एक आँखों से अंधा व्यक्ति हाथ में लालटेन लिए अंधेरी रात में रास्ते के निकट एक बड़े खड्ड के पास खड़ा था। और चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था- भाइयो, सामने बड़ा खड्ड है। बचते हुए इधर से निकलना।
उधर से निकलने वाले एक राहगीर ने पूछा- सूरदास, तुम्हें खुद तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता। फिर दूसरों को इस तरह रास्ता क्यों बता रहे हो?
अन्धे ने कहा मेरी माथे की आँखें ही फूटी हैं। हृदय की आँखें खुली है, जिनसे में दूसरों को आपत्ति में पड़ने का खतरा देखता हूँ और उन्हें बचाने का सामर्थ्य भर प्रयास करता हूँ।
प्राचीन काल के जिन महापुरुषों की छाप हमारे हृदय पर लगी हुई है, उसका कारण उनकी विद्या, प्रतिभा, वाणी या चातुरी नहीं वरन् उनका आदर्श जीवन निर्मल चरित्र, उज्ज्वल लक्ष्य एवं तप त्याग ही है। चरित्रहीन व्यक्ति प्रचार द्वारा क्षणिक भावावेश तो उत्पन्न कर सकते हैं, पर उसका प्रभाव कभी भी स्थायी नहीं हो सकता।
धर्म प्रचार के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने जीवन को आदर्श बना कर दूसरों के सामने अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करें। काम ही सबसे बड़ा प्रचार है। श्रेष्ठ काम करके ही हम दूसरों को श्रेष्ठ बनने के लिए सच्ची और ठोस शिक्षा दे सकते हैं। उपदेशकों की नहीं अब उन आदर्शवादियों की आवश्यकता है जो धर्म कर्तव्यों को अपने जीवन में ओत-प्रोत करते हुए कुछ जनता का व्यावहारिक मार्ग दर्शन कर सकें।
हम आज जहाँ हैं वहीं से आगे बढ़ने का प्रयत्न करें। पूर्णता की ओर चलने की यात्रा आरम्भ करें। दोषों को ढूँढ़ें और उन्हें सुधारें। गुणों का महत्व समझें और उन्हें अपनायें। इस प्रकार आन्तरिक पवित्रता में जितनी कुछ अभिवृद्धि हो सकेगी उतने का भी दूसरों पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा। सन्मार्ग की दिशा में चलने के लिए उठाया हुआ प्रत्येक कदम अपने लिए ही नहीं, समस्त संसार के लिए श्रेयस्कर होता है।
-लोकमान्य तिलक
मानव जीवन को उत्कृष्टता की-पूर्णता की-लक्ष्यप्राप्ति की अन्तिम मंजिल तक पहुँचाने का एक मात्र उपाय अध्यात्म ही है। इससे लोक और परलोक की सार्थकता सुनिश्चित होती है। परलोक में स्वर्ग और मुक्ति, का लाभ उसे ही मिलता है जो अपने अन्तःकरण को आध्यात्मिक आदर्शों के अनुरूप ढाल लेने में सफल होता है। आत्म साक्षात्कार, ईश्वर-दर्शन एवं ब्रह्म प्राप्ति, की उपलब्धि का एक ही मार्ग है कि आत्मा पर चढ़े मल आवरण विक्षेपों को हटा कर उसे शुद्ध स्वरूप में विकसित किया जाय। लौकिक जीवन का प्रत्येक क्षेत्र उसी के लिए मंगलमय बनता है जिसने अपने गुण कर्म स्वभाव एवं दृष्टिकोण को परिष्कृत कर लिया है। श्रेय पथ पर चलने वाले लोग ही महापुरुष बनते हैं और इतिहास में अपना अनुकरणीय आदर्श छोड़ जाते हैं। यश-शरीर को अमर बनाने का सौभाग्य ऐसे ही लोगों को मिलता है।
सुदृढ़ स्वास्थ्य, समर्थ मन, स्नेह सहयोग, क्रिया कौशल, समुचित धन, सुदृढ़ दाम्पत्य, सुसंस्कृत सन्तान, प्रगतिशील विकास-क्रम, श्रद्धा सम्मान, सुव्यवस्थित एवं सन्तुष्ट जीवन का आधार केवल एक ही है- अध्यात्म। अपने को सुधारने से संसार सुधर जाता है। अपने को ठीक कर लेने से चारों ओर का वातावरण ठीक बनने में देर नहीं लगती। यह एक निश्चित तथ्य है कि जो अपने को सुधार न सका, अपने प्रति विधि को सुव्यवस्थित न कर सका, उसका इहलौकिक और पारलौकिक भविष्य अन्धकारमय ही बना रहेगा जो इस लोक को नहीं संभाल सका उसको परलोक क्या संभलेगा, जो इस जीवन में नारकीय मनोभूमि लिये बैठा है उसे परलोक में स्वर्ग मिलेगा ऐसी आशा करना व्यर्थ है। स्वर्ग की रचना इसी जीवन में करनी पड़ती है, दुष्प्रवृत्तियों के भव बन्धनों से इसी जीवन में मुक्त होना पड़ता है। परलोक में यही सफलताएं साकार बन जाती हैं। इसलिए मनीषियों ने मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमता उसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति को ही माना है।
आज सच कुछ औंधा और विकृत हो रहा है। अध्यात्म की भी कम दुर्गति नहीं हो रही है। अनात्मवादी, मानव-जीवन की पवित्र करने वाली हेय मान्यताएं अध्यात्म का आचरण ओढ़े बैठी हैं, जो कोई उनके चंगुल में फंस जाता है उसी की दुर्गति होती है। जीवन के क्रमिक विकास का सुनिश्चित मार्ग छोड़ कर भाग खड़े होते हैं। अस्त व्यस्त जीवन, नशेबाजी, आलस, प्रमाद, विचित्र वेश-विन्यास, संसार को मिथ्या कहने का फैशन यही आज के अध्यात्मवादी महात्माओं का स्वरूप है। जो उनके चंगुल में फँस जाता है उसे भी वही छूत लगा देते हैं। गृहस्थों का अध्यात्म और भी विलक्षण है, वे किसी मन्त्र-तन्त्र की दस पाँच माला फेर कर लाखों करोड़ों रुपये मूल्य के वरदान पाने के लिए देवताओं की मनौती मनाते रहते हैं। दर्शन, स्नान, कथा-वार्ता जैसे छोटे-छोटे कर्म-काण्डों द्वारा जन्म भर के किये पापों के दंड से बच निकलने की तरकीब ढूँढ़ते रहते है। उनके लिए स्वर्ग मुक्ति एक बाल-कल्पना मात्र होती है, जो छोटा-सा कर्म-काण्ड कर लेने मात्र में सहज ही मिल जाती है। इन भोले लोगों को ऐसे ही प्रलोभन देकर तथाकथित धर्मध्वजी ठगते खाते रहते हैं।
इस प्रवंचना में आज लाखों व्यक्ति भटक रहे हैं। उन्हें लाभ तो मिलना ही क्या था, धन और समय की बर्बादी ही हो सकती थी सो होती रहती है। कागज के बने नकली शेर से मनोरंजन मात्र हो सकता है असली सिंह के गुण उसमें कहाँ होते हैं? असली अध्यात्म के द्वारा लोक और परलोक का जो मंगलमय प्रतिफल मिल सकता था वह इस विकृत, औंधे एवं नकली अध्यात्म के द्वारा कैसे सम्भव हो सकता है? इस मार्ग पर चलने वालों की असफलता को देखते हुए सर्वसाधारण के मन में उसकी ओर से विरक्ति, उपेक्षा एवं अनास्था पैदा हो रही है। अब धर्म और अध्यात्म की चर्चा को नाक भौं सकोड़ते हुए ही सुना जाता है। हर समझदार व्यक्ति अपने बच्चों को उससे दूर रखने का प्रयत्न करता है ताकि वे भी इस भ्रम जंजाल में फँसकर अपना भविष्य अन्धकारमय न बनाने लगे।
प्राचीन काल में ऐसी बात न थी। लोग अपने छोटे बालकों को ऋषियों के आश्रमों में पढ़ने के लिए इसलिए भर्ती करते थे कि अध्यात्म का पारस स्पर्श करके उन लोहे जैसे बालकों को शोभायमान स्वर्ण बनने का अवसर मिलेगा। आग के संपर्क में आने वाले मनुष्यों को भी तेजस्वी, मनस्वी, और यशस्वी होना स्वाभाविक है। जीवन की दिशा ठीक कर देने और उसे परिष्कृत दृष्टिकोण से जिन्दगी जीने की प्रशंसा प्रेरणा का नाम ही तो अध्यात्म है। जिसे यह कल्पवृक्ष मिल गया उसे किसी बात की कमी नहीं रहती। जिसने इस अमृत को पा लिया उसे किसी अतृप्ति का कष्ट नहीं सहना पड़ता। अध्यात्म का प्रकाश जिसके भी हृदय से प्रकाशवान् हो उठा उसके चेहरे पर सन्तोष, उल्लास आशा एवं श्रेष्ठता की किरणें निश्चित रूप से बिखरी पड़ी होंगी। शोक सन्ताप उसे छू भी न गये होंगे। उसके जीवन का प्रत्येक क्षेत्र सुविकसित बन रहा होगा। वाणी तथा क्रिया में श्रेष्ठता टपक रही होगी और उसका व्यक्तित्व अपनी उत्कृष्टता से दूसरे अनेकों को बल एवं प्रकाश प्रदान कर रहा होगा।
असली अध्यात्म का स्वरूप आज लुप्तप्राय बन चुका है। जिसने अपने जीवन में आध्यात्मिक आदर्शों को उतारा हो ऐसे मनीषी ढूँढ़े नहीं मिलते। धर्म ग्रन्थ पढ़ने सुनने की कथा वार्ता एवं पूजा-पाठ की वस्तु बन गये हैं उनमें जिस जीवन निर्माण का बिखरा हुआ प्रशिक्षण है उसे आज की स्थिति के अनुरूप किस प्रकार कर्म रूप से परिणत किया जाय? उसके द्वारा प्राप्त होने वाली सफलताओं को प्रत्यक्ष करके कैसे लोगों को उस महत्ता के लिए प्रभावित एवं आकर्षित किया जाय इसका कोई विधान सामने नहीं है। प्राचीन काल की भाँति आज भी अध्यात्म को अपना कर मनुष्य अपने व्यक्तिगत और सामूहिक जीवन को सुविकसित बना सकता है, उसकी कोई प्रत्यक्ष प्रक्रिया कहीं भी दृष्टि गोचर नहीं होती। बातूनी प्रतिपादन अब किसी के गले नहीं उतरते क्योंकि अध्यात्म के नाम पर अत्युक्तिपूर्ण बातें इतनी अधिक कहीं जा चुकी हैं कि उन पर विश्वास करने का सहसा किसी को भी साहस नहीं होता।
इस अभाव की पूर्ति की जानी चाहिए। अध्यात्म को अपनाने से लौकिक जीवन कितना सफल और समुन्नत हो सकता है इसे व्यवहार से प्रत्यक्ष करके, दिखाया जाय तभी इस महान् विज्ञान की उपयोगिता लोग समझ सकेंगे और उसे अपनाने के लिए उत्साहपूर्णता अग्रसर हो सकेंगे।
आर्य मान्यताओं के अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप क्या है और उसे पूजा-पाठ तक सीमित न रखकर मस्तिष्क की प्रत्येक विचारणा और क्रिया की प्रत्येक हलचल में कैसे ओत-प्रोत किया जाय जिससे मानव-जीवन स्वर्गीय विभूतियों से भरा पूरा दिखाई देने लगे, यह प्रत्यक्षवाद के माध्यम में सिखाया समझाया जाना चाहिए। इसके बिना यह अवस्था मिट न सकेगी जिसके कारण लोग इस महान् तत्वज्ञान को निरुपयोगी समझ कर उससे दूर हटते चले जा रहे हैं।
जिस प्रकार हम देश-व्यापी अन्य समस्त विकृतियों के परिशोधन और अभावों की पूर्ति के लिए अनेकों प्रयत्न कर रहे हैं उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि अध्यात्मवाद के वर्तमान विकृत स्वरूप को हटा कर आर्ष अध्यात्मवाद का उज्ज्वल स्वरूप सर्व साधारण के सम्मुख प्रस्तुत किया जाय। निस्संदेह यह एक कठिन कार्य है। क्योंकि पिछले एक हजार वर्ष के अन्धकार युग में विदेशी षड़यन्त्र के अंग बन कर लोगों ने अध्यात्म के नाम इतना कूड़ा-कचरा जमा कर दिया है, जिसके नीचे हमारा प्राचीन आदर्श और प्रबुद्ध दर्शन एक प्रकार से दब ही गया है। भाग्यवाद, पलायनवाद, निराशावाद, उपेक्षावाद, पराधीनतावाद, अकर्मण्यतावाद, दीनता और जो कुछ बुरे-से-बुरा हो रहा हो, उसे ईश्वर इच्छा मान कर सहना-करना यही मुख्यतया अध्यात्मवाद के नाम पर कहा सुना गया है।
क्षण भंगुरता, पग-पग पर मौत का भय दिखाकर व्यक्तिगत और सामूहिक कर्तव्यों को माया बता कर सब कुछ छोड़कर भजन करने की ही शिक्षा दी गई है। सुधार संघर्ष और सेवा कार्यों को अहंकार बताया गया है और कहा गया है कि यह कार्य मनुष्य नहीं ईश्वर ही कर सकता है। इस प्रकार के विचारों के पीछे विदेशी शासकों के अत्याचारों को सन्तोषपूर्वक सहने की मनोभूमि प्रस्तुत करना ही एक मात्र उद्देश्य था। भावनाशील व्यक्तियों को उपेक्षावादी एकान्त सेवी बनाकर ही तो जनता को नेतृत्व विहीन किया जा सकता था। जरा-जरा से छोटे-छोटे कर्म काण्ड करके पापों के फल से बच निकलने का प्रलोभन देकर जातीय जीवन में दुश्चरित्रता का प्रवेश हो सकता है और इसी प्रकार तो कोई जाति सामूहिक रूप से निस्तेज की जा सकती थी। एक ओर तलवार से और दूसरी और इस पलायनवादी दर्शन से भारतीय समाज को निरस्त किया गया। तभी तो इतने लम्बे समय तक इतने बड़े जन समूह पर मुट्ठी भर लोग इतना नृशंस शासन कर सकने में समर्थ हुए।
तथाकथित धर्माचार्यों को, सन्त-महन्तों को इन्हीं दिनों पौ बारह करने का अवसर मिले। हर एक चतुर साधू बाबाजी ने अपने नाम के सम्प्रदाय खड़े किये और अपनी सिद्ध चमत्कारों की किम्वदन्तियाँ फैलाईं। आश्चर्य यह होता है कि इन सिद्ध चमत्कारी सन्तों से किसी ने यह न कहा कि आप इतने सामर्थ्यवान हैं तो इस अत्याचारी शासन से छुटकारे का प्रबन्ध तो कर दीजिए। उन दिनों भोली जनता बुरी तरह दिग्भ्रान्त होती रही और अगणित प्रकार के अनात्मवादी विचारों को अध्यात्म के नाम पर गले उतारती रही। आज भी परम्पराओं की दुहाई देकर इसी अन्धकार युग की भ्रांतियों को अध्यात्म माना जा रहा है। जुआ, सट्टा, बताने वाले, नशेबाज बाबाजी और मुफ्त का माल लूटने को लालची, अन्ध-विश्वासी आज भी अन्धे-कोढ़ी की जोड़ी बने बैठे हैं और जहाँ-तहाँ उन्हीं के लाभ पर अध्यात्मवाद की कूड़ा गाड़ी लुढ़क रही है।
यह स्थिति निश्चित रूप से बदली जानी चाहिए। हमें उस प्रबुद्ध अध्यात्म की जानकारी जन साधारण को करानी चाहिए जिसके स्पर्श मात्र से लोहे को पारस छूने के समान प्रतिक्रिया होती है। सच्ची अध्यात्म की मान्यताएं और भावनाएं मनुष्य में यदि थोड़ी सी भी प्रवेश कर सकें तो वह निश्चित रूप से संयमी, सदाचारी, प्रसन्न चित्त, निर्भय, उदार और सद्गुणी बनेगा। जिसमें इन गुणों का प्रवेश हो सका वह जीवन के हर क्षेत्र में प्रगति करेगा और प्रस्तुत कठिनाइयों में से प्रत्येक को अपने पुरुषार्थ द्वारा परास्त करके निज की तथा समाज की सुख शान्ति की सम्भावना अनेक गुनी बढ़ा सकने में समर्थ होगा। भारतीय व्यक्तित्व का स्तर और अपने समाज का स्तर ऊँचा उठाने के लिए अध्यात्म की मान्यताओं को गहराई तक जन मानस में उतार देना ही एक मात्र उपाय हो सकता है। इससे पूर्व वर्तमान विकृतियों का परिशोधन कर आर्ष अध्यात्म का उज्ज्वल स्वरूप निखार कर लोगों के समाने रखना होगा। प्राचीन धर्म शास्त्र में यह सब कुछ मौजूद है पर आवश्यकता इस बात की है कि उसे सुव्यवस्थित रूप से क्रमबद्ध किया जाय, जिससे सर्व साधारण के लिए उसकी उपयोगिता को समझ सकना सम्भव हो सके। साथ ही उसका प्रत्यक्ष स्वरूप भी प्रस्तुत करना होगा। आर्ष अध्यात्म के प्रशिक्षण प्रचार को व्यावहारिक स्वरूप देने बाते रचनात्मक कार्यों की व्यवस्था करनी होगी। अध्यात्म तत्व ज्ञान की सेवा में ऋषियों के सारे जीवन लगते थे, वे जानते थे कि मानव-कल्याण का यही एक मात्र उपाय है। आज यदि हम में से भी कुछ लोग वर्तमान दुरवस्था को सुधारने और आर्ष अध्यात्म को समुज्ज्वल रूप में प्रस्तुत करने के लिए कुछ करने को कटिबद्ध हो सकें तो निश्चय ही देश, धर्म, समाज और संस्कृति की भारी सेवा सम्भव हो सकेगी।
रावण मरा हुआ युद्ध भूमि में पड़ा था। उसके मृत शरीर को देखने लक्ष्मण जी गये और लौटकर आने पर उनने बताया कि रावण के शरीर में असंख्यों छिद्र हो रहे थे। छलनी की तरह वह छिदा पड़ा था।
इतने छेद क्यों कर हुए? दल के वानरों ने पूछा तो लक्ष्मण इतना ही कह सके कि राम के तीरों की बाण वर्षा से ही ऐसा होना सम्भव हुआ होगा।
राम मुस्कराये। उनने कहा-तीरों ने नहीं दुर्गुणों ने उसके शरीर को छेदा, और यह महा बलशाली योद्धा अपने पापों के फलस्वरूप मर गया। हे लक्ष्मण! न शस्त्र किसी को मारते हैं और न शत्रु। मनुष्य अपने दुर्गुणों से जर्जर होता रहता है और पाप का घड़ा भर जाने पर स्वयं ही नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।
जीवन का सदुपयोग कर सकना मानवीय बुद्धिमत्ता एवं दूर-दर्शिता का सबसे बड़ा प्रमाण है। जिसने इस सुर-दुर्लभ मानव-जीवन का ठीक उपयोग कर लिया, उसका समुचित लाभ उठा लिया वह आन्तरिक दृष्टि से निरन्तर संतुष्ट और प्रसन्न रहता है। बाह्य-जीवन में उसे दूसरों का सम्मान, सहयोग एवं स्नेह मिलता है तथा सद्गुणों के फलस्वरूप सुख-साधनों की भी कमी नहीं रहती। मनुष्य-जन्म ऐसा अलभ्य अवसर है जो कठिनाई से ही मिलता है। उसे अस्त-व्यस्त रीति से गंवा देने को नादानी ही कहा जायगा।
बुद्धिमत्ता और पूर्णता की कसौटी दुनिया की दृष्टि में धन और पद को माना जाता है। जिसने जितना कमा लिया, जिसको जितना बड़प्पन मिला वह उतना ही चतुर कहलाता है। पर विचार करने से यह मापदण्ड सर्वथा अनुपयुक्त एवं भ्रमपूर्ण सिद्ध होता है। अनीति से कोई दुष्ट व्यक्ति भी धनवान हो सकता है और धूर्तता से भी बड़प्पन पाप जा सकता है। अमीर बाप का अयोग्य बेटा भी प्रचुर सम्पत्ति का अधिकारी हो सकता है। लाटरी आ जाने पर कोई हीन स्तर का व्यक्ति भी समृद्ध कहला सकता है अथवा कोई सज्जन, सद्गुणी व्यक्ति परिस्थितिवश गिरी दशा में पड़ा रह सकता है। इससे बुद्धिमत्ता की परख कहाँ हुई? संयोगवश मिली हुई सफलता-असफलताओं से किसी व्यक्ति का बौद्धिक स्तर नापा जाना किसी भी प्रकार उचित नहीं कहा जा सकता।
बुद्धिमत्ता की सबसे बड़ी बात यह है कि मनुष्य अपने जीवन का उद्देश्य और लक्ष्य समझे और उसे प्राप्त करने के लिये गंभीरतापूर्वक सोचे एवं साहस के साथ कदम उठाए। इस दिशा में समुचित विचारणा, भावना, प्रेरणा एवं गति प्राप्त हो सके इसलिये अध्यात्म ज्ञान को सुनना, समझना आवश्यक होता है। आत्म-शास्त्र की रचना इसी उद्देश्य से हुई है। अपनी मानसिक और शारीरिक गतिविधियों की समुचित समीक्षा कर सकने, अपने गुण दोषों को पूरी तरह जान सकने, दोषों को हटाने और गुणों को बढ़ाने में तत्पर हो सकने की प्रवृत्ति आध्यात्मिक विचारधारा से ही प्राप्त होती है। इसलिए इस सद्ज्ञान एवं तत्व-ज्ञान को जान लेने से जीवन सार्थक एवं सरल बन जाता है। ऋषियों ने सद्ज्ञान को ही जीवनमुक्ति का आधार माना है।
तत्वज्ञान के नाम पर आज निरर्थक कूड़ा, कचरा हमारे सामने आ उपस्थित होता है। किन्हीं देवी देवताओं के अनहोने, कौतूहलपूर्ण चरित्र बच्चों का परी-कथा जैसा मनोरंजन तो कर सकते हैं पर उनमें वह तथ्य कहाँ होते हैं जिनसे मनुष्य जीवन की गूढ़-गुत्थियों को समझने और सुलझाने में सहायता मिल सके। जिन्हें पढ़ने या सुनने मात्र से उद्धार हो सके ऐसी कथा प्रवचनों के भेद भरे महात्म्य हमें सुनने को मिलते हैं किन्तु उन वस्तुओं का अभाव ही रहता है जो जीवन के यथार्थ स्वरूप को बताते हुए उसके सदुपयोग का व्यावहारिक एवं बुद्धिसंगत मार्ग बता सकें। धर्म प्रवचनों का उद्देश्य यही होना चाहिए था पर खेद की बात है कि मूल प्रयोजन की आवश्यकता तनिक भी पूर्ण न करने वाली निरर्थक बातें पढ़ने और सुनने को मिलती हैं। विस्तृत विधि विधान वाले धार्मिक कर्मकाँड तो बताये जाते हैं, पर यह नहीं सुझाया जाता कि हम अपनी मनोवृत्तियों का परिष्कार करते हुए जीवन का सदुपयोग करने के लिये क्या करें? पूजा, पाठ, दान, स्नान, दर्शन, झाँकी के अतिरिक्त जीवन विकास के लिये जिस ज्ञान और विधान की आवश्यकता है उससे सर्वथा रहित होने के कारण आज का तत्व ज्ञान, अध्यात्म एवं कथा प्रवचनों का आयोजन भी निरर्थक आडम्बर का रूप धारण करता चला जा रहा है।
आवश्यकता इस बात की है कि हम मानव जीवन की महत्ता को समझें और उसकी विशेषताओं का सदुपयोग करते हुये भौतिक एवं आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करें। बुद्धिमत्ता का यही सच्चा प्रमाण है। भगवान ने हमें बुद्धि दी है तो उसका उपभोग उस प्रकार ही करना चाहिये जिससे हम वस्तुतः समझदार और सच्चे बुद्धिमान भी कहला सकें।
परमात्मा ने हमारे शरीर में सभी योग्यताएं विशेषताएं और क्षमताएं भर रखी हैं जिनका सदुपयोग करने से अन्तःजगत में शान्ति एवं बाह्य जगत में सुख की संभावनाएं प्रत्यक्ष प्रकट होने लगती हैं। सुख साधन प्राप्त करने के लिए बाह्य जगत में हम जितना श्रम करते हैं उसका एक चौथाई भी यदि हम अन्तःजगत की स्थिति को समझने और सुधारने में लगावें तो उतना बड़ा कार्य हो सकता है जिसके फलस्वरूप समृद्धि और प्रसन्नता की अगणित सम्भावनाएं हाथ बाँध कर आगे आ खड़ी होंगी।
आत्म निर्माण के आधार पर गुण, कर्म, स्वभाव का विकास करते हुए जो प्रगति की जाती है वही स्थिर रहती है और वही निरन्तर अग्रसर होती चली जाती है। चतुरता और परिस्थितियों की अनुकूलता से जो लाभ उठा लिया जाता है वह देर तक ठहरता नहीं। जो परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर समृद्धि लाई थीं वे प्रतिकूल होने पर विपत्ति भी प्रस्तुत कर सकती हैं। पर यदि आधार मजबूत है, मनुष्य अपना व्यक्तित्व सुदृढ़ बना चुका है तो फिर कठिन परिस्थितियाँ भी उसे देर तक विपन्न स्थिति में नहीं रख सकती। अपने सद्गुणों द्वारा वह अपने खोये वैभव एवं सम्मान को पुनः प्राप्त कर लेगा। प्रतिकूल परिस्थितियाँ उन्हें ही दबोच सकती हैं जिनका व्यक्तित्व खोखला है। जिसने अपनी जड़ें गहराई तक जमीन में धँसा रखी हैं वह बरगद का पेड़ बड़े-बड़े आँधी तूफानों को आसानी से सहन कर लेता है। सुसंस्कृत स्वभाव और परिष्कृत व्यक्तित्व के मनुष्य भी संसार की हर प्रतिकूलता से टकरा कर अनुकूलता उपलब्ध कर सकने में समर्थ और सफल होते हैं।
सुख समृद्धि की स्थिति प्राप्त करने के लिए हमें काफी तैयारी करनी पड़ती है। स्वास्थ्य, शिक्षा, मित्रता, धन आदि का संग्रह इसीलिए किया जाता है कि इनके द्वारा उन्नतिशील सुख साधनों को उपलब्ध किया जा सके। पर हम यह भूल जाते हैं कि उनसे भी महत्वपूर्ण माध्यम है-व्यक्तित्व का निर्माण। छिछोरा, बचकाना, अशिष्ट, सतावला एवं अस्त-व्यस्त व्यक्तित्व वाला मनुष्य बाह्य साधनों में चाहे कितना ही सम्पन्न क्यों न हो किसी की दृष्टि में श्रद्धा एवं सम्मान का पात्र न बन सकेगा। सामने न सही पीठ पीछे उसे केवल उपहास एवं भर्त्सना का भाजन ही बनना पड़ेगा। किन्तु सुसंस्कृत, शालीन, सभ्य एवं परिष्कृत दृष्टिकोण वाले व्यक्ति भले ही आर्थिक या अन्य प्रकार की कठिनाइयों में पड़े हो, अपना सम्मान अक्षुण्ण रख रहे होंगे। बादलों में छिपे सूर्य का भी प्रकाश तो फैलता ही है, सज्जनता सम्पन्न मनुष्य भी अपने महत्व को किसी भी परिस्थिति में गिरने नहीं दे सकता।
जीवन का सदुपयोग करने का पहला कदम यह है कि हम अपने व्यक्तित्व को सुधारने, बनाने एवं विकसित करने पर समुचित ध्यान दे। उस साहित्य को पढ़ें जो उस सम्बन्ध में मार्ग दर्शन कर सके, उन प्रवचनों को सुनें जो जीवन विकास के लिए व्यावहारिक मार्ग दर्शन दे सकें, उन लोगों की संगति करें जिनने अपने गुण, कर्म, स्वभाव का सज्जनोचित परिष्कार कर लिया हो। आत्म ज्ञान की प्राप्ति इन उचित माध्यमों से करनी चाहिए। सच्चा अध्यात्म ज्ञान यही है। वह भले ही वेद शास्त्र से सन्त-महात्माओं से प्राप्त होता हो अथवा किसी मामूली पुस्तिका या सामान्य गृहस्थ से, हमें तथ्य को पकड़ना चाहिए। बाह्य परिधान से कुछ बनता बिगड़ता नहीं। सोने की डली चाहे मखमल की डिब्बी में रखकर दी जाय चाहे ढाक के पत्ते में लिपटी हुई हो, उसके मूल्य में कोई अन्तर नहीं आता। सद्ज्ञान वही कहला सकेगा जो हमें व्यक्तित्व सम्पन्न बना सके।
जान लेने के बाद, करना सुगम होता है। अपने दोषों को ढूंढ़ने समझने और उन्हें सुधारने की विधि हमें सीखनी चाहिए। अपने गुणों को पहचानने और उन्हें निरन्तर बढ़ाने की पद्धति का ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए। इसी मार्ग पर चलते हुए जीवन का सदुपयोग कर सकने की प्रक्रिया हाथ लगेगी और यदि आत्म-निर्माण को सर्वोपरि महत्वपूर्ण कार्य समझकर उसे करने के लिए कटिबद्ध होने का साहस मिल गया तो समझना चाहिए कि नरतनु को सार्थकता के लक्ष तक पहुँचाने वाली आधी मंजिल पार हो गई।
निर्माण का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। उत्पादक और निर्माता ही यश, धन और श्रेय प्राप्त कर सकते हैं। सबसे बड़ा उत्पादन अपने गुण, कर्म, स्वभाव के क्षेत्र में उत्कृष्टता को उत्पन्न करना और निर्माणों में सब से बड़ा आत्म-निर्माण ही माना गया है। इस और जिसका ध्यान है, जिसका प्रयत्न इस दिशा में लगा हुआ है वस्तुतः वही सबसे बड़ा बुद्धिमान है। जीवन के सदुपयोग कर सकने का श्रेय उसे ही मिलेगा और उस सफलता के फल स्वरूप प्राप्त होने वाली विभूतियों का अधिकारी भी वही बनेगा।
पुण्य वह कहलाता है जो सदुद्देश्य के लिए निष्काम भाव से किया गया है। उसके मूल में त्याग और बलिदान की वृत्ति रहती है। इस वृत्ति के कारण ही साधारण दीखने वाले काम भी आध्यात्मिक दृष्टि से पुण्य बन जाते हैं और उनका फल आत्म-कल्याण ही नहीं, साँसारिक सुख-शान्ति भी होता है।
जो कार्य साँसारिक लाभ के उद्देश्य से, भौतिक प्रतिफल प्राप्त करने के लिए किये जाय तो वे व्यवसाय बन जाते हैं। बाहर से पुण्य दीखने वाले कार्य भी यदि भौतिक प्रतिफल पाने के उद्देश्य से किये जाय तो उनका पुण्य तत्व नष्ट हो जाता है और वे भी साधारण श्रेणी के कार्यों में गिने जाते हैं।
सकाम और निष्काम उपासना का अन्तर प्रत्यक्ष है। भगवान भावना को पहचानते हैं और उसी के आधार पर भक्त की आराधना का मूल्याँकन करते हैं। कौन खुदगर्जी से मूर्ति के लिए भजन का ढोंग बनाये बैठा है और कौन प्रभु प्रेम से विह्वल होकर आत्म समर्पण की दृष्टि से प्रभु की इच्छा के अनुसार अपनी इच्छाओं को बनाने का प्रयत्न कर रहा है, यह अन्तर भगवान से छिपा नहीं रहता। वे इसी आधार पर पात्र की पात्रता परखते हैं और उसी अनुपात से उस पर अनुग्रह भी करते हैं। शबरी, निषाद, गोपी, सुदामा, आदि साधना-विधान से अपरिचित होने पर भी प्रभु का अनुग्रह प्राप्त कर सके, जब कि विधि विधान के ज्ञाता कर्मकाण्डी ज्ञानी-ध्यानी लोग भी खाली हाथ रहते देखे गये हैं। त्याग और प्रेम का, श्रद्धा और विश्वास का अभाव कठोर से कठोर कर्मकाण्ड को भी निष्प्राण और निर्जीव बना देता है।
कन्या दान को परम पवित्र पुण्य कार्य माना जाता है इसमें उस दान की निस्वार्थता ही प्रधान कारण है। जीवन भर बड़े स्नेह से पाली हुई ममतामयी कन्या को वर के हाथों बिना किसी बदले की आशा करके सौंपा जाता है। कन्या दान देने वाले उसकी ससुराल की कोई वस्तु नहीं खाते। उसके यहाँ के पैसे को किसी काम में नहीं लेते। दानी की निस्वार्थता ही तो दान की श्रेष्ठता को प्रतिपादन करती है। यदि कोई व्यक्ति कन्यादान के बदले में वर से अपनी बेटी की कीमत वसूल कर ले तो उसे सामाजिक प्रथा के अनुसार घृणित माना जाता है। यही बात प्रत्येक सत्कार्य के लिए लागू होती है। निस्वार्थता से ही कोई शुभ कार्य सच्चे अर्थों में शुभ कार्य कहला सकता है।
मनीषियों का कथन है कि पुण्य भले ही थोड़ा किया जाय पर उसमें उच्च भावनाओं का, निस्वार्थता का पूरा समावेश रखा जाय। उसका स्तर गिरने न दिया जाय। व्यवसाय के लिए अनेक क्षेत्र पड़े हुए हैं, उन्हें अपना कर जीवन क्रम चलाया जा सकता है पर पुण्य को तो व्यवसाय नहीं ही बनाना चाहिए। इससे पुण्य की भी श्रेष्ठता नष्ट होती है। ब्राह्मण और संत की महत्ता इसीलिए मानी जाती है कि वे निरन्तर पुण्य परमार्थ के कार्यों में लगे रहते हैं पर उसके बदले में कुछ नहीं चाहते। यदि वे अपने ज्ञान और प्रेम को बाजारू ढंग से बेचें और उसका व्यवसाय करें तो फिर उन्हें किसी की श्रद्धा पाने का कोई अधिकार न रहेगा।
सेवा वृत्ति हमारे स्वभाव का एक अंग होना चाहिए। इसे एक मानवीय कर्त्तव्य माना जाना चाहिए और पुण्य परमार्थ की दृष्टि से ही इसे किया जाना चाहिए। यदि इसके बदले यश की प्रत्युपकार की आशा की जायगी तो सेवा कार्य बन ही न पड़ेगा। जब जहाँ यश मिलता है तब यहाँ थोड़ा-सा सेवा कार्य बन पड़ता है, जब उसमें कमी दीखती है तभी वह उत्साह ठंडा पड़ जाता है। यह पुण्य प्रवृत्ति कहाँ हुई?
बदले का भाव आते ही हर वस्तु व्यावसायिक स्तर की हो जाती है। माता अपने बच्चे को निस्वार्थ प्रेम करती है और अपने रस रक्त से उसे सींचती है इसीलिए उसकी महत्ता सर्वोपरि मानी जाती है। गाय भी बच्चे को दूध पिलाती और उसे खिलाती-दुलारती है, पर उसका वह कार्य प्रतिफल की भावना से किया हुआ होता है। इसलिए उस पाले हुए बच्चे का जो भाव अपनी माता के प्रति होता है वह धाय के प्रति नहीं।
वह पुण्य जो स्वार्थ या लाभ के लिए किया गया है और कुछ भले ही हो पुण्य नहीं हो सकता। जिसका लौकिक लाभ मिल चुका, उससे पारलौकिक प्रयोजन प्राप्त करना चाहते हैं, तो दुहरा प्रयोजन कहाँ सिद्ध होगा? जिस टिकट पर मुहर लग चुकी वह दूसरी बार फिर लिफाफे पर नहीं चिपकाया जा सकता। जिस चेक को एक बार बैंक में भुना लिया गया उसे ही दुबारा भुनाने में सफलता न मिलेगी। कोई ऐसा दुहरा लाभ उठाने की चेष्टा कर रहा होगा तो उसे जालसाज ठहराया जायगा। यह बात सत्कर्मों के ऊपर भी लागू होती है। वाहवाही लूट लेने का लाभ मिल जाने पर वह पुण्य चले हुए कारतूस की तरह अपनी शक्ति और संभावना समाप्त कर चुका होता है।
हमारे सार्वजनिक जीवन में फैले हुए भ्रष्टाचार का कारण उतना धन नहीं जितना मान है। मान पाने के लिए सरकारी और गैर सरकारी संस्थान में नाम के भूखे लोग इतनी धमाचौकड़ी मचाते हैं कि सारा वातावरण ही गंदा हो जाता है। सार्वजनिक संस्थाओं में मंत्री और प्रधान बने जाने के लिए गुटबन्दी और दुरभिसंधि का ऐसा जाल फैलता है कि वह संस्था अपना उद्देश्य और गौरव ही खो बैठती है। हमारे देश की तीन चौथाई सार्वजनिक संस्थाएं इसी रोग से ग्रसित हैं। उनके कार्यकर्ता यदि पद, सत्ता, मान प्रतिष्ठा के फेर में जितना समय और मस्तिष्क लगाते हैं उतना उस मिशन को पूरा करने में लगाते तो न जाने कितना उपयोगी काम हो गया होता।
पूजा प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए कितने ही लोग सन्त महात्मा बनते हैं। कोई-कोई तो शहरों और भीड़ में समाधि लगाने का खेल दिखाते हैं। समाधि के लिए वन, पर्वत उपयुक्त होते हैं। शहरों में, भीड़ में, पैर पुजाने, पैसा बटोरने की समाधि लगाने वाले की क्या आवश्यकता पड़ गई यह बहुत सोचने पर भी कुछ समझ में नहीं आता।
परमार्थ और पुण्य की आकाँक्षा आत्मा की भूख है। उससे तत्काल आत्म सन्तोष मिलता है यह उसका वास्तविक प्रतिफल है। दया, करुणा, सहृदयता, उदारता, स्नेह, सहयोग एवं सेवा भावना को चरितार्थ करने का, बढ़ाने का अवसर पुण्य परमार्थों के द्वारा ही तो मिलता है। सत्कर्म न करें तो सद्विचारों का कोई महत्व ही न रह जायगा। विचारों को जब कर्म का जामा पहनाया जाता है तभी वे संस्कार बनते हैं और आत्मिक प्रगति की व्यवस्था जुटाते हैं, इसलिए मानव-जीवन की सार्थकता का लाभ प्राप्त करने के इच्छुक विचारशील व्यक्ति को अपने जीवन में परमार्थ के लिए समुचित स्थान रखना चाहिए, पर उसे लोकहित, जन कल्याण एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की दृष्टि से निस्वार्थ भाव से ही करना चाहिए और निस्वार्थता में यश कामना के त्याग को भी सम्मिलित रखना चाहिए तभी तो सच्ची सेवा भावना को विकसित होने का अवसर मिलेगा और तभी आत्मसन्तोष का रसास्वादन कर सकना सम्भव होगा।
मरने के बाद अपनी कृतियों के द्वारा नाम अमर कर जाने वाली बात भी मूर्खतापूर्ण है। मान लीजिए आज कानपुर निवासी लाला सोहनलाल एक लाख रुपया लगाकर धर्मशाला बनाते हैं। कुछ दिन बाद उनकी मृत्यु हो जाती है। फिर वे इलाहाबाद में जन्म लेकर रमई कुम्हार बनते हैं। रमई जी से कोई व्यक्ति कानपुर के स्वर्गीय लाला सोहन लाल जी द्वारा बनाई हुई धर्मशाला की चर्चा करता है तो जीवात्मा वही होते हुए भी उसे उस पिछले जीवन के यश से न कोई लाभ होता है और न प्रसन्नता। सोहन लाल नामक शरीर की प्रशंसा होती रहे तो उस जीवात्मा का क्या प्रयोजन सिद्ध हुआ जो आज रमई कुम्हार के शरीर में निवास कर रही है? इसलिए यह सोचना भी अनुपयुक्त है कि अमुक स्थान खड़ा कर जाने से हमारा यश बना रहेगा। जब मरने के बाद ‘हमारे’ की परिभाषा ही बदल जाती है, उसका स्वरूप ही दूसरा बन जाता है तो फिर पिछले जन्म के उस मरणधर्मा शरीर के यश से भी क्या कुछ काम निकला?
