शान्ति की खोज में चलने वाले पथिक को यह जान लेना चाहिए कि अकेले रहने या जंगल पर्वतों में निवास करने से शांति का कोई सम्बन्ध नहीं। यदि ऐसा होता, तो अकेले रहने वाले जीव जन्तुओं को शान्ति मिल गई होती और जंगल पर्वतों में रहने वाली अन्य जातियाँ कब की शान्ति प्राप्त कर चुकी होतीं।
अशान्ति का कारण है आन्तरिक दुर्बलता। स्वार्थी मनुष्य बहुत चाहते हैं और उसमें कमी रहने पर खिन्न होते हैं। अहंकारी का क्षोभ ही उसे जलाता रहता है। कायर मनुष्य हिलते हुए पत्ते से भी डरता है और उसे अपना भविष्य अन्धकार से घिरा दीखता है। असंयमी की तृष्णा कभी शान्त नहीं होती । इस कुचक्र में फँसा हुआ मनुष्य सदा विक्षुब्ध ही रहेगा भले ही उसने अपना निवास सुनसान एकान्त में बना लिया हो।
नदी या पर्वत सुहावने अवश्य लगते हैं। विश्राम या जलवायु की दृष्टि से वे स्वास्थ्यकर हो सकते हैं पर शान्ति का उनमें निवास नहीं। चेतन आत्मा को यह जड़ पदार्थ भला शान्ति कैसे दे पावेंगे? शान्ति अन्दर रहती है और जिसने उसे पाया है उसे अन्दर ही मिली है। अशान्ति उत्पन्न करने वाली विकृतियों को जब तक परास्त न किया जाय तब तक शान्ति का दर्शन नहीं हो सकता, भले ही कितने ही सुरम्य स्थानों में कोई निवास क्यों न करता रहे।
......सन्त तिरुवल्लुवर
पूजा अर्चा का तात्पर्य ईश्वर को प्रसन्न करना नहीं वरन् अपनी भक्ति भावना, प्रेम-प्रकृति को विकसित करना है। एक महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक व्यायाम की तरह ही पूजा-अर्चा की प्रक्रिया को माना जा सकता है, जिसके आधार पर पूजा-काल में किया हुआ अभ्यास हमारे स्वभाव का एक अंग बन जाय। विचारों और कार्यों में प्रेम की दिव्य पुण्य प्रकृति झिलमिलाने लगे यही पूजा की सार्थकता है। हम जो कुछ भी सोचें उसमें प्राणिमात्र के हित साधन की आकांक्षा ओत-प्रोत रहे और जो कुछ करें उसका प्रत्येक अंश विश्व मानव की सुख शान्ति अभिवृद्धि करने वाला सिद्ध हो, यही तो प्रेममय जीवन की गतिविधि हो सकती है। भक्ति -मार्ग का यही लक्ष्य हैं। ईश्वर-भक्त के लिये अपने जीवन को इसी दिशा में अग्रसर करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। भक्त उसे ही कहा जा सकता है जो प्राणिमात्र में ईश्वर को समाया हुआ देखता है और उसे पाप-पंक की गन्दगी से स्वच्छ करके सब प्रकार स्वच्छ एवं उत्कृष्ट बनाने के लिये प्रयत्न करता रहता है। हर किसी को उसकी इच्छानुसार सन्तुष्ट कर सकना न तो उचित है और न आवश्यक। क्योंकि बहुत से लोग ऐसे हैं जो दुष्टतापूर्ण आकाँक्षायें रखते हैं, दूसरों का शोषण करना चाहते हैं। यदि उन दुष्प्रवृत्तियों को भी पूर्ण करने के लिए कोई भोला भावुक व्यक्ति प्रयत्न करने लगे तब तो उसमें अनीति ही पनपेगी, असुरता का पोषण होगा। प्रेमी को विवेकशील भी रहना पड़ता है ताकि दूसरों के हित साधन का सच्चा उपाय समझ सके और जरूरत हो तो कड़ुई कुनैन खिलाने या फोड़े का आपरेशन करने वाले डॉक्टरों की तरह बाहर से निष्ठुर एवं कठोर दीखने वाला दूरदर्शितापूर्ण व्यवहार भी कर सके। कठोरता के पीछे भी अनन्त करुणा छिपी हो सकती है।
समयानुसार व्यवहार की कोमलता या कठोरता का अन्तर रहना स्वाभाविक है और आवश्यक भी। पर उसके मूल में अपना स्वार्थ साधन नहीं, दूसरों की हित साधना—दूरवर्ती स्थिर फल देने वाली श्रेय-योजना ही सन्निहित होनी चाहिए। जीवन की यही सर्वोत्कृष्ट नीति हो सकती है। इसी में मानव जीवन की सफलता और सार्थकता मानी जा सकती है। प्रेमी स्वभाव बनाने की साधना को ही ईश्वरभक्ति या पूजा अर्चा कहते हैं। इस उद्देश्य में हम जितने ही सफल होते जाते हैं ईश्वर उतना ही हमारे निकट खिंचता चला आता है। वस्तुतः ईश्वर हमारे नितान्त निकट है। रोम रोम में समाया हुआ है। प्रत्येक श्वाँस प्रश्वाँस में उसी की बंशी बजती है। अन्तरात्मा में बैठा हुआ वह क्षण-क्षण में हमारे साथ विचार विनिमय करता है और बिना पूछे ही श्रेय साधन के आवश्यक परामर्श देता रहता है। हमीं है जो उसकी उपेक्षा करते हैं, भुलाये रहते हैं और अवज्ञा की अशिष्टता बरतते हैं। ईश्वरभक्ति इतने से ही पूर्ण हो सकती है कि उसे हम अपने कण-कण में समाया हुआ, अपने चारों ओर फैला हुआ। हर घड़ी साथ रहता, खेलता और मैत्री निबाहता हुआ देखें। इतनी अनुभूति अन्तरात्मा में जागृत हो सके तो समझना चाहिए कि ईश्वर मिल गया।
ईश्वर को अपनी मनमर्जी के अनुसार चलाने की, उसे नौकर जैसे हुक्म देने की धृष्टता छोड़कर यदि उसकी मर्जी से अपनी मर्जी मिलाने की शिष्टता सीख लें तो ईश्वर की उपलब्धि का जो लाभ मिल सकता है वह निश्चित रूप से मिल जायगा। ईश्वर प्राप्ति कोई ऐसा कार्य नहीं है जिसके लिए जगह-जगह भटकना पड़े। परमात्मा कहीं खोया हुआ नहीं है जिसे ढूंढ़ना पड़े। वह नाराज नहीं है जिसे प्रसन्न करना पड़े। करना केवल इतना ही है कि उसे जानते हुए भी अनजान जैसी गति-विधियों को अपना रखा है उन्हें बदल दिया जाय। पूजा अर्चा के समय तक ही ईश्वर का जप ध्यान करने को सीमित न रख कर, उस अनुभूति को यदि पूरे समय, पूरे जीवन-क्रम में, पूरी स्नेह-सम्वेदना के साथ देखा, समझा और अनुभव किया जा सके तो ईश्वर प्राप्ति का यह लक्ष्य सहज ही प्राप्त हो सकता है। अंगार पर भस्म की परत चढ़ जाने से उसका स्वरूप अग्नि जैसा न रहकर कुछ और ही प्रकार का बन जाता है। जलता हुआ अंगार गरम होता है। रंग लाल रहता है, प्रकाश भी उसमें से निकलता है, किन्तु जब वह कुछ समय ऐसे ही निष्क्रिय पड़ा रहता है, और नया ईंधन नहीं मिलता तो धीरे-धीरे बुझने लगता है। ऊपर की परत पर भस्म की एक तह छा जाती है। तब देखने में वह काला, प्रकाश रहित और छूने से उष्णता से रहित बन जाता है। यही बात आत्मा की भी है। ईश्वर का अंश होने से वह अग्नि जैसे दिव्य गुणों से परिपूर्ण है, पर जब दिव्य विचारों और दिव्य कर्मों का ईंधन नहीं मिलता तो वह मुरझाने और बुझने लगता है। मल, आवरण और विक्षोभ की राख जैसी पर्त उस पर छा जाती है। तब वह निष्कृष्ट कोटि का जीव मात्र रह जाता है। अगणित मनुष्य इसी स्थिति में पड़े हुए हैं। उनके गुण,कर्म, स्वभाव ऐसे घटिया होते हैं कि पशु से, कीट पतंगों से भी निम्न श्रेणी में ही उन्हें गिना जा सकता है। ऐसी दशा में यह सन्देह होने लगता है कि इन घृणित व्यक्तियों को ईश्वर का पुत्र व आत्मा कैसे कहा जाए? जलते हुए अंगार और राख के ढके हुए अंगार में जो अन्तर होता है वही प्रबुद्ध आत्माओं और पतित नर-पामरों के बीच भी पाया जाता है।
राख की परत हटा देने पर अंगार का भीतरी भाग पुनः गरम, प्रकाशवान और लाल ही दृष्टिगोचर होता है। इसी प्रकार कुविचारों और कुसंस्कारों का आवरण हटा देने पर साधारण स्तर का प्रतीक होने वाला मनुष्य भी महात्मा, महापुरुष एवं देवता की श्रेणी में पहुँच जाता है। अन्तस्तल में महानता मौजूद रहने से आवरण को हटा देने मात्र की प्रक्रिया उसे पूर्व स्थिति में ले आती है। उपासना और आराधना आत्मा पर चढ़े हुए मल-आवरण और विक्षोभों के हटाने के निमित्त ही की जाती है। बर्तन माँजने से वे पुनः चमकने लगते हैं, धो डालने से कपड़े पुनः स्वच्छ हो जाते हैं, स्नान करने से शरीर में पुनः ताजगी आ जाती है। उपासना के द्वारा आत्मा पर उच्च संस्कार डालने की विधि-व्यवस्था यदि ठीक प्रकार बनी रहे तो उसकी पवित्रता, महानता, एवं उत्कृष्टता भी निरन्तर बढ़ती चली जाती है। यह प्रगति धीरे-धीरे उन्नति के उच्च शिखर तक ले पहुँचती है और आत्मा की स्थिति भी परमात्मा के समान बन जाती है। उसमें वे सब विशेषताएँ और शक्तियाँ अवतरित होती हैं जो उसके उद्गम केन्द्र परमात्मा में मौजूद हैं।
इसमें कठिनाई अवश्य है। पूजा में थोड़े कर्मकाण्ड की विधि-व्यवस्था पूरी कर लेने से काम चल सकता है, पर ईश्वर प्राप्ति तो तभी निभेगी जब पूरा जीवनक्रम ही दिव्यता के साँचे में ढाला जाय। आत्मिक पवित्रता ही ईश्वर प्राप्ति की निशानी है। जो आत्मा पवित्र है उसे अपने भीतर परमात्मा की झाँकी प्रतिक्षण होती रहेगी।
तपस्वी, साधकों में अनेकों आध्यात्मिक विशेषतायें पाई जाती हैं। इनका व्यक्तित्व अनेकों ऋद्धि-सिद्धियों से भरा होता है। अपने निज के लिए उज्ज्वल भविष्य की रचना करने के साथ-साथ वे दूसरों का भी बहुत भारी हित साधन कर सकने की शक्ति से सम्पन्न होते हैं। माया, स्वार्थ, अज्ञान, वासना, तृष्णा के—काम, क्रोध, लोभ,मोह, मद, मत्सर के—बन्धनों में बँधा हुआ जीव तुच्छ है। उसकी शक्ति सामर्थ्य, स्थिति सब कुछ तुच्छ है। छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए उसे दीनता प्रकट करते और अभाव कठिनाइयों का रोना रोते देखा जा सकता है। पर जब वह इन तुच्छताओं का परित्याग करके आत्मस्वरूप को पहचान लेता है और जो सोचना चाहिए वही सोचता है, जो करना चाहिए वही करता है तो वह प्रबुद्ध आत्मा ईश्वर के बिलकुल समीप जा पहुँचता है और वे सब विशेषताएं उसमें प्रकट होती हैं जो ईश्वर में मौजूद हैं। सिद्ध पुरुषों की संकल्प-शक्ति के बल पर सारा संसार दहल उठता है, लोक-लोकान्तरों तक इसकी आकाँक्षा हलचल मचा देती है। अपने तप और आशीर्वाद का एक कण दूसरों को देकर वह उन्हें निहाल बना सकता है। अष्टसिद्धियों और नव-निधियों का वर्णन झूठा नहीं है। मानव प्राणी अनन्त शक्तियों से ओत-प्रोत हैं। ब्रह्माँड का सारा नक्शा पिण्ड में मौजूद है। इस शरीर के अन्दर समस्त दिव्य शक्तियाँ बीज रूप में मौजूद हैं। साधना के द्वारा उन्हें विकसित करने के पश्चात् मनुष्य महान् ऐश्वर्यवान् बन सकता है।
व्यावहारिक जीवन में यह सभी चाहते हैं कि लोग हमारे साथ सत्य बोलें, सदाचरण करें और सहानुभूति प्रकट करें। आत्मा अपनी श्रेष्ठता, सत्य के द्वारा ही तो व्यक्त करता है। सत्य आत्मा का नैसर्गिक गुण है। इस विशेषता के कारण ही मनुष्य अपने समीपवर्ती लोगों से सदैव सत्य व्यवहार की ही अपेक्षा किया करते हैं। चोर, बदमाश, लफंगे, उठाईगीर तक भी दूसरों से झूठी बात सुनकर जल-भुन उठते हैं और इसका प्रतिकार लेने के लिए तुल पड़ते हैं। हम दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, यह दूसरी बात है पर एक बात जो प्रत्येक प्राणी में समान रूप से दिखाई देती है, वह यह है कि सभी सत्य के प्रति आदर-भाव रखते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि सत्य ही आत्मा की अभिव्यक्ति है। तत्वदर्शियों का कथन है कि “परमात्मा यदि किसी के समक्ष प्रकट होना चाहे तो उसे प्रकाश से अपना शरीर और सत्य से अपनी आत्मा को धारण करना पड़ेगा।”
मानव जीवन की सुव्यवस्था का आधार सत्य है। हम सभी से सत्यानुसरण की अपेक्षा रखते हैं, इसका अर्थ यही हुआ कि लोगों को प्रसन्नता, आदर-भाव, व्यवस्था, स्वस्थ चिन्तन, परिपूर्णता और सुख की प्राप्ति सत्य से होती है। जब तक लोग पारस्परिक विश्वास प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक किसी प्रकार का कारबार चला नहीं सकते। किसी से अधिक देर तक संपर्क भी इस प्रकार नहीं रखा जा सकता। असत्य के अन्धकार में जब तक वस्तु स्थिति ठीक प्रकार जान नहीं पड़ती तब तक भ्रमवश कोई विश्वास भले ही प्राप्त कर ले किन्तु सत्य का प्रकाश उदय होते ही विद्रूप उत्पन्न हो जायेगा। घृणा और तिरस्कार, निन्दा और निरादर की परिस्थितियाँ आते देर न लगेगी। व्यवस्था ही इस बात की द्योतक है कि लोग आपस में कितना विश्वास करते हैं। जो लोग मूर्ख बनाकर धोखादेही को ही जीवन का व्यापार मानते हैं, वे बड़ी भूल कर रहे हैं। यह अपने दायित्व के प्रति अकर्त्तव्य की भावना है, इससे किसी को किसी अच्छे परिणाम की आशा नहीं करनी चाहिए। सन्त इमर्सन का कथन है-”व्यापार-जगत में विश्वास व्यवस्था का यदि लोप हो जाये तो सारे मानव-समाज का ढाँचा ही अस्त व्यस्त हो सकता है।”
इस बात की सत्यता का अनुमान आज की परिस्थितियों से भली-भाँति लगाया जा सकता है। दुकानदार लोग दूसरों को ठगने और अधिक धन कमाने की गरज से दूध में पानी, घी में वनस्पति, खोये में आटा मिलाकर ग्राहक की जेब काट लेते हैं। थोड़ी देर के लिए इस पर उन्हें बड़ी प्रसन्नता होती है, किन्तु दूसरे दिन बच्चा बीमार हो जाता है तो डॉक्टर के पास जाता है। डॉक्टर भी सस्ते मूल्य की दवाएं महंगे चार्ज लेकर उससे अनुचित मुनाफा कमाता है। डॉक्टर को वकील, वकीलों को फर्नीचर वाले, फर्नीचर वालों को इनकम-टैक्स वाले, सारे के सारे एक ही जाल में बुरी तरह से जकड़े हैं। किसी को भी चैन नहीं मिल पाता। यह सारी अव्यवस्था इस कारण है कि लोगों में ईमानदारी की प्रवृत्ति नहीं रही और एक दूसरे को ठगने के कुचक्र में फँस कर सभी कोई घाटा उठा रहे हैं।
लोग समझते हैं कि दूसरों को धोखा देते रहना आसान है। इसे वे अपनी सफलता का आसान तरीका मानते हैं, किन्तु चालाकी देर तक छिपती नहीं। असलियत का अन्त में पता चल ही जाता है। समय पर “ढोल की पोल” खुले बिना रहती नहीं। जब सही स्थिति का पता चल जाता है, तो सभी उससे घृणा करने लगते हैं, दूर भागते हैं। सचाई और ईमानदारी का ही एक मार्ग “साँच को आँच” की कहावत के अनुसार उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। प्रारम्भ में सत्यशील लोगों को भले ही घाटा उठाना पड़े, किन्तु जब लोगों की नजर में उसका मूल्य चढ़ जाता है तो सम्मान भी मिलता है और सफलता भी। सत्य का मार्ग किसी भी प्रकार घाटे का सौदा नहीं कहा जा सकता।
सत्य की महिमा सदैव से ही गाई जाती रही है। शास्त्रकार ने लिखा है :-
अश्वमेध सहस्रञ्च सत्यञ्च तुलया धृतम्।
अश्वमेध सहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते॥
“अश्वमेध फल और को सत्य को तौला गया। एक ओर हजार अश्वमेध यज्ञों के फल को रखा गया और दूसरी ओर एक सत्य के फल को तो सत्य का पलड़ा भारी रहा।”
सत्कर्म करने की प्रेरणा इसलिए दी जाती है कि इससे लोगों का नैतिक-विकास होता है। सच्चे आदमी का नैतिक बल इतना प्रबल होता है कि उसकी तुलना दस हजार हाथियों के बल के बराबर की जाती है। बड़ी-बड़ी बौद्धिक शक्तियाँ, मशीनी-ताकतें और मानवीय संगठन भी सत्य के समक्ष परास्त होते देखे गए हैं। हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा के समक्ष विश्वामित्र को घुटने टेक देने पड़े, महात्मा गाँधी की वाणी में वह शक्ति थी कि ‘ब्रिटिश साम्राज्य’ जैसी शक्ति शाली सत्ता को भी हथियार डाल देने पड़े। गाँधीजी की वाणी सदैव सत्य से अनुप्राणित होती थी। मनुष्य की शक्ति , उसका व्यक्तित्व और उसकी महानता सभी उसकी सचाई में सन्निहित हैं, इसीलिए उसकी सर्वत्र प्रतिष्ठा भी की जाती है।
सत्य जीवन की कसौटी है। इसमें तपाया हुआ मनुष्य सोने जैसा खरा निकल आता है। परमात्मा का सान्निध्य सुख प्राप्त करने के सम्पूर्ण साधनों में सत्य का महत्व सर्वप्रथम है। प्रसिद्ध, सगुण-भक्त कवि- अब्दुर्रहीम खानखाना ने एक बड़ा ही मार्मिक दोहा प्रस्तुत किया है :-
साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप।
जाके हिरदय साँच है, ताके हिरदय आप॥
अर्थात्- “परमात्मा वहीं निवास करता है, जहाँ सचाई होती है।” एक झूठ की तुलना तो सौ पापों के समान की गई है।
मनुष्य अपने जीवन में जितना ही अधिक सत्यता का समावेश करता जाता है, उसे उतना ही अधिक विराट-पुरुष की अनुभूति होने लगती है। वह शरीरों की विभिन्नता में, योनियों की विविधता में भी एक ही प्राण, एक ही चेतन आत्मा समाविष्ट हुआ देखता है। इससे उसकी दृष्टि अंतर्मुखी होने लगती है और आत्मिक महानतायें विकसित होने लगती हैं। इस संसार के बाह्य प्रयोजनों को वह सुविधा के और सहायक तो मानता है किन्तु इन्हें साध्य नहीं मानता। सत्य का साध्य है- विराट-पुरुष परमात्मा के दर्शन। इस भावना से वह अपनी व्यष्टि को समष्टिगत भावना में घुला देता है। इससे जीवन की दिशा ही बदल जाती है और मनुष्य दिन-दिन अधिक तेजी से अपने जीवन लक्ष्य की ओर अग्रसर होने लगता है। सत्य एक साधन है जो सरलता पूर्वक हमें परमात्मा के समीप पहुँचा देता है।
जब ऐसे प्रकाश का अन्तःकरण में उदय होता है तो आडम्बर का महत्व गिर जाता है। दूसरों में अपना प्रभाव पैदा करने, बड़प्पन दिखाने का भाव अब उसे तुच्छ प्रतीत होता है। सादगी ही उसका जीवन बन जाती है और विचारों में श्रेष्ठता आने लगती है। मानवता का यह प्रधान गुण है कि मनुष्य अपने विचारों का स्तर ऊँचा उठाये और लौकिक कामनाओं को बहुत छोटा मानकर केवल उन साधनों तक ही सीमित रहे जो केवल जीवन धारण के लिए पर्याप्त हों। महत्वाकाँक्षाओं की विपुलता ही मनुष्य को दिखावटीपन की ओर खींचती रहती है। इससे बचने का एक ही उपाय है कि हम इस विश्व की सत्यता को हर घड़ी अनुभव किया करें।
आकर्षण का मूल बिन्दु भी सत्य है। वाणी-सत्य के कारण अनावश्यक प्राण शक्ति का अपव्यय बचता है। ब्रह्मचर्य भी सत्य का एक अंग है। इससे शरीर स्वस्थ और निरोग रहता है। इसी प्रकार शरीर के जिस अवयव से हम प्राकृतिक उपभोग के अतिरिक्त अस्वाभाविक क्रियाओं का पालन नहीं करते तो हमारी शक्तियाँ बनी रहती हैं। शरीर में शक्ति धारण किये रहने से ही सौंदर्य स्थिर रहता है। यह भाव सत्य के अनुशीलन से ही हमारे अन्तःकरण में प्रादुर्भूत होता है।
जब इस प्रकार सत्य के प्रति निष्ठा और असत्य के प्रति घृणा का भाव आता है तो मानवीय मनोभूमि के रहस्य जानने की दिशा में प्रवृत्त होती है। अब प्रत्येक वस्तु के पैदा होने के कारण पर विचार प्रारम्भ करता है। रात में असंख्यों तारागण, दिन में सूर्य देवता की यात्रा, चन्द्रमा की कलाओं का पूर्ण दृश्य, पृथ्वी, पशु, पक्षी, वृक्ष, नदी, पहाड़, इन समस्त की रचना का सूक्ष्म विधान जानने की ओर प्रयुक्त हुआ। मन अन्ततोगत्वा, आत्मज्ञान की भूमिका में प्रवेश करता है। इससे उसमें अंतर्मुखी जागृत होती है। ऐसी अवस्था में यदि पर्याप्त ज्ञान बाह्य सहारा न भी मिले तो भी मनुष्य अपने मन में श्रेष्ठ संस्कार तो पैदा कर ही सकता है। यह शिक्षा पद्धति किसी आधुनिक शिक्षा-पद्धति से कम महत्वपूर्ण नहीं। जिसमें केवल साँसारिक विषयों के विवेचन की तार्किक कुशलता भरी हो, उस विद्या से आत्म-विद्या कहीं अधिक श्रेष्ठ है। इसके लिये बौद्धिक शिक्षा की उतनी आवश्यकता नहीं जान पड़ती जितना मानवीय अन्तःकरण में सत्य के समावेश की। श्रुति का कथन है :-
सत्य स्वतन्त्र रूप से साधन भी है और लौकिक व्यवहार में तप, ब्रह्मचर्य आदि विशेषण भी उसे ही बनना पड़ता है। मन, वाणी और कर्म की एकता सत्य के साँचे में ढालने से ही सर्वांगपूर्ण सत्य का ज्ञान होता है। मुंडकोपनिषद् में ऋषि ने सत्य की महिमा इस प्रकार बताई है :-
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा
समग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम।
अन्तः शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो
यं पश्यन्ति यतयः क्षीण दोषाः॥
(मु॰ 3। 1। 5)
“उस परमात्मा को जो सबके शरीर के भीतर हृदय में विराजमान है, जो विशुद्ध ज्ञान स्वरूप और सर्वथा निर्दोष है, उसे दोषों का शोधन करते हुये साधक जन सत्य-सम्भाषण, सत्य-तप और सत्य एवं ब्रह्मचर्य से उत्पन्न ज्ञान द्वारा ही जान सकते हैं।”
शक्ति और सामर्थ्य इसी सूक्ष्म दर्शिता के परिणाम स्वरूप प्राप्त होती है। किसी वस्तु को सही रूप में देखने का दृष्टिकोण जब प्राप्त होता है, उसको सम्पन्न करने की क्षमता तभी उत्पन्न होती है। जब तक किसी वस्तु के प्रति हमारा अनुमान सही नहीं निकलता, तब तक हम में उसे प्राप्त करने की सामर्थ्य भी नहीं होती। असफलता की आशंका बनी रहती है। इसलिए हमें सर्व प्रथम उस असीम सत्य के प्रति आस्थावान होना पड़ता है।
सच्चा व्यक्ति जहाँ भी जाता है अपने चरित्र और व्यक्तित्त्व की छाप दूसरों पर डाले बिना छोड़ता नहीं। वाक्-शक्ति के द्वारा लम्बे-चौड़े प्रवचन, कथा, उपदेश दिये जा सकते हैं किन्तु जिससे लोगों को प्रभावित किया जा सके और दूसरों को भी सन्मार्ग की दिशा में गतिमान् किया जा सके, उस शक्ति का नाम है सत्य। ऐसे लोगों का संपर्क चाहे वह दो घड़ी का ही क्यों न हो सारे जीवन भर भूलता नहीं।
सत्यवान् व्यक्ति कम बोलते हैं किन्तु उनकी वाणी में जो माधुर्य होता है उसका प्रभाव जादू जैसा पड़ता है। उनके व्यवहार में वह सरलता होती है, वह सम्मोहन होता है जो अनेकों दूसरों को खींच कर अपने पास बुला लेता है। सत्य के ईंट और गारे से बनी हुई जीवन की इमारत तेज तूफानों में भी सुदृढ़ खड़ी रहती है। बनावटीपन, ढोंग, छल और कपट के झोंपड़े तो थोड़ी-सी हवा चलते ही उखड़ कर दूर जा गिरते हैं। सचाई में ही वह बल होता है जो दूसरों को भी ऊँचे उठाता है। इस संसार में विजयी वे होते हैं जिनके जीवन सत्य से प्रकाशवान होते हैं। जीवन का प्राण और बल सत्य ही है।
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपाघ्नन।
इन्दो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराभरत्॥
ब्रह्मचर्य-तप से देवता लोग मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर लेते हैं। ब्रह्मचर्य की शक्ति से ही इन्द्र देवताओं पर शासन कर सके और उन्हें सब प्रकार से सुखी रख सके थे।
मनुष्यों और पशु-पक्षियों की तुलना करते हुए शास्त्रकार ने लिखा है-”ज्ञानं हि तेषाँधिको विशेषः।” अर्थात् आहार-विहार, भय, निद्रा, कामेच्छा की दृष्टि से मनुष्य और पशु में कोई विशेष अन्तर नहीं पाया जाता । शारीरिक बनावट में भी कोई बड़ी असमानता दिखाई नहीं पड़ती। खाने-पीने, चलने, उठने, बैठने, बोलने, मल-मूत्र त्याग के सभी साधन पशु और मनुष्यों को प्रायः एक जैसे ही मिले हैं। पर मनुष्य में कुछ विशेषतायें इन प्राणियों से भिन्न हैं। उसकी रहन-सहन की रुचि, उचित-अनुचित का भय, भाषा-भाव आदि कितनी ही विशेषतायें यह सोचने को विवश करती हैं कि वह इस सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी है। उसकी रचना किसी उद्देश्य पर आधारित है। इन सम्पूर्ण विशेषताओं का कारण उसका ज्ञान है। साधारण तौर पर शरीर यात्रा चलाने और मन को प्रसन्न करने की क्रिया पशु भी करते हैं किन्तु इसके पीछे उनका कोई विधिवत् विचार नहीं होता। यह कार्य वे अपनी अन्तः प्रेरणा से किया करते हैं। उनके जीवन में जो अस्तव्यस्तता दिखाई देती है उससे प्रकट होता है कि उन्हें उचित अनुचित का ज्ञान नहीं होता।
मनुष्य का प्रत्येक कार्य विचारों से प्रेरित होता है। यह भी कहा जा सकता है कि मनुष्य को विचार शक्ति इसलिये मिली है कि उचित अनुचित को ध्यान में रख कर वह सृष्टि संचालन की नियमित व्यवस्था बनाये रखने में प्रकृति को सहयोग देता रहे। जो केवल खाने-पीने और मौज उड़ाने की ही बात सोचते हैं। इसी को जीवन का श्रेय मानते हैं उनमें और मनुष्येत्तर पशुओं, पक्षियों और कीट-पतंगों में अन्तर कहाँ रहा? यह क्रियायें तो पशु भी कर लेते हैं।
विचार-बल संसार का सर्व श्रेष्ठ बल है। विचार शक्ति का सूचक है। पशु निर्विचार होते हैं इसलिये वे परस्पर अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान नहीं कर सकते, उनकी कोई लिपि नहीं, भाषा नहीं। किसी प्रकार का संगठन बना कर अपने प्रति किये जा रहें, अत्याचारों का वे प्रतिवाद नहीं कर सकते। इसीलिए शारीरिक शक्ति में मनुष्य से अधिक सक्षम होते हुए भी वे पराधीन हैं। विचार शक्ति के अभाव में उनका जीवन क्रम एक बहुत छोटी सीमा में अवरुद्ध बना पड़ा रहता है।
विश्रृंखलित, ऊबड़-खाबड़ धरती को क्रम बद्ध व सुसज्जित रूप देने का श्रेय मनुष्य को है। घर, गाँव, शहर, देश आदि की रचना सुविधा और व्यवस्था की दृष्टि से कितनी अनुकूल है। अपनी इच्छायें, भावनायें दूसरों से प्रकट करने के लिए भाषा-साहित्य और लिपि की महत्ता किससे छिपी है। आध्यात्मिक अभिव्यक्ति और साँसारिक आह्लाद प्राप्त करने के लिए कला-कौशल, लेखन, प्रकाशन की कितनी सुविधायें आज उपलब्ध हैं। यह सब मनुष्य की विचार शक्ति का परिणाम है। मनुष्य को ज्ञान न मिला होता तो वह भी रीछ, बन्दरों की तरह जंगलों में घूम रहा होता। सृष्टि को सुन्दर रूप मिला है तो वह मनुष्य की विचार-शक्ति का ही प्रतिफल है। विचारों का उपयोग निःसन्देह अतुल्य है।
विचारों की विशिष्ट शक्ति का स्वामी होते हुए भी मनुष्य का जीवन निरुद्देश्य दिखाई दे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। जिसके कार्यों में कोई सूझ न हो, विशिष्ट आधार न हो, उस जीवन को पशु-जीवन कहें तो इसमें अतिशयोक्ति क्या है। हवाई जहाज निराधार आकाश में उड़ता है। अभीष्ट स्थान तक पहुँचने का उसे निर्देश न मिलता रहे तो वह कहीं से कहीं भटक जायेगा। कुतुबनुमा की सुई वायुयान चालक को बताती रहती है कि उसे किस दिशा में चलना है। इस निर्देश के आधार पर ही वह सैंकड़ों मील का रास्ता पार कर लेता है। प्रत्येक प्राकृतिक पदार्थ किसी न किसी उद्देश्य से निर्मित है। सूर्य प्रतिदिन आसमान में आता है और लोगों को प्रकाश, गर्मी और जीवन देने का अपना लक्ष्य पूरा करता रहता है। वृक्ष, वनस्पति, वायु-जल, समुद्र, नदियाँ सभी किसी न किसी लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं। इस संसार में यह व्यवस्था तभी तक है जब तक प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक पदार्थ अपनी अवस्था के अनुसार अपने कर्तव्य कर्म पर स्थिर है।
मानव-जीवन की महत्ता इस पर है कि हम वर्तमान साधनों का उपयोग अंतर्दर्शन या आत्म-ज्ञान प्राप्ति के लिए करें। उद्देश्य का मार्ग बहुधा किसी विशिष्ट दिशा की ओर ही होता है। प्रकृति जिस ओर ले जाना चाहे उधर ही चलते रहें तो इन प्राप्त शक्तियों की सार्थकता कहाँ रही? जैसा जीवन दूसरे प्राणी जीते हैं वैसा ही हम भी जियें तो विचारशीलता का महत्व क्या रहा? बुद्धि की सूक्ष्मता, आध्यात्मिक अनुभूतियाँ, विराट की कल्पना आदि, ठीक वायुयान का मार्ग-दर्शन करने वाले कुतुबनुमा की सुई के समान है, जिससे मनुष्य चाहे तो अपना उद्देश्य पूरा करने का निर्देशन प्राप्त कर सकता है। उद्देश्य कभी श्रमहीन और मात्र साँसारिक नहीं हो सकते। जिन साधनों से इहलौकिक रसानुभूति मिलती है वे केवल मानव-जीवन की सरसता और श्रेष्ठता को कायम रखने के अतिरिक्त और कुछ अधिक नहीं होते। इन्हीं के पीछे पड़े रहें तो अपना वास्तविक लक्ष्य-जीवन लक्ष्य-पूरा न हो सकेगा।
यदि यह विचार बना लिया कि हमारा उद्देश्य जीवन-मुक्ति है तो अभी से इसकी पूर्ति में लग जाइए। एक बार लक्ष्य निर्धारित कर लेने के बाद अपनी सम्पूर्ण चेष्टाओं को उसमें जुटा दीजिए। अपने धैर्य से विचलित न हों, जो राह पकड़ी है उस पर दृढ़तापूर्वक चलते रहें। तब देखें कि आप कितनी शीघ्रता से अपना जीवन-लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।
“न निश्चिन्तार्था द्विरमन्ति धीरः।” अर्थात्- महापुरुषों का यह प्रधान सद्गुण है कि वे अपने जीवन उद्देश्य से कभी डिगते नहीं। महापुरुषों के जीवन में उद्देश्य की एकता और तल्लीनता, लगन और तत्परता इस ऊँचे दर्जे तक पाई जाती है कि वह पाठक के अन्तःस्थल को झकझोरे बिना मानती नहीं। आपकी महानता की कसौटी भी इसमें है कि आप अपने लक्ष्य के प्रति कितने आस्थावान् हैं? उसकी पूर्ति के लिये आप कितना त्याग और बलिदान करते हैं?
