ईश्वर ने हमें अपनी सर्वोत्कृष्ट कृति के रूप से विनिर्मित किया है। वह अविश्वस्त एवं अप्रमाणिक नहीं हो सकता, इसलिए हमें अपने ऊपर विश्वास करना चाहिये। ईश्वर हमारे भीतर निवास करता है। जहाँ ईश्वर निवास करे, वहाँ दुर्बलता की बात क्यों सोची जानी चाहिए? जब छोटा-सा शस्त्र या पुलिस कर्मचारी साथ होता है, तो विश्वासपूर्वक निश्चिन्त रह सकना सम्भव हो जाता है, फिर जब कि असंख्य वज्रों से बढ़ कर शस्त्र और असंख्य सेनापतियों से भी अधिक सामर्थ्यवान् ईश्वर हमारे साथ है, तब किसी से डरने या आतंकित होने की आवश्यकता ही क्यों होनी चाहिए।
जो अपने ऊपर भरोसा करता है, उसी का दूसरे लोग भी भरोसा करते हैं। जो अपनी सहायता आप करता है, उसी की ईश्वर भी सहायता करता है। जिसने अपने हाथ पैर चलाना बन्द कर दिया, उसका डूबना निश्चित है। हो सकता है कि किसी निष्ठावान को भी कभी असफल होना पड़ा है पर संसार में आज तक जितने सफल हुए हैं, उनमें से प्रत्येक को आत्म विश्वासी बनकर ही आगे बढ़ना पड़ा है। हो सकता है किसी किसान की फसल मारी जाय, पर जिसे धान काटने का सौभाग्य मिला है, उनमें से प्रत्येक को बोने और सींचने की कठोर प्रक्रिया को अपनाना ही पड़ता है। आत्म-विश्वास शक्ति का स्रोत है। उसी के सहारे किसी के लिए आगे बढ़ना सम्भव हो सकता है। भाग्य का निर्माण ईश्वर नहीं, आत्म-विश्वास करता है। जो निष्ठापूर्वक पुरुषार्थ में संलग्न है और हार-जीत की चिन्ता न करते हुए आगे ही बढ़ता जाता है, उस आत्म-विश्वासी के लिए पर्वतों को भी रास्ता देना पड़ता है।
- ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
मनुष्य के मस्तिष्क की रचना कुछ इस प्रकार हुई है कि उसमें जिस प्रकार के विचार आयेंगे, वैसा ही आचरण और शरीर पर प्रभाव पड़ेगा। विचार-भावनाओं के अनुरूप ही मनुष्य का निर्माण होता है। विचार शक्ति के द्वारा ही उसके जीवन में उतार-चढ़ाव और परिवर्तन होते हैं। अच्छे विचारों से बुरे विचारों को दबाया जा सकता है। इस प्रकार यह मनुष्य की विशेषता है कि वह जैसा जीवन निर्मित करना चाहे, अपने विचार, अपनी भावनाओं के परिष्कार द्वारा वैसा ही कर सकता है।
वैराग्य भावना में निस्संदेह बड़ी शक्ति है। बुरे से बुरे संस्कार वैराग्य के बादलों से धुलते देखे गये हैं। कामासक्त तुलसीदास, दुष्ट दुराचारी बाल्मीक, हिंसक व्याध और अंगुलिमाल जैसे व्यक्तियों के हृदय में जब वैराग्य भावना का प्रवाह उमड़ा तो उनके जीवन की धारायें ही बदल गईं। सारे के सारे सन्त, महात्मा और महान् पण्डित बन गये।
विचार, भाव तथा क्रिया में अत्यन्त सूक्ष्म ग्रहण शीलता रखते हुये साँसारिक विषयों के प्रति निरपेक्ष बने रहने का नाम वैराग्य है। संक्षेप में राग द्वेष के बन्धनों से मुक्त होना ही वैराग्य है। यह भी कह सकते है कि वैराग्य उस अवस्था या स्थिति का नाम है, जब मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ विभिन्न भावों से हटकर चिर सत्य की ओर जागृत हों। इन भावनाओं की शक्ति और सामर्थ्य की थाह पाना निश्चय ही कठिन बात है, क्योंकि जिस किसी के जीवन में भी इन भावनाओं का उदय हुआ, उनका तीव्र विरोध, उपहास और साँसारिक विषय, विकार कुछ कर नहीं पाये। षट-विकारों के शमन का भी श्रेष्ठ उपाय वैराग्य भावनाओं को ही मान सकते हैं। वैराग्य द्वारा ही सात्विक कार्य सम्पन्न होते हैं। वैराग्य का अर्थ है- त्याग, समर्पण, विवेक और सत्य के प्रति श्रद्धा की अनन्य भावना। इस प्रकार वैराग्य में वह सम्पूर्ण शक्तियाँ सन्निहित हैं, जिनमें मनुष्य अपने जीवन में सन्तुलन बनाये रख सकता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर इन विकारों को काबू में रखने का सरल और प्रभावशाली मार्ग यही है कि जब कभी ऐसे आवेश आयें, तब उन्हें दूर हटाने के लिये वैराग्यपूर्ण चिन्तन करने लग जायें। तभी आत्मग्लानि और शरीर, मन और वाणी के शक्ति -विनाश से बच सकते हैं, तभी तत्परता पूर्वक अपने जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ते रह सकते हैं।
षट-विकारों में वासना का प्रहार सबसे अधिक तीव्र और मन को हिला देने वाला है। जब यह भाव मनुष्य के अंतर्मन में प्रविष्ट हो जाता है तब उसकी शक्ति और भी बड़ा रूप ले लेती है। यह विकार प्रस्फुटित होकर मनुष्य के आचरण को दूषित करता है, इसलिये उससे बचाने के लिये आध्यात्मिक चिन्तन-मनन, पूजन, कथा-कीर्तन प्राकृतिक दृश्यों से अनुराग, भ्रमण आदि अनेकों साधन काम में लाये जा सकते हैं। पर इतने से यह आशा नहीं की जाती कि आप का आवेश रुक गया या आग फिर कभी न उठेगी। अंतर्मन में प्रस्तुत कामुक चेष्टायें संयोग पाते ही उठ खड़ी होंगी और इच्छा न होते हुये भी आपको विभ्रमित करने लगेंगी।
जब कभी ऐसी अवस्था आये तो आप वैराग्य भावना का सहारा लीजिये। आप कल्पना कीजिये कि जिस स्त्री के हाव-भाव और अंग प्रत्यंगों को देखने से आपकी कामुकता जागृत हो रही है, वह इस समय मर चुकी है। यह उसकी लाश है जो आपके सामने खड़ी है। अभी चील कौवे और सियार आते हैं और इस शरीर को वे अपना भोजन मानकर उसे चीरने फाड़ने का काम शुरू कर देते हैं। छिः यह क्या, माँस, हड्डियाँ, आँतों में जमा हुआ मल, मूत्र-क्या इसी सबके लिये मेरी वासना जागृत हुई है? क्या इन हाड़-मांस के ऊपर चढ़ी हुई सुनहली पन्नी के ऊपर हम अपनी शक्ति, और ओज समाप्त कर देंगे।
आप जितना भावनात्मक गहराई तक उतर सकें उतरें। आप को यथार्थ ज्ञान मिलेगा, शक्ति मिलेगी और इस दूषित विकार के आघात से बड़ी आसानी के साथ बच जायेंगे। शरीर की नश्वरता और आत्म-ज्ञान की प्रबल जिज्ञासा का भाव जितनी शक्ति और-क्षमता के साथ आप उठायेंगे, उतना ही वैराग्य भाव उमड़ता हुआ चला आयेगा। मैं अपने जीवन को इन तुच्छ बातों में नहीं गंवाऊंगा, न जाने कब विनष्ट हो जाने वाले शरीर के प्रति मैं भला क्यों आसक्त होऊँ, मैं आत्मा हूँ, अपने मूल स्वरूप को जानना ही मेरा लक्ष्य है। इस प्रकार के अनेकों विचार आप तर्क और प्रमाण के साथ उठाते चले आइये, निश्चय ही आपकी कामुकता का आवेश आपको छोड़कर भाग जायेगा। आपके जी में “मातृवत् परदारेषु” का सुन्दर भाव उमड़ता हुआ चला जायेगा, आगे आन्तरिक दृष्टि से आनन्दित हो उठेंगे और जो विचार अभी थोड़ी देर पहले आपको आक्रान्त कर रहा था, वह न जाने कहाँ विलुप्त हो जायेगा।
वासना का प्रभाव मनुष्य के जीवन में आँधी-तूफान की तरह होता है, इससे बचने के लिये सिनेमा, नाटक, अभद्र प्रदर्शनों से तो बचें ही, बुद्धि विवेक और सद्विचार भी ठीक रखें और इसे वैराग्य पूर्ण भावनाओं के द्वारा भी निवारण करें।
क्रोध की अवस्था भी ठीक ऐसी ही होती हैं। संसार में ऐसा कोई भी पाप नहीं जो क्रोधी व्यक्ति न कर सकता हो। क्रोध को पाप का मूल कहकर पुकारा जाता है। यह भी एक आवेश में आता है और अनेकों अनर्थ उत्पन्न करके ही समाप्त होता है। पीछे उन पर भारी दुःख तथा पश्चात्ताप होता है। इससे बचने के पूर्व-अभ्यास के रूप में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, सौजन्यता, सहिष्णुता और उदारता आदि भावों को विकसित करें तो ठीक है, किन्तु यदि फिर भी कदाचित ऐसा अवसर आ जाये तो आप पुनः वैराग्यपूर्ण भावनाओं का स्मरण कीजिये। आप विचार कीजिये, आप जिसे दण्ड देना चाहते हैं, जिस पर आपको क्रोध आ रहा है, वह यदि आप होते तो आप पर कैसी बीतती। मान लीजिये आपने ही वह गलती कर डाली होती और कोई उसका दण्ड आपको दिया जा रहा होता तो आपके शरीर में कितनी पीड़ा छटपटाहट हो रही होती। यह भाव उठते ही आपके हृदय में करुणा का भाव उत्पन्न होगा। आप सोचेंगे कि दण्ड देना अनुचित है। दूसरों को पीड़ा न देना ही मानव धर्म है। आपका क्रोध पराभूत हो जायगा और आप उसके विषैले प्रभाव से बच जायेंगे। कोई भी प्रतिशोध-जनक प्रतिक्रिया उठने से बच जायेगी।
क्रोध के प्रतिरोध में उत्पन्न वैराग्य भावनाओं से ईर्ष्या, दुश्चिन्ता और संघर्षपूर्ण विचार समाप्त होते हैं और प्रेम, दया तथा मैत्री भाव जागृत होते हैं। इन भावनाओं से क्रोध की उत्तेजना समाप्त हो जाती है।
धन की तृष्णा भी मनुष्य के जीवन में वैसी ही जड़ता उत्पन्न करती है, जैसी काम और क्रोध। पराया माल छीनने, हड़पने और चोरी कर लेने तथा दूसरों की कमाई का उचित पारिश्रमिक न देने की बात किसी भी प्रकार मानवीय नहीं कही जा सकती। इससे मनुष्य का घोर आन्तरिक पतन होता है। आप विचार कीजिये कि आप जब श्रम-पूर्वक धन कमाते हैं और उसका कुछ हिस्सा कहीं गिर जाता है या कोई उसे उठा ले जाता है, तो आपको कितना दुःख होता है। फिर इस धन से मनुष्य का जीवन लक्ष्य भी तो पूरा नहीं होता। क्या यह पाप की कमाई अपने बाल-बच्चों के लिये छोड़कर उन्हें भी आलसी और अकर्मण्य बनाना चाहते हैं? जो धन आपकी लाश के साथ आपके साथ जाने वाला नहीं है, उसको आप अनाधिकार पूर्वक क्यों प्राप्त करना चाहते हैं? आप उससे बँधे क्यों जा रहे हैं? इस धन के लोभ में पड़कर आप अपनी आत्मा, अपने जीवन लक्ष्य की बात ही भूल जायेंगे, फिर ऐसे धन से लोभ कैसा? प्रीति कैसी? छोड़िये इसे। जो कुछ परिश्रम से कमाया है उतने में ही बड़ा आनन्द है। धन का बखेड़ा बढ़ाने की अपेक्षा निर्धन होना, आत्म-धन प्राप्त करना कहीं अधिक श्रेष्ठ व श्रेयस्कर है। हम कभी इस परम आदर्श से विचलित नहीं होंगे। इस प्रकार आप अधर्म की कमाई और अनावश्यक लोभ वृत्ति से निकल सकेंगे।
मनुष्य की सबसे अधिक दीन-हीन अवस्था उस समय दिखाई देती है, जब यह छोटी-छोटी बातों के लिये अनुचित आसक्ति या मोह भाव प्रदर्शित करता हैं। छोटी-सी चीज के टूट-फूट जाने से आप कितने परेशान हो उठते हैं। टूटे-फूटे बर्तन कपड़ों और अनेकों अनावश्यक वस्तुओं से आपका इतना अधिक लगाव आखिर क्यों हैं? संसार की सभी सम्पत्तियों में शरीर का महत्व ही सर्वाधिक है। इसी से उपभोग करते हैं। और स्वामित्व प्रकट करते हैं? इसका भी तो एक दिन विनाश हो जाता है। जिसके उपभोग और स्वामित्व के लिये आप यह मोह कर रहे हैं, जब उसी को नहीं रहना, तो क्या करेंगे आप इन नाचीज वस्तुओं का संग्रह करके। इनके टूट-फूट जाने, सड़ने गलने से आप इतना दुःखी क्यों हो जाते हैं? दुःख करना ही है तो सोचिये आपने अभी तक मानव सुलभ साधनों का आत्मविकास में कितना उपयोग किया? अपने जीवन लक्ष्य की ओर आप कितना बढ़ सकें हैं? क्या आप अपने आपको पहचान सके हैं? नकारात्मक उत्तर मिलने से आपका जी दुःखी होगा। जिस प्रकार अब तक हजारों आदमी इस संसार में मर-खप गये, उसी प्रकार हमारा भी शरीर-साधन व्यर्थ गया, तो कहाँ रही इसमें अपनी बुद्धिमत्ता। आपकी सफलता इसी में सन्निहित है कि आप अनुचित और छोटी-छोटी वस्तुओं के प्रति मोह का भाव त्यागिये, ताकि आपकी शक्तियाँ आध्यात्मिक जीवन की ओर उन्मुख हो सकें।
मनुष्य के विनाश का सबसे प्रबल कारण है उसका अहंकार। मैं ही सब कुछ हूँ, मेरा विचार ही सबसे अच्छा है, मैं ही सबसे अधिक सुन्दर हूँ, मैं धनी हूँ, मैं पण्डित हूँ आदि अहंकारिक भावों के कारण संसार में कलह झंझट युद्ध और महायुद्ध की विभीषिकायें उठ खड़ी होती हैं। क्या यह अभिमान सार्थक हो सकता है? नहीं। रावण, दुर्योधन, कंस, हिरण्यकश्यप, नैपोलियन, सिकन्दर आदि अहंकारी पुरुषों ने आखिर क्या लाभ उठाया? उन्हें भी हाथ मलते ही इस संसार से विदा होना पड़ा, फिर आपकी क्या भला बिसात? आप से अधिक तो इसी धरती में ही अनेकों रूपवान, धनवान, शक्ति और सामर्थ्यवान् विद्यमान् हैं, फिर यह अहंकार आपका क्या प्रयोजन हल कर सकता है? आध्यात्मिक विकास की सबसे बड़ी बाधा मनुष्य के अहंकारपूर्ण विचार ही होते हैं। संसार की क्षणभंगुरता को हमेशा ध्यान में बनाये रखने से ही यह सम्भव है कि मनुष्य इस दुष्प्रवृत्ति से बचा रह सके।
इसी प्रकार मत्सर अर्थात् ईर्ष्या और डाह का भाव भी मनुष्य के अधःपतन का कारण होता है। मनुष्य की उन्नति, उसकी शक्ति और परिस्थितियों के अनुसार कम ज्यादा होती ही है। अपनी शक्तियों का विकास मानवोचित ढंग से करें, तो इससे किसी का अहित नहीं होता। पर जब दूसरों की समृद्धि देखकर लोग ईर्ष्या-द्वेष रखने लगते हैं, तो वहीं वैयक्तिक और सामूहिक आत्मिक पतन प्रारम्भ हो जाता है। मनुष्य का जीवन इसलिये नहीं मिला। हमें सेवा, सत्कार, प्रेम, दया, न्याय आदि के विकास के लिये साधन स्वरूप यह शरीर उपलब्ध होता है। इसे प्राप्त कर होड़ करें तो तो चारित्रिक श्रेष्ठता की,
सत्यं ब्रह्मा देवाः सत्यमेवोपासते।
- वृहदारण्यक 5। 5। 1
सत्य ही ब्रह्म है। देवता सत्य की ही उपासना करते हैं।
न संदृशे तिष्ठति रुपमस्य
न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम्
हदा हृदिस्थं मनसा य एन-
मेवं विदुर मृतास्ते भवन्ति।
-श्रोताश्रतरोपनिषद् 4। 20
उस परमात्मा का रूप आँखों के आगे नहीं ठहरता। उसे कोई आँखों से नहीं देख सकता। साधक उस अन्तर्यामी को भक्तिपूर्वक हृदय में स्थित देखते है और अमर हो जाते हैं।
ताकि अपना जीवन उद्देश्य भी पूरा हो, लोगों को प्रसन्नता-मिले और सामाजिक जीवन में खुशहाली लाने में अपना भी कुछ उपयोग हो । यदि यह न कर सके तो मनुष्य शरीर और पशुओं के शरीर में अन्तर ही क्या रहा। विवेक से मन पराकाष्ठा को पहुँचता है और इसी अवस्था में वैराग्य द्वारा उसका सन्तुलन होता है। इसलिये षट-विकारों के शमन और आध्यात्मिक आस्था प्रबल करने के लिये वैराग्य पूर्ण भावनायें बड़ी उपयोगी सिद्ध होती हैं। वैराग्य से मनुष्य का जीवन उन्नत होता है और अनेकों आध्यात्मिक अनुभूतियाँ प्राप्त होती हैं।
अनीश्वर-वादियों का कथन है कि विज्ञान द्वारा ईश्वर सिद्ध नहीं होता तो हम उसे क्यों मानें? विचारणीय बात यह है कि क्या हम केवल उन्हीं बातों को मानते हैं, जो प्रत्यक्ष या विज्ञानसम्मत हैं? जीवन के कितने ही आदर्श और तथ्य ऐसे हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध अन्तरात्मा से है। नीति-शास्त्र का आधार यही है। धर्म, सदाचार, नीति, कर्तव्य, परमार्थ आदि को विज्ञान की कसौटी पर यदि कसा जाय, तो यह सभी कुछ व्यर्थ प्रतीत होगा और मनुष्य को पशु की तरह आचरण करना ठीक प्रतीत होगा।
विज्ञान के द्वारा ईश्वर को सिद्ध या असिद्ध करने का प्रयत्न हास्यास्पद है। जिसे विज्ञान कहा जाता है- वह वस्तुतः पदार्थ-विज्ञान है। पदार्थों के बारे में खोज करना, पदार्थों से जीवनोपयोगी प्रयोजन सिद्ध करना, इस भौतिक विज्ञान की मर्यादा है। इसके अतिरिक्त वह अधिक सूक्ष्म तत्वों तक पहुँच सकने में असमर्थ है।
नीति, शास्त्र, सदाचार, त्याग, बलिदान, परोपकार, संयम जैसे आवश्यक विषयों में विज्ञान की कोई पहुँच नहीं। यदि इन विषयों को विज्ञान के आधार पर हल किया जाय तो उन उपयोगी मान्यताओं को त्यागना पड़ेगा जो मानवीय सामाजिक जीवन के लिए मेरुदण्ड के समान आवश्यक हैं।
विज्ञान की दृष्टि में नर और मादा का यौन सम्बन्ध स्वाभाविक है। उसमें बहिन, पुत्री या माता का कोई विचार नहीं होता। जब सृष्टि के अन्य सभी जीव-जन्तु अपनी बहिन, पुत्री या माता के साथ यौन-सम्बन्ध करने में कोई संकोच नहीं करते, तो मनुष्य ही क्यों करें? इस प्रतिबन्ध का, इन मर्यादाओं का विज्ञान समर्थन नहीं करता, वरन् उन्हें व्यर्थ बताता है। यदि विज्ञान की कसौटी पर यौन-सदाचार व्यर्थ सिद्ध होता है, तो क्या हम उसकी व्यर्थता स्वीकार कर लेंगे और पशुओं की तरह बहिन, पुत्री, माता की मर्यादा को छोड़ देने के लिए उद्यत होंगे?
विज्ञान के अनुसार जीव, जीव का भोजन है। प्रत्येक प्राणी के लिए अपना स्वार्थ ही प्रधान है। फिर त्याग, बलिदान, उदारता, दान, सेवा और परोपकार का महत्व कहाँ रहेगा? जीवधारियों के गुण-धर्म के बारे में विज्ञान की कसौटी प्राणी की स्वाभाविक प्रवृत्ति ही है। सभी जीवों को अपनी क्षुधाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिए जो भी अवसर मिलता है, उससे बिना उचित-अनुचित का विचार किए लाभ उठाते हैं, फिर मनुष्य भी यदि वैसा ही करता है तो उसमें क्या अनुचित है? स्वार्थपरता एवं स्वच्छंद भोगवाद का विरोध विज्ञान के द्वारा नहीं हो सकता, वरन् उसके आधार पर तो समर्थन ही करना पड़ेगा। ऐसी दशा में क्या हम विज्ञान को ही सब कुछ मानकर-परमार्थ की प्रवृत्ति को मानव-जीवन से बहिष्कृत करने को तत्पर होंगे? और यदि होंगे तो क्या उसके फलस्वरूप किसी सत्परिणाम की आशा करेंगे?
विज्ञान बताता है कि मौत से हर प्राणी डरता है, बचता है, लड़ता है और भागता है। यह इसका स्वाभाविक धर्म है। यदि मनुष्य को भी इस स्वाभाविक धर्म से बँधा हुआ मान लिया जाय तो, फिर मृत्यु के लिये हँसते हुए तैयार रहने वाले सैनिकों एवं देश-धर्म पर बलिदान होने वाले महा-मानवों को प्रकृति विरोधी एवं मूर्ख ही मानना पड़ेगा। फाँसी का हुक्म सुनने के बाद जिनके वजन जेल की कोठरियों में आठ-आठ पौण्ड बढ़ गए, उन क्रान्तिकारियों को मौत से डर न लगने का विज्ञान के पास क्या उत्तर है?
