जब मनुष्य अकेला होता है, उसके पास और आस-पास भी जब कोई नहीं होता है, तब कोई पाप करने से उसे जो भय लगता है, एक शंका रहती है, वह किसके कारण होती है ? उसे बार-बार ऐसा क्यों लगता है कि कोई उसके पाप को देख रहा है ? क्यों उसका शरीर पूरे उत्साह से उस पाप कर्म में उत्साहित नहीं रहता ? और क्यों बाद में भी वह एक अपराधी की तरह मलीन रहता है? क्या कभी कोई इस पर विचार करता है कि जब उसके पाप को देखने वाला कोई मौजूद नहीं तब उसे भय किसका है वह किससे डर रहा है ? कौन उसे ऐसा करने को निःशब्द रोकता और टोकता रहता है ? कौन उसके मन, प्राण और शरीर में कंपन उत्पन्न कर देता है ?
निःसंदेह यह उसका अपना अन्तःकरण है, जो उसे उस पाप से हटाने के प्रयत्न में विविध प्रकार की शंकाओं, संदेहों व कम्पनादि भयद्योतक अनुभवों से उसे वैसा न करने के लिए संकेत करता जाता है और जो मनुष्य उसकी अवहेलना करके वैसा करता है, उसका अन्तःकरण एक न एक दिन उसकी गवाही देकर उसे दण्ड का भागी बनाता है। यह हो सकता है कि किसी का पाप कर्म दुनिया से छिपा रहे, किंतु उसके अपने अन्तःकरण से कदापि नहीं छिप सकता। वह उसकी एक-एक क्रिया और विचार का सबसे प्रबल और सच्चा साक्षी होता है। जब किसी कारणवश मनुष्य को अपने पाप का दण्ड किसी और से नहीं मिल पाता तो समय आने पर उसका अन्तःकरण उसे स्वयं दण्डित करता है। हमारे लिए उचित यही है कि अन्तःकरण में विद्यमान परमात्मा की आवाज को सुनें और उसका अनुसरण करें।
- महर्षि रमण
आज भारत ही नहीं सारे संसार की बड़ी भयावह स्थिति हो गई है। संसार एक ऐसे बिंदु के समीप पहुँच गया है जहाँ पर किसी समय भी उसका ध्वंस हो सकता है। आज संसार को भयानक ध्वंस से बचाने के लिए वैयक्तिक तथा सामूहिक प्रार्थनाओं की परम आवश्यकता है।
द्वापर काल में महाभारत युद्ध की भयानक भूमिका देखते हुए दूरदर्शी भगवान व्यास, राष्ट्र और विश्व की कल्याण-भावना से विकल होकर अपनी दोनों भुजाएँ उठा कर पुकार करते रहे कि “ऐ मदान्ध लोगों! अर्थ और काम से धर्म श्रेष्ठ है, अर्थ को इतनी महत्ता देकर अनर्थ मत करो, परमार्थ का आश्रय लो, परमार्थ का आश्रय लो।” किंतु अर्थ और काम के गुलाम लोगों ने उनकी पुकार न सुनी, जिसके फलस्वरूप महाभारत का युद्ध हुआ।
आज संसार पुनः उसी महाभारत की स्थिति में पहुँच गया है। आज के आणविक अस्त्र उस समय के अस्त्र-शस्त्रों से अधिक भयानक और विनाशक हैं। साथ ही आज का संसार उस समय से कहीं अधिक लोलुप, स्वार्थी और अर्थलिप्सु बन गया है। आज भी जाने कितने मनीषी महात्मा व्यास की भाँति विहलता से पुकार कर रहे है किंतु आज का मनुष्य उसी प्रकार से फिर जैसे बहरा हो गया है। न उसे कुछ दिखलाई देता है और न सुनाई।
फिर भी सदैव की भाँति जहाँ एक ओर आसुरी सम्पद् के लोग भौतिक साधनों द्वारा संसार के विनाश की तैयारी कर रहे है, वहाँ दूसरी ओर संसार का कल्याण चाहने वाले दैवी सम्पद् के लोग आध्यात्मिक साधनों द्वारा परमात्मा से कल्याण की कामना करते हैं और इस देवासुर द्वन्द्व में “धर्म की विजय और अधर्म का नाश” के सिद्धान्त पर अन्ततोगत्वा धर्म की ही विजय होगी।
आज जिस प्रकार विनाशक तत्व संसार में व्याप्त हो गये हैं, उसी प्रकार उनका नाश करने के लिए व्यापक प्रयत्न की आवश्यकता है। धर्म-प्रिय लोगों के पास ध्वंसक वृत्ति के व्यक्तियों की भाँति भौतिक साधनों का भण्डार तो होता नहीं और न वे इनमें विश्वास करते हैं, अपितु उनके पास जो प्रभु-स्मरण और उसकी प्रार्थना रूपी अपरिमित शक्ति है वह संसार की सारी शक्तियों के अपेक्षा कहीं अधिक बढ़कर है। यदि आज संसार की सब सदाशयी व्यक्ति एक-एक अथवा एक साथ प्रभु से प्रतिदिन प्रार्थना ही करने लगें तो भी संसार के सारे अनिष्ट दूर हो जायें और उनके स्थान पर सुख और शाँति का स्रोत बहने लगे।
यह निर्विवाद है कि यदि आज के धनधारी, सत्ताधारी, वैज्ञानिक, राजनीतिज्ञ आदि अपना काम करते हुए नित्य कुछ समय प्रभु की प्रार्थना का भी कार्यक्रम अपना लें, तो आज के यह सारे विनाश साधन स्वतः निर्माण साधनों में बदल जायें। उनके जीवन का प्रवाह अनायास ही स्वार्थ की ओर से परमार्थ की ओर बह चलेगा और तब वे स्वयं ही ध्वंसक उपादानों से घृणा करने लगेंगे और अपनी क्षमताओं को विश्व-कल्याण की दिशा में मोड़ देंगे।
किंतु उनमें यह परिवर्तन लाने के लिए अधिक से अधिक लोगों को प्रार्थनायें करनी चाहिए और अपनी प्रार्थनाओं में इन लोगों की सद्बुद्धि मिलने का भी भाव रहना चाहिये।
निरन्तर देखा जाता है कि जब किसी व्यक्ति या राष्ट्र पर कोई आपत्ति आ जाती है तो वे भी तत्परता से ईश्वर से आपत्ति दूर करने के लिए प्रार्थनायें करने लगते हैं। युद्ध के समय मंदिरों, मस्जिदों, गिरजों व गुरुद्वारों में सामूहिक प्रार्थनायें होने लगती हैं, घण्टे, घड़ियाल और घण्टियाँ बजने लगती हैं, अजानें, नमाजें और ग्रन्थों की पाठ-ध्वनि होने लगती है। लोग अनुष्ठानों और प्रभु कृपा के लिए पंडितों, पुजारियों को नियुक्त करने लगते हैं। इस बात से स्पष्ट प्रकट होता है कि लोग प्रार्थनाओं में महत्व को समझते हैं और उनमें विश्वास करते हैं, किंतु तब पता नहीं कि नित्य प्रति प्रभु-प्रार्थना क्यों नहीं करते जिससे संसार में आपत्तियाँ आये ही नहीं।
आज प्रत्येक व्यक्ति संसार के तट पर खड़ी आपत्ति को देख रहा है, फिर क्यों नहीं प्रार्थनाओं के अमोघ साधन द्वारा उनके निराकरण में लग जाता ? क्या वह इस बात की राह देख रहा है कि विनाश का ताँडव-नृत्य होने लगे तब वह प्रार्थनाओं का प्रारम्भ करे। यह ठीक नहीं है। जब विनाश अपना ताँडव प्रारम्भ कर देगा तब तो मनुष्य की बुद्धि ही ग्रसित हो जायेगी। सबको अपनी-अपनी पड़ जायेगी और तब उस अशाँत भाव मनःस्थिति में प्रार्थनाओं का वह प्रभाव न होगा जो शाँत मनःस्थिति में होता है।
अतः आज से ही हम सब को वैयक्तिक और सामूहिक रूप से प्रभु-प्रार्थना का कार्यक्रम अपने और संसार के कल्याण के लिए बना लेना चाहिये।
परमात्मा की प्रार्थना एक ऐसा साधन है जिससे एक स्थायी शाँति सहज रूप में संसार में लाई जा सकती है। यदि प्रतिदिन संसार में हो रहे शाँति-सम्मेलनों का सत्य उद्देश्य शाँति ही लाना है तो इनके साथ थोड़ी-सी प्रार्थना भी आवश्यक है। ईश्वर की प्रार्थना करने से मनुष्य में सद्भावनाओं का विकास होता है। बिना सच्ची सद्भावनाओं के शाँति स्थापना नहीं की जा सकती फिर क्यों न लाख शाँति सम्मेलन होते रहें।
मनुष्य जितना परमात्मा की ओर उन्मुख रहता है उतनी ही उनमें शाँति आती है। संसार में शाँति लाने के लिए अपने हृदय में जितनी अधिक शाँति लेकर प्रयत्न किया जावेगा वह उतना ही अधिक सफल होगा।
केवल संसार ही नहीं अपने छोटे से दायरे, परिवार और यहाँ तक कि अपने व्यक्तिगत जीवन में शाँति की परम आवश्यकता है। आज संसार में सामूहिक अशाँति ही नहीं वैयक्तिक अशाँति भी बहुत बढ़ गई है। प्रत्येक मनुष्य अशाँति से जलता हुआ दिखाई देता है। पिता-पुत्र, पति-पत्नी, भाई-बहिन, स्वामी-सेवक सब एक दूसरे से कलह करते और अशाँत होते देखे जाते हैं। क्या मनुष्य को ऐसा नारकीय जीवन बिताना शोभा देता है ? क्या वह अच्छा लगता है कि कदम-कदम पर ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, और अविश्वास का वातावरण मिलता रहे ? संसार में सुँदर स्निग्ध स्नेह की धारा बहने के बजाय आग की लपटें बढ़ती रहें?
कौन ऐसा है जो आज इस अशान्त वातावरण से त्रस्त नहीं हो गया है? एक भी ऐसा व्यक्ति देखने को नहीं मिलेगा जो इससे मुक्ति न चाहता हो। इन सारे दुःखों से छूटने का एक ही उपाय है- ‘प्रार्थना’। सच्चे अन्तःकरण से मानव को दोष, दुर्गुणों से रहित सत्पथगामी बनाने की प्रार्थना प्रारम्भ होते ही संसार से सारे दुःख, क्लेश दूर होने लगेंगे।
प्रार्थना एक विज्ञान है जिसमें मनुष्य को बदल देने की शक्ति होती है। साधारण व्यवहार में जब विनम्रता सफलता का कारण बनती है तो ईश्वर को लक्ष्य बनाकर जो विनय की जावेंगी उसकी शक्ति का कितना व्यापक प्रभाव पड़ेगा, इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
जब एक व्यक्ति भी प्रार्थना करेगा तो उससे वातावरण में जो प्रभाव पड़ेगा, उससे अन्य व्यक्ति प्रभावित होकर प्रार्थना करने के लिए उत्सुक हो उठेंगे, और अन्यों से अन्य, इस प्रकार एक दिन सारे संसार का वातावरण प्रभावित हो उठेगा। जब अनुकरण की सहज बुद्धि से मनुष्य दूसरों की बुराइयों को सीख लेता है तो क्या कारण है कि यह अच्छाइयों को ग्रहण न करेगा? आज जब एक राष्ट्र अन्य राष्ट्र का अनुकरण कर रहा है, तो कौन कह सकता है कि एक देश में यदि नियमित रूप से सामूहिक प्रार्थनाओं का राष्ट्रगत कार्यक्रम अपनाया जावे तो दूसरे राष्ट्र उसका अनुकरण नहीं करेंगे।
प्रार्थना का हमारे दैनिक जीवन में नित्य के आवश्यक कार्यों की तरह स्थान रहना चाहिए। जिस प्रकार स्नान, भोजन आदि को भुलाया नहीं जाता उसी प्रकार प्रार्थना को भी भुलाया न जाय। आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाली इस पुण्य प्रक्रिया को दैनिक जीवन की एक आवश्यक क्रिया मानकर उसे नित्य प्रति निष्ठापूर्वक करते रहा जाय।
अच्छा तो यह हो कि प्रार्थना का महत्व समझाने और उसे दैनिक जीवन में स्थान देने के लिए एक जन आन्दोलन जैसी योजना बनाई जाय। इससे आस्तिक ईश्वर भक्त और प्रार्थना की शक्ति से सम्पन्न भारत, अपने कल्याण की ही शक्ति सामर्थ्य प्राप्त नहीं करेगा वरन् उससे समस्त विश्व का भी कल्याण होगा।
संसार की रचना छोटे-छोटे परमाणुओं से मिलकर हुई है। जड़ और चेतन परमाणुओं के विभिन्न संयोग से ही यह संसार गतिमान हो रहा है। जड़ परमाणुओं की शोध बीसवीं शताब्दी के विज्ञान की सबसे बड़ी देन है। कहते हैं जब इस परमाणु शक्ति का पूर्णरूपेण उपयोग होने लगेगा तब मनुष्य के लिए इस संसार में कुछ भी असंभव न रहेगा। वह स्वेच्छापूर्वक ग्रह-नक्षत्रों में ऐसे ही विचरण कर सकेगा जैसे इस पृथ्वी में एक गाँव से दूसरे गाँव को चले जाते हैं। यह शक्ति कितनी बड़ी होगी इसका अनुमान लगाना भी कठिन है।
जिस परमाणु की शक्ति और महत्ता इतनी बढ़-चढ़ कर है वह इतनी सूक्ष्म वस्तु है कि उसे बड़ी से बड़ी खुर्दबीन लगाकर भी देख पाना संभव न हुआ। केवल उसकी प्रतिक्रियाओं के आधार पर उसका नामाँकन हुआ है। पदार्थ का सबसे छोटा से छोटा टुकड़ा जिसके और अधिक अंश न हो सकें वह ‘अणु’ कहलाता है। इस अणु में भी ‘न्युक्लियस’ या केन्द्र पिण्ड और इसके किनारे अण्डाकार कक्षा में गति करता हुआ “इलेक्ट्रान”, स्थिर “न्यूट्रॉन” और “प्रोटान” से मिलकर बना हुआ परमाणु होता है, जिसको हम देख भी नहीं सकते। उस एक परमाणु का जब विस्फोट होता है तो आइन्स्टाइन के “मासकनवर्जन” सिद्धान्त के अनुसार 33 लाख किलो कैलोरी ताप पैदा होता है। यह शक्ति एक विशाल भू-भाग को जलाकर खाक कर देने में पूर्णतया समर्थ है। अभी तो उस पर अनेकों खोजें और भी होनी शेष हैं।
प्रत्येक पदार्थ इन छोटे-छोटे परमाणुओं से मिलकर बना है। मिट्टी के छोटे-छोटे कणों का वृहत्स्वरूप यह पृथ्वी है, समुद्र पानी की एक छोटी-सी बूँद है। विशाल वट वृक्ष का निर्माण उसके बीज के एक बहुत छोटे अंश से होता है। परमाणु एक प्रकार से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का नक्शा है, जो कुछ शक्तियाँ इस सृष्टि में दिखाई देती हैं वे सब बीज रूप में एक परमाणु में विद्यमान हैं। इस शक्ति की हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
जड़ परमाणु की इतनी सामर्थ्य देखकर आश्चर्य होता है पर चेतन अणु की शक्ति उससे भी अधिक है। जड़ पदार्थ स्वाधीन नहीं होते। उनकी अपनी कोई इच्छा शक्ति नहीं होती। किन्तु चेतना शक्ति स्वच्छन्द है। वह पदार्थ पर शासन करती है शासित से शासक की शक्ति अधिक होना भी चाहिये। जड़ से चेतना का महत्व अधिक है उसे जानकर ही मनुष्य के वास्तविक प्रयोजन की सिद्धि होती है।
आत्मा को विश्व चेतना का परमाणु ही समझना चाहिये। पदार्थ के परमाणु की शक्ति का हिसाब लगा चुके हैं उससे आत्म शक्ति की तुलना कर सकते हैं।
संसार में जो कुछ चल रहा है उसका स्रष्टा परमात्मा अनन्त शक्तिशाली है। उसी का यह सब खेल चल रहा है इस विश्व में। परम शक्तिशाली परमात्मा की प्रत्येक शक्तियाँ हमारी अन्तरात्मा में उसी तरह समायी हुई हैं जिस तरह वृक्ष की सम्भावना उसके बीज में होती है। उपनिषद्कार के कथन से इस आत्मशक्ति का परिचय मिलता है।
एको देवः सर्वभूतेषु गूढः।
सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।
कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः
साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च॥
अर्थात्- वह परमात्मा ही सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मा रूप में विद्यमान है। वह सर्वव्यापक है, सर्वान्तर्यामी है, वही कर्मों का अधिष्ठाता है। सम्पूर्ण भूतों का निवास, सब का साक्षी, चेतन स्वरूप और सबको जीवन देने वाला एवं पवित्र और गुणातीत भी है।
सारे संसार में जो शक्ति परमात्मा की है। मनुष्य देह में वह सारी योग्यताएं जीवात्मा को उपलब्ध हैं। यह शक्तियाँ हमारी अपनी हैं किन्तु अज्ञान वश हम उन्हें भूल चुके हैं। देह अर्थात् पदार्थ के सुखों में आसक्ति हो जाने के कारण आत्मा की इस सूक्ष्म सत्ता की ओर हमारा ध्यान भी आकृष्ट नहीं होता। यही हमारे दुःखों का कारण है। आत्महीनता का कारण मनुष्य की आत्म-अज्ञानता ही है।
आत्म-ज्ञान के मूल में वह शक्ति, वह सामर्थ्य और विशेषतायें सन्निहित हैं कि उन्हें यदि जागृत कर लिया जाय तो मनुष्य अपने आप में महामानव, देवत्व तथा परमात्मा की सी शक्ति अनुभव कर सकता है। आत्मा वह कल्पतरु है जिसकी छाया में बैठने से कोई भी कामना अपूर्ण नहीं रहती है।
महापुरुषों के जीवन को फूल के समान खिला हुआ, सिंह की तरह अभय, सद्गुणों से ओत-प्रोत देखते हैं तो स्वयं भी वैसा होने की प्रसुप्त आकाँक्षा जागती है। आत्मा की यह आध्यात्मिक माँग है। उसे अपनी विशेषतायें प्राप्त किये बिना सुख नहीं होता। पारलौकिक कामनाओं में डूबे रहकर हम इस मूल आकाँक्षा पर पर्दा डाले हुये पड़े रहते हैं। इससे किसी भी तरह जीवन लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती।
श्रेष्ठता मनुष्य की आत्मा है। इसलिए जहाँ कहीं भी उसे श्रेष्ठता के दर्शन मिलते हैं वही आकुलता पैदा होती है। मोर के पंखों की सी सुन्दरता पाने को हर कोई लालायित रहता है। किसी कवि की परिपूर्ण कविता पढ़ कर ऐसा लगता है काश! हम भी ऐसा ही लिख पाते। पक्षियों को आकाश में उड़ता हुआ देखकर लगता है, अपनी इच्छानुसार स्वच्छन्द आकाश में विचरण करने की सामर्थ्य मिली होती तो कितना अच्छा होता। यह अभिलाषायें जागती तो हैं किन्तु यह विचार नहीं करते कि यह आकाँक्षा आ कहाँ से रही है। आत्म केन्द्र की ओर आपकी रुचि जागृत हो तो आपको भी अपनी महानता जगाने का श्रेय मिल सकता है, क्योंकि लौकिक पदार्थों में जो आकर्षण दिखाई देता है वह आत्मा के प्रभाव के कारण ही है। आत्मा की समीपता प्राप्त कर लेने पर वह सारी विशेषतायें स्वतः मिल जाती हैं, जिनके लिए मनुष्य जीवन में इतनी सारी तड़पन मची रहती है। सत्य, प्रेम, धर्म, न्याय, शील, साहस, स्नेह, दृढ़ता, उत्साह, स्फूर्ति, विद्वता, योग्यता, त्याग, तप और अन्य नैतिक सद्गुणों की चारित्रिक विशेषताओं के समाचार और दृश्य हमें रोमाँचित करते हैं क्योंकि ये अपनी मूलभूत आवश्यकतायें हैं। इन्हीं का अभ्यास डालने से आत्म तत्व की अनुभूति होती है।
आत्म-ज्ञान का सम्पादन और आत्म केन्द्र में स्थिर रहना मनुष्य मात्र का पहला और प्रधान कर्तव्य है। आत्मा का ज्ञान चरित्र के विकास से मिलता है। अपनी बुराइयों को छोड़कर सन्मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा इसी से दी जाती है कि आत्मा का आभास मिलने लगे। आत्म सिद्धि का एक मात्र उपाय पारमार्थिक भाव से जीव मात्र की सेवा करना है। इन सद्गुणों का विकास न हुआ तो आत्मा की विभूतियाँ मलिनताओं में दबी हुई पड़ी रहेंगी।
बुराइयाँ आत्मा को प्रिय नहीं हैं। आप जब किसी चोर या डाकू को सजा पाते हुये देखते हैं तो आपको भय प्राप्त होता है, तुरन्त जी में आता है कि कहीं हम भी चोरी न करने लग जायें। कसाई को जानवर काटते देखकर, शिकारी को पक्षियों को मारने की हिंसात्मक क्रिया देखकर दुःख होता है। दुष्टता और राक्षसी प्रवृत्ति से दूर भागने का प्रयास सभी करते हैं। अनीति, अत्याचार, अन्याय, आतताईपन, द्वेष, त्रुटि, कुरूपता, चोरी, ठगी आदि के क्षण, संस्मरण तथा घटनायें बड़ी अप्रिय लगती है। यह अपनी मूल स्थिति के अनुरूप होता है। आत्मा कभी निकृष्ट होना नहीं चाहती क्योंकि उत्कृष्टता उसका सहज स्वभाव है। भय उसे इसलिए पसन्द नहीं है कि वह चिर अभय है। कुरूपता इसलिए अप्रिय है कि आत्मा का सौंदर्य बड़ा मोहक है। यह स्थिति प्राप्त न होने तक छटपटाहट अवश्य रहेगी। असंतुष्ट होना यह व्यक्त करता है कि अभी तक आपको ‘निजत्व’ का ज्ञान नहीं मिला है।
देवत्व हमारी आवश्यकता है, दुष्प्रवृत्तियों से भय लगता है, पवित्रता हमें प्रिय है। अपवित्रता से दुख मिलता है, निश्छलता से सुख मिलता है। छल और कपट के कारण जो संकीर्ण स्वभाव बनता है उससे अपमान मिलता है। जो कुछ श्रेष्ठ है, साथ है वही आत्मा है और उसी को प्राप्त करना मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य है। जब तक इस बात को समझ नहीं लेते, कोई भी समस्या हल नहीं होती।
श्रेष्ठता से सुख मिलता है यह सच है, इसे प्राप्त करना ही जीवन लक्ष्य है, इसे भी मानते हैं तो सन्मार्ग और सत्प्रवृत्तियों द्वारा अपने देवत्व को जगाना पड़ेगा। प्रत्येक गुण का अमृतकुण्ड हमारी आत्मा में है इसलिए अपने आत्मभाव का परिष्कार करना पड़ेगा। आत्मीयता की भावना उठती है तो उच्च प्रवृत्तियों का प्रकाश हमारे जीवन में लहराने लगता है।
यह जागृति प्रत्येक अवस्था में अभीष्ट है। यह संसार स्वप्न की तरह है। जिस प्रकार जागने पर स्वप्न मिथ्या प्रतीत होते हैं, उसी प्रकार आत्मा का ज्ञान प्राप्त होने पर लौकिक कामनायें झूठी मालूम पड़ने लगती हैं। अभी जो अपनी शक्तियों को लौकिक संघर्षों में अपव्यय करना पड़ता है उसे यदि पतनकारी दुष्प्रवृत्तियों से हटाकर सद्गुणों के रचनात्मक कार्यक्रम में लगायें तो शक्तियों का सदुपयोग भी होता है और आत्मा के अकूत शक्ति संसार का अधिकार भी मिलने लगता है।
संसार में जो कुछ भी विभूतियाँ एवं श्रेष्ठतायें हैं उन सब में अपना आत्म तत्व ही प्रवाहित हो रहा है। सत्-चित् आनन्द स्वरूप आत्मा ही सम्पूर्ण श्रेष्ठता और सौंदर्य का स्रोत है। जन्म और मरण का, निर्माण और विनाश का जो विश्वव्यापी खेल चल रहा है, वह विश्व आत्मा की शक्ति का प्रतीक है। यह शक्ति पुँज हमारे भीतर भरा पड़ा है। जब तक हम उस से विमुख रहकर लौकिक कामनाओं में डूबे रहते हैं तब तक बड़े दीन-दुखी बने और दरिद्रता से घिरे रहते हैं, किन्तु जब पारमार्थिक जीवन की उमंग आती है तो हमारी शक्तियों का स्रोत भी उमड़ पड़ता है। तब हमारा जीवन विशाल आनन्दमय और शक्तिसम्पन्न बन जाता है।
गुरुनिष्ठ, जबाला के पुत्र सत्यकाम ब्रह्मा को जानने की इच्छा से महर्षि हरिद्रुमत के पास गये। गुरुजन तब शिष्य की श्रद्धा की परीक्षा लिया करते थे। श्रद्धावान् शिष्य ही ब्रह्मा-ज्ञान प्राप्त कर सकते है। अतः उनकी यह परीक्षा लेने के उपरान्त ही उन्हें विशद-ज्ञान दिया जाता था। महर्षि ने भी वही किया। सत्यकाम को 4 सौ अत्यन्त कृश गायें सौंपी गईं और उनकी संख्या एक हजार न होने तक उसे वापस न लौटने की आज्ञा कर दी गई। सत्यकाम गायों की सेवा में तत्पर हुये। उनकी अटूट श्रद्धा के कारण ही उन्हें वृषभ, अग्नि, हंस तथा मद्रु नामक जल मुर्ग पक्षी के द्वारा ब्रह्मा ज्ञान प्राप्त हो गया।
छान्दोग्य उपनिषद् की इस कथा में उपनिषद्कार ने श्रद्धा को ही ब्रह्मा-ज्ञान की पृष्ठ भूमिका सिद्ध की है। साधना के क्षेत्र में जो अनेक विघ्न व बाधायें आती हैं, उनसे बचाने के लिए श्रद्धा अनिवार्य है। ब्रह्मा-ज्ञान की पूर्णता तक पहुँचने के लिए जिज्ञासु के अन्तःकरण में तरह तरह की शंकायें उठा करती हैं, वह कभी ब्रह्मा की ओर, कभी माया की ओर खिंचता रहता है। इनमें मायावी तत्व, साँसारिक भोग वासनाओं में ऐसी आकर्षक शक्ति भरी होती है कि वह एक क्षण में मनुष्य को साधन-विरत कर देती है। इनसे बचाने का एक मात्र पाथेय मनुष्य की आन्तरिक श्रद्धा है। हृदय में श्रद्धा और मन में विश्वास हो तो अनेक कठिनाइयों के होते भी मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ता हुआ चला जायगा। श्रद्धा मनुष्य में दृढ़-निश्चय शक्ति पैदा करती है, जिससे वह उस कंटकाकीर्ण पथ को प्रसन्नतापूर्वक पार कर लेता है, साधारण व्यक्ति जिस पर चलने से भी डरते, कतराते और दूर भागते हैं। इसलिए श्रद्धा के द्वारा ही आध्यात्मिक जीवन का श्री गणेश माना जाता है।
श्रद्धा से यद्यपि निश्चयात्मक बुद्धि का संचार होता है किन्तु वह बुद्धि से निम्न तत्व है। बुद्धि साँसारिक, सामाजिक एवं व्यवहारिक जीवन की शक्ति है। जबकि श्रद्धा आपका और परमात्मा के असीमत्व को बाँधने और पकड़ने वाली प्रचण्ड क्षमता है। अतः वह बुद्धि की अपेक्षा अधिक सद्-प्रवृत्त और जागृत है। श्रद्धा एक प्रकार की आत्मा के सूक्ष्म अन्तराल से प्रस्फुटित होने वाली आनन्दपूर्ण कृतज्ञता है जो निराश हृदय को सान्त्वना, अवलम्बन एवं जीवन देती है। प्रेक का क्षेत्र एकाकी है, इसलिए उसका विस्तार श्रद्धा की अपेक्षा कम है। श्रद्धा सर्वात्मा की अनुभूति कराने वाली शक्ति का नाम है। इसमें आत्म-समर्पण का भाव है इसलिए वह अन्य सभी सद्भावनाओं से श्रेष्ठतम है। श्रद्धा परमात्मा के प्रेक का प्रतीक है।
संत बिनोवा ने कहा है- “सद्विचार पर बुद्धि रखने का नाम ही श्रद्धा है। यही श्रद्धा मनुष्य को शक्ति, प्रेरणा एवं आध्यात्मिक प्रकाश देती है और मनुष्य जीवन को सार्थक बनाती है।” महात्मा गाँधी जी के विचार में “श्रद्धा का अर्थ है आत्म विश्वास।” इस तरह का विश्वास मनुष्य जीवन में सदैव अपेक्षित है क्योंकि व्यक्ति की यदि ‘अहं’ भावना का नाश नहीं होता तो उसकी अन्तर्मुखी दृष्टि भी जागृत नहीं होती। केवल बाह्य पदार्थों में सुख अनुभव करने और उनमें ही अपना अधिकार प्रदर्शित करते रहने से मनुष्य की बुद्धि पूर्णतया साँसारिक बन जाती है। श्रद्धा के द्वारा विनयशीलता आती है, नम्रता का उदय होता है। परमात्मा को प्राप्त करने की यह आवश्यक शर्त है कि मनुष्य अपने आपको बिल्कुल छोटा अहंकार विहीन बना ले। जब तक मनुष्य की यह आन्तरिक वृत्ति जागती नहीं तब तक उसे विषय-विकारों से निवृत्ति भी नहीं मिलती। श्रद्धा के द्वारा मनुष्य में भक्ति भाव आता है। वह अपने आपको परमात्मा के हाथों सौंपकर हलकापन अनुभव करता है इससे उसकी आध्यात्मिक दिशा सरल एवं बोधगम्य बनती है और मनुष्य तेजी से जीवन सार्थकता की ओर बढ़ता चला जाता है।
लोग समझते हैं कि परमात्मा की कृपा जब तक नहीं होती तब तक ईश्वरीय ज्ञान का अभ्युदय नहीं होता, किन्तु बात ऐसी नहीं है। परमात्मा की कृपा सब पर समान है। मनुष्य यदि उसकी कृपा से वंचित है तो इसका मूल कारण उसका अपना ही दर्प व अभिमान है। जो मनुष्य अपने अन्तःकरण को शुद्ध बनाकर श्रद्धानुरत कर लेते हैं वे दिव्य ज्ञान या परमात्मा की कृपा के अधिकारी बन जाते हैं। मन और इन्द्रियों का संयम श्रद्धा से ही होता है, श्रद्धा से ही आत्म ज्ञान की तत्परता आती है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा पराँ शान्ति मचिरेणाधि गच्छति॥
(गीता 4 । 39)
अर्थात्- साधन परायण, इन्द्रियों को नियंत्रण में रखने वाले, श्रद्धावान् व्यक्ति ही ज्ञान प्राप्त करते हैं। इस प्रकार ज्ञान प्राप्त व्यक्ति ही परमात्मा को प्राप्त करते हैं।
श्रद्धा, क्षणिक भावुकता या आवेश का नाम नहीं है वरन् यह साधना की कठिनाइयों को झेलने की कसौटी है। आवेशपूर्ण श्रद्धा से जीवन में कोई विशेष लाभ नहीं होता किन्तु जो लोग दृढ़तापूर्वक साधन की कठिनाइयों को सहन करते रहते हैं उनकी श्रद्धा और भी तेजस्वी बनती है और मन पर तथा इन्द्रियों पर संयम करना आसान हो जाता है।
“हम हैं” और “हमें सुखपूर्वक, भोगपूर्वक जीवित बने रहना चाहिये” जब तक मनुष्य इतने ही घेरे में पड़ा रहता है तब तक उसे केवल भौतिक वस्तुओं का ही ज्ञान रहता है, इसी को ही वह सब कुछ मानकर दिन-रात इसी प्रयोग में लगा रहता है। किन्तु मनुष्य जब अपने आपको घुलाकर अपने सुखों को दूसरों पर ढाल देना चाहता है तो उसका आत्म तत्व जागृत होता है। आत्मा और “मैं शरीर हूँ” का भेद प्राप्त होने पर मनुष्य की विचार प्रणाली में परिवर्तन आता है तब वह सोचता है मैं क्या हूँ, मेरी उत्पत्ति का कारण क्या है, उद्देश्य क्या है? इन प्रश्नों की गहराइयों में बढ़ते हुये मनुष्य को एक विश्वास प्राप्त होता है कि सचमुच उसका अपना अस्तित्व इस संसार में कुछ भी नहीं है। सम्पूर्ण जगत की तुलना में वह मिट्टी के एक कण से भी बहुत छोटा है। इस तरह के आत्म ज्ञान का आभास होने पर आत्मा के विषय में वह दृढ़ हो जाता है और इस तरह ईश्वर के प्रति विश्वास दृढ़ हो जाता है। श्रद्धेय के प्रति अपनी श्रद्धा का विकास करने से उसे आत्म विषयों में और भी अधिक आनन्द की अनुभूति होने लगती है। फलस्वरूप श्रद्धा से ही उस मनुष्य के जीवन में सुख का विस्तार होता है और परमात्मा की प्राप्ति में पड़ने वाले विघ्नों को, घेरों को तोड़ते हुये जीवन उद्देश्य की ओर बढ़ते रहने का साहस जाग जाता है। इस स्थिति में पहुँचने के उपरान्त आध्यात्मिक प्रगति में बाधायें आते हुये भी वह मन्द या शिथिल नहीं होती। आगे बढ़ने का उत्साह सदैव ही बना रहता है।
भोगवादी व्यक्ति जिस तरह भोग की लालसा में अनुचित-उचित का विचार नहीं करता और उसी में सुख का अनुभव करता है उस तरह सदाचारी व्यक्ति भी अपने चारों ओर प्रसन्नता देखना चाहता है। अपनी प्रसन्नता का निश्चय श्रद्धा द्वारा ही होता है, क्योंकि अपनी यथार्थ शक्ति और सामर्थ्य का बोध श्रद्धा द्वारा ही होता है। भले ही उन अभूतपूर्व परिणामों की तत्काल उपलब्धि न हो किंतु श्रद्धा के साथ जो आशा का अविचल सम्बन्ध है, उससे मनोभूमि की निराशा तथा दुःखों का अन्त हो जाता है। ऊपर से देखने में दूसरे लोग भले ही यह अनुमान करें कि उसका जीवन शुष्क, रसहीन है किंतु उसके अन्तर में जो आनन्द का स्रोत उमड़ता रहता है उसे दूसरा समझ नहीं पाता, पर वह व्यक्ति अपनी आन्तरिक आनन्द की स्थिति से ही अपने चारों ओर प्रसन्नता का अनुभव कर लेता है।
श्रद्धा इस तरह मनुष्य के व्यक्तिगत उत्थान का ही साधन नहीं वरन् उससे औरों को भी आदर्श की प्रेरणा और मंगल कार्यों में उत्साह मिलता है। क्योंकि मनुष्य अपने हृदय का परिचय श्रद्धा द्वारा ही तो देता है। श्रद्धावान् व्यक्तियों के आचरण में पवित्रता होती है, आत्मीयता, सौहार्द्र एवं सौजन्यता होती है। इन सद्गुणों के रहते हुए चारुतायुक्त वातावरण का निर्मित होना स्वाभाविक भी है। आन्तरिक श्रद्धा का धारण करने वाले मनुष्यों की सान्निध्यता में सभी को सुख मिलता है क्योंकि वहाँ किसी के लिए दुर्भावना नहीं होती।
श्रद्धा के अनुसंगी विचारों का संचार जब सामाजिक जीवन में करते हैं तो उससे स्वस्थ वातावरण बनता है। इसे समाज की आन्तरिक भूख समझनी चाहिये। ऐसे व्यक्तियों के बैठने, चलने, फिरने, हँसने, बोलने तथा व्यवहार करने से ही उनके शील एवं प्रतिभा का परिचय मिलता है फलतः दूसरे भी उनका अनुकरण करते हैं और दैवी-सम्पदाओं वाले समाज का विकास होता है।
आत्म-ज्ञान से निरुत्साहित इस युग में मनुष्य के अज्ञान का कारण मनुष्य की अश्रद्धा ही है, जिसके कारण वह मोह-बन्धनों में भटकता फिर रहा है। उसका व्यक्तिगत जीवन तथा सामाजिक जीवन दुःखमय होने का कारण भी यही है। स्वस्थ समाज की रचना के लिये, आत्म-ज्ञान एवं ब्रह्मज्ञान की नितान्त आवश्यकता की पूर्ति के लिए श्रद्धा ही साधन है। इसी से सच्चा ज्ञान समृद्ध होता है तथा लोक-मंगल की भावनाओं का विस्तार होता है।
मनुष्य को परमात्मा ने केवल एक यंत्र नहीं बनाया है जो अपनी एक विधि और एक रीति से अपना काम करता चले, न उसके काम में कोई बाधा आये और न कोई असफलता मिले!
