परमात्म-प्रेम से सम्पन्न जीवन ही धन्य है।

परमात्मा से प्रेम होना ही प्राणी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। परमात्मा में प्रीति होते ही प्राणी को सारी कामनायें परितृप्त हो जाती हैं। उसके दुख-दारिद्र्य प्रकाश की उपस्थिति में अन्धकार के समान दूर हो जाते हैं। प्राणी आत्म-तुष्ट हो जाता है। उसकी सारी क्षुद्रतायें मिट जाती हैं। जीवन में अनन्त और अक्षय सुख का सागर लहरा उठता है।

परमात्मा के प्रति प्रेम ही सच्चा प्रेम है अन्य सारे आकर्षण वासनायें हैं, जिनका सुख क्षणिक और परिणाम में दुःखकारक है। जिस प्रेम में अनन्तता, अक्षयता और निरपेक्षता न हो जो पवित्रता और सम रूपता से रहित हो वह प्रेम नहीं मोह है! वास्तविक और नित्य नवीनता वाला प्रेम केवल ईश्वर विषयक ही हो सकता है? संसार-विषयक नहीं!

परमात्मा के प्रति प्रेम रखने वाला अपने सच्चे स्वरूप को जान लेता है और अन्य प्राणियों की वास्तविकता को समझ लेता है जिससे उसके भीतर विश्व प्रेम की भावना जागृत हो जाती है।

परमात्मा के प्रति प्रेम रखने वाला जीवन के सत्य को पहचान लेता, आत्मा के दिव्य दर्शन कर लेता है और उसे एक ऐसी अहेतुकी परितृप्ति प्राप्त हो जाती है कि फिर किसी वस्तु की कामना नहीं रहती।

—महर्षि रमण


भगवान आपके अन्दर सोया है, उसे जगाइये

‘अओ नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः—”मैं अज, नित्य, शाश्वत एवं पुराण हूँ” यह आत्मा की अभिव्यक्ति है। जिसमें किंचित भेद भाव नहीं, जो मुक्त है, जिसमें किसी प्रकार का कोई विकार नहीं, अभाव रहित, सदा सर्वदा सर्वत्र सम्पूर्ण एक रस, एक रूप हूँ मैं, मेरा कभी परिवर्तन नहीं होता। नाना रूपों में मैं एक ही आत्मा विद्यमान हूँ।

परमात्मा ने ही आत्मा को आच्छादित कर रखा है यह कहें तो अत्युक्ति न होगी। आत्मा में जो भी शक्ति और प्रकाश है वह सब परमात्मा का ही स्वरूप है। परमात्मा मुझ से विलग कहाँ? वह मैं हूँ, मैं वह हूँ, कर्त्तापन की मित्रता है अन्यथा उसमें और मुझमें अन्तर नहीं। मैं और कुछ नहीं हूँ परमात्मा की उपस्थिति ही मेरे जीवन का कारण बनी है। वह मेरे साथ है इसलिये मैं जीवित हूँ। वह चला जायगा तो मैं भी चला जाऊँगा। मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व वह ब्रह्म ही है।

सृष्टि के प्रारम्भ में परमात्मा ने अनेक प्राणियों की रचना की पर सब अपूर्ण, सब अधूरे। किसी की शारीरिक शक्ति बड़ी थी, किसी का सौंदर्य सर्वोपरि था, कोई बोलता मधुर था, किसी को नृत्य कला अच्छी आती थी, कोई अधिक ऊँचाई तक उड़ सकता था किसी में अधिक दौड़ने की क्षमता थी। प्रवीण सब थे पर किसी एक ही विषय को लेकर। उपयोगी सब थे पर सर्वांगपूर्णता किसी में न थी। एक-दो गुण मिलते थे और बाकी एक दूसरे से भिन्न किसी में गुण किसी में अवगुण। यह विषमता संभवतः उसे रुची न होगी इसलिये उसने अलौकिक देह रचने का निश्चय किया होगा।

वह विलक्षण प्राणी मनुष्य है। इसमें बड़ी सूक्ष्मता और सावधानी से कार्य किया उसने। एक-एक कलपुर्जा कीमती से कीमती बनाया। बड़ी अजब शक्तियाँ पिरोईं उनमें। मनुष्य बनकर तैयार हुआ तो सृष्टिकार स्वयं चकरा गया। इस रचना पर उसे सबसे अधिक आश्चर्य हुआ।

सम्पूर्ण देव शक्तियाँ इसमें प्रविष्ट हुई। उन्होंने अपने अपने कार्य प्रारम्भ किए। अग्निदेव जागृत हुये तो भूख लगी, वरुण को जल की जरूरत पड़ी, किसी ने निद्रा माँगी, किसी ने जागृति। सब की अपनी दिशा थी, अपना काम था। इनमें पारस्परिक प्रतिद्वन्दिता न होती रहे और उनका नियन्त्रण बराबर किया जाता रहे इस दृष्टि से एक जबर्दस्त नियामक सत्ता की आवश्यकता जान पड़ी तो परमात्मा स्वयं उसमें समा गया। इस तरह इस अद्भुत मनुष्य जीवन का प्रादुर्भाव हुआ इस सृष्टि में। सृष्टि के अन्य प्राणियों का सरदार बना मनुष्य तो उसे भी नियन्त्रित रखने के लिये उसका भगवान भी उसके साथ रहने लगा ताकि आवश्यकता पड़ने पर उसकी सहायता भी की जा सकती और उसे दुराचरण या अधिकारों के दुरुपयोग से रोका भी जा सकता।

तब से अब तक मनुष्य निरन्तर एक प्रयोग के रूप में चलता आ रहा है। कभी वह गलती करता है तो उस अपराध के बदले सजा मिलती है और यदि वह अधिक कर्त्तव्यशील होता है तो उसे अधिक बड़े इनाम और अधिकार दिये जाते हैं। गलती का परिणाम दुःख और भलाई का परिणाम सुख। सुख और दुःख का यह अन्तर्द्वन्द्व आदि काल से चलता आ रहा है।

यदि मनुष्य के सम्पूर्ण ऐतिहासिक जीवन पर दृष्टि डालें तो ऐसा प्रतीत होता है कि जितना समय बीतता जाता है उसकी भलाई की शक्ति मरती जाती है और उसके अन्तर का असुर भाग बलवान होता जा रहा है। इसके फलस्वरूप उसके दुःखों में भी बढ़ोतरी होती जा रही है। वर्तमान युग इस स्थिति की पराकाष्ठा है यह कहें तो अतिशयोक्ति न होगी। आज लोगों में बड़ी दीनता है, लोग हीन और अभावग्रस्त हैं। यह झगड़ालू स्वार्थी और संकीर्ण प्रवृत्ति वाला हो गया है। मनुष्य का यह अधोगामीपन देखकर विश्वास नहीं होता कि उसमें अन्दर परमात्मा जैसी महत्वपूर्ण शक्ति का निवास हो सकता है। दुर्बल मनुष्य में सर्वशक्तिमान परमात्मा ओत-प्रोत हो सकता है इसकी इन दिनों कल्पना भी नहीं की जा सकती।

मनुष्य की दयनीय दशा का एक ही कारण है और वह यह है कि उसके अन्दर का भगवान् मूर्छित हो चुका है अथवा उसने अपनी मनोभूमि इतनी गन्दी बना ली है जहाँ परमात्मा का प्रखर प्रकाश संभव नहीं। यदि वह सचेत रहता, उसकी मानसिक शक्तियाँ प्रबुद्ध रहतीं, भलाई की शक्ति जीवित रहती तो वह जिन साधनों को लेकर इस वसुन्धरा पर अवतीर्ण हुआ है वे अचूक ब्रह्म-अस्त्र हैं। उसकी शक्ति वज्र से भी प्रबल है। सृष्टि का अन्य कोई भी प्राणी उसका सामना करने को समर्थ नहीं हो सकता। यह युवराज बन कर आया था। विजय, सफलतायें, उत्तम सुख, शक्ति शौर्य साहस निर्भयता उसे उत्तराधिकार में मिले थे। इनसे वह चिरकाल तक सुखी रह सकता था। भ्रम, चिन्ता, शंका संदेह आदि का कोई स्थान उसके जीवन में नहीं पर अभागे मनुष्य ने अपनी दुर्व्यवस्था आप उत्पन्न की। अन्तःकरण की ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा करने के कारण ही उसकी यह दुःखद स्थिति प्रकट हुई। अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने का अपराधी मनुष्य स्वयं है, इसका दोष परमात्मा को नहीं।

संसार के छोटे कहे जाने वाले प्राणी एक निश्चित प्रकृति लेकर जन्मते हैं और प्रायः अन्त तक उसी स्थिति में बने रहते हैं। इतना स्वार्थी मनुष्य ही था जिसे अपने साधनों से तृप्ति नहीं हुई और उसने दूसरों के स्वत्व का अपहरण करना प्रारम्भ किया। न्यायाधीश बनकर आया था पर स्वयं अन्याय करने लगा। ऐसी स्थिति में परमात्मा के अनुदान भला उसका कब तक साथ देते। ईश्वरीय गुणों से पथ-भ्रष्ट मनुष्य की जो दुर्दशा होनी चाहिये थी वही हुई। दुःख की खेती उसने स्वयं बोई और उसका फल भी उसे ही चखना पड़ा।

परमात्मा हमारे बड़े समीप बस कर प्रेम का संदेश देता है पर मनुष्य अपनी वासना से उसे कुचल देता है। वह अपनी सादगी, ताजगी और प्राण शक्ति से हमें सदैव अनुप्रणित रखने का प्रयत्न रखता है, पर मनुष्य आडम्बर, आलस्य और अकर्मण्यता के द्वारा उस शक्ति को छिन्न-भिन्न कर देता है। कालान्तर में जब आन्तरिक-प्रकाश की शक्ति क्षीण पड़ जाती है तो दुःख और द्व्रन्द के बखेड़े बढ़ जाते हैं। तब मनुष्य को औरों की भलाई करना तो दूर अपना ही जीवन भार रूप हो जाता है। परमात्मा की अन्तःकरण से वियुक्ति ही कष्ट और क्लेश का कारण, बन्धन का कारण है।

मनुष्य बड़ी बुद्धि विवेक और विचार वाला प्राणी है पर खेद है कि वह अपनी इन शक्तियों का उपयोग लौकिक कामनाओं और इन्द्रिय भोगों तक ही सीमित रखता है। इस अज्ञानान्धकार में ग्रसित मनुष्य को बड़ी शक्तियों का आभास भी नहीं होता इसीलिये वह कोल्हू के बैल की तरह एक सीमित दायरे का ही चक्कर काटता रहता है। उसे इतना भी पता नहीं होता कि हमारे शीश पर बड़ी शक्तियों का हाथ है और उनसे जीवन को सफल बनाने का आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।

मनुष्य समाज का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे अपनी गुप्त शक्तियों का आभास भी नहीं होता या वे उन्हें जानना ही नहीं चाहते यह एक बड़े आश्चर्य की बात है। अपनी दुर्बलताओं का भार लादे हुये जानवरों की तरह जीना ही उन्हें पसन्द होता है। घोड़े, बैल, हाथी या बकरी की पीठ पर अच्छी-अच्छी वस्तुयें लाद कर एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर ले जाते हैं पर बेचारे जानवरों को क्या पता कि उनकी पीठ पर कोई बहुमूल्य वस्तु रखी है। उनके लिये पीठ पर रखी कोई भी वस्तु भार-समान ही है और इसी रूप में वे उसे ढोते रहते हैं। अज्ञान में फँसे मनुष्य की भी स्थिति ठीक ऐसी ही होती है उनके लिये विचार, वाणी या विवेक का उतना ही महत्व है, जितना पीठ पर कीमती सामान रखने वाले घोड़े या हाथी की दशा होती है।

मनुष्य को असीम शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, नैतिक एवं आत्मिक सम्पदाओं से सुसज्जित कर इस भूतल पर भेजा गया है पार अपने प्रयोग का ढंग विपरीत हो जाने, उद्देश्य बदल जाने के कारण उन शक्तियों से लाभ तो कुछ मिलता नहीं अशान्ति, भय, घबराहट, चिड़चिड़ापन अस्थिरता, राग, द्वेष, घृणा स्वार्थ और ईर्ष्या का वातावरण और तैयार कर लेता है। आत्मविकास के लिये अपनी क्षमताओं को ईश्वरीय रूप में देखना था और उनका प्रयोग दिव्य तेज और स्फूर्ति की प्राप्ति के लिये किया जाना चाहिये था। ऐसा करने वाले मनुष्य का अपना जीवन सार्थक होता और दूसरों को भी आत्म-कल्याण की प्रेरणा मिलती।

आप अपनी मानसिक दुर्बलताओं का विश्लेषण किया कीजिये। देखिये क्या यह कामनायें और वासनायें अन्त तक आपका साथ देंगी। आप इस

पर जितना अधिक विचार करेंगे उतना ही वे तुच्छ प्रतीत होंगी और उनके प्रति आप के जी में घृणा उत्पन्न होगी। मानसिक दुर्बलतायें रुकेंगी तो आन्तरिक शक्तियों का प्रस्फुरण तीव्र होगा, आपके अन्दर का ईश्वरीय अंश बढ़ेगा।

ईश्वर दिव्य है वह आपके अन्दर दिव्यता लाना चाहता है। वह सत् है और वैसी ही प्रतिक्रिया आपके अन्दर चलाने की उसकी इच्छा होती है। आपके मन का मैल दूर ही तो आपका जीवन ईश्वरीय मनमोहकता, दिव्यता का आकर्षण केन्द्र बन जाय और उसकी सुवास से आपका सारा वातावरण महक जाय।

अपने भीतर समाविष्ट अमिट सत्य को पहचानिये, यह सत्य आपको संकीर्णता से मुक्त कर देगा। संसार की बदलती हुई गतिविधियों से, शरीर के नाना प्रकार के रूपों से तब आप दुःखी और विक्षुब्ध न होगे। आपका जीवन हास्ययुक्त, चहकता और दमकता हुआ रहेगा। मूल बात आत्म-चेतना को पहचानना है जिससे आप मन को तमोगुण से बचा सकते हैं और मनुष्य जीवन को आनन्दमय बना सकते हैं।

वह परमात्मा तेजस्वी, प्रकाशवान् और सम्पूर्ण मानसिक पीड़ाओं को नष्ट करने वाला है। उसे विकसित करने में ही आपका कल्याण है। भगवान् कृष्ण ने कहा है—

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमद्र्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मन तेजोऽशसम्भवम्॥

(गीता10 । 41)

हे अर्जुन! इस जगत में जो कुछ भव्य, तेजस्वी तथा ऐश्वर्यवान् प्रतीत होता है वह मेरे ही तेज का अंश है। जो अपने अन्दर मुझ दैवी चेतना का अनुभव करते है मैं उनके बन्धन काट देता हूँ।”


अमर हो तुम, अमरत्व को पहचानो

पिता के वंश, ऐश्वर्य, गुण शक्ति और सामर्थ्य के अनुरूप बालक अपने जीवन स्तर का निर्माण प्रारम्भ करता है। उसके स्वाभिमान, रहन-सहन, खान-पान, वेष-भूषा में पिता की आत्म-स्थिति का अधिकाँश प्रभाव होता है। धनी पिता का पुत्र सुन्दर वस्त्र पहनता है, अच्छा खाना खाता है, चलने, यात्रा करने में भी उसकी शान-शौकत अन्यों से भिन्न होती है। जैसा बाप करता है प्रायः उसी का अनुकरण बेटे किया करते हैं।

भिखारी के बेटे को स्थिति भिखारी जैसी होती है। फटे कपड़े अस्त-व्यस्त बाल, रूखा शरीर सब कुछ ठीक भिखारियों जैसा। इससे अधिक शान का जीवन बिताना भला वह भिखारी का बालक क्या जान सकता है जिसने जीवन में न अच्छा भोजन देखा हो, न अच्छे वस्त्र पहने हों और न आलीशान मकान में रहने का सौभाग्य ही मिला हो। शील, गुण और आचरण अधिकाँश व्यक्तियों को पैतृक सम्पत्ति के रूप में ही मिला करते हैं।

यह उत्तराधिकार मनुष्य को भी ठीक इसी रूप में मिला है। परमात्मा का पुत्र होने के नाते उसे वह सारी निधियाँ मिली हैं जिनसे वह साँसारिक जीवन सुख, सुविधा और शान के साथ बिता सकता है। परमात्मा के जो गुण और शक्तियाँ बताई जाती है वह मनुष्य में—आत्मा में भी ठीक उसी तरह सन्निहित हैं। ऐसे कोई अधिकार शेष नहीं जो ईश्वर ने अपने युवराज को न दिये हों। वह अपने बेटों को निराश्रित, निरीह और निर्बल कैसे देख सकता था। अपनी सम्पूर्ण शक्तियों का अनुदान उसने अपने बेटे - मनुष्य को दिया ताकि वह इस संसार में उल्लास का जीवन जी सके। स्वयं सुख भोगकर आने वालों को भी वैसा ही उत्तराधिकार सौंपता हुआ जा सके।

आत्मदर्शी ऋषियों की लेखनी आत्मा की महत्ता प्रतिपादित करते हुये थक गई पर कथानक पूरा न हो पाया। शक्तियों की सीमा को “नेति-नेति” कहकर पुकारना पड़ा क्योंकि वे वर्णन भी कब तक करती। कुछ वर्षों के जीवन में यही हजार, दो हजार पुस्तकों में आत्म-सत्ता की महत्ता लिख जाते इससे अधिक और हो भी क्या सकता था? अनन्त शक्ति सम्पन्न आत्मा का गुणानुवाद आखिर कब तक गाया जाता।

किन्तु आज के मनुष्य की दीन-हीन स्थिति देखकर लगता है शास्त्रकार अतिशयोक्ति कर गये हैं, कुछ का कुछ लिख गये हैं। परमात्मा पूर्ण वैभव सम्पन्न है पर मनुष्य के पास पेट भरने के और सुख से रहने के भी साधन नहीं। परमात्मा विश्वदर्शी है पर मनुष्य अपने आपको भी नहीं जानता। परमात्मा असीम शक्तिशाली है पर मनुष्य तो छोटे-छोटे कार्यों के लिये भी औरों का मुँह ताकता है। किसी भी गुण राशि में तो उसका और परमात्मा का मेल नहीं खाता, फिर विश्वास कैसे किया जाय कि मनुष्य परमात्मा का पुत्र है, अमृत-तत्व का उत्तराधिकारी युवराज है।

वस्तुतः आपकी शक्ति अपार है, आपके गुण अनन्त है, आपकी क्षमता असीम है पर यह है उत्तराधिकार रूप में ही। परमात्मा सम्पूर्ण विश्व का पालनकर्त्ता, सर्व-रक्षक सबका भरण-पोषण करने वाला है इसलिये उसे भी यह सतर्कता बरतनी पड़ी कि वह अपनी शक्तियाँ योग्य हाथों में सौंपे और उसे भले कार्यों में प्रयुक्त हुआ देखे। जब कोई ऐसा उत्तराधिकारी व्यक्ति उसे दिखाई दे जाता है तो अपनी तिजोरी की चाबी भी उसे सौंप देता है। अयोग्य व्यक्तियों को वह अपनी शक्तियाँ देकर उनका दुरुपयोग होता कैसे देख सकता था? उत्तराधिकार तो किसी अच्छे व्यक्ति को ही दिया जाता है।

एक पिता की कई सन्तानें होती हैं। कोई कपटी, कोई चोर, कोई लवार। कई उनमें से शील स्वभाव, गुणवान् और आज्ञाकारी भी होते हैं। पिता बड़ी सावधानी से उन सबका निरीक्षण करता रहता है और जिसे योग्य समझता है उसे गृहस्थी का भार सौंपने, सारा धन दे जाने में प्रसन्नता अनुभव करता है। जो उसकी शान, ऐश्वर्य और वंश परम्परा से विमुख होकर अकृत्य करता है उसे देता तो कुछ नहीं, उल्टे उसे दण्ड और भुगतना पड़ता है।

साधारण मनुष्यों की जब यह दशा होती है तो परमात्मा को अधिक कड़ाई, अधिक सावधानी रखना आवश्यक थी, क्योंकि उसका कार्य क्षेत्र भी तो बहुत बड़ा है सारे संसार में उसी के बेटे तो विचरण कर रहे हैं।

साधारण मनुष्य का बेटा जब अपने पिता की सम्पत्ति का स्वामित्व पाता है तो उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। सब के सामने अकड़ कर, शान के साथ चलता है। न उसे किसी का भय होता है और न कोई अभाव। तो फिर जिसे परमात्मा का उत्तराधिकार मिल जाय तो उसकी प्रसन्नता, निर्भयता, वैभव तथा ऐश्वर्य का तो कहना ही क्या। वह चाहे तो सारे संसार के सामने ऐंठ कर, अकड़कर चल सकता है। उसे भय और अभाव हो भी कहाँ सकता है?

मनुष्य स्वभावतः अधोगामी है इस दृष्टि से यह नियन्त्रण रखना जरूरी भी था। पर ईश्वर न्यायकारी भी है उसने आत्म-कल्याण का मार्ग किसी के लिये भी अवरुद्ध नहीं किया। वह साधन सबको समान रूप से मिले जिनके माध्यम से मनुष्य, अपने लौकिक तथा पारलौकिक दोनों प्रकार के उद्देश्य पूरे कर लेता।

वायु, जल, प्रकाश, मेघ आदि का उपभोग सब समान रूप से करते हैं। पापी विचार, अनुभव, स्मृति, दर्शन, श्रवण आदि के साधन भी प्रायः सभी को एक समान ही मिले हैं। इनके द्वारा मनुष्य यदि चाहता तो आत्म-विकास कर सकता था, पर उसने किया कहाँ? सब कुछ देखते हुये भी मनुष्य अज्ञानी बना रहा। घटनायें कई बार घटीं, घटती रहती हैं पर उसने कभी विचार करना नहीं चाहा। इसी कारण वह अपनी वर्तमान स्थिति से ऊपर उठ भी नहीं सका।

लोग कहा करते हैं कि जीव जब माता के गर्भ में बन्दी की-सी स्थिति में बड़ा होता है तब यह परमात्मा से अनेक प्रकार की विनती करता है। वह चाहता है कि इस जन्म-मरण के फन्द से जितनी जल्दी छुटकारा मिले, बन्धन मुक्ति मिले उतना ही अच्छा है। इसके लिये वह तरह-तरह की प्रार्थनायें करता है किन्तु जन्म लेने के बाद इस संसार की हवा लगते ही वह सब भूल जाता है और फिर वही शिश्नोदर परायण जीवन जीने में लग जाता है।

लोगों की भूल यह है कि वे अपने आप को ईश्वर का पुत्र होना स्वीकार करना नहीं चाहते। विज्ञान का सहारा लेकर लोग प्रत्यक्षवाद की दुहाई देते हैं किन्तु यह खुला हुआ संसार क्या कम प्रत्यक्ष है, मृत्यु जन्म की घटनायें कम प्रत्यक्ष हैं? जन्म जरा और यौवन का पाना और खो देना भी किसी को विचार प्रदान नहीं कर सकता क्या?

ईश्वर का पुत्र होने के नाते मनुष्य असीम आध्यात्मिक शक्तियों और दैवी सम्पदाओं का स्वामी बन सकता है किन्तु वह अपने को इस स्थिति वाला मानता कब है? अपनी इस धृष्टता के कारण यह मनुष्योचित आचार से भी पतित होकर दुष्कर्म करता है अपने स्वार्थ के लिए औरों के अधिकारों का अपहरण करता है। खुद का पेट भरे दूसरे चाहे भूख से मर जायें, अपना घर भर जाय दूसरे चाहे कानी कौड़ी के लिये तरसते रहें। इतना ही नहीं वह अपने से गई-गुजरी स्थिति वालों के साथ पैशाचिक उत्पीड़न करता है, दूसरों का खून पीता और अट्टहास करता है। ऐसे दुष्ट पुत्र को परमात्मा अपनी शक्तियाँ देता कैसे? उसे तो दण्ड ही मिलना चाहिये था और वही मिलता भी है।

स्वार्थ और संकीर्णता की दुष्प्रवृत्तियों के रहते हुए मनुष्य परमात्मा का उत्तराधिकारी कैसे बन सकता है? उसे चाहिये था कि वह पैतृक गुणों को आधार मानकर चलता और अपने आप को ईश्वर का पुत्र होना स्वीकार कर ईश्वरीय आदेशों का पालन करता। ईश्वर शक्ति का स्रोत है उससे सम्बन्ध स्थापित करता तो मनुष्य का जीवन, शक्ति सम्पन्न हो जाता। परमात्मा की विशेषतायें उसमें भी परिलक्षित होतीं।

हमारा शाश्वत स्वरूप पीछे पड़ गया है और हम अपने आप को मनुष्य का शरीर मान बैठे हैं, इसीलिये शारीरिक सुखों तक ही सीमित भी हैं। शरीर में इन्द्रियों के सुख हैं सो मनुष्य उन्हें ही भोगने का हर घड़ी इच्छुक बना रहता है। सुख की इस इच्छा में वह अपने विज्ञानमय स्वरूप को भूल जाता है। जब तक शरीर रूपी साधन अपनी प्रौढ़ अवस्था में रहता है तब तक भोगों की आसक्ति में पड़े रहते हैं और इस बीच अपनी असफलता का दोष औरों के मत्थे मढ़ना सीख जाते हैं और इस तरह सन्तोष करना चाहते हैं पर शाश्वत नियम कभी बदलते नहीं। समय पर वृद्धावस्था आनी ही थी, शरीर दुर्बल पड़ना ही था, मौत को आना ही था, उस समय न किसी को दोष देते बनता है न कुछ किये होता है। दुःख की स्थिति में, अज्ञान की स्थिति में वह मर जाता है और बार-बार इसी चक्कर में पड़ा दुःख भोगता रहता है।

परमात्मा की सृष्टि में सुख ही सुख है। दुःख का नाम भी नहीं है पर सारे फसाद की जड़ यह है कि लोग अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना नहीं चाहते। बेटा अपने धनी बाप से बिछुड़ गया है और अपने आप को निर्धन की-सी स्थिति में पड़ा हुआ अनुभव करता है। उसका शरीर, प्राण और मन सब अस्त-व्यस्त है क्योंकि वह जानता भी नहीं कि उसका बाप कितना व्यवस्थित, कितना विकसित और कितना विशाल है। अपने अमर स्वरूप को मनुष्य पहचान जाय तो यह विशेषतायें उसमें भी तत्काल परिलक्षित होने लगें।

दुधारू गाय की बछिया भी दुधारू होती है। मीठे आम की नस्ल में उत्पन्न किया हुआ आम भी उसी गुण वाला होता है। सन्तरे के पेड़ में नीबू के फल नहीं लगते। अपने अमर स्वरूप में मनुष्य भी ईश्वरीय गुणों से ओत-प्रोत है किन्तु उसकी यह महानता अज्ञानता के अन्धकार में छिपी हुई है। मनुष्य अपने पिता परमात्मा के गुण, ऐश्वर्य और वैभव के अनुरूप अपना जीवन क्रम बनाता तो उसकी शक्तियाँ भी छिपी हुई न रहतीं और वह भी अपने आप को अपने पिता के सदृश ही सत्-चित् और आनन्द रूप में पाता।

आप अपने आप को रक्त , माँस, अस्थि, मज्जा, मेदे आदि से बना हुआ क्षुद्र शरीर मत मानिये। आप आत्मा हैं। इस तथ्य को भली भाँति समझ लें। आत्मा अपने अमरत्व को पहचानने के लिये ही मनुष्य शरीर में अवतरित हुई है। उसे इस उद्देश्य को पूरा करना ही चाहिये। अमरत्व का आनन्द लूटना ही चाहिये। इस उद्देश्य के लिये वह अग्रसर हो तो सचमुच उसका यह अलभ्य अवसर पाना भी सार्थक हो।


सेवा ही सच्ची भगवद्भक्ति है।

विद्वानों ने जन सेवा तथा परोपकार को जो भगवद्भक्ति कहा है वह ठीक ही है। जिस मनुष्य के हृदय में जन जन के लिये प्रेम का प्रवाह बह रहा होगा वही जन सेवा में प्रवृत्त होगा। उसके हृदय में निवास करने वाला यह प्रेम ही परमात्मा रूप है। जन-सेवा के माध्यम से मनुष्य इसी हृदयस्थ प्रेम को परितृप्त करता है, और इस प्रकार वह परमात्मा को ही भक्ति करता है।

इसके अतिरिक्त जन-जन परमात्मा-रूप है। संसार में मात्र मनुष्य ही क्या सारे जड़ चेतन उसी एक का रूप हैं। किसी की सेवा करने वाला व्यक्ति वास्तव में हाड़ माँस से बने किसी के शरीर की सेवा नहीं करता बल्कि देह के माध्यम से उसकी उस आत्मा को ही परितृप्त करता है जो परमात्मा का प्रतिनिधि स्वरूप है। अपने प्रेम और दूसरे की आत्मा को तुष्ट करके मनुष्य एक से परमात्मा की दुहरी उपासना ही करता है, दुहरा पुण्य प्राप्त करता है।

सेवा करने का अपना महत्व है किन्तु सेवा के स्वरूप का भी महत्व कम नहीं है। कौन सेवा, जनता जनार्दन के माध्यम से, परमात्मा की वास्तविक सेवा है और कौन सी नहीं? वह सेवा जिसमें मनुष्य का कोई स्वार्थ निहित होता है, चाहे वह स्वार्थ स्थूल हो अथवा सूक्ष्म, प्रत्यक्ष हो अथवा परोक्ष, सेवा की उस कोटि में नहीं आती जिसे भगवद्भक्ति कहा जाता है।

यदि प्रत्येक सेवा को भगवद्भक्ति की संज्ञा दी जाती है तो स्वामी सेवा, सरकारी सेवा, भय लोभ अथवा दबाव जन्य सारी सेवायें भगवद्भक्ति ही मानी जायेंगी। किन्तु ऐसा नहीं है। एक मात्र निःस्वार्थ, निष्कपट और अहेतुकी सेवा ही भगवद्भक्ति की कोटि की मानी जायेगी।

बहुत सी ऐसी सेवायें भी हो सकती हैं जो उपर्युक्त विचारों से मुक्त होने पर भी भगवद्भक्ति की कोटि में नहीं आतीं। जैसे किसी की सेवा करते समय विषमता का भाव होना, घृणा अथवा जुगुप्सा की गंध होना, अपने को अपदस्थ अथवा तुच्छ समझना। सेवा कर्म पर यह कतिपय आरोपण भी सेवा-सत्कर्म को उसकी पुण्यवती स्थिति से भिन्न कर देते हैं। सेवा कर्म में निःस्वार्थता ही नहीं निर्मोहता की भी आवश्यकता है। सेवा का यह शाश्वत स्वरूप है,जो त्रिकाल में अपनी महान पुण्य-पदवी पर प्रतिष्ठित रहता है।

इसी क्षेत्र में सेवा की विविध श्रेणियाँ हैं। प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय। प्रथम श्रेणी की सेवा वह है जिससे किसी को स्थायी सुख लाभ हो। द्वितीय श्रेणी की सेवा वह है जिससे किसी का दीर्घजीवी दुख दूर हो और तृतीय श्रेणी की सेवा वह है जिससे किसी की सामयिक आवश्यकता अथवा आपत्ति दूर हो।

इन श्रेणियों में ज्ञान दान की सेवा प्रथम श्रेणी की है, क्योंकि ज्ञानालोकित किया हुआ मनुष्य संसार के समस्त दुःखों से छूट जाता है। न उसे शारीरिक कष्ट सताता है, न मानसिक और न आर्थिक। वह सारे कष्ट क्लेशों से एक साथ ही मुक्त होकर चिदानन्दमय हो जाता है। ऐसी ज्ञान मूलक सर्वांगीण सेवा का श्रेय उन ऋषि, मुनियों और संत महात्माओं को सबसे अधिक प्राप्त हुआ, जिन्होंने अज्ञानान्धकार में भटकती हुई मानवता को प्रकाश का पथ दिखाया। इन महात्माओं में वे संत और भी शाश्वत श्रेय और चिरन्तन पुण्य के अधिकारी हुए जिन्होंने मानवता को सही रास्ता दिखलाने में अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया और मनुष्यों द्वारा मारे जाते समय भी उन्हीं के कल्याण की कामना की और आशीर्वाद दिया।

ज्ञान दान में भी मनुष्य को परमात्मा की ओर अधिकाधिक उन्मुख करना ही श्रेयस्कर सेवा है। जो व्यक्ति जितने व्यक्तियों को उस प्रभु की ओर अग्रसर करता है वह मानो उतनी ही संख्या में उतने ही रूपों में एक साथ परमात्मा की सेवा करता है। परमात्मा की ओर उन्मुख व्यक्ति अपने इस कर्तव्य का जो पुण्य पाते हैं वह तो पाते ही हैं, इसके अतिरिक्त प्रेरणा देने वाला प्रेरितों की संख्या के अनुसार ही एक अकेले ही उतने पुण्य फलों का भागी बनता है। अस्तु, परमात्मा की ओर ले जाने वाला ज्ञान दान करना सर्वोपरि सेवा है, सर्व श्रेष्ठ भगवद्भक्ति है।

द्वितीय श्रेणी की सेवा के अंतर्गत वे सेवायें आती है जिनसे किसी का दीर्घजीवी दुःख दूर हो। सहानुभूति तथा सहृदयता द्वारा किसी का शोक हरना, किसी निराश को उत्साहित करना, किसी की बिगड़ती हुई स्थिति सँभालने में सहायता करना, किसी निरपराध की रक्षा करना, किन्हीं दो की शत्रुता मिटाना और वैमनस्य दूर करना तथा किन्हीं अनाथ अथवा निराश्रितों को आश्रय देना आदि-इस प्रकार की सेवाओं से एक दीर्घकाल तक कष्ट पाने वाला जीवन भी प्रकाश की किरण पा लेगा, जिससे उसकी आत्मा आजीवन उपकारी को शुभाशीष देती रहेगी।

इस प्रकार की सेवाओं में जहाँ वैयक्तिक हित होता है वहाँ एक प्रकार से समाज का भी हित साधन होता है। सहायता, सौहार्द एवं सहानुभूति के आधार पर जिन व्यक्तियों का दुःख दूर किया जायेगा उनमें मानवता पूर्ण सामाजिकता की चेतना आयेगी वे परस्पर सहायता एवं सहयोग आदि मानवीय गुणों का महत्व समझेंगे, जिससे उनका मानसिक विकास होगा और वे दूसरों की सेवा में भी प्रवृत्त होंगे! इस प्रकार अच्छे नागरिकों की वृद्धि से सामाजिक वातावरण में एकात्मकता का सन्निवेश होगा!