उद्देश्य बना लेना ही पर्याप्त नहीं हो सकता। यह भी परखना पड़ेगा कि आपका ध्येय कितना मूल्यवान है। उद्देश्य उच्च न हुआ तो परिस्थिति बदलते ही उस विचारणा का बदल जाना भी सम्भव है। असाधारण लक्ष्यों में ही वह शक्ति होती है जो मनुष्य को नियमित प्रेरणा देती रहे और उसे उत्साह से ओत प्रोत रखती रहे। मंजिल तक पहुँचने में जो बाधाएँ आती हैं उनसे संघर्ष करने और धैर्यपूर्वक अन्त तक डटे रहने की क्षमता लक्ष्य की उत्कृष्टता से ही सम्भव होती है।
आत्म-कल्याण के उद्देश्य की पूर्ति के लिए उच्च गुणों की आवश्यकता पड़ती है। बहुतेरे कष्ट उठाने होते हैं अपने को संकट में डालना पड़ता है। यह बात सच है कि कष्ट सहन करते-करते असाधारण सहिष्णुता उत्पन्न हो जाती है किन्तु आरम्भ में मानवोचित साहस का परिचय तो देना ही पड़ता है। लोभ, मोह, मद, मत्सर, काम और क्रोध के प्रबल मनोविकार भी अपना हथियार चलाने से बाज नहीं आते। इन सब आघातों को धैर्यपूर्वक, ध्येय सिद्धि तक सहन करना पड़ता है। जो इस निश्चय में दृढ़ हो जाता है। “देहं वा पातयेत् कार्यं वा साधयेत्” अर्थात् सिद्धि या मृत्यु ही जिनका सिद्धान्त बन जाता है वे ही अन्त तक लक्ष्य प्राप्ति के दुर्गम पथ पर टिके रहते हैं। ऐसे लोगों को ही सफलता के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
इसमें सन्देह नहीं है कि जीवन-लक्ष्य प्राप्ति कठिन प्रक्रिया है किन्तु इस प्रकार उद्देश्य संरक्षण से ही मनुष्य का नैतिक विकास होता है। जो अपने शरीर और मन को कष्टपूर्ण कसौटी में भली भाँति कस लेते हैं उन्हीं का चरित्र उज्ज्वल बनता है। नैतिक विकास और चारित्रिक संगठन ही आध्यात्म का विशुद्ध उद्देश्य है। विकारों को दूर करना और सद्गुणों का अभिवर्द्धन ही धर्म है। इसलिए आध्यात्मिक, धार्मिक एवं नैतिक विकास के साधकों को सर्व प्रथम अपना जीवन-लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए। उद्देश्य की आँच पर तपाई हुई आत्मायें ही संसार का कुछ कल्याण कर सकती है। “उद्देश्य हीना पशुभिः समाना :- अर्थात् जिनके जीवन का कोई उद्देश्य नहीं उनमें और पशुओं में कोई अन्तर नहीं होता।
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है- इसकी बुद्धि-निष्ठा ज्ञान के प्रति आग्रह। अन्ध-श्रद्धा, अन्ध-मान्यता के लिए हमारे यहाँ कोई स्थान नहीं है। भारतीय संस्कृति के आदि आविष्कर्त्ताओं ने प्रारम्भ से ही किसी एक प्रमाण तथ्य को महत्व न देकर बुद्धि को ही धर्म-संस्कृति का निर्णायक बनाया। विवेक एवं ज्ञान-भारतीय संस्कृति की आत्मा है। इसका इतना बड़ा महल बुद्धि के ऊपर ही खड़ा है। बौद्धिक आधारशिला पर ज्ञान का सर्वांगीण विकास और उसकी शोध हमारी अपनी एक विशेषता रही है। इस विशेषता को दूर कर दो, भारतीय संस्कृति का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा।
हमारे यहाँ जिसने भी कोई नई शोध की उसे पूज्य माना गया। ऋषि का पद प्रदान कर उसे समाज में सर्वोपरि महत्व दिया, फिर चाहे उसका दर्शन पूर्व खोजों से भिन्न ही क्यों न रहा हो। जहाँ अन्य देशों में नई खोज करने वालों को जिन्दा जला दिया गया, अनेकों कष्ट दिए गए, मर्मान्तक पीड़ाओं से प्राण लिए गये, वहाँ हमारे यहाँ प्रत्येक नवीन तथ्य के प्रतिपादक की, जीवन जगत के सूक्ष्म या स्थूल क्षेत्रों में नई खोज करने वालों की पूजा की गई। यह हमारी बुद्धि-निष्ठा और ज्ञान के प्रति रचनात्मक प्रेम का परिचायक है। और यही कारण है कि हमारे धर्म-ग्रन्थ, ऋषि-सन्त, समाज से मार्ग-दर्शक एक नहीं अनेकों हैं और विशेषता यह है कि प्रत्येक का दर्शन का दृष्टिकोण एक दूसरे से भिन्न है, फिर भी वे सब से सब भारतीय धर्म-संस्कृति के अंग हैं। ज्ञान की इतनी विस्तृत शोध, बुद्धि की निरन्तर साधना और कहीं देखने को नहीं मिलती। संसार में सब से अधिक अवतार (युग पुरुष) दार्शनिक,ऋषि-मुनि, सन्त-महात्माओं की उपज हमारी इस स्वतन्त्र बुद्धि-निष्ठा और ज्ञान से प्रति स्वतन्त्र चिन्तन का ही परिणाम है।
गायत्री को गुरु मंत्र माना गया है। उसे वेद-माता कहा गया है और गायत्री उपासना प्रत्येक हिन्दू के लिए आवश्यक धर्म कर्तव्य बताया है। क्यों? किस लिए? यह गायत्री की मूल भावना से अपने आप स्पष्ट हो जाता है, जिसमें उस शक्ति शाली, तेजस्वी, सर्वव्यापी, दिव्य तत्व का ध्यान करके, उससे बुद्धि की निर्मलता, शुद्धि, पवित्रता की प्रार्थना की गई है। स्पष्ट है कि गायत्री ज्ञान का, बुद्धि का, शोध, अभिवृद्धि का साधना मात्र है। नित्य-प्रति प्रत्येक द्विजाति दिन में कम से कम तीन समय परमात्म-तत्व का ध्यान करते हुए उससे ‘सद्बुद्धि’ की-विवेक की प्रार्थना करता है।
वेद का अर्थ है-ज्ञान और ज्ञान बुद्धि की साधना का परिणाम है। इसीलिए गायत्री को वेद माता कहा गया है। भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता के मूल स्रोत-आधार वेद अर्थात् ज्ञान हैं और ज्ञान बुद्धि की देन है। अस्तु हमारी समस्त जीवन पद्धति का सञ्चालन बुद्धि के द्वारा होता आया है। कौटिल्य ने कहा है “जिस मनुष्य की बुद्धि का विकास नहीं होता अथवा जो बुद्धि द्रोही या अविवेकी होता है वह मनुष्यता से गिर जाता है।” शास्त्रकार ने बुद्धि को ही सर्वोपरि बल बतलाया है। “बुद्धिर्यस्य बलं तस्य। निर्बुद्धिह्य कुतो बलम्।” जिसमें बुद्धि है उसी में बल है बुद्धिहीन के पास बल कहाँ?
पितामह भीष्म से पूछा गया- “कोऽयं धर्मः कुतो धर्मः।” यह धर्म कौन है कहाँ से आता है। पितामह ने कहा-”मिसद्धत्तम” विचारशील व्यक्ति चिन्तन मनन अध्ययन करके धर्म का निर्माण करते हैं। तात्पर्य है कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति विचार प्रधान है बुद्धि प्रधान है- वेद-प्रधान है। अर्थात् ज्ञान के द्वारा प्रेरित है। वह किसी प्रकार के आग्रह को लेकर नहीं चलती।
हमारे शास्त्रकारों ने, धर्म संस्थापकों ने, ज्ञान देने वालों ने भी अपनी बात को ही सत्य बता कर उसे बिना कुछ कहे सुने मान लेने की बात कहीं नहीं कही है। उन्होंने अपनी ही बात पर जोर नहीं दिया है- “बुद्धे फलमनाग्रह” दुराग्रह न करना ही बुद्धिमत्ता का चिन्ह है। वे कहते हैं “मनः पूतं समाचरेत्” तुम्हारे मन को जो अच्छा लगे वही करो। अपनी बुद्धि के कपाट बन्द मत करो। अपने ज्ञान के प्रकाश को धूमिल न होने दो। गीता का लम्बा-चौड़ा उपदेश देने पर भी श्रीकृष्ण ने अर्जुन की स्वतन्त्र बुद्धि का अपहरण नहीं किया। उन्होंने कहा अर्जुन “यथेच्छसि तथा कुरुः” जो तुझे अच्छा लगे वह कर।
बुद्धि की साधना के लिए अन्ध श्रद्धा को कोई स्थान नहीं है। न वह किसी एक लकीर पर फकीर होने या “बाबा वाक्य प्रमाणम्” के रूढ़िवाद में अवरुद्ध होती है। यही कारण है कि हमारा धर्म हमारी संस्कृति किसी एक व्यक्ति को या एक पुस्तक को लेकर नहीं चलती, न किसी घिसी-पिटी मान्यता को ही दुहराने की आज्ञा देती है। अनेकों वेद शास्त्र, पुराण, स्मृति, आगम, नियम, अनेकों धर्म ग्रन्थ ज्ञान की नाना दिशाओं का बोध कराते हैं, बिना किसी आग्रह अनुग्रह के। ऋग्वेद तत्व ज्ञान, आत्मा-परमात्मा आदि का ज्ञान कराता है। यजुर्वेद में नाना कर्मकाण्ड, विधि विधानों का विवरण है। अथर्ववेद भौतिक सृष्टि के रहस्यों से भरा पड़ा है। सामवेद में आत्मा को ऊँचा उठाने वाला संगीत निहित है। शरीर को स्वस्थ निर्मल शक्ति शाली बनाने का मार्ग आयुर्वेद बताता है तो आत्म-रक्षा, समाज रक्षा की शिक्षा धनुर्वेद में निहित है। मनोरञ्जन, हँसी खुशी का जीवन बिताने, दुखों को भुला देने का शास्त्र गंधर्व वेद में भरा पड़ा है। इस तरह जीवन के विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालने वाले वेद और उपवेद भरे पड़े हैं हमारे ज्ञान भण्डार में। अनेकों शास्त्र, स्मृतियाँ, पुराण, दर्शन-ग्रन्थ हैं जिनकी संख्या और परिचय देना इस छोटे-से लेख में सम्भव नहीं। संक्षेप में भारतीय संस्कृति को ज्ञान-साधना की उपज, बुद्धि निष्ठा का फल कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी।
जो लोग यह समझते हैं कि ज्ञान की सीमा निश्चित हो चुकी या किसी ग्रन्थ, धर्म पुस्तक या किसी महापुरुष के उपदेशों तक वह सीमित है वे भूल करते हैं। ज्ञान की तो कोई सीमा हो ही नहीं सकती। जिस तरह काल अनन्त है उसी तरह ज्ञान भी अनन्त है। हमारे यहाँ ज्ञान को ‘ब्रह्म’ कहा गया है “ज्ञानं ब्रह्म।” ब्रह्म अनन्त, अनादि है तो ज्ञान की सीमा कैसे हो सकती है। ज्ञान के शोधकर्ता ऋषियों का युग समाप्त हो गया यह भी असंगत है। ज्ञान की शोध से साथ-साथ ही ऋषियों का भी आविर्भाव होता रहता है। आज भी जो नई शोध करते हैं, नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते हैं, ज्ञान के क्षेत्र में कोई नया तथ्य ढूँढ़ते हैं वे ऋषि परम्परा के ही अंतर्गत आते हैं। वस्तुतः ज्ञान के किसी भी क्षेत्र में उसकी पूर्णता का साक्षात्कार करने वाला ऋषि कहा जाता है। ज्ञान का वह अंग कुछ भी हो सकता है। अपने अनुसंधान में खाना-पीना भूल जाने वाले-न्यूटन भी ऋषि ही थे। वेदों का भाष्य करने वाले मैक्समूलर भी ऋषि ही तो थे। 50 वर्ष तक अध्ययन, मनन, चिन्तन करके संसार को समाजवाद की नई दृष्टि प्रदान करने वाला मार्क्स, चार्ल्स डार्विन, दयानन्द, गाँधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, अरविन्द, लोकमान्य तिलक, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, ये सब ऋषि परम्परा के ही तो ज्योर्तिदीप थे। ऋषियों का कोई युग नहीं होता, वे हर युग में ज्ञान की नई-नई शोध, संस्करण करके अवतरित होते रहते हैं।
खेद है हम लोग एक लम्बे समय से ज्ञान की खोज-बुद्धि की साधना का मार्ग छोड़ बैठे। आज से सैकड़ों वर्ष पूर्व जो तथ्य थे, ज्ञान का जो विकास हुआ था उसे ही हम लोग गले से लटकाये फिरने लगे। परिणाम यह हुआ कि हम ज्ञान के क्षेत्र में पिछड़ गये और बँधी बँधायी लकीर ही पीटते रहे। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने पूर्वज ऋषियों के उत्तराधिकार को पूरा-पूरा निभायें और ज्ञान की खोज, बुद्धि की साधना का क्रम शुरू करें। भारत और भारतीय संस्कृति की यदि कोई विशेषता है तो वह यही है ज्ञान की उपासना-और उससे नई खोज नई शोध प्रस्तुत करना। इस कार्यक्रम को हम जितना जल्दी शुरू करेंगे उतना ही अपने पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर सकेंगे।
क्या आप अपनी सफलता के लिए, अपने अभ्युत्थान के लिए जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए किसी की मदद, किसी के सहारे की प्रतीक्षा में खड़े हैं? क्या आप इस आशा में ही बैठे हैं कि दूसरे आकर आप को तुर्त-फुर्त सफलता की मंजिल पर पहुँचा देंगे? यदि ऐसा ही है तो यह निश्चित है कि इस धोखे में आपको निराशा के सिवा कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। स्वयं आपके सिवा संसार में कोई शक्ति नहीं जो आपको सफलता की मंजिल पर पहुँचा सके, विजय की सिद्धि प्रदान कर सके। आप को अपने ही पैरों पर चलना होगा, स्वयं ही पुरुषार्थ करना होगा और विश्वास करना होगा अपने आप पर जीवन की सिद्धि के लिए-सफलता के लिए। यह जीवन का ध्रुव सत्य है।
क्या आपने एक विचारक और जीवन की भूल-भुलैयाओं में पड़े हुए उस नागरिक की कहानी पढ़ी है। वह नागरिक अपनी समस्याओं में, जीवन की उलझनों में काफी उलझा हुआ था, कोई राह नहीं सूझ रही थी उसे। सोच रहा था कोई मदद करे। एक दिन उसे बड़ी ही प्रेरणाप्रद पुस्तक मिली जिसे पढ़ कर उसमें आशा का संचार हुआ। उसने सोचा शायद इसका लेखक समस्याओं के समाधान करने में मेरी मदद करेगा। वह नाम पता ढूंढ़ता हुआ उस विद्वान के पास पहुँचा और उसकी पुस्तक का परिचय देते हुए बोला-”आपने बहुत अच्छा लिखा लेकिन क्या आप मेरी कुछ मदद कर सकते हैं।” विद्वान ने बड़ी गम्भीरता से सोच विचार किया और कहा- “आप कल आना।” दूसरे दिन ठीक समय पर वह नागरिक उक्त विद्वान के यहाँ पुनः गया। उन्होंने उसे अपने कमरे में बैठाया और बोले-”भाई मैं तो तुम्हारी मदद नहीं कर सकता लेकिन एक अन्य व्यक्ति आयेगा वह तुम्हारी मदद कर सकेगा” और यह कह कर उसे वह विद्वान एक दूसरे कमरे में अन्दर ले गया बोला—”यहाँ बैठिए अभी वह आता होगा।” काफी समय हो गया कोई नहीं आया तो नागरिक ने व्यस्त होकर कहा—”वे सज्जन अभी तक नहीं आये जिनके लिए आपने कहा है।” विद्वान बोला-”अभी आता है।” फिर प्रतीक्षा में काफी समय बीत गया। अधीर होते हुए नागरिक ने फिर वही प्रश्न किया। अब की बार विद्वान उठा और सामने से एक बड़े पर्दे को हटाया तो उसके पीछे बड़ा शीशा था जिसमें ठीक उस नागरिक का पूरा चेहरा, शरीर दिखाई देने लगा। शीशे में उस नागरिक की छाया की ओर इशारा करते हुए विद्वान बोला-”भोले आदमी! यह सामने दिखाई देने वाला मनुष्य ही तुम्हारी सहायता कर सकता है दूसरा कोई नहीं।”
सचमुच उस दिन उस नागरिक ने जीवन का बहुत बड़ा पाठ सीखा। उसे अपने ऊपर विश्वास हुआ “मैंने कितने ही दिवस दूसरों की मदद की आशा में गुजार दिए, लेकिन अब मैं स्वयं ही अपनी मदद कर सकता हूँ, दूसरा कोई भी मुझे मंजिल तक नहीं पहुँचा सकता। इन पाँवों से चल कर स्वयं ही वहाँ पहुँचूँगा।”
हम बार-बार यह दुहराते हैं कि जीवन की सफलता का उत्कर्ष केन्द्र बिन्दु स्वयं अपने आप में ही निहित है कहीं बाहर नहीं। वही एक ऐसा आधार है जिसके सहारे आप जीवन-पथ की कड़ी से कड़ी मंजिल भी तय कर सकते हैं। यदि आप संसार में, पदार्थों में, साधनों में इस आधार को अपने से बाहर ढूँढ़ेंगे तो अन्त में आपको निराशा ही मिलेगी। क्षणभंगुर, नाशवान, परिवर्तनशील संसार, इसके पदार्थ, साधन आपका कितनी दूर तक साथ दे सकेंगे? वे कहीं भी साथ छोड़ सकते हैं अन्ततः आप अकेले ही बच रहेंगे जीवन-पथ पर-आगे बढ़ने के लिए। अस्तु बिना किसी आशा प्रतीक्षा के ही निज बल पर आगे बढ़िए। इस तरह की प्रतिक्षा में जीवन धन नष्ट न कीजिए।
अपने पैरों पर खड़े होइये। किसी से मदद, दया की भीख न माँगिए। न किसी से कुछ इच्छा करें न कोई शिकवा-शिकायत ही। एकमात्र अपनी आन्तरिक शक्ति पर भरोसा रखिए। यदि आपमें अपने पैरों पर ही चलने की ताकत होगी तो निश्चित समझिए हजारों पग आपकी मदद को चल पड़ेंगे। आपको अपने हाथों पर विश्वास होगा तो हजारों हाथ आपकी मदद को दौड़ पड़ेंगे। यह कोई कल्पना नहीं जीवन का सत्य है। सहयोग सहायता से उन्हें वंचित रहना पड़ता है जो इसकी प्रतीक्षा में दूसरों की आशा लगाये बैठे रहते हैं।
दूसरे लोग आपको मार्ग बता सकते हैं, गिर पड़ने पर उठा भी सकते हैं लेकिन इतना निश्चित है कि जीवन का वास्तविक पथ प्रदर्शन आपके अन्दर से ही होगा। मार्ग पर आपको ही चलना पड़ेगा। दूसरों से मार्ग पूछें, बाहर से अनुभव संग्रह करें, लेकिन फिर भी उसका अभियान आप स्वयं ही पूरा कर सकते हैं। अन्य कोई नहीं। बालक को अभिभावक गिर पड़ने पर उठा सकते हैं, लेकिन अपने ही पैरों पर वह खड़ा होना सीख सकता है दूसरों पर नहीं। यदि कोई उसे गिर जाने पर भी न उठावे तो भी उसके अन्तर में उठने की, अपने आप खड़े होने की, अपने पैरों पर चलने की प्रवृत्ति एक दिन उसे खड़ा कर देगी और चलना सिखा देगी।
अपने पैरों पर चलने वालों, अपने अन्तर केन्द्र पर हाथ रख कर उससे मार्ग-दर्शन प्राप्त करने वालों को, आत्मनिर्भर होने वालों को दूसरों की मदद की आवश्यकता नहीं है। फिर दूसरे लोग आपकी कब तक मदद कर सकते हैं? बहुत थोड़े समय तक। यदि आप में दूसरों पर निर्भर रह कर जीवन गुजारने की आदत पड़ जाये, आप स्वयं कुछ भी न करें, या आप से दूसरों को कुछ भी करने की आशा न रहे तो निश्चित समझिए कोई भी आपका साथ नहीं देगा। आपका अत्यन्त प्रिय, साथी, अपार साधन सम्पत्ति, बहुत सहायक भी आपका साथ छोड़ देंगे। आपकी उपेक्षा करेंगे। जिसे आप अपना आधार मानते हैं उसे खिसकते कुछ भी समय नहीं लगेगा। पति-पत्नी को बुरा लगने लग जाता है। पुत्र माँ-बाप को और माँ बाप असमर्थ हो जाने पर पुत्र को। तब न कोई मित्र सहारा देता न बन्धु। इस बात को सत्य समझें और जीवन का अंग बना लें। आपको अपने ही पैरों पर अन्त तक जीवन यात्रा तय करनी होगी। यह ठीक है कि जो सहयोग मिलता है उसे अभिमान वश ठुकरायें नहीं और जिसको आपकी मदद की आवश्यकता है उसे सर्वथा व्यक्ति वादी ही बन कर उपेक्षित न करें।
शान्ति का, विश्राम का, आनन्द का स्थान भी आपके अन्दर ही है। जिस व्यक्ति अपने अन्दर ही शान्ति नहीं मिलती तो निश्चित है उसे कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकती। मित्र, सखा, बन्धु-बान्धवों या संसार की अन्य बातों में हम शान्ति ढूँढ़ने का व्यर्थ प्रयत्न करते हैं, यत्र-तत्र भटकते हैं। बुद्ध बहुत वर्षों तक इधर-उधर भटके। लेकिन अन्त में अपने अन्तर में ही उन्हें शान्ति का आधार मिला। अपने अन्तर में जो व्यक्ति शांत है उसके लिए सब जगह शान्ति मिल जाती है। जो अन्दर से अशान्त है उसे कहीं भी शान्ति नहीं मिल सकती।
जो व्यक्ति यह सोचता है कि संसार के लोग उसके दुख दर्द को बंटा कर उसे आनन्द प्रदान करेंगे वह भूल में हैं। सुख, आनन्द एवं विश्राम का स्रोत तो मनुष्य के अपने अन्दर ही है, उसकी आत्मा। साँसारिक पदार्थों और वस्तुओं पर अपनी सुख, शान्ति, विश्राम को छोड़ने वाला व्यक्ति जीवन भर उनके परिवर्तन के साथ सदैव हिलता-डुलता भागता-दौड़ता रहेगा तब यह प्रयास उसके लिए मृग-मरीचिका ही सिद्ध होगा।
अपने हृदय के सिंहासन पर बैठ कर आप संसार के स्वामी और शासक हैं लेकिन संसार में अपना स्थान
आज का हमारा सारा वाँग्मय हमारे लिए निकम्मा है- वह बड़े छोटे स्तर पर है। हमें नया वांग्मय बनाना होगा। धर्म की नए सिरे से स्थापना करनी होगी और ऊँचे स्तर पर जाना होगा। अब वह पुराना धर्म--मूर्ति, कपूर, आरती आदि हमारा कार्य साधन नहीं कर सकेगा। अब तो सारा मानव-समाज ही भगवान की मूर्ति है। उसकी आरती करनी होगी--उसे दोनों समय भोजन मिलता है या नहीं, यह देखना होगा। आज के विज्ञान-जगत् में इसके अतिरिक्त हमारा और कोई निस्तार नहीं है।
-विनोबा भावे
ढूंढ़ने जब आप निकलते हैं तो आप पराधीन हैं, जहाँ आपको परावलम्बन का जीवन बिताना पड़ता है और दूसरों की खुशी, नाराजी पर सुखी-दुखी होना पड़ता है।
आप यह न सोचें कि संसार आपको क्या समझेगा। यदि आप अपने अन्तर में विराजमान होकर अपना शासन भली प्रकार चलाते हैं तो आप संसार के राजा महाराजाओं से भी अपार वैभवशाली हैं, उच्च है, महान् हैं। इसी सत्य को अंगीकार करने वाले स्वामी रामतीर्थ अपने आपको “राम बादशाह कहा करते थे” जब कि संसार वाले भले ही उन्हें कोई फकीर, साधु, संन्यासी के रूप में जानें। क्या आप भी अपने बादशाह नहीं बन सकते? ऐसे बादशाह जिसके समक्ष संसार के समस्त वैभव, यश, ऐश्वर्य, कीर्ति की कान्ति भी फीकी पड़ जाती है।
महापुरुषों और जन-साधारण में यही एक फर्क है कि वे अपने अन्तर में स्थित होकर संसार को गति देते हैं जब कि हम संसार में स्थित होकर आगे बढ़ना चाहते हैं। संसार के वस्तु पदार्थों में अपना लक्ष्य, अपनी सफलता, अपना ऐश्वर्य, सुख, शान्ति ढूँढ़ते हैं और अन्ततः इसके लिए हमें निराश ही होना पड़ता है। संसार की लहरों में निराश्रित होकर बहना पड़ता है। उसकी बनने, मिटने वाली, परिवर्तनशील, टूटने-फूटने वाली लहरों में थपेड़े खाकर अशान्त एवं परेशान होना पड़ता है। लेकिन जो अपने अन्तर के दुर्भेद्य, अजर-अमर जहाज का कप्तान बन कर बैठा हुआ है, वह संसार की लहरों को भी रौंदता हुआ तीव्र गति से आगे बढ़ जाता है। ऐसा है मनुष्य का आधार बिन्दु जो उसके अपने ही अन्तर में है कहीं बाहर नहीं।
आपका कल्याण, आपका अभ्युत्थान, आपकी स्थायी सफलता, जीवन यात्रा की पूर्णता, आपकी स्थायी सुख शान्ति आनन्द की निधियाँ इसी पर आधारित हैं कि आप अपने हृदय में स्थित उस केन्द्र बिन्दु की खोज करें, जिसमें अपार शक्ति है, अनन्त सामर्थ्य है। इसी सत्य को जीवन का प्रेरक बना कर अपनी विजय का आधार बनायें। किनारे-किनारे भटकने के बजाय अन्तर के गर्भ में ही गोता लगावें, पत्ती-पत्ती ढूँढ़ने के बजाय जीवन- वृक्ष के मूल में ही विश्राम प्राप्त करें। अपने अन्तर को केन्द्र बना कर जीवन की गति-विधियाँ चालू रखें जैसे सूर्य को केन्द्र मान कर ग्रह नक्षत्र चलते हैं। अपने शासक आप बनें। दूसरे व्यक्तियों की सहायता की आशा में न बैठे रहें, अपने अन्तर के देव का आवाहन करें। “दूसरों से प्रेम करें लेकिन उनके प्रेम के मुहताज न बनें। दूसरों से सहानुभूति रखें उन्हें सहयोग करें लेकिन दूसरों की सहानुभूति सहायता की इच्छा न रखें।” अपने बादशाह बन कर, स्वामी बनकर जीवन का संचालन करें। जन्म से लेकर मरण तक अपना पथ स्वयं तैयार करें। अपने ही पैरों पर चलें।
यह निश्चित है जब तक आप अपनी सहायता, पथ-प्रदर्शन के लिए देवताओं, स्वर्गीय दूतों, मनुष्यों की सहायता की याचना करते रहेंगे, तब तक आप पराधीनता, दुख अशान्ति, पराजय से छुटकारा नहीं पा सकते। इन से छुटकारा पाने का एक ही आधार है कि अपने अन्तर प्रकाश से स्वयं अपना पथ प्रकाशित करें।
फूलों से लदे गुलाब के पौधे को चिन्तामग्न देख पास में उगे आम के झुण्ड ने इसका कारण पूछा।
गुलाब ने कहा आज तो मैं फूलों से लदा हूँ, पर वह पतझड़ दूर नहीं, जब मैं पत्तों से भी झड़ जाऊँगा और फिर मेरी कटीली डालियों को कोई आँख उठा कर भी न देखेगा। क्या यह कम चिन्ता की बात है?
आम ने कहा- मित्र! उस आज की सुषमा और अगले पतझड़ के बाद फिर आने वाली अपनी सुन्दरता का विचार क्यों नहीं करते? मुझे देखो न अभी फल-फूलों में लदने में कई वर्ष लगेंगे पर उसकी आशा और कल्पना करने में निरन्तर प्रमुदित बना रहता हूँ।
वेद भगवान् का मत है-”आरोहणमाक्रमण जीवतो जीवतोऽनम्” जीवन के लिए सबसे आवश्यक बात यह है कि उसे रुकना नहीं चाहिए। उन्नत होना और आगे बढ़ना जीवन का स्वाभाविक धर्म है। यह विकास यात्रा द्रुतगति से सर्वत्र चल रही है। वैज्ञानिकों का कथन है कि यह पृथ्वी जिस पर हम निवास करते हैं 365+1/4 दिन में सूर्य की परिक्रमा कर लेती है। सूर्य को भी चुपचाप बैठने में चैन नहीं मिला। वह भी सौरमण्डल के समस्त दो खरब नक्षत्रों को लेकर कृत्तिका की यात्रा पर निकल पड़ा। कृत्तिका अभिजित की ओर, अभिजित किसी चौथे ग्रह की ओर। सभी के सभी चलायमान हैं किसी को चुपचाप बैठने में आनन्द नहीं आता। चलते रहना, क्रियाशील बने रहना सृष्टि का सनातन नियम है। जहाँ रुके वहीं मौत है, वहीं जड़ता है। चलना जीवन का प्रतीक है, रुक जाना ही मृत्यु है।
कहते हैं “आलसी को पाप खा जाता है।” यह बात सच है कि अकर्मण्यता से अवांछनीय तत्वों को प्रोत्साहन मिलता है, फलतः विनाश के क्षण मानवीय प्रगति पर हावी हो जाते है। परिश्रम के अभाव में सौभाग्य की प्राप्ति सम्भव नहीं। जो चलता है वह ऐश्वर्यों और महान् विभूतियों का स्वामी बन जाता है। ऐतरेय ब्राह्मण का प्रेरक विचार है :-
माऽनाश्रान्ताय श्रीरस्ति.......
