निस्वार्थ भाव से, बदला न पाने की इच्छा से और अहसान न जताने के विचार से जो उपकार दूसरों के साथ किया जाता है उसके फल की समता तीनों लोक मिलकर भी नहीं कर सकते। बदला पाने की इच्छा रहित जो भलाई की गई है, वह समुद्र की तरह महान है। कोई मनुष्य किसी आवश्यकता से व्याकुल हो रहा है, उस समय उसकी मदद करना कितना महत्वपूर्ण है, इसे उस व्याकुल मनुष्य का हृदय ही जानता है। जरूरतमंदों को एक राई के बराबर मदद देना उससे बढ़कर है कि बिना जरूरत वाले के पल्ले में एक पहाड़ बाँध दिया जावे।
जिसने तुम्हारे साथ भलाई की है उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करो। सहायता का मूल्य वस्तु के मूल्य से मत नापो, वरन् उसका महत्व अपनी आवश्यकता को देखते हुए नापो कि उस समय यदि वह मदद तुम्हें न मिलती तो तुम्हारा क्या हाल होता। उनका अहसान मत भूलो जिन्होंने मुसीबत के समय तुम्हारी मदद की थी। उपकार को भूल जाना नीचता है, पर उन्हें क्या कहें जो भलाई के बदले बुराई करते हैं?
धरती माता से उस दिन मनुष्यों का भार न उठाया जायेगा जिस दिन वे प्रेम और कृतज्ञता छोड़कर निष्ठुर और कृतघ्न बन जायेंगे। आदमी की चमड़ी में क्या खूबसूरती है? सुन्दर तो उसका मन होता है। जिसके मन में दूसरों के प्रति प्रेम भावनाएं उठती रहती हैं, जो दूसरों के थोड़े से भी उपकार का सदा स्मरण करता रहता है और उसका बदला चुकाने का प्रयत्न करता है, वस्तुतः वही मनुष्य सुन्दर है और इसी सौंदर्य से मनुष्यता एवं इस वसुधा की सीमा बढ़ती है।
-ऋषि तिरुवल्लुवर,
आत्मा - परमात्मा का ही अंश है। जिस प्रकार जल की धारा किसी पत्थर से टकराकर छोटे छींटों के रूप में बदल जाती है, उसी प्रकार परमात्मा की महान सत्ता अपने क्रीड़ा विनोद के लिए अनेक भागों में विभक्त होकर अगणित जीवों के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं। सृष्टि सञ्चालन का क्रीड़ा कौतुक करने के लिए परमात्मा ने इस संसार की रचना की। वह अकेला था। अकेला रहना उसे अच्छा न लगा, सोचा एक से बहुत हो जाऊँ। उसकी यह इच्छा ही फलवती होकर प्रकृति के रूप में परिणित हो गई। इच्छा की शक्ति - महान है। आकाँक्षा अपने अनुरूप परिस्थितियाँ तथा वस्तुयें एकत्रित कर ही लेती है। विचार ही कार्य रूप में परिणित होते हैं और उन कार्यों की साक्षी देने के लिए पदार्थ सामने आ खड़े होते हैं। परमात्मा की एक से बहुत होने की इच्छा ने ही अपना विस्तार किया तो यह सारी वसुधा बन कर तैयार हो गई।
परमात्मा ने अपने आपको बखेरने का झंझट भरा कार्य इसलिए किया कि बिखरे हुए कणों को फिर एकत्रित होते समय असाधारण आनन्द प्राप्त होता रहे। बिछुड़ने में जो कष्ट है उसकी पूर्ति मिलन के आनन्द से हो जाती है। परमात्मा ने अपने टुकड़ों को - अंश, जीवों को बिखेरने का विछोह कार्य इसलिए किया कि वे जीव परस्पर एकता, प्रेम, सद्भाव, संगठन, सहयोग का जितना - जितना प्रयत्न करें उतने आनन्दमग्न होते रहें। प्रेम और आत्मीयता से बढ़कर उल्लास शक्ति का स्रोत और कहीं नहीं है। अनेक प्रकार के बल इस संसार में मौजूद हैं पर प्राणियों की एकता के द्वारा जो शक्ति उत्पन्न होती है उसकी तुलना और किसी से भी नहीं की जा सकती। पति-पत्नी, भाई - भाई, मित्र - मित्र, गुरु- शिष्य, आदि की आत्मीयता जब उच्च स्तर तक पहुंचती है तो उस मिलन का आनन्द और उत्साहवर्धक प्रतिफल इतना सुन्दर होता है कि प्राणी अपने को कृत्य - कृत्य मानता है।
कबीर का एक दोहा प्रसिद्ध है --
राम बुलावा भेजिया कबिरा बीना रोय।
जो सुख प्रेमी संग में, सो बैकुण्ठ न होय॥
इस दोहे में बैकुण्ठ से अधिक प्रेमी के सान्निध्य को बताया गया है। कबीर प्रेमी को छोड़कर स्वर्ग जाने में दुख मानते और रोने लगते हैं। वस्तु स्थिति यही है। सच्चे प्रेम में ऐसा ही आनन्द होता है। जहाँ मनुष्य - मनुष्य के बीच में निष्कपट, निःस्वार्थ, आन्तरिक और सच्ची मित्रता होती है, वहाँ गरीबी आदि की कठिनाइयाँ गौण रह जाती हैं और अनेक अभावों एवं परेशानियों के रहते हुए भी व्यक्ति उल्लास भरे आनन्द का अनुभव करता है।
उपासना में प्रेम का अभ्यास एक प्रमुख आधार है। ईश्वर की भक्ति करने का अर्थ है - आदर्शवाद। प्रेम के विकास का आधार भी यही है। सच्चे और ईमानदार मनुष्यों के बीच ही दोस्ती बढ़ती और निभती है। धूर्त और स्वार्थी लोगों के बीच तो मतलब की दोस्ती होती है वह जरा- सा आघात लगते ही काँच के गिलास की तरह टूट -फूट कर नष्ट हो जाती है। लाभ में कमी आते ही तोते की तरह आंखें फेर ली जाती हैं। यह दिखावटी धूर्ततापूर्ण मित्रता तो एक प्रवंचना मात्र है, पर जहाँ जितने अंगों में सच्चा मैत्री भाव होगा वहाँ आनन्द, सन्तोष और प्रफुल्लता की निर्झरिणी निरन्तर झरती रहेगी। यदि कुछ लोगों का परिवार या संगठन प्रेम के उच्च आदर्शों पर आधारित होकर विकसित हो सके तो वहाँ उस परिवार के सभी सदस्यों को विकास एवं हर्षोल्लास का परिपूर्ण अवसर मिलता रहेगा। जिस समाज में सच्ची मित्रता, उदारता, सेवा और आत्मीयता का आदर्श भली प्रकार फलने - फूलने लगता है वहाँ निश्चित रूप में स्वर्गीय वातावरण विनिर्मित होकर रहता है। देवता जहाँ कहीं रहते होंगे वहाँ उनके अच्छे स्वभाव ने प्रेम का वातावरण बना रखा होगा और उस भाव - प्रवाह ने वहाँ स्वर्ग की रचना कर दी होगी। स्वर्ग यदि कहीं हो सकता है तो उसकी सम्भावना वहीं होगी जहाँ सज्जन पुरुष प्रेमपूर्वक मिल-जुल कर आत्मीयता, उदारता, सेवा और सज्जनतापूर्वक रह रहे होंगे।
ईश्वर उपासना से स्वर्ग की प्राप्ति का जो महात्म्य बताया गया है उनका आधार यही है कि उपासना करने वाले को भक्ति का मार्ग अपनाना पड़ता है। परमात्मा को, आत्मा को, आदर्शवाद को जो भी प्यार करना सीख लेगा उसे अनिवार्यतः प्राणिमात्र से प्रेम का अभ्यास होगा और इस कारण के रहते हुए उसका निवास स्थान एवं समीपवर्ती वातावरण स्वर्गीय अनुभूतियों से ही भरापूरा रहेगा। उपनिषद् का वचन है -- “रसो वैस” अर्थात् प्रेम ही परमात्मा है। बाइबिल में भी इसी तथ्य की पुष्टि की है और मनुष्य को प्रेमी स्वभाव का बनने पर जोर देते हुए कहा है कि जो प्रेमी है वही ईश्वर का सच्चा भक्त कहलायेगा। भक्ति की महिमा से आध्यात्म - शास्त्र का पन्ना - पन्ना भरा पड़ा है। भक्ति से मुक्ति मिलने की प्रतिष्ठापना की गई है। भक्त के वश में भगवान को बताया गया है। इन मान्यताओं का कारण एक ही है कि प्रेम की हिलोरें जिस अन्तरात्मा में उठ रही होंगी उसका स्तर साधारण न रहेगा। जिसमें दिव्य गुण, दिव्य स्वभाव का आविर्भाव होगा, वह दिव्य कर्म ही कर सकेगा। ऐसे ही व्यक्तियों को देवता कहकर पुकारा जाता है। जहाँ देवता रहेंगे वहाँ स्वर्ग तो अपने आप ही होगा।
प्रेम का अभ्यास ईश्वर को प्रथम उपकरण मानकर किया जाता है। कारण यही है कि उसमें स्वार्थ भी दोष नहीं है। सूक्ष्म ब्रह्म की उपासना जिन्हें कठिन पड़ती है वे साकार प्रतिमा बनाकर अपनी भावनाओं को किसी पूजा प्रतीक पर केन्द्रित करते हैं, फलस्वरूप निर्जीव होते हुए भी वह माध्यम सजीव हो उठता है। मूर्ति - पूजा का तत्वज्ञान यही है। यह बात हर कोई जानता है कि देव प्रतिमायें पत्थर या धातु की बनी निर्जीव होती हैं। उनके सजीव होने की बात कोई सोचता तक नहीं। पर यह आध्यात्मिक तथ्य मूर्ति पूजा के माध्यम से प्रकाश में लाया जाता है कि जिस किसी से सच्चा प्रेम किया जायेगा जिसके लिए भी आस्था और श्रद्धा का प्रयोग किया जायेगा वह वस्तु चाहे निर्जीव हो या सजीव, भक्त की भावना के अनुरूप फल देने लगेगी। मूर्ति पूजा करते हुए साकार उपासना करने वाले अगणित भक्तजन जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकने में सफल हुये है। मीरा, सूर, तुलसी, रामकृष्ण परमहंस आदि की साकार उपासना निरर्थक नहीं गई। उन्हें परमहंस तक पहुँचा सकने में ही समर्थ हुई।
रबड़ की गेंद दीवार पर मारने से लौटकर फैंकने वाले के पास ही पीछे को लौटती है। पक्के कुँए में मुँह करके आवाज लगाने से प्रतिध्वनि गूँजती है। उसी प्रकार इष्ट देव को दिया हुआ प्रेम लौटकर प्रेमी के पास ही आता है और उस प्रेम प्रवाह से रससिक्त हुआ अन्तरात्मा ईश्वर मिलन, ब्रह्म साक्षात्कार एवं भगवत् कृपा का प्रत्यक्ष अनुभव करता है। एकलव्य भील की बनाई हुई मिट्टी की द्रोणाचार्य की प्रतिमा उसे उतनी शस्त्र - विद्या सिखाने में समर्थ हो गई जितनी कि गुरु द्रोणाचार्य स्वयं भी नहीं जानते थे। मिट्टी के द्रोणाचार्य में एकलव्य की जो अत्यन्त निष्ठा थी उसके कारण ही वह प्रतिक्रिया सम्भव हो सकी कि वह भील बालक उस युग का अनुपम शस्त्र चालक बन सका। ईश्वर के साकार व निराकार स्वरूप का ध्यान पूजन, जप, अनुष्ठान करते हुए साधक अपनी प्रेम भावना, श्रद्धा और निष्ठा को ही परिष्कृत करता है। इस मार्ग में वह जितनी प्रगति कर सके उतनी ही ईश्वरानुभूति का परमानन्द उसे उपलब्ध होने लगता है।
साधना यदि सच्ची हो, सच्चे उद्देश्य से की गई हो तो उसका परिणाम यह होना ही चाहिए कि उपासक के मन में प्रेम की धारा प्रवाहित होने लगे वह प्राणी मात्र को अपनी आत्मा में और अपनी आत्मा को प्राणिमात्र में देखे। दूसरों का दुःख उसे अपने निज के दुःख जैसा कष्टकारक प्रतीत हो और दूसरों को सुखी, समुन्नत देखकर अपनी श्री समृद्धि की भाँति ही सन्तोष का अनुभव करे। प्रेम का अर्थ है -- आत्मीयता और उदारता। जिसके साथ प्रेम भाव होता है उसके साथ त्याग और सेवापूर्ण व्यवहार करने की इच्छा होती है। प्रेमी अपने को कष्ट और संयम में रखता है और अपने प्रेमपात्र को सुविकसित, सुन्दर एवं सुरम्य बनाने का प्रयत्न करता है। सच्चे प्रेम का यही एकमात्र चिन्ह है कि जिसके प्रति प्रेम भावना उपजे उसे अधिक सुन्दर, अधिक उज्ज्वल एवं प्रसन्न करने का प्रयत्न किया जाय।
भले-बुरे, सत्य-असत्य, कल्याण-अकल्याण की तर्क बुद्धि इस संसार में प्रायः हर मनुष्य में समान रूप से पाई जाती है किन्तु कोई ऐसी स्थिर वस्तु दिखाई नहीं देती जिसे हम प्रत्येक परिस्थिति में सत्य मानते रहें। आज देखते हैं कि अपना एक परिवार है, माँ है, स्त्री है, बच्चे हैं, घर, जमीन, जायदाद सभी कुछ है। इन पर आज अपना पूर्ण स्वामित्व है। क्या मजाल कि इन्हें कोई हमारी मर्जी के बिना अपने अधिकार में ले ले। क्योंकि यह हमारी सम्पत्ति और विभूतियाँ हैं। इसमें कहीं असत्य नहीं कोई सन्देह नहीं। किन्तु कल परिस्थितिवश जमीन बेचनी पड़ी, घर गिरवी रख दिया, कौन जाने कब किस प्रियजन की मृत्यु हो जाय। ऐसी दशा में कोई सत्य वस्तु समझ में नहीं आती है। यह घर किसी का न रहा अन्त में अपना भी न रहेगा। यह संसार परिवर्तनशील है। इसकी प्रत्येक वस्तु प्रतिक्षण अपना स्वरूप बदलती रहती है।
किन्तु एक अन्तिम सत्य भी है इस संसार में। वह है प्रेम। प्रेम अपने परिजनों पर, विचारों और सिद्धान्तों का प्रेम, स्वत्व और सम्मान के प्रति देश और राष्ट्र- धर्म और संस्कृत के प्रति व्यक्ति को अगाध प्रेम होता है। इसी के बल पर संसार के सभी क्रिया व्यवसाय चलते हैं। यह सारा संसार व्यवस्थित ढंग से चल रहा है। सभी जानते है कि यह संसार मिथ्या है, भ्रम है किन्तु सभी जी रहे हैं, मरने से सभी डरते हैं केवल प्रेम के लिये। यह अलग बात है कि उनका प्रेम साँसारिक है, वस्तु या पदार्थ के प्रति है अथवा प्रेम - स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति के लिये। दिशायें दो हो सकती हैं किन्तु आस्था एक है। इसी पर सारा संसार टिका है। इसी से विधि- व्यवस्था भली भाँति चल रही है।
प्रेम मानव - जीवन की महान् कसौटी है। इससे मनुष्य के दृष्टिकोण हृदय की विशालता एवं बुद्धि की सूक्ष्मता का पता चलता है। जिसके हृदय में प्रेम का प्रकाश जगमगाता है वह मनुष्य उत्कृष्ट होता है। मनुष्य शरीर में देवत्व प्राप्त करने का सौभाग्य उन्हें मिलता है जो प्रेम करना जानते हैं। प्रेम मानव जीवन की सर्वोदय प्रेरणा है। शेष सभी भाव आश्रित भाव हैं। स्वाधीन और सद्गति दिलाने वाली आन्तरिक प्रेरणा प्रेम है जिसमें संसार की रचना होती है। जीवन समृद्ध बनता है और मानव जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
प्रेम हृदय की उस पवित्र भावना का शब्द रूप है जो अद्वैत का बोध कराती है। मैं और तुम का विलगाव का भाव वहाँ नहीं होता। इसलिए समष्टिगत विशाल भावना का नाम प्रेम माना गया है। यह विशुद्ध बलिदान है। त्याग और आत्मोत्सर्ग की भावना है जिसमें मनुष्य अपने हितों को अपने प्रेमी के लिये हवन करते हुए असीम तृप्ति का अनुभव करता है। बदले की भावना से नहीं जो केवल प्रेम के लिये प्रेम करता है वही सच्चा प्रेम है।
साधारण तौर पर अपनी प्रेरणा का आधार अपना स्वार्थ होता है। अपने “स्व” या “अहम्” की पूर्ति के लिए सब कुछ करते हैं, भूख मिटाने, शृंगार सजावट करने, महल उठाने, जायदाद जमा करने की सम्पूर्ण चेष्टाओं के पीछे अपने स्वार्थ काम किया करते हैं। किन्तु अन्तःकरण का वह आध्यात्मिक भाव जागृत नहीं होता जिसमें प्रेम का स्वाद चखा जा सके। यह लेन-देन जीवन का साधारण नियम है। जब हम इससे आगे बढ़ते हैं और लेने के संकीर्ण भाव को समाप्त कर देते हैं तो प्रेम का उदय होता है। इसमें सब देना ही देना है। प्रेम का पुरस्कार केवल प्रेम है। और किसी दूसरी वस्तु से इसे खरीदा या बेचा नहीं जा सकता।
मनुष्य का जीवन लक्ष्य निर्धारित करते समय यह ध्यान दिया जाता है कि उसकी स्वाभाविक वृत्तियों की ऐसी व्यवस्था हो जो उसे उत्थान, अभ्युदय और विकास की ओर अग्रसर करे। उसी को चरित्र निर्माण कह सकते हैं। यह भाव मनुष्य में तभी आ सकता है जब वह अपने सच्चे स्वरूप को पहचाने और आत्म-ज्ञान प्राप्त करे। जब ऐसी प्रक्रिया जीवन में चल पड़ती है तो दीनता और हीनता के बुरे भाव समाप्त होकर आत्मा का प्रकाश दिखाई देने लगता है। उस ज्योति से एक साधारण तत्व प्रेम उमड़ने लगता है। इस सुख का एक कण भी जिसे मिलता है उसे चरित्र निर्माण करते देर नहीं लगती। इसीलिये यह कहा गया है मनुष्य जीवन का लक्ष्य प्रेम स्वरूप की प्राप्ति है।
यह भाव जितना विस्तृत होता जाता है मनुष्य का व्यक्तित्व भी उसी क्रम से परिष्कृत होने लगता है। आरंभ में यह भाव अपने ऊपर तक रहता है जो कुछ खायें वह हम खायें, जो अच्छा हो वह हम पहनें आदि की स्वार्थपूर्ण भावनाओं से मनुष्य अपने को ही जब तक प्राथमिकता देता रहता है तब तक वह प्रेम की अनुभूति नहीं कर पाता। इसलिये तब तक बड़ी अस्थिरता चंचलता और अशान्ति बनी रहती है। धीरे- धीरे इसका परिष्कार होने लगता है। धर्मपत्नी आ जाती है तो अपने स्वार्थों में कटौती करते हैं। अब प्रेम का प्रादुर्भाव होता है। अपनी व्यष्टि जितनी ही समाप्त होती जाती है उतनी ही प्रेमपूर्ण भावनायें बढ़ने लगती हैं। पुत्रों के प्रति गाँव और समाज, देश और जाति के प्रति धर्म और संस्कृति के प्रति अपने स्वार्थों का त्याग करते करते पूर्ण आन्तरिक परिष्कार हो जाता है और हम इस योग्य हो जाते हैं कि विश्वात्मा का सान्निध्य सुख प्राप्त कर सकें।
जब यह उत्सर्ग की भावना प्राणिमात्र के प्रति जागृत होने लगती है तो सच्चे प्रेम की अनुभूति होने लगती है। इसलिए गीताकार ने सन्देश दिया हैं :--
आत्मानाँ सर्वभूतेषु सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शिनः ॥
अर्थात् “सभी भूत प्राणियों में एक ही आत्मा समाया हुआ है इसलिए सभी को समभाव से देखते हुए सभी के साथ प्रेम करना चाहिए।”
प्रेम संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। जिसे बड़ी -बड़ी मशीनें, अस्त्र- शस्त्र और बलवान् मनुष्य नहीं जीत पाये उन्हें प्रेम की कोमल भावनायें जीतने में समर्थ हुई है।
महापुरुष ईसा ने लिखा है -- “हमें एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए, क्योंकि प्रेम ही ईश्वर है। ईश्वर को वही जानता है जो प्रेम करता है।” परमात्मा की उपासना का मूल आधार प्रेम है। जो अपने सजातियों से प्रेम करता है, वही सच्चा ईश्वर भक्त है।
भगवान कृष्ण ने जिस कर्मयोग की आवश्यकता पर गीता में अधिक बल दिया है उसका आधार भी प्रेम ही है। यह निश्चित बात है कि जब तक स्वार्थपूर्ण भावनाओं का उन्मूलन नहीं होता तब तक विशुद्ध कर्त्तव्य भावना का उदय नहीं होता। इसलिये जैसे ही हम फल की भावना से रहित होकर केवल कर्त्तव्य की दृष्टि से काम करने लगते हैं वैसे ही अपने अन्तःकरणों में प्रेम का प्रादुर्भाव होने लगता है। प्रेम के बिना कर्म की पूर्णता में विश्वास नहीं किया जा सकता। कर्म-कौशल, जो प्रेम की प्रेरणा से हो वही योग है।” ऐसा भगवान् कृष्ण ने गीता में प्रतिपादित किया है। इन शब्दों से प्रेम के स्वयं योग होने की बात पुष्ट होती है अर्थात् परमात्मा को प्राप्त करने का सबसे सीधा रास्ता और सरल उपाय विशुद्ध प्रेम ही है।
किन्तु आत्म-बलिदान का मार्ग कठिन भी उतना ही है। संसार में पुरुष- प्रेम, नारी -प्रेम, देश, जाति या संस्कृति का प्रेम कोई भी क्यों न हो उसके लिए एक परीक्षा निश्चित है। जो इस परीक्षा में अन्त तक धैर्यपूर्वक टिके रहते है उन्हें ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है। महापुरुषों ने सदैव ही यह परीक्षा दी है, उन्होंने मार्ग पर बिछे हुए काँटों को भी फूलवत् हँस- हँसकर चुना है। कठिनाइयों, मुसीबतों और आपदाओं को अपनी छाती से लगाया है। तब कहीं जाकर उन्हें महान् कहलाने का गौरव प्राप्त हुआ। कृष्ण - प्रेम में मतवाली मीरा को यमुना में फेंका गया, विष दे दिया गया, घर से निष्कासित कर दिया किन्तु उसकी निष्ठा में राई रत्ती भर भी कमी नहीं आई। तब कहीं मीरा महान् बनी। देश - प्रेम के दीवाने राणाप्रताप जंगलों- जंगलों भटके, मिट्टी के बरतनों में घास की रोटियाँ खाई। किन्तु अकबर की दासता उन्होंने स्वीकार नहीं की। राणा प्रताप इस तितीक्षा पर कस कर धन्य हुए।
इस संसार में आये दिन लोग जन्म लेते हैं और सैंकड़ों की तादाद में रोज मरते रहते हैं किन्तु जिन्होंने अपने सिद्धान्तों पर दृढ़तापूर्वक विश्वास किया, जो अपनी आस्थाओं के प्रति सदैव ईमानदार बने रहे, जिन्होंने प्रेम किया और जीवन की आखिरी साँस तक अपने व्रत का निर्वाह किया, उनके हाड़ माँस का तन भले ही नष्ट हो गया हो, पर उनका यश- शरीर युग-युगान्तरों तक लोगों को प्रेरणा व प्रकाश देता रहता है।
चरित्र की उत्कृष्टता प्रेम है। यह मानवता की सर्वश्रेष्ठ साधना है, जिससे आत्म बल प्राप्त होता है। निर्भीकता, दृढ़ता, साहस, पवित्रता, त्याग, सत्यनिष्ठा और कर्त्तव्य- भावना का आधार शुद्ध और पवित्र प्रेम है। इसे अपने जीवन में धारण करने वाला पुरुष मानव न रहकर महामानव और देवता बन जाता है। जाति का जीवन खिल उठता है। ऐसे कर्त्तव्य - निष्ठ नागरिकों के बाहुल्य से ही राष्ट्रों के हित फलते फूलते रहते हैं। प्रेम मानव- जीवन की सार्थकता है। प्रेमविहीन जीवन तो पशुओं का भी नहीं होता।
प्रेम एक निर्मल झरना है। उसके प्रवाह में जो भी आ जाता है, वह निर्मल हो जाता है पात्र और कुपात्र ही की घृणा जैसे झरने के स्वच्छ प्रवाह में नहीं होती है वैसे ही प्रेमी अन्तःकरण में किसी प्रकार की ईर्ष्या- विद्वेष या घृणा की भावनायें नहीं होतीं। महात्मा गाँधी अपने आश्रम में अपने हाथों से एक कोढ़ी की सेवा - शुश्रूषा किया करते थे। इसमें उन्हें कभी भी घृणा पैदा नहीं होती थी। प्रेम की विशालता में ऊपर से जान पड़ने वाली मलीनतायें भी वैसे ही समा जाती हैं जैसे हजारों नदियों का कूड़ा-कबाड़ समुद्र के गर्भ में विलीन हो जाता है। प्रेम आत्मा के प्रकाश से किया जाता है। आत्मा यदि मलीनताओं से ग्रसित है तो भी उसकी नैसर्गिक निर्मलता में अन्तर नहीं आता है यही समझकर उदारमना व्यक्ति अपनी सहानुभूति से किसी को भी वंचित नहीं करते।
प्रेम साधन की वस्तुएं नहीं माँगता। धर्मपत्नी को चाहे जिस स्थिति में रखें, वह अपने पति के प्रेम में कम या अधिक की दुर्बल वृत्ति से दूर बनी रहती है। पति की जितनी आय साधन और परिस्थितियाँ होती हैं उन्हीं में सच्चा सुख मानती है। जिन दम्पत्तियों में ऐसी भावनायें होती हैं, वे अनेकों अभाव रहते हुए भी असीम सुख का अनुभव करते रहते हैं। प्रेम की सच्ची परख भी यही है कि अभाव और अयोग्यता के कारण भी सहृदयता और कर्त्तव्य भावना में किसी प्रकार का विक्षेप उत्पन्न न हो।
सच कहें तो मानव जीवन का आज तक जो भी विकास हुआ है, वह सब प्रेम का संबल पाकर हुआ है। घृणा और ईर्ष्या - द्वेष के कारण लोगों के दिल - दिमाग बेचैन उदास और खिन्नमना बने रहते हैं। निर्माण कर्त्ता प्रेम है, जिससे विशुद्ध कर्त्तव्य - भावना का उदय होता है। हम यदि इस भाव को अपने जीवन में धारण कर पायें तो अमीरी हो या गरीबी, शहर में रहते हों या गाँव में, मकान पक्का हो अथवा कच्चा, एक ऐसा जीवन जी सकते हैं, जिसे सुखी जीवन कह सकें। कहते हैं परमात्मा की उपासना से बड़े सुख मिलते हैं। यह सुख प्रेम का ही प्रसाद है। प्रेम की पूजा ही परमात्मा की पूजा है। फिर हम भी प्रेमी ही क्यों न बनें?
