सम्पन्न नर मेवान्नं दरिद्रा भुज्जते जनः। क्षुत्स्वादुताँ जनयति साचाढयेषु दुर्लभः॥
(म. भा. उ. 34। 50)
अन्न का असली स्वाद दरिद्री (मेहनती) पुरुषों को मिला करता है कारण कि क्षुधा अन्न में स्वाद पैदा करती है, अर्थात् जोर से भूख लगने पर खाने में जो स्वाद आता है, वह स्वाद धनवान् को दुर्लभ है।
कृच्छे स्वपि न तत्कुर्यात्साधूनाँ यदसम्मतम्।
जीर्णशी चहिताशीच मिताशीच सदाभवेत ॥
(विष्णु धर्मात्तर पु. 2। 233। 265)
सज्जन पुरुषों के विरुद्ध व्यवहार विपत्तिकाल में भी न करें और हमेशा जीर्णशी (भूख लगने पर खाने वाला) मिताशी (अन्दाज का खाने वाला) और हिताशी (जो पदार्थ लाभदायक हों उनको खाने वाला) होवे। ऐसे व्यवहार से इस लोक और परलोक में सुख प्राप्त होता है।
नहिं मासं तृणाद् काष्ठादुपलाद्वापि जायते। हमे जन्तौ भवेन्माँसं तस्मात्तत्परिवर्जयेत् ॥
(स्कं पु. 6। 29। 232)
यह माँस, तृण, काष्ठ और पत्थर से उत्पन्न नहीं होता जीव के मरने पर प्राप्त होता है, इसलिए इसको त्याग दे।
सुरामत्स्याः पशोर्मां संद्विजातीनाँ बलिस्तथा। धूर्त्तैः प्रवर्तित यज्ञेनैतद् वेदेषु कथ्यते ॥
(म.भा.शाँ. 265। 9)
शराब, मछली, पशु का माँस द्विजातियों में जीव का बलिदान इनको धूर्तों ने प्रवृत्त किया है, वेदों में कहीं नहीं कहा गया।
यक्ष रक्षपिशाचान्नाँ मद्यं माँसं सुरासवम । तद् ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामा श्रंता हविः ॥
(मनु. 11। 96)
माँस, मदिरा आदि यक्ष, राक्षस और पिशाचों का भोजन है। ब्राह्मण को न खाना चाहिए।
ना कृत्वा प्राणिनाँ हिंसा माँसमुत्पद्यते क्वचिद्। न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्माँसं विवर्जयेत्॥
(मनु. 5158)
प्राणी की हिंसा किये बिना माँस नहीं मिलता और प्राणी का वध स्वर्ग देने वाला नहीं अतः माँस न खाना चाहिए।
देयमार्त्तस्य शयनं स्थित श्रान्तस्य चासनम्।
तृषितस्य च पानीयं क्षुधितस्य चभोजनम्॥
चक्षुर्दद्यान्मनो दद्याद्वाचं दद्यात्सुभाषितम्।
उत्थाय चासनं दद्यादेषधर्माः सनातनः॥
(म. भा. वन. अ. 2)
रोग पीड़ित को शयन के लिए स्थान, थके को आसन, प्यासे को पानी, भूखे को भोजन देना चाहिए। आये हुए को प्रेम दृष्टि से देखें, मन से चाहें, मीठी वाणी से बोले, उठा करके आसन दे- यह सनातन धर्म है।
दान मेवकलीयुगे। (पराशर॰ 1। 23)
दानमेकं कलौयुगे। (मनु0 1। 86)
कलियुग में दान ही मुख्य धर्म है।
न्यायार्जित धनं चापि विधिवद्यत्प्रदीयते । अर्थिभ्यः श्रद्धयायुक्त दान मेतदुदाह्वतम् ॥
ईमानदारी से पैदा किया हुआ पैसा विधिपूर्वक अर्थी (चाहने वाले) को श्रद्धा के साथ देना- दान है।
चोट खाया हुआ साँप आक्रमणकारी पर ऐसी फुँकार मार कर दौड़ता है कि उसके होश छूट जाते हैं, बचाव के लिए भागना ही पड़ता है। साँसारिक व्यथाओं से विक्षुब्ध मनुष्य की भी ऐसी ही स्थिति होती है जब मनुष्य को पीड़ायें चारों ओर से घेर लेती हैं और कोई सहारा नहीं सूझता तो वह निष्ठापूर्वक अपने परमेश्वर को पुकारता है। हार खाये हुए मनुष्य की कातर-पुकार से परमात्मा का आसन हिल जाता है और उन्हें सारी व्यवस्था छोड़कर भक्त की सेवा के लिए भागना पड़ता है। मनुष्य ने बुलाया हो और उसकी शुभेच्छा न आई हो, मनुष्य ने सहायता माँगी और परमात्मा ने मनोरथ पूर्ण न किया हो, मनुष्य की प्रार्थना पर परमात्मा दौड़कर न चला आया हो ऐसा कभी नहीं हुआ और न ही आगे कभी होगा। मनुष्य के विश्वास की शक्ति के आगे परमात्मा को सदैव ही झुकना पड़ा है।
उसे बुलाइये, वह आपके अन्तःकरण में दिव्य प्रकाश बनकर उतरेगा, मधुर संगीत बनकर हृदय में गुँजन करेगा, आशीर्वाद बन कर आपके दुःख दर्द दूर करेगा। पर उसे सच्चे हृदय से बुलाइये, निष्कपट और निश्छल होकर पुकारिये।
ऐसा समय आता है जब मनुष्य संसार को भूलकर कुछ क्षण के लिए ऐसे दिव्य लोक में पहुँचता है, जहाँ उसे असीम सहानुभूति और शाश्वत शान्ति मिलती है। प्रार्थना की इस आन्तरिक स्थिति और उसके आनन्द को कोई भुक्त-भोगी ही जान सकता है। परमात्मा के सन्निकट पहुँच कर आत्मा अब भक्ति - भावना से अपनी वेदनायें प्रस्तुत करती है तो अनिर्वचनीय आनन्द मिलता है। अन्तःकरण की समस्त वासनायें विलीन हो जाती हैं, इन्द्रियों की चेष्टायें शान्त हो जाती हैं। उस आनन्द की अभिव्यक्ति करते हुये महाकवि सूर ने लिखा है-
ज्यों गूँगहि मीठे फल को रस उर अन्तर ही भावै ।
अमित स्वादु सब ही जु निरन्तर अमित तोप उपजावे॥
मन वाणी को अगम अगोचर सो जाने जो पावै॥
सूर की अनुभूति का आनन्द ध्रुव ने पाया था। उसके दुःखी हृदय ने, संसार से संतप्त अन्तःकरण ने परमात्मा को करुण स्वरों में पुकारा था। भगवान उसके पास आये थे। कुमार ध्रुव ने पूर्णता की स्थिति प्राप्त की थी। परमात्मा का अनुग्रह न रहा होता तो ध्रुव अजर-अमर कैसे होता।
हिरण्यकश्यप की हठधर्मिता से दुःखी बालक प्रहलाद ने उसे बार-बार पुकारा, उसका नारायण बार-बार उसकी मदद के लिये दौड़ा। विष पिया उसके भगवान ने, समुद्र के गर्त में पाथेय बना प्रहलाद का भगवान्। इससे भी काम न चला तो नृसिंह बनकर प्रहलाद का भगवान खंभा चीर कर दौड़ा आया। जिसने मनुष्य को पैदा किया उसके हृदय में अपनी सन्तान के लिए मोह न हो, ममता न हो यह कैसे हो सकता है। मनुष्य बुलाये और वह न आये ऐसा कभी हुआ नहीं।
द्रौपदी जान गई कि इस सभा में उसे बचाने वाला कोई नहीं है। दुःशासन चीर खींचता है। लाज न चली जाय इस भय से निर्बल नारी अपने दीनानाथ को पुकारती है। भगवान श्रीकृष्ण आते हैं, उसका चीर बढ़ता है। दुःशासन थक गया, पर चीर समाप्त न हुआ। परमात्मा की अनन्त शक्ति को नापने की सामर्थ्य किस में है? उसे तो उनका परम भक्त ही जान और समझ सकता है।
सामूहिक प्रार्थनाओं का बल सदैव परमात्मा को स्वर्ग से धरती पर उतार लाने में समर्थ रहा। देवासुर संग्राम की कथाओं में ऐसे अनेक वर्णन हैं। महाभारत के युद्ध की घटना है। युद्ध भूमि में किसी टिटहरी ने अंडे दे रखे थे। युद्ध जोर का चल रहा था। पक्षियों को और कोई सहारा दिखाई न दिया तो उन्होंने ईश्वर की शरण ली। परमात्मा ने उनके विश्वास की रक्षा की। एक हाथी का घंटा टूट कर अंडों को छुपाकर बैठ गया युद्ध समाप्त होने पर उसमें से पक्षियों के बच्चे सकुशल निकाल लिये गये।
गजराज की पुकार पर उन्हें वाहन का भी परित्याग करना पड़ा था। नंगे पैरों वे दौड़े थे और गज को ग्राह के फन्द से मुक्त किया था। जब भी, जिस अवस्था में भी, जिसने परमात्मा को सच्चे हृदय से पुकारा वह अपने आवश्यक कार्य छोड़ कर दौड़ा। जीवात्मा के प्रति उसकी दया अगाध है, अनन्त है। वह भक्त का स्नेह बन्धन ठुकराने में असमर्थ है।
बहुत से लोग हैं जो ईश्वर और उसके अस्तित्व को मानने से इनकार करते हैं, पर यदि भली भाँति देखा जाय तो मूढ़ताग्रस्त व्यक्ति ही ऐसा कर सकते हैं। एक बहुत बड़ा आश्चर्य हमारे सामने बिखरा पड़ा है। उसे देखकर भी जिसका विवेक जागृत न हो, कौतूहल पैदा न हो उसे और कहा भी क्या जायगा। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है यह दृश्य आप किसी अन्य ग्रह में बैठे देख रहे होते तो समझते मनुष्य का अभिमान कितना छोटा है। ब्रह्मांडों की विशालता की तुलना में वह चींटी से भी हजार गुना छोटा लगेगा। अनन्त आकाश और उस पर निरन्तर होती रहती ग्रह नक्षत्रों की हलचल, सूर्य-चन्द्र, सागर, पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, वनस्पति मनुष्य के स्वयं के बदलते हुए क्षण क्या यह सब मनुष्य का विवेक जागृत करने के लिए काफी नहीं हैं? परमात्मा का अस्तित्व मानने के लिए क्या इतने से संतोष नहीं होता? विचारवान् व्यक्ति कभी भी ऐसा न सोचेगा। इतनी बड़ी विश्व व्यापी गतिविधि का नियंत्रणकर्ता तो कोई होना ही चाहिए। पृथ्वी ठीक 365, दिन में ही सूर्य की परिक्रमा लगाये इतनी सूक्ष्म गणित निकालने वाला कोई विधायक सृष्टा तो होना ही चाहिए। कोई नियामक न हो तो सम्भवतः स्थूल प्रकृति का अस्तित्व भी न होता सर्वत्र शून्य ही शून्य बिखरा पड़ा होता।
सम्पूर्ण हिन्दू-संस्कृति का आधार भी ईश्वर-निष्ठा ही है। कोई भी धार्मिक कृत्य परमात्मा के ध्यान के बिना प्रारम्भ नहीं करते। उसे स्मरण करते ही वह शक्ति मिल जाती है, जिससे मनुष्य कठिनाइयों को पार करता हुआ आगे बढ़ता चला जाय। मनुष्य जीवन में पग-पग पर ऐसी कठिनाइयाँ आती हैं कि उनमें ईश्वरीय संयोग न मिले और परमात्मा का अनुग्रह न प्राप्त हो तो मनुष्य का जीवन विश्रृंखलित हो जाय। ईश्वर पर विश्वास कर लेने के बाद अन्तःकरण में इतनी दृढ़ता आ जाती है कि फिर बाहरी कठिनाइयाँ विक्षिप्त नहीं कर पातीं और सफलता का मार्ग खुलता चला जाता है।
ऐसे उदाहरण इस युग में भी चरितार्थ होते रहते हैं। संत ज्ञानेश्वर, जगद्गुरु शंकराचार्य, संत तुकाराम, सूर और तुलसी का जीवन बीते कुछ अधिक दिन नहीं हुये। भारतीय स्वतन्त्रता की उपलब्धि अभी कुछ दिन पूर्व ही हुई है। उसका प्रणेता महात्मा गान्धी अकेला था। शरीर भी कुल 86 पौण्ड का। कोई सेना साथ में न थी। कोई शस्त्र भी नहीं उठाया था उनने। “राम-नाम” का बल था गान्धी के पास। पर उस नाम के स्मरण और चिन्तन में ऐसी प्रगाढ़ निष्ठा भरी थी कि गान्धी के नाम से लहर आती थी और उत्तर-दक्षिण में एक विकट तूफान सा उठ पड़ता था। वह शक्ति गान्धी की नहीं थी, जनता की भी नहीं थी। सम्पूर्ण क्रान्ति का बीज वह “राम-नाम” था जो हर वक्त गान्धी की जबान पर रहता था, उसके हृदय में गूँजता रहता था।
आदि काल से लेकर अब तक जितने भी सन्त महापुरुष हुए हैं और जिन्होंने भी आत्म-कल्याण या लोक-कल्याण की दिशा में कदम उठाया है, उन्होंने परमात्मा का आश्रय मुख्य रूप से लिया है। मनुष्य के पास शक्ति भी कितनी है। बहुत थोड़ा शरीर बल, उस पर विषयों के प्रलोभन, बहुत थोड़ा साधन-बल उस पर भी साँसारिक गतिरोध। अपनी ही सामर्थ्य पर वह न तो आत्म-कल्याण कर सकता है, न संसार की ही कुछ भलाई कर सकता है। पर जब भी उसने ईश्वर की जयकार की, उसे अपना सहयोगी चुना और सहायता के लिए पुकार की कि वह दौड़ा और उसकी शक्ति बन कर दिशा प्रदर्शित करने लगा। परमात्मा की कृपा पाकर मनुष्य अपना शंख बजाता हुआ चला जाता है, मोक्ष उसके पीछे-पीछे चलता है। ज्ञान की मशाल लेकर आगे बढ़ता है, लोक-कल्याण पीछे-पीछे भागता हुआ चला आता है। इसमें श्रेय मनुष्य को नहीं परमात्मा को है। वही शक्ति बनकर पुरुष में अवतीर्ण होता है, जो भी उसे निष्ठापूर्वक बुलाता है उसकी मदद के लिए परमात्मा आता अवश्य है। आज तक ईश्वर विश्वास न किसी का निष्फल गया और न आगे इसकी सम्भावना है।
कर्मों और कर्म फलों को ईश्वरार्पण कर देने के आदेश में बहुत बड़ा रहस्य एवं मन्तव्य छिपा हुआ है। जिन-जिन धर्म प्रवर्तकों ने इस रहस्य को समझ लिया है, उन्होंने अपने अनुग्रह-पात्रों को वैसा करने का आदेश दिया है।
कर्मों एवं कर्म-फलों का ईश्वरार्पण कर देने में छिपे रहस्य का पता लगाने से अनेक मोटी बातें सामने आती हैं। संसार में जो कुछ क्रिया-कलाप दृष्टिगोचर होता है, उसका मूल प्रेरणा-स्त्रोत ईश्वर ही है, या यों कहना चाहिए कि यह सब कुछ ईश्वर ही करता है। प्रत्यक्ष में अधिकारियों द्वारा किये हुए सारे कार्य परोक्ष में प्रमुख राज-सत्ता द्वारा ही किया हुआ माना जायेगा। मनुष्य ईश्वर का प्रतिनिधि कर्मचारी है, स्वतन्त्र अथवा मूल कार्य-कर्ता नहीं। वह जो कुछ करता है, ईश्वर की प्रेरणा से उसी की शक्ति द्वारा उसी के हेतु करता है। यही कारण है कि जब-जब वह उसके निर्देश के विरुद्ध स्वेच्छाचारिता करता है, तब-तब अपदस्थ होकर दण्ड का भागी बनता है। वह अपनी स्वेच्छाचारिता के उत्तरदायित्व से मुक्त नहीं हो सकता।
जिस प्रकार मनुष्य स्वेच्छाचारिता के रूप में परम प्रभु से विद्रोह करता है, उसी प्रकार कर्मों के स्वामी, संचालक एवं स्त्रोत परमात्मा को न मानकर अपने को मानना भी उसके प्रति चोरी करना है। जो कर्मचारी अपने स्वामी के आदेशों का ठीक-ठीक पालन करता हुआ कर्म करता है, वह उसके फलाफल का उत्तरदायी नहीं होता। उसके कर्मों का सारा परिणाम स्वयं स्वामी संभालता है और कर्मचारी निर्द्वन्द्व तथा निर्भीक अवस्था में यथावत् स्थित रहता है। न उसे चिन्ता करने की आवश्यकता रहती है और न व्यग्र होने की।
समझने के लिए यदि यह भी मान लिया जाये कि मनुष्य स्वयं कर्म करता है और उसके फल का अधिकारी भी वह स्वयं ही है, तब भी अपनी यह पूँजी यदि वह सर्व समर्थ परमात्मा को सौंप दे तो स्वर्ग, नरक, सुख, दुःख, शोक, सन्ताप, अच्छाई, बुराई आदि द्वंद्वों से उसी प्रकार सुरक्षित हो जाये जैसे कोई धनाढ्य अपना धन रिजर्व बैंक में जमा करके चोर डाकुओं, ठगों, उचक्कों और चाटुकारों, शोषकों से छुट्टी पा लेता है। अस्तु अपने प्रत्येक कर्म को, उसके फल को उसी की सम्पत्ति मान कर उसी प्रकार उसे समर्पित कर देने में ईमानदारी और कल्याण है, जिस प्रकार कोई सेनापति किसी भू-खण्ड को जीत कर सम्राट को समर्पित कर देता है।
जिन कर्मों और कर्म-फलों को अपने ऊपर लादे रहने से कोई लाभ नहीं, उल्टे हानि ही है, उन्हें अपने पास रक्खे रखना बुद्धिमानी नहीं। फिर एक कर्म करके उसका फल सिर रख लेने से दूसरा कर्म करते समय वह क्षिप्रता न रह सकेगी जो निर्भार होकर काम करने में। इस प्रकार यदि एक के बाद दूसरे कर्म का भार अपने शिर पर लादते चले जायेंगे, तो शीघ्र ही बहुत बड़े बोझ से दब कर सारी स्फूर्ति तथा क्षमता का अन्त कर लेंगे। प्रतिदिन के असंख्यों कर्मों का बोझ लेकर कोई कितनी दूर तक सुविधापूर्वक जीवन यात्रा कर सकता है? जीवन-रण में जो जितना अधिक स्फूर्तिवान् और निर्द्वन्द्व होगा वह उतनी ही अधिक सफलता प्राप्त करेगा।
यह स्वतः सिद्ध है कि जो कर्म को अपना मानेगा वह उसके फल का भी अधिकारी बनेगा और तदनुसार ही फल की मिठास तथा कड़वाहट को भी चखना पड़ेगा। मनुष्य का स्वभाव है कि वह अपने प्रत्येक कर्म का फल मधुर से मधुर चाहता है। किन्तु ऐसा होना सम्भव नहीं कि उसके सारे कर्म-फल पाने पर वह दुःखी होगा, निराश होगा और रोयेगा। अब क्यों न इस दुःख का कारणभूत भूमिका कर्मों की फलासक्ति से किनारा कर लिया जाए।
इन मोटे कारणों के अतिरिक्त कर्म-फलों की आसक्ति त्याग करने के आदेश के सूक्ष्म कारण और भी महत्वपूर्ण है। मनुष्य जीवन कोई साधारण उपलब्धि नहीं, इसे पाने का हेतु असंख्यों जन्मों का पुण्य ही है। यह न तो यों ही अकस्मात् मिल गया है और न यों ही साधारण रूप में आगे मिल सकेगा। मनुष्य जीवन एक अमूल्य अवसर है। यह बार-बार नहीं आता। मनुष्य जीवन एक ऐसा अवसर है, जिसका सदुपयोग करके कोई भी सच्चिदानन्द परमात्मा को पा सकता है। तुच्छ शारीरिक भोगों की तुलना में जो सर्वमुख रूप परमात्मा के साक्षात्कार और परमपद मोक्ष की उपेक्षा करता है, वह उस मनुष्य की तरह ही गँवार और अभागा है, जो चिन्तामणि को गुँजा फल के लोभ में त्याग देता है।
यह परमात्मा का कितना बड़ा अनुग्रह है कि उसने हमें घोड़ा, गधा, बैल, बकरी आदि न बना कर मनुष्य बनाया है। अब यदि हम इस मनुष्य जीवन को घोड़ों और गधों जैसा बना लेते हैं तो न केवल अपनी हानि ही करते हैं, बल्कि उस दाता को भी लज्जित करते हैं। मनुष्य जीवन देने से बड़ा कोई दूसरा अनुग्रह परमात्मा के पास नहीं है। मनुष्य जीवन देकर मानों उसने अपने सारे वरदान, सारी कृपा और सारी करुणा ही हम पर उड़ेल दी है।
कर्म फल की आसक्ति में एक बहुत बड़ा दोष यह है कि फलाकाँक्षी का सारा ध्यान फल की ओर ही लगा रहता है, जिससे वह निपुणतापूर्वक कर्म नहीं कर पाता और ऐसी दशा में प्रतिकूल फल की तनिक भी सम्भावना होने पर काम करना छोड़ देता है। बहुत बार यह भी होता है कि प्रतिकूल फल की आशंका से कोई काम प्रारम्भ ही नहीं करता। फल लोभी इसी ऊहापोह में पड़ा रहता है कि न जाने ऐसा करने में सफलता मिलेगी अथवा असफलता और यदि वह किसी प्रकार से कुछ करने की हिम्मत भी करता है तो हर समय सफलता के लोभ में असफलता की चिन्ता करता रहता है। सफलता की अत्यधिक कामना असफलता को ही निमन्त्रित करती है।
कर्म को अपना किया हुआ मानने से उसकी असफलता में तो दुःख होता ही है, सफलता में भी मनुष्य अभिमान से अभिभूत होकर अपनी हानि कर लेता है। एक कर्म की सफलता का अभिमान दूसरे कर्म में अदक्षता उत्पन्न कर देता है। सफलताभिमानी की इच्छा रहा करती है कि लोग उसकी योग्यता तथा समर्थता की प्रशंसा करें, उसका आदर तथा सम्मान करें। किसी भी कारण से उत्पन्न हुआ अभिमान मनुष्य को पतन के गर्त में गिराये बिना नहीं रहता।
मनुष्य में एक सीमित शक्ति रही है। किन्तु जब व अपनी शक्ति विश्व के निर्माता या नियामक में समाहित कर देता है, तो वह अनन्त शक्तिवान् हो जाता है। सिन्धु में बिन्दु की तरह मिल कर पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। कर्तापन का अभिमान करने वाला, विराट् विश्व चेतना से अलग होकर एक संकुचित सीमा में घिर कर बड़ा ही दीन−हीन बन जाता है। कर्माभिमानी जहाँ छोटे-छोटे काम करने में कठिनाई अनुभव करता है और पग-पग पर सफलता-असफलता से प्रभावित होता है, सुख-दुःख के वशीभूत होता रहता है, वहाँ स्वयं को सम्पूर्ण रूप से परमात्मा को अर्पण कर देने वाला बड़े से बड़े काम को साधारण रूप से कर लेता है।
कोई छोटा काम भी जब ईश्वरीय कार्य समझ कर किया जाता है तो वह भी महान् बन जाता है। किसी कार्य को ईश्वर का कार्य समझ कर उसमें उपासना का भाव रहता है, जिससे मनुष्य अपने पूर्ण पवित्र तन-मन से उसे करता है और ऐसी दशा में कार्य में सफलता मिलना अनिवार्य है। परमात्मा के प्रति किया हुआ छोटा-सा नीराजन भी जिस प्रकार परम पवित्र तथा महान् समझा जाता है, उसी प्रकार प्रभु को समर्पित किया हुआ मनुष्य का साधारण कार्य भी असाधारण माना जाता है। एक गरीब द्वारा की हुई छोटी-सी आरती के प्रति क्या गरीब, क्या अमीर सभी नत-मस्तक होते हैं, पूर्ण पवित्र समझते हैं। उसी प्रकार ईश्वरीय कार्य समझ कर किया हुआ लघु से लघु कार्य भी लोगों की श्रद्धा-भक्ति का कारण बनता है।
इस चिर-दुर्लभ मानव-जीवन को पाकर जो छोटे-छोटे कर्म फलों के लिए लालायित रहता है, वह परमात्मा के साक्षात्कार जैसे परम लाभ से वंचित रह जाता है। प्रत्येक कर्म को परमात्मा का समझ कर करने और उसके फल को भी उसका समझ लेने में मनुष्य का अपना कुछ बिगड़ता नहीं, तब न जाने वह क्यों कर्माभिमानी बन कर अनमोल मानव-जीवन का दुरुपयोग किया करता है?
संसार में असंख्यों ऐसे उदाहरण पाये जाते हैं कि समान साधनों वाले दो व्यक्तियों में से एक उन्नत और महान् बन जाता है और दूसरा यथास्थान एड़ियाँ घिसता हुआ मरा करता है।
साधारणतया लोग ऐसी विषमताओं को भाग्य कहकर सन्तोष कर लेते हैं। इसके वास्तविक रहस्य को समझने का प्रयत्न नहीं करते। किसी बात को केवल भाग्य कहकर टाल देना और उसके कारणों की खोज न करना मनुष्य जैसे बौद्धिक प्राणी के लिए शोभनीय नहीं। परमात्मा ने मनुष्य को बुद्धि दी ही इसलिए है कि वह किसी बात पर ठीक-ठीक विचार करके उसका निष्कर्ष निकाले और परिणामों से पूरा-पूरा लाभ उठायें।
किसी का भाग्य कोई पूर्व निर्धारित नियति नहीं है और न वह कोई ऐसा ईश्वरीय विधान ही है, जो पहले से लिख दिया जाता हो, जिसके अनुसार सफलता असफलता, उत्थान-पतन अथवा सुख-दुःख की प्राप्ति होती हो।
अविचारकों एवं अकर्मकों ने विधि-विधान के अर्थ में जिस विषय को भाग्य की संज्ञा दे रखी है, वह वस्तुतः मनुष्य के कर्म-कौशल का प्रमाण-पत्र है, जो यह प्रकट किया करता है कि उसने क्या, कितना और कैसे किया? उसकी योग्यता, कार्य और कर्मठता में कितना सामंजस्य है?
सफलता-असफलता, उन्नति और अवनति हानि और लाभ, सुख और दुःख आदि मानव-जीवन के जो भी संयोग हैं, वे उसके व्यक्तित्व की क्षमता पर निर्भर करते हैं। जिसने जिस अनुपात से अनुकूल और जिसने अपने व्यक्तित्व को जितना निकृष्ट, निर्बल और निस्तेज बनाया हुआ है वह उसकी प्रतिकूल सम्भावनाओं का भागी बनता है।
जीवन में अभ्युदय पाने, ऊँचे उठने और सौभाग्यपूर्ण सफलताओं का वरण करने के लिए मनुष्य को अपना व्यक्तित्व पूर्ण, परिष्कृत एवं प्रतिभावान बनाना ही होगा !
मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्माण बाह्य परिस्थितियों पर उतना निर्भर नहीं करता, जितना कि अपने प्रति उसके निजी दृष्टिकोण पर। जो व्यक्ति अपने प्रति जिस प्रकार की धारणा रखता है, वह उसी प्रकार का बन जाता है।
आत्मा में एक ऐसी शक्ति निवास करती है जो मनुष्य के विचारों को अपने स्मृति-पट पर अंकित कर लेती है और जीवन के समस्त तत्वों को उन्हीं के अनुसार बनाती बिगाड़ती रहती है। अपने प्रति क्षुद्र विचार रखने, अपनी योग्यताओं, क्षमताओं और कुशलताओं में अविश्वास करने से मनुष्य की आत्म-शक्ति बिना किसी संशोधन, सुधार अथवा हेर-फेर के उन विचारों को शरीर के प्रत्येक अणु-परमाणु के पास प्रेषित कर उन्हें वैसा ही नगण्य एवं निष्क्रिय बन जाने का आदेश देती है, जिसके फलस्वरूप वे वैसे ही बन जाते हैं। ऐसी दशा में मनुष्य का संपूर्ण व्यक्तित्व हीन एवं हेय बन जाता है।
यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि कोई कितना ही बलवान्, तेजस्वी और स्वस्थ क्यों न हो, यदि प्रतिदिन दो-चार आदमी उससे यह कहते रहें कि तुम तो बड़े ही निर्बल, मलीन और अस्वस्थ दिखाई देते हो तो कुछ ही समय में वह वैसा बन जायेगा।
इस प्रकार के निराशापूर्ण संकेतों की निरन्तर पुनरुक्ति से किसी भी प्रकार के मन में पहले सन्देह उत्पन्न होता है- ‘क्या वास्तव में वह वैसा ही है’ और उसी दृष्टिकोण से निरीक्षण करने के कारण अपने को कुछ-कुछ उसी प्रकार का देखने भी लगता है। ऐसी दशा में एक ओर उसका सन्देह विश्वास में बदलने लगता है और दूसरी ओर चिन्ता के कारण उसका शारीरिक एवं मानसिक पतन प्रारम्भ हो जाता है। जिससे ‘अन्ततो गत्वा’ वह बिल्कुल निस्तेज, निर्बल और रोगी हो जाता है।
झूँठे संकेतों, काल्पनिक भयों और निर्मूल शंकाओं के कारण संसार में न जाने कितने व्यक्ति नित्य मरते और बीमार होते रहते हैं। धूर्त भविष्यवक्ता कितने ही भोले-भाले व्यक्तियों को ग्रह-नक्षत्रों, भाग्य-दुर्भाग्य और अशुभ अनिष्टों की झूँठी सूचनायें दे-देकर, भयभीत करते और ठगते रहते हैं।
इस प्रकार जब दूसरों के झूठ-मूठ बहकाने और कहने भर से आदमी प्रभावित होकर वैसा बन जाता है तब अपने प्रति मनुष्य की धारणा कितनी प्रभावपूर्ण होगी, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। अन्य व्यक्ति तो कभी समय, अवसर आने पर अपना विचार व्यक्त कर पाते हैं, किन्तु अपने प्रति अपनी धारणा तो हर समय काम करती है। फिर भला उसके अनुसार बनने में कितना समय लगेगा?
