों में छपाया और भाषण भी दिये। फलस्वरूप रूढ़िवादी लोग उनके विरुद्ध हो गये। इन विरोधियों में एक उनके पिता भी थे। जिन की नाराजगी के कारण युवक राममोहनराय को घर छोड़ कर भागना पड़ा।
हिन्दू-धर्म में प्रचलित संकीर्णता को देखकर उन्हें बड़ा दुःख हुआ। वे बौद्ध-धर्म की ओर आकर्षित हुए और उसका अध्ययन करने तिब्बत चले गये। वहाँ भी उन्होंने लामाओं को ईश्वर के समान अपनी पूजा कराते देखा तो बड़े खिन्न हुए। उन्हें बुद्धिवादी—बौद्धधर्म—से बड़ी आशा थी। पर स्वार्थपरता और संकीर्णता का वहाँ भी बोलबाला देखा तो निराश होकर वहाँ से भी लौट पड़े। मनुष्य अपने को ईश्वर बताये यह धृष्टता उन्हें सहन न हुई और खुले रूप में इसका विरोध करने लगे। लामाओं को यह पता चला तो वे उनकी जान के ग्राहक बन गये। बड़ी कठिनाई से एक उदार तिब्बती महिला की सहायता से वे निकल भागने में समर्थ हुए और वापिस भारत आ गये।
पिताजी की मृत्यु के बाद वे घर पर ही रहने लगे और शास्त्रों के अध्ययन में अधिक समय लगाने लगे। इसी बीच उनके बड़े भाई की मृत्यु हो गई। परिवार के लोगों ने उसकी भोली स्त्री को आदेश दिलाकर सती होने के लिए राजी कर लिया। बेचारी डरते-डरते पति की लाश के साथ चिता पर बैठी पर जैसे ही आग जलने लगी वह मर्मान्तक पीड़ा से व्याकुल होकर चिता से उठ भागी। कुटुम्बी लोगों ने बाँस मार-मार कर उसे पुनः चिता में झोंक दिया। कोई उसकी चीत्कार सुन न सके, इसलिए जोरों से बाजे बजने का प्रबन्ध कर दिया। इस घटना को जब राममोहनराय ने देखा तो उनकी आँखों में खून बरसने लगा। उन दिनों बंगाल में सती-प्रथा का बहुत जोर था। विधवाओं का निर्वाह भार सहन न करना पड़े और उसके पति की सम्पत्ति को हड़पने का अवसर मिल जाय इस लालच में लोग बेचारी शोकाकुल विधवा को सती होने का उपदेश देते थे जलने में कोई कष्ट न होने का बहकावा देते थे, कमजोरी दिखाने पर कटु-वचन कहते थे और स्वीकृति न सही चुप हो जाने पर भी स्वीकृति की योजना करके सती करने की तैयारी करा देते थे। अपने वंश की नामवरी भी उन्हें उसी में दीखती थी। मरने के पूर्व विधवा को नशीली चीजें खिला देते थे ताकि वह जलते समय कुछ बोल न सके। मंध के नाम पर चलने वाली इस नृशंसता के संबंध में राजा राममोहनराय ने पूरी खोज-बीन की और बेचारी विधवाओं को किस प्रकार सती होने के लिए उद्यत किया जाता है इस क्रूरता के पीछे छिपे रहस्यों का ऐसा खोजपूर्ण एवं दिल दहला देने वाला चित्रण पुस्तक रूप में प्रकाशित कराया कि पढ़ने वाले के पत्थर हृदय को भी पसीजना पड़ा।
सती प्रथा के विरुद्ध उन्होंने घनघोर आन्दोलन किया रूढ़िवादियों ने उनका फिर विरोध किया पर वे अपने कार्य में लगे ही रहे। जन-मत उनके पक्ष में हुआ और प्रजा के गण्यमान्य लोगों ने सरकार से माँग की कि इस नृशंसता के विरुद्ध कानून बनाया जाय। अंग्रेजी सरकार मान गई और कानून बना कर सती प्रथा को रोक दिया गया। इस प्रकार इस महान समाज-सुधारक की एक बड़ी आकाँक्षा पूरी हुई। उस कानून से जिन सहस्रों विधवाओं को जीवित जला डालने के षडयंत्र से प्राण मिला उनकी आत्माएं इस महान सुधारक की कितनी उपकृत हुईं यह कहने की आवश्यकता नहीं।
विधवाओं की दुर्दशा का दृश्य उनकी आँखों के सामने घूमता तो एक सहृदय व्यक्ति की भाँति वे फूट-फूट कर रोने लगते। उनने विधवा विवाह की आवश्यकता प्रतिपादित की और इसे प्राचीन परम्पराओं और शास्त्र-मर्यादा के अनुकूल सिद्ध करने के लिए ‘विधवा विवाह मीमाँसा’ नामक एक ग्रन्थ प्रकाशित कराया जिससे लोगों की आँखें खुलीं, और जाना कि यदि किसी विधवा का पुनर्विवाह कर दिया जाता है तो उसमें धर्म या शास्त्र का तनिक भी उल्लंघन नहीं होता। पुरातन पंथी लोग हर नई बात को अधर्म मानने की तरह इन विचारों का भी विरोध करते रहे पर विचारशील लोगों का समर्थन दिन-दिन बढ़ता ही चला गया। अविवेकपूर्ण बातों का विरोध करने वाले लोगों को अन्ततः परास्त ही होना पड़ता है फिर वे भले ही बहुसंख्य क्यों न हों। अकेले राजा राममोहनराय का प्रतिपादन धीरे-धीरे जनता द्वारा एक तथ्य और औचित्य के रूप में स्वीकार किया जाने लगा और विधवाओं के मार्ग से एक बड़ी कठिनाई किसी हद तक दूर हो सकी।
नर और नारी को एक स्तर पर लाने और उनके कर्तव्य एवं अधिकार समान घोषित करने की दिशा में राजा साहब ने जो कार्य किया उससे हिन्दु-धर्म की श्रेष्ठता बढ़ी और इस प्रकार मानवता की एक बड़ी सेवा उनके द्वारा बन पड़ी।
वे हिन्दू धर्म के यथार्थ स्वरूप से नव-युवकों को परिचित कराना चाहते थे इसलिए उन्होंने हिन्दू कालेज की नींव डाली। हिन्दू विश्व विद्यालय के संस्थापक महामना मालवीयजी की तरह राजा राममोहनराय भी यही चाहते थे कि हमारी प्रबुद्ध नई पीढ़ी हिन्दू संस्कृति की महानताओं और विशेषताओं से परिचित होकर अपने आचरणों द्वारा इस उत्कृष्ट आदर्शवाद को विश्व मानव की प्रगति का सर्वश्रेष्ठ माध्यम सिद्ध करे। हिन्दू कालेज उन्होंने इसी उद्देश्य से स्थापित किया और बड़ी लगन से उसे चलाया भी। उन दिनों ईसाई शिक्षा संस्थाओं का जाल फैल रहा था उनके मुकाबले में यह प्रयास दुस्साहसपूर्ण ही था। इस प्रयास को सफल बनाने के लिए उन्हें बाधाओं से निरन्तर संघर्ष करते रहना पड़ा।
समाज सुधार आन्दोलन को गतिशील बनाने के लिए उन्होंने ‘संवाद कौमुदी’ और ‘मीरत अल अखबार’ नामक दो साप्ताहिक पत्र चलाये। उन दिनों सरकार प्रेस प्रतिबन्ध बहुत कड़े थे। कोई व्यक्ति सरकार की मर्जी के विरुद्ध कुछ छाप नहीं सकता था। इन नियन्त्रणों के विरुद्ध राजा साहब ने बहुत आन्दोलन किया और प्रतिबन्धों को शिथिल कराया।
हिन्दू धर्म से सच्चा प्यार करने वाले, राजा साहब इस महान् संस्कृति को उसके वास्तविक रूप में परिष्कृत करने के लिए अथक परिश्रम करते रहे। उनके प्रयासों से हिन्दू धर्म पर से डगमगाती हुई नई पीढ़ी की आस्था पुनः जमी और बुद्धिजीवी वर्ग विधर्मी संस्कृति के चंगुल में फँसने से बच गया। इसका बहुत कुछ श्रेय उस महान् सुधारक को दिया जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
काँग्रेस के सुप्रसिद्ध नेता और बंबई हाई कोर्ट के जज न्यायमूर्ति महादेव गोविन्द रानाडे को बंगला भाषा सीखनी थी । समय का अभाव और अध्यापक ढूँढ़ने की कठिनाई से बचने के लिए उन्होंने एक बंगाली भाषी नाई से हजामत बनाने के लिए नित्य की व्यवस्था कर ली। वह जितनी देर में हजामत बनाता उतनी देर में उससे बंगला सीखते रहते। इस प्रकार उनकी शिक्षण व्यवस्था चलने लगी।
एक दिन उनकी धर्मपत्नी ने यह देखा तो कहा—इसे कोई और सुनेगा और देखेगा तो आपका सम्मान घटेगा। भला अनपढ़ नाई से आप जज होकर इस प्रकार पढ़ें, वह भी कोई सम्मान की बात है।
रानाडे ने हँसते हुए कहा—दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाये थे जिनमें कीड़े-मकोड़े और पशु-पक्षी भी थे फिर मुझे नाई को गुरु बनाने में क्यों संकोच होना चाहिए?
जैसा कि हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार और अपराध की प्रवृत्तियों ने हमारे समाज में व्यापक रूप से अपनी जड़ें फैला रखी हैं। विनोबा भावे के शब्दों में “भ्रष्टाचार तो शिष्टाचार हो गया है। जब सभी लोग ऐसा करने लगें तो यह भ्रष्टाचार नहीं शिष्टाचार हो जाता है। भ्रष्टाचार तभी तक है जब तक कुछ लोग उसे करें, लेकिन सब लोग उसे अपना लें तो वह शिष्टाचार हो जाता है।”
बात बिल्कुल ठीक है। भ्रष्टाचार ने व्यापक स्तर पर जन-जीवन को प्रभावित कर रखा है। नौकरशाही में, व्यापार में, समाज में, नेताओं में, राजनीति में, धर्म में यहाँ तक व्यक्तिगत, पारिवारिक जीवन में भी भ्रष्टाचार फैला हुआ है। अर्थात् विभिन्न क्षेत्रों में हमारा आचरण सचाई-ईमानदारी, कर्तव्यपरायणता, न्याय आदि में अनुकूल न होकर बेईमानी, झूठ, स्वार्थ और अन्याय से प्रेरित होता है। इसे दूर कैसे किया जाय, यह एक अहम् समस्या है। क्योंकि जब तक जन जीवन से भ्रष्टाचार दूर न होगा तब तक हमारा विकास न हो सकेगा, प्रगति और उन्नति की सभी योजनायें अधूरी और निकम्मी रह जायेंगी।
हममें से बहुत से लोगों का मत है कि भ्रष्टाचार दूर करने के लिए सरकार को कड़े कदम उठाने चाहिएं। प्रभावशाली कानून बना कर ऐसे लोगों को कड़ी सजायें देनी चाहिएं। यह आवश्यक भी है। सरकारी नियन्त्रण से लोगों में भ्रष्टाचार की प्रवृत्तियों को बहुत कुछ दबाया जा सकता है। डिक्टेटर प्रधान शासन पद्धति वाले देशों में ऐसा होता भी है और कुछ हद तक सफलता मिल जाती है, किन्तु इस बुराई को शासन पूर्णतया मिटा नहीं सकता। सर्वप्रथम तो सरकारी मशीनरी ही जब इससे प्रभावित हो तो कानून का कोई कारगर उपयोग नहीं हो पाता। इसके सिवा कानून बनने से पूर्व उससे बच निकलने के रास्ते ढूँढ़ लिये जाते हैं। हम देखते हैं कि कानून का सहारा लेकर दोषी व्यक्ति भी कई बार साफ बरी हो जाते हैं। दण्ड और सजा का भय भी लोगों को प्रभावित नहीं करता। आज कई अपराधों के लिए मृत्यु दण्ड निश्चित है फिर भी वे बढ़ते जा रहे हैं, घटते नहीं।
इस तरह का सरकारी प्रयत्न भ्रष्टाचार के निरोध का पूर्ण समाधान नहीं है। हाँ ये भी कुछ अंशों में इस समस्या के दूर करने में सहायक हो सकते हैं। वस्तुतः भ्रष्टाचार एक सामाजिक समस्या है। यह समाज के चरित्र और स्वभाव से संबंध रखती है। जब तक समाज का चरित्र उत्कृष्ट नहीं होगा स्वभाव उत्तम नहीं बनेगा, तब तक भ्रष्टाचार की जड़ नहीं मिट सकती। लोगों को चरित्र निर्माण की दिशा में प्रोत्साहन किया जाना चाहिए।
इसके लिए सर्वप्रथम समाज के अग्रगण्य नेता, बड़े आदमी, राज्याधिकारी, मन्त्री, धर्म गुरुओं को अपने आदर्श-चरित्र और सद्व्यवहार का उदाहरण जन-साधारण के समक्ष रखना चाहिए। किसी भी बात का समाज में प्रचार करने के लिए पहले उसे अपने जीवन में अपनाना आवश्यक है। समाज के अगुआ लोग जैसा आचरण करते हैं, उसका अनुकरण दूसरे लोग करते हैं। सामाजिक राजनैतिक, धार्मिक कार्यकर्ता और नेता लोग जब अपने प्रत्यक्ष आचरण और उदाहरण के द्वारा जनता को चरित्र निर्माण का मार्ग दिखायेंगे तो वह दिन दूर नहीं होगा जब भ्रष्टाचार, अपराध की प्रवृत्तियाँ हमारे समाज से दूर हट जायेंगी। महात्मा गाँधी ने कुछ समय पूर्व यही उदाहरण प्रस्तुत किया था। उन्होंने न तो कानून बनाने की माँग की, न दोषी को सजा देने की, न समाज के दोषों को गिनाया। उन्होंने जैसा समाज बनाना चाहा उसके अनुसार पहले स्वयं को बनाया। यही कारण था कि देखते-देखते लोगों में अपूर्व त्याग, सेवा, परमार्थ की भावना पैदा हो गई थी उस समय। गाँधीजी के नेतृत्व में असंख्यों भारतवासियों ने अपने हितों का त्याग करके जन-कल्याण के लिए अपना सहर्ष उत्सर्ग किया था। जब तक समाज के मूर्धन्य नेता इस आदर्श का अवलंबन नहीं करने लगे तब तक साधारण जनता कैसे इन आदर्शों को अपनायेगी। जब मंत्री, नेता, धर्मगुरु, समाज सेवक अपना स्वार्थ सिद्ध करने, अपनी कोठियाँ, मिलें बनाने में लगे रहेंगे, अपने लिए सम्पत्ति एकत्रित करने में जुटे रहेंगे तब तक जन-साधारण क्यों नहीं इसी मार्ग का अनुकरण करेगा? आज समाज से भ्रष्टाचार के दूर होने में यह एक बहुत बड़ी बाधा है।
विभिन्न समाज-सेवी, धार्मिक संस्थाओं के द्वारा समाज में ऐसा वातावरण बनाया जाय जिससे लोगों को बुराइयाँ छोड़ने की प्रेरणा मिले। लोगों से सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से मिलावट न करेंगे, रिश्वत घूस न लेने, अपने कर्तव्य का सच्चाई के साथ पालन करने की प्रतिज्ञायें कराई जायें। इनसे भले ही पूरे-पूरे परिणाम न निकलें किन्तु भ्रष्टाचार का विरोधी वातावरण बनता है समाज में। इसके साथ-साथ सदाचारी और सज्जन व्यक्तियों को ढूँढ़-ढूँढ़ कर उनका सार्वजनिक अभिनन्दन किया जाय। उन्हें प्रोत्साहन दिया जाय। समाज में इस तरह के व्यवहार शुद्धि के व्यापक आन्दोलन चलाये जायें।
वस्तुतः भ्रष्टाचार करने वाले हम स्वयं ही तो हैं। हम ही रिश्वत लेते हैं, गवन करते हैं, पदार्थों में मिलावट करते हैं। भ्रष्टाचार हम और हमारे भाई बन्धुओं में ही तो फैला हुआ है। जब हम सामूहिक रूप से इस बुराई का त्याग करेंगे और अपने उत्कृष्ट आचरण का उदाहरण पेश करेंगे तो यह सम्भव नहीं कि भ्रष्टाचार का भूत हमारे समाज को नष्ट कर सके ।
बुराइयों का संबंध मनुष्य के प्रेरक भावों से होता है। अपने कार्य क्षेत्र में हमारे भाव अपने लाभ की प्रेरणा न देकर सामाजिक हित के प्रेरक हों। हम जो कुछ भी करें उसका जन-समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह भाव प्रमुख होना चाहिए। यदि हमारे किसी भी कार्य-व्यवहार से दूसरों को हानि उठानी पड़े, उनका शोषण हो, सामाजिक संपत्ति नष्ट हो तो ऐसे कार्य हमें नहीं करने चाहिए। अपना उचित पारिश्रमिक निकाल कर सार्वजनिक कार्यों को ईमानदारी के साथ पूरा किया जाय तो कोई सन्देह नहीं हमारी योजनायें सफल न हों। निर्मित भवन, बाँध आदि अल्प काल में ही नष्ट न हों। राष्ट्रीय सम्पत्ति से खिलवाड़ न हो।
विचारणीय बात है अपना घर बनाने, अपना लाभ सोचने, अपना पेट भरने की प्रवृत्ति से सामाजिक जीवन कमजोर होता है और जब समाज कमजोर, विश्रृंखल हो जाता है तो उसे कोई भी विरोधी शक्ति हड़प लेती है। समाज की अपनी स्वतन्त्र सत्ता नष्ट हो जाती है। ऐसी दशा में उन लोगों की भी खैर नहीं रहती, जिन्होंने अपने आपको बनाया है, अपना ही पेट भरा है। समाज के नष्ट होते ही उन्हें भी नष्ट हो जाना पड़ता है। उनकी संपत्ति छीन ली जाती है। काश! अपना लाभ न सोच कर समाज को शक्तिशाली बनाया जाय तो उसके साथ सभी की सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा हो सकती है।
हममें व्यक्तिगत लाभ की बात न सोचकर समाज के हित-चिन्तन की प्रवृत्ति हो तो हमारे कार्यों में भ्रष्टाचार घुस नहीं सकता। हमारी आत्मा इस आत्मघाती बुराई के लिए आज्ञा नहीं दे सकती।
सरकारी क्षेत्रों को सहायता देकर हम कानून को भी अधिक प्रभावशाली बना सकते हैं। समाज के दूषित तत्वों को कमजोर बना सकते हैं। डाकू, चोर, गुण्डे, बदमाशों को हमारे समाज का एक अंग आश्रय देता है। दूसरों के साथ अत्याचार दुर्व्यवहार होने पर हम अपने घरों में दुबक जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर इन दूषित तत्वों के विरुद्ध गवाही नहीं देते, न कुछ बोलते हैं। दूसरी ओर बदमाशों की संगठित शक्ति हमको एक-एक करके नुकसान पहुँचाती रहती है। यदि हम एक दूसरे की मुसीबत में कूद पड़ें तो कोई कारण नहीं कि समाज के दूषित तत्वों की हरकतें बढ़ें। एक व्यक्ति पर बदमाशों का हमला होने पर पूरा पड़ौस, पूरा मुहल्ला, पूरा गाँव, कस्बा मिलकर प्रतिरोध करे तो बुराइयाँ नहीं पनपें। समाज की संगठित शक्ति ही बुराइयों को परास्त कर सकती है।
सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक किसी भी क्षेत्र में यदि भ्रष्ट व्यक्ति का सामूहिक प्रतिरोध किया जाय तो भ्रष्टाचार पनप नहीं सकता। अक्सर हम परस्पर शिकायत करते हैं—”भ्रष्टाचार बढ़ गया है” “अमुक दोषी है” लेकिन अपने कर्तव्य में धाँधली करने वाले अफसर के खिलाफ हममें से कितने लिखा−पढ़ी करते हैं? काम में ढीलढाल और लापरवाही बरतने वाले कर्मचारियों के खिलाफ हममें से कितने बोलते हैं। उल्टे रिश्वत देकर अपना काम निकाल लेना हम लोग अधिक पसन्द करते हैं। टैक्स देकर सरकार से हम यह नहीं पूछते कि उसका क्या उपयोग हो रहा है? या सार्वजनिक पैसे का दुरुपयोग क्यों किया जा रहा है? इस तरह अन्याय, अत्याचार, रिश्वत, भ्रष्टाचार आदि के विरुद्ध सामूहिक प्रयत्न किए जायें तो ये अधिक दिनों तक जीवित नहीं रह सकते। समाज में से ऐसे व्यक्तियों को आगे आना चाहिए जिनमें जन-सेवा की भावना हो। उन्हें संगठित होकर भ्रष्टाचार के विरुद्ध कदम उठाना चाहिए। जो लोग ऐसी बुराई करते हैं उनके विरोध में जुलूस, प्रचार, बहिष्कार, असहयोग, कानूनी कार्यवाही तथा आवश्यक हो तो सत्याग्रह तक किया जाय। उनकी अनीति से बचने के लिए जगत को जाग्रत और शिक्षित किया जाय। उसे अपने मौलिक अधिकारों की जानकारी दी जाय। हमारी सेवा के लिए नियुक्त हुआ व्यक्ति यदि अन्याय करता है, भ्रष्ट आचरण करता है तो यह हमारी ही कमजोरी है। क्योंकि हम अपने अधिकारों को नहीं समझते उन्हें नहीं जानते।
भ्रष्टाचार की समस्या हमारी एक बड़ी समस्या है। इसके कारण हमारी प्रगति का पहिया बहुत धीरे चल रहा है। इसे दूर करना आवश्यक है। इसे मिटाये बिना हमारी विकास की योजनाएं अधूरी पड़ी रहेंगी। समृद्धि और सफलता की आशा दुराशा मात्र सिद्ध होगी।
बच्चे अपराधी क्यों बनते हैं इसका कोई एक निश्चित कारण नहीं वरन् उनके जीवन से संबंध रखने वाली अनेकों बातें हैं, जो बच्चों को अपराध की ओर प्रवृत्त करती हैं। बाल अपराधों के लिए समाज का वह सम्पूर्ण ढाँचा ही उत्तरदायी है जिसमें बच्चों का व्यक्तित्व ढलता है। समाज की जैसी हवा बच्चे को लगती है उसका वैसा ही प्रभाव उसके जीवन पर अंकित हो जाता है।
बच्चे का प्रथम संपर्क माता-पिता से होता है। उसमें अपराधी प्रवृत्ति का बीज बहुत कुछ उसके गर्भस्थ जीवन में ही जम जाता है, जब माता पिता अनैतिक जीवन बिताते हैं। बाल-अपराध के प्रसिद्ध अन्वेषक हीली लिखते हैं कि “कुछ ऐसे प्रमाण मिलते हैं जिनसे मालूम होता है कि शराब अथवा किसी अन्य नशे में सम्भोग करने पर पैदा होने वाले बच्चों में पैदाइशी अवगुण आ जाते हैं। जिस तरह शरीरगत दोष कोढ़, क्षय आदि बीमारियाँ वंश परम्परागत चलती हैं उसी तरह बच्चों के मानसिक संस्थान की बनावट में भी वंशानुक्रम का बहुत कुछ हाथ होता है। हीली ने 1000 बाल अपराधियों पर प्रयोग करके यह निष्कर्ष निकाला कि 56 प्रतिशत अपराधी वंश परम्परागत थे। उन्होंने आगे लिखा है—गर्भ-काल में माँ का जैसा जीवन-क्रम, मनोभाव होता है उसकी सूक्ष्म छाप बच्चे पर अवश्य पड़ती है। यही कारण है कि गर्भकाल में जिन स्त्रियों में उत्तेजना, क्रोध के आवेश अधिक आते हैं उनके बच्चों का स्वभाव भी उत्तेजक क्रोधी बन जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि बहुत से बच्चों के अपराधी जीवन के पीछे उनके माँ-बाप का चरित्र मुख्य होता है।