कषाय वस्त्रधारी स्वामी विवेकानन्द अमेरिका के शिकागो नगर में सड़क पर जा रहे थे। उनका यह वेष अमेरिका निवासियों के लिए कौतूहल की वस्तु था।
पीछे आ रही एक अमेरिकन महिला ने अपने साथी पुरुष से कहा -- ‘जरा इन महाशय की इस अजीब पोशाक को तो देखो।’
स्वामीजी ने वह व्यंग सुना। जरा- सा रुके और मुड़कर उस महिला से कहा -- ‘देवि, आपके देश में सभ्यता के उत्पादक दर्जी और सज्जनता की कसौटी कपड़े माने जाते हैं। पर जिस देश से मैं आया हूँ उसमें कपड़ों से नहीं, मनुष्य के चरित्र से उसकी पहचान की जाती है।
स्वामीजी ने वह व्यंग सुना। जरा- सा रुके और मुड़कर उस महिला से कहा -- ‘देवि, आपके देश में सभ्यता के उत्पादक दर्जी और सज्जनता की कसौटी कपड़े माने जाते हैं। पर जिस देश से मैं आया हूँ उसमें कपड़ों से नहीं, मनुष्य के चरित्र से उसकी पहचान की जाती है।
यद्यपि संस्कृति सम्पूर्ण मानव समुदाय के विकास क्रम की सम्यक् चेष्टाओं का भण्डार है और इसीलिए इसे किसी सीमाओं में नहीं बाँधा जा सकता तथापि स्थान विशेष पर यदि इस तरह के विकास की कोई लम्बी परम्परा रहती है तथा उसमें अपनी कोई विशेषता होती है तो उसका नाम स्थान विशेष से जुड़ जाता है। अरबी घोड़ा, नागौरी बैल, लखनवी खरबूजा, मगही पान आदि नामकरण इन वस्तुओं के उत्पत्ति स्थान से इसलिए जुड़े हुए हैं कि वहाँ इनमें अपनी एक विशेषता है। इसी तरह की विशेषताओं के कारण संस्कृति का भी नाम करना होता है। “भारतीय संस्कृति” यद्यपि विश्वमानव की संस्कृति है सम्पूर्ण मानव समुदाय के विकास में आदि काल से इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है तथापि भारत भूमि में, जो एक ओर हिमालय की पर्वत मालाओं से तथा तीन ओर समुद्र से घिरी हुई है, विकास करने वाले समाज ने जीवन जीने की, अपने आचार- विचारों की, सामाजिक व्यवस्थाओं की, ज्ञान-विज्ञान की जो विशिष्ट प्रणाली विकसित की है वही भारतीय संस्कृति है। इसकी अपनी विशेषतायें हैं। अपना इतिहास है अपनी गाथा है। भारत के कोटि- कोटि जनों में चाहे उनकी उपासना पद्धति, खान-पान, जीवनचर्या भिन्न भिन्न हो सकती है किन्तु भारतीय संस्कृति का प्रवाह सरलता से देखा जा सकता है, अनुभव किया जा सकता है। क्योंकि वैदिक काल से लेकर अब तक यह प्रवाहमान धारा की तरह हमारे जीवन को स्पर्श करती आ रही है, हमें प्रेरणा देती रही है।
भारतीय संस्कृति की महत्ता और विशेषता को व्यक्त करते हुए बापू ने लिखा है -- “मेरा तो यह निश्चित मत है कि दुनिया में किसी भी संस्कृति का भण्डार इतना भरा पूरा नहीं है जितना हमारी संस्कृति का।”
मैक्समूलर ने कहा है --- “मनुष्य के मस्तिष्क में जीवन के सबसे बड़े सिद्धाँत और सबसे बड़ी युक्तियाँ भारतवर्ष ने ही खोज निकाली हैं।” उन्होंने तो भारतीय संस्कृति का गुण-गान करते हुए यहाँ तक लिख दिया है -- “यदि मुझ से पूछा जाय कि आकाश के नीचे मानव मस्तिष्क ने कहाँ मुख्यतम गुणों का विकास किया, जीवन की महत्वपूर्ण समस्याओं पर सबसे अधिक गहराई से सोच-विचार किया और ऐसे महत्वपूर्ण तथ्य खोज निकाले जिनकी ओर उन्हें भी ध्यान देना चाहिए जो प्लेटो और कान्ट के अनुयायी हैं, तो मैं भारतीयों की ओर ही संकेत करूंगा।”
“ यदि मैं अपने आप से पूछूँ कि हम यूरोपीय किस संस्कृति का आश्रय लेकर वह सुधारक वस्तु प्राप्त कर सकते हैं जिसकी कि हमें अपने जीवन को अधिक सार्थक महत्वपूर्ण विस्तृत और व्यापक बनाने में आवश्यकता है, न केवल इस जीवन के लिए अपितु बदले हुए अनन्त जीवन के लिए, तो मैं फिर आपको भारत की ओर ही संकेत करूंगा।”
काउन्ट जोन्स जेनी के शब्दों में -- “भारतवर्ष केवल हिन्दुओं का ही घर नहीं, वरन् वह संसार की सभ्यता और संस्कृति का आदि भण्डार है।”
भारतीय संस्कृति ऐसे गुरु गम्भीर सत्यों पर आधारित है जिनकी विश्व मानव को सदा- सदा आवश्यकता रहेगी। और इसीलिए भारतीय संस्कृति सदा-सदा अजर - अमर रहेगी। राष्ट्र मिटते रहेंगे, सभ्यतायें बदलती रहेंगी, जातियों का स्वरूप भी नष्ट होता रहेगा, सामाजिक व्यवस्थाएं बदलती रहेंगी लेकिन भारतीय संस्कृति अपनी महान विशेषताओं का सन्देश सदा सुनाती रहेगी।
संसार का कोई भी तो विषय नहीं है जो हमारी संस्कृति से अछूता रहा हो आज जो कुछ भी विश्व में वर्तमान है उसका सूत्रपात, श्रीगणेश भारतीय संस्कृति से ही हुआ ऐसा इतिहास के विद्वान बताते हैं।
प्रसिद्ध इतिहासज्ञ प्रो. बेवर ने कहा है कि अरब में ज्योतिष विद्या का विकास भारतवर्ष से हुआ। डॉ. पीबो ने लिखा है- संसार रेखा गणित के लिए भारत का ऋणी है यूनान का नहीं। कोलबुक ने कहा है- भारतवर्ष ने ही चीन और अरब को ज्योतिष शास्त्र और अंकगणित दिया ।
‘यूरोप के प्राचीन इतिहास’ में लिखा है - “दर्शन विज्ञान और सभ्यता सम्बन्धी सारी बातें यूनान ने भारत से सीखीं और यहाँ से वे सारे संसार में फैली। अरब और यूरोप में जो ज्ञान का प्रकाश फैला वह भी भारत से ही। वर्तमान भूगोल, इतिहास और पुराने चिन्हों की खोज स्पष्टतया प्रकट करती है कि भारतीयों ने कला-कौशल ज्ञान- विज्ञान का प्रचार पश्चिम के देशों में जाकर किया।”
प्रो. लुई रिनाड ने लिखा है- “संसार में भारतवर्ष के प्रति लोगों का प्रेम और आदर, उसकी बौद्धिक नैतिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति के कारण ही है।”
प्रसिद्ध विद्वान रोम्या रोलाँ ने कहा है -”अगर संसार में कोई एक देश है जहाँ जीवित मनुष्य के सभी सपनों को उस प्राचीन काल से जगह मिली है , जब से कि मनुष्य के अस्तित्व का सपना प्रारम्भ हुआ, तो वह भारत है।”
ज्ञान-विज्ञान, कला - कौशल, युद्ध - विद्या विभिन्न वस्तु पदार्थ, प्रणालियों का सर्व-प्रथम भारत से ही सूत्रपात हुआ। डफ ने लिखा है -- “भारतीय विज्ञान इतना विस्तृत है कि यूरोपीय विज्ञान के सब अंग वहाँ मिलते हैं।”
कर्नल रश ब्रुक विलियम ने कहा है- “सीसे की गोलियों और बन्दूकों के प्रयोग का वर्णन विस्तार से यजुर्वेद में मिलता है। भारत में वैदिककाल में ही बन्दूक तोपों का प्रचलन हो गया था।”
भारतीय संस्कृति के बारे में अपना मत प्रकट करते हुए मि. डेलमार (न्यूयार्क) ने लिखा है - “पश्चिमी संसार जिन बातों पर अभिमान करता है वे असल में भारतवर्ष से ही वहाँ गई हैं। और तो और तरह- तरह के फल-फूल, पेड़-पौधे, जो इस समय यूरोप में पैदा होते हैं हिन्दुस्तान में लाकर वहाँ उगाये गये थे। मलमल रेशम, घोड़े, टीन इनके साथ -साथ लोहा ओर सीसे का प्रचार भी यूरोप में भारत से ही हुआ। केवल इतना ही नहीं ज्योतिष, वैद्यक अंकगणित, चित्रकारी ओर कानून भी भारत वासियों ने ही यूरोप को सिखलाया। “
भारतीय संस्कृति ने संसार को वस्तु पदार्थ आदि बाहरी ज्ञान विज्ञान ही विश्व को नहीं दिया अपितु मानव - जीवन एक चिरन्तन सत्य, मूल रहस्य उससे सम्बन्धित आत्म-ज्ञान की महान देन भी दी। पदार्थों के स्थूल विज्ञान से अधिक अन्वेषण हमारे यहाँ आध्यात्म विज्ञान में हुआ और तत्सम्बन्धी जो कुछ भारत ने विश्व को दिया उसका वह सदा-सदा ऋणी रहेगा।
भारतीय संस्कृति के प्रवाह का उद्गम वे चिरन्तन शाश्वत और सनातन सत्य रहे है, जिनकी अनुभूति महान आर्य जाति के ऋषियों ने अपने तप के द्वारा की थी।
विक्टर कोसिन लिखते हैं -- “जब हम पूर्व शिरोमणि भारत की साहित्यिक एवं दार्शनिक कृतियों का अवलोकन करते हैं तब हमें ऐसे गंभीर सत्यों का पता चलता है जिनकी उन निष्कर्षों से तुलना करने पर जहाँ पहुँचकर यूरोपीय प्रतिभा कभी - कभी रुक गई है, हमें पूर्व के तत्वज्ञान के आगे घुटने टेक देना पड़ता है।”
फ्रेडरिक शेलिंग ने कहा है -- “भारतीय आध्यात्मवाद के प्रचुर प्रकाश पुँज की तुलना में यूरोपवासियों का उच्चतम तत्वज्ञान ऐसा ही लगता है जैसे मध्याह्न सूर्य के व्योम व्यापी प्रताप की पूर्ण प्रखरता में टिमटिमाती हुई अनलशिखा की कोई आदि किरण, जिसकी अस्थिर और निस्तेज ज्योति ऐसी हो रही हो मानो अब बुझी कि अब बुझी।”
खेद का विषय है कि हम भारतवासी अपनी इतनी महान, व्यापक, समर्थ संस्कृति को आज भूल गये। इसका परिणाम यह हुआ कि संसार की गति से हम पिछड़ गये। हमारे यहीं से गए हुए ज्ञान - विज्ञान को आधार बनाकर विश्व की बहुत सी जातियाँ हमसे आगे बढ़ गईं। भारतीय संस्कृति के मूल भूत सत्यों को भुलाकर हमने पतन का मार्ग अपनाया। भारतीय जीवन समाज का पिछड़ापन, अविकसितता तब तक नहीं मिट सकेगी जब तक हम अपनी संस्कृति के गौरव को नहीं समझेंगे। उसके सत्यों को जीवन में न उतारेंगे। उनके सम्बन्ध में अन्वेषण अनुसन्धान जो सदियों से बन्द हो गये हैं शुरू नहीं करेंगे। आज भारतीय समाज का सबसे बड़ा कर्तव्य है अपनी संस्कृति का उद्धार करना, उसको विकास की दिशा प्रदान करना। हम सभी को इसी चुनौती को स्वीकार करने के लिए तत्पर होना चाहिए।
क्या आप उस स्थान पर खड़े हैं जहाँ सभी ने आपका साथ छोड़ दिया है, आप से मुंह मोड़ लिया है, आपसे नाता तोड़ लिया है? तो निराश होने अथवा घबराने की आवश्यकता नहीं है। आपसे पहले भी अनेकों नर नाहर अकेले चल चुके हैं। अपने पैरों पर जीवन की यात्रा तय कर चुके हैं। आप अकेले हैं यह अनुभव कर लेना आपके लिए वरदान सिद्ध होगा। इसका सदुपयोग कीजिए।
महात्मा कन्फ्यूशियस ने कहा है- “महान् व्यक्ति जो चीज ढूँढ़ते हैं वह उन्हें अपने ही अन्दर मिलती है जब कि कमजोर दूसरों का मुँह ताका करते हैं।” अपने ऊपर निर्भर रहकर ही मनुष्य जीवन में किसी सत्य का साक्षात्कार कर सकता है कुछ प्राप्त कर सकता है। अन्य लोगों को अपने से ही फुरसत नहीं। सचमुच दूसरों का मुँह ताकने वाले व्यक्ति को अपनी सफलता, आशा आकाँक्षाओं के लिए निराश ही रहना पड़े तो कोई नई बात नहीं। किसी भी क्षेत्र में सच्ची और स्थाई सफलता मनुष्य अपने ही प्रयत्नों से प्राप्त कर सकता है। महान् बनने वाले और साधारण व्यक्तियों में यही अन्तर है कि एक अपनी शक्ति क्षमता पर भरोसा रखकर अपने बल पर जीवन यात्रा पूरी करता है। दूसरा अन्य लोगों का पिछलग्गू बनकर दूसरों का सहारा पकड़ता है। लेकिन परिणाम में महान् व्यक्ति जीवन की उच्च मंजिल तक पहुँच जाते हैं तो अन्य परावलम्बी लोग बीच में ही लटके रह जाते हैं। वे किधर के भी नहीं रहते।
प्रसिद्ध विद्वान इब्सन ने कहा है-”संसार में सबसे शक्तिशाली मनुष्य वही है जो अकेला (आत्म-निर्भर) है।” कमजोर वही हैं जो दूसरों का मुँह ताका करता है, दूसरों के ऊपर आशा लगाए बैठे रहते हैं। साथ ही परावलम्बी व्यक्तियों को, दूसरों के सहारे चलने वाले लोगों को अपने जीवन का बहुत अधिक समय नष्ट करना पड़ता है जबकि नेपोलियन के शब्दों में “जो अकेले चलते हैं वे तेजी से बढ़ते हैं।”
मनुष्य को दो प्रकार से शिक्षा मिलती है एक दूसरों के कहने सुनने, अथवा पुस्तकों के पढ़ने पर दूसरी शिक्षा मनुष्य स्वयं जीवन और जगत की खुली पुस्तक से, अपने अनुभवों से सीखता है। लेकिन दूसरे प्रकार की शिक्षा ही स्थायी और ठोस होती है। पहले प्रकार की शिक्षा केवल ऊपरी सहायता मात्र कर पाती है। यही कारण है कि आजकल ऊँची से ऊँची बातें कही जाती हैं पुस्तकों में पढ़ाई जाती हैं। लेकिन लोगों का उससे कोई विशेष भला नहीं होता। उन सबसे भी वही व्यक्ति लाभ उठा सकता है जो स्वयं निर्माण की बुद्धि का प्रयोग करता है। कई बार तो यह ऊपरी शिक्षा मनुष्य को भ्रम में डालने का कारण भी बन जाती है।
अस्तु चाहे व्यापार हो या शिक्षा उद्योग-आविष्कार उपार्जन के सभी क्षेत्रों में वही मनुष्य आगे बढ़ सकता है जिसमें अपने अकेलेपन को समझने, उसका प्रयोग करने की क्षमता होती है। जिसने अकेलेपन का रहस्य समझ लिया, वही आगे बढ़ेगा।
कभी आपने विचार किया है कि आपके अकेले में भी एक महान शक्ति निवास करती है ऐसी महान् शक्ति जो संसार को हिला सकती है। और इसी के बल पर अकेला व्यक्ति शक्तिमान, निर्द्वंद्व, रह सकता है। वह है आत्मा की शक्ति। वेद के ऋषि ने कहा है - “अहमिन्द्रो न पराजिग्ये” मैं आत्मा हूँ मुझे कोई हरा नहीं सकता। “आत्मशक्ति पर विश्वास रखने वाले व्यक्ति को मृत्यु भी नहीं डरा सकती।” “तमेव विद्वान् न विभाय मृत्योः।” “उस आत्मा को जान लेने पर मनुष्य मृत्यु से भी नहीं डरता।”
आप अकेले हैं। तब संसार के सब सहारों की आशा छोड़कर अपनी आत्मा का अवलम्बन लें। अपनी आत्मा की ज्योति को अपना पथ- प्रदर्शक बनावें। शास्त्रकार ने कहा है- “अन्तः शरीरे ज्योतिर्मयोहि शुभ्रो....... अन्तर में विराजमान ज्योतिर्दीप ही मनुष्य का पथ-प्रदर्शन करता है।” इसलिए “आत्मदीपो भव” अपने दीपक आप बनें। उस आत्मज्योति पर विश्वास रक्खें जो आपके अंदर में अखण्ड रूप से जल रही है। इस ज्योति के सिवा अन्य कोई आपको सही-सही प्रकाश नहीं दे सकती। जब भी आप अकेले हों, आप किसी कठिनाई में भटक रहे हों समस्या में उलझ रहे हों तब अन्तःज्योति के प्रकाश में जीवन का पथ ढूंढ़ें। इधर-उधर न भटकें। आपके लिए अनुकूल, हितकर, श्रेयस्कर मार्ग दर्शन आपकी आत्म-ज्योति से ही मिल सकेगा, बाहर से नहीं। गीताकार ने इसी तथ्य पर जोर देते हुए कहा है--
“उद्धरेदात्मनाऽ--ऽत्मानं नात्मानभवसादयेत्।”
हम स्वयं ही अपना उद्धार कर सकते हैं। अन्य कोई नहीं। इसे हृदय में पक्की तरह अंकित कर लें। अकेले ही आगे बढ़ने के लिए पथ संधान करने के लिए आपको अपनी आत्मा पर विश्वास करना होगा उसे ही अपना सर्वस्व समझना होगा। अपने आत्म स्वत्व को भुला देने वाला व्यक्ति अधिक दिन नहीं चल सकता, उसे संसार नष्ट कर डालता है। आत्म- शक्ति को समझने जानने उसे बढ़ाने के लिए उन सभी बुरे कर्मों से बचना होगा जो हमारे अन्तर्बाह्य जीवन को कलुषित करते हैं। इसके लिए सबसे बड़ी आवश्यकता है संयम की। संयमी ही स्वावलम्बी हो सकता है।
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्वावलम्बी बनने का प्रयत्न करें। कर्म क्षेत्र में व्यावहारिक जीवन में आप अपना जितना बोझ अपने ऊपर उठायेंगे उतने ही आपके ‘अकेले’ की शक्ति बढ़ती जायगी, उतनी ही आपकी क्षमतायें उर्वर होंगी। अपने प्रत्येक कार्य को स्वयं पूर्ण करें। किसी भी काम को दूसरे पर न छोड़ें। दूसरे के सहारे की आशा तनिक भी न रखें। अपने लिये ऐसे कार्यों का चुनाव करें जिन्हें आप स्वयं अपने बल बूते पर पूरा कर सकें। दूसरों के भरोसे कल्पना के बड़े - बड़े महल न बनावें। बालकों की तरह दूसरों के कंधे पर चढ़कर चलने की वृत्ति का त्याग करें। दूसरों के बलबूते आपको स्वर्ग का भी राज्य, अपार धन सम्पत्तियों का अधिकार, उच्च पद प्रतिष्ठा भी मिले तो उसे ठुकरा दें। अपने आत्म- सम्मान के लिए, अन्तर्ज्योति को प्रज्ज्वलित रखने के लिए, स्वावलम्बी बनने के लिए। अपने प्रयत्न से आप छोटी - सी झोंपड़ी में रहकर, धरती पर विचरण करके, मिट्टी खोदकर कड़ा जीवन भी बिता लेंगे तो वह बहुत बड़ी सफलता होगी, आपके अपने लिए। इससे आपके अकेले के स्वत्व में वह शक्ति क्षमता पैदा होगी जो किसी भी वरदान प्राप्त शासक, पदाधिकारी, सम्पत्तियों के स्वामी को दुर्लभ होती है।
जगत के कोलाहल के बीच, तथाकथित अपने कहाने वालों के बीच, साथियों के बीच भी अपने अकेलेपन को न भूलिए। जगत के व्यवहार के बीच भी अपने को अकेला समझने का अभ्यास अवश्य करते रहें। नियमित रूप से आप ऐसा समय निकाल सकते हैं जब अपने अकेलेपन पर आप विचार कर सकें। अपनी अन्तर्ज्योति से सान्निध्य प्राप्त कर सकें। उस पर विश्वास कर सकें।
लेकिन यह भी ध्यान रखने की बात है कि अकेले चलने का अर्थ व्यक्तिवादी स्वार्थी होना नहीं है, तो अहंकारी बनना भी नहीं। जहाँ व्यक्तिवाद और अहंकार पैदा हुआ कि मनुष्य अपने श्रेयपथ से भटक जाता है गलत काम कर बैठता है जो उसे पतन की ओर अग्रसर कर देते हैं। अकेलेपन का अर्थ लोक- व्यवहार को तोड़ बैठना अथवा सामाजिक उत्तरदायित्व से आँख मूँद लेना, परस्पर सहयोग सहायता मेल - जोल से हाथ धो बैठना भी नहीं है। अकेले स्वत्व का अर्थ है मनुष्य जीवन और जगत में विचरण करने के लिए बाह्य वस्तु, पदार्थों पर दूसरे लोगों की सहायता पर ही अवलम्बित न रहें। वरन् उसकी इस यात्रा का शक्ति स्रोत उसके अन्तर से बहे। अन्तःप्रेरणा पर चलने वाले ही सफल होते हैं। बाह्य अनुभव, ज्ञान, दूसरों के दृष्टिकोण विचारों को हेय समझने की गुंजाइश नहीं है यहाँ आवश्यकता इस बात की है कि बाह्य ज्ञान, अनुभव, विचारों को अन्तर्दीप के प्रकाश में देखें। आँख मूँद कर उनको न मान लें। इस तरह स्वतन्त्र निर्णय करने वाला व्यक्ति ही जीवन में सही तथ्य तक पहुँच सकता है।
जीवन में अकेले चलने की क्षमता पैदा करें। क्योंकि एक न एक दिन आपको अकेले ही चलना होगा। कोई भी अपने कन्धों पर आपको मंजिल तक नहीं पहुंचा सकता। परावलम्बी,पराधीन, पिछलग्गू का भी कोई जीवन है? प्रकृति ने आपको स्वतन्त्र बुद्धि दी है, स्वतन्त्र शरीर दिया है। ऐसी शक्तियाँ दी हैं जो किसी दूसरे के सहारे काम नहीं करती। अपनी इन मौलिक शक्तियों, क्षमताओं का उपयोग कीजिए, स्वतन्त्र जीवन बिताइए, स्वावलम्बी बनिए। इसी में आपका गौरव है, शान है, आपका स्वत्व है।
राम रावण युद्ध का प्रथम दौर प्रारम्भ हुआ। रावण ने अपने सर्वोच्च सेनापति मेघनाद को ही सबसे पहले लड़ने भेजा। वह मेघनाद जिस पर रावण के युद्ध का, उसकी विजय का पूरा-पूरा दारोमदार था। मेघनाद को आता देख राम पीछे हट गये और बोले- “लक्ष्मण तुम्हें ही मेघनाद से युद्ध करना है।”
कैसी विचित्र बात थी। अपार शक्तिशाली राम को पीछे क्यों हटना पड़ा मेघनाद से और अकेले लक्ष्मण को ही क्यों उसका सामना करने भेजा? इसका स्पष्टीकरण करते हुए राम ने ही कहा है, “लक्ष्मण, मेघनाद बारह वर्षों से तप कर रहा है, ब्रह्मचारी है। और तुमने चौदह वर्षों से स्त्री का मुँह तक नहीं देखा। मेरे साथ रहकर तपस्वी, संयमी जीवन बिताया। इसलिये तुम ही मेघनाद को हरा सकते हो। मैं तो गृहस्थ हूँ।” और सचमुच लक्ष्मण ही उसे हरा सके। मेघनाद को इन्द्रजीत कहा जाता है। इसका तात्पर्य वस्तुतः अपनी इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर लेने से है।
पितामह भीष्म के बारे में कौन हिन्दू जानता न होगा। महाभारत का वह घनघोर युद्ध जिसमें श्रीकृष्ण को भी अपनी प्रतिज्ञा भंग करनी पड़ी उनके समक्ष। हनुमान से लेकर महर्षि दयानन्द, विवेकानन्द तथा बहुत से महापुरुष संसार में जो कुछ कार्य कर सके उसका मूलाधार उनका संयमी ब्रह्मचर्यपूर्ण जीवन ही था। स्वयं महात्मा गाँधी का जीवन उस समय से प्रकाश में आया जब से उन्होंने अखण्ड संयम, ब्रह्मचर्य की धारणा की।
मनुष्य का शरीर एक शक्ति उत्पादक डायनेमो की तरह है। इससे नित्य निरन्तर महत्वपूर्ण शक्तियों का उद्वेग होता रहता है। जब इन्हें रोककर संग्रहीत कर लिया जाता है और उचित दिशा में लगा दिया जाता है तो महान् कार्य सम्पन्न होते हैं। और जब इसे विषय भोगों के छिद्रों से नष्ट कर दिया जाता है तो मनुष्य दीन−हीन, असहाय, परतन्त्र- परावलम्बी बन जाता है। अपने शक्ति धन को लुटा देने के बाद मनुष्य थोथा है, रोता है। अपनी शक्ति को संचित रखकर उसका सदुपयोग करने से ही मनुष्य का जीवन प्रभावशाली, महत्वपूर्ण बनता है।
इसीलिए हमारे मनीषियों ने संयम - ब्रह्मचर्य को जीवन का आवश्यक अंग बताया। उसे आवश्यक धर्म कर्तव्य बताया। धर्म का एक अंग बना दिया। वस्तुतः ब्रह्मचर्य ही जीवन है, तेज है, शक्ति है, सामर्थ्य है। ब्रह्मचर्य के अभाव में उत्कृष्ट - जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। मनुष्य जितना संयमी होगा उतना ही उसका व्यक्तित्व उतना ही प्रखर तेजस्वी, सामर्थ्यवान बनेगा। दूसरों को प्रभावित कर सकेगा।
यह ध्रुव सत्य है, और हमारे प्राचीन मनीषियों से लेकर आधुनिक महापुरुषों का अनुभव सिद्ध तथ्य है कि भोगों में मनुष्य को सुख नहीं मिल सकता। गीताकार ने कहा है :--
ये हि संस्पर्शजाः भोगा दुःख योनय एवते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥
“जो ये इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सब भोग हैं वे निःसन्देह दुःख के ही हेतु हैं और अनित्य हैं। हे अर्जुन। बुद्धिमान विवेकी पुरुषों को उसमें रमण नहीं करना चाहिए।”
मनुष्य जब सुख की खोज में इन्द्रिय और विषयों को साधन बनाकर प्रयत्न प्रारम्भ करता है। मन, बुद्धि को भी इसी ओर लगाता है तो इसी प्रयत्न में अनेकों दुःखों का सूत्रपात हो जाता है उसके लिए। मनुष्य जब शरीर की आवश्यकता के लिए नहीं वरन् रसना के माध्यम से अनेक स्वाद के आनन्द के लिए भोजन करता है तो भोजन की मात्रा और उसके स्वरूप का निर्णय पेट न करके जिव्हा करने लगती है। जीभ की तृप्ति के लिए मनुष्य तरह-तरह से सुस्वादु भोजन करता है। और परिणाम रोग, शारीरिक कष्टों के रूप में ही प्राप्त होता है। यही बात जननेन्द्रिय के सम्बन्ध में है। उसका उपयोग सन्तानोत्पादन के लिये होता है। उसके साथ जुड़ा हुआ सुख तो प्रकृति का एक पारितोषिक और वरदान है। लेकिन जब मनुष्य सन्तानोत्पादन के लिए नहीं वरन् उस सुख को प्रधान मानकर विषयों में प्रवृत्त होता है और प्रकृति की मर्यादा का उल्लंघन करता है तो परिणाम में अपनी शक्तियों का ह्रास करता है और दुःखों को निमन्त्रण देता है। अपनी जीवनी शक्ति का नाश करके मृत्यु की ओर अग्रसर होता है।
विषय भोगों में इन्द्रिय, मन, बुद्धि में संसार और इसके पदार्थों में मनुष्य को सुख मिल ही नहीं सकता। जिसे हम सुख समझते हैं उसके बदले वस्तुतः बड़े दुःख के रूप में मूल्य चुकाना पड़ता है। जब तक वह सुख नहीं मिलता तो उसे प्राप्त करने की बेचैनी, फिर भोगते ही वह समाप्त हो जाता है फिर नये सिरे से उसकी प्राप्ति के लिये मन बुद्धि इन्द्रियों को संचालित करना पड़ता है। और कोल्हू के बैल की तरह एक अन्धी दौड़ में मनुष्य को इनके पीछे दौड़ते रहना पड़ता है। दुःख पश्चाताप, क्लेश, आत्मग्लानि, आसक्ति न जाने कितनी ही हानियाँ उठानी पड़ती हैं इनके लिए। इसमें कोई सन्देह नहीं कि विषय - भोगों में हम जितने लिप्त रहते हैं, उतने ही मृत्यु और विनाश की ओर ही अग्रसर होते जाते हैं।
क्या आपको उस व्यक्ति की घटना याद है जिसने एक सुन्दर फूल देखा? देखकर उसका मन ललचाया। उसने उसे तोड़कर नाक से सूँघा ही था कि वह दर्द में मारे चिल्ला उठा। क्यों ? उस फूल के अन्दर एक मधुमक्खी बैठी थी। सूँघते समय उसी ने उसे डंक मार दिया और वह दुःख से तिलमिला उठा। विषय भोगों का सुख भी इसी तरह है। वह हमें लुभावना लगता है। हम उसमें लीन होते हैं लेकिन परिणाम में दुःख के जहरीले डंक से भी हमें घायल होना पड़ता है।
हमारे शरीर में निहित जीवनी शक्ति ही सर्वत्र अपना काम करती है। सुनने में, खाने में, पीने में, काम करने में, यही अपना काम करती है। अन्य क्षेत्रों में शक्ति का इतना क्षय नहीं होता जितना सम्भोग में होता है। एक सीमा तक जबकि भोग मर्यादित होते हैं तब शक्ति अनावश्यक रूप से खर्च नहीं होती। लेकिन अमर्यादित वासना तृप्ति में अन्य विषयों से अधिक शक्ति का क्षय होता है। इसलिए यह अधिक हानिकारक सिद्ध होता है। संयम में ब्रह्मचर्य- इन्द्रिय निग्रह को ही अधिक महत्व दिया गया है। यद्यपि अन्य भोगों का संयम भी आवश्यक होता है लेकिन मुख्य रूप से काम वासना तथा रसना का संयम ब्रह्मचर्य का मूलाधार है, अन्य सब इसके पूरक हैं।
अनियन्त्रित, अमर्यादित वासनापूर्ति का हमारे शरीर, मन, ज्ञानतन्तुओं पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। उससे केवल कुछ शारीरिक तत्व जो कि महत्वपूर्ण होते हैं उनका क्षरण ही नहीं होता अपितु सूक्ष्म प्राणशक्ति, जीवनी शक्ति का भी बहुत बड़ा अंश व्यय होता है। इस अपव्यय से हम खोखले, रिक्त, जर्जरित बनते जाते हैं, चाहे हमारा बाहरी कलेवर कितना ही मोटा - ताजा क्यों न दीखता हो। बीमारियाँ, रोग कीटाणु जिसे धर दबाते हैं उसे मृत्यु समय- पूर्व ही उठा ले जाती है। यह सब उस जीवनी-शक्ति के अपव्यय के कारण ही होता है।
वासना में लिप्त रहने से वह जीवन रस जो शरीर को तेजवान, रसवान बनाता है काफी मात्रा में नष्ट होता है। और यही कारण है कि भोगी मनुष्य निस्तेज रसहीन सूखा-सा दिखाई देता है। उसके जीवन में सरसता, चेतना एवं स्फूर्ति जैसी चीज नाम मात्र को शेष रहती है उत्साह और साहस की मात्रा ऐसे लोगों में बहुत ही कम दृष्टि गोचर होती है।
इस तरह से होने वाले अपार क्षय को रोकने के लिये, शक्तियों को संग्रहीत सञ्चित करने के लिये, परिणाम में प्राप्त होने वाले दुःखों से बचने के लिए, हमारे पूर्वजों ने संयम तप, ब्रह्मचर्य जीवन के लिए आवश्यक बताया है। यह कोरी कल्पना नहीं है व्यवहार सिद्ध है। विषय में नष्ट होने वाली शक्ति अपने सूक्ष्म से सूक्ष्म रूपों में परिवर्तित होती हुई महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न कर देगी। ऊर्ध्वरेतस् का यही अर्थ है कि मनुष्य अपनी जीवनी शक्ति गन्दे मार्ग में नष्ट न कर उसे सञ्चित कर उत्कृष्ट कार्यों की साधना में लगाता है, इसे कई सूक्ष्म शक्तियों में परिवर्तित कर कला, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, आदि का सृजन करने लगता है।
काम शक्ति एक महत्वपूर्ण शक्ति है जिसको निम्नगामी बनाकर उसे नष्ट करके अपने दुःखों का आधार बनाया जा सकता है समाज में अपराधों को प्रोत्साहन दिया जा सकता है या इसके विपरीत इसे संयमित कर उपयोगी महान् कार्यों में व्यक्त किया जा सकता है। और इसीलिए संयम की आवश्यकता को महत्व दिया गया है। कोई व्यक्ति यदि अपनी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, क्षमताओं को बढ़ाना चाहे, कोई महत्वपूर्ण सृजन अनुसंधान का काम करना चाहे, तो उसे संयम का पथ ही अपनाना पड़ेगा।
क्या आप शक्ति-सम्पन्न, विजयी, सफल, महान जीवन बिताना चाहते हैं? क्या आप अपना व्यक्तित्व उत्कृष्ट बनाना चाहते हैं? तो आपके लिए एक ही मार्ग है, वह है संयम का मार्ग, ब्रह्मचर्य की साधना। भोगों के पथ पर चलकर शक्ति का, महानता का, विश्वास का पथ संधान नहीं किया जा सकता। यह उतना ही सत्य है जितना छिद्र युक्त घड़े में पानी का संचय नहीं किया जा सकता। संयम को छोड़कर अन्य कोई मार्ग नहीं है अपने उत्कर्ष का, जीवन का, महानता का, सुख का, शांति का।
जब संसार में सभी साथी मनुष्य का साथ छोड़ दें, पराजय और पीड़ाओं के दंश मनुष्य को घायल कर दें, पैरों के नीचे से सभी आधार खिसक जायें, जीवन के अन्धकार युक्त बीहड़ पथ पर यात्री अकेला पड़ जाय तो भी क्या वह जीवित रह सकता है? कुछ कर सकता है? पथ पर आगे बढ़ सकता है? अवश्यमेव। यदि वह स्वयं अपने साथ है तो कोई शक्ति उसकी गति को नहीं रोक सकती। कोई भी अभाव उसकी जीवन यात्रा को अपूर्ण नहीं रख सकता। मनुष्य का अपना आत्म-विश्वास ही अकेला इतना शक्तिशाली साधन है जो उसे मंजिल पर पहुँचा सकता है। विजय की सिद्धि प्राप्त करा सकता है।
कवीन्द्र रवीन्द्र का ‘अकेला चल’ शीर्षक वाला गीत आपने पढ़ा या सुना होगा। उस गीत के भाव हैं - “यदि कोई तुझसे कुछ न कहे, तुझे भाग्यहीन समझ कर सब तुझसे मुँह फेर लें और सब तुझसे डरें - तो भी तू अपने खुले हृदय से अपना मुँह खोल कर अपनी बात कहता चल।”
“अगर तुझसे सब विमुख हो जायें, यदि गहन पथ प्रस्थान के समय कोई तेरी ओर फिर कर भी न देखे तब पथ के कांटों को अपने लहू- लुहान पैरों से दलता हुआ अकेला चल।”
“यदि प्रकाश न हो, झंझावात और मूसलाधार वर्षा की अंधेरी रात में जब अपने घर के दरवाजे भी तेरे लिए लोगों ने बन्द कर दिए हों तब उस वज्रानल में अपने वक्ष के पिंजर को जलाकर उस प्रकाश में अकेला ही जलता रह।”
निःसंदेह हर परिस्थिति में मनुष्य का एक मात्र साथी उसका अपना आपा ही है। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में “आत्म-विश्वास सरीखा दूसरा मित्र नहीं, आत्म-विश्वास ही भावी उन्नति की प्रथम सीढ़ी है।” सचमुच आत्म- विश्वास के कारण दुर्गम पथ भी सुगम बन जाता है, बाधायें भी मंजिल पर पहुँचाने वाली सीढ़ियाँ बन जाती है। एमर्सन ने कहा है -- “आत्म- विश्वास सफलता का मुख्य रहस्य है।”
आत्म-विश्वास मनुष्य को तुच्छता से महानता की ओर अग्रसर करता है। सामान्य से असामान्य बना देता है। स्वेट मार्डेन ने कहा है-- “आत्म-विश्वास की मात्रा हममें जितनी अधिक होगी उतना ही हमारा सम्बन्ध अनन्त - जीवन और अनन्त - शक्ति के साथ गहरा होता जायगा।” जब चारों ओर विपत्तियों के काले बादल मंडराते हों, जब सागर में कहीं भी जीवन नैया को खड़ा करने का किनारा न मिल रहा हो, भयंकर तूफान उठ रहे हों, नाव अब डूबे की स्थिति में हो तो कैसे उद्धार हो सकता है? आत्म-विश्वास ही ऐसी स्थिति में मनुष्य को बचा सकता है। इसी तथ्य को व्यक्त करते हुए कार्लाइल ने लिखा है -- “आत्म विश्वास में वह शक्ति है, जो सहस्रों विपत्तियों का सामना कर उनमें विजय प्राप्त करा सकती है।”
आत्म विश्वास--परमात्मा पर विश्वास करना है, जिसकी शक्ति अजेय है, अनन्त है। जो अपने आप पर विश्वास करता है, अपनी बागडोर उस के हाथों सौंप देता है, उस पर संसार विश्वास करता है। संसार भर में नेतृत्व, शासन पथप्रदर्शन वे ही करते हैं जिन्हें अपने आप पर महान् विश्वास होता है। अपने ऊपर अपार विश्वास रखकर ही वे संसार को प्रभावित करते हैं। आत्म- विश्वास के बल पर एक मनुष्य अफ्रीका के जंगलों में से भी भयंकर जंगली शेर को पकड़ लाता है। हिंसक जन्तुओं के बीच खड़ा होकर उन्हें नचाता है। लेकिन आत्म-विश्वासहीन व्यक्ति शहर के बीच एक कुत्ते से भी डर जाता है। बन्दर भी उसे भयभीत कर देता है। वस्तुतः सभी मनुष्यों का शरीर एक - सा ही होता है किन्तु जिस व्यक्ति के चेहरे से, आँखों से आत्म- विश्वास का अपार तेज प्रवाहित होता है, जिसके हृदय में आत्म-विश्वास का सम्बन्ध है, उसके समक्ष हिंसक जन्तु भी पालतू - सा बनकर दुम हिलाने लगता है। उसका वह तेज ही दूसरों पर जादू का सा असर डाल देता है।
कोलम्बस जब पृथ्वी की परिक्रमा करने चला था, उसके दुर्बल हृदय साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया, उसे बुरा-भला कहकर वापिस लौट जाने की सलाह दी, लेकिन उसका एक अजेय आत्म- विश्वास नहीं टूटा और उसने नई दुनिया की खोज की। पृथ्वी को गोल सिद्ध किया। नैपोलियन की सेना रुक गई आल्पस पर्वत को देखकर। उसके सेनानियों को कोई मार्ग नहीं मिला, लेकिन यह दुर्भेद्यता नैपोलियन के अथाह आत्म-विश्वास के लिए बाधा नहीं बन सकी। उसने कहा -- “कुछ भी हो हमें आल्पस पर होकर मार्ग निकालना है” और सचमुच उस विशाल पहाड़ को काट -छाँट कर मार्ग बना लिया गया।
भगवान राम अपने अजेय आत्म-विश्वास के बल पर ही वनवास की विपत्तियों को सह सके, रावण से लोहा ले सके। महात्मा गाँधी के अथाह आत्म - विश्वास ने विशाल ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंका। इसके विपरीत ऐसे भी लोग हैं जो अपने ऊपर होने वाले सामाजिक राजनैतिक जुल्मों को चुपचाप सहन कर लेते हैं। नपुँसक की तरह उनमें कोई पौरुष नहीं रहता, बुराइयों से लड़ने के लिए, इसका कारण आत्म विश्वास का अभाव ही है।
महर्षि दयानन्द ने उस समय जबकि सारा देश रूढ़िवाद, अन्ध-विश्वास, कुरीतियों, आडम्बरों में डूबा हुआ था, इनके विरुद्ध क्रान्ति की आवाज उठाई। उस समय अपने मिशन के लिए वे अकेले ही थे लेकिन उनके अपार आत्म-विश्वास ने राष्ट्र को नया मार्ग दिखाया। संसार का एक भी महापुरुष, यदि उसके जीवन से आत्म -विश्वास की सामर्थ्य निकाल दी जाय तो वह कुछ भी नहीं बचता।
मनुष्य कितना ही विद्वान, गुणवान, शक्तिशाली क्यों न हो लेकिन यदि उसमें आत्म-विश्वास की भावना नहीं है तो वह विद्वान होकर भी मूर्खों का सा जीवन बितायेगा। शक्तिशाली होकर भी कायर सिद्ध होगा।
आत्म-विश्वास मनुष्य के कार्यकलाप, उसके जीवन, व्यवहार, गति आदि में एक प्रकार की चैतन्यता, जीवट भर देता है। उसके समस्त जीवन को प्राणवान बना देता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों को देखने मात्र से अपना प्रभाव डालता है और लोग उस पर विश्वास करने लगते हैं। उसमें एक प्रकार की दिव्यता महानता सी मालूम पड़ती है। यह और कुछ नहीं, उसका अपना अपार आत्म-विश्वास ही होता है। जो अपने पर विश्वास नहीं रख सकता, उस पर दूसरे भी विश्वास नहीं करते, न उसे कोई महत्व देते हैं।
एक सी परिस्थितियों, एक-से साधन सम्पत्ति, शिक्षा शक्ति होने पर भी कुछ व्यक्ति महान् बन जाते हैं और उनके दूसरे साथी जीवन की सामान्य आवश्यकताओं को भी पूरी नहीं कर पाते, उन्हें दर-दर भटकना पड़ता है, पराधीनता, तिरस्कार का जीवन बिताना पड़ता है। इसका कारण आत्म-विश्वास का अभाव ही है। जब कि पहले प्रकार के व्यक्तियों में यही शक्ति प्रधान होती है। आत्म-विश्वास वह ज्योति है जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व उसके गुण, कर्म, स्वभाव, जीवन सब प्रकाशयुक्त बन जाते हैं और सर्वत्र अपनी आभा छिटकाते हैं जब कि आत्म- विश्वास हीन व्यक्ति निर्वीर्य, निस्तेज, हीन जीवन बिताता है।
एक शक्तिशाली, सामर्थ्यवान् व्यक्ति के मन से जब आत्म विश्वास नष्ट होने लगता है तो संसार में उसके जमे हुए पैर भी उखड़ने लगते हैं। सुरक्षित चट्टान पर खड़ा होते हुए भी वह वहाँ से लुढ़कने लगता है। भवसागर के थपेड़ों से वह आहत होकर उसकी लहरों में ही डूबने उतराने लगता है। इसके विपरीत एक आत्म-विश्वासी, पलटे हुए पासे को भी एक दिन सीधा कर लेता है, जीवन की झंझावातों में दृढ़ खड़ा रहता है, विपरीतताओं में भी सन्तुलित और शान्त रहकर जीवन पथ पर निरन्तर आगे बढ़ता रहता है। वह अभाव, विरोध सहन करके अकेला ही मंजिल तक पहुँचता है।
निस्सन्देह आत्म-विश्वास अपने उद्धार का एक महान् सम्बल हैं। निराशा में ही आशा का संचार करने वाला, दुःख को भी सुख में बदल डालने वाला, विपत्तियों में भी आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाला, असफलताओं में भी सफलता की ओर अग्रसर करने वाला, तुच्छ से महान्, सामान्य से असामान्य बनाने वाला कौन - सा तत्व है? वह है -- मनुष्य का अपने ऊपर भरोसा, अपनी आत्म- शक्ति पर अटूट विश्वास?
