मनुष्य शरीर भगवान का सबसे बड़ा अनुदान है। सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में मनुष्य जीवन की उपलब्धियाँ इतनी महान हैं कि उनमें धरती और स्वर्ग जितना अन्तर माना जा सकता है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने वाले जीव विचार, बोली, भाषा, साहित्य भोजन की अनिश्चितता, वस्त्र, मकान, चिकित्सा, पारस्परिक सेवा, सहानुभूति, यातायात की सुविधा, वैज्ञानिक उपकरण, रक्षा प्रसाधन, मनोरंजन, न्याय, शासन आदि सभी सुविधाओं से वंचित, एक प्रकार से निरीह जीवन व्यतीत करते हैं। उनकी तुलना में मनुष्य को जो सुविधाएं प्राप्त हैं उनका मूल्याँकन किया जाय तो वह अन्तर उससे भी अधिक बैठेगा जितना मनुष्य अपने और देवताओं के बीच में मानता है। जैसे देवताओं की स्थिति प्राप्त करने के लिए, स्वर्ग की उपलब्धि के लिए मनुष्य आकाँक्षा किया करता है ठीक उसी प्रकार अन्य जीवन भी यह सोचे तो उचित ही होगा कि मनुष्य जैसा शरीर और साधन पाकर वे प्रत्यक्ष स्वर्ग का आनन्द प्राप्त कर सकते हैं।
संसार में किसी को कितनी ही बड़ी असुविधाएं प्राप्त क्यों न हों पर वे उन असुविधाओं का लाख करोड़वाँ भाग भी नहीं है जो इन योनियों में भ्रमण करने वाले जीवों को सहन करनी पड़ती हैं। इस सृष्टि से गई-गुजरी जिन्दगी व्यतीत करने वाला मनुष्य भी चाहे तो यह संतोष और गर्व कर सकता है कि मुझे सृष्टि के अन्य प्राणियों की अपेक्षा लाखों करोड़ों गुनी सुविधाएँ प्राप्त हैं। सचमुच ईश्वर की महती अनुकम्पाओं में से एक यह है कि उसने हमें मनुष्य शरीर प्रदान किया है। इस उपलब्धि के लिए उसके प्रति जितनी कृतज्ञता प्रकट की जाय उतनी ही कम है। जो लाभ चौरासी लाख योनियों में से किसी को भी प्राप्त नहीं है उसका मिलना परमात्मा की महती कृपा से ही हमारे लिए संभव हो सका है।
तत्वदर्शियों का कथन है कि प्राणी को दे सकने लायक दो ही महान उपहार ईश्वर के पास है। एक वह मनुष्य शरीर के रूप में हमें दे चुका। दूसरा उसने पात्रता देखकर देने के लिए सुरक्षित रखा है इस रहस्यमय दिव्य उपहार का नाम है-’मानवीय अन्तःकरण।’ जिसे यह मिल गया वह इस सृष्टि के कण-कण में आनन्द का स्रोत उद्भूत होते देखता है और पग-पग पर स्वर्गीय उपलब्धियों का अनुभव करता है और स्वर्गीय जीवन का आनन्द लेता हुआ अपने को सब प्रकार धन्य अनुभव करता है। ऋषि, देवता, महा पुरुष, देवदूत और अवतारों के शरीर तो मनुष्य जैसे ही होते हैं, पर अन्तर यह रहता है कि उन्हें मानवीय अन्तःकरण भी मिला होता है, जब कि साधारण नर-तनु धारी पाशविक प्रवृत्ति और दृष्टि रखने के कारण पग-पग पर शोक, सन्ताप, क्षोभ, असन्तोष एवं त्रास सहते हुए किसी प्रकार मौत के आने का समय गिनते रहते हैं।
मनुष्य शरीर देने के बाद जो दूसरा महान उपहार ‘मानवीय अन्तःकरण’ हमें अभी तक नहीं मिला है, वह जिसे भी, जब भी मिल जाता है तब उसके जीवन का हर पहलू आनन्द और उल्लास से खिल पड़ता है। चन्दन के वृक्ष की तरह वह अपनी सुगन्ध उस सारे क्षेत्र में फैला देता है जहाँ वह रहता और बढ़ता है। नर पशु की तरह खाने सोने और मस्ती करने में सुर-दुर्लभ मानव-जीवन के अलभ्य अवसर को बर्बाद कर देना परले सिरे की मूर्खता है। इसका ऐसा उपयोग होना चाहिए जिससे भव-बन्धन कटे। क्षण-क्षण स्वर्गीय आनन्द अनुभव होता रहे और शरीर त्यागते समय संतोष की साँस लेने का अवसर मिले। दुर्भाग्य इतना ही है कि वह सूझ-बूझ उठती नहीं, जिसके आधार पर सन्मार्ग अपना कर उत्कृष्ट जीवन का ताना-बाना बुना जा सके। लोग लम्बी-चौड़ी कल्पनाएँ तो करते रहते हैं, भौतिक महत्वाकांक्षाओं की तरह आत्मिक प्रगति के स्वप्न भी देखते रहते हैं पर ऐसा कोई ठोस कार्यक्रम उनके बूते बन नहीं पड़ता जिससे वे महत्वाकाँक्षाएँ पूर्ण हो सकें। कारण यही है कि आकाँक्षाएँ उथली होती है। उनके पीछे-लगन, निष्ठा, तत्परता, प्रेरणा एवं जीवट का अभाव ही रहता है। यह कमी ही वह बाधा है जिसके कारण इच्छा रहते हुए भी जीवन को सार्थक बनाने वाले गुण, कर्म, स्वभाव का निर्माण करने से हम वंचित रह जाते हैं।
लोग सम्पत्तियों और विभूतियों को बहुत महत्व देते हैं। वे सोचते हैं जिसके पास जितने साधन हैं वह उतना ही भाग्यशाली या बुद्धिमान है। बड़प्पन भी आजकल साधनों से ही नापा जाता है। इस गलत दृष्टिकोण में उलझ कर आम तौर से मनुष्य सम्पत्ति’, सत्ता, ख्याति एवं विलासिता के फेर में पड़े रहते हैं और यह अमूल्य मानव शरीर यों ही बर्बाद कर देते हैं।
बुद्धिमत्ता इसमें है कि मानव शरीर परमात्मा ने दे दिया तो अब अपने पुरुषार्थ से मानव अन्तःकरण का विकास करे। मानवता के अनुरूप विचारणीय, भावना एवं प्रकृति यदि उपलब्ध हो सके तो निश्चय ही यह जीवन सार्थक बन जाता है। सद्भावनाएँ जिसके भीतर भरी रहती हैं उसके चेहरे पर सौम्यता का प्रकाश फैला रहता है और हर किसी को इतना मृदुल लगता है कि उसे निहारते ही बनता है। सौम्यता से बढ़कर सुन्दरता का और कोई प्रमाण नहीं हो सकता। सज्जनता से भरी वाणी में जो नम्रता, शालीनता एवं मधुरता रहती है उसे सुनने के लिए हर किसी के कान प्यासे रहते हैं। स्नेह और सद्भावना भरी वाणी शहद से अधिक मीठी होती है, उसे सुनकर निराश एवं मुरझाये हुए चेहरे आशा के प्रकाश से खिलने लगते हैं।
मानव शरीर में विचरण करने वाले नर-पशुओं की आज कमी नहीं। असुर, पशु और पिशाच जिस ढंग से सोचते हैं वही तरीका उनने अपनाया होता है। अपने तुच्छ स्वार्थ के लिए दूसरों का बड़े से बड़ा अहित करने में उन्हें संकोच नहीं होता। उद्दण्डता और अनीति का आचरण करते हुए उन्हें लज्जा नहीं आती। आलस्य और व्यसनों के फेर में पड़े हुए अपना सब कुछ बर्बाद करते रहते हैं पर उन्हें यह नहीं सूझता कि हम कुछ अनुचित बात कर रहे हैं। जिन्हें अपने स्वास्थ्य का ज्ञान नहीं, भविष्य की चिन्ता नहीं, शान्ति की खोज नहीं और प्रगति की आकाँक्षा नहीं उन्हें नर-पशु ही कहा जा सकता है।
मनुष्य का शरीर मिलना यह ईश्वर की महती कृपा है। दूसरे जीवों की तुलना में भौतिक सुविधा की दृष्टि से यह एक बड़ा सौभाग्य भी है। पर यदि उसे निरर्थक तरीके में बर्बाद कर दिया जाय, जिन्दगी को भार की तरह किसी तरह काट लिया जाय तो उसे एक खेदजनक दुर्घटना ही कहा जायगा। शरीर की दृष्टि से निश्चय ही मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ है पर यदि मन की दृष्टि से पशुता का साम्राज्य ही छाया रहा, मानवता का प्रकाश अन्तःकरण में प्रकाशित न हो सका तो शारीरिक सौभाग्य की उपलब्धि का कुछ अधिक महत्व न रह जायगा।
भावनात्मक दृष्टि से जिसने मानवता का स्तर प्राप्त कर लिया व्यक्तिगत जीवन में वही सुखी और सन्तुष्ट रह सकता है। उसी को साँसारिक जीवन में प्रतिष्ठा एवं किसी कार्य की स्थायी सफलता मिल सकती है। सद्गुणों से ही अपने व्यक्तित्व की छाप दूसरों पर पड़ती है और उसी से श्रद्धा की उत्पत्ति होती है और सहयोग एवं सद्भाव भी उसी के फलस्वरूप प्राप्त होता है। दुर्गुणी मनुष्य जहाँ जायगा वहीं दुर्गन्ध फैलेगी और विरोधियों एवं शत्रुओं का अनायास ही बाहुल्य होता चला जायगा। संघर्ष और क्लेश उसे घेरे रहेंगे। इस प्रकार का अशान्त जीवन कितनी ही सम्पत्तियों से लदा हुआ क्यों न हो दुख दुर्भाग्य से ही भरा रहेगा और उसे असफल ही माना जायगा।
हमारे भीतर पशुता और मानवता की उभय पक्षीय सत्ताएं काम करती रहती हैं। असुरता और देवत्व दोनों ही सक्रिय रहते हैं। इस देवासुर संग्राम में हमारा विवेक जिसका भी समर्थन करने लगे वही पक्ष बलवान हो जाता है। असुरता के पक्ष में यदि भावनाएं मुड़ गई तो जीवन का सारा ढाँचा असुरता से भर जायगा। विचार, कार्य, मित्र और साधन उसी तरह से जुट जायेंगे और वैसा ही वातावरण अपने चारों ओर जमा हुआ दिखाई देगा। इसके विपरीत यदि देवत्व का समर्थन अन्तःकरण ने करना आरंभ कर दिया तो स्वभाव, चरित्र एवं क्रियाकलाप ऐसा होगा जैसा देवताओं का होता है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि असुरता का प्रतिफल दुःख दारिद्र एवं क्लेश, कलह के रूप में सामने आता है और देवत्व की प्रतिक्रिया सुख शान्ति का रूप धारण कर हमें आनंदमय परिस्थितियों के पुरस्कार प्रदान करती है। इसलिए हमको सदैव मानवीय सद्गुणों को ग्रहण करने का ही प्रयत्न करना चाहिये ताकि मनुष्य जीवन का प्राप्ति का सम्पूर्ण लाभ प्राप्त हो सके।
इस वर्ष दो चैत्र हो जाने से नवरात्रि अन्तिम चैत्र में होगी। ता. 13 अप्रैल 64 चन्द्रवार से ता. 21 अप्रैल मंगलवार तक 9 दिन का यह पर्व रहेगा। इस बीच में एक तिथि घट गई है पर नवरात्रि तो 9 रात्रि ही में ही पूरी होती है। इसलिए जिन्हें उन दिनों 9 दिन का 24 हजार गायत्री अनुष्ठान करना हो उन्हें 13 से 21 तक साधना करनी चाहिए।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
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वर्ष 25 सम्पादक - आचार्य श्रीराम शर्मा अंक 3
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एक व्यक्ति नित्य हनुमान जी की मूर्ति के आगे दिया जलाने जाया करता था। एक दिन मैंने उससे इसका कारण पूछा तो उसने कहा-”मैंने हनुमान जी की मनौती मानी थी कि यदि मुकदमा जीत जाऊँ तो रोज उनके आगे दिया जलाया करूंगा। मैं जीत गया और तभी से यह दिया जलाने का कम चल रहा है।
मेरे पूछने पर मुकदमे का विवरण बताते हुए उसने कहा- एक गरीब आदमी की जमीन मैंने दबा रखी थी, उसने अपनी जमीन वापिस छुड़ाने के लिए अदालत में अर्जी दी, पर वह कानून जानता न था और मुकदमें का खर्च भी न जुटा पाया। मैंने अच्छे वकील किए खर्च किया और हनुमान जी मनौती मनाई। जीत मेरी हुई। हनुमान जी की इस कृपा के लिए मुझे दीपक जलाना ही चाहिए था, सो जलाता भी हूँ।
मैंने उससे कहा-भोले आदमी, यह तो हनुमान जी की कृपा नहीं अकृपा हुई। अनुचित कार्यों में सफलता मिलने से तो मनुष्य पाप और पतन के मार्ग पर अधिक तेजी से बढ़ता है, क्या तुझे इतना भी मालूम नहीं। मैंने उस व्यक्ति को एक घटना सुनाई-’एक व्यक्ति वेश्यागमन के लिए गया। सीढ़ी पर चढ़ते समय उसका पैर फिसला और हाथ की हड्डी टूट गई। अस्पताल में से उसने सन्देश भेजा कि मेरी हड्डी टूटी यह भगवान की बड़ी कृपा है। वेश्यागमन के पाप से बच गया।
मनुष्य सोचता है कि जो कुछ वह चाहे उसकी पूर्ति हो जाना ही भगवान ही कृपा है। यह भूल है। यदि उचित और न्याययुक्त सफलता मिले तो ही उसे भगवान की कृपा कहना चाहिए। पाप की सफलता तो प्रत्यक्ष अकृपा है। जिससे अपना पतन और नाश समीप आता है उसे अकृपा नहीं तो और क्या कहें?
-बिनोवा
संसार में समय-समय पर जो भी समाज सुधारक और महापुरुष हुये हैं उन सब ने मानव-समाज में सुख-शान्ति तथा सुव्यवस्था बनाये रखने के लिये इस बात पर अधिक बल दिया है कि लोगों के अन्तःकरण निर्मल एवं पवित्र बनें। महात्मा युद्ध, महावीर, नानक, कबीर, रामतीर्थ, विवेकानन्द सुकरात, ईसामसीह प्रभृति महापुरुषों ने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये व्यापक जन-क्रान्तियाँ कीं। सामाजिक-उत्थान का आधार भी यही है कि अधिकाधिक लोग पवित्र-अन्तःकरण वाले हों।
मनुष्य के विचार क्षेत्र में एक शक्ति काम करती है जो सदैव उसके अच्छे-बुरे कर्मों की विवेचना किया करती है। जीवात्मा के भले-बुरे कर्मों की साक्षी देने वाली प्रवृत्ति का नाम ही अन्तःकरण है। दूसरे शब्दों में इसे विवेक बुद्धि कह सकते हैं। परमात्मा की मंगलमय वाणी, उनका सान्निध्य सुख प्राप्त करने का यही पुनीत स्थल है। अपने आप में ही इतनी महान सत्ता विद्यमान होते हुए भी लोग दुःखी एवं व्याधिग्रस्त क्यों हैं, यह विचारणीय बात है।
मनुष्य की अन्तःकरण में आसुरी और दैवी दोनों शक्तियाँ कार्य करती हैं। दुष्प्रवृत्तियाँ आसुरी प्रकृति के लोगों में होती हैं और सद्प्रवृत्तियाँ दिव्य स्वभाव के लोगों में पाई जाती है। विचारवान दूरदर्शी एवं आदर्शवादी लोगों का जब किसी राष्ट्र में बाहुल्य होता है तो वहाँ सुख-समृद्धि की परिस्थितियाँ आते देर नहीं लगती, किन्तु यदि दुष्ट दुराचारी अन्तःकरण के नर पिशाचों की ही अधिकता बनी रही तो मानव-समाज नारकीय यंत्रणाओं में ही फँसा रहेगा। सदाचारी व्यक्ति सुखद परिस्थितियों का निर्माण करते हैं पर अपवित्र अन्तःकरण के व्यक्ति औरों को पीड़ा ही दे सकते हैं।
युग परिवर्तन के लिये ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता है जो अपने चरित्र और व्यक्तित्त्व द्वारा जन-साधारण का मार्ग दर्शन करते हुये उन्हें सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकें। उपदेश देकर अथवा गीता रामायण वेद शास्त्र आदि कोई विशिष्ठ धार्मिक पुस्तक के द्वारा भी किसी को थोड़ी देर तक तो उत्साह दिलाया जा सकता है किन्तु दुष्प्रवृत्तियों के जागृत होते ही वह उत्साह ठण्डा पड़ जाता है। लोग फिर पहले जैसा जीवन क्रम अपना लेते हैं।
कहने का असर उतना व्यापक एवं प्रभावशील नहीं होता जितना कर दिखाने का। चोर, बदमाश, उठाईगीरों को किसी स्कूल कालेज में चोरी, बदमाशी का प्रशिक्षण नहीं किया जाता। दुराचार अच्छी बात है यह किसी पुस्तक में लिखा नहीं मिलेगा। फिर भी हजारों की संख्या में लोग इन कुत्सित कर्मों को करते हैं। इसका कारण बुरे लोगों के बुरे चरित्र को देखकर प्राप्त हुई बुरी निष्ठा है जिससे प्रभावित होकर दूसरे लोग भी बुरी आदतों के शिकार हो जाते हैं।
यही बात सदाचार के क्षेत्र में भी लागू होती है। लोग सदाचार और सद्प्रवृत्तियों का भी वैसे ही निष्ठापूर्वक अनुकरण करते हैं जैसे दुष्ट दुराचारी दुष्प्रवृत्तियों का। पिछले दिनों जब भारत में चीनी आक्रमण हुआ तो राष्ट्र रक्षार्थ अपना सब कुछ न्यौछावर कर देने की बाढ़-सी आ गई थी। बच्चे, अपंग अपाहिज तथा भिखारी भी इस काम में पीछे नहीं रहे। उत्कृष्ट ईमानदारी के समाचार, अपने को खतरे में डालकर औरों को बचाने के दृष्टान्त आये दिन समाचार पत्रों में छपा करते हैं। इनसे भी लोगों को वैसी ही प्रेरणा मिलती है जैसे बुराइयों से बुरे कर्मों को प्रोत्साहन मिलता है।
सुख सभी को अभीष्ट है पर यह कम ही लोग जानते हैं कि सच्चा सुख कहाँ है। यह सुख अन्यत्र नहीं हमारी भावनाओं में ही सन्निहित है। पर हम उसे ढूँढ़े भी तो। सुख प्राप्ति के लिये अन्तःकरण की पवित्रता आवश्यक है। उसकी प्राप्ति एवं अभिवृद्धि के लिये अपने भीतर के अवगुण देखना ढूँढ़ना और उनमें आवश्यक हेर-फेर करना होता है। जब कोई व्यक्ति गम्भीरतापूर्वक आत्म निरीक्षण करता है तो उसे अपने दोष दुर्गुण सहज ही दिखाई देने लगते हैं। विचार-शील मनुष्य ऐसे प्रयत्न करता है कि वह बुराइयों से बचा रहे क्योंकि वे ही उसके लक्ष्य सिद्धि के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करती हैं।
असत्य के स्थान पर सत्य को, द्वेष भाव के स्थान पर आत्मीयता को, आलस्य व प्रमोद के स्थान पर कर्मशीलता व सरलता को, भोग के स्थान पर त्याग भावना की प्रतिष्ठापना कर देने पर मनुष्य कुविचारों और कुकर्मों से बच सकता है। अन्तःकरण की निर्मलता में विक्षेप पैदा करने वाली आसुरी प्रवृत्तियाँ ही मनुष्य को कुकर्मों की ओर प्रेरित करती रहती हैं। यदि इनसे बचने का प्रयत्न किया जाय तो मनुष्य सहज ही में अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।
सुख प्राप्ति के उपाय बताते हुये स्वामी विवेकानन्द ने लिखा है “दयाशील अन्तःकरण प्रत्यक्ष स्वर्ग है।” दया मनुष्य का वह सद्गुण है जो अन्तःकरण की स्वाभाविक निर्मलता बनाये रखता है। दयावान व्यक्ति सब में अपना ही आत्मा निहारता, स्वार्थ के तुच्छ आवरण को तोड़कर समष्टि में फूट पड़ता है। तुच्छ न रहकर महानता की ओर अग्रसर होना है। सुख का अनन्त स्त्रोत इसी में है कि मनुष्य अपने आपको विश्वात्मा में घुला दे। संकीर्ण मनोवृत्तियाँ पतन और दुःख का कारण होती हैं। दयावान अन्तःकरण में इन्हीं दिव्य भावनाओं के बाहुल्य से मनुष्य को स्वर्ग जैसी रसानुभूति होती है।
परमात्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान पाने के लिये ऋषियों ने अन्तःकरण की शुद्धि पर विशेष बल दिया है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये उन्होंने निष्काम कर्मयोग की महत्ता प्रतिपादित की है। ताकि मनुष्य विषयासक्ति से बचा रहकर अपने चरम लक्ष्य की प्राप्ति के लिये सतत प्रयत्नशील बना रहे। अनुपयुक्त कामनाओं के बाहुल्य से आन्तरिक मलिनता का उदय होता है। ऐसे तमसाच्छन्न अन्तःकरण को इतना समय कहाँ मिलता है कि वह महाविराट के साथ सान्निध्य और उससे प्राप्त होने वाले असीम दुख की कल्पना कर सके। सन्तकवि तुलसीदास की वाणी में अवतरित हुये भगवान राम ने स्वयं कहा है :-
निर्मल जन जो सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।
मुझे वही प्राप्त कर सकता है जिसका अन्तःकरण निर्मल हो। छल और कपट परमात्मा को प्रिय नहीं फिर इनके रहते उनकी प्राप्ति कैसे सम्भव हो सकती है।
मैले शीशे में सूर्य की किरणों का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता। उसी प्रकार जिनका अन्तःकरण मलिन और अपवित्र है उनके हृदय में ईश्वरीय प्रकाश का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ सकता। इसलिये उनकी प्राप्ति के लिये अपने अन्तःकरण को पवित्र बनाइये। आपको औरों के हित साधन में भी प्रवृत्त होना है सो विशाल अन्तःकरण धारण कीजिये। जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उसे स्वच्छ और निर्मल बनाइये। तभी मानव-जीवन की सार्थकता है।
अन्तःकरण की निर्मलता मनुष्य को बाह्य गतिविधियों सहिष्णु भाव, मुखाकृति में सौम्यता और व्यवहार में उदारमना होने से परिलक्षित होती है। जिनका अन्तःकरण पवित्र और विशाल होता है उन्हें कभी मित्रों का अभाव न रहेगा। आप दूसरों से यदि सम्मान और सहयोग पाना चाहते हैं तो इसका एक ही उपाय है, अपना अन्तःकरण छल रहित बनाइये। उज्ज्वल व्यक्तित्व की यही परख है कि व्यक्ति का अन्तरात्मा कितना पवित्र है।
धरती में देवत्व का विकास और दनुजता का विनाश हो इसके लिये पवित्र अंतःकरण के व्यक्तियों की अधिकता होना आवश्यक है। देवत्व के विकास का प्रथम सोपान मानव का निर्मल अन्तःकरण ही माना गया है। इसके बिना अणु से विभु, लघु से महान बनने की अभिलाषा अधूरी ही बनी रहेगी। अपवित्र अन्तःकरण बना रहा तो दिव्य दृष्टि का उदय होना असम्भव है। आन्तरिक निर्मलता एवं पवित्रता में वह शक्ति है। जो अन्य साधनों के अभाव में भी जीवन लक्ष्य की प्राप्ति करा सके।
अन्तःकरण को अशुद्ध वासनाओं से बनाइये। उसकी पवित्रता पर किसी भय या प्रलोभन का कुठाराघात न होने दीजिये। पापी अन्तःकरण की यन्त्रणा ही वह नरक है जो जीवित व्यक्ति को प्रतिक्षण पश्चाताप की आग में जलाती रहती है। ऐसा व्यक्ति न तो स्वयं चैन पाता है न दूसरों को ही शाँतिपूर्वक रहने देता है। अशाँति का कारण प्रताड़ना पूर्ण पापी अन्तःकरण ही हुआ करता है। यदि उसे कुत्सित प्रवचनों से बचाया जा सके तो सर्वत्र ही मंगलदायक परिस्थितियाँ दिखाई देने लग पड़ेगी।
मानस तीर्थों का वर्णन करते हुए महर्षि अगस्त्य ने पवित्र अन्तःकरण को सब तीर्थों का राजा कहा है :-
सत्य तीर्थ क्षमा तीर्थ तीर्थ मिन्द्रिय निग्रहः।
सर्व भूत दया तीर्थ तीर्थ मार्जव मेव च॥
दान तीर्थ दमस्तीर्थ सन्तोषस्तीर्य मुच्यते।
ब्रह्मचर्य परं तीर्थ तीर्थ न प्रियवादिता॥
ज्ञानं तीर्थ, घृतिस्तीर्थ तपस्तीर्थ मुदाहृतम्। तीर्थानामपि तत्तीर्थ विशुद्धिर्मनसः परा।
“सत्य तीर्थ है, क्षमा तीर्थ है, इन्द्रियों पर नियंत्रण करना भी तीर्थ है। सब प्राणियों पर दयाभाव, जीवन की सरलता ये भी तीर्थ हैं। दान तीर्थ है, मन का संयम तीर्थ है। संतोष और ब्रह्मचर्य का पालन ये उत्तम तीर्थ हैं। प्रिय वचन बोलना भी तीर्थ है। ज्ञान तीर्थ है, धैर्य तीर्थ है, तप को भी तीर्थ ही माना गया है किन्तु अन्तःकरण की शुद्धि तो इन सब का तीर्थराज है।”
इसमें संदेह नहीं कि धर्म अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्ति का प्रमुख आधार आन्तरिक निर्मलता है जिससे व्यक्ति में अच्छे कर्मों की निष्ठा जागृत होती है। सत्कर्मों से दूसरे लोगों में भी सद्भावनायें जागृत होती है। यदि आप दूसरों से सद्कामनाओं की, निश्छल-आत्मीयता की अपेक्षा रखते हैं तो आपको भी दूसरों के प्रति अपना अन्तःकरण निर्मल और पवित्र बनाना पड़ेगा।
दूसरे लोग कदाचित आपके साथ ईर्ष्या द्वेष रखते हों, किसी कारण आपके साथ उनका मनोमालिन्य चल रहा हो तो भी आप अपनी आन्तरिक निर्मलता बनाये रखिये। उनके प्रति शिष्ट एवं सदाचार का ही प्रदर्शन कीजिये। इससे आप अपनी सरलता बनाये रख सकेंगे। इसी आन्तरिक सदाचार की रक्षा की पुष्टि करते हुये तपस्वी वाल्मीकि ने लिखा है :-
न परः पापमादत्ते परेषाँ पाप कर्मणाम।
समयों रक्षितव्यस्तु सन्ताश्वारित्र-भूषणाः॥
“श्रेष्ठ पुरुष पापचारियों के पाप नहीं ग्रहण करते। उन्हें अपराधी मान कर उनसे बदला भी नहीं लेते। इस उत्तम सदाचार की रक्षा करना धर्म है क्योंकि सदाचार ही सत्पुरुषों का भूषण है।”
आप यदि ईर्ष्या द्वेष की, आलस्य और प्रमाद, वासना और अहंकार की तुच्छ आँधी में भटक रहे है तो एक क्षण रुक कर शान्तिपूर्वक विचार कीजिए। अपने विवेक को जागृत कीजिये। विश्वास कीजिये। यदि दूसरों को पीड़ित करके आप कुछ सफलता पा भी लें तो इससे आपका भला होना सम्भव नहीं। इसके बदले तो आपको पश्चात्ताप की आन्तरिक यन्त्रणायें ही मिलेंगी। इनसे तो लोक-परलोक सभी कुछ बिगड़ने वाला है।
उचित यही है कि अन्तःकरण की दैवी शक्ति को जागृत कीजिये और देवत्व के विकास में निष्ठापूर्वक लग जाइये। हजारों करोड़ों जन्मों के पश्चात मिले मनुष्य शरीर को पाप परिताप की भट्टी में झोंके देना बुद्धिमानी नहीं। इससे तो आप जीवन लक्ष्य से दूर ही होते चले जायेंगे। आज आपको जो सुअवसर मिला है उसका सदुपयोग कीजिये। अमूल्य मानव जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम अपने जीवन लक्ष्य की प्राप्ति में प्रयत्नशील हों। इसके लिये सर्वप्रथम हमें अपने अन्तःकरण को ही निर्मल और पवित्र बनाना पड़ेगा।
ईश्वरचन्द विद्यासागर एक दिन अपने मित्र के साथ एक गाँव जा रहे थे। रास्ते में हैजा से आक्रान्त एक दीन-हीन व्यक्ति मूर्छित अवस्था में पड़ा मिला। विद्यासागर उसकी सफाई करने पास के अस्पताल में पहुँचाने का उपक्रम करने लगे।
साथी मित्र ने कहा- हम लोग आवश्यक काम से जा रहे हैं। उस छोटे काम को कोई और कर लेगा, हम लोग अपना कार्य क्यों छोड़े?
विद्यासागर ने कहा- मानवता की सेवा से बढ़ कर और कोई काम बढ़ा नहीं हो सकता। उस निस्सहाय पीड़ित की उपेक्षा करके अपनी निष्ठुरता ही तो हम लोग प्रमाणित करेंगे। निष्ठुर व्यक्ति कोई कार्य भला नहीं कहा जा सकता।
यतोऽभ्युदनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।
अर्थात्-’धर्म वह है जिससे इस लोक में अभ्युदय हो और अन्त में मोक्ष की प्राप्ति हो।’
इस न्याय के अनुसार जिसने धर्म का पालन किया वही अपने जीवन को सार्थक बना सका। मनुष्य, पक्षी, पशु आदि सभी अपने-अपने स्वाभाविक धर्म का निर्वाह करते हैं। धर्म ही इहलोक और परलोक का निर्माता हो। वही एक ऐसा सुगम मार्ग है जो जीवन नैया को पार लगाने में सहायक होता है।
धर्म उस सर्वव्यापक परमात्मा का श्रेष्ठ विधान है। वही सम्पूर्ण जगत का धारण करने वाला है। उसी के सहारे पृथिवी और आकाश टिके हुए हैं। समुद्र अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता यह उसका धर्म है। जल-वृष्टि करना मेघ का धर्म है। दग्ध करना अग्नि का धर्म है। इसी प्रकार सब अपने-अपने धर्म पर अटल हैं।
एक बार एक राजा ने अपराधी के तर्क का उत्तर देते हुए कहा-’सर्प का धर्म काटना है, वह मनुष्य को काट खाये तो उसका कुछ अपराध नहीं है, अपराधी उस मनुष्य का है जिसने सर्प के बिल में हाथ डाल कर अपने स्वभाव के विरुद्ध कार्य किया।’
ईश्वर जैसे अनादि और सनातन है, वैसे ही धर्म भी सनातन है। जिसने धर्म के विरुद्ध कार्य किया, यही नष्ट हो गया। रावण, कंस, दुर्योधन आदि अनेक महाबलवानों का उदाहरण दिया जा सकता है जो धर्म के विपरीत चल कर नष्ट हो गए। उनके कुलों में कोई रोने वाला भी उस समय तो शेष नहीं बचा।
विभिन्न मतमतान्तरों को धर्म कह दिया गया है। विभिन्न सम्प्रदायों को भी धर्म कहा गया। परन्तु, न तो मतमतान्तर धर्म हैं और न सम्प्रदाय ही। वे तो धर्म की ओर ले जाने वाले मार्ग हैं। उनमें से किसी भी मार्ग को अपना लीजिए, वह आपको एक लक्ष्य की ओर ले जायेंगे। उन मार्गों से जो शुभ कर्म हैं, उन्हीं का समूह धर्म है। उनमें जो विभिन्न आडम्बर आदि हैं, वे यथार्थ न होने से त्याज्य हैं। अतः धर्म श्रेष्ठ कर्मों का ही रूपांतर है।
मनुष्य यह मानले कि आत्मा सबका एक ही है तो उसकी समझ में यह बात आ जायगी कि दूसरे को दुःख हुआ तो अपने को ही हुआ। यदि आपने किसी को सुख पहुँचाया तो प्रकारान्तर से अपने को ही पहुँचाया। अर्थात् दूसरे का दुःख-क्लेश अपना ही मानना चाहिए।
सभी प्राणी अपने-अपने कर्म का फल भोगते हैं। यदि कोई समझे कि आज ही किसी का हाथ काट कर उसका परिणाम देखे कि आज ही मेरा हाथ कटता है या नहीं तो तुरन्त सी कोई बात नहीं होती परन्तु उसके दुष्कर्म का फल कालान्तर में मिलता अवश्य है। बहुत-सों को तो तत्काल भी मिल जाता है। यह आवश्यक नहीं कि फल उसी प्रकार हाथ कटने से मिले, बल्कि वह किसी भी प्रकार से सही, भुगतना अवश्य पड़ता है।
एक बार की बात है-एक बच्चे को किसी कुत्ते ने काट खाया, लोगों की समझ में कुत्ता पागल नहीं था, अतः बच्चे का साधारण उपचार हुआ और वह ठीक भी हो गया। परन्तु पाँच-सात वर्ष बाद अकस्मात उसके शरीर में भीषण दर्द हुआ। डाक्टरों ने बहुत सोच विचार के पश्चात निर्णय किया कि इसे कभी कुत्ते ने काटा है उसी का विष इस समय उभर आया है।
अब सोचिए कि कब का विष कब उभरा। इसी प्रकार हमारा कब का बुरा कर्म न जाने कब उभर आवे। इसलिए दूसरों के अनिष्ट-चिंतन से बचना चाहिए। उसका परिणाम अपने लिए ही अहितकर होता है।
हम सब एक परमात्मा द्वारा उत्पन्न पुत्र हैं इसलिए परस्पर भाई-भाई हैं। तो एक भाई अपने दूसरे भाई को दुःख क्यों देना चाहेगा?
ईश्वर सब का रक्षक है। एक व्यक्ति दूसरे को दुःख देना चाहे तो वह दुःखी और निर्बल की सहायता करेगा। भगवान अत्याचारी का साथ कभी नहीं देते। वे उसी पलड़े पर बैठते हैं जो हलका हो। परन्तु धर्म उसके साथ होना चाहिए। अधर्मी मनुष्य के वे साथी नहीं हैं। जिसे उनकी आवश्यकता नहीं उसके पास वे कभी नहीं जाते। सन्तों ने निर्बल के बल राम कहकर इस बात की पुष्टि की है।
सभी तत्वज्ञानी जानते हैं कि परमात्मा ही उत्पत्ति, पालन और विनाश करते हैं। वही इस जीव को अपनी माया में भ्रमाते और वही उससे निकाल लेते हैं। आप कहेंगे कि जब परमात्मा को ही हमारी चिन्ता है तो हम क्यों अपनी चिन्ता करें? आपका यह तर्क ठीक तो है। परन्तु आपने कभी यह भी सोचा है कि आपके गमनागमन के लिए सुन्दर मार्ग तो बना है, परन्तु उस पर चलना आपको ही पड़ेगा। अपने पाँवों को कष्ट दिए बिना आपका कही भी जाना-आना संभव नहीं है।
इससे यह सिद्ध हुआ कि कर्म किए बिना सब निरर्थक है। कर्म ही धर्म है। उसी का पालन करने से सुख शाँति मिलेगी। हम जो कुछ करें उसमें अपना ही लाभ न देखें। आपके कर्म से दूसरों की हानि न हो। लाभ हो तो बहुत ही अच्छा है। लाभ न हो तो हानि भी तो नहीं होनी चाहिए।
इसे दूसरे प्रकार से भी समझिए-आप किसी की हानि करेंगे तो जिसकी हानि हुई है, उसके मन में द्वेषाग्नि उत्पन्न हो जायगी और जब कभी अवसर मिलेगा, वह आपको भी हानि पहुँचाने का यत्न करेगा। आप चाहें कि आप जिससे द्वेष करते हैं वह आपसे प्रेम करे तो यह कभी संभव नहीं है। प्रेम के बदले में प्रेम पाया जा सकता है, द्वेष के बदले प्रेम कैसे मिलेगा?
ऐसे महापुरुष भी हैं जो द्वेष के बदले में प्रेम प्रदान करते हैं परन्तु, उनकी गणना साधारण मनुष्यों में नहीं की जा सकती। वे तो पहुँचे हुए पुरुष होंगे जिन्होंने राग द्वेष को त्याग दिया है। वे प्राणी मात्र के प्रति प्रेम और दया का भाव रखते हैं। उन्हें अपने से द्वेष रखने वाले के प्रति शत्रुता नहीं होती और स्नेह करने वाले से प्रेम नहीं होता। उनका धर्म विश्व का कल्याण करने वाला है।
एक बात और है-आप किसी शत्रु से प्रेम करते हैं तो वह शत्रु आपसे द्वेष कब तक करता रहेगा? उसे एक दिन अवश्य झुकना पड़ेगा आपके सामने। वह विवश हो जायगा अपना शत्रु-भाव त्यागने के लिए। इसमें दोनों का हित भी है तो क्यों हम ऐसे मार्ग पर चलें जो हमारे लिए अहितकर है? हम क्यों न उसका और अपना दोनों का कल्याण सोचें? यदि हम ऐसा आचरण करने लगें तो कोई झंझट ही सामने न आवे फिर कोई विवाद जीवन के क्षेत्र में बाधक न बने।
मनुष्य के समान ही पशु, पक्षी आदि को पीड़ित करना भी अधर्म है। जब हमें कोई शक्तिशाली व्यक्ति पीड़ित करे तो हमें स्वयं तो कष्ट होता ही है, साथ ही हमारा मन उस पीड़क को कोसता भी है, उसी प्रकार आज जिस निर्बल को सतायेंगे तो वह भी आपको शाप देगा। आपके द्वारा किये गए अन्याय की प्रतिक्रिया स्वरूप उसका प्रतिफल भी आपको ही भोगना पड़ेगा।
आज अत्याचारी अपने अन्याय पर भले ही मुस्करा ले, परन्तु जब अन्त समय आयेगा और अट्टहास करती हुई मृत्यु अपना भयंकर पंजा तेजी से जकड़ने का यत्न करेगी उस समय अपने कुकृत्यों पर पश्चात्ताप करने के सिवाय और कुछ भी न बन पड़ेगा।
परमात्मा द्वारा रची गई सृष्टि में सभी जड़ चेतन प्राणी अपने-अपने सामर्थ्यानुसार एक दूसरे का उपकार करते हैं। वे एक दूसरे का विनाश नहीं, उत्कर्ष चाहते हैं। जब पशु-पक्षियों तक उपकार की भावना भरी है तो हम मनुष्य होकर भी दूसरों का उपकार क्यों न करें?