मनुष्य को परमात्मा ने एक स्वतंत्र बुद्धि वाला चेतन प्राणी बनाया है। उसे हाथ-पाँव काम करने के लिए और विवेक काम के औचित्य-अनौचित्य समझने के लिए दिया है। उसकी इच्छा है कि मनुष्य अधिक से अधिक परिश्रमी, कर्मठ और धैर्यवान बनें, इसीलिए उसके सभी काम निर्विघ्नतापूर्वक नहीं होते चलते। यदि सारे काम बिना बाधा के सहज रूप में होते चलें तो कर्म-कौशल का महत्व ही समाप्त हो जाये। मेरा विश्वास है कि जिस काम को करने में मनुष्य को बाधायें नहीं आतीं, उसे अपनी कार्य-कुशलता का परिचय देने का अवसर नहीं रहता, वह काम मनुष्य के करने योग्य नहीं होता।
- महामना मदनमोहन मालवीय
विदेशों में भारत की शान अपनी गौरवपूर्ण साँस्कृतिक विशेषता के कारण है। जो आदर्श, उद्देश्य और कर्म यहाँ जन-जीवन में प्रयुक्त होते आये हैं वे अन्य देशों के रहन-सहन से सर्वथा भिन्न है। यों देखने में बाह्य दृष्टि से अंतर भले ही दिखाई न पड़ता हो किंतु आन्तरिक जीवन में जो महानतायें छिपी पड़ी हैं उनके कारण विश्व की कोई भी सभ्यता का संस्कृति उसका मुकाबला नहीं कर सकती। यहाँ कला और सत्य के सम्मिश्रण से बाह्य और आन्तरिक जीवनों का निर्माण होता है जबकि आधुनिक सभ्यता, जिसका मूल स्रोत पाश्चात्य संस्कृति है, उसकी कला में सौंदर्य तो है पर सत्य नहीं है। रूप तो है पर आत्मा नहीं है। कला जो फलाशा से संयुक्त हो उसकी सौंदर्य स्थिर नहीं होता है। सत्य ही उसका आत्मा है जिसके लिए बीच में किसी वासनात्मक प्रक्रिया के लिये कोई स्थान नहीं है।
एक बहुचर्चित विवाद चल पड़ा है कि आज के युग में रहन-सहन में, वेश-भूषा में जो अनेकों सौंदर्य प्रसाधन मिल गये हैं इसी से संस्कृति विकसित हुई है और वह आर्ष संस्कृति से कहीं अधिक निखरी हुई हैं। यह बात वे कह सकते हैं जिन्होंने भारतीयता की आत्मा का दिग्दर्शन न किया हो। कुछ गलत परम्पराओं, रूढ़िवादिताओं या काल प्रभाव से भारतीय जीवन में जो विकृति आ गई है उसके आधार पर एक तरह का निर्णय कर लेना उचित नहीं है। भारतीय संस्कृति में जो यवनों की, अंग्रेजों और पारसियों की संस्कृति का समावेश हो गया है और उससे एक अजीब ‘हिन्दुआना’ रूप बन गया है उसे प्रमाण मानकर पाश्चात्य संस्कृति को श्रेष्ठतर बताना कदापि उचित नहीं कहा जा सकता।
संस्कृति कुछ सीमित रीति-रिवाजों, रहन-सहन तक ही सीमित नहीं होती वरन् धर्म, दर्शन, साहित्य, कला, समाज और व्यक्तिगत जीवन के सम्पूर्ण वृत्त का नाम संस्कृति है। सच्चे जीवन का विकास इन सब बातों से मिलकर होता है। भौतिक दृष्टि से विकसित होना, साधन या सफलताओं की बाहुल्यता प्राप्त कर लेने मात्र से यह उद्देश्य पूरा नहीं हो जाता। भारतीय संस्कृति का इतिहास देश और काल से भी अत्यधिक विस्तृत है। लोक-जीवन की इसमें जो व्याख्या हुई है वह अधिक अंतरंग, शक्तिवंत और पूर्णतया वैज्ञानिक है। प्रत्येक आचरण, प्रत्येक आदर्श, रीति-रिवाज, व्रत, पर्व, त्यौहार, वस्त्र, भवन, गाँव और समाज अपने आप में एक ऐसा आध्यात्मिक विश्लेषण छिपाये हुये है जिसे जानने वाला ही वस्तुतः इस संसार में मनुष्य जीवन धारण का सौभाग्य प्राप्त कर पाता है।
अब जो रहन-सहन वाली संस्कृति का नाम लिया जाता है वह न केवल एकाँगी है उसमें अनेकों बुराइयाँ है। अभाव, आसक्ति और अत्यधिक आवश्यकतायें उसकी तीन विशेषतायें हैं। इनके कारण व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में स्वार्थपरता, निर्दयता, कामुकता, छल, कपट, दम्भ, पाखण्ड और अनाचार बढ़ता हुआ जा रहा है। इस अभागी आधुनिक संस्कृति ने हमारे भारतीय जीवन में जब से प्रवेश किया है तब से यहाँ का जीवन भी बुरी तरह अस्त-व्यस्त होता चला जा रहा है। स्वेच्छाचारिता, दाम्पत्य-जीवन में छल, कपट, ढोंग, तलाक और सामाजिक जीवन में ऐसे अनेक दुर्गुणों का तेजी से विकास हो रहा है कि इन्हें देखकर आज कोई यह मानने को तैयार न होगा कि भारतवर्ष अपनी संस्कृति के कारण कभी श्रेष्ठ और शिरोमणि रहा होगा !
भारतीय संस्कृति महान् आध्यात्मिक है। यजुर्वेद के एक ही सूक्त में उसकी विशद् व्याख्या करते हुये ऋषि ने लिखा है-
“सा प्रथमा संस्कृतिः विश्ववारा”
यजु. 7। 14
अर्थात् - यह जो विश्व है वह बड़ा विशाल है और एक नियामक; अधिपति और चैतन्य देवतत्व से वह संचालित है। उस परम-तत्व को जानने के लिए जिस “संस्कार सम्पन्न जीवन-प्रणाली” की आवश्यकता पड़ती है उसे ही संस्कृति कहा जा सकता है।
प्रकृति की क्रिया शक्ति की तरह मनुष्य की एक स्वतन्त्र सत्ता भी है जो अपने प्रयत्नों से संस्कारों का निर्माण कर सकती है। यह एक सूक्त ही विस्तृत हो कर धर्म, दर्शन, सदाचार, वेश-भूषा और रीति-रिवाजों में फैल जाता है। जैसे आम के बीज ही यह विशेषता होती है कि उसका फल भी आम ही होता है, इमली के बीज से जामुन का फल प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार जो संस्कृति ईश्वरीय अंश से प्रादुर्भूत होती है वह सम्पूर्ण जीवन को एक विस्तृत दायरे में बाँधकर अन्त में फिर उसी तत्व में विलीन हो जाती है। यों कहना चाहिए कि भारतीय संस्कृति का अर्थ है- महान से महानता का अभ्युदय और अन्त में उसी महानता में ही विलीन हो जाना। धर्म और जीवन इसके पर्याय हैं।
धर्म से आध्यात्मिक जीवन विकसित होता है और जीवन में समृद्धि का उदय होता है। मन, वचन और कर्म की गतिविधियों को इसी उद्देश्य से बाँध दिया जाता है। इसी से उसमें वह विशेषतायें परिलक्षित होती हैं जो किसी अन्य धर्म या संस्कृति में देखने को नहीं मिलतीं।
धर्म की आवश्यकता मनुष्य जीवन की शुद्धता के लिये है। अशुद्ध आचरण मनुष्य तब करता है जब वह अपने आप को मनुष्य की दृष्टि से देखता है। पर वस्तुतः मनुष्य का यथार्थ रूप उसकी सूक्ष्मतम आत्म-सत्ता है। अतः उसके जीवन के विविध अंगों का निर्माण भी इसी दृष्टि से होना चाहिये। धर्म यह बताता है कि हम अपने वास्तविक स्वरूप को न भूलें उसे प्राप्त करें और जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिये हमारा जन्म हुआ है उसे सदैव अपने सामने बनाये रहें। यह दार्शनिक विशेषता किसी अन्य संस्कृति में नहीं है। लोग यह भूल जाते हैं कि वे मनुष्य से भी कुछ अधिक हैं इसी से वे लक्ष्य से भटकते हैं। शुद्ध रूप में भारतीय संस्कृति में यह भूल कहीं भी नहीं है।
इस तरह के आध्यात्मिक ज्ञान से जब प्राण और मन परिपक्व हो जाता है तो बाह्य दृष्टि से सामान्य जीवन जीते हुए भी हमारे और पाश्चात्य-संस्कृति परायण लोगों के जीवन में भारी अंतर होता है। आन्तरिक जीवन में सत्य, प्रेम, न्याय, तप, त्याग, सहिष्णुता, आत्मीयता, क्रियाशीलता, शक्ति, सामर्थ्य, विवेक और विज्ञान ओत-प्रोत रहता है जिसके कारण अज्ञान, अशक्ति और अभाव से उत्पन्न होने वाले दुःखों का अन्त हो जाता है और यहाँ के जीवन में सुख, संतोष, शाँति, उल्लास, सरसता और आनन्द छाया रहता है। संस्कृति का तीसरा क्षेत्र मानव की स्थूल या भौतिक रचनायें ही है। इनका मुख्य रूप जीवन के समस्त स्थूल साधन हैं, जिन्हें कला भी कहा जा सकता है। व्यापक दृष्टि से विचार करके देखो तो धर्म, दर्शन, साहित्य साधना, निर्माण परक प्रयत्न, समाज और राष्ट्र की व्यवस्था, वैयक्तिक जीवन के नियम और अनुशासन, कला शिल्प, स्थापत्य, संगीत, नृत्य, वाद्य, सौंदर्य रचना के अनेक विधान तथा उपकरण- यह सब उसी संस्कृति के अर्थ में आ जाते है। यह उससे अलग नहीं हैं पर पाश्चात्य संस्कृति की तरह यह मनुष्य जीवन का पूरक अंश है। धर्म और दर्शन, जीवन और उसका तात्विक स्वरूप यह उसकी प्रमुख स्थिति है। यह न रहे तो दूसरी आवश्यकताओं का महत्व गिर जायगा। जो वस्तुयें सुख-प्राप्ति के लिए निश्चित की गई थीं उन्हीं से उलटे परिणाम उत्पन्न होने की आशंका बढ़ जाती है, जैसा कि इन दिनों दिखाई दे रहा है।
संस्कृति का निर्माण या व्याख्या करते समय यह आवश्यक है कि गुणों का ही आग्रह किया जाय। गुणों को ही आदर्श कहते हैं। आदर्श ही धर्म है यदि वह सत्य से प्रतिष्ठित है। सत्य सम्मिश्रित धर्म ही विश्व का सर्वोपरि नियम है। इस दृष्टि से संस्कृति को जीवन की सम्पूर्ण व्यवस्था का पर्याय कहा जा सकता है। भारतीय संस्कृति में यही विशेषता पाई जाती है। संसार का जो सत्य है, सौंदर्य है और लक्ष्य है उसे मन, वचन और कर्म द्वारा एकीकरण करना ही संस्कृति का उद्देश्य है। जो इसमें जितना अधिक सफल होगी वही संस्कृति सर्वमान्य और प्रामाणिक कही जाएगी। इन्हीं विशेषताओं के कारण भारतीय संस्कृति विश्व में सर्वोपरि है। इसी के कारण उसकी अपनी एक अनोखी शान है।
सूर्य की प्राण शक्ति प्रस्फुटित होकर जिस तरह वनस्पति जगत का विधान करती है, उसी प्रकार परमात्मा प्रकीर्ण हो कर सम्पूर्ण संसार का सृजन करता है। यह जो कुछ दिखाई देता है उसी की रचना है। जो चेतना इस विश्व ब्रह्माण्ड में दिखाई देता है वह सब परमात्मा की ही चेतना है। सम्पूर्ण जीवधारी उसी के अंग मात्र हैं, उसी तत्व के सूक्ष्म परमाणु मात्र हैं। फिर बड़े खेद की बात है कि मनुष्य आपस में भेद-भाव, छल-कपट, धोखादेही की स्वार्थपूर्ण परम्परायें अपनाये बैठा है, इससे मानव जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता है। जाति पाँति, भाषा-विचार, वर्ण-भेद की जो विभिन्नता दिखाई देती है उस से सत्य का वास्तविक स्वरूप छिपाया नहीं जा सकता। परमात्मा ने जीवन और मृत्यु के बीच जो आवश्यक साधन थे उन्हें सबको समान रूप से वितरित कर के यह सिद्ध किया है कि यह पृथ्वी और यहाँ के साधन व्यक्ति विशेष के लिये नहीं हैं। इनका उपभोग मिल बाँटकर करने में ही मानव जीवन की सार्थकता है। आत्मा को इसी में संतोष मिलता है।
सारा विश्व एक प्रेम के सूत्र में बंध सकता है यदि सभी लोग संसार को एक कुटुम्ब के रूप में देखें और प्रत्येक मनुष्य से वैसे ही प्रेम करें जैसे अपने परिवार के सदस्यों के साथ करते हैं। व्यवहार की सहृदयता हृदय की विशाल भावनाओं से समुन्नत होती है। जितने उच्च विचार और उदार भावनायें होंगी, उतना ही औरों को अपनी ओर आकर्षित करने की क्षमता भी होगी। चिरस्थायी स्नेह मनुष्य की आन्तरिक उत्कृष्टता से ही प्राप्त होती है। वाचालता और कपटपूर्ण व्यवहार से किसी को थोड़ी देर तक अपनी ओर लुभाया जा सकता है, पर स्थिरता का सूत्र तो प्रेम ही है। हमारे अन्तःकरण में दूसरों के लिये जितनी अधिक मैत्री की भावना होगी उतना ही अपना व्यक्तित्व विकसित होगा, उतनी ही आत्म शक्तियाँ प्रबुद्ध होंगी।
पूर्ण कल्याण की भावना “आत्मवत् सर्व भूतानि यः पश्यति सः पण्डित” इस एक वाक्य से ही निहित है। चरित्र की उदारता और सज्जनता का अर्थ ही यह है कि मनुष्य, मनुष्य को, जीव जन्तुओं को भी उनके अधिकारों का उपयोग ठीक उसी तरह करने दे, जिस तरह हम अपने लिये औरों से अपेक्षा रखते हैं। गोस्वामी तुलसी दास की पंक्तियाँ मानवता शब्द को भली प्रकार अभिव्यक्त कर देती हैं -
आपु आपु कहँ सब भलों अपने कहं कोय कोय।
तुलसी सब कहँ जो भलों, सुजन सराहिय सोय॥
अर्थात् सज्जन तथा सराहनीय वह है जो केवल स्वहित तक ही सीमित नहीं है। जो उदारता पूर्वक सब के हित की बात सोचता है वही मनुष्य श्रेय का अधिकारी हो सकता है।
अपने हित की साधना का भाव तो पशु पक्षियों तक में पाया जाता है। अतः इसमें कोई बुद्धिमानी नहीं हो सकती कि मनुष्य सम्पूर्ण जीवन केवल अपनी ही स्वार्थपूर्ण प्रवंचनाओं में बिता दे। इससे अन्त तक मानवीय शक्तियाँ प्रसुप्त बनी रहती हैं। प्रेम और आत्मीयता की भावनाओं का परिष्कार नहीं हो पाता। स्वार्थपरता नहीं संकीर्णता के कारण मनुष्य का जीवन कितना दुःखमय कितना कठोर हो सकता है यह सर्व विदित है।
हममें ईश्वर सदृश गुण और अनन्त शक्ति की योग्यता होने पर भी हमारा जीवन अर्द्ध विकसित क्यों है ? यह एक विचारणीय प्रश्न है। इससे यह मानना पड़ता है कि हमारी जीवनचर्या में कहीं कोई भूल हो रही है। यह देखना है कि क्या वस्तुतः हमारे आचरण दैवी तत्वों के सदृश हैं। यहीं अपनी भूल पकड़ में आती है। परमात्मा अपने सभी पुत्रों के हित का समान रूप से ध्यान रखता है। संसार पर उसकी कृपा है, सभी से वह प्रेम करता है। इसीलिए वह अनन्त शक्तिशाली है, अपराजेय है। हम भी अपना जीवन इसी साँचे में ढालने का प्रयत्न करें, सबके हित का अपना हित मानें, सबके साथ प्रेम करें तो अपनी शक्तियों का विस्तार न हो ऐसा नहीं हो सकता।
अन्य जीवधारियों के जीवन से अपनी तुलना करते हैं तो मालूम पड़ता है कि मनुष्य जीवन में विकास की सम्भावनायें विद्यमान हैं। अपनी दिव्यता का अनुकरण करते जायेंगे तो अपनी सहायता की अभिलाषा भी पूर्ण होती चली जायगी।
ईश्वर का आदेश भी ऐसा ही लगता है। यह आवाज प्रतिक्षण आती है उठो, मुझ जैसा पूर्ण और परिपक्व बनो। संकीर्णताओं में इन अमूल्य क्षणों को नष्ट न होने दो। यह संसार निःसार है इसकी सत्यता यदि कुछ है तो यही कि कुछ दिन इस धरती पर प्रेम और आत्मीयता का आनन्द प्राप्त कर लें। यही आत्मा की आध्यात्मिक प्यास है। किंतु जब भौतिक सुखों के लिये आत्म कल्याण की इस भावना का परित्याग कर देते है तो यह बुझती नहीं और भी भड़क उठती हैं। आन्तरिक तड़पन, क्षोभ और अशाँति इसी कारण होती है कि मनुष्य इन्द्रिय सुखों की लालसा में इतना छोटा बन गया है कि अपने वास्तविक स्वरूप को भी पहचानने में असमर्थ हो गया है।
विश्व प्रेम की भावना में जो रमणीयता, सौंदर्य दर्शन या मोहकता होती है वही मनुष्य की सच्ची धार्मिक सम्पत्ति हो सकती है। इसी से पुण्य पथ प्रशस्त होता है, इसी से सर्व शक्तियाँ जाग्रत होती हैं। घृणा और क्रोध, वैर और बदले की भावना से मनुष्य का जीवन स्तर दिन-दिन गिरता चला जाता है, इससे सामूहिक तौर पर व्यक्ति और समाज दोनों का पतन होता है। समाज में सात्विकता का प्रकाश जिन सद्गुणों से फैलता है उनकी ओर संकेत करते हुये भगवान् कृष्ण ने बताया है -
अद्वेष्टा सर्वभूतानाँ मैत्रः करुणा एव च।
निर्ममो निरहंकारः सम दुःख सुख क्षमो॥
अर्थात् जो सम्पूर्ण प्राणियों को अद्वैत भावना से देखता है, सबके साथ मैत्री करुणा माया मोह से रहित और नम्रता पूर्ण व्यवहार करता है, जो सम्पूर्ण प्राणियों के प्रति क्षमा भाव रखता है, उनके साथ सुख और दुःखों में समान रहता है, वही पूर्ण पुरुष है। अर्थात् महानता का लाभ मनुष्य इन्हीं सद्गुणों के आधार पर पाता है।
हम लोग एक ही माता पिता से उत्पन्न सन्तान को परस्पर भाई-बहिन समझते हैं। मानवीय दृष्टिकोण से यह सही भी है। व्यवहारिकता में इसी आधार कर्त्तव्य विभाजन और उसका क्षेत्र निर्धारित करने की सुविधा रहती है, किंतु भावनात्मक दृष्टि से इतने से ही संतोष नहीं मिलता। तब हमें यह मानकर चलना पड़ता है कि एक परमात्मा से ही जीवात्मा उत्पन्न और उसी से सम्बद्ध है वही हमारा पिता, माता, सर्वस्व है। इस आधार पर संसार के सभी जीवधारियों को अपने से भिन्न नहीं कह सकते। एक पिता जिस तरह अपने बच्चों को प्रगाढ़ स्नेह और प्रेम के सूत्र में बंधा देखना चाहता है वैसी ही सदिच्छा परमात्मा की भी हम से हो सकती है। इस सत्य से ही एकता की वृद्धि की होती है। समाज की पूर्ण विकसित रचना के उद्देश्य से महापुरुष सदैव इस बात पर जोर देते रहे हैं कि मनुष्य अपने आपको विश्व समाज का सदस्य मानें। आज भी यह आवश्यकता ज्यों की त्यों विद्यमान है। युग परिवर्तन के लिये इसी योग का अभ्यास भी किया जाना है।
प्रेम का साम्राज्य सर्वत्र है। इसके बिना मानव जीवन में सरसता नहीं आती। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। वह जितने अधिक अंशों में समाज के प्रति आत्म विकास करता है उसी के अनुपात में प्रेम की अन्तः ज्योति मानवीय जीवन की मधुरता को उपलब्ध करता है। यह आत्म विकास की साधना जितना अधिक तेज होगी समाज में सद्गुणों का प्रसार उसी गति से होता रहेगा। और एक दिन मनुष्य पूर्ण विकास की अवस्था भी प्राप्त कर लेगा।
भावनाओं का विस्तार अपने आप से करना है। व्यक्तिगत चरित्र निर्माण से यह प्रक्रिया प्रारम्भ होती है, धीरे-धीरे परिवार, गाँव, समाज, राष्ट्र और विश्व के साथ उसका सामंजस्य बढ़ता जाता है। इसी क्रम में व्यक्ति का निज का ज्ञान, बौद्धिक विकास और ईश्वर अनुभूति की सिद्धि प्राप्त होती है। यह आत्मयोग ही ब्रह्म ज्ञान का सबसे सीधा और सरल रास्ता है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना आत्मा के पूर्ण विस्तार की प्रतीक है। ऐसे व्यक्तियों के सहृदयता, उदारता कष्ट सहिष्णुता आदि सद्गुण पराकाष्ठा तक जा पहुँचते हैं, उनके लिये अपने पराये का भेद मिट जाता है। वह परमात्मा के प्रकाश में ऐसे असीमत्व का अनुभव करते हैं, जिससे उसके सम्पूर्ण दुःख, अभाव आदि नष्ट हो जाते हैं और प्राणिमात्र की सेवा में सर्वस्व बलिदान करने की महानता जागृत होकर धरती को कृतार्थ कर देती है।
मनुष्य के जीवन में देवत्व और असुरत्व का संग्राम प्रतिक्षण चलता रहता है। इस अंतर्मन्थन में जिस शक्ति की प्रबलता होती है वैसे ही परिणाम मनुष्य को प्राप्त होते हैं। सुख-दुख, प्रेम-वैर, राग-द्वेष, प्रिय-अप्रिय, आशा-निराशा और पाप-पुण्य के द्वन्द्वयुद्ध में जो पक्ष विजयी होता है उस के प्रतिफल इस जीवन में, और अन्य लोकों में संस्कार रूप में प्राप्त होते हैं। देवत्व मनुष्य की सुख-सुविधाओं और विकास में योग देता है; असुरत्व से मनुष्य का जीवन दुःख, क्लेश और कठिनाइयों में ग्रसित होकर तड़पता रहता है। इस निर्णय का अधिकार मनुष्य को ही है कि वह देवत्व का समर्थन करे या दनुजत्व को अपने जीवन का उद्देश्य बनाये।
प्राकृतिक नियमानुसार प्रत्येक अच्छी वस्तु कुछ कठिनाई से मिलती है। देवत्व श्रेष्ठ है किंतु उसके लिए जो त्याग और तपश्चर्या का मूल्य चुकाना पड़ता है वह निःसंदेह कठिन है। सुखोपभोग के लिये तो हमारे सभी अंग, हमारा मन, चित्त, प्राण और इन्द्रियाँ सभी व्याकुल और लालायित हैं परन्तु दुःख पाने की बारी आती है तो मुँह मोड़ लेते हैं। कठिनाइयों से हाथ सिकोड़ लेने की आदत है हमारी, इसीलिए दुर्बलताओं से हर क्षण घिरे रहते हैं। सुख-दुःख में समान रूप से विद्यमान हैं। जिस तरह ही दुःख संसार हमें प्रिय नहीं है उसी तरह सदैव सुख की भी कल्पना नहीं की जा सकती। फिर भी सुख इस संसार में अधिक है किंतु वे प्राप्त उन्हीं को होते हैं कठिनाइयों से संघर्ष करने का जिनका स्वभाव हो जाता है। दुःखरूपता का पर्दा हटाये बिना अंतर की आँखें नहीं खुलती, न ही किसी तरह की श्रेष्ठता मनुष्य के जीवन में आती है।
सुख की अभिलाषा है भी पूर्णतया आध्यात्मिक स्वर्ग में असंख्य सुखों की प्राप्ति होती है और नरक दुःखों का घर है, इसका समर्थन करते हुये महापुरुषों ने भी स्पष्ट किया है कि सुख की आकाँक्षा ही मनुष्य का सही उद्देश्य है। पुण्य और पाप-पुण्य में प्रवृत्ति और पाप से बचने में मनुष्य का बहुत कुछ लक्ष्य सुखासक्ति और दुःख विरक्ति ही है। सामाजिक संगठन और लोक सदाचार के संरक्षण का भी यह सर्वोत्तम उपाय है। नैतिक दृष्टि से स्वर्ग की अभिलाषा मनुष्य की मूलभूत आकाँक्षा मान लें तो भी कोई हर्ज नहीं किंतु यह बात जान लेना चाहिये कि जिस सुख की अभिव्यक्ति यहाँ की जाती है वह शाश्वत, सत्य और चिरन्तन होना चाहिए। साँसारिक सुखों के प्रति आसक्ति, मोह, लालसा मनुष्य मात्र की सहज दुर्बलता है। इस सुख के लिए मनुष्य असंयम, पाप और अत्याचार ही बढ़ाता है जिससे यहाँ का सारा जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। ऐसे सुख की भर्त्सना की गई है।
साँसारिक सुखों को ही यदि मानव-जीवन का लक्ष्य मानते हैं तो भावी दुःख की आशंका से प्रतिक्षण परेशान रहना पड़ता है। सुख की कामनायें जितना बढ़ेंगी अभाव उतने ही अधिक दिखाई देंगे। परिणामस्वरूप यह संसार दुःखों का ही आगार दिखाई देगा। इससे लोग निरन्तर विक्षुब्ध, गतचेतन, निरुपाय और विक्षिप्त से दिखाई देंगे। आश्रयहीन होकर मनुष्य का जीवन पूर्णतया दुःखमय बन जाय यदि मनुष्य दुःखों से घबड़ाने लगे। अशाँत-जीवन में सुख हो भी नहीं सकते। फिर मृत्यु की समस्या जो उसके साथ जुड़ी हुई है उसके कारण तो वह और भी कातर, भयभीत और दुःखी बना रहता है। यहाँ जरूर कोई न कोई हमारी भूल है। निश्चय ही हम इस संसार और यहाँ की परिस्थितियों का गलत अर्थ लगा रहे हैं तभी तो सारा जीवन दुःख, कष्ट और अभाव से घिरा हुआ दिखाई दे रहा है।
भूल यही है जो मनुष्य पदार्थ प्रेमी है। साँसारिक पदार्थ भी किसी सीमा तक ही सुख दे सकते हैं। अधिक परिमाण में सुख की लालसा ही दुःख का कारण बन जाती है। इतनी-सी भूल ही तूल बन जाती है और यह जीवन अभिशाप-सा दिखाई देने लगता है।
शरीर और उसके सुख क्षणिक हैं, नाशवान हैं किंतु “हम जो हैं-वह विशुद्ध तत्व रूप आत्मा हैं।” शरीर और आत्मा में भेद रखने की आवश्यकता पूरी न करने से ही साँसारिक सुखों में भ्रम पैदा होता है। यह विवेक दृश्य और उसके कारण पदार्थ का चिन्तन करने से आता है। आत्म-ज्ञान का उदय होते ही परिस्थितियाँ बदलती हैं और सुख का सही स्वरूप हमारे आगे परिलक्षित होने लगता है।
इस संसार में आत्म-ज्ञानी पुरुष ही पूर्ण सुखी हो सकते हैं क्योंकि उनके विचार स्थिर और कर्म सात्विक होते हैं। शेष व्यक्ति तो सचमुच दुःखों की ओर ही बढ़ रहे दिखाई देते हैं।
ग्रीक के प्रसिद्ध साहित्यकार कवि सोफोक्लिज ने लिखा है “संसार का सबसे दुःखी प्राणी मनुष्य ही है। उसका यहाँ से लौट जाना ही श्रेयस्कर है।” प्रसिद्ध कवि शेली और इलियड तथा आडेसी जैसी अमर कृतियों के निर्माता मनीषी होमर ने भी मानवीय जीवन को बड़े निराश शब्दों में व्यक्त किया है। वस्तुतः इस संसार को यदि सही रूप में न देख पाये तो यह संसार अधिकाँश सुखों की मृगमरीचिका और दुःखों से ओत-प्रोत ही दिखाई देता है।
स्पष्ट है कि सुख-दुःख मनुष्य की भावनाओं से सम्बद्ध है। भावनायें जब तक साँसारिक वस्तुओं से लिपायमान रहती हैं तब तक संसार ही सत्य लगता है। जब भावना स्तर ऊँचा उठाकर समष्टिगत चिन्तन के क्षेत्र में प्रविष्ट होते हैं तो एक अनिर्वचनीय आनन्द की स्थिति हमें प्राप्त होती हैं। भोग और विलास से मनुष्य की यह आध्यात्मिक क्षुधा मिटती नहीं। राजा बृहद्रथ, विश्वामित्र, ययाति और बाजिश्रवा के महान् ज्ञानी पुत्र नचिकेता आदि ने वैभव त्याग के द्वारा साँसारिक सुखों की निस्सारता को अपने चरित्र, त्याग और तपमय जीवन के द्वारा प्रमाणित किया था। तप के ही आत्मा का उत्थान संभव है। संसार को सही रूप से समझने के लिये उसमें भोग नहीं ढूंढ़ना चाहिए। हम दृष्टा बनकर जियें-प्रत्येक अच्छी-बुरी चीज पर विचार करना सीखें। उस स्तर से सोचने का प्रयास करें जिसमें बैठकर शारीरिक और आत्मिक विश्लेषण खुल कर किया गया हो। इस तरह की जिज्ञासा-वृत्ति से ही सही निष्कर्ष पर पहुँचना संभव हो सकेगा।
देवताओं के बारे में ऐसी कल्पना की जाती है कि वे अपरिमित शक्ति और अनन्त सामर्थ्य वाले होते हैं उनकी प्रत्येक कामनायें पूर्ण होती हैं। वे अपनी शक्ति से किसी भी दीन-दुःखी का उपकार कर सकते हैं। हिंदू दर्शनों में यही स्थिति आत्म-ज्ञानी पुरुषों की व्यक्त की गई है। आज की वैज्ञानिक मान्यताओं ने भी इस बात को सिद्ध कर दिया है कि व्यक्त-दृश्य की अपेक्षा अव्यक्त-अदृश्य- अर्थात् चेतन तत्व की शक्ति अतुलित ही है। मनुष्य आत्म-शोधन के द्वारा अपने देवत्व को विकसित करते हुये यह शक्ति और सामर्थ्य स्वयं भी प्राप्त कर सकता है। इसके लिए - सच्चे सुख के लिए अन्तःकरण में उत्कट भाव होना चाहिये ताकि पूर्णता के मार्ग में जो कठिनाइयाँ आती हैं उन्हें सहन करने की शक्ति आ जाय।
असुरों से सभी घृणा करते हैं क्योंकि उनकी भावनाओं में स्वार्थपरता और भोग लालसा इतनी प्रबल होती है कि वे इसके लिए दूसरों के अधिकार, सुख और सुविधायें छीन लेने में कुछ भी संकोच नहीं करते। उनके पास रहने वाले भी दुःखी रहते हैं व्यक्तिगत बुराइयों के कारण उनका निज का जीवन तो अशाँत होता ही है। दुःख की यह अवस्था किसी के लिए भी अभीष्ट नहीं है।
हम सुख भोगने के लिए इस संसार में आए हैं। दुःखों से हमें घृणा है। पर सुख के सही स्वरूप को भी तो समझना चाहिए। इन्द्रियों के बहकावे में आकर जीवन-पथ से भटक जाना मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी के लिए श्रेयस्कर नहीं लगता। इससे हमारी शक्तियाँ पतित होती हैं। अशक्त होकर भी क्या कभी सुख की कल्पना की जा सकती है? भौतिक शक्तियों से सम्पन्न व्यक्ति का इतना सम्मान होता है कि सभी लोग उसके लिये छटपटाते हैं फिर आध्यात्मिक शक्तियों की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। देवताओं को सभी नत मस्तक होते हैं क्योंकि उनके पास शक्ति का अक्षय-कोष माना जाता है। हम अपने देवत्व को जागृत करें तो वैसी ही शक्ति की प्राप्ति हमें भी हो सकती है। तब हम सच्चे सुख की अनुभूति भी कर सकेंगे और हमारा मनुष्य का जीवन सार्थक होगा। हमें असुरों की तरह नहीं देवताओं की तरह जीना चाहिये। देवत्व ही इस जीवन का सर्वोत्तम वरदान है हमें इस जीवन को वरदान की तरह ही जीना चाहिए।
अनेक आध्यात्मिक गुणों में एक गुण सौंदर्य और पवित्रता भी है। अपने आप को शुद्ध रखना तथा शृंगार प्रत्येक मनुष्य को प्रिय है। उसी प्रकार शुद्ध, शृंगार युक्त दूसरे मनुष्य भी बड़े प्रिय लगते हैं चाहे वह किसी अन्य जाति के ही क्यों न हो। गंदे तथा फूहड़ व्यक्तियों के पास किसी को बैठने का भी जी नहीं करता। अपने प्रिय जनों की सन्तुष्टि के लिये या आत्मतुष्टि के लिये ही क्यों न हो सजावट देखकर सभी का मन मुग्ध हो जाता है। शृंगार आत्मा का प्रिय विषय है, पवित्रता उसका प्रकाश है अतः इन्हें प्राप्त कर उसका सुखी होना स्वाभाविक ही है।
धर्म, जिस प्रकार मनुष्य मात्र की कल्याण और भलाई के व्यापक अर्थ में लिया जाता है, सम्प्रदाय, या वर्ग विशेष की संकीर्णता उसे अपवित्र करती है। उसी तरह अपना मैला शरीर शुद्ध कर लेना, या केवल स्वच्छ कपड़े पहन लेना ही शुचिता और सौंदर्य का अर्थ नहीं है। देह को साफ करने का कार्य तो पशु पक्षी भी कर लेते हैं। सुँदर शृंगार तो वेश्यायें भी कर लेती हैं। तरह-तरह का वेष-विन्यास बनाकर अनैतिक आचरण करने वालों के लिये तो शृंगार ही एक प्रकार का महामंत्र है, किंतु यह वास्तविक शृंगार नहीं आत्मघात है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार की शुद्धि एवं शृंगार कर लेना विरले प्रेमी सज्जनों को आता है। शृंगार लौकिक कामनाओं का पूरक नहीं आत्मिक सद्गुणों का परिष्कार है। शुद्धि का अर्थ बाह्य शुद्धि नहीं, आन्तरिक पवित्रता है।
