दया, धर्म का मूल

दया एक दैवी गुण है जिस पर सभी धर्मों की रूपरेखा स्थिर है। दया के बिना कोई धर्म, धर्म नहीं रहता परम भक्त तुलसीदास जी ने इसी तथ्य को व्यक्त करते हुए लिखा है-

दया धर्म का मूल है पाप मूल अभिमान।

तुलसी दया न छोड़िए जब लगि घट में प्रान॥

वस्तुतः दया ही अपने आप में सबसे बड़ा धर्म है जिसका आचरण करने से मनुष्य का आत्म विकास होता है। समस्त हिंसा, द्वेष, वैर विरोध की भीषण लपटें दया का संस्पर्श पाकर शाँत हो जाती हैं। दया परमात्मा का निजी गुण है। इसीलिए भक्त, संतजन भावना को दयासिन्धु कहते हैं। परमात्मा का यह दिव्य गुण जब सज्जनों के माध्यम से धरती पर अमृत बनकर बरसता है तो इससे सभी का भला होता है। लोक विजेताओं से भी बड़ा है दया का राजमुकुट। और इसकी शक्ति जिससे हिंसक भी अहिंसक, दुश्मन भी मित्र बन जाते हैं, अपार है।

दया एक दैवी गुण है। इसका आचरण करके मनुष्य देवत्व प्राप्त कर सकता है। दयालु हृदय में परमात्मा का प्रकाश ही प्रस्फुटित हो उठता है। क्योंकि भगवान स्वयं दयास्वरूप है। दयालु हृदय में ही उसका निवास होता है। दया के आचरण से मनुष्य में अन्य दैवी गुण स्वतः ही पैदा होने लगते हैं। महर्षि व्यास ने लिखा है ‘सर्वप्राणियों के प्रति दया का भाव रखना ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग है।’ महात्मा गाँधी ने कहा था ‘दया और सत्य का अन्योन्याश्रित संबंध है। जहाँ दया नहीं वहाँ सत्य नहीं।’ विदेशी विचारक होम ने लिखा है जो दूसरों पर दया नहीं करता उसे परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती।

दया अपने आप में प्रसन्नता, प्रफुल्लता का मधुर झरना है। जिस हृदय में दया निरन्तर निर्झरित होती रहती है वहीं स्वयंसेवी आह्लाद, आनन्द के मधुर स्वर निनादित होते रहते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि दयालु व्यक्ति सहज आत्मसुख से सराबोर रहता है।

दया की शक्ति अपार है। सेना और शस्त्रबल से तो किसी राज्य पर अस्थायी विजय मिलती है। किन्तु दया से स्थायी और अलौकिक विजय मिलती है। दयालु व्यक्ति मनुष्यों को ही नहीं अन्य प्राणियों को भी जीत लेता है। सर्व हितचिन्तक दयालु व्यक्ति से सभी प्राणियों का भय, अहित की आशंका दूर हो जाती है। उसके सान्निध्य में सभी प्राणी अपने आपको सुरक्षित और निश्चिन्त समझते हैं। ऋषि आश्रमों के उपाख्यानों से मालूम होता है कि वहाँ सभी प्राणी निर्भय होकर विचरण करते थे। ऋषियों के बालक उनके साथ खेलते थे। इतना ही नहीं हिंसक पशु भी अपनी हिंसा भूलकर अन्य अहिंसक पशुओं के साथ विचरण करते थे। ऐसी है दया की शक्ति। दयालु ऋषियों के निवास से आश्रमों का वातावरण हिंसा, क्रूरता अन्याय द्वेष आदि से पूर्णतः मुक्त होता था।

दया से दूसरों का विश्वास जीता जाता है। यह प्राणियों के हृदय पर प्रभाव डालती है। दया समाज में परस्पर की सुरक्षा और सौहार्द की गारंटी है, क्योंकि इसमें दूसरों के भले की भावना निहित होती है। जिस समाज में लोग एक दूसरे के प्रति दयालु होते हैं, परस्पर सहृदय और सहायक बनकर काम करते हैं वहाँ किसी तरह के विग्रह की संभावना नहीं रहती। विग्रह, अशान्ति, क्लेश वहीं निवास करते हैं जहाँ व्यवहार में क्रूरता है। क्रूरता अपना अन्त स्वयं ही कर लेती है। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप विभिन्न उपद्रव उठ खड़े होते हैं। दया से स्नेह, आत्मीयता आदि कोमल भावों का विकास होता है। दयालुता ही तो समाज को एकाकार करती है।

दया सुधार का एक शक्तिशाली माध्यम है अपराधी भी मनुष्य ही होता है और उसके हृदय में भी दया बीजरूप से निवास करती है। किन्हीं कारणों अथवा अज्ञानतावश मनुष्य अपराधी जीवन का अवलम्बन लेता है, खासतौर से ऐसे अपराधी लोगों का जीवन किसी के सहयोग प्रेम, सहानुभूति, आत्मीयता से रहित होता है। शायद इसीलिए ये लोग कठोर, क्रूरकर्मी बन जाते हों। कुछ भी हो किन्तु बाद में भी इन्हें किसी दयालु हृदय की आत्मीयता और सद्भावनायें मिल जायें तो ये पुनः मनुष्य बन जायें, इनमें मानवीय गुणों का विकास हो जाय। पुण्यात्मा, ऋषियों, सन्तों, महापुरुषों के संपर्क में आकर अनेक क्रूरकर्मी, कठोर हृदय व्यक्ति भी सुधर जाते हैं। वस्तुतः दया हमारे स्वभाव, संस्कृति, सभ्यता का मूलाधार है। दया, आत्मा का विशिष्ट गुण है। दया के आचरण के लिये किन्हीं बाह्य साधनों की आवश्यकता नहीं होती। पर दुःख कातरता-सम्वेदना, आत्म-त्याग और सहिष्णुता पर दया का विकास होता है। दूसरों के दुख, कष्ट, मुसीबतों को समझकर उन्हें सुखी बनाने, गिरे हुओं को उठाने की तीव्र भावना का उदय होना, इसके लिये अपने हित-अहित का ध्यान न रखकर प्राण-प्रण से जुट जाना, इसमें आने वाले कष्टों को सहर्ष सहन कर लेना दया-धर्म के आधार हैं। खुद-दुःख रहकर भी दूसरों को सुखी बनाना, खुद जलकर भी दूसरों को प्रकाश देना, खुद मिटकर भी दूसरों को सुखी बनाना, परहित साधन में स्वयं को भूल जाना दयाधर्म का सर्वोत्कृष्ट आदर्श हैं।

दया का दान सबसे महान दान है। भौतिक वस्तुओं के दान से किसी की सामयिक सहायता की जा सकती है। कुछ समय के लिए किसी बाह्य अभाव की पूर्ति की जा सकती है किन्तु दया का दान पाकर, अपने दुःख का अभिन्न साथी, सहयोगी, मित्र पाकर मनुष्य में जो संतोष प्रसन्नता, उत्साह, आशा उमंगें पैदा होते हैं इनसे मनुष्य बड़े-से-बड़े कष्ट, अभावों, मुसीबतों में भी सरलता से जीवन पथ पर आगे बढ़ता रहता है। वस्तुतः दया का दान लड़खड़ाते पैरों में नई शक्ति देना, निराश हृदय में जागृति की नई प्रेरणा फेंकना, गिरे हुए को उठने की सामर्थ्य प्रदान करना, अन्धकार से भटके हुए को प्रकाश देना है।

इसलिए शास्त्र कहता है- दयालु बनिये? अपने हृदय में परमात्मा के इस महान गुण का विकास कीजिए। आपकी दया की आवश्यकता है उन करोड़ों लोगों को जो दुःख, कठिनाई, मुसीबतों में उलझे कराह रहे हैं, जौ गिरे हुए हैं, जिनके पग लड़खड़ा रहे हैं आगे बढ़ने में, जिनका कोई सहारा नहीं है धरती पर। प्रतिदिन हमारे में से प्रत्येक के सामने ऐसे क्षण आते ही रहते हैं जब दूसरों को हमारी आवश्यकता होती है। यदि हममें से प्रत्येक नियमित रूप से दया-धर्म का आचरण करे तो मानव समाज के अनेकों कष्ट सहज ही समाप्त हो जाएं। सामूहिक प्रगति एवं शालीनता का सर्वत्र विकास होने लगे।

जैसे हम परमात्मा से दया की प्रार्थना करते हैं उसी तरह हमारा कर्त्तव्य है कि हम भी दूसरों पर दया करेंगे तो भगवान भी आप पर दया करेगा। आपके आये दिन होने वाले अनेकों अपराधों को क्षमा करेगा।


महात्मा महान आत्मा वाला पुरुष

प्रेम और समता मनुष्य को ज्ञान देता है कि वह अपनी सीमाओं से बाहर भी है और वह अखिल जगत की आत्मा का ही भाग है। समता की यह अनुभूति मानव की आत्मा में उमड़ कर ही कला, विज्ञान, साहित्य और श्रेष्ठ रचना द्वारा संसार में सद्गुण, सद्विचार तथा सद्प्रेरणा देने में सहायक होती है। तभी हमारी महान आत्माएं स्वार्थ, निष्कपटता, उदारतादि द्वारा संसार में सहायक होती हैं। तभी हमारी महान आत्माएं स्वार्थ त्याग, निष्कपटता, उदारतादि द्वारा संसार में प्यार-प्रेम, परोपकार और सद्व्यवहार का प्रसार करती हैं। महान आत्माओं ने प्रेम के मार्ग में अनेक कष्ट, शारीरिक-यंत्रणाएं सहकर, यही नहीं मृत्यु तक का भी स्वागत कर मनुष्य के सच्चे स्वरूप को समझा और आदर्श जीवन व्यतीत करके मानवता के परम सत्य की पुष्टि की। इसीलिए हम उन्हें महात्मा अर्थात् महान आत्मा वाला महापुरुष कहकर संबोधित करते हैं।

हमारी आत्मा जब संकीर्णता का वरण करती है तो निज की विशेषता खो देती है। इसकी विशेषता, समत्व में ही है। हम विश्व से समभाव होकर ही अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कर सकेंगे और तभी हमें वास्तविक आनन्दानुभूति होगी। हम भययुक्त और संघर्ष की विषम स्थितियों में तभी तक रहते हैं जब तक कि प्रकृति के व्यापक-समत्व के सिद्धाँत को नहीं समझ पाते और तभी तक हमें सारा संसार पराया जान पड़ता है। अपने और पराये तथा अपने अन्तःकरण और विश्व की व्याख्या के बीच जो सहज समता है उसे अनुभव कर इसी एक मंगलमय सूत्र के द्वारा जीवन को धन्य बनाता है।

-रवीन्द्रनाथ टैगोर


आत्म बल कैसे बढ़े

आत्म-बल मानव जीवन का सबसे प्रभावशाली बल है। यह अपने पास हो तो उसके द्वारा हर क्षेत्र में सफलता ही सफलता प्राप्त होगी। असफलताओं का कारण ही अपनी आन्तरिक निकृष्टता है। ओछी आदत, आलस्य और दुष्प्रवृत्तियों के कारण मनुष्य का अन्तस्तल निकृष्ट कोटि का रहता है। उसमें धैर्य, साहस, दृढ़ता, लगन जैसे सद्गुण पनपते नहीं। सफलता के लिए जिन सद्गुणों की ऊंची, स्वभाव की और सत्प्रवृत्तियों की आवश्यकता है वे यदि अपने में न हों तो फिर बड़े-बड़े लाभ प्राप्त करने की आशा दुराशा मात्र ही बनी रहेगी। इस दुनिया में हर वस्तु कीमत देकर प्राप्त की जाती है। यही यहाँ का नियम है। सफलताएं भी उत्कृष्ट मनोभूमि और आत्मबल के मूल्य पर खरीदी जाती हैं, यदि यह साधन पास में न हो तो फिर बड़ी-बड़ी आशाएं और आकाँक्षा करना निरर्थक है।

परमात्मा की इस सुव्यवस्थित दुनिया में हर चीज की नाप-तोल और व्यवस्था बनी चली आ रही है। उसका व्यतिक्रम नहीं हो सकता। कभी-कभी अपवाद देखने में आते हैं उनके पीछे भी पूर्व जन्मों के संग्रह का अनायास लाभ मिलना ही कारण होता है। प्रयत्न और पुरुषार्थ चाहे अब किया जा रहा हो, चाहे पहले कर लिया गया हो, लाभ उसी के आधार पर मिलेगा। पुरुषार्थों में सबसे बड़ा पुरुषार्थ अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुसंस्कृत बनाना है। जिसने अपने को सुधार लिया उसकी सारी उलझनें सुलझ जाती है। जिसने अपना निर्माण कर लिया उसके लिए हर क्षेत्र में सफलता हाथ बाँधे खड़ी होगी।

सफलता के प्राप्त करने की इच्छा और आशा बाँधने से पूर्व हमें अपने आपको उसका पात्र और अधिकारी बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। क्षमता उत्पन्न होने पर सफलता का मार्ग सहज ही प्रशस्त हो जाता है। जिसके पास पैसा हो वह किसी भी दुकान से अपनी अभीष्ट वस्तु खरीद सकता है पर जिसकी जेब खाली है उसे निराश ही रहना पड़ेगा। बाहरी साधन सामग्री की सम्पत्ति को ही लोग क्षमता मानते हैं पर वस्तुतः मनुष्य के पास असली सम्पत्ति उसकी आँतरिक क्षमता ही होती है। जिसमें सद्गुण मौजूद है, जिसमें आत्म-तत्व मौजूद है वह साधना सामग्री, अनुकूल परिस्थिति एवं जन सहयोग को सहज ही प्राप्त कर लेता है, किन्तु जो दोष, दुर्गुणों से भरा पड़ा है, उसकी सम्पदा और साधना सामग्री भी देर तक ठहर न सकेगी। लक्ष्मी कुपात्रों के पास नहीं रहती इसी प्रकार ओछे लोगों को सच्चे मित्रों और सहायकों से भी वंचित रहना पड़ता है।

उन्नति और सुख समृद्धि के लिए आकाँक्षा करना उचित है पर इसके लिए आवश्यक क्षमता एवं योग्यता का जुटाना भी आवश्यक है। बाह्य परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही अनुकूल क्यों न हो पर यदि भीतर से खोखला है तो उसे प्रतिकूलता का ही सामना करना पड़ेगा। इसलिए अभीष्ट मार्ग पर सफलता प्राप्त करने के लिए बाह्य उपकरण जुटाने के साथ-साथ आन्तरिक सुधार के लिए भी प्रयत्नशील रहना चाहिए। यह भूल नहीं जाना चाहिए कि दुर्गुणी व्यक्ति कोई क्षणिक सफलता भले ही प्राप्त कर ले उसे अन्तःकरण असफल ही रहना पड़ता है।

अध्यात्म मार्ग पर चलने वाले व्यक्तियों को अनेकों ऋद्धि सिद्धियाँ मिल सकती हैं पर उसके लिए आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता निताँत आवश्यक है। भजन पूजन का साधनात्मक कर्मकाण्ड आवश्यक है पर अन्तःशुद्धि के बिना वह निष्प्राण ही बना रहता है। कितने ही व्यक्ति जीवन भर भजन पूजन करते रहते हैं पर अपने दोष दुर्गुणों को सुधारने की ओर ध्यान नहीं देते। काम, क्रोध, लोभ, मोह में उनका मन घटिया श्रेणी के लोगों की तरह ही डूबा रहता है। स्वार्थपरता और संकीर्णता उन्हें बुरी तरह घेरे रहती है। दोष और दुर्गुणों से मन भरा रहता है। ऐसी दशा में उनके भजन में कोई लाभ होगा, ऐसी आशा नहीं करनी चाहिए। जलते तवे जैसे पानी की कुछ बूंदें दुर्गुणों से भरा हुआ मन पूजा के थोड़े छींटें लगने मात्र से शाँत नहीं हो सकता। उसके लिए आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार और आत्म-निर्माण की विशेष साधना करनी पड़ती है।

मन शुद्ध होने पर थोड़ा-सा भी भजन पर्याप्त हो सकता है। धुले कपड़े पर जरा सा रंग लगा देने से वह रंग जाता है पर मैले और काले कंबल पर ढेरों रंग लगाने से भी उसमें परिवर्तन नहीं होता। भजन भी एक प्रकार का रंग है जो तभी खिलता है जब उपासना करने वाले की मनोभूमि पवित्र हो। इस ओर उपेक्षा बरती गई तो फिर उन लाभों की आशा नहीं करनी चाहिए जो अध्यात्म-मार्ग पर चलने वाले को मिलते हैं। ईश्वर-प्राप्ति और आत्म-कल्याण की साधना में सफलता उसी को मिलती है जो अपना आत्मशोधन करने के लिए प्रायः प्रारंभ से प्रयत्न करता है। ऐसे साधकों की थोड़ी-सी उपासना भी उन्हें उसके लक्ष्य तक पहुँचा देती हैं। इसके विपरीत यदि अन्तःकरण पाप अंक में डूबा रहा तो भजन से भी कुछ काम न चलेगा।

आज भजन पूजन तो बहुत लोग करते हैं पर अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं पर ध्यान नहीं देते। वे भूल जाते हैं कि आत्म-कल्याण के लिए भजन की आवश्यकता इसलिए मानी गई है कि ईश्वर को सर्वव्यापी और न्यायकारी मान कर उसे हर घड़ी ध्यान में रखें और अन्तःकरण की पवित्रता को बढ़ाते हुए ईश्वर की कृपा प्राप्ति का अधिकारी बनें। यदि यह लक्ष्य भुला दिया जाय और ऐसा सोचा जाय कि केवल भजन से ही सब कुछ हो जायेगा, उतने मात्र से ही ईश्वर प्रसन्न हो जायेगा तो यह धारणा गलत है। लाखों व्यक्तियों का तो पेशा ही आज भजन बना हुआ है, इतने पर भी उनके जीवन में कोई प्रतिभा दिखाई नहीं पड़ती, इससे प्रकट होता है कि उनके कार्यक्रम में कोई भूल रह गई है। वह भूल है एकाकी साधना। जब तक सद्गुण न बढ़ेंगे, आत्म-शोधन का प्रयत्न न चलेगा तब तक पूजा अर्चना की प्रक्रिया एक विडम्बना ही बनी रहेगी।

आध्यात्मिक मार्ग के पथिकों के लिए भजन करना उचित है पर उनके साथ ही यह भी आवश्यक है कि अपने भावना स्तर को ऊंचा करें, चरित्र निर्माण की ओर ध्यान दें और गुण, कर्म, स्वभाव का ऐसा विकास करें जो एक आध्यात्मिक कहलाने वाले व्यक्ति के लिए आवश्यक है। यह प्रक्रिया सम्पन्न होते ही आध्यात्मिक सफलता का लक्ष्य सहज ही पूरा होगा, उसमें विलम्ब का कोई कारण शेष न रह जायेगा।

ईश्वर की कृपा से मनुष्य का निश्चय ही बड़ा कल्याण होता है, ईश्वर का साक्षात्कार और उसकी प्राप्ति निश्चय ही मानव जीवन की बहुत बड़ी सफलता है पर वह मिलती उन्हें ही है जो आत्म-निर्माण, आत्म-सुधार और आत्म-विकास के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। इसलिए ईश्वर-प्राप्ति और आत्म-कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के मूल आधार आत्म-निर्माण की ओर हमें पूरा ध्यान देना चाहिए। बीज बोने से ही फल प्राप्त होगा, और जड़ को सींचने से ही पत्ते और फूलों की शोभा दीख पड़ेगी। आत्म-बल बढ़ाने के लिए हमें ईश्वर उपासना करनी चाहिए पर साथ ही जीवन शोधन और परमार्थ कार्यक्रमों को अपनाये रहने का भी पूरा ध्यान रखना चाहिए। सन्मार्ग पर चलना ही आत्म-बल बढ़ाने का अमोघ साधन है।


भुजायें सोने की खान है

एक माली के लड़के बड़े आलसी थे। वे काम-काज से जी चुराते और व्यर्थ की बातों में अपना समय नष्ट करते रहते। लड़कों के इस व्यवहार से माली बहुत दुःखी रहता। जब वह मरने लगा तो उसने लड़कों को बुलाया और कहा- तुम आलस में पड़े रहकर घर में जो कुछ है उस सब को बर्बाद कर दोगे। पर मैंने तुम्हारे भविष्य का ध्यान रखा है और बाग में प्रत्येक पेड़ के नीचे थोड़ा-थोड़ा सोना गाढ़ रखा है, जब जरूरत हो तब निकाल लेना। यह कहकर माली मर गया। घर में जो थोड़ी-सी पूँजी थी वह थोड़े ही दिनों में समाप्त हो गई। लड़के भूखों मरने लगे। उसने सोचा चलो पेड़ों के नीचे से सोना निकालें। वे जुट गये और एक-एक करके सब पेड़ों को खोदते गये। पर किसी के नीचे कुछ न निकला। लड़के जानते थे कि हमारा बाप कभी झूठ नहीं बोलता था फिर भी उसकी यह सोने वाली बात कैसे झूठी निकली इसका उन्हें आश्चर्य था। कुछ दिन बाद वर्षा हुई, पेड़ों के नीचे मिट्टी खुद जाने से जड़ों में काफी पानी पहुँचा और हर पेड़ ने भारी तादाद में फल दिये। आमदनी इतनी हुई कि हर पेड़ के नीचे सोना निकलने वाली बात सच हो गई। भुजायें सोने की खान है। परिश्रम करने से वह सोना सहज ही प्राप्त हो सकता है।


श्रद्धा ही जीवन है

श्रद्धा मानव जीवन की नींव है। जैसी जिसकी श्रद्धा होती है वैसा ही उसका व्यक्तित्व बनता है। गीताकार के शब्दों में ‘श्रद्धामयोऽयं पुरुषः’ यह मनुष्य स्वभाव से ही श्रद्धावान है। यह बात अलग है कि उसकी श्रद्धा का आधार क्या हो। जिस तरह सूर्य के बिना दिन नहीं होता, आँखों के बिना देखा नहीं जा सकता, कानों कि बिना सुना नहीं जा सकता, उसी तरह श्रद्धा के बिना जीवन गतिमय नहीं हो सकता। जिस तरह दीपक के प्रज्ज्वलित रहने के लिए स्नेह आवश्यक है उसी तरह जीवन के लिए श्रद्धा अपेक्षित है। वह मनुष्य, मनुष्य नहीं जिसमें श्रद्धा न हो।

श्रद्धा ही सत्य का साक्षात्कार कराती है। ‘श्रद्धया सत्यामाप्यते’ (यजु. 19.30) श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है। ‘श्रद्धा प्राणः’ (अथर्व 9।5।21) श्रद्धा मनुष्य का प्राण है। श्रद्धाहीन मनुष्य निष्प्राण, निर्जीव ही समझना चाहिए। क्योँकि किसी तरह की श्रद्धा न होने से वह निश्चेष्ट ही रहेगा और चेष्टारहित जीवन मृत्युतुल्य ही होता है।

श्रद्धा मुक्ति का, ज्ञान प्राप्ति का, जीवन साधना का आधार है। गीताकार ने कहा है-

‘श्रद्धावन् लभते ज्ञान तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्ध्वा पराँशान्तिमचिरेणाधि गच्छति॥’

‘श्रद्धालु व्यक्ति अपनी इन्द्रियों का संयम करके तत्परता से ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान प्राप्त होने पर मुक्ति मिलती है और फिर वह परम शाँति, सुख की अनुभूति करता है।’

हमारी श्रद्धा का उदय होता है किसी महत्वपूर्ण व्यक्तित्व से। जब हम किसी व्यक्ति में जनसाधारण से विशेष गुण या शक्ति का दर्शन करते हैं तो उसके प्रति एक आनन्दयुक्त आकर्षण पैदा होता है हममें यह आकर्षण उसके महत्व को स्वीकार करने के साथ-साथ हममें उसके प्रति पूज्य भाव भी पैदा करता है। इस प्रक्रिया का नाम श्रद्धा है।

श्रद्धा का आधार व्यक्ति के गुण कर्म ही होते हैं। इसलिए जिन कर्मों की प्रेरणा से श्रद्धा उत्पन्न होती है उन्हें धर्म की संज्ञा दी जाती है और इसी धर्म से मनुष्य समाज की स्थिति होती है। संक्षेप में धर्मवान व्यक्ति हमारी श्रद्धा का केन्द्र होता है। श्रद्धालु और श्रद्धेय के बीच में यह धर्म (कर्म) ही मुख्य हेतु होता है।

मनुष्य की प्रतिभा, शक्ति साधन सम्पन्नता भी श्रद्धा का आधार हो सकती है किन्तु ये कोई सार्वभौमिक नियम नहीं है। इनके संबंध में यह कोई निश्चय नहीं कि इनसे समाज का भला ही होगा। प्रतिभावान व्यक्ति भी समाज का शोषण कर सकता है, उसे हानि पहुँचा सकता है। शक्तिशाली होकर भी मनुष्य गुण्डा, दुष्ट, दुराचारी हो सकता है। साधन-सम्पन्न व्यक्ति भी बुराई और समाज को हानि पहुँचाने वाले कार्य कर सकता है। इसलिए जिन कृत्यों से सामाजिक हित में बाधा पड़े वे मनुष्य को श्रद्धा के पूर्ण आधार नहीं हो सकते। यों समाज में थोड़े बहुत व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो आतताइयों की प्रशंसा करते हैं। व्यसनी दुराचारी होकर भी कोई प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति कुछ व्यक्तियों की श्रद्धा का केन्द्र हो सकता है। साधन सम्पन्न व्यक्ति असामाजिक कर्म करके भी बहुतों का श्रद्धा भाजन बन सकता है। किन्तु ये सभी समाज के लिए अहितकर होने से हमारी श्रद्धा के सही आधार नहीं हो सकते। उल्टे ऐसे लोगों के प्रति श्रद्धालु होकर उन्हें प्रोत्साहन देना उनके द्वारा की गई पाप प्रवृत्तियों का भागी बनना है अर्थात् पाप का भागी बनना है।

अस्तु सद्कर्म, सदाचार, शील, सज्जनता ही हमारी श्रद्धा का उपयुक्त आधार हो सकते हैं क्योंकि इसका मनुष्य मात्र के भले से संबंध होता है। समाज की स्थिति को बल मिलता है इनसे। इनके अभाव में तो प्रतिभाशाली साधन सम्पन्नता भी हानिकारक हो सकती है।

सज्जनता, शील और इससे प्रेरित सत्कर्म जिन्हें दूसरे शब्दों में धर्म भी कहा जा सकता है संसार के सभी जन-समुदायों में प्रतिष्ठित है और इनसे समाज के नियम, व्यवस्था, स्थिति में सहयोग मिलता है। इसलिए ये ही हमारी श्रद्धा के सच्चे आधार हो सकते हैं।

श्रद्धा जहाँ मनुष्य के निजी जीवन का आधार बनती है, प्रेरणा का काम करती है, जीवन के रहस्यों को स्पष्ट कर मुक्ति प्रदान करती है वहाँ वह एक महत्वपूर्ण सामाजिक कर्त्तव्य भी है। सदाचारी, शीलवान, धार्मिक व्यक्ति के प्रति यदि हम श्रद्धा नहीं रखते तो कर्त्तव्य का पालन नहीं करते। किसी को भले काम करते देखकर, त्याग-साहसपूर्ण कदम रखने पर, धर्म का आचरण करने पर यदि हमारे मन से धन्यवाद, कृतज्ञता के भाव प्रकट न हो तो हम समाज के लिए जड़, पत्थर की तरह हैं। हम उसके लिए किसी काम के नहीं। अस्तु श्रद्धा एक सामाजिक उत्तरदायित्व है। इससे धर्म को बल मिलता है, सज्जनता को जीवन। जिस तरह वृक्ष को हरा−भरा रखने के लिए उसे सींचते रहने की आवश्यकता है उसी तरह समाज को शुभ कर्मों से युक्त रखने, धर्ममय रखने के लिए, उसे श्रद्धा से सींचते रहने की आवश्यकता है।

श्रद्धा वस्तुतः एक सामाजिक भावना है। वह एक ऐसी ‘आनन्दपूर्ण कृतज्ञता’ है जो एक प्रतिनिधि के रूप में हमें समाज के सम्मुख प्रकट करते हैं। लेने देने की कोई बात नहीं होती श्रद्धा में। यह एक सामाजिक उत्तरदायित्त्व है। जन-सामान्य का धर्म है। कोई भी व्यक्ति श्रद्धा का पात्र हो सकता है यदि वह सामाजिक जीवन के लिए उपयोगी होता है।

श्रद्धा के द्वारा हम अपना ही भला नहीं करते वरन् समाज का भी बहुत बड़ा साधन करते हैं। एक सदाचारी, धर्मवान व्यक्ति स्वभाव से अपने आस-पास प्रसन्नता और आनन्द की उपस्थिति देखना चाहता है और हम अपनी श्रद्धा प्रकट करके अपना आनन्द और प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। इससे श्रद्धेय का उत्साह बढ़ता है। उसे अपनी सामर्थ्य का ज्ञान होता है। इससे समाज में शील, सदाचार, धर्म को प्रोत्साहन मिलता है जो समाज की सुरक्षा स्थिति के लिए आवश्यक होते हैं।

श्रद्धा कहने की, या प्रचार करने की वस्तु नहीं है। अपने मन में किसी के प्रति श्रद्धा रखकर बहुत दूर रहते हुए भी उसके महत्व को समाज में प्रतिष्ठा देने में सहायक हो सकते हैं हम। श्रद्धा का आधार गुण और कर्म होते हैं। मनुष्य तो गौण होता है। उस गुण और धर्म को हम कहीं भी श्रद्धापूर्वक बल दे सकते हैं स्वयं आचरण करके और दूसरों में उनका प्रसार करके। इस संदर्भ में यह कहने कोई आवश्यकता नहीं कि ‘मैं आपके प्रति श्रद्धा रखता हूँ।’

जिसका सब कुछ छूट गया है, जो जीवन से निराशा हो चुके हैं और सान्त्वना, अवलम्बन और जीवन देती है-श्रद्धा। प्रत्येक समर्थ व्यक्ति भी अपने आप में अपूर्ण होता है उसे किसी अवलम्बन की आवश्यकता होती है और श्रद्धा ही मनुष्य का शुद्ध अवलम्बन होती है। इसमें ऐसा ‘परकीय-विश्वास’ होता है जिससे स्वकीन कार्य भी सुगम हो जाता है। श्रद्धालु का जीवन सरल हो जाता है। उसके जीवन के ताप शीलत हो जाते हैं। कठिनाइयाँ निष्प्रभ हो जाती हैं श्रद्धा के अवलम्बन से। जिन लोगों का जीवन श्रद्धा रहित होता है उनके जीवन में सुगम पथ बन्द हो जाते हैं उन्हें कठिनाइयों का कष्टकाकीर्ण पथ का अवलम्बन लेना पड़ता है या बहुत दिनों में थोड़ी-सी दूरी ही तय कर पाते हैं वे। लेकिन जो श्रद्धा अर्जित कर लेते हैं उनके लिए कठिन और असंभव कुछ भी नहीं रहता।

‘श्रद्धा का मूलाधार है दूसरे के महत्व को स्वीकार करना।’ किसी भी क्षेत्र में व्यक्ति की विशेषताओं से प्रभावित होकर हम उसे महत्व देते हैं ऐसी दशा में अपना आपा भूलना पड़ता है। लेकिन जिन लोगों में स्वार्थ और संकीर्णतायें भरी रहती हैं, जिन्हें अपनी बड़ाई ही अच्छी लगती है, जिन्हें अपने सिवा किसी का महत्व नहीं सुहाता ऐसे स्वार्थी और अभिमानी लोगों में श्रद्धा की भावना पैदा नहीं होती। अपनी संकीर्णताओं के कारण ये लोग दूसरों के कार्य और जीवन का यथार्थ मूल्याँकन भी नहीं कर पाते।

श्रद्धा न्याय-बुद्धि पर चलती है। श्रद्धेय के जितने महान गुण कर्म-धर्म होंगे उतने ही अनुपात से दूसरे लोगों में श्रद्धा का उदय होता है। सद्गुण, सत्कर्म, शील, धर्मपालन का सच्चा मूल्यांकन है- श्रद्धा। श्रद्धा कोई व्यापार नहीं है जिसमें श्रद्धावान कुछ प्राप्ति की आशा रखे श्रद्धेय से। यह तो दो व्यक्तियों के बीच का पुनीत माध्यम है। किसी चाह की प्राप्ति की भावना रख यदि हम किसी के प्रति श्रद्धा प्रकट करते हैं तो वह श्रद्धा नहीं चापलूसी, खुशामद है। श्रद्धा के नाम पर स्वयं को और श्रद्धेय को धोखा देना है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आजकल ऐसे झूठे श्रद्धालु और श्रद्धापात्रों का अधिक बोलबाला है।

शास्त्रकारों ने एक मत होकर कहा है-श्रद्धापूर्वक किए हुए कर्म, दिये गये दान आदि ही सफल होते हैं। अश्रद्धापूर्वक किया हुआ कोई भी कर्म निष्फल हो जाता है गीताकार ने कहा है-

‘अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।

असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥’

‘श्रद्धा के बिना किये हुए यज्ञ यागादि, दिये हुए दान की हुई तपश्चर्या यहाँ तक कि कोई भी कर्म, फल नहीं देता। व्यर्थ चला जाता है। हे अर्जुन उससे इस लोक में कोई सिद्धि नहीं मिलती तो भला परलोक में क्या मिलेगी?’

वेद के ऋषि ने भी कहा है-

श्रद्धायाग्नि समिध्यसे, श्रद्धा हूयते हविः।

श्रद्धा भगस्य मूर्धिनि वचसा वेदयामसि॥

(ऋग्वेद)

‘श्रद्धा से आत्माग्नि प्रदीप्त होती है। उसमें श्रद्धापूर्वक ही आहुति दी जाती है। श्रद्धा समस्त कल्याणकारी कार्यों के शीर्ष-स्थान पर विराजमान है श्रद्धा के बिना कुछ भी तो प्राप्त नहीं होता।’

उपनिषद्कार ने भी यही कहा है-

श्रद्धयादयम् (श्रद्धापूर्वक देना चाहिए)

श्रद्धालु के प्रति श्रद्धापूर्वक जो कुछ दिया जाता है उसे दान कहते हैं। वैसे दान की प्रेरणा दो होती हैं- एक श्रद्धा, दूसरी दया। सामर्थ्यहीन, गरीब, असहाय व्यक्तियों को दान देने की प्रेरणा दया से उत्पन्न होती है किन्तु श्रद्धा की प्रेरणा से सामर्थ्यवान व्यक्ति को देने की भावना पैदा होती है। विद्यादान में रत, समाज सेवा और परोपकार में लीन, मानव समुदाय की ज्ञान वृद्धि में लीन पुरुषों के अभाव की पूर्ति तत्परता से करना ही सच्ची बात है। वह समाज के ठीक पेट में जाता है और समाज के सभी अंगों को परिपुष्ट करता है। लेकिन स्वार्थियों, पाखण्डियों, अन्यायियों को जो दिया जाता है वह समाज के उसी तरह अंग नहीं लगता जिस तरह छिद्रयुक्त घड़े में पानी संग्रहीत नहीं रहता।

स्वार्थी व्यक्ति श्रद्धा को अपने लाभ की पूर्ति या अपनी तुच्छ मनोवृत्ति की तृप्ति के लिए उपयोग करते देखें जाते हैं। कोई साधुओं के वस्त्र पहनता है और कोई जन-सेवा का नारा लगाते हैं तो कोई बड़े भारी त्यागी बनकर समाज को धोखा देते हैं। ऐसे लोग ऊंची-ऊंची बातें कहते हैं जैसे कोई महान विद्वान हो या ज्ञानी ध्यानी। तरह-तरह के बनाव, प्रचार, प्रोपेगण्डा के द्वारा भोले लोगों को प्रभावित कर उनकी श्रद्धा प्राप्त करते हैं और फिर- उससे शोषण करते हैं, उन समाज का अपने लाभ के लिए।

कई लोग श्रद्धा को अपने मनोविलास का साधन बनाते हैं। ऐसे लोगों के लिए श्रद्धा उसी तरह है जैसे कि नशेबाज के लिए शराब, भांग, गाँजा, चण्डू आदि। ऐसे लोग अपने कामों से एक क्षण के लिए भी अपने नाम का वियोग नहीं सह सकते। ये लोग ऐसे काम उठाते हैं जिनमें नाम और काम का आडम्बर अधिक हो लेकिन मूल में कुछ भी न हो। लेकिन श्रद्धा इस तरह के दुरुपयोग और अपव्यय के लिए नहीं है। हमें इस संबंध में पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। कोई दूषित मनोवृत्ति का व्यक्ति हमारी श्रद्धा भावना का शोषण कर उसका दुरुपयोग न कर सके। क्योंकि श्रद्धा के द्वारा हमारी समस्त शक्तियों का भी दुरुपयोग किया जा सकता है। श्रद्धा समाज को पुष्ट करने वाली एक अमृतधारा है किन्तु समाज का यह भी कर्त्तव्य है कि दुष्ट, स्वार्थी, लोग इसका दुरुपयोग न करें।

इस सावधानी के साथ हम श्रद्धा की उपासना करें।

श्रद्धाँ प्रार्प्यहवाभहे श्रद्धाँ मध्यदिन परि।

श्रद्धाँ सूर्यस्य निम्रुचि श्रेद्धे श्रद्धापयह नः॥

(ऋ. 0। 051। 5)

‘श्रद्धा देवी का आह्वान करो। प्रातः काल श्रद्धायुक्त हों हम। मध्याह्न में श्रद्धावान रहें। सायंकाल श्रद्धा से युक्त हों और रात्रि में भी श्रद्धायुक्त रहें। जीवन के प्रत्येक कार्य में, प्रत्येक क्षण श्रद्धा को धारण किये रहें।’


त्याग करें, पर किसका

त्याग जीवन का एक आवश्यक धर्म है। जीवन शोधन का राजमार्ग है। प्राप्ति और प्रगति का नवचरण है त्याग। यह अशुभ के स्थान पर शुभ की प्रतिष्ठा का नियम है। एक को छोड़ने पर ही दूसरे की प्राप्ति संभव होती है। रखा हुआ कदम उठाकर, वर्तमान आधार छोड़कर ही पथ पर आगे नवचरण धरा जा सकता है। पेट में अवशेष तत्व का (मल का) त्याग करने पर ही भोजन की रुचि पैदा होती है। शुद्ध वायु ग्रहण करने के लिए फेफड़ों में स्थित अशुद्ध वायु को छोड़ना पड़ता है। नव शरीर धारण करने के लिए एक दिन जर्जर शरीर का भी त्याग कर देना पड़ता है। संग्रह करने से, पदार्थों को चिपकाये रहने से जीवन गति में विषमता पैदा हो जाती है। रुका हुआ पानी सड़ने लगता है। पेट यदि खाये हुए पदार्थों को अपने अन्दर ही संग्रह करता रहे तो अनेकों बीमारियाँ पैदा होकर शरीर नाश की स्थिति पैदा हो जायेगी। हृदय रक्त की वितरण व्यवस्था में संग्रह बुद्धि से काम ले तो शरीर की चैतन्यता ही नष्ट हो जायेगी।

इस तरह त्याग जीवन का एक आवश्यक ही नहीं अनिवार्य नियम है। त्याग के बिना विकास प्रगति, उन्नति का पथ प्रशस्त नहीं होता। जब हम किन्हीं पदार्थों, परिस्थितियों यहाँ तक विचारों भावनाओं में बंधे पड़े रहते हैं तब तक अन्य विषयों की ओर हमारी गति ही नहीं होगी। इसलिए किसी वस्तु का विषय विशेष से बंधना उसमें ही लिप्त रहना तो सर्वथा त्याज्य है। जो कुछ आपके पास है आप जो कुछ भी जानते हैं उसे अपनी उन्नति का आधार बना सकते हैं। जिस सीढ़ी पर आप खड़े हैं उसका सहारा लेकर ऊपर उठ सकते हैं लेकिन अन्ततः सीढ़ी आपको छोड़नी ही पड़ेगी। यह असंभव है कि आप उस पर खड़े भी रहें और ऊपर भी पहुँच जायं।

जीवन की पगडण्डी बड़ी लम्बी है। संसार का क्षेत्र बड़ा विस्तृत है। आगे बढ़ने के लिए, प्राप्त करने के लिए आपको नित्य त्याग करना पड़ेगा ही। यहाँ कोई भी तो ऐसा धाम नहीं है जहाँ कर कह सकें ‘बस हमारी यात्रा पूरी हो गई’ ‘अब यहाँ से हटना नहीं पड़ेगा।’ जब तक जीवन है संसार है, तब तक हमें छोड़ना पड़ेगा, त्याग करते रहना होगा।

इसलिए त्याग कीजिए ‘मैं’, और ‘मेरेपन’ का ताकि आप ‘पर-सत्ता’ की अनुभूति कर सकें। जब तक ‘मैं’ है आप परमात्मा की विराट सत्ता की अनुभूति प्राप्त न कर सकेंगे। ‘मेरेपन’ के कारण वस्तुओं की सीमा से बाहर न निकल सकेंगे। ऐसी स्थिति में आप विश्व-चक्र की गति से पिछड़ जायेंगे। चूँकि सारा संसार ही त्याग धर्म पर चल रहा है अस्तु संग्रह और रोके रखने की वृत्ति आपके जीवन में संघर्ष पैदा कर देगी। यहाँ का धर्म है कि विश्व जीवन को गति देने के लिए कुछ न कुछ त्याग करते रहो? और जब आप चाहेंगे ‘मैं नहीं दूँगा’ ‘मैं नहीं छोड़ूंगा’ ऐसी स्थिति में विश्व प्रकृति के विरोध का सामना करना पड़ेगा और तब तक आपको विवश होकर छोड़ना पड़ेगा, एक पराजित योद्धा की तरह। फिर क्यों स्वेच्छा से त्याग करके विश्व क्रम में सहयोग न दिया जाय। इससे दो लाभ होंगे एक स्वधर्म पालन करने का संतोष दूसरे हमारा जीवन एकाकी, संकीर्ण न रह कर विश्वजीवन से संयुक्त हो जायेगा। हम जीवन की उच्च भूमिकाओं में प्रवेश पा सकेंगे।