उच्चस्तरीय कर्म सदा निःस्वार्थ भाव से ही सम्भव है। लालची और नामवरी का भूखा आदमी उन ठोस कार्यों के सर्वथा अयोग्य ही रहता है जिनके द्वारा देश, धर्म, समाज और संस्कृति की सच्ची सेवा हो सकती है।
विचारों में महान शक्ति है। जिस तरह के हमारे विचार होंगे उसी तरह की हमारी सारी क्रियाएं होंगी और तदनुकूल ही उनका अच्छा बुरा परिणाम हमें भुगतना पड़ेगा। विचारों के पश्चात ही हमारे मन में किसी वस्तु या परिस्थिति की चाह उत्पन्न होती है और तब हम उस दिशा में प्रयत्न करने लगते हैं। जिसकी हम सच्चे दिल से चाह करते हैं, जिसकी प्राप्ति के लिए हम अन्तःकरण से अभिलाषा करते हैं, उस पर यदि दृढ़ निश्चय के साथ कार्य किया जाय, तो उस वस्तु की प्राप्ति अवश्यंभावी है। जिस आदर्श को हमने सच्चे हृदय से अपनाया है, यदि उस पर मनसा वाचाकर्मणा चलने को हम कटिबद्ध हैं, तो हमारी सफलता निःसन्देह है।
जब हम विचार द्वारा किसी वस्तु या परिस्थिति का चित्र मन पर अंकित कर उसके लिए प्रयत्नशील होते हैं, उसी समय से उस पदार्थ के साथ हमारा सम्बन्ध जुड़ना आरम्भ हो जाता है। यदि हम चाहते हैं कि हम दीर्घ काल तक नवयुवा बने रहें, तो हमें चाहिए कि हम सदा अपने मन को यौवन के सुखद विचारों के आनन्द-सागर में लहराते रहें। यदि हम चाहते हैं कि हम सदा सुन्दर बने रहे, हमारे मुख-मण्डल पर सौंदर्य का दिव्य प्रकाश हमेशा झलका करे तो हमें चाहिए कि हम अपनी आत्मा को सौंदर्य के सुमधुर सरोवर में नित्य स्नान कराते रहें।
यदि आपको संसार में महापुरुष बनकर यश प्राप्त करना है, तो आप जिस महापुरुष के सदृश होने की अभिलाषा रखते हैं, उनका आदर्श सदा अपने सामने रक्खें। आप अपने मन में दृढ़ विश्वास जमा लें कि हममें अपने आदर्श की पूर्णता और कार्य सम्पादन शक्ति पर्याप्त मात्रा में मौजूद है। आप अपने मन से सब प्रकार की हीन भावना को हटा दें और मन में कभी निर्बलता, न्यूनता, असमर्थता और असफलता के विचारों को न आने दें। आप अपने आदर्श की पूर्ति हेतु मन, वचन, कर्म से पूर्ण दृढ़तापूर्वक प्रयत्न करें और विश्वास रक्खें कि आपके प्रयत्न अन्ततः सफल होकर रहेंगे।
आशाजनक विचारों में बड़ी विलक्षण शक्ति भरी हुई है। आप इसका अवश्य अनुभव लीजिए। आप यह दृढ़ धारणा बना लीजिए कि हमारी अभिलाषाएँ - यदि वे सात्विक और पवित्र हैं- अवश्य पूर्ण होंगी, हमारे मनोरथ सिद्ध होंगे और हमारे सुख स्वप्न सच्चे साबित होंगे। हमारे लिए जो कुछ होगा, वह अच्छा ही होगा बुरा कभी न होगा। तब आप देखेंगे कि इस तरह के शुभ, दिव्य और आशामय विचारों का आपकी शारीरिक मानसिक, साँसारिक एवं आध्यात्मिक उन्नति पर क्या ही अच्छा असर होता है।
आप अपने हृदय में इस विश्वास की जड़ जमा लें कि जिस कार्य के लिए सृष्टिकर्ता परमात्मा ने हमें बनाया और यहाँ भेजा है, उस कार्य को हम अवश्य पूर्ण करेंगे। इसके विषय में अपने अन्तःकरण में तिल मात्र भी सन्देह को स्थान न दें। आप हमेशा उन्हीं विचारों को अपने मन मन्दिर में प्रवेश करने दें, जो हितकर हैं, कल्याणकारी हैं। उन विचारों को देश निकाला दे दो, जो मन में किसी प्रकार का सम्भ्रम, अविश्वास उत्पन्न करते हों। आप अपने पास उन विचारों को जरा भी न फटकने दें, जो असफलता या निराशा का संकेत मात्र करते हों।
आप चाहे जो काम करें, चाहे जो होना चाहें पर हमेशा उसके बारे में आशापूर्ण, शुभसूचक विचार रखें। ऐसा करने से आप को अपनी कार्य शक्ति बढ़ती हुई मालूम होगी और साथ ही साथ यह भी अनुभव होगा कि हम दिनों दिन प्रगति कर रहे हैं। जहाँ आपने अपने मन मन्दिर में आनन्दप्रद, सौभाग्यशाली और शुभ चित्रों को देखने की आदत बनाली तो फिर इसके विपरीत परिणामकारी आदत बनाना आपके लिए असम्भव हो जायगा।
क्या आप वास्तव में सुख की खोज में हैं? तो आप मन वचन और काया से यह धारणा कर लें कि हमारा भविष्य प्रकाशमान होगा, हम उन्नतिशील और सुखी होंगे, हमें सफलता और विषय एवं सब प्रकार की आनन्दजनक सामग्री प्राप्त होगी। बस, सबसे प्रथम सुविचारों की दिव्य पूँजी लेकर कर्मक्षेत्र में प्रवेश कीजिए और फिर उसके मीठे फल चखिए।
बहुतेरे मनुष्य अपनी इच्छाओं को-अपनी आशामय तरंगों को- जाज्वल्यमान रखने की बजाय उन्हें कमजोर कर डालते हैं। वे इस बात को नहीं जानते कि हमारी अभिलाषाओं की सिद्धि के लिए जितना ही हम दृढ़ भाव, अविचल निश्चय रखेंगे, उतना ही हम उनको सिद्ध कर सकेंगे। कोई बात नहीं यदि हमें अपने कार्य सिद्धि का समय बहुत दीर्घ मालूम होता हो, पर यदि हम सच्चे दिल से उसको प्रत्यक्ष करने के लिए जुट जावेंगे, तो धीरे-धीरे अवश्य ही हम अपने कार्य में सफल हो जावेंगे।
बहुतेरे मनुष्य कहा करते हैं कि भाई! अब हम बूढ़े हो गये, थक गये, बेकाम हो गये। अब हमें परमात्मा बुला ले तो अच्छा हो। वे इस रोने को रोते रहते हैं कि “हम बड़े अभागे हैं, कमनसीब हैं। हमारा भाग्य फूट गया है-दैव हमारे विरुद्ध हैं। हम दीन है, लाचार हैं। हमने जी तोड़ परिश्रम किया, उन्नत होना चाहा पर भाग्य ने हमें सहायता न दी।” पर वे बेचारे इस बात को नहीं जानते कि इस तरह का रोना-रोने से हम अपने हाथ से अपने भाग्य को फोड़ते हैं। उन्नति रूपी चन्द्रिका को काले बादलों से ढाँकते हैं। इस तरह के कुविचार हमारी शान्ति, सुख और सफलता के घोर शत्रु हैं। इन्हें देश निकाला देने में ही कल्याण है। उत्पादक शक्ति का यह एक नियम है कि जिसका हम दृढ़ता पूर्वक चिंतन करते है, वह वस्तु हमें अवश्य प्राप्त होती है। यदि आप इस बात का पक्का विश्वास करें कि हमें आवश्यक सुख सुविधाओं का लाभ होगा, हम समृद्धिशाली होंगे, हम प्रभावशाली होंगे और आप इस दृष्टि से अपना प्रयत्न आरम्भ करेंगे तो आप में इस प्रकार की विलक्षण उत्पादन−शक्ति का उदय होगा जो आपके मनोरथों को सफल करेगी।
बहुत से मनुष्य कहेंगे कि इस तरह के स्वप्नों में डूबे रहने से-कल्पना ही कल्पना में रहने से-हम वास्तव में कुछ भी न कर सकेंगे पर यह उनकी भूल है। हमारे कहने का यह आशय नहीं है कि आप हमेशा कल्पना लोक में ही विचरते रहें, विचार ही विचार में रह जावें, केवल मन ही के लड्डू खाया करें। किन्तु हमारे कहने का आशय यह है कि किसी काम को करने के पहले उस काम को करने की दृढ़ इच्छा मन में कर लें और सारी विचार-शक्ति को उस ओर झुका दें। मन के विचारों को मन ही में लय करके उसको कार्य रूप में परिणित करना अत्यावश्यक है। सब बड़े आदमी जिन्होंने महत्ता प्राप्त की है, वे सब पहले उन सब अभिलषित पदार्थों का स्वप्न ही देखा करते थे। जितनी स्पष्टता, आग्रह एवं उत्साह से उन्होंने अपने सुख-स्वप्न की, आदर्श की सिद्धि के लिए प्रयत्न किया, उतनी ही उन्हें सिद्धि प्राप्त हो सकी।
समृद्धि के अंकुर पहले हमारे मन में ही फूटते हैं और फिर इधर-उधर फैलते हैं। दरिद्रता का भाव रखकर हम समृद्धि को अपने मानसिक क्षेत्र में कैसे आकर्षित कर सकते हैं? क्योंकि इस दुर्भाव के कारण वह वस्तु, जिसकी हम चाह करते हैं एक पैर भी हमारी ओर आगे नहीं बढ़ती। कार्य करना किसी एक चीज के लिए और आशा करना किसी दूसरी की-यह स्थिति बहुत ही सोचनीय है। मनुष्य समृद्धि की चाहे जितनी इच्छा करे, पर दुर्दैव के-गरीबी के विचार समृद्धि के आने के द्वारों को बन्द कर देते हैं। सौभाग्य और समृद्धि, दरिद्रता एवं निरुत्साहपूर्ण विचारों के प्रवाह द्वारा अवरुद्ध होने के कारण आप तक नहीं आ सकते। उन्हें पहले में मानसिक क्षेत्र में उत्पन्न करना चाहिए। यदि हम समृद्धि शाली होना चाहें तो पहले हमें उसके अनुसार अपने विचार बना लेने चाहिएं।
निश्चय कर लो दरिद्रता के विचारों से हम अपने मुँह को मोड़ लेंगे। हम केवल हठाग्रह से समृद्धि की ही आशा रखेंगे, ऐश्वर्य आदर्श ही को अपनी आत्मा में जगह देंगे, जो कि हमारी स्वाभाविक प्रकृति के अनुकूल है। निश्चय कर लो कि हमें सुख-समृद्धि प्राप्त करने में अवश्य सफलता मिलेगी। इस तरह का निश्चय, आशा और अभिलाषा तुम्हें वह पदार्थ प्राप्त करायेगी, जिसकी तुम्हें बड़ी लालसा है। हार्दिक अभिलाषा में अटूट उत्पादक शक्ति भरी है। जीवन में सफलता प्राप्त करना केवल हमारे विचारों की महानता पर निर्भर है। विचार ही हमारे जीवन की आधारशिला है।
शिष्टाचार जीवन का दर्पण है जिसमें हमारे व्यक्तित्व का स्वरूप दिखाई देता है। शिष्टाचार के माध्यम से ही मनुष्य का प्रथम परिचय समाज से होता है। अच्छा या बुरा, दूसरों पर कैसा प्रभाव पड़ता है यह हमारे उस व्यवहार पर निर्भर करता है जो हम दूसरों से करते हैं। शिष्ट व्यवहार का दूसरों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है, दूसरों को सद्भावना आत्मीयता और सहयोग की प्राप्ति होती है। साथ ही समाज में लोकप्रियता बढ़ती है। इसके विपरीत अशिष्ट व्यवहार दूसरों में घृणा, द्वेष, पैदा कर देता है। अशिष्ट व्यक्ति को शायद ही कोई आत्मीय सहयोगी मिलता है। अशिष्टता से अपने भी पराये बन जाते हैं। सहयोगी भी पीछा छुड़ा लेते हैं यहाँ तक कि दूसरे लोग मिलना भी पसन्द नहीं करते। ऐसा है अशिष्टता का अभिशाप जो हमारे व्यक्तित्व के विकास को अवरुद्ध कर देता है साथ ही हमें समाज में अकेला छोड़ देता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मनुष्य में कोई विशेषतायें या आकर्षण न हों फिर भी शिष्ट व्यवहार से सहज ही दूसरों की सद्भावनायें अर्जित की जा सकती हैं जो जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए बड़ी उपयोगी और आवश्यक हैं। शिष्टाचार और सद्व्यवहार के विरोधियों को भी अपना बनाया जा सकता है। यह वह अमृत है जिससे कटुता, विरोध और शत्रुता पिघल जाते हैं।
शिष्टाचार व्यवहार की वह रीति-नीति है जिसमें व्यक्ति और समाज की आन्तरिक सभ्यता और संस्कृति के दर्शन होते हैं। परस्पर बात-चीत, सम्बोधन से लेकर दूसरों की सेवा, त्याग, आदर भावनायें तक शिष्टाचार के अंतर्गत आ जाते हैं। शिष्टाचार हमारे आचरण और व्यवहार का एक नैतिक मापदण्ड है, जिस पर सभ्यता और संस्कृति का भवन निर्माण होता है। एक दूसरे के प्रति सद्भावना, सहानुभूति, सहयोग आदि शिष्टाचार के मूलाधार है। इन मूल भावनाओं से प्रेरित होकर दूसरों के प्रति नम्र, विनय-शील, संयम, आदरपूर्ण उदार आचरण ही शिष्टाचार है।
शिष्टाचार का क्षेत्र उतना ही व्यापक है जितना हमारे जीवन-व्यवहार का। समाज में जहाँ-जहाँ भी हमारा दूसरे व्यक्ति से संपर्क होता है, वहीं शिष्टाचार की आवश्यकता पड़ती है। घर में परिवार के छोटे से लेकर बड़े सदस्यों के साथ, सभी जगह तो हमें शिष्टाचार की आवश्यकता पड़ती है, जहाँ तक एक से अधिक व्यक्तियों का संपर्क हो वहीं शिष्टाचार की अपेक्षा रहती है। हमारा सम्पूर्ण जीवन, कार्य व्यापार, मिलना-जुलना, सभी में शिष्ट व्यवहार की आवश्यकता पड़ती है।
सद्व्यवहार, सदाचार आदि शिष्टाचार के ही अंग है। शिष्टाचारी मन वचन कर्म से किसी को हानि नहीं पहुँचाता। वह दुर्वचन कभी नहीं बोलता। न मन से किसी का बुरा चाहता है। जिससे किसी का दिल दुखे ऐसा कार्य भी वह नहीं करता। विनय और मधुरतायुक्त व्यवहार ही उसके जीवन का अंग होता है। किसी भी तरह के अभिमान की शिष्टाचार में गुँजाइश नहीं रहती। नम्रता, विनय, शील, आदि सद्गुण शिष्टाचार के आधार हैं। इतना ही नहीं शिष्टाचारी की सम्पदा, समृद्धि बढ़ने के साथ ही उसकी निरभिमानता, और नम्रता, विनयशीलता बढ़ती जाती है। जिस तरह फलों के बोझ से वृक्ष नीचे झुक जाते हैं, उसी तरह ऐसे व्यक्तियों की लौकिक सम्पदायें ऐश्वर्य के बढ़ने पर भी नम्रता और विनयशीलता बढ़ जाती है।
शिष्टाचार एक ऐसा सद्गुण है जिसे अभ्यास और आचरण द्वारा प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए किन्हीं विशेष परिस्थितियों या उच्च खानदान में जन्म लेने की आवश्यकता नहीं। किसी भी स्थिति का व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक शिष्टाचार का अभ्यास जीवन में ढाल सकता है। इसके लिए संवेदन-शीलता, हृदय की कोमलता अत्यावश्यक है। ऐसे व्यक्ति का अपने व्यवहार और जीवन क्रम में छोटी-छोटी बातों पर भी ध्यान रहता है जिससे दूसरों को कोई दुःख महसूस न हो। किसी का दिल न दुखे। शिष्टाचार में दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना आवश्यक है।
स्मरण रहे शिष्टाचार का सम्बन्ध मनुष्य के हृदय से है। वह आत्म-रंजन का माध्यम है। इसका आधार आत्मिक सौजन्य है। कृत्रिमता का शिष्टाचार में तनिक भी स्थान नहीं है। बनावटीपन से एक दूसरे का आत्म-रंजन नहीं होता और यह एक मशीनवत् रूखी प्रक्रिया मात्र बनकर रह जाता है। इस तरह का कृत्रिम शिष्टाचार सीधे, भोले-भाले व्यक्तियों को प्रभावित कर उनसे अपना उल्लू सीधा करने के लिए उपयोग में लाया जाता है। आजकल के तथाकथित सभ्य और पढ़े लिखे समाज में इसी तरह का कृत्रिम शिष्टाचार बढ़ता जा रहा है जिसमें एक दूसरे के हृदय पर मिलन ही नहीं हो पाता और यह एक निर्जीव प्रक्रिया मात्र बनकर रह जाता है। शिष्टाचार आत्मा की अभिव्यक्ति है। जिस शिष्टाचार में हमारा हृदय नहीं उमड़ता, जिसमें आत्मा दूसरों से ऐक्य प्राप्त करने के लिए मचल नहीं उठती, जिससे एक दूसरे में प्रसन्नता, आनन्द, सुख की लहरें नहीं उठती वह शिष्टाचार व्यर्थ है एक दूसरे के लिए धोखा है और तथाकथित चालाकी, कूट नीति या छल का ही एक अंग है। इसे छोड़कर हमें जीवन में सच्चे, आत्म प्रेरित शिष्टाचार को स्थान देना चाहिए।
अकृत्यं नैव कर्तव्यं प्राण त्यागेऽप्यु परिस्थते।
न च कृत्यं परित्याज्यमेष धर्मः सनातनः।
चाहे मृत्यु सामने आ जाय, अकृत्य कभी न करें और मृत्यु का सामना करते हुये भी सत्कार्य करते रहना चाहिये, यही सनातन धर्म है।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षतिः।
तस्माद्धर्मो त हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीन॥
धर्म का निरादर करने वाला स्वयं नष्ट हो जाता है और धर्म की रक्षा करने वाले की धर्म स्वयं रक्षा करता है। इसीलिए धर्म का कभी त्याग न करके धर्माचरण करते रहना चाहिये।
आजकल अशिष्टता की व्यापक वृद्धि होती जा रही है। व्यवहार में उच्छृंखलता बढ़ती जा रही है। यह हमारे समाज और देश के लिए एक अभिशाप है। दूसरे के सम्मान, आदर का कोई ध्यान नहीं रखकर अपने स्वार्थ और स्वेच्छाधार से प्रेरित होकर दूसरों के साथ मनमाना व्यवहार करना अशिष्टता है। दूसरों की भावनाओं को ध्यान न रखकर उनका मजाक उड़ाना, ताने कसना, व्यंगबाण मारना, दूसरों में त्रुटियाँ निकाल कर उनका उपहास करना अशिष्टता का साकार रूप है। माँ-बाप या अभिभावकों की उपेक्षा या कुसंगति के फलस्वरूप बच्चे गाली का प्रयोग करना, भद्दे अश्लील वचन बोलना सीख लेते हैं और फिर इसमें तनिक भी लज्जा महसूस नहीं करते। घर हो या बाहर, एकान्त स्थान हो या सार्वजनिक, लोगों को बुरे शब्द बोलते, अशिष्ट आचरण करते हुए देखा जा सकता है। सभा, जुलूसों में भाग लेते समय, रेल में सफर करते समय, सिनेमाओं में इस तरह का कुत्सित आचरण, अशिष्टाचार लोगों में सहज ही देखा जा सकता है। गुरुजनों अथवा परिवार में वृद्ध जनों के सम्मान, आदर, उन्हें प्रमाण करने, पैर छूने की परम्परायें मिटती जा रही हैं। आज के शिक्षित और सभ्य कहे जाने वाले लोग इनमें अपना अपमान-सा समझते हैं।
कुछ भी हो, किसी भी रूप में अशिष्टता मानव-जीवन का बहुत बड़ा कलंक है, समाज में बढ़ती हुई अशिष्टता देश और जाति के लिए हानिकारक है। इसे हेय और त्याज्य माना जाय। दैनिक जीवन की छोटी से लेकर बड़ी बातों में शिष्टाचार ही हमारी सभ्यता और संस्कृति का दर्पण है। किसी भी तरह की अशिष्टता अपनी असभ्यता और पिछड़ेपन की निशानी है। इससे दूसरे लोगों में हमारी साख और कीमत कम होती है।
आवश्यकता इस बात की है कि हमारे पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय जीवन में बढ़ती हुई अशिष्टता को व्यापक स्तर पर दूर किया जाय। तभी हम विश्वास के क्षेत्र में आगे बढ़ सकेंगे। परस्पर व्यवहार, बात-चीत, रहन-सहन में शिष्टाचार के सिद्धान्तों का पालन करने का हम सभी को प्रयत्न करना चाहिए। बचपन से ही उठने, बैठने बोलने, चलने, व्यवहार करने के शिष्ट तरीके सिखाये जायें। बच्चों के अशिष्ट आचरण में सुधार का ध्यान दिया जाय। शिष्टाचार का स्वयं आचरण करके अपने से छोटों के समक्ष हमें उनके सुधार का उदाहरण पेश करना चाहिए।
स्वाध्याय सन्दोह-
सदा तूँवों के सहारे तैर कर आप तैराक नहीं बन सकते-
आत्म-विश्वास की भावना मनुष्य की वास्तविक उन्नति का मूल कारण होती है, क्योंकि सामर्थ्य से ही विश्वास का उद्भाव होता है। समर्थ व्यक्ति ही उन्नति की चोटी पर चढ़ने में सफल हुआ करते हैं। परमुखापेक्षी व्यक्ति या जातियाँ पग-पग पर अपमानित होने के अतिरिक्त पर-तन्त्र रहते हैं और स्वतन्त्रता एवं आत्म-निर्भरता के प्रसादों से वंचित रहते हैं। ऐसे व्यक्तियों को यह बात भली प्रकार समझ लेनी चाहिये कि जो व्यक्ति सदा दूसरों की नकल ही करता रहता है वह कभी कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कर सकता। जो व्यक्ति सदा तूँबों के सहारे तैरता है वह कभी तैराक नहीं बन सकता। इसी भाँति जो व्यक्ति या जाति दूसरों की दया और अनावश्यक सहायता पर निर्भर रहते हैं वे दुःखी और परतन्त्र ही बने रहेंगे। संसार के श्रेष्ठ लोग और सर्व साधारण भी स्वावलम्बी व्यक्ति का ही आदर करते हैं। जो व्यक्ति सुख और हर्ष का ओर ले जाने वाली प्रत्येक वस्तु के लिये अपने पर निर्भर रहता है तो समझ लो कि उसने सुखी जीवन की उत्तम योजना बना ली है। इस प्रकार का व्यक्ति बुद्धिमान, चरित्रवान और संयमी होता है।
आत्म-विश्वास की कमी ही हमारी बहुत-सी असफलताओं का कारण होती हैं। सफलता के प्रथम सोपान पर चढ़ने के लिये यह आवश्यक है कि मनुष्य अपने ऊपर अविश्वास की भावना को कभी पास न फटकने दे। यदि हम अपने को कमजोर समझने लग जायँ तो निःसन्देह कमजोर बन जायेंगे। यदि अपने को बलवान समझने लगे तो हमारे भीतर बल का अभाव न रहेगा। इस प्रकार विश्वास रखकर काम करने का फल यह होता है कि मनुष्य को अपनी सुषुप्त शक्तियों का ज्ञान होने लगता है और उसको वह अनुभव होने लगता है कि वह उन अनेकों कार्यों को कर सकने में समर्थ है जिनको वह भाग्य के अधीन समझ कर छोड़ बैठा था।
-नैतिक जीवन
आत्म-विश्वास की अमोघ शक्ति-
आपके कार्य की नींव आपका आत्म-विश्वास है। आप अमुक कार्य कर सकते है इस विचार में ही शक्ति है। याद रखिये कि जिस मनुष्य में पूर्ण आत्म-विश्वास है, उसे अपने भविष्य के विषय में किसी प्रकार की चिन्ता नहीं रहती। वह उन आशंकाओं से मुक्त रहता है जिनसे कि दूसरे आदमी दबे रहते हैं। उस व्यक्ति को जो आत्म-विश्वास से सुरक्षित है कार्य और विचार की वह स्वाधीनता मिल जाती है जिससे उच्च कार्यों की सम्पादन शक्ति प्राप्त करने में बड़ी सहायता मिलती है।
जिस मनुष्य का मन भय, चिन्ता और शंका से भरा हो, वह कोई कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि महान कार्य करने के लिये स्वाधीनता की भावना अत्यावश्यक है। शंका और सन्देह आपके मन की एकाग्रता में बाधक होते हैं। आत्म-विश्वास और आत्म-श्रद्धा प्रत्येक कार्य में प्रथम है। आत्म-विश्वास द्वारा ही मनुष्य ने बड़े-बड़े कार्य किये हैं और भारी विपत्तियों का सामना किया है। एक शक्तिशाली व्यक्ति के मन से जब आत्म-विश्वास घटने लगता है तो उसके पैर उखड़ जाते हैं। आपके जीवन का महान या साधारण होना आपके विश्वास की शक्ति पर निर्भर है। विश्वास होने से ही आप में और परमात्मा में एकता पैदा होती है और इसी के प्रभाव से आपके मन-मन्दिर में अनन्त शक्ति व अनन्त ज्ञान का अनुभव होता है। बहुत से व्यक्तियों को इस बात का पता ही नहीं होता कि विश्वास के कारण ही उन्हें सफलता प्राप्त होती है और विश्वास ही का प्रभाव उनके आदर्शों पर भी पड़ता है। वास्तव में विश्वास एक आध्यात्मिक कार्य-शक्ति है।
संसार में सभी बड़े-बड़े कार्य करने वाले व्यक्तियों में आप आत्म-विश्वास प्रचुर मात्रा में पायेंगे। उन्हें अपनी योग्यता, अपनी शक्ति और अपने कार्य पर पूर्ण रूप से भरोसा रहता है। आपको चाहिये कि आप भी अपना आत्म-विश्वास बनाये रखें और इस बात को ध्यान में रखें कि जिस कार्य में अपने हाथ डाला है उसे अवश्य ही पूरा कर लेंगे। आत्म-विश्वास के सहारे ही आप अपनी मंजिल पर पहुँच सकते हैं, क्योंकि आत्म-विश्वास के द्वारा आपकी की कार्य-शक्ति कई गुना बढ़ जाती है।
-’आप क्या नहीं कर सकते’
आप सब कुछ कर सकते हैं-
जीवन में उत्साह भरने के हेतु उपनिषद् काल के ऋषियों ने कहा था-’उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत’ अर्थात् “उठो, जागो! जो श्रेष्ठ कार्य हैं उन्हें पहचानो और उनमें प्रवृत्त हों।” अन्तरात्मा से ध्वनित हुये ये शब्द उन जंजीरों को एक ही झटके में तोड़ देते हैं जो हमारे तन-मन को चारों ओर से घेरे रहती हैं। यह मन्त्र हमारे हृदय में नई आशा जगाता है, हमें नये उत्साह, नये विश्वास के साथ कार्य प्रवृत्त करता है। दूसरे के जीवन में आशा, उत्साह और विश्वास की ज्योति जगाने से पहले स्वयं अपने जीवन में इन गुणों का प्रकाश करना जरूरी है तभी हम दूसरों को कुछ देने योग्य बन सकते हैं। यदि हमारा अपने पर ही विश्वास नहीं, तो हम दूसरों को तो क्या देंगे, स्वयं अपनी कठिनाइयों का सामना भी न कर पायेंगे।
पर हमें यह याद रखना चाहिये कि आत्म-विश्वास और अहंकार में बड़ा भेद है। आत्म-विश्वास जितना सत्य के निकट की चीज है अहंकार उतना ही मिथ्या का पर्यायवाची है। जो यह जानता है कि वह क्या है, वह यह भी निर्णय कर सकता है कि उसे क्या करना है। आत्म-विश्वासी बातचीत में बार-बार अपने लक्ष्य का उल्लेख अहंकार से प्रेरित हो नहीं करता, वरन् इसलिये करता है कि उसके सामने प्रत्येक क्षण उस लक्ष्य का स्पष्टतर चित्र प्रकट होता रहे। इस प्रकार वह अपने अभिलाषित संकल्प को बलिष्ठ करता है और धैर्य के साथ अपने पथ पर गतिशील बने रहने की प्रेरणा प्राप्त करता है।
आत्म-विश्वासहीन व्यक्तियों को प्रायः अपने को क्षुद्र एवं तुच्छ मानने की धारणा हो जाती है। अपनी ही दृष्टि में गिर जाने से वे समझते हैं कि हम सबके द्वारा तिरस्कृत और उपेक्षित हैं। यह भावना हमको प्रायः निष्क्रिय बना देती है। इससे हमारे विचारों की गति रुक जाती है और हमारा व्यक्तित्व संकुचित हो जाता है। ऐसे आत्म-हीन व्यक्तियों का मन प्रायः यही सोचता रहता है कि दूसरे लोग उनके सम्बन्ध में क्या सम्मति रखते हैं। इसलिये आत्म विश्वासहीनता अपने पतन का सबसे बड़ा कारण बन जाती है।
-’सफल जीवन’
जीवन में हम आशावादी बनें-
कुछ वर्ष पहले ‘एक विश्व’ की कल्पना एक स्वप्न मात्र था। पर आज सब राष्ट्र इतने घुल-मिल गये हैं दूरी को वैज्ञानिक साधनों से इतना कम कर दिया गया है, कि सब राष्ट्र पड़ोसी की भाँति बन गये हैं। एक विश्व की यह कल्पना पहले कुछ चुने हुये लोगों की आशा और स्वप्न मात्र थी। आज भी उस स्वप्न को साकार होने में असंख्यों कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, किन्तु हमें विश्वास करना चाहिये कि हमारी आशा और श्रद्धा इन कठिनाइयों पर विजय पा लेगी। जीवन की सार्थकता भविष्य के प्रति हमारे सदैव आशान्वित रहने में है। आशान्वित व्यक्ति ही स्वप्न-योजक जीवन बिता सकता है। आज की कठिनाइयों से चिन्तित होकर हमें निराश और अविश्वासों नहीं बनना चाहिये।
संसार का भव्य-भवन जिन स्तम्भों पर खड़ा है वे वही हैं जो अनन्त आशावान् हैं। इनकी दृष्टि भूतकाल की ओर न रहकर भविष्य की ओर रहती है। जीवन में बाधाएँ तो आती ही हैं, लेकिन मनुष्य उन पर विजय अवश्य पाता है। आरम्भ से अब तक मनुष्य की आत्मा सब बाधाओं और कठिनाइयों के होते हुये भी आगे बढ़ती रही है। इसी अटूट आशा से संसार प्रगति कर रहा है। आशा न रहे तो वर्तमान की बाधाओं में ही वह डूब जाय। वर्तमान सदैव संघर्षशील रहता है। सत्य को तात्कालिक जगत पहले सदा अस्वीकार करता है, पर अन्त में सत्य के आगे हार माननी पड़ती है। संसार के सत्यासत्य भरे कोलाहल की नहीं सचाई की होती है। एक लोकोक्ति है कि ‘चन्द्रमा जब बिल्कुल पूर्ण होता है तभी उसका क्षीण होना आरम्भ होता है और जब अमावस्या को उसका पूर्ण विलोप हो जाता है, तभी चाँदनी रातें आरम्भ होती है।” अतः सब कुछ खोकर भी मनुष्य अपना जीवन आरम्भ कर सकता है। मनुष्य वही है जो कभी नहीं हारता।
-’सफल जीवन’
भावना के आधार पर पत्थर में भगवान प्रकट होते हैं। इस जड़ जगत में चेतन का साधारण स्वरूप तो वह है जिसके अनुसार जीव जन्मते मरते, सोते, खाते, और अपनी शरीर यात्रा पूरी करते हैं, पर विशिष्ट स्वरूप भावना में ही सन्निहित है। बाहर से देखने में मनुष्य, देवता और असुर एक सी ही शकल सूरत के होते हैं पर उनका भीतरी स्वरूप एक दूसरे में सर्वथा भिन्न होने के कारण उनका आचरण एवं व्यक्तित्व उसी के अनुसार ढल जाता है।
बाह्य जीवन में मनुष्य जैसा भी कुछ दीखता है। वस्तुतः वह उसके आन्तरिक स्वरूप का प्रतिबिम्ब मात्र ही होता है। मोटर किस दिशा में दौड़ रही है इसमें श्रेय मोटर का नहीं ड्राइवर की इच्छा का है। वह चाहे तो क्षण कर में उसे मोड़ भर विपरीत दिशा में वापिस भी लौटा सकता है। इसी प्रकार जीवन का बाहरी ढर्रा आज जिस प्रकार का चल रहा है कल उसमें भारी परिवर्तन भी हो सकता है और वह परिवर्तन इतना बड़ा होना भी सम्भव है कि उसे आश्चर्य जैसा देखा या माना जाय।
बाल्मीकि और अंगुलिमाल जैसे भयंकर डाकू क्षणभर में परिवर्तित होकर इतिहास प्रसिद्ध सन्त बन गये। गणिका और अम्बफली जैसी वीराँगनाओं को सती साध्वी का प्रात-स्मरणीय स्वरूप ग्रहण करते देर न लगी। विश्वामित्र और भर्तृहरि जैसे विलासी राजा उच्च कोटि के योगी बन गये। नृशंस अशोक बुद्ध धर्म का महान प्रचारक बना। तुलसीदास और सूरदास की कामुकता का भक्ति भावना में परिणत हो जाना प्रसिद्ध है। विशिष्ट लोगों के इस प्रकार के असंख्य चरित्र इतिहास के पृष्ठों पर पढ़े जा सकते हैं। छोटी श्रेणी के लोगों में छोटे-मोटे आश्चर्यजनक परिवर्तन नित्य ही देखने को मिल सकते हैं। इससे स्पष्ट है कि जीवन का बाहरी ढर्रा जो चिर प्रयत्न से बना हुआ होता है, विचारों में-भावनाओं में परिवर्तन आते ही बदल जाता है।
मित्रों को शत्रु बनते, शत्रु को मित्र रूप में परिणत होते, दुष्ट को सन्त बनते, संत को दुष्टता पर उतरते, कंजूस को उदार, उदार को कंजूस, विषयी को तपस्वी, तपस्वी को विषयी बनते देर नहीं लगती। आलसी उद्योगी बनते है और उद्योगी आलस्यग्रस्त होकर दिन बिताते है। दुर्गुणियों में सद्गुण बढ़ते-और सद्गुणी में दुर्गुण उपजते देर नहीं लगती। यह जादू जैसे हेर-फेर आये दिनों मनुष्यों के जीवनों में होते रहते हैं। इसका एक मात्र कारण इतना ही है कि उनकी विचार धारा बदल गई, भावनाओं में परिवर्तन हो गया। भीतरी आस्थाओं, विश्वासों मान्यताओं एवं आकाँक्षाओं में यदि थोड़ा भी हेर-फेर होता है तो उसकी छाया बाह्य जीवन में तुरन्त दिखाई देने लगती है।
संसार का जो भी भला-बुरा स्वरूप हमें दृष्टिगोचर हो रहा है, समाज में जो कुछ शुभ-अशुभ दिखाई पड़ रहा है, व्यक्ति के जीवन में जो कुछ उत्कृष्ट-निकृष्ट है उसका मूल कारण उसकी अन्तः स्थिति ही होती है। धनी, निर्धन, स्वस्थ-निरोग, अकाल मृत्यु-दीर्घ जीवन, सन्त-असन्त, मूर्ख विद्वान, घृणित-प्रतिष्ठित, सफल असफल का बाहरी अन्तर देखकर उसके व्यक्तित्व का मूल्याँकन किया जाता है। पर लोग यह भूल जाते हैं कि यह बाहरी भली-बुरी परिस्थितियाँ और कुछ नहीं मनुष्य के मनोबल, आस्था और अन्तः प्रेरणाओं की प्रतीक है। भाग्य भी यदि कभी कुछ करता होगा तो निश्चय ही उसे पहले मनुष्य की मनोरुचि में ही प्रवेश करना पड़ता होगा। जिसकी अन्तः गतिविधियाँ सही दिशा में चलने लगीं उसके लिए अभीष्ट दिशा में सफलता ही मिलने वाली है किन्तु जिसका मानसिक स्तर चंचलता, अवसाद, अविश्वास, आलस, आवेश, दैत्य आदि दोषों से दूषित हो रहा है, उसके लिए अच्छी परिस्थितियाँ और अच्छे साधन उपलब्ध होने पर भी दुर्गति का ही सामना करना पड़ेगा।
सौभाग्य और दुर्भाग्य यों दैवी अनुग्रह एवं कोष का, प्रारब्ध भोगों का परिणाम दिखाई पड़ता है, पर गंभीरता से विचार करने पर इसी परिणाम पर पहुँचना पड़ता है कि यह तत्व केवल हमारी आन्तरिक उत्कृष्ट और निकृष्ट परिस्थितियों का ही परिणाम है। यदा-कदा अपवाद स्वरूप कभी-कभी इसमें ऐसे विपरीत उदाहरण भी देखे जाते हैं जब सुव्यवस्थित व्यक्तित्व वाले व्यक्ति भी आपत्तियों में फँसते और अस्त-व्यस्त लोग मौज मारते रहते हैं। इसमें भी उनका कोई गुप्त गुण दोष ही कारण रहता है। अच्छे समझे जाने वाले व्यक्ति, अधिकाँश अच्छाइयों के होते हुए भी कुछ दोष अपने में छिपाये रहते हैं, वे दोष भी अपनी विकृतियाँ तो उत्पन्न करेंगे ही। समझा यह जाता है कि यह आपत्ति अच्छाइयों के कारण आई पर वस्तुतः वह उनकी किन्हीं भूलों एवं त्रुटियों का ही परिणाम होता है। इसी प्रकार कई बुरे समझे जाने वाले व्यक्ति भी कुछ लाभ एवं सफलताएं उठाते हैं। वह भी उनकी किन्हीं अच्छाइयों का ही प्रतिफल होता है।
सत्यवादी और ब्रह्मचारी व्यक्ति यदि क्रोधी स्वभाव का है तो उसके प्रति लोग विरोध एवं द्वेष भाव रख रहे होंगे। सत्यवादिता को इसके लिए दोष नहीं दिया जाना चाहिए। इसी प्रकार कोई डाकू लूट का माल ले आता है तो इसमें उसके साहस को ही श्रेय मिलेगा। सत्यवादिता का शुभ और डकैती का अशुभ फल तो समयानुसार उन्हें मिलेगा ही पर सज्जन में जो छोटा दोष और दुर्जन में जो थोड़ा गुण था उसका भी तो बुरा-भला फल उन्हें मिलना ही चाहिए। यह कहना उचित नहीं कि डकैती में धन मिलता है। डकैती तो समाज में घृणा, परलोक में नरक और राज दंड में जेल का ही परिणाम उत्पन्न कर सकती है। जो लाभ मिला वह तो उसके निरोग शरीर, मनोबल, दुस्साहस, सतर्कता, मुस्तैदी, निशानेबाजी, चतुरता आदि अनेक गुणों का ही प्रतिफल मात्र था।
यह कहना उचित नहीं कि इस कलियुग में सज्जन घाटे में और दुर्जन लाभ में रहते हैं। सनातन नियमों में कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। सत्य और तथ्य देश-काल, पात्र का अन्तर किये बिना सदा सुस्थिर और अक्षुण्ण ही रहते हैं। सन्मार्ग पर चलने वाले की सद्गति और कुमार्ग पर चलने वाले की दुर्गति होने की सच्चाई में कभी भी किसी प्रकार भी अन्तर नहीं आ सकता। कलियुग, सतयुग की कोई बाधा इन सत्यों को झुठला नहीं सकती। सूर्य सदा से गर्मी और प्रकाश का केन्द्र रहा है। जल सदा ही प्रवाही और शीतल माना जाता है। परिस्थितिवश थोड़ा अन्तर कभी पड़ जाय यह बात दूसरी है पर उनके मूल स्वरूप में स्थायी अन्तर नहीं आ सकता। इसी प्रकार श्रेष्ठता के सत्परिणाम और दुष्टता के दुष्परिणामों के अतिरिक्त और किसी भिन्नता की कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह अटल तथ्य सूर्य और चन्द्रमा की तरह अपने-अपने स्थान पर आदिम ही बने रहेंगे।
अध्यात्म का मूल्याँकन किसी कर्म काण्ड, आवरण, आडम्बर या दृश्य से नहीं किया जा सकता। वह तो विशुद्ध रूप से एक आन्तरिक स्थिति है, जिसकी विचारणा और मान्यता उच्च आदर्शों पर अवलम्बित है। वस्तुतः वही अध्यात्मवादी है जो स्वार्थ, लालच, वासना और विलास को पृथक रखकर सोचता है। बाह्य परिस्थितियाँ इससे भिन्न प्रकार की भी देखी जाती हैं। कई ढोंगी धर्म-ध्वजी लोग दूसरों को ठगने के लिए धर्मात्मा का आडम्बर ओढ़े बैठे रहते हैं और इसी प्रदर्शन से भोले लोगों को ठगते खाते रहते हैं। साधु का भेष धारण किये कितने ही दुरात्मा लोग धन और माल की लूट मचाते रहते हैं। बेचारे सरल स्वभाव व्यक्ति उनके आडम्बर को ही साधुता का प्रमाण मानकर अपनी गाँठ कटाते रहते हैं।
इसी तरह ऐसा भी देखा जाता है कि साधारण गृहस्थ जैसा कार्य क्रम अपनाये हुए सादा और सरल जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति अत्यन्त उच्च कोटि की भूमिका में जाग्रत रहते हुए सन्त, ऋषि, महामानव, देवदूत जीवन-मुक्त एवं नर-नारायण जैसा व्यक्तित्व बनाये रहने में समर्थ होते हैं। कई व्यक्तियों को छोटी-सी सरल पूजा विधि उत्कृष्ट भावनाओं से ओत-प्रोत होने के कारण महान तपश्चर्या जैसा लाभ देती है, और कई कष्टसाध्य योगाभ्यास, करने वाले विरक्त वनवासी भी भावना के अभाव में केवल लकीर ही पीटते रहते हैं। भूसी कूटने की तरह उनके हाथ लगता कुछ नहीं। कर्मकाण्ड की उपयोगिता तभी है जब उसके साथ भावना का समुचित संमिश्रण हो। इसके बिना वह सारी क्रियाकलाप एक विडम्बना मात्र बनकर रह जाता है।