इसी प्रकार ईश्वर का आँखों से न दिखाई देना या वैज्ञानिक यन्त्रों से उसका प्रमाणित न होना इतना बड़ा कारण नहीं है कि जिसके आधार पर उस महान सत्ता के अस्तित्व से इनकार किया जा सके। इस संसार में सभी कुछ तो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता।
ईश्वर दिखाई नहीं देता, इसलिये उसे न माना जाय, यह कोई युक्ति नहीं है। अनेकों वस्तुएँ ऐसी हैं जो आँख से नहीं दीखती, फिर भी उन्हें अन्य आधारों से अनुभव करते और मानते हैं। कोई वस्तु बहुत दूर होने से दिखाई नहीं पड़ती, पक्षी जब आकाश में बहुत ऊँचा उड़ जाता है, तो दीखता नहीं। कोई वस्तु नेत्रों के बहुत समीप हो, तो भी वह नहीं दीखती। अपने पलक या आँखों में लगा हुआ काजल अपने को कहाँ दीखता है? यदि नेत्र न हों, कोई व्यक्ति अन्धा हो, तो भी उसे वस्तुएँ नहीं दीखेंगी, इसका अर्थ यह नहीं कि वे वस्तुएँ हैं ही नहीं। चित्र उद्विग्न हो, मन कहीं दूसरी जगह पड़ा हो, किसी समस्या के चिन्तन में लगा हो तो आँख के आगे से कोई चीज गुजर जाने पर भी वह दिखाई नहीं देतीं। बहुत सूक्ष्म वस्तुएँ भी कहाँ दिखाई देती है? परमाणु या रोग कीटाणु बिना सूक्ष्मदर्शी यन्त्र के दीखते नहीं। किसी पर्दे की आड़ में रखी हुई, सन्दूक आदि में बन्द की हुई, जमीन में गढ़ी हुई वस्तुओं को भी आँखें कहाँ देख पाती हैं? सूर्य के प्रकाश के कारण दिन में तारे नहीं दीखते। पानी में नमक घुल जाता है, तो फिर नमक दीखता नहीं, फिर भी पानी में उसका अस्तित्व तो रहता ही हैं।
जो वस्तु दिखाई न दे, वह है ही नहीं यह मान्यता किसी प्रकार भी उचित नहीं ठहराई जा सकती। केवल आँखें ही किसी वस्तु के अस्तित्व को प्रमाणित करने का एकमात्र साधन नहीं हैं।
ईश्वर को अस्तित्व से केवल इस कारण इनकार करना कि वह इस आज के अविकसित विज्ञान या बुद्धिवाद की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, कोई ठोस कारण नहीं है। प्रत्यक्ष के आधार पर तो यह भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि हमारा पिता वस्तुतः कौन है। माता की साक्षी को ही इसके लिये पर्याप्त प्रमाण मान लिया जाता है। मानव-जीवन की अनेकों महत्वपूर्ण अवस्थाएँ उस विज्ञान के आधार पर निर्भर हैं, जिसे अध्यात्म विज्ञान कहते हैं। पदार्थ विज्ञान से नहीं, अध्यात्म-विज्ञान से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है।
ईश्वर का अवलम्बन करके ही मानव-जाति की अब तक की प्रगति सम्भव हुई हैं। प्रेम, करुणा, उदारता, दान, संयम, सदाचार, पुण्य, परमार्थ जैसे सद्गुणों का विकास आस्तिकता के आधार पर ही सम्भव हो सका है और इन्हीं गुणों के द्वारा सामाजिकता की प्रवृत्ति बढ़ी है यदि इस महान् आदर्श का परित्याग कर दिया जाय तो व्यक्ति का आन्तरिक स्तर इस प्रकार का ही बनेगा, जिससे द्वेष, घृणा, संघर्ष और आतंक का मार्ग अपनाने के लिए मन चलने लगे। हमारे पड़ोसी देश चीन का उदाहरण सामने है। वहाँ की जनता का कैसा नृशंस उत्पीड़न साम्यवादी सरकार ने किया है, पड़ोसी देशों के साथ कैसी आक्रमणात्मक नीति अपनाई है, आदर्शवाद से नितान्त पतित छल-छिद्र भरी कूट-नीति का सहारा लिया है, प्रचार में कितना सफेद झूठ अपनाया है, यह किसी से छिपा नहीं हैं। आदर्शवादिता का ही दूसरा नाम आस्तिकता है। जो आस्तिकता छोड़ चुका, उसके लिए छल, अपराध, आक्रमण, उत्पीड़न आदि नाम की भी कोई वस्तु नहीं रह जाती। पार्टी की नीति ही उसके लिए सब कुछ है, भले ही वह कितनी ही गलत क्यों न हो। नैतिक प्रवृत्तियों से रहित विचारधारा कितनी भयावह होती है, इसका अनुभव पग-पग पर होता रहता है। नैतिकता का बाँध आस्तिकता की चट्टानों से ही बनता है। यदि यह बाँध तोड़ दिया गया तो फिर व्यक्ति या सरकार अपनी-अपनी सनकें पूरी करने के लिए कुछ भी कर गुजरेंगे और शान्तिप्रिय लोगों के लिए जीवन धारण कर सकना भी एक समस्या बन जायगा।
आस्तिकता मानव जीवन की आधारशिला है। उसका परित्याग करना एक प्रकार से नैतिकता की व्यवस्था को ही चौपट कर डालने जैसी विपत्ति खड़ी करना होगा। मानव-जाति के भविष्य को खतरे में डालने वाली इस विभीषिका से हम जल्दी सावधान हो जावें उतना ही उत्तम हैं।
भारतीय संस्कृति की सर्वोपरि विशेषता है जीवन और जगत को देखने का उसका आध्यात्मिक दृष्टिकोण। वस्तु पदार्थ की सीमा से उठकर उनके कारण तत्व का अनुसंधान, क्षणभंगुर, मरणशील पार्थिव जीवन से उठकर, शाश्वत, चिरन्तन, अजर-अमर जीवन, व्यक्तिगत चेतना से उठकर विश्व-चेतना की अनुभूति, भारतीय संस्कृति का मूल आधार रहा है और यह सत्य हमारी मिट्टी का एक अंग बन गया है। भौतिक शक्तियों की सीमाओं से उठ कर विश्व का संचालन करने वाली सार्वभौम शक्ति का अनुसंधान हमारे यहीं आरम्भ हुआ। उसे सर्वोपरि माना। यद्यपि उसे जानने समझने के ढंगों में, उसे कहने के ढंग में विविधताएँ हो सकती हैं, लेकिन हमारा समस्त साहित्य ज्ञान-विज्ञान, कला साधनायें उस शाश्वत सत्य का अनुसरण करके चलते हैं। इसी लिये भारतीय साहित्यकार, कलाकार लौकिक दृष्टि से अभावग्रस्त पाया जाता है। यहाँ नंगे, घर विहीन साधु संन्यासियों को अधिक महत्व दिया गया है राजा महाराजाओं से। धनवान् की अपेक्षा एक ऋषि की, तपस्वी की अधिक प्रतिष्ठा मानी गई है हमारे यहाँ और इसी कारण हमारे देश ने संसार को सबसे अधिक महान् पुरुष दिये। ऐसे महान् पुरुष जिन्होंने संसार को विघटन के बजाय एक सूत्र में बाँधा, युद्ध और संघर्षों के बजाय शान्ति और सह-जीवन का सन्देश दिया। और इसीलिए समस्त विश्व भारत को आज भी अपना प्रकाश स्रोत मानता है। यदि संसार में भारत की कोई प्रतिष्ठा और महत्ता है तो उसकी आध्यात्मिक विशेषता के कारण ही।
इसका अर्थ यह नहीं कि हमने भौतिक जीवन को व्यर्थ, नाशवान् समझकर उपेक्षित कर दिया हो। इतिहासकार बताते हैं कि हमारा धर्म-विज्ञान, हमारे मन्दिर, मूर्तियाँ, शिल्प, वास्तु विज्ञान, हमारा साहित्य, कला, कौशल, वाणिज्य, व्यापार की धाक संसार में सर्वत्र थी और उनकी विकसित दशा ही आज विश्व में मौजूद है। प्रसिद्ध यूनानी विद्वान् एरियन ने लिखा है- “जो लोग भारत से आकर यूनान में बसे थे और जिन्होंने वहाँ के निवासियों को अधीनस्थ किया था वे कैसे थे? वे देवताओं के वर्णन थे अपना निजी का सोना उनके पास बहुत था। वे रेशम के कामदार ऊनी दुशाले ओढ़ते थे और बहुमूल्य रत्नों के हार पहनते थे।” ऐसा ही यूनान के प्राचीन इतिहास में मिलता है। “भारत के निवासी जो यहाँ (यूनान में) आकर बसे थे, बड़े बुद्धिमान और कला कुशल थे, उन्होंने यहाँ विद्या और वैद्यक का प्रसार किया, यहाँ के निवासियों को सभ्य और अपना विश्वासपात्र बनाया।”
भारतीय संस्कृति ने एक उत्कृष्ट जीवन प्रणाली विश्व-मानव को प्रदान की, जिसमें संघर्ष, शोषण, अधिकारवाद के लिए कोई स्थान नहीं रहा था। हमारी आश्रम प्रणाली, वर्ण व्यवस्था, पारिवारिक जीवन, गण-राज्यों के द्वारा जिस जीवन-प्रणाली का विकास हमने किया था, वह अद्वितीय थी। तथाकथित समाजवादी प्रणाली का बहुत पहले ही हमारे यहाँ प्रयोग हो चुका है। “सर्वसाम विरोधेन ब्रह्मकर्म समारर्भे”, ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’, वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष भारतीय जीवन में ही मिलता है। किसी भी प्रकार के दबाव को स्थान नहीं था हमारे यहाँ। सामुदायिक जीवन में विषमता पैदा करने वालों को असुर, चोर कहकर उन्हें दण्डित किया जाता था। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन की संघर्षविहीन सुरक्षा शान्ति, समृद्धि, विकास का समाजवादी प्रयोग विश्व में सर्वप्रथम भारतीय संस्कृति के अंतर्गत ही हुआ।
अध्यात्म, साधना, समाज आदि के नाम पर जीवन को शुष्क नीरस बना कर बिताने की गुँजाइश नहीं है भारतीय संस्कृति में। जो ऐसा समझते हैं वे भूल करते हैं। जल्दी-जल्दी आने वाले पर्व त्यौहारों की हमारे यहाँ भरमार है, जिन पर मनुष्य आमोद-प्रमोद, प्रफुल्लता का अनुभव कर सके, हँसी खुशी का जीवन बिता सके और वह भी सामुदायिक रूप से। इतना ही नहीं इनके साथ-साथ कई मनोवैज्ञानिक तथ्य जुड़े हुए हैं, जिनसे मनुष्य के मानसिक स्तर में सुधार और परिवर्तन होते हैं।
मानव जीवन को सभ्य शिक्षित, समर्थ, सुसंस्कृत बताने का भी वैज्ञानिक विधान भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है। ऋषिकुलों, गुरुकुलों में जीवन के चौथाई भाग तक विभिन्न जाति-स्तर, श्रेणी के परिवारों के बच्चों के साथ परिवार की तरह रहना, आचार्य के व्यावहारिक जीवन से प्रत्यक्ष और अक्षरीय ज्ञान प्राप्त करना, ब्रह्मचर्य, श्रम, सेवा का जीवन बिताना, प्रकृति के अंक में खेलना, बालक के जीवन निर्माण की दिशा में अद्वितीय प्रयोग थे। षोडश संस्कारों का प्रयोग ठीक उसी तरह हुआ, जैसे किसी पदार्थ को अनेकों पुट और भावनायें देकर अमृतौषधि में बदल दिया जाता है। षोडश संस्कार भी इसी तरह का प्रयत्न था, जब बच्चे को उसकी विभिन्न स्थितियों में भावी जीवन के लिए भावनात्मक दृष्टि से समर्थ, योग्य बनाया जाता था।
कला, साहित्य, उद्योग-धन्धे, व्यापार, व्यवसाय के क्षेत्र में भी हमने विश्व में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया था। युद्ध कौशल, लड़ाई के शस्त्रास्त्र, वैज्ञानिक उपकरणों का निर्माण सबसे पहले भारतीय क्षेत्र में ही हुआ था। इन सबकी विस्तृत विवेचना हम अन्यत्र करेंगे।
जीवन की सुव्यवस्था, आचार-विचार, आहार-विहार की एक सुव्यवस्थित प्रणाली का उदय भारत से हुआ। खान-पान, रहन-सहन के विज्ञान सम्मत तरीकों की खोज भारत में हुई, यह सब मानते हैं।
भारतीय संस्कृति की जो सबसे बड़ी महत्ता और अन्तर्राष्ट्रीय श्रद्धा तथा सद्-भावना का आधार है, वह है इसकी समन्वय की क्षमता, दूसरों को अपने आप में समा लेने की गम्भीरता। यह ऐसे सार्वभौम सत्यों पर खड़ी है कि किसी भी संस्कृति के साथ इसका टकराव हो ही नहीं सकता, वरन् विभिन्न धारायें जैसे समुद्र गर्भ में समा जाती हैं, उसी तरह संसार की समस्त संस्कृतियाँ भारतीय संस्कृति में अन्तर्भूत हो जाती हैं। इसका एक कारण यह भी है कि यह सभी विश्व संस्कृतियों की आदिस्रोत रही है। इतिहास साक्षी है कि रोम, मिश्र, सिन्धु आदि की संस्कृतियाँ खोज, संग्रहालय, पुरातत्व विभाग की सामग्री रह गई हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति आज भी नाना आक्रमणों, अवरोधों, कठिनाइयों के बावजूद जैसी की तैसी स्थिर है। उनका लोहा अब भी समस्त विश्व मानता है। निस्सन्देह भारतीय संस्कृति समन्वयवादिनी रही है। विश्व में जहाँ अन्य संस्कृतियाँ परस्पर टकराव, संघर्ष, युद्धों का कारण रही हैं, आपस में रक्त की नदियाँ जिन्होंने बहाई हैं, वहाँ भारतीय संस्कृति ने प्रेम, स्नेह, अहिंसा, मैत्री करुणा का पाठ पढ़ाया है संसार को। आचार्या महादेवी वर्मा ने लिखा है- “इस विशाल देश के पास ऐसी विराट संस्कृति है, जिसमें ज्ञान-विज्ञान, विभिन्न विचारों, विविध अनुभूतियों का और अनेक कर्तव्यों का समन्वयात्मक संघात है। सचमुच हमारी संस्कृति समन्वयवादिनी रही है।”
भारतीय संस्कृति की एक बहुत बड़ी प्रेरणा है- इसकी त्याग प्रधानता। पाश्चात्य तथा अन्य कई संस्कृतियाँ जहाँ भोग प्रधान हैं, वहाँ हमारी संस्कृति त्याग प्रधान रही है। वस्तु, पदार्थ, सामग्रियों को अपने सुख, आराम, मौज-मजे के लिए एकत्र न करके, उसे परमार्थ में लगा देना हमारी संस्कृति की महानता है। त्याग का प्रतीक ‘यज्ञ’ भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है। ‘यज्ञ’ का मूल-दर्शन त्याग की भावना पर ही आधारित है।
हम भारतीय संस्कृति को समझें, उसका अध्ययन करें, उसके आधार स्तम्भों का अनुशीलन करें। इससे बड़ी आवश्यक बात यह है कि हम इन साँस्कृतिक आदर्शों को जीवन में ढालें, उन्हें अपनायें और हम में से प्रत्येक व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह भारतीय नागरिक के नाते भारतीय संस्कृति का मूर्तिमान सजीव स्वरूप ग्रहण करे।
आज अन्धकार में भटकने वाले जन-समाज को भारतीय संस्कृति का प्रकाश पहुँचाने की इतनी आवश्यकता है, जितनी पहले कभी नहीं रही। जिन उलझनों में संसार बुरी तरह ग्रस्त और सन्त्रस्त है, उनका समाधान भारतीय संस्कृति के आदर्शों से ही हो सकता है।
हमारे जीवन व्यापार का बहुत कुछ आधार हमारा मन ही होता है। मन की प्रेरणानुसार ही जीवन की गतिविधियाँ चलती हैं। जिस तरह मोटर, इंजन या कोई मशीन उसके ड्राइवर की प्रेरणा पर चलती है, उसी तरह हमारा जीवन हमारे मानसिक-संस्थान की प्रेरणा पर चलता है। किसी भी व्यक्ति के जीवनक्रम से उसकी मनोस्थिति को सहज ही जाना जा सकता है। मानसिक स्थिति पर ही जीवन की सफलता -असफलता निर्भर करती है। जिस तरह कुशल ड्राइवर गाड़ी को सही सलामत मंजिल तक पहुँचा देता है, उसी तरह स्वस्थ मनः स्थिति मनुष्य के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता का कारण बन जाती है। लेकिन जिस तरह अनाड़ी ड्राइवर गाड़ी को कहीं भी दुर्घटनाग्रस्त कर सकता है उसी तरह असन्तुलित और अस्वस्थ मन जीवन नैया को मझधार में ही डुबो देता है, नष्ट कर देता है। इस मनः स्थिति का शोधन, सुधार जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है, एक अनिवार्य शर्त है, सफलता की कामना रखने वाले श्रेयार्थियों के लिये। मन की साधना ही जीवन सिद्धि का मूलमन्त्र है।
लेकिन मनः शक्ति का परिशोधन करना सामान्य बात नहीं है। जीवन भर के लिए साधना और अभ्यास करना पड़ता है, इसलिए हमारा सारा उपासना विधान, कर्मकाण्ड, योगशास्त्र आदि सभी मनः शोधन पर ही आधारित हैं। जिस तरह पहलवान बनने के लिए, शरीर को शक्ति शाली बनाने के लिए नित्य-प्रति व्यायाम और पौष्टिक भोजन की आवश्यकता पड़ती है उसी तरह मन को शक्ति शाली बनाने के लिए, मनः शक्ति के शोधन के लिए मानसिक साधनाएँ, मानसिक व्यायाम करने पड़ते हैं, मन को भी पौष्टिक भोजन देना पड़ता है, उत्कृष्ट विचार और उदात्त भावनाओं का। सचमुच सधा हुआ, निर्मल, स्वस्थ मन जीवन सिद्धि के लिए एक वरदान है।
स्वस्थ और सबल मन के लिये शरीर का स्वस्थ होना प्राथमिक आवश्यकता है। कहावत है, स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। योगशास्त्र के प्रणेता ने सर्वप्रथम शरीर-शोधन के कार्यक्रमों को ही महत्व दिया है। शारीरिक अस्वस्थता एवं असमर्थता में चित्त की एकाग्रता की साधना सम्भव नहीं होती। जब मोटर के अंचर-पंचर, कील-काँटे ही ढीले-ढाले, टूटे-फूटे होंगे, तो कोई भी ड्राइवर अपनी क्षमता का उपयोग नहीं कर सकता। छिद्रयुक्त घड़े में दूध का दोहन सम्भव नहीं होता। अस्वस्थ शरीर में मनःशक्ति के प्रकट होने की आशा नहीं की जा सकती, क्योंकि शरीर की शिकायत पर ही मन बारबार लगेगा। इसके अतिरिक्त अस्वस्थता के कारण मानसिक संस्थान भी ठीक-ठीक काम नहीं कर सकेगा। अस्वस्थ शरीर अपार मनोबल को धारण नहीं कर सकता। इसलिए उचित आहार-विहार, नियमित जीवन, व्यायाम आदि के द्वारा पहले अपना शरीर स्वस्थ, शक्तिशाली और निरोग बनाना आवश्यक है।
हमारे दैनिक जीवन और कार्य-क्रमों का भी मानसिक स्थिति पर भारी प्रभाव पड़ता है। हम क्या करते हैं, कैसे करते हैं, इससे ही मन का अभ्यास बनता है। यदि हम बुरे कामों में लगे रहेंगे, अनैतिक कार्यक्रमों में लगे रहेंगे, तो मन भी हीन बनता जायगा। इसके विपरीत हम शुभ कार्य में लगेंगे तो मन का अभ्यास भी शुभ ही बनेगा। जिनका जीवन-क्रम जितना क्लिष्ट, अशुभ, अनैतिकतापूर्ण होता है, उतनी ही उसकी मानसिक स्थिति भी उलझी हुई, क्लिष्ट बन जाती है। सेवा, दूसरों की सहायता, जनकल्याण के कार्य, नैतिकता और सदाचारपूर्ण जीवन आदि में लीन व्यक्ति का मनःशोधन स्वयमेव होता जाता है। उनके मन की निर्मलता बढ़ती जाती है और मन अपनी महान् शक्तियों का स्रोत सहज ही खोल देता है उसके लिये।
जीवन क्षेत्र में मिलने वाली विभिन्न सफलताएं भी मनः शक्ति को बढ़ाने के लिए बड़ी कारगर सिद्ध होती हैं। अक्सर लोगों का मन सफलताओं से उत्साहित होता है और असफलताओं से मारा जाता है। जिन्हें जीवन में असफलतायें मिलती हैं, उनमें से अधिकाँश का मन हार मानकर बैठ जाता है। ऐसे लोग मानसिक दृष्टि से निर्बल हो जाते हैं, इसलिए जीवन संग्राम में जहाँ तक बने, हमारा प्रयास ऐसा होना चाहिए कि असफलताओं का विशेष सामना न करना पड़े। दरअसल बहुत से लोग यह भूल करते है कि अपनी शक्ति , सामर्थ्य, साधनों का ध्यान रखे बिना बड़े-बड़े कामों का बोझा उठा लेते है। विवेकहीन महत्वाकाँक्षायें उन्हें ऐसी गलती करने के लिये मजबूर करती है, लेकिन इनका परिणाम तो असफलता के सिवा और कुछ मिलने से रहा।
मन का सबसे बड़ा स्वभाव है इसकी चंचलता। यह किसी एक विषय पर केन्द्रित नहीं रहता। बारबार एक को छोड़कर दूसरे विषय पर दौड़ता है। मन कितने ही संस्कारों का आगार होता है और वे समय-समय पर मन को प्रेरित करते रहते हैं। इन संस्कारों को हटाकर उसको अंचल बना देना सामान्य बात नहीं है। स्वयं महारथी अर्जुन ने ही इस तथ्य का अनुभव करके कहा था-
चंचलंहि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवदृढ़म्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
“हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल है, मनुष्य को मथ डालता है। यह बड़ा शक्तिशाली है। वायु की तरह ही मन को वश में करना भी मैं कठिन मानता हूँ।”
ऐसे चंचल और प्रमथन स्वभाव वाले मन को शोधन करने का मार्ग बताते हुए भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा था-
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥
“हे महाबाही! निःसन्देह मन बड़ा चंचल है, यह रुक नहीं सकता। परन्तु हे कौन्तेय! अभ्यास और वैराग्य से यह वश में किया जा सकता है।
जीवन का एक निर्दिष्ट लक्ष्य, कार्यक्रम बनाया जाय। उसी के अनुरूप सद्विचारों और उदात्त भावनाओं के चिंतन में मन को एकाग्र कर दिया जाय। मन चाहे या न चाहे, वह कितना ही भागे, उसे उस लक्ष्य और कार्यक्रम पर ही पकड़कर बार-बार लगाइये। इसके सिवा जो भी विरोधी विचार, भावनायें मन में उठे, उनकी ओर ध्यान न दें, उनसे विरक्त रहें। थोड़े समय में मन की चंचल दूर होकर मन एकाग्र हो जायगा। आप ऐसे एकाग्र मन की शक्ति का जिस दिशा में भी उपयोग करेंगे, उधर ही यह आश्चर्य उत्पन्न कर दिखायेगा। बाह्य क्षेत्र में उपयुक्त कार्यक्रम और आन्तरिक क्षेत्र में तद्नुसार भाव, विचारों के चिन्तन का अभ्यास परिपक्व होने पर मन की चंचलता से छुटकारा मिल जाता है। शुभ के चिन्तन, मनन, अभ्यास से मन की अशुभ वृत्तियाँ बुरे संस्कार भी क्षीण हो जाते हैं और एक दिन मन शुद्ध निर्मल बन जाता है।
मन में शुद्ध भावनाओं को प्रोत्साहन दीजिए। शुभ विचारों के चिन्तन में मन को लगाए रहिए। इस पर भी यदि वह उच्छृंखलता बरते तो उस पर ध्यान न दीजिए। आपने जो निश्चय किया है, जो लक्ष्य और कार्यक्रम बनाया है, उसी की धुन निरन्तर सुनते रहे। अपने मन को आप देखेंगे एक दिन आपका मन अपनी समस्त उच्छृंखलता, उद्दण्डता, चंचलता छोड़कर आपका दास बन जायगा। मन की साधना के लिए उपयुक्त वातावरण, अनुकूल परिस्थितियों का होना भी आवश्यक है। जिस तरह चीनी के भण्डार में रखकर सामान्य मनुष्य से चीनी खाने की आदत छुड़ाई नहीं जा सकती, उसी तरह मन की चंचलता को बढ़ाने वाले वातावरण में रहकर उनको साधना प्रायः कठिन ही होता है। इसलिए जहाँ तक बने साधना के अनुकूल, शान्त, निर्विघ्न परिस्थितियों में रहकर मन को एकाग्र करने की साधना की जाय, तो अपेक्षाकृत जल्दी सफलता मिलेगी।
अपने दैनिक जीवन-क्रम में भी जहाँ तक बने स्थिरता, धैर्य और शान्ति के साथ काम करना चाहिए। चंचलता भागदौड़, अस्तव्यस्तता, आवेश और उद्वेग को तो जीवन में किसी भी शर्त पर स्थान नहीं होना चाहिये। इससे मन की शक्ति नष्ट होती है। हम जो भी कुछ करें, वह व्यवस्थित शान्त होकर करें।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व जब लोग स्वर्गीय लोकमान्य तिलक से पूछा करते थे, “स्वराज्य को परिभाषा क्या है? आपके लक्ष्य का स्वरूप क्या है।” तब वे कहते थे “स्वदेशी ही स्वराज्य है, राष्ट्रीय शिक्षण ही स्वराज्य है विदेशी बहिष्कार ही स्वराज्य है”। स्वराज्य की कैसी परिभाषा थी उनकी! इसके लिए जो साधन मिलता था, उसी के बारे में कह देते थे कि यही स्वराज्य है, यही हमारा साध्य है।
ठीक इसी तरह जब गाँधी जी से लोग पूछते थे तो उस समय जो साधन उन्हें ठीक लगता था, उसी को बताते हुए कहते थे “खादी ही स्वराज्य है, हिन्दू-मुस्लिम एकता ही स्वराज्य है स्त्री शिक्षा ही स्वराज्य है, अस्पृश्यता निवारण ही स्वराज्य है।” इसी तरह की विभिन्न परिभाषायें वे करते चले जाते थे।
उक्त परिभाषाओं से स्पष्ट मालूम पड़ता है कि साधन ही साध्य है। साधन और साध्य की एकरूपता में ही सिद्धि निहित है। जैसे साधन होंगे वैसा ही साध्य परिणाम में मिलेगा। मंजिल पर पहुँचना इस इस बात पर निर्भर करता है कि यात्री पथ को कैसे पूरा करते हैं। राह चलना ही मंजिल को प्राप्त करना है। भली प्रकार अध्ययन करना ही परीक्षा में सफलता का जनक है और दोनों मिलकर सिद्धि बनते हैं।
बापू ने कहा है-”मैं जानता हूँ कि अगर हम साधनों की चिन्ता रख सकें तो साध्य की प्राप्ति लाजमी है। मैं यह भी अनुभव करता हूँ कि साध्य की ओर हमारी प्रगति ठीक उतनी ही होगी, जितने हमारे साधन शुद्ध होंगे।”
स्वामी विवेकानन्द ने और भी स्पष्ट करते हुए कहा है-”हम जितना साध्य पर ध्यान देते हैं, उससे अधिक साधन पर दें। यदि साधन ठीक होंगे तो सही परिणाम मिलेगा ही। कारण से ही कार्य की उत्पत्ति होती है। कार्य अपने आप नहीं आ सकता। कारण जब तक उपयुक्त , ठीक और बलशाली न होगा तब तक ठीक परिणाम नहीं मिल सकता। एक बार हम अपना लक्ष्य बना लेते है और ठीक-ठीक साधनों का निश्चय हो जाय, तो फल तो मिलेगा ही यदि साधन में पूर्णता है। यदि हम कारण की परवाह करते हैं तो फल अपने आप स्वयं की परवाह कर लेगा। साधन ही कारण है, इसलिए उन पर ध्यान देना ही साध्य का रहस्य है।”
गीताकार ने भी साधना, क्रिया पर जोर देते हुए कहा है-”स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः।” जो व्यक्ति सच्चाई के साथ अपना कार्य करता है, उसे ही सिद्धि मिलती है । कर्म साधना ही साध्य की अर्चना है।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि साध्य कितना ही पवित्र उत्कृष्ट महान् क्यों न हो यदि उस तक पहुँचने का साधन गलत है, दोषयुक्त क्यों है तो साध्य की उपलब्धि भी असम्भव है। जिस तरह मिट्टी का तेल जला कर वातावरण को सुगन्धित नहीं बनाया जा सकता, उसी तरह दोष-युक्त साधनों के सहारे उच्चस्थ लक्ष्य को प्राप्त करना असम्भव है। वातावरण की शुद्धि के लिए सुगन्धित द्रव्य जलाने होंगे। उत्तम साध्य के लिए उत्तम साधनों का होना आवश्यक है, अनिवार्य है। ठीक इसी तरह उत्कृष्ट साध्य-लक्ष्य का बोध न हो तो उत्तम साधन भी हानिकारक सिद्ध हो जाते हैं।
आज हमारी सबसे बड़ी भूल यह है कि हम साध्य तो उत्तम चुन लेते हैं, महान् लक्ष्य भी निर्धारित कर लेते है, लेकिन उसके अनुकूल साधनों पर ध्यान नहीं देते। इसीलिए हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में गतिरोध पैदा हो जाता है। और साध्य से हम दूर भटक जाते हैं हम जो कुछ भी लक्ष्य निर्धारित करते हैं, तो फिर हमारा ध्यान उस लक्ष्य पर ही रहता है। उसे कैसे जैसे भी प्राप्त कर लिया जाय, यही हमारी साधना होती है। और कई बार भ्रम में भटक कर हम गलत साधनों का उपयोग कर बैठते है। फलतः साध्य के प्राप्त होने का जो सन्तोष और प्रसन्नता मिलनी चाहिए, उससे हम वंचित रह जाते हैं।
चाहे सामाजिक क्रान्ति हो या व्यक्तिगत साधना, लक्ष्य की प्राप्ति तभी सम्भव होगी जब साध्य और साधन को जोड़कर मनुष्य साधननिष्ठ बनेगा।
परीक्षा में सफलता के लिए मनोयोगपूर्वक अध्ययन की आवश्यकता है। लेकिन बहुत से विद्यार्थियों की मनोदशा ऐसी बन गई है कि कैसे जैसे भी तिकड़म भिड़ाकर चोरी से, नकल करके परीक्षा में सफलता पास कर ली जाय। बहुत से विद्यार्थी अध्ययन में परिश्रम न करके इस तरह के हथकण्डों की खोज में रहते हैं, जिससे श्रम भी न करना पड़े और सफलता भी मिल जाय।
लोग धनवान बनना चाहते हैं, ठीक भी है। धनी बनना कोई बुरी बात नहीं हैं और इसके लिए पर्याप्त पुरुषार्थ बुद्धि, विवेक के साथ लगाया जाय, तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य धनवान् न बने। लेकिन पुरुषार्थ न करके बिना श्रम किए ही लोग लक्ष्मी अर्जित करना चाहते हैं। जुआ, सट्टा, चोरबाजारी, मिलावट, अधिक मुनाफाखोरी, न जाने कितने ही अपराधी साधनों का अवलम्बन ये लोग लेते हैं और समाज को, साथ ही स्वयं को भी हानि पहुँचाते हैं, क्योंकि समाज के नुकसान में ही आज व्यक्ति की हानि निहित है। कमजोर छिन्न-भिन्न समाज व्यक्ति की भी रक्षा नहीं कर सकता । जिस तरह चोरी डकैती व्यभिचार से अर्जित धन को बुरा समझा जाता है, इसी तरह उक्त अनैतिक साधनों से धनोपार्जन गलत है। बहुत कुछ अंशों में ऐसे मनुष्य को असफलता और असन्तोष ही मिलता है। ऐसे व्यक्तियों को धन के द्वारा जो सुख आदि मिलना चाहिए, वह नहीं मिलता। परिणाम में वही उनके लिए क्लेश का कारण बन जाता है।
उच्च पद प्रतिष्ठा, ऐश्वर्य प्राप्ति के लिए मनुष्य के सामने विस्तृत संसार पड़ा हुआ है। पुरुषार्थ और प्रयत्न के साथ मनुष्य कुछ भी प्राप्त कर सकता है, लेकिन वह इस राज-मार्ग को न अपना कर दूसरों को नुकसान पहुँचाता है, बढ़ते हुओं की टाँग खींचता है, व्यर्थ ही संघर्ष पैदा करता है अथवा किसी की खुशामद मिन्नतें करता है। ये दोनों ही साधन गलत हैं। इस के लिए व्यक्तिगत प्रयत्न आवश्यक है। अपने पुरुषार्थ के बल पर मनुष्य क्या नहीं प्राप्त कर सकता? लोग चलते है जन-सेवा का लक्ष्य लेकर, लेकिन वे जनता से अपनी सेवा कराने लग जाते हैं। बहुत से ज्ञानी, उपदेशक धर्म पर चलने के लिए बड़े-लम्बे चौड़े उपदेश देते हैं, लेकिन उनके स्वयं के जीवन में हजारों विकृतियाँ भारी पड़ी रहती है। कई साधु-संन्यासी, सन्त महात्मा लोगों को त्याग, वैराग्य, मोक्ष, आत्म-कल्याण की बात कहते हैं, लेकिन वे जन-साधारण से भी अधिक माया, मोह में लिप्त पाये जाते हैं। देश सेवा के लिए राष्ट्र को उन्नति और, विकास की ओर अग्रसर करने के लिए लोग राजनीति में आते हैं, लेकिन अफसोस होता है जब वे पार्टी बाजी, सत्ता हथियाने के लिए, गुटबन्दी के लिए परस्पर लड़ते झगड़ते हैं, कूटनीति का गन्दा खेल खेलते है अपने घर भरते हैं, जनता की आँखों में धूल झोंकते हैं।
साधनों में इस तरह की भ्रष्टता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए अहितकर सिद्ध होती है। इससे किसी का भी भला नहीं होता। सिद्धि बहुत दूर हट जाती है।
जिस तरह साधनों की पवित्रता आवश्यक है, उसी तरह साध्य की उत्कृष्टता भी आवश्यक है। साध्य निकृष्ट हो और उसमें अच्छे साधनों को भी लगा दिया जाय, तो कोई हितकर परिणाम प्राप्त नहीं होगा। उल्टे उससे व्यक्ति और समाज को हानि ही होगी। उत्कृष्ट साधन भी निकृष्ट लक्ष्य की पूर्ति के आधार बन कर समाज में बुराइयाँ पैदा करने लगते हैं। बुराइयाँ तो अपने आप भी फैल जाती हैं, लेकिन किन्हीं समर्थ साधनों का प्रयोग किया जाय, तो वे व्यापक स्तर पर फैलने लगती हैं। अतः जिनके पास साधन हैं, माध्यम हैं उन्हें आवश्यकता है उत्कृष्ट लक्ष्य के निर्धारण की।
सिद्धि का यही रहस्य है कि उत्कृष्ट लक्ष्य का चुनाव, फिर उसके अनुकूल ही उत्कृष्ट साधनों का उपयोग। साध्य और साधन की एकरूपता पर ही सिद्धि का भवन खड़ा होता है।
आत्म-कल्याण के मार्ग में इन्द्रियों की प्रबलता को प्रमुख शत्रु माना है। इन्द्रियों से प्राप्त होने वाले सुखों के प्रति राग और द्वेष मिलकर मनुष्य को दिग्भ्रान्त करते रहते हैं। यही कारण है कि बाह्य-जीवन की नश्वरता को स्वीकार करते हुये भी वह आत्मा के उद्धार की बात तक नहीं सोच पाता है। शास्त्रों में इस विषय में अधिक जोर दिया गया है कि मनुष्य शरीर रहते हुये अपने स्वरूप का ज्ञान कर लेना चाहिये अन्यथा पुनः युग युगान्तरों तक अनेकों घृणित योनियों में विचरण करना पड़ता है। तब कहीं दुबारा मानव-शरीर प्राप्त करने का संयोग मिलता है। इस दुर्लभ संयोग को यों ही बर्बाद कर देना बुद्धिमानी की बात नहीं है।
अग्नि के तेजस्वी स्वरूप को देखने के लिये ऊपर की सारी राख हटानी पड़ती है। अन्धकार फल रहा हो, तो किसी भी वस्तु का साफ -साफ स्वरूप नहीं दिखाई पड़ता। उसी प्रकार अन्तःकरण के मल, विक्षेप बने रहें तो आत्म-ज्ञान प्राप्त करना सम्भव न होगा। मानसिक चंचलता और आन्तरिक मलिनता का उदय इन्द्रियों के असंयम से होता है। इसलिये गीताकार ने लिखा है-
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोनं वशमागच्छंतौ हास्य परिपन्थिनौ॥
अर्थात्- मनुष्य का चाहिये कि इन्द्रियों के अर्थ व उनमें सन्निहित जो राग और द्वेष हैं, उन दोनों के वश में नहीं होवे, क्योंकि आत्म-कल्याण के मार्ग में विघ्न करने वाले ये दोनों ही प्रबल शत्रु हैं।