महात्मा सुकरात की सूरत-शक्ल अच्छी नहीं थी पर उन्होंने इसकी शिकायत कभी भी परमेश्वर से नहीं की। वे प्रार्थना किया करते थे ‘प्रभो! आप मुझे भीतर से सुन्दर बना दो।’ उनकी आन्तरिक सुन्दरता से ही आकृष्ट होकर बरबस लोग उनकी ओर खिंचे हुये चले आते थे। आत्मा के शृंगार में सचमुच एक ऐसा अमृत निर्झर टपकता है जिसका मधुपान कर मनुष्य का जीवन आनन्द विभोर हो जाता है। बाह्य शुद्धि और शृंगार में बहुत थोड़ा आकर्षण होता है किंतु जिसके अन्तःकरण का तरह-तरह के सद्गुणों के आभूषणों से शृंगार करना सीख लिया उसका जीवन सार्थक हो जाता है। जो भीतर से स्वच्छ होते हैं उन्हीं का बाह्य प्रकाश भीतर के प्रकाश से चमक कर लोगों के नेत्र और हृदय दोनों को प्रकाशित कर देता है। शरीर और आत्मा दोनों से देवत्व की आभा प्रस्फुटित हो इसके लिये आन्तरिक सौंदर्य उतना ही आवश्यक है जितना, बाह्य। दोनों के समन्वय से ही मनुष्य का जीवन पूर्ण पवित्र बनता है।
शरीर के प्रत्येक अंग को जल, मिट्टी, साबुन आदि के द्वारा शुद्ध रखना मनुष्य की बाह्य पवित्रता है। स्वच्छ और सुँदर वस्त्र, साधारण आभूषण यह भी बाह्य शृंगार में आते है किंतु आन्तरिक सौंदर्य के अभाव में यह शृंगार अधूरा है। मन, बुद्धि तथा अहंकार का भी उतना ही परिमार्जन होना चाहिये। नेत्रों में स्वाभाविक पवित्रता हो जिसमें हर स्त्री-पुरुष को माता-पिता सुहृद-सुजन के रूप में देख सकें। नेत्रों से फूटने वाली धूर्तता, कामुकता, अपवित्रता रहते हुये सारी बाह्य सफाई धोखा मात्र ही कही जायगी। उसी प्रकार शुद्ध और सरल वाणी का प्रयोग हो। जो सुने वह भी उतना ही पवित्र हो जितना कहने वाला। इस तरह बाह्याभ्यान्तरिक पवित्रता से ही मनुष्य के पवित्र जीवन का सूत्रपात होता है।
सन्ध्या वन्दनादि धार्मिक अनुष्ठानों का प्रथम मंत्र है-
अपवित्रः पवित्रोवाऽसर्वावस्थाँगतोऽ पिया।
यः स्मरेत्पुण्डरी कक्षो सः बाह्याभ्यान्तरःशुचिः॥
अर्थात् - अभी तक मेरी अपवित्र या पवित्र कोई भी अवस्था रही हो अब परमात्मा का स्मरण करने से मैं बाह्य और आन्तरिक दृष्टि से पवित्र हो गया हूँ।”
उपरोक्त सूक्त में दो बातें बताई गई हैं (1) पहली यह कि परमात्मा की उपासना के लिये पवित्रता अनिवार्य है। (2) वह पवित्रता बाह्य भी हो और आन्तरिक भी। अशुद्ध वस्तुओं का त्याग करना और शुद्ध वस्तुओं को धारण करना यह मनुष्य के व्यक्तित्व की कसौटी है इसके बिना यह अध्यात्मिक मार्ग पर एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकता। इससे आवश्यक हो जाता है कि मनुष्य अपने को बाहर और भीतर दोनों ओर से स्वच्छ और पवित्र रखे। शरीर की, वस्त्रों की, घर की खान-पान तथा रहन सहन की शुद्धि मन की स्वस्थ अवस्था की द्योतक होती है। पर गंदगी मन की अस्वस्थता को प्रकट करती है। इससे स्वास्थ्य की खराबी के साथ ही व्यवहारिक जीवन में भी खराबी उत्पन्न होती है। किसी से सम्मान नहीं मिलता, कोई प्रेम नहीं करता, कोई मैत्री भी उन आदमियों से नहीं रखना चाहता जो बाह्य-शुद्धि पर ध्यान नहीं देते।
सौंदर्य-प्रिय व्यक्ति जिस तरह शरीर को शुद्ध रखकर उसका वस्त्राभूषण से शृंगार करते हैं, उसी प्रकार अन्तरंग जीवन को भी सद्गुणों, सद्भावों, सद्ज्ञान एवं आत्माभिमान से सजाया जाता है। बाहर और भीतर दोनों की शुद्धता पर प्रकाश डालते हुये स्वायंभु मनु ने लिखा है
अंद्विर्गात्रणि शुद्धयन्ति मनः सत्येन शुद्धयति।
विद्या तपोभ्याँ भूतात्मा, बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्धयति॥
(मनुस्मृति 5। 109)
अर्थात्, जल से शरीर को, सत्य से मन को, विद्या और परश्चर्या से आत्मा को तथा ज्ञान से बुद्धि को शुद्ध बनाना ही सच्चा बाह्य और अंतरंग शृंगार है।”
मनुष्यों के स्वभाव को मलिन करने वाले राग, ईर्ष्या, अत्याचार, चिकीर्षा, द्वेष और असूया ये छः प्रबल बुराइयाँ शास्त्रों में बताई गई हैं, इनको शुद्ध किये बिना आन्तरिक सौंदर्य के दर्शन नहीं होते। बाह्य पवित्रता के लिये भी उसी तरह स्नान, शौच, वस्त्र, आहार, आवास आदि की शुद्धता चाहियें। पहली आवश्यकतायें आत्मा के लिये हैं दूसरी शरीर के लिये। आत्मा और शरीर दोनों जब स्वच्छ, पवित्र और रसयुक्त बनते हैं तभी वास्तविक शृंगार के दर्शन होते हैं।
साँसारिक भोगों की दृष्टि से बाह्य स्वच्छता पर प्रायः अधिकाँश ध्यान देते हैं, किंतु आध्यात्मिक शृंगार के बिना उस स्वच्छता का कोई आनन्द नहीं मिल पाता। मनुष्य का मन बड़ा चंचल होता है। इन्द्रियों के वशीभूत होकर मनुष्य राग-द्वेषादि कुप्रवृत्तियों में फँसकर अनिष्ट करता रहता है। मन की पवित्रता के लिये ईश्वर आराधन, सत्पुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य के स्वाध्याय की बड़ी आवश्यकता होती है। पवित्र मन में अनेक गुणों का विकास स्वतः होने लगता है। लौकिक वस्तुओं को लेकर अभिमान, मोह, ममता, लोभ, क्रोध आदि द्वेष दुर्विकारों का त्याग ही अन्तर्जीवन की शुद्धि है। इसी प्रकार अपने अन्तःकरण में श्रद्धा, भक्ति, विवेक, सन्तोष, क्षमा, उदारता, विनम्रता, सहिष्णुता, एवं अविचल प्रसन्नता का धारण करना ही सुन्दर शृंगार है। केवल बाह्य शरीर के शृंगार पर ध्यान देना, मनुष्य के स्थूल दृष्टिकोण का परिचारक है। आत्म ज्ञान के साधकों तथा श्रेय के उपासकों के लिये आन्तरिक शृंगार की महत्ता अधिक है।
बाह्य सौंदर्य की आवश्यकता आन्तरिक सौंदर्य के साथ जुड़े रहने में ही है। अन्यथा वह उच्छृंखल बन जायगा और संसारी मनुष्यों को रिझाने में परतंत्रता भोगी बनना पड़ेगा। इस स्थिति के कारण ही आज अधिकाँश पाप के शिकार हो रहे हैं। यहाँ बाह्य जीवन के शृंगार पर आक्षेप करने का कोई उद्देश्य नहीं है पर यह स्पष्ट है कि बाह्य शृंगार ही जीवन का उद्देश्य नहीं बन जाना चाहिये।
शृंगार और शुद्धि आत्मा के विकास के विषय हैं इसमें सन्देह नहीं है किन्तु अपना दृष्टिकोण एकाँगी न होना चाहिये। हमें सौंदर्य के सच्चे स्वरूप को समझने का प्रयत्न करना चाहिये। मनुष्य की बाह्य पवित्रता से आन्तरिक शुद्धता का महत्व कम नहीं है वरन् यह दोनों ही एक दूसरे की पूरक हैं। मनुष्य का जीवन इन दोनों में उभयनिष्ठ होना चाहिये। तभी शृंगार की पूर्णता का आनन्द प्राप्त होता है। यह आनन्द मनुष्य को मिल सकता है पर इसके लिये अपनी आत्मा को सद्गुणों एवं सद्भावनाओं से ओत-प्रोत रखने की जरूरत होती है। शुद्ध शरीर, स्वच्छ मन और सद्चित्त वृत्तियों के द्वारा ही यह संयोग प्राप्त किया जा सकता है।
परस्वानाँ च हरणं परदाराभिमर्शनम्।
सुहृदामतिशंका च त्रर्यो दोषाः क्षयावहाः॥
दूसरों के धनों का अपहरण, दूसरों की स्त्रियों के साथ अनुचित सम्बन्ध और मित्रों के प्रति अति शंका- ये तीन मनुष्य का नाश कर देते हैं।
सूर्य की स्वाभाविक धूप जो शरीर पर पड़ती है कठिन गर्मी में भी उसे शरीर सहन कर लेता है। किरणें बिखरी हुई होती हैं अतः वे अपना सामान्य ताप ही दे पाती हैं। किन्तु नतोदर शीशे के लेन्स से एक इंच स्थान की धूप को केन्द्रित कर दिया जाय तो उस ताप को शरीर का कोई भी अंग सहन न कर सकेगा। कोई भी वस्त्र उसमें बिना जले न रहेगा। उससे कहीं भी अग्नि पैदा की जा सकेंगी और विविध प्रयोजन पूरे किये जा सकेंगे।
सूर्य किरणों की केन्द्रीभूत शक्ति की तरह निग्रहीत मन की शक्ति और सामर्थ्य भी अतुलित है। अस्त-व्यस्त मनोदशा से जीवन का कोई विशेष उद्देश्य पूरा नहीं होता। सामान्य श्रेणी के जीवों की तरह ही वह आहार-विहार की साँसारिक बातों में ही उलझा रहता है किन्तु यदि उसे एक लक्ष्य पर स्थिर कर दिया जाय तो उससे साधारण जीवन में भी कई गुनी शक्ति दिखाई देने लगेगी और मन चाही कल्पना पूरी की जा सकेगी।
साधारण लोगों के मन की कोई निश्चित गति नहीं होती। तालाब के पानी की तरह जिधर से हवा चली उधर से, वैसी ही कम-ज्यादा वेग वाली लहरें उठने लगेंगी। प्रायः लोग अपने से बड़े, पास-पड़ोस और उस समाज के व्यक्तियों के आचरणों का ही अनुकरण करते रहते हैं और उतने ही क्षेत्र में विचार उठाते रहते हैं। इससे मनुष्य के जीवन में कोई विशेषता नहीं आती। किन्तु यदि मन को संकल्पपूर्वक किसी विशेष लक्ष्य की पूर्ति में लगा दिया जाता है तो उसमें समुद्री ज्वार-भाटे की तरह ऐसी शक्ति भर जाती है कि कठिन दिखाई पड़ने वाले कार्य भी आसानी से पूरे हो जाते हैं। लोग उनकी सफलता पर आश्चर्य प्रकट करते हैं, यह सब उन्हें चमत्कार-सा लगता है। पर चमत्कार-सी दिखाई देने वाली यह सफलता एकाग्र मन की संग्रहीत शक्ति के परिणाम से और कुछ अधिक नहीं होती। मन की तन्मयता में वह शक्ति है जो बड़े से बड़े कार्य आसानी से पूरी कर सकती है।
मन में उठने वाली इन विचार तरंगों को स्वेच्छापूर्वक विचरण न करने देना चाहिए। क्योंकि निरन्तर उठते रहने वाले विचार अच्छे बुरे जैसे भी होंगे वैसे ही तत्व वे सूक्ष्म जगत से आकर्षित करते रहेंगे और वह विचार स्वभाव में परिणत होने लगेगा। बाह्य रूप से शारीरिक परिवर्तन भले ही दिखाई न पड़े पर यदि कुविचारों में ही मन रस लेता रहे तो बुरे स्वभाव का परिपक्व हो जाना अवश्यम्भावी है। इस अवस्था में मनुष्य अपना नैतिक पतन तो करता ही है औरों को भी पथ-भ्रष्ट करने का एक सजीव केन्द्र सा बन जाता है। इस तरह के विचारों वाले मनुष्य की समीपता जिसे भी मिलेगी उनके भी दुष्ट और दुराचारी हो जाने की सम्भावना रहेगी।
मनः शक्ति के इस दूषित पक्ष को देखकर ही उसे स्वेच्छाचारी न होने देने की सलाह दी गई है। शास्त्रकारों ने निरन्तर अभ्यास द्वारा उसे नियंत्रण में रखने की शिक्षा दी है। उन्हें यह मालूम था कि दृश्य जगत के संपर्क में रहने के कारण मनुष्यों की वासना एवं तृष्णा परक आकाँक्षाओं का उठना स्वाभाविक है। उन्हें जिधर आकर्षण दिखाई देगा उधर ही दौड़ेगी। मन को स्थूल भोगों में ही अधिक सुख मिलता है अतः उसकी इच्छायें, आकाँक्षायें, कल्पनायें तथा विचारणायें भी वैसी ही अधोगामी होंगी। हीन विचारों के कारण मनुष्य के जीवन में चंचलता, अस्थिरता, क्षुद्रता और निकम्मापन आता है। फलस्वरूप यह जीवन अनेक कष्टों एवं उद्वेगों में फँसा रहता है। उस उलझन में न किसी तरह की भौतिक उन्नति ही हो पाती है न आध्यात्मिक लक्ष्य ही पूरा हो पाता है।
अनियंत्रित मन प्रयोग रूप में अनेकों आकाँक्षायें बनाता बिगाड़ता रहता है। कभी वह असंख्य धन प्राप्त करने की इच्छा करता है, कभी विद्वान होने का सपना देखता है। पहलवान बनने, नेता बनने, प्रतिष्ठा पाने, धनी होने, भोग भोगने की अनेकों योजनायें वह बनाया करता है। यह योजनायें स्थिर नहीं होती है। औरों के जीवन की प्रतिक्रिया स्वरूप ही वह इन लालच भरे सपनों के पीछे अंधी दौड़ लगाया करता है। पर उसकी कोई भी आकाँक्षा निर्दिष्ट नहीं होती। हृदय की संवेदनशीलता के कारण वह प्रत्येक अवस्था में अपने आपको ही ठीक समझता है, पर इन अनेक कामनाओं का वह समन्वय नहीं का पाता। एक ही समय पर कोई वक्ता बनना चाहे और पहलवान बन सके यह असम्भव है। एक बार में एक ही क्रिया को अधिक सुविधा और सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता है। अभी खाना, अभी पानी, अभी घर, अभी दुकान, अभी रेल, अभी मोटर- सब बातें एक साथ नहीं होतीं। उन्हें क्रमिक रूप से पूरा करने से ही कोई उचित व्यवस्था बन पाती है। इनका क्रम किस प्रकार हो? कौन सी आकाँक्षा किस सीमा तक संजोकर रखी जाय? उसकी पकड़ कितनी मजबूत हो? इन सब पर भली प्रकार विचार करने से ही जीवन दशा को सुनियोजित रखा जा सकता है।
सबसे महत्व की बात यह है कि एक लक्ष्य के लिए अनेक आकाँक्षायें परस्पर पूरक कैसे बनें? इस स्थिति को यदि विचारपूर्वक समझ लिया जाय तो अपने अभीष्ट मनोरथों को लोग बड़ी आसानी से पूरा कर सकते हैं। इच्छायें जीवन के विशिष्ट पहलू व परिस्थितियों से बँधी होती हैं, अतः उनका योग्य निर्धारण तथा उपयोग सम्पूर्ण जीवन का एक केन्द्र बिन्दु, एक लक्ष्य निश्चित करने में है। यह लक्ष्य जितना महान होगा, उच्चस्तरीय, भव्य सम्पूर्ण जीवन को दृष्टिगत रखकर निर्धारित, सर्वांगीण और व्यापक होगा इच्छाओं और आकाँक्षाओं का वेग भी उतनी ही मजबूती तथा कठोरता से सम्हालने की जरूरत पड़ेगी। छोटी ऊँचाई से गिरने पर चोट की उतनी आशंका नहीं रहती जितनी बड़ी ऊँचाई से गिरने पर लगती है। ऊँचे लक्ष्यों को साधने के लिए इसीलिए अधिक लगन, गहन तत्परता और कठोर मानसिक नियंत्रण की आवश्यकता पड़ती है। यदि मन को साध लिया जाय और वह रुचि पूर्वक लक्ष्य पूर्ति में लगा रहे तो कठिनाइयाँ सरल हो जाती हैं और मनुष्य अभीष्ट सफलता प्राप्त कर लेता है।
पर यह कार्य उतना सरल नहीं है। लक्ष्य पूर्ति के मार्ग में अनेक द्विविधायें तथा उलझन भरे प्रश्न आते हैं जिनका निराकरण करना कठिन हो जाता है। एक प्रश्न के दो पहलू आ जाते हैं, दोनों ही उचित और आवश्यक प्रतीत होते हैं पर चुनाव एक का ही करना होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि आवश्यकता से भिन्न कोई बात सामने अटल प्रारब्ध बनकर आ जाती है उस समय यह अनुमान करना कठिन हो जाता है किसे ग्रहण करें और किसे छोड़ दें। पर यदि मन स्वस्थ और नियंत्रित है तो वह अपने विवेक बल से अच्छे बुरे का, उचित-अनुचित का ज्ञान प्राप्त कर परिस्थितियों को काबू में ला सकता है। आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि ऐसी स्थिति में विवेक का अंकुश, मनः नियंत्रण इतना कठोर हो कि उसे प्रलोभनों की ओर झुकने न दिया जाय। क्योंकि मन प्रायः अपनी रुचि के ही निर्णय निकालता है जो लक्ष्य पूर्ति में बाधक भी हो सकते हैं।
आशा, विश्वास, दृढ़ता, तन्मयता, कर्मठता, धैर्य और कष्ट सहिष्णुता मनोबल के प्रतीक हैं। मन को संतुलित अवस्था में रखने, एक ही लक्ष्य की ओर उसे प्रेरित करने में इन गुणों का प्रादुर्भाव होता है और आन्तरिक महानता विकसित होने लगती है। इन गुणों से मन की तमाम शक्तियाँ केन्द्रीभूत होकर एक प्रचंड दावानल सी बन जाती हैं। ऐसे बलवान मन को चाहे जहाँ लगा दिया जाय उधर से ही सफलता का मार्ग खुलता हुआ दिखाई देगा। निराशा, उद्विग्नता, चंचलता, और अश्रद्धा यह मनोविकार है। ईर्ष्या, विद्वेष, कुढ़न, चिड़चिड़ापन आदि से मानसिक शक्तियों का पतन होता है और जीवन में किसी विशेषता या महत्ता के दर्शन नहीं होते। यह दोनों ही पहलू मनुष्य के सामने हैं जिसे चाहे चुन लें और वैसा ही सफल या असफल जीवन बना लें।
मन बड़ा शक्तिशाली है। पर उससे कोई विशिष्ट लाभ तभी प्राप्त किया जा सकता है जब उसे पूर्ण नियंत्रण में रखा जाय। जीवन लक्ष्य की प्राप्ति, साँसारिक सुख सुविधायें प्राप्त करने के लिए भी यह शर्त अनिवार्य है। हमारा मन वश में हो जाय तो इस जीवन को स्वस्थ व समुन्नत बना सकते हैं और पारलौकिक जीवन का भी मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।
गीताकार ने क्रोध की सर्वनाशी शक्ति के बारे में बताते हुए कहा है।
“क्रोधात् भवति संमोहः संमोहात्स्मृति विभ्रमः।
स्मृति भ्रंशाद् बुद्धि नाशो बुद्धि नाशात्प्रश्यति॥
“ क्रोध का आवेग आने पर मूढ़ता पैदा होती है। मूढ़ता से स्मृति भ्रान्त हो जाती है। स्मृति के भ्रान्त होने से बुद्धि का नाश हो जाता है। और बुद्धिहीन मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है।”
क्रोध के आवेग में जो कुछ भी हो जाय कम ही है। यह व्यक्ति के सर्वनाश का संकेत है क्योंकि इसका आवेग आने पर मनुष्य की सोचने विचारने की शक्ति क्षीण हो जाती है और वह आवेग में कुछ भी कर सकता है। मार पीट, कत्ल, आत्महत्या, नृशंस घटनायें क्रोध के आवेग में ही घटती हैं। सन्त तिरुवल्लरु के शब्दों में “आवेग उसे ही जलाता है जो उसके पास जाता है किन्तु क्रोध तो पूरे परिवार, समाज को संतप्त कर देता है। क्रोध एक प्रकार की आँधी है, जब वह आती है तो विवेक को ही नष्ट कर देती है और अविवेकी व्यक्ति ही समाज में अपराध तथा बुराइयों के कारण बनते हैं।
शास्त्रकार ने क्रोध को सर्वनाश बताते हुए लिखा है-
क्रोधःप्राणहरः शत्रुः क्रोधोमित मुखोरिपुः।
क्रोधोऽसिः सुमहातीक्ष्णः सर्वक्रोधोऽपकर्षति॥
“क्रोध प्राण नाशक शत्रु है, क्रोध अपरिमित मुख वाला बैरी है, क्रोध बड़ी तेज धार वाली तलवार है वह मनुष्य का सब कुछ हरण कर लेता है।”
क्रोध का कारण बताते हुए गीता में कहा है “कामात् क्रोधोऽभिजायते” कामना से क्रोध का जन्म होता है। अक्सर मनुष्य को अपने सुख की आराम की आनन्द की लाभ आदि की कामनायें होती हैं जब इन कामनाओं में कोई विक्षेप का कारण उपस्थित हो जाता है तो मनुष्य में क्रोध का उदय होता है। दूसरे शब्दों में अपनी हानि या दुःख का कोई कारण उपस्थित होने पर क्रोध का आवेग पैदा होता है। स्मरण रहे जिस समय में कामना जितनी प्रगाढ़ होगी क्रोध का स्वरूप भी उतना ही प्रबल और वेगवान होगा। अपने मनोरथों को विफल करने वाले, अभीष्ट की प्राप्ति के मार्ग में बाधक बनने वाले का स्पष्ट परिचय पाकर क्रोध का उदय होता है। कई बार अपनी असफलता का प्रयोग भी किसी मानसिक उद्विग्नता के कारण भी संपर्क में आने वाले लोगों से क्रुद्ध व्यवहार हो जाता है। अपने मन की जटिलताओं के कारण भी मनुष्य का स्वभाव क्रोधी बन जाता है। इन सबके मूल में एक ही तथ्य है, वह है अपनी कामनाओं में विक्षेप पड़ना, उन्हें सफल होते न देख पाना।
जब क्रोध का आवेग आता है तो उसका एक ही लक्ष्य होता है, जो अपनी कामनाओं में बाधक बना है उसे नुकसान पहुँचाना। मार-पीट कर, सामान को नष्ट कर, काम में रोड़ा अटकाकर जैसे भी बने क्रोध का लक्ष्य दूसरे को हानि पहुँचाना ही होता है। वह भले ही किसी भी रूप में पहुँचाई जाय। कभी-कभी लोग क्रोध से प्रेरित होकर अपना ही सिर फोड़ने लगते हैं। अंग भंग, आत्महत्या तक कर लेने को उद्यत हो जाते हैं, ऐसे लोग। किन्तु इसका आधार भी अपने कुटुम्बियों, स्नेह, सम्बन्धियों को वर्तमान या भविष्य में हानि पहुँचाना ही होता है। स्मरण रहे ऐसी हरकतें बेगानों के साथ कभी नहीं की जातीं। ऐसा मनुष्य तभी करता है जब दूसरों को इस प्रपंच की परवाह होती है वे इस क्रोध प्रदर्शन से प्रभावित होते हैं।
लेकिन कई बार जब मनुष्य अपने प्रतिकार की भावना को पूर्ण नहीं कर पाता, दूसरे के शक्तिशाली या समर्थ होने पर क्रोधी जब अपने मन्तव्य में सफल नहीं हो पाता तो वह स्वयं अपने ऊपर वैसी ही क्रिया करने लगता है, जैसी दूसरे को हानि पहुँचाने के लिए करता है। वह अपना सिर फोड़ने लगता है, बाल नोंचता है, अंग भंग करता है। इस तरह क्रोध की कार्य पद्धति एक ही है, वह है नाश करना तोड़ फोड़ करना, नुकसान पहुँचाना।
क्रोध अन्धा होता है। वह केवल उस ओर देखता है जिसे दुख का कारण समझता है, या अपनी कामनाओं का बाधक मानता है। और उसका नाश हो, उसे हानि, दुःख पहुँचे, क्रोधी का यही लक्ष्य होता है। क्रोधी व्यक्ति कभी अपने बारे में नहीं सोचता। मेरी भी कोई भूल है, कुछ मैंने भी किया है, या जो मैं करने जा रहा हूँ, उसके क्या परिणाम होंगे? इनके बारे में कुछ भी नहीं सोचता। इसके कारण बड़े-बड़े अनर्थ हो जाते हैं।
क्रोध के इस अन्धेपन के कारण ही कभी-कभी निर्दोष व्यक्तियों को हानि उठानी पड़ती है। दफ्तर से बिगड़कर आया बाबू घर में पत्नी या बच्चों को मारता पीटता है। कभी नौकर पर क्रोध उतारता है। चाणक्य का क्रोध प्रसिद्ध है। वह विवाह करने जा रहा था। मार्ग में कुश उसके पैर में चुभ गये। उसने मठ्ठा और कुदारी लेकर कुशों को खोदना शुरू किया, उनकी जड़ में मठ्ठा देना शुरू किया। कई लोग जब चूल्हा जलाते-जलाते थक जाते हैं, तो वह नहीं जलता तो चूल्हे को ही फोड़ देते हैं, या पानी डाल कर अपना गुस्सा उतारते हैं। अपनी असावधानी वश जब राह चलते पत्थर या ईंट की ठोकर लग जाय तो कई व्यक्ति उसे उखाड़ कर चूर-चूर करने को उद्धत हो जाते हैं।
क्रोध का अधिक अभ्यस्त हो जाने पर मनुष्य की प्रकृति “क्षणे रुष्टः” क्षण-क्षण में बात-चीत पर चाहे वह उसके भले की ही क्यों न हो क्रुद्ध होने की आदत-सी पड़ जाती है। क्रोध का लम्बा अभ्यास हो जाने पर तो मनुष्य की मानसिक स्थिति कुछ ऐसी हो जाती है कि उसे लड़े भिड़े बिना रहा नहीं जाता। जिस तरह नशेबाज को नशे की भूख उठ आती है उसी तरह एक लम्बे अभ्यास के बाद क्रोधी व्यक्ति की मानसिक स्थिति ऐसी बन जाती है, कि उसे बात-बात पर क्रोध होने लगता है। लड़ना, भिड़ना, मारना पीटना, गाली देना बुरा कहना ऐसे व्यक्तियों के स्वभाव का स्थायी अंग बन जाता है।
क्रोध इतना फुर्तीला मनोविकार है कि इसमें सोचने-विचारने, समझाने-बुझाने का अवसर नहीं रहता। बात-बात में क्रोध का उदय हो ले जाता है। कभी-कभी हम उसका कारण सोच समझ भी नहीं पाते कि क्रोध अपने प्रचण्ड रूप में प्रकट हो उठता है। अन्य मनोविकारों के साथ अचानक ही क्रोध आ धमकता है।
क्रोध से मनुष्य के पुण्य कार्य, सद्भावनायें, सद्गुण उसी तरह नष्ट हो जाते हैं जैसे बाढ़ आने पर कोई उद्यान नष्ट हो जाता है। ऋषि ने कहा है-
संचितस्यापि महतो वत्स क्लेशेन मानवैः।
यशसस्तपसश्चैव क्रोधो नाशकरः परः॥
“वत्स! मनुष्य के द्वारा बहुत प्रयत्नों से अर्जित यश और तप को भी क्रोध सर्वथा नष्ट कर डालता है।”
सन्त कबीर ने इसी तथ्य को प्रतिपादित करते हुये कहा है :-
“कोटि परम लागे रहें, एक क्रोध की लार।
किया कराया सब गया, जय आया हंकार॥
तपते यतते चैव यच्च दानं प्रयच्छति।
क्रोधेन सर्व हरति तस्मात् क्रोधंविवर्जयेत॥
“मनुष्य जो तपः संयम दान आदि करता है उस सब को क्रोध नष्ट कर डालता है। इसलिये क्रोध का त्याग करना चाहिए।”
क्रोध को मन में स्थान देना भयंकर जहरीले नाग को घर में बिठाना है, जो एक दिन हमको सर्वथा नष्ट कर डालता है। जब क्रोध किसी कारण दब जाता है तो यह विष अन्दर ही अन्दर फैलता है और हमारे स्वभाव, मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव डालता है।
क्रोध सामाजिक शान्ति भंग करता है। यह संक्रामक है। एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैलता है। एक व्यक्ति का क्रोध दूसरे में भी क्रोध का संचार कर देता है। और इस तरह पूरे समाज में अशान्ति की आग सुलग जाती है इस कारण वश क्रोध तत्काल प्रकट नहीं तो पाता या वह बहुत दिनों तक बना रहता है तो बैर का रूप ले लेता हैं। इसमें क्रोध की उग्रता और उसका वेग तो क्षीण पड़ जाता है किन्तु लक्ष्य को हानि पहुँचाने का भाव दिनों दिन दृढ़ होता जाता है। और अपने बचाव के लिए सोच विचारने का ध्यान रखा जाता है। फिर मौका लगते ही दूसरे पर वार कर दिया जाता है। यह क्रोध का ही परिवर्तित रूप है।
उक्त विभिन्न रूपों में क्रोध हमारे जीवन के लिए भयंकर विष सिद्ध होता है। इसीलिए सभी धर्मों समाज व्यवस्थाओं में क्रोध त्याग का उपदेश दिया गया है। हम को भी जीवन के इस भयंकर शत्रु से बचने के लिए सावधान रहना चाहिए।
पैसा,पैसा, पैसा-आज जिधर देखिये उधर पैसे के लिये पुकार मची हुई है, छीना-झपटी, लूट-खसोट, छल-कपट, मक्कारी-दगाबाजी और न जाने क्या-क्या हो रहा है। पैसे के लिए कुछ ऐसी दिशाहीन दौड़-धूप हो रही है, कि क्षण-भर ठहर कर सोचने का मौका किसी के पास है ही नहीं। इस समय आदमी कुछ ऐसा पैसे के लिए भाग रहा है, मानो अकस्मात् आई हुई किसी विपत्ति से बचने के लिए लोग ऊँचे-नीचे, खाई, खंदक का विचार किये बिना भागा-भाग मचाये हुए हैं।
पैसा न तो कोई इतनी बड़ी चीज है जिसके लिए जीवन का सर्वस्व भेंट चढ़ा दिया जाये, न ऐसा है कि यह कोई आज अकस्मात् आविर्भूत हुई जैसी अद्भुत वस्तु है, जिसे पाने के लिये इतनी आपा-धापी की जावे और न ही निकट भविष्य में तिरोधान ही होने वाला है, जिससे आज ही इसे जैसे भी हो, लूट-खसोट, चोरी-चकारी से अधिक से अधिक रख लिया जावे नहीं तो आगे कभी इसके दर्शन न होंगे।
पैसा पहले भी था, आज भी है और आगे भी रहेगा, इसमें शंका अथवा सन्देह करने की गुंजाइश का प्रश्न ही नहीं उठता। तब क्या बात है कि आज पैसे के लिए ऐसा पागलपन आदमी पर सवार है? पैसा पहले भी था और उसकी उपयोगिता एवं आवश्यकता भी थी, किन्तु उसके लिये इतना अन्धा पागलपन न था।
यदि आज किसी से पूछा जाये कि पैसे के लिए यह मतवालापन क्यों है, जिसके लिए करणीय अथवा अकरणीय काम करने में जरा भी संकोच नहीं है? तो सबसे पहले तो वह आप से करणीय-अकरणीय कामों की परिभाषा पूछेगा-और जब आप उसे इसकी कोई सरल-सी परिभाषा बतलायेंगे तो उस पर पचास तरह के तर्क रखकर और विवाद करके आपको प्रतिक्रियावादी, अप्रगतिशील अथवा पुरातन-पंथी सिद्ध करने का प्रयत्न करेगा-नहीं तो सीधी-सी एक बात कह देगा कि जमाना ही ऐसा है जिसमें ऐसा किये बिना गुजारा ही नहीं। उसके कहने से कुछ ऐसा मालूम होगा कि जमाना कुछ ऐसा दैवी फरमान लेकर आया है, जिसके अनुसार यदि पैसे के लिए यह सब कुछ न किया गया तो वह बरबाद करके रख देगा। ऐसा करने की बड़ी भारी विवशता आ पड़ी है।
आज किसी बात के लिए जमाने को जिम्मेदार ठहरा देने का एक रिवाज-सा चल पड़ा है। जमाने को दोष दिया और छुट्टी पाई। किन्तु यह सोचने समझने का जरा भी कष्ट नहीं किया जाता कि आखिर किसी जमाने का स्वरूप बनता तो उस समय के आदमियों से ही है। वास्तव में जमाना किसी को बुरा नहीं बनाता बल्कि मनुष्य ही जमाने को बुरा बनाते हैं।
आज का समस्त संसार, आज के समय से पहले का समय, एक स्वर से अच्छा बतलाता है और कहता है कि पहले के समय में लोग इतने बुरे नहीं थे। उनमें आज जैसा झूठ, कपट, मक्कारी आदि नहीं थी। वे बड़ा ही सरल एवं शुभ जीवन बिताते थे। आज हम तरह-तरह से उनकी प्रशंसा और सराहना तो करते है किन्तु उन जैसा बनने का प्रयत्न नहीं करते हैं। हम अच्छाई को अच्छाई और बुराई को बुराई जानते, मानते हुए भी अभिशप्त आत्मा की तरह बुराई की ओर ही भागते चले जा रहे हैं।
अच्छाई से बुराई की ओर पलायन का प्रमुख कारण है आज की अर्थ- प्रधान मनोवृत्ति! हम हर काम पैसे के बल पर करना चाहते हैं। पैसा कमाना चाहते हैं तो पैसे के बल पर, धर्म करना चाहते है तो पैसे के बल पर, स्वस्थ रहना चाहते हैं तो पैसे के बल पर, सुख चाहते हैं तो पैसे के बल पर, शान्ति चाहते है तो पैसे के बल पर, सम्मान चाहते हैं तो पैसे के बल पर, स्वर्ग चाहते हैं तो पैसे के बल पर और मोक्ष चाहते हैं तो पैसे के बल पर। तात्पर्य यह है कि हम लौकिक अथवा पारलौकिक जो कुछ भी चाहते हैं वह सब पैसे के बल पर पाना चाहते हैं। मानो पैसा एक ऐसा वरदान हैं जिसके मिलते ही हमारी सारी कामनायें पूर्ण हो जायेंगी। और इसलिए आज हम पैसे को उचित अथवा अनुचित हर तरीके से प्राप्त करने में जुटे हुए हैं। परन्तु यह कभी नहीं सोचते कि जिनके पास असंख्य धन है, क्या उन्हें सब कुछ प्राप्त है? क्या उनकी सारी मनोकामनायें पूर्ण हो गई हैं? क्या वे अपने जीवन में पूरी तरह से सुखी और संतुष्ट हैं? यदि इस बात का पता गहराई में बैठकर लगाया जावे तो ज्ञात होगा कि जो जितना अधिक धनाढ्य है वह उतना ही अधिक चिन्तित और व्यग्र है।
सुख-शान्ति का निवास पैसे में नहीं। मनुष्य की अन्तरात्मा में है। उसके नेक कामों और कोशिशों में है। पैसा तो संसार में वस्तुओं के विनिमय और आदान-प्रदान का एक साधारण सा माध्यम मात्र है। वस्तु के अभाव अथवा अनावश्यकता में पैसे का क्या मूल्य अथवा उपयोग रहता है?