डडडडडडडडडडडडडडडडडडड
चरैवेति चरैवेति॥
अर्थात्—जो चलता है उसकी जाँघें पुष्ट बनती हैं। फल प्राप्ति तक उद्योग करने वाला व्यक्ति पुरुषार्थी होता हैं। प्रयत्नशील पुरुष के पाप-ताप, भव-बन्धन मार्ग में ही नष्ट हो जाते है, इसलिए चलते रहो, चलते रहो।
जीवन की शक्ति, सौंदर्य और सफलता चलते रहने में है। जीवन की सार्थकता भी इसी में है किन्तु यह समझ लेना आवश्यक है कि हमारी यात्रा सोद्देश्य हो। जीवन का एक निश्चित लक्ष्य हो। यह उद्देश्य भौतिक सुखों की आकाँक्षा भी हो सकता है। किन्तु इससे शरीर धारण और मानव-जीवन में जो विशेषताएँ दिखाई देती हैं उनका कुछ भी उपयोग नहीं हो पाता। मनुष्य को विचार, बल, भाषा लिपि, विचारों के आदान-प्रदान की जो सुविधाएँ मिली हैं, वे किसी विशेष प्रयोजन के लिए दी गई जान पड़ती हैं। संसार के सभी धर्म और जाति के नेताओं, महापुरुषों के इस सम्बन्ध में दो मत नहीं हैं। सभी ने यह स्वीकार किया है कि मानव-जीवन का लक्ष्य अंतर्दर्शन है। आत्म-ज्ञान पाये बिना वह चिरविश्रान्ति का भागी नहीं बन सकता। इस सत्य की मशाल को जो मजबूती से हाथों में पकड़कर सदैव आगे बढ़ता रहता है उसी का जीवन-उद्देश्य पूरा होता है। इसी में स्वास्थ्य, शक्ति , स्वतन्त्रता और स्वावलम्बन सन्निहित है।
अकर्मण्य पुरुष का जीवन बहुत संकुचित अशक्त और अन्धकारमय होता है। प्रगति का दुर्गति से गहरा सम्बन्ध है। जिनके जीवन में क्रियाशीलता नहीं होती, जो आलस्य में पड़े अपना समय व्यर्थ गँवाते रहते हैं उन्हें अन्त में पछतावा ही हाथ लगता है। कौन जाने जो परिस्थितियाँ हमें आज उपलब्ध हैं। वे कल भी बनी रहेंगी। यह संसार परिवर्तनशील है। आज जहाँ हरे-भरे खेत खड़े हैं वहाँ एक दिन के अन्धड़, तूफान से मैदान दिखाई पड़ने लगता है। हिमालय के बारे में लोगों का कहना है कि वहाँ किसी जमाने में समुद्र था। कब कोई नखलिस्तान, रेगिस्तान में बदल जाय यह कहा नहीं जा सकता। इसलिए आज जो शक्ति और साधन हमें मिले हैं, उन्हें ही लेकर आगे बढ़ चलें अपने जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए। दौड़ लगादें तो जीवन के सूर्य को छुपने के पूर्व प्राप्त कर सकते हैं। न भी मिले तो समीप तो पहुँच ही सकते हैं, आगे के लिये अधिक सुविधाजनक,अधिक अनुकूल परिस्थितियाँ तो पैदा कर ही सकते हैं।
भगवान् कृष्ण ने लिखा है :—
ईश्वरः सर्वभूतानाँ ह्मद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयर्न्सव भूतानि यन्त्रारुढ़ानि मायया॥
अर्थात्-संसार की प्रत्येक वस्तु में एक ही आध्यात्मिक प्राण-शक्ति परमात्मा,विद्यमान है। प्रकृति अपनी सम्पूर्ण पार्थिव शक्तियों के साथ निश्चित योजना के अनुसार जीवन का निर्माण करती हुई आगे बढ़ती दिखाई देती है। प्रकृति में न तो आलस्य है न स्तब्धता। मनुष्य की अन्तः प्रकृति भी यही चाहती है कि हम रुकें नहीं। जर्मनी के महाकवि गेटे ने लिखा है कि अपनी प्रगति और विकास-क्रम में प्रकृति जिस प्रकार रुकना नहीं जानती मनुष्य भी वैसे ही सक्रिय रहे तो वह सहज ही अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। प्रकृति के इस गुण की अवहेलना ही मृत्यु का कारण है।
जीवन एक महान यात्रा है जिसकी सुघड़ता सदैव चलते रहने में है। जब तक हम चलते रहते हैं तब तक हमारी शक्तियों का उपयोग होता रहता है। रेलगाड़ी जब किसी स्टेशन पर थोड़ी देर खड़ी रहती है तो इंजन की सुरक्षा के लिए उसके अन्दर भरी हुई सारी भाप शक्ति को बाहर निकाल देना पड़ता है। ऐसा न किया जाय तो अपनी ही शक्ति अपना ही विनाश करने को तत्पर हो जाती है। शक्ति का सदुपयोग तभी तक बना रहता है जबतक पाँव आगे बढ़ते रहते हैं। रुक जाते हैं तो शक्ति विघटन का खतरा पैदा हो जाता है। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षण का उपयोग अपनी विकास-यात्रा की पूर्ति में होना चाहिए।
जीवन को एक संग्राम मानें तो मनुष्य को एक सैनिक मानना, पड़ेगा। सिपाही का प्रमुख कार्य है लड़ना संघर्ष करना। मनुष्य जीवन में शत्रुओं की कमी नहीं है। काम, क्रोध, मद, मोह, मत्सर के षडरिपु हर क्षेत्र में मनुष्य को परास्त करने की ताक में बैठे रहते हैं। दुश्मन को जीतने के लिए जब बन्दूक में संगीन चढ़ाकर सिपाही आगे बढ़ता है तो अपने दुश्मनों को रौंदता, मारता, काटता हुआ आगे बढ़ता जाता है। सिपाही होने का गौरव भी इसी में है कि उसके पाँव पीछे न पड़ें, विजय और स्वच्छन्दता भी इसी में है। जो डरकर पीछे रह जाते हैं उन्हें पराधीन होकर ही जीना पड़ता है। उस जीवन का कोई मूल्य नहीं जो हिम्मत-पस्त होकर जीवन-संग्राम में आगे बढ़ने से इनकार कर देता है।
आगे बढ़ने का अर्थ यहाँ जमीन नापने या पैदल चलने से नहीं है। यह संकेत आध्यात्मिक विकास के लिए है। आध्यात्मिक-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जो उद्योग करना पड़ता है, उसे आगे बढ़ना, चलना, यात्रा पूरी करना कहा जा सकता है। यह मंजिल विचार और व्यवहार दोनों से प्राप्त की जाती है। विचार मनुष्य की असाधारण शक्ति है। इस के बल पर संसार का सत्य-असत्य प्रकट होता है। ज्ञान की विशेषता मनुष्य में न रही होती तो उसका जीवन भी पशुओं जैसा होता। बेचारा आदमी रीछ, भालू, बन्दर, लोमड़ी, खरगोश के समान ही इधर-उधर निरुद्देश्य भटक रहा होता। पर विचार शक्ति के द्वारा वह एक आध्यात्मिक जगत का निर्माण करता है। इसी से उसकी जीवन-धारण की प्रक्रिया पूरी होती है। अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान, मनुष्य को विचारशक्ति के ही द्वारा होता है।
मनुष्य यदि खाने-पीने और सामान्य स्तर का जीवन जीने तक ही सीमित बना रहे तो यह माना जायगा कि वह अकर्मण्य है। उसमें जीवन नहीं है। निर्जीव है, मुर्दा है। जो इतनी बड़ी शक्ति पाकर भी आगे बढ़ना नहीं चाहता वह कायर पुरुष है। कायर वही है जिसमें संघर्षों से दो-दो हाथ करते हुए आगे बढ़ने का साहस नहीं होता। हजारों लाखों को रोज ही मुर्दा घाटों पर जलते देखते हैं फिर भी हम अपनी जीवन की नश्वरता को नहीं पहचानते। रोज ही हजारों महापुरुषों के सान्निध्य से गुजर जाते हैं पर अपने को उनसे कुछ भी प्रेरणा नहीं मिलती। क्या कहें ऐसे आदमी को जिसे विचार का पारस मिला है तो भी निर्धन है। शक्ति मिली है पर निर्बल बना हुआ इन्सान अपने लक्ष्य से भटक गया है, केवल इसलिए कि वह आगे बढ़ने, चलते रहने की हिम्मत नहीं बाँध पाता।
वह चाहता तो आत्म-निरीक्षण और जीवन शोधन करते हुए आगे बढ़ता । विश्वात्मा के साथ मेल पैदा करता। आत्मीयता, समता, सहानुभूति और सहचरत्व का विकास करते हुए अपना जीवन-लक्ष्य सहज ही पूरा कर लेता किन्तु बैठे रहकर उसने कितनी भारी क्षति कर ली इसका अनुमान लगाना भी कठिन है।
प्रगति होती है आचरण से। विचारों से जो सिद्धान्त मस्तिष्क में आते हैं वे आचरण में प्रयुक्त होकर अपनी स्थिति के अनुरूप पतन या विकास में सहायक होते हैं। सत्कर्मों से स्वर्ग प्राप्ति की कामना की जाती है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के मंगलमय सुकृत्य मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में सहायक होते हैं। जिन्होंने सदाचार की महत्ता को समझ लिया वे जीवन पथ पर आधे पार हो गये, ऐसा समझना चाहिए किन्तु जिन्हें अभी तक स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, कलह और कटुता से ही छुटकारा नहीं मिला, उनके भाग्य में पशुवत् यंत्रणायें ही भोगनी लिखी हैं। मनुष्य जीवन जैसा अलभ्य अवसर पाकर भी जो आगे न बढ़ सका, उसे जितना धिक्कारा जाय वह कम ही है।
मनुष्य सत्कर्मों के प्रकाश में आगे बढ़ता है और दुष्कृत्यों के अन्धकार में इधर-उधर भटकता, मारा-मारा घूमता रहता है। अपनी शक्तियों और सामर्थ्यों का नाश करता देखा जाता है। मनुष्य इसका जिम्मेदार स्वयं ही है।
योग वसिष्ठ ने कहा है—
न च निस्पन्दता लोके दृष्टेहशवताँ बिना।
स्पन्दाच्च फलं संप्राप्ति स्तस्मात दैवं निरर्थकम्॥
अर्थात्—जो अपनी सफलता के लिए देवताओं के भरोसे बैठे हैं वे अकर्मण्य हैं। उन्हें ही मृत मानते हैं। फल की प्राप्ति उचित कर्म करने से ही होती है।
स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे “मानव जीवन का सारा रहस्य उसकी वृद्धि में है।” उसे दिन-दिन आगे बढ़ना चाहिए। अकर्मण्य होने से मनुष्य पथ-भ्रष्ट हो जाता है और पतित बनकर निकृष्ट जीवन जिया करता है। गति का आधार कर्म है। सत्कर्मों से सद्गति होना निश्चित है। पर बैठे रहने से तो न आध्यात्मिक सफलता हाथ लगेगी न साँसारिक सुख ही मिलेंगे। इसीलिए भगवान् कृष्ण ने कहा है—”हे अर्जुन! तू कर्म करना छोड़ देगा तो तेरी जीवन यात्रा भी नहीं चल सकती।”
चलने का अर्थ है अपनी शक्तियों का सदुपयोग करना। उन्नति के लिए निरन्तर उद्योग करना, विकास की ओर उन्मुख होना और एक ऐसा सुव्यवस्थित जीवन बिताना जिसमें प्राण हों, शक्ति हो और सामञ्जस्य हो। यह विकास सत्य का विकास हो, यह राह ज्ञान की राह हो तो निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि हमारे पाँव ठीक दिशा में बढ़ रहे हैं।
मानव-जीवन का प्रमुख आदर्श है नैतिक विकास करना। इससे मनुष्य का विकास सम्भव होगा। सहयोगपूर्वक नैतिक जीवन जीने से ही परस्पर हित संरक्षित बने रहते हैं। सूर्य का मार्ग भिन्न है। चन्द्रमा अपनी दूसरी राह जाता है। सभी अपने-अपने निर्दिष्ट पथ पर चलते हुए अपनी विकास यात्रा पूरी कर रहे हैं। आत्मा का ध्यान बनाये रखने से मनुष्य कुमार्गगामी नहीं होता। जिस प्रकार दूसरे यह उपग्रह अपनी निश्चित कक्षा में बढ़ते रहते हैं उसी प्रकार मनुष्य की भी एक कक्षा है, आध्यात्मिक कक्षा। ग्रह अपने इसी निश्चित पथ पर चलता हुआ निरन्तर आगे बढ़ता रहे— इसी में उसकी सफलता है, इसी में मानव-जीवन का गौरव है।
एक बार एक गरीब आदमी हजरत इब्राहीम के पास पहुँचा और कुछ आर्थिक सहायता माँगने लगा। हजरत ने कहा —तुम्हारे पास यदि कुछ सामान हो तो मेरे पास ले आओ। गरीब आदमी के पास तश्तरी, लोटा और दो कम्बल थे। हजरत ने एक कम्बल छोड़कर सब सामान नीलाम करा दिया।
नीलाम में प्राप्त हुए दो बिरम उसे देते हुए कहा —एक, दिरम का आटा और एक दिरम की कुल्हाड़ी खरीद लो। आटे से पेट भरो और कुल्हाड़ी से लकड़ी काटकर बाजार में बेचो। गरीब आदमी ने यही किया। पन्द्रह दिन बाद लौटकर फिर आया तो उसके पास बचत के दस दिरम थे। हजरत ने कहा —समझदारी यदि समर्थ हो तो अवश्य सहायता अपने ही बाजुओं से माँगे।
स्वामी विवेकानन्द ने मानव अन्तरात्मा को जागृत करने के लिए जो प्रबल प्रयत्न किए थे उनका प्रभाव सारे भारतवर्ष पर—विशेषतया बंगाल पर पड़ा। अध्यात्म कायरों या भगोड़ों की बपौती नहीं वरन् शूरवीरों और सत्पुरुषों की जीवन नीति है, यह उपदेश करते हुए स्वामीजी देशव्यापी प्रचार कार्य में लगे थे। तेजस्वी नवयुवक उनसे बहुत प्रभावित हुए। धर्म, संस्कृति, समाज और राष्ट्र के प्रति निष्ठा पैदा करना और मानवता के महान उत्तरदायित्वों को समझते हुए महापुरुषों जैसी जीवन-नीति के लिए भावनाशील व्यक्तियों को तैयार करना स्वामी जी का लक्ष्य था। उस कषाय वस्त्रधारी महात्मा ने भारत के सच्चे सपूत की तरह उस अध्यात्म का प्रसार किया जिससे मृतकों में भी जीवन उत्पन्न होता है। स्वामी रामदास ने जिस प्रकार यवन काल में महाराष्ट्र को जाग्रत करके स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानी पैदा किए थे, उसी प्रकार स्वामी विवेकानन्द ने देशभर में, विशेषतया बंगाल में ऐसी लहर उत्पन्न की, जिससे प्रभावित होकर भावनाशील लोग गौरवास्पद जीवन जीने के लिए आतुर हो उठे। यही भावना बंगाल के क्रान्तिकारी आन्दोलन के रूप में फूटी। यह प्रकट तथ्य है कि अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्तिकारी संघर्ष में बंगाल ही अग्रणी रहा।
आत्मदर्शी नेताओं द्वारा झकझोरकर जागृत की गई नई पीढ़ी भारत के अतीत को वापिस लाने के लिए जिन दिनों छटपटाहट अनुभव कर रही थी, उन्हीं दिनों 15 अगस्त 1872 में कलकत्ता में अरविन्द का जन्म हुआ। उस समय स्वराज्य की बात करना भी अपराध था पर अरविन्द की सतत साधना फलित हुई। 75 वर्ष के तप ने ठीक उनके जन्म दिन पर ही भारत में अपना पूर्ण स्वतन्त्रता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया।
अरविन्द के पिता सुप्रसिद्ध सिविल सर्जन डॉक्टर कृष्णधन घोष, अपने इस बालक को उच्च शिक्षा दिलाकर सरकार में कोई बड़ा अफसर बनाना चाहते थे। अतएव 7 वर्ष की आयु में ही इंग्लैण्ड पढ़ने भेज दिया। 18 वर्ष की आयु में उनने सिविल सर्विस की परीक्षा दी और आई. सी. एम. प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली। इसी अवधि में अपने निरन्तर अध्यवसाय के द्वारा उन्होंने अंग्रेजी के अतिरिक्त , जर्मन, लैटिन, ग्रीक, फ्रेञ्च और इटली की भाषाओं, में भी निपुणता प्राप्त कर ली।
आई. सी. एस. पास करने पर उन्हें भारत सरकार द्वारा कोई उच्च पद दिया जाने वाला था। पर उनका जन्म गुलामी का पट्टा बाँधकर ऐश आराम की जिन्दगी बिताने के लिए नहीं हुआ था। उन्हें कुछ बड़े काम करने थे। सोचा यदि अफसरी मिल गई और सम्भव है फिर उसी में फँस गए तो प्रलोभन के बन्धन तोड़कर बाहर निकलना कठिन होगा। अतएव घुड़सवारी की परीक्षा देने से इनकार कर दिया, इस प्रकार वे जान बूझकर असफल बनने के लिए अड़ गये।
हीनताग्रस्त मस्तिष्क दूसरों के अन्धानुकरण में अपनी बड़ाई समझते हैं। जैसा कि आज अंग्रेजों के चले जाने पर भी उनके रहन-सहन, आहार-विहार, भाषा, भेष, नकल बनाने में अपना बड़प्पन अनुभव करते हैं। अरविन्द ऐसे ओछे न थे। 18 वर्ष वे इंग्लैंड में रहे और उन्होंने अंग्रेजों के जातीय गौरव और उपयुक्त गुणों को सीखा, स्वतन्त्र देश में रहकर उन्हें स्वतन्त्रता प्राण प्रिय लगने लगी। भारत लौटे तो उनके कण-कण में भारत को इंग्लैंड जैसा स्वतन्त्र, सम्पन्न और प्रबुद्ध बनाने की आकाँक्षा भरी हुई थी।
अरविन्द की प्रतिभा और व्यक्तित्व से बड़ौदा नरेश बहुत प्रभावित हुए और वहाँ उनकी नियुक्ति शिक्षा शास्त्री के रूप में हो गई। 13 वर्षों तक वे वहाँ प्रधानाध्यापक और वाइस प्रिंसिपल और निजी सचिव का काम योग्यतापूर्वक करते रहे। इस बीच उन्होंने सहस्रों छात्रों में जातीय जीवन भावनाएँ भरीं और उन्हें चरित्रवान देशभक्त बनाया।
इंग्लैंड से लौटते ही उन्होंने बंगाल में क्रान्तिकारी आन्दोलन की नींव जमाने का कार्य आरम्भ कर दिया। संगठन के अतिरिक्त प्रचार को भी माध्यम बनाया। बम्बई के अंग्रेजी साप्ताहिक ‘इन्दु प्रकाश’ में पुरानों के बदले नये दीपक ‘शीर्षक लेखमाला’ चालू रखकर भारत के नव-निर्माण के लिए प्रत्येक देशभक्त आह्वान का आह्वान किया। उन दिनों पत्र कम निकलते थे, जो निकलते थे वे चाव से पढ़े जाते थे। इन लेखों का भारी प्रभाव पड़ा और उन्हें अनेकों साथी सहयोगी मिलने लगे। उन्होंने ‘तरुण संघ’ की स्थापना की जिसमें आगे चलकर भारत के कितने ही स्वतन्त्र क्रान्तिकारी संगठन सम्मिलित हो गए। राष्ट्रीय दैनिक ‘वन्देमातरम्’ के सम्पादक बने और क्रान्तिकारी दैनिक ‘युगान्तर’ का सञ्चालन किया। उन्होंने क्रान्तिकारी योजनाएं बनाने के लिए सुयोग्य विचारकों की एक ‘अनुशीलन समिति’ बनाई जो भारत की और संसार की परिस्थितियों पर गम्भीरतापूर्वक विचार करके योजना तैयारी करती और ‘तरुण-संघ’ के सदस्य उन्हें कार्यान्वित करने में लग जाते। उन दिनों एक तरह से भारत में स्वाधीनता संग्राम की क्रान्तिकारी योजनाओं का समग्र सञ्चालन वे स्वयं ही कर रहे थे।
अरविन्द के जीवनोद्देश्य का परिचय पाणिग्रहण के दिनों अपनी पत्नी को लिखे गए पत्रों में भली प्रकार मिल जाता है। उनने एक पत्र में अपनी सहधर्मिणी को लिखा —तुम चाहो तो मुझे सनकी कह सकती हो, मुझे एक नहीं तीन तरह का पागलपन है। एक पागलपन यह है कि मुझे जो कुछ ईश्वर ने दिया है उसमें से के वल निर्वाह योग्य अपने लिए लेकर बाकी सबका सब जनता जनार्दन को लौटा देना चाहता हूँ। इस गए गुजरे समाज का अंग होते हुए भी यदि मैं अपने ऐश-आराम या संग्रह की बात सोचूँ, तब वह मेरे लिये चोरी, बेईमानी की तरह ही एक घृणित काम होगा। दूसरा पागलपन यह है कि— मैंने निश्चय किया है कि मैं ईश्वर को प्राप्त करके रहूँगा। आज के सम्प्रदायवादियों के आडम्बरों पर मेरा कोई भरोसा नहीं, तो भी यह पक्की निष्ठा है कि ईश्वर है और उसे कोई भी सच्चा मनुष्य प्राप्त कर सकता है। मैं मार्ग तलाश करूंगा, उस पर चलूँगा और कितना ही श्रम, समय एवं कष्ट क्यों न हो, मैं अपना ईश्वर प्राप्ति का लक्ष्य प्राप्त करके रहूँगा। तीसरा पागलपन यह है कि भारत माता को अपनी सगी माता जैसी भावना से पूजना चाहता हूँ। उसका सच्चा भक्त बनना चाहता हूँ। और इस मातृ भक्ति के लिए बड़े से बड़ा बलिदान करने की प्रसन्नता अनुभव करना चाहता हूँ।” सचमुच इनकी यह तीनों सनकें जीवन के अन्तकाल तक बनी रहीं और वे एक साधारण बंगाली से बढ़कर विश्व की महान विभूति इन सनकों के आधार पर ही बन सके।
लार्ड कर्जन ने बंगाल को दो भागों में बाँट देने के लिए जो ‘बंग भंग’ योजना रखी उससे सारा देश तिलमिला उठा। बंगाल में उसके प्रतिरोध के लिए सक्रिय आन्दोलन उठ खड़ा हुआ। अरविन्द घोष उसका नेतृत्व करने लगे। विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार, राष्ट्रीय स्वयं सेवकों का संगठन, अदालतों का बहिष्कार, शिक्षा का विस्तार तथा अँग्रेजों को आतंकित करने के उपाय इस आन्दोलन के अंग थे। उन्होंने नेशनल कालेज की स्थापना में प्रमुख भाग लिया और मात्र 75)मासिक वेतन पर काम करते रहे। काँग्रेस में उन्होंने प्रवेश किया और नेताओं की अग्रिम पंक्ति में जा पहुँचे।
सरकार उनके क्रान्तिकारी विचारों और कार्यों से आतंकित हो उठी। 2 मई सन् 1908 को कलकत्ता के मानिक तल्ला बाग में तलाशी हुई जिसमें बम पिस्तौल और कारतूसों का भण्डार मिला, चालीस युवक पकड़े गये जिनमें अरविन्द घोष भी थे। अलीपुर षडयन्त्र केस का
समुद्रतरणे यद्वदुपायो नौः प्रकीर्तिता।
संसारतरणे तद्वद् ब्रह्मचर्य प्रकीर्तितम्॥
जैसे विशाल जलाशय, समुद्र को पार करने के लिए नौका ही एकमात्र साधन, उपाय है उसी प्रकार इस संसार रूपी भवसागर से पार उतरने के लिए ब्रह्मचर्य रूपी नौका ही श्रेष्ठ उपाय है।
यह मुकदमा सेशन जज की अदालत में एक वर्ष तक चला। देशबन्धु चितरञ्जनदास की योग्यता और परिश्रम से अरविन्द इस मुकदमे से छूट गये। पीछे हाईकोर्ट ने हाथ मलते हुए अपने फैसले में लिखा —’प्रमुख अपराधी और षड्यंत्रकारी तो इस मुकदमे में अरविन्द घोष थे जिन्हें पहले ही मुक्त कर दिया गया।’
जेल में उन्हें एकान्त काल कोठरी में रखा गया, जिसका अनुभव वर्णन करते हुए उनने लिखा है— एकान्त में रहने वाला या तो सन्त बन जाता है या फिर पूरा शठ हो जाता है।” इनके इस कथन की सचाई भारत में जहाँ-तहाँ फैले एकान्तवासी ‘शठों’ के रूप में प्रत्यक्ष देखी जा सकती है। पर वे स्वयं तो सन्त ही बने। जेल से लौटकर उनकी प्रवृत्ति साधना की ओर मुड़ी। उन्हें लगा कि उथले व्यक्तित्व, बुद्धि कौशल और शारीरिक धमा चौकड़ी मात्र से कोई बड़ा काम नहीं कर सकते। बड़ा काम आत्मबल द्वारा ही सम्पन्न होता है और आत्मबल की प्राप्ति के लिए आत्म-चिन्तन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास आवश्यक हैं। ‘व्यक्ति को अपना व्यक्तित्व समष्टि की सत्ता में समर्पित करना चाहिए।’ इस लक्ष्य को लेकर वे पाण्डिचेरी गये और व्यक्ति गत स्वार्थ के लिए नहीं, विश्व-मानव के पुनरुत्थान के लिए वैसा ही तप करने लगे जैसा कि भगीरथ ने गंगा को लाने के लिए किया था। वे भारत भूमि में आध्यात्म की ऐसी ज्ञान गंगा का अवतरण करना चाहते थे जो मानव-जाति के समस्त कषाय कल्मषों को धोकर शुद्ध कर सके। उनने अपने लक्ष्य के प्रति आस्था प्रकट करते हुए कहा है— भारत ही विश्व का नेतृत्व करेगा। यहाँ की आध्यात्म विचारधारा विकसित होकर समस्त संसार को सुख-शान्ति का सन्देश देगी और मानव-जाति का उसी से कल्याण होगा।
महायोगी अरविन्द मद्रास से 112 मील दूर समुद्र तट पर अवस्थित पाण्डिचेरी नामक स्थान में लम्बी अवधि तक आध्यात्म साधन में निरत रहे। उनके सान्निध्य में पहुँचकर सहस्रों विद्यार्थियों ने नया प्रकाश पाया। 5 दिसम्बर 1950 को 78 वर्ष की आयु में उन्होंने महाप्रयाण किया। उनका सारा जीवन महा मानवता की साधना में ही व्यतीत हुआ। स्वतंत्रता सैनिक के रूप में भी और ज्ञान गंगा के अवतरण में संलग्न तपस्वी के रूप में वे एक ही लक्ष्य में निरन्तर लगे रहे। भारत माता अपने अरविन्द जैसे सच्चे सपूतों पर ही गर्व कर सकती है, ऐसे लोगों को जन्म देने से ही उसका गौरव बढ़ सकता है।
एक खरगोश बहुत भला था। उसने बहुत से जानवरों से मित्रता की और आशा की कि वक्त पड़ने पर मेरे काम आयेगे। एक दिन शिकारी कुत्तों ने उसका पीछा किया। वह दौड़ा हुआ गाय के पास पहुँचा और कहा—आप हमारे मित्र हैं, कृपाकर अपने पैने सींगों से इन कुत्तों को मार दीजिए। गाय ने उपेक्षा से कहा—मेरा घर जाने का समय हो गया। बच्चे इन्तजार कर रहे होंगे, अब मैं ठहर नहीं सकती। तब वह घोड़े के पास पहुँचा और कहा—मित्र घोड़े! मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर इन कुत्तों से बचा दो। घोड़े ने कहा—मैं बैठना भूल गया हूँ, तुम मेरी ऊँची पीठ पर चढ़ कैसे पाओगे? अब वह गधे के पास पहुँचा और कहा—भाई, मैं मुसीबत में हूँ, तुम दुलत्ती झाड़ने में प्रसिद्ध हो इन कुत्तों को लातें मारकर भगा दो। गधे ने कहा—घर पहुँचने में देरी हो जाने से मेरा मालिक मुझे मारेगा। अब तो मैं घर जा रहा हूँ। यह काम किसी फुरसत के वक्त करा लेना। अब वह बकरी के पास पहुँचा और और उससे भी वही प्रार्थना की। बकरी ने कहा—जल्दी भाग यहाँ से, तेरे साथ मैं भी मुसीबत में फँस जाऊँगी। तब खरगोश ने समझा कि दूसरों का आसरा तकने से नहीं अपने बल बूते से ही अपनी मुसीबत पार होती है। तब वह पूरी तेजी से दौड़ा और एक घनी झाड़ी में छिपकर अपने प्राण बचाए।
अक्सर झूठे मित्र कुसमय आने पर साथ छोड़ बैठते हैं। दूसरों पर निर्भर रहने में खतरा है, अपने बलबूते ही अपनी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
हिन्दू-धर्म वह विकासमान विधि व्यवस्था है जो युगों-युगों से मानव-जीवन को वैयक्तिक, सामाजिक, भौतिक, आध्यात्मिक आदि सभी क्षेत्रों में प्रगति की ओर अग्रसर करती आ रही हैं। यद्यपि हिन्दू-धर्म भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाले जन-समाज की जीवन पद्धति से अभिन्न रहा है तथापि यह सार्वभौम मूल्यों---तथ्यों पर आधारित होने के कारण मानवधर्म---सनातनधर्म के रूप में प्रतिष्ठित है। और इसीलिए हिन्दू-धर्म को किन्हीं जातीय, भौगोलिक, मान्यताओं की सीमाओं में बाँधना अयुक्त है।
हिन्दू-धर्म, सनातन-धर्म है। सार्वभौम है, मानवमात्र का धर्म है। इसकी कोई आदि तिथि नहीं, इसका आरम्भ तो उसी दिन से हो गया जिस दिन से मनुष्य ने अपने जीवन को उन्नत, विकसित, उत्कृष्ट बनाने की दिशा में सोचना प्रारम्भ किया। हिन्दू-धर्म की कोई क्षेत्रीय जातीय मर्यादायें नहीं है। क्योंकि यह विश्व कल्याण की कामना लेकर चलता है। सबके सुख समृद्धि की भावना से ओत-प्रोत है यह। पाश्चात्य विद्वान् रोम्याँ रोला ने कहा है —”मैंने यूरोप और एशिया के सभी धर्मों का अध्ययन किया है। परन्तु मुझे उन सब में हिन्दू-धर्म ही सर्वश्रेष्ठ दिखाई देता है।” आगे उन्होंने कहा है “मेरा विश्वास है कि इसके सामने एक दिन समस्त जगत को सिर झुकाना पड़ेगा।”
हिन्दू-धर्म की सबसे बड़ी विशेषता इसकी आध्यात्मिक मान्यतायें—आस्थायें हैं। अध्यात्म ही हिन्दू-धर्म की आत्मा है। यह आध्यात्मिक मान्यताओं को अन्य मान्यताओं की अपेक्षा अधिक महत्व देता है। हिन्दू धर्म के अनुसार मनुष्य को अपनी सीमित चेतना का उपयोग उच्चस्तर, असीम आत्म-अस्तित्व तथा परमानन्द की प्राप्ति के लिए करना आवश्यक है। लेकिन जगत को भुलाकर नहीं। इस आध्यात्मिक साधना की तपस्थली जगत को बनाकर ही लक्ष्य सन्धान करना होगा। जगत में ही मुक्ति प्राप्त करनी होगी, ऐसी हिन्दू-धर्म की मान्यता है। हिन्दू-धर्म समस्त ब्रह्माण्ड की आध्यात्मिक एकता को लेकर चलता है और उसका प्रयोग मानव-जीवन में करके उसे व्यापक एवं महान् बनाना है। यही “सर्वोच्च तादात्म्य” है। सीमित-लघु में अपूर्णता है, अज्ञान है, इसलिए असन्तोष भी है। हिन्दू-धर्म मनुष्य को अपनी संकीर्णता, अज्ञान, लघुता से उठाकर —पूर्णता और ज्ञान के प्रकाश-पुँज में स्थित देखना चाहता है जहाँ उसके समस्त असन्तोष, दुःख नष्ट हो जाते हैं। इसे ही मुक्ति कहते हैं।
असीमित अनन्त के ज्ञान-प्रकाश में मुक्ति ही हिन्दू-धर्म की मूल मान्यता है, इसके अनुसार मोक्ष ही मानव-जीवन का परम पुरुषार्थ है, जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। लेकिन इस मुक्ति या मोक्ष को यहीं, इसी जीवन में, इसी धरती पर मानवीय सम्बन्धों में प्राप्त करना है। जीवन की कार्य-पद्धति को मूर्त देखना है। हिन्दू-धर्म हमारे समस्त कर्मों को ईश्वरोन्मुखी बनाकर, उन्हें पवित्र बनाकर, लक्ष्य-सन्धान करने का साधन बनाता है।
हिन्दू-धर्म की एक महत्वपूर्ण विशेषता है इसकी अजर अमर जीवनी-शक्ति । आश्चर्य होता है युगों-युगों के भीषण प्रहार, राजनैतिक सामाजिक परिवर्तनों के बाद भी यह अपना अस्तित्व बनाये हुए है। इसमें भी विशेषता यह है कि हिन्दू-धर्म किसी भी रूप में आक्रमणकारी नहीं रहा है, जब कि अन्य धर्मों के नाम पर संसार में भीषण रक्तपात हुए, मानव-जाति के किसी भाग को शोषण का शिकार होना पड़ा।
महाभारत के भीषण संग्राम के कारण हिन्दू-धर्म की मान्यता, रूप अस्त-व्यस्त हो गया था। तब व्यास तथा अन्य तत्कालीन ऋषियों ने हिन्दू-धर्म को व्यवस्थित किया। वैदिक युग के समाप्त होते हुए यज्ञ-यागादि धर्म-कर्मों के नाम पर अनेकों बुराइयां पैदा हो गई थीं, तब बौद्ध-धर्म के रूप में ही हिन्दू-धर्म का नवीन संस्करण हुआ और अपने युग में मानव-जाति का पथ-प्रदर्शन किया। आठवीं शताब्दी में जब ह्रसशील बौद्ध धर्म, शाक्त -सम्प्रदायों के रक्त पूर्ण जादुई अपराधों, अनाचार का जोर था, तब शंकराचार्य का उदय हुआ और उन्होंने हिन्दू धर्म का पुनर्नवीनीकरण करके उसे सशक्त बनाया। श्रीशंकर ने अल्पायु में ही ह्रासोन्मुखी बौद्धधर्म को खदेड़ दिया। विभिन्न मत मतान्तरों का शुद्धिकरण कर उनमें समन्वय पैदा करके हिन्दू-धर्म को दृढ़ आधार प्रदान किया।
सोलहवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक हिन्दू-धर्म के समक्ष और भी कठिन अवसर आए। मुस्लिम शासन में हिन्दू-धर्म को नष्ट-भ्रष्ट करने के दुष्प्रयत्न कुछ कम नहीं हुए। हिन्दुओं को नीच समझना, उनका बल-पूर्वक धर्म परिवर्तन, उनके धार्मिक स्थानों को नष्ट करना, धार्मिक क्रिया कर्मों पर दण्ड देना आदि ने एक बारगी हिन्दू-धर्म को हिला दिया। मथुरा, अयोध्या, काशी, सोमनाथ आदि तीर्थ स्थानों को कई बार नष्ट-भ्रष्ट किया गया। लेकिन हिन्दू-धर्म की निर्माण की शक्ति पर आश्चर्य होता है कि सात सौ वर्षों की अवधि में हिन्दू संस्कृति को नष्ट करने के प्रबल प्रयत्न किये गए किन्तु उनमें स्थायी सफलता न मिली। हर तोड़-फोड़ का पुनर्निर्माण होता रहा। मुस्लिम अत्याचारों के बावजूद भी हिन्दू-धर्म अधिकाधिक विकसित हुआ। चैतन्य, सूर, मीरा, तुलसी, जैसे भक्तों का उदय हुआ और उन्होंने इसे जीवित रखा।
अंग्रेजों के आगमन के साथ-साथ हिन्दू-धर्म पर एक और संकट आया। वह था ईसाई-मिशनरियों का धर्म प्रचार और अंग्रेजी ढंग की शिक्षा। इन्होंने एक ओर अबोध लोगों को बहकाकर धर्म-परिवर्तन के लिए प्रोत्साहन दिया तो दूसरी ओर अंग्रेजी ढंग से भारतीय समाज को शिक्षा दी, जिसका उद्देश्य भी उन्हें ईसाई बनाना था। लेकिन देश के महापुरुषों ने तत्काल इस खतरे को पहचाना और राजा राममोहन राय, विवेकानन्द, दयानन्द, तिलक, अरविन्द, महात्मा गाँधी जैसे व्यक्तियों ने इस खतरे के प्रति समाज को जागरुक किया। लेकिन अभी तक भी यह खतरा बना हुआ है, यह पूरी तरह दूर नहीं किया जा सका है। वर्तमान पीढ़ी पर यह दायित्व है कि वह इस चुनौती का सामना करे।
हिन्दू-धर्म किसी एक व्यक्ति का बताया हुआ या किसी पुस्तक विशेष में लिखा हुआ धर्म नहीं है, अपितु यह अनेकों ऋषियों, विचारकों, चिन्तकों, तत्वदर्शियों के चिन्तन, शोध, प्रयोग, अनुभवों की उपज है। हिन्दू-धर्म का प्रवर्तक कोई एक व्यक्ति नहीं रहा है। यह एक बहुत बड़े विद्वत् समाज की वैज्ञानिक शोध का परिणाम है। इसीलिए हिन्दू-धर्म किन्हीं बँधी बँधायी लकीरों, मान्यताओं पर नहीं चलता वरन् वह ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित है जो कभी नहीं बदलते।
यद्यपि समयानुसार हमारे साधन, परम्पराओं, मान्यताओं में परिवर्तन होता रहता है लेकिन मूल सत्य, हिन्दू धर्म की आत्मा सदैव अपरिवर्तित रहती है। भारतीय जीवन के कुछ पहलुओं को देखकर ऐसा भाव होने लगता है कि हिन्दू-धर्म पुरानी मान्यताओं, परम्पराओं का खण्डहर है। कुछ सीमा तक यह सही भी हो सकता है, लेकिन एक अनन्त परम्परा के रूप में चली आ रही क्रांतदर्शी आत्माएँ हिन्दू-धर्म की ही देन हैं जो समय-समय पर इस क्षीणता, पुरातनता के मैल को साफ कर मूलभूत तत्वों की दृढ़ता से घोषणा करती हैं। समस्त पुरातन को ही नवीन रूप दे डालती हैं। यही हिन्दू-धर्म की चिर नूतनता, सजीवता का चिन्ह है—वैज्ञानिकता का प्रमाण है।
एक व्यक्ति पर विरक्ति का नशा चढ़ा। दो प्रहर रात्रि गये वह उठा और घर छोड़कर ईश्वर की खोज में चलने लगा। सोते हुए स्त्री बच्चों की ओर उसने घृणा से देखा और कहा —यही हैं वे दुष्ट जिनने मुझे माया-जाल में बाँध रखा था। माँ की बगल में सोए हुए बच्चे ने सपने में यह अनर्थ देखा और वह चौंककर चीख पड़ा। अलसाई आँखों से माता ने अपने मुन्ने को कलेजे से चिपका लिया। चुपके से भगवान ने कहा —मूर्ख, माया-जाल में, कर्तव्य के बन्धनों में मैंने ही तुझे बाँधा था। इस माता को देख जो रोते बालक को छाती से लगाकर सान्त्वना देती है और एक तू है जो आश्वस्तों को धोखा देकर घर से भागता है। मैं तो कुटुम्बियों के रूप में तेरे घर मौजूद हूँ, फिर तू मुझे ढूंढ़ने कहाँ चला?