जिन इन्द्रियों को आत्म-विकास की रुकावट मानते हैं, यथार्थ में हमारे आत्म-कल्याण का कारण भी वही हैं। शत्रु के रूप में तो वे अपने बहिर्मुखी स्वभाव के कारण परिलक्षित होती हैं। जब तक इनका उपयोग बाह्य-जीवन के सुखोपभोग में करते हैं, तब तक यह शत्रु हैं, किन्तु जैसे ही इन्हें आत्म-ज्ञान व आत्म-विकास की ओर मोड़ देते हैं, तो इनके सत्परिणाम भी दिखाई पड़ने लगते हैं। परेशानी तभी तक रहती है, जब तक ये अपनों अर्थों में पूर्ण स्वच्छन्द होती हैं। सदुपयोग करने लगें तो इन्हीं से महत्वपूर्ण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। आवश्यकता सिर्फ इतनी है कि इनकी स्वतन्त्र विचरण की बहिर्मुखी प्रवृत्ति पर अंकुश बनाये रहें।
किसी घोड़े को बेलगाम छोड़ दें तो वह अपने सवारी को गड्ढे में गिरा कर ही रहेगा। सवारी की सुरक्षा सदैव इस बात पर निर्भर रहती है कि वह घोड़े के नियन्त्रण को ढीला न करे। इससे जिस दिशा में, जितनी दूर जाना चाहेंगे, वही घोड़ा सुरक्षा-पूर्वक आपको पहुँचा देगा। जिह्वा-इन्द्रिय को ही लीजिये। भाँति-भाँति के स्वाद युक्त व्यंजनों की उसे सदैव लालसा बनी रहती है। चटोरपन की बहिर्मुखी प्रवृत्ति के कारण वह स्वास्थ्य को बर्बाद करती है। जिह्वा का उपयोग वस्तुतः इसलिए है कि उससे खाद्य या अखाद्य की पहिचान करते रहें। अधिक कड़ुवा खा लेने पर जीभ छटपटाने लगती है। यह उसकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति है कि यह अखाद्य है, उदरस्थ कर जाने का दुष्परिणाम तो बाद में मिलेगा। पाचन संस्थान को खराबी से होने वाले दुष्परिणामों से बचाने के लिए ही जीभ की तड़फड़ाहट उठी थी। किन्तु इसका लाभ तभी है जब हम खाद्य और अखाद्य के भेद को स्वीकार करें, उस पर नियंत्रण करें।
आँखों का कार्य है सौंदर्य-दर्शन । आत्मा के उद्गम, परमात्मा के सौंदर्य को अन्यतम कहा जाता है। उस आन्तरिक सौंदर्य के साक्षात्कार की लालसा स्वाभाविक है। हर किसी को सुन्दर वस्तुयें देखने की इच्छा बनी रहती है, किन्तु अधिकाँश होता यह है कि लोग बाह्यरूप, रंग, चमक-दमक को ही सौंदर्य मानते हैं। बात यहीं तक रहती तब भी गनीमत थी, किन्तु स्वार्थपूर्ण और वासनात्मक दृष्टिकोण के द्वारा लोग आन्तरिक सौंदर्य पर पर्दा डाल देते हैं। विराट् का सौंदर्य इतना अभूतपूर्व और आह्लादमय है कि एक बार उसकी अनुभूति कर पायें तो आँखें सदैव उसे पाने के लिये ही तरसती रहेंगी। इसी दृष्टि से इनकी उपयोगिता भी है।
इस संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब विधिवत, वैज्ञानिक तथ्य पर सन्निहित है। इस विज्ञान को समझने के लिए इन्द्रियों के विषय-विकारों से दूर रहना परमावश्यक है। इन्द्रियों में आसक्त हुआ व्यक्ति कभी अध्यात्म-विज्ञान की ओर उन्मुख नहीं हो सकता। उसकी सारी चेष्टायें इन्हीं कुत्सित, घृणित, अदूरदर्शी, क्षणिक सुखोपभोग के आस-पास ही चक्कर लगाया करती हैं। फलतः विराट् के साथ आत्मीयता स्थापित करने की कभी भावना तक नहीं बन पाती। तुलसीदासजी ने मानस में लिखा है-
इन्द्रिय द्वार झरोखा नाना, तहँ-तहँ सुर बैठे करि थाना।
आवत देखहिं विषय बयारी, ते हठि देहिं कपाट उघारी।
जब सो प्रभंजन उर गृह जाई, तबहिं दीप विज्ञान बुझाई। इन्द्रिय सुरन्ह न ज्ञान सोहाई, विषय भोग पर प्रीति सदाई।
अर्थात् - अनियन्त्रित इंद्रियां बलात् विषयों की और खींच ले जाती हैं। ज्ञान-विज्ञान की बात यों ही रखी रह जाती है।
विषयों में, राग और द्वेषों में स्वच्छन्द विचरण करती हुई इन्द्रियों को विचार व विवेक द्वारा ही नियन्त्रण में रखा जा सकता है। भोग से कभी तृप्ति नहीं होती। इससे मनुष्य अपने जीवन लक्ष्य से भटक कर दुःख, क्लेश तथा त्रासदायक परिस्थितियों में जा फंसता है। इस विचार को गहराई तक अपने अन्तःकरण में प्रवेश कर लेने से और इस पर निरन्तर चिन्तन मनन करते रहने से भोग के दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम दिखाई दे जाते हैं। धीरे-धीरे इनसे घृणा उत्पन्न होने लगती है।
इतना होते भी यह नहीं कहा जा सकता कि इन्द्रियाँ आपके वश में आ गईं। जब कभी अनुकूल परिस्थिति बन जाती है, तो इनमें प्रबल उत्तेजना उठे बिना नहीं रह पाती। ऐसी अवस्था में सारी विचार-शक्ति लड़खड़ा जाती है और एक आवेश के साथ लोग बुरे कर्मों की ओर बलात् खिंचे चले जाते हैं। यह परिस्थिति विचारों की क्षीण शक्ति के कारण ही उपस्थित होती है, इसलिए अपने प्रत्येक विचार को एक संकल्प का रूप दे देना चाहिए। बड़ी सूक्ष्मता और चतुराई से यह देखते रहना चाहिये कि इन्द्रियाँ कहीं अपनी इच्छा से तो हमें नहीं घसीट रहीं। इन्द्रियों का स्वभाव जानकर उन्हें सही मार्ग पर ले जायें। इसका सबसे सरल उपाय यह है कि अपना अधिकाँश समय परमात्मा के मनन चिन्तन में लगाये रखें। जितनी देर आपका मन आन्तरिक विचारों के क्षेत्र में डूबा रहेगा, उतनी देर इन्द्रिय-विषय भी बिलकुल नहीं उठेंगे। यदि ऐसी स्थिति आती है, तो उन्हें बहलाकर फिर से सद्-चिन्तन में लगा देना चाहिये। इसके लिए मन का संकल्पवान् होना आवश्यक है, इसी से इन्द्रियों पर नियन्त्रण रखा जा सकता है।
अपनी आन्तरिक निर्मलता बनाये रखने से इन्द्रियाँ अपने आप संयमित होने लगती हैं। इस व्यवस्था का आधार सदाचरण है। द्वेष, घृणा, ईर्ष्या, क्रोध आदि से ही अन्तःकरण मलिन व अपवित्र बनता है। अपनी भावनाओं में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, सौजन्य और सहानुभूति के बाहुल्य से ही आन्तरिक श्रेष्ठता स्थिर रहती है। जब तक ऐसी स्थिति बनी रहती है, तब तक दूषित विकार उत्पन्न नहीं होते और इन्द्रियाँ नियंत्रित बनी रहती हैं।
इन्द्रियों को आत्मा का शत्रु नहीं सेवक मानना चाहिये। परमात्मा ने इन्हें इसलिये प्रदान किया है कि इनकी सहायता से सृष्टि संचालन की आवश्यकता पूरी हो और सुख मिले। निःसन्देह इन्द्रियाँ बड़ी उपयोगी हैं। इनसे जीवात्मा का उत्कर्ष होता है और आनन्द की प्राप्ति होती है। ये आत्मा के हित व कल्याण में बाधक नहीं, वरन् साधन स्वरूप हैं। इनका सदुपयोग किया जाय तो मनुष्य जीवन का मधुर रस चखता हुआ अपना जीवन-लक्ष्य पूर कर सकता है।
सच तो यह है कि किसी भी इन्द्रिय का उपयोग करना पाप नहीं है। ये अन्तःकरण की विभिन्न क्षुधाओं, पिपासाओं को तृप्त करने का उत्तम माध्यम हैं। ज्ञानेन्द्रियों की क्षुधा उचित रीति से तृप्त नहीं की जाती तो आन्तरिक क्षेत्र का सम्पूर्ण सन्तुलन ही बिगड़ जाता है, मानसिक गड़बड़ी पैदा होती है। बुरा तो इनका अनुचित उपयोग है। अस्वाभाविक इच्छा पूर्ति के लिए अनियन्त्रित भोग-वासना के कारण आदमी पतित बनता है। अमर्यादित और स्वेच्छाचारी इन्द्रियाँ जीवन-लक्ष्य से गिराती हैं इसलिए इन्द्रिय भोगों की सर्वत्र निन्दा की गई हैं, उचित रीति से भोगी गई इन्द्रियों का सदुपयोग बुरा नहीं होता। हमारे शत्रु के रूप में तो अनियन्त्रित भोग-वासना होती है इससे ही बचने का सदैव प्रयत्न करना चाहिये।
मानव-जीवन की सफलता, सौंदर्य और उपयोगिता में वृद्धि जिन नैतिक सद्गुणों से होती है, उनमें सहानुभूति का महत्व कम नहीं है। शक्ति , सत्यनिष्ठा, व्यवस्था, सच्चाई कर्म-निष्ठा, निष्पक्षता, मितव्ययिता और आत्म-विश्वास के आधार पर सम्मान मिलता है, समृद्धि प्राप्त होती है और जीवन के सभी क्षेत्रों में सफलता के दर्शन होते हैं, किन्तु लौकिक जीवन में जो मधुरता तथा सरसता अपेक्षित है, वह सहानुभूति के अभाव में सम्भव नहीं। सहानुभूति चरित्र की वह गरिमा है, जो दूसरों का मन मोह लेने की क्षमता रखती है। इससे पराये अपने हो जाते हैं। किसी तरह की रुकावट परेशानी मनुष्य जीवन में नहीं आती। सहानुभूति से मन निर्मल होता है, पवित्रता जागती है और बुद्धि-प्रखरता से व्यक्तित्व निखर उठता है।
सन्त वेलूदलकाक्स का कथन है, “जब अपनी ओर देखो तो सख्ती से काम लो, दूसरों की ओर देखो तो नम्रता का उद्गार प्रकट करो। अनुचित छोटाकशी से परहेज करो- दोष-दर्शन साधारण मनुष्यों का कार्य है। इसमें सन्देह नहीं है कि दूसरों को गिराने, नीचा दिखाने की वृत्ति आत्म-हीनता की परिचायक है। निकृष्ट विचार-धारा के लोग सदैव समाज में कलह और कटुता के बीज बोते हैं। इससे सभी उनका निरादर करने लगते हैं। उनका विश्वास उठ जाता है और मुसीबत पड़ने पर कोई साथ तक नहीं देता। बीमार पड़े हैं, पर दवा का कहीं इन्तजाम नहीं । दूध माँगते हैं पर कोई पानी देने को भी तैयार नहीं होता । बड़ी दुर्दशा होती है, कोई पास तक नहीं आता। पर किया क्या जाए, जिसने दूसरों के साथ उदारता, करुणा, शालीनता, सभ्यता, मुक्तहस्तता एवं दयालुता का कभी भी रुख न अपनाया हो, उसको आड़े वक्त कोई सहयोग न करे, सहायता न दे तो इसमें आश्चर्य करने की कौन-सी बात है।
दूसरों को जीतने के लिये सहानुभूति एक रामबाण हैं। ‘सह’ का अर्थ है साथ-साथ, अर्थात् उस जैसा। अनुभूति का अर्थ है अनुभव, बोध। जैसी उसकी अवस्था हो वैसी ही अपनी, इसी का नाम सहानुभूति है। एक व्यक्ति पीड़ा से छटपटा रहा है, गहरी चोट लग गई, है इससे बेचारे का पाँव टूट गया है, कष्ट के मारे तड़फड़ा रहा है। एक दूसरा व्यक्ति उसकी बगल में खड़ा है, उससे यह दृश्य देखा नहीं जाता। यह कष्ट मुझे होता तो कितनी तकलीफ होती, वह इस भावना मात्र से छटपटा उठता है। उसकी भी दशा ठीक वैसी ही हो जाती है, जैसी चोट खाये व्यक्ति की। झट डॉक्टर को बुलाता है, घाव साफ करता है और दवा लगाता है। दूसरों की कठिनाई मुसीबतों को अपना दुःख समझ कर सेवा करने का नाम सहानुभूति है। यह मानवता का उच्च नैतिक गुण है। वाल्ट विटमैन के शब्दों से यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि सहानुभूति किसे कहते हैं। उन्होंने लिखा है, “मैं विपत्तिग्रस्त मनुष्य से यह नहीं पूछता कि तुम्हारी दशा कैसी है वरन्-मैं स्वयं भी आपदग्रस्त बन जाता हूँ।
सहानुभूति का अर्थ वाक्जाल या ऊपरी दिखावा मात्र नहीं। कई सयाने व्यक्ति बातों के थाल परोसने में तो कोई कसर नहीं करते, पर कोई रचनात्मक सद्भाव उनसे नहीं बन पाता। अरे भाई! बड़ा बुरा हुआ तुम्हारी तो सारी सम्पत्ति जल गई, अब क्या करोगे, आजीविका कैसे चलेगी, बच्चे क्या खायेंगे आदि-आदि अनेकों प्रकार की मीठी मीठी चिकनी-चुपड़ी बातें तो करेंगे, पर यह न बन पड़ेगा कि बेचारे को अभी तो खाना खिलादे। जो सामान जलने से बच गया है, उसे कहीं रखवाने का प्रबन्ध करवा दें। कोई ऐसा संकेत भी करे तो नाक भौं सिकोड़ते हैं। भाई-बेबस हूँ, पिछली दालान में तो बकरियाँ बंधती हैं, बरामदे में शहतीर रखे हैं। जबान की जमा-खर्च बनाते देर न लगी, पर सहायता के नाम पर एक कानी कौड़ी भी खर्च करने को जो तैयार न हुआ, ऊपरी दया दिखाई ही तो इससे क्या बनता है। सच्ची सहानुभूति वह है जो दूसरों को उदारतापूर्वक समस्याएँ सुलझाने में सहयोग दे। करुणा के साथ कर्तव्य का सम्मिश्रण ही सहानुभूति है। केवल बातें बनाने से प्रयोजन हल नहीं होता है, उसे तो दिखाया या प्रपंच मात्र ही कह सकते हैं।
प्रशंसा और आत्म-सुरक्षा का सहानुभूति से कोई सम्बन्ध नहीं। प्रशंसा एक मूल्य है, जो आप कर्तव्य के बदले में माँगते हैं। मूल्य माँगने से आपकी सेवा की कर्तव्य न रही, कर्म बन गई। इसे नौकरी भी कह सकते हैं । ऐसी सहानुभूति से कोई लाभ नहीं हो सकता क्योंकि आपकी इच्छा पर आघात होते ही आप विचलित हो जायेंगे। प्रशंसा न मिली तो आत्मीयता का भाव समाप्त हो जाता है। ऐसी अवस्था में भावना की शालीनता नष्ट हो जाती है। ऐसी सहानुभूति घृत निकाले हुए छाछ जैसी होगी। शहद निकाल लिया तो मोम की क्या कीमत रही। बदले में कुछ चाहने की भावना से सहानुभूति की सार्थकता नहीं होती, इसे तो व्यापार ही कह सकते हैं।
सहानुभूति मानव अन्तःकरण की गहन, मौन और अव्यक्त कोमलता का नाम है। इसमें स्वार्थ और संकीर्णता का कहीं भी भाव नहीं होता। जहाँ ऐसी निर्मल भावनायें होती हैं, वहाँ किसी प्रकार के अनिष्ट के दर्शन नहीं होते। आत्मीयता, आदर, सम्मान और एकता की भावनाएँ, सहानुभूतिपूर्ण व्यक्तियों के अन्तःकरण में पाई जाती हैं। इससे वे हर घड़ी स्वर्गीय सुख की रसानुभूति करते रहते हैं। उन्हें किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता। क्लेश उन्हें छू नहीं जाता। उनके लिए सहयोग की कोई कमी न रहेगी। ऐसे व्यक्ति क्या घर, क्या बाहर एक विलक्षण सुख का अनुभव कर रहे होंगे। और भी जो लोग उनके संपर्क में चले जाते हैं, उन्हें भी वैसी ही रसानुभूति होने लगती है।
दूसरों के दुःखों में अपने को दुःख जैसे भावों की अनुभूति हो तो हम कह सकते हैं कि हमारे अन्तःकरण में सच्ची सहानुभूति का उदय हुआ है। इससे व्यक्तित्व का विकास होता है और पूर्णता की प्राप्ति होती है। सभी में अपनापन समाया हुआ देखने की भावना सचमुच इतनी उदात्त है कि इसकी शीत छाया में बैठने वाला हर घड़ी अलौकिक सुख का आस्वादन करता है। दीनबन्धु परमात्मा की उपासना करनी हो तो आत्मीयता की उपासना करनी चाहिये। दार्शनिक बालक ने परमात्मा की पूजा का कितना हृदय स्पर्शी चित्र खींचा है। उन्होंने लिखा है- “दीनों के प्रति मैं सहज भाव से खिच जाता हूँ, उनकी भूख मेरी भूख है, उनके पैरों में रहता हूँ, वंचनाओं की पीड़ा सहना है, गले से लगाता हूँ, मैं भी उतनी देर के लिये दीन और ठुकराया हुआ प्राणी बन जाता हूँ।”
सहानुभूति लोगों में एकात्म-भाव पैदा करती है। दूसरे लोगों का आन्तरिक प्रेम और सद्भाव प्राप्त होता है। ऐसे लोगों में विचार-हीनता और कठोरता नहीं आ सकती। वे सदैव मृदुभाषी, उदार, करुणावान और सेवा की कोमल भावनाओं से ओत-प्रोत बने रहेंगे। जो दूसरों के साथ सहयोग करना नहीं जानते, जो समाज में सदैव अत्याचार और विक्षोभ की गलित-वायु फूँकते रहते हैं, उन्हें इन दुर्गुणों के बुरे परिणाम भी अनिवार्य रूप से भोगने पड़ते हैं। स्वार्थी असंवेदनशील और हिसाबी व्यक्ति चतुराई में कितने ही बड़े चढ़े रहें, कितने ही पढ़े-लिखें, शिक्षित तथा योग्य क्यों न हों, अन्त में सफलता से हाथ धोना ही पड़ेगा।
सहानुभूति मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है। हर मनुष्य दूसरे मनुष्य से मानवता के एक सूत्र से बँधा हुआ है। इस नियम में शिथिलता पड़ जाय तो सारा जीवन अस्त−व्यस्त हो सकता है। स्वार्थ और आत्मतुष्टि की भावना से लोग दूसरों के अधिकार छीन लेते हैं, स्वत्व अपहरण कर लेते हैं, शक्ति का शोषण कर लेने से बाज नहीं आते। इन विशृंखलता के आज सभी ओर दर्शन किये जा सकते हैं। अपनी स्वादप्रियता के लिए जानवरों, पशु-पक्षियों की बात दूर रही, लोग दुधमुँह बच्चों तक माँस खा जाते हैं, ऐसे समाचार भी कभी-कभी पढ़ने को मिलते रहते हैं। दवा, शृंगार और विलासिता के साधनों की पूर्ति अधिकाँश अनैतिक कर्मों से हो रही है । इस जीवन काल में मानवता के संरक्षण के लिए सहानुभूति अत्यन्त आवश्यक है। इसी से दैवी सम्पदाओं का संरक्षण किया जा सकता है। तत्वों से संघर्ष करने के लिये जिस संगठन की आवश्यकता है, उसे सहानुभूति के द्वारा ही पूरा किया जा सकता है। सहानुभूति एक शक्ति है, एक सम्बल है, जिससे मानवता के हितों की रक्षा होती है।
सहानुभूति इतनी विशाल आत्मिक भाषा है कि इसे पशु-पक्षी तक प्यार करते हैं। किसी चरवाहे पर सिंह हमला कर दे तो समूह के सारे जानवर उस पर टूट पड़ते हैं और सींगों से मार-मारकर बलशाली शेर को भगा देते हैं। एक बन्दर की आर्त पुकार पर सारे बन्दर इकट्ठा हो जाते हैं। बाज के आक्रमण से सावधान रहने के लिये चिड़ियाँ विचित्र प्रकार का शोर मचाती हैं। यह बिगुल सुनते ही सारे पक्षी अपना-अपना मोर्चा मजबूत बना कर छुप जाते हैं। सहानुभूति की भावना से जब पशुओं तक में इतनी उदारता हो सकती है, तो मनुष्य इससे कितना लाभान्वित हो सकता है, इसका मूल्याँकन भी नहीं किया जा सकता । हृदय की विशालता, जीवन की महानता, सहानुभूति से मिलती है। सार्वभौमिक, प्रेम, नियम और ज्ञान प्राप्त करने का आधार सहानुभूति है। इससे सारा संसार एक ही सत्ता में बँधा हुआ दिखाई देता है।
सहानुभूति के विकास के साथ चार और सद्गुणों का विकास होता है। (1) दयाभाव (2) उदारता (3) भद्रता (4) अंतःदृष्टि। सहानुभूति की भावनाएँ जितना अधिक प्रौढ़ होती हैं, दया भावना उसी के अनुरूप एक आवेश-मात्र न रहकर स्वभाव का एक अंग बन जाती है। जीव-जन्तुओं के प्रति भी दया आने लगती है। किसी का दुःख देखा नहीं जाता। सभी के दुःखों में हाथ बटाने की भावना पैदा होती है। स्वेच्छापूर्वक किसी का उपकार करना ही उदारता है, यह सहानुभूति का दूसरा चरण है। इस कोटि के सभी व्यक्ति भद्र माने जाते हैं। इन सज्जनोचित भावनाओं से अंतःदृष्टि जागृत होती है। समता का भाव उत्पन्न होता है। जो सबको परमात्मा का ही अंश मानते हैं, वही आत्मज्ञान के सच्चे अधिकारी होते हैं।
निर्दयतापूर्वक किये गए कार्य, नीचता, ईर्ष्या विद्वेष और सन्देह के दुर्गुणों के कारण लोगों को बाद में बड़ा पश्चात्ताप करना पड़ता है। जब चारों तरफ से असहयोग, अविश्वास और असम्मान लोग व्यक्त करने लगते हैं तो अपने कुकृत्यों पर बड़ी आत्मग्लानि होती है। सोचते हैं, हमने भी परोपकार किया होता, दूसरे के दुःखों को अपना दुःख समझकर मेल-व्यवहार पैदा किया होता तो आज जो अकेलेपन का दुःख भोग रहे हैं, उससे तो बच गए होते। इस पश्चात्ताप की अग्नि में जल-जलकर लोग अपनी शेष शक्तियों का भी नाश कर लेते हैं। किन्तु जो दूसरों के हृदय के साथ अपना हृदय मिला देते हैं उन्हें सभी से निश्छल प्रेम मिलता है और मर्म-ज्ञान प्राप्त होता है।
मनुष्य का जीवन कुछ इस प्रकार बँधा हुआ है कि वह दूसरों की सहायता प्राप्त न करे तो एक पग भी आगे बड़ा नहीं सकता। पशुओं के बच्चे जन्म लेने से कुछ घण्टे बाद ही प्राकृतिक प्रेरणा से यह जान लेते है कि दूध जो हमें पीना चाहिए, कहाँ है। बिना किसी संकेत के चट से अपनी आवश्यकता आप पूरी कर लेते हैं। किन्तु मनुष्य के लिये यह सब कुछ सम्भव नहीं। पालन-पोषण हुआ तो माता-पिता के द्वारा, शिक्षा के लिए विद्यालयों की शरण ली। खाना खाने से लेकर चलने-बोलने तक में वह पराश्रित है। बैल न हो तो खेती कहाँ से करें। लुहार हल न बनाए तो खेत कैसे जोतें। जुलाहा कपड़ा न बुने तो वस्त्र कहाँ से आवें। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसे उदारपूर्वक आदान-प्रदान करते रहना पड़ता है। अपनी कमाई वस्तु का उपयोग दूसरों के लिए करता है तो दूसरों से भी अनेकों सुविधायें प्राप्त करते हैं। यह सम्पूर्ण क्रिया-व्यवसाय पारस्परिक सहयोग और सहानुभूति पर निर्भर है। इसी से जीवन में व्यवस्था है। मानवीय प्रगति की सम्भावनायें एक दूसरे की सहानुभूति की भावना पर टिकी है। हमें भी सब के साथ उदारतापूर्ण बर्ताव, करना चाहिए। इसी में ही हमारी सफलता है, इसी में मनुष्य का कल्याण है।
बुद्धि एक ऐसा महत्वपूर्ण तत्व है, जिसके द्वारा मनुष्य का जीवन प्रकाशित होता है, प्रेरित होता है। यदि अन्य प्राणियों से मनुष्य में कोई विशेषता है, तो वह है-बुद्धि। जहाँ बुद्धि नहीं, वहाँ मनुष्य, मनुष्य नहीं, वह बिना सींग-पूँछ का एक तुच्छ प्राणी मात्र रह जाता है। बुद्धि के द्वारा ही जीवन में गलत- सही, उत्कृष्ट-निकृष्ट, धर्म-अधर्म,कार्य-अकार्य की ठीक-ठीक निर्णय होता है। जिस तरह किसी यान में लगा हुआ प्रकाश यन्त्र चालक को सही मार्ग का दर्शन कराता है, उसी तरह मानव शरीर में बुद्धि का स्थान है। बुद्धि ही ऐसी कसौटी है, जिस पर मनुष्य जीवन को, जगत को परख कर ठीक-ठीक निर्णय पर पहुँच सकता है। जिस तरह नेत्रहीन के लिए मनोरम दृश्य व्यर्थ है उसी तरह बुद्धि-हीन के लिए जीवन और जगत के मधुर रहस्य, शास्त्र-वार्ता, ज्ञान-विज्ञान व्यर्थ है और उनके बिना जीवन जड़ है, पशु तुल्य है। इसीलिए हमारे यहाँ बुद्धि को शुद्ध-निर्मल बनाने के लिए बहुत जोर दिया गया है। संसार में जो भी गति, उन्नति-प्रगति, विकास, खोज, अन्वेषण हो रहे हैं, यह सब बुद्धि की ही देन हैं।
शास्त्रकार ने कहा है-
“बुद्धेर्बुद्धिमताँ लोके नास्त्यगम्यं हि किंचन।
बुद्धथा यतो हता नन्दाश्चाणक्ये नासिपाणयः॥”
“बुद्धिमानों की बुद्धि के समक्ष संसार में कुछ भी असाध्य नहीं है। बुद्धि से ही शस्त्र-हीन चाणक्य ने सशस्त्र नन्दवंश का नाश कर डाला।”
मनुष्य के हाथ पैरों की, शरीर की स्थूल शक्ति सीमित है। यह प्रत्यक्ष में अपनी सीमा तक ही कारगर सिद्ध होती है, लेकिन बुद्धि की शक्ति बहुत अधिक व्यापक है। यह दूर, आते दूर तक भी प्रभाव डाल सकती है। “दीर्घौ बुद्धिमतो बाहू याम्याँ दूरे हिनस्ति सः।” बुद्धिमान की भुजायें बड़ी लम्बी होती हैं, जिनसे वह दूर तक वार कर सकता है। महर्षि व्यास के अनुसार “बुद्धि श्रेष्ठानि कर्माणि” बुद्धि से विचारपूर्वक किए गये कार्य ही श्रेष्ठ होते हैं।
बुद्धि मनुष्य के लिए दैवी विभूतियों में उच्च कोटि का वरदान है। इसके सहारे मनुष्य अपने जीवन को अधिक उन्नत, प्रभावशाली बना सकता है। संसार में जो कुछ मनुष्य कृत उपलब्ध है, वह बुद्धि की ही देन है। कहावत है-बुद्धिमान का एक दिन मूर्ख के जीवन भर के बराबर होता है।
बुद्धि का विकास करना जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। बुद्धि को विकसित, संस्कारित और समर्थ बनाने की प्रत्येक मनुष्य के लिए आवश्यकता है। इसलिए कि वह अधिकाधिक उत्कृष्ट जीवन बिता सके, मानवीय गरिमा को आत्मसात् कर सके। बुद्धि को अधिकाधिक प्रौढ़, व्यापक बनाने के लिए ज्ञान की साधना, विचारों की अर्चना करना आवश्यक है। ज्ञान, विचार-साधना के क्षेत्र में हम जितने अधिक प्रयत्न करेंगे, उतना ही हमारी बुद्धि का विकास होगा।
बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने के लिए सर्वोपरि आवश्यकता है ‘सीखने और सिखाने की तीव्र लगन की।’ सीखने के लिए मानव जाति का संचित अब तक का ज्ञान कुछ कम नहीं है। नाना क्षेत्रों में ज्ञान का अथाह भण्डार भरा पड़ा है। इसके अतिरिक्त संसार की खुली पुस्तक से हर समय कुछ न कुछ सीखने को मिलता ही रहता है। दूसरी बात है, सीखे हुए को सिखाने की। दूसरों को सिखाने से भी बुद्धि का विकास होता है। वस्तुतः दूसरों के माध्यम से ही जो कुछ सीखा हुआ है, वह परिष्कृत होता है।
सीखने के क्षेत्र में दूसरों के विचारों से परहेज नहीं करना चाहिए। खासकर हमारे यहाँ की यह विशेषता है और हमारी परम्परा ही कुछ ऐसी रही है, जिसके अनुसार हमने किसी के भी विचार से परहेज नहीं किया। संसार भर के विचारों का हमने प्रयोग किया और जो उपयुक्त लगा उसे स्वीकार करने में आना-कानी नहीं की। बुद्धि की साधना करने वाले के लिए अपनी ग्रहण शक्ति को एकाँगी नहीं बनाना चाहिए। अपने आपको किसी एक ही विचारधारा में कैद नहीं कर लेना चाहिए। जो ऐसी भूल कर बैठते हैं, उनकी बुद्धि भी एकाँगी बन जाती है। वह नाना दिशाओं में विकसित नहीं हो पाती।
बुद्धि के साधक लिए-ज्ञान की उपासना करने वाले को किसी भी स्थिति में पहुँचकर यह नहीं मान लेना चाहिए कि बस, अब इतिश्री हो चुकी। स्मरण रखिये, ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। यह नित नूतन विकास क्रम की गोद में पलता है, इसीलिए बुद्धि की भी कोई सीमा नहीं हो सकती। उसके लिए भी विकसित होने के नित नये अध्याय खुलते रहते हैं। प्रसिद्ध विचारक बेकन ने कहा है “ईश्वर ने बुद्धि की कोई सीमा निश्चित नहीं की है।”
ज्ञानार्जन के लिए अपने बुद्धि के यन्त्र को सब क्षेत्रों में, सब संस्थाओं में, सब प्रणालियों में घुसकर सीखने दें। किसी एक-संस्था, विचार-प्रणाली, नियम में आबद्ध न करें। जहाँ-जहाँ भी ज्ञान के नये स्रोत प्रकाश में आवें, वहाँ-वहाँ ही आप प्रवेश कीजिए-सीखिए। अध्यात्म, समाजशास्त्र, परिवार, अर्थ विज्ञान, नीति, सदाचार, राजनीति, विज्ञान, जन-सेवा, मानस-शास्त्र, धर्म-संस्कृति सभी विषयों, सभी क्षेत्रों में अपनी गति रखें। आपके ज्ञानार्जन का क्षेत्र जितना व्यापक होगा, उतनी ही आपकी बुद्धि भी विशाल-व्यापक बनेगी।
नीतिकार ने कहा है- “दृष्टि पूर्तन्यसेत्पादं वस्त्रपूतं पिबेज्जलं।” देखकर कदम रखिये, छानकर पानी पीजिये। सब ओर से जानकारी किया हुआ खरा उतरे, उसे व्यवहार में लाइये। किसी भी बात को इसलिए मत मान लें कि किसी व्यक्ति विशेष ने कहा है या वह किसी ग्रन्थ में लिखी है अथवा एक बहुत बड़ा मानव समुदाय उसके अनुसार चलता है। प्रत्येक बात, विचार, परम्परा को मौलिक चिन्तन की कसौटी पर ही सही-सही परखे बिना व्यवहार में नहीं लाना चाहिए।
बुद्धि को किसी भी तरह आग्रह प्रधान, मोहासक्त एकांगी नहीं रखना चाहिए। पुरातन का ज्ञान भी प्राप्त करना चाहिए तो वर्तमान का भी। लेकिन ग्रहण वही करना चाहिए जो अपने स्वतन्त्र विचार की कसौटी पर, अपने तथा समाज के लिए हितकर सिद्ध हो। हममें से बहुत कम लोग ही इस तरह बुद्धि को स्वतन्त्र रख पाते हैं। हममें से अधिकाँश तो किन्हीं संस्थाओं, विचार प्रणालियों, चली आ रही मान्यताओं अथवा नये विचारों को आँख मूँद कर बुद्धि पर पर्दा डालकर मान लेने के अभ्यासी हैं। हमारे जो विश्वास बन गये हैं जो मान्यतायें हमारी हैं, उनसे हम इस तरह चिपक जाते हैं कि उनसे परे-कुछ सोचने, समझने, मानने की गुंजाइश ही नहीं रहने देते। लेकिन इस तरह को प्रवृत्ति बुद्धि की विकसित न कर उसे कुण्ठित करना ही है। इसलिए सब पढ़ लिख कर, देखकर सुनकर भी बुद्धि को स्वतन्त्र रखना, उसमें मौलिकता का जीवन डालना आवश्यक है।
स्वतन्त्र बुद्धि की कसौटी पर जो सत्य लगे उसे अपने तक ही सीमित न रखकर, उसे स्वतन्त्रता पूर्वक व्यक्त करने, दूसरों को सिखाने की क्षमता और साहस का होना भी आवश्यक है। बहुत से लोग बड़े बुद्धिमान होते हैं, निर्णय पर भी पहुँच जाते हैं लेकिन वे साहस के साथ अपने अनुभव को प्रकट नहीं करते। उक्त प्रकार से बुद्धि को दबाने पर वह कुण्ठित हो जाती है, उसकी क्षमता नष्ट हो जाती है।
आप जिस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, उसे साहस के साथ प्रकट कीजिए, दूसरों को सिखाइये। चाहे आपको कितने ही विरोध-अवरोधों का सामना करना पड़े, आपकी बुद्धि जो निर्णय देती है, उसका गला न घोटें। आप देखेंगे कि इससे और आपकी बुद्धि अधिक कार्य कुशल समर्थ बनेगी।
बौद्धिक विकास के लिए एक सरलतम, प्रभावशाली, सर्व-सुलभ मार्ग है-भगवान की उपासना। ईश्वरी सत्ता के साथ एकात्मकता जितनी बढ़ेगी, उतनी ही बुद्धि सूक्ष्म और सामर्थ्यवान् बनेगी। सन्त बिनोवा ने कहा है- “बुद्धि की शुद्धि के लिए भगवान की भक्ति से बढ़कर कोई भी साधन आज तक अनुभव में नहीं आया।” हमारे देश में भगवान की भक्ति , उपासना का जो व्यापक प्रचार है वह पूर्वज मनीषियों द्वारा समाज के बौद्धिक जागरण की एक महत्वपूर्ण योजना का ही रूपांतरण हैं। दैवी चेतना का प्रकाश बुद्धि के क्षेत्र में जितना अधिक होता है, उतना ही वह प्रखर, तेजस्वी बनती है। मन्त्रराज गायत्री में तो बुद्धि को प्रखर, शुद्ध बनाने के लिए परमात्मा से स्पष्ट प्रार्थना का विधान है। किसी भी रूप में परमात्मा का चिन्तन, मनन, ध्यान, पूजा, उपासना बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने का महत्वपूर्ण उपाय है।
नियमित स्वाध्याय, सत्संग, मौलिक चिन्तन, जीवन और जगत का अनुभव, निर्भयता पूर्वक सीखने और सिखाने की लगन, उत्साह, ईश्वर भक्ति , परमात्मा की पूजा उपासना आदि ऐसे आधार हैं, जिनके द्वारा हम अपनी बुद्धि का विकास कर सकते हैं। बौद्धिक विकास के क्षेत्र में न तो किन्हीं प्राचीन ग्रन्थों के पाठ करने से काम चलेगा, न पूर्वजों की गुण गाने से। इसी तरह वर्तमान युग के उच्छृंखल लहरों में बह जाने से भी कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। बौद्धिक विकास के लिए आधुनिक युग के अनुरूप नई प्रयोगशालाएं बनानी पड़ेंगी, जहाँ प्राचीन और अर्वाचीन समन्वय के नवीन प्रयोग करने होंगे, नई सूझ-बूझ का परिचय देना होगा, नई राह निकालनी पड़ेगी।
आज हमारी बुद्धि भ्रमित है। हममें से अधिकाँश लोग जीवन के किसी भी क्षेत्र में कोई सही निर्णय नहीं कर पाते। जिधर की हवा आती है, हम उधर ही बह जाते हैं। यह स्थिति छोड़नी होगी और बुद्धि के प्रकाश स्तम्भ की ज्योति दीप्त करनी होगी। स्मरण रहे यह महान कार्य जादू की तरह अचानक नहीं हो जाता। इसके लिए जीवन भर धैर्य, गम्भीरता के साथ, निरालस्य होकर अनवरत प्रयत्न करना आवश्यक होता है।
नहुष को पुण्य फल के बदले में इन्द्रासन प्राप्त हुआ। वे स्वर्ग में राज्य करने लगे। ऐश्वर्य और सत्ता का मद जिन्हें न आवें, ऐसे कोई विरले ही होते हैं। नहुष भी सत्ता मद से प्रभावित हुये बिना अछूते न रह सके। उनकी दृष्टि रूपवती इन्द्राणी पर पड़ी। वे उसे अपने अन्तःपुर में लाने की विचारणा करने लगे। प्रस्ताव उनने इन्द्राणी के पास भेज ही दिया।
इन्द्राणी बहुत दुखी हुई। राजाज्ञा के विरुद्ध खड़े होने का साहस उसने अपने में न पाया तो एक दूसरी चतुरता बरती। नहुष के पास उसने सन्देश भिजवाया कि वह ऋषियों को पालकी में जोते और उस पर चढ़कर मेरे पास आवे तो प्रस्ताव स्वीकार कर लूँगी।
आतुर नहुष ने अविलम्ब वैसी व्यवस्था की। ऋषि पकड़ बुलाये, उन्हें पालकी में जोता गया, उस पर चढ़ा हुआ राजा जल्दी-जल्दी चलने की प्रेरणा करने लगा।
दुर्बलकाय ऋषि दूर तक इतना भार लेकर तेज चलने में समर्थ न हो सके। अपमान और उत्पीड़न से वे क्षुब्ध हो उठे। एक ने कुपित होकर शाप दे ही डाला- “दुष्ट! तू स्वर्ग से पतित होकर पुनः धरती पर जा गिर।” शाप सार्थक हुआ, नहुष स्वर्ग से पतित होकर मृत्यु लोक में दीन-हीन की नाईं विचरण करने लगे।
इन्द्र पुनः स्वर्ग के इन्द्रासन पर बैठे। उन्होंने नहुष के पतन की सारी कथा ध्यानपूर्वक सुनी और इन्द्राणी से पूछा-भद्रे! तुमने ऋषियों को पालकी में जोतने का प्रस्ताव किस आशय से किया था?
