मानवीय शक्तियों का कोई अन्त नहीं, वे इतनी ही अनन्त हैं जितना यह आकाश। ईश्वरीय चेतना का प्रतीक प्रतिनिधि मानव प्राणी उन सब सामर्थ्यों को अपने अन्दर धारण किये हुए है, जो उनके पिता परमेश्वर में विद्यमान हैं। यदि आत्मा और परमात्मा का संयोग सम्भव हो सके तो साधारण सा दीन दीख पड़ने वाला व्यक्ति नर से नारायण बन सकता है और उसकी महानता परमात्मा जितनी ही विशाल हो सकती है।
आत्मा और परमात्मा में अन्तर उत्पन्न करने वाली माया और कुछ नहीं, केवल अज्ञान का एक इतना कलेवर मात्र है। भौतिक आकर्षणों, अस्थिर संपदाओं और उपहासास्पद तृष्णा वासनाओं में उलझे रहने से मनुष्य के लिए यह सोच समझ सकना कठिन हो जाता है कि वह जिस अलभ्य अवसर को - मनुष्य शरीर को प्राप्त कर सकता है। वह एक विशेष सौभाग्य है और उसका सदुपयोग जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, विशेष उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही होना चाहिए। शरीर का ही नहीं आत्मा का भी आनन्द ध्यान में रखना चाहिए।
यदि हम अपने स्वरूप और कर्तव्य को समझ सकें और तदनुकूल करने के लिए तत्पर हो सकें तो इस क्षुद्रता और अशांति से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है जिसके कारण हमें निरन्तर क्षुब्ध रहना पड़ता है। अज्ञान की माया से छुटकारा पाना ही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है। ऐसे पुरुषार्थी को ईश्वरीय महानता उपलब्ध हो सकती है और वह पुरुष से पुरुषोत्तम बन सकता है।
परमाणु शक्ति के सम्बन्ध में आधुनिक वैज्ञानिकों का कथन है कि जब उसकी सम्पूर्ण जानकारी मनुष्य को ही जायगी तो सारे ग्रह नक्षत्रों की दूरी ऐसी हो जायेगी जैसे पृथ्वी पर एक गाँव से दूसरा गाँव किन्तु इसकी जानकारी का भी अधिष्ठाता मनुष्य है अतः उसकी शक्ति का अनुमान लगाना भी असम्भव है। मनुष्य में वह सारी शक्तियाँ विद्यमान हैं जिनसे इस संसार का विनाश भी हो सकता है और निर्माण तो इतना अधिक हो सकता है कि उसका एक छोटा सा रूप इस सुरम्य धरती को ही देख सकते है।
मनुष्य विधाता की रचना का सर्वश्रेष्ठ चमत्कारिक प्राणी है। अव्यवस्थित धरती को सुव्यवस्थित रूप देने का श्रेय उसे ही प्राप्त है। ज्ञान, विज्ञान, भाषा लिपि स्वर, आदि की जो विशेषताएं उसे प्राप्त हैं उनसे निःसन्देह उसकी महत्ता ही प्रतिपादित होती है। मनुष्य इस संसार का समग्र सम्पन्न प्राणी है, महर्षि व्यास ने इस सम्बन्ध में अपना मत व्यक्त करते हुए लिखा है :-
गुह्यं ब्रह्म तदिदं व्रवीम-
महि मानुषात श्रेष्ठतरं हि किंचित्॥
“मैं बड़े भेद की बात तुम्हें बताता हूँ कि मनुष्य से बढ़कर इस संसार में और कुछ भी नहीं है।” वह सर्वशक्ति सम्पन्न है। जहाँ चाहे उलट-फेर कर दे, जहाँ चाहे युद्ध मार काट मचा दें। जी में आये तो शान्ति और सुव्यवस्था स्थापित करदे। कोई भी कार्य ऐसा नहीं जो मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर हो। धन, पद, यश, आदि कोई वैभव ऐसा नहीं जिसे वह प्राप्त न कर सकता हो।
भगवान राम और कृष्ण भी मनुष्य ही थे किन्तु उन्होंने अपनी शक्तियों का उत्कर्ष किया और नर से नारायण बन कर विश्व में पूजे जाने लगे। मनुष्य अपने पौरुष से-विद्या, बुद्धि और बल से- वैभव प्राप्त कर सकता है। देवत्व की उच्च कक्षा में प्रतिष्ठित हो सकता है, वह भगवान बन सकता है। उसकी शक्ति से परे इस संसार में कुछ भी तो नहीं है। शास्त्रकार का कथन है “यत्त्रह्माण्डे तत्पिण्डे” अर्थात् जो कुछ भी इस संसार में दिखाई देता है वह सभी बीज रूप से मनुष्य के शरीर में-पिण्ड में विद्यमान है।
मनुष्य दीन, हीन और पद दलित तभी तक है जब तक वह अपने आपको पहचानता नहीं। तुलसीदास जी जब तक निकृष्ट जीवन व्यतीत करते रहे तब तक वे शोक संताप में डूबे रहे, किसी ने उन्हें जाना तक नहीं, बेचारे मारे मारे इधर से उधर घूमते रहे। किन्तु जैसे ही उनकी आन्तरिक शक्तियाँ प्रकाशित हुईं, तुलसीदास जी अमृत पुत्र हो गये, जन-जन की वाणी में समा गये, सन्त बन गये महात्मा हो गये। बाल्मीकि, अंगुलिमाल आदि की कथायें सर्वविदित हैं। विल्वमंगल सूरदास के नाम से प्रसिद्ध हुए, इसके मूल में मानवीय अन्तःकरण का विकास ही सन्निहित है। वह शक्तियाँ, वह सामर्थ्य प्रत्येक मनुष्य में है अन्तर केवल इतना है कि लौकिक कामनाओं से घिरा हुआ इन्सान पारलौकिक सम्भावनाओं का विचार तक नहीं करता, इसी कारण वह छोटा है, तुच्छ है, निकृष्ट है।
अपने प्रभाव से मनुष्य चेतना विहीन प्राणियों को भी नवजीवन देने की शक्ति रखता है। देश समाज और राष्ट्र तक बदल डाले हैं उसने। मनुष्य सामाजिक जीवन का निर्माता है, उससे राष्ट्र को बल मिलता है। मानवीय शक्ति की एक चिंगारी से युग परिवर्तित हुए हैं, हो रहे हैं और यह क्रम आगे भी युग-युगान्तरों तक चलता रहेगा। वह जिधर चलता है, दिशायें चलने लगती हैं, रुकता है तो सारा संसार निष्प्राण सा हो जाता है। मनुष्य ही संसार की गति, जीवन और प्राण है। वह न होता तो सारा संसार ऊबड़-खाबड़ अस्त-व्यस्त और जड़वत् पड़ा होता। धरती पर यही प्राण बिखराता और विभिन्न प्रकार के खेल रचाया करता है।
वैज्ञानिक आविष्कारों और औद्योगिक संस्थाओं की ओर दृष्टि घुमाने से उसकी महत्ता की बात और भी पुष्ट होती है। लगता है चाहे जब अणु- आयुधों का प्रयोग करके वह सारी धरती को तहस -नहस कर डाले। यह भी सम्भव है कि वह इस शक्ति का उपयोग रचनात्मक कार्यों में करने लगे तब तो स्वर्ग के सभी बहुमूल्य पदार्थ यहीं प्राप्त करने में कोई मुश्किल शेष न रहेगी। मनुष्य के अन्दर भगवान का तेज, सृष्टि का सत्व सिद्धियों के स्रोत, देखकर उसे प्रभु का प्यारा कहने को मन करता है। लगता है इन्हीं विशेषताओं के कारण संसार के दूसरे प्राणी शारीरिक शक्तियों में प्रबल होते हुये भी उसे शीश झुकाते हैं।
इतना होते हुये भी मनुष्य की यह दलित और गलित अवस्था देखकर एकाएक उसकी शक्तियों पर विश्वास नहीं होता। इसका एक ही कारण है कि लोग सुख प्राप्ति के साधनों में भटक जाते हैं और अपनी शक्तियों से वंचित बने रहते हैं। सुख और शान्ति का मूल है मनुष्य की आत्मा। जब तक वह आत्म साक्षात्कार नहीं कर लेता तब तक उसकी शक्ति ऐसी ही है जैसे घर में अपार सोना गड़ा है, पर वह किस स्थान पर कितनी गहराई पर गड़ा है, इस ज्ञान के अभाव में उस सोने की प्राप्ति नहीं हो सकती। आत्मा ही सिद्धियों की जननी है। ब्रह्मा तादात्म्य का कारण और माध्यम भी वही है। उसे पहचाने बिना मनुष्य शक्तिवान नहीं हो सकता। इसके लिए मनुष्य को साधना स्वाध्याय संयम एवं पारलौकिक जीवन का अभ्यास करना पड़ता है तब उस शक्ति का अभ्युदय होना सम्भव हो सकता है।
आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिए कुल, देश और काल का कोई बंधन नहीं है। अपनी श्रद्धा निष्ठा, विश्वास, लगन और तत्परता के बल पर हीन कुल उत्पन्न व्यक्ति भी आत्मोद्धार कर सकता है। अजामिल, गुह, रैदास और कबीर आदि सन्तों के जीवन से यह प्रमाणित होता है कि आत्म ज्ञान प्राप्त करने के लिये वर्ण व्यवस्था बाधक नहीं। जीवन शोधन के द्वारा नीच कुल में उत्पन्न व्यक्ति भी सवर्णों जैसी ही आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त कर सकता है। इसी प्रकार सतयुग, द्वापर, कलियुग की सीमायें भी इस मार्ग में रुकावट नहीं डालती है। हमारे पूर्व पुरुष अनन्त शक्तियों के स्वामी थे। यह उत्तरदायित्व किसी न किसी रूप में हमें भी प्राप्त है और आगे भी यह क्रम सदैव इसी भाँति चलता रहेगा। संस्कृति, शिक्षा और सदाचार के अनुरूप कुल और काल में- आत्म ज्ञानी पुरुषों में न्यूनाधिक्य तो हो सकता है किन्तु यह परिस्थितियाँ इनसे प्रतिबन्धित नहीं हैं।
आत्म-परिष्कार निःसंदेह एक प्रकार का तप है। इससे कई व्यक्ति अपनी असमर्थता प्रकट करने लगते हैं। बचाव के लिये लोग यह कहा करते है “हमारी तो अब अवस्था नहीं रही। या हम अब बुड्ढे हो गये अब तो मन भी नहीं लगता। या हम तो अभी नवयुवक हैं, अभी हमारे हँसने खेलने के दिन है। धर्म कर्म की बातें तो वृद्धावस्था में चलती हैं आदि-आदि।” पर इसलिये वस्तु स्थिति बदलती नहीं। आत्मा जन्म मरण रहित है। उसे न बुढ़ापा आता न मृत्यु होती है। प्रत्येक परिस्थिति में वह एक सा होता है। ऐसा न होता तो ध्रुव पाँच वर्ष की अवस्था में पूर्णता प्राप्त न करते। जगद्गुरु शंकराचार्य ने इकत्तीस वर्ष की अवस्था में ही वह कार्य पूरा कर दिखाया था जो कोई सौ वर्ष का भी व्यक्ति नहीं कर सकता था। सन्त ज्ञानेश्वर ने 15 वर्ष की अवस्था में गीता की सुप्रसिद्ध ज्ञानेश्वरी टीका लिखी थी। अमेरिका के प्रख्यात आविष्कारक एडिसन 135 वर्ष के बाद तक सृष्टि के महत्वपूर्ण रहस्य खोजने में लगे रहे और सफलता पाई। आत्मोन्नति के मार्ग में आयु का कम या ज्यादा होना बाधक नहीं है आवश्यकता केवल अपने संस्कारों के जागरण की होती है।
उन्नतिशील होना पूर्णतया भाग्य पर भी निर्भर नहीं है। विचार पूर्वक देखने से यह पता चलता है कि परमात्मा से जो साधन मनुष्यों को मिले हैं वे प्रायः समान हैं। हर किसी को दो हाथ, दो पाँव, नाक, आँख, मुख आदि एक जैसे मिले हैं। विचार, विद्या, आदि के साधन भी प्रत्येक मनुष्य अपनी लगन के अनुसार प्राप्त कर सकता है। भाग्यवादी सिद्धान्त कायरों और का पुरुषों का है। पुरुषार्थ एक भाव है और उसका कर्ता पुरुष है अर्थात् मनुष्य अपने भाग्य का निर्माण अपने पौरुष से करता है। अपनी पूर्व असमृद्धि से किसी को अपनी क्षुद्रता स्वीकार नहीं कर लेनी चाहिए। बलवान आत्मायें प्रतिकूल दिशा में भी उन्नति करती हैं। मनुष्य के व्यक्तित्व का सच्चा परिष्कार तो कठिनाइयों में ही होता है।
बाह्य साधनों के अभाव का रोना भी अत्यन्त दुर्भाग्य पूर्ण है। आपके पास फाउन्टेन पेन नहीं है तो क्या इससे लिखने का काम रोक देना चाहिए। आप होल्डर से भी काम चला सकते हैं कलम या पेन्सिल ही इस्तेमाल कर लें तो क्या हर्ज है। मनुष्य साधनों का दास नहीं है वह साधन स्वयं बनाता है। धन स्वतः पैदा नहीं होता, किया जाता है। इसलिये निर्धनता पर आँसू बहाना हम अकर्मण्यता मानते हैं। उद्योगी पुरुष तो हजार हाथ कुआँ खोदकर भी पानी निकाल लेते हैं। आत्म-शोधन भी किसी साधन के अभाव में रुकता नहीं। यदि अपना मनोबल कमजोर न हो तो गई-गुजरी अवस्था में भी आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है।
अपनी इच्छा शक्ति दृढ़ हो तो स्थान, संगठन आदि के अत्यन्त छोटे अभाव भी आत्मोत्थान में बाधा पहुँचा नहीं सकते। संसार के अधिकाँश महापुरुषों ने तो आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिये अपनी सुख सुविधाओं का त्याग भी कर दिया था। एक दृष्टि से भौतिक सम्पन्नता आध्यात्मिक विकास में बाधक मानी गई है क्योंकि इससे मनुष्य की चेष्टायें अन्तर्मुखी नहीं हो पातीं। मनुष्य साँसारिक विषय वासनाओं में ही फँसा रहता है। हमारे ऋषियों ने इसी लिये यज्ञीय जीवन की परम्परा को जन्म दिया है। वे स्वयं त्यागमय जीवन जीते थे ऐसा ही आदेश वे हमें भी दे गये हैं। उनके ऐसा करने का एक ही उद्देश्य था कि मनुष्य अपनी आवश्यकतायें बढ़ाकर आत्म कल्याण के मार्ग से कहीं विचलित न हो जाये।
योग वसिष्ठ में कहा गया है कि मनुष्य अपनी आत्मा के दर्शन अपनी ही शक्तियों को प्रयुक्त करके करे, कोई बाह्य शक्ति आपकी सहायता नहीं कर सकती :-
यद्यदासाद्यते किंचित्केनचित्क्वचिदेव हि।
स्वशक्तिसंप्रवृत्त्या यल्लभ्यते नान्यतः क्वचित्।
अर्थात् मनुष्य यदि कुछ प्राप्त करता है तो अपनी ही शक्तियों के द्वारा। बाहरी साधन सीमित सहायता मात्र दे सकते हैं। इसी प्रकार सन्त इमर्सन का कथन है “मनुष्य अपनी सहायता आप ही कर सकता है।”
जिन सद्गुणों को आधार पर मनुष्य उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है उनमें से प्रमुख है - आत्म -विश्वास। अंग्रेजी के प्रमुख कवि टेनिसन ने लिखा है “जीवन शक्ति सम्पन्न हो सकता है यदि हममें आत्म विश्वास, आत्मज्ञान, और आत्म संयम हो।” मनुष्य व्यर्थ ही लौकिक कामनाओं में डूबा रहता है। इससे उसका कोई भी प्रयोजन पूरा नहीं होता। मनुष्य का ध्येय इससे शरीर सुख तक ही सीमित हो जाता है। किन्तु जब वह यह विचार करने लगता है कि शरीर जड़ और चेतन शक्तियों का सम्मिश्रण है तो उसकी आध्यात्मिक आस्था जागृत होती है। इसी का नाम आत्म-विश्वास है। इसी से आत्म क्षुद्रता का निवारण होता है।
संकल्प कर लेने मात्र से ही सफलता नहीं मिल सकती। इसके लिए क्रियाशील होना पड़ता है और संयमित जीवन द्वारा शारीरिक शक्तियों को गतिशील रखना पड़ता है। सौंदर्य लहरी में जगद्गुरु शंकराचार्य ने लिखा है :-
शिवः शक्त्या युक्तों यदि भवति शक्तः प्रभवितुँ।
न चेदेव देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमपि॥
अर्थात् संकल्प सिद्धि के लिये कर्म करना पड़ता है। कर्म का आधार शक्ति है, तभी सामर्थ्य बनती है। शक्ति न हो तो क्रियाशीलता भी न रहेगी।
इस प्रकार मनुष्य जब धीरे-धीरे अपने दोष दुर्गुणों को हटाकर श्रेष्ठ संस्कारों को धारण करने लगता है तो उसके जीवन में दृष्टिकोण में, स्वभावतया परिवर्तन होने लगता है। भोग-विलास की लालसा मिट जाती है और आत्म-ज्ञान की इच्छा बलवान होती जाती है। वैसे ही साधन भी मिलते जाते हैं और जीवन क्रम सरलतापूर्वक लक्ष्य प्राप्ति की ओर अग्रसर होने लगता है। यह साधन बाह्य नहीं होते वरन् आन्तरिक विशेषतायें ही होती हैं। सत्य, अहिंसा, प्रेम, त्याग, सेवा, आशा, उत्साह, धैर्य, स्वाध्याय, संयम सदाचार आदि के द्वारा उसका परिष्कार होकर शुद्ध निर्मल तथा पवित्र आत्मा के दर्शन होने लगते हैं।
यही वह स्थिति होती है जहाँ सम्पूर्ण शक्तियाँ आकर केन्द्रीभूत हो जाती हैं और “अहं ब्रह्मास्मि अयमात्मा” की शक्तिशाली भूमिका पर मनुष्य पदार्पण कर जाता है। मनुष्य जिस उद्देश्य को लेकर इस धरती में आता है उसकी पूर्ति हो जाती है और वह अनन्त सिद्धियों का स्वामी बन कर सुखोपभोग करता है। जिन्हें सुख की कामना हो उन सबके लिए भी यही रास्ता है कि अपना पौरुष जागृत करें, शक्तिशाली बनें। तभी सच्चा सुख मिल सकता है।
छान्दोग्य उपनिषद् में एक कथा आती है। एक बार इन्द्र और विरोचन-दो व्यक्तियों में एक जिज्ञासा पैदा हुई “मैं क्या हूँ।” वे बार-बार सोचते विचारते लेकिन उन्हें “मैं” का अता-पता नहीं लगा। आखिर दोनों मिलकर आदरपूर्वक शिष्य भाव से हाथ में समिधाएँ लेकर आचार्य प्रजापति के पास गये और नम्रतापूर्वक उनसे अपनी जिज्ञासा प्रकट की। उनके प्रश्न का जवाब देते इसके पूर्व ही प्रजापति ने उनकी योग्यता, पात्रता को जानने के लिए एक युक्ति निकाली। उन्होंने कहा “थाली में पानी भरकर अपना-अपना मुँह देखो उसमें तुम्हें अपना स्वरूप दिखाई देगा।”
इन्द्र और विरोचन दोनों झट से सजधज कर पानी से भरी थाली में अपने को देखने लगे। विरोचन को अपना सजा संवारा रूप देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई और अपने साथियों में जाकर अभिमान के साथ कहने लगा “भाई मैंने तो “मैं”का पता लगा लिया है। इन्द्र कुछ बुद्धिमान था, उसे सन्तोष नहीं हुआ और वह आचार्य प्रजापति के पास जाकर कहने लगा -”भगवन् असंस्कृत शरीर की प्रतिच्छाया ही प्रतिबिम्ब में दिखाई देती है। यदि यह शरीर काना, लूला, लंगड़ा होता तो प्रतिच्छाया भी वैसी ही दिखाई देती, वस्त्र अलंकारों को उतार देने पर प्रतिबिम्ब का सौंदर्य भी नष्ट हो जाता है। और शरीर के नष्ट हो जाने पर यह भी नहीं रहता इसीलिए इसे मैं अपना स्वरूप कैसे मानूँ। मुझे इससे शान्ति नहीं मिलती”(छान्दोग्य 8। 6। 2)।
इन्द्र समझदार था। सोचा इन वस्त्र अलंकारों से सजा हुआ शरीर ही यदि “मैं हूँ” तो यह निश्चित है कि इनके नष्ट होते ही मैं भी नष्ट हो जाऊंगा। इनके मैले, जीर्ण-शीर्ण होने पर “मैं” भी त्याज्य बन जाऊँगा। जो नष्ट होने वाली वस्तुयें हैं वह कदापि “मैं” नहीं हो सकती और इन्द्र को इससे शाँति नहीं हुई न उसको समाधान ही मिला। अपने इस मनोभाव को उसने आचार्य के समझ निर्भय होकर प्रकट कर दिया। उधर विरोचन अपने सजे हुए सुन्दर वस्त्रालंकारों से विभूषित शरीर के प्रतिबिम्ब को ही “मैं” का स्वरूप जानकर के चला गया।
हममें से बहुत ही कम लोगों के मन में यह प्रश्न उठता है “मैं क्या हूँ”। इस पर बहुत बहुत कम लोग ही सोचने- विचारने का प्रयत्न करते हैं। अधिकाँश तो भवसागर के प्रवाह में बहने वाले ही बनकर रहते हैं। उनके मन बुद्धि चेतना पर अज्ञान का पर्दा इस तरह पड़ा रहता है कि वे कभी यह सोचते तक नहीं कि वे कौन हैं? उन्हें क्या करना है? कहाँ जाना है ?
कुछ लोग मैं के अस्तित्व को शरीर तक ही मानकर विरोचन की सी भूलकर बैठते हैं। और शरीर को सुख देने, खाने-पीने खुश रहने, मौजमजा उड़ा लेने में ही जीवन का सार समझते हैं। लेकिन यदि शरीर को ही मैं का स्वरूप मान लिया जाय तो फिर जीवन का मूल्य ही क्या रह जाता है। कोई झंझट ही फिर शेष नहीं रह जाता। कुछ करने या न करने का कोई महत्व नहीं रहता फिर ज्ञान-विज्ञान की बात कौन करें। फिर न जीने से लाभ रहता न मरने से हानि, क्योंकि सभी शरीरों की एक ही गति होती है। किसी-न-किसी समय में वे अन्ततः नष्ट हो जाते हैं। ज्ञानी अज्ञानी, सत्यवादी और झूठा, सज्जन और दुर्जन सभी को तो शरीर की दृष्टि से एक दिन मिट जाना ही पड़ता है। ऐसी स्थिति में तो मरने से पहले का कोई महत्व नहीं तो मरने के बाद में कोई अस्तित्व नहीं रहता। जीवन सिर्फ दो अन्धकार के बीच की पतली-सी रेखा मात्र है। देर-सवेर में फट जाने वाले, मैले पड़ जाने वाले वस्त्रों का-सा मूल्य है, हमारे जीवन का चाहे वह सादा हो या चमकदार। लेकिन क्या हमें इतना सोच लेने भर से इन्द्र की तरह असन्तोष नहीं होता ? “मैं” को जानने की जिज्ञासा कर इससे समाधान नहीं हो रहा ऐसा महसूस होने लगता है हमें।
फट जाने वाले, नष्ट हो जाने वाले वस्त्राभूषणों से युक्त प्रतिबिम्ब को ‘मैं’ का स्वरूप जान लेने से हमारी जिज्ञासा शाँत नहीं होती। क्योंकि इन्हें धारण करके हम अच्छे लगते हैं और उतार फेंकने पर कुरूप, इस तरह स्पष्ट है कि वस्त्र फट जाने पर यह भास नहीं होता कि मैं फट गया। वस्त्राभूषण उतार देने या पहने रहने पर “मैं” का अस्तित्व बना ही रहता है।
ठीक यही स्थिति शरीर के साथ भी है। वस्त्रों की तरह हमारा शरीर नित्य ही किसी न किसी रूप में नष्ट होता रहता है। मल-शरीर से निकलने वाले दूषित तत्व-क्या हैं? नष्ट हुए शरीर का अवशेष। रसायन-शास्त्री, वैज्ञानिकों के प्रयोगों से यह सिद्ध हो चुका है कि शरीर में नित्य असंख्यों कोष नष्ट होते हैं असंख्यों ही नये पैदा हो जाते है इस तरह शरीर की दृष्टि से तो हम नित्य ही मरते हैं। और नित्य ही जन्म लेते हैं। लेकिन “मैं” के अस्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं होता।
इसी तरह शरीर का कोई अंग कट जाने पर कोई यह स्वीकार करने का तैयार नहीं होगा कि उसका “मैं” फट गया। अँगुली कट जाने पर, आँख फूट जाने पर, यह तो मालूम होता है कि मेरे शरीर में कुछ क्षति हो गई है। लेकिन हमें यह विश्वास नहीं होता कि हम अपूर्ण हो गये। अपनी अज्ञात पूर्णता के अस्तित्व में हमारी सहज आस्था कम नहीं होती है। “मैं हूँ” यह भावना कभी नष्ट नहीं होती।
“मैं” की खोज में हम आगे बढ़ें इससे पहले यह जान लेना आवश्यक है कि आखिर “मैं” को जान लेने की आवश्यकता क्यों है? बहुत से लोग तो इस सम्बन्ध में कुछ सोचते विचारते ही नहीं। ऐसे लोगों को खाने पीने मौज -मजे उड़ाने से फुर्सत नहीं मिलती लेकिन इस तरह की प्रवृत्ति पशुत्व की द्योतक है। क्योंकि शायद ही पशुओं के मन में अपने भूत भविष्य के बारे में सोच विचार करने की तरंग उठती हो। उनको अपने प्रकृति प्रेरित कार्यों में लगे रहना ही प्रिय होता है।
कुछ बुद्धिमान कहे जाने वाले लोग इस महाप्रश्न में बेकार न लगकर अपना काम करना ही अधिक अच्छा समझते हैं। वे इस जटिल प्रश्न को सुलझाने में व्यर्थ श्रम करना अच्छा नहीं समझते। लेकिन हमें क्या करना चाहिये यह निश्चय करना इससे भी कठिन है और बिना सही निश्चय के किये गए कार्य अनन्तः मनुष्य के लिए अशाँति, असंतोष के कारण ही बनते हैं। कर्तव्य का निश्चय भी तभी हो सकता है जब हम अपने असली अस्तित्व की जानकारी कर सकें। यदि हम शरीर ही हैं तो फिर हमारे कर्तव्यों की सीमा भी शरीर तक ही सीमित रहेगी। किसी भी कर्तव्य-अकर्तव्य का निर्णय हमें वहीं तक करना होगा जितना इसी जीवन से सम्बन्ध है। उदाहरणार्थ हमें किसी जगह एक माह रहना है तो वहाँ वर्षों में बनने वाले भव्य भवन बनाने की योजनायें किस काम की? इसी तरह ‘मैं’ का अस्तित्व यदि शरीर से परे महान है लम्बा है तो हमें अपने कर्तव्यों का निर्णय भी इसी आधार पर करना पड़ेगा।
तात्पर्य यह है कि अपने आपको जाने बिना जीवन पथ पर, कर्तव्य-मार्ग पर हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। इसके अभाव में तो हमारी स्थिति ठीक वैसी होगी जैसे कोई मनुष्य आँखें बन्द किए जंगल में तेजी से दौड़ रहा हो। उससे पूछा जाय, ‘भाई तुम क्यों दौड़ रहे हो, तुम्हें कहाँ जाना है कहाँ से आए हो?” और इनका उत्तर वह अपनी अजानकारी में दे तो हम उसे पागल ही कहेंगे। क्या हमारी स्थिति भी अपने स्वरूप को जाने बिना कुछ ऐसी ही नहीं है ? इसलिए ‘मैं’ के स्वरूप की जानकारी करना इस सम्बन्ध में प्रारम्भिक आधार खोजकर आगे बढ़ना नितान्त आवश्यक है। इसके बिना हम अपने जीवन की सही-सही रूपरेखा न बना सकेंगे, न अपने कर्तव्यों का, अपनी गति दिशा का सही-सही निर्धारण ही कर सकेंगे। अपने स्वरूप को जानना जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
सचमुच जीवन का वास्तविक लाभ वे ही उठा पाते हैं जो पहले अपने आपको बनाने का प्रयत्न करते हैं। अपने को न जानने वाले व्यक्ति आकारहीन वस्तुओं की तरह है जिन्हें वायु का झोंका तिनके की तरह बहा कर ले जा सकता है। ऐसे लोगों को संसार प्रवाह में बेकार ही बहते रहना पड़ता है।
आध्यात्म विज्ञान, आध्यात्मिक साधनायें इतनी सामर्थ्यवान, प्रभावशाली हैं कि उनके द्वारा भौतिक विज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण सफलतायें उपलब्ध की जा सकती हैं। हमारे देश में अनेकों ऋषियों, महर्षि-सन्त, महात्माओं, योगी, यतियों का जीवन इसका प्रमाण है। बिना साधनों के उन्होंने आज से हजारों वर्ष पूर्व अन्तरिक्ष, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा आदि के सम्बन्ध में अनेकों महत्वपूर्ण तथ्य खोज निकाले थे। अनेकों विद्यायें, कला-कौशल, ज्ञान-विज्ञान में उनकी गति असाधारण थी। बड़े-बड़े राजमुकुट उनके पैरों में झुकते थे। लेकिन अपनी आध्यात्म साधना के समक्ष वे सब कुछ महत्वहीन समझते थे और निरन्तर अपने ध्येय में संलग्न रहते थे।
आज उन्हीं आध्यात्म वेत्ताओं के देश में इस महान विज्ञान की जितनी दुर्गति हुई है उस पर किसी विचारशील व्यक्ति का दुःखी होना स्वाभाविक ही है। आध्यात्म विज्ञान के प्रति आजकल हमारे मूल्याँकन की कसौटी, परिचय प्राप्ति के ढंग इतने बदल से गये हैं कि हम आध्यात्म विद्या से बहुत दूर भटक गये हैं। इसके वास्तविक मर्म को न जानने के कारण आध्यात्म के नाम पर बहुत से लोग जीवन के सहज पथ हो छोड़कर अप्राकृतिक, असामाजिक, उत्तरदायित्वहीन जीवन बिताने लग जाते हैं। गलन अस्वाभाविक जीवन क्रम के कारण कई बार शारीरिक अथवा मानसिक रोगों से पीड़ित हो जाते हैं।
आज आध्यात्मिक जीवन बिताने का अर्थ जन-साधारण में लोक जीवन को उपेक्षित मानने से होता है। अक्सर लोगों में यह धारण भी कम नहीं फैली है कि यह संसार ‘क्षण-भंगुर’ है; ‘माया है।’ इसका त्याग करने पर ही मोक्ष-कल्याण की मंजिल प्राप्त हो सकती है। और इसी धारणा से प्रेरित होकर बहुत से लोग अपना कर्तव्य अपनी जिम्मेदारियाँ छोड़ बैठते हैं। अपना घर-बार छोड़ते हैं। लेकिन यदि घर गृहस्थी को छोड़ना, अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़ना ही आध्यात्मिक पथ पर बढ़ने का प्रथम चिन्ह है तो सारे ऋषियों को हमें आध्यात्मिक इतिहास से हटाना पड़ेगा। क्योंकि प्रायः सभी ऋषि-महर्षि गृहस्थ थे। जनसाधारण का स्वाभाविक सहज जीवन बिताते थे। गुरुकुल पाठशालायें चलाते थे। जनता के धर्म-शिक्षण का कार्य पूरी तरह निभाते थे।
ऋषियों ने संन्यास आश्रम की व्यवस्था करके घर छोड़ने की भी बात कही थी लेकिन जीवन के शेष चौथे भाग में, वृद्धावस्था में वह भी मुक्ति के लिए नहीं अपितु जीवनभर अर्जित ज्ञान से समाज को लाभान्वित करने, परमार्थ का जीवन बिताने के लिए। साँसारिक दृष्टि से भी धर्म-अर्थ-काम के बाद फिर मोक्ष का नम्बर आता है। खेद होता है जब लोग विभिन्न परिस्थितियों में जीवन के निखरे बिना, संस्कारित हुए बिना- अपने स्वाभाविक जीवन पथ को छोड़कर संसार को छोड़ते है; अपने कर्तव्य उत्तरदायित्वों से मुँह मोड़ते है। चूँकि उनकी वृत्तियाँ परिमार्जित तो होती नहीं, इसलिए आगे चलकर अनेकों द्विविधाओं द्वंद्वों में पड़कर वे अशाँति और असंतोष का जीवन बिताते हैं। अपने आपको कोसने लगते हैं। संसार में क्षण भंगुरता के पाठ को पढ़कर न जाने कितने होनहार व्यक्तियों का जीवन नष्ट हो जाता है। अपने लिए या समाज के लिए वे जो कोई महत्वपूर्ण कार्य करते वह तो होता ही नहीं उल्टे ऐसे लोग समाज पर भार-स्वरूप बनकर रहने लगते हैं। क्योंकि शरीर रहते कोई कितना ही त्यागी बने उसे भोजन वस्त्र आदि की आवश्यकता तो होती ही है।