यदि हम अपने प्रति इस प्रकार के विचार करते हैं कि हम निहायत निकम्मे, नालायक और किसी काम के योग्य नहीं हैं, तो हमारी आत्म-शक्ति हमारे मन मस्तिष्क एवं शरीर के समस्त तत्वों को उसी प्रकार का बना देगी जिसके फलस्वरूप हमारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही नगण्य एवं हेय हो जायेगा। मनुष्य के शक्ति -तत्व यन्त्र की भाँति आज्ञाकारी और छुई-मुई की तरह संवेदनशील होते हैं। क्षुद्रता की सूचना पाते ही वे शिथिल और प्रोत्साहन पाते ही विकसित हो उठते हैं।
मनुष्य के विचारों में एक आकर्षण-शक्ति भी होती है; जिसके द्वारा वह वायु-मण्डल में फैले सजातीय विचारों का प्रभाव भी खींच लेते हैं। अपने प्रति दीनता, हीनता निरुपायता, निष्क्रियता, विवशता आदि का विचार बनाते ही वायुमण्डल में बिखरे हुए हेयता के सारे तत्व आकर्षित होकर आप में इकट्ठे हो जायेंगे, जिनके दबाव से आपकी शक्तियाँ कुचल कर नष्ट हो जायेंगी और आप जीवन में किसी काम के न रहेंगे।
निरन्तर चिन्तन एक प्रकार की उपासना ही होती है। जिस देवता की चिन्तन द्वारा निरन्तर उपासना की जाती है, वह प्रसन्न होकर अपने अनुरूप वरदान करता है। यदि आप अपने क्षुद्र विचारों का निरन्तर चिन्तन करते रहेंगे तो अवश्य ही आपको क्षुद्रता की सिद्धि होगी और अनचाहे भी वह आपके जीवन में बस जायेगी।
इसके विपरीत जब मनुष्य अपने प्रति शुभ विचार रखता है और निरन्तर उसी दिशा में सोचता रहता है, वह एक दिन अवश्य शिवं का अधिकारी बनता है। अपने को सशक्त समर्थ, होनहार तथा भाग्यवान समझने और उसका संकेत आत्मा को देते रहने से वह आपके शक्तितत्त्वों को उसी प्रकार प्रेरित करती और गढ़ती रहती है। यही कारण है कि किसी के विकास में प्रोत्साहन, सराहना एवं प्रशंसा का बहुत गहरा महत्व है।
देखा जाता है कि कमजोर से कमजोर बच्चे प्रोत्साहन और शुभ सूचनायें पाकर बड़े ही कुशाग्र बुद्धि और होनहार बन जाते हैं। प्रोत्साहन पाकर हारती हुई सेनायें जीत जाती हैं, साहस बँधाने से डूबते हुए व्यक्ति किनारे लग जाते हैं और आशा का सम्बल देने से मरणासन्न रोगी जी उठते हैं।
अभ्युदय, समुन्नति एवं आत्म-कल्याण चाहने वाले को चाहिए कि वह अपने प्रति कभी कोई हीन भावना न बनाये, अपने को पस्तहिम्मत न करें। इस प्रकार कभी न सोचे कि वह तो कमजोर है, साधनहीन है, संसार में क्या कर सकता है। इसके विपरीत उसे इस प्रकार के महान और कल्याणकारी विचार रखने चाहिये कि वह सर्वशक्ति मान परमात्मा का अंश है, उसमें उस परमात्मा के सारे तत्व उसी प्रकार विद्यमान् हैं, जिस प्रकार एक अंजलि जल में समुद्र के अनन्त जल के सम्पूर्ण तत्व समाये रहते हैं। वह संसार के हर काम को करने की क्षमता रखता है। निराशा, पस्तहिम्मती उसके पास नहीं आते उसकी आत्मा उसकी मित्र है। संसार में वह महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए भेजा गया है, इसके लिए उसे आवश्यक शक्तियाँ भी दी गई हैं। अपने अन्दर की इन्हीं शक्तियों के आधार पर वह वे सारे कार्य सम्पादित कर दिखायेगा। वह अवश्य सफल होगा और शीघ्र ही अभ्युदय प्राप्त करेगा !
इस प्रकार के आशापूर्ण विचार रखने और तदनुसार उसकी सूचना आत्मा को देते रहने से वह उसकी शक्ति इसी भावना के अनुसार गढ़ देगी और तब आत्मा का शक्ति तत्व इसी के अनुसार महान और तेजस्वी बन जायेगा और फिर आपके अभ्युदय का मार्ग संसार का कोई भी अवरोध नहीं रोक पायेगा!
सदा शुभ सोचो शुभ करो, शुभ की आकाँक्षा करो, आपका सम्पूर्ण जीवन पवित्र और पुनीत बन जायेगा, आपको सत्य शिव और सुन्दर की प्राप्ति होगी।
मनुष्य जीवन का जितना सूक्ष्मतम और सुन्दर प्रयोग ऋषियों ने किया उतना किसी देश, जाति या संस्कृति ने नहीं किया। मनुष्य की सूक्ष्म प्रकृति का अध्ययन करना कोई आसान बात न थी। इसके लिये भारतवर्ष ने सुखोपभोग का त्याग कर शोध की, गहन साधना की और जो निष्कर्ष निकले, उन्हें दृष्टि में रखते हुए पितामहों ने एक सर्वथा पृथक आचार-संहिता तैयार की और उसके अनुरूप जीवन ढालने की शिक्षा दी। भारतीय संस्कृति और सभ्यता का रूप-रंग बिल्कुल ही नया तैयार किया गया- ऐसा जैसा किसी देश में व्यवहृत नहीं हुआ। इतनी विलक्षण, इतनी सर्वांगपूर्ण जिस पर थोड़ा चिन्तन करने से भी ऋषियों के प्रति श्रद्धा से हृदय गदगद हो जाता है।
“मैं लूँगा और आपको न दूँगा” की नीति पर जब संसार चल रहा था, तब यहाँ विचार किया गया कि इस बात में मनुष्य की विशेषता ही क्या रही? भोग तो सभी भोगने के इच्छुक रहते हैं, पैसे के लिए हर कोई नाजायज काम करने के लिए तैयार रहता है, आलस्य में समय काटने की अधोगामी आदत से तो समाज ही ग्रस्त है, अच्छा से अच्छा खाने और अच्छा पहनने की इच्छा किसे नहीं होती? यह सब सामान्य व्यक्ति के लक्षण हैं। इनमें से कई प्रवृत्तियाँ तो पशुओं में भी पाई जाती हैं, फिर मनुष्य भी उन्हीं में चक्कर काटता रहे तो उसकी विशेषता ही क्या रही? ज्ञान, बुद्धि और विवेक का सदुपयोग कहाँ हुआ? मनुष्य को जो असाधारण शक्ति और सामर्थ्य मिली है, उसके रहते हुए भी यदि वह निकृष्ट श्रेणी का जीवन जिये, तो उसमें मनुष्य जीवन की सार्थकता कहाँ रही? श्रेष्ठ उपलब्धि का प्रयोग तो किसी श्रेष्ठ कार्य में ही होना चाहिए इस बात को केवल हम भारतीयों ने जाना है, इसीलिए संसार में हमारी ज्येष्ठता और श्रेष्ठता विद्यमान है।
रोजी और रोटी की समस्या मनुष्य के लिए उतनी जटिल नहीं जितनी अपना जीवन लक्ष्य समझने की आवश्यकता महत्त्वपूर्ण हो सकती है। कोई भी व्यक्ति जो ईश्वर, पुनर्जन्म आदि पर विश्वास न करता हो तो उसे भी मानना ही पड़ेगा कि मनुष्य जीवन जैसा अलभ्य अवसर बार-बार मिलने वाला नहीं। इस बहुमूल्य वस्तु को यों ही निरर्थक, सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों की तरह बिता देना कोई समझदारी की बात नहीं होगी। मनुष्य जीवन का उद्देश्य सामान्य जीवन क्रम से उलटा चलकर ही किया जा सकता है। जिस ढर्रे में दूसरे लोग चल रहे हैं, उसके परिणाम तो सबके सामने हैं, क्या हर्ज है यदि उससे विपरीत चलकर कुछ नये तथ्यों की खोज की जाय?
इस विचारधारा के साथ ही भारतवर्ष में एक नये दर्शन का आविर्भाव होता है। साधना का जन्म इसी प्रेरणा से हुआ और इससे जो सिद्धि मिली वह अलौकिक थी, महान् थी, जिसका एक कण बिखर जाने से भी संसार में स्वर्गीय सुख का वातावरण छा जाता है। नाम है उसका-मानवता अर्थात् “मुझे नहीं चाहिए, आप लीजिये”। मेरा कुछ नहीं सब परमात्मा का है। परम पिता की वस्तु का उपभोग मिल बाँट कर ही करना चाहिये, यह निष्कर्ष मनीषियों ने गहन साधना और अनुभवों के आधार पर निकाला। इसी नीति पर चल कर ही संसार की रक्षा और सुखों का विकास हो सकता है। इससे विलग मनुष्य की शान्ति का दूसरा उपाय नहीं। जिसे न्याय और अन्याय का ज्ञान है, जो सब प्राणियों में एक आत्म-तत्व समाया हुआ देखता है, जो ग्रहण करने योग्य और अग्रहणीय का भेद समझता है, संसार के वैभव अपने आप चक्कर काटते हुए उसके पास जा पहुँचते हैं। त्याग का सुख मनुष्य को अनायास ही मिल जाता है और न मिले न सही, पर मानवता से पूरित अन्तःकरण में इतनी शक्ति व सामर्थ्य भरी होती है, जिसे पाकर मनुष्य को संसार के भोग तुच्छ से लगते हैं। आत्मा की महत्ता के आगे क्षण-भंगुर भोगों की कीमत भी भला क्या हो सकती है।
महर्षि वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, दधीचि, कण्व, अंगिरा, जमदग्नि, भारद्वाज आदि ऋषियों, ब्रह्मर्षियों ने जो सिद्धियाँ प्राप्त की थीं, उनका आज के मनुष्य की बुद्धि ठीक प्रकार से अनुमान भी नहीं लगा सकती। उनकी ऋद्धि सिद्धियों के आगे संसार झुकता था, दिशायें काँपती थीं, आकाश और पाताल को बाँध देने वाले होते थे उनके संकल्प। चाहते तो सारे संसार के असंख्य सुख बटोर कर बहुत काल तक उनका सुखोपभोग करते पर उन्होंने सुखों की आकाँक्षा की कब? मनुष्यता के आगे संसार के सारे सुख उन्होंने धूलि समान समझे। वे सदैव मानवता की सेवा के लिए तत्पर रहे। दधीचि को जो सुख अनन्त सिद्धियों के स्वामी होने से नहीं मिला, वह उन्होंने मानवता के लिए आत्म बलिदान करने में पाया। सिद्धियों का विकास केवल इसीलिए किया जाता है, कि मनुष्य इस निर्विष्ट लक्ष्य को पा जाय। मनुष्य का जन्म मानवता की सेवा के लिए हुआ है इस मर्म को समझ जाय।
एक युग था जब मनुष्य की सारी गति-विधियों का केन्द्र “हम किसके काम आ जायें?” “हमारे द्वारा किसी भलाई हो जाय?” यह भावना हुआ करती थी और श्रेष्ठता का इसे ही मापदंड समझा जाता था। धन, वैभव, आदि की लोगों को उतनी भूख न रहती थी, जितना समाज के हित में, विश्व के हित में अपने आपको उत्सर्ग कर देने की इच्छा दृढ़ और बलवती रहा करती थी। आदर्शों के लिए प्राण त्याग करने में लोग गौरव समझा करते थे और जिसे वह संयोग मिल जाता था, वह अपने ऊपर परमात्मा की बहुत बड़ी कृपा अनुभव किया करते थे।
राज-सिंहासन की रक्षा के लिए अपने पुत्र को कटा देने वाली स्वामि-भक्ति नी पन्नादाई का इतिहास कोई भूल सकता है? बूढ़े च्यवन ऋषि की आँख फोड़ने के अपराध में सुकन्या द्वारा उनका पत्नीत्व स्वीकार कर लिया जाना किसी आदर्श से कम है क्या? गान्धारी अन्धे पति के कष्ट को स्वयं न देख सकीं और आजीवन आँखों में पट्टी बाँधे रहीं, ऐसा गौरव प्रदर्शित करने की क्षमता विश्व के इतिहास में केवल हिन्दू-जाति को मिली। इसी के कारण उसका यश आज भी आकाश के उज्ज्वल नक्षत्र की भाँति प्रकाशित है।
मानवता के विकास में उद्दात्त धार्मिक मान्यताओं, अपने गुरुजनों, परिजनों, राष्ट्र और समाज की मर्यादाओं आदि में सच्ची निष्ठा और श्रद्धा प्रदर्शन करने वाली हिन्दू जाति की वह मूल धारणा अभी भी बिल्कुल मिट नहीं गई- मन्द जरूर पड़ गई है। मध्य-कालीन परिस्थितियों के कारण बुद्धि-शून्य श्रद्धा, अन्ध श्रद्धा, संकीर्णता, साम्प्रदायिकता के भाव अब हिन्दुओं में जड़ पकड़ने लगे हैं। विश्व का मार्गदर्शन करने वाली सत्ता की ऐसी जड़ता पर किसे दुःख न होगा। विशेषकर जिन्होंने अपने ऋषियों के आदर्शों पर श्रद्धा और विश्वास पाया हो, उनके किए तो इस तरह का आन्तरिक पतन बड़े ही दुःख का कारण हो सकता है। अपनी सन्तान से कोई ऐसी आशा कर भी नहीं सकता कि वे अपने पुरुषों की विरासत को धूल में ही मिला देंगे, अपने आत्म-गौरव को यों ही नष्ट हो जाने देंगे।
आज युग की चेतना ने फिर से अंगड़ाई ली है। भारतवर्ष की आत्मा फिर से जाग रही है। आज तो सर्वत्र दानवता की विशाल सेना मानवता के एक-एक आदर्श को धूलिसात् करने को तुली हुई है उसे नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए ऋषियों के संकल्प पुनः भारतीय भूमि पर उतर आने के लिए उतावले हो रहे हैं। उन संकल्पों का स्वागत करना हमारा सबका पुनीत कर्त्तव्य है, प्रत्येक भारतीय मानवता की रक्षा के लिए जिया करता है। अपनी इस आदर्श विरासत को अब फिर से पुनर्जागृत करने के लिए यदि हम कटिबद्ध हों, तो इसमें हमारी अपनी शान ही है।
मनुष्य जीवन का सही मूल्याँकन करने वाले ऋषियों ने हमें उपदेश किया था-
“मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्।”
‘ओ मनुष्य! तू सच्चे अर्थों में मानव बन।’ तेरा लक्ष्य आत्म-विकास ही न हो, तुम केवल मनुष्य बनकर सन्तोष न करना, वरन् अपने जीवन द्वारा दिव्यता का,मानवता का विकास करना। अपने आदर्शों के लिए उत्सर्ग होने के लिए सदैव तत्पर रहना ताकि मानवता का प्रवाह रुकने न पावे, सूखने न पावे।
मनुष्य जीवन का रहस्य इस एक मन्त्र में छिपा हुआ है, उसे जागृत करने की आज बड़ी जरूरत है। यह मानवता हमारे पूर्व-पुरुषों की देन, हमारी विरासत है। इसकी रक्षा का उत्तरदायित्व भी हम पर ही है। हम इसके लिए कितना सावधान हैं, आने वाला युग इस बात को बड़ी उत्सुकता के साथ जाँच रहा है।
इतिहास में सम्राट अशोक- ‘अशोक महान्’ के नाम से प्रसिद्ध है। यह ‘महान्’ की पदवी उसे इसलिए नहीं मिली कि उसका साम्राज्य पूर्व में बंगाल के समुद्र, पश्चिम में अफगानिस्तान, उत्तर में कश्मीर और दक्षिण में मैसूर तक फैला हुआ था। उसको ‘महान्’ इसलिए भी नहीं कहा जाता है कि उसने कलिंग जैसे राज्यों को विजय किया और अपने साम्राज्य की सीमायें बढ़ाईं।
अशोक केवल ‘महान्’ ही नहीं, बल्कि प्रियदर्शी भी कहा जाता है। वह इसलिए कि उसने अपने अनुभव के आधार पर मानवता के सत्य स्वरूप के दर्शन किये, युद्ध की विभीषिकाओं को समझा और जन-सेवा के महत्व का मूल्याँकन किया।
प्रारम्भ में अशोक भी उन बुराइयों से मुक्त न थे, जो किसी भी शासक, सम्राट अथवा सत्ता-सम्पन्न व्यक्ति में हो सकती हैं। अहंकार, क्रूरता, लिप्सा आदि अवगुण अशोक में भी थे। यद्यपि अपने पिता बिन्दुसार से अशोक को एक विशाल एवं सम्पन्न साम्राज्य प्राप्त हुआ था, जिसकी रक्षा एवं पालन का ही दायित्व इतना बड़ा था कि अशोक को एक क्षण का भी अवकाश न मिलता। किन्तु लोभ एवं लिप्सा मनुष्य की इतनी बड़ी दुर्बलता है कि उसके वशीभूत होकर उसकी विस्तार भावना की कोई सीमा नहीं रहती और वह भूत, भविष्य का विचार किये बिना अन्धा होकर उसमें लग जाता है और अन्त में एक दिन ऐसा आता है कि मनुष्य की यही लिप्सा उसे विनाश के अनन्त गर्त में लेकर बैठ जाती है और तब उसके वे काम जो उसने यश, ऐश्वर्य के लोभ से किये थे, उसके अपयश का कारण बनते हैं।
किन्तु जो बुद्धिमान् इस दिशा में थोड़ा चलकर ही ठहर जाते है, विचारपूर्वक उसकी हानियों एवं अवाँछनीयता को समझ लेते हैं और अपना मार्ग बदल देते हैं, वे मानो मृत्यु के मार्ग से अमृत-पथ पर आ जाते हैं। सम्राट अशोक भी निस्सन्देह एक ऐसे ही बुद्धिमान व्यक्ति थे।
अशोक का राज्याभिषेक पिता की मृत्यु के चार साल बाद हुआ था। हो सकता है, जैसा अनेक इतिहासकार बतलाते हैं कि इस अवधि में अशोक को सिंहासन के मार्ग में विरोधी अपने अनेक भाइयों से लड़ना और उन्हें मारना पड़ा हो। यद्यपि अनेक इतिहासकार इस अनुमान से असहमति प्रकट करते हुए कहते हैं कि अशोक को राज्य के लिए अपने भाइयों से न तो लड़ना पड़ा होगा और न उनके रक्त से अपने हाथ रँगने पड़े होंगे, क्योंकि अपने पिता के जीवन-काल में ही वह तक्षशिला तक अन्य अनेक दूरवर्ती प्रदेशों का शासक रह चुका था, जिससे यह सिद्ध हो चुका था कि मौर्य साम्राज्य का उत्तराधिकारी अशोक ही था। कुल परम्परा के अनुसार उसे राज्य के लिए अपने भाइयों की हत्या करने का पाप नहीं करना पड़ा होगा। यह तो इतिहासकारों का अपना-अपना अनुमान ही है, इसकी सत्यता की कोई पृष्ठ-भूमि इतिहास में नहीं है। जहाँ बिन्दुसार की मृत्यु तथा अशोक के राज्याभिषेक के बीच अन्तर अवधि को लोग बन्धु-कलह का कारण बतलाते है, वहाँ यह भी कहा जा सकता है कि इस अवधि में वह पिता के शोक के कारण राज्यारोहण के लिए तैयार न हुआ हो और सिंहासनासीन हुए बिना ही राज्य संचालन करता रहा हो।
खैर कुछ भी सही, यदि अशोक अपने भाइयों को मारकर सिंहासन का मार्ग निष्कण्टक करने में लगा भी रहा हो, तो भी यह उसकी वह सामान्य दुर्बलता थी, जो सत्ता लोलुपों में पैदा हो जाती है। अधिकार की प्यास वास्तव में वह पिशाचिनी है, जो अपने पालने वाले को ही खा जाती है।
निदान सिंहासन पर आरुढ़ होते ही अशोक ने अपने विस्तृत साम्राज्य का और विस्तार करने की सोची! उन दिनों महानदी से मद्रास के पुलीकट और बंगाल तक फैला हुआ एक ऐसा स्वाभिमानी प्रदेश था, जो कलिंग कहलाता था और गणतन्त्र होने से किसी सम्राट की सत्ता न मानता था। यद्यपि कलिंग न तो अशोक की सीमाएं छूता था और न किसी प्रकार उसे परेशान करता था, तथापि अशोक से उसकी स्वतन्त्र सत्ता न देखी गई और वह उस पर किसी कारण के बिना ही चढ़ दौड़ा।
इस अभिमान के पीछे न तो कोई आवश्यकता थी, न कोई राजनीति और न कोई विशेष उद्देश्य। इसके पीछे अशोक का एक मात्र अहंकार ही काम कर रहा था। अहंकार मनुष्य की बुद्धि को इस सीमा तक भ्रष्ट कर देता है कि वह अपनी अभिव्यक्ति के लिए बिना किसी कारण के दूसरे को कष्ट देने लगता है। अहंकारी व्यक्ति तब तक किसी की सत्ता नहीं लेता, त्रास नहीं देता, उसे सन्तोष नहीं होता। यदि वह चुपचाप बैठा रहे और अपने अहंकार के वशीभूत होकर अत्याचार के पथ पर पाँव न रक्खे तो यह पिशाच उसकी मानसिक शाँति हरण कर लेता है और जब वह उसकी प्रेरणा से क्रूर कर्मों में प्रवृत्त हो जाता है तो उसकी आत्मा का नाश करके उसे श्रेय पथ में गिरा देता है। यह अहंकार दुमुंहे साँप की तरह अपने आश्रयदाता को हर स्थिति में डसता रहता है, इसीलिए अभ्युदय तथा सुख शान्ति के सच्चे इच्छुकों ने इस सर्प को जड़ मूल से नष्ट कर देने का निर्देश किया है।
निरहंकार हो जाने पर मनुष्य जीवन की सारी अशाँति पूर्ण सम्भावनाएं नष्ट हो जाती हैं। उसके मन, बुद्धि परिष्कृत होकर आत्मा को एक निस्पृह आनन्द से भर देते हैं।
कलिंग का कोई अपराध न था, तब भी अहंकारवश अशोक ने उस पर आक्रमण कर ही दिया। अशोक की दृष्टि में कलिंग का स्वाभिमानपूर्ण स्वतन्त्रता-प्रेम ही अपराध बन गया। कलिंग एक शाँति प्रिय छोटा सा प्रदेश था। अशोक अश्व, गज, रथ आदि से सुसज्जित सेना और योजनों तक विस्तृत साम्राज्य का स्वामी! कलिंग के व्यवस्थापक इस शक्ति असन्तुलन की अच्छी तरह समझते थे, फिर भी उन्होंने अपनी स्वतन्त्रता को रक्षा में बरबाद हो जाने का संकल्प करके अशोक की चुनौती स्वीकार करली।
कलिंग की जनता पराधीनता के अभिशाप को अच्छी तरह समझती थी। पराधीनता के अभिशाप एवं अपमानित जीवन की अपेक्षा कलिंग के स्वाभिमानी वीरों ने वीर-गति की अखण्ड शाँति को अधिक श्रेयस्कर समझा।
युद्ध हुआ, और एक निर्णायक युद्ध हुआ! अशोक की अहंकार-जन्य क्रूरता की विजय हुई। किन्तु कब? जब कलिंग का बच्चा-बच्चा रण-भूमि में काम आ गया। पुरुष नाम का कोई चिन्ह वहाँ बाकी न रहा। इस युद्ध में अकेले कलिंग की राजधानी में ही लगभग ढाई लाख व्यक्ति घायल हुए और बन्दी बनाये गए, जब कि इससे पाँच गुनी संख्या में लोग मारे गये। इस प्रकार कलिंग के लगभग आठ लाख व्यक्ति उस युद्ध में काम आये।
अशोक विजयी हुआ, किन्तु शीघ्र ही उसकी विजय पराजय में बदल गई, जब कलिंग की वीर महिलायें स्वाधीनता की रक्षा में रण-क्षेत्र में उतर आई। अशोक को एक मात्र स्त्रियों की सेना देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। कारण पूछने पर पता चला कि इस युद्ध में कलिंग का सम्पूर्ण पुरुष वर्ग काम आ चुका है और अब नारियाँ अपने देश की स्वाधीनता के लिए संग्राम-भूमि में आई है। अशोक को अपनी विजय पर लज्जा, और किये पर घोर आत्म-ग्लानि हुई! यथार्थ का पता लगाने के लिए उसने संग्राम-भूमि से लेकर नगर की गलियों तक का निरीक्षण किया। सम्पूर्ण नगर लाशों से भरा पड़ा था। स्थान-स्थान पर रक्त के पनाले बह रहे थे। वृद्ध माताएं बाल विधवाएं और असमर्थ पिताओं का विलाप इस अकारण हत्याकाण्ड के लिए अशोक को कोस रहा था।
अहंकार से मूर्छित अशोक का ‘मनुष्य’ जाग उठा। अभी तक जो अशोक अहंकार की आँखों से नर-संहार को देख-देखकर अपनी रक्त-रंजित विजय पर गर्व कर रहा था, वही मनुष्यता की आँखों से उस पाप को देखकर रोने लगा। उसकी आँखों में पश्चात्ताप के इतने आँसू बहे कि हृदय से आत्मा तक वह करुणा, दया तथा सम्वेदना की जीती-जागती प्रतिमा बन गया।
मनुष्य पाप करता है, अपराध करता है और तब तक करता रहता है, जब तक वह ठहर कर अपने किए पर विचार नहीं करता, क्योंकि ज्यों ही वह अपने किए पर विचार करने लगता है, उसका पैर पाप-पथ पर चलता-चलता स्वयं रुक जाता है। उसका विवेक जाग उठता है और उसे अपने कुकृत्य के स्वरूप और उसको परिणाम स्पष्ट दीखने लगते हैं। वह अपने कर्मों का स्वयं न्यायी बन कर निर्णय देने लगता है और अपने को दोषी पाता है, धिक्कारता है और पश्चात्ताप करता हुआ उसके परिमार्जन के लिए तड़प उठता है।
कि सी भी कारण अथवा बहाने से आये पाप-कर्मी के जीवन में एक दिन यह घड़ी अवश्य आती है और तब उस तड़पती हुई स्थिति में अपने को संभाल सकना उसके लिए असम्भव होने लगता है। इस पाप परिमार्जन तथा पश्चात्ताप से बचने के लिए केवल एक ही उपाय, एक ही रास्ता शेष रह जाता है और वह है- अपने किये का समुचित प्रतिकार! और वह है- असत्कर्मों के विपरीत सत्कर्म करना। जिस मानवता को त्रास दिया है, उसे हर प्रकार से सुखी करना।
अशोक ने मार्ग बदला, हृदय बदला और बदल दिया अपना समस्त दृष्टिकोण। अब वह अपने को प्रजा का स्वामी नहीं, सेवक समझने लगा। कलिंग हत्याकाँड से करुण बना, अशोक जब जन-सेवा के क्षेत्र में आया तब उसकी आत्मा में धर्म के द्वार स्वयं खुलने लगे और वह मनुष्यता से देवत्व की ओर बढ़ने लगा। राज्य-विस्तार छोड़ कर अब वह धर्म-प्रसार की ओर बढ़ चला!
अशोक ने अपने साम्राज्य भर में धर्म शिक्षाओं से अंकित शिक्षा-लेख तथा स्तूप गढ़वाये, जिनमें उसने धर्म का मूल समझा कर दया को मनुष्य मात्र के हृदय से प्रेरित करने का प्रयत्न किया। आत्म-संयम, पवित्रता, कृतज्ञता, करुणा तथा सहानुभूति का प्रचार करते हुए उसने मनुष्यों को क्रोध, क्रूरता तथा ईर्ष्या जैसे दुर्गुणों से बचने की शिक्षा दी। प्राणि मात्र के प्रति दया, माता-पिता की सेवा तथा गुरुजनों के प्रति आदर-भावना अशोक के धर्म लेखों के प्रमुख आदेश थे।
यही नहीं कि अशोक ने धर्म को अपनी राजनीति में प्रमुख स्थान दे दिया, बल्कि धर्म की रक्षा के लिए विद्वानों तथा महात्माओं की एक समिति स्थापित कर दी। राज्य कर्मचारियों को आदेश दे दिया कि वह प्रजा में धर्म-पालन की प्रगति के प्रति दृष्टि रखें।
बौद्ध धर्म में दीक्षित होकर अशोक ने अपने पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा की लंका, चीन एवं इण्डोचाइना आदि देशों में धर्म-प्रचार के लिए भेजा। आज संसार में जो बौद्ध-धर्म का प्रचार दीखता है, उसका सारा श्रेय सम्राट अशोक को ही है। प्राणि मात्र में दया उपजाने के लिए अशोक ने आखेट पर प्रतिबन्ध लगा दिया और स्वयं भी माँस तथा मदिरा का सेवन त्याग दिया। सम्राट अशोक के इन सत्प्रयत्नों से न केवल उसकी प्रजा ही धर्म-परायण हो गई, बल्कि उसकी आत्मा का अतुलनीय विकास हो गया।
धर्म-प्रचार करने के साथ-साथ अशोक ने प्रजा के लिए अनेक हितकर कार्य भी किये। उसने राज्य में अनेक सदाचार समितियों की स्थापना की, अनेक दान-शालायें खुलवाई और न्यायालयों का सुधार किया। अशोक ने सारे राज्य में सड़कों का निर्माण कराया, उनके किनारे फलदार तथा छायादार वृक्ष लगवाये। आधे-आधे कोस पर हजारों कुँओं और गौ-शालाओं का निर्माण कराया। सैकड़ों धर्मशालाओं तथा औषधालयों के निर्माण के साथ-साथ उसने पशुओं के लिए भी अनेक चिकित्सालयों का प्रबन्ध किया।
इस प्रकार कलिंग के हत्यारे अशोक ने अपनी जीवन-गति में मोड़ लाकर अपने सारे पापों का परिमार्जन कर डाला।
सम्राट अशोक के उदाहरण ने स्पष्ट कर दिया कि मनुष्य संसार में क्या से क्या बन सकता है। जहाँ वह अपने एक दृष्टिकोण से पशु और पिशाच बन सकता है तो दूसरे में पिशाच से देवता भी बन सकता है। मनुष्य को प्राणि मात्र के प्रति मैत्री का भाव रखना चाहिए और उनकी सुख-सेवा के लिए यथा-सम्भव प्रयत्न करना चाहिए। मनुष्यत्व का लक्षण दया है, धर्म है, क्रूरता अथवा कुकर्म नहीं।
शक्ति मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपेक्षित है। छोटे-छोटे दैनिक कार्यों से लेकर बड़े-बड़े सार्वजनिक निर्माण के कार्य भी सभी व्यक्तिगत या सामूहिक शक्ति के माध्यम से ही पूरे होते हैं। खेत में काम करना है तो शक्ति चाहिए, वजन उठाना हो तो शक्ति चाहिए। विद्यालय में अध्यापन के लिए, कचहरियों में वकालत के लिए, सेना में भरती होकर युद्ध करने के लिए या राजनैतिक सेवाओं के लिए भी शक्ति के बिना काम नहीं चलता। शक्ति का स्वरूप कैसा भी हो, पर मनुष्य जीवन में उसकी आवश्यकता निर्विवाद है।
सत्य और अहिंसा-प्राणि जगत के दो आवश्यक सिद्धान्त हैं, किन्तु उनकी रक्षा भी शक्ति के बूते ही हो सकती है। शक्ति के बिना सिद्धान्त अधूरा है, फिर यह कितना ही अहिंसक, सत्यशील एवं सुकोमल क्यों न हो?