पैदा होने के बाद घर वालों के व्यवहार पर बच्चों का जीवन बहुत कुछ निर्भर करता है। कई बार वे अपने अभिभावक, माता-पिता, अध्यापक आदि के कठोर व्यवहार के कारण अपराधी बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में दूसरों को तंग करने में परेशान करने में उन्हें प्रसन्नता होने लगती है। वे अपने से बड़ों की आज्ञा उल्लंघन करके, उनकी इच्छा के विरुद्ध आचरण करके उन्हें तंग करने में गर्व अनुभव करते हैं जो आगे चलकर उनकी आदत में आ जाता है। ये ही बच्चे अपने छोटे भाई बहन या दूसरे बच्चों को मारने पीटने में सन्तोष अनुभव करते हैं।
बच्चों को सख्ती से दबाने पर या उनकी आलोचना करने पर वे बुराई के प्रति अधिक आग्रही बन जाते हैं। अभिभावकों के कटु वचन भी बच्चे में कितना स्थायी प्रभाव पैदा कर देते हैं इसका उदाहरण हीली ने दिया है। उन्होंने एक 11-12 वर्ष के बहुत ही सच्चरित्र बच्चे लड़के का जिक्र किया है जो अपने पिता के एक ही वाक्य से बिल्कुल बदल गया। शाम को पिता घर पर आया। उसका स्वभाव काफी चिड़चिड़ा हो रहा था। उसने देखा बच्चा पढ़ने के समय आराम कर रहा है। पूछने पर दूसरे लड़के ने बताया—”उसकी तबियत खराब है—इसलिए आराम कर रहा है।” पिता ने गुस्से में कहा—”झूठ बोल रहा है।” बस इसी बात की प्रतिक्रिया बच्चे पर ऐसी हुई कि उस दिन से उसका जीवन ही बदल गया। उसने कहा—”मैं बहानेबाज़ हूँ, झूठा हूँ। अब ऐसे ही करूंगा।” वह अकर्मण्य, आलसी बन गया। सारा दिन ताश खेलने लगा। पढ़ना-लिखना सब छोड़ दिया।
हीली ने एक अन्य उदाहरण में बताया है कि पिता द्वारा पीट कर घर से बाहर निकाल दिए गये एक बच्चे ने आवारा जीवन बिताना शुरू किया। यह विचारणीय है कि उसे दूसरों को पीटने में, अपमानित करने में अधिक आनन्द आता था।
किसी भी तरह से दुर्बल माँ-बाप जो अपने बच्चों पर भली प्रकार नियन्त्रण नहीं कर पाते उनके बच्चे बिगड़ जाते हैं। अक्सर देखा जाता है कि गूँगे, बहरे, अन्धे, अपाहिज, निर्धन माँ-बाप की सन्तानें प्रायः बिगड़ जाती हैं, क्योंकि वे अपने बच्चों पर भली प्रकार नियन्त्रण और उनका संरक्षण नहीं कर पाते। जो माँ-बाप दिन भर अपने काम धन्धे में ही उलझे रहते हैं, बच्चों के जीवन में कोई दिलचस्पी नहीं रखते, उनके बच्चे बहुधा पथ-भ्रष्ट हो जाते हैं। क्योंकि बच्चों में उछल-कूद की प्रवृत्ति होती है, जब उसे सही दिशा नहीं मिलती तो वह गलत दिशा में प्रवृत्त हो जाती है। ऐसे नेता, सार्वजनिक कार्यकर्त्ता जो अपने बच्चों के लिए समय नहीं दे पाते उनके बच्चे भी आवारा बन जाते हैं। आधुनिक युग की औद्योगिक सभ्यता ने जहाँ बच्चों और अभिभावकों के परस्पर संपर्क को कम कर दिया है वहाँ बाल अपराधों की संख्या में भी कम वृद्धि नहीं की है।
माता-पिता के पारस्परिक झगड़े, दुर्व्यवहार के कारण भी बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है। माँ-बाप का कलह-पूर्ण जीवन, चारित्रिक दोष, बच्चों को अपराधी बनाने का महत्वपूर्ण कारण है। पारिवारिक उथल-पुथल, कलह, दुर्व्यवहार आदि बच्चों के मानस-संस्थान पर बुरा प्रभाव डालते हैं और वे गलत माँग अपनाते हैं। जिस परिवार के लोग एक स्थान छोड़कर दूसरा स्थान, एक घर छोड़कर दूसरा घर बदलते रहते हैं उनके बच्चों पर बुरा प्रभाव पड़ता है, उनके जीवन में अस्थिरता आ जाती है। दूसरों के प्रति ममता, मित्रता एवं अपनेपन की भावना नष्ट, शिथिल हो जाती है। इससे उनमें एकाकीपन, स्वार्थपरता एवं उदासीनता की वृत्तियाँ उभर आती हैं।
बहुत से बच्चे निराश होकर तब अपराधी बन जाते हैं जब उनकी अपनी सीमा से बढ़ी हुई महत्वाकांक्षायें पूरी नहीं होतीं। प्यार के स्थान पर बच्चों को फटकारना, स्वयं बच्चों के जीवन में दिलचस्पी न लेकर उसे दूसरों पर छोड़ देना, अभिभावकों द्वारा उनके प्रति मनोरंजन, स्नेह का अभाव होना ऐसी कई बातें हैं जिनसे वे अपराधी प्रवृत्तियों में लग जाते हैं। घर ही बच्चे की प्रथम पाठशाला है और घर के सदस्यों का व्यवहार ही उसका पाठ्यक्रम है। परिवार में जैसी प्रेरणायें बच्चे को मिलती हैं वैसा ही वह बन जाता है। बच्चों को बुराई की ओर प्रवृत्त करने तथा अपराधी जीवन बिताने के लिए बुरे साथी और कई सामाजिक बुराइयाँ भी कम उत्तरदायी नहीं हैं। स्मरण रहे बच्चों को गड्ढे में गिराने वाला, पतित करने वाला, अपराधी बनाने वाला, सर्वप्रथम बुरा साथ ही मुख्य होता है। यह साथ पहले घर में ही मिलता है। माता-पिता, रिश्तेदार, भाई-बहन कोई भी हो सकते हैं, जो बच्चों को बुराई की ओर प्रवृत्त करते हैं। सबसे पहले बच्चों को बिगाड़ने के लिए घर में ही बुरा साथ मिलता है, उसके बाद फिर पड़ौस, स्कूल और घर से बाहर। स्मरण रहे कई बुरी आदतों, काम वासना संबंधी बुराइयों का प्रारम्भ प्रायः बुरे साथ से ही होता है।
अभिभावकों को इतना तक ध्यान नहीं रहता कि उनके बच्चे किनके साथ उठते-बैठते हैं, किनके साथ खेलते हैं, कितना भी होनहार बालक क्यों न हो बुरे संगत में पड़कर वह भी पतित हो जाता है। बच्चों का ग्रहणशील किन्तु विवेकहीन मस्तिष्क शीघ्र ही बुराइयों की ओर आकर्षित हो जाता है। बच्चों में बुराइयों की जड़ अधिकतर बुरे साथियों से ही जमती है।
बच्चों को बिगाड़ने में कई सामाजिक बुराइयों का भी काफी महत्व है। इनमें गन्दे सिनेमा, दूषित अश्लील साहित्य, गलत सामाजिक मान्यता परम्परायें आदि मुख्य हैं।
सिनेमा का बच्चों की भावनाओं को दूषित कर उन्हें बुराइयों की ओर प्रवृत्त करने में बड़ा हाथ है। मद्रास के एक समाजशाही रामास्वामी अय्यर ने बाल-अपराधों की जाँच करके अपनी रिपोर्ट में लिखा है—”सिनेमा बाल-अपराध का एक बहुत बड़ा कारण है।” यहाँ तक कि धार्मिक फिल्मों में भी अश्लीलता, अशिष्टता की बहुतायत होती है। तथाकथित सामाजिक चलचित्र तो और गये-बीते होते हैं। फिर इनसे बच्चों में अपराध प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिलता है। इसीलिए उक्त समाजशास्त्री ने सुझाव दिया है कि बाल-अपराधों को मिटाने के लिए अन्य उपायों के साथ-साथ चल-चित्रों के प्रति काफी कड़ाई बरतनी चाहिए। ऐसी फिल्में जिनमें काम, तड़क-भड़क की प्रधानता होती है, बच्चों के कोमल मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालती हैं। बच्चे भी वैसा ही करने लगते हैं और इस अभ्यास में उन्हें अपराधी जीवन का मार्ग अपनाना पड़ता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अधिकाँश फिल्मों का प्रभाव बच्चों में वासनामय जीवन का सूत्रपात कर देता है।
गन्दे उपन्यास, कहानियाँ, भद्दी तस्वीरें, बच्चों की अपराध प्रवृत्तियों को जगाते हैं, बुद्धि तथा चरित्र को भ्रष्ट करते हैं। वस्तुतः बच्चों को अपराध की नियमित शिक्षा गन्दे साहित्य से ही मिलती है। ब्रिटेन के अपराध शास्त्रियों ने कुछ दिनों पहले बाल-अपराध के कारणों पर प्रकाश डालते हुए बताया है—”सिनेमा में दिखाई जाने वाली हिंसात्मक, क्रूर, अश्लील घटनायें बच्चों को अपराधी बनाने के लिए बहुत कुछ उत्तरदायी हैं।”
हमारे समाज का संकीर्ण दृष्टिकोण जिसके अनुसार कोई बच्चा तनिक-सी गलती कर बैठे तो फिर उसे बुरा मान लिया जाता है, उसके प्रति बुरी धारणा बना ली जाती है और बात बात में उसे अपमानित किया जाता है, इससे भी बहुत से बच्चे अपराधी जीवन की ओर प्रेरित हो जाते हैं। भूल करना मनुष्य का जन्मजात स्वभाव है। प्रारम्भ में की गई गलतियों को भुला कर बच्चों के प्रति सौम्य व्यवहार रखने पर वे सुधर सकते हैं।
बहुत से बच्चे अपने आप में अपराधी नहीं होते वरन् एक अपराधी बच्चों के समुदाय की प्रेरणा अथवा दबाव से बुराइयाँ करते हैं। प्रत्येक स्थान पर ऐसे बच्चों का एक समूह अवश्य होता है जो अन्य सीधे-सादे, सरल बच्चों को बहका फुसला कर या धमका कर बुरे कामों के लिए प्रेरित करते हैं।
बहुत-सी शिक्षण संस्थाओं में अध्यापकों के गलत आचरण के कारण भी बच्चों में बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं। जो अध्यापक बच्चों के साथ धूम्रपान करते हैं, ताश, चौपड़ आदि खेलते हैं, अपने मित्रों के साथ गपशप और अश्लील बात-चीत करते हैं, उनसे बच्चे क्या सीख सकते हैं? इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि अपने शिक्षकों की नकल करके बच्चे भी वैसा ही करने का प्रयत्न करने लगते हैं। बहुत से अध्यापक बच्चे की किसी शारीरिक या मानसिक कमजोरी को महत्व देकर उन्हें तिरस्कृत करते हैं, अपशब्द कहते हैं या उनकी उपेक्षा करते हैं। परिणाम यह होता है कि बालक के मन में एक तीव्र प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है और वह कई गलत कार्यों, बुराइयों में फूट निकलती है। बच्चा स्कूल में केवल अक्षरीय ज्ञान ही प्राप्त नहीं करता वरन् उस चरित्र और आदर्श को भी ग्रहण करता है जो अध्यापकों और अपने सहपाठियों के जीवन से उसे मिलता है। यही कारण है कि बहुत से बच्चे तो प्रारम्भ में बहुत ही भले होते हैं, स्कूल कालेजों में जाने के बाद बिगड़ जाते हैं।
फ्राँस के द्वारा पददलित अल्जीरिया को स्वतन्त्र कराने के लिए वहाँ के स्वाभिमानी देशभक्तों ने लंबे समय से संघर्ष किया है। अन्याय के विरुद्ध लड़ने में ही तो किसी जीवित समाज, देश या व्यक्ति का गौरव परखा जा सकता है। अनीति सहने का अर्थ है उसे और अधिक बढ़ाने एवं परिपुष्ट करने में सहयोग देना। जिन्हें कायरता ने ग्रसित न कर रक्खा हो, वे अन्याय सहन नहीं करते और बड़ी से बड़ी जोखिम उठाकर संघर्ष करते हैं। अल्जीरिया के देशभक्तों ने लंबे समय से अपना स्वाधीनता संग्राम जारी रक्खा, और उसमें हजारों ने हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी।
पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों को दुर्बल समझा जाता है। और उनसे घर गृहस्थी के अतिरिक्त किन्हीं बड़े साहसपूर्ण कार्यों की आशा नहीं की जाती। पर विचार करने पर स्पष्ट होता है कि उनके गले में सामाजिक पराधीनता की तौक पड़ी है उसी के कारण वे ऐसी दुर्बल एवं असहाय बनी हैं। यदि अवसर मिले तो वे पुरुषों से किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं रह सकतीं। अल्जीरिया में जिन नारियों को स्वतन्त्रता संग्राम में भाग लेने का अवसर मिला, उन्होंने पुरुषों से बढ़कर ही अपनी देशभक्ति और वीरता का परिचय दिया।
तीन देशभक्त लड़कियों ने जिनका नाम भी संयोगवश जमीला ही था—स्वतन्त्रता संग्राम में अपनी बलि चढ़ाकर वहाँ के निवासियों के लिए एक ऐसी आशा उत्पन्न कर दी जिसके कारण वहाँ के युवक हार मानकर घर बैठे रहने में डूब मरने जैसी शर्म अनुभव करते थे। इन तीन जमीलाओं का बलिदान प्रत्येक अल्जीरिया निवासी के मन में एक टीस उत्पन्न करता रहा और उसे संघर्ष के युद्ध क्षेत्र में लाकर खड़ा होने की प्रेरणा देता रहा। भारत में जैसे महात्मागाँधी की जय का नारा लगाया जाता है उसी प्रकार अल्जीरिया निवासी ‘जमीला जिन्दाबाद’ का नारा लगाने और स्वतन्त्रता संग्राम में जूझने की प्रेरणा प्राप्त करते हैं।
पहली जमीला वहाँ के क्रान्तिकारी दल की सदस्य थी। अनेक गुप्त प्रवृत्तियों का संचालन करती और स्वतन्त्रता संग्राम को आगे बढ़ाने के लिए दल द्वारा निर्धारित कार्यक्रम को पूर्ण करने में लगी रहती। फ्राँसीसी पुलिस ने उसे पकड़ लिया। गिरफ्तारी के समय उसके पास वैसे कागजात भी पकड़े गए जिससे दल की गति-विधियों पर प्रकाश पड़ता था। अन्य सदस्यों के नाम तथा गति-विधियों की जानकारी प्राप्त करने के लिए पुलिस ने उसे ऐसी-ऐसी यंत्रणायें दीं जिनका विवरण सुनने मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वर्षों तक उसे यन्त्रणाएँ दी जाती रहीं पर जब उसने कोई भेद नहीं बताया तो फाँसी की सजा सुना दी गई। इस देश में फाँसी देने की अपेक्षा उसे फ्राँस ले जाया गया और वहाँ उसके मृत्युदण्ड की व्यवस्था की गई।
इतने छोटे अपराध पर इतना बड़ा दण्ड देने के कारण सारे संसार में उसकी प्रतिक्रिया हुई। विश्व के जनमत ने फ्राँस को धिक्कारा। फ्राँसीसी नेताओं ने भी इस दण्ड की भर्त्सना की। अल्जीरिया में तो इस सजा ने एक प्रकार से आग ही भड़का दी और विद्रोह की लपटें तेजी से बढ़ने लगीं। अन्त में सरकार झुकी। मौत की सजा कारावास में बदली गई और अब जब कि समझौता हो रहा है उसे रिहा भी कर दिया गया है।
दूसरी जमीला को अपनी बहिन और बहनोई को सरकारी अत्याचारों से उत्पीड़ित होते देखकर रोष आया वह क्राँतिकारी कार्य करने लगी। 22 वर्ष की छोटी आयु में उसने जो कार्य किए उससे फ्राँसीसी सरकार चिन्तित हो उठी और उसे गिरफ्तार कर लिया गया। भेद पूछने के लिए इतनी यन्त्रणायें दी गई कि उसका शरीर ही बेकाम हो गया। जेल का अधिकाँश समय उसे अस्पताल में काटना पड़ा। अमानवीय यंत्रणाओं के प्रमाण मौजूद थे इसलिए उनके विरोध में वकीलों की एक समिति ने मिलकर न्यायालय में इसकी पुकार भी की पर सुनने वाला कौन था।
तीसरी जमीला उससे भी छोटी थी, सिर्फ 20 वर्ष की। उसे भी उन्हीं अभियोगों में पकड़ा गया। यन्त्रणाओं में कमी न रक्खी गई। फिर भी उसने इतनी दृढ़ता दिखाई कि पुलिस को कुछ भेद पाने की आशा छोड़ देनी पड़ी समझौते का वातावरण बन जाने से इस तीसरी जमीला के भी प्राण बच गये अन्यथा मृत्युदण्ड उसके लिए ही निश्चित था।
नेतृत्व साहस करता है योग्यता नहीं। जब कि बड़े-बड़े सुयोग्य और साधन सम्पन्न व्यक्ति मनोबल के अभाव में कुछ कर नहीं पाते तब छोटे-छोटे साहसी व्यक्ति अपनी स्वल्प सामर्थ्य के साथ साहसपूर्वक आगे बढ़ सकते हैं तो बहुत कुछ कर दिखाते हैं। अल्जीरिया की इन तीन लड़कियों ने जिस साहस, त्याग और देशप्रेम का परिचय दिया, उसने सारे देश में प्रेरणा फूँक दी और फ्राँसीसियों को फौलादी ‘पंजा ढीला करने के लिए विवश होना पड़ा।
तीन जमीलाएँ अल्जीरिया के आकाश में उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह चमकती हैं। संसार का इतिहास उन्हें भुला न सकेगा।
मानव समाज में होने वाले संघर्षों का एक कारण आर्थिक प्रश्न भी रहा है। धन, दौलत, सम्पत्ति, जायदाद को लेकर सदा से परस्पर संघर्ष, लड़ाई-झगड़े, लूट-खसोट होते रहे हैं। व्यापक पैमाने पर होने वाले आक्रमण, युद्ध आदि का कारण भी बहुत कुछ अर्थ ही रहा है। आज भी संसार में व्याप्त संघर्ष का आधार अर्थ व्यवस्था ही है। मालिक और नौकर में, गरीब और अमीर में, हो रहे संघर्ष की खाई आज कुछ कम नहीं है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि अर्थ व्यवस्था की शुद्धि मानव जीवन की सुरक्षा, प्रगति के लिये अत्यावश्यक है। इसीलिए मनीषियों ने इस समस्या पर गम्भीरता से विचार किया और अपरिग्रह का स्वर्ण-सूत्र मनुष्य के लिए दिया। उसे धर्म व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग निर्धारित करके परिग्रह को पाप बताया।
आज के अर्थ-प्रधान युग में इन धर्म व्यवस्थाओं को कैसे अपनाया जाय? सामान्य मनुष्य भी इन्हें आचरण में कैसे लायें? ये विचारणीय प्रश्न हैं। क्योंकि आज की अर्थ-व्यवस्था इतनी दूषित हो गई है कि भविष्य के लिए अर्थ संग्रह का विचार न रक्खा जाये तो सामान्य व्यक्ति का जीवन निर्वाह कठिन हो जाय। आज की सामाजिक परिस्थितियाँ इतनी जटिल हो गई हैं कि दुर्घटना, बुढ़ापा, बीमारी, असहाय हालत में मनुष्य के पास कोई आर्थिक व्यवस्था न हो तो बड़ी कठिनाईयों का सामना करना पड़े। जो लोग दूर-दर्शिता के साथ इन परिस्थितियों का ध्यान में रखकर आर्थिक व्यवस्था को मजबूत रखते हैं वे सरलता से कठिनाइयों में से निकल जाते हैं। आवश्यकता पड़ने पर दूसरों की मदद भी कर सकते हैं। इसीलिए नीतिकारों ने आर्थिक व्यवस्था का मध्यम मार्ग सुझाते हुए बताया है कि “बुद्धिमान मनुष्य को ऐसा आचरण करना चाहिए कि चैन से सो सके। जवानी में ऐसा रहना चाहिए कि बुढ़ापा सुख से बिता सके। साराँश यह है कि भविष्य में आने वाली अनजान घटनाओं, कठिनाई, परेशानियों में सरलता से जीवन निर्वाह के लिये कुछ संग्रह करना मनुष्य के लिए उचित है। अन्य प्राणियों में भी ऐसी प्रवृत्ति पाई जाती है। चींटी, दीमक, मधुमक्खी आदि का उदाहरण स्पष्ट है। एक नीतिकार ने तो यहाँ तक लिख दिया है कि “बुद्धिमान मनुष्यों को जीवन अनन्त मानते हुए विद्या और अर्थ का चिन्तन करना चाहिए।”
इसमें कोई सन्देह नहीं कि आज के अर्थ प्रधान युग में सामान्य मनुष्य को अपना जीवन सुचारु रूप से निर्वाह करने के लिए अर्थ संग्रह करना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। आज जीने का अधिकार भी उन्हें ही है जो आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हैं क्योंकि परिवार का भरण-पोषण, बच्चों की शिक्षा दीक्षा, सभी तो अर्थ साध्य हैं। घर में किसी के बीमार पड़ जाने पर आज की महंगी चिकित्सा-पद्धति और जीवन निर्वाह का खर्च गरीब मनुष्य वहन नहीं कर सकता और इसीलिए उसे अकाल मृत्यु का ही वरन् करना पड़ता है।
अर्थ संग्रह करना आवश्यक है किन्तु स्मरण रहे इसमें स्वामित्व की भावना न हो। जो कुछ भी हम उपार्जन करें, संग्रह करें उस पर मालिकाना हक न समझकर समाज के एक साझीदार संरक्षक का अधिकार ही समझना चाहिए। उपार्जित एवं संग्रह की गई सम्पत्ति पर हमारे सहित सम्पूर्ण समाज का अधिकार समझना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में आवश्यकता पड़ने पर संग्रहीत बन समाज के हित में खर्च करने में कंजूसी न बरती जाय। वेद में आदेश है कि “सौ हाथों कमा और हजारों हाथों दान कर दे।” मनुष्य अर्थोपार्जन करे, धन संग्रह करे किन्तु समाज के हित में, गिरे हुओं को उठाने में, असहायों की सहायता करने में जरूरतमंदों के हक में उसे उन्मुक्त हृदय से खर्च कर दे।
खेद है कि आज लोगों में इस भावना का ह्रास हो गया है। लोग उपार्जित संग्रहीत धन पर अपना ही स्वामित्व समझते हैं। इसका अर्थ है उस सम्पत्ति का उपयोग वे स्वयं अथवा उनके निजी व्यक्ति ही कर सकते हैं। इस तरह का स्वामित्व चाहे किसी व्यक्ति का हो या किसी परिवार, वर्ग, विशेष या किसी संस्था का ही क्यों न हो हेय एवं हानिकारक है। इस तरह के स्वामित्व का जो परिणाम होता है उसके बारे में महात्मा गाँधी ने लिखा है—”धनवानों के यहाँ आवश्यक वस्तुयें भरी पड़ी रहती हैं, पड़ी-पड़ी सड़ा करती हैं किन्तु उन्हीं के अभाव में दूसरे करोड़ों लोग बेहाल रहते हैं, भूखे मरते हैं, जाड़े में ठिठुरते हैं खुली धरती पर सोते हैं। करोड़पति, अरबपति बनना चाहते हैं तो भी वे सन्तुष्ट नहीं होते दूसरी ओर लोगों को भरपेट भोजन भी नहीं मिलता।”