किसी को अन्धकार से निकाल कर जीवन के प्रकाश पथ पर लाना हृदय में सहृदयता तथा सहानुभूति के भाव पैदा करना भी भगवद्भक्ति ही हैं। अपने अथवा किसी दूसरे में सद्गुण उत्पन्न करना भी एक आध्यात्मिक कार्य है। सद्गुण उत्पन्न करना भी एक प्रकार से परमात्मा की ओर ही उन्मुख होना है।

ऐसी सेवाओं को द्वितीय श्रेणी में इसलिये लेना होगा कि जीवन प्रकाश पाकर लोग साँसारिकता तक ही सीमित रह सकते हैं। सम्भव है कि उनका दृष्टिकोण विशुद्ध आध्यात्मिक और पारमार्थिक न हो!

आवश्यकता आ पड़ने पर किसी की आर्थिक सहायता करना, किसी रोगी के उपचार का प्रबंध कर देना, किसी विद्यार्थी की फीस दे देना, किसी को छोटा मोटा काम करा देना, स्मारक रूप में विद्यालय, धर्मशाला, गौशाला, अनाथालय आदि बनवा देना तृतीय श्रेणी को सेवायें हैं। इस प्रकार से किसी की सामाजिक आवश्यकता तो पूर्ण हो सकती है, तात्कालिक असुविधा दूर हो सकती है, किन्तु कोई स्थायी आत्मिक अथवा मानसिक विकास नहीं होता।

इस प्रकार की सेवाओं की पृष्ठभूमि में किसी सक्षम व्यक्ति की उदारता, दया अथवा सहानुभूति रह सकती है, किन्तु वह भी स्थायी नहीं आकस्मिक अथवा तात्कालिक! संस्थाओं अथवा सुविधा व आश्रय भवनों के निर्माण में तो बहुधा लोगों की दिखाने की वृत्ति, लोकेषणा अथवा अहंकार का भाव ही रहता है!

यद्यपि इस प्रकार की भावना के साथ कोई भी सेवा बहुत सराहनीय अथवा श्रेयस्कर नहीं है तथापि सामाजिक दृष्टि से इनका भी अपना महत्व है! अनुकरण करके अन्य लोग भी इस प्रकार के कार्य करने के लिये उत्साहित हो सकते हैं। सुविधा पाने वाले व्यक्तियों को समाज के प्रति आस्था एवं श्रद्धा हो सकती है। शिक्षा-संस्थाओं द्वारा विद्या का प्रचार होता है और विद्यार्थियों में से किसी भी अच्छे और ऊँचे महात्मा के निकल आने की सम्भावना रह सकती है! विशुद्ध भगवद्भक्ति न होने पर भी इस प्रकार की सामाजिक एवं सार्वजनिक सेवाओं का भी अपना मूल्य और महत्व है! सम्भव है इनसे लोग आध्यात्मिकता की ओर अधिक न बढ़ें किन्तु सामाजिकता की ओर बढ़ने की प्रेरणा तो पा ही सकते हैं।

सभी प्रकार की सेवाओं का महत्व तथा आवश्यकता है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने क्षेत्र, अपनी सीमा तथा क्षमता के अनुसार कुछ न कुछ सेवा कार्य अवश्य करना चाहिये। सेवा के हजारों प्रकार हो सकते हैं। यह प्रत्येक कार्य सेवा ही है जिससे प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष किसी भी रूप में संसार का दुख दर्द दूर हो और हितकारी परिस्थितियाँ उत्पन्न हों। यदि व्यापक दृष्टि से विचार किया जावे तो संसार में क्या समर्थ और क्या असमर्थ, सभी को एक दूसरे की सेवा की आवश्यकता है। संसार में जो कुछ भी व्यापार व व्यवहार हो रहा है वह सब एक दूसरे की सहायता से चल रहा है! सेवा का एक अर्थ पारस्परिकता भी हो सकता है! यदि नित्य प्रति के सामान्य व्यापार तथा व्यवहार से स्वार्थ, संकोच छल कपट निकाल दिया जाये तो यह माना जायेगा कि संसार का प्रत्येक व्यक्ति मानवता की निष्काम सेवा ही करता है।


गाथा इस देश की, गाई विदेशियों ने

भारतवर्ष की शक्ति और समृद्धि, ज्ञान और गुरुत्व विश्व-विख्यात है। प्राचीनकाल की श्रेष्ठतम उपलब्धियों से भरपूर साहित्य और इतिहास हमें प्रतिक्षण उस गौरवपूर्ण अतीत की याद दिलाता है। पूर्वजों की आत्माओं का प्रकाश अब भी इस देश के कण-कण को जागृति का सन्देश दे रहा है। वह बात हर एक नागरिक के हृदय में समाई हुई है, वह आत्माभिमान अभी तक मरा नहीं। किन्तु काल के दूषित प्रभाव के कारण आज आर्य-जाति सब तरह से दीन-हीन बन चुकी है। अब उसका कदम केवल विनाश की ओर ही बढ़ रहा है। जानते हुये भी हम अपनी पूर्व प्रतिष्ठा को भुलाये बैठे हैं। हमारी गाथायें विदेशों में बिक गईं। हमारे ज्ञान की एक छोटी-सी किरण पाकर पाश्चात्य देश अभिमान से सिर उठाये खड़े हैं और हम अपने पूर्वजों की शान को भी मिट्टी में मिलाने को तैयार है।

कठोर बनने का कोई उद्देश्य नहीं है। कटु बात कहकर अपनी ही आत्मा के कणों का जी दुखाना नहीं चाहते किन्तु जो दुर्गति हमारी संस्कृति की इन दिनों हो रही है उसे देखकर हृदय में सौ-सौ बरछों का-सा प्रहार लग रहा है। आत्मा की इस आवाज को कोई धर्माभिमानी, राष्ट्र-हितैषी तथा जाति के गौरव के लिये प्राण अर्पण करने वाला ही समझ सकता है।

आर्य संस्कृति का या हिन्दू धर्म का नाम उल्लेखन करने में साम्प्रदायिक संकीर्णता का भाव नहीं आना चाहिये। हमारी संस्कृति दिव्य-संस्कृति है। उसमें प्राणिमात्र के हित की व्यवस्था है। यह उद्बोधन केवल इसलिये है कि उस चिर-सत्य का प्रादुर्भाव केवल इसी भूमि में हुआ है इसी से हम उसे एक विशेष सम्बोधन से विभूषित करते हैं अन्यथा हिन्दू-धर्म का क्षेत्र सम्पूर्ण विश्व है। काउन्ट जोन्स जेनी ने इस बात को स्पष्ट करते हुये बताया है—”भारतवर्ष केवल हिन्दू धर्म का ही घर नहीं है वरन् वह संसार की सभ्यता का आदि भंडार है।”

“संसार में भारतवर्ष के प्रति लोगों का प्रेम और आदर उसकी बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक सम्पत्ति के कारण है।” यह शब्द प्रो॰ लुई रिनाड ने व्यक्त किये हैं। इन शब्दों से भी यही तथ्य प्रकाशित होता है कि भारत समग्र विश्व का है और सम्पूर्ण वसुन्धरा इसके प्रेमपाश में आबद्ध है। अनादि काल से धर्म की, संस्कृति और मानवता की ज्योति यह विकीर्ण कर रहा है। धरती की अनुपम कृति यह देश भला किसे प्यारा न होगा। भारतवर्ष ने जो आध्यात्मिक विचार इस संसार में प्रसारित किये हैं वे युग युगान्तरों तक अक्षुण्ण रहने वाले हैं। उनसे अनेक सुषुप्त आत्माओं को अनन्त काल तक प्रकाश मिलता रहेगा। भारतीय संस्कृति के प्रवाह का उद्गम वे चिन्तन, शाश्वत और सनातन सत्य रहे हैं जिनकी अनुभूति ऋषियों ने प्रबल तपश्चर्याओं के द्वारा अर्जित की थी, वह प्रभाव धूमिल भले ही हो गया हो किन्तु अभी तक भी लुप्त नहीं हुआ है।

धार्मिक, आध्यात्मिक एवं नैतिक क्षेत्र में ही हम सर्वसम्पन्न नहीं रहे वरन् कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं छूटा जहाँ हमारी पहुँच न रही हो। आध्यात्मिक तत्व ज्ञान के अतिरिक्त सामाजिक, व्यावहारिक तथा अन्य विद्याओं के ज्ञान विज्ञान में भी हम अग्रणी रहे हैं। अपनी एक शोध में डॉ. थीवो ने लिखा है कि “संसार, रेखागणित के लिये भारत का ऋणी है यूनान का नहीं।” प्रसिद्ध इतिहासज्ञ प्रो. बेवर का कथन है—”अरब में ज्योतिष विद्या का विज्ञान भारतवर्ष से हुआ।” कोलब्रुक ने बताया है कि “कोई अन्य देश नहीं, चीन और अरब को अंकगणित का पाठ पढ़ाने वाला देश भारतवर्ष ही है।”

यूनान के प्राचीन इतिहास का दावा है कि “भारत के निवासी यूनान में आकर बसे। वे बड़े बुद्धिमान, विद्वान और कला-कुशल थे। उन्होंने विद्या और वैद्यक का खूब प्रचार किया। यहाँ के निवासियों को सभ्य और विश्वासपात्र बनाया।” निःसन्देह इतना सारा ज्ञान अगाध श्रम शोध और लगन के द्वारा पैदा किया गया होगा। तब के पुरुष आलस्य, अरुचि, आसक्ति , अहंकार आदि से दूर रहे होंगे तभी तो वह तन्मयता बन पाई होगी जिसके बूते पर इतनी सारी खोज की जा सकी होगी। दुर्भाग्य की बात है कि आज वही भारतवर्ष विदेशियों के अनुकरण को ही अपनी शान समझता है। इस कार्य में जो जितना अधिक निपुण है उसे उतनी ही सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है।

विश्व के विविध विषयों के जब आँकड़े प्रस्तुत किये जाते हैं तो यह देखकर तीव्र वेदना होती है कि उनमें भारतवर्ष पिछड़ी श्रेणी में आता है। शिक्षा के क्षेत्र में हम सबसे कमजोर, भारतीयों की औसत आय संसार में सबसे कम, आरोग्य के नाम पर सबसे दुःखी, दुर्बल और रोगग्रस्त; आहार में सबसे कम कैलोरी वाला, निर्धनता में सबसे पहले दर्जे का। अवनति की कोई हद नहीं। कोई क्षेत्र नहीं छूटा जहाँ मात न खाई हो। क्या वह समृद्धि हम फिर से देख सकेंगे जिसका वर्णन प्रसिद्ध यूनानी विद्वान एरियन ने इस तरह किया है-

“जो लोग भारत से आकर यहाँ बसे थे वे कैसे थे? वे देवताओं के वंशज थे, उनके पास विपुल सोना था। वे रेशम के कामदार ऊनी दुशाले ओढ़ते थे। हाथी दाँत की वस्तुयें व्यवहार में लाते थे और बहुमूल्य रत्नों के हार पहनते थे।”

जो विध्वंसक विज्ञान और एटमी हथियार इन दिनों बन रहे हैं उनसे भी बड़ी शक्ति वाले आयुध यहाँ वैदिक युग में प्रयुक्त हुये हैं। सरस्वती की उपासना के साथ साथ शक्ति की भी समवेत उपासना इस देश में हुई है। अथर्ववेद में अनेक स्थानों पर जो “अशनि” शब्द का प्रयोग हुआ है उसका अर्थ आजकल की भीमकाय तोपों जैसा ही है। प्रोफेसर विल्सन का कथन है—”गोलों का आविष्कार सबसे पहले भारत में हुआ था। यूरोप के संपर्क में आने के बहुत समय पहले उनका प्रयोग भारत में होता था।”

कर्नल रशब्रुक विलियम ने एक स्थान पर लिखा है—

“शीशे की गोलियाँ और बन्दूकों के प्रयोग का हाल विस्तार से यजुर्वेद में मिलता है। भारतवर्ष में तोपों और बन्दूकों का प्रयोग वैदिक काल से ही होता था।”

डफ महोदय लिखते हैं—”भारतीय विज्ञान इतना विस्तृत है कि यूरोपीय विज्ञान के सब अंग वहाँ मिलते हैं।”

कहाँ तक गिनायें, ऐसे आख्यानों से यूरोप का इतिहास भरा पड़ा है। फ्रेडरिक शेलिग, प्रो॰ मैक्समूलर, रोम्या रोलाँ, एम लुई जिकोलिएट, विक्टर कोसिन आदि अनेक विद्वानों तथा दार्शनिकों ने मुक्त कंठ से भारतीय गरिमा की प्रशंसा की है। जो भी इस संस्कृति के प्रभाव में आया उसी का मन इसे देख कर मोह गया। भारतीयों की सहृदयता, धर्म, श्रद्धा और ईश्वर विश्वास के आगे संसार नत-मस्तक हो जाता है।

वह ज्ञान, वह गौरव, विज्ञान, कला समृद्धि और संस्कृति सबका सब इस देश के गर्भ में अभी भी विद्यमान है। वह खोजें दृढ़ हैं, निरर्थक या लोप नहीं हुईं। उन विद्याओं का अस्तित्व अब भी विद्यमान है और यह प्रतीक्षा किया करता है कि कोई आये और हमारे अनन्त भंडार में से जितना मन चाहे, बटोर ले जाय। किन्तु कहाँ है वह साहस? उस तन्मयता को क्या हो गया? कहाँ है वे कर्मवीर जो राष्ट्र के गौरव को फिर से ऊँचा उठा सकें।

हमने एक परिभाषा सीख ली है-”पतन की परिभाषा।” नशे में झूमते हुये व्यक्ति को जैसे खुद का भी होश-हवास नहीं रहता ठीक उसी तरह हो गये हैं हम! हमारी रगों में विदेशीपन का, बनावट का नशा छा गया है। अपने साँस्कृतिक गौरव को भूल चुके हैं। तभी दिनों-दिन हमारी दुर्गति बढ़ती जा रही है। बेकारी रह नहीं सकती। भ्रष्टाचार टिक नहीं सकता, व्यभिचार पनप नहीं सकता, अत्याचार अधिक दिन तक सर उठाये खड़ा नहीं रह सकता, पर हमारा आत्माभिमान तो जागे। हम जिस दिन अपने गौरव को समझ पायेंगे उस दिन हमारी अवस्था ही भिन्न होगी। सर्वत्र हास-परिहास होगा। ज्ञान की गंगा यहाँ बह रही होगी। समृद्धि का कुबेर अपना खजाना लुटा रहा होगा। सब कुछ होगा पर हमारी आध्यात्मिक वृत्तियाँ भी तो जागें। यदि इतना साहस हम में पैदा हो जाय तो युग को बदलते देर न लगेगी। वह स्वर्णिम विहान विहँसता हुआ चला आयेगा। आइये! अब उसी धर्म और संस्कृति के अवगाहन के लिए तैयार हों।


ब्राह्मणत्व जागेगा तो राष्ट्र जागेगा

ऋषियों ने मनुष्य समाज की प्रवृत्तियों का गहन अध्ययन कर यह निश्चय किया कि उसका नेतृत्व और मार्गदर्शन ऐसे व्यक्तियों के हाथ में हो, जो पक्षपात रहित, निर्लोभ रहकर सर्व साधारण के हित की रक्षा कर सकें। नेतृत्व एक बड़ी शक्ति है, बुरे व्यक्तियों के हाथों में पड़कर जिसका दुरुपयोग भी हो सकता है। अतः यह आवश्यकता समझ में आयी कि समाज के बुरे तत्वों पर अंकुश रखने के लिये राज्य की बागडोर किसी के भी हाथ में रहे पर उसका नियंत्रण उन लोगों के हाथ में रहे जो उस शक्ति का दुरुपयोग न होने दें।

सामाजिक व्यवस्था, सर्व साधारण के हित, श्रेष्ठ व्यक्तियों के हाथ में नेतृत्व मार्गदर्शन एवं प्रशासनिक नियंत्रण रखने की दृष्टि से यहाँ जातियों का वर्गीकरण हुआ और प्रत्येक की स्थिति, गुण कर्म तथा स्वभाव के अनुरूप अधिकार और कर्तव्य भी प्रदान किये गये।

ब्राह्मण समाज का शिरोमणि समझा गया। उसके कर्त्तव्य और जिम्मेदारियाँ बहुत बड़ी थीं, उसका जीवन एक कठोर तपश्चर्या थी, इसलिये उसे अधिकार भी बढ़े हुए दिये गये। ब्राह्मण ने भी इस कठोर जीवन को सहर्ष स्वीकार किया क्योंकि लोक-कल्याण के लिये उसका हृदय बड़ा विस्तृत, बड़ा विशाल था।

ब्राह्मण बुद्धि, विचार और सत्कर्म आदि की दृष्टि से तो श्रेष्ठ होता ही है ब्रह्मा शक्ति से आविर्भूत होने के कारण वह प्रचुर क्षमतावान् समझा जाता है। जो व्यक्ति अपनी शक्तियों, सामर्थ्यों का उपयोग निजी स्वार्थों तक ही बाँध रखते हैं उनकी तुलना में तपस्वी, परोपकारी, त्यागी और कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों को बड़ा पद मिलना भी चाहिये था। जो समाज कल्याण तथा लोकोपकार के लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहे, ऐसे ब्राह्मणों के बाहुल्य से ही जातीय विकास संभव हुआ है। हिन्दू इस योग्य हुआ है कि वह अन्य राष्ट्रों के समक्ष अपना गौरव ज्वलन्त रख सकें। राष्ट्र की शान और सुरक्षा भी ब्राह्मणों के हाथ अक्षुण्ण रही है।

ब्राह्मण मनुष्य समाज का देवता है। वह जन-कल्याण की भावनायें उत्सर्ग करता है। इस दृष्टि से समाज में उसे प्रथम स्थान मिले तो यह सर्वथा उपयुक्त ही है।

शास्त्र का भी मत ऐसा ही है। कहा है—”ब्रह्मक्षत्रिय वैश्य शूद्रा इति चत्वारो वर्णास्तेषाँ वर्णानाँ ब्राह्मण एव प्रधान इति वेद वचनानुरूपं स्मृतिमिरप्युक्तम्।” अर्थात् ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण कहे गये हैं। इनमें ब्राह्मण प्रधान है ऐसा वेद का मत है। स्मृतियों में भी यही कहा गया है।

किन्तु “ब्राह्मण” शब्द के अर्थ पर अब लोगों में बड़ा तीव्र मतभेद है। कोई ब्राह्मणत्व का आधार श्रेष्ठ, सत्कर्म मानते हैं, कोई जन्म परम्परा से ही जातियों का वर्गीकरण हुआ मानते हैं। यह प्रश्न बड़े महत्व का है। इस पर विचार करना और भी आवश्यक है।

शाब्दिक अर्थ के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्म-ज्ञान की स्थिति सामान्य बात नहीं जो हर किसी को तपश्चर्या के अभाव में भी मिल जाया करे। यों तो आज भी शास्त्र पारंगतों की कमी नहीं पर ब्रह्मनिष्ठ का ज्ञान मात्र वाचिक नहीं अनुभव सिद्ध भी होता है। जिसका पाण्डित्य असाधारण हो वह ब्राह्मण है। यह अर्थ-सार्थक और सही लगता है।

ब्राह्मण “शक्ति “ का प्रतीक है। उसकी सामर्थ्य, उसका प्राण और उसकी विद्वता असीम बनाई गई है इन विशेषताओं को देखते हुये वंश परम्परागत ब्राह्मण होने की बात तर्क संगत नहीं प्रतीत होती।

इसके सही निर्णय के लिये वहीं चलना पड़ेगा जहाँ ब्राह्मण का प्रादुर्भाव हुआ है।

बज्र सूचिकोपनिषद् में इसे लेकर 8 श्लोकों तक ब्राह्मण को क्रमशः जीव, देह तथा ज्ञानी मानकर उसका विश्लेषण किया गया है और यह बताया गया है कि जीव ब्राह्मण नहीं क्योंकि वह विभिन्न योनियों में शूकर, कूकर आदि के रूप में भी जन्म लेता रहता है। देह अर्थात् जन्म से भी वह ब्राह्मण नहीं क्योंकि ब्राह्मण से लेकर चाण्डाल तक सभी पंच भौतिक शरीरों वाले हैं। अन्य प्राणियों के शरीरों की भी ऐसी ही दशा है। शिक्षा भी ब्राह्मणत्व का आधार नहीं क्योंकि शिक्षा के विविध रूप हैं और उसका पारंगत कोई भी व्यक्ति हो सकता है।

अन्तिम श्लोक में ब्राह्मण की परिभाषा देते हुये कहा है “जो आत्मा के द्वैत-भाव से रहित अर्थात् अपने को सदैव आत्मा के रूप में ही देखता हो। सत्य, ज्ञान और आनन्द; अनन्त स्वरूप तथा निर्विकल्प रहने वाला हो। परमात्मा की तरह ही सब भूतों का अन्तर्यामी, काम, राग आदि से रहित हो उसे ब्राह्मण कहते हैं। संयम-नियम का पालन करने वाला, मत्सर, तृष्णा, आशा, मोह, दम्भ, अहंकार आदि से पृथक रहने वाला ही ब्राह्मणत्व का अधिकारी होता है।

इस तरह का विश्लेषण यह सिद्ध करता है कि जन्मजात ब्राह्मण होने की बात अप्रमाणित है। ब्राह्मण की स्थिति सामान्य नहीं होती, उसकी क्षमता और ब्रह्म की क्षमता में एकरूपता होती है इसीलिये उसका इतना गौरवपूर्ण स्थान है। यह गुण जाति परम्परा से देखने में नहीं आते इसलिये ब्राह्मण की शास्त्रीय व्याख्या ही बुद्धि संगत है।

दुर्भाग्य से आज ऐसे ब्राह्मणों का राष्ट्र में नितान्त अभाव है। इसीलिये राष्ट्रीय जीवन में किसी प्रकार गौरव दिखाई नहीं देता। राजनैतिक स्वतन्त्रता भले ही मिल गई हो पर विचार और आचरण की दृष्टि से राष्ट्र अभी भी परतन्त्र है। इस स्थिति का निराकरण सच्चे ब्राह्मणों के उदय से ही संभव है।

स्वतन्त्रता के नाम पर आज जो स्वेच्छाचारिता, पदलोलुपता, दंभ, दुराचार आदि बढ़ रहे हैं उससे इस देश का भारी अहित हुआ है। यहाँ का नैतिक जीवन बुरी तरह नष्ट हुआ है। कलह और प्रतिस्पर्धा बढ़ने से जन-असंतोष भी बुरी तरह बढ़ा है। इसमें मनुष्य के स्वतन्त्र चिन्तन का अभाव एक बहुत बड़ा कारण है।

ब्राह्मण चिन्तन-शील होता है। वह अपनी बुद्धि की सूक्ष्मता तथा ब्रह्मतेज से युक्त होकर अपने चारों ओर की परिस्थितियों को प्रभावित करता है। उसके संपर्क में आने वाले व्यक्ति एक अलौकिक प्रकाश का अनुभव करते हैं और उन्हें भी सत्कर्मों की प्रेरणा होती है। समाज में सदाचार और सत्प्रवृत्तियाँ जागृत होती हैं तो उससे सामाजिक एवं राष्ट्रीय विकास की संभावनायें तीव्रता से विकसित होती हैं।

ऐसे थोड़े से ब्राह्मणों का भी प्रादुर्भाव यहाँ हो जाय तो यहाँ के जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार और बुराइयों का प्रभाव कम होते देर न लगे। प्रकाश जहाँ रहता है अन्धकार को वहाँ से भागना ही पड़ता है, सत्प्रवृत्तियों को जहाँ जोरदार समर्थन मिल रहा हो वहाँ दुःख, दीनता और दरिद्रता का टिक पाना असंभव है। ब्राह्मण की जागृति इसलिये अनिवार्य है कि उसमें राष्ट्रीय चेतना की जागृति छुपी हुई है।

इस जागृति के लिये साधना की आवश्यकता होगी। ब्राह्मण का आविर्भाव कठिन तपश्चर्या से होता है, पर इस युग की परिस्थितियाँ इतना गिर गई हैं कि लोग साधारण स्तर की तपश्चर्या से, कठिनाई से भी भय खाते हैं। लोगों का नैतिक स्तर जितना गिरा है मनोबल उससे भी अधिक गिरता हुआ चला जा रहा है। ऐसी स्थिति में साधना की कठिनाइयों में देर तक टिके रहना सबके लिये कठिन हो जाता है और एक महान् आवश्यकता की पूर्ति यों ही अधूरी पड़ी रह जाती है।

आज लोग भोग चाहते हैं, अधिक से अधिक सुख चाहते हैं; इस तृष्णा में हमारा परलोक ढक गया है। सुखोपभोग की भ्रामक बुद्धि ने आत्म-ज्ञान पर पर्दा डाल दिया है। लोगों का जीवन उद्देश्यहीन हो गया है। अब लोग स्वार्थ के लिये सदाचार को छोड़ देने में पटु हो गये हैं, अतः यह समस्या खड़ी हो गई है कि सच्चे ब्राह्मणत्व का पुनर्जागरण किस प्रकार किया जाय।

जिस दिन से ऐसा वातावरण बनने लगेगा उस दिन से राष्ट्रीय जीवन में भी नव-जागरण का शुभारम्भ हो जायगा। साधना जागृत होगी तो निश्चय ही राष्ट्र का ब्राह्मणत्व जागृत होगा। ब्राह्मण जागृत होगा तो यह राष्ट्र जागृत हो जायेगा और यह देश पुनः अपने अतीत कालीन ज्ञान, गौरव और समृद्धि की ओर बढ़ने लगेगा। ब्राह्मण इस देश के विकास की रीढ़ है उसे अब जागृत होना ही चाहिये।


मनुष्य जीवन की विभूति श्रद्धा

श्रद्धा मनुष्य जीवन के उन आधार-भूत सिद्धाँतों में से एक है जिससे वह पूर्ण विकास की ओर गमन करता है। श्रद्धा न हो तो मनुष्य साँसारिक सफलतायें प्राप्त करके भी आत्मिक सुख प्राप्त न कर सकेगा क्योंकि जिन गुणों से आध्यात्मिक सुख मिलता है उनकी पृष्ठभूमि श्रद्धा पर ही निर्भर है।

इसलिए मानसकार ने बताया है

‘भवानी शंकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।

याभ्याँ बिना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥

(बालकाँड 2)

अर्थात्—शंकर विश्वास है तो भवानी श्रद्धा। दोनों की उपासना से ही सिद्धि या अन्तःकरण में स्थित परमात्म देव के दर्शन सम्भव होते हैं।

शिवत्व अर्थात् जीवन के बुरे तत्वों का संहार—ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख कारण है किन्तु शिव अकेला अपूर्ण है उसे उमा भी चाहिए। उमा अर्थात् गुणों का अभिवर्द्धन। शिव का अर्थ है असुरता का संहार और भवानी का अर्थ है भावनाओं का परिष्कार। शिव के रूप में विश्वास दृढ़ होता है, कठिन होता है पर भवानी के रूप में श्रद्धा सरल और सुखदायक होती है। अतः विश्वास जगाना हो तो श्रद्धा की शरण लेनी चाहिये। श्रद्धा साधना को सरल बना देती है, सुखरूप कर देती है।

श्रद्धा का समावेश मनुष्य के पारलौकिक जीवन को भी आनन्दमय बनाता है। मनुष्य मृत्यु से दुखी इसलिए रहता है कि वह जानता है उस ओर अकेला जाना पड़ेगा। भय की, भूल की, अज्ञान की जड़ अकेलापन है। उससे सभी को दुःख मिलता है पर हृदय की श्रद्धा जीवित रहे तो अकेलापन भी नहीं अखरता। श्रद्धा स्वयं अन्तःकरण में आनन्द का उद्रेक करती है तो ऐसा आभास होता है कि हमारी प्रिय वस्तु हमारे बहुत समीप, अपनी कल्पना में ही ओत-प्रोत है। अपना अन्तर्देवता श्रद्धा के वश में है, वह आपकी इच्छाओं की पूर्ति अन्तःकरण में ही किया करता है। उससे मनुष्य को असीम तृप्ति मिलती है।

निर्जन का निवासी श्रद्धा भावना के द्वारा अनन्त से प्यार करता है, उसे जगाता है, चूमता है और उसके साथ घुल-घुल कर बातें करता है। अनन्त भी उसके सम्पूर्ण अपराध क्षमा कर अपनी गोदी में समेट लेता है। यह सुख श्रद्धा का सुख, यह सुख भावनाओं के परिष्कार का सुख है, इस सुख से आत्मज्ञान का सुख फलित होता है।

समाज में रहकर भोग की सारी परिस्थितियाँ मौजूद हों तो भी लोगों का सन्तुष्ट रह पाना सन्दिग्ध है। सुख किसी पदार्थ में नहीं है वह तो आत्मा की किसी वस्तु में आरोपित कर देने का भाव मात्र है। मन में श्रद्धा हो तो हर उदासीन वस्तु भी अपने प्रेम का, आनन्द का पात्र बन सकती है। दूर गये परिजनों के चित्र देखकर सुख अनुभव करते हैं, भगवान की मूर्ति का स्तवन कर पुलकित होते हैं इसमें अपनी श्रद्धा ही आधार है। श्रद्धा से पाषाण भी भगवान बन जाता है।

एक मनुष्य अपने घर से बहुत दूर देवी के दर्शन को गया। बहुत दिनों से दर्शनों की अभिलाषा थी। मन्दिर के द्वार पर पहुँचा तो प्रवासी का हृदय भर आया। साष्टांग प्रणाम किया उसने और फूल-पत्र जो कुछ लाया था अर्पित कर दिये मूर्ति के सामने। मूर्ति को इस पर अभिमान हो गया। बोली मैं कितनी ऐश्वर्यवान् हूँ जो लोग दूर-दूर से आते और मुझे शीश झुकाते हैं।

आकाश यह सब देख रहा था। उसने कहा देवि! तुम्हारा वैभव धन्य है किन्तु इतना और जान लो कि मनुष्य तुम्हें पूजने नहीं आया। इनकी तो आदत है कि दूर जाकर ये अपनी श्रद्धा को पूजते हैं। इनकी श्रद्धा के कारण ही तू देवी है अन्यथा तेरा कलेवर तो पत्थर से बनी प्रतिमा मात्र है।

सचमुच श्रद्धा न होती तो मनुष्य, बड़ा शून्य, शुष्क, नीरस और उदास होता। तब उसकी स्वार्थ वृत्तियों पर कौन अंकुश लगाता, उसकी संकीर्णता को कौन रोकता। कामान्ध हो गया होता मनुष्य यदि वह भावनाशील न रहा होता। निश्चेष्ट हो जाता मानव यदि उसके हृदय में श्रद्धा न होती। परमात्मा तो दूर वह अपने कुटुम्बियों से, माता-पिता, बालकों से, भाइयों से, पत्नी आदि किसी से भी सहृदयता का व्यवहार न करता। श्रद्धा है इसलिए मनुष्य जीवित है, समाज जीवित है, परमात्मा जीवित है। वह लुप्त हो जाय तो क्या व्यक्ति और क्या समाज, मनुष्य सबको दबोच कर खा गया होता। पर बेचारा श्रद्धा का दास है उसी के सहारे जीवन की कठिनाइयों को झेलता रहता है। खुद भूखा, नंगा रहकर औरों का पालन करता है। कष्ट आप झेलता है, कमाता खुद है, बाँट देता है सबको। समाज के प्रति उत्सर्ग की भावना न रही होती तो मनुष्य जीवन में आनन्द भी क्या शेष बचता? श्रद्धा है जो मनुष्य को बलिदान करना सिखाती है।

श्रद्धा का अर्थ है आत्म-विश्वास, ईश्वर पर विश्वास। इसके सहारे मनुष्य अभाव में, तंगी में, निर्धनता में, कष्ट में, एकान्त में भी घबड़ाता नहीं। जीवन के अन्धकार में श्रद्धा प्रकाश बन कर मार्गदर्शन करती है और मनुष्य को उस शाश्वत लक्ष्य से विलग नहीं होने देती। आत्मदेव के प्रति, ईश्वर के प्रति जीवन लक्ष्य के प्रति हृदय में कितनी प्रबल जिज्ञासा है, जीवन की इस विशालता को जानना हो तो मनुष्य के अन्तःकरण की श्रद्धा को नापिये। यह वह दैवी मार्ग-दर्शन है जिसे प्राप्त कर साँसारिक बाधाओं का विरोध कर लेना सहज हो जाता है।

प्राचीन काल के गुरु, आचार्य धर्मतत्व वेत्ता सब शिष्य की श्रद्धा की गहराई की परख कर लेने के उपरान्त उन्हें ब्रह्म विद्या का अधिकारी घोषित करते थे। जब तक शिष्य की श्रद्धा का आकार न समझ लिया जाता था तब तक उन पर गोपनीय साधनाओं और सिद्धांतों को प्रकट न किया जाता था। श्रद्धावान् विद्यार्थी ही ज्ञान का, आत्म-दर्शन का महान् लाभ प्राप्त करते थे।