शची मुस्कराने लगीं। वे बोलीं-नाथ, आप जानते नहीं, सत्पुरुषों का तिरस्कार करने, उन्हें सताने से बढ़कर सर्वनाश का कोई दूसरा कार्य नहीं। नहुष को अपनी दुष्टता समेत शीघ्र ही नष्ट करने वाला सबसे बड़ा उपाय मुझे यही सूझा। वह सफल भी तो हुआ।
देव सभा में सभी ने शची से सहमति प्रकट कर दी। सज्जनों को सताकर कोई भी नष्ट हो सकता है। बेचारा नहुष भी उसका अपवाद कैसे रहता।
स्त्री-पुरुष, राजा-रंक, धनी-निर्धन, अशक्त -सशक्त सभी की यह कामना होती है कि उन्हें सुख मिले। सुख का सच्चा स्वरूप और उसकी वैज्ञानिक आवश्यकता पर बहुत थोड़े से व्यक्तियों ने विचार किया होता है। अधिकाँश तो शरीर की स्थूल उपभोग सामग्रियों को ही सुख का साधन मानते हैं और इन्हीं के पीछे अन्धी दौड़ लगाते रहते हैं। यह साधन और ये सुख इतने निर्बल होते हैं कि उनसे व्यक्ति की आन्तरिक पिपासा शान्त नहीं होती। क्षणिक सुख का-सा जो आभास होता है, वह भी अन्ततः अग्नि में घी डालने का ही काम करता है। इससे सुख प्राप्ति की कामना प्रबल होती है और इनके प्रति राग या आसक्ति बन जाती है।
यह भाव सुख न रहकर दुःख बन जाता है, क्योंकि शारीरिक सुख अधोगामी होते हैं। इनसे शक्यों का पतन होता है-और यह अशक्तता ही दुःख का कारण होती है। इसलिए इन्द्रियों की बाह्य लिप्सा को सुख नहीं मानते।
धन-दौलत, जिसे सुख का साधन मानते हैं, वह भी सुख कहाँ दे पाता है। ऐसा रहा होता तो हेनरी फोर्ड, राकफेलर आदि प्रमुख धनपति महा सुखी रहे होते। धन के कारण उत्पन्न होने वाला भय, आलस्य, भोग आदि से मनुष्य का हृदय हर घड़ी काँपता रहता है। धनिकों को थोड़ा घाटा लगा कि हार्टफेल हुआ। यह बात बताती है कि धन का साहसी भावनाओं से पूर्णतया सम्बन्ध-विच्छेद है। अतः भयदायक परिस्थितियों में रहकर, विपुल धन-सम्पत्ति का स्वामी होकर भी मनुष्य सुखी रह सकेगा, इसमें सन्देह ही है।
शारीरिक दृष्टि से बहुत मोटा या बलवान होने में भी स्थिरता नहीं है। संसार की अन्य वस्तुओं की तरह शरीर में भी परिवर्तन होता रहता है। आज की स्वस्थ अवस्था सदैव इसी तरह बनी रहेगी इसकी कहीं निश्चिन्तता नहीं है।
एक बात यह भी है कि शरीर की दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति भी कई बार अहंकार प्रदर्शन और दूसरों पर अपनी धाक जमाने की भावना से कुत्सित और नृशंस कर्म करने लगते हैं। अपराधों के वैधानिक दण्ड से मनुष्य बचाव कर सकता है, किन्तु पाप की प्रक्रिया जब मस्तिष्क में विद्रूप उत्पन्न करती है तो मनुष्य के बाह्य और आन्तरिक-जीवन में अशान्ति की आँधी छा जाती है। ऐसे व्यक्तियों का अन्त सदैव ही बड़ा निर्मम, निर्दय और भयानक हुआ है।
तब फिर क्या सौंदर्य को सुख मान लें ? अपने पास भरा-पूरा परिवार है, उससे क्या सुख मिलता है। बहुत पढ़-लिख लिया है, इससे क्या सुखी हैं? सोचते चले जाइये। एक-एक परिस्थिति पर पूर्णतया विचार कर लीजिये। बाह्य साधन सुख नहीं दे सकते। सौंदर्य का आकर्षण मनुष्य को पतित बना देता है, फिर वह सदैव साथ रहने वाला भी तो नहीं है। परिवार में संख्या तो अधिक है, किन्तु बेटे-बाप में नहीं बनती। बच्चियों की शादी की समस्या सताती है। बेटे दुष्ट और दुर्गुणी हों, स्त्रियाँ फूहड़ हों तो नारकीय यंत्रणायें देखने के लिये दूर जाने की आवश्यकता न होगी।
तथाकथित अर्थकरी विद्या भी मनुष्य को सन्तुष्ट नहीं कर सकी। आज शिक्षा का प्रसार हुआ है पर उसी अनुपात में बेकारी भी बढ़ी है। दिखावट, बनावट, फैशन-परस्ती, फिजूलखर्ची आदि बुराइयां आज अधिकाँश पढ़ें लिखे लोगों में ही दिखाई देती हैं। फलस्वरूप वे अशिक्षितों से भी अधिक दुखी रहते देखे जाते हैं। ऐसी दशा में शिक्षा को भी सुख का मूल कैसे मान लें।
मनुष्य का निर्माण जिस ढाँचे में हुआ है, वह सच्चाई और ईमानदारी का खाका है। आन्तरिक सद्गति जिसे सुख कहते हैं, वह मनुष्य की भावनाओं का परिष्कार मात्र है, अन्यथा इस विश्व में न तो कुछ सुख है न दुःख । आत्मा स्वभावतया उदात्त और विशाल है, उसे इस विशालता तथा समष्टिगत भावना में ही आनन्द आता है। स्वार्थ की संकीर्णता प्रवृत्ति और बाह्य भोगों की आसक्ति से उसकी स्वाभाविक पवित्रता पर लाँछन आता है। ऐसी अवस्था में उसका सुखी होना असम्भव ही है। दुर्भावनाओं से उसे तृप्ति नहीं होती। दुष्कर्मों से उसे दुःख मिलता है, अशान्ति रहती है। इसलिए सुखी जीवन का प्रमुख आधार यह है कि हमारा जीवन पवित्र बने और हम सब के हित में अपना हित समझें।
मनुष्य जब इस स्वाभाविक आकाँक्षा पर पर्दा डालने का प्रयत्न करता है, छल, कपट, द्वेष और दुर्भावनाओं से अपनी आन्तरिक निर्बलता पर आघात पहुँचाता है, तो आत्मा छटपटाती है, दुखी और बेचैन होती है। थोड़ी देर के लिये लगता है कि हमें बड़ी सफलता मिल गई, पर वह व्यक्ति सचमुच निरा निर्धन ही है, जो अपनी आत्मिक संपत्तियों को इस तरह खिलवाड़ में विनष्ट कर देता है। कितनी दयनीय अवस्था है कि मनुष्य प्रत्येक वस्तु का मूल्याँकन बाह्य-दृष्टि और साँसारिक दृष्टिकोण से करता है।
मनुष्य के दुःख का प्रमुख कारण उसके निजत्व की अज्ञानता है। इस कारण मनुष्य का दृष्टिकोण ही भिन्न हो जाता है। जिस स्थिति में है उसी को आधार मानकर जीवन का सारा क्रिया व्यापार चलता है। इन व्यवसायों में जब विघ्न उत्पन्न होते हैं, तो भाग्य को दोष देते हैं। भगवान को कोसते, रोते बिलखते रहते हैं।
हमारी स्थिति ठीक उस नाटक के राजा की-सी है जो नाटक समाप्त होने पर भी इस बात पर अड़ जाता है कि मेरा वह खजाना, रानी, सेना, सिपाही लाओ, नहीं तो घर नहीं जाऊंगा। तब नाटक-कम्पनी का मालिक उसे समझता है कि भाई, तुम्हें राजा तो इस नाटक की सफलता के लिये बनाया था। तुम सचमुच राजा तो नहीं हो। एक निर्धन व्यक्ति हो, जिसे पारिश्रमिक देकर इस कम्पनी में भरती किया था।
ऐसे बावले राजा पर लोग हँसते हैं। कहते हैं वह बिल्कुल बुद्धिहीन है। पर हम सब ठीक उस राजा जैसे ही हैं। जो अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर हाड़-माँस की मानव देह पर अभिमान कर बैठे हैं। प्रत्येक बात, सुख और सुविधाओं का चिन्तन इस पंचभौतिक शरीर की दृष्टि से ही करते रहते हैं। पर जब इस जीवन का नाटक खतम होता है और हम शरीर के स्टेज से उतार दिये जाते हैं, तो कितने दुःखी हो सकते हैं, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इस संसार में वही परमात्मा विभिन्न रूपों में रूपांतरित होकर अपना प्रकाश फैला रहा है। वह कण-कण में समाया है। वह साक्षी है, वह नित्य, अविनाशी, परमात्मा ही सच्चे आनन्द का स्त्रोत है, उसी को जानने की प्रेरणा देते हुए उपनिषद्कार ने लिखा है-
भूर्भुवः स्वस्त्रयो लोका व्याप्त भोम्व्रह्यतेषूहि।
स एव तथ्यतो ज्ञानी यस्तद्वेति विचक्षणा॥
“अर्थात् इस पृथ्वी, आकाश और पाताल में जो सर्वत्र विद्यमान् परमात्मा है, वही जानने योग्य है। उसे जाने बिना मनुष्य दुःख, क्लेश और सन्ताप से विमुक्त नहीं हो सकता।
मनुष्य जीवन में सात्विकता की ऊँची कक्षा प्राप्त कर लेना ही सर्वसुलभ और सहज उपाय है। इसके लिए कहीं जटिल ऊहापोह की आवश्यकता नहीं। निष्काम भावना से संसार के सम्पूर्ण कर्मों का पालन करते हुए मनुष्य अपनी भौतिक सात्विकता प्राप्त कर सकता है। मनुष्य सत्याचरण करे, इसमें कौन-सी कठिनाई है। परमात्मा की उपासना सद्व्यवहार, सहृदयता, उदारता, निष्कपटता, ये कौन-से वजनदार पत्थर हैं, जो उठाये नहीं उठते। मनुष्य इन सद्गुणों को अपने जीवन में विकसित करने का साहस करे, तो ऐसी कोई भी बाधा नहीं जो उसे सुख प्राप्ति से रोक सके। मनुष्य जीवन की सरलता, शुचिता और सात्विकता की त्रिशक्ति के आधार पर ही उसके भौतिक, भावनात्मक और पारलौकिक सुख विकसित होते हैं।
हमारे श्रेष्ठ अन्तःकरण का जो दिव्य पुरुष इस शरीर में विद्यमान है, अपना धन, शक्ति , विद्या तथा सौंदर्य, सब कुछ वही है। बाह्य साधनों में जो सुख दिखाई देते हैं, वे रेगिस्तान की मरीचिका के समान ही हैं। उनमें भटकता हुआ इन्सान मृग की भाँति धोखा ही खाता है।
इस तथ्य को जितना ही विचार सकें उतना ही अच्छा है, जितना अपने जीवन में समावेश कर सकें, उतना ही श्रेयस्कर है। सत्य और न्याय के साँचे में विनिर्मित मनुष्य जीवन को इन्हीं की प्राप्ति में ही सन्तोष मिल सकता है।
लोगों की ऐसी मान्यता है कि इस धरती से अन्यत्र कहीं ऊपर आसमान में स्वर्ग अवस्थित है। इसके बारे में उन्हें तरह-तरह की कल्पनायें करते देखा जाता है। कहते हैं वहाँ सभी प्रकार के शरीर-सुख मिलते हैं। इस स्वर्ग की प्राप्ति के लिए लोग तरह-तरह के कर्मकाण्ड करते रहते हैं।
ऊपर कोई स्वर्ग है या नहीं, इस पचड़े में पड़ने की अपेक्षा यह देखना अधिक अच्छा है कि उस स्वर्ग जैसी परिस्थितियों को अपनी इस धरती पर भी उतारा जाना सम्भव है?
साधनों की दृष्टि से इस धरती में किसी प्रकार का अभाव नहीं है। रुपया-पैसा,धन-जायदाद, वस्त्र-आभूषण, फल-फूल, मेवा-मिष्ठान आदि सभी सुख सामग्रियों से धरती-माता की गोद भरी पूरी है। यदि यहाँ कुछ कमी हो सकती है तो वह भावनात्मक न्यूनता ही होती है। सुख के साधनों के साथ स्नेह, प्रेम और आत्मीयतापूर्ण भावनाओं के सम्मिश्रण को ही स्वर्ग कहा जा सकता है।
यह स्वर्ग आपके घर में ही मौजूद है, आप भले ही उसे न देख पाते हों। यह स्वर्ग-दाम्पत्य-जीवन का स्वर्ग, किसी ऊपर वाले स्वर्ग से कम सरस, सुखद और सुरुचिपूर्ण नहीं है। जिसने इसका रसास्वादन कर लिया वह अन्यत्र स्वर्ग की क्यों कामना करेगा?
पति और पत्नी का मिलन एक आध्यात्मिक मिलन होता है। दो आत्माओं का सम्मिलन इतना आनन्ददायक होता है कि वे दोनों अपने इस सुमधुर सम्बन्ध का परिपाक बनाये रखने के लिये सम्पूर्ण जीवन कठिनाइयों और मुसीबतों का खुशी-खुशी सामना करते रहते हैं। घर गृहस्थी जुटाने के लिए कितना श्रम, उद्योग और अध्यवसाय करना पड़ता है, इसे प्रत्येक सद्गृहस्थ भली प्रकार जानता है। इसी प्रकार घर के आन्तरिक मामलों की देख−रेख, बच्चों के लालन-पालन, भोजन व्यवस्था, पतियों की समुचित सेवा में बेचारी गृहणियों को कितनी दौड़-धूप करनी पड़ती है, यह किससे छुपा है। एक दूसरे के प्रति आत्म-उत्सर्ग की भावना निश्चय ही आध्यात्मिक तथ्य है। युग-युगान्तरों के संस्कारों के परिणामस्वरूप यह सुखद संयोग मिलता है। एक प्राण दो शरीरों की यह सम्मिलित इकाई जितनी प्रगाढ़ आत्मत्याग की भावनाओं से ओत-प्रोत होगी, उसी अनुपात से आपके आँगन में स्वर्ग बिखरा पड़ा होगा। उस वातावरण में रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति जीवन के सच्चे सुख का रसास्वादन कर रहा होगा। जहाँ इस आत्मीयता में कमी होगी, वहाँ दुःख और दारिद्रय की परिस्थितियाँ ही दिखाई देंगी। स्वर्ग का आधार जिस प्रकार भावनात्मक परिष्कार है, उसी प्रकार कलह और कटुता के आधार पर नारकीय जीवन का सूत्रपात होता है। मनुस्मृति में कहा गया है :-
सन्तुष्टो भार्यया भर्ता भर्त्रा भार्या तथैव च ।
यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणं तत्रवैवम्॥
स्त्रियाँ तु रोचमानायाँ सर्व तद्रोचते कुलम्।
तस्याँ त्वरोचमानायाँ सर्वमेव न रोचते॥
अर्थात् जिस कुल में पत्नी से पति और पति से पत्नी अच्छी प्रकार सन्तुष्ट रहते हैं, उसी घर में सौभाग्य और ऐश्वर्य निवास करते है। जहाँ उनमें कलह होता हैं। वहाँ दुर्भाग्य और दारिद्रय स्थिर रहता है। स्त्री की प्रसन्नता से घर की प्रसन्नता मुखरित रहती है। यदि वह अप्रसन्न रही तो सभी ओर अप्रसन्नता और दुःखद परिस्थितियाँ उठ पड़ती हैं।
दाम्पत्य-जीवन के सुख का चाव विवाह के थोड़े दिन तक पूर्ण स्थिर रहता है। जब तक दोनों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण बना रहता है, तब तक दोनों ही एक विलक्षण सुख का अनुभव किया करते है। थोड़ी देर तक पति दिखाई न दे, तो नव-वधू का हृदय आशंका से छटपटाने लगता है। तरह-तरह की मंगल कामनायें अन्तःकरण से उठने लगती है। पति आ जाता है तो ऐसा प्रतीत होता है जैसे खोए हुए प्राण वापस हुए हों। पुरुषों की भी ऐसी ही अवस्था होती है। उन्हें भी अपनी पत्नी के लिए तरह-तरह की वस्तुएं एकत्रित करने में बड़ा आनन्द आता है। इसके लिये वे अनेकों प्रयत्न भी करते हैं। जब तक यह भावनाओं का आदान-प्रदान चलता रहता है, तब तक घर का वातावरण अत्यन्त रोचक और सजीव बना रहता है।
किन्तु आकर्षण की कमी के साथ भावनाओं का स्तर भी गिरने लगता है। पारस्परिक प्रिय-दर्शन और आत्मदान के स्थान पर एक दूसरे के दोष, ऐब और कमियाँ ढूँढ़ने लग जाते है। यही से गृहस्थ की दुर्दशा प्रारम्भ होती है जो घर को अन्ततः नरक जैसी दुःखद परिस्थितियों में जा पटकती है।
आकर्षण में गिरावट का प्रमुख कारण अनियन्त्रित काम वासना ही है। इसका प्रधान दोषी पुरुष है। भारतीय परम्पराओं के अनुसार पुरुषों के अधिकार बड़े माने जाते हैं। अधिकाँश व्यक्ति इस स्वामित्व का दुरुपयोग अपनी क्षणिक इन्द्रिय उत्तेजना की पूर्ति में किया करते है। इससे सौंदर्य का आकर्षण कम होने लगता है और लोग आध्यात्मिक सन्निकटता से दूर हटने लगते हैं।
स्त्रियों को अपनी सम्पत्ति मानकर उनसे व्यवहार करने की पुरुष की आदत नितान्त दुर्भाग्यपूर्ण है। जो कर्त्तव्य स्त्रियों के पुरुषों के प्रति होते हैं, वैसा ही निर्वाह यदि पुरुष भी अपनी पत्नियों के प्रति करें तो दाम्पत्य जीवन को चिरकाल तक सुखद शान्तिमय बनाये रखा जा सकता है। पुरुषों के कर्त्तव्यों की विवेचना करते हुए पद्मपुराण में लिखा है ।
नास्तिभार्या समंतीर्थं नास्ति भार्या समंसुखम्।
नास्ति भार्या सर्मंपुण्य, तारणाय हिताय च॥
पुरुष के हित व कल्याण के लिए पत्नी से बढ़कर न तो कोई तीर्थ है न पुण्य, स्त्री के समान सुख अन्यत्र मिलना असम्भव है।
इस सुख की अनुभूति तभी मिल सकती है, जब स्त्री-पुरुषों में पारस्परिक विश्वास सुदृढ़ बना रहे। इससे आत्मीयता बनी रहती है, स्नेह स्थिर रहता है। छोटी-मोटी गलतियाँ भी हो जाती हैं, तो उन्हें उदारतापूर्वक क्षमा कर देने से सम्बन्धों में बिगाड़ पैदा नहीं होता। जो इतना भी न कर सकें, उसे मनुष्य कहना भी भूल है। मनुष्य की सच्ची कसौटी वह है कि यह अपने संरक्षण में निवास करते वालों का शारीरिक और मानसिक भरण पोषण करने हुए दूसरों के हितों में ही अपना सुख माने। अपनी पत्नी, अपने बच्चों को सुखी, हँसता-खेलता देखकर कौन ऐसा सद्गृहस्थ होगा, जिसे खुशी न होती हो। छोटी-छोटी गलतियाँ प्रायः सबसे होती रहती हैं। दाल में थोड़ा नमक ज्यादा हो गया, बच्चे ने दूध बिखेर दिया या भोजन पकाने में थोड़ा विलम्ब हो गया, इतने मात्र से यह मान लेना कि आपकी पत्नी आपका ध्यान नहीं रखती, उचित प्रतीत नहीं होता। जिस प्रकार पुरुषों को बाह्य जीवन में अनेकों उलझनें आती हैं, वैसी ही घर में भी सम्भव हैं। इन समस्याओं को लेकर अपने मधुर सम्बन्ध क्यों खराब करें? उदारता पूर्वक गलतियों को क्षमा कर देने से दूसरे भी सोचते है कि आपको उनका कितना ध्यान है। इसी बात को लेकर तो नारियाँ अपने पिता का घर छोड़कर पतियों का सहचर्य स्वीकार करती हैं जिससे इसकी पूर्ति भी सम्भव न हो सकी, इतना भी नहीं बन पड़ा तो उस अभागे पति को कंजूस ही कहा जायगा।
आनन्द का वातावरण पति-पत्नी के स्नेहपूर्ण सम्बन्धों पर आधारित है। उनमें आत्मीयता हो तो कम-शिक्षित और कम सुन्दर दम्पत्ति भी अभावपूर्ण जीवन में भी सुख का रसास्वादन प्राप्त कर सकते हैं। आकर्षण का कारण बाह्य सौंदर्य नहीं कहा जा सकता। आन्तरिक पवित्रता, स्नेह और आत्मीयता के कारण अपनी कम सुन्दर पत्नी भी प्राण-प्रिय होती है। घर का सौंदर्य भी मधुर सम्बन्धों से ही फलता-फूलता है।-शास्त्रों का कथन है-
भार्यापत्युर्व्रतं कुर्याद् भार्यावाश्व पतिवतम्।
संसारोऽपि हि सारः स्याद दम्पत्योरेक कः॥
यदि पति-पत्नी एक हृदय हों तो यह अनुसार संसार भी सारवान् बन सकता है। वहाँ इसी धरती में भी स्वर्ग के दर्शन करने हों तो हर सद्गृहस्थ को अपने दाम्पत्य जीवन में प्रेम, स्नेह, आत्मीयता और अभिन्नता की भावना पैदा करनी होगी।
मनुष्य इच्छाओं का पुतला है। उसके व्यावहारिक जीवन में प्रतिक्षण अनेकों आकाँक्षायें उठा करती है। स्वास्थ्य की, धन की, स्त्री और यश की अनेकों कामनायें प्रत्येक मनुष्य में होती हैं। इसके विविध काल्पनिक चित्र मस्तिष्क में बनते बिगड़ते रहते हैं। जैसे ही कोई इच्छा स्थिर हुई कि मानसिक शक्तियाँ उसी की पूर्ति में जुट पड़ीं, शारीरिक चेष्टायें उसी दिशा में कार्य करने लगती हैं। संसार की विभिन्न गतिविधियाँ व क्रिया कलाप चाहे वह भौतिक हों अथवा आध्यात्मिक, इच्छाओं की पृष्ठभूमि पर निरूपित होते हैं। रचनात्मक कदम तो पीछे का है, पहले तो सारी योजनाओं को निर्धारित कराने का श्रेय इन्हीं इच्छाओं को ही है।
स्थिर तालाब के जल में जब किसी मिट्टी के ढेले या कंकड़ को फेंकते हैं तो उसमें लहरें उठने लगती हैं। पत्थर के भार व फेंकने की गति के अनुरूप ही लहरों का उठना, तेजी व सुस्त गति से होता है। ठीक इसी प्रकार हमारी इच्छायें क्या हैं, यह हमारी शारीरिक चेष्टायें, चेहरे के हाव-भाव बताते रहते है। व्यभिचारी व्यक्ति की आँखों से हर क्षण निर्लज्जता के भाव परिलक्षित होंगे। चेहरे का डरावनापन अपने आप व्यक्त कर देता है कि यह व्यक्ति चोर, डाकू, बदमाश है। कसाई की दुर्गन्ध से ही गाय यह पहचान लेती है कि वह वध करना चाहता है।
इसी प्रकार सदाचारी, दयाशील व्यक्तियों के चेहरे से सौम्यता का ऐसा माधुर्य टपकता है कि देखने वाले अनायास ही उनकी ओर खिंच जाते हैं। विचारयुक्त व गम्भीर मुखाकृति बता देती है कि यह व्यक्ति विद्वान, चिन्तनशील व दार्शनिक है। प्रेम व आत्मीयता की भावना से आप चाहे किसी जीव-जन्तु को देखें, वह भयभीत न होकर आपके उदार भाव की अन्तरमन से प्रशंसा करने लगेगा।
अनन्त आनन्द के केन्द्र परमात्मा के हृदय में एक भावना उठी- “एकोऽहंबहुस्यामि” और इसी का मूर्तिमान रूप यह मंगलमय संसार बन कर तैयार हो गया। यह उनकी सद्-इच्छा का ही फल है कि संसार में मंगलदायक और सुखकर परिस्थितियाँ अधिक हैं। यदि ऐसा न होता तो यहाँ कोई एक क्षण के लिये भी जीना न चाहता। पर अनेकों दुःख तकलीफों के होने पर भी हम मरना नहीं चाहते, इसलिये कि यहाँ आनन्द अधिक हैं।
इच्छा एक भाव है, जो किसी अभाव, सुख या आत्मतुष्टि के लिये उदित होता है। इस प्रकार की इच्छाओं का सम्बन्ध भौतिक जगत से होता है। इनकी आवश्यकता या उपयोगिता न हो, सो बात नहीं। दैनिक जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन चाहिये ही। सृष्टि संचालन का क्रम बना रहे इसके लिये दाम्पत्य जीवन की उपयोगिता से कौन इनकार करेगा? पर केवल भौतिक सुखों के दाँव-फेर में हम लगे रहें तो हमारा आध्यात्मिक विकास न हो पायेगा।
तब सौमनस्यता व सौहार्दपूर्ण सदिच्छाओं की आवश्यकता दिखाई देती है। प्रेम, आत्मीयता और मैत्री की प्यास किसे नहीं होती। हर कोई दूसरों से स्नेह और सौजन्य की अपेक्षा रखता है। पर इनका प्रसार तो तभी सम्भव है, जब हम भी शुभ इच्छायें जागृत करें। दूसरों से प्रेम करें, उन्हें विश्वास दें और उनके भी सम्मान का ध्यान रखें। इन इच्छाओं के प्रगाढ़ होने से सामाजिक, नैतिक व्यवस्था सुदृढ़, सुखद होती है, पर इनके अभाव में चारों ओर शुष्कता का ही साम्राज्य छाया दिखाई देगा।
मानव जीवन गतिवान् बना रहे, इसके लिये स्व-प्रधान इच्छायें उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है। पर इनके पीछे फलासक्ति की प्रबलता रही तो उसकी तृप्ति न होने पर अत्यधिक दुःखी हो जाना स्वाभाविक है। इच्छाओं के अनुरूप परिस्थितियाँ भी मिल जायेंगी, ऐसी कोई व्यवस्था यहाँ नहीं। कोई लखपति बनना चाहे, पर व्यवसाय में लगाने के लिये कुछ भी पूँजी पास न हो तो इच्छा पूर्ति कैसे होगी। ऐसी स्थिति में दुःखी होना ही निश्चित है। जो भी इच्छायें करें वह पूरी ही होती रहें, यह सम्भव नहीं। इनके साथ ही आवश्यक श्रम, योग्यता एवं परिस्थितियों का भी प्रचुर मात्रा में होना आवश्यक है। किसी की शैक्षणिक योग्यता मैट्रिक हो और वह कलक्टर बनना चाहे, तो यह कैसे सम्भव होगा? इच्छाओं के साथ वैसी ही क्षमता भी नितान्त आवश्यक है। विचारवान् व्यक्ति सदैव ऐसी इच्छायें करते हैं, जिनकी पूर्ति के योग्य साधन व परिस्थितियाँ उनके पास होती हैं।
इसका तात्पर्य यह नहीं कि हम जिन परिस्थितियों में आज हैं, उन्हीं में पड़े रहें। जितनी हमारी क्षमता है, उसी से सन्तोष कर लें, तब तो विकास की गाड़ी एक पग भी आगे न बढ़ेगी। आज जो प्राप्त है उसमें सन्तोष अनुभव करें और कल अपनी क्षमता बड़े इसके लिये प्रयत्नशील हों, तो इसे शुभ परिणिति कहा जायेगा। नैपोलियन बोनापार्ट प्रारम्भ में मामूली सिपाही था। चीन के प्रथम राष्ट्रपति सनयात सेन अपने बाल्यकाल में किसी अस्पताल के मामूली चपरासी थे। इन्होंने अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिये क्रमिक विकास का रास्ता चुना और अपना लक्ष्य पाने में सफल भी हुये।
इस व्यवस्था में लम्बी अवधि की प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है, पर व्यक्तित्व के निखार का यही रास्ता है। अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिये पहले आप उस काम के करने की दृढ़ इच्छा मन में करलें, पीछे सारी मानसिक शक्तियों को उसमें लगा दें, तो सफलता की सम्भावना बढ़ जाती है। दृढ़ इच्छा शक्ति से किये गये कार्यों को विघ्न बाधायें भी देर तक रोक नहीं पातीं। संसार में जिन लोगों ने भी बड़ी इच्छाओं की पूर्ति की, उन्होंने पहले उसकी पृष्ठभूमि को अधिक सुदृढ़ बनाया, पीछे उन कार्यों में जुट पड़े। तीव्र विरोध के बावजूद भी सिकन्दर झेलम पार कर भारत विजय दृढ़ मनस्विता के बल पर ही कर सका। शाहजहाँ की उत्कृष्ट अभिलाषा का परिणाम ताजमहल आज भी इस धरती पर विद्यमान् है।
जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी ऐसे ही महान् कार्यों की श्रेणी में आती है। दूसरों से सिद्धियों सामर्थ्यों की बात सुनकर, आवेश में आकर आत्म-साक्षात्कार की इच्छा कर लेना हर किसी के लिये आसान है। पर पीछे देर तक उस पर चलते रहना, तीव्र विरोध और अपने स्वयं के मानसिक झंझावातों को सहते हुये इच्छा पूर्ति की लम्बे समय तक प्रतीक्षा की लगन हम में बनी रहे तो परमात्मा की प्राप्ति के भागीदार बन सकना भी असम्भव न होगा।
इसके विपरीत यदि हमारी इच्छा शक्ति ही निर्बल, क्षुद्र और कमजोर बनी रही तो हमें अभीष्ट लाभ कैसे मिल सकेगा? अधूरे मन से ही कार्य करते रहे तो लाभ के स्थान पर हानि हो जाना सम्भव है। इच्छायें जब तक बुद्धि द्वारा परिमार्जित होकर संकल्प का रूप नहीं ले लेतीं, तब तक उनकी पूर्ति संदिग्ध ही बनी रहेगी। इच्छा-शक्ति यदि प्रखर न हुई तो वह लगन और तत्परता कहाँ बन पायेगी जो उसकी सिद्धि के लिये आवश्यक है।
मनुष्य इच्छायें करें, यह उचित ही नहीं आवश्यक भी है। इसके बिना प्राणि जगत निःचेष्ट एवं जड़वत् लगने लगेगा, किन्तु इसका एक विषाक्त पहलू भी है, वह है इनकी अति और अनौचित्य। मनुष्य जीवन को क्लेशदायक परिणामों की ओर ले जाने में अति और अनुचित इच्छाओं का ही प्रमुख हाथ है। स्वामी रामतीर्थ कहा करते थे-मनुष्य के भय और चिन्ताओं का कारण उसकी अपनी इच्छायें ही हैं। इच्छाओं की प्यास कभी पूर्ण रूप से सन्तुष्ट नहीं हो पाती। बात भी ऐसी ही है। आज जो 100 रुपये पाता है वह कल 1000 रुपये की सोचता है और यदि यह इच्छा पूरी तो गई तो दूसरे ही क्षण 1 लाख की कामना करने लग जाता है। इच्छा वह आग है जो तृप्ति की आहुति से और प्रखर हो उठती है। एक पर एक अंधाधुंध इच्छायें यदि उठती रहें तो मानव जीवन नारकीय यन्त्रणाओं से भर जाता है।
अच्छी या बुरी, जैसी भी इच्छा लेकर हम जीवन क्षेत्र में उतरते हैं, वैसी ही परिस्थितियाँ, सहयोग भी जुटते चले जाते हैं। हमारी इच्छा होती है एम॰ ए॰ पास करें तो स्कूल की शरण लेनी पड़ती है, अध्यापकों का सहचर्य प्राप्त करते हैं, पुस्तकें जुटाते हैं। तात्पर्य यह है कि इच्छाओं के अनुरूप ही साधन जुटाने की आदत मानवीय है। पर यदि यही इच्छायें अहितकर हों तो दुराचारिणी परिस्थितियाँ और बुरे लोगों का संग भी स्वाभाविक ही समझिये। ऐसी स्थिति में व्यक्ति अपनी कामना भले ही पूर्ण कर ले, पर पीछे उसे निन्दा, परिताप एवं बुरे परिणाम ही भोगने पड़ेंगे। व्यभिचारी व्यक्ति अपयश और स्वास्थ्य की खराबी से बचा रहे, यह असम्भव है। चोर को अपने कुकृत्य का दण्ड न भोगना पड़े, यह हो नहीं सकता। तब आवश्यकता इस बात की होती है कि हम अच्छी कामनायें ही करें।
विशुद्ध आत्मा से की गई सदिच्छायें बड़ी बलवती होती हैं। ऐसा व्यक्ति स्वयं तो स्वर्गीय सुख अहर्निश आस्वादन करता ही है, साथ ही अनेकों औरों को भी सन्मार्ग की प्रेरणा देकर उन्हें भी सदाचार में प्रवृत्त कर देता है। दूसरों की भलाई करने वालों को सदैव, सर्वत्र सम्मान सुख मिलेगा ही। औरों के दुःख में हाथ बटाने वाले ही सच्चे मित्र प्राप्त करते हैं। परमार्थ की जिनकी वृत्ति होती है, उन्हें औरों की आत्मीयता से वंचित रहते कभी किसी ने न देखा होगा।
दक्षिण के महान् सन्त तिरुवल्लुवर ने लिखा है- “योगी वही है जो साँसारिक इच्छाओं को वशवर्ती करे, औरों की हित-कामना में रत हो।” यह सच ही है कि मनुष्य इस धरती पर एक महान् उद्देश्य लेकर अवतरित हुआ है। यह सुयोग उसे बार-बार नहीं मिलता। आज जो शारीरिक, मानसिक और भावनाओं की क्षमता हमें मिली है, कौन जाने अगले जन्मों में भी मिलेगी अथवा नहीं। फिर हमें सच्चे हृदय से आत्म-कल्याण की ही कामना करनी चाहिये। अपना जीवन लक्ष्य भी पूरा हो सकेगा तथा औरों के प्रति कर्तव्य पालन भी हो सकेगा।
हम स्वास्थ्य, सद्गृहस्थ, धन और यश की कामना करें, पर परमार्थ को भी भुलायें नहीं। आत्म-तुष्टि का जहाँ ध्यान रहे, वहाँ यह भी न भूलें कि इस संसार में हजारों लाखों ऐसे भी हैं, जो हमारी परिस्थितियों से कोसो पीछे पड़े अभाग्य का रोना रो रहे हैं। इनके भी हित एवं कल्याण की इच्छा करना हमारा परम धर्म है। इसके अभाव में तो वह परिस्थितियाँ भी देर तक न टिक सकेंगी, जो आज हमें मिली है। कोई धनी व्यक्ति यदि सारा धन समेट कर बैठ जाय, आस-पास के लोग भूखे मरते रहें, तो वह व्यक्ति सुरक्षा स्थिर रखे रहेगा ऐसी आशा बहुत कम करनी चाहिये।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। अपने परिवार, पड़ोस, गाँव राष्ट्र की अनेक जिम्मेदारियाँ उस पर होती हैं। हम अपनी सुख सुविधाओं की बात सोचें, पर औरों के प्रति सच्चे हृदय से कर्तव्य पालन करने की इच्छा करे तभी हमारा भला होगा। जीवन लक्ष्य की प्राप्ति भी तभी सम्भव है, जब हम में सदिच्छायें जागृत हों, औरों के प्रति शुभ कामनाओं का विकास हो।
जब हम विशुद्ध हृदय से प्राणिमात्र से स्वार्थ-पूर्ण अथवा कुत्सित लाभ उठाने का विचार त्याग देंगे, तो हम परमात्मा के इतने समीप पहुँच जायेंगे कि संसार के सारे पदार्थ सुन्दर दिखाई देने लगेंगे। पर हमने स्वयं ही अपने कुविचारों तथा कुकृत्यों द्वारा उस दैवी प्रवाह का मार्ग अवरुद्ध कर रखा है, जिसके प्राप्त हो जाने से हमारा आत्म विकास हो सकता है। प्रत्येक बुरा कर्म हमारी आँखों में पर्दा डाल देता है, जिसके कारण हम समाजिक जीवन में दूषित वातावरण पैदा करने में लग जाते हैं और परमात्मा की श्रेष्ठता से वंचित रह जाते हैं, क्योंकि प्रत्येक बुरा काम हमें ईश्वर से दूर ले जाता है। जब आप अपनी संकीर्णता का परित्याग कर देंगे तो आप देखेंगे कि परमात्मा हर दिल में समाया हुआ आपको मिलने के लिये खोज रहा है। आप कभी किसी के साथ अपने-पराये, ऊँच-नीच, छोटे-बड़े का भेद पूर्ण बर्ताव न करें। इस तरह आप के भीतर ही जो अनन्त आत्म-शक्ति का कोष भरा हुआ है, वह जाग जायगा। आप अपने अभिलाषित पदार्थों की प्राप्ति में समर्थता प्रतीत करने लगेंगे।
-स्वेट मार्डेन
देवता अब इन्सान बनो।
छोड़ भक्ति को तन्द्रा युग-युग संचित ज्ञान बनो॥
मन्दिर का कारागृह तज कर खेतों पर उतरो,
भूल वन्दना के स्वर प्राणों में संघर्ष भरो,
ताप से तप कंचन निखरो।
अन्धकार की निविड़ निशा में नवल विहान बनो।
देवता अब इन्सान बनो।
तुम ने नहीं सुना क्या पौरुष का बजता डंका,
नहीं देखते सजी-सजायी रावण की लंका
राम अब क्या भ्रम क्या शंका ।
सोमनाथ मत बनो पार्थ के अभ्युत्थान बनो।
देवता अब इन्सान बनो॥
अधः पतन का जाल चुनौती देने आया है,
भावों की झंझा ने पथ का दीप बुझाया है,
मनुज भूला भरमाया है,
सत्य, न्याय, समता, क्षमता के गौरव गान बनो।
देवता अब इन्सान बना
- विद्यावती मिश्र
आओ, हथकड़ियों से ये शिर फोड़-फाड़ उर जाग्रत कर दो,
जन-जन में उत्साह, अतुल बल पौरुष शौर्य धीरता धर दो,
टीका कर मस्तक पर वरदे। वर दो, भर दो बल कर-कर में,
गूँज उठे फिर देखो जयध्वनि भू-मंडल जल-थल अम्बर में
कहने को रह जाय जगत में नहीं हमारी व्यथा कहानी,
“कहने को मुँह नहीं हमारे, भला कहें क्या करुण कहानी।”
-सुधीन्द्र
बस झुक जाओ देख प्रभंजन, गिरि को देख न रुक जाओ,
और न जम्बुक से मृगेन्द्र को देख सहम कर लुक जाओ,
झुकना,रुकना, लुकना ये सब कायर की सी बातें हैं-
बस तुम तो वीरों से निज को बढ़ने को उत्सुक पाओ
अपनी अविचल गति से चलकर नियतिचक्र की गति बदलो।
बढ़े चलो बस बढ़े चलो हे युवक निरन्तर बढ़े चलो॥
-अज्ञात
उठ चेत और हो सावधान तू बहुत सो चुका है अब तक,
स्थिति न गिरी यह सुधरेगी चैतन्य न तू होगा जब तक,
निज सैन्य साज, संगठन बना, सेवा की सच्ची साध लिये,
तू कदम बढ़ाता जा अपने, एक नई लहर निर्बाध लिये,
निर्भय होकर बढ़ चल आगे, कर में लेकर अपना निशान
नव-युग का है यह नव-विहान, उठ शीघ्र प्राप्त कर दिव्यज्ञान।
-वासुदेव प्रसाद गुप्त
मन में बल हो तो शिखर चाट लेंगे तलवे,
सागर का वक्षस्थल राहें देगा फट कर,
संकल्प मन्त्र की शक्ति , कौन जो सहन करे?
पद-पथ को नमन करेंगी बाधायें हटकर,
अम्बुधि काँपेगा रत्न कोष धर चरणों पर,
हम को अगत्स्य की कथा याद करनी होगी।
स्वर्णिम विहान के फूल खिले उस पार मगर,
इस विकट रात की नदी पार करनी होगी।
- रमेशनारायण तिवारी
दानवता से हार मान कर, मानवता है सिसक रही। मानवता की स्नेह-डोरियाँ, उलझ-उलझ कर चिटक रही॥
कोटि-कोटि पलकें पथरायी, अपलक राह निहारते। मेरे राम! आज वसुधा के कण-कण तुम्हें पुकारते॥
अगिन दशानम विचर रहे हैं स्वर्ण भूमि निष्प्रभ अकुलाती।
राम राज्य की सुखद कल्पना पर काली छाया लहराती॥ हरो धरा के भार देव! फिर बर्बर युग हुँकारते।
मेरे राम! आज वसुधा के कण-कण तुम्हें पुकारते॥
-शिवानन्द शिवम्
समय नहीं ढप पर बिरहा, झूमर, कजली गाने का,
समय नहीं, दर्दीले भावों में मन उलझाने का,
मौसम की खामोशी भी संकेत कर रही है-
समय नहीं, अब प्रणय-गीत में मन को फुसलाने का।
ऐसे गाओ गीत जोश से लहू उबल जाये,
धरती का कण-कण जग जाये ऐसा गान सुनाना होगा।
जिन्हें भोर की अलसाई निंदिया है सुला रही,
उन्हें सजग करने को हम को आगे कदम बढ़ाना होगा।
-महेन्द्र कुमार “नीलम”
असत्य को संसार में सभी धर्मों, सम्प्रदायों, समाज प्रणालियों में बुरा माना है। सभी महापुरुषों ने असत्य को छोड़ देने का उपदेश दिया है। किसी वास्तविक तथ्य को, सही बात को छुपाकर उसके बदले दूसरी ही नई मनगढ़न्त बात कहना, वैसा ही करना, असत्य का अनुसरण करना है। वाचिक दोषों को असत्य भाषण में बहुत बड़ा दोष (पाप) माना गया है। अक्सर लोग किसी दण्ड से बचने के लिये अथवा अपने दोषों को छिपाने या किसी लाभ की प्राप्ति के लिये झूठे बोलते हैं। अनुचित रूप से दूसरों को दोष देना एवं निन्दा करना भी असत्य भाषण ही माना जाता है। इसी तरह अनाप-सनाप बकना, कटुता भरे वचन भी असत्य भाषण के ही रूप हैं। किसी भी रूप में असत्य भाषण का आधार प्रलोभन, राग, द्वेष, लाभ आदि ही होते हैं।
असत्य का अनुसरण किसी भी हालत में किया जाय, वह सभी प्रकार से सदोष और गड़बड़ी पैदा करने वाला है। असत्य भाषण, असत्य आचरण, मनुष्य के आन्तरिक और बाह्य जीवन में अनेकों विषमतायें पैदा कर देता है और उनसे समस्त व्यक्तित्व, कलुषित, सदोष बना जाता है। असत्य के त्याग की शिक्षा किसी रूढ़ि परम्परा पर आधारित नहीं है, वरन् यह उन वैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है जिनसे असत्य के दुष्प्रभाव की जाँच जीवन-विद्या-विशारदों ने की है।
किसी भी कारण झूठ बोलते रहने पर धीरे-धीरे यह अभ्यास परिपक्व हो जाता है और फिर मनुष्य जाने अनजाने हर समय झूँठ बोलने लगता है। इसका व्यक्ति के जीवन पर भारी प्रभाव पड़ता है। स्वाभाविक और सीधी सही जानकारी या वास्तविक तथ्य को छिपाकर उसके स्थान पर कृत्रिम प्रसंग गढ़ने पर मस्तिष्क को प्रायः सात गुना कार्य करना पड़ता है। एक ओर तो सही तथ्य को लेकर मन से निकलने वाले स्वाभाविक प्रवाह को जोरों से दबाना पड़ता है, दूसरी ओर ऐसी नई बात प्रस्तुत करनी पड़ती है, जो असत्य होते हुए भी पकड़ में न आवे। ऐसा ढंग खोजना पड़ता है, जिससे असत्य का पर्दा न खुल जाय। सचमुच असत्य को छिपाने के लिये मस्तिष्क को ऐसा ताना-बाना बुनना पड़ता है कि कहीं उसका भेद न खुल जाय। दूसरी ओर अन्तर से निकलने वाले सत्य के प्रवाह को जोरों से दबाना पड़ता है कि कहीं अनायास ही असलियत न खुल पड़े। असत्य वक्ता के दिमाग को असाधारण सतर्कता से इतना काम करना पड़ता है कि उससे भारी मानसिक-क्षति उठानी पड़ती है और उसका मानसिक संस्थान दुर्बल होने लगता है।
मानसिक संस्थान की दुर्बलता के साथ ही मनुष्य में “दो व्यक्तित्व” पोषण पाने लगते हैं ओर वे भी विषय प्रकृति के। एक असली दूसरा नकली। असली व्यक्ति सही बात को जानता है, उसी में आस्था रखता है, उसे ही प्रकट करना चाहता है। नकली व्यक्तित्व सही बात को छिपाता है, सत्य की आवाज को कुचलता है और मनगढ़न्त कहानी बना लेता है। वह सत्य को प्रकट नहीं होने देता। असली व्यक्तित्व नकली व्यक्तित्व के इस कृत्य से घृणा करता है, उससे परेशान एवं दुःखी रहता है। दोनों में द्वन्द्व पैदा हो जाता है। इससे असत्यवक्ता की मनोभूमि अन्तर्विरोधों, अंतर्द्वंद्वों से भर जाती है। मनोविज्ञान शास्त्र के अनुसार ऐसी स्थिति में कई मानसिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। पागलपन, मूर्च्छा, अनिद्रा, स्मरणशक्ति का ह्रास, सिरदर्द, दुःस्वप्न, रक्तचाप, धड़कन, मधुमेह आदि रोग आमतौर से इसी स्थिति में पैदा हो जाते हैं।
वैज्ञानिक शोधों से यह सिद्ध हो गया है कि मनुष्य की असन्तुलित, अंतर्द्वंद्व भरी मनोभूमि उसके शारीरिक और मानसिक रोगों का प्रमुख कारण बन जाती है। दो व्यक्तित्वों की अन्तर्द्वन्द्व भरी मानसिक स्थिति से स्वास्थ्य पर बहुत बड़ा दुष्प्रभाव पड़ता है। कपटी, छली, धूर्त, कुचक्री, चोर, असत्यवादी प्रकृति के लोग धीरे-धीरे अपने मानसिक, शारीरिक स्वास्थ्य को नष्ट कर लेते हैं।
असत्य मनुष्य के बाह्य जीवन को भी उसी तरह प्रभावित करता है जैसे उसके स्वयं के व्यक्तित्व को। मालिक और नौकर के बीच, मित्र-मित्र के बीच, स्वजनों और सम्बन्धियों के बीच अविश्वास, घृणा और द्वेष, दुर्भावना पैदा करने में असत्य आचरण, असत्य भाषण का ही पुरा हाथ होता है। कोई भी व्यक्ति दूसरों के साथ धोखेबाजी भरा झूठा व्यवहार कर लेगा किन्तु वह यह नहीं सहेगा कि कोई उसके साथ भी कोई धोखेबाजी करे। जब वह अपने साथ इस तरह का व्यवहार देखता है तो उसमें बड़ा क्रोध और रोष पैदा होता है। जिसने ऐसा किया है उसके प्रति घृणा और प्रतिहिंसा की भावना बल पकड़ लेती है। बदला लेने के लिये जो न पड़ता है, करता है। दण्ड देने, बदला लेने, असमान निन्दा आदि में जो भी सम्भव होगा वह करेगा। इस तरह असत्य जहाँ भी प्रयुक्त होगा वहीं इस तरह के विष बीज बो देगा। परस्पर के द्वेष, क्रोध, घृणा प्रतिशोध से समाज में भी गन्दगी और अशान्ति फैलती है। जिस समाज में इस तरह के झूँठे, बेईमान, धोखेबाज लोग अधिक होते हैं, वहाँ शान्ति, प्रेम, मैत्री सद्भावना के सम्बन्ध स्थिर नहीं रह पाते और परस्पर कलह, उपद्रव, आक्रमण की दुर्भावनापूर्ण प्रक्रियायें बढ़ती हैं और पनपती हैं।
असत्य से किसी स्थायी लाभ की प्राप्ति नहीं होती, वह तो धोखे का सौदा है। लेकिन खेद का विषय है लोग फिर भी असत्य का अवलम्बन लेते हैं। एक-दो बार भले ही असत्य, धोखेबाजी से कुछ भौतिक लाभ प्राप्त कर लिया जाय किन्तु फिर सदा के लिये ऐसे व्यक्ति से दूसरे लोग सतर्क और होशियार हो जाते है उससे दूर रहने का प्रयत्न करते हैं । असत्यभाषी को लोक-निन्दा को पात्र बनकर समाज से परित्यक्त जीवन बिताना पड़ता धोखेबाज, झूठे, चालाक व्यक्ति का साथ उसके भी बच्चे नहीं देते।
किसी भी तथ्य की असलियत को छिपाने, किसी दण्ड के भय से बचने, किसी लाभ की प्राप्ति करने, किसी की निन्दा आलोचना करने, अनर्गल प्रलाप के रूप में, जिस किसी भी कारण झूठ बोलने की, असत्याचरण की आदत को छोड़ देना ही श्रेयस्कर होता। किसी भी कारण से जीवन में असत्य को स्थान देना अपनी बरबादी का द्वार खोलना है। वस्तुतः प्रारम्भ में झूठ बोलना लाभ और प्रसन्नतादायक लगता है, किन्तु अन्ततः देर सवेर में असत्य का पर्यवसान घोर संकटों, मुसीबतों असफलताओं के रूप में भी हानिकर सिद्ध होता है। असत्य का आश्रय लेकर कभी भी किसी ने कोई महत्वपूर्ण लाभ नहीं कमाया। यों किसी ने प्रारम्भ में कुछ लाभ भी प्राप्त किया, तो भी सदा के लिये समाज की नजरों से गिरकर हेय, परित्यक्त, अछूत जीवन बिताना कोई जीवन है। असत्य, धोखे-बाजी, चालाकी, सदैव घाटे का सौदा है।
गृहमेव गृहस्थानाँ सुसमाहित चेतसाम्।
शान्ताहं कृ ति दोषाणाँ विजना वन भूमयः।
अरण्य सदनेतुल्ये समाहित मनोदृशाम्॥
- योग वाशिष्ठ 5। 56। 23
जिसका चित्त स्थिर है और अहंकार शान्त है उन गृहस्थों के लिये घर ही निर्जन वन के समान है। शाँत चित्त वालों के लिये घर और वन एक-सा है।
सत्य ही सब तरह से हमारे लिए उपासनीय है। सत्य के मार्ग पर आरम्भ में कुछ कठिनाइयाँ आ सकती हैं, किन्तु यह जीवन को उत्कृष्ट और महान् बनाने का राजमार्ग है। जिस तरह आग में तपाकर, कसौटी पर घिसकर सोने की परख होती है, उसी तरह सत्य की कसौटी पर खरे उतरने के लिए आने वाली कठिनाइयों का सामना करना ही उचित भी है और आवश्यक भी। एक बार सत्यनिष्ठा की प्रामाणिकता सिद्ध होने पर मनुष्य की स्थिति शुद्ध सोने जैसी हो जाती है। सत्य का मार्ग सरल, सहज और स्वाभाविक है। ऐसे मंगलमय पथ पर चलकर लोक और परलोक को सुख−शांतिमय क्यों न बनावें।
मकान-मालिक जब घर छोड़कर कहीं अन्यत्र चला जाता है तो उस मकान की दुर्दशा प्रारम्भ हो जाती है। मकड़ियाँ जाला बनाने लगती हैं। जगह-जगह चिड़ियाँ घोंसले बना लेती हैं। कीड़े-मकोड़े बढ़ जाते हैं। वर्षा और वायु के प्रकोप से दीवालों में दरारें पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे आलीशान मकान भी खाली पड़े रहने पर ध्वस्त होकर धराशायी बन जाते हैं। यह स्थिति घर में फली क्रियाशीलता के अभाव से हो जाती है। जब तक मालिक रहता है, तब तक उसकी लिपाई, पुताई, छानी-छप्पर, मिट्टी-मरम्मत होती रहती है। इससे वही मकान साफ -सुथरा और वर्षा में भी सुदृढ़ बना रहता है। ठीक यही बात मानव जीवन के बारे में भी लागू होती है। जब तक मनुष्य क्रिया-शील रहता है तब तक अंग-प्रत्यंग तथा मानसिक चेष्टायें सही दिशा में लगी रहती हैं, पर जैसे ही आलस्य और अकर्मण्यता संवार हुई कि रोग-शोक, असन्तोष और अशान्ति, दैन्य और दीनता के जीव-जन्तु अपना-अपना अड्डा मनःक्षेत्र में जमाने लग जाते हैं और चारों ओर निराशा की मुर्दनी छाई जान पड़ने लगती है।
लोहा देखने में कितना ठोस व मजबूत दिखाई पड़ता है। सारे शरीर की शक्ति लगा कर भी उसे तोड़ा जाना सम्भव नहीं। काटना हो तो पैनी छैनी और वजनदार घनों की चोट देनी पड़ेगी। पर उसी लोहे को किसी कूड़े-कचरे के ढेर में फेंक दीजिये तो कुछ ही दिन में जंग लग जायगी और सम्पूर्ण लोहे को चाट कर बैठ जायेगी। मनुष्य शरीर भी लोहे जैसा ही है। इसकी सुन्दरता और मजबूती तभी तक स्थिर समझिये, जब तक इसमें क्रियाशीलता है। काम से जी-चुराने और दूर भागने का परिणाम लोहे में जंग लग जाने जैसा ही हो सकता है। शरीर का महत्व काम से ही है।
कहावत है- “खाली दिमाग शैतान का घर” अर्थात् निरर्थक समय बिताने और आलस्य में पड़े रहने से उत्पन्न शिथिलता अनेक प्रकार की विकृतियाँ ही पैदा करती है। अपने साथ अनेक औरों को भी इससे हानि ही होती है। पारस्परिक कलह, अनैतिक तत्व और दुराचार बरतने वाले वे ही लोग होते हैं जो श्रम से जी चुराते हैं। जो फैशनपरस्ती को ही जीवन मानकर केवल बन ठन कर इधर-उधर घूमते रहते हैं, ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिये अभिशाप माने जाते हैं । ऐसे आदमियों को कोई अच्छी दृष्टि से नहीं देखता। उनका सभी जगह निरादर होता है। प्यारा चाम नहीं काम होता है।
जीवन-विद्या के विद्वान व प्रमुख आचार्य टिनमैन अपने अनुयाइयों को सम्बोधित कर कहा करते थे-”जो आलस्य में अपना मूल्यवान् समय गँवाता है वह अभागा है। पृथ्वी पर परिश्रम से मुक्ति नहीं है । मनुष्य कर्म के लिये उत्पन्न हुआ है। उसे जीवन भर परिश्रम करना चाहिये।” एक कर्मशील महापुरुष का कथन है-”जीवन के उपरान्त चिर-काल तक मुझे विश्राम ही तो करना है।”
मनुष्य-जीवन का सच्चा सदुपयोग उसे सत्कर्मों में लगाने से ही होता है। कुछ दिन मौज-मजा लूटने में ही उसे बिता दिया तो इसमें श्रेय की कौन-सी बात रही। भावी सन्तति को सच्ची दिशा में ले जाने के लिये, प्रत्येक व्यक्ति को कर्म करना आवश्यक है। निष्क्रियता से व्यक्तित्व का विकास रुकता है, जिससे मानवीय पतन की सम्भावनायें बढ़ जाती हैं। शिकागो विद्यालय के शरीर क्रिया विज्ञान के प्रख्यात पण्डित डॉक्टर एलेक्जेंडर क्लीटमैन ने 35 वर्षों के अन्वेषण से आलस्य की प्रतिक्रियाओं का पता लगाया, उन्होंने लिखा है-”आलस्य का अर्थ है व्यक्ति की मानसिक अयोग्यता और इसका परिणाम विनाश ही हो सकता है।”
आलस्य से शरीर का तापमान गिरता है। यह ह्रास एक-दो डिग्री तक होता है, इससे शिथिलता बढ़ जाती है।” आलस्य में जीवन बिताने वाले लोगों की उम्र इसीलिये कम हो जाती है। इसके विपरीत श्रमिकों, मजदूरों की आयु अधिक होती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों की राय भी यही हैं कि संसार की अधिक उम्र वाली जातियाँ वही हैं, जहाँ काम की प्रतिष्ठा होती है।
सन्त विनोबा ने अपने एक प्रवचन में काठियावाड़ के मध्यम वर्ग को सम्बोधित करते हुये बड़े महत्वपूर्ण शब्द कह थे । उन्होंने बताया “मैं इतना ही कहूँगा कि काम के लिये आपमें इज्जत और प्रेम का भाव होना चाहिये। इसके अभाव में अच्छी सेवा न हो सकेगी। काम तो होगा, लेकिन जिस हेतु से वह काम शुरू हुआ है, वह हेतु पूरा नहीं होगा। इसलिये काम के लिये शरीर अच्छा,मजबूत बनाओ और काम के लिये प्रीति और आदर रखो। इसके लिए अपनी चेष्टाओं को निरन्तर जागृत रखने और शक्ति शाली बनाने की अधिक आवश्यकता प्रतीत होती है। शक्ति शरीर की बिजली है और कर्म प्रकाश। हमारी शक्ति जितनी प्रगाढ़ होगी, क्रिया की रोशनी उतना ही जगमगायेगी और दूसरों को रास्ता बतायेगी।
श्रमशीलता को असम्मान तथा हीनता का बोधक मानना नासमझ लोगों को शोभा दे सकता है। आज के शिक्षित वर्ग में यह बुराई गहराई तक प्रवेश कर गई है, जिससे सभी ओर दुःख और निराशा, आत्म-प्रवंचना और आत्महत्याओं के दृश्य दिखाई देते हैं। इससे जन-जीवन बड़ा अस्त-व्यस्त हुआ है। पाश्चात्य देशों की, जिनमें अमेरिका, रूस, ब्रिटेन आदि प्रमुख हैं, उन्नति का एक ही रहस्य है कि वहाँ काम की इज्जत है, आलस्य की नहीं। संसार के बड़े-बड़े महापुरुषों, सन्त-महात्माओं, समाज सुधारकों ने व्यवहारिक जीवन में इस बात के उदाहरण प्रस्तुत किये है कि काम बड़प्पन का चिन्ह है। भगवान कृष्ण, राम, बुद्ध, नामदेव, सुकरात, मुहम्मद आदि सभी महापुरुषों ने कर्म की महत्ता प्रतिपादित की है। महात्मा गान्धी जी स्वयं चक्की पीस कर उसका आटा खाते थे। इनमें से किसी की इज्जत कम नहीं हुई। आज भी लोग इन्हें श्रद्धा से माथा टेकते हैं ।
