आध्यात्मिकता की मुसकान

आत्मा का स्वरूप आनन्दमय है। जिसे आत्मज्ञान हो जाता है, उसे निरन्तर आनन्दित ही देखा जा सकता है। आध्यात्मिकता का दूसरा नाम है- प्रसन्नता। जो प्रसन्न नहीं रह सकता उसने न आत्मा को जाना और न ईश्वर को। शोक संतप्त, उद्विग्न और विक्षुब्ध व्यक्ति तो अनात्म तत्वों के वाहन मात्र है। जो क्रोध से झल्लाया करता है, जिसे खीज़ और आवेश का बार-बार शिकार होना पड़ता है उसकी आस्तिकता संदिग्ध ही मानी जायेगी।

इस संसार में सब कुछ हँसने को लिए उपजाया गया है। जो बुरा और अशुभ है वह हमारी प्रखरता की चुनौती के रूप में है। परीक्षा के प्रश्न पत्रों के देखकर जो छात्र रोने लगे, उसे अध्ययनशील नहीं माना जा सकता। जिसने थोड़ी-सी आपत्ति-असफलता एवं प्रतिकूलता को देखकर रोना-धोना शुरू कर दिया, उसकी आध्यात्मिकता पर कौन विश्वास कर सकता है? प्रतिकूलता हमारा साहस बढ़ाने, धैर्य को मजबूत करने और सामर्थ्य को विकसित करने आती है। सरल जिन्दगी यदि संयत हो सके तो वह सबसे भद्दे ढंग की ही होगी क्योंकि वह जो सरलता पूर्वक दिन गुजारता रहता है उसमें न तो किसी प्रकार की विशेषता रह जाती है और न प्रतिभा। संघर्ष के बिना भी भला कहीं, इस दुनिया में किसी का जीना सम्भव हुआ है।

नई उपलब्धियों में हमें हँसना चाहिए, अब तक मिल चुका उससे सन्तोष व्यक्त करना चाहिए और भविष्य की शुभ सम्भावनाओं की कल्पना करके सदा प्रमुदित होते रहना चाहिए। रोना एक अभिशाप है जो केवल अविवेकी लोगों को शोभा देता है। जिसे आत्मा के स्वरूप का ज्ञान है और परमात्मा की महत्ता, कुशलता और विनोद को समझता है उसे हँसने मुस्कराने की परिस्थितियों के अतिरिक्त और कुछ इस जीवन में अनुभव ही क्या हो सकता है?

-महर्षि रमण


ईश्वर है या नहीं?

नास्तिकवाद का कथन यह है कि-”इस संसार में ईश्वर नाम की कोई वस्तु नहीं, क्योंकि उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष उपकरणों से सिद्ध नहीं होता।” अनीश्वरवादियों की मान्यता है कि जो कुछ प्रत्यक्ष है, जो कुछ विज्ञान सम्मत है केवल वही सत्य है। चूंकि वैज्ञानिक आधार पर ईश्वर की सत्ता का प्रमाण नहीं मिलता इसलिये उसे क्यों मानें?

इस प्रतिपादन पर विचार करते हुए हमें यह सोचना होगा कि अब तक जितना वैज्ञानिक विकास हुआ है क्या वह पूर्ण है? क्या उसने सृष्टि के समस्त रहस्यों का पता लगा लिया है? यदि विज्ञान को पूर्णता प्राप्त हो गई होती तो शोधकार्यों में दिन-रात माथापच्ची करने की वैज्ञानिकों को क्या आवश्यकता रह गई होती?

सच बात यह है कि विज्ञान का अभी अत्यल्प विकास हुआ है। उसे अभी बहुत कुछ जानना बाकी है। कुछ समय पहले तक भाप, बिजली, पेट्रोल, एटम, ईथर आदि की शक्तियों को कौन जानता था, पर जैसे-जैसे विज्ञान में प्रौढ़ता आती गई, यह शक्तियाँ खोज निकाली गई। यह जड़ जगत् की खोज है। चेतन जगत् सम्बन्धी खोज तो अभी प्रारम्भिक अवस्था में ही है। बाह्य मन और अंतर्मन की गति-विधियों को शोध से ही अभी आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं हैं। यदि हम अधीर न हों तो आगे चलकर जब चेतन जगत् के मूल-तत्वों पर विचार कर सकने की क्षमता मिलेगी तो आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व भी प्रमाणित होगा। ईश्वर अप्रमाणित नहीं है। हमारे साधन ही स्वल्प है जिनके आधार पर अभी उस तत्व का प्रत्यक्षीकरण सम्भव नहीं हो पा रहा है।

पचास वर्ष पूर्व जब साम्यवादी विचारधारा का जन्म हुआ था तब वैज्ञानिक विकास बहुत स्वल्प मात्रा में हो पाया था। उन दिनों सृष्टि के अन्तराल में काम करने वाली चेतन सत्ता का प्रमाण पा सकना अविकसित विज्ञान के लिए कठिन था। पर अब तो बादल बहुत कुछ साफ हो गये हैं। वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ मनीषियों के लिए चेतन सत्ता का प्रतिपादन कुछ कठिन नहीं रहा है। आधुनिक विज्ञान वेत्ता ऐसी संभावना प्रकट करने लगे है कि निकट भविष्य में ईश्वर का अस्तित्व वैज्ञानिक आधार पर भी प्रमाणित हो सकेगा। जो आधार विज्ञान को अभी प्राप्त हो सके हैं वे अपनी अपूर्णता के कारण आज ईश्वर का प्रतिपादन कर सकने में समर्थ भले ही न हों पर उसकी सम्भावना से इनकार कर सकना उनके लिए भी संभव नहीं है।