गुरुजनों के श्रद्धापूर्वक चरण स्पर्श और लकीर पीटने की तरह पैर छू देने की क्रिया समान होते हुए भी उसका प्रतिफल आकाश पाताल जैसा भिन्न होता है। गंगा स्नान, देव पूजन, श्रद्धा, दान पुण्य, व्रत उपवास, जप, तप, हवन, तर्पण, त्यौहार, संस्कार आदि धर्म कृत्यों के साथ जितनी उच्चस्तरीय भावना जुड़ी होगी उसी अनुपात से उनका शुभ संस्कार अन्तःकरण पर जमेगा और आत्मिक विकास से वह क्रियाएं उतनी ही सहायक होंगी। यदि बेगार भुगतने की तरह एवं क्रीडा कौतुक या चिन्ह पूजा की भाँति इन्हें निपटाया जाय तो दूसरों की दृष्टि में धर्मात्मा समझे जाने के मिथ्या तोष का लाभ भले ही मिल जाय वस्तुतः इनसे कोई आध्यात्मिक प्रयोजन सिद्ध न होगा।
‘अध्यात्म’ की एक शब्द में यदि व्याख्या की जाय तो उसे ‘उत्कृष्ट भावना’ कहा जा सकता है। जिसके मस्तिष्क, मन, अन्तःकरण में उच्च आदर्शवादी भावनाएं उठती रहती हैं, जो अपना जीवन आदर्श की दिशा में मोड़ रहा है उसे अध्यात्मवादी कहा जा सकता है। शुभ कर्म इसके लिए एक श्रेष्ठ साधन है। उनके माध्यम से वे भावनाएं कार्यान्वित होने पर संस्कार का रूप धारण करती हैं और स्वभाव से सम्मिलित होकर मनोभूमि में परिपक्वता एवं स्थिरता का रूप ग्रहण करती हैं। इसलिए शुभ कर्म अध्यात्म की प्राप्ति के लिए एक आवश्यक अंग माने गये हैं। धर्म कृत्यों की प्रशंसा एवं उपयोगिता इसी दृष्टि से है। पर यदि कोई शुभ कर्म परम्परा की पूर्ति या भौतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाय तो वह आध्यात्मिक प्रगति में विशेष सहायक न हो सकेगा। यों शुभ कर्मों के सहारे ही आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग खुलता है पर यह स्मरणीय है कि भावनाओं के जागरण की उपेक्षा की गई, उनका अभाव बना रहा तो फिर बड़े-से-बड़े कर्मकाण्ड भी जीवन लक्ष की पूर्ति के लिए कुछ विशेष सहायक न हो सकेंगे।
भक्ति का तात्पर्य कोमल भावनाओं की अभिव्यक्ति ही है। यों आज ईश्वर की पूजा, अर्चना, ध्यान, कीर्तन को ही भक्ति कहा जाता है पर हमें जानना चाहिए कि वह तो विशाल भक्ति भावना का एक कण मात्र है। समग्र भक्ति वह है जो मानव मात्र में, प्राणि मात्र में, जड़ चेतन में, सर्वत्र महान एवं उत्कृष्ट ही देखती है और अपनी कोमल भावनाओं से इस जगत में कण-कण को आच्छादित करके उसे प्रेम के अमृत में सराबोर कर देती है। उसी अनुभूति से मनुष्य का अनुभव करता है और साथ ही उसको सार्थक हुआ भी अनुभव करता है। उपासनात्मक कर्मकाण्ड में भक्ति भावना का समन्वय होना आरंभिक आवश्यकता की दृष्टि से उपयोगी है पर उसे ही ‘पूर्णता’ मान लेना भारी भूल कही जायगी। जो लोग ईश्वर पूजा में ‘भक्त’ दिखाई पड़ते हैं पर व्यावहारिक जीवन में संकीर्णता, स्वार्थपरता, निष्ठुरता धारण किये रहते हैं उनको भक्त किसी भी प्रकार नहीं कहा जा सकता। संकीर्ण दायरे तक में ही सीमित-पूजा वन्दना के छोटे दायरे में बँधी भक्ति आरंभिक अभ्यास का एक अकिंचन साधन भले ही हो उससे वास्तविक प्रयोजन किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकता।
ये सन्तुष्टाः श्रुतिपरा महात्मान्ते महाबलाः।
धर्म्म पंथानमारुढ़ास्तानु पास्व पृच्छ च॥
धर्म मार्ग पर चलने में यदि कोई शंका सन्देह उत्पन्न हो तो वेदाभ्यासी, महात्मा, सन्तोषी शक्ति सम्पन्न, जिनका जीवन ही धर्माचरण पर आधारित है उनका आश्रय और मार्ग दर्शन प्राप्त कर धर्म में प्रवृत्त हों।
हमें समग्र अध्यात्म की साधना करनी होगी क्यों उसे अपनाये बिना जीवन की सार्थकता का मार्ग अनुरुद्ध ही बना पड़ा रहेगा। भावना को आदर्शवादी उत्कृष्टता की दिशा में तरंगित करने और उन्हें कार्य रूप से परिणत करते हुए परिपक्व होने देने के प्रयोजन से शुभ कार्य करते रहने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना पड़ेगा। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमारी विचार धारा यदि आदर्शवादी परम्पराओं का अवलम्बन करके अग्रसर हो, व्यावहारिक जीवन में उतरे और जीवन क्रम को ओत-प्रोत करे तो समझना चाहिए कि अब हम सचमुच अध्यात्मवादी बने और उस महान जीवन लाभ से पाने के अधिकारी बने जिसे प्राप्त करके मनुष्य धन्य बन जाता है, अमृतत्व का अनुभव करते हुए अक्षय आनन्द में निमग्न रहता है और पूर्णता एवं जीवनमुक्ति का परम लाभ प्राप्त करता है।
त्याग और तप की मूर्ति ईसा के उत्तराधिकारी बनने वाले पोप जब धन, सत्ता और विलास की प्रतिमूर्ति बन गये तो धर्मप्रेमी जनता में विक्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक ही था। रोम पर पोप का शासन था, ईसाई हुकूमतें ही नहीं जनता भी उनके इशारे पर नाचती थी। आखिर वह कितने दिन चलता। बगावत हुई। इटली की सेना ने रोम की सत्ता पोप के हाथों से छीन ली। पादरी लोग जान बचाकर भागे। कितने ही पादरियों ने सरकार से प्रार्थना करके अपने को जेल में रखवाया ताकि उनका जीवन सुरक्षित रह सके।
विद्या रुपं धनं शौर्य्य कुलीनत्वमरोगता।
राज्यं स्वर्गश्च मोक्षश्च सर्व धर्म्मादवाप्यते॥
विद्या, धन, रूप, शूरता, कुलीनता, आरोग्यता, राज्य, स्वर्ग, मोक्ष आदि सम्पदाएँ धर्म-पालन करने वाले को ही प्राप्त होती हैं और सद्गुण धर्मात्मा में ही पाये जाते हैं।
शक्तिमानष्य शक्तोऽप्तो धनवानपि निर्धनः।
श्रुतवानपि मूर्खश्च यो धर्म विमुखो नरः॥
धर्म से विमुख, रहित मनुष्य शक्तिमान होने पर भी निर्बल, धन, वैभव रहते भी निर्धन और वेद-शास्त्रों का ज्ञाता होने पर भी मूर्ख रहता है।
इस स्थिति को देखकर बालक ऐचिले को बड़ा दुःख हुआ। उसकी माता धर्मात्मा थी और वह इस बालक को भी पादरी बनाना चाहती थी। बेटा भी इससे सहमत था पर पादरियों की यह दुर्गति देखकर उसे क्लेश हुआ। उसकी माता ने समझाया बेटा! सच्चे धर्म प्रसारकों की सदा आवश्यकता थी और आगे रहेगी। जिनकी दुर्दशा हो रही है वे विलासी और नकली साधु हैं। यदि कोई सच्चा धर्मोपदेशक बन सके तो इसमें उसका भी कल्याण है और धर्म तथा जनता की भी सेवा है। माता ने यह भी बताया कि एक सच्चे धर्मोपदेशक में किन गुणों की आवश्यकता है। त्याग, सेवा, निर्लोभता, उपासना, सदाचार आदि विशेषताओं के साथ उसे विद्वान् भी होना चाहिए। समुचित ज्ञान के अभाव में मनुष्य को न तो आत्म-सन्तोष होता है और न वह दूसरों को ज्ञान-दान से सन्तुष्ट कर सकता है।
बालक एचिले को पादरियों के अपमान से बड़ा दुःख हुआ था। उसने सदा पादरी बनने की ठानी ताकि धर्मोपदेशकों के प्रति जनता के मन में उत्पन्न हुए क्षोभ को वह शान्त करके पुनः श्रद्धा की जड़ जमा सके।
इटली के एक छोटे से गाँव डेसियो में ऐचिले जन्मा। उसका बाप जुलाहे का काम करता था। दस बारह घण्टे के कठोर परिश्रम से वह अपने परिवार की गुजर के लायक कमा पाता था। ऐचिले उसका चौथा पुत्र था। वह थोड़ा बड़ा हुआ तो अपने चाचा के पास जो पादरी था अस्सो नामक गाँव में चला गया। पर्वतों और प्राकृतिक सौंदर्य से घिरे उस उपवन में उसने काम चलाऊ शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद वे कई धार्मिक पाठशालाओं में पढ़ते रहे। उन्होंने शिक्षा जारी रखी और तीन विषयों में उन्होंने ‘डॉक्टरेट’ प्राप्त की। इतने विद्वान पादरी उन दिनों इटली में नहीं के बराबर थे।
उन्होंने धर्मप्रचार तथा जनसेवा का कार्य आरम्भ किया साथ ही आजीविका के लिए नौकरी कर ली। वे दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर नियुक्त हुए। फिर वे विशाल अब्रोशियन पुस्तकालय के प्रधान संचालक नियुक्त हुए। वहाँ उन्होंने बहुत पढ़ा और बहुत ग्रन्थ लिखे।
उन्होंने जन-सेवा के लिए बहुत कार्य किया। अनाथ बच्चों को पढ़ाया और उनकी आर्थिक सहायता की। अनेकों शिक्षा संस्था चलाई, पीड़ितों की विविध प्रकार से सेवा की और कुमार्ग पर चलते हुओं को धर्मोपदेश देकर सन्मार्ग पर चलाया। मजदूरों, स्त्रियों और बच्चों के सुधार के लिए अनेकों महत्वपूर्ण कार्य किये।
इटली की आवश्यकता देखकर उनने राजनीति में भी प्रवेश किया। पोलेण्ड में उन्हें अपोस्टालिक विजिटेटर बना कर भेजा गया। तीन साल बाद वहाँ से लौटे तो उन्हें आर्क बिशय बनाया गया। अन्त में वे प्रधान पोप चुने गये। सरकार ने उन्हें ‘नाइट आफ काँस’ की उपाधि से सम्मानित किया।
सन् 1870 में जब इटली की सेना ने रोम पर से पोप का अंधकार समाप्त किया तब से पादरियों का कोई सम्मान देश में न रह गया था। पर ऐचिल की योग्यता और सेवा-भावना से जनता भली प्रकार परिचित थी, उसकी अश्रद्धा श्रद्धा मैं बदल गई। अब ऐचिले का नाम था पोप पायस। जब वे धर्म-मंच पर भाषण देने आये तो विशाल जन समूह उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए घुटने टेक कर बैठा था, सेना ने उन्हें अपने शस्त्र भेंट किये। ऐसा विशाल सम्मान पिछले पचास वर्षों में किसी पोप का न हुआ था।
पोप पायस केवल धर्म गुरु मात्र हो न रहे उन्होंने संसार में सद्-भावनाएं बढ़ाने के लिए भी भारी प्रयत्न किया। उन्होंने इटली और रोम का पुराना झगड़ा सुलझाया। फ्राँस में कपड़े के कारखानों में हड़ताल हुई तो उन्होंने मजदूरों का पक्ष लिया और बहुत-सी सुविधाएँ दिलाई। साम्यवादी नास्तिकता की निन्दा की किन्तु पूँजीवाद के साथ कोई रिआयत नहीं की। उनने कहा-यह और भी अधिक मूर्खतापूर्ण एवं निंदनीय है। मुसोलिनी ने जब तक धार्मिक युवक संस्था का दमन किया तब भी उनने आवाज उठाई। यहूदियों के प्रति घृणा फैलाने वालों को उन्होंने लताड़ा और कहा-यह बात ईसाई आदर्शों के विपरीत है। उन्होंने आधुनिक विचार धाराओं और वैज्ञानिक प्रगति का स्वागत किया। मृत्यु शैया पर पड़े-पड़े उनने क्रिसमस पर एक संदेश प्रसारित करते हुए कहा-विश्व-शान्ति के लिये मानव मात्र को प्रयत्न करना चाहिए। उन्होंने जीवन भर शान्ति के लिए घोर संघर्ष किया।
धर्म के प्रति और धर्मोपदेशकों के प्रति जनता में जो अश्रद्धा है उसका कारण धर्म व्यवसाइयों की अकर्मण्यता, विलासिता एवं जनता को ठगने की वृत्ति ही है। इसी कारण लोगों की निष्ठा उन पर से उठती आ रही है। यदि ऐचिले-पोप पायस से-जैसे आदर्शों को धर्म गुरु लोग अपनावें, अपना चरित्र ऊँचा रखें, और जन-सेवा में उत्साहपूर्वक संलग्न रहें तो उनको व्यक्तिगत सम्मान भी मिले और धर्म रुचि भी बढ़े। पोप पायस ने आगे बढ़कर संसार के समस्त धर्म जीवियों का प्रत्यक्ष मार्ग दर्शन किया है।
दो मित्र एक आम के बगीचे में पहुँचे। पेड़ पके हुए मीठे फलों से लदे हुए थे। दोनों का मन फलों को देखकर खाने के लिए ललचाने लगा।
बाग का माली उधर से निकला। उसने आगन्तुकों की इच्छा को जाना और कहा-मालिक की आज्ञा है कि कोई यात्री एक दिन यहाँ ठहर सकता है, जितना खा सके आम खा सकता है पर साथ नहीं ले जा सकता। सो आप लोग चाहे तो दिन भर इच्छानुसार आम खायें पर संध्या होते-होते चले जावें। साथ में एक भी आम न ले जा सकेंगे।
मित्रों को बड़ी प्रसन्नता हुई। वे अपनी रुचि के आम खाने को चल दिये। पेड़ सभी अच्छे थे आम सभी मीठे थे सो एक मित्र जिस पेड़ पर चढ़ा उसी पर बैठा-बैठा खाने लगा। शाम तक खूब पेट भरा और तृप्त होकर नीचे आ गया।
दूसरे ने सोचा, इस सुन्दर बगीचे की जाँच पड़ताल कर ले। खट्टे, मीठे और जाति किस्म का पता लगाते अन्त में खाना आरम्भ करेंगे। वह इसी खोज बीन में लगा रहा और शाम हो गई। माली ने दोनों आगन्तुकों को बाहर किया और बाग का फाटक बन्द कर दिया। एक का पेट भर चुका था दूसरे का खाली। एक प्रसन्न था दूसरा असन्तुष्ट।
फाटक के बाहर बैठे हुए एक दरवेश ने कहा-दोस्तों यह संसार आम के बगीचे की तरह है। थोड़ी देर यहाँ रहने का मौका मिलता है और समय बीतते ही विदाई की घड़ी आ पहुँचती है। बुद्धिमान वह है जो सत्कर्मों द्वारा तृप्ति दायक सत्परिणामों का लाभ से सका, मूर्ख वह है जो मोह ममता प्रपंच में इधर-उधर मारा फिरे। लगता है कि तुम में से भी एक ने मूर्खता और एक ने बुद्धिमत्ता बरती है।
केवल उचित को ही स्वीकार करें-
पुराने जमाने के बड़े-से-बड़े गणितज्ञों से आज का विद्यार्थी ज्यादा जानता है, क्योंकि गणित की जो नयी-नयी खोजें हुई हैं पुराने लोगों को वह मालूम नहीं थीं।
आज का विद्यार्थी न्यूटन से भी ज्यादा गणित जानता है। पुराने जमाने में जब युधिष्ठिर जुए में हारे और द्रौपदी को दासी बनने की नौबत आयी, तब भरी सभा में द्रौपदी ने पूछा कि क्या मेरे पति हार गये, इसलिए मुझे दासी बनना पड़ेगा? उस समय भीष्म, द्रोण, विदुर आदि इस सवाल को पेचीदा समझते थे। आज के जमाने में इस केस को क्या कोई सुप्रीम-कोर्ट में भेजना चाहेगा? युधिष्ठिर महाराज धर्मशील थे। उन्होंने धर्म-नियम माना था कि कोई जुआ खेलने के लिए बुलाये तो वो नहीं करना चाहिए। क्या आज कोई इसको धर्म मानेगा? मनु ने स्मृति में लिखा है कि बार-बार चोरी करने वाले का हाथ काट डालना चाहिए। क्या आज इस सजा को कोई कबूल करेगा?
हमारे पूर्वजों ने अच्छी-अच्छी चीजें तो दी हैं, उसके साथ कुछ गलत चीजें भी दी हैं।
बात यह है कि हर चीज में श्रेयस और प्रेयस होता है। अच्छी चीजें हैं वे लेनी चाहिए और बुरी चीजों को छोड़ना चाहिए और अच्छा-बुरा पहचानने का विवेक हमको हासिल करना चाहिए।
-बिनोवा
दो में से एक का चुनाव-
कई बार दो परस्पर विरोधी बातें सामने आ जाती हैं और उनमें से एक को चुनना होता है। दोनों ही बातें प्रिय और उचित लगती हैं पर यह निर्णय नहीं हो पाता कि इन दोनों में से किस रास्ते पर चलना ठीक है। ऐसी दशा में आदर्शवाद जिस बात के पक्ष में अधिक हो उसे ही चुनना चाहिए।
आपका लड़का विवाह योग्य है। उसका एक सम्बन्ध किसी अमीर घर से आता है किन्तु दूसरा सम्बन्ध गरीब घर का है। लड़की शिक्षा में दोनों समान हैं। ऐसी दशा में लोभ की दलील यह हो सकती है कि अमीर घर में विवाह करने पर आर्थिक लाभ रहेगा। पर दूसरी और गरीब पिता को कठिनाई में सहायता करने एवं निर्धन कन्या को सुखी घर में पहुँचने का लाभ देना एक उद्धार पक्ष है। एक और लाभ है दूसरी और उदारता। ऐसे अवसरों पर आदर्शवाद को ही पहला स्थान देना चाहिए। अमीर आदमी अपनी कन्या को पैसे के बल पर दूसरी अच्छी जगह-शायद आप से भी अच्छी जगह पहुँचा सकता है, पर ऐसा कर सकना एक गरीब के लिए कठिन है। इसलिए आपका निर्णय दोनों समान श्रेणी की कन्याओं में से गरीब घर की कन्या के पक्ष में ही होना चाहिए।
इसी प्रकार देश-भक्ति और परिवार प्रेम के बीच में से एक का चुनाव करना पड़ सकता है। शत्रु का आक्रमण होने पर देश-रक्षा के लिए सेना में भर्ती हुआ जाय या बच्चों के प्यार प्रेम को निबाहा जाय? दोनों ही पक्ष आकर्षक हैं। इनमें से एक को चुनना हो तो आपका मन आदर्शवाद की ओर ही झुकना चाहिए। परिवार प्रेम उचित है पर देश-रक्षा उससे भी पहला कर्त्तव्य है। इसी प्रकार लोभ और कर्तव्य के बीच में संघर्ष हो सकता है। धन लोभ की आशा भी आकर्षक है उसके लिए कर्त्तव्यच्युत होने के लिए मन ललचा सकता है पर इस मानसिक द्वन्द्व के समय आप कर्त्तव्य के पक्ष में ही अपनी बुद्धि और विचार-शक्ति का उपयोग करें।
-स्वामी शिवानन्द
हम आगे ही बढ़ें-
जो व्यक्ति या जाति आगे चलने से इन्कार करती है उसको दैव या प्रकृति के नियम चाबुक मारते हैं। यह नियम अटल है। इसके व्यवहार में कभी रिआयत नहीं हो सकती। परमेश्वर को किसी जाति या सम्प्रदाय का पक्ष नहीं है। जो कोई उसके नियम के अनुसार चलता है वह उसका प्यारा है, वह बचता है, किन्तु जो उसके नियम को तोड़ता है- वह उसका शत्रु है, वह मरता और नष्ट होता है। जरा देखो तो, यदि तुम साँसारिक शासन के नियमों के विरुद्ध चलो तो तत्काल दण्ड पा जाते हो किसी तरह बच नहीं सकते। जब साँसारिक शासन के विरुद्ध चलने का यह हाल है, तब भला परमेश्वर के नियमों के विरुद्ध चलना और बचने की आशा करना बिलकुल मूर्खता है या नहीं? धर्मशास्त्र के अनुसार भी आगे बढ़ने से इन्कार करने का नाम ही पाप है। इसको तमोगुण कहते हैं।
-स्वामी रामतीर्थ
ईश्वर का चिन्तन मनन-
जिस तरह से दाल के दाने चक्की में पीसे जाते हैं उसी तरह समस्त जीव काल द्वारा प्रेरित जन्म मृत्यु-रूपी दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। किन्तु जिस तरह दाल के कुछ दाने चक्की के मध्य वाले डण्डे में चिपकने से बचे रहते हैं उसी प्रकार ईश्वर रूपी केन्द्र से जिसके सहारे संसार का सब कार्य कलाप चल रहा है, कालचक्र घूम रहा है कोई-कोई जीव चिपक जाते हैं तो वे मुक्त हो जाते हैं। ईश्वर के चिन्तन मनन भक्ति द्वारा मनुष्य प्रकृति के नियमों का उल्लंघन कर मुक्त हो सकते हैं।
-रामकृष्ण परमहंस
उत्तम पुरुष की परिभाषा-
वह कि, जो अपनी असफलता के लिए किसी दूसरे को दोषी नहीं ठहराता, न यह अपने काम में असफल होने वालों की हँसी ही उड़ाता है।
वह कि, जो दृढ़ निश्चयी होता है, पर अपने विरोधियों से झगड़ा नहीं करता। सबसे बड़े प्रेम से मिलता है, पर उनके साथ किसी गुटबन्दी में नहीं पड़ता।
वह कि, जो गुणों का संचय करता है, जो प्रसन्न रहता है, घमण्ड को अपने से बहुत दूर रखता है और जो सत्य को समझने की कोशिश करता है।
वह कि, जिसकी सहायता सहज ही प्राप्त की जा सकती है। पर उसे प्रसन्न करना कठिन होता है क्योंकि खुश उसे सचाई ही कर सकती है, खुशामद नहीं। निम्न पुरुष किसी की सहायता बड़ी कठिनाई से करता है, पर उसे खुश करके उसका कृपापात्र बनना आसान है। निम्न व्यक्ति की दुर्बल इच्छाओं की पूर्ति सत्य-असत्य किसी तरह करते जाइये वह उन्हें स्वीकार करेगा और प्रसन्न रहेगा।
वह कि, जो अपने दोष देखता है, सबसे मित्रता का व्यवहार करता है पर वह किसी के मोहपाश में नहीं फंसता। जो अपनी योग्यता को अपना धन समझता है, जो हमेशा शान्त और गम्भीर रहता है।
-सन्त कन्फ्यूशियस
आनन्दमय संसार-
आनन्द, इस संसार में सर्वत्र आनन्द ही आनन्द भरा पड़ा है। देखने वालों के दृष्टि दोष से दिखाई नहीं पड़ता, प्रातःकाल उठते ही चिड़ियों का मधुर कलरव, शीतल मन्द पवन और उषा की लालिमा क्या यह कुछ कम आनन्द की अनुभूति है? दिन भर दिखाई देने वाली चहल-पहल, संध्या को अस्त होता सूर्य और आकाश में रंग-बिरंगे बादल कैसे सुन्दर लगते हैं कि उन्हें देखने के आनन्द का ठिकाना नहीं रहता। काली रात की चादर पर झिलमिल करते हुए सितारे। बादलों से मोतियों की तरह बरसने वाली वर्षा क्या हमें आनन्द देने के लिए कुछ कम है? शीत काल से अँगीठी के आगे बैठकर तापना और रात की गहरी नींद में निमग्न होकर सो जाना कितना सुखकर लगता है। यहाँ आनन्द की कमी नहीं, देखने वाली आँखें स्वच्छ हों तो सब और प्रसन्नता, आशा और उल्लास का वातावरण ही दिखाई पड़ेगा।
इस संसार का सबसे बड़ा आनन्द है अन्तःकरण में रहने वाली सज्जनता, सरलता और सन्तोष की भावना। इन सुखों के रहते हुए भी लोग दुःखी रहते हैं, यह क्या आश्चर्य की बात नहीं है।
-मेटर लिंक
न विशेषोऽस्ति वर्णानाँ सर्व ब्राह्ममिद जगत।
ब्रह्मणा पूर्व सृष्टं हि कर्म भिर्वर्णताँ गतम्॥
मनुष्य और वर्णों में कोई अन्तर, विशेषता नहीं क्योंकि यह सब एक ही ब्रह्मा द्वारा रचे हैं विभिन्नता, पृथकता, वर्ण-भेद केवल धर्म के आधार पर दिखाई देते हैं।
अध्यात्म-विद्या के वैज्ञानिक ऋषियों ने आहार के सूक्ष्म गुणों का अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया था और यह पाया था कि प्रत्येक खाद्य-पदार्थ अपने में सात्विक, राजसिक और तामसिक गुण धारण किये हुए है और उनके खाने से मनोभूमि का निर्माण भी वैसा ही होता है। साथ ही यह भी शोध की गई थी कि आहार में निकटवर्ती स्थिति का प्रभाव ग्रहण करने का भी एक विशेष गुण है। दुष्ट, दुराचारी, दुर्भावनायुक्त या हीन मनोवृत्ति के लोग यदि भोजन पकावें या परोसे तो उनके वे दुर्गुण आहार के साथ सम्मिश्रित होकर खाने वाले पर अपना प्रभाव अवश्य डालेंगे। न्याय और अन्याय से, पाप और पुण्य से कमाये हुए पैसे से जो आहार खरीदा गया है उससे भी वह प्रभावित रहेगा। अनीति की कमाई से जो आहार बनेगा वह भी अवश्य ही उसके उपभोक्ता को अपनी बुरी प्रकृति से प्रभावित करेगा।
इन बातों पर भली प्रकार विचार करके उपनिषदों के ऋषियों ने साधक को सतोगुणी आहार ही अपनाने पर बहुत जोर दिया है। मद्य, माँस, प्याज, लहसुन, मसाले, चटपटे, उत्तेजक, नशीले, गरिष्ठ, बासी, बुसे, तमोगुणी प्रकृति के पदार्थ त्याग देने ही योग्य हैं। इसी प्रकार दुष्ट प्रकृति के लोगों द्वारा बनाया हुआ अथवा अनीति से कमाया हुआ आहार भी सर्वथा त्याज्य है। इन बातों का ध्यान रखते हुए स्वाद के लिए या जीवन रक्षा के लिए जो अन्न औषधि रूप समझ कर, भगवान का प्रसाद मान कर ग्रहण किया जायगा वह शरीर और मन में सतोगुणी स्थिति पैदा करेगा और उसी के आधार पर साधना-मार्ग में सफलता मिलनी संभव होगी।
उपनिषदों में इस सम्बन्ध में अनेकों आदेश भरे पड़े है। जैसे-
“खाया हुआ अन्न तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो स्थूल भाग है वह मल बनता है, जो मध्यम भाग है वह माँस बनता है और जो सूक्ष्म भाग है सो मन बन जाता है। पिया हुआ जल तीन प्रकार का हो जाता है। उसका जो स्थूल भाग है वह मूत्र हो जाता है जो मध्यम भाग है वह रक्त हो जाता है जो सूक्ष्म भाग है वह प्राण हो जाता है। हे सौम्य ! मन अन्नमय है। प्राण जलमय है। वाक् तेजोमय है।”
-छान्दोग्य, अध्याय 6 खण्ड 5
“अन्न ही बल से बढ़कर है। किसी को यदि दस दिन भोजन न मिले तो प्राणी की समस्त शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं और वे फिर तभी लौटती हैं जब वह पुनः भोजन करने लगे। तुम अन्न की उपासना करो। यह अन्न ही ब्रह्म है।”
-छान्दोग्य, अध्याय 6 खण्ड 6
“आहार में अभक्ष्य त्याग देने से चित्त शुद्ध हो जाता है। आहार शुद्धि से चित्त की शुद्धि स्वयमेव हो जाती है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है तो क्रम से ज्ञान होता जाता है और अज्ञान की ग्रन्थियाँ टूटती जाती है।”
-पाषुपत ब्रह्मोपनिषद्
“आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। अन्तःकरण शुद्ध होने से भावना दृढ़ हो जाती है और भावना की स्थिरता से हृदय की समस्त गाँठें खुल जाती है।”
-छान्दोग्य
तैत्तरीय उपनिषद् में इस सम्बन्ध में अधिक प्रकाश डाला गया है और आत्म-कल्याण के इच्छुकों को आहार-शुद्धि का विशेष रूप से ध्यान रखने का निर्देश किया गया है।
अन्नाद्वै प्रजाः प्रजायन्ते। याः काश्च पृथिवी श्रिताः। अथो अन्ने नैव जीवन्ति। अथेनदपियन्त्यन्तत्। अन्नœहि भूतानाँ जेष्ठम्। तस्मात्सर्वोषधयमुच्यते। सर्व वै तेऽन्नमाप्तु वन्ति येऽन्नं ब्रह्मोपासते।
“इस पृथ्वी पर रहने वाले समस्त प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं। फिर अन्न से ही जीत है। अन्त में अन्न में ही विलीन हो जाते हैं। अन्न ही सबसे श्रेष्ठ है। इसलिए वह औषधि रूप कहा जाता है। जो साधक अन्न की ब्रह्म रूप में उपासना करते हैं वे उसे प्राप्त कर लेते हैं।”
तस्माद्धा एतस्मादन्नरसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः।
नेनैष पूर्णः। सवा एष पुरुष विध एव।
-तैत्तरीय 2। 2
“इस अन्न रसमय शरीर के भीतर जो प्राणमय पुरुष है वह अन्न से व्याप्त है। यह प्राणमय पुरुष ही आत्मा है।”
अन्न व निन्द्यात्। तद व्रतम्। प्राणों वा अन्नम्। शरीरमन्नार्म प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतन्नमन्ने प्रतिष्ठितम्। स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितं देव प्रतितिष्ठिति। अन्नवानन्नादो भवति। महान भवति। प्रजया पशुभिब्रह्मवर्चसेन। महान कीर्त्या।
तैत्तरीय 3। 7
“अन्न की निन्दा न करें। यह व्रत है। प्राण ही अन्न है। शरीर प्राण पर आधारित है। इसलिए वह अन्न में ही स्थित है। जो मनुष्य यह जान लेता है कि मैं अन्न में ही प्रतिष्ठित हूँ वह प्रतिष्ठावान् हो जाता हैं अन्नवान् हो जाता है। प्रजावान् हो जाता है, पशुवान् भी। वह ब्रह्मतेज से स्पष्ट होकर महान् बनता है। कीर्ति से सम्पन्न होकर भी महान बनता है।”
आगे चलकर अष्टम अनुवाक में और भी निर्देश है-
अन्नं न परिचक्षीत। तद व्रतम्।...........अन्नं बहु कुर्वीत तद् व्रतम्।
“अन्नं की अवहेलना न करें। यह व्रत है। अन्न को बहुत बढ़ावें। यह व्रत है।”
हा…वु, हा…वु, हा…वु, अहमन्नमह महमन्नम्। अह मन्नादो…ऽहमन्नादो …ऽमन्नादः।
-तैत्तरीय 3। 10
“आश्चर्य! आर्श्चय!! आश्चर्य!!! मैं अन्न हूँ! मैं अन्न हूँ! मैं अन्न हूँ! मैं ही का भोक्ता हूँ। में ही अन्न का भोक्ता हूँ, मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ।”
आहार शुद्धौ सत्वशुद्धिः सत्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। स्मृतिलभ्ये सर्व ग्रन्यीनाँ विप्र मोक्ष स्तस्यै मृदित कषायाय ब्रह्मसस्पादर्शयति भगवान् सनत्कुमारः।
जब आहार शुद्ध होता है तब सत्य यानी अन्तःकरण शुद्ध होता है। अन्तःकरण शुद्ध होने पर विवेक बुद्धि ठीक काम करती है। उस विवेक से अज्ञानजन्य बन्धन-ग्रन्थियाँ खुलती हैं। फिर परम-तत्व कर साक्षात्कार हो जाता है। यह ज्ञान नारद को भगवान् सनत्कुमार ने दिया।”
अथर्ववेद में अनुपयुक्त अन्न को त्याज्य ठहराया गया है। प्राचीन काल में हर व्यक्ति आहार ग्रहण करने से पूर्व यह देखता था कि यह अन्न किस प्रकार के व्यक्ति द्वारा उपार्जित एवं निर्मित है। उसमें थोड़ा भी दोष होने पर उसे त्याग दिया जाता था। केवल पुण्यात्माओं का अन्न ही लोग स्वीकार करते थे। किसी के पुण्यात्मा होने की एक कसौटी यह भी थी कि लोग उसका अन्न ग्रहण करते हैं या नहीं।
अथर्ववेद 9 । 6 । 25 में कहा गया है-
सर्वोवा एष जग्ध पाप्मा यस्यान्नमश्नन्ति।
“अर्थात्, वही व्यक्ति पुण्यात्मा है जिसका अन्न दूसरे खाते हैं।”
आज भी वह पुरानी प्रथा देहाती क्षेत्रों में किसी रूप में प्रचलित है कि जिसके आचरण अनुचित समझे जायें उसके यहाँ का अन्न, जल ग्रहण न किया जाय। जातिच्युत होने में यही दण्ड मुख्य होता है।
वाल्मीकि रामायण में अन्तःकरण को देवता के रूप में प्रस्तुत करते हुए इसी प्रकार का प्रतिफल बतलाया गया है, लिखा है-
“यदन्न पुरुषों भवति तदन्नास्तस्य देवताः।”
“अर्थात् मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसके देवता खाते हैं।”
कुधान्य खाकर साधना करने से साधक का इष्ट भी भ्रष्ट हो जाता है और उससे जिस प्रतिफल की आशा की गई थी वह प्रायः नहीं की प्राप्त होता।
उपकारिषु यस्साधुः साधुत्वे तस्य कोगुणः।
अपकारिषु यस्साधुः स साधु सदिभरुच्यते॥
जो पुरुष उपकारी व्यक्ति के प्रति सज्जनता दिखलाता है, उसकी सज्जनता का कोई मूल्य नहीं। सज्जनता या साधुता तो वही है जो दुर्जन के प्रति सज्जनतापूर्ण व्यवहार दिखलाये और सच्चा साधु भी वही जो दुष्ट के प्रति भी साधु व्यवहार करे।
जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता अर्जित करने के लिए कई बातों की आवश्यकता होती है। आवश्यक तैयारी में तनिक से कमी रहने पर भी सफलता कोसों दूर हट जाती है। तनिक सी भूल-चुक हो जाने पर मनुष्य के मनोरथ अपूर्ण ही रह जाते है। सफलता का मार्ग बड़ा क्लिष्ट और जटिल है। वह अनेकों बातों पर निर्भर करती है। जिनमें कुछ निम्न हैं।
(1) एक लक्ष्य, एक ध्येय :- संसार में अनेकों कार्यक्रम हैं। मानव की शक्ति, क्षमता एक सीमित और निर्धारित परिधि में रहती है। जन-साधारण एक साथ अनेकों लक्ष्य, अनेकों कार्यक्रमों का बोझा नहीं ढो सकता। कोई भी मनुष्य अनेकों दिशाओं में भाग दौड़ नहीं सकता। प्रत्येक मनुष्य के लिए जो सफलता प्राप्त करना चाहता है उसे एक ही लक्ष्य का चुनाव करना पड़ेगा। उसे ही अपना अभीष्ट ध्येय बनाना पड़ेगा। उसी के अनुसार कार्यक्रमों में लगना पड़ेगा। युद्ध के लम्बे और विस्तृत क्षेत्र में किसी फौजी टुकड़ी का नायक दुश्मन से भिड़ने के लिए मोर्चा बना लेता है। उसी मोर्चे पर जब वह डटकर संघर्ष करता है तो बहुत कुछ सफलता मिल जाती है। यही बात जीवन संग्राम पर भी लागू होती है। जीवन में एक लक्ष्य, एक ध्येय और एक कार्यक्रम का चुनाव सफलता की पहली माँग है। संसार के महान कहे जाने वाले और सामान्य दर्जे के लोगों में एक यही अन्तर रहा है। महान बनने वाले अपने जीवन को एक दिशा में प्रेरित कर उसमें खपा देते हैं। दूसरी ओर सामान्य लोग कभी इधर कभी उधर भटकते रहकर जीवन में कोई महत्वपूर्ण सफलता अर्जित नहीं कर पाते।
जीवन में असफल होने वाले बहुत से लोगों का एक कारण अपने लिए एक निर्दिष्ट दिशा-लक्ष्य का चुनाव न करना भी रहता है। कभी इधर, कभी उधर, एक को छोड़कर दूसरे में, दूसरे को छोड़कर तीसरे काम में लगने वाले व्यक्ति किसी में भी सफलता प्राप्त नहीं करते। इसलिए अपने जीवन की एक दिशा निर्धारित कीजिए और सदैव उसी ओर चलते रहिए। कई लोग एक कार्य में बहुत-सा समय बिता कर उसे छोड़ बैठते हैं और फिर दूसरे काम को हाथ में लेते है। इस तरह के अधिकाँश लोग जीवन में असफलता का ही सामना करते हैं।
कई लोग काम कुछ करते हैं और उनका मन उलझा रहता है किन्हीं दूसरी बातों में। ऐसा मनुष्य अपने काम को पूरा-पूरा अंजाम नहीं दे पाता। बैठे हैं दुकान पर और मन घूम रहा है सर्कस में। काम कर रहे हैं दफ्तर में किन्तु मन उलझा रहता है राजनैतिक दाव-पेंचों में। अतएव उन्हें किसी भी तरफ से सफलता नहीं मिलती। चाहे कितना ही छोटा सामान्य लक्ष्य क्यों न चुना जाय, मनुष्य यदि अन्त तक उसमें एकाग्र होकर लगा रहेगा तो वही उसका सफलता के वरदान से स्वागत करेगा। किसी भी कार्य को हाथ में लेकर उसे पूरा करने में कोई कसर न उठा रखना ही सफलता का मूलमंत्र है।
(2) शक्ति और क्षमता का उपयोग :- पानी को एक निश्चित ताप तक गर्म करने पर ही उससे भाप बनती है- वह भाप जिसकी शक्ति से विशालकाय इंजन धक्का पाकर अपने पथ पर आगे बढ़ता है। यदि भाप अन्य रास्तों से निकल जाय या पानी को कम दर्जे की गर्मी दी जाय जिससे भाप पैदा नहीं हो तो इंजन आगे नहीं बढ़ेगा। जीवन-रूपी इंजन को भी अपने लक्ष्य, उद्देश्य की ओर अग्रसर करने में अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को केन्द्रित करना पड़ता है। किसी कार्य की पूर्ति के लिए आवश्यक शक्ति क्षमता की आवश्यकता है। जब तक मनुष्य अपनी सम्पूर्ण शक्ति, क्षमता को अपने लक्ष्य की पूर्ति में नहीं लगाता तब तक सफलता संदिग्ध ही रहती है। अधूरे मन से जी चुराकर बोझा समझकर अपने काम में लगने वाले लोगों को प्रायः असफलता ही मिलती है। किसी काम की इच्छा करने से या लक्ष्य का चुनाव करने से ही काम की पूर्ति नहीं हो जाती। काम के लिए लक्ष्य के लिए, प्राणपण से जाना होता है तभी सफलता की मंजिल पाई जा सकती है। बिना श्रम और प्रयास के सफलता की आशा करना आकाश-कुसुम तोड़ने के समान ही है। अतः अपने लक्ष्य की सिद्धि के लिए सफलता के लिए अपनी समस्त शक्ति और क्षमता का उपयोग कीजिए। प्राण-प्रण से उसमें जुट जाइए।
(3) व्यापक दृष्टिकोण :- जीवन में किसी भी कार्य के चुनाव के लिए अपनी रुचि और पसन्द को स्थान देना ठीक है किन्तु फिर भी अनुभवहीनता, एवं अज्ञान की स्थिति में मनुष्य की रुचि और पसंद का दायरा बहुत ही सीमित और संकीर्ण रहता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य जीवन में आने वाले कई सुअवसरों को अपनी रुचि का विषय न समझकर टाल देते हैं। मनुष्य इन अवसरों से लाभ उठाकर बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर सकता है। कई बार ऐसा भी होता है कि अपनी पसंद और इच्छा के कार्य का समय निकल जाता है और मनुष्य केवल लीक ही कूटता रहता है। परिणाम यह होता है कि असफलता का ही सामना करना पड़ता है। इसलिए श्रेयार्थी को अपनी अच्छा और पसंद के स्वभाव को व्यापक बनाना चाहिए। यदि कोई महत्वपूर्ण कार्य करने का अवसर सामने आये तो उसे छोड़ा नहीं जाय। ‘मुझे यह पसंद नहीं’, यह इच्छा नहीं लगता, इससे मेरी रुचि नहीं आदि मान्यतायें रखना, अपने आपको सीमाओं में जकड़ लेना है, जो प्रगतिशीलता के लिए अवरोध हैं। हमारी कार्य-प्रणाली, इच्छा और पसंद की प्रेरणा पर निर्भर न रहे वरन् कार्य करना हमारा स्वभाव, हमारी आदत में होना चाहिए। पसंद और इच्छा के भरोसे न बैठकर सामने आने वाले कार्य में जुट जाने वाला व्यक्ति जीवन में एक-एक करके अनेकों सफलतायें प्राप्त कर सकता है।