ऐसे असंख्य वर्णन शास्त्रों में धर्म पुराणों में मिलते हैं। शिष्य सत्यकाम जाबालि, आरुणि, उपमन्यु, नचिकेता आदि ने अपनी उत्कट श्रद्धा के द्वारा अपने गुरुओं को द्रवीभूत किया और अल्प आयु में ही वह ज्ञान अर्जित कर सके जो कठिन साधनाओं से भी सम्भव न था। भक्त ध्रुव की अचल श्रद्धा के परिणाम स्वरूप देवर्षि को पृथ्वी पर आना पड़ा और कुमार का मार्ग-दर्शन करना पड़ा। अपनी उत्कृष्ट श्रद्धा से उसने परमात्मा को जीत लिया। ध्रुव ने नहीं उसकी श्रद्धा ने उसे पाँच वर्ष की आयु में ही पूर्णता की स्थिति को पहुँचा दिया।

अपनी श्रद्धा के कारण ही राजा दिलीप गुरु वशिष्ठ के विशेष कृपा पात्र बने थे। गुरु ने उन्हें एक ही कार्य सौंपा था कि वे उनकी गायें चराया करें। ऐश्वर्य और भोगों में पले हुये दिलीप और उनकी धर्म-पत्नी के लिये गौओं के पीछे जंगल-जंगल घूमना कम कठिन बात न थी। धूप उन्हें देखने को न मिली थी, कांटों से खेलना वे न जानते थे, बिना पदत्राण भला वे ऊँची-नीची बिजन श्रृंखलाओं में कैसे घूम पाते? हिंसक पशुओं का सामना करना तो क्या महारानी उन्हें देख भी न सकती थीं किन्तु राज-दम्पत्ति की श्रद्धा ने उनमें वह शक्ति भर दी कि दिलीप वन-वन घूमें, गायें चराईं शेरों से लड़े और शूलों से जूझे। गुरु-शिष्य की श्रद्धा के समक्ष परास्त हो गये और उन्हें राजा का अभीष्ट पूरा करना ही पड़ा।

यह श्रद्धा ईश्वर प्राप्ति या पूर्णता के लिये ही आवश्यक नहीं वरन् वह अपने लोगों पर आत्म-भाव, धर्म और संस्कृति के प्रति प्रेम, राष्ट्र और जाति के प्रति कर्तव्यनिष्ठा का भी पाठ सिखाती हैं। मनुष्य जिस सामूहिकता में बँधा हुआ है उसका जीवन और प्राण भी श्रद्धा ही है। हिन्दुओं में तो उसका स्थान और भी सर्वोपरि है इसलिये यहाँ का लौकिक जीवन भी पारलौकिक जीवन के समान ही सुख-सुविधाओं से ओत-प्रोत होता है।

हम औरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं तो हमारा सम्मान होता है, हमारी बात की कद्र की जाती है इससे अपनी प्रसन्नता में अभिवृद्धि होती है।

अपनी योग्यता पर श्रद्धा रखिये, अपने धन, घर, पुत्र-पुत्री माता-पिता सबके प्रति श्रद्धा रखिये इसमें आपका कुछ व्यय नहीं होगा वरन् आपकी भावनायें आपको सुख ही देंगी।

यह श्रद्धा मनुष्य के सर्वतोन्मुखी विकास का आधार हैं अतः मनुष्य जीवन में श्रद्धा उद्देश्य बनकर रहनी चाहिये। श्रद्धा मनुष्य जीवन का आदर्श होना चाहिये।


मन के हारे हार है, मन के जीते जीत

साँसारिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति और उनके उपभोग की दृष्टि से शारीरिक बल का महत्व निर्विवाद है। रोगी और दुर्बल शरीर वालों को धरती के सुख के सारे उपहार बेकार हैं, उनसे उसकी परेशानियाँ ही बढ़ती हैं, झंझट ही उत्पन्न होते हैं। कहा भी है—”सर्व सुखी निरोग काया” रोग रहित सशक्त शरीर सब सुखों का मूल है।

किन्तु मन का बल शरीर के बल से भी बड़ा है। इसके अभाव में शारीरिक बल भी किसी काम का नहीं होता। देखा गया है कि उत्तम स्वास्थ्य वाले व्यक्तियों को भी जब कोई मानसिक आघात लगता है तो वे अपनी स्थिति सम्हाल नहीं पाते और अपने सामान्य जीवन-क्रम से गिरकर स्वयं ही अपनी दशा दयनीय बना डालते हैं। एक व्यक्ति बड़ा धनी था। उसका स्वास्थ्य भी बड़ा अच्छा था। उन्होंने जीवन में कभी असफलता न देखी थी, कभी सफलता के लिये उन्हें संघर्ष करने की आवश्यकता भी न पड़ी थी। पैतृक व्यवसाय हाथ लग गया था खूब अच्छे खाते-पीते और मस्त रहते थे। किसी तरह का उन्हें कोई अभाव न था।

मित्रों की सलाह पर एक दिन उन्होंने काफी बड़ा सौदा कर लिया। रातों-रात भाव बदला और दूसरे दिन जब बिक्री का समय आया तो उन महाशय को पता चला कि इससे उन्हें कई लाख का घाटा हुआ। बस सेठ जी का दिल धड़कने लगा। हक्के-बक्के रह गये। दुबारा सही आवाज भी न निकाली। विक्षिप्त से हो गये। चाहते तो उनके पास तब भी लाखों की सम्पत्ति बची हुई थी, दुबारा फिर रोजगार खड़ा कर लेते। पर सेठ जी का मनोबल इतना कमजोर था वे स्थिति की गम्भीरता को बर्दाश्त न कर सके और पागल हो गये, और इसी अफसोस में पड़े रहने के कारण अन्त में उनकी मृत्यु भी हो गई।

धन कोई महत्व की वस्तु नहीं। उसके आने या चले जाने से किसी का कुछ बनता बिगड़ता भी नहीं पर मानसिक दुर्बलता के कारण उक्त महाशय को जीवन जैसी बहुमूल्य वस्तु की क्षति उठानी पड़ी।

अपने परिचय के पाठक जी हैं। पन्द्रह वर्ष पूर्व जब वे मिले थे उनका शरीर बड़ा दुबला-पतला था, साधारण से अध्यापक थे। पाँच व्यक्तियों का परिवार था उनमें भी कोई न कोई आये दिन बीमार ही बना रहता था। पाठक जी कभी मिलते तो उनकी दयनीय स्थिति पर कुछ सहायता करने की इच्छा होती तो वे कहते नहीं भाई स्थिति कमजोर है पर मेरा मन कमजोर नहीं, तन हारा है मन नहीं। आप देखिये तो सही मैं आपको क्या करके दिखाता हूँ।

ऐसी कमजोर स्थिति में भी मास्टर साहब का मन कभी म्लान न हुआ, सदैव हँसते-खेलते, विनोद करते मिलते। भीतर ही भीतर उनकी योजनायें चलती रहतीं। बड़ी गुप्त और बड़ी ठोस योजनायें। आकाश और पाताल को उलट-पलट कर डालने वाली योजनायें।

प्राइमरी स्कूल के मास्टर साहब की स्थिति में परिवर्तन शुरू हुआ। बी. ए. किया एम. ए. किया और प्रोफेसर बन गये। मस्ती जीवन में थी ही, अभाव था सो भी पूरा हो गया। अब उनकी आय 500) मासिक से भी अधिक है। घर गृहस्थी ऐसी जिसे देखकर मन प्रसन्नता से भर जाय। मास्टर साहब का स्वास्थ्य ऐसा बढ़िया हो गया जैसे उन्होंने वर्षों कसरत की हो। इतना बड़ा परिवर्तन क्या उनके भाग्य ने किया? नहीं, वह तो उनका तीक्ष्ण मनोबल था जिसने यह चमत्कार कर दिखाया।

अनिश्चयता की मनोवृत्ति रहने के कारण लोगों के उपाय कारगर नहीं होते। सफलता का एक आधार है व्यक्ति का मनोबल। मनुष्य के मन में कल्पनायें उठें और उन्हें पूर्ण करने के प्रयत्न करने का वह साहस करे। न हिम्मत छूटे, न धैर्य टूटे, तो इच्छायें भी पूरी होती हैं। इससे जीवन में आशा का संचार होता है निराशा दूर भागती है। काम में सफलता मिलती जाती है तो नये काम हाथ में लेने और उन्हें पूरा करने की प्रवृत्ति जगती है।

यह सच है कि प्रत्येक सफलता मनुष्य का मनोबल बढ़ाती है पर क्रिया क्षेत्र में यह बात सदैव संभव नहीं है। संघर्ष करते हुए सफलता के साथ असफलता भी हो सकती है। आशा के साथ निराशा की भी उत्पत्ति हो सकती है। मनोबल की परीक्षा का यही समय होता है। आशायुक्त जीवन से निरन्तरता आती है तो निराशा से निकम्मापन भी आ सकता है। यहाँ परिस्थिति न सम्भालें तो मनुष्य के सारे प्रयास व्यर्थ हो सकते हैं। इसलिए यह बहुत जरूरी बात है कि सफलता की आशा रखें पर साथ ही असफलता के समय धैर्य भी जागृत रखें। किसी भी अवस्था में मनोबल क्षीण न हो तो रुका कदम रुका नहीं रहता, निराशा आशा में बदलती और हारी बाजी फिर से जीत में बदल जाती है।

इच्छायें करें पर यह न भूले कि उनका विकास एकाएक नहीं हो जाता। कुछ समय लगता है, कुछ श्रम लगता है। परिस्थितियों की अनुकूलता और प्रतिकूलता का भी विचार करना पड़ता है। इतना सब न करें तो इच्छायें कल्पना मात्र रह जायेंगी और उनसे कोई उद्देश्य पूरा न होगा।

पहले छोटी इच्छायें कीजिये और उन्हें संकल्प का रूप दीजिये। एक संकल्प पूरा होगा तो आपका मनोबल बढ़ेगा, उत्साह और उल्लास जागेगा। क्रमशः अपने संकल्प का स्तर बड़ा बनाइये और इस तरह अपने मनोबल को और भी ऊँचे उठाते हुए चले जाइये पर यह याद रहे कि संकल्प टूटना नहीं चाहिये अन्यथा मन में निराशा उत्पन्न होगी और मानसिक क्रियाशक्ति को छिन्न-भिन्न कर देगी।

उदाहरणार्थ - जब आप प्रातःकाल सो कर उठते हैं तो बिस्तर त्यागने के पूर्व आप कुछ क्षण रुकिये। स्वस्थ और चैतन्य होकर शान्त मुद्रा में बैठिये। परमात्मा को याद कीजिये और यह भावना कीजिए कि आज का दिन आपका एक जीवन है। आज आप अपनी शक्ति का अपव्यय रोकेंगे और ब्रह्मचर्य का पालन करेंगे। दिन-भर कामुक विचारों से बचते रहिये और अन्त तक आज का अपना प्रण पूरा कर ही जाइये। यह आपका एक छोटा संकल्प हुआ। धीरे-धीरे संकल्प के स्वरूप और उसकी अवधि को और भी चौड़ा करते रहिये। आपका मनोबल संकल्प की तौल के अनुसार बढ़ता ही जायेगा।

आत्म-विकास के इन कार्य-क्रमों में मन को व्यस्त रखिये तो वह आपके बड़े काम आयेगा आपको बहुत लाभ देगा। ऐसा नहीं करेंगे तो मन स्थिर नहीं रहेगा यह आप निश्चय जान लीजिए। मन को काम चाहिए, प्रोग्राम के बिना तो वह एक क्षण नहीं टिक सकता। यह नहीं तो आत्म-विनाश की खुराफात शुरू कर देगा। ताश-तमाशे के लिये, सैर-सपाटे के लिए, लड़ाई झगड़ा, कानाफूसी, मजाक आदि की अश्लील दुष्प्रवृत्तियों की ओर वह तभी दौड़ता है, जब उसे कोई रचनात्मक कार्य-क्रम नहीं मिलता। इससे सिवाय मनोबल क्षय होने के और कोई कारण नहीं। निर्धनता, दुर्बलता, दैत्यता आदि इसी आत्मविनाश के फल हैं। इन्हें रोकिये और अपना जीवन बरबाद होने से बचाइये।

आप याद रखिये कि स्वाभिमान ऊँचा रहता है तो मनोबल भी बढ़ा हुआ होता है। हीन भावनायें रखेंगे और गलत काम करेंगे तो आपका स्वाभिमान कौन ऊँचा रहने देगा। घर वाले डाँट मारेंगे, अध्यापक झिड़कियाँ देगा, प्रधान फटकार लगायेगा, फैक्टरी का मालिक काम से निकाल देगा। इससे आपके अपमान हो जाने का उतना भय नहीं है जितना आपके दुर्बल मन हो जाने का। यदि आप ऐसा करते हैं तो वह आपकी सबसे बड़ी कमजोरी होगी।

आप छोटे होने का विचार अपने मन से निकालकर दूर फेंकिए, आपके मन में अपार सामर्थ्य है। इधर देखिए यह जो विज्ञान फैला पड़ा है यह सब मन की शक्ति का चमत्कार है। उस शक्ति का अपमान न होने दीजिए। अपने मनोबल को सदैव दृढ़ रखिये। मन हार जाता है तो यह संसार भी दुःख का आगार ही समझ में आता है। आपकी सफलता आपकी जीत आपके मन की जीत है। मन को बलवान् रखना आपका धर्म है इससे आप संसार में बड़े काम कर सकते हैं, बड़ी सफलतायें अर्जित कर सकते हैं।


अनासक्ति कर्म योग का तत्वज्ञान

अनासक्ति का अर्थ यह नहीं कि जो कुछ आप करें उसमें आपको रुचि न हो। उसकी अच्छाई बुराई सफलता असफलता की चिन्ता न करें। ऐसा करने से तो कोई भी कार्य करने में लापरवाही ही रहेगी। यदि अनासक्ति का अर्थ असम्बन्ध, अरुचि अथवा निरपेक्षता लिया जायेगा तो कोई भी कार्य कुशलता पूर्वक नहीं किया जा सकता। बिना कोई आशा रक्खे कोई भी काम करने में मनुष्य का मन न लगेगा। किसी कार्य में लाभालाभ का विचार ही उस कर्म में रुचि उत्पन्न करता है। जब मनुष्य असफलता का भय और सफलता की आशा लेकर कार्य करेगा तभी उसको संलग्नता और उत्तरदायित्व पूर्ण ढंग से कर सकेगा अन्यथा नहीं।

यदि ऐसा है तो अनासक्त कर्मयोग का मतलब क्या? अनासक्ति भावना का सम्बन्ध काम करते समय नहीं उसके पूर्ण हो जाने पर संयोगवश उसकी असफलता मात्र से है, सफलता से भी नहीं। सफलता की स्थिति में उसका प्रसन्न होना स्वाभाविक है। यदि सफलता का हर्षातिरेक किसी को अभिमान अथवा अहंकार की उत्पत्ति करता है तब ही उसे अनासक्ति का सहारा लेना आवश्यक है। क्योंकि ऐसी स्थिति में कर्ता को अपना किया हुआ एक छोटा सा कार्य भी बड़ी भारी कृति मालूम होगी जिससे संतुष्ट होकर वह और अधिक कार्य करने से विरत होने लगेगा! वैसे सामान्यतः किसी कार्य की सफलता से मनुष्य का उत्साह वर्धक प्रसन्नता से विरक्त होने की कोई विशेष आशंका नहीं है।

हाँ, असफलता की स्थिति में मनुष्य को अवश्य अनासक्ति योग का अवलम्बन लेना चाहिये, जिससे उसे असफलता के खेद अथवा असंतोष, हतोत्साह अथवा निराशा का अनुभव न हो। असफलता से प्रभावित होकर सामान्य मनुष्य प्रायः पुनः प्रयत्न में विश्वास नहीं करने लगता है! दोनों दशाओं में कर्म फल से विरत अर्थात् अप्रभावित रहने का निर्देश इसलिये किया गया है कि जो मनुष्य सफलता में प्रसन्न होने का अभ्यासी है उसका असफलता की स्थिति में खिन्न और निराश होना स्वाभाविक है। अनासक्ति का पूर्ण अभ्यास करने के लिये ही कर्म फल अर्थात् सफलता असफलता के प्रति उदासीन रहने का निर्देश किया गया है। यद्यपि तटस्थता एक महान स्थिति है तथापि यदि हमको गलत प्रेरणा न दे तो सफलता में प्रसन्नता होना कोई हानिकारक अस्वाभाविकता नहीं है!

एक ओर कहा गया है कि मनुष्य का कर्म में अधिकार है, उसे हर अच्छा बुरा काम करने की स्वतन्त्रता है। पर दूसरी ओर निर्देश है कि मनुष्य सब कुछ करता हुआ भी कुछ नहीं करता। वह एक माध्यम मात्र, है, उसकी समस्त क्रियायें परमात्मा द्वारा प्रेरित होती हैं। विराट-पुरुष परमात्मा ही सारे कर्मों का कारण है।

यह दोनों कथन देखने में एक दूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं। जब मनुष्य किसी शक्ति की प्रेरणा से यंत्रवत् कार्य करता है तब वह कर्मों में स्वतंत्र, उसका उत्तरदायी किस प्रकार ठहराया जा सकता है? और यदि वह कर्मों में स्वतन्त्र है, अच्छा बुरा जो चाहे कर सकता है तब किसी शक्ति की प्रेरणा की बात कैसे टिक सकती है?

इन कथनों के विरोधाभास को समझने के लिये गहराई से विचार करने की आवश्यकता है! मनुष्य में जो चेतना पूर्ण गतिवत्ता है उसका कारण तो वह विराट-शक्ति है किन्तु कर्मगति की दिशा मनुष्य की अपनी है। परमात्मा विद्युत की भाँति गतिशीलता की शक्ति तो देता किन्तु उस शक्ति से संचलित मनुष्य-यंत्र किस ओर जाता है इसका उत्तरदायी वह नहीं है! विद्युत धारायें केवल प्रेरणा देती हैं अब आगे उपभोक्ता का कर्तव्य है कि वह उसका उपयोग रोशनी करने में करता है या किसी के प्राण लेने में। गैस मोटर को ढकेलती भर है उसके चलने के ढंग का उत्तरदायित्व संचालक पर है।

संसार में जो कुछ अच्छा बुरा हितकर अथवा अहितकर होता है वह सब परमात्मा की प्रेरणा तथा इच्छा से होता है, मनुष्य का उसमें कोई हाथ नहीं है। वह स्वयं कुछ नहीं करता। किसी विराट्-शक्ति द्वारा उससे बलात् कराया जाता है, ऐसा विश्वास धारण करने से मनुष्य भले ही अपने कर्म फल का भागी न बने, पर यह विश्वास व्यवहार जगत में हितकर नहीं है। स्वभावतः बुराई की ओर दौड़ने वाला मनुष्य इस विश्वास के बल पर और भी भयंकर हो जायेगा। उसको किसी कर्म का फल भले ही भोगना न पड़े किन्तु उसके कुकर्म दूसरों के लिये तो कष्ट एवं अनिष्टकर होंगे ही।

किसी को मारने वाला यह सोचकर अपने कृत्य की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाये कि उसने वैसा स्वयं नहीं किया बल्कि सर्व शक्तिमान परमात्मा की प्रेरणा से किया, और मरने वाला अथवा उसके सम्बन्धी यह सोच कर संतोष कर लें कि इसमें मारने वाले का कोई दोष नहीं, मरने वाला परमात्मा की इच्छा से मृत्यु को प्राप्त हुआ है, यह भला किस प्रकार सम्भव हो सकता है?

यदि इस नियम को सार्वभौम मान कर यह कल्पना भी कर ली जाय कि संसार का प्रत्येक मनुष्य यह विश्वास रखने लगा है कि कोई किसी काम का उत्तरदायी नहीं है और न कोई किसी को कष्ट अथवा हानि पहुँचाने का दोषी है तब तो संसार में एक भयानक अव्यवस्था ही उत्पन्न हो जाय। न कोई किसी को मारने लूटने में संकोच करे और न कोई उसका प्रतिकार। सबल व्यक्ति निर्बलों को एक मिनट में मिटाकर रख दें। किसी कृत्य के परिणाम, उसके दण्ड तथा प्रतिकार के भय से ही मनुष्य एक साधारण अनुशासन में चलता है!

सब कुछ परमात्मा की इच्छा से होता है ऐसा विश्वास बना लेने पर मनुष्य के ज्ञानी होने की कम किन्तु निरंकुश होने की अधिक सम्भावना है। यदि मनुष्य के प्रत्येक कर्म में सर्व शक्तिमान की प्रेरणा रहती है तो फिर कर्म करने वाले को उसका परिणाम क्यों भुगतना पड़ता है मनुष्य असंयम करता है किन्तु ईश्वर की इच्छा से तो फिर उसे रोग के रूप में उसका दण्ड क्यों मिलता है? एक प्रकार से तो यह परमात्मा का अन्याय ही प्रतीत होता है। पहले तो वह किसी को कुछ बुरा करने को प्रेरित करता है और फिर उसे वैसा करने का दण्ड देता है, यह कहाँ का न्याय हुआ। और यदि यह मान लिया जाय कि सर्व शक्तिमान मनुष्य से शुभाशुभ कर्म कराकर फिर जो उसे उसका पुरस्कार अथवा दंड देता है यह उसकी लीला है खेल है-तब भी यह उस सर्व शक्तिमान विराट् पुरुष के अनुरूप नहीं है। यह बचकाना खेल न तो उसके गौरव उपयुक्त है ओर न वह ऐसा खेल खेलेगा ही।

विराट् पुरुष द्वारा प्रेरित यह याँत्रिकता जड़ प्रकृति तथा विवेक रहित पशु-पक्षियों में तो किसी हद तक मानी जा सकती है किन्तु सचेतन तथा विवेकशक्ति सम्पन्न मनुष्य के विषय में नहीं मानी जा सकती।

परमात्मा ने मनुष्य को अनेक आश्चर्यजनक शक्तियाँ देकर स्वतन्त्र कर दिया है कि यदि वह चाहे तो शक्तियों का सदुपयोग करके परमपद प्राप्त कर ले अथवा उनके दुरुपयोग द्वारा अधोगति में जा पड़े। उसने मनुष्य को सारे उपादान देकर खिलाड़ी की तरह संसार के मैदान में छोड़ दिया है और स्वयं एक निष्पक्ष दर्शक की भान्ति उसका खेल देखता है कि सुगति दुर्गति के इस विशाल खेल में कौन खिलाड़ी जीतता है और कौन हारता है। जो अपने स्रोत अर्थात् लक्ष्य को पाता जाता है वह उस परमपद परमात्मा की गोद में पहुँचता जाता है और जो हारता है वह खेलने के लिये दुबारा संसार में भेज दिया जाता है। मनुष्य की आयु खेल के एक अवसर की अवधि है। समाप्त हो जाने के बाद यदि खिलाड़ी सफल नहीं हो पाता तो उसे समयानुसार पुनः अवसर व समय दिया जाता है।

विवेकवान मनुष्य को इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये कि उसके शुभाशुभ कर्मों का प्रेरक तथा संचालक सर्व शक्तिमान परमात्मा है, उसका अपना कोई दायित्व नहीं है। न वह कुछ करने के स्वतन्त्र है और न करता ही है।

अनासक्ति कर्मयोग का यह अर्थ कदापि नहीं है कि तटस्थ रहकर कुछ भी अच्छा बुरा किये जाओ कोई भी गुण दोष हमारे लिये नहीं आयेगा। अनासक्ति कर्मयोग का केवल यह अर्थ है कि अपने कर्मों के फलाफल से प्रभावित होकर कर्म गति में व्यवधान अथवा विराम न आने दें जिससे दिन प्रति दिन अपने कर्मों में सुधार करते हुये परमपद की ओर बढ़ते जायें।

गाय के महत्व को न भूलें

भारतीय संस्कृति के चार प्रमुख स्तम्भों में गंगा, गीता, गायत्री, गौ में गाय का महत्व कम नहीं है। हमारे पूर्वजों में गायत्री, गंगा और गीता के प्रति जो श्रद्धा और सम्मान की भावना रही है वैसी ही गौ-माता के प्रति भी रही है। यह श्रद्धा साम्प्रदायिक या अन्धविश्वास न होकर गुण, सात्विकता और पवित्रता की दृष्टि से रही है। गौ का महत्व केवल इसलिए ही नहीं है कि वह हमें दूध देती है, उसी के बछड़ों से कृषि की जाती है वरन् उसमें पाया जाने वाला ओज, संस्कारों को पुष्ट करने वाली सात्विकता की दृष्टि से भी वह पूज्य है। वेद का कथन है :—

नमस्ते जायमानायै जाताया उतते नमः।

वालेभ्यः शफेभ्यो रुपायाघ्न्ये ते नमः॥

यया द्यौर्यया पृथिवी ययाऽऽपो गुपिता इमाः।

वशाँ सहस्रधाराँ ब्रह्मणाच्छावदामसि।

—अथर्व 10। 10। 1, 4

“हे अबध्य गौ। उत्पन्न होते समय और उत्पन्न होने पर तुम्हें प्रणाम! हम तुम्हारे शरीर, रोम और खुरों की शक्ति को पहचानते हैं। तुमने द्युलोक, भूमण्डल एवं इन जलों को भी सुरक्षित रक्खा है इसलिए सहस्र धाराओं से दूध देने वाली हे गौ माता, हम तुम्हारी स्तुति करते हैं।”

ऐसी स्तुतियों और चर्चाओं से शास्त्रों में पन्नों के पन्ने भरे पड़े हैं, जिनमें गाय के स्थूल और सूक्ष्म लाभों को वर्णन किया गया है। पद्म पुराण सृष्टि खण्ड में गाय के महत्व पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला है। स्कन्द. प्रभास. में गौ का स्थान ब्राह्मण, गुरु और देवता के समान दिया गया है। वायु पुराण, कश्यप संहिता, स्कन्द पुराण के आवन्त्यखण्ड, रेवाखण्ड, चरक संहिता, बौधायन स्मृति, लोकनीति में गाय के प्रभाव का वर्णन है और उससे प्राप्त होने वाले लाभों की व्याख्या है।

हिन्दू-धर्म ग्रन्थों में ही गाय के महत्व को प्रतिपादित किया गया हो ऐसी बात नहीं। दूसरे धर्मों में भी उसे पूज्य भाव से देखा गया है। “नौशियात हादी” में मनुष्य के स्वास्थ्य और आरोग्य के लिये गाय का दूध आवश्यक बताया है।

अफगानिस्तान के भूतपूर्व अमीर अमानुल्ला खाँ ने बम्बई यात्रा में कहा—”मुसलमानों को, मुल्लाओं और पीरों की बातों में न आकर हिन्दुओं के साथ शान्ति रखनी चाहिए। हिन्दुस्तान के लिए गाय और बैल बड़े उपकारी जीव हैं, आपको इनके वंश की वृद्धि की चेष्टा करनी चाहिए।”

“फतवे हुमायूनी” भाग 1 पृष्ठ 360 में “गाय की कुर्बानी इस्लाम-धर्म का नियम नहीं है” ऐसा बताया गया है। कुस्तुन्तुनियाँ के सादिक गौ को पवित्र मानते थे। “ईसाइयाह” ‘जरथुस्त्र’ ‘इदीस साइस्ता’ आदि विभिन्न धर्म ग्रंथों में गाय के महत्व को स्वीकार किया गया है।

जब तक भारतवर्ष में इस गौ-सम्पदा का अभाव नहीं रहा तब तक यहाँ धन-धान्य की कमी नहीं रही। यहाँ के बछड़े दूसरे देशों में बड़ा सम्मान पाते थे। यहाँ की गायें प्रचुर मात्रा में दूध और घी देती थीं जिसका सेवन करने से न केवल लोगों के शरीर स्वस्थ बलिष्ठ होते थे वरन् उनमें सद्गुणों का भी आविर्भाव होता था। गाय के दूध में शक्ति की मात्रा से सात्विकता की मात्रा कहीं अधिक होती है उसका प्रभाव सीधा संस्कारों पर पड़ता है। जब तक यहाँ गौ को पूज्य स्थान मिला तब तक लोगों का आत्मबल और मनोबल भी ऊँचा रहा किन्तु गौ-सम्पदा कम होने के साथ ही देश का गौरव भी कम होने लगा।

“यतो गावस्ततो वयम्” (गायें हैं इसी से हम लोग हैं, इस बात को भूल जाने के कारण पशुधन और धान्य क्षेत्र में हमारी यह दुर्दशा हो रही है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में तो गौ की आवश्यकता सर्वाधिक होनी चाहिए।

प्रत्येक बालक का आरोग्य केवल आरोग्य ही नहीं प्रत्युत बुद्धि उसके द्वारा पिये हुए दूध के परिमाण और प्रकार पर अधिक अवलम्बित है। भारतवर्ष के ऐसे करोड़ों बच्चों के शारीरिक विकास का आधार और बौद्धिक विकास का साधन गौ है। गाय के दूध में वह सारे तत्व पायें जाते हैं जिनसे उसका शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य तेजी से विकसित होता है। पहले बच्चों को गाय का ताजा दूध पिलाने की प्रथा थी इससे बाल-स्वास्थ्य का निर्माण बड़ी तेजी से होता था और वे प्रौढ़ होने पर छोटी मोटी बीमारियों के आघातों को चुटकी बजाकर झेल लेते थे, किन्तु अब वह क्षमता कहीं दिखाई नहीं देती। बालकों को गाय के दूध की पर्याप्त मात्रा न मिल पाने के कारण उन्हें छोटी अवस्था से ही रोग घेरे रहते हैं। बालकों के शारीरिक विकास के लिये गाय का दूध अन्य दूधों की अपेक्षा अधिक लाभदायक होता है। उसे बच्चा आसानी से पचा लेता है। दूसरे दूध या तो उसे पचते नहीं या उनमें पर्याप्त जीवनी-शक्ति नहीं होती। कीटाणु नाशक होने के कारण गो-दुग्ध का महत्व बालक, युवा, वृद्ध, स्वस्थ व रोगी सभी के लिये समान रूप से लाभदायक होता है।

सहायक-धन्धे के रूप में भी गौ-पालन अत्यन्त हितकर है। आम के आम गुठलियों के दाम वाली कहावत गायें चरितार्थ करती हैं। इनसे प्राप्त दूध का घी बेचकर छाछ, मट्ठा घरेलू उपयोग में लिया जा सकता है। गोबर की खाद से खेतों की उर्वराशक्ति बढ़ाई जा सकती है। जिस परिवार में चार-छः गायें होंगी वह घर कभी अभावग्रस्त नहीं रह सकता। ग्रामीण क्षेत्रों में गौ-पालन प्रमुख धन्धा भी हो सकता है।

किन्तु अब इस क्षेत्र में उपेक्षा बरते जाने से गायों की संख्या तेजी से कम होती जा रही है। उधर गौ-हत्या की मात्रा इतनी तेजी से बढ़ रही है कि सारा गौ-वंश ही नष्ट होता हुआ दिखाई दे रहा है। हिन्दुस्तान के लिये यह कलंक की बात है। हम यदि गौओं के विकास और पालन-पोषण को उचित महत्व दें तो उससे हमारे आर्थिक विकास में लाभदायक सहायता मिलती है। ऐसा न करें और गौ-धन को उसके स्वाभाविक रूप में भी बढ़ने दें तो भी लाभ ही है किन्तु गायों के वध की मात्रा बढ़ जाने से यह समस्या विचारणीय बन गई है। उसे रोकने का प्रयत्न न किया गया तो यह धन सर्वनाश की सीमा तक जा पहुँचेगा और उससे भारतीय जीवन की पवित्रता नष्ट होगी।

वेद में गौवध को एक महान् पाप बताया गया है और कहा भी है :—

यदि नो गाँ हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम्।

तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोऽसो अवीरहा॥

—अथर्व वेद 1। 16। 4

“ऐ अभिमानी! तू हमारी गौओं की हत्या करता है इसलिये हम तुझे सीसे की गोली से बींध देंगे, जिससे तू हमारे वीरों का वध न कर सके।”

“किताब मस्तरक” में लिखा है-”तुम पर लाजिम है गाय का दूध और घी। खबरदार! उसके गोश्त से। उसका दूध शिफा है घी दवा है और गोश्त बीमारी है।”

किन्तु इन धार्मिक निर्देशों और महापुरुषों के उपदेशों के बावजूद भी गो-वध की संख्या इतनी तेजी से बढ़ रही है कि उससे सारे हिन्दू समाज के संस्कारों पर कुठाराघात हो रहा है। सरकारी रिपोर्टों के आधार पर सन् 1952-53 में 46,08,173 गायों की खाल बाहर भेजी गई। बछड़ों की खाल इससे अलग थीं। इससे पूर्व 1945-46 में बछड़ों की 172000 खाल बाहर भेजी गई जब कि 1952-53 में 2007951 खाल भेजी गई थीं। इससे गौ-वध की उत्तरोत्तर वृद्धि का अनुमान सहज में ही हो जाता है। लाला हरदेव सहायजी के कथनानुसार देश में वध किये गये गोवंश की खालों का कम से कम दाम अनुमानतः 1500000 रु . होता है।

बूढ़ी और बेकाम गायों को भी कसाइयों को सौंप देना मानवता की दृष्टि से घोर अपराध है। जिन्होंने दूध पिलाया, खाद दी, बछड़े दिये उनको अपनी मौत मरने तक आवश्यक चारा-पानी और चिकित्सा की व्यवस्था करना प्रत्येक का कर्तव्य होना चाहिए।

दैनिक आहार में गाय के दूध, घी, मट्ठे आदि का अधिक से अधिक उपयोग होना चाहिए। इससे हमारे शरीर पुष्ट होंगे और शुभ संस्कारों की भी वृद्धि होगी।

गो रक्षा और गौ-संवर्द्धन धार्मिक दृष्टि से प्रत्येक हिन्दू का प्रमुख धर्म कर्तव्य है। हमारे समाज में पूर्वकाल से गौ का स्थान जननी माता के तुल्य माना गया है। गाय को कामधेनु और सुरभि की पदवी प्राप्त है। केवल साँसारिक दृष्टि से देखें तो भी गौवंश की उन्नति इस देश के लिये बहुत आवश्यक है।