पैसा अस्थिर है। आज है तो कल बना ही रहेगा इसका कुछ निश्चय नहीं। चोरी, डकैती, ठगी, मुकदमा, बीमारी, अग्निकाण्ड, दुर्घटना, घाटा, विवाह, शादी आदि अनेक आकस्मिक कारण ऐसे हो सकते हैं जिसमें आज की कमाई सम्पत्ति से कल वंचित होना पड़े। ऐसी दशा में यह आशा करना उचित नहीं कि अब अधिक कमा कर रख लें तो उससे आजीवन काम चलता रहेगा और सुखोपभोग की आवश्यक वस्तुयें समय-समय पर खरीदी जा सकेंगी।
इस प्रकार सोचने की अपेक्षा समय-समय पर आवश्यकता के अनुरूप कमाते रहने की क्षमता को बनाये रखने के लिए ही प्रयत्न करना चाहिए ताकि संग्रह की चिन्ता और सुरक्षा से बचकर परिस्थितियों के अनुसार काम चलाने एवं कमाने में कोई अड़चन न आवे।
अब सन्तानों के लिए धन का संचय ले लिया जावे। किसी हद तक, जहाँ तक कि उनके विकास और प्रगति में बाधा न पड़े धन का संचय किया जाना उचित है। किन्तु किसी भी प्रकार से कमाकर धन का अम्बार लगा देने का ठीक-ठीक अर्थ यही होगा कि या तो आप अपने बच्चों दर बच्चों को कमाई के अयोग्य समझते हैं या आप चाहते हैं कि वह आगे चलकर निकम्मे और दुर्व्यसनी बनें। आमतौर से यह देखा जाता है कि जिसने स्वयं नहीं कमाया है वह पैसे का मूल्य नहीं समझता, अपव्यय करता है और दुर्व्यसनों में फँस कर अपने सर्वनाश के साधन जुटा लेता है। इस प्रकार उत्तराधिकार में छोड़ा हुआ अनावश्यक धन सदा उनके लिए अहितकर ही सिद्ध होता है। बच्चों के लिए पैसे का अम्बार छोड़ने का प्रयत्न करने के बजाय उन्हें कर्मठ और सुयोग्य बनाइये और अधिक से अधिक उनकी कमाई और प्रगति के लिए पिता के नाते एक प्रशस्त मार्ग छोड़ जाइये, और कहीं यदि आप पैसा केवल पैसे के संचय की भाव से बटोरते हैं तब तो आप उस धन के बे कौड़ी के गुलाम हैं। ठीक उस सर्प की भाँति हैं जिसका प्रयोजन तो कुछ है नहीं किन्तु धन संचय पर केवल पहरा दे रहा है।
और यदि यह कहा जाये कि अधिक से अधिक कमा कर अधिक से अधिक परोपकार और धर्म कर्मों में लगाया जायेगा, तो पहले तो उसका उपार्जन ही इस बात का प्रमाण है कि कहने वाला धर्म में कितना विश्वास रखता है। फिर इस से कहीं श्रेष्ठ और फलदायक यह होगा कि पैसा कमाने के भ्रष्ट माध्यम, जैसे चोरी, ठगी, बेईमानी आदि का परित्याग कर दिया जावे एक तो सदाचार की कमाई स्वयं ही अपने में एक पुण्य है। फिर भ्रष्टाचार के लाख रुपये से नेक कमाई का एक पैसा भी धर्म कर्म के लिए लाख गुना अच्छा है। फिर पैसे से परमार्थ बन पड़ने वाली बात भी सार हीन है। पुण्य परमार्थ मनुष्य के श्रम और सद्भावनाओं का सम्मिलित स्वरूप है। उसी से किसी का सच्चा हित हो सकता है। ईश्वर भी ऐसे ही को पुण्य मानता है। तथा जिसके पास अपरिमित धन है वह कुछ पैसे किसी तथाकथित धर्म कार्य में लगा भी दे, तो अनीति की कमाई अकारथ ही चली जायेगी इससे सस्ती नामवरी के अतिरिक्त पुण्य प्रयोजन की कोई सिद्धि न हो सकेगी।
अब रही पैसे से आनन्द की बात। यदि कोई यह कहे कि हम तो संसारवादी हैं। संसार में जितने आनन्द हैं उनका उपयोग करना ही हमारा ध्येय है- तो सबसे पहले साँसारिक विषय भोगों में सच्चा आनन्द है ही नहीं केवल आनन्द का एक धोखा है, एक छलना है। फिर भी यदि कोई विषय भोगों को भोगेगा तो अपने अर्थों में आनन्द के लिये, शराब पियेगा, कुकर्म करेगा, विविध व्यंजनों को अपनायेगा और धीरे धीरे अपना जीवन एक अभिशाप बना लेगा। इस प्रकार वह पाप से कमाया हुआ पैसा भी दूसरों के हवाले कर देगा और एक दिन जब इन विषयों और झूठे इन्द्रिय भोगों से ठगा हुआ अशक्त हो जायेगा तब न उसका पैसा उसके पास होगा, और न उसका शरीर ही काम देगा। उसके पास केवल एक दर्शनीय दरिद्रता, पश्चाताप, विषाद, निराशा के अतिरिक्त कुछ भी शेष न रहेगा। और वह अपने सिर पर कुकर्म की गठरी रक्खे हुये इस संसार से घसीटता हुआ चला जायेगा।
इस प्रकार हम देख सकते हैं कि वह अनुचित वित्तेषणा संसार को कितने भयानक और गहरे गढ़े की ओर लिये जा रही है। इसलिये धन लोलुपता की दृष्टि किसी को भी अपने जीवन में नहीं पनपने देना चाहिये। सभी बुराइयाँ संक्रामक रोगों की तरह बड़े वेग से फैलने वाली होती हैं। क्या आज कोई भी भ्रष्टाचारी यह कह सकता है कि वह किसी दूसरे के भ्रष्टाचार का शिकार नहीं है? यदि एक घी में मिलावट करके बेचता है तो दूसरा उसे दूध में पानी दे जाता है। यदि एक खाद्य वस्तुओं में मिलावट करता है तो दूसरा उसे दवाओं में धोखा देता है। यदि एक रिश्वत लेता है तो उसे कहीं देना भी पड़ता है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि एक व्यक्ति एक प्रकार का भ्रष्टाचार करता है तो वह दूसरों से दूसरे प्रकार के भ्रष्टाचार का शिकार बनता है। और सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि एक भ्रष्टाचारी दूसरे अन्य प्रकार के भ्रष्टाचारी को कोसता तो है लेकिन भ्रष्टाचार कोई भी दूर नहीं करना चाहता। यह कैसी बच्चों जैसी बात है कि जब हम खुद चोरी, बेईमानी करते हैं तब तो बड़े प्रसन्न होते हैं और अपने को बड़ा चतुर समझते हैं परन्तु जब स्वयं किसी की चोरी, मुनाफाखोरी आदि से प्रभावित होते है तो बुरा भला कहते है। जब कोई अपने अनुचित स्वार्थ के लिए किसी अधिकारी को घूँस देता है तब तो अपने आप को बड़ा व्यवहार कुशल समझता है किन्तु जब वह अधिकारी अपने स्वार्थ से रिश्वत की भूमिका बनाता है तब उसे बेईमान कहने लगते हैं।
आज संसार की इस भयानक स्थिति की जड़ में इस अनियंत्रित वित्तेषणा का विष काम कर रहा है जिसने अपने प्रभाव से सारे मानव समाज को विषाक्त बना दिया है।
अस्तु हमें अर्थ का ठीक-ठीक अर्थ समझ कर उसका महत्व निर्धारित करना चाहिये। जहाँ समाज में धन की अनिवार्य आवश्यकता है वहाँ इससे अधिक अनिवार्यता इस बात की है कि यह उचित रूप से उपार्जित किया जाना चाहिये और उचित कार्य में ही लगाया जाना चाहिये। धन के अधिकतर अर्जन की होड़ लगाने के बजाय उसके सदुपयोग की होड़ होनी चाहिये। अर्थ को अनर्थ का कारण न बना कर सामर्थ्य का कारण बनाना चाहिये।
अन्य समाजों को छोड़ दीजिये- किन्तु अपने भारतीय समाज में वित्तेषणा को सभी ऐषणाओं को बुरा माना गया है क्योंकि यह अनुभव सिद्ध बात है कि सन्मार्ग से लाया हुआ धन देवता और कुमार्ग से लाया हुआ धन पिशाच होता है जो कभी न कभी सारे कुल और समाज को अवसर पाते ही ग्रस लेता है।
यस्तपस्वी जटी मुण्डों नग्नो वा चीवरावृतः।
सोऽप्यसत्यं यदि ब्रूते निन्द्याः स्यादन्त्यजादपि॥
जो तपस्वी वस्त्रधारी, सिर मुँडायें हुये, वस्त्र हीन अथवा वस्त्रधारी होते हुये भी असत्य बोलता है, वह चाँडाल से भी बुरा है।
तक्षकस्य विषं दन्ते मक्षिकाया विषं शिरः।
वृश्चिकस्य विषं पुच्छे सर्वांगे दुर्जनो विषम॥
साँप के दाँत में विष होता है और मक्खी के सिर में विष होता है। बिच्छू की पूँछ में विष होता है किन्तु दुर्जन के तो सम्पूर्ण अंगों में विष रहता है।
आत्मार्थं जीव लोकेऽस्मिन्को न जीवति मानवः।
परं परोपकार्रा यो जीविति स जीविति॥
अपने आपके लिए इस जीव लोक में कौन मनुष्य नहीं जीवित रहता है। पर सच्चा जीवन उसी का है जो परोपकारार्थ जीता है।
शिष्टाचार भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड है। शिष्टाचार भले व्यवहार का प्रतीक है। इसका मूल उद्देश्य सब के साथ प्रेम रखना, आदर और आत्मीयता प्रदर्शित करना है। पारिवारिक तथा सामाजिक जीवन की मधुरता के लिए शिष्टाचार की आवश्यकता सर्व प्रमुख है।
भली-बुरी आदतों का समावेश यों किसी से कहने सुनने से बहुत कम होता है, अधिकाँश संस्कार, अच्छी-बुरी प्रवृत्तियाँ तो बाल्यकाल में अपने अभिभावकों से ही सीखते हैं। सभ्य और शिष्ट बालक हों, इसकी शिक्षा उन्हें व्यवहार में मिले तो वह शिक्षा निश्चय ही अधिक प्रभावशाली होगी। बड़े हो जाने पर अच्छी बातें धारण करने में भी लोग लज्जा या संकोच सा अनुभव करते हैं। बालकों में इस परम्परा का विकास अपने शुद्ध आचरण से करना होगा। शिष्टाचार की उन्हें व्यवहारिक शिक्षा देने की जरूरत है।
आम बोलचाल की भाषा में हम लोगों को ‘तुम’ या ‘तू’ कहकर पुकारते है। ऐसा ही अनुकरण बच्चे भी कर लेते हैं और इन अशिष्ट शब्दों की परिपाटी चल पड़ती है। इन शब्दों में कुछ कम मिठास है। ये शब्द- सज्जनोचित भी नहीं लगते। ‘तुम’ के स्थान पर ‘आप’ का प्रयोग करने में कोई कठिनाई भी समझ में नहीं आती। छोटे-बड़े पढ़े-अनपढ़ सभी सुविधापूर्वक ‘आप’ शब्द का उच्चारण कर सकते हैं। दैनिक बोलचाल की भाषा में ‘आप’ सम्बोधन को संयुक्त होना भी चाहिए। इससे बोलचाल में आत्मीयता भी झलकती है और मधुरता भी।
अपने से बड़े गुरुजनों, माता-पिता, भाई-भावजों तथा बहनों को प्रणाम करने की भारतीय परम्परा अति प्राचीन है। प्रातःकाल अपने से बड़ों का आशीर्वाद मिल जाता है तो दिनभर उच्च भावनायें, उल्लास और स्फूर्ति बनी रहती है। आत्मीय सम्बन्ध भी प्रगाढ़ होते है। इसी तरह सायंकाल बिस्तर पर जाने के पूर्व प्रियजनों के उपकारों का स्मरण करना और उनके प्रति आन्तरिक श्रद्धा व्यक्त करना भी अपनी सद्भावनायें बनाये रखने के लिये आवश्यक है। मनुष्य के सुखी जीवन के लिये इन आचरणों का व्यवहार में लाना नितान्त आवश्यक है। सायंकाल दीपक जलाने पर, सामूहिक प्रार्थना या आरती के उपरान्त भी अभिवादन की प्रक्रिया चलाये तो और भी उत्तम है।
जब कोई नया सम्बन्धी या मित्र मिलता है और उसका परिचय कराया जाता है तो हाथ जोड़कर अभिवादन करना चाहिये। इसी तरह यदि कोई पुरस्कार या कुछ खाने की वस्तु देता है तो विनीत शब्दों में आभार प्रदर्शित करना चाहिये। शिष्टाचार में भी कोई कारीगरी नहीं लगती। सीधे सच्चे शब्दों को सरल भाव से व्यक्त कर देना किसी को भी कठिन न होगा।
गुरुजन या माता-पिता जब कुछ समझाते हों तो उस समय भी ‘जी’ या ‘जी हाँ’ कहना अच्छा लगता है। रूखेपन से ‘ऐ’ या ‘हाँ’ कहना अच्छा नहीं समझा जाता, उल्टे कहने वाले का ओछापन ही प्रकट होता है। राजस्थान में ‘हुक्म’ और बंगाल में ‘आज्ञा’ कहने की प्रथा है। इससे भी शिष्टाचार का प्रयोजन पूरा हो जाता है। इसी तरह दूसरों का नाम पुकारने में भी श्री, श्रीमान् माननीय आदि भद्र शब्दों का प्रयोग करना चाहिये। लिखते समय भी इन सम्बोधन कारक शब्दों को प्रयुक्त करें ताकि पत्र की भाषा विनम्र बनी रहे। पत्र में शब्दों की जटिलता नहीं, भाषा की विनम्रता ही प्रिय लगती है।
उठने-बैठने में भी शिष्टाचार का पूरा ध्यान रखना चाहिये। अपने से बड़ों को सिरहाना देना और पायताने की ओर स्वयं बैठने से अपनी श्रद्धा भक्ति व्यक्त होती है, इसी तरह कभी किसी की तरफ पीठ करके भी बैठना अच्छा नहीं होता। बात करते समय नत मस्तक रहना ही भारतीय परम्परा है।
साथ चलना पड़े तो अपने गुरुजनों, माता-पिता, के बराबर चलना अच्छा नहीं लगता। उनसे एक कदम पीछे ही चलना चाहिये। उनके हाथ में कोई सामान हो तो उसे स्वयं ले लेना चाहिये। सवारी पर बैठना हो या दरवाजे में प्रवेश करना हो तो भी उन्हें आगे चलने देना चाहिये। हाँ, यदि द्वार खुला न हो तो उसे आगे बढ़कर खोल दें और पीछे हट जाये। गुरुजनों के साथ रहते हुये उनके सभी छोटे-मोटे कार्य हम स्वयं करें तो उनका आशीर्वाद मिलता है और अपने कोमल भाव भी जागृत रहते हैं।
घर में आये हुये मेहमान, मित्र या किसी सम्भ्रान्त पुरुष का स्वागत बैठे-बैठे ही न करें। आप उठकर आगे जायें उनका स्वागत करते हुये उनके पास जो सामान हो उसे स्वयं उठाकर घर के भीतर तक ले आयें। विदा करते समय भी यह ध्यान रहे कि आप उन्हें बैठे-बैठे ही विदा न कर दें। आप उनके साथ, दरवाजे तक, या सवारी में बैठने तक, बने रहे। विदा होते समय भी नम्र शब्दों में उनकी कुशलता की कामना करें, और प्रणाम करते हुये वापस लौटें। माननीय अतिथि के साथ यदि कोई अन्य व्यक्ति हों तो उनकी भी उपेक्षा न हो। उन्हें भी अतिथि की तरह ही सम्मान देना चाहिये। यह जरूरी नहीं है कि वे आपके परिचित हों तभी आप उन्हें सम्मान दें। साथ में आया हुआ व्यक्ति भी आपका अतिथि है और उसे भी योग्य सत्कार मिलना ही चाहिये।
आगन्तुक व्यक्तियों को कई बार किसी स्थान की, विशेष परिस्थितियों या रीति-रिवाज की जानकारी न होने से वे कभी उल्टा कार्य भी कर सकते हैं या परिस्थितिवश उनसे किसी बात में भूल भी हो सकती है। उस समय आपका हँसना शोभा नहीं देगा। लोग आपको अभद्र समझेंगे। भूल का सुधार कराना ही हो तो विनीत शब्दों में इस तरह कहें जिससे अतिथि को किसी प्रकार की पीड़ा न पहुँचे। अतिथि अपने यहाँ देवता समझा जाता है उसका भूलकर भी अपमान न करना चाहिये।
यात्रा के समय भी शिष्टाचार की सामान्य विधि अपनाये रहने से बड़ी सुविधा मिलती है। रेलगाड़ियों में सीटों को कई लोग गलत ढंग से कब्जे में कर लेते हैं। उनसे भी सीधे शब्दों में ही जगह छोड़ने की प्रार्थना करें। दर्प प्रदर्शित करने से लोग प्रतिवाद करने लगते हैं और इससे कलह का वातावरण भी बन जाता है। इससे आप की हानि भी संभव है। किसी व्यक्ति का परिचय प्राप्त करना हो या कुछ पूछना हो तो इस तरह पूछिए जिससे आपकी सज्जनता एवं शिष्टता टपकती हो। इस तरह शिष्टाचार करने पर आस-पास के व्यक्तियों पर आपकी सज्जनता का असर जरूर पड़ेगा। और तब आप अपनी बात अधिक सुन्दर ढंग से स्पष्ट कर सकेंगे। इस तरह प्रभाव भी यथेष्ट पड़ेगा।
घर या बाहर जहाँ कहीं भी आप जायें यह याद रखें कि आपकी वाणी, व्यवहार और क्रिया से किसी प्रकार का अनुचित कर्म न हो जाय। किसी स्थान को मैला न करें, बीड़ी सिगरेट न पियें, फलों आदि के छिलके आम इस्तेमाल की जगहों में, स्टेशन, सड़क या सार्वजनिक स्थानों में न फेंकें। इन स्थानों के प्रति भी आपके कर्तव्य ऐसे ही हैं जैसे अपने घर के साथ। स्वच्छता का भाव सब जगह रखें। यदि दूसरे लोग ऐसी अशिष्टता कर रहे हों तो आपका यह कर्तव्य है कि उन्हें “कृपया ऐसा न कीजिये” यों कहकर वैसा न करने की सलाह दें। अधिकारपूर्वक किसी को धमकाना अच्छा नहीं होता। जिस कार्य से किसी का जी दुःखी हो, कृपया उसे न किया कीजिये।
सामान्य शिष्टाचार की यह छोटी-छोटी बातें भी बड़ी महत्वपूर्ण होती हैं। अच्छाई का एक-एक कण मिल कर महान व्यक्तित्व बनता है और बुराई की छोटी सी आदत भी क्लेश, कलह, कटुता और पतन का कारण बन जाती है। दैनिक व्यवहार में विनीत होने की कला का अभ्यास प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है पर यह सब कुछ हो भावनापूर्वक ही। दिखावे के लिये किये गये शिष्टाचार से किसी भले परिणाम की आशा नहीं करनी चाहिये।
दूसरों से सम्मान और सद्भावनायें प्राप्त करने की सभी इच्छा करते हैं। यह कोई मुश्किल बात भी नहीं है पर इतना हमें जरूर जान लेना चाहिये कि हम जैसा भी व्यवहार दूसरों के साथ करते हैं उसी की प्रतिक्रिया ही हमारे साथ होती है। यदि हम चाहते हैं कि लोग हमारे साथ सज्जनोचित व्यवहार करें तो हमें शिष्टाचार का प्रयोग करना पड़ेगा। शिष्टाचार ही सभ्यता की जननी है इसी से हम सभ्य कहलाने का गौरव प्राप्त कर सकेंगे।
सर्व साधारण से लेकर महा मनीषियों तक ने स्वास्थ्य को आवश्यक ही नहीं जीवन को अनमोल सम्पदा कहा है। भर्तृहरि ने अपने नीतिशतक में जिन दुर्लभ चार वस्तुओं का वर्णन किया है, उनमें स्वास्थ्य का प्रथम स्थान है- शारीरिक-स्वास्थ्य, पतिव्रता स्त्री, आज्ञाकारी पुत्र और सच्चा मित्र।
कोई भी ऐसा शास्त्रकार अथवा नीतिकार नहीं हुआ है जिसने स्वास्थ्य की भूरि-भूरि आवश्यकता न बताई हो। स्वास्थ्य की महत्ता और उसके बनायें रखने की रीति पर सारे सभ्य संसार में आयुर्वेद सम्बन्धी ग्रन्थ बहुत पूर्व ही लिखे जा चुके हैं, आज भी लिखे जा रहे हैं। किन्तु हम देखते हैं कि ज्यों ज्यों उपचार और स्वास्थ्य सम्बन्धी साहित्य और साधनों की बढ़ती हो रही है त्यों त्यों मनुष्य का स्वास्थ्य और भी बिगड़ता जा रहा है। अस्तु हमें सबसे प्रथम इस पर विचार करना चाहिये कि आज मनुष्य का स्वास्थ्य दिन-दिन क्यों बिगड़ता जा रहा है ?