निर्धन का धन, असहाय का सहायक, अशक्त की सामर्थ्य यदि कोई है तो वह उसका आत्म- विश्वास ही हो सकता है। यही सब परिस्थितियों में मनुष्य का साथ देकर उसे विजयी बनाता है जीवन के समराँगण में ? यह आत्म-विश्वास ही मनुष्य का उद्धार करने वाला है और इसका अभाव ही पतन की ओर धकेलने वाला है। अन्य कोई भी शक्ति नहीं जो मनुष्य को बना सके या बिगाड़ सके।
आत्म-विश्वास मनुष्य की शक्तियों को संगठित करके उन्हें एक दिशा में लगाता है। शारीरिक, मानसिक शक्तियाँ आत्म-विश्वासी के इशारे पर नाचती हैं और काम करती हैं। जो अपनी शक्तियों का स्वामी है, नियन्त्रण कर्ता है उसे संसार में कोई भी कमी नहीं रहती। सिद्धि, सफलतायें स्वयं आकर उसके दरवाजे खटखटाती हैं।
निर्बल, असहाय, दीन, दुःखी, दरिद्री कौन? जिसका आत्म- विश्वास मर चुका है। भाग्यहीन कौन? जिसका अपने विश्वास ने साथ छोड़ दिया है। वस्तुतः आत्म- विश्वास जीवन नैया का एक शक्तिशाली समर्थ मल्लाह है जो डूबती नाव को पतवार के सहारे ही नहीं वरन् अपने हाथों से उठाकर प्रबल लहरों से पार कर देता है। आत्म - विश्वासहीन व्यक्ति जीवित होता हुआ भी मृत तुल्य है। क्योंकि उत्साह, तेज, शक्ति, साहस, स्फूर्ति, आशा, उमंग के साथ जीना ही जीवन और ये सब वहीं रहते हैं, जहाँ आत्म-विश्वास होता है।
न जात्या ब्राह्मणाश्चात्र क्षत्रियो वैश्य एव न।
न च शूद्रो न वै म्लेच्छो भेदिता गुण कर्मभिः॥
जन्म या जाति से न कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होता है ओर न शूद्र ही। जाति, जन्म की दृष्टि से सब समान हैं। किन्तु गुण, कर्म के आधार पर अवश्य विभेद तथा अलग - अलग वर्ण हो जाता है। जो जैसा कर्म करेगा, उसे वैसा ही वर्ण प्राप्त होगा।
अतः जीवन में सफल होना है, विजयी बन कर जीवन बिताना है, संसार में ढकेले जाने वाले नहीं वरन् संसार को गति देने वाले बन कर रहना है, जीवन के उतार-चढ़ाव, हार-जीत के द्वन्द्वों में, कठिनाई उलझनों की झंझाओं में स्थिर रहना है, संसार पर अपनी छाप छोड़ कर जाना है, आशा और उमंग का जीवन बिताना है, तो अपने आत्म-विश्वास को जगाइये, उसे विकसित कीजिए। स्मरण रखिए आत्म-विश्वासी के लिए ही संसार स्थान देता है। जो अपने आपको महत्वपूर्ण नहीं मानता उसे संसार भी ढकेल कर एक ओर कर देता है।
परशुराम उन दिनों शिवजी से शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। अपने शिष्यों की मनोभूमि परखने के लिए शिवजी समय- समय पर उनकी परीक्षा लिया करते थे। एक दिन गुरु ने कुछ अनैतिक काम करके छात्रों की प्रतिक्रिया जाननी चाही। अन्य छात्र तो संकोच में दब गए पर परशुराम से न रहा गया। वे गुरु के विरुद्ध लड़ने को खड़े हो गये और साधारण समझाने - बुझाने से काम न चला तो फरसे का प्रहार कर डाला।
चोट गहरी लगी। शिवजी का सिर फट गया। पर उन्होंने बुरा न माना। वरन् सन्तोष व्यक्त करते हुए गुरुकुल के समस्त छात्रों को सम्बोधन करते हुए कहा -- अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना प्रत्येक धर्म-शील व्यक्ति का मनुष्योचित कर्त्तव्य है। फिर अन्याय करने वाला चाहे कितनी ही ऊँची स्थिति का क्यों न हो। संसार से अधर्म इसी प्रकार मिट सकता है। यदि उसे सहन करते रहा जायेगा तो इससे अनीति बढ़ेगी और इस सुन्दर संसार में अशान्ति उत्पन्न होगी। परशुराम ने धर्म रक्षा के लिए जो दर्प प्रदर्शित किया उससे मैं बहुत प्रसन्न हूँ।
शंकर जी ने अपने इस प्रिय शिष्य को उठाकर छाती से लगा लिया। उन्हें अव्यर्थ शस्त्र ‘परशु’ उपहार में दिया और आशा प्रकट की कि उनके द्वारा संसार में फैले हुए अधर्म का उन्मूलन करने की एक भारी लोक सेवा बन पड़ेगी। शिवजी ने अपने शिष्यों को और भी कहा- बालकों! केवल दान, धर्म, जप, तप, व्रत, उपवास ही धर्म के लक्षण नहीं हैं, अनीति से लड़ने का कठोर व्रत लेना भी धर्म साधना का एक अंग है। अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापना एक ही रथ के दो पहिये होते हैं। दोनों का क्रम चक्र ठीक चलते रहने से सृष्टि का सन्तुलन ठीक रहता है इसलिए धर्म की रक्षा के लिए एक उपाय पर निर्भर न रहकर दोनों का ही अवलम्बन करना चाहिये। परशुराम की धर्म - संघर्ष - वृत्ति अनुचित तनिक भी नहीं। उसमें आदि से अन्त तक औचित्य ही भरा पड़ा है। परीक्षा के लिए ही मैंने अनुचित आचरण किया था। और तुम सब पर उसकी प्रतिक्रिया देखनी चाही थी। परशुराम सफल हुआ। इसका मुझे गर्व है। इस गर्व को प्रख्यात करने के लिए परशु प्रहार के चिन्ह को शिवजी ने सदा दीखते रहने वाला ही बनाये रखा। उनके सहस्र नामों में एक नाम ‘खण्ड परशु’ अर्थात् ‘फरसे से जिसका सिर फट गया हो’ - भी विख्यात है। विष्णु ने भी भृगु की लात छाती पर खाई थी और औचित्य का अनुमोदन करने के रूप में उस चिन्ह को सदा छाती पर बनाए रखा था।
उन दिनों हैहयवन्शीयडडडडडडडड क्षत्रिय राजमद से मदाँध हो रहे थे। रावण, कंस, हिरण्यकश्यप की तरह उन्होंने स्वेच्छाचारिता अपना रखी थी। स्वार्थवश चाहे जिसके साथ जघन्य व्यवहार करने पर उतारू हो जाते। भृगुवंशी पुरोहितों ने ऐसा न करने के लिए उन्हें समझाया तो कुपित होकर उल्टे आक्रमणकारी बन गये। घर खोदकर फेंक दिये, स्त्रियों के गर्भ फाड़डडडडड डाले और जिसने उन्हें समझाया था उनके सिर काट लिए। जो बच गये वह महिष्मती छोड़कर सरस्वती तट पर जा बसे।
इन्हीं विस्थापित पुरोहितों में एक बालक था- परशुराम। वह शिवजी से शिक्षा तो प्राप्त करता, पर साथ ही अत्याचारी के विरुद्ध उसके मन में निरन्तर आग जलती रहती। वह सोचता गुरु के द्वारा जो शक्ति उसे मिलेगी उसे अनाचार के विरुद्ध संघर्ष करने में प्रयुक्त करेगा। बालक की निष्ठा परखने को शिवजी ने वैसा प्रसंग उत्पन्न किया था। जब बालक ने गुरु का ही सिर फोड़ दिया तो उन्हें विश्वास हो गया कि बालक में लौह पुरुष के गुण मौजूद हैं और वह अधर्म के उन्मूलन की जन- आकाँक्षा को पूरा करके रहेगा। शिवजी का आशीर्वाद पाकर उनकी शिक्षा और विभूतियों से सुसज्जित होकर परशुराम अनाचार विरोधी एक महान अभियान की तैयारी करने लगे।
परशुराम के इरादों का उस समय के शासक कार्तवीर्य सहस्रार्जुन को पता लगा तो वह आग बबूला हो गया और उन्हें पकड़ने आश्रम में सैन्य समेत जा पहुँचा। वे न मिले तो उनके पिता जमदग्नि का भाँति- भाँति से अपमान किया और उनके आश्रम तथा पुस्तकालय को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। परशुराम जब घर आये और आश्रम की यह दुर्दशा देखी तो उनके क्षोभ का ठिकाना न रहा। वे अपना दुर्दान्त परशु लेकर अकेले ही महिष्मती पहुँचे और सहस्रार्जुन को धर दबाया। उसकी भुजायें फरसे से काट डालीं और सेना को धनुषबाण से विचलित कर दिया। प्रतिशोध की आग और बढ़ी। सहस्रार्जुन के वंशजों ने अन्य अनेक राजाओं को लेकर चढ़ाई कर दी और परशुराम के पिता जमदग्नि को 21 स्थानों से घायल करके उन्हें मार डाला।
कहने वालों ने कहा -- एक साधु या ब्राह्मण के लिये इस प्रकार हिंसात्मक कार्य करना उचित नहीं। उनने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया कि अनीति ही वस्तुतः हिंसा है। उसका प्रतिकार करने के लिए जब अहिंसा समर्थ न हो तो हिंसा भी अपनाई जा सकती है। शास्त्र ने वैदिक हिंसा को हिंसा नहीं माना है। क्रोध वह वर्जित है, जो स्वार्थ या अहंकार की रक्षा के लिए किया जाय। अन्याय के विरुद्ध क्रुद्ध होना तो मानवता का चिन्ह है। मानवता की मूलभूत आस्था को खोकर क्रोध- अक्रोध जैसे नीति नियमों में उलझे रहना व्यर्थ है। मेरा क्रोध धर्मयुक्त है और मेरी हिंसा भी अनीति के प्रतिकार में प्रयुक्त होने के कारण उचित है। धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के लिये सदा से यही क्रम अपनाया भी जाता रहा है। ऐसे तर्कयुक्त वचनों को सुनकर कहने - सुनने वाले चुप हो जाते। वे संघर्ष की आग सुलगाये हुए देश- देशान्तरों में भ्रमण करने लगे। जन सहयोग से उन्होंने अत्याचारियों के विनाश में आशाजनक सफलता पाई। व्यक्तियों के पास कितनी ही बड़ी शक्ति क्यों न हो, जनता की संगठित सामर्थ्य से वह कम ही रहती है। परशुराम के नेतृत्व में भड़का हुआ विद्रोह एक नहीं इक्कीस बार नृशंस लोगों के अनाचारों का उन्मूलन करने तक चलता रहा और जब अवाँछनीय तत्व समाप्त हो गए तभी वह शान्त हुआ।
अनाचार को समाप्त करने की उद्दात्त भावनाओं से प्रेरित होकर यद्यपि परशुरामजी को हिंसात्मक नीति अपनानी पड़ी, पर उन्होंने इसे कभी अनुचित न समझा। शान्ति की स्थापना के लिये प्रयुक्त हुई अशान्ति सराहनीय है और अहिंसा की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए की गई हिंसा में पाप नहीं माना जाता। स्वार्थ और अन्याय के लिये ही आक्रमण वर्जित है पर यदि आत्म रक्षा या अनाचार की रोकथाम के लिए प्रतिरोधात्मक उपाय के समय में हिंसा अपनानी पड़े तो न अनुचित माना जाता है और न हेय। परशुरामजी शास्त्र और धर्म के गूढ़ तत्वों को भली भाँति समझते थे इसलिए आवश्यकता पड़ने पर काँटे से काँटा निकालने, विष से विष मारने की नीति के अनुसार ऋषि होते हुए भी उन्होंने धर्म रक्षा के लिए सशस्त्र अभियान आरम्भ करने में तनिक भी संकोच न किया।
जब प्रयोजन पूर्ण हो गया तो उन्होंने अनावश्यक रक्तपात को एक क्षण के लिए भी जारी रखना उचित न समझा। फरसे को उन्होंने समुद्र में फेंक दिया-जो राज्य छीने थे वह सारी भूमि महर्षि कश्यप को दान कर दी ताकि वे उन प्रदेशों में सुराज्य स्थापना की व्यवस्था कर सकें। पितरों ने प्रसन्न होकर जब उनके इस धर्म संघर्ष के लिए प्रसन्नता प्रकट की तो उनने यही कहा-यदि आप लोग प्रसन्न हैं तो पहले की तरह ही मेरी तपस्या, स्वाध्याय, और धर्म रक्षा के मार्ग में प्रीति उत्पन्न हो जाए।
जन- कल्याण के लिये परशुरामजी ज्ञान और विग्रह दोनों को ही आवश्यक मानते थे। नम्रता और ज्ञान से सज्जनों को और प्रतिरोध तथा दण्ड से दुष्टों को जीता जा सकता है, ऐसी उनकी निश्चित मान्यता थी। इसलिए वे उभय पक्षीय सन्तुलित नीति लेकर चलने से ही धर्म रक्षा की सम्भावना स्वीकार करते थे। उनकी मान्यता उनके शब्दों में ही इस प्रकार है :--
अग्रतश्चतुरो वेदाः पृष्टतः शसरंधनु।
इदंब्राह्म इदं क्षार्त्रशास्त्रादपि शरादपि॥
अर्थात् “मुख से चारों वेदों का प्रवचन करके और पीठ पर धनुषबाण लेकर चला जाए। ब्रह्म-शक्ति और शस्त्र-शक्ति दोनों ही आवश्यक हैं। शास्त्र से भी और शस्त्र से भी धर्म का प्रयोजन सिद्ध करना चाहिए।”
वैशाख सुदी 3 अक्षय तृतीया को परशुराम जी की जन्म जयन्ती मनाई जाती है। इन्हें भगवान का अवतार माना जाता है और वे शरीर समेत अमर हैं ऐसा कहा जाता है। कोंकण और केरल में उनकी पूजा अधिक होती हैं। समुद्र तट पर कितने ही उनके मन्दिर बने हैं और वहाँ कितने ही मेले भी इसी पर्व पर लगते हैं।
सज्जनता और दुष्टता की अति कहीं भी नहीं होनी चाहिए। दोनों का ही समुचित प्रयोग किया जाना चाहिए। दुष्टों के साथ सज्जनता और सज्जनों के साथ दुष्टता को व्यर्थ ही नहीं अनुपयुक्त समझने की मान्यता परशुरामजी के जीवन और आदर्शों में कूट - कूट कर भरी थी। अहिंसा के इसी स्वरूप का वे प्रतिपादन करते रहे। हिंसा और अहिंसा का अद्भुत समन्वय करने वाले परशुराम अभी भी हमारे विचार क्षेत्र में एक पहेली की तरह विद्यमान रहते हैं।
शरीर और मन का सम्बन्ध अटूट है। मन विकृत हुआ तो शरीर भी सुखी न रहेगा। इसी प्रकार शारीरिक दुर्बलता, रोग और पीड़ा का मन पर भी प्रभाव पड़ता है। शरीर की अपेक्षा मन अधिक शक्तिशाली है। मनुष्य का सम्पूर्ण क्रिया- व्यापार मन की विचार - स्थिति के अनुरूप होता है। जो सोचते हैं, वहीं करते है। मन में जैसे विचार उठते हैं, वैसी ही क्रियाएं व्यवहार में आती हैं। बाह्य कर्म का आधार मन है, इसलिए स्वास्थ्य पर मन की असंयत प्रवृत्तियों का प्रभाव अवश्य पड़ता है। साधारणतया बीमारी और स्वास्थ्य की खराबी को शारीरिक विकार समझ कर उपचार की व्यवस्था की जाती है किन्तु इसका प्रधान कारण मन है। अतः मानसोपचार की उपयोगिता सर्व-प्रथम है।
मानसिक वृत्तियों का शारीरिक स्थिति पर जो प्रभाव पड़ता है, वह अधिक अस्पष्ट नहीं है। धन और पद की अनियन्त्रित इच्छाओं के कारण आज लोगों में महामारी की तरह मानसिक बेचैनी उठ खड़ी हुई है। इसका यह प्रभाव हुआ कि लोग दिन भर आफिस में, घर के बाहर काम करते हैं। सायंकाल हारे-थके लौटते हैं तो दुकान, ट्यूशन, सभा-सोसायटी, सिनेमा-नाच- घरों की ओर भागते फिरते हैं। मन की इस असंयत-स्थिति के कारण पर्याप्त विश्राम तक नहीं कर पाते। फलतः शरीर गिरने लगता है, थकावट शरीर के अंग-अंग में समा जाती है। दिल की धड़कन, अनिद्रा की शिकायत प्रायः ऐसे ही लोगों को होती है, जो अत्यधिक व्यस्तता के कारण पर्याप्त विश्राम तक नहीं कर पाते।
हमारे गुर्दों के ऊपर दो ग्रंथियाँ होती हैं। इन्हें “ग्लैण्ड्स आफ फ्लाइट “ कहा जाता है। यह शरीर को आने वाले भय से सावधान करती हैं। अत्यधिक व्यस्तता, बेचैनी, और श्रम के कारण इन्हें विश्राम न मिले तो शारीरिक विकार के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। नींद आनी बन्द हो जाती है, पाचन क्रिया खराब होने लगती है। माँस पेशियाँ थोड़े से मानसिक तनाव से बुरी तरह उत्तेजित हो उठती हैं और उनकी सारी अवरोधक शक्ति समाप्त हो जाती है। यह हलचल इसलिए होती है कि ‘ग्लैण्ड्स आफ फ्लाइट’ से निकलने वाले एक विशेष प्रकार के तत्व का स्राव बन्द हो जाता है। इससे ये सारे उपद्रव उठ खड़े होते हैं।
भय, घृणा, ईर्ष्या, क्रोध, कुढ़न, जलन आदि प्रत्येक मानसिक आवेश का प्रभाव शारीरिक अवयवों पर स्पष्ट रूप से पड़ता है। अत्यधिक भय की अवस्था में हृदय धड़कने लगता है और दम फूल जाता है। हृदय की धड़कन की तीव्रता के फलस्वरूप रक्त-शुद्धि का कार्य शिथिल पड़ जाता है, जिससे शरीर में दूषित तत्व कार्बोनिक एसिड की मात्रा बढ़ने लगती है और एकाएक दम फूल जाने से फेफड़ों में तेज धक्का लगता है, जिसका स्वास्थ्य पर अनिष्टकारी असर पड़ता है। यह उत्तेजना यदि निश्चित सीमा को पार कर गई तो लोगों की मृत्यु तक हो जाती है। भूत-व्याधा के भय से मरने वालों की मानसिक शक्ति इतनी निर्बल रही होती है कि उनका शरीर भय के कारण उठी उत्तेजना को सहन नहीं कर पाता और मृत्यु हो जाती है। इस उत्तेजना का प्रमुख कारण मानसिक तनाव की स्थिति को ही माना जाता है।
यह कार्य हमारे मस्तिष्क के अधीन होता है। वह यदि इन आवेशों, भयों या उत्तेजनाओं को उपेक्षित कर दे तो शरीर के स्नायु केन्द्र पर पड़ने वाली हानिकारक प्रतिक्रिया से बच सकते है। जैसे कोई व्यक्ति यदि आपको गाली दे देता है या ऐसे अपशब्द कह देता है जिसे आप सहन नहीं कर सकते। ऐसी दशा में आपका स्नायु संस्थान भी उत्तेजित होगा ही। अतः आप उसके अपशब्दों को हँसकर टाल दीजिए। यह समझिए कि वह व्यक्ति मूर्ख है, नासमझ है, हम भी वैसे ही क्यों बनें, तो आप क्षणिक आवेश से उत्पन्न भारी दुष्परिणाम से बच जायेंगे।
यह भी देखा गया है कि आवेश के समय आहार का पौष्टिक अंश माँस - पेशियों की उत्तेजना से हुई क्षति की पूर्ति के लिए चला जाता है। यह कार्य एक झटके से सम्पन्न होता है, जिसका पाचन क्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे पाचन संयंत्र शिथिल पड़- जाते हैं। चूहों के ऊपर प्रयोग करके देखा गया है कि शान्त वातावरण में वजन बढ़ता और स्वास्थ्य स्थिर रहता है जब कि भयावह और कोलाहलपूर्ण स्थानों में शरीर गिरने लगता है और आयु कम हो जाती है।
आत्म- निरीक्षण की प्रवृत्ति को कड़ाई से लागू करने से ही सम्भव है कि सही बात का पता चले। अन्यथा ऐसी स्थिति में भी हम पक्षपात कर सकते हैं। कारण यह है कि मन इतना जबर्दस्त वकील है कि वह अपने पक्ष में अनेकों प्रमाण प्रस्तुत करके रख देता है। हम जिसे स्नेह करते हैं उसमें हजार बुराइयाँ हैं तो भी एक भी नहीं दिखाई पड़ती किन्तु किसी से द्वेष हो तो वह अनेकों दुर्गुण उसमें दूर से ही दिखाई देने लगते हैं। अपनी प्रत्येक वस्तु को उदार दृष्टि से देखने और दूसरों के कार्यों में खामियाँ निकालने की लोगों में आम धारणा होती है। इससे वस्तु के सही दृष्टिकोण का पता नहीं लग पाता। दूसरों के अधिक धन कमाने को यह कहकर ईर्ष्या करने लगते हैं कि उसने डटकर मुनाफाखोरी, चोरबाजारी, ठगी और धोखादेही की है। वही कार्य स्वयं करें तो इसे अपनी बुद्धि का कौशल मानते हैं। इससे सचाई छुपती है और पक्षपात बढ़ता है। ईर्ष्या, विद्वेष, क्रोध और कलह का अधिकाँश कारण यही है कि हमारा परखने का दृष्टिकोण स्वार्थपूर्ण होता है।
आत्म - निरीक्षण का यह कार्य इस दृष्टि से करें कि गलत अन्दाज लगाने से उठने वाली दुर्भावनायें हमारे स्वास्थ्य को खराब करेंगी। इससे हमारी सामाजिक प्रतिष्ठा गिर जाएगी, लोग बुरा कहेंगे और हमसे कोई भी आत्मीयतापूर्ण व्यवहार नहीं करेंगे। इस प्रकार सोचने से आपको सही बात का समर्थन करने में किंचित हिचक व संकोच नहीं होगा। इससे आपका मनोबल बढ़ेगा, शक्ति आयेगी, प्रसन्नता होगी और स्वास्थ्य भी स्थिर बना रहेगा।
आप दूसरों से जैसे व्यवहार की अपेक्षा करते हैं वैसा ही आचरण दूसरों के साथ भी कीजिए। दुःख और चिंता से बचाने वाला इससे अच्छा कोई दूसरा उपाय नहीं है। जो दूसरों को दुःख देगा या अभद्र व्यवहार करेगा, उसे सामाजिक दण्ड - प्रतिकार, घृणा, निन्दा का पात्र बनना ही पड़ेगा। अपनी आत्मा भी उसके लिए धिक्कारती ही रहेगी। इनसे बचने का सीधा रास्ता और सरल उपाय यही है कि सबके साथ आत्मीयतापूर्ण व्यवहार करें। सहयोग सहानुभूति और सहृदयता के सद्गुणों के कारण दूसरों से भी प्रेम, स्नेह, प्रशंसा एवं सम्मान प्राप्त होता है, इससे प्रसन्नता होती है, सुख मिलता है।
निराशा मनुष्य की शारीरिक व मानसिक गिरावट का प्रबल कारण होती है। इससे सफलता का मार्ग ही अवरुद्ध हो जाता है, इसलिए आशावादी बनने का प्रयत्न करना चाहिए। आशा आध्यात्मिक जीवन का शुभ आरम्भ है। आशावादी व्यक्ति सर्वत्र परमात्मा की सत्ता विराजमान देखता है। उसे सर्वत्र मंगलमय परमात्मा की मंगलदायक कृपा बरसती दिखाई देती है। सच्ची शान्ति, सुख और सन्तोष मनुष्य की निराशावादी प्रवृत्ति के कारण नहीं, अपने ऊपर अपनी शक्ति पर विश्वास करने से होता है। पुरुषार्थ से बड़े - बड़े प्रारब्ध भी वश किये जाते हैं। जिसमें स्फूर्ति है, शक्ति है और आलस्य जिसे छू नहीं गया, वे ही आशावान् व्यक्ति जीवन में सफल होते हैं।
काम शक्ति भी इसी प्रकार जीवन शक्ति का प्रतीक है किन्तु गर्भ धारण तक ही सीमित रखने की इसकी एक सुनिश्चित मर्यादा है। अमर्यादित कामेच्छा एक प्रकार की आग है, जो आदमी को जलाया करती है। कामलिप्सा के साथ ही शरीर की गर्मी बढ़ने लगती है। साँस की गर्मी बढ़ती और त्वचा का तापमान बढ़ जाता है। इस गर्मी के दाह से कुछ जीवन तत्व व शारीरिक धातुएं पिघलने लगती हैं और मूत्र के साथ स्रवित होने लगती हैं। इसका शरीर और मन पर तुरन्त प्रभाव होता है। शारीरिक शिथिलता और अशक्तता के साथ ही आत्म - हीनता, आलस्य, निराशा और दुर्बुद्धि जागृत होने लगती है। जो लोग अधिक विषयी होते हैं, उनकी शारीरिक शक्ति का इस प्रकार पतन होता है कि सर्दी, जुकाम जैसे हल्के रोग सहन करने की शक्ति तक चली जाती है।
अपनी सम्पूर्ण चेष्टायें ब्रह्मचर्य, संयम और पवित्र जीवन जीने के विविध कार्यक्रमों में लगी रहें। नारी के प्रति अपनी भावनायें आदरपूर्ण रहें। विचारोत्तेजक नृत्य गाने और अश्लील सिनेमा आदि से अधिक से अधिक बचने का पवित्र प्रयत्न करें तो ही यह आशा रखी जा सकती है कि व्यक्ति का शरीर बल ऊँचा होगा, आत्मबल उच्च स्तर का चढ़ा - बढ़ा होगा।
क्रोध भी शरीर और मन पर विषैला प्रभाव डालने वाली महा व्याधि है। डॉक्टर आरोली और केनन का कथन है कि क्रोध के कारण अनिवार्य रूप से उत्पन्न होने वाली विषैली शर्करा पाचन - क्रिया को शिथिल कर देती है, इससे हाजमा खराब हो जाता है। “15 मिनट क्रोध से उत्पन्न शक्ति को यदि बचा लें तो इससे 7॥ घन्टे अनवरत श्रम किया जा सकता है। “ डॉक्टर जेस्टर के इस कथन से क्रोध के भीषण परिणामों का सहज ही में अन्दाज किया जा सकता है।
क्रोध का अधिकाँश कारण अपना झूठा अहंकार होता है। अतः सदैव शिष्ट, उदार, मित-भावी और नम्र बनने का प्रयत्न करना चाहिए। जो स्वयं को सबसे छोटा मानता है, उसे इस दुष्ट महारोग से बिना औषधि छुटकारा मिल जाता हैं।
इसी प्रकार लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, कलह और कटुता की दुर्भावनायें भी मनुष्य को नीचे गिराती हैं। इनकी हरघड़ी अपने मस्तिष्क की प्रयोगशाला में निगरानी बनाये रखना चाहिए। इन्हें असंयत, अमर्यादित छोड़ देंगे तो मानसिक शारीरिक विग्रह उत्पन्न होते देर न लगेगी। इनकी भयंकरता से जीवन का सम्पूर्ण उल्लास और आनन्द समाप्त हो जाता है।
तत्कर्म यन्नबन्धाय सा विद्या सा विमुक्तये।
आयासाया परं कर्म, विद्याऽन्या शिल्पनैपुणम्॥
- विष्णु पुराण
कर्म वही है जिससे बन्धन टूटें, नहीं तो वह प्रयास मात्र है। विद्या वही है, जिससे मुक्ति प्राप्त हो, नहीं तो वह शिल्प - निपुणता मात्र है।
सात्विकता की अभिवृद्धि होने से आत्मा में असाधारण शान्ति, सन्तोष, प्रसन्नता और प्रफुल्लता का आनन्द छाया रहता है। सदाचरण से जीवन का प्रत्येक क्षेत्र फलता - फलता दिखाई देता है। सत्कर्म मनुष्य को ऊँचे उठाते हैं। सभी प्रकार के सुखों और सफलताओं की कुँजी यह आत्म - निरीक्षण की प्रवृत्ति जिसने अपना ली उसका कायाकल्प होते देर न लगेगी। मनुष्य शरीर में भी देवत्व के दर्शन यदि कहीं सम्भव हो सकते हैं तो वे शीलवान् पुरुष में प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं, इसलिए अपना प्रत्येक कार्य सतोगुणी हो। भावनाओं में लोक-कल्याण सन्निहित हो। ऐसा कर सकें तो हमारे शरीर और मन का रोग मुक्त, शाँत एवं संतुलित रहना संभव हो सकता है।
स्वाध्याय सन्दोह -
सत्य ही सर्वोपरि है -
सत्य से परे कुछ नहीं। जिस प्रकार प्रकाश के बिना कोई वृक्ष फल - फल नहीं सकता, उसी प्रकार सत्य के बिना जीवन सफल तथा सार्थक नहीं हो सकता। जिस घर की दीवारें सीधी खड़ी न हों उसके किसी भी क्षण गिरने की सम्भावना बनी ही रहेगी। इसी प्रकार सत्य - विहीन जीवन में पतन की आशंका का बना रहना स्वाभाविक है।
सच्चाई की खातिर अपने सुख-दुःख, मान- अपमान, हानि-लाभ तथा हार-जीत की परवाह न करो। अपने व्यक्तित्व से सम्बन्ध रखने वाली वस्तुओं को अकारण भली और दूसरे से सम्बन्ध रखने वाली वस्तुओं को बुरी समझने का स्वभाव त्याग दो। स्वमत को इसलिये बड़ाई मत दो कि वह तुम्हारा मत है। इसी प्रकार दूसरों के मत को भी निरपेक्ष भाव से देखा करो। अपनी स्तुति सुनकर न फूलो और न अपनी आलोचना सुनकर या पढ़कर क्रोध करो। अपनी स्तुति, निन्दा पर दृष्टि न रखते हुए केवल सत्य का अनुसन्धान किया करो। यही ज्ञानालोक पाने का रहस्य है।
सत्य में ही हर एक की और सभी की भलाई है। यह सारा जगत सत्य के प्रकाश के लिए ऐसा ही साधन है जैसा कि अग्नि के लिए ईंधन। विश्व, जगत सत्य के लिए ही है। इसलिए चरित्रवान पुरुष फल की परवाह न करता हुआ अटल निश्चय रखता है कि अन्त में, सत्य में ही सबका हित और कल्याण है।
-चरित्र - विकास
शाब्दिक सत्यता बनाम आन्तरिक सत्यता -
सच्ची सत्यता तो अन्तःकरण की ही होती है, केवल शब्दों की नहीं। कई बार तो लोग केवल शब्दों पर वितण्डावाद किया करते हैं और उसी से अपने को सत्यवादी सिद्ध करना चाहते हैं। उदाहरणार्थ कोई व्यक्ति भोजन करके बाहर आया और किसी ने पूछा कि ‘रोटी खा आए?’ “उसने उत्तर दिया --”नहीं।” वास्तव में बात यह ठीक थी कि उसने केवल चावल खाया था, रोटी नहीं खाई थी। पर पूछने वाले का आशय ‘रोटी’ से भोजन का ही था। यह शाब्दिक वितण्डावाद नहीं तो क्या है? ऐसे शब्दों के वितण्डावाद से असत्य का दोष दूर नहीं हो सकता। इसमें शब्द सत्य होने पर भी भाव झूठे हो सकते हैं। इसलिए शाब्दिक सत्यता ही सत्यता नहीं, वास्तविक सत्यता भावों की, अन्तःकरण की होनी चाहिए।
प्रधान सत्यता व्यावहारिक है, चाहे उसके लिए प्रत्यक्ष कर्म करना पड़े या न पड़े - प्रत्यक्ष बोलना पड़े या न पड़े। जिस समुदाय या समाज में केवल शाब्दिक सत्यता का मान होगा और व्यावहारिक सत्यता का विचार न रहेगा, वह अधोगति में ही पड़ा रहेगा, उसकी नैतिक स्थिति सुधरने की आशा नहीं।
-सत्य की श्रेष्ठता
सत्य में ‘प्राचीन’ और ‘नवीन’ का झंझट क्यों ?