चूँकि त्याग एक को हटाकर दूसरे की प्रतिष्ठा का अवसर देता है इसलिए मन, कर्म, वचन से उन सभी बातों का त्याग किया जाय जो अशुभ हैं। अशुभ का त्याग करने पर ही शुभ की प्रतिष्ठा संभव होगी। जब तक हमारे विचार, भावना तथा कर्मों में अशुभ का बोलबाला है तब तक शुभ को स्थान कैसे मिलेगा? जिस तरह द्वार के किवाड़ों को खोलते ही सूर्य प्रकाश सहज ही भवन को प्रकाशित कर देता है उसी तरह जीवन से अशुद्ध तत्वों को निकाल देने पर शुभ का उदय अपने आप हो जाता है। बुराइयों के छूटते ही अच्छाइयाँ स्वतः पैदा हो जाती हैं। क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, मोह, ममता, लोभ आदि बुराइयों के छूटने पर दया, प्रेम, करुणा, श्रद्धा, तितिक्षा, शम, दम आदि सद्तत्वों का उदय होने लगता है।

हमें उन सभी कार्य व्यवहार प्रवृत्तियों का त्याग, करना चाहिये जो अशुभ से, असत्य से प्रेरित हैं, जिनका परिणाम सदैव दुःखदाई और पतन की ओर ले जाने वाला होता है। जो असुन्दर है। विषय-वासना और उनसे प्रेरित भोगों का त्याग करना आवश्यक है क्योंकि इनके रहते हुए जीवन में उच्च आदर्शों की प्रतिष्ठा संभव नहीं होती। मनुष्य की शक्तियाँ अस्त−व्यस्त एवं क्षीण हो जाती हैं इनमें लिप्त रहने से, आध्यात्मिक एवं भौतिक किसी भी क्षेत्र में ऐसी सफलता नहीं मिलती जिससे संतोष मिल सके। व्यक्ति की दिनों दिन विषय-वासनाओं में आसक्ति बढ़ती ही जाती है और वह इनके जंजाल से छूट नहीं पाता। इनसे कई मानसिक जटिलताएं भी दिनों-दिन बढ़ती जाती हैं। विषय भोगों का चिन्तन तक तो जीवन में कई तरह की विषमतायें पैदा कर देता है। शास्त्रकार ने लिखा है-

ध्यायते विषयान्पुसः संगस्तेषुप जायते।

संगात्संजायते कामः कामात् क्रोधोभिजायते॥

‘विषयों का चिंतन करने से उनमें आसक्ति पैदा हो जाती है। विषयों की आसक्ति से कामना उत्पन्न होती है और कामना यदि पूर्ण न हो तो क्रोध की उत्पत्ति होती है।’ इस तरह विषयों के चिन्तन मात्र से ही अनेकानेक मानसिक जटिलताएं उत्पन्न हो जाती हैं और मनुष्य अपने श्रेय पथ से विचलित हो जाता है।

लिप्सा चाहे विषय भोगों की हो या धन दौलत की या पद प्रतिष्ठा की उसे मानसिक और व्यावहारिक क्षेत्र से सर्वथा दूर करने का प्रयत्न किया जाय। मन में रहने वाली उस इच्छा एवं रुचि का भी त्याग कीजिए जिससे विषय-भोगों की तृष्णा बढ़े, जिनसे लोभ, मोह, अभिमान आदि को पोषण मिलता हो।

ऐसे भोजन का त्याग करना चाहिए जिससे स्वाद में आसक्ति बढ़ती हो, जिससे आलस्य, प्रमाद बढ़ता हो, जो तामसी बासी, गन्दा और किसी का झूठा हो, जो बेईमानी की कमाई से प्राप्त हुआ हो। शुद्ध, सात्विक, ताजा हल्का पौष्टिक और पसीने की कमाई से प्राप्त हुआ भोजन ही शरीर को स्वस्थ और ताजा रखता है।

वाणी से असत्य वचन, चापलूसी, परनिन्दा, कटुभाषण व्यर्थ वार्तालाप का त्याग करना चाहिए क्योंकि ये अशुभ और अनैतिक हैं। इनसे जीवन में कलह, पश्चाताप, लड़ाई, झगड़े, अशाँति पैदा हो सकते हैं। परस्पर के संबंध खराब हो जाते हैं। उन सभी दृश्यों तथा प्रसंगों से दूर रहें जिनसे दूषित मनोभावों, वासनाओं को पोषण मिले। मनुष्य जो कुछ भी देखता है उसकी प्रतिक्रिया मन पर होती है। उस दृश्य से संबंधित जो वासना मन में होती है, वह प्रबल हो उठती है और मनुष्य को वैसा ही करने की प्रेरणा देती है।

किसी भी स्थिति में बुरे काम करना, बुरा सोचना और बुरा कहना त्याज्य है। इतना ही नहीं बुरा देखने और सुनने से भी दूर रहना अच्छा है। इस तरह जीवन के सभी क्षेत्रों से अशुभ, असुन्दर का त्याग करना चाहिये जिससे शुभ का उदय हो।

कई बार हम लोग किन्हीं गलत प्रेरणा, उत्तेजनाओं से उत्तेजित मनोभावों में बहकर त्याग का विकृत रूप अपना लेते हैं। साधन-वस्तु अथवा अपनी जिम्मेदारी और कर्त्तव्यों का त्याग करते हैं। कोई घरबार छोड़ देते हैं तो कोई वस्त्र या वस्तु विशेष का त्याग करते हैं। लेकिन इनसे तो त्याग की आवश्यकता पूर्ण नहीं होती, न उसकी परिभाषा बनती है। त्याग का मूलाधार मनुष्य की मनोस्थिति है। इच्छा और कामनाओं का त्याग, अहंकार स्पृहीमोह आदि मनोभावों का त्याग ही सच्चा त्याग है। जब तक मनुष्य इन दूषित मनोभावों का त्याग नहीं करता तब तक उसे शाँति और संतोष की प्राप्ति नहीं होती, चाहे वह बाहरी त्याग के कितने ही प्रयत्न क्यों न करता रहे। गीताकार ने इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए लिखा है-

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमान्श्चरति निस्पृहः।

निर्ममो निरहंकारः स शाँति मधिगच्छति॥

‘सभी कामनाओं को छोड़कर सब ओर से निस्पृह, ममता रहित, अहंकार का त्याग करने वाला ही शाँति को प्राप्त करता है।’

हम सम्पत्ति का त्याग करते हैं किन्तु मन में स्थित लोभवृत्ति को नहीं छोड़ते, पर परिवार का त्याग करते हैं किन्तु ममता, मोह, का त्याग नहीं करते। स्थान, पद, अधिकार छोड़ देते हैं किन्तु अहंकार नहीं छोड़ते। इसी कारण हम सदैव शान्त और असन्तुष्ट बने रहते हैं। त्याग यदि अकल मन से किया होता है तो उससे शाँति, आत्म सुख की प्राप्ति होती है। किन्तु हम आवेश में आकर या दिखावे के लिए बाहरी त्याग करते हैं, आन्तरिक प्रेरक हेतुओं का त्याग नहीं करते और इनके छोड़े बिना कहीं भी एकान्त, वनों, गिरि-गुफाओं में ही क्यों न रहा जाय शाँति नहीं मिलती।

वस्तुतः धन परिवार, पद, साँसारिक पदार्थ आदि अपने-अपने स्थान पर कोई भी बुरे नहीं हैं। लेकिन इनके प्रति राग, आसक्ति मोह-ममता, लोभ, अभिमान आदि का संसर्ग ही दोष का कारण बनता है। इन्हीं का त्याग करना आवश्यक है। महर्षि व्यास ने लिखा है-’जिसने इच्छा का त्याग कर दिया उसे घर छोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं और जो इच्छा के वशीभूत है उसके वन में चले जाने पर कोई लाभ नहीं। अपनी इच्छा और कामनाओं का त्याग ही सच्चा त्याग है। वह जहाँ भी रहे वहीं भवन कन्दराएं हैं।’

इस तरह अपनी कामनाओं, इच्छाओं, वासनाओं तथा दूषित मनोभावों का त्याग ही सर्वोपरि त्याग है। इन प्रेरक हेतुओं का त्याग न करके जो प्रवृत्तियों का बलात् त्याग करता है, गीताकार ने उसे दम्भी बतलाया है। ऐसे व्यक्ति अपने आदर्श से जल्दी ही विचलित हो जाते हैं, जिन्होंने शरीर क्रिया का त्याग किया और मन से विषयों का चिन्तन करते हैं ऐसे लोग पथभ्रष्ट हो जाते हैं। योगभ्रष्ट होने वाले साधक इसी श्रेणी के होते हैं।


लक्ष्मी का निवास

उत्तरायण सूर्य आने पर प्राण त्यागने की प्रतीक्षा में शरशैय्या पर पड़े हुए भीष्म पितामह से युधिष्ठिर ने विनयपूर्वक पूछा-भगवन्! लक्ष्मी का निवास कहाँ रहता है? यह रहस्य कृपापूर्वक मुझे बता सकें तो वैसा अनुग्रह कीजिए।

भीष्मजी ने उत्तर दिया-राजन ऐसा ही प्रश्न एक बार रुक्मिणी ने साक्षात् लक्ष्मीजी से पूछा था। उन्होंने स्वयं जो उत्तर दिया था उसे ही मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।

लक्ष्मी बोली-हे रुक्मिणी! मैं ऐसे लोगों के यहाँ रहती हूँ जो निर्भीक, क्रियाकुशल, कर्त्तव्यपरायण, हंसमुख, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा सत्यपरायण हों। जो लोग गुरुजनों का सम्मान करते हैं। मन को वश में रखते हैं, शक्ति बढ़ाते है, परिश्रम करते हैं, समय नहीं गंवाते और जागरुक रहकर सब काम करते हैं, छोटों को क्षमा करते हैं, ईर्ष्या-द्वेष से बचे रहते हैं उन दूरदर्शी मनुष्यों के यहाँ में सदा ही बनी रहती हूँ।

किन्तु जो आलसी, क्रोधी, कृपण, व्यसनी, अपव्ययी, दुराचारी, कटु वचन बोलने वाले, अदूरदर्शी और अहंकारी होते हैं उनके कितने ही प्रयत्न करने पर भी मैं अधिक दिन नहीं ठहरती।

जिन घरों में स्त्रियों को सम्मानित और सन्तुष्ट रखा जाता है, देव पूजन और स्वाध्याय होता है, जहाँ सब लोग प्रेमपूर्वक मिल जुलकर रहते हैं, अनुशासन में रहते हैं, उदारता बरतते और प्रसन्नचित रहते हैं और वहाँ से अन्यत्र जाने को मेरा मन नहीं रहता। परन्तु जहाँ जुआ, परनिंदा, देर से सोना, देर से उठना, चटोरापन, मिथ्याचार, सज्जनों का उपहास और धर्म के प्रति उपेक्षा रहती है वहाँ क्षण भर ठहरना भी मुझे कष्टकारक होता है।


महान बालक कासाविआन

फ्राँसीसी और अंग्रेजों में युद्ध हो रहा था। नेल्सन के नेतृत्व में अंग्रेज सेना फ्राँसीसी सेना को परास्त करती हुई आगे बढ़ रही थी। समुद्री लड़ाई का भी पूरा जोर था। औरियम्ट नामक फ्राँसीसी जहाज पर भी गोलाबारी होने लगी। उसके कप्तान ने अपने ग्यारह वर्षीय लड़के कासाविआन का जहाज की एक छोटी जिम्मेदारी सौंप दी और कहा जब तक वह आज्ञा न दे तब तक वह वहीं ठहरा रहे और उसी काम को संभालता रहे।

युद्ध घमासान हो रहा था। गोलाबारी से औरियंट जहाज क्षत विक्षत हो गया वह डूबने लगा तो जहाज के कर्मचारी छोटी डोंगियों में उतर कर जान बचाने लगे। उन्होंने उस लड़के से भी कहा कि जहाज में आग लग गई है वह अब डूबने ही वाला है इसलिए जल्दी चलो तुम भी नाव में बैठकर अपनी जान बचाओ। लड़के ने कहा-मैं अपने पिता द्वारा सौंपी हुई जिम्मेदारी को छोड़कर यहाँ से हट नहीं सकता। वे आज्ञा देंगे तो ही यहाँ से हटूँगा। वह पिता को आज्ञा के लिए पुकारने लगा पर उसका कप्तान तो पहले ही गोली का शिकार हो चुका था उत्तर कौन देता। लड़का उसी काम पर अड़ा रहा और हंसते-हंसते मर गया। फ्राँसीसी इतिहासकारों ने इस घटना का स्मरण करते हुए लिखा है कि-उस युद्ध में विपुल हानि हुई पर नष्ट हुई चीजों में एक देश कीमती चीज उस कासाविआन का उच्च अन्तःकरण था।

स्वाध्याय सन्दोह-


सच्ची ईश्वर भक्ति का आधार

सेवा में ईश्वरीय भावना का महत्व

सेवा करना परम धर्म समझ कर यथायोग्य तन, मन, धन से सबकी सेवा करो, परन्तु मन में कभी इस अभिमान को न उत्पन्न होने दो कि मैंने किसी की सेवा या उपकार किया है। उसे जो कुछ मिलता है सो उसके भाग्य से उसके कर्मफल के रूप में मिला है, तुम तो निमित्त मात्र हो तुम दूसरे की सुख पहुंचाने के निमित्त बनाये गये, इसको ईश्वर की कृपा समझो और जिसने तुम्हारी सेवा स्वीकार की उसके प्रति मन में कृतज्ञ होओ।

सेवा करके अहसान जताना, सेवा के बदले में सेवा चाहना, अन्य किसी भी फल-कामना की पूर्ति चाहना तो स्पष्टतः सेवाधर्म से च्युत होना है। मन में इस इच्छा को कदापि उत्पन्न न होने दो कि उसे मेरी की हुई सेवा का पता रहना चाहिये। सेवा के बदले में मान चाहना या बड़ाई और प्रतिष्ठा की चाह करना तो बहुत अनुपयुक्त है। यहाँ मनुष्य बहुधा भूल कर बैठता है। जब वह किसी व्यक्ति या समाज की कुछ सेवा करता है, उस समय तो संभवतः सेवा भाव से ही करता है, परन्तु पीछे से यदि उस सेवा के बदले में उसे कुछ भी नहीं मिलता, अथवा उसके उपलक्ष्य में किसी अन्य व्यक्ति को सम्मान मिलता है तो उसे दुःख-सा होता है। इस तरह दुःखी होने का कारण यह होता है उसने मन ही मन उस सेवा के बदले में सम्मानित होने का अपना स्वत्त्व समझ लिया था। दूसरे का सम्मान होते देखकर उसे अपना हक छिनता सा नजर आता है। वास्तव में यह एक प्रकार से सेवा का मूल्य घटाना है। इसलिये सेवा करके यह कभी मत चाहो कि मुझे कोई पुरस्कार या सम्मान मिले, न दूसरे की मान मिलता देखकर डाह करो। तुम अपना अधिकार केवल सेवा का ही समझो।

-”कल्याण कुँज”

अपने भीतर के आत्म-केन्द्र पर स्थिर रहो-

यदि आप विश्वास करते हैं कि आपकी प्रसन्नता दूसरे व्यक्तियों या साँसारिक पदार्थों पर निर्भर नहीं है वरन् उसका अटूट स्रोत अपने भीतर ही है, तो आप किसी भी दशा में क्यों न हो हमेशा शाँत रहेंगे। रंज और कष्ट आदि आपको कभी भी नहीं सता सकेंगे। इसके विपरीत यदि आप दूसरों पर ही भरोसा रखते हैं और दूसरों के व्यवहार को ही अपनी प्रसन्नता का आधार समझते हैं, अपनी शाँति के लिये दूसरों की सहायता को आवश्यक मानते हैं, तो आप आध्यात्मिक दृष्टि से कभी उच्च श्रेणी में नहीं समझे जा सकते। ऐसी दशा में कहीं आपका ठिकाना न होगा और साँसारिक उलझनों तथा परिवर्तनों के साथ-साथ आप भी हिलते-डुलते रहेंगे।

इस नश्वर संसार में कदम-कदम पर परिवर्तन, विनाश और भय की काली-काली छायाएं हैं। इसके विपरीत आध्यात्मिक जगत में पग-पग पर सुरक्षा, सृजन और आनन्द के फूल बिखरे हुए हैं। आत्मा स्वयं पूर्ण है। तुम्हारे रहने का वास्तविक स्थान तुम्हारे भीतर ही है। तुमको चाहिए कि अपने भीतर के उस स्थान का पूरा-पूरा सदुपयोग करो। उस स्थान के तुम स्वयं शासक हो, पर दूसरे स्थान पर तुम शासक नहीं शासित बन जाते हो। इस बात की चिन्ता मत करो कि दूसरे व्यक्ति इस स्थान का प्रबंध किस प्रकार से करते हैं, वरन् तुम यह ध्यान रखो कि तुम अपने हृदय के शासन को निपुणता से चलाते हो या नहीं? अपने स्वामी आप बनो। तुम्हारे भीतर ही ज्ञान का अमर स्रोत है। यदि तुम्हें स्वयं अपनी इस शक्ति पर विश्वास नहीं है तो दूसरे लोग तुम्हारा विश्वास कैसे करेंगे? यदि तुम स्वयं अपने ही लिये सच्चे नहीं हो तो फिर तुमको सच्चाई और कहाँ से मिलेगी?

-”आनन्द पथ”

आन्तरिक शुद्धिरहित कर्मकाण्ड-

आन्तरिक जगत में जब तक साधना की भावना नहीं पनपती और ग्रहण किये गये व्रत या नियम के लिये ठीक तरह चरित्र का बल उत्पन्न नहीं होता, तब तक बाहर के व्रतों और नियमों का क्या मूल्य है? बाहरी व्रत और नियम तो आन्तरिक की रक्षा के लिये है, वे अन्दर की वस्तु की रक्षा करने वाली चहारदीवारी की तरह हैं। हमने अपने वास स्थानों में दीवारें खड़ी की हैं वे मिट्टी या पत्थर के रूप में खड़ी हैं। यदि उनके अन्दर कुछ भी नहीं है कोई व्यक्ति नहीं हैं कोई उपयोगी सामग्री नहीं है, केवल दीवारें ही दीवारें हैं, तो उनका क्या मूल्य है? दीवारों का मूल्य तभी है जब वहाँ सम्पत्ति बिखरी हो और आदमियों की चहल-पहल हो। इनकी रक्षा के लिये ही दीवारें खड़ी की जाती हैं और दरवाजों पर ताले लगाये जाते हैं। यही उन दीवारों की सार्थकता है।

यही बात जीवन के संबंध में भी समझनी चाहिये। जीवन के भीतर सत्य, अहिंसा, त्याग आदि रत्न बिखरे होने चाहिए। जितनी जीवन की विशेष साधनायें हैं वे बहुमूल्य गुणों के रूप में होनी चाहिये। इन साधनाओं की रक्षा के लिये ही बाहर के क्रियाकाण्ड के दीवारें हमको खड़ी करनी है। जीवन में यदि तत्व है, सत्य है, भीतर में चरित्र बल है, आध्यात्मिक बल है तो उनके द्वारा भी हमारे आन्तरिक जीवन की रक्षा होगी। कभी-कभी ऐसा होता है कि अन्दर का घर खाली है, भीतर कुछ भी नहीं है किन्तु बाहर बड़ी-बड़ी दीवारें खड़ी हैं। ऐसे स्थान में सिवाय भ्रम के कुछ नहीं होता। पर अन्दर यदि चरित्र बल है और बाहर-व्रत, नियम, उपवास आदि है, तो वे भी बहुमूल्य माने जायेंगे। हम उनकी कीमत कम करना नहीं चाहते। वास्तव में वे भी बहुमूल्य हैं, पर उनका महत्व तभी माना जायेगा जब भीतर चरित्र-बल होगा।

-”आस्तेय दर्शन”

ईश्वर भक्ति का स्वरूप-

जीवन में हमें ईश्वर विषयक श्रद्धा, भक्ति और निष्ठा की बहुत जरूरत है। लेकिन इन सब में जितनी हद तक विवेक, पुरुषार्थ और व्यापकता होगी उतनी ही हद तक ये भावनायें हमें कृतार्थ कर सकेंगी। ईश्वर संबंधी प्रेम से हमारे चित्त में केवल असात्विक भाव जागृत हों और उन भावों की अधिकता से हम विह्वल या मूर्च्छित हो जायं, शरीर की सुध-बुध खोकर ईश्वर को पुकारने लग जायं या स्वयं राधा बनने का प्रयत्न करते हुए स्त्रियोचित हावभाव, वेषभूषा और बोली का अनुकरण करने लगें, तो इसे वास्तविक भक्ति नहीं माना जा सकता।

विश्व में भरी हुई जिस महान शक्ति से हमारा निर्माण हुआ है और शरीर बुद्धि और मन सहित चैतन्य द्वारा मानव-कर्त्तव्यों को पूरा करने की जो शक्ति हमें दी गई है उसे सार्थक कर दिखाना ही भक्ति की सच्ची परिसीमा है। यद्यपि विश्व-शक्ति की तुलना में हमें अणु के समान है, तो भी यह अणु उसी का अंश होने के कारण परमात्मा में जिन सात्विक गुणों की कुछ न की जाती है वे सब अंश रूप में हम में हैं ही। इन गुणों का उत्कर्ष और उनको पूर्णता साधने की कोशिश करना भक्ति का सच्चा लक्षण है। हम कहते हैं कि परमात्मा में दया, न्याय, वात्सल्य, उदारता, प्रेम, क्षमा आदि गुण हैं। हम यह अपेक्षा रखते हैं कि संसार में सर्वत्र फैली हुई मानव जाति में भी ये सद्गुण हों। तो क्या इन्हीं सद्गुणों को अपने में लाना, उनका उत्कर्ष करना और इस प्रयत्न द्वारा ही विश्व-शक्ति (परमात्मा) के सात्विक तत्वों के साथ समरसता सिद्ध करना सच्ची तद्रूपता (भक्ति) नहीं है?

-”विवेक और साधना”


हम चरित्र को महत्व दें

एक विचारक ने कहा है-’जब धन चला गया तो कुछ भी नहीं गया, जब स्वास्थ्य चला गया हो कुछ गया, जब चरित्र चला गया तो सब कुछ गया।’ मानव-जीवन का कुछ सार है तो वह है मनुष्य का चरित्र। चरित्र ही मनुष्य की सर्वोपरि सम्पत्ति है। स्वेट मार्डन ने लिखा है “संसार के व्यक्तियों की आवश्यकता है जो धन के लिए अपने आपको बेचते नहीं, जिनके रोम-रोम में ईमानदारी भरी हुई है, जिनकी अन्तरात्मा दिग्दर्शक यंत्र की सुई के समान एक उज्ज्वल नक्षत्र की ओर देखा करती है जो सत्य को प्रकट करने में क्रूर राक्षस का सामना करने से भी नहीं डरते, जो कठिन कार्यों को देखकर हिचकिचाते नहीं, जो अपने नाम का ढिंढोरा पीटे बिना ही साहसपूर्वक काम करते जाते हैं। मेरी दृष्टि में वे ही चरित्रवान आदमी हैं।”

उत्कृष्ट चरित्र ही मानव-जीवन की कसौटी है। यों धन, विद्या, कला, शक्ति आदि का भी मनुष्य के जीवन में अपना स्थान है, महत्व है किन्तु धर्म बुद्धि द्वारा चरित्र के द्वारा इनका नियंत्रण नहीं होता तो ये सब उल्टे मनुष्य और समाज के लिए हानिकर सिद्ध हो सकते हैं। मनुष्य निर्धन हो, अधिक विद्वान, शक्ति प्रभुता सम्पन्न भी न हो, तो जीवन की उपयोगिता और महत्ता में कोई कमी नहीं आती। इसके विपरीत व्यक्ति इन सबसे सम्पन्न हैं लेकिन चरित्रवान नहीं है तो सब कुछ होते हुए भी दीन, मलीन, हीन है। उससे न अपना भला हो सकेगा न समाज का। उल्टे बंदर के हाथ में चाकू की तरह वह अपना और दूसरों का अहित ही करेगा। उत्तम चरित्र वाला व्यक्ति समाज के लिए एक बहुत बड़ी सम्पत्ति है। विश्व कवि टैगोर के शब्दों में ‘प्रतिभा से भी उच्च है चरित्र का स्थान। स्माइल्स ने लिखा है ‘चरित्र एक सम्पत्ति है अन्य सम्मतियों से भी महान।’ अन्य सम्पत्तियाँ अस्थायी हैं किन्तु चरित्र की सम्पत्ति मानव जाति की स्थायी निधि है।

हमारी चारित्रिक सीमाएं ही हमारी सफलता की सीमाएं बनती हैं। किसी व्यक्ति का चारित्रिक स्तर जानकर उसके जीवन की दिशा, सफलता, असफलता का अन्दाज लगाया जा सकता है। चरित्र ही जीवन में अन्य संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करता है जीवन की स्थायी सफलता का आधार मनुष्य का चरित्र ही है। इस आधार के बिना जैसे-तैसे सफलता प्राप्त कर भी ली जाय तो वह अधिक टिकाऊ नहीं हो सकती। जीवन की अंतिम सफलता या असफलता मनुष्य के चरित्र पर ही निर्भर करती है। व्यक्ति परिवार, राष्ट्र की स्थायी समृद्धि और विकास हमारे चारित्रिक स्तर पर ही निर्भर करते हैं। चारित्रिक हीनता से ही शक्ति समृद्धि और विकास का विघटन होने लगता है। यह एक दृढ़ चट्टान है जिस पर खड़ा व्यक्ति अजेय और महान होता है। लोकमान्य तिलक ने कहा है कि- ‘संसार में सच्चरित्र व्यक्ति ही उन्नति प्राप्त करते हैं।’

सम्पूर्ण जीवन, कार्य व्यवहार, विचार मनोभावों की निर्मलता, शुद्धि से ही चरित्र का गठन होता है। सेवा, दया, परोपकार, उदारता, त्याग, शिष्टाचार, सद्व्यवहार, आदि चरित्र के बाह्य अंग है तो सद्भाव, सद्विचार, उत्कृष्ट, चिन्तन, नियमित, व्यवस्थित जीवन, शाँत, गंभीर, सुलझी हुई, राग द्वेष-हीन मनोभूमि चरित्र के परोक्ष अंग हैं। संक्षेप में आत्म-त्याग और अध्यवसाय चरित्र के महत्वपूर्ण आधार स्तंभ हैं। अपने विचार मनोभाव, चेष्टाओं पर अपना नियंत्रण रखना, बुराइयों को छोड़कर जीवन में अच्छाइयों को महत्व देना, आत्म-संयम है। दूसरों के हित कल्याण के लिए अपने सुख और लाभ का ध्यान न रखकर पूरा-पूरा प्रयत्न करना आत्म-त्याग है। जीवन शोधन परमार्थ एवं अपने लक्ष्य पथ पर आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना अध्यवसाय है। जिसके जीवन में इस त्रिवेणी का संगम होता है वह सहज ही चरित्र की पवित्रता प्राप्त कर लेता है।

लोग बड़े परिश्रम के साथ धन कमा सकते है, स्वयं तथा अपने बच्चों के लिए बड़ी मात्रा में सम्पत्ति एवं वैभव सामग्री एकत्रित कर सकते हैं। पुस्तकें पढ़-पढ़कर विद्वान भी बन सकते हैं। अपनी चतुराई, बुद्धिमानी, दावपेचों के बस पर उच्च स्थान, पद-प्रतिष्ठा आदि भी प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन धनवान, विद्वान,नेता होना चरित्रवान होने का कोई प्रमाण नहीं है। इन विभूतियों से युक्त होकर भी लोग चरित्र-हीन हो सकते हैं। चरित्रवान ही इन विभूतियों का अपने तथा दूसरों के लिए सदुपयोग कर सकता है अन्यथा इनसे उल्टा वह अपने पतन और विनाश का मार्ग ही अपना लेता है।

दूसरे लोगों के दुःख, अभाव, परेशानियों में आप मदद नहीं कर सकते तो आपका धन वैभव मिट्टी है। यदि आप भूले भटकों को जीवन का मार्ग नहीं दिखा सकते तो आपकी विद्वता कोई महत्व नहीं रखती। आप समाज को कल्याण की ओर प्रवृत्त नहीं कर सकते तो आपका नेतृत्व, उच्च पद व्यर्थ है। चरित्र स्वार्थ पर नहीं परमार्थ पर जीवित रहता है। आप जो कुछ भी हैं, आपके पास जो भी है उसका दूसरों के हित में क्या उपयोग है? ‘सर्वजन हिताय’ में आपकी क्या उपयोगिता है? इस परमार्थ सूत्र पर ही चरित्र की बाह्य आधारशिला रखी है। सच्चरित्रता व्यावहारिक जगत में जीवन से निसृत होने वाली पावन गंगा है जो अपने संपर्क में आने वाले सभी का भला करती है। सब के लिए हितकर सिद्ध होती है। सेवा, आत्मीयता, मैत्री, भ्रातृत्व उत्तम चरित्र की ही देन हैं।

आपके विचार, इच्छायें, आकांक्षायें, आचरण जैसे हैं उन्हीं के अनुरूप आपके चरित्र का गठन होता है और जैसा आपका चरित्र है वैसी ही आपकी दुनिया बनती है। आपका जीवन और आपका संसार आपके ही चरित्र की देन है। लोग समझते हैं हमारा जीवन और संसार बाह्य परिस्थितियों पर चलते हैं किन्तु ऐसा नहीं है। आप स्वयं अपने हाथों ही इनका निर्माण करते हैं। असन्तुलित, अस्त-व्यस्त जीवन, स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण, निम्न विचार, आलस्य और प्रमाद युक्त असफलताओं का सामना करना पड़े तो इसमें किसका दोष? इसके विपरीत उदारमना, निस्वार्थ भाव से सबके हितचिन्तक, जीवन की प्रवृत्तियों के प्रति जागरुक रहने वाले व्यक्ति अनेकों विषमताओं में सुख शाँति सफलता का उपभोग करते हैं। मनुष्य की अपनी ही छाया उसके चारों ओर रहती है। जहाँ सच्चरित्र व्यक्ति के जीवन में शाँति सन्तोष, प्रसन्नता, विकास का क्रम भली प्रकार चलता रहता है वहाँ चरित्रहीन को चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखाई देता है और अपनी अनेकों सम्पन्नताओं के बीच भी उसकी जीवन नैया बीच में ही डूब जाती है। हमको भला-बुरा, सफल-असफल, महान और तुच्छ बनाता है हमारा अपना ही चरित्र।

चरित्रहीन व्यक्ति के पास यदि धन होगा तो वह उसे भोग-विलास और अन्य दुष्प्रवृत्तियों में जल्दी ही नष्ट कर डालेगा। ऐसा व्यक्ति यदि विद्वान है तो अपनी प्रतिभा, बुद्धि को अनेकों षड़यंत्र, छल, कपट, धोखा आदि में उपयोग करेगा, शक्तिशाली होगा तो दूसरों पर अत्याचार करेगा। ऐसा धन, विद्वता, शक्ति समाज के लिये घातक हैं जो चरित्रहीन व्यक्ति के अधिकार में हो। चरित्रवान व्यक्ति ही इन विभूतियों का सदुपयोग कर अपना तथा दूसरों का भला कर सकता है।

जीवन में हम क्या कमा रहे हैं क्या कर रहे हैं इसका मूल्याँकन धन, पाण्डित्य, शक्तियों के रूप में न करके चरित्र के रूप में करें। इन विद्या, धन, कला शक्तियों के विकास में भी समय लगाना चाहिए किन्तु ये सब कुछ चरित्र को शक्तिशाली, क्षमता-सम्पन्न बनाने के लिये ही हैं। इनके लिए चरित्र नहीं है। जीवन की महती सिद्धियां चरित्र को व्यापक, प्रभावशाली, शक्ति सम्पन्न बनाने के लिए ही उपयोगी है। जीवन की समस्त प्रवृत्तियों का उद्देश्य चरित्र का गठन ही रखा जाय।

चरित्र ही जीवन की सबसे बड़ी स्थायी सम्पत्ति है। धन, विद्या, शक्ति के अभाव में भी चरित्रवान उन्नति का सकता है किन्तु चरित्र के अभाव में कोई भी व्यक्ति उत्कृष्टता प्राप्त नहीं कर सकता। चरित्र ही वह जीवन-ज्योति है जो मनुष्य को कठिनाई, आपत्तियों, निराशा, अहंकार, अंधकार में मार्ग दिखाता है। किसी गुण विशेष की प्राप्ति से चरित्र का उद्देश्य पूर्ण नहीं होता। सम्पूर्ण जीवन उद्देश्य चरित्र है। इसलिए पूर्ण जीवन-साधना चरित्र के लिए अपेक्षित है। चरित्र कोई कल्पना नहीं। यह तो जीवन का जगमगाता सूर्य है। राम के कर्त्तव्य पालन में, भरत के त्याग-तप में, मीरा के प्रेम से, हरिश्चन्द्र के सत्यव्रत में, दधीचि के दान में कृष्ण के अनासक्ति योग में चरित्र की पूर्णता के दर्शन होते हैं। चरित्र जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता है जिसके अभाव में एक कदम भी जीवन की गति आगे नहीं बढ़ सकती। चरित्र ही जीवन रथ का सारथी है। उत्तम चरित्र जीवन को सही दिशा में प्रेरित करता है तो चरित्र हीनता पथ-भ्रष्ट करके कहीं भी विनाश गर्त में ढकेल सकती है।

खेद है भौतिकवाद की अंधी दौड़ में आज जीवन के मूल्याँकन के व्यापक स्तर बदलते जा रहे हैं। समाज में उनको प्रतिष्ठा मिलती है, लोग उनको महत्व देते हैं जो धनी सम्पत्तिवान, विद्वान, प्रतिभाशाली, उच्चपदस्थ हैं। लोग इसी कारणवश धन, पद, प्रतिष्ठा अर्जित करने में अन्धाधुँध लगे हुए हैं। इन सबके समक्ष चरित्र को प्रायः हम भूलते जा रहे हैं। यही कारण है कि चरित्र का मूल्याँकन कम होता चला जा रहा है। हम धनवानों की जी हुजूरी करते हैं, नेताओं का मुँह ताकते हैं, पंडितों की वाह-वाह करते हैं, चमत्कार दिखाने वालों के पैर पूजते हैं, किन्तु चरित्रवान सदाचारी व्यक्तियों को कोई महत्व नहीं देते। यह बहुत बड़ी सामाजिक विकृति है। इससे लोगों में चरित्र से विमुख होकर बाह्य सफलताएं अर्जित करने की अंधी प्रवृत्ति पैदा होती है।

वर्तमान युग में हमारी सम्पदा, विद्वता शिक्षा काफी बढ़ी है, उच्च स्थानों के लिए खुला अवसर भी मिला है। तथाकथित, भोग विलासपूर्ण जीवन स्तर भी बढ़ा है किन्तु इसी अनुपात में हमारा चरित्र दिनों दिन गिरता जा रहा है। चरित्रवान व्यक्ति बहुत ही कम मिलते हैं और उसमें से भी बहुत थोड़े धैर्य-पूर्वक अन्त तक अपने चरित्र को स्थायी रख पाते हैं। बढ़ता जा रहा भ्रष्टाचार, बेईमानी, धोखाधड़ी, भेदभाव, ईर्ष्या-द्वेष, बुराइयां आदि अपने चरित्र को भुलाकर उस भौतिक सम्पदाओं के संग्रह की अंधी दौड़ में लगने का ही परिणाम है। जब तक हम अपने चरित्र के प्रति जागरुक न होंगे, चरित्र को सर्वोपरि न मानेंगे तब तक हमारी व्यक्तिगत सामाजिक जीवन को विषमतायें दूर नहीं होंगी न हमारी समस्याओं का ही समाधान होगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन में चरित्र को प्रमुख स्थान दें। चरित्र ही हमारे मूल्याँकन की कसौटी हो। चरित्रवान व्यक्तियों को प्रोत्साहन और महत्व दें।


लक्ष्मी जी का निवास

असुरों का परित्याग कर लक्ष्मी जी देवलोक में इन्द्र के पास पहुँची और बोलीं-अब मैं तुम लोगों के पास रहा करूंगी।

आश्चर्य चकित इन्द्र ने लक्ष्मी जी से पूछा-भगवती, आप तो चिरकाल से दैत्यों के यहाँ निवास कर रही थीं भला, उन्हें छोड़कर अचानक यहाँ चले आने का क्या कारण उपस्थित हुआ?

लक्ष्मी जी ने कहा- हे सुरेश, जब तक दैत्य उदार, परिश्रमी, स्वाध्यायशील, सदाचारी, स्वच्छता प्रिय, स्त्रियों का सम्मान करने वाले, कृतज्ञ, मधुरभाषी, दयालु, उदार, निरहंकारी, मितव्ययी और नियमित दिनचर्या वाले रहे तब तक मैं वहाँ प्रसन्नतापूर्वक निवास करती रही। पर अब जबकि उनने अपना स्वभाव बदल डाला आलस, छिद्रान्वेषण, कटु भाषण, ईर्ष्या, अस्वच्छता, व्यसन, व्यभिचार, उच्छृंखलता, अवज्ञा, गुरुजनों का तिरस्कार, अधर्म मिथ्याचार और अहंकार को अपना लिया तब उनके यहाँ ठहर सकना मेरे लिये असंभव हो गया और उनके अनुनय विनय करने पर भी मैं उन्हें छोड़कर यहाँ चली आई हूँ। अभी तुम लोगों में अच्छे गुण दिखाई पड़ रहे हैं इन्हीं से आकर्षित होकर यहाँ आई हूँ। यदि तुम लोग भी प्रमाद करने लगे तो यहाँ भी मैं न ठहर न सकूँगी। सज्जनता के सद्गुणों के अतिरिक्त मुझे और कुछ भी प्रिय नहीं। अपने प्रिय स्थान को ही मैं खोजती रहती हूँ और जहाँ उपयुक्त स्थान मिल जाता है वहीं निवास करती हूँ।


अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न करने वाले- शंकराचार्य

समय अपनी समस्याओं को हल करने के लिए समय-समय पर ऐसे महापुरुष पैदा किया करता है जो उस काल की उलझनों को सुलझाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ कर सकने में समर्थ हों। भगवान शंकराचार्य ऐसे ही अवतारी महापुरुषों में से एक थे।

जन्मजात प्रतिभा यों सभी में रहती है और जिनमें वह न्यून हो वह उसे प्रयत्नपूर्वक बढ़ा भी सकता है पर शंकराचार्य में स्वतः ही वह अधिक थी। विद्याध्ययन के लिए पाठशाला भेजा गया तो वहाँ उन्होंने अल्प आयु में ही बहुत कुछ पढ़ लिया। वेद, शास्त्र, दर्शन और उपनिषदों में उन्होंने समुचित प्रवीणता प्राप्त कर ली।

विवेकशील बालक के सामने प्रश्न उपस्थित हुआ कि वह इस प्रतिभा का क्या उपयोग करे? कुसंस्कारी, स्वार्थपरायण, संकीर्ण भावना वाला लड़का इतना ही सोच सकता है कि नौकरी-चाकरी करके शौक-मौज की जिन्दगी पूरी करेंगे और बाबू बनने के गौरव में जीवन की सार्थकता मान लेनी चाहिए। पर शंकराचार्य उस मिट्टी के बने न थे। उनने जो सोचा वह ऊंचे स्तर का था और जो किया उसे इतना उत्कृष्ट आँका गया कि उन्हें ‘जगत गुरु’ मानकर गौरवास्पद पदवी से विभूषित किया गया। अब तो उनकी गद्दी पर बैठने मात्र में उनके अनुयायी तक ‘जगद्गुरु’ कहलाने का सौभाग्य प्राप्त कर लेते हैं।

बालकपन बीता ही था, किशोर अवस्था पूरी करके यौवन का आगमन अभी हो भी न पाया था कि जीवनोद्देश्य को निश्चित करने की विचारणा पूरी करके वे एक निष्कर्ष पर पहुँच भी गये और जब उन्हें अपने निष्कर्ष की उपयोगिता और श्रेष्ठता पर विश्वास हो गया तो उसे पूरा करने के लिए उन्होंने जो कुछ भी हो सका सो सब कुछ किया।

शंकराचार्य अपनी माता की इकलौती संतान थे। साधारण स्त्रियों की तरह उनकी माता भी यही चाहती थी कि बेटे बहू और नाती पोतों से भरा घर देखकर प्रसन्नता प्राप्त करें। पर बालक एक माता के मोह को महत्व देने की अपेक्षा असंख्य माताओं के पुत्रों को सच्ची सुख-शाँति का संदेश देने के पक्ष में था। युवक संन्यासी बनकर लोकमंगल के लिए अपना जीवन उत्सर्ग करना चाहता था, पर माता तो माता ही ठहरी, उसमें मदालसा जैसा साहस कहाँ? विश्वहित को अपनी निज की प्रसन्नता से बढ़कर मानने की, और जो महान है उसके लिए लघु का त्याग करने की उदारता उसमें कहाँ? बेचारी रो-धोकर बालक को समझाती-बूझाती रही कि वह घर गृहस्थी को संभाले और उसकी आँखों से ओझल न हो।

युवक में माता के प्रति अगाध निष्ठा थी। वे उसका पूरा सम्मान करते थे और उसकी सेवा में किसी प्रकार की न्यूनता न रहने देना चाहते थे, पर अन्तरात्मा ने यह स्वीकार न किया कि मोहग्रस्त व्यक्ति अविवेक पूर्वक किसी बात का आग्रह कर रहा हो तो भी उसे स्वीकार कर ही लेना चाहिए। माता की ममता का बहुत मूल्य है पर विश्व माता की सेवा करने का मूल्य उससे भी बड़ा है, विवेक ने ‘बड़े के लिए छोटे त्याग‘ उचित बताया और शंकराचार्य के लिए जो उचित है वह ईश्वर का निर्देश लगा। आत्मा ने परमात्मा की वाणी सुनी और उसी पर चल पड़ने का निश्चय भी बन गया।

कई बार बच्चों को बहलाने के लिए कुछ बहानेबाजी भी करनी पड़ती है। बूढ़ी माता का मोह बालकों की बाल-हठ से अधिक महत्व का न था। अस्तु प्रबुद्ध किशोर ने उसे झाँसा देकर काम बना लेने की मुक्ति ढूंढ़ निकाली। एक दिन माता पुत्र नदी में नहाने गये। माता किनारे पर बैठी थी, बेटा तैर कर स्नान का आनन्द ले रहा है। अचानक बेटे ने चिल्लाना शुरू किया- बचाओ, कोई बचाओ, मगर मुझे खींचे लिये जा रहा है। बेटे की चीत्कार सुनकर माता किंकर्तव्य विमूढ़ हो गई। बचाने का कोई उपाय वह जानती न थी। बेटे ने फिर कहा- ‘माता, मुझे भगवान शंकर के लिए समर्पण कर दो, वे ही अब मुझे बचा सकते हैं।’ मर जाने से जीवित रहने का मूल्य अधिक है, भले ही संन्यासी चलकर जीवित रहा जाय। माता को निर्णय करते देर न लगी। उसने भगवान शंकर से शर्तबंद प्रार्थना की-’मेरा बेटा मगर के मुँह से निकल आवे तो उसे आपके समर्पण करूंगी। संन्यासी बनने दूँगी।’

युवक के चेहरे पर प्रसन्नता की रेखा दौड़ गई, वह धीरे-धीरे किनारे पर आ गया। संन्यास की आकाँक्षा पूरी हुई। उन्होंने कषाय वस्त्र धारण कर भारतीय धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए घर-घर पर अलख जगाने का निश्चय कर लिया। ईश्वर उपासना में वे नित्य ही बहुत समय लगाते पर साथ ही यह भी विचार करते थे कि देश में अनेकों मत-मतान्तरों के कूड़े-करकट ने वेद-धर्म को पूरी तरह पराजित कर रखा है उसका भी तो उद्धार किया जाना चाहिए। ब्राह्मण का धर्म और संस्कृति की सुरक्षा के लिए जागरुक प्रहरी की तरह जो कर्त्तव्य पालन करना आवश्यक है, वह भी तो करना चाहिए। उन्होंने समग्र अध्यात्म को अपने जीवन में उतारा। भावनापूर्वक उपासना की, जीवन को अधिकाधिक पवित्र और निस्पृह बनाया, साथ ही लोक सेवा के लिए सामर्थ्य भर प्रयत्न करने का भी निश्चय किया। आर्ष अध्यात्म का स्वरूप भी यही है। इस त्रिविध कार्यक्रम को अपनाये बिना न कोई अध्यात्मवादी बन सकता है और न साधु संन्यासी कहला सकता है। शंकराचार्य न तो आलसी थे, न अविवेकी, न आडम्बरी फिर उन्हें सत्य को अपनाने में अड़चन ही क्या हो सकती थी?