हमें परोपकारी बनना चाहिए। दूसरों को कष्ट में पड़ा देखकर उनके साथ सहानुभूति का व्यवहार करें तो इससे परमात्मा भी प्रसन्न होते हैं। पड़ोसियों से सद्व्यवहार करना ही हमारे धर्म में सम्मिलित है। इसलिए हमें ऐसी चेष्टा करनी चाहिए जिससे हमारे द्वारा किसी को कोई कष्ट न होने पावे।
हमारे ऋषियों ने मानव धर्म की जो व्याख्या की है, उसका सार यही है कि मनुष्य यदि ईश्वर को मानता है और उसका धर्म में विश्वास है तो उसे सदाचारी सत्यनिष्ठ और सत्यवक्ता होना चाहिए। दया, प्रेम, क्षमा आदि गुण जिस मनुष्य में है, वह सभी का प्रीति-भाजन बन सकता है। अतः अपना कल्याण चाहते हो तो धर्म-मार्ग का अवलम्बन करो। इसी में सब प्राणियों का परम हित है।
यह संसार एक रस नहीं है। यहाँ शीत भी है उष्णता भी दिन है तो रात भी जन्म का सम्बन्ध मृत्यु के साथ सदैव से चला आ रहा है। एक-सी परिस्थिति कहीं भी दिखाई नहीं देती। प्रत्येक स्थिति का विपरीत भाव अवश्य मिलेगा। सुख और दुःख भी ऐसे ही उभय संयोग हैं। यह सर्वत्र न सुख है न दुःख। दोनों समान रूप से विद्यमान है। देखने में एक स्थिति भली दूसरी हेय लगती है। सुख सभी चाहते ओर दुःख को सर्वथा त्याज्य समझते हैं, किन्तु यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो दोनों ही उपयोगी और आवश्यक, प्रतीत होते हैं। धनात्मक और ऋणात्मक विद्युत धाराओं के संयोग से जैसे प्रकाश का उद्भव होता है, वैसे ही जीवन को गतिवान बनावे रखने के लिये सुख भी आवश्यक है और दुःख भी। एक-सी परिस्थिति का परिणाम अगति, स्थिरत्व और जड़ता है। एक के बिना दूसरे का महत्व ही न रहेगा। विरोधाभासों को एक दूसरे का प्रतिपक्षी नहीं पूरक मानना चाहिये।
कोई व्यक्ति चाहे कि वह कठिनाइयों, दुःख, मुसीबतों से तो बचा रहे और जिस कार्य में हाथ डाले उसमें सफलता ही मिले तो इस आकाँक्षा को बुद्धिसंगत नहीं कहा जायेगा। विपत्तियों से बचकर, लुक-छिपकर, पीछा छुड़ाकर कोई आँशिक सफलता भले ही प्राप्त कर ले किन्तु लक्ष्य तक पहुँचने, पूर्णता प्राप्त करने के लिये इनसे संघर्ष करना ही पड़ेगा। दुःख मनुष्य के हित के लिये परमात्मा के वरदान स्वरूप आते हैं। इनसे घबड़ाना, दुःख के समय दुःखी चिन्तित एवं परेशान होना मौत के समान है। दुःखों से निराश हो जाने पर मानवीय विकास का पथ रुक जाता है। जीवन कठिनाइयों से भरी एक चुनौती है जिसका धैर्य साहस और निष्ठापूर्वक सामना करना ही पुरुषार्थ है। आत्म विकास की शुरुआत यहीं से होती है।
कहते हैं “मुसीबत कभी अकेले नहीं आती। उसके बाल बच्चे भी साथ होते हैं।” अभी एक कठिनाई से छूटे नहीं कि दूसरी आ धमकी। स्वास्थ्य ठीक हुआ नहीं कि व्यापार से घाटा आ गया। कर्ज पूरा किये दो दिन ही हुए थे कि किसी परिजन की मृत्यु हो गई। पानी की लहरों के समान एक पर एक मुसीबतें दौड़ी चली आती हैं। ऐसे समय पर लोगों के हाथ पाँव ठण्डे पड़ जाते हैं। बुद्धि काम नहीं देती। पाँव लड़खड़ा जाते हैं। आशंका रहती है कि फिर कोई नई मुसीबत न खड़ी हो जाय, इस दुश्चिन्ता के मारे अधमरे हो जाते हैं। किन्तु जो अटल प्रारब्ध है उससे भय क्यों? आने वाली कठिनाई के प्रति कायरता कैसी?
जीवन का संग्राम है। इसे कायरों को भी लड़ना पड़ता है, शूर-वीरों को भी। किसी के हाथ संगीन पकड़ते काँपते हैं तो कोई जान की बाजी लगा कर दुश्मन के साथ चार हाथ दिखाता है। कठिनाइयाँ, दुःख, मुसीबतें ऐसे ही शत्रु हैं जिनसे हमें लड़ना ही पड़ेगा। इनसे पीछा छुड़ाना असम्भव है। फिर इन्हें साहस के साथ क्यों न ललकारे? क्यों न वीर योद्धाओं के समान इनसे जूझें? जीवन संग्राम में वही विजय पाता है जो कठिनाइयों से रक्त की अन्तिम बूँद रहने तक, जीवन की अन्तिम साँस तक लड़ता है। जीवन का श्रेय भी इसी में है कि मुसीबतों में घबड़ाये नहीं, उनके साथ संघर्ष करें।
सृष्टि के आदि से मरे हुए व्यक्तियों की सूची बनाना यदि सम्भव रहा होता तो संसार का सारा कागज इस कार्य के लिये खल जाता। पर जिन्हें आज भी दुनिया जानती है इनका नाम लिखें तो एक पुस्तक भी पूरी न होगी। यहाँ नाम उन्हीं का अमर रहता है जो महान संकल्प लेकर आते हैं, जो औरों के हित एवं कल्याण के लिये अपना जीवन होम देते हैं, वही युगों तक जीवित रहते हैं वे ही आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा व प्रकाश देते हैं। जो केवल रोजी-रोटी, पुत्र-कलत्र तक ही सीमित रहा उसकी साँस भले ही चलते रहे, मृतक ही समझा जायेगा। दूसरों के लिये अपनी हड्डियाँ दान कर देने वाले परमार्थी पुरुष ही संसार में जीते हैं।
मनुष्य की अनेकों इच्छायें होती हैं। स्वस्थ शरीर की, प्रचुर धन की, सुन्दर सुशील स्त्री आदि की। वह अनेकों कामनायें करता है, पर परिस्थितियाँ प्रतिरोध करती हैं, जिससे उसके सुख, तृप्ति में बाधा पड़ती है। इससे वह दुःख का अनुभव करने लग जाता है। यहाँ तक कि उसे जीवन एक दुःख-सा लगने लगता है। जन्म होते ही मृत्यु की पग-पग पर आशंका, धन बढ़ते ही चोरों का भय, पद बढ़ते ही औरों की ईर्ष्या, विद्वेष और मनोमालिन्यता, यही तो होता है। दुख के पीछे फिर सुख रहा ही कहाँ? तब तो सचमुच जीवन दुःखों का घर ही लगने लगता है। फिर क्या भयभीत होकर आज जिस परिस्थिति में पड़े हैं उसी में बने रहें? इससे तो मानव के विकास का मार्ग ही रुक जायेगा। लघु से महान बनने की प्रक्रिया ही मारी जायेगी। कर्मवीर पुरुष दुःखों से घबड़ाते नहीं उन पर विजय पाने का सदैव प्रयास करते रहते हैं।
जीवन का खेल है। ठीक बच्चों जैसा ही। बालक क्रीड़ा और विनोद के लिए भावी जीवन की तैयारी के लिए खेल खेलते हैं। हमें भी अपनी आत्मा का विकास करते हुए पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये जीवन का खेल खेलना पड़ता है। यह क्रम अनादि काल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा। जन्म, पालन-पोषण, विकास, सुख-सुविधाओं की प्राप्ति के लिये आपा-धापी, कठिन परिस्थितियाँ, संघर्ष-वृद्धावस्था मृत्यु आदि का क्रम सदैव ऐसे ही चलता रहेगा। कितने ही युग बदल गये किंतु यह खेल वैसे ही चल रहा है। परिस्थितियाँ भिन्न हो सकती हैं, पात्र भिन्न हो सकते हैं। किन्तु सांसारिक खेल का तारतम्य सदैव ऐसे ही ही चलता रहेगा। फिर सुख प्राप्ति के क्षणों में मदान्ध हो उठना, दुःख के क्षणों में बेतरह छाती पीटना, इसे कौन बुद्धिमत्ता का कार्य मानेगा। जीवन वही जीता है जा इसे खेल की तरह खेलता है। वही चतुर है वही सुजान है।
जीवन एक स्वप्न है। स्वप्न में मनुष्य कभी अपने को राजा के रूप में देखता है, कभी सुन्दर पक्षी आदि के रूप में। उसकी मानसिक चेष्टायें भी उस समय की अवस्था के अनुरूप होती हैं। सुख, दुःख, मिलन, विछोह, हँसने प्रतीत होते हैं। पर जैसे ही नींद टूटी कि पिछले स्वप्न की गतिविधियों की याददाश्त मात्र रह जाती है। हमारा जीवन भी अगले महान जागरण का स्वप्न जैसा ही है। पर इसकी सार्थकता तब है जब आज इसे सच माने और आत्मा के जागरण, परमात्मा की प्राप्ति के लिये आज के साधनों को उपयोग में लायें। स्वप्न का जैसा आभास तो केवल इसलिये है कि हम जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के महत्व को समझें। सत्य की शोध में अपना जीवन लगायें, तभी यह समझा जायगा कि यह स्वप्न देखना भी सार्थक हुआ।
जन्म के दिन से एक-एक दिन मनुष्य मृत्यु की ओर बढ़ता है। जीवन भर वह नाना जंजालों में फँसा पड़ा रहता है। माया, मोह, कामनाओं और वासनाओं से घिरा हुआ इन्सान वह सोच भी नहीं पाता कि उसका लक्ष्य क्या है। आये दिन अनेकों को मृत्यु के घाट उतरते देखता है किन्तु कभी विचार नहीं करता कि यह घटना आखिरकार उसके साथ भी घटित होने वाली है। महाभारत के रचयिता में इस पर महान आश्चर्य प्रकट करते हुए लिखा है।
अहन्यहनि भूतानिक गच्छन्ति यम मन्दिरम।
शेषाः स्थिरत्व मिच्छनित किमार्श्चय मतः परम॥
अर्थात्-”प्राणी निरन्तर काल के गाल में चले जा रहे हैं। यह देखते हुए भी शेष लोग सदा रहने की कामना कर रहे हैं, इससे बढ़कर आश्चर्य की बात क्या होगी?” मौत के मुँह से कोई बच नहीं सकता। एक एक करके सभी को काल के गाल में समा जाना है। यह जानते हुए भी कभी यह विचार तक जागृत नहीं होता कि हम क्या हैं? कहाँ से आये हैं और हमारा लक्ष्य क्या है? मौत की छाया हर किसी के साथ छाया की भाँति घूमती है पर लोग कभी उस पर विचार तक नहीं करते, सोचते तक नहीं।
जीवन एक महान यात्रा है। रास्ते में चलते राहगीर को कभी साफ सड़क तो कभी कंटीले जंगल पार करने होते हैं। कहीं पहाड़ हैं पर रास्ते की थकान से वह घबड़ा कर बैठ नहीं जाता। जीवन भी ऐसी ही यात्रा है। सच्चे राहगीर की तरह जीवन के उतार चढ़ावों के बीच भी अपने लक्ष्य के प्रति लगन और तत्परता बनाये रखें तो देर-सबेर मंजिल तक पहुँच जाना निश्चित समझिये। सुखों-दुःखों को पथ की धूप-छाँव मानें। इनमें आसक्त न हो। कोई व्यक्ति यदि सुखों की छाया में ही विश्राम करते रहना चाहे तो उसे बुद्धिमान न कहा जायेगा। ऐसी स्थिति में उसका जीवन लक्ष्य भी पूरा हो पाना सम्भव न होगा।
जीवात्मा का ध्येय है अनन्त आनन्द की प्राप्ति। उसकी माँग है-”मृत्योर्माऽमृतं गमय।” मृत्यु से अमरत्व की ओर जाने की उसकी चिर अभिलाषा है। नदियाँ अपने आप में सन्तुष्ट न होने से समुद्र की ओर दौड़ी चली जाती हैं। पहाड़ आकाश की विशाल सीमा लाँघने को उतावले खड़े हैं। हवा को एक स्थान पर चैन नहीं। सूर्य, चन्द्रमा, तारे कुछ और अधिक पाने के लिये निरन्तर गतिशील रहते हैं। यह प्रतिक्रिया संसार के प्रत्येक परमाणु में चल रही है-किसी को भी अपने आप में सन्तोष नहीं मिलता। जड़ व चेतन सभी पूर्णता के लिये गतिवान हैं। स्थिरता में, जड़ता में, अपने आप ही में किसी को आनन्द की उपलब्धि नहीं हो रही इसलिये सब के सब अपने स्वत्व को किसी सत्ता में घुला देने के लिये सतत् क्रियाशील दिखाई देते हैं।
ऐसी ही प्रक्रिया जीवात्मा की है। वह अपने ही दायरे से सन्तुष्ट नहीं। व्यष्टि में उसे अनन्त की प्राप्ति नहीं होती तो वह समष्टि की आत्मा का पावन स्पर्श करने के लिये बेचैन है। जीवात्मा जब तक अपने उद्गम विश्वात्मा के दर्शन नहीं पा लेता, जब तक अन्तर्यामी सत्ता के साथ एक प्राण नहीं हो लेता तब तक उसे चैन नहीं। अब इस प्रतिज्ञा की पूर्ति में लग जाना ही उचित है। जीवन और मृत्यु के प्रश्न को देर तक ठुकराया जाना अच्छा नहीं। आत्म चिन्तन की प्रवृत्ति बनाने से अपनी प्रतिज्ञा के प्रति जागरुक बने रहना सम्भव है। मृत्यु का सदैव ध्यान बनाये रखने से पथ से गिरने के भय से सहज ही बचा जा सकता है।
जीवन एक सौंदर्य है। यहाँ वह सारी मंगलमय परिस्थितियाँ विद्यमान हैं जिनके सहारे मनुष्य अपनी विकास यात्रा आसानी से पूरा कर सकता है। परमात्मा से प्रेम एवं आत्मीयता स्थापित करने का अच्छा तरीका यह है कि हम उसका अभ्यास परिजनों से प्रारम्भ करें। संसार में सबके साथ सत्य का व्यवहार करें, न्याय रखें और सहिष्णुता बरतें। स्वार्थ की अहं वृत्ति का परित्याग कर परमार्थ के विशाल क्षेत्र में पदार्पण करें। इससे दिनों-दिन मनुष्य विराट की ओर अग्रसर होता चलेगा। साँसारिक सौंदर्य की उपेक्षा करके कोई व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता। कर्त्तव्य को तिलाँजलि देकर कोई लक्ष्य नहीं पा सकता। विश्वात्मा का साक्षात्कार छलाँग लगाकर पाना सम्भव नहीं, इसके लिये तो जीवन-सौंदर्य की उपासना ही करनी पड़ेगी। यही रास्ता सर्वसुलभ है और सरल भी।
इस संसार में स्वार्थ की अहंकारपूर्ण प्रवंचना से यदि बचा जा सके तो सब ओर अपना ही आत्मा बिखरा दिखाई देगा। स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे-”राम बादशाह के साम्राज्य में किस बात की कमी है? सारा संसार ही अपना है फिर अभाव कैसा।” यदि मनुष्य अपने समान औरों से भी प्रेम कर सके तो यहाँ सब ओर मंगलमय परिस्थितियाँ बिखरी दिखाई देंगी। जो स्वयं आनन्द-स्वरूप है उसकी रचना दुःखद क्यों होगी? दुःख का कारण तो मनुष्य का स्वार्थ ही है। पर जिन्हें सुख की कामना है उन्हें तो प्रेम की ही उपासना करनी चाहिये। जीवन का आनन्द भी इसी में है कि हम अपने आपको औरों के लिये घुला दें। दूसरों के कुछ काम आयें।
मनुष्य का जीवन एक शुभ अवसर है जो उसे हजारों लाखों योनियों में भ्रमण करने के बाद मिला है। इसे यों ही गँवा देना बुद्धिमत्ता की बात न होगी। जीवन भर लौकिक गोरखधन्धों में ही फँसे रहें तो इस अवसर का सदुपयोग कहाँ रहा। केवल धन और उसकी लोलुपता, स्वार्थ और उसकी पूर्ति, भोग और उसकी तृप्ति में फँसे रहना मनुष्य के लिये उचित नहीं। ऐसी जिन्दगी तो पशु-पक्षी भी बिता लेते हैं, फिर यदि मनुष्य भी इन्हीं हीन गतिविधियों में व्यस्त रहे तो उनमें और पशु-पक्षियों में अंतर ही कहाँ रहा।
आहार की आवश्यकता पशुओं को जैसी ही होती है जैसी मनुष्यों को। निद्रा, भय और काम-वासना भी दोनों में पाई जाती है, पर मनुष्य में धर्म-भावना होती है इसी से वह श्रेष्ठ है। धर्म-विहीन व्यक्ति और पशु समान ही कहे जायेंगे। आज जो जीवन हमें मिला है उसे आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर प्रगतिशील बनाना ही धर्म है। इसी में मानव भाव का कल्याण है।
देखने में आता है कि सुख-स्वास्थ्य, दूध-पूत, धन-दौलत, यश-मान सभी कुछ होते हुए भी अधिकाँश व्यक्ति दुःखी रहते हैं। कोई विरले व्यक्ति होंगे, जो परिवार के कीचड़ में फंस कर भी कमल की तरह उससे अलिप्त और अप्रभावित रहते हों। तब क्या नानकजी की यह वाणी सत्य है कि ‘नानक दुखिया सब संसार।’ किसी ज्ञानी ने सुख की परिभाषा इन शब्दों में की है- “इस सृष्टि में दुःख ही व्यापक है। दुःख के अभाव को ही सुख कहना उचित होगा।”
तब तो यह मानकर ही चलना अधिक कल्याणकर होगा कि सुख तो दो दिन का साथी है असल में दुःख ही चिरसंगी है। इस चिरसंगी के साथ जो व्यक्ति समझौता करना जानता है, उसे दुःख गहराई तक प्रभावित नहीं कर पाता। मनुष्य जीवन की सार्थकता इन साँसारिक रगड़े-झगड़े से ऊपर उठने में है, नहीं तो ये आप पर हावी हो जायेंगे। आपको पराजित कर आपकी आत्मिक शक्ति को मरोड़कर रख देंगे।
दुःख के मूल कारण माने जाते हैं अभाव, प्रियजन की मृत्यु, बीमारी, कुरूपता, शारीरिक बल की कमी, प्रेम में असफलता, ईर्ष्या, घृणा और डर की बातें।
उपर्युक्त परिस्थितियों में प्रत्येक व्यक्ति की अनुभूति विभिन्न प्रकार से हो सकती है। किसी व्यक्ति के लिए अभाव का मतलब है जीवन की दुनिया की जरूरतों को पूरा करने के साधनों की कमी। संतोषी मनुष्य भगवान से केवल इतना ही माँगकर सन्तुष्ट है कि-
साई इतना दीजिए, जामें कुटुम समय।
मैं भी भूखा ना रहूँ, अतिथि ना भूखा जाय॥
जब कि ठीक इसके विपरीत ऐसे लोग भी हैं कि सब कुछ पाकर भी तृष्णा के शिकार बने रहते हैं। उनकी ‘हाय और’ ‘हाय और’ की पुकार कभी बन्द ही नहीं होती। दुर्बल हृदय व्यक्ति को यदि जरा-सा जुकाम भी हुआ या 66 डिग्री भी बुखार हुआ तो वह दिन में दस बार अपनी नब्ज़ देखेगा और इसी चिन्ता में परेशान रहेगा कि शायद अब उसे निमोनिया होने जा रहा है, जब कि दूसरों की चिन्ता में रत परोपकारी व्यक्ति अपना दुःख दर्द भूलकर बीमारी और अभावों में भी सेवा कार्य करते देखे गए हैं। जीवन में असफलता दृढ़ निश्चयी को आगे बढ़ने की प्रेरणा देगी, जब कि एक निराशावादी को जीवन में मामूली-सी असफलता भी आत्मघात करने की हद तक पागल बना सकती है।
इससे यह प्रमाणित होता है कि प्रतिकूल परिस्थितियों को हम वास्तव में दुःख का कारण नहीं कह सकते। असल में यह प्रत्येक मनुष्य की अपनी-अपनी समझ, परख और जीवन के प्रति दृष्टिकोण है, जो कि अभाव, असफलता ओर प्रतिकूल परिस्थितियों को दुःख की संज्ञा देता है। अब देखना यह है कि क्या धन-दौलत, स्वास्थ्य, सौंदर्य, सन्तान, भोग-विलास आदि मनुष्य के जीवन को सुख, शान्ति और सन्तोष से भर देने में समर्थ है? क्या इनके द्वारा दुःख से छुटकारा मिल सकता है?
कर्मशील व्यक्ति के लिए तो धन हाथ का मैल है। उस को यदि कार्य में सफलता मिलती है तो यही उसका पुरस्कार है। हाँ, मेरा बैंक-बैलेन्स दिन पर दिन बढ़ रहा है और मेरा परिश्रम धन के रूप में साकार हो रहा है, यह जान कर चाहे उसे आत्म-सन्तुष्टि हो, पर क्या वह स्वअर्जित अपार धन राशि को भोगने में खुद समर्थ है? पुरुष पुरातन की वधू लक्ष्मी चंचला है। अगर धन बंटता नहीं और उसे होनहार पुरुषार्थियों का संरक्षण प्राप्त नहीं होता तो वह जरूर नष्ट हो जाता है। धन मनुष्य को निर्णय, अधिकार से अन्धा और दंभी बना देता है। अमीरों और धनियों की अपनी मुसीबतें हैं। हरदम उन्हें अपने धन की रक्षा की चिन्ता बनी रहती है। आगे इसको संभालने वाला सुयोग्य वारिस होना चाहिए इसी चिन्ता में वे घुलते रहते हैं। निन्यानवे के फेर में पड़कर वे धन का सदुपयोग ही भूल जाते हैं। धन का बढ़ता हुआ ढेर ही उनके जीवन की चिन्ताओं का मूल कारण बन जाता है। धन साधन न होकर जीवन का ध्येय बनकर रह जाता है।
अब लीजिए स्वास्थ्य को। इसमें कोई सन्देह नहीं कि ‘तन्दुरुस्ती हजार न्यामत है और सुन्दर तथा सुडोल काया एक वरदान है, पर यह भी तो चिरस्थायी नहीं है। कई बूढ़े पंगु भी अपने में मस्त और सुखी पाये गये हैं जब कि बड़े-बड़े पहलवान, नौजवान और रूपगर्विता नारियाँ भी किसी रोग या दुर्घटना का शिकार होकर अपना महत्व खो बैठते हैं। सभी स्वस्थ पुरुष सुखी तो नहीं होते और न सभी आकर्षक सुन्दरियाँ पति की प्यारी ही होती है। जो वस्तु अपने को प्राप्य न हो उस ओर प्यारी ही होती हैं। जो वस्तु अपने को प्राप्य न हो उस ओर मनुष्य लपकता है। सुन्दरी युवती का पति भी दूसरी स्त्रियों के प्रति आकृष्ट होता देखा गया है।
युवावस्था में मित्रता, घनिष्ठता, विश्वास और भावुकता मिलकर प्रेम का रूप ले लेते हैं। मैं किसी का हो जाऊँ किसी को अपना बना लूँ यह लालसा प्रेमी को दीवाना बना देती है। प्रेमिका के बिना उसे दुनिया सुनी लगती है। उसको पाकर वह निहाल हो जाता है। पर थोड़े दिनों में जब प्रेम का खुमार उतर जाता है, जब वे प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे के दोषों की कटु आलोचना करते नहीं थकते। कभी-कभी यौवन का यह उन्माद प्रेम वासना की सुनहली गली को पार करके जब यथार्थता की भूमि पर से गुजरता है तो समझदार प्रेमी-प्रेमिकाएँ अपना सन्तुलन नहीं खोते। एक दूसरे के गुणों की कद्र करते हैं। उनका प्रेम विश्वास और सहयोग का पुट पाकर गम्भीर और स्थायी हो जाता है। यह प्रेम की विजय न होकर उनकी समझदारी जय होती है।
प्रेम में ईर्ष्या या अधिकार की भावना ही दुःख का कारण बनती है। सच्चा प्रेम किसी व्यवसाय में लगाई हुई पूँजी नहीं है कि जिसके बदले में प्राप्ति दिनों दिन बढ़ती जाए, न वह फिफ्टी-फिफ्टी का सौदा ही है। यहाँ तो देने से ही सुख है। लेने और देने का जहाँ हिसाब लगाने बैठे कि प्रेम दुःख का कारण बन जाएगा।
लालसाओं का अन्त नहीं एक के बाद एक बढ़ती ही जाती है। जिस बात की पूर्ति इन्सान अपने जीवन में नहीं कर पाता, उसकी पूर्ति वह अपनी संतान के जीवन में देखना चाहता है। निस्संतान व्यक्ति अपने वंश की बेल को समाप्त होते देख अत्यन्त दुःखी होता है। उसे इस बात से सन्तुष्टि नहीं होती कि मनुष्य का नाम उसकी सन्तान से नहीं सुकर्मों से अमर होता है। सन्तान जहाँ नाम चलाती है, वहाँ डुबोती भी है। गृहस्थियों की अनेक चिन्ताओं का कारण सन्तान ही होती है। बच्चे का पालन पोषण, उसकी तरक्की के लिए अनेक साधन जुटाने का काम क्या कम परेशानी का है? सन्तान के पीछे मनुष्य कितने प्रलोभनों और दुर्बलताओं का शिकार बनता हैं। उद्देश्य और अनुशासन-हीन लड़के माँ-बाप की जिन्दगी को दूभर करके रख देते है। इसलिए निस्सन्तान व्यक्ति को इस पहलू से विचार करते हुए आत्म-सन्तोष करना चाहिए। अपनी सन्तान नहीं तो दूसरों के बच्चों को प्यार दुलार कर वे अपने मन को प्रसन्न कर सकते हैं। किसी गरीब, पर योग्य बालक को अपना कर अपना जीवन सरस बना सकते हैं।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि कर्म करो पर फल की आशा मत करो। सुख पाने में नहीं त्यागने में है। सुख के पीछे बावले होकर दौड़ने में नहीं, अपितु कर्मशील होकर दुःख और मुसीबतों से जूझने में है। यदि आप दुःख को जीत लेते हैं, उसे अपने पर हावी नहीं होने देते तो आप सुखी हैं। आसक्ति से दूर रहकर दूसरों के लिए जिए। जो मनुष्य अपने परिवार को भूलकर दूसरों के लिए जीता है, उसी को जीने का सच्चा आनन्द मिलता है। माँ-बाप इसी प्रेरणा के वशीभूत होकर अपने बच्चों के लिए जीते हैं। उसकी सफलता, सुख और आनन्द में उन्हें सन्तोष मिलता है। इसी भावना को अधिक व्यापक बनाने का प्रयत्न करने से मनुष्य परिवार के दायरे से निकल कर समाजोपयोगी जीवन व्यतीत करने में समर्थ हो पाता है। माया मोह आर्थिक दृष्टिकोण, स्वार्थ, अर्थप्रधान नीति मनुष्य को जहाँ एक ओर स्वार्थी बनाती हैं उसकी वृत्ति को संकुचित करती हैं, वहाँ दूसरी ओर दुःख की अनुभूति को तीव्र भी कर देती है। मनुष्य परिस्थितियों का दास बन जाता है और जीवन के वास्तविक सौंदर्य से भी अनजान रह जाता है। उसकी दिलचस्पी, प्रेम, त्याग और सहयोग का दायरा संकुचित हो जाता है।
इन्सान दुर्बलताओं का पुतला है, वह परिस्थिति का दास बन जाता है इस तथ्य को स्वीकार करके मनुष्य को दूसरे को उदारता और सहानुभूति के साथ समझने की चेष्टा करनी चाहिए। आप जैसा व्यवहार अपने प्रति चाहते हैं, वैसा ही दूसरे के प्रति करें। अपने मन को टटोलें। यदि आपकी आत्मा आपको चेतावनी देती है, तो उसे सुनें। अपराधी और अन्यायी चाहे समाज से बच जाए पर आत्मा की कचोट उसे चैन से नहीं रहने देगी। अपने को धोखा देना ही सबसे बड़ा धोखा है। पछतावे की अग्नि बड़ी दारुण होती है। उसमें तपे बिना आत्मा पवित्र नहीं हो सकती।
दूसरों से कुछ पाने से ही सुख नहीं है, देने में भी सुख है। किसी भूखे को खाना खिलाकर या किसी असहाय की मदद करके आपको जो आनन्द मिलता है, उसके आशीर्वाद से आपका जो आत्मिक बल बढ़ता है, वह कुछ कम नहीं है। “मैं भी दूसरों को सुखी बना सकता हूँ, मेरे सहयोग की किसी को अपेक्षा है” यह भरोसा आत्म-विश्वास पैदा करता है। जो इन्सान अपने को भूलकर दूसरों के लिए जीता है, उसको दुःख नहीं व्यापता। अधिकाँश माताएँ और पत्नियां अपने बच्चों व पतियों के लिए बड़े से बड़ा दुःख सहने को तैयार रहती हैं। उन्हें अपने खाने-पीने या आराम की परवाह नहीं रहती। इसीलिए माता का दर्जा पिता से अधिक ऊँचा माना गया है।
दुःख को जीतने के लिए हमें अपनी कमजोरियों को ही जीतना होगा। स्वार्थ, माया मोह, ईर्ष्या, क्रोध, द्वेष आदि से ऊपर उठकर ही मनुष्य दुःख के शिकंजे से छुटकारा पा सकता है।
मेवाड़ की रक्षा के लिये महाराणा प्रताप अन्तिम प्रयत्न करते हुये निराश हो गये थे। अकबर की विशाल सेना और अपरिमित साधनों का मुकाबला करते-करते छोटे से मेवाड़ प्रवेश के साधन समाप्त हो चुके थे। प्रत्येक लड़ाई में राजपूतों ने चिरस्मरणीय शौर्य और वीरता का परिचय दिया, महाराणा प्रताप ने दो-चार हजार सैनिकों को लेकर बड़ी-बड़ी बादशाही सेनाओं का मुंह मोड़ दिया, पर मुगल सल्तनत के साथ बहुत अधिक थे। एक सेना नष्ट हो जाती तो दूसरी भेज दी जाती। एक स्थान का रसद-पानी खत्म हो जाता हो दूसरे स्थान से अन्नादि सामग्रियां भेज दी जातीं। पर महाराणा प्रताप अकेले अपने ही बल पर जूझ रहे थे।
अन्त में ऐसा समय आ गया जब उनके पास न तो रुपया पैसा बचा, न सिपाही और हथियार रहें। बादशाही सेना को निरन्तर आगे बढ़ते देखकर और पहाड़ों के भीतर रहकर अपने तथा अपने साथियों के लिये सूखी रोटी मिल सकना भी असम्भव समझकर उन्होंने मेवाड़ को त्याग कर सिन्ध की तरफ जाने का विचार किया।
जिस समय महाराणा प्रताप देश त्याग का निश्चय करके और अपने बचे खुचे साथियों को लेकर अरावली पर्वत को पार करके सिन्ध में जाने को कदम बढ़ाने लगे कि किसी ने उनको पीछे से पुकारा-”ओ मेवाड़ पति। राजपूती वीरता की शान दिखाने वाले। हिन्दू धर्म के रक्षक। जरा ठहर जाओ।” राणा ने चौंककर पीछे मुड़कर देखा तो उनके राज्य के पुराने जमाने के मंत्री भामाशाह उनकी तरफ दौड़े चले आ रहे थे। भामाशाह किसी प्रकार राणा के देश त्याग का समाचार सुनकर तुरन्त ही उठकर दौड़े चले आये थे।
वे समीप पहुँचते ही आँखों में आँसू भरे हुये भर्राये स्वर से बोले-’स्वामी। आज कहाँ जा रहे हैं और क्यों इतने व्यथित तथा उदास जान पड़ते हैं?” महाराणा का निराशापूर्ण उत्तर सुनकर भामाशाह कहने लगा-”नहीं, एक बार आप फिर अपने घोड़े की बाग मेवाड़ को तरफ मोड़िये और नये सिरे से तैयारी करके मातृ-भूमि के उद्धार का प्रयत्न कीजिये। इसमें जो खर्च होगा वह मुझसे लीजिये। आपके पूर्वजों की दी हुई पर्याप्त सम्पत्ति मेरे पास है, वह सब मैं आपके चरणों में भेंट करता हूँ। वह मातृ-भूमि के उद्धार में लग सके इससे बढ़कर उसका सदुपयोग क्या हो सकता है? इसलिये आप मेरी प्रार्थना स्वीकार करके उस सम्पत्ति द्वारा लड़ाई की फिर तैयारी करें। यदि सफल हो जायें तो ठीक ही है, अन्यथा फिर जहाँ स्वामी, वहीं पर यह सेवक भी चलेगा।” भामाशाह के अपूर्व त्याग और देश-भक्ति को देखकर महाराणा प्रताप का हृदय भर आया और उसके अनुरोध को मानकर वापस लौट आये। कहा जाता है कि भामाशाह के भण्डार में इतना धन था कि जिससे पच्चीस हजार सेना का बारह वर्ष तक खर्च चल सकता था।
सामाजिक उन्नति और सुख-पूर्वक जीवन निर्वाह करने के लिये को सहयोग की आवश्यकता सभी स्वीकार करते हैं, पर यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो यह भी स्पष्ट प्रतीत होता है कि अधिकांश मानवीय सद्गुणों और धर्म का मूल मानी जाने वाली सद्वृत्तियों का भी इससे बहुत अधिक सम्बन्ध है। जिन व्यक्तियों में सहयोग की वृत्ति का उचित रूप में विकास हो जाता है उनमें “वसुधैव कुटुम्बकम की भावना भी जागृत हो जाती है। वे अनुभव करने लगते हैं कि संसार में जितने भी प्राणी है वे वास्तव में एक ही वृहत परिवार के अंग स्वरूप हैं और उनमें जितना अधिक सहयोग, ऐक्य, मित्रता की भावना का प्रसार होगा उतना ही सबका लौकिक-पारलौकिक का हित-साधन हो सकेगा।
यों तो आरम्भ से ही मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और उसने जो कुछ उन्नति, प्रगति की है, उसका श्रेय अधिकाँश में उसकी सहयोग वृत्ति को ही है। मनुष्य ने इस पृथ्वी को जो अपने निवास योग्य बनाया है, बड़े-बड़े पर्वतों, जंगलों, सागरों में घुसकर जो जीवन निर्वाह के साधन खोज निकाले, जिन लाखों की आबादी वाले, सुख सुविधापूर्ण नगरों का निर्माण किया है और सड़कें, रेल, तार, जहाज आदि का विस्तार करके सारी दुनिया को एक घर के समान बना दिया है, इस सबका मूल आधार सहयोग की प्रवृत्ति ही है। व्यापार-व्यवसाय, उद्योग-धन्धे, शिक्षा-प्रचार, सुरक्षा की व्यवस्था के क्षेत्रों में भी आज जो बड़ी-बड़ी योजनायें सफल होती दिखाई पड़ रही हैं वे सहयोगमूलक प्रवृत्तियों का ही परिणाम है। इतना ही क्यों ज्ञान-विज्ञान की आश्चर्यजनक उन्नति, समाज-सेवा करने वाली विशाल संस्थायें, लोक-कल्याण के लिये की जाने वाली युग परिवर्तनकारी योजनायें-सभी की सफलता का आधार मनुष्यों का पारस्परिक सहयोग ही होता है। मनुष्य जितने अधिक परिमाण में और जैसी हार्दिकता के साथ सहयोग-भावना का परिचय देते हैं उतनी ही अधिक सफलता इन विषयों में मिलती है।
पर इस साँसारिक सफलता से भी बढ़ कर महत्वपूर्ण मानवता की भावना है जो क्रमशः मनुष्य के अन्तर में विकसित हो रहो और जिसके प्रभाव से एक ऐसी मानव जाति का उदय हो रहा है जो भविष्य में वैसे ही पारस्परिक प्रेम और सौहार्द के साथ रह सकेगी जैसे आज एक कुटुम्ब या परिवार के व्यक्ति रहते हैं। कुछ लोगों को यह एक असम्भव कल्पना जान पड़ेगी और वे वर्तमान विश्वव्यापी संघर्ष की घटनाओं को देखकर इसे एक सुहावना स्वप्न मात्र बतलायेंगे, पर वास्तव में वे एक विचारक की दृष्टि से देखना नहीं जानते। एक समय था कि सभी मनुष्य बहुत छोटे-छोटे समुदायों में बँटे थे और वे आपस में लड़ते-झगड़ते, एक दूसरे की हत्या ही नहीं करते रहते थे, वरन् एक दूसरे को मारकर खा जाने में भी कोई दोष नहीं समझते थे। उस अवस्था से परिवर्तन होते-होते मनुष्य अब ऐसी स्थिति में आ पहुँचे है कि संसार में प्रतिवर्ष सैकड़ों, हजारों व्यक्ति ऐसे निकल आते है जो बिना किसी स्वार्थ या सम्बन्ध के अपरिचित व्यक्तियों की रक्षार्थ प्राण दे देते हैं। आज ऐसे व्यक्तियों की नितान्त कमी नहीं है जो मानवता के हित को अपने स्वार्थ या सुख की अपेक्षा अधिक महत्व का मानते हैं और संसार की भलाई के कामों में सच्चे हृदय और निःस्वार्थ भाव से योग देते हैं। इन सब बातों को देखकर निश्चय होता है कि सहयोग कृत्रिम या क्षणस्थायी चीज नहीं है वरन् वह उसी आन्तरिक प्रकृति का एक अंश ही है और जैसे-जैसे मनुष्य का आत्मिक विकास होता जायगा वैसे-वैसे ही उसकी भी वृद्धि होती जायगी और एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब कि वह दरअसल एक सार्वभौम स्वाभाविक प्रवृत्ति का रूप ग्रहण कर ले।
सहयोग की प्रवृत्ति से मनुष्य के हृदय में जो मैत्री भावना उत्पन्न होती है वह वास्तव में अपने और दूसरों के कल्याण की दृष्टि से मनुष्य का सब से बड़ा सद्गुण है। संसार में कृष्ण, वेद व्यास, गौतम बुद्ध, महावीर, ईसा आदि मानवता के त्राता महापुरुष हुये हैं उनकी सबसे बड़ी विशेषता मैत्री भावना ही थी। वे समस्त प्राणियों को आत्मवत् दृष्टि से देखते थे और उनके कष्टों को दूर करने के लिये ही अपना समस्त शक्ति लगाते रहते थे। इन्हीं महापुरुषों की शिक्षा का परिणाम है कि मनुष्य देश और काल के अन्तर को भुला कर धीरे-धीरे मनुष्य मात्र को अपना भाई या सम्बन्धी समझने की तरफ अग्रसर हो रहा है और आज उसके दिमाग में यह विचार पैदा हो चुका है कि संसार के समस्त देशों के भेद-भावों को प्रत्यक्ष रूप में मिटाकर एक मानव-समाज की स्थापना की जाय।
यह मानव मात्र की एकता का सिद्धान्त कोई नई बात नहीं है। भारतीय मनीषी तो इसे हजारों वर्ष पूर्व “वसुधैव कुटुम्बकम्” अथवा “सर्वभूतेषु” जैसे सूत्रों द्वारा प्रकट कर चुके थे और यहाँ के हजारों भक्तों तथा सन्तों ने उनके अनुसार आचरण करके भी दिखा दिया था। आज भी भारत और अन्य देशों के महापुरुष इसी सत्य का अनुभव करके उसे संसारव्यापी रूप देने का प्रयत्न कर रहे हैं, यद्यपि ऊपरी दृष्टि से इस समय अधिकाँश मनुष्य घोर स्वार्थ की तरफ प्रेरित जान पड़ते हैं और एक ऐसे संघर्ष की तैयारी में संलग्न हो रहे हैं जिससे मानवीय सभ्यता का सर्वनाश ही सम्भव जान पड़ता है, पर इसके साथ ही यह भी स्पष्ट है कि मानवता की एकता का सन्देश इस समय सबके कानों तक पहुँच गया है और वह उनकी आत्मा को झकझोर रहा है। जिस बात को पहले केवल थोड़े से मनीषी ही कहते और समझते थे वह अब साधारण लोगों के दिमाग में भी उठने लग गई है। इससे आशा होती है कि नाश के काले बादलों के होते हुये भी अन्त में सहयोग का सूर्य ही अधिक शक्तिशाली सिद्ध होगा और संसार अन्धकारमय प्रदेश से निकल कर सार्वजनिक सुख-शान्ति के सुप्रकाशित युग में जा पहुँचेगा।
सहयोग तथा मैत्री की यह भावना सामूहिक रूप से संसार का कल्याण करने वाली ही नहीं है, वरन् व्यक्तिगत दृष्टि से भी वह मनुष्य मात्र के लिये हितकारी है। इसके प्रभाव से मैत्री भाव रखने वाला व्यक्ति सब प्राणियों का सुहृद बन जाता है। जब वह अपने हृदय में किसी के प्रति शत्रुता का भाव नहीं रखता तो किसी अन्य के मन भी उसके प्रति विरोध की भावना उत्पन्न नहीं होती और दुनिया की तरफ से निर्भय बन जाता है। यदि संयोगवश उसे कोई कष्ट भी उठाना पड़ता है तो वह उसे दैवी विधान या आकस्मिक दुर्घटना समझ कर जरा भी क्षुब्ध नहीं होता। वह किसी अन्य मनुष्य को इसका कारण नहीं समझता और इसलिये सब प्रकार की चिन्ताओं और भयों से मुक्त रहता है। पारस्परिक वैमनस्य या मनोमालिन्य के भावों के निरन्तर बढ़ते रहने के कारण जो अगणित कठिनाइयाँ उत्पन्न होकर मानव-जीवन को कष्टपूर्ण बना देती है, वह उन सबसे मैत्री-भावना द्वारा ही बच जाता है।
इतना ही नहीं इस प्रकार मनःस्थिति बन जाने पर मनुष्य की आन्तरिक प्रसन्नता, आह्लाद की भावना स्थायी हो जाती है और समयानुसार व्यावहारिक रूप में प्रकट होकर उसको दिन ब दिन ऊंचा उठाती जाती है। इस भावना की प्रेरणा से मनुष्य सबके सुख-दुःख में आगे बढ़ कर भाग लेने लगता है, दीन-दुःखी और अभावग्रस्तों की हर तरह से सहायता करते लगता है, सदैव दूसरों की सेवा और सहायता के लिये प्रस्तुत रहता है। ऐसी स्थिति में पहुँच जाने पर अन्य सब लोग भी उसके प्रति प्रेम और आदर की भावना रखने लगते हैं, उसकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनते हैं और उसे अपनी शक्ति के अनुसार सहयोग भी देने लगते हैं। संसार में जितने भी बड़े और छोटे महापुरुष हुये है उन सबका यही जीवन-क्रम रहा है। ऐसे ही लोग सर्व-साधारण द्वारा नेता, अगुआ या माननीय माने जाते हैं। यद्यपि आज हमारे देश में ‘नेता’ शब्द की बड़ी दुर्गति हो रही है और ‘नेताओं’ को हम घोर स्वार्थ के कीचड़ में निमग्न देख रहे हैं, पर इनमें अधिकाँश ‘स्वयम्भू नेता’ हैं। वे अपने धन, विद्या, चतुराई या तिकड़म के जोर से नेता बन बैठे हैं, पर उनके भीतर उस मैत्री-भावना का सर्वथा अभाव है जो महापुरुषों में स्वभावतः होती है। यही कारण है कि ऐसे ‘मौसमी नेता’ अधिक समय तक टिक नहीं पाते। स्थायी प्रभाव और यश उन्हीं का प्राप्त होता है जो हृदय से सबको अपना अनुभव करते हैं। व्यक्तिगत तथा सामूहिक कार्यों में निःस्वार्थ भाव से सहयोग देने को प्रस्तुत रहते हैं।
सहयोग-भावना बाला मनुष्य जिस प्रकार भीतर से शुद्ध भाव-युक्त और सबका हितचिन्तन करने वाला होता है उसी प्रकार बाहर से भी सदैव सबके साथ मधुर व्यवहार करने वाला, सहानुभूति रखने वाला तथा विनीत होता है। वास्तव में उसकी आन्तरिक मैत्री-भावना के परिणामस्वरूप उसका स्वभाव ही ऐसा बन जाता है कि वह किसी के प्रति कठोरता अथवा निर्दयता का व्यवहार नहीं कर सकता और जहाँ तब सम्भव होता है। प्रत्येक की सहायता के लिये हमेशा तैयार रहता है। इस कारण अन्य लोगों के हृदय पर भी उसका प्रभाव पड़ता है और सज्जनों का तो कहना ही क्या दुर्जन व्यक्ति भी अधिक समय तक उसके प्रतिकूल नहीं रह सकते। हम जो अनेक सन्त पुरुषों के जीवन वृत्तांतों में किसी विरोधी के द्वारा उनके सताये जाने और अन्त में स्वयं उनके अनुयायी बनकर पूर्ण सहयोग देने का वृत्तांत पढ़ते है, उसका यही रहस्य है। चैतन्य चरित में मधाई-मधाई का, तुलसीदास के वृत्तांत में काशी के कई पण्डितों का, तुकाराम की जीवनी में पूना के एक ब्राह्मण का जो वर्णन मिलते हैं वे सब इसी के उदाहरण हैं कि अगर कोई अपनी स्वाभाविक दुष्टतावश या किसी प्रकार की गलतफहमी के कारण किसी सच्चे सहृदय व्यक्ति का विरोध करता भी है तो अन्त में उसे अपनी गलती स्वीकार करनी ही पड़ती है। इससे प्रायः उसका हृदय-परिवर्तन हो जाता है, उसके जीवन की धारा बदल जाती है और वह विरोध करने के स्थान पर उक्त महापुरुष का सहयोगी बन जाता है।
यह भी कोई आवश्यक बात नहीं कि हम प्रत्येक मैत्री-भावना युक्त सज्जन पुरुष के जीवन में कोई सार्वजनिक सफलता या स्मरणीय घटनायें ढूँढ़ने का प्रयास करें। ऐसे उदाहरण तो देश-काल के विशेष अवसरों पर किन्हीं दो-चार महापुरुषों के ही मिलते हैं। पर संसार के शान्तिपूर्ण विकास में और सहयोग तथा सद्भावना की निरन्तर वृद्धि में उन व्यक्तियों का महत्व भी किसी प्रकार कम नहीं है जो चुपचाप दूसरों के हित में संलग्न रहते हैं और दूसरों की भलाई के लिये अपने स्वार्थ की हानि की परवाह नहीं करते। ऐसे लोगों के कार्यों और विचारों से स्वयं ही एक पवित्र और उदारतायुक्त वातावरण तैयार होता रहता है जिसका प्रभाव दूर-दूर तक पड़ता है और जिससे अन्य अनेक लोग भी उसी मार्ग का अनुसरण करने लगते हैं। ऊपर हमने जो कृष्ण, वेद व्यास, बुद्ध, महावीर, ईसा आदि के उदाहरण दिये हैं वे तो मानवता के उच्च आदर्श तथा वास्तविक आध्यात्मिक जीवन के मार्गदर्शक हुये हैं। अगर उनके पश्चात अन्य लाखों करोड़ों व्यक्ति उनके उद्देश्यों के अनुसार आचरण नहीं करते, उनकी शिक्षाओं को कार्य रूप में परिणित करके नहीं दिखाते तो संसार की इतनी उन्नति और प्रगति कैसे सम्भव होती? इसलिये यह ख्याल करना हर्गिज ठीक नहीं कि इस प्रकार के कार्य या आदर्शों का पालन करना केवल कुछ महापुरुषों या सन्तों का ही कार्य है। प्रत्येक छोटे से छोटा व्यक्ति भी इस मार्ग पर अपनी शक्ति और परिस्थितियों के अनुसार अग्रसर हो सकता है। यदि वह सच्चाई के साथ इस पर आचरण करता रहेगा तो एक दिन वह भी किसी उच्च स्थिति को अवश्य प्राप्त कर लेगा।
आवश्यकता केवल इसी बात की है कि हम मनुष्य मात्र की अभिन्नता और सहयोग-भावना के महत्व को हृदयंगम कर लें, और इस बात को मन में अच्छी तरह बैठा लें कि व्यक्ति और समष्टि का कल्याण इस सद्प्रवृत्ति की वृद्धि में ही है। यह केवल साँसारिक उन्नति, शक्ति और सफलता की प्राप्ति, धन और वैभव की वृद्धि के लिये ही आवश्यक नहीं है, वरन् मनुष्य का आत्म-विकास भी बहुत कुछ इसी पर निर्भर है। इसके द्वारा मनुष्य अन्य लोगों से एकात्म-भाव का अनुभव करता है जिससे वैर, घृणा, शत्रुता के दूषित भावों का उदय होता है। यही सब मनुष्यता के प्रधान लक्षण हैं और इन्हीं को ग्रहण करने से मनुष्य अपने नाम को सार्थक कर सकता है।
असुरों ने अपने बुद्धि कौशल और पराक्रम से इक्कीस बार देवताओं को हराया और हर बार इन्द्रासन पर प्रतिष्ठित हुए। इतने पर भी वे देर तक उस स्थान पर स्थिर न रह सके और हर बार उन्हें अन्ततः स्वर्ग छोड़ने के लिए विवश होना पड़ा। देवर्षि नारद ने अपने पिता ब्रह्मा से पूछा-तात, विजयी होने पर भी असुर इन्द्रासन पर अपना अधिकार क्यों न रख सके?