सत्य के यथार्थ खोजी के सामने जो भी प्रश्न आये उसे बिना पक्षपात के उन पर विचार करना चाहिए। राग-द्वेष से रहित होकर, बिना लालच या भय से वशीभूत हुए आपको अपनी विचार शक्ति से काम लेना चाहिए। प्रत्येक प्रश्न से सम्बन्धित प्रमाणों को, तर्कों को ईमानदारी से बुद्धि की तराजू पर रखकर तोलना चाहिए, ऐसी तराजू पर जो रागद्वेष से प्रभावित न हो। आपको किसी शब्द प्रमाण (शास्त्रीय वचन) की, किसी बड़े नाम की, परम्परा की या सिद्धान्त की परवाह नहीं करनी चाहिए। आपको ऐसी किसी चीज की परवाह न करनी चाहिये जिसे आपकी बुद्धि सत्य न मानती हो।
सत्य का यथार्थ खोजी किसी ‘प्राचीन’ बात को ‘प्राचीन’ होने के कारण स्वीकार नहीं कर सकता और न ‘नवीन’ बात को नवीन होने के कारण अस्वीकार करता है। वह किसी बात को केवल इसलिए स्वीकार नहीं करता कि वह मर चुकी है, और न वह किसी के कथन का केवल इसलिए खण्डन करता है कि वह जीवित है। इसलिए आप प्रत्येक कथन का मूल्य इसी आधार पर लगाइए कि वह कितना तर्कानुकूल है। इस बात पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं कि वह बात किसने कही है। बात कहने वाला एक राजा भी हो सकता है और एक गुलाम भी हो सकता है -- एक दार्शनिक भी हो सकता है और एक नौकर भी हो सकता है। पर इससे किसी कथन की सत्यता अथवा तर्कानुकूलता न तो बढ़ती है, न घटती है। कथन का मूल्य कहने वाले के यश अथवा पद से सर्वथा स्वतन्त्र है। इसलिए आप उसी को स्वीकार करें जिस पर वास्तव में आपको विश्वास हो कि यह सत्य है।
-स्वतंत्र चिन्तन
सच्ची सफलता का एक मात्र साधन
ईमानदारी सफलता का सबसे प्रधान साधन है। एक दिन ऐसा जरूर आता है। जब बेईमान आदमी दुःख और विपत्ति में फँसकर अपनी बेईमानी पर पश्चाताप करने लगता है। लेकिन ऐसा कोई भी आदमी नहीं जिसे अपनी ईमानदारी पर पश्चाताप करना पड़ा हो। हालाँकि कभी-कभी ईमानदार आदमी भी असफल हो जाते हैं, क्योंकि वे मितव्ययिता, योजना तथा व्यवस्था जैसे तीन स्तम्भों का निर्माण करने में असफल रहते हैं। परन्तु उनकी असफलता इतनी अधिक दुखदायी नहीं होती जितनी की बेईमान व्यक्ति की होती है, कम-से-कम उन्हें इतना सन्तोष तो होता है कि उन्होंने कभी किसी व्यक्ति को धोखा नहीं दिया। अपने जीवन के अन्धकारयुक्त क्षणों में भी वे अपनी आन्तरिक पवित्रता पर सन्तोष अनुभव कर सकते हैं।
अज्ञानी लोग यह सोचते हैं कि समृद्धि प्राप्त करने के लिये बेईमानी ही सबसे सीधा मार्ग है। ऐसा इसलिये होता है कि वे पहले से ही बेईमानी पर आचरण करने वाले होते हैं। बेईमान आदमी नैतिकता की दृष्टि से अदूरदर्शी होता है। जिस प्रकार एक शराबी केवल तात्कालिक आनन्द को ही देखता है, उसके अन्तिम परिणाम को नहीं देखता। वह नहीं समझ पाता कि इस प्रकार के आचरण से उसका चरित्र नष्ट होता है और वह अपनी व्यापार या नौकरी का विध्वंस कर लेता है। इसी प्रकार दूसरों के प्राप्य धन को अपनी जेब में रखकर भले ही हम यह सोच लें कि कितनी चालाकी और सफलता के साथ हमने दूसरे को ठग लिया, लेकिन उस समय हम इस यथार्थता को नहीं समझ पाते कि वास्तव में हमने अपने को ही छला है। बेईमानी से प्राप्त पैसे को मय सूद के जाना पड़ेगा, और इस न्याय से हम किसी प्रकार न बच सकेंगे। जिस प्रकार आकाश में फेंका हुआ पत्थर आकर्षण शक्ति के सिद्धान्तानुसार पृथ्वी पर ही लौटकर आता है उसी प्रकार नैतिक गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त भी अटल रूप से काम करता रहता है।
- सफलता के आठ साधन
सच्चे आदर्शों का प्रतिपालन ।
मनुष्यों के उच्च ध्येय और आदर्शों का सम्बन्ध सिद्धान्तों से बहुत अधिक है। सारे नैतिक नियम आदर्श ही होते हैं। सत्य बोलो, चोरी मत करो, परस्त्री समागम पाप है, उपकार करना धर्म है, विपत्ति में धैर्य रखना चाहिए, इत्यादि नियम जीवन के आदर्श हैं। ऐसे नियमों के विषय में अनेक लोग शंकाएं उठाया करते हैं कि हाँ, देखने में तो नियम बहुत अच्छे हैं, पर ये व्यवहार में नहीं आ सकते। ऐसे लोगों को जानना चाहिए कि बहुसंख्यक लोग इन नियमों का न्यूनाधिक परिमाण में पालन करते हैं और तभी कुटुम्ब, समाज और राज्य स्थिर रहते हैं। इनको न मानने वालों की संख्या थोड़ी है। हम सबकी स्पष्ट इच्छा रहती है कि सब लोग सदैव इन नियमों के अनुसार चलें। जब कभी इनके विपरीत कोई बात देख पड़ती है, तो हम अपनी अप्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं। इस कारण ठीक विचार न कर सकने वाले लोगों को ऐसा जान पड़ता हैं कि इन नियमों का वास्तविक रूप में पालन नहीं होता और न हो सकना सम्भव है। परन्तु यह उनके उथले मन का भ्रम है। यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य में कमजोरियाँ हैं, वह कभी-कभी मनोविकारों के अधीन हो जाता है, और उस समय वह इन नियमों को भंग करने लगता है। परिणाम स्वरूप उसकी अधोगति हो जाती है। मनुष्य उच्च बना रहे और समाज का कार्य ठीक- ठीक चलता रहे, इसके लिए ऐसे आदर्श नियमों की बड़ी आवश्यकता है।
- नीति निबन्धावली
“जन-गण-मन अधिनायक जय हे, भारत भाग्य विधाता” राष्ट्र-गीत के निर्माता रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जीवन-भर पद-दलित मानवता को ऊँचा उठाने के लिए मानव को मानव बन कर रहने की प्रेरणा देने के लिए संघर्ष किया। वे जानते थे क्रान्ति तोपों और बन्दूकों से नहीं, विचार परिवर्तन से होती है। भावनाएं न बदलें तो परिस्थितियों में स्थायी हेर-फेर नहीं हो सकता । फिर यदि विचार बदल जायें तो बिना दमन या दबाव के भी सब कुछ बदल सकता है। उनने कुरूप परिस्थितियों को सुन्दर बनाने के लिए एक सच्चे कलाकार की तरह साधना की। कला को कला के लिए सीमित नहीं रखा जा सकता। उसे सत्यं, शिवं, सुंदरं की सेवा के लिए प्रयुक्त किया जाना चाहिए। इस तथ्य को उन्होंने मूर्तमान करने के लिए जो तपस्या की उसे चिर-काल तक भुलाया न जा सकेगा।
रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्व - कवि माने जाते हैं। उनकी कविताएं मानवता का प्रतिनिधित्व करती हैं, उनकी कला में मानवता की उत्कृष्टता उभर कर आती है। कलाकार विश्व मानव की सुसज्जा में कितना उत्तरदायित्व उठा सकता है, इसका अनुपम उदाहरण उन्होंने अपने सारे जीवन को काव्यमय बनाकर प्रस्तुत किया।
7 मई 1861 में कलकत्ता में वे जन्मे। उनके पिता देवेन्द्रनाथ ठाकुर बंगाल के महर्षि कहे जाते हैं। उनने अपने सद्गुणों और उद्दात्त भावनाओं को इस छोटे बालक में कूट - कूट कर भरने का प्रयत्न किया। वे चाहते तो दूसरे पिताओं की तरह अपने पुत्र को ‘कमाऊ’ बनाने के लिए भी लगाये रह सकते थे, पर उनने सोचा पिता वही धन्य है, जिसने अपनी सन्तान को मानवता की सेवा कर सकने योग्य बना सकने में सफलता प्राप्त की। देवेन्द्र बाबू जब तक जिये प्रयत्न करते रहे कि उनका पुत्र संसार के श्रेष्ठ नागरिकों में गिना जा सकने योग्य बने और विश्व मानव का गौरव बढ़ाने में कुछ महत्वपूर्ण योग- दान करे। उनने बालक को इसी दृष्टि से शिक्षित और सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न किया और उनके प्रयत्न सफल भी हुए। विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपना जीवन-क्रम जिस प्रकार ढाला, उससे उनके पिता की आत्मा सन्तुष्ट होकर ही गई।
काम चलाऊ पढ़ाई पढ़ने के बाद क्लर्क ढालने वाली शिक्षा से उन्हें घृणा हो गई और वे नये युग का नया साहित्य लिखने में लग गये। ग्रेजुएट बनने का विचार उन्होंने छोड़ दिया। माता सरस्वती की साधना ही उनका लक्ष्य बन गया। छोटी आयु में ही उनकी कविताएं प्रकाशित होने लगीं। कविताएं ही नहीं, नाटक, उपन्यास और निबन्ध भी उन्होंने लिखने आरम्भ किये। मनोयोग, अध्ययन और सदुद्देश्यपूर्वक लिखी गई उनकी रचनाएं सम्मान प्राप्त करने लगीं। यौवन के द्वार में प्रवेश करते-करते उनने बहुत कुछ लिख डाला । इन कृतियों ने पराधीनता के बन्धन काटने के लिए जहाँ तड़प पैदा की, वहाँ यह प्रकाश भी दिया कि हमें आखिर करना क्या है, जाना कहाँ है? स्वाधीनता की सार्थकता तभी है, जब उसका उपयोग व्यक्ति को सुसंस्कृत और समाज को सुविकसित करने के लिए हो सके। बदलने वाले युग के उद्गाता की तरह उन्होंने यह सब कुछ पाया। उनका गायन जन- मानस को झंकृत करने में सफल हुआ ही मानना पड़ेगा।
जमींदारी का काम देख- भाल करने की जिम्मेदारी सौंपी गई, पर रोजी - रोटी का प्रश्न जब बिना उनके सिर खपाये भी हल हो सकता था तो वे क्यों पिसे को पीसने में अपना समय बर्बाद करते। जमींदारी का काम घर के दूसरे लोगों पर छोड़कर वे कमाने में नहीं, मानवता का शृंगार करने में जुट गये। उनने एक से एक अभिनव रचनाओं का निर्माण आरम्भ कर दिया। बंगला भाषी जनता उनकी प्रेरणाओं से भाव विभोर हो उठी।
उनके कन्धे जितने मजबूत होते गये उतने ही उत्तरदायित्वों का भार भी लदता गया। ‘भारती’ मासिक पत्रिका का सम्पादन आरम्भ किया। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय का बन्द पड़ा हुआ ‘बंग दर्शन’ अपने सम्पादकत्व में पुनः प्रकाशित किया तथा अनेक पत्र- पत्रिकाओं में अपने विचारों को छपाना आरम्भ कर दिया। नव-जीवन संचार की धारा अजस्र रूप से बहने लगी।
टैगोर की भावना उनकी लेखनी में ही नहीं, कृतियों में भी उभर - उभर कर ऊपर आती थी। भारत के अनेक क्षेत्रों में प्लेग फैला तो वे एक सच्चे लोक - सेवी की तरह उनकी सेवा, सहायता में जुट गये। ‘चिर कुमार सभा’ का संगठन करके रचनात्मक कार्यों में अनेक नव-युवकों को लगाया। बिहार भूकम्प के समय पीड़ितों की सहायता के लिए उन्होंने दिन- रात एक करके बहुत काम किया। बंगीय साहित्य सम्मेलन के प्रान्तीय राजनैतिक सम्मेलन के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपने समय में जो कार्य किया उससे उनकी सेवा साधना में चार चाँद लग गये।
उन्होंने शान्ति निकेतन कला मन्दिर बनाया, जो छोटे रूप में आरंभ होकर विश्व-विद्यालय के रूप तक विकसित हुआ। इस विश्व भारती ने भारत के लिए ही नहीं, संसार भर के लिए सच्चे कला साधकों का-लोक सेवियों का-निर्माण करने में महत्वपूर्ण योग-दान दिया है।
संसार के प्रमुख देशों में भ्रमण करके उनने अपने विचारों का प्रचार यूनान, मिश्र, आस्ट्रेलिया, हंगरी, रुमानिया, इटली, जापान, जर्मनी, स्वीडन, कनाडा, रूस में किया। इंग्लैण्ड, अमेरिका आदि देशों के विश्व-विद्यालयों में उनके भाषण हुए जो बहुत ही पसन्द किये गये। सन् 1913 में उनकी कविता के संग्रह ‘गीताँजलि’ पुस्तक पर ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला, उस कविता पुस्तक का अनुवाद संसार की प्रायः सभी भाषाओं में हो चुका है। भारत में तथा भारत से बाहर उन्हें अनेक विश्व विद्यालयों ने ‘डॉक्टर’ की उपाधि दी और भारत सरकार ने भी उन्हें “सर” की उपाधि से सम्मानित किया।
1919 में जलियावाला में जो नृशंस हत्याकाण्ड हुआ उससे उन्हें भारी क्षोभ हुआ। उनके सभापतित्व में इस काण्ड के विरुद्ध एक बड़ी सभा होने वाली थी पर सरकारी प्रतिबन्ध के कारण वह न हो सकी। फिर भी वे अपना क्षोभ प्रकट करते रहे और ‘सर’ की उपाधि वापिस कर दी। वे इंग्लैण्ड दौड़े गये और ब्रिटिश सरकार के भारत मन्त्री से भारतीय जनता का क्षोभ व्यक्त किया। अमेरिका गये और वहाँ की जनता तथा सरकार को अंग्रेजों की दमन नीति से परिचित कराके भारतीय स्वाधीनता के लिए सहानुभूति अर्जित की।
स्वतन्त्रता आन्दोलन को अनुचित नीति से दमन करने की सरकारी नीति के वे दिन-दिन विरुद्ध होते गये। अपना प्रभाव डालकर वे सरकार को ‘अति’ बरतने से रोकते रहे और खुले शब्दों में अपना रोष लेखों और भाषणों में व्यक्त करते रहे। यों रवीन्द्र विशुद्ध रूप से कवि थे, पर कवि केवल गीतकार ही नहीं होता, अनीति को देखकर व्यथित होना भी उसकी सहृदयता की कसौटी होती है। टैगोर सच्चे कवि की तरह अनीति का विरोध करने में कभी पीछे नहीं रहे। अपनी शक्ति के अनुसार उनने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपने ढंग से बहुत कुछ किया। सन्त ऐंड्रूज और एनी बेसेन्ट को कवि का पूर्ण सहयोग प्राप्त होता रहा।
साहित्य को उन्होंने नई दिशा में मोड़ा। पाशविक प्रवृत्तियों का चित्रण करके पाठक के पशुत्व को भड़काना उन्होंने एक अनैतिक कार्य समझा और उन लोगों को लताड़ते रहे तो जनता की निम्नगामी रुचि के अनुरूप वस्तुएँ लिखकर सस्ती ख्याति तथा पाप की कौड़ी कमाना चाहते हैं। कवि और साहित्यकार का कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व जनमानस को पतन की ओर से मोड़कर उत्थान की ओर अभिमुख करना है। कुण्ठाओं को हटाकर आशा का प्रकाश उत्पन्न करना है। कर्त्तव्यनिष्ठा कवि ने बहुत लिखा है। कभी-कभी अपने नाटकों में स्वयं भी अभिनय किया है। उनकी कृतियों पर कई फिल्में बनी हैं। उनके उपन्यासों को श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाता है और गीतों को भावनापूर्वक गाया जाता है। इस लोक-प्रियता के पीछे कवि का वह महान् व्यक्तित्व और कर्तृत्व काम करता है, जिसने मानवता की सेवा को ही अपना लक्ष्य रखा और उसी के लिए अपने को खपा दिया।
जीवन में असन्तोष और अशान्ति क्यों पैदा होते हैं? इसका कोई एक उत्तर नहीं दिया जा सकता। मानव जीवन में दृश्य-अदृश्य ऐसे बहुत से कारण होते हैं जो अशान्ति और असन्तोष पैदा कर देते हैं, फिर भी मनुष्य की द्विविधामय स्थिति, यथार्थ से आँखें मूँद कर कल्पना-लोक में विचरण करना, जीवन जीने का अस्वाभाविक मार्ग अपनाना, तृष्णा, अपने आपके प्रति अनजान रहना, असन्तुलित मन निरुद्देश्य जीवन ऐसे मुख्य कारण हैं, जिनसे मनुष्य जीवन में अशान्त और असन्तुष्ट रहता है।
अशान्ति, असन्तोष मनुष्य के जीवन में तब पैदा हो जाती हैं, जब उसके आन्तरिक और बाह्य मन में एक समता नहीं होती है। अन्तर मन कुछ और चाहे और बाह्य मन कुछ और करे। ऐसे लोग असन्तुष्ट और अशान्त ही रहते हैं, जो दुविधा की स्थिति में पड़े रहते हैं। कई व्यक्ति अंतर्मन से बड़े आदर्शवादी होते हैं। लेकिन बाह्य मन की प्रेरणा से अपने आदर्श के प्रतिकूल कार्य कर बैठते हैं। कई बार मनुष्य की नैतिक बुद्धि प्रबल होती है लेकिन असंस्कृत मन पूर्व अभ्यास- संस्कार के कारण अनैतिक कार्य की प्रेरणा देकर मनुष्य को प्रवृत्त कर देता है और यही द्वन्द्वात्मक स्थिति मनुष्य की अशान्ति, असन्तोष का कारण बन जाती है। इससे कई शारीरिक मानसिक बीमारियाँ भी उत्पन्न हो जाती हैं। मन की शान्ति और सन्तोष के लिए इस तरह की द्विविधा को मिटा कर अपने अन्तर - बाह्य मन में सामंजस्य पैदा करना आवश्यक है। जैसा भीतर हो, वैसा बाहर इस तरह की एकरूपता जितनी होगी, उतनी ही मनुष्य में प्रसन्नता, शान्ति, सन्तोष की वृद्धि होगी।
असन्तोष का एक मुख्य कारण है अपनी यथार्थ स्थिति को भूल जाना, वास्तविकता से आँखें मूँद कर किसी के कहे, सुने या कल्पित स्वरूप में अपने आपको समझने, देखने की भूल कर बैठना। बहुत से लोगों को इसी कारण जीवनभर अशान्ति और असन्तोष का सामना करना पड़ता है। अपनी सहज स्वाभाविक स्थिति को भुलाकर लोग जब जीवन का अस्वाभाविक मार्ग अपनाते हैं, अपनी सीमा से कुछ अधिक की आकाँक्षायें रखते हैं तो उन्हें असन्तुष्ट रहना पड़ता है। क्योंकि प्रकृति का एक नियम है कि क्रमिक विकास से ही सब उच्च कक्षाओं में, स्थितियों में पहुँचते हैं। बचपन से कोई अचानक वृद्धावस्था में नहीं पहुँच जाता। उगते हुए पेड़ में ही फल नहीं आ जाते। अभी किशोरावस्था में ही पहुँचे है कि दूसरों के कहे सुने अनुसार लोग बड़े दार्शनिक, धार्मिक बन जाने की धारणा कर बैठते हैं। लेकिन उनकी प्राकृतिक स्थिति इससे भिन्न होती है, वह उछल-कूद सीखना, सृजन करना आदि प्रवृत्ति प्रधान कार्यों में लगा ना चाहती है। वे जबरन इन पर रोक लगाते हैं, फलतः उनकी प्रकृति और अस्वाभाविक प्रवृत्तियों में संघर्ष पैदा हो जाता है और यही असन्तोष का कारण बन बैठता है।
ठीक इसके विपरीत लोग बड़ी उम्र में पहुँचकर भी युवकों, किशोरों जैसे प्रवृत्ति प्रधान कार्यक्रमों में लगे रहते हैं, जब कि प्रकृति उन्हें निवृत्ति की ओर लगाना चाहती है। भौतिक कार्यक्रमों से विरक्त होकर दर्शन धर्म संस्कृति समाज के चिन्तन में लीन हो जाना आवश्यक है। जब मनुष्य ऐसा नहीं करता, तब भी उक्त प्रकार का असन्तोष पैदा हो जाता है।
कई लोगों की बड़ी उच्च आकाँक्षाएं होती हैं। वे जीवन के महान् स्वप्न देखते हैं। कल्पना क्षेत्र में उड़ते हुए क्या से बन जाते हैं। कई महापुरुषों की जीवनी पढ़कर उनके बारे में सुनकर लोग वैसा ही बन जाना चाहते हैं। महत्वाकाँक्षायें रखना बुरी बात नहीं है। इन्हीं के सहारे मनुष्य आगे बढ़ता है, उच्च सफलतायें अर्जित करता है। लेकिन महत्वाकाँक्षाओं के पीछे भी मनुष्य की अपनी स्थिति, योग्यता, परिस्थितियाँ क्षमता आदि का भी कम महत्व नहीं होता। जो व्यक्ति अपनी महत्वकाँक्षाओं और अपनी परिस्थितियों में तालमेल बैठाकर प्रयत्न - रत रहता है, वह सफल भी हो जाता है लेकिन अपनी स्थिति को भूलकर मनुष्य जब अपरिमित महत्वाकाँक्षाओं के पीछे अन्धा हो जाता है, तब उसे असन्तोष और अशान्ति का ही सामना करना पड़ता है।
आप क्या हैं, आपकी परिस्थितियाँ कैसी हैं, आप कैसे धरातल पर खड़े हैं, आपकी कितनी क्षमतायें हैं? इन्हें जाने, समझे बिना महत्वाकाँक्षाओं के पीछे न दौड़ें। बड़े व्यक्तियों के कहने पर विचार करें, उनके उपदेशों को जीवन में उतारें लेकिन उन जैसा बनने का अन्धा प्रयत्न न करें। स्मरण रखिए प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक प्रकृत बनावट होती है। उसी की सीमा में बढ़ते रहने पर वह अपने आप में पर्याप्त विकास प्राप्त कर सकता है। लेकिन जब इसके विपरीत मनुष्य अपने प्रकृत स्वत्व को भुला कर दूसरे की नकल करता है, तब उसे अन्तर्द्वन्द्व का सामना करना पड़ता है। प्रत्येक व्यक्ति की अपनी सृष्टि होती है। अपना स्वत्व होता है। अपनी विशेषता होती है। जो मनुष्य इस वास्तविकता को भुलाने का असफल प्रयत्न करता है, वह उतना ही अशान्त और असन्तुष्ट रहता है।
सन्तोष के साधन के लिए आपके पास वर्तमान में जो कुछ है, उस पर सन्तोष करें, उसका लाभ उठावें। इसका अर्थ यह नहीं कि भावी प्रगति के लिए प्रयत्न ही न किया जाय। सन्तोष का अर्थ हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना नहीं है। वर्तमान से सन्तुष्ट रहकर भावी उन्नति के लिए धैर्यपूर्वक प्रयत्नशील रहना शान्ति के लिए आवश्यक है।
मनुष्य की अशान्ति और असन्तोष का कारण उसका अपना मन भी है। असन्तुलित, बिना साधा हुआ मन मनुष्य को ऐसी परिस्थितियों में घसीटता रहता है अथवा ऐसी उधेड़- बुन में लगा रहता है, जिससे अशान्ति और असन्तोष की आग सुलगती रहती है। जिस तरह बिना सधा हुआ घोड़ा सवार को दुःखद परिस्थितियों में डाल देता है, उसी तरह असंस्कृत, असन्तुलित मन मनुष्य को कई दोष चक्रों में फँसता रहता है, जहाँ असफलता, अशान्ति, असन्तोष ही परिणाम में मिलते हैं।
भले ही मनुष्य इनका दोष भाग्य पर या किसी व्यक्ति पर मढ़ता रहे, लेकिन मूलतः दोष उसके बिना सधे हुए मन का ही होता है। जिसका मन सधा हुआ नहीं है, वह व्यक्ति सदैव अपनी परिस्थितियों, दूसरे व्यक्तियों के पराधीन, परावलम्बी, परमुखापेक्षी रहता है। इससे क्षुब्ध और असन्तुष्ट भी रहता है। स्वावलम्बी, सधे हुए मन वाला व्यक्ति ही सन्तुष्ट और शान्त रह सकता है। जिनका मन आवेशों, उद्वेगों से चलायमान रहता है, जो नाना मनोविकारों से ग्रस्त रहता है, वह व्यक्ति कभी भी शान्ति नहीं पा सकता। विकृत मन की मुख्य तीन अवस्थायें बताई गई हैं - क्षिप्त, विक्षिप्त और मूढ़। इनसे उत्कृष्ट स्थिति है--एकाग्र तथा निरुद्ध मन की। महर्षि पातंजलि ने उक्त तीनों स्थितियों को विकृत बताया है। एकाग्र और निरुद्ध मन ही शान्ति तथा असन्तोष का अधिकारी होता है।
मनुष्य की अशान्ति का एक और कारण होता है, उसका निरुद्देश्य जीवन। प्रत्येक व्यक्ति जीवन में पदार्पण के साथ ही अपनी जीवन यात्रा का एक विशेष लक्ष्य लेकर आता है। लेकिन जब वह संसार में आकर यहाँ के नानात्व में, आकर्षणों में, वस्तु पदार्थों में उलझ जाता है, उनमें लिप्त हो जाता है, तब अन्तर में बैठी हुई चेतना उसे कचोटती रहती है और वह तब तक छटपटाती रहती है, जब तक मनुष्य एक निर्दिष्ट लक्ष्य निर्धारित नहीं कर लेता, जो अन्तरात्मा से स्वीकृत हो।
किसी भी रूप में निरुद्देश्य, लक्ष्य-विहीन जीवन जिसमें मनुष्य परिस्थितियों, वातावरण, दूसरों के द्वारा ठेला जाता है, ऐसी परिस्थिति में शान्ति और सन्तोष की प्राप्ति नहीं होती। आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपना लक्ष्य निर्धारित करे और उसके अनुसार आगे बढ़े। निर्दिष्ट लक्ष्य की ओर बढ़ने पर मनुष्य को एक तरह का सन्तोष मिलता है।
इस सम्बन्ध में एक और महत्वपूर्ण बात है वह यह कि स्वार्थपूर्ण जीवन में मनुष्य को स्थायी शान्ति नहीं मिलती, न ऐसे जीवन में सन्तोष ही मिलता। परमार्थ प्रधान कार्यों से ही मनुष्य शान्ति अनुभव करता है। इस परमार्थ में दूसरों के हित में मनुष्य के प्रयास जितने बढ़ते जायेंगे, वह उतना ही सन्तुष्ट और शान्त होता जायेगा।
संसार में अनेकों दुष्कर्मों को पाप की संज्ञा दी जाती है। चोरी करना, हत्या, दुराचार, झूँठ बोलना, धोखा देना, विश्वासघात करना, किसी को पीड़ा-नुकसान पहुँचाना आदि पाप कर्म कहे जाते हैं। लेकिन एक और भी बड़ा पाप होता है, वह है कमजोर होना। दुर्बलता अपने आप में एक बहुत बड़ा पाप है। दुर्बलता चाहे शारीरिक हो, मानसिक या सामाजिक, सभी प्रकार की मनुष्य के लिए अभिशाप है। क्योंकि दुर्बलता से अन्य पापों को प्रोत्साहन मिलता है। कमजोर आदमी ही पाप में जल्दी प्रवृत्त होता है।
कमजोरी का मोटा अर्थ शारीरिक दुर्बलता से ही लिया जाता है और यही अधिक हानिकारक है। स्वर्गीय लोकमान्य तिलक ने कहा था--”शरीर को रोगी और दुर्बल रखने के समान दूसरा कोई पाप नहीं है।” क्योंकि शरीर के दुर्बल होने पर मनुष्य का मस्तिष्क भी दुर्बल हो जाता है और दुर्बल मस्तिष्क बुराइयों के द्वारा जल्दी ही घसीट लिया जाता है। दुर्बल व्यक्ति ही संसार में बुराइयों को प्रोत्साहन देते हैं। दुःखों की जड़ दुर्बलता ही है। मिल्टन ने कहा है-- “कमजोर होना ही दुःखी होना है।” स्वामी विवेकानन्द ने कहा है--कमजोरी कभी न हटने वाला बोझ और यन्त्रणा है, दुर्बलता का नाम ही मृत्यु है।“ हमारे बहुत से दुःखों का कारण यह दुर्बलता ही है।
संसार में अत्याचार, पीड़ा, जुल्म, बुराइयों की खुराक दुर्बलता है। मिल्टन ने कहा है-”सारी दुर्जनता दुर्बलता की ही लेन है।” विचार कीजिए जिसमें कोई शक्ति नहीं है, जिसमें साहस नहीं, वह अपने या अपने पड़ौसी पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध कैसे आवाज उठा सकेगा? अत्याचार सहन करना, उसे समाज में होते देखना भी कम पाप नहीं है। इससे दूसरों को जुल्म करने का प्रोत्साहन मिलता है।
इस संघर्ष प्रधान संसार में ससम्मान जीवित रहने का हक उन्हीं को है, जो शक्तिवान है। कहावत है--’दुनिया में कमजोरों को जीने का हक नहीं है।’ जो दुर्बल हैं--कमजोर हैं, उन्हें यह संसार अधिक दिन जीवित नहीं रहने देता। प्रकृति भी उनसे जीने का हक छीन लेती है।
संसार कर्म भूमि है और शक्तिवान ही कुछ कर सकता है। दुर्बल - क्षीणकाय व्यक्ति यहाँ क्या कर सकता है, वह तो उल्टा दूसरों पर भार बन कर रहता है। इस तरह का परावलम्बी, पराधीन जीवन अपने आपमें एक अभिशाप है। जो व्यक्ति, जो समाज दुर्बल होता है, उसे दूसरों के अत्याचार सहन करने पड़ते हैं, गुलामी का जीवन बिताना पड़ता है। अपनी स्वाधीनता की रक्षा वे ही लोग कर सकते हैं, जो शक्तिशाली होते हैं। इसीलिए स्वतन्त्रता की बात कहने से पहले स्वामी विवेकानंद ने भारतीयों को शक्तिशाली बनने के लिए--शक्ति की उपासना के लिए-कहा था, उन्होंने बड़े ही मार्मिक शब्दों में भारतीयों की कमजोरी के बारे में कहा था--”हमारे शस्त्र कितने ही बड़े क्यों न हों, हमारे पूर्वज कितने ही महान् क्यों न हों, लेकिन मैं आपसे स्पष्ट भाषा में कह देना चाहता हूँ कि हम बड़े ही दुर्बल हैं। प्रथमतः हम शरीर से दुर्बल हैं फिर मस्तिष्क से। हम एक साथ मिल नहीं सकते। एक दूसरे से प्रेम नहीं करते। हम तीन मनुष्य एकत्र होते ही एक दूसरे से घृणा करते हैं। ईर्ष्या करते हैं, लड़ते झगड़ते हैं। हम बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, सोचते-विचारते हैं, लेकिन करते कुछ नहीं।”
लौकिक जीवन की भाँति ही आध्यात्मिक क्षेत्र में भी कमजोर व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता। शास्त्रकार ने कहा--”नायमात्मा बल हीनेन लभ्य” बल हीन व्यक्ति आत्मवान् नहीं बन सकता। महर्षि रमण से एक बार उनके एक अनन्य भक्त तथा प्रतिष्ठित व्यक्ति ने ब्रह्म-दीक्षा के लिए कहा। लेकिन वे सज्जन रुग्ण थे। महर्षि ने कहा--”छिद्रयुक्त घड़े में पानी नहीं ठहर सकता।” तात्पर्य था रुग्ण शरीर आध्यात्मिक दीक्षा के लिए अयोग्य होता है।
खेद है लोग अपनी शारीरिक, मानसिक, साँसारिक शक्तियों को न बढ़ाकर प्रथम प्रयत्न में ही अध्यात्मवादी बन जाना चाहते हैं। कैसी विडम्बना है। इस भूल को बताते हुए स्वामी विवेकानन्द ने कहा था--”सर्वप्रथम आपको बलवान बनना होगा, धर्म पीछे आयेगा। तुम सभी भाँति बलवान बनो, यही मेरा उपदेश है तुम्हारे लिए। गीता-पाठ नाम-जप करने की अपेक्षा तुम फुटबाल खेलने से स्वर्ग के अधिक समीप पहुँचोगे। बलवान शरीर, मजबूत पुट्ठों से तुम गीता को अधिक समझ सकोगे। शरीर में ताजा रक्त होने से तुम श्रीकृष्ण की महती प्रतिभा और महान् तेजस्विता को अच्छी तरह समझ सकोगे। जिसका शरीर और मन रुग्ण है, दुर्बल है, वह आध्यात्मिक तेजस्विता को कैसे धारण कर सकेगा? कठोर साधनायें वह कैसे कर सकेगा? और तो और कमजोर की तो दैव भी सहायता नहीं करता। नीतिकार ने कहा है--”देवोऽपि दुर्बल घातकः” कमजोर को तो देवता भी मारता है।
हमारे जीवन के अधिकाँश क्लेश, दुःख, अशान्ति, पीड़ा, असफलताओं का मुख्य कारण हमारी दुर्बलता ही होती है। जब कि हम इनके लिए दूसरों को कोसा करते हैं, भाग्य को दोष देते हैं। यह दुर्बलता की खास पहचान है। कमजोर व्यक्ति ही शिकायतें अधिक करता है काम कम। दुर्बलता ही अन्याय-- और अन्यायी को आकर्षित करती है। जहाँ शक्ति होती है, वहाँ ये तत्व ठहर भी नहीं सकते।
मुख्यतया दुर्बलता तीन प्रकार की होती है-- शारीरिक जिसके बारे में ऊपर लिखा जा चुका है। किसी भी तरह का रोग, शारीरिक असमर्थता पहली दुर्बलता है फिर मानसिक दुर्बलता का नम्बर आता है। स्वतन्त्र विचार, क्षमता का अभाव, ईर्ष्या द्वेष, संकीर्णता, स्वार्थपरता, आदि मानसिक कमजोरी के अंतर्गत आते हैं। ऐसी स्थिति में लोग सदैव किसी भी तथ्य के अशुभ पहलू पर ही अधिक ध्यान देते हैं। आलोचना, शिकायत, दुर्भावनायें कमजोर मनोस्थिति में ही उपजती हैं। दुर्बल मनोभूमि का व्यक्ति सुख- सुविधापूर्ण जीवन में भी दुःखी और परेशान रहता है। अकारण ही भयभीत रहता है। ऐसे लोग कोई रचनात्मक, लाभप्रद कार्य नहीं कर पाते, उनकी शक्तियाँ सदैव रोने झींकने में ही खर्च हो जाती हैं। उन्हें संसार नारकीय यातनाओं का आगार जान पड़ता है।