काम करने से प्रसन्नता, सन्तोष व शान्ति मिलती है। मानसिक या शारीरिक दोनों ही श्रम समान रूप से आवश्यक हैं। दोनों में समन्वय बना रहे तो ही काम चलेगा। किन्तु इनमें में किसी एक को प्राथमिकता देना, दूसरे को गौण मानने की बात न्याय संगत नहीं लगती। खेती का कार्य भी मानवता के विकास में उतना ही उपयोगी है, जितना आफिस के क्लर्क का कार्य। शारीरिक श्रम का महत्व कम नहीं। स्वास्थ्य का सन्तुलन बना रहे, इसके लिए बुद्धि जीवियों को शारीरिक और शारीरिक श्रम करने वालों को बौद्धिक कार्य भी करने चाहिये। दोनों में तालमेल बनाये रखने से ही मनुष्य जीवन के सच्चे आनन्द की उपलब्धि सम्भव है।
लाचारी से, बेमन काम करना एक भारी दुर्गुण है। इससे सफलता का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। वृद्धावस्था में नितान्त निष्क्रिय होकर बैठ जाने की नीति गलत है। ढलती उम्र में भी सक्रिय बने रहने से दुःखद परिस्थितियाँ नहीं टकराती। दार्शनिक सुकरात का कथन है-”मनुष्य की सक्रियता का चरम उत्कर्ष तीसरे प्रहर, अर्थात् जीवन के सन्ध्या काल वृद्धावस्था में होता है। इस समय तक मानसिक शक्तियाँ पूर्ण परिपक्व हो जाती है।” प्रबुद्ध ज्ञान और जीवन के लम्बे अनुभवों के आधार पर महत्वपूर्ण कार्य जीवन के अन्तिम दिनों ही होते हैं। हमारे यहाँ चतुर्थ आश्रम संन्यास का अधिक महत्व इसी दृष्टि से माना गया है। लोक सेवा का यह सब से अच्छा समय होता है।
आज की परिस्थितियों में नैतिक उत्थान की, मानवीय कल्याण की जो-योजनायें चलाई जा रही हैं, उनका पूरा किया जाना तभी सम्भव है जब लोग श्रम की सार्थकता समझें, कर्म के महत्व को पहचाने। श्रम धरती का देवता है। कर्म मनुष्य का आभूषण है। यह वह कसौटी है, जिसमें रगड़ खाकर अनेक सद्गुणों का विकास निखर आता है। श्रम के सहारे धरती से सोना पैदा करते हैं। कर्म से ही यहाँ सुख-शान्ति, समृद्धि और सफलता का अवतरण होता है। धरती में स्वर्ग की-सी परिस्थितियों का निर्माण जिन सद्गुणों से सम्भव है, उनमें से कर्मशीलता प्रमुख है। आइये हम सब मिलकर श्रम-पूर्वक निरन्तर कर्म करने की आदत डालें और व्यक्तिगत जीवन को समृद्ध एवं सामूहिक वातावरण को उल्लासमय बनाने की एक आवश्यक शर्त पूरी करें। ताकि आसमान के स्वर्ग को अपनी वसुन्धरा में उतार कर ले आयें, युग की यही माँग है, होना भी यही है।
जिन कारणों और अभावों से लोग दुःखी रहते हैं, उनके मूल तक जायें तो यह पता चलता है कि मनुष्य को किसी प्रकार का अभाव उतना दुःख नहीं देता जितना उसकी चिन्तित रहने की प्रवृत्ति दुःख देती है। किसी विषय को लेकर अकारण ही लोग उस पर आशंकापूर्ण कल्पनाएँ गढ़ते रहते हैं। अगले वर्ष बच्ची की शादी करनी है तो अभी से सोचने लगे कि दहेज के लिये रुपया कहाँ से आयेगा-गल्ले और कपड़ों का प्रबन्ध कैसे होगा? घर गिर रहा है, रिश्तेदार सम्बन्धी आयेंगे तो क्या कहेंगे, इसकी भी मरम्मत करवानी है, इधर नौकरी में भी तरक्की नहीं हो रही, बच्चे की फीस के पैसे भी देने हैं आदि अनेकों प्रकार से वह एक ही विषय को लेकर सोच-सोच कर दुःखी रहता है। इस प्रकार चिन्ताओं में जलते रहना आज संक्रामक रोग-सा बन गया है।
चिन्ता एक प्रबल मनोव्याधि है। इससे मानसिक शक्तियों का नाश होता है और शरीर पर दूषित प्रभाव पड़ता है। इससे लोगों का मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य गिर जाता है। “स्टाप वरीइंग एण्ड गेटवेल” पुस्तक के विद्वान लेखक डॉ. एडवर्ड पोडोलस्की ने अपनी पुस्तक में लिखा है, “चिन्ता से हृदय, रक्त का बढ़ाव, गठिया, सर्दी, जुकाम तथा बहुमूत्र आदि रोग हो जाते हैं। इस कारण इन रोगों से मुक्ति दिलाने वाले साधन प्रयोग में अवश्य लाने चाहिए।
डॉ. ऐलिक्स कैरेल का कथन है कि जो लोग चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग नहीं जानते वे जवानी में ही मर जाते हैं। चिन्ता वास्तव में एक ऐसा रोग है, जो अन्दर ही अन्दर जलाता रहता है और सारे रक्त माँस को जलाकर राख कर देता है। लोग समझते हैं कि उन्हें कोई शारीरिक व्याधि लग गई है, किन्तु यह होता मानसिक चिन्ताओं के कारण ही है। इससे जीवन-शक्ति का नाश हो जाता है, स्वास्थ्य गिर जाता है और रोग की स्थिति बनते देर नहीं लगती। मानवीय-विकास की सारी सम्भावनायें समाप्त हो जाती है।
जिन्हें इस जीवन में किसी प्रकार के सुख की आकाँक्षा हो, जिन्हें सफलता प्राप्त करनी हो, उन्हें सर्व प्रथम चिन्ता रहित बनने का प्रयत्न करना चाहिये। इससे अपनी शक्ति सुरक्षित रहेगी। बचाई हुई शक्ति किसी भी कार्य में लगाने से वहीं सफलता के दर्शन होने लगते हैं। चिन्ता रहित जीवन सफलता का स्रोत माना जाता है।
चिन्ताओं से मुक्ति पाने का सरल उपाय यह है कि सदैव कार्य करते रहें। दत्तचित्त होकर अपने काम में जुटें रहने से सारा ध्यान काम की सफलता पर चला जाता है। चित्त विविध अनुभवों में उलझा रहता है। जब तक अपना काम भली प्रकार पूरा न हो जाय या जब तक पूर्ण सफलता न मिल जाय, तब तक सारी मानसिक चेष्टाओं को उसी में लगाये रहेंगे तो चिन्तायें आप ही दूर भाग जायेंगी। अकर्मण्य बने रहने से ही अनावश्यक सोचने विचारने को समय निकलता है। कहावत है “खाली दिमाग शैतान का घर।” कोई काम न होगा तो चिन्ताएँ आयेंगी, बुरे-बुरे विचार उठेंगे और उनकी प्रतिक्रिया भी शरीर और मन पर पड़ेगी ही। इसलिये किसी न किसी काम में हर समय लगे रहना आवश्यक है।
यह देखा जाता है कि लोग बीती हुई घटनाओं की भयंकर कल्पना में अपनी शक्ति और समय का दुरुपयोग करते रहते हैं। जो हो चुका वह वापस लौटने का नहीं, फिर उस पर अकारण विलाप करने से क्या फायदा? जो हो गया उसे भूलकर भविष्य के सुखद परिणामों की प्राप्ति के लिये एकान्त मन से लगे रहना ही श्रेयस्कर होता है। इसी प्रकार आने वाली घटनाओं से संघर्ष करने के लिए उत्साह पैदा कीजिए। देखिये आप की शक्ति भी कितनी प्रबल है।
हिटलर कहा करता था अच्छे से अच्छे भविष्य की कल्पना करनी चाहिए और खराब से खराब परिणाम भुगतने के लिये तैयार रहना चाहिये। इससे अकारण उठने वाली चिन्ताओं से छुटकारा मिलता है। एक पहलवान की इच्छा थी कि वह दूसरे को पछाड़ेगा। इस आशा से उसने स्वास्थ्य का निर्माण किया। वर्षों तक दण्ड बैठक का अभ्यास किया। शक्तिवर्द्धक पौष्टिक आहार जुटाया, तब कहीं जाकर दूसरे पहलवान से कुश्ती लड़ने के योग्य हुआ। फिर भी दाँव पेंच नहीं बन पड़े और कुश्ती में हार गया। इससे यह नहीं माना जा सका कि उसका श्रम-व्यर्थ गया। उसके परिणाम तो सुन्दर स्वास्थ्य और आरोग्य के रूप में मिले ही। इसलिये आने वाले भयंकर परिणामों के प्रति पहले से ही साहस पैदा करना चाहिए, ताकि बुरे परिणाम की दुश्चिन्ता से बचे रहें। सुखद कल्पना के सत्परिणाम तो आपको मिलेंगे ही, उनसे आपको कोई वंचित न कर सकेगा।
अकारण चिन्तित रहने का एक कारण यह भी है कि लोग बिना सोचे समझे किसी बात की पूर्ण सफलता का निर्णय कर लेते हैं। यह निर्णय आपके पक्ष में आये ही, इसके लिए श्रम, उद्योग और चतुराई भी अपेक्षित थी। फिर यदि परिस्थितियाँ नहीं बन पड़ीं तो भी अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में बाधा आ सकती है। विपरीत परिणाम भी उपस्थित हो सकता है। ऐसे समय प्रायः लोग अपना धैर्य खो बैठते है और शोक सन्ताप करके बैठे-बैठे चिन्ता या पश्चात्ताप करते रहते हैं। बारबार अपनी असफलता पर ही दुःख होता है इसलिये पहले से ही पूर्ण सफलता का निर्णय कर लेने की भूल न करें वरन् यदि परिस्थितिवश असफलता का सामना करना पड़े तो उसके लिये भी तैयार रहना चाहिए।
परिस्थिति-वश यदि ऐसी कोई विपरीत घटना जीवन में घटित होती है तो आप अपने मित्रों शुभ-चिन्तकों और समझदार लोगों से इस विषय में विचार-विमर्श कीजिए। इससे सम्भव है आपकी कठिनाइयों का कोई दूसरा हल निकल सके किन्तु यदि यह अच्छी प्रकार समझ लिया गया है कि यह कठिनाई घटती या मिटती दिखाई न पड़े, तो भी उद्विग्न मत हूजिए। तब मानसिक शांति के लिये उस चिन्ता के विषय से चित्त हटाकर अपना ध्यान किसी दूसरे रुचिकर विषय में लगाने का प्रयत्न करना चाहिये।
किसी के प्रियजन की आकस्मिक मृत्यु हो गई है, तो यह संकट ऐसा है जिसे सुधारा नहीं जा सकता है। पर चिन्ता करने के दुष्परिणामों से बचने के लिये कोई ऐसा रचनात्मक उपाय प्रयोग में ला सकते हैं, जिससे शोक का वातावरण बदल जाय और चित्त अशान्त रहने की अपेक्षा किसी सन्तोष दे सकने वाले काम में लग जाय। किसी की रुचि धार्मिक कथा-साहित्य में होती है। उन्हें गीता रामायण आदि किसी पुस्तक के स्वाध्याय से अन्तःकरण की तुष्टि करनी चाहिए। जिन्हें प्राकृतिक जीवन प्यारा लगता हो, वे ऐसा भी कर सकते हैं कि कुछ दिन तक कहीं तीर्थ यात्रा आदि में समय बितावें। अपनी रुचि के अनुसार अपनी शान्ति प्राप्त करने के प्रयत्न करें, तो कई साधन ऐसे बन जायेंगे, जिससे चिन्ता-जनक परिस्थिति में भी अपना मानसिक सन्तुलन बनाये रख सकें।
चिन्ता एक संक्रामक रोग है। जब हम किसी ऐसे व्यक्ति के पास बैठते हैं, तो उसकी निराशा के तत्व खींचकर हम भी निरुत्साहित होने लगते हैं। ऐसे लोग सदैव भाग्य को दोष देते रहते हैं। हम अभागे हैं, हमारा जीवन निरर्थक गया, घर न बनवा सके, जायदाद न खरीद पाये, हम पर परमात्मा नाखुश है आदि निराशाजनक भावनाओं से वे अपना भाग्य तो बिगाड़ते ही हैं, अपने संपर्क में आने वालों का भविष्य भी अन्धकारमय कर देते हैं।
आप सुन्दर भविष्य की कल्पना कीजिए। अधिक योग्य, चरित्रवान्, स्वस्थ और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बनने की अनेकों नई-नई योजनायें बनाइए और अपनी परिस्थितियों का उनके साथ मेल होने दीजिए। कोई न कोई योजना जरूर ऐसी आएगी जो आपके विकास में सहायक बनेगी। महापुरुष ईसा ने कहा है “कल के लिये चिन्ता मत करो वरन् सुनियोजित प्रयत्न करो, ताकि आपका कल अधिक सुनहला हो।” अच्छे चिन्तन से, संग्रहीत साँसारिक अनुभवों के सहारे, अधिक उत्साह पूर्वक कार्य करने की शक्ति जागृत होती है। पश्चाताप और आत्मग्लानि की दुश्चिन्ता से कार्यनिष्ठा, साहस शक्ति और कुशलता का नाश होता है। आप सदैव इन से बचने का प्रयत्न कीजिए। जीवन के प्रति आशंकापूर्ण भावनायें कदापि न करें। सदैव भविष्य के मंगलमय होने की कल्पना किया करें। इसी में सुख है, शांति है, श्रेय है।
मनुष्य स्वभाव में अनेकों मनोविकार ऐसे हैं, जो निरन्तर उसकी मानसिक तथा शारीरिक योग्यता का विनाश किया करते हैं। घृणा, द्वेष, काम, मद मोह और लोभ जैसे दुर्गुणों को स्वच्छन्दता देने से मानसिक विष सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त हो जाता है। इससे बुद्धि, ज्ञान, स्वास्थ्य आदि पर विषैला प्रभाव पड़ता है और व्यक्ति दिन-दिन हीन परिस्थितियों की ओर गिरता चला जाता है। किन्तु क्रोध तो इन समस्त दुर्गुणों का सम्राट है। इससे होने वाले तात्कालिक परिणाम भी इतने भयंकर होते हैं कि उन्हें देखकर जी काँप उठता है। ऐसी घटनायें आये दिन आँखों के आगे से गुजरा करती हैं, जिनमें मनुष्य छोटे से कारण से उत्तेजित होकर वीभत्स दृश्य उपस्थित कर देते हैं
महर्षि बाल्मीक ने लिखा है :-
क्रोधः प्राणहरः शत्रुः क्रोधोऽमित्र मुखो रिपुः। क्रोधोऽसि महातीक्ष्णः सर्वक्रोधोऽपकर्षति॥
तपते यतते चैवं दानं प्रयच्छति।
क्रोधेनं सर्व हरति तस्मात् क्रोध विवर्जंयेत्॥
(उत्तरकाँड 71)
अर्थात्- क्रोध प्राण हरण करने वाला शत्रु है, क्रोध अमित्र मुखधारी बेरी है, क्रोध एक तीक्ष्ण तलवार है, क्रोध सब प्रकार से गिरा देने वाला है, क्रोध तप, संयम और दान का अपहरण कर लेता है, अतएव क्रोध से सदैव बचना चाहिये।
क्रोध का मन के दूसरे विकारों से घनिष्ठ सम्बन्ध है। उत्तेजना और आवेश आते ही सत्य-असत्य का विवेक मारा जाता है, जिससे लड़ाई, झगड़ा, कटुता, मारपीट, हत्याओं की घटनायें तक हो जाती है, किसी व्यक्ति के प्रति निरन्तर क्रोध बनाये रखने से स्थायी कटुता का भाव पैदा हो जाता है। जिससे दोषदर्शन, उत्पीड़न और अकारण औरों का नुकसान करते रहने की आदत पड़ जाती है। इस प्रकार एक ही विकार से अनेकों विकारों की शाखा-प्रशाखायें फूट पड़ती हैं। अस्थिरता, क्षणिकता, बुद्धि का कुण्ठित होना, उद्विग्नता, अहंकार असहिष्णुता आदि दुर्गुण क्रोधी मनुष्य में अपने आप ही आ जाते हैं। चिड़चिड़ापन भी क्रोध का ही एक छोटा रूप है। यह प्रायः अशक्त पुरुषों का मनोविकार है, इसलिये एक आवेश में ही वह समाप्त भी हो जाता है। किन्तु क्रोध मन को एक उत्तेजित और खिंची हुई अवस्था में रख देता है। जिससे रक्त में गर्मी पैदा होती है। इससे उसके संचालन में तेजी आती है। यह झटके तीव्रता से आते रहे तो स्वास्थ्य पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है। विचारों में भी प्रेम, सत्य, न्याय, दया और विवेक आदि का लोप हो जाता है। आध्यात्मिक शक्तियों के विषय में तो यह सबसे प्रबल शत्रु माना गया है।
क्रोध से शारीरिक शक्तियों का पतन हो जाता है। किसी क्रोधी व्यक्ति को देखिये, किस प्रकार उसका चेहरा तमतमा उठता है, नेत्र लाल हो जाते हैं, ओठ चलने लगते हैं। आन्तरिक अवयवों पर भी इसका दूषित प्रभाव पड़ता है। हृदय धड़कने लगता है। आँतों का पानी सूख जाता है, जिससे शरीरस्थ मल सूख कर आँतों से चिपक जाता है। इससे शरीर सूख कर काँटा हो जाता है पाचन क्रिया शिथिल पड़ जाती है। खून में एक प्रकार का विष पैदा हो जाता है, जिससे जीवन-शक्ति कमजोर पड़ जाती है।
हार्वर्ड मेडिकल कालेज के प्रोफेसर डॉक्टर वाल्टर केनिन लिखते हैं कि “मनुष्य के दोनों गुर्दों के ऊपर चने के आकार की दो छोटी -छोटी ग्रन्थियाँ होती हैं, जिनमें ‘एडरेनलिन’ तत्व भरा होता है। यह खून के साथ मिलकर जब जिगर में पहुँचता है तो वहाँ जमे हुये ग्लाइकोजन को शक्कर में बदल देता है।” यह शक्कर शरीर के तमाम अंगों में पहुँच कर रगों और पुट्टों को फाड़ देता है। क्रोधी मनुष्य को कोई रोग न होते हुए भी इसी हानिकार स्थिति में होकर गुजरना पड़ता हैं।
क्रोध करने के कारणों पर यदि विचार करे तो वे बिलकुल छोटे दिखाई देते हैं। कई बार तो वे बिलकुल निराधार दिखाई पड़ते हैं। संयत मनःस्थिति के अभाव में प्रायः लोग एकाएक उत्तेजित होकर अनर्थ कर डालते हैं। कई बार यह कारण इतने छोटे होते है कि उनके कारण किये गये अपराध पर विश्वास तक नहीं होता। कानपुर का एक समाचार है कि रेलवे स्टेशन पर ननकू नामक व्यक्ति फल बेचा करता था। किसी व्यक्ति ने उससे उधार लीची माँगी पर ननकू ने इनकार कर दिया। इस पर क्षुब्ध होकर उक्त व्यक्ति ने ननकू की चाकू से हत्या कर दी। ये कारण इतने छोटे हैं कि मनुष्य थोड़ा भी अगर ध्यान दे ले, तो इन भयंकर परिणामों से बचा जा सकता है। घरों में थाली फेंकने, कपड़े फाड़ने, बच्चों को पीटने, स्त्रियों को मारने, धमकाने के हेय दृश्य जो उपस्थित हुआ करते हैं, उनमें मानव स्वभाव की छोटी छोटी गलतियाँ और भूलों के सिवाय और कुछ नहीं होता।
घरेलू और सामाजिक व्यवस्था को बनाये रखने के लिये यह अत्यन्त आवश्यक है कि क्रोध के विनाशक परिणामों पर ध्यान दें और उनके उन्मूलन का सम्पूर्ण शक्ति से प्रयत्न करें। इससे सदैव हानि ही होती है। प्रायः देखा गया है कि क्रोध का कारण जल्दबाजी है। किसी वस्तु को प्राप्त करने या इच्छापूर्ति में कुछ विलम्ब लगता है तो लोगों को क्रोध आ जाता है। इसलिये अपने स्वभाव में धैर्य और संतोष का विकास करना चाहिये।
जब कोई कार्य गलत हो जाय या कोई हानि हो जाय तो उसे समझने में जल्दबाजी न करें। गम्भीरतापूर्वक सोचें कि यह सब किस कारण से हुआ। आप निर्णय करते समय बुद्धि में पर्याप्त उदारता बनाये रखिये, इससे आपको बड़ी शाँति मिलेगी। यदि कोई दूसरा व्यक्ति आपको अपशब्द या कड़ुवे वचन कहता है, तो आप यह समझ कर कि यह व्यक्ति मूर्ख है, कुछ न बोलिये, मौन व्रत कर लीजिये। इससे आप अकारण उत्तेजित भी नहीं होंगे और कोई अयाचित घटना भी नहीं घटेगी। मन-ही मन सामने वाले की बेवकूफी पर मुस्कराते रहिये, देखिये आपके जी में जरा भी दुःख नहीं आयेगा।
एक गिलास ठंडा पानी पीकर अपना क्रोध शाँत करने की विद्या बड़ी उत्तम है। क्रोध आये तो आप कुछ देर के लिये उस स्थान से हट जाइये किसी शीतल बगीचे में घूम आइये। एक अत्यन्त सरल उपाय यह भी है कि अपने किसी प्रियजन के पास बैठकर थोड़ी देर स्नेहपूर्ण बात करके उसकी सहानुभूति प्राप्त करने का प्रयत्न कीजिए।
क्रोध का एक कारण असात्विक आहार भी होता है। “जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” की कहावत सर्व विदित है। अधिक तीखा, कडुआ, कसैला, बासी-बुसा भोजन मानसिक विकार पैदा करता है। मिर्च-मसाले तथा खटाई खाने वाले अधिकाँश व्यक्ति क्रोधी और चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं। इसलिये जो भी आहार हम ग्रहण करें, उसमें सात्विकता का पूर्ण ध्यान बनाये रखें। भोजन करते समय बड़ी प्रसन्नता होनी चाहिये। परमात्मा का प्रसाद मान कर आहार ग्रहण करने से जैसा भी रूखा-सूखा आहार हो, वही अतीव संस्कारवान और पुष्टिदायक बन जाता है। कुढ़ते हुये भोजन करना एक बहुत बड़ा दुर्गुण है। इससे आहार का सात्विक लक्ष्य पूरा नहीं होता। वह चाहे कितना ही पुष्टि-दायक क्यों न हो, जीवन-तत्व प्राप्त न होगा।
कदाचित आपको क्रोध आता ही है तो एक और प्रयोग कीजिये। जैसे ही क्रोध आये, चुपचाप अपने कमरे में चले जाइये और एक स्वच्छ-सा शीशा लेकर उसमें अपनी आकृति देखिये। अनुभव कीजिये कि क्रोध के कारण आपका मुँह तमतमा उठा था, सो बड़ी शिथिलता आ गई। सारा सौंदर्य चला गया है। मुँह फीका पड़ गया है। अब थोड़ा जल लेकर साबुन से मुँह धो कर तौलिये से मुँह साफ कर लीजिये और फिर शीशे के सामने खड़े होइये। देखिए, आपने अपनी सुन्दरता फिर से प्राप्त करली है। अब जरा-सा मुस्कराइए। आपको प्रसन्नता मिलेगी। दुबारा जब कभी कोई घटना घटेगी तो आपको आज के सौंदर्य में जो कमी दिखाई दी थी, वह एकदम से याद आ जायेगी और आप क्रोध करने से बच जायेंगे।
मीठे शब्दों में वह शक्ति होती है जो बड़े अड़ियल तथा तीखे स्वभाव के व्यक्तियों को भी नम्र बनाती है। प्यार और पुचकार कर बात करने से क्रोधी व्यक्तियों के हृदय की कोमलता जागृत होती है। कुछ दिन उन्हें यह संस्पर्श निरन्तर मिलता रहे तो क्रोध से बचे रहने का उनका भी अभ्यास हो जाता है।
हमारे यहाँ दान को बहुत बड़ा महत्व दिया गया है। अपनी आमदनी का एक अंश दान के रूप में खर्च करना अनिवार्य माना है। हमारे पूर्वज मनीषियों ने दान का धर्म के साथ अटूट सम्बन्ध जोड़कर उसे आवश्यक धर्म-कर्तव्य घोषित किया था। दान की बड़ी-बड़ी आदर्श गाथाएं हमारे साहित्य में भरी पड़ी हैं और आज भी हम किसी न किसी रूप में दान की परम्परा को निभा रहे हैं। गरीब से लेकर अमीर, सभी अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार कुछ-न कुछ दान करते ही हैं। मानो दान देना हमारे स्वभाव का एक अंग ही बन गया हो।
लेकिन अन्य परम्पराओं की तरह ही दान की परम्परा में भी दोष उत्पन्न हो गये हैं। दान का सदुपयोग न होकर दुरुपयोग अधिक होने लगा है। दान के पीछे जो श्रद्धा, सद्भावना, त्याग तथा सदुपयोग की वृत्ति होनी चाहिये, उसकी जगह कई विकृतियों ने लेली है। दान क्यों करना चाहिए, दान किसे देना चाहिये, कैसे देना चाहिये, यह बहुत ही कम लोग जान पाते हैं। गीताकार ने दान की व्याख्या करते हुए कहा है-
दातव्यति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे कालेच पात्रे च तद्दानं सात्विकं स्मृतं॥
यत्ततु प्रत्युपकारार्थं फलर्मुाद्दश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्॥
अदेशेकाले यद्दानमात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥
“दान देना मनुष्य का कर्तव्य है, ऐसा जानकर बिना बदले की भावना से देश, काल, पात्र का ध्यान रखकर जो दान दिया जाता है वह सात्विक दान है।”
क्लेश पाकर या बदले की भावना से किसी कामना पूर्ति के लिये दिया जाने वाला राजसिक दान है।
जो दान बिना सत्कार के, देश-काल-पात्र का ध्यान रखे बिना, उपेक्षा या तिरस्कार के साथ दिया जाता है, वह तामसिक दान है।
व्यवहारिक क्षेत्र में भी दान के पीछे मुख्यतया तीन भावनायें निहित होती है। एक दान वह जो श्रद्धा से प्रेरित होकर किसी सामर्थ्यवान यथा-विद्वान, तपस्वी जननेता, देशसेवक, वैज्ञानिक, कलाकार आदि को दिया जाता है। इसमें श्रद्धा ही मुख्य होती है। दूसरे प्रकार का दान दया प्रेरित होकर दीन-हीन सामर्थ्य-विहीन लोगों को दिया जाता है। तीसरे प्रकार का दान अहंकार से प्रेरित होकर अपनी दानशीलता की ड्योढ़ी पिटवाने के लिये, नाम यश खरीदने के लिए, किसी लाभ के लिए, बड़ा बनने के लिए दिया जाता है।
अब हम देख सकते हैं कि हमारे समाज में दान की क्या स्थिति है? दान का उत्कृष्ट स्वरूप बहुत कुछ विलुप्त होता जा रहा है और उसके स्थान पर राजसिक, तामसिक दान की बाढ़-सी आ गई है और वह उसी तरह समाज के अंग नहीं लग पाता, जिस तरह अतिसार के रोगी को दिया जाने वाला भोजन। एक ओर गुलाब की खेती सूखी जा रही है और दूसरी ओर हम काँटे, झाड़-झंखाड़ों को सींच रहें हैं। दान के नाम पर कैसी विडम्बना व्याप्त है।
सच तो यह है कि दान के पीछे दातापन की भावना ही न होनी चाहिए। यह एक जीवन का स्वाभाविक कर्तव्य है। कालिदास ने कहा है।
“अदानं हि विसर्गाय सताँ वारिमुचामिव।”
“जैसे बादल पृथ्वी पर से जल लेकर फिर पृथ्वी पर ही वर्षा देते हैं, उसी तरह सज्जन जिस वस्तु का ग्रहण करते हैं, उसका त्याग भी कर देते हैं।” समाज में , संसार में से ही हमने संग्रह किया है, प्राप्त किया है, तो उसे समाज के लिए, संसार के लिए त्याग भी कर देना होगा। कितना सहज आधार है दान का । फिर “मैं दान कर रहा हूँ” ऐसा कहने का अधिकार भी कहाँ रह जाता है।