इसी तरह के स्वामित्व से ही मानव जाति आज संघर्षों के दौर से गुजर रही है। सम्पत्ति पर इस मालिकाना हक से ही परस्पर की लूट खसोट, लड़ाई-झगड़े, संघर्ष, क्रान्तियों का प्रादुर्भाव होता है आज के युग के पूँजीपति और सर्वहारा मजदूर वर्ग का महत्वपूर्ण संघर्ष इसी दूषित स्वामित्व की भावना पर आधारित है।
हम जो कुछ उपार्जन करें, संग्रह करें उस पर समाज का हक मानकर चलें, आवश्यकता पड़ने पर उसे समाज के हित में लगा दें तो फैली हुई असमानता आर्थिक असंतुलन जल्दी ही दूर हो जाय और किसी को अभाव में भूखे नंगे रहकर न मरना पड़े।
जो कुछ उपार्जन किया जाय, उसके बदले पर्याप्त श्रम अवश्य किया जाना चाहिये प्रत्येक मनुष्य को प्राप्य वस्तु सामग्री सम्पत्ति आदि का मूल्य श्रम के रूप में चुकाना आवश्यक है। जो बिना श्रम किए ही वस्तुओं का उपभोग करता है, अपने भण्डार, तिजोरी भरता है, वह शोषक है। क्योंकि बिना श्रम का मूल्य चुकाये वस्तु पदार्थ उत्पन्न नहीं होते। किसी न किसी को तो श्रम करना ही पड़ता है। श्रम कोई दूसरा करे और उससे उत्पादित सामग्री का उपभोग अन्य व्यक्ति करे तो यह एक बहुत बड़ा नैतिक और सामाजिक अपराध है। प्राप्त वस्तुओं के बदले हम श्रम का मूल्य चुकाने लगेंगे तो समाज में कोई वस्तु का अभाव नहीं रहेगा, सबको बराबर मिलेगा क्योंकि श्रम किसी का हक छीनने का नियम नहीं वरन् अपना हक अपने पुरुषार्थ से पाने का नियम है। अतः श्रम हमारी जीवन पद्धति का अंग बन जाना चाहिए, हम उसे ही संग्रह करें उसका ही उपभोग करें जिसका मूल्य श्रम के रूप में हमने चुका दिया है।
परिग्रह, वस्तु संग्रह, उपभोग का संबंध अनियमित भोग और फिजूलखर्ची से नहीं है। वर्तमान परिस्थितियों में जीवन निर्वाह का सीधा, सच्चा सादगीपूर्ण मार्ग जो बुद्धि सम्मत हो उसी पर हमें चलना चाहिए। अपरिमित भोगों की तृप्ति और वासना तथा विलासिता को अपनाकर पदार्थों का मनमाना उपभोग करना अनैतिक है। चाहे हमारे पास कितनी ही सामग्री क्यों न हो, लेकिन उसे समाज की धरोहर मानकर जीवन निर्वाह के लिए अत्यावश्यक कार्यक्रमों में ही उसका उपभोग किया जाना चाहिए। फिजूलखर्ची के रूप में समाज की सम्पदा, जिसके हम संरक्षक मात्र हैं उसे नष्ट-भ्रष्ट करने का, उड़ा देने का हमें अधिकार नहीं है। यह किसी से नहीं छुपा है कि व्यसन, विलासिता और शेखीखोरी पर खर्चे होने वाले बड़े धन से बचाकर उससे अनेकों असहाय, गरीब, लोग भूखी नंगी मानवता को रोटी कपड़ा और रहने को मकान दिये जा सकते हैं।
अमर्यादित संग्रह, दूसरे का हक छीनकर अपना घर भरने की प्रवृत्ति, किसी भी तरह अपनी सम्पत्ति बढ़ाने की आदत मनुष्य की बहुत बड़ी कमजोरी है। इस तरह के लोगों को अपने स्वयं के तथा अपने बेटे पोतों के भविष्य की भारी चिन्ता होती है। वे पूर्णतया भविष्य के प्रति अविश्वस्त रहते हैं और जितना अपना घर भरा जा सके उसे भरने के लिए प्रयत्नरत रहते हैं। इस अनैतिक मनोवृत्ति का आधार “ईश्वर पर अविश्वास” ही होता है। जिन्हें संसार के व्यवस्थापक परमात्मा पर विश्वास नहीं जिन्हें अपने पुरुषार्थ और शक्ति का बोध नहीं ऐसा ही व्यक्ति अपने तथा अपने बच्चों के भविष्य के प्रति शंकालु रहता है। और अमर्यादित परिग्रह करता है। आवश्यकता इस बात की है कि स्वार्थ, तृष्णा से प्रेरित होकर किए जाने वाले संग्रह से बचा जाय इसे ही शास्त्रकारों ने पाप की संज्ञा दी है।
आज के युग में जिसमें जीवन प्रणाली बड़ी क्लिष्ट हो गई है, समाज व्यवस्थायें बहुत कुछ बदलती जा रही हैं, न्याय और सचाई के साथ, नैतिक मर्यादाओं में रहते हुए सम्पत्ति सामग्री, एकत्रित करना, परिग्रह करना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है जन सामान्य के लिए। किन्तु उस पर निजी मालिकाना हक की भावना न रक्खी जाय। प्राप्त सामग्री को समाज की सम्पत्ति मानकर आवश्यकता पड़ने पर उसे समाज के हक में लुटा देने में संकोच न रक्खा जाय। सामग्री के परिग्रह का आधार किसी का शोषण, उत्पीड़न या हक छीन लेना न होवे वरन्
उपभोग किए जाने वाले एवं संग्रहीत सामग्री के बदले पूरा-पूरा मूल्य चुकाया जाय श्रम के रूप में। संग्रहीत सम्पदा को अमर्यादित भोग, विलास, फिजूल खर्ची में नष्ट न किया जाय वरन् सरल, सीधे, सादे जीवन निर्वाह का आधार बनाया जाय। स्वार्थ तथा तृष्णा से प्रेरित होकर किए जाने वाले परिग्रह से बचा जाय।
अपरिग्रह की उत्कृष्ट स्थिति जिसमें प्रति दिन की आवश्यकताओं को उसी दिन पूर्ण करके दूसरे दिन के लिए कुछ भी संग्रह न रखना सन्त महात्माओं का महान् गुण है। यदि समाज में इस मनोवृत्ति की वृद्धि हो अपनी दैनिक आवश्यकताओं से अधिक का संग्रह न किया जाय तो किसी तरह की विषमता न रहे। लेकिन यह एक व्यक्ति की नहीं सम्पूर्ण समाज की मनोवृत्ति हो। उत्पादन संग्रह और वितरण की व्यवस्था व्यक्तिगत न होकर समाजगत हो। इन तरीकों से मानव जाति में फैली अनेक विषमतायें शीघ्र ही दूर हो जायें। बापू ने कहा था—”कंगाल को भी पेट भरने का हक है समाज में। समाज का कर्तव्य है कि उसे उतना हासिल करा दे। इसके लिये पहला कदम उन धनवानों को उठाना चाहिए जो “अत्यन्त” परिग्रह रखते हैं। यदि संसार के समस्त धनपति ऐसा त्याग कर सकें तो गरीबों का भी सहज ही पेट पालन होने लगे।”
पूर्ण परिग्रह मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट सद्भावना का प्रतीक है। इसे लक्ष्य मानकर चलना चाहिए। व्यवहार में यदि अभी आना सम्भव न हो तो कम से कम इतना तो करना ही चाहिए कि अनीतिपूर्वक अनावश्यक संग्रह न किया जाय। जो कमाया जाय उसे, केवल उचित आवश्यकताओं में ही कम किया जाय और साथ ही समाज को सुविकसित बनाने के लिए पिछड़ों को ऊंचा उठाने के लिये अपनी आय का एक बड़ा अंश नियमित रूप से दान करते रहा जाय।
अपने आध्यात्मिक एवं भौतिक गुणों के कारण हमारे यहाँ तुलसी के पौधे को बहुत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसे धार्मिक आस्थाओं से जोड़ कर भारतीय जीवन-पद्धति का अभिन्न अंग माना गया है। घर में तुलसी का पौधा लगाना, उसकी पूजा करना, नित्य मन्दिर में चरणामृत के साथ दोनों समय भोजन के साथ भगवान के प्रसाद के रूप में तुलसी पत्र लेना, हमारे दैनिक जीवन में तुलसी के उपयोग और उसके महत्व का परिचायक है। इतना ही नहीं एक ग्रामीण से लेकर शहर का शिक्षित व्यक्ति भी अनेक बीमारियों में तुलसी को याद करता है।
शास्त्रकार ने कहा है कि—
तुलसी काननं चैव गृहेयस्याव तिष्ठते।
तद्गृहे तीर्थं भूतंहि न यान्ति यम किंकराः॥
“जिस घर में तुलसी का वन है वह घर तीर्थ के समान पवित्र है। उस घर में यमदूत नहीं आते।’ यहाँ यमदूतों का अर्थ, जहरीले कीड़े सर्प बिच्छू आदि, रोग कीटाणु बीमारियों से है।
इसी तरह अन्यत्र कहा है—
तुलसी विपिनस्यापि समन्तात्पावनं स्थलम्।
कोशमात्रं भवत्येव गंगे यस्येव पायसः॥
“तुलसी वृक्ष के चारों ओर एक कोश अर्थात् दो मील तक की भूमि गंगाजल के समान पवित्र होती है।” स्मरण रहे रोग कीटाणु नाश की गंगाजल में अपूर्व शक्ति है। उसमें कोई कीटाणु जीवित नहीं रह सकता और इसीलिए गंगाजल कभी सड़ता नहीं।
एक धर्म ग्रन्थ में लिखा है—
तुलसी गंधमादाय यत्र गच्छति मारुतः।
दशो दिशाः पुनव्याशु भूत ग्रामान् चतुविंधान॥
“तुलसी की गन्धयुक्त हवा जहाँ भी जाती है वहाँ की दशों दिशायें शीघ्र ही पवित्र हो जाती हैं और आकाश, पृथ्वी, वायु, जल आदि चारों तत्व उससे शुद्ध हो जाते हैं।”
हमारे यहाँ ही नहीं विदेशों में भी इसे पवित्र और लाभदायक माना है। यह कथा प्रसिद्ध है कि ईसा के वध स्थान पर तुलसी के पौधे उत्पन्न हुए थे। ग्रीस में आधुनिक युग में भी एक विशेष दिन तुलसी का उत्सव मनाया जाता है जिसे “सैन्ट बैसिश डे” कहते हैं। इस दिन वहाँ की स्त्रियाँ तुलसी की शाखायें अपने गृह द्वार पर लाकर टाँगती हैं। उनका विश्वास होता है कि इससे उनकी मुसीबतें कष्ट दूर होंगे।
हमारे यहाँ तो तुलसी के साथ एक बहुत बड़ा धार्मिक क्रियाकाण्ड, तरह-तरह से उसकी पूजा-प्रदक्षिणा, तुलसी-दल सेवन का विधान है। ये सब परम्परायें, मान्यतायें किसी अन्ध-विश्वास पर आधारित हों ऐसी बात नहीं है। अब वैज्ञानिक अनुसंधान और रासायनिक विश्लेषणों के आधार पर यह सिद्ध हो गया है कि तुलसी में कीटाणु नाशक तत्व प्रचुर मात्रा में हैं, जिससे रोग निवारण में यह काफी लाभप्रद सिद्ध होता है। तुलसी के पत्तों में एक प्रकार का कीटाणु-नाशक द्रव्य होता है जो हवा के संयोग से इधर-उधर उड़ता है। तुलसी का स्पर्श करने वाली वायु जहाँ भी जाती है वहीं अपना रोग-नाशक एवं शोधक प्रभाव डालती है। मनुष्य शरीर में श्वांस के द्वारा और स्पर्श से यह अनुकूल परिणाम पैदा करती है। शरीर से रोगों का निवारण होता है और स्फूर्ति, प्रफुल्लता पैदा होती है। तुलसी शरीर की टूट-फूट से होने वाले विषैले कोषों को शुद्ध करती है और शरीर से दूषित तत्वों को नष्ट करती है।
तुलसी में रोग-नाशक शक्ति प्रचुर मात्रा में होती है। चरक के अनुसार यह हिचकी, खाँसी, दमा, फेफड़ों की बीमारी तथा विष-निवारक होती है। भावमिश्र ने तुलसी को हृदय रोगों में लाभकारी, रक्त विकार को दूर करने वाली, अग्नि-दीपक, पाचन-क्रिया को स्वस्थ बनाने वाली बताया है। सुश्रुत ने भी इसे रोग-नाशक, तेज-वर्धक वात कफ-शोधक, छाती के रोगों में लाभदायक तथा आन्त्रक्रिया को स्वस्थ रखने वाली बताया है। पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञान ने भी तुलसी को खाँसी ब्रौंकाइटिस, निमोनिया, फ्लू, क्षय आदि रोगों में लाभदायक बताया है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि संसार की सभी चिकित्सा पद्धतियों में तुलसी के महत्व को स्वीकार किया गया है। आयुर्वेदिक, ऐलोपैथिक, यूनानी, होमियोपैथिक वाले सभी अपने-अपने ढंग से रोग निवारण और स्वास्थ्य सुधार के लिए तुलसी का उपभोग करते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा की गई खोजों के आधार पर पता चला है कि तुलसी से प्राप्त होने वाला द्रव्य क्षय रोग के कीटाणुओं का नाशक होता है।
अधिकाँश रोगों में तुलसी बहुत ही प्रभावशाली सिद्ध हुई है। दैनिक जीवन में सामान्य रूप से भी इसका सेवन करते रहना बहुत ही हितकर होता है। जुकाम, बुखार, मलेरिया, इन्फ्लुएंजा आदि में तुलसी का काड़ा बना कर देने से लाभ होता है। मलेरिया के लिये तो यह अमोघ औषधि है। जहाँ तुलसी होती है वहाँ मच्छर नहीं रहते हैं। एक प्रयोग के अनुसार तुलसी का घोल पिचकारी से छिड़कने पर या तो मच्छर भाग जाते हैं या मर जाते हैं। तुलसी को शरीर पर मल कर सोया जाय तो मच्छर नहीं काटते।
आमाशय और आँतों पर तुलसी का अनुकूल प्रभाव पड़ता है। इसके नियमित सेवन से पाचन संस्थान भली प्रकार काम करता है। मन्दाग्नि दूर होती है। पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। प्रातःकाल तुलसी के चार पाँच पत्ते चबा कर शीतल जल पीने से शरीर के कई दोष दूर होते हैं। बीज, तेज, मेधा, बल की वृद्धि होती है। आमाशय, जिगर, हृदय, छाती के रोगों में लाभ होता है। पुराण के अनुसार जो प्रातः मध्याह्न और संध्या तीनों समय तुलसी का सेवन करता है उसकी काया उसी तरह शुद्ध हो जाती है जैसे सैकड़ों चांद्रायण व्रतों से होती है। रक्त विकार फोड़े फुन्सियों चर्म रोगों में भी इसका लाभ दायक प्रभाव पड़ता है। इसके लिये तुलसी का सेवन और इसका लेप दोनों ही उपयोगी रहते हैं।
इस तरह तुलसी बीमारियों के निवारण के लिये अपने आप में एक परिपूर्ण औषधि है। प्रायः सभी रोगों में यह प्रभावकारी सिद्ध हुई है क्योंकि इसमें एक महत्वपूर्ण गुण है। शरीर से विषैले तत्वों का शमन करना और शरीर की कार्य प्रणाली को स्वस्थ, सशक्त बनाना। विभिन्न रोग शरीर में विजातीय पदार्थ इकट्ठे हो जाने, या रोग कीटाणुओं के बढ़ जाने अथवा शरीर के अक्षम हो जाने से ही पैदा होते हैं। तुलसी इन तीनों का निवारण करती है। यह शरीर को शुद्ध करती है, कीटाणुओं को नष्ट करती है और शरीर को शक्तिशाली समर्थ बनाती है।
शरीर शोधन के साथ-साथ तुलसी मानसिक शुद्धि के लिये भी काफी प्रभावशाली है। सर्वप्रथम शरीर की अशुद्धि ही मन की अशुद्धि का कारण होती है। तुलसी इसे दूर करती है और स्वस्थ शरीर में स्वस्थ मन काम करता है। तुलसी सूक्ष्म रूप से शान्ति, सात्विकता, निर्मलता, शीतलता के गुणों से युक्त होती है। आप कुछ समय के लिये तुलसी के उपवन में बैठ जाए आपको तत्काल ही शान्ति मिलेगी। इसीलिये आध्यात्मिक साधनाओं से तुलसी का अनन्य संबंध है। तुलसी के सेवन, उसकी सेवा पूजा, सान्निध्य रखने से सात्विकता की वृद्धि होती है और आत्मिक गुण बढ़ते हैं। जिस तरह शरीरगत दोषों को तुलसी दूर करती है उसी तरह मानसिक दोषों को भी दूर कर सद्गुणों का विकास करने में लाभप्रद होती है। अक्सर तुलसी की माला, कण्ठी आदि शरीर में धारण करने का विधान है हमारे यहाँ। यह इसी ठोस सिद्धान्त पर आधारित है। हमारे यहाँ ही नहीं विदेशों में भी इसका आध्यात्मिक कार्यों में उपयोग होता है। तुलसी की लकड़ी को किसी भी रूप में शरीर में धारण करने पर वह शाँतिदायक सिद्ध होती है। मन्दिरों में तुलसीदल युक्त चरणोदक दिया जाता है इससे क्रोध और अहंकार, उत्तेजनाएं शान्त होते हैं। नम्रता पैदा होती है। तुलसी का स्पर्श कर आने वाली वायु से पवित्र भावनायें जाग्रत होती हैं। सूक्ष्म प्रेरणाओं को ग्रहण करने की सामर्थ्य प्राप्त होती है।
हमारे यहाँ दैनिक जीवन में तुलसी का संपर्क बनाये रखने के लिये ही पूर्वज-मनीषियों ने इसे धार्मिक-मान्यता दी थी। घरों में तुलसी के विरवा लगाना, जल चढ़ाना, उनका पूजन करना, परिक्रमा करना आदि गृहस्थ के लिये आवश्यक धर्म कर्तव्य के रूप में माना गया है। इन सब के पीछे ऋषियों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण और उनके जीवन का लंबा अनुभव ही था।
तुलसी के पौधों के पास सर्प भी नहीं आते, रोग कीटाणु वहाँ ठहर भी नहीं सकते। इसकी गन्ध से वे दूर रहते हैं या मर जाते हैं। अनेकों रोगों में यह रामबाण औषधि है। तुलसी वातावरण को शुद्ध बनाती है। आध्यात्मिक गुणों की वृद्धि और विकास के लिए तुलसी बहुत ही महत्वपूर्ण और उपयोगी है।
खेद है हम दिनों दिन इस लाभदायक पौधे को और इसके विज्ञान सम्मत गुणों को भूलते जा रहे हैं। थोड़ा बहुत उपयोग इसका धार्मिक क्षेत्र में रह गया है वह भी केवल पूजा, तुलसी विवाह, जल चढ़ा देने तक ही सीमित रह गया है। हमारे घरों में से इसका निवास उठता जा रहा है। सामान्य बीमारियों में भी हम इस गुणकारी औषधि को छोड़ कर डाक्टरों के पास दौड़े जाते हैं और अपना धन लुटाते हैं। यदि हम थोड़ा बहुत भी ध्यान घर में तुलसी के उपवन लगाने में लगावें और आवश्यकता पड़ने पर इसे ही दवा रूप में लें या दैनिक उपयोग करें तो हमारा शरीर और मन दोनों ही शुद्ध और पुष्ट हों। हमारे घर के आस-पास का वातावरण भी शुद्ध निर्मल और शान्तिदायक बने। तुलसी हमारे दैनिक जीवन में बहुत ही उपयोगी है। हमें इसके महत्व को समझ कर तुलसी का उत्पादन और उसका उपयोग बढ़ाने का प्रयत्न करना ही चाहिए।
बालक अब्राहम लिंकन में महापुरुषों के जीवन चरित्र पढ़ने का बड़ा शौक था। घर की आर्थिक स्थिति बहुत दयनीय थी इसलिए वे खरीद तो न सकते पर इधर-उधर से माँग कर अपना शौक पूरा करते।
एक सुशिक्षित सज्जन से वे एक पुस्तक माँग कर पढ़ने लाये। उनने बालक की उत्कंठा देख कर पुस्तक दे तो दी पर कड़े शब्दों में हिदायत कर दी कि पुस्तक खराब न होने पावे और जल्दी से जल्दी लौटा दी जाय।
घर में दीपक न था। ठंड दूर करने के लिए अंगीठी में आग जला कर सारा घर उसी पर आग तापता था। लिंकन उसी के प्रकाश में पुस्तक पढ़ते थे। सारा घर सो गया, पर वे न सोये और पुस्तक में खोये रहे। अधिक रात गए जब नींद आने लगी तो जंगले में पुस्तक रख कर सो गया। संयोगवश रात को वर्षा हुई। बौछारें जंगले में हो कर आईं और पुस्तक भीग गई।
बालक सवेरे उठा तो उसे बड़ा दुख हुआ। बिना मैली कुचैली किये ठीक समय पर पुस्तक लौटा देने का वचन वह पूरा न कर सकेगा, इस पर उसे बड़ा दुःख हुआ। आँखों में आँसू भरे वह पुस्तक उधार देने वाले सज्जन के पास पहुँचा और ‘रुद्ध’ कण्ठ से भारी परिस्थिति कह सुनाई।
वे मैली पुस्तक वापिस लेने को तैयार न हुए। कीमत चुकाने को पैसे न थे। अंत में उनने यह उपाय बताया कि तीन दिन तक वह उस सज्जन के खेत में धान काटे और उस मजदूरी से पुस्तक की मूल्य भरपाई करे। बालक ने खुशी-खुशी यह स्वीकार कर लिया। तीन दिन धान काटे और वचन पूरा न करने के संकोच से छुटकारा पा लिया।
बालक लिंकन के ऐसे-ऐसे छोटे सद्गुणों ने उसे आगे बढ़ाया और बड़ा हो कर वह अमेरिका का लोक-प्रिय राष्ट्रपति चुना गया।
आपके प्रति यदि किसी का व्यवहार अनुचित प्रतीत होता है तो यह मानने के पहले कि सारा दोष उसी का है, आप अपने पर भी विचार कर लिया करें। दूसरों पर दोषारोपण करने का आधा कारण तो स्वयमेव समाप्त हो जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी की छोटी-सी भूल या अस्त-व्यस्तता पर आप मुस्करा देते हैं या व्यंगपूर्वक कुछ उपहास कर देते हैं। आपकी इस क्रिया से सामने वाले व्यक्ति के स्वाभिमान पर चोट लगना स्वाभाविक है। अपनी प्रशंसा सभी को प्यारी लगती है पर व्यंग या आलोचना हर किसी को अप्रिय है। कोई नहीं चाहता कि अकारण लोग उसका उपहास करें, मजाक उड़ायें। फिर आपके अप्रिय व्यवहार के कारण यदि औरों से अपशब्द, कटुता या तिरस्कार मिलता है तो उस अकेले का ही दोष नहीं। इसमें अपराधी आप भी हैं। आपने ही प्रारम्भ में इस स्थिति को जन्म दिया है। इसलिये दूसरों से प्रतिकार की भावना बनाने के पूर्व यदि अपना भी दोष-दर्शन कर लिया करें तो अकारण उत्पन्न होने वाले झगड़े जो कि प्रायः इसी से अधिक होते हैं, क्यों हों?