(4) खतरों से खेलने का स्वभावः- अक्सर लोग किसी सम्भावना के पीछे चलने में, सफलता के लिए खतरा उठाने में डरते हैं, झिझकते हैं। लोग सदैव इसी चक्कर में रहते हैं कि बिना खतरा मोल लिए ही कोई सफलता मिल जाय। किन्तु बिना जोखिम उठाये, खतरों से बचने वालों से तो असफलता कोसों ही दूर रहती है। जो जीवन में आने वाले खतरों के बावजूद भी लोग बढ़ते हैं सफलता उन्हीं का स्वागत करती है। जो भावी आशंका, भय से ग्रस्त होकर किसी काम में हाथ ही नहीं डालेंगे, या जो आगे बढ़ने में झिझकते हैं वे कभी सफल नहीं होते। बिना हौसले और हिम्मत, आकाँक्षाओं का बिना सामना किये जीवन संघर्ष में कैसे सफलता मिल सकती है? यदि हिम्मत और साहस के साथ खतरों से लेकर आगे बढ़ने पर भी मनुष्य को असफलता मिल जाय तो वह उससे कहीं अच्छी है जिसमें मनुष्य आकाँक्षाओं से भयभीत होकर हाथ पर हाथ धरे बैठा रहता है। आगे बढ़ने के लिए कदम ही नहीं उठाता। पहली श्रेणी का व्यक्ति आने वाली असफलताओं के बावजूद भी अपने प्रयत्न जारी रखेगा तो एक दिन सफलता स्वयमेव चली आयेगी। अस्तु आशंकाओं का सामना कीजिए, साहस और हिम्मत से खतरों में भी आगे बढ़िये। जोखिम उठाये बिना जीवन में कोई महत्वपूर्ण सफलता नहीं पाई जा सकती।
(5) खिलाड़ी की भावना रखें :- अपने मार्ग पर चलते हुए, अपने कार्यक्रम में लगे रहते हुए भी खिलाड़ी की भावना अनिवार्य है। काम को खेल समझकर किया जाय। जो व्यक्ति अपने काम का हिसाब किताब देखकर, उसका बोझा ढोते हुए चलता है वह बीच में ही चकनाचूर हो जाता है। सफलता तक नहीं पहुँच पाता। कदाचित वह सफल भी हो जाय तो उस समय इतना थका हुआ होता है कि सफलता का आनन्द नहीं ले पाता। अत्यन्त व्यस्त रहते हुए भी अपने आनन्द, विश्राम शाँति को तिरोहित न होने दिया जाय। अपने ऊपर काम को सवार नहीं होने दिया जाय वरन् काम के ऊपर सवार रहें। कार्य करना, लक्ष्य की ओर आगे बढ़ना एक स्वभाव बना लिया जाय। जीवन में इतनी निश्चिन्तता रहे कि खाते समय, सोते समय मनोरंजन के समय काम का भूत परेशान न करे। अपने आनन्द, शाँति, सन्तोष को बेचकर यदि स्वर्ग का वैभव मिलता हो तो विवेकशील व्यक्ति को उसे अस्वीकार कर देना ही श्रेयस्कर होगा। कार्य को खेल मानकर कीजिए। इससे वह आपकी शक्तियों का शोषक न बनकर उर्वरक खाद का काम देता रहेगा।
हमारे जीवन में नित्य प्रति उठ खड़ी होने वाली शिकायतें समस्यायें परेशानियाँ बहुत कुछ हमारी अपनी ही बनाई हुई होती है। गलत चिन्तन और अस्वस्थ मनोस्थिति ही हमारे सामने सुरक्षा की तरह मुँह बायें खड़ी समस्याओं, शिकायतों का प्रमुख कारण होती हैं। कभी-कभी हम एक ही विषय पर बहुत अधिक सोच-विचार करने लगते हैं जिससे जीवन के अन्य अंग अविकसित ही रह जाते हैं।
कभी-कभी हम भविष्य की कल्पित समस्याओं में इतने उलझ जाते हैं कि वर्तमान का सदुपयोग ही नहीं कर पाते। कभी-कभी हम अतीत की स्मृतियों में खो जाते हैं और अपने भाग्य को कोसा करते हैं। कभी जीवन में प्राप्त असफलताओं पर ही पश्चाताप करते बैठे रहते हैं। जीवन की उत्कृष्ट उपलब्धियाँ अपना मूल्य चाहती हैं किन्तु हम भय या शंकावश आगे पग नहीं बढ़ाते, फलस्वरूप जहाँ के तहाँ खड़े अपने दुर्भाग्य का रोना रोते रहते हैं। संक्षेप में अपनी असफलता, परेशानियों, उलझनों, भय, शंका, डर आदि के कारण हम स्वयं ही हैं। स्वस्थ मानसिक स्थिति और सही दृष्टिकोण अपना कर हम जीवन के अमूल्य वरदानों का लाभ प्राप्त कर सकते हैं, इसमें तनिक भी संदेह नहीं।
अधिकाँश लोगों को भविष्य की चिन्ता सताती रहती है। यह उचित भी है, भावी जीवन के बारे में सोच विचार करना दूरदर्शिता है। किन्तु भविष्य के बारे में इतना चिन्तित हो जाना जिससे वर्तमान की उपेक्षा होने लगे ठीक नहीं। भविष्य की कल्पना चाहे कितनी ही सुन्दर हो, उसके चिन्तन में वर्तमान की उपेक्षा और उसके प्रति असंतोष पैदा कर लेना, सफलता और सुख-शाँति का द्वार बंद कर लेना है। स्मरण रखिए वर्तमान के प्रति जागरुक और सचेष्ट रहकर ही आप भविष्य की मनोहर कल्पना को साकार कर पायेंगे। वर्तमान की कद्र कीजिए, उसका उपयोग कीजिए, भविष्य के निर्माण में वर्तमान को आधार बनाइये, एक दिन आप सचमुच अपने भविष्य का साकार दर्शन कर सकेंगे।
बहुत से व्यक्तियों को अपनी आशा अभिलाषाओं के पूर्ण न होने, अरमानों के टूट-फूट जाने की शिकायत रहती है। अपने सुनहले स्वप्न साकार न होने पर, जो सोचा था, वह पूरा न होने पर एक तरह का विषादयुक्त दुःख उनके जीवन में छाया रहता है। हमारे विचार, कल्पनायें, आशा अभिलाषायें, अरमान कितने सही हैं, यथार्थ की धरती पर उनका कितना मूल्य है, वे कितने महत्वपूर्ण और ठोस हैं, यह सोचना भी आवश्यक है। इस तरह विचार करने पर बहुत सी आकाँक्षाएं अनावश्यक और अनुपयुक्त निकलेंगी। शेखचिल्ली की सी कल्पनायें, आशायें यदि पूरी न हो तो इसमें किसी का क्या दोष।
कई बार मनुष्य की आशा, अभिलाषायें, आकाँक्षायें अन्तःप्रेरित न होकर भावावेश, किसी की अन्धाधुँध नकल या किसी कल्पित सुख की प्राप्ति के लोभ से प्रेरित होती हैं और इसीलिए वे पूरी न हो तो इसमें किसका दोष? उच्च आशायें, आकाँक्षायें रखना बुरा नहीं है किन्तु इसके लिए अपने आपको भी तौलना आवश्यक है। कोई भी लक्ष्य पूरा-पूरा मूल्य चुकाये बिना प्राप्त नहीं होगा। क्या अपने अपनी आशा अभिलाषा तथा आकाँक्षाओं के लिए उत्साह, साहस, श्रम, लगन के रूप में मूल्य चुकाया है? यह भी सोचना चाहिए।
किसी भी उत्कृष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य को अनेकों बार असफलताओं के दौर से गुजरना पड़ता है। तब कहीं अन्त में सफलता के दर्शन होते हैं। किन्तु बहुत से लोग बीच में ही अपना साहस छोड़ बैठते हैं। प्रारंभ में प्राप्त कुछ असफलताओं से ही लोगों का धैर्य टूट जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में एक बार सफलता के क्षण अवश्य आते हैं किन्तु वे तभी जब मनुष्य सफलता-असफलता का ध्यान न रखकर अपने कर्तव्य पर डटा रहता है। कई व्यक्तियों को जीवनभर असफलताएं मिली किन्तु वे हारे नहीं और एक दिन असंख्यों असफलताओं के बाद जाकर कहीं सफलता के दर्शन हुए। आप अपनी कुछ असफलताओं के आधार पर ही जीवन का नाप−जोख न करें। अध्यवसाय धैर्य और लगन पूर्ण प्रबल एवं पुरुषार्थ जारी रखें तो सफलता मिलेगी ही।
जीवन को सुख, वर्चस्य, आनन्द से दूर रखने वाली एक दीवार है- अतीत का चिन्तन दरअसल मनुष्य के चिन्तन। का सहज आधार होती हैं अपनी कठिनाइयाँ। अतीत की दुःख घटनाएं मनुष्य के सुखी जीवन में भी दुःख, परेशानियों का संचार कर देती हैं। इससे जीवन की उर्वरता नष्ट होती है। शक्तियाँ पंगु हो जाती है जिससे भावी संभावनाएं भी दफन हो जाती हैं। उन्हें जहाँ का तहाँ गड़ा रहने दें। भूलना, गलती करना, ठोकरें खाना मानव-जीवन का अंग हैं। अतीत की स्मृतियों को सदा के लिए भूल जाइये।
अक्सर लोगों की शारीरिक शिकायतें भी बहुत रहा करती हैं। रुग्णता, शारीरिक असमर्थताएं बहुत से लोगों को परेशान करती हैं। किन्तु शारीरिक स्थिति भी बहुत कुछ मानसिक स्थिति पर निर्भर करती है। मनोविकृति से कई शारीरिक विकृतियाँ जन्म ले लेती हैं। यदि अपने मनोबल को बढ़ाया जाय तो अनेकों शारीरिक शिकायतें स्वतः दूर हो जाती है। कई कठिन रोगों में चिकित्सा आदि का सहारा भी लिया जा सकता है। फिर भी यदि मन स्वस्थ है तो बीमारी में भी प्रसन्नता, मस्ती, आनन्द मुक्त रहा जा सकता है। इतना ही नहीं इससे रोगमुक्त होने की बड़ी सहायता मिलती है। वस्तुतः काल्पनिक मानसिक बीमारियाँ अधिक होती हैं। वास्तविक बीमारी बहुत कम लोगों को ही होती है जिनमें से बहुत कुछ चिकित्सा से ठीक हो जाते हैं। ऐसे अनेकों व्यक्ति इसी धरती पर ही हुए हैं जिन्होंने अनेकों शारीरिक असमर्थताओं के रहते हुए भी जीवन में महान सफलतायें अर्जित की। मानव जीवन विश्व प्रकृति का एक खेल है, आत्मा का एक स्फुरण है, आनन्द, प्रसन्नता, मस्ती जिसका स्वभाव है। परेशानी, क्लेश, असंतोष, शिकायतें हमारे अपने ही प्रयत्नों के फलस्वरूप हैं। जीवन की भयावनी विषादपूर्ण तस्वीर हम अपने ही विचार, दृष्टिकोण और आचरणों से बनाते हैं।
जीवन अनेकाँगी है। सभी दिशाओं में जीवन को उन्मुक्त होकर विकसित होने दीजिए। किसी एक ही बात पर सम्पूर्ण जीवन को उड़ेल न दें, अन्यथा अन्य क्षेत्रों में असफलता एवं निराशा का सामना करना पड़ेगा। मन पर नियंत्रण रखें। हर समय अनेक विषयों पर न सोचें। वरन् जिस समय जो कार्यक्रम सामने हो उसी के बारे में सोचें, उसे ही करें। व्यापार करते समय व्यापार की बातें सोचे। घर में पहुँच कर परिवार की। यदि आप राजनीति के समय व्यापार की, व्यापार के समय गृहस्थ की चिन्ताओं में ग्रस्त रहेंगे तो कोई भी कार्य अच्छी तरह न करेंगे। सोते समय अणु युद्ध और हानि लाभ की बातों पर सोचेंगे तो आपकी नींद ही हराम हो जायेगी।
सोपान भूतं स्वर्गस्य मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम्।
तथात्मानं समाधत्स्व भ्रश्यसे न पुनयथा॥
सुर दुर्लभ मानव शरीर जो बड़े पुण्यों से प्राप्त होता है, स्वर्ग प्राप्ति का सोपान है। इसे शुभ कार्यों में लगाना चाहिये ताकि मनुष्य अवनति, पथ भ्रष्टता, पतन की ओर अग्रसर न हो सके।
जीवन में पद-पद पर साहस और शक्ति की आवश्यकता है। जीवन में आने वाली परिस्थितियों का आप उत्साह और साहस के साथ स्वागत करें, उसकी चुनौती को स्वीकार करें। तभी आप जीवन के वरदानों से लाभान्वित हो सकेंगे। जीवन में खाने-पीने, का उपभोग करने की वस्तुओं का प्रायः अभाव नहीं रहता, सच्चा अभाव अपने मानसिक असन्तुलन, आन्तरिक असन्तोष और गलत दृष्टिकोण का ही रहता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे अधिकाँश दुःख, अभाव, अभियोगों का आधार भी यही है। अपने मानसिक स्वास्थ्य को सुधारें, जो विकृतियाँ अन्दर घर किए बैठी है उन्हें दूर करें तभी आप निश्चय ही आनन्दमय जीवन जी सकेंगे।
जीवनचार अनुभव किये जाने वाले सुख-दुःख मनुष्य की मानसिक स्थिति पर निर्भर करते हैं, हालाँकि अधिकाँश लोग बाह्य परिस्थितियों को अपने सुख-दुःख का कारण मानकर उन्हें कोसा करते हैं या सराहना करते रहते हैं। लेकिन इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि सुख-दुःख मुख्यतया मनुष्य की अपनी मानसिक स्थिति का ही परिणाम है। एक सी परिस्थितियों में एक व्यक्ति सुखी रहता है तो दूसरा दुःख अनुभव करता है। शास्त्रकार ने कहा है।
तमेव विषयं प्राप्य सुख-दुःखे ततो नृणाम्।
मनोऽवस्थितिभेदेन जायेते इति दृश्यते॥
“मन ही सुख-दुःख का कारण है इसीलिए ऐसा देखा जाता है कि एक ही विषय को पाकर मन के अवस्था-भेद से लोग सुख-दुःख अनुभव करते रहते हैं।”
अस्वस्थ मनोवृत्ति के अंतर्गत अपने अज्ञान, एवं अविवेक, नासमझी से सुख के क्षणों का भी हम लाभ नहीं उठा पाते वरन् खुशी में भी दुःख का मातम मनाते रहते हैं। कई बार तो असन्तुलित मन तनिक-सी परेशानी न होते हुए भी काल्पनिक परेशानियों का ऐसा ताना-बाना बुन लेता है जिसमें जीवन की संभावनायें अस्त-व्यस्त हो जाती हैं। इतना ही नहीं सुख के क्षणों को भी हम गंवा बैठते हैं।
बाह्य परिस्थितियों को ही यदि आधार बनाया जाय तो भी ऐसा कभी नहीं होता कि किसी व्यक्ति के जीवन में दुख ही दुःख आये और किसी को सुख ही सुख मिले। जगत में सन्तुलन कायम रखना प्रकृति की विशेषता है। वह किसी को सुख साधनों से मुक्त करती है तो उतने ही अनुपात में दुःख का कारण भी जोड़ देती है। प्रकृति के नियमानुसार प्रत्येक व्यक्ति का जीवन सुख और दुःख के दो पहियों पर चलता है। जिसके जीवन में दुःख की घड़ियाँ आती हैं तो उसके साथ कुछ ऐसी परिस्थितियाँ भी पैदा हो जाती हैं, जिन पर मनुष्य संतोष, शाँति, प्रसन्नता की साँस ले सके।
अति सुख या अति दुःख मनुष्य का अपनी ही अस्वस्थ मनोवृत्ति का परिणाम है।अपने दुःख या अपने सुख में हम एकाकी भाव से इतने डूब जाते हैं कि दूसरे पक्ष का तनिक भी विचार नहीं कर पाते।
कई बार तो मनुष्य को अपने सुख, सफलता, प्रसन्नता के क्षणों में भी भय होने लगता है, अपनी असन्तुलित मनोवृत्ति के कारण। किसी भी परिस्थिति से प्राप्त अति सुख के समय भी हमारे मन में कई तरह के भय, शंकायें, उठ खड़ी होती हैं और सुख के क्षणों को हम दुःख में परिवर्तित कर लेते हैं। अपनी इच्छानुसार सुस्वादु भोजन पाकर भी कई लोग अपनी स्वाद लोलुपता, अथवा पेटू कहलाने की आशंकाओं से ग्रस्त होकर परेशानी में पड़ जाते हैं। कई व्यक्ति परम्परा और संकोच की भावनाओं से ग्रस्त होकर अपने सुखी दाम्पत्य जीवन का भी लाभ नहीं उठा पाते। कई साधन सम्पन्न व्यक्ति मन की शंकाओं के कारण सुविधायुक्त जीवन भी नहीं बिता पाते। गलत नीति और दुराचरण की विकृत कल्पनाओं से प्रेरित होकर मनुष्य दूसरे के सुख, वर्चस्व से भी दुःखी होने लगता है। दूसरे की सफलता, उन्नति से परेशान होता है, नाक भौं सिकोड़ता है। यह सब मनुष्य की अस्वस्थ और असन्तुलित मनोवृत्ति का कारण है। दुःख-सुख की व्यवस्था इसी मनोवृत्ति का परिणाम है।
दुःख अपने आप में कुछ भी नहीं है न इसका कारण कोई परिस्थिति विशेष ही है। हमारी मनोभावनायें, मानसिक स्थिति ही जीवन में अनुभव होने वाले छोटे से लेकर बड़े दुःख का कारण हैं। हमारे अपने अन्दर ही, अपने व्यक्तित्व के पर्दे में ही दुःख की भयावनी तस्वीर छिपी रहती है।
दुःख का मूल आधार मनुष्य के अपने नकारात्मक विचार होते हैं। रचनात्मक, विधेयक विचार मनुष्य में बड़े परिश्रम और लम्बे अभ्यास के बाद परिपक्व होते हैं। किन्तु नकारात्मक मनोभूमि मनुष्य की सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति का परिणाम है, जिसके कारण मनुष्य में चिन्ता, परेशानी, क्लेश, भय, निराशा, हीनता, अवसाद के भावों का विस्तार होता है और ये ही दूषित भाव मनुष्य के दुःख का आधार बनते हैं। बाह्य परिस्थितियों के अनुकूल और सुख साधनों से सम्पन्न होकर भी नकारात्मक मनोभूमि का व्यक्ति दुःख ही अनुभव करता है। इतना ही नहीं वह सुख आनन्द के अवसरों का भी लाभ नहीं उठा पाता। इस तरह जीवन में कभी दुःखों से छुटकारा नहीं मिल पाता।
जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए हमें स्वस्थ, सबल, रचनात्मक मनोभूमि की अत्यन्त आवश्यकता है। इसके बिना हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकेंगे प्रत्युत हमारा असन्तुलित मन ही हमारे विनाश का कारण बन जायेगा। इसके लिए आत्म निरीक्षण द्वारा अपने मनोविकारों को समझा जाय। अपनी मनोभूमि का पूरा-पूरा निराकरण किया जाय। जो भी नकारात्मक विचार हों उनसे पूर्णतया मुक्त होने का प्रयत्न किया जाय। स्मरण रहे आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया इतनी गंभीर भी न हो जिससे जीवन के अन्य अंगों की उपेक्षा होने लगे। केवल अपने बारे में ही सोचते रहना, अपने व्यक्तित्व में घुसाकर ही ताना-बाना बुनते रहना भी आगे चलकर मानसिक दोष बन जाते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि अपनी मनोविकृति के बारे में गंभीरता से सोचा जाय और फिर उसे सुधारने में तत्परतापूर्वक लग जाया जाय।
नकारात्मक विचारों को हटाकर रचनात्मक, विधेयक दृष्टिकोण अपनाने पर दुःखदायी परिस्थितियाँ भी मनुष्य के लिए सुखकर परिणाम पैदा कर देती हैं। वस्तुतः स्वस्थ मनोवृत्ति का व्यक्ति सुख और आनन्द को ही जीवन का सर्वस्व नहीं मानता। एक सीमा तक इन्हें उपयोगी भी माना जा सकता है।
स्वस्थ मनोवृत्ति का मनुष्य दूसरों के सुख, आनन्द से प्रसन्नता अनुभव करता है। वह दूसरों को सुखी देखकर अधिक संतोष अनुभव करता है। जीवन के प्रति सरस और सजीव दृष्टिकोण अपनाने के कारण अपनी कठिनाइयों से भी बहुत कुछ सीखता है और उन्हें एक उग्र अध्यापक मात्र मानकर स्वागत ही करता है।
यदि हमारा मानसिक संस्थान रचनात्मक, स्वस्थ एवं सबल हो तो ऐसा कोई क्षण नहीं होता जिसमें हमें दुःखी रहने का अवसर मिले। सारा जगत एक चमत्कार और प्रसन्नता का स्रोत है हमारे लिये, विशाल नीला आकाश, उड़ते फुदकते कलरव करते पक्षी, धरती पर फैली हरियाली, छोटे-छोटे बच्चों के खेल, सुन्दर पुष्प, मित्र सगे सम्बंधियों का प्रेम आदि अनेकों सुख स्रोत धरती पर मौजूद हैं। इतना ही नहीं दुःख और कठिनाईयों में सुख की खोज की जा सकती है यदि हमारा दृष्टिकोण उत्कृष्ट एवं विधेयक हो। सारा जीवन ही सरस, सजीव और उत्साह का स्रोत है धरती पर। हम कितना सुख या आनन्द प्राप्त कर सकते है यह हमारे अपने ही दृष्टिकोण पर निर्भर करता है।
स्वस्थ मानसिक स्थिति में सुख और आनन्द की सीमा मनुष्य के निजी व्यक्तित्व तक सीमित नहीं रहती। वह अकेला सुख अनुभव नहीं कर सकता। दूसरों को सुखी, प्रसन्न, देखकर भी उसे आनन्द मिलता है। इसीलिए ऐसे लोग अपने सुख आनन्द तक ही सीमित न रहकर दूसरों को भी सुखी बनाने का प्रयत्न करते हुए सन्तोष अनुभव करते रहते हैं।
जो जीवन से प्यार करता है, उसे ही जीवन का रस, और आनन्द का वरदान मिलता है। उसे ही स्वास्थ्य, बल, लोकप्रियता मिलती है, जो जीवन से दोस्ती का हक अदा करता है, सुख और आनन्द उनका स्वागत करते हैं, उनसे लिपटे रहते हैं जिसकी मनोभूमि रचनात्मक, विधेयक रहती है। निराशा, कुढ़न, चिन्ता, क्लेश, ईर्ष्या, अवसाद, भावावेश जहाँ घर किए बैठे रहते हैं वहाँ से सुख, शाँति, आनन्द सदैव दूर ही रहते हैं।
सुख दुःख हमारे अपने ही पैदा किए होते हैं। हमारी अपनी ही मनोभूमि का परिणाम हैं। हम अपनी मनोभूमि परिष्कृत करें, विचारों को उत्कृष्ट और रचनात्मक बनायें, भावनायें शुद्ध करें, इसी शर्त पर जीवन हमें सुख शाँति, प्रसन्नता, आनन्द प्रदान करेगा। अन्यथा वह सदा असंतुष्ट और रूठा हुआ ही बैठा रहेगा और अपने लिए आनन्द के द्वार सदैव बंद रखे रहेगा।
सभी तरह के कार्य, व्यवसाय, खेती, शिल्प, कला, नौकरी मजदूरी आदि अपने-अपने स्थान पर अपना महत्व रखते हैं। प्रत्येक अपने स्थान पर उतना ही उपयुक्त है जितना दूसरे छोटे काम को भी भली प्रकार करते हुए, मनुष्य जीवन में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकता है। इसी तरह बड़े काम को ठीक-ठीक तरह न करके वह जीवन में असफल भी हो सकता है। काम के छोटे-बड़े होने का इतना अधिक महत्व नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात है काम को करने का ढंग तरीका। एक व्यक्ति किसी अच्छे काम को भी लापरवाही एवं अपनी कमजोरियों से बिगाड़ कर जीवन में असफल हो सकता है तो दूसरा व्यक्ति अपने साधारण से काम को रुचि लगन एवं तत्परता के साथ पूर्ण करके उसे जीवन की सफलता का आधार बना लेता है।
‘बाटा’ नाम का एक मोची का लड़का शहर की सड़कों पर बैठकर जूतों की मरम्मत पालिश आदि करता था। किन्तु अपने काम को भली प्रकार करते हुए वह अपने जीवन काल में जूतों का सम्राट बन गया। आज भी बाटा कम्पनी जूतों के लिए प्रसिद्ध और विश्वस्त मानी जाती है। वाशिंगटन साधारण व्यक्ति से बढ़कर अमेरिका के राष्ट्रपति बन गये थे। वे प्रारंभ में एक दीन-हीन किसान परिवार के सदस्य थे। कालिदास अपने ही प्रयत्नों के कारण महामूर्ख से प्रकाण्ड विद्वान बन गये। इस तरह इतिहास में ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जिनमें दीन-हीन सामान्य परिस्थितियों से उठकर अनेकों व्यक्तियों ने महानता प्राप्त की। यह कोई जादू या करामात नहीं थी वरन् अपने सामने आये हुए काम के प्रति उनकी लगन निष्ठा, परिश्रम, दिलचस्पी, जागरुकता एवं अन्य सद्गुणों का परिणाम था।
एक छोटे बच्चे एडीसन को उसकी माँ वैज्ञानिक बनाने के विचार से एक बड़े वैज्ञानिक के पास ले गई और उनके पास अपने बच्चे को रखने की प्रार्थना की। उस वैज्ञानिक ने बच्चे को अपने पास रख लिया और मकान में झाडू लगाने का काम सौंपा। वह बालक बड़ी तन्मयता के साथ मकान में झाडू लगाता। मकान के कोने, दीवारें, छतें, अलमारियां फर्श आदि को वह खूब साफ रखता। वैज्ञानिक बालक की कार्य कुशलता से बड़ा प्रसन्न हुआ और वही उस वैज्ञानिक की देख-रेख में आगे चलकर महान वैज्ञानिक बना। यदि बालक पहले ही यह सोच लेता कि यहाँ तो झाडू लगाने का काम है यहाँ क्या सीखने को मिलेगा चलें? तो शायद वह अपने जीवन की महानता को प्राप्त न कर पाता। अन्य साधारण व्यक्तियों की तरह ही अपना जीवन बिताता।
जब किसी काम को पूर्ण लगन और दिलचस्पी के साथ किया जाय तो मनुष्य की सोयी हुई शक्तियाँ जाग्रत हो उठती है। उसमें काम करने की क्षमता, शक्तियों का विकास हो जाता है। और इसी से वह एक से दूसरे काम में सफलता प्राप्त करता चला जाता है। काम में मन का न जमना, शिकायतें करना, काम की कठिनाइयों को बढ़ा−चढ़ा कर तूल देना, काम से घृणा करना ऐसी बातें हैं जिससे काम में रुचि नष्ट हो जाती है और फिर छोटा हो या बड़ा कोई भी काम पूरा नहीं हो पाता। मनुष्य को असफलताओं का सामना करना पड़ता है, इसी के साथ उसकी अकर्मण्यता भी बढ़ती जाती है।
प्रत्येक कार्य एक कला है, चाहे वह छोटा हो या बड़ा। प्रत्येक कार्य का मौलिक आधार समान है। जिस तरह एक कलाकार अपनी कला से प्रेम करता है उसमें तन्मयता, के साथ खो जाता है, उसके प्रति दिलचस्पी और लगन का अटूट स्रोत उमड़ पड़ता है, उसी तरह प्रत्येक काम को किया जाय तो वह काम ही निश्चित समय पर वरदान बनकर मनुष्य को धन्य कर देता है। प्रत्येक कार्य एक खेल, कला मालूम हो, बोझा न लगे, तभी मनुष्य उसमें सफलता अर्जित कर सकता है।
दिलचस्पी, लगन, तन्मयता के साथ ही अपने काम में सतत जागरुकता, सतर्कता बरतना भी आवश्यक है। इससे दुतरफा लाभ होता है। सर्व प्रथम मनुष्य की मानसिक शारीरिक शक्तियों का नियंत्रण और व्यवस्था कायम होती है। अन्तःक्षेत्र में उठने वाली विघटनात्मक ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का संयम होता है। बुद्धिमता, शक्ति सफलता को सतर्कता जागरुकता से संरक्षण और पोषण मिलता है। बाह्य क्षेत्र में इससे काम की ठीक-ठीक व्यवस्था क्रम निर्धारित होते हैं। काम की आवश्यकतायें महसूस होती हैं और मनुष्य उसके प्रति अपना पूरा श्रम अंजाम कर देता है। अपने कार्यों में ढीलापन, सतर्कता का अभाव, गैर जिम्मेदारी, अव्यवस्था, अनिश्चितता का होना असफलता को निमंत्रण देना ही है। किसी देश का रक्षक दल अपनी ड्यूटी पर तो तैनात हो किन्तु सतर्क और जागरुक न हो, ढीली-ढाली प्रवृत्ति हो, कोई जोश न हो तो उस पर दुश्मन का आक्रमण और देश में दुश्मन की घुसपैठ, तोड़-फोड़ और एक दिन अधिकार हो जाना संभव है। इसी तरह सतर्कता जागरुकता का मनुष्य के कामों में भी इतना ही महत्वपूर्ण स्थान है।
इंग्लैण्ड की एक घटना है। एक भारतीय ने अपने कपड़े एक दर्जी को सिलने के लिए दिए। दर्जी ने कपड़ों को तैयार कर लौटाने की निश्चित तिथि बतला दी। निश्चित दिन वे महाशय अपना कपड़ा लेने उस दर्जी के यहाँ गये। उन्होंने देखा दुकान बंद है किन्तु एक खिड़की खुली हुई है और उसमें एक लड़का बैठा हुआ है। लड़के से पूछ-ताछ करने पर उसने कहा ‘आज मालिक के घर एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई है सब लोग उसे दफनाने गये हुए हैं। केवल मैं ही आपके कपड़े देने के लिए बैठा हुआ हूँ।’ बच्चे ने कपड़े दिए और फिर खिड़की बंद कर दी। अपने काम के प्रति इस तरह की जागरुकता पाबंदी ही मनुष्य को उसमें सफल बनाती है।
अपने काम के प्रति सतत जागरुक रहने वाले, समय के पाबंद लोग सर्वत्र विश्वासपात्र माने जाते हैं। तत्परता से ही विश्वसनीयता प्राप्त होती है। जो मालिक स्वयं कार्यरत रहते हैं, जिन्हें अपने काम की बारीकियों से लेकर गहरी बातों तक का ज्ञान रहता है वे अपने कर्मचारियों के लिए भी प्रेरणाप्रद बन जाते हैं और काम में ढील-ढाल, टालमटोल करने वाले कर्मचारियों पर अंकुश का काम देते हैं। वे समय के आगे रहते है और अपने काम पर सवार रहते हैं। जो लोग आलस्य और ढीली-ढाली प्रवृत्ति से अपने काम पर तैयार नहीं रहते वे पिछड़ जाते हैं।
किसी भी व्यवसाय, काम की सफलता के लिए उसमें व्यवस्था, सफाई, स्वच्छता, रखना उतना ही आवश्यक है जितना उसके प्रति दिलचस्पी लगन जागरुकता आदि। स्वच्छता, व्यवस्था, क्रम से ही काम में सौंदर्य, आकर्षण और उत्कृष्टता पैदा होती है। किसी भी छोटी दुकान, शिल्प कार, कलाकार के मकान से लेकर बड़े होटल, व्यावसायिक केन्द्र, कारखाने तक में यदि अव्यवस्था गंदगी होगी, अस्त-व्यस्त सामान बिखरा पड़ा होगा तो कोई भी वहाँ आने वाला व्यक्ति उससे प्रभावित न होकर दूर हटने का ही प्रयत्न करेगा। गंदगी, अव्यवस्था, फूहड़पन के वातावरण में लोगों का सर चकराने लगना, जी मिचलाना, मिज़ाज खराब होना स्वाभाविक ही है। ऐसी स्थिति में किसी व्यवसाय की सफलता होने की आशा करना विडम्बना ही होगी। व्यवस्था, स्वच्छता, क्रम, सही तरीके के अभाव में कई व्यक्ति अपने वर्षों से चालू किए गये काम की प्रारंभिक स्थिति, गई बीती हालत में ही पड़े रहते है। अपना दीन-हीन घिनौना जीवन बोझ की तरह बिताया करते हैं।
न हृष्यत्यात्मसंमाने, नावमानेन तप्यते।
गाँगो ह्रद इवाक्षोन्यो, यः स पण्डित उच्यते॥
जो आत्म सम्मान से फूलता नहीं, तिरस्कार से दुःखी नहीं होता। गंगा के आगाध जल की भाँति कभी क्षुब्ध नहीं होता-वह पण्डित कहलाता है।
सतर्कता, तन्मयता उत्साह प्रसन्नता के साथ भविष्य की आशा रखकर सुव्यवस्था, स्वच्छता, सफाई, क्रमबद्ध रूप से मनोयोगपूर्वक किए गए कार्यों में कुछ अपवादों को छोड़कर आम तौर पर मनुष्य को सफलता मिलती ही है। सामान्य से महान बनने के लिए अपने काम के प्रति पूरा-पूरा अंजाम देना और निष्ठा, लगन के साथ कर्मों पासना करना आवश्यक है।
नदी को सागर तक पहुँचने में अनेकों अवरोधों एवं रुकावटों का सामना करना पड़ता है। बड़ी-बड़ी चट्टानें उसके मार्ग में आती हैं और रुकावट डालती हैं। लेकिन जल अवरोधों से टकराकर नदी के प्रवाह में तेजी, उत्तेजना होती है। वह अपने बहने के तारतम्य को नहीं तोड़ती और एक क्षण ऐसा आता है जब उन अवरोधों को अपने आप हट जाना पड़ता है नदी के मार्ग से, या उसके प्रवाह में टूट-टूट कर बह जाना पड़ता है।
मानव जीवन में भी अन्त तक अवरोधों का सामना करना पड़ता है। जितने उच्च लक्ष्य, कार्यक्रम होंगे उतने ही अनुपात में मनुष्य को विरोधों का सामना करना पड़ता है। इसीलिए जीवन को संघर्षमय कहा गया है। कोई भी व्यक्ति अथवा समाज जब किसी महान लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है तो दूसरे लोग अकारण ही विरोध करने लगते हैं। उससे जलने लगते हैं उसके मार्ग में रुकावटें डालते हैं, उपहास करते हैं। प्रत्येक प्रगतिशील व्यक्ति को तो अवश्य ही अपने जीवन में इन तत्वों का सामना करना पड़ता है। किन्तु मनस्वी लोग इन विरोध, रुकावटों को ही अपनी प्रगति और सफलता की फसल के लिये खाद बना लेते हैं। कठिनाई और विरोध का अवसर आने से ही मनुष्य के पराक्रम और आत्म-विश्वास का विकास होता है। विरोध उत्साहियों के उत्साह को कई गुना बढ़ा देता है। वस्तुतः विरोधी हमारी सहायता करता है क्योंकि उससे हमारे गुणों का विकास होता है। हममें उत्साह और आत्म स्फूर्ति की वृद्धि होती है।
बहुत से लोग विरोध के सामने आत्म-समर्पण कर बैठते हैं। हार मान लेते हैं और आगे बढ़ने के विचार ही छोड़ देते हैं। लेकिन यह मानसिक कमजोरी ही मानी जायेगी। विरोध को अनुकूलता में ढाल लेना एक महत्वपूर्ण सफलता है। जो इस सीमा को पार कर लेते हैं, वे जीवन में सफलता की मंजिल भी पार कर ही लेते हैं।
किसी भी शुभ कार्य को प्रारंभ करते ही मनुष्य को दूसरे लोगों के उपहास का सामना करना पड़ता है। लोग कहने लगते हैं ‘अरे! यह क्या कर लेगा? बेकार दूसरों की नकल करता है। अपने पैर देखकर तो चलता नहीं आदि आदि। लोग व्यर्थ ही उसकी खिल्ली उड़ाने लगते हैं। बार-बार टोकते हैं। तरह-तरह से उपहास करते हैं। इस तरह मनुष्य को अपने कार्य के शुभारंभ में ही भारी उपहास का सामना करना पड़ता है और बहुत से दुर्बल मन वाले लोग यहीं हारकर बैठ जाते हैं। उनका संकल्प, आकांक्षायें जन्म लेते ही मर जाती हैं।
जब कई दृढ़ संकल्प व्यक्ति इस तरह के उपहास की परवाह न कर अपने प्रयत्न जारी रखते हैं तो प्रतिपक्षी लोग खुलकर विरोध करने लगते हैं। प्रगतिशील के मार्ग में रुकावटें डालते हैं विघ्न उपस्थित करते हैं। उसके आचरण, चरित्र पर आक्षेप करने लगते हैं। उसके सहयोगियों को बहकाते फुसलाते हैं। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में उलटा सीधा कहते हैं। इस स्थिति में भी कई लोगों का धैर्य डगमगा जाता है और बहुत से लोग यहाँ आकर अपने पाँव को पीछे हटा लेते हैं। अपने लक्ष्य और शुभ कार्य को छोड़ बैठते हैं।
ऐसे ही मनस्वी होते हैं जो इस तरह के विरोधों की परवाह न कर एकाग्रता के साथ लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं और उनके अथक परिश्रम और लगन के कारण जब सफलता के आसार दीखने लगते हैं तो वे ही विरोधी, आलोचक अपनी सहानुभूति दिखलाने लगते हैं यहाँ तक कि वे लोग उनके साथ ही आ मिलते हैं। अधिकाँश विचारों विरोधी करना छोड़ देते हैं।
शुभ कार्यों में लगने वाले, उन्नति और विकास की ओर बढ़ने वालों के समक्ष एक ही मार्ग है दृढ़ता के साथ अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर गतिशील रहना। एक बार लक्ष्य और उत्कृष्ट मार्ग का चुनाव कर फिर उस ओर निरन्तर आगे बढ़ते रहना कर्मवीर के लिए आवश्यक है। मार्ग में क्या-क्या मिलता है, किन अवरोधों का सामना करना पड़ता है, क्या-क्या गुजरता है, इसकी परवाह किए बिना उपहास, विरोध, आक्षेपों को सहन करते हुए जो अन्त तक लगा रहता है वह अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त कर ही लेता है। किन्हीं परिस्थितियों वश सफलता न भी मिले तो अपने सदुद्देश्य लक्ष्य के लिये मर मिटना या असफल होना भी श्रेयस्कर है। इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए गीताकार ने कहा है-
‘हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्ग
जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुतिह कौन्तेय
युद्धाय कृत निश्चयः॥
‘या तो मर कर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा जीतकर पृथ्वी को भोगेगा, इससे हे अर्जुन! कृत-निश्चय होकर युद्ध के लिये तैयार हो।’
निश्चय ही जीवन संग्राम में किसी भी विरोध उपहास या मोह से ग्रस्त होकर विरत हो जाना मनस्वी लोगों के लिये जीवित ही मृत्यु प्राप्त करने के समान है। उनके लिये एक ही रास्ता है अपने पथ पर आगे बढ़ते रहना। इससे परिणाम में प्राप्त होने वाली असफलता भी, सफलता का ही दूसरा स्वरूप है। उससे मिलने वाला आत्म-संतोष सफलता से कम नहीं होता।
विरोध और विघ्नों से निपटने का दूसरा मार्ग है उनकी उपेक्षा करना। समाज में संकीर्ण प्रकृति के लोग, परम्परा के अन्धानुयायी, कूप मण्डूक लोगों की कमी नहीं होती। इन्हीं का वर्ग बड़ा होता है। यही कारण है कि सदा से नवीन पथ को खोज निकालने वाले, प्रगति और विकास के उपासकों को इन बहुसंख्यक लोगों के विरोध का सामना करना पड़ा है। ऐसे लोग व्यर्थ ही ईर्ष्या, द्वेष या अपने स्वार्थों से प्रेरित होकर सज्जनों के मार्ग में रोड़े अटकाते हैं, उन्हें भला−बुरा कहते हैं मजाक उड़ाते हैं। किन्तु इसका एक ही समाधान है ऐसे लोगों की प्रवृत्तियों को उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाय। उन्हें अपनी नीचता को प्रकट करने दीजिये लेकिन आप अपनी सज्जनता और शालीनता न छोड़ें। अपने मार्ग पर चलते रहें। वे लोग अपने आप ही थक कर बैठ जायेंगे। ऐसे लोगों से उलझने में आपकी शक्ति व्यर्थ ही नष्ट होगी।
वस्तुतः इस तरह के विरोधी बहुत ही छोटी बुद्धि के, निम्नस्तर के लोग होते हैं जो अकारण ही जलते भुनते रहते हैं। बुद्धिमान मनुष्य को सदा ही इनके आचरण और हाव-भावों की उपेक्षा ही करनी चाहिये।
भयंकर तूफान से गेलीलो झील का पानी बांसों ऊंचा उछलने लगा। जो नावें चल रहीं थी वे बुरी तरह थरथराने लगी। लहरों का पानी भीतर पहुँचने लगा तो यात्रियों के भय का आरापार न रहा।
एक नाव में एक कोने में कोई निर्द्वंद्व व्यक्ति सोया पड़ा था। साथियों ने उसे जगाया। जग कर उसने तूफान को ध्यानपूर्वक देखा और फिर साथियों से पूछा- आखिर इससे डरने की क्या बात है? तूफान भी आते ही हैं, नावें भी डूबती ही हैं और मनुष्य मरते ही हैं। इसमें क्या ऐसी अनहोनी बात हो गई जो आप लोग इतनी बुरी तरह हड़बड़ा रहे हैं?