मनुष्य की तीसरी दुर्बलता समाजगत होती है। इसमें भी दो मार्ग हैं- पहला सामूहिकता का अभाव दूसरा जीवन निर्वाह के साधनों में परावलम्बन। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज के साथ रहकर ही वह उन्नति, आत्म-रक्षा कर सकता है। इसलिए समाज का शक्तिशाली होना आवश्यक है और संगठन में ही समाज की शक्ति निर्भर करती है। जो मानव समुदाय संगठित न होगा वह कमजोर होता जायगा और यह कमजोरी उसके लिए पराधीनता, शोषण, अन्याय, उत्पीड़न आदि को सरलता से आमन्त्रित कर लेती है। हम संगठित नहीं थे, इसलिए हम पर विदेशियों ने आक्रमण किया, तरह-तरह के अत्याचार, अन्याय किये, सदियों हमें गुलामी में दिन बिताने पड़े। जब हम संगठित होकर खड़े हो गये तो इन समस्त जंजीरों को हमने जादू की तरह तोड़ फेंका। शक्तिशाली अंग्रेज शासन को भारत छोड़ना पड़ा।
जीवन निर्वाह के साधनों में मुख्य आर्थिक कमजोरी भी खास कर आज के अर्थ प्रधान युग में महत्वपूर्ण है। आर्थिक दृष्टि से हीन मनुष्य भली प्रकार जीवन बिता सके, अपने उत्तरदायित्व और कर्त्तव्यों का वहन कर सके, यह असम्भव है। भौतिक दृष्टि से भी मनुष्य को सम्पन्न होना आवश्यक अच्छी-अच्छी प्रतिभायें, पहलवानों कैसे शरीर, स्वस्थ मन भी आर्थिक समस्याओं में उलझ कर, चिन्ता में पड़कर रुग्ण हो जाते हैं।
अपनी शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक कमजोरियों को दूर करने का पूरा-पूरा प्रयत्न कीजिए। स्मरण रखिए दुर्बलता ही मृत्यु का दूसरा नाम है। शक्तिशाली बनिए। शक्ति ही जीवन का पर्याप्त है। अपने शरीर को, मन को शक्तिशाली बनाइए। संगठित हूजिए। जीवन निर्वाह के साधन, उपकरण, पदार्थों में आत्म-निर्भर बनिए। भौतिक सम्पत्तियाँ बढ़ाइए। इस तरह का सर्वांगपूर्ण शक्ति संपन्न जीवन ही सच्चे अर्थों में जीवन है।
विश्व मानव की समस्या पर प्रकाशपूर्ण साहित्य के निर्माता - महामनीषी टॉलस्टाय यों रूस के नागरिक थे, पर जो कुछ उन्होंने सोचा, किया और लिखा वह विश्व नागरिक के दृष्टिकोण का ही प्रतिनिधित्व करता है। उनने संसार की विविध समस्याओं पर जिस उद्दात्त भावना के साथ विचार किया और हल खोजा, यदि वह दूसरे लोगों को भी पसन्द आ गया होता तो निस्संदेह आज यह संसार कहीं अधिक बेहतर स्थिति में होता।
रूस के सम्मानित काउण्ट परिवार में तूला जिले के एक छोटे गाँव में टॉलस्टाय सन् 1822 में जन्मे। दो वर्ष की आयु में माता और नौ वर्ष की आयु में पिता चल बसे तो दूर के रिश्ते की चाची ने उन्हें पाला। मैट्रिक पास करके वे विश्व साहित्य में बिखरे हुए ज्ञान का लाभ उठाने के लिए विदेशी भाषाएं पढ़ने बैठे, पीछे वे कानून पढ़ने लगे। इसी बीच राष्ट्र की रक्षा का प्रश्न सामने आया, तो वे पढ़ाई छोड़कर सेना में भर्ती हो गये। काकेशस की लड़ाइयों में उनने बहादुरी के साथ भाग लिया। बाद में सेवेस्तोपोल की लड़ाई में भी मोर्चे पर गये। इस बीच तीन अवसर ऐसे आये कि वे मौत के मुँह में जाने से बाल - बाल ही बचे।
युद्ध के समय जो कुछ उन्होंने देखा सुना, उससे उनकी अन्तरात्मा पर स्थायी प्रभाव पड़ा और युद्धों का अन्त करके स्थायी शान्ति का आधार खोजने के लिए वे कार्य करने लगे। सेना की नौकरी छोड़ दी और एक विचारक के रूप में मानव जीवन का स्वरूप समझने और समझाने के लिए तत्पर हुए। उन्होंने बहुत पढ़ा, बहुत सोचा और अन्त में अपनी निष्ठाओं को जन-साधारण के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए एक साहित्य-निर्माता के रूप में कार्य-क्षेत्र में उतरे। यह कार्य उन्होंने आत्मालोचना से प्रारम्भ किया। अपने निज के अन्तर्द्वन्द्वों, दोष, दुर्गुणों, दुर्बलताओं की कठोर आलोचक की तरह उन्होंने समीक्षा की। सच्चे समीक्षक का गुण है भी यही कि जिस तरह दूसरों के दोष दुर्गुणों की वह चर्चा करता है, उससे भी अधिक कठोरता के साथ यदि अपनी समीक्षा कर सके तो ही उसकी सच्चाई स्वीकार की जा सकती है। ‘टॉलस्टाय की डायरी’ उनके विनिर्मित साहित्य की अमर रचना है। इतना कठोर, इतना नग्न आत्मालोचन शायद ही किसी आत्म - कथा लेखक ने उस समय तक किया हो।
अब उन्होंने अन्य रचनाएं भी लिखनी आरम्भ कीं, जो उस समय की पत्र - पत्रिकाओं में आदरपूर्वक छपने लगीं। ‘शैशव’ नाम की उनकी सर्वप्रथम कहानी बिना लेखक का नाम प्रकट किये छपी तो उसकी प्रशंसा उस समय के प्रसिद्ध कथाकार तुर्गनेव ने भी की। इसके बाद उनकी ‘किशोरावस्था’ और ‘यौवन कथाएँ’ भी इसी प्रकार प्रसिद्ध हुईं। उनकी प्रतिभा इन कथाओं में व्यक्त परिस्थितियों के मूल्याँकन की शैली में ऐसी अच्छी तरह उभरी रहती कि पाठक उन्हें पढ़कर प्रभावित हुए बिना रह नहीं सकता था।
टॉलस्टाय जानते थे कि विशाल अध्ययन के बिना कोई व्यक्ति सही अर्थों में साहित्यकार नहीं बन सकता। जिसका ज्ञान संचय जितना स्वल्प है उसकी विचारणा भी उतनी ही संकुचित होगी। विशाल दृष्टिकोण का परिष्कार विशाल अध्ययन पर निर्भर रहता है। इसलिए उन्होंने अपनी ज्ञान वृद्धि के लिए अधिक प्रयत्न किया। रूसी भाषा में जो कुछ उनके काम का था, वह सब कुछ पढ़ डाला। इसके अतिरिक्त अन्य भाषाओं में जो उत्कृष्ट है, उसे समझने के लिए उन्होंने फ्राँसीसी, जर्मन, अरबी, ग्रीक, लैटिन, तुर्की, हिब्रू, इटालवी आदि भाषाएं पढ़ीं और उनमें लिखे गये श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन किया। गद्य की ही तरह उन्हें पद्य से भी प्रेम था। उन्होंने संगीत सीखा और गायन तथा वाद्य की कला में अच्छी प्रगति कर ली। अपनी ज्ञान पिपासा तृप्त करने के लिए वे विदेशों में गये और वहाँ उन्होंने बहुत कुछ सीखा समझा। इस बीच में उनकी कितनी ही रचनाएँ पत्र - पत्रिकाओं में छपती रहीं और कई पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं।
काउण्ट की आयु 34 वर्ष की हो चुकी थी। अब उसके विवाह का अवसर आया। सोफिया नामक 18 वर्षीय लड़की से उनकी घनिष्ठता बढ़ी। विवाह की बात पक्की हो गई तो उन्होंने अपनी डायरी उस लड़की को दे दी जिसमें उनके अब तक के जीवन की सभी कुत्सित घटनाओं का नग्न चित्र अंकित था। जुआ, शराबखोरी, व्याभिचार आज तक जो भी उचित अनुचित किया था वह सभी कुछ उसमें लिखा था। सोफिया उसे पढ़कर बहुत खिन्न हुई और सारी रात रोती रही। उसने अपने भावी पति का जो आदर चित्र मन में संजो रखा था वह इस डायरी ने चकनाचूर कर दिया। फिर भी उसने इतना तो माना कि यह व्यक्ति सच्चा और ईमानदार है। मुझे धोखे में रखकर प्रेम करने की अपेक्षा सच्चाई प्रकट करके सम्बन्ध टूटने का खतरा तक उठाने को तैयार है। ऐसे ईमानदार व्यक्ति संसार में मिलते नहीं। उसने इस सच्चाई और ईमानदारी को टॉलस्टाय का सबसे बड़ा गुण माना जिसके सामने अन्य सभी दोष तुच्छ हैं। सोफिया ने विवाह स्वीकार कर लिया और उन दोनों का दाम्पत्ति जीवन अन्त तक ईमानदारी और वफादारी के सुदृढ़ सूत्र में बँधा रहा।
टॉलस्टाय की भौतिक महत्वाकाँक्षायें समाप्त हो गईं। धन, यश या शान-शौकत को ओछेपन का चिन्ह मानने लगे और जीवन का स्वरूप अपने आदर्शों के अनुरूप ढालने का प्रयत्न करने लगे। शहर छोड़कर वे अपनी जन्मभूमि गाँव, यास्नाया पोल्याना चले गये और वहाँ निर्धन किसानों के बीच उन्हीं में घुल मिलकर सेवा कार्य करने लगे। बच्चों के लिए उन्होंने एक पाठशाला खोली, अशिक्षितों को पढ़ाया तथा ग्रामीणों का स्तर उठाने के लिए जो कुछ कर सकते थे करने लगे। उस समय की प्रचलित शिक्षा प्रणाली उन्हें बहुत दोषपूर्ण लगती थी अतएव उसके सुधार के लिए प्रयत्न करते थे। इस सम्बन्ध में अनेक लेख लिखे, अधिकारियों से अनुरोध किए तथा अपने चलाये स्कूल में सुधरी हुई शिक्षा पद्धति का नमूना प्रस्तुत किया। बच्चों के लिए उन्होंने साहित्य भी लिखा जिसमें तीन रीछों की कहानी बहुत ही लोकप्रिय हुई। उनके यह शिक्षा सुधार के प्रयत्न निष्फल नहीं गये। अधिकारियों ने उनके सुझावों में से कुछ को मान लिया और सरकार द्वारा कई प्रकार के हेर फेर भी किए गये।
टॉलस्टाय इस बात के पक्ष में थे कि उनकी जो भी कृति हो वह उत्कृष्ट हो। बेगार भुगतने की तरह उलटा सीधा कोई काम फूहड़ ढंग से करके रख देने के वे घोर विरुद्ध थे। वे कहा करते -- “मनुष्य की कृतियाँ ही उसके गौरव का चिन्ह हैं। यदि वे फूहड़ ढंग से की गई हैं तो अपने कर्ता के ओछेपन की चुगली सदैव करती रहेंगी और उसे लज्जित होने का साधन बनेंगी। इसलिए प्रत्येक आत्मसम्मान रखने वाले व्यक्ति को अपना हर काम इतने मनोयोग, परिश्रम एवं सुघड़ ढंग से करना चाहिए कि उसे लोक-सम्मान ही नहीं आत्म-सन्तोष भी मिले। “ उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘युद्ध और शान्ति’ तथा ‘अन्ना कैरिनिना’ विश्व साहित्य में अमर स्थान रखते हैं। उनके लिखने में उन्होंने प्रायः छह छह वर्ष लगाये। सैकड़ों पुस्तकें ढूँढ़ी, ऐतिहासिक सामग्री जमा की, पाण्डुलिपियों को वे बार - बार पढ़ते और उनमें बार-बार संशोधन करते थे। इस प्रकार वे रचनाएं कई-कई बार नए सिरे से लिखे जाने के उपरान्त ही इस योग्य समझी जातीं कि वे प्रेस में छपने दी जा सकें। उतावले नौसिखिए लेखक जो बिना किसी तैयारी के यों ही लिखना आरम्भ कर देते हैं और न छप सकने पर दूसरों पर दोष मढ़ते हैं, उन्हें टॉलस्टाय की शैली एक महत्वपूर्ण मार्ग दर्शन करती है। अच्छी वस्तु तैयार करने के लिए अपनी चीज को कड़ी समीक्षा की कसौटी पर कसते हुए उसमें ठोस तथ्यों का बाहुल्य, भावपूर्ण शैली में लिखने की कला सीखना आवश्यक है। यह कार्य धैर्य स्वाध्याय अभ्यास और अध्यवसाय के आधार पर ही संभव है। विश्व साहित्य के अमर निर्माता महर्षि टॉलस्टाय ने जो कुछ लिखा वह उनकी जीवन साधना का चिन्तन और मनन का, तप और आदर्श का मूर्तिमान प्रतिफल ही कहे जा सकने योग्य है।
समारा में उन्होंने एक नई जमीन खरीदी और वहाँ कृषि करने लगे। हरे भरे खेतों में काम करते हुए उन्हें जो प्रेरणा मिलती वह उनकी भावना क्षेत्र में प्रवेश करके लेखनी द्वारा फूट पड़ती। प्रकृति के सान्निध्य में रहकर ही उनकी कला निखरी। समारा में जब दुर्भिक्ष पड़ा तो उन्होंने एक लोकसेवी की तरह पीड़ितों की सहायता के लिए कुछ उठा न रखा, सहायता-आश्रम खोला और आपत्ति ग्रस्तों की सहायता की। सहृदयता ही किसी कलाकार का सच्चा गुण हो सकता है। टॉलस्टाय में वह यदि पर्याप्त मात्रा में न होती तो वे एक लेखक भर रह जाते-महान मनीषी कभी भी न बन पाते।
उनके जीवन काल में ही उनकी ख्याति इतनी बढ़ गई थी कि सरकारी अत्याचारों के विरुद्ध बहुत कुछ करते रहने पर भी अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने से घबराते थे। उनके विचारों के प्रकाशन पर प्रतिबन्ध लगाये गए। जिन रचनाओं को प्रकाशित होने से रोक दिया गया उनकी टाइप की हुई प्रतियाँ प्रचारित होती थीं। इस अपराध में प्रचारकों को और उनके सचिव को गिरफ्तार किया गया। टॉलस्टाय ने सरकार को ललकारा कि इन निर्दोषों को पकड़ने की अपेक्षा सरकार मुझे पकड़े जेल या फाँसी जो भी चाहे दण्ड दे। अनीति के विरुद्ध आवाज उठाने वाला तो मैं हूँ इसलिए दण्ड भी मुझे ही मिलना चाहिए। इस ललकार को भी सरकार ने अनसुनी ही किया और उन पर मुकदमा चलाने का साहस न किया।
यह महान मनीषी व सच्चे धर्मात्मा थे, पर उनने चर्च के आडम्बरपूर्ण ढकोसलों को मानने से इनकार कर दिया। इस पर उन्हें अधार्मिक ठहराया गया और पादरियों ने बड़ा बवाल मचाया, पर वे बिना हिचक के भारी विरोध का सामना करते हुए अपनी मान्यताओं का प्रतिपादन करते रहे। वे जितने साहसी थे उतने ही सादगी प्रिय भी थे। वेशभूषा को देखकर अजनबी व्यक्ति उन्हें एक मामूली किसान ही समझता था। एक बार वे एक स्कूल का निरीक्षण करने जाने वाले थे। अध्यापकों ने उनके स्वागत की बड़ी तैयारी कर रखी थी। नियत समय पर जब वे स्कूल पहुँचे तो दरबान ने कहा-”ए, बुड्ढे एक तरफ बैठ, एक बड़े आदमी यहाँ आने वाले हैं।” बहुत प्रतीक्षा के बाद भी जब अतिथि न आए तो अध्यापकगण निराश होकर स्कूल बन्द करने लगे। एक कोने में बैठे इस बुड्ढे ने दरबान के आदेशानुसार एक तरफ बैठे रहने की बात कही तो सबको बड़ा संकोच हुआ और इनसे क्षमा माँगने लगे। इस महापुरुष की सादगी देखते ही बनती थी।
टॉलस्टाय ने आर्थिक समानता और विश्व बन्धुत्व के विचारों का प्रतिपादन किया था सो वे यह भी चाहते थे कि उनके पास जो कुछ भी है उसे वे किसानों और गरीबों में बाँट दें, उनकी रचनाएँ छपाने का सभी को अधिकार हो। पर उनकी धर्मपत्नी इससे सहमत न थी। उसके कितने ही अबोध बच्चे थे, जिनके निर्वाह और शिक्षा के लिए उन्हें अनिश्चित छोड़ दिये जाने का विरोध करती थी। इस प्रकार पारिवारिक कलह की नींव पड़ी और वह बढ़ती ही गई। एक दिन वे नाराज होकर घर से निकल पड़े और रेल द्वारा कहीं बाहर जा रहे थे कि रास्ते में ही बीमार हो गये। एक छोटे स्टेशन पर उन्हें उतारा गया और वहीं के स्टेशन मास्टर के घर पर उनका स्वर्गवास हो गया।
महात्मा गाँधी ने टॉलस्टाय के उदात्त विचारों से बड़ी प्रेरणा ली और उनका जीवन संग्राम प्रायः इन्हीं आदर्शों के अनुकूल प्रगतिशील हुआ। उन्होंने जो कुछ सोचा, लिखा कहा और किया वह इतना महान है कि उसकी प्रेरणा मानव जाति को चिरकाल तक अनुप्राणित करती रहेगी।
दमिश्क में एक बार बड़ा अकाल पड़ा। लोग बेमौत मरने लगे, जो जिन्दा थे वे सूखकर पिंजर हो रहे थे। इन्हीं दिनों एक अमीर से मेरी भेंट हुई। वह भी औरों की तरह ही सूख रहा था।
मैंने पूछा भला, आपको क्या कमी है। आपके पास तो खाने और ऐश करने की हर चीज मौजूद है फिर क्यों इस प्रकार सूख रहे हैं।
अमीर ने कहा- क्या वह तन्दुरुस्त आदमी सुखी हो सकता है, जिसकी बगल में बीमार पड़ा कराहता हो। आस -पास के लोग जब मुसीबतों से घिरे हों तो सुखी का सुख भी उसके लिए जहर बन जाता है।
-शेखवादी
हमारे देश के एक राजनयिक प्रतिनिधि इंग्लैंड गए हुए थे। उस समय वहाँ पैट्रोल पर कन्ट्रोल था। सरकारी कूपन से ही पैट्रोल मिल सकता था। उन्होंने भी सरकारी कार्यालय से कूपन प्राप्त कर लिए और एक टैक्सी किराए पर लेकर अपने काम पर निकले। कई दिनों तक वे अपने काम पर घूमते रहे। जब उन्हें स्वदेश रवाना होना था उनके पास बहुत से कूपन शेष रह गये। उन्होंने अपनी उदारता दिखाते हुए वे कूपन टैक्सी वाले को देते हुए कहा- ये आजकल बड़ी कठिनाई से मिलते हैं। इन्हें रखो काम आएंगे।” यह सुनकर टैक्सी वाले की आँखें चढ़ गईं। गुस्से के साथ वह बोला क्या आपने मुझे इतना नीच समझा है जो मैं चोरी के अनधिकृत कूपनों से लाभ उठाऊँ। जितना पैट्रोल मुझे नियमित रूप से मिलता है मैं उससे तनिक भी अधिक नहीं ले सकता यह तो अपनी सरकार के साथ, अपने देश के साथ धोखा है। क्या आपके यहाँ इसे बुरा नहीं समझा जाता।”
भारतीय राज पुरुष बड़े शर्मिन्दा हुए उन्होंने टैक्सी वाले से क्षमा माँगी। टैक्सी वाले ने आगे कहा- “मैं गत माह 10 दिन बीमार रहा इसीलिये जब पहली तारीख को कूपन लेने गया तो जितने कूपन मेरे पास बचे थे वे अपने कोटे में से कटवा दिए।”
घटना सामान्य-सी लगती है किन्तु उसमें कितनी देश भक्ति, सामाजिक, नागरिक उत्तरदायित्व की भावना सन्निहित है। शायद इसी प्रबल देशभक्ति और राष्ट्रीय भावना के कारण ब्रिटेन ने बड़ी-बड़ी लड़ाइयों में अपना बहुत कुछ गंवाकर भी अपने अस्तित्व को पूर्ववत् कायम रखा अपने देश के गौरव को जीवित रखा।
राजनैतिक दृष्टि से हम स्वतंत्र हो गये लेकिन अभी तक राष्ट्रीय भावना, नागरिक जिम्मेदारियों के प्रति हम सचेत नहीं हो पाये हैं। यही कारण है कि कन्ट्रोल के समय हमारे यहाँ काला बाजार जोरों से चलता है। अनाज के भण्डार भरे रहने पर भी कृत्रिम महंगाई पैदा करके अत्याधिक मुनाफा हम लोग कमाते हैं। और तो और सार्वजनिक निर्माण कार्यों में लगने वाले सामान यथा-सीमेन्ट, लोहा, कोलतार, लकड़ी आदि बहुत-सा सामान चोर बाजारों में बेच दिया जाता है और हमीं लोग सस्ता पाकर उसे खरीद लेते हैं, फिर भारी मुनाफे के साथ उसे बेचते हैं। कई महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ, दबा, मशीनें आदि जो बड़ी कठिनाई से प्राप्त विदेशी मुद्रा खर्च करके प्राप्त की जाती हैं हमारे यहाँ वे भी काले बाजार में पहुँच जाती हैं। ऐसी स्थिति में क्या हम एक स्वतन्त्र देश के उत्तरदायी नागरिक कहला सकते हैं?
सन् 1948 की बात है कि हमारे देश के एक केन्द्रीय मन्त्री राष्ट्रमण्डलीय सम्मेलन में भाग लेने इंग्लैण्ड गये थे। सभी प्रतिनिधियों को एक दिन भारत की ओर से दूसरे दिन इंग्लैण्ड की ओर से दावत दी गई। इनमें एक ही कम्पनी की एक ही किस्म की सिगरेटें काम में लाई गई थीं लेकिन दोनों दिन उनके स्वाद में बड़ा अन्तर था। बाह्य फर्क सिर्फ इतना था कि एक दिन काम में लाये गये पैकेट भारत से खरीदे थे जो अच्छे थे दूसरे पैकेट इंग्लैण्ड से ही खरीद कर आये थे। कम्पनी एक ही थी उसकी शाखा भारत में भी थी। पूछने पर ब्रिटेन के प्रतिनिधि ने बताया “महायुद्ध के कारण हमारे तम्बाकू के खेत बहुत नष्ट हो गये। हमारे पास थोड़ी-सी तम्बाकू रही है। उसमें से हम अच्छी किस्म को अलग से निकाल कर विदेशों में जाने वाली सिगरेटों के काम में लाते हैं ताकि बाहर हमारी साख नष्ट न हो। घटिया किस्म की तम्बाकू हम अपने ही देश में उपयोग करते हैं। इसीलिए आपको यह फर्क मालूम पड़ता है।”
कैसी उद्दात्त भावना है अपने देश के नाम व उसकी साख की रक्षा के लिए। यही कारण है कि आज भी इंग्लैण्ड संसार के बाजार में बहुत कुछ छाया हुआ है। वहाँ की बनी चीजें प्रामाणिक और मजबूत समझी जाती हैं। एक हमारे देश का उद्योगपति है जिसका उद्देश्य घटिया वस्तु तैयार करके अधिक मुनाफा कमाना अपना अधिकार और धर्म समझना है। कुछ समय पहले की बात है रूस ने करोड़ों रुपये के जूते इसलिए लौटा दिए क्योंकि वे दिखाए गए नमूने से बहुत ही घटिया किस्म के थे। जब भी हम बाजार में जाते हैं तो कई वस्तुओं की मजबूती, असलियत के बारे में विश्वास ही नहीं होता। कैसी विडम्बना है?
जहाँ एक ओर हमारे कन्धे पर अपनी स्वतन्त्रता का भार है, अपने देश की आन और साख का उत्तरदायित्व है वहाँ हमारी निम्न उत्पादन नीति, मिलावट, नकली सामान तैयार करना क्या एक बहुत बड़ा अपराध नहीं है?
इतना ही नहीं आवश्यकता पड़ने पर देश के लिए अपनी आवश्यकताओं को सीमित बनाना पड़ता है, थोड़े में गुजारा करना पड़ता है। कई वस्तुएं जिनके बिना हमारे जीवन क्रम में कोई विशेष बाधा न पड़े उनका त्याग भी करना पड़ता है। रूस में क्रान्ति हुई। देश प्राचीन सामन्तवादी शासन से मुक्त हुआ। जन- प्रतिनिधि के रूप में लेनिन ने देश की बागडोर अपने हाथों सम्भाली। उसके सामने देश का नव-निर्माण, औद्योगिक विकास का बहुत बड़ा काम था जो मशीनों वैज्ञानिक उपकरणों से ही सम्भव था। यह सब इंग्लैण्ड और अमेरिका के बाजारों में थे। इसके लिए रूस के पास विदेशी मुद्रा की कमी थी। अब रूस के सामने एक ही रास्ता था जंगली जानवर, लकड़ी, खाल, माँस, पनीर आदि पश्चिमी बाजारों में बेचकर विदेशी मुद्रा अर्जित की जाय और उससे मशीनें, उपकरण आदि मँगाये जायें। लगभग दस वर्ष तक रूसी जनता को तुला हुआ भोजन और मोटे कपड़े पर गुजारा करना पड़ा। बिना डॉक्टर के सर्टिफिकेट के किसी को पावभर दूध भी नहीं मिलता था। यहाँ तक कि बीमार प्रिंसक्रो-पाटकिन को भी दूध नहीं मिला था।
निस्सन्देह एक स्वतन्त्र देश के नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि अपने आराम के लिये, वह समाज की शक्ति को दुर्बल न करे। वरन् उसे परिपुष्ट करने के लिए अपनी बहुत सी आवश्यकताओं का स्वेच्छा से त्याग करने के लिए भी उद्यत रहे। आजकल हमारे देश में चीनी का संकट चल रहा है और एक हम हैं कि इस पर भी बड़ी दावतें, प्रतिभोज, शादी, विवाह पर खूब खर्च करते हैं।
जीवन निर्वाह की सीमित आवश्यकताओं के अतिरिक्त भोग-विलास, मौज-मजे, आराम-सुख-चैन की जिन्दगी बिताने के नाम पर हमारे यहाँ कितना अपव्यय होता है, सम्पत्ति, पदार्थों का कितना नाश होता है। लेकिन हम नहीं जानते कि व्यर्थ ही नष्ट किए जाने वाले पदार्थों को, बड़े भारी अपव्यय को रोककर यदि उसे हम राष्ट्र निर्माण की दिशा में लगावें तो कोई सन्देह नहीं कि कुछ ही समय में हमारा देश संसार में समृद्ध देशों की पंक्ति में खड़ा हो सकने योग्य बन जाय। भारत अपने आप में कोई गरीब नहीं है, पहले भी इसे सोने की चिड़िया कहा जाता था और आज भी सम्पदाओं की कोई कमी नहीं है हमारे यहाँ। यदि उत्पादन की उपयुक्त व्यवस्था, खर्च करने का सही ढंग और वस्तुओं का सदुपयोग भली प्रकार हो तो हमारे अभाव सब नष्ट हो जायें। किसी भी कारण हमारे देश के विकास क्रम में गतिरोध पैदा नहीं हो सकता।
एक स्वतन्त्र देश के नागरिक की हैसियत से हमें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिए, जिससे देश कमजोर हो, हमारे समाज की क्षमता नष्ट हो। चोरबाजारी, अधिक मुनाफाखोरी, घटिया उत्पादन, फिजूलखर्ची, वस्तु-पदार्थों का दुरुपयोग ये सभी हमारे लिए कलंक की बात हैं। इनसे देश का सामर्थ्य कमजोर होता है। ये हमारे गौरव और सम्मान के लिए विष हैं। इन्हें तो हमें छोड़ना-ही-छोड़ना है, आवश्यकता पड़ने पर अपना सब कुछ भी देश की समाज की बलिवेदी पर अर्पण करने में नहीं चूकना चाहिए। यही देशभक्ति का सबसे बड़ा तकाजा है।
सच मानिए, आप दुनिया के सबसे बड़े महान पुरुष हैं। पर एक ही दुर्गुण है आप में, और वह यह कि आप अपने महान गुणों को अपने में ही छिपाये रहते हैं, उन्हें प्रकाश में नहीं आने देते।
अणु विस्फोट में सबसे पहले जो चार वैज्ञानिक सफल हुए उनमें से एक लियो जिलार्ड भी थे। इस आविष्कार का पेटेण्ट भी अमेरिका में जिलार्ड और उनके एक साथी फरमी के नाम से ही हुआ था। अणु शक्ति के व्यावहारिक उपयोग और उसकी महती संभावनाओं से सुप्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता आइंस्टीन को जिलार्ड ने ही परिचित कराया था। आगे चलकर उसी आधार पर मैनहटन योजना को स्वीकार करते हुए प्रेसीडेण्ट रुजवेल्ट ने अणु बम बनाने की स्वीकृति दी थी और तभी से संसार में यह नया आतंक जन्मा।
अणु अन्वेषणों के सम्बन्ध में निरन्तर संलग्न रहते हुए उनका शरीर किसी प्रकार रेडियो सक्रियता से प्रभावित हो गया और उन्हें ऐसे केन्सर से ग्रस्त होना पड़ा, जिसका कोई इलाज न था। डॉक्टर उन्हें असाध्य घोषित कर चुके थे, मृत्यु उनकी सुनिश्चित हो चुकी थी, इस सर्वविदित तथ्य से परिचित हो जाने पर कभी-कभी उनके मित्रगण विदाई की भेंट करने के लिए आया करते थे।
इन भेंट करने वाले मित्रों ने जिलार्ड की मृत्यु के उपरान्त जो संस्मरण लिखे हैं, उनसे विदित होता है कि अन्तिम समय तक निराशा, खिन्नता और उदासी उन्हें स्पर्श तक कर सकने में असमर्थ रहीं। वे अपने डाक्टरों को अपनी चिकित्सा के सम्बन्ध में परामर्श देते और वे जो भूल करने वाले थे उसे समझाते हुए “रेडियोलोजी” के रहस्यों को समझाते हुए बताते कि इस तरह के रोगों में क्या उपचार कितना उपयोगी और कितना निरुपयोगी हो सकता है? डॉक्टर उनकी उपचार व्यवस्था करने से पूर्व अणु रोगों की चिकित्सा के बारे में भी सिद्धान्तों का निर्धारण उन्हीं के परामर्श से करते।
नार्मन कजिन्स ने अपनी मुलाकात का वर्णन करते हुए लिखा है- उनकी मेज पर अनेकों महत्वपूर्ण कागजों का ढेर लगा था। जिनमें निशस्त्रीकरण अभियान सम्बन्धी साहित्य की पाण्डु लिपियाँ, संस्करण, शोध कार्यों की पृष्ठभूमि तथा अनेक वैज्ञानिक विवेचनाओं की रूप-रेखाएँ भरी पड़ी थीं। वे उन ग्रन्थों को नियमित रूप से लिखते और संसार भर के वैज्ञानिकों की विभिन्न जिज्ञासाओं से भरे उनके पत्रों के लम्बे उत्तर स्वयं ही लिखते। कोई मिलने वाला आता तो चुटकुले सुनाकर उसे हँसाते और उस हँसी में स्वयं भी खो जाते। सहानुभूति प्रकट करने, सान्त्वना देने के उद्देश्य से आने वाले मित्र वहाँ दूसरा ही वातावरण देखते तो दंग रह जाते। वहाँ मौन की मनहूसी नहीं, वरन् जिन्दगी की अठखेलियाँ काम कर रही होतीं, जिनका स्पर्श करके सहानुभूति का प्रदर्शन करने आने वाले आगन्तुक उल्टे सहानुभूति के पात्र होकर वापिस लौटते।
जिलार्ड ने विज्ञान की शोध के लिए जीवन भर बहुत काम किया। उन्होंने प्राणि-शास्त्र, जीव - विज्ञान, भूगर्भ, अणु विज्ञान एवं रेडियोलौजी के सम्बन्ध में अनेक तथ्यों की शोध की और उन खोजों से विज्ञान क्षेत्र में भारी लाभ उठाया गया। जीवन के अन्तिम दिनों में वे अणु शस्त्र की विभीषिका और उसके कारण मानव जाति के होने वाले अहित की चेतावनी संसार को देने में लगे हुए थे। उनका मत था कि अणु शक्ति को विश्व संघ द्वारा ऐसे नियन्त्रण में रखा जाय जिससे उसका उपयोग ध्वंसात्मक कार्यों में नहीं, वरन् रचनात्मक प्रयोजनों के लिए ही किया जाय। विज्ञान का विस्तार करना ही नहीं, उसका सदुपयोग भी उन्हें अभीष्ट था।
इस महान् वैज्ञानिक ने अपनी अन्तिम साँसें काम करते करते ही पूरी कीं। जब तक उनका शरीर कुछ भी करने योग्य रहा वे बराबर अपने महान् विज्ञान के लिए काम करते रहे। बिस्तर पर पड़े-पड़े भी वे दूसरे वैज्ञानिकों को परामर्श देते और उनका मार्ग दर्शन करते, ग्रन्थ लिखते और विचारणा द्वारा शोध में निमग्न रहते। मरने के अंतिम क्षण तक वे हँसते मुस्कुराते रहे और आगे क्या करना है, इसी की चर्चा करते रहे। मृत्यु का भय उन्हें छू भी न सका। निराशा और खिन्नता को उन्होंने पास भी न फटकने दिया क्योंकि वे जिन्दगी का स्वरूप जानते थे और समझते थे कि जब आत्मा की मृत्यु होती ही नहीं, शरीर मात्र ही बदलता है तो मरने से डरने की बात ही क्या रह जाती है। विज्ञान केवल भौतिक पदार्थों के ही नहीं, जीवन विद्या के क्षेत्र में भी प्रवेश करता है। सच्चे वैज्ञानिक की तरह उनने जिन्दगी को भी वैज्ञानिक ढंग से ही जी कर दिखाया।
गृहस्थ - धर्म अन्य सभी धर्मों से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। महर्षि व्यास के शब्दों में “गृहस्थ्येव हि धर्माणा सर्वेषाँ मूल मुच्यते” गृहस्थाश्रम ही सर्व धर्मों का आधार है। “धन्यो गृहस्थाश्रमः” चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम धन्य है। जिस तरह समस्त प्राणी माता का आश्रय पाकर जीवित रहते हैं, उसी तरह सभी आश्रम गृहस्थाश्रम पर आधारित हैं।
परिवार-संस्था सहजीवन के व्यावहारिक शिक्षण की प्रयोगशाला है। इसीलिए कुटुम्ब समाज संस्था की इकाई माना जाता है। गृहस्थ में बिना किसी संविधान, दण्ड-विधान, सैनिक शक्ति के ही सब सदस्य परस्पर सहयोगी सह-जीवन बिताते हैं। माता, पिता, पुत्र, पति-पत्नी, नाते-रिश्तों के सम्बन्ध किसी दण्ड के भय अथवा कानून की प्रेरणा पर कायम नहीं होते, वरन् वे स्वेच्छा से कुल धर्म कुल परम्परा, आनुवंशिक संस्कारों पर निर्भर करते हैं। प्रत्येक सदस्य अपनी-अपनी मर्यादाओं का पालन करने में अपनी प्रतिष्ठा, कल्याण, गौरव की भावना रखकर खुशी-खुशी उन्हें निभाने का प्रयत्न करता है। कुटुम्ब के साथ सह-जीवन में आवश्यकता पड़ने पर प्रत्येक सदस्य अपने व्यक्तिगत सुख स्वार्थों का त्याग करने में भी प्रसन्नता अनुभव करता है। यही सह-जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता होती है। बिना अपने स्वार्थों का त्याग किये, कष्ट सहन किये सह- जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती और उसमें भी विशेषता यह है कि यह त्याग-सहिष्णुता स्वेच्छा से खुशी के साथ वहन की जाती है। सह-जीवन के लिए ऐसा शिक्षण और कहाँ मिल सकता है?