अगर किसी को अपनी बात मनवानी ही है अथवा यह पूर्ण रूप से जान लिया गया है कि अमुक कार्य में इस व्यक्ति का अहित है, आप उसे छुड़ाना चाहते हैं तो भी अशिष्ट या कटु-व्यवहार का आश्रय लेना ठीक नहीं। यदि वह व्यक्ति आपके तर्क या सिद्धान्त को नहीं मानता तो आप उसे अयोग्य, मूर्ख या दुष्ट समझने लगते हैं और अनजाने ही ऐसा कुछ कह या कर बैठते हैं जो उसे बुरा लगे। इससे दूसरे के आत्माभिमान को चोट लगती है, जिसकी प्रतिक्रिया भी कटु होती है। उससे कलह बढ़ने की ही सम्भावना अधिक रहेगी।
उसी बात को स्नेह और आत्मीयतापूर्वक कहें तो आपके संबंध भी अच्छे बने रहते हैं और आपकी बात भी मान ली जाती है। ऐसे समय किन्हीं व्यक्तियों या घटनाओं के उदाहरण प्रस्तुत करें तो प्रभाव और भी परिपुष्ट होगा किन्तु यह ध्यान बना रहे कि आपकी बात पूर्ण आत्मीयता के साथ कही जा रही है। इतने पर भी शत प्रतिशत यह आशा नहीं करनी चाहिए कि वह आपकी बात मान ही ले, क्योंकि उसकी अपनी धारणा भी तो किसी आधार पर टिकी होती है। उसके सिद्धान्त में बल है अथवा नहीं, यह अलग बात है। बात सिर्फ मान्यता की है। ऐसे समय उसे दुष्ट मानने की अपेक्षा यह देखना अधिक श्रेयस्कर है कि उसके ज्ञान या अनुभव में कमी है, या उसे प्रभावित करवाने की क्षमता का आप में अभाव है। इस प्रकार के विचार से आप उत्तेजित भी नहीं होते, क्रोध भी नहीं आता और प्रतिशोध या बदला लेने की हानिकारक भावना भी नहीं बनती। आपके संबंध भी ज्यों के त्यों बने रहते हैं। उनमें भी किसी प्रकार का तनाव पैदा नहीं होता।
मनुष्य को सम्मान उसकी योग्यता-अयोग्यता, गुरुता, कार्यक्षमता और उपयोगिता के आधार पर मिलता है। पात्रत्व के अभाव में आपको सम्मान मिलने की आशा नहीं बाँधनी चाहिए। अहंकारवश कई व्यक्ति पात्रता न होते हुए भी दूसरों से भारी सम्मान की आशा करते रहते हैं और जब वह नहीं मिलता है तो दूसरों को दोष देने लगते हैं। उन्हें अपना विरोधी शत्रु या ईर्ष्यालु मानने लगते हैं। कई व्यक्ति इसी अहंकारवश अनावश्यक शेखी-खोरी करते रहते हैं और जो उनसे सहमत नहीं होता उससे क्षुब्ध होते हैं। ऐसी झूठी शैली जताने से आपका सम्मान गिर जायेगा और दूसरों से प्रतिष्ठा पाने की आपने जो आशा की थी उससे भी वंचित बने रहेंगे।
यह भी देखिये कि ऐसी ही अपेक्षा दूसरे भी आपसे रखते हैं। जिस प्रकार आपको प्रशंसा प्रिय है। वैसे ही दूसरों को भी। आप दूसरों से सहयोग और सहानुभूति चाहते हैं वैसे ही आपके मित्र-बन्धु पड़ौसी भी आपसे ऐसी ही अपेक्षा रखते हैं। स्वयं औरों से सेवा लेकर दूसरों को अँगूठा दिखाने का संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाने से आप औरों की नजरों से गिर जायेंगे। यदि चाहते हैं आड़े वक्त आपकी कोई मदद करे तो औरों के दुःख में हाथ बंटाइये, और सहानुभूति प्रकट कीजिये। औरों के साथ उदारतापूर्वक व्यवहार करने से ही उनका हृदय जीत सकते हैं। सहयोग और सहानुभूति प्राप्त कर सकते हैं। इस संसार में सर्वत्र क्रिया की प्रतिक्रिया चलती है। “दो तो मिलेगा” की ही नीति सच्ची और व्यवहारिक है।
कई बार ऐसा होता है कि कोई बात आप भूल जाते हैं। कोई बात आपकी स्मरण शक्ति से उतर जाती है। इसका दण्ड आप अपने घर वालों, बच्चों और प्रियजनों को देने लगते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि आप यह मान बैठते हैं कि मैंने बच्चे को अमुक वस्तु लाने के लिए कह दिया था, वस्तुतः आपने कहा नहीं था। कभी-कभी अस्पष्ट या अधूरे आदेशों को दूसरा ठीक प्रकार समझ नहीं पाता और आप यह समझ बैठते हैं कि हमारी अवज्ञा की गई है। जिसे आदेश दिया था यह अपनी असमर्थता, प्रकट करता है तो इसे आप उसकी अवज्ञा मान कर दण्ड देते हैं, झिड़कते और भला-बुरा कहते हैं। भूल जाने की बात मानवीय है। आपकी ही तरह दूसरा भी मानसिक कमजोरी के कारण भूल कर सकता है। आप यहीं मान लें कि भूल हमसे या दूसरों से हो सकती है तो क्यों किसी को दण्ड देंगे, क्यों दुर्भाव पैदा करेंगे? मानसिक सन्तुलन बनाये रखने के लिए इस प्रकार करना ही अच्छा होता है।
जल्दबाजी करने से भी गलती हो जाती है। इसलिये कोई समस्या आये उस पर पूर्णरूप से विचार कर लेने के बाद ही कोई कदम उठाना अच्छा होता है। आप ढूंढ़ें तो हर परेशानी का आधा कारण तो अपने में ही मिल सकता है। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि गलती हर बार आप ही करते हैं, अनुचित रूप से किसी को अकारण दण्ड न मिले, इसलिए प्रत्येक अव्यवस्था में अपनी भूल ढूंढ़नी चाहिए। यह सम्भव है कि दूसरा व्यक्ति किसी भूल, भ्रम या परिस्थितिवश आपकी इच्छा पूरी न कर सका हो। ऐसी दशा में उस पर दुर्भाव का आरोपण कर बैठना अन्याय ही कहा जायगा। किसी के प्रति अन्यायपूर्ण धारण बना लेने से बुरी प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। इसलिए किसी पर दोषारोपण करने के पूर्व शान्त चित्त से यह देखना चाहिये कि आपकी भूल या दूसरे की विवशता के कारण ही तो ऐसा अप्रिय प्रसंग नहीं बन पड़ा जो आपको क्षुब्ध बनाये हुए है।
जो लोग प्रत्येक कार्य में अपने को ही सर्वथा सही मानकर दूसरों को भ्रान्त मानते हैं वे भूल करते हैं। इससे सचाई दब जाती है और मनोमालिन्य तथा झंझट बढ़ने लगते हैं। संसार के सभी व्यक्ति भिन्न-भिन्न स्वभाव, रुचि व प्रकृति के होते हैं। दो सगे भाइयों तक की आदतों में बड़ा अन्तर देखा जा सकता है, फिर सभी आपकी प्रकृति मान्यता का अभिरुचि का अनुकरण करें ऐसा सम्भव नहीं। किसी को चावल खाना पसन्द है, किसी को रोटी प्रिय है। इतना अन्तर तो प्रायः रहता ही है। इस तथ्य को समझते हुए, दूसरों को दोषी ठहराने, न ठहराने की समस्या का समाधान करने में अपने को ही पिछली पंक्ति में खड़ा करना पड़ेगा। समन्वय से काम चल जाय तो अच्छी बात है किन्तु कदाचित ऐसा नहीं होता तो भी अपनी रुचि भिन्नता को ध्यान में रखते हुए दूसरों की इच्छा सहन करनी चाहिए। दूसरों की इच्छा के लिए यदि अपनी अभिरुचि का दमन कर देते हैं तो प्रत्याशी पर आपकी इस सद्भावना का असर जरूर पड़ेगा। दूसरे क्षण वह आपकी इच्छाओं को प्राथमिकता देगा। घरेलू वातावरण में सद्भावना का वातावरण बनाये रखने के लिये यह अत्यावश्यक है कि प्रत्येक वस्तु का चुनाव करते समय आप यह मान लीजिए कि इसके दोषी आप भी हो सकते हैं तो आये दिन होने वाले झगड़ों में से बहुत से तो स्वतः ही मिट जायेंगे।
प्रिय दर्शन मनुष्य का श्रेष्ठ सद्गुण है। औरों में अच्छाइयाँ देखने से अपने सद्गुणों का विकास होता है। वह कहना कि दूसरे ही निरे दोषी हैं, अनुचित बात है। संसार में हर किसी में कोई न कोई सद्गुण अवश्य होता है। किसी में सफाई अधिक है, कोई ईमानदार है, कोई नेक-चलन, कोई अच्छा वक्ता है, कोई संगीतज्ञ है। आत्मीयता, उदारता, साहस, नैतिकता, श्रमशीलता जैसे सदाचारों में से कोई न कोई संपत्ति हर किसी के पास मिलेगी। इन्हें ढूँढ़ने का प्रयास करें, उनके सत्परिणामों पर ध्यान दें तो अपना भी जी करता है कि हम भी वैसा ही करें। आत्म विकास का क्रम यही है। दूसरों की अच्छाइयों का अनुकरण करना मनुष्य को आगे बढ़ाता और ऊँचा उठाता है। मानव से महामानव बनने की पद्धति यही है कि छिद्रान्वेषण के स्वभाव को त्याग कर प्रत्येक व्यक्ति में जो भी अच्छाइयाँ दिखाई दें उनकी प्रशंसा करें और स्वयं भी वैसा ही बनने का प्रयत्न करें।
जिस प्रकार हम दूसरे व्यक्तियों के सत्कर्मों से प्रेरणा लेते हैं, उसी प्रकार अपने दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ने और निकाल कर बाहर कर देने से आत्म-शोषण की प्रक्रिया और भी तीव्र होती है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी भिन्न-भिन्न कठिनाइयाँ होती हैं। हो सकता है कोई अमीर हो, कोई चिड़चिड़ा हो, कोई ईर्ष्यालु अथवा अर्थलोलुप हो। जब इन कठिनाइयों, विकारों की खोजबीन कर लें तो उन पर शान्तिपूर्वक नियन्त्रण का प्रयास करना चाहिये। मान लीजिये किसी में चिड़चिड़ापन अधिक है, बात-बात में उत्तेजित हो जाता है। अपनी भूल समझता भी है पर यह मान बैठता है, कि यह दोष उसके स्वभाव का अंग है। यह उससे छूटना सम्भव नहीं। ऐसी निराशा सर्वथा अनुपयुक्त है। मनुष्य चाहे तो अपने स्वभाव को थोड़ा प्रयत्न करके आसानी से सुधार सकता है। हमें अपना स्वभाव और दृष्टिकोण संघर्षमय न बनाकर रचनात्मक बनाना चाहिए। सड़क पर चलते हैं तो कंकड़ चुभेंगे ही किन्तु पैरों में जूते पहन लेते हैं तो चलते रहने की क्रिया में अन्तर भी नहीं पड़ता और आत्म-रक्षा भी हो जाती है।
इसी प्रकार चिड़चिड़ेपन का प्रतिद्वन्द्वी मनोभाव धैर्य और सहिष्णुता को अपना लेने से भी मानसिक प्रहारों की रक्षा की जा सकती है। प्रत्येक अशुभ संस्कार से बचने का यही सीधा-सच्चा व सरल उपाय है।
दूसरों को उजड्ड दुर्बुद्धि या विद्वेषी बताने की अपेक्षा यह अच्छा है कि आप स्वयं अपने आपको ही मिलनसार बनायें। औरों में दोष देखने का श्रम न करें। साथ ही अपनी उदारता, दूर-दर्शिता, सहनशीलता जैसे सामाजिक सद्गुणों का विकास करते रहें। इस बुद्धिमत्तापूर्ण मार्ग पर चलने से ही यह सम्भव है कि दूसरे लोग आपका सम्मान करें, आपकी बात मानें, सहयोग और सहानुभूति का व्यवहार करें। प्रायः कोई व्यक्ति स्वेच्छा से बुरा नहीं बनता अतः मनुष्य को यह सोचने की भूल कदापि नहीं करनी चाहिए कि हमारे विचारों के अनुसार जो लोग गलती करते हैं वे हमें परेशान करने के उद्देश्य से ऐसा करते हैं। इस प्रकार की कल्पनाओं से सावधान रहें ताकि किसी के साथ अन्याय न हो आप इसका कारण अपने स्वभाव की छोटी-छोटी त्रुटियाँ भी हो सकती हैं जिन्हें आप नगण्य मानते हैं। इसलिए दूसरों से सामंजस्य सौहार्द, सौजन्यता और आत्मीयता बनाये रखने के लिये यही उचित है कि जब कभी कोई अशुभ परिस्थिति उठती दिखाई दे तब अपने दोषों को भी देख लिया करें। ऐसा दृष्टिकोण अपनाने से आये दिन दूसरों के साथ होते रहने वाले झंझटों में से अधिकांश तो स्वयं ही निर्मूल हो सकते हैं।
खलीफा उमर एक दिन मगरब को नमाज पढ़ रहे थे। उनने देखा कि—आसमान में एक फरिश्ता मोटी बही बगल में दबाये उड़ा चला आ रहा है। उनने फरिश्ते को पुकारा और उस मोटी बही में क्या लिखा है यह पूछा? फरिश्ते ने कहा—’इसमें उन लोगों की नामावली है जो खुदा की इबादत करते हैं।” खलीफा को आशा थी कि उसमें उनका नाम जरूर होगा। इसलिए उनने पूछा—भाई, जरा देखना मेरा भी नाम इस बही में है न? सारी बही उलट-पलट कर देखने पर भी जब उनका नाम न मिला तो फरिश्ते ने शिर हिला दिया। खलीफा बहुत निराश हुए। जीवन भर खुदा के लिए काम करते रहने पर भी उनका नाम इबादत करने वालों की नामावली में शामिल न हो सका। कुछ दिन बाद उसने फिर एक ऐसे ही फरिश्ते का आकाश में उड़ते देखा जिसके हाथ में एक छोटी-सी पुस्तक थी। खलीफा ने उसे भी पुकारा और उस पुस्तक में क्या लिखा है यह पूछा? फरिश्ते ने कहा—’इसमें उन लोगों के नाम दर्ज हैं जिनकी इबादत खुदाबन्द करीम करते हैं।’ खलीफा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या कोई ऐसे लोग भी हो सकते हैं जिनकी इबादत खुदा खुद करे। पुस्तक का पहला पन्ना खोला गया तो उसमें सबसे पहला नाम खलीफा उमर का ही था। फरिश्ते ने कहा—जो लोग खुदा के मकसद को पूरा करने में, उसकी दुनिया को अच्छा बनाने में लगे रहते हैं उनकी भक्ति सचमुच इतनी ही ऊँची है कि खुदा को उनकी इबादत खुद करनी पड़े।
यह विश्व व्यवस्था अपनी गति से चलती है,
तुम चाहो तो इस गति का लाभ उठा देखो।
व्यक्तित्व तुम्हारा यदि शुभ गति का प्रेमी हो,
तो उसमें प्रभु का प्रेरक हाथ लगा देखो।
तुम कुछ न करोगे तो भी विश्व चलेगा ही,
फिर क्या नर का कतृत्य ज्ञान निस्सार नहीं?
वह क्या बाँसों लम्बा अधिकार जताएगा?
जिसका अपनी साँसों पर भी अधिकार नहीं।
तब गर्व और अधिकारों का लड़ना छोड़ो,
कर्तृत्व नहीं कर्तव्य भाव का ध्यान करो।
निश्चय तुम होगे अखिल विश्व वैभव स्वामी,
यदि तुम अपनी सच्ची विभुता का ज्ञान करो।
काँटे दिखते हैं जब कि फूल से हटता मन,
अवगुण दिखते हैं जब कि गुणों से आँख हटे।
उस मन के कमरे में दुख क्यों आ पायेगा?
जिस कमरे में आनन्द और उल्लास डटे।
—बलदेवप्रसाद मिश्र
अपना अतिशय चैतन्य लिए इस धरती पर-
युग के श्वासों को सुरभित करने आये हो।
कलि के कर्दम में खड़े हुए तुम पंगज से—
अपनी सुषमा में सतयुग को भरलाये हो॥
फिर भी निर्लिप्त निछावर करते आये हो-
जन-हेतु स्वयं के जीवन का तुम हर स्पंदन।
युग-पुरुष! तुम्हारा अभिनन्दन—
युग की पीड़ा का हालाहल खुद पीकर तुम-
पीयूष सभी को बाँट रहे हो, निर्भय बन।
वत्सलता की यह गोद हो गई हरी भरी-
पर-हित जब से कि समर्पित तुमने किया स्तवन।
युग के पथ दर्शक! आज तुम्हारी सेवा में-
युग-श्रद्धा आई है करने को पद-बंधन॥
युग-पुरुष ! तुम्हारा अभिनन्दन-
—मुनि बुद्धमल
असत् से ले चल सत् की ओर,
तमस् से मुझे ज्योति की ओर,
मृत्यु से अमृत-पथ की ओर—
असत् से ले चल सत् की ओर!
—रामस्वरूप ‘खरे’
जीवन में अभ्युत्थान लिये,
अभिनव उन्नत निर्माण लिये,
जागृति के नूतन गान लिये,
नवयुग का नव आह्वान लिये,
मानवता के सम्मान जाग,
शक्ति स्रोत तूफान जाग,
उत्कर्षों के अभिमान जाग,
प्राचीन स्वर्ग विहान जाग,
—अज्ञात
यह अकेलापन, अँधेरा, यह उदासी, यह घुटन,
द्वार तो हैं बन्द, भीतर किस तरह झाँके किरन!
बन्द दरवाजे जरा से खोलिए,
रोशनी के साथ हँसिए-बोलिए
मौन पीले पात-सा झर जायगा,
तो हृदय का घाव खुद भर जायगा!
एक जीना है हृदय में भी, सहज घर में नहीं,
सर्जना के दूत आते हैं सभी होकर वहीं!