विधाता ने कहा-वत्स, बल द्वारा ऐश्वर्य को प्राप्त तो किया जा सकता है पर उसका उपभोग केवल संयमी ही करते हैं। संयम की उपेक्षा करने वाले असुर जीतने पर भी इन्द्रासन का उपभोग कर ही कैसे सकते थे?
प्रगति के लिए ज्ञान की नितान्त आवश्यकता है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य भी अन्य जीव-जन्तुओं की तरह आत्मिक दृष्टि से हीन अवस्था में ही पड़ा रह सकता है। अन्य प्रदेशों में एकाकी रहने वाले आदिवासी अनेकों मानवीय सत्प्रवृत्तियों से वंचित रह जाते हैं। शिक्षण के अभाव में न तो प्रस्तुत क्षमताओं का विकास हो सकता है और न परिष्कार। ऐसी दशा में शरीर की प्रेरणाओं के आधार पर ही जीवनयापन करना पड़ता है। ऐसे जीवनों को पाशविक जीवन ही कहा जा सकता है। ज्ञान प्राप्ति की व्यवस्था जो न कर सकेगा, विवेक की आँखें जिसकी न खुल सकेंगी उसे अज्ञान के अन्धकार में भटकते हुए निम्नस्तरीय दिनचर्या के आधार पर अपनी जिन्दगी काटनी पड़ेगी।
मनुष्य में मूलतः अनेक महत्वपूर्ण शक्तियाँ मौजूद हैं। उनका सदुपयोग करने से गिरी हुई परिस्थितियों का व्यक्ति भी निरन्तर प्रगति करने की सुविधाएँ एकत्रित कर सकता है और बड़ी-सी-बड़ी बाधाओं को पार करते हुए उन्नति के उच्चतम शिखर तक पहुँच सकता है। पर यह सम्भव तभी है जब वह ज्ञान का महत्व समझे और उसकी प्राप्ति के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। सीखने में जिसे रुचि न होगी, या जिसे प्रशिक्षण के साधन न मिलेंगे, उसके लिए अपनी आन्तरिक क्षमताओं को पहचान सकना तक कठिन है, फिर उनका जागरण, अभिवर्धन और परिष्कार तो हो ही कैसे सकेगा? इसीलिए मनीषियों ने इस बात पर अत्यधिक जोर दिया है कि मानवता को सार्थक बनाने वाले ज्ञान की साधना में निरन्तर संलग्न रहा जाय। एक दिन भी ऐसा न बीते जिसमें ज्ञान की आराधना न की गई हो।
लोहा एक साधारण पदार्थ है पर उसका स्पर्श जब पारस-मणि से हो जाता है तो उसे सोने के रूप में बदलते देर नहीं लगती। मनुष्य भी साधारणतया एक दुर्बलकाय नगण्य पशु-मात्र है पर उसे जब ज्ञान का लाभ होता है तो अपनी मानसिक क्षमता का पूरा लाभ उठा सकता है और उस मार्ग पर चल सकता है जिसके लिए उसे इस सुरदुर्लभ सौभाग्य की प्राप्ति हुई है।
स्वाध्याय और सत्संग मानवीय जीवन आकाश में सूर्य और चन्द्रमा की तरह चमकने वाले दो उज्ज्वल प्रकाश केन्द्र हैं। जहाँ इनका अस्तित्व न होगा वहाँ चिरस्थायी अन्धकार छाया रहेगा। अन्तरात्मा में विकास की अनेक सम्भावनाएं मौजूद हैं। पर वे प्रस्फुटित और पल्लवित तभी होती है जब उन्हें उपयुक्त साधन मिलें। बीज में वृक्ष बनने की संभावना निश्चित रूप से मौजूद है, पर उसको मूर्त रूप तभी मिल सकेगा जब खाद पानी की आवश्यकता की उचित रूप से पूर्ति होती रहे। उसके अभाव में सशक्त बीज भी अंकुरित न हो सकेगा। व्यक्ति में बीज की ही भाँति ईश्वर प्रदत्त अनेक सुसंभावनाएं विद्यमान हैं पर उनका विकास सत्संग और स्वाध्याय के ही आधार पर होता है।
दर्पण के सामने जो भी वस्तुएं आती हैं, उनकी वैसी ही छाया दीखने लगती है। कपड़े को जैसे रंग में रंगा, जाय, वह वैसा ही बन जाता है। बालक जन्मतः सभी समान मनोभूमि लेकर आते हैं पर उन्हें अपने परिवार एवं वातावरण में जो कुछ सीखने को मिलता है वे उसी ढाँचे में ढलने लगते हैं। भाषा, स्वभाव, संस्कार, आहार, अभ्यास, दृष्टिकोण आदि का निर्माण मनुष्य का बालक अपने समीपवर्ती वातावरण से ही तो ग्रहण करता है। सज्जन माता-पिता से जन्मे बालक का पालन-पोषण यदि कुसंस्कारी वातावरण में हो तो वह कुसंस्कारी ही बनेगा। इसी प्रकार निम्न स्तर के घर में जन्मा बालक यदि सुसंस्कारी लोगों द्वारा पाला जाय, तो उसका वैसा ही सुसंस्कृत होना निश्चित है।
कभी-कभी कुछ अपवाद भी ऐसे देखने में आते हैं कि अच्छे लोगों के घर जन्मे बच्चे कुसंस्कारी और बुरी स्थितियों में जन्मे बालक प्रबुद्ध स्तर के बने हैं। ऐसे उदाहरणों में से कुछ में तो पूर्व जन्मों की प्राप्त प्रेरणा प्रधान कारण रहती है। और कुछ में ऐसा होता है कि वे बालक किसी प्रभावशाली संपर्क में आ जाते हैं और निकटवर्ती परिस्थितियों के प्रभाव को हटा कर किसी मनस्वी व्यक्ति की प्रेरणा से उत्थान या पतन के मार्ग पर चल पड़ते हैं। प्रेरणा कहीं न कहीं से उन्हें जरूर प्राप्त हुई होती है। यदि किसी बालक को बाह्य वातावरण से सर्वथा पृथक रखा जाय तो वह नर-पशु के अतिरिक्त और कुछ भी न बन सकेगा। भेड़िये की माँद में पकड़े गये बालक रामू का लखनऊ अस्पताल में अभी बहुत कुछ वैसा ही स्वभाव बना हुआ है जैसा कि उसको पालन करने वाले भेड़ियों ने उसे सिखा दिया था।
हनुमान जी में बहुत बल विद्यमान था पर ज्ञान के अभाव में वे समुद्र लाँघने को तैयार नहीं हो पा रहे थे। जामवन्त ने उन्हें आत्मबोध, कराया तो वे खुशी-खुशी तैयार हो गये, और सहज ही उस कार्य को सम्पन्न कर सकने में भी सफल हो गये। हनुमान की उस सफलता में जामवन्त का उद्बोधन अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है। यदि जामवन्त के स्थान पर उस समय कोई कायर और डरपोक सलाहकार रहा होता तो वह अनेक आशंकाएं व्यक्त करके हनुमान के मनोबल को और भी अधिक गिरा सकता था, ऐसी दशा में उनके लिए समुद्र लाँघने की बात का सोच सकना भी कठिन हो जाता। संगति का प्रभाव अन्य जीवों के लिए महत्वहीन भले ही हो मानव प्राणी के लिए तो वहीं सबसे बड़ा प्रश्न है। सुसंगति और कुसंगति को उसके जीवन-मरण एवं उत्थान-पतन की समस्या कहा जा सकता है।
आजीविका उपार्जन की चिन्ता हर किसी को करनी पड़ती है, क्योंकि उसके बिना शरीरयात्रा का उचित निर्वाह भी नहीं हो सकता। अपने-अपने ढंग से इस समस्या को हल करना अपने में से प्रत्येक के लिए एक अनिवार्य प्रश्न है। यदि यह हल न हो सका तो बाह्य जीवन के विकास में भारी बाधाएं उठ खड़ी होंगी। इसी प्रकार आत्मिक जीवन की प्रगति एवं सुव्यवस्था के लिए सत्संगति की आवश्यकता का भी अत्यधिक महत्व है। कुसंग में घिरे रहने से प्रगति का पथ अवरुद्ध ही बना रहेगा। सत्संगति में ही वह शक्ति रहती है कि गिरे हुओं को भी ऊँचा उठाने के लिए आवश्यक प्रेरणा और प्रकाश दे सके। सुगंधिकार की दुकान के समाने खड़े होने मात्र से मनमोहक गंध का लाभ होता है पर यदि कोयला बेचने वाले की दुकान पर बैठा जाय तो कपड़े काले होने की ही संभावना रहेगी।
जिन्हें हीन आन्तरिक स्थिति अखरती हो और जो महापुरुषों जैसी मनोभूमि प्राप्त करके बाह्य जीवन में उत्कृष्ट परिस्थितियों का आनन्द लेना चाहें उनके लिए यह अनिवार्य रूप में आवश्यक है कि सत्संगति को तलाश करें, ऐसे लोगों की समीपता प्राप्त करें जो वाणी में नहीं चरित्र से महान हों। आज तथाकथित सत्संगों का ढोंग जगह-जगह खड़ा दीखता है। और लोग उधर-उधर की बेसिर बातें भी उपदेश प्रवचन के नाम पर बहुत करते हैं। इस ध्यवसायिक कोलाहल में आडम्बर बहुत और काम की बात प्रायः बहुत ही कम रहती है। इसलिए इस प्रकार के कुचक्रों में जाने से पूर्व यह परख लेना चाहिए, कि वहाँ व्यक्तित्व को विकसित करने के लिए व्यावहारिक वातावरण भी कुछ है या अंट-संट बातों में ही समय की बर्बादी होती है। सत्संग उसे ही कहना चाहिए जो हमारे व्यक्तिगत जीवन में वाणी से नहीं चरित्र से हमें उत्कर्ष की दिशा में आवश्यक प्रेरणा और प्रकाश कर सके।
महान चरित्र और आदर्शवान् व्यक्तियों का समय खाली नहीं रहता। उनकी महानता का चिन्ह व्यस्तता है। जो जितना फालतू रहता होगा उसे उतना ही प्रमादी समझा जा सकता है। जीवन का सदुपयोग एक-एक क्षण को क्रम-बद्ध रीति से व्यतीत करने में ही तो है। इसलिए श्रेष्ठ मनुष्यों को कभी इतना खाली नहीं पाया जा सकता कि उनके साथ अपना फालतू समय देर तक बिताया जा सके। फिर भी यह प्रयत्न करना चाहिए कि किसी न किसी प्रकार सच्चे मनस्वी और तेजस्वी लोगों के साथ अपना संपर्क बना रहे। निकट से उनके जीवन क्रम का अध्ययन करने का अवसर मिले। श्रेष्ठ पुरुषों के चरित्रों में आदर्शवाद की मात्रा अधिक रहती है। इसलिए उनसे अनुकरणीय तथ्य अधिक मिल सकते हैं। यों कुछ न कुछ कमजोरी सभी में रहती है। पर जिनमें श्रेष्ठता में अधिक हो उन्हें श्रेष्ठ व्यक्ति कहा जा सकता है और उनकी समीपता से ऐसा प्रकाश मिलने का अवसर अधिक रहता है जिसके आधार पर आन्तरिक जीवन के विकास की संभावनाएं बढ़ सकें।
इस व्यस्तता के युग में सत्संग के लिए समय की कमी रहने की शिकायत प्रायः सभी को रहती है। फिर श्रेष्ठ पुरुष अधिक संख्या में मिल सकें यह भी कठिन है और उनका अपनी पहुँच के उपयुक्त समीपवर्ती क्षेत्र में होना तो और भी अधिक कठिन है। ऐसी दशा में सत्संग की दुकान लगाये बैठे रहने वाले बकवादी लोगों की ओर यदि मुड़ जाया जाय तो उससे उलटी हानि की आशंका ही अधिक रहेगी। इन परिस्थितियों में एक ही उपाय रह जाता है कि सत्पुरुषों के जीवन चरित्रों को पढ़कर उनमें से जो प्रेरणाएं अपने लिए उपयुक्त हों उन्हें ग्रहण करने के लिए, निरन्तर प्रयत्नशील रहा जाय। यों जब कभी श्रेष्ठ पुरुषों का सान्निध्य एवं प्रवचन का लाभ मिल सकता हो तब उसके लिए भी सचेष्ट रहा जाय।
जीवनोत्कर्ष के लिए जिस सद्ज्ञान की आवश्यकता है वह सत्संग में प्राप्त होता है और सबसे सरल और सबसे प्रभावशाली उपाय यह है कि स्वाध्याय के माध्यम से सत्पुरुषों का सान्निध्य निरन्तर प्राप्त करते रहा जाय। यह कार्य श्रेष्ठ साहित्य द्वारा ही सम्भव हो सकता है। सद्ग्रन्थों में महापुरुषों के जीवन चरित्र खुले पृष्ठों की तरह सर्व साधारण के लिए उपलब्ध है। बहुत पूछ-ताछ करने पर जो बातें जानी जा सकती हैं वे उन जीवन-चरित्रों में सहज ही लिखी मिल जाती हैं। फिर जिन महापुरुषों के प्रवचन जिस विषय पर सुनने हों, जिस शंका का समाधान उनसे प्राप्त करना हो उसके लिए उनका साहित्य पढ़ लेना चाहिए। इस नीति से हर घड़ी हर विषय पर हर महापुरुष का सत्संग-लाभ घर बैठे हो सकता है।
सत्यमेक व्रतं यस्य दया दीनेषु सर्वदा।
काम क्रोधों वशौ यस्य साधुः कथ्यते बुधः॥
सत्यवती, दीनों पर दया करने वाले काम, क्रोध को वश में रखने वाले को ही विद्वान साधु कहते हैं।
व्यक्तिगत सत्संग में एक खतरा यह रहता है कि उसकी अनुपयुक्त विचारधारा एवं कार्य पद्धति भी अपने को प्रभावित करके दिग्भ्रांत कर सकती है। पर सत्साहित्य के माध्यम में व्यक्तित्व का दबाव न रहने से उस पर अधिक विचार कर सकने और जो अपने उपयुक्त हो उसे ही स्वीकार करने की सुविधा रहती है। अपने आदर्श एवं लक्ष के अनुरूप अनेक ऐसे महापुरुष सत्साहित्य के माध्यम से ढूँढ़े जा सकते हैं जिनने उसी मार्ग पर चलकर सफलता प्राप्त की हो। पर समीपवर्ती क्षेत्र में तो जो भी विकसित व्यक्तिगत मिलेगा, उसकी समीपता सम्भव होगी और यदि उसका चरित्र एवं व्यक्तित्व उत्तम होते हुए भी मार्ग अनुपयुक्त है तो उन अवांछनीय गति विधियों की प्रेरणा ही अपने को मिल सकती है। इस दृष्टि से व्यक्तिगत सत्संग की अपेक्षा भी कई बार तो सत्साहित्य के द्वारा प्राप्त किया गया सत्संग अधिक निर्दोष एवं अधिक उपयुक्त सिद्ध होता है।
कई साधु बाबा त्याग वैराग्य, तितीक्षा, उच्च शिक्षा आदि की दृष्टि से प्रशंसनीय होते हैं। पर उनमें आलस्य, प्रमोद, कटु वचन, नशेबाजी, भाग्यवाद, कर्तव्य त्याग, अन्धविश्वास आदि अनेक दोष भी होते हैं। ऐसे लोग अपने गुणों से लोगों को आकर्षित करके उन्हें अपने दोषों का भी शिकार बना लेते हैं। व्यक्तिगत संपर्क सत्संग में इस तथ्य का बहुत अधिक ध्यान रखा जाए कि प्रत्येक सज्जन में कुछ दोष भी रहते हैं, उसके विचारों में कहीं-न-कहीं भ्रान्ति भी रहती है। इसलिए विवेक को प्रधानता देते हुए जिसके पास जितना उपयोगी हो उससे उतना ही ग्रहण करना चाहिए। हम गोदुग्ध को ही ग्रहण करते है, गो मूत्र को उपेक्षापूर्वक छोड़ देते हैं। इसी प्रकार श्रेष्ठ समझे जाने वाले व्यक्तियों से केवल उतना ही सीखा जाय, जो जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक एवं उपयुक्त हो।
ऐसा सत्साहित्य मानव-जीवन के विकास का सर्व-श्रेष्ठ माध्यम हो सकता है, जो उसे जिन्दगी जीने की कला सिखा सके। गुण कर्म स्वभाव को परिष्कार करते हुए सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने की प्रेरणा को संजीवनी बूटी कह सकते हैं। यही अमरता प्रदान करने वाला अमृत है, उसी को कायाकल्प करने वाला पारस कह सकते हैं, और उसी में सच्ची तृप्ति और शाश्वत शान्ति प्राप्त होने के कारण उसे कल्पवृक्ष भी कहा जा सकता है। जिसकी सत्साहित्य में अभिरुचि उत्पन्न हो गई, और जो जीवन-निर्माण के सद्ज्ञान को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करने लगा उसका कल्याण अति निकट है यही समझना चाहिए।
श्रम-शक्ति का सुव्यवस्थापूर्वक जीवनोत्कर्ष के लिए सुनियोजित करना मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमता मानी जा सकती है। समय ही ईश्वरप्रदत्त सम्पत्ति है। इसका उपयोग जिस प्रयोजन के लिए भी किया जाय वही सिद्ध होता चला जायगा। आज कल लोग धन को अधिक आवश्यक मानते हैं और उसे कमाने की इच्छा करते हैं। फलस्वरूप आजीविका के कार्यों में उसे लगाये रहते हैं। परिस्थिति, साधन और क्षमता के अनुरूप लाभ भी होता है। जो जितना श्रमशील है वह उतना ही आगे बढ़ेगा। उसे उतनी ही सफलता मिलेगी और जिसने जितनी ढील बरती होगी उसे उतनी ही असफलता का सामना करना पड़ेगा।
लक्ष्य कुछ भी क्यों न हो उसमें प्रगति तभी होती है जब अभीष्ट मात्रा में श्रम एवं समय लगे। पौधे का बढ़ना खाद और पानी पर निर्भर रहता है। इन दोनों वस्तुओं को प्राप्त करके ही कोई पेड़ बड़ा होकर फलने फूलने की स्थिति प्राप्त कर सकता है। उसी प्रकार कोई भी लक्ष्य तब प्राप्त होता है जब उसके लिए मनोयोगपूर्वक श्रम और समय को नियोजित किया जाय और व्यवस्थापूर्वक कार्यक्रम बना कर नियमित रूप से उसमें लगा रहा जाय।
कला कौशल, शिक्षा, भाषण, लेखन, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि कार्यों में कई व्यक्ति असाधारण प्रगति करते देखे जाते हैं। लोग समझते हैं कि उन्हें कोई दैवी वरदान या प्रारब्ध लाभ प्राप्त हुआ है। पर वस्तुतः यह उनके श्रम एवं मनोयोग का ही फल रहा होता है। लौकिक हो चाहे पारलौकिक हर प्रयोजन के लिए परिपूर्ण श्रम और उचित समय लगाने की आवश्यकता रहती है। जो सफलता के इस रहस्य को नहीं समझते वे आलस को छाती से चिपकाये रहने पर भी उन्नति के बड़े-बड़े स्वप्न देखते रहते हैं। उन्हें निराशा के अतिरिक्त और क्या हाथ लग सकता है? समय को व्यर्थ गँवाना और श्रम से जी चुराना, यह दो दुर्गुण जीवन को बर्बाद करने के लिए पर्याप्त है कहते हैं कि शनिश्चर और राहु और दशा सबसे खराब होती है और जब वे आती है, तो बर्बाद कर देती है। इस कथन में कितनी सच्चाई है यह कहना कठिन है। पर यह नितान्त सत्य है कि आलस को शनिश्चर और प्रमाद को-समय की बर्बादी को-राहु माना जाय, तो इनकी छाया पड़ने मात्र से मनुष्य की बर्बादी का पूरा-पूरा सरंजाम बन जाता है।
अवनति ग्रस्त लोगों की हीन स्थिति के अनेक कारण होते हैं पर सबसे बड़ा कारण यह रहता है कि वे अपनी समय शक्ति और श्रम शक्ति का महत्व नहीं समझ पाते। इन दैवी सम्पत्तियों का सदुपयोग करने से सब कुछ प्राप्त कर सकने की सच्चाई जिन्होंने हृदयंगम नहीं की है, वे जड़ की सींचना छोड़कर पत्तों को छिड़कते फिरते हैं और जल्दी बिना परिश्रम के मनोवाँछित सफलता प्राप्त करने के लिए भटकते रहते हैं। देवी देवताओं की मनौती मनाने वाले आशीर्वाद वरदान के लिए योगी यतियों की तलाश में फिरने वाले लोग प्रायः इसी श्रेणी के होते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि पुरुषार्थ में बढ़कर और कोई देवता नहीं सुनियोजित ढंग से मनोयोगपूर्वक श्रम करने से बड़ी और कोई सिद्धि दात्री साधना नहीं।
मनुष्य की भुजाओं में रहने वाला श्रम देव उतना शक्ति शाली और उदार है कि अपने किसी भक्त को कभी निराश नहीं होने देता। समय के सदुपयोग की तत्परता को अलादीन का चिराग या विक्रमादित्य के अदृश्य शक्ति शाली “वीरों” से तुलना की जा सकती है। ऐसे असंख्य उदाहरण हमारे आस-पास बिखरे पड़े होते हैं, जिन्हें ध्यान देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि कोई गुजरी परिस्थितियों का व्यक्ति भी यदि प्रगति को सुव्यवस्थित योजना बनाकर उसके लिए श्रम और समय की आवश्यक मात्रा लगाने लगे, तो उन्नति की संभावनाएं तत्काल दृष्टिगोचर होने लगती हैं। इन दोनों देवताओं की पूजा कभी भी निरर्थक नहीं हो पाती। लौकिक और पारलौकिक सभी प्रगतियों के द्वारा कुँठित करने वाले दो ही असुर मुख्य हैं-एक आलस्य, दूसरा प्रमाद। समय को बर्बाद करने वाला और श्रम से जी चुराने वाला अपना शत्रु आप है। उसे बाहरी शत्रुओं की क्या आवश्यकता? अपनी बर्बादी के लिए यह दो दुर्गुण जिसने पाल रखे हैं उसे शनि और राहु की दशा की प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी। उसके ऊपर साढ़ेसाती नहीं अजर-अमर सत्यानाशी शनि देवता सदा ही चढ़े रहेंगे। राहु का दुर्दिन स्थायी रूप से उसके सिर पर मंडराता रहेगा।
संसार के प्रगतिशाली लोग प्रगति की दिशा में कदम पर कदम बढ़ाते चले जा रहे हैं। विज्ञान की शोधों ने विकास की आश्चर्यजनक सुविधायें उत्पन्न की है। चन्द्रमा पर झण्डा गाड़ा गया है और ग्रह-नक्षत्रों की यात्रा का अभियान आरम्भ हो गया है। धन और वैभव की संभावनायें अधिकाधिक बढ़ी हैं। अस्वस्थता और दुर्बलता को जीतने की तैयारियाँ की जा रही हैं। इन महत्वकाँक्षाओं के पीछे मानवीय श्रम एवं मनोबल की प्रेरक शक्ति ही काम कर रही है। इन जीवित एवं प्रत्यक्ष देवताओं की पूजा करके जब संसार के प्रगतिशाली लोग मन माने वरदान प्राप्त कर रहे हैं तब हम मन्त्र सिद्धि के चमत्कारों की लालसा में ही भटकते रहते हैं। सबसे बड़ा मन्त्र है-जीवनक्रम को सुनियोजित करके उसमें समय श्रम एवं पुरुषार्थ को पूरी तरह संलग्न कर देना। इस मन्त्र को व्यावहारिक जीवन में उतारने की साधना जिसने आरम्भ कर दी उसे अष्ट-सिद्धि नव-निद्धि न सही पर जीवन को सुविकसित करने की सफलता बहुत बड़ी मात्रा में अवश्य ही मिलकर रहेगी।
हमें उन तत्वों की ओर ध्यान देना ही चाहिये जो जीवन विकास के मूल आधार हैं। उनका सदुपयोग ही लौकिक, पारलौकिक सफलता का एकमात्र उपाय है। ईश्वर ने हमें शरीर और मन जैसी अनमोल वस्तु दी है। उनका लाभ वही उठा सकता है जो शरीर को सुव्यवस्थित श्रम में निरन्तर लगाये रहता है और एक क्षण का समय भी बर्बाद न होने देने के लिए सतर्क रहता है। मनोयोगपूर्वक दिलचस्पी के साथ जो भी कार्य किया जायगा उसकी चमक निराली ही होगी। बेगार भुगतने की तरह भार रूप में किसी प्रकार पूरा किया हुआ काम और अपने सम्मान का प्रश्न बनाकर पूरी तन्मयता के साथ किया हुआ काम जमीन-आसमान की तरह भिन्न दिखाई पड़ता है। जिस काम में सजीवता होगी वह छोटा ही क्यों न हो करने वाले के व्यक्तित्व एवं गौरव को बढ़ाने में भारी सहायक सिद्ध होगा। सफलता की ऊँची स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रत्येक प्रगतिशील को इसी रास्ते अपनी यात्रा करनी पड़ी है। हम भी यदि सफल लोगों की जिन्दगी जीना चाहें तो यही तरीका अपनाना पड़ेगा कि परिश्रमी बनें, घोर परिश्रम में आनन्द अनुभव करें तथा समय का एक क्षण भी बर्बाद न होने दे। अपने कामों में हमारी जितनी ही अधिक दिलचस्पी होगी वे उतने ही अधिक सुन्दर बन पड़ेंगे और उन कला कृतियों के तिनकों द्वारा सफलता का वह घोंसला बुना जा सकेगा जिसमें बैठकर किसी चतुर पक्षी की तरह हम भी सन्तोष का जीवनयापन कर सकें।
उज्ज्वल भविष्य के संजोये हुए स्वप्नों की सार्थकता निरर्थकता इस बात पर निर्भर है कि हम कितने धैर्यपूर्वक, कितने अध्यवसाय के साथ निर्धारित लक्ष्य में संलग्न होते हैं। उसके लिए कितना मनोयोग लगाते और कितना पुरुषार्थ करते हैं। आलस्य और प्रमाद यह दो जहाँ रहेंगे, वहाँ पग-पग पर असफलता प्रस्तुत रहेगी। दैवी अनुग्रह भी पुरुषार्थियों का सहायक होता है। आलसी और
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद्विद्यते परम्।
सत्येन विधृतं सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥
सत्य से बढ़कर कुछ भी नहीं, सत्य में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। सत्य से ही प्रतिष्ठा बढ़ती है।
प्रमादी धरती के भार माने जाते हैं, उन पर कृपा करके देवता भी अपनी उदारता का दुरुपयोग क्यों करें। एक बार कृपा कर भी दी जाय तो अपने दुर्गुणों के कारण अकर्मण्य को दूसरे दिन फिर दुर्भाग्य का ही सामना करना पड़ेगा। यह सोच कर दैवी कृपा भी उनसे दूर ही रहती है। हम प्रगतिशील पुरुषार्थी बनें तो दैवी अनुग्रह भी सहज प्राप्त होने लगेगा।
प्रार्थना जीवन का ध्रुवतारा है
ईश्वर-प्रार्थना ने मेरी रक्षा की। प्रार्थना के आश्रय बिना मैं कबका पागल हो गया होता। अन्य मनुष्यों की भाँति मुझे भी अपने सार्वजनिक एवं व्यक्तिगत जीवन में अनेक कटु अनुभव करने पड़े। उनके कारण मेरे अन्दर कुछ समय के लिये एक प्रकार की निराश-सी छा गयी थी। उस निराशा को दूर करने में मुझको सफलता हुई तो वह प्रार्थना के ही कारण हुई। सत्य की भाँति प्रार्थना मेरे जीवन का अंग बनकर नहीं रही है। इसका आश्रय तो मुझे आवश्यकतावश लेना पड़ा। मेरी ऐसी अवस्था हो गयी कि मुझे प्रार्थना के बिना चैन पड़ता कठिन हो गया। ईश्वर के अन्दर मेरा विश्वास ज्यों-ज्यों बढ़ता गया, प्रार्थना के लिये मेरी व्याकुलता भी उतनी ही दुर्दमनीय हो गयी। प्रार्थना के बिना मुझे जीवन नीरस एवं शून्य-सा प्रतीत होने लगा।
सच पूछिये तो शरीर के लिये भोजन भी इतना आवश्यक नहीं है, जितनी आत्मा के लिये प्रार्थना की आवश्यकता है, क्योंकि शरीर को स्वस्थ रखने के लिये कभी-कभी उपवास (भोजन का त्याग) आवश्यक हो जाता है, किंतु प्रार्थना-रूप भोजन का त्याग किसी प्रकार ही हितकर अथवा वाञ्छनीय नहीं कहा जा सकता। प्रार्थना का अजीर्ण तो कभी हो नहीं सकता।
मैं आप लोगों से अनुरोध करूंगा कि आप लोग तार्किक युक्तियों का आश्रय छोड़कर एक नन्हें-से बच्चे की भाँति ईश्वर में निश्छल विश्वास करना प्रारम्भ कर दें। यदि मेरा अस्तित्व है तो ईश्वर का अस्तित्व अवश्य है। केवल मेरे ही जीवन का नहीं, किंतु मेरे जैसे अन्य लाखों मनुष्यों के जीवन का यह एक अत्यावश्यक अंग है। चाहे वे इसके विषय में वाद-विवाद न कर सकें, किंतु उनके जीवन से हम यह देख सकते हैं कि वह उनके जीवन का एक अंग बन गया है।
-महात्मा गाँधी
बढ़ो, आगे बढ़ो
विकासवाद का इतिहास हमको यह उपदेश देता है कि “आगे बढ़ो या मरो”। जो कोई आगे बढ़ने से इन्कार करेगा वह कुचला जायगा। इसके विषय और कोई वश या इलाज नहीं है। संसार में जितने प्राणी हैं, सबकी दशाओं पर ध्यान करने से यही नियम मालूम होता है कि “बढ़ो”। जड़, चेतन, वनस्पति सभी स्थानों पर इसी नियम का सिक्का (आतंक व राज्य) है। असभ्य जातियों और पशुओं को पढ़ने से भी यही मालूम होता है कि उनके खून की प्रत्येक बूँद पर लिख दिया गया है कि “आगे बढ़ो”। कहा गया है और सच है कि उन्नति पुरुषार्थ से और कष्ट उठाने से होती है। जो व्यक्ति परिश्रम और प्रयत्न न करेगा, वह नष्ट होगा और कुचला जायगा। जिस तरह एक गाड़ी में घोड़ा जोता जाता है, उसका काम है कि गाड़ी को खींच कर आगे ले जाये। यदि वह चले और रुक जाय तो कोचवान उस पर चाबुक पर चाबुक मारता है। यही दशा व्यक्तियों और जातियों की है।
-स्वामी रामतीर्थ
तीन पदार्थ
तीन पदार्थ खाओ, तीन वस्तुएं पहनो, तीन चीजों का आचरण करो-अहिंसा, सत्य और ब्रह्मचर्य। तीनों चीजों का स्मरण रखो, मृत्यु भौतिक दुःख तथा ईश्वर। तीन का परित्याग करो-अहंकार, कामना और राग। तीन गुणों का विकास करो- नम्रता, निर्भयता और प्रेम। तीन शत्रुओं का उन्मूलन करो-काम, क्रोध और लोभ। तीन बातों से प्रेम करो- मोक्ष की इच्छा, सत्पुरुषों का संग और निष्काम सेवा।
-स्वामी शिवानन्द
स्त्रियाँ ब्रह्म-विद्या परायण हों
जब तक कुछ ऐसी बहनें नहीं निकलती हैं, तब तक न स्त्री जाति का उद्धार होगा और न मानवता की उन्नति होगी। दोनों बातें आज रुकी हुई हैं। एक साल से मैं खास कर बहनों के लिए ये बातें कह रहा हूँ। मैंने ब्रह्म-विद्या की धुन में ही घर छोड़ा और वह धुन दूसरों को लगाने में भी कुछ सफल हुआ। लेकिन वे पुरुष थे। मुझे उम्मीद है कि अब कुछ स्त्रियों को ब्रह्मविद्या की धुन लगेगी, उनके जीवन का स्पर्श समाज को बदल सकेगा। आज तक एक भी स्त्री शास्त्रकार नहीं निकली है। शास्त्रकार वह होता है, जिसके शब्दों को अपना आधार समझकर लोग अपनी जिन्दगी उस पर खड़ी कर सकते हैं और निःशंक भाव से उस शब्द पर चल सकते हैं, जैसे अच्छे इंजीनियर के बनाये हुए रास्ते पर निःशंक भाव से चलते हैं। मैं चाहता हूँ कि कोई स्त्री शास्त्रकार बने। अब तक समाज के रक्षण का दारोमदार हिंसा पर था, लेकिन अब दुनिया के ध्यान में आ रहा है कि उससे रक्षण नहीं हो सकता है। इसलिए अब दुनिया को अहिंसा की तरफ मुड़ना होगा, उसके नये-नये हथियार ईजाद करने होंगे। अब स्त्रियों के लिए मौका आया है कि वे ब्रह्मविद्या-परायण हों और शास्त्रकार बनें। मुझे उम्मीद है कि ऐसी कुछ बहनें निकलेंगी, इसलिए नहीं कि यह मेरी ख्वाहिश है, बल्कि इसलिए कि वह जमाने की ख्वाहिश है। -विनोबा
आध्यात्मिक श्रद्धा
अनन्त युगों से भारत की जनता की प्रेरणा का मूल-स्रोत जीवन का आध्यात्मिक पक्ष ही रहा है न कि केवल भौतिक। आखिर श्रद्धा का यही स्रोत है जिसके आधार पर भारत अब तक टिका रह सका है। और यही श्रद्धा है जिसे यदि लोगों ने अपने जीवन में बनाए रखा तो यह भविष्य में भी भारत की रक्षा कर सकेगी। आध्यात्मिक श्रद्धा जीवन का अनिवार्य अंग है। हम समस्त भौतिक सुविधाओं को प्राप्त करें किंतु उसे प्राप्त करते हुए जीवन के आध्यात्मिक श्रद्धा की उपेक्षा की तो भारत का कोई सहारा नहीं बचेगा, आशा के समस्त तार टूट जायेंगे।”
-डॉ. राजेन्द्रप्रसाद
समय की कसौटी
समय का बरबाद होना और उसका सदुपयोग होना इसकी एक कसौटी है। जिस क्षण में चित्त में कोई विकार न उठता हो उस क्षण का सदुपयोग हुआ, फिर चाहे बाह्य निष्पत्ति हो या न हो। इससे उलटे, जबकि बहुत काम होता है, लेकिन चित्त में विकार-तरंग उठते हों, तो उतना सारा समय बरबाद हुआ, यही समझे। फिर चाहे दुनिया की दृष्टि से उतना समय काम में लगा, ऐसा भी क्यों न प्रतीत हो।”
-भावे
तीन बड़े सत्य
इस दुनिया के तीन ही बड़े सत्य हैं- आशा आस्था और आत्मीयता। दूसरों को अपना मानना और उसमें कुछ नहीं, यही कहना चाहिये। जिसमें प्रेम नहीं वह बड़ा उपदेशक होने पर भी निरा शंख या मजीरा मात्र है जो सिर्फ आवाज ही पैदा कर सकता है। किसी ने भले ही अष्ट सिद्धि और नौ निधियाँ प्राप्त कर ली हों पर यदि उसका हृदय प्रेम से सूना है तो उसे तुच्छ ही माना जायगा। कोई कितना ही बड़ा दानी या धर्म विद्या क्यों न ही पद यदि वह प्रेमी नहीं तो उसे भी स्वर्ग में प्रवेश न मिलेगा। ईश्वर को प्रेम और प्रेम को ईश्वर कहना चाहिए। जिसके हृदय में प्रेम मौजूद है उसे ईश्वर की प्राप्ति हो चुकी, इसमें संदेह नहीं किया जा सकता।
-सेन्ट पाल
संघर्ष करो-
इस बात की चिंता मत करो कि स्वर्ग और नर्क है ‘या नहीं’? मत इस बात की फिक्र करो कि आत्मा का अस्तित्व है या नहीं? इस झगड़े में भी मत पड़ो कि विश्व में कोई अविनाशी सत्ता है या नहीं? पर संसार हमारे नेत्रों के सम्मुख है, और वह कष्टों से भरा है। तुम भी बुद्ध के समान उसके भीतर जाओ और उसके कष्टों को कम करने के लिये संघर्ष करो या उसी प्रयत्न में मर जाओ। अपने को भूल जाओ, यह सबसे पहला पाठ है जो तुमको सीखना चाहिये-फिर चाहे तुम आस्तिक हो चाहे नास्तिक हो-द्वैतवादी हो या अद्वैतवादी हो-ईसाई हो या मुसलमान हो। एक ही पाठ जो प्रत्येक के लिये अनिवार्य है वह है अपने संकीर्ण अहम को समाप्त करके विराट आत्मा का निर्माण करना।
-स्वामी विवेकानन्द
आशा मनुष्य का शुभ संकल्प है। प्राणियों में वह अमृत है। जैसे सारा वनस्पति जगत सूर्य से पोषण पाता है वैसे ही मनुष्य में आशायें ही शक्ति का संचार करती हैं। मनुष्य की प्रत्येक उन्नति, जीवन की सफलता, जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का संचालन आशाओं द्वारा होता है। आशायें न होती तो संसार नीरस, अव्यक्त और निश्चेष्ट सा दिखाई देता। इसलिये भारतीय आचार्यों ने सदैव मानव समाज को यही समझाया है-