दुख से डरिये नहीं उसका सामना कीजिये

एक ओर मनुष्य ज्यों-ज्यों सभ्यता की ओर बढ़ता और सुख-सुविधा के साधन जुटाता गया, त्यों-त्यों उसमें कष्ट सहन करने की क्षमता कम और दुःख अनुभूत करने की दुर्बलता अधिक बढ़ती गई है। जहाँ दुःखानुभूति की वृद्धि हुई है वहाँ इससे यह लाभ भी हुआ है कि मनुष्य-मस्तिष्क सुख की अधिकाधिक खोज करता हुआ परमानंद तक पहुँच गया है।

सामान्यतः जन साधारण उस परमानन्द तक नहीं पहुँच सकता, फिर भी दिन प्रति दिन सिर पर खड़े हुये दुःखों से बचाव करने का उपाय तो करना ही होगा। किसी बात का निराकरण करने के लिये उसके मूल को समझना होगा। जिस प्रकार किसी रोग के उपचार के लिये वैद्य को सबसे पहले रोग का निदान करके उसके उत्पन्न होने के कारण को खोजना और समझना पड़ता है, उसी प्रकार दुःख के निराकरण के लिये उसके स्वरूप और कारण को समझना होगा।

दुःख क्या है, उसकी उत्पत्ति कैसे होती है, उससे क्या अहित है और उसका निराकरण किस प्रकार हो सकता है, इन सब बातों पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है।

आकाश की भाँति दुःख भी कोई स्थूल वस्तु नहीं है, वह भी एक निराकार अनुभूति मात्र है। यह अनुभूति जितनी तीव्र होगी दुःख का अनुभव भी उतना ही ‘प्रचण्ड होगा’। दुःख यदि असुविधा पूर्ण परिस्थिति विशेष पर निर्भर होता तो अधिक सुविधाओं वाले हर व्यक्ति को सुखी होना चाहिये, और असुविधा पूर्ण जीवन व्यतीत करने वाले को दुःख से दब कर मर जाना चाहिये। संसार में सुख सुविधाओं के साधन उतने नहीं हैं जितनी कि जन संख्या। इस अनुपात से तो यदि दुःख का कारण असुविधा पूर्ण परिस्थितियाँ ही होतीं, तो संसार का दो तिहाई जन समुदाय हर समय रोता कलपता ही दृष्टिगोचर होता। किन्तु होता ऐसा नहीं। जहाँ सुविधा-सम्पन्न व्यक्ति प्रसन्न दीखते हैं वहाँ असुविधाग्रस्त व्यक्ति भी और जहाँ असुविधा ग्रस्त लोग व्यग्र एवं विकल होते देखे जाते हैं, वहाँ सुविधा सम्पन्न व्यक्ति भी कम परेशान नहीं होते। इस न्याय से तो यही सिद्धान्त निकलता है कि सुख दुःख का अस्तित्व सुविधा असुविधा पूर्ण परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है, बल्कि इनका कोई अन्य कारण है।

दुख सुख का मूल बाह्य परिस्थितियों में नहीं, मनुष्य की अपनी मनःस्थिति में है, और उनकी न्यूनाधिकता का होना उसकी संवेदनशीलता की तीव्रता पर निर्भर करता है हर समय देखा जा सकता है कि एक ही समान परिस्थिति में रहने वाले दो व्यक्तियों में से एक दुखी दीखता है और दूसरा प्रसन्न। कभी-कभी यह भी देखा जाता है कि किसी एक ही परिस्थिति में एक ही व्यक्ति कभी प्रसन्न और कभी खिन्न होने लगता है।

एक समय ऐसा भी था जब संसार में किसी प्रकार की सुविधा का कोई छोटा मोटा साधन भी नहीं था। मनुष्य प्राकृतिक साधनों पर निर्भर रह कर भी प्रसन्न रहा करता था। यदि असुविधायें ही दुख का कारण होतीं तो उस समय से अब तक मनुष्य को जीवित न रहना चाहिये था। आज भी देखा जा सकता है कि मनुष्य की अपेक्षा पशु पक्षियों के पास साधनों की कमी ही नहीं पूर्णरूपेण अभाव है तब भी वे मनुष्यों से अधिक प्रसन्न दीखते हैं। मनुष्य की भाँति कोई भी पशु पक्षी रोते कलपते नजर नहीं आते। वे एक नैसर्गिक जीवन यापन करते हुये भी प्रमुदित एवं प्रसन्न रहते हैं।

पशु पक्षी ही क्यों सभ्य मानव संसार को ही ले लिया जाये। आज भी ऐसे देश द्वीप और भूखंड है जिनके निवासियों को सुख सुविधाओं के साधन नहीं के बराबर ही उपलब्ध हैं। कोई जातियाँ रेगिस्तान के बीच रहती हैं, कोई पानी के नीचे तो कोई बर्फ से घिरी हुई रह गई किन्तु वे भी हँसती खेलती और प्रसन्न होती हैं। एक किसान और साहूकार की ही तुलना कर ली जाये कि जिस कड़ाके की सरदी में किसान अपने खेत में गाता हुआ हल जोतता है, उसी सरदी में कोई अमीर आदमी लिहाफ में लिपटा हुआ अँगीठियों के बीच भी कष्ट अनुभव करता है। किसी एक व्यक्ति को ले लीजिये कि जाड़ों में जो प्रातः काल लिहाफ से मुँह नहीं निकालता वही अपने किसी प्रिय जन को लेने के लिये प्रसन्नतापूर्वक दौड़ा-दौड़ा स्टेशन जाता है।

इनके अतिरिक्त ऐसे भी व्यक्ति पाये जाते हैं जो सुख सुविधाओं को त्याग कर असुविधापूर्ण जीवन अपना कर प्रसन्न रहते हैं। साधक तथा तपस्वी सब इसी श्रेणी के व्यक्ति हैं। यदि साग्रह अपनाया हुआ उनका असुविधापूर्ण जीवन दुख का कारण होता, तो प्रथम तो वे उसे अपनाने की गलती ही नहीं करते अन्यथा पहले से अधिक प्रसन्न, स्वस्थ और तेजवान दीखने के स्थान पर दुर्बल, असन्तुष्ट, खिन्न एवं दीन हीन दीखते।

इस प्रकार हम देख सकते हैं कि दुख-सुख का कारण बाह्य परिस्थितियाँ नहीं बल्कि मनुष्य की मनःस्थिति ही हैं।

जिसका मन बलवान है, जिसकी बुद्धि ठीक-ठीक क्रियाशील है और जिसकी संवेदनशीलता छुई मुई की तरह सुकुमार नहीं है वह मनुष्य अपेक्षाकृत दुःख का अनुभव कम ही करेगा। जिस विवेकशील ने दुःख के अस्तित्व में विश्वास नहीं किया हुआ है, जो कष्टों और आपत्तियों को उद्बोधन, सतर्कता, सावधानी और कर्मठता का हेतु मानता है वह सुखों से अधिक दुखों से लाभ उठाता है।

सुख-सुविधापूर्ण परिस्थितियों में मनुष्य प्रायः निकम्मा, आलसी और सुकुमार हो जाता है जिससे मन-बुद्धि के साथ उसकी सारी इन्द्रियाँ निस्तेज तथा निर्जीव हो जाती हैं। उन पर उसी प्रकार विकारों का मोर्चा लग जाता है जिस प्रकार बेकार पड़ी हुई मशीन पर। चलती हुई मशीन के सारे पुरजे जिस प्रकार चमकदार और चिकने बने रहते हैं, ठीक उसी प्रकार संघर्षरत मनुष्यों की सारी क्षमतायें एवं अवयव तेजस्वी बने रहते हैं।

आपत्ति काल में जो मनुष्य दुख से दब कर, निश्चेष्ट हो जाता है उसके सम्पूर्ण जीवन को एक छोटी सी विपत्ति भी अमरबेलि की तरह घेर कर सुखा देती है। और जो दुःख को एक चुनौती की तरह स्वीकार करता है वह एक बीज की तरह धरती का पर्त चीर, कर पल्लवित हो उठता है।

“संसार दुखों का सागर है”-यह उक्ति केवल उन्हीं पर चरितार्थ होती है जो दुखों से भयभीत और प्रत्येक क्षण सुख के लिये लालायित रहते हैं। सुख-सुविधा की अतिशय चाह भी दुख का एक विशेष कारण है। इस निरन्तर परिवर्तनशील और द्वन्द्व प्रधान जगत में जो सदा अपने मनोनुकूल परिस्थितियों की अपेक्षा करता है उसके लिये संसार की लघु से लघु प्रतिकूलता भी एक बड़ा दुःख बन जाती है। हम क्यों चाहते हैं कि हमें केवल शीतल मंद सुगन्ध समीर ही प्राप्त होती रहे, गर्म वायु का कोई झोंका हमारे पास होकर न निकले। ऐसा किस प्रकार सम्भव हो सकता है। जब संसार में दोनों प्रकार की वायु चलती हैं तो क्रम से वे हमारे पास आयेंगी ही। यदि हम छाँह की कामना करते हैं तो धूप सहन ही करनी होगी।

इसके अतिरिक्त , यदि यह सम्भाव्य भी मान लिया जाये कि मनुष्य के मनोनुकूल परिस्थितियाँ संचित की जा सकती हैं और किसी प्रकार दुःख को पास नहीं भी आने दिया जा सकता है तब भी कुछ ही समय में एकरसता के कारण सुख सुविधा की व्यवस्था भी दुःखदायी रह जायेगी। एक जैसी स्थिति में रहते-रहते मनुष्य का मन ऊँचा उठता है और तब वह प्रिय वातावरण में भी नीरसता अनुभव करने लगता है। जिस प्रकार वियोग, संयोग-सुख का उद्दीपक है उसी प्रकार सुखानुभूति को पुलकपूर्ण बनाये रहने के लिये दुःख का पुट भी आवश्यक है। कोई वस्तु किसी को कितनी ही प्रिय क्यों न हो यदि वह उसे निरंतर ही खाने पीने को दी जाती रहे तो शीघ्र ही उस व्यक्ति को अपनी वह प्रिय वस्तु भी अरुचिकर लगने लगेगी।

विश्वास रखिये कि दुःख का कोई अपना अस्तित्व नहीं है यह आपकी अपनी मनोदशा का विकृत स्वरूप है! दुःख की दवा रोना नहीं मुस्काना ही है! दुख को देख कर मुस्कुराइये इसे नियति का छल समझ कर हँसिये!

यदि आप दुःख की दशा में हाथ पैर छोड़ कर बैठ जायेंगे उसके प्रति, आत्म समर्पण कर देंगे तो यह काल्पनिक प्रेत आपको विनष्ट कर देगा। दुःखी होने वाला व्यक्ति न कभी स्वस्थ रह सकता और न सुखी, न वह कोई उन्नति कर सकता है और न विकास। दुखशील प्रवृत्ति के व्यक्ति के मन मस्तिष्क निष्क्रिय और आत्मा निस्तेज होकर पतित हो जाती है!


धर्म का स्वरूप और उपयोग

जीवन में स्थायी सुख-शान्ति लाने के लिये धर्म का पालन करना बहुत आवश्यक है। जनसाधारण की सामान्य धारणा के अनुसार धर्म कोई विशिष्ट कर्म काण्ड नहीं है। धर्म का अर्थ पूजा-पाठ अथवा साधना-उपासना ही नहीं है। यह सारे कर्म-काण्ड जीवन को धार्मिक पथ पर चलाने और उसका अभ्यस्त बनाने के साधन मात्र हैं। पवित्र कर्म-काण्ड करने से मनुष्य के कुसंस्कार तथा अहितकर अभ्यास मिटते हैं और उनके स्थान पर सुसंस्कार और कल्याणपूर्ण अभ्यासों का समावेश होता है।

धर्म तो मनुष्य जीवन की वह सामान्य पद्धति है जिसको अपना कर चलने से एक चिरस्थायी सुख-शाँति की उपलब्धि होती है। पग-पग पर विग्रह तथा विनाश कारणों का समापन होता है। धर्म का अवलम्बन लेकर चलने से जीवन दिन-दिन उन्नति की ओर अग्रसर होता चलता है। उन्नतिपूर्ण जीवनयापन करना ही मनुष्यता है, इसके विपरीत अधोगामी जीवन जीना और कुछ भी हो मानवता तो नहीं ही है!

भारतीय मनीषियों ने अध्ययन, चिन्तन और अनुभव के आधार पर सुख-शाँति पूर्ण जीवन-यापन की जो पद्धति खोज निकाली है उसको धर्म का नाम देकर दश लक्षणों अथवा कर्तव्यों की सीमा में समाहित कर दिया है। जो मनुष्य इन दश गुणों अथवा कर्तव्यों को अपना कर चलता है वह न केवल स्वयं सुखी रहता है अपितु दूसरों के लिये भी सुख का हेतु बनता है!

“धृतिः क्षमा दमोऽस्तुते यै शौचमिन्द्रि निग्रहः। धीविद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।”

“धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय निग्रह, धी, विद्या, सत्य एवं अक्रोध यह धर्म के दश-लक्षण हैं—अर्थात् यह दश ऐसे कर्तव्य अथवा गुण हैं जो मनुष्य को महान बना कर सुख-शाँति की उपलब्धि कराते हैं।

यह दश कर्तव्य केवल धर्म के ही लक्षण नहीं बल्कि सच्ची मनुष्यता के पावन सोपान और विश्वकल्याण के मूल मंत्र भी हैं।

इन दश लक्षणों को अपना कर चलने वाले को किसी धर्म विशेष का अनुयायी मानना संकुचित दृष्टिकोण तथा संकीर्ण विचारधारा का परिचय देना है। यह किसी जाति विशेष के लिये साम्प्रदायिक निर्देश नहीं अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिये माँगलिक निष्कर्ष हैं जिनको सार्वभौम भावना रखने वाले भारतीय चिन्तकों ने सम्पूर्ण जीवन का मंथन करके निकाला है। यह जीवन तथ्य किसी देश, जाति, राष्ट्र अथवा सम्प्रदाय की निधि नहीं है। इस विभूति में समग्र संसार का अधिकार है जो चाहे ग्रहण कर सकता है और लाभ उठा सकता है।

धर्म के ये दश लक्षण अंधविश्वास के विषय नहीं हैं बल्कि तर्क और अनुभव की कसौटी पर परखे हुये मानवजीवन के शाश्वत सत्य हैं। संसार में कितने ही धर्म, मजहब, पंथ और सम्प्रदाय क्यों न चला करें और क्यों न कितने ही पीर, पैगम्बर, सन्त, महन्त, साधु अथवा महात्मा पैदा हो जायें-मानव-कल्याण का निर्देश करते समय इस त्रयकालिक दशक से बाहर नहीं जा सकते। वे जो कुछ नया पुराना कहेंगे वह इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती हुई इनकी ही शाखायें प्रशाखायें होंगी।

इस धार्मिक दशक को जीवन में उतारते समय विवेचना पूर्वक इनका स्वरूप समझ लेना अत्यावश्यक है।

धृति का अर्थ है धैर्य। मनुष्य एक कर्मशील प्राणी है। इस कर्म प्रधान विश्व में बिना कर्म किये, बिना कुछ काम किये किसी का गुजर नहीं हो सकता। अथवा यों कहना चाहिये कि वह जीवित नहीं रह सकता। अतएव मनुष्य कुछ न कुछ करता ही रहता है। अपना विकास, परिवार का पालन, समाज की सेवा आदि सब बातें कर्म पर आधारित हैं। यदि मनुष्य क्रियाशील न रहा होता तो आज संसार को जिस उन्नत दशा में देखते हैं वह वैसा न होता, बल्कि चारों ओर निर्जीविता, जड़ता और उजाड़पन वर्तमान होता। इन ऊँचे-ऊँचे भवनों, समुन्नत कला-कौशलों के केन्द्रों, साहित्य और शिल्पों के स्थान पर सब कुछ ऊबड़- खाबड़ ही रहा होता और जीवन की चहल-पहल के स्थान पर मृत्यु जैसा सन्नाटा छाया रहता। हम संसार में आज जो कुछ भी सत्यं-शिवं-सुन्दरम् देख रहे हैं वह सब मनुष्य की क्रियाशीलता का ही फल है।

कोई भी काम करने में धैर्य की नितान्त आवश्यकता है। जो धैर्यवान है वह कर्म करने से पहले उसके शुभाशुभ परिणाम पर विचार कर सकता है उसको सफल बनाने के लिये मार्ग निर्धारित कर सकता है। अपने कर्म के सतासत एवं उपयोगिता अनुपयोगिता पर सोच सकता है। इसके विपरीत जो अधैर्यवान् है आवेश अथवा उद्वेग पूर्ण है वह न तो कर्म की इन आवश्यक भूमिकाओं पर विचार कर सकता है और न दक्षता प्राप्त कर सकता है। उद्वेग पूर्वक किया हुआ कार्य प्रायः न तो अपनी पूर्णता को प्राप्त होता है और न वाँछित फल का वाहक ही बनता है। वह तो अस्त-व्यस्त क्रिया-कलाप की तरह एक निरर्थक श्रम ही होता है।

अधैर्य मनुष्य का बहुत बड़ा दुर्गुण है। अधीर व्यक्ति में अपेक्षित गम्भीरता का अभाव ही रहता है जिससे वह चपलता के कारण समाज में उपहास, उपेक्षा और निन्दा का पात्र बनता है। अधीर व्यक्ति के मन बुद्धि स्थिर नहीं रहते। वह न किसी विषय में ठीक से सोच सकता है और न कर्तृत्व अथवा अकर्तृत्व का निर्णय कर सकता है। अधैर्यवान् व्यक्ति अदक्षता, अस्त-व्यस्तता, अनिर्णायकता एवं अक्षमता के कारण जीवन के हर क्षेत्र में असफल होकर दुःख भोगता है। इसके विपरीत जो घृतिवान है वह जिस कार्य को पकड़ता है उसे पूर्ण मनोयोग, विवेक बुद्धि और समग्र-शक्ति लगा कर पूरा किये बिना नहीं रहता। धैर्यवान व्यक्ति कर्म करके उसके फल की प्रतीक्षा में व्यग्र नहीं होता बल्कि फलासक्ति से रहित होकर कार्य किया करता है, जिससे वह कर्मों में न तो क्लान्ति अनुभव करता है और न सफलता असफलता से आँदोलित होता है। ऐसे धृति-धर कर्म योगी ही जीवन में अपूर्व सफलता पाकर सुख-शाँति का लाभ प्राप्त करते हैं।

क्षमा का अर्थ है निद्वेष होना। निद्वेष व्यक्ति ही संसार में अजातशत्रु बनता है। जो अजातशत्रु है पूरा संसार उसका हितैषी रहता है। उसे हर समय हर स्थिति में प्रत्येक व्यक्ति की सद्भावना तथा सहयोग मिलता रहता है। क्षमावान व्यक्ति हर स्थान पर स्नेह पूर्ण सम्मान का पात्र बना रहता है।

‘क्षमा’ धारण करना कायरता अथवा दुर्बलता का चिन्ह नहीं बल्कि यह स्थिर बुद्धि, गम्भीर मन और उन्नत आत्मा का लक्षण है। अपराध करने पर भी किसी को क्षमा कर देना, उसके प्रतिशोध, प्रतिकार एवं प्रतिहिंसा की भावना न रखना किसी कायर हृदय की क्षमता के बाहर है। अपराधी के प्रति निर्द्वेष रह सकना किसी धीर वीर मनस्वी के लिये ही साध्य है। जिसके हृदय में विद्वेष नहीं जिसका कोई शत्रु नहीं और जिसको संसार का स्नेह एवं सौहार्द प्राप्त है ऐसे क्षमाशील व्यक्ति को सुख-शाँति न मिले यह त्रय काल में असम्भव है।

‘दम’ का अर्थ है दमन करने, समाधान करने की योग्यता। इस दमन का आशय है उच्छृंखल मन और अनियंत्रित कामनाओं का नियंत्रण करना। योग्यता पूर्वक विग्रह, विद्वेष तथा वैमनस्यता का समाधान करना। क्या बाह्य और क्या आन्तरिक विग्रह एवं विकारों का समाधान अनुग्रह पूर्वक ही किया जा सकता है। अविचारिता पूर्ण बलात्कार से किसी बुराई का समाधान सम्भव नहीं। क्रिया प्रतिक्रियाओं के वशीभूत होकर जो दमन किया जाता है वह अत्याचार में बदल जाता है और अत्याचारी के नसीब में सुख-शान्ति की कोई रेखा नहीं होती। अग्नि का समाधान जल और द्वेष का सहृदयता है। दमन-शील व्यक्ति आत्मा के प्रति दयालु रहता है कुविचारों तथा कुकामनाओं से आत्मा की रक्षा करता है। मन की अनियंत्रित चंचलता में शक्ति की क्षय नहीं कर देता। मन, बुद्धि और शरीर पर समुचित नियंत्रण रख कर उन्हें शक्तिशाली बनने का अवसर देता है। हर दृष्टि से शक्तिशाली बन कर दमनशील संयमी संसार के सारे सुखों का अधिकारी बनता है।

अस्तेय का अर्थ है अवंचकता होना। जिसके मन में कोई चोर नहीं रहता, वह दूसरों के प्रति ही नहीं बल्कि अपने प्रति भी सच्चा और ईमानदार रहता है। जहाँ किसी को धोखा न देना उसके प्रति हितकारक है वहाँ वंचकता का भाव न होना अपने प्रति कल्याणकारक है। जो वंचक नहीं, झूठा नहीं, वह संसार में सबका विश्वास पा लेता है। अवंचक व्यक्ति निरपराध रह कर निर्विरोध, निर्विकार, निर्द्वन्द्व एवं निर्भय जीवन यापन करता हुआ सुख शाँति का अधिकारी बनता है। अनास्तेयता पूर्ण व्यक्ति की आत्मा स्वस्थ तथा सबल होकर अक्षय आनन्द का स्रोत बन जाता है।

शौच का अर्थ है- पवित्रता। पवित्र मन प्राण वाला व्यक्ति शरीर से भी स्वस्थ रहता है। उसे रोग शोक और पाप-ताप रूपी शत्रु नहीं घेरते। पवित्र मनः व्यक्ति स्वच्छ और समुन्नत दशा में रहता है। उसे मलीनता और गन्दगी नहीं भाती। वह शिव एवं सुन्दर होने का अनुयायी होने से कला पूर्ण जीवन का आनन्द प्राप्त करता है।

इन्द्रिय निग्रह का अर्थ है वासनाओं से अपनी रक्षा करना। जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं वह मिताहारी, मितव्ययी एवं मितभाषी होता है। जिसमें इन तीन गुणों का विकास हो जाता है वह संसार के बहुत से दुर्गुणों से बच जाता है। मिताहार रोग से, मितव्ययिता दरिद्रता से और मितभाषण निरर्थक विग्रह तथा वाद-विवाद से रक्षा करता है। जो इन्द्रियों का दास है वह जीवन का सारा सार शीघ्र ही खोकर खोखला हो जाता है, फिर उसके पास लोलुपता तथा लिप्सा के अतिरिक्त कुछ भी शेष नहीं रहता। जहाँ अनियंत्रित-इन्द्रिय व्यक्ति दुःख दारिद्रय से ग्रसित अल्पजीवी होता है वहाँ इन्द्रिय निग्रही व्यक्ति सुख पूर्ण दीर्घ जीवन का अधिकारी होता है।

धीः—मनुष्य की विवेक बुद्धि को कहते हैं। जिसका विवेक प्रबुद्ध है उस पर कोई विपत्ति नहीं आती और यदि संयोगवश आ भी जाती है तो विवेकी व्यक्ति उसका शीघ्र समाधान कर लेता है। जो विवेकवान है उसे किसी का भय नहीं। विवेक मनुष्य को सदैव सत्कर्मों में ही प्रवृत्त रखता है और सत्कर्मों में लगे हुये व्यक्ति के पास सुख-शाँति की कमी नहीं रहती।

‘विद्या’ का अर्थ केवल शिक्षा ही नहीं ज्ञान भी है! जिस व्यक्ति में विद्या नहीं वह बहुधा अविनयी ही होता है। धृष्ट व्यक्ति का न कहीं मान होता है और न उसे कोई चाहता है! संसार का अनन्त ऐश्वर्य पा लेने वाला व्यक्ति यदि अज्ञानी है तो वह अपने वैभव की न तो रक्षा कर सकता है और न सदुपयोग। ज्ञान के अभाव में सारे गुण, सर्वशक्तियाँ पंगु होकर निकम्मी हो जाती हैं। अज्ञान मनुष्य जीवन में निषिद्ध अन्धकार के तुल्य है। अज्ञानी व्यक्ति अंधेरे में भटकते हुए के समान पग-पग ठोकर खाता रहता है। जो विद्यावान है ज्ञानवान है वह निर्धन रहकर भी सुख-शाँति पूर्ण आत्म जीवन व्यतीत कर सकता है।

सत्य का अर्थ है किसी भ्रम अथवा भूलों में न भटकना। जो व्यक्ति सत्य का उपासक है वह किसी व्यक्ति अथवा वस्तु के बाह्य स्वरूप से प्रभावित होकर उसे अपनाने का प्रयत्न नहीं करता। सत्यवादी व्यक्तित्व की ही खोज में रहता है और प्रत्येक वस्तु के यथार्थ रूप को पाने का प्रयास किया करता है।

“सत्य के उपासक की वाणी में तेज और कर्मों में एक सार्थक दक्षता रहती है। वह न अहितकर बोलता है, और न कोई अकल्याणकर कार्य करता है। सत्य जीवन का मूल मंत्र है। सत्य का आधार लेकर चलने वाले की सफलता निश्चित है।

‘अक्रोध’-का अर्थ है उत्तेजित न होना। सदैव ही शाँत एवं आवेगरहित रहना। जिसने क्रोध को जीत लिया उसने मानो संसार को जीत लिया। क्रोध मनुष्य को अन्धा कर देता है। क्रोध का आवेग आने पर मनुष्य आगा-पीछा नहीं सोच पाता और अकरणीय कार्य कर बैठता है। क्रोधी की बुद्धि क्रोध की आग में जल कर नष्ट हो जाती है और बुद्धि का विनाश हो जाने से मनुष्य का विनाश निश्चित ही है।

इसके विपरीत जो शाँत है आवेग रहित है उसे अनिष्ट का कोई भय नहीं। अक्रोधी व्यक्ति शीतल जल की भाँति स्वयं भी शीतल रहता है और दूसरों को भी शीतल रखता है।

इस प्रकार जो व्यक्ति अपने जीवन में धर्म लक्षण कहे जाने वाले इन दश गुणों का समावेश कर लेता है उसकी सुख-शाँति में कोई बाधा नहीं पड़ती।


Quotation

शरीर और कीर्ति दोनों नाशवान हैं और मृत्यु भी सदा निकट रहती है इस कारण धर्म का संग्रह करना उचित है। —चाणक्य


मधु-संचय


मधु-संचय (Kavita)

उठो, उठो, सहयोगी, मिल जुल जीवन ज्योति जगाओ। श्रम साधन से नेक नियति से-धरती स्वर्ग बनाओ॥

धरती के धीरज से थिर हैं उन्नत शैल शिखर, गौरव बन कर सप्त सिन्धु लहराया करते हैं। मन की सहज सरलता से सरितायें बहती हैं- यौवन के निर्झर गति को दुलराया करते हैं॥

जीवन उसका धन है, सर्जन उसकी थाती है, जिसे नाश का कुटिल लुटेरा लूट नहीं सकता। चाहे जितनी दूर गगन में कोई विहग उड़े, किन्तु धरा से उसका नाता टूट नहीं सकता॥

—श्री शलभ


उठो, उठो (Kavita)

उठो, उठो सहयोगी मिल जुल जीवन ज्योति जगाओ, श्रम साधन से नेक नियत से धरती स्वर्ग बनाओ,

ईंट ईंट जुड़ने से देखो महल खड़ा हो जाता है, करना-करना मिलने से चट्टान बड़ा हो जाता है।

क्यों निराश क्यों रुके राह में अपना कदम बढ़ाओ, सुख से जीने के सब साधन और सामान जुटाओ।

न्याय और ईमान न बिगड़े मानव गुण अपनाओ, उठो-उठो सहयोगी मिल जुल जीवन-ज्योति जगाओ॥

—कृष्ण बिहारी लाल “राही”


भौतिक जग के सुख (Kavita)

भौतिक जग के सुख वैभव का प्रस्तार रहेगा कितने दिन? क्षण-भंगुर जीवन की कलिका में सार रहेगा कितने दिन?

सुख और वासना का आखिर व्यापार रहेगा कितने दिन? जग की मृगतृष्णा में जल का संचार रहेगा कितने दिन?

सोचो मनुष्य! नश्वर जग का विस्तार रहेगा कितने दिन? जग की प्रवञ्चना करके तुम बन सकते हो सज्जन महान्,

आँखों में धूल झोंक औरों की बन सकते हो शक्तिमान, जग की प्रताड़ना करके तुम कहला सकते हो पुण्यवान्,

पर तेरा अपने पापों से उद्धार रहेगा कितने दिन? सोचो मनुष्य! नश्वर जग का विस्तार रहेगा कितने दिन?

—श्यामाकान्त द्विवेदी “आनन्द”


कलि में छिपा पराग (Kavita)

तुझमें छिपा हुआ वह जैसे कलि में छिपा पराग है। अथवा वीणा के तारों में जैसे पञ्चम राग है।

किन्तु अपरिचित तू इससे ही तुझे नहीं विश्वास है। यह है कहता कौन कि मन्दिर मस्जिद उसके धाम है।

घट-घट वासी अगम अगोचर अन्तर्यामी राम है। उसे प्राप्त करने का साधन आत्मा का संन्यास है।

—विद्यावती मिश्र


चेतनता के संस्पर्शों (Kavita)

ईंटों को दो वस्त्र रूप का पाषाणों में प्राण उभारो, चेतनता के संस्पर्शों से जड़ता हँसकर मुँह-मुँह बोले।

सागर की फेनिल साँसों पर चला करें जलयान तुम्हारे, लेकर तुमको आसमान में घूमें भू के उड़नखटोले।

सिन्धु थहाओ, लौह उड़ाओ करो हुकूमत जल-थल-नभ पर, दूर चन्द्रमा के सपनों पर अपना घर आजाद करो तुम।

मैं कब कहता हूँ अम्बर में उड़ने का तुम स्वप्न न देखो, मैं यह कहता हूँ अम्बर से पहले भू को प्यार करो तुम।

मैं कब कहता हूँ तन का शृंगार नहीं अच्छा लगता है, मैं यह कहता हूँ तन से पहले मन का शृंगार करो तुम॥

—श्यामनारायण एम. ए.