ये अहम् की शृंखलाएं तोड़िए,
और कुछ नाता कली से जोड़िए,
जब सड़क का झोर भीतर आयेगा,
तो अकेलापन स्वयं मर जायगा।
आइए, कुछ रोज कोलाहल भरा जीवन जिएँ,
अंजुरी भर दूसरों के दर्द का अमरित पिएँ।
—बालस्वरूप ‘राही’
बैसाख सुदी पूर्णिमा से लेकर जेष्ठ सुदी पूर्णिमा तक एक महीने गायत्री तपोभूमि में दस-दस दिन के तीन शिक्षण शिविर सानन्द पूर्ण हुए। देश के कोने-कोने से ‘युग-निर्माण’ योजना में अभिरुचि लेने वाले प्रबुद्ध परिजन इन शिविरों में भाग लेने आये। प्रथम शिविर 26 मई से 4 जून तक, दूसरा 5 से 14 जून तक और तीसरा 15 से 24 जून तक सम्पन्न हुआ। इस एक महीने प्रेम, आनन्द, उल्लास और सद्ज्ञान की प्रेरणा का ऐसा स्वर्गीय वातावरण यहाँ बना रहा कि विदा होते समय हर शिक्षार्थी की आँखें छलछला आई। विवशता के कारण जाना तो था पर जाने के लिए इच्छा किसी की भी न होती थी। देवभूमि में ठहरने का जितना स्थान है तथा जितने लोगों के साथ व्यक्तिगत परामर्श कर सकना सम्भव है उसे ध्यान में रखते हुए ही आने वालों को स्वीकृति दी गई थी।
यह तीनों शिविर परामर्श शिविर थे। शिक्षार्थियों का जीवन किस प्रकार सुविकसित एवं सुसंस्कृत बने, इस संबंध में आवश्यक परामर्श दिये गए और वे ऐसा कार्य-क्रम बनाकर ले गये जिस पर चलना घर पहुँचते ही आरंभ करेंगे। दस दिन की शिक्षा में यह भली प्रकार समझाया गया कि आध्यात्म केवल पूजा पाठ की ही वस्तु नहीं है, वरन् उसका लाभ उठाया जा सकना तभी संभव है जब इन उच्च आदर्शों का अपने व्यावहारिक जीवन में समावेश किया जाय। उपासना का निश्चय ही बहुत महत्व है पर जब तक जीवन-निर्माण की साधना के लिए भी समुचित प्रयत्न न किया जायगा तब तक उपासना एकाँगी एवं अपूर्ण रहेगी और उसका समुचित लाभ उपलब्ध न हो सकेगा। इसलिए जिन्हें वस्तुतः आत्मिक प्रगति करनी हो उन्हें उच्च आदर्शों को अपने दैनिक व्यवहार में समाविष्ट करना चाहिए। इस तथ्य को इन शिविरों में ऐसी अच्छी तरह प्रतिपादित किया गया कि आगन्तुकों में से प्रत्येक ने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाने की प्रतिज्ञा की और इसके लिए आरम्भिक शुभारम्भ उसी समय से आरम्भ कर दिया। स्थिति को देखते हुए यह विश्वास किया जा सकता है कि जो भी सज्जन इन शिविरों में आये वे उत्कृष्ट एवं आदर्श जीवन-यापन के लिए अपने प्रयत्नों को और भी तीव्र करेंगे। यदि यह प्रयत्न जारी रहे तो यह निश्चित है कि इन शिक्षार्थियों में से अनेकों प्रकाशवान् उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह चमकते हुए दृष्टिगोचर होंगे। पिछले पच्चीस वर्षों में अखण्ड-ज्योति आध्यात्मिक आदर्शों के प्रसार में लगी रही, अब वह समय आ गया है कि उन आदर्शों को व्यवहारिक जीवन में समाविष्ट करने के लिए एक आन्दोलन के रूप में कटिबद्ध हुआ जाय। यही शिविर उसी भावना से बुलाये गये थे। स्थिति को देखते हुए यह विश्वास किया जा सकता है कि वे पूर्ण सफल रहे। इस बार के इन शिविरों में प्रायः विचारशील और सुसंस्कृत लोग ही थे, इसलिए उनके विचार और परामर्शों को युग-निर्माण योजना के सफल एवं व्यापक बनाने के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा। विचार गोष्ठियों में योजना के प्रत्येक पहलू पर गम्भीर विचार विनिमय हुआ और अन्त में शत-सूत्री योजना का सार लेकर स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज निर्माण करने की युग-निर्माण योजना को एक व्यापक आन्दोलन के रूप में व्यापक बनाने का निश्चय किया गया।
गत वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर 6 जुलाई को युग-निर्माण योजना का विधिवत् उद्घाटन हुआ था। उस बात को एक वर्ष पूरा होने को जा रहा है। इस अवधि में जो कार्य हुआ उसे असंतोषजनक नहीं कहा जा सकता पर अभी जो करना शेष है, वह भी बहुत है। द्वितीय वर्ष की कार्यपद्धति का निर्धारण करने के लिए इन तीन शिविरों में परिवार के प्रबुद्ध परिजनों एवं कर्मठ कार्यकर्ताओं को बुलाया गया था। उनके परामर्श से जो कार्यक्रम बना उसे प्रत्येक दृष्टि से महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। शिविरों के विचार-विमर्श एवं निष्कर्ष का साराँश पाठक अगले पृष्ठों पर पढ़ें।
यह निर्विवाद है कि धर्म और सदाचार के आदर्शवादी सिद्धान्तों का प्रशिक्षण भाषणों और लेखों से पूरा नहीं हो सकता। यह दो माध्यम महत्वपूर्ण तो हैं पर इनका उपयोग इतना ही है कि वातावरण तैयार कर सकें। वास्तविक प्रभाव तो तभी पड़ता है जब अपना अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करके किसी को प्रभावित किया जाय। चूँकि हमें नये समाज की, नये आदर्शों की, जन-मानस में प्रतिष्ठापना करनी है इसलिए यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य दूसरों के सामने अपना अनुकरणीय आदर्श रखें। प्रचार का यही श्रेष्ठ तरीका है। इस पद्धति को अपनाये बिना जन-मानस को उत्कृष्टता की दिशा में प्रभावित एवं प्रेरित किया जाना सम्भव नहीं। इसलिए आगामी वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण कार्य यह है कि परिवार का प्रत्येक सदस्य इस बात की चेष्टा करे कि उसके जीवन में आलस, प्रमाद, अव्यवस्था एवं अनैतिकता की जो दुर्बलताएं समाई हुई हों उनका गम्भीरतापूर्वक निरीक्षण करे और इस आत्म चिन्तन में जो-जो दोष दृष्टिगोचर हों उन्हें सुधारने के लिए एक क्रम-बद्ध योजना बनाकर आगे बढ़ चले।
आत्म-चिन्तन के लिए हममें से हर एक को अपने से निम्न प्रश्न पूछने चाहिए और उनके उत्तरों को नोट करना चाहिए।
समय जैसी बहुमूल्य जीवन निधि का हम ठीक प्रकार सदुपयोग करते हैं या नहीं? आलस्य और प्रमाद में उसकी बर्बादी तो नहीं होती?
जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का हमें ध्यान है या नहीं? शरीर सज्जा में ही इस अमूल्य अवसर को नष्ट तो नहीं कर रहे? देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के पुनीत कर्तव्य की उपेक्षा तो नहीं करते?
अपनी विचारधारा एवं गतिविधियों को हमने अन्धानुकरण के आधार पर बनाया है या विवेक दूर-दर्शिता एवं आदर्शवादिता के अनुसार उनका निर्धारण किया है।
मनोविकारों और कुसंस्कारों के शमन करने के लिए हम संघर्षशील रहते हैं या नहीं? छोटे-छोटे कारणों को लेकर हम अपनी मानसिक शान्ति से हाथ धो बैठने और प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध करने की भूल तो नहीं करते?
कटु भाषण, छिद्रान्वेषण एवं अशुभ कल्पनाएं करते रहने की आदतें छोड़कर सदा सन्तुष्ट, प्रयत्नशील एवं हँसमुख रहने की आदत हम डाल रहे हैं या नहीं?
शरीर, वस्त्र, घर तथा वस्तुओं का स्वच्छ एवं सुव्यवस्थित रखने को अभ्यास आरम्भ किया या नहीं? श्रम से घृणा तो नहीं करते?
परिवार को सुसंस्कारी बनाने के लिए आवश्यक ध्यान एवं समय लगाते हैं या नहीं?
आहार सात्विकता प्रधान होता है न? चटोरपन की आदत छोड़ी जा रही है न? सप्ताह में एक समय उपवास, जल्दी सोना, जल्दी उठना—आवश्यक ब्रह्मचर्य का नियम पालते हैं न?
ईश्वर उपासना, आत्म-चिन्तन, स्वाध्याय को अपने नित्य-नियम मं स्थान दे रखा है न?
आमदनी से अधिक खर्च तो नहीं करते? कोई दुर्व्यसन तो नहीं? बचत करते हैं न?
उपरोक्त दस प्रश्न नित्य अपने आपसे पूछते रहने वाले को जो उत्तर आत्मा दे उन पर विचार करना चाहिए और जो त्रुटियाँ दृष्टिगोचर हों उन्हें सुधारने का नित्य ही प्रयत्न करना चाहिए।
आत्म सुधार के लिए क्रमिक परिष्कार की पद्धति को अपनाने से भी काम चल सकता है। अपने सारे दोष दूषणों को एक ही दिन में त्याग देने का उत्साह तो लोगों में आता है पर संकल्प-शक्ति के अभाव में बहुधा वह प्रतिज्ञा निभ नहीं पाती, थोड़े समय में वही पुराना कुसंस्कारी ढर्रा आरम्भ हो जाता है। प्रतिज्ञाएं करने और उन्हें न निभा सकने से अपना संकल्प बल घटता है और फिर छोटी-छोटी प्रतिज्ञाओं को निभाना भी कठिन हो जाता है। यह क्रम कई बार चलाने पर तो मनुष्य का आत्म विश्वास ही हिल उठता है और वह सोचता है कि हमारे कुसंस्कार इतने प्रबल हैं कि जीवनोत्कर्ष की दिशा में बदल सकना अपने लिए संभव ही न होगा। यह निराशाजनक स्थिति तभी आती है जब कोई व्यक्ति आवेश और उत्साह में अपने समस्त दोष दुर्गुणों को तुरन्त त्याग कर देने की प्रतिज्ञा करता है और मनोबल की न्यूनता के कारण चिर-संचित कुसंस्कारों से लड़ नहीं सकता।
आत्म शोधन का कार्य एक प्रकार का देवासुर-संग्राम है। संस्कारों की आसुरी वृत्तियाँ अपना मोर्चा जमाये बैठी रहती हैं और वे सुसंस्कार धारण के प्रयत्नों को निष्फल बनाने के लिए अनेकों छल-दल करती रहती हैं। इसलिये क्रमशः आगे बढ़ने और मंथर किन्तु सुव्यवस्थित रीति से अपने दोष दुर्गुणों को परास्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। सही तरीका यह है अपनी सभी बुराइयों एवं दुर्बलताओं को एक कागज पर नोट कर लेना चाहिए और प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर उसी दिन का ऐसा कार्यक्रम बनाना चाहिए कि आज अपनी अमुक दुर्बलता को इतने अंशों में तो घटा ही देना है। उस दिन का जो कार्यक्रम बनाया जाय उसके सम्बन्ध में विचार कर लेना चाहिए कि इनमें कब, कहाँ, कितने, किन कुसंस्कारों के प्रबल होने की सम्भावनाओं के सामने आने पर हमें कम से कम कितनी आदर्शवादिता तो दिखानी ही चाहिए, यह निर्णय पहले ही कर लेना चाहिए और फिर सारे दिन प्रातःकाल की हुई प्रतिज्ञा के निबाहने का दृढ़तापूर्वक प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी सफलता भी आत्मसुधार की दिशा में प्राप्त होती चले तो अपना साहस बढ़ेगा और धीरे-धीरे सभी दुर्गुणों को छोड़ सकना सम्भव हो जाएगा।
आज इतनी मात्रा में ही भोजन करेंगे, इतनी दूर टहलने जायेंगे, इतना व्यायाम करेंगे, आज तो ब्रह्मचर्य रखेंगे ही, बीड़ी पीने आदि का कोई व्यसन हो तो रोज जितनी बीड़ी पीते थे उसमें एक कम कर ही देंगे, इतने समय तो भजन या स्वाध्याय करेंगे ही, सफर एवं व्यवस्था में आज इतनी देर का अमुक समय तो लगावेंगे ही, इस प्रकार की छोटी-छोटी प्रतिज्ञाएं नित्य लेनी चाहिए और उन्हें अत्यन्त कड़ाई के साथ उस दिन तो पालन कर ही लेना चाहिए। दूसरे दिन की स्थिति समझते हुए फिर दूसरे दिन की सुधरी दिनचर्या बनाई जाय। इसमें शारीरिक क्रियाओं का ही नहीं, मानसिक गतिविधियों का सुधार करने का भी ध्यान रखा गया हो। प्रतिदिन छोटी-छोटी सफलताएं प्राप्त करते चलने से अपना मनोबल निरन्तर बढ़ता है और फिर एक दिन साहस एवं संकल्प बल इतना प्रबल हो जाता है कि आत्म शोधन की किसी कठोर प्रतिज्ञा को कुछ दिन ही नहीं, वरन् आजीवन निबाहते रहना सरल हो जाता है।
दैनिक आत्म-चिन्तन एवं दिनचर्या निर्धारण के लिए एक समय निर्धारित किया जाय। दिनचर्या निर्धारण के लिए, प्रातः सोकर उठते ही जब तक शैय्या त्याग न किया जाय वह समय सर्वोत्तम है। आमतौर से नींद खुलने के कुछ देर बाद ही लोग शैय्या त्यागते हैं। कुछ समय तो ऐसे ही आलस में पड़े रहते हैं। यह समय दैनिक कार्यक्रम बनाने के लिए सर्वोत्तम है। इसी प्रकार आत्म चिन्तन के लिए रात को सोते समय का अवसर सर्वोत्तम है। शैय्या पर जाते ही तुरन्त किसी को नींद नहीं आ जाती, इसमें कुछ देर लगती है। इस अवसर को आत्म-चिन्तन में, अपने आपसे 10 प्रश्न पूछने और उनके उत्तर प्राप्त करने में लगाया जा सकता है। जिनके पास अन्य सुविधा के समय मौजूद हों वे इन कार्यों को सुविधा के अन्य समयों पर भी कर सकते हैं। पर उपरोक्त दो समय व्यस्त से व्यस्त सज्जनों के लिए भी सुविधाजनक रह सकते हैं और इन दोनों प्रक्रियाओं को अपना कर हम आसानी ये आत्मिक प्रगति के पथ पर बहुत आगे तक बढ़ सकते हैं।
ज्येष्ठ के शिविरों में आये हुए प्रायः प्रत्येक शिक्षार्थी ने जीवन साधना की इस पद्धति को दैनिक कार्यक्रम में सम्मिलित करने का संकल्प किया और विश्वासपूर्वक कहा कि वे इसे दृढ़तापूर्वक आजीवन निबाहते रहेंगे। शिविरों में जो परिजन परिस्थिति वश पधार नहीं सके उन्हें भी इस प्रेरणा को अपनाना चाहिए और इस शिक्षण में सम्मिलित होने का लाभ लेना चाहिए।
आत्म-शोधन के लिए दस प्रश्नों को रोज अपने आपसे पूछना और जो त्रुटियाँ परिलक्षित हों उन्हें क्रमशः किन्तु पूर्ण श्रद्धा और दृढ़ता के साथ सुधारने के लिये नित्य नियमित रूप से प्रयत्न करते रहना यह आध्यात्मिक उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रथम साधन है। अखण्ड-ज्योति परिवार के युग-निर्माण योजना के प्रत्येक सदस्य को अनिवार्य रूप से इसे आरम्भ कर देना है। दूसरा कार्यक्रम जो इतना ही महत्वपूर्ण है वह यह है कि सत्प्रवृत्तियों को केवल अपने तक ही सीमित करके सन्तोष न कर लिया जाय वरन् उन्हें व्यापक बनाने के लिये, अपने समीपवर्ती क्षेत्र में प्रतिष्ठित करने के लिये सामर्थ्य भर प्रयत्न किया जाय। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि एक व्यक्ति कितना ही भला, कितना ही सज्जन, कितना ही आध्यात्मवादी क्यों न हो, यदि वह चारों ओर बुरे व्यक्तियों और बुरे वातावरण से घिरा होगा, तो अपनी शक्ति एवं सज्जनता को स्थिर न रख सकेगा जिसके स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन, चाचा, ताई, भतीजे, दुष्ट प्रकृति के हों निरन्तर कलह और दुष्टता का वातावरण बनाए रहते हों तो वहाँ अपने आत्मिक प्रयोगों को पूरा कर सकना भी असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य हो जायगा। इसी प्रकार जिस नगर या समाज में दुर्बुद्धि समाई हुई हो उसमें रहते हुए कोई व्यक्ति अपनी सुख-शान्ति के साथ निर्वाह नहीं कर सकता । इस दुनिया को छोड़कर कहीं अन्यत्र भाग जाना सम्भव नहीं। वन, पर्वतों को जाएं तो भी वहाँ का समीपवर्ती वातावरण सुधारना ही पड़ता है। यह सुधार कार्य हमें अपने निकटवर्ती क्षेत्र में आरम्भ कर देना चाहिये।
पुण्य परमार्थ की दृष्टि से भी सबसे बड़ा शुभ कार्य दूसरों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना ही माना गया हैं। इसी को ब्रह्म-कर्म कहते है। साधु ब्राह्मण इसी प्रक्रिया में संलग्न रहने के कारण पूज्य माने जाते थे। इस परमार्थ को हमें भी अपने जीवन में अपनाना ही पड़ेगा। स्वार्थ से परमार्थ की ओर बढ़ने का सर्वश्रेष्ठ साधन यही हो सकता है कि हम अपने सम्बन्धित व्यक्तियों को उत्कृष्ट जीवन जीने की प्रेरणा देने का भी कार्य अपने दैनिक जीवन में होने वाले अनेक कार्यों में से एक महत्वपूर्ण आवश्यकता के रूप में करना आरम्भ कर दें।
अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जीवन-निर्माण का, व्यावहारिक आध्यात्म का—जो व्यापक प्रशिक्षण हो रहा है उसकी देश विदेश के असंख्य विचारकों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है। यह सर्वथा सत्य है कि अखण्ड-ज्योति में प्रस्तुत विचार-धारा को अपना कर कोई भी व्यक्ति जीवन की समग्र प्रगति का द्वार प्रशस्त कर सकता है। हमें चाहिए कि अपनी अखण्ड-ज्योति को अपने घर के समस्त सदस्यों को पढ़ाने या सुनाने की व्यवस्था बना लें। परिवार के साथ ही हमें जीवन काटना है, यदि वे सुसंस्कृत नहीं बनते तो अपनी अवाँछनीय गतिविधियों के कारण स्वयं भी दुख पायेंगे और हमें भी उद्विग्न बनाये रहेंगे। इसलिये समय रहते उनके परिष्कार का उपाय किया जाय। इस प्रकार के उपायों में एक कारगर उपाय यह है कि उन्हें अखण्ड-ज्योति द्वारा प्रस्तुत विचारधारा को पढ़ने या सुनने में अभिरुचि उत्पन्न की जाय। अपने परिजनों के साथ इससे बड़ा उपकार दूसरा और कोई हो नहीं सकता कि वे सद्गुणी और सुसंस्कृत बनने की प्रेरणा प्राप्त करें । उनके भविष्य उज्ज्वल बनाने वाला यही श्रेष्ठ साधन है जो कोई अभिभावक आसानी से अपने परिवार के लिये प्रस्तुत कर सकता है।
अपने व्यक्तित्व एवं परिवार को सुसंस्कृत बनाने की तरह ही अपने रिश्तेदारों, मित्रों एवं परिचितों को भी यह लाभ दिया जाना चाहिये। जिनका भी हित साधन हमें अभीष्ट हो, उन्हें सद्ज्ञान की प्रेरणा से सुसंबद्ध कर देना चाहिए। किसी को धन दौलत या कीमती वस्तुओं का उपहार देने की अपेक्षा यह कहीं अधिक उत्तम है कि उन्हें आत्म-निर्माण के लिये प्रेरणा देने वाले साहित्य, संस्थान एवं वातावरण के साथ जोड़ दिया जाए। स्वयं का व्यक्तित्व यदि दूसरों को ऊँचा उठाने के उपयुक्त न हो, अपने को इतना प्राप्त न हो जो जहाँ यह सब मौजूद है उसके साथ सम्बद्ध करके भी दूसरों का भारी हितसाधन किया जा सकता है। अगले वर्ष यह कार्य अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को पूरा करना है। एक भी पाठक ऐसा न हो तो अकेला ही अपनी पत्रिका पढ़कर उसे कूड़े में पटक देता हो। हममें से हर एक को यह व्रत लेना है कि उसकी पत्रिका से लाभ उठाने वालों की—पढ़ने या सुनने वालों की संख्या कम से कम दस होगी। यह धर्मप्रचार-ज्ञानप्रसार, ब्रह्मदान जितना सरल है उतना ही महत्वपूर्ण भी है। हम तीस हजार अखण्ड-ज्योति के सदस्य इस प्रक्रिया को अपना कर कुछ ही महीनों में तीन लाख हो सकते हैं।
‘एक से दस’ की पद्धति अपना कर ही हम अपने संगठन एवं परिवार को व्यापक बना सकते हैं। लोक-निर्माण का, युग परिवर्तन का महान मिशन इसी प्रकार तो पूरा होगा। इसके लिए हर सदस्य को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी पड़ेगी जेष्ठ के शिविरों में आये हुए शिक्षार्थियों ने यह प्रतिज्ञा की है कि वे स्वयं तो अपना कर्तव्यपालन करेंगे ही, साथ ही परिवार के अन्य सदस्य जहाँ कहीं इस दिशा में शिथिलता दिखाते मिलेंगे, वहाँ बलपूर्वक उनसे आग्रह अनुरोध करके ‘एक से दस’ की प्रसार पद्धति को कार्यान्वित कराने में कुछ उठा न रखेंगे। तीस हजार को तीन लाख में इस वर्ष परिणित हो ही जाना चाहिये।