निराशायाँ समं पापं मानवस्य न विद्यते।
ताँ समूलं समुत्सार्थं ह्याशवादं परोभव॥
मनुष्य के लिये निराशा से बढ़कर दूसरा कोई पाप नहीं इसलिये इसका समूल नाश करके आशावादी बनना धर्म है। मानवीय प्रगति का आधार आशावादिता को ही मानते हुये उन्होंने आगे और भी कहा है-
मानवस्योन्नतिः सर्वा साफल्यं जीवनस्य च।
चरितार्थर्श्य तथा सृष्टेराशावादं प्रतिष्ठितम्॥
संसार में आने के उद्देश्य की पूर्ति के लिये हे मनुष्यों तुम्हें सर्वप्रथम आशावादिता का आश्रय लेना चाहिये।
संसार के सारे कार्य आशाओं पर चलते है। विद्यार्थी अपना समय, धन लगा कर दिन-रात श्रमपूर्वक अध्ययन में लेना रहता है। अध्यापकों की झिड़कियाँ सुनता है अपना सुख चैन सभी कुछ छोड़ कर केवल ज्ञानार्जन में लगा रहता है। इसीलिये कि उसे यह आशा होती है कि वह पढ़-लिख कर सभ्य सुशिक्षित नागरिक बनेगा। देश जाति के उत्थान में भागीदार बनेगा। सम्मानपूर्वक जीवन जियेगा। खेत खलिहानों से लेकर कल कारखानों तक में जितने भी व्यवसाय फैले हैं उनके मूल में कोई न कोई आशा ही क्रिया-शील होती है।
आशाएं जीवन का शुभ लक्षण हैं। इनके सहारे मनुष्य और विपत्तियों में दुश्चिन्ताओं को हँसते-हँसते जीत लेता है। दो केवल दुनिया का रोना रोते रहते हैं उन्हें अर्द्धमृत ही समझना चाहिये, किंतु आशावान् व्यक्ति पुरुष के लिये सदैव समुद्यत रहता है। वह अपने हाथ में फावड़ा लेकर कूद पड़ता है खेतों में, और मिट्टी से सोना पैदा कर लेता है। आशावान् व्यक्ति अपने भाग्य का निर्माण स्वयं करता है। वह औरों के आगे अपना हाथ नहीं बढ़ाता बल्कि औरों को जीवन देता है।
तुर्क सम्राट तैमूरलंग कई युद्धों में लगातार पराजित होता रहा। इक्कीसवीं बार उसके अंग-रक्षक सैनिकों को छोड़कर और कोई शेष न रहा। वह एक गुफा में बैठा विचारकर रहा था, तभी एक चिकने पत्थर पर चढ़ने का प्रयास करती हुई चींटी दिखाई दी। वह बार-बार गिर जाती किन्तु ऊपर चढ़ने की आशा से पुनः प्रयास करती। यह देखकर तैमूर के हृदय में फिर से आशा का संचार हुआ। उसने सोचा यदि छोटी-सी चींटी इतनी बार असफल होने पर भी निराश नहीं होती और अपना प्रयत्न नहीं छोड़ती तो मैं ही हिम्मत क्यों हारूं? वह नई शक्ति जुटाने में लग पड़ा और फिर से दुश्मन पर विजय पाई। आशायें पुरुषार्थ को जगा देती हैं जिससे मनुष्य बड़े-से-बड़े कार्य करने में तैमूरलंग के समान ही समर्थ होता है।
चरित्रवान व्यक्ति कभी निराश नहीं होते क्योंकि उनकी भावनायें उद्दात्त एवं ऊर्ध्वगामी होती है। वे हर क्षण कठिनाइयों से लड़कर अपना अभीष्ट पा लेने की क्षमता रखते हैं। प्रतिभाशाली व्यक्तियों को निराशा के क्षणों में भी आशा का प्रकाश दिखाई देता है, इसी के सहारे वे अपनी परिस्थितियों में सुधार कर लेते हैं। सत्यवादी हरिश्चंद्र यदि गुरु-दक्षिणा चुकाने में निराश हो गये होते तो आज संसार में उन्हें कौन जानता? उनके पास वह सब कुछ तो नहीं था जिसकी उनके गुरुदेव ने याचना की थी। पर स्वयं को मुसीबतों में डालकर, पत्नी और बच्चे को भी बेचकर अपनी गुरु-दक्षिणा चुकायी और आशावादिता के शुभ लक्षणों का परिचय दिया। मनुष्य परिस्थितियों का वशवर्ती नहीं वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करता है, किंतु यह तभी सम्भव है जब वह आशावादी हो। ऐसा व्यक्ति किसी भी कार्य को करने के पहिले उस पर गम्भीरता पूर्वक विचार करता है। आने वाली कठिनाइयों का निराकरण खोज निकालता है, आवश्यक साधन जुटा लेता है, तब पूर्ण तत्परता व लगन के साथ कार्य में प्रवृत्त होता है। जिससे बड़ी-सी-बड़ी परिस्थितियाँ भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पातीं। सफलता ऐसे ही व्यक्ति पाया करते हैं।
आशावादी व्यक्ति औरों की भी दुश्चिन्ताओं तथा दुखद परिस्थितियों से बाहर निकाल लाता है, ऐसे ही व्यक्ति समाज को प्रेरणा प्रकाश दे सकते हैं किंतु निराशावाद मानसिक कमजोरी का लक्षण है, जो अपने आस-पास असन्तुलन पैदा करता है तथा औरों को अन्धकार के गहन गर्त में धकेल देता है। निराश व्यक्ति जीवन में कहीं सफलता प्राप्त नहीं कर सकते उन्हें सदैव दुर्भाग्य एवं परमात्मा की अकृपा ही दिखाई देती है। परछिद्रान्वेषण, ईर्ष्या, द्वेष मनोमालिन्य उन्हें ही घेरे रहता है जो निराशावादी होते हैं। पर आशावादी व्यक्ति तो सर्वत्र ही मंगलमय परिस्थितियाँ देखते हैं। उसे संसार दुश्चिन्ताओं और जंजालों का घर नहीं सुख का उद्यान प्रतीत होता है। वह हर क्षण जगत में सौंदर्य और माधुर्य का दर्शन करता है। गरीबी तथा अभाव भी उसे हताश नहीं करते।
आशा और आत्म-विश्वास चिरसंगी है। समुद्र में लहरें स्वाभाविक हैं, दीप शिखा का प्रकाश से अटूट सम्बन्ध है, अग्नि में ऊष्मा होगी ही। आशावादी व्यक्ति का आत्मविश्वासी होना भी अवश्यम्भावी है। आत्मविश्वास से आन्तरिक शक्तियाँ जागृत होती हैं। इन शक्तियों को वह जिस कार्य में जुटा दे वहीं आश्चर्यजनक सफलता दिखाई देने लगेगी। सम्पूर्ण मानसिक चेष्टाओं से किये हुए कार्य प्रायः असफल नहीं होते। किन्तु निराशा वह मानवीय दुर्गुण है जो बुद्धि को भ्रमित कर देता है। मानसिक शक्तियों को लुँज-पुँज कर देता है। ऐसा व्यक्ति आधे मन से डरा-डरा-सा कार्य करेगा। ऐसी अवस्था में सफलता प्राप्त कर सकना ही क्या होगा? जहाँ आशा नहीं वहाँ प्रयत्न नहीं। बिना प्रयत्न के ध्येय की प्राप्ति न आज तक कोई कर सका है न आगे सम्भव है।
विद्वान विचारक स्वेट मार्डेन ने लिखा है “निराशावाद भयंकर राक्षस है जो हमारी नाश के ताक में बैठा रहता है”। निराशावादी प्रगति की भावना का त्याग कर देते हैं। यदि कभी उन्नति करने का कुछ ख्याल आया भी तो विपत्तियों के पहाड़ उन्हें पहले दिखाई देने लगते हैं। कार्य आरंभ नहीं हुआ कि चिंताओं के बादल मँडराने लगे। प्रयत्न शुरू नहीं किये कि बेचारा पहले ही अधमरा हो चला। पर आशावादी व्यक्ति प्रसन्न होकर कार्य प्रारम्भ करता है। गतिवान बने रहने के लिए मुसीबतों को सहायक मानकर चलता है। उत्साहपूर्वक अन्त तक पूर्व नियोजित कार्य में सन्नद्ध रहता है इसी से उसकी आशायें फलवती होती हैं। आशा ही जीवन है, निराशा को तो मृत्यु ही मानना चाहिए।
एक व्यक्ति का कलकत्ता में लंबा चौड़ा कारोबार था। हजारों की आमदनी थी। मोटर गाड़ियाँ थीं, नौकर चाकर थे सभी प्रकार सुखी एवं सन्तुष्ट था। पर परिस्थितियों में एकाएक परिवर्तन आया। व्यवसाय में भारी घाटा आया। लाखों रुपये कर्ज हो गये। लोग अपना-अपना हिसाब चुकाने के लिये दरवाजा खट-खटाने लगे। वह व्यक्ति आशावादी था। मोटर फर्नीचर आदि को बेच डाला। बैंक में जो पूँजी थी निकाल ली। कर्जे की भरपाई कर दी और जो भी जेवर आदि शेष बचा उसे बेचकर फिर से एक छोटा व्यापार शुरू कर दिया और फिर थोड़े ही दिनों में वैसा ही बन गया जैसा पहले था। आशावादी व्यक्ति परिस्थितियों से घबड़ाता नहीं, पर निराशा व्यक्ति के जीवन में छोटा-सा झटका लगा बस पाँव ढीले पड़ गये, चिंताओं ने आ दबाया। कई बार तो ऐसे व्यक्तियों के हार्टफेल भी हो जाते हैं।
उचित यही है कि आज हमारी जैसी परिस्थितियाँ हैं उनमें सन्तोष अनुभव करें और आगे के लिये उनसे अच्छे परिणामों की आशा करें, तभी हम जीवन में कोई महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं। एक-सी परिस्थिति में पड़े रहना अकर्मण्य पुरुषों को शोभा दे सकता है। किन्तु आपकी शान इसी में है कि आप हर घड़ी, सुन्दर भविष्य की आशा करें। आज जिस पद पर हैं कल उससे बड़ा दर्जा मिले ऐसी आशा करें और अभी से उनके लिये प्रयत्न शुरू कर दें। सच्चे आध्यात्मवादी का यह प्रथम लक्षण है कि वह उज्ज्वल भविष्य के लिये हर क्षण आशावान् बना रहे।
माइकेल फैरेडे का नाम वैज्ञानिक जगत में बड़े सादर के साथ लिया जाता है। उसने विद्युत सम्बन्धी अनेकों महत्वपूर्ण खोजें की हैं। चुम्बक से बिजली उत्पन्न करने का फैरेडे को ही श्रेय मिला। आज-कल टेलीफोन व्यवस्था जिन सिद्धांतों पर आधारित है वह इन्हीं की जीवन साधना का परिणाम है।
फैरेडे लन्दन में एक ऐसे लुहार के यहाँ जन्में जिसके पास न रहने को घर और न खाने को अन्न था। एक पुराने अस्तबल की छत पर टूटे छप्पर में वह लुहार रहता था। उसके चार बच्चे थे जिन्हें प्रायः वस्त्रों के अभाव से सर्दी में ठिठुरना पड़ता था और कई दिन ऐसे भी निकलते थे कि एक रोटी के चार टुकड़े करके बच्चों को बाँट दी जाती और वे बेचारे उतने में ही सन्तोष करके सो जाते। इन्हीं बच्चों में एक वैज्ञानिक फैरेडे भी था।
उसने अपना रास्ता आप बनाया। धनी माँ-बाप के लडैते बेटो को जो साधन मिलते हैं और इनके सहारे वे आगे बढ़ते हैं, फैरेडे को वह सब कहाँ नसीब था। एक-दो वर्ष ग्राम्य पाठशाला में पढ़ने के बाद जैसे ही वह कुछ कर सकने लायक हुआ उसे कमाने के लिए कुछ करने को विवश होना पड़ा। उसे अखबार बेचने वाले के यहाँ एक काम मिला कि पाठकों के पास अखबार ले जाय और जब तक वे पढ़ न लें तब तक खड़ा रहे। फिर उनसे वापस लेकर दूसरे को पढ़ाने जाय। घन्टों खड़ा रहना पड़ता तब एक पैसा प्रति ग्राहक मजदूरी मिलती। उस जमाने में खरीद कर अखबार पढ़ने वाले कम थे, एक अखबार को कितने ही आदमी पढ़ते और लौटाते थे। फैरेडे चार-छह पैसे रोज की मजदूरी मुश्किल से कमा पाता।
पीछे उसने जिल्दसाजी सीखी। एक जिल्दसाज के यहाँ नौकर हुआ। जो वैज्ञानिक पुस्तकें जिल्द बँधने आतीं उन्हें यह पढ़ डालता। वैज्ञानिक व्याख्यान जहाँ होते सुनने जाता और घर पर आकर घंटों वैज्ञानिक तथ्यों के ऊपर विचार करता। दुर्भाग्य से इन्हीं दिनों उसके पिता का देहान्त हो गया। माता तथा भाइयों के निर्वाह का बोझ उसके ऊपर आ गया। अब मेहनत अधिक करनी पड़ती, समय कम बचता फिर भी वह निराश न हुआ वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयत्न उसने जारी ही रखा।
एक दिन वह साहस बटोर कर हम्फी डेबी से मिला जो इन दिनों वैज्ञानिकों की रायल सोसाइटी के प्रधान कार्यकर्ता थे। उसने रायल सोसाइटी में कुछ काम मिलने की प्रार्थना की ताकि वह अपनी रुचि के अनुसार प्रगति कर सके। सर हम्फी ने उसे झाड़ू लगाने और औजार साफ करने की नौकरी दे दी। इसे पाकर उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। नौकरी का काम पूरी तत्परता से करना और बचे हुए समय में वैज्ञानिकों से संपर्क बढ़ाकर अपनी ज्ञान वृद्धि करना। इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और स्वतन्त्र रूप से बीस साल तक शोध कार्य किया तथा विद्युत सम्बन्धी अन्वेषणों में वैज्ञानिकों की सभा के सदस्य बनाये गये और विज्ञान जगत में भारी सम्मान प्राप्त किया।
वे कहा करते थे-”मैं केवल इतना चाहता हूँ कि अपने श्रम से मानव के ज्ञान के भण्डार की कुछ उन्नति, वृद्धि कर सकूँ। बस इतनी-सी मेरी महत्वाकाँक्षा है।” उनमें अपने विषय का इतना अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया था कि संसार भर के वैज्ञानिक उनसे परामर्श करते थे। उनकी कृतियों के बारे में मि. ग्लैडस्टोन ने कहा था-”वैज्ञानिक ज्ञान की इन अद्भुत कृतियों से संसार बहुत समृद्ध और उपकृत हुआ है।”
भूखे मरने वाले, टूटे छप्पर में रहने वाले, अखबार पढ़ाने और जिल्दसाजी करने वाले, केवल दो कक्षा पढ़े लड़के को फैरेडे बनने में कितना कठिन श्रम करना पड़ा, कितने धैर्य और साहस से काम लेना पड़ा इसका ज्ञान बहुत थोड़े लोगों को है। उसने अपना एक-एक दिन जीवन-युद्ध के रूप में काटा। एक ओर गरीबी, तथा साधन-हीनता की कठिनाई दूसरी और ऊँची महत्वाकाँक्षा इन दोनों का समन्वय करने में उन्हें अपनी दिनचर्या और मानसिक सन्तुलन पूरी तरह सँभालना पड़ा। औरों की तरह यदि वे अभावों से घबड़ा जाते, कठिनाइयों को देखकर निराश हो जाते, उस गई गुजरी स्थिति में ही अनुकूलता उत्पन्न न करते तो वे इतनी बड़ी मंजिल कदापि प्राप्त न कर पाते।
शास्त्रों में पतिव्रत धर्म की महिमा को मुक्त कण्ठ से वर्णन किया गया है और बताया गया है कि पतिपरायणा नारी वह सद्गति सहज में प्राप्त कर लेती है जो योगी-यती एवं ज्ञानी-ध्यानी बड़ी कठिनाइयाँ सहते हुए प्राप्त करते हैं। पतिव्रता नारियों के गौरवमय चरित्रों से भारतीय इतिहास का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है।
अन्धे पति से अपनी स्थिति अच्छी रहने देने की अनिच्छुक धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी ने आँखों में आजीवन पट्टी बाँधे रहने का व्रत लिया और उसे आजीवन निभाया। शैव्या ने हरिश्चन्द्र के साथ, दमयन्ती ने नल के साथ, सीता ने राम के साथ कठिन समय आने पर अपने त्याग और प्रेम का अद्भुत परिचय दिया। सत्यवती ने सत्यवान के साथ, सुकन्या ने वृद्ध च्यवन के साथ कितना उत्कृष्ट सम्बन्ध निवाहा? अरुन्धती, अनुसूया, बेहुला, शकुन्तला, भारती, आदि कितनी ही नारियों के ऐसे दिव्य चरित्र मिलते हैं जिससे यह प्रतीत होता है कि पतिपरायणता को इस देश का नारी समाज अत्यन्त उच्च भावनाओं के साथ निबाहता रहा है।
पतियों के साथ परलोक में भी रहने की भावना से प्रेरित होकर उनके मृत शरीरों के साथ जलकर कितनी ही नारियाँ इस बात का परिचय देती रही हैं कि उनने आदर्श के लिए चिता में जीवित जलने का मर्मान्तक कष्ट सहकर भी भावनाओं को ऊँचा उठाये रहना उचित समझा। पतियों की शान पर रत्ती भर भी आँच न आने देने और पतिव्रत धर्म की रक्षा के लिए चित्तौड़ की रानियों ने जो अपूर्व बलिदान का परिचय दिया उसकी महिमा किन शब्दों में कही जाय? अभी भी स्थान-स्थान पर सतियों के मन्दिर और स्मारक जहाँ-तहाँ देखने को मिलते है, इससे प्रतीत होता है कि प्राचीन काल में भारतीय नारी ने अपने आदर्शवाद की कितने कष्ट सहकर भी रक्षा की है।
पतिव्रत धर्म को एक योग साधन माना गया है। उसका अवलम्बन करने से नारी को आध्यात्मिक उत्कर्ष श्रेष्ठ सद्गति का प्राप्त होना स्वाभाविक है। आत्मसमर्पण एक उच्च स्तरीय साधना है। भगवान को भक्त जब अपना समर्पण करता है तो वह अपने ‘अहम्’ को समाप्त कर देता है और स्वतन्त्र इच्छाओं का परित्याग कर भगवान की इच्छा को अपनी इच्छा बना लेता है। इस प्रकार द्वैत को मिटाने और अद्वैत को प्राप्त करने का साधन बन जाता है। ‘तृष्णा, अहंता, कामना, लोभ, मोह, मान और स्वार्थ की समाप्ति आत्म-समर्पण के साथ ही होती है और साधक को वह मनोभूमि प्राप्त होती है जिसमें भक्ति-मार्ग की सारी कठिनाइयों से सहज ही छुटकारा मिल जाता है। गीता में आत्म-समर्पण योग को साधना मार्ग का मुकुट-मणि कहा है। योगी अरविंद तथा अन्य अनेक तत्व-दर्शियों ने इसी माध्यम से आत्मोत्कर्ष का प्रयास किया और उसे उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही उसको पाया भी जैसा कि शास्त्रकारों ने वर्णन किया है।
भगवान की उपासना उनका कोई भी रूप मानकर की जा सकती है। पौधों में तुलसी, वृक्षों में पीपल, नारियों में गंगा, पत्थरों में शालिग्राम भगवान का प्रतीक मानकर पूजे जाते हैं, मन्दिर में देव प्रतिमायें पाषाण एवं धातुओं की होती हैं उनमें श्रद्धा विश्वास का आरोपण कर जब यह आस्था जमा ली जाती है कि यह भगवान है तो उसकी भावना की प्रतिध्वनि उन्हीं मान्य स्वरूपों से टकरा कर लौटती है और वही फल मिल जाता है जो साक्षात् भगवान की भक्ति करने पर उनके प्रत्यक्ष अनुग्रह द्वारा प्राप्त होता है। पतिव्रत धर्म को पालन करने में भी यही प्रयोजन सिद्ध होता है। पति को भगवान मानकर साधना करने में कोई अड़चन नहीं। जब पत्थर, नदी, वृक्ष, पौधों को भगवान माना जा सकता है और उनकी पूजा की जा सकती है तो मनुष्य शरीर धारी आत्मा के प्रति वैसी मान्यता बनाने में क्या कठिनाई हो सकती है? योग साधना के प्रथम चरण में गुरुभक्ति को ईश्वर भक्ति का प्रारम्भ माना जाता है। गुरु को आत्मसमर्पण करके शिष्य ईश्वर परायणता का अभ्यास करता है और जब उसमें निष्ठा जम जाती है तब उसी का विकसित स्वरूप परमात्मा में आत्मा का लय करने देने का निमित्त बन जाता है। तात्पर्य इतना ही है कि मनुष्य को भी भगवान का स्वरूप मानकर उसके माध्यम से आत्मसमर्पण का अभ्यास किया जा सकता है और योग साधन का लक्ष प्राप्त करने में इस सरल माध्यम से आगे बढ़ा जा सकता है।
भारतीय नारियाँ इसी विचार से पतिव्रत धर्म को आत्म-कल्याण की भावना मानकर उसे अपनाती रही है। पति की दुर्बलताओं और त्रुटियों की ओर उनने उपेक्षा ही की है। अच्छी भावनाओं की उत्कृष्टता बनी रहना तभी संभव है जब साधक अपने इष्ट के दोष, दुर्गुण एवं दुर्बलताओं की उपेक्षा करता हुआ अपने कर्तव्य एवं सद्भाव में रत्ती भर भी कमी न आने दे। पतिव्रता यही तो करती है। पति को अपना सर्वस्व मानकर उसकी इच्छानुगामिनी बन कर कोई नारी जब उसे आत्मिक प्रगति का, आत्म-समर्पण साधना का माध्यम समझती हुई एक भावुक भक्त की भूमिका में उतरती है तो उसके लिए आत्म-कल्याण का लक्ष्य प्राप्त कर लेना कुछ भी कठिन नहीं रह जाता।
आत्मिक प्रगति के साथ-साथ पतिव्रत धर्म के पालन में लौकिक प्रगति की असंख्य सम्भावनाएं निहित रहती हैं। संघर्ष तभी होता है जब दोनों के मन में भिन्नता रहती है। एक की राह पूर्व, दूसरे की पश्चिम होती है तभी मन मुटाव का अवसर आता है। यदि पति-पत्नी में से एक दूसरे का इच्छानुवर्ती बन जाय तो फिर संघर्ष का कोई कारण न रहेगा। सुधार की दृष्टि से प्रेमपूर्वक भी प्रयत्न किये जा सकते हैं, कुमार्गगामी को सन्मार्ग पर लाने के लिए प्रेम और त्याग की अपनत्व भरी लड़ाई भी की जा सकती है। इस प्रकार भी हृदय परिवर्तन हो सकता है। सुधार के लिए कटु संघर्ष अनिवार्य नहीं। पति-पत्नी के बीच कोई मतभेद हो तो उसे सुलझाने में बिना संघर्ष किये ही अपनी सद्भावना शक्ति से भी बहुत कुछ प्रयोजन सिद्ध हो सकता है। त्याग से बढ़कर और कोई शक्ति नहीं, प्रेम से बढ़कर और शस्त्र नहीं। इस शक्तिशाली शस्त्र को अपना कर कोई भावना-शील पतिव्रता नारी अपने कुमार्ग-गामी पति को भी सन्मार्ग पर ला सकती है और यदि न भी ला सके तो वह अपना कर्तव्य करती हुई आत्म सन्तोष कर ही सकती है। संघर्ष को तो बचा ही सकती है।
पति सुधरा हुआ हो तब तो कहना ही क्या है पर यदि उसका स्तर घटिया हो, विचार, चरित्र एवं व्यवहार की दृष्टि से वह उपयुक्त स्थिति से नीच हो तब भी उसे निबाहने की भावना रखने वाली नारी पारिवारिक कलह को बचा सकती है और दाम्पत्य जीवन को क्लेश-द्वेष की आग में जलने से तो सुरक्षित रख ही सकती है। पारिवारिक शाँति का भौतिक जीवन में इतना बड़ा स्थान है कि उस पर धन समृद्धि एवं अन्य अनेक सुख सुविधाओं को निछावर किया जा सकता है। संतोषी स्वभाव की सहिष्णु, परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढालने वाली, कर्तव्यपरायण एवं हँसमुख विनम्र स्वभाव की स्त्री को ‘गृहलक्ष्मी’ कहते हैं। जिस घर में ऐसी देवियाँ रहती हैं वहाँ सुख शान्ति को भी विवश होकर रहना पड़ता है।
सत्यवादिता के एक ही सद्गुण को अपना लेने से छोटे-छोटे अनेकों सद्गुण मनुष्य में स्वतः उत्पन्न हो जाते हैं उसी प्रकार पतिव्रत धर्म अपना लेने पर नारी में वे अनेकों विशेषताएँ उत्पन्न हो जाती हैं जिनके कारण वह पति परिवार में साम्राज्ञी बन कर रहे। महाभारत में द्रौपदी-सत्यभामा संवाद प्रसिद्ध है। उस प्रसंग में द्रौपदी ने यही बताया है कि वह काली-कलूटी होते हुए भी अपने पतियों के हृदय पर अपने पतिव्रत एवं श्रेष्ठ स्वभाव के कारण किस प्रकार शासन करती है। उस प्रयोग को कोई भी स्त्री कर सकती है और बुरे में बुरे पारिवारिक वातावरण को अपने सद्गुणों के आधार पर स्वर्गीय सुख-शाँति का केन्द्र बना सकती है। जहाँ पतिव्रत की प्रगाढ़ आस्था होगी, आत्म समर्पण का भाव रहेगा। वहाँ भावनागत कोमलता के कारण पति को सुखी और सन्तुष्ट बनाने की आकाँक्षा की जायेगी और उस आकाँक्षा की पूर्ति के लिए अपने गुण कर्म स्वभाव को उसी ढाँचे में ढालना पड़ेगा जिससे अभीष्ट परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकें। अपने सद्गुणों से ही तो पति तथा उसके परिवार को सन्तुष्ट रखा जाता है। पतिव्रता नारी को अनिवार्यतः अपनी स्वेच्छाचारिता त्याग कर अपनी इच्छाओं एवं स्वभाव को नरम बनाकर अनुकूलता उत्पन्न करके बहुत कुछ बदलना पड़ता है। पतिव्रता में ऐसा परिवर्तन अनायास ही होता भी है।
पर-पुरुष से कुकर्म न करने का नाम ही पतिव्रत नहीं है। यह तो उसका एक छोटा सा अंग-मात्र है। वस्तुतः आत्म-समर्पण की भावना का नाम ही पतिव्रत धर्म है। उसका स्तर ईश्वर भक्ति जैसा होता है। इस आध्यात्मिक साधना को अपनाने वाली नारी अहंताजन्य अगणित पापदोषों से मुक्त होकर द्वैत की मंजिल पार करती हुई अद्वैत की ब्रह्म निर्वाण की जीवन स्थिति प्राप्त करती है और अपने सद्गुणों के कारण जिस घर में रहती है वहाँ स्वर्गीय सुख-शाँति का वातावरण प्रस्तुत कर देती है। पातिव्रत का यह एक ही लाभ भौतिक-दृष्टि से इतना बड़ा है कि उसे अन्य सफलताओं एवं सम्पन्नताओं से कहीं अधिक बढ़-चढ़ कर माना जायगा। दो आत्माएँ एक बनकर जब जीवन यापन करती हैं तो उनका बल साहस एवं अन्तस्तल इतना अधिक विकसित होने लगता है जिसके माध्यम से अनेक कठिनाइयों से लड़ते हुए प्रगति पथ पर बढ़ते चलना और शक्तिमय सार्थक जीवनयापन कर सकना सहज ही संभव हो जाता है। प्रगतिशील लोगों के जीवन में उनकी धर्मपत्नियों का भारी सहयोग रहा है। यदि उन्हें ऐसी नारी न मिली होती जो मनोबल बढ़ाने और जीवन को व्यवस्थित रखने में सहायता कर सके तो सम्भवतः वे गिरी स्थिति में ही गुजर करते और महापुरुष एवं प्रगतिशील बनने के लाभ से वंचित हो रह जाते। पतिव्रता नारी किसी पति के लिए एक दैवी वरदान ही कही जा सकती है।
सुसंतति का मूल आधार दाम्पत्ति प्रेम है। बच्चे को विकसित सुशिक्षित एवं सुसंस्कारी बनाने के लिए जितने भी उपाय हो सकते हैं उन सब से अधिक प्रभावशाली मार्ग यह है कि पति-पत्नी में आन्तरिक प्रेम रहे। रज-वीर्य के मिलने से बच्चे का शरीर बनता है पर उसका अन्तःकरण माता-पिता के परस्पर प्रेम और सद्भाव पर निर्भर रहता है। जिन पति-पत्नी के बीच अगाध प्रेम होगा उसके गर्भोत्पादक परमाणु एक ही विद्युत धारा से प्रभावित होकर अनुकूलता की दिशा में गतिशील रहेंगे। गर्भ में बालक के शरीर की वृद्धि माता के रस व रक्त से होती है पर चेतना एवं भावना-संस्थान माता-पिता के परस्पर प्रेम भाव की विद्युत धाराओं के आधार पर ही विकसित होता है। उन दोनों के बीच यदि द्वेष, घृणा, मनोमालिन्य रहे असन्तोष के भाव रहें तो उसकी प्रतिक्रिया गर्भस्थ बालक के मानसिक विकास पर अत्यन्त घातक होती है। माता जैसी उद्विग्न, असन्तुष्ट रहती है उसी के अनुरूप बालक का मन अनेक विकृतियों एवं मानसिक गलतियों से भर जाता है और बड़ा होने पर वह अवज्ञाकारी, उद्दण्ड, अविवेकी, असंयमी आसुरी प्रकृति का होता है। आज ऐसे ही दुर्गुणी बालकों का बाहुल्य हो रहा है उसका प्रमुख कारण पति-पत्नी के बीच रहने वाला दुर्भाव होता है।
वर्णशंकर बालकों को हेय इसलिए माना गया है कि गुप्त व्यभिचार से उनका जन्म होने के कारण माता-पिता उसके आगमन को अशुभ मानते हैं, छिपाते हैं, पछताते हैं और गर्भस्थ आत्मा को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। ऐसा न भी करें तो भी उस नवनिर्माण से उन्हें कोई प्रसन्नता नहीं होती। उस स्थिति में माता-पिता के बीच परस्पर दुर्भाव ही बढ़ते रहते हैं। इसका प्रभाव बालक की मनोभूमि पर पड़ता है और वह बड़ा होने पर एक असभ्य नागरिक बनता है। विदेशों में कुमारी माताओं के गर्भ से उत्पन्न जारज सन्तानों से पालन का राज्य की ओर से प्रबन्ध है। हर वर्ष लाखों बच्चे इस प्रकार उत्पन्न होते और पलते हैं। पर देखा यह जाता है कि वे मानसिक दृष्टि से विकसित नहीं होते, ऊँची शिक्षा मिलने पर भी वे घटिया कामों के योग्य ही बन पाते हैं। यही बात उन बालकों के बारे में लागू होती है जो विवाहित माता से तो उत्पन्न होते हैं, वैध भी माने जाते हैं पर माता-पिता के मनोमालिन्य के कारण मानसिक दृष्टि से अविकसित ही रह जाते हैं। इन्हें स्पष्टतः वर्णशंकर नहीं कहा जा सकता पर लगभग वैसी ही मनोभूमि माता-पिता की रहने से बच्चे भी उत्कृष्ट भावना-स्तर से वंचित रह जाते हैं। हमारी पीढ़ियों में नैतिकता, मानवता, चरित्र एवं आदर्शवादिता के तत्व क्रमशः घटते ही चले जा रहे है। इसका एक बहुत बड़ा कारण दाम्पत्ति जीवन में आत्मीयता की प्रगाढ़ता न होना भी है ही।
पतिव्रत धर्म सुसंतति को जन्म देने के लिए नितान्त आवश्यक है। बालकों से ही किसी परिवार का भविष्य उज्ज्वल बनता है। अपने वंश, कुल और परिवार का गौरव बढ़ाने वाले बालक वहीं जन्मेंगे जहाँ माता ने पतिव्रत धर्म को उचित महत्व दिया होगा। यह तत्व जहाँ जितना ही कम होगा वहाँ उसी अनुपात से बालकों से शरीर और मन में अगणित विकृतियाँ भरी रहेगी। जो अभिभावक अपनी संतान में मनोवाँछित स्वास्थ्य सौंदर्य एक सद्गुण देखना चाहते हैं उन्हें उसकी सबसे बड़ी तैयारी यही करनी चाहिए कि पति-पत्नी के बीच अगाढ़ प्रेम और विश्वास बना रहे।
नारी के लिए जो महत्व पतिव्रत का है वही ज्यों-का त्यों नर के लिये पत्नी व्रत का है। जिस प्रकार नारी पतिव्रत धर्म का अवलम्बन करके अपने आत्म-कल्याण, पारिवारिक स्वर्ग एवं सुसंतति की संभावना उत्पन्न करती है उसी प्रकार पुरुष पत्नीव्रत धर्म का पालन करते हुए इन्हीं विभूतियों एवं सिद्धियों को उपलब्ध करता है।
पतिव्रत धर्म और पत्नीव्रत धर्म एक दूसरे के पूरक हैं। नर और नारी की रचना इस प्रकार हुई है कि एक दूसरे की अपूर्णताओं को पूर्ण करके पारस्परिक सहयोग से एक सर्वांगपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करें। पत्नी को अर्धांगिनी कहा गया है, यही बात पति के लिए भी कही जा सकती है। दोनों का सम्मिलित स्वरूप ही एक परिपूर्ण इकाई बनता है। दो हाथ, दो पैर, दो आँखें, दो नथुने, दो कान, दो फेफड़े मिलकर जिस प्रकार अपने-अपने प्रयोजन को पूरा करते हैं उसी प्रकार नर-नारी भी एक सर्वांगपूर्ण जीवन की आवश्यकता पूरी करते हैं। आँख, नाक, कान, हाथ, पाँव, नथुने, फेफड़े आदि युग्मों में से एक यदि नष्ट हो जाय, बीमार, अशक्त, दुर्बल या अव्यवस्थित हो तो शरीर में उपहासास्पद कुरूपता बढ़ती है। लोग उसे काना, भेंड़ा, लंगड़ा, टोंटा, नकटा आदि कहकर चिढ़ाते हैं। बात वास्तविक होती है फिर भी उसमें अपमान अनुभव किया जाता है क्योंकि अपूर्णता अपमान की ही बात होती भी है। मानव-जीवन भी गाड़ी के दो पहियों की तरह पति-पत्नी रूपी दो संतुलित माध्यमों पर ठीक प्रकार लुढ़कता है। इनका पारस्परिक ताल-मेल न खाता हो तो गाड़ी को कुछ दूर तक घसीट भले ही लिया जाय उसमें लम्बी यात्रा पूरी नहीं हो सकती। पति-पत्नी के बीच यदि संतुलन और सामंजस्य न हो तो किसी भी गृहस्थ का भविष्य अन्धकार-मय ही बना रहेगा।
जिन्हें सार्वजनिक सेवा या किसी विशेष लक्ष्य से इतनी तन्मयता होती है कि गृहस्थ पालन एवं आजीविका उत्पादन में समय का एक अंश भी बर्बाद न हो ऐसे विशिष्ट मनस्वी लोगों के लिए बिना गृहस्थ बनाये भी काम चल सकता है। वे आजीवन अविवाहित रहना चाहें तो रह भी सकते हैं। जिन्हें कोई शारीरिक या मानसिक रोग है और गृहस्थ के उत्तरदायित्वों को निबाहने में असमर्थ हैं उनके लिए भी अविवाहित रहना ठीक है। पर सामान्य मनुष्य को गृहस्थ बनना ही पड़ता है इसके बिना उसकी अपूर्णता प्रगति के पथ में भारी अड़चन उत्पन्न करती है और उस अड़चन के कारण शारीरिक मानसिक सामाजिक एवं आर्थिक क्षेत्रों में मनुष्य पिछड़ा हुआ ही पड़ा रहता है।