इसका सबसे पहला कारण यह है कि हम अधिकाधिक अप्राकृतिक होते जा रहे हैं। हमने सुख सुविधाओं के नाम पर अपने चारों ओर इतने अधिक कृत्रिम उत्पादन इकट्ठे कर लिये हैं कि हमारे और प्रकृति के बीच बहुत बड़ा व्यवधान पड़ गया है।
हमारा शरीर प्रकृति के पंचतत्वों से बना है-मिट्टी, जल, वायु, अग्नि और आकाश। केवल मानव शरीर ही नहीं यह सारी सृष्टि ही इन पाँच तत्वों से बनी है। यह निर्विवाद है कि जो वस्तु जिस तत्व की बनी होगी, उसके बने रहने में उस तत्व की चरम महत्ता है। अस्तु हमारे शरीर के बने रहने अर्थात् स्वस्थ रहने में उपयुक्त पाँच तत्वों के संपर्क की अनिवार्य आवश्यकता है। हमें मिट्टी के सारे रूप अन्न और वनस्पति की, श्वास के रूप में सूर्य किरणों की और उन्मुक्तता के रूप में आकाश की अखण्ड आवश्यकता है। हम जब-जब इन तत्वों से जितना दूर हो जाते हैं, उतने ही अस्वस्थ हो जाते हैं। हम खाने के नाम पर अन्नों और वनस्पतियों को बिगाड़ कर खाते हैं, सघन स्थानों पर दूषित वायु में श्वास लेते हैं, अधिक से अधिक आन्तरिक और बन्द कक्षों में रहकर सूर्य के दर्शन दुर्लभ कर लेते हैं, तथा मकान, महल, और कोठियों के रूप में अपने चारों ओर प्राचीरों और छतों का निर्माण करके आकाश को तो अपने जीवन से बहिष्कृत ही कर देते हैं।
इसके अतिरिक्त हम अपने जीवन में इतने अनियमित हो गये हैं कि हमें स्वयं ही पता नहीं रहता कि हम किस समय क्या काम करेंगे अथवा कर सकते हैं। प्रकृति के, जिसको कि हम जड़ कहते हैं, सारे काम एक निश्चित समय और क्रम से होते हैं, किन्तु, अपने को चेतन कहकर दम्भ करने वाले मनुष्य का कोई काम भी क्रमानुसार नियम से नहीं होता। सूर्य समय पर उदय होता और समय पर अस्त होता है, अपने निश्चित समय पर मेघ छाते और बरसते हैं, फूल समय पर खिलते और मुरझाते हैं, फल समय पर उगते और पकते हैं, अन्न न तो असमय उपजाये जा सकते हैं और न काटे, अपने निश्चित समय नक्षत्र चमकते और छिपते हैं, सारे ग्रह मण्डल एक निश्चित नियम से परिभ्रमण करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति का ऐसा कोई कार्य नहीं है जिसमें एक निश्चित काल-कम का नियम न हो। किन्तु मनुष्य का ऐसा कोई कार्य नहीं जो एक निश्चित काल क्रम के अनुसार चलता हो। यही कारण है कि प्रकृति चिरजीवी और प्राणी अचिरजीवी है। वह कभी जल्दी उठता है तो कभी देर से, कभी देर से सोता है तो कभी जल्दी, कभी भूख लगने पर खाता है तो कभी बे भूख, कभी अधिक खाता है तो कभी कम, कभी कुछ खाता है तो कभी कुछ, कभी व्यायाम करता है तो कभी नहीं, कभी खुले में सोता है तो कभी बन्द में। साराँश यह है कि वह कोई काम न तो नियम से करता है और न इसकी महत्ता समझता है।
यदि हम पशु पक्षियों को देखें तो वे मनुष्य से अधिक स्वस्थ, सुन्दर और प्रसन्न दिखाई देंगे। इसका कारण है उनका प्रकृति के निकट अधिक से अधिक रहना और नैसर्गिक नियमों का पालन करना। पक्षी सूर्योदय के साथ ही जगते हैं, हर्ष मनाते और क्रीड़ा करते हैं, अपने लिये प्रकृति की ओर से निर्धारित वस्तुयें ही खाते, समय पर संयोग करते और उन्मुक्त आकाश के नीचे प्रकृति के हरे भरे विशाल आँगन में विहार करते हैं। मनुष्य को छोड़कर संसार का प्रत्येक प्राणी अपने ही श्रम के आधार पर ही खाता और जीता है। उनमें से कोई किसी के आश्रित नहीं रहता।
कोई भी मनुष्य न तो जल्दी मरना चाहता और न दुखी रहना चाहता, किन्तु वह काम अपनी कामना के विपरीत करता है। जहाँ पहले भारतीयों की औसत आयु सौ साल थी वहाँ आज कठिनता से केवल 25-30 साल रह गई है। हमें अपने प्राचीन ग्रन्थों में शतजीवी होने की जो व्यवस्था मिलती है, क्या वह निराधार है? नहीं कदापि नहीं। इसी शतवर्षीय जीवन के आधार पर ही भारतीय जीवन के मूल आश्रम-धर्म की व्यवस्था की गई है। यदि यह कोई कोरी कल्पना मात्र होती तो भारतीय सभ्यता-संस्कृति का इतना प्राचीन भवन अब तक खड़ा न रहता।
दीर्घजीवी होने के रहस्य में स्वास्थ्य एक मूल मन्त्र है। जो स्वस्थ नहीं, वह न तो दीर्घजीवी हो सकता, न सुखी रह सकता और न कुछ कर ही सकता है। अस्वस्थ मनुष्य अपने लिये भार तो होता ही है, दूसरों के लिये भी भार स्वरूप बन जाता है। अतएव मनुष्य का प्रथम कर्तव्य है कि वह संसार में स्वस्थ होकर जिये।
स्वस्थ जीवन बिताने की एक कला है उसके कुछ नियम हैं जिनका पालन करने से कोई मनुष्य स्वस्थ हो सकता है और स्वस्थ रह सकता है।
स्वस्थ जीवन का सर्वप्रथम नियम है आहार विहार-हम क्या खायें और कैसे रहें ? खाने के लिये केवल वही पदार्थ खायें जो अधिक से अधिक अपने प्रकृत रूप में और स्वास्थ्यप्रद हों। जैसे फल, शाक, सब्जी आदि। भोजन को अधिक पकाकर अथवा जला कर खाना हानिकर है। भोजन अधिक से अधिक दो बार आवश्यकतानुसार ही करना चाहिये। अधिक खाना अथवा अधिक-क्रम खाना स्वास्थ्य के लिये अहितकर है। भोजन की वस्तुएँ ऐसी चुनिये जो सरस और सुपाच्य हों। अधिक नीरस और गरिष्ठ भोजन करने से पाचन क्रिया को आवश्यकता से अधिक परिश्रम करना पड़ता है जिसके कारण यह शिथिल होने लगती है और फिर आगे चलकर हल्के से हल्का भोजन भी पचा सकने में असमर्थ हो जाती है। जिसके फलस्वरूप पेट खराब रहने लगता है और विविध प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। बार-बार खाना अथवा अधिक खटास-मिठास और मिर्च मसाला खाने का अर्थ है रोगों को निमन्त्रण देना।
भोजन की उपयुक्तता के साथ पाचन क्रिया ठीक रखने के लिए श्रम अथवा व्यायाम बहुत आवश्यक है। जो व्यक्ति शारीरिक कार्य जैसे, लकड़ी काटना, पत्थर ढोना, जमीन खोदना, मशीन खींचना आदि द्वारा अपनी आजीविका कमाते हैं उन्हें विशेष तौर पर कोई व्यायाम करना आवश्यक नहीं है। परन्तु जो पढ़ लिख कर अथवा एक स्थान पर बैठे कर अपना काम करते हैं उनके लिये शारीरिक व्यायाम एक अनिवार्य आवश्यकता है।
अपनी स्थिति के अनुसार ही व्यायाम का चुनाव करना चाहिये। जैसे विद्यार्थियों के लिये खेल-कूद दौड़ धूप। बैठकर काम करने वालों के लिये प्रातः भ्रमण आदि, भारी भरकम शरीर वालों को यथा साध्य शीघ्र चल कर घूमना और कोई सूर्य-प्रणाम आदि आसन करना। धर्मपरक व्यक्तियों को, अन्य नियमों के साथ कोई न कोई प्राणायाम, या कोई साधना पूर्ण योगासन करना चाहिये।
भोजन के बाद रहन-सहन आता है। प्रातःकाल सूर्योदय पर नियमित रूप से उठिये और रात्रि में बहुत देर तक न जागिये। ठीक समय पर नैमित्तिक कर्म कीजिए।
वस्त्र
देशकाल के अनुसार पहनने चाहिये। भारत शीत प्रधान देश नहीं है, अस्तु यहाँ के लोगों को अधिक घने व तंग वस्त्र नहीं पहनने चाहिये। अधिक तंग वस्त्र पहनने से शरीर के रोम-कूप बन्द हो जाते हैं, जिससे अन्दर की गन्दी वायु बाहर निकालने, तथा बाहर की स्वच्छ वायु अन्दर जाने में बाधा पड़ती है। पसीने के साथ निकला हुआ मल शरीर पर जम जाता है, जिससे विविध प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं। गर्मी में विरल वस्त्र, बरसात में अपारदर्शी और जाड़ों में सघन पहनने चाहिये। किन्तु किसी भी ऋतु में तंग वस्त्रों का प्रयोग स्वास्थ्यकर नहीं है। क्योंकि उससे शरीर की स्वाभाविक प्रक्रिया में अवरोध होता है। अन्य ऋतुओं में तो क्या जाड़ों में भी इतने अधिक वस्त्र न पहनिये जिससे आपको एक बोझ लेकर चलना पड़े, और ऋतु के वातावरण का अनुभव आपके शरीर को बिल्कुल न हो। ऋतु के प्रभाव का कुछ न कुछ अनुभव होते रहना परमावश्यक है। क्योंकि हर ऋतु मनुष्य के लिये कुछ न कुछ स्वास्थ्यप्रद उपहार लेकर आती है। प्रकृति के किसी भी स्वाभाविक वातावरण से भयभीत न होइये। प्रकृति किसी भी ऐसे तत्व को कभी नहीं भेजती जो उसकी सृष्टि के लिये हानिकारक हो। मनुष्य को उनसे हानि जब ही होती है जब वह उसके नैसर्गिक नियमों का उल्लंघन करने का दोषी होता है। अन्यथा धूप में काम करने वाले किसान मजदूरों का जीना दुर्लभ हो जाता है। जाड़ों में अधिकतर नहीं के बराबर वस्त्र पहन कर निर्धन जीवित न रहते। हम जितना वातावरण से भयभीत रहते हैं अथवा भागते हैं वह उतना ही हमें तस्त्र करता है।
गर्मी में खुले, बरसात में छाये, और जाड़ों में ऐसे कक्षों में रहें और सो सकते हैं जिनमें प्रकाश और वायु के प्रवेश की पर्याप्त व्यवस्था हो, आवश्यकतानुसार कम से कम कपड़े ही ओढ़िये बिछाइये। इस प्रकार उनको उठाने धरने, धुलाने, सुखाने आदि की परेशानी से बचने के साथ-साथ व्यय की भी बचत होगी।
स्वस्थ जीवन के लिये ब्रह्मचर्य का पालन एक प्रधान नियम है बुद्धि जीवियों विद्यार्थियों, एवं साधकों के लिये यह जितना अनिवार्य है उतना ही अनिवार्य यह श्रमजीवियों के लिये भी है। क्योंकि ब्रह्मचर्य का संचय आन्तरिक शरीर को लाभ पहुँचाने से पहले बाह्य शरीर को बल प्रदान करता है। स्वास्थ्य के सारे नियमों का पालन करते हुये यदि ब्रह्मचर्य का पालन न किया गया तो यह किसी वृक्ष की जड़ सींचने के बजाय पत्ते सींचना होगा। इसका अर्थ यह होगा कि एक ओर से तो आप शरीर-भवन का निर्माण करते हैं और दूसरी ओर से उसे ढहाते भी जाते हैं, तब इस प्रकार तो आपका सारा श्रम और प्रयत्न ही बेकार चला जायगा। भविष्य के लिये सारे संचयों में ब्रह्मचर्य का संचय सर्वश्रेष्ठ है। ब्रह्मचर्य आपको हर नियम पालन करने में उत्तरोत्तर सहायक सिद्ध होगा। स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन के लिए ब्रह्मचर्य पालन का प्रमुख स्थान है।
स्वास्थ्य और सफाई के नियमों में स्वच्छता को स्थान न देंगे तो कोई लाभ न उठा सकेंगे। मानिये आप स्वास्थ्य प्रद भोजन तो खाते हैं, परन्तु वह गन्दा और बासी है तो इसके परिणाम में रोग ही प्राप्त होगा। आप उपयुक्त वस्त्र पहनते ओढ़ते हैं किन्तु वे गन्दे रहते हैं तो स्वस्थ होने की आशा छोड़ दीजिये। आप खुले और बड़े कमरे में रहते तो अवश्य हैं, परन्तु वह कूड़ा करकट नाक थूक आदि से गन्दे हैं तो परिणाम विदित ही है। आप घूमते हैं, व्यायाम करते हैं और आसन करते हैं किन्तु शरीर गन्दा रखते हैं तो आप पर “शरीरं व्याधि मन्दिरम्” वाली उक्ति चरितार्थ होगी, इसलिये आवश्यकता है कि अपने रहने के स्थान, ओढ़ने पहनने और बिछाने के कपड़े अच्छी प्रकार स्वच्छ रखिये, शरीर को हर प्रकार से साफ रखिये, वस्त्रों को अधिक गन्दा होने से पहले धोइये, कमरों की प्रति दिन सफाई कीजिये और जाड़ों में कम से कम एक बार और गर्मी आदि में दो बार नहाइये।
स्वास्थ्य के लिये जिस प्रकार बाह्य प्रयत्नों की आवश्यकता है उसी प्रकार आन्तरिक प्रयत्नों की भी।
सदैव प्रफुल्लित मन और प्रसन्नचित्त रहिये। दुश्चिन्ताओं को पास न आने दीजिये। बुरे विचारों को दूर रखिये सदैव क्रियात्मक ढंग से सोचिये, भूत को भुलाकर वर्तमान में संतुष्ट रहकर भविष्य के लिये विचार कीजिये। अच्छा साहित्य पढ़िये, सत्संग करिये और अवस्थानुसार परमात्मा का स्मरण कीजिए, छल, कपट, द्वेष दम्भ, लोभ, क्रोध आदि दुर्भावनाओं से बचिये। आलस्य, प्रमाद भीरुता व परावलंबन का परित्याग कीजिये, सद्वृत्तियों का विकास कीजिये। परोपकार एवं सदाचार में तत्पर रहिये।
सभा समितियों में सम्मिलित होइये, रमणीक स्थानों का दर्शन कीजिये, वस्तुओं का संकलन करिये और आडम्बर को व्यवहार में न लाइए। सत्य और विनम्रता को स्थान दीजिये। अन्याय एवं अनाचार का यथा साध्य विरोध करिये। आत्मशोधन में लगे हुए हर प्रकार से अपने जीवन को अनुशासित करने का प्रयत्न कीजिये।
सच्चे ज्ञान के पिपासुओं और मानव सेवियों के लिए न कोई धर्म पराया होता हैं और न कोई देश, विदेश। उनकी ज्ञान-पिपासा की तृप्ति जिन धार्मिक सिद्धान्तों से होती है वही उनका धर्म और जहाँ उनकी सेवाओं की आवश्यकता होती है वही उनका देश होता है।
जिस प्रकार अनेक अन्य महापुरुषों ने एक देश में जन्म लेकर दूसरे देश को अपनी सेवाएँ समर्पित कीं, उसी प्रकार मिस मार्गारेट एलिजाबेथ नोवल ने आयरलैंड में जन्म लेकर भारत की सेवा की।
इनके पिता सेम्युएल स्वीमण्ड एक पादरी और माता मेरी इजावेल हैमिल्टन ईसाई धर्म की कट्टर अनुयायिनी थीं। स्वाभाविक था कि परिवार के धार्मिक वातावरण की छाप मिस नोवल के संस्कारों पर पड़ती। वे नियमित रूप से माता-पिता के साथ गिरजा घर जातीं और घर पर धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन करतीं। यह कार्यक्रम उनका लगभग अठारह वर्षों तक चला।
किन्तु अठारह वर्षों की इस अवधि में भी जब उनकी आत्मा की कोई तृप्ति न हुई तो उन्होंने ईसाई धर्म को तर्क की कसौटी पर कसना और विवेक की आँख से देखना शुरू कर दिया। तर्क की कसौटी पर ईसाई धर्म के सिद्धान्त उन्होंने बड़े ही कमजोर और संदिग्ध पाये, जिसके लिए उन्होंने एक स्थान पर स्वयं कहा है-
“अठारह वर्ष की आयु के पश्चात् ईसाई धर्म के सिद्धान्तों के प्रति मेरे मन में तरह-तरह की शंकाएँ उठने लगीं। उनमें से बहुत से सिद्धान्त तो मुझे सर्वथा असत्य और निःसार विदित हुए। मैंने बहुत कुछ चाहा, किन्तु अन्धविश्वास के बल पर ईसाई धर्म के प्रति अपनी आस्था को मैं डगमगाने से बचा न सकी। सात वर्षों के द्वन्द्वात्मक संघर्ष के बाद आखिर मेरे अन्तःकरण ने ईसाई धर्म को बिल्कुल अस्वीकार कर दिया और मैंने चर्च जाना छोड़ दिया।”
इस प्रकार ईसाई धर्म छोड़ देने मात्र से तो ज्ञानालोक की प्राप्ति सम्भव न थी। उसके लिए तो एक ऐसे धर्माकाश की आवश्यकता थी जिस के सत्य एवं शाश्वत सिद्धान्त सूर्य के समान ही असमान हों। निदान उसकी खोज में वे विभिन्न धर्मों की सिद्धान्त वीथियों में भटकती फिरीं। किंतु उनको वह उज्ज्वल प्रकाश कहीं न मिल सका जो उनके विवेक को संतुष्ट करके अन्तःकरण को प्रसन्न कर सकता। दिन-दिन उनकी ज्ञान पिपासा बलवती और अशान्ति बढ़ती गई। किन्तु वे ज्ञान की खोज में निराश होकर उदासीन न हुईं। उन्हें विश्वास था कि जिस वस्तु की प्राप्ति के लिए मेरे मन में एक सच्ची लगन लगी हुई है उसके न मिलने का कोई कारण नहीं है।
अपनी खोज के सिलसिले में एक बार उन्हें अपनी एक सहेली के घर स्वामी विवेकानन्द के दर्शनों और उनका प्रवचन सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। बड़े ध्यान से उनका तर्क संगत प्रवचन सुनते-सुनते उन्हें ऐसा लगा जैसे जिस ज्ञान की खोज उन्हें थी उसका उद्गम मिल गया। बस फिर क्या था सच्ची जिज्ञासु कुमारी नोवल हिन्दू धर्म के अध्ययन में संलग्न हो गईं।
वह ज्यों ज्यों उसकी गहराई में उतरती गईं त्यों-त्यों उच्चतर ज्ञान के स्तर उनके सामने उघरते चले गये। जिसके फलस्वरूप उन्हें न केवल हिन्दू धर्म पर ही आस्था हुई, अपितु उसकी जन्मभूमि भारत भूमि से भी अगाध प्रेम हो गया। उन्होंने हिन्दू धर्म में दीक्षित होने और स्वामी विवेकानन्द को अपना धर्म गुरु बनाने का संकल्प कर लिया। अपने इस मन्तव्य को प्रकट करते हुए उन्होंने स्वामीजी को अपने को शरण में ले लेने के लिए पत्र लिख कर प्रार्थना की। स्वीकृति मिलने पर वे तत्काल भारत की ओर रवाना हो पड़ी। ध्येय की पक्की और लगन की पूरी उन मिस नोवल को न देश की संकीर्ण सीमायें रोक सकीं और न परिवार तथा परिचितों का मोह बाँध पाया।
भारत में उनका स्वागत करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने उनकी निष्ठा की परीक्षा लेते हुए कहा-’मिस नोवल!
भारतीय भूमि पर तुम्हारा स्वागत करता हूँ और जानता हूँ कि भारत को आज ऐसी नारियों की आवश्यकता है। किन्तु फिर भी मैं तुम से स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि तुम एक योरोपीय महिला हो, भारतीय जलवायु तुम्हारे अनुकूल हुआ न हुआ तो ? सम्भव है धर्म के कठोर नियम संयमों का पालन तुम्हारी प्रकृति के विपरीत पड़े। वेदान्त की असिधारा पर तुम्हारी प्रकृति अनभ्यस्त बुद्धि चल सकी या न चल सकी ? सम्भव है तुम्हारे मौलिक संस्कार अनागत संस्कारों का विरोध करें। इसलिए तुम अभी खूब अच्छी प्रकार सोच लो, विचार कर लो, क्योंकि एक बार इस मार्ग पर चल पड़ने के बाद फिर छोड़ भागना हमारे और तुम्हारे दोनों के लिए लज्जा का विषय होगा। क्योंकि मनुष्य का संकल्प एक होता है बार-बार बदलता नहीं। जिस प्रकार हाथी के दाँत बाहर निकल आने पर फिर दुबारा वापस नहीं होते उसी प्रकार मनुष्य का ध्येय पथ पर बढ़ा हुआ चरण पीछे नहीं हटता।”
कुमारी नोवल ने इसका केवल एक छोटा-सा उत्तर दिया-”भगवन्! मैं। भारतीय हूँ, आप केवल जन्म के कारण मुझे योरोपियन न समझिये। मेरा बाह्य आकार प्रकार अवश्य योरोपियन है किन्तु मेरी आत्मा विशुद्ध भारतीय है। मुझे निराश न करिए। अपनी शरण देकर मेरी अपनी आत्मभूमि की सेवा करने का अवसर दीजिए।”
स्वामी विवेकानन्द जी उनकी इस महान निष्ठा से बहुत प्रसन्न हुए और दीक्षित कर अपनी शिष्या बना लिया। दीक्षित हो जाने के बाद उन्होंने पाश्चात्य जीवन प्रणाली को त्याग कर भारतीय जीवन प्रणाली अपनाई।
स्थित हो जाने के बाद उन्होंने अपने गुरु से अपने कार्यक्रम का रूप रेखा का निर्देश माँगा। स्वामीजी ने उन्हें बड़े सरल शब्दों में बताया कि मानव का सबसे महान कार्य है अज्ञानान्धकार में भूले-भटके मनुष्यों को प्रकाश देना और दीन दुखियों की सेवा करना। जाओ, भारत की सेवा करो।
अपने गुरु से निर्देश पाकर मिस नोवल तत्काल काम में जुट गईं। उन्होंने नगर के विभिन्न भागों में घूम-घूम कर दुःखी जनों की सेवा करना प्रारम्भ कर दी और साथ ही बंगला तथा संस्कृत का अध्ययन भी।
वे उन्हें रहन सहन का तरीका बतातीं और स्वच्छता का सक्रिय उपदेश करतीं। बच्चों को प्यार करतीं और रोगियों की सुश्रूषा। यद्यपि भाषा की कठिनाई से उन्हें समझाने और समझने में असुविधा होती थी तथापि वे किसी प्रकार अपना काम चलाती रहीं। उन्होंने भाषा का बहाना लेकर उसके अध्ययन तक बैठे रहने की नहीं सोची, अपितु, जो कुछ जितना और जिस तरह हो जनसेवा ही करना ठीक समझा।
अपने महान अध्यवसाय से उन्होंने कुछ समय में ही बंगला और संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर लिया। वे अब उत्साह से सेवा कार्यों में जुट गईं। अब वे सेवा-सुश्रूषा भी करतीं और उन्हें और उनके बच्चों को पढ़ातीं भी।
इस प्रकार मिस नोवल दिन-दिन सर्व साधारण में लोकप्रिय होती गईं और इधर संभ्रान्त परिवारों में उनकी आलोचना प्रारम्भ हो गई। किन्तु उनके काम में इससे कोई शिथिलता न आई और उन्होंने आलोचना का उत्तर व्यर्थ वाद विवाद से न देकर और अधिक उत्साह पूर्ण सक्रियता से दिया।
अल्पकाल ही में उन्होंने नारी समाज में शिक्षा की भावना का उदय कर दिया और उसको स्थायित्व एवं विकास देने के लिए कलकत्ता की बोस पारा नामक गली में एक प्राथमिक कन्या पाठशाला प्रारम्भ की। नारी शिक्षा की दिशा में अपने विचारों को मूर्त रूप देते ही उन्हें रूढ़िवादी एवं अन्ध धार्मिकों की तीव्र आलोचना का सामना करना पड़ा। उस समय का रूढ़िवादी वर्ग, जिसका कि समाज पर प्रभाव भी बहुत था नारी शिक्षा को अधर्म मानता था और विरोध करता था। उसने एड़ी चोटी का जोर लगाकर मिस नोवल को अपने उद्देश्य में असफल करने और जनसाधारण में उन्हें अप्रिय बनाने का घोर परिश्रम किया। पहले तो वह अपने मन्तव्य में कुछ सफल हुआ और लोग मिस नोवल पर अविश्वास करने लगे। किन्तु कुछ ही समय बाद उनकी सच्ची लगन के सामने रूढ़िवादियों का प्रभाव ठहर न सका और उनकी पाठशाला धीरे-धीरे चल निकली। अब पाठशाला चलाने के लिए पैसे और कार्यकर्त्ताओं की कठिनाई जनसाधारण से माँग-माँग कर और कार्यकर्त्ताओं की कमी स्वयं अपने परिश्रम से हल कर ली।
उनकी तपस्या से वह प्रारम्भिक पाठशाला कुछ ही दिनों में एक विशाल विद्यालय बन गई और उनकी ओर सर जगदीशचन्द्र बोस और रवीन्द्रनाथ टैगोर जैसे महान पुरुषों और सरला घोषाल जैसी विदुषी नारियों का ध्यान आकृष्ट हुआ, जिससे उनके संपर्क में बहुत से बड़े-बड़े लोग आने लगे और उनका परिचय क्षेत्र निम्नकोटि से लेकर उच्चकोटि के क्षेत्र तक पहुँच गया। अब कुमारी नोवल के साधारण काम असाधारण कार्यों में बदलने लगें।
भारत की सेवा में अपना जीवन संपूर्ण रूप से निवेदित कर देने के कारण उनके गुरु स्वामी विवेकानन्द ने उनका नाम मिस नोवल से बदल कर ‘कुमारी निवेदिता’ कर दिया और वे परिचितों के बीच बहिन निवेदिता के संबोधन से प्रसिद्ध हो गईं।
पाठशाला के अतिरिक्त उन्होंने साहित्य क्षेत्र में पदार्पण किया और हिन्दू धर्म तथा समाज पर लगभग डेढ़ दर्जन बड़ी ही गम्भीर गवेषणा पूर्ण पुस्तकें लिखीं, जिनने पाश्चात्य जगत में एक हलचल मचा दी, और यूरोप में हिन्दू धर्म के प्रति ईसाई मिशनरियों की फैलाई भ्राँतियों में एक भूकम्प आ गया। वहाँ के लोग हिन्दू धर्म के महत्व और तत्व को समझने लगे। इसके विरोध में पुनः ईसाई मिशनरियों की अनर्गल बकवास और उनकी पुस्तकों के ऐसे मुँहतोड़ उत्तर उन्होंने दिए कि उनकी जबान बंद हो गई।
उन्होंने पुस्तकों की रचना के साथ-साथ ‘प्रबुद्ध भारत’, ‘कर्मयोगी’, ‘द हिन्दू कर्मयोगी’, ‘युगान्तर’, ‘स्टेट्समैन’, ‘मार्डन रिव्यू’ और ‘अमृत बाजार पत्रिका आदि आधे दर्जन से अधिक तत्कालीन आध्यात्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन एवं लेखन किया। उन्होंने सर जगदीश चन्द्र बोस को वैज्ञानिक क्षेत्र और रवीन्द्र नाथ टैगोर को साहित्य के क्षेत्र में सहायता एवं सहयोग किया।
जन क्षेत्र में उतरकर उन्होंने 1906 में आई बाढ़ के समय पीड़ितों की जो सेवा की, उसका उदाहरण संसार में मिलना मुश्किल है। वे बिना किसी साधन और साथी की अपेक्षा किये अकेली गाँव-गाँव घूमतीं, कमर तक पानी में घुसतीं, खेतों खलिहानों और झाड़-झंखाड़ों में जाकर बाढ़ पीड़ितों की सहायता करतीं। इससे उन दुःखी ग्राम वासियों को इतना प्रेम हो गया कि वे झुण्ड के झुण्ड अपनी निवेदिता भगनी को गाँव के बाहर तक पहुँचाने आते और रो-रो कर उन्हें विदा करते।
समाज सेवा के अनेक महान कार्य करने के बाद बहन निवेदिता ने राजनीति में पदार्पण किया। क्योंकि वे अपनी मातृभूमि भारत को पराधीन नहीं देख सकती थीं? वे जानती थीं कि देश की सर्वांगीण सेवा पराधीन रहते हुए नहीं की जा सकती। लेखों और भाषणों से कदम बढ़ा कर वे सक्रिय आँदोलनों तक पहुँचीं और साधारण स्वयं सेविका से उठ कर गोखले, तिलक, विपिनचन्द्र और अरविंद जैसे तत्कालीन शिखरस्थ नेताओं के समकक्ष ही नहीं पहुँचीं अपितु उनकी निर्देशिका तक बनीं।
अपने गुरु का आदेश पूरा करने में निवेदिता ने अपना सर्वस्व लगा दिया। वे आजीवन मानवता की सेवा करती-करती पैंतालीस वर्ष की आयु में ही 13 अक्टूबर 1912 को एक अलौकिक तेज पुँज की भाँति अस्त हो गईं।
किन्तु, उनका साहित्य उन्हें विश्व के और उनकी सेवा उन्हें भारत के इतिहास में युगों-युगों तक अमर रखेगी। उनकी प्रारम्भिक कन्याशाला आज “रामकृष्ण मिशन भगिनी निवेदिता कन्याशाला”, नाम से एक विशाल शिक्षा संस्था के रूप में उनका नाम आलोकित कर रही है।
उनकी मृत्यु से भारत को महान क्षति हुई किन्तु उनके कार्यों से भारत की आगामी पीढ़ियाँ सदैव लाभान्वित होती रहेंगी।
यह उनकी लगन, परिश्रम और सत्य धर्म निष्ठा का फल है कि विदेश में जन्म लेकर भी वे भारत की सच्ची संतान और भारतीय जनता की श्रद्धा पात्र बनीं। उनकी समाधि पर आज भी लिखा है-”यहाँ विश्राम कर रही हैं वह भगिनी निवेदिता जिसने भारत के लिये अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया।”
धर्म, संस्कृति, शिक्षा, कृषि, विज्ञान, चिकित्सा, ज्योतिष, ग्रह विज्ञान आदि में अग्रगण्य भारतवर्ष अपनी वीरता के कारण भी संसार में प्रसिद्ध है। यहाँ की धरती को वीर-प्रसूता कहा गया हैं। इतिहास साक्षी है कि इस देश ने जहाँ संसार को सत्य-अहिंसा, न्याय-नीति, धर्म-परायण का पाठ पढ़ाया है वहाँ असुरत्व के दमन के लिए, आत्मरक्षा के लिए उसने वीरता भी प्रदर्शित की है। वीरता हमारी शक्ति है जिससे हम संगठित रहे हैं और हमारे धर्म तथा संस्कृति की रक्षा हुई है। किन्तु आज जो परिस्थितियाँ हमारे आगे दिखलाई पड़ रही हैं उनसे भारी असंतोष होता है। अन्य आध्यात्मिक तत्वों की तरह राष्ट्र की वीर भावनायें भी घटती चली जा रही हैं।
वीर संस्कार प्रत्येक युग में आवश्यक रहे हैं। भगवान् राम ने रावण की दुष्टता का दमन किया था। कृष्ण ने कौरवों का मान-मर्दन किया था। शिव जी, राणाप्रताप, झाँसी की रानी की वीरतापूर्ण कहानियाँ इतिहास के पन्नों में अंकित हैं और वे युग-युगान्तरों तक असत्य, अनीति और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने की प्रेरणा देती रहेंगी। यहाँ वीर भावना केवल काव्य का विषय नहीं, वह सर्व-साधारण की उद्दात्त जीवन पद्धति रही है। शत्रु से युद्ध करते हुये मृत्यु का आलिंगन करना यहाँ शोक का नहीं आह्लाद और उत्सव का विषय माना जाता रहा है। शास्त्रों का गहन अध्ययन करने वाले पंडित अपनी पीठ पर तरकस और कंधों पर प्रत्येक-क्षण धनुष डाले घूमते थे ताकि आवश्यकता पड़ने पर वे दुष्टों से संघर्ष भी कर सकें। जो उपदेश से न मानें उन्हें शक्ति और बल के द्वारा भी सिखाया जगाया जा सके। “शक्ति और सरस्वती की” समवेत साधना इस देश की विशेषता रही है।
मातायें अपने बालकों को पालने में झुलाती हुई कहती थीं।
इला न देणी आपणी, हालरिया हुलराय।
पूत सिखावै पालणै मरण बड़ाई पाय॥
ओ! मेरे प्यारे पुत्र अपनी धरती शत्रु के हाथ न जाने देना चाहे तेरे प्राण क्यों न चले जायें। मृत्यु तो मनुष्य का बड़प्पन है।” माताओं के इन शब्दों में क्या ही अनोखी शान थी, कितना गौरव था उनकी आत्माओं में। तभी तो उनकी आत्मा का रस पीकर परिवर्द्धित होने वाले बालक भी इतनी प्रौढ़ भावनाओं के होते थे जो इस संसार में जीवन और मृत्यु को खेल समझते थे। उन्हें न जीवन के प्रति कोई राग होता था न मृत्यु से भय। देश की रक्षा के लिये, धर्म की रक्षा के लिये सब से आगे बढ़ कर प्राण देने की प्रतिद्वन्दिता होती थी मौत भी उन शूरवीरों की वीरता के आगे सर झुका देती थी।
किन्तु आज वह संस्कार न जाने कहाँ लोप होते जा रहे हैं। न तो हमारी माताओं में वह तेजस्विता रही है कि बेटों को जीवन संग्राम के लिये विधिवत् तैयार कर सकें और न अब वह वातावरण ही रहा है। अपने से गई-गुजरी स्थिति के व्यक्ति को डराने, धमकाने और रौब दिखाने को ही लोग वीरता समझते हैं। पड़ोसियों को नीचा दिखाने में लोग शान समझते हैं। हतवीर्य बालक अल्प अवस्था से ही कायर, कमजोर और जरा-सी परिस्थिति में घबड़ा जाने वाले होते हैं। लड़ाई तो वह स्वप्न में भी देख लें तो दिल धक-धक करने लगे। इस साहस की कमी का एक ही कारण है वीरतापूर्ण संस्कारों का जागरण न किया जाना। पहले शिक्षा के साथ युद्ध का भी अभ्यास कराया जाता था। शास्त्र के साथ शस्त्र की भी पूजा की जाती थी। छोटे-छोटे बालकों को प्रारम्भ से ही कठोर जीवन बिताने का अभ्यास कराया जाता था। कथा-कहानियाँ भी उन्हें ऐसी ही सुनाई तथा पढ़ाई जाती थीं जो सच्ची और घटनात्मक होती थीं। इससे बालकों का साहस जागृत होता था और वीरता के संस्कार परिपुष्ट होते थे। आहार आदि की व्यवस्था भी ऐसी ही होती थी जिससे उनका शरीर शक्तिशाली बना रहता था। आने वाली मुसीबत का वे वरदान की तरह स्वागत करते थे। प्रत्येक नवयुवक इस प्रतीक्षा में रहा करता था कि कब कोई ऐसा समय आयें जब उन्हें अपनी प्रतिभा एवं शक्ति प्रदर्शन का अवसर मिले। उनका शौर्यत्व सदैव जागृत बना रहता था। पर यह परिस्थितियाँ अब कहीं दिखाई नहीं देतीं।
वीरता के संस्कार संघर्ष शक्ति और कठोर जीवनपद्धति से बनकर आते हैं। किन्तु अब इनमें से एक भी परिस्थिति दिखाई नहीं देती। लोगों के मनोबल इतने गिरे हुये हैं कि अपने सामने अन्याय होता हुआ देखकर भी तमाशबीन की तरह चुपचाप खड़े रहते हैं, बुरे तत्वों और बुराइयों से टक्कर लेने की उनकी जरा भी हिम्मत नहीं पड़ती। विलासिता, राग-रंग, सिनेमा-शौकीनी बढ़ने के कारण लोगों के दिल बिल्कुल छोटे होते जा रहे हैं। अन्धकार में पैर रखते हुए काँपते हैं। शरीर में थोड़ी-सी पीड़ा हो जाय तो यों चिल्लाते, रोते और कराहते हैं मानों उन पर कोई मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा है। शरीरों में सहन शक्ति रही नहीं, हृदय कमजोर पड़ गये हैं, सरल जीवन में ही सुख अनुभव करने की भद्दी आदतों ने आज देश की वीर भावनाओं को मटियामेट करके रख दिया है।
क्षात्र-धर्म मनुष्य जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। उसका पालन न किया जाय तो न देश की सुरक्षा संभव हो सकती है न जाति, धर्म और संस्कृति की। “वीर-भोग्या वसुन्धरा” की कहावत के अनुसार धरती में जीने का सच्चा आनन्द वीरों को मिलता है। पर यह वीरता उद्धतपन, अत्याचार या डाकुओं जैसा साहस नहीं है। राणासाँगा, रणजीत सिंह, गोरा बादल, फतेह सिंह, जोरावर सिंह, भगत सिंह, महात्मा गान्धी तथा ब्रिगेडियर शैतान सिंह की तरह किसी आदर्श की रक्षा के लिए आत्म-बलिदान की भावना का नाम ही वीरता है। प्रेम और मृत्यु वीरों के लिये समान होते हैं। धर्म और कर्त्तव्य पालन के लिए जो बड़े से बड़े प्रलोभन को ठुकरा सकता है, जिसे न जीवन में आसक्ति होती है न मौत से घबराहट, वही सच्चा वीर है। वीरता से मनुष्य की स्थिर भावना और उसकी निष्ठा की परीक्षा होती है। जो इस कसौटी पर सही उतरते हैं उन्हें ही वीर कहा जायगा, फिर भले ही रणक्षेत्र में प्राण त्याग करें या सामाजिक जीवन के किसी सत्य आदर्श के लिए संघर्ष करते हुए जीवन बलिदान करना पड़े।
हमारी इस शानदार परम्परा का ह्रास नहीं होना चाहिए अन्यथा इस देश का गौरव मिट जायगा। हमारी भावनाओं में यदि वह शक्ति न हुई जिससे आस-पास फैली हुई दुष्टता से मुकाबला किया जाता है तो हमारे हित भी सुरक्षित न रह सकेंगे। निर्बल चिड़ियों को जिस तरह बाज झपट ले जाता है उसी तरह हम भी लूट लिये जायेंगे। कायर को कहीं शरण नहीं मिलती। अपनी रक्षा मनुष्य स्वयं कर सकता है। अपने मुकाबले के लिये उसे स्वयं कठोर और साहसी बनना पड़ता है। दूसरों के सहारे जिन्दगी बिताने में कोई आनन्द भी नहीं आता। यह संभव भी नहीं है कि किसी दूसरे व्यक्ति या राष्ट्र का संरक्षण सदैव ही मिलता रहे क्योंकि दूसरों के भी अपने हित होते हैं और उनकी सुरक्षा भी उन्हें करनी पड़ती है। अतः हमारे लिये परम आवश्यक है कि हम अपने जीवन में वीरता के संस्कारों का स्वतः जागरण करें अपने पैरों पर आप खड़े हों।
अब वह युग आ गया है जब हमें इस बात पर गम्भीरता से विचार करना है कि आत्मा-रक्षा और आत्म-कल्याण के योग्य हम में शक्ति, सामर्थ्य तथा उत्कट भावनायें जागृत हों। आत्म-पतन की ओर इसी गति से बढ़ते रहे तो जो गौरव अभी तक अन्य जातियों के समक्ष हम को जीवित किये हुये हैं वे भी नष्ट हो जायेंगे और हमारी गणना संसार के निकृष्ट श्रेणी के लोगों में होने लगेगी।
“वीरता हमारा स्वभाव है, हम शक्ति के उपासक है, संघर्ष से हम नहीं घबराते।” इन मान्यताओं को फिर से जगाने की जरूरत है ताकि हमारे धर्म संस्कृति तथा आदर्शों की रक्षा हो सके। आओ आज वेद भगवान की इस प्रार्थना को फिर दोहरायें-
त्वं शुष्मिन् पुरुहूत वाजयन्त मुपब्रु वे शतक्रतो।
स नो रास्व सुवीर्यम्॥
ऋ. वे. 8। 88 (98) 12
हे प्रभो ! आप उन्हें अधिक प्यार करते हैं जो शक्तिशाली होते हैं, अतः हम भी शक्तिशाली, वीर और बलवान बनेंगे।
अच्छा होता अगर साधना होती साध न होती।
मेरा जीवन सहज कर्म को अपना धर्म बनाता,
मेरा भाव विश्व की करुणा का सहचर बन जाता,
मेरे प्राण तिरोहित होते वसुधा की ममता में,
मेरी श्वासों में सौरभ का अन्तराल मुस्काता,
तब शायद तारे बन जाते ये श्रम-कण के मोती।
अच्छा होता अगर साधना साध न होती॥
महायज्ञ है आज, सृजन की पावन बेला आई,
वर्तमान कह रहा भविष्यत की दो नहीं दुहाई,
आज आजकी बात कि कल बस दिवास्वप्न मृगतृष्णा,
शैशव बीता आज खड़ी शृंगार किये तरुणाई,
दिव्य दृष्टि अपने को दृगजल से यदि नहीं भिगोती।
अच्छा होता अगर साधना होती साध न होती॥
-विद्यावती मिश्र
आदर्श प्रेम आदान नहीं है जग में,
वह तो प्रदान है मानवता के मग में,
सामाजिक लज्जा आज कराह रही है,
अपनी आग्नेय तपस्या चाह रही है,
“क्या चिन्ता? ये तन बाह्य-वियोग सहेंगे,
हम सूक्ष्म शरीरों में तो एक रहेंगे
-शिशुपाल सिंह ‘शिशु’
जे तट पर बैठे बात बनाया करते हैं-
क्या वे जीवन भर सागर से कुछ पा पाय?