वस्तुतः ‘मुक्ति’ जीवन के सहज विश्वास क्रम की वह अवस्था है जहाँ मानवीय चेतना सर्व-व्यापी विश्व-चेतना से युक्त होकर स्पन्दित होने लगती है और उसमें में परमार्थ कार्यों का मधुर संगीत गूँजने लगता है। तब व्यक्ति अपने सुख, अपने लाभ अपनी मुक्ति को भूलकर सबके कल्याण के लिए लग जाता है। इस ऊँची मंजिल तक साँसारिक परिस्थितियों में साधनामय जीवन बिताने से ही पहुँचा जा सकता है। जिस तरह बिना सीढ़ियों के छत पर नहीं पहुँचा जा सकता, उसी तरह संसार में अपने कर्तव्य उत्तरदायित्वों को पूर्ण किए बिना जीवन मुक्ति की मंजिल तक नहीं पहुँचा जा सकता। ऋषियों ने जीवन के सहज पथ का अनुगमन करके पारिवारिक जीवन में रहकर ही अपूर्व आध्यात्मिक उत्कर्ष प्राप्त किया था - ब्रह्म का साक्षात्कार भी।
जब तक शरीर है, संसार में रहना है, भूख, प्यास महसूस होती है तब तक इस संसार को नाशवान, क्षण-भंगुर कहकर लोक-जीवन की उपेक्षा करना बहुत बड़ी भूल है, अपने आपको धोखा देना है। ऐसी स्थिति में मुक्ति असम्भव है। अपने वैयक्तिक सामाजिक साँसारिक उत्तरदायित्वों को त्यागकर जीवन मुक्ति की चाह रखने वाले व्यक्ति को इस सम्बन्ध में निराश ही रहना पड़े तो कोई आश्चर्य नहीं। आध्यात्म शास्त्र के प्रणेता ऋषियों ने तो मनुष्य को उत्तरोत्तर कर्तव्ययुक्त जीवन बिताने का निर्देश दिया था। चार आश्रमों में प्रथम ब्रह्मचर्याश्रम में विद्याध्ययन गुरु सेवा, आश्रम के कार्य, फिर इससे बढ़कर गृहस्थ में परिवार के भरण-पोषण का भार समाज के कर्तव्यों का उत्तरदायित्व सौंपा था। क्रमशः वानप्रस्थ और संन्यास लोक-शिक्षण जन-सेवा के लिए निश्चित थे। इस व्यवस्था के अनुसार, एक क्षण भी मनुष्य उत्तरदायित्वहीन जीवन नहीं बिना सकता। कैसा था उनका आध्यात्म? जनक राजा होकर भी जीवन मुक्त थे। हरिश्चंद्र सत्यवादी - राम अवतारी। कृष्ण भोगी होकर भी योगी थे। क्रोधी स्वभाव होने पर भी दुर्वासा महर्षि थे, श्रीकृष्ण के गुरु।
जो लोक-जीवन को पुष्ट न कर सके, जो व्यक्ति का सर्वांगीण विश्वास साध न सके, जो जग पथ पर चलते हुए मनुष्य को शक्ति प्रेरणा न दे सके, जो मनुष्य को व्यवहारिक जीवन का राज-मार्ग न दिखा सके, वह ‘आध्यात्म विज्ञान’ हो ही नहीं सकता।
आध्यात्म शास्त्र में तो अपने लाभ की बात, अपने सुख की इच्छा को बिल्कुल ही स्थान नहीं है, चाहे वह लौकिक हो या पारलौकिक। वहाँ तो अपने से सबमें प्रयाण होता है। संकीर्ण से महान् की ओर, सीमित से असीम की ओर गति होती है। ऋषि कहता है “मुझे राज्य की, स्वर्ग की मोक्ष की, कामना नहीं है। मुझे यदि कोई चाह है तो वह है दुःखी आर्त लोगों की सेवा करने, उनके दुःख दर्दों को दूर करने की।” कैसा महान् था हमारा अध्यात्म शास्त्र जो मोक्ष, स्वर्ग, राज्य की सम्पदाओं की भी ठुकरा देता था। एक हम हैं कि संतान-धन-पद-यश-स्वर्ग की प्राप्ति के लिए आध्यात्मवादी बनने का प्रपंच रचते हैं, अपनी आत्मा को धोखा देते है। वस्तुतः जो अंतर - बाह्य, लौकिक-पारलौकिक सभी क्षेत्रों में जो हमें व्यक्तिवाद से हटाकर समष्टि में प्रतिष्ठित करे, व्यक्तिगत चेतना से उठाकर विश्व-चेतना में गति प्रदान करे, वहीं से अध्यात्म की साधना प्रारम्भ होती है।
आध्यात्म के नाम पर हमारे यहाँ गलत आचरण, विचित्र रहन-सहन, अजीब आदतें, कौतूहलपूर्ण हरकतों को भी बड़ा महत्व मिल गया है और इनसे समाज को गलत प्रेरणा भी मिलती है। अक्सर देखा जाता है कि जो अन्न न खाये पर फल, दूध खूब उड़ाये, लेटे नहीं खड़ा ही खड़ा रहे, भस्म रमाये या तिलक छापे, बढ़िया रेशमी वस्त्रों से शृंगार करे, मौन रखे-बोले नहीं, विक्षिप्त-सा आचरण करे, तात्पर्य यह है कि अपने रहन-सहन आहार-विहार में कोई विचित्रता रखे उसे बड़ा आध्यात्मिक व्यक्ति माना जाता है। ऐसे कई व्यक्ति तो बेहूदी गालियाँ भी बकते हैं और फिर भी लोग उतना ही उनकी कृपा के लिए उनसे चिपकते हैं। कैसी विडम्बना है? अप्राकृतिक-जीवन, विकृत आचरण, फूहड़ रहन-सहन भी हमारे यहाँ आध्यात्मिक गुण समझे जाते हैं। विचार कीजिए कभी ऐसा अध्यात्म जो जीवन को अस्वाभाविक बनावे, मनुष्य का कल्याण कर सकता है? कदापि नहीं।
आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने आध्यात्म विज्ञान के महत्व को समझें, उसके बारे में पर्याप्त जानकारी करें। और इसके नाम पर जो गलत बातें प्रचलित हो रही हैं उनसे अपना बचाव करें। अध्यात्म को अपने जीवन विश्वास का आधार बनावें।
संसार में अधिकाँश व्यक्ति बिना किसी उद्देश्य का अविचारपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं किन्तु जो अपने जीवन को उत्तम विचारों के अनुरूप ढालते हैं उन्हें जीवन-ध्येय की सिद्धि होती है। मनुष्य का जीवन उसके भले-बुरे विचारों के अनुरूप बनता है। कर्म का प्रारम्भिक स्वरूप विचार है अतएव चरित्र और आचरण का निर्माण विचार ही करते हैं, यही मानना पड़ता है। जिसके विचार श्रेष्ठ होंगे उसके आचरण भी पवित्र होंगे। जीवन की यह पवित्रता ही मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती है, ऊँचा उठाती है। अविवेक पूर्ण जीवन जीने में कोई विशेषता नहीं होती। सामान्य स्तर का जीवन तो पशु भी जी लेते हैं किंतु उस जीवन का महत्व ही क्या जो अपना लक्ष्य न प्राप्त कर सके।
उत्कृष्ट जीवन जीने की जिनकी चाह होती है, जो अंतःकरण से यह अभिलाषा करते हैं कि उनका व्यक्तित्व सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा कुछ ऊँचा, शानदार तथा प्रतिभा-युक्त हो, उन्हें इसके लिए आवश्यक प्रयास भी जुटाने पड़ते हैं। संसार के दूसरे प्राणी तो प्राकृतिक-प्रेरणा से प्रतिबन्धित जीवनयापन करते हैं किंतु मनुष्य की यह विशेषता है कि वह किसी भी समय स्वेच्छा से अपने जीवन मान में परिवर्तन कर सकता है। मनुष्य गीली मिट्टी है, विचार उसका साँचा। जैसे विचार होंगे वैसा ही मनुष्य का व्यक्तित्व होगा। इसलिए जब भी कभी ऐसी आकाँक्षा उठे तब अपने विचारों को गम्भीरतापूर्वक देखें- बुरे विचारों को दूर करें और दिव्य-विचारों को धारण करना प्रारम्भ कर दें, तब निश्चय ही अपना जीवन उत्कृष्ट बनने लगेगा।
प्रत्येक मनुष्य में प्रगति की ओर बढ़ सकने की बड़ी ही विलक्षण शक्ति परमात्मा ने दी है किंतु यह तब तक अविकसित ही बनी रहती है जब तक श्रेष्ठ आदर्श सम्मुख रखकर वैसा ही उद्दात्त बनने की चेष्टा नहीं की जाती। मनुष्य को यह भाव अपने मस्तिष्क से निकाल देना चाहिए कि उसके पास पर्याप्त बौद्धिक क्षमता या शैक्षणिक योग्यता नहीं। कई बार भाग्य और परिस्थितियों को भी बाधक मानते हैं किन्तु यह मान्यताएं प्रायः अस्तित्व-विहीन ही होती हैं। निर्बलता, न्यूनता और अनुत्साह की दुर्बल मान्यताओं से अभिप्रेत मनुष्य जीवन में कोई महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर पाते। अनुभव किया कीजिये कि आप में विश्वास और मनोरथ-सिद्धि की बड़ी विलक्षण-शक्ति भरी पड़ी है। आपको केवल उस शक्ति को प्रयोग में लाना है- आप देखेंगे कि आपके स्वप्न अवश्य साकार होते हैं। जो विचार आप को तुच्छ और विनाशपूर्ण दिखाई दें, उन्हें एक क्षण के लिए भी मस्तिष्क में टिकने न दें, उन योजनाओं के विचार-विमर्श में ही लगे रहें जिनसे आपको लक्ष्य-प्राप्ति में मदद मिलती है।
सफलता मनुष्य को तभी मिलती है जब मनुष्य अपने विचारों को साहसपूर्वक कर्म में बदल देता है। आप विद्याध्ययन करना चाहते हैं, स्वस्थ बनना चाहते, तेजस्वी, बलवान और महापुरुष बनना चाहते हैं- किसी भी स्थिति में आपके विचारों को दृढ़तापूर्वक मूर्तरूप देना ही पड़ेगा।
निराशाजनक और अन्धकारमय विचारों को एक प्रकार से मानसिक रोग कहा जा सकता है। निराश व्यक्ति अपने भाग्य का विनाश स्वयं ही करते हैं। प्रत्येक कार्य में उन्हें शंका ही बनी रहती है। अधूरे मन से सन्दिग्ध अवस्था में किये गए कार्य कभी सफल नहीं होते। यह एक प्रकार के कुविचार हैं जो हमारी अवनति के मुख्य कारण होते हैं। आशावान् व्यक्ति अल्प-शक्ति और विपरीत परिस्थिति में भी अपना मार्ग बना लेते हैं। श्रेष्ठता, उत्कृष्टता और पवित्रता के विचारों से ही आत्मविश्वास जागृत किया जा सकता है। इसी से वह शक्ति प्राप्त होती है जो मनुष्य को बहुत ऊँचे उठा सकती है।
भले और बुरे-दोनों प्रकार के विचार मनुष्य के अंतःकरण में भरे होते हैं। अपनी इच्छा और रुचि के अनुसार वह जिन्हें चाहता है उन्हें जगा लेता है। जिनसे किसी प्रकार का सरोकार नहीं होता व सुप्तावस्था में पड़े रहते हैं। जब मनुष्य कुविचारों का आश्रय लेता है तो उसका कलुषित अन्तःकरण विकसित होता है और दीनता,निष्कृष्टता, आधि व्याधि, दरिद्रता, दैन्यता के अज्ञानमूलक परिणाम सिनेमा के पर्दे की भाँति सामने नाचने लगते हैं। पर जब वह शुभ्र विचारों में रमण करता है तो दिव्य-जीवन और श्रेष्ठता का अवतरण होने लगता है, सुख, समृद्धि और सफलता के मंगलमय परिणाम उपस्थित होने लगते हैं। मनुष्य का जीवन और कुछ नहीं विचारों का प्रतिबिम्ब मात्र है।
आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश पाने के लिए विचार-शोधन अत्यावश्यक है। श्रद्धा-भक्ति आत्म-विश्वास और गहन निष्ठा आदि मनोवृत्तियों के पीछे एक सत्य क्रिया-शील रहता है। इस सत्य में ही वह क्षमता और उत्पादक शक्ति होती है जो हमारी प्राकृत अभिलाषाओं को सुख और सफलता का रूप प्रदान करती है। अतः यह मानना पड़ता है कि दिव्य विचार उन्हें ही कह सकते हैं जो सत्य से ओत-प्रोत हों। सत्य कसौटी है जिसमें विचारों की सार्थकता निरर्थकता का अनुपात व्यक्त होता है। सार्थक विचारों से ही मनुष्य का जीवन भी सार्थक होता है। निरर्थक विचारों को तो दुःखरूप ही मान सकते हैं।
हमारी अभिलाषायें जब अंतर्बल को जगा नहीं पातीं और विजय कामना मन्द पड़ जाती है तो यह देखना चाहिए कि सही विचार की प्रक्रिया में क्या कोई विरोधी भाव कार्य कर रहा है इनमें से? पलायनवाद प्रमुख है। पलायनवाद का सीधा सा अर्थ है अपनी शक्तियों की तुलना में अपने काम को बड़ा या कष्ट साध्य मानना। जब हम कठिनाइयों से संघर्ष करने का विचार त्याग देते हैं तो वहीं सारी उत्पादक मशीनरी ठप्प पड़ जाती है, सरलता की ओर भागने का प्रयत्न करने लगते हैं। पर इससे कुछ बनता नहीं। चित्तवृत्तियां अस्त−व्यस्त हो जाती हैं और महानता प्राप्ति की कामना धूलि-धूसरित होकर रह जाती है।
भाग्यवाद भी ऐसा ही विरोधी भाव है। सच कहें तो भाग्यवाद मनुष्य की सबसे संकीर्ण मनोवृत्ति है। काम, क्रोध,भय, बैर आदि दुष्प्रवृत्तियों का जन्मदाता हम भाग्यवाद को ही मानते हैं। पुरुषार्थ के सहारे मनुष्य ने बड़ी-बड़ी सफलताएं पाई हैं, बड़ी -बड़ी कठिनाइयों और मुसीबतों को झेलकर आगे बढ़ा है- निश्चयात्मक बुद्धि से पुरुषार्थ का उदय होता है और भाग्यवाद का अर्थ है मनुष्य की संशयात्मक स्थिति। सन्देह की स्थिति में कभी किसी का काम सफल नहीं होगा क्योंकि इससे विचार शक्ति निश्चेष्ट और निष्प्राण बनी रहती है। “मैं इस कार्य को अवश्य पूरा करूंगा।” इस प्रकार के संशय रहित संकल्प में ही वह शक्ति होती है जो सफलता, सुख और श्रेय प्रदान करती है।
भावुकता, अतिशयता तथा संकीर्णता आदि और भी अनेकों छोटी-छोटी शिकायतें मनुष्य के मस्तिष्क में भरी होती हैं। यह दुर्बलताएं मनुष्य की उच्च विचारधारा को रोकती हैं। निम्नकोटि के विचारों से मनुष्य का जीवन स्तर भी दीन-हीन और पतित ही बना रहता है, अतः उत्कृष्टता प्राप्ति की जिन्हें कामना हो, उन्हें अपने मस्तिष्क में उन्हीं विचारों को स्थान देना चाहिए जिससे उसकी सम्पादन शक्ति बलवान बनी रहे।
आप उन वस्तुओं की कल्पना किया कीजिए जो दिव्य हों, जिनसे आप का जीवन प्रकाशवान् बनता हो। आपका आत्म-विश्वास इतना प्रदीप्त रहे कि अपने प्रयत्न और उत्साह में किसी तरह की शिथिलता न आने पावे। आत्म-सत्ता की महत्ता पर प्रत्येक क्षण विचार करते रहा करें, इससे मानव-जीवन अवश्य सार्थक होगा। इस मार्ग पर चलते हुए आज नहीं तो कल आप निश्चय ही उच्च स्थिति प्राप्त कर लेंगे।
सन्मार्ग की ओर चलते हुये मनुष्य जिन दिव्य अनुभूतियों की कामना करता है उन तक पहुँचने में, पग-पग पर कठिनाइयाँ उपस्थित होती हैं। भौतिक या व्यावहारिक इच्छा जितनी बलवान नहीं होती जितनी मानसिक विभ्राँतियाँ परेशान करती हैं। आचार क्षेत्र की हरएक कठिनाई दूर हो सकती है, न भी हो तो उससे आध्यात्मिक जीवन के प्रति संशयात्मक स्थिति उत्पन्न नहीं होती, किंतु मनुष्य की चित्तवृत्तियों में वह शक्ति होती है जो उसे एक क्षण में श्रेय से हटाकर प्रेय की ओर धकेल देती है।
इसलिये श्रेयार्थी को अपने मस्तिष्क की प्रत्येक हलचल पर बड़ा ध्यान रखना पड़ता है। चित्तवृत्तियों पर नियंत्रण रखते हुये उन्हें हर क्षण सन्मार्ग की ओर लगाये रखने वाली शक्ति का ही नाम विवेक है। सत्य को प्राप्त करने और उसे जीवन में धारण करने के लिये आत्म-निरीक्षण, आत्म-शोधन और सत्य ग्रहण-इन तीनों क्रियाओं के सम्मिश्रण का ही नाम विवेक है। विवेक वह प्रकाश है जिसमें मनुष्य आध्यात्मिक दृष्टि से अपना सही रास्ता निर्धारित करता है और सही कदम उठाता है। विवेक के साधन का पालन, आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत में ही नहीं, अंत तक, जब तक मानव शरीर बना हुआ है अथवा साधनों का सिद्धि में विलय नहीं हो जाता, तब तक करना पड़ता है। विवेक ही मानव जीवन की सच्ची कसौटी, सच्ची सफलता है।
हमारी उन्नति का मूलाधार हमारा चित्त है। दुष्प्रवृत्तियों में घूमने वाली चित्त की दशा ही दुःख और दुर्गति का कारण होती है। किंतु जब चित्त की दशा विशुद्ध रूप से सत्य को ग्रहण करने में तत्पर बनी रहती है तो - पारमार्थिक बुद्धि का विकास होता है, मनुष्य निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर गतिशील बना रहता है और अन्ततोगत्वा अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। इसलिये विवेक मनुष्य जीवन की प्रथम आवश्यकता है। इसी से जीवन दिशा का निर्माण होता है, शास्त्रकार का कथन है :-
प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत नरश्चरितमात्मनः।
किं नु में पशुभिस्तुल्यं किं नु सत्पुरुषैरिति॥
अर्थात् “मनुष्य को चाहिये कि वह सदैव अपने चरित्र का निरीक्षण करता रहे। यह ध्यान बनाये रखे कि वह जो विचार कार्य और व्यवहार कर रहा है वह मानवीय हैं- पशुओं जैसे नहीं।” जब तक इस प्रकार की चेतना मानव मन में जागृत रहती है तब तक उसके सभी क्रियाकलाप सत्य और यथार्थ मूलक बने रहे है।
आध्यात्मिक जीवन का समग्र रूप से विवेचन करने वाली बुद्धि ही विवेक है। अपने मन वाणी और शरीर के प्रत्येक व्यापार का प्रतिक्षण निरीक्षण करता हुआ विवेक करता रहे कि उसके द्वारा कौन से कर्म सच्चे और कौन से मिथ्या, आडम्बर या केवल अहंकार की पूर्ति के लिये होते है। यह मीमाँसा न्याय-पूर्ण हो तो ही यह आशा की जा सकती है कि मनुष्य विवेकशील बना रह सकता है।
विवेकयुक्त कर्म ही हमारी बौद्धिक और आध्यात्मिक शक्तियों का विकास करते हैं। जो कर्म केवल परम्परागत अथवा अपने मानसिक संस्कारों के द्वारा चलते रहते हैं, उनसे मनुष्य की उन्नति होगी, इस में संदेह है। ऐसी अवस्था में तो कई बार व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से विनाश की परिस्थितियाँ उत्पन्न होती देखी गई हैं। सच्चा विकास चित्त को शुद्ध और बुद्धि को परिष्कृत करके आचरण करने से ही होता है। इसी का नाम सदाचार है। मानव धर्म भी इसे ही कहते हैं।
मनुष्य जो भी कुछ कर्म करता है वे पहले विचार रूप में मस्तिष्क में आते हैं। कार्य करने का साधन शरीर है। यदि यह कार्य विवेकयुक्त नहीं रहेंगे तो विचारों और आचरण में असंगति आ सकती है। इससे विभ्रम पैदा होता है और कार्य की सफलता में गतिरोध उत्पन्न होता है। विचार और आचरण में एक रूपता लाने का मुख्य कार्य विवेक द्वारा होता है। इसी से संयम, दृढ़ता, धर्मनिष्ठा और आत्म-विश्वास के शुभ गुणों का परिष्कार होता है। विकारों के साथ संघर्ष करके उन्हें नियंत्रण में रखकर या दबाकर ही धर्म साधनों में स्थिर रहा जा सकता है।
मनुष्य किसी भी स्थिति में क्यों न हो सत्य की खोज और प्राप्ति कर सकता है। रीति यह है कि वह अपनी वर्तमान परिस्थितियों का सदुपयोग बुद्धि और शक्ति प्राप्त करने में लगाए। अपने मस्तिष्क में पवित्र विचारों को निरन्तर स्थान देने से शुभ कर्मों में मन लगा रहता है और मनुष्य की बुद्धिमत्ता उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है। क्रियाओं में सदाचार से शक्ति का विकास होता है और अपव्यय रुक जाने से शक्ति का ह्रास नहीं होता। स्थिर शक्ति और सात्विक बुद्धि के सम्मिश्रण से ही दिव्य जीवन की अनुभूति होती है। आध्यात्मिक जीवन का राजमार्ग भी यही है।
आदर्श और रुकावटों का प्रमुख केन्द्र मनुष्य का अन्तःकरण ही होता है, सद्प्रवृत्तियों के विकास से आदर्शों की रक्षा होती है और दुष्कर्मों के संयोग से ही असफलता, दीनता और हीनता के अमंगल परिणाम प्रस्तुत होते हैं। मनुष्य अपने आदर्शों की प्राप्ति कर ले, इसके लिये उसे अन्तःकरण की इस पवित्रता को बनाये रखना परमावश्यक है। जिनका आचरण इस प्रकार हो कि वे भूल सुधार की इच्छा रखते हों उनके सम्बन्ध में यह कहा जा सकता है कि वे आगे चलकर सफलता प्राप्त कर लेंगे। थोड़े शब्दों में यह कह सकते हैं कि उसका व्यक्तित्व विवेकशील है। इन शब्दों से ही मनुष्य की प्रगति का सरलतापूर्वक अन्दाज लगाया जा सकता है।
श्रेयार्थी को पुराने अनिष्टकारी संस्कार नष्ट करके शिष्ट संस्कार ग्रहण करने चाहियें। यह प्रयत्न शुष्क व नीरस न हो। इसमें अरुचि का भाव न आये, इसके लिये धैर्य दृढ़ता और विकार के अंतर को समझना, साँसारिक कामनाओं और आत्मा की स्वाभाविक आकाँक्षा के बीच जो एक पर्दा पड़ा होता है उसे सदैव ध्यान में बनाये रखना चाहिये। क्रोध और तेजस्विता, दीनता और नम्रता, दुर्बलता और क्षमा, साहस और भीरुता, दम्भ और आत्मविश्वास के बीच जो अंतर है, उसे प्रत्येक क्षण विचारते रहने से ही सहज वृत्तियों की समुन्नति होती है। मानवीय विकास का क्रम यही है कि मनुष्य निरन्तर सत् और असत् के बीच मौलिक भेदभाव बनाये रहे।
भावनात्मक परिष्कार के लिये केवल अपने विचार-जगत में निरीक्षण की प्रवृत्ति रखना ही यथेष्ट नहीं है। अपने खान-पान, वस्त्र, आवास, पास-पड़ोस के जीवन पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार करते रहना होगा। व्यक्ति की भलाई का क्षेत्र उसके मन, वाणी और शरीर तक ही सीमित नहीं है, उसका सामाजिक पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है अतः इधर से भी पूर्ण विवेक का पालन करना पड़ेगा। आरोग्य, मितव्ययिता, निरासक्तता के साथ ही सामाजिक सम्बन्ध, विनयशीलता, भद्रता और सौमनस्यता भी अतीव आवश्यक हैं।
मानसिक, भावनात्मक तथा साँसारिक जीवन की न्यायपूर्ण समीक्षा ही विवेक की स्थिति है। यदि हम इस दिशा में निष्क्रिय, निश्चेष्ट और निष्प्राण बने रहें तो हमारे जीवन का परम लक्ष्य एक गोपनीय विषय ही बना रह जाएगा। लोग कभी साँसारिक कामनाओं से हटकर आध्यात्मिक जीवन की ओर झाँककर देखना भी न चाहेंगे। इसलिये अन्य भूमिकाओं के साथ विवेक की साधना भी सतत् चलती रहनी चाहिये ताकि हमारे जीवन का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पहलू आँखों से ओझल न होने पाये। एक भाग अप्रकाशित ही न बना रहे इसके लिये विवेक की अखण्ड-ज्योति प्रत्येक मनुष्य के जीवन में जगमगाती ही रहनी चाहिये। हमारा हृदय इतना शुद्ध और पवित्र होना चाहिये कि प्रत्येक भावना का सूक्ष्मतर प्रत्युत्तर वह दे सके।
मनुष्य जीवन के दो पहलू हैं। सत्-अर्थात् निर्माण का क्षेत्र, असत्-अर्थात् निषेधात्मक पहलू। किसी निश्चित पथ पर सरलतापूर्वक आगे बढ़ने का यही उपाय है कि अपने मार्ग की बाधाओं को दूर करते हुए आगे बढ़ें। आध्यात्मिक विकास के पथ पर भी ठीक ऐसी ही प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। अपने दोष दुर्गुणों को ढूंढ़ना, उनका निवारण करना। अपने जीवन में सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन एवं प्रश्रय देना। इसी का नाम विवेक है। जो इस स्थिति को पा लेते हैं उन्हीं का मानव जीवन सफल कहा जा सकता है। वही अंत में महानता की महान विभूति से गौरवान्वित होते और श्रेय का अनन्त सुख प्राप्त करते हैं।
भावनाओं की गहराई में जाकर जब मानव-जीवन की सार्थकता पर विचार करते हैं तो यह स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाता है कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य बाह्य सुखोपभोग तक सीमित नहीं। साँसारिक सुख जीवन को सरस और सर्वांगपूर्ण बनाये रखने की दृष्टि से उपयोगी हो सकते हैं किंतु उन्हें ही साध्य मान लेना आत्म-कल्याण की सबसे बड़ी बाधा है। मनुष्य के दुःखों तथा अवनति का कारण बाह्य सुखों की अनियन्त्रित आकाँक्षा के अतिरिक्त और कुछ हो नहीं सकता। आज सर्वत्र इन्द्रिय सुखों का ही इन्द्रजाल फैला हुआ है। इसी से मानव जीवन में गहरी अस्त-व्यस्तता समायी हुई है।
हमारा पतन इसलिये नहीं हुआ कि हमारे पूर्वजों के बनाये हुये रीति-रिवाज और सामाजिक प्रतिबन्ध कठोर थे, खराब थे, वरन् इसलिये कि उनका जो सात्विक लक्ष्य था, उस पर पहुँचने के लिये जिस वातावरण और साधनों की आवश्यकता थी उनको बहिष्कृत किया गया और एक नये सिद्धान्त पर ही उन सभी को जोड़ दिया गया।
जब तक हमारी परम्परायें, आत्म ज्ञान और अन्तः दर्शन की आवश्यकता की पूर्ति के आर्ष-सिद्धान्त के अनुसार रहीं तब तक बाह्य और आन्तरिक जीवन में सुख शाँति और संतोष की परिस्थितियाँ बनी रहीं। किंतु जैसे ही बाह्य सुखों की प्रधानता बढ़ी वैसे ही क्लेश, कलह और कटुता के दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम दिखाई देने लगे। यह हमारी अन्धानुकरण की प्रवृत्ति के कारण हुआ। हमारे पाँव पाश्चात्य संस्कृति के रूपमान और आकर्षक पथ की ओर इस तरह बढ़े कि हमारे अपने आदर्श और सिद्धान्त पूर्णतया भौतिकवादी सिद्धान्तों पर विलीन हो गये। इन्द्रिय-जन्य सुखों को ही प्रधानता दी जाने लगी। परिणाम स्वरूप आध्यात्मिक जीवन का ढाँचा ही लड़खड़ा गया।
भौतिक और आध्यात्मिक विचार धारा में एक मौलिक मतभेद है। आध्यात्मिक आदर्श मनुष्य का जीवन अन्य प्राणियों की अपेक्षा श्रेष्ठतर मानते हैं और मनुष्य से दिव्य जीवन के दार्शनिक दृष्टिकोण को समझने की अपेक्षा करते हैं। दिव्य-जीवन का अर्थ है मानवीय सद्गुणों से समृद्ध, शुद्ध जीवन। इसमें आत्मकल्याण से निजी उद्देश्य के साथ विश्वकल्याण की आदर्श भावना सन्निहित है। अर्थात् मनुष्यों के बल, बुद्धि और पराक्रम को श्रेष्ठ साधन मानते हुये भी प्राणिमात्र के प्रति आत्मभावना ही हमारी विशेषता है। इसमें किसी के उत्पीड़न का कहीं भाव तक नहीं आता। विश्वसुख और विश्वशाँति का इससे बढ़कर दूसरा आदर्श हो नहीं सकता। सरल शब्दों में हिल-मिलकर साँसारिक सुखों का उपभोग और आत्म कल्याण ही दृढ़तर भावना ही पूर्वीय संस्कृति का स्वरूप है। इसी से मानवीय हितों की रक्षा सम्भव हो सकती है।
किंतु भौतिकवादी मान्यता का रूप ही कुछ दूसरा है। उस की सम्पूर्ण परम्परायें, रीति और रिवाज बाह्य जगत के सुखों को प्राप्त करने के साधन मात्र हैं। अर्थात् सुख चाहे वह किसी से छीन कर प्राप्त किये जाएं अथवा मनुष्येत्तर प्राणियों की हिंसा द्वारा प्राप्त हो, उनको पा लेना दुष्कृत्य नहीं बुद्धिमत्ता मानी जाती है। इससे वहाँ के आचार-विचार और जीवन यापन के विभिन्न व्यवसायों में भी वैसी ही भयानकता छाई हुई है। तलाक के बड़े-बड़े आंकड़े छापना ही मानो उनकी बुद्धि का और सभ्यता का प्रतीक है। माता-पिता के प्रति सद्भावना की कमी, सामाजिक-जीवन में स्वार्थपरता, बेईमानी, चोरी, झूठ, छल, कपट, आडम्बर- यदि सब विशेषतायें हमने भी उनसे सीख लीं। छोटी-छोटी बातों में कानून की शरण, धन का अपव्यय और उसे प्राप्त करने के लिये अनैतिक आचरण करना, अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिये पशु पक्षियों तक का हाड़-माँस और खून चूस लेने में ही जो अपनी विशेषता समझता हो उसे भी कोई बुद्धिमान व्यक्ति भला कहेगा। ऐसी-घृणित परम्परायें जिस समाज तथा राष्ट्र में फैल रही हों, उन्हें क्या तो सुख प्राप्त होंगे, क्या उनका आत्मकल्याण होगा। दर-दर की ठोकरें खाना, क्षुब्ध, अशाँत और उद्विग्नता के दुष्परिणाम ही उन्हें मिल सकते हैं, वही मिले भी। ऐसी अवस्था में धर्म और अध्यात्मवाद को दोष लगाना उचित नहीं है। दुःख के परिणाम हमने स्वयं पैदा किये हैं। इसका दोषारोपण किसी दूसरे पर करने का हमारा कोई अधिकार नहीं है।
भौतिक सभ्यता का अनुकरण आज जिस तेजी से हो रहा है- लोगों का नैतिक पतन भी उसी गति से हो रहा है। स्वामी विवेकानंद ने वर्षों पहले इस बात की चेतावनी देकर हमें सतर्क किया था। उन्होंने कहा था- “ध्यान रखो, यदि तुम आध्यात्मिकता का त्याग कर दोगे और इसे एक ओर रखकर पश्चिम की जड़वादपूर्ण सभ्यता के पीछे भागने लगोगे तो तुम्हारा अब तक का सम्पूर्ण गौरव समाप्त हो जावेगा, तुम्हारी जाति मरी हुई समझी जायेगी, और राष्ट्र की सुदृढ़ नींव जिस पर इसका निर्माण हुआ है पतन के गहरे गर्त में चली जायेगी- इसका प्रतिफल सर्वनाश के अतिरिक्त और कुछ न होगा”।
भौतिक सभ्यता का प्रभाव, हमारे खान-पान से लेकर रीति-रिवाजों तक आ गया है या यूँ कहिए कि पूर्णतया अभारतीय बनते चले जा रहे हैं। हमारे वस्त्र ऐसे हो रहे हैं कि देखने वालों की आँखों में शरारत और कामुकता नाचने लगती है। सिनेमा-साहित्य, नाच, स्नो पाउडर की भरमार ऐसी बढ़ी है कि लोगों का सारा धन, समय और शक्तियाँ इन्हीं में बर्बाद हो रही है। खान-पान, बोली-भाषा, आचार-विचार सभी बदल गए। अपने परिवार के प्रति क्या कर्तव्य होने चाहिएं, शिक्षा का स्वरूप कैसा हो, जीवन कैसे जियें- यह किसी को मालूम तक नहीं है। अवाँछनीय प्रतियोगिताओं की बाढ़ में अनैतिकता की सन आई है। स्त्रियों और कुमारियों में सौंदर्य प्रदर्शन की भावना इतना उग्र रूप धारण करती जा रही है कि पुरुषों की आँखें शर्म के मारे झुकी जा रही हैं। घर के लोग खाने पीने के लिए तड़पें और कुछ चालाक व्यक्ति शौक मौज का जीवन बितायें। स्त्री और पुरुष के भेद को मिटा देने वाली इस जड़ सभ्यता ने कितना पैशाचिक उत्पीड़न किया है इस समाज का, कि देखने वालों का दम घुटा जा रहा है। चारों तरफ हाहाकार मचा हुआ है। क्या यही हमारी सभ्यता है ? इसी को संस्कृति कहें? हमारे गौरव, हमारी कीर्ति और हमारी सम्पन्नता का भारतवर्ष यह नहीं है। यह तो बहका हुआ कदम है जो विदेशियों की राह पर चल रहा है। और उसी में उसे नष्ट हो जाना है।