ऋषि आध्यात्मिक, धार्मिक एवं नैतिक जीवन का लोक शिक्षण करते थे। बड़े कोमल सिद्धान्त थे उनके। आचरण और व्यवहार उनका ऐसा सीधा-सादा और सरल था कि सामान्य श्रेणी का व्यक्ति उनकी आन्तरिक पूर्णता का अनुमान भी नहीं कर सकता था। पर उनके जीवन में एक शाश्वत शक्ति कार्य किया करती थी, एक गजब की प्रेरणा प्रस्फुटित होती रहती थी, ऋषि उसके सहारे अभय विचरण करते थे। जो उनके आदर्शों के विपरीत आचरण करता था, उन्हें उनकी शक्ति का सामना करना होता था। ऐसी घटनायें असामान्य समझी जाती थीं और उन्हें देखकर प्रायः सभी लोग उनकी शक्ति को शीश झुका देते थे। ऋषियों की डाली सदाचारी परम्परायें बेरोक-टोक विकसित होती थीं। उनका सामना करने की किसी में शक्ति न होती थी।
दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध निरन्तर उत्कट संघर्ष, उनकी लगन, शौर्य, सहिष्णुता, कर्मठता और अनवरत क्रियाशीलता को देखकर भी उनकी शक्ति का आभास होता है। वेद इस बात के साक्षी हैं। वेदों के वजन का कोई भी ग्रन्थ इस सृष्टि में नहीं। उनमें जो ज्ञान और विज्ञान भरा है वह ऋषियों की प्रचंड शक्ति का द्योतक है। सच कहें तो ऋषि शक्ति के मूर्तिमान स्वरूप ही थे।
ऋषियों के जीवन से यह भली-भाँति स्पष्ट होता है कि शक्ति का आधार साधना है। चाहे वह भौतिक समृद्धि के लिए हो चाहे आध्यात्मिक उन्नति के लिए। शक्ति अपेक्षित हो तो साधना करनी पड़ेगी।
धन जुटाने के लिए क्या कुछ नहीं करते है, हल चलाते हैं, नौकरी करते हैं, रोजगार करते हैं। बची हुई कमाई बैंक में जमा करते हैं, ताकि ब्याज आये। दूसरे व्यवसाय के लिए साधन जुटाना, दौड़-धूप, बेंच-खोंच, लेन-देन आदि, न जाने कितना श्रम करना पड़ता है। यह क्या हुई? धन जुटाने की साधना। विद्यार्थी प्रतिदिन पैदल चलकर विद्यालय जाता है, फीस के पैसे देता है, मास्टरों की डाँट सुनता है। जब घर वाले सैर-सपाटे को गये होते हैं, तब वह किताबों से जूझता है। पाठ याद करता है। यह क्या हुई? विद्या प्राप्त करने की साधना। ठीक है, बिना साधना के कोई भी तो लौकिक कामना पूर्ण नहीं होती।
इन पंक्तियों में हमारा उद्देश्य आध्यात्मिक जीवन से सम्बन्धित साधना की वैज्ञानिक स्थिति का वर्णन करना है। हम यह बताना चाहेंगे कि आत्म-कल्याण के लिए लौकिक सफलताओं से कहीं अधिक बड़ी और कड़ी साधना की जरूरत है। साधना की आग में तपकर ही वह शक्ति आती है, जिसके द्वारा मनुष्य अपना तथा सैकड़ों औरों का कल्याण कर सकने में समर्थ हो पाता है।
साधना का क्षेत्र बहुत व्यापक, बड़ा विशाल है। अधिकाँश उपनिषद् इसी तत्व की व्याख्या में लिखे गये हैं। अनेक प्रकार के योगों का प्रादुर्भाव हुआ है। उनमें अनेक प्रकार की प्रक्रियाएं चलती हैं। उन सबका उद्देश्य केवल शक्तियों को विकसित करना ही होता है।
आत्म-शक्ति के विकास के लिए अनेक प्रकार की साधनाओं का वर्णन मिलता है। बाह्य कलेवर की दृष्टि से उनमें भिन्नता भले ही दिखाई देती हो, पर उनका दृष्टिकोण एक ही है और वह है पंचकोषों के विकास द्वारा आत्म-साक्षात्कार का पथ प्रशस्त करना।
पाँच कोष जीवात्मा के पाँच आवरण हैं, पाँच साधन हैं, जिनके सहारे लोक और परलोक की सुख और सुविधायें अर्जित की जाती हैं। पाँच कोषों का सुव्यवस्थित होना उसी प्रकार आवश्यक है, जिस तरह रेलगाड़ी की सुविधाजनक यात्रा के लिए (1) इंजन (2) भाप (3) भाप बनाने वाले साधन (4) ड्राइवर और (5) रेल की पटरी आवश्यक हैं। इनमें से किसी एक के भी न होने से यात्रा में कठिनाई होगी। रेल की शक्ति का प्रवाह इन पाँचों का सम्मिश्रित रूप है। जीवात्मा की भी ठीक ऐसी ही स्थिति है।
मनुष्य को विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो वह पाँच पदार्थों के सम्मिश्रण से बना हुआ कोई पुतला जैसा जान पड़ेगा। (1) स्थूल शरीर (2) प्राण (3) मन (4) शरीर की वैज्ञानिक स्थिति और (5) आनन्द, यह जीवात्मा के पाँच कोष कहे जाते हैं। यह पाँचों पुर्जे सही काम करते हों तो मनुष्य का जीवन ठीक प्रकार बीतेगा यह आशा करनी चाहिए। इनमें से कोई भी अंग विकृत हुआ कि जीवन-यात्रा कठिन पड़ जायेगी और शरीर धारण का लक्ष्य ही विपरीत पड़ जायेगा।
शरीर दुर्बल हो तो बीमारियों, रोग और शोकों के प्रकोप चढ़ बैठेंगे। मनुष्य का धूर्त अंश बहुत पहले से दुर्बल व्यक्तियों को सताता रहा है। प्रकृति भी निर्बलों को ही सताती है। थोड़ी गर्मी तेज हुई कि वह असह्य हुई। शीत का प्रकोप बढ़ा कि जुकाम, खाँसी आदि दौड़ पड़े। शारीरिक दुर्बलता की स्थिति में इन्द्र के भोग भी सुख नहीं दे सकते। स्वादिष्ट भोजन तो क्या साधारण आहार भी पचाना कठिन हो जाता है। न भोग और साँसारिक सुख, न सामाजिक प्रतिष्ठा। निर्बल शरीर वालों की तो सर्वत्र उपेक्षा और दुर्दशा ही होती है।
साधना का एक उद्देश्य है, शारीरिक शक्ति को जागृत करना। यह भी आध्यात्म का ही एक अंग है। शास्त्रों में बताया है कि “दुर्बल शरीर वालों के लिए तो दैव भी घातक होता है।” अतः आत्म-कल्याण के प्रत्येक इच्छुक की पहली साधना शरीर को स्वस्थ बनाने की करनी चाहिये।
प्राचीन काल में विद्यालयों में शारीरिक-शिक्षा का पर्याप्त स्थान था। आसन, प्राणायाम, व्यायाम, आहार, उपवास आदि उन सभी साधनों का प्रयोग किया जाता था, जिनसे लोगों का स्वास्थ्य सशक्त और जीवन्त बना रहता था। मुग्दर भाँजना, भाले फेंकना, तलवार चलाना, दौड़, कुश्ती, कसरत, यात्रायें आदि चलती रहती थीं। इन सबका मूल उद्देश्य यही होता था कि लोगों के स्वास्थ्य कमजोर न पड़ने पावें। स्वास्थ्य को लौकिक तथा पारलौकिक जीवन का प्रमुख आधार समझा जाता था अतः उसकी ओर पर्याप्त ध्यान रखना आवश्यक भी था।
यह आवश्यकता आज पहले से भी अधिक है। उस समय वातावरण दूषित नहीं था अतः सामान्य नियमों का पालन करते हुए भी लोग स्वस्थ बने रहते थे, पर आज की स्थिति बिलकुल भिन्न है। नियमित जीवन बिताने वाला व्यक्ति भी आज बीमार पड़ सकता है क्योंकि आज का वातावरण बड़ा दूषित, अशान्त, कोलाहलपूर्ण तथा रेडियोधर्मी धूल से विकृत हो रहा है। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य को गम्भीर खतरा उत्पन्न हो रहा है। इस युग में स्वास्थ्य के साधनों पर पर्याप्त ध्यान न रखा जाय तो मनुष्य का इसी एक समस्या से ही छुटकारा पाना कठिन हो जायगा, जैसा कि इन दिनों स्पष्ट देखने में आता है।
आन्तरिक शक्तियों के विकास में असुविधा न पड़े, इसके लिए आपका स्वस्थ रहना अत्यावश्यक है। अतः उन सभी प्रवृत्तियों को चलाना, जिनसे मनुष्य का आरोग्य स्थिर रह सके, आवश्यक है। इन्हें भी साधना का एक उपयोगी अंग मानना चाहिए।
आध्यात्मिक साधना का दूसरा क्षेत्र है- प्राण। यह प्राण शरीर के कण-कण में व्याप्त होकर जड़ देह को गतिमान करता है। निष्प्राण शरीर किसी काम का नहीं होता। उसी प्रकार शरीर के प्राण की विकृति से भी अनेकों रोग-शोक उत्पन्न हो जाते हैं। प्राण का महत्व इससे भी अधिक है। आत्म-साक्षात्कार की गतिविधियाँ प्राण के महत्वपूर्ण नियंत्रण पर आधारित हैं, इसलिए प्राण-तत्व की जानकारी भी जीवन-विकास का परम उपयोगी अंग हो जाती है।
शरीर की दशा में प्राण का नियंत्रण और उससे होने वाली शारीरिक क्रियाओं का विशद् विज्ञान है। उस सब की चर्चा की जाय तो एक बड़ा ग्रन्थ बन सकता है। प्राण की शक्ति अलौकिक है और उसका जागरण प्राणायाम द्वारा किया जाता है, यहाँ इतना ही जान लेना पर्याप्त है।
शक्ति का दूसरा आधार है-प्राण। प्राण- प्राणायाम द्वारा भी मिलता है, अन्न-जल आदि से भी उपलब्ध होता। विचार के माध्यम से भी प्राण धारण करते हैं, दूसरे प्राणवान व्यक्ति अनुदान में भी प्राण दे सकते हैं। दूसरे दें या नहीं, स्वयं की शक्ति का अभिवर्द्धन कर उससे आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करना हो तो प्राण की साधना भी आवश्यक होगी। प्राण जीवन की बड़ी शक्ति है। इसके बिना आत्म-विकास संभव नहीं।
शरीर और प्राण से भी वृहत्तर शक्ति एक और है, वह है- मन की शक्ति । मन समस्त इन्द्रियों से सूक्ष्म और प्रचंड शक्ति वाला माना गया है। मनुष्य जीवन की सम्पूर्ण गतिविधियों का आधार मन है। मन चाहे तो मनुष्य देवता बन जाय, गिरना शुरू कर दे तो वह अत्यन्त निकृष्ट कोटि का व्यक्ति बन जाय।
जप, तप, स्वाध्याय, साधना आदि सम्पूर्ण क्रियाओं का स्वामी मन है। मन की प्रचंड हुँकार से देवासन हिल जाते हैं, राष्ट्र बदल जाते हैं, व्यक्ति का कायाकल्प हो जाता है। जागृत मन मनुष्य को परमात्मा की शक्ति वाला बना देता है।
साधना का मूल्य उद्देश्य भी मानसिक शक्तियों के प्रवाह को रोककर उसे कल्याणकारी मार्ग में लगाना ही है। अतः यह समझ लेना चाहिये कि मनोनिग्रह जीवन निर्माण की प्रमुख शर्त है। हमारे कल्याण के लिए मन की शक्तियों का विकास होना ही चाहिये। उसे स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन आदि के माध्यम से ऊर्ध्वगामी होना ही चाहिये। मन सुधर जाय तो जीवन सुधर जाय। मन बदल जाय तो जीवन की दिशा बदल जाय। शास्त्रों में तो यहाँ तक कहा है कि बन्धन और मोक्ष का कारण भी मन ही है।
इतनी बड़ी शक्ति को उपेक्षित कर आत्म-कल्याण कहाँ संभव है? मन को दुर्गुणों से बचाकर उसे सन्मार्गगामी बना सकें, तो समझना चाहिये कि आज नहीं तो कल अपना मनोबल बढ़ने ही वाला है और उससे आत्म-कल्याण का मार्ग भी खुलने ही वाला है।
मनुष्य का शरीर शक्तियों का अपूर्व भाण्डागार है। शास्त्रकार ने तो यहाँ तक कहा- “यत् ब्रह्माण्डे तत् पिण्डे” जो कुछ इस ब्रह्माण्ड में है वह सब इस शरीर में है। सूर्य की अजस्र उष्णता और अलौकिक प्रकाश, चन्द्रमा की शीतलता, शून्य की विशालता, मेघों की क्षमता, लोक-लोकान्तरों से प्रस्फुटित होने वाले अनन्त रहस्यों का केन्द्र है यह मनुष्य शरीर। संभवतः समस्त सृष्टि में इतनी सर्वांगपूर्ण वस्तु अन्य नहीं, जितना कि यह मनुष्य की देह है। अजब विलक्षणता भरी है परमात्मा ने इसमें। उन सम्पूर्ण शक्तियों का स्वामित्व मनुष्य को मिल जाय तो वह देवता बन जाय, भगवान बन जाय।
इतना उपयोगी उपकरण होते हुये भी लोग अभाव का जीवन, क्षुद्र जीवन, कीट पतंगों जैसा शिश्नोदर परायण जीवन जीते हैं। इससे अधिक और कुछ विशेषता उनमें दिखाई नहीं देती। यह आश्चर्य की बात है। इसका एक मात्र कारण मनुष्य की अज्ञानता है। पिता की गाड़ी हुई रकम घर में ही हो पर बेटे को उसका ज्ञान न हो, तो वह धन उसके किस काम का? मनुष्य की स्थिति भी ऐसी ही है। परमात्मा ने मनुष्य को अनन्त अनुदान दिये हैं। शरीर रूपी तिजोरी में चक्रों, ग्रन्थियों, उपत्यिकाओं एवं नाड़ी-गुच्छकों आदि के रूप में ऐसे महत्वपूर्ण हीरे, जवाहरात भर कर दिये हैं कि वे मनुष्य को मिल जायें तो वह श्रीसम्पन्न हो जाय, मालामाल हो जाय। मनुष्य उन शक्तियों को प्राप्त कर धन्य हो सकता है।
प्रसन्नता मनुष्य के सौभाग्य का चिन्ह है। जो व्यक्ति हर समय प्रसन्नचित्त रहता है, उसके पास लक्ष्मी का निवास रहता है। जिसकी मुस्कान चली जाती है, प्रसन्नता तिरोहित हो जाती है, उससे लक्ष्मी रूठ जाती है। श्री, लक्ष्मी का बहुत लोकप्रिय नाम है। हँसने से, प्रसन्न रहने से मनुष्य के मुख पर एक श्री, एक कान्ति, एक तेज विराजमान रहता है, जो संसार के समस्त श्रेयों को खींच कर ले आता है।
प्रसन्नचेता व्यक्ति को देखकर लोग प्रसन्न होते हैं, उसकी ओर आकर्षित होते हैं, उसकी मैत्री प्राप्त करना चाहते हैं। प्रसन्नता एक आध्यात्मिक वृत्ति है, एक देवी चेतना है। इसका आश्रय ग्रहण करने वाले के सारे शोक संताप भाग जाते हैं। प्रमुदित मन और प्रसन्नचित्त व्यक्ति के पास बैठ कर लोग अपना दुःख-दर्द भूल जाते हैं, सुख और संतोष का अनुभव करते हैं। मुदितात्मा व्यक्ति देवदूत होता है। संसार का कलुष दूर करने वाला होता है।
मनुष्य को जब भी हँसने का अवसर मिले, खूब हँसना चाहिये। जो हँसना नहीं जानता, वह जीना नहीं जानता। हँसी, मुस्कान और प्रसन्नता यौवन की आधार शिला है। जो हँस सकता है, मुस्करा सकता है, प्रसन्न हो सकता है, वह अस्सी वर्ष की अवस्था में भी नौजवान है। इसके विपरीत जो मन-मलीन और उदास रहता है, वह बीस वर्ष की आयु में भी बूढ़ा है। यौवन का गुण है- आकर्षण। हँसने वाले की ओर सारा संसार आकर्षित हो उठता है और रोने-झींकने वाले से सबको विकर्षण रहता है। जो हर समय रोता-झींकता और विषाद करता रहता है, वह जीवन के संजीवनी तत्व को नष्ट कर देता है और जो हर समय प्रसन्न और प्रमुदित रहता है, वह अमृत को ग्रहण करता है।
आप हँसेंगे तो संसार आप का साथ देगा। आप रोयेंगे तो आप अकेले रह जायेंगे। कोई आपके पास बैठना न चाहेगा। हास में जीवन और रुदन में मृत्यु की छाया रहती है। मनुष्य जितनी देर हँसता है, अपने जीवन में उतनी ही अवधि की वृद्धि कर लेता है। हास्य मनुष्य का सच्चा मित्र, सच्चा साथी और सहचर सब कुछ है। जो इसको अपने साथ लेकर चलता है, वह जीवन में अवश्य सफल होता है। हास शत्रुता का शमन करता है। प्रतिकूलताओं को मित्र और क्रोध को शान्त बनाता है। प्रसन्नचित्त व्यक्ति की जिन्दगी एक महोत्सव के समान बन जाती है, जिससे उसे क्षण-क्षण उत्साह, उल्लास और आनन्द की प्राप्ति होती है।
हँसना स्वास्थ्य का मूल-मंत्र है। हँसने से मनुष्य के मानसिक तनाव दूर हो जाते हैं। उसे एक मधुर विश्राम प्राप्त होता है। हँसना एक मानसिक, शारीरिक एवं बौद्धिक व्यायाम है। हँसने से नाड़ी संस्थान पर एक विशेष प्रभाव पढ़ता है, जिससे वे नवीन शक्ति पाकर क्रियाशील हो उठती हैं। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध आदि उत्तेजनाओं से जो शारीरिक अस्तव्यस्तता उत्पन्न हो जाती हैं, मनोविकारों का जो विष अवयवों में संचित हो जाता है वह हँसने से, प्रसन्न होने से दूर हो जाता है। हँसने से फेफड़ों को नवीन शक्ति मिलती है, जिससे शरीर का रक्त शुद्ध और सशक्त बनता है। हास से उत्पन्न होने वाली पुलक से पेट के सारे विशाद नष्ट हो जाते हैं, जिससे मनुष्य की पाचनक्रिया का सुधार होता है, शुद्ध रक्त की वृद्धि होती है। आरोग्य के लिये हास्य एक अनमोल रसायन है।
जीवन में पग-पग पर आने वाली कठिनाइयों, मुसीबतों और समस्याओं, मनुष्य में जो एक क्लान्ति, कमजोरी और अरुचि उत्पन्न हो जाती है, वह हँसने से दूर हो जाती है और शरीर में एक नवीन चेतना, नव-स्फूर्ति का समावेश होता है।
हास परिहास से मनुष्य जीवन की सारी कठिनाइयाँ सरल हो जाती हैं। बड़ी से बड़ी प्रतिकूलता आने पर भी प्रसन्नचेता व्यक्ति न कभी क्लान्त होता है और न परेशान। उसकी बुद्धि हर समय ठीक-ठीक काम करती रहती है, जिसने वह पहाड़ जैसी कठिनाइयों को सुगमता से पार कर जाता है।
संसार के किसी भी महापुरुष का जीवन देख लिया जाय, उनके अन्य गुणों के साथ प्रसन्नता का गुण प्रधान रूप से जुड़ा हुआ मिलेगा। हर स्थिति एवं परिस्थिति में एक रस, प्रसन्न रहना, महापुरुषों की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य रहा है। प्रसन्नता मनुष्य की कार्य-क्षमता को कई गुना बढ़ा देती है। प्रसन्न मन व्यक्ति एक घंटे में जितना काम कर लेता है, खिन्न मन और व्यग्र मस्तिष्क वाला व्यक्ति उतना काम एक दिन में भी नहीं कर पाता। इसके अतिरिक्त प्रसन्नता की स्थिति में जो कार्य कुशलता आती है, वह क्लान्त मनःस्थिति में नहीं। जो कार्य प्रसन्नतापूर्ण उत्साह के साथ प्रारम्भ किया जाता है, वह अवश्य पूर्ण सफल होता है। कार्यारम्भ की प्रसन्नता उसकी सफलता की पूर्व सूचना है। जो काम रोते-झींकते और खिन्न मन से किया जाता है, उसका पूर्ण एवं फलीभूत होना संदिग्ध ही रहता है। ऐसी स्थिति में किये हुये कार्य बहुधा असफल ही रहते हैं।
अप्रसन्न, उदास तथा खिन्न रहने वाले व्यक्ति की सारी शक्तियाँ शिथिल हो जाती है। विषादोत्पादक स्थिति में एक ऐसी तपन होती है, जो मानव जीवन के सारे उपयोगी तत्वों को जला डालती है। खिन्नता मानव जीवन का भीषण अभिशाप है। यह जीती-जागती नरक की भयानक ज्वाला की भाँति मनुष्य को दीन-हीन दुःखी और दरिद्र बना कर रख देती है। जिसके चेहरे पर मुस्कान नहीं, हँसी नहीं, प्रसन्नता नहीं, कोई भी उसके पास बैठना, उसे याद करना, उसके संपर्क में रहना पसन्द नहीं करता। हर आदमी उससे दूर भागता है, जिससे उसका जीवन एकाकीपन के भार से दब कर दुरूह बन जाता है।
अप्रसन्न प्रवृत्ति के व्यक्ति क्या सार्वजनिक और क्या पारिवारिक किसी भी स्थिति में सुख और आनन्द नहीं पा सकते। ऐसे व्यक्तियों के परिवार में एक सूनापन छाया रहता है। न कोई खुल कर हँस पाता है और न बोल पाता है। यहाँ तक कि हँसी खुशी का जन्म सिद्ध अधिकार रहने वाले बच्चे तक सहमे-सहमे एक कोने में दुबके रहते हैं।
अप्रसन्न प्रवृत्ति का व्यक्ति भयानक रूप से ईर्ष्यालु होता है। वह स्वयं तो हँसी-खुशी पूर्वक नहीं ही रह पाता, दूसरों को भी हँसने नहीं देख सकता। मुक्त मन, खुल कर हँसते वाले को वह मन से कोसता और बुरा भला कहता रहता है। ऐसे व्यक्ति को हर आदमी का हास अपना उपहास अनुभव होता है। उसे ऐसे लगता है कि हँसने वाला उस पर व्यंग कर रहा है, हँसी के बहाने उसका अपमान एवं तिरस्कार कर रहा है। जहाँ पर वह हँसी का विरोध नहीं कर सकता, वहाँ तो मन ही मन जलता भुनता रहता है, और जहाँ पर वह हँसी का विरोध कर सकने की स्थिति में होता है, वहाँ के प्रसन्न वातावरण की हत्या किये बिना नहीं मानता।
जीवन में जिसने प्रसन्नता का महत्व नहीं समझा, उसने मानो सौभाग्यपूर्ण अभ्युदय के द्वार ही बंद कर दिये। रुदन, विषाद और मनहूसियत को प्रश्रय देने वाले व्यक्ति का जीवन अपने में एक ऐसा अभिशाप बन जाता है, जिसका फल अनिष्ट और अमंगल के अतिरिक्त कुछ नहीं होता।
मनुष्य का जीवन रोते-बिलखते काटने के लिए नहीं बल्कि हँसते-खेलते और गाते-मुस्कराते हुए महोत्सव की भाँति आनन्द लेने के लिए ही है। जीवन में ऐसी घटनाएँ तथा परिस्थितियाँ भी आती हैं, जब हँसी-खुशी एक अपराध मानी जा सकती है। किन्तु इसका यह मतलब कदापि नहीं कि उस दुखद परिस्थिति को इतनी गहराई तक अपना लिया जाये कि सारा जीवन ही विषाद पूर्ण बन कर रह जाये। संसार के क्रम के अनुसार अनेक परिस्थितियों को मनुष्य के दो आँसुओं की भी आवश्यकता हो सकती है। किन्तु उनको उतने ही आँसू देने चाहिये, जितने का कि अधिकार उनको है। सम्पूर्ण जीवन को आँसुओं के रूप में उड़ेल देना बुद्धिमानी नहीं। आँसू मनुष्य के अपवाद और हास उसके जीवन का सत्य है, यथार्थ है।
निराशा मनुष्य-जीवन की भयंकर शत्रु है। यह जीवन को घुन की तरह चाट कर खोखला कर देती है। निराशा की पकड़ में फँसे हुए मनुष्य का मन-मस्तिष्क निषेधात्मक प्रवृत्तियों का केन्द्र बन जाता है।
जो निराश है, वह निर्जीव है। निराशा व्यक्ति के जीवन से हर्ष-उल्लास, आमोद-प्रमोद, हास-विलास आदि सारी प्रसन्न प्रवृत्तियों का बहिष्कार हो जाता है। निराशा से घिरा हुआ मनुष्य संसार में बिना पंखों के पक्षी की तरह दयनीय एवं दुःखपूर्ण जीवन काटता है।
निराशा का जन्म अधिकतर असफलताओं से हुआ करता है। असफलता जीवन में असम्भाव्य घटना नहीं है। संसार में सभी असफल होते हैं, कोई बिरला ही ऐसा होगा जिसका कभी असफलता का सामना न करना पड़ा हो। संसार के महान् और सफल से सफल व्यक्ति को अनेकों बार असफलताओं का सामना करना पड़ा है। असफलताओं में जो निराश नहीं होता, निरुत्साहित नहीं होता वह अन्त में इतनी बड़ी सफलता पाता है, जो कि स्वर्णाक्षरों में लिखी जा सके। असफलता से निराश होकर बैठे रहना कायरता है। असफलतायें मनुष्य के धैर्य, साहस और पुरुषार्थ की कसौटी हैं। जिस सफलता तक पहुँचते-पहुँचते अनेकों असफलताओं को सहन नहीं करना पड़ता है, उस सफलता का कोई विशेष मूल्य और महत्व नहीं होता। असफलताओं के पीछे पाई हुई सफलता में एक दिव्य सुख, एक अलौकिक रस होता है। असफलताओं से डरना, भागना अथवा निराश नहीं होना चाहिए। उत्थान का ऊर्ध्वगामी भाग सफलता-असफलताओं के सोपानों से ही बना हुआ है। जो सफल होना चाहता है उसे सहर्ष असफलता को वरण करना होगा।
असफलता पाने पर जो निराश हो जाता है, वह कभी भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। निराश व्यक्ति की सारी शक्तियों को काठ मार जाता है। निराशा एक ऐसा विष है, जो शीघ्र ही मन, मस्तिष्क में फैल कर मनुष्य की सारी स्फूर्ति, सारी कार्य-क्षमता को मूर्छित कर देता है। निराश व्यक्ति निष्क्रिय होकर किसी काम के योग्य नहीं रहता।
निराशा एक क्लीवता है और क्लीव व्यक्ति जीवन संग्राम से भयभीत होकर भागा-भागा रहता है। वह प्रतिकूलताओं से टकराने और प्रतिरोधों के बीच गतिशील रहने की हिम्मत नहीं रखता।
एक कोने में मुँह लटकाये बैठे रहने और नैराश्य पर अपने मन को केन्द्रित किये रहने से मनुष्य इतना नकारात्मक हो जाता है कि छोटे से छोटा काम कर सकने में भी शंकाशील रहता है। काम में हाथ डालते ही उसका पहला भाव यही उठता है- ‘मुझसे यह काम हो सकना कठिन है।’ यह नकारात्मक भावना इतनी अशुभ और अनिष्टकारी होती है कि किसी भी कार्य को न तो सफल ही होने देती है और न पूर्ण!