कुटुम्ब के निर्माण के लिए फिर किसी कृत्रिम उपाय, संकल्प विधान की आवश्यकता नहीं होती। परिवार अपने आप में ‘स्वयं-सिद्ध’ संस्था है। माता-पिता, भाई-बहन, चाचा-ताऊ, पुत्र आदि के चुनाव करने की आवश्यकता नहीं होती। जहाँ गृहस्थ है, वहाँ ये सब तो हैं ही। और इन सम्बन्धों को स्थिर रखने के लिए किसी कृत्रिम उपाय की भी आवश्यकता नहीं होती। कुटुम्ब तो सहज आत्मीयता पर चलते हैं।
कहावत है-”पानी की अपेक्षा खून अधिक गाढ़ा होता है, इसलिए एक ही जलाशय के पास बसने वालों की अपेक्षा एक ही कुटुम्ब में बँधे लोगों के सम्बन्ध अधिक प्रगाढ़ आत्मीय, अभेद्य होते हैं।” कितना ही बैर भाव क्यों न पैदा हो जाय लेकिन खून का असर आदमी के दिल और दिमाग से हट नहीं सकता। एक खून का व्यक्ति अपने साथी से स्वयं लड़ लेगा लेकिन दूसरे का आक्रमण बर्दाश्त नहीं करता। दुनिया में सब सम्बन्ध परिस्थिति वश टूट सकते हैं लेकिन खून का नहीं। कोई पुत्र अपने पिता से यह नहीं कह सकता कि मैं तुम्हारा बेटा नहीं। कोई भाई अपनी बहन से यह सिद्ध नहीं कर सकता कि “मैं तुम्हारा भाई नहीं।” खून का सम्बन्ध स्वयं सिद्ध है। एक माता-पिता अपने पुत्र के लिए जितना सोच सकते हैं, उतना हृदयपूर्वक अन्य नहीं सोच सकता। इसमें कोई सन्देह नहीं कि एक ही खून से सींची हुई कुटुम्ब संस्था गृहस्थ जीवन का अलौकिक चमत्कार है।
गृहस्थ का आधार है, वैवाहिक जीवन। स्त्री और पुरुष विवाह-संस्कार के द्वारा गृहस्थ जीवन में प्रवेश करते हैं। तब वे गृहस्थाश्रमी कहलाते हैं। स्मरण रहे विवाह संस्कार का अर्थ दो शरीरों का मिलन नहीं होता। हमारे यहाँ विवाह स्थूल नहीं, वरन् हृदय की, आत्मा की, मन की एकता का संस्कार है। जो विवाह को शारीरिक निर्बाध कामोपभोग का सामाजिक स्वीकृति-पत्र समझते हैं, वे भूल करते हैं। वे अज्ञान में हैं। विवाह का यह प्रयोजन कदापि नहीं है। भारतीय जीवन पद्धति में उसका उद्देश्य बहुत बड़ा है, दिव्य है , पवित्र है। विवाह के समय वर कहता है-
“द्यौरहं पृथ्वी त्वं सामाहम्हक्त्वम्।
सम्प्रिदौ रोचिष्णू सुमनस्यमानौजीवेव शरदः शतम्॥”
“मैं आकाश हूँ, तू पृथ्वी है। मैं सामवेद हूँ, तू ऋग्वेद है। हम एक दूसरे पर प्रेम करें। एक दूसरे को सुशोभित करें। एक दूसरे के प्रिय बनें। एक दूसरे के साथ निष्कपट व्यवहार करके सौ वर्ष तक जियें।”
यही कहीं नहीं कहा है कि पति और पत्नी दो शरीर हैं। उन दोनों शरीरों का मिलन ही विवाह है अथवा भोगासक्त जीवन बिता कर अल्प- मृत्यु प्राप्त करना ही विवाह है।
आकाश और पृथ्वी का सहज मिलन पति पत्नी के सम्बन्धों का अपूर्व आदर्श है। विवाह ज्ञान और कला का संगम है। प्रेम के लिए एक दूसरे को अर्पण कर देने का विधान है, दो हृदयों को निष्कपट- खुले व्यवहार सूत्र में पिरोने का विधान है। विवाह संयमपूर्वक लेकिन आनन्दमय जीवन बिताकर पूर्ण आयु प्राप्त करने का सहज मार्ग है।
गृहस्थ का उद्देश्य स्त्री - पुरुष एवं अन्य सदस्यों का ऐसा संयुक्त जीवन है जो उन्हें शारीरिक सीमाओं से ऊपर उठा कर एक दूसरे के प्रति निष्ठा, आत्मीयता, एकात्मकता की डोर में बाँध देता है। यह डोर जितनी प्रगाढ़ - पुष्ट होती जाती है, उतनी ही शारीरिकता गौण होती जाती है। ऐसी परिस्थिति में शरीर भले ही रोगी, कुरूप हो जावे लेकिन पारस्परिक निष्ठा कम नहीं होती।
एक स्त्री ही संसार में सबसे सुन्दर और गुणवती नहीं होती, लेकिन पति के लिए सृष्टि में उसके समान कोई नहीं। संसार में सभी माँ एक सी नहीं होतीं, लेकिन प्रत्येक माँ अपने बच्चे के लिए मानो ईश्वरी वात्सल्य की साकार प्रतिमा है। एक गरीब कंजर अशिक्षित माँ के अंक में बालक को जो कुछ मिल सकता है, वह किसी दूसरी स्त्री के पास नहीं मिल सकता। प्रत्येक बालक के लिए माँ उसकी जननी ही हो सकती हैं और काना, कुरूप, गन्दा, अविकसित बालक भी माँ के लिए सबसे अधिक प्रिय होता है। धर्म की बहन कितनी ही बना ली जाएं लेकिन भाई के लिए जो उमड़ता-घुमड़ता हृदय एक सहोदर बहन में हो सकता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इस तरह हम देखते हैं कि गृहस्थाश्रम शारीरिक सम्बन्धों पर टिका हुआ नहीं है। अपितु स्नेहमय, दिव्य, सूक्ष्म आधार स्तम्भों पर इस पुण्य भवन का निर्माण होता है। पारिवारिक जीवन में परस्पर सम्बन्धों की यह दिव्यता ही गृहस्थ जीवन की आत्मा है।
गृहस्थाश्रम वृत्तियों का शोधन करना जीवन की साधना की एक रचनात्मक प्रयोगशाला है। मनुष्य की काम वासना को पति-पत्नी में एक दूसरे के प्रति कर्त्तव्य, निष्ठा, प्रेम में परिवर्तित कर कामोपभोग को एक साँस्कृतिक संस्कार बनाकर सामाजिक मूल्य में बदल देना गृहस्थाश्रम की ही देन है। स्मरण रहे गृहस्थाश्रमी शरीर-निष्ठ अथवा रूप-निष्ठ नहीं होता। कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व, प्रेम की निष्ठा ज्यों-ज्यों बढ़ती है, शारीरिकता नष्ट होने लगती है और क्रमशः पूर्णरूपेण शारीरिकता का अन्त होकर उक्त दिव्य आधार मुख्य हो जाते हैं। कामुकता भी नष्ट हो जाती है। इसलिए गृहस्थाश्रम कामोपभोग का प्रमाण-पत्र नहीं, अपितु संयम-ब्रह्मचर्य मूलक है। संयम का एक क्रमिक लेकिन व्यावहारिक साधना स्थल है। सेवा-शुश्रूषा, पालन-पोषण, शिक्षण एक दूसरे के प्रति प्रेम, त्याग, सहिष्णुता के माध्यम से मनुष्य की कामशक्ति संस्कारित, निर्मल होकर मनुष्य को व्यवस्थित संगत, दिव्य बनाने का आधार बन जाती है।
गृहस्थ तप और त्याग का जीवन है। गृहस्थी के निर्वाह-पालन के लिये किए जाने वाला प्रयत्न किसी तप से कम नहीं है। कुटुम्ब का भार वहन करना, परिवार के सदस्यों को सुविधापूर्ण जीवन के साधन जुटाना, स्त्री, बच्चे, माता, पिता, अन्य परिजनों की सेवा करना बहुत कठिन तपस्या है। गृहस्थ में स्वयमेव मनुष्य को अपनी अनेकों प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाना पड़ता है। कोई भी गृहस्थ स्वयं कम खा लेता है, पुराना कपड़ा पहन लेता है, लेकिन परिवार के सदस्यों की चिकित्सा, वस्त्र, भोजन, बच्चों की शिक्षा-दीक्षा के लिए सब प्रबन्ध करता है। पेट काट कर भी माँ-बाप बच्चों को पढ़ाते हैं। फटा कपड़ा स्वयं पहनकर बच्चों को अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनाते हैं। गृहस्थ में जिम्मेदार व्यक्ति के सामने अन्य सदस्यों को सुखी सन्तुष्ट रखने का ध्यान प्रमुख होता है, स्वयं का गौण। उधर गृहिणी सबसे पीछे जो बच जाता है, वह खा लेती है। सबकी सेवा में दिन-रात लगी रहती है। बिना किसी प्राप्ति की इच्छा से सहज रूपेण। सचमुच गृहस्थाश्रम एक यज्ञ है तप और त्याग का। प्रत्येक सदस्य उदारतापूर्वक सहज ही एक दूसरे के लिए कष्ट सहता है, एक दूसरे के लिए त्याग करता है।
गृहस्थाश्रम समाज को सुनागरिक देने की खान है। भक्त, ज्ञानी, सन्त, महात्मा, महापुरुष, विद्वान, पण्डित, गृहस्थाश्रम से ही निकल कर आते हैं। उनके जन्म से लेकर शिक्षा-दीक्षा, पालन-पोषण, ज्ञान-वर्धन गृहस्थाश्रम के बीच ही होता है। परिवार के बीच ही मनुष्य की सर्वोपरि शिक्षा होती है।
गृहस्थाश्रम की सर्वोपरि उपलब्धि है उसका आतिथ्य धर्म। आतिथ्य धर्म कितना बड़ा सामाजिक मूल्य है। जिसे कहीं भोजन न मिले, जो संयोग से ही पहुँच जाय उसे भोजन कराये बगैर गृहस्थी भोजन नहीं करता। गाँव के पास -पड़ौस में कोई भूखा न रह जाय, इसके लिए प्रतिदिन नियम पूर्वक किसी अतिथि को भोजन कराये बिना कुछ भी न खाना, हमारे यहाँ गृहस्थाश्रम की अभूतपूर्व देन है। असंख्यों असमर्थ, अपाहिज अथवा अन्य उच्च कार्यों में लगे त्यागी तपस्वी, संन्यासी, सेवकों का जीवन निर्वाह गृहस्थाश्रम से ही होता है।
गृहस्थाश्रम समाज के संगठन, मानवीय मूल्यों की स्थापना, समाज निष्ठा, भौतिक विकास के साथ-साथ मनुष्य के आध्यात्मिक-मानसिक विकास का क्षेत्र है। गृहस्थाश्रम ही समाज के व्यवस्थित स्वरूप का मूलाधार है।
संसार में ऐसी कोई भी वस्तु नहीं जिसकी प्राप्ति मनुष्य के लिए असम्भव हो। प्रयत्न और पुरुषार्थ से सभी कुछ पाया जा सकता है लेकिन एक ऐसी भी चीज है जिसे एक बार खोने के बाद कभी नहीं पाया जा सकता और वह है समय। एक बार हाथ से निकला हुआ समय फिर कभी नहीं हाथ आता। कहावत में है “बीता हुआ समय और कहे हुए शब्द कभी वापिस नहीं बुलाए जा सकते।” समय परमात्मा से भी महान् है। भक्ति-साधना द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कई बार किया जा सकता है लेकिन गुजरा हुआ समय पुनः नहीं मिलता।
समय ही जीवन की परिभाषा है, क्योंकि समय से ही जीवन बनता है। समय का सदुपयोग करना जीवन का उपयोग करना है। समय का दुरुपयोग करना जीवन का नष्ट करना है। समय किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। वह प्रतिक्षण मिनट घण्टे, दिन महीने वर्षों के रूप में, निरन्तर अज्ञात दिशा को जाकर विलीन होता रहता है। समय की अजस्र धारा निरन्तर प्रवाहित होती रहती है। और फिर शून्य में विलीन हो जाती है। फ्रैंकलिन ने कहा है- समय बरबाद मत करो क्योंकि समय से ही जीवन बना है।” निस्संदेह वक्त और सागर की लहरें किसी की प्रतीक्षा नहीं करतीं। हमारा कर्त्तव्य है कि हम समय का पूरा-पूरा सदुपयोग करें।
शेक्सपीयर ने कहा है “मैंने समय को नष्ट किया है अब समय मुझे नष्ट कर रहा है।” सचमुच जो व्यक्ति अपना तनिक-सा भी समय व्यर्थ नष्ट करते हैं उन्हें समय अनेकों सफलताओं से वंचित कर देता है। नेपोलियन ने आस्ट्रेलिया को इसलिए हरा दिया कि वहाँ के सैनिकों ने पाँच ही मिनट का विलम्ब कर दिया उसका सामना करने में। लेकिन वही नेपोलियन कुछ ही मिनटों में बन्दी बना लिया गया क्योंकि उसका एक सेनापति कुछ ही मिनट विलम्ब से आया। वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन की पराजय इसी कारण से हुई । समय की उपेक्षा करने पर देखते-देखते विजय का पासा पराजय में पलट जाता है। लाभ हानि में बदल जाता है।
संसार में जितने भी महान पुरुष हुए हैं उनकी महानता का एक ही आधार स्तम्भ है कि उन्होंने अपने समय का पूरा- पूरा उपयोग किया। एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने दिया। जिस समय लोग मनोरंजन खेल तमाशों में मशगूल रहते हैं, व्यर्थ आलस्य प्रमाद में पड़े रहते हैं, उस समय महान् व्यक्ति महत्वपूर्ण कार्यों का सृजन करते रहते हैं। ऐसा एक भी महापुरुष नहीं जिसने अपने समय को व्यर्थ नष्ट किया हो और वह महान् बन गया हो। समय बहुत बड़ा धन है। भौतिक धन से भी अधिक मूल्यवान। जो इसे भली प्रकार उपयोग में लाता है वह सभी तरह के लाभ प्राप्त कर लेता है। वह छोटी-सी उम्र में ही दूसरों से बहुत आगे बढ़ जाता है।
समय जितना कीमती और फिर न मिलने वाला तत्व है उतना उसका महत्व प्रायः हम लोग नहीं समझते। हममें से बहुत से लोग अपने समय का बहुत ही दुरुपयोग करते हैं उसको व्यर्थ की बातों में नष्ट करते रहते हैं। आश्चर्य है समय ही ऐसा पदार्थ है जो एक निश्चित मात्रा में मनुष्य को मिलता है लेकिन उतना ही अधिक अपव्यय भी होता है। हममें से कितने लोग ऐसा सोचते हैं कि हमारा कितना समय आवश्यक और उपयोगी कार्यों में लगता है और कितना व्यर्थ के कामों में, सैर सपाटे, मित्रों से गपशप, खेल तमाशे, मनोरंजन, आलस्य, प्रमाद आदि में? हम कितना समय नष्ट करते हैं व्यर्थ की बकवास, अनावश्यक कार्यों में? हम कितना समय नष्ट करते हैं यदि इसका लेखा जोखा लें तो प्रतीत होगा कि अपने जीवन -धन का एक बहुत बड़ा भाग हम अपने आप ही व्यर्थ नष्ट कर डालते हैं समय के रूप में। काश एक - एक मिनट घण्टे, दिन का हम उपयोग करें तो कोई कारण नहीं कि हम जीवन में महान् सफलताएँ प्राप्त न करें।
समय की बरबादी का सबसे पहला शत्रु है किसी काम को आगे के लिए टाल देना। “आज नहीं कल करेंगे।” इस कल के बहाने हमारा बहुत- सा समय नष्ट हो जाता है। स्वेट मार्डेन ने लिखा है “इतिहास के पृष्ठों में फल की धार पर कितने प्रतिभावानों का गला कट गया। कितनों की योजनायें अधूरी रह गईं, कितनों के निश्चय बस यों ही रह गये, कितने पछताते हाथ मलते रह गये। कल असमर्थता और आलस्य का द्योतक है।”
इस कल से बचने के लिए ही महात्मा कबीर ने चेतावनी देते हुए कहा है।
काल करै सो आज कर, आज करै सो अब।
पल में परलै होयगी बहुरि करेगा कब॥
कल पर अपने कोई भी काम न टालें। जिन्हें आज करना है उन्हें आज ही पूरा करलें। स्मरण रखिए प्रत्येक काम का अपना अवसर होता है और अवसर वही है जब वह काम आपके सामने पड़ा है। अवसर निकल जाने पर काम का महत्व भी समाप्त हो जाता है तथा बोझ भी बढ़ता जाता है। स्वेट मार्डेन ने लिखा है “बहुत से लोगों ने अपना काम कल पर छोड़ा और वे संसार से पीछे रह गये अन्य लोगों द्वारा प्रतिद्वन्दिता में हरा दिये गए।”
समय का ठीक -ठीक लाभ उठाने के लिए आवश्यक है कि एक समय एक ही काम किया जाय। जो व्यक्ति एक समय में अनेकों काम करना चाहते हैं उनका कोई भी काम पूरा नहीं होता और उनका अमूल्य समय व्यर्थ ही नष्ट हो जाता है।
जो काम स्वयं करना है उसे स्वयं ही पूरा करें। अपना काम दूसरों पर छोड़ना भी एक तरह से दूसरे दिन काम टालने के समान ही है। ऐसे व्यक्ति का अवसर भी निकल जाता है और उसका काम भी पूरा नहीं होता।
अपना समस्त जीवनक्रम एक सुनिर्धारित समय विभाजन-चक्र के अनुसार चलावें। उठने, नहाने, घूमने जाने, कार्य करने, अध्ययन, मनन, चिन्तन, गृहकार्य आदि का एक बंधा हुआ समय हो। और ठीक समय पर अपने काम में लग जाना चाहिए। पत्रों का उत्तर तत्काल दें। दिए हुए समय पर लोगों से मिलने जायें। अपने दैनिक जीवन में छोटे- छोटे कार्यों में भी नियमितता बरतें, समय के पाबन्द बनें।
जरा विचार कीजिए आपको अमुक दिन अमुक गाड़ी से बम्बई जाना है। अगर आप गाड़ी के सीटी देने के एक मिनट बाद स्टेशन पहुँचे तो फिर आपको वह गाड़ी, वह दिन, वह समय कभी नहीं मिलेगा। निश्चित समय निकल जाने के बाद आप किसी दफ्तर में जायें तो निश्चय है आपका काम नहीं होगा। आपको स्मरण होगा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर, जार्ज वाशिंगटन आदि को सड़क पर से गुजरते देखकर लोग अपनी घड़ियाँ मिलाते थे। अपने काम और समय का इस तरह मेल रखें कि उसमें एक मिनट का भी अन्तर न आये। तभी आप अपने समय का पूरा-पूरा सदुपयोग कर सकेंगे।
आलस समय का सबसे बड़ा शत्रु है। यह कई रूपों में मनुष्य पर अपना अधिकार जमा लेता है। कई बार कुछ काम किया कि विश्राम के बहाने हम अपने समय को बरबाद करने लगते हैं। वैसे बीमारी, तकलीफ आदि में विश्राम करना तो आलस्य नहीं है। थक जाने पर नींद के लिए विश्राम करना भी बुरा नहीं हैं। थकावट हो नींद, आये तो तुरन्त सो जावे लेकिन आँखें खुलने पर पड़े-पड़े चारपाई न तोड़ें। अभी उठते हैं, अभी उठते हैं, कहते रहें तो यही आलस्य का मन्त्र है। आँखें खुली कि तुरन्त अपने काम में लग जायें।
रस्किन के शब्दों में “जवानी का समय तो विश्राम के नाम पर नष्ट करना ही घोर मूर्खता है। क्योंकि यही वह समय है जिसमें मनुष्य अपने जीवन का, अपने भाग्य का निर्माण कर सकता है। जिस तरह लोहा ठण्डा पड़ जाने पर घन पटकने से कोई लाभ नहीं उसी तरह अवसर निकल जाने पर मनुष्य का प्रयत्न भी व्यर्थ चला जाता है।” विश्राम करें अवश्य करें। अधिक कार्यक्षमता प्राप्त करने के लिए विश्राम आवश्यक है लेकिन उसका भी समय निश्चित कर लेना चाहिए। और विश्राम के लिए ही लेटना चाहिये।
समय बड़ा मूल्यवान है। उसे बड़ी कन्जूसी से खर्च करना चाहिए। जितना अपने समय-धन को बचाकर उसे आवश्यक उपयोगी कार्यों में लगावेंगे उतनी ही अपने व्यक्तित्व की महत्ता एवं कीमत बढ़ती जायेगी। नियमित समय पर काम करने का अभ्यास डालें। इसकी आदत पड़ जाने पर आपको स्वयं ही इसमें बड़ा आनन्द आने लगेगा।
यदि मनुष्य प्रतिदिन किसी काम विशेष में थोड़ा-थोड़ा समय भी लगावें तो वह उसमें महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त कर सकता है। महा मनीषी स्वेट मार्डेन ने कहा है “जीवन भर एक विषय में नियमित रूप से प्रतिदिन एक घण्टा लगाने वाला व्यक्ति उस विषय का उद्भट विद्वान बन सकता है।” प्रतिदिन एक घण्टा पढ़कर मूर्ख भी विद्वान बन सकता। जरा अनुमान लगाइए कोई भी प्रतिरोज एक घण्टे में 20 पृष्ठ पढ़ता है तो साल में वह 7300 पृष्ठ पढ़ डालेगा। इसका अर्थ हुआ 100 पृष्ठ की 73 पुस्तकें वह एक साल में पढ़ लेगा। दस वर्ष में 730 पुस्तकें पढ़ने वाले व्यक्ति का ज्ञान, विचार-स्तर कैसा होगा इसके बारे में पाठक स्वयं ही अन्दाज लगा सकते हैं। अतः समय को मामूली न समझें नियमित रूप से कोई भी काम आप करेंगे तो धीरे-धीरे उसमें बहुत बड़ी योग्यता हासिल कर लेंगे यह निश्चित है।
समय की बर्बादी आज कल मनोरंजन के नाम पर भी बहुत होती है। रेडियो, सिनेमा, खेल, तमाशे, ताश शतरंज आदि में हम नित्य ही अपना बहुत-सा समय बर्बाद करते रहते हैं। महात्मा गाँधी ने एक बार अपने पुत्र मणिलाल को पत्र में लिखा था “खेलकूद, मनोरंजन का समय बारह वर्ष की उम्र तक है।” आज हम इसमें अपना कितना समय खर्च करते हैं यह स्वयं ही अनुमान लगा सकते हैं। मनोरंजन खेल आदि को जीवन में रखा ही जाय तो उसके लिये भी एक नियत समय रखना चाहिए।
अपने आस पास का वातावरण, ऐसा रखना चाहिए कि अपना समय किसी कारण बर्बाद न हो। वक्त बर्बाद करने वाले दोस्तों से दूर की ‘नमस्ते’ रखनी चाहिए। निठल्ले लोग ही अक्सर दूसरे का वक्त बर्बाद करने जा पहुँचते हैं। इन्हें दोस्त नहीं दुश्मन मानना ही उचित है।
स्मरण रखिए समय बहुत मूल्यवान वस्तु है। इससे आप जितना लाभ उठा सकते हैं उठाएँ। आप समय को नष्ट करेंगे तो समय भी आपको नष्ट कर देगा। समय के सदुपयोग पर ही आप कुछ बन सकते हैं।
भारत के राष्ट्रीय तिरंगे झण्डे को जन्म देने वाली भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की मशाल जलाने वालों की प्रथम पंक्ति में गिनी जाने की अधिकारिणी श्रीमती भीकाजी कामा के कार्यकलापों से आज की पीढ़ी के लोग कम ही परिचित हैं। पर इससे क्या, उनका जीवन बलिदान इतना शानदार है कि इतिहास उसे भुला किसी भी प्रकार न सकेगा।
वे उन दिनों जन्मीं जिन दिनों काँग्रेस बड़े लोगों के राजनैतिक मनोरंजन का एक रंग-मंच मात्र थी। गाँधी जी एक साधारण वकील की तरह काम कर रहे थे। जवाहरलाल नेहरू स्कूल में पढ़ रहे थे। सन् 21 और 30 और 42 के आन्दोलन में जिन नेताओं ने नेतृत्व किया वे या तो जन्मे हो न थे या अपने निजी कामों में लगे हुए अन्य नागरिकों की तरह अपने - अपने धन्धों में लगे थे। उन दिनों स्वराज्य का नाम लेना भी अपराध समझा जाता या। ऐसी परिस्थितियों में भी इस निर्भीक महिला ने- परिवार के लोगों का विरोध सहन करते हुए क्रान्तिकारी संगठन आरम्भ किया। संगठन के सदस्यों को बम बनाना सिखाया। घर से बहिष्कृत हुईं। जेल गईं। पुलिस की कठिन यातनाएँ सहीं और अन्त में देश निकाले की सजा में जीवन का अधिकाँश समय बिताने को विवश की गईं। उन्होंने सारा योरोप छान डाला, भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के लिये सहानुभूति ही नहीं धन-राशि भी उन्होंने इकट्ठी की और विदेशों में रहकर भी भारत की स्वतंत्रता के लिये मृत्यु पर्यन्त अबाध गति से काम करती रहीं।
श्रीमति भीकाजी कामा के पिता सेठ सोराबजी फ्रामजी पटेल बम्बई के एक मध्यम श्रेणी के पारसी व्यापारी थे। उन्होंने अपनी कन्या को शिक्षा ही नहीं दी वरन् यह भी सिखाया कि मनुष्य का जीवन एक महत्वपूर्ण वस्तु है और उसका सदुपयोग विचारशील दूरदर्शी दृष्टिकोण के साथ ही किया जाना चाहिए। किशोरी कामा अपने पिता के साथ 1885 का प्रथम काँग्रेस अधिवेशन देखने गईं। वहाँ उनने परतन्त्रता के अभिशाप का स्वरूप समझा और संकल्प किया कि वे खाने सोने की जिन्दगी नहीं जीएँगी वरन् राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के लिये काम करेंगी।
अधिवेशन से लौटकर सबसे पहले नारी संगठन को हाथ में लिया। उन दिनों पर्दे का बहुत जोर था, नारी शिक्षा की बात उपहासास्पद समझी जाती थी अशिक्षा और अन्धविश्वासों से ग्रस्त भारतीय नारी दयनीय स्थिति में पड़ी थी। कामा ने सोचा उन्हें नारी जागरण और संगठन के लिए काम करना चाहिए। अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए वे घर-घर जातीं। उनमें शिक्षा और संगठन की प्रेरणा भरतीं। आरम्भ में उनका उपहास और विरोध होता रहा पर पीछे कितनी ही सुशिक्षित नारियाँ उनके संगठन में सम्मिलित होकर महिला सुधार का कार्य तेजी से आगे बढ़ाने लगीं। अनेकों रात्रि पाठशालाएँ कन्या विद्यालय, चलते-फिरते नारी पुस्तकालय, सिलाई संस्थान शिशु मन्दिर तथा चिकित्सा केन्द्र उन्होंने चलाये, जिनसे महिला समाज पर बड़ा प्रभाव पड़ा और उनका संगठन तथा नवजागरण का मिशन ठीक प्रकार चल निकला।
उनकी ही तरह कितने ही नवयुवक भी स्वतन्त्रता संग्राम की आरम्भिक तैयारी के रूप में जागरण और संगठन के कार्य में लगे थे। कामा ने उन्हें भी प्रोत्साहन और मार्ग दर्शन देना आरम्भ कर दिया। इस प्रकार उनका घर सार्वजनिक प्रवृत्तियों का अड्डा बनने लगा। सरल प्रकृति के पिता इससे घबराये। वे नहीं चाहते थे कि लड़की इस हद तक राजनैतिक कार्यों में लगे कि उन्हें सरकार का कोप भाजन बनना पड़े। इसलिये उनका एक धनी पारसी परिवार के रुस्तमजी कामा के साथ विवाह कर दिया। बचपन का उनका नाम भीकाजी पटेल था अब वे भीकाजी रुस्तमजी कामा कहलाने लगीं।
गृहस्थ के कर्त्तव्यों को वे खुशी से निबाहती थीं, पर उनकी रुचि स्वतन्त्रता आन्दोलन की पृष्ठभूमि तैयार करने में थी। वे अधिक समय अपने जीवनोद्देश्य के लिये लगाना चाहती थीं। नारी जागरण का कार्य जो उन्होंने हाथ में ले रखा था वह उन्हें अत्यन्त प्रिय था। ससुराल वाले अपनी बहू की गतिविधियाँ घर की चारदीवारी तक सीमित रखना चाहते थे। मतभेद बढ़ता गया और बात यहाँ तक पहुँची कि उन्हें ससुराल से बहिष्कृत होना या सार्वजनिक कामों में से एक चुन लेने का फैसला करने को विवश होना पड़ा। ससुराल में वे व्यक्तिगत सुख की अधिकारिणी बनी रह सकती थीं पर भारत माता अपने जागृत बच्चा-बच्ची से उद्धार की जो आशा कर रही थी, उसे निराश ही करना पड़ता। उतने मातृभूमि की सेवा के लिए आत्मदान करना उचित समझा और दाम्पत्ति सुख को छाती पर पत्थर रखकर तिलाँजलि दे दी। अब वे परित्यक्ता थीं। रुस्तमजी ने उन्हें तलाक दे दी। अब वे पूरे मनोयोग के साथ निश्चिन्तता पूर्वक संगठन कार्य में जुट गईं।
अधिक परिश्रम के कारण वे बीमार पड़ीं, बीमारी भयंकर थी और उनका बड़ा आपरेशन होना था। वैसी व्यवस्था उन दिनों भारत में न थी, इसलिए उन्हें लन्दन जाना पड़ा। आपरेशन सफल रहा और वे धीरे-धीरे स्वास्थ्य लाभ करने लगीं। उसी बीच लन्दन में उनकी भेंट भारत के क्रान्तिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा से हो गई। वे ब्रिटेन के प्रगतिशील लोगों में प्रचार करके भारत की स्वतन्त्रता के लिए सहानुभूति एकत्रित कर रहे थे। श्रीमती कामा उनके कार्य से प्रभावित हुई और उनके कार्य में सहायता करने लगीं। हाइड पार्क में उनके भाषण सुनने वाले अंग्रेजों की भीड़ दिन - दिन बढ़ने लगी। ब्रिटिश सरकार उनके कार्यों को खतरनाक मानने लगी और श्रीमती कामा की गिरफ्तारी का वारन्ट जारी कर दिया।
वे बड़ी चतुराई से ब्रिटिश चैनल पार कर चुपके से फ्राँस जा पहुँचीं और छोटा-सा ‘बोर्डिंग हाउस’ खोलकर अपना काम चलाने लगीं। यों बाहर से देखने वाले के लिए यह एक मामूली बोर्डिंग हाउस मात्र था, पर वस्तुतः योरोप में भारतीय पक्ष का प्रसार करने और सहानुभूति एकत्रित करने के लिए यह एक क्रान्तिकारी केन्द्र ही बना हुआ था। वहाँ से आन्दोलन के संदर्भ में बुलेटिन छपते और प्रसारित होते और क्रान्तिकारियों का जमघट वहाँ जुड़ा रहता। योरोपीय देशों की जनता तथा सरकारों के अभिमत वे चुपके- चुपके भारतीय क्रान्तिकारियों को पहुँचातीं और उन्हें उधर से धन राशि भी भिजवातीं। इन्होंने स्वयं भी सारे योरोप में दौरा किया और भारतीय स्वतन्त्रता के पक्ष में प्रबल वातावरण बनाया। उन्होंने ‘वन्देमातरम्’ नामक एक पत्र का प्रकाशन भी आरम्भ किया।
ब्रिटेन सरकार की आँखों में उनके कार्य कलाप काँटे की तरह चुभ रहे थे। फ्राँस सरकार पर दबाव डालकर कामा को गिरफ्तार करके उसे सौंप देने के लिए बहुत दबाव डाला गया, पर जब इससे सफलता न मिली तो एक आर्डिनेन्स जारी करके उन्हें ‘फरार’ घोषित कर दिया।
1908 में अन्तर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन जर्मनी में हुआ। उसमें श्रीमती कामा भारत के प्रतिनिधि के रूप में आमन्त्रित की गईं। सम्मेलन में भारतीय पक्ष उन्होंने बड़ी खूबी से प्रस्तुत किया और वहीं अपनी साड़ी में से खोल कर भारत का राष्ट्रीय झण्डा फहराया, जिसका उपस्थित जनता ने भारी हर्ष - ध्वनि के साथ स्वागत और अभिनन्दन किया। राष्ट्रीय तिरंगे झण्डे का जन्म यहीं से हुआ। यह कल्पना श्रीमती कामा की ही है। बाद में उसके स्वरूप में थोड़े सुधार भी होते रहे।
प्रथम महायुद्ध आरम्भ होते ही, मित्र राष्ट्रों का गठबन्धन हो गया और ब्रिटिश सरकार की इच्छानुसार उन्हें फ्राँसीसी गवर्नमेंट ने गिरफ्तार करके किसी पुराने किले में कैद कर दिया। जेल की यातनाएँ सहते हुए वे इस अज्ञातवास में भी भारतीय स्वतन्त्रता का मंत्र जपती रहीं।
इस प्रकार 35 वर्षों तक फरार घोषित की गईं श्रीमती कामा विदेशों में देश निकाले की स्थिति में पड़ी रहीं। उनका शरीर बाहर रहा पर मन भारत में पड़ा रहा और स्वाधीनता के लिये वे इतना काम करती रहीं जितना कोई कर सकता है। उन्होंने बम बनाने की कला का भारतीय पुरुषों को प्रशिक्षण करने के लिए फाँस रहते हुए भी व्यवस्था बना ली। फलस्वरूप भारत में अनेक बम विस्फोट हुए और सरकार को आतंकित किया जाता रहा।