सभी उसका उत्तर सुनकर अवाक् रह गए। निर्द्वंद्व व्यक्ति ने कहा-विश्वास की शक्ति तूफान से बड़ी है। तुम विश्वास क्यों नहीं करते कि यह तूफान क्षण भर बाद बंद हो जायेगा।
भयभीत यात्रियों के उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना उस अलमस्त ने आँखें बंद की और अपने भीतर की झील में उतर कहा-पूरी शक्ति के साथ कहा- शाँत हो जा मूर्ख! तूफान तुरंत शाँत हो गया।
सहमे हुये नटखट बच्चे की तरह तूफान रुक गया। नाव का हिलना बंद हुआ कि यात्रियों ने चैन की साँस ली। अब उस अलमस्त यात्री ने- जीसस क्राइस्ट ने साथियों से पूछा-दोस्तों, विश्वास बड़ा है। तूफान को तुमने उससे भी बड़ा क्यों मान लिया था?
नित्से जर्मनी के उस दार्शनिक का नाम है जिसने धार्मिकता और आस्तिकता अपनाने की अपेक्षा मनुष्य को श्रेष्ठ मनुष्य, महामानव, अतिमानव बनने की प्रेरणा दी। वह प्रत्येक आदर्श और विचार को विवेक एवं उपयोगिता की कसौटी पर कसने का पक्षपाती था। इसलिए उसने समाज में प्रचलित मान्यताओं में से प्रत्येक पर कसौटी लगाई और उसकी दृष्टि में जो कुछ भी खरा नहीं उतरा उसी को उसने अमान्य ठहराया। उसकी कसौटी पर आस्तिकता और धार्मिकता का प्रचलित स्वरूप भी खरा नहीं उतरा इसलिए उसने केवल प्राचीनता के आधार पर या किन्हीं ग्रंथों एवं संतों के द्वारा प्रतिपादित होने के कारण उन्हें मान्य नहीं ठहराया। उसने विवेक को अपनाने पर बहुत जोर दिया, सत्य की कसौटी पर हर आदर्श की कड़ी परीक्षा लेने के लिए उसने जन-साधारण को आमंत्रित किया।
प्रिंस विस्मार्क जर्मनी को शक्तिशाली बनाने में संलग्न थे, राजकीय सैनिक और औद्योगिक शक्ति से अपने राष्ट्र को अधिकाधिक सम्पन्न बनाने का प्रयत्न कर रहे थे, उनके कार्यक्रम को सफल बनाने में नित्से के दर्शन का महत्वपूर्ण हाथ था।
नित्से आरंभ में एक धार्मिक ईसाई थे। बड़े प्रेम से बाइबल पढ़ा करते थे। पढ़ते-पढ़ते कई बार भावावेश में उनकी आँखों से आँसू बहने लगते थे। पर जैसे-जैसे बड़े होते गये, हर बात को उन्होंने कसौटी पर कसना शुरू किया। फलस्वरूप उन्हें ईसाई मान्यताओं से विरति हो गई। धार्मिक ईश्वर के स्थान पर उन्होंने ‘अति मानव’ की देवता के रूप में कल्पना की और इस बात पर जोर दिया कि मनुष्य को आध्यात्मिक ही नहीं भौतिक दृष्टि से भी अधिकाधिक विकसित होना चाहिये।
अपने निजी जीवन के कटु अनुभवों के आधार पर वे सुरा, सुन्दरी के घोर विरोधी थे। उसने इनके फेर में पड़कर बहुत कुछ खोया था और भारी ठोकरें खाई थीं इसलिए वे उनके जाल से विचारशील लोगों को बचते रहने की ही सलाह देते थे।
नित्से ने कितने ही महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे हैं। उनमें ‘दस स्पीक जराथस्ट’ की बहुत प्रशंसा है। स्वयं लेखक ने इसे अपनी सर्वोत्कृष्ट और महान कृति माना है। फिर भी उसके जीवन काल में उसकी बहुत कम प्रतियाँ बिकी।
इस महान दार्शनिक के विचारों से हिटलर प्रभावित हुआ और उसने नाजीवाद अपनाया। उसी की प्रेरणा से जर्मन जाति, शक्ति और शौर्य की उपासक बनी और वह नशा इतना गहरा चढ़ा कि दो-दो महायुद्धों में हारने और भारी क्षति उठाने पर भी खुमारी अभी तक गई नहीं है। जर्मन युवक अभी भी विश्व-विजय के सपने देखते हैं।
नित्से ने लिखा है-’पीछे की ओर नहीं, आगे की ओर देखो। पूर्वजों की कब्र में तुम्हें नहीं रहना है वरन् अपनी सन्तति के साथ ही दिन काटने है, इसलिए भविष्य ही तुम्हारी आशाओं का केन्द्र होना चाहिए। उसी के निर्माण में तुम्हारी इच्छा शक्ति केन्द्रित होनी चाहिए। तुम सबको स्वतंत्र रूप से हर समस्या पर विचार करना चाहिए जैसा कि मैंने किया है। केवल अच्छे बनने से काम न चलेगा। साथ ही दुरुस्त बनने की भी कोशिश करो।’
नित्से ने दो प्रकार की नैतिकता का प्रतिपादन किया है। एक वीरोचित दूसरी दासोचित। वीरोचित नैतिकता में वे पुरुषत्व, साहस, कर्मठता और वीरता का प्रतिपादन करते हैं और इसके लिए कठोरता, हिंसा, भयंकरता, युद्ध और कूटनीति को आवश्यक गिनाते हैं। दासोचित नैतिकता में वे विनम्रता, अनासक्ति, दीनता, दयालुता और शाँति को मिलते हैं। उसने ईसाई धर्म से बौद्ध युग जैसा खतरा देखा और जनता को केवल सज्जनता और शाँति की ही रट न लगाते रहने की चेतावनी देते हुए कहा-’यह संसार शक्ति और श्रेष्ठता के सिद्धान्तों पर चल रहा है। योग्यतम का, दूसरों को परास्त करके जीवित रहना, एक कठोर तथ्य है जिसे समझ लेना ही बुद्धिमानी है। जीवन संग्राम में पिछड़ कर अपने आपको नष्ट होने से बचाने के लिए दृढ़ इच्छा शक्ति, प्रभुत्व की लालसा और प्रबल मनोवेगों की आवश्यकता है इसके बिना कोई व्यक्ति या समाज महान नहीं बन सकता। साहसी बनना, शक्तिशाली बनना ही सत् है। दुर्बलता ही असत है।’
उन्होंने गणतंत्र के सिद्धांतों का भी विरोध करते हुए कहा-’सब मनुष्य समान नहीं हो सकते। गणतंत्र का अर्थ है-’घटिया लोगों का वर्चस्व और श्रेष्ठ व्यक्तियों का तिरस्कार’ ऐसी स्थिति में महापुरुष न तो उत्पन्न हो सकते हैं और न उन्हें वर्चस्व प्राप्त हो सकता है। चुनावों में होने वाली धाँधली और अशिष्टता को पार कर आगे बढ़ सकना श्रेष्ठ पुरुषों के लिए किस प्रकार संभव हो सकता है?’
आज जनतंत्र के युग में नित्से के विचार विलक्षण लगते हैं, उनकी व्याख्यायें विचित्र मालूम पड़ती हैं, और शाँति तथा समानता के सर्वप्रिय सिद्धान्तों से परिचित लोगों के लिए उनकी बातें अग्राह्य जंचती है, फिर भी इसमें संदेह नहीं कि उनके विचारों के पीछे एक बल है और एक समय ऐसा आया था जब लगता था कि नित्से द्वारा पोषित अधिनायकवाद के सिद्धान्तों के आगे ही कहीं दुनिया को मस्तक न झुकाना पड़े।
नित्से जब मरने को थे तो उनने अपनी बहिन से कहा-”मेरे शव के साथ स्वजनों के अतिरिक्त और कोई कोलाहल करने वाली भीड़ न हो। मेरी समाधि के पास किसी पादरी को न आने देना। मैंने अपनी रक्षा उनसे की है, तुम मेरी समाधि को भी उनकी परछांई से बचाना और एक ईमानदार नास्तिक की तरह मुझे दफना देना।”
सन् 1844 में वे जन्मे और 1889 में पैंतालीस वर्षों के होकर मर गये। अन्तिम दिन उनके निराशापूर्ण थे। उन्हें व्यक्तिगत जीवन के सब ओर असफलता ही मिली थी। इटली छोड़कर वे आल्पस पर्वत पर एकाँकी जीवन व्यतीत करने लगे थे। स्वास्थ्य भी उनका साथ नहीं देता था। उसने लिखा है-आज मेरी आकाँक्षाओं के अनुरूप समय नहीं है पर एक दिन वह आवेगा अवश्य।’ कौन जाने वह समय कब आवे? फिर भी इतना तो मानना ही पड़ेगा कि उनके विचारों में बड़ी जीवट थी और उसने बहुत बड़े जनसमुदाय को प्रभावित भी किया।
नित्से के विचारों से कोई सहमत हो या असहमत पर इतना तो मानना ही पड़ेगा कि वे अपने विचारों के प्रति ईमानदार रहे। जैसा उसने सत्य समझा वैसा निर्भीकता पूर्वक कहा। भय या प्रलोभन के कारण वे अपनी मान्यताओं को दबाने या छिपाने की अपेक्षा आजीवन कष्ट भुगतते रहना, विरोध व्यंग्य और उपहास सहना तथा लोगों द्वारा तिरस्कृत लाँछित होना पसंद करते रहे। मनुष्य को अपनी अन्तरात्मा के प्रति आस्थावान और निर्भीक होना चाहिए, इतनी शिक्षा तो उनसे हर कोई प्राप्त कर ही सकता है।
एक बहुत बूढ़े आदमी के हाथ और सिर हिलने लगे। आँखों से भी कम दीखता। वह भोजन करता तो कोई चीजें हाथ से गिर जाती और कमरे का फर्श खराब हो जाता। बेटे की बहू इस पर बहुत नाराज होती, उसने बूढ़े को दरवाजे से बाहर रहने और रोटी देने का प्रबंध कर दिया।
जिस मिट्टी के बर्तन में खाना दिया जाता था, हाथ हिलने के कारण वह भी एक दिन छूट गिरा और टूट गया। इस पर बेटे की बहू ने बहुत क्रोध किया और उसे लकड़ी का बर्तन बनवा कर दे दिया।
एक दिन बूढ़े का नाती लकड़ी का टुकड़ा लेकर उसे काट छाँट करने में लगा हुआ था तो लड़के के पिता ने उसे डाँटते हुए कहा-यह क्या खटपट कर रहे हो?
लड़के ने पास खड़ी अपनी माता से कहा-आप और पिताजी जब ऐसे ही बूढ़े हो जावेंगे तब मुझे भी तो दरवाजे से बाहर आप लोगों को इस प्रकार लकड़ी के बर्तन में भोजन देना पड़ेगा, सो लकड़ी से बर्तन बनाने का अभ्यास कर रहा हूँ।
किन्हीं माता-पिता को इसलिये खिन्न नहीं होना चाहिये कि उन्हें केवल कन्यायें ही हैं पुत्र नहीं। पुत्र की उपयोगिता एवं आवश्यकता के पीछे व्यक्तिगत स्वार्थपरता एवं एक अन्धकारमय भावना की ही प्रधानता रहती है।
सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा के जमाने में परिवार को एक स्वतंत्र संगठन के रूप में विकसित होने की जब गुँजाइश थी तब पुत्रों की अधिकता परिवार की आर्थिक, सुरक्षात्मक एवं सामाजिक स्थिति मजबूत करने की दृष्टि से उपयोगी होती थी। लोगों में एक दूसरे के प्रति प्रेम, सद्भाव, उदारता एवं सहन-शीलता का दृष्टिकोण रहता था इसलिए पुत्र-पौत्रों से, उनकी पत्नियों और पुत्रों से भरा हुआ परिवार सुख-शाँति के सुगंधित पुष्पों से भरे उद्यान जैसा दीखता था, उस जमाने में पुत्रों की उत्पत्ति पर हर्ष मनाया जाना उचित भी था। कृषि और पशुपालन को बड़े परिवार अच्छी तरह कर सकते थे जिनमें पुरुषों की अधिकता रहती थी। माता-पिता को अपने पुत्र-पौत्रों से वृद्धावस्था में जब, सेवा, सम्मान प्राप्त होता था, तब आड़े समय के लिए सहारा समझकर भी उनका महत्व माना जाता था।
आज सोचने का ढंग दूसरा हो गया है। जिनके पास बड़ी-बड़ी जोतें हैं, उन कृषकों के अतिरिक्त और कोई वर्ग सम्मिलित कुटुंब प्रथा को अपनाने के लिये तैयार नहीं। भाई-भाई से तो अलग होते ही हैं- विवाह होते ही पत्नी को लेकर माता-पिता से भी अलग हो जाने वाले युवकों की संख्या तेजी से बढ़ रही है शिक्षितों को आमतौर से नौकरी करनी पड़ती है उनकी बदली भी होती रहती है। इसलिये स्वभावतः उन्हें अपनी पत्नी को लेकर अलग रहना पड़ता है। जहाँ इकट्ठे रहते हैं वहाँ भी मत भिन्नता, असहिष्णुता एवं स्वार्थों की आपाधापी के कारण खींचतान बनी रहती है और वे यही सोचते रहते हैं और वह सुदिन कब आवे जब अलग घर बसाकर रहेंगे और स्वच्छन्द जीवन बिताने का अवसर मिलेगा।
ऐसे स्वच्छन्दतावाद के युग में वे कारण तथ्य और तर्क निरर्थक हो जाते हैं जो सम्मिलित कुटुम्ब प्रथा के युग में आदर्श प्रतीत होते थे। पुत्रों की अधिकता किसी जमाने में उपयोगी थी पर आज वैसा कहाँ है? भरण-पोषण, शिक्षा विवाह और फिर आजीविका में लगाने तक का क्रम इतना महंगा और सिर दर्द से भरा हुआ है कि कई पुत्रों की उपस्थिति कन्या से कहीं अधिक महंगी पड़ती है। समर्थ हो जाने पर उनका तथा उनकी बहुओं का आमतौर से जो रवैया रहता है उससे भी किसी माता-पिता को प्रसन्नता नहीं होती। सच तो यही है कि असंतोष बढ़ता है। जिनको संतान नहीं है उनकी और जिनको बहुत बेटे पोते हैं उन दोनों की तुलना की जाय तो वे लोग हजार गुने अधिक सुखी मिलेंगे जिन्हें संतान नहीं है। तृष्णा का कोई अन्त नहीं, आकाश कुसुम पाने के लिये कोई रोया करे तो इसका कोई उपाय नहीं। पर आज की स्थिति में तथ्य यही है कि जिसके जितने अधिक पुत्र हैं वह उतना ही अधिक बन्धनों से ग्रसित व्यक्ति की तरह अगनित चिन्ताओं का उत्पीड़न सह रहा होगा। किन्हीं बिरले सौभाग्यशालियों की बात अलग है, उन्हें अपवाद ही माना जा सकता है।
परिवार की सुसंपन्नता और सुव्यवस्था से जहाँ तक इस युग की परिस्थितियों का संबंध है वहाँ तब सबसे अच्छा वह है जिसे कोई संतान नहीं। देश की आर्थिक परिस्थितियों की माँग भी यही है कि अब संतानोपार्जन को सीमाबद्ध किया जाय। व्यक्ति को अपने विकास का अवसर भी छोटे परिवार में ही मिल सकता है। इसलिये उन्हें ईश्वरीय कृपा का विशेष भाजन मानना चाहिये जिन्हें संतान नहीं है। व्यक्तित्व एवं प्रेम की अभिव्यक्ति के लिये ऐसे व्यक्ति किन्हीं अनाथ असहाय बालक को अपने घर में रखकर उसका पालन-पोषण कर सकते हैं। इस प्रकार उन्हें सन्तान पालन का सुख मिल सकता है और परमार्थ का श्रेय भी उपलब्ध हो सकता है। निःसंतानों से कुछ कम भाग्यवान वे हैं जिन्हें केवल कन्यायें ही कन्यायें हैं। कुछ समय संतान पालन का हर्षोल्लास अनुभव करने के बाद उसे ससुराल में भेज देने से जल्दी से अभिभावकों का उत्तरदायित्व हलका हो जाता है और वे निश्चिंतता का अनुभव करते हुए वृद्धावस्था को शाँति प्राप्ति एवं सत्प्रयत्न में लगा सकते हैं।
जिन्हें भगवान ने पुत्र दिये हैं उनके लिये यही उचित है कि भावनापूर्वक उनका लालन-पालन करें और तत्परता पूर्वक उनकी शिक्षा-दीक्षा के साधन जुटायें। राष्ट्रमाता के सुसंस्कृत नागरिक होने का पुण्य परमार्थ उन्हें मिल सके। अपनी सुन्दर प्रतिकृति रूप में लोकसेवी सुसंस्कृत नागरिक पीछे छोड़ जाना किसी सद्गृहस्थ को सच्चा स्मारक हो सकता है। यह सोचकर पुत्रवानों को पूरा-पूरा ध्यान उनके आत्मिक विकास पर देना चाहिये। बच्चों के लिये बहुत धन छोड़ जाना या ऊंची पढ़ाई पढ़ाकर ज्यादा पैसे ही नौकरी से लगा देने से कोई पिता-पुत्र ऋण से उऋण नहीं हो सकता। सुसंस्कृति, सज्जन एवं सद्गुणी संतान बन सकी तो ही पिता-माता का प्रजनन श्रम सार्थक माना जा सकता है।
जिन्हें पुत्र नहीं केवल कन्यायें हैं उन्हें ईश्वर की इस महान अनुकम्पा को सौभाग्य ही मानना चाहिये। दुःखी या निराश होने का तो इसमें कोई कारण है ही नहीं। जो लोग इसलिए दुःखी है कि उन्हें कन्यायें ही क्यों प्राप्त हुईं, उन्हें अविवेकी के अतिरिक्त और क्या कहा जाय। चूँकि लोग यह समझते हैं कि पुत्र महत्वपूर्ण और कन्या निरर्थक है- इसलिये हम भी वैसा ही समझें यह बिलकुल भी आवश्यक नहीं।
राष्ट्र निर्माण में नारी का योग अधिक है। पुरुष में कठोरता और दुष्टता अधिक रहती है। आज की परिस्थितियों में यह दोष अपनी चरमसीमा तक पहुँच चुका है। इस समय करुणा और सहृदयता की आत्मदृष्टि ही विश्व शाँति का उद्देश्य पूरा कर सकती है। इस प्रयोजन की सिद्धि के लिये युग की पुकार यह है कि पुरुष का वर्चस्व भावनात्मक संतुलन का, सच्ची उन्नति का यही मार्ग है। राजनीति, शिक्षा, सेवा, अर्थ का संचालन क्रम यदि पुरुष के हाथ से छीनकर स्त्री के हाथ में दे दिया जाय तो आज की ये विभीषिकायें जो मानव सभ्यता को निगल जाने लिये मुँह बायें बैठी हैं, देखते-देखते सरल हो सकती हैं। मितव्ययितापूर्वक घर खर्च चलाने वाली नारी जब राष्ट्र कोष की मंत्राणी होगी तो एक पैसा भी शासन कार्यों में अपव्यय न हो सकेगा। जब ये विदेश मंत्री होंगी तो दूसरे देशों के नागरिक भी उन्हें वैसे ही प्रिय लगेंगे जैसे ससुराल में रहते हुये पितृगृह के भाई भतीजों का उन्हें ध्यान रहता है। ऐसी मनोभावना से शोषण और आक्रमण की नीति कैसे अपनाई जा सकेगी? अपने सुहाग और बच्ची का निरन्तर मंगल चाहने वाली नारी जब युद्ध मंत्री होगी तो वह पड़ोसी देश की अपनी बहिनों का सुहाग और बच्चों को रक्त स्नान कराने की क्रूरता पर कैसे कटिबद्ध हो सकेगी? जो कार्य तोपें नहीं कर सकती वह उनकी करुणा के द्वारा हल हो सकेगा। सीमा संघर्ष जैसी समस्यायें तब कहाँ रहेंगी? महिला शिक्षा मंत्री बने तो वह सब से पहले वही वातावरण उत्पन्न करेंगी जिसमें पढ़कर बच्चे अपने परिवार के लिये, माता-पिता, बहिन और पुत्री के लिये सहृदय एवं उदार बन सकें। राजनीति को धर्म नीति में परिणित करने का प्रयोग पुरुषों द्वारा सफल न हो सका तो अब उसका परीक्षण नारी के हाथों सत्ता सौंप कर किया जाना चाहिए।
साहित्य सृजन का कार्य नारी के हाथों सौंप कर अब अश्लील, निर्लज्ज, वासनात्मक, कुत्सित रचनाओं की समाप्ति के संबंध में निश्चिन्त हो सकते हैं। चिकित्सक बनकर वे अपनी स्वाभाविक करुणा से रोगियों के प्रति अधिक सहृदयता पूर्ण व्यवहार कर सकेंगी। शिक्षा का कार्य उनके हाथ में रहे तो बालकों में सहृदयता और सज्जनता के संस्कार ही उत्पन्न होंगे। हमें विश्वासपूर्वक यह आशा करनी चाहिए कि नारी के हाथों ही मानव जाति का भविष्य उज्ज्वल बनेगा। उनकी सुसंस्कृति बढ़ने से ही उनके शरीर और मन का रस पीकर उत्पन्न होने वाले बच्चे सुसंस्कृत बनेंगे। नारी का जितना उत्कर्ष होगा, नर का भविष्य भी उतना ही उज्ज्वल बनता जायेगा। इस उभय पक्षीय प्रगति से ही संसार में सुख शाँति का वातावरण उत्पन्न हो सकेगा।
युग निर्माण योजना में ईश्वर की उपासना नारी रूप में की जाती है। गायत्री को माता की आकृति में पूजा अर्चना करने का उद्देश्य नारी मात्र के प्रति अधिक श्रद्धा एवं अधिक सम्मान उत्पन्न करना भी है। अनुष्ठानों के अन्त में तथा नवरात्रियों में कन्या पूजन, कन्या भोजन की प्रथा के मूल में भी यही उद्देश्य छिपा हुआ है। वैदिक सभ्यता में नारी को हर दृष्टि से अधिक पूज्य, अधिक पवित्र, अधिक श्रेष्ठ एवं अधिक महान माना गया है।
नव युग की इस निर्माण बेला में हमें नारी के प्रति अपना दृष्टिकोण ऊंचा उठाना ही होगा ताकि वह अपना समुचित विकास कर सके और उस विकास का महत्वपूर्ण लाभ समस्त संसार को मिल सके। यह कार्य हमें पुत्र और कन्या के बीच माने जाने वाले अन्तर को समाप्त करते हुए आरंभ करना चाहिये।
यह सृष्टि नर और नारी दोनों के संयोग से चल रही है। दोनों की ही समान आवश्यकता, उपयोगिता एवं महत्ता है। इसलिए श्रेय और सम्मान भी दोनों को समान ही मिलना चाहिए। हमारा निज का अस्तित्व माता के बिना संभव न हुआ होता। पत्नी के बिना हमारा जीवन कम ही अस्त-व्यस्त रहता। उनकी उपयोगिता हमारी दृष्टि से स्पष्ट है। बाहरी क्षेत्र में कोई मित्र कितने ही उपयोगी क्यों न हों व्यक्तिगत जीवन में अत्यन्त निकटवर्ती आत्मीय जैसे समझे जाने वाले संबंधियों में माता और पत्नी ही प्रमुख होती हैं। नारी के बिना नर का न तो अस्तित्व ही संभव है और न विकास ही हो सकता है। ऐसी दशा में पुत्री के जन्म पर शोक मनाया जाना, उसे दुर्भाग्य समझा जाना एक मतिभ्रम ही माना जा सकता है।
पुरुष का तीन चौथाई सौभाग्य-दुर्भाग्य नारी से, उसकी माता से या पत्नी से नापा जा सकता है। मनुष्य जाति का भविष्य नारी की उत्कृष्टता एवं निकृष्टता से संबंधित है। भारी की स्थिति जितनी ही विकसित होगी उतना ही मानव समाज सुविकसित हो सकेगा। प्रजनन का कठिन उत्तरदायित्व नारी के स्वास्थ्य पर नारी आघात पहुँचाता है इसलिए उनकी मृत्यु संख्या भी पुरुषों की अपेक्षा अधिक रहती है। जिस तरह का प्रतिबंधित जीवन उन्हें बिताना पड़ता है उसमें अकाल मृत्यु एवं अल्पायु का प्रहार भी अधिकतर उन्हीं पर होता है। ऐसी दशा में नर-नारी की संख्या सृष्टि-संतुलन ठीक रखने की दृष्टि से भी लड़कों की अपेक्षा लड़कियों का जन्म अधिक संख्या में होना ही वाँछनीय है। यदि लड़के अधिक होने लगे और लड़कियाँ घट जायं तो एक ऐसी विश्वव्यापी विपत्ति सामने आ खड़ी होगी जिसका कोई हल ही न निकल सके।
(1) ‘पुत्र का दिया हुआ पिण्डदान पितरों को मिलता है, पुत्री का नहीं’
(2) ‘पुत्र से नाम चलता है पुत्री से नहीं,’-यह मान्यताएं नितान्त मूर्खतापूर्ण है। तथ्य यह है कि अपना दिया हुआ अन्न दान-पिण्डदान, अपने को मिलता है, दूसरे का दिया हुआ दूसरे को नहीं मिल सकता। यदि पिता दुष्ट दुरात्मा रहा है तो उसे दुर्गति ही प्राप्त होगी। बेटे का किया पुण्य उसके किसी काम न आवेगा, इसी प्रकार यदि मनुष्य सज्जन रहा है तो उसका पुत्र न होने पर भी, पिण्ड न देने पर भी, सद्गति ही प्राप्त होती है। अनेकों व्यक्ति ब्रह्मचारी, अविवाहित या सन्तानहीन मरते हैं। क्या वे इसीलिए नरक में पड़ेंगे कि उनका बेटा पिण्ड-श्राद्ध या तर्पण करने के लिए नहीं है? इन शुभ कर्मों का भी महत्व है। पर उनके करने पर मुख्य लाभ श्राद्ध करने वाले श्रद्धालु पुत्र को ही मिलता है। श्रद्धा की सुगंधि से उन पितरों की आत्मा संतोष एवं तृप्ति लाभ करती है। दिया तो जिसने है फल तो उसी को मिलेगा, कोई किसी के पाप पुण्य में भागीदार नहीं बन सकता। आत्मा अपनी ही सज्जनता-दुर्जनता से सद्गति एवं दुर्गति की भागी बनती है। इस शाश्वत सत्य को समझने वाला इस मान्यता को कैसे स्वीकार करेगा कि बेटे के पिण्ड दान बिना पितरों की सद्गति न होगी।
वंश चलने वाली बात उससे भी परले सिरे की भ्राँति है। अपनी दस पीढ़ी के पूर्वजों के नाम तक हमें याद नहीं होते, उनके स्वरूप और कर्मों का तो स्मरण ही किसे होगा। जब अपने वंशजों को अपने ही पुरखों की जानकारी इतनी जल्दी विस्मरण हो जाती है तो दूसरों की दृष्टि से किसी का वंश चलना न चलना महत्व ही क्या रखता है। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी प्रायः 25 से भी कम वर्षों में उत्पन्न हो जाती है। कई बार तो अठारह वर्ष तक के लड़के पिता बनते देखे गये हैं। औसत 25 वर्ष मानें तो दस पीढ़ी 250 वर्षों की होती हैं। नाम और यश तो पाँच पीढ़ी का भी याद नहीं रहता इस हिसाब से 18×5=90 वर्षों में ही लोग बाप दादों को भूल जाते हैं। पर यदि 25 वर्षों में पीढ़ी होने और 10 पीढ़ी में भूलने की बात भी मान ली जाय तो 25×10=250 वर्षों में वंश चलने की बात समाप्त हो जाती है। इतने थोड़े दिन तो कोई कुँआ, बावड़ी, बरगद या खजूर का पेड़ भी नाम चला सकता है।
हम स्वयं अपने बाप-दादों का क्या नाम चलाते हैं? केवल सरकारी कागजों में वल्दियत लिखी जाती है। विवाह के समय शाखोच्चार में तीन पीढ़ी के नामों की चर्चा कर दी जाती है। पितृ पक्ष में कोई श्राद्ध तर्पण करता हो तो भी पूर्वजों का दो-तीन पीढ़ी के पूर्वजों का स्मरण कर लिया जाता है। इन बातों को इतना महत्व नहीं दिया जा सकता है कि इन्हें ‘वंश चलना’ कहा जा सके। सही बात यह है कि मनुष्य के शुभ-अशुभ कर्म ही किसी के वंश और यश को कायम रखते हैं। बुद्ध, शंकराचार्य, हरिश्चन्द्र, प्रहलाद, शिवि, दधीचि, शिवाजी, प्रताप, गाँधी आदि का यश उनकी संतानों के कारण नहीं उनके स्वयं के सत्कर्मों के कारण ही चल रहा है। ऐसी दशा में बेटे के द्वारा वंश चलने की बात में कितना सार है- इसे कोई भी विचारशील भली प्रकार समझ सकता है। कुतिया, शूकरी और बकरी हर साल कई बार प्रसव करती और कई बार बच्चे देती है। उनमें कितने ही पुत्र भी होते हैं। उन पुत्रों ने अपने माता-पिता का कितना वंश चलाया होता है?