जो निराश है, वह कायर है और जो कायर है, वह संसार का कोई भी काम नहीं कर सकता। असफलता, आलोचना अथवा अवरोध का भय भूत की तरह हर समय उसके सिर पर सवार रहता है।
निराशा से क्षोभ, क्रोध, आवेग और आवेश जैसे अनेकों विकार उत्पन्न हो जाते हैं। बात-बात में चिढ़ना, कुढ़ना और कुण्ठित होना उसका स्वभाव बन जाता है। निराश व्यक्ति के पास कोई न तो बैठना चाहता है और न उससे बात करना चाहता है। नैराश्य से घिरा हुआ व्यक्ति जहाँ बैठता है, वहाँ के सम्पूर्ण वातावरण को ही विषादपूर्ण बना देता है। उसके संपर्क से दूसरे व्यक्तियों में उसके कीटाणु प्रवेश करने लगते हैं। निराशा क्षय रोग की तरह ही एक छूत की बीमारी है। निराश एवं विषादयुक्त व्यक्ति से हर आदमी बचने और भागने की कोशिश करता है।
नास्तिकता निराशा का सबसे भयंकर एवं अनिष्टकारी फल है। नास्तिक व्यक्ति का आत्म-विश्वास उठ जाता है, जीवन की रुचि समाप्त हो जाती है, जिससे अधिकतर ऐसे व्यक्ति आत्म-हत्या के शिकार बनते हैं। संसार में आत्म-हत्याओं की जितनी घटनाएं होती हैं, उनमें से 95 प्रतिशत आत्म-हत्याएं निराशा के कारण होती हैं।
निराश व्यक्ति न केवल अपना, बल्कि अपने आसपास के व्यक्तियों का मानसिक स्तर गिरा देता है। उसे संसार की सारी सूचनाओं और घटनाओं में केवल निराशा ही दीखती है, फलस्वरूप वह उसी प्रकार की सूचना दूसरों को देता है, जिससे अन्य लोगों में भी निराशा की प्रवृत्ति उत्पन्न हो जाती है। आहें भरना, उदास रहना, समाज और संसार को कोसते रहने का स्वभाव बन जाने से निराशा-ग्रस्त व्यक्ति को न किसी से प्रेम हो पाता है और न अपनत्व। उसे संसार में हर व्यक्ति शत्रु और स्वार्थी दिखलाई देता है। राष्ट्र के प्रति तक उसकी भावनाएं इतनी दूषित हो जाती हैं कि वह उनको हानि तक पहुँचाने की सोचने लगता है। संसार में जितने भी राष्ट्र-द्रोही हुए हैं, उनके इस कुत्सित कर्म में निराशा का हाथ अवश्य रहा है। निराश व्यक्ति को पुण्य से और परमार्थ कार्यों से घोर घृणा हो जाती है, जिससे वह सक्रिय पापी भले ही न बने, मानसिक पातकी तो अवश्य बन जाता है। भीषणतम अपराधों के पीछे निराशा का हाथ अवश्य रहता है।
नैराश्य को प्रश्रय देने का अर्थ है- संसार के सारे पाप-तापों के लिए जीवन का द्वार खोल देना। जिस प्रकार सुनसान और अन्धकार से भरे खण्डहर में कीड़े-मकोड़ों, घास-फूँस, चमगादड़ तथा उल्लुओं का निवास हो जाता है, उसी प्रकार निराशा से अंधेरे मन में कुत्सित भाव, ओछे विचार और विपरीत बुद्धि का निवास हो जाता है।
निराश व्यक्ति में भय की प्रवृत्ति इस मात्रा तक बढ़ जाती है कि जीवित अवस्था में श्वाँस-प्रश्वाँस लेते हुए भी उसे हर समय चारों ओर मृत्यु ही मृत्यु दिखलाई देती है। उसे संसार का हर व्यक्ति अपने से बलिष्ठ और तेजस्वी दिखाई देता है। सड़क पर चलते, बाग में घूमते और रेल आदि में सफर करते उसे हर समय दुर्घटना और चोट-चपेट लग जाने का भय बना रहता है। अपने इस भय के कारण वह बड़ा ही दब्बू और कायर हो जाता है। किसी को जवाब देना, खुल कर बात करना उसके वश के बाहर हो जाता है। निराशापूर्ण व्यक्ति का जीवन इतना दयनीय हो जाता है कि उस पर उससे निम्न कोटि और निम्न योग्यता के व्यक्ति भी तरस खाने लगते हैं।
मनुष्य को किसी भी अवस्था अथवा परिस्थिति में निराश नहीं होना चाहिए। सौ असफलताएं मिलने पर भी जो एक सौ एकवें बार प्रयत्न करता है, वह अवश्य सफल होता है। सफलता-असफलता से निरपेक्ष रहकर निरन्तर कार्य-रत रहना ही निराशा से बचने का अमोघ उपाय है। जो व्यक्ति अपने पूरे तन-मन से काम में संलग्न रहता है, उसे निराश होने के लिए समय ही नहीं रहता।
निराशा एक भयानक रोग है। जिससे न केवल मानसिक शक्तियों का ही ह्रास होता है, अपितु शारीरिक स्वास्थ्य भी चौपट हो जाता है। निराश व्यक्ति हर समय चिन्ता और क्षोभ से जलता रहता है, जिससे उसे न तो भूख लगती है और न नींद आती है। इससे उसके शरीर-संस्थान पर भयानक प्रतिक्रिया होती है। पाचन क्रिया और रक्त संचार की प्रणाली बिगड़ जाती है, जिससे शरीर व्याधियों का घर बन कर “शरीरम् व्याधि मन्दिरम्” वाली उक्ति चरितार्थ कर देता है। वास्तव में यह उक्ति अवश्य ही किसी निराश हृदय से अपने सजातीय निराश बन्धुओं पर ही चरितार्थ होने के लिए प्रकट हुई है।
जहाँ तक हो निराशा की भयंकर बीमारी को अपने पास न आने देना ही ठीक है और यदि वह किसी कारण से आक्रमण कर भी दे तो उसे अधिक देर तक टिकने नहीं देना चाहिए। इसका अनुभव होते ही हास-परिहास, व्यंग्य-विनोद और मनोरंजन द्वारा उसे तुरन्त भगा देना चाहिए। निराशा को एक क्षण भी प्रश्रय देने का अर्थ है- ‘जीवन में विषाद के गहरे बीज बो लेना।’
यों जो समाज में साधु-संतों के रूप में हजारों रंगे सियार देखने में आते हैं और हजारों अनपढ़, मूर्ख और गंवार उनकी पूजा करते देखे जाते हैं। यह रंगे सियार इन अन्धविश्वासी मूर्खों की श्रद्धा का लाभ उठा कर खुद गुलछर्रे उड़ाते हैं।
लोग इन रंगे की हजारों अवाँछनीय हरकतें देखते हैं, किन्तु फिर भी उनकी पूजा अर्चा करने में संकोच नहीं करते। इसका कारण यह नहीं कि अंध श्रद्धालुओं को उनसे कोई लाभ है और भला ये धूर्त साधु संन्यासी उनको लाभ पहुँचा भी क्या सकते हैं उल्टे उनका शोषण कर कुछ हानि ही पहुँचाते हैं। इसका कारण वास्तव में यह है कि समाज को सच्चे साधु संन्यासियों ने इतनी सुख शाँति पहुँचाई है कि देश में उनके वेष तथा नाम की पूजा होने लगी है।
समाज और संसार के हित साधन करने और उसकी ताप-तप्त आत्मा को शीतल करने के लिए, उसे कुमार्ग से सुमार्ग पर चलाने के लिए जिन महात्माओं ने अपने सर्वस्व को, सुख-सुविधा को, परिवार परिजनों को त्याग कर तपस्यापूर्ण जीवन अपना कर अपने को तिल-तिल बलिदान कर दिया है, भला वे साधु महात्मा जन-आदर के पात्र क्यों न बनते? अब यह एक अन्य अभिशाप है कि उनके नामों और कामों का लाभ उठाकर, उन जैसा वेष बनाकर और बातें करके अपना वैयक्तिक स्वार्थ साधन करते हैं और अविवेकी जन-समुदाय उनकी परीक्षा किये बिना, उनके कर्तव्यों को देखे बिना उनकी अंध भक्ति करने लगता है।
महाराष्ट्र के संत तुकाराम एक ऐसे ही सर्वस्व-त्यागी महात्मा थे, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन समाज का हित करने में लगा दिया। उनके लिखे हुए अभंग ताप-तप्त जन मानस को अपने चन्दन जैसे शीतल भावों से शाँत करते हैं। विषाद, निराशा और असहायता के समय उनको प्रकाश देकर जीवन में आगे का मार्ग दिखलाते हैं। कौन कह सकता है कि संत तुकाराम जैसे महात्माओं ने अपने गद्य-पद्यात्मक उपदेशों का संग्रह यदि समाज को न दिया होता तो उन परिस्थितियों में समस्त जन-साधारण की क्या दशा हुई होती?
वैसे संसार के किसी भी समाज में कवितायें रचने वालों तथा उपदेश देने वालों की कभी कमी नहीं रही है, किन्तु संतों को छोड़कर अन्य किसी की वाणी ने दुखियों का दुःख दूर नहीं कर पाई। भाषा के उन्हीं शब्दों में अन्य कवि तथा उपदेशक भी अपने विचार व्यक्त किया करते हैं, जिनमें कि एक संत। तब क्या बात है कि संतों की वाणी का प्रभाव जन-मानस पर ही नहीं, बल्कि उसकी आत्मा को स्थायी रूप से प्रभावित करता है और परम्परागत अपना प्रभाव बनाए रहता है। बात यह नहीं कि जन-साधारण किसी अन्य कवि अथवा उपदेशक की वाणी की जान-बूझ कर उपेक्षा करते हैं अथवा हठात् उन पर विश्वास नहीं करना चाहते।
बात वास्तव में यह है कि जहाँ अन्य लेखक अथवा वक्ता अपने निवास पर वास करते हुए ही कल्पना के बल पर रचनायें करके जन-मानस को प्रभावित करना चाहते हैं, साथ ही अपनी कृतियों का धन अथवा मान सम्मान के रूप में कुछ मूल्य भी चाहते हैं। उनकी कृतियों में उनका अपना व्यक्तित्व प्रधान रहता है और उनके सोचने समझने तथा लिखने का सार बहुधा बौद्धिक ही रहता है। उनमें आत्मा की पुकार तथा मन की कसक बहुत कम रहती है।
इसके विपरीत एक सत साँरडडडडड का दुःख दूर करने के लिए अथवा दुःख पीड़ित मानवता को देखकर विरक्त होकर अपना सारा सुख, सारी सुविधा, परिजन तथा प्रियजनों को त्याग कर चल देता है और जन-साधारण के बीच पाप-ताप तथा परितापों से पीड़ित मानवता के क्लेशों को अपनी आत्मा में सच्चाई के साथ अनुभव करता है और उसकी पवित्र आत्मा से जो शब्द अनायास निकल पड़ते हैं, वही अकृत्रिम शब्द उसकी रचनायें अथवा उपदेश बनकर जन-मानस में घर लेते हैं, अपना एक स्थाई प्रभाव डालते हैं। यही कारण है कि लोग अन्य कवियों की कला-कृतियों की अपेक्षा संतों की टूटी-फूटी वाणी में की गई सीधी-सादी रचनाओं को अधिक मात्रा में कंठहार बना लेते हैं। किसी आपत्ति, दुःख अथवा निराशा के समय कलापूर्ण कृतियों के स्थान पर इन्हीं का सहारा लेते हैं।
संसार के दुःखाग्नि में दग्ध जीवों के लिए शाँति शीतल भागीरथी लाने वाले संतों में संत तुकाराम का विशेष स्थान है। छत्रपति शिवाजी के निर्माता समर्थ गुरु रामदास का जो स्थान महाराष्ट्र में हैं, उससे कम आदरपूर्ण स्थान संत तुकाराम का नहीं है। यद्यपि उनके दिवंगत होने के बाद उनके भक्तों तथा अनुयायियों ने उनके साथ अनेक चमत्कारपूर्ण किंवदन्तियाँ जोड़ कर उन्हें अतिमानव सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, किन्तु वास्तविकता यह नहीं है कि संत तुकाराम कोई चमत्कारी अथवा अलौकिक पुरुष थे। हाँ, यदि वे अतिमानव थे तो इस अर्थ में कि उन्होंने अपना सर्वस्व त्याग कर अपने को समाज की सेवा करने में तिल-तिल गला दिया। संसार की सुख-शाँति के लिए ही उन्होंने भगवान की भक्ति की और उसी के लिए जिये तथा मरे। उन्हें अपनी व्यक्तिगत सुख-शाँति, सिद्धि समृद्धि अथवा मोक्ष आदि की कोई इच्छा न थी।
संत तुकाराम का जन्म पूना में इन्द्रायणी नदी के तट पर देहू नामक ग्राम में हुआ। इनके जन्म काल के विषय में मतभेद पाया जाता है। जब भी कतिपय विश्वस्त विद्वान इनका जन्म सम्वत् 1530 शाके अर्थात् 1590 ई॰ बतलाते हैं। यद्यपि इनका जन्म शूद्र कुल में बतलाया जाता है, तथापि इन्होंने अपने तप-त्याग तथा परमार्थ साधन से अपने में ब्राह्मणत्व उत्पन्न कर महाराष्ट्र में अतुल सम्मान प्राप्त किया।
पहले-पहल जब इन्होंने भगवद्भजन कीर्तन तथा पूजा पाठ प्रारम्भ किया, गाँव के रूढ़िवादी तथा संकीर्ण दृष्टिकोण वाले सवर्णों ने इनका घोर विरोध किया। इनको तरह-तरह के त्रास दिये। किन्तु भगवद्भजन का रस अनुभव कर लेने वाले तुकाराम तनिक भी विचलित न हुए। वे रूढ़िवादियों का तिरस्कार तथा दण्ड सहन करते हुए भी भगवान के भजन-कीर्तन में लगे रहे। उन्होंने न तो अपने पर किये जा रहे अत्याचार का प्रतिवाद किया और न किसी विरोधी की निन्दा की। संत तुकाराम अच्छी तरह समझते थे कि रूढ़िवादियों के पास विवेक की कमी होती है। वह परम्परा के पालन में बुद्धि से काम न लेकर अपने अंधविश्वासों से प्रेरित रहा करते हैं। उन्हें पूरा विश्वास था कि आज अज्ञानवश जो लोग उनके सत्कर्म का विरोध करते हुए दण्ड और क्लेश दे रहे हैं, एक दिन उनको सद्बुद्धि प्राप्त होगी ओर ये लोग अपने किये पर पछतायेंगे।
संत तुकाराम सब कुछ शाँतिपूर्वक सहते रहे, यहाँ तक कि जब कुरीतिवादियों का अत्याचार उनको अपने ध्येय पथ से विचलित न कर सका तो उन्होंने जबरदस्ती उन्हें गाँव से बाहर निकाल कर गाँव में प्रवेश वर्जित कर दिया। इस अकारण निर्वासन का भी उन्होंने कोई प्रतिकार नहीं किया। बल्कि गाँव के बाहर एक शिला पर बैठे हुए तेरह दिन तक भगवद्भजन करते रहे।
वर्तमान समय में जिसे ‘स्वाधीनता’ कहा जाता है, वह पशुबल पर निर्भर है। कोई भी राष्ट्र दूसरे राष्ट्र का विश्वास नहीं करता। कौन कब और किस पर आक्रमण कर बैठेगा, इस भय से प्रत्येक स्वाधीन राष्ट्र को सिर से पैर तक अस्त्र-शस्त्र से सुसज्जित रहना पड़ता है। जो सबसे बड़े शक्ति शाली राष्ट्र हैं, उन्हें स्थल सेना, जल सेना, वायु सेना की वृद्धि की प्रतियोगिता में लगा रहना पड़ता है। क्या इसी का नाम स्वाधीनता है? जिस स्वाधीनता की रक्षा के लिये लाखों, करोड़ों व्यक्तियों को अन्नहीन, वस्त्रहीन, गृहहीन रखकर, अस्त्र-शस्त्र, गोला गोली खरीदना पड़ता है, उसे ‘स्वाधीनता’ कहा जाय या ‘पराधीनता’?
-ठाकुर दयानन्द
सन्त तुकाराम का यह घोर तप देखकर विरोधवादियों का आसन हिल गया और उन्होंने सन्त तुकाराम को एक सच्चा महात्मा मानकर अत्याचार करना बन्द कर दिया और गाँव में प्रवेश का प्रतिबन्ध उठा लिया।
भजन के प्रभाव से भगवान की यह अनुकम्पा देखकर उनका ध्यान और भी अधिक परमात्मा की ओर लग गया। इधर ज्यों-ज्यों वे भगवान में तन्मय होते गये त्यों-त्यों हृदय में अहिंसा, सत्य तथा जन-सेवा के भाव बढ़ते चले। जिससे दीन-दुखियों की सक्रिय सेवा करना उनके भगवद् भजन का एक विशेष अंग बन गया। तब उन्होंने अपने परमार्थ चिन्तन को दीन-दुखियों की सेवा करने में क्रियात्मक रूप दे दिया। वे राह चलते बटोहियों के सर का बोझ अपने सर पर ले लेते और उनको उनके गन्तव्य स्थान तक पहुँचा देते। किसानों के खेतों की रखवाली करते, उन्हें खेत जोतने, बोने में मदद करते। किसी के बैलों तथा किसी की गायों के लिए चारा काट लाते और अपने हाथ से बड़े प्रेम से खिलाते। तीर्थ यात्रियों के सूजे हुये पैरों को अपने हाथ से धोते और घण्टों तक उनकी सिकाई करते रहते। वे पैदल दूर दूर की यात्रा करते और जहाँ भी किसी रोगी अपाहिज अथवा अनाथ दीन-दुःखी को देखते, वहीं रम जाते और दिन रात उनकी सेवा-सुश्रूषा करते।
अपने इस प्रकार के सेवा कार्यों से सन्त तुकाराम बड़े ही जन-प्रिय बन गये। अब ग्रामवासी दिनभर का अपना काम करने के बाद उन्हें चारों ओर से घेरकर बैठ जाते तथा उपदेश सुनते और मिलकर कीर्तन-भजन करते।
सन्त तुकाराम के सामूहिक कीर्तन-भजनों का इतना प्रभाव पड़ा कि ग्राम-ग्राम के अपने आपसी झगड़े खत्म हो गये। लोग मिल-जुल कर एक दूसरे की सहायता करने लगे। सभी जाति तथा वर्णों के लोग उनके पास आते और मातृत्व भाव से भरकर मिल-जुल कर कीर्तन करते। उनमें ऐसा प्रेम उत्पन्न हो गया कि पूरे के पूरे गाँव एक परिवार की तरह दीखने लगे। जहाँ पहले लड़ाई-झगड़े होते रहते थे वहाँ पर प्रेम की गंगा बहने लगी।
संत तुकाराम लोगों को भक्ति का उपदेश देते, त्याग और वैराग्य की प्रेरणा करते। किन्तु उनके त्याग का मार्ग निवृत्त नहीं प्रवृत्ति था। वे कभी किसी को घर-बार त्याग कर सन्त होने के लिए नहीं कहते और न कभी इस बात की प्रेरणा करते कि वह जीवन के आवश्यक कर्तव्य को त्यागकर केवल भजन, कीर्तन में ही लगे रहें। उन्होंने लोगों को परिश्रम और पारस्परिकता का महत्व समझाया और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान बनने की प्रेरणा दी।
धीरे-धीरे तुकाराम की कीर्ति पूरे महाराष्ट्र में फैल गई। एक बार छत्रपति शिवाजी उनके दर्शनों के लिये आये और उनका कीर्तन सुनकर सारा राज-काज छोड़कर वैरागी होने को तैयार हो गये। किन्तु सन्त तुकाराम ने उन्हें प्रवृत्ति मार्ग का सच्चा स्वरूप समझाकर अपना कर्तव्य करते रहने की प्रेरणा दी। वे जानते थे कि निवृत्ति एक विशेष प्रकार के संस्कारवान लोगों के लिए ही संभव है। साधारण स्थिति के लोग तो निवृत्ति मार्गी बनकर और भी अधिक भटक जाते हैं।
इस प्रकार तैंतालीस वर्ष की आयु तक महाराष्ट्र में एक नव जीवन का जागरण करके एक दिन स्वयं कीर्तन करते-करते परम धाम चले गये।
“चाहे संसार भर के सारे बड़े-बड़े उपदेशक आ जायें, चाहे स्वयं ईश्वर आकर उपदेश करने लगें, परन्तु जब तक आप स्वयं अपने को उपदेश देने को तत्पर नहीं होंगे, तब तक दूसरों के उपदेशों से रंच मात्र लाभ नहीं होगा। स्वर्ग आपके भीतर ही है और तब भी आप गली-गली उसके विषयों में ढूँढ़ते फिरते हैं। जो वस्तु भीतर मौजूद है, उसे आप बाहर तलाश करते हैं, यह कैसा आश्चर्य है?”
-रामतीर्थ
आज सन्त तुकाराम तो जनता के बीच नहीं हैं, किन्तु महाराष्ट्र में वे जो भक्ति -भावना से भरी हुई कर्तव्यनिष्ठा के उपदेशों तथा अपने लिखे हुये जिन आठ हजार भजनों को छोड़ गये हैं, वे आज भी जन साधारण से लेकर उच्च वर्ग तक का मार्ग प्रदर्शन करते हुये सुख-शान्ति प्रदान कर रहे हैं। निःसन्देह भारत को ऐसे ही जनसेवी सन्त महात्माओं की आवश्यकता है।
“ओ मृत्यु ! जब तक मेरी पूर्ण परितृप्त नहीं होती, जब तक मेरे प्यार की पीड़ा शान्त नहीं होती, ठहर, में अभी मर नहीं सकती।”
“ओ मृत्यु ! जरा ठहर, अभी में नहीं मर सकती, जब कि जीवन का माधुर्य स्त्रोत मेरे भीतर उफना पड़ रहा है, मेरा यौवन भरपूर है और हरी-भरी डाल पर मेरा मन उछल-कूद मचा रहा है”:-
यह भारत-कोकिला- ‘श्रीमती सरोजनी नायडू’ की एक अंग्रेजी कविता का भावानुवाद है, जिससे उनके भरपूर कवि हृदय का पूर्ण परिचय मिलता है। उपर्युक्त पंक्तियों को पढ़ कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इनकी निर्मात्री ‘सरोजनी’ का हृदय कितना कोमल, भावनायें कितनी प्रेमपूर्ण और जीवन के प्रति कामनायें कितनी ममतामयी हैं। ऐसी कोमल भावना वाली सरोजनी के जब सम्पूर्ण जीवन पर दृष्टिपात किया जाता है, तब पता चलता है कि उनके कवि-जीवन की आयु सिपाही जीवन की अपेक्षा बहुत कम है।
श्रीमती सरोजनी नायडू का जीवन अपने दो सीमान्तों को छूता हुआ परस्पर विरोधी दिशाओं में बहता हुआ दीखता है। एक ओर कोमल भावनापूर्ण कवि और दूसरी ओर कठोर अनुशासन का समर्थक सेनानी। एक ओर कुसुम और दूसरी ओर काँटे।
अभी सरोजनी की आयु लगभग नौ वर्ष की ही थी, एक दिन एक प्रसंग पर अंग्रेजी न बोल पाने से बड़ी लज्जित हुईं। स्वाभिमान की धनी उस नौ वर्ष की अबोध बालिका पर इस ग्लानि की बड़ी सृजनात्मक प्रतिक्रिया हुई। उसके बाल हृदय ने शीघ्र ही अंग्रेजी सीखने का संकल्प कर लिया। क्या बालक और क्या वृद्ध, कोई क्यों न हो, यदि किसी कार्य को करने का संकल्प हृदय से कर लेता है, तो उसके बल पर असम्भव को भी सम्भव कर दिखाता है। संकल्प में एक अपनी शक्ति होती है, जो मनुष्य में आत्म-विश्वास के साथ उत्साह का स्फुरण कर उसको रचनात्मक दिशा में प्रेरित कर देती है।
बालिका सरोजनी ने पूरे तन-मन से अंग्रेजी सीखने का प्रयत्न प्रारम्भ कर दिया। परिश्रमपूर्ण प्रयत्न का एक ही परिणाम होता है और वह है- “सफलता!” निदान केवल दो वर्ष के तपोपूर्ण परिश्रम ने सरोजनी के संकल्प की अतिपूर्ति कर दी। वह न केवल अंग्रेजी बोलने और समझने लगी, बल्कि उसमें कविता भी लिखने लगी।
निःसन्देह यह एक विस्मयकारक चमत्कार ही मालूम होता है कि जो नौ वर्ष की बालिका अंग्रेजी का एक शब्द नहीं बोल पाती थी, वह ग्यारह वर्ष की आयु में पहुँचते-पहुँचते अंग्रेजी में कविता करने लगी। किन्तु इस घटना को वे ही चमत्कार मान सकते हैं और वे ही विस्मय कर सकते हैं, जो संकल्पपूर्ण पुरुषार्थ की शक्ति से अनभिज्ञ हैं। एकाग्रता, एक निष्ठा तथा एक ध्येयता में वह अतुलनीय शक्ति है, जिसके बल पर भाषा की उपलब्धि तो क्या आकाश के तारे भूमि पर लाये जा सकते थे। बालिका सरोजनी में इन गुणों की कमी न थी। यह उसकी पैतृक सम्पत्ति थी।
सरोजनी के पिता अघोरनाथ चट्टोपाध्याय, न केवल लगनशील थे, बल्कि एक अध्यवसायी व्यक्ति भी थे। वे एक क्षण कभी बेकार न बैठते थे और न कभी निरर्थक अथवा निरुपयोगी श्रम करते थे। उनकी बेटी सरोजनी ने अपने पिता के इस गुण का अनुकरण कर चरितार्थ कर दिखाया कि वह वास्तव में एक महान् अध्यवसायी पिता की पुरुषार्थिनी पुत्री है।
एक बार फलीभूत पुरुषार्थ हजार सफलताओं को अपने पीछे लिये रहता है। एक बार का जगाया हुआ आत्म-विश्वास एक सच्चे साथी की तरह जीवन-भर साथ देता है।
प्राण-पण से लगकर अपने प्रथम संकल्प में कृतकृत्य होने से सरोजनी का उत्साह सौ-गुना बढ़ गया और बारह वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा पास करली। विद्याध्ययन के साथ ही उन्होंने अपनी कवि-कला को भी निरन्तर परिष्कृत एवं विकसित किया, जिसके फलस्वरूप वे तेरह वर्ष की अवस्था में पहुँचते-पहुँचते ‘लेडी ऑफ द लेक’ नामक एक खण्ड काव्य तथा लगभग दो हजार पंक्तियों के एक धारावाहिक नाटक की रचना कर सकीं।
सरोजनी की विद्या-विदग्धता को देखकर नवाब हैदराबाद ने उनके पिता से उन्हें विद्याध्ययन के लिए विदेश भेजने का अनुरोध किया और उसके लिए लगभग बयालीस हजार रुपये प्रति वर्ष छात्र-वृत्ति देने का भी वचन दिया।
निरन्तर अभ्यास एवं अध्यवसाय की शिला पर चमकाई हुई प्रतिभा की चमक होती ही कुछ इतनी आकर्षक है कि उसकी ओर बड़े से बड़े व्यक्ति का ध्यान आकर्षित होते देर नहीं लगती। भला निजाम-हैदराबाद अपनी भूमि के इस रत्न की प्रतिभा का प्रकाश विदेशों में बिखरवा कर लगे हाथ श्रेय लेने में क्यों चूक जाते? गुणों का सर्वत्र आदर होना सहज स्वाभाविक ही है। आत्म-विश्वास, आत्म-बल एवं अध्यवसाय के कृत्यों पर खिले सरोजनी के प्रतिभा-प्रसून संसार में सुगन्ध बिखेरते ही, फिर बुद्धिमान् नवाब ही अपने योगदान द्वारा उनकी उन्नति एवं विकास के इतिहास में अपना नाम क्यों न लिखा लेते? निजाम की आर्थिक सहायता से सरोजनी की प्रतिभा कृतार्थ ही न हुई, बल्कि छात्र-वृत्ति की धन-राशि भी सार्थक हो गई।
लन्दन में सरोजनी ने किंग्स कॉलेज और कैम्ब्रिज के गिर्टन कॉलेज को अपनी विलक्षण बुद्धि और विलक्षण प्रतिभा से चकाचौंध कर दिया। अपने प्रवास काल में सरोजनी इटली भी गई। जहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य ने उनके कवि-हृदय को इस सीमा तक प्रोत्साहित किया कि उन्होंने वहाँ पर अनेक काव्य संग्रहों की रचना की, जिसके प्रकाशन ने उन्हें शीघ्र ही ख्यातिनामा बना दिया।
विद्याध्ययन के पश्चात् भारत लौटने पर उन्होंने गृहस्थ-जीवन में प्रवेश किया। किन्तु कल्पना-लोक की उस विहंगिनी को घर की एक संकुचित सीमा में रहकर अपनी प्रखर प्रतिभा को निरुपयोगी बनाते अच्छा न लगा और वे पति की अनुमति से देश-सेवा के क्षेत्र में निकल पड़ीं।