फ्रांसीसी जेल में से वे जर्जर शरीर होकर लौटीं। उनके स्वास्थ्य ने जवाब दे दिया। मृत्यु निकट आने लगी। वे अन्तिम समय भारत माता के दर्शन करना चाहती थीं और उसी की गोदी में अपना प्राण त्यागना चाहती थीं। अतएव उन्होंने भारत के वायसराय से प्रार्थना की कि मुझे मरने के लिए भारत भूमि में पहुँचने की आज्ञा दी जाय। उन्हें आज्ञा तो मिली पर इस शर्त पर कि किसी राजनैतिक कार्य से सरोकार न रखेंगी। इस प्रकार वे भारत लौट सकीं और बम्बई के अस्पताल में कुछ दिन रहकर 16 अगस्त 1936 में स्वर्गवासिनी बन गई।
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम की अमर - सेनानी श्रीमती कामा अपनी लगन और निष्ठा के सहारे मातृ - भूमि के लिए त्याग और बलिदान का जो आदर्श उपस्थित कर सकीं वह किसी भी देश भक्त के लिए अनुकरणीय हो सकता है। भारत की जनता अनन्त काल तक उनकी सच्ची तपस्या के लिए उनके चरणों पर अपनी भाव-भरी श्रद्धाँजलि अर्पित करती रहेगी।
कहावत है-”धन कमाना सरल है, किन्तु खर्च करना कठिन है।” साधारण अर्थ में तो यह कहावत हास्यास्पद मालूम पड़ती है। कोई भी कह उठेगा- “खर्च करने में क्या है, लाओ चाहे जितना पैसा दे दो, मैं कुछ ही समय में खर्च कर दूँगा, कमाना ही कठिन है।” लेकिन बात ऐसी नहीं है, यह कहावत अपने आप में अर्थशास्त्र का महत्वपूर्ण सूत्र है।
हमारी आर्थिक समस्याओं के पीछे कमाने का इतना दोष नहीं है, जितना खर्च करने का। थोड़ा बहुत अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुसार कमाते तो सभी हैं। बहुत कम व्यक्ति ऐसे मिलेंगे, जो कुछ न कमाते हों। हमारी खर्च प्रणाली ही आर्थिक समस्याओं की जड़ में मुख्य होती है। हम नहीं जानते कि हमें किस तरह खर्च करना चाहिए। जहाँ खर्च नहीं करना चाहिए, वहाँ हम पानी की तरह पैसा बहाते हैं और जहाँ आवश्यकता पड़ती है, वहाँ हम रीते हो जाते हैं या खर्च करने में कंजूसी बर्तते हैं। खर्च करने की इस दोषयुक्त प्रणाली के कारण ही हमारे सामने आर्थिक समस्याएं उठ खड़ी होती हैं। हम उपयुक्त आमदनी होते हुए भी सुखी नहीं हो पाते। खर्च को विषम व्यवस्था के कारण कम आमदनी से लेकर अधिक आमदनी वालों को पूछ लिया जाय, सभी खर्च न चलने की शिकायत करते मिलेंगे, चाहेंगे और आमदनी बढ़ जाय। लेकिन आमदनी बढ़ जाती है फिर भी हमारी शिकायत बन्द नहीं होती, वह बनी रहती है- “खर्च नहीं चलता।”
इसमें कोई सन्देह नहीं कि पर्याप्त धनोपार्जन करते हुए भी हम खर्च करने की विधि नहीं जानते और अपनी आमदनी से सही अर्थों में सुखी नहीं हो पाते हैं।
खर्च की प्रणाली में सबसे बड़ा दोष है- खर्चे का बजट अपनी आमदनी से अधिक रखना। जिस व्यक्ति का खर्च आय से अधिक होगा, उसका जीवन सुखी और संतुष्ट नहीं हो सकता। न वह ईमानदारी पर ही अधिक दिन तक टिक सकता है। क्योंकि फिर बढ़े हुए खर्चे की पूर्ति के लिए वह अनैतिक ढंग से कमाने के मार्ग अपनायेगा। अधिक धन कमाने से आधिक सुख नहीं मिलता, वरन् ठीक-ठीक ढंग से खर्च करने पर ही सुखी और सन्तुष्ट जीवन बिताया जा सकता है। जो व्यक्ति सौ रुपये कमाता है, और खर्चा डेढ़ सौ का बना रखा है, वह अपनी आवश्यकताओं के लिए उधार कर्ज लेगा या बेईमानी से धन कमायेगा। दोनों ही रास्ते उसकी आन्तरिक शान्ति के लिए गलत हैं। फिर कमाई से अधिक खर्च करने की आदत के कारण आय बढ़ने के साथ - साथ अधिक खर्च करने का स्वभाव - सा बन जाता है और मनुष्य अपनी आर्थिक समस्याओं में उलझा रहता है। चाणक्य ने कहा है- “अपार धनशाली कुबेर भी यदि अपनी आमदनी से अधिक खर्च करेगा तो एक दिन कंगाल हो जायेगा। “
अपनी आमदनी को देखकर खर्च की व्यवस्था इस तरह करनी चाहिए कि आमदनी का कुछ अंश बचाया भी जा सके, जो कठिनाई पड़ने पर काम आवे। स्मरण रहे खर्च की नियमित व्यवस्था मर्यादा के लिए हमें किसी दूसरे का अनुकरण नहीं करना चाहिए। एक सौ रुपये कमाने वाला व्यक्ति तीन-सौ रुपये कमाने वाले से खर्च की नकल न करे। वह अपनी आर्थिक स्थिति को देखे और उसी में से कुछ बचत रखकर खर्च करे।
कोई वस्तु इसलिए न खरीदे कि वह सस्ती है, क्योंकि सस्ती चीज अधिक मात्रा में खरीद लेने पर उसे खर्च करने की इच्छा भी बढ़ जाती है और अधिक खर्च हो जाती है। इससे वह अपने औसत मूल्य से भी महँगी पड़ती है।
अपव्यय की तरह ही खर्च करने में कंजूसी भी बहुत बड़ा दोष है। बहुत से लोग जीवन - भर कमाते-कमाते मर जाते हैं, किन्तु वे अपने या दूसरों के लिए आवश्यक खर्च भी नहीं करते। अपने बच्चों को योग्य बनाने में, उनकी शिक्षा-दीक्षा में बहुत-से लोग कंजूसी करते हैं। कई लोगों को पैसे से इतना मोह होता है कि वे हारी-बीमारी में भी दवा-दारु के लिए पैसा खर्च नहीं करते और मर तक जाते हैं। नजर कमजोर होती है, लेकिन चश्मा नहीं लगाते और धीरे- धीरे अन्धे तक हो जाते हैं। पैसा होते हुए भी बहुत से लोग खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने, रहन- सहन में इतनी कंजूसी करते हैं कि वो दरिद्र-से लगते हैं। वे एक दिन मर जाते हैं और उनकी जीवन भर की सँजोयी हुई सम्पत्ति यों ही जमीन में गढ़ी रह जाती है या बच्चों द्वारा फिजूल - खर्ची में फूँक दी जाती है।
खर्च करने के सम्बन्ध में फिजूलखर्ची या कंजूसी दोनों ही बुरे हैं। आमदनी से अधिक और अनाप - शनाप खर्चे करना जहाँ कई कठिनाइयों को जन्म देता है, यहाँ अपनी नियमित आवश्यकताओं को पूरा न करके, उनमें कंजूसी करना और भी बुरा है, इससे जीवन केवल धन के लिए नष्ट हो जाता है। धन जीवन को सुरक्षित और समृद्ध रखने के काम नहीं आता। अपव्यय और कंजूसी दोनों ही अर्थ - व्यवस्था के असंगत मार्ग हैं। किफायत भी करनी चाहिए। लेकिन परेशानी उठाकर, शरीर को नष्ट करके , कष्ट झेल कर, केवल धन को संग्रह करते रहने के नाम पर की जाने वाली बचत बुरी है, त्याज्य है।
- खर्च करने में मध्यम मार्ग ही अपेक्षित है। एक अर्थशास्त्री ने कहा है -- “खर्च तो गंगाजी के प्रवाह की तरह है। जल गतिशील रहता है। धन है तो खर्च भी होना ही चाहिए। हाँ बरसाती नदी की तरह इसमें बाढ़ नहीं आनी चाहिए।’
यही मितव्ययिता का मध्यम मार्ग ही खर्च करने की सही आधार शिला है। नियमित आवश्यकताओं की पूर्ति के निमित्त अपनी आमदनी को ध्यान में रखकर खर्च करना बुरा नहीं है। धन का खर्च करना न कहकर उसका सदुपयोग कहना ही मितव्ययिता है। रोके रखने से धन उपयोगिता, उर्वरक क्षमता ही नष्ट हो जाती है और फिजूलखर्ची से वह स्वयं ही नष्ट हो जाता है। चर प्रवाहिनी नदी की धारा की तरह धन का संचय और सदुपयोग करते रहना चाहिए।
मितव्ययिता जहाँ अर्थ-व्यवस्था के लिए एक उत्कृष्ट मार्ग है, वहाँ इससे मनुष्य में नैतिक सद्गुणों की भी वृद्धि होती है। अर्थ के माध्यम से रुपये पैसों के द्वारा तो इनकी साधना-अभ्यास किया जाता है। आर्थिक क्षेत्र में मितव्ययिता के अभ्यास से मनुष्य जीवन के अन्य क्षेत्रों में भी अपनी विभिन्न शक्तियों का सदुपयोग करता है। यह ध्रुव सत्य है कि आर्थिक क्षेत्र में अपव्ययी स्वभाव वाला व्यक्ति आध्यात्मिक, नैतिक, धार्मिक क्षेत्रों में भी संयमी और अपनी शक्तियों का सदुपयोग करने वाला रहे, इसकी सम्भावना कम ही है। मितव्ययिता जहाँ हमारी आर्थिक व्यवस्था को दृढ़, समर्थ बनाती है, वहाँ हमारे मानस पटल पर भी ऐसे संस्कार छोड़ती है, जिसके द्वारा हम सर्वत्र ही अपने जीवन धन का, अपनी शक्तियों का सही सही उपयोग कर सकें।
बच्चों को आज्ञापालक और अनुशासित बनाने का काम महत्वपूर्ण होते हुए बड़ा पेचीदा भी है। हमारे देश में बहुत कम ही माँ -बाप, अभिभावक - गण इस सम्बन्ध में अपना कर्तव्य निभा पाते हैं। अधिकाँश तो जीवन भर बच्चों की अनुशासनहीनता, उच्छृंखलता के प्रति शिकायत ही करते रहते हैं। आधुनिक बाल - मनोविज्ञान और बाल शिक्षण पद्धति भी केवल पढ़ने - लिखने की बात रह गई है। पारिवारिक जीवन में इसका उपयोग नहीं के बराबर ही होता है।
बच्चों को अनुशासन सिखाने, अपनी आज्ञा मनवाने का प्रायः सभी लोग एक ही रास्ता अपनाते हैं, वह है, मार -पीट या डाँटना - डपटना। सजा देकर बच्चों में अच्छी आदतें पैदा करने की एक परिपाटी - सी पड़ गई है। लेकिन बच्चों को सुधारने के लिए सजा देना बहुत पुराना नियम पड़ गया है। आज के विकसित युग में तत्सम्बन्धी खोज अनुभवों ने इसे व्यर्थ और अव्यावहारिक सिद्ध कर दिया है। बाल-मनोविज्ञान के ज्ञाता जानते हैं कि सजा के द्वारा बच्चों को सुधारने से समस्या जटिल बनती है। बच्चों का व्यक्तित्व संकुचित, अविकसित बनता है।
मनोवैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध हो चुका है कि बच्चा किसी भी बात को स्थायी रूप से तभी सीख पाता है, जब वह उसके बारे में सोचता है और यह निर्णय करता है कि ऐसा करना अच्छा है। कोई बालक घर से बाहर आवारा घूमता है, माँ बार-बार चिल्लाती है, लेकिन वह नहीं मानता, न घर का काम करता, न पढ़ने में मन लगाता है। इस बात पर उसे पीटा जाय या अनुनय विनय की जाय तो वह नहीं मानेगा। भय के मारे कुछ समय वैसा न भी करेगा, लेकिन भय का कारण दूर हुआ कि वह फिर वैसा ही करने लगता है। लेकिन जब वह समझ लेता है कि आवारा घूमना, माँ का कहना न मानना बुरा है तो फिर ऐसा वह नहीं करेगा। घर के सामान को खराब करने से बालक भय के आधार पर सदा सर्वदा नहीं रोका जा सकता, लेकिन जब वह जान लेता है कि सामान खराब करने से अपना ही नुकसान होता है तो वह ऐसा नहीं करेगा।
बाल-मनोविज्ञान इसी बात पर बल देता है कि बालक को कोई काम सिखाने के लिए उसके साथ जोर-जबर्दस्ती से काम लेने की आवश्यकता नहीं है, अपितु उसकी उपयोगिता, महत्ता को समझने-बूझने की स्थिति पैदा की जाय, जब बालक किसी बात के बारे में सही-सही सोच समझ लेता है तो फिर उसे सीख भी जल्दी ही लेता है। जो बुरा होता है, उसे जल्दी ही छोड़ देता है। बच्चे को अनुशासित बनाने के लिए हमें इसी आधार को लेकर चलना होगा। यद्यपि यह मार्ग अधिक कठिन है, इसके लिए अभिभावकों में अधिक बुद्धि, विवेक, चातुर्य, सूक्ष्म-दृष्टि होने की आवश्यकता है, तभी वे ऐसा करने में सफल हो सकते हैं। इसमें समय भी लगता है, प्रयत्न भी कई ढंग से करने होते हैं तथापि स्थायी समाधान के लिए यह सर्वोपरि मार्ग है।
बहुत से माँ-बाप इसके लिए प्रतीक्षा न कर अधिक पचड़े में न पड़कर सीधे-सरल मार्ग से सजा देकर बच्चों को सुधारने का प्रयत्न करते हैं, लेकिन इससे बच्चे बहुत बार सुधरने के बजाय बिगड़ते ही अधिक हैं या उनका वह सुधार बहुत ही कम स्थायी होता है। दण्ड के भय का कारण दूर होते ही बालक फिर वैसा ही करने लगता हैं, अथवा वह विद्रोही बन जाता है। उसमें कई मानसिक विकृतियाँ पैदा हो जाती है और ये सभी उसके व्यक्तित्व को दूषित कर देते हैं।
अक्सर बच्चों की तरफ से शिकायत होती है कि वे समय पर नहीं उठते, न समय पर पढ़ते हैं। वे अस्त - व्यस्त जीवन बिताते हैं। उनके खेलने, खाने- पीने, पढ़ने आदि का कोई क्रम नहीं है, तो भी बार-बार बच्चों को डाँटना-डपटना ठीक नहीं। बच्चों के लिए दिन भर का एक कार्य-क्रम निश्चित कर देना आवश्यक है। बच्चा जब थोड़ा-बहुत समझने लगे तो उनकी एक मोटी-सी दिनचर्या बना दे और उसके अनुसार बालक को चलने का अभ्यास डालें। स्मरण रहे दिनचर्या के नियम बनाते समय उसका श्रेय-महत्व बालक को देते हुए उसकी राय माँगें। अपने लिए बनाये जाने वाले कार्यक्रम में बच्चा जब स्वयं रुचि लेता है, तो उसे भली प्रकार निभाता भी है। कदाचित बालक निश्चित कार्यक्रम में भूल करे तो उसे संकेत कर देना चाहिए, जिससे बालक अपनी भूल को ठीक कर सके। किसी विशेष अवसर पर या परिस्थितिवश आवश्यकता पड़ने पर नियमित कार्यक्रम में हेर फेर भी किया जा सकता है। लेकिन बच्चे को नियमित क्रम-बद्ध जीवन-यापन का अभ्यास शुरू से ही कराना चाहिए।
बालक कोई भी गलत काम करे, उसे देखकर टालना नहीं चाहिए। तुरन्त बालक की भूल सुधार कर देना आवश्यक है, अन्यथा बार बार एक तरह की गल्ती दुहराते रहने पर उसका अभ्यास पड़ जाता है और उसे ठीक करना कठिन हो जाता है। जैसे बालक पहली बार माचिस से खेलता हुआ पाया जाय तो उसे तुरन्त प्यार से यह समझा दिया जाय --”इससे आग लग जाती है और जल जाते हैं, इससे नहीं खेला करो, खिलौनों से खेलो।” और फिर बालक को खिलौने देकर उस ओर लगा देना चाहिए। जो माँ-बाप पहले तो प्यार-वश या लापरवाही वश एक लम्बे समय तक बालक की भूलों को टालते रहते हैं, उस पर ध्यान नहीं देते और आगे चलकर जब बच्चे बड़े -बड़े नुकसान करने लगते हैं तो उन्हें मना करते हैं, रोकते हैं, लेकिन उनका अभ्यास ऐसा पड़ जाता है कि अब वे कहना नहीं मानते । अतः अनुशासन की सीख प्रारम्भ से ही बालक को छोटी -छोटी भूल सुधार के माध्यम से देना आवश्यक है।
जिन वस्तुओं से बच्चों को खतरा हो अथवा कीमती वस्तुएँ जिन्हें बालक तोड़ता - फोड़ता हो, ऐसी हालत में अच्छा यह है कि बच्चे की निगाह चुका कर अथवा उसका ध्यान खिलौने आदि में अन्यत्र लगाकर उन वस्तुओं को एक तरफ रख दिया जाय, जहाँ बालक की निगाह उन पर न पड़े। सीधे रूप में मना कर करने पर बालक नहीं मानेगा।
बात - बात पर बच्चों को नकारात्मक आदेश भी नहीं देने चाहिएं। बालक कुछ करें और बाद में उससे ‘ना’ कहना पड़े, उसके पूर्व ही उसे रोक लेना चाहिए। क्योंकि किसी भी काम में जब बालक मनोयोगपूर्वक लग जाता है, तब उसे मना करने पर वह कई बार नहीं मानता। अतः अच्छा यही है कि उसे काम में लगने से पूर्व ही रोक लेना चाहिए। बार-बार मना करने पर बालक की एकाग्रता, मनोयोग नष्ट होता है। उसका जीवन निराशाजनक विचारों से भर जाता है। अतः आवश्यकता पड़ने पर ही बालक पर ‘ना’ का प्रयोग करना चाहिए। वह भी बड़े स्नेह के साथ।
बच्चों से झूठे वायदे कभी न करें। इससे वह अपने माँ -बाप की हर बात पर अविश्वास करने लगते हैं फिर उपयुक्त बात भी वह नहीं मानता। बच्चे के साथ जो वायदा किया जाय, उसे पूरा अवश्य करें। जिन्हें आप पूरे न कर सकें ऐसे वायदे कभी भी न करें।
क्रोध, झुँझलाहट, चिड़चिड़ाहट के द्वारा बच्चों को अनुशासन सिखाने का प्रयत्न न करें। इनसे बच्चों का सहज उत्साह नष्ट हो जाता है। वह मूक पशु की तरह बिना कोई ‘न चय’ किए के आदेश पालन करने लगता है। उसकी वैयक्तिक स्वतन्त्र प्रतिभा कुन्द हो जाती है। वह असमय में ही कृत्रिम अनुशासन पालन करने के प्रयत्न में अधिक धीर-गम्भीर सोच-विचार करने वाला बन जाता है, जो स्वस्थ दशा नहीं कही जा सकती।
बच्चों को अनुशासित रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता इस बात की है कि स्वयं माता-पिता भी अपने जीवन में अनुशासित रहें। नियमित व्यवस्थित जीवन बितायें। जो माँ -बाप स्वयं देर से उठें और बच्चों से कहें जल्दी उठो, स्वयं खेलने, घूमने-फिरने में समय बर्बाद करें और बच्चों से कहें- ‘पढ़ों समय खराब न करो’ उनकी आज्ञा बालक नहीं मानेंगे। अभिभावकों को चाहिए कि अपने स्वयं के आचरण, व्यवहार, जीवन पद्धति से बच्चों को अनुशासन की सीख दें।
दैनिक जीवन के कर्म, कर्त्तव्य और व्यवहार में अनेकों ऐसी छोटी - छोटी बातें होती हैं, जिनकी प्रायः लोग उपेक्षा किया करते हैं। आहार -विहार, रहन-सहन, बातचीत में कई बातें ऐसी होती हैं, जिनको अत्यन्त छोटी मानकर लोग उनकी ओर से उदासीन बने रहते हैं। किन्तु कई बार इनके परिणाम इतने गम्भीर होते हैं कि बाद में भारी पछतावा होता है। इसलिए यह आवश्यकता होती है कि जो भी काम करें चाहे वह देखने में कितना ही छोटा क्यों न हो, भली प्रकार से सोच- विचार करके किया जाना चाहिए। छोटी बातों का महत्व कम नहीं होता। जीवन की सर्वांगपूर्णता भी इन्हीं में सन्निहित होती हैं।
संसार की प्रत्येक वस्तु छोटे-छोटे परमाणुओं से मिलकर बनती है। वैज्ञानिकों का कथन है कि इस संगठन में किसी सूक्ष्म परमाणु का भी विस्फोट हो जाय तो संसार में बड़े विनाशकारी दृश्य उपस्थित हो सकते हैं। सूर्य-चन्द्रमा तथा सभी छोटे-बड़े ग्रह-उपग्रह भी अपनी नियत व्यवस्था के अनुसार क्रियाशील हैं। इनकी गति में कहीं अवरोध उत्पन्न हो जाय तो सारे संसार में प्रलय हो सकती है। इसलिए छोटी वस्तुओं की उपेक्षा न करना ही व्यवस्था की दृष्टि से उचित है।
बड़ी वस्तुओं की पूर्ति छोटी वस्तुओं से होती है। मिट्टी का एक - एक कण मिलकर पृथ्वी बनी है। एक - एक सींक मिलकर बुहारी का काम देती है। श्रमिकों के सामूहिक प्रयासों से बड़े - बड़े मिल - कारखाने चलते हैं। किसी मशीन का एक छोटा - सा पुर्जा निकाल दें तो उसका चलना बन्द हो सकता है। इंजन में बाइलर का जितना महत्व है, पिस्टन का उससे कम नहीं। इसी प्रकार जीवन की सम्पूर्ण क्रियाशीलता भी छोटे - छोटे कर्मों में विभक्त है। इनमें से एक को भी छोड़ दें तो उसका न्यूनाधिक प्रभाव दूसरे कर्मों पर पड़ता है। आहार लेते समय एक रोटी अधिक खा लें तो पाचन-क्रिया का खराब होना निश्चित है। पेट की खराबी, दस्त, बुखार आदि अनेकों उपद्रव खड़े हो जाने का कारण एक छोटी-सी भूल, एक रोटी अधिक खा जाने पर यदि पहले ही विचार कर लिया जाय तो बाद में उठ खड़े होने वाले उपद्रवों तथा गम्भीर प्रतिक्रियाओं से सहज ही में बचा जाना सम्भव है।
“तू” और “तुम” या “आप” में ऊपर से देखने में कोई बड़ा भारी अन्तर दिखाई नहीं देता। किन्तु इनके प्रयोग से सामने वाले व्यक्ति की मनः स्थिति पर जो प्रभाव पड़ता है, वह विचारणीय है। आप किसी को सम्बोधन करते समय “आप” शब्द उच्चारण करते हैं -- आइये आप यहाँ बैठ जाइए, आपने भोजन कर लिया क्या? इन शब्दों से द्वितीय पुरुष पर आपके शिष्ट - आचार का प्रभाव पड़ेगा। इसमें उसे प्रसन्नता भी होगी और आपके व्यवहार से सन्तुष्टि भी। आत्मीयता, मृदुलता और सज्जनोचित व्यवहार का यही तरीका है कि सम्बोधन करते समय आदर पूर्ण शब्दों का अधिक से अधिक प्रयोग करें।
रूखे और कर्कश संभाषण से सुनने वाले की आन्तरिक भावनाओं पर चोट लगती है, वह आपका कितना ही निकट का सम्बन्धी, प्रियजन या परिवार का ही व्यक्ति क्यों न हो, आपका बुरा मान जायेगा और बदले में स्वयं भी अभद्र व्यवहार करेगा। यदि आपके प्रभाव के कारण ऐसा न भी करे तो भी आपका हृदय से सम्मान नहीं करेगा। दबी हुई भावनायें जब भी अवसर पायेंगी, वह आपकी बुराई करने लगेगा। ईर्ष्या, द्वेष, कलह और कटुता के अधिकांश दृश्य इन छोटी - मोटी भूलों के परिणाम स्वरूप ही उठ खड़े होते हैं। इनसे सदैव बचने का प्रयत्न करना चाहिए और अपने सम्भाषण में मिठास भरे मृदुल शब्दों का ही प्रयोग करना शिष्टाचार और बड़प्पन का चिन्ह है।
छोटा काम भी निर्लिप्त भाव से, मन लगाकर उत्साहपूर्वक करने में बड़ा सुख मिलता है। इससे काम करने की आन्तरिक-शक्ति प्राप्त होती है। महापुरुष गेटे का कथन है- “हमारे दैनिक कामों और कर्त्तव्यों को मनोयोगपूर्वक पूरा करने में वे रहस्य छिपे पड़े हैं, जिनसे मनुष्य के सुख और शान्ति के द्वार खुलते हैं। उस सितारे की भाँति जो दूर आकाश में अनवरत चमक रहा है, जो न दम लेता है, न ठहरता है, प्रत्येक व्यक्ति को इस प्रकार अपने दैनिक कर्त्तव्यों को पूरा करने में अपने सम्पूर्ण साहस और दृढ़ता के साथ लगा रहना चाहिए।”
दिनभर किसी बड़े काम को ही करते रहने से भी आनन्द नहीं मिलता। छोटे, कम महत्व के सहायक कर्मों को पूर्ण रुचि के साथ करने से भी व्यक्तित्व के परिष्कार में सहायता मिलती है। प्रातःकाल उठकर नित्य कर्म, स्नान, घर और कपड़ों की सफाई, भोजन, टहलना, मिलना जुलना, हँसना - खेलना आदि सभी में सावधानी रखने, संयत रहने से ही आप दिनभर प्रसन्न चित्त रह सकते हैं। दातौन न करने अथवा स्नान न करने से किसी की मृत्यु नहीं हो जाती है, यह ठीक है। किन्तु मुँह से निकलने वाली बदबू और शारीरिक दुर्गन्ध के कारण फूट पड़ने वाली कष्टदायक बीमारियों का संचालन यहीं से होता है, यह आपने नहीं विचारा क्या? दाँत साफ न करने का परिणाम अन्त में पायरिया ही हो सकता है। शरीर साफ न रहे तो त्वचा के रोगों का हो जाना निश्चित ही समझिए।
घर में कई वस्तुएँ बिखरी हुई अस्त-व्यस्त पड़ी होती हैं। आपकी दृष्टि में वे न आती हों, यह बात नहीं है, पर हर बार आप उन्हें सुव्यवस्थित बनाने की बात टाल जाते हैं। दैनिक आवश्यकता की वस्तुएँ जैसे- कलम, दवात, कपड़े, चप्पल आदि नियत स्थानों पर रखे रहा करें तो आवश्यकता के समय जो हड़बड़ी, दौड़-धूप, हो- हल्ला मचता है, उससे बचने में कितना सहारा मिल जाय? हम देख तो लेते हैं कि आँगन में कीलें बिखरी पड़ी हैं, पर थोड़े-से आलस्य या उपेक्षावश उन्हें उठाते नहीं है। किन्तु यही जब बच्चे के पाँव में चुभ जाती हैं तो आप अपनी पत्नी या दूसरे सदस्यों पर बरसने लगते हैं। आपने थोड़ी सावधानी की होती और पहले ही उन्हें सँभाल कर रख दिया होता तो बेचारे बच्चे को यह दुःख क्यों उठाना पड़ता। पत्नी, बच्चों को डाँटने-मारने से जो घर के वातावरण में कटुता और क्षुब्धता आ गई उससे भी बचाव हो जाता। इसलिए अपनी दृष्टि सदैव इतनी पैनी होनी चाहिए कि कोई भी वस्तु दिखाई दे तो ठीक ढंग से सँभाल कर रख दें। इससे व्यवस्था भी बनी रहती है और सहूलियत भी।
लोग बड़े आदमी इसलिए बन जाते हैं कि वे छोटे से छोटे काम को भी जी लगाकर करते हैं। कई व्यक्ति स्वयं तो कुछ नहीं करना चाहते और दूसरों की बाल में खाल निकालते रहते हैं। इससे मनुष्य का ओछापन प्रकट होता है। सुसंस्कृत व्यक्ति अपने सभी छोटे - बड़े काम इस प्रकार पूरे करते रहते हैं, मानो इन कर्त्तव्यों में ही उनका सारा सुख वैभव और आनन्द -भाव छिपा हुआ है। बड़ा काम करना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् यह भी आवश्यक है कि सामने आया हुआ काम कितना ही साधारण क्यों न हो, उसे भी अच्छी तरह और मनोयोगपूर्वक पूरा किया जाये। महात्मा गाँधी दूसरों को गन्दगी से बचाने के लिए अपने मल पर स्वयं मिट्टी पटक देते थे। यही शिक्षा वे अपने अनुयाइयों को भी दिया करते थे।
प्रत्येक कार्य को पूर्ण तत्परता और निर्लिप्तता के साथ पूरा करने से ही मनुष्य के अन्दर प्राकृतिक ढंग से बड़े - बड़े कामों और कर्त्तव्यों को पूरा करने की शक्ति आती है। छोटे कार्यों की सुचारु रूप से सम्पन्नता के द्वारा ही इच्छा शक्ति का परिपाक होता है। यह दृढ़ता जब जीवन में उतरती है, तो बड़े कर्त्तव्य निभाने की अन्तःप्रेरणा स्वतः उठने लगती है। एकाग्रता और इच्छा-शक्ति को बढ़ाने के लिए कई बाह्य उपचार भी लोग प्रयोग में लाते हैं। प्राणायाम, आसन, त्राटक आदि के द्वारा लोग यह अभ्यास करते हैं, किन्तु इससे आँशिक सफलता मात्र प्राप्त करते हो सकती है। दत्तचित्त होकर सम्पूर्ण कार्यों को एक व्यवस्था क्रम से निभाने से यह आवश्यकता स्वयमेव पूरी हो जाती है।
समर्थ व्यक्तियों का प्रभाव छोटे बच्चों और कम समझ के व्यक्तियों पर पड़ता है। इससे वे भी इन बुराइयों को अपने जीवन में प्रवेश की स्वीकृति दे देते हैं और बिना किसी प्रशिक्षण के वे भी इन घृणित कर्मों में लग जाते हैं। इसलिए भावी पीढ़ी के निर्माण के लिए भी यह परमावश्यक है कि लोग अपने स्वभाव, आचरण, बातचीत और व्यवहार की इन छोटी-छोटी कमजोरियों की उपेक्षा न किया करें।
जीवन गति का नाम धाम से जिसको काम नहीं।
जीवन है वह पंथ कि जिस पर यति विश्राम नहीं।
जीवन है पाथेय समय के अविचल राही का।
जीवन है बल कुरुक्षेत्र के तपे सिपाही का।
पौरुष के माथे पर श्रम का बाना जीवन है।
जीवन है शृंगार कर्म का, तप की गीता है,
जीवन है वह घट जो अक्षय जल पी रीता है,
जीवन उसका अनुगत, जिसने उसको जीता है,
जीवन उसका स्वामी जिसका यौवन बीता है,
सगर सुतों पर सुरसरि धार बहाना जीवन है ।
- विद्यावती मिश्र
कर्त्तव्य - मार्ग पर डट कर, आगे बढ़ते ही जाओ,
जब तक न सफल हो जाओ, जब तक न विजय-श्री पाओ;
तुम कर्म-सिंह नर - वर हो, विचरो सदैव निर्भय हो-
भगवान - भक्ति का बल हो, आशा से भरा हृदय हो;; दुखियों के दुःख मिटाओ, मृतकों में जीवन भर दो,
पीड़ित हताश हृदयों में, आशा आलोकित कर दो;;
सन्ताप -ताप -तम- टारो, सेवा -सुख -सूर्य उदय हो-
मन, वचन, कर्म में शुचिता, आशा से भरा हृदय हो;; अज्ञान भाव ना व्यापे, अन्याय न रहने पाए,
कोई न किसी के द्वारा, पीड़ित हो कष्ट उठाए;;
सब - सब पर प्रेम प्रसारें, सबमें सद्भाव-विनय हो -
यम - संयम जीवन - व्रत हो, आशा से भरा हृदय हो;;
प्राणों का मोह न करके, जो जन - हित कर जाते हैं,
सुख - सुविधा भर जाते हैं, भव सागर तर जाते हैं;;
उन वीरों का यश - सौरभ, हे भगवन्। कभी न क्षय हो-
हम कर्म - वीर बन जायें, आशा से भरा हृदय हो,
- कविरत्न डॉ॰ हरीशंकर शर्मा
छिप- छिप अश्रु बहाने वालो मोती व्यर्थ लुटाने वालो!
कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है!!
खोता कुछ भी नहीं यहाँ पर केवल जिल्द बदलती पोथी!
जैसे रात उतार चाँदनी पहने सुबह धूप की धोती!!
वस्त्र बदल कर आने वालो चाल बदल कर जाने वालो!
चन्द खिलौनों के खोने स बचपन नहीं मरा करता है!!
कितनी बार गगरिया फूटी शिकन न पर आई पनघट पर!
कितनी बार किश्तियाँ डूबीं चहल-पहल वो ही है तट पर!!
तम की उमर बढ़ाने वालों, लौ की आयु घटाने वालों!
लाख करे पतझर कोशिश पर उपवन नहीं मरा करता है!!
लूट लिया माली ने मधुवन, लूटी न लेकिन गंध फूल की!
तूफानों तक ने छेड़ा पर, खिड़की बन्द न हुई धूल की!!
नफरत गले लगाने वालो, सब पर धूल उड़ाने वालो!
कुछ मुखड़ों की नाराजी से दर्पन नहीं मरा करता है!!
-नीरज
सदाचार सँवर उठे, जगह - जगह गुरुत्व में,
वदान्यता निखर उठे, जगह -जगह प्रभुत्व में,
भविष्य जगमगा उठे, अबोध छात्र वृन्द का,
लिखो स शक्त भाग्य - लेख मातृ -भूमि हिन्द का
गुरुत्व हो सफल हर एक लाड़ला महान हो।
कि भारतीय लोकतंत्र सर्व शक्तिमान हो॥
- अज्ञात
थक जाएगी डगर एक दिन-
गति में यदि आये न शिथिलता।
मिल जायेगी शान्ति सुनिश्चित।
अधरों पर आए न विकलता ॥
शूलों की नोकों पर खिलते सुन्दर सुमन अपार।
भूल न जाना पंथ, घिरा हो चहुँ दिशि में अधियार॥
- रामस्वरूप खरे, एम. ए.