सच्ची साधना, सच्चे आदर्शों पर आधारित साधना सहज ही पूरी होती है। भगवान शंकर उनके तप से प्रसन्न हुए और चाण्डाल के रूप में उन्हें दर्शन दिया। शंकराचार्य नदी में स्नान करके वापिस लौट रहे थे कि मार्ग में एक चाण्डाल में उन्हें छू दिया। इस पर वे कुपित होने लगे। चाण्डाल ने नम्रतापूर्वक पूछा-भेद-बुद्धि तक का आप त्याग न कर सके तो त्यागी कैसे कहलाते हैं? मनुष्य-मनुष्य में जाति-पाति के आधार पर ऊंच-नीच का अन्तर करना यह अध्यात्म आदर्शों से मेल कहाँ खाता है, आप सत्य के अनुयायी होते हुए भी इस भ्राँत धारणा को क्यों अपनाये बैठे हैं?

शंकराचार्य को अपनी भूल प्रतीत हुई। उस समय की रूढ़ियों से जो असत्य का आवरण बनकर उनकी आँखों पर पड़ा हुआ था वह चाण्डाल की सत्य और विवेक से भरी वाणी से हट गया। उन्होंने इस प्रकार साहसपूर्वक सत्य का प्रतिपादन करने वाले चाण्डाल को श्रद्धा पूर्वक अभिवन्दन किया और माना कि भगवान शंकर ही चाण्डाल के रूप में उन्हें मार्ग दर्शन कराने आये थे।

उन दिनों शैव-शाक्त, कापालिक, वाममार्गी और अगणित स्वेच्छाचारी मत-मतान्तर फैले पड़े थे। अवतार सिद्ध पुरुष और धर्म प्रवर्तक बनने की लोकेषणा ने उस समय के विद्वानों और साधुओं को कोढ़ की बीमारी की तरह ग्रसित कर रखा था। अपनी कुछ नई युक्ति निकाल कर वे लोग अपने-अपने सम्प्रदाय गढ़ लेते और जनता में मतिभ्रम पैदा करके चेली-चेले बना कर उन्हें मूंड़ते रहते। बौद्ध धर्म जैसी दया और करुणा का उद्देश्य लेकर अवतरित हुई विचारधारा हीनयान और महायान जैसे वाममार्गी, भोगवादी विचारों से प्रभावित हो चुकी थी। ऐसे अन्धकार युग में वेद-धर्म का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया था। इस स्थिति को देखकर युवक संन्यासी की आत्मा विचलित हो उठी और उसने इस अंधकार में प्रकाश उत्पन्न करने का संकल्प कर लिया। वे अकेले ही पद यात्रा पर चल पड़े और परिव्रज्या करते हुए देश के कौने-कौने में आर्ष आदर्शों और सिद्धाँतों का अलख जगाने लगे।

उन्होंने यह भी अनुभव किया कि केवल वाणी द्वारा धर्म प्रचार करने से ही काम न चलेगा। जन-भावना को परिष्कृत करने के लिए लेखनी का उपयोग भी आवश्यक है। प्राचीन ग्रंथों के माध्यम से उन्होंने अपनी विचारधारा को जन-मानस तक पहुँचाने के लिए उनके प्रेरणाप्रद भाष्य करने आरंभ कर दिये। गीता, वेदान्त-दर्शन और उपनिषदों पर उन्होंने अति महत्वपूर्ण भाष्य लिखे तथा और भी अन्य अनेकों भक्ति, ज्ञान, वैराग्य एवं सदाचार की प्रेरणा देने वाली रचनाएं लिखते रहे। थोड़े ही समय में उसने बहुत अधिक लिखा, जो अधिक ही नहीं उत्कृष्ट भी है।

सदुद्देश्य के लिए सच्चे मन से काम करने वालों को न साथियों की कमी रहती है और न साधकों की। जगद्गुरु शंकराचार्य ने काश्मीर से रामेश्वर और द्वारका से आसाम तक भारत के एक छोर से दूसरे छोर तक भ्रमण किया। मण्डन मिश्र जैसे उद्भट विद्वान उन्हें सच्चे साथी के रूप में मिले। हस्तामलक, तोटकाचार्य, पद्मनाभ, समित्-पणि चिद्विलास, ज्ञानकन्द, विष्णु गुप्त, शुद्ध कीर्ति, भानुतरिच, कृष्ण दर्शन, बुद्धि विरचि, आनन्दगिरि आदि मेधावी विद्वान इनके प्रमुख शिष्यों में विख्यात है। इनके संगठित प्रयत्नों से बौद्धिक क्राँति का एक महान अभियान आरंभ हुआ और वह सभी दृष्टियों से सफल रहा।

सामान्य लोग प्रचलित प्रथाओं को ही धर्म मान बैठते हैं फिर वे चाहे कितनी ही अनुपयुक्त, कितनी ही अवाँछनीय, कितनी ही अशास्त्रीय क्यों न हो। जो कोई भी सुधार की बात कहता है उसे तत्कालीन रूढ़िवादी लोग तरह-तरह से लाँछित करते हैं और उसका विरोध करने में ही नहीं, हानि पहुँचाने में भी कुछ कमी नहीं रहने देते। सुधारक शंकराचार्य को भी अन्य सभी सुधारकों की तरह भारी विरोधों और दुष्टताओं का सामना करना पड़ा। उन्हें अनेक शास्त्रार्थ करने पड़े और प्राण घातक आक्रमणों का साहसपूर्वक मुकाबला करना पड़ा। ‘सत्य में हजार हाथियों का बल होता है।’ इस तथ्य पर आस्था रखने वाले शंकराचार्य अपने पथ से तनिक भी विचलित न हुए और वे जीवनभर निर्धारित लक्ष्य की ओर बढ़ते ही चले गये।

भारी कार्य भार ने उनके स्वास्थ्य पर बुरी तरह दबाव डाला और वे रुग्ण रहने लगे। भगन्दर का फोड़ा निकला जो विश्राम और चिकित्सा के लिए अवकाश चाहता था, पर जिसके जी में अनाचार के विरुद्ध बगावत की आग जल रही हो उस योद्धा को शरशैय्या पर भी चैन कहाँ। भगन्दर का फोड़ा लिये वे आठ वर्ष तक निरन्तर भ्रमण करते रहे और बत्तीस वर्ष की छोटी सी आयु में इस लोक से प्रयाण कर गये।

एक बारगी आदेश में किसी महान तथ्य के लिए प्राण दे देना सरल है। पर आजीवन चट्टान की तरह अविचल रहकर धर्म उद्देश्य के लिए आये दिन की कठिनाइयों का सामना करते रहना और बाधाओं से लड़ते हुए आगे बढ़ना विरले ही शूरवीरों का काम है। शंकराचार्य ऐसे ही सच्चे शूरवीर थे। शहीद की तरह जिए और शहीद की तरह मरे। उनके महान आदर्श और महान त्याग के लिए संसार चिरकृतज्ञ रहेगा।


वशीकरण विद्या

संत दादू के पास एक महिला आई। उसका पति रुष्ट रहता था। घर की अनबन से निरन्तर अशाँति बनी रहती थी। महिला ने अपनी दुःखी गाथा संत से कही और कष्ट निवारण के लिए वशीकरण कवच माँगा।

संत ने उसे समझाया कि पति के दोष दुर्गुणों का विचार न करते हुए तुम सच्चे मन से उसकी सेवा करो। प्रेम से पशु भी वश में हो जाते हैं, मनुष्य की तो बात ही क्या है?

महिला को इससे संतोष न हुआ। वह वशीकरण कवच की ही माँग करती रही। अन्त में दादू जी ने एक कागज पर दो लाइन उसे लिखकर दे दीं और कहा- यह कवच है इसे पहनना और मेरे कहे अनुसार पति की प्रेमपूर्वक सेवा करना।

एक वर्ष बाद वह महिला बहुत सी भेंट उपहार लेकर आई। उसका पति वश में हो चुका था ‘घर का नरक स्वर्ग में परिणत हो चुका था। श्रद्धापूर्वक उसने संत के चरणों में मस्तक नवाते हुए भेंट प्रस्तुत की और वशीकरण कवच की बड़ी प्रशंसा करने लगी।

दादू ने उपस्थित लोगों से कहा-आप लोग भी यह वशीकरण विद्या सीख लें। महिला से उन्होंने कवच वापिस लेकर उसे खोला और सबको दिखाया। उसमें एक दोहा लिखा था-

दोहा-दोष देख मत क्रोध कर, मन से शंका खोय।

प्रेम भरी सेवा लगन से, पति वश में होय॥


सामूहिक चेतना की आवश्यकता

हमारे जीवन के दो बिन्दु है-एक व्यक्तिगत, दूसरा समष्टिगत। दो बिन्दुओं के संयोग से ही एक सरल रेखा आती है। व्यक्ति और समष्टि के बिन्दुओं को मिला देने पर ही जीवन यात्रा का मार्ग बनता है। यद्यपि ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, दोनों का अपना-अपना महत्व है। व्यक्तियों के समूह से ही समाज का निर्माण होता है तो व्यक्ति भी समाज की ही देन है फिर भी हमारी गति-दिशा व्यक्ति से समाज की ओर है। समष्टिगत-जीवन ही हमारा ध्येय बिन्दु है। एक हमारी जीवन यात्रा का प्रारंभ स्थान है तो दूसरा गन्तव्य। व्यक्तिगत जीवन अपूर्ण है वह सामाजिक जीवन में आत्मसात होकर ही पूर्ण बनता है। ठीक उसी तरह जैसे नदी, समुद्र आदि में बिन्दु मिलकर पूर्णता प्राप्त करता है।

व्यक्ति और कुटुम्ब मरते हैं, नष्ट होते रहते हैं, नये पैदा भी होते हैं किन्तु समष्टि का जीवन अखण्ड है, अनन्त है, सदा-सदा चलता रहता है। व्यक्तिगत जीवन सामयिक, बरसाती नदी नालों की तरह है किन्तु समाज तो चिर-प्रवाहिता सुरसरी की तरह है जो कभी रुकता ही नहीं। यह समष्टि जीवन अनन्त है। वह नित्य प्रवाहित और सारभूत पूर्णतत्व है। इसके विपरीत व्यक्ति और उसका आकार प्रकार अनित्य, अस्थायी अल्पजीवी, असार है। जो नित्य है स्थायी और अनन्त है उस समष्टिगत जीवन को लक्ष्य करके यात्रा करना व्यक्ति का अभीष्ट धर्म है।

समाज से परे एकाकी रहकर तो व्यक्तिगत जीवन का भी विकास संभव नहीं है। जीवन विकास के अनुकूल साधन, परिस्थितियाँ, समाज ही जुड़ा सकता है। विभिन्न शिक्षण संस्थायें, उनमें काम करने वाले व्यक्ति, जीवन निर्वाह के साधन, ज्ञान, विज्ञान, आविष्कार अन्वेषण के व्यापक कार्यक्रम क्या एक व्यक्ति द्वारा संभव है? हमारे दैनिक काम में आने वाली विभिन्न वस्तुएं, कपड़ा, अन्न, मकान, रेल, टेलीफोन, मोटरें, बिजली आदि के निर्माण, उत्पादन व्यवस्था में कितने व्यक्तियों का हाथ रहा है अब तक? इसका हम अनुमान भी नहीं लगा सकते। समाज के सहयोग के अभाव में हम एक कदम भी तो आगे नहीं चल सकते। हम एक दिन भी तो जीवित नहीं रह सकते। समाज में रहकर ही। हमारा जीवन संभव है। इसी के बीच शक्तियों और गुणों का विकास हो सकता है। अस्तु समष्टिगत जीवन को ही हम अपना ध्येय बनावें। उसी को शक्तिशाली और समर्थ बनाने में अपना योग दें। सामाजिक जीवन जितना समर्थ, विकसित और व्यवस्थित होगा उतना ही व्यक्ति भी विकास और उन्नति के महान अवसर प्राप्त कर सकेगा।

एकाकी व्यक्ति तो सुख भी नहीं भोग सकता। जिसे हम सुख और आनन्द कहते हैं वह भी तो समाज की ही एक स्थिति है। सुख के स्वर्ग में भी यदि मनुष्य को एकाकी छोड़ दिया जाय तो वह उससे ऊब जायेगा और भयभीत हो उठेगा। दूसरों के साथ ही मनुष्य सुख आनन्द मना सकता है। अक्सर हम प्रकृति की दी हुई वस्तुओं को अपने अनुकूल बनाकर, उन्हें अपने लिए संग्रह कर अधिक सुखी होने का प्रयत्न करते रहते हैं। मुझे अधिकाधिक सुख मिले ऐसा ही तो होता है हमारा प्रयास। किन्तु अथक परिश्रम करने, रात दिन लगे रहने पर भी तो हमें उस स्थिति का सन्तोष नहीं मिलता जहाँ हम कह सकें कि ‘सुख मिल गया।’ इतना ही नहीं हमारे ये व्यक्तिगत सुख प्राप्ति के प्रयास भी अनन्तः दुःखों का कारण बन जाते हैं व्यक्तिगत सुख चाहे कितना ही क्यों न हो वह सीमित है और अन्ततोगत्वा दुःख में परिणित होकर हमारी अशाँति का कारण बनता है।

आनन्द, सुख वस्तुतः आत्मा के गुण हैं इससे ये सार्वभौमिक भी है। समष्टि के साथ मिलने वाला सुख ही हमें आनन्द दे सकता है। इसलिए निजी सुख के बजाय समष्टि के सुख को महत्व देना, उसे सर्वोपरि मानना सुखी होने का आधार है।

इसलिए जीवन के सभी क्षेत्रों में हमारा ध्येय समष्टिगत है, सामाजिक है। हमारा कार्य व्यवहार सामाजिक जीवन को परिपुष्ट और विकसित करने के लिए हो। समाज जितना उत्कृष्ट होगा उतना ही व्यक्ति भी उन्नति और विकास के अवसर प्राप्त कर सकेगा। स्वामी रामतीर्थ ने कहा था-’तुम समाज के साथ ही ऊपर उठ सकते हो और समाज के साथ ही तुम्हें नीचे गिरना होगा। यह तो नितान्त असंभव है कि कोई व्यक्ति अपूर्ण समाज में पूर्ण बन सके। क्या हाथ अपने शरीर से पृथक रहकर बलशाली बन सकता है? कदापि नहीं।’ समाज के साथ ही हमारी स्थिति भी चलती है।

जिस समाज में व्यक्ति अपने-अपने लाभ, अपने सुख, अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की प्रेरणा से जीते हैं, अपनी व्यक्तिगत जरूरतें पूर्ण करने में ही जीवन बिताते हैं, वह समाज विशृंखलित हो जाता है। सामूहिक ध्येय के अभाव में व्यक्ति की गति स्वकेन्द्रित रहती है तो वह समाज नष्ट हो जाता है। चाहे उसमें कितने ही बड़े विद्वान, योद्धा, राजनीतिज्ञ, शक्तिशाली व्यक्तित्व क्यों न हो। शास्त्रकार ने लिखा-

बहवो यत्र नेतारः सर्वे पण्डित-मानिनः।

सर्वे महत्वमिच्छन्ति तद्वृन्दमवसीवति॥

‘जहाँ बहुत से नेता हैं, सभी अपने को पण्डित मानने वाले अहंकारी हैं, और सभी अपनी-अपनी महत्ता चाहते हैं वह समाज नष्ट हो जाता है।’

अपने ही हित की बात, अपनी महत्वाकाँक्षा, अपना लाभ, अपनी उन्नति की बात चाहे वह धार्मिक हो या भौतिक, सामाजिक जीवन के लिए घातक है। हम जो कुछ भी करते हैं, सोचते हैं उसका आधार समष्टिगत न होकर जब व्यक्तिगत होता है तो अनेकों सामाजिक विषमतायें एवं संघर्ष पैदा जो जाते हैं और सार्वजनिक अशाँति उत्पन्न हो जाती है। ऐसी स्थिति में व्यक्तिगत जीवन भी खतरे में पड़ जाता है।

स्मरण रहे व्यक्ति और समाज की उन्नति साथ-साथ चलती है। यदि समाज कमजोर, विशृंखल, अव्यवस्थित होगा तो व्यक्ति के विकास में समर्थ न हो सकेगा। न वह व्यक्ति की रक्षा कर सकेगा। सामूहिक शक्ति के अभाव में व्यक्ति भी दूसरों द्वारा शोषित होगा। उसे अन्याय, अत्याचार का सामना करना पड़ेगा। इतिहास इस बात का साक्षी है कि इसी कमजोरी के कारण, सामाजिक चेतना के अभाव में, अपने ही लाभ और सुख को मान्यता देने के कारण हमें विदेशियों के आक्रमण तथा अत्याचार के दिन देखने पड़े। महमूद गौरी, गजनबी, तैमूरलंग, नादिरशाह को हमारी सामाजिक विशृंखलता, व्यक्ति वाद के कारण ही सफलता मिली अपने पैर जमाने में। हमारी धार्मिक सामाजिक आस्थाओं को इसीलिए नष्ट भ्रष्ट होना पड़ा। हमारी अपार सम्पत्ति इसी कारण विदेशों में चली गई और यही प्रमुख कारण था कि हमें शताब्दियों तक गुलामी का जीवन बिताना पड़ा। हम अपने ही मसलों में उलझे रहे। अपने स्वार्थ की पूर्ति में लगे रहे। हमारा कोई सामूहिक ध्येय नहीं था, उस समय। हालाँकि उस समय कई विद्वान भी थे, धनी सम्पत्तिशाली भी थे, किन्तु सामाजिक चेतना के अभाव में अपना तथा जन-जीवन का अपमान शोषण वे नहीं रोक सके। इस व्यक्तिवाद के कारण हमारी बहुत बड़ी पराजय हुई जिसकी क्षतिपूर्ति हमारा समाज अभी तक नहीं कर पा रहा है। सामूहिक ध्येय को भुलाकर व्यक्तिगत स्वार्थों में लिख रहने की त्रुटि का परिणाम हम बहुत समय से भोगते आये हैं।


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हमारे बारे में जो कोई ऊट-पटाँग बातें करते हैं करने दो बुरा नहीं मानना चाहिए। गिरजाघर की मीनार क्या चीलों की चीख पर ध्यान देती है। -इलियट

जिस समाज की शक्तियाँ एक दिशा में मिलकर काम करती है, जहाँ समान ध्येय, समान आदर्श परम्परा, संस्कृति, सभ्यता एक होती है वहाँ समाज जल्दी ही विकसित और समृद्धिवान हो जाता है।

हममें से प्रत्येक का ध्येय समष्टि जीवन को पूर्ण और समृद्ध बनाने का हो। समाज सेवा का ऐसा व्रत जिससे सामाजिक आदर्श श्रद्धा को बल मिले, परस्पर संघर्ष और विरह दूर होवें, समता एकता बढ़े और सभी लोग सुख, शाँति वैभव पूर्ण जीवन बितायें, लेना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर समष्टि के हितार्थ व्यक्तिगत लाभ का त्याग करने में भी न चूकें हम।


युग-दृष्टा राजर्षि गोखले

श्री गोपाल कृष्ण गोखले के व्यक्तित्व की चर्चा करते हुए महात्मा गाँधी ने लिखा है-लोक सेवकों को कैसा होना चाहिए, इसकी जो कल्पना मूर्ति मैंने अपने मन में बना रखी है उस आदर्श के साकार स्वरूप श्री गोखले थे। वे स्फटिक जैसे निर्मल, गाय जैसे सरल, सिंह जैसे शूर थे। उदारता इतनी अधिक थी कि उसे दोष भी माना जा सकता है। मुझे उनके व्यक्तित्व में कहीं रत्ती भर भी दोष नहीं दीख पड़ा। मेरी दृष्टि से राज-नेताओं के क्षेत्र में वे एक आदर्श व्यक्ति थे।

ओछे व्यक्तित्व के मनुष्य कभी बड़े काम नहीं कर सकते। जिस चतुरता के बल पर वे नामवरी और सफलता कमाने की आशा लगाते हैं, अन्त में वही उन्हें धोखा देती है। ओछापन देर तक छिप नहीं सकता और जब वह प्रकट होता तो अपने ही पराये बन जाते हैं और वे लोग जो आरंभ में उनकी प्रशंसा किया करते थे वे ही अन्त में निन्दक और असहयोगी बन जाते हैं। यों सीमित दायरे में जीवन कम रखने वाले को भी वैयक्तिक सफलताओं के लिए उद्दात्त दृष्टिकोण ही रखना अपेक्षित है पर जिसे सार्वजनिक क्षेत्र में काम करना हो उसे ओछापन छोड़कर उदारता और साधुता का ही अवलम्बन करना चाहिए। व्यक्तिगत उत्कृष्टता के अभाव में मनुष्य के सारे गुण निरर्थक सिद्ध होते हैं विशेषतया सार्वजनिक कार्यकर्ता की सफलता तो संदिग्ध ही हो जाती है। धूर्तता के बल पर कोई व्यक्ति लोक नेता के पद पर देर तक आसानी से नहीं रह सकता, भले ही वह किसी प्रकार उसे कुछ समय के लिए प्राप्त करने में सफल हो जाय।

गाँधी जी जौहरी थे-वे मनुष्यों को परखते थे। गुणों के आधार पर नहीं व्यक्तित्व के आधार पर, गोखले को उनने परखा तो खरा पाया और सच्चे मन से उनके अनुयायी हो गये। वे उन्हें अपने राजनैतिक गुरु के रूप में मानते थे और अपनी गतिविधि निर्धारित करने में उनसे बहुत प्रकाश ग्रहण करते थे।

ऋषि शब्द की व्याख्या करते हुए यही कहा जा सकता है कि मानव जीवन की समस्याओं पर जो समग्र रूप से विचार कर सके, युग के अनुरूप अपना कर्त्तव्य निर्धारित कर सके, गिरों को उठाने के लिए जिसके मन में तड़पन उठती हो और स्वयं तपस्वी जीवन बिताते हुए दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करे वह ऋषि है। काका कालेलकर ने पिछले दिनों भारत में जन्मी विभूतियों में से देवेन्द्र नाथ ठाकुर, दयानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानन्द, गोखले, गाँधी, अरविन्द, रविन्द्रनाथ ठाकुर, ऐनी वेसेन्ट आदि महा मानवों को ऋषि श्रेणी में गिना है। गोखले सचमुच इस युग के ऋषि हुए हैं।

वे सच्चे ब्राह्मण थे। राजनीति में धर्म का प्रवेश उन्होंने आवश्यक माना और इसके लिए अपनी सामर्थ्य भर प्रयत्न भी करते रहे। एक बार एक संन्यासी उनके पास आये और उनके ब्राह्मण होने की श्रेष्ठता का प्रतिदान करने लगे। गोखले ने उत्तर दिया यदि किसी वंश में जन्म लेने के कारण मुझे श्रेष्ठ माना जाय तो ऐसी श्रेष्ठता को दूर से ही मेरा नमस्कार है। मनुष्य गुणों से ही श्रेष्ठ बन सकता है फिर चाहे वह किसी देश, जाति या वर्ग का क्यों न हो। गोखले ब्राह्मण कुल में जन्मे थे पर उनकी श्रेष्ठता जन्म में नहीं कर्म में सन्निहित थी।

उस महा मनीषी ने गरीबी को जन्मजात ईश्वरीय वरदान के रूप में पाया और उसे वे आजीवन प्रेमपूर्वक छाती से लगाये रहे। महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के एक छोटे गाँव में वे जन्मे। छोटी आयु में ही पिता जी का स्वर्गवास हो गया विधवा माता, चार बहनें और दो भाई सात प्राणियों के गुजारे के लिए कोई साधन न था तो उनके बड़े भाई को पढ़ाई छोड़ कर 15 रुपये मासिक की नौकरी करनी पड़ी। उदार बड़े भाई ने अपने छोटे भाई की पढ़ाई बन्द न होने दी। उसे कोल्हापुर पढ़ने भेजा और उस 15 रुपये में से सात रुपये में पूरे परिवार का खर्च चला कर आठ रुपये गोखले को पढ़ाई का खर्च देते। गरीबी ने उन्हें अनेकों गुण दिये। अमीरों के बच्चे पैसे का मूल्य नहीं समझ पाते और सुविधाओं की अधिकता के कारण व्यक्तित्व को विकसित करने वाली विशेषताओं से वंचित रह जाते हैं। गरीबी से उत्पन्न कठिनाइयाँ मनस्वी व्यक्ति को सतर्क, कर्मठ और सद्गुणी भी बनाती हैं। उससे दब तो लोग वे जाते हैं जिनकी आर्थिक स्थिति की तरह मानसिक स्थिति भी दयनीय होती है।

अच्छी श्रेणी में उन्होंने बी.ए. पास किया। उस जमाने में उच्च शिक्षा नाम मात्र की थी। इतने पढ़े लोगों को ऊंची सरकारी नौकरी या धन कमाने के अनेकों मार्ग खुले हुए थे। पर गोखले ने तो विद्या किसी और ही उद्देश्य के लिए पढ़ी थी। वे उसे नर-नारायण की सेवा का एक साधन बनाना चाहते थे। उनके जैसे ही भावनाशील व्रतधारी लोगों ने मिलकर अशिक्षा दूर करने के लिए ‘दक्षिण शिक्षा समिति’ स्थापित की। उसके आजीवन सदस्यों को 35 रुपये मासिक पर, सदा काम करते रहने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी। गोखले उसके सदस्य बने और समिति द्वारा संचालित फर्गूसन कालेज में बीस वर्ष तक निष्ठापूर्वक अध्यापन कार्य करते हुए, देश सेवा के लिए नई पौध बनाने में लगे रहे। लोकमान्य तिलक के इस्तीफा दे देने पर तो उन्हें गणित भी पढ़ाना पड़ा, यों राजनीति, इतिहास, अर्थशास्त्र आदि विषयों को वे पहले से ही पढ़ाते थे।

परिस्थितियों ने कालेज से बाहर भी उनकी सेवाओं की आवश्यकता अनुभव की और उनका क्षेत्र धीरे-धीरे समाज सेवा, पत्रकारिता और राजनीति की दिशा में अग्रसर होने लगा। अनेक पत्रों में वे नव चेतना उत्पन्न करने वाले लेख लिखा करते और कुछ ही दिनों में ‘राष्ट्र सभा समाचार’ का सम्पादन भार भी उन्हीं पर आ पड़ा। न्याय मूर्ति रानाडे द्वारा स्थापित ‘सार्वजनिक संस्था’ के वे मंत्री चुने गये। कार्य भार की अधिकता देखते हुए रानाडे ने 150 रुपये मासिक वेतन लेने का अनुरोध किया पर उन्होंने 22 वर्ष की आयु में 35 रुपये काम चलाते रहने की जो प्रतिज्ञा की थी, उसका उल्लंघन करना उचित न समझा और अनुरोध को अस्वीकार करते हुए स्वल्प वेतन पर गरीबी के साथ गुजर करते रहे।

लोक सेवा में अपना जीवन उत्सर्ग करने वाले जन-सेवकों की निर्वाह व्यवस्था करने के लिए गोखले ने ‘सर्वेण्ट आफ इण्डिया सोसायटी’ की स्थापना की। एक से एक आदर्शवादी और राजनैतिक संन्यासी उस आश्रम से व्यक्तिगत जीवन की आर्थिक समस्याओं से निश्चित होकर जन जागरण के काम में जुट गये। कहना न होगा कि सोसायटी के सदस्यों ने भाषण, लेखन, कला, रचनात्मक कार्य द्वारा जन जीवन में नव जागरण की ऐसी आग फूँकी जो राजनैतिक पराधीनता समाप्त होने तक कभी बुझने न पाई।

राजनीति के क्षेत्र में उनने प्रवेश किया तो अपनी सूझ-बूझ प्रतिभा और व्यक्तित्व के बल पर आशाजनक कार्य कर दिखाया। राष्ट्रीय महा सभा काँग्रेस में प्रवेश करके उन्होंने उसका संगठन मजबूत किया, शक्ति बढ़ाई और उस दिशा में तेजी से बढ़ाया जिस पर चलते हुए ‘स्वराज्य’ को प्राप्त करने के लिए पथ प्रशस्त हो सके। बम्बई प्रान्तीय काँग्रेस के मंत्री, फिर काँग्रेस महा समिति के संयुक्त मंत्री बने और 1905 में अ. भा. काँग्रेस के बनारस अधिवेशन में वे अध्यक्ष चुने गये। दक्षिण अफ्रीका से गाँधी जी को निमंत्रण देकर उनने भारत बुलाया और उनके हाथ में जन नेतृत्व सौंपने की अंतःभूमिका बड़ी कुशलता से उन्होंने ही पूरी की।

भारत में प्लेग फैला तो पीड़ितों की सहायता के लिए जी जान से जुटे रहे। उस समय के भयानक दुर्भिक्ष में क्षुधातों के लिए उनसे कुछ उठा न रखा। बंग-भंग आन्दोलन और तत्कालीन स्वदेशी आन्दोलन में उनने आगे बढ़ कर भाग लिया। दक्षिण अफ्रीका की सरकार द्वारा वहाँ के भारतीयों पर होने वाले अत्याचारों को विरुद्ध गाँधी जी द्वारा आरंभ किये अभियान में सहायता करने वे अफ्रीका पहुँचे और ब्रिटिश सरकार को भारत के प्रति उदार नीति बरतने की प्रेरणा देने के लिए कई बार इंग्लैण्ड की यात्रा की। बम्बई धारा सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और पीछे दिल्ली की केन्द्रीय धारा सभा के सदस्य भी चुन लिये गये। अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के दोहन का वे निरन्तर भंडाफोड़ करते और इस प्रयत्न में लगे रहते कि भारतीय जनता को सरकार द्वारा उपयोगी कार्यों की अधिकता का लाभ मिले। उस समय की परिस्थितियों में सरकार को झुकने के लिए जितना कुछ संभव था वे नरम और गरम तरीके अपनाकर भारतीय जनता के सच्चे प्रतिनिधि के रूप में संघर्ष करते रहे। जहाँ आवश्यकता पड़ी वहीं उन्होंने डट कर विरोध करने में भी संकोच न किया। उस समय के वायसराय लार्ड कर्जन उन्हें अपना ‘समवयस्क प्रतिद्वन्दी माना करते और कहा करते थे, ‘उनके संपर्क में अब तक जितने भी मनुष्य आये उनमें गोखले ही सबसे अधिक मजबूत और बलवान हैं।’

‘जो मिले उसे प्राप्त करो और आगे के लिए संघर्ष जारी रखो उस समय की राजनीति का यही केन्द्र बिन्दु उन परिस्थितियों को देखते हुए उचित भी था। ब्रिटिश सरकार पर भरसक जवाब डाल कर उन्होंने मार्ले मिन्टो सुधार घोषणा कराई जिसके अंतर्गत भारत को कुछ अधिक अधिकार मिले। दक्षिण अफ्रीका में गाँधी-स्मट्स समझौता उनसे कराया और भारतीयों को कुछ राहत मिली। कांग्रेस के नरम और गरम दलों में समझौता करा सकना उनकी ही सूझ-बूझ का फल था। वे लड़ना जानते थे पर जहाँ समझौते का अवसर आता उससे चूकते न थे। देश के कौने-कौने में भ्रमण करके उन्होंने राष्ट्रीय चेतना उत्पन्न करने वाले असंख्य भाषण दिये। देश को संगठित करने और भावनात्मक एकता उत्पन्न करने के लिए उनके प्रयास निरन्तर चलते रहे। उनने भारत के एक सच्चे देश भक्त के रूप में जीवन का प्रत्येक दिन लोक हित के लिए अर्पित करने में ही सौभाग्य समझा।

व्यक्तिगत जीवन की तरह ही वे सार्वजनिक जीवन में भी ईमानदार थे। ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध एक बयान में उनने एक बार ऐसे आरोप लगाये जो पीछे जाँच करने पर असत्य निकले। अपनी गलती के लिए उन्होंने सार्वजनिक रूप से खेद प्रकट किया। यों उस समय के नेता उनके इस माफी माँगने से रुष्ट हुए और कुछ समय तक वे साथियों द्वारा उपेक्षित होने पर एकाकी पड़ गये, इसका उन्हें जरा भी दुःख न हुआ। सचाई उनकी दृष्टि में सबसे बड़ी बात थी। राजनीतिक लाभों के लिए वे सचाई की उपेक्षा नहीं कर सकते थे। उनकी राजनीति में धर्म के लिए प्रमुख स्थान था।

गोखले ने राष्ट्रीय कार्यों के लिए प्रचुर धन एकत्रित किया और उसका विभिन्न कार्यक्रमों में उपयोग भी हुआ। पर उनके व्यक्तिगत जीवन के लिए फर्गुसन कालेज से सेवा निवृत्त होने पर जो 25 रुपये मासिक पेंशन मिलती थी, वही पर्याप्त हो जाती। जिस गरीबी से उन्होंने जीवन आरंभ किया उसे ही उन्होंने जीवन भर अपनाये रखा और केन्द्रीय सभा की सदस्यता आदि से सभी कुछ अतिरिक्त आय हो जाती तो उसे जरूरतमंदों को उदारतापूर्वक दे डालते। गोपाल कृष्ण गोखले यों राजनेता के रूप में प्रख्यात हैं पर वस्तुतः वे एक ऋषि थे। सच्चे ब्राह्मण की तरह उन्होंने जनता जनार्दन की उपासना के लिए विश्व मानव को सत्यं शिवं सुन्दर से समलंकृत करने की आराधना के लिए अहिर्निशि निष्ठापूर्वक कार्य किया। ऋषि ऐसे ही लोगों को तो कहते हैं-वेश में नहीं कर्म में उनका ऋषि-तत्व देखा और परखा जा सकता था। ऐसी ही विभूतियों से इस महान देश का मस्तक ऊंचा होता चला आया है और आगे होता रहेगा।


तीन उम्मीदवार

बादशाह को एक कर्मचारी नौकर की आवश्यकता थी। तीन उम्मीदवार सामने पेश किये गये। बादशाह ने पूछा-यदि मेरी और तुम्हारी दाढ़ी में साथ-साथ आग लगे तो पहले किसकी बुझाओगे?