श्रीमती सरोजनी नायडू की एक कवित्य-शक्ति ही इतनी पर्याप्त थी कि जिसके बल पर वे सहज ही विश्व-ख्याति प्राप्त कर सकती थीं। किन्तु उनके सत्य-परायण हृदय को यह स्वीकार न हो सका कि जहाँ एक ओर युग की पुकार- देश की प्रत्येक प्रतिभा एवं योग्यता को स्वतन्त्रता-संग्राम की ओर संकेत कर रही हो, वहाँ दूसरी ओर वे कल्पना-लोक में विचरण करती हुई काव्यानन्द में डूबी रहें। कर्तव्य की पुकार भावना से अधिक महत्वपूर्ण होती है।
निदान सन् 1915 के लगभग वे श्री गोपालकृष्ण गोखले के नेतृत्व में कार्य करती रहीं और कांग्रेस में सम्मिलित होकर देश-सेवा का सक्रिय कार्य करने लगीं। किसी भी कर्मठ एवं लगनशील व्यक्ति को किसी भी स्थान पर ऊपर उभरते देर नहीं लगती। शीघ्र ही वे काँग्रेस की एक प्रतिभाशालिनी नेता बन गई और सम्पूर्ण भारत का भ्रमण करती हुई अपने भाषणों, वक्तव्यों एवं प्रवचनों द्वारा युग-याचना को पूरा करने के लिये जन-जागरण का पुण्य प्रयास करने लगीं। अपने कर्तव्य की पूर्ति में निरत काव्यकुँज की उन कोकिला को अब यह भी पता न चलता कि कब दिन निकला, कब संध्या हुई और कब रात ढली! अब श्रीमती सरोजनी नायडू एक भावुक कवियित्री ही नहीं, बल्कि कर्मठ सेनानी भी थीं। उनके कंठ में मधु-मधुपों की गुँजार का स्थान बलिदानपूर्ण ललकार ने ले लिया।
अत्यधिक कार्य भार से उनका स्वास्थ्य गिर गया, जिसके सुधार के लिए वे लन्दन गई। सन् 1919 में जिस समय वे लन्दन में रोग-शय्या पर थीं, भारत में जलियावाला काण्ड हुआ, इसका समाचार पाकर उनका करुण हृदय बुरी तरह आहत हो उठा। अपनी पीड़ा भूल कर भारत के निर्दोष स्त्री बच्चों पर हुए अत्याचार के विरुद्ध विदेश में भी खड़ी हो गई। उन्होंने वहाँ भी एक ऐसा आन्दोलन मचाया कि लन्दन-सरकार तक भयभीत हो उठी। जिसके हृदय में पर-पीड़ा की अनुभूति है, जो अपना अणु-अणु अन्यों की सेवा में समर्पित कर चुका है, उसे अपनी पीड़ा देखने और अपनी परवाह करने का अवकाश ही कब रहता है। अन्यायपूर्ण अत्याचार से उन्हें इतनी पीड़ा हुई कि डाक्टरों ने उन्हें हृदय-रोगी घोषित कर दिया और परामर्श दिया कि कुछ समय तक निरन्तर निष्क्रिय रहकर आराम करें। डॉक्टर की बात सुन कर श्रीमती सरोजनी नायडू को हँसी आ गई। उन्होंने कहा “डॉक्टर! निष्क्रिय आराम का परामर्श देकर आप एक प्रकार से मुझे मृत्यु की राय दे रहे हैं। जिसके सम्मुख एक उत्तरदायित्वपूर्ण व्यापक कर्तव्य क्षेत्र पड़ी हो, भला वह बेकार बैठ कर आराम कैसे कर सकता है? मुझे सुख-शाँति तब तक नहीं मिल सकती, जब तक मैं भारत की करुण कहानी सुना कर सारे संसार का हृदय न हिला दूँ।”
श्रीमती नायडू के उदात्त गुणों, उसकी कर्तव्यनिष्ठा और कार्य तत्परता ने शीघ्र ही उन्हें काँग्रेस के चोटी के नेताओं में स्थान दिला दिया। सन् 1924 में वे काँग्रेस की प्रतिनिधि बना कर दक्षिण अफ्रीका भेजी गई। सन् 1926 में कानपुर कांग्रेस की अध्यक्ष बनाई गई और सन् 1928 में अमेरिका तथा कनाडा में भारतीय दृष्टिकोण की प्रचार प्रतिनिधि बनाई गई।
इस प्रकार आत्मानन्द में निमग्न रहने वाली श्रीमती नायडू ने युग की पुकार पर एक सुख-सुविधापूर्ण जीवन त्याग कर कर्तव्य का कंटकाकीर्ण-पथ अपनाया और यह सिद्ध कर दिखाया कि मनुष्य की प्रतिभा को किसी भी दिशा में क्यों न लगा दिया जाय वह अपना चमत्कार दिखाये बिना नहीं रहती।
सन् 1942 में जिस समय महात्मा गाँधी गिरफ्तार कर लिये गये तथा श्रीमती सरोजनी नायडू ने आन्दोलन की बागडोर संभाली और जनता को एक साहसपूर्ण सफल नेतृत्व प्रदान किया। मनुष्य की शक्ति अनन्त है, उसकी सामर्थ्य अपरिमित है। जो सच्चा कर्मयोगी है और जिसने कर्मों के दर्पण में ही कर्मों का सौंदर्य देख लिया है, उसके सामने कितना ही कठिन, कितना ही महान् और कितना ही अधिक काम क्यों न आ जाये, वह कभी विचलित नहीं होता। आत्म-विश्वास, उत्साह और आत्म-बल ऐसे सिद्ध मन्त्र हैं कि जो भी इनका आश्रय ग्रहण कर लेता है, वह एक कर्मठ कर्मयोगी बने बिना नहीं रहता।
सन् 1942 के बाद सन् 1947 में जब भारत स्वतन्त्र हुआ, श्रीमती सरोजनी नायडू को उत्तर-प्रदेश का शासन भार सौंपा गया, जिसको उन्होंने गवर्नर के रूप में दक्षतापूर्वक कर दिखाया। श्रीमती सरोजनी नायडू स्वतन्त्र भारत की सर्वश्रेष्ठ शासिका मानी जाती हैं। श्रीमती सरोजनी नायडू एक साथ ही कवि, कर्मयोगी, प्रशासिका, गृहणी और कूटनीतिज्ञ थीं। उन्हें अपने नारीत्व पर बड़ा गर्व था। वह कहा करती थीं- “मैं भारत की उस महान् नारी जाति की वंशज हूँ, जिसकी माताओं के समक्ष गीता की पवित्रता, सावित्री के साहस और दमयन्ती के आत्म-विश्वास का आदर्श है।”
उत्सवे व्यसने चैव दुर्भिक्षे राष्ट्रेविप्लवे।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः॥
उत्सव में, व्यसन में, दुर्भिक्ष में, गदर के समय, कचहरी में और श्मशान में जो साथ है, वही बाँधव है।
रहस्य भेदो या याञ्चा च नष्ठुर्य चलचित्तता।
क्रोधो निःसत्यता द्यूतमेतन्मित्रस्य दूषणम्॥
मित्र में यह दोष न होने चाहिए, गुप्त बातों को प्रकट करना, मांगना, कठोरता, चित्त की चपलता, क्रोध, असत्य और जुआ खेलना।
दाम्पत्य जीवन के सुख और सफलता का आधार शिक्षा नहीं है, धन भी नहीं है। यदि किसी की भी ऐसी मान्यता रही हो, तो उन्हें इसे बदल डालना चाहिये। आज के शिक्षितों में जितना पारस्परिक वैमनस्य, मनमुटाव और सम्बन्ध-विच्छेद की घटनायें घट रही हैं, उनसे यह सिद्ध हो चुका है कि सुखी दम्पत्ति का होना शिक्षा पर निर्भर नहीं। धन पर भी नहीं हैं, क्योंकि वह केवल आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन मात्र है। आवश्यकतायें पूरी होती चलें तो पारस्परिक आत्मीयता के बन्धन मजबूत बने रहेंगे, इस बात का कुछ निश्चय नहीं है।
सफल दाम्पत्य जीवन के लिए परिष्कृत भावनायें और परिमार्जित दृष्टिकोण आवश्यक है। स्त्री-पुरुषों के स्वभाव मिलते हों, एक दूसरे के लिए आत्मदान की भावना हो तो अल्प साधन, कम शिक्षा और स्वल्प सौंदर्य वाले दम्पत्ति भी मस्ती का, हँसी-खुशी का जीवन जी सकते हैं। विवाहों में जो कर्मकाण्ड, आदर्श और संस्कार डाले जाते हैं, उनका उद्देश्य भावनात्मक दृष्टि से स्त्री और पुरुष को चारों ओर से खींचकर एक केन्द्र बिन्दु पर लाना ही होता है। जिन घरों में उन आदर्शों पर अमल होता है, वहाँ आमोद-प्रमोद, हास-विलास का जीवन सदैव उभरता हुआ रहता है। उन घरों में स्वर्ग की-सी परिस्थितियों का रसास्वादन किया जाता रहता है।
सन् 1912 की घटना है, एक टाइटैनिक नामक अंगरेजी जहाज समुद्र में डूब रहा था। कर्मचारी लाइफबोटों द्वारा आवश्यक सामान और व्यक्तियों को बचाने का प्रयत्न कर रहे थे। श्रीमती इसाडोर और श्री स्टास नाम का एक जोड़ा उस जहाज में यात्रा कर रहा था। लाइफ बोट में उनमें से केवल एक ही बचाया जा सकता था। श्री स्टास ने अपनी पत्नी को उठाकर लाइफ बोट में पहुँचा दिया ताकि उसकी जीवन रक्षा हो जाय, पर बोट अभी छूटी भी न थी कि श्रीमती इसाडोर उछल कर जहाज में कूद आईं और अपने पति से बोलीं- “स्वामी, हम जीवन भर साथ रहे फिर अन्तिम समय क्यों अलग हों। साथ-साथ जिये हैं, तो मरेंगे भी साथ-साथ।” इन शब्दों में कितनी आत्मीयता, कितना प्रेम, कितनी अभिन्नता थी। जिन दम्पत्तियों में इतना प्रगाढ़ स्नेह होता है, उन्हीं का जीवन सफल माना जाता है।
प्रेम सौंदर्य पर आधारित नहीं है उसके लिए मनुष्य की भावनायें चाहिये। अमेरिका के प्रसिद्ध कमाण्डर एण्ड्रयू जैकसन तथा रेचल की प्रेम-गाथा विश्व विख्यात है। कहते हैं रेचल अनपढ़ और सामान्य रूप वाली थी, जबकी जैक्सन उस समय के इने-गिने रूपवान व्यक्तियों में था। आत्म-निष्ठा के कारण वह सदैव रेचल के प्रेम-पाश में बँधा रहा।
प्रारम्भ में कुछ दिनों तक प्रायः सभी स्त्री-पुरुषों में प्रेम रहता है, किन्तु धीरे-धीरे जब एक दूसरे का स्वभाव प्रकट होने लगता है और एक दूसरे की इच्छा के अनुकूल बर्ताव नहीं होता, तो आकर्षण घटने लगता है और कुछ दिन में तो गृहस्थ जीवन बिलकुल नीरस हो जाता है। अधिक विलासिता तथा पारस्परिक हितों की रक्षा न करने के कारण भी यह स्थिति पैदा हो जाती है, इसलिये कुछ नियम ऐसे हैं जिन्हें स्त्री-पुरुषों को समान रूप से पालन करते रहना चाहिये। उन पर चलकर दाम्पत्य-जीवन को सफल बनाया जा सकता है।
दाम्पत्य जीवन स्त्री-पुरुष की अनन्यता का धार्मिक गठबन्धन है। इसकी सार्थकता तब है जब दोनों में पूर्ण विश्वास रहे। अविश्वास से एक दूसरे के प्रति घृणा उत्पन्न होती है। दुःख, छिपाव, दिखावट तथा बनावटी व्यवहार से कटुता पैदा होती है और दोनों एक दूसरे के प्रति उदासीन हो जाते हैं। जरा-जरा सी बात पर एक दूसरे पर चारित्रिक सन्देह की छींटाकशी प्रारम्भ होती है, जो सारे प्रेम-भाव को समूल नष्ट कर डालती है। अविश्वास और सन्देह का प्रायः कोई आधार नहीं होता। अपनी दुर्बलता के कारण ही यह भ्राँति पैदा होती है। इसलिये यह आवश्यक है कि पति-पत्नी एक दूसरे पर सन्देह न किया करें और यदि कोई ऐसी अवस्था आ जाय, तो उसे सद्भावनापूर्वक बातचीत द्वारा साफ कर लिया करें।
उपेक्षा का भाव भी कभी-कभी सन्देह उत्पन्न कर देता है। स्त्री बीमार हो, उसे कुछ कष्ट हो और पुरुष उसकी परवाह न करे या पुरुष को कोई शारीरिक या मानसिक पीड़ा हो और औरत उसकी उपेक्षा करे तो यह स्थिति दाम्पत्य जीवन को विषाक्त बनाती है। दोनों एक दूसरे के अभावों की पूर्ति और परेशानियों में सहायक बनकर साथ-साथ जीवन संग्राम में उतरते हैं, फिर एक की दूसरे के द्वारा उपेक्षा हो तो सन्देह उत्पन्न होना स्वाभाविक ही है।
मनुष्य में प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होने का स्वभाव होता है। परमात्मा से काम निकालने के लिये भी लोग उनकी प्रशंसा करते हैं। स्तुतियों में यही तो होता है कि देवता के गुणों की प्रशंसा की जाती है। ठीक उसी प्रकार अपनी निन्दा सुनकर लोगों को दुःख होता है। पारिवारिक जीवन में इन दोनों बातों का सदैव ध्यान रखना चाहिये।
स्त्री और पुरुष, दोनों एक दूसरे को पारिवारिक सुखों का देवता समझ कर उनकी प्रशंसा किया करें तो प्रेम और सहयोग की भावना पैदा होती है। कुछ न कुछ गुण हर किसी में होते हैं, उनकी प्रशंसा मुक्त कंठ से करनी चाहिए। इसमें हीनता या संकोच नहीं करना चाहिये। अपने जीवन साथी को उत्साहित करना, ऊँचा उठाना, सुसंस्कृत और सभ्य बनाना अपना लक्ष्य होना चाहिए। संभव है उसकी इन कामों में रुचि न हो, पर प्रशंसा में वह शक्ति होती है जो मनुष्य में कठिन से कठिन कार्य करने के लिए उत्साह भरती है।
इस बात के लिए स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों का उत्तरदायित्व अधिक है। उन्हें चाहिये कि वे स्त्रियों के खाना पकाने, सेवा करने, शिशु पालन में सहयोग देने की प्रशंसा किया करें, इससे उनका हृदय उदारता और आत्मीयता से भरा रहता है। उनके प्रत्येक हाव-भाव से प्रेम स्नेह और आत्मदान की भावना टपकती रहती है। इससे उल्लासपूर्ण वातावरण विनिर्मित होता है।
एक दूसरे के रंग-रूप, माता-पिता या ससुराल वालों को लेकर कभी आलोचना नहीं करनी चाहिये। ऐसी कोई भी बात न कहनी चाहिये, जिससे अपने जीवन साथी की अपेक्षा किसी दूसरे का महत्व अधिक जान पड़ता है। लोग अपने आदमियों के सामने दूसरों की प्रशंसा करने में तो बड़े पटु होते हैं, पर चतुर जन वे होते हैं जो औरों के सामने भी अपने ही व्यक्तियों की प्रशंसा करते हैं।
इन बातों में जहाँ पुरुषों के दायित्व बड़े हैं, वहाँ स्त्रियों को भी चाहिये कि वे अपनी इच्छायें, आवश्यकतायें पतियों के सामने रखते समय घर की आर्थिक स्थिति का भी ध्यान रखा करें। जो इच्छायें पति न पूरी कर सकते हों, उन्हें कभी भूलकर भी जबान पर नहीं लाना चाहिये।
दाम्पत्य जीवन की सफलता के लिए भावनात्मक परिष्कार का उद्देश्य स्त्री-पुरुष को नेक और सुशील बनाना होता है। पुरुष में पुरुषत्व के और स्त्री में स्त्रीत्व के गुण विद्यमान हों तो कोई कारण नहीं कि दाम्पत्य जीवन सुख से न बीते। अन्य सारी योजनायें इन्हीं गुणों के विकास की माध्यम हैं। मुख्य रूप से पुरुष में शक्ति , साहस, सक्रियता और निर्भयता आदि गुणों का समावेश हो और स्त्री में कोमलता, मृदुता, दयालुता, स्नेह सौम्यता और सहानुभूति के गुण होने चाहिये। दोनों के स्वभाव में अपने-अपने गुणों का पर्याप्त स्थान हो तो प्रेम, विश्वास, आत्मीयता आदि का परिमार्जन अपने आप होता है और दाम्पत्य जीवन में उत्तरोत्तर घनिष्ठता बढ़ती जाती है और उनका जीवन में आनन्द की कोई कमी नहीं रहती। ऐसे घरों में श्रेष्ठ और सद्गुणी सन्तानें जन्म लेती हैं और उनके सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन सुखी एवं समुन्नत होता है। इसलिये दाम्पत्य जीवन को पवित्र बनाना, उद्देश्य पूर्ण रखना प्रत्येक गृहस्थ का मूल धर्म कर्तव्य है। इस कर्तव्य की उपेक्षा न की जानी चाहिये।
तिरस्कार प्रगति और प्रसन्नता का विरोधी विचार है, इससे बचना चाहिये। छोटी-मोटी गलतियाँ प्रायः हर किसी से होती रहती हैं, उन्हें लेकर अपने जीवन साथी को झिड़कना, डाँटना, कोसना, अपशब्द कहना, गाली देना मूर्खता का चिन्ह है। इससे दिल टूट जाता है और सहयोग करने की भावना नष्ट हो जाती है।
मानव-जीवन अमोल रत्नों का भण्डार है। अपरिमित विभूतियों का विधान है, किन्तु इसकी विभूतियाँ प्राप्त उसे ही होती हैं, जो उनके लिये प्रयत्न करता है, उनके लिये पसीना बहाता है। आलसी और स्थगनशील व्यक्ति इसकी एक छोटी-सी सिद्धि भी नहीं पा सकता।
जीवन एक संग्राम है, एक आनन्ददायक संग्राम। परन्तु कब, जब मनुष्य इस संग्राम के हर मोर्चे पर एक वीर सैनिक की तरह लड़ने के लिए तैयार रहता है। जो भीरु है, पलायनवादी है, उसके लिये यह एक जलता हुआ नरक कुण्ड ही है। वह हर कदम पर असफलता और निराशा से पराभूत होकर जिन्दगी भर रोता-झींकता रहेगा।
जीवन की बहुमूल्य विभूतियाँ पाने के लिये पुरुषार्थ करना चाहिए, अपने को पूरी तरह से दाँव पर लगा देना चाहिए। जो इसकी निधियाँ प्राप्त करने का संकल्प लेकर कार्य में जुटा रहता है, वह अवश्य सफल और सुखी होता है।
मानव-जीवन की प्राप्ति को संसार की कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं मानना चाहिए। इस प्रकार का विचार रखने वाले उसमें छिपी हुई बहुमूल्य विभूतियों का लाभ नहीं उठा पाते हैं। मानव-जीवन को सहज स्वाभाविक प्रक्रिया मानने वाले ही प्रायः इसे व्यर्थ में बर्बाद कर डालते हैं।
मानव-जीवन एक दुर्लभ उपलब्धि है, एक अलौकिक अवसर है। यह बात ठीक-ठीक उन्हीं लोगों की समझ में आती है, जो उसका सदुपयोग करके इस लाभ को प्रत्यक्ष देख देते हैं। मानव जीवन का क्या महत्व है, इसको केवल दो व्यक्ति ही बता सकते हैं, एक तो वे जिन्होंने इसके चमत्कारों को अपने अनुभवों में स्पष्ट देखा है, दूसरे वे जो इसे व्यर्थ में बर्बाद करके इसके अन्तिम बिन्दु पर पहुँच कर पछता रहे हैं।
इस जीवन का एक-एक क्षण बहुत मूल्यवान् है। मनुष्य को चाहिए वह पुरुषार्थ के बल पर इसकी पूरी कीमत लेने का प्रयत्न करें।
जो साहसी है, सतर्क और सावधान है, मानव जीवन की अनन्त विभूतियाँ केवल वही पा सकता है। जीवन-रण में केवल वही विजय प्राप्त कर सकता है, जो किसी भी परिस्थिति में हिम्मत नहीं हारता। जीवन उसी का सफल होता है, जिसके यापन के पीछे कोई सदुद्देश्य अथवा कोई ऊँचा लक्ष्य रहता है।
जीवन में सदुद्देश्य रहने से ही मनुष्य आज तक इतनी उन्नति करता चला आया है। मनुष्य को निरन्तर उन्नति और विकास की ओर बढ़ने की प्रेरणा देने वाली शक्ति सदुद्देश्यता ही है। जीवन का कोई उद्देश्य न होने से ही पशु सदैव ही अपनी पाशविक अवस्था में ही रहते हैं। न तो उन्होंने आज तक कोई उन्नति की है और न आगे ही कर सकने की सम्भावना है। यही नहीं बिना किसी सदुद्देश्य के जीवन बिताने वाले मनुष्य भी एक प्रकार के पशु ही हैं। वे भी अपने जीवन में कोई उन्नति नहीं कर सकते और एक दिन फिर मनुष्यता को खोकर पशुता में डूब जायेंगे।
मनुष्य को मानव जीवन यों ही बर्बाद करने के लिए नहीं मिला है। उस सर्वशक्तिमान् सृष्टा ने संसार में किसी चीज को यों ही बर्बाद होने के लिए नहीं बनाया है। यहाँ किसी चीज का उद्देश्य बर्बादी होता, तो उसके बनाने का अर्थ ही क्या?
संसार की हर चीज का एक मतलब है, उद्देश्य है और वह यह कि उसका सीमान्त सदुपयोग किया जाये। संसार की सारी जड़-चेतन वस्तुओं में मानव-जीवन सबसे अधिक महत्व एवं मूल्य रखता है। यदि इसका उद्देश्य भी विषय वासना तथा भोगों का उपभोग होता, तो निश्चित रूप से अन्य पशु-पक्षियों तथा कीड़ों-मकोड़ों की भाँति इसे भी विवेक-बुद्धि और ज्ञान की सम्पत्ति नहीं दी जाती। मनुष्य का विवेकवान् होना ही यह सिद्ध करता है कि उसके जीवन का उद्देश्य अन्य प्राणियों से भिन्न है और वह है- अपने निर्माता को पहचानना और उसे पाने का प्रयत्न करना।
समुद्र की तरह जीवन-मंथन करने से भी मनुष्य को सुख-शाँति के असंख्यों रत्न मिलते हैं। जीवन-मंथन का अर्थ है-सामने आये हुए संघर्षों तथा बाधाओं से अनवरत लड़ते रहना। जो प्रतिकूलताओं को देखकर डर जाता है, मैदान छोड़ देता है, वह जीवन की अनन्त उपलब्धियों में से एक कण भी नहीं पा सकता।
संसार में मानव-जीवन सभी को एक तरह से और क्षमता के साथ मिलता है। किन्तु जो सावधानीपूर्वक इसका सदुपयोग करता है, वह अन्यों की अपेक्षा अधिक सफलता पाता है। वे भी मनुष्य हैं, जिनकी जीवन-गाथायें पढ़ी जाती हैं और वे भी मनुष्य हैं जो उनकी गाथायें आश्चर्यपूर्वक पढ़ा करते हैं। दोनों का यह अन्तर केवल इस बात पर निर्भर करता है कि इनमें से एक ने अपने जीवन का साहस, उत्साह और उल्लास के साथ सदुपयोग किया है और दूसरे ने इसको आलस्य-प्रमाद अथवा वितृष्णाओं की तुष्टि में केवल बर्बाद किया है।
मानवता केवल इसमें नहीं है कि हमने जीवन क्षेत्र में साधनों को किस सीमा तक अपनी स्वार्थ परिधि में घेर रखा है। मानवता इसमें है कि हमने अपने प्राप्त साधनों को किस सीमा तक संसार के कल्याण में नियोजित किया है।
असंख्यों भौतिक उपलब्धियाँ प्राप्त कर लेने और अतुल सम्पत्ति का संचय कर लेने पर भी आज तक किसी मनुष्य में कोई विशेषता नहीं देखी गई है। वह ठीक उसी सीमा तथा श्रेणी में ही रहता है, जिसमें अन्य सामान्य व्यक्ति ! सम्पत्ति तथा साधनों की अनावश्यक बहुतायत से किसी भी आत्मा का विकास नहीं होता और न वह मानवता की सच्ची अनुभूति प्राप्त कर पाता है। मानवता की सच्ची अनुभूति का मार्ग है- आत्म-परिष्कार और आत्म-परिष्कार की सम्भावना तभी सम्भव है, जब वह भौतिक-वैभव के बीच भी अपना दृष्टिकोण अस्वार्थी रहकर परोपकार भावना से व्यवहार करें।
जीवन की असंख्यों जटिलताओं के बीच भी मनुष्य को कुछ श्रेयस्कर करना है। उसे मानव-जीवन के चरम-लक्ष्य तक पहुँचाना है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उसे अपने स्वार्थों को भी परमार्थ के रूप में बदलना है। उसे जो कुछ खाना-पीना और करना-धरना है, वह केवल अपने लिए वहीं, बल्कि दूसरों के लिये करना है।
स्वार्थपूर्ण जीवन और परमार्थपूर्ण जीवन में कोई विशेष विपरीतता नहीं है, केवल एक दृष्टिकोण का अन्तर है। जिस प्रकार स्वार्थी व्यक्ति खाता-पीता और व्यवहार करता है, उसी प्रकार एक परमार्थी व्यक्ति भी। उसका जीवन क्रम कोई विलक्षण अथवा विचित्र प्रकार से नहीं चलता। स्वार्थी और परमार्थी के बीच जो अन्तर है, वह केवल इतना है कि एक जो कुछ चाहता या पाता है, वह केवल अपने लिये, अपने तक सीमित रखने को होता है और परमार्थी की सारी इच्छाओं एवं उपलब्धियों का लाभ दूसरों के लिए रहता है।
यह बात ठीक है कि जीवन के भौतिक स्वार्थों में लाभों का भी एक स्थान है, किन्तु किसी एक आवश्यक सीमा तक ही। संसार के भौतिक स्वार्थ एवं लाभ साधन मात्र हैं, साध्य नहीं। जीवन-लक्ष्य निःसन्देह इन संकीर्ण स्वार्थों एवं लाभों से परे है।
मनुष्य को यह न भूलना चाहिए कि वह इस विश्व ब्रह्मांड में किसी विशेष उद्देश्य के लिए जन्मा है और वह विशेष उद्देश्य है, आध्यात्मिक आदर्शों की प्राप्ति करना। आध्यात्मिक आदर्शों की प्राप्ति अथवा पूर्ति के लिये उसे भौतिकता पूर्ण संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठना होगा, तभी उसकी आत्मा का विकास होगा और उद्देश्य की पूर्ति के लिये प्रशस्त मार्ग दिखलाई देगा।
आध्यात्मिक आदर्शों की पूर्ति के लिये यह आवश्यक नहीं कि साधारण जीवन की सारी आवश्यकता तथा उसके कर्तव्यों को छोड़कर अध्यात्म साधना में लग जाये। मनुष्य को करना यह चाहिये कि वह साधारण जीवन क्रम को ही आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ओत-प्रोत करले।
किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि हम जीविका और जीवन निर्वाह का बहाना ले घोर स्वार्थी बन जायें और दूसरे का ध्यान छोड़कर केवल अपने तक ही सीमित रहें।
जीवन-निर्वाह की बात को उसकी अपनी सीमा तक ही रखना चाहिए। जिस दिन मनुष्य जीवन निर्वाह को सामने रखकर स्वार्थों का पोषण करना छोड़ देगा और सोचने लगेगा कि जिस प्रकार मेरे लिये जीवन-निर्वाह आवश्यक है, उसी प्रकार दूसरे के लिये भी, उसी दिन संसार में बहुत से दुःखों का तिरोधान हो जायेगा।
उपयोगी वस्तुओं का एक-एक टुकड़ा जोड़कर रखने से कुछ दिन में उसकी इतनी बड़ी मात्रा इकट्ठी हो जाती है, जिससे कोई बड़ी आय पैदा की जा सकती है या किसी कार-रोजगार के लिये सामग्री बनाई जा सकती है। छोटी-छोटी वस्तुयें बेकार समझ कर फेंक दी जाती हैं, पर यदि उन्हें हिफाजत से रखा जाय तो उन्हीं वस्तुओं से बड़ा लाभ निकल सकता है।
गृहस्थ जीवन में यह प्रयोग बड़े लाभ की वस्तु हैं। इससे बड़े आयोजनों में काम आने योग्य पूँजी इकट्ठी की जा सकती है या ऐसी वस्तुयें इकट्ठी की जा सकती हैं, जिनसे ‘फुरसत की आजीविका’ चलाई जा सकती है। कण-कण का जोड़ एक मन हो जाता है। एक-एक सींक जोड़कर बुहारी बन जाती है। जिन्हें यह विद्या आ जाय, वे धन के लिये परेशान नहीं हो सकते और उनकी हर टूटी-फूटी वस्तु का भी उपयोग हो जाता है।