जानकीजी कन्या थी उसने अपने पिता जनक का नाम चलाया और वंश भी। द्रुपद राजा का यश द्रौपदी ने अमर बनाया। सावित्री, मदालसा, सुकन्या, अरुन्धती, अनुसूया, कौशल्या, गार्गी, मैत्रेयी, भारती, शकुन्तला, पद्मिनी, लक्ष्मीबाई, कस्तूरबा आदि को जिन माता-पिता ने जन्म दिया था उन्हें सौ पुत्र उत्पन्न करने से बढ़कर यश मिला। शास्त्र का वचन है- ‘दश पुत्र समा कन्या या स्यात् शीलवती सुता’ यदि कन्या शीलवान हो तो वह दश पुत्रों से बढ़कर है। सच बात तो यह है कि मनस्वी, तेजस्वी और प्रतिभावान कन्या निकम्मे सैंकड़ों पुत्रों से बढ़कर मानी जा सकती है।
कन्या में स्वभावतः सौम्यता, मृदुलता और सात्विकता अधिक होती है। उसकी उपस्थिति से घर का वातावरण बड़ा मृदुल और सौम्य बना रहता है। लड़कों में उद्दण्डता अधिक पाई जाती है इसलिए उनसे माता-पिता बहुधा खीजते रहते हैं। लड़कियों की कौशलता अभिभावकों के हृदय को शीतल और प्रफुल्लित बनाये रहती है। जिस प्रकार कोमल पुष्पों की मृदुलता उद्विग्न मन को भी शीलता प्रदान करती है, उसी तरह कन्याओं की स्वाभाविक सात्विकता अभिभावकों की साँसारिक विक्षोभों की परेशानी का अपनी सरल मुस्कान द्वारा सहज ही शमन कर देती हैं। कन्यायें साक्षात करुणा एवं स्नेह की प्रतिमा होती हैं। उनकी उपस्थिति से घर में सौम्य वातावरण का ही सृजन होता रहता है।
त्याग और दान, अध्यात्म के दो प्रधान आधार हैं। जो जितना उदार है, जिसमें जितनी त्याग वृत्ति है, जो अपने प्रयत्न और परिश्रम से दूसरों को जितना सुखी बना सकता है, जिसमें जितनी निस्वार्थता रहती है वह उतना ही बड़ा अध्यात्मवादी होता है। इन सत्प्रवृत्तियों को जो जितना चरितार्थ कर सके उसकी आध्यात्मिक साधना उतनी ही बढ़ी चढ़ी मानी जायेगी। यह उद्देश्य कन्याओं की उपस्थिति से सहज ही पूरा होता है। लड़कों के द्वारा कमाई या सेवा प्राप्त होने का लाभ रहता है। वे सदा घर में रहेंगे इसलिए उनसे मोह भी बढ़ता है। उद्दण्ड और अवज्ञाकारी होने से उन पर क्रोध भी आता है। पुत्र के द्वारा वे कामनाएं पूरी होंगी जो हम पूरी नहीं कर सके।
स्वस्थ जीवन जीने के लिए आहार, जल, स्वच्छ वायु सफाई व शारीरिक श्रम की आवश्यकता होती है। इनमें से कुछ साधन ऐसे हैं जो शरीर को शक्ति देते हैं, अवयवों का संवर्द्धन व सम्पोषण करते हैं। कुछ तत्व संतुलन बनाये रखते हैं। इन सबसे अधिक उपयोग उन तत्वों का है जो शरीर में सफाई की क्रिया सम्पन्न करते हैं। पहले और दूसरे प्रकार के साधन, शक्ति व सन्तुलन तो देते हैं किन्तु साथ ही मल विकार भी उतनी ही मात्रा में उत्पन्न कर देते हैं। यह विजातीय पदार्थ यदि शरीर में सड़ता गलता रहे, इसके निकालने की सावधानी न बरती जाय तो स्वास्थ्य के जल्दी ही गिर जाने की आशंका बनी रहती है। नावदान की सफाई न करें तो सारा घर दुर्गन्ध से भर जाता है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों व कारखानों के धुयें से चिमनी से बाहर निकालने की पद्धति न चलाई जाती तो सारे मजदूर कर्मचारी उसकी घुटन से मर जाते। हर आठ-दस स्टेशन के बाद यदि इंजन का पुराना कोयला व राख न गिरा दिया जाय तो नया ईंधन डालने की जगह ही शेष न रहे।
यही अवस्था शरीर की भी होती है। शरीर भी किसी मशीन से कम नहीं। इसमें मल विकार का पैदा होना स्वाभाविक है। इसे दूर न किया जाय तो दुर्गन्ध फूट पड़ने जैसी क्रिया उत्पन्न हो जाती है। विजातीय द्रव्य किसी-न-किसी रोग के रूप में शरीर फोड़ कर बाहर निकल पड़ती है। इसलिये स्वास्थ्य को स्थिर बनाये रखने के लिये शारीरिक सफाई व मल निष्कासन की बड़ी आवश्यकता है। किसी कारणवश पेट में गड़बड़ी उत्पन्न होने पर इसके लिये जुलाब आदि से कई साधन काम में लाये जाते हैं। किन्तु इन सबसे अधिक उपयोगी प्राकृतिक और निरापद साधन है उपवास। जुलाब जैसे अप्राकृतिक साधनों में एक बुराई यह होती है कि इनकी प्रतिक्रिया इतनी तीव्र होती है कि वे मल विकार के साथ ही पाचक अम्लों, रसों को भी अनुचित मात्रा में बाहर निकाल देते हैं। उपवास में ऐसी किसी बात की आशंका न होने से उसका महत्व अत्यधिक माना गया है।
पाचन संस्थान को आवश्यक विश्राम देने व दुबारा सुविधा व सरलतापूर्वक कार्य करने देने की सृष्टि से भी उपवास का महत्व अधिक है। निरन्तर काम करते हुये सभी की शक्ति का ह्रास होता है। इस खोई हुई क्रीड़ा शक्ति को पुनः प्राप्त कर लेने का सिद्धाँत जीवन के हर क्षेत्र में लागू है। पशु आहार लेने के बाद बैठकर जुगाली करते हैं, बिना विश्राम दिये किसी इंजन या बाइलर को लगातार चलाते रहें तो उसके फट जाने का भय बना रहता है। सप्ताह में एक दिन रविवार का अवकाश भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये किया जाता है। शरीर में यह प्रक्रिया उपवास से पूरी होती है।
अध्यात्मिक दृष्टि से तो उपवास का महत्व और भी अधिक है। विषय विकारों के शमन का उपाय वर्णन करते हुए गीताकार ने कहा है-
‘विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।’
अर्थात् निराहार रहने से विषय विकारों की निवृत्ति होती है। ‘उपवास दर्शन’ या ‘फिलॉसफी आफ फास्टिंग‘ के विद्वान रचयिता श्री ए.ए. प्युरिंगटन महोदय ने लिखा है कि रोग चाहे शारीरिक हो अथवा मानसिक उपवास से सभी में लाभ होता है। यदि आप स्वास्थ्य और सौंदर्य, शक्ति व और साहस प्राप्त करना चाहते हैं तो उपवास कीजिये।’ ‘उपवास से नैतिक व आध्यात्मिक प्रगति होती है, नैसर्गिक बुद्धि का उदय होता है। रोग निवारण, आत्म विश्वास की प्राप्ति, प्रेम की विशालता की दिव्य अनुभूति, विराट के साथ आत्म-सामंजस्य आदि का महत्वपूर्ण प्रसाधन उपवास है।’ उनके अनुसार उपवास आरोग्य लाभ का प्राकृतिक व निधात्मक पहलू है।
शरीर का पाचन संस्थान यंत्र सरीखा है, यह रबड़ जैसे पदार्थ से बना है। भोजन नली से आँत तक पहुँचने में आहार में स्टार्च, लार, हाइड्रोक्लोरिक एसिड आदि रासायनिक तत्व उसे रस के रूप में परिवर्तित करने का काम करते हैं किन्तु आँत में पहुँचते ही पाचन क्रिया प्रारंभ हो जाती है। जीवन भर अविवेकपूर्ण आहार लेते रहने से इसमें फैलाव आ जाता है, इससे रक्त के अतिभार और तंतुओं के दबाव में रुकावट पड़ती है। साथ ही सफाई के अम्लों के पर्याप्त स्राव न हो पाने के कारण मल विकार व विजातीय द्रव्य आँतों से चिपकना शुरू कर देता है, छोटी आँत तक पहुँचते-पहुँचते यह विकार और भी बढ़ जाता है। डाक्टरों का मत है कि आँतों में यह मल तीन से पाँच सेर तक जमा होता है। प्रारंभ में इससे अपच व गैस आदि का बनना यही उपद्रव दिखाई देते हैं किन्तु धीरे-धीरे इसमें गाँठें पड़ना शुरू हो जाता है जिससे भयानक परिणाम उपस्थित होने की आशंका बढ़ जाती है।
भोजन बंद कर देने के साथ ही रक्त का अतिभार कम होना प्रारंभ हो जाता है। अभी तक जो अम्ल व क्षार पाचन क्रिया सम्पन्न कर रहे होते थे वे सब मिलकर सफाई का, मल को बाहर धकेलने का कार्य प्रारंभ कर देते हैं। रक्त की संश्लेषण क्रिया फालतू पानी को बाहर निकालने लगती है। यह क्रिया कुछ समय तक चलती है। धीरे-धीरे रक्त प्रवाह का मार्ग संकुचित होने लगता है तब शारीरिक क्रिया में विशेष प्रकार की उथल-पुथल महसूस होने लगती है क्योंकि इस समय रक्त में विजातीय मल से उत्पन्न विष को घुलाना व श्लेष्मा को नियंत्रण में बनाये रखने व इस विषैले पदार्थ को बहा ले जाने का कार्य तेजी से प्रारंभ होता है।
इस प्रतिक्रिया के फलस्वरूप शारीरिक व्यवस्था क्रम में कुछ गड़बड़ी सी उत्पन्न होती जान पड़ती है। जी मिचलाता है। मुँह में बार-बार थूक आता है। फेफड़ों से लौटी हुई साँस में अपेक्षाकृत अधिक दुर्गन्ध होती है। थकावट बढ़ जाती है। पसीने के साथ भी बदबू उड़ने लगती है। इन लक्षणों से प्रायः लोग घबड़ा जाते अथवा उपवास को नुकसानप्रद मान लेते हैं। किन्तु वस्तुस्थिति ऐसी नहीं। यह अवस्था तीन-चार दिन से अधिक नहीं चलती। रुधिर संचार की व्यवस्था में जो अभी तक रुकावट पड़ रही थी, वह मल शोधन व निष्कासन की निरन्तर प्रक्रिया चलते रहने के कारण अपने पूर्व रूप में आने लगती है यह अवस्था छठवें या सातवें दिन से प्रारंभ हो जाती है और शरीर निर्मल स्निग्ध और हलका हो जाता है। लम्बे उपवासों में यह क्रिया कई बार आवृत्त होती है इनसे शारीरिक अवस्था में बार-बार फेर बदल होता है। लगभग बीस दिन बाद शरीर मल रहित, शुद्ध व पवित्र बन जाता है। रक्त, माँसपेशियाँ, भेजा, नाडियों, तंतुओं और अस्थियों के मल विकार दूर हो जाने से शरीर की व्यवस्था व ग्रहणशीलता परिपक्व हो जाती है। इससे लंबे उपवासों के बाद स्वास्थ्य में शीघ्रता से सुधार होते देखा गया है।
उपवास का अर्थ केवल यही नहीं होता कि एक लंबे समय के लिये आहार का बिलकुल त्याग कर दिया जाय। भिन्न-भिन्न अवस्था के व्यक्तियों के अनुरूप उपवास की भी व्यवस्था कई प्रकार की संभव है। दुर्बल व क्षीणकाय व्यक्ति के लिए यह संभव नहीं कि वह लंबा उपवास कर सके। ऐसे व्यक्तियों को प्रातःकाल का नाश्ता छोड़ देना व एक समय हलका आहार लेते रहना सबसे अच्छा उपवास है। इससे शरीर को शक्ति भी मिलती रहती है और आहार की कमी के कारण पाचन के बाद जो शक्ति शेष बच जाती है वह मल निष्कासन व सफाई का कार्य प्रारंभ कर देती है। कठोर शारीरिक श्रम करने वालों के अतिरिक्त सभी को प्रातःकालीन नाश्ता छोड़ देना भी उपवास जैसा लाभ देता है। आहार में एक निश्चित मात्रा की कमी कर देना भी अच्छा उपवास है। इनमें अस्वाद भोजन लेने और एक ही समय आहार लेने की क्रिया जोड़ दी जाय तो और भी अधिक लाभ होता है।
जिन्हें इसमें भी असुविधा होती हो वे सप्ताह में एक या दो दिन भी ऐसा क्रम अपना सकते हैं। इन आँशिक उपवासों से जिनमें एक समय बिना नमक या गुड़ के एक ही लगावन के साथ भूख मिटाने जितना आहार ले लिया जाय, स्वास्थ्य सुधार में बड़ी सहायता मिलती है। ये सब के लिये समान रूप से सुलभ है। इन्हें बालक वृद्ध, रोगी स्त्रियाँ आदि सभी कर सकते हैं। लंबे उपवासों में अधिक सावधानियाँ बरतने के खतरों से बचने का सबसे अच्छा उपाय इन क्ररिक व आँशिक उपवासों को ग्रहण करना है। इसमें शरीर का नव संस्कार भले ही मन्द गति से हो किंतु विसर्जन व श्लेष्मा हीन खाद्य वस्तुओं से शरीर को पर्याप्त शक्ति मिलने की दोनों ही क्रियायें आसानी से चलती रहती है।
कई लोग आध्यात्मिक दृष्टि से उपवास काल में जल तक पीने का निषेध करते हैं। किन्तु यह हानिकारक है। हल का उपयोग दिन में कई बार बिना प्यास के भी करते रहना चाहिये इससे मल शोधन व शारीरिक सफाई के कार्यों में, मल को नर्म बनाकर बाहर निकालने में बड़ी सुगमता हो जाती है। पानी के साथ नींबू या सोडा का उपयोग और भी लाभदायक है। इससे आँतों की बड़ी सुगमता से सफाई होती रहती है। संभव हो सके तो एनिमा की भी सहायता से आँतों की सफाई क्रम चलाया जा सकता है। लंबे उपवासों के पूर्व इसी प्रकार कोई रेचक पदार्थ लेने से भी लाभ होता है। स्वच्छ व ताजी हवा में रहना, घूमने टहलने जैसे हल्के व्यायाम करते रहना व थकावट महसूस होने पर पर्याप्त विश्राम करना भी उतना ही आवश्यक है। शोधन प्रणाली से उत्पन्न विष जब भेजे से गुजरता है तो अनिद्रा, दुःस्वप्न जैसे दृश्य भी उपस्थित हो सबसे है ऐसे समय अपने विश्वास में कमी नहीं आने देनी चाहिये। बीच में ही परिवर्तन की आवश्यकता जान पड़े तो श्वेतसार हीन तरकारी का रस या टमाटर का रस थोड़ी मात्रा में लिया जा सकता। इन सामान्य नियमों का पालन करते रहने से उपवास काल की आशंकाओं से बचा जा सकता है।
सबसे अधिक सावधानी उपवास समाप्त करने पर आहार लेते समय बरतने की आवश्यकता होती है। एक निश्चित समय तक शरीर में खाद्य पदार्थ न जाने और पर्याप्त शक्ति न मिलने के कारण पाचन संस्थान में शिथिलता आ जाती है। आहार न लेने से भूख भी बढ़ जाती है। इस समय यदि भारी पदार्थ या पेट भरकर भोजन कर लिया जाय, तो आँतों में धक्का लगता है। पाचन शक्ति के अनुपात में आहार की मात्रा अधिक होने से अपच आदि की विषोत्पादक परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। इससे अब तक का सारा श्रम व किया कराया उद्यम व्यर्थ चला जाता है और नुकसान तक हो जाने का भय बना रहता है।
उपवास के बाद पहला आहार रेचक प्रभाव वाला हो, अधिक पोषक पदार्थों की उनकी आवश्यकता नहीं। साधारण अवस्था में श्वेतसार हीन तरकारी का रस, पालक का रस अथवा जल मिला हुआ थोड़ा सा दूध लेना अच्छा होता है। आहार व्यवस्था में क्रमिक बढ़ोतरी करते हुये पूर्णाहार तक जाना चाहिये। उपवास के बाद शरीर निर्माण की गति में तेजी आ जाती है इसलिये खाद्य व्यवस्था के सन्तुलन पर पूरा ध्यान बनाये रखना अच्छा रहता है।
लंबे उपवासों को छोड़कर, जिनमें किसी अनुभवी चिकित्सक की आवश्यकता पड़ती है, जीवन में उपवास को कोई न कोई स्थान देने से स्वास्थ्य की स्थिरता व सुधार में बड़ी सहायता मिलती है। हल्के व विवेकपूर्ण उपवास न तो इतने कठिन होते हैं कि किये न जा सके, न ही इनसे किसी प्रकार खतरे की संभावना रहती है। यह खाद्यान्न की समस्या से सुधार का भी सर्वोत्तम उपाय है। राष्ट्रीय दायित्व का निर्वाह, शारीरिक स्वास्थ्य व आध्यात्मिक विकास इन सभी उद्देश्यों की पूर्ति का उपवास बड़ा ही सीधा सच्चा और सरल उपाय है। हम में से हर एक को किसी-न-किसी रूप में उपवास अवश्य करना चाहिये।
सौ वर्ष से भी कम गुजरे हैं कि हम लोग स्त्री-शिक्षा के लिये पुकार मचाया करते थे। कहते थे कि जिस समाज की नारियाँ अशिक्षित-मूर्ख होंगी, उसके पुरुष किस प्रकार सभ्य, उन्नतिशील और आदर्श हो सकते हैं? आज हमारी वह पुकार बहुत कुछ कार्यान्वित हो गई है। गाँवों की नहीं तो शहरों की अधिकाँश लड़कियाँ स्कूल जाकर थोड़ा-बहुत पढ़ना-लिखना सीख ही लेती हैं। हायर सैकिन्डरी और कालेजों में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या भी लाखों तक पहुँच चुकी है।
पर क्या जिस आशा, जिस आदर्श की पूर्ति के लिये हमने स्त्री-शिक्षा की पुकार उठाई थी, उसमें भी कुछ सफलता प्राप्त हुई? हमें ¹द से कहना पड़ता है कि हमारी आगामी पीढ़ी में कोई ऐसे विशेष लक्षण दिखलाई नहीं देते जिन्हें हम वास्तविक उन्नति या प्रगति के चिन्ह कह सकें। इसके विपरीत कभी-कभी तो उनकी उच्छृंखलता फैशन परस्ती, स्वार्थपरता को देखकर यही विचार आता है कि ‘चौबेजी चले छब्बे जी बनने को पर रह गये दुब्बेजी।’ साक्षरता का प्रचार अवश्य बढ़ा है, पुस्तकों और अखबारों का प्रचार भी अधिक हो गया है, इधर-उधर की बातें बनाने और ज्ञान-विज्ञान के ‘सिद्धाँत’ झाड़ने में भी वृद्धि हुई है, पर सच्ची कर्मशीलता, परोपकार और उदारता की भावना और गंभीर अध्ययन तथा मनन का दर्शन बहुत कम होता है।
क्या कारण है कि स्त्री-शिक्षा की पर्याप्त वृद्धि हो जाने पर भी समाजोत्थान में उसका कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता? मुख्य बात यही जान पड़ती है कि इस समय लड़कियों को जो शिक्षा दी जा रही है वह जीवनोपयोगी नहीं है, वरन् इधर-उधर की सस्ती नकल मात्र है। इस शिक्षा-प्रणाली पर दृष्टिपात करते हुए एक विचारक ने कितने ही वर्ष पहले लिखा था-’हर साल हजारों लड़कियाँ हाई स्कूल की परीक्षा में पास निकलती हैं और जिनको ईश्वर ने साधन दिये हैं वे कालेजों में भी जाती हैं। पर उच्च शिक्षित लड़कियों में से कितनी ऐसी है, जिनका विवाहित जीवन सफल कहा जा सकता है, जिनके जीवन में अतृप्ति नहीं है, अशाँति नहीं है, जो अपने वर्तमान पर सन्तुष्ट हैं और भविष्य की तरफ आशापूर्ण दृष्टि से देखती हैं? जो कुछ देखने में आता है, वह ठीक इसका उल्टा है। यह सच है कि पढ़ी-लिखी लड़कियाँ इससे इन्कार करेंगी, नव-शिक्षित सम्प्रदाय इस पर नाक-भौं सिकोड़ेगा, पर इसका कारण यही है कि आधुनिक शिक्षा में हमें आत्म वंचना की कला में पारंगत बना दिया है। ----यह बात नहीं है कि लड़कियों को जो शिक्षा मिली है वह तत्वतः बुरी है। उसमें अच्छाइयाँ है, उसमें कल्पनाशक्ति और बुद्धि के विकास की गुँजाइश है। उसमें जो चीज बुरी है वह है उसका गलत प्रयोग। भावी जीवन के उपयोग का ख्याल किये बिना शिक्षा का प्रयोग करना नादानी है। और सबको एक ही साँचे की शिक्षा देना भी ठीक नहीं। शिक्षित लड़कियाँ इसीलिये गृहजीवन में अपनी विद्या का विशेष उपयोग नहीं कर पाती, क्योँकि शिक्षा देते समय उनके भावी जीवन का कुछ विचार ही शिक्षकों और पाठ्य-क्रम बनाने वालों के सामने नहीं होता।’
जिस लड़की को भावी-जीवन में अनेक प्रकृति के लोगों के साथ मिलकर एक गृहस्थी का संचालन करना है उसको सहिष्णु, धैर्यशील और सेवाभावी होना आवश्यक है। इससे भी बढ़कर बात यह है कि वह मातृत्व के गौरव और कर्तव्यों को समझे और पालन करे। इस प्रकार की शिक्षा से ही वह परिवार तथा समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व की पूर्ति कर सकती है। ऐसी शिक्षा उसे वैसे तो उसके माता-पिता तथा ससुराल के संबंधी ही दे सकते हैं, पर स्कूली शिक्षा में भी इस बात का ध्यान रखना अत्यावश्यक है कि वह उपरोक्त गुणों की वृद्धि में सहायक सिद्ध हो।
जिन कारणों से आज शारीरिक दुर्बलता बढ़ रही है, बीमारियों के नये-नये रूप सामने आ रहे हैं उनमें धूम्रपान भी एक बड़ा कारण है। लोगों के गिरे हुये स्वास्थ्य का 50 प्रतिशत कारण धूम्रपान है।
संसार के विकसित व अर्द्ध-विकसित सभी देशों में धूम्रपान अत्यधिक प्रसार के कारण एक विश्वव्यापी समस्या बन गई है। इसलिये संसार के सभी विचारवान लोकसेवी और समाज-सुधारक इस बात को लेकर चिन्तित हैं। सिगरेट, तम्बाकू पीने वालों की संख्या दिन प्रतिदिन तेजी के साथ बढ़ती जा रही है। अकेले अमेरिका के सर्वेक्षण से पता लगाया जा सकता है कि धूम्रपान में किस तेजी के साथ वृद्धि हो रही है। सन 1901 में वहाँ प्रति व्यक्ति 50 सिगरेट प्रतिवर्ष खपत थी और लगभग 7 करोड़ व्यक्ति इसके आदी थे। इसके बाद सन् 1930-1940-1950 में यह संख्या क्रमशः 1365,1828,3322 तक पहुँच गई, सन् 1961 की रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या 3986 थी। अपने देश में तो यह संख्या यहाँ तक बढ़ी है कि बीड़ी, सिगरेट उत्पादन के 1 लाख कारखाने व दुकानें चल रही हैं। इन आँकड़ों को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि स्वास्थ्य के सर्वनाश की घड़ी अब अधिक दूर नहीं है। इसका असर न पीने वालों पर भी उतना ही पड़ता है जितना पीने वालों पर, क्योंकि मुँह से निकला हुआ धुआँ तो और भी वातावरण को विषाक्त बनाता है।
धूम्रपान मानव स्वास्थ्य पर क्या असर डालता है इस संबंध में अब तक सैंकड़ों अधिकृत और प्रामाणिक रिपोर्ट प्रस्तुत की जा चुकी हैं। सिगरेट पीने से स्वास्थ्य पर कितना बुरा असर पड़ता है इस संबंध में अभी हाल ही में अमरीकी धूम्रपान-विशेषज्ञ सर्जन जनरल की एक वैज्ञानिक समिति ने एक लंबी विज्ञप्ति प्रकाशित की है। इस शोध कार्य में दस प्रसिद्ध डाक्टरों और एक वैज्ञानिक ने 14 मास तक अनवरत श्रम व प्रयोग किये हैं। यह रिपोर्ट 387 पृष्ठों पर तैयार हुई है। धूम्रपान के विभिन्न पहलुओं पर इसमें विस्तार से विचार हुआ है और यह निष्कर्ष निकाला गया है कि स्वास्थ्य की समस्या का यह सबसे घातक शत्रु है।
पहले वैज्ञानिकों का मत था कि तम्बाकू में केवल निकोटीन और काट दो ही ऐसे तत्व पाये जाते हैं जो शरीरस्थ हाइड्रोक्लोरिक आदि अम्लों के साथ मिलकर बुरी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। तब तक यही माना जाता था कि इससे पाचन संस्थान में ही आँशिक खराबी आती है। किन्तु बाद में जापानी और रूसी वैज्ञानिकों ने इस संबंध में और भी अधिक शोध की, जिससे पता चला कि आँखों की अधिकाँश बीमारियाँ, अल्पायु में ही कम दिखाई देना, अजीर्ण, मुँह में पानी भरना, चक्कर आना, गहरी और पूरी नींद न आना ओठों का पककर कैंसर हो जाना आदि बीमारियों का कारण धूम्रपान ही है।
धुयें के साथ शरीर में गया निकोटीन खून के सशक्त जीवाणुओं को नष्ट करता है या निर्बल बना देता है। स्नायविक दुर्बलता और अन्य वीर्य-संबंधी बीमारियों का कारण भी यही है। बार-बार बीड़ी, सिगरेट पीने से बार-बार शरीर में उत्तेजना उठती है। फिर शरीर शिथिल पड़ जाता है। यह क्रिया बड़ी खतरनाक होती है। इससे खून सूखता है स्वास्थ्य गिरता है और उम्र कम हो जाती है। जर्मनी के डाक्टरों ने इस बात की गहरी शोध की और पता लगाया कि प्रतिदिन एक पैकेट सिगरेट पीने वालों की आठ वर्ष और दो सिगरेट पीने वालों की 18 वर्ष उम्र कम हो जाती है। इन हानिकारक कुप्रभावों को देखते हुए जितनी जल्दी इस दुर्व्यसन से बचा जा सके, बचने का प्रयत्न करना चाहिये।
इस संबंध में जो अब नये तथ्य प्रकाश में आ रहे हैं उनसे तो स्वास्थ्य को चौपट करने वाले और भी भीषण परिणाम उपस्थित होते दिखाई देते हैं। अमरीका के हारवर्ड सार्वजनिक स्वास्थ्य स्कूल के दो वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि सिगरेट के धुएं में रेडियो सक्रिय तत्व होता है जो फेफड़े में कैंसर उत्पन्न करता है। तम्बाकू में ‘पोलोनियम’ नाम का एक विषैला तत्व होता है जो धुएं के साथ मिलकर शरीर में चला जाता है। इससे श्वाँस नली और फेफड़े प्रभावित होते हैं। डॉक्टरों का मत है कि यदि एक निश्चित मात्रा में यह तत्व श्वाँस नली में एकत्र हो जाय तो आदमी की मृत्यु तक हो सकती है। फेफड़ों में सफाई के रक्त-छिद्रों को यह ढ़क देता है जिससे खून स्वच्छ नहीं हो पाता और अपने साथ धुयें का विषय लेकर हृदय की ओर चला जाता है। हृदय की दुर्बलता व पीलापन उन्हीं को रहता है जो धूम्रपान के आदी होते हैं। यह धुआँ यदि ऊर्ध्वगामी हो जाय तो मस्तिष्क में विकृति पैदा करता है। ऐसे लोग अर्द्ध-विक्षिप्त से रहते हैं। आलस्य घेरे रहता है तथा वे निराशावादी हो जाते हैं।
धूम्रपान से उत्पन्न होने वाला सबसे भयानक रोग कैंसर है। भारतीय विशेषज्ञ डॉ. जुस्सावाला का कथन है कि धूम्रपान से योरोप और अमरीका निवासी फेफड़े के कैंसर से पीड़ित होते हैं किन्तु हमारे यहाँ यह गले के कैंसर के रूप में होता है। पान, सुपारी और तम्बाकू के सेवन से गले का कैंसर हो जाता है। यह बड़ा हानिकारक होता है। कैंसर चाहे होंठ का हो, गले अथवा फेफड़े का हो महा-भयानक बीमारी है। सैलफोर्ड (मैनचेस्टर) के चिकित्साधिकारी डा. जे. एलबर्न ने लिखा है कि इस शताब्दी के शेष वर्ष अर्थात् अगले 35 वर्षों में फेफड़ों के कैंसर से अकेले इंग्लैण्ड और वेल्स में लगभग दस लाख व्यक्तियों की मृत्यु होगी। उन्होंने आगे कहा कि अगले 20 वर्षों में कैंसर एक सर्दी जुकाम की तरह आम बीमारी का रूप धारण कर लेगा। अणु-आयुध-वेत्ताओं के अनुसार अब तक जो बम विस्फोट हो चुके हैं उसकी सक्रियता का धूम्रपान करने वालों पर शीघ्रता से प्रभाव पड़ेगा, इससे प्रति वर्ष संसार के चालीस लाख लोगों की मृत्यु होती रहेगी।
धूम्रपान से कैंसर होने के ठोस प्रमाण मिल जाने से संसार की सभी प्रगतिशील सरकारें बड़ी चिंतित हैं। अमरीकी काँग्रेस इस बात का प्रयत्न कर रही है कि सिगरेट की डिब्बियों में उनके पीने की हानियाँ लिखी जाया करें। ऐसे आन्दोलन किये जाने की भी संभावना है जिससे लोग इसके भयानक परिणामों को समझ सकें। धूम्रपान उन्मूलन सरकारी स्तर पर हो यह अच्छी बात है किन्तु इस दिशा में पीने वालों का भी ध्यान आकर्षित करना चाहिये।
अमरीकी अनुसंधान समिति ने प्रमाण जुटाने के लिये 1. पशुओं पर 2. डाक्टरी चिकित्सा द्वारा 3. जनसंख्या के अध्ययन से जो जानकारियाँ हासिल की उनसे भी यही सिद्ध होता है कि धूम्रपान एक घातक दुर्व्यसन है। पहले प्रयोग में पशुओं पर धुयें और ‘काट’ नामक तम्बाकू के विष के प्रभाव का अध्ययन किया और ऐसे सात तत्वों का पता लगाया जिनसे कैंसर हो जाता है। यह तत्व शारीरिक रासायनिक क्रियाओं की प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न होते हैं। इसका प्रयोग उन पर किया गया जो पीने वाले थे। देखा गया कि शरीर के विभिन्न अंगों, कोषों और तंतुओं पर धूम्रपान का हानिकारक प्रभाव पड़ता है। तीसरा प्रयोग जनसंख्या के आँकड़ों से किया गया। जो लोग फेफड़े के कैंसर से पीड़ित थे उनमें से अधिकाँश धूम्रपान करने वाले थे। यह भी देखने में आया कि कफ, खासी, छाती के रोग, फेफड़ों की ठीक तरह काम न करने की शिकायत साँस लेने में कठिनाई तथा पीड़ा की शिकायतें अधिकाँश उन्हीं की थीं जो सिगरेट पीते थे। इस कारण से मरने वालों की संख्या भी पूर्ण आयु भोगकर मरने वालों से 70 प्रतिशत अधिक थी। यह सभी आँकड़े यह मानने को बाध्य करते हैं कि आज की स्वास्थ्य की खराबी का प्रमुख कारण धूम्रपान ही है।
‘हम अनुभव करते है कि राष्ट्रीय और स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारियों, स्वयंसेवी स्वास्थ्य संस्थाओं को चाहिये कि वे युवकों में धूम्रपान की भावना को खतरनाक आदत बताकर निरुत्साहित करें’ यह शब्द अमरीकी कैंसर बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. वेडेल स्काट ने कहे थे। इससे धूम्रपान के भीषण दुष्परिणामों का पता चलता है। उन्होंने यह भी सुझाव दिया है कि सिगरेट के पैकेटों में निकोटीन और टार की मात्रा लिख दी जाया करे जिससे लोग खरीदते और पीते समय सचेत हो जाया करें। इससे धूम्रपान के अधिक न बढ़ने देने में भी सहायता मिलती है। देखा गया है कि जो जितना अधिक सिगरेट पीता है उसे उतना ही तीव्रता से नुकसान उठाना पड़ता है। सबसे बेहतर तो यही है कि इसके दुष्परिणामों को देर तक विचार करें और देखें कि इससे हमारी कितनी बड़ी हानि हो सकती है। जितना शीघ्र हो सके इस दुर्व्यसन से बचने का प्रयत्न हर किसी को करना चाहिये। जिसने भी यह आदत डाल रखी है वह यदि इससे बच सके तो यही समझना चाहिये कि उसने अपनी एक महत्वपूर्ण सेवा कर ली, अपने आप को बीमारियों से और अकाल मृत्यु से बहुत हद तक बचा लिया।
जिन्हें एक दम छोड़ देने में कठिनाई महसूस होती हो वे धीरे-धीरे भी पीने की मात्रा कम करते हुए भी छोड़ सकते हैं। यह भी संभव है कि जब तक इसकी हुड़क परेशान करे तब तक सौंफ इलायची आदि इसके बदले में सेवन करते रहें। धीरे-धीरे इस आदत में शिथिलता पड़ती जायेगी। तब बीड़ी, सिगरेट पीने की इच्छा भी इतना परेशान नहीं करेगी और छोड़ देना सरल हो जायेगा। सबसे अच्छी बात यही है कि इसका संकल्पपूर्वक त्याग कर दें। जब किसी वस्तु की बुराई, कुप्रभाव तथा हानियाँ समझ में आ जाती है तो अपने आप ही उनसे घृणा उत्पन्न हो जाती है। ऐसे अवसर प्राप्त करना चाहिये और दृढ़तापूर्वक इस दुर्व्यसन को छोड़ ही देना चाहिये।
कई लोगों को यह शिकायत करते सुना जाता है कि इसके छोड़ने से अपच की शिकायत हो जाती है। कई तो सुस्ती दूर करने का उपाय बताकर बहानेबाजी करते हैं। ऐसे व्यक्ति बौद्धिक दृष्टि से भीरुता एवं संशयग्रस्त होते हैं। थोड़ा-सा साहस करते हुए उन्हें डर लगता है वह डर ही मनोविज्ञान के सिद्धान्तानुसार उन बहानों की पृष्ठ-भूमि बन जाता है। एकदम नशा छोड़ देने से भी किसी को वैसी हानि नहीं होती जैसी कि कल्पना की जाती है। आदत बदलने के समय दो-चार दिन थोड़ी असुविधा जरूर अनुभव होती है पर पीछे वह सब स्वतः ही ठीक हो जाता है। जिन्हें अपना स्वास्थ्य प्यारा है जो इस संसार के सुखोपभोग के लिये अधिक दिन जीने की आकाँक्षा करते हैं उन्हें अब इस दिशा में ढील देना उचित प्रतीत नहीं होता। आस्ट्रेलिया में धूम्रपान को विज्ञप्ति के प्रकाशन के तदनन्तर ही जैसे ही लोगों के सामने वास्तविक तथ्य आये लाखों व्यक्तियों ने सिगरेट पीना छोड़ दिया। किसी नशे को एक दम छोड़ देना भी कुछ कठिन नहीं हो सकता बशर्ते कि मनुष्य में थोड़ा संकल्प बल मौजूद हो।
धूम्रपान छोड़ देने से धन के अपव्यय से बचने अथवा उस पैसे को रचनात्मक कार्य में लगाने मात्र का ही लाभ नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य समस्या का सरलतापूर्वक समाधान भी इसी से होता है। अनेक बीमारियों से बचाव होता है। धूम्रपान छोड़ने से स्वास्थ्य में आशाजनक सुधार होता है। जिन्हें रहते रात-रात भर नींद नहीं आती थी उन्हें नशेबाजी छोड़ देने पर गहरी नींद सोते देखा गया है। स्नायु शक्ति बढ़ती है। आँखों की रोशनी बढ़ती है। पाचन क्रिया में तो थोड़े दिन में ही सुधार दिखाई देता है जिसका सत्परिणाम शरीर के प्रत्येक अंग पर देखा जा सकता है।
जिन्हें अपने घिसे पिटे रास्ते पर ही चलना है, स्वास्थ्य की गाड़ी को रो-रोकर ढोना ही मंजूर है उनकी बात दूसरी है, पर जिन्हें अपना स्वास्थ्य अभीष्ट है जो सुख और सुविधाओं का स्वस्थ व नीरोग जीवन जीना पसंद करते हैं, उनकी भलाई इसी में है कि धूम्रपान की बुरी लत आज से, अभी से छोड़ दें। यह श्रेष्ठ सत्कर्म है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण का भी उद्देश्य इसी से पूरा होता है।
महात्मा हंसराज पंजाब के सुप्रसिद्ध समाज सेवी और शिक्षा शास्त्री थे। बचपन में जब वे विद्यार्थी थे तब अनेकों अनपढ़ व्यक्ति उनसे अपनी चिट्ठियाँ पढ़वाने और लिखवाने लाया करते थे। उनका बहुत-सा समय इसी में लग जाता था।
परीक्षा का समय निकट आ गया था। एक दिन उनकी माता ने कहा-अपनी पढ़ाई की ओर भी कुछ ध्यान दे, सारा वक्त उन्हीं लोगों की बेगार में मत बर्बाद किया कर।
हंसराज ने विनयपूर्वक कहा-माताजी! यदि पढ़ाई से दूसरों का कुछ फायदा न हुआ तो मेरे पढ़ने-लिखने से क्या लाभ?
तुम में ज्योति इसी से ही तो सूरज चमका करता,
तुझमें शाँति इसी से चंदा शीतलता है भरता;
यह कोमल आकर्षण तेरे भव्य हृदय की माया,
देख रहा जो कुछ वह तेरे ही भावों की छाया;
हिमगिरि तुँग विशाल इसीसे झुका न तेरा मस्तक,
सरिताएं गतिवान, चरण की गति न सकी इससे रुक;
नव-घन बन तूने जग-मरुथल पर जीवन बरसाया,
देख रहा जो कुछ वह तेरे ही भावों की छाया;
तेरी एक श्वास में अंकित वासुदेव की गीता,
तेरा ही विश्वास राम, तेरी श्रद्धा ही सीता;
तू क्या यह सब भेद अभी तक जान नहीं है पाया।
देख रहा जो कुछ वह तेरे ही भावों की छाया॥
-विद्यावती मिश्र
शबनम-सा तो तुम जीवन भर रोये हो,
कुछ फूलों-सा काँटों में भी मुस्कालो॥
पतझर के पीले पात गिने हैं तुमने,
कुछ मधुऋतु की कोंपल को भी तो देखो।
दुख की आँधी से परिचय नित्य किया है,
सुख के विस्तृत अंचल को भी तो देखो॥
पथ में पग-पग पर मिले पराजय के स्वर,
अब मंजिल पर तो गीत विजय के गालो॥
माना दुःख है, पर रोने से क्या होगा,
असहाय रुदन पर हंसते हैं जगवाले।
आँसू पोंछों, मुस्कानों को अपना लो,
दुर्भाग्य-दुर्ग पर पड़ जायेंगे ताले॥
रोओगे तो अपने भी साथ न देंगे।
हंस-हंस कर औरों को मन मीत बनालो॥
-विनोद रस्तोगी
जिनको विश्वास अडिग निज पर वरदान नहीं
माँगा करते-
कब जाना शलभ विचारे ने जलना उसकी नादानी है?
शबनम का कतरा क्या जाने वह मोती है या पानी है?
कंटक में कलियाँ पलीं चटक कर फूल बनी
अलि मंडराया,
वे क्या जाने अलि तब तक है जब तक यह खिली
जवानी है।
जो देने में ही सुख पाते प्रतिदिन नहीं माँगा करते,
जिनको विश्वास अडिग निज पर वरदान नहीं
माँगा करते।
-अज्ञात
ओ देश की जवानियों, चलो उठो-उठो,
इतिहास की निशानियों, चलो उठो-उठो,
ओ जून की रवानियों, चलो उठो-उठो,
संघर्ष की कहानियों, चलो उठो-उठो,
हम जन्म लें स्वतंत्र ही, स्वतंत्र ही मरें-
तुम अर्चना करो, अमोघ अर्चना करो,
तुम अर्चना करो।
अधिकार लो, सदा न भीख माँगते रहो
संग्राम से जनम-जनम न भागते रहो,
छाई घटा, चली हिलोर, जागते रहो,
घर में कहीं घुसे न चोर, जागते रहो,
अपने महान देश के कुशल बचाव की-
तुम योजना करो, सशस्त्र योजना करो,
तुम योजना करो।
कुचली गई स्वतंत्रता कि फनफना उठो,
अपमान देश का हुआ कि झनझना उठो,
हमला अगर कहीं हुआ कि सनसना उठो,
दुश्मन बढ़े कि आर-पार दनदना उठो,
संसार भी अगर कहीं मुकाबला करे-
तुम सामना करो, समर्थ सामना करो,
तुम सामना करो।
-गोपाल सिंह नेपाली
चाँद से, सूर्य से, शोलों से, सितारों से खेल।
फूल से, शूल से, पतझर से, बहारों से खेल॥
जिन्दगी खेल है, कोई नहीं साथी तो क्या?