एक ने कहा पहले आपकी बुझाऊंगा। दूसरे ने कहा-पहले अपनी बुझाऊंगा। तीसरे ने कहा-एक हाथ से अपनी और दूसरी हाथ से आपकी बुझाऊंगा।

बादशाह ने तीसरे आदमी की नियुक्ति कर दी और दरबारियों से कहा-जो अपनी उपेक्षा करके दूसरों का भला करता है वह अव्यवहारिक है। जो स्वार्थ को ही सर्वोपरि समझता है वह नीच है और जो अपनी और दूसरों की भलाई का समान रूप से ध्यान रखता है उसे ही सज्जन कहना चाहिए। मुझे सज्जन की आवश्यकता थी, सो उस तीसरे आदमी की नियुक्ति की गई।


जनसंख्या वृद्धि की समस्या

हमारी सामूहिक भौतिक समस्याओं में सबसे बड़ी समस्या जनसंख्या वृद्धि की है। भारत की भूमि और वर्तमान अर्थव्यवस्था जितने लोगों का भार-वहन कर सकती है उसकी अपेक्षा आबादी कहीं अधिक होने से राष्ट्रीय अर्थ संतुलन बिगड़ता है और उसका प्रभाव प्रत्येक नागरिक पर बुरा ही पड़ता है।

सन् 51 की जनगणना 35,68,91,624 थी। भोजन और श्रम की दृष्टि से छोटे बालकों का हिसाब काट कर 100 की आबादी 86 मानी जाती है। इस हिसाब से उस समय लगभग 30 करोड़ खाने वाले थे। प्रति व्यक्ति 14 औंस भोजन के हिसाब से इनके लिए 4.4 करोड़ टन अन्न की आवश्यकता पड़ती थी। पर आँकड़ों के हिसाब से बीज और बर्बादी काट कर करीब 4 करोड़ टन उत्पन्न होता था। तदनुसार 40 लाख टन की कमी पड़ती थी। दस वर्ष बाद सन् 60 की जनगणना के हिसाब से भी वही स्थिति है। अन्न की पैदावार बढ़ाने के सरकारी और गैर सरकारी अनेक प्रयत्नों के बावजूद वह कमी ज्यों की त्यों बनी हुई है। कारण एक ही है जन-संख्या का तेजी से बढ़ते जाना।

अन्न की भाँति दूध की समस्या भी है। भारतीयों के दैनिक भोजन में यह प्राणिजन्य प्रोटीन केवल 5.6 ग्राम मात्र होता है। जब कि न्यूजीलैंड में 69.4, आस्ट्रेलिया में 62.5, अमेरिका में 60.7 और इंग्लैण्ड में 43.4 ग्राम होता है। कैलोरी के हिसाब से परखा जाय तो भी हमारा भोजन बहुत घटिया दृष्टि का है। आयरलैण्ड में प्रति व्यक्ति 3480, न्यूजीलैण्ड में 3380, आस्ट्रेलिया में 3280, अमेरिका में 3117, इंग्लैण्ड में 3080 और भारत में केवल 1620 कैलोरी का दैनिक भोजन होता है। घटिया भोजन मिलने के कारण काम करने की शक्ति भी कम, रोग निरोधक क्षमता और दीर्घ जीवन की संभावना भी कम रहती है। दूध घी न मिलने का कारण भी यही है कि देश के दूध उत्पादन की अपेक्षा जनसंख्या कहीं अधिक है। हर एक के हिस्से में कम मात्रा में और घटिया किस्म का भोजन आता है, फलस्वरूप व्यक्ति की उत्पादन शक्ति भी न्यून ही रहती है।

कितने एकड़ भूमि का खाद्य प्रति व्यक्ति के हिस्से में आवे इस दृष्टि से हम संसार के अन्य देशों की अपेक्षा काफी पीछे हैं। 100 एकड़ भूमि का उत्पादन पोलैण्ड में 31 व्यक्तियों के हिस्से में आता है, इसी प्रकार चैकोस्लेविया में 24 हंगरी में 30 रुमानिया में 30, यूगोस्लाविया में 42 और इंग्लैण्ड में 6 व्यक्तियों को 100 एकड़ के उत्पादन का लाभ मिल जाता है। किन्तु भारत में इतनी ही भूमि को 148 लोगों का पेट भरना पड़ता है। ऐसी दशा में हमें अपर्याप्त एवं अपौष्टिक भोजन से ही काम चलाना पड़ता है।

अपर्याप्त भोजन से शारीरिक दुर्बलता, शारीरिक दुर्बलता से कम उत्पादन, कम उत्पादन से दरिद्रता और दरिद्रता से व्यक्ति का स्तर गिरा हुआ रह जाता है और वह गिरावट प्रत्येक क्षेत्र में निराशाजनक समस्यायें उत्पन्न करती है। कम पूँजी के कारण कृषि पशुपालन तथा उद्योगों में भी उन्नति नहीं हो पाती। लोग जैसे-तैसे काम चलाते हैं, वे जीते नहीं, किसी प्रकार जी भर लेते हैं।

जन शक्ति किसी राष्ट्र की सच्ची सामर्थ्य मानी जा सकती है पर तभी जब उसके निर्वाह के समुचित साधन मौजूदा हों। जनसंख्या की वृद्धि ऐसी सुरक्षा है जो बढ़ते हुए उत्पादन से भी अधिक मुँह फाड़ देती है और हाथ पैर पीटने पर भी अभाव घटता नहीं, बढ़ ही जाता है। बेकारी, बेरोजगारी की समस्या भी विकट होती जाती है। प्रति वर्ष बढ़ जाने वाले लोगों को अन्न ही नहीं रोजगार भी चाहिए। भारत में 70 प्रतिशत लोग कृषि उद्योग में लगे हैं। अब इस उद्योग में इतनी गुँजाइश नहीं रही कि अधिक लोगों का भार वहन कर सके। अन्य उद्योगों में तथा नौकरियों में बहुत थोड़े लोग खप सकते हैं ऐसी दशा में बेरोजगारी हर वर्ष घटने की अपेक्षा बढ़ ही जाती है।

प्रसिद्ध अर्थशास्त्री माल्थस ने लिखा है कि जिस गति से जनसंख्या का प्रवाह बढ़ता है उस गति से उत्पादन बढ़ा सकना संभव नहीं हो सकता इसलिए समझदार लोगों का कर्त्तव्य है कि अपने समाज में अनावश्यक जनसंख्या न बढ़ने दें। जनसंख्या शास्त्री डॉ. एस. चन्द्रशेखर का कथन है- भारत की सुख समृद्धि और खुशहाली इस बात पर निर्भर रहेगी कि बढ़ती हुई जनसंख्या की गति को मन्द किया जाय।

राष्ट्रीय विकास की दृष्टि से जन जीवन का स्तर ऊंचा उठाने के लिए अनेक प्रयत्नों की आवश्यकता है। सरकारी और गैर सरकारी प्रयत्नों से दरिद्रता के विरुद्ध एक बड़ा अभियान छेड़ा ही जाना चाहिए। अशिक्षा, दरिद्रता और बीमारी से ग्रस्त जन-समाज किसी राष्ट्र की शक्ति का नहीं वरन् उसकी दुर्बलता एवं कठिनाई का ही द्योतक हो सकता है। या तो जनसंख्या के अनुरूप साधन उत्पन्न किए जाने चाहिए अन्यथा साधनों के अनुरूप जनसंख्या को सीमित रहना चाहिए। दोनों का संतुलन रहना आवश्यक है। यदि वह असंतुलित होता है और साधनों की तुलना में आबादी बढ़ती है तो उसका प्रतिफल, बीमारी, अकालमृत्यु, दुर्बलता, गंदगी, दीनता, अशिक्षा, बेरोजगारी, अपराध, कलह एवं अशाँति के रूप में ही दृष्टिगोचर हो सकता है।

व्यक्तिगत जीवन में भी अधिक सन्तानोत्पादन का घातक प्रभाव पड़ता है। महिलायें अपना स्वास्थ्य खो बैठती हैं। प्रसव काल में अगणित मृत्युएं हर साल होती हैं। घटिया भोजन, अधिक श्रम, मानसिक उलझनें, ब्रह्मचर्य संबंधी असंयम, वंश परम्परा की दुर्बलता यही बातें स्वास्थ्य बिगाड़ने के लिए बहुत बड़े कारण रूप हैं, इस पर भी यदि नारी को अधिक बच्चे पैदा करने का भार वहन करना पड़े तो उसका स्वास्थ्य किस प्रकार स्थिर रह सकेगा? जिन शरीरों में अपना निज का काम चलाने की भी समुचित क्षमता नहीं है वे अपने थोड़े से रक्त माँस में से ही नये-नये बच्चों के शरीर बनाने और उन्हें बहुत दिन तक दूध के रूप में जीवन रस पिलाते रहने और अपना स्वास्थ्य ठीक बनाये रखने में समर्थ होंगे इसकी आशा करनी व्यर्थ ही है। आज की स्थिति में स्त्रियों पर एक दो बच्चों में अधिक भार पड़ना उनके साथ हुआ अत्याचार ही माना जा सकता है।

बच्चों के उचित पालन पोषण एवं शिक्षा की सुव्यवस्था के लिए जितनी अच्छी आर्थिक स्थिति इस महंगाई के जमाने में अपेक्षित है, उतनी सामर्थ्य बहुत कम लोगों को होती है, फिर भी वे अविवेकपूर्वक बच्चे उत्पन्न करते रहते हैं। जितने मेहमानों को ठहराने और खिलाने का प्रबंध न हो उतने निमन्त्रित कर बैठना बुद्धिमत्ता का चिन्ह नहीं। भुखमरी, अशिक्षा और दुर्दशाग्रस्त जीवनयापन करने के लिये बच्चों को बुला-बिठाना किसी भी विचारशील माता-पिता के लिए लज्जा की बात ही हो सकती है।

परिवार का आर्थिक संतुलन बिगाड़ने और घर के प्रत्येक व्यक्ति को अभावग्रस्त जीवन व्यतीत करने की उलझन में डालने के लिए अपने आर्थिक स्तर से अधिक संतानोत्पादन से बड़ी गलती और कोई नहीं हो सकती। विचारशीलता का तकाजा यह है कि प्रत्येक सद्गृहस्थ अपने परिवार की सुस्थिरता का विचार करते हुए राष्ट्रीय कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुये संतानोत्पादन को सीमाबद्ध रखने का पूरा-पूरा ध्यान रखें। अधिक बच्चे उत्पन्न करने में खुशी मनाने जैसी बात किसी भारतवासी के लिए तो उसकी अविवेकता ही कहीं जायेगी।


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निस्वार्थ सेवा

जिस प्रकार ईश्वर के साकार और निराकार स्वरूपों का ध्यान करने के लिए मन और बुद्धि को अन्तःस्थित करना होता है उसी प्रकार सर्वव्यापक ईश्वर की अनुभूति के लिए प्राणिमात्र की निःस्वार्थ सेवा की आवश्यकता है।

जब हम सेवा में पूर्ण तल्लीन हो जाते हैं तब अपने शरीर तथा मन की अर्थात् शारीरिक, मानसिक क्रियाओं की नितान्त विस्मृति हो जाती है। मन को बंधन में डालने वाले संस्कार नष्ट होने लगते हैं। निःस्वार्थ सेवा के द्वारा अपने स्वार्थ को त्यागकर अपने ध्यान को परमार्थ बिन्दु पर केन्द्रित कर देने से स्वार्थ की इच्छा परहित में परिवर्तित हो जाया करती है।

-मेहरबाबा


करुणामूर्ति माता टेरीजा

यूगोस्लाविया में जन्मी इस ईसाई संन्यासिनी का जन्म नाम ‘जोग्ज्हा बोजाग्ज्हा’ है। उन्नीस वर्ष की आयु में वे आज से पैंतीस वर्ष पूर्व कलकत्ता के सेन्टमेरी हाईस्कूल में अध्यापिका बनीं और तभी उन्होंने लोरेत्तो मठ में संन्यास की दीक्षा ले ली। संन्यास का नाम उन्हें मिला-’टेरीजा’। स्कूल का काम पूरा होते ही वे गरीबों के गंदे गली मुहल्लों में निकल जाती और वहाँ रोगों से कराहते हुए दर्दी, भूखे बालक, असहाय बूढ़े, पतिता नारी और अशिक्षा एवं अंधविश्वासों के कारण पिछड़े हुए लोगों की जो सेवा उनसे बन पड़ती, दिन भर करती रहती। मानव-जीवन से खिलवाड़ करने वाले अनाचारों के प्रति उनके मन में विद्रोह की भावना तो बराबर उठती थी, पर वे उसे उद्विग्नों की तरह क्रोध करते रहने और अव्यवस्था फैलाने में नहीं वरन् रचनात्मक कार्य करने में लगाया करतीं।

पीड़ित और पददलित मानव की सेवा करने में ईश्वर की सर्वोत्तम पूजा मानने वाले प्रभुपरायण भक्तों में से एक है-माँ टेरीजा। इनने आजीवन कुमारी रहकर ईश्वर उपासना की सर्वश्रेष्ठ पद्धति जनसेवा में अपने जीवन का उत्सर्ग करके आत्म-कल्याण का पथ अपनाया और अपने निश्चित लक्ष्य में बालकपन समाप्त कर जीवन का उदयकाल आरंभ होते ही वे जुट गई।

कलकत्ता, आसनसोल आदि बंगाल के कतिपय नगरों में बंगाली ढंग की किनारीदार सफेद धोती पहने गरीबों के मुहल्लों में इस करुणामयी मातृत्व की मूर्ति नारी को काम करते हुए देखा जा सकता है। गोरी चमड़ी के अतिरिक्त और कोई चिन्ह ऐसा नहीं जिससे उन्हें अभारतीय के रूप में पहचाना जा सके। उनका क्षोभ करुणा में बदल जाता है और सेवा उनका कष्ट कम करने के लिए जो कुछ संभव होता है सो करने लगती है।

सेवा कार्यों में इतनी तन्मयता देखकर उदारमना पोप ने उन्हें रात को देर तक और आवश्यकता पड़े तो रात को बाहर भी रह जाने की छूट दे दी। यों ऐसी संन्यासिनी महिलाओं का मठ के नियमानुसार रात को मठ से बाहर रहना निषिद्ध है। पर पोप ने इस युवती की उच्च आत्मा में मरियम की झाँकी देखी और उन्हें हर प्रकार के प्रतिबंधों में मुक्त कर दिया।

टेरीजा के सेवा कार्यों से प्रभावित होकर उनकी अन्य सहयोगिनियाँ इस क्षेत्र में उतरीं और उनके संगठित प्रयत्नों से पीड़ित मानवता की सेवा के लिए जो महत्वपूर्ण कार्य संभव हुआ है उसे देखकर कोई भी भावनाशील व्यक्ति श्रद्धा से नत-मस्तक हुए बिना नहीं रह सकता।

साध्वी टेरीजा की 169 जीवन दानी, सेवाव्रती साथिन महिला कार्यकर्ता छाया की तरह उनके साथ रहती और आदर्शों का पालन करती हुई दिन-रात एक करती रहती हैं। उनके द्वारा 55 सेवा केन्द्र विभिन्न जिलों में संचालित होते हैं। उनमें से आठ सो कुष्ठ चिकित्सालय ही है जिनमें 2000 से ऊपर कोढ़ियों का उपचार होता हैं। उनके अनाथालयों में निराश्रित बालकों के लिए आरंभ ले लेकर उच्च शिक्षा तक की व्यवस्था है जिनकी संख्या 3000 से ऊपर है। सात अस्पतालों में लगभग पचास रोगियों की चिकित्सा यह लोग करते हैं। छोटे बच्चों के लिए एक विशेष सेवा संस्थान है, गंदी बस्तियों में शिशु विकास के लिए बहुत कुछ किया जाता है। दिल्ली, आगरा, राँची, झाँसी, अम्बाला, अमरावती और बम्बई की गंदी बस्तियों में माता टैरीजा की संस्था- ‘मिशिनरीज आफ चेरिटी’ के अंतर्गत जो कार्य करती है उनके द्वारा वे लोग जिनके भाग्य में केवल तिरस्कार एवं उपेक्षा ही आई है, स्नेह एवं सहानुभूति पाते और अपने को धन्य हुआ अनुभव करते हैं। मृत्यु मुख में जाने वाले वे निराश्रित लोग जो मरणासन्न अवस्था में उसी संख्या के आश्रम में जा पहुँचते हैं, शाँतिपूर्वक मृत्यु का वरण करते है। कई तो इनमें से बच भी जाते हैं।

संन्यासियों के सामने सच्ची उपासना और धर्म परायणता का अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने वाली माता टैरीजा के सत्प्रयत्नों के लिए किस अभागे का श्रद्धा से मस्तक झुक न जायेगा। मनीला की ‘रैमोन मैग्सासे पुरस्कार समिति’ ने अपना 10 हजार डालर का विश्वबन्धुत्व पुरस्कार दो वर्ष पूर्व ही उन्हें प्रदान किया है और भारतीय गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रपति ने उन्हें ‘पद्मश्री’ पदक देकर भारत की सराहनीय सेवा के लिए उनका सम्मान प्रदर्शित किया।

यों ऋषि-सिद्धियों का लाभ प्राप्त करने के भ्रम जंजाल में भटकने वाले साधु बाबाजियों की कमी नहीं। कहने भर को त्यागी, पर वस्तुतः आलसी और व्यसनी लोग त्याग-वैराग्य का झूठा ढोल पीटते रहते हैं। इसमें न उनका कुछ भला होता है और न किसी और का। ऐसे लोगों के लिए माता टेरीजा का उदाहरण ऐसा है जिससे हर विचारशील को प्रकाश और प्रेरणा ग्रहण करने के लिए बहुत कुछ मार्ग-दर्शन मिल सकता है।


स्वर्ग

मरने के बाद एक व्यक्ति की आत्मा को मृत्यु-दूत धर्मराज के सामने ले पहुँचे। दूतों ने बताया यह एक बड़ा महात्मा है। भरी युवावस्था में अपने माता-पिता और स्त्री-बच्चों को छोड़ कर यह जंगल में चला गया और जीवन भर जप तप करता रहा।

धर्मराज ने कहा-कर्त्तव्यों का त्याग कर कोई व्यक्ति धर्मात्मा नहीं बन सकता। परिवार के लोगों के साथ विश्वासघात करके इसने अधर्म ही कमाया, ऐसा भजन किस काम का जो कर्त्तव्यों को भुला कर किया जाय। इसे पुनः धरती पर भेजो और कर्त्तव्य पालन के साथ भजन करने का आदेश करो, तभी इसे स्वर्ग में स्थान मिलेगा।

यमदूतों ने एक-दूसरे व्यक्ति की आत्मा उपस्थित की और कहा- यह व्यक्ति बड़ा कर्त्तव्य परायण है। काम को ही सब कुछ समझता है। इसकी स्त्री बीमार पड़ी और मर गई पर यह उसकी कुछ भी परवाह न करके अपने कर्त्तव्य में ही लगा रहा।

धर्मराज ने कहा- ऐसे हृदयहीन का स्वर्ग में क्या काम? भावनापूर्वक किया गया कर्त्तव्य ही प्रशंसनीय हो सकता है। जिसे अपने नैतिक कर्त्तव्यों का ज्ञान नहीं उसकी शारीरिक, दौड़-धूप क्या महत्व रखेगी। इसे पृथ्वी पर भेजा और कहो कि भावनापूर्वक जीवन लिए और दूसरों से प्रेम करना सीखे तभी उसे स्वर्ग में स्थान मिलेगा।

एक तीसरे व्यक्ति की आत्मा लाई गई। यमदूतों ने कहा- यह साधारण गृहस्थ है। सदा आस्तिक रहा, पवित्र जीवन जिया, प्रेमपूर्वक परिवार को सुविकसित किया और दूसरों के उत्थान के लिए निरन्तर प्रयत्न करता रहा। धर्मराज ने कहा- स्वर्ग ऐसे ही लोगों के लिए बनाया गया है, इसे आदरपूर्वक ले जाओ और आनन्दपूर्वक यहाँ रहने की व्यवस्था कर दो।


वर्ण व्यवस्था का स्वरूप और लक्ष्य

समय और श्रम का सदुपयोग करके ही मनुष्य प्रगति की ओर बढ़ता है। यदि इन दोनों का क्रम अस्त-व्यस्त रहे तो फिर जीवन का कोई महत्वपूर्ण लाभ न उठाया जा सकेगा। जो अपना समय बर्बाद करते रहते हैं, जिन्हें अपनी आयुष्य का क्रम विभाजन करना नहीं आता, जिन्हें उपलब्ध क्षणों का सद्व्यय का मार्ग नहीं सूझता वे यहाँ से खाली हाथों चले जाते हैं। मृत्यु के समय उन्हें प्रतीत होता है कि कितनी बड़ी मूर्खता उन्होंने इस सुअवसर की उपेक्षा करते हुए की है। श्रम करने की शरीर और मन में जो अद्भुत क्षमता है उसी का सदुपयोग करने से विभिन्न दिशाओं में सिद्धियाँ तथा सफलताएं प्राप्त होती हैं। श्रम से जी चुराने वाले आलसी और समय का दुरुपयोग करने वाले प्रमादी एक प्रकार के आत्महत्यारे ही कहे जा सकते हैं।

समय और श्रम यह दो प्रत्यक्ष देवता हैं। हनुमान अंगद की तरह, नल-नील की तरह, राम-लक्ष्मण की तरह, सूर्य-चन्द्र की तरह, धरती-आकाश की तरह इनका जोड़ा है। इनका दोनों पहियों का ठीक तरह तालमेल बिठाकर ही मानव जीवन का प्रगति रथ आगे बढ़ता है। रात और दिन की तरह इन्हीं के आधार पर सुख शाँति का सन्तुलन बना हुआ है। जिसने समय का मूल्य नहीं समझा उसे ज्यों-त्यों गुजार दिया, जिसने श्रम में उत्साह नहीं दिखाया, काम चोरी की तरह बेगार भुगतने की तरह मजबूरी में जितना अनिवार्य था उतने ही हाथ पैर हिलाये तो यही समझना चाहिए कि वह जीवित रहते हुए भी मृतक जैसा आचरण कर रहा है। समय का अपव्यय और श्रम में अनुत्साह की बुराई जिसमें मौजूद है उसे सौ शत्रुओं और हजार विघ्नों से बढ़कर प्रगति पथ के अवरोध का सामना करना पड़ेगा।

ऋषियों ने इस तथ्य को समझा था और उन्होंने एक सुव्यवस्थित योजना बनाकर मानव जाति को क्रमबद्ध अनुशासन में करते हुए यह प्रयत्न किया था कि हर मनुष्य अपने समय और श्रम का पूरा-पूरा ध्यान रखें। समुचित सावधानी तभी रह सकती है जब उसका क्रम विभाजन ठीक तरह हो सके। पूरे दिन यदि कोई मनुष्य एक ही काम करता रहे, न कार्य में भिन्नता हो न अवधि नियत हो, हर समय एक ही काम करते रहा जाय, कब तक कितना करना है उसकी कोई सीमा निर्धारित न हो तो काम मनुष्य के लिए भार बन जायेगा, उसमें न आनन्द रहेगा न उत्साह। अच्छा और रुचि का कार्य भी बोझिल हो जायेगा और करने वाला उससे घबराने लगेगा।

चार वर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के नाम से विख्यात हैं और ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास यह चार आश्रम कहे जाते हैं। वर्णों की रचना किसी विशेष लक्ष्य को चुन कर उसी के माध्यम से आत्मिक प्रगति में एकनिष्ठ भाव होकर लग जाने के उद्देश्य से की गई है। यों जीवन का लक्ष्य तो आत्म कल्याण एवं पूर्णता की प्राप्ति ही है पर उसका अभ्यास करने के लिए कोई लौकिक माध्यम भी तो अपनाना पड़ेगा। विद्या पढ़ने के लिए पुस्तकों की, बल प्राप्ति के लिए व्यायाम उपकरणों की, धन प्राप्त करने के लिए उद्योग की व्यवस्था करनी पड़ती है। बुद्धि, आरोग्य, समृद्धि यों अदृश्य एवं सूक्ष्म शक्तियाँ हैं पर उनका वैभव तो किसी स्थूल माध्यम से ही प्रकट होता है। इसी प्रकार आत्म कल्याण का सूक्ष्म उद्देश्य प्राप्त करने के लिए भी कोई भौतिक कार्य क्रम तो चाहिए ही। इच्छा और कामना करते रहने से तो कोई लाभ मिल नहीं जाता। आत्म कल्याण का उद्देश्य पूरा करने के लिए भी बाह्य जीवन में कोई रुचिकर, उपयोगी एवं सदुद्देश्यपूर्ण कार्यक्रम निर्धारित करना ही पड़ता है। एक दिशा निर्धारित करके उस पर चलते रहने से ही पथिक को अपनी यात्रा का परिणाम प्राप्त करने का अवसर मिलता है। जो कभी इधर-उधर भटकता रहेगा, कोई दिशा निर्धारित न करेगा उसे न तो किसी लक्ष्य की प्राप्ति होगी और न वह किसी कार्य में विशेषज्ञता प्राप्त कर अपनी प्रतिभा ही चमका सकेगा।

अस्तु, यह आवश्यक है कि आत्म कल्याण का लक्ष प्राप्त करने के लिए मनुष्य अपना एक निर्धारित कार्यक्रम निर्धारित करे और फिर पूरी दिलचस्पी के साथ संसार का सर्वोत्तम काम समझ कर उसी क्रम को आजीवन अपनाये रहे। इसी विधान को वर्ण-धर्म कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र का क्रम विभाजन, मनुष्य-मनुष्य के बीच ऊंच-नीच या छोटे-बड़े का भाव पैदा करने के लिए नहीं, वरन् गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार एक निर्धारित गति-विधि अपना कर तीर की तरह लक्ष की ओर बढ़ चलने की व्यवस्था बनाने के लिए हुआ है।

संसार में चार ही प्रमुख शक्तियाँ है- 1. ज्ञान 2. बल 3. धन 4. श्रम, इन्हीं चारों खंभों पर प्रगति का मंच खड़ा किया गया है। मनुष्य ने अब तक जो उन्नति की है, उसका सारा श्रेय इन चार विभूतियों को ही है। यदि यह न हो तो जन्मजात रूप से जैसा भी कुछ मानव प्राणी उत्पन्न होता है उसे सबसे पिछड़ा ही माना जा सकता है। एक-एक वर्ण में इनमें से एक-एक शक्ति की विशेष आराधना करने, उसमें विशेषता प्राप्त करने का लक्ष्य बनाता है और उस मार्ग पर निरन्तर चलते हुए अपने तथा दूसरों के लिए सुख शाँति का लक्ष्य प्रशस्त करता है।

ब्राह्मण ज्ञान शक्ति का, क्षत्रिय बल-शक्ति का, वैश्य धन-शक्ति का और शूद्र श्रम-शक्ति का अभिवर्धन करते हुए इसका लाभ सारे समाज को पहुँचाते हैं। इस कार्य विभाजन को दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि जो ज्ञान की आराधना में संलग्न है वह ब्राह्मण जो बल की साधना में लगा है वह क्षत्रिय, जिसने समृद्धि की अभिवर्धन में मन लगाया वह वैश्य और जो श्रम देवता का अनुष्ठान करके इस गंदे, अव्यवस्थित एवं कुरूप संसार को सुन्दर बनाने का तप कर रहा है वह तपस्वी शूद्र कहलाता है। यह विशुद्ध कर्म विभाजन है, इसमें ऊंच-नीच की क्या बात हुई? एक ही परिवार के कई व्यक्ति कई तरह का काम करते हैं। उनमें से कोई ऊंच-नीच नहीं होता। वृद्ध पिता जी पूजा पाठ एवं कथा वार्ता एवं समाज सेवा में लगे रहते हैं वे ब्राह्मण हुए, एक लड़का सेना में हवलदार है वह क्षत्रिय हुआ, दो लड़के दुकान चलाते हैं वे वैश्य हुए, स्त्रियाँ घर का काम-धंधा, रोटी चौका का प्रबंध करती हैं वे शूद्र हुई। इनमें से किसी को नीच-ऊंच कैसे कहा जा सकता है। अपनी रुचि और योग्यता के अनुसार कार्य विभाजन में भिन्नता रहने से अच्छा ही हुआ। समाज की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति इस प्रकार संभव हो गई। सब लोग एक ही काम करते तो उसमें नीरसता आती और अन्य काम बिगड़ते। इसलिए कार्यों में थोड़ा अन्तर होना व्यक्ति एवं समाज के विकास की दृष्टि से उचित भी है और आवश्यक भी।

संसार में समस्त दुःखों के चार कारण हैं- 1. अज्ञान 2. अशक्ति 3. अभाव 4. आलस्य। जितने भी मनुष्य, जितने भी प्रकार के कष्ट भुगत रहे हैं उन सबके दुःखों का मूल कारण इन चार में से ही कोई हो सकते हैं। अज्ञानी का दृष्टिकोण, विचारने का ढंग गलत होता है वह न सोचने योग्य बातें सोचता और न करने योग्य निर्णय करता है। फलस्वरूप अनेकों अनावश्यक उलझनों में उलझकर दुःख भोगता है। अशक्त अपनी दुर्बलता के कारण न तो उपयुक्त उपार्जन कर पता है, न संघर्षों का मुकाबला कर पाता है उसे कमजोर पाकर भीतरी, और बाहरी शत्रु अपना आक्रमण प्रबल कर देते हैं, फलतः उसे त्रास सहने पड़ते हैं।

अभावग्रस्त मनुष्य जीवनोपयोगी वस्तुओं से वंचित रहकर अपना सामान्य क्रम चलाने में असमर्थ हो जाता है। दरिद्रता उसके मनोबल, सम्मान, स्वास्थ्य एवं संतुलन को खा जाती है। साधनों के अभाव में आगे बढ़ने का न तो साहस होता है और न सुयोग बैठता है। ऐसी दशा में उसे मन मसोस कर दीन दुःखियों की स्थिति में पड़े रहकर अभावजन्य दुःखों को भोगते रहना पड़ता है। आलस्य तो सबसे दुष्ट शत्रु है ही उसकी छाया जहाँ भी पड़ रही होगी वहाँ सब कुछ चौपट हो रहा होगा। शनि ग्रह की दशा की चर्चा ज्योतिष ग्रंथों में पाई जाती है। वह शनि आकाश में रहने वाला जड़ पिंड नहीं वरन् आलस ही होता है। जिस पर उसकी दशा आई वह बर्बाद हुए बिना नहीं रह सकता। आलस्य के कारण इस संसार में कितना दुःख दरिद्र फैला हुआ है इसका अनुमान लगाया जाय तो उसे मानव जाति का घोर शत्रु ही माना जायेगा।

उपरोक्त चारों दुःख-हेतुओं को अपने निज के जीवन में से बहिष्कार करने के संघर्ष में संलग्न होने की वीरता अपने-अपने क्षेत्र में चारों ही वर्णों को दिखानी पड़ती है। अपने कार्यक्रम में प्रगति करते हुए जो शक्तियाँ उपलब्ध होती हैं उनका लाभ स्वयं ही उठाते रहने की स्वार्थपरता से बचते हुए सारे समाज को उसका लाभ पहुँचाने का व्रत लेना पड़ता है। तभी वह वर्ण-धर्म ठीक तरह पालन हुआ समझा जायेगा।

ब्राह्मण अपने सद्ज्ञान से बिना किसी फल की आकाँक्षा रखे सारे समाज को उसका लाभ देने का प्रयत्न करता है। गुरुकुल, चिकित्सालय, कथा, प्रवचन, सत्संग, सत्कार आदि की प्रक्रिया अपनाकर जन-समाज का भावना स्तर ऊंचा बनाने के लिए वह प्राण-पण से प्रयत्न करता है। उसका व्यक्तित्व श्रद्धा-पद बना रहे इसलिए दूसरों की तुलना में अधिक त्यागी, तपस्वी, संयमी, अपरिग्रह में रह कर अपनी वाणी से ही नहीं चरित्र से भी यह शिक्षा देता है कि सन्मार्ग पर चलते हुए यदि गरीबी से भी रहना पड़े तो आन्तरिक उल्लास एवं बाहरी आनन्द में कोई कमी नहीं आ सकती।

क्षत्रिय अपने प्राण हथेली पर रखकर अनैतिक तत्वों से संघर्ष करता है। साधारण लोग प्रत्याक्रमण के भय से भयभीत होकर दुष्टता के आगे सिर झुका देते हैं और उससे समझौता भी कर लेते हैं वह क्षत्रिय जिसने समाज की सुरक्षा का, दुर्बलता की हिमायत करने का व्रत लिया है वह अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए शरीर बल, शस्त्र बल एवं सत्ता बल प्राप्त करके उद्दंडताओं को नियंत्रित करने के कार्य में लगता है। उसका कार्य किसी भी त्यागी, तपस्वी, आत्म बलिदानी से कम महत्वपूर्ण नहीं माना जा सकता है।

वैश्य उत्पादन और उद्योग के प्रत्येक पहलू को विकसित करते हुए जन साधारण की जीवनोपयोगी सुविधाओं को बढ़ाता है। अन्न, वस्त्र, दूध, शाक, औषधियाँ, पुस्तकें, सुई, साबुन, बुहारी आदि अनेक आवश्यकीय साधनों से जनता को वंचित न रहना पड़े इसलिए वह उत्पादन एवं वितरण के लिए आवश्यक व्यवस्था करते हुए सर्व साधारण की एक बड़ी कठिनाई को दूर करता है। श्रम के बिना कोई भी कार्य पूरा नहीं हो सकता। छोटे से बड़े हर काम में श्रम ही सफलता उत्पन्न करता है। उस अभाव की पूर्ति शूद्र वर्ण को करनी पड़ती है इसलिए इस सहयोग के अनुरूप उसका गौरव भी अधिक माना गया है।

आज चारों वर्णों का विकृत स्वरूप ही दिखाई पड़ रहा है। इसका कारण उस व्यवस्था का दोष नहीं वरन् लोगों की नासमझी एवं अनुपयुक्त गति-विधियों को ही माना जा सकता है। वर्ण धर्म हमें सिखाता है कि जीवन का कोई लक्ष्य बना कर जिया जाय। एक निर्धारित दिशा में पूर्णता प्राप्त करने के लिए, लोकहित का उद्देश्य लेकर तन्मयतापूर्वक संलग्न रहा जाय और यह समझा जाय कि हमारा कार्य संसार के किसी भी श्रेष्ठतम कर्म से घट कर नहीं हो सकता। ईमानदारी, कर्त्तव्यनिष्ठा, समाज-सेवा एवं आत्म-कल्याण का लक्ष्य रखकर अपनी आन्तरिक सद्वृत्तियों के विकास का अभ्यास करने के लिए कोई भी कार्य अपनाया जाय वह योग साधना, तपश्चर्या एवं पुण्य परमार्थ से किसी भी प्रकार कम श्रेयस्कर न होगा।

वर्ण धर्म में आज भयंकर विकृति यह आई है कि उसे कर्म विभाजन न मानकर वंश परम्परा का रूप मिल गया है जातियों को वर्ण समझा जाने लगा है। ऊंच-नीच की निरर्थक भावना को इसी आड़ में प्रश्रय मिला है और अलग-अलग गुटों के रूप में हमारा जातीय जीवन खण्ड-खण्ड हो गया है। मानव जाति की एकता और श्रेष्ठता को नष्ट-भ्रष्ट करने में आज वर्ण धर्म की विभूतियाँ अभिशाप बन रही हैं पर उनका मूलस्वरूप वस्तुतः वैसा है नहीं। उसका निर्माण मानव के सुव्यवस्थित विकास क्रम को सरल बनाने के लिये ही हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी रुचि और क्षमता के अनुरूप कार्य चुने, सदुद्देश्य से उसे आरंभ करे और आन्तरिक सद्वृत्तियों के विकास को माध्यम मानते हुए पूरी ईमानदारी-जिम्मेदारी और दिलचस्पी से उसे पूरा करने में तत्परता पूर्वक लगा रहे तो उससे उसका भी कल्याण है और समाज का भी। वर्ण धर्म की यह प्रेरणा मानव जाति का भविष्य उज्ज्वल बनाने में निस्सन्देह बहुत ही सहायक सिद्ध हो सकती है।


आश्रम-धर्म की उपयोगिता और आवश्यकता

आयुष्य का समय विभाजन करने की दृष्टि से आश्रम धर्म की परम्परा का निर्माण किया गया है। जिन्दगी को चार हिस्सों में बाँटा जा सकता है। बालकपन, जवानी, ढलती आयु और वृद्धावस्था। इन चारों की अपनी-अपनी अलग स्थिति है, उनकी विशेषताओं तथा परिस्थितियों का ध्यान रखकर उपयुक्त कार्यक्रम बने तभी से जीवन का संतुलित विकास हो सकेगा। प्रतिदिन हमें इसी प्रकार का क्रम विभाजन करना पड़ता है। सवेरा होते ही शौच, स्नान, व्यायाम, जलपान का क्रम रहता है। धूप फैलते ही काम पर जुट जाना पड़ता है। मध्याह्न को भोजन, विश्राम, सायंकाल काम को समेटना, दिन छिपने पर नित्यकर्म, रात को सोना यह एक स्वाभाविक क्रम है। प्रातःकाल भोजन, दिन चढ़ते ही सोना, सायंकाल शौच, स्नान, रात को काम करना इस प्रकार का उल्टा ढर्रा बन जाय तो विशेष परिस्थितियों की बात छोड़िये- साधारणतया इस अस्वाभाविक क्रम को अनुपयुक्त ही माना जायेगा और उसका स्वास्थ्य तथा कार्य की सफलता पर भी बुरा प्रभाव पड़ेगा।

बालकपन, यौवन, ढलती आयु और वृद्धावस्था को भी एक जीवन दिन मानकर उसका यथोचित क्रम विभाजन ही श्रेयस्कर हो सकता है। न्यूनतम बीस वर्ष की आयु तक स्वास्थ्य और बुद्धि के विकास के लिए शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के लिए ब्रह्मचर्य, खेलकूद, व्यायाम, अध्ययन एवं भावी जीवन में आने वाली समस्याओं को समझने तथा उन्हें हल करने की विधि का साँगोपाँग प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। यह आयु इसी क्रम में लगनी चाहिए। दस बारह वर्ष तक की आयु तो माता-पिता के सान्निध्य में ही बितानी चाहिए पर इसके बाद किशोर अवस्था को उच्च चरित्र एवं विवेकशील जीवन कला विशेषज्ञों की देख−रेख में अत्यन्त सावधानी के साथ बनाई हुई क्रम विधि के अनुसार व्यतीत की जानी चाहिए।

किशोर अवस्था जीवन की सबसे संवेदनशील एवं महत्वपूर्ण स्थिति है। मनुष्य का बनना बिगड़ना इसी में होता है। नया खून, नया उत्साह, नयी आशा एवं नया अनुभव पाने के लिए मचलता रहता है। जोश बहुत और होश कम रहने के कारण बच्चे इसी आयु में दिग्भ्रांत होते और कुमार्गगामी बनते हैं। इसलिए इसे जीवन का सबसे खतरनाक समय माना गया है। निर्माण के लिए उपयुक्त समय भी वही है। महापुरुष बनने के लिए उपयुक्त संस्कार प्रायः इसी आयु में अंकुरित होते हैं। इसलिए किशोर अवस्था का समय सुसंस्कारी सान्निध्य, प्रशिक्षण एवं नियंत्रण में व्यतीत किया जाना चाहिए। जहाँ इस प्रकार की व्यवस्था बन गई वहाँ बच्चे के भविष्य को उज्ज्वल बनाने का सुदृढ़ शिलान्यास हो गया, यही मानना चाहिए। प्राचीन काल जैसी गुरुकुल पद्धति अब नहीं है फिर भी हमें उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए दूसरे उपाय सोचने चाहिए। ब्रह्मचर्य का मतलब केवल कामेन्द्रिय संयम ही नहीं वरन् उसका वास्तविक तात्पर्य जीवन का सर्वांगीण विकास-ब्रह्म का सद्ज्ञान का सहचर्य, सान्निध्य ही हैं। ब्रह्मचारी अर्थात् आदर्शवादी परम्पराओं के आचरण का अभ्यास करने वाला। बालकपन, जन्म से लेकर बीस पच्चीस वर्ष तक का आयुष्य भावी जीवन को विधिवत् जीने की कला सीखने की इस तैयारी में ही लगाया जाना चाहिए।

आश्रम-व्यवस्था का क्रम जितना आवश्यक प्राचीन काल में था उतना ही अब भी है। वह नृतत्व विज्ञान की गहन-गवेषणा के आधार पर विनिर्मित होने के कारण एक शाश्वत सत्य ही माना जा सकता है। पद्धति चाहे पहले जैसी हो, चाहे आधुनिक स्थिति के अनुरूप उसमें हेर-फेर किया गया हो पर तथ्य ज्यों के त्यों ही रहेंगे उन्हें बदला नहीं जा सकता। चढ़ती आयु को शारीरिक और मानसिक विकास के उपयुक्त वातावरण में व्यतीत न किया जायेगा तो व्यक्तित्व सड़ी-गली आदतों के ढाँचे में ढल कर निकृष्ट कोटि का ही बन सकेगा। ऐसे कुसंस्कारी लोग धन या सत्ता प्राप्त कर लेने पर भी अपने तथा समाज के लिए अभिशाप बने रहते हैं।

युवावस्था जीवन का पौरुष प्रदर्शित करने के लिए है। महत्वाकाँक्षाओं को सुनियोजित ढंग से कार्यान्वित करते हुए अपनी क्षमताओं का विकास करने एवं समाज की भौतिक समृद्धि बढ़ाने के लिए है। श्रम द्वारा उत्पादन बढ़ाना, अपनी क्षमताओं को कार्य रूप में परिणत करते हुए अपना साहस एवं अनुभव बढ़ाने और अपने समीपवर्ती क्षेत्र में उल्लास उत्पन्न करने का समय यही है। वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा की कामनाएं स्वभावतः मन में हिलोरें लेती रहती हैं, इसलिए उनकी नैतिक ढंग से पूर्ति का अवसर भी उसी आयु में मिलता है। धन का उपार्जन, मंगलमय गृहस्थ की रचना तथा पुरुषार्थ द्वारा दूसरों की तुलना में अपने को अधिक प्रतिभावान एवं सफल सिद्ध करने का अवसर युवावस्था में ही मिलता है। जो कामनाएं और वासनाएं विकृत होकर मनुष्य को पतन के मार्ग पर ले दौड़ सकती हैं उन्हें नियंत्रित कर नैतिक रूप में अपना रास्ता बना सकना गृहस्थ में ही संभव है। संसार की भौतिक सम्पदायें इसी आयु में बढ़ाई जा सकती है। वैज्ञानिक, कलाकार, सैनिक, श्रमिक सभी कोई बीस या पच्चीस से लेकर पचास-पचपन वर्ष की आयु तक महत्वपूर्ण कार्य कर लेते हैं। यह तीस वर्ष का मध्याह्न काल तपते हुए सूर्य की तरह व्यतीत किया जाता है। कर्मठता और पुरुषार्थ इसी आयु में चुनौती देने आते हैं। ब्रह्मचर्य में संग्रहीत ज्ञान-योग को गृहस्थ में प्रवेश करने पर ही कर्मयोग में परिणत करने का अवसर मिलता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि युवावस्था में केवल भौतिक कार्य ही करने चाहिए। आध्यात्मिक या परमार्थिक कार्यों की ओर ध्यान ही नहीं देना चाहिए। वास्तविकता यह है कि जीवन को आदि से अन्त तक सदुद्देश्यों के लिए ही व्यतीत किया जाना चाहिए। युवावस्था में गृहस्थ रचना से लेकर अर्थ उपार्जन तक जो भी कार्य किये जायें उनके पीछे पारमार्थिक उद्देश्य ही सन्निहित रहना चाहिए। काम का स्वरूप चाहे भौतिक हो या आध्यात्मिक यदि उसे उच्च भावनाओं से, लोकहित की दृष्टि से किया गया है तो वह अपने लिए आत्म कल्याण का और समाज के लिए लोकहित साधना का ही सिद्ध होगा। सत्कर्म करने की स्थिति प्रत्येक आयु में-प्रत्येक आश्रम में रहती है। व्यक्तिगत जीवन के भौतिक उत्कर्ष के साथ-साथ आत्म-कल्याण एवं लोकहित के पारमार्थिक कार्य भी चलते रह सकते है। संसार के अधिकाँश महापुरुषों ने अपने गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए युवावस्था में भी जनहित के महत्वपूर्ण कार्यों का सम्पादन किया है।

ढलती आयु जिसे वानप्रस्थ कहते हैं, समाज का ऋण चुकाने के लिए है। मानव जीवन का तनिक भी विकास सामाजिक सहयोग के बिना संभव नहीं हो सकता। अन्य जीव अपने एकाकी बलबूते पर अपना निर्वाह कर लेते हैं पर मनुष्य प्राणी के लिए यह शक्य नहीं, वह श्रम-पद पर दूसरों की सहायता पर निर्भर रहता है और जिसे जितना अच्छा सहयोग मिल जाता है उतना ही वह शूरवीर एवं समुन्नत बन सकता है। इस तथ्य ने हर मनुष्य को समाज का ऋणी बना रखा है। उस ऋण को चुकाये बिना जो मर जाता है शास्त्र के अनुसार उसे नरक में जाना पड़ता है। ज्ञान सम्पादन और सुखोपयोग के अवसर ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रमों में मिलते हैं, उन ऋणों से उऋण होने की स्थिति वानप्रस्थ में ही प्राप्त होती है।