प्राचीन काल के इतिहास पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि कुछ थोड़े में अपवादों को छोड़कर प्रायः सभी ऋषि गृहस्थ थे। योग साधन एवं वनवास में रहते समय भी उनकी पत्नियाँ साथ रहती थीं। ब्रह्मचर्य पालन या न पालन मनुष्य की मनोदशा पर निर्भर है। गृहस्थ में भी आवश्यक ब्रह्मचर्य रह सकता है और अविवाहित लोग भी अपना सत्यानाश करते रह सकते हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए गृहस्थ मुनि भी सपत्नीक रहते थे। ऋषियों में प्रधान सप्त ऋषियों की पत्नियाँ भी और उनके बच्चे भी थे। वशिष्ठ ऋषि के बालकों को विश्वामित्र द्वारा मार डाले जाने की कथा प्रसिद्ध है। लोमश ऋषि के बालक शृंगी ऋषि ने अपने पिता के अपमान से कुद्ध होकर परीक्षित को शाप दिया था। इस प्रकार भी कथाओं का वर्णन यहाँ किया जाय तो प्रायः प्रत्येक ऋषि की धर्म पत्नी और बालकों की सुविस्तृत चर्चा की जा सकती है। पत्नी बच्चों को त्याग कर भाग खड़े होने का वैराग्य तो अवैदिक अशास्त्रीय और अनैतिक है। यह प्रथा तो बुद्धकाल में पड़ी थी, जिसका वैदिक धर्मानुयायी सदा से विरोध करते चले आ रहे हैं। वानप्रस्थ तो पत्नी समेत होता ही है। संन्यास में पत्नी की रुचि और सुविधा प्रधान रहती है। वह चाहे तो अपने पुत्र-पौत्रों के साथ रहे चाहे तो पति के साथ परिव्रज्या या कुटीचक के रूप में उनका सहचरत्व ग्रहण करके वैराग्य धर्म का पालन करती रहे।
देवताओं में से सभी गृहस्थ हैं। ईश्वर के अवतारों में भी अधिकाँश ने अपना गृहस्थ बनाया है। ब्रह्मा की पत्नी, सावित्री, विष्णु की लक्ष्मी, शंकर ही पार्वती, इन्द्रा की शची, वृहस्पति की अरुन्धती प्रसिद्ध है। भगवान राम और कृष्ण जिनका नाम लेकर हम भव सागर से पार होते हैं। गृहस्थ ही तो थे। दाम्पत्ति जीवन की आवश्यकता एवं उपयोगिता को स्वीकार करते हुये उन्होंने मर्यादा पालन के लिए एक सद्गृहस्थ के रूप में ही अपना चरित्र प्रस्तुत किया है। जीवन की सुविधा तो दाम्पत्ति जीवन में बढ़ती है साथ ही कितने ही जीवन लक्ष्यों की पूर्ति में भी भारी सहायता मिलती है।
जो सुविधा नारी को नर का सान्निध्य स्वीकार करने में है वही नर के लिये नारी का आश्रय लेने में है। तत्वतः वे दोनों एक दूसरे की अपूर्णताओं को अपनी-अपनी विशेषताओं के द्वारा पूर्ण करते हैं। इनमें से कोई न बड़ा है न छोटा। न किसी के अधिकार कम हैं न अधिक। न किसी का गौरव न्यून है न अधिक। हाथ, पैर, कान, आँख, में से किसे ऊँच कहा जाय किसे नीच? किसे बड़ा माना जाय किसे छोटा? गाड़ी के दो पहियों में से किसे महत्वहीन? वस्तुतः दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, इनमें से किसी को भी तुच्छ नहीं कहा जा सकता। यदि श्रेष्ठता कनिष्ठता ढूँढ़ी भी जाय तो नारी का पलड़ा ही भारी पड़ता है। बालक को जन्म देने से माता का अनुदान ही अधिक रहता है इसलिए पिता से माता को श्रेष्ठ माना गया है। पति-पत्नी में भी नारी प्रधान है। भगवान के नाम युग्मों में पत्नी का नाम पहले है पति का पीछे। लक्ष्मी, नारायण, उमाशंकर, सीताराम राधेश्याम, जैसे नामों में इसी तथ्य का प्रतिपादन होता है।
पतिव्रत धर्म पालन करती हुई नारी जिस प्रकार अपने जीवन को सार्थक और संबंधित वातावरण को स्वर्गीय बनाती है ठीक वही बात पत्नीव्रत धर्म पालन करते हुए पुरुष भी करता है। इसलिए शास्त्रकारों ने पतिव्रत धर्म और पत्नी व्रत धर्म को एक ही न्याय तुला में तोला है और नर-नारी को समान निष्ठा के साथ अपने-अपने इन धर्म कर्तव्यों का पालन करने का निर्देश दिया है। पत्नी को अपने शरीर का आधा अंग मान कर उसे आत्मसात करने में, उसकी प्रगति, प्रसन्नता एवं सुविधा के लिये अधिकाधिक त्याग बलिदान करने में पति की सदाशयता उसी प्रकार परखी जाती है जैसे पत्नी की आत्मसमर्पण करते हुए पतिव्रत पालन करने में। वह एकाँगी हो तो फलप्रद न होगा, एक पक्ष चाहे तो कर्तव्य भावना में उसे किसी प्रकार निबाहता रह सकता है पर उसका विकास संभव न होगा, विकास तो दूसरे पक्ष के आवश्यक सहयोग पर ही निर्भर हैं। ताली दोनों हाथ से बजती है। राम का पत्नीव्रत सीता को पतिव्रता बनाये रहा पर मन्दोदरी ने रावण को मरते ही विभीषण से पुनर्विवाह कर लिया। यह तथ्य बताते हैं कि सुविकसित सजीव पतिव्रत तभी सम्भव है जब पति भी पत्नीव्रत के प्रति वैसा ही निष्ठावान हो, जैसी कि सती साध्वी नारियाँ अपने धर्म कर्तव्य के प्रति गहन आस्था धारण किये रहती हैं।
पिछले दिनों परिस्थितियों से अनुचित लाभ उठाने की दुष्प्रवृत्ति ने मानव मन में घुस बैठने का जोरों से प्रयत्न किया है, फलस्वरूप जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भयानक प्रवृत्तियों का बोलबाला हो चला है। शिशुओं का पालन और गृह व्यवस्थापिका का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व संभालने के कारण नारी का कार्यक्षेत्र घर रहा है। घर में रहते हुए बौद्धिक विकास चातुर्य एवं अनुभव सम्पादन करने के अवसर कम मिलते हैं। फलतः नारी बौद्धिक दृष्टि से कुछ पिछड़ी रह जाती है। भाग-दौड़ एवं कठिन श्रम जैसा कि नर को करना पड़ता है वैसा नारी को नहीं करना पड़ता फिर प्रसव एवं शिशुपालन का प्रत्यक्ष दबाव उस पर पड़ता है जिससे स्वास्थ्य भी कुछ न कुछ पिछड़ा ही रहता है। उपार्जन के माध्यम घर से बाहर होते हैं। पुरुष की स्थिति उसे एक कार्य के लिए समर्थ बनाती है इसलिए वह ‘कमाऊ’ कहलाता है और नारी उससे भी अधिक श्रम करती रहने पर भी ‘बिना कमाऊ’ रहती है। पुरुष कमाकर लाने पर गर्व करता है और इसके बदले में अपना वर्चस्व अधिकार प्रदर्शित करता है। परिस्थितियों ने बुद्धि, स्वास्थ्य और उपार्जन की दृष्टि से नारी को नर से पिछड़ा रहने दिया है पर उसका अर्थ यह कदापि नहीं कि फलतः यह क्षमताएँ उनमें नहीं हैं या कम हैं। जिन देशों में उन्हें समुचित अवसर मिलता है वे पुरुषों की तुलना में अपनी उपयोगिता कुछ बढ़-चढ़ कर ही सिद्ध करती हैं।
शिक्षा स्वास्थ्य और उपार्जन में कार्यक्षेत्र में समाज ने नारी को पीछे छोड़ा और नर को आगे बढ़ाया। इससे पुरुष को अधिक विनम्र, अधिक कृतज्ञ और अधिक उदार होना चाहिए था। नारी ने गृह-क्षेत्र के कठिन उत्तर-दायित्व को स्वीकार कर पुरुष को अधिक समर्थ बनने का अवसर दिया तो इसमें उदारता उसी की तो मानी जायगी। यदि नारी यह स्वीकार न करती, अपने स्वतन्त्र विकास पर अड़ जाती तो नर को चूल्हा, चौका और गृह व्यवस्था स्वयं ही सँभालनी पड़ती। कितने ही देशों में पुरुषों को शिशु-पालन, भोजन छादन तथा दूसरे गृह कार्य करने पड़ते हैं और नारी उपार्जन तथा अन्य सामाजिक कार्यों को संभालती है। वहाँ उनकी प्रतिभा एवं स्थिति नर से कहीं अच्छी होती है। ऐसे देशों की स्त्रियों के लिए यही उचित है कि वे पुरुषों को धन्यवाद दें कि गृह कार्यक्रम का अपेक्षाकृत कहीं अधिक कठिन कार्य उनने अपने कन्धे पर लेकर उन्हें बाहर का सरल और मनोरंजक कार्य करने की छूट दे दी। इसी प्रकार जिन देशों में वह सुविधा पुरुषों को प्राप्त है वहाँ उनका धर्म है कि नारी की उदारता से प्राप्त हुए इस अवसर का आभार मानें और इसका प्रत्युपकार चुकाने के लिए उचित से भी अधिक सौहार्द सज्जनता एवं उदारता का परिचय दें।
खेद की बात यह है कि नारी की उदारता से प्राप्त सुविधा का प्रत्युपकार चुकाने के स्थान पर उसे हेय और हीन माना जाने लगा और अपनी विकसित सामर्थ्य के अहंकार में नारी को पददलित प्रतिबंधित एवं उत्पीड़ित किया गया। ऐसे नियम उपनियम बनाये गये जिससे उसके मानवीय अधिकार भी छिन गये। पर्दा प्रथा भले ही यवन शासन काल में हिन्दु ललनाओं के सतीत्व की रक्षा के लिए सदुद्देश्य से प्रचलित की गई हो, पीछे तो उसने एक कानून एवं परम्परा का रूप धारण कर लिया। पुरुष की अपेक्षा हेय एवं हीन, असभ्य एवं अविश्वस्त होने की क्रूर मानवता पर्दा प्रथा के पीछे-पीछे छिप कर नियति पर व्यंग करती रहती है। मनुष्य को मनुष्य के आगे मुँह ढक कर रहना पड़े। एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के आगे खुले शब्दों में बोल न सके यह प्रतिबंध मानवीय सभ्यता का इतना बड़ा तिरस्कार है कि हमें अपनी इस अनैतिकता को धर्म मान्यता घोषित करते हुए शर्म से डूब कर ही मर जाना चाहिए।
भारतीय नारी का वर्तमान पिछड़ापन पुरुष वर्ग की अमानुषिक क्रूरता का प्रतिफल है। इस पिछड़ेपन को उसने ईश्वर प्रदत्त वरदान माना और प्राप्त सुविधा कर बुरे से बुरा दुरुपयोग करने का प्रयत्न किया। इसी दुरुपयोग का एक बड़ा प्रमाण यह है कि पतिव्रत धर्म नारी के लिए तो आवश्यक माना जाता है पर पुरुष उस प्रतिबंध से बचा रहना चाहता है और स्वयं इस सम्बन्ध में अनैतिकता एवं स्वच्छन्दता का आचरण करना चाहता है। कामी, विषयी, लम्पटी, दुराचारी और अनेकों अश्लील कुकर्मों में लगे हुए पुरुष भी अपनी पत्नी को सीता, सावित्री से कम नहीं देखना चाहते।
बंधन, उत्पीड़न, त्रास एवं दमन के बल पर नारी को मनुष्यों की सद्भावनाएं एक दूसरे को अपनी ओर आकर्षित करती हैं प्रेम से प्रेम और द्वेष से द्वेष की वृद्धि होती है। बलवान का उत्तर-दायित्त्व दुर्बल से अधिक है। आज पुरुष समर्थ है तो उसका कर्तव्य है कि अपने आचरण और व्यवहार से ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करे जिनके रहते हुए पत्नी पतिव्रत के अतिरिक्त और कोई बात सोच ही न सके स्त्रियाँ स्वभावतः देवी होती हैं। उनके नाम के आगे देवी शब्द लगाने की प्रथा परम्परा वास्तविकता के आधार पर ही प्रचलित हुई है। भगवती देवी, शकुन्तला देवी, राधा देवी, सावित्री देवी, विमला देवी आदि नामों में इस सच्चाई का ही उद्घोष है कि नारी में देवी तत्त्व अत्यधिक मात्रा में विद्यमान है। यह मात्रा अक्षुण्ण बनी रहे, सुविकसित हो और परिपुष्टि होती चले इसके लिए यह आवश्यक है कि पुरुष अपना आन्तरिक स्वरूप देवताओं जैसा बनाये रहे। भारतीय नारी स्वभावतः पतिव्रता होती हैं। कुलटा तो उसे पुरुषों की दुष्टता बहका कर ही बना देती है। पति परायणता की भावनाएं विद्रोह न करने लगे, इतना ध्यान रखना पति का काम है। उसे अपने को आदर्श पति के रूप रखना चाहिए और निष्ठापूर्वक पतिव्रत धर्म का पालन करना चाहिए, जैसे कोई सती-साध्वी नारी पतिव्रत धर्म का पालन करती हैं। उभय-पक्षीय कर्तव्य पालन से ही वह परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, जिसमें मनुष्य का गृहस्थ जीवन सार्थक हो और परिवार में स्वर्गीय वातावरण का आनन्द लाभ किया जा सके।
मानव शरीरधारी के लिये स्वास्थ्य रक्षा की समस्या सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यद्यपि अनेक अनभिज्ञ व्यक्ति धन को ही सब से बड़ी चीज बतलाते हैं और अन्य लोग बढ़िया भोज्य सामग्री, चमक-दमक की पोशाक, सुन्दर महल, गाड़ी, मोटर आदि वाहन को सुख का आधार कहते हैं, पर थोड़ा-सा ही विचार करने पर मालूम हो जाता है कि ये सब चीजें उत्तम स्वास्थ्य होने पर ही उपयोगी सिद्ध हो सकती हैं। दुनिया में ऐसे सैकड़ों व्यक्ति मिल सकते हैं जिनके पास लाखों या करोड़ों की संख्या में भी धन मौजूद हैं और सब प्रकार की सुख-सामग्री भी जिनको प्राप्त है, पर जो सदा रोगी और दुःखी ही बने रहते हैं। ऐसे ही अनेक व्यक्ति तो यहाँ तक दुःखी होते हैं कि आत्मघात करके दुःखों से छुटकारा पाने की चेष्टा करते हैं।
अब से पचास-साठ वर्ष पहले अमरीका के मि0 राकफैलर संसार के सब से बड़े धनी व्यक्ति समझे जाते थे। उस समय उनकी सम्पत्ति का अनुमान एक अरब रु0 के लगभग किया जाता था। पर धन कमाने में ही सदा संलग्न रहने के फलस्वरूप उनका स्वास्थ्य खराब हो गया था और उनके आमाशय में ऐसी खराबी पैदा हो गई थी कि वे किसी तरह का खाद्य-पदार्थ पचा नहीं सकते थे। करोड़पती से भी बढ़ कर धनवान होने पर भी वे साधारण भोजन के लिये तरसते थे। अन्त में एक डॉक्टर ने उनको मक्खन निकला हुआ दूध, जिसे अनेक स्थानों में तो फैंक दिया जाता है, खाने को बताया और वह उनको किसी प्रकार हजम होने लगा।
इस दृष्टि से सही और स्थायी स्वास्थ्य मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पत्ति है जिसके आधार पर यदि मनुष्य चाहे तो अपने जीवन को हर तरह से सार्थक बना सकता है। पर इसमें भी अधिकाँश मनुष्य एक भूल यह करते हैं कि वे इस विषय पर केवल शारीरिक-भौतिक दृष्टि से विचार करते हैं। अगर वे अच्छा आहार प्राप्त करके हृष्ट-पुष्ट बन जाते हैं और बिना किसी विशेष बीमारी के अपना नित्य का काम ठीक तरह से करते रहते हैं तो इस स्थिति को सन्तोषजनक मान लेने है। वे इससे आगे बात पर कभी विचार नहीं करते कि शरीर के साथ ही उनकी मानसिक स्थिति का ऊँचा रहना और आत्मिक शान्ति का प्राप्त करना भी आवश्यक है। वस्तुतः मानसिक और आत्मिक क्षेत्र शरीर की अपेक्षा विशेष महत्त्व के होते हैं। यदि ये दोनों ठीक दशा में न रहें तो शारीरिक स्वास्थ्य का स्थायी रह सकना भी सम्भव न होगा। इसी तथ्य को दृष्टिगोचर रख कर श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है :-
आयुः सत्व वलारोग्य सुख प्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृघा आहारा सात्त्विकप्रियाः॥
अर्थात् “सात्विक आहार ही आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य सुख और प्रीति की वृद्धि करने वाला होता है।” इसके विपरीत राजसिक आहार, चाहे वह अधिक स्वादिष्ट तथा चटपटा जान पड़ता है और उसके द्वारा आरम्भ में ताकत और हिम्मत की अधिकता भी जान पड़ती है, पर अन्त में वह रोग, दुःख और चिन्ता का उत्पन्न करने वाला ही सिद्ध होता है :-
कट्वम्ललवणात्युष्णा तीक्ष्णरुक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्ठा दुःखशोकमय प्रदाः॥
इस भेद का मुख्य कारण यही है कि जहाँ सात्विक भोजन मनुष्य से आध्यात्मिक भावों की वृद्धि होती है, सद्गुणों की ओर मन झुकता है, वहाँ राजसिक और तामसिक आहार से आत्मा पर अन्धकार का पर्दा पड़ने लगता है और सद्विवेक की शक्ति कुण्ठित होकर मन कुमार्ग पर जाने लगता है। ऐसी स्थिति में लोग चाहे आरम्भ में कुछ व्यसनों या शौकों की पूर्ति होने से खुशी भले ही मना लें पर इसका अन्तिम परिणाम पतन के सिवाय और कुछ नहीं हो सकता।
आहार का सब से पहला नियम यह है कि वह भली प्रकार पच कर शरीर के पोषणार्थ उत्तम रस और रक्त के रूप में परिणित हो सके। यही कारण है कि अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थों, उपनिषदों चिकित्सा ग्रन्थों में हर जगह यह आदेश दिया गया है कि आमाशय के आधे भाग को भोजन से भरे, चौथाई को पानी से भरे और शेष चौथाई को वायु के संचारार्थ खाली रहने दे जिससे भोजन का परिपाक भली प्रकार हो सके। पर जैसा हम भली प्रकार जानते हैं कि सब प्रकार की मिठाइयाँ और अधिक घी वाले पदार्थ गरिष्ठ होते हैं और यदि उनको अधिक मात्रा में खाया जाय तो अनपच हो कर रस और रक्त को अशुद्ध बनाते हैं। यही कारण है कि जो पण्डे, पुजारी आमतौर से मिष्ठान्न और पकवान का भोजन पाते रहते हैं, उनमें सात्विकी के बजाय राजसिक और तामसिक प्रवृत्ति ही विशेष देखने में आती है।
आहार के इस आध्यात्मिक पहलू को दृष्टिगोचर रख कर ही योग ग्रन्थों में सुपाच्य खाद्य-पदार्थों का अल्प मात्रा में सेवन करने का आदेश दिया है। जो ऐसा नहीं करते उनके लिये देर तक आसन पर बैठ सकना, प्राणायाम के द्वारा नाड़ी शुद्ध कर सकना और ध्यान में मन लगाये रख सकना कठिन हो जाता है। आरम्भिक यौगिक क्रियाओं का एक उद्देश्य यह भी होता है कि शरीर की पूरी तरह शुद्धि हो जाय और किसी तरह की व्याधि अथवा शारीरिक कष्ट का चिह्न न रहे। क्योंकि जिसके मन की एकाग्रता तथा ध्यान शारीरिक कष्टों के कारण भंग होते रहेंगे वह मन को वशीभूत करके चित्त की वृत्तियों को संयमित करने में कदाचित ही समर्थ हो सकता है। इसलिये योगी को सर्वप्रथम स्वादेन्द्रिय को वश में करके अपने आहार का इस प्रकार नियमन करना पड़ता है कि उसमें साधनों को करने लायक शक्ति तो पूर्ण मात्रा में बनी रहे, पर पेट में किसी प्रकार की गन्दगी, कब्ज, वायु की अधिकता आदि दोष उत्पन्न न हों।
यदि मनुष्य पाशविकता और लम्पटता से ऊपर उठ कर सचमुच आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने का इच्छुक हो तो उसके लिये अपने आहार में सुधार करना अनिवार्य है। हमारा भोजन न्याययुक्त उपायों से उपार्जित, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार का कष्ट न होकर प्राप्त किया हुआ, सात्विक-गुणयुक्त तो होना ही चाहिये, पर साथ ही यह भी ध्यान रखा जाय कि यथासम्भव स्वाभाविक और प्राकृतिक अवस्था में भी हो। परम्परा और पुराने अभ्यास को देखते हुए आज हम यह तो नहीं कह सकते कि मनुष्य आग पर पकाये भोजन को पूर्णतया त्याग कर केवल फल, मूल और पत्तों का ही उपयोग करने लगे, पर हम यह अवश्य कहेंगे कि पके हुये भोजन के परिमाण में कमी करके उसे साथ में कच्चे फल, शाक, पत्तों का व्यवहार अवश्य करना चाहिये और अपनी शारीरिक और आर्थिक परिस्थिति को देखते हुए प्राकृतिक भोजन का परिमाण क्रमशः बढ़ाते चलना चाहिये।
इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि अन्न, दूध, फल, मूल और पत्तों का सादा भोजन आध्यात्मिकता की प्राप्ति में सहायक होता है। जब कि कृत्रिम पदार्थ, मिर्च-मसाले से युक्त उत्तेजक भोजन, घी-तेल-चीनी-मैदा आदि के बने गरिष्ठ पकवान मनुष्य में शारीरिक और मानसिक विकार उत्पन्न करके उसे पतनकारी मार्ग में ढकेलते हैं, तब प्राकृतिक भोजन का उचित परिमाण में व्यवहार करना शरीर और मन को स्वस्थ रखते हुये आत्मोत्थान के मार्ग को भी प्रशस्त करेगा। हमको यह भी स्मरण रखना चाहिये कि आजकल के मनुष्य जो भोजन और विषय की दृष्टि से असंयमशील हो गये हैं उसका एक कारण यह भी कि वे स्वाद और चटोरेपन के वशीभूत होकर कृत्रिम उपायों से स्वादिष्ट, चटपटे बनाये गये खाद्य पदार्थों को आवश्यकता से अधिक खाते रहते हैं। इससे उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है और उनकी मनोवृत्तियाँ विकार-युक्त हो कर पाप-मार्ग की ओर प्रवृत्त होने लगती हैं। इसलिये आध्यात्मिकता के अभिलाषी को अन्य सत्कर्मों और सदाचरणों के साथ आहार की शुद्धता, पवित्रता और प्रकृति अनुकूल होने का भी ध्यान रखना आवश्यक है। वे लोग भूल में हैं जो चौके-चूल्हे और छुआछूत के नियमों का पालन करने को ही पवित्रता और धार्मिकता का प्रमाण समझ लेते हैं। वास्तविक महत्त्व अपने परिश्रम की न्याययुक्त कमाई से प्राप्त किया भोजन का है, जिसको हिताहार और मिताहार की दृष्टि से ग्रहण किया जाय। वही मनुष्य की सात्विकता और आध्यात्मिकता की दृष्टि से उच्च बना सकता है।
वर्तमान समय में हमारे समाज का जो दशा है उसे दुःखपूर्ण ही कह सकते हैं। स्त्री-पुरुष, बालक-बूढ़े, विवाहित और अविवाहित किसी से बात कीजिये, सौ में से नब्बे या पिच्यानवे अपने दुःखों का रोना ही सुनाने लगेंगे। जो इस पाँच सुख की बात भी करेंगे तो उनकी बातों की विवेचना करने से प्रतीत हो जायगा कि उनकी सुख की भावना अज्ञान और उत्तरदायित्वहीनता के कारण है। यह बात नहीं कि सब लोग गरीबी या धनाभाव की वजह से ही दुःखी हैं, नहीं, अधिकाँश धनवान और अमीर व्यक्ति भी उतने ही दुःखी दिखलाई पड़ते हैं जितने कि गरीब। कोई लड़के-लड़कियों का विवाह ठीक न हो सकने के कारण दुखी है, किसी को अच्छा दहेज न मिलने की शिकायत है तो दूसरा लड़की की विवाह में सामर्थ्य से अधिक खर्च करने के कारण कर्जदारों के तकादे से मरा जा रहा है। साराँश समाज में इस प्रकार की तरह-तरह की अनेकों कुप्रथाएं और रूढ़ियां व्याप्त हैं कि जिनके कारण मनुष्य को किसी न किसी तरह की चिन्ता, परेशानी लगी ही रहती है।
विवाह, जन्म और मृत्यु जैसी बड़ी-बड़ी बातों को छोड़ भी दें तो भी हिन्दू-समाज की सभी जातियों में ऐसी छोटी-बड़ी सैकड़ों प्रथायें, रूढ़ियां, रस्म-रिवाज पाये जाते हैं जिनके कारण गृहस्थ व्यक्तियों पर सदा किसी न किसी प्रकार का भार बढ़ता ही रहता है और व्यस्तता बनी ही रहती है। जात-बिरादरियों में प्रत्येक अवसर पर परस्पर लेन-देन की ऐसी रीतियाँ प्रचलित हैं कि मनुष्य की कमाई का एक बड़ा अंश उन्हीं में खर्च हो जाता है। छोटी-छोटी बातों में इन रीति-रिवाजों का उल्लंघन नहीं कर पाते। लड़की और बहुओं का आना-जाना, बहन-बेटी का विदा होना, किसी बच्चे का जन्म होना, जन्म के बाद नामकरण, अन्नप्राशन, मुण्डन, कान छेदना, विद्यारम्भ आदि जो भी संस्कार हो, हर अवसर पर सगे सम्बन्धियों, इष्ट-मित्रों, पड़ौसियों को कुछ देना आवश्यक हैं। और इस देने में सदा बदले का ध्यान रखना पड़ता हैं। जिसके यहाँ से जितना आता है उसे उसी हिसाब से देना पड़ता है। अगर आप उनको देना भूल जायें या कम भेजें तो वे बुरा मान जायेंगे और सदा उलाहना देते रहेंगे। अगर किसी बहन-बेटी को किसी ऐसे अवसर पर नियम से कम दिया जाय या देने में भूल हो जाय तो वह सदा इसी बात का ताना मारती रहेगी।
इस प्रकार की प्रथाओं का परिणाम शुभ नहीं होता। इस प्रकार जो कुछ दिया जाता है उसमें बदला चुकाने का अपनी ‘नाक’ ऊँची रखने की बात होती है। हम बहन-बेटियों और संगे-सम्बन्धियों को हर त्यौहार पर और विवाह शादी, संस्कार आदि के अवसरों पर जो कुछ रुपया पैसा, जेवर, कपड़े आदि दिया करते हैं उसमें किसी प्रकार की प्रेम या स्नेह की भावना नहीं होती वरन् वह अपनी ‘आबरू’ या ‘नाक’ की रक्षा के ख्याल से दिया जाता है। हमारे मन में यह भाव रहता है कि यदि अपनी हैसियत और नाम के अनुसार उचित ‘नेग‘ भेंट नहीं दी जायगी तो हमारी बदनामी होगी। जब इस प्रकार की भेंट सामर्थ्य न होते हुए भी विवश होकर देनी पड़ती है तो हम मन ही मन उन सम्बन्धियों को कोसते रहते हैं। इस प्रकार के कार्यों में जो हार्दिकता और प्रसन्नता होनी चाहिये उसका चिन्ह भी नहीं रहता और हम उनको एक भार समझ कर लाचारी से करते हैं। इस कारण सम्बन्धियों में प्रायः सच्चा प्रेम भी नहीं हो पाता अनेक बार भीतर ही भीतर वैमनस्य की भावना पैदा हो जाती है, पर ऊपर से दिखाने के लिये शिष्टाचार बरता जाता है।
हमारे इन रस्म-रिवाजों में किसी की मृत्यु के उपरान्त शोक-प्रदर्शन की प्रथा भी बड़ी अस्वाभाविक हैं। यों तो संसार के सभी देशों और समाजों में किसी व्यक्ति की मृत्यु पर किसी न किसी रूप में शोक का भाव प्रकट किया जाता है और खास कर अगर ऐसी मृत्यु असामयिक हो तो लोगों को दुख भी होता है। पर हिन्दुओं में किसी मरने वाले के लिये एक दिन ही नहीं, कई दिन तक जिस प्रकार रोना-धोना किया जाता है अथवा ‘स्यापा’ आदि करते हैं वह एक निराली ही चीज है। किसी के मरने पर सारे मुहल्ले की ओर नाते-रिश्ते की स्त्रियाँ इकट्ठी होकर इस प्रकार ढाडें मार-मार कर रोती हैं जिससे मालूम पड़ता है कि वे मृतक के वियोग से अधीर हो रही हैं। पर वास्तव में घर में दो-चार लोगों के सिवा, किसी के मन में दुःख का लेश भी नहीं होता और वे यह सब रोना-धोना रस्म के रूप में ही करती है।
पंजाबी स्त्रियों का ‘स्यापा’ इस सम्बन्ध में विशेष उल्लेखनीय है। वे एक गोल आकार में खड़ी होकर जोर-जोर से विलाप करती हुई दोनों हाथों से इस प्रकार छाती कूटती हैं कि देखने वाले को रोमाँच हो आता है। साथ ही उनमें एकाध वृद्धा स्त्री कुछ शोकपूर्ण उद्गार भी प्रकट करती जाती है। जिसको ‘वैन’ कहते है। यह कार्य-क्रम दो-दो घण्टे तक भी चलता है और उन छाती कूटने वाली स्त्रियों की क्या दशा होती होगी ये वे ही जानती होंगी। ऐसा भी नहीं कि कोई स्त्री कम रोवे वा मामूली तौर से छाती कूटे। इन स्त्रियों का यह कार्य बड़े कायदे के साथ कवायद की तरह होता है। सबके हाथ एक साथ उठते हैं, और साथ ही छाती पर पड़ते हैं। अगर कोई स्त्री हाथ हलके से मारती है तो अन्य स्त्रियाँ उसकी बहुत निन्दा करती हैं और बुरा भला कहती हैं। पर यह सब रोना-धोना और छाती कूटना नाटक की तरह ही होता है। ज्यों ही इस कार्य को खत्म करके वे अपने घरों को लौटती हैं कि फिर सदा की तरह हँसने बोलने लगती हैं। कितनी तो वहाँ से निकल कर रास्ते में किसी ऐसे घर भी चली जाती हैं जहाँ कोई खुशी का उत्सव होता हो। वहाँ वे खूब बधाई देती हैं और खुशी से खाती-पीती भी हैं।
इस प्रकार के मृत्यु-शोक प्रदर्शन का क्या मूल्य हो सकता है, इसको करने वाले ही जानें। मरने वाले के लिए इस प्रकार बहुत अधिक रोने-धोने का नाटक रचना अस्वाभाविक-सा प्रतीत होता है। ऐसे अवसर पर मनुष्य को जिस गम्भीरता का परिचय देना चाहिये वह इस प्रकार के दिखावा करने से प्रायः जाता रहता है। जन्म-मरण संसार के स्वाभाविक कर्म हैं। एक आस्तिक की दृष्टि से इनको ईश्वर की इच्छा समझकर संतोष रखना ही मनुष्य का उचित कर्तव्य होता है। पर हमारे यहाँ दिखावे के लिए ही सही, जो इतना शोक मनाया जाता है और उसके उपलक्ष्य में भगवान तक को तरह-तरह उलाहना दिया जाता है, यह कोई समझदारी या बुद्धिमानी की बात नहीं समझी जा सकती।
एक बात और है कि इस प्रकार के शोक प्रदर्शन से स्त्रियों के स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचती है। यद्यपि परम्परा से यह कार्य करते रहने से उनको अभ्यास हो जाता है, तो भी सदैव इस कार्य को करते रहने से खराब असर होता ही है। जो स्त्रियाँ छाती को काफी देर तक कूटकर अपने बच्चों को दूध पिलाती हैं, क्या उससे उनकी हानि नहीं होती? ऐसा दूध निस्सन्देह बालक के लिए बहुत हानिकारक होता है। जिन स्त्रियों को ‘स्यापा’ में अधिक भाग लेना पड़ता है, वे शीघ्र बूढ़ी हो जाती हैं। इस प्रकार की रस्म को समाज को दृष्टि से किसी प्रकार हितकारी नहीं कहा जा सकता, विशेषकर जब कि उसका कोई सच्चा आधार भी न हो। ऐसी रूढ़ियों में सुधार का प्रयत्न करना प्रत्येक समझदार व्यक्ति का कर्तव्य होना चाहिए।
एक बात और है कि इस प्रकार के शोक प्रदर्शन से स्त्रियों के स्वास्थ्य को भी हानि पहुँचती है। यद्यपि परम्परा से यह कार्य करते रहने से उनको अभ्यास हो जाता है, तो भी सदैव इस कार्य को करते रहने से खराब असर होता ही है। जो स्त्रियाँ छाती को काफी देर तक कूटकर अपने बच्चों को दूध पिलाती हैं, क्या उससे उनकी हानि नहीं होती? ऐसा दूध निस्सन्देह बालक के लिए बहुत हानिकारक होता है। जिन स्त्रियों को ‘स्यापा’ में अधिक भाग लेना पड़ता है, वे शीघ्र बूढ़ी हो जाती हैं। इस प्रकार की रस्म को समाज को दृष्टि से किसी प्रकार हितकारी नहीं कहा जा सकता, विशेषकर जब कि उसका कोई सच्चा आधार भी न हो। ऐसी रूढ़ियों में सुधार का प्रयत्न करना प्रत्येक समझदार व्यक्ति का कर्तव्य होना चाहिए।
फार्म 4
1.प्रकाशन का स्थान - मथुरा
2.प्रकाशन का अवधि - क्रम- मासिक
3.मुद्रक का नाम - श्री राम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता - भारतीय
पता - बम्बई भूषण प्रेस, मथुरा।
4.प्रकाशक का नाम - श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता - भारतीय
पता - ‘अखण्ड-ज्योति’ संस्थान मथुरा।
5.सम्पादक का नाम - श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता - भारतीय
पता - ‘अखण्ड-ज्योति’ संस्थान मथुरा।
6.स्वत्वाधिकारी - श्रीराम शर्मा आचार्य अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
मैं, श्रीराम शर्मा आचार्य यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिए गए सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य है।
(हस्ता.) श्री राम शर्मा आचार्य
(हस्ता.) श्री राम शर्मा आचार्य
वह मानव क्या जो नहीं कर्म में लय हो।
है व्यर्थ गिरा जो वाचा में न अभय हो,
वह शक्ति व्यर्थ होती स्वीकार नहीं जो,
वह व्यर्थ भक्ति करती उपकार नहीं जो,
जीवन-तरु की गति है जीवन फल पाना।
फल की गति शत-शत बीजों को बिखराना॥
-विद्यावती “कोकिल”
श्रम की महत्ता स्वयमेव बढ़ जाती बहु,
नेक-नीयती से श्रम-दान कर देने में।
जीवन के पथ में अनूप श्रम सेवक है,
श्रम करने से स्वाद आता है चबैने में॥
-अनूप शर्मा
आपदा के अग्नि-पथ पर जो कभी रुकना न जाने,
दैन्य के अभिशाप में भी जो कभी झुकना न जाने,
प्रलय-झंझावात में भी भँवर में फँसना न जाने,
गीतमय जीवन बनाले गीत को ही धर्म माने,
गा सके संघर्ष में हँसकर सदा जो स्वर वही हैं।
जो हिमालय सा, उठे जीवन धरा पर, नर वही हैं।
-नर्मदा प्रसाद ‘खरे’
बरसे घर-घर में प्यार जिन्दगी मुसकाये
धरती के तन पर ही श्यामल परिधान नया,
हो नया-नया जग में मानवता का मन्दिर
हो नई आरती पूजा का सामान नया,
बीते कुहेलिका और समय के माथे से
इस नए समय में बारूदी व्यवधान उठे,
ले नयी भावना नये देवता के आगे-
पूजा करने को नया-नया इन्सान उठे।
-अमरेश
तुम में साहस है, बल है,
शक्ति प्राण का सम्बल है,
क्यों होगी फिर हार?