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक रिचर्डसन ने लिखा है-”विश्व की अगणित समस्याएँ तथा मानव की मानसिक प्रक्रियाएं वैज्ञानिक साधनों, गणित तथा यन्त्रों के आधार पर हल नहीं होतीं। भौतिक विज्ञान से बाहर भी एक अत्यन्त विशाल दुरूह अज्ञात क्षेत्र रह जाता है जिसे खोजने के लिए कोई दूसरा साधन प्रयुक्त करना पड़ेगा। भले ही उसे अध्यात्म कहा जाय या कुछ और।”

वैज्ञानिक मैकब्राइट का कथन है- “इस विश्व के परोक्ष में किसी ऐसी सत्ता के होने की पूरी सम्भावना है जो ज्ञान और इच्छायुक्त हो। विज्ञान की वर्तमान इस मान्यता को बदलने के लिए हमें जल्दी ही बाध्य होना पड़ेगा कि-” विश्व की गतिविधि अनियंत्रित और अनिश्चित रूप से स्वयमेव चल रही है।”

विज्ञानवेत्ता डॉ. मोर्डेल ने लिखा है- “विभिन्न धर्म सम्प्रदायों में ईश्वर का जैसा चित्रण किया गया है, वैसा तो विज्ञान नहीं मानता। पर ऐसी सम्भावना, अवश्य है कि अणु-जगत् के पीछे कोई चेतन शक्ति काम कर रही है। अणु-शक्ति के पीछे उसे चलाने वाली एक प्रेरणा शक्ति का अस्तित्व प्रतीत होता है। इस सम्भावना के सत्य सिद्ध होने से ईश्वर का अस्तित्व भी प्रमाणित हो सकता है।

विख्यात विज्ञानी इंग्लोड का कथन है कि -”जो चेतना इस सृष्टि में काम कर रही है उसका वास्तविक स्वरूप समझने में अभी हम असमर्थ हैं। इस सम्बन्ध में हमारी वर्तमान मान्यताएँ अधूरी, अप्रामाणिक और असन्तोषजनक हैं। अचेतन अणुओं के अमुक प्रकार मिश्रण से चेतन प्राणियों में काम करने वाली चेतना उत्पन्न हो जाती है, यह मान्यता संदेहास्पद ही रहेगी।”

विज्ञान अब धीरे-धीरे ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने की स्थिति में पहुँचता जा रहा है। जॉन स्टुअर्ट मिल का कथन सच्चाई के बहुत निकट है कि -”विश्व की रचना में प्रयुक्त हुई नियमबद्धता और बुद्धिमत्ता को देखते हुए ईश्वर की सत्ता स्वीकार की जा सकती है।” कान्ट, मिल, हेल्स, होल्ट्ज, लाँग, हक्सले, काम्टे आदि वैज्ञानिकों ने ईश्वर की असिद्धि के बारे में जो कुछ लिखा है वह अब बहुत पुराना हो गया उनकी वे युक्तियाँ जिनके आधार पर ईश्वर का खण्डन किया जाया करता था, अब असामयिक होती जा रही हैं। डॉ. फ्लिन्ट ने अपनी पुस्तक ‘थीइज्म’ में इन युक्तियों का वैज्ञानिक दृष्टिकोण में ही खण्डन करके रख दिया है।

भौतिक विज्ञान का विकास आज आशाजनक मात्रा में हो चुका है। यदि विज्ञान की यह मान्यता सत्य होती कि - “अमुक प्रकार के अणुओं के अमुक मात्रा में मिलने से चेतना उत्पन्न होती है” तो उसे प्रयोगशालाओं में प्रमाणित किया गया होता, कोई कृत्रिम चेतन प्राणी अवश्य पैदा कर लिया गया होता, अथवा मृत शरीरों को जीवित कर लिया गया होता। यदि वस्तुतः अणुओं के सम्मिश्रण पर ही चेतना का आधार रहा होता तो मृत्यु पर नियंत्रण करना मनुष्य के वश से बाहर की बात न होती। शरीरों में अमुक प्रकार के अणुओं का प्रवेश कर देना तो विज्ञान के लिए कोई बड़ी बात नहीं है। यदि नया शरीर न भी बन सके तो जीवित शरीरों को मरने से बचा सकना तो अणु विशेषज्ञों के लिए सरल होना ही चाहिए था?