भारतीय धर्म वह था जो “जीवन-सिद्धि” को साकार रूप दे चुका था। यहाँ का दाम्पत्य प्रेम, पितृ-भक्ति, मातृ-पूजा, मातृ-स्नेह सभी एक से एक बढ़-चढ़ कर थे। लोगों के आहार कितने सरल और सात्विक थे। संयम और ब्रह्मचर्य की गरिमा से चेहरे प्राणवान, कान्ति युक्त तथा ओजस्वी हुआ करते थे। सदाचार, प्रेम, न्याय और आत्मीयता की भावनाओं के कारण सभी ओर सुख और संतोष छाया रहता था। इस पुण्य भूमि पर देवता भी जीवन प्राप्त करने की कामना किया करते थे। भौतिक और आध्यात्मिक सम्मिश्रण के कारण लौकिक जीवन तो सुख और शाँति से पूरित हुआ ही करते थे, पारलौकिक अनुभूतियाँ भी यहाँ उपलब्ध हुआ करती थीं। जो एक ऐसे ठोस दर्शनशास्त्र पर आधारित रहती थीं कि दूसरे देश वाले इस पुण्य भूमि के दर्शन करना अपना भाग्य समझते थे।
हमें भौतिक मान्यताओं की रूढ़िवादिता से बाहर निकल कर विवेकशील मनुष्य बनना पड़ेगा। अपने दृष्टिकोण को परिष्कृत करना होगा। मनुष्य-जीवन को सच्चे दृष्टिकोण से देखने की दार्शनिक बुद्धि का विकास किए बिना मानवीय प्रगति सम्भव हो नहीं सकती। पूर्णतया भोगवादी जीवन के परिणाम दुःखदायी ही होते हैं। हम आध्यात्मिक और भौतिक समृद्धि के सम्मिश्रित मार्ग को समझें और उस पर चलें तो मानव जीवन का सच्चा आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। यही हमारी पूर्व परम्परा है और अब इसी राह पर चलने के लिए हमें समुद्यत होना है।
सुख मानव-जीवन की स्वाभाविक कामना है। हर कोई यह चाहता है कि उसे दुःख में न रहना पड़े। जिसके लिये वह अपनी बुद्धि, शक्ति, विवेक, विश्वास और सभ्यता के अनुसार प्रयत्न भी करते हैं। एक वस्तु में यदि सुख की कमी दिखाई देती है तो दूसरी ओर भागते हैं पर पहला सुख छोड़ने के पूर्व अन्य सुख या आनन्द का विश्वास या किसी ठोस आधार पर अवलम्बित कल्पना आवश्यक है। इहलौकिक सुखों की अपेक्षा पारलौकिक सुखों की ओर आकृष्ट होने के पीछे भी यही भावना सन्निहित होती है कि मनुष्य को इन्द्रियजन्य सुख क्षणिक और व्याधि उत्पादक लगते हैं इसलिए परलोक में वह किसी ऐसे सुख की कल्पना करता है जिसमें टिकाऊपन हो, स्थिरता और अमरत्व हो। सुख के विनाश से मनुष्य घबड़ा उठता है। मृत्यु से भय केवल इसलिए लगता है कि शारीरिक सुखों के प्रति मोह होता है अतएव यह नहीं चाहते कि जिस शरीर से तरह-तरह के उपभोग करते हैं वह कभी नष्ट हो और उसका अस्तित्व मिट जाय।
मनुष्य का जी जब इस संसार के स्थूल सुखों से तृप्त नहीं हुआ तो उसने उसे ईश्वर के सान्निध्य से प्राप्त करना चाहा। वैराग्य, भक्ति, साधना, उपासना का वह अभ्यास करने लगा। आहार-विहार में उसने कठोरता और संयम प्रारम्भ किया। देह-दमन और तरह-तरह की यातनाएँ सहन करके देखीं, किंतु सुखों की कल्पना का वह सर्वथा त्याग नहीं कर सकता। कठोर तपश्चर्या के कारण भी उसकी वह इच्छा समाप्त न हुई तो लगा जैसे जीवात्मा मौलिक रूप से आनन्द प्राप्ति की कामना से ही इस संसार में अवतरित हुई है और जब तक उसकी यह आकाँक्षा सही रूप से तृप्त नहीं होती है तब तक उसके जीवन में हलचल, उद्यम और उद्योग बने ही रहते हैं।
सच्चे आनन्द का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के लिए यह देखना है कि विविध सुखों के साथ जीवात्मा का मेल किस प्रकार होता है। इन्द्रिय और विषय-सुखों के विपरीत परिणामों को देखते हुए उन्हें ध्येय नहीं माना जा सकता। शारीरिक-पतन, मनोबल में गिरावट, सामाजिक जीवन में अनेकों बुराइयों का समावेश, ऊँच-नीच का भेद-बर्ताव अपहरण और अनाचार के अधिकाँश परिणाम इन्द्रिय-भोगों की अतिशयता के कारण ही बढ़ते हैं। पारलौकिक सुखों के बारे में भी यहीं बात है कि पहले तो उसकी प्राप्ति के लिए यहीं अनेकों दुःख झेलने पड़ते हैं, फिर यदि यह मान लें कि अन्यत्र लोकों में सुख है तो वह भी इन्द्रियजन्य ही हो सकता है। इसे भी स्थिर और शाश्वत नहीं मान सकते। जब यह कल्पना उठी तो सुख और दुःख दोनों ही निर्मूल दिखाई देने लगे और इन दोनों से ही बचने के लिए वैराग्य भावना पैदा हुई।
किंतु इससे भी मनुष्य को संतोष नहीं मिला। मानव-जीवन की स्वाभाविक प्रेरणाओं का दमन करके एक प्रकार का बनावटी जीवन बिताने से स्थिर शान्ति उपलब्ध नहीं हुई। सोचा यह गया था कि सुख-असुख की कल्पना त्याग देने से चित्तवृत्तियाँ परेशान नहीं करेंगी। पर जब इस प्रकार से भी संतोष और शाँति नहीं मिलीं तो यह लगा कि हमारे बन्धन अभी भी ज्यों के त्यों बने हुए हैं। भूख, प्यास, आवास-निवास और निद्रा आदि के कारण जीवात्मा मुक्त नहीं हो पाई इसीलिए इस आन्तरिक उथल-पुथल का अन्त नहीं हो पाया। अब विवेचनात्मक बुद्धि जागृत हुई और शरीर तथा आत्मा दोनों का प्रथम अस्तित्व प्रतिभासित होने लगा। इसलिए बन्धन-मुक्त होने के लिए दोहरे उपक्रम की उपयोगिता समझ में आई। एक प्रकार के साधन ऐसे हैं जिनमें मनुष्य को शारीरिक सुखों को मिटाने के लिए तप करना पड़ता है। अपनी इच्छाओं को दबाना पड़ता है। भूख, प्यास और रहन-सहन में स्वेच्छा से अभाव उत्पन्न करना पड़ता है। यह शरीर और उसके क्षणिक सुखोपभोग के प्रति आसक्ति भाव समाप्त करने के लिए करना पड़ता है।
दूसरी ओर आत्म-विकास करना पड़ता है। इसके लिए अपने जीवन में श्रद्धा, विश्वास, प्रेम, आत्मीयता, उदारता, सहृदयता आदि सद्गुणों को प्रकाशित करना पड़ता है इससे आत्मा और शरीर के अस्तित्व और उनकी पृथक आवश्यकताएं स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देने लगती हैं। ज्यों-ज्यों मनुष्य जीवन का यह विशिष्ट संयोग अधिक विकसित और परिष्कृत होने लगता है त्यों-त्यों आत्मिक शक्तियाँ प्रकाश में आने लगती हैं और एक विलक्षण सुख की अनुभूति होने लगती है। इसी अवस्था का नाम साधना है। यह जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण अवस्था है जिसमें मनुष्य एक ऐसी संकरी पगडण्डी से होकर चलता है जिसके एक ओर मोक्ष और दूसरी ओर बन्धन, एक तरफ सुख और दूसरी ओर दुःख होता है। साधना मनुष्य की सबसे अधिक सतर्क और जागरुक अवस्था का नाम है। इसलिए साधना का दूसरा नाम ‘विचारों की तपश्चर्या’ भी है। साँसारिक और आत्मिक दोनों प्रकार के विचारों की रस्साकशी में मनुष्य कभी इधर कभी उधर खिंचता रहता है जिससे दुःख और सुख दोनों ही अनुपाततः प्रभावित करते रहते हैं।
साधक-जीवन दुस्तर इसलिए मानते हैं कि वैराग्य के आवेश में कठोरता का कृत्रिम जीवन सच्चा और स्वाभाविक नहीं होता। मन की कल्पना जब तक सात्विक बनी रहती है तब तक इस जीवन में सरसता बनी रहती है, किंतु कल्पनायें कभी एक-सी नहीं रहतीं इसलिए असत् कल्पनाओं में पड़ते ही मनुष्य का जीवन कार्य-रहित और आनन्द रहित होता जाता है। कभी अनुभूति और उत्साह बढ़ता है, किसी समय मानसिक चञ्चलता और अतृप्ति का अनुभव होने लगता है। साधना का महत्व इसलिए होता है कि इससे मानवीय दोषों का निवारण होता है। कठिन इसलिए होती है कि मनुष्य का दम्भ बढ़ने का भय बना रहता है।
जीवन-ध्येय की प्राप्ति की दृष्टि से वैराग्य, भक्ति साधना और आत्मा ज्ञान प्राप्त करना निःसन्देह उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है किन्तु दम्भाचार बढ़ने से मनुष्य के सर्वनाश की भी आशंका बनी रहती है, इसलिए यह नहीं कह सकते कि साधक जीवन सभी के लिए ही उपयोगी है।
सत्कर्म मनुष्य जीवन की-सर्वांगीण साधना का पर्याय है। हमारा लक्ष्य मन, बुद्धि और शरीर इन तीनों की शक्तियों को विकसित और शुद्ध करना होना चाहिए। हमारा शरीर निरोग, स्वस्थ, चपल और बलवान हो ऐसे अपने आप में गुण पैदा करने चाहिएं। मन ऐसा हो जो सात्विक विषयों में रुचि ले और संकल्पवान हो। बुद्धि शुद्ध विचारों से अनुप्राणित-अर्थात् सत्-असत् का विवेक भाव बनाये रखे, हमारा यह प्रयत्न होना चाहिये। हमारा यह विश्वास होना चाहिये कि हमारे समग्र विकास के लिए सात्विक आनन्द प्राप्त करना आवश्यक है। प्रेम, उदारता, स्नेह, आत्मीयता, मैत्री, सज्जनता आदि सद्गुण मानवीय विकास में बाधक नहीं होते। दुःख का कारण दुष्कृत्य और आलस्य व अकर्मण्यता होती है। इससे मनुष्य का जीवन पतित होता है। वह अन्त में स्थूल भोगों के क्षुद्र आनन्द की ओर चलने लगता है। इससे व्यक्तिगत जीवन में तो बुराइयाँ आती ही हैं, सामाजिक जीवन भी मलिन और अपवित्र होता है। फलतः सम्पूर्ण मानव-जाति को अवनति और दम्भ-पाखण्ड में जीवन यापन करना पड़ता है।
सुख और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए न तो कर्तव्य कर्मों- गृहस्थ जीवन-से भागने की आवश्यकता है, न ही सुखों की भावना को कठोरतापूर्वक कुचलने की। भाव यह होना चाहिए कि- कर्म करें पर वे नितान्त स्वार्थपूर्ण न हों, सुखों का उपयोग करें किन्तु उनके प्रति आसक्ति न हो। इस प्रकार जीवन शोधन करके, विवेकपूर्वक अपनी प्रवृत्तियों को निश्चित करने और व्यावहारिक रूप से उन्हें अमल में लाते हुए चित्त शुद्ध करना, सद्गुणों की वृद्धि करना ही मानव मात्र का ध्येय होना चाहिए। इसी को भगवान कृष्ण ने गीता में निष्काम कर्म-योग और शास्त्रकारों ने “सहज समाधि” की उपाधि दी है।
सभी प्राणियों के साथ अपने सम्बन्धों को पवित्र, उदार, आत्मीयतापूर्ण और सुखप्रद बनाने का हमें प्रयत्न करना चाहिए, इससे मनुष्य को सात्विक सुख और आनन्द का अनुभव हुए बिना नहीं रहेगा। शरीर, मन और बुद्धि की शुद्ध शक्तियों को जागृत करने से ही मनुष्य सच्चा सुख प्राप्त कर सकता है, यही मनुष्य जीवन की सर्वोत्कृष्ट साधना है। यही उसके विकास का उत्तम मार्ग है। इसी से मनुष्य का जीवन लक्ष्य भी पूरा हो जाता है।
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मनुष्य की एक महत्वाकाँक्षा काम कर सकती है, वह है शक्तिवान बनने की कामना। हर कोई यही चाहता है कि वह समीपवर्ती लोगों से अधिक उन्नति करे, अधिक सफलता प्राप्त करे। इससे दूसरों में प्रभाव पैदा करने, अपनी साख जमाने और सम्मान प्राप्ति की लोग आशा किया करते हैं। शक्तिवान बनने की यह प्रतिद्वन्द्विता स्वाभाविक तौर पर प्रायः सभी में होती है। किन्तु ऐसे व्यक्ति बहुत थोड़े होते हैं जो अपनी इस आकाँक्षा को उचित रीति से पूरी कर पाते हैं। सफलता के लिए अपनाये गये साधन यदि अनुचित हैं, छल और कपट-पूर्ण हैं, समाज को धोखा देने वाले हैं तो उस सफलता का लाभ स्थायी न होगा। जब लोग यह जान पायेंगे कि आपकी सफलता के पीछे कुटिल कर्म और अनुचित प्रयोग सम्मिलित हैं तो लोग आप से घृणा करने लगेंगे। सर्वत्र निरादर होने लगेगा। शक्तिवान बनने का यह मार्ग व्यावहारिक नहीं हैं।
शक्ति वृद्धि के लिए आदमी को आत्म- विश्वासी होना पड़ता है। आत्म विश्वास में वह शक्ति भरी रहती है। जो मनुष्य को सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचा देती है। ऐसा मनुष्य न तो किसी के उपहास की परवाह करता है और न विघ्न बाधाओं से डरता, घबराता हैं। आत्म विश्वास मानव जीवन का वह बल है जो संसार में बड़ा से बड़ा कार्य, कम साधनों के द्वारा भी सरलतापूर्वक सम्पन्न करा देता है।
इमर्सन ने कहा- “ अपने ऊपर विश्वास करो- आपका हृदय शक्ति से भर जायेगा।” हजारों लाखों वर्षों से लोग बाह्य उपकरणों का भरोसा करते रहे हैं, आज भी करते है। किन्तु जिन्होंने अपनी आत्मिक शक्तियों को पहचाना, उन्होंने कुछ ऐसी विभूतियाँ प्राप्त कीं, कि लोग उन्हें जननायक, विजयी और महान मानने के लिए विवश हुए। ऐसे मनुष्यों ने सदैव अपनी नैसर्गिक सरलता और मौलिक गरिमा का आवाहन किया जिससे उनमें वह तेजी आई-वह स्फूर्ति, वह शक्ति पैदा हुई - कि बड़े-बड़े पहाड़ उनके आगे झुक गये। सफलताओं ने स्वयं आगे बढ़कर उन्हें विजय माला पहनाई। मुगल सम्राट बाबर, विश्व- जीत नैपोलियन, जर्मन के प्रधान मन्त्री विस्मार्क आदि ऐसे ही महापुरुषों में थे जिन्होंने आत्म-विश्वास के बल पर आश्चर्य-जनक सफलताएं प्राप्त कीं।
यह कभी भी मत सोचिए कि आप अकेले हैं, आपकी शक्ति और सामर्थ्य बिल्कुल छोटी है, आपका ज्ञान, शारीरिक क्षमता सब कुछ स्वल्प हैं। इससे आपमें दीनता और हीनता की मारक भावनाएं पैदा होंगी जो आपके भविष्य को अन्धकारमय बना देंगी। सोचिए आपके पास है क्या नहीं? आप साहसी हैं, कर्मशील हैं, पौरुष दिखाने की क्षमता है। आपका शरीर मोटा तगड़ा न सही स्वस्थ तो है, निरोग तो है। महात्मा गाँधी का वजन तो कुल 86 पौण्ड था। फिर आप यह क्यों मान रहे हैं कि आपकी शक्ति सीमित हैं। इन शक्तियों का थोड़ा उपयोग तो कीजिए तब आपको पता चलेगा कि आप कितने बलशाली हैं। आप भी जार्ज हर्बर्ट के इस मंत्र को अपने जीवन में धारण करके तो देखें “बेखटके अकेले रहो। अपना आदर आप करो और देखो कि तुम्हारी आत्मा की क्या दशा है ? .............।” जिसके हृदय में यह ज्ञान प्रकाशित है वह अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को एक ही केन्द्र बिन्दु पर जुटाकर आश्चर्यजनक लाभ तो प्राप्त कर ही सकता है।
आत्म-विश्वास का अर्थ है अपनी परिस्थितियों और समस्याओं का हल अपने आप में ढूंढ़ना। आप क्यों दूसरे लोगों से सहायता की याचना करते हैं। उनके पास भी तो वही उपकरण हैं तो परमात्मा ने आप को भी दिये हैं, क्यों नहीं अपने हाथ-पाँव चलाते। अपनी बुद्धि का उपयोग करते। बाहरी मनुष्य आपको सहायता देकर ऊँचे उठा नहीं सकता। इसके लिए आपको अपनी ही शक्तियों का सहारा पकड़ना पड़ेगा। प्रत्येक दशा में आत्म-विश्वास जागृत करना पड़ेगा।
इसका अभिप्राय यह नहीं कि आप सहयोग और संगठन की वृत्ति से अलग होने का प्रयत्न करने लगें। या आप औरों से सीख और उचित परामर्श भी लेने का परित्याग कर दें। सामाजिक जीवन में यह किसी प्रकार भी सम्भव नहीं है। इसे तो मानसिक दुराग्रह या आत्मिक दुर्बलता ही कहा जायेगा। आत्म-विश्वास का अर्थ यह है कि हम अपने स्वत्वाभिमान को दुर्बल न होने दें। आत्महीनता की निराशापूर्ण भावनायें मनुष्य को भाग्यवाद की ओर प्रेरित करती हैं जिससे लोगों में अकर्मण्यता का संचार होने लगता है। आत्म-विश्वास का उपदेश करने का एक ही उद्देश्य है कि मनुष्य दैववाद के भ्रामक सिद्धान्त का प्रतिपादन न करने लगे। परन्तु परमात्मा की दी हुई शक्तियों को सदैव क्रियाशील रखने का नाम ही आत्म-विश्वास है।
आध्यात्मिक आस्थाओं के संसार में पग-पग पर सुरक्षा, निर्माण और सुख की परिस्थितियाँ दिखाई देती हैं। आत्मा स्वयं पूर्ण है। वह अनन्त शक्तियों का भण्डार है। इसके आश्रय में आने वाला व्यक्ति ही इन शक्तियों का अधिकार प्राप्त करता है। जो इसका सदुपयोग करता है उसी का जीवन व्यवस्थित रहता है। दृढ़-इच्छा-शक्ति, अटूट परिश्रम, अनन्त धैर्य ये किसी भी बाह्य उपकरण से कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। अपने जीवन के व्यवहार में इन्हें प्रयुक्त करिये, आपका भविष्य अवश्य उज्ज्वल बनेगा।
आत्म-विश्वास मनुष्य की सम्पूर्ण शक्तियों को एक स्थान पर संगठित करता है। संगठित शक्तियों को जीवन के जिस क्षेत्र में उतार देते है वहीं भारी उथल-पुथल मच जाती है। दूसरे लोग भी हमारा भरोसा करने लग जाते हैं। इसका श्रेय शक्तियों के संगठन को होता है। चित्त की एकाग्रता के प्रबल होने से मस्तिष्क की सम्पूर्ण कार्य-कारिणी शक्तियाँ विकसित होती हैं और उसी क्षेत्र में काम करने लग पड़ती हैं। आत्म-विश्वास ही हमारी गुप्त शक्तियों के जागरण का मूल मन्त्र है।
आत्म-विश्वास और दृढ़ प्रतिज्ञा के बिना मनुष्य परिस्थितियों का दास बना रहता है। हर घड़ी किसी न किसी सुयोग की चिन्ता में डूबा रहता है। कहीं से जमीन में गड़ा धन मिल जाए, कोई ऐसा आशीर्वाद दे जाय कि परीक्षा में उत्तीर्ण हो जायें, शादी-विवाह, रोजी-रोजगार आदि के लिए जो किसी घटना या संयोग की ताक में बैठे रहते हैं, उनकी आत्मिक शक्तियों में ऐसा जंग लग जाता है, जो जीवन भर छुटाए नहीं छूटता। अन्ततोगत्वा बुरे परिणाम, दुःखद परिस्थितियों और असफलता के प्रेत-पिशाच उन्हें आ घेरते हैं। तब पछतावा ही हाथ लगता है। पुरुषार्थ और प्रयत्न के क्षण तो तब तक समाप्त हो जाते हैं।
आत्म-विश्वास का पूरक भाव है दृढ़-इच्छा-शक्ति। यही तो वह रहस्य है जो बिगड़ी बनाता है, ऊँचे उठाता और समस्याओं से पार लगाता है। दृढ़-इच्छा-शक्ति से सम्पन्न किये हुये कार्य सदैव ही सफल हुए हैं, आगे भी होते रहेंगे। किंतु द्विविधापूर्ण निर्णय एक ही क्षण में सफलता का प्रवाह दूसरी ओर बदल देते हैं। जो व्यक्ति भूल करने के भय से अथवा बीच में ही कार्य के छूट जाने की आशंका से कोई निश्चित निर्णय नहीं कर पाते। उनसे सचमुच ही गलतियाँ होने लगती हैं। प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि वह एक सुदृढ़ आधार का निर्माण करके उसके सहारे जीवन को ऊँचा उठाता हुआ ध्येय पथ पर अनवरत आगे बढ़ता रहे। इसके लिये दृढ़ता, सुनिश्चितता एवं संकल्प शक्ति का आवाहन करना पड़ता है। आत्म-विश्वास इन तीनों गुणों का मिश्रित रूप माना जा सकता है।
मनुष्य सुँदर स्वास्थ्य, जीवन में स्वच्छन्दता व सफलता प्राप्त कर सकता है किन्तु अकर्मण्यता के द्वारा नहीं। इनके लिए अपनी आत्मिक शक्तियों को जगाना पड़ता है। लगन और तत्परतापूर्वक क्रियाशीलता का आश्रय लेना पड़ता है किंतु यह सब तभी सम्भव है जब हमारा आत्म-विश्वास सर्वप्रथम प्रगाढ़ बने। आत्म-विश्वासी लोगों का जीवन ही इस संसार में सच्चा-जीवन है। हमें भी आत्म-विकास के लिए, जीवन की सर्वांगपूर्ण समुन्नति के लिये आत्म-विश्वासी ही होना पड़ेगा। इसी से मानव-जीवन की सच्ची सफलता के दर्शन हो सकेंगे।
उद्यम और विकास के पथ पर चलते हुए अनेकों विघ्न बाधाओं का आना स्वाभाविक है। कार्य छोटा हो या बड़ा आध्यात्मिक हो अथवा साँसारिक, उलझनें मुसीबतें और कठिनाइयाँ आयेंगी ही। इनसे बच कर सफलता की मंजिल तक पहुँचना असम्भव है। रास्ते की इन रुकावटों का सामना करना वीरोचित कार्य है। जो संघर्षों से कतराता नहीं वह सर्वोपरि साहसी है। वे कायर और कापुरुष होते हैं जो विघ्नों से हार मानकर उद्यम करना छोड़ देते हैं। इससे किसी प्रकार की सफलता प्राप्त नहीं की जाती। सफलता का व्यापक और विशिष्ट लक्षण उत्साह है। मानवी विकास की अधिकाँश सम्भावना साहस धैर्य और पराक्रम पर सन्निहित है।
आपका स्वास्थ्य खराब हो चुका है, पाचन संस्थान बिल्कुल विकृत हो चुका है। मिर्च मसालों के अधिक सेवन से पेट में गड़बड़ी बनी रहती है, खट्टी डकारें आती है, जी मिचलाया करता है। किसी चिकित्सक ने आपकी सलाह दी है कि आप कुछ दिन शाकाहार कर लीजिए। आप उसके महत्व को भी भली भाँति समझ चुके हैं। प्रारम्भ में स्वास्थ्य सुधारने की प्रबल आकाँक्षा उठी थी उसी से प्रेरित होकर आपने शाकाहार आरम्भ कर दिया। अभी तीन दिन ही हुए थे कि आपका मन तरह-तरह के भोजन पकवानों, मेवा-मिष्ठानों की ओर दौड़ने लगा। शाक ग्रहण करते समय कुछ रूखा लगता है सो आपका ध्यान बार-बार स्वादयुक्त भोजन की ओर दौड़-दौड़ जाता है। आप हार मानने लगते हैं बाजार से चुपचाप कुछ खा आते हैं तो जिह्वा इन्द्रिय जीत जाती है और फिर से उसी पूर्व जीवन के क्रम पर आ जाने को विवश कर देती है। यह पट-परिवर्तन एक क्षणिक विग्रह के कारण हुआ। निश्चयात्मक बुद्धि के अभाव में आप स्वास्थ्य सुधारने के लक्ष्य से गिर गए फलस्वरूप असफलता आपके हाथ लगी। यदि आपने जिस तत्परता से कार्य शुरू किया था उसी उत्साह से शाकाहार पर निर्भर रहते, रूखा भोजन करते रहने के साहस पर अडिग बने रहते तो आपका स्वास्थ्य जरूर अच्छा हो जाता।
मनुष्य का एक सामान्य जीवन क्रम बना होता है। खाना, पीना, सोना, चलना, उठना, बैठना, रोग, शोक, चोट-मोच के क्षण सभी के जीवन में एक से आते हैं। इसका सामान्य ज्ञान भी सभी को होता है किन्तु जीवन की एक दूसरी दिशा होती है, कष्ट और कठिनाइयों की दिशा। इससे जीवन का सही मूल्याँकन होता है। नयी-नयी अनुभूतियाँ प्राप्त होती हैं किन्तु यह तभी सम्भव है जब मनुष्य सामान्य जीवन क्रम को त्याग कर और कष्ट कठिनाइयों के अनुभवपूर्ण पथ पर चलने का साहस करते हैं। कूप मण्डूक के समान एक सी स्थिति पर सन्तुष्ट रहने वाले व्यक्ति क्या तो सफलता प्राप्त कर सकेंगे क्या ही महानता की उच्चतम अनुभूतियाँ प्राप्त कर सकेंगे? भयभीत बने रहने से जीवन का सच्चा या व्यावहारिक ज्ञान पाना कठिन है।
नैपोलियन बोनापार्ट कहा करता था “भय से आत्मसम्मान नष्ट हो जाता है।” यह नीति सम्मत बात है कि साहसी मनुष्य अकेला ही सैंकड़ों को मात दे सकता है। जो परिस्थितियों और आलोचनाओं से घबरा कर अपने कर्तव्य से गिरते नहीं अन्त में विजय उन्हीं की होती है कार्य का शुभ आरम्भ करने से पूर्व आप एक बार दृढ़ता पूर्वक विचार कर कीजिए कि आप विफल नहीं होंगे, फिर अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को उसी पर जुटा दीजिए। आप विश्वास कीजिए आपका निश्चय ही अन्त तक साहस देता रहेगा। आत्म शक्ति लेकर निश्चित मार्ग पर चल निकलिए रुकिए नहीं। यह मत देखिये कि आपका साथी पीछे जा रहा है। युद्ध में लड़ने वाले सिपाही मरने वालों की तादाद नहीं गिनते। ऐसा करें तो आगे से गोली लग जाने का खतरा बना रहेगा। अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए चलते ही रहिए, क्षेत्र से बाहर न जाइए तो आप अन्त में अपने निश्चय को अवश्य पा लेंगे।
संसार में कुछ कार्य इतने महान व आवश्यक माने जाते हैं जिनके लिए दूसरी सभी वस्तुओं का उत्सर्ग कर देना पड़ता है। देश की रक्षा के लिए माताएं अपने पुत्रों को, पत्नियाँ अपने पतियों को, बिना परिणाम की बात सोचे लड़ाई के मैदान में भेज देती हैं। वैज्ञानिक अपने देश की शक्ति बढ़ाने के लिए अपने जीवन को खतरे में डालकर महत्वपूर्ण प्रयोग करते रहते हैं। मानवता की प्रति स्थापना के लिए गौतम बुद्ध का त्याग- देवत्व के विकास के लिए महर्षि दधीच का अस्थिदान, ये ऐसे विशिष्ट कार्य है जिन में छोटे-बड़े दूसरे हितों का ध्यान नहीं दिया गया। तभी किसी महान संकल्प की पूर्ति हो पाई है। विश्वहित की कामना से अपने सुखों का त्याग सर्वोपरि साहस का परिचायक है। इससे व्यक्ति की महानता का परिचय मिलता है। मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी का दूसरा नाम निर्भयता है।
उत्साह में कमी का एक महत्वपूर्ण कारण अपनी प्रतिष्ठा के प्रति भ्रान्तिपूर्ण संकल्पना होती है। यह भाव पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों में अधिक पाया जाता है। आत्म प्रतिष्ठा, आदर व सम्मान प्राप्त करने की लालसा मनुष्य को अपने लक्ष्य से गिरा देती है क्योंकि इससे अन्तर्चेतना कई क्षेत्रों में विभक्त हो जाती है। यश की कामना से किए हुए कर्तव्य को औचित्य का भान नहीं रहता, इससे बाद में पश्चाताप और प्रायश्चित ही भोगना पड़ता है। आत्मसम्मान का अर्थ है आप अपने सिद्धान्तों को बलपूर्वक किसी पर थोपना चाहते हैं। इस महत्वाकाँक्षा का जीवन लक्ष्य से संघर्ष हो जाता है, फलतः मूल उद्देश्य अस्त−व्यस्त हो जाता है और दीनता का उदय हो जाता है। वह विचारों की दीनता सारे उत्साह पर पानी फेर देती है इस लिए कर्तव्य करते हुए भी फल की कामना न करने को ही भारतीय संस्कृति में जीवन साफल्य का साधन माना जाता है। इसमें संदेह नहीं है कि सुख व समृद्धि के कारण उत्साह है किन्तु यह ध्यान बना रहें कि आप केवल सम्मान के भाव से प्रभावित नहीं हो रहे है, तभी वास्तविक सफलता तक पहुँच पायेंगे।
साहस में कमी का एक कारण “आत्म निर्भरता का अभाव” भी है। अपने ऊपर विश्वास करना, अपनी शक्तियों पर विश्वास करना एक ऐसा सद्गुण है जिससे विचार योग्यता और साहस उत्पन्न होता है। जो प्रत्येक कार्य में दूसरों का मुँह ताकते हैं वे जीवन में कोई महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सकते किन्तु जो यह मानते हैं कि कोई भी कार्य उनकी शक्ति से परे नहीं उनमें अदम्य उत्साह भर जाता है जिसके सहारे वे बड़े-बड़े कार्य तक हँसी खुशी पूरा कर लेते हैं। कहावत है “ परमात्मा उन्हीं की मदद करता है जो अपनी मदद आप करते हैं”। दूसरों पर निर्भर होना मनुष्य की हीनता का बोधक है। इससे अपना बल घटता है इच्छाओं की पूर्ति में अनेकों विघ्न बाधायें आ उपस्थित होती हैं। सफलता का अच्छा और सीधा पथ यह है कि अपनी शक्तियों पर विश्वास करना सीखें। मनुष्य की प्रतिष्ठा, स्वाधीनता और निर्भयता इसी बात में है।
संसार में हर किसी को एक सी परिस्थितियाँ उपलब्ध नहीं हैं। सभी मिल मालिक बनना चाहें तो फिर मजदूर रहना कौन स्वीकार करेगा? जो जिम्मेदारी मिले उसे ही सम्मानपूर्वक निबाहना मनुष्य का सर्वोत्तम कर्तव्य है। अपनी जिम्मेदारियाँ दूसरों पर टालने से आत्मिक विकास नहीं हो पाता। दिन-दिन बुरी परिस्थितियों की ओर खिंचते हुए चले जाते हैं। ऐसी स्थिति में किसी प्रकार की सफलता की आशा नहीं की जा सकती। हर परिस्थिति में संघर्ष करने वाले व्यक्ति ही सफल और मुक्ति पथगामी हुए हैं। परिस्थितियों से टकराने से ही मनुष्य की अन्तः प्रतिभा जागृत होती है। सोयी हुई शक्तियों का विकास होता है। इस जागृत शक्ति को जिस दिशा में लगा देते हैं, वहीं सफलता के दर्शन होने लगते है। जो निर्भयता पूर्वक अच्छी, बुरी, हर एक स्थिति में अनुकूलता प्राप्त कर सकता है, उन्नति सफलता और आनन्द की उपलब्धि उसी को होती है।
कायर लोग ही मृत्यु से भयभीत हुआ करते हैं। जब एक दिन मृत्यु का आना निश्चित है, तो वह चाहे जिस क्षण आ जाये, उसमें डरना क्या?