घर में ऐसी सन्दूक रखिये, जिसके ऊपर दस नये पैसे का सिक्का डालने भर की जगह हो। उसमें मजबूत ताला लगा कर, चाहें तो उसे सील भी करके रख दें और प्रतिदिन अपनी आय से 10 नये पैसे का एक सिक्का निकाल कर उसमें डाल दिया करें। 10 नये पैसे का कोई बड़ा महत्व नहीं है, इससे आपके दैनिक खर्चे में कोई परेशानी नहीं आ सकती।
एक महीने में इस सन्दूक में 30 × 10 = 300 पैसे अर्थात् 3 हो जाते हैं, एक वर्ष में यह रकम 3 × 12 = 36 हो जाती है। मान लीजिये आपकी आयु अभी 15 वर्ष है। तीस वर्ष की आयु में आपके परिवार का भार आप पर आ जाता है, उस समय आपको किसी रोजगार के लिए पूँजी की जरूरत पड़ती है तो आपको औरों के आगे हाथ पसारने की जरूरत न पड़ेगी। 15 वर्ष की जमा बचत 36 × 15 = 540 होगी, जो एक साधारण व्यवसाय के लिये पर्याप्त रकम होगी। यदि इस बचत को हर महीने सरकारी बचत योजना के अनुसार जमा कराया जाता रहता तो यही रकम ड्योढ़ी दूनी हो जाती है।
बेटी की शादी या बच्चे की पढ़ाई, किसी बीमारी या कोई आवश्यक वस्तु खरीदने में भी इस रकम का सदुपयोग हो सकता है। अचानक इतनी रकम की आवश्यकता पड़ जाती और आपके पास बचत न होती तो आप औरों के कर्जदार हो गये होते। पर आपकी कण-कण जोड़ने की आदत ने आपका कितना हित साधा, कितना बड़ा काम निकाला।
धन जोड़ने के सम्बन्ध में ही यह बात लागू नहीं होती आप हर क्षेत्र में इससे लाभ उठा सकते हैं।
साबरमती आश्रम में बापू जी के निर्देशानुसार दातौन का ऊपर का कुचला हुआ भाग तो काट कर फेंक दिया जाता था और नीचे के भाग को धोकर रख लिया जाता था। एक महीने में यह लकड़ियाँ इतनी हो जाती थीं जितने से एक महीने तक आग जलाने का काम किया जाता था। आप चाहें तो एक-एक लकड़ी का टुकड़ा इकट्ठा कर अपनी धर्मपत्नी को चूल्हा जलाने की सुविधा बढ़ा सकते हैं।
आपके घर कोई पत्रिका आती है या कोई अखबार आता है। उसे पढ़कर यों ही न फेंक दिया करें। कृपया उसे किसी अलमारी में सुरक्षित रख दिया करें। एक महीने में जितने कागज इकट्ठे हो जायें उन्हें एक दिन बैठकर छोटे बड़े लिफाफे बनाकर अपने पंसारी को बेच दिया करें। इससे उन अखबारों की कीमत भी वसूल हो जाती है और इतने दिन के संचय का कुछ न कुछ लाभ भी मिल जाता है।
एक दरी खरीदने में दस रुपये लगते हैं। घर की आय इतनी नहीं होती कि सब के लिए दरी की व्यवस्था हो सके। आपकी धोतियाँ पुरानी होकर फट जाती हैं, इन्हें फेंकें नहीं। धोती को धुलाकर रखते चलें। दो-चार धोतियाँ इकट्ठी हो जायें तो उन सबको मिलाकर बच्चों के बिछाने लायक ‘दसौने’ तैयार किये जा सकते हैं और एक दरी की कीमत 10 रुपये बचाई जा सकती है।
घर में शीशे की बोतलें, बल्ब आदि टूटते रहते हैं, बहुत-सा लोहे का सामान रद्दी हो जाता है। उसे फेंककर दूसरों की मुसीबत बढ़ाने की बजाय आप किसी सुरक्षित स्थान पर रखते रहिये और जब उसकी मात्रा 4-5 सेर हो जाय तो किसी रद्दी सामान खरीदने वाले को बेच कर पैसे वसूल कर सकते हैं। गाँवों के किसान रस्सियों के टुकड़े इकट्ठे करते रहते हैं। कुछ दिन में फेरी वाले आकर उसे खरीद ले जाते हैं। यह बेकार रस्सियाँ कागज बनाने के काम आ जाती है बाजार में इनकी कीमत 20 रुपये-से लेकर 30 रुपये- मन तक की होती है। गाँव के चतुर व्यक्ति फुरसत के समय औरों की रस्सियाँ खरीद कर अच्छी कमाई कर लेते हैं।
दरवाजे के सामने लोग नीम के पेड़ रखते हैं। उनकी निबौलियाँ गिरकर यों ही बरबाद हो जाती हैं। इन्हें इकट्ठा कर घूरे में डालकर खाद बनाई जा सकती है या उन निबोलियों को इकट्ठा कर उनसे तेल निकाला जा सकता है। मच्छरों से बचने और त्वचा की बीमारियों में यह तेल बड़ा लाभदायक सिद्ध होता है। इससे दवा के पैसे बचते हैं।
आपके घर में आटे को छानकर रोटियाँ बनती हैं। चोकर निकाल कर बाहर फेंक दिया जाता है। अब इसे सुरक्षित रखा करिये और हर पंद्रहवें दिन उसे पानी में घोलकर छान लिया कीजिये। चोकर में जो आटा होगा वह पानी में घुल जायगा। इसमें गुड़ या चीनी मिलाकर आग पर चढ़ा दीजिये। आपके परिवार के लिये एक समय का स्वादिष्ट आहार निकल आयेगा। महीने में दो दिन भी इस तरह करें तो प्रति माह 5 या 10 रुपये के अन्न की बचत कर सकते हैं।
घर में पत्तेदार सब्जियाँ आती है, तो उनके पत्ते तोड़कर फेंक दिये जाते हैं। मूली, शलजम, फूलगोभी आदि के पत्तों में विटामिन की मात्रा अपेक्षाकृत अधिक होती है। सब्जी के साथ इन पत्तों को भी काटकर पका लिया करें, जिससे कम पैसे की सब्जी से काम चल जाता है और उससे शरीर को भी लाभ मिलता है।
घर के आस-पास कुछ न कुछ बेकार जगह प्रायः सब घरों में होती है। उसे गोड़कर छोटी-छोटी क्यारियाँ बना लेनी चाहिये। बरसात के दिनों में उन स्थानों में फूलों तथा सब्जियों के बीज डाल देने चाहिये। यह कार्य घर के बच्चे बड़ी रुचिपूर्वक करते हैं। पौधों की देख-रेख निकाई, गोड़ाई तथा पानी देने का काम उन्हें ही सौंप देना चाहिये। अच्छी तरह देखभाल की जाय तो इस तरह 4 महीने तक सब्जी प्राप्त की जा सकती है। फूल बारहमासी भी हो सकते हैं। उनसे पूजन का भी काम हो सकता है और घर के आस-पास का वातावरण भी सुन्दर और खुशबूदार होता है।
“तुलसी के अमृतोपम गुण” पुस्तक उठाइये। आप देखेंगे कि उसमें बहुत ही कम खर्च में बन जाने वाली उपयोगी औषधियाँ दी हुई हैं। इन औषधियों को बनाकर छोटी-छोटी शीशियों में रखकर उनमें नाम लिखकर रख लीजिये और कम पैसे में लोगों को दिया कीजिये। इससे लोगों की भलाई भी होगी और आपके समय का आर्थिक उपयोग भी हो जायेगा।
जगह हो तो तुलसी के पौधे अपने घर के आस-पास ही बड़ी मात्रा में उगाये जा सकते हैं। जगह न हो तो उन्हें गमलों में भी लगाया जा सकता है। तुलसी के पौधों की तरह नींबू, पपीते, आम, जामुन आदि के बाग भी लगाये जा सकते हैं।
बबूल की छाल या बादाम के छिलके जलाकर उससे अच्छा दन्त-मंजन बनाकर रखा जा सकता है।
कुछ पढ़े-लिखे लोग स्कूल या नौकरियों से लौटकर घर में साबुन बनाने, रेडियो असेम्बुल करने, घड़ी सुधारने आदि की कला भी सीख कर उसका लाभ उठा सकते हैं।
आपके यह छोटे-छोटे साधन परिवार के प्रत्येक व्यक्तियों की रुचि में सम्मिलित हो जायँ तो उससे आर्थिक जीवन की अनेक कठिनाइयाँ हल हो सकती हैं। ऐसा करना कुछ बुरा नहीं होता। उससे समय की बचत का उपयोग भी हो जाता है तो बेकारी की समस्या का हल भी निकल आता है।
छोटी-छोटी वस्तुओं का संग्रह और उनसे लाभ उठाना एक अच्छी आदत है। इससे मनुष्य की रचनात्मक वृद्धि का विकास होता है और धन की परेशानी दूर होती है। छोटी-छोटी बातें एक बड़ी व्यवस्था का निर्माण करती हैं। छोटी-छोटी आय से एक बड़ी आय बन जाती है और उससे बड़े-बड़े काम तक सध जाते हैं।
कन्फ्यूशियस का जन्म एवं उदय लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व उस युग में हुआ था, जो धार्मिक अन्ध-विश्वासों का युग कहा जा सकता है। जो धार्मिक वक्ता, धर्माचारी तथा धर्म प्रतिपादक नहीं होता था, जनता में उसका सम्मान तो दूर असम्मान ही हुआ करता था। धर्म की बातों के माध्यम से ही लोग जीवन में आगे बढ़कर जन-साधारण का नेतृत्व किया करते थे।
ऐसे समय में आचार्य कन्फ्यूशियस जीवन दर्शन में एक नई क्रान्ति लेकर जन-जीवन में आये। उन्होंने जनता को जन्म, जीवन तथा मरण की पहेलियों में उलझाने के बजाय मानव जीवन के कलापूर्ण यापन का सन्देश दिया। “जन्म से पूर्व मनुष्य कहाँ था और मृत्यु के पश्चात् वह कहाँ जायेगा”- इस प्रकार के पचड़े में पड़ने के बजाय उन्होंने जन-साधारण को यह बतलाया कि उन्हें यह जो मानव जीवन मिला है, उसको सच्चे मानों में किस प्रकार सार्थक तथा सफल बनाया जाये।
महात्मा कन्फ्यूशियस जीवन में आदर्शवादिता के समर्थक अवश्य थे किन्तु ऐसे आदर्श के जो मानव-व्यवहार में पूरी तरह उतारे जा सकें। वे केवल बौद्धिक आदर्शवादी नहीं थे। उनका कहना था कि मनुष्य जो कुछ कहे अथवा सोचे उसे अपने व्यावहारिक जीवन में मूर्तिमान भी करे। निष्क्रियात्मक आदर्श जीवन उन्नति की सबसे बड़ी बाधा है।
अपने जीवन में किन्हीं ऊँचे आदर्शों की स्थापना करके उनके अनुसार अपने जीवन को न चलाना सबसे बड़ी आत्मप्रवंचना है, क्योंकि कोरा आदर्शवादी बकता बहुत है किन्तु करता कुछ नहीं है। अपने वाक्जाल में सर्व साधारण को फाँसकर उन्हें राह तो दिखाता है किन्तु स्वयं उस मार्ग पर नहीं चलता। बुद्धि कौशल से पथ-प्रदर्शक बन जाने से वह अपनी चतुरता की रक्षा में लगा रहने से अपना आत्मिक सुधार नहीं कर पाता। यह एक भयंकर आत्म वंचना है।
चीन के प्रसिद्ध चाँग राजवंश में पाँच सौ पचास ईसा पूर्व कन्फ्यूशियस का जन्म हुआ। जिस समय उनकी आयु तीन वर्ष की थी, उस समय उनके पिता की मृत्यु हो गई, जिससे उन्हें महान कठिनाइयों के बीच अपना जीवन चलाते हुये अध्ययन करना पड़ा। असहनीय कठिनाइयों के बीच जिनका विद्या प्रेम अक्षुण्ण बना रहता है, वे अवश्य ही एक दिन भारती के वरद पुत्र बनकर रहते हैं। इस उपलब्धि का कोई अलौकिक कारण नहीं होता। इसका सीधा-सा एक कारण होता है कि कठिन परिस्थितियों में रहकर पढ़ने वाले विद्यार्थी का ध्यान अध्ययन के अतिरिक्त अन्य किसी ओर नहीं जाता। विद्या प्राप्त करना उसके जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है, जिसे सफलतापूर्वक हल करने में वह जी-जान से लगा रहता है। यही एक लगनपूर्ण तन्मयता उसकी सफलता का कारण बनती है। जो विद्यार्थी अनावश्यक साधन तथा सुविधायें लेकर अध्ययन किया करते हैं, उनका पूरा ध्यान पढ़ाई में नहीं लगता और न वे अध्ययन के अनिवार्य परिश्रम को ही वहन कर पाते हैं। सुविधाओं की बहुतायत होने से वे आलसी तथा छुई-मुई बन जाते हैं, जिससे क्षण-क्षण पर थकान तथा शिथिलता अनुभव करने के अभ्यस्त हो जाते हैं। विद्या प्राप्ति के इच्छुक व्यक्तियों को सम्भव होने पर भी अपने चारों ओर सुख सुविधाओं के साधन संचय नहीं करने चाहिये। विद्याध्ययन एक तपस्या है, एक साधना है। इसको जीवन का एक सामान्य कार्य-क्रम मानकर अपनाने से अधिकतर असफलता ही हाथ आती है।
बालक कन्फ्यूशियस जो कुछ पढ़ते थे, उसे अपने जीवन में उतारते जाते थे। इससे केवल 14 वर्ष की आयु में ही उनको महातत्व की अनुभूति होने लगी। आदर्श जीवन की इस तात्कालिक सफलता महानता तथा सुन्दरता को देखकर उन्हें यथार्थ जीवन के कलापूर्ण यापन में अखण्ड विश्वास हो गया और उन्होंने इस वरदान को जन-जन के बीच वितरित करने का संकल्प कर लिया।
बाईस वर्ष की अवस्था में पहुँचते-पहुँचते उन्होंने आवश्यक अध्ययन पूरा करके जन-कल्याण की शिक्षा में पदार्पण किया। सबसे पहले उन्होंने एक पाठशाला की स्थापना की, जिसमें भरती हुये बच्चों को वे स्वयं पढ़ाते थे। यद्यपि आचार्य कन्फ्यूशियस में इतनी योग्यता थी कि यदि वे चाहते तो सीधे जनता के बीच अपने विचारों का प्रचार कर सकते थे। किन्तु उन्होंने ऐसा न करके जो पाठशाला की स्थापना की, उसके पीछे दो कारण काम कर रहे थे। एक तो यह कि बिना कोई साकार कार्य किये सहसा जनता में उतर जाने से वे केवल वाक्-वीर ही समझे जा सकते थे, कर्मवीर नहीं और ऐसी दशा में जन-साधारण के अविश्वास पात्र बनने की सम्भावना थी। जीवन में सही मार्ग दिखलाने के लिये सर्व-सामान्य का विश्वास प्राप्त करना बहुत आवश्यक है, जो केवल शाब्दिक शक्ति से नहीं, कार्यों की मूर्तिमत्ता से ही प्राप्त किया जा सकता है।
दूसरे कन्फ्यूशियस अच्छी प्रकार जानते थे कि बच्चों की मनोभूमि अन्ध-विश्वासों तथा अन्य अविश्वास, संशय, तर्क, ईर्ष्या, द्वेष आदि के विकारों से कंटकित नहीं होती। उनमें बोये हुये सद्विचारों के बीच सरलता से फलीभूत हुआ करते हैं। जहाँ रूढ़ संस्कारों के कारण प्रौढ़ों को धर्म की आड़ लेकर किसी बात को समझाने में बड़ी ही सावधानी तथा सतर्कता को अपनाना पड़ेगा, वहाँ बच्चों के संस्कार बनाने में इस चातुर्य की आवश्यकता न पड़ेगी और शीघ्र ही उनकी निर्मित की हुई नई पीढ़ी समाज के रंगमंच पर उतर आयेगी। ऐसी दशा में वे एक से बहुत होकर सरलतापूर्वक अपने विचारों का प्रसार तथा प्रचार कर सकते हैं।
आचार्य कन्फ्यूशियस की पाठशाला क्या थी, सच्ची मानवता तथा नागरिकता की प्रशिक्षणशाला थी। उस पाठशाला में निर्धन तथा धनी, उच्च तथा निम्न हर प्रकार के छात्रों के साथ पूर्ण समानता का व्यवहार किया जाता था। यद्यपि पाठशाला के व्यय के लिये धनी विद्यार्थियों से कुछ शुल्क लिया जाता था और निर्धन विद्यार्थी शुल्क-मुक्त होकर पढ़ते थे, तथापि उनके बीच किसी प्रकार के पक्षपात अथवा विषमता का कोई व्यवहार नहीं किया जाता था। विद्यार्थियों का क्रियात्मक चरित्र निर्माण तथा अनुशासन इस पाठशाला की एक प्रमुख विशेषता थी। आचार्य शब्द ज्ञान के स्थान पर विद्यार्थियों के आचरण की ओर अधिक ध्यान देते थे। जब तक एक पाठ के उपदेश प्रत्येक विद्यार्थी के व्यक्तिगत आचरण में पूर्ण रूप से नहीं उतर जाते थे, तब तक उन्हें आगे का दूसरा पाठ नहीं पढ़ाया जाता था।
आचार्य कन्फ्यूशियस की संस्था की इन मौलिक विशेषताओं ने उन्हें तथा उनकी पाठशाला को शीघ्र ही लोकप्रिय बना दिया और वे बालकों के जीवन-निर्माण के सफल शिल्पी के रूप में प्रसिद्ध हो गये।
जीवन-निर्माण की इस प्रारम्भिक पाठशाला की स्थापना करके और उसकी व्यवस्था को दृढ़ बनाकर आचार्य कन्फ्यूशियस लू राज्य की प्रसिद्ध राजधानी चले गये। पाठशाला छोड़कर लू राज्य की राजधानी जाने का विशेष कारण यह था कि वहाँ लाओ-से नाम का दार्शनिक एक नवीन धर्म की स्थापना कर रहा था। एक ऐसे धर्म की स्थापना कि जिसमें एक स्वप्निल आदर्शवाद तथा रहस्यवाद के अतिरिक्त और कुछ न था। वह जन-साधारण को धर्म के नाम पर यथार्थ जीवन से दूर ले जाकर एक स्वप्न-लोक में पटक देना चाहता था, जिससे वह एक दार्शनिक रहस्य बनकर सदैव पुजता रहे।
आचार्य कन्फ्यूशियस ने उससे मिल कर विचारों का आदान-प्रदान किया और व्यावहारिक यथार्थता के साथ सद्गुणों के विकास तथा आत्मोन्नति के सरल सिद्धान्तों के पालन तथा प्रतिपादन की आवश्यकता पर बल दिया और इसी को सच्चा धर्म कहकर उन्होंने जनता के लिये आवश्यक बताया। कथनी तथा करनी में साम्य रखने वाले कन्फ्यूशियस का प्रभाव लाओ-से पर गहरे रूप से पड़ा और वह उनका सहयोगी बन गया। दो प्रभावशाली व्यक्तियों के एक मत होकर कार्य करने का जो सत्परिणाम होता है, वह लू राज्य की राजधानी को प्राप्त हुआ और वहाँ अन्ध-विश्वासों के खंडहर टूटकर मानवीय मान्यताओं के नये महल बनने लगे।
इसी बीच इस नव निर्माण तथा कुछ अन्य कारणों से उक्त राजधानी में राजनीतिक हलचल शुरू हो गई। कन्फ्यूशियस अपने कुछ अनुयायियों के साथ वहाँ से यह सोचकर चल दिए कि जन-निर्माण का कार्य राजनीति की हलचल से दूर रहकर ही किया जा सकता है।
कन्फ्यूशियस के उपदेशों में सच्ची नागरिकता एवं आचरणपूर्ण अनुशासन के दर्शन पाकर तात्कालिक चीन सरकार ने उनकी कार्यकुशलता का लाभ उठाने तथा जनता का भला करने के लिए अनुरोधपूर्वक उन्हें राज्य के चुँगट नामक नगर का गवर्नर बना दिया। एक प्रकार से जहाँ यह कन्फ्यूशियस का राज सम्मान था, वहाँ उनकी योग्यता तथा कार्यकुशलता की परीक्षा भी थी। किन्तु जो निस्पृह है, निःस्वार्थ एवं आचरणवान है, जिसने अपने परिश्रमपूर्ण प्रयत्न से योग्यताओं की सिद्धी की है और सच्चाई के साथ काम करने वाला है, उसके हाथ में हल से लेकर राजदण्ड तक क्यों न दे दिया जावे, वह उसमें उत्तीर्ण ही होकर रहेगा। असफलता का भय तो स्वार्थी, आलसी तथा अयोग्यों के लिये निर्मित किया गया है।
शीघ्र ही उनकी योग्यता ने उन्हें शासन के सर्वोच्च पद पर पहुँचा दिया और तब उन्होंने एक ऐसी अडिग शासन व्यवस्था की स्थापना की कि जनता ने नित्य परिवर्तनशील शासन के त्रास से आश्वासन की श्वाँस ली। इस प्रकार एक सन्त शासक के अनुशासन में जनता से बेईमानी तथा दुराचरण दूर भागने लगे। लोगों में शासन के प्रति विश्वास के साथ-साथ राजभक्ति का भी उदय होने लगा।
इस प्रकार आचार्य कन्फ्यूशियस ने न केवल एक अच्छे शासन की नींव डाली, अपितु जनता के हित के लिए अनेकों सराहनीय कार्य किए। उन्होंने कृषि के व्यापार तथा उद्योगों में विकास एवं सुधार कर देश की भुखमरी को भगाया। युवा तथा वृद्ध व्यक्तियों के लिए शक्ति , सामर्थ्य, स्वास्थ्य, कार्य तथा उपयोगिता के मापदण्ड पर तोलकर अलग-अलग भोजन की व्यवस्था की। वस्तुओं का मूल्य निर्धारित करके जन-साधारण को मुनाफाखोरी के अभिशाप से मुक्त किया।
कर के रूप में प्राप्त धनराशि को जनहित के कार्यों में लगाकर सड़कों, पुलों, पाठशालाओं एवं पुस्तकालयों के निर्माण तथा जीर्णोद्धार कराया, जनता में समता तथा सुख संतोष की स्थापना के लिए उन्होंने धनवानों को इतना शक्तिशाली होने से रोका कि आगे चलकर वे शासन पर हावी होकर गरीब जनता का शोषण करने में समर्थ एवं निर्भय हो जावें। कन्फ्यूशियस की शासन सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण यह था कि उनकी उस व्यवस्था से क्या धनी, क्या निर्धन, क्या ऊँच तथा क्या नीच सभी प्रकार के व्यक्ति पूर्ण सन्तुष्ट थे।
इस प्रकार एक शान्तिमय सफल शासन व्यवस्था स्थापित करके तथा अन्य शासकों के सामने अनुकरणीय उदाहरण रखकर कन्फ्यूशियस पुनः देशाटन पर चल दिये। उनकी शासन कुशलता की कीर्ति सुनकर अनेक राज्यों के राजाओं ने उन्हें अपने राज्य का शासन भार संभालने के लिए आमंत्रित किया, किन्तु जन-सेवा के कार्य को छोड़कर उन्होंने दुबारा शासक बनना स्वीकार नहीं किया। अनेक राजाओं ने उनके सम्मान में उन्हें वृत्तियाँ देनी चाहीं, किन्तु उनको भी अस्वीकार करके वह जन-सेवी महात्मा कठिन से कठिन परिस्थितियों में जन-कल्याण के लिए देश-देश, गाँव-गाँव तथा गली-गली मानवता के सन्देश सुनाता घूमा।
एक बार भूख से व्याकुल उनके अनेक अनुयायियों ने प्रार्थना की कि इस प्रकार कष्ट उठाने से तो अच्छा है कि किसी राज्य की वृत्ति क्यों न स्वीकार करली जावे। इस पर आचार्य कन्फ्यूशियस ने उत्तर दिया कि श्रेष्ठ पुरुष सदैव ही अपने हाथ से उपार्जित धन ही काम में लाते हैं। कठिन कठिनाइयाँ श्रेष्ठ पुरुषों की कंठहार हैं, जिनके कारण ही वे पहचाने जाते हैं। जो कठिनाई को वरण नहीं कर सकता, आपत्तियों को सहन नहीं कर सकता और विषम परिस्थितियों में भी प्रसन्न नहीं रह सकता वह कभी श्रेष्ठ पुरुष नहीं बन सकता और न कोई श्रेयस्कर कार्य ही कर सकता है।
इस प्रकार तिहत्तर वर्ष की आयु तक जन-सेवा का कार्य करते, मानवता तथा नागरिकता का पाठ पढ़ाते और अन्ध-विश्वासों के युग में सत्य का प्रकाश देते हुए महात्मा कन्फ्यूशियस 480 ई0र्पू0 पृथ्वी तल पर अपनी अक्षय कीर्ति छोड़कर स्वर्ग सिधार गये।
दूसरों का डाला अंकुश गिराने वाला होता है और अपना बनाया उठाने वाला।
-गाँधीजी
प्रियजनों से भी मोहवश अत्यधिक प्रेम करने से यश चला जाता है और दुनिया में बदनामी होती है।
-रामायण
जो अपना अदब करते हैं, उनका सब अदब करेंगे ही।
-बौकन्सफील्ड
जब तुम किसी दुर्बल मनुष्य को सताने के लिए उद्यत होओ, तो सोचो कि अपने से बलवान् मनुष्य के आगे जब तुम भय से काँपोगे तब तुम्हें कैसा लगेगा?
-तिरुवल्लुवर
“मेरे कहने पर आप पूर्ण विश्वास रखें” ऐसा कहने वाला मनुष्य मानव जाति का कट्टर शत्रु है।
-विवेकानन्द
हर आदमी अपने मत को सच्चा और बच्चे को अच्छा समझता है, लेकिन इसलिये दूसरे के मत या बच्चे को बुरा कहना उचित नहीं है!
-सादी
मोहम्मद साहब की तलवार की मूँठ पर ये वाक्य खुदे हुए थे- जो तेरे साथ अन्याय करे उसे क्षमा कर दे। जो तुझे अपने से काट कर अलग कर दे, उससे मेल कर। जो तेरे साथ बुराई करे, उसके साथ तू भलाई कर और सदा सच्ची बात कह-चाहे वह तेरे ही खिलाफ क्यों न जाती हो!
यदि ‘मोमिन’ होना चाहता है, तो अपने पड़ोसियों का भला कर और यदि ‘मुस्लिम’ होना चाहता है, तो जो कुछ अपने लिए अच्छा समझता है, वही मनुष्यमात्र के लिए अच्छा समझ और बहुत मत हँस क्योंकि निस्सन्देह अधिक हँसने से दिल सख्त हो जाता है।
-अज्ञात
शरीर के लिये किसी औषधि की जरूरत ही न हो, अगर खाया हुआ खाना हजम हो जाने के बाद नया खाना खाया जाय।
-तिरुवल्लुवर
अगर तुझे एक क्षण का भी अवकाश मिले तो तू उसे शुभ कार्य में लगा क्योंकि कालचक्र अत्यन्त क्रूर और उपद्रवी है।
-जयास बिन दलहर्स
असफलता सिर्फ यह साबित करती है कि सफल होने का हमारा इरादा काफी मजबूत नहीं था।
-अज्ञात
बिना आचार के कोरा बौद्धिक ज्ञान वैसा ही है, जैसा कि खुशबूदार मसाला लगाया हुआ मुर्दा।
-गाँधीजी
एक क्षण भी बगैर काम के रहना ईश्वर की चोरी समझो। मैं दूसरा कोई रास्ता भीतरी या बाहरी आनन्द का नहीं जानता हूँ।
-गाँधीजी
ईश्वर के रहस्य को तू तभी समझ सकेगा जब कि अपने दिल को साफ बना लेगा।
-जामी
अगर मुझे यह विश्वास हो जाता कि मैं हिमालय की किसी गुफा में ईश्वर को पा सकता हूँ, तो मैं तुरन्त वहाँ चल देता, पर मैं जानता हूँ कि मैं इस मनुष्य जाति को छोड़कर उसे और कहीं नहीं पा सकता!
-गाँधीजी
बादशाह को हजरत मूसा ने उपदेश किया कि भलाई वैसी ही गुप्त रीति से कर, जैसे मालिक ने तेरे साथ की है। उदारता वही है, जिसमें निहोरे का मेल न हो, तभी उसका फल मिलता है।
-अज्ञात
यदि वयस्क लोग उन उपदेशों पर स्वयं अमल करें जो वे बच्चों को देते हैं, तो दुनिया अगले सोमवार को ही स्वर्ग तुल्य हो जाय।
-आर ॰ किंग
दुनिया में इज्जत के साथ जीने का सबसे छोटा और सबसे शक्ति शाली उपाय है कि हम जो कुछ बाहर से दिखाना चाहते हैं, वैसे ही वास्तव में हों भी।
-सुकरात
काम की अधिकता नहीं, अनियमितता आदमी को मार डालती है।
-गाँधीजी
कोई कितना ही बड़ा हो, अन्धों की तरह उसके पीछे न चलो। ‘अमुक आदमी कहे सो वेदवाक्य’ ऐसा मानने वाले को कोई समझदार कहेगा क्या?