विज्ञान का क्रमिक विकास हो रहा है, उसे अपनी मान्यताओं को समय-समय पर बदलना पड़ता है। कुछ दिन पहले तक वैज्ञानिक लोग पृथ्वी की आयु केवल सात लाख सात वर्ष मानते थे और जिसके अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 97 करोड़ वर्ष मानी गई है। अब रेडियम धातु तथा यूरेनियम नामक पदार्थ के आधार पर जो शोध हुई है, उससे पृथ्वी की आयु लगभग दो अरब वर्ष सिद्ध हो रही है और वैज्ञानिकों को अपनी पूर्व मान्यताओं को बदलना पड़ रहा है।

विज्ञान ने सृष्टि के कुछ क्रियाकलापों का पता लगाया है। क्या हो रहा है इसकी कुछ जानकारी उन्हें मिली है। पर कैसे हो रहा है, क्यों हो रहा है, यह रहस्य अभी भी अज्ञात बना हुआ है। प्रकृति के कुछ परमाणुओं के मिलने से प्रोटोप्लाज्म-जीवन तत्व बनता ही है, पर इस बनने के पीछे कौन नियम काम करते है इसका पता नहीं चल पा रहा है। इस असमर्थता की खोज को यह कहकर आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता कि--इस संसार में चेतन सत्ता कुछ नहीं है।

जार्ज डार्विन ने कहा है - “जीवन की पहेली आज भी उतनी ही रहस्यमय है जितनी पहले कभी थी।” प्रोफेसर जे.ए. टामसन ने लिखा है -”हमें यह नहीं मालूम कि मनुष्य कहाँ से आया, कैसे आया, और क्यों आया। इसके प्रमाण हमें उपलब्ध नहीं होते और न यह आशा ही है कि विज्ञान इस सम्बन्ध में किसी निश्चयात्मक परिणाम पर पहुँच सकेगा।”

“आन दी नेचर आफ दी फिजीकल वर्ल्ड” नामक ग्रन्थ में वैज्ञानिक एडिंगटन ने लिखा है -”हम इस भौतिक जगत् से परे की किसी सत्ता के बारे में ठीक तरह कुछ जान नहीं पाये हैं। पर इतना अवश्य है कि इस जगत् से बाहर भी कोई अज्ञात सत्ता कुछ रहस्यमय कार्य करती रहती है।”

विज्ञानवादी इतना कह सकते है कि जो स्वल्प साधन अभी उन्हें प्राप्त है उनके आधार पर ईश्वर की सत्ता का परिचय वे प्राप्त नहीं कर सके पर इतना तो उन्हें भी स्वीकार करना पड़ता है कि जितना जाना जा सकता है, उससे असंख्य गुना रहस्य अभी छिपा पड़ा हैं। उसी रहस्य में एक ईश्वर की सत्ता भी है। नवीनतम वैज्ञानिक उसकी सम्भावना स्वीकार करते है। वह दिन भी दूर नहीं जब उन्हें उस रहस्य के उद्घाटन का अवसर भी मिलेगा। अध्यात्म भी विज्ञान का ही अंग है और उसके आधार पर आत्मा-परमात्मा तथा अन्य अनेकों अज्ञात शक्तियों का ज्ञान प्राप्त कर सकना भी सम्भव होगा।


परिवार में आस्तिकता का वातावरण

ईश्वर उपासना मानव जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। आत्मिक स्तर को सुविकसित, सुरक्षित एवं व्यवस्थित रखने के लिए हमारी मनोभूमि में ईश्वर के लिए समुचित स्थान रहना चाहिए और यह तभी संभव है जब उसका अधिक चिन्तन, मनन, अधिक सामीप्य, सान्निध्य प्राप्त करते रहा जाय। भोजन के बिना शरीर का काम नहीं चल सकता, साँस लिए बिना रक्ताभिषरण की प्रक्रिया बिगड़ जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की उपेक्षा करने के उपरान्त आन्तरिक स्तर भी नीरस, चिन्ताग्रस्त, अनिश्चित, अनैतिक, अव्यवस्थित एवं आशंकित बना रहता है। यह हानि कुछ कम हानि नहीं है। दीखने वाली हानियों को लोग आसानी से समझ लेते हैं, पर इस जीवन के सारे आनन्द और उद्देश्य को ही नष्ट कर देने वाली हानि को हम न तो देख पाते हैं और न समझते ही हैं। यह कैसे दुर्भाग्य की बात है।

मानव जीवन की प्रगति और सुख-शान्ति आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता पर निर्भर रहते हैं। इस उत्कृष्टता की पुष्टि एवं अभिवृद्धि के लिए ही उपासना तंत्र का आविर्भाव हुआ हैं। भौतिक सुख- साधन, बाहुबल और बुद्धिबल के आधार पर कमाये जा सकते हैं पर गुण-कर्म-स्वभाव की उत्कृष्टता पर निर्धारित समस्त विभूतियाँ हमारे आन्तरिक स्तर पर ही निर्भर रहती हैं। इस स्तर के सुदृढ़ और समुन्नत बनाने में उपासना का भारी योग रहता है। इसलिए अत्यन्त आवश्यक कार्यों की भाँति ही उपासना को दैनिक कार्यक्रम में स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीविका उपार्जन, आहार, विश्राम, सफाई, गृहस्थ पालन, विद्याध्ययन, मनोरंजन आदि का ध्यान रखा जाता है, वैसा ही ध्यान उपासना का भी रखा जाना चाहिए।

जन-साधारण को सदाचारी और सुनियंत्रित समाजोपयोगी रखने के विचार से सरकार जन-मानस पर कठोर नियंत्रण कायम करने के लिए विभिन्न प्रयत्न कर रही है। अनेकों कानून, अध्यादेश एवं नियंत्रण स्थापित करके लोगों को उचित दिशा में चलाने के लिए अपने दृष्टिकोण के अनुसार वह बहुत कुछ करने में लगी हुई है, पर सफलता बहुत ही स्वल्प सक्रिय दृष्टिगोचर होती है।