विनोबा के शब्दों में “दान के मानी फेंकना नहीं वरन् बोना है।” समाज के धरातल पर दान एक प्रकार की खेती है। जो दिया जाता है, वह परिपक्व होकर समाज की उन्नति, कल्याण, विकास में सहायक होना चाहिए। दान से समाज का शरीर पुष्ट होना चाहिए, तभी वह दान है। अन्यथा दान के नाम पर अपने धन, सम्पत्ति साधनों को नष्ट करना है, व्यर्थ गँवाना है। ज्ञान-दान में लीन, विद्वान, परोपकार में लीन, कर्मवीर, ज्ञानवृद्धि में सहायक तत्वज्ञानी, अनेकों जन-सेवकों के अभावों की पूर्ति करना समाज को ही भोजन देना है। इन परमार्थकारियों को दिया गया दान खेत में बोये गए बीज की तरह कई गुना होकर समाज को ही मिल जाता है।
विनोबा ने कहा है “तगड़े और तन्दुरुस्त आदमी को भीख देना, दान करना, अन्याय है। जो दान अनीति और अधर्म को बढ़ाता है, वह दान नहीं वह तो अधर्म ही है। विवेकशील लोग अनुमान लगा सकते हैं कि इस तरह की अन्धदान प्रवृत्ति के कारण समाज में बहुत से लोगों ने भीख माँगकर, दान के ऊपर ही गुजारा करने का जन्म सिद्ध अधिकार-सा मान लिया है। हमारे देश में भिखमंगों की एक जमात-सी खड़ी हो गई है, जिनका पेशा ही दान लेना और उससे मौज करना बन गया है।
देश और समाज के लिये, जनकल्याण के लिए गरीब जरूरत मन्द लोगों की सहायता के लिए, लोकसेवी परमार्थरत सज्जनों की अभावपूर्ति के लिए हृदय खोलकर दान दीजिए। लेकिन जिन्होंने दान लेना अपना पेशा बना लिया है, जो दान के माध्यम से अपने लिए धन जायदाद एकत्र कर रहे हैं, जो दान के पैसे से खूब मौज गुलछर्रे उड़ाते हैं, तरह-तरह की बदमाशियाँ करते हैं, उन्हें एक फूटी कौड़ी भी न दें। अन्यथा धन नाश के साथ-साथ आपको अनेकों पापों का भागी बनना पड़ेगा, यह ध्रुव सत्य है।
बहुत से लोग किसी मन्दिर धर्मशाला में कुछ रुपया देकर अपने नाम का पत्थर लगाने में, किन्हीं धर्म संस्थाओं को कुछ धन देकर अपना नाम पत्र पत्रिकाओं, सभा समितियों में रोशन कर लेने को ही दान समझते हैं। कुछ लोग अपनी कामनापूर्ति का दाव सफल हो जाने पर दान का पुण्य लूटते हैं। कई लोग अपनी खुशामद कराकर, अपनी दान-वीरता, धर्मशीलता के गुणगान के लिए दान करते हैं। यह तो एक तरह का व्यापार है, जहाँ दान के बदले यश, नाम, कीर्ति, कामनापूर्ति, अपनी खुशामदगिरी, सेवा-चाकरी खरीदी जाती है।
ईसामसीह ने कहा था-”तुम्हारा दायाँ हाथ जो देता है उसे बाँया हाथ भी न जान पाये।” किसी को आपके सहयोग सहायता की आवश्यकता है, कोई जरूरतमंद-अभावग्रस्त, परेशान है तो चुपचाप उसकी सहायता कर दीजिए कि दान लेने वाला भी न जान पाए। इसीलिए गुप्त दान को सर्वोपरि माना गया है। स्मरण रहे दान के बदले यदि आपको तुरन्त ही कोई लाभ मिल गया, चाहे वह नाम, यश, कीर्ति या सामाजिक महत्व ही क्यों न हो तो आपके दान का भी मूल्य गिर गया। शास्त्रकारों ने श्रेष्ठ दानी उसे ही बताया है जो बिना माँगे और बिना प्रकट किए हुए ही दान करता है।
बहुत से लोग दूसरों को दीन-हीन,गरीब असहाय, मानकर दान करते हैं, मानो वे दूसरों के साथ बड़ा उपकार कर रहें हों। लेकिन इस तरह का भेदभाव दान की पवित्रता सात्विकता को नष्ट कर देता है। अहसान, बड़प्पन जताकर, दूसरे को निम्न कोटि का समझकर, उपेक्षा या तिरस्कार के साथ दिया गया दान तामसिक दान है। दूसरे लोग भी आपकी ही तरह समाज के एक अंग हैं। यह ठीक है कि अपने प्रयत्न या संयोगवश साधन संपत्ति आपके पास एकत्र हो गई है, लेकिन वह सम्पूर्ण समाज की, धरती की ही तो है। आवश्यकता पड़ने पर समाज को लौटा देने में आपको गर्व, बड़प्पन की भावना नहीं रखनी चाहिए।
आपका दान समाज के लिए जितना उपयोगी होगा, उतनी ही उसकी पवित्रता, सात्विकता बढ़ेगी और पात्र के साथ-साथ आपका भी कल्याण सध सकेगा। सोच समझकर पात्र और उसकी आवश्यकता को देखकर, उपयोगिता को समझकर, बिना किसी, लाग लपेट के शुद्ध हृदय से दान दीजिए और समाज का भला कीजिए।
स्वास्थ्य-निर्माण में मालिश एक अत्यन्त उपयोगी व्यायाम है। इससे स्वस्थ जीवन जीने के लिए ऐसी ही मदद मिलती है जैसी आहार, विश्राम, उपवास व टहलने आदि से मिलती है। आयुर्वेद में कहा गया है।
वातव्याधि हरति कुरुते सर्व गात्रेषु पुष्टि।
दृष्टि मन्दामीप वितानुतेवैवतेयोयाँ च॥
निद्राँ सौख्य जनपति जराँ हंति शक्ति विधतै
धत्तेकान्ति कनक सदृशीं नित्यमभ्यंग योगात्॥
अर्थात्-”नियमित रूप से तेल मालिश करने से वात रोग दूर होता है। अंग पुष्ट होते हैं, दृष्टि तेज होती है, निद्रा और सुख-उत्पन्न होता है वृद्धावस्था दूर होती है। शरीर में शक्ति उत्पन्न होती है और शरीर का वर्ण सोने के समान हो जाता है।”
मालिश का प्रमुख कार्य है रक्त संचार में तेजी लाना। शरीर में रुधिर संचार का कार्य हृदय में सम्पन्न होता है। स्वच्छ खून धमनियों द्वारा सारे शरीर में दौड़ता है और अशुद्ध-रक्त-वाहिनी शिराओं द्वारा अस्वच्छ रुधिर हृदय में एकत्रित होता है। यहाँ उसकी सफाई होती है। खून जब पर्याप्त मात्रा में हृदय में नहीं पहुँचता तब तक सफाई की प्रक्रिया तेज नहीं होती। अशुद्ध रक्त सारे शरीर में फैला रहता है। शिरायें शिथिल बनी रहती हैं। किन्तु मालिश से इन शिराओं में गर्मी उत्पन्न होती है और तेजी से रक्त संचार होने लगता है। हृदय की गति भी उसी अनुपात से बढ़ जाती है और सारे शरीर में स्वच्छ रुधिर लहलहाने लगता है। मालिश करने का अर्थ है रक्त शुद्धि के कार्य में नाड़ियों की मदद करना।
मालिश एक ऐसी कला है, जिससे शरीर के सम्पूर्ण अवयवों में रक्त -अभिसरण की क्रिया तेजी से सम्पन्न होती है। जिन स्थानों में रक्त जमा हुआ होता है या हल्की गुल्थियाँ पड़ जाती हैं, उसे पिघला कर पतला बनाने का काम मालिश से आसानी से पूरा हो जाता है। इससे रक्त वाहिनी नाड़ियों को विवश होकर कार्य में तेजी से जुट जाना पड़ता है। रक्त पतला हो जाने से फेफड़े भी आसानी से दूषित रक्त -विकार दूर कर देते हैं। यह गन्दगी मल-मूत्र और पसीने द्वारा स्वतः बाहर निकल जाती है। साथ ही शरीर का हल्का व्यायाम हो जाने से हलकापन, चैतन्यता, एवं स्फूर्ति बढ़ जाती है। इससे फेफड़े, जिगर, तिल्ली, छोटी व बड़ी आँतें, गले की ग्रन्थियाँ, रीड़ के चक्रों की बीमारी खराबी व कमजोरी दूर हो जाती है।
शारीरिक अंगों में क्रियाशीलता पाचनशक्ति , रस निःसरण, पचे हुए रस का शरीर में शोषण तथा सफाई के कार्यों में तेजी लाने का सर्वोत्तम उपाय मालिश है। धमनी और शिराओं की आकुंचन क्रिया में तेजी आने से रक्त चाप बढ़ जाता है। इससे रक्त के श्वेत जीवाणु सशक्त होते हैं, जो किसी भी रोग के कीटाणुओं का मुकाबला करने में सफल होते हैं। रोग-निरोधक शक्ति बढ़ती है और सम्पूर्ण रुधिर विकार दूर हो जाते हैं।
मनुष्य के सारे शरीर में लगभग 347 पेशियाँ होती है। इनमें से ऊपरी सतह वाली लगभग 44 पेशियाँ होती है। दूसरे व्यायामों से ऊपरी सतह की माँस पेशियों में तो हलचल हो जाती है, किन्तु आन्तरिक माँस पेशियों को लाभ और स्नेह सिंचन पहुँचाने के लिए गहरी मालिश की आवश्यकता होती है। इससे निष्क्रिय पड़े अंगों में क्रियाशीलता उत्पन्न होती है और ये माँस पेशियाँ बढ़ने लगती हैं। जिनमें अधिक मोटापा भद्दापन आ जाता है, वे सुडौल बनने लगती हैं।
माँसपेशियों की मालिश से उनमें शक्ति आती है। थकान दूर होती है। मानसिक या शारीरिक श्रम से उत्पन्न थकावट पैदा करने वाला दूषित तत्व जो इनमें जमा हो जाता है, वह दूर हो जाता है और स्फूर्ति बढ़ जाती है। इनमें वृद्धि व विकास के साथ-साथ ही बोझा उठाने व कार्य करने की शक्ति जागृत होती है।
शरीर की स्नायु प्रणाली पर मालिश का बड़ा महत्व पूर्ण असर पड़ता है। इनमें मालिश से उत्तेजना पैदा होती है, जिससे थकावट दूर होकर आराम की स्थिति आती है। जिन स्नायुओं में किसी प्रकार का दर्द होता हो उनकी मालिश करने से दर्द कम हो जाता है।
सरसों का तेल इस क्रिया के लिये अधिक उपयुक्त होता है। रोग नाशक शक्ति होने के साथ ही इससे शरीर को शीतलता व चिकनाई मिलती है। गांठें परिपुष्ट होती हैं और चर्म विकार दूर होते हैं। शुद्ध घानी का तेल मिल के तेल की अपेक्षा अधिक लाभदायक होता है। जिन्हें महंगा न पड़े, उन्हें नारियल का तेल इस्तेमाल करना चाहिये। नारियल का वृक्ष प्रायः सभी पेड़ों से अधिक ऊँचा होता है। इसमें एक रेडियम नामक विशेष प्रकार का तत्व होता है, जो शारीरिक धातु को पुष्ट करने में लवण का कार्य करता है। स्नायु मण्डल रक्त -वाहिनी नाड़ियों, अन्तड़ियों तथा दूसरे शारीरिक अवयवों की उष्णता को हटाकर शीतलता पैदा करता है। नैसर्गिक विटामिन प्राप्त होता है। कुछ बीमारियों में, जैसे लकवा वात आदि में राई या तिल का तेल भी इस्तेमाल करते हैं रंगीन काँच की बोतलों में नारियल का तेल भर कर कुछ दिन धूप में रखने से वह भी इन रोगों में इस्तेमाल करने योग्य हो जाता है।
मालिश के प्रमुख तरीके ये हैं (1) घर्षण (2) दण्डन (3) थपकी (4) कम्पन और (5) सन्धि प्रसारण । इनका प्रयोग अवस्था, स्थिति और आवश्यकता के मुताबिक किया जाता है। शरीर के ऊपरी सतह पर समान दबाव से गदेलियों की सहायता से रगड़ने या मालिश करने को घर्षण कहते हैं। इससे रक्त में गर्मी पैदा करने के लिये तेजी से हाथ चलाना पड़ता है। यह गति प्रति मिनट 30 से लेकर 180 तक होनी चाहिये और तब तक किया जाना चाहिये जब तक रोम-कूपों से सारे तेल का शोषण नहीं हो जाता । केवल तेल चुपड़ लेना या उसे ऊपर-ऊपर ही रगड़ते रहना लाभदायक नहीं होता। इस क्रिया में यह ध्यान रखना चाहिये कि हाथों की गति हर बार हृदय की ओर हो जैसे यदि पाँव का घर्षण कर रहे हैं तो पिण्डुली से मोटी जंघाओं की ओर हाथ ले जाना चाहिये। इसी प्रकार बारी-बारी से हर अंग की मालिश करने से चर्म विकार दूर होते है, त्वचा स्वच्छ कोमल व स्निग्ध हो जाती है और दूसरे अवयवों के भी दूषित पदार्थ बाहर निकल जाते हैं।
शरीर के विभिन्न स्थानों की मालिश करने से कई प्रकार के लाभ होते हैं। पेड़ू की मालिश करने से कब्ज की शिकायत दूर होती है। सन्धि वात में जोड़ो की मालिश करते हैं। चर्बी इकट्ठा हुए स्थान की मालिश करने से मोटापा दूर होता है और शरीर सुडौल बनता है। सिर की मालिश अनिद्रा को भगाती है। मसूड़ों की घर्षण क्रिया भी एक प्रकार की मालिश ही है, इससे दाँत मजबूत होते हैं। मधुमेह के रोगियों को मालिश कराने से रक्त के अन्दर बेकार शर्करा जल जाती है और उसका पेशाब से निकलना कम हो जाता है। पक्षाघात, अपच, सायटिका, पथरी, लीवर की दुर्बलता, डिम्बाशय, प्लूरिमी तथा हृदय की दुर्बलता के लिए शरीर की नियमित मालिश करनी चाहिये, इससे तात्कालिक लाभ मिलता है
मालिश करने के लिये जिन्हें साधन व समय न मिलें, उन्हें स्नान करते समय शरीर के सभी अंगों को खूब मल कर धोना चाहिये। रगड़ने की क्रिया मालिश जैसी ही छोरों से हृदय की ओर को हो तो स्नान से भी वही लाभ मिलता है, जो किसी तेल या उबटन से प्राप्त होता है। स्नान करने के उपरान्त किसी मोटे तौलिये से सारे शरीर को रगड़ कर पोंछ डालना चाहिये। इससे रक्त के संचार में तेजी तथा सजीवता उत्पन्न होती है
मालिश करने के बाद थोड़ी देर तक हलकी धूप में बैठना स्वास्थ्य के लिये लाभदायक होता है। दर्द या चोट की मालिश में तो सेंकने की क्रिया भी साथ साथ चलाते हैं। इससे खून में गर्मी पैदा होती है और दूषित पदार्थ निकल जाते हैं । मालिश से उत्पन्न पसीना व तेल आदि के सम्मिश्रण से उत्पन्न गन्दगी तथा रोमकूपों की सफाई के लिये साबुन या मुल्तानी मिट्टी से स्नान कर लेना बड़ा लाभदायक होता हैं। इससे शरीर को शीतलता प्राप्त होती है।
धनी-निर्धन, रोगी या स्वस्थ, बालक,वृद्ध या नवयुवक, सभी मालिश से अपना स्वास्थ्य सुधार सकते या स्थिर बनाये रख सकते हैं। इसमें किसी प्रकार हानि की आशंका नहीं है। नियमित रूप से प्रतिदिन तेल मालिश करना स्वास्थ्य के लिए अतीव हितकारी होता है।
बुराई, भ्रष्टाचार, अपराधों के सम्बन्ध में हमारी शिकायतें दिनों दिन बढ़ती जा रही हैं। प्रतिदिन एक बँधे हुए ढर्रे की तरह हम नित्य ही इस सम्बन्ध में टीका टिप्पणी करते हैं, तरह-तरह की आलोचनायें करते हैं। कभी सरकार को दोष देते हैं तो कभी प्रशासन व्यवस्था की छीछालेदार करते हैं। कभी किन्हीं व्यक्तियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराते हैं। इस तरह की शिकायतें एक सामान्य व्यक्ति से लेकर उच्च-स्थिति के लोगों तक से भी सुनी जा सकती हैं। इनमें बहुत कुछ ठीक भी हो सकती हैं। लेकिन कभी हमने यह भी सोचा है कि इनके लिए हम स्वयं कितने जिम्मेदार हैं। हम भूल जाते है कि बहुत कुछ अपराध, बुराइयाँ हमारे व्यवहारिक जीवन में अपने ही प्रयत्नों का परिणाम हैं। हमारे अनीतिपूर्ण जीवन, सामाजिक उत्तरदायित्व के प्रति उपेक्षा, सच्चाई के प्रति आँख मूँद कर हाथ पर हाथ धरे बैठ जाने की प्रवृत्ति से ही बुराइयों को प्रोत्साहन मिलता है। यदि हम इनके लिए स्वयं को उत्तरदायी मानकर अपना सुधार करने में लगें, अपने कर्तव्यों को समझने लगें तो कोई सन्देह नहीं कि बुराइयाँ घटने लगें और एक दिन समाप्त भी हो जायें।
बुराइयों को मिटाने के लिए हमारा सर्व-प्रथम कर्तव्य है-हम दूसरों के साथ ऐसा व्यवहार न करें, जिसे हम स्वयं अपने लिए न चाहते हों। भगवान मनु ने इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए अपनी प्रजा को बताया था- “आत्मनः प्रतिकूलिति परेषाँ न समाचरेत्” जिस बात को तुम अपने लिए नहीं चाहते, उसे दूसरों के लिए मत करो।
हम नहीं चाहते कि कोई हमारा अपमान करे तो हमारा भी कर्तव्य है कि हम किसी का अपमान न करें। इसी तरह विश्वासघात, छल, कपट, धोखादेही ही, उत्पीड़न, शोषण आदि बुराइयों का शिकार हम स्वयं नहीं होना चाहते तो हमारा भी धर्म है कि हम दूसरों के साथ ऐसा न करें। लेकिन खेद है कि जब कोई हमारे ऊपर अत्याचार करता है, तो हम बुराई, की सिद्धान्तों की दुहाई देते हैं और बचाव के लिए गुहार मचाते हैं। किन्तु जब हम स्वयं दूसरों के साथ ऐसा करते हैं, तब किसी के कुछ कहने सुनने पर भी हमारे कान पर जूँ तक नहीं रेंगती। और यही कारण है कि बुराइयाँ दिनों दिन बढ़ती जाती है। हम उनकी शिकायतें करने, आलोचना करने में ही अपना काम पूरा समझ लेते हैं।
बुराइयों के सम्बन्ध में दूसरी विचारणीय बात है कि इन्हें रोकने के लिए हम स्वयं कितनी सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हैं? अपने कारोबार, मनोरंजन, आराम, घर गृहस्थी के अलावा हम समाजिक कर्तव्यों में कितना हाथ बटाते हैं, यह प्रश्न हमारे सबके लिए एक चुनौती है। भारतीय नागरिक की यह बहुत बड़ी कमजोरी है कि वह अपने ही जीवन से इतना चिपका रहता है कि सामाजिक उत्तरदायित्वों की ओर आँख उठाकर नहीं देखता, उनकी ओर उपेक्षा भाव बनाये रखता है। पड़ौस में डाकू रहता है। अनैतिक कार्य का अड्डा है, समाज विरोधी हरकतें हमारे सामने होती रहती हैं। दूसरों को बदमाशी करते हम देखते हैं, किन्तु हम में से कितने इनकी सूचना सरकारी अधिकारियों को देते हैं, या इनके खिलाफ हममें से कितने लोग आवाज उठाते हैं? इनके विरोध में आन्दोलन हमसे से कितने चलाते हैं। बहुधा हम इन्हें चुपचाप देखते रहते हैं। बहुत बार हममें से ही बहुत से लोग अपराधियों को आश्रय देते हैं, सहायता पहुँचाते हैं, उन्हें बढ़ावा तक देते हैं। यह निश्चित सत्य है कि अपनी बुराइयों के बल पर जीवित नहीं रह सकते। अपराधी समाज के सहयोग पर ही उनका अस्तित्व कायम रहता है। जागरुक व्यक्ति जानते हैं कि समाज के तथाकथित स्वार्थी लोग ही अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए अवाँछनीय तत्वों को प्रोत्साहित करते हैं, उन्हें सहारा देते हैं, आवश्यकता पड़ने पर उनका बचाव भी करते है। फिर एक दिन एक-एक कर हम सभी को इन दूषित तत्वों से हानि उठानी पड़े तो इसमें दोष किसका? क्योंकि अपराधी किसी का सगा नहीं होता, अपना लाभ न होते देख वह अपने तथाकथित बचाव करने वाले व्यक्ति पर भी आक्रमण कर सकता है।
कई बार किसी नागरिक पर बदमाश लोगों के आक्रमण को देखकर भी हममें से बहुत से लोग चुपचाप आगे पग बढ़ा जाते हैं। हममें से कइयों की जानकारी में रिश्वत का दौर चलता रहता है। कई बार हम जानते हैं कि सार्वजनिक कार्यों में ठेकेदार तथा नौकरशाही अनावश्यक लाभ उठा रहें हैं। हममें से बहुत से लोग धोखा-धड़ी, ठगी, चोरबाजारी, मिलावट करने वालों को भली भाँति जानते हैं, किन्तु यह सब जानकर भी हम इनका भण्डाफोड़ नहीं करते। इनकी शिकायत पुलिस को या अपराध निरोधक संस्थाओं को नहीं करते। इनके खिलाफ संगठित होकर आन्दोलन नहीं होता ।
इस सम्बन्ध में हमारी यह शिकायत हो सकती है कि आजकल कोई सुनता नहीं, जो इस तरह के कदम उठाता है, उसे उल्टी परेशानियाँ उठानी पड़ती हैं। बहुत कुछ अंशों में यह ठीक भी है। किसी बात की सूचना देने पर गुण्डे के बजाय सूचना देने वाले को ही गिरफ्तार कर लिया जाता है। बुराई का प्रतिरोध करने वाले को दूषित तत्वों का कोप भाजन बनना पड़ता है। यह सब ठीक है, किन्तु बिना कोई खतरा उठाये बुराइयों को दूर तो नहीं किया जा सकता। सुधार के लिए एक ही मार्ग है, वह है सब तरह के खतरे उठाकर बुराइयों का मुकाबला करना। यदि प्रशासन इस सम्बन्ध में ढील दे, तो उसके खिलाफ भी आवाज उठाई जाय। कोई सरकारी कर्मचारी या समाज का सदस्य इन दूषित तत्वों का बचाव करे, इन्हें प्रोत्साहन दे तो उनकी भी आलोचना करने में नहीं चूकना चाहिए।
इस तरह के प्रतिरोध के लिए अकेले व्यक्ति को तो संकल्प करना ही चाहिए, किन्तु सारे समाज को संगठित होकर बुराइयों के विपरीत कदम उठाना चाहिए। कोई कारण नहीं कि समाज की संगठित शक्ति के समक्ष बुराइयाँ जीवित रह सकें। खेद है, सामाजिक उत्तरदायित्व हम लोग नहीं समझते। कोई व्यक्ति किसी गुण्डे से निपटते समय सहायता के लिए पुकार करता है, तो हम किवाड़ बन्द करके बैठ जाते हैं, सुनकर भी अनसुनी कर जाते हैं, देखकर भी अनदेखे बन जाते हैं। लेकिन वह दिन भी दूर नहीं जब हमें भी इन दूषित तत्वों से आक्रान्त होना पड़ेगा।
आज बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष में, भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए सामूहिक अभियान की आवश्यकता है। जब तक लोगों में इस सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना पैदा न होगी, तब तक बुराइयाँ एक-एक कर हम सबको प्रभावित करती रहेंगी, हानि पहुँचाती रहेंगी।
हमारी एक सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि हम बड़े-बड़े सिद्धान्त बघारते हैं, नीति और न्याय की ऊँची-ऊँची बातें करते हैं, लेकिन यह सब दूसरों के लिए। अपने कार्य कलापों को न्याय, नीति की कसौटी पर हम बहुत ही कम कसते हैं। एक दुकानदार बाजार में बैठकर सरकार, पुलिस आदि के भ्रष्टाचार की जी खोज कर आलोचना करता है, किन्तु उसकी आलोचक वृत्ति उस समय गायब हो जाती है, जब वह वस्तुओं में मिलावट करता है, ग्राहकों को कम तोलता है, अधिक मुनाफा वसूल करता है। आततायी और गुण्डों को हम लोग कोसते हैं, उन्हें बुरा कहते हैं, किन्तु हमारी समीक्षात्मक बुद्धि उस समय जाने कहाँ चली जाती है, जब हम पराई स्त्री को बुरी निगाह से देखते हैं। बिना प्रति-मूल्य दिए समाज के साधनों का उपभोग करते हैं, अनीति के साथ धन एकत्र करते हैं, दूसरों के श्रम अधिकार एवं साधनों का अनुचित शोषण करते हैं।
जिस तरह हम दूसरों की आलोचना करते हैं, उसके लिए न्याय नीति की माँग करते हैं, उसी तरह यह भी आवश्यक है कि हम अपने व्यवहार को नीति, धर्म की कसौटी पर कसें। जो बुरा है उसे न करें।
हम दूसरों के साथ कोई ऐसी बात न करें जो स्वयं अपने लिए न चाहते हों। बुराइयों को मिटाने के लिए सामाजिक उत्तरदायित्व जो हम पर हैं, उसे सब तरह के खतरे उठाकर भी पूरा करने में न चूकें। कार्य व्यवहार को नीति, न्याय और धर्म की कसौटी पर परखें, जो बुराई है उससे दूर रहें। ये तीन बातें हमारे जीवन में ढल जायँ तो कोई सन्देह नहीं कि ये बुराइयां आज नहीं तो कल समाप्त ही हो जायगी।
बच्चों के साथ अपने दैनिक व्यवहार में हम बहुत-सी भूलें कर बैठते हैं और उनका बच्चों के सम्पूर्ण जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। बहुत से माँ-बाप अपने लाभ के लिए या बच्चों को सुधारने के लिए उन्हें तरह-तरह के भय दिखाया करते हैं। अबोध बच्चों को अक्सर ‘हौवा’ से डराया जाता है। “मुन्ना जल्दी सोजा, दुबक जा, नहीं ‘हौवा’ आ जायगा” ऐसे भय-प्रधान संकेत बच्चों को दिए जाते हैं। अबोध बालक समझने लगता है कि ‘हौवा’ नाम की कोई भयानक वस्तु है जो उसे खा जायगी या पकड़ ले जायगी।
कुछ बड़ा हो जाने पर जब वह चलने- फिरने लायक होता है तो कुत्ता, शेर, पकड़ ले जाने वाले साधु बाबा का डर दिखाया जाता है। प्रत्यक्ष डर दिखाने के साथ साथ ही घर में कहे जाने वाले किस्से, कहानी जिनमें राक्षस, भूत, प्रेत, चुड़ैल आदि की प्रधानता रहती है, बच्चों में कुछ कम भय पैदा नहीं करते । बहुत से घर वाले तो अमुक स्थान, पीपल का पेड़, मरघट, कब आदि पर भूत-प्रेत का निवास बता कर बच्चों को वहाँ जाने, चौराहा लाँघने से रोकते हैं।
किसी भी रूप में बच्चे को डराने की प्रवृत्ति बहुत ही हानिकारक सिद्ध होती है। इन बातों से बालक के कोमल मन पर भय की भावना इतनी दृढ़ता से जम जाती है कि वह जीवन-भर नहीं छूट पाती। वह अँधेरे में, अकेले में डर महसूस करता है। अँधेरे में कोई कपड़ा या वस्तु हवा से हिलती-डुलती देख कर उसकी घिग्घी बँध जाती है। जिन वस्तुओं का नाम लेकर डराया जाता है, यथा कुत्ता, बिल्ली, बन्दर, भालू, साँप, छिपकली, इनके संपर्क में आते ही बालक होश-हवाश खो बैठता है। भयावनी कहानियाँ उसकी विचारधारा और कल्पनाओं को उसी दिशा में मोड़ देती हैं, जिससे बालक अकारण ही भयभीत होता रहता है, कई भयप्रद कल्पनाओं और विचारों उलझ कर।
एक दूसरे ढंग से भी माँ-बाप बच्चों में भय की भावना पैदा करते हैं। बात-चीत में, व्यवहार में, बच्चों के साथ सख्ती से पेश आना, उन्हें झिड़क देना भी बच्चों को दूसरे ढंग से भयभीत बना देता है। ऐसा बालक बात बात में दूसरों से डरने लगता है। कुछ करने से पूर्व झिझकता है। धीरे-धीरे यह भय इतना बढ़ जाता है कि वह कुछ नहीं कर पाता ।