कफन पहन और, चिता वाले अंगारों से खेल।
-नीरज
युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति
युग-निर्माण योजना को विशेष गति और साकार स्वरूप देने के लिए ‘त्रिविध प्रशिक्षण’ की जो योजना प्रस्तुत की गई है उसे परिजनों ने बहुत ही आवश्यक एवं उपयुक्त माना है और उसके संबंध में बहुत ही भावनापूर्ण विचार व्यक्त किये हैं। देश भर के विचारशील एवं प्रबुद्ध सम्भ्राँत मनीषियों ने इस योजना को अत्यन्त आवश्यक, व्यावहारिक एवं निश्चित रूप में अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत करने वाली माना है।
ऐसा इस एक मास में आये हुए हजारों पत्रों से पूर्णतया स्पष्ट होता है। जिस सुदृढ़ संकल्प के साथ इस योजना को आरंभ किया जा रहा है, जिन तपे हुए व्यक्तियों द्वारा इसे कार्यान्वित किया जा रहा है और युग की पुकार के उपयुक्त जो सामयिक कदम उठाया गया है, उनका सम्मिलित स्वरूप सफल ही होकर रहेगा ऐसी भविष्यवाणी और शुभ कामना के अगणित पत्र हमें प्राप्त हो चुके हैं, यह आशीर्वाद एवं प्रोत्साहन हमारे संकल्प एवं प्रयत्न को अग्रगामी बनाने की प्रेरणा भरी भूमिका प्रस्तुत कर रहे हैं।
अखण्ड ज्योति के माध्यम से, पुस्तकों से, पत्र व्यवहार से तथा वाणी से पिछले पच्चीस वर्षों से धर्म, ज्ञान, नीति सदाचार का यथासंभव प्रचार किया जा रहा है। संस्कारवान व्यक्तियों पर उसका प्रभाव ही पड़ा है और एक सीमा तक सन्तोषप्रद सफलता भी मिली है। लाखों व्यक्तियों की जीवन दिशा बदली है और वे कुछ से कुछ बने हैं। इन सुधरे हुए व्यक्तियों ने समाज की नवरचना में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया है। पर इतना चलने से ही मंजिल पूरी नहीं हो जाती, हमें आगे बहुत दूर तक चलना है, जो किया जा चुका उससे हजारों गुना अधिक करना है। राष्ट्र निर्माण एवं विश्व शाँति का कार्य बहुत व्यापक और बड़ा है, उसके लिए उतनी ही बड़ी विचारणा, भावना, प्रक्रिया एवं योजना अभीष्ट है। जैसे-जैसे संकल्प वाला सहयोग बल एवं उत्तरदायित्व बढ़ता जा रहा है वैसे ही वैसे क्रिया में भी तेजी आनी ही है। युग-निर्माण योजना की गतिशीलता को निरंतर अग्रगामी होते ही जाना है। परमात्मा की इच्छा-स्वरूप नवयुग की उषा का उदय होना इसी प्रकार संभव भी है।
जिस विचारधारा को गत पच्चीस वर्षों से सिखाया समझाया जाता रहा है वह पाठकों को हृदयंगम हुई या नहीं इसकी परीक्षा का समय आ पहुँचा। उस विचारधारा एवं प्रेरणा को कार्यान्वित होना ही चाहिए। जो ज्ञान मस्तिष्क का भार एवं मनोरंजन बन कर रह जाय वह निरर्थक है। ज्ञान की सार्थकता तो तभी है जब वह कार्य रूप में परिणत हो। धर्म या अध्यात्म उसी को मानना चाहिए जो व्यावहारिक जीवन में उतरे। धर्म कथा को कहने सुनने भर की, पाठ करने मात्र से पुण्य मिल जाने की जादूगरी मान लिया जाय तो उसे भ्राँति के अतिरिक्त और कहा ही क्या जा सकता है? आवश्यकता इस बात की है कि अध्यात्म को, धर्म और सदाचार को जन-जीवन में ओत-प्रोत होने की प्रक्रिया चल पड़े। तभी तो उसके सत्परिणामों को प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकेगा। अब अखण्ड ज्योति परिवार के सामने वही स्थिति आ उपस्थित हुई है कि जो कुछ पच्चीस वर्ष में सीखा गया है उसे कार्य रूप में परिणत किया जाय।
हममें से हर एक को अपना निर्माण करने के लिए कटिबद्ध होना होगा। लोक शिक्षण की दिशा में वाणी और लेखनी एक सीमा तक ही अपना प्रभाव उत्पन्न करती हैं। इसके बाद प्रभाव डालने का, उन्हें प्रेरणा देने का सबसे बढ़िया सबसे कारगर और सबसे निश्चित मार्ग एक ही है- अपनी श्रेष्ठता का अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करना। इसी कसौटी पर हमारी वास्तविकता अब परखी जानी है। पच्चीस वर्ष में जो हम लोगों ने लिखा या पढ़ा है उसका कितना प्रभाव अन्तःकरण पर हुआ? उस प्रेरणा ने कितनी गतिशीलता प्रदान की? इन प्रश्नों का उत्तर अब हमें अपने आचरण द्वारा ही देना पड़ेगा।
धर्म और अध्यात्म के महान आदर्शों को कहते लिखते ही न रहकर अब हमने भी अपनी नीति यह बना ली है कि जो सिखाया जाय उसे कार्यान्वित भी किये जाने पर पूरा-पूरा जोर दिया जाय। जो लोग सद्ज्ञान की विचारधारा से प्रभावित हों उन्हें सत्कर्म की गतिविधि अपनाने के लिए भी दबाया जाय। कुछ ठोस काम होगा तो वह इसी तरह होगा।
हमारी अभिलाषा है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य उत्कृष्ट प्रकार के व्यक्तित्व से सम्पन्न भारतीय धर्म और संस्कृति का शिर ऊंचा करने वाला सज्जन व्यक्ति बने। उसका जीवन उलझनों और कुण्ठाओं से भरा हुआ नहीं वरन् आशा, उत्साह, संतोष एवं मस्ती से भरा हुआ बीते। हर व्यक्ति अपने परिवार के बारे में ऐसा ही सोचता है, हम भी ऐसा ही सोंचे तो यह स्वाभाविक ही है। मनुष्य यदि थोड़ा-सा बदल और ढल जाय तो एक-एक के जीवट क्रिया में ऐसा सुसंयत सुयोग उत्पन्न हो सकता है। प्रश्न केवल कुछ बदलने, कुछ सुधरने और कुछ करने का है। इसके लिए अपेक्षाकृत कुछ अधिक प्रेरणा एवं जीवन चाहिए। प्रशिक्षण योजनाओं का उद्देश्य इसी आवश्यकता की पूर्ति करना है।
हर व्यक्ति अपनी समस्याओं को हल कर सकता है, अपने भाग्य और भविष्य को उज्ज्वल बना सकता है, पर यह सब कैसे किया जाय इस विधि-व्यवस्था को कोई विरले ही जानते हैं, जो जानते हैं वे मनोबल के अभाव में वैसा कर नहीं पाते। निरोगता, विद्या, समृद्धि, प्रतिष्ठा, मैत्री, कौटुम्बिक सुख शाँति आदि विभूतियों को चाहता तो हर व्यक्ति है पर उनको किस मूल्य पर प्राप्त किया जा सकता यह नहीं जानता, जो जानता है वह उस मूल्य को चुकाने का साहस नहीं करता। फलस्वरूप प्रगति और सुख शाँति की कामना कल्पना मात्र बनकर रह जाती है। आवश्यकता इस बात की है कि यह स्थिति बढ़ती जाय। यह परिवर्तन जिस प्रेरणाप्रद प्रोत्साहन के मार्गदर्शन की अपेक्षा रखता है उसी की पूर्ति के लिए ‘त्रिविध प्रशिक्षण योजना’ को क्रियान्वित करने के लिए हमें कटिबद्ध होना पड़ा है।
सिक्के ढालने की टकसाल में नया पैसा, दो पैसा, पाँच पैसा, दस पैसा, पच्चीस पैसा, पचास पैसा का सिक्का ढलता है और उसमें अर्थ व्यवस्था की आवश्यकता पूरी होती है। युग-निर्माण योजना की प्रशिक्षण योजना को भी एक टकसाल ही कहना चाहिए। इसमें चारों वर्ण और चारों आश्रमों का ठीक प्रकार पालन करने की समग्र व्यवस्था राष्ट्र की प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति करने वाले व्यक्तित्व ढालेगी और उससे साँस्कृतिक एवं नैतिक पुनरुत्थान की एक भारी आवश्यकता पूर्ण होगी। आशा यह करनी चाहिए कि यह टकसाल ऐसे व्यक्तित्व ढालने में समर्थ होगी जिन्हें हीरे-मोतियों के वजन से भी अधिक मूल्यवान गिना जायेगा।
संतोष की बात है कि इस योजना का परिवार के भीतर और बाहर आशातीत स्वागत हुआ है। अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को इस बात की तैयारी करनी चाहिए कि वह अपनी स्थिति के अनुसार जीवन-निर्माण के त्रिविध प्रशिक्षणों द्वारा आत्म-कल्याण और युग-निर्माण का दुहरा श्रेय प्राप्त करने का जीवन को धन्य बनाने वाला सुअवसर प्राप्त कर सके।
यों पुस्तकीय ज्ञान तो मनुष्य जीवन भर प्राप्त करता रह सकता है पर स्वभाव और संस्कारों का निर्माण बचपन में होता है। बारह तेरह वर्ष तक की अबोध आयु में बाह्य मस्तिष्क विकसित नहीं हो पाता, उस अवधि में अंतर्मन ही प्रधानतया काम करता है। इसलिए तब तक की शिक्षा सामने प्रस्तुत परिस्थितियों द्वारा ही प्राप्त होती है। छः वर्ष तक की आयु का प्रधान प्रशिक्षण माता द्वारा होता है और छः वर्ष से 12 वर्ष तक की आयु का उत्तरदायित्व पिता को संभालना पड़ता है। माता से मतलब उन सब महिलाओं से है जो घर के भीतर रहती और बालकों पर अपना प्रभाव डालती हैं। छः वर्ष के बाद बालक को घर की चहारदीवारी से बाहर बाह्य संसार में जो कुछ हो रहा है, होता है, उसका ज्ञान देकर शिशु, मस्तिष्क को सुविकसित करना पिता का काम है। पिता से मतलब यहाँ उन सब समर्थ पुरुषों से है जो बच्चों के बाह्य ज्ञान की अभिवृद्धि में सहायता पहुँचाते हैं।
इसके बाद गुरु का नम्बर आता है। हर माता का ज्ञान सीमित होता है, शिशु विकास के लिए जैसे मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक वातावरण की आवश्यकता होती है और प्रवृत्तियों के चढ़ाव उतार का जिन्हें विस्तृत अनुभव हो उसे अध्यापक, सर्वत्र नहीं मिलते। चिकित्सा का काम अनुभवी चिकित्सकों को ही सौंपा जाता है उसी प्रकार बालकों के अन्तःकरण का गुण कर्म स्वभाव का परिष्कृत निर्माण सुयोग्य उपाध्यायों द्वारा ही संभव होता है। प्राचीन काल में यह आवश्यकता गुरुकुलों में पूरी होती थी। प्रत्येक व्यक्ति अपने किशोर बालकों को गुरुकुलों में भेजता था।
तेरह-चौदह वर्ष से लेकर अठारह-बीस वर्ष तक की आयु ऐसी है जिसमें जोश अधिक और होश कम रहता है। इसे जीवन का सब से अधिक खतरनाक, सबसे अधिक महत्वपूर्ण समय कहा जा सकता है। महत्वपूर्ण इसलिए कि इस आयु में यदि किसी को सुसंस्कृत बनाया जा सके तो वह सामान्य स्थिति में रहते हुए भी महा मानव की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। खतरनाक इसलिए कि इस आयु में यदि कुसंगजन्य दुर्गुणों से न बचाया जा सका तो मनुष्य भावी जीवन में हीन, हेय और घृणित ही बन सकता है। बुद्धि विकास की, भावनाओं के उफान की, यह प्रथम अवधि इतनी संवेदनशील है कि जैसा कुछ भी मनुष्य इस आयु में ढल जाता है, जीवन भर प्रायः वैसा ही बना रहता है। अपवाद तो बुढ़ापे में भी सुधारने के होते हैं पर उनकी संख्या कम ही पाई जाती है।
युग-निर्माण के लिए प्रबुद्ध एवं मनस्वी व्यक्तियों की आवश्यकता है। यों नई पीढ़ी का निर्माण माता-पिता के उत्कृष्ट गुण, कर्म स्वभाव द्वारा ही होता है। पर इतने से भी काम नहीं चल सकता। उतनी आयु में किशोर अवस्था में उसकी संगति और व्यक्तित्व की ढलाई प्रमाणिक मनीषियों द्वारा होनी और की जानी चाहिए। सुगठित और सुसंस्कृत चरित्र के व्यक्ति ही महामानव बन सकते हैं, उन्हीं के द्वारा अपना या समाज का कुछ भला हो सकता है। इसलिए यह आवश्यक था कि व्यक्तियों के निर्माण की ढलाई करने वाला एक ऐसा शिक्षा केन्द्र बने जहाँ पूरा ध्यान इस बात पर दिया जाय कि आदर्श महामानव के गुण, कर्म, स्वभाव से सुसम्पन्न बनाने की दृष्टि से ही पूरा का पूरा प्रशिक्षण प्राचीन काल के गुरुकुलों की तरह होता रहे।
आज यों कई प्रकार के विद्यालय चलते हैं। उनमें नौकरी दिलाने वाली शिक्षा का उतना बड़ा पाठ्य-क्रम छात्रों के ऊपर लादा रहता है कि वे परीक्षा में उत्तीर्ण होने की चिन्ता में दिन-रात लगे और घुलते रहने के अतिरिक्त दूसरी बात सोच भी नहीं पाते। विद्यालयों में खेलों की व्यवस्था रहती है पर अधिकाँश छात्र उससे बचने का प्रयत्न करते हैं ताकि उस भारी कोर्स को पूरा करने में अधिक से अधिक समय जुटे सके। कैदी जैसा कठोर और अत्यधिक व्यस्त जीवन व्यतीत करते हुए किशोर जीवन बुरी तरह कुचल-मसल जाता है और फिर बड़े होने पर वे पास होकर नौकरी में भले ही लग जावें व्यक्तित्व की दृष्टि से मुरझाने और मसले हुए लोगों को मानसिक दृष्टि से जैसा लुञ्ज-पुञ्ज होना चाहिए वैसे ही गये-गुजरे बने रहते हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि प्राचीन काल की आर्ष शिक्षा पद्धति का वह स्वरूप पुनः विकसित किया जाये जिसमें सारा पाठ्य-क्रम इस प्रकार चुना हुआ हो जो छात्र के समग्र व्यक्तित्व की आवश्यकता पूर्ण करने में शरीर, मन और चरित्र को उत्कृष्ट प्रकार का बनाने में, कारगर सिद्ध हो। पुस्तकों से ही नहीं, परामर्शी, मनोरंजन, दिनचर्या और व्यवहार का सारा ढाँचा व्यक्तित्व के निर्माण की आवश्यकता को पूर्ण करने वाला हो। मानव जीवन की एक भी समस्या ऐसी न बचे जिसे वह शिक्षार्थी गहराई तक न समझ ले। आगे चलकर उसे जिन समस्याओं का सामना करना पड़ेगा या अन्य लोगों को जो मार्गदर्शन करना पड़ेगा उसका व्यावहारिक ज्ञान इतना परिपूर्ण होना चाहिए कि जिन्दगी जीना अत्यन्त सरल हो जाय और मनुष्य जन्म के सदुपयोग एवं आनन्द का पूरा-पूरा लाभ उठा सकने का अवसर मिल जाय। ऐसी शिक्षा को ही वास्तविक शिक्षा कहा जा सकता है। यों कहने को देश में कितने ही गुरुकुल भी चलते हैं, छात्रावासों समेत विद्यालय भी हैं, पर वहाँ भी भारी पाठ्यक्रमों को पूरा करने में ही बेचारे छात्र लगे रहते हैं और व्यक्तित्व निर्माण के विशेषज्ञों एवं महत्व देने वाले उपाध्यायों का अभाव होने से यह पहलू वहाँ भी उपेक्षित ही पड़ा रहता है। नाम मात्र की खाना-पूर्ति करके किसी प्रकार संतोष और दिखावा कर लिया जाता है। जब प्रशिक्षकों को ही उस विषय में समुचित ज्ञान नहीं तो वे बेचारे छात्रों को प्रेरणा देने वाली व्यवस्था भी कैसे जुटा सकेंगे। लेक्चर देने मात्र से छात्रों से ढाला नहीं जा सकता। उनकी प्रत्येक क्रिया और वृत्ति पर निरन्तर बारीकी से ध्यान रखा जा सके और गेहूँ विकृत उत्पन्न होने पर उसे तुरंत संभाल लिया जाने पर ही व्यक्तित्वों का निर्माण संभव है। इसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि छात्र को निरन्तर कैसा अवसर मिलता रहे, जिससे उसका व्यक्तित्व निखरने और विकसित होने की प्रेरणा प्राप्त करता रहे।
प्रयत्न यह किया जा रहा है कि उत्कृष्ट व्यक्तित्व निर्माण की समग्र शिक्षा देने के लिए एक ऐसे विद्यालय का सूत्रपात कर ही दिया जाय जिससे इस युग की इस महान आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए कुछ ठोस काम बन पड़ना संभव हो सके। छात्रों को यदि चार वर्ष तक इस प्रकार का शिक्षण मिलने की सुविधा प्राप्त हो सके तो निश्चय ही वे एक आदर्श मानव बनकर अपना और समाज का भारी हित कर सकने की दृष्टि से आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
आजकल प्रत्येक अभिभावक का दृष्टिकोण यह रहता है कि उसके लड़के को कोई नौकरी मिले। सरकारी प्रमाणपत्रों से ही नौकरी मिलती है इसलिए अपने बच्चों को उसी शिक्षा पद्धति में लगाना पड़ता है। भले ही जितना पैसा और श्रम उस पढ़ाई में लगा है, नौकरी में उसका ब्याज भी वसूल न हो, पर करना वही पड़ता है। ऐसी परिस्थिति के लोगों के बालक इस पद्धति से लाभ नहीं उठा सकते। क्योंकि जीवन विद्या के विभिन्न पहलुओं का प्रशिक्षण ही इतना बड़ा होगा कि चार साल से उसे पूरा कर सकना काफी कठिन पड़ेगा, फिर साथ ही स्कूली जंजाल भी पढ़ाया जाय तो दोनों में से एक भी उद्देश्य पूरा न हो सकेगा। हमारी शिक्षा पद्धति में स्कूलों, छात्रों से अनेक गुना व्यावहारिक ज्ञान प्रत्येक दिशा में अधिक होगा पर नौकरी दिलाने वाला प्रमाण-पत्र न मिल सकने से दूसरों की दृष्टि में उस पढ़ाई का कोई मूल्य नहीं आँका जा सकता। इस शिक्षा के लिए उन्हीं परिवारों के बच्चे मिल सकते हैं जिनके घर में कृषि, वाणिज्य शिल्प आदि की परम्परागत व्यवस्था बनी चली आती है या फिर उन लोगों के बच्चे मिलेंगे जो निखरे हुए व्यक्तित्व का मूल्य समझते हैं और यह विश्वास करते हैं कि यदि मनुष्य सुयोग्य हो तो अपने पुरुषार्थ से इतना कमा सकता है जो इन नौकरी की दयनीय दुर्दशा में पड़े हुए लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक होगा।
जीवन जीने की समग्र शिक्षा प्रत्येक दृष्टि से नितान्त आवश्यक है। उसका आज नहीं तो कल व्यापक प्रसार होकर ही रहेगा। लाखों की संख्या में हर वर्ष स्कूलों से निकलने वाले छात्रों को नौकरियाँ आखिर मिलेंगी भी कहाँ से? फिर इतना धन और श्रम सेवा गंवा कर उठती आयु की उमंगों तथा आवश्यकताओं को कुचल मसल डालने में लाभ की क्या है? यह बात आज तो नहीं पर कल लोगों की समझ में जरूरी आवेगी। इतने महंगे मूल्य पर मिले हुए प्रमाणपत्र भी जब नौकरी दिलाने में समर्थ न होंगे तब लोग उसकी व्यर्थता समझेंगे और अपने बालकों का हित इस बात में मानेंगे कि शारीरिक और मानसिक दृष्टि से सुविकसित बनाने वाले शिक्षण क्रम के लाभ से उन्हें वंचित न किया जाय। जिस शिक्षा पद्धति का सूत्रपात बहुत छोटे रूप से हम करने जा रहे हैं, वह कुछ ही दिन में व्यापक रूप धारण करेगी। हमारी सुनिश्चित आस्था है कि कल का समझदार मनुष्य अपने बालकों को नौकरी के लिए नहीं सुविकसित व्यक्तित्व की उपलब्धि की दृष्टि से पढ़ाना पसंद करेगा। तब वही शिक्षा पद्धति चाहे सरकारी, चाहे गैर सरकारी रूप से लोकप्रिय और व्यापक होकर रहेगी, जैसा कि छोटा शिक्षण केन्द्र का आरंभ करने जा रहे है। तब ऐसी व्यवस्था प्रत्येक नगर गाँव में फलती-फूलती दिखाई देगी। ऐसी दशा में यहाँ से निकले हुए छात्र उन शिक्षा केन्द्रों के संचालक, व्यवस्थापक एवं अध्यापक बन कर राष्ट्र-निर्माण में महान योगदान दे सकेंगे।
अखण्ड-ज्योति परिवार के स्वजनों में से 25 किशोर छात्र लेकर यह प्रशिक्षण जल्दी ही आरंभ करेंगे। शिक्षा, छात्रावास आदि की कोई फीस न होगी। पर अपने भोजन वस्त्र का व्यय भार छात्रों को स्वयं ही उठाना पड़ेगा। इस योजना की चर्चा गत अंक में हुई थी। प्रसन्नता की बात है कि अनेक अभिभावकों ने अपने बालक इस शिक्षण के लिए भेजने की उत्सुकता प्रकट की है। अभी उनके विधिवत आवेदन-पत्र माँगे गये हैं। उनमें से छाँट होगी। क्योंकि लेने केवल 25 हैं। यदि शिक्षा की समुचित साधन व्यवस्था बन सकी तो प्रति वर्ष नये 25 छात्र लेने का भी क्रम चल सकता है और प्रथम कक्षा के छात्र दूसरी, तीसरी, चौथी में बैठते रहेंगे। किन्तु यदि स्थान की तंगी एवं सुयोग्य शिक्षकों की कमी बनी रही तो यह 25 छात्र ही हमारे द्वारा चार वर्ष तक पढ़ाये जाते रहेंगे और जब यहाँ सत्र चार वर्ष में पूरा हो जाय तब नये 25 फिर भर्ती करेंगे। व्यवस्था और विस्तार भविष्य के गर्भ में हैं पर आरंभ तो किया ही जा रहा है। इस वर्ष छात्रों का चुनाव करके अगले वर्ष 1 जुलाई से शिक्षा आरंभ करने का विचार है। सुविधा हो सकी तो यह कार्य पहले भी आरंभ हो सकता है।
व्यक्तिगत जीवन को सुविकसित करने में परिवार की स्थिति ही सबसे अधिक सहायक या बाधक होती है शरीर के विभिन्न अवयवों की तरह परिवार के सदस्य भी हमारे समग्र जीवन में एक अभिभाज्य अंग बनकर जुड़े होते हैं। प्रगति के इच्छुकों को आत्म-कल्याण की योजना से परिवार को सुविकसित करने की भी व्यवस्था बनानी पड़ती है।
खेद की बात है कि बुद्धिमान और सुशिक्षित कहलाने वाले व्यक्ति भी अपने निज के व्यक्तित्व को सुविकसित बनाने की ओर से उदास रहते हैं और परिवार निर्माण के उत्तरदायित्व को भी भुलाये रहते हैं। यों अपने और अपने स्त्री बच्चों के भोजन, कपड़े, शिक्षा, मनोरंजन तथा अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी लोग यथासंभव साधन जुटाते रहते हैं पर उस गुण, कर्म, स्वभाव की प्रक्रिया का समावेश नहीं करते जिन्हें मानव जीवन की महानतम सम्पदा करना चाहिए। दुर्गुण यों प्रत्यक्ष में कोई भारी बाधा जैसे दिखाई नहीं पड़ते पर उन छोटी-छोटी त्रुटियों के कारण जीवन का विकास क्रम ही रुक जाता है इसी प्रकार सद्गुण देखने में कोई महत्व की वस्तु मालूम नहीं पड़ते पर अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी मनुष्य के जीवन में सुख-शाँति एवं प्रगति के साधन उत्पन्न करने में भारी सहायता करते हैं। स्वास्थ्य, धन, मान, ज्ञान, मैत्री आन्तरिक शाँति एवं आत्मिक प्रगति का सारा आधार मनुष्य के गुण, कर्म, स्वभाव पर निर्भर रहता है। जिसने इस ओर से उपेक्षा बरती, समझना चाहिए कि उसने अपने भविष्य के साथ निर्मम खिलवाड़ का खेल खेला है।
आज जब कि हम राष्ट्र के नव जागरण और निर्माण का महान लक्ष्य लेकर चले हैं तो हमें सबसे पहले अपने-अपने व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बनाने और अपने परिवार में सभ्य समाज का आदर्श उपस्थित करना होगा। जैसा भी कुछ समाज का संसार हम चाहते हैं उसका एक छोटा उदाहरण हमें अपने परिवार में प्रस्तुत करना चाहिए। देश या संसार का शासन हमारे हाथ में नहीं है, पर परिवार की हुकूमत तो हाथ में है ही। अपनी छोटी योजना का, इस छोटे दायरे में यदि सही उपयोग करके हम अपने कौशल को प्रमाणित कर सके तो निश्चय ही एक कुशल प्रशासक का, लोक निर्माता का गौरव प्राप्त कर सकते हैं और सुन्दर बगीचे में रहकर फल-फूलों का लाभ उठाने वाले माली की तरह सुसंस्कृत परिवार की प्रतिक्रिया का स्वर्गीय परिस्थितियों की तरह अनुभव करते हुए अपने सत्प्रयत्न का प्रत्यक्ष लाभ इसी जीवन में ले सकते हैं।
आज शिक्षा का अनेक दिशाओं में विकास हुआ है, विभिन्न प्रकार की उच्च शिक्षा के कालेज मौजूद हैं, पर आत्म-निर्माण और परिवार-निर्माण जैसे असाधारण महत्व के कार्य के लिए कहीं कोई सुव्यवस्थित शिक्षणक्रम न होना एक ऐसी कमी है जिसकी पूर्ति किये बिना राष्ट्रीय उत्थान कदापि संभव नहीं हो सकता।
गत अंक में अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को यह खुला निमंत्रण भेजा गया है कि अपने परिवार समेत एक महीना मथुरा आकर हमारे पास रहें और जीवन-निर्माण की जो विचारधारा अखण्ड-ज्योति के माध्यम से दी जाती रहती है उसे कार्य रूप में परिणत करने, अभ्यास में लाने, जीवन में उतारने का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करें। स्वास्थ्य रक्षा, स्वभाव सुधार, दृष्टिकोण का परिष्कार, आर्थिक संतुलन, स्नेह सौहार्द, दांपत्ति निष्ठा, बच्चों के विकास, शिक्षा एवं विवाह की समस्या, पारस्परिक मनोमालिन्य एवं शत्रुता का निराकरण, उपासना तथा आत्म-कल्याण जैसी अगणित समस्यायें हमें घेरे रहती हैं और अपना उचित हल चाहती हैं। किन्तु जीवन विद्या के आधारभूत सिद्धांतों का समुचित ज्ञान न होने से हम इन्हें सुलझा नहीं पाते वरन् कई बार तो दिन-दिन इस तरह और उलझते चले जाते हैं कि जीवन नरक बन जाता है। इस स्थिति में बचते हुए सुविकसित सुसंस्कृत जीवन जीने के लिए हमें क्या सोचना और क्या करना चाहिए, यही सब व्यावहारिक रूप से इस एक महीने के प्रशिक्षण में सिखाया जायेगा। आशा यही करनी चाहिए कि इस शिक्षण में लगाया हुआ एक महीने का समय शिक्षार्थियों के लिए प्रत्येक दृष्टि से सफल और सार्थक ही सिद्ध होगा।
नई पीढ़ी का अवतरण एक अत्यंत महत्वपूर्ण समस्या है। माता-पिता के कुसंस्कारी होने के कारण सन्तति उनसे भी अधिक कुसंस्कारी बनती है फलस्वरूप, हमारी पीढ़ियाँ निरन्तर घटिया स्तर की बनती जा रही हैं। जिनके व्यक्तित्व ओछे संस्कारों से ढल गये हैं उन्हें उपदेशों से सुधारना भी कठिन होता है। अच्छे खिलौने बढ़िया चिकनी मिट्टी से बनते हैं। रेतीली मिट्टी से बने हुए खिलौने या बर्तन न तो सुन्दर होते हैं और न टिकाऊ। इसी प्रकार कुसंस्कारी माता-पिता के द्वारा विनिर्मित बालकों से यह आशा नहीं की जा सकती कि वे अपने वश या देश धर्म को गौरवान्वित करने वाला जीवन जी सकेंगे। राष्ट्रीय महानता, उसके सुसभ्य नागरिकों पर निर्भर रहती है और ऐसे सुविकसित व्यक्तित्व अनायास ही नहीं उपज पड़ते वरन् माता-पिता को अपने आपका निर्माण करके उसी ढाँचे में शिशुओं को ढालने की तैयारी करनी पड़ती है। युग निर्माण के लिए हमें अगली प्रबुद्ध पीढ़ी की आवश्यकता है। महापुरुषों जैसी उत्कृष्ट आत्माएं ही उज्ज्वल भविष्य का नव-निर्माण करेंगी। ऐसी आत्माओं का अवतरण यदि हम लोग अपने घरों में देखना पसंद करते हों तो उसकी तैयारी में लग जाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं हो सकता।
ऐसे महान प्रशिक्षण के लिए एक महीने का समय कम है पर दो कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए हमें छोटा कार्यक्रम बनाने के लिए विवश होना पड़ा है। 1. इस शिक्षण में केवल पुरुष ही नहीं उनकी धर्म पत्नी तथा वयस्क बच्चे भी साथ आवेंगे ताकि सारे परिवार को उपर्युक्त शिक्षण मिल सके। अधिक दिनों के लिए पूरे परिवार समेत बाहर जाने से सभी को कठिनाई होती है। 2. हमें भी अपने विचार परिवार- अखण्ड-ज्योति परिवार के 30 हजार सदस्यों को शिक्षण देना है। समय कम है। थोड़ा-थोड़ा लाभ सभी को मिल सके, इसलिये एक महीने का क्रम रखकर ही संतोष करना पड़ेगा।
चान्द्रायण व्रत करते हुए सवा लक्ष अनुष्ठान करने के इच्छुक कितने ही अध्यात्म प्रेमी ऐसे होते हैं जो गायत्री तपोभूमि में रहते हुए हमारे सान्निध्य में अपनी तपश्चर्या पूर्ण करना चाहते हैं उनके लिए यह एक महीने के शिविरों में जीवन विद्या शिक्षण के अतिरिक्त तपश्चर्या का आध्यात्मिक परिणाम प्राप्त करने का दुहरा सुअवसर मिल सकता है। इसी प्रकार जो लोग शारीरिक दृष्टि से दुर्बलता एवं अस्तव्यस्तता अनुभव करते है उनके लिए प्राकृतिक चिकित्सा विधि से अपने खोये स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने और प्राकृतिक की व्यावहारिक शिक्षा द्वारा दूसरे अनेकों की रोग मुक्ति की सेवा कर सकने की सामर्थ्य उपलब्ध करने का स्वर्ण सुयोग मिल सकता है, यह लाभ भी कम महत्व का नहीं है। कई व्यक्ति साहित्य निर्माण में एक सीमा तक अभिरुचि रखते हैं, कविता करते हैं, वक्ता बनने के इच्छुक हैं पर इन सब बातों की क्रमबद्ध शिक्षा प्राप्त न कर सकने के कारण उनकी प्रगति नहीं हो पाती। ऐसे लोगों के लिए यह एक महीना स्वयं सुयोग जैसा सुअवसर सिद्ध हो सकता है। इतने कम समय में इतने प्रकार के लाभ प्राप्त कर सकने की व्यवस्था शायद ही कभी कहीं बनी हो।
पहला शिविर भाद्रपद सुदी पूर्णिमा तदनुसार ता. 21 सितम्बर अक्टूबर तक चलेगा। आश्विन से वैशाख तक आठ महीने के लिए क्रमशः शिक्षार्थियों को आने की स्वीकृतियाँ दी जा रही हैं। प्रति वर्ष इसी प्रकार एक वर्ष के लिए स्वीकृतियाँ जेष्ठ में दे दी जाया करेगी और इसी क्रम में थोड़े-थोड़े शिक्षार्थी हर महीने मथुरा आते रहेंगे। सुविज्ञ परिजन इस योजना से लाभान्वित होने के लिए जैसा उत्साह प्रकट कर रहे हैं उससे इस परिवार प्रशिक्षण क्रम का भविष्य बहुत ही उज्ज्वल प्रतीत होता है।
वर्णाश्रम धर्म भारतीय संस्कृति का मानव जीवन को सुविकसित करने का एक अत्यंत ही विवेकपूर्ण मार्ग है। किशोर अवस्था में शरीर और मन का संयम करने से भावी जीवन में सुदृढ़ता और समर्थता आती है। इसके बाद गृहस्थ में उपार्जन और अभिवर्धन की, पौरुष और विकास की साधना करते हुए आत्मा की उमंगों को तृप्त किया जाता है। छोटे बच्चों का उत्तरदायित्व जब बड़ा बच्चा संभाल ले, युवावस्था समाप्त हो जाय और पारिवारिक जिम्मेदारियाँ हल्की हो जायं तो हर मनुष्य का परम पवित्र कर्त्तव्य है कि ढलती आयु को आध्यात्मिक परिष्कार में लगावे। युवावस्था की आँधी मन के ऊपर कुछ कूड़ा कचरा बखेर जाती है। काम, क्रोध, लोभ, मोह से सना हुआ जीवन क्रम स्वभावतः कुछ ऐसे कलुषित अन्तःकरण पर जमा कर देता है कि यदि उन्हें शुद्ध न किया जाय तो स्वभाव का अंग एवं संस्कार रूप धारण करके वे जीव के लिए भव-बंधन में बाँधने वाले रस्से बन जाते हैं और उनमें जकड़ा हुआ वह पुनः चौरासी के चक्र में घूमने लगता है।
जिस प्रकार चढ़ती उम्र में ब्रह्मचर्य, यौवन में गृहस्थ आवश्यक है उसी प्रकार यह भी उचित है कि ढलती आयु को आत्म-कल्याण की साधना में लगाया जाय। उपासना, जीवन शोधन और परमार्थ के त्रिविध आध्यात्मिक कार्यक्रमों में पूरी तरह लग जाने का ठीक यही समय है। यदि इस ओर से उपेक्षा बरती गई तो शरीर त्यागते समय कुसंस्कारों में घिरा हुआ जीव बहुत ही त्रास पाकर विदा होता है। उस समय की मोह ममता तथा वासना तृष्णा उसे सद्गति का अधिकारी नहीं बनने देती। फिर उन्हीं प्रियजनों की, प्रिय वस्तुओं की समीपता पाने के लिए कर्मानुसार भली-बुरी योनियों में जन्मता मरता रहता है, जिसने मोह बन्धनों से छुटकारा प्राप्त नहीं किया उसके लिए जीवन मुक्ति असम्भव ही बनी रहेगी।
जिनकी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ इतनी हल्की हो गई हैं कि घर का ढर्रा थोड़े मार्ग दर्शन से अपने आप चलता रहे, उनके लिए सबसे बड़ी दूर-दर्शिता और बुद्धिमता की बात यही है कि वह आत्म-कल्याण की साधना में लगे और वानप्रस्थ जीवन के नियम धर्मों का पालन करना आरंभ कर दें। (1) स्वाध्याय सत्संग और चिन्तन मनन में समुचित समय लगाते हुए अपनी अन्तःभूमिका को अधिकाधिक परिष्कृत करने का प्रयत्न करें। (2) ईश्वर उपासना में अधिक मन लगावें। (3) अपने स्वभाव और संस्कारों को परमार्थ वृत्ति से सम्पन्न करने के लिए लोक-सेवा के कार्यक्रमों को विशुद्ध अध्यात्मिक साधना मानते हुए जन-कल्याण की प्रवृत्तियों में पूरे उत्साह के साथ भाग ले। संयम, सदाचार, त्याग, उदारता, निर्लोभता और निरहंकारता का सतर्कतापूर्वक अभ्यास करें। यह तीनों बातें जिनके जीवन क्रम का अंश बन गई समझना चाहिए कि वानप्रस्थ धर्म अपनाते हुए उसने मानव-जीवन की सफलता का द्वार प्रशस्त कर लिया।
आज की स्थिति अत्यंत दुःखदायक है। चार आश्रम मिट गये केवल एक गृहस्थ आश्रम ही बचा है। जब से होश संभाला और जब तक मरता है मनुष्य गृहस्थ ही बना रहता है। इसी प्रकार चार वर्णों में से तीन मिट गये एक वैश्य वर्ण ही शेष है। धन लालसा के अतिरिक्त किसी का और कोई लक्ष्य नहीं होता। तथाकथित साधु ब्राह्मण से लेकर चोर-डाकुओं तक हर वर्ग के व्यक्ति केवल धन की आकाँक्षा में ग्रसित और उसी का ताना-बाना बुनते देखे जाते हैं। इस प्रकार वर्णाश्रम धर्म की कमर टूट जाने से भारतीय समाज का सारा ढाँचा लड़खड़ा गया है। धर्म और संस्कृति एक विडम्बना के रूप में ही जीवित है। वर्णाश्रम धर्म की महान परम्पराएं ही जब नष्ट हो गईं, रीढ़ की हड्डी ही टूट गई है तो जो कुछ जीवित बचा है उसे मृत से गया बीता मानना चाहिए। आज हमारे महान धर्म की ऐसी ही दुर्गति हो रही है।
युग निर्माण की पुण्य बेला में सबसे अधिक आवश्यकता वानप्रस्थ आश्रम को जागृत करने की है। गृहस्थ की जिम्मेदारियों से निवृत्त हो जाने पर भी जो लोग ‘गृहमोह’ की बीमारी से, गठिया या लकवे के रोगी की तरह निर्जीव पड़े है उनमें पुनः जीवन संचार करने की आवश्यकता है। प्राचीन काल में यही वर्ग-केवल यही वर्ग सारे समाज को उत्कृष्ट बनाये रहने का उत्तरदायित्व अपने कंधे पर उठाता था और निस्वार्थ एवं सुयोग्य लोक सेवकों की आवश्यकता पूर्ण करता था। किसी समाज की उत्कृष्टता इस बात पर निर्भर रहती है कि उसमें अनुभवी, सुयोग्य, चरित्रवान और निस्वार्थ लोकसेवी कितनी संख्या में हैं। जहाँ यह तत्व जितना अधिक होगा वहाँ उतना ही प्रकाश, जीवन एवं उत्कर्ष दृष्टिगोचर होगा।
लोक सेवकों की आवश्यकता वेतन भोगी लोगों से पूरी नहीं की जा सकती। सरकारी महकमों में लाखों कर्मचारी तथाकथित लोकसेवा के लिए नियुक्त हैं। उनका दृष्टिकोण वेतन ही रहने से जो कुछ वे करते हैं वह उसकी अपेक्षा बहुत कम होता है जितना कि वह कर सकते थे। फिर भौतिक कामों में उनका कुछ उपयोग हो भी सकता है। आत्मिक स्तर ऊंचा उठाने में तो ऐसे लोग चाहिएं जो स्वयं सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से ओत-प्रोत जीवन जी रहे हों। उपदेश से नहीं लोग आदर्श को प्रत्यक्ष देखकर प्रभावित होते हैं। वानप्रस्थ लोगों की निष्ठा, सच्चरित्रता, अनुभवशीलता और निस्वार्थता ही जन-जीवन को अनुप्राणित करने में समर्थ हो सकती है। ऐसे लोग वेतन से नहीं खरीदे जा सकते, जो खरीदे जाते हैं वे वेतन भर के लिए काम करते हैं। उतनी स्वल्प चेष्टाओं से लोक-निर्माण जैसे महान उद्देश्यों की पूर्ति संभव नहीं हो सकती। भारतीय धर्म को सजीव एवं सशक्त रखा जाना हो तो उसके लिए वानप्रस्थ परम्परा को पुनः सजीव करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं।
युग-निर्माण का उद्देश्य पूर्ण करने के लिये हमें चारों आश्रमों का ही पुनर्गठन करना है। ब्रह्मचारी किशारों के लिए चार वर्ष की,गृहस्थों के लिये एक मास की शिक्षण बन रही हो तो वानप्रस्थों को ही अछूता क्यों छोड़ा जायेगा, उनके लिए एक वर्ष की शिक्षा का कार्यक्रम बनाया गया है। इस अवधि में उपासना के एक ऊंचे स्तर तक पहुँचाने का, जीवन शोधन की दिशा में काफी आगे बढ़ चलने का और परमार्थ कार्यों में युग की आवश्यकता के अनुरूप समुचित अनुभव प्राप्त करने का कार्यक्रम बना लिया गया है और अखण्ड-ज्योति परिवार के उन भावनाशील एवं सुशिक्षित लोगों को इसी जेष्ठ सदी पूर्णिमा से एक वर्ष के लिए मथुरा आने का आमंत्रण गत अंक में दिया गया है।
कहने की आवश्यकता नहीं कि उच्च-स्तरीय गायत्री उपासना का पंचकोशी साधना क्रम, चान्द्रायण व्रत और गायत्री पुरश्चरणों की सम्मिलित साधना विधि कितनी प्रभावशाली हो सकती है। फिर उसके लिये गायत्री तपोभूमि का तीर्थ तथा सुयोग्य सान्निध्य एवं मार्ग दर्शन का लाभ साधना की सफलता के लिये कितना उपयोगी प्रसिद्ध हो सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि स्वाध्याय और सत्संग की कितनी समर्थ सुविधा यहाँ उपलब्ध है। जीवन शोधन के अनुकूल जहाँ सारा वातावरण हो वहाँ अनायास ही अपने संस्कार भी वैसे ही ढलने लगते हैं। कोई वानप्रस्थ का सच्चा लाभ प्राप्त करने का इच्छुक व्यक्ति मथुरा आकर प्रस्तुत शिक्षण योजना का लाभ ले तो वही विश्वास करना चाहिए कि उसे खाली हाथ न लौटना पड़ेगा।
त्रिविध प्रशिक्षण की जो महान योजनाएं गायत्री तपोभूमि में आरंभ की जा रही हैं उनकी सफलता इन वानप्रस्थ शिक्षार्थियों के उत्साह पर ही निर्भर रहेगी। उनके लिये वेतनभोगी अध्यापक नियुक्त नहीं किये जाते हैं। चार वर्ष के लिये ब्रह्मचारियों की शिक्षा, एक-एक महीने के लिये पत्नी तथा परिवार समेत आने वाले गृहस्थों की शिक्षा, प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा आगंतुकों की रोग निवृत्ति, के बहुर्मुखी व्यस्त कार्यक्रम होंगे। इन कार्यों में हमारे सहायक के रूप में यह एक वर्ष की शिक्षा प्राप्त करने के लिये आने वाले वानप्रस्थ ही कार्य करेंगे। साधना स्वाध्याय के अतिरिक्त इन्हें इस ज्ञान-दान में भी हाथ बंटाने का अवसर मिलेगा। सेवा धर्म अपनाये बिना किसी का भी अन्तःकरण शुद्ध नहीं हो सकता इसलिये यह धर्म सेवा भी उन्हें आत्म-कल्याण का एक श्रेष्ठ साधन मानते हुए करनी होगी।