आजकल शासन के हाथ में बहुत बड़ी शक्ति आ गई है। सरकारें व्यक्ति पर भारी नियंत्रण करने लगी हैं। अधिनायकवादी, एकतन्त्री सरकारें मनुष्य की भौतिक और लौकिक समस्त शक्तियों पर काबू पाने और लोगों को अपनी मन मर्जी का बनाने और चलाने का प्रयत्न कर रही हैं। औजार और कारतूस जिस प्रकार फैक्ट्रियों में बनते हैं, उसी प्रकार मनुष्यों के विचार और प्रवृत्तियों को भी अपनी मन-मर्जी का ढाल लेने में ऐसी सरकारें संलग्न रहती है। एक हद तक उन्हें सफलता भी मिलती है पर यह निश्चित है कि यदि उच्च आदर्शवाद के लिए, आध्यात्मिक कोमल भावनाओं के लिए अन्तःकरण में कोई स्थान न रहा, तो मनुष्य से यह आशा नहीं की जा सकती कि महानता के उच्च गुण उसमें कभी विकसित हो सकेंगे। आन्तरिक प्रेरणा से जो प्रेम, त्याग, संयम या श्रेष्ठता उत्पन्न हो सकती है, वह सरकारी प्रचार या दबाव के कारण कदापि संभव न होगी। संसार की शांति और सुव्यवस्था इसी बात पर निर्भर है कि मनुष्य उच्चस्तरीय भावनाओं से ओत-प्रोत रहे। यह भावनाएँ भीतर से निकलती हैं, बाहर से नहीं थोपी जा सकती। अन्तःकरण पर प्रभाव डालने की शक्ति, श्रद्धा और विश्वास में ही सन्निहित रहती है। इसलिए जब तक इन तत्वों को न जगाया जायगा तब तक यह उत्कृष्टता की अन्तः प्रेरणा कहाँ जागृत होगी? और जब तक यह जागरण न होगा तब मनुष्य अधोगामी प्रवृत्तियों से ऊँचा न उठ सकेगा।

मानव जीवन की प्रगति उसके सद्गुणों पर निर्भर है। जिनके गुण कर्म स्वभाव का निर्माण एवं विकास ठीक प्रकार हुआ है वे सुसंयत व्यक्तित्व वाले सज्जन मनुष्य अनेकों बाधाओं और कठिनाइयों को पार करते हुए अपनी प्रगति का रास्ता ढूँढ़ लेते हैं। विपरीत परिस्थितियों एवं बुरे स्वभाव के व्यक्तियों को भी, प्रतिकूलताओं को भी सुसंस्कृत मनुष्य अपने प्रभाव एवं व्यवहार से बदल सकता है और उन्हें अनुकूलता में परिणत कर सकता है। इसके विपरीत जिसके स्वभाव में दोष दुर्गुण भरे पड़े होंगे वह अपने दूषित दृष्टिकोण के कारण अच्छी परिस्थितियों को भी दूषित कर देगा। संयोगवश उन्हें अनुकूलता द्वारा सुविधा प्राप्त भी हो तो दुर्गुणों के आगे वह देर तक ठहर न सकेगी। दूषित दृष्टिकोण जहाँ भी होगा वहाँ नारकीय वातावरण बना रहेगा। अनेकों विपत्तियाँ वहाँ से उलझती रहेंगी।

इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें सद्गुणों की जननी आस्तिकता को धैर्य और विवेकपूर्वक अपनाने का प्रयत्न करना चाहिए। ईश्वर का भय मनुष्य को नेक रास्ते पर चलाते रहने में सबसे बड़ा नियंत्रण है। राजकीय कानून या सामाजिक दंड की दुस्साहसी लोग उपेक्षा करते रहते है। अपराधों और अपराधियों का बाहुल्य, पुलिस और जेल का भय भी इन्हें कम नहीं कर पाता। पर यदि किसी को ईश्वर पर पक्का विश्वास हो, अपने चारों ओर प्रत्येक प्राणी में कण-कण में ईश्वर को समाया हुआ देखे, तो उसके लिए किसी के साथ अनुचित व्यवहार कर सकना संभव नहीं हो सकता। कर्मफल की ईश्वरीय अविचल व्यवस्था पर जिसे आस्था होगी वह अपना भविष्य अन्धकारमय बनाने के लिए कुमार्ग पर बढ़ने का साहस कैसे कर सकेगा? दूसरों को ठगने या परेशान करने का अर्थ है ईश्वर को ठगना या परेशान करना। ऐसी भूल उससे नहीं हो सकती जिसके मन में ईश्वर का विश्वास, भय और कर्मफल की अनिवार्यता का निश्चय गहराई तक जमा हुआ है।

सच्चरित्रता को आस्तिकता का पर्यायवाची शब्द माना जा सकता है। ढोंग जैसी झूठी भक्ति, जिसमें साढ़े तेईस घंटे पाप करते रहने और आधे घंटे पूजा-पत्री करके सारे पापों से छुटकारा मिलने की प्रवंचना सिखाई जाती है, उपहासास्पद हो सकती है। इसी प्रकार देव दर्शन से सकल मनोरथ सहज ही पूरे जो जाने की मान्यता भी धृष्टता कही जा सकती है पर सच्चे अध्यात्म का सच्ची आस्तिकता का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं होता। ईश्वर विश्वास का आस्तिकता का प्रतिफल एक ही होना चाहिए- सन्मार्ग का अवलम्बन और कुमार्ग का त्याग जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में धर्म और कर्तव्य का अनुशासन स्थापित करने के लिए ईश्वर विश्वास से बढ़कर और कोई प्रभावशाली माध्यम हो नहीं सकता।