-शेक्सपियर
मृत्यु अपार शान्ति के सागर में विश्राम करना है। मृत्यु जीवन का परिपक्व फल है। मृत्यु व्यक्त और अव्यक्त के मिलने का महापर्व है। मृत्यु नवजीवन का आरम्भ है। सभी भाँति मृत्यु मंगलमय है, आनन्ददायी है। मृत्यु और जीवन का आनन्द साथ है। महर्षि वाल्मीकि ने कहा है-
“सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति।
गत्वा सुदीर्घनष्वानं सह मृत्यु निवर्ततें॥
“मृत्यु (जीवन के) साथ ही चलती है। वह साथ ही बैठती है और सुदूरवर्ती पथ पर भी साथ-साथ जाकर ही लौट आती है।”
मृत्यु जीवन का इतना अनन्य आवश्यक अंग होते हुए भी हममें से अधिकाँश लोग उसे भुलाये रहते हैं और जीवन की एक स्वाभाविक घटना से, मृत्यु से हम भयभीत हो उठते हैं। उसकी कल्पना मात्र से हम सिहर उठते हैं। साक्षात मृत्यु आने पर तो रोने लगते हैं, छटपटाते हैं, भयातुर होकर हाथ पैर फेंकने लगते हैं। अधिकाँश लोगों की मृत्यु इसी तरह होती है। मौत को न चाहना, मृत्यु का भय, मृत्यु के अवसर पर कष्टानुभूति, अव्यवस्थिता ये सब हमारे अपने ही प्रयत्नों का फल है। वस्त्र उतारने में जैसे कठिनाई न होनी चाहिए उसी तरह शरीर के जर्जरित रुग्ण चोले को उतार फेंकने में भी कष्ट न होना चाहिए। लेकिन ऐसा क्यों नहीं होता है, इसका उत्तर देते हुए विदेशी विचारक मेरीबेल कहता है “ यह सब इस कारण है कि हमने इससे अपनी जान पहचान बढ़ाने का उद्योग नहीं किया।” मृत्यु को तो हम जीवन व्यापार में खोकर बिल्कुल ही भूल जाते हैं। हमारे मन में कभी मरने की कल्पना भी नहीं होती, जिसका एक न एक दिन हमें स्पर्श करना ही होता है।
सुकरात कहते थे “मृत्यु के बारे में हमेशा प्रसन्न रहो।” मृत्यु प्रसन्न होने आनन्द मनाने का अवसर है, लेकिन हम इसके बारे में कभी सोचते विचारते भी नहीं। अन्य बातों की तरह मौत से मिलने की तैयारी भी हम करें तो मिल्टन के शब्दों में “मृत्यु एक सोने की चाभी है जो अमरता के महल को खोल देती है” सत्य सिद्ध हो। सचमुच जो मरना जानते हैं उनके लिए मौत भयंकर नहीं होती।
वस्तुतः मृत्यु नये जन्म की तैयारी करने का अवसर है। जीवन मृत्यु की तैयारी करने का अवसर है तो हमारा समस्त जीवन क्या है? मृत्यु के पड़ाव तक पहुँचने का मार्ग। लेकिन हम यह भूल जाते हैं और जीवन व्यापार अपने संग्रह के लिए करने लगते हैं। हमारा प्रत्येक कार्य ऐसा होता है मानो हमें इसी धरती पर रहना है। मृत्यु की असली तैयारी बहुत ही कम लोग कर पाते हैं। लेकिन वे ही मौत को भगवान का निमंत्रण मानकर, आनन्द का मंगल का पर्व जानकर प्रसन्न होते हैं।
देशबन्धु दास ने मृत्यु के समय एक कविता लिखी थी जिसके भाव हैं “मेरे ज्ञानाभिमान की गठरी मेरे सिर से उतार ले। मेरी पुस्तकों की गठरी मेरे कन्धों से नीचे उतार ले। इस बोझ को उठाते उठाते मैं अब बहुत जीर्ण शीर्ण हो गया हूँ। मुझमें जान नहीं हैं। मैं बहुत थक चुका मेरे बोझों को उतार लें, प्रभो।”
“ अब वेद की आवश्यकता है न वेदान्त की। अब तो सब कुछ भूल जाने दो प्रभु। अब मुझे आपका वह राज्य दिखाई दे रहा है। प्रभो! मैं तुम्हारे कुँज के द्वार पर खड़ा हूँ। अपने निर्वाणोन्मुख दीपक को प्रज्ज्वलित करने के लिए तेरे द्वार पर आया हूँ, भगवान।”
जो मृत्यु का मर्म जानते हैं वे इसी तरह मृत्यु को देख कर कविता रचने लगते हैं जैसे बसन्त की बहार को, बरसात की रिमझिम को, पक्षियों के कलरव को देख सुनकर। प्रिय के धाम में प्रवेश पाने का अवसर है मृत्यु। पीहर में, माँ की ममतामयी अंक में मोद मनाने आह्लाद प्राप्त करने की मंगल बेला है- मृत्यु। इसीलिए तो सुकरात मरते समय अमृत तत्व का आस्वादन कर रहा था अपने शिष्यों को हँसी खुशी में मौत का अर्थ समझा रहा था। सन्त तुकाराम कीर्तन करते-करते मौत की गोदी में सो गये। गेटे “अधिक प्रकाश! अधिक प्रकाश!!” की चकाचौंध में ही लीन हो गये। लोकमान्य ने “यदा यदाहि धर्मस्य” वाला श्लोक बोलते- बोलते आंखें मूँद लीं। दयानन्द “प्रभु-इच्छा की पूर्ति” का स्मरण करते हुए अनन्त में विलीन हो गये। महात्मा बुद्ध “आत्मन्दीय का अर्थ” बताते हुए चल बसे। बापू “हे राम, हे राम” कर रहे थे। स्वतन्त्रता संग्राम के असंख्यों सेनानी ‘अहले वतन की याद में मस्ती भरे तराने गाते हुए मौत की गोद में कूद पड़े। हंसी खुशी के साथ मौत का आलिंगन करने वाले अमर लोगों की गाथाओं से इतिहास भरा पड़ा है।
मौत से डरने वाले ही जन्म मरण को बन्धन समझते हैं उससे पीछा छुड़ाने के लिए नाना प्रयत्न करते हैं लेकिन जो मृत्यु का रहस्य जानते हैं उनके लिए जीवन मरण एक खेल है। महात्मा बुद्ध ने कहा था “मुझे निर्वाण मोक्ष नहीं चाहिए। मैं तो बार-बार जन्म लेता रहूँ, दीन-दुखी लोगों की सेवा के लिए।” हमारे सन्त ऋषि -महर्षियों के लिए मृत्यु आनन्द का पर्व है। शांति के अपार सागर में छलाँग लगाने की शुभ वेला है। चैतन्य महाप्रभु आनन्द की मस्ती में मतवाले होकर सागर में कूद पड़े थे। स्वामी रामतीर्थ के लिए मृत्यु भागीरथी की धारा में अपनी गोद फैलाये बैठी थी। माँ की सुखकर गोद को देखते ही स्वामी जी मचल उठे और कूद पड़े। उनके लिए दीपावली का पर्व बनकर आयी थी मृत्यु।
मृत्यु के क्षण ही जीवन की परीक्षा का समय होता है। इसी समय पर मालूम पड़ता है कि व्यक्ति ने पिछला जीवन कैसा बिताया। जो मरते समय रोयेगा, हाथ पैर फेंकेगा, छटपटायेगा तो समझा जायगा कि इस मनुष्य ने सारा जीवन रोते कलपते, इधर-उधर मृग मरीचिका की तरह भाग-दौड़ करते बिताया है। जो मृत्यु के समय हंसेगा जिसके चेहरे पर शान्ति प्रसन्नता आनन्द की रेखायें फूट पड़ेंगी उसका जीवन सफल माना जायगा। महापुरुषों की मृत्यु भी अलौकिक होती है उन क्षणों में एक अपूर्व पर्व जैसा वातावरण बन जाता है। धरती पर दो आत्मीय व्यक्तियों के मिलने का अवसर कितना सुखद बन जाता है। लेकिन मृत्यु के अवसर पर तो आत्मा परमात्मा के दरवाजे पर पैर रखती है। प्रेमी अपने प्रियतम से मिलता है। भक्त अपने भगवान से। पुत्र अपनी माता से। इसलिए मृत्यु के समय भी आनन्द का, उल्लास का वातावरण होना ही चाहिए। मृत्यु एक पर्व है, जन्म जैसा ही।
मृत्यु के अवसर पर मनुष्य की स्मृति बहुत साफ हो जाती है। समय और पक्ष-विपक्ष की धूल हट जाती है। उस समय जीवन भर के कर्म-घटनायें, सिनेमा की दृश्यावली की तरह एक-एक करके स्मृति पटल पर आने लगती है। जिसने जीवन का सही -सही उपयोग किया होता है। जिन्होंने व्यर्थ ही अपने जीवन वन को लुटा दिया, दुरुपयोग किया उन्हें घोर पश्चाताप, असन्तोष की आग में जलना पड़ता है और देखा जाता है कि इस तरह के लोग मरते समय बड़ी मानसिक यन्त्रणा, कष्ट सा अनुभव करते हैं। मरने में बड़ा लम्बा समय लेते हैं। इसी तरह जो लोग पहले से ही अपने आपको मृत्यु के लिए तैयार न करके वस्तु पदार्थों के गोरखधन्धे, संग्रह आदि में ही लगे रहते हैं उन्हें अपना सब कुछ जुटाया हुआ सामान जब छोड़ना पड़ता है, खाली हाथ जाना पड़ता है तो बड़ा मानसिक कष्ट होने लगता है। संसार और यहाँ के वस्तु पदार्थों में उनकी आसक्ति उन्हें बड़ा कष्ट देती है।
जीवन एक कहानी है मृत्यु उसका परिणाम। जीवन एक प्रश्न है तो मृत्यु उसका उत्तर। जीवन एक यात्रा है तो मृत्यु साँझ। दोनों का अनन्य साथ है। लेकिन गौरवपूर्ण मृत्यु प्राप्त करना जीवन की सफलता का प्रमाण है और यह जीवन भर तैयारी करने पर ही निर्भर करती है। हमारा जीवन मृत्यु की तैयारी कर अवसर है। आवश्यकता इस बात की है कि मृत्यु को याद रखते हुए हम अपने कार्यक्रम निर्धारित करें। योजनायें बनायें। यह भी निर्विवाद सत्य है कि मृत्यु का गौरवपूर्ण सुखद शान्तिमय स्पर्श तभी प्राप्त होता है जब हम स्वः को भूलकर परमार्थ के लिए जीवन लगा देते हैं किसी महान सत्य की साधना में, जन सेवा में, परमार्थ में, जीवन लगा देने पर ही मौत के आनंददायी क्षण प्राप्त होते है मनुष्य को।
परमात्मा ने अनेक विभूतियों से सुसज्जित कर मनुष्य को इस धरती में भेजा है। जिन मंगलकारी उपहारों को लेकर वह इस वसुन्धरा में अवतीर्ण होता है वे इतने हैं कि एक-एक की खोज और गणना करने बैठें तो अतुल श्रम व समय लगाना पड़े। भावनाओं को व्यक्त करने के लिए जैसी बुद्धि व वाणी उसे मिली है, संसार के किसी अन्य जीव जन्तु को उपलब्ध नहीं। संसार की सारी मशीनें एक ही शरीर के सम्मुख हतप्रभ हैं। खाने, पीने, चलने, फिरने की स्वचालित मशीन और कोई भी नहीं जैसी मनुष्य को प्राप्त है। पारस्परिक प्रेम और स्नेह, त्याग और आत्मोत्सर्ग, सौजन्य और सौहार्द, संगठन और सहानुभूति के बल पर वह चाहें तो इसी धरती पर स्वर्ग उतार कर रख दें। इनसे भी बढ़कर श्रेष्ठ व अनुपम वस्तु उसे मिली है। वह है आत्मिक बल की अनुपम सम्पदा। इसे प्राप्त कर मनुष्य सचमुच देवता बन जाता है।
किन्तु कार्य जगत में जब हम इन उपहारों में से एक को भी अधिकतर जीवनों में फलित होते नहीं देखते तो बड़ा आश्चर्य होता है। इन महत्वपूर्ण अनुदानों का स्वामी होकर भी उसकी दीनता, हीनता देखकर बड़ी निराशा होती है। लगता है उसने इनका दुरुपयोग कर लिया। बजाय सुखी व समुन्नत जीवन बिताने के बेचारा क्लेश और क्लान्त परिस्थितियों में पड़ा किसी प्रकार जीवन के दिन पूरे करता रहता है। इसका एक प्रबल कारण है भय। भय से बढ़कर अनिष्टकारी दूसरा कोई मनोविकार नहीं। यह ऐसा महान घातक शत्रु है, जो व्यक्ति की विकास विजय को पराजय में, आशा को निराशा में, उन्नति को अवनति में क्षण भर में बदल कर रख देता है।
भय के दो रूप हैं एक क्रियात्मक दूसरा भावनात्मक। पहला कर्ता और परिस्थिति के स्थूल संयोग या संघर्ष की आशंका से होता है। रात के अँधकार में डर जाना। चोर बदमाश आदि किसी आततायी के आक्रमण आदि की आशंका को इस कोटि में माना जाता है। इससे शारीरिक, आर्थिक व व्यावसायिक क्षति सम्भव है। किन्तु दूसरी प्रकार का भय जो मनुष्य को देर तक उत्पीड़ित करता, बुलाता रहता है, वह है मन का भय। इनके पीछे भी आधार क्रियात्मक हो सकते हैं किन्तु ऐसे भय अधिकाँश निराधार ही होते हैं। पहले से उतना नुकसान नहीं होता, क्योंकि वे घटना के अनन्तर ही समाप्त हो जाते हैं। किन्तु निरन्तर शारीरिक व मानसिक शक्तियों का शोषण करने वाला तो यह मन का भय ही होता है।
भयभीत होने का अर्थ है- आत्म बल की कमी, आत्म विश्वास की न्यूनता। आने वाली कठिनाई या दुर्घटना से आतंकित होने का एक ही अर्थ होता है कि उससे लड़ने, जूझने और संघर्ष करने का साहस नहीं है। यह मनुष्य का एक बड़ा दुर्गुण है कि वह बिना जाने पहचाने केवल कागजी कंस से- कपोल कल्पित मान्यताओं से-भयभीत रहे। भय की परिस्थिति के मूल तक पहुँच कर देखें तो वास्तविकता कुछ भी न निकलेगी। मानसिक दुर्बलताओं के अतिरिक्त भय का और कोई कारण नहीं। यदि कुछ हो तो उसे अपने सुदृढ़ मनोबल के द्वारा, विवेक और बुद्धि के माध्यम से सुलझाया जाना सम्भव है।
एक आदमी अँधेरे में पाँव धरता है तो आगे भूत खड़ा दिखाई देता है। बेचारा डर जाता है। होंठ सूख जाते हैं। छाती धौंकने लगती है, धैर्य छूटा कि भूत सवार हुआ। फिर जैसी कल्पना करते जाते हैं भूत वैसी ही क्रियायें करने लगता है। पर एक दूसरा व्यक्ति थोड़ी हिम्मत बाँधता है सारा साहस बटोर कर आगे बढ़ता है, सोचता है देखें यह भूत भी क्या बला है। आगे बढ़ता है तो हवा के कारण हिलती डुलती झाड़ी के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता है। तब उसे पता चल जाता है भूत और कुछ नहीं अपना ही मानस पुत्र है, अपनी ही कल्पना की तस्वीर है। डर जाने के अस्सी फीसदी कारण ऐसे ही होते हैं। कई बार ऐसे समय आ सकते हैं जब कोई हिंसक जीवन या आततायी पुरुष द्वारा ऐसी घटना उपस्थित हो। पर यदि वहाँ भी मनुष्य साहस और शौर्य से काम ले तो इन्हें भी पार कर सकता है। कहावत है “हिम्मताँ मरदे तो मददे खुदा।” अनेकों ऐसी घटनायें घटित हुई हैं जब छोटे छोटे बालकों ने खूंखार हिंसक जानवरों का मुकाबला करके उनसे अपनी आत्म रक्षा की है। भयभीत होने का तो एक ही अर्थ है, अपने प्रतिद्वन्द्वी के आक्रमण के सामने सिर झुका देना। डर जाना जान बूझकर अपने आपको आपत्तियों के जाल में फँसा देना।
छोटे-छोटे जीव-जन्तु, पशु पक्षी घोर जंगलों में भी निर्भय विचरण करते रहते हैं। अनेकों भयदायक परिस्थितियाँ होते हुए भी उन्हें इस तरह निर्भीक घूमते देखते हैं तो मनुष्य की क्षमता पर, शारीरिक व मानसिक शक्ति पर सन्देह होने लगता है।
भय मनुष्य की योग्यता कुण्ठित कर देने का प्रमुख कारण है। मानवीय योग्यताओं को देखते हुये यह आशा की जाती है कि लोग दिन प्रतिदिन उन्नति की ओर, विकास की ओर बढ़ते चले जायें। आज जिस स्थिति में हैं कल उससे बेहतर स्थिति में हो। आज की अपेक्षा कल कुछ अधिक धनवान् बलवान् गुणी एवं शिक्षित हों। किन्तु इस तरह भयभीत रहकर अपनी विकास गति को शिथिल एवं लुँज-पुँज कर डालने की बात उपहासास्पद सी लगती है। यह सब इसलिए होता है कि हम आने वाली घटनाओं तथा परिस्थितियों को बहुत बढ़ा चढ़ाकर देखते हैं और अपनी शक्तियों को उनसे कमजोर मानते हैं। इससे पराक्रम तथा कर्तव्य निष्ठा का ह्रास होता है। जिस कर्म के किए जाने की यथार्थ आवश्यकता थी वह नहीं हो पाता। कई बार तो उसके स्थान पर अनुचित कार्य तक होते देखे जाते हैं। डरपोक मन, कायरता और सशंकित रहने की विनाशक वृत्तियों के रहते कोई महत्वपूर्ण कार्य पूरा कर पाने में समर्थ नहीं हो सकता। सफलता प्राप्त करना हो तो भय रहित होकर उस कार्य में जुटना पड़ेगा अन्यथा मानसिक चेष्टाओं में वह एकाग्रता, लगन एवं तत्परता न बन पड़ेगी जिनकी कार्यपूर्ति के लिए आवश्यकता अनुभव की गई थी। छिन्न-भिन्न एवं दुर्बल मनोबल से कोई कार्य पूरे नहीं होते। इसलिए पहले साहस का अनुसरण करना होता है।
इस स्थिति पर जितनी जल्दी नियंत्रण किया जा सके करना चाहिए। लगातार भय की स्थिति से आत्महीनता और दीनता के भावों का उदय होता है। मनुष्य दिन-दिन मानसिक दुर्बलता से ग्रसित होता चला जाता है। इससे बचने का एक ही उपाय है कि जब कभी ऐसा अवसर, ऐसी परिस्थिति आये जो भयोत्पादक हो उसे ललकार कर संघर्ष किया जाये। भय केवल एक हीन कल्पना मात्र है। इसलिए आत्म बल संवर्धित करने वाले कार्यक्रमों को अपने जीवन में धारण करने से इससे सहज ही बचा जा सकता है।
आत्म सुधार के क्षेत्र की सबसे बड़ी बाधा भी यही है। अविचारी लोगों द्वारा उपहास करने की क्षुद्रता से डरकर लोग संकोच में पड़ जाते हैं। आत्म शोधन एवं आत्म विकास के इच्छुकों को बहुधा लोक निन्दा एवं जग- हँसाई के भय से अपना रास्ता छोड़ने को मजबूर होना पड़ता है। उन बेचारों ने कभी किसी की ऐसा साहस करते देखा सुना नहीं होता। पुराने ढर्रे पर ही सबको चलते देखा होता है इसलिये उन्हें हर नवीनता, चाहे वह कितनी ही हितकर अथवा श्रेयस्कर ही क्यों न हो अटपटी ही लगती है। स्थिति उस समय और भी कठिन हो जाती है जब आस -पास आसुरी प्रवृत्ति के लोगों का बाहुल्य हो। ऐसे व्यक्तियों के द्वारा उपहास किये जाने से निरुत्साहित होकर प्रायः आत्म सुधार के इच्छुक अपना सही रास्ता छोड़ देते हैं। प्रगति पथ पर बढ़ते हुए कदम बिना मंजिल तक पहुँचे बीच में ही रुक जाते हैं। भय सफलता का सबसे बड़ा बाधक है। साहसी और हिम्मतवान व्यक्ति हजार कठिनाइयों में भी विचलित नहीं होते। जीवन के किसी भी क्षेत्र में व्यवस्था एवं क्रम बनाये रखने के लिए सुदृढ़ मनोबल एवं साहसी होने की अत्यन्त आवश्यकता है। इनके अभाव में पग-पग पर भय उत्पादक परिस्थितियाँ रास्ता रोकती और पीछे लौटने को मजबूर कर देती हैं। विकास की गाड़ी रुके नहीं -सफलता की मंजिल तक पहुँचने में संदेह न रहे इसके लिए भयभीरुता छोड़नी पड़ेगी। परिस्थितियों से संघर्ष करने की हिम्मत करनी पड़ेगी। तभी किसी महत्वपूर्ण निष्कर्ष तक पहुँचना सम्भव हो सकेगा।
ज्ञान की वृद्धि के लिए, ज्ञानोपासना के लिए पुस्तकों का अध्ययन एक महत्वपूर्ण आधार है। मानव जाति द्वारा संचित समस्त ज्ञान पुस्तकों में संचित है। खासकर जब से लिखने और छापने का प्रचार हुआ तब से तो मानव द्वारा उपलब्ध ज्ञान लिपिबद्ध करके संचित किया जाने लगा। इसलिए उत्तम पुस्तकों का अध्ययन करना ज्ञान प्राप्ति के लिए बहुत ही आवश्यक होता है। अच्छी पुस्तकें एक विकसित मस्तिष्क का ‘ग्राफ’ होती हैं। मिल्टन ने कहा है ‘अच्छी पुस्तक एक महान आत्मा का जीवन रक्त है।” क्योंकि उसमें उसके जीवन का विचारसार सन्निहित होता है। व्यक्ति मर जाते हैं लेकिन ग्रन्थों में उनकी आत्मा का निवास होता है। ग्रन्थ सजीव होते हैं। इसीलिए लिटन ने कहा है “ग्रन्थों में आत्मा होती है। सद्ग्रन्थों का कभी नाश नहीं होता।”
विकासशील जीवन के लिए पुस्तकों का साथ होना आवश्यक है, अनिवार्य है, क्योंकि पुस्तकों में उसे जीवन का मार्ग दर्शक प्रकाश स्रोत मिलता है। वस्तुतः संसार के सभी भीषण सागर में डूबते उतराते मनुष्य के लिए पुस्तकें उस प्रकाश स्तम्भ की तरह सहायक होती हैं जैसे समुद्र में चलने वाले जहाजों को मार्ग दिखाने वाले प्रकाशगृह।
सिसरो ने कहा है “ग्रन्थ रहित कमरा आत्मा रहित देह के समान है।” तात्पर्य यह है कि उत्तम पुस्तकें नहीं होने से मनुष्य ज्ञान से वंचित रह जाता है और ज्ञान रहित जीवन मुर्दे के समान व्यर्थ होता है। जो व्यक्ति दिन-रात अच्छी पुस्तकों का संपर्क प्राप्त करते हैं उनमें मानवीय चेतना ज्ञानप्रकाश से दीप्त होकर जगमगा उठती है। ज्ञान का अभाव भी एक तरह की मृत्यु है।
उत्तम पुस्तकों में उत्तम विचार होते हैं। उत्तम विचार उदात्त भावनायें भव्य कल्पनायें जहाँ हैं वहीं स्वर्ग है। लोकमान्य तिलक ने कहा है- मैं नरक में भी उत्तम पुस्तकों का स्वागत करूंगा क्योंकि इनमें वह शक्ति है कि जहाँ ये रहेंगी वहाँ अपने आप ही स्वर्ग बन जायेगा।” स्वर्ग का दृश्य अस्तित्व कहीं नहीं है। मनुष्य की उत्कृष्ट मनोस्थिति जो उत्तम विचारों का फल है वह स्वर्ग है। उत्तम पुस्तकों का सान्निध्य मनुष्य की बुद्धि को जहाँ भी मिलता है वहीं उसे स्वर्गीय अनुभूति होने लगती है।
सच्चे, निस्वार्थी आत्मीय मित्र मिलना कठिन है। हममें से बहुतों को इस सम्बन्ध में निराश ही होना पड़ता है। लेकिन अच्छी पुस्तकें सहज ही हमारी सच्ची मित्र बन जाती हैं। वे हमें सही रास्ता दिखाती हैं। जीवन पथ पर आगे बढ़ने में हमारा साथ देती है। महात्मा गाँधी ने कहा है “अच्छी पुस्तकें पास होने पर हमें भले मित्रों की कमी नहीं खटकती। वरन् मैं जितना पुस्तकों का अध्ययन करता हूँ उतनी ही वे मुझे उपयोगी मित्र मालूम होती हैं।
मानव जीवन संसार का ज्ञान असंख्यों अनेकताओं से भरा पड़ा है। मनुष्य का अपना मानस ही इतने अधिक विचारों से भरा रहता है कि क्षण-क्षण नई लहरें उत्पन्न होती रहती हैं। इन अनेकताओं का परिणाम होता है मनुष्य के अन्तर-बाह्य जीवन में अनेकों संघर्ष विचार संग्राम में पुस्तकें ही मनुष्य के लिए प्रभावशाली शस्त्र सिद्ध होती हैं। एक व्यक्ति का ज्ञान सीमित एकाँगी हो सकता है लेकिन उत्तम पुस्तकों के स्वाध्याय से मनुष्य अपने आपका सही-सही समाधान ढूंढ़ सकता है। खासकर विचारों के संघर्ष में अनेकों पुस्तकें ही सहायक सिद्ध होती हैं।
पुस्तकें मन को एकाग्र और संयमित करने का सबसे सरल साधन हैं अध्ययन करते करते मनुष्य जीवन में समाधि अवस्था को प्राप्त कर सकता है। एक बार लोकमान्य तिलक का आपरेशन होना था। इसके लिए उन्हें क्लोरोफार्म सुँघाकर बेहोश करना था। लेकिन इसके लिए उन्होंने डॉक्टर को मना कर दिया और कहा “मुझे एक गीता की पुस्तक ला दो मैं उसे पढ़ता रहूँगा और आप आपरेशन कर लेना।” पुस्तक लाई गई। लोकमान्य उसके अध्ययन में ऐसे लीन हुए कि डाक्टरों ने आपरेशन किया तो वे तनिक भी हिले भी नहीं न कोई दुख ही महसूस हुआ। पुस्तकों के अध्ययन में ऐसी तल्लीनता प्राप्त हो जाती है जो लम्बी योग साधनाओं से भी प्राप्त नहीं होती है।
पुस्तकों के अध्ययन के समय मनुष्य की गति एक सूक्ष्म विचारलोक में होने लगती है। दृश्य जगत, शरीर यहाँ के कर्म- व्यापार हो- हुल्लाड़ भी मनुष्य उस समय भूल जाता है। सूक्ष्म विचार लोक में भ्रमण करने का यह अनिर्वचनीय आनन्द योगियों की समाधि अवस्था के आनन्द जैसा ही होता है। इस स्थिति में मनुष्य दृश्य जगत से उठकर अदृश्य संसार में, सूक्ष्म लोक में विचरण करने लगता है और वहाँ कई दिव्य चेतन विचारों का मानसिक स्पर्श प्राप्त करता है। यह ठीक उसी तरह है जैसे योगी दिव्य चेतना का सान्निध्य प्राप्त करता है ध्यानावस्था में। पुस्तकों का अध्ययन ऐसी साधना है, जिससे मनुष्य अपने अन्तर्बाह्य जीवन का पर्याप्त विकास कर सकता है।
मनोविकारों से परेशान, दुःखी चिन्तित मनुष्य के लिए उनके दुख दर्द के समय उत्तम पुस्तकें अमृत हैं जिनका सान्निध्य प्राप्त कर वह अपना उस समय दुख-दर्द, क्लेश सब कुछ भूल जाता है। अच्छी पुस्तकें मनुष्य को धैर्य, शान्ति, साँत्वना प्रदान करती हैं। किसी ने कहा है “सरस पुस्तकों से रोग पीड़ित व्यक्ति को बड़ी शान्ति मिलती है” जैसे स्नेहमयी जननी की मीठी-मीठी थपकियाँ बच्चों को मीठी नींद में सुला देती हैं वैसे ही मन या शरीर की पीड़ा को शान्त करने के लिये उत्तम पुस्तकों का अवलम्बन लेना सुखकर होता है।
उत्तम पुस्तकें, आदर्श ग्रन्थ बहुत बड़ी सम्पत्ति हैं। अपनी सम्पत्ति के लिए उत्तराधिकार में छोड़ने के लिए सर्वोपरि मूल्यवान वस्तु है संसार में। जो अभिभावक अपनी सन्तान के लिए धन, वस्त्र, सुख, आमोद-प्रमोद के साधन न छोड़कर उत्तम पुस्तकों का संग्रह छोड़ जाते हैं वे बहुत बड़ी सम्पत्ति छोड़ते हैं। क्योंकि उत्तम ग्रन्थों का अध्ययन करके मनुष्य, ऋषि देवता महात्मा महापुरुष बन सकता है। जिन परिवारों में ज्ञानार्जन क्रम पीढ़ियों से चलता रहता है। उनमें से पण्डित, ज्ञानी, विद्वान अवश्य निकलकर आते हैं। जहाँ पुस्तकें होती है वहाँ मानो देवता निवास करते है। वह स्थान मन्दिर है जहाँ पुस्तकों के रूप में मूक किन्तु ज्ञान की चेतनायुक्त देवता निवास करते है। वे माता-पिता धन्य हैं जो अपनी सन्तान के लिए उत्तम पुस्तकों का एक संग्रह छोड़ जाते हैं क्योंकि धन, सम्पत्ति, साधन सामग्री तो एक दिन नष्ट होकर मनुष्य को अपने भार से डुबो भी सकती है किन्तु उत्तम पुस्तकों के सहारे मनुष्य भवसागर की भयंकर लहरों में भी सरलता से तैरकर उसे पार कर सकता है।
जीवन में अन्य सामग्री की तरह हमें उत्तम पुस्तकों का संग्रह करना चाहिये। जीवन के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालने वाले, विविध विषयों के उत्तम ग्रन्थ खरीदने के लिए खर्च के बजट में सुविधानुसार आवश्यक राशि रखनी चाहिए। कपड़े, भोजन, मकान, की तरह ही हमें पुस्तकों के लिए भी आवश्यक खर्चे की तरह ध्यान रखना चाहिए। स्मरण रखिए उत्तम पुस्तकों के लिए खर्च किया जाने वाला पैसा उसी प्रकार व्यर्थ नहीं जाता जिस तरह अँधेरे बियावान जंगल में प्रकाश के लिए खर्च किए जाने वाला धन।
एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए वह यह है कि पुस्तकें कमरे को सजाने के लिए अथवा प्रदर्शिनी लगाने के लिए न खरीदी जायें वरन् उनका नियमित अध्ययन जीवन के अन्य कार्यक्रमों की तरह ही आवश्यक अंग बना लेना चाहिए। उनसे अधिकाधिक लोगों को ज्ञान मिले, इसके लिए अध्ययन की प्रेरणा सुविधा जुटाते रहना चाहिए। पुस्तकों की उपयोगिता अध्ययन से ही है अन्यथा वे कीड़ों का भोजन बनने के सिवा कुछ नहीं रहती। नई पुस्तकों खरीदना, उनका अध्ययन करना, उनको अधिकाधिक उपयोग में लाना ही पुस्तकों की सच्ची कद्र करना है।
स्मरण रखिए पुस्तकें जागृत देवता हैं। उनके अध्ययन, मनन, चिन्तन के द्वारा पूजा करने पर तत्काल ही वरदान पाया जा सकता है। हमें नियमित रूप से सद्ग्रन्थों का अवलोकन करना चाहिए। उत्तम पुस्तकों का स्वाध्याय जीवन का आवश्यक कर्तव्य बना लेना चाहिए।
मानव जीवन की समृद्धि विकास कल्याण उसके व्यष्टि से समष्टि की ओर, आत्मा से परमात्मा की ओर, द्वैत से अद्वैत की ओर विस्तीर्ण होने में ही सन्निहित है। “यो वे भूमा तत्सुखम्” भूमा में अनन्त में विस्तार पाना ही सुख है और यह विस्तार जब इतना व्यापक हो जाता है कि मनुष्य के सभी द्वैत-द्वन्द्व समाप्त हो जाते हैं तब वह स्वयं भी अद्वैत बन जाता है। ऐसी स्थिति में सब उसके और वह सबका बन जाता है। व्यक्तिवाद, स्वार्थपरता अपना-परायापन का मतलब है संकीर्णता, सीमितता और इसका परिणाम है असुरक्षा, अशाँति, दुःख। समत्व, ऐक्य, अद्वैत का अर्थ है इसी भाँति सुख शाँति और समृद्धि। इसीलिए जीवन दर्शन के आचार्य ऋषि ने मनुष्य को समष्टिगत जीवन बिताने का निर्देश दिया है।
अद्वैत की, एकता की ऐसी महान भावना ही हमारे जीवन की मूल आधार शिला है। भारतीय धर्म, दर्शन, समाज व्यवस्था, संस्कृति की मूल प्रेरणा यही अद्वैत की भूमा में विस्तृत होने की विशाल भावना रही है।
धरती पर जीवन की बनावट ही कुछ ऐसी है कि वह अपने आप में सिमट कर नहीं रह सकता। सम्पूर्ण समाज सृष्टि से वह प्रभावित होता है, और उससे सम्पूर्ण समाज। जिस तरह श्वास प्रश्वास का सम्बन्ध विश्वव्यापी वायु तत्व से जुड़ा हुआ है उसी तरह से मनुष्य का जीवन समष्टि के साथ जुड़ा हुआ है। और वह स्वयं भी प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपने आस-पास की दुनिया को प्रभावित करता है। इस तरह व्यक्ति का विकास समष्टि के जीवन के साथ जुड़ा हुआ है। वह जितना इस कड़ी को मजबूत करेगा उतना ही वह अपने और समाज के जीवन को समृद्ध, विकसित करेगा। मनुष्य जितना अपने जीवन को समष्टि के साथ व्यापक बनाता जाता है वह उतनी ही उच्च कक्षा में प्रवेश करता है। महानता की सीढ़ी पर पैर रखता है।
आस पास का क्षेत्र का-जिसे समाज कहा जाता है- हमारे व्यक्तित्व के विकास में बहुत बड़ा हाथ होता है। इसलिए प्रतिदान स्वरूप मनुष्य का भी कर्तव्य हो जाता है कि वह उस संस्थान को अधिकाधिक समर्थ और समृद्ध बनावें ताकि वह व्यक्ति के निर्माण एवं विकास में अपना पूरा-पूरा हक निभा सके।
अपने स्वार्थ, अपनी ही मान्यताओं, अपने ही लाभ में आसक्त रहने वाला मनुष्य समाज को तो कमजोर करता ही है साथ ही अपनी प्रगति में भी बाधक बनता है। वह स्वयं अपनी ही परिधि में गिरफ्तार रह कर समाज के साधनों से लाभ नहीं उठा पाता इसलिए पिछड़ जाता है, अविकसित रह जाता है। इसीलिए व्यक्तिवादी स्वार्थमयी भावना का विरोध करते हुए ऋषि ने कहा था :-
मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः
सत्यं ब्रवीमि वधदूतसतस्य।
न अर्यमणं पुष्यति नो सखायं
केवलाघो भवति केवलादी॥
“संकीर्ण मनोवृत्ति वाले के पास धन राशि व्यर्थ है। अपने ही घर में उसने यह अन्न इकट्ठा नहीं किया है वरन् अपनी मृत्यु को ही एकत्र किया है। जो अपने भाई बहन को नहीं देता, योग्य व्यक्तियों को नहीं देता और अपना ही ध्यान रखता है वह पाप रूप है।”
समाज को अभावग्रस्त देखकर भी हम अपना घर भर रखें, तो यह अपनी मौत को निमन्त्रण देना है क्योंकि दुर्बल समाज हमारी रक्षा नहीं कर सकता। इसके साथ ही एक न एक दिन समाज के कोप का भी भाजन बनना पड़ेगा। ऐसे स्वार्थी लोगों को दूसरों का सहयोग आत्मीयता मिलना तो असम्भव ही है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि अपने समाज के हित में अपना हित समझा जाय, उसकी समृद्धि विकास में ही मनुष्य का विकास निहित है।