यह निश्चित है कि हमारा जीवन जितना बनावटी होगा, हमारी आवश्यकतायें जितनी बढ़ी हुई होंगी, उतना ही हमें अपनी शक्तियों को उनकी प्राप्ति के लिए किए जाने वाले प्रयत्न में लगाना होगा, जैसा कि आजकल हो रहा है। प्रतिमाह सौ रुपये से लेकर हजार रुपया पाने वाला व्यक्ति जीवन में अभाव ही महसूस करता है। उसका निर्वाह नहीं होता और जन-साधारण का जीवन इसकी पूर्ति के लिए भाग-दौड़ में ही लगा रहता है। नीति-अनीति से जैसे भी बने, मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जुटा रहता है। जीवन के किसी उत्कृष्ट पहलू, आदर्श दृष्टिकोण , महान् लक्ष्य पर सोचने-विचारने का उसे समय ही नहीं मिलता। अधिकाँश मनुष्य गरीब से लेकर अमीर तक सभी अपनी आवश्यकता की पूर्ति के गोरखधन्धे में ही लगे रहते हैं। इधर आमदनी बढ़ती है तो उधर आवश्यकतायें भी सुरसा की तरह मुँह फाड़ कर खड़ी हो जाती हैं और यह भी निश्चित है कि हमारी दिन-रात बढ़ने वाली आवश्यकताओं का कभी अन्त नहीं हो सकता। इन पर नियन्त्रण प्राप्त करने का एक ही आधार है और वह है सादगी के आधार पर अपनी आवश्यकताओं का निर्धारण करना।
वस्त्रों की आवश्यकता इसलिए होती है कि हम अपने शरीर को ढक सकें। सर्दी-गर्मी से शरीर का बचाव कर सकें और यह साधारण मूल्य के कपड़े से सम्भव है। गाँधी जी तो खादी की एक धोती और एक चद्दर में ही काम चला लेते थे। सन्त-महात्मा एवं महापुरुषों का काम थोड़े से कपड़ों से ही चल जाता है। फिर क्या आवश्यकता पड़ जाती है कि हम लोग बड़ा महँगा कीमती कपड़ा खरीदें और उसे नई-नई तर्जों एवं डिजाइनों में बनवायें। बाजार में गये, जो चीजें हमने देखीं, जी ललचाया और खरीद लाए। एक स्त्री 10-15 रुपए की चार साड़ियों में अपना काम भली प्रकार चलाती रह सकती है, फिर क्या आवश्यकता पड़ जाती है कि—सौ, दो सौ रुपए कीमत की एक-एक साड़ियाँ खरीद कर बक्स भरे जावें? गर्मी में सामान्य आदमी एक धोती, कुर्ता, बनियान आदि में काम चला सकता है पर यहीं हमारे देश में लोगों को कीमती सूट पहने देखा जाता है, भले ही अन्दर से पसीने बह रहे हों।
यह सच है कि हम वस्त्रों का संग्रह, खरीद तन ढकने के लिए नहीं करते वरन् अपनी तड़क-भड़क के लिए फैशन, बनाव आदि की दृष्टि से करते हैं। सर्दी गर्मी से बचने के लिए कपड़े नहीं पहनते लेकिन हम कैसे अच्छे लगते हैं, इसके लिए वस्त्र पहनते हैं और इसीलिए हर वर्ष सैकड़ों रुपया कपड़ों के नाम पर बाजार में बहाते हैं, फिर भी कहते हैं हमारी आवश्यकताएँ पूर्ण नहीं होती।
भोजन कितना आवश्यक है जीवन निर्वाह के लिए और सभी लोग कहते है—क्या करें दिन भर पेट के लिए सब कुछ करना पड़ता है। लेकिन वस्तुतः मनुष्य का पेट बहुत कम में भर जाता है। रोटी-साग गरीब-अमीर सभी को प्रायः मिल जाता है लेकिन फिर भी लोग कहते हैं “क्या करें पेट ही नहीं भरता”। इसका कारण यह नहीं कि हमारा पेट कोई बड़ी भारी टंकी बन गया है। सच तो यह है कि हम पेट भरने के लिए नहीं खाते, अपने स्वाद के लिए मिठाइयाँ, पकवान्, चाट-पकौड़ी न जाने क्या-क्या उड़ाते हैं और अपनी कमाई का पैसा गंवाते हैं, साथ ही इसके कारण बीमारियों के शिकार होकर डॉक्टर, वैद्य, हकीमों के पास जाते है, फिर दवाओं के नाम पर खर्च करते हैं। यदि आदमी पेट भरने की दृष्टि से ही खाए तो बहुत कम खर्चे में काम चल सकता है।
इसी तरह हम रहन-सहन, रीति-रिवाज, त्यौहार-वार के नाम पर दिखावे के लिए अपने नाम या बड़प्पन के लिए किस तरह अनाप शनाप खर्च करते हैं? भारतीय नागरिक की कमाई का बहुत बड़ा अंश इन्हीं में खर्च हो जाता है। हालाँकि इसके लिए हमारी प्राचीन परम्परायें, रूढ़ियां आदि कम उत्तरदायी नहीं हैं फिर भी विचारशील व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक इस तरह के फालतू खर्चे को रोक सकते हैं।
तथा कथित “जीवन स्तर” “स्टेंडर्ड आफ लिविंग” की प्रचलित व्याख्या ही यह हो गई है कि मनुष्य कितना कीमती वस्त्र पहनता है, खाने पीने, मौज मजे करने में, कितना अधिक खर्च करता है। समाज में ब्याह शादी, दावत-भोज आदि के नाम पर कौन कितना धन फूँकता है, इसके आधार पर ही उसका बड़प्पन आँका जाता है और इस सब के कारण मनुष्य दिन रात कमाने की फिक्र में लगा रहता है। यदि लोगों के जीवन उद्देश्य के बारे में अन्वेषण किया जाय तो निन्यानवे प्रतिशत “कमाना और खा पीकर जीवन बिता देना” ही निकलेगा और खाना, पीना, पहनना, मौज मजे करना भी ऐसा जिससे अन्त में मनुष्य को कोई लाभ नहीं मिलता, उसे पश्चाताप ही हाथ लगता है। सम्पूर्ण जीवन इसी गोरख-धन्धे में लगा देना और फिर उसका नतीजा शून्य! कैसी विडम्बना है! कैसी मरीचिका है!
सादगी भारतीय जीवन-पद्धति का एक महत्वपूर्ण नियम रहा है और शायद सादा-जीवन बिता कर ही हमारे पूर्वजों ने ज्ञान की महान् साधना की होगी। उस ज्ञान की—जिसके कारण समस्त संसार भारत को सभ्यता का सूर्य, ज्ञान विज्ञान का देश मानते रहे, जिसके बल पर भारत जगद्गुरु कहलाया।
सादगी एक ऐसा नियम है जिसके सहारे हम अपने वैयक्तिक तथा सामाजिक जीवन की बहुत-सी समस्याओं सहज ही हल कर सकते हैं। सादगी के द्वारा अपना बहुत-सा समय, धन, खर्च होने वाली शक्तियाँ बचा सकते हैं और उनका अपने उत्कर्ष के लिए सदुपयोग कर सकते हैं।
इसीलिए हमारे पूर्वजों ने जीवन के बाह्य विभाग को कम महत्व दिया है। सादगी से जीवन बिताने के लिए कहा है ताकि हम अपनी शक्ति व्यर्थ नष्ट न कर उसका सदुपयोग अच्छे कार्यों में कर सकें। ऋषियों का जीवन इसी सत्य का प्रतीक था और किसी भी महान् पथ का संधान करने वाले महापुरुष को सादगी का मार्ग ही अपनाना पड़ता है। अपनी आवश्यकतायें बहुत कम, सामान्य रखनी पड़ती हैं जिनसे जीवन का निर्वाह सहज रूप में होता रहे।
सादगी जहाँ व्यक्तिगत जीवन में लाभकारी होती है, वहाँ सामाजिक जीवन में भी संघर्ष, रहन-सहन की असमानता कृत्रिम अभाव महंगाई आदि को दूर करके वास्तविक समाजवाद की रचना करती है। सादगी समाजवाद का व्यावहारिक नियम कर दिया जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। समाज में, जीवन संघर्ष इसलिए बढ़ गया है कि प्रत्येक अपने लिए अधिक से अधिक माँग करता है, अपनी शक्ति के अनुसार साधन सामग्री जुटा लेता है, इससे दूसरों का हक भी छिनता है और समाज में अभाव पैदा होता है। अभाव से महँगाई बढ़ती है। सादगी सिखाती है कि जितनी आवश्यकता है, जितने से जीवन सरलता से चल जाता है उतना ही काफी है। फिर छीना-झपटी, अभाव क्यों रहेगा? न किसी का हक छिनेगा न महँगाई बढ़ेगी। यदि संसार के सभी लोग सादा जीवन बिताने लगें तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि मानव-जाति की अनेकों आर्थिक और सामाजिक समस्यायें सुलझ जाएं। जीवन सरल हो जाय।
इसलिए जीवन को सादा बनाइए, इससे आपका और समाज का बहुत बड़ा हित साधन होगा।
एक दिन पत्थर फूल पर बहुत नाराज हुआ। उसने कहा—जानता नहीं, मेरी शक्ति । तुझे जरा-सी देर में पीस कर रख दूँगा।
फूल मुसकराया और बोला—तब तो आप मेरी सुगन्धि को दूर-दूर तक फैला देने का उपकार ही करेंगे, महोदय! इसमें मुझे न खिन्न होना और न उद्विग्न।
आज नारी के उत्थान, उसके विकास, समानाधिकार, उत्कर्ष की चारों ओर से आवाज उठाई जा रही है। धन में, पद में, शिक्षा-दीक्षा में, समाज के मंच पर, घर में, बाजार में, सब जगह नारी को पुरुषों के समान हक मिलने चाहिएं। ऐसा सभी विचारक, सुधारक, जन-नेता कहते हैं और वस्तुतः यह एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इस ओर प्रयत्न होंगे, होने ही चाहिए।
लेकिन क्या इससे ही मूल समस्या का समाधान हो जायगा? क्या इन तथ्यों से ही नारी और पुरुष के जीवन में एकता आ जायगी? इन प्रश्नों का उत्तर यदि हम इस सम्बन्ध में अब तक प्राप्त की गई सफलताओं में से ढूंढ़ें तो मालूम होता है कि मूल प्रश्न ज्यों का त्यों ही पड़ा हुआ है। आजकल हमारे यहाँ तथा संसार में बहुत जगह नारी को पुरुषों के साथ समानता के वैधानिक अधिकार मिल गये हैं और वे व्यवहार में भी आने लगे हैं लेकिन मूल रूप से नारी पुरुष से उतनी ही दूर है जितनी मध्ययुग में थी। अभी नारी हमारे सार्वजनिक जीवन का सहज अंग नहीं बन पाई है। नारी शब्द के साथ ही हमारे मन में एक विशेष भेदपूर्ण पदार्थ की कल्पना काम करने लगती है। पुरुष शब्द के उच्चारण पर हम कोई महत्व नहीं देते । उसे अपने समाज की सामान्य-सी बात समझकर सहज और गौण रूप में स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन नारी के विषय में ऐसा नहीं है। हम उसे एक विजातीय-तत्व समझकर उसके आगे-पीछे, ऊपर-नीचे, आकार-प्रकार के बारे में दिमाग दौड़ाने लगते हैं। उसकी ओर आकर्षित होते हैं। उसे अपने से भिन्न पदार्थ समझकर उसकी समीक्षा करने लगते हैं।
बाह्य-जीवन में समानता के अनेकों अधिकार मिल जाने पर भी पुरुष और नारी के बीच भेद की स्थिति आज मूल रूप से बनी हुई है हम इस सम्बन्ध में एकता अभी नहीं कर पाये। बाजार में नित्य ही अनेकों पुरुष हमारी आँख के सामने होकर निकलते हैं लेकिन उसका हमारे मन, मस्तिष्क पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन एक नारी को देखकर हम कौतूहल की तरह उसकी ओर घूर-घूरकर देखने लगते हैं। अच्छी बुरी भावना कुछ भी हो सकती है लेकिन एक विजातीय पदार्थ की तरह नारी और पुरुष के बीच आज भी असमानता की एक महत्वपूर्ण खाई बनी हुई है जिसे हमारी संवैधानिक एवं सामाजिक व्यवस्था भी पार नहीं कर पाई है।
यह समस्या सामाजिक अथवा राजनैतिक ढाँचे से परे है। इसका आधार आध्यात्मिक है। आन्तरिक है। बाहरी नहीं। यही कारण है कि नारी की समानता के अनेकों बाहरी प्रयत्न होते हुए भी नारी पुरुष से दूर ही है, एक विजातीय पदार्थ के रूप में। इसलिए नारी और पुरुष की समानता के लिए बाह्य प्रयत्नों के साथ-साथ हमें आध्यात्मिक प्रयत्न भी करने होगे, जिनके ऊपर ही नारी पुरुष की विभेदता का मूलाधार अवलम्बित है।
जब तक हम शरीर-भेद, लिंग-भेद द्वारा नारी और पुरुष का परिचय प्राप्त करते रहेंगे तब तक यह विभेदता कभी दूर नहीं हो सकती। पुरुष नारी को नारी समझेगा और नारी पुरुष को पुरुष। फिर समानता का आधार ही क्या रह जाता है? समानता का आधार आत्मा है जो स्त्री पुरुष दोनों में एक समान है। नारी और पुरुष ही नहीं यदि पुरुष-पुरुष के बीच भी शारीरिक आधार पर परिचय प्राप्त करने का प्रयत्न होगा तो वहाँ भी अनेकों भेदभाव, विकार जन्म ले लेंगे। इसलिए नारी और पुरुष में समानता पैदा करनी होगी तो हमें मानसिक आधार पर परिचय प्राप्त करना होगा। आत्मा के आधार पर मानना, समझना पड़ेगा। यदि हम किसी नारी को आत्मा की दृष्टि से देखेंगे तो हमारे उसके बीच भेद का कोई आधार ही नहीं मिलेगा। अपनी तरह उसकी भी आत्मा को समझकर उसे विश्वात्मा का सहज अंग जानकर शान्त रहेंगे।
यदि शारीरिक परिचय भी हो तो केवल सेवा, सहयोग, सद्भाव एवं स्नेह के लिए ही हो सकता है। वासना की दृष्टि से शरीर परिचय निकृष्ट है। शरीर से शरीर का सम्बन्ध सेवा, स्नेह एवं सहयोग के लिए होना चाहिए। लेकिन आत्मिक दृष्टिकोण विचलित न हो। अन्यथा शरीर संपर्क के साथ ही शरीर भेद की दृष्टि उत्पन्न होगी और उससे विकार पैदा होगा।
स्त्री पुरुष का मूल भेद शरीर आकृति के आधार पर है आत्मा के आधार पर नहीं, इसलिए शरीर-प्रधान दृष्टिकोण न रखकर हमें आत्मा का दृष्टिकोण बनाना पड़ेगा। यह जितना व्यापक बनेगा उतना ही नारी पुरुष के बीच की असमानता दूर होगी। जब तक हमारे समाज में शरीर परायणता को महत्व मिलता रहेगा तब तक नारी और पुरुष का भेद समाप्त नहीं होगा। नारी और पुरुष के बीच परिचय का आधार आत्मा ही हो तो समस्या मूल रूप से हल हो जाती है।
फिर भी जो लोग यह दृष्टिकोण बनाने में असमर्थ हैं, जो आत्म-दृष्टि प्राप्त करने की स्थिति में नहीं हैं, उनके लिए ऋषियों ने मनीषियों ने एक दूसरा सरल मार्ग बताया है। यदि नारी को आत्मा-रूप में नहीं जान सकते तो उसे मातृशक्ति के रूप में पूजा उपासना की प्रतिमा के रूप में देखें। यह मातृशक्ति सर्वत्र व्याप्त है, नारी तो केवल उसकी मूर्तिमान प्रतिमा ही है। हमारे यहाँ इसी मातृशक्ति की पूजा के रूप में अनेक देवियों की मूर्तियाँ बनी हुई हैं। दुर्गा, सरस्वती, लक्ष्मी, काली, षोडश मातृकायें, राधा, सीता, गौरी कितने ही रूपों में आज भी नारी के मातृ रूप की पूजा हम कर रहे हैं।
इसलिए आत्मा की दृष्टि के सिवा नारी को देखने समझने, परिचय प्राप्त करने का यदि कोई दूसरा मार्ग है तो वह है उसका पूजनीय मातृ-स्वरूप।
सीता के फेंके गये आभूषणों के बारे में पूछने पर लक्ष्मण राम से कहते हैं।
नाहं जानामि केयूरे नाहं जानामि कुण्डले।
नूपुरे त्वमि जानामि नित्यं पादाभिवन्दनात्॥
“हे भगवन्! केयूर, कुण्डल आदि मैं नहीं जानता हूँ। यदि कुछ जानता हूँ तो पैरों के उन नूपुरों को जिन्हें मैं माता की पदवन्दना के समय देखा करता था।”
कितना उत्कृष्ट उदाहरण है, नारी के प्रति पुरुष के दृष्टिकोण का। लक्ष्मण ने कभी सीता के जेवर, शरीर को सौंदर्य के रूप में देखा ही नहीं। सीता उनके लिए मातृशक्ति की साकार मूर्ति थी जिस की चरण वन्दना में ही वे लीन रहते थे।
जहाँ पुरुषों को अपना दृष्टिकोण बदलने की आवश्यकता है, अपनी भावनाओं में परिवर्तन करने के जरूरत है, वहाँ नारी जाति को भी अपनी धारणाओं, अपने विश्वासों में परिवर्तन करने की आवश्यकता है। नारी स्वयं अपने आपको पुरुषों से अलग एक भिन्न तत्व समझती है और शारीरिक आधार पर ही अपना परिचय प्राप्त करती है। जब तक नारी वस्त्रों में, बनाव शृंगार में, फैशन में, जेवर आभूषणों में अपना व्यक्तित्व देखती रहेगी, पुरुषों के लिए कामिनी बन कर उनकी वासनाओं की तृप्ति के लिए ही अपना जीवन समझती रहेगी, या खा पीकर घर की चहार दीवारी में पड़े रहना ही अपना आदर्श समझेगी तब तक कोई भी शक्ति , नियम, कानून उसका उद्धार नहीं कर सकेंगे।
अपने उद्धार के लिए नारी को स्वयं भी जागरुक होना पड़ेगा। अपने आपको आत्मा, वह आत्मा जो पुरुषों में भी है, समझना होगा। मातृत्व के महान पद की प्रतिष्ठा को पुनर्जीवित रखने के लिए उसे सीता, गौरी, मदालसा, देवी, दुर्गा, काली की-सी शक्ति , क्षमता और कर्त्तव्य का उत्तरदायित्व ग्रहण करना होगा। कामिनी-विलास की सामग्री न बन कर अपने आपको आदर्श-पूज्यनीय गुणों का आधार बनाना होगा तभी वह गिरी हुई अवस्था से उठ सकती है। समाज में अपना अधिकार पूर्ण स्थान प्राप्त कर सकती है।
पुरुष और नारी में असमानता पैदा करने के लिए नारी के पुनरुत्थान के लिए हमें इन आध्यात्मिक प्रश्नों को आध्यात्मिक आधार पर हल करना होगा, तभी हमारा उद्देश्य सफल हो सकता है।
‘सन्त काल’ उस समय को कहा जाता है जिन दिनों यवन काल के उत्पातों से जनता किंकर्तव्यविमूढ़ हो रही थी। आन्तरिक फूट, आदर्शों में विडम्बना का समावेश, संगठन का अभाव आदि कितने ही कारण ऐसे आ जुटे थे कि बहुसंख्यक जनता मुट्ठी भर विदेशी विधर्मियों द्वारा बुरी तरह पद-दलित की जा रही थी। उत्पीड़न और अपमान के इतने कडुए घूँट आए दिन पीने पड़ रहे थे कि चारों ओर अन्धकार के अतिरिक्त और कुछ दीख ही न पड़ता था। लोग हताश होकर पराजित जाति जैसी हीनता को स्वीकार करने लगे थे। लँगड़ा, लूला प्रतिरोध सफल न हो सका तो उसे ईश्वरीय कोप मान कर चुप बैठे रहने में ही लोग अपनी भलाई सोचने लगे। ऐसी परिस्थितियों में आशा की एक नवीन किरण के रूप में भारत में ‘सन्त मत’ पनपा।
नानक, गुरु गोविन्दसिंह, रामानन्द, कबीर, ज्ञानदेव, एकनाथ, तुकाराम, तुलसीदास, सूरदास, रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द, रामतीर्थ, कबीर, दादू, रैदास, चैतन्य आदि अनेक सन्त-महात्मा उन्हीं परिस्थितियों में उत्पन्न हुए और उन्होंने धर्म और ईश्वर पर से डगमगाती हुई निराश जनता की आस्था को पुनः सजीव करने का सफल प्रयत्न किया। रैदास इसी माला की एक उज्ज्वल मणि थे।
सन्त रैदास हरिजन कुल में उत्पन्न हुए। उनके पिता चमड़े का व्यापार करते थे। जूते भी बनाये जाते थे। रैदास बचपन से ही बड़े उदार थे। घर में सम्पन्नता थी। वे सोचते थे कि सम्पन्न लोगों को अपनी सम्पदा में दूसरे अभाव-ग्रस्तों को भी भागीदार बनाना चाहिए अन्यथा संग्रह किया हुआ अनावश्यक धन उनके लिए विपत्ति रूप में सिद्ध होगा। वे प्रतिदिन एक जोड़ा जूता अपने हाथ से बना कर असमर्थों को दान करते, जिससे वे कुश-कंटकों और शीत धूप से पैरों को बचाते हुए अपना कार्य करते रह सकें।
यह उदारता युवक रैदास के पिताजी को पसन्द न आई। दूसरे अन्य असंख्य लोगों की तरह वे अपने बेटे को ‘कमाऊ’ देखना चाहते थे। कमाऊ होना ही तो सब से बड़ा गुण माना जाता है। पिता ने उन्हें रोका, न माने तो बिना छप्पर का एक बाड़ा रहने के लिए देकर उन्हें और उनकी स्त्री को घर से निकाल दिया। पराई कमाई पर निर्भर रहने की अपेक्षा परिश्रमपूर्वक स्वावलम्बी जीवन रैदास को पसन्द आया और वे पूरे परिश्रम तथा मनोयोगपूर्वक बढ़िया जूते बनाने लगे। इसी से अपना गुजारा करते और एक जोड़ी जूता नित्य दान भी करते।
गृहस्थ रहते हुए भी मनुष्य महात्मा हो सकता है, इसका अनुकरणीय उदाहरण रैदास ने प्रस्तुत किया और वे उसमें पूर्ण सफल भी रहे। गुजारे के लिए आठ घण्टा श्रम करने से काम चल सकता है। आठ घण्टा नित्य-कर्म और भोजन विश्राम के लिए पर्याप्त होते है। इसके अतिरिक्त आठ घण्टा समय लगभग सभी के पास शेष रहता है। प्रबुद्ध लोग उसका सदुपयोग करके अभीष्ट लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ते चले जाते हैं। जब कि प्रमादी लोग इस मूल्यवान समय को बर्बाद करके मौत के दिन ही पूरे कर पाते हैं। रैदास प्रबुद्धों की श्रेणी में थे। उनने बचे हुए समय को तप और साधना में लगाने का क्रम बनाया। उनके व्यक्तित्व से प्रभावित अगणित लोग उनके पास आते और उनकी शिक्षाएँ प्राप्त करके अपना पथ निर्धारित करते। उनके घर में सत्संग का क्रम चलता ही रहता। जूते बनाते हुए भी वे धर्म चर्चा करते रहते।
एक ओर जहाँ, उनकी ख्याति बढ़ रही थी, दूसरी ओर उनके विरोधी भी बढ़ते जाते थे। ईर्ष्या की डाकिन ने मानवीय प्रगति में कितनी बाधा पहुँचाई है, सत्पुरुषों और निर्दोषों को कितना सताया है, अकारण कितने ही लोगों को दूसरों की उन्नति देख कर जल-भुन कर खाक होने के लिए विवश किया है, इसे देखते हुए यही प्रतीत होता है कि इस की सर्पिणी से बढ़ कर और कोई व्यापक बुराई शायद ही मनुष्य का अहित करने में समर्थ हो सकी हो। उच्च वर्ण कहलाने वाले लोगों को रैदास की प्रतिष्ठा असह्य लगती, वे उन से मन ही मन कुढ़ते, निन्दा, व्यंग और उपहास करते तथा तरह-तरह के लाँछन लगाने में पीछे न रहते। रैदास इस पर हँस भर देते और कहते हाथी अपने रास्ते चला जाता है उसे किसी के धूलि फेंकने या चिढ़ाने से विचलित होने की जरूरत नहीं होती। धैर्य साहस और सचाई जिसके साथ हैं उसका सारा संसार विरोधी होकर भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। उनने अपना धर्म-प्रचार जारी रखा।
उन दिनों उच्च वर्ण के लोग भी आतंक से डर कर और प्रलोभन में खिंच कर धड़ाधड़ विधर्मी बन रहे थे, फिर छोटे वर्ण वालों के लिए तो उस ओर लुढ़कने लगना और भी सरल था। छोटी कहलाने वाली जातियाँ और भी तेजी से विधर्मी बनने लगी थीं। शासन का प्रलोभन और उच्च वर्ण वालों का तिरस्कार यह दुहरा दबाव उनके मन को डाँवाडोल करने लगा था। इन परिस्थितियों में सन्त रैदास ने हिन्दू-धर्म की महत्ता, आस्तिकता एवं ईश्वर विश्वास की आस्था को बढ़ाने के लिए कार्य आरम्भ किया और असंख्यों हरिजन उस प्रेरणा से प्रभावित होकर विचलित होने से बच गये। उन्होंने अपनी वाणियों में अपने आदर्शों का भली भाँति प्रतिपादन किया है— अपना धर्म छोड़ कर विधर्मी बनने के लिए विचलित लोगों को उनने कहा—
हरि-सा हीरा छोड़ि के,
करै आन की आस।
ते नर नरकै जायँगे,
सत भाषै रैदास॥
विधर्मियों की पराधीनता के लिए भर्त्सना करते हुए उन्होंने भारतीय-समाज को ललकारा और कहा—
पराधीन का दीन क्या,
पराधीन बेदीन।
पराधीन पर दास को,
सब ही समझैं हीन॥
सन्त रैदास सच्चे ईश्वर भक्त थे। वे पूजा किये बिना जल तक भक्षण न करते थे। आपने अपने ही स्थान पर भगवान का मन्दिर बनाया जिसमें निरन्तर भजन, कीर्तन और उपदेश होते रहते थे।
उन्होंने सारे भारत का भ्रमण किया और निराशाग्रस्त जनता को आशा का सन्देश पहुँचाया। ईश्वर पर विश्वास और धैर्य रख कर आशाजनक भविष्य के लिए कमर कस कर काम करने का मार्ग बताया। उनके अनेकों शिष्य हुए जिनमें प्रसिद्ध भक्त -नारी मीरा बाई भी एक थीं। ईश्वर भक्ति के माध्यम से सन्त काल के महात्माओं ने संगठन, आशा और उत्साह की जो धारा प्रवाहित की, वह उन परिस्थितियों में सर्वथा उपयुक्त ही थी। खुले प्रतिरोध का कोई कार्यक्रम तो उन दिनों चल भी नहीं सकता था। सन्त मत के माध्यम से सिख गुरुओं ने कितना बड़ा काम किया यह सर्व विदित है। सीधा संघर्ष न सही, संघर्ष की भूमिका में सभी सन्तों का बड़ा महत्वपूर्ण योग रहा है। सन्त रैदास ने हरिजन कुल में जन्म लेकर पिछड़े लोगों में धैर्य और स्थिरता की जो भावना उत्पन्न की, उससे हिन्दू-धर्म की कितनी भारी सेवा सम्भव हुई, आज उसका मूल्याँकन कर सकना भी हमारे लिए कठिन है।
मरणासन्न डार्विन को थोड़ा होश हो गया। उनने अपनी पुत्री से कहा—बेटी, मैं न स्वर्ग जाना चाहता हूँ, न नरक। मैं तो यदि परलोक कहीं होता होगा तो उसके द्वार पर अड़ा रहूँगा और इन पण्डितों को न स्वर्ग में प्रवेश करने दूँगा और न नरक में। अन्यथा ये इस लोक की तरह परलोक में भी पाखण्ड फैलाये बिना न मानेंगे।
चिन्ता एक विनाशक वृति है, जो मनुष्य की शक्ति और समय का अनावश्यक मात्रा में क्षरण करती रहती हैं। जिस शक्ति के द्वारा मनुष्य अपना स्वास्थ्य सुधार सकता था, आजीविका कमा सकता था, विद्याध्ययन अथवा कोई उपयोगी कला सीख सकता था, वह व्यर्थ ही बरबाद हो जाती है। जितने समय को वह शारीरिक मानसिक, आर्थिक अथवा किसी अन्य प्रयोजन में, विकास के काम में लगा सकता था उसे छोटी-छोटी बातों की चिन्ताओं में ही गंवाता रहता है। मनुष्य जीवन किसी महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिये मिलता है, इसे छोटी-छोटी बातों की चिन्ताओं में गंवा देना समझदारी की बात नहीं। अपने जीवनलक्ष्य को समझना और उसमें अन्त तक तत्परता पूर्वक लगे रहना तभी सम्भव हो सकता है जब चिन्ताओं से छुटकारा पायें, इनसे दूर रहें और इनसे क्षरित होने वाली शक्तियों को बचाकर अपने निर्दिष्ट लक्ष्य की प्राप्ति में लगायें।
चिन्ताओं से मनुष्य की रचनात्मक क्रिया-शक्ति में थोड़ी कमी ही आती अथवा थोड़ा समय ही बरबाद होकर रह जाता तो भी विशेष हानि न थी। दैनिक कार्यों में, चलने उठने बैठने और अन्य कई ऐसे कार्य होते हैं जिनमें निष्प्रयोजन कुछ शक्ति भी लग जाती है कुछ समय भी। किन्तु उसकी हानि भी वहीं समाप्त हो जाती है। पर चिन्तायें अपने पीछे भी एक विषाक्त वातावरण बना जाती हैं जो मनुष्य की जीवन शक्ति का चिरकाल तक शोषण करता रहता है। इनसे जितना ही बचाव किया जाता है, ये शहद की मक्खी की तरह उतना ही पीछा करती और अपने विषदंश चुभोती रहती हैं। मनुष्य चिन्ताओं के जाल में फँस कर अपनी मौत के ही सरंजाम जुटाता रहता हैं। जीवन-मृत्यु अकालमृत्यु की ओर तेजी से ले जाने वाली यह चिन्तायें ही होती हैं। किसी कवि ने लिखा है :—
चिन्ता चंगुल ही परयो तो न चिता को शंक।
यह सोखै बूँदन जियत मुये जात वा अंक॥
अर्थात् चिता तो मुर्दा को जलाती है किन्तु चिन्ता तो जीवित मनुष्य को तिल-तिल घुला-घुला कर मारती है।
चिन्ताओं से मस्तिष्क के अन्तराल में कार्य करने वाली सेल या फाइबर शक्तियों से किस प्रकार जीवन शक्ति का तड़ित क्षरण होता है, इसका पता जर्मनी के डॉक्टरों ने एक प्रयोग से लगाया। किसी पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति को अचानक चिन्ता जनक समाचार सुनाया गया। इस से वह घबड़ा कर उठने लगा तो उसे चक्कर आ गया और गिर गया। डॉक्टरों ने शारीरिक परीक्षा के बाद देखा कि उसकी इतनी शक्ति एक ही झटके में समाप्त हो गई जिससे वह एक सप्ताह तक लगातार श्रम कर सकता था। चिन्तायें मस्तिष्क को उत्तेजित करती हैं जिससे शक्ति का बुरी तरह अपव्यय होता रहता है। इससे मनुष्य के सौंदर्य, शारीरिक बल और ज्ञान का नाश होता रहता है।
चिन्ता जीवन की शत्रु है। शत्रु का काम होता है, त्रास देना, भयभीत रखना और दाँव लगते ही आक्रमण करना। ठीक ऐसा ही काम चिन्तायें करती हैं। दिन-रात मनुष्य को घुलाती रहती हैं। रक्त , वीर्य, बल और बुद्धि का निरन्तर शोषण करती रहती हैं। व्यक्ति को निराश बना देती हैं। इससे मनुष्य सदैव डरा-डरा सा बना रहता है। कुछ दिन ऐसी ही स्थिति बनी रहने से चिड़चिड़ापन, अर्द्धविक्षिप्तता तक की नौबत आ जाती है। स्थिति अधिक विकृत हो जाने पर मनुष्य के प्राण ही ले कर छोड़ती हैं। छोटी-सी बात को लेकर इतने बड़े दुष्परिणाम तक पहुँचने की बात कुछ असंगत लगती है किन्तु होता ऐसा ही है। चिन्ता का रोग भीतर ही भीतर गलाता है। यह स्थिति बड़ी खतरनाक होती है इसका किसी चिकित्सक के पास इलाज भी नहीं। इसका परिणाम अन्ततः अकाल मृत्यु ही होता है।
चिन्तायें आखिर आती क्यों हैं, यह विचारणीय प्रश्न है। अधिक गहराई में जाकर देखें तो इनका आधार बड़ा ही टूटा फूटा सड़ा-गला-सा लगता है। चिन्तायें आती नहीं, मनुष्य स्वयं उन्हें बुलाता है और अपने पास पाल कर रखता है। चिन्ता का अर्थ है किसी समस्या से हार मान लेना, अपने आप को पराजित घोषित कर देना। यह एक मनोविकार है जो मनुष्य की दुर्बलता प्रकट करता है। प्रस्तावित कठिनाई को अपनी शक्ति से बड़ी मान लेने के अतिरिक्त चिन्ताओं का और कोई भी अस्तित्व नहीं। खान-पान, रहन-सहन और सामाजिक व्यवहार की अनेकों चिन्तायें होती हैं किन्तु इनके आधार इतने छोटे होते हैं कि उन्हें जानने से हँसी आती है। अपना पड़ोसी अच्छा खाता पाता है। उसकी नौकरी भी अच्छी है। पर खुद का भोजन बड़ा रूखा-सूखा होता है। वेतन भी कम मिलता है। इन्हीं बातों को विवशतापूर्वक देखने का अर्थ है चिन्ता। दूसरा अच्छा खाना है तो क्या हुआ, कितने ही तो ऐसे हैं जो बेचारे एक समय ही भोजन पाते हैं। आपको केवल सौ रुपये ही वेतन मिलता हैं तो असंख्य ऐसे हैं जो दिन भर कठोर श्रम करके भी शाम तक बारह आने कमा पाते हैं। तब फिर यह चिन्ता क्यों? इससे यही पता चलता है कि चिन्ताओं का आधार उतना बड़ा नहीं होता जितना लोग उसे महत्व देते हैं।
चिन्ताओं के द्वारा अपनी कार्य क्षमता घटा देना, जीवन में घबराहट उत्पन्न करना अल्प विकसित बुद्धि वालों का काम है। यह आत्म विश्वास की कमी का द्योतक है। इन्हें बढ़ाओ नहीं, दूर कीजिये। यह आपके शत्रु है। इनके कारण पूरे मन से अपने विकास पथ पर अग्रसर न हो सकोगे। अधूरे मन से कभी अपनी क्षमता को दोष देते रहे कभी लक्ष्य प्राप्ति को बड़ा दुस्तर कार्य मानते रहें तो ये आपको गुलाम बना लेंगी। इससे सफलता की प्राप्ति में सन्देह ही बना रहेगा। आशावाद और कर्मठता को अपने जीवन में धारण करने से वह आसुरी चिन्तायें अपने आप लौट जायेंगी। इनसे हार मान लेने का अर्थ है जीवन के प्रति नैराश्य। इसका परिणाम है पतन की ओर उन्मुख होना, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसलिये अपने जीवन को समुन्नत बनाने के लिये इन्हें सदैव दूर रखिये, अन्यथा ये असमय ही खा जाने वाली डाकिनें हैं।
चिन्ताओं से बचाव का सबसे अच्छा साधन है आध्यात्मिक धारणा। इस संसार में जो कुछ हो रहा है वह सब एक खेल मात्र है। किसी का अभिनय सुखद होता है किसी का दुखद। नाटक करने वाले अभिनेता यह जानते हैं यह सब स्टेज तक ही है। रंग मंच से नीचे आ जाने पर सब अपने पुराने रूप में आ जाते हैं। जीवन की विभिन्न क्रियाओं को भी इसी प्रकार देखना और मानना चाहिये। यहाँ की प्रत्येक वस्तु परिवर्तनशील है, यहाँ का प्रत्येक पदार्थ नाशवान है। इसलिये इनके परिणामों की आसक्ति से दूर रहना ही श्रेयस्कर है। इससे चिन्ताओं से अपने आप छुटकारा मिल जाता है। विशुद्ध कर्त्तव्य भावना से यहाँ का प्रत्येक कार्य, क्रिया व्यापार चलाते रहना ही अच्छा है। समस्याओं से अपनी सामर्थ्य को छोटा मान लेना चिन्ता का कारण है। आप अपनी समस्याओं को संयोग या पार्ट मात्र मानिये। उन्हें निकालिये सही किन्तु कठिनाइयों की चिन्ता न कीजिये तो ही जीवन लक्ष्य की ओर सफलतापूर्वक अग्रसर हो जाना सम्भव होगा। चिन्ताओं के चक्कर में ही पड़े रहे तो आपका विचार क्षेत्र भी संकुचित बना रहेगा। विचारों का दायरा न बढ़ा तो वह स्थिति कहाँ बन पड़ेगी जिसके लिये अमूल्य मानव जीवन मिला है।