पचास पचपन की आयु तक पहुँचते-पहुँचते आम तौर से अपने बच्चे बड़े हो जाते हैं। गृहस्थ में प्रवेश करके कुछ उपार्जन करने लगते हैं। अपनी कमाई भी बुढ़ापे के लिए कुछ तो संचित रहती ही है। इस सबके द्वारा ऐसा क्रम बनाना पड़ता है कि ढलती आयु का व्यक्ति अपने परिवार की साधारण देखभाल तथा व्यवस्था करते हुए अपने समय का कम से कम आधा भाग परमार्थ मैं- लोक हित में लगाने लगे। समाज सेवा का-लोक मानस की उत्कर्षता को बनाने और बढ़ाने का उत्तरदायित्व वानप्रस्थों का ही है। ये बिना आर्थिक प्रतिफल चाहे लोक हित के कार्यों में समय दे सकते हैं। गुजारे की व्यवस्था घर पर रहने से उन्हें निर्वाह के लिए सार्वजनिक धन की अपेक्षा नहीं करनी पड़ती। इन्द्रिय शिथिल होने लगने-रूप यौवन चले जाने से वासनात्मक विकृतियों की संभावना भी कम हो जाती है। लोक सेवा के योग्य अनुभव भी संग्रह हो जाता है और सफेद बाल हो जाने से दूसरों पर इस ढलती उम्र का भी प्रभाव पड़ने लगता है। मृत्यु की समीपता से धर्म में रुचि भी वास्तविक होती है और युवावस्था में अन्य भोगों के भोग लेने से उनकी निरर्थकता भी समझ में आ जाती है। इसलिए जन-कल्याण के लिए निस्वार्थ लोक सेवा का परम पवित्र उत्तरदायित्व वानप्रस्थों के कंधे पर ही आता है। जो लोग उसकी उपेक्षा करते हैं वे समाज के साथ विश्वासघात करने वाले अथवा कर्त्तव्य की अवहेलना करने वाले ‘कार्य-हीन’ ही माने जा सकते हैं।

वानप्रस्थ मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय है। अपने परिवार का भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रशिक्षण करने के लिए उसे एक प्रकार से अध्यापक का काम करना पड़ता है। घर को गुरुकुल बनाकर उसमें परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए सर्वांगीण विकास की योजना बनाना और उनमें से हर एक को उचित नियंत्रण में रखना उस कुलपति वानप्रस्थ का ही कर्त्तव्य है। अवकाश अधिक रहने और सम्मानास्पद स्थिति उपलब्ध रहने के कारण गृहव्यवस्था का संचालन वह अधिक सुविधापूर्वक कर भी सकता है। इसके अतिरिक्त उसे घर से बाहर सार्वजनिक हित के कार्यों में आगे बढ़कर भाग लेना चाहिए। सेवा कार्यों में सबसे उत्कृष्ट प्रकार का सबसे अधिक आवश्यक और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि लोगों की प्रवृत्तियों और भावनाओं को कुमार्गगामी बनने से रोकने और सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करने के लिए पूरी शक्ति और सामर्थ्य का प्रयोग किया जाय।

लोक मानस में सात्विकता, सद्भावना और उत्साह करने वाली प्रवृत्तियों का संचालन वानप्रस्थियों का कार्य है। अवकाश के क्षणों का सदुपयोग उन्हें इसी दिशा में करना चाहिए। युग-निर्माण योजना के 108 कार्यक्रम इसी प्रकार के हैं जिन्हें अपनाने के लिए वानप्रस्थ आश्रम के लोगों को आगे बढ़कर आना चाहिए। कई व्यक्ति भजन करके शाँति प्राप्त करने की बात सोचते हैं। यह बात शरीर से पूर्ण अशक्त हो जाने पर चौथेपन के लिए उपयुक्त हो सकती है पर जिनने समाज का ऋण नहीं चुकाया है, वानप्रस्थ का कर्तव्य पूरा नहीं किया है वे इस तक एकाँत की बात सोचने लगें तो उन्हें भगोड़े सिपाहियों की तरह कायर एवं शास्त्र मर्यादा को तोड़ने वाला उच्छृंखल ही माना जायेगा। भजन हर किसी को करना चाहिए। हर आश्रम में उसकी आवश्यकता है। ब्रह्मचर्य और गृहस्थी की तरह वानप्रस्थ में भी भजन, स्वाध्याय, आत्म-चिन्तन एवं योग साधन करना चाहिए, पर इसके लिए घर छोड़कर भाग खड़े होने या सामाजिक उत्तरदायित्वों को तिलाँजलि देने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

जिस प्रकार बचपन में सफेद दाढ़ी-मूँछ लगाकर बुड्ढा बनने का अभिनय करने वाला उपहासास्पद है उसी प्रकार आश्रम धर्म को तिलाँजलि देकर-बिना ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ की नियत धर्म-मर्यादा पूरी किये अन्धाधुन्ध बाबाजी बन जाने वाला भी उपहासास्पद है। वे अनैतिक वातावरण उत्पन्न करने में ही सहायक होते हैं। आज 56 लाख बाबाजी इधर-उधर मारे-मारे फिरते और दूषित वातावरण उत्पन्न करते देखे जाते हैं। उनमें से थोड़े से ही ऐसे होंगे जिन्होंने प्रबल वैराग्य से प्रेरित होकर सामाजिक विषमताओं से जूझने के लिए बुद्ध, शंकराचार्य, दयानन्द आदि की तरह समय से पूर्व संन्यास लिया हो। अपवाद किन्हीं विशिष्ट महापुरुषों के लिए उपयुक्त हो सकते हैं। साधारणतया तो आश्रम धर्म की मर्यादाओं का पालन करते हुए नियत विधान के अनुसार ही जीवन को सार्थक बनाने वाले क्रम को अपनाते हुए ही आगे बढ़ना चाहिए।

जीवन के अन्तिम अध्याय में जब मनुष्य अपने शरीर, मन की ब्रह्मचर्य में परिवार और समाज की गृहस्थ में और धर्म संस्कृति की वानप्रस्थ में सेवा कर ले तब उचित है कि सत्तर-अस्सी के लगभग संन्यास की तैयारी करे। वसुधैव कुटुम्बकम मानता हुआ, मोह और तृष्णा से निवृत्त होकर उच्चतम भावनाओं में निमग्न रहे। अपने संपर्क में आने वालों को ज्ञान एवं प्रकाश दे तथा वानप्रस्थों का उसी प्रकार मार्ग-दर्शन करे जैसे वानप्रस्थ, गृहस्थों का मार्ग प्रदर्शन करते हैं। संन्यासी के लिए परिव्रज्या उचित है, वह एक स्थान पर न ठहरा रहे वरन् भ्रमण करते रह कर साधना का अन्तिम अध्याय पूर्ण करें।

चार वर्ण और चार आश्रम किसी भी समाज के व्यवस्थित विकास के लिए सर्वोत्तम योजना हो सकती है। भारतीय धर्म में उसकी उपयोगिता के कारण ही उसे आवश्यक धर्म-कर्त्तव्य गिना गया है।


आदर्श और संकल्प के प्रतीक-महर्षि कर्वे

महर्षि कर्वे यों एक शतायुष व्यक्ति का नाम है पर हम चाहे तो उन्हें आदर्श पर मर-मिटने वाले जीवन्त संकल्प के रूप में भी पहचान सकते हैं। जीवन के प्रथम भाग में ये प्रोफेसर थे। अच्छा वेतन मिलता था और मौज की जिन्दगी कटती थी। पर जिन्हें मानव-जीवन के अनुपम अवसर का महत्व विदित है वे मौज से घृणा ही कर सकते हैं, उन्हें अपने को जला कर दूसरों के लिए प्रकाश उत्पन्न करना ही बुद्धिमतापूर्ण लगता है।

चढ़ती उम्र में वे विधुर हो गये। प्रथम पत्नी का स्वर्गवास होने पर घर बसाने के लिए दूसरी पत्नी की आवश्यकता अनुभव की गई तो उन्होंने निश्चय किया कि यदि विवाह करना ही होगा तो विधवा-विवाह करेंगे। कुमार पुरुष ही कुमारी कन्याओं से विवाह के अधिकारी हो सकते हैं। विधुरों को यदि विवाह आवश्यक है तो वही सुविधा विधवाओं को क्यों न मिले? यह तर्क उन्हें न्याययुक्त लगा और जो उचित हो उसे ही करना किसी सच्चे मनुष्य के लिए गौरव की बात हो सकती है। उस जमाने में ब्राह्मण-वर्ण में विधवा विवाह की बात कहना सुनना भी अचंभे जैसा लगता था। फिर भी उनने निश्चय यही किया कि विधवा से विवाह न कर सकें तो वे शेष जीवन अविवाहित ही व्यतीत करेंगे।

उन्होंने एक स्वल्प शिक्षित बाल-विधवा से विवाह कर लिया और उसे सुशिक्षित बनाकर नारी जाति की सेवा के लिए कुछ विशेष कार्य करने की बात सोची। विधवा-विवाह करने के उपरान्त उन्हें जाति से बहिष्कृत होना पड़ा। समाज में उन्हें पापी और पतित जैसा माना जाने लगा। कहीं जाते तो लोग मुँह फेर लेते और पीने को पानी माँगने पर उसे भी देने से इनकार कर देते। इतने अपमान सहते हुए भी उनने मन हलका न होने दिया। और प्रेम-पूर्वक पत्नी को सुशिक्षित बनाने में लगे रहे।

कुछ दिनों बाद उनने नौकरी छोड़ दी और दुर्दशा ग्रस्त अबलाओं को सुशिक्षित एवं स्वावलम्बी बनाने के लिये एक संस्था खड़ी करने का निश्चय किया। यह बड़ा दुस्साहसपूर्ण कदम था। आजीविका से हाथ धोकर बिना किसी ठोस सहायता इस प्रकार का कार्य आरंभ कर देना लोगों की दृष्टि में मूर्खतापूर्ण था, वे इसे एक सनक समझते थे और सोचते थे यह ऊट-पटाँग बात जल्दी ही बन्द हो जायेगी। पर कर्वे दूसरी ही मिट्टी के बने थे। जो कदम उठाया सो उठाया। संकल्प शक्ति से उसे पूरा करके ही चैन लिया।

पूना के सदाशिव पेठ मुहल्ले में किराये के एक मकान में सन् 1896 में कर्वे दम्पत्ति ने, ‘अनाथ बालिका श्रम ची मण्डली’ प्रारंभ की। आरंभ में इसमें केवल चार छात्राएं थीं। उनका यह कार्य लोगों को पसंद नहीं आया। विधवाओं और निराश्रित महिलाओं को पढ़ने से क्या काम, उन्हें तो घर के भीतर दुःख-सुख सहते हुए दिन काटना ही धर्म-संगत है। ऐसी जन-मान्यता के बीच अनाश्रित नारियों को स्वावलम्बी एवं शिक्षित बनाने की योजना लोकप्रिय हो सकेगी इसकी कम ही संभावना दीखती थी। फिर कर्वे दम्पत्ति विधवा-विवाह का दुस्साहसपूर्ण कदम उठाकर अपनी प्रतिष्ठा भी तो खो चुके थे। कितनी भारी अग्निपरीक्षा में होकर इन संस्थाओं को गुजरना पड़ा होगा, आज की सुधरी हुई परिस्थितियाँ हमारे लिए उनकी कल्पना कर सकना भी कठिन है।

नगर में प्लेग फैला और लोग बेहिसाब मरने लगे तो विद्यालय को नगर से बाहर ले जाने की बात सोची गई। एक खेत में छोटी-सी पर्णकुटी बनाकर आश्रम चलाया जाने लगा। खेत के मालिक को कार्य की उपयोगिता प्रतीत हुई और उसने थोड़ी सी भूमि इस कार्य के लिए दे दी। निकट के गाँव वाले जो आरंभ में तरह-तरह के व्यंग्य उपहास किया करते थे, जब वस्तु स्थिति को समझे तो उनने भी अपनी लड़कियों को पढ़ने भेजना आरंभ कर दिया।

लोक मंगल के लिए महर्षि कर्वे ने भिक्षा पात्र उठाया। ‘मुट्ठी फण्ड’ की मित्रों के घर व्यवस्था कराई और इस प्रकार जो थोड़ी-सी आय होती उसी से अनाथ अबला-मण्डली का काम चलता। धीरे-धीरे छात्राओं की संख्या बढ़ती गई। जो लोग आरंभ में हंसते थे उन्हें हैरत होने लगी कि परिस्थितियाँ जिस कार्य के बिलकुल अनुकूल न थीं, आमतौर से जिस बात को नापसंद किया जाता था वह समस्त विघ्न-बाधाओं के रहते हुए भी प्रगति पथ पर अग्रसर हो तो इसे सुदृढ़ व्यक्ति का सशक्त संकल्प मानने के अतिरिक्त और समझा ही क्या जा सकता था।

आज वही ‘अनाथ बालिकाश्रमा ची मण्डली’ विशालकाय महिला विद्यापीठ के रूप में यशस्विनी संस्था बनकर खड़ी है। गत 68 वर्षों में उसने सहस्रों उपेक्षित और तिरस्कृत नारियों को सुशिक्षित एवं स्वावलम्बी बनाकर मानवोचित जीवन जी सकने की स्थिति में पहुँचाया है। सहस्रों कन्याओं ने इस संस्था की छाया में शिक्षा प्राप्त करके अपने परिवारों में नव-जीवन की हरियाली उत्पन्न की है। सैंकड़ों ऐसी हैं जो उच्च पदों पर आसीन होकर देश और समाज की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।

आर्थिक ईमानदारी और हिसाब पाई-पाई का रखने के बारे में महर्षि कर्वे प्रख्यात हैं। नौकरी छोड़ते समय जो पाँच हजार के लगभग फण्ड मिला था उसे उन्होंने संस्था के आरंभिक संचालन के निमित्त खर्च कर दिया। इसके बाद बीमे की जो रकम उन्हें मिली, उसे उन्होंने बड़े लड़के को पढ़ाई के खर्च के लिए कर्ज रूप में इस शर्त पर दिया कि काम से लगते ही वह उस रकम को वापिस लौटावेगा और उससे उसके दूसरे छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च चलेगा। लड़कों ने ईमानदारी से पिता की आज्ञा मानी और अपने छोटे भाई-बहिनों की पढ़ाई के लिए इस शिक्षा काल में लगी हुई उधार रकम को लौटाया। लोग पूछते थे कि भला बाप-बेटे में भी कर्ज देने और वसूल करने का कोई व्यवहार होता है? तो महर्षि कहते- हर मनुष्य को स्वाभिमानी और स्वावलम्बी होना चाहिये। दूसरों की सहायता से हमें जो मिलता है उसे समयानुसार दूसरों की सहायता से खर्च करना न भूलें यही ईमानदारी की बात है। मैं अपने बच्चों को ईमानदारी और स्वावलम्बी देखना चाहता हूँ। इसलिए उनकी जो सहायता करता हूँ उसे वैसी ही स्थिति के दूसरों लोगों की सहायता करने की शर्त पर ही देता हूँ। मुफ्त किसी को क्यों तो कुछ लेना चाहिए और क्यों मैं उसे दूँ?

आदर्शवादी महर्षि कर्वे अपने जीवन के सौ वर्ष पूरे कर चुके। उनकी शताब्दी अनेक स्थानों पर मनाई गई। भारत सरकार ने उनके चित्रों वाले डाक टिकट चला कर लोक सेवियों को सम्मान देने का अपना कर्त्तव्य पालन किया। उनकी यशस्विनी संस्था ‘महिला विद्यापीठ’ की हीरक जयंती मनाई गई और देश भर के मनीषियों ने उसके सेवा कार्यों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की।

इमर्सन की व्याख्या के अनुसार ‘ऋषि वह वट वृक्ष है जिसकी छाया में अनेकों को शीतलता भरा आश्रय मिलता है।’ महर्षि कर्वे पर यह व्याख्या अक्षरशः खरी उतरी है। उन्होंने अपने जीवन का सारा समय गिरे हुओं को उठाने, अशाँतों को शाँति देने और अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न करने में लगाया है। ऐसे ही नर-रत्नों को जन्म देकर कोई जाति अपने को यशस्वी और धन्य बनाती है।


जार्ज वाशिंगटन

बड़ी तेजी से बह रही पत्थर और चट्टानों से भरी हुई पहाड़ी नदी में एक स्त्री का छोटा सा बालक बहने लगा। स्त्री करुण स्वर से सहायता के लिये लोगों को पुकारने लगी। सब चुपचाप खड़े थे, कोई अपनी जान को जोखिम में न डालना चाहता था। इतने में एक अठारह वर्षीय लड़का नदी में कूदा और चट्टानों से टकराने में बाल-बाल बचता हुआ उस बच्चे तक पहुँचा और उस मूर्छित बालक को पीठ पर लाद कर किनारे आ गया। इस प्राणों पर खेलने वाले युवक को बच्चे की माँ ने बहुत आशीर्वाद दिये। बड़ा होने पर यह लड़का अमेरिका का प्रेसीडेंट हुआ। इसका नाम था- जार्ज वाशिंगटन।


नारी की महानता को समझें

नारी पुरुष की पूरक सत्ता है। वह मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत है। उसके बिना पुरुष का जीवन अपूर्ण है। नारी उसे पूर्ण करती है। मनुष्य का जीवन अन्धकारयुक्त होता है तो स्त्री उसमें रोशनी पैदा करती है। पुरुष का जीवन नीरस होता है तो नारी उसे सरस बनाती है। पुरुष के उजड़े हुए उपवन को नारी पल्लवित बनाती है।

इसलिए शायद संसार का प्रथम मानव भी जोड़े के रूप में ही धरती पर अवतरित हुआ था। संसार की सभी पुराण कथाओं में इसका उल्लेख है। हमारे प्राचीन धर्म ग्रंथ मनुस्मृति में उल्लेख है-

द्विधा कृत्वाऽऽत्मनो देहमर्धेन पुरुषोऽमवत्।

अर्धेन नारी तस्याँ स दिराजम सृजत्प्रभुः॥

‘उस हिरण्यगर्भ ने अपने शरीर के दो भाग किए। आधे से पुरुष और आधे से स्त्री का निर्माण हुआ।’

इस तरह के कई आख्यान हैं जिनसे सिद्ध होता है कि पुरुष और नारी एक ही सत्ता के दो रूप हैं और परस्पर पूरक हैं। फिर भी कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व और त्याग के कारण नारी कहीं महान है पुरुष से। वह जीवन यात्रा में पुरुष के साथ नहीं चलती वरन् उसे समय पड़ने पर शक्ति और प्रेरणा भी देती है। उसकी जीवन यात्रा को सरस, सुखद, स्निग्ध और आनन्दपूर्ण बनाती है नारी, पुरुष की शक्तियों के लिए उर्वरक खाद का काम देती है। महादेवी वर्मा ने नारी की महानता के बारे में लिखा है-

‘नारी केवल माँस पिण्ड की संज्ञा नहीं है, आदिम काल से आज तक विकास पथ पर पुरुष का साथ देकर उसकी यात्रा को सफल बनाकर, उसके अभिशापों को स्वयं झेलकर और अपने वरदानों से जीवन में अक्षय शक्ति भर कर मानवी ने जिस व्यक्तित्व, चेतना और हृदय का विकास किया है उसी का पर्याय नारी है।’

इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी धरा पर स्वर्गीय ज्योति की साकार प्रतिमा है। उसकी वाणी जीवन के लिए अमृत स्रोत है। उसके नेत्रों में करुणा, सरलता और आनन्द के दर्शन होते हैं। उसके हास्य में संसार की समस्त निराशा और कड़ुवाहट मिटाने की अपूर्व क्षमता है। नारी सन्तप्त हृदय के लिए शीतल छाया है। वह स्नेह और सौजन्य की साकार देवी है। आचार्य चतुरसेन शास्त्री के शब्दों में ‘नारी पुरुष की शक्ति के लिए जीवन सुधा है। त्याग उसका स्वभाव है, प्रदान उसका धर्म, सहनशीलता उसका व्रत और प्रेम उसका जीवन है।’

कवीन्द्र रवीन्द्र ने नारी के हास में जीवन निर्झर का संगीत सुना है। जयशंकर प्रसाद ने कहा है-

नारी केवल तुम श्रद्धा हो, विश्वास रजत नग पग तल में।

पीयूष स्रोत सी बहा करो, जीवन के सुन्दर समतल में॥

संसार के सभी महापुरुषों ने नारी में उसके दिव्य स्वरूप के दर्शन किये हैं जिससे वह पुरुष के लिए पूरक सत्ता के ही नहीं वरन् उर्वरक भूमि के रूप में उसकी उन्नति, प्रगति एवं कल्याण का साधन बनती है। स्वयं प्रकृति ही नारी के रूप में सृष्टि के निर्माण, पालन-पोषण संवर्धन का काम कर रही है। नारी के हाथ बनाने के लिए हैं बिगाड़ने के लिए नहीं। परिस्थिति वश-स्वभाव वश नारी कितनी ही कठोर बन जाय किन्तु उसकी वह सहज-कोमलता कभी ओझल नहीं हो सकती जिसके पावन अंक में संसार को जीवन मिलता है। प्रेमचन्द के शब्दों ‘नारी पृथ्वी की भाँति धैर्यवान् शान्त और सहिष्णु होती है।’

नारी की प्रकट कोमलता, सहिष्णुता को पुरुष ने कई बार उसकी निर्बलता का चिन्ह मान लिया है और इसलिए उसे अबला कहा है। किन्तु वह यह नहीं जानता कि कोमलता, सहिष्णुता के अंक में ही मानव जीवन की स्थिति संभव है। क्या माँ के सिवा संसार में ऐसी कोई हस्ती है जो शिशु की सेवा, उसका पालन-पोषण कर सके। संसार में जहाँ-जहाँ भी चेतना साकार रूप में मुखरित हुई है उसका एक मात्र श्रेय नारी को ही है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि नारी समाज की निर्मात्री शक्ति है, वह समाज का धारण, पोषण करती है संवर्धन करती है।

नारी अपने विभिन्न रूपों में सदैव मानव जाति के लिए त्याग, बलिदान, स्नेह, श्रद्धा, धैर्य, सहिष्णुता का जीवन बिताती है। माता-पिता के लिए आत्मीयता, सेवा की भावना जितनी पुत्री में होती है उतनी पुत्र में नहीं होती। पराये घर जाकर भी पुत्री अपने माँ-बाप से जुदा नहीं हो सकती। उसमें परायापन नहीं आता, उसके हृदय में वही सम्मान, सेवा की भावना भरी रहती है जैसी बचपन में थी। भाई-बहिन का नाता कितना आदर्श, कितना पुण्य-पवित्र है। भाई-भाई परस्पर जुदा हो सकते हैं एक दूसरे का अहित कर सकते हैं किन्तु भाई-बहिन जीवन पर्यन्त कभी विलग नहीं हो सकते। बहन जहाँ भी रहेगी अपने भाई के लिए शुभ कामनायें, उसके भले के लिए प्रयत्न करती रहेगी। माँ तो माँ ही है। पुत्र की हित चिन्ता, उसका भला, लाभ हित सोचने वाली माँ के समान संसार में और कोई नहीं है। संसार के सब लोग मुँह मोड़ लें किन्तु एक माँ ही ऐसी है जो अपने पुत्र के लिए सदा सर्वदा सब कुछ करने के लिए तैयार रहती है।

पत्नी के रूप में नारी मनुष्य की जीवन संगिनी ही नहीं होती वह सब प्रकार से पुरुष का हित-साधन करती है। शास्त्रकार ने भार्या को छः प्रकार से पुरुष के लिए हित-साधक बतलाया है-

कार्य्येषु मन्त्री, करणेषु दासी, भोज्येषु माता, रमणेषु रम्भाः

धर्मानुकूला, क्षमाया धरित्री, भार्या च षड्गुण्यवती च दुर्लभा॥

‘कार्य में मंत्री के समान सलाह देने वाली, सेवादि में दासी के समान काम करने वाली, भोजन कराने में माता के समान पथ्य देने वाली, आनन्दोपभोग के लिए रम्भा के समान सरस, धर्म और क्षमा को धारण करने में पृथ्वी के समान-क्षमाशील ऐसे छः गुणों से युक्त स्त्री सचमुच इस विश्व का एक दुर्लभ रत्न है।’

राम के जीवन से सीता को निकाल देने पर रामायण पीछे नहीं रहता। द्रौपदी, कुन्ती, गाँधारी आदि का चरित्र काल देने पर महाभारत की महान गाथा कुछ नहीं रहती, पाण्डवों का जीवन संग्राम अपूर्ण रह जाता है। शिवजी के साथ पार्वती, कृष्ण के साथ राधा, राम के साथ सीता, विष्णु के साथ लक्ष्मी का नाम हटा दिया जाय तो इनके लीला, गाथा चरित्र अधूरे रह जाते हैं।

प्राचीन काल से नारियाँ घर गृहस्थी को ही देखती नहीं आ रही, समाज, राजनीति, धर्म, कानून, न्याय सभी क्षेत्रों में वे पुरुष की संगिनी ही नहीं रही वरन् सहायक, प्रेरक भी रही हैं। उन्हें समाज में पूजनीय स्थान दिया गया है। महाराज मनु ने तो अपनी प्रजा से कहा था।

‘यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः।’

जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवता निवास करते हैं। क्योंकि समाज में नारी को समान, पूज्य-स्थान देकर जब उसे पुरुष का सहयोगी, सहायक बना लिया जाता है तो ही समृद्धि, यश, वैभव बढ़ते हैं, जिससे सुख, शाँति, आनन्दपूर्ण जीवन बिताया जा सकता है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि नारी का सहयोग मानव जीवन में उन्नति, प्रगति, विकास के लिए आवश्यक है, अनिवार्य है। वह समाज उन्नति नहीं कर सकता, जहाँ स्त्री जो मानव-जीवन का अर्द्धांग ही नहीं एक बहुत बड़ी शक्ति है, को सामाजिक अधिकारों से वंचित कर उसे लुँज-पुँज एवं पद-दलिता बना कर रखा जाता है।

आवश्यकता इस बात की है कि हम नारी को समाज से वही प्रतिष्ठा दें, जिसकी आज्ञा हमारे ऋषियों ने, मनीषियों ने दी है। उसे जीवन के सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ावें। हम देखेंगे कि नारी अबला, असहाय न रहकर शक्ति सामर्थ्य की मूर्ति बनेगी। वह जीवन यात्रा में हमारे लिए बोझा न रहकर हमारी सहायक, सहयोगिनी सिद्ध होगी। तब हमें उसके भविष्य के संबंध में चिन्तित न होना पड़ेगा। वह अपनी रक्षा करने में स्वयं समर्थ होगी। अपना निर्वाह करने में समर्थ होगी। हमारे सामाजिक जीवन की यह एक बहुत महत्वपूर्ण माँग है कि सदियों से घर बाहर दीवारी में गंदे पर्दे, बुर्के की ओट में छिपी हुई पराश्रिता, परावलम्बी, अशिक्षित, अन्धविश्वास ग्रस्त, संकीर्ण स्वभाव नारी को वर्तमान दुर्दशा से उभारें। उसे समानता, स्वतंत्रता की मानवोचित सुविधा प्रदान करें। उसे शिक्षित, स्वावलम्बी, सुसंस्कृत एवं योग्य बनावें। तभी वह हमारे विकास में सहायक बन सकेगी। भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित करने में योग दे सकेगी।


सच्चे पुरोहित-रविशंकर महाराज

गुजरात में पाटण वाडियै नामक एक जाति है जिसे पेशेवर अपराधियों में गिना जाता था, महाराज रविशंकर इन्हीं के पुरोहित थे। इस वर्ग में वे देवता की तरह पूजे जाते थे। कोई पाटण वाणिया महाराज को रास्ते में मिलता तो अपनी पगड़ी उनके पैरों के नीचे बिछा देता, उनकी चरण रज लेने के लिये। महाराज का उज्ज्वल चरित्र सार गुजरात में प्रख्यात था और अभी भी उनका नाम उस प्रदेश में एक धरती के देवता की तरह आदर और श्रद्धा के साथ लेते हैं।

दूसरे पंडित पुरोहितों की तरह यदि महाराज चाहते तो पोथी-पत्रा के सहारे पेट का धंधा करते रह सकते थे और दूसरे अनेकों की तरह दान दक्षिणा के बल बूते से चैन की जिन्दगी व्यतीत कर सकते थे। पर उसने अपना दूसरा ही रास्ता चुना और पुरोहित नाम को सच्चे अर्थों में सार्थक की तरह माना।

अपने हाथ के कते सूत की बड़ी और घुटनों तक की खादी की धोती यही दो परिधान उनके शरीर पर रहते। किसी भी स्थिति में जो सरलतापूर्वक प्राप्त किया जा सके ऐसा नियमित भोजन था उनकी खिचड़ी। सो भी बिना नमक की। अस्वाद व्रत धारी महाराज अपना भोजन आप पकाते थे अपनी सेवा आप करने की दृष्टि से, पर छूत के पाखण्ड को उन्होंने कभी मान्यता न दी। बिना जूता नंगे पैरों घूमने वाले इस ऋषि ने सच्चे परिव्राजक और ब्राह्मण का आदर्श प्रस्तुत किया और निरन्तर गाँव-गाँव घूमकर नीति धर्म एवं सदाचार का जीवन भर प्रशिक्षण किया।

अपनी निस्वार्थता, आदर्शवादिता सेवा वृत्ति और उच्च मनोभूमि के कारण जनता में उनके प्रति भारी श्रद्धा की। उसे श्रद्धा का उपयोग दूसरों की तरह उन्होंने अपनी पूजा कराने या कोई स्वार्थ सिद्ध में नहीं किया वरन् जन कल्याण के लिये ही उसे प्रयुक्त करते रहे। यश, विज्ञापन और प्रतिष्ठा के भूखे लोक सेवक जहाँ ईर्ष्या द्वेष से जलते भुनते रहते हैं वहाँ महाराज अपने उज्ज्वल चरित्र से यह बताया करते थे कि सच्चे लोक सेवी को यशलिप्सा से कितना दूर रहना चाहिए।

उनके प्रभाव और व्यक्तित्व को देखकर सरदार पटेल ने राष्ट्रीय कार्यों में उनकी सामर्थ्य का उपयोग किया। गुजरात में वे सरदार पटेल के दाहिने हाथ समझे जाते थे। बारदोली सत्याग्रह में उन्होंने अग्रिम पंक्ति में रहकर जो कार्य किया उसे देखकर लोगों को आश्चर्य से दाँतों तले उंगली दबानी पड़ी।

उनका कार्य क्षेत्र प्रधानतया अपराधी जातियों में सच्चरित्रता उत्पन्न करना था। धर्म पुरोहित के रूप में उनके घरों में जाते। उनके साथ बैठते-उठते सोते और रहते। आडम्बर उन्हें छू भी नहीं गया था। पाटण वाडियों में उस समय ऐसा रिवाज था कि वे चोरी किये बिना रह नहीं सकते थे। एक सप्ताह तक जो चोरी करने न जाय उसकी स्त्री रूठ जाती थी- उसे कायर मानती थी और घर छोड़ देने तक को तैयार हो जाती थी। पुलिस का आतंक दूसरी ओर उन्हें तंग करता था। पुलिस कर्मचारी के सामने इस जाति के पुरुषों, स्त्रियों और बच्चों तक को दिन में दो बार हाजरी देने जाना पड़ता था। कहीं भी उन्हें न सम्मान प्राप्त होता था और न विश्वास। कोई दूसरा काम करने की आदत और रुचि न होने से वे आजीविका के लिए अन्य कार्य कर भी नहीं पाते थे। ऐसे दुर्दशाग्रस्त लोगों को सदाचारी और स्वावलम्बी जीवन बिताने के लिये तैयार करना कितना कठिन मार्ग है, यह सभी जानते हैं। पर कठिन भी साहसी लोगों द्वारा ही सम्पन्न होते हैं। महाराज साहस की मूर्ति थे, उनके कदम जिधर बढ़े उधर सफलता दौड़ती ही चली आई।

अपराधी जातियों के बीच उनने आत्मीयता के संबंध स्थापित किये और अन्तःकरण की वाणी से चोरी, जुआ, नशा और आलस छोड़ने के लिए समझाया। उनका समझाना ऐसा जो कभी निरर्थक न जाता। कितने ही लोग सच्चे मन से प्रतिज्ञा करते और उसे आजीवन निवाहते, जहाँ चोरी होती वहाँ महाराज पहुँच जाते और जिसने चुराया होता उससे माल वापिस दिलाते। अपराधी को अपना पाप स्वीकार करना ही पड़ता। कई बार तो वे अपराधियों को पुलिस में हाजिर होकर अपना अपराध स्वीकार करने के लिए तैयार करते और जो राजदण्ड मिलता उसे प्रायश्चित मानकर उसकी आत्म-शुद्धि की व्यवस्था करते। सरकार ने भी यह नीति अपनाई थी कि जिस व्यक्ति की सिफारिश महाराज कर दें उसे पुलिस में रोज हाजिर होकर दो बार हाजिरी देने के प्रतिबंध से मुक्त कर दिया जाय।

एक बार उन्होंने भयंकर आतंकवादी दस्युओं से मिलने का निश्चय किया और जहाँ उनके मिलने की संभावना थी वहाँ अंधेरी रात में चल दिये। डाकुओं ने उस अजनबी को लूटने को बन्दूक तानी तो वे खिलखिला कर हंस पड़े और बोले- मैं भी तो तुम्हारी बिरादरी का डाकू ही हूँ। दस्युओं ने बन्दूक नीची कर ली और पूछा कि किस गिरोह के हो? कहाँ रहते हो? महाराज ने कहा-मैं गाँधी जी के गिरोह का डाकू हूँ। दस्युओं को पास बिठा कर उन्होंने बड़े मार्मिक शब्दों में कहा-’हमें तो पराधीन बनाने वालों के विरुद्ध शूरता प्रकट करनी चाहिए। निरपराध देशवासियों को लूटने से क्या लाभ? उनके प्रस्ताव से कितने ही डाकुओं ने वह कार्य छोड़ दिया और उपयोगी कार्य करने लगे।

काठियावाड़ के जमींदारों और ठाकुरों के बीच घूम कर वे उनसे शराब छोड़ने की प्रतिज्ञा कराते। एक बार एक जमींदार ने कहा- ‘महाराज शराब छूटती ही नहीं क्या करूं? उसने मुझे बुरी तरह पकड़ रखा है।’ महाराज ने दूसरे दिन उसे अपने ठहरने के स्थान पर बुलाया। जब वह आया, तो महाराज एक खम्भे को दोनों हाथों से लपेट कर जकड़े हुए खड़े थे। बोले-’भाई, मैं तुम्हारे पास बैठ कर बात करना चाहता था पर क्या करूं? इस खम्भे ने मुझे पकड़ रखा है, छोड़ता ही नहीं।’ जमींदार असमंजस में पड़े और बोले- ‘भला बेजान खम्भा आपको क्या पकड़ेगा? आपने ही तो उसे जकड़ रखा है। महाराज ने मुस्कराते हुए कहा- ‘तब बेचारी शराब तुम्हें कैसे पकड़ सकती है।’ जमींदार की आँखें खुल गई और उसने उसी दिन से शराब छोड़ दी।

चीन जब आज जैसा आक्रमणकारी न था तब वे पेकिंग में होने वाली शाँति परिषद में भाग लेने गये और वहाँ एक अधिवेशन के अध्यक्ष भी बने। चीनी सरकार उन्हें अपना देश दिखाने के लिए मोटर आदि का विशेष प्रबंध कर रही थी पर उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया और पैदल ही गाँव-गाँव घूम कर, ग्रामीणों के साथ घुल मिलकर उन्होंने वहाँ के जन-जीवन का अध्ययन किया।

दया और धर्म का, कर्त्तव्य और पुरुषार्थ का संदेश सुनाते हुए गाँव-गाँव घूमना यही उनकी प्रधान साधना थी। रात को चलना और दिन में काम करना यही उनका तरीका था। रात में चलने के खतरे की ओर से जब लोग उन्हें आगाह करते थे तो वे यही कहते- डरने से मरना अच्छा। जो मुसीबत रात को अंधेरे में आ सकती है वह दिन में न आवेगी, इसका क्या भरोसा।

लोग उनसे पूछते- ‘अब तो आप वृद्ध हो चले, विश्राम क्यों नहीं करते?’ वे यही कहते- ‘जब तक मेरे यजमान अपराधी प्रवृत्तियाँ छोड़कर मुझे निश्चिन्त नहीं कर देते, तब तक मैं विश्राम कैसे कर पाऊंगा?’ सच्चे पुरोहित की तरह उन्हें देश-धर्म और जन-साधारण को ऊंचा उठाने की लगन लगी रहती थी और उसी भावना से प्रेरित होकर अहिर्निश काम करते रहते थे। ऐसे ही आदर्श पुरोहितों की भारत को आज भारी आवश्यकता है।


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यस्येच्छेदुत्तमाँ मैत्रीं, कुर्यान्नार्थामिलाषकम्।

परोक्षे तद्रहश्वारं, तत्स्त्रीसंभाषणम् तथा॥

तन्नयूनदर्शनं नैव, तत्प्रतीपविवादनम्।

असहाय्यं च तत्कार्ये, अनिष्टोपेक्षणं न च॥

जिस व्यक्ति से अभिन्न मित्रता की इच्छा हो, उससे कभी धन की अभिलाषा नहीं करनी चाहिए, उसके रहस्यों को उसकी पीठ-पीछे नहीं कहना चाहिए, उसकी अनुपस्थिति में उसकी स्त्री से बात चीत नहीं करनी चाहिए, मित्र की कमियों पर दृष्टि नहीं रखनी चाहिए। मित्र के विरुद्ध किसी से नहीं कहना चाहिए। उसके कामों में सदा सहायता करनी चाहिए, मित्र के अनिष्ट की कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।


बढ़ते हुये बाल अपराध

दिनों दिन बढ़ते हुए बाल अपराध हमारे सामाजिक जीवन के लिए एक चुनौती हैं। छोटे-छोटे बच्चों में अपराधी प्रवृत्तियाँ संसार के सभी देशों में एक गंभीर समस्या बन गई है। कुछ दिनों पहले समाचार पत्रों में एक खबर प्रकाशित हुई थी जिसके अनुसार ब्रिटेन के कलेक्टन नामक स्थान पर एक हजार से अधिक ब्रिटिश किशोरों ने हमला बोल दिया। उन्होंने कारें नष्ट कर दी, लोगों को मारा-पीटा, दुकान और क्लबों में घुसकर सम्पत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया, राह चलने वालों को धक्का देकर गिरा दिया, नगर में जो छुट्टी मनाने आया उसके साथ उन्होंने दुर्व्यवहार किया। शराब तम्बाकू आदि की चोरी की। दो दिन तक सारे नगर में उत्पात मचाये रखा। पुलिस के आने पर दिन निकलते-निकलते वे शहर से भाग गये।

यह समाचार तो बाल अपराधों का एक बढ़ा हुआ रूप है। किन्तु बच्चों के जीवन में दैनिक व्यवहार की छोटी-छोटी बातों से ही अपराध की जड़ें जमती हैं। बहुत से बच्चे घर से स्कूल का नाम करके जाते हैं किन्तु वहाँ अनुपस्थिति लगती रहती है और ये अपने दूसरे साथियों के साथ खेलते रहते हैं, घूमते हैं। कई तो स्कूल में छुट्टी की अर्जी दे देते हैं। घर के सोचते हैं बच्चा पढ़ने गया है लेकिन वह खेल कूद के लिए घर से जाता है, यह वे बहुत समय तक नहीं जान पाते।

फीस के पैसों की चाट पकौड़ी उड़ाई जाती है। बहुत से बच्चे सिनेमा खेल तमाशे, पतंगबाजी आदि में पैसा उड़ा देते हैं। जब पैसे की और जरूरत पड़ती है तो मित्रों से पूरा कर लेते हैं फिर घर में चोरी करने लगते हैं। ये ही बच्चे आगे चलकर जेब काटते हैं। सार्वजनिक सम्पत्ति को हानि पहुँचाते हैं।

बहुत से बच्चों में अपने साथी, छोटे भाई बहन आदि को मारने पीटने की आदत पड़ जाती है। लेकिन यही प्रवृत्ति आगे नृशंस हत्या मार-पीट, छुरा घोपने, जैसी बुराइयों में बदल जाती है। एक लम्बे अभ्यास के बाद उनका ऐसा स्वभाव बन जाता है कि दूसरों को मारने पीटने, पीड़ित करने में उन्हें आनन्द आने लगता है। वे अकारण ही इस तरह की हरकतें करने लगते हैं। चौदह वर्षीय एक लड़के ने आठ वर्षीय एक लड़के को पेड़ से लटका कर मार दिया। पूछने पर उसने बताया ‘मेरे मन में ऐसी ही तरंग उठी थी।’

अमेरिका में सेक्रामेंटो नामक स्थान पर चौदह वर्ष के एक लड़के ने दस वर्षीय एक लड़की को हथौड़े की चोट से मार दिया, इसलिये कि ‘किसी को मार देने की उसकी इच्छा तीव्र हो उठी थी।’ एक पन्द्रह वर्षीय किशोर ने एक लड़की को छुरा घोप कर मार डाला। लड़की जब तड़पते हुये प्राण त्याग रही थी तब लड़का बड़ा प्रसन्न हो रहा था। पूछने पर उसने बताया कि ‘बहुत दिनों से किसी को छुरा घोंप देने की मेरी इच्छा प्रबल हो रही थी।’ इस तरह से अनेकों उदाहरण हमारे सामने आया करते हैं जिसमें लड़के, लड़कियां बिना मतलब ही अपने साथियों को दूसरे बच्चों को मारते-पीटते है। उक्त नृशंस घटनाओं की शुरुआत प्रारंभ में मामूली मार-पीट से ही होती है।