समष्टि में विस्तार पाने के लिए सर्व प्रथम आवश्यकता है सामूहिकता की भावना की। हमारा दृष्टिकोण जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने पर से प्रेरित न होकर समष्टिगत हो। हम जो भी करें उसका प्रभाव समाज पर क्या पड़ेगा यह विचार करना आवश्यक है। इस तरह के सभी प्रयत्न त्याज्य हैं जिनमें हम अपने लाभ की साधना से समाज के हितों को नुकसान पहुँचाते हों। समाज में जहाँ अन्य लोगों को सरलता से पेट भरने को अन्न न मिले और हम अपने भण्डारों में अन्न संग्रहीत करें, समाज के बहुत बड़े वर्ग को जहाँ रोटी, कपड़ा, आवश्यक शिक्षा, चिकित्सा आदि की व्यवस्था न हो और हम अपने लिए कोठी बंगले, आमोद-प्रमोद के साजो सरंजाम एकत्र करें तो यह ऋषियों की भाषा में पाप होगा। किसी भी स्थिति में हमें उन कार्यों से बचना चाहिए जिससे अपने लाभ के लिए सम्पूर्ण समाज का ही अहित कर रहे हों।
हमारे समाज शिल्पी ऋषियों ने स्थान-स्थान पर हमें आदेश देते हुए कहा है “संगच्छध्वम् सम्बदघ्वम्” तुम्हारी गति और वाणी में एकता हो। “समानी प्रया सहवोऽन्नाभागः”। तुम्हारे खाने पीने के स्थान व भाग एक जैसे हों। “समानो मंत्रः समिति समानी।” तुम्हारी सभा समितियाँ एक समान हों और तुम्हारे विचारों में सामञ्जस्य एकरूपता हो। “समानी व आकूतिः समानो हृदयानियः”। तुम्हारे हृदय के संकल्प भावनायें एक सी हों। सामूहिक जीवन की समृद्धि के लिए समाज के विकास के लिए हम सब में एकता समानता की भावना का होना आवश्यक है। आवश्यकता इस बात की है कि हम सब में बन्धुत्व की भावना का उदय हो। वेद में कहा भी गया है।
“अज्येष्ठासोऽकनिष्ठाराः सं भ्रातरो वावृधु सौभगाय” हम सब प्रभु की संतान एक दूसरे के भाई भाई हैं। हम में न कोई छोटा है न कोई बड़ा। हम सब एक हैं, ऐसी उत्कृष्ट भावना का होना समाज की समृद्धि के लिए आवश्यक है। रुद्र सूक्त का प्रणेता ऋषि तो समाज की सेवा करने वालों को भी नमस्कार करता हुआ कहता है “चर्मकारेभ्यो नमो, स्थकारेभ्यो नमो, कुलालेभ्यो नमो।” अरे चमार तुझे नमस्कार है, बढ़ई तुझे नमस्कार है, कुम्हार तुझे नमस्कार है।” ऋषि किसी को भी अस्पृश्य नहीं मानता वरन् वह समाज की किसी भी रूप में कर्म करके पूजा करने वाले को वन्दनीय समझता है। इतना ही नहीं वह तो पतितों को भी नमस्कार करता है “स्ते ना वाँ पतये नमो।” चोरों और चोरों के नायकों को भी प्रणाम करता है ऋषि। क्यों ? आखिर चोर भी तो समाज के अंग हैं, मनुष्य हैं। और सामाजिक कारणों से ही वह चोर बनता है। ऋषि पागल नहीं थे वे अद्वैत के द्रष्टा थे, उन्होंने इसे अपने जीवन में आत्मसात कर लिया था। इसीलिए तो वाल्मीकि जैसे डाकू में भी उन्होंने तनिक से संपर्क मात्र से उसके ऋषि तत्व को जगा दिया था।
जहाँ सामूहिकता, अद्वैत की भावना नहीं रहती मनुष्य में अपना और परायापन का भाव आ जाता है, वही संघर्ष छीना झपटी द्वेष दुर्भावनाओं को प्रोत्साहन मिलता है। वहाँ अनेकों अवाँछित तत्व पैदा हो जाते हैं। क्रान्ति का उदय भी इसी से होता है। और इन परिस्थितियों में समाज को अशाँति के दौर से गुजरना पड़ता है, फिर वे लोग जो अपने लिए ही संग्रह करके रखते है उनका भी अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है। बहुधा उन्हें समाज के कोप का भाजन बनना पड़ता है।
किसी भी रूप में विषमतायें, ऊंच-नीच, छोटे-बड़े, अपने पराये की भावनायें सामाजिक जीवन के लिए भयंकर विष हैं। और यह भी निश्चित है कि इनके रहते कोई भी समाज सुरक्षा, शाँति, समृद्धि की ओर अग्रसर नहीं हो सकता।
हम अपने और समाज के बीच इन विषमताओं को जितना हटाते जाएंगे, जितना हम समाज के साथ घुलते जाएंगे उतना ही समाज शक्तिशाली समर्थ बनेगा। और वह हमारे विश्वास-समृद्धि में अपना पूरा-पूरा योगदान दे सकेगा। समाज को अपना कुटुम्ब मानकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को जगाना होगा, तब सबके सुख में हमारा सुख होगा, सबके हित में हमारा हित होगा।
समाज शारीरिक संस्था है। जिस प्रकार शरीर में प्रत्येक अवयव का संबंध है, उसी प्रकार समाजगत प्रत्येक व्यक्ति समाज-सूत्र द्वारा एक दूसरे में बंधा हुआ है।
-स्पेन्सर
शरीर के जिस अंग में पक्षाघात हो जाता है वह अंग क्रिया-हीन निश्चेष्ट तथा निष्प्राण-सा हो जाता है। पक्षाघात की जो स्थिति शरीर में होती है, मस्तिष्क में वही अवस्था निराशा में होती है। नैराश्य, मन की सारी स्फूर्ति को कुचल कर उसे निष्क्रिय बना डालता है। निराश व्यक्ति का कभी किसी काम में जी नहीं लगता, किसी प्रकार लगा भी तो वह अधूरा ही रह जाता है। इससे एक पर एक असफलतायें ही बढ़ती जाती हैं। वैसे तो लक्ष्यहीनता, घृणा, उदासीनता, कायरता, अस्थिरता आदि मन की नकारात्मक प्रवृत्तियाँ भी मनुष्य के क्रिया-व्यवसायों में दूषित प्रभाव डालती हैं किंतु निराशा के दुष्परिणाम तो इतने गम्भीर रूप से दिखाई देते हैं कि लोग इसके कारण बात की बात में अपनी जान तक गंवा देते हैं। यह निराशा-मनुष्य की घोर शत्रु है। इससे बचने में ही कल्याण है।
अनुमान है कि अमेरिका में प्रतिवर्ष पन्द्रह सौ से भी अधिक लोग आत्म-हत्या करते हैं। संसार के सभी भूभागों में निश्चित ही यह संख्या बहुत बड़ी होगी। सारे संसार में प्रतिवर्ष 1 लाख से भी अधिक व्यक्ति आत्म-घात कर लेते हैं। प्रतिदिन 500 से भी अधिक व्यक्तियों की आत्म-हत्या आज के सभ्य संसार के लिये एक बड़ा कलंक ही है - अकारण ही इस प्रकार जीवन की बाजी लगाना इस युग की सबसे बड़ी और चिन्तनीय समस्या है।
इन आत्म-हत्याओं के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण से यह सिद्ध हो चुका है कि 90 प्रतिशत आत्म-हत्याओं का कारण लोगों की निराशा है। परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाना, व्यवसाय में घाटा, मुकदमे की हार, मान हानि और प्रेम की असफलता आदि- ये कारण इतने बड़े नहीं कि इनसे विक्षुब्ध होकर लोग अपने जीवन का अंत ही कर डालें। आये दिन ऐसी घटनायें घटा ही करती हैं। प्रत्येक परीक्षा में पचास प्रतिशत से अधिक लोग अनुत्तीर्ण होते ही हैं, भाव की तेजी, मन्दी से व्यवसाय में घाटा आना भी सम्भव है, ऐसे समय निराश व्यक्ति ही अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं और इस प्रकार के दुष्कृत्य कर बैठते हैं।
निराशा मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु, ईश्वर का अभिशाप है। मनुष्य की शारीरिक और मानसिक शक्तियों को - समूल नष्ट करने वाली है यह निराशा। इन अवसरों पर जिन व्यक्तियों में धैर्य और आत्म-विश्वास की कमी हुई उनके पथभ्रष्ट होने में किंचित देर नहीं लगती।
निराशा का मूल कारण है आत्म-विश्वास की कमी। अपने ऊपर जिन्हें प्रत्येक क्षण अविश्वास बना रहता है। वे पूरे मन से अपना काम नहीं कर पाते, हर जगह हर बात में आशंका करते रहने से किसी काम में सफलता नहीं मिल पाती। इस कारण से उत्पन्न उद्विग्नता, विक्षोभ और दुःख के कारण निराशा का जन्म होता है। छोटी-छोटी सफलतायें भी अविश्वास का उन्मूलन करती रहती हैं और उतने ही अंगों में निराशा का अंत होता रहता है। कई बार बौद्धिक क्षमता के अभाव के कारण भी ऐसी परिस्थितियाँ आ जाती हैं। समय और सामर्थ्य से आगे बढ़ कर भी जब हम किसी बहुत बड़े लाभ या सफलता की अभिलाषा करते हैं तब भी निराशा का उदय होता है। सफलता के लिये रुचि, समय और स्थान की अनुकूलता, सामर्थ्य और योग्यतायें भी चाहियें, यदि यह न हुईं और सफलता की चाह ज्यों की त्यों बनी रही तो अंत में निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। इसलिये ऊँची स्थिति प्राप्त करने के लिये पहले छोटे कदम उठाने पड़ते हैं। बी. ए. पास करने के लिये प्रारम्भ में “अ” और “व” भी पढ़ने पड़ते हैं। इस तरह से किये हुये कार्यों में नवीनता और रुचि बनी रहती है। थकावट नहीं आती। अविश्वास, आलस्य आदि दोष छूटने लगते हैं और प्रतिभा का विकास होने लगता है। यदि ऐसा प्रतीत होने लगे कि इन सीमाओं का उल्लंघन कर रहे हैं तो प्रारम्भ से ही धैर्य, साहस और उत्साह का वातावरण बनाते रहने का प्रयत्न करना चाहिये ताकि अंतिम समय में असफल होने पर भी निराशा न आने पाये। यदि ऐसा कर सके तो उस कार्य को दुबारा पूरा करने की आप में पर्याप्त हिम्मत बनी रहेगी।
कदाचित आप निराशा से मुक्ति नहीं पा रहे हैं तो उसे आप अपने मन में ही डाले न रहिये। मन में ही घुलते रहने से स्वास्थ्य नाश होगा, मानसिक शक्तियाँ क्षीण होंगी। आप घबराइये नहीं, अपने मित्र से सलाह कर लीजिये, वयोवृद्ध अनुभवी व्यक्तियों से उचित परामर्श कर लीजिये। आपका दुःख बंट जायेगा, जी हल्का हो जायेगा और आगे के लिये एक नई सूझ उत्पन्न होगी। कैसी भी बात क्यों न हो, उसे गुप्त कभी भी नहीं रखना चाहिये, जहाँ तक हो सके अपने परिजनों मित्रों में व्यक्त कर देने से अपनी सारी कठिनाई तत्काल समाप्त हो जाती है। शेष के लिये कोई उचित हल निकल आता है।
अपने विचारों को कार्य-रूप में परिणत न करने में भी निराशा पैदा होती है। प्रसिद्ध दार्शनिक गोथे ने लिखा है- “क्रिया में परिणत न होने वाले विचार रोग बन जाते हैं।” डॉ. हेनरी के भी ऐसे ही विचार हैं। उन्होंने लिखा है - “मस्तिष्क जब अपने ही व्यूह में द्रुतगति से चक्कर लगाने लगता है और शारीरिक अवयवों को गति नहीं दे पाता तभी निराशा उत्पन्न होती है।” अतएव यह सुनिश्चित है कि अपने विचार अपनी इच्छाओं को पूरी तरह कार्यों में अभिव्यक्त होना चाहिये। यदि ऐसा नहीं हुआ तो अंतःकरण में घोर अशाँति छायी रहेगी। अपनी कठिनाईयों को समस्या का रूप मत दीजिये। परिस्थितियों के अनुसार अच्छे-बुरे सभी तरह के परिणाम भुगतने के लिये अपना दिल और दिमाग मजबूत रखिये। दिन के चौबीस घण्टे काम में लगे रहिये। न मिलेगा समय, न आयेगी निराशा का सिद्धान्त ही सर्वोत्तम है। इसी तरह उन बातों की कामना करना भी छोड़ दीजिये जो परिस्थिति साध्य हैं। जो कुछ मिले उतने से ही संतोष कर लिया कीजिये। इससे आपकी मानसिक प्रसन्नता सदैव स्थिर बनी रहेगी।
संघर्ष के क्षणों में हार मान लेना यह मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। मनुष्य में वह सभी शक्तियाँ सन्निहित हैं जिनके कारण वह असमय में भी मनचाही सफलतायें प्राप्त कर सकता है। पर इसके लिये विश्वास और लगन की आवश्यकता है। ऐसे अनेकों उदाहरण हैं जब अपनी अल्प शक्तियों का उपयोग करके भी मनोवाँछित सफलतायें प्राप्त की गई हैं, इसका एक उदाहरण इस प्रकार है :-
हिंदुओं में अब भी यह विश्वास है कि रामायण और महाभारत पढ़ने से लोगों को मोक्ष मिल जाता है। इस बात का पता जब हावड़ा की 80 वर्षीय अशिक्षित पनुवती देवी को चला तो उन्होंने धैर्य साहस और आत्म-विश्वास के साथ जोतगिरी ग्राम में पढ़ना शुरू कर दिया। यह घटना लगभग 8 वर्ष हुये घटित हुई थी। अब तक इस गाँव में पनुवती के इस साहस के कारण वयस्क शिक्षा की विधिवत परम्परा चल पड़ी है। लगता है अब वहाँ कोई निरक्षर नहीं रहेगा। उद्देश्य कैसा भी हो उसकी पूर्ति के लिये अपनी चेष्टाओं को एकाग्र करके लगन और तत्परता के साथ कार्य करें तो सफलता जरूर मिलती है इसमें किसी तरह का संदेह नहीं हैं।
परेशानी तभी तक रहती है, जब तक मन में शंका तथा भय बना रहता है। साहस के हारते ही निर्णय-शक्ति समाप्त हो जाती है। मनुष्य उस विषय पर ठीक विचार नहीं कर पाता, क्योंकि उसकी तर्क शक्ति मंद पड़ जाती है। मन की इस अराजकता से ही उसकी शक्तियों का पतन होता है और किसी कार्य में सफलता नहीं मिल पाती। मानसिक शक्तियों के दबते ही मनुष्य की प्रतिभा कुन्द हो जाती है और इससे उसकी सारी कार्य-क्षमता समाप्त हो जाती है। उस समय यदि निराशा से बचने का प्रयत्न नहीं करते और आशा, उत्साह की कल्पना नहीं करते तो आप का जीवन बेकार हो जायेगा। इस विनाशकारक वृत्ति को रोकने में ही मनुष्य मात्र का कल्याण है।
हमारी समस्त निराशाओं का मूल कारण हमारी ईश्वर से भिन्नता है। मनुष्य तब तक अपने आप में बिल्कुल असहाय अरक्षित और अकेला है, जब तक कि वह अपने ही अहं भाव तक सीमित रहता है, उसकी निराशा, दुःख और छटपटाहट भी तभी तक रहती है। जो हमेशा परमात्मा को अपने पास समझता में, वह सभी निराशाओं और कष्टों से ऊपर उठ जाता है। जिन कठिनाईयों और संघर्षों से सामान्य जन भयभीत बने रहते हैं, ईश्वरवादी उन्हें अपनी प्रगति अपने विकास का माध्यम मानता है और उसका सहर्ष स्वागत करता है। आशाओं का केन्द्र भगवान ही है। जो उस पर आस्था रखता है, उसके जीवन में आशा का संचार होने लगता है।
सेवा मानव-जीवन को उत्कृष्ट और पूर्ण बनाने की एक महत्वपूर्ण साधना है। जो फल अनेक तरह की तपश्चर्याओं, साधनाओं, कर्मकाण्ड, उपासनाओं से प्राप्त होता है वह मनुष्य को सेवा के द्वारा सहज ही मिल जाता है। स्व. वल्लभ भाई पटेल ने कहा है “गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।” गौतम बुद्ध ने यही कहा है- “जिसे मेरी सेवा करनी है वह पीड़ितों की सेवा करे।” सेवा के महान् व्रती बापू ने कहा था “लाखों गूँगों के हृदय में ईश्वर विराजमान हैं, मैं इन लाखों की सेवा के द्वारा ही ईश्वर की पूजा करता हूँ।” सेवा से मनुष्य का तन, मन, धन सब कुछ पवित्र बन जाता है। सेवा से ज्ञान प्राप्त होता है, विश्वात्मा का सान्निध्य प्राप्त होता है सेवा से। सेवा ही मनुष्य का सर्वोपरि धर्म है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि जीवन का यथार्थ लक्ष्य सेवा ही है। आध्यात्मिक, धार्मिक जीवन बिताने पर भी अन्ततः मनुष्य को सेवा की ही प्रेरणा मिलती है। जो जितना विकसित होगा उसमें सेवा की भावना उतनी ही प्रबल होगी। यही मनुष्य के आत्म विकास की सच्ची निशानी है। बसे संसार को छोड़ने वाले, कठोर तपश्चर्या करने वाले बुद्ध को अंत में पीड़ितों की सेवा करने वाली प्रेरणा वापिस संसार में घसीट लाई। सुकरात, ईसा, मुहम्मद, राम, कृष्ण, गाँधी, दयानंद एवं पूर्वकालीन ऋषि महर्षियों का जीवन मंत्र सेवा ही तो था। जीवन लक्ष्य की मंजिल का मार्ग सेवा की सीढ़ियों पर होकर ही जाता है। सचमुच सेवा का मार्ग ज्ञान, मति तप योग आदि के मार्ग से भी ऊँचा है। क्या सेवा भावी मनुष्य को ब्रह्म सायुज्य का लाभ जीते जी नहीं मिल जाता जब उसकी चेतना असीम विश्वात्मा की अर्चना में लगती है जन-जन की सेवा में लीन होती है ?
धन सम्पत्ति रूप यौवन प्रभुता सब मनुष्य को संतुष्ट करने में अपूर्व ही सिद्ध होते हैं, किंतु एक सेवा ही है जो उसे शाँति संतोष प्रदान करती है। हमारे यहाँ संन्यास को जीवन का सर्वोत्कृष्ट स्वरूप माना है लेकिन सेवा संन्यास से भी बड़ी है। संन्यास तो अपनी मुक्ति का आधार बन कर रहा जाता है किंतु सेवा परमार्थ की बलि वेदी पर स्वयं को होम देना है। सेवा जीवन यज्ञ है। इस में मनुष्य संसार रूपी कुण्ड में जनता जनार्दन के मुँह में सेवा की आहुतियाँ देता है।
हमें सेवा को जीवन के एक आवश्यक व्रत के रूप में ग्रहण करना चाहिए। सेवा की साधना कोई भी किसी भी परिस्थिति में कर सकता है। सेवा के लिए पैसे की आवश्यकता नहीं है। उत्कृष्ट भावना, अपनी संकुचितता छोड़ कर जन जीवन के साथ एक रूप होना ही सेवा के लिए पर्याप्त है।
जो लोग यह सोचते हैं क्या करें हमारे पास धन नहीं हम में कोई योग्यता नहीं कैसे सेवा करें? ऐसे लोग समझने में भूल करते हैं। पैसे से किसी की सेवा नहीं होती वह तो साधन है जो सेवा वृत्ति के विकास के साथ स्वयमेव ही चला आता है। बहुत से लोगों की शिकायत होती है, क्या करें अपने काम से ही फुर्सत नहीं मिलती। काम की चक्की में दिन रात इतने उलझे रहते हैं कि अवकाश ही नहीं मिलता। किंतु सेवा व्रत लेने वाले कभी किसी सत्पुरुष ने अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों तथा उत्तरदायित्व को नहीं छोड़ा। यदि हम में सेवा की इच्छा हो तो अत्यन्त व्यस्त जीवन में से भी समय निकाल सकते है। अस्तु सेवा के सम्बन्ध में आवश्यकता इस बात की है कि हम में इसके लिए उत्कृष्ट अभिलाषा हो, प्रयत्न, भावना हो। सेवा को जीवन साधना का अंग मान कर हम आँशिक रूप में ही चालू कर सकते हैं। अधिक नहीं प्रति दिन एक दो घण्टे ही निकाल लें तो बहुत है। और यह किसी के लिए कठिन नहीं है। जब लोग खेल-कूद मनोरंजन सैर-सपाटों के लिए समय निकाल लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि वे प्रति दिन कुछ भी समय सेवा के लिए न निकाल सकें ।
अब बहुत से लोग यह भी कह सकते हैं कि क्या सेवा करें ? सेवा के लिए सारा धरातल पड़ा है। पद पद पर दूसरे लोगों को हमारी सेवा की आवश्यकता पड़ती है। सेवा किसकी की जाय? इसका उत्तर देते हुए बापू ने कहा कि “सेवा उनकी करो जिनको सेवा की जरूरत है।” अंधों की, गरीबों की, असहाय दीन दुःखियों की सेवा करिए। जिनका कोई नहीं है उन्हें सहारा दीजिए, जो गिर पड़े हैं उन्हें उठाइये। समाज में उनकी संख्या अधिक है।
प्रति दिन हमारे दैनिक जीवन में ऐसा अवसर आते हैं जब दूसरों को हमारी सेवा की आवश्यकता होती है। किसी अशिक्षित का पत्र लिखना। कोई कहीं का पता पूछे उसे सही ठिकाने पहुँचा देना। बोझ उठाने में किसी की मदद कर देना, दुर्घटनाग्रस्त हो जाने पर किसी को अस्पताल पहुँचा देना, कहीं झगड़ा हो रहा हो तो उसे सुलझा देना, कोई सार्वजनिक स्थान गंदा पड़ा हो तो उसकी सफाई कर देना-ऐसे सैंकड़ों ही अवसर सेवा के लिए हमारे समक्ष रहते हैं। हम इन अवसरों पर दूसरों की सहायता कर सकते हैं, उन्हें सहयोग दे सकते हैं।
बहुत से लोग सेवा के लिए बड़ी बड़ी आकाँक्षायें रखते हैं, महापुरुषों की नकल करना चाहते हैं। सेवा कार्य यदि महत रूप से नहीं बनता तो वे कुछ भी नहीं करते। बड़े अवसरों की प्रतीक्षा में बैठे रहने के बजाय छोटे-छोटे अवसर जो नित्य ही हमारे जीवन में आते हैं उनका पूरा-पूरा ध्यान रख कर सेवा व्रत निभाना लोक सेवा का प्रारम्भिक पाठ है। बड़े-बड़े अवसर तो फिर स्वतः ही आने लगते हैं जहाँ उनकी सेवाओं की माँग पर माँग होने लगती है। “पहाड़ फिर; पत्थर ही उठायें” की कहावत के अनुसार सेवा की साधना हमें नीचे से, छोटी-छोटी बातों में दूसरों की सहायता करके शुरू करनी चाहिए।
सेवा साधना में मनुष्य को अपने बड़प्पन, पद प्रतिष्ठा की भावना का त्याग करना आवश्यक है। स्मरण रहे सेवक का पद संसार में सबसे नीचा होता है। उसका स्थान जनता जनार्दन के पैरों के नीचे होता है तभी तो वह विराट मानव की सेवा कर सकता है। जनसेवी को पद, प्रतिष्ठा, बड़प्पन के सभी अलंकारों का त्याग करना आवश्यक है। महात्मा गाँधी के पास एक संन्यासी आये। बापू ने पूछा “आप किस लिए आये हैं ? “जनता की सेवा करने के लिए”। बापू ने कहा कि सेवा करनी है तो गेरुए वस्त्रों को उतारो क्योंकि महात्मा समझ कर लोग उल्टी आप की सेवा करने लगेंगे।” सेवा के समय हमें अपनी वैयक्तिक विशेषताओं, अलंकारों का त्याग करना आवश्यक है। अन्यथा सेवा एक तरह का प्रदर्शन, रस्म बन जाती है। जैसे कि आज के लोग या अफसर श्रमदान करते हुए फोटो खिंचाते और छपाते हैं।
लोक सेवक का हृदय जितना संवेदनशील होगा उतना ही वह दूसरे की सेवा के अवसर प्राप्त कर सकेगा। सम्वेदना, परदुःखकातरता ही दूसरों की पीड़ा को समझने की सामर्थ्य प्रदान करती है। पत्थर दिल क्या जानेगा किसी के दुःख दर्द को। हमें हृदय की सहज कोमलता का भी विकास करना चाहिए। दूसरों के दुःख को अपना दुःख समझना, दूसरों की पीड़ा अपनी पीड़ा समझने पर ही उन की सेवा सहायता की प्रेरणा पैदा होती है।
आत्म विकास के लिए, सामाजिक उत्तरदायित्व, मानवीय कर्तव्य के नाते हमें जन सेवा को जीवन का महत्वपूर्ण नियम बना लेना चाहिए। नित्य किसी न किसी रूप में कम से कम एक व्यक्ति की सेवा का व्रत तो हम अत्यन्त व्यस्त हो कर भी निभा ही सकते हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन जब छोटे थे तो उन्हें गप्पे लड़ाने की बड़ी आदत थी। लोग उनकी बातों पर सहसा विश्वास न करते। पर बड़े होने पर वे बदल गये और अपने गुणों के कारण अमेरिका के राष्ट्रपति चुन लिये गये।
राष्ट्रपति होने के बाद वे अपनी ननसार गये और अपनी वृद्धा नानी से कहा - “इस बार मैं अध्यक्ष चुन लिया गया।” नानी ने कहा ‘किसका ?” विल्सन ने कहा - “अमेरिका का”।
इस पर बुढ़िया ने हँसते हुये कहा - तू बूढ़ा होने को आया, पर अभी तक तेरी गप्पे हाँकने की आदत नहीं छूटी?
भारतीय समाज निर्माताओं ने मनुष्य के आन्तरिक बाह्य जीवन को अधिकाधिक परिष्कृत उन्नत, विकसित करने के लिए भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में नाना प्रयोग किए। नाना आदर्शों संस्थाओं की स्थापना की। धर्म, दर्शन, अर्थविज्ञान, वर्ण-व्यवस्था, आश्रम आदि इसी प्रकार के प्रयोग थे। लेकिन जीवन में विभिन्न पहलुओं का एकीकरण करते हुए उन्होंने परिवार संस्था का एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया था, जो व्यावहारिक, सहज सुलभ, सुखकर सिद्ध हुआ। परिवार संस्था ने मनुष्य के जीवन को आदि काल से ऐसा मार्गदर्शन किया है जैसा अन्य किसी भी संस्था ने नहीं किया होगा। इतिहास बदल गये, दुनिया का नक्शा बदल गया, समाज संस्थाओं में बड़े-बड़े परिवर्तन हुए लेकिन भारतीय समाज में परिवार संस्था आज भी ध्रुव बिन्दु की तरह जीवित है। यद्यपि वर्तमान युग में कई आर्थिक, वैज्ञानिक, सामाजिक परिवर्तनों का प्रभाव अब परिवार पर भी पड़ने लगा है लेकिन भारतीय परिवार के मूल में जो विशाल भावना, जीवित प्रेरणा का काम कर रही है वह उसे मिटने नहीं देगी। वर्तमान संक्रमण काल के बाद वह परिस्थितियों में परिवार संस्था पुनर्गठित होकर-मानव के उत्कर्ष में अपना योगदान जारी रखेगी।
वस्तुतः मानवीय जीवन में जो कुछ भी आनन्दमय, रसपूर्ण साथ ही कर्तव्य और धर्म का सारतत्व है वह “हिंदू-परिवार” में सरलता से मिल जाता है। हमारे समाज-शिल्पियों ने ‘परिवार संस्थान’ की नींव में ऐसे अमृततत्वों के बीज वपन कर दिए हैं जिनके कारण काल के अनन्त प्रवाह में भी भारतीय परिवार अपना अस्तित्व सदा-सदा कायम रखेगा।
भारतीय मनीषियों की एक विशेषता रही है, वह यह है कि उनके प्रयोग केवल स्थूल पक्ष अथवा भौतिक तथ्यों तक ही सीमित नहीं रहते थे। वे सूक्ष्म क्षेत्रों में विश्व का संचालन करने वाले सार्वभौमिक तथ्यों की खोज करते थे और फिर उन्हें भौतिक विधानों में व्यवस्थित करते थे। परिवार संस्था के मूल में किसी ऋषि के इसी तरह के सूक्ष्म अन्वेषण का रहस्य छुपा हुआ है।
नारी और पुरुष परिवार संस्था के दो मूल स्तम्भ हैं। दोनों मानो नदी के दो तट हों जिनके मध्य से परिवार की जीवन की धारा बहती है। वैदिक साहित्य में स्त्री-पुरुष की उपमा पृथ्वी और द्युलोक से दी गई है। विवाह संस्कार के अवसर पर भी पुरुष, स्त्री से कहता है “द्योरहं पृथ्वी त्वम।” मैं द्यो हूँ तू पृथ्वी। आकाश और धरती, पुरुष और प्रकृति, के संयोग से ही विश्व परिवार का उदय हुआ, ठीक इसी तरह स्त्री और पुरुष के संयोग से परिवार संस्था का निर्माण होता है। हिंदू परिवार की मूल प्रेरणा बहुत विशाल है जिसमें हिंदू धर्म की वह मूल भावना सुरक्षित रहती है जिसके अनुसार हमारे यहाँ स्थूल और नश्वर का सम्बन्ध विश्वव्यापी चिरन्तन नित्य सूक्ष्म सत्ता के विधान से मिलाया गया है। परिवार संस्था केवल स्थूल व्यवस्था मात्र नहीं है अपितु उसमें भी एक सूक्ष्म किंतु सनातन सत्य की जीवन ज्योति समाई हुई है। विश्व जीवन में द्योः और पृथ्वी से लेकर परिवार में स्त्री-पुरुष के गृहस्थ जीवन की मधुर कल्पना में ऋषि का एक ही दार्शनिक दृष्टिकोण रहा है। जैसे द्युलोक और पृथ्वी एक ही संस्थान के पूरक, तत्व हैं उसी तरह स्त्री और पुरुष भी परिवार संस्था के पूरक अंग हैं।
स्त्री-पुरुष की अभेदता को व्यक्त करते हुए पुरुष, स्त्री से कहता है - “सामोऽहस्मि ऋकत्वम्” मैं यह हूँ तू वह है। तू वह है मैं यह हूँ। मैं साम हूँ तू ऋक् है। किसी वस्तु का व्यास अथवा परिधि परस्पर अभिन्न होते हैं। व्यास न हो तो परिधि का अस्तित्व नहीं, परिधि न हो तो व्यास कहाँ से आये? सृष्टि के मूल भूत हेतु में जिस तरह द्युलोक और पृथ्वी का स्थान है उसी तरह परिवार संस्था में स्त्री पुरुष का कैसी विशाल कल्पना थी हमारे समाज शिल्पी मनीषी की पारिवारिक जीवन के अन्तराल में।
परिवार संस्था में जहाँ स्त्री पुरुष को अभेदता का प्रतिपादन किया गया है। वहाँ पूरे संस्थान को कर्तव्य धर्म की मर्यादाओं में बाँध कर उसे सभी भाँति अनुशासन, सेवा त्याग, सहिष्णुता-प्रिय बनाया जाता है और इन पारिवारिक मर्यादाओं पर ही समाज की सुव्यवस्था, शान्ति, विकास निर्भर करता है। परिवार में माता-पिता, पुत्र, बहन, भाई, पति-पत्नी, नातेदार, रिश्तेदार, परस्पर कर्तव्य धर्म से बंधे हुए होते हैं। कर्तव्य की भावना मनुष्य में एक दूसरे के प्रति सेवा सद्भावना उत्सर्ग की सद्वृत्तियाँ पैदा करती हैं। हिन्दु परिवार में समस्त व्यवहार कर्तव्य की भावना पर टिका हुआ है। सभी सदस्य एक दूसरे के लिए सहर्ष कष्ट सहन करते हैं, त्याग करते हैं। दूसरों के लिए अपने सुख और स्वार्थ का प्रसन्नता के साथ त्याग करते हैं। शास्त्रकारों की भाषा में यही स्वर्गीय जीवन है। इसके विपरीत जहाँ अपने सुख और स्वार्थ के लिए दूसरों के हकों की छीनाझपटी, अपने अधिकार जताकर केवल पाने या लेने ही लेने का व्यवहार सामूहिक जीवन में परस्पर तनाव और संघर्ष को जन्म देता है, वहाँ विरोध, द्वेष, ईर्ष्या पैदा हो जाती है। इसे ही नीतिकारों ने नरक कहा है। यदि धरती पर स्वर्गीय जीवन की प्रत्यक्ष रचना कहीं हुई है तो वह है भारतीय परिवार संस्था। रस, आनन्द, त्याग उत्सर्ग सेवा सहिष्णुता का स्वर्गीय वातावरण यदि कहीं देखना ही हो वह हिन्दू परिवार में सफलता से देखा जा सकता है। रामायण का आदर्श हिन्दू परिवार का ज्वलन्त उदाहरण है। इसमें स्वार्थपरता पदलोलुपता, बुराइयों के ऊपर त्याग, सेवा, सद्गुणों की विजय बताई गई है।
परिवार ने जहाँ व्यक्ति के विकास में भारी योग दिया है वहाँ सामाजिक साँस्कृतिक उत्थान में भी बहुत बड़ा हाथ रहा है। परम्परा को आधार बना कर उससे आगे नियमित विकास और सन्तुलित प्रगति के क्षेत्र में परिवार संस्था सदा-सदा कार्य करती रही है। समाज के लिए जो भी हितकर आवश्यक है उसकी रक्षा परिवार संस्था ने पूरी की है। पर्व, त्यौहार, कला, सौजन्य, उत्साह, उमंग को परिवार संस्था ने ही सदा-सदा- जीवित रखा है।
समाज और संस्कृति के विकास में परम्परा का अपना एक महत्व रहा है। लोग अपनी परम्परा को शानदार बनाये रखने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करते हैं और इस तरह के आदर्श कुलों का जहाँ बाहुल्य होता है वह समाज भी आदर्श और महान बन जाता है। महात्मा विदुर ने युधिष्ठिर को आदर्श कुलों के आधार बताते हुए कहा था “तप, दम, ब्रह्म-ज्ञान, यज्ञ, दान शुद्ध विवाह, सम्यक् विचारों से कुल आदर्श बनते है”। इन बातों में कहीं भी ऐसा नहीं है कि धन अथवा भौतिक ऐश्वर्य सम्पदाओं से कुल की मर्यादा बढ़ती है। धर्म के आचरण से ही परिवार उन्नत होते हैं। प्रत्येक सदस्य परिवार की शान के लिए उसकी समृद्धि विकास के लिए अपने जीवन में बड़े से बड़ा काम करने की इच्छा रखता है और ऐसी उत्साहयुक्त भावना व्यक्ति और समाज दोनों के लिए बहुत ही हितकर सिद्ध होती है। व्यक्ति जहाँ परिवार के भवन में धर्म आदर्श की सीढ़ियों पर ऊँचे से ऊँचा चढ़ता है वहाँ ऐसे व्यक्तियों से समाज भी समुन्नत होता है और अनेक सदस्यों से युक्त परिवार का उत्थान सभी भाँति स्वच्छ फूलता-फलता समृद्ध और विकसित होता रहता है।
परिवार संस्थान तपस्थली है जहाँ व्यक्ति स्वेच्छा से तप -त्याग धर्माचरण का अवलम्बन लेता है। परिवार में मनुष्य का आत्मिक मानसिक विकास सरलता से हो जाता है। परस्पर एक दूसरे के प्रति अपने कर्तव्य निभाने का धर्म मनुष्यों का जीवन निखार देता है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि हिन्दू परिवार व्यक्तिगत जीवन निर्माण के साथ साथ सामाजिक जीवन की समृद्धि के लिए एक महान प्रयोग हुआ है हमारे देश में। अनेक आक्रमणों, आघातों को सहकर भी आज जो हमारी सामाजिक, साँस्कृतिक धरोहर सुरक्षित रही है उसके मूल में परिवार संस्था का बहुत बड़ा योग रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि आज के परिवर्तनों, परिस्थितियों में परिवार संस्था को पुनर्गठित करके समाज की इस जीवनदायिनी धारा को अधिक शक्तिशाली और समृद्ध बनाया जाए।