जीवन का यह ध्येय नहीं है (Kavita)

जीवन का यह ध्येय नहीं है, बीते यह दुर्भोगों में, उच्छृंखल बन कलुष बढ़ाये अथवा बीते रोगों में,

बन जाये पाषाण हृदय भी मृदुल मोम कुछ करने का, मनु सन्तानों यह मत भूलो जीवन है कुछ करने को।

—श्री यज्ञदत्त अक्षय


तुम जगाते रहे हो (Kavita)

तुम जगाते रहे हो, जगाते रहो,

युद्ध की इस निशा को सवेर करो।

तुम कवि हो, रवि, रोशनी हो तुम्हीं,

तम का विस्तार छाया उसे तुम हरो,

तुम न चुप हो कवि, आज बोलो जरा,

यह समय है तुम्हारे ही उद्गार का।

—श्री मुक्ति नाथ त्रिपाठी


असन्तुष्ट रहें न विक्षुब्ध; जिन्दगी हँस-हँस कर जियें

आत्म विकास, दीर्घ जीवन, आत्म विश्वास एवं आनन्द प्राप्ति के लिये आवश्यक है कि हम पूर्ण रूप से मानसिक रोगों से मुक्त रहें। असन्तोष तथा विक्षोभ जैसे मानसिक उद्वेग, मानसिक स्वास्थ्य की प्राप्ति में बाधक होते हैं। प्रसन्नता, संतोष और अन्य सतोगुणी सम्पदायें मानसिक रूप में मनुष्य को स्वस्थ रखती हैं इससे वह अपने लक्ष्य की ओर तत्परता से बढ़ता हुआ चला जाता है। लौकिक जीवन भी सुखमय बना रहता है और पारलौकिक ध्येय में भी अनस्थिरता नहीं आती।

स्वर्ग यहीं पर है। यह सर्वत्र बिखरा पड़ा है। जहाँ भी उद्वेग रहित मस्तिष्क, शुद्ध हृदय और पवित्र अन्तःकरण है वहाँ स्वर्ग है। यह समस्त संसार आनन्द से ओत-प्रोत है किन्तु जो तृष्णा, असन्तोष तथा आत्म-ग्लानि के बोझ से दबे जा रहे हैं वे न इसे देख सकते हैं न सुन सकते हैं। उसमें भाग लेकर अपने जीवन को उल्लासमय रखने के लिये यह स्वर्ग आप को प्रति क्षण पुकारता रहता है। कोई व्यक्ति न तो स्वर्ग से वंचित है और न हठात् किया जाता है। परेशानी केवल इतनी है कि अपने मानसिक संस्थान में क्षोभ और असन्तोष की आग भड़का कर लोग स्वयं ही उससे सम्बन्ध विच्छेद किये रहते हैं। इस अवाँछनीय स्थिति को दूर कीजिये। प्रसन्नता आपकी सहचरी है उसे प्राप्त कीजिये। जिन्दगी घुट-घुट कर नहीं हंस-हँस कर मस्ती में बिताने के लिये है। जब हम अपने मस्तिष्क को उद्वेग-ग्रन्थियों से उन्मुक्त कर देंगे, सर्वत्र आनन्द ही आनन्द फैला दिखाई देगा।

जो मनुष्य संशयों से व्याकुल है, जो राग में फँसा है, जो केवल शारीरिक भोगों का ध्यान करता है, उसकी तृष्णा बढ़ती जाती है। ऐसा पुरुष अपनी जंजीरों को कसता जाता है। स्वयं ही दुःखों में जकड़ता जाता है। परन्तु जिस मनुष्य ने अपने संशय दूर कर लिये हैं, जो सावधान है, जिसे थोड़ा मिले तो भी सन्तुष्ट रहे, वह भोगों के अशुभ गुणों पर विचार नहीं करता, उसका जीवन सुखी रहता है और पाप-बन्धनों से वह मुक्त हो जाता है।

कई लोगों का जीवन ऐसा नहीं होता। धन की अतृप्त तृष्णा उन्हें सताती है, भोगों की ओर जी लगा रहता है, यश पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करने की हवस उन्हें हर घड़ी नाच-नचाती रहती है। वे समझते हैं उनके क्लेश का कारण कोई और है, इसी से उनके मन में बराबर खीझ बनी रहती है। धन न होना कोई अभिशाप नहीं है। वास्तव में दरिद्री वही है जिसमें भारी तृष्णा है। जहाँ मन सन्तुष्ट रहता है वहाँ धनवान और निर्धन होने की असमानता का विचार भी नहीं होता। सन्तोषी सबसे बड़ा धनी है। धन की इच्छा होगी तो दीनता उत्पन्न होगी ही। कमाई अधिक कर ली तो उससे अभिमान जरूर बढ़ेगा फिर यदि वह नष्ट हो गया तो शोक बढ़ना स्वाभाविक है इसलिये जो निस्पृह है सन्तोषी है, वही सुख में रहता है।

आज जब कि राजनैतिक, सामाजिक शैक्षणिक, आर्थिक, सामरिक, औद्योगिक तथा आध्यात्मिक क्षेत्रों में सतर्कता व लगन से काम करने के प्रयत्न किये जा रहे हैं तब भी एक अत्यन्त महत्वपूर्ण पहलू उपेक्षित-सा पड़ा है वह है मनुष्य को स्वस्थ तथा हँसी खुशी का जीवन जीना सिखाने की योजना। उद्योग और अर्थ विकास के साथ-साथ मनोविकास होना भी आवश्यक है अन्यथा बढ़े हुये साधनों से मनुष्यों को कोई प्रसन्नता नहीं मिलेगी वह केवल क्षुब्ध और असन्तुष्ट ही बना रहेगा। साधन जितना बढ़ेंगे आवश्यकतायें भी उतना ही बढ़ती रहेंगी और सारे मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट कर डालेंगी। ऊपर से वह सम्पन्न दिखाई देगा किन्तु आन्तरिक जीवन में कोई सरसता न होगी।

दैवी हृदय के मनुष्य शोक और यातना विहीन होते हैं। मनुष्य का सच्चा जीवन प्रचुर और अमिश्रित सुख है-इस बात को समझकर वे कभी असन्तुष्ट या विक्षुब्ध नहीं होते। हतोत्साह, निराशा, शोक ये आनन्दजन्य उद्वेग स्वार्थपरायणता तथा कामना के प्रतिबिम्बित पक्ष हैं। इन दुर्गुणों का परित्याग कर दे, तो ये परिणाम स्वयं ही दूर हो जाते हैं। तब केवल दैवी आनन्द शेष रह जाता है। जो कुछ अभी होने वाला है, उसके सम्बन्ध में चिन्ता न करें। जो कुछ हो चुका उसको बार-बार याद करना भी भूल है। जो कुछ वर्तमान है उसे केवल आत्म-विकास का साधन समझिए और उसी शस्त्र से जीवन संग्राम लड़िए। परिस्थितियों के हाथ अपना जीवन वैभव मत बेचिए।

संसार के सभी प्राणी यदि किसी बात में एक स्वर से सहमत हैं तो वह केवल ‘दुःख से छुटकारा पाने की चेष्टा’ करना ही है। क्या बूढ़े, क्या बालक, क्या मनुष्य, क्या पशु-पक्षी दुःख के नाम से सभी घृणा करते हैं। प्रयत्न करने पर भी मनुष्य आपत्ति के चंगुल से बच नहीं पाता। इस का कारण भी जीवन में निर्द्वन्दता का अभाव होना है। दुःख निरा घृणास्पद ही है पर उसका मूल कारण असन्तोष की वृत्ति ही इस बात की जिम्मेदार है, अतः जीवन में प्रसन्नता को ओत-प्रोत होने देने के लिए हमारा जीवन कामना शून्य, सन्तुष्ट वृत्ति का होना चाहिये।

आप सुख के लिये निर्मित हुये हैं। आप स्वर्ग के पुत्र हो। शुद्धता, विवेक , प्रेम, प्रचुरता, आनन्द तथा शान्ति ये वस्तुयें इस संसार की चिरन्तन यथार्थतायें हैं, वे मनुष्य के लिये दैवी वरदान हैं पर मानसिक संतृष्णाओं में रहकर आप उनसे वंचित ही बने रहेंगे। अपने विचार जगत को इस तरह स्वच्छ करने का प्रयत्न करें कि उसमें कोई धब्बा शेष न रह जाय। व्यावहारिक जगत में यह बात कुछ कठिन-सी लगती है। आजीविका-व्यापार में ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं जब मनुष्य के विचार शुद्ध नहीं रहते। उनमें कोई न कोई विकार आ टपकता है, और सारी मनोभूमि को गन्दा करके रख देता है। अन्धकार घनीभूत हो रहा हो तो प्रकाश की एक किरण उसे मिटा डालती है। मनोविकारों का अन्धकार सन्तोष के दैवी प्रकाश से ही दूर होता है। सन्तोष अंतर्जगत में ऐसे वातावरण की सृष्टि करता है जिससे सारे मनोविकार आकर धुल जाते हैं।

मनुष्य सन्तुष्ट होकर जीना सीख जाय तो फिर उसके लिये संसार में कोई दुःख शेष न रहे। प्रत्येक वस्तु को सुख तथा आनन्द में रूपांतरित कर लेना मुख्यतः दैवी मनुष्यों का ही कार्य तथा कर्तव्य है। प्रत्येक वस्तु को दरिद्रता तथा विपत्ति के रूप में देखना यह असन्तोष का लक्षण है जिसका अनुसरण साँसारिक वृत्ति के मनुष्य अचेतन होकर किया करते हैं। सन्तोष एक शक्ति है जो प्रत्येक वस्तु को शक्ति तथा सौंदर्य के रूप में परिणत कर देती है। यह दरिद्रता में भी प्रचुरता, दुर्बलता में भी शक्ति , कुरूपता में भी सुडौलता, कटुता में भी मधुरता, अन्धकार में भी प्रकाश उत्पन्न करता है तथा अपने प्रभाव से कमजोर परिस्थितियों में भी आनन्द पूर्ण स्थिति बना लेता है।


Quotation

अपने मन को हास्य और आनन्द के अनुरूप बना लो, इससे सहस्रों हानियाँ रुक जाती हैं और जिन्दगी लम्बी हो जाती है।

प्रत्येक विनोद के साथ उससे सम्बन्धित सुख रहता है, और अन्य बातों की अपेक्षा उसी में विनोद का आनन्द भी मिलता है।

—शेक्सपीयर

कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य, धर्म-अधर्म की परीक्षा के लिये शास्त्रकारों ने बताया है कि उसे—”आत्म सन्तुष्टि” की कसौटी पर कसा जाय। अर्थात् जिस कर्त्तव्य से हमारी आत्मा सन्तुष्ट हो, मन प्रसन्न रहे वही धर्म है। जो कार्य करने में भय, लज्जा, शंका, ग्लानि जैसे मनोविकार उत्पन्न हों उन्हें करने के लिये आत्मा रोकती है। इसलिये आध्यात्मिक वृत्ति के मनुष्य अपनी आत्मा की प्रवृत्ति को देखते हैं। वे सोचते हैं कि जिस कार्य के करने से हमारी आत्मा को सन्तोष होगा वही हमारे लिये अभीष्ट है। उसी का वे सम्पादन भी करते हैं। वेद भगवान का प्रवचन है :—

आ रोहतायुर्जरसं वृणाना अनुपूर्व यतमाना यतिष्ठ । इह त्वष्टा सुजनिमा सजोषा दीर्घमायुः करतिजीवसे वः॥

अर्थात्—जिन्हें दीर्घ जीवन की कामना है वे संयमित जीवन द्वारा स्वास्थ्य बनाये रखें, सन्तोष, प्रीति और हँसी-खुशी का जीवन जियें। सदैव कर्मशील बने रहें। उत्तम सन्तान उत्पन्न करें और कुशलता को प्राप्त करें।


मन स्वस्थ तो शरीर स्वस्थ

मनुष्य जीवन की सम्पूर्ण गतिविधियों का परिचालन मन द्वारा होता है। सूक्ष्म और अदृश्य रूप में मस्तिष्क से जैसे विचार उत्पन्न होते हैं वैसी ही जीवन में क्रियाशीलता आती है। कर्मों के फल भी वैसे ही होते हैं। जीवन के विभिन्न पहलुओं के साथ स्वास्थ्य भी इसी प्रभाव क्षेत्र में आता है। यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं वरन् पूर्ण सत्य है कि मनुष्य का आरोग्य उसकी मनोदशा पर निर्भर करता है। मन की विकृति और कुरूपता ही बुरे स्वास्थ्य के रूप में परिलक्षित होती है उसी प्रकार मन का स्वस्थ होना शारीरिक पुष्टता का प्रमाण है।

एक अँग्रेजी कहावत के अनुसार “तन्दुरुस्त शरीर में तन्दुरुस्त मन” वाले व्यक्ति को ही नीरोग माना जाना चाहिये। शरीर अस्वस्थ हो पर यदि मन को अस्वस्थ, निराश और उद्विग्न न होने दिया जाय तो उस दुर्बलता के लक्षण चिरस्थाई न होंगे। उसे दूर भागना पड़ेगा। हीनता और निराशा की भावनायें कुछ काल तक मन एवं विचारों में परिपोषित रहने के कारण रोग की भावना ग्रन्थि का रूप धारण कर लेती है। साधारण बीमारी हलके उपचार से ठीक हो सकती है किन्तु इस ग्रन्थि चेतना का उपचार अलभ्य है। वह कठिनाई से दूर होती है। मन की निराशा एक संक्रामक रोग है, इसे दूर करने के लिये आत्म-अपमान की भावनायें मन से निकाल कर सदैव उत्साही, आशावादी एवं क्रियाशील बने रहना चाहिए। अशुभ भावनायें मन से निकल जाती हैं तो शरीर उसके दूषित प्रकोप से बच जाता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण वाले के लिए हर स्थिति में सुख और आनन्द है अतः खिन्नता की स्थिति को त्याग कर, कायरता और घबराहट को हटाकर, सदैव शुभ संकल्पों और रचनात्मक योजनाओं में लगे रहना चाहिए।

शारीरिक स्वास्थ का मूल मन है इस बात को भूलना नहीं चाहिए। अनेक रोग केवल मानसिक विकारों के कारण उत्पन्न होते हैं अतः उत्तम स्वास्थ्य के लिए मानसिक रूप से भी स्वस्थ होना अति आवश्यक है। सद्विचार ही उत्तम जीवन का निर्माण करते हैं अतः प्रयत्न यह हो कि बुरे विचार, बुरी भावनायें, चिन्ता, हीनता आदि दूर रहें और यदि इनका प्रहार होता है तो उनका संशोधन बराबर किया जाता रहना चाहिए।

यह देखना चाहिए कि आपके जीवन में कोई मानसिक कष्ट तो नहीं है। किसी रोजगार में घाटा हुआ हो, नौकरी न लग रही हो, विवाह की समस्या हो, परीक्षा में असफल रहे हों, इंटरव्यू सफल न हुआ हो, दाम्पत्य जीवन में मनोमालिन्य हो—ऐसा कोई कारण हो सकता है जिससे आपका मन पीड़ित हो। स्वास्थ्य की खराबी का शत-प्रतिशत कारण इस तरह की मानसिक वेदना होती है। यदि इस तरह की किसी खास पीड़ा से स्वतन्त्र न हुआ जाय तो उसका शारीरिक स्थिति पर दबाव पड़ता है और स्वास्थ्य खराब हो जाता है। प्रयत्न कीजिए कि आपकी यह परेशानी दूर हो जाय, कुछ हद तक परिस्थिति के साथ समझौता हो जाय तो भी बुरा नहीं पर आप इसी उलझन में ही न पड़े रहिये। अभाव दूर न हो तो उसकी कल्पना ही छोड़ दीजिये। संसार में अनेकों निर्धन, बेकारीग्रस्त, अनुत्तीर्ण, असफल व्यक्ति हैं फिर भी वे सब जी रहे है फिर आपको क्या इतनी भी गुँजाइश नहीं कि आप भी कुछ थोड़े से अभाव को सहन कर जायँ। हर स्थिति में प्रसन्न रहने का ‘फार्मूला’ अपना लें तो आपको यह कष्टकारी परिस्थितियाँ बेकार-सी प्रतीत होंगी और आप उस जटिलता से बच जायेंगे जिसके कारण आपके स्वास्थ्य पर उस दुश्चिन्ता का खराब असर पड़ने वाला था। आपको मानसिक विकारों से हर घड़ी स्वतन्त्र रहना चाहिए।

यदि आप विनोदप्रिय हैं, और व्यक्तिगत जीवन में उसे एक वरदान की तरह प्रयोग किये हुये हैं तो आप अपने को स्वास्थ्य की दृष्टि से अधिक सकुशल अनुभव करेंगे। विनोद प्रसन्नता प्रदान करता है जिससे स्नायु-संस्थान सशक्त बना रहता है। जी खोल कर हँस लेने वाले लोगों को आमाशय तथा यकृत आदि के रोग नहीं होते। हृदय मजबूत और शेष शरीर भी नीरोग रहता है। कई परिस्थितियों, चिन्ता व निराशा के क्षणों में शरीर पर पड़ने वाले बोझ को विनोद प्रियता हलका और सहनशील बना देती है। अपनी असफलताओं पर ही सदैव चिन्तन करते रहना रोग का प्रमुख कारण है इससे मन की शक्ति अकारण खर्च होती है जिससे शेष शरीर की शक्ति खिंचकर मानसिक चिन्ता में खर्च होने लगती है।

अकेलापन भी मनुष्य को कम कष्ट नहीं देता। विशेषकर जब कोई विपत्ति आती है उस समय तो अकेला रहने में मनुष्य की उदासी तथा खीझ और भी अधिक बढ़ जाया करती है। कोई बात एक ही मनुष्य के मन में अधिक दिनों तक पड़ी रहे तो इस दबाव के कारण स्वास्थ्य में अधिकाँश खराबी उत्पन्न हो जाती है। कष्ट भी सुखों की भाँति बाँटने से निबट जाते हैं। अपने मित्रों, सुहृद परिजनों तथा धर्मपत्नी से समय-समय पर समस्याओं के सुलझाव में सहायता लेते रहने से उतना कष्टकर दबाव नहीं पड़ता जिससे शरीर में हैरानी पैदा हो जाय। दूसरों की सहानुभूति तथा सहयोग मिल जाने से आत्मिक प्रसन्नता होती है, साहस जागता है तथा मनोविकार दूर होते हैं। चित्त की प्रफुल्लता बढ़ने से स्वास्थ्य में सजीवता आती है इसलिये आरोग्य का एक सबसे अच्छा उपचार यह भी है कि अपने दुःख बाँट दिये जाया करें। उनमें अपने मित्रों, परिजनों को सहयोगी बना लिया जाना चाहिये।

किसी की उन्नति देखकर ईर्ष्यालु भावना उत्पन्न नहीं करनी चाहिए। ईर्ष्या मन की प्रबल शत्रु है यह उसमें संशय उत्पन्न करती है और कमजोर बना डालती है। सही सोचने और उचित व्यवहार करने की क्षमता ईर्ष्यालु व्यक्ति में नहीं होती। वे केवल हीन, आत्मघाती विचारों में ही लगे रहते हैं और शारीरिक शक्ति का महत्वपूर्ण अंश व्यर्थ की योजनाओं में बर्बाद करते रहते हैं। इससे बात-बात पर चिढ़ जाना, तुनकमिज़ाजी, सिर में चक्कर आना, विचारों का ठीक काम न करना आदि अनेकों उपद्रव उठ खड़े होते हैं और शारीरिक दृष्टि से मनुष्य का बड़ा अहित हो जाता है। दूसरों की उन्नति देख कर प्रसन्न होना चाहिये। सब के साथ आत्मीयता पूर्ण सम्बन्धों का निर्वाह करने में सुख का अनुभव होना चाहिये।

अपने सुख की तरह औरों के सुखों का भी ध्यान रखिये। सर्वथा अनहोनी बातों पर ही विचार करते रहना अच्छा नहीं होता। मन व्यर्थ के प्रलापों में न फँसा रहे और वह अशुभ चिन्तन में ही न लगा रहे इसका सर्वोच्च उपाय यह है कि उसे हर घड़ी कार्य व्यस्त रखा जाय। आलस्य एक बहुत बड़ा अपराध है जिससे शरीर की स्थूल और सूक्ष्म, बाह्य और आन्तरिक सभी प्रकार की शक्तियों का तेजी से पतन होता है खुराफात की बातें प्रायः आलसी प्रकृति वालों को ही सूझती हैं। जिनके पास कोई काम न होगा उन्हीं के मस्तिष्क में कूड़ा-कचरा भर रहा होगा और वे अपने आपको उतना ही परेशान अनुभव कर रहे होंगे।

विचार और चिन्तन की विकृति से जिस तरह मनोभूमि अस्वच्छ और दूषित होती है उसी तरह आहार-विहार में असंयम से भी मन दुष्प्रवृत्तियों की ओर आकर्षित होता है इस बात को ध्यान में रखकर ही हिन्दू धर्म में अनेक निषेध एवं निर्देश लगाये गये हैं। नशीली वस्तुओं के प्रयोग, माँस, मदिरा आदि अभक्ष्य, मादक, तीखे, चटपटे खाद्यों पर प्रतिबन्ध लगाने का यही तात्पर्य रहा है कि इस तरह मनुष्य का मन स्वस्थ रहे, शरीर स्वस्थ रहे। नित्य शारीरिक व्यायाम आदि की आवश्यकता भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये है। स्वास्थ्य रक्षा के यह दोनों ही पहलू आवश्यक हैं इनमें से कोई एक भी उपेक्षणीय नहीं है।

उत्तम स्वास्थ्य आध्यात्मिक जीवन की मूल आवश्यकता है उसे प्राप्त करने के लिये प्रत्येक व्यक्ति को प्रयत्नशील होना चाहिये। आहार, व्यायाम, विश्राम आदि स्वास्थ्य की स्थिरता के लिये उपयोगी हैं किन्तु आत्म-विकास, दीर्घ-जीवन, आत्म-विश्वास तथा आनन्द प्राप्ति के लिये उससे भी अधिक आवश्यक मानसिक रोगों से मुक्त होना है। मन का स्वास्थ्य ही शरीर का स्वास्थ्य है। मन स्वस्थ है तो शरीर अपने आप स्वस्थ बना रहेगा।


शुभ कर्म दिखावे के लिये नहीं, अन्तः प्रेरणा से करें

दुष्कर्मों से मनुष्य के अन्तःकरण में अशान्ति असंतोष एवं विक्षोभ पैदा होता है। अनेक सफलताओं के बावजूद भी आत्मग्लानि के कारण उसे आन्तरिक सुख नहीं मिलता। बाहर से व्यक्ति को सफल माना जाता है पर वस्तुतः उसकी आन्तरिक स्थिति असफल और दुःखी ही बनी रहती है। इसलिये दुष्कर्मों से चाहे कितनी ही बड़ी सफलता क्यों न मिलती हो उन्हें घृणास्पद मानना चाहिये। बुरे कर्मों के फल कभी भी सुखकारी नहीं हो सकते।

शुभ कर्मों में वह शक्ति है जिससे मनुष्य अल्प साधनों में भी सुख, शान्ति और संतोषपूर्वक जीवन का आनन्द भोग सके। साँसारिक सफलतायें भले ही न मिलें पर उस व्यक्ति का मनोबल, आत्मबल इतना ऊँचा होगा कि उसे किसी बात का अभाव महसूस न होगा। उसके जीवन में मस्ती होगी। वह निर्भय होगा। स्वावलम्बी होगा अनेकों औरों का मार्ग दर्शन कर रहा होगा।

शुभ कर्मों का शुभ फल अनिवार्य है पर यदि उनका सम्पादन आत्म प्रशंसा के लिये हुआ तो फल में वह स्वच्छता स्थिर न रहेगी जिससे आन्तरिक शान्ति और संतोष प्राप्त होता है। यह बुराई अब सामान्य सी हो गई है। अच्छे कर्म अब केवल दिखावे के लिये ही होते हैं। एक तो उनका अभाव ही मनुष्य जीवन को छल रहा है उस पर जहाँ-जहाँ जो थोड़ी सी प्रवृत्तियाँ काम कर भी रही हैं उन में भी दिखावे की भावना इस तेजी से बढ़ रही है कि शुभ कर्मों से आत्मोत्कर्ष तथा लोक-कल्याण की आवश्यकतायें पूरी नहीं हो पा रहीं। उल्टे अच्छे कामों के प्रति लोगों में अश्रद्धा उत्पन्न होती जार ही है। यह गम्भीर बात है कि लोग काम थोड़ा करें और दिखावा अधिक। हृदय की प्रेरणा वहाँ काम करती हुई नहीं दिखाई देती। इससे उन्हें सच्ची प्रशंसा भी नहीं मिल पाती। इससे उसके फल में भी कमी होना स्वाभाविक है।

शुभ कर्मों के साथ-साथ शुद्ध भावना का होना भी नितान्त आवश्यक है। ऐसा न हुआ तो वह सत्कर्म भी अवसर मिलते ही, कुकर्म में परिवर्तित हो जायेगा और इस तरह भले कार्यों के प्रति लोगों के दिलों की निष्ठा नष्ट हो जायेगी। धर्मशालायें, अनाथालय, गौशालाएं आदि अनेकों प्रवृत्तियों के पीछे लोगों की स्वार्थ पूर्ण भावनायें काम किया करती हैं। बाहर से लोक-कल्याण का दिखावा मात्र होता है पर भीतर ही भीतर उन्हें आर्थिक-साधन समझा जाता है और उन्हें यही लाभ प्राप्त करने का माध्यम मानकर काम किया जाता है। फलस्वरूप लोक-कल्याण की सच्ची-प्रवृत्तियों का भी स्वरूप लोगों को नकली-सा दिखाई दे रहा है। यह शुभ कर्मों के नाम पर सद्प्रवृत्तियों को लज्जित करना है। इन का ठोस लाभ नहीं मिल सकता।

शुभ कर्मों का आडम्बर करने से कोई लाभ नहीं। इन्हें विचार और कार्यों में भली प्रकार स्थान देने वाला ही वास्तव में धर्मात्मा माना जाता है। ऐसे सुदृढ़ आधार पर ही जीवन को इमारत का निर्माण करना चाहिये। शुभ कर्मों की प्रतिक्रिया अन्तःकरण से उठनी चाहिये और यही आदर्श लेकर उसे लक्ष्य तक पहुँचाना चाहिये, चाहे इस में अपनी आत्माहुति ही क्यों न देनी पड़े। ऐसी सच्ची निष्ठा यदि संसार में एक व्यक्ति की भी हो जाती है तो वह समग्र विश्व में हलचल मचा देता है और बिना कहे हुये बहुतों की सेवा करता हुआ चिरकाल तक जीवित बना रहता है।

हरिश्चन्द्र के हृदय में जो सत्य की निष्ठा जागृत हुई थी वह आत्म प्रेरणा से प्रभावित थी तभी वे अनेक कठिनाइयों से भी नहीं झुके। जगद्गुरु शंकराचार्य ने अनेकों कष्ट सहे पर आध्यात्मिक-प्रशस्ति का पथ न छोड़ा क्योंकि उनका आध्यात्म-प्रेम आन्तरिक था। महात्मा गान्धी ने आजादी की माँग स्वार्थ वश नहीं की थी। हजारों लोगों की मुक्ति का प्रश्न ही उनके हृदय में जागृत हुआ था तब उनमें वह शक्ति आई जिससे गोराशाही के मृत्यु-तुल्य कष्टों को वह हँसते-हँसते झेल गये। शुभ-कर्मों के प्रति आत्म-निष्ठा हो तो उनकी पूर्ति का बल अपने आप आता है। साधन भी बनते हैं और परिस्थितियाँ भी साथ देती हैं। किन्तु बिना परिश्रम। बिना कष्ट झेले बाहरी दिखावे से “वाह-वाह” की इच्छा की जाती है तो दुर्बल हृदय मनुष्य उसमें देर तक खड़ा नहीं रह पाता और उसे अपयश और अनादर ही मिलता है। इससे न केवल औरों को हानि होती है वरन् स्वयं की भी खिन्नता और परेशानी बढ़ती है। ढोंग या मायाचार के कारण आध्यात्मिक पतन ही होता है।

फल तो मनुष्य को भावना के अनुसार मिलता फिर दिखावे का कोई लाभ नहीं। बाह्य आडम्बरों से कभी आन्तरिक शुद्धि नहीं हो सकती। इसलिये अच्छी प्रवृत्तियों को जीवन में धारण करने के पूर्व आपको यह विचार कर लेना होगा कि आप अन्त तक उस में स्थिर बने रहेंगे। दूसरों को अधर्माचरण से लाभ उठाते देखकर उनकी नकल करने को न ललचाओ। काँटे में लिपटा हुआ आटे का टुकड़ा खाकर मछली की जो दशा होती है, जाल के नीचे फैलाये हुये अन्न के दानों को खाकर चिड़िया की जो गति होती है, माँस की लालसा से हड्डी के साथ अपने ही जबड़ों का रक्त चूसने में जो दुर्दशा कुत्ते की होती है वही दशा अनीति द्वारा लाभ उठाने वालों की होती है। इस प्रकार के मार्ग का अनुसरण करने की कोई बुद्धिमान और दूरदर्शी मनुष्य आकाँक्षा नहीं कर सकता। करुणा वृत्ति, उदारता और अन्तः प्रेरणा पूर्वक किया हुआ थोड़ा सा कार्य भी फलदायक और सुखकारी होता है। सच्चाई का एक कण भी इतना स्वादिष्ट होता है कि उसकी तुलना मनों बनावट से नहीं हो सकती। नकली फल देखने में सुन्दर भले ही लगें किन्तु उनमें कोई स्वाद नहीं होगा।

इस युग में लोगों के दुःख बहुत बढ़ गये हैं इसका कारण यही है कि नकलीपन लोगों की नस-नस में समा गया है। खाद्यान्न से लेकर जीवनोपयोगी सभी वस्तुओं में नकलीपन दिखावा और मिलावट बेहद बढ़ी है। बढ़िया-बढ़िया कपड़ों से लिपटे हुये शरीर को उघाड़ कर देखें तो हड्डियाँ ही दिखाई देंगी। असंयम के कारण सूखे चेहरों पर कलई पोतने से आज तक किसी को सुन्दरता मिली है? हमारे जीवन का प्रत्येक अंग केवल दिखावट मात्र रह गया है। भीतर ही भीतर असंतोष, अशान्ति और अभाव का घुन उसे खाये जा रहा है इसी लिये आज लोग इतने दुःखी दिखाई पड़ रहे हैं।

आत्मीयता का गहरा प्रेम-सम्बन्ध जैसा पहले दिखाई देता था अब वह स्वप्न हो गया है। मित्रता और प्रेम भी लोग स्वार्थ वश करते हैं। शिष्टाचार वश अपने माता-पिता को रोटी देकर ही लोग अपने कर्त्तव्य की इति-श्री समझ लेते हैं। उनके कष्टों को, दुःखों और परेशानियों को मिटाने की रुचि भला किसमें है? हृदय में कायरता, मन में मैल, विचारों में वासना भरी पड़ी है इसीलिये अब उस जमाने जैसी मातृ भक्ति , भ्रातृत्व तथा गुरुनिष्ठा का पूर्णतया अभाव-सा हो गया है।

सच्चाई आत्मोत्थान की प्रमुख आवश्यकता है। हमारे जीवन में सादगी और सरलता को प्रचुर स्थान मिलना चाहिये। हम जो कुछ करें उसे आत्मिक लाभ की दृष्टि से करें तो लाभ की सम्भावनायें अधिक रहेंगी। सच्ची निष्ठा सदैव ही फलदायक होती है। गुणों को जीवन-व्यवहार में फैलना चाहिये उनका दिखावा नहीं किया जाना चाहिये तभी समाज में सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है।

“करना कम दिखावा अधिक” यह ओछे व्यक्तित्व का लक्षण है। लोगों को धार्मिक अश्रद्धा न हो जाय इस दृष्टि से शुभ कर्मों का दिखावा न करें तो ही अच्छा। धर्म और सदाचार के नाम पर बाह्य प्रदर्शन करने की अपेक्षा तो साधारण जीवन जीते रहना अच्छा है। इससे कम से कम विचार विद्रूप तो नहीं उत्पन्न होगा और समाज में गलत परम्परा को स्थान तो नहीं मिलेगा।

असली-नकली के संमिश्रण के कारण परिस्थिति ऐसी बन गई है कि धर्म के नाम पर जो कार्य किये जाते हैं, उनमें पुण्यों के साथ पाप भी हो जाते हैं। आज नकली की मात्रा असली से अधिक हो गई है इसलिये धर्म के नाम पर जो कुछ किया जाता है, उसमें पुण्य का भाग कम और पाप का अधिक होता है, शुभ कर्म के नाम पर जो कुछ करते हैं वह दिखावे के कारण कुछ फलित नहीं हो पाते। फूटे पेंदे वाले घड़े का पानी जिस तरह से बह जाता है। शुभ कर्मों का शुभ फल भी दिखावे के छेद से रिस जाता है फलतः अपना किया हुआ थोड़ा सा श्रम भी निरर्थक चला जाता है। हमें अच्छे कर्मों से प्राप्त होने वाली शान्ति, सुख और संतोष से वंचित न रहना पड़े इसमें लिये जो कुछ करें वह अन्तः प्रेरणा से करें, निष्ठापूर्वक करें। प्रशंसा प्राप्त करने की भावना से किये गये शुभ कर्मों का कोई लाभ नहीं होता।


समय का सदुपयोग करिये, यह अमूल्य है।

मनुष्य-जीवन में रुपये-पैसों से भी अधिक महत्व समय का है। धन का अपव्यय निर्धन बनाता है किन्तु जिन्होंने समय का सदुपयोग करना नहीं सीखा और उसे आलस्य तथा प्रमोद में गँवाते रहते हैं उनके सामने आर्थिक विषमता के अतिरिक्त नैतिक तथा सामाजिक बुराइयाँ और कठिनाइयाँ खड़ी हो जाती हैं। समय का उपयोग धन के उपयोग से कहीं अधिक विचारणीय है क्योंकि उस पर मनुष्य की सुख-सुविधा के सभी पहलू अवलम्बित है। इसलिये हमें अर्थ अनुशासन के साथ-साथ नियमित जीवन जीने का प्रशिक्षण भी प्राप्त करना चाहिये।

शेक्सपियर का यह कथन—”मैंने समय को नष्ट किया और अब समय मुझे नष्ट कर रहा है” अक्षरशः सत्य है। जो समय व्यर्थ में ही खो दिया गया, उसमें यदि कमाया जाता तो अर्थ प्राप्ति होती। स्वाध्याय या सत्संग में लगाते तो विचार और सन्मार्ग की प्रेरणा मिलती। कुछ न करते केवल नियमित दिनचर्या में ही लगे रहते तो इस क्रियाशीलता के कारण अपना स्वास्थ्य तो भला-चंगा रहता। निष्क्रियता रोग से कम नहीं, उससे अनेक बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं, खाली दिमाग शैतानी ही कर सकते हैं। इस तरह समय के अपव्यय से मनुष्य की शक्ति और सामर्थ्य ही घटती है। कहना न होगा कि नष्ट किया हुआ समय मनुष्य को भी नष्ट कर डालता है।

संसार का काल-चक्र भी कहीं अनियमित नहीं। लोक और दिक्पाल, पृथ्वी और दिक्पाल, पृथ्वी और सूर्य, चन्द्र और अन्य ग्रह समय की गति से गतिमान हैं। समय की अनियमितता होने से सृष्टि का कोई काम चलता नहीं। धरती में यही नियम लागू है। लोग समय का अनुशासन न रखें तो रेल, डाक, कल-कारखाने, कृषि-कमाई आदि सभी ठप्प पड़ जायें और उत्पादन व्यवस्था में गति भंग के साथ सामान्य जीवन पर भी उसका कुप्रभाव पड़े। एक तरह से सारी सामाजिक व्यवस्था उथल-पुथल हो जाय और मनुष्य को एक मिनट भी सुविधापूर्वक जीना मुश्किल हो जाय। जिस तरह अभी भली प्रकार सारे क्रिया कलाप कर रहे हैं वैसे कदापि नहीं हो सकते। अतः हमको भी अपनी दिनचर्या को, अपने जीवन कार्यों की आवश्यकतानुसार विभक्त करके उसी के अनुसार कार्य करना चाहिए।

अपने कार्यों का वर्गीकरण (1) स्वास्थ्य (2) धन और (3) सामाजिक सदाचार की दृष्टि से कीजिए और एक दिन के समय को इसी क्रम में बाँट कर अपने लिये एक व्यवस्थित दिनचर्या बाँध लीजिये और उसी के अनुसार चलते रहिये। इसी में आपकी सारी बातों का समावेश हो जाना चाहिए और उसी के अनुरूप जीवन क्रम चलता रहना चाहिये। इससे आप अधिक सुखमय जीवन जी सकेंगे।