कई बार किसी पराजय अथवा कटु अनुभव होने पर बालक को चिढ़ाना, धिक्कारना, उस पर व्यंग कसना भी उसके साहस को कमजोर करता है। कुछ करने से पहले ही असफलता की, हानि की भविष्यवाणी कर देना भी बच्चों में एक प्रकार का भय पैदा करता है, जिससे बालक फिर इस तरह के कार्यों में हाथ डालने पर सहम जाता है और वह अपना बढ़ा हुआ पैर तक पीछे हटा लेता है। दिन भर दिये जाने वाले भय प्रधान संकेत “देख ऐसा मत करना, अमुक वस्तु को मत छूना, शीशा मत तोड़ देना” आदि आदेश जो भय दिखाते हुए दिए जाते हैं और भूल हो जाने पर जब बच्चे को डाँट-फटकार सुननी पड़ती है, तो बालक निर्भय हो कर कुछ नहीं कर पाता। वस्तु के टूट जाने, नुकसान हो जाने के भय से बालक इतना दब जाता है कि बात-बात में बहम करने लगता है-हिचकता है। किसी महत्वपूर्ण एवं जोखिम भरे काम में हाथ डालने की उसकी हिम्मत ही नहीं होती और जो व्यक्ति जीवन में कोई जोखिम नहीं उठा सकता, वह कुछ कर भी नहीं सकता ।
किसी भी रूप में क्यों न हो बच्चों में भय के संस्कार पैदा कर देना उनके स्वाभाविक जीवन विकास-क्रम में अवरोध पैदा कर देना है। निर्द्वन्द्व, निर्भय बालक जल्दी प्रगति करता है, बजाय एक भयभीत मनः स्थिति के बच्चे के । जो बालक कुत्ते, बिल्ली, छिपकली, हौवा , भूत चुड़ैल के नाम से घिघियाते हैं, अँधेरे में, अकेले में रहने से परेशान हो जाते हैं, जो नाना भयप्रद कल्पनाओं में डूबते उतराते रहते हैं, उनसे क्या आशा की जा सकती है कि ये जीवन में कोई महत्वपूर्ण काम कर सकेंगे? आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों में भय की भावनाओं को पैदा ही नहीं होने देना चाहिए। कदाचित किसी रूप में भय पैदा हो ही जाय, तो माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बालक की स्थिति का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करके तुरन्त उसके मन से भय को दूर करें।
यदि अँधेरे में या किसी स्थान विशेष पर बालक जाने से डरे, तो उसे प्रेम के साथ अपना पूर्ण संरक्षण प्रदान करें। स्मरण रहे बालक अपने अभिभावकों की गोद में अपने आपको सर्व प्रकार से सुरक्षित समझता है। लेकिन माँ-बाप ही जब हौवा या जूजू भूत, चुड़ैल आदि का डर बताते हैं, तो उसका धैर्य ओर विश्वास नष्ट हो जाता है। समझदार माँ-बाप को चाहिये कि वे बच्चों को इस तरह के कोई काल्पनिक भय न दिखावें, चाहे ऐसा उनके भले के लिए ही किया जाय लेकिन वह सर्वथा गलत है। जिस स्थान पर जाने से बालक डरता हो, उसे अपने संरक्षण का पूर्ण विश्वास देकर उस स्थान पर ले जाना चाहिए और उसकी वास्तविकता का खोखलापन विनोद में ही समझा देना चाहिए। कुछ समय वहाँ खेलने-कूदने में बिताने पर उसके मन से भय की भावना दूर हो जायगी। कोई नुकसान हो जाय, वस्तु टूट-फूट जाय, बालक को कोई असफलता मिल जाय, तो उसे आप कभी न टोकें न कोई दोष दें न मीन-मेख ही निकालें। गिरे हुए बालक को कोसने के बजाय उसे उठने, असफल हो जाने पर सफलता के लिए प्रोत्साहित कीजिए, खतरों, दुर्घटनाओं के लिये उसे डाँट-फटकार देने की अपेक्षा उसका हौसला बढ़ाइए। तभी उसका जीवन आने वाली बहुत-सी असफलता, दुर्घटना, कठिनाईयों को झेल सकेगा। बच्चों से जो नुकसान हो गया, वह तो पूरा होने का नहीं । व्यर्थ ही उन्हें भयभीत करना, डाटना-फटकारना उनके मनोबल को क्षीण कर देना है। अतः बच्चों को उनकी भूलों पर, असफलता पर, असावधानी पर शर्मिन्दा न करें, उन्हें न कोसें।
बच्चों को भूल कर भी ऐसी कथा, कहानियाँ, प्रसंग न सुनायें, जिनमें भूत, प्रेत चुड़ैल, हौवा जैसी काल्पनिक लेकिन भयानक बातों की प्रधानता हो। इसके स्थान पर उन्हें इतिहास के वीरों की, महान पुरुषों की, साहस शौर्य की घटना, कथाओं को सुनाया जाय। पढ़ने के लिए अच्छा साहित्य हो, जो उनके मनोबल को महान बनावे।
बच्चों को सहज रूप में खेलने-कूदने देना चाहिए। उनको बात-बात पर टोकना, डिक्टेटर का-सा हुकुम चलाना, दण्ड देना अनुपयुक्त है । इससे बालक का मनोबल क्षीण होता है और वह सहमा-सहमा रहने लगता है। झिझकता है। दब्बूपन की भावना उसमें घर कर लेती है। बच्चे को उसकी सहज स्थिति में रह कर विकसित होने देना चाहिए।
एक बात और सबसे महत्वपूर्ण है कि माता-पिता, अभिभावकों को भूल कर भी अपने बच्चों के समक्ष कोई भय प्रदर्शन नहीं करना चाहिए। वस्तुतः बालक अपने अभिभावकों को सर्व समर्थ समझाता है और इसी विश्वास से वह उनके संरक्षण में रह कर निडर रहता है। लेकिन वे जब भय युक्त आचरण करते हैं, तो बालक का विश्वास डगमगा जाता है, साथ ही वह भी भयभीत होने लगता है। जो माँ-बाप स्वयं डरपोक होंगे, तो उनके बच्चे साहसी, निडर बन जायं, ऐसा सम्भव नहीं। माँ-बाप को चाहिए कि अपने बच्चों में निर्भयता साहस की भावना जगाने के लिए स्वयं इस तरह का आचरण व्यवहार करें।
इसमें कोई सन्देह नहीं कि बाल्यकाल में बच्चों के कोमल मन में जमी हुई भय की भावना उन्हें जीवन-भर के लिए अकर्मण्य, कायर एवं भीरु बना देती है। उन्हें एक प्रकार की मानसिक गुलामी का जीवन बिताना पड़ता है, क्योंकि संसार में निर्भयी ही महत्वपूर्ण स्थान पा सकते हैं। माँ बाप का कर्तव्य है कि वे अपने बच्चों का जीवन भय के कारण नष्ट न होने दें। सर्व प्रथम उनमें भय की भावना पैदा ही न होने दें, फिर यदि हो भी जाय तो उसे दूर करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करें।
युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति-
संसार में अगणित उपासना पद्धतियाँ प्रचलित हैं। अपने स्थान पर वे सभी ठीक हैं और साधक की भावनानुसार उन सबका ही फल होता है। इन सबमें गायत्री का अपना विशिष्ट स्थान है। चारों वेदों की जननी, भारतीय धर्म और संस्कृति की उद्गम गंगोत्री-गायत्री के 24 अक्षरों में वह भावना, शिक्षा और शक्ति ओत-प्रोत हो रही है, जिसका आश्रय लेकर मनुष्य लौकिक और पारलौकिक प्रगति की दिशा में तेजी से अग्रसर हो सकता है।
इन 24 अक्षरों का गुँथन ऐसे वैज्ञानिक ढंग से हुआ है कि उनका क्रमबद्ध उच्चारण करने मात्र से भी मनुष्य शरीर में अवस्थित सूक्ष्म चक्र, उपचक्र एवं उपत्यिकाएं जागृत होकर गुण, कर्म, स्वभाव में, आत्मिक स्तर में, श्रेयस्कर परिवर्तन उत्पन्न होता है। फिर यदि भावना एवं विधि-विधान के साथ उसकी उपासना की जा सके, तब तो कहना ही क्या है? मनोबल वृद्धि, सद्भावनाओं का विकास, आन्तरिक पवित्रता एवं आध्यात्मिक विशिष्ट शक्तियों का जागरण जैसी अनेक उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं और उनका प्रतिफल लौकिक एवं पारलौकिक, भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से परम मंगलमय होता है।
भारत के आध्यात्मिक एवं उपासनात्मक इतिहास पर बारीकी से दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ आदिकाल से ही गायत्री उपासना की प्रधानता रही है। त्रिकाल सन्ध्या में गायत्री के बिना भारतीय धर्म के अनुरूप संध्या उपासना हो ही नहीं सकती । शास्त्रों में लिखा है कि गायत्री से रहित व्यक्ति निन्दनीय है, उसके हाथ का अन्न जल भी ग्रहण न करना चाहिए। इस भर्त्सना के पीछे मूल प्रयोजन इतना ही है कि गायत्री का परित्याग कोई भारतीय धर्मावलम्बी न करे। अवतारों,ऋषियों और महापुरुषों की प्रधान उपासना गायत्री की ही रही है। हिन्दू-धर्म के सूर्य-चन्द्र-राम कृष्ण गायत्री के अनन्य उपासक थे। समस्त ऋषियों की तपश्चर्या का केन्द्र बिन्दु गायत्री था। वैदिक काल में तो आज के प्रचलित अगणित देवी देवताओं की चर्चा तक न थी, न आज जैसी विभिन्नता और विद्रूपता ही उस समय उत्पन्न हुई थी। तब उपासना जगत में मात्र गायत्री की ही प्रतिष्ठा थी। इस महान अवलम्बन को लेकर यहाँ के निवासियों ने आध्यात्मिक और भौतिक सत्परिणाम भी प्राप्त किये थे। प्राचीन इतिहास में भारत का जो महान गौरव दृष्टिगोचर होता है, उसके पीछे गायत्री शक्ति की प्रधानता थी। इस महान् तत्व को खोकर आज हम मणि-हीन सर्प ही तरह दीन-हीन बने हुए हैं।
देश, धर्म, समाज और संस्कृति के नव-जागरण की इस पुण्य बेला में हमें आत्मिक शक्तियों का आश्रय लेना पड़ेगा। आत्मबल ही संसार का सबसे बड़ा बल है। भारत का आत्मिक विकास ही इस देश की तथा समस्त संसार की समस्त समस्याओं का हल कर सकने में समर्थ हो सकता है। उत्थान का मूल स्रोत भौतिक साधन सामग्री में नहीं, आत्मिक स्तर में ही सन्निहित है। अतएव अब जब कि भारतीय राष्ट्र और धर्म की आत्मा जागृत होकर प्रबल एवं प्रकाशवान होने जा रही है, तब हमें पुनः उसी शक्ति स्रोत को अपनाना पड़ेगा, जिसका आश्रय लेकर हमारे पूर्व पुरुष सर्वांगीण प्रगति के पथ पर अग्रसर हुए थे। हमें उपेक्षित गायत्री महातत्व की शरण में जाना ही पड़ेगा। हमारी वैयक्तिक एवं सामूहिक प्रगति का वास्तविक आधार गायत्री महामन्त्र के आधार पर विकसित हुआ महान् आत्मबल ही हो सकता है।
गायत्री उपासना का महान माध्यम-
अखण्ड-ज्योति परिवार में सदस्यों को गायत्री उपासना की प्रेरणा विगत 25 वर्षों से लगातार दी जाती रही है। परिजनों ने उस प्रेरणा को अपनाया भी है और उसका समुचित प्रतिफल भी सामने आया है। इस उपासना ने लोगों के आत्मिक स्तर को समुन्नत बनाने में जो योग दिया है, उसी का प्रतिफल है कि यह परिवार आत्मिक दृष्टि से समुन्नत लोगों का एक श्रेष्ठ संगठन बन कर सामने आया है और युग-निर्माण योजना जैसे ऐतिहासिक कार्य की भूमिका सम्पादन करने का साहस करने एवं उत्तरदायित्व सम्भालने के लिए कटिबद्ध हो सका है।
अब चूँकि हमारा सेवा काल दिन-दिन घटता जा रहा है-कुछ ही वर्ष और रह गया है-ऐसी दशा में यह आवश्यक था कि गायत्री तत्व अपनाने से उपलब्ध होने वाली शक्ति का प्रत्यक्ष अनुभव करने वाले कुछ व्यक्ति तैयार कर लिये जायं, जो उस परम्परा को जारी रख सकें जो हमें प्राप्त हुई है। अतएव इस बसन्त पंचमी से (6 फरवरी 65) से इस महान् उपासना की कुछ विशिष्ट शिक्षा देना उन लोगों को आरम्भ कर रह हैं, जो भौतिक प्रयोजनों के लिए नहीं आत्मिक उत्कर्ष के लिए उसका उपयोग करना चाहते हैं
आमतौर से मनुष्य बड़ा स्वार्थी और संकीर्ण होता है। उसकी दृष्टि केवल भौतिक लाभ तक ही सीमित रहती है। पूजा उपासना के पीछे भी उसका प्रयोजन कुछ भौतिक लाभ उठाना ही बना रहता है। कुछ फायदा हो गया तो भोग प्रसाद चढ़ाने लगे और कुछ नुकसान हो गया तो उसका सारा दोष उपासना पर थोपकर उसे छोड़ बैठे। उनकी दृष्टि में लाभ कमाने के अनेक उद्योग धन्धों में से एक धन्धा पूजा भी होता है। लाटरी की तरह इसमें कम लागत से अधिक लाभ होने के लालच में कई व्यक्ति बहुत कुछ कमा लेने या बड़े दुर्भाग्यों को मिटा लेने की आशा में ही कोई पूजा करने को तैयार होते हैं। थोड़े दिन की परीक्षा में यदि अभीष्ट लाभ नहीं निकला, तो इसे भी बेकार का धन्धा मानकर छोड़कर बैठते हैं।
भौतिकता में पैर से चोटी तक डूबे हुए व्यक्तियों को आध्यात्म की ओर आकर्षित करने के लिए थोड़ी पूजा से बड़ा लाभ कमाने का आकर्षण एक सीमा तक कारगर हो सकता है, पर उसकी उपयोगिता तभी है जब आगे चल कर वह उपासक अपने कार्यक्रम स्तर को बदल कर आत्मकल्याण के लिए, सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने को लिए अग्रसर हो सके। यदि यह स्तर न बदला, उपासक लालची ही बना रहे और आत्मिक लक्ष्य को मुफ्त का गौण लाभ मानता रहे तो उपासना का मूल प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। लालची आदमी आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में दूर तक आगे नहीं बढ़ सकता।
हम अपने उत्तराधिकारियों की नियुक्ति कर रहे हैं, ताकि उदीयमान राष्ट्र की आत्मा को जगाने के लिए वे लोग उस प्रयास को जारी रख सकें जो हम अपने मार्ग दर्शक देवता के नेतृत्व में अब तक करते चले आये हैं। भारतीय जनता को देवत्व गायत्री साधना से प्राप्त होगा। साधना का अर्थ केवल पूजा ही नहीं, वरन् जीवन की गति विधियों की उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालना भी हैं। हमें भारतीय जनता की गतिविधियों में इस श्रद्धा का समावेश करना ही होगा कि आस्तिकता के प्रधान आधार सदाचरण और लोक मंगल को सत्प्रवृत्तियों के अपनाने और बढ़ाने के लिए निरन्तर प्रयास किया जाय। इसके बिना राष्ट्र का वास्तविक उत्थान ही नहीं सकेगा। अतएव इस महान आवश्यकता की देशव्यापी पूर्ति के लिए एक अभियान जारी रखना ही पड़ेगा और उन जारी रखने वालों में समुचित आत्मबल रहना ही चाहिए ताकि, इतने बड़े प्रयोजन को अग्रसर कर सकने में वे समर्थ हो सकें।
योजना के दो पहलू-
युग निर्माण योजना हमारे जीवन का प्रधान कार्यक्रम है । इस कार्यक्रम के दो पहलू हैं। एक बाह्य दूसरा आन्तरिक। बाह्य कार्यक्रम के अंतर्गत समाज में सत्प्रवृत्तियों एवं परम्पराओं को सामाजिक जीवन में प्रवेश कराया जाता है। संगठन, सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन, स्वस्थ परम्पराओं का प्रचलन, जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण, गीता आन्दोलन आदि की 108 रचनात्मक प्रवृत्तियाँ इस बाह्य कार्यक्रम में सम्मिलित हैं। इन्हें सामाजिक स्तर के कार्यक्रम बना कर भी चलाया जा सकता है। संसार में अनेक संगठनों एवं व्यक्तियों ने बड़े-बड़े सुधार तथा विकास कार्यक्रम सामाजिक स्तर पर बनाये तथा बढ़ाये हैं। युग-निर्माण योजना को भी इस आधार पर गतिशील रखा जा सकता है। हम इस स्तर पर भी प्रयास कर रहे हैं। उन प्रयासों के गतिशील बनाये रखने की जिम्मेदारी जो लोग अपने कन्धों पर उठावेंगे, उन्हें हम अपना प्रतिनिधि मानेंगे। जहाँ कहीं भी हमारी आवाज- अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ एक प्रतिनिधि-मण्डल इसी दृष्टि से नियुक्त किया है कि वे योजना की भावना को समझें और इसे मूर्त रूप देने के लिए कुछ संगठनात्मक, रचनात्मक एवं आन्दोलनात्मक कार्यक्रम अपने क्षेत्र में जारी रखें। जो प्रकाश वहाँ पहुंचा है उसे बुझने न दें वरन् स्वयं तेल जाती बनकर उस चिनगारी को प्रकाश पुञ्ज को स्वरूप देने का प्रयास करने रहे। युग-निर्माण योजना को मूर्तिमान् एवं गतिशील बनायें रखना प्रतिनिधियों का एक प्रधान कर्तव्य है। अपने क्षेत्रों में उन्हें वही करते रहना चाहिए, जो यदि हम स्वयं वहाँ होते तो जन-जागरण की दृष्टि से करते होते ।
दूसरा वर्ग उत्तराधिकारियों का है। उन्हें संगठनात्मक कार्यों में तो संलग्न रहना ही है, साथ ही एक दूसरा उत्तरदायित्व भी सम्भालना है, वह यह कि उपासना द्वारा अपना स्वयं का आत्म-बल बढ़ावे और दूसरे सत्पात्रों में इसके बीजाँकुर उगाते एवं सींचते रहें। इसके लिए हमारी व्यक्तिगत परम्परा गायत्री उपासना की है। इस उपासना को वे इस ढंग से करें कि उन्हें उस स्तर का आत्म-बल मिले, जिसकी आत्म-कल्याण, जीवन की लक्ष्य प्राप्ति एवं राष्ट्र के नव-निर्माण में नितान्त आवश्यकता रहेगी। हम अब तक जो कुछ कर सके या पा सके हैं, उसके पीछे गायत्री द्वारा उपार्जित आत्म-बल ही महिमा की काम कर रही है। आगे जिन्हें इस परम्परा को विशेष बल-पूर्वक जारी रखना है, उन्हें भी इस आधार को अपनाये रहना ही पड़ेगा। अतएव उपासना पथ पर हमारे कदम से कदम मिला कर या आगे पीछे जो चल सकेंगे उन्हें हम अपना उत्तराधिकारी मानेंगे।
प्रतिनिधि पर एकहरा उत्तरदायित्व है, उत्तराधिकारियों पर दुहरा। प्रतिनिधि सामाजिक उत्कर्ष के रचनात्मक कार्य करते रह सकते हैं। वे गायत्री उपासना न भी करें तो उसके लिए बाध्य नहीं। सामाजिक स्तर पर नव-निर्माण का जो कार्य भार उनके कन्धे पर पड़ा है, वे उसे निबाहते रहेंगे, तो उनके प्रतिनिधित्व का उत्तरदायित्व पूरा हुआ मान लिया जायगा। उत्तराधिकारियों को इतना तो करना ही ठहरा, इसके अतिरिक्त वे गायत्री उपासना के विशेष साधना क्षेत्र में भी उतरेंगे एवं बढ़ेंगे ताकि आत्म-बल का वह स्रोत उन्हें उपलब्ध हो सके, जो नर को नारायण बना सकने में समर्थ हो सकता है।
निष्काम उपासना और आत्मबल-
इस स्तर की उपासना सदा निष्काम होती है। जो बिना किसी कामना या इच्छा के साधना करते हैं, उन्हें ही ईश्वर का सच्चा प्रेम और आशीर्वाद प्राप्त होता है। आत्म-बल भी उन्हीं का बढ़ता है और दूसरों का उपकार करने, प्रेरणा देने, जीवन बदलने, प्रकाश पहुँचाने एवं आशीर्वाद देकर भला करने की क्षमता की निष्काम उपासकों में ही रहती है। कामनाशील उपासकों के अन्तःकरण में उतनी स्पष्ट एवं गहरी श्रद्धा उत्पन्न नहीं हो सकती, जिससे परमेश्वर को द्रवित किया जा सके। फिर जो कुछ वे कामते हैं, वह उनके भौतिक प्रयोजनों में ही पूरा हो जाता है, ऐसी दशा में वे उस पूँजी का संग्रह कर नहीं पाते, जिससे बड़े आध्यात्मिक प्रयोजनों की पूर्ति हो सके। अतएव जिन्हें आत्म-बल संग्रह करने की, नर से नारायण रूप में विकसित होने की आकाँक्षा हो उन्हें सकाम उपासना के स्तर से ऊँचा उठकर निष्काम भावना अपनानी पड़ेगी और अपनी साधना का उद्देश्य परमार्थ ही रखना पड़ेगा। जो इस शर्त को स्वीकार करते हुए गायत्री उपासना करने को तत्पर हों, वे ही हमारे उत्तराधिकार का उत्तरदायित्व सम्भाल सकने में समर्थ हो सकेंगे।
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को प्रतिनिधि अथवा उत्तराधिकारी बनने का खुला आमन्त्रण प्रस्तुत किया गया है। प्रश्न साहस का है, जिनमें हिम्मत हो वे इस निमन्त्रण को स्वीकार कर सकते हैं। कोई भौतिक पदार्थ बाँटे जा रहे होते, तो अगणित याचक आ खड़े होते, पर यहाँ तो लेने का नहीं देने का प्रश्न है-भोग का नहीं त्याग का प्रश्न है, इसलिए स्वभावतः कोई विरले ही आगे बढ़ने का साहस करेंगे। फिर भी यह निश्चित है कि यह धरती कभी भी वीर-विहीन नहीं होती। इसमें ऊँचे आदर्शों को अपनाने वाले, ऊँचे स्तर के, बड़े दिल वाले व्यक्ति भी रहते ही हैं और उनका अपने परिवार में अभाव नहीं है। थोड़े ही सही पर है जरूर। जो हैं, उतनों से भी अपना काम चल सकता है। हमारे हाथों में जो मशाल सौंपी गई थी, उसे हम हजार दो हजार हाथों में भी जलती देख सकें, तो सन्तोष की बात ही कही जायगी।
कौन क्या करे का उत्तर।
प्रतिनिधि क्या करेंगे इसका उत्तर शत-सूत्री युग निर्माण योजना के रूप में दिया जा चुका है। उन्हें अपनी परिस्थिति के अनुसार नव-निर्माण के लिए कुछ न कुछ करते ही रहना चाहिए। परमार्थ के ईश्वर की वास्तविक पूजा समझ कर कुछ समय उन्हें नियमित रूप से इन कार्यों के लिए लगाते रहना चाहिए। पूरे समय को अपने और अपने परिवार के लिए ही खर्च नहीं करते रहना चाहिए, वरन् उसमें से कुछ नियमित रूप से बचाना चाहिए और उसे जन-जागरण के नव-निर्माण के, कार्यों में लगाना चाहिए। नियमित समय-दान की प्रतिनिधित्व का शुल्क है। स्थानीय परिजनों का संगठन और उस संगठन के द्वारा जनजागरण के आयोजन का यह व्यवस्था चलाते रहना प्रतिनिधियों का कर्तव्य है। इतना यदि वे करने लगे, तो मानना चाहिए कि जो उत्तरदायित्व उनके कन्धों पर सौंपा गया था, उसे वे ईमानदारी से निवाहने लगे हैं। कुछ पूजा उपासना भी उन्हें करनी ही चाहिए। गायत्री में उनकी रुचि न हो, तो वे किसी भी प्रकार भगवान का स्मरण करते रहें और उससे आत्म-बल प्राप्त होने की प्रार्थना करते रहें।
उत्तराधिकारियों को अनिवार्य रूप से गायत्री उपासना का अवलम्बन करना होगा। ऊपर की पंक्तियों में यह कहा जा चुका है कि उनकी उपासना निष्काम होगी, उसका उद्देश्य केवल आत्म-बल की प्राप्ति रहेगा। इसके अतिरिक्त उन्हें अपने साधना क्रम में भी इस वसन्त पंचमी से कुछ हेर-फेर कर देना होगा, जिसका वर्णन अगले लेख में किया जा रहा है।
हमारे निज के जीवन विकास की आधार शिला गायत्री है। उसका पय-पान करके हमने अपना अध्यात्म शरीर परिपुष्ट किया है। जैसे लाभ और जो अनुभव हमें इस उपासना द्वारा उपलब्ध हुए हैं, उसी अनुभव से प्रेरित होकर हम अपने सभी स्वजन प्रिय जनों को समय-समय पर गायत्री उपासना की प्रेरणा देते रहे हैं। जिनने उस शिक्षा को अपना कर इस मार्ग पर कदम उठाये हैं, उनने भी उत्साहवर्धक और आशाजनक अनुभव ही प्राप्त किए हैं। लौकिक सफलताओं के लिए, अत्यन्त संकट और कष्टों की निवृत्ति के लिए जिनने भी इस अवलम्बन का आश्रय लिया है, उन्हें सन्तोषजनक प्रतिफल ही मिला है। ऐसे कोई विरले ही होंगे जिन्हें यह कहने का अवसर मिला है कि हमारी गायत्री उपासना व्यर्थ चली गई। जिनने आत्मकल्याण के उद्देश्य में निष्काम उपासना की है, उनके सन्तोष का तो कहना ही क्या है? वे अपने जीवन क्रम और स्तर में कायाकल्प जैसा परिवर्तन हुआ अनुभव करते हैं।
विभिन्न व्यक्तियों की आन्तरिक स्थिति के अनुभव पर उन्हें अलग-अलग प्रकार की साधनायें भी बताई गई हैं और जिन्होंने निष्ठा पूर्वक उन्हें अपनाए रखा है, उन्होंने आश्चर्य जनक परिणाम भी प्रत्यक्ष देखा है। कुछ नैष्ठिक उपासकों की पंचकोशी साधना गत तीन वर्ष से चल रही है। अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश, यह गायत्री माता के पाँच मुख हैं। इन पाँचों का अनावरण कैसे हो इसका योग शास्त्र में वर्णित विधान हम प्रतिवर्ष अक्टूबर मास के अंकों में छाप
डडडडड ने दिया नियन्त्रण डडडडडडडड बलिदान का !
डडडडड हो गया आज नकल निर्माण का !!
आयो होता बनकर उसने अपनी अञ्जलि डाल दो,
मुक्तिन्त्रमा के श्री चरणों में चढ़ा साधना थाल दो,
तुम्हें मिला जो अवसर अनुपम उसका उपयोग लो,
बेला है सामूहिक श्रम की उसमें अपना योग दो,
ध्यान रहे तुमको प्रतिक्षण अपने दायित्त्व महान का!
महायज्ञ आरम्भ हो गया आज नक्ल निर्माण का!!
जीवन के अभिनव सपनों को भू पर तुम्हें उतारना,
पावन डडडडड लाने की करो भगीरथ डडडडड,
कल्प वृक्ष बोओ तुम जिसमें सर्वसिद्धि का फल लगे,
राग प्रमाता का गाओ जिससे प्रसुप्त जीवन जगे,
अपनायो पथ तुम जन जन के हित का जग कल्याण!
महायज्ञ प्रारम्भ हो गया आज नक्ल निर्माण का!!
करो न जल्दी स्वार्थ, अहं से सर्वसिद्धि की कल्पना,
सब मिलजुल डड नारायण की करो आज डडड,
कमी ना रहे पाने अपूर्णा अन्तरतम के संकल्प है,
डडडडडड का सम्बोधन करना युग का काया कल्प है,
सर्जन करो सबल हाथों से नया रूप इन्सान का!
महायज्ञ प्रारम्भ हो गया आज नक्ल निर्माण का!!
-विद्यावती मिश्र.
*समाप्त*