-विवेकानन्द
जो अन्याय करता है, वह सहने वाले की अपेक्षा हमेशा अधिक दुर्दशा में पड़ता है।
-प्लेटो
किसी कठिनाई से बाहर निकलने के लिए पहला कदम यह है कि हम इस बात की कुछ जानकारी प्राप्त करें कि हम उसमें कैसे पड़ गये।
-एनन
इन विशिष्ट घड़ियों में हमारा विशिष्ट कर्तव्य
युग परिवर्तन की संधि बेलाएं लम्बे समय के बाद कभी-कभी ही आती है। सामान्य काल में सामान्य परिस्थितियाँ चलती रहती हैं और लोगों का जीवन ढर्रा भी सामान्य रीति से चलता रहता है। पर जब असामान्य परिवर्तन की विशेष संधि-वेला आती है, तब उस समय जन साधारण के, विशेषतया प्रबुद्ध व्यक्तियों के कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व भी कुछ असामान्य हो जाते हैं और उन्हें निबाहने के लिये उस समय की जागृत आत्माओं को अपनी गतिविधियाँ भी असामान्य ही बनानी पड़ती हैं।
बीमारी, दुर्घटना, अग्निकाण्ड, मृत्यु, फौजदारी जैसी कोई विशेष आकस्मिक घटना घर में घटित हो जाय तो परिवार के सदस्यों को अपने सामान्य क्रम में परिवर्तन करना पड़ता है और इस प्रकार व्यवस्था बनानी पड़ती है कि उस आकस्मिक परिस्थिति का हल निकल सके। इसी प्रकार युगों का जब परिवर्तन काल आता है, तब उसमें विशेष परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाती हैं और उनके समाधान के लिये उत्तरदायी लोगों को आगे बढ़कर, अपने सामान्य कार्यक्रमों को छोड़कर उन विशेष कर्तव्यों का पालन करने के लिए तत्पर होना पड़ता है।
जिन लोगों की अन्तरात्मा अविकसित है, उनके लिये अपने शारीरिक, आर्थिक एवं पारिवारिक स्वार्थ इतने प्रबल दिखाई पड़ते हैं कि उनकी पूर्ति भी वे दिन-रात गलते-घुलते रहने पर भी कर नहीं पाते। देश, धर्म, समाज, संस्कृति की चर्चा तो उन्हें मनोविनोद के लिये अच्छी लगती है, पर जब उनके सम्बन्ध में कुछ कर्तव्य पालन करने, कष्ट सहने या त्याग करने का अवसर आता है तब बगलें झाँकने लगते हैं। वस्तुतः उनका अविकसित अन्तःकरण संकीर्ण स्वार्थों के अतिरिक्त और कुछ सोच समझ नहीं पाता। उनके लिए उतना ही दायरा सब कुछ है। मेंढक की सारी दुनिया कुएं में भरे हुये पानी जितनी ही है, पर हंस कुछ अधिक देखते, समझते और सोचते हैं उनके सामने मानसरोवर से लेकर समुद्र तक की विशाल जल राशि का दृश्य प्रस्तुत रहता है और वे उसी दृष्टिकोण से अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करते हैं, जबकि कुएं का मेंढक अपने उस छोटे से दायरे तक ही सीमित रहता है।
जागृत आत्माओं का कर्तव्य-
जागृत आत्माओं का, प्रबुद्ध व्यक्तियों का, धर्मात्माओं एवं महापुरुषों का एक ही चिन्ह है कि वे संकीर्ण क्षेत्र में सीमित नहीं रहते। शरीर, घर और धन इतना ही सब कुछ है, ऐसा वे नहीं मानते, और उनके अतिरिक्त और कुछ कर्तव्य उनको नहीं है, ऐसा वे नहीं सोचते। अपने समय की, देश, धर्म, संस्कृति एवं समाज की जिम्मेदारियाँ वे समझते हैं और उनकी सामयिक आवश्यकताएं पूरी करने के लिए वे कुछ करते भी हैं। बकवास से नहीं, कार्यों से ही किसी की महानता परखी जा सकती है।
परीक्षा के समय कभी-कभी आते हैं। वे जब आते हैं, तब यह परखते हैं कि इसने अब तक जो किया है, उसके पीछे उसकी लगन, निष्ठा एवं वास्तविकता कितनी है। वार्षिक परीक्षा छात्रों के परिश्रमी, अध्यवसायी, लगनशील होने न होने की परख कर देती है। बातूनी लड़के अपनी प्रशंसा में लम्बी-चौड़ी डींगें हाँकते रहते हैं, परीक्षा उसकी वास्तविकता-अवास्तविकता का निर्णय कर देती है। इसी प्रकार आदर्शवादी व्यक्तियों के जीवन में भी वे परीक्षा काल आते हैं, जिनकी कसौटी पर यह सिद्ध हो जाता है कि सिद्धान्तों एवं आदर्शों के प्रति उनकी आस्था कितनी वास्तविक-अवास्तविक थी। राजा हरिश्चन्द्र, प्रह्लाद, कर्ण, भीष्म, राम, कृष्ण, दधीचि, शिवि आदि के सामने परीक्षा के अवसर आये थे, उनमें वे खरे उतरे तो उनकी वास्तविकता प्रमाणित हो गई और वे सच्चे आदर्शवादियों की श्रेणी में प्रतिष्ठित हो सके।
कसौटी पर खरे उतरें-
कोई आदर्शवादी धर्म एवं अध्यात्म की बात तो बहुत करे, पर परीक्षा का समय आने पर इधर-उधर छिपा रहे तो उसकी आस्था संदिग्ध ही मानी जाएगी। ईश्वर और धर्म की मान्यताएं केवल इसलिये हैं कि इन आस्थाओं को हृदयंगम करने वाला व्यक्ति , निजी जीवन में सदाचारी और सामाजिक जीवन में परमार्थी बने। यदि यह दोनों प्रयोजन सिद्ध न होते हों, इन दोनों कसौटियों पर वास्तविकता सिद्ध न होती हो तो यही कहना पड़ेगा कि यह तथाकथित ईश्वर भक्ति और धर्मात्मापन दंभ मात्र था। अपने लिये धन-दौलत और बेटे-पोते चाहने की कामना से माला घुमाते रहने का नाम ही भजन नहीं है, वरन् उसका प्रमुख चिन्ह यह है कि जिसे ईश्वर से प्रेम हो, वह उसकी दुनिया को अधिक सुन्दर, अधिक व्यवस्थित, अधिक विकसित बनाने में अधिक से अधिक योगदान करे। इस दिशा में किया हुआ त्याग, बलिदान ही किसी व्यक्ति के प्रबुद्ध, जाग्रत, आदर्शवादी, ईश्वर भक्त एवं धर्मात्मा होने का चिन्ह हो सकता है।
विद्यार्थी साल-भर पढ़ते हैं। उस सामान्य समय में किसी के अध्ययन का ठीक तरह पता नहीं चलता। वार्षिक परीक्षा के दस-बीस दिन ही होते हैं, पर वे दूध पानी का विश्लेषण करके रख जाते हैं। सामान्य काल में किसी बकवादी एवं दंभी को भी ईश्वर भक्त , धर्मात्मा या आदर्शवादी समझा जा सकता है, पर जब परख की असामान्य घड़ी सामने आ उपस्थित हो तो यह पता चल जाता है, कि कौन कितने गहरे पानी में है। चिरकाल के पश्चात् इन दिनों ऐसा समय आया है जिसमें जन-साधारण की भीड़ में छिपे हुये नर रत्नों, महामानवों एवं अध्यात्मवादियों को आगे आने, ऊँचे उठने और चमकने का अवसर मिलेगा। दूध जब गरम किया जाता है, तो उसमें जितने अंश घी के होते हैं वे मलाई के रूप में ऊपर तैर कर आ जाते हैं। जन-समाज में जो महान आत्माएं छिपी रहती हैं, उनके प्रकाश में आने का अवसर ऐसे ही परीक्षा-काल में आता है जैसा कि आजकल है।
पाकिस्तान, चीन के आक्रमणों ने देश के पौरुष और स्वाभिमान को चुनौती दी है। इन आक्रमणकारी परीक्षकों को हमें बातों से नहीं, वरन् अपने शौर्य और पराक्रम से, त्याग और बलिदान से उत्तर देना होगा और यह बताना होगा कि हम वैसे दुर्बल, कायर और स्वार्थी नहीं है, जैसा कि उनने समझा था। आक्रान्ता किसी भी जाति का शौर्य परखने आते हैं। यदि उसमें कमी देखते हैं, तो अपना कुचक्र जारी रखते हैं, अन्यथा इरादे बदल देते हैं। रोगों के कीटाणु उन शरीरों में अड्डा जमाते हैं, जिनका रक्त पहले से ही दूषित हो। यदि रक्त शुद्ध हो तो भयानक छूत के रोग कीटाणु भी अपने आक्रमण में असफल हो जाते हैं। चीन, पाकिस्तान के खूनी पंजे तभी तक खुले रहेंगे, जब तक उन्हें हमारे शौर्य का परिचय न मिल जाय। जब उन्हें यह अनुभव होगा कि उन्हें किसी साहसी, बलिदानी और देशभक्त समाज से जूझना पड़ रहा है, तो वे चट्टान से टकराने की अपेक्षा अपने कदम पीछे की ओर ही लौटाने को विवश होंगे।
नव निर्माण की धर्म-सेना-
युद्ध मोर्चों पर भारतीय सैनिकों ने जो शौर्य, साहस एवं आत्म-त्याग दिखाया है, उससे सारे संसार में राष्ट्र का सम्मान बढ़ा है। शत्रुओं को भी छठी का दूध याद आया है। हमारे रणबाँकुरे आगामी संघर्षों में भी ऐसी ही बहादुरी दिखावेंगे और हर बार की परीक्षा में खरे सोने की तरह अधिक उज्ज्वल होकर चमकेंगे यह आशा करनी चाहिये। पर बात यहीं तक समाप्त नहीं हो जाती। केवल सैनिक ही समस्त राष्ट्र नहीं हैं। राष्ट्र की समर्थता और सशक्तता के लिए हर नागरिक को सैनिकों जैसा शौर्य, साहस एवं त्याग अपने अन्दर विकसित करना चाहिये, तभी राष्ट्र समर्थ बनेगा। अन्यथा सेना मात्र बहादुरी का यश लेकर रह जायगी। राष्ट्रीय समर्थता सैनिकों तक सीमित नहीं है। किसी शूरवीर सेना को भी उससे बड़ी या बड़े आयुधों वाली सेना परास्त कर सकती है, पर जो अपराजित शक्ति है, वह समस्त राष्ट्र की भावनात्मक शक्ति ही है और उसका स्रोत नागरिकों के स्तर पर अवलम्बित है। हमारी सेना ही नहीं, जनता भी उतनी ही उत्कृष्ट स्तर की होनी चाहिये।
शरीर में निकले हुये फोड़े रक्त में विषैलेपन का चिन्ह मात्र होते हैं। रक्त विषैला न हो तो या तो फोड़े निकलते नहीं या जल्दी अच्छे हो जाते हैं। किन्तु रक्त विषैला होने पर फोड़े न भी निकलें, तो भी गठिया, जलन, खुजली, हडफूटन आदि मन्द विकार बने ही रहते हैं। चीन की ठीक नाक के नीचे उसका प्रदेश हाँगकाँग ब्रिटिश आधिपत्य में है। उसी का अंग फारमोसा अमेरिका की गोद में है। दोनों को वह वापिस लेना चाहता है, पर इस दिशा में कुछ भी कर नहीं पाता। इसके विपरीत हिन्दुस्तान की उस भूमि को जो उसकी अपनी नहीं है, हड़पने के लिए आक्रमण करता है। इसका कारण क्या है, समझना ही पड़ेगा। कारण सिर्फ एक है और वह यह कि वह भारतीय जनता को दुर्बल समझता है। जरा-सा पाकिस्तान, अपने से अनेक गुने बड़े भारत पर अकारण चढ़ दौड़ता है, इसके पीछे भी उसकी एक ही मान्यता है कि हिन्दुस्तानी भीतर ही भीतर खोखले हैं। इन्हें आसानी से डराया, धमकाया और लूटा खसोटा जा सकता है। जिस दिन चीन और पाकिस्तान की वर्तमान मान्यताएं बदल जायेंगी, उस दिन युद्ध अनायास ही समाप्त हो जाएगा। और वे लड़ाई की भाषा छोड़कर मित्रता की बोली बोलेंगे।
बलिदान की घड़ी में बगलें न झाँकें-
आक्रमणकारियों को युद्ध मोर्चे पर मुँह तोड़ उत्तर देना जुझारू सैनिकों का काम है, पर आक्रमणकारियों के इरादे बदल देना उन सेना नायकों का काम है, जिनके पास ईश्वरप्रदत्त भावना एवं प्रतिभा के ऐसे तत्व विद्यमान हैं, जिनके आधार पर वे भारतीय जनता का स्तर उत्कृष्ट एवं समर्थ बना सकें।
इस खेदजनक तथ्य को स्वीकार करने में कोई हर्ज नहीं कि हमारा भावनात्मक स्तर पिछले दो हजार वर्ष से बिगड़ता चला आया, फलस्वरूप मुट्ठी-भर मुसलमान और अँग्रेज आक्रामकों ने एक हजार वर्षों तक हमें पददलित किया। यह स्वीकार करने में भी कोई हर्ज नहीं कि विदेशी दासता के कारण अनेक दुष्प्रवृत्तियों ने हमारे लोक-मानस को अन्धकार से आच्छादित कर रखा है। नैतिक और सामाजिक दृष्टि से हम अभी काफी पिछड़े हुए हैं। यह पिछड़ापन जब तक विद्यमान है, तब तक आक्रमणों की संभावना तो बनी ही रहेगी, साथ ही हम सच्चे अर्थों में सबल एवं समर्थ राष्ट्र के रूप में भी विकसित न हो सकेंगे। हमारी आन्तरिक उलझनें भी न सुलझेंगी और उनमें फँसे रहकर बाह्य आक्रमणों जैसी ही हानि उठाते रहेंगे।
किसान और व्यापारी यदि जमाखोरी न करें और उचित मुनाफे से सन्तुष्ट रहें, उपभोक्ता थोड़ा कम खायें, तो इतनी मात्र देशभक्ति दिखाने से सुरसा जैसी खाद्य समस्या का देखते-देखते हल हो सकता है, न विदेशों से अन्न खरीदना पड़े, न अपमान और दबाव सहना पड़े। इंजीनियर, ठेकेदार और श्रमिक यदि देशभक्ति की भावना से निर्माण करें, तो जो निर्माण अब हो रहा है, उससे आधी लागत में दूना मजबूत काम हो सकता है। कारखाने वाले और व्यापारी देश की आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन और वितरण करने की देशभक्ति को प्रधान लक्ष्य रखें, तो देश में किसी भी चीज की कमी न पड़ने पावे। वकील, अदालतें और पुलिस यदि कड़ाई से अपराधों की रोकथाम के लिये कटिबद्ध हो जायें, जनता उनका पूरा सहयोग करे, तो बढ़ते हुये अपराध देखते-देखते समाप्त हो सकते हैं। सरकारी कर्मचारी यदि जन-सेवक के रूप में अपने कर्तव्य ईमानदारी से पालन करें, तो जनता और सरकार के सहयोग से प्रगति और शान्ति का मंगलमय वातावरण विकसित होता दिखाई पड़ेगा।
विवाहोन्माद जैसी कुरीतियाँ यदि न रहें, छोटे सामयिक उत्सवों के रूप में यदि बिना खर्च के विवाह शादी हो जाया करें, तो देश की आर्थिक और सामाजिक समस्या का कैसा सुन्दर हल निकल आवे। स्त्रियों को अशिक्षित और पर्दे में बन्द रखने की मूढ़ता यदि समाप्त हो जाय, तो आधी आबादी को निर्जीव से सजीव स्थिति में पहुँचने का अवसर मिले। सामाजिक समानता की मान्यताएं पनपें तो पिछड़े हुए, उपेक्षित, दीन, दुर्बल और अछूत कहलाने वाले करोड़ों व्यक्ति अन्य सवर्णों की तरह ही सुविकसित होकर राष्ट्र की सशक्तता बढ़ावें। भाग्यवाद, भूत, पलीत एवं धार्मिक अन्ध-विश्वासों के कारण नष्ट होने वाली जन-शक्तियों को बचाकर उपयुक्त मार्ग में लगाया जा सके, तो इसके द्वारा प्रगति की दिशा में चमत्कारी अवसर उत्पन्न हो सकते हैं। अकेली तमाखू पीने पर होने वाले 2 करोड़ रुपये प्रतिदिन, अर्थात् 720 करोड़ वार्षिक अपव्यय रोका जा सके। अन्य नशे भी बहिष्कृत हो सकें, तो देश के स्वास्थ्य, मनोबल एवं धन की बहुत बचत हो सकती है। अध्यापक यदि छात्रों में पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त किसी जीवित समाज के लिये आवश्यक गुणों का भी बीजारोपण करने लगें, तो अगली पीढ़ी अजस्र तेज से भरी-पूरी बन सकती है। 56 लाख पेशेवर और लगभग उतने ही आँशिक रूप से धर्म-जीवी साधु-ब्राह्मण लोक-निर्माण के कार्यों में लग जायें, तो हमारा नैतिक एवं सामाजिक स्तर आश्चर्यजनक रीति से उज्ज्वल बन सकता है। मन्दिरों में लगी हुई और धर्म के नाम पर दान से प्राप्त होने वाली पूँजी का यदि जन-साधारण में आदर्शवादिता की धर्म भावनाएं जगाने में उपयोग किया जा सके, तो राष्ट्र की भावनात्मक शक्ति का पारावार न रहे और वह विश्व के मार्ग-दर्शक, जगद्गुरु की स्थिति में फिर आ पहुँचे। करोड़ों विधर्मी जो हिन्दू धर्म की गोद में बैठने के लिये लालायित हैं, यदि उनके लिये द्वार खुल जाये तो आज हिन्दू-धर्म जो मात्र 34 करोड़ लोगों का धर्म रह गया है, कुल सबसे आगे निकल कर विश्व-धर्म बन सकता है।
नव-निर्माण के लिये अथक श्रम-
विगत एक सौ वर्षों में इंग्लैंड, अमेरिका, फ्राँस, रूस, चीन, जापान आदि देशों ने कितनी आश्चर्यजनक प्रगति की है। सौ वर्ष पूर्व इन देशों की दशा आज की तुलना में बहुत ही गई-गुजरी थी। भारतवर्ष को जो भौतिक एवं आध्यात्मिक साधन उपलब्ध हैं, उनके आधार पर वह 25 वर्षों में उतनी प्रगति कर सकता है, जितनी दूसरों ने सौ वर्षों में की है। पर इसके लिये आवश्यकता उन सेना-नायकों की है, जो भारतीय जनता के अस्त-व्यस्त लोक-मानस को चकमका कर, उलट-पुलट कर रख दें और प्राचीनता के आधार पर उसका नव-निर्माण करने के लिये कटिबद्ध हों। ऐसे लोगों का अभाव नहीं, केवल निरुत्साह ही बाधक है। यदि यह कमी दूर हो सके, जन-जागरण के लिये एक सुगठित सेना की तरह यदि बौद्धिक-क्रान्ति करने वाले आदर्शवादी लोक-सेवक निकल पड़ें, तो देश का कायाकल्प ही हो सकता है। सीमाओं पर आक्रमण करने वाले तो झक मार कर बैठ ही जायेंगे, साथ ही विघटनकारी अन्तर्द्वन्द्वों का भी कहीं पता न चलेगा। भाषा, प्रान्त और जाति, सम्प्रदायों के नाम पर जो विघटनकारी दुष्प्रवृत्तियाँ पनप रही हैं, उनका कहीं पता भी न चलेगा।
उज्ज्वल भविष्य की समस्त सम्भावनाएं इस बात पर निर्भर हैं कि प्रबुद्ध, जागृत एवं प्रतिभावान् व्यक्ति अपनी संकीर्ण सीमाबद्धताओं में ही उलझे न रहकर युग-निर्माण के लिये, जन-जागरण के लिये कुछ कर गुजरने को कटिबद्ध हों। प्रचारात्मक और रचनात्मक कार्यों के द्वारा जनता को संगठित, जागृत एवं कर्तव्यरत बनाया जा सकता है। यह कार्य राजनीति से नहीं, धर्म के मंच से ही सम्भव होगा। भारत की 80 फीसदी जनता अशिक्षित है और लगभग इतने ही लोग देहातों में रहते हैं। उन्हें किसी अन्य स्तर पर नहीं, केवल धार्मिक स्तर पर ही आन्दोलित किया जा सकता है। शिक्षित एवं शहरी वर्ग में भी उनकी आदर्शवादिता को उभारने का प्रयोजन केवल धर्म एवं अध्यात्म के आधार पर ही संभव हो सकता है।
अखण्ड-ज्योति परिवार में जो प्रबुद्ध आत्माएं हैं, उन्हें युग पुकारता है। वे संकीर्ण स्वार्थपरता का वैयक्तिक जीवन जीने की अपेक्षा युद्ध मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की तरह कुछ त्याग-बलिदान करने के लिये तत्पर हों, समय दान करें, जन-संपर्क के लिये अवसर निकालें, और जन-जन के मन मन में नव-जीवन का संचार करने वाली भावनाएं भरें, तब काम चले।
जो लोग अपने को धर्मात्मा, ईश्वर भक्त एवं आदर्शवादी कहते हैं, मानते हैं, उनके लिये आज की अग्नि परीक्षा की घड़ियाँ कुछ करने के लिये कह रही हैं। यदि उसमें से कोई कुछ करना चाहे तो अपनी स्थिति के अनुरूप बहुत कुछ कर सकता है। युग-निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रम उसे सादर आमन्त्रित करते हैं। जो केवल पूजा-पाठ की थोड़ी चिन्हपूजा करके ही स्वर्ग, मुक्ति , ईश्वर दर्शन के सपने देखते हैं, उन्हें जानना चाहिये कि उनकी सच्चाई और आस्था आज अग्नि परीक्षा की कसौटी पर कसी जा रही है। यदि वे कष्ट-साध्य कर्तव्यों से कतराते हैं, तो मुलम्मा चढ़े सोने की तरह उस परख में उनकी आब जनता जनार्दन के सामने उतर ही जायगी।
वे वयोवृद्ध व्यक्ति , जिनके ऊपर से कमाने-धमाने की जिम्मेदारी चली गई है, बच्चे परिवार की व्यवस्था संभाल लेते हैं, उन्हें अपने अधिकाँश समय को राष्ट्रीय जागरण के लिए लगाना चाहिए। आज की परिस्थितियों में ईश्वर की सबसे उत्तम भक्ति और आत्म-कल्याण की सर्वश्रेष्ठ साधना यही हो सकती है कि इस देवभूमि भारत को धरती का स्वर्ग बनाने के लिए जन-जन में विवेकशीलता एवं आदर्शवादिता की भावनाएं उत्पन्न की जायें। इस साधना में लगे हुए वयोवृद्ध व्यक्ति अपना लोक परलोक सुधारेंगे, आत्म-कल्याण और ईश्वर प्राप्ति का लाभ प्राप्त करेंगे तथा देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति के पुनरुत्थान में योगदान देकर अक्षय पुण्य अर्जित करेंगे।
यों घर में कुछ न कुछ काम तो सदा ही लगा रहता है, पर राष्ट्र के नव-निर्माण का कार्य भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। इस आड़े समय में तो सब काम छोड़कर भी उसे प्रधानता दी जानी चाहिए, फिर अवकाश प्राप्त वयोवृद्ध तो घर वालों की बिना कुछ हानि किये ही अपने अनुभवी व्यक्तित्व का बहुत कुछ लाभ जनता को दे सकते हैं।
जो कई भाई हैं, उनमें से एक को समाज-सेवा के लिये देना चाहिये। शेष भाई उसके पारिवारिक उत्तरदायित्वों का वहन करें और उसे निश्चिन्तता पूर्वक समाज सेवा करने दें। जिस प्रकार युद्ध के लिये कितने ही परिवारों ने अपने यहाँ से एक-एक सैनिक दिया है, उसी प्रकार धर्म-परायण लोग भी अपने घरों से एक-एक सुयोग्य प्रतिभाशाली व्यक्ति धर्म-सेना में भर्ती होने के लिये दें। जिनका धर्म से सीधा सम्बन्ध नहीं है, वे शौर्य और देश-भक्ति से प्रेरित होकर अपने घरों के नौनिहालों को गोलियों का सामना करने के लिये भेज सकते हैं, तो जो लोग धर्म, ईश्वर, अध्यात्म, ज्ञान, वैराग्य आदि की लम्बी-चौड़ी बातें करते हैं, उन्हें गोली के सामने न सही तो समाज-सेवा के लिये तो अपने परिवारों से एक-एक व्यक्ति देना ही चाहिये।
जिन लोगों के पास आजीविका के साधन मौजूद हैं, जमीन या पैसा किराये पर उठा कर जो लोग अपना खर्च चलाने की स्थिति में हैं, उनके लिये यही उचित है कि अब अधिक कमाई के संग्रह करने, जोड़ने और बढ़ाने के कुचक्र में न फँसें। अगला समय ऐसा आ रहा है, जिसमें वैयक्तिक धन अधिक मात्रा में किसी के पास भी न रहेगा। गुजारे-भर के लिये सामान्य लोगों की-सी साधन-सामग्री रह जायगी, ऐसी दशा में जो लोग पूँजी बढ़ाने और भविष्य के लिये दौलत जोड़ने की सोचते हैं, वे भारी भ्रम में हैं। शहद की मक्खी की तरह अनावश्यक श्रम दूसरों के लिये धन कमाने में खर्च किया जाय, तो इसकी अपेक्षा यही उत्तम है कि जब गुजारे की व्यवस्था है तो अपना समय और श्रम लोक-मंगल के लिये ही क्यों न खर्च किया जाय?
साधु-ब्राह्मणों का तो यह एक परम पवित्र कर्तव्य है कि इस समय जिस धर्म का आश्रय लेकर वे अपनी आजीविका चलाते हैं और पूजा सम्मान प्राप्त करते हैं, उस धर्म की रक्षा के लिये उन्हें कुछ काम भी करना चाहिये, कुछ कष्ट भी उठाना चाहिये। आज जब कि धर्म संकट में है, देश की सुरक्षा एवं प्रगति का प्रश्न है, तब तो उन्हें उन आदर्शों को परिपुष्ट करने के लिये अपना समय लगाना ही चाहिए। ऐसी विषम परिस्थितियों में भी वे दक्षिणा बटोरने और पैर पुजाने का ही धन्धा करते रहे, कर्तव्य को तिलाञ्जलि दिये बैठे रहे तो आगामी पीढ़ियाँ उन्हें क्षमा न करेंगी। उन्हें धर्मध्वजी होने का सम्मान तो दूर, सामान्य नागरिक स्तर पर भी न गिना जायगा। उनकी आज की अकर्मण्यता भविष्य में साधु-ब्राह्मण संस्था का ही महत्व एवं गौरव समाप्त कर देगी, इसलिये उन्हें तो समय रहते चेत ही जाना चाहिए।
हर नागरिक के पास कुछ समय रहता है। आजीविका कमाने और शरीर यात्रा के दैनिक कार्यों के अतिरिक्त हर व्यक्ति के पास कुछ समय बचता है। यदि बचता न होता तो गपशप, यारबाजी, सिनेमा, शतरंज, ताश, यात्रा, मेले ठेले आदि के लिए समय कहाँ से मिलता है? लेखा-जोखा लेने पर हर आदमी के पास कुछ न कुछ ऐसा समय जरूर मिलेगा, जिसे वह नित्य-कर्म और रोटी कमाने के अतिरिक्त अपनी मन-मर्जी के कामों में लगाता है। यह मन मर्जी यदि हल्के और ओछे कामों में न लगे, जन-जागरण और नव-निर्माण के रचनात्मक कामों में लगे तो व्यस्त से व्यस्त व्यक्ति भी इतना कार्य कर सकता है, जिस पर वह आत्म-सन्तोष और आत्म-गौरव अनुभव कर सके। आवश्यकता केवल अभिरुचि बदलने भर की है। दूसरों को उपदेश करने या आलोचना करने की अपेक्षा अब अपने को रचनात्मक कार्य करने में संलग्न करना चाहिए और अपनी आदर्शवादिता की सच्चाई को प्रमाणित करना चाहिये। जिनमें आदर्शवादिता के प्रति आस्था एवं ममता है, जो उसे बढ़ते और आकर्षित होते देखना चाहते हैं, उन्हें अपने समय का एक अंश राष्ट्रीय पुनरुत्थान के लिये कुछ करने के लिये लगाना ही चाहिये। साधारण नागरिक होने पर भी यदि कुछ भावना हो, तो हर व्यक्ति बहुत कुछ कर सकता है और आज ऐसा समय है जब कि कुछ न कुछ हर व्यक्ति को करना ही चाहिये।
अखण्ड-ज्योति परिवार में जितने भी व्यक्ति हैं, उनमें से उपरोक्त परिस्थितियों के कितने ही व्यक्ति होंगे। उन्हें अब अलसाये मन से नहीं, वरन् भावनापूर्वक वस्तुस्थिति को समझना चाहिये और देश-काल को देखते हुए अपने समय और शक्ति का कुछ न कुछ भाग लगाने के लिये कटिबद्ध ही हो जाना चाहिये।
यों समस्त देश वासियों के सामने अपनी देश-भक्ति का परिचय देने का अवसर है, पर अखण्ड-ज्योति परिवार से सम्बद्ध व्यक्तियों ने गत 25 वर्ष में जो शिक्षा प्राप्त की है, उसे वस्तुतः समझा अपनाया है या नहीं, इसकी परख का ठीक यही वक्त है। प्रस्तुत समय की चुनौती को स्वीकार कर हमें अपना खोखलापन प्रमाणित नहीं करना चाहिये।
विचार-क्रान्ति एवं भावनात्मक पुनरुत्थान पर यह निर्भर है कि जनता की गतिविधियों में आवश्यक परिष्कार उत्पन्न हो। इस परिष्कार से ही राष्ट्र को सर्वांगीण समर्थता एवं सशक्तता उपलब्ध होगी। विचार कार्यों का मूल है। विचार का बीज ही कार्य रूप में परिणत होता है। उत्तम मार्ग पर वही चल सकता है, जिसके विचार ऊँचे हों। हमें जन-मानस में उत्कृष्ट विचारों का बीजारोपण करना होगा, ताकि वे उगें, पल्लवित हों और अपनी हरियाली से इस उद्यान को सुशोभित कर सकें। कुविचारों और कुसंस्कारों का मवाद जब तक हमारे विचारों और भावनाओं में भरा रहेगा, तब तक कष्टकर स्थिति बनी ही रहेगी। इस मवाद को हटाने पर ही घाव पुरेंगे। हमारे सड़े-गले विचार जब हटेंगे, तब सशक्तता उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ विकसित होंगी। वर्तमान काल की आवश्यकता जन-मानस में भरी हुई सडांद हटाने की है। भावनात्मक दृष्टि से परिष्कृत व्यक्तियों के व्यक्तित्व से ही तो समाज एवं राष्ट्र बलवान् एवं सम्पन्न हो सकता है। विचार-क्रान्ति इस युग की वर्तमान काल की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिये, प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति के लिये प्राणपण से जुट जाना ही कर्तव्य है।
हमारे सामने (1) अनैतिकता, (2) अनागरिकता, (3) दुर्व्यसन एवं (4) सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन का चतुर्विध विशाल कार्यक्रम फैला पड़ा है। बेईमानी, अपराध, अन्याय, उद्दण्डता जैसे अनैतिक कार्यों द्वारा आलस्य, फूहड़पन, अव्यवस्था, वचन न पालना जैसे अनागरिक स्वभावों द्वारा, नशेबाजी, फैशन परस्ती, शेखीखोरी, नाच रंग जैसे दुर्व्यसनों द्वारा, विवाहोन्माद, नारी तिरस्कार, ऊँच-नीच जैसी सामाजिक अन्ध परम्पराओं द्वारा आज राष्ट्र बुरी तरह जर्जरित हो रहा है। इन चार दुष्प्रवृत्तियों में जितनी शक्ति कुण्ठित एवं नष्ट होती है, उसे यदि बचाया और उपयुक्त मार्ग में लगाया जा सके तो भारतीय समाज का कायाकल्प ही हो सकता है। जो प्रगति दूसरे देशों ने 100 वर्षों में की है, वह हम अपनी दार्शनिक महान् परम्पराओं एवं भारत माता के अतुलित साधनों द्वारा 25 वर्ष के भीतर ही ऐसे अच्छे ढंग से कर सकते हैं कि संसार में फिर अपना स्थान ‘जगद्गुरु’ का हो जाय।
उपरोक्त चार मोर्चों पर जूझने के लिये हमें, (1) प्रचार, (2) संगठन (3) एवं आन्दोलन के त्रिविधि आयुधों का उपयोग करना होगा। लड़ाई में- वायुयानों, जलयानों एवं पैदल सैनिकों की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार नव-निर्माण के लिए यह त्रिविधि साधन अनिवार्य रूप से अभीष्ट होंगे। जो लोग विचारक्रान्ति के, भावनात्मक पुनरुत्थान के महान् अभियान को सफल बनाना चाहते हैं, उन्हें इन त्रिविध कार्यक्रमों को अपनाने, परिपुष्ट करने एवं बढ़ाने के लिये कटिबद्ध होना ही होगा। नव-निर्माण अभियान में सम्मिलित होने के लिये जिन प्रबुद्ध आत्माओं का आह्वान किया गया है, उन्हें इस त्रिविध आधार पर विनिर्मित शतसूत्री योजना द्वारा युग-निर्माण के लिये अपने समय दान का प्रयोग करना होगा।
स्वार्थपरता एवं संकीर्णता के विचारों को उखाड़ कर उनके स्थान पर सर्वोपयोगी गतिविधियाँ अपनाने की विचार-क्रान्ति तभी सम्भव है, जब इन आदर्शों के उपयुक्त परिपक्व एवं प्रौढ़ विचार जन-साधारण को अधिकाधिक मात्रा में मिलें। इसके लिए लेखनी और वाणी, दोनों ही माध्यम पूरी तरह अपनाने होंगे। पढ़-लिख सकने वाले लोगों तक उपर्युक्त उद्देश्य की पूर्ति करने वाला साहित्य पहुँचाना होगा और बिना पढ़े लोगों को वे ही बातें सुनानी पड़ेंगी। यह कार्य व्यक्तिगत एवं सामूहिक दोनों ही प्रकार से करना होगा। अपने संपर्क में जितने भी लोग हों, उन्हें प्रेरणाप्रद- प्रकाशवान् विचार देने के लिये संपर्क बनाने में तेजी लानी होगी। अपने परिचितों के पास जायें, उन्हें आवश्यक साहित्य पढ़ने को दें, चर्चा करें और विचार विनिमय द्वारा उनकी मनोभूमि में आवश्यक परिवर्तन प्रस्तुत करें। यह व्यक्तिगत संपर्क की कार्य-पद्धति है।