माता-पिता, अभिभावक, अध्यापकों की आज्ञा न मानना, उन्हें परेशान करना, दुर्वचन कहना, उन्हें दुःखी पीड़ित देखने में प्रसन्नता का अनुभव करने की प्रवृत्तियाँ भी बच्चों में दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। छोटे-छोटे बच्चों तक में ये प्रवृत्तियाँ देखने को मिलती हैं। और ये ही आगे चलकर उनका अपमान करते, लड़ने-झगड़ने यहाँ तक कि हत्या तक कर देने में बदल जाती है।

समाज में फैले हुये यौन अपराध, बलात्कार, अपहरण आदि की प्रारंभिक प्रवृत्तियाँ बचपन से ही शुरू होती हैं। छोटे-छोटे बच्चों में भी कामुक प्रवृत्तियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। अभिभावकों को पता भी नहीं चलता है कि बच्चों में यौन भावनायें जाग्रत हो जाती हैं और उन्हें शाँत करने के लिये वे तरह-तरह के गलत मार्ग अपनाते हैं। बचपन से ही कामुक रोगों से पीड़ित हो जाने वाले बच्चों के दूषित जीवन की सहज ही कल्पना की जा सकती है। जब ये समाज में भयंकर यौन अपराधों को जन्म देते हैं।

इनके अतिरिक्त बाल जीवन में बढ़ती जा रही हिंसा, क्रूरता, गुण्डागर्दी, नशेबाजी, आवारापन मानव-समाज के लिए एक गंभीर समस्या है। बाल अपराध इस तरह बढ़ रहे हैं कि उनका अनुमान कर सकना मुश्किल है। विभिन्न देशों में बाल अपराधों के लिए सर्वेक्षण होता रहता है किन्तु कहीं की भी रिपोर्ट पूर्ण नहीं है। वस्तुतः बच्चों के जीवन में अधिक हाथ रखने वाले माँ-बाप अभिभावक गण ही जब इन्हें नहीं जान पाते तो बेचारी सरकार क्या जानेगी। वह तो इनेगिने जो प्रकट हो चुके है उन्हीं तथ्यों का पता लगा पाती है। फिर भी जो आँकड़े मिले हैं वे सनसनीखेज हैं। उत्तर प्रदेश में सन 1958 में एक सर्वे के अनुसार कुल कैदी 242943 थे जिनमें बाल-अपराधियों की संख्या 2359 थी। बम्बई प्रदेश में 13 दिसम्बर 1958 को दण्डित अपराधी 13178 थे जिनमें बाल-अपराधियों की संख्या 847 थी। जबकि बम्बई, मद्रास तथा बहुत से राज्यों में बाल-अपराधियों को जेल में नहीं रखा जाता। वैसे बम्बई में बाल-अपराधी अदालतों और संस्थाओं के सर्वे के अनुसार 31 मार्च 1957 को 6815 पुरुष बाल-अपराधी तथा 2514 महिला अपराधी थे। सन् 58 में यही संख्या बढ़कर क्रमशः 7790 और 2699 हो गई। इसी तरह विभिन्न प्रदेशों में भी कुछ न कुछ आँकड़े अवश्य होंगे लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए।

ये तो वे आँकड़े हैं जो पुलिस की निगाह में आये हैं जिनकी संख्या नगण्य है। किन्तु हमारे दैनिक जीवन में जरा सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो छोटे-छोटे बच्चों के आचार-विचार, रहन-सहन, बोलचाल, व्यवहार में तरह-तरह की बुराइयाँ घटती जा रही हैं, जो हमारी भावी पीढ़ी की स्थिति को सूचित करती है।

बाल-अपराधों के विदेशी आँकड़े भी इस संबंध में आंखें खोल देने वाले हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में भी मोंटगोमरी हाइड के अनुसार प्रति वर्ष 10 लाख बाल-अपराधी होते हैं जो वहाँ के कुल अपराधों की आधी संख्या है। एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटेन में सन 1948/56 के बीच में 14 से 16 वर्ष के बच्चों में शराब पीकर उन्मत्त हो जाने का अपराध 8 गुना बढ़ गया और 17 से 20 वर्ष के युवक युवतियों में चौगुना। इसी तरह हिंसात्मक बाल-अपराधों की संख्या दुगुनी-तिगुनी तक हो गई। इसी तरह अनैतिक यौन अपराधों की संख्या भी बहुत बढ़ गई है।

एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 1958 में न्यूयार्क के 900 स्कूलों में से सितम्बर-अक्टूबर माह में 544 लफंगे विद्यार्थियों को निकाला जो इस तरह के उद्दण्ड छात्र-छात्राओं की संख्या का केवल एक प्रतिशत ही था। रूस में भी क्राँति के बाद बाल-अपराधों की संख्या काफी बढ़ी है।

इस तरह मानव समाज में बाल-अपराध एक बहुत बड़ी समस्या बन गये हैं। इससे हमारी समाज व्यवस्था ही सदोष नहीं बनती, उल्टे आने वाली योग्य और उत्तरदायी पीढ़ी का भी भविष्य अंधेरे में पड़ गया है। अपराधों की छूत बच्चों में बड़ी जल्दी लगती है। जाने अनजाने एक को देखकर दूसरा बालक भी वैसा ही गलत आचरण करने लगता है। बच्चों की ग्रहणशील वृत्ति होती है। फिर आवश्यकता इस बात की है कि समाज के सभी हितचिन्तकों को, अभिभावकों को इस बुराई की ओर ध्यान देना चाहिए। बच्चों को केवल खिलाने पिलाने या शिक्षा दिलाने में ही अपना कर्त्तव्य पूरा न समझ कर उन्हें अपराधी जीवन से बचाये रखना, बुराइयों में प्रवृत्त न होने देना भी आवश्यक है। बाल-अपराधों को रोकने में जितना घर वाले सफल हो सकते हैं और उतना और कोई नहीं।

इस संबंध में कुछ अधिक प्रकाश अगले अंक में डालेंगे।


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यथाशक्ति चिकीर्षन्ति, यथाशक्ति च कुर्वते।

न किंचिदवमन्यन्ते, नराः पण्डतबुद्धयः॥

जो मनुष्य शक्ति के अनुसार इच्छा करते हैं, शक्ति के अनुकूल काम करते हैं और किसी का निरादर नहीं करते- वे मनुष्य पण्डित बुद्धि होते हैं।


अन्ध दम्पत्ति-नेमेथ

अब्राह्म नेमेथ उस अमेरिकन अंधे व्यक्ति का नाम है जिसकी आँखें जन्म से डेढ़ महीने बाद ही चली गई थी- फिर भी उसने अपने जीवंत बल पर केवल उच्च शिक्षा ही प्राप्त नहीं की वरन् अंधों के लिए एक ऐसी प्रणाली का भी आविष्कार किया, जिसके सहारे आज संसार अगणित नेत्र विहीनों के लिए गणित जैसे कठिन विषयों की शिक्षा प्राप्त कर सकना संभव हुआ है।

नेमेथ का पालन पोषण उनके पितामह ने बड़ी कठिन आर्थिक परिस्थितियों में किया। बड़े होने पर इतना भी उन्होंने किया कि अंधों के स्कूल में उनके पढ़ने की भी व्यवस्था कर दी। उस समय नेत्र हीनों की शिक्षा के लिए ‘ब्रेल पद्धति’ का आविष्कार हो चुका था और उस प्रकार की कुछ पुस्तकें भी छप चुकी थीं। कागज में छेद करके साँकेतिक भाषा में अक्षर उभारे जाते थे और अंधे छात्र उन्हें छूकर शिक्षा प्राप्त करने लगे थे। पर वह पद्धति उस समय बहुत ही अविकसित थी। गणित की उच्च शिक्षा के लिए उसमें संकेतों की कोई व्यवस्था न थी।

नेमेथ मनोयोग पूर्वक पढ़ने लगे तो उनकी प्रतिभा भी निखरी। गणित में अभिरुचि अधिक थी। ये गणित में एम.ए. करना चाहते थे, पर उस समय उसके लिए कोई व्यवस्था न थी। मन मार कर उसने मनोविज्ञान में एम.ए. किया। इतनी शिक्षा तो प्राप्त कर ली पर उसका उपयोग कुछ न था। वे गुजारे के लिए कुछ काम प्राप्त करना चाहते थे पर अंधे को भला कहीं क्या काम मिलता। अन्त में उन्होंने तकियों के खोल सीना आरंभ कर दिया और अपनी गुजर करने लगे।

उन्हीं दिनों फ्लोरेंस नामक युवती को किसी रोग से नेत्र-ज्योति खो देनी पड़ी। इस अंधी लड़की को आश्रय की खोज थी। एक दूसरे का परिचय हुआ तो इस अंधी-अंधों ने परस्पर विवाह कर लिया और घर बसा कर रहने लगे। एक अंधे को दूसरा आँख वाला साथी मिले तो उससे कुछ सहारे की भी आशा हो सकती है जब दोनों ही अंधे हों तो समस्या और भी अधिक उलझती है। प्रत्येक अपनी ही नहीं अपने अंधे साथी की भी चिन्ता करनी पड़ती है। जो हो, फ्लोरेंस बड़ी मनस्वी थी, उसने अपने पति का साहस बढ़ाया और अधिक पुरुषार्थ करके अधिक अच्छा जीवन बिताने के लिए उत्कण्ठा जागृत कर दी। नेमेथ आरंभ से ही बड़े अध्यवसायी और परिश्रमी थे, पर फ्लोरेंस ने तो उनके साहस को और भी दूना कर दिया। वे गणित में उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। अंधी पत्नी ने कहा- हम लोगों की सिर्फ आँखें ही तो नहीं है, जो विकल्प शक्ति हमें मिली है वह इतनी समर्थ है कि उसके बलबूते पर भी आकाँक्षा की पूर्ति हो सकती है।

नेमेथ ने अंध शिक्षा प्रणाली पर कई शोध आरंभ कर दी और ऐसा उपाय खोजा जिससे नेत्रहीनों के लिए गणित पढ़ सकना भी संभव हो सके। इसके लिए अंग्रेजी भाषा के ज्ञान से काम नहीं चल सकता था, अतएव उन्होंने फ्रेंच, हिब्रू, ग्रीक लेटिन आदि कई भाषायें पढ़ीं और अपने खोज कार्य को तेजी से चलाया। इसी बीच एक और सौभाग्य मिला कि अंधी फ्लोरेंस की एक आँख में थोड़ी रोशनी लौट आई और वह इस लायक बन गई कि पति के बोले हुए शब्दों को लिख सके या किसी कागज को पढ़ कर उन्हें सुना सके। अब तो उनका मार्ग और भी प्रशस्त हो गया। तो उदार व्यक्तियों की सहानुभूति भी उमड़ी। कालेज में गणित के शिक्षक छुट्टी पर गये तब अस्थायी रूप से नेमेथ को वह कार्य मिल गया। वे नौकरी से बचे हुए घण्टों में उसी विद्यालय में छात्र रूप में अध्ययन भी करते थे परिवार का खर्च पूरा न कर पाते तो नर्तक मण्डली के साथ पियानो बजाने का काम करते और कुछ उससे भी कमा लेते। इस प्रकार कठिनाइयों से निरन्तर संघर्ष करते हुए उन्होंने कोलम्बिया विश्व विद्यालय से एम.ए. की उपाधि प्राप्त कर ली।

जोडज ब्रेल आव अमेरिका ने हिब्रू भाषा-भाषी नेत्रहीनों के लिए बाइबल छापने का निश्चय किया तो वह कार्य नेमेथ के जिम्मे आया उन्होंने बड़ी तत्परता से उस कार्य को पूरा किया।

अंधों की शिक्षा के लिए किये जाने वाले सरकारी प्रयत्नों में वे रुचिपूर्वक भाग लेते और समय निकाल कर उन संस्थाओं को अपनी सेवा सहायता अर्पित करते जो अंधों की शिक्षा के लिए कुछ काम कर रही होतीं। उनकी धर्म पत्नी उन कार्यों में उन्हें सदैव प्रोत्साहित करती। अंधे होने का दुःख उनने न कभी माना वरन् अपने भाग्य को यह कहकर सराहा कि वे नेत्र-हीनों की सहायता के लिए इसी कारण कुछ अधिक प्रयत्न कर सके, जो नेत्रयुक्त होने पर शायद उनके लिए संभव न होता।

अपना शोध कार्य उन्होंने और भी अधिक उत्साह के साथ जारी रखा और उन्होंने पुरानी प्रचलित अंध शिक्षा पद्धति ‘ब्रेल कोड’ में एक क्रान्तिकारी परिवर्तन किया जो ‘ब्रेल साइड रुल’ के नाम से पुकारा जाने लगा। वे इतने से ही संतुष्ट न हुए वरन् एक और पद्धति का आविष्कार किया जो पूर्व प्रचलन की अपेक्षा अधिक सरल ही नहीं है, वरन् उसमें गणित जैसे कठिन विषय को पढ़ाये जाने की भी पूरी सुविधा है। इस पद्धति के गुण दोषों पर विचार करने के लिए अमेरिकन शिक्षा विभाग की ज्वाइन्ट युनिफर्म ब्रेल कमेटी के विशेषज्ञों ने पूरी तरह जाँच पड़ताल की और जब उसे उपयुक्त पाया तो एक वर्ष बाद राष्ट्रीय सम्मेलन में उसे सरकारी मान्यता प्रदान कर दी गई।

ओछी मनोभूमि के लोग राई-रत्ती अभाव और असुविधाओं का बहाना लेकर अपने दुर्भाग्य का रोना रोने लगते हैं और गया-गुजरा जीवन जीने की परिस्थितियों को ईश्वरीय कोप-भाग्य दोष बता कर अपनी निर्दोषिता सिद्ध करते हैं। अपने को दीन-हीन सोचकर दूसरों की सहायता, याचना करते हैं और ऐसा मान बैठते हैं कि हम इन परिस्थितियों में कर ही क्या सकते हैं? ऐसे निराशावादी हीन-वृत्ति के लोगों को नेमेथ दम्पत्ति एक चुनौती के रूप में सामने खड़े होते हैं। वे कहते हैं- ‘कोई अभाव ऐसा नहीं जो मनुष्य को संकल्प शक्ति को प्रस्फुटित होने से रोक सके। मनस्वी व्यक्ति हर कठिनाई की परास्त कर सकते हैं और हर अभाव से संघर्ष करते हुए आगे बढ़ने का रास्ता निकाल ही सकते हैं जैसा कि उन्होंने स्वयं भी किया है।


ख्वाजा हसन

ख्वाजा हसन एक दिन टिग्रिस नदी के किनारे टहल रहे थे। शाम का अंधेरा हो चला था। उसने देखा कि पास में ही पेड़ के नीचे एक पुरुष एक नारी के साथ घुल-घुलकर बातें कर रहा है और हाथ में बोतल थामे है। ख्वाजा ने उसे धिक्कारा- दुष्ट नास्तिक इस सन्ध्या-काल में भी कुकर्म नहीं छोड़ता। इबादत करना न आता हो तो मुझसे सीख। उपदेश देकर वे मुड़ ही रहे थे कि सामने नदी में एक नाव चलती और उसमें बैठे हुए यात्री डूबते उतराते मौत जिन्दगी की लड़ाई लड़ने लगे।

पेड़ के नीचे अंधेरे में बैठा हुआ युवक पानी में कूदा और देखते-देखते उसने कितने ही डूबने वालों को खींच कर किनारे पर लगा दिया।

हसन किनारे पर खड़े यह देख रहे थे। जिसे वे दुष्ट नास्तिक कह रहे थे वह इतना उदार और सहृदय हो सकता है इसकी कल्पना भी न थी। जब युवक किनारे पर आया तो हसन उसकी प्रशंसा करने लगे। युवक ने उन्हें प्रणाम किया और कहा- कृपया निन्दा, प्रशंसा में जल्दी न किया करें। पेड़ के नीचे मेरी बीमार माँ बैठी है और बोतल में उसके पिलाने की दवा है।

हसन पानी-पानी हो गये और सोचने लगे बिना पूरी बात जाने कोई अभिप्राय बना लेना भूल नहीं तो और क्या है?


संत समागम

भारत माता-

‘भारत माता एक भूखण्ड नहीं, एक शक्ति है, भागवती विभूति है। यह भारत शक्ति एक महान आध्यात्मिक धारणा की सजीव शक्ति है। ईश्वर सदा अपने लिए एक ऐसा विशिष्ट देश चुन कर रखता है जिसमें सब संभावनाओं तथा सब संकटों के मध्य भी उच्च ज्ञान कुछ या अधिक शक्तियों द्वारा सदा सुरक्षित रहता है और कम से कम इस चतुर्युग में तो वह भारत ही है।’

‘हमारा विश्वास है कि भारत अवश्यमेव अपने स्वतंत्र जीवन तथा सभ्यता का विकास करेगा। वह विश्व में अग्रगामी बनकर उन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा नैतिक समस्याओं को हल करेगा, जिन्हें सुलझाने में यूरोप विफल हुआ है।’

-श्री अरविन्द

मानव और दानव-

हम सब लोग प्यासे हैं और हमारे पास कटोरा भर ही जल है। एक ही मनुष्य पानी पी सकता है। अगर मन में यह इच्छा है कि, मैं ही पानी पी लूँ और अपनी ही प्यास बुझा लूँ, तो समझ लेना चाहिए कि, मेरे अन्दर दानव है- भले ही रूप मनुष्य का हो। अगर सबको नहीं मिल सकता, तो मुझे भी नहीं चाहिए, ऐसी इच्छा हो, तो समझना चाहिए कि, हम मनुष्य हैं। इस तरह हमको अपनी परख करनी चाहिए। दिन-भर खूब थकने के बाद, रात को सोने में जैसी खुशी होती है, वैसी ही जिन्दगी भर लोगों की सेवा करने के बाद चिर-विश्राम के समय भी होती है।

-बिनोवा भावे

व्यावहारिक वेदान्त-

अपने देशबन्धुओं के हृदय में अपना हृदय मिला दीजिए। अपने और उनके बीच ‘अहंकार’ रूपी परदे को बिल्कुल स्थान मत दीजिए। क्षुद्र अहंकार छोड़कर देश से आपका तादात्म्य हो जाने पर आपके मन में जो विचार उत्पन्न होगा वह आपका नहीं-सारे देश होगा। आप आगे बढ़िए, सारा देश आपके पीछे-पीछे चलेगा।

आपके मन में आरोग्य का विचार आते ही आपके देशबंधु निरोगी और बलवान हो जायेंगे। आपकी शक्ति उनकी रग-रग में फैल जायेगी। अपने हृदय में यह भाव उत्पन्न कीजिए कि ‘मैं देश हूँ-भारत हूँ-भारतवर्ष हूँ।’ भारत की भूमि ही मेरा शरीर है, ‘केमोरिन’ मेरे पैर हैं, हिमालय मेरा शिर है, मेरे शिर के मस्तिष्क से ही ब्रह्मपुत्र और सिंधु निकली है, विन्ध्याचल मेरी कमर में बंधा हुआ कमरबंद है, ‘कारोमण्डल’ और ‘मलावार’ मेरा दाहिना बाँया पैर है, मैं समस्त भारतवर्ष हूँ। भारत की पूर्व और पश्चिम दिशायें मेरी दाहिनी और बाइ भुजाएं हैं, और समस्त जाति को आलिंगन करने के लिए मैंने अपनी दोनों भुजाएं फैला दी हैं। मेरा प्रेम विश्वव्यापक है? अहा हा! मेरे शरीर का गठन ही इस प्रकार का है। खड़ा होकर अनन्त दिक्काल की ओर अपनी दृष्टि दौड़ता हूँ, परन्तु मैं अन्तरात्मा विश्वात्मा हूँ। मैं जब चाहता हूँ तो मालूम होता है कि सारा भारत चलता है, बोलता हूँ तो भारतवर्ष बोलता है, और श्वाँस लेता हूँ तो सारा देश श्वाँस लेता है। मैं भारत हूँ, शंकर हूँ, शिव हूँ, यहाँ भाव हृदय में उत्पन्न होना ही स्वदेशाभिमान है, और इसी को व्यावहारिक वेदान्त कहते हैं।

-स्वामी रामतीर्थ

जीवन की सफलता-

जीवन में त्याग वृत्ति, सेवा और प्रेम वृत्ति को धारण करना ही होगा। फूल को अपनी पंखड़ियां गिरानी होंगी तभी तो फूल खिलेंगे। फल को वृक्ष से गिरना ही होगा, तभी तो वृक्ष होंगे। गर्भ के शिशु को गर्भाशय से बाहर आना ही पड़ता है, तभी तो पृथ्वी पर उसके शरीर, मन आदि का विकास होकर उसकी इन्द्रिय, शक्ति और विद्या-बुद्धि और उसकी इच्छा-शक्ति का विकास होता है। जहाँ ये एक ओर उसके जीवन को धन्य बनाती हैं वहाँ वह अन्यों के साथ सुसम्बंध स्थापित कर मधुर प्रेम से भर देती है। त्यागमय-प्रेममय और निस्वार्थ मानव जीवन तभी बनेगा जब आत्म-शक्ति सुनियंत्रित होगी-

-रवीन्द्रनाथ टैगोर


हम सेवा भावी बनें

संसारी मनुष्यों में दो प्रवृत्तियाँ विशेष रूप से देखने में आती हैं- एक स्वार्थ और दूसरी परमार्थ। आत्म-रक्षा, जीवन-निर्वाह और शरीर को स्थिर रखने के लिए एक सीमा तक स्वार्थ की प्रवृत्ति सर्वथा उचित और आवश्यक भी है। यदि मनुष्य अपने इतने स्वार्थ का ध्यान न रखें और उसकी यथोचित ढंग से पूर्ति न करता रहे तो उसके लिए प्राण धारण कर सकना भी कठिन हो जायेगा। उस दशा में वह न किसी तरह का धर्म-कर्म, पुण्य कार्य कर सकेगा, न किसी प्रकार के परमार्थ, परोपकार के कार्य के योग्य रह सकेगा।

पर यदि कोई व्यक्ति निरन्तर स्वार्थ में ही संलग्न रहता है, अपने खाने, पीने, पहनने तथा अन्य प्रकार की सुख-सुविधाओं को ही महत्व देकर अन्य व्यक्तियों तथा समाज के हित की उपेक्षा करता है अथवा ऐसा आचरण करता है कि जिससे सार्वजनिक कल्याण के कामों की हानि होती है, तो वह सभी विचारशील, विवेकवान सज्जनों की दृष्टि में निन्दनीय ठहरता है। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य का जीवन समाज से संबंधित है, सामाजिक सहयोग के प्राप्त होने से ही उसका अस्तित्व रह पाता है, और समाज के आधार पर ही वह तरह-तरह की सुख-सुविधाएं प्राप्त कर सकता है। ऐसी दशा में जो सामाजिक हित की बातों की उपेक्षा करके ‘अपने मतलब से ही मतलब’ रखने की नीति को अपनावे तो उसे हीन और मनुष्यता से शून्य माना जायेगा।

यद्यपि परमार्थ का क्षेत्र बहुत विस्तृत है और गंभीर भाव से विवेचना की जाय तो उचित श्रेणी के स्वार्थ का भी उसमें समावेश हो जाता है। पर सामान्यतः परमार्थ का एक प्रत्यक्ष तथा सर्व-सुलभ रूप अन्य लोगों की किसी न किसी प्रकार की सेवा ही माना जाता है। इसके द्वारा स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही सिद्ध होते हैं। इससे दूसरों का उपकार तो होता ही है, उनके अभावों की पूर्ति होने अथवा कष्टों के मिटने से वे आशीर्वाद देते ही हैं। साथ ही अपने हृदय में भी आत्मिक सन्तोष की प्राप्ति और आत्मबल की वृद्धि होती है। इस प्रकार का आत्म-विकास जीवन की प्रगति के लिए बहुत आवश्यक और महत्वपूर्ण बात है। परोपकारमय जीवन व्यतीत करते हुए जो उन्नति की जाती है वह ठोस और स्थाई होती है और ऐसे व्यक्ति का जीवन जगत में सार्थक समझा जाता है।

सेवा कई प्रकार की हो सकती है। सबसे पहली तो प्रत्यक्ष सेवा है, जो दीन-दुःखी जनों की सदैव की जाती है। संसार में इस समय धन और अधिकार संबंधी विषमता बहुत अधिक फैली हुई है। जिसके कारण करोड़ों व्यक्ति उपार्जन और निर्वाह के साधनों से वंचित होकर निराश्रित जीवन बिताने को बाध्य होते हैं। ऐसे अभागे लोग जैसे-तैसे रूखी-सूखी रोटी से पेट भर भी लें तो भी उनके सामने सदैव कोई न कोई आवश्यकता, अभाव बना ही रहता है। ऐसे लोगों को रोगी होने पर मामूली दवा भी नहीं मिलती, पथ्य का कोई प्रबंध नहीं हो पाता और उनमें से अनेकों साधारण बीमारी में ही बिना देखभाल और सहायता के मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। बाढ़, अकाल, महामारी आदि फैलने पर पहले ऐसे ही कमजोर और साधनहीन लोगों का नंबर आता है और वे कीड़े-मकोड़े की तरह हजारों लाखों की संख्या में चटपट मर जाते हैं। सेवाभावी स्वभाव के लोग ऐसे अवसर पर अपने सुख दुख या हानि-लाभ का विचार न करके कष्ट पीड़ितों की सहायता के लिए कूद पड़ते हैं और उनकी सेवा की बदौलत हजारों व्यक्तियों की प्राण रक्षा हो जाती है। ऐसी सेवा से सच्चे सेवक को जो आनन्द प्राप्त होता है वह अवर्णनीय होता है। देखने वाले तो समझते हैं कि इसे बहुत परिश्रम करना पड़ा, खतरा उठाना पड़ा, हानि सहनी पड़ी, पर इस कार्य के फलस्वरूप उसकी आत्मा का जो उत्थान होता है और हृदय किस प्रकार सात्विक भावों से भर जाता है, उसे वह अपने लिए एक अमूल्य लाभ समझता है, और इसलिए जब कभी मौका मिलता है अवसर आता है वह सेवा कार्य से नहीं चूकता। सेवा उसका जीवनोद्देश्य ही बन जाती है और अपनी परिस्थिति तथा साधनों के अनुसार अधिक से अधिक सेवा करना वह अपना धर्म समझता है।

आजकल एक अन्य प्रकार की सेवा अधिक चल पड़ी है जिसे यश या नामवरी की सेवा कह सकते हैं, यह आज कल की राजनैतिक और सामाजिक परिस्थितियों के कारण उत्पन्न हुई और उच्च श्रेणी के व्यक्तियों में उसी का बोलबाला दिखाई पड़ता है। नेताजी, सेठजी या उद्योगपति जी सार्वजनिक सेवा के कार्यों में हजारों लाखों चंदा दे डालते हैं, आवश्यकता होने पर अपने संगी, साथियों को सहायता कार्य के लिए भी भेज देते हैं, लोगों को सरकार से या किसी समुदाय विशेष से कोई शिकायत होती है तो उसके लिए दौड़-धूप करके या आन्दोलन उठाकर उसे दूर कराने की चेष्टा भी करते हैं। वे स्वयं इन कामों को जनता की सेवा के नाम से पुकारते हैं और वैसा ही भाव प्रकट करते हैं। पर उनके मन में यही भावना रहती है कि इस प्रकार लोगों में उनकी नामवरी हो जाय, जनता उनको हितैषी और सहायक समझने लगे और जब अवसर आये तो वे इस सेवा के आधार पर नगरपालिका या छोटी अथवा बड़ी व्यवस्थापक सभा के सदस्य चुन लिए जायें। शासन सभाओं में जाते समय भी वे जनता की सहायता की ही दुहाई देते हैं, पर वहाँ जाकर वे अपने कारोबार को बढ़ाने या किसी उपाय से धनोपार्जन की ही चेष्टा करते हैं। यदि वे इस प्रकार के चुनाव के झंझटों के नाम पर सरकारी अधिकारियों और शासन-सभाओं के संचालकों पर प्रभाव जमाते है और उनके द्वारा अपने व्यापार या उद्योग-धंधे को बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं।

तीसरी प्रकार की सेवा वह है जो हृदय से तो नहीं वरन् अपनी सामाजिक परिस्थितियों, मर्यादा को कायम रखने के लिए लोक-लाज या मजबूरी के नाम पर की जाती है। यद्यपि ऐसे लोगों को जनता या गरीबों से कोई हमदर्दी नहीं होती पर जब अन्य दस-पाँच परिचित और प्रतिष्ठित व्यक्ति आकर आग्रह करते हैं तो अपने सम्मान और पदवी के अनुसार कुछ आर्थिक सहायता करते ही हैं और आवश्यकता होती है तो अन्य लोगों के साथ जाकर कुछ समय भी खर्च करते हैं। ऐसी सेवा दिखावटी होती है और उसमें हार्दिकता का समावेश न होने से उसके द्वारा मनुष्य की आत्मिक उन्नति नहीं हो पाती और न मानसिक संतोष प्राप्त होता है। ऐसे लोगों को एक प्रकार का झूठा अभिमान और ऊपरी शान ही पल्ले पड़ती है।

एक चौथी तरह की सेवा अप्रत्यक्ष भी हो सकती है। जो व्यक्ति प्रत्यक्ष में किसी की सेवा न करते हुए अपने नियमित कर्म, कर्त्तव्य को ईमानदारी, सच्चाई, नेक नीयती से करते हैं, वे भी समाज की एक सेवा ही करते हैं। आजकल अधिकाँश मनुष्य हर एक काम में बेईमानी की भावना रखने लगे हैं। लोगों में नागरिकता की भावना नहीं पाई जाती और वे प्रायः ऐसे काम करते रहते हैं जिससे दूसरे अनेक व्यक्तियों की हानि होती है और वे भी वैसे ही दुराचारों की नकल करने लगते हैं। इसलिये जो लोग अपनी सच्चाई, ईमानदारी, कर्त्तव्य पालन के द्वारा अन्य लोगों के सामने श्रेष्ठ नागरिकता का उदाहरण उपस्थित करते हैं वे कोई प्रत्यक्ष सेवा न करने पर भी अन्य अनेक व्यक्तियों के जीवन सुधार करने में सहायक बनते हैं और इस प्रकार सदैव एक प्रकार की मूक सेवा करते रहते हैं।

सत्य तो यह है कि ‘सेवा’ धर्म का सच्चा और सामान्य दृष्टि से सर्वोच्च रूप है। उस तपस्या, ध्यान, जप, तीर्थयात्रा, देवार्चन आदि कर्म आजकल धर्म के लक्षण माने जाते हैं, पर इन कार्यों को करते हुए भी अनेक व्यक्तियों में तरह-तरह के दोष, दुर्गुण देखने में आते हैं। बड़े-बड़े तपस्वी, अहंकार या ख्याति के कारण एक-दूसरे से प्रति स्पर्धा का भाव रखते हैं और अनेक अवसरों पर प्रत्यक्ष रूप से लड़ते भी रहते हैं। इसी प्रकार नित्य दो-दो चार घंटे तक भजन, ध्यान करने वाले अपने स्वार्थ साधन के लिए सब तरह के दुष्कर्म करने में भी संकोच नहीं करते। पर जो व्यक्ति सच्चा सेवाभावी होगा उसमें स्वार्थ त्याग, निरहंकारिता, विनय, प्रेम, आदि सद्गुण स्वतः ही पैदा हो जाते हैं और वे निरन्तर बढ़ते ही रहते हैं।

आत्म-कल्याण के लिये सेवा भावना को अपनाया जाना आवश्यक है। परमार्थ कर्म करते रहने से ही आध्यात्मिक आस्थाओं को व्यवहार रूप में चरितार्थ करने का अवसर मिलता है। इसी प्रकार वे परिपुष्ट होकर अन्तःकरण में संस्कार का रूप धारण करती हैं और यह सुसंस्कार ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त कराने में स्वर्ग एवं मुक्ति का अवसर उत्पन्न करने के माध्यम बनते हैं। सेवा भावना भी वस्तुतः पूजा उपासना की ही भाँति साधना का एक आवश्यक अंग है।


मधु-संचय


मधु-संचय (Kavita)

जन-जन में भगवान है!

इसीलिए जन-जन की सेवा पूजा स्वयं महान है!!

दुःखी तुम्हारे हारे आये,

अपना दुःख तुम को बतलाये,

जो कुछ बने सहारा दो तुम,

क्योंकि उपेक्षा दीन-हीन की प्रभु का ही अपमान है!

जन-जन में भगवान है!!

शोक ग्रस्त हों जो भी भाई,

उनके हित बनकर सुखदाई,

तुम अपना कर्त्तव्य निभाओ,

पुण्य लाभ का अवसर पाओ,

दुःखियों का आशीष तुम्हारे लिये सुखद वरदान है!

जन-जन में भगवान है!!

-विद्यावती मिश्र

एकाकी रहने वाले का,

जीवन भी क्या टिक पायेगा।

बिना किसी का सम्बल पाये,

बिना मोल का बिक जायेगा।

अमर बनाना यदि अपने को,

औरों को भी गले लगाओ।

अपनी कुशल चाहने वाले,

औरों की भी कुशल मनाओ॥

जिससे क्लेश मिले औरों को,

वह तो कोई धर्म नहीं है।

जिससे हानि किसी जन को हो,

वह तो कोई कर्म नहीं है॥

अपना ही हित सदा न देखो,

परहित में भी ध्यान लगाओ।

अपनी कुशल चाहने वाले,

औरों की भी कुशल मनाओ॥

सबको उत्तम पन्थ मिले तुम,

ऐसे सुन्दर दीप जलाओ।

अपनी कुशल चाहने वाले,

औरों की भी कुशल मनाओ।

-गोमती प्रसाद पाण्डेय ‘कुमुदेश’

तुम मुझे इसके लिए चाहे करो बदनाम,

क्यों न कितने बुरे मेरे धरो तुम नाम,

दण्ड भी चाहे कठिन तुम दो मुझे इतना,

डूब जाए आँसुओं में, हर सुबह हर शाम,

पर यही अपराध में हर बार करता हूँ-

आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ।

-नीरज

काट कण-कण देह जिसकी दुर्ग का निर्माण होता,

एक तिल हटने न पाता भूमि में ही प्राण खोता।

जय-पराजय-यश कीर्ति यश भी छोड़ करके कामनाएं,

रात-दिन निश्चल-अटल चुपचाप गढ़ का भार होता।

शोक में रोता नहीं और हर्ष में हंसता नहीं जो,

राष्ट्र की दृढ़ नींव का पाषाण बनता है वही तो।

-अज्ञात

अनेकों प्रश्न ऐसे हैं, जो दुहराये नहीं जाते।

बहुत उत्तर भी ऐसे हैं जो बतलाये नहीं जाते॥

इसी कारण अभावों का, सदा स्वागत किया मैंने।

कि घर आए हुए, मेहमान लौटाये नहीं जाते॥

हुआ क्या आँख से आँसू, अगर बाहर नहीं निकले।

बहुत से गीत भी ऐसे हैं, जो गाये नहीं जाते॥

बनाना चाहता हूँ स्वर्ग, तक सोपान सपनों का।

मगर चादर से ज्यादा, पाँव फैलाये नहीं जाते॥

-बलबीरसिंह ‘रंग‘

जो कभी गिरता नहीं भगवान है वह।

और जो गिरकर उठे इंसान है वह॥

किन्तु जो गिरकर कभी फिर उठ न पाए

आदमी के रूप में हैवान है वह॥

-विनोद रस्तोगी

कदमों ने सीखा है चलना, रुकना सीख न पाए।

शूल-शृंग-तूफान मिले, पर हमसे जीत न पाए॥

जीवन के हर नए मोड़ पर, आकर्षण भी आए।

अनदेखे ही बढ़ता आया, वे भी मोह न पाए॥

जिससे जितना बने, हमारा पथ तम मयकर जाओ।

अरी, आपदाओं विपदाओं ! स्वागत है, तुम आओ॥

रामस्वरूप खरे बी.ए.