माझियों। रुके नहीं पतवार॥
-ब्रजेन्द्र ‘सेंगर’
है न किंचित् चाह, मेरे संकटों को दूर कर दो,
जिन्दगी के शीश सुख-समृद्धि का सिंदूर भर दो।
संकटों को झेलने की शक्ति का वरदान पाये,
ताकि हम हँसते हुए भव-सिन्धु से उस पार गायें।
-जगदीश प्रसाद खरे “अनुराणी”
हमारे सञ्चय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव,
वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा में रहती थी देव।
वही है रक्त वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान,
वही है शाँति, वही हैं शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-समान।
-जयशंकर प्रसाद
असत्य भोग-वासना, असत्य सिद्धि कामना।
मनुष्य सत्य त्याग है, मनुष्य सत्य भावना।
रुको, झुको करो मनुष्य प्रेम की उपासना।
मिली तुम्हें न यदि दया, मिली तुम्हें न भावना।
विनाश है मनुष्य तब समस्त ज्ञान साधना।
-भगवती चरण वर्मा
धर्म का दीपक, दया का दीप,
कब जलेगा, कब जलेगा विश्व में भगवान्?
कब सुकोमल ज्योति से अभिषिक्त
हो, सरस होंगे जली-सूखी रसा के प्राण?
भोग-लिप्सा आज भी लहरा रही उद्दाम,
वह रही असहाय नर की भावना निष्काम।
श्रेय होगा सुष्टु विकसित मनुज का वह काल,
जब नहीं होगी धरा। नर के रुधिर से लाल।
श्रेय होगा धर्म का आलोक वह निर्बन्ध
मनुज जोड़ेगा मनुज से जब उचित सम्बन्ध॥
- रामधारी सिंह दिनकर
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में तत्व-दृष्टि, भावना और श्रद्धा का समावेश करना पड़ता हैं। इन तत्वों का जिस-जिसकी साधना में समावेश होगा उसे उतना ही आत्मविकास का उत्कृष्ट लाभ प्राप्त होगा। गायत्री क्या है, उसकी उपासना में क्या दृष्टि रहे और किन गुणों का समावेश अपनी मनोभूमि में होना चाहिए, जिसे सब बातों का ध्यान रहेगा उसकी थोड़ी भी साधना बहुत फलदायक होगी।
सामान्य साधना जिसे छोटे स्तर की बाल साधना कहते हैं, क्रियाकाण्ड भर की होती है। ऐसे कितने ही व्यक्ति हैं जो केवल जप मात्र को ही सब कुछ समझते हैं। जप, हवन, अनुष्ठान पूजन आदि बाह्य प्रतीक उपचार ही उनकी समझ में सब कुछ होता है। जप की संख्या पूरी करनी, फिर चाहे मन में काम, क्रोध, लोभ, मोह के कुविचार उस समय कितनी ही उच्छृंखल गति से उठते क्यों न रहें। जगजननी की छवि को देखने का ध्यान करना उनके लिए सब कुछ होता हैं। श्रद्धा, प्रेम, आत्मीयता एवं तन्मयता का भाव भी साथ में हैं या नहीं इस बात पर वे लोग ध्यान नहीं देते। जप का शारीरिक श्रम भी कुछ तो उपयोगी है ही पर भावना के अभाव में वह एक प्रकार से निर्जीव ही बना रहता है।
सच्ची उपासना वह है जो आत्म-कल्याण के लिए जीवनस्तर को उत्कृष्ट बनाने के लिए दुर्बुद्धि हटा कर मनोभूमि में सद्बुद्धि की स्थापना के लिये श्रद्धा और भावना पूर्वक की जाती है। किसी लौकिक प्रयोजन को लक्ष्य रख कर कई व्यक्ति जप-तप करते हैं और यह हिसाब लगाते रहते हैं कि इतना जप हो जाने पर यह प्रयोजन पूरा हो जाना चाहिए, यह सिद्धि मिल जानी चाहिये। यदि वह प्रयोजन पूर्ण हो गया तो भी उसे छोड़ देते हैं और नहीं हुआ तो भी उसको त्याग ही देते हैं। वैद्य के पास रोगी तभी तक जाता है जब तक कि उसे कष्ट रहता है। कष्ट दूर हुआ कि रोगी ने वैद्य से रिश्ता तोड़ा। इसी प्रकार यदि रोग अच्छा न हो तो भी रोगी उस वैद्य से मुँह मोड़ लेता हैं, और उसकी बुराई करने लगता है। सकाम उपासना वालों का स्तर भी यही रहता है। किसी जप, तप से अभीष्ट लाभ हो गया फिर उसे करने की जरूरत नहीं रहती और चाही हुई अवधि में मनोकामना पूर्ण न हुई तो भी उसे व्यर्थ समझ कर छोड़ दिया जाता है। ऐसी पूजा को साधना कहना ही नहीं चाहिए, वह तो किसी लौकिक प्रयोजन को पूरा करने के लिए एक लौकिक माध्यम मात्र थी, साधना आत्म-कल्याण के लिए लौकिक कामनाओं से रहित होकर की जाती है।
परमात्मा ने जो कुछ दिया है वह कम नहीं। जो कमी है वह हमारे प्रयत्न और पुरुषार्थ की त्रुटियों के कारण है। अपने गुण, कर्म, स्वभाव के दोषों को सुधार कर व्यक्तित्व को सुव्यवस्थित करें तो प्रत्येक उचित कामना सहज ही पूर्ण हो सकती है। अपनी त्रुटियों को ज्यों का त्यों रखा जाय, दोष और दुर्गुणों को ज्यों-का-त्यों रहने दिया जाय। तृष्णा और कामना की परिस्थितियों के साथ तालमेल रखकर लम्बी-चौड़ी कामना करते हुये उनकी पूर्ति का साधन थोड़े से पूजा-पाठ को मान लिया जाय तो यह भारी भूल है। कर्म और पुरुषार्थ का उचित मूल्य चुकाने पर पात्रता के अनुरूप जो सफलतायें मिलती हैं उन्हें थोड़े से पूजा-पाठ के द्वारा चुटकी बजाते, प्राप्त करने का लालच किया जाय तो यह अनुचित और अनुपयुक्त बात होगी।
लौकिक प्रयोजनों की पूर्ति हमें अपने गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार करते हुए श्रम और अध्यवसाय द्वारा करनी चाहिये। ईश्वर ने हमें उन सभी क्षमताओं से पूरी तरह सम्पन्न करके भेजा है जिनसे अपनी आवश्यकतायें अपने बाहुबल एवं बुद्धि कौशल से सरलतापूर्वक प्राप्त कर सकें। शुभ अशुभ कर्मों के फलस्वरूप सुख-दुख की परिस्थितियाँ ही आती जाती रहती हैं। इन्हें धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिए। कर्म फल का सिद्धान्त अमिट है। हमारी करनी हमें ही भरनी पड़ेगी। इसके लिये ईश्वर को या किसी दूसरे को दोष देने से क्या लाभ? धैर्य और साहसपूर्वक बुरी परिस्थितियों का भी मुकाबला किया जा सकता है। अपनी न्याय व्यवस्था को बिगाड़ कर ईश्वर से अपने लिए पक्षपात का व्यवहार करने की प्रार्थना करना किसी सच्चे साधक को शोभा नहीं देता। यदि हमने पाप किया है तो उसका दण्ड हँसते हुए भोगने का भी साहस हम में होना चाहिए, यही मानवोचित दृष्टिकोण हो सकता हैं।
परमात्मा से प्रार्थना करनी हो तो धैर्य, साहस, पुरुषार्थ और सद्गुणों की अभिवृद्धि की ही करनी चाहिए। वस्तुतः प्रभु किसी पर प्रसन्न होते हैं तो उसे वस्तुयें नहीं, प्रेरणायें देते हैं। चिन्ता और परेशानियों से, अभाव और कष्टों से पार निकलने के लिये यदि आवश्यक मार्ग-दर्शन प्राप्त हो जाय और उस पर चलने का साहस बन पड़े तो फिर कठिन से कठिन उलझनों को मनुष्य पार कर सकता है। इसके विपरीत यदि आकस्मिक दैवी सहायता मिल जाय तो वह तत्कालिक उलझन तो दूर हो सकती है पर क्षमता और प्रतिभा के अभाव में, फिर अगले दिन वैसी ही अन्य समस्यायें आगे आ खड़ी होंगी। उलझे दृष्टिकोण के व्यक्ति आये दिन कठिनाइयों के जंजाल में फंसे ही रहते हैं। परमात्मा का सच्चा अनुग्रह यही हो सकता है कि व्यक्ति का दृष्टिकोण सुलझा हुआ हो, समस्याओं को हल करने की हिम्मत और सूझ-बूझ बनी रहे, गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसी संजीदगी हो कि अपनी ही नहीं दूसरों की गुत्थियों को भी उस माध्यम से सरल बनाया जा सके। गायत्री उपासक को माता का ऐसा ही अनुग्रह मिलता है, और वह भौतिक जीवन में सुख तथा आन्तरिक क्षेत्र में शान्ति अनुभव करता हुआ अपने आप को हर घड़ी आनन्द एवं उल्लास की स्थिति में पाता रहता है।
आपत्तियों का निवारण समस्याओं का हल और अभावों की पूर्ति के लिये आमतौर से लोग पूजा-पाठ करते हैं। श्री समृद्धि और सम्पदा की कामना में जप, तप, का विधि विधान अपनाया जाता है। मनुष्य दुर्बल प्राणी है। सुख और लाभ की इच्छाओं से प्रेरित होकर वह विविध कर्म करता है उन्हीं में से एक पूजा-पाठ भी माना गया है। देवी, देवताओं की शरण में लोग इसीलिए जाते हैं। पूजा पाठ भी ऐसे ही किसी प्रयोजन से करते हैं। संत-महात्माओं का आशीर्वाद भी इसीलिए चाहते हैं। यों बाल-बुद्धि की स्थिति में यह भी कुछ बुरा नहीं है। इसी निमित्त से सही, कुछ भगवान का नाम स्मरण हो जाय तो वह भी अच्छा ही है। पर इस दृष्टि के साथ की गई उपासना को आध्यात्मिक नहीं कह सकते। वह भौतिक उद्देश्य के लिए भौतिक प्रयत्न मात्र सिद्ध होती है और उसका प्रतिफल भी छोटा-सा ही बनकर रह जाता है। इसलिए इस प्रक्रिया को तत्वदर्शियों ने निम्नस्तरीय उपासना कहा है।
जिनकी अध्यात्म-मार्ग में कोई रुचि नहीं है, जो आत्म-कल्याण का महत्व नहीं समझते और भौतिक लाभ ही जिन्हें सब कुछ दिखाई पड़ता है उनके लिए प्राथमिक आकर्षण की दृष्टि से यह सकाम या निम्न-स्तरीय साधना भी उपयोगी है। जितना समय और श्रम उनका लगता है उसकी तुलना में कहीं अधिक लाभ उन्हें निश्चित रूप से प्राप्त हो जाता है। जो कुछ चाहा जाय वह सब पूर्ण होना ही चाहिये इसकी तो गारन्टी नहीं, पर इतना दावे से कहा जा सकता है कि जितने समय आराधना की गई है उतने समय का लाभ उसकी अपेक्षा कहीं अधिक होगा जो उस प्रयोजन के लिए भौतिक प्रयत्न करने में किया जाता। गायत्री उपासना में लगाया हुआ समय कभी किसी का व्यर्थ नहीं जाता।
रामायण में तीन प्रकार की पतिव्रता मानी गई है, 1. पति को सर्वतो भावेन आत्म-समर्पण, करने वाली 2. पति और अन्य लोगों में उचित अन्तर करके उनके साथ तदनुसार व्यवहार करने वाली है। 3. दुराचार का अवसर न मिलने और दण्ड, भय की आशंका से सदाचारिणी बनी रहने वाली। इन तीनों को ही यद्यपि पतिव्रता माना गया है पर उनकी मानसिक स्थिति के कारण वे उत्तम, मध्यम, नीच, इन तीन श्रेणियों में विभक्त की गई हैं। क्रमशः पहली से दूसरी का ओर दूसरी में तीसरी का स्तर नीचा है। उनकी इस साधना का प्रतिफल भी उसी स्तर के अनुसार मिलता है। इसी प्रकार गीता में चार प्रकार के भक्त बताये गये हैं। 1. आपत्ति आने पर उसका निवारण करने के लिए भगवान को पुकारने वाले। 2. जानकारी का कौतूहल पूरा करने के लिए परमात्मा की खोज बीन करने वाले। 3. सिद्धियाँ और विभूतियाँ पाने के लालच से जप, तप, करने वाले। 4. प्रभु को प्रगति के लिए सच्ची भावना से आत्म-समर्पण करने वाले विवेकशील ज्ञानी। इन चारों का स्तर क्रमशः एक दूसरे से श्रेष्ठ हैं। मनोभूमि के अनुसार उपासना की श्रेष्ठता निकृष्टता नापी जाती है, यद्यपि बाहर से सभी भक्तों की पूजा उपासना एक समान दिखाई पड़ती है। तीन पतिव्रताओं और चार भक्तों की बाह्य स्थिति में कोई अन्तर नहीं होता, आचरण इन सबका समान होता है पर अन्तःस्थिति के कारण उनकी श्रेष्ठता एवं निकृष्टता का स्वरूप अलग-अलग ही रहता है और उन्हें लाभ भी उसी आधार पर न्यूनाधिक प्राप्त होता है। वेश्या और पत्नी का शारीरिक आचरण एक-सा होने पर भी उनकी भावना के कारण प्रतिफल में भारी अन्तर रहना स्वाभाविक ही है।
गायत्री उपासना में भी इसी प्रकार के स्तर हैं। निम्न स्तर के साधक विपत्ति के समय माता को पुकारते हैं या कोई भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिये दरवाजा खटखटाते हैं। उनको इच्छित समय में, इच्छित मात्रा का लाभ मिला तो अपने श्रम की सार्थकता मानकर अपनी सफलता और चतुरता पर गर्व कर लेते हैं पर यदि अभीष्टित लाभ न मिला तो इष्टदेव, मार्गदर्शक तथा उपासना-विज्ञान तीनों को ही भरपूर कोसते हैं और जो थोड़ा समय साधना में लग गया उस पर पश्चाताप प्रकट करते हैं। ऐसे निम्नस्तरीय साधक अपनी घटिया मनोभूमि के कारण कोई बड़ा लाभ प्राप्त नहीं कर सकते। क्योंकि घट-घट वासिनी महाशक्ति आखिर भावना स्तर को भी तो देखना जानती है। बाहरी कर्मकाँड ही तो उसके लिए सब कुछ नहीं हैं। प्रभु की प्रसन्नता उच्च-स्तरीय भावनाओं द्वारा ही सम्भव है। वे उसी से पसीजते हैं। केवट, शबरी, सुदामा, विदुर और गोपियों का साधनात्मक कर्मकाँड साधारण रहने पर भी उनकी भावना ने उन्हें लक्ष्य की प्राप्ति कराई जब कि निकृष्ट उद्देश्य के साधन करने वाले मेघनाद, कुम्भकर्ण, रावण, भस्मासुर, हिरण्यकश्यप को प्राप्त अतुल वरदान भी उनके पतन में ही सहायक हुये। ईश्वर के राज्य में वह अध्यात्म क्षेत्र में भावना का ही सबसे बड़ा महत्व है। गायत्री उपासना की एक-सी ही साधना पद्धति अपनाने वाले व्यक्तियों में से सब को एक-सा परिणाम नहीं मिलता। कोई स्वल्प काल में ही आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करते हैं और कुछ तो बहुत समय बीत जाने पर भी कोई प्रकाश दृष्टिगोचर नहीं होता।
यों उपासना का अपना लाभ तो होता ही है। उसका परिणाम तो होना ही ठहरा। पर किस व्यक्ति को कितना लाभ मिलेगा उसका अनुमान लगाना हो तो यही जानना पड़ेगा कि उसने किस भावना से, किस श्रद्धा और तन्मयता से साधना की। यदि यह सब घटिया रहा होगा तो उसके अनुसार घटिया परिणामों की ही आशा की जा सकती है। गायत्री उपासना को महात्म्यों का शास्त्रकारों ने विशद वर्णन किया है। उसे देखते हुए प्रतीत होता है कि यह साधना पारस, कल्पवृक्ष, कामधेनु और अमृत के समान उपयोगी है। कितने साधकों को वैसे ही लाभ मिले भी हैं। उनके चरित्र और उदाहरण सामने आते हैं तो विश्वास और भी बढ़ता है। प्राचीनकाल में समस्त ऋषि मुनि, राम कृष्ण और अवतार, महापुरुष ज्ञानी मनस्वी और विचारशील व्यक्ति गायत्री उपासना ही करते रहे हैं। यही हमारी एक मात्र जातीय आराधना रही है। इसी मन्त्र की शक्ति से इस देश का अध्यात्म बल बढ़ा है और हमारा इतिहास गौरवपूर्ण बना है। अभी भी ऐसे अनेक गायत्री उपासक मौजूद हैं जिनका आत्मबल इस गये बीते युग में भी आश्चर्यजनक कहा जा सकता है। इन तथ्यों पर विचार करने से प्रतीत होता है कि उस महामन्त्र के बारे में ऋषियों और शास्त्रों ने जो कुछ कहा है वह असत्य नहीं है। पर जब अपनी निज की बात पर सोचते हैं, हमने इतने दिन इतने घण्टे इतने हजार जप कर लिया और हमारे मनोरथ तब भी पूरे नहीं हुये तो निराशा होने लगती है। मस्तिष्क यही सोचता है कि यह महात्म्य सही होता तो हमें भी इतना लाभ क्यों न मिलता?
इस द्विविधा का समाधान इस प्रकार करना चाहिए कि निम्न स्तरीय-क्षुद्रता की मनोभूमि में की हुई उपासना बहुत थोड़ी फल देती है। उच्चस्तरीय साधना से ही वह परिणाम होता है जिसके आधार पर शास्त्रों में वर्णित गायत्री महात्म्य का सत्य माना जा सके। विगत 24 वर्षों से हम गायत्री उपासना की शिक्षा सर्व साधारण को देते रहे हैं। इस महामंत्र की महत्ता जन-मानस में प्रवेश कराने के लिए व्यापक आन्दोलन गठित करके लाखों व्यक्तियों को इस मार्ग पर लगाया है। इन पर हुए प्रयोग का अनुभव कि गायत्री उपासना निष्फल तो किसी की नहीं जाती, पर सच्चा लाभ वे ही उठाते हैं जिनने उच्चस्तरीय उपासना का अवलम्बन किया है। इस प्रकार के व्यक्तियों में से एक को भी असफलता की शिकायत करते नहीं सुना। उतावले, श्रम की तुलना से अधिक लाभ प्राप्त करने के लोभी, अश्रद्धालु और केवल कौतुक एवं परीक्षण की दृष्टि से थोड़ा भी प्रयोग करने वाले लोग भी निराशा व्यक्त करते देखे जाते हैं और उन्हीं का उत्साह स्वल्प-साधना के पश्चात शिथिल एवं समाप्त होते देखा जाता है।
जिस प्रकार शरीर को नित्य स्नान करना और देह को स्पर्श करने वाले कपड़ों का रोज धोना आवश्यक है, उसी प्रकार मन की शुद्धि के लिए स्वाध्याय और अन्तःकरण की शुद्धि के लिए उपासना भी आवश्यक है। शरीर को स्नान न कराया जाय तो दुर्गन्ध आने लगेगी और अनेक बीमारियाँ पैदा होंगी। वस्त्रों को न धोने से भी ऐसी गन्दगी और कुरूपता उत्पन्न होगी जिसके कारण दूसरे लोग घृणा करने लगेंगे और शरीर एवं मन की मलीनता बढ़ेगी। इसी प्रकार यदि मन को स्वाध्याय के साबुन और सत्संग के जल में न धोया जायगा तो गंदे वातावरण का प्रभाव निरन्तर पड़ते रहने के कारण दिन-दिन उसका स्तर नीचा ही गिरता चला जायगा। आत्म-चिन्तन और आत्म-शोधन का प्रयत्न जो नहीं करते वे आत्मिक दृष्टि से ऊँचे उठ ही नहीं सकते। जिन्हें स्वाध्याय और सत्संग के लिए अवकाश नहीं उन्हें आत्मिक प्रगति में अभी अभिरुचि ही उत्पन्न नहीं हुई ऐसा निश्चित रूप से कहा जा सकता है।
उपासना अन्तःकरण की शुद्धि के लिए आवश्यक है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार पर चढ़े हुए मल, आवरण, विक्षेप उपासना के द्वारा ही हटाये जाते हैं। इसलिए हमारे नित्य कर्म में उपासना के लिए कोई नियत समय अवश्य ही रहना चाहिए। कार्यव्यस्त व्यक्ति भी इतना तो कर ही सकते हैं कि नींद खुलने पर शैया त्यागने तक का जो समय आलस्य जैसी स्थिति में बिताना पड़ता है उसे ईश्वर उपासना में लगा दें। मानसिक ध्यान और मानसिक जप तो बिना स्नान किये भी चारपाई पर बैठे या पड़े भी हो सकता है। इसके लिए किसी सामान या विधि-विधान की भी जरूरत नहीं है। यदि श्रद्धा हो और उपयोगिता समझी जाय तो व्यस्त से व्यस्त मनुष्य भी इस प्रकार आधा, चौथाई घण्टा भजन के लिए निकाल सकता है जिन्हें इस ओर रुचि न हो और न करने का बहाना ही ढूँढ़ना हो उनके लिए तो निठल्ले समय बर्बाद करते रहने पर भी फुरसत न मिलने का रोना बना ही रहेगा।
रात को सोते समय परमात्मा का ध्यान भजन करते हुए निद्रा में विलीन होना और प्रायः उठते ही प्रभु का स्मरण करते हुए दिनचर्या-कार्यारम्भ करना एक बहुत ही उपयोगी प्रक्रिया है। एक दिन को एक जीवन मानना चाहिए। दिन भर काम करने के पश्चात रात्रि को निद्रामग्न होते समय ऐसा सोचा जा सकता है कि एक जन्म पूर्ण हुआ और अब चिरनिद्रा-मृत्यु की गोद में शयन करने जा रहे हैं। कहते हैं कि ब्रह्माजी का एक दिन एक कल्प के बराबर होता है। हम भी यदि एक दिन को एक जीवन मानें और उसका सर्वोत्तम उपयोग करने की ठानें तो उस छोटे रिहर्सल को करते हुए समस्त जीवन को अधिकाधिक श्रेष्ठ बनाते चलने में सफल हो सकते हैं।
मृत्यु के समय माया-मोह से निवृत्त होकर ईश्वर का स्मरण करते हुए शान्तिपूर्वक प्राण त्याग करने से सद्गति प्राप्ति होती है। इसी प्रकार रात्रि को सोते समय समस्त चिन्ता और विक्षेपों से निवृत्त होकर प्रभु-स्मरण करते हुए यदि निद्रा की शरण में जाया जाय तो गहरी नींद आवेगी और बुरे सपने न दीखेंगे। अन्तिम समय चित्त पर जो संस्कार डाले जाते हैं वे उस विश्राम काल में परिपक्व हो कर प्रातःकाल खिले हुए पुष्प की तरह अपना सुन्दर स्वरूप प्रकट करते हैं। इसी प्रकार प्रातःकाल नये दिन का- ये जन्म का-शुभारम्भ करते हुए प्रभु स्मरण का मंगलाचरण होना चाहिए। भारतीय संस्कृति के अनुसार प्रत्येक शुभ कार्य परमात्मा की आराधना के साथ आरम्भ होना चाहिए। नया दिन भी एक नया जन्म है। उसे आरम्भ करते हुए भी यदि प्रभु को स्मरण करने का नित्य नियम बना लिया जाय तो इसके प्रभाव से दिनभर के कार्यक्रम पर आध्यात्मिकता की छाया बनी रहेगी। प्रत्येक नये दिन का आदि और अन्त प्रभु स्मरण के साथ ही होना चाहिए। किसी धर्म ग्रन्थ का आरम्भ और अन्त मंगलाचरण के साथ ही होता है। हमारा प्रत्येक दिन भी हमारे जीवन का एक ग्रन्थ है। उसे आत्म कथा का एक स्वर्णिम पृष्ठ बनाने का प्रयत्न करें और आदि तथा अंत में ईश्वर की चर्चा करते रहे तो इसे एक स्वर्णिम पृष्ठ बनाने का प्रयत्न करें और आदि तथा अन्त में ईश्वर की चर्चा करते रहें तो इसे एक दैनिक श्रेष्ठ विधि व्यवस्था ही मानी जायगी।
गायत्री महामंत्र भारतीय धर्म और संस्कृति का मूल आधार है। उसकी उपासना हमारा धर्म कर्तव्य है। प्रातः काल उठते और रात को सोते समय मन ही मन उसका जप करना चाहिए और परमात्मा के दिव्य प्रकाश का ज्योतिर्मय ध्यान करते हुए भावना करनी चाहिए कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अन्धकार हटे और सद्ज्ञान रूप धर्म, कर्तव्य, ज्ञान एवं आदर्श प्रकाश दीप्तिमान होता रहे। गायत्री सद्बुद्धि की देवी है, हमें परमात्मा से एक ही प्रार्थना करनी चाहिए कि दुर्बुद्धि के कारण हमारा जीवन क्रम अस्त-व्यस्त और तमसाच्छन्न बना पड़ा है इसमें परिवर्तन केवल सद्बुद्धि से ही सम्भव होगा। ऋतम्भरा प्रजा प्राप्त हुए बिना हमारा कल्याण कहाँ? इसलिये हे सर्वशक्तिमान प्रभु आप हमें जीवन को सार्थक बनाने वाली सद्बुद्धि दीजिए, सत्प्रवृत्तियों का हमारे अन्तःकरण में प्रेरित कीजिए, सद्भावनाओं से हमारी मनोभूमि का कण-कण भर दीजिए। सद्बुद्धि का मानना ही गायत्री उपासना का तत्व-ज्ञान है। भक्ति पूर्वक परम प्रभु से इसी की याचना हमें करते रहना चाहिए।
भोजन करते समय पहले उसे परमात्मा को समर्पण करें और पीछे प्रसाद मान कर उसे ग्रहण करना चाहिए। जितनी बार भोजन करें उतनी बार पहले नेत्र बन्द करके गायत्री मन्त्र का जप कर और प्रभु को अर्पण करने के पश्चात स्वयं खावें। भोजन की ही भाँति प्रत्येक उपलब्धि हमें ईश्वर अर्पण करना चाहिए। धन, वैभव, स्त्री, पुत्र, यश, मान, एवं सफलता का प्रत्येक उपहार हमें प्रभु के चरणों में अर्पण करना चाहिए और जो कुछ मिल सका है उसका श्रेय परमात्मा को देते हुए कृतज्ञता प्रकट करने, धन्यवाद देने के बाद ही, ग्रहण करना चाहिए। आहार का भोग लगाने का अभ्यास आरम्भ करके इस विधि को हमें जीवन की प्रत्येक सफलता तक विकसित करते जाना चाहिए।
सायं प्रात :-सोते उठते-और दो-तीन बार खाते समय भजन के चार-पाँच अवसर तो हर आदमी को मिल ही सकते हैं, उसमें अश्रद्धा ही बाधक हो सकती है, समय की कमी नहीं। यदि मनुष्य चाहे तो स्नान के बाद दस मिनट का समय नियमित उपासना के लिए भी निकाला जा सकता है। साकार उपासना करने वाले गायत्री माता के चित्र को और निराकार मानने वाले अगरबत्ती या दीप में जलती हुई अग्नि को प्रतीक मान कर उसके आगे नमन पूजन करने के उपरान्त 108 मन्त्र जप सकते है। माला हो तो ठीक नहीं तो उँगलियों के सहारे या घड़ी के माध्यम से उतनी संख्या पूरी की जा सकती हैं। प्रायः छह मिनट में एक माला, 108 मंत्रों का जप हो जाता है। इनके साथ पुनः नमन प्रणाम, आरती, सूर्यार्घदान आदि जो भी कर्मकाण्ड बन पड़े उसके साथ पूजा पूर्ण की जा सकती है। इस प्रकार नित्य की विधिवत् पूजा आराधना को कोई मनुष्य चलाना चाहे और दृढ़तापूर्वक उस क्रम को निबाहना चाहे तो इतना विधान भी बड़ी आसानी से चलता रह सकता है। सायंकाल की आरती, परिवार के लोगों के साथ सामूहिक प्रार्थना का क्रम भी जो लोग चलाना चाहें उनके लिए वह कार्य भी दस पाँच दिन में एक साधारण ढर्रा बन जाता है और बड़ी आसानी से उस व्यवस्था का निर्वाह होता रहता है।
यह अत्यन्त सरल विधियाँ बताई गई हैं। इन्हें अत्यन्त कार्य-व्यस्त व्यक्ति भी काम में ला सकते हैं। जिन्हें जिस समय अवकाश मिलता हो तब कर सकते हैं। नियमित साधना स्नान करके विधिपूर्वक की जाती है उसका विधान गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ में विस्तारपूर्वक लिखा जा चुका है। वह जिनमें जितनी बन सके उन्हें उस प्रकार करना चाहिए पर जिन्हें सचमुच ही अवकाश न मिलता हो या अन्य कोई कठिनाइयाँ, बाधक होती हो वे सोते, उठते, खाते, पीते जप ध्यान की मानसिक साधना तो किसी भी स्थिति में कर सकते है। चलते फिरते भी वह की जा सकती है। भगवान का नाम अविधिपूर्वक लेने में भी कुछ हर्ज नहीं। विधिपूर्वक की हुई उपासना निश्चय ही अधिक फल देती हैं पर जिन्हें अवकाश की कमी है वे मानसिक साधना बिना किसी नियम प्रतिबन्ध का पालन किये भी कर सकते हैं।
जादू-टोना के रूप में गायत्री का उपयोग करने के लालची लोग निम्न स्तर के गिने जाते हैं। उनकी पूजा प्रक्रिया उपासना की श्रेणी में नहीं आती वरन् लालची का एक भौतिक उद्योग मात्र ही उसे माना जाता है। ऐसे उद्योगों का भी कुछ तो फल होता ही है, कई बार तो इतने से भी आश्चर्यजनक परिणाम होते देखे गये हैं। असंभव दीखने वाले काम बनते और पर्वत के समान आपत्तियों के पहाड़ रज राई होते देखे गये हैं। आर्थिक तंगी, सन्तान का अभाव, बीमारी, पारिवारिक कलह, शत्रुओं का प्रकोप, प्रगति पथ में बाधा आदि अनेकों अड़चनें छोटी-मोटी उपासनाओं से भी हल होती देखी गई हैं। पर कई बार ऐसा भी होता है कि पर्वत समान कठिन प्रारब्ध और पुण्य पूँजी की समाप्ति के कारण उत्पन्न हुई दरिद्रता थोड़ी-सी उपासना से नहीं भी दूर होती। बड़े भगोने में पानी गरम करना चाहे और उसमें भी जल्दी करे तो उसे निराश होना ही पड़ेगा। ऐसे ही लोग उस आराधना को निरर्थक बताते और गाली देते सुने जाते हैं।
उचित यही है कि कोई कामना लेकर गायत्री उपासना न की जाय इससे साधक ईश्वर की दृष्टि में लालची भिखमँगा ठहरता है और उसका मूल्य स्वयं अपनी भी आँखों में घट जाता है। कामना पूर्ण होने पर अहंकार बढ़ता हैं कि हमने अपने जादू-मन्त्र से इतना लाभ प्राप्त कर लिया और असफलता मिलने पर नास्तिकता एवं विक्षोभ की भावना उत्पन्न होती है। सकाम उपासना से लाभ सीमित और हानि अधिक है। आध्यात्मिक प्रगति की सम्भावना तो उससे बनती ही नहीं, क्योंकि जब आत्म कल्याण की बात सोची ही नहीं गई थी, सकाम प्रयोजन को ही ध्यान में रखा गया था तो आत्मिक लाभ मिलता भी कैसे? यह हानि निष्काम उपासना में बिलकुल नहीं वरन् दुहरा लाभ है। आत्मिक प्रगति-सद्बुद्धि की उपलब्धि तो उसमें निश्चित रूप से होती है और जितना लाभ सकाम उपासना से मिलना चाहिए उतना लौकिक लाभ भी मिल ही जाता है। निराश या क्षुब्ध होने की गुँजाइश इसलिए नहीं रहती कि जब तुच्छ स्वार्थ के लिए किया ही नहीं गया था तो असफलता मिलने पर भी खिन्नता क्यों आवेगी?