मोती उनको ही मनचाहे मिल जाते हैं-
जो त्याग मोह, सागर के तल तक हो आये॥
-रामस्वरूप खरे
हर दर्द को अपना बनाना जानता हूँ,
मुश्किलों से मैं निभाना जानता हूँ।
हर कदम पर मौत का साया मिला है,
फिर भी मैं हँसना-हँसाना जानता हूँ॥
-चन्द्रकुमार खन्ना
तुमने वैभव के पाँव पखारे अर्घ्य दिया,
इन्द्रासन की चारणता में गौरव माना।
अवसर की चंचल धाराओं में बहते तृण !
तुमने तूफानों से टकराना कब जाना?
जो बैसाखी पर चले, पले पर आश्रय पर,
गतिमान चरण का स्वाभिमान वह क्या जानें?
पतवारों के तालों पर ही नाचने वाली,
नैया, गति श्रम के सुख को कैसे अनुमाने?
-श्रीनिवास शुक्ल
समय का है अस्तित्व महान,
समय अभिशाप समय वरदान,
समय के साथ चलो इन्सान।
समय है आता हुआ भविष्य-
समय है बीता हुआ अतीत!
समय है धरती की मुस्कान,
समय है जीवन का संगीत!
-अमर बहादुर सिंह “अमरेश”
हर जीवन-दीप जलाने वालों से कहता-
दिन अन्धकार को बाँध शिखा में जलो जलो।
है दूर नहीं मंजिल कदमों को चूमेगी-
सन्तोष, सत्य के कठिन राह पर चलो चलो,
मैं तन, मन, धन, जीवन की बाजी लगा रहा-
तुम विश्व बन्धु का अनुपम पाठ पढ़ा देना॥
मैं दीप जलाता विषम विश्व के प्राँगण में-
तुम अन्तःतम में स्नेह शिखा सुलगा देना।
-सूरज प्रसाद रमानी
नहीं चाहता मेरे स्वर में दुनिया गाये,
किसी बाँसुरी को मैं अपना स्वर दे दूंगा।
हिचकी लेता होगा जिसके कर का दीपक,
उसी अभागे को मैं अपना घर दे दूँगा।
दाता अतिथि बुलाकर मेरी मर्यादा को मत बहकाओ।
जिनको मुझसे प्यार बहुत है ऐसे भी मेहमान बहुत हैं॥
-शलभ
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तैत्तिरीय उपनिषद् में “मातृदेवो भव”, “पितृ देवो भव” के साथ “आचार्य देवो भव” कह कर गुरु का महत्व माता-पिता के तुल्य बताया है। इतना ही नहीं अनेक स्थानों पर तो “गुरु साक्षात् परब्रह्म” कह कर उसकी सर्वोपरिता को भी स्वीकार किया गया है। वस्तु स्थिति भी ऐसी ही है। बच्चे के पालन-पोषण का कार्य माता-पिता करते हैं किन्तु उसे संस्कारवान बना कर सुसभ्य नागरिक बनाना आचार्य की जिम्मेदारी है। इस महान् उत्तरदायित्व के कारण ही गुरु मनुष्य समाज का देवता है। उसकी महत्ता पर जितना लिखा जाय उतना कम है।
हमारी प्राचीन पद्धति के अनुसार जैसे ही बालक की बुद्धि का विकास प्रारम्भ हो उसे योग्य गुरु को सौंप देने का विधान है। गुरुकुल प्रणाली में विद्यार्थी पूर्ण शिक्षित होने तक अपने गुरु के समीप रहकर जहाँ अक्षराभ्यास, भाषा बोध, व्याकरण, साहित्य, दर्शन आदि का अध्ययन करते थे वहाँ उन्हें चरित्र, सदाचरण, पवित्रता, आन्तरिक निर्मलता, अतिथि-सेवा भ्रातृ-भावना, सहयोग, सहानुभूति, परदुःख, कातरता और परोपकार की भी शिक्षा दी जाती थी। मानसिक प्रौढ़ता, विचारशक्ति, उत्तम स्वास्थ्य और शुद्ध जीवन लेकर स्नातक जिस क्षेत्र में प्रवेश करते थे उसी में सत्य को प्रतिस्थापित कर योग्य नागरिक कहलाने का श्रेय प्राप्त करते थे। जो अपने चरित्र और विद्वता को कसौटी पर कस कर पूर्णता प्राप्त कर लेते थे शिक्षा का गुरुतर कार्य उन्हीं को सौंपा जाता था। ताकि वे विद्यार्थियों को अक्षर ज्ञान के साथ सद्गुणों की क्रियात्मक शिक्षा भी दे सकें। इसके लिए वे पहले अपने उद्दात्त चरित्र की परीक्षा देते थे। जिनमें विद्यार्थियों के चरित्र और ज्ञान को परिपक्व बनाने की, उनके मन और जीवन को सत्प्रेरणाएँ देकर उत्कृष्ट बनाने की क्षमता होती थी उन्हें ही आचार्यत्व का गौरवपूर्ण पद प्राप्त होता था। श्रेष्ठ चरित्र की आधार-शिला पर विनिर्मित बालकों का जीवन भी तब भव्य और भला बनता था।
आज गुरु की आज्ञा का पालन करना तथा उनकी सेवा करना प्रतिगामिता का चिन्ह समझा जाता है। शिक्षा क्षेत्र में भौतिक शिक्षा पद्धति का पूर्णतया प्रचलन होने से अब शिक्षक भी वैसे निष्ठावान नहीं रहे। शिक्षकों का कार्य पाठ्य विषय को किसी तरह प्रतिपादित करके समझा देना और विद्यार्थियों ने शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रमाण पत्र पा लेना समझ लिया है। शिक्षा के क्षेत्र में श्रद्धा प्रायः विलुप्त हो चली है और सभी ओर अनुशासन-विहीनता ही दृष्टिगोचर हो रही है। व्यवहारिक ज्ञान की शिक्षा देने का कोई प्रयोजन नहीं रह गया। नागरिक जीवन में प्रवेश पाने तक बालकों में इस कारण से न तो बौद्धिक आत्मनिर्भरता आ पाती है और न वे जीवन के सदुद्देश्य को ही समझ पाते हैं। सामाजिक जीवन जो अस्त-व्यस्त हो रहा है वह इसी के कारण है।
गुरु की महत्ता शिक्षा और गुणों तक ही सीमित नहीं है। सही ज्ञान का दिग्दर्शन कराना उनका प्रमुख उद्देश्य रहा है। मनुष्य संसार की अनेक समृद्धियाँ प्राप्त कर ले, सुख और सुविधाओं की किसी तरह की कमी न हो तो भी उसके शांतिमय जीवन की कल्पना नहीं की जा सकतीं। इस सृष्टि के “कारण” और “उद्देश्य” को समझे बिना शाश्वत आनन्द की अनुभूति नहीं होती। यह ज्ञान प्राप्त करना मनुष्य का मूल उद्देश्य है। विद्यार्थी जीवन में मनुष्य की बुद्धि कोमल और ग्रहणशील होती है अतः श्रेष्ठ संस्कारों के बीज उनमें डालना इस समय आवश्यक होता है। ब्रह्म सूत्र का प्रथम सूत्र-”अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” - विद्यार्थी के मन की ज्ञान पिपासा को प्रकट करता है। विश्व की रहस्यमयी गुत्थियों को सुलझा कर परम सत्य की खोज करना मनुष्य जीवन का लक्ष्य भी है। लक्ष्य पूर्ति के साधना की आवश्यकता भी होती है। साधना अनुभवी पथ-प्रदर्शक की देख रेख में ही सम्पन्न हो सकती है। गुरु शब्द में ‘ब्रह्म विद्या’ का बोध होता है। साधना और ‘ब्रह्म विद्या’ के निष्णात आचार्य यह समझते थे कि साधना काल में साधक के जीवन में जो मोड़ और परिवर्तन लाने होते हैं उसके लिये विद्यार्थी जीवन सब से उचित है। इस समय मस्तिष्क में श्रद्धा और विश्वास अधिक होता है किन्तु मानसिक परिपक्वता प्राप्त कर लेने के बाद लोगों के विचार और संस्कारों को बदलना कठिन हो जाता है। इसके लिए अधिक शक्ति, समय और श्रम लगा कर भी परिणाम थोड़े ही निकलते हैं। विद्यार्थी जीवन में बुद्धि का उदय होता है इसलिए उसमें आसानी से श्रद्धा उत्पन्न करके ब्रह्मतत्त्व की ओर प्रेरित किया जा सकता है। इस बात को भारतीय आचार्यों ने गहराई तक समझ लिया था, इसीलिए जीवन के प्रारम्भ में ही शिक्षा के साथ साधना का समन्वय किया गया था।
गुरु के सान्निध्य में रह कर शिष्य साधना का तेजस्वी जीवन बिताते थे। तपोवेष्ठित होने से उनका शरीर स्वर्ण जैसा देदीप्यवान् होता था। संसार की कठिनाइयों से संघर्ष करने की उनमें शक्ति होती थी। वार्तालाप, विवेचन, विश्लेषण और विचार-विनिमय के द्वारा उनमें गंभीर चिंतन की प्रवृत्ति जागती थी। साधना और स्वाध्याय के सम्मिश्रण से उनको आत्म-ज्ञान की अनुभूति हो जाती थी। विद्यार्थी केवल गुण-पुँज या ज्ञान पुँज ही नहीं शक्ति-पुँज होकर भी निकलते थे। फलस्वरूप उन्हें भौतिक सुखों की कोई आकाँक्षा न होती थी तब वे अधिकार नहीं कर्तव्य माँगते थे। सेवा को वे व्रत समझते थे। साहस और कर्मठता उनमें कूट-कूट कर भरी होती थी। मनुष्य शरीर के रूप में उनमें स्वयं देवत्व निवास करता था। ऐसे मेधावी पुरुषों से यह भारत भूमि भरी पूरी थी। यहाँ सुख और समृद्धि की वर्षा हुआ करती थी।
गुरु के समीप रह कर जहाँ शिष्य इस तरह की खोजस्विता धारण करते थे वहाँ गुरु-विहीन पुरुषों की भर्त्सना भी होती थी। “निगुरा” शब्द एक तरह की गाली समझी जाती थी। इसे एक तरह का समाजिक अपराध समझा जाता था। माता-पिता पहले ही यह व्यवस्था बना लेते थे कि बालक को किसी आचारवान् तथा गुणवान गुरु के समीप भेज देना चाहिये। इससे वे अपने बालकों को गुरुविहीन होने के अपराध से बचा लेते थे।
ज्ञानवान् तथा बुद्धिमान् आचार्यों के मार्ग-दर्शन में रहकर जीवन की सर्वांगपूर्ण शिक्षा इस देश के नागरिकों ने पाई थी, इसी से वे अपने ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता को प्रकाशित रख सके। गुरुकुलों के रूप में न सही, उतने व्यापक क्षेत्र में भी भले ही न हो किन्तु यह परम्परा अभी पूर्ण रूप से मृत नहीं हुई है। आज भी ब्रह्म विद्या के जानकार आचार्य और “अथातो ब्रह्म जिज्ञासा” के जिज्ञासु शिष्य यहाँ विद्यमान हैं किन्तु उनकी संख्या इतनी कम है कि ये किसी तरह लोक-जीवन में प्रकाश उत्पन्न नहीं कर पा रहे है। फिर भी संतोष यह है कि “गुरु-गौरव” अभी भी यहाँ सुरक्षित है और उसका पूर्ण विकास भी संभव है। इसमें कुछ देर भले ही लगे किन्तु आत्मा की ज्ञान-पिपासा को अधिक दिन तक भुलाया नहीं जा सकता। उसके जागने का समय अब करीब आ पहुँचा है।
एक बार फिर से विचार करना पड़ेगा कि पाश्चात्य प्रणाली पर आधारित आधुनिक शिक्षा-संस्थाओं में जो व्यवस्था चल रही है उससे क्या मानवीय जीवन की समस्यायें पूरी होती हैं? आज की शिक्षा का एक मात्र उद्देश्य अर्थ-प्राप्ति और कामोपभोग रह गया है। जीवन निर्माण तथा राष्ट्र के उत्थान के लिये ऐसी शिक्षा से कोई लाभ नहीं हो सकता। विद्यार्थी जीवन में तपश्चर्या, तत्परता और संयम भावना जागृत करने की आवश्यकता है। इसके लिये गुरु-शिष्यों के संबंधों में अनुशासन का भाव पैदा करना आवश्यक है।
इस आवश्यकता की पूर्ति के लिये सर्वप्रथम योग्य, विचारवान्, दृढ़ चरित्र तथा ब्रह्मवेत्ता अध्यापकों को ढूंढ़ निकालना पड़ेगा। शिक्षा की नींव जब तक चरित्रवान् व्यक्तियों के हाथों से नहीं पड़ेगी तब तक जातीय-विकास की समस्या हल न होगी। जो स्वयं प्रकाश फैलाने वाला है यदि वहीं अंधेरे में ठोकर खा कर गिरे तो दूसरों को वह उजाला क्या देगा? राष्ट्र को ज्ञानवान्, प्रकाशवान् तथा शक्तिवान् बनाने के लिये गुरु और शिष्य परम्परा का सुधार नितान्त आवश्यक है। लोक-जीवन में विकास की समस्या इसके बिना कभी भी पूरी न होगी।
घर में प्रचुर संपत्ति है। सुँदर मकान, आज्ञाकारिणी स्त्री, स्वामिभक्त सेवक, सज्जन परिवार-सभी कुछ हैं। शरीर भी पूर्ण स्वस्थ और बलिष्ठ है, पर जिस जीवन में सदैव भय और आतंक छाया रहता है उसे कभी सुखी न कहेंगे। भय संसार में सबसे बड़ा दुःख है। जिन्हें संसार में रहते हुये यहाँ की परिस्थितियों का अभय नहीं हो तो मृत्यु की कल्पना से वे भी काँप उठते हैं। इसीलिये यह निश्चित ठहरता है कि अभय होने के सदृश सुख इस संसार में है नहीं। भय-विमुक्त होना मनुष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य है।
भय के लिये कारण निर्दिष्ट होना जरूरी नहीं है। मानसिक कमजोरी, दुःख या हानि की काल्पनिक आशंका से ही प्रायः लोग भयभीत रहते हैं। सही कारण तो बहुत थोड़े होते हैं। कोई सह-कर्मचारी इतना कह दे कि आप नौकरी से निकाल दिये जायेंगे, इतने ही से आप डरने लगते हैं। कोई मूर्ख पण्डित कह दे कि अमुक नक्षत्र में अति वृष्टि योग है बस फसल नष्ट होने की आशंका से किसानों का दम फूलने लगता है। नौकरी छूट ही जायेगी या जल गिरेगा ही यह बात यद्यपि निराधार है केवल अपनी कल्पना में ऐसा सत्य मान लिया है, इसी के कारण भयभीत होते हैं। इस अवास्तविक भय का कारण मनुष्य की मानसिक कमजोरी है, इसका निराकरण भी संभव है। मनुष्य इसे मिटा भी सकता है।
परिस्थितियों या आशंकाओं के विरुद्ध मोर्चा लेने की शक्ति हो तो भय मिट सकता है। इसके लिये हृदय में दृढ़ता और साहस चाहिये। 1812 ई. में जब अंग्रेजों और अमेरिकनों में युद्ध चल रहा था तो सीचिवे भास नामक बस्ती के पास समुद्र में अंग्रेजों का जहाज दिखाई दिया। उसमें से कुछ सिपाही छोटी-छोटी किश्तियों में बैठकर बस्ती की ओर बढ़ने लगे। यह लोग गाँव जला देंगे और हमें मार डालेंगे, इस भय से ग्रामवासी अपने-अपने हथियार रखते हुये भी पहाड़ियों के पीछे छुप गये। एक बारह वर्षीय लड़की से यह कायरपन सहन न हुआ, वह अकेले युद्ध भी न कर सकती थी। वह कहीं से ढोल उठा लाई और एक जगह छुप कर उसे जोर-जोर से पीटने लगी। उसकी योजना सच निकली। छिपे हुये ग्राम-वासियों ने समझा हमारे सिपाही आ गये हैं अतः निकलकर अंग्रेजों पर हमला कर दिया। अंग्रेज डर कर भाग गये। साहस ही वस्तुतः भय को पराजित करता है इसके लिये मानसिक कमजोरियों का परित्याग होना चाहिये। परिस्थिति से घबड़ा जाने के कारण ही लोगों को हानि उठानी पड़ती है।
अनहोनी बात की कल्पना यदि आपके मस्तिष्क में आती है तो उसका एक भय युक्त चित्र अपने आप में दिखाई देने लगता है, इसी से डर जाते हैं। ऐसे अवसर आने पर वस्तु स्थिति का निराकरण तत्काल कर लेना चाहिये, क्योंकि जब तक यह कल्पना आपके मस्तिष्क में बनी रहेगी तब तक आप कोई दूसरा काम भी न कर सकेंगे। अंधेरी रात में घर में सोये हैं, ऐसी शंका होती है कि छत पर कोई है। “चोर ही होगा” यह कल्पना अधिक दृढ़ हो जाती है। बस आपकी हिम्मत छूट जाती है, और डर जाते हैं। थोड़ा साहस कीजिये, और उठिये, चाहे तो हाथ में लाठी ले लीजिये। ऊपर तक हो आइये आपकी परेशानी दूर हो जायेंगी, चोर ही हुआ तो वह अपनी आहट पाते ही भागेगा। आपकी संपत्ति भी बच जायेगी और भय की दशा भी दूर हो जायेगी। काल्पनिक भय या आशंका जन्य भय तत्काल निराकरण से ही दूर हो जाते हैं।
इन परिस्थितियों से हार मान लेने से भयभीत होने का अभ्यास बन जाता है। पग-पग पर भय घेरे रहता है। कुछ संपत्ति है, तो डर बना रहता है कहीं छिन न जाये। बच्चे से प्यार करते हैं, उसे कुछ हो न जाय। पास-पड़ोस, गाँव, राज्य या देश में अपना बड़ा सम्मान है। वह कहीं लुट न जाये। बड़ी मेहनत से, समय और धन लगाकर सुन्दर स्वास्थ्य बनाया है कहीं कोई बीमारी न आ जाय। मामूली जुकाम से क्षय का भय। फुँसी से सेप्टिक न हो जाय। अनिष्ट मात्र की आशंका से बुरी तरह से भयग्रस्त बने रहने का स्वभाव बन जाता है। कुछ लोग अपने साहस की बड़ी दाद देते रहते हैं, किन्तु मृत्यु की बात सोचने से वे भी अंतर्मन में डरे-डरे से रहते हैं। इन से बचने के कई प्रयास करते हैं, पर मनोबल के अभाव में एक आशंका दूर होती है तो दूसरी खड़ी हो जाती है। किसी भी तरह इससे छुटकारा नहीं मिल पाता।
मनुष्य और भय दोनों परस्पर विरोधी शब्द हैं। मनुष्य में जिस शक्ति की कल्पना की जाती है उसकी तुलना में उसे भय कदापि न होना चाहिये। पर आत्म-बल की कमी और अपनी शक्तियों पर विश्वास न रखने से ही वह स्थिति बनती है। भय मनुष्य को केवल पाप से होना चाहिए। जो बुराई उसको पतन की ओर ले जाती हो उस से डरे तो भय का कुछ अर्थ भी निकले। चोरी, छल, कपट बेईमानी, मिलावट, जुआ, नशा, माँसाहार इनसे सामाजिक जीवन में कलुष उत्पन्न होता है इनसे भयभीत होना व्यक्ति और समाज के हित में हैं। किन्तु मृत्यु और विपरीत परिस्थितियों से घबड़ाना मनुष्योचित धर्म नहीं है।
आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करें तो यह निष्कर्ष निकलता है-”द्विताया भयं भवति”। अर्थात् परमात्मा को भूल कर अन्य वस्तुओं के साथ लगाव रखने के कारण ही भय होता है। मनुष्य अपने शाश्वत स्वरूप को विस्मृत बना कर शरीर और उसके हितों के प्रति जितना अधिक आसक्त होता है उसे दुःख और मृत्यु को आशंका उतना ही भयाकुल बनाती है। हम में से ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो शरीर की नश्वरता और मृत्यु की असंदिग्ध संभावना को स्वीकार न करता हो। यह एक तथ्य है जो मनुष्य को शिक्षा देना चाहता है कि वह शरीर से विलग कोई अविनाशी तत्व है। जन्म और मरण के नित्य-क्रमों से यह स्पष्ट भी हो जाता है कि मनुष्य आध्यात्मिक दृष्टि से अविनाशी तत्व है अतः उसे मृत्यु-भय से कदापि विचलित नहीं रहना चाहिये।
देह आदि क्षण-भंगुर पदार्थों में अभिनिवेश होने के कारण ही भय होता है। शारीरिक शक्तियाँ बिलकुल न्यून होती हैं, इसलिए अप्रिय घटनाओं से लड़ने के लिये भरोसा नहीं होता है किन्तु जब अपने जीवन का सम्पूर्ण भार परमात्मा को सौंप देते हैं तो अपने में एक बहुत बड़ी शक्ति अनुभव करते हैं। परमात्मा के अतिरिक्त और दूसरा कोई हमारा भय छुड़ाने वाला नहीं है। शरणागति होने से ही मनुष्य अपने यथार्थ रूप का ज्ञान कर पाता है। आत्मज्ञान की स्थिति प्राप्त होते ही सारे अभाव दूर हो जाते हैं। शरीर का भेद खुल जाता है और यह समझ में आ जाता है कि नाशवान वस्तु के प्रति लगाव रखना ठीक नहीं। उसके टूटने बिगड़ने या नष्ट हो जाने का भय तब परेशान नहीं करता।
संसार में जो कुछ दिखाई दे रहा है वह प्रकृति और परमात्मा के सम्मिश्रण से ही बना है। प्रकृति परिवर्तनशील है। आज बिगड़ती है कल नया रूप धारण कर लेती है। परमात्मा की चेतन शक्ति, प्रकृति के आवरण में प्रविष्ट होकर ही मनुष्य शरीर का निर्माण हुआ है। शरीर प्रकृति है इसे प्रत्येक दशा में नष्ट ही होना है किन्तु आप पूर्णतया परमात्मा के चेतन अंश-आत्मा है। शरीर आपका साधन मात्र है। यह आपके कल्याण और साँसारिक सुखोपभोग के लिये मिला है। किन्तु सच्चा सुख आपको मिलेगा तभी जब आप को अपनी आत्म शक्ति की पहिचान हो जायेगी।
श्रीमद्भागवत में भी ऐसा ही संकेत किया गया है। ग्रन्थकार ने लिखा है-
अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो,
ध्यातुर्धिया स्वप्न मनोरथौ यथा।
तत् कर्म संकल्प विकल्पक मनो,
बुधो निरुन्ध्यादभयं ततः स्यात्॥
अर्थात् यह संसार पूर्णतया परमात्मा से परिपूर्ण है फिर भी हमारे मन की कल्पना के कारण वस्तुओं के अनेक रूप दिखाई देते हैं। मन ही अनेक इच्छायें किया करता है। अन्य वस्तुओं का संकल्प विकल्प करते रहने वाले इस मन को परमात्मा में निरुद्ध कर देने से भय समाप्त हो जाता है क्योंकि तब सर्वत्र परमात्मा ही शेष दिखाई देता है।
जो अभय है, वही सच्चा सुखी है। भय में डूबा रहने वाला तो दुःख ही पाता रहेगा, दुःखी ही कहा जायेगा।
किसी भी मार्ग का अनुसरण करें गुण-दोष कुछ न कुछ सभी में मिलेंगे। यह समझ कर सहज कर्म करने में ही मनुष्य को रुचि लेना चाहिये। छोटे-छोटे दोषों पर पारिवारिक मनोमालिन्य या किसी साधारण सी बात को लेकर गृहस्थ जीवन का परित्याग करने वाले या घर छोड़कर भाग खड़े होने वालों की भर्त्सना ही की जा सकती है। अपने बालक-बच्चों तथा आश्रितों को असहाय अवस्था में छोड़कर भागने वालों को परमात्मा के कोप का भाजन बनना पड़े तो इसमें अनुचित भी क्या है। ईश्वर की उपासना के लिये भी इस तरह घर छोड़कर भाग खड़े होना न शास्त्र सम्मत है न ईश्वर इच्छा के अनुरूप। एक व्यक्ति की सुविधा के लिये अनेकों को दुखी एवं कष्टमय जीवन बिताने के लिये विवश करना ईश्वर का विधान कभी नहीं हो सकता। मनुष्य में इतना साहस होना चाहिये कि छोटी-छोटी कमियों, गलतियों, त्रुटियों, कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों में भी स्वधर्म-पालन पर अड़ा रह सके। गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है-
“सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्”
‘हे अर्जुन! सर्वत्र कोई न कोई दोष होता ही है, किन्तु कर्तव्य पालन का फिर भी परित्याग नहीं होना चाहिये।” हमें जिस स्थिति में परमात्मा ने पैदा किया है और जो स्वभाव के अनुसार है, विवेकयुक्त हैं, जिसमें धर्म की अधिकाँश मर्यादायें समाहित हों, उसका मनोयोगपूर्वक पालन करने से श्रेय की प्राप्ति होती है। अपना धर्म ठुकराकर, गृहस्थ से भागना या घर छोड़कर केवल अपने सुख के लिये इधर-उधर मारे-मारे घूमना पाप है।
सभी मनुष्यों को इच्छानुकूल सुविधायें मिलती रहें ऐसी व्यवस्था इस संसार में नहीं है। विद्यार्थी का परीक्षाफल में उत्तीर्ण होना ही नहीं, असफल होना भी संभव है। फेल हो जाने पर यह सोचना कि अब मैं किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहा, घरवाले क्या कहेंगे, मित्रों के सामने जाते हुये अतीव ग्लानि एवं लज्जा का अनुभव होगा, यह आँधी मति विद्यार्थी को कभी शोभा नहीं दे सकती। जीवन को गतिमान रखने के लिये असफलताओं के आघात आवश्यक भी हैं, निरन्तर सफलता भी जड़ता का ही चिन्ह है। उसमें मनुष्य जीवन के सर्वांगीण विकास की दृढ़ता नहीं प्राप्त कर सकता।
कोई-कोई व्यक्ति घर के झगड़ों से क्षुब्ध होकर, या जीवन में आती रहने वाली अन्य कठिनाइयों का इच्छित समाधान न कर सकने के कारण आत्म हत्या कर लेते हैं या घर छोड़कर भाग जाते है। इस तरह कर्तव्य कर्म से विमुख होना तो अपना ही नहीं अपने स्वजन परिजनों के साथ भी आत्म-घात ही हुआ। पीछे बिलखते हुये अभिभावक या त्रास भोगते हुये निरीह बालक-बालिकाओं को छोड़ जाना भी क्या मनुष्य का धर्म हैं? ऐसा करने वालों की निन्दा ही की जा सकती हैं, भले ही परिस्थितियाँ कितने ही नाजुक दौर तक पहुँच गई हों। उनका डटकर हिम्मत के साथ मुकाबला करना चाहिये। कठिनाइयों से घबरा जाय, वह भी कोई आदमी है। ‘आल्पस पर्वत’ से टक्कर लेकर ही एक मामूली इन्सान, महान् नैपोलियन बनता है। ब्रिटिश साम्राज्य से लोहा लेकर एक मामूली वकील महात्मा गाँधी बनता है। स्वतन्त्रता संग्राम में एक नई आजाद हिन्द फौज खड़ी कर देने को सुभाष की सी हिम्मत होनी चाहिये। छोटी-छोटी बातों पर भाग्य की दुहाई पुरुष को तो विषमताओं से जूझने के लिये हर घड़ी तैयार रहना ही चाहिये।
परिस्थितियों पर विचार करने के लिये मनुष्य को सदैव गंभीरता से काम लेना चाहिये। आज जैसी स्थिति कल भी रहेगी यह सोचना अबुद्धिमत्तापूर्ण है। हम साहस, शौर्य और कर्मठता से काम करें तो असफलता को सफलता में, निर्धनता को धन प्राप्ति में, अस्वस्थता को उत्तम स्वास्थ्य में क्यों नहीं बदल सकते? थोड़ा समय ही तो लगेगा। एक दिन में किसी को सफलता मिली भी हैं? फिर आप ही उतावले क्यों होते है। धैर्य रखिये और कठिनाइयों से लड़ पड़िये। आपका खराब समय जरूर टल जायेगा। गरीबी दूर होगी। जरूर आपके स्वास्थ्य में परिवर्तन होगा।
शारीरिक दृष्टि से पीड़ित या मानसिक विक्षोभ के कारण गृह-परित्याग कर देने वालों की तरह एक ओर भी वर्ग होता है जो किसी ऋद्धि-सिद्धि के चक्कर में बाबाओं द्वारा चेले मूँड़ लिये जाते है या आवेश और अत्यधिक भावुकता के कारण गृहस्थ-जीवन को जंजाल, मिथ्या, माया और भ्रम बताकर घर से भाग जाते हैं। हम इस स्थिति को पहले से भी अधिक दुःखदायक मानते हैं। हम इस स्थिति को पहले से भी अधिक दुःखदायक मानते हैं। हम इस स्थिति को पहले से भी अधिक दुःखदायक मानते हैं। यदि मनुष्य के लिए पारिवारिक जीवन, बालकों, परिजनों का पालन पोषण ही माया है तो यह सारा संसार अन्न, वस्त्र यह भी तो सब माया ही है। फिर क्यों दूसरों के दरवाजे पर भीख माँगते घूमते हैं ? क्यों दूसरों के गाढ़े पसीने की कमाई मुफ्त में खाते हैं ? माया और जंजाल इस संसार में कुछ भी नहीं हैं। मनोविकार ही हैं जिन्हें माया कहें, शैतान कहें या भटकने वाला समझें। मनुष्य सद्विचारों से ओतप्रोत हो, तो परमात्मा की उपासना का वही सुख घर में रहकर भी प्राप्त कर सकता है जो दर-दर भटकते से भी संभव नहीं हैं। छोड़ना ही है तो मनुष्य के शरीर में बसे हुए काम, क्रोध, लोभ, मद तथा मोह आदि को ही क्यों न छोड़ा जाय। इससे यह जीवन भी शान से जीने का आनन्द मिलता है और परलोक में भी सुख मिलता है।
जो मनुष्य सामाजिक जीवन में रहकर मन और इन्द्रियों पर नियंत्रण नहीं रखता वन में जीने या घर बार छोड़ देने से उसका मन भी बदल जायगा। वहाँ भी वह अपने पाप के नये-नये तरीके ढूंढ़ लेगा। और नहीं कुविचारों के रहते हुए भला उसे आत्म-शान्ति कैसे मिलेगी ? इधर घर वालों की कलपती हुई आत्माओं से निकली हुई दुर्भावनायें भी क्या उसे चैन से रहने देंगी। सामाजिक जीवन कर्त्तव्य के अनेकों रास्ते होते हैं जिनमें लगा रहकर मनुष्य मन और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर सकता है और आसानी से अपना पारमार्थिक लक्ष्य पूरा कर सकता है। अन्यत्र रह कर पाप के कीचड़ में फिसल जाने का भी खतरा हो सकता है किन्तु उपयुक्त गृहस्थ जीवन में ऐसी तो कोई भी आशंका नहीं होती।
धर्म और ईश्वरत्व की आड़ में कितने ही लोग घर के क्लेश के कारण कष्ट का अनुभव होने पर लज्जा, भय और क्रोध के वशीभूत होकर घर से पलायन कर जाते है। दूरदर्शी न होने के कारण ही वे ऐसा करते है। बाहर जाकर जब उन्हें और भी अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तब पश्चाताप करते हैं। इधर घर न लौटने की मिथ्या लोक लाज के कारण मन और भी विक्षुब्ध बना रहता है। ऐसी अवस्था में किसी वेषधारी साधु-महात्मा के चक्कर में पड़कर बेचारे स्वयं भी वैसा ही छल, कपट और आडम्बर का जीवन बिताने को मजबूर होते है।
इस तरह पाखण्ड-प्रचारकों के मन से पाप की भावना तो जाती नहीं, सुख-शान्ति भी नहीं मिलती, दूसरे ढर्रे से तृष्णा और दूसरे ढंग से विषय पतले पड़ जाते हैं, और वे अधोगति की ओर ही ले जाते हैं। इसलिए हमें गीता के इस आदेश को बार-बार स्मरण करना चाहिये-