अन्ध-विश्वास का इन्द्रजाल

अन्ध-विश्वास और रूढ़िवादी परम्परायें आज भी हमारे समाज में जड़ जमाये बैठी हैं और जन-जीवन को प्रभावित करती रहती हैं। अशिक्षित, ग्रामीण जीवन में तो इनका पूरा-पूरा बोलबाला है किन्तु शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले घरानों में भी इनका कुछ कम प्रभाव नहीं है। ज्ञान-विज्ञान, प्रतिभा और तर्क ताक में धरे रह जाते हैं जब घर में तथाकथित ‘बुढ़ियापुराण’ की चलती है। बात-बात में मीनमेख, शंका, भय, पश्चाताप, हमारे दैनिक जीवन में बड़ा अवरोध बन जाते हैं। ये हमारे मनोबल को क्षीण करते हैं। कई असामाजिक, अनुत्तरदायी कृत्य हो जाते हैं इन अंधविश्वासों की प्रेरणाओं से।

समाचार-पत्रों में प्रायः ऐसी खबरें निकला करती हैं कि ‘अमुक व्यक्ति ने देवी पर अपनी जीभ काटकर चढ़ा दी, ‘बच्चे की बलि दे दी।’ अकसर लोग किसी विशेष सिद्धि या लाभ के लिए देवी देवताओं की कृपा प्राप्त करने के लिए ऐसे जघन्य कृत्य करते हैं। देवी देवताओं पर मुर्गे, सूअर, बकरे, भैंसे की बलि चढ़ाना इसी तरह की अंध प्रेरणाओं पर आधारित होता है। लेकिन इस तरह के अंध विश्वास की हद हो जाती है जब मनुष्य नर-बलि देता है या अपना अंग काटकर चढ़ाता है। सिद्धि तो किसी को मिलती नहीं लेकिन जघन्य पाप का भागी बनना पड़ता है।

कुछ समय पूर्व एक समाचार निकला था जिसके अनुसार मध्य प्रदेश के एक तालाब में किसी विशेष पर्व पर नहाने और जूते वहाँ छोड़ आने पर शनिदशा दूर हो जाने के अंध विश्वास पर वहाँ छोड़े गए जूते हटवाने में राज्य सरकार का हजारों रुपया खर्च हुआ और तालाब दलदल बन गया। लेकिन कितनों की शनि दशा दूर हुई यह अज्ञात है।

अक्सर कई बार कुछ स्वार्थी लोगों के द्वारा ऐसी खबरें उड़ाई जाती हैं कि ‘अमुक तालाब में नहाने से असाध्य रोग दूर हो गया।’ तब हजारों लोग उसमें डुबकियाँ लगाते हैं। कीचड़ को भी शरीर में लपेटते हैं। लेकिन इस तरह ठीक हुआ एक भी व्यक्ति हमने अभी तक नहीं देखा।

एक व्यक्ति के यहाँ सन्तान जीवित नहीं रहती थी। दो-चार माह में मर जाती थी। अब बूढ़ी अम्मा ने पीर, पुजारी, स्याने, दिवाने, मुल्ला, फकीर सब की तलाश करना शुरू किया। कोई भूत-प्रेत का प्रकोप बताये, कोई भाग्य का चक्र तो कोई मकान में चुड़ैल का बासा बताये। गरज यह है कि जितने मुँह उतनी बातें। तरह-तरह के गण्डे ताबीज बनवाये, पीर पुजारों की मनौतियां पूरी की। स्याने दीवानों ने तरह-तरह से उनकी स्त्री को बहलाया, बकरे मुर्गी के बच्चे की बलियाँ दी गई। तरह-तरह के उतारे करके उनको सामान सिन्दूर दिया, आटा आदि चौराहे पर छोड़ा गया। लेकिन इस सबके बावजूद भी संतान जीवित नहीं रही। कई साल बीत गये तो संयोगवश उनके यहाँ एक सन्तान जीवित रही तो बूढ़ी स्त्रियों द्वारा तरह-तरह के टोटके किए जाने लगे। उसका नाम विद्याभूषण, यज्ञदत्त, शारदानन्द आदि न रखकर बुढ़िया पुराण के अनुसार ‘कूड़ामल’ रखा गया।

बच्चे को काफी बड़ा हो जाने तक दूसरों के माँगे हुए कपड़े पहनाये जाते रहे। शीतला देवी के प्रकोप के भय से टीका नहीं लगवाया। दुर्भाग्य से कुछ ही समय बाद बच्चे को चेचक का प्रकोप हो गया और वह बदसूरत हो गया। नाम तो पहले कूड़ामल था ही अब शक्ल भी वैसी ही हो गई। बच्चे को भूत चुड़ैलों का भय बताकर दो पहर में कहीं जाने नहीं दिया जाता। दूध पीकर बाहर जाने पर मुँह में राख की चुटकी रख दी जाती। कभी कुछ तबियत खराब हो जाती तो चूल्हे में राई नमक मिर्च की चूनी दी जाती जिससे अच्छे भलों को भी खाँसी और छींक का त्रास सहना पड़ता। ज्योतिषी के अनुसार शनि केतु आदि की शाँति के लिए पूजा-पाठ, दक्षिणा आदि का आयोजन हुआ।

हमारे जीवन में इस तरह के अंध विश्वास कुछ कम नहीं है। यह तो एक सामान्य-सा उदाहरण है। छींकने, थूकने किसी के मिल जाने तक पर हमारे कार्यक्रम रद्द हो जाते हैं। सफलता का विश्वास नष्ट हो जाता है। आत्मविश्वास और साहस तो कभी के गायब हो जाते हैँ। भीरुता, कायरपन, आशंकायें हमारे स्वभाव का अंग बन जाती हैं।

हम कहीं जाने को तैयारी हों और कोई व्यक्ति अचानक छींक दे तो हमारा बढ़ा हुआ पाँव तत्क्षण रुक जाता है। बिल्ली रास्ता काट जाय तो आगे बढ़ने में जो कुछ भी बुरा हो जाय वह थोड़ा है। ऐसी मान्यतायें बनी हुई हैं हमारी।

गोरखपुर की तरफ के एक सज्जन के साथ हमें कुछ दिन रहना पड़ा। जब वे कहीं जाते तो अपने सब मिलने वालों से एक दिन पहले कह देते-’भाई कल हम कहीं जायेंगे, हमें टोकना मत।’ भूलवश कोई उन्हें पूछ बैठता- ‘आज कहाँ जा रहे हैं’ तो उनकी आँखें लाल हो जाती और झगड़ा करने पर उतारू हो जाते। फिर कितना ही आवश्यक काम हो वे नहीं जाते। एक दिन पूछने पर उन्होंने बताया- ‘कहीं जाते समय ऐसा पूछने पर हमारी तरफ लाठियाँ चल जाती है।’ इतना ही नहीं रास्ते में कोई धोबी, तेली, डाकोत मिल जाय तो लोग अपनी खैर नहीं समझते। लोग पहले से ही अपनी हानि या सफलता की कल्पना कर लेते हैं। आश्चर्य तो यह देखकर होता है कि इन्हें मैले का टोकरा लादे हुए कोई मेहतर मिल जाय तो भारी खुशी होती है।

धार्मिक पूजा उपासना के लिए मन्दिरों और मूर्तियों का होना अच्छा है किन्तु जगह-जगह पत्थर इकट्ठे कर उन्हें सिन्दूर से रंग कर असंख्य देवी देवताओं पर सिर रगड़ने में हमारा कितना समय बर्बाद होता है? घास बाबा, प्रेत बाबा, पीर, भैरव, भवानी, भूत प्रेत के नाम पर न जाने कितने पत्थरों के सामने हम नाक रगड़ते फिरते हैं, उनसे दुआएं माँगते हैं, पर पीठ फेरने पर चाहे उन पर कुत्ते ही पेशाब क्यों न करें। यह है हमारे अंध-विश्वास का नाटक। स्वामी विवेकानन्द ने एक बार हमें चेतावनी देते हुए कहा था-’जो समाज चौके, चूल्हे तथा बर्तनों को पूजता रहेगा पत्थर-पत्थर पर सिर रखता फिरेगा वह कभी ऊंचा नहीं उठ सकता।’ किसी के बताने पर कि अमुक स्थान पर अमुक देवता ने लीला की थी, या कोई घटना हुई थी तो लोग वहाँ की मिट्टी लेते-लेते गड्ढा कर देते हैं।

किसी भी तीर्थ या मन्दिर में जाने पर हम अपना सौभाग्य समझते हैं और पुण्य कमाते हैं, एक बहुत बड़ा धर्म समझते हैं। किन्तु हमारा वह धर्म खोखला होता है। जब अपने चरणों से इन पवित्र स्थानों को हम गंदा बनाते हैं, मन्दिर के पीछे ही टट्टी पेशाब करने बैठ जाते हैं, किसी पवित्र सरोवर, नदी के वातावरण को दूषित बनाते हैं। हम दान दक्षिणा के नाम करोड़ों रुपया खर्च कर देते हैं किन्तु किसी जरूरतमंद, गरीब की सहायता करने की ओर हमारा ध्यान नहीं होता। तरह-तरह की लीलायें स्वाँग बनाने में धर्म के नाम पर पैसा पानी की तरह बहा दिया जाता है किन्तु जन-जीवन की सुविधा का कल्याण के लिये हम एक पैसा खर्च करना नहीं चाहते। धर्म के नाम पर पाखण्ड और प्रपञ्च रचने वाले सण्डे-मुस्टण्डों की भेंट पूजा में हम दिल खोलकर खर्च करते हैं, किन्तु किसी सद्गुणी, सदाचारी का सम्मान करना हम नहीं जानते। जिनका पेट खूब भरा है उन्हें हम मिठाइयाँ और माल खिलाते हैं किन्तु जिन्हें प्रयत्न करने पर भी रोटी कपड़ा नसीब नहीं होता उनकी ओर से हम आँख मीचे रहते हैं।

इस तरह हमारे जीवन में अन्ध-विश्वास, रूढ़िवादी परम्परायें व्यापक रूप से घर करे बैठी हैं। हम इन्हीं में उलझ कर सत्य से दूर रह जाते हैं। इनका मायावी पर्दा हमें सत्य तक पहुँचने ही नहीं देता। आवश्यकता इस बात की है कि ज्ञान, विवेक और स्वतंत्र चिन्तन के आधार पर इन्हें जाना जाय और अपने व्यवहार, कार्यप्रणाली से अंध विश्वासों को दूर किया जाय।


Quotation

दुष्ट लोगों को निन्दा में बहुत आनन्द आता है। कौवा पक्षी सभी रसों को चखने के पश्चात गंदगी से ही सन्तुष्ट होता है।

-महाभारत

जो व्यक्ति तुम्हारे सामने औरों की निन्दा करता है वह अन्यों के सामने तुम्हारी भी निन्दा करने में नहीं चूकेगा।

-शेख सादी


जीवेम् शरदः शतम्

संसार के सुखोपभोग करते हुए लम्बी आयुष्य प्राप्त करने की इच्छा सभी की होती है। जल्दी मर जाने की बात किसी को पसंद नहीं आती। यह स्वाभाविक भी है। यह मानना भूल है कि आयु की घड़ियाँ पूर्व निर्धारित होती हैं। किसी को पच्चीस और किसी को पचास वर्ष की उम्र देने का अन्याय ईश्वर नहीं कर सकता। दीर्घ जीवन के नियमों का पालन करते हुए हर कोई सौ वर्ष का जीवन सुख और सुविधापूर्वक बिता सकता है। आरोग्य विद्या विशारद डोनल्ड सिम्पसन का मत है कि ‘वर्तमान में जीवनयापन में जो जटिलताओं और विषमताओं का जोर हो गया है उनके रहते हुए भी मनुष्य अपनी इच्छानुसार आयु को लंबा बना सकता है।’ अभी वह समय भी अधिक दूर नहीं गया है जब हमारे पुरखे मनमानी उम्र का उपभोग करते थे।

अपनी नियमित दिनचर्या के कारण पितामह भीष्म चोटों और घावों से क्षत−विक्षत होते हुए भी उत्तरायण सूर्य जाने तक हठात जीवन धारण किये रहे। राजा सत्यवा, मार्कण्डेय आदि आप्त पुरुषों ने इच्छानुवर्ती आयु प्राप्त की। सोलहवीं सदी में इटली का एक साधारण नागरिक लुई कोरनारो अपनी संयत जीवनचर्या के कारण दो सौ साल से अधिक जीवित रहा। उसने कभी भी माँस शराब आदि अभक्ष्य पदार्थों का सेवन नहीं किया था। खाओ, पियो और मौज करो की नीति नितान्त नामक है। इससे जीवन-शक्ति का क्षय होता है। मृत्यु काल पूर्व-निश्चित है यह विश्वास मानकर जीने वाले, जो जी में आये पर डालने वाले असमय ही मौत को निमंत्रण दे देते हैं।

इस संबंध में प्रमुख अनियमितता है आहार की और वैज्ञानिक जानकारी का अभाव। केवल स्वाद के लिये चटपटे मसालेदार खाद्य पदार्थ जुटाने और फिर उन्हें दिन में कई बार जब जी में आये पेट की आवश्यकता व स्थिति का विचार किये बिना उदरस्थ करते रहने की आदत अत्यन्त दोषपूर्ण है। अधिक से अधिक प्राकृतिक नियमों के समन्वय से ही इस दिशा में सुधार संभव है। मिताहार भी उतना ही आवश्यक है। मैसूर निवासी सर विश्वेश्वरैया शतायु होते हुए भी 50 वर्ष के लगते हैं। चुस्त व सजग हैं। इसका कारण वे व्यायाम और मिताहारी होना बताते हैं। त्रिवेन्द्रम आयुर्वेद कालेज के दीर्घायुषी वर्तमान प्रिंसिपल का तो गत 30 वर्ष तक वजन एक-सा बना रहा। वे स्वास्थ्य के चार प्रयोग बताते हैं। 1. नित्य तेल मालिश, 2. नियमित व्यायाम 3. छाछ और 4. मिताहार।

ब्राजील के वयोवृद्ध प्राध्यापक का कहना है कि संयत जीवन से 120 वर्ष जीना संभव है, बशर्ते कच्चा खायें, ताजा खायें और खुली वायु का अधिकाधिक सेवन करें। वे भोजन को 32 बार चबाकर निगलने पर अधिक जोर देते हैं। संसार के सबसे अधिक दीर्घजीवी बलगेरियाँ के लोग हैं। वैज्ञानिकों ने इसकी गहन शोध की और बताया कि इसका मामूली-सा कारण है और वह यह है कि यहाँ के लोग आहार के संबंध में बहुत सतर्कता बरतते हैं।

आहार के संबंध में यह विशेष उल्लेखनीय है कि सच्ची व परिपक्व भूख लगने पर ही खाना खायें। लंदन के स्वास्थ्य विशेषज्ञ ब्लाड़ीमीर कोरेचोवस्की का मत है- ‘भूख से जितना अधिक खाते हैं समझना चाहिए कि हम उतना ही विष खाते हैं।’

केवल आहार की ओर सावधानी बरतना पर्याप्त न होगा वीर्य-रक्षा भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्षणिक सुख के लिये अपना जीवन-तत्व निचोड़ते रहने वालों को असमय ही मौत का शिकार होना पड़ता है। ब्रह्मचर्य पूर्वक जीवन जीने से शक्ति बढ़ती है, ओजस निखरता है और आयु लंबी होती है। महात्मा गाँधी ने 36 वर्ष की उम्र में ब्रह्मचर्य के महत्व को समझा और उसका पालन किया। वे कहा करते थे कि मैं 125 वर्ष जीऊंगा। 80 वर्ष की आयु में वे पूर्ण निरोगी थे। गोली न मारी जाती तो उनकी इच्छा निश्चय ही पूर्ण होती।

इसी प्रकार शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाये रखने के लिये श्रम का अधिक महत्व है। इससे शरीर चुस्त, खून गर्म तथा पाचन संस्थान सशक्त बना रहता है। जो लोग यह मानते हैं कि व्यायाम और शारीरिक परिश्रम से शक्ति का क्षरण होता है वे भारी भूल करते हैं। यह बात प्रयोगों से भली भाँति जानी जा सकती है। ऑफिस में काम करने वाले क्लर्कों का स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं होता जितना खेत में काम करने वाले किसान का। भारतीय आयु सर्वेक्षण के आँकड़ों से पता चलता है कि उत्तरप्रदेश के लोगों की औसत आयु अन्य प्रान्तों की तुलना में अधिक बैठती है और इसका कारण वहाँ के लोगों का अधिक श्रमशील होना ठहराया गया है। अधिकाँश में खेतिहर प्रान्त होने के कारण लोगों को कठोर परिश्रम करना पड़ता है। इससे स्वाभाविक भूख, प्राकृतिक आहार और स्वच्छ हवा की आवश्यकता सरलता से पूरी होती रहती है। दैनिक जीवन में शारीरिक श्रम का प्रचुर स्थान बनाये रखना चाहिये।

तुर्की का जारुआगा नामक व्यक्ति सन् 1934 में 164 वर्ष की अवस्था में मरा। इस अवधि में उसने 13 शादियाँ की और अपने पीछे 36 बेटे छोड़े। जब कभी लोग उससे इसका कारण पूछते तो वह कहता कि मैंने अपने आपको नशों से बचाया। उसने जीवन भर कभी शराब नहीं पी। अफीम, चरस, गाँजा, भाँग आदि नशीली वस्तुओं का प्रयोग बड़ा ही हानिकारक होता है। इनसे निकलने वाला टार और निकोटीन विष मानव-शरीर के सभी जीवन तत्वों को सुखा कर खोखला बना देता है। ऐसी अवस्था में पूर्ण आयु प्राप्त करने की बात सोची भी नहीं जा सकती।

जीवन रक्षा के नियमों में जितना उपरोक्त व्यावहारिक बातों का पालन अनिवार्य है उतना ही मानसिक आघातों से बचाव का भी पूरा ध्यान रखने की आवश्यकता है। क्रोध, उत्तेजना, चिन्ता, चिड़चिड़ापन निराशा और जल्दबाजी से स्नायु संस्थान में बार-बार उत्तेजना और शिथिलता उत्पन्न होती है जिससे खून के सशक्त जीवाणु मर जाते हैं और शरीर की सामान्य गतिविधि भी बोझिल सी लगने लगती है। एक प्रयोग से जर्मनी डाक्टरों ने यह पता लगाया कि एक बार के क्रोध आने से 8 घंटे तक काम कर सकने वाली शक्ति का नाश हो जाता है। सो मानसिक अस्तव्यस्तता से अबूझ बने रहना दीर्घ जीवन के लिये उतना ही हर्षप्रद है जितना किसी विष के प्रत्यक्ष प्रयोग से। इंग्लैण्ड के प्रसिद्ध चिकित्सक हार्डर का कहना है- ‘जैसे बने आप प्रसन्न चित्त रहें तो आपका स्वास्थ्य बहुत अच्छा रहेगा। दीर्घ जीवन की कुँजी है आपकी मानसिक प्रसन्नता। अतः इसे किसी कीमत पर न लुटाइये।’

ये नियम इतने सस्ते, सरल व सर्वसुलभ हैं कि इन्हें हर कोई प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण कर सकता है। ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसके लिये लंबी दौड़ धूप, भारी सिफारिश तथा ऊंचे मूल्य की आवश्यकता हो। इन साधनों के बरतने में ऊंच-नीच, छोटे-बड़े का भेदभाव भी कहीं नहीं। यदि कुछ त्रुटि है तो वह इतनी ही समझ में आती है कि लोग जीवन जीने के नियमों को जानबूझकर लात मार रहे हैं। अपनी त्रुटियाँ व्यवस्था की ओर ध्यान न दे ईश्वर को अपराधी ठहराने की बात न्याय संगत नहीं लगती। यह भी दोष देना उचित प्रतीत नहीं होता कि आज की परिस्थितियाँ वैसी नहीं जैसी हमारे पूर्वजों को प्राप्त थीं। दूध घी का अभाव दीर्घजीवी होने के मार्ग में उतना बाधक नहीं जितना आज लोगों की गलत दिनचर्या तथा दोषपूर्ण आहार-बिहार क्रम है।

सभी चाहते हैं कि उन्हें दीर्घ जीवन का सुख मिले। पूर्ण स्वस्थ व निरोग जीवन की आकाँक्षा हर किसी को होती है पर इसके लिये जिन बातों के अनुसरण की आवश्यकता होती है उनसे भटक कर लोग सीधे शार्टकट रास्ते से आगे बढ़ना चाहते हैं पर अभी तक ऐसा कोई सस्ता मार्ग बना नहीं। इसका एक ही उपाय है-सादा भोजन, संयमित आहार-बिहार और अधिकाधिक प्राकृतिक जीवन। इन्हीं का विस्तार करके धूप सेवन, हल्के और ऐसे वस्त्र जिनको पहनने पर भी मौसम का शरीर पर प्रभाव पड़ता रहे स्नान आदि की व्यवस्था आदि नियमों को प्रतिपादित किया जा सकता है। पर वे सभी संयमित दिनचर्या के ही विभिन्न अंग हैं।

मनुष्य-जीवन बड़े उपयोग की वस्तु है। इसे यूँ ही उपेक्षापूर्वक बिता देना बुद्धिमानी की बात नहीं। यह अवसर बार-बार नहीं आता। इसलिये इसका भरपूर उपयोग करने की सतर्कता हर एक को बरतनी चाहिए।

गायत्री की उच्चस्तरीय साधना


सच्चे साधक नहीं होते

आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथ ‘माधव निदान’ के निर्माता माधवाचार्य जी वृन्दावन में कठोर गायत्री उपासना करने में संलग्न रहते थे। लगातार 13 वर्ष उन्हें विधि-पूर्वक पुरश्चरण करते हुए बीत गये पर कोई विशेषता उन्हें अपने में दिखाई न पड़ी। तप का कोई फल दृष्टिगोचर न हुआ तो वे खिन्न रहने लगे और अपनी असफलता से खीज कर वे वृन्दावन छोड़ काशी के लिए चल दिये।

उदासी उन्हें घेरे हुई थी। मणिकर्णिका घाट पर बैठे हुए सोच विचार में मग्न थे कि उसी श्मशान में रहने वाला एक कापालिक अघोरी उनके पास आया और उदासी एवं चिन्ता का कारण पूछने लगा। माधवाचार्य ने वस्तुस्थिति कह सुनाई। अघोरी ने कहा-योग की दक्षिणमार्गी वैदिक उपासनाएं देर में फल देती हैं। बरगद की तरह वे धीरे-धीरे बढ़ती है- समय पर परिपक्व होकर साधक का कल्याण करती हैं और चिरस्थायी फल देती हैं। इसमें धैर्यवान साधक ही सफल होते हैं। पर ताँत्रिक साधना में यह बात नहीं है। उससे लाभ तो निम्न स्तर का ही मिलता है और वह ठहरता भी थोड़े दिन है। पर मिलता जल्दी है। जिन्हें धैर्य नहीं, उन आतुर लोगों के लिए जल्दी लाभ दिखाने वाली ताँत्रिक साधना लाभदायक हो सकती है। आपको चमत्कार देखने की जल्दी हो तो श्मशान साधन करो। विधि मैं बता दूँगा।

माधवाचार्य सहमत हो गये और वे काशी के मणिकर्णिका घाट पर स्थित श्मशान में रहकर कापालिक की बताई हुई अघोर क्रिया के अनुसार साधना करने लगे। अघोरी ने उन्हें बता दिया था कि श्मशान में रहने वाली दुष्ट आत्मा उन्हें भय एवं प्रलोभन के दृश्य दिखा कर साधना भ्रष्ट करने का प्रयत्न करेंगी, सो वे किसी की ओर ध्यान न देते हुए अपने कार्य में एकनिष्ठ भाव से लगे रहें। माधवाचार्य वही करने लगे। रोज ही उन्हें डरावने और प्रलोभन भरे आकर्षण दिखाई देते पर वे उनसे तनिक भी विचलित न होते। इस प्रकार उन्हें एक वर्ष बीत गया।

एक दिन पीछे अदृश्य में से आवाज आई कि तुम्हारा मंत्र सिद्ध हो गया, कुछ उपहार, वरदान माँगों। माधवाचार्य अपने साधन में मग्न रहे, उनने उधर ध्यान भी नहीं दिया। ऐसे ही अटपटे अनुभव उन्हें रोज होते थे। पर जब कई बार वही आवाज सुनाई दी तो उन्हें उधर ध्यान देना पड़ा। पूछा आप कौन हैं? किस प्रकार का उपहार दे सकते हैं? उत्तर मिला- हम भैरव हैं। तुम्हारी इस साधना से प्रसन्न होकर वर देने आये हैं। माधवाचार्य ने कहा- विश्वास नहीं होता, इसलिए कृपा कर सामने उपस्थित हूजिए और दर्शन दीजिए ताकि मैं वस्तु स्थिति को समझ सकूँ।

भैरव ने कहा- गायत्री उपासना के कारण आपको इतना ब्रह्म-तेज उत्पन्न हो गया है कि उसकी प्रखरता में सहन नहीं कर सकता और आपके सामने नहीं आ सकता। जो कहूँगा पीछे से ही कहूँगा। इस पर माधवाचार्य को भारी आश्चर्य हुआ और उनने प्रश्न किया-यदि गायत्री उपासना का ऐसा ही महत्व है तो कृपया बताइयेगा कि 13 वर्ष तक कठोर तप करते रहने पर भी मुझे कोई अनुकूल अनुभव क्यों नहीं हुआ? आप इसका रहस्य बता सकें तो मेरे लिए इतना ही पर्याप्त होगा। जब आप गायत्री तेज के सामने प्रकट होने में भी असमर्थ हैं तो आपके द्वारा दिये हुए छोटे-मोटे उपहारों से मेरा काम भी क्या चलेगा?

जिज्ञासा का समाधान करना भैरव ने स्वीकार कर लिया और माधवाचार्य को नेत्र बंद करके ध्यान भूमिका में जाने को कहा, उन्हें तत्काल पूर्व जन्मों के दृश्य दिखाई पड़ने लगे। पिछले 13 जन्मों में उनने एक से एक भयंकर पाप किये थे। इस दृश्य को जब वे देख चुके तब उसने कहा- आपकी 13 वर्ष की साधना पिछले 13 सालों के पापों का शमन करने में लग गई। जब तक दुष्कर्मों से उत्पन्न कुसंस्कार दूर नहीं हो जाते तब तक गायत्री उपासना उसी की सफाई में खर्च होती रहती है। आपकी विगत गायत्री साधना ने पूर्व संचित पापों का समाधान कर दिया। अब आप नये सिरे से पुनः उसी उपासना को आरंभ कीजिए। सफलता मिलेगी। प्रसन्न मन माधवाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये। उन्होंने पुनः गायत्री उपासना आरंभ की और फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ।

हम में से अनेकों की स्थिति ऐसी ही होती है। कुछ दिन साधना करते हैं पर पूर्व जन्मों का और इस जन्म का पाप भार इतना अधिक होता है कि उसकी सफाई हुए बिना कोई विशेष आध्यात्मिक प्रकाश प्राप्त होना संभव नहीं होता। आतुरता में हम जब अभीष्ट परिणाम नहीं देखते तो निराश हो उठते हैं। यह अधीरता उन लोगों के लिए उचित नहीं जो आत्मकल्याण का महान लक्ष्य लेकर साधना पर अग्रसर हुए हैं। इस आत्म-शोधन की साधना करते हुए अपने को निर्मल बनाना चाहिए ताकि गायत्री उपासना का समुचित लाभ मिल सके। कपड़े पर रंग तभी ठीक चढ़ता है जब उसे पहले अच्छी तरह धो लिया जाय। मैला कुचैला कपड़ा रंग के महत्व को भी नष्ट कर देता है। अपनी दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को शोधन करते हुए जो साधना की जाती है उसका समुचित लाभ मिलता ही है। यह धैर्यपूर्वक साधना करने वालों के लिए ही संभव है। फल, समय पर ही आता है। उतावली करने से भी पौधा अपनी क्रमिक गति से ही बढ़ता है। साधना भी समयानुसार ही फलित होती है। पूर्व संचित दुष्कर्मों को शुद्ध करने में जो समय अभीष्ट है उसके पूरा हो जाने पर ही सफलता की प्राप्ति हो सकती है।

महाभारत में सावित्री और सत्यवान की कथा आती है। सत्यवान निर्धन ऋषि कुमार है उसका आयुष्य भी केवल एक वर्ष शेष है। इतने पर भी राजकुमारी सावित्री उसके सद्गुणों से प्रभावित होकर वरण करती है। एक वर्ष बाद मृत्यु का समय आने पर यमराज से संघर्ष करके सत्यवान के प्राण लौटा लाती है। सत्यवान सावित्री के साथ स्वर्गीय जीवन बिताता हुआ जीवन-लक्ष्य को प्राप्त करता है।

इस कथा में एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण तथ्य अलंकारिक रूप में छिपा हुआ है। गायत्री का ही दूसरा नाम सावित्री है। वह सत्यवान को ही वरण करती है। वह भले ही स्वास्थ्य, धन, शिक्षा आदि विशेषताओं से रहित ही क्यों नहीं हो। सावित्री को सत्यवान ही प्रिय है। जिसके गुण, कर्म, स्वभाव में सत तत्व का, सात्विकता का, जितना अधिक अंश होता है वह उतना ही गायत्री का प्रियपात्र बनता है और उस अनुग्रह के कारण यह मृत्यु जैसी भयानक विभीषिकाओं से भी आसानी से बच जाता है। सत्य निष्ठा के कारण सावित्री जिस पर प्रसन्न हुई है उसे लोक और परलोक में सब प्रकार की सुख-शाँति ही मिलती है।

उपरोक्त कथानक में गायत्री का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए साधक का सत्यवान होना आवश्यक बताया गया है। सात्विकता का जितना अंश उसके गुण कर्म स्वभाव में समन्वित हो रहा होगा उसे उतनी ही कृपा उस महान शक्ति की प्राप्त होगी। सफलता उसके गले में विजय माला पहनाने स्वयं दौड़ी आवेगी।

गायत्री उपासना का विधान और कर्म-काण्ड सर्व विदित है। गायत्री महाविज्ञान ग्रंथ में उसका साँगोपाँग वर्णन हो चुका है। प्रायः सभी साधक उस ऋषि प्रणीत शास्त्र सम्मत परम्परा को अपनाते हुए जप तप करते हैं पर देखा जाता है कि किसी को आशाजनक लाभ होता है और किसी की प्रगति अवरुद्ध पड़ी रहती। एक ही विधान को अपनाते हुए एक समान काम करने वाले व्यक्तियों में से जब किसी को स्वल्प, किसी को अधिक लाभ मिलता है तो इसके अन्तर का कारण ढूंढ़ते हुए एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि सत् तत्व की- सात्विकता की न्यूनता ही इस अन्तर का एकमात्र कारण रहता है। सत्यवान को सावित्री कभी त्याग नहीं सकती। जिसने अपनी सात्विकता बढ़ाते रहने पर समुचित ध्यान रखा है ऐसा नैष्ठिक गायत्री उपासक कभी गायत्री माता की कृपा से वंचित नहीं हो सकता। उसकी साधना का सत्परिणाम मिलना ही चाहिए। विलम्ब होते देखकर किसी साधक को अधीर नहीं होना चाहिये।

वेदमाता गायत्री और उसकी शक्ति

जप करने वाले का त्राण-कल्याण उद्धार करने वाली शक्ति को (गायन्त त्रायते) गायत्री कहते हैं। इस महामंत्र का जप करने वाला श्रेय पथ पर मन्द या तीव्रगति से अग्रसर ही होता जाता है।

ऋग्वेद 1। 164। 39 में कहा गया है- ‘ऋचौ अक्षरे परमे व्योमन्। यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः’ अर्थात् वेद मंत्रों में दैवी शक्तियाँ भरी हुई हैं। वेद-मंत्रों से केवल भिक्षा ही नहीं वरन् वह वैज्ञानिक प्रक्रिया भी जुड़ी हुई है जिसके उच्चारण मात्र से मनुष्य के शरीर और मन से विशेष प्रकार के स्पन्दन होते हैं और उनसे अभीष्ट लाभ प्राप्त होने का पथ प्रशस्त होने लगता है।

गायत्री भारतीय धर्म का सर्वश्रेष्ठ एवं सर्व प्रधान मंत्र है। चारों वेदों की जननी वेद माता गायत्री की उपासना का सभी शास्त्रों और ऋषियों ने एक स्वर से महत्व स्वीकार किया है। इस महाशक्ति की आराधना करने वाले को अपनी मनोभूमि अधिक पवित्र रखनी चाहिए। जिस प्रकार शुद्ध स्थान, शुद्ध शरीर, शुद्ध वस्त्र एवं शुद्ध पूजा उपकरणों की साधना में आवश्यकता है उसी प्रकार उपासक को अपनी मनोभूमि शुद्ध रखने का भी प्रयत्न करना चाहिए। कहा भी है-

क्रोधं लोभं तथा निद्राँ निष्ठीवन विजृम्भरणे।

दर्शनं च विनीचानाँ वर्जयेज्जाप कर्मणि॥

अर्थात् क्रोध, लोभ, निद्रा, थूकना, जमुहाई लेना, नीच कर्म करने वालों का दर्शन जप करने वाले के लिए निषिद्ध है।

मनः सन्तोषणं शौचं मौनं मंत्रार्थ चिन्तनम्।

अकामत्वमनिर्वेदो जप संपत्ति हेतवः॥

अर्थात्- मन की प्रसन्नता, पवित्रता, मौन- मंत्रार्थ का चिन्तन, निष्कामता, निराशा न होना यह जप की सफलता के प्रधान आधार हैं।

इस प्रकार की शुद्ध और सात्विक मनोभूमि रखने वाले साधक की सफलता असंदिग्ध होती चली जाती है।

गायत्री मंत्र के विनियोग का देवता सविता और ऋषि विश्वामित्र बताया गया है। इन दोनों तत्वों को हृदयंगम करने से साधक की पूर्वभूमिका का उचित निर्माण हो जाता है।

सविता यों मोटे अर्थ में सूर्य को कहते हैं। इसलिए गायत्री को सूर्य का मंत्र भी कहा जाता है। महाभारत के अनुसार कुँती ने सूर्य-मंत्र (गायत्री) की उपासना द्वारा तेजस्वी कर्ण को जन्म दिया था। गायत्री जप करते समय सूर्योन्मुख रहने का विधान है। प्रातः पूर्व की ओर सायं पश्चिम की ओर, मध्याह्न उत्तर की ओर मुख करके जप करने का जो विधान है उसमें सूर्योन्मुख रहना ही कारण है। जहाँ गायत्री का प्रतिमा-विग्रह स्थापित नहीं होता वहाँ सूर्य को ही गायत्री का प्रतीक मानकर उसके सम्मुख जप करने का विधान बना हुआ है। जप के साथ सूर्योपस्थान, सूर्य अर्घ्यदान, सूर्य-स्तवन की प्रक्रिया इसी से जुड़ी है कि गायत्री के देवता सविता का अर्चन भी यथोचित रूप से होता रहे।

गायत्री की छवि ‘सूर्य मण्डल मध्यस्था’ मानी जाती है। भगवती गायत्री का स्वरूप सूर्य-मण्डल के बीच में ही चित्रित किया जाता है। निराकार उपासना करने वाले दीपक की लौ या सूर्य के समान प्रकाशवान तेज बिन्दु का ध्यान करते हुए गायत्री जप करते हैं। अपने भीतर उस महातेज को ओत-प्रोत करने के संबंध में ए.ड. 1। 2 में सूर्यः चक्षुः भूत्वा अक्षिणी प्रावशित्। की भावना अपनाने का निर्देश किया गया है। नेत्रों के माध्यम से सूर्य मुझ में प्रकाश रूप प्रवेश करता हुआ रोम-रोम को प्रकाशवान कर रहा है। यह धारणा गायत्री उपासक की सूक्ष्म चेतना को प्रकाशवान बनाती है।

‘यो असौ आदित्ये पुरुषाः सो असौ अहम्’। वा. य. 40। 17

अर्थात्- ‘जो यह आदित्य पुरुष है वही मैं हूँ।’ अपने को अज्ञानरूपी अन्धकार से दूर ज्ञान प्रकाश से प्रकाशित आदित्य रूप आत्मा अनुभव करने से भी गायत्री के देवता सविता का विनियोग बनता है। ‘यो देवः सविता स्माकं धियो धर्मादि कर्माणि प्रेरयेत्तस्य तर्द्भग स्तद्वरेण्य मुपास्यहे।’

अर्थात्- जो सविता देवता हमारी बुद्धि को धर्म आदि सत्कर्मों की ओर प्रेरित करता है उसके वरेण्य भर्ग की हम उपासना करते हैं।

यहाँ यह स्पष्ट कर दिया गया है कि केवल प्रकाश का ध्यान करना ही पर्याप्त नहीं वरन् उस प्रकाशवान तेजस्वी परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए जो हमें सत्प्रवृत्तियों की ओर प्रेरणा देता है।

‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ में इसी भावना को अपनाने का निर्देश है। मैं प्रकाशरूप स्वरूप हूँ, प्रकाश मेरा लक्ष्य है। प्रकाश की ओर चल रहा हूँ और अन्त में प्रकाश बनकर ही रहूँगा, ऐसी मान्यता और भावना रख कर गायत्री उपासना करने वाला इस महामंत्र के देवता सविता का उचित विनियोग कर सकता है।

ऋषि विश्वामित्र है। (विश्वामित्रः सर्व मित्रः) विश्वामित्र अर्थात् विश्व का सब का मित्र। सबको मित्रता की आँख से देखने का स्वभाव बनाकर गायत्री उपासक इस महामंत्र के ऋषि विश्वामित्र का अपनी मनोभूमि में आह्वान करता है। ‘अद्वेष्टा सर्व भूतेषु’ की ‘मित्रस्य’ चाक्षुषा समीक्षे’ की भावना रखकर सब से बैर त्यागने और सब को मित्र मानने की प्रवृत्ति बना लेने वाला गायत्री उपासक अपने आपको विश्वामित्र परम्परा का अनुयायी बनाकर गायत्री साधन की सफलता की एक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक शर्त पूरी कर लेता है।

‘गय’ कहते हैं प्राण को और ‘त्र’ कहते हैं त्राण को। प्राणी का त्राण करने वाली जो उपासना, उसे गायत्री कहा जाता है। शास्त्रकारों ने इसे ही, सबसे बड़ा तीर्थ बताया है। ‘जनाः सैस्तरन्ति तानि तीर्थानि’ अर्थात् मनुष्य जिसके सहारे पार होते हैं वही तीर्थ है। त्राण करने की, पार करने या उद्धार करने की क्षमता से सम्पन्न होने के कारण गायत्री को तीर्थ कहा जाता है। ‘ग‘ से गंगा, ‘य’ से यमुना, ‘त्र’ से त्रवेणी। गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलन से जैसे तीर्थराज की त्रिवेणी बनती है वैसे ही आधिदैविक, आधिभौतिक, आध्यात्मिक त्रासों से छुड़ाकर जीवन लक्ष्य को प्राप्त करा देने की शक्ति से सुसम्पन्न गायत्री माता मानी गई है।

अथर्ववेद 19। 71। 1 में वेद माता गायत्री का महात्म्य वर्णन करते हुए उसका स्तवन किया गया है-

‘स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रयोदयन्ताँ पावमानी द्विजनाम्। आयुः प्राणं प्रजाँ कीर्ति द्रविणं ब्रह्म वर्चसं मह्यं दत्ता व्रजत् ब्रहम लोकम्।’

‘अर्थात् पवित्र करने वाली, वर देने वाली, प्रेरणा देने वाली वेदमाता गायत्री आयु, प्राण, प्रजा, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्म तेज एवं ब्रह्मलोक प्रदान करती है।’

यह महाशक्ति उचित रीति से उपासना करने वाले को सचमुच सब कुछ प्रदान करती है। कोई वस्तु ऐसी नहीं जो इस कामधेनु की सम्यक् सेवा करने वाले की उपलब्ध न हो सकती हो।

देवी भागवत में एक कथा आती है कि एक बार घोर दुर्भिक्ष से पीड़ित जनता जब देवताओं द्वारा भी अपने कष्ट दूर न करा सकी तो गायत्री उपासना में संलग्न महर्षि गौतम की शरण में गई। दयार्द्र गौतम ने जन कल्याण के लिए विशेष तप किया जिससे प्रसन्न होकर भगवती अन्नपूर्णा गायत्री ने उन्हें एक ‘पूर्ण पात्र’ प्रदान किया और उस पूर्णपात्र- के माध्यम से उपलब्ध अन्न से क्षुधार्त जनता की व्यथा दूर हो गई।

नित्या चोपासना शक्तेर्या दिना तु पतत्य धः,

सर्वमुक्तं समासेन यत्युष्टं तत्त्वयाऽनध।

अर्थात्- हे राजन! इस संसार में समस्त सन्तापों से मुक्ति दिलाने वाली एकमात्र उपासना भगवती गायत्री की है। इसके बिना जीव का उद्धार नहीं हो सकता।

युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति-


अपना संगठन कार्य इसी मास पूरा किया जाय

युग-निर्माण योजना को गतिशील बनाने का उत्तरदायित्व परिवार के सक्रिय कार्यकर्ताओं- शाखा संचालकों के कंधे पर आया है। उन्हीं के सहयोग से गत वर्ष में इतनी प्रगति संभव हुई है और आगे धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने का आज का स्वप्न यदि कल साकार होना होगा तो इन्हीं कर्मठ नरपुंगवों के त्याग एवं बलिदान के आधार पर ही संभव होगा।

योजना की सफलता के लिए ‘समय दान’ की आवश्यकता है। इस ज्ञान-यज्ञ में ‘समय’ की आहुतियाँ पड़नी चाहिए। युग-यज्ञ में भाग लेने वाले याज्ञिकों से ‘समय’ श्रद्धाँजलि लेकर राष्ट्र वेदी पर उपस्थित होने का आह्वान किया गया था। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने परीक्षा की घड़ी में न तो बगलें झाँकी और न मुँह छिपा कर कायरता का परिचय दिया। वरन् एक से एक आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा लगाये हुए युग-निर्माण की दिशा में बहुत कुछ कर गुजरने के लिए कटिबद्ध होकर एक सुदृढ़ सेना की तरह अग्रिम मोर्चे पर जा खड़े हुए हैं।

रचनात्मक कार्यों के लिए समय दान ही अपेक्षित होता है। धन या दूसरी ऐसी ही अन्य वस्तुएं जन-मानस के निर्माण में अधिक सहायक नहीं हो सकती। श्रद्धा के साथ किया हुआ श्रम, भावनापूर्वक दिया हुआ समय ही युग-परिवर्तन के लिए आरंभ किए गए इस महायज्ञ में अभीष्ट आहुतियों का उद्देश्य पूरा कर सकते हैं। इसलिए निष्ठावान स्वजनों में इस बार ‘समय दान’ की योजना की गई और कितने हर्ष की बात है कि स्वजनों ने इस संबंध में आशाजनक उदारता का परिचय दिया है।

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को युग निर्माण के लिए कुछ ‘समय दान’ नित्य नियमित रूप में करते रहने का आह्वान किया है। अधिक व्यस्त और संकोची स्वभाव के व्यक्तियों को भी इतना तो करना ही पड़ता है कि अपने निज के व्यक्तित्व और परिवार को सुविकसित करने के लिए कुछ समय नियमित रूप में लगाया करें। साधना, स्वाध्याय, व्यायाम आदि द्वारा आत्म-विकास करें और एक घंटा नित्य अपने परिवार को सुशिक्षित एवं विचारशील बनाने के लिए गोष्ठी का कार्यक्रम चलाया करें। घर का कोई वयस्क व्यक्ति ऐसा न बचे जो अखण्ड-ज्योति पढ़ता या सुनता न हो। घर के लोगों को और अपने को आदर्श जीवन जीने की प्रेरणा देते रहने की समाज-सेवा तो हर परिजन के जिम्मे आई है। इसे अधिकाँश सदस्य पूरा कर रहे हैं जिसने अभी शिथिलता बरती है उनसे जल्दी इस क्रम को आरंभ कर देने की आशा की जाती है।

पर आज की विषम परिस्थितियों में इससे बड़े और कड़े प्रयत्नों की आवश्यकता है। थोड़ी आग लगे तो एक लोटा पानी छिड़क कर या दूसरे छोटे प्रयत्नों से उस पर काबू पाया जा सकता है। पर जब भयंकर अग्निकाण्ड हो रहा है और गगनचुम्बी लपटें उठ रही हों तो ‘फायर ब्रिगेड’ की आवश्यकता पड़ती है। भारी मात्रा में तीव्र गति से जल डालने पर ही वह आग बुझती है। आज सर्वत्र अनाचार की आग लगी हुई है। उसकी विभीषिका प्रत्यक्षतः सामने है। इसे बुझाने के लिए दमकलों की फायर ब्रिगेडों की आवश्यकता है। परिवार के सक्रिय कार्यकर्ताओं को शाखा संचालकों को हम इसी रूप में देखते और मानते हैं। उनके तप और त्याग की शीतल धारा जलते हुए मानव-समाज को शाँति प्रदान कर सकने में समर्थ हो सकती है ऐसा हमें पूरा और पक्का विश्वास है।

जिनमें कुछ अधिक साहस और श्रद्धा है, जिनमें त्याग, बलिदान के कुछ अधिक तत्व मौजूद है, जिनका अन्तरात्मा विश्व विराट परमात्मा की उपासना के लिए कुछ अधिक भावनाशील हो, उन सब स्वजनों को यह कहा जा रहा है कि वे अपने व्यक्तित्व और अपने परिवार तक ही सीमित न रहें वरन् इससे आगे बढ़ कर जन-जीवन को सुविकसित करने के लिए कुछ बड़े क्षेत्र में काम करें। कम से कम अपनी विचारधारा के व्यक्तियों से संपर्क बनाने उन्हें प्रोत्साहन देने के लिए कुछ समय देते रहने को तैयार हो ही जायें। ऐसा सेवा कार्य ईश्वर उपासना या आत्मकल्याण की साधना में किसी भी प्रकार कम नहीं है। जिसने यह आदर्श स्वीकार कर लिया है और जो लोक-सेवा का परमार्थ करने के लिए घर से बाहर भी कुछ समय देने लगे हैं उन्हें अखण्ड-ज्योति परिवार का ‘शाखा संचालक’ कहा जाता है।

अखण्ड-ज्योति परिवार में गत वर्ष की अपेक्षा सदस्य बहुत बढ़ गये हैं और गत वर्ष जो शिथिल थे उनमें से अनेकों में उत्साह भी बहुत बढ़ा है इसलिए गत वर्ष के सक्रिय कार्यकर्ताओं की अपेक्षा अब उनकी संख्या कहीं अधिक है। अपना नाम ‘शाखा संचालकों’ के रजिस्टर में बहुत लोग नोट करा चुके हैं, अब इसकी जरूरत नहीं, अब इस बात की आवश्यकता है कि जिनकी अन्तरात्मा में इस महान मिशन को सफल बनाने के लिए कुछ करने की प्रेरणा उठे वे उसे कार्यान्वित करने में तुरन्त ही लग पड़े। उस कार्य को ही किसी के ‘शाखा संचालक’ होने, न होने का प्रमाण माना जायेगा।