वैयक्तिक सुखोपभोग और साँसारिक कार्यों में क्षमतावान् होने के लिए आपका स्वस्थ रहना बहुत जरूरी है। स्वास्थ्य सुखी जीवन की प्रमुख शर्त है, अतः उन सभी नियमों को प्राथमिकता दीजिए जिनसे आपका शरीर और मन स्वस्थ व प्रबुद्ध रहता है। हमेशा सूर्योदय से कम से कम एक घंटा पहले उठा कीजिए और शौच, स्नान आदि से निवृत्त होकर कुछ टहलने या व्यायाम आदि की व्यवस्था बना लीजिये। प्रातःकाल का मुक्त वायु शरीर की शक्ति और पोषण प्रदान करता है, दिन-भर देह स्फूर्ति और ताजगी से भरी रहती है। इस अवसर को गँवाना रोग और दुर्बलता को निमंत्रण देने से कम नहीं। जो तब भी बिस्तरों में पड़े सोते रहते हैं वे प्रातःकालीन ऊषीय-रश्मियों, निर्दोष वायु से वंचित रह जाते हैं और उनका शरीर सुस्त और निस्तेज हो जाता है। वे कोई भी कार्य आधी रुचि से करते हैं तदनुकूल सफलता भी आधी ही मिलती है।

दिन-भर के कार्यों का अनुमानित आकार भी आप बिस्तर से उठते ही बना लीजिए और फिर उसमें परिश्रमपूर्वक लग जाया कीजिए। सफलता के लिए खीझ या परेशानी मन में न आने देकर मस्तीपूर्वक सुबह से शाम तक काम में जुटे रहिये यह क्रियाशील आपको रोगों और दुश्चिन्ताओं से दूर रखेगी। यह याद रखिये कि नियमित समय पर किया हुआ काम पूर्ण रूप से भलीभाँति सम्पन्न होता है और उसके पूरा हो जाने से आन्तरिक उल्लास और प्रसन्नता की वृद्धि होती है। इससे शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मनोबल तथा आत्मबल भी बढ़ता रहता है। इसी तरह सायंकाल को भी अपने उन सभी कार्यों की समीक्षा करनी चाहिये जो दिन-भर आपने किये हैं। उनमें से कोई ऐसा दीखे जिससे आपके शारीरिक अथवा मानसिक स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ता हो तो उसे आगे के लिये रोकने या कम करने का प्रयत्न कीजिये।

साराँश यह है कि समय का विभाजन करते समय आप स्वास्थ्य की बात को भी ध्यान में रखिये और उसके प्रति बेपरवाह मत हो जाइये। आप चाहें तो समय के सदुपयोग और व्यवस्थित कार्य प्रणाली द्वारा स्वयं ही स्वस्थ बने रह सकते हैं, कार्यों में इनका दुरुपयोग करके उसे आलस्य में भी खो सकते हैं, पर याद रखिये इस बात का ध्यान जितनी देर बाद में आयेगा अपने आपको आप उतना ही पिछड़ा हुआ अनुभव करेंगे।

यही बात अर्थ उपार्जन के बारे में भी लागू होती है। शुभ और सुखी जीवन के लिये धन बहुत आवश्यक है। आर्थिक विषमता होने से दूसरे दैनिक कार्य भी कठिनाई से चल पाते हैं इसलिये धनोपार्जन के लिये भी समय का उपयोग कीजिए। समय के गर्भ में लक्ष्मी का अक्षय भंडार भरा पड़ा है पर उसे पाते वही हैं जो उसका सदुपयोग करते हैं।

आपको जितना समय कार्यालय में काम करना पड़ता है उतने से ही संतोष नहीं हो जाना चाहिये। अपने लिये कोई अन्य रुचिकर घरेलू उद्योग चुनकर भी अपनी आय बढ़ाने का प्रयत्न होना चाहिये। जापान के नागरिक ऐसा ही करते हैं। वे छोटी मशीनें या खिलौनों के पुर्जे लाकर रख लेते हैं और अपने व्यवसायिक कार्य से फुरसत मिलने पर नियमित रूप से कुछ समय उसमें भी लगाते हैं। इन कार्यों में वे अपने परिवार वालों का भी सहयोग लेते हैं और इस तरह वे अपनी बँधी आय के लगभग बराबर आय पार्ट-टाइम में कर लेते हैं। उनकी खुशहाली का सबसे बड़ा कारण समय का समुचित सदुपयोग ही कहा जा सकता है।

स्वास्थ्य और मनोरंजन के अतिरिक्त जो समय शेष रहता है उसका सदुपयोग समाज-कल्याण के लिये करना चाहिये। समय का अभाव किसी के पास नहीं पर अधिकाँश व्यक्ति उसे बेकार के कार्यों में व्यतीत किया करते हैं। ताश, चौपड़, शतरंज, मटरगस्ती आदि में समय बर्बाद करने से शरीर और मन की शक्ति का पतन होता है। इस समय का सदुपयोग सामाजिक उत्थान के कार्यों में करना हमारा धर्म है।

समय का मूल्य अमूल्य है। उसके समुचित सदुपयोग की शिक्षा ग्रहण करें तो इस मनुष्य जीवन में स्वर्ग का-सा सुखोपभोग प्राप्त किया जा सकता है। आवश्यक है कि अपने समय को उचित प्रकार से दिन-भर के कार्यों में बाँट लें जिससे जीवन के सब काम सुचारु रूप से होते चले जायें। हमें इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिये कि समय ही जीवन है। यदि हमें अपने जीवन से प्रेम है तो अपने समय का सदुपयोग भी करना चाहिये।

हम अपना समय आलस्य और निरर्थक कार्यों में खर्च न करें। आलस्य दुनिया की सबसे भयंकर बीमारी है। आलस्य समस्त रोगों की जड़ है। उसे साक्षात् मृत्यु कहें तो इसमें अत्युक्ति न होगी। अन्य बीमारियों से तो शरीर को छुटकारा भी मिल जाता है किन्तु आलस्य एक प्रकार का जंग है जो सारे मनुष्य जीवन को ही खा डालता है। आलस्य में पड़ कर मनुष्य की क्रिया शक्ति कुँठित होने लगती है जिससे न केवल शरीर शिथिल पड़ता है वरन् आर्थिक आय के साधन भी शिथिल पड़ जाते हैं।

हमारी जीवन व्यवस्था के लिये समय का बहुमूल्य उपहार परमात्मा ने दिया है। इसका एक-एक दिन एक-एक मोती के समान कीमतदार है जो इन्हें बटोर कर रखता है, सदुपयोग करता है वह यहाँ सुख प्राप्त करता है। गँवाने वाले व्यक्ति के लिए समय ही मृत्यु है। समय के दुरुपयोग से जीवनी शक्ति का दुरुपयोग होता है और मनुष्य जल्दी ही काल के गाल में समा जाता है। इसलिए हमें चाहिये कि समय का उपयोग सदैव सुन्दर कार्यों में करें और इस स्वर्ग तुल्य संसार में सौ वर्ष तक सुखपूर्वक जियें।


बड़ों के सम्मान में भूल न करें

“आशीर्वाद” प्राप्त कर लेना हिन्दू धर्म में परम सौभाग्य तथा विजय का सूचक माना गया है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि अपने से बड़े-बुजुर्ग, माता-पिता एवं गुरुजनों से आशीर्वाद मिलने से मनुष्य का मनोबल बढ़ता है और उससे एक प्रकार की शक्ति अनुभव की जाती है। इसलिये प्रत्येक मंगल कार्य, उत्सव, पर्व तथा किसी भी शुभ कार्य के आरम्भ में अपने से बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह बड़ों के प्रति सम्मान प्रकट करने और आत्मबल सम्पन्न होने का लक्षण है। जो ऐसा नहीं करता उसे नीच प्रकृति का उच्छृंखल व्यक्ति माना जाता है। वाल्मीकि रामायण में बताया गया है—

मातरं पितरं विप्रमाचार्यं चावमन्य वै।

स पश्यति फलं तस्य प्रेतराज दशं गतः॥

अर्थात्—जो माता, पिता, ब्राह्मण तथा गुरु देव का सम्मान नहीं करता वह यमराज के वश में पड़कर पाप का फल भोगता है।”

किसी के प्रति सम्मान प्रकट करने या प्रणाम करने से मनुष्य छोटा नहीं हो जाता वरन् इससे श्रेष्ठत्व की प्रतिष्ठा ही होती है और उस उच्च भावना का लाभ भी मिले बिना रहता नहीं। शुद्ध अन्तःकरण से किया हुआ नमन आन्तरिक शक्तियों को जगाता है इसलिये श्रेष्ठ पुरुषों ने सदैव ही इस मर्यादा का पालन किया है। भगवान् राम और आचार्य रावण में पारस्परिक प्रतिद्वन्दिता थी। राम रावण की कुटिलता को जानते थे किन्तु पाण्डित्य और श्रेष्ठता के प्रति उनके हृदय में जो श्रद्धा भावना थी उसके वशीभूत होकर ही उन्होंने विपरित परिस्थिति में भी इस नैतिक मर्यादा का पालन किया था। रामायण में लिखा है—

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। विप्र चरण पंकज सिर नावा॥

“इस प्रकार रणोद्यत राम ने अपना रथ आगे बढ़ाया और रावण के सम्मुख पहुँचकर उसके चरण-कमलों में अपना शीश झुकाया।”

सैद्धान्तिक मतभेद के बावजूद भी व्यवहारिक जीवन में बड़ों को सम्मान देने का उच्चादर्श भारतीय संस्कृति की अपनी निजी विशेषता है। वह आत्मा ही बलवान होता है जो प्रभु सत्ता के समक्ष अपने आपको बिलकुल लघु मानता है और तुलसीदासजी के शब्दों में “सियाराम मय सब जग जानी, करहुँ प्रणाम जोरि युग वाणी” की भावना रखने वाला ही सच्चा कर्मयोगी होता है। अनावश्यक अभिमान मनुष्य को पतित बनाता है। इसका उदय न हो इसलिये बड़ों के समक्ष सदैव विनम्र होकर रहने की शिक्षा हमें दी गई है। महाभारत में अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं जब विपक्षी पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य को अर्जुन आदि पाण्डव चरण स्पर्श करते और उनका शुभाशीष प्राप्त करते हैं। शिष्य की निष्ठा से द्रवीभूत गुरु उनकी जय कामना करते हैं और वैसा होता भी है। यदि यह मान लें कि विजय का हेतु उनकी शक्ति थी गुरुजनों का वरदान नहीं तो भी यह बात निर्विवाद सिद्ध होती है कि जो शक्ति अभिमान के वशीभूत न हो वह श्रेष्ठ तो होगी ही और उस श्रेष्ठता से लाभान्वित होने का लाभ तो उन्हें अनायास मिला ही।

सम्मान से प्रत्येक व्यक्ति को एक प्रकार की आध्यात्मिक तृप्ति मिलती है, उसे प्रत्येक व्यक्ति चाहता है। आपको भी सम्मान मिले इसके लिये इस आदि सभ्यता की परम्परा को जीवित रखना चाहिये। बड़े दुर्भाग्य की बात है कि आधुनिक शिक्षा-धारी व्यक्तियों में अहंकार इतना बढ़ रहा है कि बड़ों को सम्मान देना वे अनावश्यक समझते हैं। इसे वे छोटापन मानते हैं। कई व्यक्ति तो माता-पिता को मारने पीटने और उन पर रौब दिखाने में ही अपना बड़प्पन मानते हैं। यह हमारी संस्कृति के नाम पर कलंक ही है कि लोग अपने जन्म-दाताओं को त्रास दें। गुरु-परम्परा तो प्रायः समाप्त-सी होती जा रही है और इनके प्रति उनकी भावनायें भी बिलकुल ओछी हो गई हैं। सामयिक अनुशासन को बनाये रखने के लिये और आत्म सम्मान प्राप्त करने का भी यही मार्ग है कि हम भी अपनों से बड़ों के साथ वैसा ही व्यवहार करें। दार्शनिक सुकरात ने कहा है—”अच्छा सम्मान पाने का मार्ग यह है कि तुम भी सम्मान करो। तुम जैसा प्रतीत होने की कामना करते हो वैसा बनने का प्रयास करो।”

बड़ों के प्रति सम्मान तथा अनुशासन होना पारिवारिक संगठन का मूल आधार है। यह संगठन प्रेम मूलक होता है। वहाँ पारस्परिक आत्मीयता होती है। एक सदस्य दूसरे सदस्य का ध्यान रखता है और अधिकार के स्थान पर कर्तव्य की प्रधानता रहती है। इस स्थिति में सुख और अमन के लिये बाह्य साधनों पर नितान्त अवलम्बित नहीं होना पड़ता। लोगों में पारस्परिक स्नेह और आत्मीयता हो तो कोई कारण नहीं कि घरेलू वातावरण कष्टप्रद लगे। पारिवारिक अनुशासन सुख और व्यवस्था का मेरुदंड है इसे अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि लोगों में बड़ों के प्रति आदर का भाव बना रहे। ऐसा होने से उस वातावरण में श्रद्धा और विश्वास में कमी नहीं होने पाती और वह संगठन सुदृढ़ स्थिति में कायम बना रहता है। जब तक यह संगठन कायम रहता है तब तक धन-धान्य की भी कमी नहीं रहती और बाहरी लोगों के आक्रमण भी सफल नहीं होते। इसीलिये इस भावना को पवित्र दैवी तत्व माना गया है। पितरों को पूजने की प्रथा बड़ों के प्रति आस्था का ही चिन्ह है।

सम्मान के पीछे मूल भावना जितनी पवित्र होगी उतना ही वह अधिक उपादेय होगा और जिसके प्रति सम्मान प्रकट किया गया है उनके हृदय से “आशीर्वाद” की बहुत-सी मात्रा खींच लाने वाला होगा। लोक व्यवहार और दिखाने के लिये प्रदर्शित सम्मान से आत्मिक अभिव्यक्ति नहीं होती और वह एक संकीर्ण विचार मात्र रहकर अपने आप में ही सिमटकर रह जाता है। सम्मान की परम्परा का प्रारम्भ आत्म विकास की मूल प्रेरणा को लेकर होता है इसलिये वह निष्काम तथा निर्लोभ होना चाहिये। वहाँ पर अहंकार, लोभ आदि आसुरी वृत्तियों का प्रादुर्भाव न होना चाहिये। इसे एक रूढ़ि मात्र भी बनकर न रह जाना चाहिये। वरन् इस भावना को अन्तरात्मा के स्पर्श की सुखानुभूति होने देनी चाहिये ताकि सम्मान आध्यात्मिक प्रशस्ति का ही साधन बना रह सके।

समय बीतने के साथ परम्परा अपने आप रूढ़ि का रूप ले लेती है। यदि उसकी मूल प्रेरणा में आत्मीयता और अनुशासन का भाव न रहे तो यह परम्परा भी वैसी ही निष्फल हो जाती है। बड़ों की समता और उनके अनुभवों का लाभ हम विनीत होकर ही पा सकते हैं। बनावटीपन के कारण तो अपने आप ही छले जाते हैं। हम जब बालक थे तो माता-पिता ने जिस तरह हमारी सेवा-सुश्रूषा की थी हमें भी अपने माता-पिता की सेवा उसी आदर भावना से करनी चाहिये। जो ऐसा नहीं करते उनकी विद्या का नाश हो जाता है और वे कृतघ्न कहलाते हैं।

वेद की आज्ञा है—

न यस्य सातुर्ज नितोरवारि,

न मातरा नू चिदिष्टौ।

अधा मित्रो न सुधितः पावको,

अग्निर्दीदाय मानुपीपु विक्षु॥

धार्मिक श्रद्धा का विकास और उच्चादर्श की प्रेरणा प्रारम्भिक वातावरण से मिलती है। छोटी अवस्था से ही इन भावनाओं का उद्दीपन होता है। हमारे बालक अपने जीवन का निर्माण हमारे स्वभाव से ही अनुकरण करके सीखते हैं। उन्हें एक विशेष प्रकार की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि में ढालने के लिये और आत्म सम्मान प्राप्त करने के लिये भी हमारे आचरण में बड़ों के प्रति सम्मान का समावेश बना रहना चाहिये। धर्म, सदाचार और नैतिकता का बीजारोपण यहीं से होता है। यह परम्परा इधर कुछ समय से लुप्त हो गई है जिसके कारण हमें बड़े कष्ट मिले हैं। लोगों के जीवन क्षुद्र और अहंकारी बने, परिवार संगठन स्थिर न रह सके जिससे आर्थिक नैतिक पतन हुआ और सामाजिक जीवन में भी पारस्परिक विश्वास डाँवाडोल हो गया। अब इस गलती को दोहराना नहीं। हमें अपने जीवन की सर्वतोन्मुखी प्रगति अभीष्ट हो तो बड़ों के सम्मान में भूल न करें। माता-पिता और गुरुजनों के आशीर्वाद से जीवन संग्राम में विजय ही होती है।


छोटी-सी बुराई से भी सावधान रहें

सैद्धान्तिक जीवन के प्रति लोगों की भावनायें कितनी ही ऊँची क्यों न हों यदि व्यवहारिक जीवन शुद्ध और सतर्क नहीं है तो उससे मनुष्य को कोई आन्तरिक संतोष न मिल सकेगा। व्यावहारिक आचरण व्यक्त होता है इसलिए उसका लोगों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। किसी के अन्तःकरण में क्या छिपा है इसे कोई नहीं जानता। बाह्य अभिव्यक्ति के आधार पर ही एक व्यक्ति दूसरे की भावनाओं का अन्दाज लगाता है। किसी की हमारे प्रति कैसी भावनायें है इसका पता उसके व्यवहार से ही चलता है।

मनुष्य जैसा बाहर से व्यवहार करता है वैसा ही उसका अन्तःकरण भी होगा, यद्यपि यह बात पूर्ण सत्य नहीं है तो भी लौकिक जीवन में उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों तथा मुसीबतों को देखते हुये लोगों से यही कहा जाता है कि जो कुछ करने की इच्छा मन में हो पहले उसे तौल लें उसके परिणाम को भली प्रकार विचार लें। आवेश में अविवेकपूर्ण कार्य कर डालने से बाद में मनुष्य को बहुत पश्चाताप करना पड़ता है। गलती हो जाती है और भूल समझ में आ जाती है तो भी भूल सुधार नहीं हो पाता। चाहते हुये भी समस्या दूर नहीं होती वरन् वह अनेकों दूसरी कठिनाइयों में बदलती चली जाती है और मनुष्य की उद्विग्नता भी उसी हिसाब से बढ़ती जाती है। छोटी-सी बुराई का जाल भी जब उलझ जाता है तो उससे निकलना मनुष्य के लिये कठिन हो जाता है इसलिये प्रत्येक कार्य की शुरुआत के पूर्व उसके परिणाम पर विचार कर लेना आवश्यक हो जाता है। बुराई चाहे कितनी ही छोटी समझ में आये यह नहीं भूलना चाहिये कि उसके परिणाम बहुत गम्भीर भी हो सकते हैं। पहले यह भले ही समझ में न आयें पर समस्या उलझ जाती है तो इस बात का सहज ही में अनुमान हो जाता है।

क्षणिक मनोरंजन के लिये एक व्यक्ति शराब पी लेता है। वह समझता है कि इससे अधिक से अधिक शारीरिक क्षति ही होगी, थोड़ा-सा स्वास्थ्य भी गिरेगा। किन्तु शराब पी लेने के बाद उसे निज का ज्ञान जाता रहा। अब तक वह भले ही सज्जन व्यक्ति रहा हो पर शराब को इससे क्या प्रयोजन। उसे तो अपना प्रभाव दिखाने का मतलब। नशे धुत आदमी में भी कहीं सज्जनता रहती है? शराब को पाशविक वृत्तियों को उत्तेजित करना था सो उसने अपना काम पूरा कर दिया। अब उन उत्तेजित भावनाओं को लेकर मनुष्य शान्त कैसे रह सकता है। वह भी दूसरों को गाली देता है, झगड़ता है, मारपीट मचाता है। भले ही अचेतन अवस्था में उसने यह सब किया हो पर दूसरों में इतनी सहिष्णुता कहाँ होगी? इतनी बर्दाश्त की क्षमता भला किसमें होगी कि कोई व्यक्ति गालियाँ बके, मारे-पीटे और वह चुपचाप खड़ा रहे। परिणामतः कलह हुआ। चोटें आई, मुकदमे चले और बर्बादी हुई। शराब पीने की गलती बहुत छोटी दिखाई देती थी किन्तु उसके परिणाम की विभीषिका में जानें तक जाती देखी गई हैं। कोई भी बुराई कितनी ही छोटी क्यों न दिखाई दे उससे बुद्धिमान व्यक्तियों को सदैव सावधान ही रहना चाहिये।

महर्षि विश्वामित्र बहुत बड़े तपस्वी थे। उनका प्रभाव बहुत बढ़ा-चढ़ा था। साधना के लिए उनमें गम्भीर आस्था थी। आत्मिक शक्तियों की भी उनके पास कोई कमी न थी। पर भूल एक क्षण की उनके लिए घातक बन गई। क्षणिक कामावेश को महर्षि रोक न सके फलस्वरूप बहुत-काल की साधना के फल से उन्हें वंचित होना पड़ा। हर बुराई मेनका का-सा सुन्दर रूप बना कर ही आती है। चतुर-जन उसे दूर से ही नमस्कार कर लेते हैं किन्तु जो बिना विचारे ही उसे आश्रय दे देते हैं महर्षि की तरह बाद में उन्हें पश्चाताप ही करना पड़ता है।

प्रतिदिन कोटि गायों का दान करने वाले नृपति-नृग ने एक गाय की भूल की और उन्हें गिरगिट की योनि में जाना पड़ा, महाराज युधिष्ठिर को थोड़े से झूठ के पीछे नरक की यातनायें सहनी पड़ी। सामान्य मनुष्यों के लिए तो कहना ही क्या जब कि संसार के महापुरुषों ने छोटी बातों की उपेक्षा की और उनके कटु परिणाम उन्हें भुगतने पड़े। इतिहास प्रसिद्ध महाभारत की घटना का कारण थोड़े से शब्द थे जिनसे दुर्योधन का अपमान किया गया। विश्व विजयी नैपोलियन की हार का कारण उसके द्वारा अपने एक सेनापति को कठोर दंड देना बताया जाता है। यह ऐतिहासिक घटनायें देखने में छोटी प्रतीत भले ही होती हों किन्तु इनसे जीवन की सब से महत्वपूर्ण समस्या का हल निकलता है और वह यह कि मनुष्य यदि चैन की बसर चाहता है तो उसे छोटी-छोटी बातों की भी उपेक्षा कभी भूलकर नहीं करनी चाहिये।

हर बड़े उत्पात का जन्म छोटी बुराई के गर्भ से ही होता है। छोटी सी कटु बात भी घोर संघर्ष का कारण बन जाती है। भाइयों-भाइयों में पिता-पुत्रों में स्वामी और सेवक में कलह होती है, कटुता उत्पन्न होती है तो उनके पीछे कोई बड़ा कारण नहीं होता। किसी को अप्रिय बात कह देने, उचित सम्मान न देने, समानता का व्यवहार न करने के कारण ही इन मधुर सम्बन्धों में विकृति आती है और घर की शान, समृद्धि तथा उन्नति का द्वार बन्द कर चली जाती है। बड़े दुष्परिणाम न सहने पड़ें इसके लिये यह आवश्यक है कि हमारी निगाह हर छोटी से छोटी आदत पर, आवेश पर, वाणी पर और क्रिया पर बनी रहे ऐसा करने से ही बड़ी कठिनाइयों से बचना संभव हो सकता है।

बच्चा घर की कोई चीज उठा कर ले गया, कोई चीज चुपचाप बनिये को दे आया, चुपचाप मिठाई चुराकर खा ली, पर अभिभावकों ने कान न दिया। बच्चा अपना था इसलिये उठा लिया होगा ऐसी मान्यता प्रायः भारी पड़ती है। बच्चों को पूर्व में अनुशासन की, नियमितता की शिक्षा नहीं मिलती तो वही आगे चल कर उद्दंड और दुराचारी बनते हैं। घर की छोटी चोरी करने वाले ही आगे चल कर बड़ी चोरियों की हिम्मत करते हैं। बड़े दुस्साहस लोग प्रारम्भ में ही नहीं करते वरन् इस योग्यता तक पहुँचाने का कार्य छोटी बुराइयाँ करती हैं। वे ही बड़े दुष्कर्मों का प्रशिक्षण करती हैं। आरम्भ की गलती पर सावधानी की नजर रखी जाय तो मनुष्य बड़े अनिष्टों से सहज छुटकारा पा सकता है।

प्रत्यक्ष हों या अप्रत्यक्ष, प्रकट हों अथवा अप्रकट बुराई का बुरा फल अवश्य मिलता है। छुप कर की गई बुराइयाँ खुली हुई बुराइयों से और भी अधिक घातक होती है। ऐसी दशा में अपनी आत्मा भी साथ नहीं देती और अन्तःकरण में द्वंद्व की स्थिति पैदा हो जाती है। स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे—”बुराई के बीज चाहे गुप्त से गुप्त स्थान में बोओ, वह स्थान चाहे किले की तरह ही सुरक्षित क्यों न हो पर प्रकृति के अत्यन्त कठोर, निर्दय, अमोघ, अपरिहार्य कानून के अनुसार तुम्हें ब्याज सहित कर्मों का मूल्य चुकाना ही पड़ेगा।” बुराइयाँ गुप्त रह कर भी जीवित रहती और पनपती हैं इस बात में बिलकुल संदेह नहीं। क्योंकि उससे अपनी आत्मा तो पतित होगी ही और नीच प्रवृत्तियों की ओर अग्रसर भी जरूर होगा। मनुष्य में दुष्प्रवृत्तियाँ बड़े और वह शान्ति से बना रहे यह नामुमकिन है। बुराई के दंड से न आज तक कोई बचा है और न आगे बच सकेगा।

मनुष्य जीवन बड़ा बहुमूल्य है। एक बार मिलने के पश्चात किसे मालूम कब जन्म हो। यह शरीर भी कब नष्ट हो जाय कुछ पता नहीं। अतएव पग-पग पर सजग रहने की आवश्यकता है। जरा सी असावधानी से आप भारी संकट में फँस सकते हैं।

मामूली सी कब्ज बढ़ कर छोटी बड़ी बीमारियों का रूप धारण कर सकती है। छोटा सा फोड़ा पक कर घाव बन जाता है। शारीरिक बुराइयों का जो फल शरीर पर पड़ता है, मानसिक कुविचारों का उससे भी घातक प्रभाव मनुष्य की आन्तरिक शान्ति और व्यवस्था पर पड़ता है। जो लोग क्षणिक आवेश में पड़ कर किसी बुराई को बुलाते हैं उन्हें उस का दुष्परिणाम भी भुगतना पड़ता है। अतः हमें अपना प्रत्येक कदम बहुत सही, बिलकुल नपा तुला रखना चाहिये।

जीवन की घड़ियाँ गिनी-चुनी हैं। इनका सच्चा सदुपयोग आत्म-विकास है। अपने आप को गुणवान् बनाने से बढ़ कर कल्याणकारी वस्तु और नहीं। पर बुराइयाँ हमें उधर जाने से रोकती हैं। इनके विषय में बहुत सतर्क रहिये। अच्छाइयों का एक-एक तिनका चुन चुन कर जीवन भवन का निर्माण होता है पर बुराई का एक हलका झोंका ही उसे मिटा डालने के लिये पर्याप्त होता है। अतः आने वाला प्रत्येक क्षण अपनी जागरुकता का विषय होना चाहिये। सतर्कता दैवी गुण है। बुराइयों के प्रति निरन्तर सतर्क रहने से मनुष्य अपने जीवन के अनेक कंटक दूर कर सकता है।


आरोग्य रक्षा के तीन प्रहरी

चिकित्सा का क्षेत्र बहुत तेजी से बढ़ रहा है किन्तु उत्तम-स्वास्थ्य की दिशा में कोई प्रगति नहीं दिखाई दे रही। तरह-तरह की औषधियों का निर्माण, चिकित्सा उपकरणों का उत्पादन तथा वैद्य, हकीमों, डाक्टरों की जितनी बढ़ोतरी इन दिनों हुई है स्वास्थ्य और आरोग्य की समस्या इतनी ही जटिल होती दिखाई दे रही है। बढ़े हुये साधनों से लाभ न हो तो यही समझना चाहिये कि हमारी जीवन पद्धति में कुछ दोष है। उसका स्वास्थ्य वाला पहलू कुछ असूझ-सा है या उधर मनुष्य का ध्यान कम है। कुछ भी हो आरोग्य के जो मूलभूत प्राकृतिक सिद्धान्त हैं उन्हें मिटाया या भुलाया नहीं जा सकता। जीवन पद्धति में दोष हो तो औषधियों का कुछ महत्व नहीं, कोई उपयोगिता नहीं।

आरोग्य मनुष्य की साधारण समस्या है। थोड़े से नियमों के पालन, साधारण-सी देख-रेख से वह पूरी हो जाती है किन्तु उतना भी जब मनुष्य भार समझकर पूरा नहीं करता तो उसे कड़ुआ प्रतिफल भुगतना पड़ता है। थोड़ी-सी असावधानी से बीमारी तथा दुर्बलता को निमन्त्रण दे बैठता है। रहन सहन में यदि पर्याप्त संयम रखा जाय तो कुछ थोड़े से नियम हैं जिनका पालन करने से मनुष्य आयु-पर्यन्त उत्तम स्वास्थ्य का सुखोपभोग प्राप्त कर सकता है। उनमें से तीन प्रमुख हैं (1) प्रातः जागरण (2) ऊषा पान (3)वायु सेवन। यह तीनों ही नियम सर्वसुलभ और रुचिकर हैं, इनमें किसी तरह की कोई कठिनाई नहीं जिनका पालन न हो सके, या जिसके लिये विशेष साधन जुटाने की आवश्यकता पड़े।

प्रातः जागरण को संसार के सभी लोगों ने स्वास्थ्य के लिये अतिशय हितकर माना है। अँग्रेजी कहावत है “जल्दी सोना और जल्दी उठना मनुष्य को स्वस्थ, धनवान और बुद्धिमान बनाता है।” शास्त्रकार का कथन है—

“ब्राम्हे मुहूर्त उत्तिष्ठेत्स्वस्थेऽरक्षार्थ मायुषः।”

प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में जाग उठने से तन्दुरुस्ती और उम्र बढ़ती है।

वेद का प्रवचन है—

यदद्य सूर उदितोऽनागा मित्रो अर्यमा। सुवाति सविता भगः॥

—साम 13। 51

अर्थात्—प्रातःकालीन प्राण-वायु सूर्योदय के पूर्व तक निर्दोष रहती है अतः प्रातः काल जल्दी उठना चाहिये इससे स्वास्थ्य और आरोग्य स्थिर रहता है तथा धन की प्राप्ति होती है।”

सन्त बिनोवा का कहना है—”रात में नींद लेने के बाद शरीर की वृद्धि हो जाती है। उसे कायम रखने लिये सुबह जल्दी उठ जाना चाहिये। उस समय दिमाग ताजा रहता है, कोई आवाज नहीं होती, सृष्टि की अनुकूलता होती है इसलिये उस वक्त बुद्धि-ज्ञान-ग्रहण के लिये जागृत रहती है।”

सिखों के धर्म ग्रन्थों में आया है—’अमृत बेला सचनाऊ’ अर्थात् प्रातःकाल जल्दी न उठने से बुद्धि मन्द पड़ जाती है, मेधा नहीं बनती और स्वास्थ्य गिर जाता है।

विचार-पण्डित स्वेटमार्डन ने लिखा है “यदि आप चाहते हैं कि आपकी आयु अधिक हो, बुढ़ापा आप से दूर रहे, आपका शरीर पूर्ण स्वस्थ बना रहे तो आप प्रातःकाल जल्दी उठा कीजिये।”

आरोग्य रक्षा के नियमों में प्रातःकाल जागने में विश्व एक मत है। यह जानी हुई बात है कि दिन भर के कार्यों दौड़ धूप आदि से जो धरती में हलचल उत्पन्न होती है उससे प्राकृतिक वातावरण अशान्त हो जाता है। धूल के कण, कार्बन-तत्व और अन्य विषैले पदार्थ हवा के साथ आकाश में भर जाते हैं इनका स्वास्थ्य पर दूषित प्रभाव पड़ता है। उस वायु में स्थूल तत्व अधिक होते हैं और प्राण की मात्रा कम होती है जिससे मनुष्यों के शरीरों में भी स्थूलता तो बढ़ती है और प्राण-संचय अवरुद्ध होता है। दिन भर का कोलाहल रात में शान्त होने लगता है और तीसरे पहर अर्थात् प्रातःकाल तक वह सारा ही गर्द गुबार जमीन में बैठ जाता है जिससे प्राण-वायु निर्दोष हो जाती है। इस वातावरण में स्वाभाविक साँसें लेने पर भी प्राण की इतनी मात्रा शरीर में एकत्रित हो जाती है जिससे सारा दिन तबियत प्रसन्न रहती है और ताजगी बनी रहती है। इससे प्राण का संचित कोष रीतता नहीं और आरोग्य स्थिर बना रहता है। इस प्राण में इतनी जीवट होती है जो दिन भर के विषैले पदार्थों से लड़कर उसे समाप्त कर देने में सफल हो जाती है और शरीर पर कोई दूषित आघात पड़ने नहीं पाता। इस प्राण-विद्युत के संचय के लिये प्रातःकाल जल्दी जाग उठना सब प्रकार मंगलकारी होता है।

इन लाभों को जानते हुये भी लोगों को शिकायत रहती है कि प्रातःकाल उनकी नींद ही नहीं टूटती, यदि प्रयत्न करें और जागकर बैठ जायें तो आलस्य दूर नहीं होता। शरीर को जितने विश्राम की आवश्यकता होती है वह पूरी न हो तो आलस्य आना, जम्हाइयाँ उठना स्वाभाविक है। यह शिकायत उन्हीं की हो सकती है जिनकी नींद पूरी न होती हो। ऐसा तभी संभव है जब वह देर से सोता हो। इसलिये प्रातःकाल जल्दी उठने के लिये यह आवश्यक है कि शाम को यथा संभव जल्दी ही आवश्यक कार्यों से निबट कर सो जाया जाय और जल्दी सबेरे उठकर नियमित दिनचर्या में लग जाया जाय। सोकर जाग जाने का अर्थ केवल चारपाई पर बैठ जाना नहीं होता वरन् इस समय का उपयोग भी होता रहे।