मैं सृष्टि - प्रलय का खेल खेलता रहता हूँ माया रचकर।
मेरा स्वर लेकर मूक पथिक अपने मन की कह जाता है॥
मेरे प्रकाश के कण - कण लेकर ज्योतित हैं तारे, हिमकर रवि।
जग के प्राणों में बिखरी है मेरे ही प्राणों की शुभ छवि॥
मेरी गुरुता का रूप शैल, मेरी लघुता का चित्र धूल।
मेरा ही रूप विराट विश्व, लघु रूप विश्व का मेरा कवि ॥
- विनोद रस्तोगी॥
युग - निर्माण आन्दोलन की प्रगति-
युग-निर्माण योजना का प्रथम वर्ष ता॰ 24 जुलाई आषाढ़ गुरु पूर्णिमा- को पूरा हुआ और दूसरा आरम्भ हुआ। यह पुनीत पर्व अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य ने किसी- न -किसी रूप में मनाया। ऐसे कोई विरले ही बचे होंगे जिनने इस ओर उपेक्षा बरती हो। जहाँ कुछ अधिक सदस्य हैं, वहाँ सामूहिक आयोजन हुए और जहाँ उनकी संख्या एक - दो ही है वहाँ व्यक्तिगत रूप से गुरु पूजन के साथ-साथ योजना के अनुभव जीवन में डालने की तैयारी की गई। यों गुरु पूर्णिमा अन्यत्र भी अपने ढंग से मनाई जाती है पर उनमें और अपने आयोजनों में अन्तर यह है कि दूसरे लोग गुरु पूजन मात्र करके कर्त्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं जबकि अखण्ड - ज्योति परिवार के सदस्यों को अगले वर्ष आत्म -निर्माण के कुछ न कुछ कार्यक्रम बनाने और आगे बढ़ने के लिए कदम उठाने का भी संकल्प करना होता है।
जुलाई की अखण्ड - ज्योति में पृष्ठ 49 से 65 तक वे सारे कार्य - क्रम प्रस्तुत किये गए हैं जिन्हें अपनी - अपनी परिस्थिति के अनुसार हममें से प्रत्येक को कुछ तो क्रियान्वित करना ही होगा। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उस पर पूरा -पूरा ध्यान दिया है। जिनकी उपासनाएं शिथिल या बन्द हो गई थीं, उनने उसे इसी गुरु पर्व से पुनः आरम्भ कर दिया है। अपने स्त्री बच्चों से भी किसी-न-किसी रूप में उसे शुरू कराया है। हर घर में, हर परिवार में, हर व्यक्ति में, आस्तिकता का बीजाँकुर पनपने, ईश्वर विश्वास को सुदृढ़ रखने के लिए उपासना में निष्ठा होना आवश्यक है। चरित्र-निर्माण का-आधार आस्तिकता ही हो सकती है। इसलिए अपनी प्रेरणा पद्धति का यह एक आवश्यक अंग रहा है कि किसी-न-किसी रूप में उपासना के लिए अन्य आवश्यक नित्य कर्मों की तरह स्थान रहना चाहिये। अस्तु इस गुरु पर्व पर परिवार में जो उपासना करने वाले लोग थे अब उनकी संख्या दूनी से अधिक हो गई है।
व्यक्तिगत जीवन सुधार कार्य-क्रम में (1) समय का सदुपयोग करने के लिए नियमित दिनचर्या बनाकर उसके अनुसार बरतते हुए आलस्य को हटाना। (2) बजट बना कर खर्च करने का क्रम निर्धारित कर फिजूलखर्ची पर कठोर नियन्त्रण लगाना। (3) क्रोध और आवेश को शत्रु मानते हुए सहिष्णुता और सज्जनतायुक्त व्यवहार करना तथा मीठा बोलना। (4) घर में अपने से बड़ों को नित्य प्रातःकाल प्रणाम, चरणस्पर्श करना। (5) शरीर वस्त्र, घर और सामान को अधिकाधिक स्वच्छ रखना। (6) आहार को अधिक सात्विक और व्यवस्थित बनाना तथा ब्रह्मचर्य के संबन्ध में अधिक कठोरता बरतना, यह छह कार्यक्रम परिवार में अधिक उत्साहपूर्वक अपनाये गये हैं और संकल्प यह किया है कि अगले एक वर्ष में इन छह बातों में अधिकाधिक सफलता प्राप्त करने के लिए पूरी तत्परता से प्रयत्न किया जायगा।
परिवार निर्माण के लिए घर में एक घण्टा रोज की परिवार गोष्ठी चलाने का क्रम गुरुपूर्णिमा के दिन से उत्साहपूर्वक आरम्भ हुआ है। गतवर्ष परिजनों में से केवल दसवाँ भाग ऐसा था जो इन गोष्ठियों को चलाता था, अब प्राप्त सूचनाओं के अनुसार यह संख्या बढ़कर एक तिहाई हो गई है। प्रगति इसी क्रम से चली तो शेष दो तिहाई सदस्य जो अभी शिथिलता बरत रहे हैं वे भी परिवार प्रशिक्षण के लिए नियमित रूप से एक घण्टा रोज देने लगेंगे। कुटुम्ब को सुसंस्कृत, संगठित और सुविकसित बनाने के लिए इन गोष्ठियों का कितना अधिक महत्व है इसका अनुभव यह क्रम आरम्भ करने वालों को थोड़े ही दिन में हो जाता है। घर में जो अब तक अशिक्षित रहे है उन्हें इन दैनिक गोष्ठियों द्वारा शिक्षित बनाने का क्रम चल पड़ा है। कन्याओं को स्कूल न भेजने या थोड़ा पढ़ा कर बन्द कर देने की जो संकीर्ण दुर्बलता लोगों के मनों में भरी हुई थी उसे भली प्रकार झकझोर दिया गया है और लोग अब अपनी लड़कियों को भी लड़कों की तरह ही सुशिक्षित बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं। प्राप्त सूचनाओं के अनुसार इस प्रेरणा से प्रभावित होकर वे कन्यायें जिनकी शिक्षा का द्वार प्रायः बन्द हो चुका था अब पुनः खुल गया है उनकी संख्या दस हजार से कम नहीं है। घरों में नैतिक, सामाजिक, साँस्कृतिक विषयों की चर्चा चल पड़ने या सुनने का नित्य क्रम बनने से हर घर में विचारक्रान्ति की चिनगारी सुलगाई गई है। थोड़े ही दिनों में इसकी लपटें उठेंगी तो बढ़ती हुई गर्मी और रोशनी का उत्साह भरा वातावरण दिखाई देने लगेगा।
युग-निर्माण के उपयुक्त नई पीढ़ी में नये महापुरुष जन्मने वाले हैं। उच्च लोकों की दिव्य आत्माएँ भारत भूमि पर अवतरित होने वाली हैं। वे मानव जाति का नेतृत्व करके विश्वशान्ति की भूमिका प्रस्तुत करेंगी। दिव्य आत्माओं के नये अवतरण के लिए उन परिवारों का वातावरण सुसंस्कृत होना आवश्यक है जहाँ वे जन्म लें। सम्भव है यह श्रेय अपने परिजनों को मिले। इसलिए उनका पारिवारिक वातावरण अधिक-से-अधिक सुसंस्कृत होना चाहिए। अन्यथा गर्हित वातावरण में कोई दिव्य आत्मा जन्म लेना या ठहरना पसन्द न करेगी। परिवार निर्माण योजना के पीछे यह एक रहस्यमय प्रक्रिया भी छिपी हुई है, इसलिए इस बात पर बहुत जोर दिया गया है कि हममें से प्रत्येक को अपने परिवारों का वातावरण उत्कृष्ट बनाना चाहिए और अपने उज्ज्वल चरित्र का घर में लोगों के लिए अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने इस प्रयोजन को समझा है और अपने-अपने परिवारों में श्रेष्ठ परम्पराएँ प्रचलित करने की ओर आवश्यक ध्यान दिया है। इस गुरुपूर्णिमा से शिथिल लोगों ने भी आवश्यक प्रयत्न आरम्भ कर दिये हैं।
समाज-निर्माण के लिए यह आवश्यक है कि अपने समय का एक अंश लोक-सेवा के लिये नियमित रखा जाय, समाज सेवा को भी अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं में नित्य कर्मों से सम्मिलित रखा जाय। जिस प्रकार अपनी निज की तथा अपने व्यापार, परिवार की समस्याओं पर ध्यान दिया जाता है वैसे ही समाज के उत्थान पतन में आवश्यक दिलचस्पी ली जाय। विकृतियों को रोका जाय और सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाया जाय। यह तभी सम्भव है जब हमारे समय का एक अंश इन कामों के लिए भी लगे। प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड - ज्योति परिवार के सदस्यों ने इस दिशा में आवश्यक उत्साह दिखाना आरम्भ कर दिया है। “ज्ञान यज्ञ के लिये समय दान” का प्रश्न हर एक के सामने एक आवश्यक प्रश्न के रूप में उपस्थित हुआ है। कम ही लोग ऐसे हैं जिनकी संकीर्णता पैरों की जंजीर साबित हुई है अन्यथा अधिकाँश ने उदारता, साहस और दूरदर्शिता को अपनाते हुए समय का एक अंश इस दिशा में लगाना आरम्भ कर दिया है।
गुरुपूर्णिमा आयोजनों की प्राप्त सूचनाओं से विदित होता है कि इस वर्ष वृक्षारोपण, शाक बोना तथा फूल उगाने की दिशा में लोगों का उत्साह फूट पड़ा है। अनुमानतः इस वर्षा ऋतु में परिजनों ने दस हजार वृक्ष लगाये हैं और जितनी शाक भाजी बोई है उसका आधा भी यदि ठीक तरह उग सका तो एक लाख टन से कम सब्जी उत्पन्न न होगी। स्वास्थ्य सुधार तथा अन्न संकट की दृष्टि से यह उत्पादन कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसी प्रकार लगभग एक लाख घर ऐसे होंगे जिनके आँगनों में- बाहर तथा गमलों में रंग-बिरंगे सुगन्धित फूल खिले होंगे तथा तुलसी के बिरवा लहलहा रहे होंगे।
शिक्षा प्रसार के लिये प्राइमरी स्कूल, मिडिल स्कूल, हाईस्कूल, कन्या विद्यालय खुलवाने, उन्हें विकसित कराने, छात्रों की संख्या बढ़वाने, इमारतों के लिए चन्दा कराने, श्रमदान तथा भूमिदान के द्वारा स्कूलों का स्थान बनाने, सरकारी सहायता उपलब्ध करने के कार्य पर हर जगह जोर दिया जा रहा है। उसी प्रकार प्रौढ़ शिक्षा के लिये जगह-जगह छुट-पुट प्रयत्न चल रहे हैं। स्त्री शिक्षा के लिए तीसरे पहर और पुरुष शिक्षा के लिये रात्रि पाठशालाएं चलाई जा रही हैं जिनसे साक्षरता की समस्या हल हो। कामों में लगे हुए लोगों के लिए ऐसे रात्रि विद्यालय स्थापित कराये जा रहे हैं जिनमें पढ़कर प्राइवेट परीक्षाएँ दे सकना लोगों के लिए सम्भव हो सके। स्कूली छात्रों के लिए ऐसी कोचिंग - ट्यूटोरियल - रात्रि पाठशालाएं चलाई जा रही हैं जिनमें छात्र स्कूली पढ़ाई भी पूरी कर सकें और नैतिकता की आवश्यक शिक्षा भी प्राप्त कर सकें। शिक्षा प्रसार राष्ट्र - निर्माण का आवश्यक अंग है। उसे बढ़ाने के लिए अखण्ड ज्योति परिवारों ने मिलजुल कर अपने - अपने ढंग से कार्य आरम्भ किए हैं। गुरु पूर्णिमा से इन प्रयासों में दूनी तेजी आई है।
दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखना, व्यायामशाला, प्राकृतिक चिकित्सा आदि कितने ही उपयोगी कार्य ऐसे हैं, जो अभी भी उपेक्षित पड़े हैं। उस दिशा में अभी बहुत थोड़ा प्रयत्न हुआ है। आशा है आगे चलकर यह प्रवृत्तियाँ भी बल पकड़ेगी। जब कि लोग समाज सेवा के लिए कुछ समय नियमित रूप से लगाने ही लगे हैं और सामूहिकता का महत्व समझकर संगठित होने लगे हैं तो कुछ ही दिन में अनेकों रचनात्मक कार्यों का श्रीगणेश होने ही वाला है।
गुरुपूर्णिमा पर्व को जिस शान के साथ अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों ने देश भर में मनाया है उसके समाचार, ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक पत्रिका में संक्षिप्त रूप से छपेंगे ही। उन पर दृष्टिगत करने से कोई भी विचारशील व्यक्ति यह अनुमान भली प्रकार लगा सकेगा कि अपने छोटे से परिवार ने युग - निर्माण की दिशा में इस शुभ दिन से जिस उत्साह और लगन के साथ कदम बढ़ाये हैं उससे उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना स्पष्ट है। अभी एक वर्ष ही हुआ है। हमारे अगले वर्ष कितने गौरवपूर्ण होंगे इसकी कल्पना मात्र से आँखों में आशा की ज्योति चमकने लगती है।
नव निर्माण के लिए अनेक रचनात्मक प्रवृत्तियों को प्रचलित और विकसित करने की आवश्यकता पड़ेगी। साथ ही कुरीतियों, अनैतिकताओं और अन्ध मान्यताओं के विरुद्ध संघर्ष भी आरम्भ करना होगा। दूध में से मक्खन निकालने के लिए ‘रई’ को उल्टी तथा सीधी ओर दोनों ही तरह घुमाना पड़ता है। उसी प्रकार एक ओर हमें निर्माणात्मक कार्यों के लिए प्रयत्न करना होगा तथा दूसरी ओर अवाँछनीयता पर प्रहार करना होगा। झाड़ झंखाड़ों को उखाड़कर ही सुरम्य उपवन लगाये जाते हैं यही नीति हमें भी अपनानी होगी।
किन्तु इससे पूर्व यह आवश्यक है कि इन दोनों कार्यों के लिए अभीष्ट शक्ति संग्रह कर ली जाय। यह शक्ति जन संगठन की ही हो सकती है। संघशक्ति के बिना लोक -मानस का परिष्कार कर सकना सम्भव न होगा। दोनों प्रकार के रचनात्मक और ध्वंसात्मक - कार्यक्रम जन-शक्ति के आधार पर ही सम्पन्न होंगे। अतएव हमारा प्रारम्भिक प्रयास यह है कि अपने छोटे से कुटुम्ब को- अखण्ड-ज्योति परिवार को - एक सुगठित संगठन के रूप में विकसित कर लिया जाय और फिर उन योजनाओं को इस छोटे क्षेत्र में प्रारम्भ किया जाय जिन्हें आगे चलकर देशव्यापी एवं विश्वव्यापी बनाना है।
संगठन के मूल में कोई दिशा, प्रेरणा, आस्था एवं कार्य पद्धति होनी चाहिये। ‘अखण्ड-ज्योति’ नियमित रूप से पढ़ने वालों की विचारधारा, आस्था, अभिरुचि एवं कार्य-प्रणाली एक विशेष दिशा में ढलती है, यह निश्चित है। इस पत्रिका के पृष्ठों पर जो ज्वलन्त प्रेरणाएँ बिखरी पड़ी रहती हैं वे पाठक की मनोभूमि पर एक गहरा प्रभाव डालती हैं यह अनुभव सिद्ध तत्व है। इस लिए युग -निर्माण जैसे महान् कार्य का शुभारम्भ करने के लिए सर्वप्रथम उन लोगों को लिया गया है जो इसके आवश्यक मनोभूमि उपलब्ध कर चुके हैं। अखण्ड-ज्योति के पाठकों को इसी श्रेणी के विशिष्ट व्यक्तियों में माना जा सकता है। अतएव इस महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए सर्व प्रथम उन्हें ही संगठित एवं शृंखलाबद्ध किया गया है।
अखण्ड-ज्योति के सदस्यों को ही युग -निर्माण का सदस्य माना गया है। इन तीस हजार व्यक्तियों को सुसंगठित करना हमारा प्राथमिक एवं आधारभूत कार्य है। जहाँ, जितने अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं, उन्हें इकट्ठे होकर एक शाखा के रूप में परिणत हो जाना चाहिए और पाँच व्यक्तियों की एक कार्य समिति उन्हीं में से चुन लेनी चाहिए। उन्हीं में से एक शाखा संचालक चुना जाय। यह अनुरोध गत कई महीनों से किया जाता रहा है। कितनी ही जगह संगठन बन भी गये हैं, पर अब यह आवश्यक समझा गया है कि जहाँ भी अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं, वहाँ इसी महीने संगठन कार्य पूरा कर लिया जाय। युग-निर्माण योजना का द्वितीय वर्ष आरम्भ होते ही पहला काम हमें यही पूरा कर लेना है। सन्तोष की बात है कि गुरु पूर्णिमा के दिन सैकड़ों स्थानों पर शाखाओं की विधिवत् स्थापना हो गई। पाँच व्यक्तियों की कार्य समितियाँ बन गई और एक शाखा संचालक नियुक्त हो गया। इन स्थापनाओं के संवाद युग-निर्माण योजना पाक्षिक में छपेंगे। जहाँ अभी तक इस प्रकार का संगठन नहीं बना है, वहाँ अब इस अगस्त मास में उसे पूरा कर लिया जाना चाहिए। इन पंक्तियों के द्वारा प्रत्येक अखण्ड-ज्योति परिजन से हमारा आग्रहपूर्वक अनुरोध है कि संगठन की उपेक्षा न की जाय। इस युग की सबसे बड़ी शक्ति संगठन है। जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं वे इसी महीने संगठन सूत्र में आबद्ध हो जायेंगे, ऐसी आशा है।
हमारा कार्य है- शाखा कार्यालय की- युग -निर्माण केन्द्र की स्थापना। इसके लिए एक नियत स्थान निश्चित कर लेना चाहिए, सदस्य - गण समय - समय पर जहाँ इकट्ठे होते रहें, परस्पर प्रेम - भाव बढ़ाते रहें और आगे स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार क्या गतिविधियाँ अपनाई जायें, उसका निश्चय करते रहें। इतना प्रारम्भिक कार्य पूरा हो जाने पर आगे के लिए कुछ ठोस कार्य भी हो सकने की आशा की जा सकती है। जड़ जमेगी तो पत्ते भी निकलेंगे। जहाँ जड़ ही न होगी, वहाँ पत्तों की क्या आशा? जहाँ संगठन का स्वरूप और स्थान सामने आ जाता है, वहाँ निश्चित रूप से कुछ कार्य भी होने लगता है।
स्थापना के उपरान्त जो रचनात्मक कार्य सर्व प्रथम आरम्भ करना है, वह है - युग निर्माण पुस्तकालय की स्थापना। इसके लिए सदस्य-गण परस्पर मिल-जुलकर कम से कम पाँच रुपया मासिक का चन्दा होते रहने की व्यवस्था कर लें। इस धन से युग-निर्माण उद्देश्यों की पूर्ति करने वाली पुस्तकें मँगानी आरम्भ कर देनी चाहिएं। प्रारम्भ में कुछ अधिक चन्दा इकट्ठा हो सकता हो तो वैसा करना चाहिए, ताकि शुरुआत में कुछ अधिक साहित्य मँगाया जा सके।
इस पुस्तकालय की यह विशेषता होगी कि परिवार का प्रत्येक सदस्य अपने मित्रों, स्वजनों, परिचितों के घरों पर इस साहित्य को पहुँचाने और वापिस लाने के लिए एक स्वयं-सेवक की तरह- धर्म -प्रचारक की तरह समय दान - श्रम दान भी करे। आज लोगों में एक तो वैसे ही पढ़ने की रुचि नहीं, जो पढ़ते हैं वे मनोरञ्जन के लिए ओछा साहित्य पढ़ते हैं। जीवन निर्माण के लिए विचारोत्तेजक पुस्तकें आम तौर से लोगों को रूखी लगती हैं। उनकी ओर अभिरुचि एवं आकर्षण पैदा करना साधारण नहीं, असाधारण कार्य है।
पुस्तकालय स्थापना का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब अभिरुचि उत्पन्न करने के लिए सदस्य - गण प्राण से प्रयत्न करें। लोगों के घरों पर जा -जाकर - दर-दर की ठोकरें खाकर, युग -निर्माण साहित्य पढ़ने के लिए आकर्षण पैदा करें। प्रयत्न करने पर एक सदस्य एक महीने में एक नये व्यक्ति में इस प्रकार की अभिरुचि अवश्य पैदा कर सकता है। शाखा में यदि दस सदस्य हों और वे वर्ष में बारह न सही, दस ही नये व्यक्तियों को सत्साहित्य पढ़ने की -- स्वाध्याय की अभिरुचि उत्पन्न करने में सफल हो सकें तो यह दस व्यक्तियों का प्रयत्न सौ नये व्यक्तियों को योजना की भावनाओं से प्रभावित कर सकता है। उन्हें योजना का सहायक माना जा सकता है। आगे चलकर यह ही सदस्य बन सकते हैं और अपना संगठन दस से बढ़कर सौ का हो सकता है। जिस शाखा में सौ सदस्य हों, सो भी भावनाशील और विचारशील, तो यह निश्चित है कि वे उस नगर के लिए एक अग्रिम पंक्ति का नेतृत्व उपस्थित कर सकेंगे और जनता को अपनी विचारणा, योजना एवं कार्य-पद्धति से आशाजनक सीमा तक प्रभावित कर सकते हैं।
प्रगति के इतने चरण जो शाखा पार कर लेगी, वह एक प्रचण्ड शक्ति के रूप में प्रकट होगी और आगे चलकर नव-निर्माण के महान अभियान में ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करेगी। अखण्ड-ज्योति के सदस्यों से गुरु पूर्णिमा की श्रद्धाँजलि के रूप में यही योजना की गई है। जिनमें कुछ जीवट हो वे इतना कर डालने के लिए उठ खड़े हों। कार्य बहुत सरल है। कठिनाई केवल अपने आलस्य, संकोच और अनुत्साह की है। इन तीनों को हटाकर आज की महत्वपूर्ण घड़ी में कुछ कर गुजरने की आशा उन सब स्वजनों से की जा रही है, जिनमें जीवन का अंश मौजूद है। विश्वास यही है कि यह आशा पूर्ण होगी।
जुलाई की अखण्ड-ज्योति में ‘जीवन- निर्माण का मासिक प्रशिक्षण’ और ‘गीता के माध्यम से जन - जागरण की शिक्षा’ शीर्षक दो लेखों में अखण्ड - ज्योति के पाठकों को मथुरा आने का आमन्त्रण दिया गया था। अगस्त अंक में इस सम्बन्ध में और भी अधिक स्पष्टीकरण किया जा चुका है। हर्ष की बात है कि इन दोनों निमन्त्रणों का परिजनों ने उत्साह - वर्धक स्वागत किया है और अपनी-अपनी सुविधा का समय देखकर इन प्रशिक्षणों में भाग लेने की स्वीकृतियाँ प्राप्त करके आने की तैयारी में लग रहे हैं।
इस वर्ष आश्विन, मार्गशीर्ष, माघ और चैत्र के चार शिविर शरीर और मन की अस्वस्थता दूर करने की दृष्टि से लगाये जा रहे हैं। चान्द्रायण व्रत के साथ गायत्री पुरश्चरण करने का अवसर जिन्हें मिल सके, उन्हें सौभाग्यवान ही कहना चाहिए। जो लोग चान्द्रायण व्रत न कर सकेंगे, उन्हें उनकी स्थिति के अनुरूप दूध कल्प, छाछ कल्प, शाक कल्प, फल कल्प या अन्न कल्प की विधि से उपवास कराया जायगा और बिगड़े हुए पाचन यन्त्र को सुधारने का प्रयत्न किया जायगा। प्राकृतिक चिकित्सा की व्यावहारिक शिक्षा, साथ ही उसका अपने ऊपर परीक्षण इससे दुहरा लाभ होगा। एक महत्वपूर्ण चिकित्सा विधि भी इतनी छोटी अवधि में सीख ली जायगी और उसकी उपयोगिता का अपने ऊपर प्रयोग करके विश्वास भी हो जायगा।
गायत्री उपासना, चान्द्रायण व्रत के साथ करने पर कितनी प्रभावशाली होती है, यह बात कहने की नहीं, वरन् अनुभव करने की ही है। साधारण रीति से -घर के झंझट-भरे वातावरण में उपासना करने की अपेक्षा गायत्री-तपोभूमि जैसे पवित्र वातावरण में रहकर इस प्रकार की तपश्चर्या के साथ साधना करने का प्रतिफल कुछ दूसरी ही तरह का होगा। आत्म-बल बढ़ने और अन्तःकरण पर चढ़े हुए, कषाय कल्मषो का शमन करने के लिए यह एक महीना किसी के लिए भी बहुत मूल्यवान सिद्ध हो सकता है।
मनोविकारों, मानसिक दुर्बलताओं और मानसिक रोगों को पहचानने, उनके दुष्परिणामों को जानने और जानकर उनके समाधान का उपाय कर सकने में बहुत कम लोग समर्थ होते हैं। इस एक महीने के प्रशिक्षण में शिक्षार्थियों की मानसिक अस्वस्थता को दूर करने का भी प्रयत्न होगा। मानसिक स्वास्थ्य का महत्व शारीरिक स्वास्थ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण है, जो यह जानते हैं, उन्हें यह मानसिक परिष्कार के लिए मिलने वाला उपचार भी कम उपयोगी प्रतीत न होगा।
जीवन जीने की कला के विविध पहलू इन शिविरों में समझने को मिलेंगे। शारीरिक, मानसिक ही नहीं, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, नैतिक, पारिवारिक समस्याओं को सुलझाने की पद्धति सीखने को मिलेगी और यह सीखा जा सकेगा कि दाम्पत्ति - जीवन को आनन्दमय बनाने और अपने बच्चों को सुयोग्य एवं सुसंस्कृत बनाने का उपाय क्या है? जीवन जीने की कला जितनी ही महत्वपूर्ण है, दुर्भाग्य से आज वह उतनी ही उपेक्षित पड़ी हुई है। शिविरों में आने वाले शिक्षार्थी इस एक महीने की अवधि में जीवन विद्या का जितना अंश सीख सकेंगे, वह उनके लिए जन्म भर एक अविस्मरणीय उपहार की तरह आनन्ददायक प्रतिफल देता रहेगा।
इसी प्रकार कार्तिक, पौष, फाल्गुन, बैसाख में होने वाले ‘चार गीता शिविर’ उन लोगों के लिए एक दैवी वरदान की तरह उपयोगी सिद्ध होंगे, जो नये युग का नया नेतृत्व करने के लिए साहस कर सकते हैं। राजनैतिक नेतृत्व अब फिसड्डी सिद्ध होने वाले हैं। सामाजिक एवं चारित्र्यक क्षेत्र ही अपनी आवश्यकता एवं उपयोगिता प्रतिपादित करेंगे। इन्हीं क्षेत्रों का नेतृत्व मानव जाति की समस्याओं का समाधान करेगा और जो लोग इन क्षेत्रों में अपना वर्चस्व प्रदर्शित करेंगे, वे संसार में ऐतिहासिक महापुरुषों की तरह अजर - अमर बने रहेंगे।
युग की पुकार ऐसे ही लोक - नायकों की है, जो अन्धकार में भटकती हुई मनुष्य जाति को उसकी सामाजिक, नैतिक, शारीरिक एवं मानसिक स्थिति उत्तम बनाकर सुख शान्ति का चिरस्थायी वातावरण प्रस्तुत कर सकें। इस आवश्यकता की पूर्ति गीता प्रवचनों द्वारा सम्भव है। भगवान श्रीकृष्ण ने मोह - ग्रस्त अर्जुन पर यही अमृत बरसाया था। मूर्च्छित समाज के लिए आज फिर उसी संजीवनी बूटी की आवश्यकता पड़ी है। अस्तु प्रयत्न यह किया जा रहा है कि गीता प्रचारकों के रूप में सहस्रों जन-नायक जन-मानस की दिशा मोड़ने के लिए निकल पड़े और धार्मिकता एवं आस्तिकता के वातावरण में जनसाधारण के अन्तःकरणों तक वह प्रेरणा पहुँचावें, जिससे सुनने वालों की चित्त वृत्तियाँ आशा जनक मोड़ लिये बिना न रह सकें।
ठीक भागवत सप्ताह की पद्धति पर गीता के साप्ताहिक धर्मानुष्ठानों की परम्परा हमें प्रचलित करनी है। उसकी रूप-रेखा क्या होगी? यह पिछले दो अंकों में कहा जा चुका है। गीता के श्लोक, उनकी संगति वाली रामायण की चौपाइयां, हर श्लोक के साथ धर्म-पुराणों की कथाएं तथा ऐतिहासिक घटनाओं का वर्णन होने से कथा, साधारण कथा न रहेगी। वरन् वह अमृत वर्षा बन जाएगी। जनता द्वारा छन्द बद्ध गीता अनुवाद का गायन वाद्य के साथ सामूहिक रूप से कीर्तन, भजन की तरह परायण किया जाना बहुत ही आकर्षक एवं आनन्दमय प्रतीत होगा। उसे सुनते-2 उठने को किसी का मन न करेगा। इस प्रकार की आकर्षक कथा शैली का प्रशिक्षण इन एक महीने के शिविरों में होगा। आत्म कल्याण के लिए आवश्यक ज्ञान प्राप्त करने के अतिरिक्त जन-मानस में प्रेरणा भर देने वाले प्रवचन पद्धति भी सीख ली जाएगी। यह कम महत्त्व ही बात नहीं है।
इसी अवधि के षोडश संस्कार, जन्म दिन, विवाह दिन आए संस्कार और त्यौहार पर्व मनाने की विधि विधान सिखा दिया जायेगा। जिससे परिवार धार्मिकता और कर्त्तव्य-परायणता की प्रतिष्ठापना सम्भव हो सके। घरेलू प्रवचन इन्हीं माध्यमों से ही होते हैं। व्यक्तिगत जीवन को संस्कारवान् बनाने के लिए इन संस्कारों की कितनी अधिक आवश्यकता है? यह बताना जरूरी नहीं। कठिनाई यह थी कि ऐसी सरल संस्कार पद्धति अब तक थी नहीं जो थी, उनका व्यावहारिक ज्ञान न होने से केवल पुस्तक के आधार पर कुछ बनाना पड़ता था। अब वह सब व्यावहारिक रूप से सिखाया जाएगा तो उसका प्रयोग भी सरल बन जाएगा। गायत्री मंत्र की आम तौर से जरूरत पड़ती रहती है। इसका आद्योपांत परिपूर्ण विधान जान लेने से भी गायत्री मंत्र के माध्यम से होने वाले सामूहिक धर्म शिक्षण का एक वक्त बड़ा कार्य कर सकना आ जाता है।
सच्चे धर्म प्रचारकों की पहले भी आवश्यकता थी और अब भी है। सच्चे ब्राह्मणों के लिए प्राचीन काल में भी अपार श्रद्धा थी, अब भी है और आगे भी रहेगी। यह ब्राह्मणत्व की परम्पराएँ सदा की भाँति आगे भी अभिष्ट रहती है। इस पुण्य प्रक्रिया का शिक्षण युग-निर्माण के उद्देश्य करने की जो व्यवस्था की गई है, उसे सोने में सुगन्ध ही कहना चाहिए। इस माध्यम से गुजारे की समस्या भी सहज ही हल हो जाती है। माध्यम वृत्ति से गुजारा करने और गृहस्थ पालने के योग्य आजीविका भी इस माध्यम से मिल ही जाने वाली है।
गीता प्रचारक वस्तुतः युग - निर्माण योजना के उद्देश्यों और आदर्शों को विश्वव्यापी बनाने वाले जन - नेता ही होंगे। उनका स्थान दक्षिणा - खाऊ, पोथी - पण्डितों में नहीं, वरन् धर्म - सैनिकों में, युग - प्रवर्त्तकों में होगा। इसलिए जो उस मार्ग पर चलना चाहें वे इन एक - एक महीने के गीता शिविरों में आने की तैयारी करें। शाखाएँ अपने प्रतिनिधि इस प्रशिक्षण के लिए भेज सकती हैं। जिनके यहाँ पंडित पुरोहित या यजमानी कार्य होता है उनके लिए तो यह सब दृष्टियों से उपयुक्त है।
जिन्हें पारिवारिक उत्तरदायित्वों से छुट्टी मिल गई वे तपोभूमि में आकर निवास करने के लिए सादर आमन्त्रित किये जा रहे है। वेद, शास्त्र, दर्शन, उपनिषद्, गीता, रामायण आदि विधिवत पढ़ने और साधना करने का यह जो शान्तिमय वातावरण है, वह वृद्धावस्था के उद्देश्यों को पूरा करके पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा सकता है। अब तपोभूमि में स्थान सम्बन्धी जो नई सुविधा हो गई है, वह घर से निवृत्त हो जाने वालों के लिए बहुत ही सुविधाजनक है। जो अपने खर्च की व्यवस्था घर से चला सकते हों, उन वयोवृद्धों को मथुरा आकर अपना जीवन सफल बनाने की साधना में लग जाना चाहिए। इस प्रकार की परिस्थिति वालों को तपोभूमि सादर आमन्त्रित करती है। सभी शिक्षार्थी निवास की सुविधा प्राप्त कर सकेंगे, पर उन्हें अपनी भोजन व्यवस्था स्वयं करनी होगी।
मथुरा आने के लिए - इन प्रशिक्षणों से लाभ उठाने के लिए अखण्ड - ज्योति परिवार के सभी परिजनों को आमन्त्रित किया गया है। बीमारी आदि के समय जैसे कुछ दिन साधारण काम छोड़ने पड़ते हैं, उसी तरह इन शिक्षाओं के लिए भी समय निकालने का प्रयत्न करना चाहिए। यह स्वर्ण - सुयोग न छोड़े जाने लायक ही है।
व्यक्ति-निर्माण, समाज-निर्माण, युग-निर्माण की प्रेरणा लेकर अखण्ड-ज्योति का प्रकाश पिछले 25 वर्षों से चल रहा है। इसकी किरणें जिन पर भी पड़ी हैं उन्हें अन्धकार से छुटकारा पाने और अपने को आलोकित करने का अवसर मिला है। लाखों व्यक्तियों ने अपनी जीवन दिशा मोड़ी और संकीर्ण दायरे में कीड़े - मकोड़ों को जीवन जीने वाले देवत्व की परिधि स्पर्श कर सकने की स्थिति तक पहुँचे यह एक वास्तविकता है।
हमें प्रयत्न यह करना चाहिये कि अखण्ड - ज्योति की प्रत्येक कापी का लाभ अधिक से अधिक व्यक्ति उठावें। जिस घर में वह पहुँचती है, उसमें जो भी पढ़े - लिखें हो वे उसे पढ़ें और जो बिना पढ़े हों वे सुनें, ऐसा प्रबन्ध किया ही जाना चाहिये। प्रत्येक अंक कम से कम 10 व्यक्तियों की ज्ञान वृद्धि का साधन बने तभी उसे मँगाने की सार्थकता है।
यह वर्ष अखण्ड-ज्योति की रजत-जयंती का वर्ष है। इसमें हर परिजन को कुछ नये ग्राहक बनाकर अपनी श्रद्धाँजलि अर्पित करनी है, जिनने अभी यह नहीं किया है, उन्हें अब कर लेना चाहिए। अपने मित्रों, स्वजनों को उपहार में भी भिजवाना चाहिए। यों अखण्ड-ज्योति के ग्राहक एक वर्ष से कम के लिए नहीं बनाये जाते पर इन दिनों उसमें यह ढील कर दी गई है कि जुलाई से दिसम्बर तक छह महीनों के लिए 2) रुपया भेज कर भी उसका ग्राहक बना जा सकता है।
जिन्हें 4) रुपया देने कठिन पड़ते हैं, या उपहार में अधिक खर्च नहीं करना चाहते वे छह महीने के लिए भी ग्राहक बन या बना सकते हैं। रजत-जयन्ती वर्ष में अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए हममें से हर एक को उत्साह एवं भावनापूर्वक प्रयत्न करना चाहिए।
जिसे प्रत्येक घर में, प्रत्येक पुस्तकालय में रहना ही चाहिए
परिवार की पूँजी और प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए लोग जमीन, जायदाद, व्यवसाय, सोना, चाँदी आदि बनाते और बढ़ाते हैं। शरीरों और मनों के सुख के साधन जुटाते हैं। इसी तरह यह भी आवश्यक है कि परिवार के सदस्यों की मनोभूमि को विकसित, दृष्टिकोण को परिष्कृत, विवेक को जागृत, जीवनक्रम को व्यवस्थित और गतिविधियों को सुसंस्कृत बनाने के साधन भी जुटाये जायें।
जिस प्रकार धन मनुष्य के बाह्य जीवन की आवश्यकताएं पूरी करता है उसी प्रकार आन्तरिक जीवन की आवश्यकताएं ज्ञान से पूरी होती हैं। धन की तरह ही मनुष्य जीवन में सद्ज्ञान का भी महत्व है। प्रत्येक विवेकशील व्यक्ति का कर्त्तव्य है कि वह भौतिक जीवन को अभावग्रस्त न रहने देने के लिए जिस प्रकार धन उपार्जन करता है, उसी तरह आन्तरिक जीवन को सुसंस्कृत बनाने के लिए सद्ज्ञान का संग्रह करता रहे। मनुष्य शरीर ही नहीं आत्मा भी है, इसलिए उसको केवल शरीर के बारे में ही नहीं कुछ आत्मा के बारे में भी सोचना चाहिए और आत्मिक प्रगति के लिए भी कुछ करना चाहिए।
जीवन कैसे जियें? इस प्रश्न का विवेकसंगत उत्तर देना ही सद्ज्ञान का उद्देश्य है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए ‘अखण्ड -ज्योति’ ने युग -निर्माण साहित्य प्रकाशित करना आरम्भ किया है। प्रथम वर्ष में जो पुस्तकें छपी हैं, उनकी सूची अगले पृष्ठ में दी है। इन्हें स्वाध्याय - साहित्य कहना चाहिए। पुस्तकों की एक - एक पंक्ति आशा, स्फूर्ति, साहस और आदर्श की प्रेरणा से ओत -प्रोत रखने का प्रयत्न किया गया है। सभी में बढ़िया 28 पौण्ड ग्लेज कागज, मोनो टाइप की सुन्दर छपाई, कार्ड - बोर्ड के तिरंगे टाइटल पेज तथा 100 पृष्ठ हैं। मूल्य प्रत्येक का एक - एक रुपया रखा गया है। पुस्तकें इतनी सुन्दर और नयनाभिराम बन पड़ी हैं कि उन्हें देखते ही बनता है और पढ़ने में तो वे जादू भरी हैं ही।
हममें से प्रत्येक को अपनी पारिवारिक पूँजी के रूप में एक घरेलू युग- निर्माण पुस्तकालय बनाना चाहिए। जिसमें यह साहित्य रहे। परिवार के स्त्री - पुरुष, बाल - वृद्ध, स्वजन - सम्बन्धी तथा पड़ौसी इन्हें पढ़ा या सुना करें। इससे जीवन - निर्माण की पृष्ठ भूमि तैयार होगी और इस सद्ज्ञान के संपर्क में आने वाला तेजी से मानवता के आदर्श अपनाने के लिये अग्रसर होगा। युग -निर्माण केन्द्रों के सामूहिक पुस्तकालयों के लिए तो यह साहित्य एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में अभीष्ट है।
आप अपनी दैनिक आवश्यकताओं में से कुछ बचाइए और परिवार की सच्ची पूँजी के रूप में घर में युग -निर्माण पुस्तकालय स्थापित कीजिए। इस वर्ष 45 पुस्तकें छपी हैं, अगले वर्षों में भी यह क्रम जारी रहेगा, जिससे पुस्तकालय की पूँजी हर वर्ष बढ़ती रहेगी। यह व्यवस्था भी हमें परिवार की अनिवार्य आवश्यकताओं में ही सम्मिलित कर लेनी चाहिए।
इस प्रथम वर्ष की 44 पुस्तकों का विषयानुसार वर्गीकरण इस प्रकार है :--
हर घर में रहने लायक व नव प्रकाशित पुस्तकें ---
आध्यात्मिक, दार्शनिक एवं साधनात्मक
ईश्वर और उसकी प्राप्ति
अपना उद्धार आप करें
आत्म - कल्याण का राजमार्ग
पंथ अनेक लक्ष्य एक
वेदों का दिव्य सन्देश
जिन्दगी कैसे जिएँ?
आप सर्व शक्तिमान हैं
मनुष्य का मूल्याँकन
आशा की जीवन -ज्योति
विचारों की अलौकिक शक्ति
संकल्प शक्ति के अद्भुत चमत्कार
प्रगति के पथ पर
इन दुर्गुणों को छोड़िए
कविता और गायन
युग सन्देश
युग गायन
युग वीणा
उद्बोधन
दोहा - अंताक्षरी
आरोग्य रक्षा और प्राकृतिक चिकित्सा
आरोग्य रक्षा के रहस्य
क्या खाएँ? कैसे खाएँ?
प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान
कब्ज कैसे दूर हो?
बलवर्धक व्यायाम
शक्ति का स्रोत प्राणायाम
तम्बाकू एक घातक विष है
पारिवारिक समस्याओं का हल
परिवार और उसका निर्माण
मितव्ययी बनिए - सुखी रहिए
सुख शान्तिमय गृहस्थ
सुसंतुलित परिवार
बाल - निर्माण साहित्य
शिशु जन्म से पूर्व
शिशु और अभिभावक
हमारे महान् उत्तराधिकारी
बच्चों को कैसे सुधारा जाए
बच्चे और उनका मनोविज्ञान
बाल विकास की समस्याएं
नव - निर्माण के दर्शन एवं मार्ग
हम बदलें तो दुनिया बदले
समाज की अभिनव रचना
समस्त समस्याओं का एक ही हल
नये युग का सूत्रपात
हमारी युग- निर्माण योजना
कथा, इतिहास और जीवन चरित्र
धर्म पुराणों की सत्कथाएं
चरित्र निर्माण की कथाएं
बड़ों की बड़ी बातें
भारत की महान् विभूतियाँ
संसार के महापुरुष
नोट - प्रत्येक पुस्तक का मूल्य एक रुपया है। 10) रु॰ से अधिक की पुस्तकें लेने पर डाकखर्च माफ । 10) रु॰ से कम की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च भी देना पड़ेगा। पूरा सैट मँगाना हो तो अपने रेलवे स्टेशन का नाम भी लिखें। अपना नाम व पता पूरा और स्पष्ट अक्षरों में हिन्दी या अंग्रेजी में लिखना चाहिए।
पता - अखण्ड - ज्योति संस्थान, मथुरा । (यू॰ पी॰)
टूट कर गिर पड़ीं पाँव की बेड़ियाँ,
ज्योति से हर दिशा जगमगाने लगी।
उड़ चले व्योम को भावना के विहंग,
नाश की तम - निशा डगमगाने लगी।
पौ फटी, राग फूटा, सुबह हो चली,
घर, नगर, गाँव दर -दर मुखर छा गया।
स्वर्ग को चल पड़े स्वर्ग के देवता,
स्वर्ग के अभ्युदय का समय आ गया॥
लो हुआ मुक्त अब आदमी तोड़कर,
युग-युगों से लगी मोह की अंगला।
एक ही शै लगी-मात खाने लगी,
काम की क्रोध की, लोभ की शृंखला॥
मेखला बाँध कर कर्म की देह से
श्रम जगा, भगा, शक्ति मिलने लगी।
स्वर्ग को चल पड़े स्वर्ग के देवता-
इस धरा की असुर-वृत्ति हिलने लगी।
कौन है राह जो रोक ले इस घड़ी?
स्वर-सृजन का उठा जो, उसे थाम ले?
पाँव में ठोकरों पर लगें ठोकरें,
किन्तु तो भी अजय का न पैगाम ले॥
कोटियों विघ्न-प्रतिबन्ध, घातें उठें,
अब न परवाह उनकी कुटिल चाल की।
स्वर्ग को चल पड़े स्वर्ग के देवता,
कौन है राह जो रोक ले काल को॥
बलराम सिंह परिहार
*समाप्त*