प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अपने जीवन को सार्थक एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने की आधारशिला-आस्तिकता को जीवन में प्रमुख स्थान देने का प्रयत्न करे। ईश्वर को अपना साथी, सहचर मानकर हर घड़ी निर्भय रहे और सन्मार्ग से ईश्वर की कृपा एवं कुमार्ग से ईश्वर की सजा प्राप्त होने के अविचल सिद्धान्त को हृदयंगम करता हुआ अपने विचारों और आचरणों को सज्जनोचित बनाने का प्रयत्न करता रहे। इसी प्रकार जिसे अपने परिवार में, स्त्री बच्चों से सच्चा प्रेम हो, उसे भी यही प्रयत्न करना चाहिए कि घर के प्रत्येक सदस्य के जीवन में किसी न किसी प्रकार आस्तिकता का प्रवेश हो। परिवार का बच्चा-बच्चा ईश्वर विश्वासी बने।

अपने परिवार के लोगों के शरीर और मन को विकसित करने के लिए जिस प्रकार भोजन और शिक्षण की व्यवस्था की जाती है उसी प्रकार आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ बनाने के लिए घर में बाल-वृद्ध सभी की उपासना में निष्ठा एवं अभिरुचि बनी रहे। इसके लिए समझाने - बुझाने का तरीका सबसे अच्छा है। गृहपति का अनुकरण भी परिवार के लोग करते है इसलिए स्वयं नित्य नियमपूर्वक नियत समय पर उपासना करने के कार्यक्रम को ठीक तरह निबाहते रहा जाय। घर के लोगों से जरा जोर देकर भी उनकी ढील पोल को दूर किया जा सकता है। आमतौर से अच्छी बातें पसन्द नहीं की जातीं और उन्हें उपहास तथा उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता है। यही वातावरण अपने घर में भी धुला हुआ हो सकता है, पर उसे हटाया तो जाना ही चाहिए। देर तक सोना, गंदे रहना, पढ़ने में लापरवाही करना, ज्यादा खर्च करना, बुरे लोगों की संगति आदि बुराइयां घर के किसी सदस्य में हो तो उन्हें छुड़ाने के लिए प्रयत्न करना पड़ता है। क्योंकि यह बातें उनके भविष्य को अन्धकारमय बनाने वाली, अहितकर सिद्ध हो सकती हैं। उसी प्रकार नास्तिकता और उपासना की उपेक्षा जैसे आध्यात्मिक दुर्गुणों को भी हटाने के लिए घर के लोगों को जरा अधिक सावधानी और सफाई से कहा सुना जाय तो भी उसे उचित ही माना जाएगा।

अपने कुटुम्ब की सबसे बड़ी सेवा यह हो सकती है कि प्रत्येक परिजन को आस्तिक एवं उपासक बनाया जाय। उस मार्ग को अपनाकर वे अपना भविष्य उज्ज्वल बना सकते है। आस्तिकता धर्म विश्वासों को जन्म देती है और धर्म विश्वासों पर सुदृढ़ रहने वाला अपने कर्तव्यों पर भी स्थिर रहता है। फलस्वरूप उसका शरीर, मन, परिवार, व्यवहार, लोक-परलोक सभी कुछ आनन्दमय बनता है। जो लड़कियाँ आस्तिकता के विश्वास को छोटेपन से ही मन में जमा लेंगी वे ससुराल जाने पर पतिव्रत धर्म का भी पालन करेंगी और उस घर के प्रत्येक सदस्य के साथ सद्व्यवहार करना अपना धर्म कर्तव्य मानेंगी। ऐसी दशा में वहाँ वे आँखों का तारा ही बन कर रहेंगी। सभी उन्हें दुलार करेंगे और दुख दर्द में पलकों की छाया किये रहेंगे। जो गौरव पिता के प्रचुर दहेज देने से भी लड़कियों को ससुराल में नहीं मिल सकता वह उनके सद्गुणों के द्वारा मिल जाता है। सद्गुण धर्म-विश्वासों के फलस्वरूप ही उत्पन्न होते हैं और धर्म-विश्वासों को आस्तिकता की देन ही कहा जा सकता है। इस प्रकार जिस कन्या को उनके माता-पिता ने आस्तिकता की उपासना की शिक्षा दी है, उनने उसका भविष्य आनन्दमय बनाने के लिए सबसे बड़ी सम्पत्ति वसीयत कर दी है। इसके विपरीत जिन लड़कियों को उच्छृंखलता, नास्तिकता, विलासिता और असहिष्णुता के वातावरण में पलने दिया है, वे जहाँ कहीं भी रहेंगी नरक उत्पन्न करेंगी उसमें स्वयं भी जलेंगी और सारे परिवार को भी जलाती रहेंगी। ऐसी आदतों की अभ्यस्त लड़कियों का अहित उन अभिभावकों ने ही किया होता है जिनने बचपन से उन्हें धार्मिक मान्यताओं से पूजा उपासना से वंचित रखा है। संभव है ऐसा उन्होंने प्यारवश किया हो पर वस्तुतः वह परिणाम में शत्रुता के समान ही अहितकर सिद्ध होता है।