सूर्योदय से पूर्व शैया त्यागते ही बिना शौचादि गये शाम के रखे हुये जल का पान करना “ऊषापान” कहलाता है। जल की मात्रा एक पाव से लेकर तीन पाव तक हो सकती है। जिस बर्तन में जल रखा हो वह ताँबे का हो तो अधिक अच्छा है यदि यह संभव न हो तो किसी भी स्वच्छ बर्तन में ढक कर रखा जा सकता है।

वैद्यक ग्रन्थों में ऊषापान को ‘अमृत-पान’ कहा गया है, स्वास्थ्य के लिये उसकी बड़ी प्रशंसा की गई है और यह बताया गया है कि जो प्रातःकाल नियमित रूप से जल पीते हैं उन्हें बवासीर, ज्वर, पेट के रोग, संग्रहणी, मूत्र रोग, कोष्ठबद्धता, रक्त पित्त विकार, नासिका आदि से रक्त-स्राव, कान, सिर तथा कमर के दर्द, नेत्रों की जलन आदि व्याधियाँ दूर हो जाती हैं। वैद्यक ग्रन्थों में लिखा है—

सवितुरुदयकाले प्रसृतीः सलिकस्य दिवेदष्टौ।

रोग जरा परियुक्तो, जीवेद्वत्सर शतं साग्रम्॥

अर्थात्-सूर्योदय से पूर्व आठ अंजुली जल पीने से मनुष्य कभी बीमार नहीं पड़ता, बुढ़ापा नहीं आता और सौ वर्ष से पूर्व मृत्यु नहीं होती।

प्रातःकाल जल पीने से आँतों में लगा हुआ मल साफ होता है और उसमें पुष्टता आती है। गुर्दे शक्तिशाली बनते हैं। आँख की ज्योति बढ़ती है, बाल सफेद नहीं होते, बुद्धि तथा शरीर निर्मल रहता है जिससे वह सब प्रकार के रोगों से बचा रहता है। प्रातःकाल जल पीना आरोग्य रक्षा की दूसरी महत्वपूर्ण कुँजी है।

स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रातः जागरण का वास्तविक लाभ वायु सेवन से है। यदि कोई प्रातः काल उठकर कुछ दूर शुद्ध वायु में घूमने जाया करे तो निश्चय ही उसकी आयु लम्बी होगी। जिस स्थान पर मनुष्य तथा अन्य प्राणी बहुतायत से निवास करते हैं, उनके द्वारा निरन्तर साँस छोड़ने तथा चीजों को मैला करते रहने से उस स्थान का वातावरण शुद्ध नहीं रहता। वायु में दोष आ जाने से वह लोगों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। किन्तु आबादी के बाहर के स्थान वृक्षों द्वारा निरन्तर शुद्ध किये जाते रहते हैं इसलिये गाँव या नगर से बाहर के शांतिमय वातावरण में कुछ देर रहकर आरोग्य लाभ का अवसर प्राप्त किया जा सकता है। भ्रमण से जहाँ व्यायाम की आवश्यकता पूरी होती है वहाँ बाहर की शुद्ध वायु का लाभ मिलता है। भ्रमण ऐसे ही शुद्ध बाग-बगीचों वाले स्थानों की ओर करना चाहिये। खुले आसमान की ओस भरी दूब में नंगे पाँव घूमने से शरीर को अपार शक्ति मिलती है।

स्वास्थ्य और आरोग्य रक्षा के लिये यह तीन अचूक नियम हैं। स्वास्थ्य जैसी साधारण समस्या के लिये किसी कठोर व्रत की आवश्यकता नहीं है कोई व्यक्ति इन नियमों का पालन करते हुये आरोग्य लाभ प्राप्त कर सकता है। यह तीन प्रहरी ऐसे हैं जो सब तरफ से हमारे स्वास्थ्य की रक्षा और शरीर को पोषण प्रदान करते हैं, इन्हें सजग रखें तो कोई रोग तथा शारीरिक व्याधि हमें कष्ट व पीड़ा न दे सकेगी।


बालकों का विकास इस तरह होगा।

बच्चों के विकास की समस्या यदि देखा जाये तो उन प्रमुख समस्याओं में से है जिनसे राष्ट्र का निर्माण होता है। यह उत्तरदायित्व प्रत्येक माता पिता का है कि उनके बालक सभ्य सुसंस्कृत तथा प्रतिभावान् हों। इस जिम्मेदारी का, उदारता पूर्वक धैर्य और विवेक के साथ पालन न किया जाय तो बालकों का दुर्गुणी होना-स्वाभाविक है। चरित्र का संगठन बालक की अबोधावस्था से ही प्रारम्भ होना चाहिये।

प्रायः एक वर्ष की अवस्था से ही बालक अपने मनोवेग प्रदर्शित करने लगते हैं। इसी अवस्था में वे अपने समीपस्थ लोगों के हावभाव बड़ी जिज्ञासा पूर्वक देखते हैं। डाँटने, धमकाने आदि की प्रतिक्रिया भी उनमें उठने लगती है, अनुकरण की प्रवृत्ति भी प्रायः इसी अवस्था से प्रारम्भ हो जाती है। उनकी निजी उमंग और दूसरों के क्रिया-कलापों का अनुकरण-इन दो बातों का निरीक्षण इन दिनों भली भाँति न किया जाय और उन्हें अधम तरीके से रखा जाय तो उनके चरित्र में ओछापन आ सकता है। गौर कीजिये आपका बालक इस अवस्था में कुछ सीखने लगता है कृपया कोई गन्दी बातें न प्रदर्शित किया कीजिये।

बालक की रुचि इस बात में नहीं होती कि उसके प्रति आपकी भावनायें क्या हैं। संतान के प्रति दुर्भावनायें प्रायः लोगों में होती भी नहीं किन्तु इस समय बालक आपके-व्यवहार की प्रतीक्षा करता है और आचरण से सीखने का प्रयास करता है। एक प्रोफेसर साहब जब पुस्तकें पढ़ते थे तो अपने बच्चे का मन बहलाने के लिये कभी कभी पुस्तक की तसवीरें दिखाने का प्रयत्न करते थे। बच्चा इसमें तो अपनी रुचि प्रदर्शित नहीं करता था किन्तु वह खड़ा होकर किताब के पन्ने पलटने लगता था। चित्र दिखाने की भावना को इस उम्र में समझना कुछ कठिन है किन्तु प्रोफेसर साहब पुस्तक पढ़ते समय जो बार बार पेज पलटते थे वह क्रिया बालक के मन को अधिक प्रभावित कर सकी। तात्पर्य यह है कि इस उम्र में बालक आपके व्यवहार और आचरण का अनुकरण करते हैं भावनाओं का नहीं यह एक बात हुई। मुख्यतया बालकों के सामने गन्दे हाव-भावों का प्रदर्शन बिलकुल नहीं करना चाहिये।

एक वर्ष की उम्र हो जाने से बालक अपनी उमंगें, अपने संस्कार भी प्रदर्शित करने लगता है। सूक्ष्मता से निरीक्षण कीजिये कहीं उसमें खीझने के, खाने पीने के या गुम सुम रहने के लक्षण तो नहीं हैं यदि ऐसा हो तो बच्चे को डराइये नहीं, ऐसी क्रियायें कीजिये जिससे उसकी प्रसन्नता बढ़े। खाने से अरुचि उत्पन्न न हो और वह क्रिया शील रहने लगे। पर यदि बालक में प्रसन्न रहने, खेलने कूदने तथा किसी वस्तु को बड़े गौर से देखने की आदत हो तो उसके इन गुणों पर अपनी प्रसन्नता भी मिलाइये। हाथ ऊँचा उठाकर बच्चे को आशीर्वाद दीजिये, बढ़ावा दीजिये ताकि उसकी स्वाभाविक उमंग को बल मिल सके। दूसरी बात हुई बालक की प्रतिभा का स्वाभाविक विकास।

उसकी स्वाभाविक उमंगों और घर के सदस्यों के हाव-भाव और क्रिया कलापों में सुन्दर सामंजस्य होने दीजिये ताकि बालक का विकास न रुकें। छोटा पौधा लगाते हैं तो दो काम करते हैं उसको बढ़ने की उमंग न रोकना, अपनी ओर से थोड़ा खाद पानी देकर उसे बढ़ने देना। यह दोनों सिद्धान्त ठीक इसी तरह बालकों पर भी लागू होते हैं उनके विकास की ये दो शर्तें प्रमुख हैं।

बालक की यह स्थिति परिपक्व होने लगती है। उनकी मानसिक शक्ति का विकास होने लगता है। अतः प्रारम्भिक काल में बच्चे को मारने पीटने, डाँटने-डपटने धमकाने-डराने और उन्हें कठोर नियंत्रण से बचाने का प्रयत्न करना चाहिये अन्यथा उसका अन्तर्मार्ग जटिल ग्रन्थियों से ग्रसित हो जायगा। पौधे को झाड़-झंखाड़ों से दबाकर रखें तो बौना हो कर रह जाता है। बच्चे का मस्तिष्क भी बौना होकर रह जायगा अगर आपने उसके मनमें भय उत्पन्न कर दिया। यह अवस्था बच्चे के लिये स्नेह, प्यार और दुलार की होती है। आप उसे दुराव-दुत्कार देकर निराश न होने दीजिये। अन्यथा उस के मस्तिष्क का उपजाऊपन बैठ जायगा।

तीन वर्ष के बाद बालक अभिभावकों की भावनायें समझने लगता है। पूर्व में जो अनुभव तथा संवेदनायें प्राप्त हुई थीं अब वे क्रिया शील होने लगती है और बच्चा इनमें अपनी रुचि दिखाने लगता है। प्रत्येक परिस्थिति को वह समझने भी लगता है। जब तक केवल अनुकरण की बात थी तब तक वह स्थायी नहीं थी किन्तु समझ कर करने से कर्म में स्थायित्व आने लगता है अर्थात् उसका स्वभाव पुष्ट होने लगता है। इसलिये अब यह देखना चाहिये कि वह जो कुछ कर रहा है उसमें उस के विचारों की दिशा क्या है। बालक की सामर्थ्य अल्प होती है इसलिये अपने विचारों को वह कार्य में तो पूर्ण रूप से परिणित नहीं कर सकता पर उसकी चेष्टाओं से उसकी—अंतर्भावनायें व्यक्त हो जाती हैं। इसलिये अब उसके सामने रुचिकर, शिक्षात्मक और सुबोध प्रसंग उपस्थित करना चाहिये। बच्चा चित्र देखना चाहता है तो उसे सुन्दर भाव भंगिमा वाले चित्र दिखाइये। शिक्षात्मक पशु पक्षियों की कहानियाँ, गाने आदि में उसे पर्याप्त रस मिलता है। पर सावधान, अब उसकी बुद्धि भी क्रियाशील हो उठी है इसलिये ध्यान रखिये कहीं आप उसे अश्लील चित्र, भद्दी कहानियाँ और बुरे गाने तो नहीं सुनाते। इनका दूषित प्रभाव बच्चे के कोमल अन्तःकरण पर पड़ता है इसलिये आप जो भी करते हैं उसमें रुचि, सद्भावना और कोमलता का ध्यान जरूर बनाये रखिये।

इस उम्र में प्रायः बालक हठीले हो जाते हैं। अभिभावक उन पर बेतरह झुँझलाते और मार-पीट करने लगते हैं। इसमें दोष उन बच्चों का नहीं होता वरन् उनके माता पिता ही उन्हें ऐसा बना देते हैं। अनावश्यक प्यार जताकर उन्हें ऐसा कर दिया जाता है या बार बार डाँट-डपट कर उन्हें जिद्दी प्रकृति का बना दिया जाता है।

इस उम्र में बच्चों का उत्साह बढ़ाना चाहिये और छोटी-मोटी आदतों से स्वावलम्बन सिखाने का कार्य प्रारम्भ कर देना चाहिये। योग्य शिक्षा के अभाव में—बालक का व्यक्तित्व अविकसित रह जाता है उसमें स्वयं के मस्तिष्क की उपजाऊ शक्ति नष्ट हो जाने का भय बना रहता है। एडम मान्टसरी का कथन तो यह है कि इस उम्र में आने तक बच्चों की योग्यता इतनी बढ़ा देनी चाहिये कि वह स्कूली शिक्षा ग्रहण करने के योग्य हो जाय। सचमुच यह कोई असंभव बात भी नहीं है। बालकों का मस्तिष्क बिलकुल स्वच्छ तथा निर्मल होता है। विद्या का प्रभाव उस पर तात्कालिक होता है। यदि रुचि उत्पन्न कर दी जाय तो यही बालक आगे चलकर बड़े मेधावी और प्रतिभावान बन सकते हैं। ज्यों-ज्यों बालक की उम्र बढ़ती चले त्यों-त्यों उसके ज्ञान को बढ़ाते चलिये। परिस्थितियों की जानकारी तथा प्रत्येक विषय को सरल बनाकर समझाने की पद्धति का विकास करते जाइये।

बच्चे को अक्षर ज्ञान हो जाय और वह पाठशाला जाने लगे तो आपकी जिम्मेदारियाँ और बढ़ जाती हैं। उसे अब ठीक तरह से कपड़े पहने की आदत डालनी चाहिये। हाथ, पाँव, मुँह, नाक, दाँत आदि से लेकर उसके कपड़ों को तथा बिस्तर की सफाई की ओर भी उसका ध्यान आकृष्ट करते रहिये। यहाँ भी उसे डराकर या धमकाकर मानसिक आघात पहुँचाने की आवश्यकता नहीं है।

जिस तरह स्वभाव की शिक्षा चलती है उसी तरह ज्ञान संवर्द्धन तथा भावनात्मक परिष्कार के लिये उसे छोटी-छोटी साहसिक, शिक्षाप्रद और चरित्र निर्माण की कथा कहानियाँ भी पढ़ाना चाहिये। बच्चों के मासिक निकलते है उनसे भी उसका ज्ञान विकास होता है। पौराणिक कथाओं में भी बालकों के निर्माण की बड़ी सामग्री है। चित्रकारी, मिट्टी के खिलौने बनाने की कला, संगीत, सुन्दर स्थानों पर भ्रमण, फूलों का परिचय, ज्ञान और उनकी ओर बालक का मानसिक झुकाव पैदा करना, पक्षियों के नाम इत्यादि बता कर उसका मन भी बहलाना चाहिये और इससे उनके ज्ञान प्राप्त करने की तृष्णा भी तृप्त होती है।

चौदह वर्ष की अवस्था बालक की प्रौढ़ावस्था मानी गई है इस उम्र तक बालक में ज्ञान की पिपासा, सदाचार, संयम, सेवा आदि के संस्कार परिपक्व कर देने चाहिये ताकि वह अपने शेष जीवन में इनको पूर्ण रूप से विकसित करता हुआ एक योग्य नागरिक बन सके। मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालकर बालक को संस्कारवान बनाने का उत्तरदायित्व प्रत्येक माता पिता को है इसे पूर्ण लगन और तत्परता के साथ निभाया जाना चाहिये।

युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति


मानव समाज को अखण्ड-ज्योति परिवार का अभिनव उपहार

गुरुपूर्णिमा में दस हजार युग-निर्माताओं द्वारा एक लाख व्यक्तियों का प्रशिक्षण

गत 13 जुलाई को गुरुपूर्णिमा पर्व अखण्ड-ज्योति परिवार की उत्कृष्टता एवं गौरव गरिमा में चार चाँद लगाने आया। यों इस संगठन ने विगत 25 वर्षों में इतना कुछ किया है जिसे चिरकाल तक भुलाया न जा सकेगा पर पर्व भी और यह परिवार भी एक अविस्मरणीय ऐतिहासिक तथ्य बन गये हैं।

नव निर्माण का प्रयोजन पूर्ण करना तभी संभव है जब जन-साधारण की कार्य पद्धति निकृष्ट न रह कर श्रेष्ठ बने। कार्यों की श्रेष्ठता का नाम ही तो स्वर्ग है। जहाँ सज्जनता का व्यवहार होता है सब लोग सत्कर्मों में संलग्न रहते हैं वहाँ सुख, शान्ति, प्रगति और समृद्धि की सुरसरि प्रवाहित होती है। मनुष्य यदि एक-दूसरे से प्रेम, उदारता, सहयोग एवं सज्जनता बरतने लगे, कोई किसी का अहित अनिष्ट न करे तो फिर इस धरती पर स्वर्ग अवतरित होने में क्या देर रह जायगी? सज्जन, सुसंस्कृत और सहृदय व्यक्ति ही तो देवता कहलाते हैं। जहाँ ऐसे लोगों का बाहुल्य होगा उसे सुरलोक ही तो कहेंगे। किसी समय भारत भूमि ऐसी ही विशेषताओं में भरीपूरी थी, अतएव उसे समस्त विश्व की जनता धरती का स्वर्ग मानती थी। अपनी उन विशेषताओं को छोड़ देने के कारण ही हम पतन के नरक में गिरे। अब फिर जबकि आध्यात्मिक नव-निर्माण का पाञ्चजन्य बजा है तब हमें मानव जाति की गतिविधियाँ श्रेष्ठता और सज्जनता की दिशा में मोड़नी हैं। इस संदर्भ में जितनी ही सफलता मिलती जायगी हम उतने ही कृतकार्य होते जायेंगे।

निकृष्ट और निरर्थक कृत्य में संलग्न जन-समुदाय को किस प्रकार श्रेष्ठता और सज्जनता की दिशा में मोड़ा जाय? इस प्रश्न, का एक मात्र उत्तर यही हो सकता है कि—उसके विचार बदलें। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि विचारों के बीज ही समयानुसार कार्य रूप में परिणत होते हैं। बीज छोटा ही क्यों न हो, पर वृक्ष की उत्पत्ति उसी पर निर्भर रहती है। भले या बुरे जैसे भी कार्य लोग करते हैं, पहले वे उनकी विचार भूमिका में अवतरित होते हैं। वहाँ धीरे-धीरे जड़ जमाते और पनपते हैं। यह आन्तरिक प्रक्रिया भले ही आँखों से दिखाई न पड़े पर वस्तुतः व्यक्तियों की कार्य-पद्धति का निर्माण उसी भूमिका में होता है। अचानक न कोई भला काम बन सकता है न बुरा। विचारों द्वारा जो पृष्ठ भूमि अन्तःप्रदेश में विनिर्मित होती रहती है उसी को समयानुसार हम कार्य रूप में परिणत होते देखते हैं। जिस प्रकार कोई वृक्ष समयानुसार अपना फल देता ही है उसी प्रकार मन क्षेत्र में जो विचार जमते और पलते रहते हैं वे कालान्तर में भले या बुरे कार्य बनकर सामने आते हैं। आज यदि दुष्कर्मों का, दुष्प्रवृत्तियों का बाहुल्य है तो उसका एक मात्र कारण यही समझना चाहिए कि जन-साधारण की मनोभूमि में निकृष्ट एवं दुष्ट विचारों ने अड्डा जमा लिया है।

युग परिवर्तन के हमारे महान अभियान की सफलता इसी एक बात पर निर्भर है कि जन-साधारण की वर्तमान विचारधारा बदलने और पलटने में हम किस हद तक सफल होते हैं। विचारों में उचित परिवर्तन हुए बिना भी बाहरी लीपा-पोती से अच्छे कार्यों के प्रचलन का प्रयत्न किया जा सकता है पर उसका परिणाम क्षणिक एवं प्रदर्शन मात्र होता है। श्रम दान से सामूहिक सुख-सुविधाओं की वृद्धि का प्रयास जहाँ-तहाँ होते देखा जाता है पर वह रहता प्रदर्शन मात्र ही है। बेमन से, यश-प्रशंसा या दबाव से लोग थोड़ी-सी लकीर एक-दो दिन पीट देते हैं, फोटो खिंच जाने पर फिर श्रमदान भी पूरा हुआ समझ लेते हैं। इसी प्रकार अन्य सत्कर्म कभी-कभी लोग करते ही हैं पर उनकी आड़ में अपने पाप छिपाने या सस्ती वाहवाही लूट कर जनता से अन्य कोई लाभ उठाने की मनोवृत्ति काम करती रहती है। नये वैद्य और नये वकील आमतौर से कितने ही लोग, सार्वजनिक संस्थाओं में प्रवेश करते देखे जाते हैं, अपना परिचय बढ़ाते हैं और जैसे ही लोगों की सहानुभूति का लाभ मिलने लगा, अपना धन्धा जम गया वैसे ही लोकसेवा का बाना उतार देते हैं। कितनी ही संस्थाओं में काम करने वाले बहुधा स्वल्प श्रम से अधिक प्रतिष्ठा और अधिक आजीविका कमाने के लिये आते हैं। उसी से वे लाभदायक पदों को अपने लिए सुरक्षित रखना चाहते हैं, दूसरों के लिए जगह खाली नहीं करते। इसी बात को लेकर गुटबन्दी होती है और संस्थाएँ नष्ट हो जाती हैं। धर्म और परमार्थ का आवरण ओढ़कर अगणित व्यक्ति अपना उल्लू सीधा करते हैं और भोली जनता को लूटते खाते रहते हैं। बाहर से देखने में उनका कार्यक्रम धर्मयुक्त, लोक सेवा जैसा लगता है पर वास्तविकता परखने पर ढोल की पोल स्पष्ट हो जाती है।

कहने का तात्पर्य यह है कि ऊपरी प्रयत्नों से अच्छे काम कराये भी जाने लगे और भीतरी स्तर को बदला न गया तो उससे कोई वास्तविक प्रयोजन सिद्ध न होगा। विचारों में श्रेष्ठता और उत्कृष्टता की मात्रा एवं आस्था जितनी परिपक्व होगी, उतना ही श्रेष्ठ सत्कर्म बन पड़ना संभव होगा। युग परिवर्तन दिखाई तब देगा जब श्रेष्ठ सत्कर्मों का बाहुल्य परिलक्षित हो और यह स्थिति तब आवेगी जब अन्तःकरण के गहन स्तर तक विचारों में परिवर्तन हो। लोग अनुचित को छोड़कर उचित को हृदयंगम करने लगें तो फिर श्रेष्ठ सत्कर्मों की अभिवृद्धि में कोई बाधा नहीं रह जाती। फिर सतयुग सामने ही तो उपस्थित होगा।

भारत का प्राचीन गौरव और वर्चस्व पुनः वापिस लाना हो तो उसी समय जैसी उत्कृष्ट विचारधारा को भी व्यापक बनाना होगा। हमारा प्रधान कार्यक्रम यही है। इसे विचार क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति, हृदय परिवर्तन आन्दोलन, जो कुछ भी नाम दिया जाय, हमारा प्रयोजन यही है। सड़ी गली दुनिया के स्थान पर सर्वांग सुन्दर संसार का निर्माण करना इस एक ही तरीके से संभव हो सकता है कि लोगों के विचार करने का वर्तमान ढंग उलट-पलटकर रख दिया जाय। स्वार्थ, संकीर्णता, वासना और तृष्णा की आसुरी महत्वाकाँक्षाओं को संयम, सदाचार, स्नेह, सौजन्य सेवा एवं सज्जनता में परिवर्तित कर दिया जाय तो बदला हुआ युग उपस्थित होने में फिर कोई अड़चन शेष न रह जायगी।

विचार क्रान्ति के लिए यों छुट पुट प्रयत्न होते ही रहते हैं, पर उनका आधार राजनैतिक एवं सामाजिक स्तर एक सीमित रहने से तात्कालिक छोटी-मोटी सफलताएँ ही मिलकर समाप्त हो जाती हैं। जिन लोगों ने स्वराज्य आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर काम किया था, सत्ता हाथ में आने पर उनमें से कितने ही स्वार्थ साधन में लग गये। बात यह थी कि उनमें उथले स्तर के राजनैतिक प्रयोजन भर तक के विचार थे। यदि वे आध्यात्मिक स्तर तक उतर गये होते तो फिर वे आजीवन राष्ट्र निर्माण को ऊँची कक्षा में ही कार्य करते हुए दृष्टिगोचर होते। जो ऐसे स्वतन्त्रता सैनिक थे वे आज भी सर्वोदय या दूसरे रचनात्मक कार्यों में संलग्न है। प्रयत्न यही होना चाहिए कि विचार क्रान्ति का आधार धर्म और अध्यात्म रहे ताकि उन्हें अपनाने वाला अपनी आन्तरिक महानता विकसित करते हुए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्टता भरे आदर्श उपस्थित करता रहे।

अखण्ड-ज्योति द्वारा संचालित विचार क्रान्ति का युग निर्माण आन्दोलन इसी स्तर का है, इसलिए उसके प्रतिफल-स्वर्ग को धरती पर उतरने के रूप में निश्चित है। अपने प्रयास जितने तीव्र होंगे लक्ष्य की पूर्ति उतनी ही सरल एवं शीघ्र सम्मुख आती दिखाई देगी। इस गुरुपूर्णिमा से यह अभियान अत्यन्त सुव्यवस्थित रूप से आरम्भ हो गया है। यों छुट-पुट प्रयत्न तो गत 26 वर्षों से चल रहे थे, अब उसे पूर्णतया सुचारु रूप से चलाने की पद्धति जिस उत्साह एवं जिस तत्परतापूर्वक आरम्भ की गई है उससे हर उज्ज्वल भविष्य की आशा करने वाले आस्थावान् व्यक्ति की आँखें चमकने लगी हैं।

परिवार के प्रबुद्ध परिजनों पर इस बात के लिए जोर डाला गया है कि उन्हें अखण्ड-ज्योति के पाठक मात्र न रह कर अपने आप को युग निर्माता के रूप में परिणत करना चाहिए। एक घंटा समय और एक आना दैनिक इस ज्ञान यज्ञ के लिए समर्पित करते रहने का व्रत लेना चाहिए। प्रसन्नता की बात है कि यह अनुरोध परिजनों ने ध्यानपूर्वक सुना और भावनापूर्वक समझा है। प्रेम का अर्थ ही त्याग है। जो व्यक्ति देश, धर्म, समाज और संस्कृति को सच्चा प्यार करता होगा उसे अपने इन आराध्यों के लिए कुछ त्याग भी करना ही पड़ेगा। जो त्याग की बात सुनते ही घबराता और पीछे हटता है वह प्रेमी नहीं कहा जा सकता। आदर्शवाद का पौधा त्याग बलिदान की खाद, पानी पाये बिना पनप ही नहीं सकता, मानव जीवन की श्रेष्ठता का निखार सोने की तरह तपाये, काटे और घिसे जाने पर ही संभव है। जो दीपक की तरह जलना नहीं चाहता वह प्रकाशवान भी नहीं हो सकता। यह तथ्य जिन लोगों ने विगत कई वर्षों में निरन्तर सीखे हैं, उनके लिए यह तनिक भी कठिन नहीं था कि युग की चुनौती के रूप में यदि कोई छोटा कार्यक्रम सामने रखा गया है तो उसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लें। हुआ भी यही है। परिवार के अधिकाँश परिजनों ने अपने आपको अब विचार क्रान्ति के अग्रदूतों के रूप में परिणत कर लिया है। वे सच्चे, कर्मठ एवं आदर्शवादी युग निर्माता की तरह अपने कंधों पर आये हुए उत्तरदायित्वों का पालन करेंगे।

इस गुरुपूर्णिमा पर दस हजार परिजनों ने इस प्रकार की प्रतिज्ञायें ली हैं। वे नियमित रूप से एक घंटा समय विचार क्रान्ति की पृष्ठभूमि तैयार करने में लगाया करेंगे। इसमें से हर एक को न्यूनतम दस व्यक्तियों का अपना ‘सेवा क्षेत्र’ चुनना पड़ेगा। नव निर्माण के लिए जिस प्रखर विचारधारा का प्रवाह इन दिनों गतिशील किया जा रहा है, उसे कम से कम दस व्यक्तियों तक नियमित रूप से पहुँचाना होगा। अखण्ड-ज्योति, युग निर्माण योजना पाक्षिक एवं क्रान्तिकारी ट्रैक्ट माला को अपने क्षेत्र में सदस्यों को पढ़ाने या सुनाने के लिए एक घण्टा समय लगाया जाय, उनके प्रस्तुत विषयों पर चर्चा एवं विचार विनिमय करते रहा जाय तो कोई कारण नहीं कि वे विचार परिवर्तन की दिशा में उन्मुख न हो सकें।

दस हजार युग निर्माता यदि दस-दस व्यक्तियों का भी प्रशिक्षण करेंगे तो न्यूनतम एक लाख व्यक्तियों के ऊपर विचार क्रान्ति का सक्रिय प्रयोग आरम्भ हो जायगा। यों अखण्ड-ज्योति के 40 हजार सदस्यों में से केवल 10 हजार ही सक्रिय कार्यकर्ता निकले और वे केवल दस का ही प्रशिक्षण करें ऐसी बात नहीं। इससे बहुत अधिक होना है। कितने ही कर्मठ सहयोगी ऐसे हैं जो हर वर्ष 108, 240 या 1000 तक अखण्ड-ज्योति सदस्य बनाया करते हैं। क्या ऐसे लोग केवल 10 का ही प्रशिक्षण करके चुप बैठे रहेंगे? फिर इन दिनों 100 के लगभग वानप्रस्थ बने हैं वे क्या दस व्यक्तियों तक ही अपनी गतिविधियाँ सीमित रखेंगे? चालीस हजार परिजनों में से दस हजार ही सक्रिय रहें और शेष निष्क्रिय हो जाये ऐसा भी संभव नहीं। यह संख्या बढ़ेगी ही। इस प्रकार अभी दस हजार कर्मयोगियों द्वारा एक लाख व्यक्तियों को विचार क्रान्ति के छात्रों के रूप में प्रशिक्षित किया जा रहा है, यह संख्या भी कम संतोष, गर्व और हर्ष की नहीं है। एक लाख छात्रों का यह विचार क्रान्ति विश्व विद्यालय आज की परिस्थितियों में अनुपम एवं अभिनव ही कहा जा सकता है। जीवन निर्माण की कला सिखाने, विवेक सम्मत विचारधारा अपनाने, नव निर्माण के लिए त्याग, बलिदान करने के कटिबद्ध करने के लिए ऐसा प्रेरणा केन्द्र कोई था भी नहीं जो भारतीय जनता में मानसिक स्तर की अभिनव रचना कर सके। इस अभाव की पूर्ति के लिए अपना यह सत्प्रयत्न क्या महत्वपूर्ण नहीं है? आज यह प्रयास इतने विस्तृत देश को देखते हुए छोटा भले ही प्रतीत होता है पर कल उसके परिणाम दूरगामी होंगे। यह प्रशिक्षण एक लाख तक ही सीमित न रहेगा। आज के यह छात्र कल के युग निर्माण शिक्षक बनेंगे और उनके द्वारा अगली पीढ़ी की शिक्षा आरम्भ होगी। यह क्रम चक्रवृद्धि ब्याज की दर से बढ़ेगा तो कुछ ही वर्षों में समस्त संसार को, समस्त मानव जाति को आदर्शवादिता की प्रेरणा से अनुप्राणित कर सकना संभव होगा। वर्तमान कठिनाइयों और बुराइयों के प्रति क्षोभ व्यक्त करते रहने, उन्हें कोसते रहने से कुछ काम चलने वाला न था। प्रतिकार और उपचार से ही कुछ प्रयोजन सिद्ध होता है। अखण्ड-ज्योति परिवार की यह विचार क्रान्ति पद्धति ऐसी ही रचनात्मक प्रक्रिया है जिसका सुन्दर परिणाम हम थोड़े ही दिनों में प्रत्यक्ष देखेंगे।

नैतिक और सामाजिक क्रान्तियाँ यों गणना की दृष्टि से अलग-अलग गिनी जा सकती हैं, पर वस्तुतः ये विचारक्रान्ति के अंतर्गत ही आती है। विचार करने का तरीका जब तक न बदलेगा तब तक लोग वर्तमान अनैतिकताओं से ही चिपके रहेंगे और कोई छोटा-मोटा समाज सुधार बाहरी दबाव से आरम्भ भी कराया गया तो लोग उसे गुप-चुप तोड़ने की तरकीबें निकाल लेंगे। इन दिनों दहेज विरोधी वातावरण बनता चला जा रहा है अतएव लालची लोग बदनामी से बचने और लालच पूरा करने के लिए गुप-चुप दहेज लेने के हथकंडे चालू कर रहे हैं। कोई वास्तविक सुधार तभी संभव है जब उस सम्बन्ध में आवश्यक तथ्य जानने, वस्तुस्थिति को मानने एवं आदर्श को अपनाने का साहस उत्पन्न हो सके। यही विचार क्रान्ति का उद्देश्य है।

यह कार्य न केवल व्यक्तियों से होगा, न केवल विचारों से, उज्ज्वल भविष्य और उत्कृष्ट विचार दोनों का समन्वय ही अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति कर सकेगा। हम उत्कृष्ट विचारधारा का सृजन कर रहे हैं, इसे कागज के पन्नों के मात्र माध्यम से जन-साधारण को हृदयंगम न कराया जा सकेगा। इन्जेक्शन की दवा को शरीर में प्रवेश कराने के लिए और पैनी सुई की जरूरत पड़ती है। हमारे विचारों को जन-साधारण के अन्तःकरण तक उतारने के लिये परिजनों का व्यक्तित्व, समय, श्रम एवं मनोयोग नितान्त आवश्यक है। हम और हमारे परिजन दोनों ही मिलकर काम करेंगे तब कुछ प्रयोजन सिद्ध होगा। यह प्रौढ़ विचारधारा जिसने लाखों व्यक्तियों का जीवन क्रम उलट-पलट कर रख दिया है जब सहस्रों परिजनों के माध्यम से जन-मानस में प्रवेश कराई जायगी तो उसका प्रभाव परिणाम जादू जैसा होगा। यह स्वर्ण सुगन्ध के समन्वय का योग अब प्रस्तुत ही किया जाना चाहिये था, सो हो भी रहा है।