हममें से हर एक को ‘मिशनरी भावना’ के साथ काम करना होगा। धर्म प्रचार के पुण्य कार्य में किसी रूप से हाथ बंटाना ही होगा। स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य समाज के रचना अभियान में जो साथी हाथ पर हाथ धरे उदासीन बैठा रहेगा उसके लिये यही कहा जा सकता है कि अभागे ने युग की पुकार को अनसुनी करके एक महत्वपूर्ण अवसर पर ‘अनार्यजुष्ट, अस्वर्ग, अकीर्तिकर कश्मल’ अपनाकर—कृपणता दिखाकर—अपने साथ शोचनीय अन्याय कर डाला।
जिस प्रकार घर में अच्छा फर्नीचर, जेवर, वस्त्र आदि की व्यवस्था प्रत्येक सद्गृहस्थ करता है उसी प्रकार प्रत्येक परिजन के पास एक युग-निर्माण पुस्तकालय होना चाहिये। जमीन जायदाद की तरह घर की यह भी एक दैवी सम्पदा होगी। जीवन-निर्माण के प्रत्येक पहलू पर आवश्यक ज्ञान एवं प्रेरणा देने वाली पुस्तकें इस पुस्तकालय में नियमित रूप से मँगाई जाती रहें। इस घरेलू पुस्तकालय का बजट पाँच रुपया मासिक तो रहना ही चाहिये। किसी अच्छे परिवार का पूरा खर्च चलने में कई सौ रुपया मासिक उठ जाता है। उसमें से किसी भी मद में कमी करके इतनी गुंजाइश निकाल लेनी चाहिये और इतने मूल्य की प्रेरणाप्रद पुस्तकें हर महीने नियमित रूप से बढ़ाते रहना चाहिए। पाँच रुपये में लगभग 500 पृष्ठ का सत् साहित्य उपलब्ध हो सकता है। अन्तःकरण की भूख बुझाने के लिए इतना साधन तो जुटाना ही चाहिये। सारे परिवार के लिए भोजन खर्च में यदि सौ-दो-सौ खर्च हो सकते हैं तो क्या उन सब की आत्मिक क्षुधा को बुझाने के लिये पाँच रुपया की रकम कोई बड़ी बात मानी जायगी। स्कूली शिक्षा पर हर परिवार में काफी खर्च पड़ता है। जीवन विद्या सीखने के लिये पूरा परिवार यदि इतनी छोटी रकम भी खर्च न कर सके तो उसकी दूरदर्शिता को संदिग्ध ही माना जायगा।
जहाँ एक व्यक्ति एक युग-निर्माण पुस्तकालय न चला सके वहाँ कई व्यक्ति मिलकर भी वैसी व्यवस्था कर सकते हैं। एक-एक रुपया मासिक के पाँच सदस्य मिलकर ही एक पुस्तकालय चला सकते हैं। पर इतना ही पर्याप्त न होगा कि पैसे का प्रबन्ध करके सत्साहित्य मँगाना प्रारम्भ कर दिया जाय। वरन् आवश्यकता इस बात की होगी कि इन वस्तुओं को पढ़ने के लिये अपने घर में ही नहीं वरन् बाहर भी अभिरुचि उत्पन्न की जाय। दुर्भाग्य से आज हमारे देश में 23 प्रतिशत लोग ही शिक्षित है, इन शिक्षितों में भी ज्ञानवर्धक साहित्य का स्वाध्याय कोई विरले ही करते हैं। जिन्हें पढ़ने लिखने का शौक है वे घटिया चीजें पढ़ते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम आत्मोत्कर्ष के विषय में अभिरुचि जागृत करें और लोगों के पीछे पड़कर उनमें जीवन-निर्माण के—युग-निर्माण के संबंध में आवश्यक जानकारी, अभिरुचि एवं आकाँक्षा उत्पन्न की जाय। इसके लिए भावनाशील शिक्षितों के साथ संपर्क बनाने, उन्हें प्रोत्साहित करने, पुस्तकें पढ़ने देने और वापिस लेने के लिये घर-घर जाने का कार्यक्रम अपनाया जाय। यह धर्मफेरी देखने सुनने में कितनी ही छोटी प्रतीत क्यों न हो, इसका परिणाम अत्यन्त व्यापक हो सकता है। हम लोग लाखों सुशिक्षितों को युग-निर्माण के व्यापार स्तम्भ बनाने की शिक्षा देकर देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति की भारी सेवा कर सकते हैं।
प्रस्तुत पुस्तकालय योजना के अंतर्गत यदि प्रत्येक ज्ञान केन्द्र से पच्ची-पच्चीस व्यक्तियों को लाभ उठाने का अवसर प्राप्त हो सके तो दसियों लाख राष्ट्र के होनहार लोगों को प्रशिक्षित करने की एक अत्यन्त व्यापक योजना बात की बात में खड़ी हो सकती है। दान की परम्परा भारतीय धर्म का प्रधान अंग रही है। हम किसी न किसी प्रकार दान-पुण्य करते ही रहते हैं। यह ज्ञानदान किसी भी धर्म-कृत्य से कम महत्वपूर्ण नहीं। फिर हम अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य अपने युग-निर्माण संकल्प के अंतर्गत इस बात के लिये प्रतिज्ञाबद्ध भी हैं कि अपनी आजीविका का एक अंश युग-निर्माण कार्यों के लिये लगाते रहेंगे। योजना का प्रधान माध्यम विचार परिवर्तन ही होता है। इस प्रयोजन के लिए हमारी आजीविका का एक अंश लगना ही चाहिये। जीवन निर्माण की कला सिखाने वाले पुस्तकालयों की स्थापना को श्रेष्ठ पुण्य परमार्थ मानकर चलने से मानव अन्तःकरण के उत्कर्ष की समस्या सहज ही हल हो सकती है। प्रयत्न यह किया जा रहा है कि जीवन की प्रत्येक समस्या पर प्रकाश डालने वाला श्रेष्ठ साहित्य एक ही स्थान से उचित मूल्य पर मिलता रहे और उसे ढूँढ़ने या जहाँ तहाँ से मँगाने का झंझट पाठकों को उठाना न पड़े। इससे इन पुस्तकालयों के संचालन में सुविधा ही रहेगी।
सत्प्रवृत्तियों की ओर अभिमुख व्यक्तियों का संगठन आवश्यक है। संगठन ही इस युग की सबसे बड़ी शक्ति है। उसी के आधार पर नये समाज की अभिनव रचना का उद्देश्य पूर्ण हो सकेगा। अखण्ड-ज्योति परिवार को यदि ठीक ढंग से संगठित कर लिया जाय तो प्रबुद्ध वर्ग का यह विशाल जन-समुदाय राष्ट्र की एक महती रचनात्मक शक्ति बन सकता है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये इस अखण्ड ज्योति सदस्यों के संगठन को एक शाखा और उसके प्रमुख कार्यकर्ता को शाखा संचालक माने जाने की पद्धति बना दी गई है। इस प्रक्रिया के अनुसार आधे से अधिक सदस्य संगठित हो चुके हैं। जो शेष हैं उन्हें अपना संगठन-प्रयोजन पूरा कर लेना चाहिये। दस-दस के विभागों में संगठित यह घटक क्रमशः एक विशाल संगठन में परिणित होंगे तो उनकी क्षेत्रीय, प्रान्तीय, अखिल भारतीय या सार्वभौम शक्तियाँ उन रचनात्मक कार्य-क्रमों को आसानी से पूर्ण कर सकेगी जो युग-परिवर्तन के लिये अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। हमें सुसंगठित होने की प्रक्रिया में पूरी तेजी लानी चाहिये यह परिवार के सभी लोगों ने एक मत से स्वीकार किया है। ज्येष्ठ मास में सम्पन्न हुए तीनों शिविरों के शिक्षार्थी इस ओर उत्साहपूर्वक काम करने का निश्चय करके ही विदा हुए हैं। जो नहीं आ सके उन्हें भी अपना संगठन कार्य इस वर्ष पूरा कर ही लेना है। अखंड ज्योति परिवार जब एक संगठित शक्ति के रूप में परिणित होगा तब उसकी अकूत सामर्थ्य देखते ही बन पड़ेगी।
मनुष्य का समस्त विकास तीन भागों में विभक्त है। (1) शरीर, (2) मन (3) समाज इन तीनों को सुदृढ़ एवं समुन्नत बनाने का प्रयास करते हुए ही हम आत्मोत्कर्ष का लक्ष्य पूरा कर सकते हैं। युग-निर्माण योजना, स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की अभिनव रचना के एक सुनियोजित अभियान के रूप में ही अग्रसर हुई है।
जीवन के इन तीनों पहलुओं को सुविकसित बनाने के लिए व्यक्तिगत और सामूहिक प्रयत्नों के द्वारा पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाना चाहिये। उन्हीं विचारों को सार्थक कहा जा सकता है जो कार्य रूप में परिणित हो सकें। परामर्श विचारों में से आमतौर से यह विचार विनिमय होता रहा कि युग-निर्माण की विचारधारा को कार्यान्वित करने के लिए हमें किस प्रकार और क्या-क्या कदम उठाने चाहिएं।
स्वास्थ्य आन्दोलन के संबंध में निश्चय हुआ कि हम लोग (1) प्रातः दूध, छाछ, नींबू, शहद, जैसी पतली वस्तुओं के अतिरिक्त दिन में केवल दो-बार ही भोजन किया करें। बीच-बीच में कुछ-न-कुछ खाते पीते रहने की आदत छोड़ें।
(2) चटोरापन छोड़ें। भोजन सुपाच्य, सादा, हलका, शाक भाजियों की अधिक मात्रा का एवं कम-से-कम मसालों का लिया करें। खाद्य पदार्थों की संख्या कम ही रहा करे।
(3) भाप से पकाने और हाथ चक्की का आटा लेने की व्यवस्था करें।
(4) माँस मछली, अण्डा, पकवान, मिठाई, चाट, पकौड़ी, अचार एवं व्यंजनों की आदत छोड़ें। शराब, गाँजा, भाँग, अफीम, तमाखू, चाय जैसे नशों से बचे ही रहें।
(5) शरीर, वस्त्र, घर भोजन और सामान की सफाई का पूरा ध्यान रखें खुली हवा और धूप से संपर्क रखें।
(6) ब्रह्मचर्य का अधिकाधिक पालन करें।
(7) जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत डालें।
(8) सप्ताह में कम-से-कम एक समय का उपवास किया करें।
(9) फल-शाक एवं फलदार वृक्षों के लगाने का सामूहिक प्रयत्न करें।
(10) व्यायामशालायें खोलें, व्यायाम शिक्षा की व्यवस्था बनावें और प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा रोग निवारण की पद्धति का प्रसार करें।
यह दस कार्य-क्रम स्वास्थ्य संवर्धन के लिये महत्वपूर्ण हैं। थोड़ा-सा ध्यान देकर अपने व्यक्तिगत जीवन में, परिवार के तथा समीपवर्ती लोगों में इन बातों को आसानी से प्रतिष्ठापित किया जा सकता है, अध्यापक अपने छात्रों को एवं चिकित्सक अपने रोगियों को इन बातों की प्रेरणा अधिक सफलतापूर्वक दे सकते हैं। ऐसे लेख, भाषण, चर्चा प्रशिक्षण-शिविर, सम्मेलन, प्रदर्शनी, प्रतियोगिता, आदि उपायों से भी इन बातों को जन स्वभाव का अंश बनाने का प्रयत्न किया जा सकता है।
स्वच्छ-मन आन्दोलन के लिये युग-निर्माण सत्संकल्प में सन्निहित विचारधारा को जनमानस में प्रविष्ट कराने के लिये जो गतिविधियाँ, जहाँ जिस प्रकार जितनी मात्रा में चल सकती हों उन्हें चलाया जाना चाहिये। नीचे लिखे दस कार्य तो हर जगह बड़ी आसानी से चलाये जा सकते हैं।
(1) शिक्षा प्रसार के लिये समुचित ध्यान दिया जाय। जहाँ स्कूल नहीं हैं वहाँ खुलवाये जायें। जो अभिभावक अपने बालकों को पढ़ाते नहीं, उसके लिये उन्हें प्रेरणा दी जाय। कन्याओं की शिक्षा के महत्व को घर-घर जाकर विशेष रूप से समझाया जाय।
(2) वयस्क स्त्री पुरुषों के लिए उनकी सुविधा के समय प्रौढ़ पाठशालाएँ चालू की जायें। निरक्षरता के कलंक को दूर किया जाय। जिनके शरीर और मन में पढ़ने की क्षमता है उन्हें अशिक्षित न रहने दिया जाय। इस प्रौढ़ शिक्षा आन्दोलन के लिये ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता होगी जो स्वस्थ-शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज रचना के आदर्शों से भरी हुई हों। शिक्षक का प्रयत्न यह हो कि साक्षरता सीखने के साथ-साथ शिक्षार्थी उन पुस्तकों के पाठों के आधार पर जीवनोत्कर्ष एवं समाज रचना के लिये आवश्यक तथ्यों को भी हृदयंगम करें।
(3) ऐसे पुस्तकालय एवं वाचनालय चलाये जाएं जिनमें स्वस्थ-विचारधारा की पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएं आवें घर-घर पुस्तकें देने और लेने जाने का प्रबन्ध करके ही सद्ज्ञान के लिए जनरुचि उत्पन्न की जा सकती है इसलिये इस तथ्य का अवश्य ध्यान रखा जाय।
(4) स्कूलों के अध्यापकों के लिए एक ऐसा मार्ग-दर्शन प्रस्तुत किया जाय, जिसके आधार पर वे इतिहास, भूगोल, साहित्य आदि पड़ते समय नैतिक आदर्शों को भी हृदयंगम कराते चलें। प्रत्येक कक्षा के छात्रों के मनोविकास के अनुरूप एक ऐसी नैतिक शिक्षा पद्धति भी चले जो सैद्धान्तिक तथ्य एवं व्यावहारिक कार्यक्रम देती रहे। प्रत्येक कक्षा के लिए ऐसी नैतिक शिक्षा पुस्तकें बनें जो छात्रों और अध्यापकों का उपरोक्त प्रकार का मार्ग दर्शन कर सकें। स्कूलों में जहाँ एक शिक्षण चल सके वहाँ तो सर्वोत्तम अन्यथा युग-निर्माण विचारधारा के अध्यापक अपने घरों पर रात्रि पाठशाला की तरह यह शिक्षा चलावें। ऐसा भी हो सकता हैं कि केवल छुट्टी के दिन इस प्रकार के क्लास लगाये जावें। गीता रामायण परीक्षा की तरह इस प्रशिक्षण की परीक्षाएँ भी रखी जा सकती है और उत्तीर्ण छात्रों को प्रमाण पत्र मिलने की व्यवस्था बनाकर उन्हें इस शिक्षा पद्धति के लिए विशेष रूप से आकर्षित किया जा सकता है।
(5) दीवारों पर आदर्शवादिता, धर्म एवं सदाचार के लिये प्रेरणा देने वाले वाक्य लिखे जाएं। जिससे नगर की दीवारें एक बोलती पुस्तक की तरह प्रेरणाप्रद सिद्ध हो सकें।
(6) संगीत, कविता, भजन, कीर्तन में आदर्शवादिता का समावेश करके जन-गायन में प्रेरणाप्रद तत्वों का समावेश किया जाय। ऐसी गान गोष्ठियाँ हुआ करें जिनमें जीवनोत्कर्ष की भावना तरंगित हो सके। पर्व त्यौहार एवं उत्सवों पर महिलाओं द्वारा गाये जाने के लिये प्रत्येक क्षेत्रीय भाषा में उत्तम गायन तैयार हों।
(7) ऐसी भाषण प्रतियोगिताएँ चालू की जाएं जिनमें नव-निर्माण के उपयुक्त विचारों का प्रकटीकरण हो। शिक्षा-प्रद दोहों की अंताक्षरी प्रतियोगिताएँ प्रचलित की जाएं। इसके लिये प्रेरणाप्रद दोहों का अकारादि क्रम से संग्रह करके अंताक्षरी को शिक्षात्मक बनाने की सुविधा उत्पन्न की जाए।
(8) घरों में टाँगने के लिये आदर्श वाक्य, महापुरुषों के तथा प्रेरणाप्रद घटनाओं के चित्र प्रकाशित हों, ओर उन्हीं से घरों को सजाये जाने का आन्दोलन चले।
(9) चित्रकला प्रदर्शिनी , अभिनय, जीवन लीलाएँ, नाटक, एकांगी आदि मनोरंजन माध्यमों से सुरुचि उत्पन्न करने का प्रयत्न किया जाय। यदि सम्भव हो तो व्यापारिक आधार पर ऐसी कम्पनियाँ भी बनें जो लाउडस्पीकरों पर गाये जा सकने योग्य भावनापूर्ण रिकार्ड तथा सिनेमा घरों में दिखाये जा सकने योग्य नव-निर्माण के उद्देश्य से फिल्म बना सकें ।
(10) समाचार पत्रों में सन्मार्ग की दिशा में प्रेरणा देने वाले समाचार एवं लेख छपें। पुस्तकों के लेखन प्रकाशन का ऐसा व्यापक एवं व्यवस्थित तन्त्र बने जिसके द्वारा उत्कृष्ट साहित्य की आवश्यकता उचित मूल्य पर पूर्ण होती रहे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये विभिन्न भाषाओं में, विभिन्न विषयों के पत्र निकलें। इनका उद्देश्य पाठकों के नैतिक विकास के अतिरिक्त और कुछ न हो।
उपरोक्त दस कार्यक्रम ऐसे हैं जिनकी किसी-न-किसी प्रकार की व्यवस्था हर जगह हो सकती है। इन माध्यमों से आज की मानसिक सत्प्रवृत्तियों एवं जनमानस को सुसंस्कृत बनाने में आशाजनक योगदान मिल सकता है—
जेष्ठ मास के तीनों शिविरों में यह कार्यपद्धति बहुत उपयुक्त समझी गई और सारे परिवार में इसके प्रचलन की कामना की गई।
एक हजार वर्ष की लंबी गुलामी ने हमें कितने ही दोष दुर्गुण और कुसंस्कार दिये हैं। वे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में आज भी लज्जाजनक स्थिति में मौजूद हैं। राजनैतिक स्वाधीनता की एक बड़ी लड़ाई जीत लेने के बाद अब हमारा कर्तव्य यही होना चाहिए कि नैतिक और सामाजिक कुसंस्कारों की दासता से भी मुक्ति पाने का प्रयत्न किया जाय। स्वतंत्रता संग्राम की ही तरह विचार-क्रान्ति के लिये भी हमें एक विचार अभियान आरम्भ करना पड़ेगा। तीनों शिविरों में आये हुए विचारशील कर्मठ सदस्यों ने यह आवश्यकता अनुभव की ओर निश्चय किया कि युग-निर्माण योजना के द्वितीय वर्ष में सामाजिक कुसंस्कारों के विरुद्ध ठोस कदम उठाए जाने चाहिएं। जिन कुरीतियों की ओर अगले वर्ष विशेष रूप से ध्यान दिया जाना है वे यह हैं—
नशेबाजी की बढ़ती हुई बुराई हमारे स्वास्थ्य, धन और चरित्र को बुरी तरह नष्ट कर रही है। शराब, गाँजा, भाँग, अफीम और विशेषतया तमाखू की खपत दिन-दिन बढ़ते जाना अपना एक खेदजनक दुर्भाग्य है। इनके विरुद्ध ऐसा वातावरण बनाना है जिससे हर व्यक्ति इन दुर्व्यसनों से होने वाली हानियों से परिचित हो सकें और इनका सेवन भी एक पाप या अपराध के रूप में देखा, समझा जाने लगे। स्वागत-सत्कार में इन नशीली चीजों ने जो सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर लिया है उन्हें इस स्थान से पदच्युत किया जाय। माँसाहार, पशुओं के साथ निर्दयता बरतने या अधिक काम लेने से रोका जाय।
अश्लील, अनैतिक साहित्य एवं चित्रों का बहिष्कार किया जाए। कुरुचिपूर्ण पत्रिकाएं, गन्दे गीत, अश्लील पुस्तकें, तस्वीरें, गाली देना, फिल्में, अवाँछनीय नृत्य आदि घृणित समझा जाय और लोग उनसे बिच्छू की तरह बचना सीखें। शारीरिक और मानसिक दुराचार को घटाया जाय। समय-समय पर इन बुरी वस्तुओं की होली जलाई जाय। इन बुराइयों के प्रति सामाजिक घृणा उत्पन्न की जाय। विलासिता, फिजूलखर्ची, सिनेमाबाजी, शृंगार, सजधज का बचकानापन निरुत्साहित किया जाय। बढ़ती हुई गुण्डागर्दी, धोखेबाजी तथा बेईमानी, स्वार्थपरता एवं निष्ठुरता रोकी जाय।
बाल-विवाह और अनमेल विवाह बन्द कराये जाएं। छोटे बच्चों के विवाह से उत्पन्न होने वाली हानियों का परिचय सर्वसाधारण , को विशेषतया पिछड़े वर्ग की ग्रामीण जनता को कराया जाए। जहाँ आवश्यकता हो बाल-विवाह निरोधक कानून की भी सहायता ली जाय। वृद्ध व्यक्ति अल्पायु कन्या से विवाह कर रहे हों तो उन्हें भी रोका जाय।
मृत्यु-भोज के नाम पर भारी प्रीति-भोज करने की रूढ़ि को हटाया जाय। यह धन लोकोपयोगी सार्वजनिक कार्यों में लगाने की विचारशीलता उत्पन्न की जाय। भूतकालीन हानिकारक मान्यता का उन्मूलन किया जाय।
भिक्षा व्यवसाय को निरुत्साहित किया जाय। समर्थ व्यक्ति आलस और कुसंस्कारों से ग्रस्त होकर भिक्षा माँगने और इसके लिए कई प्रकार के झूठे बहाने बनाते हैं। साधु का वेष बनाते हैं। अपने को असमर्थ या विपत्तिग्रस्त कहकर लोगों को ठगते हैं। इस ठगी के कारण भिक्षा के वास्तविक अधिकारियों का भी मार्ग अवरुद्ध होता है। बिना विचारे कुपात्रों को भी दान देकर उनके पतन में सहायक बनने की कमजोरी को दूर किया जाय, साथ ही वास्तविक दयापात्रों की सुविधा के लिए उदारतापूर्वक देते भी रहा जाय। जो बिलकुल ही असमर्थ नहीं हैं उनके लिए काम मिलने की व्यवस्था बनाना दान का सबसे अच्छा तरीका हो सकता है। भिक्षुओं की बढ़ोतरी से अनैतिकता बढ़ने की जो कठिनाई उत्पन्न होती है उसकी उपेक्षा न की जाय।
स्त्री और पुरुषों के नागरिक अधिकारों की समानता स्वीकार की जाय। पुत्र या कन्या में भेद-भाव न किया जाय। स्त्री शिक्षा पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाय और पर्दे की कुप्रथा को हानिकारक समझा जाय। पतिव्रत धर्म की तरह पत्नी-व्रत धर्म की भी जन मानस में प्रतिष्ठापना की जाए। पति के जो परम पवित्र कर्तव्य पत्नी के प्रति हैं उन्हें हर व्यक्ति समझे। माता, बहिन, पुत्री के प्रति भी अपने कर्तव्य की उपेक्षा न करे। नारी जाति के प्रति उचित सम्मान की भावना जन-मानस में पैदा हो ऐसा व्यापक प्रयत्न किया जाय।