चिन्तायें जीवन विकास में गतिरोध उत्पन्न करती हैं। मनुष्य की कार्य क्षमता को पंगु बना देती हैं। इससे मानवीय विकास का मार्ग भी रुक जाता है। मनुष्य एक अपनी अलग दुनिया बना लेता है, इसे चिन्ताओं की दुनिया ही कहना उपयुक्त लगता है। जब तक जीवात्मा इस छोटे से क्रिया क्षेत्र में फँसी रहती है जब तक वह अपने शाश्वत स्वरूप को समझ नहीं पाती। लघु से महत् की आकाँक्षा कोरी कल्पना मात्र बनी रहती है। सफलता का मूल अंग एक ही है कि अपनी चिन्ताओं से छुटकारा पाइये। तभी वह स्थिति बन सकती है जब अपने जीवन लक्ष्य की दिशा में भी कुछ प्रगति की जा सके।
देखा जाता है कि स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने के लिये प्रायः लोग ऐसे साधनों की तलाश में रहते हैं जिनसे तुर्त-फुर्त जादू के समान असर हो। इसके लिये पौष्टिक आहार भी जुटाते हैं, कसरत, व्यायाम भी करते हैं। इन से स्वास्थ्य सुधार और आरोग्य लाभ प्राप्त भी होता है, किन्तु शारीरिक स्वच्छता के अभाव में यह स्वास्थ्य अधिक दिन तक स्थिर नहीं रहता। देखने में यह बात छोटी लगती है इसीलिये लोग इसकी उपेक्षा भी करते है किन्तु इसके परिणाम दूरगामी एवं हानिकारक होते हैं। शारीरिक अस्वच्छता का मानसिक अवस्था और क्रियाशीलता पर भी दूषित प्रभाव पड़ता है। इसलिये स्वस्थ रहने का पहला सबक शारीरिक-स्वच्छता से प्रारम्भ होता है।
भारतीय-संस्कृति में शारीरिक पवित्रता को अनिवार्य धर्म-कर्तव्य माना गया है। भोजन करने के पूर्व स्नान करने की परम्परा प्राचीन है। यह रिवाज शारीरिक सफाई की दृष्टि से ही चलाया गया है। अपवित्र वस्तु या मैले आदि के स्पर्श के तुरन्त बाद स्नान कर डालने से शरीर विषैले कीटाणुओं के प्रभाव से भी बच जाता है और मन का विग्रह भी समाप्त हो कर प्रसन्नता व हलकापन अनुभव करने लगते हैं। इस दृष्टि से यह परम्परा अत्यन्त विवेकपूर्ण लगती है।
भारतवर्ष उष्ण-प्रदेशीय गर्म देश है। इसलिये यहाँ स्नान की उपेक्षा कभी भी नहीं की जा सकती। पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित लोग इसे भी अन्ध-परम्परा या रूढ़िवाद कह कर टालने का प्रयास किया करते हैं। यह बात हानिकारक है। आम लोगों में जो कार्य क्षमता का अभाव दिखाई देता है उसका अधिकाँश कारण यही है कि लोग स्नान के महत्व को नहीं जानते और उससे बचने का प्रयत्न करते रहते हैं।
स्वास्थ्य और शारीरिक सफाई में स्नान बड़ा महत्वपूर्ण होता है। महर्षि पतञ्जलि ने इस महत्व को इस प्रकार स्पष्ट किया है :—
पवित्रं वृष्यमायुष्यं श्रम स्वेदमलापहम्।
शरीर बल संधानं स्नानमोजस्करं परम्॥
अर्थात् —स्नान से शरीर पवित्र होता है। वीर्य और आयु की वृद्धि होती है। थकावट, पसीना तथा मैल दूर हो कर शरीर में बल तथा ओज बढ़ता है।
काम करने से शरीर में पसीना आना स्वाभाविक है। हवा के साथ मिले धूल के कण इस पसीने से मिल कर शरीर की चमड़ी के ऊपर पर्त के रूप में जमते रहते है और सारे शरीर के रोम कूप बन्द हो जाते है। इससे पसीने के रूप में बाहर निकलने वाली शरीर की गन्दगी के मार्ग में रुकावट हो जाती है। इसका स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। कुछ दिन लगातार स्नान न करने से शरीर से बुरी तरह बदबू आने लगती है। यह गन्दगी यदि साफ न की जाये तो त्वचा की बीमारियाँ होते देर न लगेंगी।
भली प्रकार स्नान कर डालने से यह गन्दगी दूर हो जाती है और त्वचा साफ कोमल और स्निग्ध बन जाती है। रोमकूप खुल जाते हैं। इससे आन्तरिक सफाई का मार्ग खुल जाता है।
स्नान का सब से बड़ा महत्व यह है कि इससे शरीर को प्राकृतिक तौर पर जल में पाई जाने वाली “विशिवा” नामक विद्युत प्राप्त होती है। इससे ठीक बिजली की करेन्ट जैसा ही शरीर में प्रभाव पड़ता है। इससे मन प्रसन्न होता है, रक्त संचार बढ़ता है और सारे शरीर में शीतलता व क्रियाशक्ति दौड़ जाती है। सारी थकावट दूर हो जाती है। प्रातःकाल स्वच्छ जल से स्नान कर डालने से सारे दिन शरीर हलका बना रहता है। आलस पास नहीं आता। इसी प्रकार शाम को जब काम करके घर लौटें तो स्नान से श्रम में खोयी हुई शक्ति पुनः प्राप्त हो जाती है।
जल्दी-जल्दी 2-4 लोटे पानी शरीर पर डाल लेने मात्र से स्नान का उद्देश्य पूरा नहीं होता। इससे शरीरस्थ मल फूल कर और भी भड़क उठता है और हानिकारक परिणाम उपस्थित होते हैं। स्नान एक प्रकार की जल-मालिश है। खूब पानी डालना, सारे शरीर को भली प्रकार रगड़ने से माँस पेशियों की सारी थकान दूर हो जाती है। ध्यान रहे कि स्नान के समय शरीर का कोई भी अंग ऐसा न रहे जिसे खूब रगड़कर साफ न कर लें। स्नान करने के पूर्व मुल्तानी मिट्टी अथवा स्नान के समय कम कास्टिक वाले साबुन से सारे शरीर को साफ कर लेना लाभदायक होता है। मिट्टी लगाकर स्नान करने का एक लाभ यह भी है कि विष चूसक गुण के कारण मिट्टी सारे शरीर का विष सोख कर बाहर निकाल देती है।
इसी प्रकार प्रतिदिन अपने दाँतों की सफाई न करें तो दांतों के जोड़ और जड़ों में खाने के छोटे-छोटे टुकड़े भर जाते हैं। जो बुरी सड़ाँध उत्पन्न करते हैं। किसी दूसरे आदमी के आगे बैठें तो वह मुँह बिचकाकर दूर भागने का प्रयत्न करता है। यह गन्दगी धीरे-धीरे दांतों की जड़ों को खाना शुरू कर देती है और पायरिया जैसी गन्दी बीमारी हो जाती है। इससे दाँत और मसूड़ों से मवाद जाने लगता है। डॉक्टरों का मत है कि भारतवर्ष में 90 प्रतिशत व्यक्तियों को पायरिया है। जिनके दाँतों से मामूली रगड़ते ही खून निकल पड़ता है उन सभी को पायरिया की प्रथम या द्वितीय अवस्था होती है। यही अवस्था आगे बढ़कर मवाद आदि के रूप में फूटती और दाँतों को असमय ही ले बैठती है। स्वास्थ्य मन्त्राणी सुशीला नायर ने डॉक्टरी सर्वे के आधार पर यह घोषणा की है कि यदि दाँतों की ओर से ऐसी ही उपेक्षा की जाती रही तो एक सदी के अन्दर ही यह पोपलों का देश बन जायेगा। इस कथन में यथार्थ ही कोई अतिशयोक्ति दिखाई नहीं पड़ती है।
यह आवश्यक नहीं कि कोई अँगरेजी दंत मंजन हो तो ही आप दाँत साफ करें। थोड़ा-सा नमक थोड़ा सरसों का तेल मिला लीजिये, बस सुन्दर पौष्टिक मंजन बन गया। जिन्हें इसमें भी कुछ असुविधा समझ में आये वे दातौन का प्रयोग कर लें। दाँतों की हिफाजत के लिये नीम या बबूल की दातौन है। इनमें रोग नाशक शक्ति होती है। भोजन करने के उपरान्त दातौन करलें तो खाने के टुकड़े दाँतों के बीच जमा न होंगे और मुँह भी स्वच्छ बना रहेगा।
बालों को स्वच्छ और संवार कर रखना एक सुघड़ आदत है। बढ़े हुए लम्बे नाखून स्वास्थ्य के लिये बड़े हानिकारक होते हैं। नाखूनों के ऊपरी सिरों पर हर कोई काली-काली भरी हुई गन्दगी देख सकता है। नाखूनों को काटें नहीं तो इस गन्दगी के पेट में चले जाने का अंदेशा बना रहता है। खाना खाते समय प्रायः उँगलियों का ऊपरी हिस्सा ही खाने में डूबता है और उतना ही हिस्सा मुँह में जाता है। आहार के साथ यह विषैला तत्व पेट में चला जाता है और पेट में बुराई पैदा करता है। इसलिये सप्ताह में कम-से-कम एक बार अपने नाखूनों की सफाई अवश्य कर लेनी चाहिये।
हाथों-पाँवों के गावे तथा वस्त्रों से ढंके रहने वाले स्थान, जोड़ों के स्थानों को भी प्रति दिन स्वच्छ कपड़े से साफ करते रहना चाहिये। पैर की हिफाजत के लिये आपका मोजा तथा जूते साफ रहें। हमेशा पैरों में जूते भी न डाले रहें, कभी-कभी नंगे पाँव भी चलने का अभ्यास बनाये रखें ताकि पैरों की खाल मरने न पावे और पसीने के कारण पाँवों में किसी प्रकार का रोग उत्पन्न न हो।
देखने में ये बातें बहुत छोटी और बिलकुल मामूली सी जान पड़ती हैं। किन्तु इनके परिणाम कभी-कभी बहुत दूरगामी होते हैं। स्वास्थ्य-रक्षा के लिये अपने घर की सफाई, नाबदान की सफाई, चौके रसोई की स्वच्छता, बर्तनों की सफाई और अपने आस-पास की स्वच्छता अनिवार्य है। पर यदि इन्हें तो साफ रखें और अपना शरीर ही गंदा पड़ा हो तो अधिक दिनों तक आरोग्य लाभ की आशा दुराशा मात्र रहेगी। हमें अपना स्वास्थ्य प्रिय हो, रोगों से बचना चाहते हों तो शारीरिक स्वच्छता और सफाई का पूरा ख्याल रखना ही पड़ेगा।
संसार सागर की यात्रा के लिए हमारा शरीर एक नाव है। शरीर के ऊपर हमारा पार उतरना या डूब जाना, बहुत कुछ निर्भर करता है। जिस तरह छिद्रयुक्त , जीर्ण-शीर्ण, कमजोर नाव से चंचल, गतिशील, संघर्षयुक्त जल धारा को पार करना कठिन है उसी तरह रोगी, निर्बल, असमर्थ शरीर से जीवन यात्रा भली प्रकार पूरी करना सम्भव नहीं होता। विजय, सफलता, आनन्द, उल्लासमय जीवन बहुत कुछ स्वस्थ एवं बलवान शरीर पर निर्भर करता है। शरीर मनुष्य के लिए एक ऐसी ईश्वरीय देन है जिस के अभाव की पूर्ति संसार में अन्य कोई भी वस्तु नहीं कर सकती।
हृदय बुद्धि जैसे महत्वपूर्ण उपकरण भी अपना अस्तित्व-सतेज स्वस्थ शरीर में ही कायम रख सकते हैं। शरीर के अस्वस्थ होते ही बुद्धि मंद हो जाती है। विवेक जाता रहता है। हृदय अपना आनन्द संगीत बन्द कर देता है। मनुष्य के लिए शेष रह जाती है जीवन की भयानकता, कठोरता, अशान्ति, क्लेश, अपमान। वह जीवित होते हुए भी मृत तुल्य हो जाता है।
हमारा शरीर उस शीशे के ग्लोब की तरह है जिसके माध्यम से लालटेन की दीप शिखा अपनी ज्योति बाहर प्रकट करती है। गन्दा, कालिख, धुयें से खराब शीशा रोशनी को भली प्रकार बाहर प्रकट नहीं होने देता। जीर्ण-शीर्ण कमजोर शरीर भी आत्म ज्योति की प्रकाश किरणों को संसार में व्यक्त होने नहीं देता। स्वस्थ एवं तेजस्वी शरीर ही आत्मा के तेजस्वी प्रकाश को धारण करके जीवन को आभामय-ज्योतिर्मय बना सकता है।
शास्त्रकार ने शरीर को ही सब धर्मों का साधन बताते हुए कहा है “ शरीर माद्यं खलु धर्मसाधनम् !” स्वस्थ शरीर के द्वारा ही जीवन और जगत के धर्म-कर्त्तव्यों का भार वहन किया जा सकता है। वस्तुतः बिना मजबूत शरीर के न हम किसी का ऋण चुका सकते, न अपना कर्त्तव्य पूर्ण कर सकते हैं। दुर्बल शरीर से न किसी की सेवा ही हो सकती है। शरीर आत्मा का मन्दिर है। बापू ने कहा है “शरीर आत्मा के रहने की जगह होने से तीर्थ जैसा पवित्र है।” आवश्यकता इस बात की है कि हम इसे तीर्थ की तरह ही स्वच्छ-सुन्दर विकारशून्य बनाने का प्रयत्न करें।
शरीर के माध्यम से ही जीवन और जगत का सौंदर्य आनन्द लाभ किया जा सकता है। शरीर में जब भरपूर उछल-कूद, मन में अपार उत्साह होता है तो यह संसार क्रीड़ा भूमि सा दीखता है। स्वर्ग लगने लगता है। और जब शरीर असमर्थ अयोग्य बलहीन हो जाता है तो यह संसार नरक तुल्य जान पड़ता है। जीवन भार स्वरूप लगने लगता है। पाश्चात्य विद्वान बीचर ने कहा है “शरीर वीणा है और आनन्द संगीत। यह जरूरी है कि यन्त्र दुरुस्त रहे।” आनन्द का संगीत स्वस्थ शरीर में ही स्पन्दित होने लगता है।
शरीर का रोगी जीर्ण-शीर्ण, कमजोर होना अपने आप में एक बहुत बड़ा पाप है। जार्ज बर्नार्डशा ने कहा है “यदि कोई बीमार पड़ेगा तो मैं उसे जेल भेज दूँगा।” बीमारी सजा है प्रकृति के नियमों का उल्लंघन करने की। रोगी होना अपने आप में अपराधी होना है। मुख्यतया मनुष्य की अपनी भूलें, वे परिस्थितियाँ जिनमें वह रहता है और जिनके निर्माण में खास तौर से वह स्वयं ही उत्तरदायी है, मुख्य होती हैं। रोगी हो जहाँ मनुष्य अपने लिए नरक या जीवन का द्वार खोलता है वहाँ समाज की उन्नति में भी बाधा पहुँचाता है। क्योंकि एक ओर तो वह व्यक्ति समाज के लिए जो कुछ करता वह रुक जाता है, दूसरे अन्य लोगों का समय-श्रम-धन रोगी के लिए लगने लगता है। परिवार के लोगों में चिन्ता फैलती है।
स्वस्थ बलवान शरीर फटे कपड़ों में भी सुन्दर लगता है। रोगी और निस्तेज व्यक्ति सुन्दर कपड़ों के सौंदर्य को भी भद्दा बना देता है। उसे कितना ही सजायें वह अनाकर्षक और कुरूप ही लगेगा।
उत्तम स्वास्थ्य ही जीवन का सौंदर्य है आनन्द की खान है। स्वास्थ्य और बल की उपासना की प्रथम कक्षा मानव देह है। शरीर को स्वस्थ, बलवान, तरोताजा, स्फूर्तिवान, तेजस्वी बनाना आवश्यक है। यही वह आधार है जिससे जीवन में अन्य शक्ति स्रोत खुलने की सम्भावना हो सकती है। स्मरण रहे स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। बलवान शरीर ही आत्मा का तेज गुण धारण करने में समर्थ होता है। कान्तिवान हँसमुख चेहरा, तेज ओज ही दूसरों के लिए आकर्षण का प्रकृत केन्द्र होता है। मनुष्य के शारीरिक स्वास्थ्य पर ही शक्ति , सामर्थ्य के अन्य स्रोत निर्भर करते हैं। इसलिये शरीर को सर्व प्रथम बलवान, स्वस्थ, तेजस्वी बनाने पर ध्यान देना चाहिए।
वैयक्तिक जीवन में शरीर के बाद नम्बर आता है हृदय और बुद्धि का। कवीन्द्र रवीन्द्र ने कहा है “हे भगवान! यह शरीर तेरा मन्दिर है अतः इसे मैं हमेशा पवित्र रखूँगा, आपने मुझे यह हृदय दिया है, मैं इसे प्रेम से भर दूँगा, आपने मुझे यह बुद्धि दी है मैं इस दीपक को हमेशा निर्मल और तेजस्वी बनाये रखूँगा।” शरीर के साथ-साथ हृदय बुद्धि का भी अपने-अपने क्षेत्र में स्वस्थ सतेज होना आवश्यक है।
अक्सर देखा जाता है कि कई व्यक्ति शरीर से स्वस्थ होते हैं लेकिन उनका हृदय बुद्धि अविकसित ही रह जाते हैं। बहुत से पहलवान कहाने वाले लोग बुद्धि के ठस और हृदय से प्रेम, आनन्द, निर्मलताशून्य होते हैं। आज तो यह एक धारणा-सी बन गई है कि जो शरीर से तगड़ा होगा बुद्धि से कमजोर रहेगा। जो बुद्धिमान होगा उसका शरीर दुर्बल होगा लेकिन वस्तुतः यह विश्वास गलत है। शरीर, मन, हृदय तीनों में से एक के निर्बल होने पर भी मनुष्य बलवान नहीं कहा जा सकता।
हमारे यहाँ हनुमान को सर्वांगीण बल का प्रतीक माना गया है। स्थान-स्थान पर हनुमान की मूर्ति कहीं न कहीं बगीचे, शहर से बाहर खुले मैदान में मिलती है। यह हमारे यहाँ किसी समय बलोपासना के व्यापक प्रसार का स्मृति चिन्ह है। श्री हनुमान के व्यक्तित्व का परिचय देते हुए कहा है।
मनोजवं मारुत तुल्यवेगं
जितेन्द्रियं बुद्धिमना वरिष्ठम।
वातात्मजं वानरयूथ मुख्यं
श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
इस छोटे से श्लोक में सर्वतोमुखी शक्ति के प्रतीक हनुमान का चित्रण मिलता है। वे केवल शरीर से ही बलवान नहीं थे मन की भाँति चंचल—स्फूर्तिवान, भी थे। ‘मारुत तुल्य वेग‘ हवा के सदृश्य वे वेगवान थे। शक्ति उपासना का आदर्श शरीर को वज्र के समान, बनाने की प्रेरणा देता है तो उसे वायु के सदृश्य वेगवान भी। हनुमान का शरीर ऐसा ही था। वे चट्टानों को चूर-चूर कर देते थे तो दस कोस भी चले जाते थे। वे वायु जैसे गतिवान थे।
शक्ति प्रतीक हनुमान शरीर के साथ-साथ मन से भी अपार बलशाली थे। उन्होंने वासना को जीत लिया था। वे जितेन्द्रिय थे, बुद्धिमान थे। उनका शक्ति , व्रत, तप प्रधान जीवन सभी प्रकार श्रेष्ठ था। शरीर और मन पर उनका पूरा-पूरा अधिकार था। वे बुद्धिमानों में भी श्रेष्ठतम थे। हृदय से वे सभी प्रकार निर्मल पवित्र और सरल थे, तो परम भक्त भी थे। हनुमान राम के अनन्य भक्त थे।
शरीर मन बुद्धि हृदय के साथ-साथ मनुष्य का एक बल और होता है वह है संगठन बल। संगठन के साथ ही व्यक्ति जीवित हर सकता है। शक्तिवान् मनुष्य भी समाज के सहयोग के अभाव में प्रभावशील नहीं रह सकता। असंगठित समाज-जातियाँ बहुत जल्दी ही नष्ट हो जाती हैं। लेकिन समाज के लिए वह किसी काम का नहीं तो व्यर्थ है। आवश्यकता इस बात की है कि अन्य शक्तियों के साथ-साथ संगठन कुशलता भी होनी चाहिए। समूह में रह कर काम करना और समाज को संगठित बनाने का सामर्थ्य भी होना आवश्यक है। हनुमान जी बानर सेना में प्रधान थे। उनके नेतृत्व में बानर सेना ने बड़े-बड़े काम किए।
शरीर मन बुद्धि-हृदय के विकास के साथ-साथ हम को संगठन को शक्ति शाली सामर्थ्यवान बनाने के लिए भी प्रयत्न करना आवश्यक है। क्योंकि संगठन में ही शक्ति है। असंगठित रहने वाले बड़े-बड़े योद्धा भी नष्ट हो जाते हैं।
शारीरिक, मानसिक एवं संगठन सम्बन्धी शक्तियों का क्या उद्देश्य है, ऐसा क्यों आवश्यक है? शक्ति के प्रतीक हनुमानजी के जीवन से सहज ही इन प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है। शक्ति साधनों का उपयोग किस लिए? राम-सेवा के लिए। रामदूत बनने में ही हनुमानजी अपना गौरव समझते हैं। भगवान का अवतार अधर्म का नाश और धर्म की स्थापना करने के लिए होता है। सच्चे भगवद् भक्त को भी अपनी गति विधियों का निर्धारण इसी आधार पर करना होता है। राम सेवा का तात्पर्य है आसुरी शक्तियों का उन्मूलन। रावण की तरह समाज को पद दलित करने वाले तत्वों के खिलाफ संघर्ष करके समाज को सभी भाँति सुरक्षित, स्वतन्त्र, सुखी बनाने की राम सेवा में लग जाना शक्ति का सर्वोत्तम उपयोग है। हनुमानजी अपने तन-मन संगठन सभी शक्तियों के साथ राम-सेवा के पुनीत उद्देश्य में लग गये थे।
शक्तियों का उपयोग दूसरों का शोषण, दलन, अपहरण करने में करना, समाज के लिए आतंक, अत्याचार, असुरता की भावना पैदा करना रावण का मार्ग अपनाना है। शक्ति तो हनुमान की तरह राम के पीछे चल कर ही पुण्यवान हो पाती है। ऋषि कहता है।
“आर्तत्राणाय यः शस्त्र न प्रहर्तु मनागसि।”
“तेरे शस्त्र पीड़ितों की रक्षा करने के लिए हैं, निरपराधों को सताने के लिए नहीं।” किसी सच्चे बलवान का बल समाज की निर्बलता की कमी की पूर्ति करने के लिए होना चाहिए न कि समाज को और भी निर्बल सिद्ध करने के लिए। जो निर्बल हैं, कमजोर हैं, असमर्थ हैं, उन्हें अपनी शक्ति का सहारा देकर बलवान बनाना, जीवन के सहज स्वाभाविक अधिकार प्रदान करना, यही बलवान का धर्म है। बलवान माँ अपने नन्हें शिशु को अपनी शक्तियों से पाल-पोस कर एक दिन सामर्थ्यवान बना देती है। स्मरण रहे शक्तियों का महत्व बनाने में है-निर्माण में है, नष्ट करने में नहीं। समाज को कमजोर बनाने के लिए शक्तियाँ नहीं हैं। इससे शक्ति वान का पतन होता है, उसकी शक्तियाँ भी धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं। शक्ति का रचनात्मक उपयोग शक्तियों को बढ़ाता है और शक्ति शाली को तेज, सामर्थ्य प्रदान करता है।
शरीर, मन, हृदय, बुद्धि की शक्तियों का विकास कीजिए। शरीर से मन, बुद्धि की शक्ति बलवान हैं। मन से हृदय की प्रेम शक्ति , निर्मलता, पवित्रता, सदाचार की शक्ति महान् हैं। और इन सब शक्तियों का समाज की रचना में उपयोग करना, संगठित होकर कार्य करना और भी महत्वपूर्ण है। सभी भाँति शक्ति शाली बनिये। स्मरण रखिये शक्ति ही जीवन है। चहुँमुखी बल का संचय करके हनुमान की प्रत्यक्ष उपासना कीजिए।
दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह की लड़ाई के सम्बन्ध में गाँधीजी ‘डरबन’ से ‘जोहान्सबर्ग’ जा रहे थे। पता चला कि गोरों ने रास्ते में उन्हें मार डालने का षड़यंत्र किया हुआ है।
एक साथी ने गाँधीजी से प्रार्थना की कि वे उस रास्ते से न चल कर दूसरे रास्ते चले जाएं। उस पर गाँधी जी ने कहा यदि मैं मरने के भय से अपने कार्यक्रम को छोड़ दूँ तो मैं सचमुच जीवित रहने योग्य नहीं हूँ। सचाई के रास्ते में चलते हुए यदि मुझे मरना पड़े तो यह मेरे लिए एक सौभाग्य की ही बात होगी। उससे मेरा लक्ष्य नष्ट नहीं वरन् सफल ही होगा।
गाँधीजी उसी रास्ते गये और उस षड़यंत्र से उनकी रक्षा उस पठान ने की जिसे 1908 में उन्हें कत्ल करने के लिए नियुक्त किया गया था।
अब से कुछ ही शताब्दी पहले ऐसा भी समय था जब मनुष्यों को पशुओं की तरह खरीदा-बेचा, मारा-पीटा और मनमाना काम लिया जाता था। उन्हें अपनी मर्जी से कुछ भी करने की छूट न थी। पूरी तरह उन्हें अपने मालिकों की इच्छा पर निर्भर रहना था। मालिक चाहे तो उनको मार भी डाल सकते थे। कोई राजा दूसरे राज्य पर आक्रमण करता तो वहाँ की प्रजा का धन लूटने के अतिरिक्त युवा पुरुषों या नारियों को भी पकड़ कर अपने यहाँ ले जाता और उन्हें दास-दासी बना कर लाभ उठाता। जो फालतू होते उन्हें सामान्य नागरिक खरीद लेते और घोड़े गधे जैसा काम लेते। मनुष्य द्वारा मनुष्य का इस प्रकार उत्पीड़न करना आज के युग में बुरा माना जाता है पर एक समय यह सब भी उचित मान लिया गया था। जिसके पास जितने गुलाम होते वह उतना ही बड़ा आदमी माना जाता।
अन्य देशों की तरह यूनान में भी दास-प्रथा सामाजिक जीवन का एक अंग बनी हुई थी। वहाँ का एक व्यापारी जो गुलामों के खरीदने बेचने का ही व्यापार करता था, एक बार एक ऐसा गुलाम पकड़ लाया जो दुबला-पतला होने के साथ-साथ बहुत कुरूप भी था। झुण्ड के और सब गुलाम तो बिक गये पर तीन रद्दी किस्म के बच गये। इनमें सब से फिसड्डी समझा जाने वाला कुरूप “ईसप” था। व्यापारी चाहता था कि कोई इन दोनों गुलामों को खरीद ले तो फिसड्डी ईसप को उसे मुफ्त में ही दे दूँ।
यूनान के एक दार्शनिक को एक गुलाम की जरूरत थी। वे हाट में पहुँचे और सस्ती कीमत का माल ढूँढ़ने लगे। मिट्टी की हाँडी ठोक बजा कर ली जाती है तो बिना परखे गुलाम कौन खरीदता? उसने एक प्रश्न पूछा तुम लोग क्या काम कर सकते हो? तो रद्दी गुलाम अपने मालिक के सिखाये हुए शब्द रटे बैठे थे, एक ने कहा—’कुछ भी’। दूसरे ने कहा—’सब कुछ।’ अब मुफ्त में मिलने वाले फिसड्डी ईसप ने कहा— महोदय जब हम तीन में से एक सब कुछ कर सकता है और दूसरा कुछ भी कर लेगा, तो फिर मेरे लिए काम बचता ही क्या है?
दार्शनिक को फिसड्डी ईसप की तर्कपूर्ण बात बहुत रु ची और उनने उससे और भी कई प्रश्न पूछे जिनका उत्तर उस ने एक तार्किक और विचारक की भाँति ही दिया। दार्शनिक ने उसे खरीद लिया और रस्से में बाँध कर घर ले आया। ईसप रास्ते भर सोचता आया कि किसी दार्शनिक के यहाँ रहने पर सम्भवतः उसे कुछ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार मिलेगा। पर जैसे ही वह घर के दरवाजे पर पहुँचे उसका दुर्भाग्य मालकिन ने ऐसा कुरूप आदमी अब तक नहीं देखा था। उनने कहा—बाजार में क्या सारे गुलाम मिट गये थे। इस जंगली जानवर को घर में रखना हो तो फिर मुझे ही यहाँ से निकलना पड़ेगा।
इन विषम परिस्थितियों में ईसप निराश न हुआ। उसने अपनी मधुर वाणी, शिष्ट व्यवहार, वफादारी और जिम्मेदारी जैसी अच्छाइयों को बढ़ाया और कुछ ही दिनों में मालकिन को इतना संतुष्ट कर लिया कि वे उससे सज्जनता का व्यवहार करतीं। दार्शनिक महोदय तो इस गुलाम की प्रशंसा करते हुए उसे अपना मित्र कहने में भी संकोच न करने लगे।
दूसरे गुलाम जब कि निराश एवं खिन्न रहते हुए दुर्भाग्य का रोना रोते हुए दिन काटते थे, ईसप अपने बचे हुये समय को कुछ सीखने और सोचने में लगाता। उसने छोटी-छोटी अनेक कहानियाँ गढ़ डालीं। मनोयोग और रुचि पूर्ण कहने और सुनाने की शैली भी बड़ी मधुर हो गई। पास-पड़ोस के बच्चे उससे कहानियाँ सुनने आते। चर्चा बड़ों तक फैली। दूर-दूर के लोग, विशेषतया शिक्षक उसके पास आते और उन गढ़ी हुई कहानियों को नोट कर के ले जाते। वे लघु कथाएं इतनी सुन्दर, आकर्षक और नीति धर्म का प्रतिपादन करने वाली होतीं कि सुनने वाले को अन्य बहुमूल्य निष्कर्षों पर पहुँचने में सुविधा होती। धीरे-धीरे ईसप की कही कथाएँ एक से दूसरे के—दूसरे से तीसरे के कानों में पहुँचती हुई यूनान भर में फैलने लगीं। भारत में ‘हितोपदेश’ तथा “पंच-तत्र की कथाएँ” जैसे आदरपूर्वक कहीं सुनी जाती हैं, इसी तरह उस देश में ईसप की कहानियाँ-लोक व्यवहार एवं सदाचार सिखाने के लिए प्रयुक्त होने लगी।
दिन भर कठोर श्रम, बदले में रूखा-सूखा भोजन, फटा-टूटा कपड़ा, चटाई पर सोना और तिरस्कृत जीवन। विधि की इस विडंबना पर भी ईसप झल्लाया नहीं वरन् यही सोचता रहा कि ऊँचे पहाड़ों की चोटी पर चट्टानों के बीच जब पेड़ पौधे उग और बढ़ सकते हैं तो मैं भी इन कठिनाइयों के बीच रहते हुए प्रगति के लिए कुछ तो कर ही सकता हूँ। परिस्थितियाँ शरीर को ही तो बँधे रह सकती हैं। मन को विकसित कर सकना तो तब भी मेरे हाथ में रह ही जाता है। जितना अवसर प्राप्त है उसी से लाभ क्यों न उठाऊँ। छुट्टी की घड़ियों को वह पढ़ने में लगाया करता और शरीर से काम करते हुए भी वह मन को विभिन्न विषयों के संबंध में विचारने में लगाया करता।
कुरूपता को उसकी सज्जनता ने ढक दिया। शरीर से दुबला और देखने में फिसड्डी लगने वाला अपने अध्यवसाय के बल पर उस स्थिति में भी अपने व्यक्तित्व को आकर्षक बनाता चला गया। उसकी शिक्षा बढ़ती गई और चतुरता भी। एक दिन उस दार्शनिक को कोई ताम्र पत्र मिला जिसमें पुरानी भाषा में कहीं छिपे हुए धन का संकेत था। पर भाषा और लिपि की अस्पष्टता से उसका तात्पर्य ठीक से निकल न रहा था। ईसप ने अपने मालिक से कहा- यदि उसे गुलामी से मुक्त कर दें तो वह इसका सही अर्थ निकाल सकता है। मालिक ने शर्त मान ली। ईसप ने सही अर्थ निकाल दिया और उन्हें गढ़े धन का भारी लाभ हुआ। फिर भी उसने अपने वचन का पालन न किया। इस लोभ से कि ईसप से अभी और भी लाभ उठाये जा सकते हैं, वे अपनी बात से मुकर गये और ईसप गुलाम का गुलाम ही बना रहा। फिर भी उसकी प्रतिभा बादलों में ढके सूर्य की किरणों की तरह फैलती ही गई।
एक बार यूनान के राज-दरबार में कोई बहुत ही पेचीदा प्रश्न उपस्थित हुआ और उसे हल करने के लिए देश के प्रमुख विद्वान बुलाये गये। कोई भी समस्या का सही हल न सोच सका, तब ईसप के बारे में फैली हुई जन श्रुति की परीक्षा करने के लिए उस गुलाम को राज्य सभा में बुलाया गया। उसने जो हल बताये उनसे दरबार में सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए। राजा ने उसे गुलामी से मुक्त करा दिया और उसकी राज्य सभा में परामर्शदाता की तरह नियुक्ति कर दी।
लीडिया के राजा क्रूसस ने यूनान पर चढ़ाई कर दी। आक्रमण की शक्ति इतनी प्रबल थी कि यूनान लड़खड़ा गया। शत्रु से संधि करने की आवश्यकता अनुभव की गई और यह कार्य ईसप के जिम्मे किया गया। दूत बन कर जब वह कुरूप व्यक्ति क्रूसस के पास पहुँचा तो उसने घृणा से मुँह फेर लिया और बात करने से इनकार कर दिया। ईसप ने नम्रता पूर्वक कहा—सचमुच मैं बहुत कुरूप हूँ और इसी योग्य हूँ कि आप जैसे श्रीमान मुझे देख कर अपनी प्रसन्नता नष्ट न करें। आप मुँह फेरे रहें पर कृपा कर मुझे एक छोटी कहानी कह लेने की आज्ञा दे दें। इतने पर संतुष्ट होकर मैं वापिस लौट जाऊँगा। राजा ने उसकी बात मान ली। ईसप ने एक गरीब चिड़िया की कहानी इतने मार्मिक ढंग से कही कि क्रूसस पिघल गया और उसने उससे घुल-मिल कर बातें कीं और अन्त में एक अच्छी संधि का मसौदा बन कर तैयार हो गया।
ईसप की इस सफलता से उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ी। पर राज दरबार के लोग यह नहीं चाहते थे कि
यका गणपते सर्वे पादा अर्न्तभवीन्त हि
नैतस्मादधिकं किंवहः ब्रह्यचर्याद्वि विद्यते
ब्रह्मचर्य से बढ़कर इस संसार में कोई उत्तम श्रेष्ठ क्षेत्र साधना नहीं है। हाथी के पैर के सामने जिस प्रकार सब छोटे हैं, उसी प्रकार सब साधन ब्रह्मचर्य में विलीन हो जाते हैं। एक गुलाम को उनकी तुलना में अधिक सम्मान मिले। ईसप से जल-भुन कर उन्होंने तरह-तरह के षड़यंत्र करने आरंभ कर दिये। एक दिन जब ईसप कहीं गये हुए थे तो उनके बिस्तर में राजा की एक कीमती सुराही छिपा कर रख दी गई और उन्हें पुलिस से पकड़वा कर न्यायालय में उपस्थित किया गया। न्यायाध्यक्ष दरबारियों से मिले हुए थे, उनके इशारे पर चोरी के अपराध में ईसप को मृत्युदण्ड मिला और पहाड़ की एक ऊँची चोटी से धकेल कर इस महा मनीषी का अन्त कर दिया गया।
ईसप की नीति कथाएँ यूनान का दायरा लाँघती हुई संसार के सभी देशों में पहुँचीं। सभी भाषाओं में उनका अनुवाद हुआ और विश्व-मानव ने उनका भरपूर लाभ उठाया। बच्चों की पाठ्य पुस्तकों में जो शिक्षाप्रद कहानियाँ पढ़ाई जाती हैं उनमें अधिकाँश ईसप की ही गढ़ी हुई हैं।
मनुष्य द्वारा मनुष्य को नीच समझा जाने, उसे गुलाम बनाये रहने और शोषण करने की नीति कितनी घातक है, उसके दुष्परिणामों पर विचार करते हैं तो लगता है कि इस दुर्बुद्धि के कारण मानव जाति का जितना अहित हुआ है, उतना शायद ही और किसी बुराई के कारण हुआ होगा। ईसप जैसे मनीषी को गुलाम, नीच और तिरस्कृत करने की भावना से इस महापुरुष का जिनने उत्पीड़न किया, उनने मानव जाति को उसके एक सुपुत्र द्वारा प्राप्त हो सकने वाले लाभों से वंचित रखने की कुसेवा ही की। यह क्रम अभी भी बन्द कहाँ हुआ है? दक्षिणा अफ्रीका में भारतीयों के साथ, अमेरिका में नीग्रो समाज के साथ, भारत में अछूतों के साथ जो दुर्बुद्धि बरती जा रही है उससे कितने ही निर्दोषों के मानवीय अधिकारों को अभी भी पददलित किया जाता है। भारतीय नारी की स्थिति तो अभी भी गुलामों से बदतर है।
ईसप के साथ उस अन्याय पर संसार भर के विचारशील लोगों ने आँसू बहाये थे। वे आँसू अब भी ज्यों के त्यों बह रहे हैं। मनुष्य द्वारा मनुष्य को पददलित करने की, छोटा या नीच समझने की, और उससे उत्पन्न उत्पीड़न की अनीति इस स्वाधीनता, समता और विश्वबन्धुत्व के युग में भी न जाने कब तक चलती रहेगी?