सबसे पहला-सब से महत्वपूर्ण-सबसे आवश्यक कार्य एक ही है कि परिवार के व्रतधारी सक्रिय सदस्य-शाखा संचालक दस परिवार को प्रोत्साहन देते रहने का उत्तरदायित्व उठा लें। जो प्रशिक्षण अखण्ड-ज्योति द्वारा किया जा रहा है इसे जीवन्त बनाने के लिए हमारे व्यक्तिगत प्रतिनिधि की तरह उन शिक्षार्थियों के पास प्रेरणा देते रहने के लिए स्वयं जाना और मिलना आवश्यक है। विचारों के साथ-साथ जब व्यक्तित्व जुड़ा होता है तभी कुछ प्रयोजन सिद्ध होता है। अखण्ड-ज्योति पाठकों के पीछे एक प्रेरक व्यक्ति होना ही चाहिए।

गत अंक में ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक पत्रिका के संबंध में सक्रिय सदस्यों से यह अनुरोध किया गया था कि वे अपने पैसे से या संबंधित दस सदस्यों से इकट्ठे हुए पैसे से एक पत्रिका मंगाना आरंभ करें और उसे एक-एक दिन दसों सदस्यों के घर पहुँचाने का प्रबंध करें। जरूरी नहीं कि स्वयं ही देने और लेने जाया करें, यह क्रम एक सदस्य दूसरे के घर पहुँचाने या लेने जाने का क्रम बना कर भी चला सकते हैं। इसमें शिथिलता न आने पाये यह देखते रहना संचालक का ही काम है। इसी बहाने हर ‘शाखा संचालक’ दस व्यक्तियों से संबंध बनाये रह सकता है और समय-समय पर यथा अवसर चर्चा करते हुए योजना को प्रेरणाओं को हृदयंगम करने के लिए उन्हें प्रोत्साहन देता रह सकता है।

हर ‘अखण्ड-ज्योति’ कम से कम पाँच व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जानी चाहिए। जिस घर में वह पहुँचती है उसका एक भी वयस्क सदस्य ऐसा न बचे उसे पढ़ता या सुनता न हो। तभी किसी घर में पत्रिका का पहुँचना सार्थक है। किसी के दबाव से चंदा तो दे दिया पर पत्रिका को रद्दी में पटक दिया तो इससे अपना घाटा सह कर अपनी अन्तरात्मा का रस निचोड़ कर इतना उपयोगी आध्यात्मिक भोजन परोसने के पीछे हमारा जो उद्देश्य है वह कहाँ पूरा हुआ? सक्रिय कार्यकर्ता शाखा संचालकों का यह कर्त्तव्य है कि अपने समीपवर्ती दस अखण्ड-ज्योति सदस्यों के यहाँ समय-समय पर जाया करें और यह देखा करें कि उस परिवार के लोग उसे पढ़ने या सुनने का लाभ उठाते हैं या नहीं। यदि इस संबंध में शिथिलता दिखाई पड़े तो अपनी सारी बुद्धिमता इस बात में खर्च करनी चाहिए कि उन लोगों को इन विचारों के पढ़ने एवं सुनने में अभिरुचि तथा आकर्षण पैदा हो जाय। यदि यह सफलता मिल गई तो समझना चाहिए कि ‘शाखा संचालक’ ने अपने कर्त्तव्यों का एक बड़ा भाग पूरा कर लिया।

प्राचीन काल में धर्म पुरोहित अपने यजमानों की एक सीमित संख्या रखते थे और उनसे निरन्तर संपर्क रख कर आवश्यक प्रेरणाएं देते रहते थे। इस प्रकार पुरोहित वर्ग इस सारे समाज को उत्कृष्ट प्रेरणाओं से ओत-प्रोत किये रहता था। आज उस आवश्यकता को हम और शाखा संचालक दोनों मिलकर पूरा कर सकते है। दो अठन्नियों से मिलकर भी एक रुपया बन सकता है। हम आदर्श जीवन की प्रेरणाएं अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों में लपेट कर भेजते हैं उन्हें पाठकों के गले उतारना शाखा संचालक अपने जिम्मे ले लें तो यह हम दोनों का मिला−जुला प्रयत्न प्राचीन काल के धर्म पुरोहितों जैसी आवश्यकता पूर्ण कर सकता है।

प्रत्येक घर में औसतन पाँच वयस्क नर-नारी माने जायं तो दस घरों में पचास व्यक्ति ऐसे होने चाहिए जो अखण्ड-ज्योति की प्रेरणा को सुन और समझ सकें शाखा संचालक जिसने दस अखंड-ज्योति सदस्यों के परिवारों के साथ अपना व्यक्तिगत संबंध जोड़ते हुए इस विचारधारा को उस क्षेत्र से हृदयंगम कराने का लिया है, सरलता से पचास व्यक्तियों का प्रेरणा केन्द्र बना रह सकता है और समय-समय पर उन्हें आवश्यक परामर्श एवं प्रोत्साहन देकर उत्कृष्ट जीवन जीने के लिए प्रस्तुत कर सकता है। एक व्यक्ति दूसरे पचास व्यक्तियों को प्रकाश देने लगे तो इसे सामान्य नहीं असामान्य बात ही मानी जायेगी। इसे छोटी नहीं बड़ी वस्तु ही कहा जायेगा। वैसे यह कार्य करने में उतना कठिन नहीं है। एक घंटा रोज लगा कर एक-दो व्यक्तियों से मिलते रहने का उद्देश्यपूर्ण कार्यक्रम बना लिया जाय तो यह कार्य उतना कठिन नहीं है जिसमें सामान्य स्थिति के व्यक्ति को भी कुछ कठिनाई प्रतीत हो। जहाँ दस से कम सदस्य हैं वहाँ यह क्रम थोड़े सदस्यों से भी चलाया जा सकता है। पीछे प्रयत्न करके और नये सदस्य भी बढ़ाये जा सकते हैं। जिन सज्जनों ने जिन्हें अखण्ड-ज्योति का ग्राहक बनाया है, वे तो सहज ही उनके शाखा-संचालक बन सकते हैं।

हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति परिवार का जून के अन्त तक इस पद्धति से वर्गीकरण हो जाय। दस सदस्यों से संपर्क बनाये रहने का कार्य एक सक्रिय कार्यकर्ता अपने जिम्मे ले लें। दो सक्रिय कार्यकर्ता अपने संबंधित सदस्यों की बीस अखण्ड-ज्योतियाँ अपने नाम रेल या डाक से मंगा लिया करें और हर महीने उनके घर देने जाया करें। इस प्रकार उन्हें एक बार तो अपने इस विचार परिवार से मिलने का विशेष अवसर मिल ही जाया करेगा। अंक खोने की शिकायतों से भी इस प्रकार सहज ही छुटकारा मिल जायेगा।

इस महीने हम प्रत्येक अखण्ड-ज्योति सदस्य से यह आशा करेंगे कि वह एक से दस की संगठन पद्धति के अनुसार संगठित हो जाय। दस पीछे एक शाखा संचालन चुन लिया जाए, नियुक्ति हो जाय या कोई कर्मठ कार्य-कर्ता स्वतः ही करने लगे। जिस नगर में अधिक सदस्य है वहाँ भी इसी पद्धति से वर्गीकरण कर लिये जाय और इन शाखा संचालकों का हर नगर में एक संगठन बना रहे। अगले वर्ष अनेक महत्वपूर्ण कार्य किये जाने हैं उसका आधार उनका यह संगठन क्रम ही होगा। इसलिए इसे अत्यंत आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्य मानकर इसी महीने पूरा कर लेना चाहिए।


जीवन निगम की त्रिविध शिक्षा

त्रिविधि प्रशिक्षण योजना के समाचार से अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य में प्रसन्नता और उत्साह की लहर दौड़ गई है। इस मास जितने पत्र आये हैं, उनसे यही स्पष्ट हुआ है कि अधिकाँश परिजनों ने अपने लिए इसे सौभाग्य ही माना है और उपलब्ध सुअवसर से सम्भवतः लाभ प्राप्त करने का निश्चय किया है।

अखण्ड-ज्योति के माध्यम से अध्यात्मवाद के उत्कृष्ट सिद्धाँतों को जन-मानस तक पहुँचाने और आदर्श जीवन बनाने की प्रेरणा जिन लोगों को उपलब्ध होती है वे अपने में प्रत्यक्ष परिवर्तन अनुभव करते हैं। यह जीवन्त प्रेरणा ऐसी सशक्त है कि जिसके भी भीतर प्रवेश करेगी, उसे उस दिशा में चलने के लिए भी विवश करेगी। किताबों और अखबारों को जिस हलके दृष्टिकोण से पढ़ा जाता है और समयक्षेप एवं मनोरंजन करके उन्हें एक कौने में रख दिया जाता है वह बात अखण्ड-ज्योति के लिए लागू नहीं हो सकती। इन पंक्तियों को एक विशेष मनोभूमिका के साथ लिखा जाता है, अतएव उनका प्रभाव भी वैसा ही पड़ता है। यह विश्वास करने योग्य तथ्य है कि इस पत्रिका को नियमित रूप से पढ़ने वाले पाठकों में से हजारों नहीं लाखों ने अपने जीवन क्रम में आश्चर्यजनक परिवर्तन होते देखा है। यह विचार केवल विचार बनकर नहीं रह सकते, उन्हें व्यवहार क्रम में प्रत्यक्ष किये बिना किसी पाठक को चैन नहीं पड़ सकता। आज की गई गुजरी परिस्थितियों और दूषित वातावरण में भी नवजीवन संचार के लिए दृष्टिकोण के परिष्कार के लिए सच्चरित्रता और सज्जनता को विकसित करने के लिए अखण्ड-ज्योति से जितना कार्य किया है, उतना शायद ही अन्य किसी माध्यम से हुआ है। इसे अत्युक्ति नहीं, वरन् एक सुनिश्चित तथ्य ही मानना चाहिए।

जब-जब कि हमारी जीवन संध्या धीरे-धीरे निकट आती जाती है और कार्य करने की क्षमता विश्रान्ति की आकांक्षा करने लगी है तब यह भाव अधिक प्रबल होने लगा है कि युग को बदल सकने योग्य उत्कृष्ट व्यक्तियों का निर्माण, जितनी द्रुत गति से जितना अधिक तथा जितना प्रभावशाली बनाया जा सकता है, उसके लिए अधिकतम प्रयत्न किया जाना चाहिए।

इसके लिए एक ही उपाय है व्यक्तिगत संपर्क। पत्रिका, पुस्तकों के माध्यम से केवल विचार भेजे जा सकते हैं। विचारों में जितनी शक्ति होती है उतना वे काम भी करते हैं। पर अधिक कार्य प्राणशक्ति का होता है। प्राण की सामर्थ्य विचारों से अनेक गुनी अधिक है। प्राचीन काल में कष्टसाध्य गुरुकुल प्रणाली से छात्र जंगलों में रहकर इसलिए नहीं पढ़ते थे कि वैसी शिक्षा का प्रबंध उनके नगरों में नहीं हो सकता था। असली बात थी, ऋषियों के तेजस्वी व्यक्तित्व का सान्निध्य जिसके कारण छात्रों में अनायास ही अनेक सद्गुण प्रवेश करते थे तथा आत्मबल निरन्तर बढ़ते रहने का लाभ मिलता था। शिक्षा का उद्देश्य मस्तिष्क का ही नहीं व्यक्तित्व का विकास करना भी है। और यह तभी पूर्ण हो सकता है जब तेजस्वी, सुविकसित अध्यापकों द्वारा प्रशिक्षण की व्यवस्था हो। प्रवचनों का उतना महत्व नहीं जितना सान्निध्य का है। आकर्षक प्रवचन कोई भी कलावन्त व्याख्याता दे सकता है, पर अपनी सहज वाणी से दूसरों के अन्तःकरण बदल देना- उन ही का काम है जो इस प्रकार की प्रतिभा एवं क्षमता से सम्पन्न हो।

हमारा मन है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के स्वजनों को जीवन का उत्कृष्ट बनाने वाला प्रशिक्षण हम स्वयं करें। उन्हें अपने व्यक्तिगत सान्निध्य में कुछ दिन रखें और अपने पास जो यत्किंचित् श्रेष्ठता है उसे उपहार की तरह दे सकने का प्रयत्न करें। अपनी इस कामना की पूर्ति से हमें जो सुख मिलेगा उसी के लिए त्रिविध प्रशिक्षण का निमंत्रण परिवार के प्रत्येक सदस्य के नाम भेजना है। पिछले दो महीनों में इस संबंध में जो कुछ लिखा छापा गया है उसे हमारा व्यक्तिगत निमंत्रण ही पाठकों ने समझा है। वस्तुतः बात भी ऐसी ही है। जो कुछ कहना है वह हम अखण्ड-ज्योति के माध्यम से पाठकों को घर बैठे पहुँचाते ही रहते हैं, अब जो शेष है कि वह यह है कि उनके उत्कृष्ट विचारों को कार्यान्वित करने में परिजन जो कठिनाई अनुभव करते हैं उसे हल करने में क्रियात्मक मार्ग दर्शन एवं सहयोग दिया जाय। इसके लिए व्यक्तिगत संपर्क एवं सान्निध्य अपेक्षित था। त्रिविध प्रशिक्षण में उसी की व्यवस्था की गई है। परिजनों को इसलिये आमंत्रित किया गया है कि वे मानवोचित उत्कृष्ट जीवन का निर्माण करने के लिए हमारी व्यक्तिगत सेवा सहायता स्वीकार करें और जिनके लिए संभव है वे मथुरा आकर इस प्रशिक्षण में भाग लें।

जिनके घर में अपने बच्चों के लिए आजीविका मौजूद है, या जो अपनी संतान को स्वावलम्बी जीवन बिताने की उपयोगिता स्वीकार करते हैं, उनके लिए हमारी चार वर्षीय शिक्षा पद्धति बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकती है। जिन्हें नौकरी करानी है उन्हें सरकारी प्रमाण पत्रों की आवश्यकता पड़ेगी। यह प्रमाण पत्र हमारी दृष्टि में विशेष महत्व नहीं रखता कारण कि स्कूली पाठ्यक्रम के कंठाग्र करने में बालकों को इतना अधिक श्रम करना पड़ता कि उनकी सारी मानसिक शक्ति प्रायः उसी में खर्च हो लेती है। अच्छे डिवीजन में पास हुए बिना सार्टीफिकेट भी नौकरी दिलाने में समर्थ नहीं होते। इसलिए छात्रों को निरन्तर यही चिन्ता लगी रहती है कि रात-दिन पुस्तकें रटें और अच्छे डिवीजन में उत्तीर्ण हों। हमें जो कुछ पढ़ाना है वह इतना अधिक है कि स्कूली कोर्स के साथ-साथ चल सकना कठिन सिद्ध होगा। इसलिए अभी यह विचार छोड़ देना पड़ा है कि हमारी शिक्षा प्रणाली के साथ-साथ स्कूली पाठ्य-क्रम का भी समावेश रहे। हमें जो कुछ पढ़ाना है वह छात्रों के व्यक्तित्व का प्रत्येक दिशा में सुविकसित बनाने वाला होगा उसे सैद्धाँतिक ही नहीं व्यावहारिक दृष्टि से भी पढ़ाया जाना है। वह सब भी इतना भारी है कि उसे पूर्ण करने में भी छात्रों को भारी श्रम एवं प्रयत्न करना होगा। ऐसी दशा में यह मानकर ही चलना पड़ा है कि हमें थोड़े ही छात्र मिलेंगे। हमें आवश्यकता भी थोड़े ही छात्रों की है क्योंकि वर्तमान स्वल्प साधनों से अधिक छात्रों की शिक्षा हमारे लिए संभव भी नहीं है। पच्चीस छात्रों के उपयुक्त ही स्थान और समय है। इतने बड़े परिवार में से इतने थोड़े छात्र आसानी से मिल जाने वाले हैं। अपना प्रयोग हम इन्हीं से आरंभ करेंगे और लोगों को बतावेंगे कि यदि शिक्षा पद्धति उपयुक्त हो तो बालकों के व्यक्तित्व का विकास कितनी सरलता पूर्वक हो सकता है। राष्ट्र को भावी सुयोग्य पीढ़ी देने के लिए जिस प्रकार की शिक्षा प्रणाली चाहिए उसकी एक प्रयोगशाला ही हमारे इस प्रयत्न को समझना चाहिए। इसकी सफलता देश के शिक्षा शास्त्रियों की आँखें खोलने वाली भी सिद्ध हो सकती है। 14 से 16 वर्ष की आयु के 25 छात्रों की आवश्यकता है। उन्हें चार साल पढ़ाया जायेगा। 18-20 वर्ष की आयु में जब वे अपने घर वापिस लौटेंगे तो हमारा विश्वास है कि उनके परिवार का कोई भी व्यक्ति यह नहीं कह सकेगा कि यह शिक्षा निरर्थक सिद्ध हुई। जो आवेदन पत्र आवेंगे उनमें से उपयुक्त लड़के ही छाँटे जायेंगे, ताकि उन पर किया गया श्रम सार्थक सिद्ध हो सके। यह शिक्षण अगले वर्ष से चलाने का विचार है, पर यदि आवश्यक व्यवस्था जल्दी हो सकी तो उससे पूर्व भी क्लास चालू की जा सकती है। साथ ही यदि कोई अभिभावक अपने बालकों को यहाँ रखकर प्राइवेट रूप से सरकारी परीक्षा दिलाने का आग्रह करेंगे तो, उस समय की परिस्थिति के अनुसार उचित व्यवस्था करने का प्रयत्न किया जायेगा।

दूसरा शिक्षण गृहस्थों का है। आरंभिक जीवन में जिन्दगी जीने की कला जो लोग नहीं सीख सके और गृहस्थ का उत्तरदायित्व समझे बिना उस जंजाल में अनायास ही फंस गये, उनकी व्यस्तता को देखते हुए कम से कम एक महीने की शिक्षा तो उन्हें लेनी ही चाहिए। गृहस्थ जीवन एक महान प्रयोग है। उस पर व्यक्तिगत जीवन की सुख-शाँति तथा प्रगति अस्सी फीसदी निर्भर रहती है। जिसका गृहस्थ जीवन अस्त-व्यस्त है उसे प्रत्यक्ष नरक का दर्शन अपने घर की चहारदीवारी के भीतर ही होता है। नई पीढ़ियों को तैयारी परिवारों के वातावरण में ही होती है। यदि वहाँ अनुपयुक्त वातावरण छाया हुआ है तो यह आशा दुराशा मात्र ही रहेगी कि बच्चे बड़े होकर सुयोग्य नागरिक बनेंगे। वे पैसे भले ही कमा सकें पर यदि चरित्रहीन और ओछी प्रकृति के हैं तो उन्हें किसी समाज के लिए अभिशाप ही माना जा सकता है।

आरोग्य और दीर्घ-जीवन, प्रसन्नता और प्रफुल्लता, सुन्दरता और सुव्यवस्था, समृद्धि और संपन्नता, स्नेह और सहयोग की समस्त संभावनाएं गृहस्थ जीवन की सुव्यवस्था पर निर्भर रहती है। नई पीढ़ी जिसके ऊपर अभिभावक गर्व कर सकें और विचारशील लोग यह अनुभव करें कि किन्हीं सभ्य लोगों ने यह सुन्दर श्रद्धांजली प्रस्तुत की है इसी प्रकार तैयार होगी। पर अध्यात्म, धर्म और परमार्थ की दिशा में भी वे ही लोग चल पाते हैं जिनका कम पारिवारिक दृष्टि से शाँतिपूर्वक चल रहा है। जिनका कुटुम्ब क्लेश कलह के नारकीय वातावरण में डूबा रहता है वे उतने ही दुःखी रहते हैं जितने कि शारीरिक रोगों से ग्रस्त दर्दी लोग कष्ट पाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हममें से प्रत्येक व्यस्त गृहस्थ, सुव्यवस्थित, सुविकसित, शाँतिमय एवं समुन्नत बनावे की कुछ जाने और इस क्षेत्र में नित्य प्रति उपस्थित होती रहने वाली उलझनों को सुलझाने की विद्या में निपुणता प्राप्त करे। गृहस्थों को सपरिवार एक महीने के लिए मथुरा आने के लिए आमन्त्रण इसीलिए दिया है कि उस महत्वपूर्ण जानकारी से अपने को परिचित और अभ्यस्त बनाकर सभ्य परिवार में रह सकने का स्वर्गीय आनन्द उपलब्ध करें। परिवार भी एक राज्य है, उसका शासन करने के लिए सुयोग्य प्रशासक जैसी प्रतिभा अभीष्ट होती है। यह प्रशिक्षण प्राप्त किये बिना जो लोग गृहस्थ बसा लेते हैं वे किसी प्रकार रोते झींकते ही जिन्दगी के दिन पूरे करते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों की यह कठिनाई हल करने के लिए यह एक महीने का गृहस्थ प्रशिक्षण इतना उपयोगी सिद्ध होगा, कि जो भी इस का लाभ उठावेंगे वे अपना एक महीने का समय तथा मार्ग व्यय आदि का खर्च निरर्थक गया है ऐसा अनुभव कदापि न करेंगे।

बिगड़े हुए स्वास्थ्य को सुधारने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा विधि से उपचार प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा दूसरों को रोग मुक्त कर सकने की शिक्षा, चान्द्रायण व्रत के साथ एक महीने का गायत्री पुरश्चरण करने की तपश्चर्या, साहित्य कार्यों में अभिरुचि रखने वालों को लेखन-कला का अभ्यास, ब्रज के तीर्थों का दर्शन आदि अनेक अन्य कार्यक्रम और इस एक महीने की शिक्षा के साथ जोड़ रखे गये हैं, जिनके कारण उसका महत्व और भी बढ़ गया है। यह शिक्षण इसी अश्विन मास में आरंभ होने वाला है। स्थान के अभाव से अभी संभवतः पच्चीस परिवारों की शिक्षा ही हर महीने चल सकेगी। गत मास पत्र बहुत आये हैं। इनमें से आश्विन से वैशाख तक आठ महीनों में जितने परिवारों के आने की स्वीकृति दी जा सकेगी उतनी देकर शेष को अगले वर्ष के लिए रुकना होगा। जेष्ठ के महीने में तो हर वर्ष 10-10 दिन के परामर्श शिविर करते रहने की बात सोची गई है।

जिनने गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ पूरी कर ली है, जिन पर कमाने या घर संभालने का भार नहीं है, उन्हें एक वर्ष तक आत्म-कल्याण की वानप्रस्थ शिक्षा लेने के लिए आमंत्रित किया गया है। इस अवधि में वे सम्पूर्ण गीता पढ़ेंगे और उसके माध्यम से लोक जागरण की कथा कहने का, आदर्शों और सिद्धाँतों के नीर-क्षीर विवेक का अभ्यास करेंगे। एक वर्ष की विशेष गायत्री तपश्चर्याएं करके अब तक के कषाय कल्मषों को धो डालने का अवसर उन्हें मिलेगा। वेद शास्त्र, एवं दर्शन, उपनिषदों का साराँश पढ़ने समझने की इतने थोड़े समय में अन्यत्र व्यवस्था बन सकना असंभव ही है। प्रवचन करने का इस अवधि में विशेष रूप से अभ्यास कराया जायेगा ताकि वे अपने क्षेत्र में नवयुग का प्रकाश और संदेश फैला सकने में समर्थ हो सकें। आत्म-कल्याण की साधना से उपासना की तरह ही लोकहित के आयोजनों में समय लगाना भी आवश्यक है। यह उभय विधि प्रशिक्षण एक वर्ष की अवधि में जो प्राप्त किया जायेगा उसे भावी जीवन में निष्ठापूर्वक करते रहने से मानव शरीर को सार्थक बनाने और लक्ष्य को प्राप्त करने का भी सहयोग बन सकता है।

त्रिविधि प्रशिक्षण प्राकृतिक चिकित्सा आदि की जो शिक्षा पद्धतियाँ तपोभूमि में चलेंगी, उनका संचालन इन वानप्रस्थों द्वारा ही होने वाला है ताकि वे ऐसे ही विद्यालय एवं शिविर अपने-अपने क्षेत्रों में भी चलाते रह सकें। यज्ञ आयोजन, जन्म-दिन षोडश संस्कार, पर्व उत्सव आदि सामूहिक धर्मानुष्ठानों को ठीक तरह करा सकने की पद्धति यह वानप्रस्थी लोग एक वर्ष में भली प्रकार सीख जावेंगे। जातीय संगठनों का संचालन, आदर्श विवाहों की व्यवस्था, युग निर्माण योजना के शत सूत्री कार्यक्रमों की कार्य पद्धति आदि अनेकों ऐसी क्षमताएं यह वानप्रस्थी लोग इस एक वर्ष की अवधि में प्राप्त करेंगे जिनके आधार पर वह अपना और अपने देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति का भारी हित साधन कर सकें।

यह वानप्रस्थ शिक्षा क्रम जेष्ठ के तीन शिविर समाप्त होते ही आरंभ हो जायगा और आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, इन तीन महीनों में उन्हें इतना सुयोग्य बना दिया जायेगा कि आश्विन से आरंभ होने वाले गृहस्थ शिविरों की त्रिविध शिक्षा में वे भी हमारे साथ हाथ बंटा सकें। आगे चलकर ब्रह्मचारियों की चार वर्षीय शिक्षा व्यवस्था में भी यह वानप्रस्थ ही हमारे सहायक के रूप से कार्य करेंगे। प्रयत्न यह किया जायेगा कि वे अपने-अपने स्थानों पर युग-निर्माण चेतना के स्वतंत्र केन्द्रों का संचालन करने की परिपूर्ण क्षमता इस अवधि में प्राप्त कर लें। और देश के कौने-कौने में मानव जाति की आत्मोत्कर्ष की आवश्यकता पूर्ण करने में बढ़-चढ़ कर काम करें। राष्ट्र का सच्चा नेतृत्व कर सकने में ऐसे ही परमार्थी वानप्रस्थी सफल हो सकते हैं।

इस शिक्षा के लिए केवल सुशिक्षित एवं सुव्यवस्थित व्यक्ति ही छाँट-छाँट कर लिये जाते हैं। इसलिए उनकी संख्या न्यून ही रह जायेगी। यह थोड़े लोग ही आगे चल कर असंख्य जनता को प्रबुद्ध बना सकने में समर्थ होंगे। इसलिए उनकी थोड़ी संख्या भी अधिक महत्वपूर्ण मानी जा सकती है।

गत दो अंकों में त्रिविध प्रशिक्षण की जानकारी छपी है। इन पंक्तियों द्वारा परिवार के सभी सदस्यों को आमन्त्रण भेजते हैं कि जिनकी जैसी स्थिति हो वे त्रिविधि शिक्षण में से अपने उपयुक्त चुनाव कर लें और उससे लाभ उठाने का प्रयत्न करें। निवास, शिक्षा आदि का कोई खर्च नहीं है। पर भोजन भार शिक्षार्थियों को स्वयं ही उठाना होगा। आने से पूर्व स्वीकृति प्राप्त कर लेना आवश्यक है। बिना स्वीकृति आने वालों को स्थान न मिल सकेगा।

त्रिविधि शिक्षा पद्धति की महत्वपूर्ण योजना को पूरा करने के लिए ‘युग निर्माण विद्या पीठ’ की आवश्यक तैयारी आरंभ कर दी गई है। इसे सफल बनाने के लिए सभी स्वजनों की सद्भावनाएं अपेक्षित हैं।


सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए

समाज के पुनर्निर्माण के लिए हमें स्वस्थ परम्पराओं को सुविकसित करने और हानिकारक कुरीतियों को हटाने के लिए कुछ विशेष काम करना पड़ेगा। अव्यवस्थित समाज में रहने वाले व्यक्ति कभी महापुरुष नहीं बन सकते। चारों और फैली हुई निकृष्ट प्रथाएं तथा विचारधाराएं बालकपन से ही मनुष्य को प्रभावित करती हैं ऐसी दशा में उसका मन भी संकीर्णताओं और ओछेपन से भरा रहता है। व्यक्तित्वों के विकास के लिए समाज का स्तर ऊंचा उठाना आवश्यक है। इसलिए अध्यात्मतत्त्व को मूर्तिमान देखने की आकाँक्षा करने वाले प्रबुद्ध व्यक्तियों को अपने समय के समाज में प्रचलित अव्यवस्थाओं को दूर करने के लिए कुछ ठोस और कड़े कदम उठाने ही पड़ते हैं।

हम भी इन जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते। सामाजिक पुनर्निर्माण के लिए साहसपूर्ण कदम उठाने की आवश्यकता है। विवाहों के नाम पर होने वाला अपव्यय हमारे समाज की सबसे बड़ी एवं सबसे घातक कुरीति है। उसका उन्मूलन हमारे जातीय जीवन-मरण का प्रश्न है। इस कुप्रथा की जड़ें इतनी गहरी घुस गई हैं कि उन्हें एकाकी कोई व्यक्ति नहीं उखाड़ सकता, इसके लिए सामूहिक एवं संगठित प्रयत्न ही सफल हो सकते हैं। अतएव विगत अंकों में जातीय संगठनों की आवश्यकता का प्रतिपादन किया जाता रहा है। इस संगठन का प्राथमिक उद्देश्य अपव्यय रहित आदर्श विवाहों की परम्परा प्रचलित करना है। पर बात यहीं तक सीमित रहने वाली नहीं है। आगे चलकर अन्य अनेक कुरीतियों का उन्मूलन तथा सभ्य-समाज के उपयुक्त स्वस्थ परम्पराओं का प्रचलन करना पड़ेगा। आरंभ इस रूप में हो रहा है पर इसका अन्त एक सुविकसित स्वस्थ, सशक्त एवं प्रबुद्ध समाज की नवरचना की सफलता के रूप में ही होगा।

यह भ्रम किसी को भी नहीं करना चाहिए कि जाति-पाति के नाम पर जो संकीर्णता का विष आज चारों ओर फैला हुआ है उसको इन संगठनों द्वारा प्रोत्साहन मिलेगा। ऐसा कदापि संभव नहीं। हम प्रगतिशील विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं और एक आदर्शवादी कार्यक्रम, आदर्शवादी लोगों द्वारा आरंभ कर रहे हैं। दूसरे जातीय संगठनों ने उस संकीर्णता का विष भले ही बढ़ाया हो पर हम तो उसका उन्मूलन करने चले हैं और हर कदम फूँक-फूँक कर उठाने की सावधानी रख रहे हैं। ऐसी दशा में लक्ष्य से विपरीत दिशा में काम होने लगेगा ऐसी आशंका क्यों करनी चाहिए? युग-निर्माण योजना के अंतर्गत आरंभ किये गये प्रगतिशील जातीय संगठन सामाजिक क्राँति की भूमिका ही सम्पन्न करेंगे, उनके द्वारा पुनर्निर्माण का रचनात्मक कार्य ही संभव होगा।

इस जातीय संगठन कार्यक्रम को, आदर्श विवाहों की परम्परा को कार्यान्वित करने के लिए कुछ ऐसे कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है जो इस दिशा में सक्रिय प्रयत्न करें, अधिक समय लगावें और अधिक उत्साह प्रदर्शित करें। इस छोटे रूप में आरंभ की जाने वाली इस सामाजिक क्राँति का रूप आगे चलकर निश्चित रूप से बहुत व्यापक होने वाला है। उसका नेतृत्व, राजनैतिक नेतृत्व से भी कहीं अधिक महत्वपूर्ण होगा। पिछली पीढ़ी के नवरत्न राजनैतिक स्वाधीनता संघर्ष में बहुत कुछ त्याग बलिदान करके भारत माता का मस्तक ऊंचा कर चुके हैं। अब वर्तमान पीढ़ी के सामने सामाजिक एवं बौद्धिक क्राँति की आवश्यकता उपस्थित है। इसके लिये वैसा ही साहस एवं त्याग अभीष्ट है जैसा कि स्वतंत्रता के सेनानी पिछले दिनों दिखा चुके हैं।

यों यह कार्यक्रम आगामी गुरु पूर्णिमा से युग-निर्माण योजना के द्वितीय वर्षारम्भ से विधिवत आरंभ हो जायेगा पर इसके लिए जैसे प्रभावशाली नेतृत्व की आवश्यकता है वह अभी नहीं मिला है। इस आवश्यकता की पूर्ति की जानी चाहिए। अपने परिवार में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं जो नेतृत्व के लिए सर्वथा उपयुक्त हैं। उनके कदम आगे बढ़ने चाहिए। समय की पुकार अनसुनी न की जानी चाहिए। आन्दोलनों के आरंभ-कर्ता अपने मौलिक साहित्य के कारण अधिक श्रेय प्राप्त करते हैं। पीछे तो उसके व्यापक हो जाने पर अनेकों एक से एक उपयुक्त व्यक्ति उसमें आ मिलते हैं। देखना यह है कि युग की इस महान आवश्यकता की पूर्ति के लिए साहसपूर्ण कदम उठाने के लिए, हम में से कौन आगे बढ़ते हैं और किन्हें इतिहास में अमर बनाने वाला श्रेय लाभ प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता है।


VigyapanSuchana

पाक्षिक-पत्र के लिए समाचार और फोटो

युग-निर्माण योजना मासिक पत्र अपने ढंग का अनोखा समाचार पत्र होगा। 10&15 साइज के अखबारी साइज में 20 पृष्ठों का यह पत्र नवयुग का संदेश लेकर तैयारी के साथ प्रकाशित होने जा रहा है। उसका प्रथम अंक 7 जुलाई को प्रकाशित हो जायेगा। इसके बाद हर महीने 7 और 22 तारीख को प्रकाशित हुआ करेगा।

अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ता को अपने लिए मार्ग दर्शन प्राप्त करने तथा जन-जीवन को सुविकसित करने के लिए जो रचनात्मक कार्य सारे देश भर में हो रहे हैं उन्हें जानने के लिए यह पत्र एक बड़ी आवश्यकता की पूर्ति करेगा। एक से दस पद्धति के अनुसार दस परिजनों को इसके पढ़ाये जाने से इसे संगठन कार्यक्रम का एक केन्द्र बिन्दु भी माना गया है।

गत वर्ष गुरु पूर्णिमा से युग-निर्माण योजना का विधिवत उद्घाटन हुआ था। तब से अब तक जहाँ, जिन व्यक्तियों द्वारा जो रचनात्मक कार्य संपन्न हुए हों, वहाँ के शाखा संचालक इस अवधि की पूरी रिपोर्ट जल्दी ही भेज दें ताकि उनका यथा संभव विवरण मासिक पत्र में छापा जा सके। आगे भी जो गतिविधियाँ चलें उनके समाचार प्रकाशनार्थ भेजे जाते रहने चाहिए।

शाखा संचालकों के आधे शरीर के बढ़िया कैमरे के खिंचे फोटो भी हमें साथ चाहिएं ताकि समाचारों के साथ जहाँ आवश्यक हो वे फोटो भी छापे जा सकें। पत्र में समाचारों के साथ-साथ आवश्यकतानुसार चित्र भी छपा करेंगे।

जिन्हें उपरोक्त पत्र का ग्राहक होना है वे अपने नाम इसी महीने नोट करा दें ताकि उतनी ही संख्या में उसे छापा जा सके। वार्षिक मूल्य 6 रुपये रहेगा।

जेष्ठ के तीन शिविर

यह अंक पाठकों के हाथ में जब तक पहुँचेगा तब तक जेष्ठ मास के दस-दस दिन वाले परामर्श शिविरों का क्रम आरंभ हो चुका होगा। प्रथम शिविर 26 मई से 4 जून तक, दूसरा 5 से 14 जून तक और तीसरा 15 से 24 जून तक का है। गर्मी की छुट्टियों में जिन्हें थोड़ा अवकाश मिल जाता है और उस समय को हमारे सान्निध्य, परामर्श में लगाना चाहते हैं, उनके लिए यह शिविर स्वर्ण-सुयोग की तरह उपयुक्त होंगे।

प्रत्येक व्यक्ति की अपनी-अपनी अलग-अलग समस्याएं होती हैं। शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, अध्यात्मिक अनेक गुत्थियाँ ऐसी होती हैं जिनके लिए किन्हीं अनुभवी व्यक्ति का परामर्श उनका हल खोजने के लिए उपयोगी सिद्ध होता है। ऐसे परिजनों के लिए यह तीनों शिविर सब प्रकार उपयोगी होंगे।

जीवन जीने की कला का व्यावहारिक ज्ञान एवं दैनिक जीवन में अध्यात्म आदर्शों का सरलतापूर्वक प्रयोग इन शिविरों के प्रशिक्षण की अपनी विशेषता होगी। जीवन निर्माण का जो प्रशिक्षण व्यापक रूप से किया जाना है उसका साराँश और प्रयोग-विधि इन शिविरों में संक्षिप्त रूप से बना दी जायेगी। किस दिशा में प्रगति करने के लिए क्या करना चाहिए, और वर्तमान कठिनाइयों को हल करने के लिए क्या गतिविधि अपनानी चाहिए इसे प्रयोगात्मक रूप से इस प्रकार इन शिविरों में समझाया जाता है कि शिक्षार्थी नया प्रकाश लेकर लौटे और मंगलमय नव-जीवन का आरंभ करे।

युग-निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रमों को कहाँ, कैसे, कितना आरंभ किया जा सकता है? इसकी संभावनाओं पर भी परामर्श किया जायेगा और आगत परिजनों की अपनी वर्तमान स्थिति में क्या कर सकना सरलतापूर्वक संभव हो सकता है, यह परामर्श दिया जायेगा।

बड़े सम्मेलनों की अपेक्षा छोटे शिविर हर दृष्टि से अधिक उपयोगी सिद्ध होते हैं। यह ध्यान में रखते हुए इस महीने यह तीन शिविर किये जा रहे हैं। इनमें आने के इच्छुकों को यहाँ के स्थान और सुविधा के अनुरूप स्वीकृतियाँ दी जा चुकी हैं। फिर भी किन्हीं को अधिक उत्कण्ठा हो तो दूसरे, तीसरे शिविरों में आने की स्वीकृति प्राप्त करने के लिए पत्र लिख सकते हैं।

विस्तृत विवरण जुलाई अंक में

त्रिविध शिक्षण में सम्मिलित होने के लिए परिवार के अधिकाँश सज्जनों ने उत्सुकता प्रकट की है। साथ ही पाठ्य-क्रम, शिक्षा-पद्धति एवं व्यवस्था का विवरण पूछा है। पत्रों में इतनी बातों का उत्तर दे सकना संभव नहीं। इसलिए जुलाई अंक में इस संबंध की सारी जानकारी प्रकाशित कर देने का निश्चय किया गया है।

इन दिनों प्राप्त पत्रों से पता चलता है कि बहुमत इस बात के पक्ष में है कि बच्चों को मैट्रिक एवं इंटर तक की प्राइवेट परीक्षाएं देने की तैयारी कराई जाय और साथ ही उनके व्यक्तित्व को विकसित करने वाला प्रशिक्षण भी चलता रहे। इससे उन्हें सरकारी प्रमाण-पत्र से प्राप्त होने वाले लाभ भी प्राप्त कर सकने का दूसरा अवसर मिलेगा। यदि बहुमत इसी पक्ष में रहा तो वैसा प्रबंध भी हो सकना संभव है। यह शिक्षण क्रम अगले वर्ष से चलेगा।

एक वर्ष का उपाध्याय शिक्षण इसी आषाढ़ से ही आरंभ होगा। इस अवधि में एक गायत्री महापुरश्चरण, चान्द्रायण व्रत, गीता की विशिष्ट शिक्षा, धर्मोपदेश की योग्यता, प्राकृतिक चिकित्सा की सैद्धाँतिक एवं व्यावहारिक शिक्षा, रामायण, उपनिषद्, दर्शन एवं वेद के मर्मस्थलों का सार अध्ययन, योजना के अनुरूप रचनात्मक कार्यों का अनुभव, षोडश संस्कार करा सकने की योग्यता आदि कितने ही ऐसे विषयों को सीखने का अवसर मिलेगा जो किसी भी व्यक्ति को अपना और दूसरों का कल्याण कर सकने की क्षमता प्रदान करें।

गृहस्थों के एक मास का, उपाध्यायों का एक वर्ष का, ब्रह्मचारियों का चार वर्ष का शिक्षण सर्वथा निःशुल्क होगा, पर भोजन व्यय सभी अपना-अपना स्वयं उठावेंगे। जो स्वयं बना सकते हों वे अपना बना लें, जो न बना सकेंगे उनके लिए सम्मिलित भोजनालय की व्यवस्था कर दी जायेगी। इस संबंध में विस्तृत विवरण जुलाई अंक में रहेगा।


बुझता दीपक


बुझता दीपक (Kavita)

एक दीपक यदि बुझाना ही पड़े, कोटि दीपों को जलाने के लिए।

तज न तू अवसर अमर उल्लास का,

भूल मत प्रकरण विमल इतिहास का,

यह मनुजता बस सहज परिधान,

क्षीण एकाकी अनश्वर श्वास का।

यह दीपक यदि आह ही भरना पड़े, अखिल जग के मुस्कराने के लिए,

एक दीपक यदि बुझाना ही पड़े ॰

व्यक्ति सीमित किन्तु लोक अपार है,

व्यक्ति बिन्दु समाज पारावार है,

व्यक्ति और समष्टि का संघर्ष ही,

आज के युग का सतत व्यापार है,

नींव का पाषाण दृढ़तर चाहिए , भवन नभ-चुम्बी बनाने के लिए।

एक दीपक यदि बुझाना ही पड़े ॰

है नहीं उत्सर्ग जाता व्यर्थ है,

सिन्धु में भी लहर का कुछ अर्थ है,

एक और अनेक के संघर्ष में,

एक भी कुछ कम न सबल समर्थ है,

प्राण की बात्ती जला दे चिर व्रती, आज दीपावलि मनाने के लिए।

एक दीपक यदि बुझाना ही पड़े ॰

-विद्यावती मिश्र

*समाप्त*