एक वर्ष पूरा करके अधिकाँश वानप्रस्थ अपने-अपने क्षेत्र में लौटे जावेंगे और फिर यहाँ जो शिक्षा प्राप्त की गई है उसे निरन्तर व्यापक एवं विकसित बनाने के लिये प्रयत्न करते रहेंगे। जैसा शिक्षण केन्द्र मथुरा में बन रहा है वैसे या उससे मिलते-जुलते शिक्षण केन्द्र, शिक्षण शिविरों की योजना देश के कौने-कौने में की जानी है। एक वर्ष जिसने क्रमबद्ध रूप में यहाँ सीखा है वह एक कुशल प्रशिक्षक के रूप में अपने प्रदेश में आशाजनक प्रकाश फैला सकने में सफल होंगे ऐसी आशा है। युग-निर्माण की शत-सूत्री योजना में जो कार्यक्रम दिये गये हैं उन्हें मूर्तमान किया जाना है। षोडश संस्कार, पर्व, त्यौहार, गायत्री यज्ञ प्रवचन आदि का अभ्यास करके लोक शिक्षण को प्रभावशाली किया जाना है। धर्म चेतना को संगठित, सशक्त और सुविस्तृत बनाया जाना है। इसके लिये विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की योग्यता वाले व्यक्ति अनेक प्रकार की कार्य पद्धति आरंभ करेंगे। भारत ही नहीं समस्त विश्व में भारतीय संस्कृति के आधार पर मानव-समाज का नव-निर्माण किया जाना है। इसे परमार्थ बुद्धि एवं निर्लोभ वानप्रस्थ ही पूरा करेंगे। विचार क्राँति और सामाजिक क्राँति का युग-यज्ञ ऐसे ही तेजस्वी वानप्रस्थों के द्वारा सुनियोजित होगा। मानवता के परित्राण के लिये इसी वर्ग की सबसे अधिक आवश्यकता एवं उपयोगिता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए उन व्यक्तियों का आह्वान किया गया है जो परमार्थ के लिये अपना जीवन लगा कर माता मानवता को गौरवान्वित करने के लिये आगे बढ़ सकें।
इस प्रयोजन के लिये अशिक्षित, असमर्थ, रोगी, व्यसनी, दुर्गुणी, आलसी प्रकृति के वृद्धजनों की कोई उपयोगिता नहीं है। उन्हें अपने-अपने घरों पर रह कर ही प्राप्त मार्ग दर्शन के अनुसार आत्म-कल्याण की साधना करनी चाहिये जिनके जी में देश और धर्म के नव-निर्माण का उत्साह और साहस है, जो शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ और समर्थ हैं, जिनकी शिक्षा सुशिक्षित कहे जाने लायक जितनी है और जो अपना भोजन, वस्त्र आदि का निर्वाह व्यय स्वयं वहन कर सकें , अभी ऐसे ही थोड़े से वानप्रस्थ लिये जाने हैं। आगे सुविधा और आवश्यकतानुसार उनकी संख्या बढ़ाई जाती रहेगी।
अखण्ड ज्योति के गत अंक में इस प्रकार के वानप्रस्थों का आह्वान किया गया है। प्रसन्नता की बात है कि जागृत आत्माएं अपने शेष जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग इस आह्वान को मान कर इस प्रशिक्षण की तैयारी कर रहे हैं उनके पत्र आ रहे हैं। चुने हुये लोगों का शिक्षाक्रम जेष्ठ सुदी 15 से आरंभ किया जाना है। यह शिक्षण क्रम हमारे भविष्य निर्माण में निर्णायक योग देगा, इसे हम सब अपनी आँखों से प्रत्यक्ष ही देखेंगे।
भारतीय धर्म को दूसरे शब्दों में वर्णाश्रम धर्म कहा जा सकता है। चारों वर्ण, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, यदि अपना-अपना कर्त्तव्य पूर्ण तत्परता, श्रद्धा और ईमानदारी से पालन करें तो समाज का ढाँचा अत्यन्त सुव्यवस्थित रूप में खड़ा रह सकता है। इसी प्रकार यदि ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास की क्रम व्यवस्था यथोचित में रीति से चलती रहे तो प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी जीवन में सुविकसित एवं सुसमृद्ध हो सकेगा। व्यक्तिगत जीवन की सफलता के लिये, चारों, आश्रम, और सामाजिक सुव्यवस्था के लिये चारों वर्णों की आर्ष प्रणाली यथोचित रीति से चलती रहनी चाहिये।
नव युग-निर्माण की पुण्य बेला में वर्णाश्रम धर्म को पुनर्जीवित किया जाना नितान्त आवश्यक है। अस्त-व्यस्त व्यवस्था को पुनः सुगठित न किया जायेगा तो वर्तमान अव्यवस्था का निराकरण और सुख शाँति का सूर्योदय न हो सकेगा।आश्रम वर्ग का पुनःनिर्माण करने के लिये ब्रह्मचारियों की चार वर्ष की, गृहस्थी की एक मास की, वानप्रस्थों की एक वर्ष की शिक्षा आरंभ की जा रही है। इसके बाद संन्यास आश्रम का नम्बर आता है। तीन आश्रमों का ठीक तरह पालन कर लेने वाला पके फल की तरह ज्ञान पक्व होकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का आदर्श अपना और निरन्तर लोक सेवा एवं लोक शिक्षण में लगा रहता है। इसके शिक्षण की कोई आवश्यकता नहीं रहती।
वर्ण धर्म का नव-निर्माण करने के लिये जातीय संगठनों की सुव्यवस्थित योजना आरंभ की जा रही है। नष्ट-भ्रष्ट ही सही पर वर्णों के ध्वंसावशेष बने हुए हैं उन्हीं के आधार पर अभिनव रचना का कार्य सुगम पड़ेगा। जातीय संगठनों की रूपरेखा गत अंक में बताई जा चुकी है। विवरण और परिचय फार्म के आधार पर जो सूचनाएं प्राप्त हुई हैं उनके अनुसार अखण्ड ज्योति परिवार के सभी सदस्यों को चार वर्णों में विभाजित करके उनके स्वतंत्र संगठन बना इनका प्रबंध कर रहा है। इन संगठनों का कार्य अपने-अपने वर्णों में कर्त्तव्य भावना उत्पन्न करके सर्वांगीण श्रेष्ठता उत्पन्न करना होगा। यह संगठन स्वतंत्र रूप में विकसित होंगे और अपने वर्ण के धर्म कर्त्तव्यों को हृदयंगम कराने एवं व्यवहार में प्रचलित करने के लिये पूरी तत्परता के साथ प्रयत्न करेंगे।
आज जातिवाद का जो विकृत रूप है वह इतना प्रतिगामी हो गया है कि समझदार लोग उससे घृणा करते हैं और जाति-पाति की बात करने वालों को संकीर्ण, प्रतिगामी, प्रगति विरोधी, फूट फैलाने वाले, एवं अखण्ड मानवता को खण्डित करने वाले मानते हैं। इसलिये जातिवाद को सम्प्रदायवाद का ही एक रूप मान कर उसकी निन्दा करते हैं। यह निन्दा निश्चय ही उचित है। वर्तमान प्रकार की संकीर्णता भरी जाति-पाति पद्धति जब तक जीवित रहेगी हिन्दू धर्म में आदर्शों में रोड़ा ही अटकाती रहेगी और मानवीय प्रगति को अवरुद्ध किये ही बैठी रहेगी। कर्त्तव्यों का सर्वथा परित्याग किये बैठे लोग भी जब केवल वंश के आधार पर अपनी श्रेष्ठता प्रतिपादित करते है और साथ ही उनका अहंकार भी करते हैं तो उस मूर्खता पर कोई भी समझदार व्यक्ति घृणा किये बिना नहीं रह सकता। एक जाति दूसरी को ऊंच-नीच माने सो बात ही नहीं है वरन् एक ही वर्ण-जाति के लोग परस्पर नींच ऊंच का मापदण्ड बीधों विश्वों में गिनते हैं तो उसे मूढ़ता की पराकाष्ठा ही कहना चाहिए। चुनाव आदि में लोग अपनी जाति के लोगों से अपनी ही जाति के उम्मीदवारों को वोट देने के लिए कहते हैं। छोटे-छोटे स्वार्थों को लेकर जाति-पाति के नाम पर पार्टी बन्दी बनाते और नीति-अनीति को ध्यान में रखकर इसी आधार पर पक्षपातपूर्ण संघर्ष खड़े कर लेते हैं। ऐसी ही अन्य अनेक बुराइयाँ हैं जिनके कारण जातिवाद को एक संकीर्णता मान कर उससे घृणा की जाती है।
उपरोक्त बुराइयों का कैसे सुधारा जाय और प्राचीन काल की वर्ण व्यवस्था का लाभ किस प्रकार समाज को पहुँचाया जाय? इस प्रश्न पर विचार करते हुए यह उपाय भावावेश मात्र मालूम पड़ता है कि जाति पाति से दूर रहा जाय, उसे मिटा दिया जाय। आज की परिस्थितियों में यह कहना सरल है, करना कठिन है। विवाह शादियों का क्षेत्र जातीय आधार पर कठिन हो चला है। जो परिपाटी को तोड़ता है उसके सामने अपने बच्चों की विवाह, शादी का प्रश्न आ उपस्थित होता है। जनमानस पूरी तरह न बदल जाय तब तक इस प्रकार का उत्साह दिखाने वाला यदि बहुत ऊंची स्थिति का व्यक्ति नहीं है तो उलटा कठिनाई में फंस जाता है। जन-मानस बदलना एक दिन का काम नहीं, उसमें समय लगता है। इसलिए दूसरा उपाय अधिक उपयुक्त है कि वर्ण-धर्म की श्रेष्ठताओं को प्रचलित किया जाय और उस में घुसी हुई बुराइयों को हटाकर शुद्ध समृद्ध समाज की रचना की जाय।
यों जातिवाद से घृणा करने वाले भी प्रकारांतर से उसका महत्व स्वीकार करते हैं और अपने नाम के साथ उसकी भी घोषणा गर्वपूर्वक करते हैं। महात्मा गाँधी, पंडित नेहरू महामना मालवीय, राजर्षि टंडन, पं-पन्त आदि काँग्रेसी ही नहीं उग्रवादी निम्ब्रूद्रीपाद, डाँगे, भूपेश गुप्त आदि कम्युनिस्ट भी अपने नाम के साथ अपने जातीय परिचय का गर्व पूर्वक प्रयोग करते रहते हैं। यों यह लोग जातिवाद की भरपेट भर्त्सना करने में भी नहीं चूकते। इसके कारणों पर विचार करने से यही स्पष्ट होता है कि वंश परम्परा का स्मरण रखना कोई बुराई नहीं है। बुराई उन विकृतियों में है जो जाति-पाति की आड़ लेकर हमारे समाज को जर्जर बनाने के लिए छद्म रूप से घूस पड़ी है और ऐसी लगती है मानो वे बुराइयाँ भी उन जातियों की अंग ही हों। यदि इस दोष को दूर किया जा सके तो निस्संदेह वर्ण व्यवस्था प्राचीनकाल की तरह आज भी हमारे सामाजिक विनाश की रीढ़ बन सकती है और उसका नव-निर्माण एक तरह से समाज निर्माण की भूमिका ही बन सकता है। हम जातीय संगठनों के द्वारा यही सब कुछ करने जा रहे हैं।
हिन्दू समाज की कुप्रथाओं में सबसे बड़ी, सबसे घातक, सबसे घृणित दहेज एवं विवाह, शादियों में उन्मुक्त होकर पैसे की होली फूँकने की कुप्रथा है। इससे हर हिन्दू को अपनी आमदनी का आधे से अधिक भाग विवश होकर बर्बाद करना पड़ता है। मध्यम श्रेणी के लोग जिनके भाई, बच्चे बच्ची विवाह योग्य हैं, इसी समस्या का हल ढूंढ़ने में किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाते हैं। बच्चों को अविवाहित रखा नहीं जा सकता, विवाह के लिये धन चाहिए ईमानदारी से सीमित धन मिलता है ऐसी दशा में इसके अतिरिक्त और कोई माँग नहीं की अनीति एवं अधर्म से भी जितना अधिक कमाया जा सकता हो कमाया जाय और अपनी पारिवारिक आवश्यकता को पूरा किया जाय। यह स्वीकार करने में हर्ज नहीं कि हमारे आधे पाप और अपराध इन विवाहों में अन्धाधुँध खर्च कराने वाली कुप्रथा के कारण ही होते हैं। जब तक यह पिशाचिनी परम्परा जारी रहेगी हम रामायण गीता पढ़ने, भजन, पूजन करने गंगा-जमुना नहाने पर भी पाप कर्मों से विरत न हो सकेंगे और हमारी आध्यात्मिक और सामाजिक प्रगति का अवरोध ज्यों का त्यों अड़ा ही बैठा रहेगा।
जातीय संगठनों की जो रूप रेखा बनाई गई है, उसकी तात्कालिक आवश्यकता इसलिए भी पड़ गई कि विवाहों के अपव्यय को, जेवर और दहेज की प्रथा को जल्दी समाप्त करना, उसके विरुद्ध घनघोर आन्दोलन करना और आदर्श विवाहों के असंख्यों उदाहरण प्रस्तुत करते हुए घातक कुरीति पर करारी चोट करना निताँत आवश्यक हो चला है। बुराई तेजी से बढ़ रही है इसे दूसरे रूप से बढ़ने दिया गया तो समाज की बर्बादी सुनिश्चित है। चीन और पाकिस्तान के खतरे से भी आन्तरिक दुर्बलता का यह पहलू अधिक आक्रामक है। इस मोर्चे पर भी सुरक्षा का प्रबंध किया जाना अनिवार्य हो गया है। इसमें देरी की गुँजाइश नहीं। यह कैसे किया जाय? इसका उपाय सोचने पर एक ही कारीगर उपाय दृष्टिगोचर हुआ कि यह कार्य जातीय संगठनों के बिना वर्तमान परिस्थितियों में और किसी प्रकार संभव नहीं हो सकता। वर-कन्या जब तक जाति के अंतर्गत ही ढूंढ़ें जाते हैं तब तक जातीय सुधार के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। और यह स्पष्ट है कि कोई भी व्यापक सुधार सामूहिक संगठित प्रयत्नों के बिना संभव नहीं हो सकता।
विवाहों में कन्या पक्ष दहेज के लिए तनिक भी दबाया न जाये वर पक्ष को वधू को चढ़ाने के लिए कीमती जेवर, कपड़े बनवाने के विवश न होना पड़े, बारातों की भीड़ ले जाने में अनेक लोगों के समय की बर्बादी और उनको रखने में बेकार का खर्च उठाने की जिम्मेदारी किसी पर भी न पड़े। आतिशबाजी, गाजे-बाजे और धूमधाम में गाढ़ी कमाई का पैसा नष्ट न हो। एक धार्मिक संस्कार मात्र सीधे-सादे ढंग से जैसे होना चाहिए वैसे ही सादगी और सात्विकता के वातावरण में विवाह, शादी हो जाया करें। यह हममें से हर एक चाहता है पर सामाजिक कुप्रथाएं शक्ति से बाहर धन बर्बाद करने के लिए विवश करती हैं। इस विवशता को जातीय संगठनों के आधार पर आसानी से नष्ट किया जाय सकेगा और अनुकरणीय आदर्श विवाहों का भारी संख्या में प्रचलन करके जनता की भीरुता को सरलतापूर्वक नष्ट किया जा सकेगा। यदि यह सुधार हो सका तो समझना चाहिए कि हिन्दू समाज की बर्बादी की भयंकर अड़चनों को जीत लिया गया। हमें यही करना है। इसलिए अगले ही महीने प्रत्येक जाति का एक स्वतंत्र संगठन खड़ा कर रहे हैं।
दहेज एवं विवाहों में अपव्यय को हटाना तो एक सामाजिक संघर्षात्मक पहलू है। ऐसी अनेक सामाजिक एवं नैतिक बुराइयाँ हमारे भीतर घुस पड़ी है उनको एक-एक करके हटाते जाने के लिए प्रयत्न चलता रहेगा और यह संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक अपना समाज पूर्ण पवित्र मानव समाज के रूप में विकसित नहीं हो जाता। सामाजिक क्रान्ति की चिंगारी, दहेज उन्मूलन आन्दोलन के रूप में आदर्श, विवाहों के रूप में आरंभ की जा रही है, यह दावानल के रूप में जब प्रज्ज्वलित होगी तो उन सभी कषाय कल्मषों को भस्मसात करेगी जिसने हमारे देव समाज को आज ऐसी लुञ्ज-पुञ्ज स्थित में ला पटका है। हमें आध्यात्मिक स्वाधीनता प्राप्त करने के लिए कुसंस्कारों से मुक्ति पानी ही पड़ेगी। जातीय संगठनों की रचना विभिन्न मोर्चों पर की हुई एक मोर्चेबन्दी ही कही जा सकती है जिसका उद्देश्य समान आसुरी प्रवृत्तियों का उन्मूलन करते हुए ऋषि परम्परा के अनुसार दैव समाज का नव-निर्माण करना ही होगा।
वर्ण-धर्म वस्तुतः मानवता का ही धर्म है। रुचि और स्थिति के अनुरूप, अज्ञान, अशान्ति और अभाव को दूर करने के लिए लोक हित की दृष्टि से कर्त्तव्य करते रहना ही वास्तविक वर्ण-धर्म है। कार्य विभाजन होते हुए भी लक्ष मानव मात्र का एक है। प्रत्येक वर्ण के कार्य भले ही बंटे हों पर उनके पीछे एक को एक ही उद्देश्य के लिए आत्म कल्याण और सामाजिक उत्कर्ष के लिए ही प्रयत्न करना होता है। यह जातीय संगठन ऋषि धर्म की प्रत्येक श्रेष्ठ परम्परा को अपने कार्य क्षेत्र में प्रसारित करते हुए महान मानवता की सेवा करने की ही भूमिका प्रस्तुत करेंगे। इसी आशा और विश्वास के साथ अगले महीने से जातीय संगठनों की योजना को हम कार्यान्वित करने जा रहे हैं।
भूल सुधार
मार्च अंक के अन्तिम कवर पृष्ठ में ‘अनन्त पथ का राही हूँ’ शीर्षक कविता के लेखक स्थान पर लेखक का नाम भूलवश डॉ. राजकुमार छप गया है। वस्तुतः इस कविता के रचयिता राजकुमार जी ‘भारतीय’ जबलपुर हैं। पाठक सुधार लेने की कृपा करें।
-सम्पादक
जेष्ठ मास में गायत्री जयन्ती गंगा दशहरा का पुण्यपर्व होने से वह महीना जितना पवित्र है उतना ही अवकाश का भी है। शिक्षा विभाग, कचहरी आदि कई सरकारी विभागों की इन दिनों गर्मी की छुट्टियां रहती हैं। खेती का काम पूरा हो जाने से कृषक तथा उनसे संबंधित अन्य लोग भी फुरसत में रहते है। इसलिए गत कितने ही वर्षों से यह महीना हमने स्वजनों से प्रेम-मिलन के लिए सुरक्षित रखा है। हर वर्ष इन दिनों गायत्री तपोभूमि में कोई न कोई शिविर रहता है। अब विचार यह किया गया है कि यह महीना परामर्श शिविरों के लिए सुरक्षित रखा जाय। जो लोग किसी न किसी कारण को लेकर परामर्श के लिए, छुटपुट साधन के लिए, अथवा तीर्थ यात्रा के लिए मथुरा आना चाहते हैं वे यदि इन निश्चित दिनों में आया करें तो परिजनों का परस्पर मिलना-जुलना भी हो सके और जीवन की सभी समस्याओं पर नये सिरे से विचार करने का अवसर भी मिल जाया करे।
जीवन निर्माण की साधना तथा गायत्री उपासना में लगे हुए लोग यदि वर्ष में एकबार अपनी प्रगति का परिचय दे जाया करें, प्रस्तुत कठिनाइयों का हल पूछ जाया करें, तथा अगले वर्ष का क्रम क्या रहे इस संबंध में विचार विनिमय कर लिया करें तो यह हम सभी के लिए उत्तम रहेगा। नौकरी पर दूर देशों में रहने वाले लोगों को वर्ष में एक बार तो अपने कुटुम्ब से मिलने घर जाने की छुट्टी मिलती है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का एक घर वह है जहाँ वे रहते हैं पर दूसरा उनकी भाव प्रेरणा का केन्द्र मथुरा भी है, इसलिए यह भी उनका घर है। माता-पिता के घर की भाँति ही ‘गुरु गृह’ भी अपना ही होता है, वहाँ भी वर्ष में एक बार जाया जाय तो यह ठीक ही है।
एक सुझाव यह था कि दो-चार दिन का एक सम्मेलन वर्ष में एक बार किया जाया करे पर यह इसलिए न रुचा क्योंकि एक साथ अधिक व्यक्ति आ जाने से सभा सम्मेलन की शोभा तो अच्छी हो सकती है पर एक साथ अधिक व्यक्तियों से परामर्श संभव न हो सकने से विचार विनिमय का उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकता। सभा में जो बात भाषण द्वारा कहनी है वह सब तो अखण्ड-ज्योति द्वारा कह ही देते हैं, कभी केवल व्यक्तिगत परिस्थितियों और कठिनाइयों को समझने तथा उसके हल करने को सुझाव परामर्श देने का काम रह जाता है। यह तभी तो हो सकता है जब समय अधिक और व्यक्ति कम हों। वस्तु यह निश्चय किया गया है कि जेष्ठ में दस-दस दिन के तीन परामर्श शिविर किये जाया करें। जिनमें भाषण क्रम और परस्पर विचार विनिमय एवं परामर्श का कार्यक्रम अधिक किया जाया करे। दस-दस दिन के तीन शिविर रहने से एक महीना पूरा हो जाता है। इस वर्ष पहला शिविर 26 मई से 4 जून तक, दूसरा 5 जून से 14 जून तक, तीसरा 15 से 24 जून तक का रखा गया है। इस प्रकार जेष्ठ का महीना पूरा हो जायेगा।
इस वर्ष में हमें भी स्वजनों से अनेक महत्वपूर्ण समस्याओं का परामर्श करना है। जातीय संगठनों का व्यापक ढाँचा खड़ा करना है और आदर्श विवाहों की भूमिका आधार कर सामाजिक क्रान्ति का सूत्रपात किया जाना है। यह हमारे जातीय नीलम की जीवन-शरण अवस्था है। जिस जीवन्त आध्यात्म को हम लोग अपने रोम-रोम में उतार रहे हैं वह पूजा की कोठरी तक सीमित नहीं रह सकता। अब हवन करने मात्र से उसकी इतिश्री नहीं हो सकती वरन् देश, धर्म, समाज और संस्कृति के प्रत्येक क्षेत्र तक वह व्यापक प्रकाश उत्पन्न करेगा। हर पाप के विरुद्ध, हर अनात्म तत्व के विरुद्ध हमें संघर्ष करना है। विवाहों के अवसर पर फूँकी जाने वाली गाढ़ी कमाई के पैसों की होली निश्चित रूप से अध्यात्म तत्व है। इसे आसुरी दंभ एवं अनाचारपूर्ण अविवेक ही कहा जा सकता है। अब समय आ गया है कि इस कुप्रथा के विरुद्ध विद्रोह का झंडा खड़ा किया जाय। इस वर्ष की तैयारी के लिए जो रूपरेखा बनी है उस मोर्चे बंदी के हर पहलू से परिवार के प्रबुद्ध लोगों को परिचित करना चाहिए। यों यह सब अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर भी समझाया जा रहा है और आन्दोलन को बल देने के लिए ही सज-धज और शान का ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक में भी 1 जुलाई से आरंभ किया जा रहा है फिर भी इतने महत्वपूर्ण कार्य को प्रारंभ करते हुए परस्पर विचार विनिमय भी आवश्यक है। इसलिए जिनमें राष्ट्र निर्माण के अपने कार्यक्रमों में विशेष रुचि है उनसे इन शिविरों में आने की विशेष रूप से अपेक्षा की गई है।
वर्णाश्रम धर्म के पुनर्जीवन के लिए, भारतीय सुसंस्कृति लिया प्राण उत्पन्न करने के लिए, जो प्रशिक्षण योजना पाई गई है, उसकी चर्चा पिछले पृष्ठों पर मौजूद है। हर वर्ष का ब्रह्मचारी शिक्षण, एक मास का गृहस्थ शिक्षण और एक वर्ष का वानप्रस्थ शिक्षण क्रम अगले दिनों आरंभ किया जाना है। हम चाहते हैं कि अपने परिवार के सभी प्रमुख व्यक्तियों को इन प्रशिक्षण घटनाओं में सम्मिलित होने का लाभान्वित होने का अवसर मिले। यथा समय इन सत्रों में शिक्षार्थियों को समान मिलेगा ही। पर जो लोग अभी किसी में भी आने की स्थिति में नहीं हैं, वे इन दस-दस दिन के शिविरों में सम्मिलित होकर जो कुछ उन सत्रों में सिखाया जाने वाला उसका साराँश मोटे तौर से इन शिविरों में आकर ही लिया करें। इस प्रकार व्यस्त व्यक्तियों को थोड़े समय में भी उस लाभ से वंचित न रहना पड़ेगा जिसे उपरोक्त त्रिविधि शिक्षण में भाग लेने वाले अधिक विस्तारपूर्वक प्राप्त करते। ऐसे लोगों के लिए यह परामर्श शिविर विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
युग-निर्माण योजना के शत-सूत्री कार्यक्रमों को मूर्त देने के लिए अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को संगठित रूप में कुछ न कुछ प्रयत्न हर जगह करते ही जाना पड़ेगा। कहाँ, कौन किस प्रकार, क्या कितना कर सकता है, इसकी चर्चा यदि हम लोग परस्पर मिल जुल कर लें तो इससे कार्य की प्रगति में सहायता हो सकेगी। हममें से प्रत्येक को अपना व्यक्तिगत जीवन अधिक उत्कृष्ट बनाने के लिए, परिवार को सुसंस्कृत एवं विकसित करने के लिए, तथा अपने देश, धर्म समाज एवं संस्कृति को सजीव, तेजस्वी तथा सशक्त बनाने के लिए बहुत कुछ काम करना है। विभिन्न परिस्थिति के लोग विभिन्न प्रकार से इन तीनों कार्यों को कर सकते हैं। किस के लिए किस प्रकार, क्या करना ठीक होगा यह सब भी परस्पर विचार विनिमय का विषय है। जेष्ठ के शिविरों में आने वाले इन सभी तथ्यों पर आवश्यक प्रकाश प्राप्त कर सकते है और यहाँ से नई प्रेरणा नया उत्साह लेकर जा सकते हैं।
प्रसन्नता की बात है कि स्वजनों ने इन परामर्श शिविरों का महत्व समझा है और जेष्ठ में मथुरा आने का इच्छा व्यक्त की है। प्रार्थियों की संख्या बहुत अधिक है। पर स्थान एक बार में अधिक से अधिक सौ व्यक्तियों को मिल सकता है। इसलिए जिनके आने की अभी अधिक उपयोगिता समझी गई है केवल उन्हें ही स्वीकृति दी गई है। जिनको स्वीकृति न दी जा सकी उनसे विवशता के लिए क्षमा माँगनी पड़ रही है। उनके नाम नोट कर लिये गये हैं और इसी वर्ष आश्विन या चैत्र की नवरात्रियों में जैसे ही फिर किसी शिविर को आयोजना बनेगी तब उन्हें स्वीकृति की दृष्टि से प्राथमिकता देंगे।
जिन्हें स्वीकृति मिल चुकी है केवल उन्हें ही आना चाहिए बिना स्वीकृति कोई सज्जन न आवे। ऐसे स्त्री बच्चों को इन शिविरों में नहीं लाना चाहिए जो केवल दर्शन झाँकी के उद्देश्य से आते हैं। स्थान कम रहने से ऐसे लोगों की वजह से उन लोगों को वंचित रहना पड़ता है जिन्हें परामर्श करना नितान्त आवश्यक था। स्त्री बच्चों, समेत ही जिन्हें आना हो वे तपोभूमि में न ठहर कर मथुरा शहर की किसी धर्मशाला में अपनी व्यवस्था कर लें तभी कुछ बात बनेगी। सम्मिलित भोजन व्यवस्था का प्रबंध किया गया है पर जाने वालों को यह मानकर चलना चाहिए कि उन्हें अपने भोजन व्यय का भार स्वयं ही उठाना है। जो दस दिन में लगभग सात रुपया 7) पड़ेगा। आगन्तुकों को शिविर आरंभ होने से एक दिन पूर्व शाम तक मथुरा पहुँच जाना चाहिए। ताकि प्रत्येक शिविर में 24-24 हजार का जो अनुष्ठान करना है प्रातः काल उसके प्रारंभ संकल्प में भाग लेना भी संभव हो सके।
एक से दस की सुनिश्चित योजना के अनुसार इस आन्दोलन को सुगठित और विकसित किया जाना है। अब इसलिए वह उपयुक्त समय आ पहुँचा जिसमें एक क्षण का विलम्ब न करके वह पद्धति कार्यान्वित करने में हमें संलग्न हो जाना चाहिए। उसके लिए दो प्रयत्न इसी महीने से आरंभ कर दिये जाने चाहिए।
(1) अखण्ड-ज्योति का प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ता पाक्षिक ‘युग-निर्माण योजना’ पत्र मंगाना आरंभ करे और उसे एक-एक दिन के लिए अपने से संबंधित दस व्यक्तियों के पास पहुँचाने का व्यवस्था क्रम बनावें। उस एक पत्रिका को कम से कम दस व्यक्ति पढ़ें। एक दूसरे को पढ़ने देता रहे और अन्त में दस दिन बाद वह पत्रिका दसों व्यक्तियों के पास घूमता हुआ उसी सक्रिय कार्यकर्ता-शाखा संचालक के पास वापिस आ जाय। उस पक्ष में छिपे समाचारों और प्रेरणाओं के संबंध में शाखा संचालक को अपने संबंधित दस सदस्यों से परामर्श करना चाहिए और जिसके लिए जो गति विधि एवं प्रेरणा अपना सकना संभव हो उसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया करें। पाक्षिक पत्रिका का प्रत्येक पृष्ठ युग-निर्माण की दिशा में अग्रसर बनाने की प्रेरणाओं से ओत-प्रोत रहा करेगा। उसमें छपी पाठ्य−सामग्री से जो प्रभाव पाठक कर पड़ेगा उसे शाखा संचालक व्यक्तिगत संपर्क बना कर थोड़ा-थोड़ा उत्पन्न करते रहेंगे तो उन लोगों के लिए इन आदर्शों को जीवन में उतर सकना अवश्य ही संभव होगा। इसलिए पाक्षिक अपने नाम मंगाकर उसे सबको पढ़ाने का नियमित रूप से प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्ता को शाखा संचालक को पढ़ा ही देना चाहिए।
(2) अखण्ड-ज्योति की पंक्तियाँ कलम, स्याही में नहीं वरन् हमारी अन्तरात्मा के आग पानी से लिखी जाती है उसे जो लोग ध्यानपूर्वक पढ़ते है उनके भीतर भी वे ही चिनगारियाँ उठना स्वाभाविक है जो कागज के पन्नों में लपेटकर हम यहाँ से भेजते हैं। पर कई नये ग्राहक जो किन्हीं दूसरों की बलात् प्रेरणा से इसी वर्ष सदस्य बने हैं, उसके महत्व से अपरिचित होने के कारण पढ़ने में आलस्य और उपेक्षा करते रहते हैं। ऐसी दशा में घाटा सहकर पत्रिका चलाने और पाठकों के सुविकसित व्यक्तित्व को नर-नारायण बनाने का हमारा मनोरथ अधूरा ही रह जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि जो भी सज्जन अखण्ड-ज्योति मंगाते हैं एक लेख प्रतिदिन के हिसाब से पूरी श्रद्धा के साथ पठन करें और उनके घर का एक भी सदस्य ऐसा न बचे जो प्रशिक्षित होते हुए भी पढ़ता न हो। प्रयत्न यह होना चाहिए कि उस घर में जो अशिक्षित हो उन्हें पत्रिका घर के किसी शिक्षित द्वारा सुनने को मिल जाया करें।
अभीष्ट लक्ष की पूर्ति के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि वर्तमान अखण्ड ज्योति के पाठक पत्रिका को श्रद्धापूर्वक आद्यापान्त पढ़ें उस पर मनन चिन्तन करें और घर के प्रत्येक सदस्य को उस विचारधारा के संपर्क में लावें। यह प्रक्रिया ठीक प्रकार चलती है या नहीं, इसके लिए भी सक्रिय कार्यकर्ताओं को, शाखा संचालकों को, अपने कंधे पर ही उत्तरदायित्व वहन करना पड़ेगा। प्रगति के लिए इस विधि-व्यवस्था को कार्यान्वित किये बिना और किसी प्रकार काम न चलेगा।
किया यह जाना चाहिए कि जहाँ जितने अखण्ड ज्योति के सदस्य हैं, वे दस-दस के छोटे संगठनों से संगठित हो जायं। इनका एक शाखा संचालक हो। प्रत्येक शाखा संचालक अपने संबंधित दसों अखण्ड-ज्योति सदस्यों के घर आने-जाने का क्रम बनाये रखें और यह देखें कि उस परिवार के सब सदस्यों को पत्रिका के पढ़ने सुनने का लाभ मिलता है या नहीं। जहाँ इस संबंध में शिथिलता हो उसे दूर करने के लिए प्रयत्न करना, अभिरुचि, उत्पन्न करना तथा प्रोत्साहन देना शाखा संचालकों का आवश्यक कर्त्तव्य रहे। प्रत्येक परिवार में औसतन पाँच वयस्क व्यक्ति माने जाय तो इस अखण्ड-ज्योति सदस्यों के परिवारों में पचास व्यक्ति होंगे। शाखा संचालक इन पचासों का एक प्रकार से प्रेरणा पुरोहित होगा। और उन सब तक युग-निर्माण विचारधारा का प्रकाश पहुंचाने का प्रयत्न करेगा। शाखा संचालक जब यह उत्तरदायित्व निबाहने लगेंगे तो इन दिनों जो पाँच हजार शाखा संचालक हैं वे पचास-पचास को प्रकाश पहुँचाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लेकर कई लाख व्यक्तियों को नव-जीवन की प्रेरणा से प्रभावित कर सकते हैं।
वर्तमान शाखा संचालकों के प्रयत्न उनके से दस संबंधित पाठकों में से एक व्यक्ति नया शाखा संचालक बन कर अन्य नये दस सदस्य बनाने और उनके परिवार के पचास व्यक्तियों को प्रकाश देने के लिए तत्पर किया जा सके तो यह क्रम चक्रवृद्धि पद्धति से बढ़ता हुआ तीन-चार छलाँगों में सारे भारतवर्ष तक और पाँच छः छलाँगों में सारे विश्व तक नव-जीवन का प्रकाश पहुँचाने में समर्थ हो सकता है। वर्तमान शाखा संचालकों के लिए यह परीक्षा की घड़ी और कर्त्तव्यनिष्ठ होने की कसौटी हो। ‘एक से दस’ का क्रम उन्हें चलाना ही चाहिए। इसके बिना युग-निर्माण जैसे महान कार्य को साकार रूप दे सकना और किसी भी प्रकार संभव न होगा।
जहाँ कम से कम बीस अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं, जहाँ कम से कम दो शाखा संचालक हैं, वहाँ ऐसा किया जाना चाहिए कि सब सदस्यों की पत्रिकाएं इकट्ठी ही मंगा ली जायं। जहाँ रेलवे स्टेशन पास हो वहाँ रेल से, जहाँ रेलवे न हो वहाँ डाक से हम रजिस्ट्री डाक पार्सल या रेल पार्सल से अंक भेज दिया करेंगे और शाखा संचालक उन सदस्यों के पास पत्रिका पहुँचा दिया करे। इसमें साधारण डाक व्यय की अपेक्षा हमें थोड़ा दुगना खर्च करना पड़ेगा। पर इससे दो महत्वपूर्ण आवश्यकताओं की पूर्ति होगी। एक तो यह कि डाक में अंक कम होने की शिकायत अब अत्यधिक बढ़ गई है। अच्छी पत्रिका देखकर लोग उसे बीच में ही चुरा लेते हैं। पाठक समझते हैं मथुरा से भेजी नहीं गई। यहाँ हर महीने दो-बार जाँचकर बहुत सावधानी से सबके अंक भेजने पर भी भारी संख्या में गुम होने की शिकायत आती हैं। प्रायः 500 अंक हर महीने दुबारा भेजने पड़ते हैं। यह झंझट उपरोक्त व्यवस्था बन जाने पर सहज ही दूर हो जायेगी। किसी को न मिलने की शिकायत न रहेगी, न किसी को असंतोष होगा। दूसरा लाभ यह है कि शाखा संचालक इस बहाने अपने उन दस सदस्यों के घर जाकर यह पता लगा सकेंगे कि अंकों को पढ़ा जाता है या नहीं। जहाँ कुछ शिथिलता दिखाई देगी उसे वे दूर करेंगे और गत अंक में जो महत्वपूर्ण छपा था उसके बारे में पूछेंगे तथा उस अंक में जो प्रेरणाप्रद है उसके संबंध में संकेत करेंगे। इस आधार पर संगठन के मजबूत होने और प्रस्तुत विचारधारा को जन-मानस में प्रवेश करने का अवसर मिलेगा।
जहाँ यह व्यवस्था संभव हो वहाँ अवश्य ही बना ली जानी चाहिए। एक बड़े नगर में, या ग्रामीण क्षेत्र में एक परिधि के शाखा संचालक इकट्ठे होकर अपना संगठन बना लें। इकट्ठे अंक मंगा लिया करें और फिर परस्पर उनका वितरण कर दिया करें तो यह एक बड़ी सुविधाजनक तथा महत्वपूर्ण बात होगी।
संगठन के द्वारा ही युग-निर्माण का मिशन व्यापक बनेगा। संगठन किसी कार्यक्रम के आधार पर ही बनता है। प्राथमिक आधार अखण्ड-ज्योति तथा “युग-निर्माण योजना” पाक्षिक पत्रिका को वर्तमान पाठकों के गले उतारने की कार्यप्रणाली के आधार पर सुनियोजित किया जाय, इससे अगला कदम शत सूत्री कार्यक्रमों को जहाँ, जिस प्रकार, जितनी मात्रा में कार्यान्वित किया जा सकना संभव हो उतना वहाँ आरंभ कराते हुए प्रगति के स्वयं ही बढ़ना होना चाहिए। कदम-कदम बढ़ने का संकल्प किया 7) हो तो आज जो कुछ असंभव एवं आश्चर्य जैसा दीखने वाला एक दिन है कल वह पूर्ण व्यावहारिक, सर्वथा संभव और नितान्त सरल प्रतीत होने लगेगा।
“युग-निर्माण योजना” पाक्षिक
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“युग-निर्माण योजना” पाक्षिक पत्रिका की आवश्यकता अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक ने अनुभव की है। स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद युग-निर्माण आन्दोलन को जनता का दूसरा व्यापक अभियान कहा जा सकता है। सामाजिक क्रान्ति एवं विचार क्राँति की इतनी विशाल योजना को अग्रगामी बनाने के लिए कितने ही समाचार पत्रों को, कितने ही विचार पत्रों की आवश्यकता है। ‘भूदान’ आन्दोलन के 17 अखबार विभिन्न स्थानों से विभिन्न भाषाओं में निकलते हैं। युग-निर्माण की शत-सूत्री योजना का प्रचार-प्रसार एवं संचालन करने के लिए दैनिक नहीं, साप्ताहिक नहीं तो कम से कम एक-एक पाक्षिक पत्र तो होना ही चाहिए। यह न्यूनतम आवश्यकता है। यदि इतना भी न किया जाता तो प्रगति का गतिशील बनाया जा सकना कठिन ही था।
इस समाचार पत्र के निकलने की सूचना गत अंक में पढ़कर परिवार के सभी स्वजनों में उत्साह की लहर दौड़ गई है। सभी ने पाक्षिक की जगह साप्ताहिक का अनुरोध किया है। पर हमारी आज की परिस्थितियों में हमारे लिए यह संभव नहीं। उच्च स्तर का, बीस पृष्ठों का, सचित्र, सर्वांग सुन्दर पत्र निकालना कितना कष्टसाध्य है इसे भुक्तभोगी ही जानते हैं। पाक्षिक ही सही पर विश्वास यह किया जाना चाहिए वह स्तर की दृष्टि से भारतवर्ष के अग्रिणी समाचार पत्रों में से एक होगा और अपनी अनेक विशेषताओं के कारण युग-निर्माण आन्दोलन को बनाने में भारी योग देगा।
परिवार के प्रायः सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं ने पाक्षिक पत्रिका मंगाने की उत्साहपूर्वक स्वीकृति भेजी है। यह इच्छा व्यक्त कि जा रही है कि एक अंक को दस व्यक्ति पढ़ा करें और एक-एक दिन हर सदस्य के घर यह पत्र पहुँचे। वह पढ़े और पढ़कर दूसरे दिन दूसरे को दे दें। नियत तारीख को नियत व्यक्ति पढ़कर दूसरे दिन दूसरे व्यक्ति के घर पहुँचा दे। इस प्रकार एक दूसरे के घर पहुँचाने का क्रम चलाते हुए परस्पर संगठन की इस विशेष कार्य पद्धति का आरंभ करेंगे। इस प्रकार दस अखण्ड-ज्योति ग्राहकों के पीछे एक पाक्षिक से काम चल जाया करेगा। ‘एक से दस’ की संगठन पद्धति इस प्रकार स्वयमेव चलने लगेगी।
जिन्हें युग-निर्माण योजना के प्रसार और सफलता में उत्साह है, जो इस आन्दोलन में सक्रिय भाग ले रहे हैं। उन सभी के लिए इसे मंगाना आवश्यक है। जिनने मंगाने की स्वीकृति नहीं भेजी है वे अब भेज दें। छः रुपया वार्षिक चंदा मिल-जुलकर इकट्ठा करें या एक ही व्यक्तित्व दे यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर है। आशा है अगले महीने तक सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं व शाखा संचालकों की स्वीकृति पाक्षिक युग निर्माण पत्रिका चालू करने के लिए प्राप्त हो जायेगी।
यदि फार्म भरकर न भेजा हो तो
अप्रैल अंक के अंत में ‘कार्य विवरण और सूचना’ शीर्षक एक परिपत्र लगाया गया था और अखण्ड-ज्योति के पाठकों से प्रार्थना की गई थी कि उसे अप्रैल के अंत तक भरकर भेज दें। वह जानकारी प्राप्त करना हमारे लिए नितान्त आवश्यक था। इसलिए इस बात पर बहुत जोर दिया गया था कि उसे भरकर भेजने में उपेक्षा न की जाय। प्रसन्नता की बात है कि अधिकाँश सदस्यों ने युग-निर्माण योजना को गति देने वाली इस जानकारी का भेजा जाना आवश्यक समझा है और उनने शीघ्र ही उन्हें भरकर भेज दिया है। फिर भी अभी काफी सदस्य ऐसे शेष हैं जिनने अपने फार्म नहीं भेजे हैं। ऐसे स्वजनों से फिर अनुरोध है कि वे यह अंक पहुँचते ही अप्रैल अंक में संलग्न कार्य भरकर तुरन्त ही भेजने की कृपा करें। इस जानकारी के आधार पर युग निर्माण योजना की इस वर्ष की विधि व्यवस्था निर्धारित की जानी है। इसलिए उपेक्षा एवं आलस्य को छोड़कर वह फार्म अभिलम्य भरकर मथुरा भेज देना चाहिए।
नहीं छोड़ना पंथ सत्य का, कितना ही व्याघात हो,
करना ऐसा श्रम, अवनी पर, जिससे पुण्य-प्रभात हो!
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धुल भरे हीरे उपवन के सुरभित सुमन ललामि तुम!
राम-कृष्ण-ईसा-पैगम्बर के शुचि गौ धाम तुम!!
ध्रुव अभिमन्यु-हकीकत-रु-रात भरत और बलराम तुम!
बाल ब्रह्मचारी शाँतनु-सुत पक्ष-पूत अभिराम तुम!!
जगहित गरल पान करते तुम, अशिव भयंकर गात हो!
आदि काल से ज्ञान-प्रेम के अक्षय अमर प्रपात हो!!
:: 2 ::
काश्मीर-कैलाश-हिमालय की गोदी के लाल तुम!
मानसरोवर पुण्य-झील के मृदुल प्रशाँत मराल तुम!!
तुम माँ के सुहाग की बिन्दी, शिव-ताण्डव की ताल तुम!
जिओ धरणि से क्षमाशील वन, लेकर हृदय विशाल तुम!!
तुम स्वतंत्रता के नव-प्रहरी, निभय शिशु नवजात हो!
कर्णधार भारत नौका के तुम माँ की सौगात हो!!
:: 3 ::
देश-भक्ति की बलिवेदों पर रखना पहले भाल तुम!
तिमिर ग्रस्त जो, उन्हें उठाना, बन किरणों का जाल तुम!!
ओ मेरी भावी आशाओं, बनो देश की ढाल तुम!
अगर शत्रु आए, बन जाना महाभयंकर काल तुम!!
विश्व-सरोवर में विकसित तुम, सुभग शाँति जलजात हो!
प्रखर भानु भी तुम्हीं, गगन में खिले इन्दु अवदात हो!!
-रामस्वरूप खरे
*समाप्त*