यही बात लड़कों के बारे में लागू होती है। यदि वे धर्म विश्वास तथा संस्कारों का प्रभाव बचपन से ही मन पर धारण कर सके, तो माता-पिता, बहिन-भाई, स्त्री-पुत्र, स्वजन सम्बन्धी सभी के प्रति अपना कर्तव्य पालन करेंगे। ऐसी दशा में स्वभावतः उनका परिवार स्वर्ग बना रहेगा, स्वभाव और स्वास्थ्य अच्छा रहेगा, यश एवं सम्मान की कमी न रहेगी। सज्जनता जहाँ रहती है वहाँ दीनता और दरिद्रता के रहने की भी कोई आशंका नहीं रहती। आस्तिकता के संस्कारों के साथ उनके अभिभावक वस्तुतः उनके भविष्य की आशाजनक प्रगति का बीमा भी कर देते हैं। ऐसे विचारशील अभिभावकों ने जिनके अपने बच्चों को आस्तिक एवं सुसंस्कारी बनाया है सचमुच ही अपना कर्तव्य आदर्श रूप से निबाहा है। उनकी जितनी सराहना की जाय, उतनी ही कम है।

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=कहानी===================================================================

यदि किसी को अधिक भौतिक अधिकार प्राप्त हुए हैं तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं होता कि दूसरों का उत्पीड़न किया जाए। आपका स्वास्थ्य उत्तम है तो दुर्बलों को सताइये नहीं। अपनी योग्यताओं का लाभ प्राप्त करिये पर दूसरों के अधिकार तो न छीनिए। संसार में सभी प्राणी स्वतन्त्र और स्वाभाविक जीवन व्यतीत करने के लिए आये हैं, अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के कष्ट पहुँचाना अन्याय है। सभी आपकी तरह सुख और सुविधायें प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आपकी तरह वे भी अपने प्रयत्नों में लगे हैं, यदि किसी तरह उनकी सहायता नहीं कर सकते तो इतना कीजिये कि आपकी तरफ से उनके प्रयत्नों में किसी तरह की रुकावट न पैदा की जाय।

धरती माता के सारे अनुदान मिल बाँट कर उपयोग करने के लिए हैं। अधिक पुरुषार्थ करके आप अधिक सुख प्राप्त कर रहे हैं इसके लिए आप बधाई के पात्र है। किन्तु अपने स्वार्थ के लिए दूसरों के सुख छीन कर उनकी बेचैनी बढ़ाने का आपको कोई अधिकार नहीं।

-लोकमान्य तिलक

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महानता की प्राप्ति और उसके साधन

महानता की प्राप्ति के लिए हमें महान् आदर्शों एवं महान् सम्बलों का सहारा लेना पड़ता है। सद्गुणों के रूप में महानता का आह्वान करके उसे यदि अपने अन्तःकरण में धारण करें और उन्हीं प्रेरणाओं के अनुरूप अपना जीवन क्रम चलावें तो विकट परिस्थितियों में रहते हुए भी महानता प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकता है।

ईश्वर महान् है, इसलिए उसकी उपासना भी हमारी महानता को बढ़ाने में सहायक होती है। आवश्यक है कि जिसे महान बनने की आकाँक्षा हो, वह ईश्वर का प्रकाश एवं अनुग्रह प्राप्त करने का प्रयत्न करे।

ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्कृष्ट भावनाओं की आवश्यकता पड़ती है। भावनाओं में प्रेम का स्थान सर्वोपरि है। प्रेम को ही भक्ति कहते हैं। भक्ति से भगवान प्राप्त किया जाता है ऐसा शास्त्रकारों का मत है। भक्ति भावना बढ़ाने का अभ्यास किसी न किसी माध्यम से किया जाता है। माता, पिता, पत्नी, पुत्र या मित्र को माध्यम बनाने में एक कठिनाई यह होती है कि इनके साथ अपना व्यावहारिक सम्बन्ध होने से कभी-कभी प्रतिकूल भावनायें भी उठ पड़ती हैं। इनमें ज्ञान, विद्या, सदाचार, दिव्य दृष्टि सात्विकता तथा निःस्वार्थता की भावनायें भी अल्प मात्रा में होने से वैसे आदर्श अपने जीवन में भी उपस्थित नहीं हो पाते अतएव गुरु-भक्ति या ईश्वर भक्ति के माध्यम से अपनी महानता के विकास का प्रारम्भ करते हैं। इस भक्ति रूपिणी साधना से आध्यात्मिक भावनाओं का तेजी से विकास होने लगता है इसलिए हमारे धर्म और संस्कृति में उपासना को सर्वप्रथम और अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है।