बूँद समुद्र के अथाह जल में घुलने लगी तो उसने कहा “अपने अस्तित्व को समाप्त करना मेरे लिए संभव न होगा। मैं अपनी सत्ता खोना नहीं चाहती।’
समुद्र ने उसे समझाया “तुम्हारी जैसी असंख्य बूँदों का समन्वय मात्र ही तो मैं हूँ। तुम अपने भाई बहिनों के साथ ही तो घुल-मिल रही हो। उसमें तुम्हारी सत्ता कम कहाँ हुई? वह तो और अधिक बढ़ गई।”
बूँद को सन्तोष न हुआ। वह अपनी पृथक सत्ता बनाये रहने का ही आग्रह करती रही।
समुद्र ने सूर्य किरणों के सहारे उसे भाप बना कर बादलों में पहुँचा दिया और वह बरस कर फिर बूँद बन गई। बहती हुई फिर समुद्र के दरवाजे पर पहुँची तो उसने हंसते हुए कहा- बच्ची पृथक सत्ता बनाये रह—कर भी तुम अपने स्वतंत्र अस्तित्व की रक्षा कहाँ कर सकीं? अपने उद्गम को समझो, तुम समष्टि से उत्पन्न हुई थीं और उसी की गोद में तुम्हें चैन मिलेगा।
इस संसार में सुखोपभोग की वस्तुओं की कमी नहीं है। आहार-विहार, वस्त्राभूषण, जमीन जायदाद, मोटर-बँगले आदि तरह-तरह की वस्तुयें यहाँ विद्यमान हैं। पर इन्हें प्राप्त करने का एक निश्चित विधान है। हर आवश्यक वस्तु किसी कीमत पर मिलने का नियम है। कभी-कभी परिस्थिति-वश कोई वस्तु किसी को बिना श्रम उत्तराधिकार में मिल जाये, ऐसे अपवाद बहुत कम देखने में आते हैं। अधिक शडडडड साधन तो मनुष्य को स्वयं जुटाने पड़ते हैं। इसके लिये पर्याप्त योग्यता, श्रम, शक्ति और अध्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है। सुख-साज की विभिन्न सामग्रियों की उपलब्धि इसी आधार पर होती है। अधिक परिश्रमी, योग्य और चतुर व्यक्ति , आलसी, अयोग्य व्यक्तियों से अधिक सफलता प्राप्त करते ही हैं। फिर दूसरों की सम्पत्ति, सुख और सफलता देखकर अकारण जलने, ईर्ष्या करने की प्रवृत्ति को दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है। मनुष्य के दुःख का एक विशेष कारण यह ईर्ष्या भी होती है।
ईर्ष्या एक नैतिक दुर्गुण है। यह व्यक्ति की हीनता व अशक्तता व्यक्त करता है। जिन लोगों को अपनी शक्ति का अनुमान नहीं होता अथवा जो आलस्य-वश अपने जीवन के बहुमूल्य क्षणों को यों ही बर्बाद किया करते हैं, प्रायः वे ही इस रोग के शिकार पाये जाते हैं। सन्देह और भय के कारण जो अपनी प्रगति करने में संकोच करते हैं उन्हीं को ईर्ष्या के प्रकोप का भागीदार बनना पड़ता है। आत्म-हीनता का यह भाव मनुष्य का सबसे प्रबल शत्रु है, जो अनेक मानसिक शक्तियों को अकारण जलाया करता है। भगवान ने सफलता प्राप्ति के प्रमुख साधन समान रूप से प्रदान किये हैं। आवश्यक उन्नति करने लायक सामर्थ्य प्रायः सभी में होती है। फिर जो स्वयं कुछ न कर सकें, उन आलसियों को औरों से ईर्ष्या करने का क्या अधिकार होना चाहिए?
हर व्यक्ति में कुछ न कुछ शक्ति व सामर्थ्य अवश्य होती है। इसके आधार पर लोग चाहें तो उन परिणामों को कम ज्यादा मात्रा में वे भी वैसे ही प्राप्त कर सकते हैं जैसे परिणाम दूसरों को प्राप्त होते देखकर ईर्ष्या होती है।
एक विद्यार्थी है उसने अपना अधिकाँश समय पढ़ने में लगाया है। हर क्षण का उपयोग विद्याध्ययन में किया है। तब जाकर कहीं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होने का उसे सौभाग्य मिला है। इस पर उसका सहपाठी ईर्ष्या या द्वेष जताये तो यह उसी की कमजोरी मानी जायेगी। दूसरे विद्यार्थी की तरह उसकी भी पढ़ने में पर्याप्त रुचि रही होती, सिनेमा आदि व्यसनों से बचा रहता, तो वह भी जरूर अच्छी श्रेणी में उत्तीर्ण होता। एक ने अपनी शक्तियों का सदुपयोग किया, एक ने प्रमाद में उन्हें गँवाया। इस पर भी यदि विद्वेष की भावनायें उठें तो उसे ओछा व्यक्ति मानना पड़ेगा।
जो किसान अधिक परिश्रम करते हैं, उनकी फसल अपेक्षाकृत अच्छी होती है, इससे दूसरे को ईर्ष्या न करनी चाहिए। अपनी शक्ति और सामर्थ्य का उपयोग उनने भी किया होता तो वे भी अधिक सफलता पाते। इसलिए यहाँ दूसरों के साथ ईर्ष्या करने को न्यायोचित नहीं कहा जायेगा।
अनियंत्रित ईर्ष्यालु प्रवृत्ति व्यक्ति की प्रतिभा और कौशल का सर्वनाश करती है। एक ही मुहल्ले में दो व्यक्ति रहते हैं एक डॉक्टर है, दूसरा मजदूर। एक के पास अस्पताल तक जाने के लिए कार है। दूसरे को फैक्ट्री तक पैदल चलना पड़ता है। यदि मजदूर डॉक्टर को देख-देखकर कुढ़ता है, उसे नीचा दिखाने के तरह-तरह के उपाय सोचता रहता है तो इस प्रकार उसकी सम्पूर्ण मानसिक चेष्टाएँ डॉक्टर को हानि पहुँचाने का क्षेत्र बन गयीं। इतने में ही उसके विचार घूमा करेंगे और उसकी शारीरिक व बौद्धिक शक्तियों का शोषण करते रहेंगे। इस बात पर सोचने का उस मजदूर के लिए एक रचनात्मक पहलू भी था। वह डॉक्टर की प्रतिभा और कौशल की प्रशंसा करता, उस पर विचार करता तो सम्भव था कि वह भी अपनी शक्तियों को विकसित कर लेता। ओवर टाइम काम करता, घर में कोई कुटीर उद्योग चला लेता तो इससे मोटर न मिलती तो साइकिल प्राप्त करने में तो विशेष कठिनाई न होती। किन्तु उसने अकारण द्वेष यश अपनी इस शक्ति का विनाश ही किया और हाथ कुछ न लगा। अन्त तक पैदल ही चलता रहा।
इस संसार में हजारों यदि हमसे अच्छे हैं तो लाखों ऐसे हैं जो हमसे भी गई, गुजरी स्थिति में हैं। दूसरों के भव्य-भवनों, आलीशान बँगलों से अपने कच्चे मकान की तुलना करने की अपेक्षा यह सोचना अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण है, कि हजारों ऐसे हैं जो घास-फूस के झोंपड़ों में निवास करते हैं। हम तो वर्षा और धूप से फिर भी बचाव कर लेते हैं, किन्तु सिरकियों के भीतर निवास करने वालों की हालत पर एक नजर भी नहीं डालते कि वे किस प्रकार वर्षा से भीगते, धूप सहते और शीत से ठिठुरते रहते हैं।
दूसरों की समृद्धि श्री और सफलता पर ईर्ष्या करने की अपेक्षा अपने से भी गई बीती स्थिति के लोगों से अपनी तुलना करने से आत्म-सन्तोष का भाव जागृत होता है। हमारी शक्ति, योग्यता और परिस्थितियों के अनुसार जो कुछ भी मिला है उसे ही परमात्मा का प्रसाद मानने से अपनी छोटी-सी सफलता भी महान लगती है। उसी पर असीम आनन्द की अनुभूति होने लगती है। दरिद्र भिखारिन को किसी अमीर के सजे-सजाये लड़के के प्रति वह प्यार नहीं होता जो उसे अपने कुरूप और मैले-कुचैले बेटे से होता है। हमें जो कुछ भी मिलता है उसे परमात्मा की इच्छा मानकर भोगने पर दुःखी होने से सहज में बचा जा सकता है। दूसरों की समृद्धि से अपनी तुलना करने से तो कुढ़न ही पैदा होती है।
आत्म-त्याग ही ईर्ष्या से बचने का एक उपाय है किन्तु यह भावना इतनी उदात्त है कि बिरले व्यक्तियों, सन्तों या महात्माओं में ही इसे पूर्ण रूप से पाया जाना सम्भव है। सामान्य व्यक्तियों को आत्म-त्याग के सरल रूप आत्मीयता द्वारा ईर्ष्या के प्रकोप से बचने का प्रयत्न करना चाहिये। सबको आन्तरिक दृष्टि से देखने से समता का भाव उत्पन्न होता है। इस आत्म-स्थिति से किसी के प्रति अन्याय अत्याचार और द्वेष, दुर्भाव रखने की भावनायें नष्ट हो जाती हैं। इस लिए सभी को अपने समान ही मानना चाहिए। दूसरों की समृद्धि और सफलता देखकर प्रसन्नता अनुभव करना ज्यादा अच्छा होता है। इससे अपनी आत्मा भी विकसित होती है और ईर्ष्या-द्वेष की दुष्प्रवृत्ति से भी बच जाते हैं।
सुख और आनन्द की प्राप्ति मनुष्य को बाह्य साधनों और परिस्थितियों के आधार पर नहीं होती। सुख का मूल हमारी आत्मा है। हम जब तक अपनी इस विशालता को अनुभव नहीं करते तभी तक ऊँच-नीच, बड़े-छोटे के हीन विचारों में फँसे रहते हैं। इन विद्वेष पूर्ण भावनाओं से मानसिक थकावट उत्पन्न होती है। जिससे हमारी क्रिया-शीलता पंगु हो जाती है। असामर्थ्य और असन्तोष का भाव पैदा होता है। इससे बचने को अपने ‘अहं’ से ऊपर उठकर सर्वात्मा में विचरण किया करें। आप तुच्छ नहीं विशाल हैं। आपकी शक्तियाँ अनन्त हैं। इसकी अनुभूति प्राप्त करने के लिए आप किसी के साथ ईर्ष्या न किया करें। तभी आपकी महानता जागृत होगी।
स्वामी सत्यदेव परिव्राजक अमेरिका के सियेटल नगर में जा रहे थे। एक आठ वर्षीय बालक जो भद्र पुरुषों की सी पोशाक पहने था, और अखबार बेच रहा था, उसने स्वामी जी से अखबार खरीदने के लिए कहा।
परिव्राजक जी ने पूछा—तुम तो किसी सम्पन्न घर के लड़के मालूम पड़ते हो, फिर अखबार क्यों बेचते हो?
लड़के ने कहा—मेरे घर वाले सम्पन्न हैं, पर उससे क्या? मुझे तो स्वावलम्बन की शिक्षा अभी से लेनी है। मैं जितना स्वयं कमा सकता हूँ उसके लिए अभिभावकों पर निर्भर क्यों रहूँ?
प्राचीन हो कि नवीन छोड़ो रूढ़ियां जो हों बुरी, बन कर विवेकी तुम दिखाओ हंस जैसी चातुरी—प्राचीन बातें ही भली हैं यह विचार अलीक है,जैसी अवस्था हो जहाँ वैसी व्यवस्था ठीक है—
—मैथिली शरण गुप्त
इस समय छाया अँधेरा, रात काली, छोर वाली। विश्वास का दीपक बुझा, इन्सान की शक्लें निराली॥
बात करते डर रहा है, बन्धु से बन्धु बेचारा। घात करने को खड़ा है, बाप से उसका दुलारा॥ हर पड़ोसी की नजर, अपने पड़ोसी पर लगी है। हर बहिन को निगलने को, आज कामुकता खड़ी है॥ भूख से कोई मरे, पर ब्लैक होना है जरूरी। अन्न महँगा, वस्त्र महँगा, है दिलों में बहुत दूरी॥ आदमी उपदेश देता, आदमी चिल्ला रहा है। आदमी को आदमी ही, आज कच्चा खा रहा है॥ विषम युग है, अतः कवि तुम, कलम अपनी फिर उठाओ।
प्रेम की आवाज दो, विश्वास के दीपक जलाओ॥
—हरीमोहन सिंह ‘कोठिया’
आज जवानी मचल रही है,
चलो आज संसार पलट दें!
आज विभव का दर्प चूर्णकर,
ताज फेंक दें, तख्त उलट दें!
जन-समुद्र में ज्वार उठा है,
अरे! ‘अगस्त’! कहाँ सोता है?
चिर-पीड़ित का सिंहनाद,
प्रलयंकर आज मूक होता है?
चरण-चरण में महा नाश है,
हम हैं ज्वाला-पथ के राही!
विजय हमारा वरण करेगी,
पथ पर संकट हो कितना ही!
बढ़े चलो उन्मत्त सिपाही!
—रामकुमार चतुर्वेदी
जो सुधा पिलायेगा धरती के कण-कण को,
इतिहास उसी के चरणों पर झुक जायेगा। अर्थी में आग लगाने वाले हाथ बहुत , पर शय को साँसें देकर कौन उठायेगा? मानवता उसके गीतों को दोहरायेगी, तो मरते अधरों में सरगम भर जायगा। जिस दिन जायेगी रात न फिर से आने को, शायद ऐसा भी एक सवेरा आयेगा। इसलिए कि सारी मानवता चिर अमर रहे, हर मानव के स्वर्गों की नींव हिलाना है। करना है दफन मौत को अपने हाथों से, अब तो हमको मरघट का नाम मिटाना है।
—महेश सन्तोषी
वैराग्य छोड़ बाहों की विभा सँभालो, चट्टानों की छाती से दूध निकालो। है रुको जहाँ भी धार, शिलाएँ तोड़ो, पीयूष चन्द्रमाओं को पकड़ निचोड़ो। चढ़ तुँगशैल शिखरों पर सोम पियो रे। योगियों नहीं, विजयी के सदृश जियो रे। छोड़ो मत अपनी आन, सीस कट जाये, मत झुको अनय पर, भले व्योम फट जायें। दो बार नहीं यमराज कंठ धरता है, मरता है जो, एक ही बार मरता है। तुम स्वयं मरण के मुख पर चरण धरो रे। जीना हो तो मरने से नहीं डरो रे। आँधियाँ नहीं जिनमें उमंग भरती है, छातियाँ जहाँ संगीनों से डरती है। शोणित के बदले जहाँ अश्रु बहता है, वह देश कमी स्वाधीन नहीं रहता है। मसाल, अंधड़ पर उछल चढ़ो रे। कि रर्चो पर अपने तन का चाम मढ़ो रे।
—रामधारी सिंह ‘दिनकर
हमारे यहाँ नारी और पुरुष के कार्यों की एक सीमा रेखा-सी मान ली गई है। घर का काम, रसोई बनाना, बच्चों की देखभाल, सफाई आदि के कार्य स्त्री के माने गये हैं तो घर से बाहर कमाई करना, खेती-नौकरी या कोई पेशा आदि करना पुरुष का काम रहा और यह विभाजन इतना दृढ़ हो गया कि नारी सुलभ कार्यों को करने में पुरुष शर्म-संकोच का अनुभव करता है तो घर की सीमा से बाहर के कार्यों में नारी का प्रयत्न निन्दनीय समझा जाता है। यद्यपि आज के युग में ये सीमायें टूटती जा रही हैं तथापि पूर्व संस्कारों के कारण कम से कम हमारे देश में तो अभी उक्त धारणायें व्यापक रूप में फैली हुई हैं। आज भी नारी और पुरुष के कार्यक्षेत्र की यह विभाजन रेखा टूटी नहीं है।
भले ही इसका कारण कुछ भी रहा हो लेकिन आज की परिस्थितियों में विकास की माँग के अनुसार इस विभाजन को लक्ष्मण-रेखा नहीं माना जा सकता। आज हमें इसकी अनुपयुक्तता पर विचार करना होगा। साथ ही इसको मिटाना होगा।
वस्तुतः पति और पत्नी दो इकाई मिलकर एक सम्मिलित व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं और जीवन यात्रा का उत्तरदायित्व इस सामूहिक व्यक्तित्व पर ही निर्भर करता है। दोनों का एक दूसरे के काम में सहयोग आवश्यक है अनिवार्य है। पति पत्नी के कार्यों का विभाजन उनकी सीमा रेखायें कभी निश्चित नहीं की जा सकतीं। दाम्पत्य जीवन का सार इसी में है कि दोनों आवश्यकता पड़ने पर वफादार साथी की तरह एक दूसरे के कामों में मदद करें, योग दें, चाहे वह काम घर के अन्दर का हो या बाहर का।
बहुधा भोजन बनाना पत्नी का काम समझा जाता है और यह ठीक भी है कि यदि पति बाहर काम पर गया है और पत्नी को अन्य कोई काम नहीं है वह घर पर रह कर भोजन बनाये। लेकिन आवश्यकता पड़ने पर पति को भी इस काम को उसी उत्साह से करना चाहिए जैसे पत्नी करती है। लेकिन बहुत से लोग इसे अपना अपमान समझते हैं। पत्नी के सामने चूल्हा फूँक ने में शर्म महसूस करते हैं। कैसी विडम्बना है। जो स्त्री जीवन भर चूल्हा फूँकती है, पति को भोजन बनाकर हमेशा देती है, यदि बीमारी-हारी में या किसी परेशानी के समय वह इसमें असमर्थ होती है तो वही पति इसमें अपना अपमान समझता है।
लेकिन समझदार पति जो पत्नी को अपने बराबर साथी की तरह समझता है कभी इसमें संकोच न करेगा। महान् लेनिन के गृहस्थ-जीवन का जिन्होंने अध्ययन किया वे जानते हैं कि वह पत्नी के हर काम में हाथ बंटाता था। पैदल ही चलकर एक साधारण नागरिक की तरह बाजार से घर का सामान, साग-सब्जी लाता था। कई वर्षों तक तो भोजन एक समय उनकी पत्नी बनाती थी और एक समय वे स्वयं।
यह आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है कि पत्नी की तरह ही घर के कामों में पति को भी कुशल होना चाहिए। आपको स्मरण होगा कि राजा नल पाक-विद्या में पारंगत थे और इसी गुण के कारण ऋतुपर्ण के सारथी के रूप में दमयन्ती ने उन्हें पहचान लिया था। गदाधारी भीम महाराज विराट के यहाँ मुख्य रसोइये के रूप में नियुक्त हुए थे। विवेकानन्द अपने हाथों बड़ा स्वादिष्ट भोजन बना लेते थे। घर के कामों में महात्मा गाँधी भी अपनी पत्नी को पूरा-पूरा योग देते थे। भोजन बनाने से लेकर घर की सफाई, टट्टी पेशाब उठाने तक के काम बापू ने स्वयं किए थे। हमारे इतिहास में एक भी महापुरुष ऐसा नहीं मिलता जिसने पत्नी के कार्यों को करने में संकोच अनुभव किया हो। और सच भी है कि जीवन के व्यापक क्षेत्र में जहाँ पति-पत्नी को मिलकर आगे बढ़ना होता है वहाँ कार्य विभाजन की कोई सीमा रेखा निर्धारित नहीं की जा सकती। जो ऐसा नहीं जानते वे अन्धकार में पड़े और अज्ञानी है।
पत्नी जीवन भर अपने पति-बच्चों के वस्त्र धोती है, उनकी सेवा करती है, जो भी करना आवश्यक होता है उसमें संकोच अनुभव नहीं करती। लेकिन आवश्यकता पड़ने पर पत्नी के कपड़े तक उठा कर धरने में, बीमारी-हारी में उसकी कुछ सेवा शुश्रूषा करने में बहुत से पति नाक भौं सिकोड़ते हैं। अपना अपमान समझते हैं। क्या इसी रूप में वे पत्नी की सेवा से उऋण होना चाहते हैं। सचमुच ऐसे व्यक्ति कभी भी नारी से उऋण नहीं हो सकते।
बहुत से परिवारों में स्त्रियाँ दिन-रात काम में लगी रहती हैं, उन्हें तनिक भी अवकाश नहीं मिलता कि कुछ विश्राम करें। दूसरी ओर पुरुष बहुत-सा समय व्यर्थ आलस्य में पड़े रहकर मौज मजे करने में, ताश शतरंज खेलने में बिताते हैं, लेकिन पत्नी को कुछ सहारा नहीं देते घर के काम में, ताकि वह भी बेचारी कुछ सुस्ता सकें, विश्राम कर सके। पति का कर्तव्य है कि जिस तरह पत्नी हमेशा निःसंकोच भाव से सेवा करती है उसी तरह वह भी आवश्यकता पड़ने पर पत्नी की सेवा करें। उसके आराम स्वास्थ्य आदि का पूरा-पूरा ध्यान रखें।
काम काज की ही बात नहीं बहुत से लोग अपनी स्त्री के प्रति सहानुभूति और सहयोग का रुख भी तो नहीं रखते। उल्टे अपने अस्त-व्यस्त कार्यक्रम से उसे परेशानी पैदा कर देते हैं। रात को साथियों की गप शप, सिनेमा आदि के कारण देर से घर आते हैं। उधर बेचारी पत्नी भोजन बनाकर थकी माँदी उनकी बाट जोहती रहती है। न वह स्वयं समय पर खा पाती है न सो पाती। पति इस तरह की व्यर्थ परेशानी से पत्नी को छुटकारा दिला सकता है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि पत्नी के प्रति सद्भावना रहे, उसकी सुविधा का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाय। ऐसी बहुत-सी कृत्रिम परेशानियों को इस तरह दूर किया जा सकता है।
यदि आप अपने दाम्पत्य जीवन को सुखी बनाना चाहते हैं, यदि आप अपनी पत्नी के स्वस्थ विकास की क्षमता रखते हैं, अपने कर्तव्य और उत्तरदायित्व के प्रति सच्चे बनना चाहते हैं तो सभी प्रकार पत्नी के कार्यों में सहयोग करें। किसी कारणवश आपकी पत्नी भोजन नहीं बना पाती तो आपका कर्तव्य है कि आप उसी भावना से भोजन बनायें जिस तरह प्रतिदिन आपकी पत्नी बनाती है।
बीमार पड़ने पर या किसी तकलीफ में पत्नी की सेवा शुश्रूषा करने में कंजूसी न करें। यही वह अवसर होता है जब आप अपनी स्त्री के ऋण से, जो जीवन भर आपके ऊपर चढ़ता रहता है, मुक्त हो सकते हैं। फिर अपने जीवन साथी की सेवा करने में शर्म क्यों? इस बात का भी पूरा-पूरा ध्यान रखें कि आपके द्वारा अकारण ही आपकी पत्नी को परेशानी न उठानी पड़ें। इसके लिए अपनी आदतों में अपने रहन-सहन और कार्यक्रम में सुधार कर लें। पत्नी के भी स्वास्थ्य मनोरंजन, घूमने फिरने का ध्यान रखें। किसी पर्व त्यौहार पर आपकी पत्नी यदि सहेलियों के साथ उत्सव मनाना चाहें तो घर के आवश्यक कार्य आप स्वयं सम्हाल लें और उसे स्वतन्त्रता के साथ आमोद-प्रमोद का अवसर प्रदान करें। सबसे बड़ी बात यह है कि स्वयं और पत्नी के बीच में किसी तरह का भेदभाव पूर्ण व्यवहार कोई सीमा-रेखा न मानें। वरन् एक बराबर साथी की तरह व्यवहार करें।
काला कौआ रोज जल्दी ही छत की मुँडेर पर आ बैठता और काँव-काँव करता रहता।
छोटे बालक ने माता ने पूछा—यह काला क्यों है और इतनी जल्दी घर-घर क्या कहने जाया करता है ?
माँ ने कहा—भक्ष-अभक्ष का विचार किए बिना यह पक्षी सब कुछ खाता है इससे इसे काला बनना पड़ा। जो बिना उचित अनुचित विचारे स्वार्थ में सब कुछ करते रहते हैं उनका मुँह भी काला होगा, यही शिक्षा देने कौआ घर-घर जाया करता है।
हमारे धर्म शास्त्रों में माता-पिता आचार्य तीनों को बालक के जीवन निर्माण में महत्वपूर्ण माना है। माँ-बाप उसका पालन-पोषण संवर्धन करते हैं तो आचार्य उसके बौद्धिक, आत्मिक, चारित्रिक गुणों का विकास करता है, उसे जीवन और संसार की शिक्षा देता है। उसकी चेतना को जागरुक बनाता है। इसी लिए हमारे यहाँ आचार्य गुरु को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, उसे पूजनीय माना गया है। आचार्य के शिक्षण, उसके जीवन व्यवहार, चरित्र से ही बालक जीवन जीने का ढंग सीखता है, आचार्य की महती प्रतिष्ठा हमारे यहाँ इसी लिए हुई।
पुरानी आचार्य परम्परा परिस्थितियों वश समय के परिवर्तन के कारण समाप्त हो गई है फिर भी आज का शिक्षक अध्यापक बहुत कुछ अंशों में उसका ही आधुनिक रूपांतर है। समय के साथ शिक्षा पद्धति-पाठ्यक्रम आदि में परिवर्तन हो सकता है लेकिन गुरु और शिष्य का सम्बन्ध सदैव रहता है और रहेगा।
आज हमारे यहाँ शिक्षक हैं अध्यापक हैं, वे छात्रों को निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षा भी देते हैं किन्तु सबसे महत्वपूर्ण बात जीवन निर्माण का व्यावहारिक शिक्षण आज नहीं हो पाता। आज गुरु -शिष्य—शिक्षक और छात्र का सम्बन्ध पहले जैसा नहीं रहा। केवल कुछ अक्षरीय ज्ञान दे देने, एक निश्चित समय तक कक्षा में उपस्थित रहकर कुछ पढ़ा देने के बाद शिक्षक का कार्य समाप्त हो जाता है तथा पाठ पढ़ने के बाद विद्यार्थी का।
अध्यापक और विद्यार्थी के बीच जो स्नेह भाव, आत्मीयता सौहार्द, समीपता की आवश्यकता है वह आज नहीं है और यही कारण है कि आज का विद्यार्थी डिग्री, डिप्लोमा ले लेता है लेकिन व्यावहारिक जीवन का शिक्षण, चरित्र, ज्ञान, उत्कृष्ट व्यक्तित्व का उसमें अभाव रहता है। इन सबके बिना विद्या अधूरी है। जो जीवन को प्रकाशित न करे, पुष्ट न बनावे वह विद्या किस काम की?