समर्थ स्वामी रामदास समय के सदुपयोग के बारे में बड़े महत्वपूर्ण शब्द कहा करते थे :-
एक सदैवपणाचे लक्षण।
रिकामा जाऊं ने दो एक क्षण॥
(दासबोध- 11-3-24)
अर्थात् “जो मनुष्य समय का सदुपयोग करता है, एक क्षण भी बरबाद नहीं करता, वह बड़ा सौभाग्यवान होता है।” धन और रुपये पैसे के मामले में यह कहा जाता है कि जिसका खर्च व्यवस्थित और मितव्ययी होता है, वही जीवन पर्यन्त धन का सुख-लाभ प्राप्त करता है, उसके खजाने में किसी प्रकार की कमी नहीं आती। ऐसे ही समय के प्रत्येक क्षण का उपयोग कर लेना भी मनुष्य की बुद्धिमत्ता का प्रतीक है। उन्नति की इच्छा रखने वालों को अपना समय कभी भी व्यर्थ न गँवाना चाहिए। समय के सदुपयोग करने में सदैव सावधान रहना चाहिये। आज जो समय गुजर गया, कल वह फिर आने वाला नहीं।
मार्ग चाहे व्यावहारिक हो अथवा पारमार्थिक, जो समय सम्बन्धी विवेक और सावधानी नहीं रखते, उन्हें इस के दुष्परिणाम जन्म-जन्मान्तरों तक भुगतने पड़ते है। आज अपने पास सभी परिस्थितियाँ हैं, साधन हैं। मनुष्य शरीर मिला है, बुद्धि और विचार की बहुमूल्य विरासत जो हमें मिली है वह यह समझ लेने के लिए है कि आपका समय सीमाओं से प्रतिबन्धित है। सृष्टि के दूसरे जीवों में से कई तो लम्बी आयु वाले भी होते हैं किन्तु मनुष्य की अवस्था अधिक से अधिक सौ वर्ष है। उसमें भी कितना समय अवस्था के अनुरूप व्यर्थ चला जाता है। फिर जो शेष बचता है उसका उपयोग यदि साँसारिक और आत्मिक विकास के लिए नहीं कर पाये तो कौन जाने यह परिस्थितियाँ फिर कभी मिलेंगी या नहीं।
आध्यात्मिक जीवन व्यतीत करने वाले भी जब समय का ठीक-ठीक उपयोग नहीं कर पाते, इस सम्बन्ध में जागरुक और विवेकशील नहीं होते तो बड़ा आश्चर्य होता है। इससे अच्छे तो वे लोग ही हैं जो विचारे किसी प्रकार जीवन निर्वाह के साधन और आजीविका जुटाने में ही लगे रहते है। उन्हें यह पछतावा तो नहीं होता कि जीवन के बहुमूल्य क्षणों का पूर्ण उपयोग नहीं कर सके। आजीविका भी अध्यात्म का एक अंग है अतएव सम्पूर्ण न सही, कुछ वर्षों में तो उन्होंने मानव जीवन का सदुपयोग किया। हाथ पर हाथ रखकर आलस्य में समय गँवाने वाले सामाजिक जीवन में गड़बड़ी ही फैलाते है भले ही वे कितने ही बुद्धिमान, भजनोपदेशक, कथावाचक, पण्डित या सन्त संन्यासी ही क्यों न हों। समय का सदुपयोग करने वाला घसियारा, बेकार बैठे रहने वाले पण्डित से बढ़ कर है क्योंकि वह समाज को किसी न किसी रूप में समुन्नत बनाने का प्रयास करता ही है।
आलस्य में समय गँवाने वाले कुसंग और कुबुद्धि के द्वारा उल्टे रास्ते तैयार करते हैं। कहते हैं “खाली दिमाग शैतान का घर”। जब कुछ काम नहीं होता तो खुराफात ही सूझता है। जिन्हें किसी सत्कार्य या स्वाध्याय में रुचि नहीं होती वे खाली समय में कुसंगति, दुर्व्यसन, ताश-तमाशे और तरह-तरह की बुराइयों में ही अपना समय बिताते हैं। समाज में व्यवस्था का कारण कोई बाहरी शक्ति नहीं होती, अधिकाँश बुराइयाँ, कलह और झंझट बढ़ाने का श्रेय उन्हीं को है जो व्यर्थ में समय गँवाते रहते हैं। मनुष्य लम्बे समय निष्प्रयोजन, खाली बैठा नहीं रह सकता अतएव यदि वह भले काम नहीं करता तो बुराई करने में उसे देर न लगेगी। उसे अच्छा या बुरा, सच्चा हो चाहे काल्पनिक, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। इसलिए यदि उसे सही विषय न मिले तो वह बुराइयाँ ही ग्रहण करता है और उन्हें ही समाज में बिखेरता हुआ चला जाता है।
मनुष्य के अन्तःकरण में ही उसका देवत्व और असुरत्व विद्यमान है। जब तक हमारा देवता जागृत रहता है और हम विभिन्न कल्याणकारी कार्यों में संलग्न रहते हैं। तब तक आन्तरिक असुरता भी मरी हुई पड़ी रहती है पर यह प्रसुप्त वासनायें भी अवकाश के लिए चुपचाप अंतर्मन में जगती रहती हैं और समय पाते ही देवत्व पर प्रहार कर बैठती हैं। इसलिए आध्यात्मिक पुरुष को चाहिए कि वह जागृत व्यवस्था में अपने जीवन के एक एक क्षण का सदुपयोग करता रहे।
जब यह दिखाई दे कि अब अपने पास कोई काम शेष नहीं रहा तो मनुष्य अपने निवास के आस पास की सफाई वस्त्रों की हिफाजत, घर की मरम्मत, बड़ों की देख-भाल, भजन ज्ञान विषयक चर्चा या किसी जीवनोपयोगी साहित्य का स्वाध्याय ही करने लग जाए। इससे टूटी फूटी वस्तुओं की सार-सम्हाल, स्वास्थ्य रक्षा और ज्ञान वृद्धि तो होगी ही। समय का मूल्याँकन केवल रुपये पैसे से ही नहीं हो सकता। जीवन में और भी अनेकों पारमार्थिक व्यवसाय हैं। उन्हें भी देखना और ज्ञान प्राप्त करना हमारा धर्म होना चाहिए। सत्कार्यों में लगाये गए समय का परिणाम सदैव सुखदायक ही होता है।
काम न करने का, लगातार किसी व्यवसाय में अभिरुचि न होने का कारण यह है कि एक सी स्थिति में रहते हुए मनुष्य को उकताहट पैदा होती है। यह स्वाभाविक भी है। मनोरंजन की आवश्यकता सभी को होती है। सन्त महात्मा भी प्रकृति दर्शन और तीर्थ-यात्रा आदि के रूप में मनोरंजन प्राप्त किया करते हैं। यह उकताहट यदि सम्हाली न जाए तो किसी न किसी व्यसन के रूप में ही फूटती है। व्यसन की शुरुआत खाली समय में कुसंगति के कारण ही होती है। हमारे धर्म प्रवर्तकों को इस विषय का ज्ञान था इसलिये उन्होंने हमारे रीति रिवाजों और आचार आदि में अनेकों प्रकार के कार्यक्रम अनिवार्य रूप में संयोजित कर दिए थे। व्रत, त्यौहार, उत्सव, विभिन्न संस्कार-समारोह, विवाह, सहभोज, कथा- कीर्तन, तीर्थ यात्रा सार्वजनिक सभाएं, जुलूस सम्बन्धियों के घर आने जाने आदि की परम्परायें इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रचलित की गई थीं कि निरन्तर काम और जीवन की दुरुहता में संलग्न मनुष्य को ऊब और उकताहट का सामना न करना पड़े।
आज कल इस प्रकार के साधनों में किसी प्रकार की कमी नहीं है। निरुत्साह और मानसिक थकावट दूर करने के लिए विविध मनोरंजक साधन आज बहुत बढ़ गये हैं। किन्तु समय के सदुपयोग और जीवन की सार्थकता की दृष्टि से इनमें से उपयोगी बहुत कम ही दिखाई देते हैं। अधिकाँश तो धन-साध्य और मनुष्य का नैतिक पतन करने वाले ही हैं। इसलिए यह भी आवश्यक हो गया है कि जब कुछ समय श्रम से उत्पन्न थकावट को दूर करने के लिए निकालें तो यह भली भाँति विचार कर लें कि यह जो समय उक्त कार्य में लगाने जा रहे हैं, उसका आध्यात्मिक उत्थान और आत्म विकास के लिए क्या सदुपयोग हो रहा है? मनोरंजन केवल प्रसुप्त वासना की पूर्ति के लिए न हो वरन् उसने भी आत्म कल्याण की भावना सन्निहित बनी रहे तो उस समय का उपयोग सार्थक माना जा सकता है।
फुरसत और खाली समय का उपभोग अच्छे, बुरे किसी भी काम में हो सकता है। नई-नई विद्या, कथा, लेखन, शास्त्रार्थ के द्वारा नई सूझ और आध्यात्मिक बुद्धि जागृत होती है। इससे अपना व समाज दोनों का ही कल्याण होता है। सत्कर्म में लगाये हुये समय से मनुष्य का जीवन सुखी, समुन्नत तथा उद्दात्त बनता है। जापान की उन्नति का प्रमुख कारण फुरसत के समय का सदुपयोग ही है। वहाँ सरकारी काम के घन्टों के बाद का समय लोग कुटीर उद्योगों में लगाते हैं, छोटे-छोटे खिलौने, घड़ियाँ आदि बनाते हैं इससे वहाँ की राष्ट्रीय सम्पत्ति बढ़ी है लोगों का जीवन सुखी हुआ है और नैतिक सदाचार का प्रसार हुआ है। खाली समय का उपयोग जिस प्रकार के कार्यों में करेंगे वैसी ही उन्नति अवश्य होगी।
समय का सदुपयोग प्रत्येक व्यक्ति करे इस सम्बन्ध में यदि कुछ व्यावहारिक कठिनाई है तो वह यह है कि मनुष्य को मनुष्यत्व का सच्चा ज्ञान नहीं होता। जीवन ध्येय का सच्चा ज्ञान तभी हो सकता है जब मनुष्य उसके लिए वास्तविक स्वरूप को पहचानें इनके लिए उसे विवेक, सावधानी और दीर्घ दृष्टि रख कर विचार करना आवश्यक है। जब तक वह अपने निजत्व के ज्ञान की ओर अग्रसर नहीं होता तब तक मनुष्य से यह आशा नहीं की जा सकती कि वह समय का मूल्य पहचान सकता है। उद्देश्य-हीनता ही समय के दुरुपयोग का प्रमुख कारण है।
रूढ़िवादिता, फैशन परस्ती, दुर्व्यसन और अनाचार आदि न मालूम कितने अवगुण आज के सभ्य समाज में फैले हुए हैं ये हानिकारक हैं, इनसे आये दिन अनेकों कष्ट, मुसीबत और आपदायें मनुष्य को घेरे रहती हैं। पर इनसे भी अधिक शक्तिशाली और अनेकों अवगुणों का जनक यह मिथ्या आडम्बर है। जब तक मनुष्य अपनी सही स्थिति को छुपाता नहीं तब तक यही सम्भव है कि उसे अधिक सम्मान न मिले, लोग उसे छोटा समझें। पर इतने से किसी प्रकार की हानि दिखाई नहीं देती। अपनी अल्प विकसित अवस्था में भी मनुष्य सुखी रह सकता है, संतोष प्राप्त कर सकता है। किन्तु जैसे ही मिथ्या आडम्बर और अपने को बढ़ा चढ़ा कर प्रदर्शित करने की हीनता भावना मनुष्य में प्रविष्ट हुई कि उसके जीवन में दुर्दशा प्रारम्भ हुई। सामाजिक जीवन में आज जो विश्रृंखलता दिखाई दे रही हैं उसका अधिकाँश कारण यही है कि मनुष्य अपना असली चेहरा छिपा कर नकली नकाब चढ़ाये बैठा है।
लोग समझते हैं कि जितना ही अधिक अपने आप को प्रदर्शित करेंगे उतनी ही हमारी औकात बढ़ेगी, सम्मान बढ़ेगा, मान और प्रतिष्ठा बढ़ेगी। पर यह भूल जाते हैं कि हम जिस समाज में पलकर इतने बड़े हुए उससे हमारी वस्तु स्थिति छिपी नहीं है। कदाचित ऐसा भी हो जाए तो “काठ की हाँडी” कितने दिन आँच सहेगी। आखिर जिस दिन टूट गई उस दिन अभी तक जितना सम्मान नहीं मिला, उससे कही अधिक लज्जा,आत्मग्लानि, अविश्वास और उपहास का सामना करना पड़ेगा। पोल खुलती है तो मनुष्य अपना मुँह छिपाने लायक नहीं रहता फिर क्या आवश्यकता है कि हम मिथ्या आडम्बर प्रदर्शित करें।
यह एक बहुत बड़ा अवगुण है कि लोग अपनी शक्ति के बाहर और स्थिति के बिल्कुल प्रतिकूल खर्च करते हैं। इस से लाभ तो कुछ होता नहीं। केवल एक महत्वाकाँक्षा के लिए कि लोग आपको अमीर समझें आप धन की होली जलाकर बैठ जाते हैं। परिणाम यह होता है कि आप कर्ज के बोझ से लद जाते हैं और विकास की सारी सम्भावनायें समाप्त हो जाती हैं। आज की गलती का परिणाम सारे जीवन भर भुगतना पड़ता है। ब्याह शादियों में नेग-चाल और जेवर आदि पर जो धन लगाया जाता है वह कितना हानिकारक है यह ध्यान देने की बात है। जिस धन से, बच्चों की पढ़ाई की व्यवस्था, परिजनों के संस्कार सुधार तथा घरेलू सुविधायें जुटाने में मदद मिलती, वह पंगु बन कर रह जाती हैं या बिल्कुल व्यर्थ बरबाद हो जाती हैं।
इससे कोई स्थाई सम्मान ही मिलता तो भी एक बात थी पर आप विश्वास कीजिये कि आप समाज की आँखों में कभी धूल नहीं झोंक सकते हैं। मान लीजिये आप परिवार का भरण−पोषण नहीं कर पाते हैं, फिर यदि आप केवल दिखावे के लिये बेकार खर्च करते हैं तो सिवाय बच्चों का पेट काटने के आप को और कौन सा रास्ता मिल गया? यदि लोग ऐसा न भी सोचें तो यह मानने में वे भूल न करेंगे कि कुछ धन आप अवैधानिक ढंग से कमाते होंगे। ऐसी अवस्था में आप निन्दा, उपहास और छींटाकशी से बच जायेंगे यह हो नहीं सकता। अतः इससे आप जिस सम्मान या बड़प्पन की कामना किये बैठे थे वह भी नहीं मिला, उलटे औरों की दृष्टि में नीचे गिरे और अपना भविष्य बरबाद कर लिया सो अलग।
यह बात स्त्रियों में अधिक होती है। अपने लिये जेवर और कीमती कपड़ों के लिये वह यह ध्यान नहीं देती कि उनके पति की हैसियत क्या है? स्त्री की इच्छा पूरी करे के लिये बेचारा पति ऐसा तभी कर सकता है जब किसी से कर्ज ले या आवश्यक कार्यों को छोड़ दे। इसके कारण आज लोगों में कितनी चिन्ता, उदासी और बेचैनी रहती है यह किसी से छुपा नहीं।
इस प्रकार के मिथ्या आडम्बर का परिणाम यह हुआ कि आज हजारों घर बरबाद हो गये हैं,...सैकड़ों अशान्ति कलह और दुर्दशा की आग में सुलग रहे है। लोगों के स्वास्थ्य खराब हो रहे हैं। अनेकों को तो आत्महत्या जैसे दुखद अपराध भुगतने पड़े हैं। जो ऐसा नहीं करते वे घुल-घुल कर अपना जीवन तत्व बरबाद करते रहे हैं और असमय ही इस संसार से विदा होते जाते हैं और अपने पीछे पत्नी और बच्चों को बिलखता हुआ छोड़ जाते हैं, देखने में बिल्कुल मामूली सी बात का इतना भयंकर परिणाम रहता है। इसलिये अपनी स्थिति से बढ़कर झूठे दिखावे की बात बुद्धि संगत नहीं की जा सकती है। बढ़ा चढ़ाकर अपने आपको प्रदर्शित करने का एक ही अर्थ है कि आप अपना जीवन बरबाद करने जा रहे हैं।
इससे व्यक्तिगत हानि तो होती ही है संक्रामक रोग की तरह सम्पूर्ण समाज की इससे प्रभावित होता है। प्रतिद्वन्द्विता की प्रतिस्पर्द्धा मनुष्य की एक विलक्षण विशेषता है। एक आदमी विवाह में एक हजार का दाँव लगाता है तो उसका पड़ोसी डेढ़ हजार, दो हजार खर्च करने में अपनी शान समझता है। इससे कम खर्च को वह अपना अपमान समझता है। यह कभी विचार नहीं करता कि हमारे पास साधन, परिस्थितियाँ और भविष्य के लिये भी कुछ शेष रहता है या नहीं। अज्ञानता पूर्वक केवल अपने मिथ्याभिमान के लिये यह अपव्यय दुख और मुसीबतों का ही कारण बन सकता है।
जिस समाज में यह अन्धानुकरण और अविवेक का बोलबाला होगा वह समाज कभी सुखी नहीं रह सकेगा। भारतीय जीवन की दुर्दशा का अधिकाँश कारण आज यही है कि लोग अपनी हैसियत से अधिक अपने आप को प्रदर्शित करना चाहते हैं। इसके लिये चाहे कितने अनैतिक अपराध करने पड़ें। भीतर-भीतर बढ़ते हुए इस प्रकार के अपराधों के कारण ही भ्रष्टाचार, दुराचार, और मिथ्याचार बुरी तरह बढ़ रहा है।
बाहरी सजधज को जो मान प्रतिष्ठा का आधार मानते हैं वे भ्रम में हैं। बुद्धिमान पुरुष बाहरी टीम टाम भड़कीले वेष विन्यास और चमकीले वस्त्राभूषणों के कारण लोगों को आदर की दृष्टि से नहीं देखते। मनुष्य की शालीनता उसकी सादगी में होती है। सद्विचार और सादगी का परस्पर का अत्यन्त निकट का सम्बन्ध होता है। जहाँ सादगी होगी वहीं सत्कर्म होंगे, जहाँ सत्कर्म होंगे वही सुखा और सुव्यवस्था होगी। प्रेम, एकता और विकास के अनेकों साधन अपने आप मिलते चले जायेंगे। उत्तम सन्तान और श्रेष्ठ संस्कार जागृत करने के लिये पुरुषों की अपेक्षा नारियों में सादगी की भावना का अधिक विकास होना आवश्यक है। सादेपन की सभी लोग इज्जत करते हैं।
अपनी वास्तविक स्थिति में अन्त तक बिना दिखलावे के साथ बने रहना मनुष्य का नैतिक बल प्रदर्शित करता है। सम्भव है आज की परिस्थितियों में कुछ झिझक, संकोच या आत्मग्लानि सी उठे किन्तु एक-सी स्थिति में सुखी व सन्तुष्ट जीवन बिताने के लिये यह सर्वश्रेष्ठ मार्ग है कि आप अपनी स्थिति का अतिक्रमण न करें। बच्चे की शादी, उधार एक हजार लेकर करने की अपेक्षा बिना धन खर्च किये किसी निर्धन कन्या के साथ कर देना अधिक श्रेष्ठ है। गरीब घरानों की कन्याओं में संस्कार कम अच्छे होंगे ऐसी मान्यता गलत है। इसलिये थोड़ी देर की चटक मटक और झूठी प्रशंसा के लिये सदैव के लिये अपने पैरों पर कुल्हाड़ी न मारिये। इससे आपका गृहस्थ तथा सामाजिक जीवन विपदाओं में ग्रस्त हो जायेगा। कभी मानसिक शान्ति न पा सकेंगे। गरीब होना पाप नहीं है किन्तु जब आप गरीबी छिपाने का प्रयत्न करने लगते हैं तो गरीबी तो ज्यों की त्यों बनी ही रहती है, अनेकों दूसरी प्रकार की विघ्न-बाधायें उठ खड़ी होती हैं। निर्धनता का उपहास कुछ दिन हो सकता हैं किन्तु झूठे प्रदर्शन से जो दुष्परिणाम उपस्थित होते है उनसे सम्पूर्ण जीवन ही बर्बाद हो जाता है।
झूठ जब तक व्यक्तिगत रूप से बोलने- चालने तक ही सीमित रहता है तब तक उससे विशेष हानि की सम्भावना नहीं होती किन्तु योजनाबद्ध झुठाई के परिणाम बड़े भयंकर होते हैं। मिथ्या आडम्बर एक प्रकार के झूठ का व्यवस्थित और शक्तिशाली रूप है। योजन बद्ध झुठाई की लाग और लपेट भी बढ़ जाती है इसलिये व्यक्ति और समाज दोनों पर उसका प्रभाव पड़ता हैं। इसलिये हम जिस स्थिति में है अपने जीवन को उतने ही क्षेत्र में नियंत्रित रखें, इसी में अपनी और समाज दोनों की भलाई है।
मनुष्य का शरीर माँस पेशियों से बनी एक प्रकार की मशीन है। इसका यदि ठीक प्रकार से प्रयोग न करें तो जीवन शक्ति का ह्रास होता है। आलस्य में समय बिताने से माँसपेशियाँ शिथिल पड़ जाती हैं, और पेट की नसें सुस्त पड़ जाती हैं। परिणाम यह होता है, कि स्वास्थ्य के मूल पेट में कब्ज, कोष्ठबद्धता आदि विकार उत्पन्न हो जाते है। स्वास्थ्य तेजी से गिरने लगता है। इस शक्ति की प्राप्ति और शिथिलता को दूर करने के लिए किसी न किसी व्यायाम की आवश्यकता अनिवार्य रूप में होती है।
जीवन रक्षा और शक्ति-सन्तुलन के लिये जिस प्रकार आहार की आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार नियमित रूप से व्यायाम करना भी स्वास्थ्य संरक्षण के लिये जरूरी है। मशीन में खरीद चढ़ाने से उसकी जंग छूट जाती है। उसी तरह व्यायाम से शरीर के दूषित मल विकार शिथिल पड़ जाते हैं और पसीने के रूप में बाहर निकल जाते हैं। चरक संहिता में व्यायाम की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुये लिखा है :-
“शरीर चेष्टाया चेष्टा स्थैर्याबल वर्धिनी।
देह व्यायाम संख्याता माभयाताँ समाचरेत्॥
अर्थात्-व्यायाम से शरीर की शक्ति स्थिर रहती है और बल बढ़ता है।”
स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिये व्यायाम का बड़ा महत्व है। व्यायाम की अति प्राचीन परम्परा आज भी हमारे यहाँ-दण्ड बैठक, कसरत कुश्ती डमबल-मुग्दर आदि के अभ्यास संसार में अपना गौरव पूर्ण स्थान रखती है। व्यायाम स्वास्थ्य से जहाँ सजीवता आती है वहाँ रोग-निरोधक शक्ति भी विपुल मात्रा में बढ़ती है। श्री लार्ड डर्वो का यह कथन अक्षरशः सत्य है “ यदि आप व्यायाम के लिये समय नहीं निकाल सकते तो आपको बीमारी के लिये समय निकालना पड़ेगा।” विजातीय तत्वों के कारण शरीर में जो विकार उत्पन्न होता है उसे नष्ट करने के लिये किसी न किसी रूप में व्यायाम करना पड़ता है। व्यायाम से स्वास्थ्य संवर्द्धन की दोहरी प्रक्रिया पूरी होती है। शारीरिक अंगों का विकास होता है और दृढ़ता आती हैं। अनावश्यक तत्व शरीर से निकल जाते है। स्वास्थ्य रक्षा के लिये यह दोनों ही नियम समान रूप से आवश्यक होते हैं।
व्यायाम स्वास्थ्य की नींव को मजबूत बनाता है, उसे चिरस्थाई रखता है। व्यायाम से शरीर स्वस्थ, हल्का, सुन्दर, सुदृढ़ तथा सुडौल बनता है। मानसिक शक्तियों का विकास होता है। निरोगता आती है। व्यायाम से रग-पुट्ठों और नसों में गति उत्पन्न होती है। श्वास-प्रश्वास की क्रिया प्रखर होने से छाती और फेफड़ों में मजबूती आती है। हृदय की गति तीव्र होती है। और रक्ताभिषरण तेजी से होने लगता है। जिगर और गुर्दे चुस्त हो जाते हैं।
अवस्था के अनुरूप उचित परिमाण में व्यायाम सभी के लिये आवश्यक है। बालक, वृद्ध, किशोर और नवयुवक सभी व्यायाम के अभाव में सुस्त से दिखाई देते हैं। व्यायाम एक प्रकार की स्वाभाविक चेष्टा है। बच्चा जन्म लेने के कुछ दिन बाद ही हाथ, पाँव हिलाने-डुलाने, इधर उधर भागने, पलटने-उलटने, दौड़ने आदि के द्वारा अपना नियमित व्यायाम पूरा करता रहता है। जो बच्चे छोटी अवस्था से निश्चेष्ट दिखाई देते है उनका स्वास्थ्य प्रायः गिरा रहता है। इसी प्रकार वृद्ध जनों को भी चुपचाप बैठा नहीं रहना चाहिये! अवस्था के अनुरूप किसी न किसी रूप में उन्हें भी व्यायाम करते रहना चाहिये! तरुणों के लिये शेष जीवन के लिये शक्ति-संचय का यही समय होता है। वे व्यायाम के माध्यम से चाहें तो वृद्धावस्था तक स्वस्थ व निरोग बने रहने की शक्ति और सामर्थ्य प्राप्त कर सकते हैं।
व्यायाम से पाचन क्रिया-प्रज्ज्वलित होती है और लिया आहार भली प्रकार पच जाता है। व्यायाम करने के 3 या 4 घंटे बाद भोजन करने से मंदाग्नि और अजीर्ण सम्बन्धी कोई भी शिकायत परेशान नहीं करती। अधिक व्यायाम के साथ अधिक शक्ति और प्रोटीन तथा चिकनाई वाले पदार्थ लिये जायें तो स्वास्थ्य और भी सुदृढ़ होता है। व्यायाम से पुराने और दुर्बल ‘कोष’ टूटकर मल के रूप में बाहर निकल जाते हैं। उसके साथ-साथ कुछ पोषक तत्व भी व्यय हो जाते हैं जिससे शरीर में थकान उत्पन्न होती है। इस थकान का पौष्टिक पदार्थों से दूर करते हैं और मालिश द्वारा भी यह थकावट दूर होती है। मालिश और व्यायाम का स्वास्थ्य-की दृष्टि से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। इससे माँस-पेशियों की थकावट दूर होती है और रक्त-प्रवाह में नाड़ियों को प्रोत्साहन मिलता है। व्यायाम से उत्पन्न थकावट को दूर करने के लिए पर्याप्त विश्राम, निद्रा और मनोविलास की भी आवश्यकता होती है।
शारीरिक स्थिति के प्रतिकूल अधिक व्यायाम स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है इसलिए व्यायाम के समय थोड़ी-सी थकान या बोझ-सा मालूम पड़ते ही उसे बन्द कर देना चाहिए। अधिक व्यायाम से भोजन में अरुचि, वमन क्षय रक्तपित्त, ज्वर, श्वाँस, चक्कर आना, थकावट, खाँसी की शिकायतें उठ सकती हैं इसलिए व्यायाम की मात्रा और नियमितता पर ध्यान देना आवश्यक होता है। अधिक व्यायाम, लम्बी दौड़ या हाँफ-हाँफ कर कसरत करने से कब्ज की शिकायत हो जाती है। आँतें दुर्बल हो जाती हैं और मल कड़ा हो जाता है, मल की नली तेजी से सूखने लगती है। इसलिए अधिक शक्ति लगाकर जो व्यायाम किए जाते हैं उनकी उपयोगिता सरल व्यायामों से कुछ कम मानी जाती है। दण्ड-बैठक लगाना, डम्बल-मुग्दर ये भारी व्यायाम हैं। ये सर्वसाधारण के लिये उपयोगी नहीं हो सकते।
बच्चों और विद्यार्थी वर्ग के लिए खेलना सबसे अच्छा व्यायाम है। कुश्ती, कबड्डी, गेंद, फुटबाल, हाकी आदि खेलों से व्यायाम की आवश्यकता पूरी हो जाती है और मानसिक प्रसन्नता भी मिल जाती है इसलिए खेल सबसे अच्छा व्यायाम है।
घर पर किए जाने वाले व्यायामों में हाथ पैरों का चलाना, उछलना, कूदना, चक्की पीसना, धान कूटना आदि व्यायाम शारीरिक और व्यावसायिक दृष्टि से भी लाभदायक होते हैं।
टहलना भी एक प्रकार का उत्तम व्यायाम है। इस में भी शारीरिक और मानसिक शक्ति प्राप्त होती है। पेट सम्बन्धी शिकायतों के लिए टहलना सबसे अच्छा व्यायाम माना जाता हैं। अधिक उम्र के व्यक्तियों के लिए तथा दिन भर कार्यालयों में काम करने वालों को मनोरंजन और स्वास्थ्य दोनों दृष्टियों से साफ स्वच्छ और हरियाले स्थानों में अवश्य टहलना चाहिए।
किसी नदी या तालाब में तैरना भी एक प्रकार का सुन्दर व्यायाम है। तैरने में फेफड़े, छाती और अंग-प्रत्यंग में तनाव आता है और रक्त प्रवाह की गति तीव्र होती है और शरीर में स्फूर्ति आती है।
व्यायाम की सर्वांगपूर्णता की दृष्टि से पेड़ पर चढ़ना भी बड़ा उपयोगी होता है। पेड़ पर चढ़ने से प्रायः शरीर की सभी माँस पेशियों का प्रसारण होता है और सम्पूर्ण अंगों का यौगिक व्यायाम हो जाता है। साथ ही पेड़ से निकलने वाली ऑक्सीजन भी मिलती है। प्राचीन काल में पेड़ पर चढ़ने का विशेष “"गुलहर"“ खेल जाता था। आज भी देहातों में यह परम्परा किसी न किसी रूप में विद्यमान है। इससे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ ही मानसिक आरोग्य भी बढ़ता है।
व्यायाम के लिए जो भी साधन आप काम में लें उस का दैनिक जीवन में उपयोग होना चाहिए। बौद्धिक-शिक्षण की तरह व्यायाम की पद्धति भी केवल दूसरों के आश्रित न हो। अपने देश काल परिस्थिति और शारीरिक स्थिति के अनुरूप अब फिर से व्यायाम के नवीनीकरण की आवश्यकता है। साधन कोई भी हो उसके द्वारा बल, चपलता, क्रियाशक्ति और शारीरिक कुशलता प्राप्त करना ही अपना लक्ष्य हो। इस हिसाब से प्रत्येक मनुष्य को एक नियमित दिनचर्या बनानी चाहिए और उसी के अनुरूप अपने जीवन को ढालने का प्रयत्न करना चाहिए।
बाल-बुद्धि के लोग शारीरिक सौंदर्य और रूप का आकर्षण बढ़ाने के लिए तरह-तरह से वेष-विन्यास और साज-सज्जा किया करते हैं। सम्भव है इससे उन्हें कुछ अधिक सफलता मिलती हो किन्तु इस प्रकार का भड़कीला वेष-विन्यास और बाहरी रूप बढ़ाने से मनुष्य के चरित्र का पतन ही हुआ है। विचित्र प्रकार की वेष-भूषा, विदेशियों की नकल अच्छे व्यक्तित्व की प्रतीक नहीं हो सकती। प्रत्येक देश काल और परिस्थिति के अनुसार जहाँ संस्कृति रीति-रिवाज और सामाजिक आचार-संहिता में एकता नहीं होती वैसे ही अपने धर्म, अपनी संस्कृति के अनुरूप केश, वस्त्र और वेष-भूषा से मनुष्य के चरित्र और आत्मिक बल का अनुमान किया जाता है। इस दृष्टि से अपनी भी एक प्रणाली है, उसी में सीमित रहने में हमारा बड़प्पन, सादगी, शालीनता तथा साँस्कृतिक गौरव माना जा सकता है।
बालों से मनुष्य का व्यक्तित्व समझ में आता है। मनुष्य की उजड्डता, ओछापन और चारित्रिक हीनता की झलक भी बालों से मिलती है। छोटे-छोटे कटाये हुए बाल मनुष्य की योग्यता प्रकट करते हैं। सुव्यवस्थित ढंग से रखाये गये बाल यह व्यक्त करते है कि व्यक्ति का स्वभाव, आचरण सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा कुछ अधिक सुन्दर होना चाहिए किन्तु बड़े-बड़े बाल, अस्त−व्यस्त और बिखरे हुए बालों से मनुष्य का ओछापन जाहिर होता है। इससे मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु दुर्बल पड़ जाते हैं। लम्बे बाल यदि ठीक प्रकार तेल डाल कर और सँवार कर न रखे जाएं तो सिर में मैल जम जाता है और फोड़े फुन्सियाँ तथा गंजापन का रोग उत्पन्न हो सकता है। इस तरह केश केवल व्यक्तित्व की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं बल्कि उनका स्वास्थ्य के साथ भी अटूट सम्बन्ध है।
कुछ लोगों को यह भ्रम होता है कि धार्मिक दृष्टि से लम्बी जटायें रखना बड़प्पन का चिन्ह है। यह आदर्श वे साधु-सन्तों और साधकों से अनुकरण करते हैं। सम्भव है जब केशकर्तन प्रारम्भ न हुआ तो लोग ऐसा करते हों, या साधनाओं की शोध में इन छोटी-छोटी बातों से समय बचा कर अधिक समय आध्यात्मिक शोधों में लगाने की आवश्यकता रही हो-तब लम्बी जटाओं को कुछ महत्व दिया जाता रहा हो। पर अब जब न तो ऐसे साधु संत और महात्मा रहे और न ही उनके काटने में किसी परेशानी का सामना करना पड़ता हो तो लम्बे बाल रखने की कोई उपयोगिता समझ में नहीं आती। सिर में व्यर्थ का बोझ बनाये रखना बुद्धिमानी की बात नहीं हो सकती। हलके छोटे बालों से सिर साफ और ज्ञान तन्तु ताजे बने रहते हैं। इससे सात्विकता बनी रहती है। बड़े बाल तमोगुण का प्रतीक होते हैं। इसी प्रकार बालों को तरह-तरह से स्त्रियों के समान काढ़ना और विचित्र तरह की आकृति बनाना भी बुरा है।
वस्त्रों के बारे में भी ठीक ऐसी ही बात है। भारतीय संस्कृति की सर्वोपरि विशेषता यही रही है कि यहाँ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सादगी को ही अधिक महत्व दिया गया है। यह विशेषता वस्त्राभूषण के साथ भी जुड़ी हुई है। पिछले दिनों हमें जो यवनों और अंग्रेजों की दासता भुगतनी पड़ी उससे हमारे सम्पूर्ण आचार-विचार ही परिवर्तित हो गए हैं। यह परिवर्तन खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल आदि सभी में समा गया है। वस्त्र भी आज हमारी साँस्कृतिक विशेषता, गौरव, जलवायु आदि के अनुरूप नहीं हैं।
भारत उष्ण प्रकृति का देश है अतएव वस्त्रों की अधिकता की यहाँ कोई आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। पूर्व पुरुषों के चित्रों से यह विदित होता है कि ऋषि-मुनि, सन्त, गृहत्यागी, गृहस्थ व राजा लोग भी प्रायः उतने वस्त्र धारण करते थे जो सदाचार और शील संरक्षण के लिए आवश्यक होते थे। विशेष अवसरों पर विशेष प्रकार के वस्त्र पहनने की परम्परा थी। अधिकाँश लोग अपने शरीर का अधिक से अधिक हिस्सा खुला रखते थे ताकि वे ऋतुओं के प्रभाव को आसानी से बर्दाश्त कर लें।