उन्नति और उत्थान के लिये दूसरे साधनों में “स्वाध्याय और सत्संग” को अधिक फलदायक और सुविधाजनक मानते हैं। स्वाध्याय भी एक प्रकार से विचारों का सत्संग है, किन्तु महापुरुषों की समीपता का मनुष्य के अन्तःकरण पर तीव्र प्रभाव पड़ता है। सन्तजनों की समीपता शीघ्र फलदायक होती है क्योंकि यह लाभ उनकी वाणी, विचार और व्यवहार से निरन्तर मिलता रहता है अतएव प्रगति भी उतनी ही द्रुतगामिनी होती है। आत्म-संस्कार के लिए सत्संग से बढ़कर कोई दूसरा साधन नहीं। बड़े-बड़े दुष्ट दुराचारी व्यक्ति तक सत्संग के प्रभाव के सुधरकर महान आत्मा बने हैं।

आत्म-निर्माण के कार्य में सत्संग निःसन्देह सहायक होता है किन्तु आज की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में जो विडंबना फैली है, उससे लाभ के स्थान पर हानि अधिक है। सड़े-गले, औंधे-सीधे, रूढ़िवादी, भाग्यवादी, पलायनवादी विचार इन सत्संगों में मिलते हैं। फालतू लोग अपना समुदाय बढ़ाने के लिए सस्ते नुस्खे बताते रहते हैं या किसी देवी देवता के कौतूहल भरे चरित्र सुनाकर उनके सुनने मात्र से स्वर्ग, मुक्ति आदि मिलने की आशा बँधाते रहते हैं। ऐसा विडम्बनापूर्ण सत्संग किसी का क्या हित साधेगा?

आज सत्संग की आवश्यकता स्वाध्याय से ही पूरी करनी पड़ती है। जहाँ जीवन को प्रेरणाप्रद मार्गदर्शन कर सकने की दृष्टि से उपयुक्त सत्संग मिल सके, वहाँ जाने और लाभ उठाने का प्रयत्न अवश्य करना चाहिए। पर जहाँ व्यर्थ की विडम्बनाओं में समय बर्बाद किया जाता हो, वहाँ जाने में कुछ लाभ नहीं। आज की स्थिति में सरल सत्संग स्वाध्याय ही हो सकता है। आत्मबल बढ़ाने वाला, चरित्र को उज्ज्वल करने वाला, गुणकर्म, स्वभाव में प्रौढ़ता उत्पन्न करने वाला साहित्य उपलब्ध करके नियमित रूप से उसे पढ़ते रहने से भी घर बैठे सत्पुरुषों के साथ सत्संग का लाभ लेने की सुविधा मिल सकती है।

स्वाध्याय केवल पुस्तकें पढ़ने को ही नहीं कहते। उसका वास्तविक उद्देश्य आत्म-निरीक्षण के लिए प्रेरणा प्राप्त करना है। शास्त्र कहता है।

प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत जनश्चरितमात्मनः। किन्नु में पशुभिस्तुल्यं किन्नु सत्पुरुषैरिव॥

प्रत्येक मनुष्य को हर घड़ी अपने स्वयं के चरित्र का निरीक्षण करते रहना चाहिए कि उसका चरित्र पशु तुल्य है या सत्पुरुषों जैसा। आत्म-निरीक्षण की प्रणाली का नाम ही स्वाध्याय है। पूर्ण मानव बनने के सद् उद्देश्य से जिनने भी स्वाध्याय का अनुसरण किया है उनकी आत्मा अवश्यमेव परिष्कृत हुई है, उनकी महानता जागृत हुये बिना नहीं रही।

महानता के विकास की सबसे बड़ी बाधा असंयम है। दुःख और सन्ताप दीनता और आत्म-हीनता की अधोगामी परिस्थितियाँ मानव-जीवन में शारीरिक व मानसिक असंयम के कारण आती हैं। आत्म-संयमी न होने से मनुष्य का व्यक्तित्व गिर जाता है।

संयम साक्षात् स्वर्ग का द्वार है। यह मनुष्य जीवन में शान्तिदायक परिणाम प्रस्तुत करता है। मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन संयम से प्रकाशित होता है। इसी से दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है। आध्यात्मिक स्वतन्त्रता तथा वैभव की प्राप्ति के लिये संयमित दिनचर्या की प्रबल आवश्यकता होती है। इसके बिना आत्म-ज्ञान का अत्यन्त आवश्यक क्षेत्र अधूरा ही रहा जाता है। मानव जीवन की सार्थकता इस बात पर है कि इस शरीर की महत्वपूर्ण शक्तियों का लाभ उठाकर अपना पारलौकिक लक्ष्य पूरा कर लें। यह प्रक्रिया आत्मसंयम से पूरी होती है।

केवल मात्र साँसारिक सुखों की पूर्ति में अपनी शक्तियों का अपव्यय करना बुद्धिमानी की बात नहीं मानी जा सकती। दूसरे प्राणियों की अपेक्षा हमें जो अधिक विचारबल मिला है, इससे यह प्रतीत होता है कि मानव जीवन किसी महान उद्देश्य से प्रेरित है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये जिस शक्ति की आवश्यकता होती है, उसे सद्विचार और सत्कर्मों से प्राप्त करते है। यह पवित्रता आत्मसंयम से ही स्थिर रहती है।

अपने जीवन को शुद्ध और समृद्ध बनाने की साधना जिन्होंने की हैं वे अपने अनुभव से कहते आये है :-

असंयतात्मना योगोदुष्प्राप्य इतिमेमतिः। वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुमायतः॥

संयमित जीवन चर्या के अभाव में योग दुष्प्राप्य है, स्वाधीन मन वाले प्रयत्नशील पुरुषों को ही इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। सुख और विषय वासना के प्रलोभन में फँस कर ही प्रायः पथ भ्रष्ट होते है।