और चरित्र निर्माण की, व्यावहारिक ज्ञान की शिक्षा पुस्तकों से, नहीं मिल सकती। वह भी व्यक्ति की समीपता से उसके चरित्र आचरण को देखने समझने से प्राप्त होती है, जो आज की शिक्षा पद्धति में नहीं के बराबर है। निःसन्देह हमारी प्राचीन शिक्षा पद्धति में इस का बहुत ध्यान रखा गया था। आचार्य और विद्यार्थी का सहजीवन आश्रमों में बीतता था। उस समय विद्यार्थी पाठ ही नहीं सीखता था अपितु आचार्य के जीवन से चरित्र व्यवहार की सीख भी लेता था। इसी सत्य पर प्रकाश डालते हुए एक बार कवीन्द्र रवीन्द्र ने कहा था।
“शिक्षा के सम्बन्ध में एक महान सत्य हमने सीखा था। हमने यह जाना था कि मनुष्य से ही मनुष्य सीख सकता है। जिस तरह जल से ही जलाशय भरता है, दीप से ही दीप जलता है, उसी प्रकार प्राण से प्राण सचेत होता है। चरित्र को देखकर ही चरित्र बनता है। गुरु के संपर्क, सान्निध्य, उनके जीवन से प्रेरणा लेकर ही मनुष्य मनुष्य बनता है। आज का “शिक्षक महोदय प्राण नहीं, दे सकता चरित्र नहीं देता, वह पाठ दे सकता है। इसी लिए आज का छात्र किसी दफ्तर, अदालत का एक बाबू बन सकता है लेकिन मनुष्य नहीं बन पाता।”
आज शिक्षक और विद्यार्थी के बीच बहुत बड़ी खाई पैदा हो गई है सम्बन्धों की। यद्यपि इसका कारण आज की सामाजिक राजनैतिक परिस्थितियां भी हैं लेकिन जो शिक्षक हैं अध्यापक हैं वे व्यक्तिगत तौर पर इस जिम्मेदारी से नहीं बच सकते। एक बार शिक्षक दिवस पर बोलते हुए एक केन्द्रीय मन्त्री महोदय ने कहा था “आप तो विद्यार्थियों की परीक्षा साल में एक बार या दो बार लेते हैं किन्तु विद्यार्थी तो आप की परीक्षा प्रति दिन, प्रति घण्टे, प्रतिक्षण ही लेते रहते हैं। वे आपको कक्षा में आते देखते हैं, पढ़ाते देखते हैं, सद्व्यवहार और दुर्व्यवहार करते देखते हैं, और फिर कक्षा के बाहर दूसरों के साथ मिलते जुलते भी देखते हैं। वे जैसा आपको देखते हैं वैसा ही स्वयं भी सीखते हैं करते हैं। इसलिए जैसे आप होंगे वैसे ही आपके विद्यार्थी- भारत के से नौ निहाल भी होंगे।”
मंत्री महोदय के उक्त सारगर्भित शब्दों से शिक्षकों की जिम्मेदारी जो व्यक्ति गत रूप से उनके ऊपर है उससे इन्कार करने की कोई गुँजाइश नहीं रह जाती है और बच्चों में बढ़ती हुई अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता, चारित्रिक त्रुटियों के लिए कुछ सीमा तक शिक्षकों को भी उत्तरदायी माना जाय तो ठीक होगा।
यहाँ तक भी कोई बड़ी बात नहीं कि शिक्षक बच्चों को अच्छी बातें नहीं सिखाते, किन्तु जब अपने गलत व्यवहार और चारित्रिक त्रुटियों से बच्चों के सामने गलत आचरण करते हैं, तो यह एक अक्षम्य सामाजिक अपराध ही है। हम देखते हैं कि छोटे-छोटे बच्चों के समक्ष अध्यापक लोग बीड़ी पीते हैं। भद्दे हँसी मजाक करते हैं। अपने दोस्तों के लिये, कई शिक्षक तो बच्चों के द्वारा बीड़ी, पान, सिगरेट मँगाते है। बड़े स्कूल कालेजों में विद्यार्थियों के साथ हँसी मजाक पूर्ण बराबरी का व्यवहार, कई अमंगल विषयों पर वार्तालाप करना, अपना चारित्रिक स्तर निम्न रखना, ऐसी कई बातें है जो विद्यार्थियों के समक्ष गलत उदाहरण पेश करती हैं। यद्यपि आजकल के विद्यार्थी भी दूध के धुले नहीं हैं तथापि शिक्षकों का उत्तरदायित्व अधिक है। बच्चा यदि गलत आचरण करता है तो वह अभिभावकों की त्रुटि का परिणाम है। इसी तरह विद्यार्थी यदि अनुशासनहीन और उद्दण्ड बनते हैं तो यह शिक्षकों की भूल-गलती का परिणाम ही माना जायगा।
यद्यपि आज का शिक्षक वर्ग उन वर्गों में से है जिस के उद्धार की सबसे अधिक आवश्यकता है। हमारे देश का शिक्षक बहुत ही सामान्य स्थिति में जीवन निर्वाह करता है। इसके अतिरिक्त जीवन की जटिलतायें बढ़ जाने, छात्रों की बढ़ी हुई संख्या के कारण भी आज के शिक्षक के लिए छात्रों से व्यक्तिगत संपर्क रखना कठिन हो गया है। लेकिन एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक के नाते अपने समस्त अभाव, अभियोगों, व्यक्तिगत कठिनाइयों में हम अपने उत्तरदायित्व पूर्ण कर्तव्यों से विमुख नहीं हो सकते। परोपकार और लोक कल्याण की भावना रख कर ही शिक्षकों को बच्चों के जीवन निर्माण की दिशा में अग्रसर होना पड़ेगा। यह सच है कि प्रारम्भिक जीवन के लम्बे शिक्षाकाल में विद्यार्थी और शिक्षक का संपर्क बड़े ही महत्व का है। यदि इस समय में बिना किसी लाभ की भावना से भी यदि बच्चों के जीवन निर्माण की दिशा में शिक्षक वर्ग ध्यान दें तो वह एक बहुत बड़ा पुण्य कार्य होगा। कोई सन्देह नहीं कि इन्हीं बच्चों में से महापुरुष, विद्वान, तपस्वी, लोक सेवी, जन नायक, कुशल नेता निकलकर न आयें। जिस देश में सुयोग्य व्यक्तियों की बहुतायत होती है, वह देश गिर नहीं सकता न उसे कोई हानि ही पहुँचा सकता।
हमारे देश, समाज, सभ्यता, संस्कृति का भार बहुत कुछ शिक्षकों के कन्धों पर ही रखा है। अपने इस उत्तरदायित्व को समझते हुए बच्चों के उत्कृष्ट व्यक्तित्व का निर्माण करने में अधिकाधिक प्रयास आवश्यक है। आज के शिक्षकों की यह बड़ी जिम्मेदारी है।
तीन पथिक पहाड़ी के ऊपर चोटी पर लम्बा रास्ता पार कर रहे थे। धूप और थकान से उनका मुँह सूखने लगा। प्यास से व्याकुल हो उन्होंने चारों ओर देखा पर वहाँ पानी न था । एक झरना बहुत गहराई में नीचे बह रहा था।
एक पथिक ने आवाज लगाई हे- “ईश्वर सहायता कर हम तक पानी पहुँचा।”
दूसरे न पुकारा- “ हे इन्द्र मेघ माला ला और जल वर्षा।”
तीसरे ने किसी से कुछ नहीं माँगा और चोटी से नीचे उतर तलहटी में बहने वाले झरने पर जा पहुँचा और भरपूर प्यास बुझाई।
दो प्यासों की आवाजें अभी भी सहायता के लिए पुकारती हुई पहाड़ी को प्रतिध्वनित कर रही थीं, पर जिसने किसी को नहीं पुकारा वह तृप्ति लाभ कर फिर आगे चलने में समर्थ हो गया।
गायत्री उपासना का भावनात्मक और वैज्ञानिकता दोनों ही दृष्टियों से बड़ा महत्व है। भावना की दृष्टि से विचार किया जाय तो मानव-जीवन के चरित्र उत्कर्ष का बीज- मन्त्र उसे कहा जा सकता है। सामान्यता मनुष्य सबसे अधिक अपेक्षा ‘सद्बुद्धि’ की ही करता है। जिस औजार से उसे निर्माण कार्य करना है उसे ही टूटा-फूटा भौंथरा और अनगढ़ रखता है । इस भूल के फलस्वरूप ही उसे जीवन लक्ष्य से वंचित रहना पड़ता है।
सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में सबसे श्रेष्ठ साधन सम्पन्न शरीर मनुष्य को मिला है। बोलने, सोचने, लिखने, करने, मिल-जुल कर रहने और खोजने की जो विशेषताएं मनुष्य को प्राप्त हैं, उन्हीं के बलबूते पर उसने उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचने में सफलता पाई है। जितनी सुविधाएं मनुष्य को प्राप्त हैं, उसका हजारवाँ भाग भी सृष्टि के अन्य प्राणियों को प्राप्त रही होतीं तो वे अपने को धन्य मानते। आश्चर्य इसी बात का है कि इतनी सुविधाएं रहते हुए भी लोग दुःखी क्यों हैं? निरन्तर चिन्तित खिन्न, उदास, क्षुब्ध और अशान्त क्यों रहते हैं? इसका एक ही कारण है कि उनकी विचारणा का- प्रज्ञा का - सद्बुद्धि का परिष्कार नहीं हुआ। यदि वे सोचने का तरीका सही बना लेते तो आज जो अगणित समस्याएं और कठिनाइयाँ सामने उपस्थित हैं उनमें से एक भी दृष्टिगोचर न होती। सोचने का तरीका यदि सीख लिया जाय तो फिर इसी जीवन में स्वर्ग की अनुभूतियाँ बिखरी हुई दिखाई पड़ने लगें। निस्सन्देह विचारणा की अशुद्ध प्रणाली ने ही स्वर्गीय सुविधाओं से सम्पन्न मानव प्राणी को नारकीय परिस्थितियों में- दुःख-दारिद्रय में पड़े रहने के लिए विवश किया है। यदि सुख शान्ति की स्थिति सचमुच अभीष्ट हो तो उसके लिए एक उपाय अनिवार्यतः करना पड़ेगा और वह उपाय है- अपनी विचार पद्धति का संशोधन।
गायत्री महामन्त्र में इसी मर्म- रहस्य का उद्घाटन किया है। मानव जाति को सन्देश दिया है कि कोल्हू के बैल बने फिरने, मृगतृष्णा में भटकते रहने की अपेक्षा मूल तथ्य को समझो। सुख प्राप्ति के लिए प्रयत्न तो करो, पर प्रयत्नों से पूर्व स्थिति को समझ भी लो कि वह कहाँ से और कैसे मिलेगा?
गायत्री मन्त्र बताता है कि विचार संशोधन, भावनात्मक परिष्कार वह आवश्यक तत्व है, जिसे प्राप्त किये बिना न किसी को आज तक सुख-शान्ति मिली है और न आगे मिलेगी। वस्तुएं क्षणिक सुख दे सकती हैं। वासना और तृष्णा की मदिरा में कुछ ही क्षण उन्मत्त रहा जा सकता है। उनकी परिणति तो दूनी अशान्ति, दूनी हानि और दूनी असफलता में ही होती है। इसलिए हमें अपने मानसिक संस्थान को शुद्ध करने का सबसे अधिक प्रयत्न करना चाहिए। अपनी एक-एक प्रवृत्ति का सूक्ष्म निरीक्षण करना चाहिए और उन पर चढ़े हुए कुसंस्कारों का साहसपूर्वक परिष्कार करना चाहिए। वस्तुतः इसी का नाम साधना है। साधना का केन्द्र-बिन्दु इसी प्रयास एवं पुरुषार्थ को कहा जाता है।
गायत्री में ईश्वर से यही माँगा है कि - “प्रभु हमें आपने मानव शरीर देकर असीम अनुकम्पा की है। अब मानव बुद्धि देकर हमें उपकृत और कर दीजिए ताकि हम सच्चे अर्थों में मनुष्य कहला सकें और मानव जीवन के आनन्द का लाभ उठा सकें।” गायत्री के 24 अक्षरों में परमात्मा के ‘सवितु’ ‘वरेण्यः’ ‘भर्गः’ और ‘देव’ गुणों का चिन्तन करते हुए उन्हें अपने जीवन में धारण करने की आस्था बनाते हुए यह संकल्प किया गया है कि परमात्मा के अनुग्रह एवं वरदान की एक मात्र विभूति ‘सद्बुद्धि’ को भी हम प्राप्त करते रहेंगे। अपने जीवन को उस ढाँचे में ढालेंगे, जिसमें कि सद्बुद्धि सम्पन्न महामानव अपने को ढालते चले आये हैं। उसी संकल्प को बार-बार पूरी निष्ठा और भावनापूर्वक दुहराने का नाम गायत्री जप है। जप का सच्चा स्वरूप समझते हुए जो उस उपासना को करते हैं, वे उसका अनिर्वचनीय लाभ प्राप्त भी कर लेते हैं। वे इस अमृत को पाकर अमर बन जाते हैं और इस मृत्यु-लोक में रहते हुए भी दिव्य-लोक में निवास करने का स्वर्गीय आनन्द पग-पग पर अनुभव करने लगते हैं।
वैज्ञानिकता की दृष्टि से गायत्री उपासना के अगणित भौतिक लाभ भी हैं। कष्टों और आपत्तियों में पड़े हुए, विपत्तियों में फंसे हुए, अभाव और दरिद्र से पीड़ित, असफलता की ठोकरों से विक्षुब्ध व्यक्ति यदि इस महामन्त्र का आश्रय लेते हैं तो उन्हें आशा की किरणें दृष्टिगोचर होती हैं। जिन्हें अपना भविष्य अन्धकारमय दीख रहा था और आपत्तियों के कुचक्र में पिस जाने का भय सता रहा था, उन्हें उस उपासना से नया प्रकाश मिलता है। अभावग्रस्त व्यक्ति दारिद्रय से और रुग्ण मनुष्य पीड़ाओं से छुटकारा प्राप्त करते देखे गये हैं। कामनाओं की जलती हुई आग तृप्ति और शान्ति में परिणत होते देखी गई है। इस अवलम्बन का सहारा लेकर गिरे हुए लोग ऊपर उठते हैं। इस प्रकार के प्रतिफल कि सी जादू से नहीं, वरन् एक वैज्ञानिक पद्धति से उपलब्ध होते हैं। गायत्री उपासना मनुष्य के विचारों और कार्यों में एक नया मोड़, एक नया परिवर्तन प्रस्तुत करती है। जिसका अंतर्जगत बदले तो उसके बाह्य जीवन में परिवर्तन प्रस्तुत होना ही चाहिए। होता भी है। इसे ही लोग गायत्री माता का अनुग्रह एवं वरदान भी मानते हैं।
अनेक व्यक्तियों को गायत्री उपासना के फलस्वरूप अनेक प्रकार के कष्टों से छुटकारा पाते और अनेक सुविधाएं उपलब्ध करते हुए देखकर हमें यही अनुमान लगाना चाहिए कि इस साधन पद्धति में ऐसे वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश है, जिनके कारण साधक की अन्त :-भूमि में आवश्यक हेर-फेर उपस्थित होते हैं और वह असफलताओं एवं शोक सन्तापों पर विजय प्राप्त करते हुए तेजी से समुन्नत, समर्थ एवं सफल जीवन की ओर अग्रसर होता है।
गायत्री का महात्म्य भावनात्मक दृष्टि से भी है और वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसी से इस महान् अध्यात्म सम्बल को श्रद्धापूर्वक अपनाये रहने और उसे नित्य नियम में स्थान दिये रहने के लिए शास्त्रकार ने ये निर्देश किया है। ऋषियों ने प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति के लिए गायत्री की निष्ठापूर्वक उपासना करने के लिए जोर दिया है और जो उस उपयोगी व्यवस्था का लाभ नहीं उठाना चाहते, उनकी भूल को उन्होंने कटु भर्त्सना के साथ निन्दनीय भी ठहराया है। गायत्री उपासना न करने वाले को उन्होंने चाण्डाल तक कहा है।
गायत्री उपासना हमारे हित में ही है। उस माध्यम से मनुष्य निश्चय ही अपनी बहुत आत्मोन्नति कर सकता है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों की गत पच्चीस वर्षों से यह प्रेरणा निरन्तर दी जाती रही है और प्रसन्नता की बात है कि उनमें से अधिकाँश इस सम्बल को अपने जीवन का आधार बना भी चुके हैं। जिन्होंने अभी इस मार्ग पर चलना आरम्भ नहीं किया है, उन्हें चाहिए कि अवलम्बन के एक परीक्षण के रूप में गायत्री उपासना आरम्भ करें और देखें कि उनके उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना उत्पन्न करने में कैसे आश्चर्यजनक ढंग से यह महान् उपासना सहायक होती है।
सामान्य गायत्री उपासना में इतना भी पर्याप्त है कि नित्य शुद्धतापूर्वक आसन पर बैठ कर गायत्री माता का ज्योतिर्मय ध्यान करते हुए कम से कम एक माला का जप नित्य कर लिया जाय। उसका विस्तृत विधान गायत्री महाविज्ञान ग्रन्थ के तीन भागों में बताया जा चुका है। जिन्हें जिस प्रयोजन के लिए जिस प्रकार की- जिस स्तर की साधना अनुकूल हो वे उसी को कर सकते हैं। ताँत्रिक विधान तथा योगाभ्यास पद्धति से भी विशिष्ट गायत्री उपासना की जाती है और उसके लघु-मध्यम एवं पूर्ण पुरश्चरण भी होते हैं। उनका उल्लेख यहाँ किया जाना अनावश्यक है। वह सब कुछ हम अपने गायत्री ग्रन्थों में लिख चुके हैं और समयानुसार अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर उसका विस्तृत विवेचन आगे चलकर फिर करेंगे। अभी तो हमें गायत्री उपासना के उस उच्चस्तरीय-आत्मोन्नति के प्रयोजन से किये जाने वाले पञ्चकोशी साधना क्रम की ही चर्चा करनी है। गत तीन वर्षों से हर अक्टूबर मास की अखण्ड-ज्योति में एक वर्ष का साधना क्रम छापते रहे हैं। साधकों ने इस मार्ग पर चलते हुए आशातीत लाभ भी उठाया हैं। तीन वर्ष से चलते हुए उस साधना क्रम का यह चौथा वर्ष इस अक्टूबर मास से आरम्भ होना है। अस्तु अगले वर्ष का पाठ्यक्रम ही इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया जायगा।
पाठक यह जान ही चुके हैं कि आत्मा के ऊपर पाँच आवरण उसी प्रकार चढ़े हुए हैं जिस प्रकार प्याज की गाँठ में, केले के तने में या एक के ऊपर एक कपड़े पहनने वाले के वस्त्रों में कई पर्त होते हैं। उसी प्रकार आत्मा पाँच आवरण ओढ़े हुए है। इन्हें (1) अन्नमय कोश, (2) मनोमय कोश, (3) प्राणमय कोश, (4) विज्ञानमय कोश, (5) आनन्दमय कोश कहते हैं। आत्मसाक्षात्कार करने के लिए इन आवरणों को हटाना पड़ता है, उनका परिशोधन करना होता है। जिस प्रकार किसान अपनी कृषि को (1) जोतने, (2) बोने, (3) सींचने, (4) रखाने और (5) काटने के पाँच संस्कारों द्वारा परिपूर्ण करके उपार्जित अन्न का लाभ घर को ले जाता है, उसी प्रकार आत्म-कल्याण की उपासना करने वाले को भी पाँच कोशों के अनावरण की साधना करनी पड़ती है। जिन लोगों की उपासना नित्य कर्म तक सीमित है, वे थोड़ा जप नित्य करके भी काम चला सकते हैं, पर जिन्हें आत्म-साक्षात्कार की पूर्ण कक्षा तक पहुँचना है, उन्हें गायत्री योग के अंतर्गत पञ्चकोशी उपासना को भी अपनाना ही पड़ता है। गायत्री माता की पाँच मुख वाली आकृति कल्पना के पीछे भी पञ्चकोशों की साधना द्वारा ही पूर्णता तक पहुँचने का अलंकारिक संकेत छिपा हुआ है।
गत तीन वर्षों में अन्नमय कोश की साधना के संदर्भ में रविवार को बिना नमक शक्कर का अस्वाद व्रत, भोजन को एक दो लगावन तक सीमित करने की शिक्षा दी गई है। आहार शुद्धि पर इसलिए जोर दिया जाता है कि मन की शुद्धता-अशुद्धता का आधार वही है। यदि अन्न अशुद्ध होगा तो मन भी अशुद्ध रहेगा और अशुद्ध मन न कभी ध्यान भजन में एकाग्र होता है। और न श्रद्धा-विश्वास को ही ग्रहण करता है। मन का परिशोधन अन्न की शुद्धि पर निर्भर है। इसलिए साधना- समर में उतरने वाले को सबसे पहले आहार शुद्धि पर ध्यान देना पड़ता है। शुद्ध कमाई का, शुद्धता-पूर्वक बनाया हुआ, भगवान का प्रसाद मानकर, औषधि एवं अमृत की भावना से भोजन करना आवश्यक है। स्वाद के लिए नहीं, वरन् शरीर रक्षा के लिए ही खाया जाना चाहिए। पेट की थैली को देखते हुए उसमें आधा आहार, चौथाई जल और चौथाई वायु के लिए स्थान रहने देना चाहिए । अर्थात् भोजन की मात्रा इतनी रहनी चाहिए, जिससे पेट पर अनावश्यक भार न पड़े, आलस्य न आवे। जल्दी-जल्दी नहीं, वरन् धीरे-धीरे अच्छी तरह चबा कर ग्रास को उदरस्थ किया जाय। यह सब बातें गत वर्षों में बताई जा चुकी हैं। उनका जान लेना ही पर्याप्त नहीं, वरन् लाभ तभी है जब अभ्यास में लाया जाय।
उपवास आत्मिक साधना का आवश्यक अंग है।
सप्ताह में एक दिन हमें उपवास रखना चाहिए। नींबू, शहद मिला हुआ जल, दूध, छाछ, शाकों का रसा जैसे पेय पदार्थों से काम चला कर उपवास करना अच्छा रहता है। जो दोनों समय उपवास न कर सकें वे सप्ताह में एक बार तो कर ही लिया करें। जिनसे एक बार भी निराहार न रहा जा सके वे उस समय पेय पदार्थ ले सकते हैं। देश की खाद्य समस्या को देखते हुए सप्ताह में एक बार अन्नाहार का त्यागना देश-भक्ति का भी काम है। एक समय उपवास करके जो अन्न बचाया है, उसके पैसे आत्मा को भोजन देने के लिए- स्वाध्याय योग्य सत्साहित्य खरीदने के लिए सुरक्षित रखे जाने चाहिएं। शरीर का भोजन घटा कर आत्मा की खुराक बढ़ाने का शुभारम्भ इस प्रकार के साप्ताहिक उपवास से आरम्भ करना चाहिए। आगे यही पद्धति बढ़ते हुए भौतिक शारीरिक लाभों की तुलना में आत्मिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए परिपुष्ट होती चली जाती है।
दिन में दो बार से अधिक भोजन नहीं करना चाहिए। आवश्यकतानुसार प्रातः या तीसरे पहर दूध, छाछ, नींबू, शहद मिला जल जैसे प्रवाही पदार्थ लिये जा सकते हैं। बीच-बीच में कुछ न कुछ खाते रहने की आदत स्वास्थ्य की दृष्टि से भी और आत्मिक दृष्टि से भी अनुपयुक्त है। इसे साहसपूर्वक छोड़ ही देना चाहिए।
इस चौथे वर्ष की साधना में पेय पदार्थों की ओर कदम बढ़ाया जाना चाहिए। जो खाते हैं वही नहीं, वरन् जो पीते हैं, वह भी अन्न है। हमारा पेय शुद्धता युक्त हो। पीने का पानी शुद्ध बर्तन में हो, छना हुआ और ढका हुआ रहे, हाथ धोकर उसे लिया जाय और मंजे हुए शुद्ध बर्तन में पिया जाय। पीते समय एक साथ गट-गट ही न चढ़ा लिया जाय, वरन् धीरे-धीरे एक-एक घूँट को मुँह में रखकर उसे चूसते हुए- अमृत की भावना करते हुए- प्रसन्न चित्त से उसे पीना चाहिए। इस प्रकार पिया हुआ जल वस्तुतः औषधि की तरह काम करता है। उससे जल चिकित्सा का प्रयोजन पूरा होता है और आत्म-शोधन में आवश्यक सहायता मिलती है।
अशुद्ध पेयों का हमें परित्याग करना चाहिए। गन्दे ढंग से, गन्दे पात्रों में, गन्दे लोगों के द्वारा लाया हुआ जल न लेने का बचाव करना चाहिए। क्योंकि जल में संस्कार ग्रहण करने की शक्ति अन्न से भी अधिक रहती है, यदि तमोगुणी स्थिति का जल प्रयोग किया जाय तो उससे साधना क्रम में बाधा ही पड़ेगी। सामूहिक जल पात्रों में जहाँ हर कोई मन माने ढंग से बिना हाथ धोये पानी भरता पीता है, काँच के गिलास बिना माँजे धोये काम में आते रहते हैं, वहाँ तभी पानी पीना चाहिए जब उसके बिना काम न चलता हो। होटलों की चाय दुहरी हानि पहुँचाती है। चाय का नशा तो हानिकारक है ही। होटलों की गन्दगी उसमें “गिलोय नीम चढ़ी” की उक्ति चरितार्थ करती है। शराब, भाँग, ताड़ी जैसे नशीले पेय आत्म- कल्याण के इच्छुकों को त्यागने ही पड़ते हैं। धुँआ पीना भी अन्न में माना जायगा। तमाखू खाना-पीना गाँजा, चरस, मादक आदि भले ही धुएं या उत्तेजना के रूप में ही क्यों ना हों, हमारे जीवन कोषों और मस्तिष्कीय कोष्ठकों में प्रवेश करके तमोगुण उत्पन्न करते हैं और यह तमोगुण आत्मिक प्रगति के मार्ग में एक भारी बाधा बनकर खड़ा रहता है। नशेबाजी से हमें बचना ही चाहिए। भले ही वह बीड़ी पीने जैसी छोटी-सी ही क्यों न हो। इस वर्ष हमें नशेबाजी और अशुद्ध जल के प्रयोग को बन्द करने का प्रयत्न करना चाहिए, जिन्हें यह बुरी आदतें पड़ गई हों उन्हें उसे छोड़ना चाहिए। एक साथ न छूट सकें तो इस वर्ष इनका उपयोग आधा तो तुरन्त ही कर देना चाहिए।
गत वर्ष निरालस्यता और ब्रह्मचर्य पर अधिक ध्यान देने के लिए कहा गया था। इस वर्ष उनकी परिपुष्टि के लिए और भी अधिक ध्यान देना चाहिए। गृहस्थों को भी जितना अधिक ब्रह्मचर्य पालना संभव हो सके पालना चाहिए। शरीर के ओज और पोषण को कम से कम नष्ट करना चाहिए। समय का एक क्षण भर बर्बाद न करना, निरन्तर काम में लगे रहना, प्रातःकाल दिनचर्या बनाकर उसे पूरा करने में मशीन की तरह लगे रहना, यह आध्यात्मिक व्यक्ति का आवश्यक कर्तव्य है। समय ही जीवन है, जीवन ही समय है। जिन्हें अपना जीवन बर्बाद करना अभीष्ट न हो, उन्हें अपने समय का एक क्षण भी बर्बाद न करके उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। अन्नमय कोश की साधना के लिए इस वर्ष गायत्री के उच्चस्तरीय पञ्चकोशी साधकों को उपरोक्त विधि व्यवस्था को ध्यानपूर्वक समझना चाहिए और तत्परतापूर्वक उसका प्रयोग आरंभ करना चाहिए।
गीताकार ने मन को ही बन्धन मोक्ष का कारण और उसे ही भयंकर शत्रु तथा घनिष्ठ मित्र बताया है। कुसंस्कारी मन बन्धन का कारण होता है, अनेक विपत्तियाँ उत्पन्न करता और वह त्रास देता है जो बुरे से बुरा, निर्दय से निर्दय शत्रु भी नहीं दे सकता। उसके विपरीत जिसका मन सुसंस्कारी है, उसे इसी धरती पर जीवन मुक्ति का, स्वर्गीय सुख शान्ति का, देवलोक में रहने का आनन्द मिलता है। कुमार्गगामी मन ही मनुष्य को घृणित, निकृष्ट स्तर पर ले जाकर पटक देता है और वही यदि सन्मार्गगामी बन जाय तो सामान्य स्तर के मनुष्य को महामानव, नर-नारायण, पुरुष पुरुषोत्तम, सन्त, ऋषि और देवता बनने की परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देता है।
मन को परिष्कृत करना गायत्री की पंचकोशी साधना का महत्वपूर्ण आधार है। पंचकोशी साधना के मनोमय कोश परिष्कार साधन में यह प्रयत्न करना पड़ता है कि हमारा मन कुसंस्कारिता से विरत होकर वैसा बने जैसे एक श्रेष्ठ मनुष्य का होना चाहिए। एक भ्रान्त धारणा यह फैल पड़ी है कि “पूजा के समय भगवान की छवि पर जिसका मन एकटक लगा रहे उसका मन वश में हो गया।” यह एकाग्रता की साधना मात्र है, जिसे मैस्मरेजम विद्या के ज्ञाता त्राटक आदि की सहायता से बड़ी आसानी से प्राप्त कर लेते हैं। हिसाब जोड़ने वाले मुनीम, निशाना साधने वाले बन्दूकची, मैस्मरेजम का खेल दिखाने वाले बाजीगर, सरकस में खेल करने वाले नट, शोध करने वाले वैज्ञानिक इस कला में निष्ठगत होते हैं, उनको अपना मन एक दिशा में लगा देने की सिद्धि मिली हुई होती है। यदि ऐसे लोग चाहें तो ईश्वर की अमुक छवि पर घन्टों ध्यान लगाये आसानी से बैठे रह सकते हैं। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि उनका मन संग्रहीत हो गया और वे मोक्ष के अधिकारी हो गये। माना कि एकाग्रता भी मन की एक सफलता है और उससे ध्यान साधना में एक सीमा तक सहायता मिल सकती है पर एकाग्रता को ही मन को जीतना कहा जाय तो यह वज्र-मूर्खता से कम भ्रान्ति न होगी।
मनोमय कोश की साधना मन को सुसंस्कृत बनाने का प्रयास है। परिष्कृत और पवित्र मन निस्सन्देह आत्मिक लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है फिर चाहे वह किसी छवि पर एकाग्र होता हो, चाहे न होता हो। एकाग्रता मस्तिष्क की सफलता है और विशालता हृदय की गरिमा। मन को एकाग्र करना एक तृण समान लाभ है, उसकी तुलना में हृदय का विशाल बना लेना हिमालय जैसी सफलता माना जा सकता है। गायत्री की पंचकोशी साधना में मन को एकाग्र होना उतना आवश्यक नहीं माना गया है, जितना अन्तःकरण का उदार, विशाल, महान् और पवित्र बनाना है। हमें इस तथ्य को भली प्रकार बार-बार हृदयंगम कर लेना चाहिए।
विगत तीन वर्षों में इस संदर्भ में कई साधना बताई जा चुकी हैं। हमारी मनोभूमि में क्या आस्थाएं जमें? इसकी एक सुव्यवस्थित संहिता ‘युग-निर्माण सत्संकल्प’ की थोड़ी-सी पंक्तियों में समाविष्ट हैं। इन थोड़ी-सी पंक्तियों में वह सब कुछ बता दिया गया है, जो हमारी मान्यताओं और आस्थाओं का आधार होना चाहिए। इस सत्संकल्प को हमें बहुत ही ध्यानपूर्वक, पूरे मनोयोग के साथ, दिन में कम से कम एक बार अवश्य ही पढ़ना चाहिए और चिन्तन एवं मनन द्वारा समय-समय पर यह विचार करते रहना चाहिए कि इस आस्था को जीवन में कितना उतार लिया गया तथा कितना उतारना शेष है। जो शेष हो उसकी पूर्ति के लिए रोज ही सोचना चाहिए और रोज ही एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए। ‘सत्संकल्प’ के अनुरूप जीवन ढाल लेने में सफलता प्राप्त कर लेने की स्थिति को यदि ‘जीवन मुक्ति’ कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। मुक्त पुरुष का अन्तःकरण कैसा हो सकता है? उसकी गतिविधियाँ कैसी रह सकती हैं? इसका सजीव चित्रण इस छोटे-से संकल्प में मौजूद है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि हमारी मनोभूमि ऐसी ही बने और हमारी गतिविधियों का निर्धारण इसी आधार पर हो। इसके लिए बार-बार जब भी अवकाश मिले तभी हमें चिन्तन मनन करना चाहिए। मनोमय कोश की यह साधना गत वर्षों में बताई जा चुकी है।
प्रातःकाल उठते ही अपनी दिनचर्या बनाना, रात को सोते समय अपने कार्यों की व्यवस्था एवं उत्कृष्टता निकृष्टता का लेखा-जोखा लेना, पूजा उपासना का ही एक अंग मानना चाहिए। यह प्रक्रिया आत्म-शोधन के लिए एक अनिवार्य पद्धति है, जिसे प्रत्येक साधक को बिना चूक एवं बिना नागा अपनाये ही रहना चाहिए। भजन में स्थान, साधक एवं परिस्थिति अन्य कठिनाई से कभी चूक भी हो सकती है, पर उठते और सोते समय अपने उत्थान पतन का विचार विश्लेषण करना तो ऐसा सरल एवं स्वाभाविक है कि उसमें नागा होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।
स्वाध्याय आत्मा की खुराक है। जिस प्रकार शरीर को भोजन दिया जाता है, उसी प्रकार जीवनोत्थान के लिए प्रकाश, प्रेरणा एवं मार्ग-दर्शन देने वाला साहित्य मनोयोगपूर्वक नित्य ही पढ़ना चाहिए। यह कार्य प्राचीन कथा, पुराण दुहराते रहने से नहीं, वरन् उस साहित्य द्वारा पूरा होगा जो हमारी आज की समस्याओं पर आज की परिस्थितियों के अनुरूप सुझाव एवं प्रकाश प्रदान कर सकें। सत्संग का उद्देश्य आज की परिस्थितियों में ऐसा साहित्य ही पूरा कर सकता है। तथाकथित ‘सत्संगी’ तो हमें उल्टे भ्रम-जंजाल में फँसा कर पथ भ्रष्ट कर देते हैं। प्रबुद्ध सत्संग की पूर्ति पढ़े लिखे लोगों को स्वाध्याय द्वारा और बिना पढ़े लिखे लोगों लोगों को उसे सुनकर करनी चाहिए। मनोमय कोश की साधना में प्रबुद्ध साहित्य के स्वाध्याय का महत्वपूर्ण स्थान है।
व्यक्ति का मन समाज के समग्र मन का ही एक अंश है। चारों ओर दूषित मनोविकारों का साम्राज्य छाया हुआ हो तो उसका प्रभाव सामान्य स्तर के मन भी ग्रहण करते ही हैं। इसलिए अपने मन की शुद्धता अक्षुण्ण बनाये रहने के लिए यह आवश्यक हैं कि अपने संपर्क में आने वाले लोगों का मन भी शुद्ध बनाने के लिए यथा संभव प्रयत्न करें। जिस प्रकार शरीर की ही नहीं, वस्त्र, मकान, अन्न, जल, वायु आदि की स्वच्छता पर भी ध्यान रखना पड़ता है, वैसे ही अपनी मानसिक शुद्धि के लिए अपने संपर्क में आने वाले लोगों का मानसिक स्तर सुधारना आवश्यक है। सद्ज्ञान प्रसाद की कार्य पद्धति युग-निर्माण योजना की रीढ़ है। उसके अनेकों प्रकार—लोक सेवा के अनेकों उपाय—समय-समय पर बनाये जाते रहते हैं। अपनी परिस्थिति के अनुसार हमें यह प्रयत्न करना ही चाहिए कि जहाँ तक अपना संपर्क क्षेत्र हो, वहाँ तक सद्विचारों का, सत्प्रेरणाओं का प्रकाश फैले। इसके लिए हमें दीपक का अनुकरण करना चाहिए और कुछ समय नियमित रूप से ज्ञान यज्ञ के लिए देते रहना चाहिए। मनोमय कोश की साधना का यह एक महत्वपूर्ण अभ्यास है।
इस चौथे वर्ष में कुविचारों को सद्विचारों से काटने का अभ्यास करना चाहिए। अपने मन में उठने वाले विचारों पर सूक्ष्म समीक्षा दृष्टि गड़ाये रहना चाहिए और जब भी कुविचार उठते देखें तो उनके विरोधी काटने वाले सद्विचारों का प्रवाह मन में जारी कर देना चाहिए। काम विकार उठते ही सुन्दर शरीर के भीतर भरी हुई गन्दगी का स्मरण करने लगना, लोभ के विचार आते ही धन और शरीर की नश्वरता एवं अनीति से उपार्जन के दुष्परिणामों का चिन्तन करना, क्रोध आते ही अपने से भी वैसी ही भूलें होते रहने की बात सोचना और जिस पर क्रोध किया जा रहा है, उसके प्रति ममता आत्मीयता का आरोपण करने लगना, इन उपायों से दुष्ट विचारों को सद्विचारों से काटा जा सकता है। संघर्ष किये बिना कुविचार हटाये नहीं जा सकते। इसलिए अपनी दुर्वासनाओं के विरुद्ध सद्भावनाओं की सेना तैयार कर लेनी चाहिए और यह नोट कर रखना चाहिए कि जब अमुक प्रकार के कुविचार उठेंगे तब उनका प्रतिरोध अमुक प्रकार के सद्विचारों से किया करेंगे। अवसर आते ही उनका प्रयोग भी आरम्भ कर देना चाहिए।