सामूहिक प्रचार के लिए छोटी-बड़ी गोष्ठियों एवं उत्सव, आयोजनों, समारोहों का प्रबन्ध करना होगा। समय-समय पर लोग किसी न किसी निमित्त से एकत्रित किये जायें और निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप भावनाएं उत्पन्न करने वाले प्रवचन प्रस्तुत करके भावनात्मक परिष्कार का प्रयोजन पूरा किया जाय। धार्मिक आधार पर इन प्रयोजनों की पूर्ति- (1) गीता के सप्ताह आयोजनों, (2) रामायण की व्याख्या में प्रस्तुत किये गये प्रवचनों, (3) सत्यनारायण कथा की छोटी गोष्ठियों, (4) परिवारों के प्रशिक्षण के लिए आयोजित सोलह संस्कारों, (5) पर्व-त्यौहारों के अवसर पर किए गए सामूहिक उत्सवों, (6) गायत्री यज्ञों के माध्यम से आमन्त्रित समारोहों में, यदि उपयुक्त प्रवचनों की व्यवस्था रहे, तो भारत की धर्म-प्रिय जनता सहज ही विचार-क्रान्ति के उपयुक्त प्रकाश प्राप्त कर सकती है। इनके अतिरिक्त भी जो कार्य सामूहिक प्रचार के लिए सम्भव हों, वे अपनाने चाहिए। हममें से हर एक का कर्तव्य है- इस प्रकार के व्यक्तिगत एवं सामूहिक प्रचार साधनों को करने और कराने में पूरी-पूरी दिलचस्पी लें और उन्हें अधिकाधिक प्रभावशाली बनाने के लिए साधन जुटाते रहें।
एक विचार के, एक उद्देश्य एवं एक लक्ष्य के लोगों का संगठन आश्चर्यजनक कार्य कर सकता है। इस युग की सबसे बड़ी शक्ति संगठन ही है। युग-परिवर्तन जैसे महान् अभियान तो संगठन की शक्ति पर ही सफल बनाये जा सकते हैं, इसलिए हमें उन लोगों को ढूँढ़ना और संगठित करना चाहिए, जो नव-निर्माण के उद्देश्य, आदर्श एवं कार्यक्रमों में आस्था रखते हों। ऐसे लोगों में अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को अग्रणी माना जा सकता है। विगत 25 वर्षों से उन्हें यही शिक्षण मिलता रहा है। धर्म और अध्यात्म के नाम पर चलने वाली विडम्बना से घृणा करने और वास्तविकता को अपनाने का साहस और विवेक उनमें जागृत हुआ है। साथ ही कुछ काम करने के लिये भी निरन्तर प्रेरणा भरी जाती रही है, इसलिये वे दूसरों की तरह बातूनी न होकर कार्य संलग्न भी रहते हैं। इन लोगों को सुसंगठित किया जा सके तो उस शक्ति का भी चमत्कार प्रस्तुत किया जा सकता है। यों इस क्षेत्र को विस्तृत करके देश-व्यापी ही नहीं, विश्व-व्यापी भी बनाना है। जो भी इस प्रकृति एवं प्रवृत्ति के व्यक्ति मिलें उन सबको एक सूत्र में संगठित करना है, पर अभी तात्कालिक आरम्भ अखण्ड-ज्योति के सदस्यों से किया जा सकता है।
जहाँ कहीं भी- जितने भी अखण्ड-ज्योति के सदस्य हों, उन सबको एक शाखा संगठन के रूप में संगठित हो जाना चाहिए। संगठन की एक पाँच व्यक्तियों की संचालन समिति बनाली जाय और वह यह प्रयत्न करती रहे कि वर्तमान सदस्यों का मिलन एवं विचार विनिमय नियमित एवं क्रमबद्ध रूप से चलते रहने की व्यवस्था बन जाय। जन्म दिन मनाने की प्रथा इस कार्य में आश्चर्यजनक रूप से सहायक होती है। जिसका जब जन्मदिन हो, तब उसके यहाँ सब परिजन एकत्रित हों, हवन, प्रवचन के अतिरिक्त पारस्परिक आत्मीयता सुदृढ़ करें। इसके अतिरिक्त समय-समय पर होती रहने वाली गोष्ठियों में निरन्तर यह विचार किया जाता रहे कि उस क्षेत्र में जन-जागरण उत्पन्न कर सकने वाली क्या प्रवृत्तियाँ चलाई जा सकती हैं। शतसूत्री कार्यक्रमों में से जहाँ जो सम्भव हो, वहाँ वह तुरन्त ही आरम्भ कर दिया जाना चाहिए। संगठन का क्षेत्र दिन-दिन अधिक विस्तृत एवं व्यापक बनाने का प्रयत्न पूरे उत्साह एवं धैर्य के साथ चलाते रहना चाहिये। इस प्रकार जो संघ शक्ति विकसित होगी, उसके द्वारा अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त कर सकने में कोई सन्देह न रह जायगा।
आन्दोलनात्मक रचनात्मक कार्यों में अनेक ऐसे हैं, जिन्हें अविलम्ब हर जगह आरम्भ कर देना चाहिए। नव-निर्माण की प्रेरणा भरने वाला एक पुस्तकालय हर जगह स्थापित हो जाना चाहिए। इसमें कूड़ा-करकट बिल्कुल भी न हो, केवल चुनी हुई वे पुस्तकें हों, जो पढ़ने वाले के मस्तिष्क एवं हृदय को नव-निर्माण के लिए आवश्यक प्रेरणा एवं प्रकाश प्रदान कर सकें। पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएं मँगाने के लिए सदस्यगण आपस में मासिक चन्दा इकट्ठा कर लें। एक जगह पुस्तकें जमा कर देने से भी कोई प्रयोजन सिद्ध न होगा। सदस्यगण उन्हें लोगों के घरों पर पहुँचाने और वापिस लाने का भी काम करें। पुस्तकें जमा न रहकर उस क्षेत्र में घूमती ही रहें तो समझना चाहिये कि पुस्तकालय की स्थापना सफल हो गई।
इस युग के देव-मन्दिर, सरस्वती-सदन, गायत्री-देवालय, सद्विचारों से परिपूर्ण पुस्तकालय ही हो सकते हैं। जहाँ इनकी स्थापना हो जाय, समझना चाहिए कि वहाँ का शाखा-संगठन सजीव एवं जागृत है। जहाँ इतना भी न हो सके, समझना चाहिए लोग उथले मन से लकीर पीटने मात्र की चिन्ह पूजा कर रहे हैं। युग निर्माण शाखाओं के लिये यह लज्जा की बात होगी कि वे ऐसा एक पुस्तकालय भी स्थापित एवं संचालित न कर सकें। उस अभाव की पूर्ति तत्काल कर ली जानी चाहिये। विचार-क्रान्ति के उद्गम स्त्रोत यह युग-निर्माण पुस्तकालय ही होंगे। हमारा रचनात्मक आन्दोलन- युग-निर्माण पुस्तकालय आन्दोलन से ही आरम्भ होना चाहिए।
प्रौढ़ पाठशालाओं और व्यायामशालाओं की स्थापना भी ऐसे रचनात्मक कार्य है, जिनका ताना-बाना हर जगह बुना जाना चाहिये। साक्षरता- राष्ट्रीय जागरण का आवश्यक अंग है। देश में एक भी निरक्षर न रहने पावे, इस लक्ष्य की पूर्ति के लिये प्रौढ़ पुरुषों और महिलाओं के लिये उनकी सुविधा के समय पर पाठशालायें चलाई जानी चाहिये। व्यायाम का प्रचार घर-घर किया जाय। मुहल्ले-मुहल्ले और गाँव-गाँव व्यायामशालायें खुलें। खेल-कूदों की प्रतियोगिताएं होती रहें। लाठी, तलवार जैसे अस्त्र-शस्त्रों का चलाना सिखाया जाय। पुस्तकालयों के अतिरिक्त जहाँ सम्भव हो सके, प्रौढ़ पाठशालाएं एवं व्यायामशालाएं स्थापित करने को भी पूरी दिलचस्पी के साथ प्रयत्न किया जाय।
दीवारों पर आदर्श वाक्य लिख कर नगर को एक बोलती पुस्तक बनाना, दोहा, अंताक्षरी, खेल-कूद, भाषण, कला-कौशल, पशु पालन, स्वच्छता आदि की प्रतियोगिता, प्रदर्शनी जैसे आयोजन जब-तब होते रह सकते हैं। संगीत, भजनों के प्रेरणाप्रद आयोजन चलते रहें। घरों में कथा-कहानियों द्वारा पारिवारिक शिक्षण होते रहें। टोलियाँ बना कर सदस्यगण लोगों के पास जन-संपर्क के लिये जाया करें और उन्हें सामाजिक कुरीतियों, दुष्प्रवृत्तियों, अनैतिकताओं एवं व्यसनों की हानियों को समझा कर उनके परित्याग का साहस उत्पन्न किया करें, तो यह टोलियाँ अपने क्षेत्र में बहुत बड़ा काम कर सकती हैं और सोये हुए इलाके नये सिरे से नव-जीवन एवं नव-जागरण कर नव-प्रकाश उपलब्ध कर सकते हैं।
आजकल सप्ताह में एक समय अन्नाहार न करने एवं आध्यात्मिक आधार पर राष्ट्र में सर्वांगीण समर्थता उत्पन्न करने के लिये ‘क्लीं’ बीजयुक्त गायत्री महामन्त्र का जो शक्ति पुरश्चरण चल रहा है, उसमें कम से कम एक माला जप करने का नियम लेकर भागीदार बनने की प्रेरणा की जा सकती है। सुरक्षा कार्यों में धन, रक्त , सैनिक देने तथा नागरिक रक्षा दलों की स्थापना करने जैसे कार्य भी बढ़ाये जा सकते हैं। करने के लिये अगणित काम पड़े हैं। युग-निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रमों में से जहाँ जो संभव हो सके, उन्हें करना एवं कराना चाहिये। रचनात्मक आन्दोलन द्वारा ही जन-मानस पर यह छाप डाली जा सकती है कि यह प्रवृत्तियाँ अब चल पड़ें। लोग चलते हुए ढर्रे में सम्मिलित होते रहते हैं। सुनने का नहीं, देखने का ठोस प्रभाव पड़ता है। जो कार्य हमें जनता से कराने हैं, वे उसकी आँखों के आगे होने लगें, उसे दीखने लगें, यह व्यवस्था करना ही रचनात्मक आन्दोलन का मूल प्रयोजन है। दृश्य-प्रेरणा से ही परिवर्तन की ठोस नींव रखी जा सकती है। इसलिये रचनात्मक आन्दोलन की व्यवस्था जहाँ कहीं भी संगठन स्थापित हो चुके हैं, वहाँ आरम्भ कर दी जानी चाहिये।
नव-निर्माण के लिये हम में से हर एक को कुछ करना है। जिनकी आत्मा में जितना धर्म-तत्व जागृत हो चुका है, उन्हें उतना ही अधिक करना है। कर्तव्य ही वास्तविकता की कसौटी है। आज देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति की पुनरुत्थान वेला प्रस्तुत है, इसमें अपना योगदान देने के लिये हमें हर बहाने और हर कारण को ठुकराते हुए, योगदान देने के लिये कटिबद्ध होना ही चाहिए। चतुर्विधि मोर्चे को जीतने के लिये प्रचार संगठन एवं आन्दोलन के त्रिविध शस्त्र हमें संभालने ही चाहिए।
(1) अगले दिनों लोक-नेतृत्व की जिम्मेदारी धार्मिक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं के कन्धों पर आने वाली है। इसलिए ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों की आवश्यकता पड़ेगी, जो अपनी भाषण शैली एवं संगठनात्मक क्षमता से राष्ट्र को नव-जीवन प्रदान कर सकें। ऐसे व्यक्तियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था गायत्री तपोभूमि में की गई है। संगीत द्वारा भजनोपदेश, भाषणों द्वारा कथा, प्रवचन तथा विभिन्न छोटे-बड़े धार्मिक समारोहों का आयोजन करने सम्बन्धी तथा सिखाने की व्यवस्था हो रही है। उस शिक्षण से तत्काल नौकरी तो नहीं मिलेगी, पर व्यक्तित्व का इतना निखार अवश्य होगा कि उस शिक्षण को ठीक तरह प्राप्त कर सकने वाला प्रकाशवान् नक्षत्र की तरह चमक सके।
इन दिनों हम सुरक्षा कार्यों में बहुत अधिक व्यस्त हैं, पर कुछ ही दिनों में उधर से थोड़ा अवकाश मिल जायगा, तब हमारा प्रमुख कार्य इस प्रकार का प्रशिक्षण ही होगा। इस शिक्षा के लिये केवल प्रतिभावान् व्यक्ति ही चाहिये। जिनके व्यक्तित्व इसके लिये उपयुक्त नहीं, उन्हें व्यर्थ कष्ट नहीं उठाना चाहिये। जो अपने को इस शिक्षा के लिये उपयुक्त समझते हैं, जिनके पास छः महीने का अवकाश हो, वे हमसे पत्र व्यवहार कर लें। इस पत्र व्यवहार से जिन्हें उपयुक्त समझा जाएगा, केवल उन्हीं को आने के लिये कहा जायगा। यह शिक्षा संगठन बसन्त पंचमी से आरम्भ होगा, पर इसके लिये नाम नोट पहले से ही हो जाने चाहिये। जो अपने को उपयुक्त समझे वे पत्र व्यवहार कर लें।
(2) सुरक्षा कार्यों के लिये शाखाएं अलग से प्रयत्न करें इस तरह जो प्रयत्न जहाँ चल रहे हों, उन्हीं में सम्मिलित होकर धन, रक्त आदि देने का योगदान दें। अलग अलग प्रयत्न करने से सामूहिक प्रयत्न बिखरते और कमजोर होते हैं। इसलिये सभी लोग, सभी संस्थाएं मिल कर इस दिशा में हर जगह काम करें। अपने कार्यों की सूचना एवं जानकारी शाखाएं हमारे पास भेजती रहें, जिससे यह पता चलता रहे कि जितना योगदान हमारे परिवार को करना था, उसमें क्या न्यूनाधिकता है।
(3) जिन परिजनों ने एक घण्टा समय और एक आना नित्य नव-निर्माण के लिए लगाने का संकल्प किया है, उन्हें स्थानीय लोगों से जन-संपर्क में अपना समय लगाते रहना चाहिये और एक आना से वे ट्रैक्ट अपने यहाँ मँगा लेने चाहिये, जो विचार क्रान्ति का प्रयोजन पूरा करने के लिये लगातार छप रहे हैं। एक आना नित्य का पैसा केवल अपने इन अत्यन्त उपयोगी और प्रेरणाप्रद ट्रैक्टों द्वारा विनिर्मित घरेलू पुस्तकालय के लिये ही होना चाहिये। उसे अन्य किसी कार्य में खर्च नहीं करना चाहिये। अब तक जो ट्रैक्ट छप चुके हैं, उनकी सूची इसी अंक में है। उन्हें पेशगी पैसा भेजकर बुक-पोस्ट से मँगा लेना चाहिये। रजिस्ट्री या वी0पी0 में एक रुपया अधिक लग जाता है।
(4) अखण्ड ज्योति का चन्दा अधिकाँश सदस्यों का इस अंक के साथ समाप्त हो जाता है। उन्हें मनीआर्डर द्वारा इसी महीने भेज देना चाहिये। जिनका चन्दा बीच के किसी महीने में समाप्त होता हो, उन्हें भी शेष महीनों का चन्दा भेजकर अपना हिसाब जनवरी से दिसम्बर तक का कर लेना चाहिए। जिन्हें ग्राहक न रहना हो, वे कृपा कर एक कार्ड इन्कारी का अवश्य डाल दें। न चन्दा भेजने और न कुछ सूचना देने से उलझन एवं अपव्ययता बढ़ती है। इसलिये पाठकों से पुनः पुनः अनुरोध है कि वे ग्राहक रहें, तो आलस्य में समय न गँवा कर तुरन्त चन्दा भेज दें, अन्यथा इन्कारी पत्र भेज दें।
(5) युग-निर्माण आन्दोलन को गतिशील रखने और उस संदर्भ में आवश्यक प्रेरणा, प्रकाश, मार्ग दर्शन एवं उत्साह पैदा करने का कार्य पाक्षिक ‘युग-निर्माण योजना’ द्वारा हो रहा है। जिन्हें अपने परिवार द्वारा संचालित इस अभिनव आन्दोलन से तनिक भी रुचि या सहानुभूति है, उन्हें इसे अवश्य मँगा कर पढ़ना चाहिए। जिनका चन्दा समाप्त हो चुका है, वे अवश्य भेज दें। जिनके पास पाक्षिक पत्रिका अभी नहीं पहुँची, वे अपना चन्दा भेजकर आरम्भ करालें। वार्षिक चन्दा 6-रु. मात्र है।
(6) इन दिनों सुरक्षात्मक कार्यों में देश-व्यापी प्रेरणा भरने के लिये हमारे कन्धों पर नये उत्तरदायित्व आ गये हैं। देश को मजबूत बनाने के अन्य विशिष्ट कार्यों में भी हमें लगना पड़ रहा है। इसलिये शीत ऋतु में शाखाओं के दौरे स्थगित कर दिये हैं। इन दिनों हमें बुलाने के लिये आग्रह न किया जाय। जब थोड़ा-सा भी अवकाश मिलेगा, दौरे का प्रोग्राम हम स्वतः बनावेंगे और जिनके आमन्त्रण थे तथा स्वीकृतियाँ दे चुके थे, उनका पहले ध्यान रखेंगे।
(7) साधारण स्थिति होने पर, माघ सुदी प्रतिपदा से पूर्णिमा तक पन्द्रह दिन का शिक्षण एवं साधना शिविर होने वाला था, वह आपत्तिकालीन परिस्थितियों के कारण न होगा। आगामी शिविर परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर जेष्ठ में ही होगा।
(8) रामायण के माध्यम से युग-निर्माण की विचारधारा के अनुकूल प्रवचनों की सामग्री जुटानी और छापनी है। अखण्ड ज्योति परिवार के जिन सदस्यों का रामायण के सम्बन्ध में इच्छा एवं गम्भीर अध्ययन, मनन, चिन्तन हो वे हमें अपनी जानकारी की सूचना दे दें, ताकि उनके परामर्श एवं सहयोग से उपरोक्त प्रकार के भाषण तैयार करने का कार्य आरम्भ किया जा सके।
(9) कुछ दिन पूर्व अखण्ड-ज्योति प्रेस में यज्ञोपवीत से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति पुस्तक छपी थी, उसकी एक प्रति भी हमारे पास नहीं है। यदि पाठकों में से किसी के पास हो तो भेज दें। उसके बदले में उसी विषय की बड़ी पुस्तक हम भेज देंगे।
(10) व्यक्तिगत पत्र व्यवहार से उत्तर के लिए जवाबी पत्र भेजने की कृपा अवश्य करनी चाहिये। व्यक्तिगत पत्रों का पोस्टेज अब इतना अधिक होने लगा है कि उस भार को वहन करना हमारे लिये कठिन पड़ता है। हर पत्र में अपना पूरा पता लिखना आवश्यक है। पूरा पता न होने पर कितने ही पत्र नित्य ही बिना उत्तर दिये रह जाते हैं।
पुराने सदस्यों से अखण्ड-ज्योति एवं युग-निर्माण पत्रिकाओं का चन्दा वसूल करने एवं दोनों के नये सदस्य बनाने का ठीक यही समय है। सक्रिय सदस्य थोड़ा समय निकालकर दो-दो, चार-चार की टोलियाँ बना लें और इस कार्य में जुट जायें। धीरे-धीरे देर में चन्दा भेजने से पुराने अंक समाप्त हो जाते हैं और बीच के महीनों से ग्राहक बनना पड़ता है। ग्राहकों का वार्षिक शुल्क वसूल करने की रसीद बहियाँ छपा ली गई हैं। सक्रिय सदस्य उन्हें मँगा लें और अपने यहाँ का चन्दा वसूल कर भिजवादें।
(6) पुस्तकें मँगाने के नियमों में गतवर्ष से जो परिवर्तन हुआ है, उसे ध्यान में रखना चाहिए। अब डाकखर्च माफ होने का नियम बिलकुल समाप्त कर दिया गया है। वह हर हालत में मँगाने वाले को देना होगा।
नई व्यवस्था के अनुसार मँगाने वालों को कमीशन देने की नई सुविधा आरम्भ कर दी गई है जो इस प्रकार है। (1) 10- से कम की पुस्तकें लेने पर कुछ भी कमीशन नहीं। (2) 10- से 99- तक की पुस्तकें लेने पर 15 प्रतिशत। (3) 100- से अधिक की पुस्तकें लेने पर 25 प्रतिशत। (4) 5- से कम की वी0पी0 नहीं भेजी जाती है। बहुत छोटे ऑर्डर वालों को पुस्तकों के मूल्य के अतिरिक्त 1.5- पोस्टेज भी मनीऑर्डर से भेजना चाहिये। (5) अखण्ड-ज्योति या युग-निर्माण पत्रिकाओं के चन्दे पर किसी को कोई कमीशन या रिआयत नहीं मिलती।
संस्कार एवं पर्वों का सुनियोजित ढंग से मनाया जाना और ऐसे अवसरों पर आवश्यक लोक-शिक्षण होना युग-निर्माण आन्दोलन का आवश्यक अंग है। अस्तु इन्हें व्यापक बनाना और इनके विधि-विधान से सर्वसाधारण को परिचित कराया जाना भी अभीष्ट है। इस प्रयोजन के लिये “अभिनव संस्कार पद्धति” मूल्य 2 रुपया 50 नये पैसे और “पर्वों की प्रेरणा और पद्धति” मूल्य 3 रुपया की दो पुस्तकें छापी गई थीं। उन ग्रन्थों में संस्कार एवं पर्वों का हर बार सभी में काम आने वाला विधान एक जगह और उन अवसरों पर प्रयुक्त होने वाले विशेष विधान पृथक प्रकरणों में थे। थोड़े क्रिया-कुशल व्यक्तियों के लिए उसे समझ लेना कुछ भी कठिन नहीं है, फिर भी नया विषय होने के कारण उस विषय से अपरिचित लोगों के लिए कुछ कठिनाई हो रही और यह माँग की गई कि हर पर्व और हर संस्कार की अलग-अलग ऐसी पुस्तकें हों, जिनमें कुछ समझने सोचने की आवश्यकता न पड़े और अजनबी भी उन पुस्तकों को खोलकर पर्व या संस्कार करा सके।
इस माँग के अनुरूप हर संस्कार, पर्व की अलग-अलग पुस्तकें तो नहीं, पर दो-दो को मिलाकर एक-एक छोटी पुस्तक छपा दी गई है। आयोजन करते समय उपस्थित सुशिक्षितों के पास एक-एक पुस्तक हो तो सभी साथ-साथ मन्त्रोच्चारण करके उस क्रिया-कलाप की शोभा बहुत ही अच्छी रीति से बढ़ा सकते हैं।
पर्व पुस्तकें
(1)श्रावणी पर्व विधान मूल्य 50 नये पैसे
(2)पितृ-अमावस्या पर्व विधान मूल्य 40 नये पैसे
(3)विजया-दशमी और दीपावली पर्व मूल्य 50 नये पैसे
(4)गीता-जयन्ती और बसन्त पंचमी पर्व मूल्य 40 नये पैसे
(5)शिवरात्रि और होलिका पर्व विधान मूल्य 50 नये पैसे
(6)गायत्री-जयन्ती और गुरु पूर्णिमा पर्व मूल्य 40 नये पैसे
संस्कार पुस्तकें
(7)पुँसवन और नामकरण संस्कार मूल्य 40 नये पैसे
(8)अन्न-प्राशन चूड़ाकर्म और विद्यारम्भ मूल्य 40 नये पैसे
(9)यज्ञोपवीत और वानप्रस्थ संस्कार मूल्य 40 नये पैसे
(10)विवाह संस्कार मूल्य 50 नये पैसे
(11)मरणोत्तर और अंत्येष्टि संस्कार मूल्य 50 नये पैसे
(12)जन्म-दिवसोत्सव, विवाह-दिवसोत्सव मूल्य 50 नये पैसे
आयोजनों के अवसरों पर सामान्यतया दस-दस प्रतियाँ इन पुस्तकों की हों तो उतने व्यक्ति मन्त्रोच्चारण करके उत्सव की शोभा और प्रेरणा को बहुत बढ़ा सकते हैं।
पता :- अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा
जन-जीवन की मनोभूमि में उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समावेश करने के लिए बीस नया पैसा सीरीज की अत्यन्त सस्ती ट्रैक्ट माला का आरम्भ किया गया है। इसकी पहली किस्त गत जून मास में 10 “विवाहोन्माद विरोधी” पुस्तिकाओं के रूप में प्रकाशित की गई थी। हिन्दू समाज में फैले हुए विवाहों के नाम पर उन्माद पर गहरी चोट इन पुस्तिकाओं ने की है।
अब दूसरी किस्त 20 नये ट्रैक्टों की इस मास प्रकाशित हुई है। प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों पर इन ट्रैक्टों में और भी अधिक करारे प्रहार किये गये हैं। नव-निर्माण के लिये हमें अपनी एक-एक त्रुटियों और दुर्बलताओं को ढूँढ़ना होगा और उनमें से हर एक का कठोरतापूर्वक उन्मूलन करना होगा। इस दिशा में यह 20 पुस्तकों का सैट सब प्रकार उपयोगी सिद्ध होगा। इस मास प्रकाशित 20 ट्रैक्टों के नाम नीचे दिये गए हैं। मूल्य प्रत्येक का 20-20 नया पैसा है।
(1) हम भाग्यवादी नहीं, कर्मवादी बनें!
(2) अन्ध-विश्वासों से लाभ कुछ नहीं, हानि अपार है।
(3) ब्राह्मण अपना उत्तरदायित्व सँभालें!
(4) साधु की महान् परम्परा और जिम्मेदारी
(5) आलस छोड़िए- परिश्रमी बनिए!
(6) अन्ध-विश्वासी नहीं, विवेकशील बनिए!
(7) भिक्षा-व्यवसाय, देश और समाज का कलंक
(8) मन्दिर जन-जागरण के केन्द्र बनें!
(9) उनसे- जो पचास वर्ष के हो चले।
(10) स्वच्छता- मनुष्य का प्रथम गुरुमन्त्र
(11) दर्शन तो करें- पर इस तरह
(12) पक्षपात त्यागें, औचित्य अपनावें!
(13) माँसाहार मानवता के विरुद्ध है!
(14) तमाखू- एक भयानक दुर्व्यसन
(15) प्राणियों के प्रति निर्दयता न करें!
(16) मृतक भोज की क्या आवश्यकता?
(17) अपव्यय का ओछापन
(18) अशिष्टता न कीजिए!
(19) ईमानदारी का परित्याग न करें!
(20) नारी को तिरस्कृत न किया जाय।
‘विवाहोन्माद विरोधी’ गत जून में प्रकाशित ट्रैक्टों के नाम निम्नलिखित हैं। मूल्य इनका भी बीस-बीस नया पैसा है।
(1) आदर्श-विवाहों का प्रचलन कैसे हो?
(2) इस हृदय-द्रावक स्थिति को कब तक सहा जाएगा?
(3) विवाह के आदर्श और सिद्धान्त
(4) विवाहोन्माद के लिये बुद्धि बेच क्यों दी जाय?
(5) यह कुरीतियाँ मिट रही हैं और मिटेंगी!
(6) आदर्श-विवाहों की रूप-रेखा
(7) तीन दिन का सत्यानाशी विवाहोन्माद
(8) विवाह-शादियों का असह्य अपव्यय
(9) विवाह का वातावरण धर्मानुष्ठान जैसा रहे!
(10) प्रगतिशील जातीय संगठनों की आवश्यकता।
इस प्रकार अब तक कुल 30 ट्रैक्ट प्रकाशित हो चुके हैं। जेष्ठ तक 30 ट्रैक्ट और भी इस सीरीज के अंतर्गत छप जाने की आशा है। यह ट्रैक्ट हममें से हर एक के पास रहने चाहिए। इन पुस्तकों से धीरे-धीरे घर में एक ऐसे पुस्तकालय का सृजन होता चलेगा जो उस परिवार के निर्माण में महत्वपूर्ण योग देगा। इन पुस्तकों को अपने परिचित लोगों को पढ़ने देने और वापिस लाने का धर्म-प्रचार कार्य भी हममें से हर एक को करना चाहिए।
एक घन्टा समय और एक आना नित्य नव-निर्माण के लिए खर्च करते रहने का जो संकल्प परिवार के सक्रिय सदस्यों ने किया है, उसका उपयोग इन ट्रैक्टों को मँगा कर अपनी घरेलू लाइब्रेरी स्थापित करने एवं उन पुस्तकों को अधिकाधिक लोगों को पढ़ाने-सुनाने के लिए करना चाहिए। आशा है अखण्ड-ज्योति के सभी सदस्यों के घरों में युग-निर्माण पुस्तकालय स्थापित किये जायेंगे और उसके लिये इन ट्रैक्टों से शुभारम्भ किया जायगा।
अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री-उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री उपासना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ-प्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
गायत्री महाविज्ञान (तीनों भाग)
प्रथम भाग- गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज-मन्त्रों का साधना विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मूल्य 3.50।-
द्वितीय भाग- गायत्री द्वारा वाममार्गी तान्त्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री उपनिषद्, गायत्री रामायण, गायत्री हृदय, गायत्री पञ्जर, गायत्री लहरी, गायत्री सहस्रनाम आदि का संग्रह। मूल्य 3.50।-
तृतीय भाग- गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों की साधना विषय विधान। जप-योग, प्राण-योग, शब्द-योग, नादयोग, हठयोग, कुण्डलिनी योग, षट्चक्र-बेधन की समस्याएं तथा अन्नमय-कोष, मनोमय-कोष, प्राणमय-कोष को सिद्ध करने के रहस्यमय मार्ग का दिग्दर्शन। 3.50।-
2. गायत्री यज्ञ विधान (दोनों भाग)
प्रथम भाग- गायत्री यज्ञ का विधान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, अस्त्र एवं विज्ञान के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मूल्य 2।- रुपया।
द्वितीय भाग- गायत्री यज्ञ करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया, जलयात्रा, मण्डप प्रवेश, वेदी पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति मन्त्र, पूर्णाहुति, वसोधारा, घृत अवघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि विधान, जिसे समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मूल्य 2।- रुपया।
गायत्री चित्रावली
विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता का ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन।
गायत्री का मन्त्रार्थ
अनेकों ग्रन्थों में, अनेकों ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेक प्रकार से किए हुए अर्थों का संग्रह, राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें हैं।
नोट- डाक खर्च हर हालत में पुस्तकें मंगाने वालों को ही देना होगा। हाँ 10।- से अधिक की पुस्तकें मँगाने पर 15 प्रतिशत कमीशन मिलता है।
पता :- अखण्ड-ज्योति प्रेस, मथुरा
न देखो इस कौतुक को और, अन्त है इसका घोर विनाश।
भला कुछ भौतिकता में नहीं, नहीं कुछ इसमें आत्म-विकास॥
बढ़ रहा दम्भ, द्वेष, पाखण्ड, छल, स्वार्थ, अत्याचार।
रक्त भाई का पीने आज, खड़ा है भाई ही तैयार॥
मरुस्थल हुआ मनुज का हृदय, कहाँ वह दया, प्रेम-व्यवहार।
सत्य, सौजन्य, स्नेह, सम्मान, शील और सदाचार, आहार॥
धर्म ने पाया कारावास- कैद हो गया आज भगवान।
रूप, धन और यौवन पर आज, खो रहा सारा जग ईमान॥
शक्ति, साहस, आशा, आनन्द, दुराग्रह की कारा में बन्द।
चतुर्दिक फैला है पतझर, धरा का खोया मधु मकरंद॥
प्रश्न है जैसे टेढ़ी खीर, समस्या लगती बड़ी दुरन्त।
विश्व के परित्राण का कहीं, दिखाई देता आदि न अन्त॥
अँधेरे जग को देगा कौन, ज्ञान का शुचिता का आलोक।
ग्रस्त विपदाओं में आकंठ, विश्व के कौन हरेगा शोक॥
पुण्य का जागे मधुर विहान, विश्व का हो पावन उत्कर्ष।
विश्व तो है यह कल की बात, आज तो जागे भारतवर्ष॥
यहाँ पर जब जब जली मशाल-ज्ञान की, जागा जब जब धर्म। विश्व ने ली सन्तोषी-साँस, मिटा है तब तब घोर अधर्म॥
मुक्त हो चुके तुम्हारे पाँव, हुये कुछ बढ़ने की स्वच्छन्द। किन्तु जकड़े हैं अब भी हाथ, घिरे अब भी सामाजिक द्वन्द्व॥
मुक्ति इन सब से पाने चलो, करें हम सब मिल कर विद्रोह। जगायें अपना पौरुष आज, शक्ति का स्वयं करें संदोह॥
तुम्हारे ऊपर यह दायित्व, काल की दिशा मोड़नी है।
उठो अब नहीं चैन का वक्त, अभी हथकड़ी तोड़नी है॥
-बलराम सिंह परिहार
जिन्हें जीवन से रुचि है, जो यह चाहते हैं कि वे मानव-जीवन को मनुष्य के अनुरूप ही व्यतीत करें वे अपने अन्दर की शक्तियों को पहचानें, उन पर विश्वास करें और उन्हें अपने अनुकूल उपयोगी बनाने के प्रयत्न में लग जायें।
जीवन को ऊँचा उठाना और सुन्दर से सुन्दर बनाना ही मानव जीवन का लक्ष्य है! निरुद्देश्य जीवन बिताने में न तो कोई शोभा है और न श्रेय ! निर्लक्ष्य जीवन बिताना तो पशुओं को भी आता है।
मनुष्य जीवन एक ईश्वरीय प्रसाद है, उपहार है। उसका अनादर करना परमात्मा का अपमान करना है। किसी काम के लिए पाये हुए एक छोटे से उपहार को मनुष्य आजीवन सजाकर और संजो कर रखता है। उसे देख-देखकर हर्षित और गर्वित होता है। तब न जाने किस कारण मानव जीवन जैसे अनिवर्चनीय उपहार की अवहेलना मनुष्य करता रहता है। क्या इसलिए कि यह उसे करुणाकर भगवान् द्वारा सहज ही में प्राप्त हो गया है। जीवन खोकर जीवन का मूल्य समझने वालों को युगों तक पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता।
-सेन्टपाल
*समाप्त*