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमो द्वारैस्त्रिभिर्नरः।
आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति पराँ गतिम्॥
अर्थात्-हे अर्जुन! काम, क्रोध, मोहादि विकारों से छूटा हुआ मनुष्य आत्म-कल्याण का आचरण करता रहे तो इससे उसे सहज ही परम गति प्राप्त हो जाती है।
गीता में इसीलिए स्वधर्म पालन पर विशेष बल दिया गया है। इस अभिप्राय को ठीक-ठीक समझ लेने पर मूढ़ कल्पना से बच जाता है। इतिहास में जिन महापुरुषों ने घर त्यागा है उनने समाज सेवा के लिए पूरा समय लगाने की दृष्टि से ही वैसा किया है। इसका अभ्यास गृहस्थ में से भी थोड़ा समय सेवा कार्यों के लिए लगाकर किया जा सकता है और जब अनुकूल अवसर हो तब विवेकपूर्ण समाज सेवा का व्रत लेकर पूरे समय भी घर से बाहर रहा जा सकता है। यह स्थिति अलग है। संसार को माया कह कर घर छोड़ भागना तो इससे बिलकुल ही उलटी और हेय स्थिति है। इससे हर विचारशील को बचना ही उचित है।
मनुष्य की आन्तरिक अभिव्यक्ति उसके काम करने की लगन और भावना से ही परखी जा सकती है। यह जानने के लिये कि यह कार्य उसे पसन्द है कि नहीं, उसकी गतिविधियों पर एक निरीक्षण दृष्टि डालिए। उत्साहपूर्वक किया हुआ कर्म यह व्यक्त करता है कि उस व्यक्ति की अभिरुचि उसमें है। अनुत्साह और शिथिलता, कर्म के प्रति अरुचि का भाव परिलक्षित करते हैं। जिस कार्य से हमें प्यार होता है उसका परिणाम शीघ्र पाने के लिए वैसे ही तत्परता भी होती है। उतनी ही फुर्ती, अभिमान और उत्साह भी होता है, जी करता है कितनी जल्दी इसे समाप्त करें और इसका सुखद परिणाम प्राप्त करें। कर्म का सुख वस्तुतः उसकी लगन, भावना और निष्ठा में ही है। इस तरह सम्पन्न किये गए कर्म प्रफुल्लता दे जाते हैं किन्तु अनुत्साहपूर्वक काम करने से निराशा, क्षोभ और असफलता ही हाथ लगती है।
जिस काम को बोझ समझ कर करेंगे उसमें मानसिक चेष्टायें पूरी तरह से प्रवृत्त न होंगी। शारीरिक शक्ति भी जिस अनुपात से लगनी चाहिए थी वह न लगेगी, तब फिर कार्य के शुभ परिणाम की आशा भी धूमिल ही बनी रहेगी। प्रसिद्ध विचारक स्वेट मार्डेन ने लिखा है-”मनुष्य की असफलतायें परमात्मा की देन नहीं उसकी निजी पैदाइश होती हैं।” यह बात अक्षरशः सत्य प्रतीत होती है। संभव है किन्हीं कार्यों के अनुरूप अपनी शक्ति व योग्यता न हो तो उनकी असफलता को तो एक संयोग कह सकते हैं किन्तु जो कार्य हम कर सकते हैं, जो हमारी शक्ति और सामर्थ्य की सीमा में ही है वह कार्य भी यदि अपूर्ण रहता है तो यह मानना पड़ता है कि इस काम को लगन और उत्साह-पूर्वक नहीं किया गया।
काम करने की एक भावना होनी चाहिए-उत्कृष्ट और विशाल भावना। आपका विश्वास यह कहता हो कि हम इस कार्य को करके ही छोड़ेंगे, इसमें आत्महित है और पुरुषार्थ है तो आप सच मानिए उस कार्य में आपको असीम आनन्द आयेगा।
कमाई करते हुए जब यह भावना होती है कि इस धन से हमारे बच्चे विकसित होंगे, परिवार, राज्य और राष्ट्र समृद्ध बनेगा तो अन्तःकरण में अपूर्व शक्ति जागृत होती है, स्वाभिमान उठता है, और प्रसन्नता से अन्तःकरण भर जाता है। जब तक यह अनुभव नहीं करेंगे कि इस उत्तरदायित्व पूर्ण कार्य का श्रेय उसे भी है तब तक कर्म का सात्विक आनन्द कैसे मिलेगा ? जो व्यक्ति इस सिद्धान्त में हितकारक उद्देश्य और ऊँची आवश्यकता नहीं देखता कि यह कार्य जन-जन का है, इसमें अपना भी कर्त्तव्य है वह अपने गलत और भ्रमपूर्ण दृष्टिकोण के कारण छोटा, ही बना रहता है, उसे कोई अच्छे परिणाम भी नहीं मिल पाते।
मनुष्य का जीवन एक आदर्श कर्म-विद्यालय है। इसमें नैष्ठिक स्नातक वे समझे जाते हैं जो कर्म को जीवन ध्येय मानकर उसे कुशलतापूर्वक निभाते हैं। विद्यार्थी अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने का लाभ तब पाता है जब वह लगनपूर्वक, भावनापूर्वक अध्ययन कार्यों में लगा रहता है। जिस तरह स्वाध्याय की चमक यह व्यक्त करती है कि विद्यार्थी का भविष्य उज्ज्वल है उसी प्रकार कर्म की उत्कट भावना यह बताती है इस मनुष्य का हृदय उत्कृष्ट और विशाल है। इन गुणों के कारण ही उसका व्यक्तित्व निखरता, समुन्नत होता, और श्रेय प्राप्त करता है।
आलस्यपूर्वक कार्य करने से तो यही अच्छा है कि चुपचाप बैठे रहें। शरीर को शिथिल और निराश बनाने की अपेक्षा उसे कुछ देर विश्राम दे लेना अच्छा है। अनुत्साह मनुष्य की अयोग्यता का चिन्ह है, इससे मनुष्य की जो नैसर्गिक दिव्यता है उसका लोप होता है। आकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए संघर्ष द्वारा अपनी शक्तियों को व्यक्त करना ही मनुष्य का सच्चा पुरुषार्थ है। जिसने जीवन में संघर्ष न किया, परिस्थितियों से टकराकर मानव जीवन की दिव्यता न हासिल की, भला वह भी कोई आदमी है ? मनुष्य वह है जो कठिनाइयों को हँस-हँस कर गले लगाता है। परेशानियों के तूफान को उज्ज्वल भविष्य का प्रतीक मानकर उनसे जूझ पड़ता है। इन वीर पुत्रों के लिए धरती माता का अंचल सदैव खुला है। वे जब चाहें सफलता का पय-पान कर सकते हैं।
आये दिन लोगों से यह शिकायतें आती हैं-हमारा काम नहीं बनता, नौकरी नहीं मिलती, आर्थिक अभाव है, गरीबी से परेशान हैं। इनके जवाब में चतुर व्यक्ति उनके संतोष के लिए भले ही यह कहें कि उनके पूर्व जन्मों के प्रारब्ध अच्छे नहीं हैं, बुरे ग्रहों का प्रभाव है, भाग्य अच्छा नहीं है। पर सच पूछा जाय तो यह उत्तर अबोध बालक को बहलाने के लिए खिलौने देना मात्र है, जिससे उसके अभावजन्य असन्तोष का कष्ट कुछ देर के लिए हलका किया जा सकता है। पर झूठे आत्मसन्तोष से ‘गम गलत’ कर लेने पर भी प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं होता। हम जो कार्य करते हैं उसकी सफलता का दोषी न तो हमारा भाग्य या प्रारब्ध है, न ही बेचारे शनि देव उसमें बाधा उत्पन्न करते हैं। सच्ची बाधा तो यह है कि हमारे अन्दर काम करने की रुचि ही नहीं है, हम अपनी आन्तरिक मलिनताओं के पर्दे में अपनी दुर्बलता छिपाना चाहते हैं। एक अनपढ़ कुली दिन-भर बोझा ढोकर शाम तक पाँच रुपये कभी लाता है तो क्या कारण है कि एक सुशिक्षित व्यक्ति दिन-भर में चार पैसे भी नहीं कमा पाता ? क्या परिस्थितियों को दोष दें ? नहीं, यह व्यक्ति की अयोग्यता का परिणाम है। काम कैसा भी क्यों न हो मनुष्य अपनी योग्यता के कारण उसे ऊँचा सिद्ध करता है। कार्य करने की भावना ही उसे कर्म को बड़ा और व्यक्ति को असामान्य बना देती है।
यह देखकर बड़ी करुणा उत्पन्न होती है कि परमात्मा का युवराज मनुष्य जिसे विरासत में सैकड़ों अनुदान परमात्मा ने दिए हैं वह भी दीनता का जीवनयापन करता है। मनुष्य अपना सिर राजाओं की तरह ऊँचा उठा सकता है, बशर्ते अपनी काम करने की शक्ति सूर्य की किरणों की तरह विकसित हों। कर्म से शक्तियाँ जागृत होती हैं। कर्म से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। कर्म से मनुष्य ऊँचा उठता है। उस कर्म की पूजा ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। इसे भी उसी लगन और भावना से करना चाहिए जिस तरह परमात्मा की उपासना श्रद्धा और विश्वासपूर्वक करते हैं।
जो शक्ति परिस्थितियों को अनुकूल बनाती है वह है काम करने की लगन और भावना। मानवीय गुणों में एक गुण यह भी है कि वह भिन्न-भिन्न अवस्थाओं के साथ भी आश्चर्यजनक ढंग से अपना मेल पैदा कर सकता है। मन की तन्मयता में वह शक्ति है जो एक ही लक्ष्य के हजार रास्ते खोलकर रख देती है। इनमें कोई भी मनुष्य अपनी रुचि, शक्ति और सामर्थ्य के अनुरूप अपना चुनाव कर सकता है।
किसी बात में नापसन्दगी है, उसे करने में जी नहीं करता तो यह प्रयत्न करें कि उसमें भी कहीं कोई शिक्षाप्रद आदर्श या मनोरंजन उपलब्ध हो सके। कई स्थानों पर विद्यार्थियों ने रिक्शे चलाकर अपने अध्ययन पूरे किए हैं। इससे समाज में उनकी प्रतिष्ठा ही हुई है, अपनी योग्यता बढ़ा लेने का जो महान् लाभ उन्हें मिला सो तो अलग है ही।
यह दुनिया वैसे ही बड़ी नीरस है। यहाँ का रहा-सहा आनन्द भी व्यवसाय की अरुचि में चला जाता है। बिना उद्देश्य और भावना से मशीन की तरह काम करने से इस जीवन के सारे आनन्द नष्ट हो जाते हैं। अतः आवश्यकता यह है कि मन और आत्म-विस्तार के लिए यह जीवन कलापूर्ण ढंग से जीने का अभ्यास डाला जाय। काम चाहे जैसा हो अपनी लगन के द्वारा उनमें सफलता की सम्भावनायें बढ़ाते हैं और भावनाओं के द्वारा इसमें सरसता उत्पन्न करते हैं। बस यही सर्वोत्तम जीवन जीने का गुरु-मन्त्र है। इसे अपने जीवन में विकसित कर सके, तो बस इस जीवन में सफलता ही सफलता और आनन्द ही आनन्द है। जिसने काम करने की ललित कला सीख ली उसे सुख प्राप्त करने के लिए अन्यत्र भटकने की क्या आवश्यकता है ? कर्म ही मनुष्य जीवन का सच्चा सुख है। हमें भी इसी में अपने आपको घुलाकर इस जीवन का श्रेय प्राप्त करना ही चाहिए।
निर्धनता मनुष्य को कई तरह से परेशान करती है इसमें कुछ भी सन्देह की बात नहीं है। धन से ही मनुष्य अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। धन न हुआ तो जरूरी है कि कठिन समस्यायें सामने आयें। पर यदि मनुष्य निर्धन होकर भी कर्जदार है तो वह सबसे बड़े दुःख का कारण हैं। गरीबी स्वयं एक बड़ा बोझ है, कर्ज और बढ़ जाता है तो जीवन व्यवस्था की रीढ़ ही झुक जाती है। मनुष्य का सारा उल्लास समाप्त हो जाता है।
धन-हीन होने पर भी स्वच्छन्द मन के आध्यात्मिक पुरुषों के जीवन में एक प्रकार का आनन्द बना रहता है। पारिवारिक संगठन, प्रेम, साहस और शक्ति का स्वभाव हो तो मनुष्य थोड़े से धन के द्वारा भी सुखमय जीवन की आनन्द प्राप्त कर लेते हैं। किन्तु कर्ज लेकर सुखोपभोग का सामग्री उपलब्ध करना एक प्रकार से भावी जीवन के सुख शान्ति को ही दाव पर चढ़ा देना है। ऋणी होकर मनुष्य कभी सुखी नहीं रह सकता। डॉ. रसर का यह कथन कि “मनुष्य ऋण लेने नहीं जाता, दुख खरीदने जाता है” सत्य ही है। कर्ज लेकर सुख की कल्पना सचमुच भ्रामक है।
विश्व कवि शेक्सपियर ने लिखा है-”न हो ऋणी, न हो महाजन, क्योंकि ऋण लिया हुआ धन अपने को भी खो देता है और देने वाले मित्रों को भी। ऋण लेने की आदत मितव्ययिता की धार को मोटी कर देती है।” उचित रीति से धन खर्च करने की बुद्धि मनुष्य में तब आती है जब वह धन ईमानदारी और परिश्रम से कमाया गया हो। मेहनत से कमाया एक पैसा भी खर्च करते हुये दर्द पैदा करता है। उससे वही करम लेना उपयुक्त समझते हैं जिससे किसी तरह का पारिवारिक उत्तरदायित्व पूर्ण होता है। जो धन बिना परिश्रम के प्राप्त हो जाता है उससे किसी प्रकार का मोह नहीं होता, इसलिये उसका अधिकाँश उपयोग भी उड़ाने-खाने या झूठी शान-शौकत दिखाने में चला जाता है।
प्रमुख बात यह है कि हर मनुष्य में इतनी शक्ति और सामर्थ्य होती है कि वह अपनी शारीरिक, पारिवारिक जिम्मेदारियों का पालन ठीक तरह से कर ले। कर्ज की आवश्यकता उन्हीं को होती है जिन्हें अपना पारिवारिक खर्च ठीक प्रकार चलाना नहीं आता या जो श्रम-चोर होते हैं। उन्हें भी मिलता तो कुछ है नहीं और फालतू के व्यसन और पाल लेते हैं, सो उनकी पूर्ति के लिये कहीं से पैसा आना चाहिए। दुस्साहसी पुरुष चोरी छल आदि का आश्रय ले लेते हैं आलसी और अकर्मण्य इसके लिये दूसरों के आगे हाथ फैलाते हैं। कर्ज ले आना तो आसान बात है। चिकनी चुपड़ी बातें बनाकर या मित्रता का ढोंग बना कर किसी से उधार ले तो सकते हैं किन्तु जब अदायगी का समय आता है तो यह बोझ सारे परिवार की अर्थ व्यवस्था पर पड़ता है। फलस्वरूप परिवारों का सौमनस्य समाप्त हो जाता है। क्लेश, कलह और कटुता बढ़ जाती है। इसमें समय भी नष्ट होता है और सदस्यों की योग्यता भी व्यर्थ चली जाती है। कर्ज एक प्रकार से गृहस्थी को चौपट करने वाला होता है।
जिन लोगों की आमदनी बहुत थोड़ी होती है और खर्च अधिक होता है वे लोग कर्ज लेकर अपने को लंगड़ा-लूला जैसा ही अनुभव करते हैं। थोड़ी देर तक के लिये भले ही पूर्ति अनुभव हो किन्तु यह बोझ बढ़ जाता है तो बस मनुष्य का सारा जीवन कर्ज को निबटाने में ही चला जाता है। ऐसे लोग देखे जा सकते हैं जो ब्याज की एवज में साहूकार का ही जीवन भर काम करते रहते हैं उनका कर्ज फिर भी अदा नहीं हो पाता तो वह बोझ उठाकर उनके निरीह बच्चों पर डाल दिया जाता है और फिर एक पैतृक समस्या बन जाती है।
कर्ज एक तरह का सामाजिक कलंक है। लेने वाले के लिये ही वह कठिन अपराध और भारस्वरूप नहीं होते वरन् देने वाले की भी परेशानियाँ कम नहीं होतीं। महात्मा टॉलस्टाय ने लिखा है “कर्ज देना मानों किसी चीज पहाड़ की चोटी से गिराना है और फिर उसे वसूल करना उतना ही कठिन होता है जितना किसी वजनदार चीज को पहाड़ की चोटी पर ले जाना। कर्ज मनुष्य की सबसे बड़ी और दूसरे को देने की गरीबी है।”
उधार लेते समय प्रायः सभी यह सोचते हैं कि फसल की अच्छी कमाई होगी, बीमा पॉलिसी मिलेगी, मकान का किराया आवेगा या प्राविडेण्ट फण्ड का पैसा मिलेगा तब आसानी से इसे अदा कर देंगे। यह सोचकर लोग शादी-विवाह, मृतक संस्कार, भोज या अन्य किसी आवश्यकता के लिये कर्ज ले लेते हैं। अदायगी के समय तक सूद ही बहुत बढ़ जाता है, फिर उस समय भी तो खर्चे बने रहते हैं अतः. देने में बड़ी कठिनाई आती है। इस तरह ऋणी और साहूकार के आपसी सम्बन्ध भी खराब होते हैं, और देने वालों की कमाई का वह भाग व्यर्थ ही चला जाता है जिससे परिवार के अन्य सदस्यों के विकास में सहायता मिल सकती थी।
सूद के रूप में दिया जाने वाला पैसा एक तरह का अपने परिजनों की प्रगति पर आघात है। जेवर या जमीन रखकर लिया गया पैसा भी अपराध ही है क्योंकि इनके बदले में ली गई मूल रकम तो चुकानी ही पड़ती है, ब्याज भी देना पड़ता है और इन वस्तुओं का उपयोग भी कुछ नहीं हो पाता। कुछ दिन कठिनाइयों को सहन कर लेना या जेवर बेच देना कर्ज लेन से कहीं अधिक अच्छा है क्यों कि इससे हमारा नैतिक साहस ऊँचा उठा रहता है और सूद पर अकारण जाने वाला धन भी बच जाता है।
ऋण मनुष्य की खर्चीली प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देता है। चोरी, बेईमानी, जुआ, सट्टा आदि से ग्रसित लोगों को प्रायः ऋणी देखा जाता है क्योंकि इन लोगों को धन बेरोक टोक खर्च करने का स्वभाव हो जाता है। इससे विलासिता बढ़ती है और लोग पूर्व संचित संपत्ति भी गँवा देते है। ऋण के फेर में फँस कर धनी, सेठ, साहूकार तक अपनी बड़ी-बड़ी दुकानें, मकान आदि गँवा कर निर्धन हो जाते हैं। उदारता वश किसी की सहायता करके उसे आर्थिक धन्धा दे देना दूसरी बात है किन्तु ऋण लेने देने की आदत को व्यवसायिक रूप देना सदैव ही घातक होता है। अधिकाँश मध्यम वर्ग के लोगों में यह बुरी लत पड़ जाती है। अपने को ऊँचा करने के लिए सीमित साधनों से आगे बढ़ने का प्रयत्न करना ही कर्ज का कारण बन जाता है। लोग यह समझते हैं कि अमुक कार्य इस ढंग का नहीं होगा तो दूसरे व्यक्ति अपमानित करेंगे, छोटा समझेंगे। अपनी हेठी न हो इसी कायरता के कारण लोग आर्थिक परतन्त्रता स्वीकार कर लेते हैं। किन्तु यह एक मामूली सी समस्या है, लोग अपनी औकात के अनुसार खर्च की मर्यादा बनाये रहें तो ऋण लेने की समस्या कभी भी सामने न आये।
अपने रुके हुये काम को आगे बढ़ाने के या कोई आर्थिक धन्धा चलाने के लिये थोड़े समय के लिए किसी आत्मीय जन से सहायता लेकर थोड़े ही दिनों में उसे लौटा देना अनुचित भले ही न कहा जाय, पर जिन्होंने कर्ज को एक तरह का पेशा ही समझ लिया हो, उनको चाहिए कि वे समाज में वैमनस्यता उत्पन्न करने के अपराध से बचें। कर्ज से चिन्ता बढ़ती है और कार्य क्षमता घटती है। इससे राष्ट्रीय संपत्ति का नाश होता है इस लिये ऋणी होना अनागरिक कर्म की कहा जायगा। इससे बचने में ही मनुष्य का कल्याण है।
आध्यात्मिक दृष्टि से तो ऋणी होना और भी अपराध है। धर्म-ग्रन्थों में तो यहाँ तक कहा जाता है कि जो इस जीवन में ऋण नहीं चुका पाते उन्हें निम्न-योनियों में जन्म लेकर इसका भुगतान करना पड़ता है। इस पर भले ही लोग विश्वास न करें पर यह बात सभी समझ सकते हैं चरित्र और नैतिक साहस को गिराने में ऋण बहुत बड़ा सहायक है। इससे अकर्मण्यता और फिजूलखर्ची को पोषण मिलता है, कटुता बढ़ती है और सामाजिक सन्तुलन बिगड़ता है।
मनुष्य को परमात्मा ने बड़ी शक्ति असीम साधन और अतुलित पौरुष प्रदान किया है। इन्हीं के सहारे वह अपनी प्रगति कर सकता है। ऋणी होना न तो विकास ही दृष्टि से उचित है और न आध्यात्मिक दृष्टि से ही। इससे तो छुटकारा पाना ही ठीक है। कोई अकस्मात दुर्घटना जीवन संकट जैसे अवसर उपस्थित हों, और अपने साधन उस स्थिति का मुकाबला करने में असमर्थ हो रहे हों तो कर्ज लेना दूसरी बात है, पर आलस से दिन काटते हुये शरीर मौज के लिए तो कदापि कर्ज नहीं लिया जाना चाहिये। और न ऐसे लोगों को कर्ज देना ही चाहिये। इस्लाम धर्म में ब्याज को हराम, इसलिये कहा गया है कि ऋण का व्यवसाय अन्तः जगत के लिये हर समय ही हानिकारक सिद्ध होता है।
जेष्ठ मास में अभूतपूर्व प्रशिक्षण
मथुरा जाने के लिये परिजनों का सादर आह्वान
युग निर्माण योजना का तृतीय वर्ष कितना शानदार होगा, इसका आभास मार्च की अखण्ड ज्योति में छपी सूचनाओं के आधार पर सहज ही लगाया जा सकता है। अभियान असाधारण है। इस युग का इसे सबसे बड़ा धार्मिक आन्दोलन कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। अखण्ड-ज्योति परिवार ने नव निर्माण का जो संकल्प किया है उसे एक ऐतिहासिक घटना ही कहा जा सकता है। इतने विशाल कार्यक्रम की पूर्ति के लिए उसकी रूप रेखा भी उतनी ही विशाल खड़ी करनी होगी। लक्ष्य के अनुरूप ही उसके साधन भी एकत्रित किये जा रहे हैं।
प्रथम दो वर्ष में केवल योजना का ढाँचा खड़ा किया गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को किसी पत्रिका को मनोरंजन के लिए पढ़ने वाले पाठक मात्र न रहने देकर, उन्हें नव-निर्माण अभियान के मोर्चों पर लड़ने वाला धर्म सैनिक बनाया गया है। उन्हें यह अनुभव करने दिया गया है कि वे किसी महत्वपूर्ण संगठन के सदस्य हैं और संयोगवश ही सही, उनके कन्धों पर एक बड़ी जिम्मेदारी आ गई है। उसे पूरा भी उन्हें करना ही पड़ेगा। इस मान्यता के अनुरूप अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य ने अपनी जिम्मेदारी समझी ही नहीं कन्धे पर उठाई भी है। विगत दो वर्ष के प्रयत्न के फलस्वरूप योजना की यह बहुत बड़ी सफलता है कि उसे 30 हजार से ऊपर ही प्रबुद्ध एवं भावनाशील से कर्मठ कार्यकर्ता अपने महान लक्ष्य की पूर्ति के लिए मिल गए हैं। म॰ गान्धी जी ने स्वाधीनता संग्राम जिन दिनों आरम्भ किया था, उन दिनों उनके पास इससे भी कम कार्यकर्ता थे।
दो वर्ष में कितना बड़ा काम हुआ है इसकी झाँकी जुलाई में युग निर्माण पत्रिका का विशेषांक पढ़ने से अनुमान लगाया जा सकेगा। तीसरे वर्ष का कार्यक्रम मार्च की अखण्ड ज्योति में छपा है अब उसकी तैयारी में हमें लग जाना चाहिए। ताकि आगामी गुरु पूर्णिमा आते ही, तीसरा वर्ष आरम्भ होते ही निश्चित कार्यक्रमों को सुसंचालित किया जा सके। तीसरे वर्ष में जो लक्ष्य निर्धारित किया गया है वह इस प्रकार है-
1-लेखनी द्वारा जनजागरण- भारतवर्ष की 14 भाषाओं में छपने वाले 7 हजार विचार प्रधान एवं समाचार प्रधान सभी अखबारों में लेखों एवं समाचारों के माध्यम से योजना का सन्देश एक करोड़ व्यक्तियों तक नियमित रूप से पहुँचाने की व्यवस्था करना। इसके लिए लेखकों एवं संवाददाताओं को बड़ी संख्या में प्रशिक्षित करना पड़ेगा। इसके लिए कलम का शास्त्र लेकर लड़ने वाले कम से कम एक हजार योद्धा चाहिए। इनको प्रशिक्षित किया जाना है। इस क्षेत्र में फिट बैठने की क्षमता सम्पन्न व्यक्तियों को व्यावहारिक रूप से यह सिखाया जायगा कि वे इस कार्य को किस प्रकार सुचारु रूप से सम्पन्न करते रह सकते हैं। अस्तु जेष्ठ में 31 मई से 14 जून तक का एक पन्द्रह दिवसीय शिविर मथुरा में लगेगा। व्यस्त लोग जून की छुट्टियों में आसानी से आ सकते हैं। पन्द्रह दिन में भी काम चलाऊ जानकारी वे ले सकते हैं।
जिनके पास अवकाश है उन्हें छः महीने इधर ठहरकर अभ्यास और अनुभव भी यहीं करना चाहिए। क्योंकि पन्द्रह दिन में इतना ही हो सकेगा कि उन्हें आवश्यक जानकारी करा दी जाय। उस जानकारी का प्रयोग करना आया कि नहीं यह तो अभ्यास पर निर्भर करेगा। और इतने बड़े ज्ञान के लिए छः महीने किसी भी दृष्टि से अधिक नहीं हैं। अपने दो अखबार निकलते हैं। छोटा प्रेस भी है। उनके माध्यम से सम्पादन, लेखन, प्रकाशन, प्रेस व्यवस्था आदि की ऐसी शिक्षा भी प्राप्त की जा सकती है जो साहित्य सेवी सैनिक बनने के इच्छुकों के लिए भावी जीवन का निर्वाह आधार भी बन सके। देश में अभी 20 फीसदी के करीब शिक्षा है। अगल 10-20 वर्षों में ही यह तीन गुनी, चौगुनी होगी तब आज की अपेक्षा लेखन, प्रकाशन एवं प्रेस व्यवस्था के लिए भी तीन-चार गुना क्षेत्र होगा। उस रिक्त स्थान को लेने के लिए अभी से वे लोग तैयार किये जाने हैं जो राष्ट्र की उस महत्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति कर सकें।
अभी यहाँ व्यवस्था छोटी ही बन पाई है। इसलिए 100 से अधिक साहित्य सेवी सैनिक जेष्ठ के शिविर में न लिये जा सकेंगे वरन् निभ सका तो इससे कम ही रखेंगे। यह प्रथम शिविर की बात है। आगे और भी कई शिविर लगाने हैं। एक हजार साहित्य सेवी विनिर्मित करने की योजना जहाँ तक हो सकेगा, तीसरे वर्ष में ही पूरी करने का प्रयत्न करेंगे ताकि अगले वर्षों में इससे भी बड़े जो कदम उठाये जाने हैं, उठा सकें।
2-धर्म प्रचारकों की विशाल सेना- धर्म प्रचारकों की एक बड़ी सेना जन-संपर्क के लिए-लोक मानस को पलट डालने के लिए व उसका पुनर्निर्माण करने के लिए तैयार करनी है। लेखनी की पहुँच शिक्षित लोगों तक सीमित है। भारत में शिक्षा ही 23 फीसदी है। उनमें से भी पत्र पत्रिकायें या पुस्तकें पढ़ने में रुचि रखने वाले 1 करोड़ से अधिक नहीं। 46 करोड़ के देश में 1 करोड़ की संख्या तुच्छ है। युग निर्माण का संदेश तो जन-जन तक पहुँचाया जाना है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए वाणी का माध्यम अनिवार्य रूप से आवश्यक है। हम धर्म का माध्यम लेकर चले हैं। जनता को धार्मिक बनाना है। अतएव वाणी द्वारा जन-जागरण करने करने का व्रत लेने वालों को धर्म प्रचारक या धर्म सैनिक ही कहा जायगा।
योजना के तृतीय वर्ष में एक हजार धर्म प्रचारकों को मोर्चे पर अड़ा देने का लक्ष्य बनाया गया है। जिसका प्रारम्भ जेष्ठ के 15 दिवसीय शिविर से किया जा रहा है। ता0 15 मई से 30 मई तक का शिविर इसी का शुभारम्भ हैं। सब को विदित है कि गायत्री तपोभूमि में स्थान सम्बन्धी तथा अन्य प्रकार की साधन सुविधा कम है। इसलिए उपरोक्त 15 दिवसीय शिविर में 100 से कम ही प्रशिक्षार्थी लिये जा सकेंगे। पर आगे यह प्रयत्न करेंगे कि शिविरों की यह शृंखला आगे बढ़ाई जाय और एक हजार धर्म प्रचारक कार्यक्षेत्र में उतार दिए जायें।
पिछले अंक में बताया जा चुका है कि (1) भागवत सप्ताहों की तरह गीता सप्ताहों के धर्मानुष्ठानों की व्यापक शृंखला फैलाई जानी है। (2) षोडश संस्कारों के माध्यम से व्यक्ति निर्माण तथा परिवार निर्माण का कार्यक्रम चलता है। (3) त्यौहारों को प्रेरणाप्रद ढंग से मनाकर समाज निर्माण की पृष्ठ-भूमि तैयार करनी है। (4) सत्य नारायण कथा द्वारा धर्म, अध्यात्म, सदाचार और नीति का स्वरूप जन-मानस में प्रतिष्ठापित करना है। (5) छोटे सस्ते सामूहिक गायत्री यज्ञों के द्वारा एकत्रित की गई कोटि-कोटि जनता तक नवयुग की प्रकाश किरणें पहुँचानी है। धर्म चेतना उत्पन्न करने के लिए यह पाँचों माध्यम एक से एक बढ़कर प्रभावशाली हैं। इस कार्य पद्धति को मूर्त रूप देने के लिए आवश्यक साहित्य अब छप चुका है। उसका व्यवहारिक प्रशिक्षण 31 मई से 14 जून तक होगा। सुयोग्य व्यक्ति 15 दिन के स्वल्प समय में भी जो कुछ सुनेंगे या देखेंगे उसके आधार पर इस योग्य बन सकेंगे कि वे नवयुग के अग्रदूत बनकर कोटि-कोटि जनता तक उदीयमान ऊषा की आभा का परिचय दे सकें।