यह गुरुपूर्णिमा मानव जाति को, भारतीय समाज को एक अभिनव उपहार देने आई है। दस हजार अध्यापकों द्वारा एक लाख छात्रों का नव-निर्माण प्रशिक्षण साधारण घटना नहीं है। निखरा व्यक्तित्व बनाने और उत्कृष्ट विचार धारा अपनाने के लिये जिन्हें भी प्रेरणा मिलेगी वे अगले दिनों उज्ज्वल नक्षत्र की तरह चमकेंगे। इन्हीं के द्वारा अगले दिनों ऐसा वातावरण बनाया जा सकेगा जिसके प्रवाह में बहते हुये सामान्य स्तर के लोग भी कुछ से कुछ बन सकें।

प्रबुद्ध आत्मा वाले मनस्वी परिजनों ने इस गुरुपूर्णिमा के अवसर पर उन युग निर्माताओं की सेना में अपना नाम लिखा लिया है जिन्हें एक घण्टा समय, एक आना नकद देकर अपने समीपवर्ती क्षेत्र में प्रकाशवान वातावरण उत्पन्न करने के लिये अपना योगदान देना है। इसके लिये परिजनों को आवश्यक प्रेरणा भी दी गई है। गत अंक में इसके लिये ‘श्रद्धांजलि फार्म’ भी लगाया गया था। जिनने उसे अभी न भरा हो, उनसे यह आशा की जायगी कि वे जल्दी ही इस आह्वान को स्वीकार करेंगे और यथा संभव शीघ्र ही युग परिवर्तन की, विचार परिवर्तन की प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिये अपना प्रयत्न आरम्भ कर देंगे। अभी यह विचार परिवर्तन अभियान भले ही दस हजार निर्माताओं द्वारा एक लाख सद्भावी व्यक्तियों को प्रशिक्षित करने के रूप में आरम्भ हुआ हो पर वह दिन दूर नहीं, जब यह मिशन विश्वव्यापी बनेगा और उसका स्वरूप एक चलते फिरते महानतम विश्व विद्यालय के रूप में परिलक्षित होगा।


समय दान सब के लिए अति सरल है।

ब्रह्म कर्म के लिये सद्ज्ञान प्रसार के लिये समय दान देने से बढ़कर और कोई सत्कर्म इस संसार में हो नहीं सकता। अन्नदान से भूख, जलदान से प्यास, वस्त्र दान से ऋतु प्रभाव का बचाव कुछ समय के लिये हो सकता है। धर्मशाला, बगीचा आदि का लाभ भी कोई कुछ ही समय तक ले सकता है, पर ब्रह्मकर्म के लिये सद्ज्ञान का अनुदान पाकर तो कोई अपनी जीवन दिशा ही बदल सकता है। सदुपदेश करने वाले के प्रयत्न से कोई चोर यदि महात्मा बन जाता है तो चोरी करते हुये जीवन का अधःपतन करने की महान क्षति से वह बचता है साथ ही महात्मा होने का असाधारण पुण्य परमार्थ भी पाता है। पतन से बचाने और उत्थान की ओर अग्रसर करने के सत्प्रयत्न ने उस व्यक्ति का ही नहीं, समस्त संसार में दुःख निवृत्ति और सुख-वृद्धि का पुण्य भी उत्पन्न किया। इस प्रकार सदुपदेश करते रहने से यदि थोड़े से व्यक्तियों के जीवन में थोड़ा-सा भी शुभ परिवर्तन हो जाय तो उसका पुण्यफल इतना अधिक हो जाता है जितना धन द्वारा हो सकने वाले स्थूल प्रयत्नों से बहुत कुछ करने पर भी नहीं होता।

गुरुपूर्णिमा से नव निर्माण के लिये एक घण्टा समय दान देने वाले आत्म-कल्याण और लोक-सेवा का जो श्रेय प्राप्त करेंगे उसे किसी बड़े धर्मानुष्ठान से कम महत्वपूर्ण नहीं मानना चाहिये। ईश्वर को प्रसन्न करने के लिये इस प्रकार की साधना पद्धति अपनाना, अन्य किसी उपासना से कम श्रेयस्कर नहीं है। जिन परिजनों ने समय-दान का व्रत लिया है उनने सचमुच बहुत बड़ी बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, उदारता एवं उत्कृष्ट आध्यात्मिकता का परिचय दिया है, इसके लिये उनकी जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है।

चौबीस घण्टे में से एक घण्टा परमार्थ कार्यों के लिये लगा सकना कुछ कठिन बात नहीं है। ऐसा अवसर हर किसी को बड़ी आसानी से मिल सकता है। अच्छा तरीका यह है कि सायंकाल या जब भी अवकाश हो लोगों के घरों पर मिलने जाया जाय, उन्हें सत्साहित्य पढ़ने को दिया जाय एवं वार्तालाप द्वारा जीवन के हर क्षेत्र में उत्कृष्ट विचार धारा अपनाने के लिये प्रभावित किया जाय। यह घण्टा लोगों को एकत्रित कर उन्हें किसी भी माध्यम से सदुपदेश करने या ऐसे सामूहिक आयोजनों की व्यवस्था करने में भी लगाया जा सकता है, जिनमें लोगों को जीवन निर्माण एवं विचार निर्माण की प्रेरणा मिलती हो। रविवार को सत्संग, सामूहिक हवन, पर्व एवं संस्कारों का आयोजन, पुस्तकें पढ़कर सुनाना आदि अनेक उपयोगी कार्यों में यह समय लगाया जा सकता है। अपनी क्या परिस्थितियाँ है और किस प्रकार समय लगाने में सुविधा रहेगी यह निर्णय हर किसी को स्वयं ही करना पड़ेगा। हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ भिन्न होती हैं इस लिये अपने ढंग से इस समय का उपयोग करने का क्रम भी स्वयं ही निर्धारित करना चाहिये।

कई व्यक्तियों की परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जो अलग से यह समय नहीं निकाल सकते। ऐसे लोग अपने संपर्क में आते रहने वाले व्यक्तियों से उनके लौकिक प्रयोजनों के साथ-साथ नव निर्माण विचार धारा की चर्चा करते रह सकते हैं। जिससे भी मिलना हो, उससे यदि आधे घंटे साँसारिक काम-काज की बात की है तो पाँच मिनट अपने उत्कर्ष अभियान की भी किसी रूप से चर्चा की जा सकती है। युग निर्माण योजना के सौ कार्यक्रम हैं, उस व्यक्ति का जिधर झुकाव हो, उसी सम्बन्ध में कुछ चर्चा की जा सकती है। काम धन्धा करते समय भी अपनी प्रचार पुस्तकें साथ रह सकती हैं, और जो उपयुक्त व्यक्ति दीखे उन्हें जल्दी वापिस करने की शर्त पर पढ़ने के लिये भी दी जा सकती हैं।

अध्यापकों को प्रतिदिन छात्रों और उनके अभिभावकों से संपर्क रखना होता है, चिकित्सक बहुत से मरीजों से रोज मिलते हैं, व्यापारी के पास ग्राहक आते ही रहते हैं, दलालों को कितनों के ही पास जाना पड़ता है, अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों के पास कितने ही प्रयोजनों के लिये लोग आते हैं। उन्हें भी दूसरों के पास जाना पड़ता है। पोस्टमैन रोज ही सैकड़ों व्यक्तियों से मिलते हैं। यात्रा के समय रेल आदि में कितनों से ही भेंट होती है। इनमें बहुत से परिचित और बहुत से अपरिचित हो सकते हैं। किसी न किसी प्रसंग से बातचीत चलती है, जहाँ अवसर हो वहाँ अपने अभियान द्वारा प्रस्तुत विचार धारा की चर्चा कर सकना कोई कठिन कार्य नहीं है।

इस प्रकार जो लोग अपने पास समय की कमी अनुभव करते हैं, और अलग से एक घंटा निकाल कर खास तौर से जन-संपर्क के लिये कार्यक्रम बनाने में कठिनाई देखते हैं वे अपने सामान्य दैनिक कार्यक्रमों में ही ऐसा ताल-मेल बिठा सकते हैं कि लौकिक चर्चाओं के साथ-साथ नव-निर्माण की प्रेरणा का कार्य भी चलता रहे। एक व्यक्ति से पाँच मिनट भी चर्चा की जाय तो बारह व्यक्तियों से इस संक्षिप्त चर्चा में ही एक घंटा लग सकता है जो किसी प्रकार अखरेगा भी नहीं और अपना संकल्प भी पूरा हो सकता है। महिलाएं अपने परिवार के सदस्यों को उपयोगी प्रसंग सुनाकर, वार्तालाप द्वारा परिजनों को समझाने का क्रम अपनाकर, प्रतिदिन कथा, कहानियाँ कहते रहने का नियम बनाकर इस एक घंटा समय-दान की पूर्ति कर सकती है। घर के दो पाँच व्यक्ति भी उनकी इस चर्चा का लाभ उठाते रहें तो भी कुछ कम महत्व की बात नहीं है।

समय दान किसी के लिये भी कठिन नहीं है। व्यस्त से व्यस्त व्यक्ति भी यदि उसकी भावना होगी तो किसी न किसी प्रकार इतना समय अवश्य लगाता रह सकता है। इच्छा ही न हो तो बहाने बनाने के लिये निठल्ले व्यक्ति के पास भी सौ बातें कहने को हो सकती हैं, जिसकी आड़ लेकर वह अपनी मजबूरी का रोना रोया करे। अखण्ड-ज्योति परिवार में प्रायः ऐसे बहानेबाज़ नहीं के बराबर ही हैं। इसलिये अधिकाँश ने समय दान का व्रत ग्रहण किया है और उसे निवाहते रहने का वचन दिया है। जो अलग से समय न निकाल सकने की कठिनाई अनुभव करते थे वे अपने दैनिक कार्यक्रमों में भी यह धर्म प्रचार प्रक्रिया जोड़ सकते हैं। इस प्रकार हम में से हर कोई समय दान सम्बन्धी अपना धर्म कर्त्तव्य बड़ी आसानी से पालन कर सकता है।


एक घंटा समय और एक आना नित्य हमें देना ही चाहिए

हमारा यह थोड़ा-सा भी प्रयास, युग निर्माण की महत्वपूर्ण भूमिका बनेगा

अखण्ड-ज्योति के पाठक मात्र न रहकर, नव निर्माण योजना के सक्रिय कार्यकर्त्ता के रूप में जिनने अपने आपको प्रस्तुत करने का व्रत लिया है, वे गत गुरुपूर्णिमा से (1)एक घंटा समय और (2)एक आना नित्य देने लगे हैं। उन्हें इन दोनों अनुदानों का उपयोग निर्धारित कार्य-पद्धति के अनुसार करना आरम्भ करें देना चाहिये।

ऐसे मनस्वी लोग जिनमें इस प्रकार का त्याग करने का साहस उत्पन्न हुआ है, निश्चित रूप से अखण्ड-ज्योति के अतिरिक्त ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक भी मँगाते रहे होंगे। यदि उनमें से कोई ऐसे हों जिनने अभी तक उसका मँगाना आरम्भ न किया हो, तो उन्हें इसी मास से पाक्षिक पत्रिका मँगाना आरम्भ कर देना चाहिये। प्रत्येक सक्रिय कार्यकर्त्ता के लिये उसे पढ़ना नितान्त आवश्यक है। अखण्ड-ज्योति में केवल विचार धारा रहती है। उसे कार्य रूप में कैसे परिणत किया जा सकता है? कैसे किया जा रहा है? इस मार्ग में क्या अड़चनें आती हैं? और उनका समाधान कैसे किया जाता है? आदि अनेकों जानकारियाँ पाक्षिक पत्रिका से ही मिलती हैं। देश-विदेशों में युग-निर्माण की दिशा में क्या हो रहा है? अपने परिवार के लोग कहाँ क्या कर रहे हैं, और क्या करने वाले हैं, यह सारा विवरण परिजनों में से हर एक को परस्पर विदित होता रहे और उससे एक दूसरे को प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन मिलता रहे, इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिये तो उसे निकाला गया है। जिनने प्रथम वर्ष के अंकों को पढ़ लिया है वे जानते हैं कि अपने महान आन्दोलन को गति-शील बनाने के लिये इस पाक्षिक की कितनी अधिक आवश्यकता है।

युग निर्माण पाक्षिक का प्रथम वर्ष जून 65 में समाप्त हो गया। अब जुलाई से दूसरा नया वर्ष आरम्भ होता है। जिनने गत वर्ष इसे मँगाया है, वे तो इस वर्ष भी इसे मँगावेंगे ही, जिनने अभी इसे नहीं मँगाया है, उन्हें इसी जुलाई से इसे चालू कर देना चाहिये ताकि एक सक्रिय कार्यकर्त्ता के लिये जो प्रशिक्षण एवं मार्ग-दर्शन आवश्यक है वह उन्हें नियमित रूप से मिलता रहे।

एक आना नित्य का अनुदान इस प्रकार का साहित्य प्राप्त करने के लिये लगाया जाना है। जो पैसे बचाये जायें उन्हें एक पेटी में डालते जाना चाहिये और उनका उपयोग ज्ञान यज्ञ के लिये आवश्यक उपकरण प्रचार साधनों को एकत्रित करने में लगाना चाहिये। यह पैसा किसी को भेजना नहीं हैं, वरन् उसे प्रेरणा साहित्य के रूप में बदल कर अपने पास ही रखना है। किसी को दान देने की अपेक्षा उसे ज्ञान देना अधिक श्रेयस्कर है। असमर्थ अपाहिजों को छोड़कर कमा सकने योग्य व्यक्तियों के गुजारे की बात दूसरी है वे साधु, ब्राह्मणों की श्रेणी में आते हैं, उनके अतिरिक्त अन्य किन्हीं व्यक्तियों को धन देना, देने वाले और लेने वाले दोनों के लिये ही पाप बनता है। देने योग्य सबसे उत्तम वस्तु ज्ञान है। यही सबसे बड़ा परोपकार है। अपना कल्याण और दूसरे का उद्धार इस प्रकार के दान से ही होता है। इसलिये जो कुछ भी दान करना हो उसे लोगों का मानसिक स्तर ऊँचा उठाने में ही किया जाना चाहिये। हम लोग एक आना रोज जो बचायेंगे, उसे केवल इसी एक कार्य में—ज्ञान यज्ञ में खर्च करेंगे।

कार्य कठिन अवश्य है पर कठिन कार्य भी तो आखिर मनुष्य ही करते हैं। आत्मोत्कर्ष की अभिरुचि उत्पन्न करना और देश-धर्म, समाज और संस्कृति सम्बन्धी समस्याओं को सुलझाने में अपना निज का ही हित देखना, यह दो तथ्य जब किसी में विकसित होने लगें तो समझना चाहिये कि अब इसने मानव जीवन की सीमा में प्रवेश किया। नर पशु की स्थिति में हमें अपने स्वजन सम्बन्धियों को नहीं ही रहने देना चाहिये और उन्हें नर नारायण, पुरुष पुरुषोत्तम बनाने के लिये प्रेरित करना ही चाहिये। इस प्रकार की प्रेरणा देते रहने के लिये निरन्तर प्रयत्न करना हमें अपना परम पवित्र धर्म कर्त्तव्य मानना चाहिये।

जन-जागरण की उपयोगी साधन सामग्री अभी तक अखण्ड-ज्योति और युग निर्माण योजना के माध्यम से दी जा रही थी अब इस वर्ष से इस शृंखला में एक बहुत ही महत्वपूर्ण तारतम्य जोड़ दिया गया है। वह है आग उगलने वाली ट्रैक्ट माला का अभिनव प्रकाशन। अपनी दोनों पत्रिकाओं के हर अंक में अनेक विषयों पर छोटे-छोटे बड़े उपयोगी लेख रहते हैं पर वे ऐसे नहीं होते जिनमें एक विषय पर पर्याप्त मात्रा में विचार सामग्री एक बार में ही प्रस्तुत की जा सके। ऐसा किया जाय तो सारी पत्रिका में दो-चार लेख ही बड़ी कठिनाई से दिये जा सकें। ऐसी दशा में पत्रिका विविध विषय विभूषित तो बनी रहेगी पर लोक रुचि जागृत करने का उद्देश्य पूरा न हो सकेगा! इस कमी की पूर्ति के लिये नई ट्रैक्ट माला प्रकाशन आरम्भ किया गया है। इनमें 24 पृष्ठ हैं। इतने पृष्ठों में एक विषय को पूरी तरह समझाने में काफी हद तक सफलता मिल जाती है।

गत मास विवाहोन्माद के विरोध और आदर्श विवाहों का प्रचलन करने सम्बन्धी विचार धारा का प्रस्तुत करने के लिये 10 ट्रैक्ट छापे गये थे। जेष्ठ के शिविर और सम्मेलन में जितने भी स्वजन आये थे उनने उन्हें पढ़ा और देखा तो भाव विभोर हो उठे। कड़कड़ाते हुये इतने तीव्र विचार कि उन्हें पढ़ने के बाद आदमी को पसीना आ जाय। लोगों ने अनुभव किया कि आज के कुँभकर्णी निद्रा में मूर्छित पड़े हुये हिन्दू समाज को जगाने के लिये ऐसे ही प्रखर पैने एवं प्रौढ़ विचारों की आवश्यकता है। जितने भी लोग जेष्ठ में यहाँ आये थे, वे सभी कई-कई सैट इन ट्रैक्टों के अपने साथ ले गये थे। पत्रों से पता चलता है कि जिनने भी उन्हें पढ़ा है उनके मन में हलचल मची और प्रस्तुत समस्या पर बीसियों आदमियों से उनने चर्चा की गई है। अभी पूरा एक मास भी उन्हें लोगों के हाथ में गये नहीं हुआ कि बिना दहेज और धूमधाम के आदर्श विवाहों के लिये प्रतिज्ञा लेने वाले व्यक्तियों की संख्या हजारों तक जा पहुँची है। आगे जब आन्दोलन तीव्र होगा तब उसका कितना प्रखर प्रभाव पड़ेगा यह समय ही बतायेगा, अभी तो पढ़ने वाले इस ट्रैक्ट साहित्य को प्रभाव उत्पन्न करने की दृष्टि से एक जड़ ही जमा रहे हैं।

शिविर के अवसर पर ऐसे प्रतिज्ञा पत्र भी छपाये गये थे जिनमें (1) विवाहोन्माद (2) दस दुष्प्रवृत्तियों में से कोई छोड़ने के लिये लोग संकल्प करें और उन प्रतिज्ञा-पत्रों पर हस्ताक्षर करें। (3) जो प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर करें उनके लिये धन्यवाद का अभिनन्दन पत्र देने वाली एक रसीद-बही भी छपा दी गई है। प्रतिज्ञा करने वाले को एक छोटा अभिनन्दन पत्र जैसा अब ‘युग निर्माण योजना’ की ओर से मिलता है उससे उन्हें प्रसन्नता होती है और उत्साह भी बढ़ता है। जेष्ठ में मथुरा आने वाले लोग दोनों प्रकार के प्रतिज्ञा पत्र के सौ-सौ की संख्या में बने हुये यह पैकिट एवं अभिनन्दन पत्रों की रसीद बहियाँ भी साथ लेते गये थे। इससे उन्हें विवाहोन्माद के अतिरिक्त नशेबाजी माँसाहार, मृत्युभोज आदि कुरीतियों के विरुद्ध लोगों से प्रतिज्ञाएँ करने के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने में बहुत सुविधा मिल ही रही है।

अब आश्विन की नवरात्रि तक ऐसे 30 ट्रैक्ट और लिखने, छापने का कार्यक्रम बना लिया गया है, जिनमें प्रचलित सामाजिक, नैतिक, शारीरिक, मानसिक दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध मानव मन को झकझोर कर रख देने वाली पाठ्य सामग्री होगी। युग निर्माण आन्दोलन को कैसे विश्वव्यापी बनाया जाय, उसके हर पहलू पर ऐसा प्रकाश डाला जायगा कि हम सब अपनी कार्य-पद्धति को भली प्रकार समझ सकें और उसे सुव्यवस्थित नीति से कार्यान्वित कर सकें। 10 छप चुके। 30 अगले दो महीनों में छपने जा रहे हैं। इस प्रकार 40 ट्रैक्टों का सैट आश्विन की नवरात्रि तक तैयार हो जायगा। यों इस योजना के अंतर्गत आगे हर वर्ष, इस वर्ष भी 60 ट्रैक्ट छापे जाने हैं। हर महीने 5 छपते रहने से हमें लिखने और पाठकों को पढ़ने से सुविधा रहेगी, पर इस बार जाड़े के दिनों में हमें चार महीने दौरे पर रहना होगा। इसलिये इन दिनों लिखना संभव न हो सकेगा। अस्तु इन्हीं दिनों 40 ट्रैक्ट पूरे कर लेने हैं। 20 बाकी रहेंगे सो चैत्र बैसाख में पूरे कर देंगे।

विश्वास यह है कि जो इन्हें पढ़ेगा वह प्रभावित हुये बिना न रहेगा। कागज, छपाई, टाइटल आदि की दृष्टि से भी उन्हें नयनाभिराम आकर्षक और उच्च स्तर का बनाया गया है। देखते ही उन्हें लेने और पढ़ने की इच्छा होती है। सस्तेपन को देखकर तो एक बार भी पाठक के मुंह से यही शब्द निकलते हैं कि ईसाइयों के धर्म प्रचार साहित्य की तुलना में यही एक मात्र हिन्दू धर्म की ओर से इस तरह का प्रयत्न है जिसमें सुन्दरता और सस्तेपन की हद कर दी गई है। मूल्य लागत भर रखा गया है। पर यह तो उसके कलेवर की चर्चा हुई। भावना, प्रेरणा, तर्क और तथ्यों की दृष्टि से उनमें जो कुछ लिखा गया है वह इतना मार्मिक है कि पढ़ने वाला यदि बिलकुल ही भावनाहीन न हो तो उस विचारधारा से प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकता।

नव निर्माण के लिये—जन मानस का बदला जाना आवश्यक है। इस कठिन प्रयोजन को पूरा कर सकने के लिये पैने विचार-शस्त्रों की आवश्यकता अनुभव की गई अतएव यह ट्रैक्ट माला आरम्भ कर दी गई। विश्वास यह है कि इसका असाधारण परिणाम होगा। एक घंटा समय देने वाले के लिये अब यह कई तरह की—कई श्रेणी की, कई प्रयोजनों की सामग्री उपलब्ध हो गई। अखण्ड-ज्योति जन-जीवन को उत्कृष्ट बनाने वाले छोटे-छोटे लेख प्रस्तुत करती है। युग निर्माण पाक्षिक में समाचार, प्रेरणा, मार्ग दर्शन एवं सूचनाओं का उत्साह वर्धक ऐसा संग्रह रहता है जिसे पढ़ने वाले को वैसा ही करने की उमंग उठने लगे। इन आग उगलने वाले ट्रैक्टों की उपयोगिता दोनों पत्रिकाओं से भी अधिक महत्वपूर्ण दिखाई देती है। हर घर में यह एक अभिनव पुस्तकालय की स्थापना करते हैं। एक विचार-पत्र मासिक, एक समाचार प्रचार पाक्षिक, हर महीने पाँच नई पुस्तकों की बढ़ोतरी इस प्रकार एक छोटा सर्वांग सुन्दर पुस्तकालय बन सकता है। इसे ज्ञान मन्दिर कहना चाहिये। ज्ञान की देवी गायत्री माता का यह जीवन्त देवालय होगा। फूल, धूपबत्ती, आरती, प्रसाद आदि में एक आना सहज खर्च हो जाता है। दोनों समय की पूजा में भी एक घंटे से कम नहीं लगता। घर में कितने ही लोग इस प्रकार के छोटे मन्दिर रखते हैं। उतने ही समय तथा धन की व्यवस्था करके हम सच्चे, सजीव, सार्थक गायत्री ज्ञान मन्दिर की स्थापना कर सकते हैं और उसके माध्यम से अपना, अपने परिवार का तथा अपने परिचित अनेकों व्यक्तियों का सच्चे अर्थों में भला कर सकते हैं।

एक आना प्रतिदिन में यह पुस्तकालय आसानी से चल सकता है। 4) वार्षिक अखण्ड-ज्योति का चन्दा, 6) युग निर्माण पाक्षिक का चन्दा, 12) डाक खर्च समेत 60 ट्रैक्टों का मूल्य, 2) में हस्ताक्षर प्रतिज्ञा-पत्र अभिनन्दन पत्र आदि के पत्रक। इस प्रकार 24) वार्षिक या दो रुपये प्रति मास में बड़ी आसानी से यह पुस्तकालय चल सकता है। 60 ट्रैक्ट यदि रेलवे पार्सल से इकट्ठे मँगाये जायें तो एक दो रुपया डाक खर्च के बच भी सकते हैं। एक घंटा समय रोज अथवा सात दिन में सात घंटे यदि लोगों से मिलने, उनके घर जाकर अपना साहित्य पढ़ने को देने, वापिस लेने में लगाया जाय तो उससे 10 व्यक्तियों का नियमित रूप से जीवन निर्माण का सच्चा लाभ प्राप्त करा सकते हैं। ज्ञान की देवी गायत्री माता की यह सच्ची पूजा, उस प्रतीक पूजा से हजार गुनी अधिक महत्वपूर्ण है जिसमें केवल मात्र जप, पूजन, आरती, प्रसाद तक ही सारी गतिविधियाँ सीमित कर ली जाती हैं। पूजा करना उचित एवं आवश्यक है पर साथ ही लोक मंगल के लिये प्रेरणाप्रद ज्ञान की अभिवृद्धि के लिये भी प्रयत्न कि ये जाते रहने चाहिये। हर ईश्वर भक्त के लिये यह आवश्यक है कि ज्ञान रूप भगवान की भी अपने श्रम एवं धन द्वारा अर्चना करे।इस गुरुपूर्णिमा से अखण्ड-ज्योति का प्रत्येक सक्रिय सदस्य कार्य पद्धति को अपनावेगा। आपने अभी तक यदि इसे न अपनाया हो तो आज से ही इसका शुभारम्भ कर देना चाहिये। युग निर्माण योजना का चन्दा आरम्भिक अंक से सदस्य बने अधिकाँश पाठकों को इसी महीने भेजना होगा। साथ ही दस विवाहोन्माद के ट्रैक्टों का 2) भी भेजना चाहिये। 100 प्रतिज्ञा-पत्र विवाहोन्माद प्रतिरोध के 62 पैसे, 100 प्रतिज्ञा-पत्र दुष्प्रवृत्ति निरोध आन्दोलन के 63 नया पैसा तथा अभिनन्दन प्रमाण पत्रों की पुस्तक 25 नया पैसा इस प्रकार 1) 50 इस प्रचार साहित्य का भी भेजना चाहिये। 6)+2)+1)50= 9) 50 इस महीने भेजने से विवाहोन्माद एवं दुष्प्रवृत्तियों के विरोधी आन्दोलन अभी से चलाये जा सकते हैं। 30 ट्रैक्ट आश्विन तक छप जायेंगे तब उनका मूल्य 6) भेज कर अपनी लोक शिक्षण योजना को तीव्र कर देना चाहिये। इन दो-तीन महीनों में ट्रैक्टों, युग निर्माण पाक्षिक तथा प्रचार पत्रकों के लिये 15) 50 की जरूरत पड़ेगी। इसे एक साथ खर्च कर लेना चाहिये और फिर हर महीने निकाली जाने वाले अर्थ अंश से उसकी पूर्ति कर लेनी चाहिये।

लोक शिक्षण के लिये जन जागरण के लिये खर्च किया हुआ यह थोड़ा-सा समय और जरा-सा धन भले ही देखने में नगण्य लगाता हो, पर उसका प्रभाव आश्चर्यजनक होगा। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य इस प्रकार थोड़ा-थोड़ा प्रयत्न करने लग जायँ तो युग परिवर्तन की महत्वपूर्ण भूमिका निश्चित रूप से सम्पादित कर सकते हैं।


आश्विन का शिविर एवं अभ्यास-सत्र

अगला शिविर आश्विन सुदी प्रतिपदा से पूर्णिमा तक ता. 26 सितम्बर से 10 अक्टूबर तक पन्द्रह दिन का होगा। इस अवधि में नवरात्रि, विजय दशमी और शरद पूर्णिमा के तीन पर्व भी पड़ते हैं। इन दिनों 24 हजार गायत्री पुरश्चरण, गायत्री तपोभूमि में रहकर करना अन्यत्र कहीं भी अनुष्ठान करने की अपेक्षा कहीं अधिक फलदायक सिद्ध हो सकता है। इस बीच में अर्ध चान्द्रायण व्रत भी चल सकता है। 7 दिन भोजन क्रमशः घटाना 1 दिन निराहार और 7 दिन भोजन क्रमशः बढ़ाना इस प्रकार अर्ध चांद्रायण व्रत हो सकता है। पूर्ण चान्द्रायण व्रत का जो लाभ, महत्व और पुण्य है उसका आधा तो इस अर्ध चान्द्रायण व्रत से भी मिल सकता है। कहना न होगा कि शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक व्यथा-बाधाओं के निवारण में चान्द्रायण व्रत जादू जैसा प्रतिफल उत्पन्न करने वाला सिद्ध होता है। इन्हीं 15 दिनों में मथुरा तथा समीपवर्ती वृन्दावन, गोकुल, महावन, दाऊजी, गोवर्धन, नन्दगाँव, बरसाना आदि देखने का ठेके की बस में प्रबन्ध करा दिया जाता है, जिससे समय और किराये की काफी बचत हो जाती है।

इन 15 दिनों में धर्म प्रचारक का संक्षिप्त पाठ्य-क्रम भी पूरा कराया जायगा। (1) सात दिन में कही जा सकने वाली गीता सप्ताह कथा, (2) सत्यनारायण कथा, (3) षोडश संस्कारों के क्रिया विधान, (4) पर्वों को मनाने की धार्मिक कर्मकाण्ड, (5) युग निर्माण योजना को कार्यान्वित करने का मार्ग दर्शन, (6) समुन्नत और सुविकसित जीवन व्यतीत करने की कला सिखाने के लिये संजीवन विद्या का प्रशिक्षण। यह सभी जानकारियाँ व्यवहारिक रूप से दी जायेंगी। इस प्रशिक्षण के आधार पर कोई भी प्रतिभावान व्यक्ति अच्छा धर्मोपदेशक बन सकता है।

जो व्यक्ति उपरोक्त विषयों का अभ्यास भी करना चाहें उन्हें 4॥ महीने मथुरा रहना होगा। इसी अवधि में उन्हें काम चलाऊ संगीत भी सिखा दिया जायगा ताकि वे एक अच्छे भजनोपदेशक बन कर सम्मानपूर्ण आजीविका भी कमा सकें और युग परिवर्तन की भूमिका सम्पादन करने का श्रेय प्राप्त कर सकें। 4॥ महीने का यह अभ्यास क्रम 22 सितम्बर आश्विन सुदी 1 से आरम्भ होकर माघ सुदी पूर्णिमा 5 फरवरी तक चलेगा। इस अवधि में शिक्षार्थियों को आश्विन और माघ के दो शिक्षण शिविरों में रहने का भी लाभ मिल जायगा।

शिक्षा पूर्णतया निःशुल्क है। छात्रों के लिये निवास, जल, रोशनी, सफाई आदि का समुचित प्रबन्ध है। पर भोजन व्यय शिक्षार्थियों को स्वयं ही करना चाहिये। कई छात्र मिलकर पका लेते हैं तो बहुत सस्ते में काम चल जाता है। जो छात्र आर्थिक दृष्टि से वस्तुतः असमर्थ होंगे उन्हें 15) मासिक छात्रवृत्ति भी भोजन के लिये देने का प्रबन्ध किया जा रहा है।

कई व्यक्ति गायत्री तपोभूमि में आकर संस्कार कराने के लिये इच्छुक रहते हैं। उनके लिये भी वही समय उपयुक्त हैं। बच्चों के नामकरण, अन्न प्राशन, मुँडन, विद्यारम्भ, बड़ों के यज्ञोपवीत तथा वानप्रस्थ, गर्भवती महिलाओं के पुँसवन संस्कार जिन्हें कराने हों वे भी नवमी, दशमी या शरद पूर्णिमा को आस-पास आवें। कुछ दिन प्रवचन लाभ करने एवं तीर्थ यात्रा करने का भी इसी अवसर पर उन्हें लाभ मिल जायगा।

आश्विन के 15 दिवसीय शिक्षण शिविर में तथा 4॥ महीने के अभ्यास-सत्र में जिन्हें आना हो उन्हें 25 सितम्बर को ही मथुरा पहुँच जाना चाहिये और अपने आने की पूर्व सूचना देकर स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिये। बिना स्वीकृति के किसी को भी नहीं आना चाहिये। स्थान सीमित है आने के इच्छुक अधिक रहते हैं इसलिये स्वीकृति लेकर आने का ही नियम बना दिया गया है।


शाखा सम्मेलन और हमारा दौरा

मार्गशीर्ष से लेकर फाल्गुन के अन्त तक उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात में रेलवे लाइन के सहारे के स्थानों में सम्मेलनों का कार्यक्रम बनाये जाने की सूचना गत अंक में छपी है। इनमें हमें जाना है और स्वजनों से संपर्क बना कर उन्हें आवश्यक प्रेरणा देनी है। उपरोक्त प्रान्तों से कितने ही निमंत्रण आ भी चुके हैं। कई जगह से आने अभी शेष हैं। जहाँ ऐसे सम्मेलनों की सम्भावना हो वहाँ के शाखा संचालकों को चाहिये कि अपनी व्यवस्था एवं तैयारी सम्बन्धी आवश्यक सूचना यथा संभव जल्दी ही हमें भेज दें।

अगले मास कार्यक्रम निश्चित कर दिये जायेंगे तब उसमें हेर-फेर की गुंजाइश न रहेगी।

*समाप्त*