निष्काम उपासना वाले को भौतिक लाभ नहीं मिलता ऐसी बात नहीं। उसका स्तर ऊँचा रहने से कामनाशील की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ मिलता है। गायत्री के द्वारा जहाँ आत्मिक प्रगति होती है वहाँ भौतिक सफलताओं का पथ भी प्रशस्त होता है। अग्नि, जल, सूर्य, चन्द्र, नदी, समुद्र आदि जड़ पदार्थ जब अपना गुण नहीं छोड़ते तो सर्वशक्तिमान अनादि महा शक्ति गायत्री की भक्तवत्सलता और अहैतुकी कृपा करने की विशेषता कहाँ चली जायगी? माता का पुत्रों के प्रति स्वाभाविक स्नेह होता है, गायत्री माता भी अपने पुत्रों पर शरीर को जन्म देने वाली जननी से भी कहाँ अधिक कृपा और करुणा का भाव रखती हैं फिर वे अपनी कृपा शरणागत पर क्यों न कटेंगी? अपनी न्यायशीलता, कर्मफल व्यवस्था और पुरुषार्थ के अनुरूप पुरस्कार देने की सृष्टि-संहिता की रक्षा करते हुए जितनी अधिक कृपा कर सकती होंगी अवश्य करेंगी। यह विश्वास रखते हुए यदि हम उच्चस्तरीय निष्काम उपासना करें तो थोड़ा-सा भी विधि-विधान हमारे लिए सब प्रकार श्रेयस्कर सिद्ध हो सकता है।
भव्य समाज की नव्य रचना
इस स्तंभ के अंतर्गत गत मास विवाह अपव्यय के विरुद्ध सुव्यवस्थित आन्दोलन खड़ा करने की जो योजना प्रस्तुत की गई थी, उसका परिवार के प्रायः सभी परिजनों ने हार्दिक स्वागत किया है। इस एक महीने में जो हजारों पत्र आये हैं उनसे प्रतीत होता है कि विवाहों में होने वाले अपव्यय के दुष्परिणामों का कटु अनुभव सभी ने भोगा है और दूसरों को इस कुप्रथा की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व बलिदान करते देखा है। इसलिए उन्हें अन्तःकरण से यह इच्छा है कि यह अविवेक जितनी जल्दी समाप्त हो सकता हो उतनी जल्दी समाप्त हो जाय।
वह दिन कितना स्वर्णिम होगा जब माता-पिताओं की कन्याएं किसी भी दृष्टि से भार रूप न होंगी। उन्हें पाकर भी पुत्र जन्म जैसा ही हर्ष मनाया जाया करेगा। विवाह नाम की कोई समस्या ही किसी के सामने न होगी। उपयुक्त जोड़े चुनने में जरा भी कठिनाई न पड़ा करेगी। सुयोग्य वधू को प्राप्त कर ससुराल वाले अपने भाग्य को सराहेंगे और उसके माता-पिता द्वारा दिये हुए इस अनुपम उपहार के बदले में आजीवन कृतज्ञता प्रकट करते रहेंगे।
इस परिस्थिति के उत्पन्न करने में विवाहों का वर्तमान स्वरूप भारी बाधा उत्पन्न करता है। लड़के वाले के यहाँ जब लड़की वाला सम्बन्ध करने पहुँचता हैं तो उसके आगमन को उपकारी का अनुग्रह न मान कर किसी लुटेरे के आने जैसी उपेक्षा के साथ देखा जाता है और सामान्य मानवीय शिष्टाचार में भी कुछ न्यूनता ही रखी जाती है। बात-चीत में ऐसा अहंकार प्रकट किया जाता है मानों वे कितने बड़े आदमी हैं और सम्बन्ध पक्का करने पर न जाने उन्हें लड़की वाले का उपकार करना पड़ेगा। कन्या को स्वीकार करने के बदले में उनकी नाना प्रकार की माँगे होती हैं और अनेकों उचित अनुचित शर्तें लगाते हैं। दहेज की लम्बी-चौड़ी माँगें करते हैं। इतनी बड़ी बरात का इतना बड़ा स्वागत, इतने कपड़े, इतने जेवर, इतना अमुक इतना तमुक। उस लम्बी-चौड़ी फरमाइश को दबे हुए बेटी वाले को स्वीकार करना पड़ता है। कुछ नरमी और कमी का वह बेचारा संशोधन भी करे तो उसकी कौन सुनता है? अपराधी को जो भी सजा जुर्माना अदालत देती हैं वह उसे भोगना पड़ता हैं। कन्या का पिता भी एक तरह का अपराधी होता है। बेटे वाला जो कुछ भी हुक्म सुना दे उसे मानने के अतिरिक्त और कुछ चारा भी तो नहीं रहता।
नये समाज का नया निर्माण करने के लिए यह आवश्यक है कि दहेज, विवाहों में अपव्यय सरीखी गलित कुष्ठ जैसी घृणित बीमारियों से समाज के शरीर को मुक्त करने के लिए प्रभावशाली कदम उठाये जायं। इसमें रूढ़िवादिता, जड़ता और अविवेकशीलता से कड़ा संघर्ष करना पड़ेगा। दुष्ट की एक ही प्रकृति होती है कि वह न तो कोई अच्छी बात अपनाना चाहता है और न बुरी बात छोड़ना चाहता है। जो कुछ जैसा कुछ चला आ रहा है उसे वहीं पसंद पड़ता है, नवीन चाहे कितना ही सुन्दर क्यों न हो उसे भयभीत ही करता है। हर सड़े, गले समाज में ऐसे लोगों का बाहुल्य होता है जो किसी अन्धपरम्परा को मरे बच्चे को छाती से चिपकाये फिरने वाली बंदरिया की तरह छोड़ना नहीं चाहते, भले ही उससे समाज का कितना ही अहित हो रहा हो। उनके सामने गुण अवगुण, उचित अनुचित, लाभ हानि, न्याय अन्याय जैसी कोई चीज नहीं होती। परम्परा टूटी कि धर्म रसातल को गया, पुरखों की बात बिगड़ा, बल इतना ही सोचने लायक मस्तिष्क उन्हें मिला होता है सो इससे आगे एक इंच भी बढ़ना उनके बूते की बात नहीं होती। ऐसे जड़तावादी हर सुधार में रोड़े अटकाते हैं। विवाहों में अपव्यय बन्द करने का प्रश्न जब सामने आवेगा तो वे विरोध के अतिरिक्त और कुछ कर ही नहीं सकते। नस-नस में भरी जड़ता उन्हें परम्परा को बनाये रखने के लिए अड़े रहने को कहेगी। मानव समाज की कितनी हानि इससे होती है इसे वे सुन समझ सकेंगे भी नहीं।
इन पुरातन पंथियों से भव्य-समाज की नव्य-रचना का आन्दोलन खड़ा करते हुए संघर्ष करना ही होगा। प्रसन्नता की बात है कि इस संघर्ष सम्भावना को स्वजनों ने समझा है और प्रगतिशील जातीय सभाएं बनाने का खुले मन से स्वागत किया है। जाति में चौधरायत ऐसे ही लोगों के हाथ में होती हैं, पंच ऐसे ही लोग रहते हैं जिन्हें धन या वृद्धावस्था के कारण बड़प्पन तो मिल गया है पर विचारशीलता से शून्य रहते हैं। लाल बुझक्कड़पन पर उनकी सारी गतिविधियाँ निर्भर रहती हैं। ऐसे ही लोग जातीय सभाएं बनाये बैठे रहते हैं और उनके माध्यम से अपने समाज में प्रचलित रूढ़ियों एवं अन्धपरम्पराओं का पोषण करते रहते हैं। इन लोगों से यह आशा करना आकाश कुसुम की तरह व्यर्थ ही है कि वे समाज की स्थिति को सहृदयतापूर्वक समझने का प्रयत्न करेंगे और समय के तकाजे को ध्यान में रखते हुए तदनुकूल परिवर्तनों के लिए कदम उठावेंगे। उनसे तो विरोध एवं लाँछन व्यंग एवं उपहास की ही आशा की जा सकती है।
इसलिए प्रगतिशील जातीय सभाओं के संगठनों की आवश्यकता को पाठकों ने एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप से स्वीकार किया है। प्रत्येक जाति में रीति रिवाज भिन्न होते हैं, विवाह शादी भी उसी दायरे में सीमित रहती हैं। ऐसी दशा में जातीय आधार पर ही उनका सुधार सरल हो सकता है। प्रगतिशीलता की सर्वतोमुखी मुहीम को चलाने के लिए जातीय संगठनों के मोर्चे पर भी एक बटालियन भेज देने की आज भारी आवश्यकता है। इस आशंका से सभी पाठकों ने इनकार किया है कि इस प्रकार के प्रगतिशील संगठनों में संकीर्णता एवं फूट की वृद्धि होगी। सच तो यह है कि प्रत्येक प्रगतिशील वर्ग अपनी-अपनी संकीर्णताओं को परित्याग करते हुए एक विशाल मानव परिवार बनाने की भूमिका तैयार करेगा।
प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के विचारशील लोगों ने वैवाहिक अपव्यय को रोकने के लिए, सक्रिय संगठन बनाने की उपयोगिता समझी है और भारी उत्साह प्रकट करते हुए यह आतुरता प्रदर्शित की है कि ऐसा कदम जल्दी से जल्दी उठाया जाय। प्रगति के लिए संघर्ष के लिए, साहस और त्याग के लिए उत्साह आवश्यक है। जहाँ यह दोनों सुयोग बनते हैं वहाँ कठिन से कठिन मञ्जिल पार होती है। परिवार में जो उत्साह इस सम्बन्ध में दृष्टिगोचर हो रहा है उसे देखते हुए यह सुनिश्चित दीखता है कि अगले दिनों भारतीय समाज में एक महत्वपूर्ण हलचल आरम्भ होगी और उसके प्रवाह में विवाह अपव्यय को बाढ़ के पानी में बहते हुए तिनके की तरह आँख से ओझल हो जाना पड़ेगा।
बड़े कार्यों के लिए बड़ी तैयारी करनी पड़ती है और बड़े साधन जुटाने पड़ते हैं। विवाहों में अपव्यय की कुरीति काफी व्यापक है, उसकी जड़ें काफी गहराई तक घुसी हुई हैं। उन्हें उखाड़ने में काफी खोद-बीन और उखाड़-पछाड़ करनी पड़ेगी। लोग आसानी से उस पुरानी रूढ़ि को छोड़ने का साहस न कर सकेंगे। औचित्य को स्वीकार करते हुए भी सामाजिक दबाव, घर वालों और रिश्तेदारों का विरोध, कंजूस या मूर्ख कहलाने का उपहास आदि अनेकों बाधाएं सामने रहेंगी। फिर उपयुक्त लड़की लड़के खोज निकालना और उनके अभिभावकों का वैसा ही विवेकशील एवं साहसी होना भी तो सरल कार्य नहीं है। इन अड़चनों को पार करने के लिए बहुमुखी योजना बनानी पड़ेगी और उसकी पूरी तैयारी करनी पड़ेगी। उथले कार्यक्रमों से काम न चलेगा।
सामाजिक क्रान्ति की दिशा में यह एक अत्यन्त ही व्यापक एवं महत्वपूर्ण कदम है। यह मोर्चा फतह हो गया तो अन्य रूढ़ियों का शमन-शोधन सर्वथा सरल हो जायगा। जिस कुरीति से सारा समाज दुखी है और जिसका नाश हर विचारशील व्यक्ति चाहता है उसके लिए आवश्यक वातावरण तो तैयार है पर उखाड़ फेंकने की क्रिया फिर भी काफी कष्ट-साध्य रहेगी। इस कठिन कार्य को करने के लिए उन व्यक्तियों की आवश्यकता है जिनमें शौर्य, साहस, तप, त्याग, लगन और उत्साह की समुचित मात्रा विद्यमान हो। ऐसे लोग आज कमजोर जरूर हैं पर उनका सर्वथा अभाव नहीं है। उपयुक्त सैनिकों की ही इस मोर्चे पर अड़ने के लिये सबसे प्रथम आवश्यकता पड़ेगी। प्रयत्न यह करना होगा कि जिनमें साहस हो वे मानवता की इस पुकार की पूर्ति करने के लिये बढ़ कर आगे आवें। हिन्दू-समाज पर लगे हुए इस भारी कलंक को अपने रक्त से धोने की हिम्मत कर सकें।
प्रगतिशील जातीय सभाओं का संगठन इन्हीं उत्साही और साहसी, प्रतिभाशाली, लोक-सेवकों के कंधों पर खड़ा किया जा सकेगा। नाम के भूखे, आलसी बातूनी और लम्बे-चौड़े सपने देखने वाले ऐसे अनेक व्यक्ति पाये जाते हैं जो घर बैठे ही तीनों लोकों के सुधारने की कल्पना करते और मन-मोदक खाते रहते हैं। ऐसे लोगों की सद्भावना एवं समर्थन मिले तो उसका भी कुछ उपयोग ही है पर उनसे वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता जो समाज की गति-विधियों को लौट पलट कर डालने जैसे महान कार्य को सम्पन्न करने के लिये आवश्यक हैं। यों कर्मठ व्यक्तियों की हर क्षेत्र में आवश्यकता रहती है पर सामाजिक क्रान्ति के गृह-युद्ध में पग-पग पर मोर्चा जमाये अड़े रहने वाले सैनिकों जैसी क्रान्तिकारी भावनाएं जिनके अन्दर विद्यमान हों ऐसे लोगों का अस्तित्व हो आशा का केन्द्र बन सकता हैं। पिछले दिनों स्वाधीनता संग्राम ही राजनैतिक क्रान्ति हो कर चुकी है। उसमें मातृभूमि के लिये एक से एक बढ़ कर उत्सर्ग करने वाले, अहिंसक एवं हिंसात्मक संघर्ष में भाग लेने वाले अगणित क्रान्तिकारियों का तप त्यागपूर्ण व्यक्तित्व ही सफलता का आधार बना था। ठीक वैसी ही आवश्यकता इस सामाजिक क्रान्ति के लिये भी अभीष्ट होगी।
एक माता की गोद से बच्चा छूट कर नदी की प्रबल धारा में बहने लगा। माता अपने शिशु की प्राण रक्षा के लिये सहायता को चीत्कार कर रही हैं। ‘होशियार’ लोग मौखिक सहानुभूति तो दिखा रहे थे पर करने को कुछ भी तैयार न थे। उसी समय एक नव-युवक उफनती नदी में अपने प्राण हथेली पर रख कर कूदा और बहते बच्चे को पकड़ कर किनारे पर ले आया। इस युवक का नाम था अब्राहम लिंकन जो अपनी ऐसी ही महानताओं के कारण अमेरिका का प्रेसीडेण्ट हुआ। आज विवाहों का अपव्यय एक ऐसी उफनती नदी बना हुआ है जिसमें सारे समाज की बालिकाएं बही चली जा रही हैं और प्रत्येक अभिभावक उनको बचाने के लिए चीत्कार कर रहा है। यह दृश्य हम सब देखते सुनते तो हैं। मौखिक विरोध और दुख भी प्रकट करते हैं पर करने की बारी आती है तो ‘अक्लमन्द’ लोगों की तरह पल्ला झाड़ कर अलग खड़े हो जाते हैं। ऐसे कुसमय ये स्वर्गीय अब्राहम की आत्मा देखती है कि उसके जैसे उदार और साहसी लोगों से भारत की भूमि रहित क्यों हो गई? कोई प्राण हथेली पर लेकर नदी में कूदने और इन बच्चियों को बचाने के लिए क्यों तैयार नहीं होता? आत्मा के अमर और शरीर को नश्वर मानने वाले, गीता-पाठी लोगों में से मोह और लोभ को छोड़ कर धर्म के लिए कुछ साहस कर सकने वाले लोग क्यों कहीं दृष्टिगोचर नहीं होते? इसका उत्तर युग की आत्मा हम से माँगती हैं और हम क्लीव, निर्जीव की तरह सिर नीचा किये मुरझाये- से खड़े हैं। इस धिक्कार योग्य स्थिति में पड़ी हुई अपनी पीढ़ी की मनोदशा पर आँसू ही बहाये जा सकते हैं।
बुद्ध धर्म के शून्यवाद ने जब वैदिक परम्पराओं को ग्रस लिया था तब साँस्कृतिक दुर्दशा पर महल के झरोखे में बैठी आँसू बहाती हुई राजकुमारी की आँखों का पानी सड़क पर चलते हुए कुमारिल भट्ट के ऊपर पड़ा। उसने ऊपर आँख उठा कर देखा और कारण पूछा तो राजकुमारी ने कहा-को वेदान् उद्धरस्यसि? अर्थात् वेदों का उद्धार कौन करेगा? कुमारिल का पौरुष इस चुनौती को स्वीकार करने के लिए तैयार हो गया। उसने कहा कि मैं करूंगा? और सचमुच उस कर्मठ युवक ने वैदिक सभ्यता की रक्षा के लिए वह सब कुछ कर दिखाया जो कोई निष्ठावान व्यक्ति कर सकता है। आज विवाहों के अपव्यय ने भारतीय संस्कृति को उस घृणित एवं मरणोन्मुख परिस्थितियों में ला पटका है जिसमें कुछ दिन वह और पड़ी रही तो उसे अपनी मौत आप मर जाने के लिए ही विवश होना पड़ेगा। कुमारिल भट्ट की इस कुसमय की घड़ी में जितनी आवश्यकता है उतनी पहले कभी नहीं रही।
यज्ञों के नाम पर होने वाली पशु हिंसा के नाम पर चारों ओर व्याप्त नृशंसता का उन्मूलन करने के लिए गौतम बुद्ध की आत्मा विद्रोह कर उठी थी, उनने तप करके जो शक्ति प्राप्त की, उसे समाज की तत्कालीन प्रवृत्तियों को बदलने में लगा दिया। आज यज्ञों के नाम पर होने वाली पशु हिंसा से बढ़ कर विवाहों के नाम पर होने वाले अपव्यय की क्रूर बलिवेदी लाखों कन्याओं के रक्त स्नान से अभिषिक्त होती रहती है। इस नृशंसता का उन्मूलन करने के लिए सहस्रों युद्धों की आवश्यकता अनुभव की जा रही है पर सब ओर सन्नाटा देख कर ‘वीर विहीन मही’ होने की आशंका दिखाई पड़ने लगती है और भारतीय गौरव का मस्तक लज्जा से नीचा झुक जाता है।
युग-निर्माण के उपयुक्त अभिनव समाज रचना का महान अभियान आरम्भ करते हुए सबसे प्रथम यही आवश्यकता अनुभव की जा रही है कि प्रत्येक जाति में ऐसे तेजस्वी युवक निकलें जो संगठन की प्रारम्भिक भूमिका का ढाँचा खड़ा करने में अपना समय लगावें और साहसपूर्वक कुछ काम कर गुजरने की लगन लेकर आगे बढ़ें। इसके लिए घर छोड़ने की आवश्यकता नहीं है। आजीविका कमाते हुए, बच्चों का पालन करते हुए भी कोई व्यक्ति थोड़ा समय पारमार्थिक कामों में लगाता रहे तो उतने में भी सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य बहुत हद तक पूरा हो सकता है। पूरा समय दे सकने वाले प्रतिभाशाली लोग वानप्रस्थों की तरह देश धर्म, समाज और संस्कृति की सेवा के लिए मिल सकें तब तो कहना ही क्या है?
अखण्ड-ज्योति परिवार में हर जाति एवं उपजाति के लोग मौजूद हैं। उसकी छाँट करके प्रारम्भिक रूप में प्रगतिशील जातीय सभाएं गठित कर दी जावेंगी, पर उतने थोड़े लोगों के संगठन किसी जाति पर व्यापक प्रभाव कहाँ डाल सकेंगे? उन्हें अपने-अपने संगठनों का व्यापक विस्तार करना होगा। प्रगतिशीलता का तात्पर्य और उद्देश्य समझाने के लिए उन्हें अपने-अपने कार्य क्षेत्र में दर दर मारा-मारा फिरता पड़ेगा। संगठन का उद्देश्य और कार्यक्रम समझ लेने पर ही तो कोई उससे प्रभावित होगा और उसमें सम्मिलित होने की तैयारी करेगा। कहने पर से तो इन संस्थाओं के सदस्य सब लोग बन नहीं जायेंगे और यदि बन भी गये तो उनमें वह साहस कहाँ से आवेगा, जिसके बल बूते पर वह बहती नदी के प्रवाह को चीर कर उलटी चलने वाली मछली की तरह नवीन परम्परा स्थापित करने का आदर्श उपस्थित कर सकें निश्चय ही इसके लिए व्यापक प्रचार और प्रयास की जरूरत होगी। जन-संपर्क बनाने के लिए दौरे करने पड़ेंगे, उद्देश्य को समझा सकने वाला साहित्य-जनता तक पहुँचना पड़ेगा और उनके मस्तिष्क में वह भावना भरनी पड़ेगी जिससे वे युगधर्म को पहचान सकें और प्रतिगामिता की हानियों और प्रगतिशीलता के लाभों से परिचित हो सकें।
जातियों के क्षेत्र छोटे-छोटे हैं बिखरे हुए पड़े हैं, उन बिखरे हुए मन को को एक सूत्र में पिरोने में कितने मनोयोग की आवश्यकता है उसे कार्यक्षेत्र में उतरने वाले ही जानते हैं। कितना विरोध, कितना उपहास, कितना व्यंग सहना पड़ता है, कितना समय नष्ट करना पड़ता है उसे वही सहन कर सकेगा जिसमें त्यागी तपस्वी जैसी भावना विद्यमान हो। घर बैठे मुफ्त में यश को लूट भागने वाले बातूनी लोग इस प्रयोजन को पूरा कहाँ कर सकेंगे? इसलिए सबसे पहली आवश्यकता ऐसे भावनाशील लोगों की ही पड़ेगी, जो युग की सब से बड़ी आवश्यकता-सामाजिक क्रान्ति के लिए अपनी सच्ची श्रद्धा को अञ्जलि में लेकर संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए साहस पूर्ण कदम बढ़ा सकें।
प्राचीन काल में मनुष्य जाति को गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार चार भागों में सामाजिक सुव्यवस्था की दृष्टि से विभक्त किया गया था। ज्ञान, शस्त्र, धन और श्रम की चार शक्तियाँ मानव-जाति की प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करती रही हैं। यों इन चारों की ही प्रत्येक व्यक्ति को आवश्यकता पड़ती है, पर इनमें से एक-एक की विशेष आराधना करने के लिए भौतिक जीवन का सुनिश्चित कार्यक्रम बनाने के लिए वर्ण धर्म का विधान बनाया गया।
आध्यात्मिक प्रगति के लिए उपासना, जीवन शोधन और परमार्थ की विशिष्ट कार्य-पद्धति अपनानी पड़ती है तब जीवन लक्ष्य की प्राप्ति होती है। भौतिक प्रगति के लिए ज्ञान, शस्त्र और धन की आवश्यकता रहती है। इन्हीं के माध्यम से अज्ञान, अशक्ति और अभावों का निराकरण होता हैं। एक वर्ग इनमें से एक लक्ष्य को लेकर कार्य-संलग्न रहे तो उसमें विशेष योग्यता प्राप्त होने और अधिक सफलता मिलने की संभावना रहती है। इस तथ्य को समझते हुए ऋषियों ने चार वर्ण बनाकर सुन्दर ढंग से श्रम विभाजन कर दिया। सामाजिक उन्नति के लिए यह एक सुन्दर व्यवस्था भी है।
कर्म में वर्ण का सिद्धान्त सनातन है। वर्ण व्यवस्था का आधार गुण, कर्म, स्वभाव है। पर वर्तमान जाति व्यवस्था वंश परम्परा से चलती है। ज्ञानी, त्यागी और लोक-सेवी ब्राह्मण का बेटा अशिक्षित दुर्बुद्धि, दुष्ट तथा दुराचारी होते हुए भी जब ब्राह्मण की कहलाता है तब आश्चर्य होता है कि वर्ण-व्यवस्था का मूल आधार इस प्रकार उलट-पुलट क्यों हो गया?
ऐतिहासिक तथ्यों की गहरी खोज बीन करने पर पता चलता है कि वर्तमान जातियाँ वर्ण नहीं वरन् वर्ग मात्र है। जिन लोगों में समीपता, प्राँत, भाषा, आचार, व्यवहार वंश की समानता के कारण परस्पर रोटी-बेटी का व्यवहार होता था उनकी परिवार शृंखला एक जाति या उपजाति कहलाने लगी। एक वंश तथा उससे संबंधित रिश्तेदारों का समूह एक वर्ग या जाति कहलाया। अधिकतर तो एक वर्ग के भीतर ही गोत्र बचाकर विवाह शादी होती है। पर कहीं-कहीं ऐसा भी है कि एक उपजाति अपने में नहीं वरन् दूसरी उपजाति में विवाह करती है। रक्त से संबंधित वंश और विवाह शादियों की शृंखला से बंधे हुए अन्य परिवार मिलकर जो वर्ग बन उन्हें ही आज जातियों या उपजातियों के नाम से गिना जाता हैं। इनकी संख्या भारतवर्ष में 17 हजार से ऊपर हैं। यदि उनका आधार वर्ण होता तो वे चार ही रहती। इतनी बहु-संख्यक वे किसी प्रकार भी न बन पातीं।
इन वर्गों को- जातियों या उपजातियों को वंश और बेटी संबंध के आधार पर बने समूह कहा जा सकता है। परिवार में केवल वंश ही प्रधान रहता है, जिसमें रिश्तेदार भी जुड़ जावें, उसे बृहत् परिवार कहा जा सकता हैं। यह छोटे-छोटे वृहत परिवार ही आज जातियों और उपजातियों के रूप में विख्यात है। वर्ण व्यवस्था से उनका कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है। वर्ण का आधार कर्म है वंश नहीं। वंश परम्परा तथा विवाह परम्पराओं का आधार लेकर चलने वाले समूहों को एक बृहत् परिवार ही माना जायगा उसे ही उपजाति या जाति का नाम मिला है।
इन बृहत् परिवारों को सुविकसित करने का कार्य अलग-अलग संगठनों के अंतर्गत किया जाय तो कुछ हर्ष नहीं, न इससे कोई हानि है और न संकीर्णता। श्रमिक वर्ग के कार्यों की या काम करने की स्थानों की भिन्नता के कारण अलग-अलग यूनियनें बनती हैं। यद्यपि उन सबका लक्ष्य एक ही होता है पर संगठन की सुविधा के लिए उनकी पृथक-पृथक यूनियनें बनती हैं। मोटर ड्राइवर ताँगा हाँकने वाले, रिक्शा चलाने वाले यद्यपि एक ही प्रकार का काम करते हैं और उनके संगठन का उद्देश्य भी एक ही है पर संगठन में सुविधा तभी रहती है जब मोटर ड्राइवर यूनियन, ताँगा यूनियन, रिक्शा यूनियन आदि अलग-अलग बनें। तेल मिलों के, कपड़ा मिलों के, औषधि फैक्ट्रियों के, हाथ करघा बुनकरों के अलग-अलग संगठन रहने पर भी यह नहीं सोचा जाता कि यह पृथकता फूट फैलाने या संकीर्णता बढ़ाने के लिए आरम्भ की गई है। सदुद्देश्य से क्षेत्र एवं एकरूपता की दृष्टि से किये हुये संगठन कभी हानिकारक नहीं हो सकते। जैन सभा, सनातन धर्म सभा, सिक्ख शिरोमणि सभा, ईसाई मिशन आदि संगठन कोई बुराई उत्पन्न नहीं कर रहें। फिर जातीय संगठन यदि प्रगतिशील उद्देश्यों के लिए बनाये जा रहे हों तो उनसे न तो किसी प्रकार की हानि हो सकती है और न संकीर्णता एवं फूट बढ़ सकती है। छोटा संगठन भी बृहत् एकता की ओर बढ़ने की एक कदम ही होता है।
युग-निर्माण योजना में परिवार-निर्माण पर अत्यधिक जोर दिया गया है। क्योंकि समाज का आधार परिवार ही है। परिवारों का सम्मिलित स्वरूप ही तो समाज है। ईंटें से मिलकर ही तो दीवार बनती हैं। ईंटें कच्ची रहती हैं तो दीवार भी कमजोर ही बनेगी। परिवारों का तारतम्य यदि अस्त-व्यस्त हो रहा होगा जो सभ्य समाज की भव्य रचना का दृश्य कहाँ दिखाई देगा? परिवारों में स्वस्थ परम्पराओं का प्रवेश’ कराने के लिए ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार सदस्यों को प्रेरणापूर्वक लगाया गया है। फलस्वरूप तीन चौथाई से अधिक इस परिवार के सदस्य अपने-अपने कुटुम्बों की अभिनव रचना करने में लगे हुए हैं। नियमित रूप से कुछ समय वे इस कार्य के लिये लगाते रहते हैं।
बृहत् परिवारों की सेवा, संगठन भी उसी प्रयत्न का विकसित रूप है। सन्मार्ग पर चलने की सफल प्रेरणा केवल उन्हें दी जा सकती है जिस पर अपना व्यक्तिगत प्रभाव हो। सुधार आन्दोलन के संदर्भ में हर व्यक्ति का वास्तविक क्षेत्र भी उन्हीं लोगों के बीच रहता है। कुटुम्बी, रिश्तेदार, मित्र, परिचित एवं जो अपने प्रभाव में हैं उन्हीं से कोई सुधारात्मक कार्य जोर देकर कराया जा सकता है। अच्छी बात सुन तो कोई भी लेता है पर करता उसी के आग्रह से है जिसका कुछ प्रभाव अपने ऊपर होता है। सन्मार्ग पर चलने में हर व्यक्ति को कुछ अड़चन अनुभव होती है उस अड़चन का मुकाबला करने के लिए आवश्यक साहस किसी प्रभावी व्यक्ति की प्रेरणा से ही मिलता है। इसलिए युग-निर्माण योजना के अंतर्गत हर परिजन को यह कहा गया है कि दूर देशों तक धर्मोपदेश देने जाने का विचार छोड़कर वह अपने प्रभाव क्षेत्र में सेवा कार्य आरंभ करें और वह प्रभाव क्षेत्र जैसे-जैसे बढ़ता जाय वैसे-वैसे सेवा क्षेत्र भी बढ़ता जाय।
बृहत् परिवार में- अपनी उपजाति के क्षेत्र में कार्य करते हुए प्रत्येक लोक सेवी को अधिक सुविधा रह सकती है। वंश, रिश्तेदारी सम्बन्धों के आपसी ताने-बाने तथा भावनात्मक स्वभावी एकता के कारण जाति या उपजाति के क्षेत्र में काम करना अपने छोटे परिवार की अपेक्षा उससे कुछ ही बड़े क्षेत्र में काम करने का अगला कदम जैसा ही प्रतीत िकेडडडडडडड सुधार और संगठन में हम लोग लगे ही हुए हैं। यदि बृहत् परिवारों तक जातीय संगठनों के इस कार्यक्षेत्र को बढ़ा दे और युग-निर्माण योजना के अनुसार सभ्य समाज की भव्य रचना के लिए एक और कदम आगे बढ़ावें तो यह उचित भी होगा, आवश्यक भी और प्रशंसनीय भी।
यों वैवाहिक अपव्यय को रोकने और सात्विकता की आदर्शवादी परम्पराओं के अनुसार विवाह सम्बन्धों के प्रचलन की प्रेरणा देने के उद्देश्य से यह जातीय संगठनों का कार्य आरम्भ करना पड़ रहा है पर उसका उद्देश्य इतने तक ही सीमित न होगा। निजी परिवारों में जिन स्वस्थ परम्पराओं को जन्म देना चाहें उन्हें भी इन बृहत् परिवारों में व्यापक बनाने का, मानवोचित गुण, कर्म स्वभाव के आध्यात्मिक प्रवेश तत्वों को दिलाने का प्रयत्न इन संगठनों को करना चाहिए। शिक्षा, स्वास्थ्य, सदाचार, सद्भावना एवं सुविधा बढ़ाने के लिये अनेकों कार्यक्रम बन सकते हैं और यह जातीय संगठन अपने कार्यक्षेत्र में समुचित उत्साह उत्पन्न कर सकते हैं। युग-निर्माण योजना 108 कार्यक्रमों को जब घर-घर में व्यापक बनाया गया है तो जातीय क्षेत्र भी तो उसी परिधि में रहेगा।
सन्ध्या, गायत्री, हवन, रामायण, गीता आदि की शिक्षाओं का क्रम और भी किया जा सकता है, स्त्री शिक्षा एवं प्रौढ़ शिक्षा के लिए विशेष जोर दिया जा सकता है और उसके लिये जगह-जगह रात्रि पाठशालाएँ आरम्भ की जा सकती हैं। वर्ष में एक बार सम्मेलन हो और उसमें सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार कराये जाय तो अच्छा ही रहेगा। माँस मदिरा का सेवन, थाली में जूठन छोड़ना, गाली देना, मृत्युभोज, पशु-बलि, अश्लील गाने, चित्र, पुस्तकें, आदि अनेकों बुराइयाँ ऐसी हैं जिन्हें छोड़ने के लिये आन्दोलन किया जा सकता है और उन अनेकों सत्प्रवृत्तियों को इन संगठनों के द्वारा फैलाया जा सकता है जो मानवता के आदर्शों को विकसित एवं परिपुष्ट करती हों। इस प्रकार यह प्रगतिशील जातीय संगठन अपने-अपने कार्यक्षेत्र में अनेकों दुष्प्रवृत्तियों का शमन और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करते हुए युग निर्माण को भूमिका में महत्वपूर्ण भाग ले सकते हैं।
युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति
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युग-निर्माण के उपयुक्त परिस्थितियाँ वे लोग उत्पन्न करेंगे जिनमें मूलतः उत्कृष्ट स्तर की शक्ति क्षमता, प्रतिभा और आस्था विद्यमान हो यह क्षमता भाषण सुनने या लिखने पढ़ने से ही उत्पन्न नहीं होती वरन् उसके लिए जन्मजात संस्कारों की भी आवश्यकता रहती है। आज धर्म और अध्यात्म पर भी राजनैतिक विषयों की भाँति ही धुँआधार भाषण होते है। कीर्तन, कथा, रामायण, यज्ञ आदि के उत्सव समारोह आगे होते रहते हैं जिसमें धर्म विषयों पर विद्वतापूर्ण भाषण होते हैं। रामलीला जगह-जगह होती है उसमें भी भगवान राम के आदर्शों को अपनाने की प्रेरणा देना ही उद्देश्य रहता है। गंगा-स्नान में मेले, कुम्भ आदि पूर्व चारों धामों, तीर्थ आदि में भी ऐसा ही वातावरण बनता है जिससे यदि मनुष्य चाहे तो बहुत कुछ प्रेरणा प्राप्त कर सकता है। नाटक, सिनेमाओं में भी कई बार धर्म-शिक्षा के दृश्य रहते हैं।
पत्र-पत्रिकाओं में कर्तव्य बोधक लेख बहुत छपते रहते हैं। गीता, रामायण जैसी प्रधान धर्म पुस्तकों की प्रतियाँ लाखों की संख्या में हर साल छपती हैं और लोगों द्वारा खरीदी एवं पढ़ी जाती हैं। ऐसा साहित्य और भी जगह-लेखन द्वारा निरन्तर यह प्रयत्न किया जा रहा है कि लोग अच्छे बनें। इन बातों को लोग पढ़ते-सुनते न हों सो बात भी नहीं है। पर देखा यह जाता है कि चिकने घड़े की तरह लोग उससे मनोरंजन मात्र कर लेते हैं, उसे जीवन में उतारने के लिए एक कदम भी आगे बढ़ने को तैयार नहीं होते। और तो और, धर्म एवं आध्यात्मिकता के प्रवचनकर्ता और लेखन स्वयं भी अपनी ‘कथनी की अपेक्षा’ करनी से बहुत पिछड़े रहते हैं। कई बार तो उनका आचरण बिलकुल उलटा देखा जाता है।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए कारण जानने की गहराई में जब उतरा जाता है तब एक बात स्पष्ट होती है कि व्यक्ति में मूलतः वे तत्व भी होने चाहिए जिन में सद्ज्ञान को ग्रहण करने की शक्ति और आदर्श को जीवन में उतारने की साहसपूर्ण सामर्थ्य भी विद्यमान हो। इसके बिना अच्छी शिक्षा का भी कुछ विशेष लाभ नहीं मिल सकता। धर्म की शिक्षा देने वालों की वक्तृता भले ही नीरस हो, उनका चरित्र सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक पवित्र, अधिक प्यारा और अधिक प्रकाशवान होना चाहिए। आज वर्ग शिक्षा देने वाले लेखक वक्ता, तो बहुत हैं पर उनके पास कबीर, नानक, गुरु गोविंदसिंह, रामदास, बुद्ध, महावीर, गाँधी जैसा व्यक्तित्व नहीं हैं। वाणी की शक्ति तो स्वल्प है। प्रभाव वस्तुतः चरित्र का पड़ता है। संस्कारवान सुनने वाले और चरित्रवान कहने वाले जब कभी मिल जाते हैं तब थोड़ा-सा प्रशिक्षण भी जादू का असर उत्पन्न करता है। इसके बिना अन्य मनोरंजन की तरह धर्म भी दिल बहलाव का एक विषय बनकर रह जाता है। धर्म जीवन में उतारने की वस्तु है, आचरण में लाने पर ही उसका कोई लाभ और प्रभाव अनुभव किया जा सकता है।
यदि धर्म को व्यावहारिक रूप धारण करते हुए देखना हो तो ऐसे संस्कारवान व्यक्तियों का निर्माण करना होगा जो हमारी तरह धर्म को सुन समझकर ही सन्तुष्ट न हो जायं वरन् उसे कार्यान्वित करने के लिए साहसपूर्ण कदम उठा सकने की क्षमता भी रखते हों। तेजस्वी व्यक्तित्वों के निर्माण के लिए माता-पिता को तप करना होता है। प्राचीनकाल के इतिहास पुराणों को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि महापुरुषों का जन्म देने वाले माता-पिताओं ने दीर्घ काल तक अनेक जन्मों तक तप किये थे। उस तप से शरीर और मनों को, रज वीर्य को ऐसा सुसंस्कारी बनाया था कि उससे तेजस्वी आत्माओं का प्रजनन संभव हो सके। उन बालकों का पालन-पोषण भी उपयुक्त वातावरण में हो सके ऐसी व्यवस्था करनी होती हैं तथा शिक्षा-दीक्षा के लिए भी ऐसा प्रबन्ध करना होता है कि जहाँ केवल साक्षरता ही नहीं वरन् चरित्र तथा व्यक्तित्व का भी विकास हो सके। सुसंस्कृत तथा श्रेष्ठ व्यक्तियों के निर्माण का यही मार्ग हैं। अपवाद रूप से कभी-कभी कीचड़ में कमल भी उत्पन्न होते हैं पर क्रम यही है कि संस्कारवान श्रेष्ठ व्यक्तित्व सदा श्रेष्ठ माता-पिता और श्रेष्ठ पारिवारिक वातावरण में से ही विनिर्मित होते रहते हैं।
अब युग की रचना के लिये ऐसे व्यक्तियों की ही आवश्यकता है जो वाचालता और प्रोपेगैण्डा से दूर रह कर अपने जीवनों को प्रखर एवं तेजस्वी बना कर अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करें और जिस तरह चन्दन का वृक्ष आस-पास के पेड़ों को सुगन्धित कर देता है, उसी प्रकार अपनी उत्कृष्टता से अपना समीपवर्ती वातावरण भी सुरभित कर सकें। अपने प्रकाश से अनेकों को प्रकाशवान कर सकें।
धर्म को आचरण में लाने के लिये निस्सन्देह बड़े साहस और बड़े विवेक की आवश्यकता होती है। कठिनाइयों का मुकाबला करते हुये सदुद्देश्य की ओर धैर्य और निष्ठापूर्वक बढ़ते चलना मनस्वी लोगों का काम है। ओछे और कायर मनुष्य दस-पाँच कदम चल कर ही लड़खड़ा जाते हैं। किसी के द्वारा आवेश या उत्साह उत्पन्न किये जाने पर थोड़े समय श्रेष्ठता के मार्ग पर चलते हैं पर जैसे ही आलस्य प्रलोभन या कठिनाई का छोटा-मोटा अवसर आया कि बालू की भीत की तरह औंधे मुँह गिर पड़ते हैं। आदर्शवाद पर चलने का मनोभाव देखते-दीखते अस्त-व्यस्त हो जाता है। ऐसे ओछे लोग अपने को न तो विकसित कर सकते हैं और न शान्तिपूर्ण सज्जनता की जिन्दगी ही जी सकते हैं। फिर इनसे युग-निर्माण के उपयुक्त उत्कृष्ट चरित्र उत्पन्न करने की आशा कैसे की जाय? आदर्श व्यक्तियों के बिना दिव्य समाज की भव्य रचना का स्वप्न साकार कैसे होगा? गाल बजाने पर उपदेश लोगों द्वारा यह कर्म यदि सम्भव होता सो वह अब से बहुत पहले ही सम्पन्न हो चुका होता। जरूरत उन लोगों की है जो आध्यात्मिक आदर्शों की प्राप्ति को जीवन की सब से बड़ी सफलता अनुभव करें और अपनी आस्था की सच्चाई प्रमाणित करने के लिये बड़ी से बड़ी परीक्षा का उत्साहपूर्ण स्वागत करें।
आदर्श व्यक्तित्व ही किसी देश या समाज की सच्ची समृद्ध माने जाते हैं। जमीन में गढ़े धन की चौकसी करने वाले, साँपों की तरह तिजोरी में जमा नोटों की रखवाली करने वाले कंजूस तो गली कूँचों में भरे पड़े हैं। ऐसे लोगों से कोई राष्ट्र न तो महान बनता और न शक्तिशाली। राष्ट्रीय प्रगति के एकमात्र उपकरण प्रतिभाशाली चरित्रवान व्यक्तित्व ही होते हैं। हमें युग-निर्माण के लिए ऐसी ही आत्माएँ चाहिये। इनके अभाव में अन्य सब सुविधा साधन होते हुए भी अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में तनिक भी प्रगति न हो सकेगी।