वर्ण, जाति या उपजाति को व्यवसाय या परम्पराओं का आधार माना जा सकता है, पर किसी वंश में जन्म लेने मात्र से कोई ऊँच या नीच न समझा जाय। गुण, कर्म, स्वभाव की श्रेष्ठता निकृष्टता को बड़प्पन या छोटेपन का आधार माना जाय, वंश को नहीं। लोकमानस को ऐसी मान्यता बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाय। उपजातियों का भेद-भाव घटा कर चार बड़ी-बड़ी जातियाँ रहें, ऐसा प्रयत्न किया जाय।
पर्व और त्यौहार सुधरे रूप से मनाये जायें। प्रत्येक पर्व और त्यौहार में जो नैतिक एवं सामाजिक प्रेरणाएँ भरी पड़ी हैं उनका महत्व उन अवसरों पर समझा एवं समझाया जाय। होली पर रंग, कीचड़, धूलि आदि उड़ाना, गन्दे गाने गाना, दिवाली पर जुआ खेलना, दशहरा पर पशु-बलि करना जैसी बुराइयों को सुधारा जाय। पुँसवन, नामकरण, यज्ञोपवीत, मुण्डन, विवाह आदि संस्कारों को पूजा-पत्री तक सीमित न रहने देकर इन्हें परिवार प्रशिक्षण का एक शक्तिशाली माध्यम बनाया जाय। पर्व, त्यौहार एवं संस्कारों को ऐसी सुधरी पद्धति से मनाया जाय कि इनके द्वारा लोक मानस को प्रबुद्ध बनाने में सहायता मिले। जन्म दिन मनाने की प्रथा प्रचलित करने पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाय ताकि इस दिन हर व्यक्ति को अपनी जीवन समस्या पर विचार करने का विशेष रूप से अवसर मिले।
मन्दिर मठों को धर्म प्रचार एवं जन-साधारण का केन्द्र बनाया जाय। देव-पूजा के साथ-साथ इनमें प्रौढ़ पाठशालाएं, रात्रि पाठशालाएं, प्रवचन, पर्व, त्यौहार एवं संस्कार मनाने की व्यवस्था, चिकित्सालय, पुस्तकालय, संगीत शिक्षा जैसे उपयोगी कार्यक्रमों का भी समुचित स्थान रहे। साधु-सन्त एवं पण्डित पुरोहित को दान दक्षिणा से गुजारा प्राप्त कर लेने के बाद उसका बदला समाज-सेवा के रूप में चुकाने के लिए प्रेरित किया जाय। कथा-वार्ताओं का उद्देश्य धर्म-भावनाओं का जागरण करना ही रहा करे।
आश्रम-धर्म में वानप्रस्थ अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं तेजस्वी माना गया है। आज इस आश्रम का लोप हो चला है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि जिनके बच्चे स्वावलंबी हो जाए वे अपना शेष जीवन समाज सेवा में लगाने की प्रतिज्ञा लेकर वानप्रस्थ ग्रहण करें। यह वानप्रस्थ ही नवयुग निर्माण के आधार स्तम्भ बन सकते हैं।
समाज सुधार के यह दस कार्यक्रम हमें तुरन्त ही हाथ में लेने चाहिए और प्रयत्न करना चाहिए कि प्रेम, उदारता, सद्भावना, नियम, सदाचार, सज्जनता एवं विवेकशीलता के आधार पर जन-मानस को सुसंस्कृत बनाया जाय।
इन कुरीतियों के अतिरिक्त वर्तमान हिन्दू समाज की सबसे बड़ी कुरीति विवाहों में होने वाला अपव्यय है। यह खर्च इतना बढ़ा-चढ़ा है कि प्रत्येक हिन्दू को अपनी कमाई का प्रायः एक तिहाई भाग विवाह शादी तथा उसके आगे-पीछे ‘अलन-चलन’ पूरे करते रहने में ही खर्च करना पड़ता है। यह पैसा न लड़की वालों के हाथ का रहता है और न लड़के वालों के हाथ का, वरन् यों ही निरर्थक अपव्यय और दिखावे में उसकी बर्बादी हो जाती है। इस खर्चें की पूर्ति के लिए, मध्यम वर्ग को बेईमानी और अनीति का मार्ग अपनाना पड़ता है क्योंकि ईमानदारी की कमाई से इस महंगाई के जमाने में गुजारा ही मुश्किल पड़ता है फिर आये दिन सुरसा के मुँह की तरह फटे हुए इस विवाह शादी के खर्चे की पूर्ति कैसे हो? इन कुरीतियों ने औसत हिन्दू को बेईमान बनने के लिए विवश किया है और जो वैसा नहीं कर पाते उन्हें आजीवन कष्ट भोगने एवं आत्महत्या तक करने को विवश होना पड़ता है। इस अत्यन्त भयानक बुराई से हमें अपने समाज को शीघ्र से शीघ्र मुक्त कराना चाहिए। कन्या को भार-रूप और पुत्र को लाभदायक माने जाने के अनुचित भेद भाव में भी यही कुरीति प्रधान कारण बनी हुई है। उसका उन्मूलन किये बिना हिन्दू समाज ‘सभ्य’ कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता। आदर्श विवाहों के लिए हमें प्रयत्नपूर्वक शुभारम्भ करना होगा। इसकी पृष्ठभूमि निम्न आधार पर बन सकती है।
(1) वर पक्ष दहेज न ले और कन्या पक्ष जेवर न मंगावें। किसी को कुछ देना हो तो वह विवाह के कुछ समय बाद ‘स्त्री धन’ के रूप में कन्या की सुरक्षित पूँजी के निमित्त दिया जाय, इसका दिखावा बिलकुल न हो। वर पक्ष अपनी नवागन्तुक वधू को और कन्या-पक्ष अपनी लड़की को विदाई के रूप में जो उपहार दें उसके लाभ इस नव-विवाहिता को ही मिलें। मिठाई, फल, वस्त्र या एक रुपया जैसी छोटी भेंट पाने के अधिकारी अन्य कुटुम्बी जन भी रह सकते हैं।
(2) अधिक संख्या में बरात ले जाना बन्द किया जाय। अत्यन्त निकटवर्ती कुटुम्बी या संबन्धियों में से जितने कम ले जाने से काम चल सकता हो, उतने ही लोग बरात में जाने चाहिएं। हर हालत में यह संख्या पचास से अधिक न हो। जिन लोगों का विवाह के अवसर पर सम्मान करना है उन्हें अपने घर पर बुला कर जलपान कराया जा सकता है। अच्छा हो यह कार्य वधू के घर आ जाने पर उसके हाथों सम्पन्न कराया जाय। वर वधू को आशीर्वाद देने के लिए एक छोटा उत्सव विवाह के बाद किया जा सकता है और उसमें मित्र लोग बुलाये जा सकते हैं। बारात में उन्हें समेट ले जाने से समय और धन की बर्बादी तथा परेशानी बढ़ने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं।
(3) आतिशबाजी, फूल टट्टी, कागज के घोड़े, नाच तमाशे, तरह-तरह के बाजे, वर की सवारी की भारी सजावट जैसे मूर्खतापूर्ण आडम्बरों में पैसे का अपव्यय बिलकुल भी न किया जाए। काम न चले तो बारात आगमन की सूचना के लिये थोड़े बाजे लिये जा सकते हैं।
(4) विवाहों में महिलाएं अश्लील गीत न गायें। गन्दे मजाक न किये जाए। रंग या दूसरी चीजें डाल कर कपड़े खराब करने वाले मनोरंजन बिलकुल न किये जाएं। सारे उत्सव में प्रेम, सज्जनता ओर सहयोग का वातावरण बना रहे।
(5) वर व समधी लोग कन्या पक्ष से अमुक नेगजोग के बहाने कोई ऐसी माँग न करें कि हमें इतना पैसा या सामान दिया जाय। स्वागत या सम्मान की अपनी स्थिति या रुचि के अनुरूप व्यवस्था करना कन्या-पक्ष वालों का काम है। इसके लिए उसे किसी भी प्रकार से दबाया न जाए।
(6) विवाहों के अवसर पर बड़प्पन पाने के लिए दोनों पक्ष पैसे की बहुत बर्बादी करते हैं। इसे रोक कर पूर्ण सादगी के साथ छोटा-सा धार्मिक समारोह मनाने की तरह यह कार्य सम्पन्न किया जाय। बर्बादी के द्वारा बड़ाई पाने की अपेक्षा वह पैसा किन्हीं लोकोपयोगी सत्कर्मों के लिए खर्च किया जाय। बड़ाई पाने के लिए यह तरीका न अपनाया जाए।
(7) विवाहों में होने वाले अपव्यय की बुराई के विरुद्ध जन-मानस को पूरी तरह उभारा जाय। इसके लिए पर्चे, पोस्टर, चित्र, कार्टून एवं पुस्तिकाएं छापी जायें। विवाहों में यह साहित्य प्रसारित किया जाय। अपने लोग किसी भी शादी में जावें तो ऐसा साहित्य साथ लेकर जावें और उस आयोजन में सम्मिलित सभी लोगों को उन विचारों से परिचित करायें।
(8) विवाह योग्य लड़कों से, लड़कियों से तथा उनके अभिभावकों से ऐसे प्रतिज्ञा-पत्र भराये जावें जिनमें आदर्श विवाह करने की ही शपथ ली गई हो। यह प्रतिज्ञा आन्दोलन हर क्षेत्र में पूरे उत्साहपूर्वक चलाया जाय।
(9) अलग-अलग जातियों के ऐसे संगठन हों जिनके पास उस समाज के सुधारवादी लोगों के तथा उनके परिवारों में विवाह योग्य बच्चों की सूचना संग्रहीत रहे। इन संगठनों के कार्यालयों से मिलने वाली सूचना के आधार पर आदर्श विवाह करने की सुविधा रहेगी।
(10) उपजातियों के बन्धन शिथिल किये जायें। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य शूद्र जैसी बड़ी जातियों के अंतर्गत छोटी उपजातियों में परस्पर विवाह शादी होने लगे तो अच्छे जोड़े ढूँढ़ने में आने वाली कठिनाई आसानी से दूर हो सकती है।
(11) आदर्श विवाह यदि सामूहिक रूप से एक स्थान पर होने लगे तो उनका प्रभाव और भी अच्छा पड़े। ऐसे विवाह किसी सामूहिक पक्ष के रूप में हो सकते हैं। जिन्हें सुविधा हो वे बसन्त पंचमी एवं गायत्री जयन्ती के दिन ऐसे आदर्श-विवाह गायत्री तपोभूमि में भी कर सकते हैं। यहाँ इसके लिए समुचित व्यवस्था रहेगी।
(12) जो लोग आदर्श-विवाह करने का अनुकरणीय साहस करें उन्हें सामाजिक सम्मान प्रदान करने की समुचित व्यवस्था रहे। जहाँ ऐसे विवाह हों वहाँ एक ऐसा आयोजन किया जाय जिसमें वहाँ के विचारणीय संभ्रांत व्यक्ति एवं सार्वजनिक संस्थाओं के प्रतिनिधि अपनी शुभकामनाएं प्रसन्नता, सराहना एवं अभिनन्दन व्यक्त करने के लिए पुष्प मालाएं लेकर उपस्थित हों। ऐसे विवाहों के समाचार अखबारों में छपें। अपनी नई पत्रिका ‘युग-निर्माण योजना’ में ऐसे समाचार चित्रों सहित छपा करेंगे।
इसके अतिरिक्त भी जो उपाय संभव हो सकें उनसे विवाहों में होने वाला अपव्यय रोका जाय। पूर्ण सादगी के साथ एक छोटे धर्म-उत्सव की तरह विवाह आयोजन होना चाहिए। युग के अनुरूप सुधरी हुई विवाह पद्धतियाँ बनें जिनमें वर-वधू परिवारों के सदस्य तथा संबंधी लोग अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप शपथ लेकर विवाह का उद्देश्य सब प्रकार सफल बनाने की प्रतिज्ञा करें। वधू पतिव्रत धर्म की और वर पत्नीव्रत धर्म पालन करने की प्रतिज्ञा करे और दोनों आजीवन उन प्रतिज्ञाओं पर सुदृढ़ रहने की घोषणा करें तो भी विवाह सार्थक हो सकते हैं। विवाह पद्धतियों में शपथ लेने और प्रतिज्ञा करने का आयोजन ही प्रधान माना जाय।
परिवारों को मिलकर ही समाज बनता है। परिवार का आरम्भ विवाह द्वारा दाम्पत्ति जीवन की प्रक्रिया द्वारा आरंभ होता है। विवाहों की आदर्शवादिता ही समाज को आदर्श बना सकती है। इसलिए विवाहोत्सव के क्षेत्र में, सभी बुराइयों को हटाकर हमें सभ्य-समाज की रचना के लिये अग्रसर होना चाहिये। शिविर के शिक्षार्थियों ने यह कार्यक्रम भावनापूर्वक किया और अपने परिवारों में यही प्रथा प्रचलित करने का वचन दिया।
युग-निर्माण योजना तीन भागों में विभक्त है। उसके तीन प्रधान कार्यक्रम हैं। (1) स्वस्थ शरीर (2) स्वच्छ मन (3) सभ्य समाज। इन तीन आयोजनों द्वारा व्यक्ति और समाज का उत्कर्ष सम्भव है। यह तीन कार्यक्रम ही आन्दोलनों के रूप में परिणित किए जाते हैं। इनकी पूर्ति के लिये जहाँ जिस प्रकार की क्रम व्यवस्था बन सकती हो वह बनाई जानी चाहिए। गत जून 63 के अंग में शतसूत्री योजना छप चुकी है। उससे न्यूनाधिक कार्यक्रम भी बन सकते हैं। मूल उद्देश्य और आदर्श तीन ही हैं। हम में से प्रत्येक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि अपने व्यक्तिगत जीवन में तथा परिवार में एवं परिवार से बाहर जिन लोगों का भी संपर्क हो उनके मनः—क्षेत्रों में, इन तीन तथ्यों की उपयोगिता एवं आवश्यकता प्रतिष्ठापित कराई जाय। जो इन तथ्यों को स्वीकार करते हों उन्हें आदर्शों को व्यवहारिक जीवन में कार्यान्वित करने की प्रेरणा दी जाय। इसी गतिविधि को अपनाकर हम आत्मकल्याण एवं विश्व-कल्याण के अपने महान लक्ष्य की पूर्ति के लिये आगे बढ़ सकते हैं।
अखण्ड-ज्योति परिवार के—युग-निर्माण योजना के प्रत्येक सदस्य का कर्तव्य है कि उपरोक्त तीन पुण्य प्रक्रियाओं को अपने-अपने क्षेत्र में गतिशील बनाने के लिए, आन्दोलन का रूप देने के लिए प्रयास करे। संगठन की बड़ी शक्ति है। जहाँ अपने दस भी सच्चे कार्यकर्ता होंगे वहाँ यह आन्दोलन आशाजनक रूप से आगे बढ़ रहा होगा। युग की पुकार—विश्वमानव की आवश्यकता पूर्ति के लिए, यह सामाजिक अभियान ऐसा उपयोगी है कि थोड़े प्रयत्न से ही विचारशील व्यक्ति आसानी से उसे पकड़ लेंगे। आवश्यकता केवल प्रथम गति प्रदान करने की—आरंभिक शुभारम्भ करने की है। इस कार्यक्रम को लेकर मानव जीवन की सार्थकता सिद्ध करने के लिए हम में से प्रत्येक को गतिशील होना ही चाहिये। संगठित रूप से प्रयत्न करने पर तो आशाजनक सफलता सुनिश्चित है। यों एकाकी व्यक्ति भी अपने सत्प्रयत्नों में संलग्न रहकर कहीं भी अनुकूल वातावरण उत्पन्न कर सकता है।
यह निश्चित है कि जिन आदर्शों को हम विश्वव्यापी बनाना चाहते हैं उनका आरम्भ हमें अपने निज के जीवन से करना होगा। हमारा अपना जीवन आदर्श, सुविकसित सुखी सुसंस्कृत एवं सम्मानास्पद बने तभी उसे देखकर दूसरे लोग उस प्रकाश को ग्रहण करने में तत्पर हो सकते हैं। इस दृष्टि से यह आवश्यक समझा गया है कि जीवन जीने की कला—व्यावहारिक आध्यात्मवाद को सिखाने के लिए एक सर्वांगीण प्रबन्ध किया जाय। यह प्रशिक्षण योजना इसी आश्विन मास से गायत्री तपोभूमि में आरम्भ की जाने वाली है। एक-एक महीने के शिविर यहाँ नियमित रूप से होते रहेंगे। पहला शिविर ता0 21 सितम्बर से 21 अक्टूबर तक का होगा। इसकी रूप-रेखा नीचे दी जा रही है—
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य सम्वर्धन की दृष्टि से यह शिविर लगाये जायेंगे। पूर्णिमा से पूर्णिमा तक इनका क्रम चला करेगा। जिनकी धर्मपत्नियां भी आ सकती हों वे उन्हें भी लाने का प्रयत्न करें। वयस्क बच्चे भी इस शिक्षण का लाभ उठा सकते हैं।
शिक्षार्थियों के निवास के लिए स्वतंत्र कमरे मिलेंगे। भोजन व्यय तथा बनाने का कार्य शिक्षार्थी स्वयं करेंगे
इस एक मास में प्रत्येक शिक्षार्थी दो गायत्री अनुष्ठान पूरे करेगा एक पूर्णिमा से अमावस्या तक दूसरी अमावस्या से पूर्णिमा तक। जिन्हें कोई विशेष उपासना की आवश्यकता समझी जायगी उन्हें वह भी बता दी जायगी।
शरीर एवं मन के शोधन के लिए जो सज्जन चान्द्रायण व्रत करना चाहेंगे उन्हें आवश्यक देख-रेख के साथ उसे आरम्भ कराया जायगा। जो वैसा न कर सकेंगे उन्हें दूध कल्प, छाछ कल्प, शाक कल्प, फल कल्प के लिए कहा जायगा। जो उसे भी न कर सकेंगे उन्हें चिकित्सा विभाग की एक विशेष पद्धति द्वारा अन्न कल्प कराया जायगा, जो बालकों तक के लिए सुगम हो सकता है। इन व्रतों का परिणाम शारीरिक ही नहीं मानसिक परिशोधन की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है।
प्राकृतिक चिकित्सा विधि से शिक्षार्थियों के पेट संबंधी रोगों की चिकित्सा इस अवधि में होती रहेगी और यह प्रयत्न किया जायगा कि पाचन तन्त्र की विकृति को सुधारने के लिए अधिक से अधिक उपचार किया जाय। पाचन तन्त्र के उदर रोगों के अतिरिक्त अभी अन्य रोगों की चिकित्सा का प्रबन्ध यहाँ नहीं हो पाया है। उपवास एनीमा, मिट्टी की पट्टी, टब बाथ, सूर्य स्नान, आसन, प्राणायाम, वाष्प स्नान, मालिश आदि उपचारों का लाभ देने के अतिरिक्त इस विज्ञान की आवश्यक शिक्षा भी दी जायगी ताकि अपने या दूसरों के स्वास्थ्य संकट का निवारण कर सकने में यह शिक्षार्थी समर्थ हो सकें।
आवेश, ईर्ष्या, द्वेष, चिन्ता, निराशा, भय, क्रोध, चंचलता, उद्विग्नता, संशय, इन्द्रिय लोलुपता, व्यसन, आलस, प्रमाद जैसे मनोविकारों का उपचार प्रवचनों द्वारा वस्तुस्थिति समझाकर विशिष्ट आध्यात्मिक साधनाओं द्वारा तथा व्यावहारिक उपाय बताकर किया जायगा। प्रयत्न यह होगा कि मानसिक दृष्टि से भी शिक्षार्थी रोग मुक्त होकर जाय।
मधुर भाषण, शिष्टाचार, नम्रता, सज्जनता, स्वच्छता, सदा प्रसन्न रहना, नियमितता, मितव्ययिता, सादगी, श्रमशीलता, तितीक्षा, सहिष्णुता जैसे सद्गुणों को विकसित करने के लिए आवश्यक उपाय कराये जायेंगे। बौद्धिक और व्यावहारिक प्रशिक्षण का मनोवैज्ञानिक क्रम इस प्रकार रहेगा जिससे शिक्षार्थी को सद्गुणी बनने का अधिकाधिक अवसर मिले।
जीवन में विभिन्न अवसरों पर आने वाली समस्याओं को हल करने के लिए ऐसा दृष्टिकोण प्रस्तुत किया जायगा, जिसके आधार पर शिक्षार्थी हर परिस्थिति में सुखी और सन्तुलित रहकर प्रगति की ओर अग्रसर हो सके।
दाम्पत्ति जीवन में आवश्यक विश्वास, प्रेम तथा सहयोग रखने, बालकों को सुविकसित बनाने तथा परिवार में सुव्यवस्था रखने के सिद्धान्तों एवं सूत्रों का प्रशिक्षण।
आध्यात्मिक उन्नति एवं मानव जीवन का लक्ष्य प्राप्त करने का सुव्यवस्थित एवं व्यवहार में आ सकने योग्य कार्यक्रम बनाकर चलने का परामर्श एवं निष्कर्ष।
उपरोक्त आधार पर एक महीने की प्रशिक्षण व्यवस्था बनाई गई है। सप्ताह में छः दिन शिक्षा चलेगी, एक दिन, छुट्टी रहेगी, जिसका उपयोग शिक्षार्थी मथुरा, वृंदावन, गोकुल, महावन, दाऊनी गोवर्धन, नन्दगाँव, बरसाना, राधाकुण्ड आदि ब्रज के प्रमुख तीर्थों को देखने में कर सकेंगे। शिक्षण का कार्यक्रम काफी व्यस्त रहेगा, इसलिए उत्साही एवं परिश्रमी ही उसका लाभ उठा सकेंगे।
आलसी, अवज्ञाकारी, व्यसनी तथा उच्छृंखल प्रकृति के लोग न आवें तो ही ठीक है।
यह शिक्षा पद्धति बहुत महत्वपूर्ण है पर स्थान संबन्धी असुविधा तथा अन्य कठिनाइयों के कारण अभी, थोड़े-थोड़े शिक्षार्थी ही लिये जा सकेंगे। जिन्हें आना हो पूर्ण स्वीकृति प्राप्त करके ही आवें। बिना सूचना दिये, अनायास या कम समय के लिये आने वाले इस शिक्षण में प्रवेश न पा सकेंगे। अपने आवश्यक कपड़े तथा बर्तन शिक्षार्थियों को साथ लाने चाहिए। मार्ग व्यय एवं भोजन आदि का पूरा प्रबन्ध करके चलना चाहिये। इस शिक्षण का तथा चिकित्सा की कोई फीस नहीं है पर अपना खर्च तो स्वयं ही उठाना होगा।
अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को इन पंक्तियों द्वारा इस जीवन निर्माण की शिक्षा के लिए सादर-आमन्त्रण भेजते हैं। जिन्हें अपने लिए यह उपयुक्त लगे वे अपने आने के संबंध में पत्र व्यवहार द्वारा महीना निश्चित कर लें, क्योंकि शिक्षार्थी अधिक और व्यवस्था कम करने से क्रमशः ही स्थान मिल सकना सम्भव होगा।