वस्त्र पहनने की जो परम्परा पूर्व पुरुषों की थी वह बड़ी सरल और उपयोगी रही है। धोती, कुर्ता, आदि का चयन सादगी और सरलता की दृष्टि से भी श्रेष्ठ रहा है और इसका सम्बन्ध स्वास्थ्य की स्थिरता से भी रहा है। किन्तु खेद की बात है कि अब वस्त्रों की दृष्टि से हमारी साँस्कृतिक-श्रेष्ठता लुप्त प्रायः हो चुकी है। पूर्णतया विदेशियों का अनुकरण हो रहा है।
पैन्ट और चूड़ीदार पायजामा, टोप आदि टाई आदि का प्रचलन सर्वथा अभारतीय है। ये यहाँ की जलवायु के अनुरूप भी नहीं हैं और इससे भद्रता भी प्रकट नहीं होती है। अब लोग समझने लगे हैं कि पैण्ट के साथ वे हर घड़ी कितनी गन्दगी साथ लिए घूमते हैं? इसका स्वास्थ्य पर कितना बुरा असर पड़ता है? दूसरे जो वस्त्र चुस्त होते हैं और जिनसे शरीर का उभार ज्यों का त्यों दिखाई देता है वे अधिकाँश वासना और कामुकता भड़काने वाले होते हैं। बनियान, कमीज, सूटर और कोट-एक के ऊपर एक- अनेक कपड़े पहन लेने से बेचारे शरीर की दुर्दशा होती है। चुस्त कपड़े स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छे नहीं माने जाते। नैसर्गिक रूप से शरीर को हर क्षण शुद्ध हवा मिलती रहनी चाहिए। यदि ऐसा न हुआ तो रोम-कूप गन्दगी से भर जाते हैं और कोमल स्थानों में हर घड़ी सीलन बनी रहने के कारण दाद, खाज, अकौता, फोड़ा और फुन्सियाँ बनी रहती हैं। किसी भी अवस्था में देश काल की परिस्थितियों के प्रतिकूल वस्त्र नुकसानदेह ही हो सकते हैं।
अब यह बुराई स्त्रियों के जीवन में प्रवेश करती जा रही है, यह एक-चिन्तनीय विषय है। स्त्रियों का आधुनिक पहनावा इतना फूहड़ और भड़कीला हो रहा है कि हर शर्मदार की आँखें नीची हो जाती हैं। दुराचार को प्रोत्साहन देने में सिनेमा, नाच, अश्लील गाने जितने आवश्यक हो रहे हैं- वस्त्र-सज्जा, उससे कहीं अधिक ही है। हमारी बच्चियाँ अब उन वस्त्रों की ओर अधिक आकर्षित होती हैं जो विचित्र प्रकार के रंग रंगीले तथा आधे- छोटे होते हैं। स्त्रियों के वस्त्र ऐसे होने चाहिएं जिनसे उनका अधिकाँश शरीर ढका रहे किन्तु वस्तु स्थिति इससे सर्वथा विपरीत है। यह बड़ी चिन्ता की बात है। अब इसमें तीव्रता से परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।
स्त्रियों की भारतीय वेषभूषा को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा प्राप्त है। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि उनकी पोशाक किसी भी देश की महिलाओं से निकृष्ट है। आज जहाँ साड़ी और पूरी बाँह के सलूके का प्रचलन दूसरे देशों में बढ़ रहा है, वहाँ यह सबसे अधिक आवश्यक है कि अपनी परम्पराओं का अनुशीलन पहले अपने घर में ही हो। हमारी बहिनों और बेटियों को इस बात पर अधिक ध्यान देना चाहिए और वस्त्रों की सादगी अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह संयम उन बालिकाओं को अधिक सिखाने की आवश्यकता है जो इस समय शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ रही हैं क्योंकि महिलाओं के निर्माण की भावी बागडोर उन्हीं के हाथों आने वाली है।
स्नो आदि के उत्पादन में तेजी से जो वृद्धि हो रही है उससे और भी चिन्ता हो रही है स्नो का 1956 में 914450 पौण्ड उत्पादन हुआ जो दूसरे वर्ष 1081889 पौण्ड हो गया। इससे यह पता चलता है कि मनुष्य अपने वेष विन्यास में किस तेजी के साथ अप्राकृतिक साधनों को बढ़ा रहा है। नैतिक दृष्टि से यह सचमुच चिन्ता की बात है कि मनुष्य की आदतों में छिछोरेपन की बढ़ोत्तरी अधिक हो रही है। एड़ी से लेकर चोटी तक जिस प्रकार से आज लोग शरीर को अप्राकृतिक ढंग से सजाते हैं उससे समाज का नैतिक पतन ही हुआ है।
मानवीय स्वभाव की यह छोटी-छोटी बातें भी सामूहिक तौर पर बड़ी प्रभावशील होती हैं इसलिए यह आवश्यकता अब प्रत्येक विचारवान के समक्ष समस्या बन कर खड़ी है। इसमें परिवर्तन किए बिना हमारे जातीय-जीवन संस्कृति का विकास होना-सम्भव नहीं है। राष्ट्र का नैतिक बल जागृत करने के लिए भी केश, वस्त्र और वेष विन्यास आदि में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने पड़ेंगे। आत्म-गौरव भी इसी में है कि अपनी साँस्कृतिक चेतना को समझें और उसे अपने जीवन में धारण करें।
खेत में लहलहाती पौध की सुरक्षा के लिए चतुर किसान उसके चारों ओर मेंड़ बाँधते, कँटीले तार रुँधते और समय-समय पर उसकी पहरेदारी करते हैं। तब कहीं उसे अन्य पशुओं से बचाना सम्भव होता है। बिना किसी देख-रेख के उसे छोड़ दें तो चिड़ियाँ, गिलहरियाँ, खरगोश आदि उन्हें चर जाते हैं। भली-भाँति सुरक्षित पौधे जल, वायु और सूर्य से पर्याप्त सामग्री ग्रहण कर धीरे-धीरे परिपक्व होने लगते हैं। इस क्रिया में कितना समय लगता है उसमें किसान को कितनी दौड़−धूप, श्रम और सावधानी बरतनी पड़ती है इसे सभी जानते हैं। बच्चा भी एक सुकुमार पौधा है, जिसे जिधर चाहो मोड़ दो। घर की चहार दीवारी में जहाँ बच्चे की सुरक्षा होती है वहाँ वह अपने जीवन-विकास की व्यावहारिक सामग्री भी अपने माता-पिता तथा अभिभावकों से ही प्राप्त करता है। वृक्ष की जड़ें अपने लिए जीवन तत्व धरती से चूसती रहती हैं-बच्चा अपना बौद्धिक पोषण-पदार्थ अपने अभिभावकों से प्राप्त करता है। सुकुमार अवस्था से बढ़कर पूर्ण नागरिक बनने तक बच्चे की सुरक्षा ऐसी ही होती है जैसे किसान अपने खेतों का रखवाली करता है।
बच्चे परमात्मा का स्वरूप होते हैं। उनमें निश्छलता स्वाभाविक और प्रकृतिदत्त होती है। बच्चे की सेवा भगवान् सबसे अच्छी सेवा मानी जा सकती है। उसमें जाति-पाँति-भाषा भेद के भाव नहीं होते। माता-पिता चाहें तो उसे विकसित कर चारित्रिक, नैतिक सद्गुणों का विकास कर दें अथवा उनका सम्पूर्ण नाश कर दें। वह कोरा कागज है जिस पर चाहे काली स्याही से लिख दें अथवा रंगीन कलाकृति ढाल दें। इसके लिए उनकी उंगली पकड़ कर सिखाने की उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती जितनी मनोवैज्ञानिक तरीकों से उन पर प्रभाव डालने की। प्रसिद्ध बाल मनोवैज्ञानिक आर्थर डिंग्ले ने कहा कि-बालक आप क्या कहते हैं उस पर अमल नहीं करेगा बल्कि क्या आप करते हैं वह सीखेगा।
घर का वातावरण बच्चों को प्रभावित करता है। स्वजनों में रहन-सहन के अनुरूप अपना निर्माण करता है। परिजनों का व्यक्तित्व उन पर प्रभाव डालता है। साफ -सफाई, सुरुचि और सदाचरण पूर्वक जीवन-यापन करने वाले दम्पत्ति ही उच्च मनोबल के मेधावी बालकों का निर्माण कर सकते हैं। ध्रुव, प्रह्लाद, श्रवण कुमार, भरत, लव−कुश, कच, अभिमन्यु-गोरा-बादल, फतहसिंह, जोरावर सिंह जैसे पुत्रों को उच्च श्रेणी का आदर्श छोटी आयु में ही प्रस्तुत करना उनके माता पिता और गुरुओं ने ही सिखाया था।
सती मदालसा ने जब चाहा कि उसका बालक ब्रह्मा-विद्या-विशारद हो तो वैसा-ही हुआ, जब चाहा तब उन्हें राज्य का उत्तराधिकारी बनने योग्य राजकुमार बनाया। राजकीय संरक्षण से वंचित शकुन्तला ने निर्जन वन में पुत्र को प्रसव किया और वहीं उसे यह शिक्षा दी कि वह एक दिन सम्पूर्ण आर्यावर्त का स्वामी बना। उसी भरत के नाम पर ही हमारे देश का नाम भारतवर्ष पड़ा था। बच्चे गीली मिट्टी होते हैं जिन्हें जैसे ढाँचे में ढाला जाय वैसे ही निर्मित होते और वैसा ही आदर्श प्रस्तुत करते हैं।
डाँट डपट से बालक में भय, विद्वेष, क्रोध और कटुता की भावनायें पैदा होती हैं जो उसके जीवन निर्माण में हानिकारक प्रभाव डालती हैं। इससे उसका साहस विलुप्त हो जाता है और दिनों-दिन भय और कायरता की हीनवृत्ति की ओर गिरता चला जाता है। सहयोग और सहानुभूति की भावनायें ऐसे शिशुओं में पनप भी नहीं पातीं जिससे वे अर्द्धविकसित रह जाते है और जीवन के किसी भी क्षेत्र में कैसी भी प्रगति नहीं कर पाते।
आज ऐसी ही सन्तति का सर्वत्र बाहुल्य है। बच्चों के आहत और मुरझाये हुए चेहरे देखते हैं तो बड़ी निराशा होती है। लगता है कल जिन नागरिकों के ऊपर राष्ट्र की आध्यात्मिक और भौतिक सम्पन्नता की आधार-शिला रखी जानी है वे आज इतने अशक्त और दुर्बल हैं तो भला वे इतने बड़े बोझ को कैसे वहन कर सकेंगे। इसके लिए किसी व्यवस्थित प्रशिक्षण की अत्यधिक आवश्यकता प्रतीत होती है जिसमें कम से कम लोग बच्चों के समक्ष सही आचरण प्रस्तुत करना सीखें। डाँटने का तरीका सदैव कटु होता है। इससे बालक में दुर्भावना पैदा होती है। स्वाभिमान की भावना उनमें भी होती है। इसे यदि बलपूर्वक दबा दिया गया तो उनकी सही दिशा चुनने की मौलिक शक्ति का पतन होता है। आत्म-निर्माण की मनोवृत्तियां कुण्ठित हो जाती हैं। जीवन में भी वे बाहरी साहस खोजते रहते हैं। इसके लिए वे अनैतिक दुष्कृत्य तक करते देखे जाते हैं।
बालक के अविकसित मस्तिष्क को उचित अनुचित या भले-बुरे की कोई विशेष पहचान नहीं होती। अखाद्य खाने में उन्हें संकोच नहीं होता। धूल के साथ भी खेलने में झिझक नहीं लगती। तोड़-फोड़ और हर चीज के साथ खिलवाड़ करने में उन्हें कुछ अनुचित नहीं लगता। इस पर यदि कोई दम्पत्ति नाराज हों अथवा उत्तेजित होकर उन्हें बेरहमी से पीट दें तो यही कहना पड़ेगा कि उन्होंने बालवृत्ति को समझने में भूल की है या फिर उनमें सहृदयता का अभाव है।
बच्चे की आयु के साथ उसका विवेक भी बढ़ने लगता है किन्तु सीमित ज्ञान के कारण वह अपने विवेक को अपने संरक्षकों, अभिभावकों और माता-पिता पर आरोपित करता है। वह बड़ी जिज्ञासा से यह अध्ययन करता रहता है कि माता क्या खाती है और उसे ही खाने के लिए दौड़ पड़ता है। पिता भाई और बहनों के आचरण में वह अपना निर्माण करता है। परिवार वाले यदि अस्वच्छ, मलिन स्वभाव के हुए तो यही मलिनता उसमें भी प्रवेश कर जाती है। बड़े हो जाने पर जो आदतें परिपक्व बन जाती हैं, उनका छोटा रूप घरवालों का ही दिया हुआ होता है। बालक में तो केवल विकास होता है आचरण की पौध लगाने के उत्तरदायी उसके घर वाले ही होते हैं।
घर के वातावरण से यदि अशुभ संस्कारों को, हीन वृत्तियों और ओछे कार्यों को निकाल दें, उनके स्थान पर यदि सुन्दर, सुरुचिपूर्ण और माँगलिक कर्मों को स्थान मिले तो ऐसे वातावरण में पले बच्चे भी सुन्दर आचरण, विचार वाले बनते हैं। पारिवारिक स्नेह, सौहार्द और सौजन्यता का जहाँ जितनी मात्रा में बाहुल्य होगा वहाँ बच्चों का नैतिक विकास भी उतना ही प्रगाढ़ और स्थिर होगा। बाह्य संस्कारों के प्रभाव की प्रतीक्षा करने से तो यही अच्छा है कि अपने आन्तरिक सद्गुणों को विकसित कर बालक की पाठशाला को सजाया जाए जिसमें वह शुभ गुण ग्रहण करे और श्रेष्ठ सत्कर्म करना सीखे।
इसके लिए हर घड़ी चतुर किसान के समान ही सावधानी और सुरक्षा बरतनी पड़ेगी। बालक पर रोकथाम लगाने के पहले आत्म-निरीक्षण करना पड़ेगा। “क्या कर रहा है” कहने के पूर्व “क्या कर रहे हैं।” जैसे सम्मान सूचक भाषण प्रयुक्त करने का प्रतिबन्ध अपने आप पर लगाना पड़ेगा। तभी यह स्थिति बन पड़ेगी जिसकी आज आकुलतापूर्वक प्रतीक्षा की जा रही है। युग-निर्माण अभियान यथार्थ में सुसन्तति को जन्म देने का आन्दोलन है। राष्ट्र का भावी सन्तान आज के बच्चों की प्रतिष्ठा पर अवलम्बित है। कल की बागडोर सम्हालने वाले आज के यह बच्चे ही हैं। फिर क्यों न आज से ही अपने उत्तराधिकारियों के निर्माण में लगें। इसी से हमारी संस्कृति, जाति और राष्ट्र की उन्नति हो सकेगी।
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्षते॥
विषयों की कामना, विषय-भोग से कभी शाँत नहीं होती। किन्तु अग्नि में घी डालने से बढ़ने वाली ज्वाला की तरह और भी अधिक बढ़ती है।
नास्ति सत्यसमोधर्मो न सत्याद्विद्यते परम्।
नहि तीव्रतरं किंचिदनृतादिहाविद्यते॥
सत्य के समान कोई धर्म नहीं, सत्य से बढ़कर कुछ श्रेष्ठ नहीं और असत्य से बढ़कर तीक्ष्ण और कुछ नहीं है।
आपने कहीं न कहीं महात्मा गाँधी के साथ या अलग से उन तीन बन्दरों का चित्र अवश्य देखा होगा जिसमें एक बन्दर दोनों हाथों से अपनी आँख बन्द किए हुए है। जिसका तात्पर्य है “बुरी बात मत देखो” “बुराई की तरफ से अपनी आँख बन्द कर लो”। किसी चित्र या दृश्य को देख कर उससे संबंधित अच्छाई या बुराई का प्रभाव अवश्य पड़ता है हम पर। बुरे चित्र देखने पर बुराइयाँ और अच्छे दृश्य देखने पर अच्छाइयाँ पनपती हैं।
वस्तुतः जो कुछ भी हम देखते हैं उसका सीधा प्रभाव हमारे मन और मस्तिष्क पर पड़ता है। किसी चित्र या दृश्य विशेष को बार- 2 देखने पर उसका सूक्ष्म प्रभाव हमारे अन्तर मन पर अंकित होने लगता है। और जितनी बार उसे देखा जाता है उतना ही वह स्थाई और परिपक्व बनता जाता है। हमारा अव्यक्त मन कैमरे की प्लेट के समान है जिस पर नेत्रों के लेन्स से जो छाया गुजरती है वही उस पर अंकित हो जाती है। हम अच्छा या बुरा जो कुछ भी देखते हैं। उसका सीधा हमारे अन्तर मन पर, सूक्ष्म चेतना पर होता है।
प्रत्येक चित्र का अस्तित्व केवल उसके आकार प्रकार तथा रंग रूप तक ही सीमित नहीं रहता वरन् उसके पीछे कुछ आदर्श होते हैं कुछ विचार, धारणायें और मान्यतायें होती हैं। ये अच्छी भी हो सकती हैं और बुरी भी किन्तु होती अवश्य हैं। वस्तुतः चित्र की अपनी एक भाषा होती है जिसके माध्यम से चित्रकार समाज में अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है। प्रत्येक चित्र में उससे हाव, भाव, भंगिमा, पोशाक, अंग प्रत्यंग, मुख, मुद्रा आदि में कुछ संकेत भरे होते हैं। चित्र या दृश्य देखने के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित अच्छी बुरी धारणा, संकेत भी मनुष्य के मन पर अंकित हो जाते हैं। हमारा मन इन आदर्शों, संकेतों को चुपचाप ग्रहण करता रहता है। चित्र दर्शन के साथ-साथ उसमें निहित अच्छाई या बुराई भी मानस पटल पर अंकित हो जाती है।
शान्त गम्भीर मुद्रा में महान् तत्व के चिन्तन में लीन किसी महापुरुष का चित्र देखकर उससे मनुष्य को गम्भीरता शान्ति की प्रेरणा मिलती है। किसी वीर योद्धा का चित्र देख कर हृदय में शौर्य और साहस के भाव उत्पन्न होते हैं। किसी जनसेवी, परमार्थ परायण शहीद की प्रतिमा देख कर समाज के लिए मर मिटने की भावना जागृत होती है। किसी देवी-देवता या अवतार की प्रतिमा देखकर, किसी मन्दिर, मस्जिद, गिर्जाघर में जाने पर, परमात्मा और उसके दिव्य गुणों का स्मरण होता है। ठीक इसी तरह भद्दे अश्लील कहे जाने वाले, अर्द्धनग्न, असामाजिक, हाव-भाव मुद्रा तथा शारीरिक अंगों के भड़कीले प्रदर्शन वाले चित्र मनुष्य में कई नैतिक बुराइयाँ पैदा करते हैं। कोई भी गन्दा या अश्लील चित्र-दृश्य देखने पर मनुष्य के मन में भी गन्दगी, अश्लीलता भड़क उठती है।
किसी भी चित्र को बार-बार देखने पर उसमें निहित विचार, आदर्शों की छाप मनुष्य में गहरी होती जाती है। ऐसी स्थिति में कोई दृश्य विशेष उसके सामने न हो तब भी उसकी कल्पना मानस पटल पर पूरा चित्र अंकित कर लेती है, पूर्व स्मृति के आधार पर और वैसी ही प्रेरणा मनुष्य को देती है। जब भी मनुष्य का मन विश्राम में होता है तो पूर्व में देखे गए चित्रों, दृश्यों को कल्पना जागृत होकर उस समय वही किया जाता है जो उन्हें प्रत्यक्ष देखने पर होती है। इसलिए चित्रों को देख लेने से ही बात समाप्त हो जाती हो ऐसा नहीं है। वे धीरे-धीरे मानव प्रकृति के अंग बन जाते है और उसे समय-समय पर वैसी ही प्रेरणा देते रहते हैं। अन्तर में छिपी पड़ी इन प्रेरणाओं के अनुसार बहुधा मनुष्य काम भी करने लगता है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि हम जो कुछ भी देखते हैं उसका हमारी प्रकृति, स्वभाव, व्यवहार-आचरण आदि पर भारी प्रभाव पड़ता है। अच्छे चित्र देखने पर जीवन में अच्छाइयाँ पैदा होती हैं। बुरे चित्र देखने पर बुराइयाँ। आवश्यकता इस बात की है कि बुरे चित्र, बुरे दृश्य देखने के बजाय उधर से आँख मींच लेना, बुराइयों को न देखना ही श्रेयस्कर होता है। गाँधीजी के आँख मींचने वाले बन्दर से हमें यही प्रेरणा मिलती है।
अच्छे या बुरे चित्रों का चुनाव करना हमारी अपनी इच्छा पर निर्भर करता है। यदि हमें अपने जीवन में अच्छे आदर्श, उच्च प्रेरणा, दिव्य गुणों को प्रतिष्ठापित करना हो तो इस सम्बन्ध में अच्छे चित्रों का चुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। महापुरुषों के, शहीदों के, तपस्वी त्यागी सन्त महात्माओं के चित्र, देवी देवता आदि के चित्र ढूंढ़ने पर सफलता से मिल जाते हैं। इसी तरह की कोई उत्कृष्ट ऐतिहासिक घटनाओं, त्याग बलिदान का दृश्य जिनमें अंकित हो ऐसे चित्र भी मिलते जाते हैं। प्रेरणा-प्रद आदर्श वाक्यों का चुनाव भी अच्छे चित्रों का काम दे सकता है। इस तरह हम उत्कृष्ट चित्रों का संग्रह करके अपनी जीवन रक्षा की महत्वपूर्ण सामग्री जुटा सकते हैं। इनसे हमें उठते-बैठते सोते जागते उत्कृष्ट प्रेरणा, महान् शिक्षा मिल सकती है।
चित्र दर्शन की इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझकर ही हमारे पूर्वजों ने नित्य मन्दिरों में भगवान की मूर्ति के दर्शन, साधु महात्माओं के दर्शनों का विधान बनाया होगा। एक भारतीय नागरिक का धर्म कर्तव्य है कि वह प्रातः सायं भगवान् तथा गुरुजनों के दर्शन करें उन्हें प्रणाम करें। सोने पूर्व, उठने पर शुभ दर्शन एक आवश्यक धर्म कर्तव्य माना जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि हमारे धार्मिक चित्र बहुत समय से हमें उच्च आदर्शों, सामाजिक मर्यादाओं त्याग, वैराग्य, संयम, बल, पौरुष, कर्तव्य आदि की उत्कृष्ट प्रेरणा देकर आत्म-विकास की ओर अग्रसर करते रहे हैं।
खेद है आज कला के नाम पर, चलचित्रों के माध्यम से, धन के लोभ के लिए समाज में बहुत ही भद्दे अश्लील चित्रों की बाढ़-सी आ गई है। यत्र-तत्र बाजार में इस तरह के चित्र अधिक मिलते हैं जिनमें दूषित हाव-भाव, भड़कीले पोशाक शारीरिक अंगों का फूहड़ प्रदर्शन मुख्य होते हैं। सिनेमा में तो अभिनेता और अभिनेत्रियों के अर्धनग्न शरीर, उनकी अश्लील मुद्राएँ भड़काने वाले तथा कथित ‘ऐक्टिंग‘ दर्शकों पर कैसा प्रभाव डालता होगा इसकी सहज ही कल्पना की जा सकती है। समाज में बढ़ती हुई अश्लीलता, फूहड़पन, फैशनपरस्ती का एक कारण सिनेमा में दिखाये जाने वाले भद्दे चित्र भी हैं।
बाजार में खुले आम इस तरह की पत्र-पत्रिकाएं बिकती देखी जा सकती हैं जिनमें बहुत ही गन्दे उत्तेजित चित्र होते हैं। भोले-भाले, अनुभवहीन यौवन में पैर रखने वाले युवक इनसे बहुत जल्दी ही प्रभावित हो जाते हैं। पैसा खर्च करके खरीदते हैं लेकिन ये गन्दे चित्र उनमें कामोत्तेजना भड़काने, कई दुर्गुण पैदा करने का बहुत बड़ा काम करते हैं। एक बुराई से अनेकों बुराइयाँ पैदा होती हैं और पतन का पथ प्रशस्त बन जाता है।
बहुत से धार्मिक कहे जाने वाले चित्र भी इसी श्रेणी में आते हैं। सीता-राम, कृष्ण-राधा, शिव-पार्वती, लक्ष्मी-विष्णु आदि युगल देवों के चित्र बहुधा बड़े ही अश्लील रूप में, अर्धनग्न या गन्दे हाव भावों के साथ मिलते हैं। चित्रकार एवं प्रकाशक का इनके पीछे क्या उद्देश्य रहता है इसकी हम चर्चा नहीं करना चाहते लेकिन साफ रूप से इतना अवश्य कहा जा सकता है कि अन्य भद्दे चित्रों की तरह ये चित्र भी मनुष्य को भद्दी प्रेरणा देते हैं। बहुत से मन्दिर में देव मूर्तियाँ भी अश्लील स्थिति में बनी रहती हैं, वे भी इसी श्रेणी में आती हैं।
कोई भी चित्र, दृश्य चाहे वह धार्मिक हो या सामाजिक कलाकृति हो या किसी चलचित्र का अंश यदि वह अश्लील, भद्दा और फूहड़ है तो उससे बचने का पूरा-पूरा प्रयत्न करना चाहिए क्योंकि इनसे मनुष्य में पाशविक प्रवृत्तियों को ही प्रोत्साहन मिलता, जागृत होती हैं। दूषित कामनायें भड़क उठती हैं, गन्दी प्रेरणायें मिलती हैं जो मनुष्य के चरित्र-आचरण, स्वभाव, प्रकृति को दूषित बना देते हैं।
अपने निवास स्थान अध्ययन कक्ष, दुकान कहीं के भी लिए आदर्श चित्रों का चुनाव करें। जिन पर उठते बैठते, चलते फिरते हर समय आपकी नजर पड़ती रहे। इनसे आप को उत्कृष्ट प्रेरणा मिलेगी। अच्छे चित्र, अच्छी पुस्तक का प्रभाव तो उसे पढ़ने उस पर मनन चिन्तन करने पर ही पड़ता है लेकिन चित्र तो देखने पर ही मनुष्य को प्रभावित करता है। गन्दे-अश्लील चित्र देखने से बचें। गाँधीजी के बन्दर की तरह बुराई की ओर से आँख मींचलें और अच्छाई को देखें।
हमारे दैनिक प्रयोग में आने वाली वस्तुओं का आजकल शुद्ध रूप में मिलना दूभर हो गया है। बाजार में कुछ भी वस्तु हम खरीदने जायें, खूब जाँच पड़ताल कर, उसे खरीदें लेकिन फिर भी विश्वास नहीं होता कि खरीदी गई वस्तु शुद्ध ही होगी। मिलावट की समस्या इस कदर व्यापक बन गई है कि वस्तु की शुद्धता के विषय में हम लोगों के मन में अविश्वास और सन्देह की जड़ बहुत अन्दर तक जम गई है। और ठीक भी है शुद्ध रूप में कोई वस्तु प्राप्त कर लेना बहुत कठिन हो गया है। यह ऐसा छूत का रोग है कि शहरी क्षेत्र से बढ़ता हुआ हमारे ग्रामीण क्षेत्रों तक में भी फैल गया है और अपनी जड़ें फैला रहा है। यद्यपि शहरों में मिलावट का रोग अधिक व्यापक और गहराई से व्याप्त है तथापि हमारे ग्रामीण अंचल इससे बचे हुए नहीं हैं। शिक्षित अशिक्षित, शहरी-ग्रामीण सभी अपनी उत्पादित वस्तुओं में अपने ढंग से मिलावट करते हैं।
घी, दूध, मसाले, आटा, अनाज, दवाइयाँ तथा अन्य बहुत-सी वस्तुएं बाजार से किसी भाग्यशाली को ही शुद्ध रूप से मिल पाती होंगी। घी के नाम पर वनस्पति मक्खन की जगह ‘मार्गरीन’, आटे में सेलखड़ी का पाउडर, पिसी हुई हल्दी में पीली मिट्टी, काली मिर्च में पपीते के बीज, कटी हुई सुपारी में कटे हुए छुहारे की गुठलियाँ, मिलाकर सरलता से बेची जा रही हैं। दूध में अरारोट या सपरेटा का पाउडर, पानी खूब मिलाया जा रहा है। मावे में उबले हुये आलू, शकरकन्द, या सपरेटा का खोवा, बहुत चल रहा है। बीड़ी सिगरेटों में रखी जाने वाली तम्बाकू में गधे, घोड़े की लीद मिलाने के समाचार भी हमने कई बार पढ़े हैं। बहुत सी दवाओं के नाम पर पंसारियों की दुकान में सड़ी गली जड़ी बूटियों का खाद, द्राक्षासव के नाम पर गुड़ का शीरा, खूब चलता है। अनाज में कंकड़, खराब अनाज, बूरे में पाउडर, शरबत में सैक्रीन खूब चलती है। यह एक प्रसिद्ध कहावत हो गई है कि “आजकल जहर भी शुद्ध नहीं मिलता।” चाँदी, सोना, ताँबा, पीतल कोई भी धातु अपने शुद्ध रूप में नहीं मिल पाती। वस्तु-वस्तु में, मिलावट आज एक सामान्य बात हो गई है। मिलावट के साथ-साथ असली वस्तु के स्थान पर नकली वस्तुयें खूब चल रही हैं जिसकी पहचान भी नहीं हो सकती।
पिछले दस वर्षों में हमारे यहाँ मिलावट की मात्रा काफी बढ़ी है। कई वस्तुओं में 25-30 प्रतिशत से लेकर 75-80 प्रतिशत से भी अधिक मिलावट होती है। हमारे लिये यह बात कितने दुर्भाग्य की है कि जहाँ एक ओर वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं, आसमान को चूम रही हैं वहाँ मिलावट की मात्रा भी बहुत बढ़ गई है। जन-जीवन की निर्वाह की सामग्री ही बड़ी कठिनाई से मिल पावे और वह भी अशुद्ध, मिलावटी हो तब उस समाज की शारीरिक मानसिक स्थिति का क्या हाल होगा, इसकी कल्पना सहज ही सामान्य बुद्धि का व्यक्ति कर सकता है। सचमुच ऐसे समाज का शारीरिक, मानसिक, नैतिक स्वास्थ्य दूषित होगा और इनके फलस्वरूप उसकी प्रगति के द्वार ही अवरुद्ध हो जायेंगे। यह ध्रुव सत्य है कि मिलावटी वस्तुओं के उपभोग से मनुष्य का स्वास्थ्य नष्ट होता है। स्वास्थ्य नष्ट होने के साथ-साथ जीवन की सभी सम्भावनाओं के मार्ग बन्द हो जाते हैं। शरीर से रुग्ण, जीर्ण-शीर्ण मनुष्य क्या कर सकता है? क्या सोच सकता है?
क्या मिलावटी वस्तुओं का प्रभाव जन-जीवन के स्वास्थ्य पर कम पड़ता है जब असंख्यों को रोगी बनना पड़ता है। रोग के साथ-साथ ही उसकी चिकित्सा पर होने वाला व्यय भी कुछ कम नहीं होता। कई बहुमूल्य जीवन फिर भी नहीं बच पाते और नष्ट हो जाते हैं मिलावटी वस्तुओं से उपभोग से। सचमुच ही व्यापक स्तर पर फैलने वाली भयंकर बीमारियों का एक मुख्य कारण अशुद्ध खाद्य का प्रयोग करना भी है। क्या मिलावट करने वाले यह नहीं सोचते कि उनके कारण कितनों को ही अकाल मौत का सामना करना पड़ता हैं? क्या वे परोक्ष रूप से जन-जीवन की सामूहिक हत्या के प्रयत्न नहीं करते। वस्तुओं में मिलावट करके? सभा में बोलते हुए भूतपूर्व स्वास्थ्य मंत्री श्री डी. पी. करमकर ने एक बार कहा था- “एक हत्यारा भी खाद्य पदार्थों में मिलावट करने वालों से अधिक ईमानदार है। वह अपने पाप के प्रति सच्चा होता है और उसे सीधे-सीधे इसका परिणाम भी दण्ड के रूप में भुगतना ही पड़ता है। किन्तु खाद्यपदार्थों में मिलावट करने वाला तो वस्तुओं को विषाक्त करके अनेकों व्यक्तियों की हत्या करके भी समाज में सच्चा, धार्मिक, बना बैठा रहता है और दण्ड से साफ बच जाता है। किसी भी रूप में मिलावट करने वालों को माफ नहीं किया जाना चाहिए। हत्यारों की तरह ही उन्हें भी अपराधी मानकर दण्ड देना अनिवार्य है क्योंकि वे अदृश्य रूप से अनेकों की जानें ले लेते हैं।”
क्या मिलावट करने वाले इस बात पर विचार करेंगे कि उनके द्वारा अज्ञात रूप से कितने जीवन नष्ट होते हैं। कितनों को रुग्ण जीवन बिताना पड़ता है। जीवन निर्वाह के लिए बेचारा मनुष्य न जाने कितनी मेहनत मजदूरी नौकरी चाकरी करता है और फिर भी तंग रहता है। तब तंगी की हालत में भी बाजार में से जैसे कैसे निर्वाह की वस्तुयें खरीद कर लाता है उसका उपभोग करके जब स्वास्थ्य, धन, समय, श्रम, नष्ट होते देखता है तो उसकी दीन स्थिति क्या होती है इसका भुक्त भोगी लोग सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। इन मिलावटी, विषाक्त वस्तुओं का सेवन करके कोई स्वस्थ सशक्त रह सकता है? कदापि नहीं। फिर कल्पना कीजिए उस समाज की, उस राष्ट्र की जहाँ खाद्य पदार्थों में मिलावट की समस्या व्यापक स्तर पर फैली हो? क्या वह देश वह समाज उन्नति कर सकेगा, शक्तिशाली बन सकेगा समृद्ध हो सकेगा इसका एक ही उत्तर है नहीं।
क्या मिलावट करके हम अपना ही नाश नहीं करते। यह सत्य है कि समाज के साथ ही व्यक्ति के जीवन का उत्कर्ष-अपकर्ष जुड़ा हुआ है। जिस समाज को हम अपने ही हाथों मिलावटी वस्तुओं का विष देकर रुग्ण, क्षीण, कमजोर बनाते हैं उसे नष्ट करते हैं क्या उसके साथ-साथ एक दिन हमारा नाश भी नहीं हो जायेगा? समाज के नष्ट होने के साथ ही हमें भी नष्ट होना पड़ेगा?
एक बार एक भारतीय सज्जन इंग्लैंड गये थे। एक स्थान पर दूध लेते समय वे पूछ बैठे “इसमें पानी तो नहीं मिला हैं” दुकानदार आश्चर्य चकित होकर बोला-”क्या आपके यहाँ दूध में पानी मिलाया जाता है?” उन सज्जन ने कोई उत्तर नहीं दिया। सचमुच बहुत से देशों में पर्याप्त मूल्य ले लिया जाता है लेकिन मिलावट करना एक बहुत ही हेय कर्म समझा जाता है। इसके मानी यह नहीं कि अन्य देशों में ऐसा होता ही नहीं है। फिर भी बहुत सी जातियों में इस अनैतिक कार्य को बहुत घृणित समझा जाता है। हमें भी राष्ट्र के लिये समाज के लिये जन जीवन की समृद्धि के लिये अपने नैतिक उसूलों के लिये खाद्य पदार्थों में मिलावट के पाप से बचना चाहिये देशव्यापी स्तर पर फैले हुए इस पाप प्रवृत्ति को दूर करना चाहिये। यदि इस सम्बन्ध में हम सफल हो सके तो राष्ट्र के विकास समाज के उत्थान, जन जीवन की समृद्धि में एक बहुत बड़ा काम हो सकेगा।
विकासवाद के अन्वेषक चार्ल्स डार्विन, जब मरणासन्न थे तो उनके घर वालों ने पादरी को बुलाया और कहा-इनकी आत्मा को शान्ति देने वाला धर्म संस्कार करा दीजिये।
पादरी ने कहा-यह महोदय नास्तिक रहे हैं। नास्तिक को स्वर्ग नहीं मिल सकता। इनके लिये धर्म संस्कार मैं तभी करा सकूँगा जब यह अपने आस्तिक होने की आस्था प्रकट करें।
डार्विन की छोटी पुत्री-मार्था ने पादरी से पूछा-मेरे पापा को, जो आजीवन सन्त की तरह रहे हैं, क्या संस्कार के अभाव में फिर भी नरक ही जाना पड़ेगा? क्या इन्हें स्वर्ग में बिना धर्म संस्कार के ही स्थान न मिल जायेगा?