अखण्ड-ज्योति परिवार का प्रत्येक घर आदर्श व्यक्तित्व ढालने की टकसाल बने यही प्रयत्न हमें करना होगा। इसके लिए यह नितान्त आवश्यक है कि इनमें ऐसा सौम्य वातावरण रहा करे जिसके सान्निध्य में रहने वाले बालक संस्कारवान बनते चले जायँ और प्राचीन भारत की तरह हर घर में नर रत्नों का उद्यान खिला हुआ दृष्टिगोचर हो सके जन्मजात संस्कारों के अभाव में स्कूली शिक्षा व्यक्तित्व निर्माण में बहुत ही कम सहायक हो सकती है। आज कितने ही आदर्श विद्यालय, छात्रालय, एवं गुरुकुल अच्छी शिक्षा की व्यवस्था रख रहे हैं पर जन्म-जात संस्कारों के अभाव में उनमें पढ़ने वाले बालक भी वैसे नहीं बन रहें हैं जैसे कि आशा की जाती थी। इसलिए पत्तों की सफाई का ध्यान रखने से पूर्व हमें जड़ को सींचना भी नहीं भूलना चाहिये। नई पीढ़ी जन्मजात इन संस्कारों लेकर जन्म यह युग-निर्माण का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पहलू है। इसकी पूर्ति के लिये हमें सुव्यवस्थित योजना बना कर काम करना होगा।
वर्तमान पीढ़ी जिस रज वीर्य में जन्मी है, जिस वातावरण में पली है, वह संस्कारवान न होने से हीन मानसिक दशा में बुरी तरह हैं। मानवीय स्वाभिमान कर्तव्य और दायित्व से वह अपरिचित जैसी ही देखती है, विपन्नताओं का रोना तो रोती है पर उसे बदलने के लिए जिस साहस त्याग और बलिदान की आवश्यकता है उससे दूर-दूर ही बनी रहती। तृष्णा और वासना में इतना जकड़ रही है कि मानवोचित पुरुषार्थ के लिए अवकाश, उत्साह बच नहीं पाता। जिन आदर्शों के लिये हमारे पूर्व पुरुष प्राण तक देने में आनन्द मानते थे उन्हें आज उपहासास्पद बेवकूफी समझा जाता है। मनुष्य इतना स्वार्थी, धूर्त और संकीर्ण बना हुआ है कि धर्म और सदाचार केवल गाल बजाने तक सीमित रह गये हैं व्यवहार में पशुता एवं पैशाचिकता का ही बोलबाला रहता है।
यह परिस्थितियाँ बदलने के लिये मानव अन्तःकरण को बदलने के लिये लोक शिक्षण तो आवश्यक है ही पर साथ ही यह और भी आवश्यक है कि लोक शिक्षण का आधार व्यक्तिगत जीवन एवं परिवार को आदर्शवादी साँचे में ढाला जाय। अध्यात्म, पूजा-पाठ की कहने सुनने की वस्तु न रहे वरन् उसे दैनिक जीवन में, नियमित व्यवहार में उतारने को एक अनिवार्य आवश्यकता माना जाय। ऐसे व्यक्तित्व और परिवार न केवल वर्तमान समाज को परिवर्तित करेंगे वरन् नई पीढ़ी में आदर्शवादी नर-रत्नों को जन्म दे सकने में भी समर्थ होंगे। मनस्वी और तपस्वी मनुष्यों का समाज जितना बढ़ता जायगा उतना ही इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण होगा। उज्ज्वल व्यक्तियों से ही भव्य समाज की नव्य रचना सम्भव होगी।
संसार में जितने भी प्रसाधन हैं उनका उपयोग जीवन को सुखी बनाने के लिए किया जाता है। उस सम्बन्ध में ज्ञान और विज्ञान का अन्वेषण एवं प्रशिक्षण सर्वत्र तीव्र गति से हो रहा है, पर वह जीवन जिसके लिए यह सब हो रहा है किस प्रकार जिया जाय इस ज्ञान के सम्बन्ध में चारों ओर अन्धकार ही दिखाई पड़ता है। छोटे-मोटे उद्योग और श्रम संस्थाओं तक में ट्रेण्ड लोगों की आवश्यकता होती है। स्कूलों में ट्रेण्ड अध्यापक रखे जाते हैं। रेल तार, डाक, पुलिस फौज आदि सभी विभागों में ट्रेनिंग एक अनिवार्य आवश्यकता मानी जाती है। इसके बिना उन कार्यों को ठीक तरह कर सकना बुद्धिमान व्यक्तियों के लिए भी संभव नहीं हो सकता। यही बात जीवन जीने के संबन्ध में भी लागू होती है। सभी शिल्प उद्योगों, कला कौशलों और सरकारी क्रिया-कलापों की अपेक्षा जिन्दगी जीना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण विषय हैं। इसकी ट्रेनिंग की कोई सुव्यवस्था न हो तो उसे फूहड़ मन से जिये जाने की ही सम्भावना रहेगी। आज अशिक्षितों की तो कौन कहे सुशिक्षित धनी बुद्धिमान और सत्ताधिकारी व्यक्तियों में से भी ऐसे बहुत कम दिखाई पड़ते हैं जो जिन्दगी जीना ठीक प्रकार जानते हैं।
जीवन कला की जानकारी के अभाव में अधिकाँश व्यक्ति दीन, दुखी और पतित स्थिति में पड़े हुए मौत के दिन पूरे करते हुए देखे जाते हैं। यह मान्यता सही नहीं कि जिसके पास धन ऐश्वर्य अधिक होगा वह सुखी रहेगा वरन् सच तो यह है कि जिसे जिन्दगी जीना आता होगा वह स्वल्प साधनों में भी आदर्श आनन्द और उल्लास के साथ रह सकेगा। ऋषियों ने स्वेच्छा से गरीबी का वरण करके लोगों को यह सिद्ध किया था कि कितनी साधन-हीन स्थिति में रहते हुए कितनी उच्चकोटि की प्राप्ति कर सकना सम्भव हो सकता है।
संसार में जितने भी ज्ञान, कला और कौशल हैं उनमें सर्वोपरि स्थान जीवन कला का है। जिसे यह आती है उसे हर घड़ी हर परिस्थिति में केवल आनन्द, उल्लास और सन्तोष का स्वर्गीय सुख ही मिलता रह सकता है। दुःख इसी बात का है कि बुद्धिमान समझा जाने वाला मानव-प्राणी जीवन विद्या की उपयोगिता और आवश्यकता को न तो अनुभव कर रहा है और न उसके लिए कोई प्रयत्न ही इस दिशा में चल रहे हैं। अनेक विषयों की शिक्षा के अनेकों विद्यालय मौजूद हैं। पर जीवन जीने की कला सिखाने वाला एक भी विद्यालय कहीं न हो यह कितने आश्चर्य और खेद का विषय है। प्राचीन काल में प्रत्येक गुरुकुल इसी शिक्षा का उद्देश्य पूरा करता था। पुस्तकीय ज्ञान तो उतना ही रहता था जितना सामान्य जीवन में काम आवे शेष तो वहाँ सब कुछ वही सिखाया-पढ़ाया जाता था। जिसके आधार पर मनुष्य अपनी प्रत्येक समस्या को सुलझाने, प्रत्येक कठिनाई का पार करने और प्रत्येक परिस्थिति में आगे बढ़ने में सफल हो सके। आज उस प्रकार की शिक्षा का कोई प्रबन्ध कहीं भी न होने से मानव जाति की कितनी बड़ी हानि हो रही हैं इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
राष्ट्र-निर्माण के लिए जैसा समाज बनाना है वह परिवार निर्माण के आधार पर ही तो बनेगा। जिस प्रकार परिवारों के समूह का नाम समाज है, इसी प्रकार व्यक्तियों के समूह को परिवार कहते हैं। परिवार व्यक्तियों के समूह से बनता है। इसलिए व्यक्ति निर्माण से परिवार निर्माण और उससे समाज निर्माण, राष्ट्र-निर्माण या युग-निर्माण का उद्देश्य पूरा हो सकता हैं। व्यक्ति-निर्माण के द्वारा ही हम राष्ट्र-निर्माण के लक्ष तक पहुँच सकते हैं। व्यक्ति-निर्माण के लिए इस प्रकार की शिक्षा-दीक्षा नितान्त आवश्यक है जिसके आधार पर मानव-जीवन का उद्देश्य, गौरव, सदुपयोग एवं व्यवहार समझा जा सके और उसे दैनिक व्यवहार में कैसे उतारा जाय, यह सीखा जा सके। नई पीढ़ी का भारत-निर्माण कर सकने में वे माता-पिता ही समर्थ होंगे जिनने जीवन कला को सीखा समझा होगा। परिवार में ऐसा श्रेष्ठ वातावरण रख सकना इन जीवन-दर्शन के ज्ञाता दंपत्ति के लिए ही संभव होगा जिसमें पले हुए बालक युग-निर्माण एवं महा मानव के रूप में अपना यश अजर अमर रख सकें।
युग-निर्माण का महा अभियान करते हुए हमें संजीवन विद्या की सर्वांगपूर्ण शिक्षा व्यवस्था का प्रबन्ध भी करना ही पड़ेगा। मोटे रूप से इन विषयों की भूमिका मात्र समझा देने से, पर आज की परिस्थितियों में किस व्यक्ति को, कौन आदर्श, किस प्रकार जीवन में उतारना चाहिए इसकी बारीकियाँ जब तक न समझाई जायगी, कार्यान्वित करने के व्यावहारिक तरीके जब तक न समझाये जाएंगे तब तक महानता के मार्ग पर चलने में जो अड़चनें आती हैं उनको सुलझाया न जा सकेगा। इसलिए ऐसे प्रशिक्षण की अनिवार्य आवश्यकता है जिससे व्यक्तिगत जीवन की असंख्य समस्याओं को सुलझाने और प्रगति-पथ पर वस्तुतः बढ़ चलने का मार्ग प्रशस्त हो सके।
हमारे मस्तिष्क में एक ऐसे विश्वविद्यालय की कल्पना है जिसमें चार वर्ष का पाठ्यक्रम हो। उसमें मानव-जीवन की प्रत्येक कठिनाई को हल करने और हर परिस्थिति के व्यक्ति को अपने ढंग से आगे बढ़ने के लिए जो भी मार्गदर्शन आवश्यक हो, वह सब उस अवधि में सिखा दिया जाय। बिगड़े हुए स्वास्थ्य को कैसे सुधारा जाय और सुधारे स्वास्थ्य को कैसे बढ़ाया जाय इस सम्बन्ध में शरीर की भीतरी और बाहरी जानकारी चिकित्सा, परिचर्या, आहार, व्यायाम आदि प्रत्येक स्थिति के उपयुक्त परिपूर्ण जानकारी कराई जाय। खेल-कूद, शस्त्र संचालन, तैरना, घुड़सवारी आदि सभी बातें उस शिक्षार्थी को भली-भाँति अभ्यास में रहनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए चिन्ता, भय, निराशा, शील, आवेश, उत्तेजना, ईर्ष्या, कुढ़न, अहंकार आदि कुविचारों से बचने और यदि वे अभ्यास में आ गये हों तो उन्हें किस प्रकार हटाया जाय इसी मनोविज्ञान के अनुरूप ऐसी विधियाँ बताई जायं जिससे मानसिक दुर्गुणों को सरलतापूर्वक समाधान हो सके। इसी प्रकार स्वभाव में मधुरता, सहनशीलता नम्रता, सज्जनता का समावेश कैसे हो और आशा, उत्साह, साहस, धैर्य, दूरदर्शिता, उदारता, संयम, नियमितता जैसे श्रेष्ठ गुण कैसे अभ्यास में आवें इसका क्रियात्मक साधन कराके शिक्षार्थी को इस योग्य बनाया जाय कि उसे मनस्वी एवं श्रेष्ठ पुरुषों की श्रेणी पुरुषों की श्रेणी में गिना जा सके।
इन्द्रियाँ जहाँ हमारे लिए अभिन्न मित्र हैं, वहाँ असंयत होने पर वे शत्रु का रूप धारण कर लेती हैं। स्वास्थ्य को नष्ट और मन को उद्विग्न करके मनुष्य को किसी काम का नहीं छोड़ती। असंयत जिह्वा इन्द्री और कामेन्द्री ने कितने होनहारों को धूलि चाटने के लिए विवश कर दिया इसकी बड़ी विषम करुण कथा है। इन्द्रियाँ के उफान को कैसे रोका जाय और संयमी रहकर कैसे तेजस्वी मनस्वी बना जाय उसका उपायों समेत विधान जानकर कोई उस मार्ग पर चले तो गृहस्थ रह कर भी योगी तपस्वियों की तरह शरीर और मन से परिपुष्ट बना जा सके।
समय का वर्गीकरण, विभाजन, दिनचर्या, कार्यक्रम एवं व्यवस्था बनाकर एक-एक क्षण का कैसे सदुपयोग किया जाय, जिससे महापुरुषों की भाँति इन 24 घण्टों में ही इतनी प्रगति की जा सके कि दूसरों को जादू एवं देवी वरदान की तरह प्रतीत हो। हर वस्तु की उचित व्यवस्था रखी जाय तो वह बहुत दिन टिकेगी और सुन्दर रहेगी। धन को बजट बना कर खर्च किया जाय, एक-एक बाई के सदुपयोग का ध्यान रखा जाय तो कम आमदनी में तो बहुत व्यवस्थित सन्तुष्ट एवं विकसित जीवन जिया जा सकता है। फिजूलखर्ची को परले सिरे की मूर्खता मान कर उसे कठोरतापूर्वक रोकना ही बुद्धिमानी है। सफाई सुन्दरता का सबसे सस्ता, सरल और श्रेष्ठ तरीका है। शरीर, वस्त्र, मकान, सामान आदि सभी की स्वच्छ सुन्दर और कलात्मक रखा जाय तो अभिनव आकर्षण इन्हीं अपनी दैनिक वस्तुओं में से फूट पड़ेगा। इन तथ्यों को कई लोग जानते तो हैं पर उन्हें स्वभाव का अंग नहीं बना पाते। चाहते तो हैं कि हम इस प्रकार के बनें पर वैसा हो नहीं पाता। प्रस्तावित विश्वविद्यालय में इन सभी विषयों का मनोविज्ञान, शरीर शास्त्र, समाज शास्त्र, नीति एवं विज्ञान के आधार ऐसा प्रशिक्षण दिया जाय कि व्यक्तित्व को श्रेष्ठ बनाने के मार्ग की बाधाओं को आसानी से हल किया जा सके।
आस्तिकता को भिखमंगापन का आडम्बर रचने की वस्तु न रहने देकर आत्मा को महानात्मा परमात्मा बनने की, नर को नारायण रूप में परिणित करने की प्रचंड प्रक्रिया बनाया जा सकता है। पर आज तो वह उतने विकृत रूप में है कि पूजा पाठ करने वालों की मानसिक एवं अन्य प्रकार की स्थिति और भी गई बीती होती है जब कि होना यह चाहिए था कि उपासना करने वाले का आत्मबल दूर से ही चमकता और वे स्वभावतः दूसरे लोगों की अपेक्षा अधिक उत्कृष्ट दृष्टिगोचर होते। पर वे वैसे होते नहीं इससे यही सिद्ध होता है कि उनकी आस्तिकता असली नहीं नकली है। असली आस्तिकता का स्वरूप और साधन सीखा जा सके, ऐसी शिक्षा को जिस विद्यालय में सिखाया जा सके वह निश्चय ही बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है।
वासना, तृष्णा, आलस्य एवं पाप तापों से मुक्त जीवन ही परलोक में मुक्ति का माध्यम बन सकता है। जिसने उस लोक में अपने लिए स्वर्गीय परिस्थितियां बना ली, उस लोक में वे ही स्वर्ग प्राप्ति के अधिकारी होंगे। देवताओं के अनुग्रह के अधिकारी वे बनेंगे जो देवताओं के अनुमोदित मार्ग पर चल रहे होंगे। ईश्वर की कृपा उन्हें मिलेगी जिन्होंने घट-घट वासी परमात्मा के प्रति अपनी श्रद्धा और सद्भावनाओं का परिचय दिया होगा। उपासना में कर्मकाण्ड नहीं आन्तरिक शुद्धि की प्रधानता मानी जाती है। इन तथ्यों को यदि भली प्रकार समझा जा सके तो परलोक बनाने के इच्छुक, सद्गति पाने के अभिलाषी भ्रम जंजालों से निकल कर उस मार्ग पर चलें जिस पर चलने से वस्तुतः आध्यात्मिक प्रगति का आनन्द मिल सकता है। ऐसा सद्ज्ञान ही किसी को अध्यात्म के प्रत्यक्ष सत्परिणामों से समुचित रीति से लाभान्वित कर पायेगा। इस अभाव की पूर्ति के लिये शास्त्रों और ऋषियों की आदि परम्पराएं जिस विद्यालय में सिखाई जायें उसी से आध्यात्मवाद की सच्ची सेवा बन पड़ेगी।
माता-पिता और वयोवृद्धों का सम्मानपूर्ण परिपालन, भाई-बहिनों के प्रति राम भरत जैसा स्नेह जिस घर में न रहे उसे प्रेत पिशाचों का निवास, श्मशान ही कहा जायेगा। गृहस्थ का स्वर्ग वहीं है जहाँ पति-पत्नी के बीच अटूट विश्वास, स्नेह, सद्भाव रहता है। एक दूसरे के पूरक अंग बनकर रहते हैं और एक दूसरे की त्रुटियों को निबाहते हुए उसे उदारता, क्षमा, सहिष्णुता एवं सहायता की भावना रखते हुए ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने का प्रयत्न करते रहते हैं। जिस घर की अर्थ व्यवस्था पर पत्नी का नियन्त्रण रहता है उस घर से लक्ष्मी कभी विदा नहीं होती। जहाँ मत भेद के कारणों पर खुले जी से विचार विनियम होता रहता है और समस्याओं को सुलझाने के लिए समाधान किये जाते रहते हैं वहाँ न तो मनोमालिन्य रह सकता है और न असन्तोष पनप सकता है। जिन घरों में मुस्कान, विनोद, आशा और उत्साह की धाराएँ चेहरों पर थिरकती रहती हैं वहाँ कोई भी अभाव अखरता नहीं। बालकों का शरीर तो माता-पिता के शरीरों में से बनता ही है साथ ही उनका मन स्वभाव, एवं आदर्श भी बहुत कुछ उन्हीं की मनोभूमि में से बन आता है। पाँच वर्ष की उम्र तक बालक अपने स्वभाव और संस्कारों का आधा भाग परिपक्व कर चुका होता है। उसे यह शिक्षण किसी प्रवचन से नहीं वरन् अभिभावकों के स्वभाव संस्कारों से उपलब्ध होता है। इसलिए विचारशील माता-पिता का कर्तव्य हो जाता है कि वे आहार-विहार पालन-पोषण का व्यावहारिक ज्ञान तो रखें ही साथ ही अपने आपको उन सद्गुणों से सम्पन्न भी करें जिन्हें बालकों में देखने की उनकी इच्छा है। सुसन्तति का निर्माण अपने आप में एक अत्यन्त विशद् गम्भीर और महत्वपूर्ण विकास है। इसकी जानकारी न होने से कुसंस्कारी सन्तान से प्राप्त होने वाले दुःखों को अभिभावक भोगते हैं और अपनी नादानी का पश्चाताप मरते-मरते तक करते रहते हैं। कोई विद्यालय यदि गृहस्थ को स्वर्ग की तरह रचना कर सकने की शिक्षा दे सके तो निःसन्देह उससे पृथ्वी पर स्वर्ग के अवतरण की भूमिका ही प्रस्तुत हो सकती है।
चारों और फैली हुई दृष्टता को सहन नहीं किया जा सकता है। भलमनसाहत को कमजोरी मानकर गुण्डागर्दी और भी पनपती है इसलिए उसके शमन के लिए संघर्ष भी आवश्यक है। सरकार ने कानून, पुलिस, न्यायालय, जेल, फाँसी आदि की व्यवस्था दुष्टता से निपटने के लिए बनाई है पर इतना ही पर्याप्त नहीं, जनता को भी उससे निपटने का संघर्ष करना होता है। अन्यथा वह कानून की पकड़ से बचकर आतंक के सहारे अपनी जड़ जमाये बैठी रहती है। दुष्टता के विरुद्ध संघर्ष का भी, सीमा-शत्रुओं से लड़ने की तरह एक विशेष युद्ध-शास्त्र है जिसमें साम, दाम, दण्ड, भेद के चारों हथियार प्रयोग करने पड़ते हैं। इस युद्ध-विद्या की जानकारी न होने पर गुंडों को परास्त करना कठिन पड़ता है जीवन-विद्या में यह ज्ञान भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसलिए उसका प्रशिक्षण भी आवश्यक है।
ऊपर जिन विषयों की चर्चा की गई है उनके अतिरिक्त भी अनेक विषय ऐसे हैं जिनकी शिक्षा उस व्यक्ति को प्राप्त करनी ही चाहिए जो मनुष्य-जीवन को सार्थक बनाने का इच्छुक हो। ऐसा एक विश्वविद्यालय देश में होना ही चाहिए जो सच्चे मनुष्य, बड़े मनुष्य, महान मनुष्य, सर्वांगपूर्ण मनुष्य बनाने की आवश्यकता पूर्ण कर सके। माना कि आज हर आदमी अपने बच्चों को नौकरी कराने के लिए पढ़ाता है। सरकारी डिग्रियों को ही कुछ मूल्य माना जाता है। फिर भी ऐसे समझदार लोग अभी दुनिया में बाकी हैं जो यह सोचते हैं कि उनका बालक यदि मानवीय गुणों से संपन्न हुआ तो किसी भी प्रकार अपनी आजीविका उनसे अच्छी तरह कमा लेगा जो ग्रेजुएट बनने के बाद तरक्की करते हुए सड़ी-गली जिन्दगी बिताते रहते हैं। फिर कुछ लोग ऐसे भी तो हैं जिनके पास कृषि, उद्योग आदि ऐसे काम मौजूद हैं जिन्हें करते हुए उनके बच्चे सुविधापूर्वक निर्वाह कर सकें। इस प्रकार के लोगों तो यह संजीवनी शिक्षा का प्रशिक्षण अपने बच्चों के लिए उपयोगी समझ ही सकते हैं।
सोचा यह जा रहा है कि 16 से 20 वर्ष तक के किशारों को चार वर्ष तक उपरोक्त शिक्षा दी जाय। यही आयु बनने बिगड़ने की होती है। यह चार वर्ष जो जीवन निर्माण का शिक्षण प्राप्त करके और उसके उपयुक्त वातावरण में रहे हुए बिता लेगा वह अपने परिवार के लिए समस्त समाज के लिए आशा का केन्द्र ही बनकर निकलेगा। 16 वर्ष की आयु में आमतौर से जूनियर हाई-स्कूल मिडिल तक की शिक्षा पूरी हो जाती है। इससे आगे को भाषा, गणित, इतिहास, संस्कृत, अंग्रेजी, साइन्स, व्यापार, कानून, लेखन, भाषण, व्यायाम सामान्य ज्ञान का ऐसा पाठ्यक्रम हो, जो जीवन में काम आने वाले विविध विषयों का इतना ज्ञान करा सके जो वर्तमान बी.ए. स्तर की अपेक्षा कम नहीं वरन् बढ़कर ही हो।
शिक्षा की फीस न हो। खाने-पीने का खर्च छात्र स्वयं उठावें। अनुभवी विद्वान् वानप्रस्थी निःशुल्क रूप से शिक्षा कार्य करें। छात्रों के रहन-सहन और आचार व्यवहार पर सर्वोपरि ध्यान रखा जाय। जीवन-विद्या के हर पहलू पर गहरा अध्ययन करने के बाद शिक्षा क्रम पूरा कर लेने पर यह छात्र बीस वर्ष की आयु में अपने घर का काम सँभालेंगे तो उनसे उनका परिवार एवं कारोबार चमक उठेगा। यदि वे इस विश्वविद्यालय से संबंधित देशव्यापी अगणित विद्यालयों में अध्यापक का कार्य करना चाहेंगे तो भी उनकी आवश्यकता रहेगी ही। इस प्रकार सरकारी डिग्री से वंचित रह जाने पर भी जीवन विद्या विश्वविद्यालय में चार साल तक पढ़े हुए छात्रों का यह शिक्षण निरर्थक गया हुआ न समझा जायगा।
सैद्धान्तिक और व्यावहारिक-थ्योरी और प्रेक्टिस-का सर्वांगपूर्ण पाठ्यक्रम बनाना होगा। उसके लिए ग्रन्थों का चुनाव तथा शिक्षण पद्धति और प्रणाली का निर्माण करने की आवश्यकता होगी। कार्य कठिन है पर उसे किए बिना कोई गति नहीं। सरकार ऐसी प्रणाली आसानी से बना सकती थी पर उससे आज की परिस्थितियों में कुछ विशेष आशा नहीं की जा सकती। फिर यह जरूरी नहीं कि हर कार्य सरकारी ही हो। गैर सरकारी क्षेत्र भी बहुत कुछ कर सकते हैं। संजीवन विद्या की शिक्षा का एक सर्वांगपूर्ण विश्वविद्यालय ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार भी चला सकता है। इसके लिए धन की नहीं भावनाओं की आवश्यकता है। भावनापूर्ण परिजन यदि चाहेंगे तो यह शिक्षण-पद्धति एक स्थान से आरम्भ होकर देश-व्यापी रूप में विस्तृत होकर युग-निर्माण के उपयुक्त वातावरण उत्पन्न करने में सहायक सिद्ध हो सकेगी।
एक-एक महीने के शिक्षण शिविर
युग निर्माण के लिए उपयुक्त शिक्षा देने वाले विश्व विद्यालय की रूप-रेखा पिछले लेख में दी गई है। वह बड़ी विद्यालय की रूप-रेखा पिछले लेख में दी गई है। वह बड़ी चीज है, इसलिए उसकी तैयारी में कुछ समय लग सकता है। फिर वह किशोर छात्रों के ही उपयुक्त हैं। जिनके ऊपर परिवार के संचालन एवं कमाने का उत्तरदायित्व है वे इतने समय तक अपने काम से छुट्टी नहीं पा सकते। ऐसे लोगों के लिए एक महीने के जीवन-विद्या शिविरों की योजना बनाई गई है।
परिवार के प्रत्येक सदस्य को इसके लिए आमंत्रित किया जायगा कि वह अपनी पत्नी समेत एक महीने आकर मथुरा रहे और संक्षिप्त रूप से जीवन के हर पहलू को सुन्दर एवं सुविकसित बनाने का प्रशिक्षण प्राप्त करे। छात्रों को जो बातें विस्तारपूर्वक चार वर्ष में पढ़ाई जायेंगी, उनका साराँश इन शिविर शिक्षार्थियों को चार सप्ताह में बता दिया जायगा। उनके वर्तमान जीवन में जो विकृतियाँ होंगी उनके सम्बन्ध में ऐसे सुझाव दिये जायेंगे जिससे वे भावी जीवन प्रगतिशील एवं शान्तिपूर्वक बिता सकें। पत्नी को साथ लाने की आवश्यकता इसलिये अनुभव की गई है कि अकेला पुरुष पैसे तो कमा सकता है पर गृहस्थ को सुव्यवस्थित नहीं बना सकता इसके लिये पत्नी का सहयोग नितान्त आवश्यक है। शरीर के अवयवों की तरह परिवार के सदस्य भी जीवन के अंग होते हैं, उनकी स्थिति का भी परिवार के सामूहिक स्वरूप पर भारी प्रभाव पड़ता है। पत्नी परिवार की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। निर्माण कार्य में उसका सहयोग सबसे अभीष्ट है। नई पीढ़ी-भावी सन्तानों का निर्माण भी पत्नी के स्वभाव पर ही निर्भर है। इसलिए यह सोचा गया है कि जिनकी पत्नियाँ मथुरा आने के लिए स्थिति में हों वे भी अपने पतियों के साथ आवें और एक महीने यहाँ रह कर अपना पारिवारिक भविष्य निर्माण का आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त करें।
विचार ऐसा किया जा रहा है कि इस वर्ष की प्रथम छमाई में-जून 64 तक युग-निर्माण योजना को व्यवस्थित रूप दे दिया जाय-उसे समुचित रूप से संगठित एवं संचालित कर दिया जाय। उसके बाद जुलाई या अगस्त से यह क्रम चले कि हर महीने की पहली तारीख से 50 परिजन अपनी पत्नियों समेत मथुरा आया करें और एक महीने का शिक्षण पूरा करके वापिस चले जाया करें। इस अवधि में उन्हें गायत्री उपासना, प्राकृतिक चिकित्सा विधि से अपने शरीर शोधन का विशेष लाभ भी मिला करेगा। यह क्रम हर महीने चले तो एक वर्ष में 600 परिजन शिक्षण प्राप्त कर लिया करें। आने वाले पूर्व पत्र व्यवहार करके यह स्वीकृति प्राप्त कर लिया करें कि उन्हें किस महीने आना है। यह निश्चय न किया जाय और चाहे जिस महीने चाहे जितने लोग आते चलें तो एक महीने तक उनके निवास एवं शिक्षण की उचित व्यवस्था न हो सकेगी। स्थान एवं शिक्षकों की स्थिति को ध्यान में रखते हुए ही तो ठीक क्रम बन सकेगा।
यह क्रम किस महीने चलेगा यह आवश्यक तैयारी के बाद अगले किसी अंक में घोषित कर दिया जायगा, पर इतना निश्चित है कि वह इसी वर्ष आरम्भ हो जायगा। अतएव ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों को उसके लिए अभी से तैयारी करनी चाहिए। जो इच्छुक हों वे अपने नाम नोट करा सकते हैं ताकि इस वर्ष में जितने लोगों का शिक्षण सम्भव हो उनमें इन पहले नाम नोट करा लेने वालों को प्राथमिकता दी जा सके।
रजत-जयन्ती -
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को रजत जयन्ती के प्रेरणा पर्व में अपनी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करने के लिए आमंत्रण दिया गया था। प्रसन्नता की बात हैं कि अधिकाँश परिजनों ने सन्तोषजनक उत्साह के साथ उसमें भाग लिया है। जो सज्जन किसी कारणवश दिसम्बर अंक में छपी पंच-सूत्री योजना के अनुसार अभी कोई प्रक्रिया कार्यान्वित नहीं कर सके उनसे भी यह आशा की जा रही है कि अगले दो तीन महीनों के भीतर किसी न किसी रूप में जयन्ती मनाने के माध्यम से युग-निर्माण योजना को व्यापक बनाने के लिए कोई न कोई कदम जरूर उठावेंगे।
पिछले मास रजत-जयन्ती पर जिन्होंने अपनी श्रद्धा, सक्रियता, कर्तव्य परायणता और सद्भावना का परिचय दिया है उन्हें आशा भरी दृष्टि में देखा जा रहा है और उनसे यह आशा की जा रही है कि युग-निर्माण के इस महान यज्ञ में वे आगे भी समय-दान की आहुति निरन्तर देते रहें और अपने सत्प्रयत्न को जयन्ती के अवसर पर प्रकट हुआ सामयिक उफान मात्र न रहने देकर उसे अखण्ड ही बनाये रहें। अखण्ड-ज्योति के प्रति अखण्ड श्रद्धा ही शोभा देगी।
जिन सज्जनों ने भारी प्रयत्न करके अथवा अपने ग्राम में पैसा खर्च करके जिन महानुभावों को अखण्ड-ज्योति का ग्राहक-युग-निर्माण योजना का सदस्य बनाया है, वे आगे वह भी करें कि उनसे मिलने-जुलने की प्रक्रिया क्रमबद्ध रूप से जारी रखें और यह प्रयत्न करते रहें कि वे सज्जन न केवल ध्यानपूर्वक स्वयं ही अखण्ड-ज्योति पढ़ा करें वरन् अपने कुटुम्बियों को भी उसे पढ़ने-सुनने का अवसर दिया करें।
किसी के आग्रह संकोच में लोग पैसे तो दे देते हैं पर पत्रिका पढ़ी नहीं जाती। जिन्हें उपहार में पत्रिका भिजवाई गई है वहाँ भी कई बार ऐसा ही होता है। इसलिए बार-बार मिलते-जुलते रह कर या पत्र लिख कर यह प्रयत्न करना चाहिए कि जिन्हें सदस्य बनाया गया है वे उसे पढ़ने में अभिरुचि लें और अपने संपर्क के दूसरे लोगों को भी उस ज्ञान से लाभान्वित किया करें। एक भी अखण्ड-ज्योति की प्रति ऐसी न हो जिससे कम से कम दस व्यक्तियों ने लाभ न उठाया हो। यह कूड़े-कचरे में पड़ी रहने देने की वस्तु नहीं वरन् युग-निर्माण की प्रेरक अग्नि है जिससे समुचित गर्मी और रोशनी प्राप्त होती रहनी चाहिए।
रजत-जयन्ती पर जिनने अपनी श्रद्धा और तत्परता का परिचय दिया है उनसे विशेष रूप से यह आग्रह है कि वे अपने नगर में ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों से संपर्क स्थापित करके उन्हें पत्रिका ध्यानपूर्वक पढ़ने की प्रेरणा दिया करें। प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ता को अपने जिम्मे कम से कम दस सदस्य तो रखने ही चाहिए और आरम्भ में यह प्रयत्न करना चाहिए कि वे विचारों को पढ़ने में अभिरुचि लें। जिनमें यह रुचि उत्पन्न हो गई उनसे ही यह आशा भी की जा सकेगी कि प्रस्तुत योजना को कार्यान्वित करने के लिए भी कुछ कदम उठा सकेंगे। परिवार की संख्या बढ़ाने का प्रयत्न तो आवश्यक है पर उस बढ़ोतरी की सार्थकता तभी है जब उन विचारों को उनके अन्तःकरण में प्रवेश करने का अवसर मिले। गिनती के बढ़ावे से नहीं कर्मठता के बढ़ाने से ही अभीष्ट पूर्ण हो सकता है।
परिवार के सक्रिय कार्यकर्ताओं को हम अपने दाहिने बायें हाथों की तरह मानेंगे और उन्हें युग-निर्माण के काम से सम्बन्धित करेंगे। प्रत्येक युग-निर्माण से हमें एक ही आशा और एक ही याचना है कि वह इस विचारधारा को लोगों के मनों में प्रवेश करने के लिये जन-संपर्क बढ़ावे और उसके लिये उत्साहपूर्वक समय लगावे। इस प्रक्रिया को अपनाये बिना योजना का पहला कदम एक से दस की परिणित का सफल होना किस प्रकार पूरा हो सकेगा? और यदि इतना भी कार्य इस अगली छमाही में पूरा न हो सका तो जिस आध्यात्मिक नैतिक साँस्कृतिक एवं सामाजिक क्रान्ति के लिये चतुर्मुखी अभियान आरम्भ किया गया है उसमें सफलता कैसे मिलेगी? हमारी प्रबुद्ध चेतना को जागृत रहना चाहिये और अखण्ड-ज्योति की रजत-जयन्ती से जो प्रेरणा ग्रहण की गई है उसे अखण्ड ही रखा जाना चाहिये।
गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग) 10॥)
गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मंत्रों का साधना विधान, आत्म साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ, गायत्री द्वारा वाममार्गी ताँत्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण, गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पंजर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह, गायत्री महामंत्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों का साधना विधान। जप-योग, ऋजु-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नाद-योग, हठ-योग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएं तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
2. गायत्री यज्ञ-विधान (दोनों भाग) 4)
गायत्री यज्ञ का विज्ञान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्र एवं साइन्स के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन एवं गायत्री यज्ञ करने का शास्त्रोक्त पूरा विधि विधान, जिसे समझ कर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है।
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3. गायत्री चित्रावली (दोनों भाग) 3॥)
प्रथम भाग में विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन है और द्वितीय भाग में व्याहृति समेत गायत्री के 26 अक्षरों में सन्निहित 26 महान आदर्शों को 23 श्लोक, 26 लेख एवं 26 आर्ट पेपर पर छपे तिरंगे चित्रों द्वारा समझाया गया है।
4. गायत्री का मन्त्रार्थ मू.1॥)
अनेक ग्रन्थों में, अनेकों ऋषियों द्वारा गायत्री महामंत्र के अनेकों प्रकार से किए हुए अर्थों का संग्रह, राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है।
स्वास्थ्य, सौंदर्य, दीर्घजीवन की पुस्तकें
(प्रत्येक का मूल्य छह-छह आना हैं)
स्वस्थ बनने की विद्या। 2. बिना औषधि के कायाकल्प। 3. दीर्घ जीवन के रहस्य। 4. उन्नति का मूलमंत्र ब्रह्मचर्य। 5. आसन और प्राणायाम। 6. बुद्धि बढ़ाने के उपाय। 7. क्या खायें? क्यों खाये? कैसे खाये? 8. दूध की आश्चर्यजनक शक्ति। 9. तुलसी के अमृतोपम गुण। 10. यौवन चिरस्थायी कैसे हो? 11. पंचतत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण। 12. उपवास के चमत्कार। 13. कब्ज की सरल चिकित्सा। 14. स्त्री रोगों की चिकित्सा। 15. बाल रोगों की चिकित्सा। 16. नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा। 17. घरेलू चिकित्सा विज्ञान। 18. सूर्य चिकित्सा विज्ञान। 19. प्राण चिकित्सा विज्ञान। 20. स्वप्नदोष की चिकित्सा। 21. भोग में योग। 22. पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि। 23. मन चाही सन्तान। 24. मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार।
6 रु. से 10 रु. तक की पुस्तकें मंगाने वाले डाक खर्च) रु. और 3 रु. से 6 रु. तक की पुस्तकें मँगाने वाले डाक खर्च) पुस्तकों के मूल्य समेत पेशगी मनीआर्डर से भेजे।) रु. से अधिक मूल्य की पुस्तकें मंगाने पर डाक खर्च माफ।
मँगाने का पता-”अखण्ड-ज्योति संस्थान” मथुरा।
युगों-युगों से चलता आया, और युगों तब फिर चलना है।
जीवन-मरण नहीं कुछ मरा यह केवल झूठा छलना है।
अर्ध से पूर्व चला हूँ मैं तो, चला चलूँगा ‘इति’ के आगे।
धरा-व्योम क्षिर्ति पर थम जाते, मेरी राह क्षितिज के आगे।
मेरे सम्मुख इस दुनिया की रात और ये प्रात नहीं है।
मैं अनन्त पथ का राही हूं, रुकने की कुछ बात नहीं है।
मेरी मंजिल को न ठिकाना, वह तो मंजिल हीन डगर है।
मुझे मुख का आनक न डर हैं, मेरा अणु-अणु अजर अमर है।
धरती की हर मंजिल मेरे पथ के, रज-कण के समान है।
पारावार नहीं है उसका, वह असोमना मूर्तिमान है।
मेरे आगे काल-व्याल का चल सकता उत्पात नहीं है।
मैं अनन्त पथ की राही हूं, रुकने की कुछ बात नहीं है।
मेरे एक चरण में जाने कितनी मंजिल तय हो जाती।
लक्ष-लक्ष में चरण चल चुका, क्या उनकी गणना हो पाती।
हार गया नक्षत्र लोक भी, लगा-लगा अनगिनत चक्कर।
क्या शताब्दियाँ गिनूँ कल्प भी जब बन गए मील के पत्थर।
नहीं बाँध सकते युग मुझको उनकी कुछ ओ बात नहीं हैं।
मैं अनन्त पथ का राही हूँ, रुकने की कुछ नहीं है।
मेरे आगे आदि अन्त ने कितने खेल तमाशे खेले
लगे और उठ गए यहाँ से कई सभ्यताओं के मेले।
मैंने देखी हैं मानवता पशुता को भी लज्जित करते।
और कही देखा है उसको दिंडडडड भव्य भाव को भरते।
यह तो नियति-चक्र की गति है, कहीं दिवस है रात, कही है।
मैं अनन्त पथ का राही हूँ, रुकने की कुछ बात नहीं है।
पल-छिप धूप-छाँह के सम ही रहे जमाने बनते मिटते।
राम-कृष्ण के अवतारों को देखा अन्तिम बड़ियाँ गिनते।
बुद्ध, मुहम्मद, ईसा सबको मैंने आते-जाते देखा।
कोई नहीं बचा आखिर में, बचा हुआ हैं केवल लेखा।
दृष्टा बन कर देखा करता, कहीं हर्ष संघात कहीं हैं।
मैं अनन्त पथ का राही हूँ, रुकने की कुछ बात नहीं है।
-डॉ. राजकुमार पाण्डेय ‘कुमार’
*समाप्त*