कुविचारों से संघर्ष करने का यह अभ्यास इस चतुर्थ वर्ष की साधना का पाठ्यक्रम है। इसे जो जितने उत्साहपूर्वक अपनायेगा, उसे आत्मिक प्रगति की दिशा में गायत्री की उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना के अभ्यास में उतनी ही सहायता मिलेगी। मनोमय कोश के परिष्कार की यह बहुत ही महत्वपूर्ण एवं उत्कृष्ट साधना है। उपासकों को इसे पूरी श्रद्धा के साथ अपनाना चाहिए।
प्राणमय कोश के अनावरण के लिए गत तीन वर्षों में तीन प्राणायाम बताये जा चुके हैं। सन् 61 के अक्टूबर अंक में ‘प्राणाकर्षण प्राणायाम’ सन् 62 में ‘लोम-विलोम सूर्य वेधन प्राणायाम’ और सन् 63 में ‘नाड़ी शोधन प्राणायाम’ के पाठ्यक्रम गायत्री उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना करने वाले नैष्ठिक साधकों को बताये गए थे। इन तीनों को एक-एक वर्ष किया जाना था। साधकों ने वैसा ही किया भी है।
सामान्यतः नित्य उपासना करने के लिए बैठते समय प्रथम संध्या वन्दन के बाद कर्म (पवित्री करण, आचमन, शिखा बन्धन, सामान्य प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी पूजन)करने चाहिएं। इसके बाद आह्वान, पूजन। इतना प्रारम्भिक कृत्य करने के पश्चात् सामान्यतः गायत्री जप आरम्भ कर दिया जाता है। पर पंचकोशी साधना के साधकों को जप से पूर्व पन्द्रह मिनट प्राणमय कोश की साधना भी आवश्यक होती है। पिछले वर्षों एक-एक ही प्रकार के प्राणायामों का अभ्यास करना होता था। इस वर्ष तीनों का सम्मिश्रित स्वरूप पाँच मिनट—कुल मिलाकर पन्द्रह मिनट करना होगा। विगत तीन वर्षों के तीनों प्राणायामों का उल्लेख यहाँ फिर किया जाता है, जिससे कि नये साधकों को उनका स्वरूप समझने और साधक क्रम आरम्भ करने में सुविधा हो।
1-प्रथम वर्ष का प्राणाकर्षण प्राणायाम—
(1)”प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर पूर्वाभिमुख पालथी मार कर बैठिए। दोनों हाथ घुटनों पर रखिए। मेरुदण्ड सीधा रखिए। नेत्र बन्द कर लीजिए। ध्यान कीजिए कि अखिल आकाश में तेज और शक्ति से ओत-प्रोत प्राणतत्व व्याप्त हो रहा है। गरम भाप के, सूर्य के प्रकाश में चमकते हुए बादलों जैसी शक्ल के प्राण का उफान हमारे चारों ओर उमड़ता चला आ रहा है और उस प्राण उफान के बीच हम निश्चिन्त, शान्त-चित्त एवं प्रसन्न मुद्रा में बैठे हुए हैं।”
(2)”नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे-धीरे साँस खींचना आरम्भ कीजिए और भावना कीजिए कि प्राणतत्व के उफनते हुए बादलों को हम अपनी साँस द्वारा भीतर खींच रहे हैं। जिस प्रकार पक्षी अपने घोंसले में, साँप अपने बिल में प्रवेश करता है, उसी प्रकार वह अपने चारों ओर बिखरा हुआ प्राण-प्रवाह हमारी नासिका द्वारा साँस के साथ शरीर के भीतर प्रवेश करता है और मस्तिष्क, छाती, हृदय, पेट, आँतों से लेकर समस्त अंगों में प्रवेश कर जाता है।”
(3) “जब साँस पूरी खिंच जाय तो उसे भीतर रोकिये और भावना कीजिए कि—”जो प्राणतत्व खींचा गया है, उसे हमारे भीतरी अंग-प्रत्यंग सोख रहे हैं। जिस प्रकार मिट्टी पर पानी डाला जाय तो वह उसे सोख जाती है, उसी प्रकार अपने अंग सूखी मिट्टी के समान हैं और जलरूपी इस खींचे हुए प्राण को सोख कर अपने अन्दर सदा के लिए धारण कर रहे हैं। साथ ही प्राणतत्व में सम्मिश्रित चैतन्य, तेज, बल, उत्साह, साहस, धैर्य, पराक्रम सरीखे अनेक तत्व हमारे अंग-प्रत्यंग में स्थिर हो रहे हैं।”
(4) “जितनी देर साँस आसानी से रोकी जा सके उतनी देर रोकने के बाद धीरे-धीरे साँस बाहर निकालिए, साथ ही भावना कीजिए कि प्राणवायु का सारतत्व अब वैसा ही निकम्मा वायु बाहर निकाला जा रहा है जैसा कि मक्खन निकाल लेने के बाद निस्साद दूध हटा दिया जाता है। शरीर और मन में जो विकार थे वे सब इस निकलती हुई साँस के साथ घुल गये हैं और काले धुएं के समान अनेक दूषणों को लेकर वह बाहर निकल रहे हैं।”
(5)”पूरी साँस बाहर निकल जाने के बाद कुछ देर बाहर साँस रोकिए अर्थात् बिना साँस के रहिए और भावना कीजिए कि अन्दर के जो दोष बाहर निकाले गये थे, उनको वापिस न लौटने देने की दृष्टि से दरवाजा बन्द कर दिया गया है और वे बहिष्कृत होकर हमसे बहुत दूर उड़े जा रहे हैं।”
“इस प्रकार पाँच अंगों में विभाजित इस प्राणाकर्षण प्राणायाम को नित्य ही जप से पूर्व करना चाहिए। आरम्भ 5 प्राणायाम से किया जाय। अर्थात् उपरोक्त क्रिया पाँच बार दुहराई जाय। इसके बाद हर महीने एक प्राणायाम बढ़ाया जा सकता है। यह प्रक्रिया धीरे-धीरे बढ़ाते हुए एक वर्ष में आधा घण्टा तक पहुँचा देनी चाहिए।”
2-लोम-विलोम सूर्य वेधन प्राणायाम
प्रथम वर्ष में उपरोक्त प्राणाकर्षण प्राणायाम सिखाया गया था और द्वितीय वर्ष में लोभ-विलोम सूर्य भेदन प्राणायाम का अभ्यास बताया गया था, जिसकी पद्धति निम्न प्रकार है :—
(1) किसी शान्त एकान्त स्थान में प्रातः काल स्थिर चित्त होकर बैठिए। पूर्व की ओर मुख, पालथी मारकर सरल पद्मासन से बैठना, मेरुदण्ड सीधा, नेत्र अधखुले, घुटनों पर दोनों हाथ। यह प्राण मुद्रा कहलाती है, इसी पर बैठना चाहिए।
(2) बाएँ हाथ को मोड़कर तिरछा कीजिए। उसकी हथेली पर दाहिने हाथ की कोहनी रखिए। दाहिना हाथ ऊपर उठाइए। अँगूठा दाहिने नथुने पर और मध्यमा तथा अनामिका उँगलियाँ बाएं नथुने पर रखिए।
(3) बाएं नासिका के छिद्र को मध्यमा (बीच की) और अनामिका (तीसरे नम्बर की) उँगली से बन्द कर लीजिए। साँस फेफड़े तक ही सीमित न रहे, उसे नाभि तक ले जाना चाहिए और धीरे-धीरे इतनी वायु पेट में ले जानी चाहिए, जिससे वह पूरी तरह फूल जाय।
(4) ध्यान कीजिए कि सूर्य की किरणों जैसा प्रवाह वायु में सम्मिश्रित होकर दाहिने नासिका छिद्र में अवस्थित पिंगला नाड़ी द्वारा अपने शरीर में प्रवेश कर रहा है और उसकी ऊष्मा अपने भीतरी अंग प्रत्यंगों को तेजस्वी बना रही है।
(5) साँस को कुछ देर भीतर रोकिये। दोनों नासिका छिद्र बन्द कर लीजिए और ध्यान कीजिए कि नाभि चक्र में प्राण वायु द्वारा एकत्रित हुआ तेज नाभि चक्र में एकत्रित हो रहा है। नाभि स्थल में चिरकाल से प्रसुप्त पड़ा हुआ सूर्य चक्र इस आगत प्रकाशवान प्राण वायु से प्रभावित होकर चमकीला हो रहा है और उसकी दमक बढ़ती जा रही है।
(6) दाहिने नासिका छिद्र को अँगूठे से बन्द कर लीजिए। बायाँ खोल दीजिए। साँस को धीरे-धीरे बाएं नथुने से बाहर निकालिए और ध्यान कीजिए कि चक्र को सुषुप्त और धुँधला बनाये रहने वाले कल्मष इस छोड़ी हुई साँस के साथ बाहर निकल रहें हैं। इन कल्मषों के मिल जाने के कारण साँस खींचते समय जो शुभ्र वर्ण तेजस्वी प्रकाश भीतर गया था वह अब मलीन हो गया और पीत वर्ण होकर साँस के साथ बाएं नथुने की इड़ा नाड़ी द्वारा बाहर निकल रहा है।
(7) दोनों नथुने फिर बन्द कर लीजिए।
फेफड़ों को बिना साँस के खाली रखिए। ध्यान कीजिए कि बाहरी प्राण बाहर रोक दिया गया है। उसका दबाव भीतरी प्राण पर बिलकुल भी न रहने से वह हल्का हो गया है। नाभि चक्र में जितना प्राण सूर्य पिण्ड की तरह एकत्रित था, वह तेज-पुँज की तरह ऊपर की ओर अग्नि शिखाओं की तरह ऊपर उठ रहा है। उसकी लपटें पेट के ऊर्ध्व भाग, फुफ्फुस को बेधती हुई कण्ठ तक पहुँच रही हैं। भीतरी अवयवों में सुषुम्ना नाड़ी में से प्रस्फुटित हुआ यह प्राण-तेज अन्तः प्रदेश को प्रकाशमान बना रहा है।
(8) अँगूठे से दाहिना छिद्र बन्द कीजिए और बाएं नथुने से साँस खींचते हुए ध्यान कीजिए कि इड़ा नाड़ी द्वारा सूर्य प्रकाश जैसा प्राणतत्व साँस से मिलकर शरीर में भीतर प्रवेश कर रहा है और वह तेज सुषुम्ना विनिर्मित नाभिस्थल के सूर्य चक्र में प्रवेश करके वहाँ अपना भण्डार जमा कर रहा है। इस तेज सञ्चय से सूर्यचक्र क्रमशः अधिक तेजस्वी बनता चला जा रहा है।
(9) दोनों नासिका छिद्रों को बन्द कर लीजिए। साँस को भीतर रोकिए। ध्यान कीजिए कि साँस के साथ एकत्रित किया हुआ तेजस्वी प्राण नाभि स्थित सूर्यचक्र में अपनी तेजस्विता को चिर-स्थायी बना रहा है। तेजस्विता निरन्तर बढ़ रही है और यह अपनी लपटें पुनः ऊपर की ओर अग्नि शिखा की तरह ऊर्ध्वगामी बना रही है। इस तेज से सुषुम्ना नाड़ी निरन्तर परिपुष्ट हो रही है।
(10) बायाँ नथुना बन्द कीजिए और दाहिने से साँस धीरे-धीरे बाहर निकालिये। ध्यान कीजिए कि सूर्य चक्र का कल्मष धुएं की तरह तेजस्वी साँस में मिलकर उसे धुँधला पीला बना रहा है और पीली प्राण-वायु पिंगला नाड़ी द्वारा बाहर निकल रही है। भीतरी कषाय कल्मष बाहर निकालने से अन्तःकरण बहुत हल्का हो रहा है।
(11) दोनों नासिका छिद्रों को पुनः बन्द कीजिए और उपरोक्त नं॰ 6 की तरह फेफड़ों को साँस से बिल्कुल खाली रखिए। नाभि चक्र से कण्ठ तक सुषुम्ना का प्रकाश पुञ्ज ऊपर उठता देखिए। भीतरी अवयवों में दिव्य ज्योति जगमगाती अनुभव कीजिए।
यह एक लोम-विलोम सूर्य वेधन प्राणायाम हुआ। साँस के साथ खींचा हुआ प्राण नाभि में स्थित सूर्य चक्र को जागृत करता है। उसके आलस्य और अन्धकार को बेधता है और वह सूर्यचक्र अपनी परिधि का वेधन करता हुआ सुषुम्ना मार्ग से उदर, छाती और कण्ठ तक अपना तेज फेंकता है। इन कारणों से इसे सूर्य वेधन कहते हैं। लोम कहते हैं सीधे को, विलोम कहते हैं उल्टे को। एक बार सीधा, एक बार उल्टा। फिर उल्टा, फिर सीधा। फिर उल्टा, फिर सीधा। बाएं से खींचना, दांये से निकालना। दाहिने से खींचना बायें से निकालना। यह उल्टा सीधा चक्र रहने से इसे लोम-विलोम कहते हैं। प्राणायाम की प्रकृति के अनुसार इसे लोम-विलोम सूर्य-वेधन प्राणायाम कहा जाता है।
3-तीसरे वर्ष के लिए ‘नाड़ी शोधन प्राणायाम’
(1) प्रातःकाल पूर्व को मुख करके कमर सीधी रखकर सुखासन से—पालथी मार कर बैठिये। नेत्रों को अधखुले रखिए।
(2) दाहिना नासिका छिद्र बन्द कीजिए। बांए छिद्र से साँस खींचिए और उसे नाभि चक्र तक खींचते जाइए।
(3) ध्यान कीजिए कि नाभि स्थान में पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्रमा के समान पीतवर्ण शीतल प्रकाश विद्यमान है। खींचा हुआ साँस उसे स्पर्श कर रहा है।
(4) जितने समय में साँस खींचा गया था, उतने ही समय भीतर रोकिये और ध्यान करते रहिए कि नाभिचक्र में स्थित पूर्ण चन्द्र के प्रकाश को खींचा हुआ श्वास स्पर्श करके स्वयं शीतल और प्रकाशवान् बन रहा है।
(5) जिस नथुने से साँस खींचा था, उसी बांये छिद्र से ही साँस बाहर निकालिये और ध्यान कीजिए कि नाभिचक्र के चन्द्रमा को छूकर वापिस लौटने वाली प्रकाशवान् एवं शीतल वायु इड़ा नाड़ी की छिद्र नलिका को शीतल एवं प्रकाशवान् बनाती हुई वापिस लौट रही है।
(7) कुछ देर साँस बाहर रोकिए और फिर उपरोक्त किया आरम्भ कीजिए। बायें नथुने से ही साँस खींचिए और उसी से निकालिए। दाहिने छिद्र को अँगूठे से बन्द रखिए। इसी को तीन बार कीजिए।
(9) जिस प्रकार बायें नथुने से पूरक, कुम्भक, रेचक, बाह्य कुम्भक किया था, उसी प्रकार दाहिने नथुने से भी कीजिए। नाभिचक्र में चन्द्रमा के स्थान पर सूर्य का ध्यान कीजिए और साँस छोड़ते समय भावना कीजिए कि नाभि स्थित सूर्य को छूकर वापिस लौटने वाली वायु श्वास नली के भीतर ऊष्णता और प्रकाश उत्पन्न करती हुई लौट रही है।
(10) बायें नासिका स्वर को बन्द रखकर दाहिने छिद्र से भी इस क्रिया को तीन बार कीजिए।
(11) अब नासिका के दोनों छिद्र खोल दीजिए। दोनों से साँस खींचिए और भीतर रोकिए और मुँह खोल कर साँस बाहर निकाल दीजिए। यह विधि एक बार ही करनी चाहिये।
तीन बार बायें नासिका छिद्र से साँस खींचते और छोड़ते हुये नाभि चक्र में चन्द्रमा का शीतल ध्यान, तीन बार दाहिने नासिका छिद्र से साँस खींचते छोड़ते हुए सूर्य का उष्ण प्रकाश वाला ध्यान, एक बार दोनों छिद्रों से साँस खींचते हुए मुख से साँस निकालने की क्रिया यह सात विधान मिलकर एक नाड़ी-शोधन प्राणायाम बनता है।
शक्ति संचार साधना
प्राणमय कोश के अनावरण की साधना से शक्ति संचारक साधना क्रम का विशेष महत्व है। इस साधना के माध्यम से हिमालय स्थित गायत्री के परम सिद्ध देवपुरुषों की शक्ति एवं सहायता प्राप्त की जा सकती है। इस साधना क्रम में भी कोई विशेष परिवर्तन इस वर्ष नहीं है।
यह प्रवाह रविवार और गुरुवार को सूर्य उदय होने से एक घण्टा पूर्व से आरम्भ होकर ठीक सूर्य उदय होने पर बन्द हो जाता है। इसलिए उस एक घण्टे की अवधि में से अपनी सुविधा का आधा घण्टा अपनी साधना के लिये नियत रखा जा सकता है।
उपरोक्त दोनों दिन सायं काल यह प्रवाह 9 से 10 बजे तक चलता है। जिन्हें प्रातः अवकाश न मिलता हो तो सायंकाल की शक्ति संचार साधना कर सकते हैं। यह सप्ताह में एक बार ही आधा घण्टा की जाती है। रविवार गुरुवार में से प्रातः या रात को जो भी आधा घण्टा अपनी सुविधा का हो उसे नियत कर लेना चाहिए और फिर उसी क्रम को साल भर तक चलाते रहना चाहिये।
शक्ति संचार साधना का क्रम
पालथी मारकर, मेरु दण्ड सीधा रखकर, नेत्रों को अधखुले रखकर ध्यान मुद्रा में बैठिए। दोनों हाथों को घुटनों पर रखिए। उत्तर दिशा में मुँह कीजिये।
भावना कीजिए कि हिमालय के उच्च शिखर से कोई दिव्य शक्ति हमें आशीर्वाद, प्रेरणा और प्रोत्साहन भरा प्राण-प्रवाह हमारे लिये भेज रही है और हम उसे श्रद्धापूर्वक अपने अन्तः प्रदेश में धारण कर रहे है।
धारणा कीजिए कि अन्तरिक्ष से एक शुभ्र पीत आभा वाला, भाप के बादलों जैसा प्राण-प्रवाह उमड़ता चला आता है। धुनी हुई रुई या हलकी बरफ या दूध के झाग सरीखी एक मृदुल विद्युत-धारा अपने चारों ओर फैली हुई है। कुहरे की तरह उसने हमारी सब ओर की परिधि घेर ली है और हम उसके मध्य बैठे हुये आनन्द एवं उल्लास का अनुभव कर रहे हैं।
ध्यान कीजिये कि किसी दिव्य चेतना द्वारा प्रेरित प्राण-प्रवाह अपने सब इन्द्रिय-छिद्रों के रोम-कूपों द्वारा शरीर के भीतर प्रवेश करके अपने अंग प्रत्यंगों में संव्याप्त हो रहा है। उस प्रवाह के साथ-साथ अपने भीतर उच्च आस्था, श्रेष्ठ श्रद्धा, आशा, उत्साह, उदारता, दया, विवेक, आनन्द- उल्लास, नीति, धर्म, त्याग, संयम, परमार्थ आदि की उच्च-भावनाएँ भी धुली चली आ रही है और उन्हें उपलब्ध करके अपना अन्तःकरण महापुरुषों जैसा उदार, महान, दूरदर्शी एवं आदर्शवादी बन रहा है।
विश्वास कीजिये कि यह प्रवाह ईश्वरीय हैं। ऋषियों जैसी पवित्रता इसमें ओत-प्रोत है। यह शक्ति अपने भीतर प्रविष्ट होकर परमात्मा का पुण्य प्रकाश उत्पन्न कर रही है।
शक्ति संचार का यह बहुमूल्य क्रम जिन लोगों ने गत वर्ष नियमित रूप से अपनाया है, उनकी आशाजनक आत्मिक प्रगति हुई है। शरीर, मन और आत्मा पर इस शक्ति संचार का आश्चर्यजनक लाभ साधकों ने पिछले वर्षों अनुभव किया है। इस महान लाभ से किसी को वंचित नहीं रहना चाहिये।
प्रतिदिन तीनों प्राणायामों का सम्मिलित अभ्यास तथा शक्ति संचार साधनों का सप्ताह में एक बार आधा घण्टा, यह क्रम चलाते रहने से प्राणमय कोश के जागरण में आशाजनक सफलता मिलती है। साधक की प्राण शक्ति बढ़ती है। उसका साहस, धैर्य, पौरुष और प्राण तेज कई गुना अधिक बढ़ जाता है।
विज्ञानमय कोश का परिमार्जन आत्मा पर चढ़े हुए मल आवरण एवं विक्षेपों को हटाने से होता है। इस संदर्भ में प्रथम वर्ष कृतघ्नता का पाप छोड़ने का साधन कराया गया था और प्रातःकाल उठते ही शैया पर उन सबका स्मरण अभिनंदन करने को कहा गया था, जिनने अपने साथ कोई उपकार किया है। इन्हीं भावनाओं का प्रकटीकरण श्राद्ध और तर्पण जीवित और स्वर्गस्थ सभी अपने प्रति उपकार करने वालों के लिये किया जाना चाहिए। माता-पिता, बड़े भाई, बड़ी भावज, बड़ी बहिन आदि घर में जो भी अपने से बड़े हों, उनको नित्य प्रातः चरण स्पर्श पूर्वक प्रणाम इसी भावना से किया जाना चाहिये। स्त्रियाँ अपनी सास, ननद, जिठानी, ससुर, पति आदि के लिए इसी प्रकार अभिवन्दन किया करें। सबसे नम्र और मधुर बोलना चाहिये। तथा शिष्ट व्यवहार करते हुए अपनी अध्यात्म परायणता का परिचय देना चाहिये।
द्वितीय वर्ष में किसी को भी, छोटों को भी ‘तू’ न कहकर ‘तुम’ या ‘आप’ कहने की सभ्य परम्परा का आरम्भ कराया गया था। यह निरहंकारिता का अभ्यास है। हम किसी को भी अपने से छोटा न समझें और न अपने को किसी से बड़ा मानें, इसी भावना में सज्जनता का परिचय मिलता है। अहंकारी, दूसरों को तिरस्कार पूर्ण संबोधन करने वाले को तो एक प्रकार से असुर ही माना गया है। मार-पीट करना तो पिशाचपन है। किसी बच्चे को मारना पीटना मनुष्य से नहीं असुर से ही बन पड़ता है। विज्ञानमय कोश का लाभ प्राप्त करने वाले को इस प्रकार की दुष्टताएं छोड़ कर निरहंकारिता ही अपनानी पड़ेगी।
तीसरे वर्ष सादगी की शिक्षा की गई थी। आहार विहार, वस्त्र, वेश, विन्यास, संभाषण, व्यवहार, हर क्षेत्र में सादगी का समावेश हो। फैशन, ठाठ-बाट, तड़क-भड़क, प्रदर्शन और बनावट छिछोरे लोगों की भोंड़ी पहचान है। संजीदा और समझदार लोगों को सादगी ही शोभा देती है। विद्या की परख विनय से, श्रेष्ठता की पहचान ‘सादगी’ से होती है।
इस चौथे वर्ष में विज्ञानमय कोश के साधकों को ‘उदारता’ का अभ्यास करना चाहिये। अपने समय, श्रम, धन एवं प्रभाव का एक अंश जन साधारण में सद्भावनाओं की अभिवृद्धि के लिये लगाना चाहिये। पूरा जीवन स्वार्थ में ही नहीं लगाना चाहिये वरन् उसका एक बड़ा भाग परमार्थ के लिये —लोक सेवा के लिये भी सुरक्षित रखना चाहिये। गायत्री के प्रति, सद्बुद्धि एवं श्रेष्ठता के प्रति, आस्था रखने वालों को उदार तथा सेवाभावी होना ही चाहिये।
अपने स्वजन, सम्बन्धी और परिचितों को सद्विचारों की, सत्कर्मों की प्रेरणा देने के लिये संपर्क बनाना, आदर्शवाद के सम्बन्ध में चर्चा एवं समर्थन करना हर अध्यात्मवादी का परम पवित्र कर्त्तव्य है। इसके लिए जिससे जितना समय निकालना सम्भव हो, उसे उतना अवश्य ही निकालना चाहिये। अपनी आजीविका का एक अंश ‘ज्ञान यज्ञ’ के लिये नियमित रूप से निकालना चाहिये। जिसकी आमदनी सौ रुपया मासिक हो उसे एक रुपया तो इस कार्य के लिये निश्चित रूप से निकालना ही चाहिये, कि उससे अपने समीपवर्ती लोगों को आत्मोत्कर्ष की, प्रेरणा की साधन सामग्री मिलती रहे। हमारे घरों में ऐसे ज्ञान मन्दिर रहने चाहियें, जिनसे स्वाध्याय का उपयुक्त साहित्य निरन्तर बढ़ता रहे और उससे अपने घर के तथा पड़ोस के लोग लाभ उठाते रहें।
आनंद का प्रत्यक्ष स्वरूप इस संसार में देखना हो तो वह ‘प्रेम’ में ही परिलक्षित हो सकता है। पंचकोशी साधना के अभ्यासियों को प्रथम वर्ष में गायत्री को अपनी माता मानकर उसकी गोदी में एक वर्ष के छोटे बालक की तरह क्रीड़ा करते, अपने मातृ प्रेम का और माता के वात्सल्य के भाव स्मरण करते हुए आनंद में आह्लादित होने का अभ्यास कराया गया है।
द्वितीय वर्ष में सूर्य प्रकाश के मध्य गायत्री माता के मुख मंडल मात्र का ध्यान करने और उनके दाहिने नेत्र की पुतली पर चित्त को एकाग्र करने की साधना कराई गई थी। पुतली की ज्योति का सुविस्तृत होकर साधक के चारों ओर आभा के स्वरूप में आच्छादित होना, और उसके अन्तःकरण में प्रविष्ट होना यह उस साधना का विस्तृत स्वरूप था।
तीसरे वर्ष दीपक जलाकर उसके माध्यम में प्रकाश-ज्योति का ध्यान, अभ्यास करना, फिर उस प्रकाश में अपने आपको तल्लीन एवं समर्पण करके एकात्म भाव का अनुभव करना, यह अद्वैत-साधन आनंदमय कोश की साधना के लिए कराया गया था। ज्योतिर्मय माता को अपने में और अपने को माता में ओत-प्रोत अनुभव करते हुए द्विधा को मिटा देना और एकात्म भाव को प्रत्यक्ष देखना, यही उस साधना क्रम का स्वरूप था।
अब इस चौथे वर्ष में विश्वात्म-दर्शन का अभ्यास हमें आनंदमय कोश के अनावरण के लिए करना चाहिए। अर्जुन को कृष्ण ने गीता सुनाते समय अपना विराट स्वरूप दिखाया था। यशोदा द्वारा माटी खाते हुए धमकाये जाने पर भी भगवान ने अपना वही
रूप उन्हें दर्शाया, कौशल्या ने राम को पालने में खिलाते हुए भी वही रूप देखा था और काकभुशुण्डिजी ने भगवान राम के मुख में प्रवेश करके भी उसी स्वरूप की झाँकी की थी। यह विश्व ब्रह्माण्ड ही परमात्मा का स्वरूप है। संसार के कण-कण में, प्रत्येक जीव में भगवान की झाँकी करना और तदनुरूप प्रत्येक के साथ सद्-व्यवहार करना विश्वात्मा की सच्ची आराधना है। अपने में सबको और सबमें अपने को समाया हुआ दीखने का अभ्यास करना चाहिए।
प्राथमिक अवस्था में प्रतिमाओं के आधार पर भगवान की स्थापना की जाती है और चंदन, अक्षत, धूप-दीप से उसका पूजन होता है। पीछे ऊँची स्थिति में पहुँचने पर इस विराट विश्व को ही परमात्मा का साक्षात् स्वरूप मानना पड़ता है और उसके चरणों पर अपने शरीर, मन, वचन, कर्म और धन को समर्पित करना पड़ता है। भगवान पत्र-पुष्पों के बदले नहीं, भावनाओं के बदले प्राप्त किये जाते हैं। और वे भावनाएं आवेश, उन्माद या कल्पना जैसी नहीं वरन् सच्चाई की कसौटी पर खरी उतरने वाली होनी चाहिएं। उनकी सच्चाई की परीक्षा मनुष्य के त्याग, बलिदान, संयम, सदाचार एवं व्यवहार से होती है। भक्ति भावना को इसी कसौटी पर परखा जाता है और यदि वह खरी होती है तो उसके बदले में आनन्दमय परमात्मा अवश्य मिलता है। सच्चिदानन्द की प्राप्ति निश्चित रूप से होती है।
आनन्दमय कोश के अनावरण की इस वर्ष की साधना विश्वात्मा का भाव दर्शन और उसकी सत्कर्मों द्वारा पूजा करने की है। उसे जो जितनी सच्चाई एवं श्रद्धा के साथ करेगा, उसे उसी अनुपात से आत्म-संतोष आत्मानन्द की प्राप्ति होगी।
गायत्री उपासना का भावनात्मक महत्व भी है और वैज्ञानिक भी। इस महाशक्ति को अमृत, पारस, कल्पवृक्ष और कामधेनु के नाम से पुकारा जाता है। जो इसका आश्रय लेता है तर जाता है। उसके लिए यह धरती ही स्वर्ग बनती है और अपना अन्तःकरण ही आनन्द का निर्झर प्रतीत होता है। आरंभ में जब तक यह उपासना जप, ध्यान और पूजन तक सीमित रहती है, तब तक उसे बाल स्थिति कहते हैं पर जब अन्तःकरण के स्तरों को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने की कठिन साधना भी चल पड़ती है तब उसमें प्रौढ़ता आती है और तदनुरूप वह आत्म-बल भी प्राप्त होता है जिसे पाकर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। पंचकोशी साधना इसी स्तर की विभूति है, जो इसे अपनाता है, वह धन्य हो जाता है।
कार्तिक मास का गीता शिविर
कार्तिक का गीता शिविर उन सब स्वजनों के लिए आवश्यक है जो लोक सेवा के क्षेत्र में उतर कर जनजागृति के लिए ठोस कार्य करना चाहते हैं। आगे परिवार में सर्वत्र भागवत सप्ताहों की तरह गीता सप्ताहों की शृंखला चलाई जाने वाली है। शाखाएं अपना वार्षिकोत्सव उसी आधार पर किया करेंगी। इसके लिए युगनिर्माण की विचारधारा एवं कार्य पद्धति से परिचित प्रशिक्षित प्रचारकों की आवश्यकता पड़ेगी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए इन शिविरों में सम्मिलित होना आवश्यक है। आत्म-कल्याण की दृष्टि से यह शिक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है। स्थानीय संगठन एवं रचनात्मक कार्यों के लिए इसकी भारी उपयोगिता है। जो लोग आजीविका की कठिनाई के कारण योग्यता रहते हुए भी बाहर भ्रमण करते हुए लोक-निर्माण करने में असमर्थ रहते हैं उनके लिए भी एक उत्तम हल इस माध्यम से हो सकता है।
जन-जागृति के महान अभियान में सक्रिय भाग लेने के इच्छुक प्रत्येक परिजन को कार्तिक मास में (ता0 21 अक्टूबर से 19 नवम्बर तक) होने वाले गीता शिविर में सम्मिलित होने के लिए इन पंक्तियों द्वारा आमंत्रित किया जाता है। शिक्षार्थियों को अपने भोजन व्यय तथा मार्ग व्यय का प्रबंध स्वयं करके आना चाहिए।
युग-निर्माण पत्रिका की आवश्यकता
अखण्ड-ज्योति जिस विचारधारा का प्रतिपादन सैद्धान्तिक रूप से करती है, उसका व्यावहारिक स्वरूप क्या हो सकता है, इसका क्रियात्मक मार्ग दर्शन करने के लिए ‘युगनिर्माण’ पाक्षिक पत्रिका निकाली गई है। परिवार के प्रत्येक सदस्य को यह दोनों ही पढ़नी चाहिएं ताकि अध्यात्मवाद के सैद्धान्तिक और व्यावहारिक दोनों ही पक्ष समझने की आवश्यकता पूरी हो सके। एकांगी शिक्षण अधूरा रह जाता है। परिवार के सक्रिय कार्यकर्ताओं के लिए तो यह एक अनिवार्य आवश्यकता है। वे युग निर्माण की दिशा में कुछ सक्रिय कदम इस माध्यम से उठा सकेंगे। अस्तु युग-निर्माण पत्रिका प्रत्येक परिजन को पढ़नी ही चाहिए । कई सदस्य मिलकर भी उसका वार्षिक चंदा 6)भेज सकते हैं।
नवरात्रि में उपासना तथा आयोजन
आश्विन मास की नवरात्रियाँ ता0 6 अक्टूबर मंगलवार से आरंभ होकर ता0 14 अक्टूबर बुधवार को पूर्ण होंगी । गायत्री उपासना के लिए यह समय बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिनसे बन पड़े, वे इन दिनों 24 हजार का लघु अनुष्ठान करने का प्रयत्न करें। अन्यथा कुछ तो उपासना बढ़ा ही देनी चाहिए। जो बिलकुल न करते हों, वे इन 9 दिनों प्रतिदिन 12 माला तो जपने का प्रयत्न कर ही देखें। प्रयोग की दृष्टि से भी यदि इतना किया जा सके तो उससे भी आत्मिक प्रगति में योग दान मिलेगा। अनुष्ठान से रहने वाली त्रुटियों का दोष परिमार्जन और संरक्षण किया जाता रहेगा जो अपने संकल्प की सूचना समय पर भेज देंगे।
नवरात्रि के अन्त में जहाँ जो सामूहिक आयोजन हों, उनका समाचार ‘युग-निर्माण’ पत्रिका में छपने भेज देना चाहिए। सामूहिक आयोजनों से जन-जागृति में बड़ी सहायता मिलती है, इसलिए यथा संभव छोटे बड़े आयोजन इस अवसर पर सर्वत्र ही किये जाने चाहिएं।
छः महीने के लिए ग्राहक
इन दिनों अखण्ड-ज्योति के जो नये ग्राहक बन रहे हैं, उन्हें छह महीने के लिए जुलाई से दिसम्बर तक के लिए ही बनाया जा रहा है। अस्तु छह महीने का चंदा 2) ही भेजना चाहिए। यों नियमानुसार एक वर्ष से कम के ग्राहक नहीं बनायें जाते, पर बीच में ग्राहक नहीं बनायें जाने पर बीच में ग्राहक बनने से नये वर्ष का हिसाब रखने में जो असुविधा होती है उसे देखते हुए इस वर्ष यह विशेष व्यवस्था की गई है।
दस-दस सदस्यों के संगठन
अखण्ड-ज्योति परिवार के सब सदस्यों को दस-दस सदस्यों के छोटे-छोटे संगठनों में संगठित कर देने का जो क्रम चलाया गया है, वह बहुत ही उपयोगी एवं आवश्यक है। प्रसन्नता की बात है कि सभी जगह उत्साही सदस्यों यह संगठन कार्य आरंभ कर दिया है । जहाँ अभी उस ओर ध्यान नहीं दिया गया है वहाँ तुरन्त ही अपना संगठन पूरा कर लिया जाना चाहिए।
ये किताबें, या कहानी हैं करुण अनगिनत मानव-हृदय की मूक-सी।
ओह! कितनी साध है इनमें छिपी, सोचकर, उठती हृदय में हूक-सी॥
महाजग में, एक जो असहाय-सा, जानवर, कहते जिसे इन्सान हैं।
उसकी सारी बेवकूफी के जमा, इसमें इक से इक अजीब बयान हैं॥
किस तरह, पेड़ों की डाली छोड़कर, गगन-चुम्बी भवन में रहने लगा।
छोड़कर वह चाल बन मानुस की फिर, कैसे वायु-विमान में उड़ने लगा॥
किस तरह उसने खुदा पहिचान कर, खूँ बहाया फिर खुदा के नाम पर ।
और कैसे मर मिटा वह चाव से, बुजर्गों के स्वर्ग से प्रिय धाम पर ।
मैं दबा- सा जाता हूँ, इस ढेर में जो हिमालय -का -सा आलीशान है।
दिल मेरा धक-धक धड़कता सोचता, पुस्तकालय! क्या अनोखी शान है॥
इसमें गौतम की दया, गाँधी का सत, क्षमा ईसा की, मुहम्मद का ईमान।
साधना जरथुस्त्र की, कन्फ्यूशियस की अमर उपदेश-माला का वितान॥डडडडडड;
पुस्तकालय! क्या नहीं तुझमें बता, सब ही तीरथ तुझमें हैं, मेरे लिए।
तुझमें वृंदावन है मीरा का छिपा, जगमगाते तुझमें ‘जौहर’ के दिए॥
तुझमें प्याला विषभरा, सुकरात का, तुझमें सूली ‘अनलहक’ की तान की ।
तेरे दामन में कहीं हैं ‘हल्दीघाट’ और ‘थरमापली’ भी यूनान की॥
कि तने ही ‘परताप’ ‘लिओनिडाज’ हैं, कितने ही ‘अर्जुन’ और ‘सीजर’ हैं छिपे।
कौन-सा है दीप जगमग ज्योति से, जो न इस जागृत दिवाली में दिपे।
है इसी में, आदि कवि की गुरु गिरा, है इसी में प्रतिमा कालीदास की।
हैं इसी में ‘सूरके शर’, भी इसी में, अमर -वाणी सन्त तुलसीदास की॥
इसमें मिल सकते हमें श्री प्रेमचन्द, गोरकी, हयूगो तथा हैं टाल्स्टाय।
जिसका चरचा था किया, ‘खय्याम’ ने, है वही यह ‘कारवानों की सराय।
भारती के भव्य मन्दिर! हे महान! कावे! विद्याप्रेमियों के पाक नाम!’
जगत की जागृति के हे जेरूसलम! इसलिए है प्रेम से तुझको प्रणाम॥
लक्ष्मण त्रिपाठी
*समाप्त*