पादरी बोला कि स्वर्ग तो ईश्वर का घर हैं, वे अपने विरोधियों को क्यों प्रवेश करने देंगे?
आश्विन का चान्द्रायण व्रत एवं सजीवन विद्या शिविर गायत्री तपोभूमि मथुरा में बड़ी सफलता एवं आनन्दमय वातावरण में सम्पन्न हुआ। स्थान की कमी के कारण 50 व्यक्तियों को ही स्वीकृति दी गई थी पर उनकी संख्या बढ़ कर 80 हो गई। कुछ लोगों को उनके विशेष अनुरोध पर निर्धारित संख्या का व्यक्तिक्रम करके स्वीकृतियाँ देनी पड़ीं। नवरात्रि में बीच के 9 दिन 27 व्यक्ति और बढ़ गये थे। उन दिनों साधकों की संख्या एक सौ से भी ऊपर पहुँच गई। स्थान की कमी की दृष्टि से सभी को असुविधा रही पर किसी प्रकार काम चल गया। शिक्षार्थियों ने इस असुविधा को भी किसी प्रकार सहन कर लिया।
चान्द्रायण व्रत को इस युग की सब से श्रेष्ठ तपश्चर्या माना गया है। अन्तःकरण पर चढ़े हुए मल आवरण और विक्षेपों का समाधान एवं संशोधन करने के लिए उससे बढ़कर और कोई साधन नहीं। वर्तमान जीवन में बन पड़े पापों का इस प्रकार अच्छा प्रायश्चित हो जाता है। इसे करने के उपरान्त जो लोग भावी जीवन में निष्पाप रहने की प्रतिज्ञा निभा लेते हैं उनके लिए निस्संदेह जीवन लक्ष्य की उपलब्धि सरल बन जाती है।
कब्ज, अपच, पेट में वायु उत्पन्न होते रहना जैसे उदर रोग ही आमतौर से अन्य अनेक रोगों का कारण होते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा-सिद्धान्तों के अनुसार कब्ज ही समस्त रोगों की एक मात्र जड़ है। कब्ज दूर हो जाने में-पेट के ठीक काम करने से, शरीर में नये जीवन का संचार होता है और निरोग दीर्घ जीवन की सम्भावना बढ़ जाती है। चान्द्रायणव्रत उदर रोगों का अमोघ उपचार है। एक महीना पेट को वैज्ञानिक ढंग का उपवास कराने का अवसर मिलता है उस विश्राम को पाकर उदर के अवयव फिर अपना काम ठीक प्रकार करना आरम्भ कर देते है उपरोक्त धर्मानुष्ठान में हमने प्राकृतिक चिकित्सा के आधुनिक विज्ञान सम्मत तथ्यों का भी समावेश कर दिया है इसलिए वह धार्मिक तपश्चर्या अब उदर रोगों की चिकित्सा की दृष्टि से भी उतनी ही महत्वपूर्ण बन गई है। आँतों की सफाई के लिये एनीमा आदि का उपयोग करते रहने से पेट अच्छी तरह साफ हो जाता है और उपवास का पूरा-पूरा लाभ भी मिलता है।
दुर्बल वृद्ध, बालक, महिलाएँ या मानसिक दृष्टि से कठोर उपवास सहन न कर सकने वालों के लिए दूध, छाछ, शाक, रस आदि की कुछ अतिरिक्त व्यवस्था कर दी जाती है जिससे यह कठिन उपवास सरल बन जाता है और दुस्साहसी लोग ही नहीं वरन् दुर्बल प्रकृति के लोग भी उसे आसानी कर पाते हैं। अलग-अलग व्यक्तियों की उदर सम्बन्धी कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए उनका अलग अलग उपचार भी चलता रहता है। जिससे शिविर में आने वाले को वह लाभ भी मिलता है जो किसी कुशल एवं विश्वस्त चिकित्सक की चिकित्सा करने से मिल सकना सम्भव है। अभी केवल उदर रोगों की चिकित्सा का ही यहाँ प्रबन्ध है। अन्य रोगों का उपचार प्रबन्ध नहीं है। फिर भी यह एक रोग मिट जाने से अन्य रोग 80 प्रतिशत स्वयं ही अच्छे हो जाते हैं। इस प्रकार चान्द्रायणव्रत शिविर शरीर शोधन की दृष्टि से एक अच्छी चिकित्सा पद्धति भी है।
शरीर और मन का एक प्रकार से उथल-पुथलकारी संशोधन हो जाने से कोई व्यक्ति अपनी जीवन प्रगति का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। यह लाभ चान्द्रायणव्रत शिविर में आने वालों को मिलता है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आश्विन के इस शिविर में देखा गया। जो भी आए उनमें से अधिकाँश इस अलभ्य अवसर को एक अनुपम सौभाग्य मानते हुए अपने भाग्य को सराहते हुए गये।
इस एक महीने में सवालक्ष गायत्री पुरश्चरण कर लेना अपने आप में एक श्रेष्ठ साधना है। यों साधारण गायत्री अनुष्ठान कोई भी अपने घर रहकर कर सकता है पर गायत्री तपोभूमि जैसे पवित्र स्थान में, चान्द्रायणव्रत करते हुए उसका महत्व बहुत बढ़ जाता है। साधारण परिस्थितियों में जो लाभ दस अनुष्ठान करने से मिलता है वह यहाँ की विशेष परिस्थितियों में एक में ही मिल जाता है। आध्यात्मिक साधना की दृष्टि से भी यह एक महीना प्रत्येक साधक के लिए बहुत उपयुक्त सिद्ध हुआ।
संजीवन विद्या का शिक्षण अध्यात्म ज्ञान का एक व्यावहारिक मार्ग दर्शन है। जिन्दगी जीने की कला से अपरिचित होने के कारण हमारे सामने चिन्ताओं, विक्षोभों, असफलताओं, कुण्ठाओं, बीमारियों एवं कठिनाइयों का पहाड़ खड़ा रहता है। पग−पग पर जीवन की निरर्थकता प्रतीत होती है। इस मानसिक विपन्नता को हटाकर आशा, उत्साह और व्यवस्थित जीवन एवं रचनात्मक दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा जिस प्रकार से सम्भव हो सकती है वह सब कुछ भाषणों तथा प्रयोगों द्वारा शिक्षार्थी की अन्तः भूमिका में प्रविष्ट कराया जाता है। यह पद्धतियाँ ऋषियों के गुरुकुलों में प्रयुक्त होती थीं इसलिये अति प्राचीन भी हैं और मनोविज्ञान की नवीनतम शोधों का तथा वर्तमान समाज विज्ञान के तथ्यों का समावेश रहने से यह नवीनतम भी है। इस प्रशिक्षण का जीवन-शोधन की दृष्टि से कैसा चमत्कारी प्रभाव पड़ता है उसे प्रत्येक शिक्षार्थी भली प्रकार अनुभव कर सकता है।
विगत जून में तीन परामर्श शिविर हुए थे। वे अलग तरह के थे। यह एक महीने का आश्विन शिविर सबसे पहले था इसलिये उसमें कुछ व्यावहारिक एवं व्यवस्था संबंधी कठिनाइयाँ तथा त्रुटियाँ रह गईं। पहले प्रयोग में यह स्वाभाविक भी था। अगले शिविरों में यह त्रुटियाँ दूर हो जायेंगी और वे अधिकाधिक उपयोगी सिद्ध होते जायेंगे। फिर भी हमें पहले शिविर में आशाजनक सफलता प्राप्त हुई है और यह सुनिश्चित हो गया है कि आगे इस पुण्य प्रक्रिया का लाभ उठा सकना हर अखण्ड-ज्योति पाठक के लिये सम्भव हो सकेगा। जीवन शोधन की इस विद्यापीठ को आरम्भ होते और उसका सफलतापूर्वक मूर्तिमान होते देखकर हमें कितना सन्तोष एवं हर्ष है उसका परिचय लेखनी द्वारा नहीं दिया जा सकता।
संजीवनी विद्या का प्रशिक्षण एवं चान्द्रायणव्रत तपश्चर्या का सम्मिलित सुयोग ऐसा है जिसका लाभ प्राप्त करने के लिये परिवार के सभी सदस्य आकुल हैं और सम्मिलित होने की स्वीकृति प्राप्त करने के लिये इतने पत्र आते हैं कि उनमें से बहुत थोड़ों को स्वीकृति दे सकना सम्भव हो पाता है। कारण यह है कि एक महीना ठहरने वाले को अपना भोजन आप बनाने वाले को उपयुक्त स्थान अभीष्ट ही है। पर गायत्री तपोभूमि में अलग कोठरियों की बहुत ही कम व्यवस्था है। जो परिवार समेत आते हैं उनके लिए तो किसी प्रकार कोठरियों की व्यवस्था हो जाती है, शेष सब को एक बड़े कमरे में इकट्ठे ही ठहरना पड़ता है जिसमें न तो उन्हें एकान्त मिल पाता है और न सामान ही यथास्थान व्यवस्थित रह पाता है।
इससे भी बड़ी कठिनाई यह है कि विद्या मन्दिर नामक छोटा कमरा जिसकी लम्बाई चौड़ाई 16&18 फुट है। बहुत ही कठिनाई से 50 व्यक्तियों के बैठने योग्य है। जून के तीनों शिविरों में लगभग 100-100 की उपस्थिति रही और इस आश्विन शिविर में उससे भी अधिक संख्या हो गई। यह प्रश्न विकट था कि इन्हें प्रवचन सुनने के लिए कहाँ कैसे बिठाया जाए? ठूँस ठाँसकर कमरे में भीतर तथा बरामदे में किसी प्रकार इन लोगों को बिठाया गया। फिर भी जिन्हें बाहर चबूतरे पर बैठना पड़ता था उन्हें भी सुनाई पड़ता रहे इसके लिए लाउडस्पीकर की व्यवस्था करनी पड़ी।
इन परिस्थितियों में 50 को स्वीकृति देने का ही हर शिविर में निश्चय किया जाता है पर वह संख्या रोकते-रोकते भी 100 हो जाती है। स्थान सम्बन्धी अभाव के कारण सभी आगन्तुकों को कष्ट उठाना पड़ता है। यद्यपि वे किसी प्रकार उसे सहन कर लेते हैं पर असुविधा तो आखिर असुविधा ही है। लगता है कि आगे 100 शिक्षार्थियों से कम के शिविर करने से काम न चलेगा। कम लोगों में भी हमें उतना ही समय लगाना पड़ता है जितना अधिक लोगों में। फिर आने वालों की आतुरता भावना एवं आवश्यकता को भी ध्यान में रखना पड़ता है। सफलताओं और उपयोगिताओं को देखते हुए कार्य का विस्तार होने ही वाला है। अतएव स्थान भी चाहिए ही।
इस समस्या की महत्ता को देखते हुए जबलपुर के श्री दाना भाई मेद्यजी राठौर ने सामान्य आर्थिक स्थिति होते हुए भी अपनी शक्ति से बाहर उदारता का परिचय देते हुए आठ परिवारों के ठहर सकने योग्य कमरे उनसे, लगी हुई कोठरी एवं बरामदों का निर्माण करा दिया है। उससे चान्द्रायणव्रत में आने वालों को बहुत कुछ राहत मिली। पर आवश्यकता को देखते हुए यह स्थान भी कम है। अभी कम से कम इतना ही स्थान ठहरने वालों के लिए और भी चाहिये। माता की इच्छा एवं प्रेरणा जब होगी। तब परिजनों में से कोई इन्हें भी पूरा कर देंगे। चन्दा माँगने का उनके लिये अपना कोई इरादा नहीं है।
तात्कालिक आवश्यकता प्रवचन हाल की है। ठहरने की बात तो किसी प्रकार चल भी सकती है पर प्रशिक्षण के लिए शिक्षार्थियों को एक स्थान तो चाहिए ही। वर्तमान स्थान उनके लिये सर्वथा अपर्याप्त है। इस तात्कालिक आवश्यकता को देखते हुए आश्विन शिविर में आये हुये शिक्षार्थी एवं तपस्वियों ने साहसपूर्ण कदम उठाया और उन्होंने आश्विन सुदी 5 का श्रम दान से इस हाल के बनाने का कार्य आरम्भ कर दिया। फावड़े और दोवरे लेकर सभी लोग जुट पड़े और देखते-देखते नींव खोदी गई उसमें ईंटें भी बिछा दी गईं। अब धीरे-धीरे जैसे साधन मिलेंगे यह कार्य आगे बढ़ेगा। फिलहाल इस कार्य को श्रमदान से जारी रखा जायेगा। तपोभूमि में कुछ साधक स्थायी रहते हैं कुछ समय-समय पर आते रहते हैं। इन सबके लिये श्रमदान अनिवार्य रहेगा और धीरे-धीरे यह निर्माण कार्य चलता रहेगा।
हवन सामग्री द्वारा होने वाले अग्निहोत्र का जो महत्व है उससे कम महत्व ज्ञान यज्ञ का नहीं है। आहुतियाँ देने से जिस प्रकार आत्म कल्याण और विश्व मंगल होता है उसी प्रकार जीवन निर्माण के प्रवचनों द्वारा भी आध्यात्मिक उद्देश्यों की पूर्ति होती है। इस दृष्टि से अग्निहोत्र की यज्ञशाला जितना ही इस ज्ञान-यज्ञ की यज्ञशाला का-प्रवचन हाल का भी महत्व है। इसके निर्माण में हर साधक को श्रमदान करते हुए प्रमुदित होना उचित भी है। चान्द्रायणव्रत शिविर में आने वालों ने इन्हीं भावनाओं के साथ श्रमदान किया भी।
यों कई साधक यह भी हिसाब लगा रहे थे कि इस ज्ञान यज्ञ की यज्ञशाला में अपनी ओर से एक हजार ईंटें लगवादें तो उसमें कितनी लागत आवे। ईंट, चूना, सीमेन्ट, लोहा, लकड़ी, मजूरी, जमीन खरीद, छत पटाव आदि का खर्च जोड़ने से यह लागत 100 के करीब निकली। कुछ व्यक्ति निर्धन होते हुए अपना भी इतना भाग लगाना चाह रहे थे। समयानुसार वे वैसा करेंगे भी। वे या कोई भी इस कार्य में न्यूनाधिक सहयोग देने के लिये स्वतन्त्र है। पर किसी को भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसके लिए कहा नहीं गया है। यहाँ की पिछली परम्परा याचना की नहीं रही तो अब या आगे भी क्यों रहेगी?
श्रमदान से बड़े-बड़े काम हो सकते हैं। सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ का तीन चौथाई काम परिजनों ने श्रमदान से ही पूरा कर लिया था। अब यह छोटा कार्य भी उस आधार पर क्यों पूरा न हो सकेगा? नवरात्रि में नये प्रवचन हाल का शुभारम्भ जिस उत्साह, जिस श्रद्धा और जिस भावना के आधार पर किया गया है उसे देखते हुए समयाडडडडडड और वह पूरा भी होना ही है। जब यह पूरा हो जाएगा और आने वाले के लिये स्वतन्त्र कोठरियों की व्यवस्था बन जायगी तो निर्धारित शिक्षा पद्धति, चिकित्सा पद्धति, एवं तपश्चर्या के विकास होने को अच्छा सुयोग भी मिल सकेगा।
पूर्व योजित घोषणा के अनुसार आगामी गीता शिविर तथा चान्द्रायणव्रत शिविरों को अगले तीन महीने स्थगित कर माघ में सम्मिलित रूप से करने का निश्चय किया गया है।
गीता शिविरों में पढ़ाये जाने के लिये। (1) गीता श्लोकों के समकक्ष हिन्दी पद्यानुवाद। (2) गीता श्लोकों के साथ रामायण चौपाइयों की संगतियाँ। (3) गीता श्लोकों से सम्बन्धित पौराणिक ऐतिहासिक गाथाएं तथा दृष्टान्त। (4) परिवार निर्माण के उपयुक्त प्रशिक्षण कर सकने वाली षोडश संस्कार विधि यह चार ग्रन्थ पाठक्रम में रखे गये थे। यह चारों मिलाकर हजार आठ सौ पृष्ठों की पाठ्य सामग्री है। आशा यह थी कि जेष्ठ शिविर के बाद आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद के तीन महीने हमें मिलते हैं उनमें इनका लेखन और मुद्रण कार्य पूरा कर लिया जायगा। पर युग-निर्माण योजना सम्बन्धी पुस्तक माला की व्यवस्था में इतना समय लग गया कि वे चारों ग्रन्थ तैयार न हो सके। इतने में आश्विन का चान्द्रायणव्रत शिविर आ गया। 50 की अपेक्षा 100 साधक उसमें आ गये। उन्हें उनके व्यक्तिगत जीवन का मार्ग दर्शन, शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य का अभिवर्धन तथा व्यवस्था सम्बन्धी कार्यों में व्यस्तता इतनी अधिक रही कि उन चार अधूरे ग्रन्थों को पूरा कर सकना संभव न हो सका।
आश्विन शिविर यों अनेक दृष्टियों से बहुत सफल रहा पर कुछ-कमियाँ रह गईं। प्राकृतिक चिकित्सा का प्रशिक्षण एवं उपचार करने के उतने साधन न थे जितने अधिक लोगों के लिये आवश्यक हैं। दूसरे ठहरने सम्बन्धी कठिनाई स्थानाभाव के कारण सभी को रही। तीसरे प्रवचनों के लिये 50 के स्थान पर 100 को बिठाने में सब लोग पूरी बात अच्छी तरह सुन न सके। आगामी शिविर आरम्भ करने तक यह तीनों कमियाँ पूरी कर लेनी आवश्यक हैं। जो प्रसाधन कम है उन्हें आगामी शिविर तक कर लेने के लिये यह शिविरों का प्रशिक्षण कार्य आगामी तीन महीने स्थगित रखने की ही बात ठीक जँची।
उधर युग-निर्माण परिवार के सदस्यों को आदर्श विवाह दहेज विरोधी अभियान, जातीय संगठन एवं अन्यान्य अनेक रचनात्मक कार्यों के लिये अधिक स्पष्ट अधिक व्यावहारिक मार्ग दर्शन एवं प्रचार साहित्य चाहिये। वह तैयार न होने से नवनिर्माण के व्यापक रचनात्मक कार्यों में जो उत्साहपूर्ण लहर आई है उसमें अड़चन उत्पन्न होती है। तद् विषयक छोटा प्रचार साहित्य, ट्रैक्ट, विषय पत्र, प्रतिज्ञा फार्म, नियमावलियाँ आदि चाहिये। उनके लिये शाखा संचालक आतुर होकर माँग कर रहे हैं।
अखण्ड-ज्योति परिवार ने युग-निर्माण योजना को कार्यान्वित करने के लिए जिस श्रद्धा तथा तत्परता से कदम बढ़ाये हैं उसे देखते हुये अपनी क्षमता से दस गुना काम करने की आकाँक्षा हम भी करते हैं पर समय और हाथ पाँव सीमित होने के कारण इच्छानुरूप कार्य यथा समय हो नहीं पाता। पिछले तीन महीनों से दिन रात व्यस्त रहते हुए भी इतने तात्कालिक कार्य शेष रह गये हैं कि उनकी पूर्ति के लिये आगामी तीन महीने शिविरों को स्थगित करने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष नहीं रह गया है। कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष इन तीन महीनों में रुके हुए आवश्यक कार्य पूरे हो जाने की आशा है। तभी शिविरों की कार्य पद्धति भी ठीक तरह चल सकेगी ऐसा मानने के लिये व्यावहारिक कठिनाइयों ने विवश कर दिया है।
अब आगामी शिविर माघ मास में होगा। वह जीवन विद्या चान्द्रायणव्रत और गीता शिक्षा का सम्मिलित शिविर होगा। उसमें दोनों ही प्रकार की शिक्षा सभी शिक्षार्थियों को सम्मिलित रूप से मिलेगी। प्रत्येक शिक्षार्थी अब चान्द्रायणव्रत की आध्यात्मिक साधना कर सकेगा, अपने शारीरिक मानसिक प्रतिरोध को हाल कर सकेगा, जीवन विद्या के उपयुक्त प्रशिक्षण प्राप्त करेगा, प्राकृतिक चिकित्सा का लाभ लेगा, ज्ञान प्राप्त करेगा और साथ ही गीता का मर्म समझकर आत्म कल्याण कर सकने तथा जन जागरण का उद्देश्य पूर्ण करने के लिये धर्म प्रचारक की भूमिका भी अदा कर सकेगा। अपने शिविरों को स्वर्ण सुयोग कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
संजीवनी विद्या की जो शिक्षा हम विविध प्रवचनों में देते हैं वह केवल गीता के माध्यम से देंगे। पूरे माघ मास हमारे द्वारा गीता कथा कही जाएगी और उसी माध्यम से वह सब कुछ बता दिया जाएगा जो एक प्रगतिशील मनुष्य के आत्मोत्कर्ष के लिए जानना आवश्यक है। कहना न होगा कि यह गीता कथा अनुपम ही होगी। सोये हुए मोहग्रस्त मन-अर्जुन-को जगाने के लिये उसमें बहुत कुछ प्रकाश विद्यमान रहेगा।
आगामी शिविर माघ मास में होगा। यह महीना आध्यात्मिक साधनाओं के लिए बहुत ही उपयुक्त है। माघ स्नान का पुण्य फल प्रख्यात है। प्रयाग में त्रिवेणी संगम पर पूरे एक महीने सहस्रों नर-नारी हर वर्ष माघ मास में ‘कल्पवास’ करते हैं। गीता शिक्षा चान्द्रायण तप, एवं गायत्री उपासना की यह त्रिवेणी भी कल्पवास के उपयुक्त ही है। आन्तरिक कायाकल्प और दूध-कल्प, छाछ-कल्प, शाक-कल्प, अन्न-कल्प आदि की योजनायें इस अवसर को सच्चे अर्थों में कल्पवास बना देंगी। इसी बीच में माता सरस्वती का जन्म दिन बसन्त पंचमी पर्व भी पड़ता है। अखण्ड-ज्योति की, हमारी साधना जीवन की जयन्ती भी उसी दिन है। इन कारणों से भी यह माघ मास अधिक शुभ अवसर बन जाता है।
पौष सुदी पूर्णिमा (17 जनवरी 65) में यह शिविर आरम्भ होगा इसलिये 16 जनवरी की शाम तक विद्यार्थियों को मथुरा आ जाना चाहिये। यह माघ मास से पुरे एक महीने चलेगा। माघ सुदी पूर्णिमा (15 फरवरी को) समाप्त हो जायगा।
आश्विन में 50 साधकों को स्वीकृति दी गई थी। पर माघ में 100 को देने की व्यवस्था कर रहे हैं। फिर भी इच्छुकों की संख्या इससे कई गुनी होनी स्वाभाविक है। सब को प्रवेश नहीं मिल सकेगा। जिन्हें इससे आगे या पीछे की स्वीकृतियाँ पहले दी जा चुकी हैं वे अब उन्हें रद्द मान लें और माघ शिविर में आने के लिये ही आवेदन करें। अब नये सिरे से स्वीकृतियाँ दी जायेंगी। समय से पहले ही इसके लिये पत्र व्यवहार करके अपना स्थान सुरक्षित करा लेना उचित होगा। जगह न रहने पर किन्हीं भी अनुरोधों को स्वीकार कर सकना हमारे वश की बात भी न रहेगी।
युग-निर्माण आन्दोलन का विधिवत् उद्घाटन गत वर्ष गुरुपूर्णिमा (जून 63) को हुआ है। इस जून में उस’का पहला वर्ष पूरा होकर दूसरा प्रारम्भ हुआ। पहला वर्ष संगठन एवं व्यवस्था में लग गया। दूसरा वर्ष ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक के साथ आरम्भ हुआ। इस नई पत्रिका की अनिवार्य आवश्यकता इसलिये पड़ गई कि गत वर्ष आन्दोलन ने गहरी नींव जमा ली थी और इस वर्ष इस पुण्य प्रक्रिया को बहुत आगे तक गतिशील होना था। इतने बड़े आन्दोलन के संचालन, मोड़, मार्ग-दर्शन के लिए प्रस्तुतः कतिपय दैनिक पत्रों की आवश्यकता है। कम से कम एक अच्छा साप्ताहिक तो होना ही चाहिए। वह भी न हो तो पाक्षिक से और क्या कमी की जाय? अतएव एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में निकाला हुआ यह पाक्षिक साधनों की दृष्टि से दुर्बल होते हुए भी अपनी कर्तव्य भूमिका का सुचारु रूप से संचालन कर रहा है।
अखण्ड-ज्योति स्थायी महत्व की वस्तु है। उसे लोग इस युग की गीता के रूप में नियमित स्वाध्याय के लिये पीढ़ियों तक संग्रह करने के लिये सुरक्षित रखते हैं। उसमें जो कुछ छपता है वह स्थायी महत्व का होता है। आन्दोलनों में सामयिक परिस्थितियों एवं प्रेरणाओं की प्रधानता रहती है इसलिये उसे समाचार प्रधान बनाना पड़ता है। ‘अखण्ड-ज्योति’ विचार प्रधान है। उसमें कुछ दिनों “युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति” नामक स्तम्भ रखकर इस आवश्यकता की आँशिक पूर्ति की गई थी पर वह चिन्ह पूजा मात्र थी। जिस प्रचण्ड आन्दोलन में तीस हजार मस्तिष्क और साठ हजार हाथ काम कर रहे हैं, जिसकी गतिविधियां निरन्तर तूफानी तेजी के साथ बढ़ती जा रही हों उसके लिये ‘अखण्ड-ज्योति’ में रहने वाला चार छह पन्ने का छोटा-सा स्तम्भ क्या काम कर सकता था? उससे आवश्यकता की कितनी पूर्ति हो सकती थी? काम भी कुछ बनता न था और अखण्ड-ज्योति के स्थायी महत्व की सामग्री भी उतनी कम पड़ जाती थी। इन परिस्थितियों में नई पाक्षिक पत्रिका आरम्भ करने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष न रह गया था।
प्रसन्नता की बात है कि इस नये प्रयास ने विगत चार महीने में ही अपना एक नया स्थान बनाया है। अपने परिवार के सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं ने उसका सच्चे मन से स्वागत किया है और आन्दोलन की एक अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति का मार्ग निकलने पर अत्यधिक सन्तोष प्रकट किया है। इस पाक्षिक ने सारे परिवार में एक नया उत्साह, नया जीवन, नया प्राण फूँका है और जो सदस्य निष्क्रिय पड़े हुए थे वे भी करवटें ही नहीं बदल रहे हैं वरन् कुछ करने के लिये भी कटिबद्ध हो रहे हैं। जिस प्रकार अखण्ड-ज्योति सोचने की दिशायें ठीक करती है। उसी प्रकार योजना जीवन-क्रम को ठीक तरह संचालित करने-’क्रियाशीलता में उल्लास भरने के लिये महत्वपूर्ण मार्ग दर्शन करती है। विचार और कार्य दोनों के मिलने में ही तो प्रगति का पथ प्रशस्त होता है। इस तथ्य को सत्य के रूप में प्रस्तुत करने के लिये यह दोनों ही पत्रिकायें अपनी-अपनी महत्वपूर्ण भूमिकाएँ प्रस्तुत कर रही हैं।
नई पत्रिका अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिये अनिवार्य आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत हुई है। उसे पढ़कर ही युग-निर्माण आन्दोलन में भाग ले सकने के लिये आवश्यक उत्साह एवं मार्ग दर्शन प्राप्त होता है। अतएव परिजन उसे उसी भाव से पढ़ने भी लगे हैं। ‘आमतौर से सक्रिय कार्यकर्ताओं ने उसे भी अपने ही पैसे से मँगाया है और अन्य सदस्यों तक उसे पहुँचाने एवं पढ़ाने की व्यवस्था कर दी है। जहाँ अधिक कठिनाई एवं कंजूसी आड़े आई है वहाँ कई सदस्यों ने मिल-जुलकर उसे मँगा लिया है। सन्तोष की बात है जहाँ कहीं भी अपने परिजन या परिवार है वहाँ यह पहुँचने लगी है और उत्साहपूर्वक पढ़ी जाने लगी है। ऐसे आलसी लोग बहुत ही कम हैं जिन्होंने नव-निर्माण के पाँचजन्य की तुमुल ध्वनि को भी अपने बहरे कानों में प्रवेश नहीं होने दिया है और कोई करवट बदलने का प्रयत्न नहीं किया है। आशा तो उनसे भी यही की जाती है कि आज नहीं तो कल उन्हें भी परिवार के इस महान अभियान के लिये आरम्भ हुई पुण्य प्रक्रिया के लिये कदम से कदम मिलाकर चलना पड़ेगा।
अब युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति का संक्षिप्त संकेत ही अखण्ड-ज्योति के अन्तिम दो-चार पृष्ठों में रहा करेगा। बाकी तो सब कुछ विस्तारपूर्वक बताने के लिये पाक्षिक पत्रिका है ही जहाँ उसे नहीं मँगाया गया है वह अगले ही दिनों उसे मंगाया भी जाने लगेगा। तब अपने रचनात्मक कार्य की प्रेरणा सन्देश भी सभी परिजनों तक पहुँचना संभव हो जायेगा। ऐसी दशा में अखण्ड-ज्योति में उस स्तम्भ के रखने की कुछ उपयोगिता नहीं रह जाती।
एक बड़े हर्ष की बात यह भी है कि पत्रकारिता की दृष्टि से युग-निर्माण योजना को एक ‘अनुपम घटना’ के रूप में देशभर के पत्र-पत्रिकाओं तथा विचारकों, विद्वानों एवं साहित्यकारों ने उसका स्वागत किया है। अब तक एक हजार से अधिक पत्र ऐसे आये हैं जिनमें इस सम्पादन शैली को भारत में ‘सर्व प्रथम’ माना गया है। पाक्षिक में छपने वाले लेखों, विचारों और समाचारों को अनेक पत्र-पत्रिकायें ‘उद्धृत’ कर रही हैं। कितने ही नवोदित साहित्यकार ऐसे अद्भुत सम्पादन की शिक्षा प्राप्त करने के लिये लालायित हो रहे हैं। चार महीने का यह प्रयास इतना सत्कार प्राप्त करेगा इसकी किसी को स्वप्न में भी आशा न थी। अखण्ड-ज्योति परिवार से बाहर लोग भी उसे एक अनुपम पत्रिका मानकर माँग रहे है। इसे ईश्वर की महती अनुकम्पा के अतिरिक्त और क्या कहा जाए?
आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं साधनात्मक
ईश्वर और उसकी प्राप्ति
अपना उद्धार आप करें
आत्म-कल्याण का राजमार्ग
पन्थ अनेक-लक्ष्य एक
वेदों का दिव्य सन्देश
जिन्दगी कैसे जिएँ?
आप सर्वशक्तिमान हैं
मनुष्य का मूल्याँकन
आशा की जीवन-ज्योति
विचारों की अलौकिक शक्ति
संकल्पशक्ति के अद्भुत चमत्कार
प्रगति के पथ पर
इन दुर्गुणों को छोड़िए
चिन्ता छोड़ो प्रसन्न रहो
सद्गुणों की सच्ची संपत्ति
कविता और गायन
युग सन्देश
युग गायन
युग वीणा
उद्बोधन
दोहा-अंताक्षरी
आरोग्य रक्षा और प्राकृतिक चिकित्सा
आरोग्य रक्षा के रहस्य
क्या खाएं कैसे खाएं?
प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान
कब्ज कैसे दूर हो?
बलवर्धक व्यायाम
शक्ति का स्रोत प्राणायाम
तम्बाकू-एक घातक विष है
पारिवारिक समस्याओं का हल
परिवार और उसका निर्माण
मितव्ययी बनिए-सुखी रहिए
सुख शान्तिमय गृहस्थ
सुसंतुलित परिवार
बाल-निर्माण साहित्य
शिशु जन्म से पूर्व
शिशु और अभिभावक
हमारे महान् उत्तराधिकारी
बच्चों को कैसे सुधारा जाए?
बच्चे और उनका मनोविज्ञान
बाल विकास की समस्याएँ
बालकों का नव निर्माण
नव निर्माण के दर्शन एवं मार्ग
हम बदलें तो दुनिया बदले
समाज की अभिनव रचना
समस्त समस्याओं का एक ही हल
नये युग का सूत्रपात
नये जीवन की नई प्रेरणा
हमारी युग-निर्माण योजना
विष से अमृत की ओर
कथा, इतिहास और जीवन-चरित्र
धर्म पुराणों की सत्कथाएँ
चरित्र निर्माण की कथाएँ
बड़ों की बड़ी बातें
भारत की महान विभूतियाँ
संसार के महापुरुष
नोट- प्रत्येक पुस्तक का मूल्य एक-एक रुपया है। 10) रु से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाकखर्च माफ । 10) रु से कम की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च भी देना पड़ेगा। पूरा सैट मंगाना हो तो अपने रेलवे स्टेशन का नाम भी लिखें। अपना नाम व पूरा पता और स्पष्ट अक्षरों में हिन्दी या अंग्रेजी में लिखना चाहिए।
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा। (यू.पी.)
आए ले हमारी प्रीति हम तैयार हैं।
मृत्यु की भी न जिसको भीति आए ले हमारी प्रीति हम तैयार हैं।
चाहता हूँ स्वर्ग से अमरत्व को लाऊँ धरा पर खींच।
चाहता हूँ विश्व की मरुभूमि को दूँ आँसुओं से सींच।
चाहता हूँ मैं बुझा दूँ यह विषमता की धधकती आग।
चाहता हूँ विश्व-पट से मैं मिटा दूँ रक्त के यह दाग।
यह मनुजता जो सतत देवत्व की पर्याय-
चाहता हूँ यह मनुष्य की अर्चना बन जाए।
आ न पाए फिर मरण त्यौहार जीवन-पर्व के उपरान्त।
चाहता हूँ हो न मानव मृत्यु से पंचत्व से भी क्लाँत।
सृष्टि में जो कुछ अशिव का तत्व है परिव्याप्त।
वेदना-वैषम्य का, नैराश्य का उत्पात।
चाहता हूँ मैं इसे शिव-सप्त में अनुरक्त में दूँ ढाल,
हो न मानव-चेतना पशु-वृत्ति से पामाल।
पाषाण की पूजा बहुत कुछ की उपेक्षित हो रहा इन्सान।
राष्ट्र की बगिया इसी से आज तक वीरान-
हो नया निर्माण मानव का, नए युग का नया इतिहास।
चाहता हूँ प्राण-पण से मैं नई धरती, नया आकाश।
मुक्त गाए गए मनुज जो मुक्ति के पदगीत, आए ले हमारी प्रीति हम तैयार हैं।
मृत्यू की भी हो न जिसको भीति आए ले हमारी प्रीति हम तैयार है।
-डॉ राजकुमार पाण्डेय ‘कुमार’
*समाप्त*