धर्म प्रचारकों को क्या करना है, इसकी रूपरेखा पन्द्रह दिन में देखी या सुनी ही जा सकेगी। उसका अभ्यास करने में समय लगेगा। भाषण कैसे दिया जाय यह सीख सुन लेने के लिए 15 दिन पर्याप्त है। पर उसका अभ्यास तो समय साध्य ही है। इसके लिए न्यूनतम छः महीने का समय चाहिए। जिन्हें इस दिशा में कुछ अधिक ठोस काम करना हो, उन्हें मथुरा छः महीने रहने का अवकाश भी निकालना ही पड़ेगा। इतनी अवधि में ही वे पूर्वोक्त पाँच कार्यक्रमों को भली प्रकार सम्पन्न कर सकने में निष्ठगत बन सकेंगे। फिर इन्हीं छः महीनों में ही उन्हें संगीत का, हारमोनियम आदि बजाने का अभ्यास भी तो करना है। अपना कार्यक्षेत्र भारत की देहातें हैं। जहाँ अभी मानसिक विकास भाषणों के नहीं संगीत के अधिक उपयुक्त हैं। धर्म प्रचार के लिए सदा से ही संगीत प्रधान माध्यम रहा है। अभी भी और आगे भी उसी की प्रमुखता रहने वाली है। कीर्तन, भजन तो हर धार्मिक आयोजन के प्रधान अंग होते हैं। इसलिए छः महीने के प्रशिक्षण में संगीत को भी जोड़ दिया गया है। धर्म प्रचारक को संगीत भी जानना ही चाहिए।
(1) 15 जून से 15 दिसम्बर तक और (2) 15 दिसम्बर से 15 जून तक, 6-6 महीने के दो सत्र चलाए जाते रहने की घोषणा की जा चुकी है। यह सत्र इसी समय से आरम्भ हो जायेंगे। लेखनी और वाणी दोनों ही माध्यमों से शिक्षा लेने वालों के सत्र इसी 15 जून से चल पड़ेंगे। यों दोनों की शिक्षा विधि स्वतन्त्र है। फिर भी समीप रहने के कारण शिक्षार्थी दूसरी कक्षाओं में पढ़ाये जाने वाले विषयों को भी बहुत कुछ सीख ही सकेंगे। लेखन कक्षा वालों को भाषण की और भाषण वालों को लेखन का भी कुछ तो अनुभव आभास हो ही जायगा। इस प्रकार दोनों कक्षाएं अपने निर्धारित शिक्षण के अतिरिक्त दूसरा प्रशिक्षण भी एक सीमा तक ले ही सकेंगी।
धर्म प्रचार के लिए निर्वाह व्यवस्था का सहज हल मौजूद है भागवत सप्ताह की तरह गीता सप्ताह कहने पर सात दिन की आजीविका साधारणतया 50) मिल जानी चाहिए। महीने के दो आयोजन भी कर लिए जायें तो 100) बच्चों का निर्वाह मिल सकता है। इसमें कोई संतोषी व्यक्ति किसी प्रकार गरीबी के साथ गुजर चला सकते हैं। संस्कार, त्यौहार, सत्यनारायण कथा आदि आयोजनों से भी आजीविका मिलती रहती है। यों यह कार्य शाखा संगठनों के जिम्मे छोड़ा गया है कि वे प्रचारक की नियत व्यवस्था करें ताकि उसे व्यक्तिगत रूप से प्रयत्न न करना पड़े और न्यूनाधिक मिलने की अनिश्चित स्थिति भी न रहे। परन्तु जो स्वतन्त्र रूप से पौरोहित्य कर्म करते हैं या करना चाहते हैं वे उस तरह भी अपनी आजीविका चला सकते हैं जिस तरह कि वर्तमान पंडित, पुरोहित चलाते हैं। यह योजना उन सबके लिए भी अतीव उपयोगी है जो अवैतनिक रूप से धर्म प्रचार करना चाहते हैं। जिनके पास अपनी निज की आजीविका मौजूद है जो नौकरी आदि से लगे हैं। अवकाश का थोड़ा समय धर्म प्रचार में लगाना चाहते हैं। ऐसे लोग उतने थोड़े समय में भी अपने क्षेत्र को जागृत करने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
3- सामाजिक क्रान्ति-अभियान- जेष्ठ के 15-15 दिवसीय लेखनी, वाणी के दोनों शिविर समाप्त होते ही उसके दो दिन बाद सामाजिक क्रान्ति सम्मेलन रखा गया है। 17,18,19 जून को तीन दिन के लिए उन सभी विचारशील एवं देश, धर्म, समाज, संस्कृति के लिए दर्द रखने वालों को बुलाया गया है जो नये समाज की नई रचना में अभिरुचि लेते हैं तथा कुछ करने के लिए इच्छुक हैं।
लेखनी और वाणी का प्रभाव मस्तिष्क पर तो पड़ता है पर आन्दोलन तब खड़े होते है जब उनका कोई दृश्य रूप सामने आये। स्वाधीनता प्राप्त करने की आकांक्षा को सत्याग्रह संग्राम का मूर्त रूप देने देने के लिए गान्धी जी को नमक सत्याग्रह का दृश्य कार्यक्रम बनाना पड़ा है। पुराने खंडहरों की सफाई और माता भारती का भव्य-भवन बनाने की प्रक्रिया का कुछ मूर्त रूप तो होना ही चाहिए, कुछ संघर्षात्मक क्रम भी चलना चाहिए ताकि आवश्यक उत्साह पैदा हो सके। शूर सैनिकों को कुछ कर गुजरने का अपना साहस पुरुषार्थ दिखाने का अवसर मिल सके। युग निर्माण योजना ऐसे एक सौ रचनात्मक कार्यक्रम लेकर चल रही है। हर स्थिति का व्यक्ति अपने ढंग में कुछ न कुछ रचनात्मक कार्य स्वतन्त्र रूप से भी कर सकता है। पर अभी जो प्रधान कार्यक्रम हाथ में लिया जा रहा है वह है विवाहों के नाम पर चल रहे ‘अन्धेर’ का उन्मूलन। नये समाज का नया निर्माण विवाह से आरम्भ होता है। वर-वधु मिलकर एक स्वतन्त्र सृष्टि का आरम्भ करते हैं। यदि मूल में ही गड़बड़ी होगी तो अन्त तक उसका बुरा प्रतिफल ही निकलेगा। विवाह अत्यन्त ही धार्मिक एवं सात्विक वातावरण में-आदर्शवादिता से ओत-प्रोत होने चाहिए ताकि वह शुभारम्भ पति-पत्नी के जीवन को धार्मिक बना सकने में, धार्मिक सन्तान उत्पन्न कर सकने में सफल हो सके। धर्म-युग का सूत्रपात यहीं से तो होना है।
कहना न होगा कि आज विवाहों के नाम पर कितना अन्धेर चल रहा है। दहेज की माँग कितनी घातक एवं कितनी अनैतिक है इसे हर विचारशील अनुभव करता है पर यह कुप्रथा अपना वीभत्स रूप दिन-दिन विकराल ही बनाती चली जा रही है। घटने के स्थान पर सुरसा के मुँह की तरह बढ़ती ही जा रही है। औसत हिन्दू को अपनी आमदनी का एक तिहाई भाग इन्हीं अपव्ययों में बर्बाद करना पड़ता है। उसकी पूर्ति के लिए बेईमानी करने को विवश होना पड़ता है। हिन्दू समाज को इन कुरीतियों ने ही बेईमान बनने के लिए विवश किया है। इसलिए इन्हें अगणित पापों की जननी ही कहना चाहिए। बेईमानी का मार्ग सब नहीं अपना पाते। थोड़ी बेईमानी से भी काम नहीं चलता, क्योंकि जिसके घर कई बच्चे हैं उसे उनके विवाह में इतना धन चाहिए जितना उसकी सामर्थ्य से बाहर है। ऐसी दशा में सामान्य स्तर के हिन्दू को अपने परिवार की सारी महत्वाकाँक्षाएँ समाप्त करके बच्चों के विवाह को ही परम पुरुषार्थ मानकर सन्तुष्ट रहना पड़ता है। इस दबाव से कई बार तो लोग इस बुरी तरह कुचल जाते हैं कि जीवन-भर कराहते-कराहते ही उन्हें मरना पड़ता है।
समय आ पहुँचा है कि हम अपने समाज में फैली हुई कुरीतियों और अनीतियों के विरुद्ध बगावत खड़ी करें। इतना साहस किये बिना व्यापक जड़ता का उन्मूलन कभी भी न हो सकेगा। आदर्श विवाहों का जिनमें न्यूनतम नाम मात्र का खर्च पड़े हमें प्रचलन करना ही चाहिए। अखण्ड-ज्योति परिवार का विशाल संगठन इस दिशा में पहल कर सकता है और उसे करनी भी चाहिए। सामाजिक क्रान्ति के लिए भी हम व्रत ले चुके हैं। उसे साहसपूर्वक पूरा करना चाहिए। यों अभी अगणित मोर्चों पर हमें लड़ना है और नये समाज की नई रचना के लिए बहुत आगे तक चढ़ना है, पर प्रारम्भिक मोर्चा, वहीं से खड़ा किया जाय जो सबसे अधिक कष्टकारक है, सबसे अधिक घृणित हैं। हमें विवाहों की धूमधाम मिटा ही देनी चाहिए और उसे एक परम पवित्र धर्मानुष्ठान के रूप में प्रचलित करना चाहिए।
17, 18, 19 जून का सम्मेलन इसी प्रयोजन के लिए बुलाया गया है। इस आन्दोलन को किस प्रकार कारगर रीति से आगे बढ़ाया जाय। इस पर गम्भीर मंत्रणा करने की आवश्यकता है, ताकि अधिक ठोस, अधिक मजबूत, अधिक कारगर कदम उठाये जा सकें और सफलतापूर्वक लड़ाई लड़ी जा सके। इस सम्बन्ध में उपयुक्त जोड़े मिलाने के लिए ऐसी एजेन्सियाँ भी कायम करनी पड़ेगी जो उपयुक्त जोड़े ढूँढ़ने में सहायता कर सकें। क्योंकि एक पक्ष सुधारवादी हो दूसरा वैसा न मिला तो सुधार कार्यान्वित नहीं हो पाता। उपर्युक्त एजेन्सियों को प्रगतिशील जातीय सुधार सभाएँ भी कह सकते हैं। चूँकि विवाह अपनी जातियों में ही होते हैं और हर जाति की अपनी-अपनी अलग कुरीतियाँ एवं व्यवस्थाएँ हैं, उन्हें सुधारने के लिए उस जाति के लोगों में अलग-अलग काम करना पड़ेगा। आदर्श विवाहों के लिए अधिक लोगों को सहमत करना, जोड़े मिलाना तथा प्रभावोत्पादक ढंग से ऐसे विवाहों का सम्मिलित आयोजन करना इन जातीय एजेन्सियों का ही कार्य है। वे उस समाज में प्रचलित अन्य अनेक कुरीतियों को भी सुधारने का प्रयत्न करती रहेंगी। जून के सम्मेलन में हर जाति की ऐसी एजेन्सियाँ, सुधार समितियाँ भी गठित कर देने का हमारा विचार है जो उपरोक्त प्रयोजनों की पूर्ति में उत्साहपूर्वक संलग्न हो सकें।
सामाजिक क्रान्ति में विश्वास रखने वाले उसके श्रीगणेश में अग्रगामी सत्साहसी लोगों को इस आयोजन में अनुरोधपूर्वक आमंत्रित किया गया है। यद्यपि जून में गर्मी अधिक पड़ती है और बड़े सम्मेलनों के लिए पंडाल आदि नहीं बन सकते। पर अच्छी ऋतु आने तक के लिए ठहरा भी तो नहीं जा सकता। योजना का तीसरा वर्ष आरम्भ होते ही हमें आदर्श विवाहों के प्रचलन की सामाजिक क्रान्ति आरम्भ करनी है। अगले वर्ष एक लाख सुशिक्षित युवकों से दहेज स्वीकार न करने के प्रतिज्ञा पत्र भरवाने हैं, ताकि ऐसे अगणित विवाह सामूहिक रूप से कराने हैं। संभवतः कुछ आदर्श विवाह तो गायत्री तपोभूमि में भी होंगे। उत्तर भारत में 600 से अधिक जातिभुमि में भी होंगे। उनमें से 100 प्रगतिशील जातीय सुधार सभाएँ तो हमें आगे बना ही लेनी होंगी। यह कार्य उपरोक्त सम्मेलन से ही आरम्भ होगा। इसलिए अधिक गर्मी रहते हुए भी अग्रगामी लोगों को आना ही होगा। यों इस सम्बन्ध में बड़ा सम्मेलन आगामी दिसम्बर में उन दिनों करेंगे जब कि शीत कालीन छुट्टियां होती हैं।
पहले विचार यह था कि जून का सम्मेलन ‘सनाढ्य’ ब्राह्मणों का हो और शेष जातियों के प्रतिनिधि उसमें प्रेक्षक की तरह सम्मिलित हों। पर इस सम्बन्ध में अखण्ड-ज्योति परिवार की सभी जातियों ने समान रूप से उत्सुकता दिखाई है और एक-एक जाति का अलग-अलग सम्मेलन करके बहुत समय लगाने की अपेक्षा एक साथ ही सब जातियों का सम्मेलन बुलाने का सुझाव दिया है। हमें भी यह ठीक लगा। इसलिए अब सामाजिक क्रान्ति सम्मेलन सभी जातियों का सम्मिलित कर दिया गया है। उसमें सभी लोग समान रूप से भाग लेंगे। हाँ, तीन दिनों में प्रथम दिन ब्राह्मण, द्वितीय दिन क्षत्रिय, तृतीय दिन वैश्य जातियों की संगठन व्यवस्था बनाने के कामकाजी कार्यक्रम के लिए अलग समय सुरक्षित रखकर बाकी खुला अधिवेशन एवं विचार-विनिमय सामूहिक रूप से ही होगा। आशा करनी चाहिए कि इस सम्मेलन के बाद देश में एक नई चेतना उत्पन्न होगी। एक ऐसी चिनगारी जलेगी जो कुरीतियों की होली को जलाकर भस्म कर देगी और विवेक का प्रहलाद हँसते-खेलते विजय ध्वजा फहराता हुआ बाहर निकलेगा।
4-चान्द्रायण व्रत तपश्चर्या- गत दो वर्षों से सैंकड़ों व्यक्तियों ने हमारी देख-रेख में चान्द्रायण व्रत किया है। उससे उनकी शारीरिक-विशेषतया पेट की बीमारियों के सुधार में आशातीत सफलता मिली है। मानसिक विकारों, दोष, दुर्गुणों के सुधार में भी इस व्रत का आश्चर्यजनक परिणाम देखा गया है। शास्त्रों में पापों के प्रायश्चित के लिए इस तपश्चर्या को अद्वितीय बताया गया है। गायत्री मन्त्र के सवा लाख पुरश्चरण के साथ चान्द्रायण व्रत सोना और सुगन्ध के मिलने जैसा उदाहरण प्रस्तुत करता है। जिन लोगों ने इन गत दो वर्षों में भाग लिया है उनमें से प्रायः सभी ने इससे उपलब्ध सत्परिणामों की दूर-दूर तक चर्चा की है, फलस्वरूप हर बार यह व्रत करने के लिये मथुरा आने वालों की संख्या बढ़ती ही गई है।
इस बार जेष्ठ में यद्यपि युग निर्माण योजना के महान् अभियान से सम्बन्धित 15-15 दिन के दो शिविर हैं और साथ ही सामाजिक कान्ति सम्मेलन भी हैं फिर भी चान्द्रायण व्रत करने वालों को निराश नहीं किया गया है। जिन्हें यह तपश्चर्या करनी हो वे 15 मई की शाम तक मथुरा आ जावें और 15 से अपना व्रत आरम्भ कर दें। दोनों शिक्षण शिविरों में सम्मिलित रहने का लाभ उन्हें अनायास ही मिल जावेगा।
5-ज्योति अवतरण साधना- विगत बसन्त पंचमी से ‘ज्योति अवतरण’ की साधना क्रम जिन लोगों ने आरम्भ किया है उन्हें इस थोड़ी ही अवधि में आशाजनक मनोबल प्राप्त हुआ है। यह ध्यान अतीव प्रेरणाप्रद है। प्रायः सूर्योदय से पूर्व का कुछ समय हममें से प्रत्येक को इस ध्यान धारणा के लिए निकालना चाहिए। समयाभाव हो तो जप संख्या में कुछ कमी की जा सकती है। पर उसे सूर्योदय के बाद भी किया जा सकता है। पर ध्यान नियत समय पर ही कर लेना चाहिए। सूर्योदय से पूर्वं कुछ समय यदि ‘ज्योति अवतरण’ ध्यान में लगाते रहा जाय तो उसका उत्साहवर्धक परिणाम सहज ही दृष्टिगोचर होने लगेगा। जिनने अभी तक उसे आरम्भ न किया हो वे अब आरम्भ कर दें।
6-प्रतिनिधि एवं उत्तराधिकारी- जहाँ कहीं भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वहाँ हमने अपने प्रतिनिधि एवं उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिए हैं। हमारा कार्यक्रम घटता चला जा रहा है। हमारे स्थान की पूर्ति इन्हीं उत्तराधिकारियों को करनी होगी। अतएव उन्हें अभी से जिम्मेदारियों को अपने कन्धों पर उठाना आरम्भ कर देना चाहिए। जहाँ अखण्ड-ज्योति पहुँचती है पर नियुक्तियाँ नहीं हुई हैं वहाँ के परिजन जनवरी अंक में संलग्न फार्म को भरकर अविलम्ब भेज दें। कोई स्थान ऐसा नहीं रहना चाहिए जहाँ अखण्ड-ज्योति तो पहुँचती हो पर प्रतिनिधि मंडल कर्मयुक्त न हुआ हो।
जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति सदस्य हैं, उन सब को एक संगठन के अंतर्गत आबद्ध हो जाना चाहिए। शाखा कार्यालय का दफ्तर स्थापित कर लिया जाय। वहाँ एक सामूहिक पुस्तकालय हो जहाँ से अन्य सदस्य जीवन निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य पढ़ने के लिये प्राप्त करते रह सकें। नियुक्त प्रतिनिधियों को नियमित रूप से ज्ञान-यज्ञ के लिये कुछ समय दान करना आरम्भ कर देना चाहिए।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों की जन्म तिथियाँ शाखा कार्यालय में नोट करनी चाहिए और ऐसा प्रबन्ध करना चाहिए कि जिस दिन जिसका जन्म दिन हो उस दिन उसके यहाँ छोटा गायत्री हवन, कीर्तन, भजन, प्रवचन आदि का सामूहिक आयोजन हो। अन्य सदस्य शुभ कामना के पुष्प भेंट करें। स्वागत में सौंफ जैसी सस्ती चीजें ही रहें ताकि दूसरों को उसका अनुकरण करने में किसी प्रकार की कठिनाई न हो। जिसका जन्म दिन हो उसे अपना जीवन अधिक प्रगतिशील एवं अधिक सेवामय बनाने की प्रेरणा दी जाय। इस प्रकार संगठन सुदृढ़ होगा और शाखा का क्रम ठीक तरह चलने लगेगा। संगठित शाखाएँ ही अगले रचनात्मक कार्यक्रमों को सुचारु रूप से चलाने में समर्थ हो सकती हैं।
7-’युग निर्माण योजना’ पाक्षिक- अपने परिवार की जो रचनात्मक गतिविधियाँ सारे देश में चल रही हैं, उसकी जानकारी हममें से सबको परस्पर रहनी चाहिए। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक निकाला गया है। योजना की गतिविधियों की जानकारी उसी से मिलती है और आन्दोलन के लिए आवश्यक वातावरण समाचारों से ही बनता है। अखण्ड-ज्योति में समाचार नहीं छपते, यह आवश्यकता पाक्षिक से पूरी होती है। अतएव उसे पढ़ना अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए आवश्यक है। जहाँ अभी तक पाक्षिक न मँगाया जाता हो वहाँ वैयक्तिक या सामूहिक रूप से 6) चन्दा भेजकर उसे तुरन्त आरंभ कर लिया जाय। आन्दोलन की गतिविधियों से हर सदस्य को परिचित रहना ही चाहिए। इसलिए ‘युग निर्माण’ पाक्षिक को मँगाने का भी हर जगह प्रबन्ध कर लिया जाना चाहिए।
8-वानप्रस्थ व्रत- जिनके बच्चे कमाने योग्य हो गये हैं, परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियाँ जिनके ऊपर से हलकी हो गई हैं, उन विचारशील स्वजनों को “वानप्रस्थ” की तैयारी करनी चाहिए। जीवन का एक चौथाई भाग समाज सेवा के लिए शास्त्रकारों ने निश्चित रखा है। जो उस समय को भी अपने लोभ, मोह में खर्च कर डालते हैं उन्हें समाज की अमानत चुराने वाले पापी कहा गया है। हमें शास्त्र मर्यादाओं के अनुसार अपना धर्म, कर्त्तव्य पालन करना चाहिए। प्राचीन भारत का गौरव यदि पुनः उपलब्ध कराना हो तो समाज सेवा का व्रत लेने वाली वानप्रस्थ परम्परा को पुनर्जीवित करना ही पड़ेगा। इसके बिना निस्वार्थ अनुभवी और ऊँचे-ऊँचे लोक सेवियों का अभाव ही बना रहेगा।
प्रसन्नता की बात है कि गत माघ के शिविर में 10 प्रबुद्ध लोगों ने वानप्रस्थ व्रत लेकर भावी जीवन समाज हित के लिए समर्पित कर देने का साहस दिखाया। यही साहस उन सब को भी दिखाना चाहिये जिनकी स्थिति अनुकूल हो। घर के ही एक कमरे में, या समीप अकेले रहने की व्यवस्था करके उस निवास स्थान को छोटा तपोवन बनाया जा सकता है। ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में अधिकाधिक कठोरता रखने का प्रयत्न किया जा सकता है। अनिवार्य इसलिए नहीं रखा गया है कि यह न सध सकने से लोग समाज सेवा के महान कर्त्तव्य से भी वंचित रह जाते हैं।
जिनको कमाने की चिन्ता नहीं है उन्हें वानप्रस्थ लेकर समाज सेवा का कार्यारम्भ करना चाहिये। जो इस स्थिति में हैं पर मोह वश साहस नहीं कर पाते उन्हें दूसरे लोग प्रोत्साहित करें यही उचित है। अखण्ड-ज्योति परिवार को बड़ी संख्या में वानप्रस्थ निकाल कर समाज को अर्पित करने हैं। इसके लिये हममें से प्रत्येक को साहस एकत्रित करना चाहिए ताकि उपयुक्त समय आते ही यह व्रत ग्रहण करने का सत्साहस दिखा सकें। जेष्ठ के शिविरों में भी ऐसा व्रत धारण करने की व्यवस्था रहेगी।
9-शिविर में आने से पूर्व- तपोभूमि में ठहरने का स्थान कम और आने के इच्छुकों की संख्या अधिक रहती है इसलिये यही नियम है कि स्वीकृति प्राप्त करके ही आना चाहिये। उपरोक्त किसी शिविर में जिन्हें सम्मिलित होना हो उन्हें अप्रैल मास से ही स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिये। जिन्हें स्वीकृति न मिले वह सम्मिलित न हो सकेंगे। जिनकी गोदी में बहुत छोटे बच्चे नहीं हों वे महिलायें भी आ सकेंगी।
भोजन व्यय सभी को अपना करना होगा। आमतौर से मिल-जुलकर दो-दो, चार-चार की इकाइयों में लोग अपना बना लेते हैं। इससे सस्ता भी पड़ता है और रुचिकर भी रहता है। तीन दिन के सम्मेलन में भोजन की दुकानें तपोभूमि के समीप ही रखने की व्यवस्था की गई है।
गायत्री प्रचार जिस दिन हमने आरम्भ किया था, वह दिन हमारे जीवन का एक विशेष दिन था। उस शुभारंभ ने लगभग एक करोड़ लोगों को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है। अब यह दूसरा कदम भी ठीक इतना ही महत्वपूर्ण उठ रहा है। राष्ट्र के भावनात्मक निर्माण में हम एक महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करने जा रहे हैं। लेखनी, वाणी और रचनात्मक कार्य पद्धति, तीनों ही मोर्चों पर जो मुहीम खड़ी की जा रही है, वह कितना अनुपम परिणाम उत्पन्न करने वाली है उसे कुछ दिन में हर कोई भली भाँति प्रत्यक्ष देख सकेगा। ऐसे महान शुभारम्भ के अवसर पर अपने सगे साथियों को अपने समीप देखने और उनका विशेष सहयोग मिलने की हमारी आकाँक्षा अनुचित नहीं है।
अपने प्रतिनिधियों, उत्तराधिकारियों एवं कार्य सहचरों को इस सम्बन्ध में यह कार्य सौंप रहे हैं कि वे अपने क्षेत्र के प्रतिभा सम्पन्न परिजनों को ज्येष्ठ के दो शिविरों एवं उसके बाद ही होने वाले सम्मेलन में शामिल होने के लिए निमन्त्रित करने जायं और उन्हें अपने साथ ही खींच लाने का प्रयत्न करें। लेखनी और वाणी शिविर जहाँ सेवा का एक विशाल क्षेत्र प्रस्तुत करते हैं, वे वहाँ व्यक्तिगत प्रतिभा के विकास का भी द्वार खोलते है। इस बढ़ी हुई प्रतिभा एवं क्षमता के आधार पर कोई व्यक्ति अपने आध्यात्मिक ही नहीं भौतिक जीवन का भी विकास कर सकता है। जिनके पास कम समय हैं वे 15-15 दिनों में भी बहुत कुछ प्रकाश प्राप्त कर लेंगे। पर अच्छा यही है कि छः महीने मथुरा रह कर इन शिविरों में व्यवहारिक अनुभव प्राप्त किया जाय। जिनकी स्थिति ठहरने की है उन्हें इसके लिए तैयार करना चाहिए कि वे छः महीने मथुरा रह कर प्रवीणता प्राप्त करें।
तीन दिन का सम्मेलन वस्तुतः एक महान परिवर्तन की पूर्ण तैयारी में अभिनव मन्त्रणा का महत्वपूर्ण आयोजन है। जो शिविरों में आवेंगे उनमें से अधिकाँश से आशा की जायेगी कि वे सम्मेलन तक ठहरें और उसके बाद भी इसके अतिरिक्त सामाजिक कार्य में अभिरुचि लेने वाले दूसरे लोगों को भी व्यक्तिगत रूप से आमन्त्रण करने जाना चाहिए, ताकि अधिक योग्य व्यक्तियों के माध्यम में अधिक व्यापक योजना बन सके।
वैदिक-साहित्य संबंधी सूचना।
इन पुस्तकों के लिए बरेली लिखिए-(1) चारों वेदों का सायण भाष्य के आधार पर हिन्दी अनुवाद ( मन्त्रों समेत ) (2) 108 उपनिषद्, मन्त्र तथा हिन्दी अनुवाद (3) छहों दर्शन (हिन्दी अनुवाद) समेत हमारे सम्पादित, अनुवादित तो हैं पर मथुरा में मिलते नहीं। उनका प्राप्ति स्थान ‘संस्कृति संस्थान’-मुहल्ला ख्वाजा कुतुब, बरेली है। इस संबंध में कोई पत्र व्यवहार मथुरा न करके बरेली ही करना चाहिये। पुस्तकों के मूल्य इस प्रकार है। (1) ऋग्वेद (चार खण्डों में) 24) (2) अथर्ववेद (दो खण्डों में) 12) (3) यजुर्वेद 6) (4) सामवेद 6)। (5) 108 उपनिषद् (तीन खण्डों में) 21)। (6) योग दर्शन 4), वेदान्त दर्शन 4), साँख्य दर्शन 4), न्याय दर्शन (4), (5) वैशेषिक दर्शन 4), (5) मीमाँसा दर्शन 4।
युग-निर्माण के लिये धर्म मंच से रचनात्मक कार्य करने के लिये निम्न पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। इस माध्यम से जन-जागरण के लिये बहुत कुछ कार्य किया जा सकता है तथा जनता को सच्चे अर्थों में धार्मिक बनाया जा सकता है।
1- गीता-कथा
गीता सप्ताह के आधार पर आयोजित धर्मानुष्ठान में प्रवचन करने योग्य 12 प्रसंग। प्रत्येक में ढेरों पौराणिक, ऐतिहासिक कथाओं एवं दृष्टान्तों का समावेश है। प्रसंग की पुष्टि के लिए श्लोक, दोहे तथा रामायण के प्रसंग भी दिये गये हैं। सजिल्द, 34 पौंड बढ़िया कागज, बड़ा साइज, मूल्य 6) रु0।
2-गीता पद्यानुवाद
राधेश्याम तर्ज पर गीता के श्लोकों का अनुवाद, मूल श्लोकों सहित। गीता पारायण के लयबाजी के साथ सामूहिक गान के उद्देश्य से इसे बनाया गया है। सजिल्द, 34 पौंड ग्लेज बढ़िया कागज। बड़ा साइज। मूल्य 3)
3-अभिनव संस्कार पद्धति
सभी संस्कारों के मनाने की सरल सुविधाजनक एवं सर्वोपयोगी पद्धति। प्रत्येक संस्कार के का वर्णन है। जन्म दिन तथा विवाह दिन मनाने की पद्धति का विधि-विधान भी सम्मिलित है। संस्कार कराते समय क्या शिक्षा उस व्यक्ति को तथा उपस्थित लोगों को दी जानी चाहिए और उनका व्यक्तिगत जीवन किस प्रकार समुन्नत बनने की प्रेरणा मिलनी चाहिये इसका समुचित उल्लेख है। बढ़िया मोटा ग्लेज कागज। कार्डबोर्ड की जिल्द मूल्य 2॥)
4-पर्वों की प्रेरणा और पद्धति
प्रमुख त्यौहार पर्वों को सामूहिक रीति से मनाने का सरल विधि विधान। पर्व त्यौहारों में सन्निहित उन सिद्धान्तों शिक्षाओं तथा प्रेरणाओं का उल्लेख है जिसे उपस्थित लोगों को समझाकर उन्हें सामाजिकता की शिक्षा दी जा सके। समाज निर्माण का धार्मिक मंच से यह एक प्रभावपूर्ण प्रयास है। बढ़िया कागज, कार्डबोर्ड की जिल्द। मूल्य 2॥)
5-सामूहिक गायत्री हवन
सामूहिक गायत्री यज्ञ करने की आदि से अन्त तक सारी विधि व्यवस्था बहुत सरल और सुबोध ढंग से समझाई गई है। इस विधि से साधारण शिक्षा वाला व्यक्ति भी विधिवत् गायत्री यज्ञ भली प्रकार करा सकता है और जनता में अनेकों बुराइयों को छुड़ाने तथा अनेकों अच्छाइयाँ बढ़ाने की प्रेरणा कर सकता है। बढ़िया कागज कार्डबोर्ड की जिल्द। मूल्य 2)
6-सत्यनारायण कथा
प्रचलित सत्यनारायण कथा का मूल उपाख्यान ज्यों का त्यों रखते हुये भी उनके संवादों में नैतिक धार्मिक एवं बौद्धिक उत्कर्ष की बड़ी ही महत्वपूर्ण विचारधारा का समावेश कर दिया गया है। इसके आधार पर कहीं हुई कथा को सुनने वालों में जीवन निर्माण का एक नवीन दृष्टिकोण उत्पन्न हो सकता है। मूल्य 75 न. पै.।
दस रुपये से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
शक्तिवंत होकर ही आना जीवन के संग्राम में,
शौर्य तुम्हारे काम-काम में शक्ति तुम्हारे काम में,
संयम और शक्ति-संचय से कर लेना गठजोड़ रे,
आलस और अविद्या को तुम देना तोड़ मरोड़ रे,
आयें कितनी ही बाधायें उनको जाना झेल तुम।
हँसी-खुशी से सदा खेलना इस जीवन का खेल तुम॥
हृदय और अन्तस्तल अपना करना है विस्तीर्ण भी,
कोटि-कोटि अन्तःकरणों तक हों वह कीर्ण-प्रकीर्ण भी,
वातावरण विनिर्मित हो शुचि हास और उल्लास का,
हो प्रशस्त पथ फिर से मानव के उज्ज्वल इतिहास का,
आगत सत्य ज्ञान का स्वागत करना अपने द्वार पर।
नहीं लुटाना श्रद्धा अपनी छल या पापाचार पर॥
मुरझाई, सूखी धरती को फूलों का उपहार दो,
तुम मनुष्य हो तो मनुष्य को उन्नति शील विचार दो,
एक मनुज की सदा दूसरे से पावनतम प्रीति हो,
नहीं किसी के साथ भूल कर भी किंचित अनरीति हो,
मिटें परस्पर द्वेष, बन्धुता फैले इस संसार में।
बन्दी रहे न मानवता द्वंद्वों के कारागार में॥
अहंकार को आश्रय देना नहीं कभी भी भूल कर,
किसी सफलता पर इतराना भी न गर्व से फूल कर,
माटी-पानी का शरीर यह भी आखिर किस काम का,
अगर विश्व के परित्राण में काम न वह कुछ आ सका,
दुःखी देखकर असहायों की करना मत अवहेलना।
करना पर-उपकार यहाँ पर सौ-सौ दुःख भी झेलना॥
-बलराम सिंह परिहार
*समाप्त*