विविध प्रशिक्षण में से एक मास की गृहस्थ शिक्षा इसी आश्विन से आरम्भ हो रही है और एक वर्ष के लिए जो वानप्रस्थ आना चाहेंगे उनका स्वागत है। “तीन लोक से मथुरा न्यारी” कहावत के अनुसार इस तीर्थ भूमि का ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व सर्वविदित है। भगवान कृष्ण की जन्मभूमि में तप करते हुए जीवन साधना का एक विशेष आनन्द है। रसखान के शब्दों में ब्रजभूमि इतनी सुन्दर है कि उस पर तीनों लोकों को निछावर किया जा सकता है। यह विशेषताएँ आज भी किसी न किसी रूप में विद्यमान मिल सकती हैं।
एक वर्ष तक निरन्तर चलने वाली 40 गायत्री अनुष्ठानों की शृंखला, नित्य हवन, चान्द्रायणव्रत द्वारा आत्मशोधन, दैनिक स्वाध्याय, नित्य सत्संग, गीता का विशिष्ट अध्ययन वेद, उपनिषद् दर्शन आदि की शास्त्रीय शिक्षा आदि कार्यक्रमों द्वारा आत्म-कल्याण की ऐसी सुविधा यहाँ उपलब्ध है जो अन्यत्र नहीं मिल सकती। प्राकृतिक चिकित्सा का सांगोपांग शिक्षण, आसन प्राणायाम आदि योग-क्रियाओं का अभ्यास, यज्ञ एवं षोडश संस्कार कराने की योग्यता, भाषण कला, धार्मिक प्रवचन युग-निर्माण के शतसूत्री रचनात्मक कार्यों के संबंध में विशिष्ट ज्ञान तथा जन-जीवन में नवजागरण उत्पन्न करने की विशिष्ट क्षमता उत्पन्न करने का अनुभव यह एक वर्षीय वानप्रस्थ-तपश्चर्या की सेवात्मक पद्धति है जो उपासना कार्यक्रमों के साथ-साथ ही चलती रहेगी।
जिनके ऊपर पारिवारिक जिम्मेदारियाँ नहीं हैं, जो कमाने की चिन्ता से मुक्त हैं उन्हें अपने शेष जीवन का सर्वोत्तम उपयोग करने का अवसर तपोभूमि में रहते हुए वानप्रस्थ जीवन बिताने में हो सकता है। जो सदा के लिये नहीं आ सकते उन्हें एक वर्ष के लिए आना भी मंगलमय प्रतीत होगा। ऐसा साधना के उपयुक्त वातावरण तथा वानप्रस्थों के निवास की विशेष व्यवस्था यहाँ बनाई गई है। जिन्हें अनुकूलता हो वे प्रसन्नतापूर्वक मथुरा आने के लिए तैयारी कर सकते हैं। पत्र व्यवहार द्वारा स्वीकृति प्राप्त की जा सकती है। बालकों के चार वर्षीय पाठ्यक्रम की बात अगले वर्ष कार्यान्वित होगी। एक साथ इतनी प्रशिक्षण योजनाएँ चालू कर सकना सम्भव भी न था।
जेष्ठ के तीन शिविरों में आने वाले सभी परिजनों में से प्रत्येक ने यह आवश्यकता अनुभव की कि शाखा-संचालकों और युग-निर्माण योजना के कर्मठ कार्यकर्ताओं को जन-जीवन में प्रेरणा उत्पन्न करने की व्यवहारिक शिक्षा की भी एक प्रशिक्षण व्यवस्था की जाय। चूँकि प्रायः सभी शाखा संचालक गृहस्थ और कार्यव्यस्त व्यक्ति हैं इसलिए यह शिक्षण अधिक लंबा न हो। एक बार में एक महीने की ही शिक्षा दी जाय। यदि वह एकबार में पूरी न हो पावे तो दूसरे वर्ष एक महीने के लिए वे फिर आ सकते हैं। विचार करने पर यह आवश्यकता उपयुक्त प्रतीत हुई। तद्नुसार इसी वर्ष से यह प्रक्रिया भी आरम्भ की जा रही है कि जिसके माध्यम से युग-निर्माण के महान अभियान का नेतृत्व कर सकने के लिए प्रतिभाशाली कर्मठ कार्यकर्ताओं को एक-एक महीने के लिए प्रशिक्षित किया जाय।
स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्यसमाज रचना के त्रिविधि आन्दोलनों की रूपरेखा इसी अंक में पिछले पृष्ठों पर दी जा चुकी है। गत वर्ष जून के अंक में इन्हीं बातों को शत सूत्री योजना के अंतर्गत विशेष विस्तार से कहा जा चुका है। जहाँ जैसी परिस्थितियाँ हों, वहाँ तदनुसार कार्य आरम्भ करते हुए यह आन्दोलन देशव्यापी बनाया ही जाना है। अस्तु यह आवश्यकता भी पड़ेगी ही—कि कहाँ किस प्रकार किन कार्यों को आरम्भ किया जाय ताकि सफलता का उत्साहवर्धक वातावरण तेजी से उत्पन्न हो चले। इस एक महीने के प्रशिक्षण में कार्यकर्ताओं को आन्दोलनात्मक पद्धति की समग्र शिक्षा देने का कार्यक्रम बना लिया गया है। आशा की जाती है कि आन्दोलन को व्यापक और सुव्यवस्थित बनाने में इस प्रशिक्षण से भारी सहायता मिलेगी।
ऐसा निश्चय किया गया है कि लोक-शिक्षण के लिये देश भर में धार्मिक शिक्षण शिविरों की व्यापक शृंखला चलाई जाय। इसलिए भागवत सप्ताह की तरह ‘गीता-कथा-सप्ताहों’ की योजना रहे। जिस प्रकार धर्म भावना से लोग भागवत सप्ताह करते हैं उसी प्रकार गीता सप्ताहों की परम्परा अपने शाखा केन्द्रों द्वारा आरम्भ हो। एक सप्ताह तक गीता का सामूहिक परायण होता रहे। जहाँ संस्कृत पढ़ने वाले व्यक्ति हों वहाँ मूल गीता का सामूहिक पाठ दो टोलियों में हुआ करे। एक श्लोक आधे लोग पढ़ें दूसरा श्लोक शेष आधे लोग पढ़ें। इस प्रकार प्रतिदिन एक पाठ पूरा कर लिया जाय। जहाँ 15-16 व्यक्ति भी इस प्रकार पाठ करने वाले होंगे वहाँ एक सप्ताह में 108 गीता पाठ आसानी से हो जाएंगे।
जहाँ संस्कृत जानने वाले नहीं हैं वहाँ के लिए गीता का पद्यानुवाद पढ़ा जाय और उसके पाठ हो जायें। इस प्रयोजन के लिए गीता का एक विशेष पद्यानुवाद तैयार भी कराया जा रहा है। इस प्रकार पाठ जहाँ होगा वहाँ संस्कृत न जानने वाली जनता भी गीता के प्रत्येक श्लोक का भावनामय अर्थ समझ सकेगी और संस्कृत पाठ से भी अधिक उपयोगिता उसकी बढ़ जायगी।
यह तो हुई पाठ की बात, अब प्रतिदिन प्रातः सायं दो बार जो डेढ़-डेढ़ दो-दो घण्टे के लिए प्रवचन होंगे, उनमें आठ दस विशिष्ट श्लोकों की व्याख्या हुआ करेगी। इन व्याख्याओं में युग-निर्माण योजना की समस्त विचार-धारा का समावेश होगा। जिन श्लोकों की व्याख्या की जाय उन्हीं विचारों की पुष्टि करने वाली रामायण की चौपाइयाँ भी कही जायें, तथा पौराणिक ऐतिहासिक कथा प्रसंगों की भी भरमार रहे, जिससे सर्वसाधारण को वह प्रकरण रुचिकर भी लगे और समझने में भी सहायता मिले। इस प्रकार सात दिन की गीता कथा एक प्रकार से युग निर्माण के सप्ताह शिक्षण शिविर की आवश्यकता पूरी करेगी। धार्मिक आयोजनों के साथ श्रद्धामय वातावरण में सम्पन्न हुआ यह शिक्षण अधिक आकर्षक भी होगा और अधिक उपयोगी भी।
अन्तिम दिन गायत्री हवन हुआ करे। जिसमें अधिक संख्या में जनता भाग ले। यज्ञोपवीत संस्कार, मुण्डन, अन्नप्राशन, विद्यारम्भ पुंसवन आदि संस्कार जिनके होने हों वे भी सामूहिक रूप से इन्हीं यज्ञों में हो जाय और उस दिन सम्पन्न हुए संस्कारों की महत्ता एवं शिक्षा पर विशेष प्रवचन हों।
गीता सप्ताह का प्रवचन करने वाला व्यास जहाँ सात दिन रहे उस क्षेत्र में स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन एवं सभ्य-समाज की अभिनव रचना के आन्दोलनों में से जिनका वहाँ सूत्रपात करा सके उसके लिए प्रयत्नशील रहे। लगनशील लोकसेवी जहाँ सात दिन रहेगा वहाँ कुछ तो जागरण होगा ही, कुछ प्रवृत्तियाँ तो आरम्भ होंगी ही। कथा वाचक वस्तुतः एक रचनात्मक कार्यकर्त्ता होगा। गीता सप्ताहों का स्वरूप, कथा भागवत जैसा धार्मिक ही रहेगा पर वस्तुतः वे इतने तक ही सीमित न रहेंगे। मोहग्रस्त अर्जुन की तरह आज के दिग्भ्रांत जन-मानस का जागरण ही उनका प्रधान लक्ष्य रहेगा। अस्तु इन आयोजनों से धर्म जागृति का वास्तविक उद्देश्य भी पूरा होगा ही।
लोक सेवकों की एक महीने की शिक्षा में गीता की उपरोक्त प्रकार की कथा-पद्धति का विशेष रूप से अभ्यास कराया जायगा। साथ ही उन्हें जन जागरण के लिए जो भी रचनात्मक कार्य करने हैं उनकी रीति नीति कथा प्रवचनों को सुलझाने की व्यावहारिक जानकारी से अवगत कराया जायगा। इस प्रशिक्षण को प्राप्त करने वाला यदि अन्यत्र शिविरों का आयोजन न भी कर सके तो छुट्टी के दिन सप्ताह में एक दिन यह कार्यक्रम चलाते हुए सात सप्ताह में एक पारायण सम्पन्न कर सकता है। अलग अलग मुहल्लों में यह सात सप्ताह के परायण चलते रह सकते हैं और कोई कार्यव्यस्त व्यक्ति भी अपने नगर में वर्ष के अन्दर छह-सात पारायण पूरे करता हुआ स्थानीय जनता में जागृति उत्पन्न कर सकता है।
जिनके कन्धों पर कमाने की जिम्मेदारी नहीं है वे बड़ी शान से कहीं भी गीता सप्ताह आरम्भ कराते हुए धर्म सेवा में संलग्न रह सकते हैं। साथ ही जिनके ऊपर गृहस्थ की जिम्मेदारी है वे इस आधार पर गुजारे की समस्या भी हल कर सकते हैं। कथा भागवत कहने वाले गुजारा कर लेते हैं तो ये सुसंस्कृत कार्यक्रम जब किसी संगठन द्वारा सुनियोजित होंगे तब गीता के कथा व्यास का गुजारा क्यों न होगा ? जो शाखा गीता कथा के सप्ताह शिविर का आयोजन करे वह व्यास को पाँच रुपया प्रतिदिन भी पारिश्रमिक दे तो महीना में चार शिविर करने वाला व्यास, भोजन मार्ग व्यय आदि के अतिरिक्त चार सप्ताहों में 140 मासिक के करीब प्राप्त कर सकता है जिसमें ब्राह्मण वृति से गुजारा करने वाले किसी परिवार का काम किसी प्रकार चल ही सकता है।
गीता कथाकार की भाषण शैली का निखार करने से लेकर प्रवचन में स्थान-स्थान पर कहीं जाने वाली चौपाइयों तथा कथा प्रकरणों के समावेश की तथा किस श्लोक की व्याख्या में युग-निर्माण के किस अंश की पुष्टि की जाय, यह सब कुछ उस एक महीने शिक्षा प्राप्त करने वाले शिक्षार्थी को अभ्यास करा दिया जायगा। पूर्णाहुति के दिन गायत्री यज्ञ, संस्कारों की धर्म प्रक्रिया तथा शिक्षा मीमाँसा करने की भी उसे पूरी जानकारी हो जायगी। रचनात्मक कार्यों को अग्रसर करने में किन चढ़ाव उतारों का सामना करना पड़ता है, यह सब जानने वाले के लिये निश्चय ही युग-निर्माण के महान अभियान का सफल नेतृत्व कर सकना सरल हो जायगा।
इस वर्ष आश्विन में गृहस्थों का शिक्षण होगा। कार्तिक से रचनात्मक कार्यकर्ताओं की गीता-शिक्षा चलेगी फिर इसी प्रकार मगसिर में गृहस्थों की, पौष में कार्यकर्ताओं की, माघ में गृहस्थों की फाल्गुन में लोक-सेवकों की, चैत्र में गृहस्थों की बैसाख में कार्यकर्ताओं की शिक्षा होगी। अर्थात् आश्विन, मगसिर, माघ, चैत्र हम चार महीनों में गृहस्थों की और कार्तिक, पौष, फाल्गुन, बैसाख में कार्यकर्ताओं की शिक्षा व्यवस्था चलेगी। इस वर्ष कार्य अधिक, स्थान कम और प्रशिक्षणकर्ता हम स्वयं ही होने से कार्यक्रम इसी प्रकार आरम्भ होगा। अगले वर्ष में ज्येष्ठ में फिर परामर्श शिविर होंगे। तब अगले वर्ष की व्यवस्था फिर बनाई जायगी। प्रयत्न यह होगा कि दोनों प्रकार की शिक्षा लगातार चलती रहें ताकि अधिक लोगों को शिक्षा का लाभ मिल सकने की व्यवस्था बन जाय।
इस वर्ष इन दोनों शिक्षाओं में जिन्हें रुचि हो वे यथा सम्भव शीघ्र ही पत्र व्यवहार करके स्वीकृति प्राप्त कर लें। देर से पत्र लिखने वालों को सीमित स्थान पूरे हो जाने पर अगले वर्ष के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
राष्ट्रीय स्वतन्त्रता संग्राम के बाद समाज को अभिनव रचना का दूसरा अभियान युग-निर्माण आन्दोलन ही है। व्यक्तिगत एवं सामूहिक जीवन में उत्कर्ष उत्पन्न करने के लिए जिस आध्यात्म आधार की नितान्त आवश्यकता है। उसकी पूर्ति इस महान् प्रयास के द्वारा संभव हो सकेगी ऐसी संभावना स्पष्ट दिखाई पड़ती है। अखण्ड-ज्योति परिवार ने इस आन्दोलन को आरम्भ करके एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर लिया है। आशा करनी चाहिये कि उसे वह ईश्वरीय सहायता मिलेगी जिसके आधार पर इस अभियान को प्रगति के पथ पर काफी दूर तक आगे बढ़ाया जा सके।
ज्येष्ठ में हुए तीन शिविरों में ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक निकलने की व्यवस्था पर बड़ा हर्ष एवं सन्तोष प्रकट किया गया। इतने बड़े आन्दोलन की गतिविधियों की प्रगति एवं कार्य-पद्धति की जानकारी के लिए कम-से-कम 20 पृष्ठ का पाक्षिक तो होना ही चाहिए था। सभी आगन्तुकों ने साप्ताहिक की आवश्यकता पर बल दिया पर चूँकि आरम्भ में उतनी बड़ी व्यवस्था बन नहीं पड़ेगी यह देखकर कुछ समय पाक्षिक से ही सन्तोष करने की बात मान ली गई। यों हर महीने ता0 7 और 22 को वह प्रकाशित हुआ करेगा पर जुलाई पहले दूसरे अंक 10-5 दिन लेट छपने की सम्भावना है। क्योंकि ता0 24 जून को शिविर समाप्त होने पर ही इसका मैटर जुटाना एवं सम्पादन आरम्भ किया गया है।
प्रत्येक शाखा संचालन के पास इसका पहुँचना आवश्यक है। हर सक्रिय कार्यकर्ता का कर्तव्य है कि वह अपने नाम एक प्रति मंगाकर क्षेत्र के कम-से-कम दस अखण्ड-ज्योति पाठकों को उसे पढ़ा दे। एक भी परिजन ऐसा न बचे जिसे युग-निर्माण पत्रिका पढ़ने को न मिलती हो। इसे सब खरीदें यह आवश्यक नहीं पर पढ़ना तो इसे सभी को चाहिए। भारतीय इतिहास में अपना स्थान बनाने वाले इस आन्दोलन की सफलता और व्यापकता पर हर परिजन को गर्व और श्रेय अनुभव करने का अधिकार होगा क्योंकि उसमें उसका श्रम एवं सहयोग सन्निहित रहेगा। ऐसी दशा में हम में से हर किसी को उसकी गतिविधियों की जानकारी रखने की आवश्यकता अनुभव होगी। इसकी पूर्ति यह नवीन पाक्षिक पत्र ही करेगा। प्रयत्न यह होना चाहिए कि पाक्षिक हर जगह पहुँचे और उसे सभी परिजनों द्वारा पढ़ा जाना संभव हो सके। इसके लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं की विशेष जिम्मेदारी है। उन्हें अपने पैसे से या मिल जुलकर इकट्ठे किये पैसे से पाक्षिक पत्र इसी महीने से मंगाना आरम्भ कर देना चाहिए। जिनने अपनी स्वीकृति या पैसा न भेजा हो उन्हें अविलम्ब इसी महीने से उसे मंगाने लगने की व्यवस्था कर लेनी चाहिये और ऐसा ढर्रा बिठा लेना चाहिए कि परिवार के सभी सदस्यों तक इस पाक्षिक की पहुँच होने लगे।
पिछले पृष्ठों पर जिन आन्दोलनों एवं कार्यक्रमों की चर्चा की गई वे सभी जहाँ, जिस प्रकार, जितनी मात्रा में संभव हो सकेंगे आरंभ हो जायेंगे। पाक्षिक के सदस्यों का कर्तव्य है कि अपने विवरण छापने के लिए बराबर भेजते रहें। यह समाचार चिट्ठी पत्री के साथ नहीं लिखे रहें व न उन्हें अलग से भेजना चाहिए ताकि उत्पादन विभाग के कार्यकर्ता उसका स्वतन्त्र रूप से उपयोग कर सकें। एक दो अंकों को देखकर यह भली प्रकार समझ में आ जायगा कि समाचार किस प्रकार के रहेंगे। अपने क्षेत्र में उस प्रकार की जितनी गतिविधियाँ हों वे तभी छपने के लिए जाती रहेंगी तो उन्हें पढ़कर दूसरे लोग प्रेरणा एवं प्रोत्साहन प्राप्त करेंगे तथा अन्यत्र भी उनके अनुकरण का प्रयास होने लगेगा।
शिविर में आये हुए कार्यकर्ताओं के लगभग 300 फोटो प्राप्त कर लिए गये हैं। अब योजना के अन्य सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं के फोटो इकट्ठे किए जाने शेष हैं। समाचारों के साथ उन श्रेष्ठ कार्यों में प्रमुख भाग लेने वाले कार्यकर्ताओं के फोटो छपते रहने से जहाँ पत्रिका की सुन्दरता बढ़ती है वहाँ वैसे कार्यों के लिए प्रोत्साहन मिलने का उद्देश्य भी पूरा होता है। स्कूली परीक्षाओं के लिए फार्मों पर चिपकाने के लिए जो पासपोर्ट साइज फोटो काम आते हैं वे ही युग-निर्माण पत्रिका में भी काम आवेंगे। बिजली से खिंचे गहरे सफेद और गहरे काले फोटो ही ब्लाक के काम में आ सकते हैं। धुँधले, बच्चों के छोटे कैमरे के फोटो ब्लाक बनाने के काम नहीं आते। छोटे-बड़े साइज भी असुविधा जनक होते हैं इसलिये पासपोर्ट साइज (डेढ़ इंच चौड़े दो इंच लंबे फोटो के लगभग) ही भिजवाने चाहिएं। पहले महीने तक सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं के फोटो इकट्ठे हो जाएं यह प्रयत्न किया जाना चाहिए।
पहले अंक से ही पाक्षिक के ग्राहक रहना चाहिए ताकि आन्दोलन की प्रगति का समग्र परिचय रह सके। जिनने अपने नाम न लिखाये हों या चंदा न भेजा हो उन्हें अपनी पत्रिका चालू करा लेनी चाहिए लिस्ट के अनुसार ही नियत संख्या में पाक्षिक छपेगा, जो देर से सूचना भेजेंगे उन्हें पिछले अंकों से वंचित रहना पड़ सकता है।
किशोर बालकों की चार वर्षीय शिक्षा और जातीय संगठनों की रूपरेखा के संबंध में भी इन तीनों शिविरों में महत्वपूर्ण विचार विनिमय हुआ किन्तु वह अनिर्णित रह गया। यह दोनों कार्य जितने महान हैं उतने ही गम्भीर तथा पेचीदगियों से भरे हुए भी हैं। इन दोनों समस्याओं में जो उलझनें रह गई हैं उन्हें सुलझाने के लिए पाक्षिक पत्रिका में पाठकों का अभिमत जानने के लिये पूरा विवरण प्रस्तुत क्रिया जायगा और शाखा संचालकों का जैसा बहुमत होगा वैसा कार्यक्रम बनाया जायगा।
इस वर्ष के तीनों शिविर सभी दृष्टि से सफल रहे। गंभीर मन्त्रणा के पश्चात् जो कार्य पद्धति निर्धारित की गई, उसका मूर्तरूप पाठक ‘युग-निर्माण योजना’ के पृष्ठों पर विस्तारपूर्वक पृष्ठों में पढ़ सकेंगे।
प्रतिमा तुम, प्रेम-पुजारी हूँ मैं, तुम सागर, एक हिलोर हूँ मैं।
तुम हो रवि, मैं प्रिय पंकज हूँ, तुम हो शुचि चन्द्र, चकोर हूँ मैं॥
तुम दीपक, मैं परवाना बना, तुम हो घन-श्याम तो मोर हूँ मैं।
नयनों में तुम्हारी मूर्ति बसी, रहा देख तुम्हारी ही ओर हूँ मैं॥
जग के मग में बिखराया हुआ, पग में चुभता हुआ शूल हूँ मैं।
चलती ही गई न भुलाई गई, वह भूली हुई लघु भूल हूँ मैं॥
दुनिया की विनोद-क्रिया के लिए बरबाद किया हुआ फूल हूँ मैं।
सबने मुझको ठुकराया सदा, अब आपके पैर की धूल हूँ मैं॥
कर चाहता था पर तूलिका ले कभी चित्र तुम्हारा बना न सका।
स्वर चाहता किन्तु तुम्हारे लिए कभी गीत मनोहर गा न सका॥
नयनों में बसा न सका तुमको, तुम में अपने को मिला न सका।
बस शोक यही है मुझे कि कभी, किसी भाँति तुम्हें अपना न सका॥
सब भाँति निराश था जीवन से, दुख के झटके सहते, सहते।
निरुपाय तुम्हारा सहारा लिया, भव-सागर में बहते, बहते॥
तुम सीख गये नभ में उड़ना, धरती पर ही रहते, रहते।
“मुझको भी बुलाओ या आओ यहाँ” मुँह सूख गया कहते, कहते॥
मिलती रही किन्तु तुम्हारे लिये, वसुधा की सुधा ठुकराता रहा।
सुख की, दुख की परवाह न की, कभी आह न की, मुसकाता रहा॥
स्वजनों ने समाज ने त्याग दिया पर गीत तुम्हारे ही गाता रहा।
तुम क्यों ठुकराते हो, जीवन में सब ठौर तो ठोकरें खाता रहा॥
दुनिया कुछ भी समझे पर मैं सकता निज राह न त्याग कभी।
यह जान के जीवित था तम में, फिर आयेगा, स्वर्ण-विहान कभी॥
घटता न वियोग-व्यथा-भय से कवि के उर का अनुराग कभी।
यदि स्नेह न दो तो दबी रहेगी, बुझती नहीं प्रेम की आग कभी॥
—श्री ‘रजेश’
*समाप्त*