संयम से जो शक्ति पैदा होती है वह चरित्र का आधार है। वैराग्य, त्याग, विरक्ति आदि तत्वों का सीधा सम्बन्ध मनोभावों से है। विचार अस्त-व्यस्त और विश्रृंखलित हों तो कर्म भी असंयत ही होंगे। अगर हमारा मन सुमार्गगामी रहकर इन्द्रियों को संयम में रखें तो समस्त साँसारिक कार्यों को करते हुए भी हम सद्गति के अधिकारी बन सकते है।

महानता के विकास में अहंकार सबसे बड़ा घातक शत्रु है। स्वार्थवादी दृष्टिकोण के कारण घमण्डी व्यक्ति दूसरों को उत्पीड़ित किया करते है। शोषण, अपहरण के बल पर दूसरों के अधिकार छीन लेने की दुष्प्रवृत्ति लोगों को नीचे गिरा देती है। जब तक ऐसी भ्रान्त धारणायें बनी रहती हैं तब तक लोग बाह्य सफलतायें भले ही इकट्ठा कर लें, वस्तुतः वे गरीब ही माने जायेंगे। साँसारिक दृष्टि से बड़ा आदमी बन जाने से किसी की महानता परिलक्षित नहीं होती। ऐसा होता तो शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ, धनकुबेरों, और दस्यु सामन्तों की ही सर्वत्र पूजा की जाती, उन्हें ही मानवता का श्रेय मिलता। किन्तु यथार्थ बात यह नहीं है। महान व्यक्ति कहलाने का सौभाग्य व्यक्ति को उदारतापूर्वक दूसरों की सेवा करने से मिलता है। इस संसार में हजारों लाखों व्यक्ति ऐसे है जो अपनी स्थिति से भी गई-गुजरी हालत में जीवनयापन करते हैं। उनके उत्थान के लिये कुछ कर गुजरने वाले व्यक्ति ही महान कहलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।

मनुष्य की महानता का सम्बन्ध बाह्य जीवन की सफलताओं से नहीं है। आन्तरिक दृष्टि से निर्मल, पवित्र और उदारमना व्यक्ति चाहे वह साधारण परिस्थितियों में ही क्यों न हो, महान आत्मा ही माना जायेगा। यह महानता साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के साधन चतुष्टय से परिपूर्ण होती है। हम आदर्शों की उपासना करें, विचारों में निर्मलता और जीवन में आत्मसंयम का अभ्यास करें, दूसरों की सेवा को ही परमात्मा की सच्ची सेवा मानें तो ही महानता का गौरव प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते है। अतः हमें साधना, स्वाध्याय, संयम एवं सेवा कार्यों में कभी भी आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये।


धर्म-रक्षा से आत्म-रक्षा

धर्म शब्द ‘ध’ धातु से बना है जिसका अर्थ है- बनाये रखना, धारण करना, पुष्ट करना। धर्म एक ऐसा मानदण्ड है जो किसी भी वस्तु के उक्त मूलतत्व का बोध कराता है जिसके कारण वह वस्तु है। महर्षि कणाद ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है-”यतोभ्युदय -निश्रेयस सिद्धिः स धर्मः।” जिससे अभ्युदय अर्थात् लौकिक जीवन की समृद्धि, विकास और आत्म कल्याण की प्राप्ति हो वही धर्म है।’ छान्दोग्य उपनिषद् में धर्म की तीन शाखाओं का उल्लेख किया गया है। ‘त्रयोधर्मस्कन्धा’ जिसमें गृहस्थ, तपस्वी, ब्रह्मचारी के कर्तव्यों की विवेचना की गई है। भगवद्गीता तथा मनुस्मृति आदि में धर्म का अभिप्राय जीवन की विभिन्न स्थितियों में अपने-अपने कर्तव्य पालन से है। महाभारतकार ने कहा है-

धारणार्द्धम मित्याहुर्धर्मों धारयते प्रजा। यत्स्याद्धारण संयुक्तं स धर्मं इति निश्चयः॥

‘धारण करने वाला होने से उसे धर्म कहा गया। क्योंकि यह प्रजा को धारण करता है। अर्थात् उसे पुष्ट करता है, समर्थ बनाता है। जो धारण करने में समर्थ है वही धर्म है।’

संक्षेप में धर्म वह कर्तव्य विधान है जिसके द्वारा जीवन का आन्तरिक एवं बाह्य सभी प्रकार का विश्वास सध सके। शास्त्रीय भाषा में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि प्रयोजनों की प्राप्ति जिस मार्ग पर चलने से हो सके वही धर्म है। धर्म जीवन की साधना का व्यवस्थित विधान है। सभी भाँति उन्नत, विकसित कल्याणकारी, आनन्दयुक्त जीवन जीने का कर्मशास्त्र है- धर्म। इसीलिए डॉ. राधाकृष्णन के शब्दों में “धर्म की शक्ति ही जीवन की शक्ति है। धर्म की दृष्टि ही जीवन की दृष्टि है।” जीवन और धर्म की अनन्यता आवश्यक है, अनिवार्य है। इसीलिए बापू ने कहा था- “धर्म जिन्दगी की हर साँस के साथ अमल में लाने की चीज है।” क्योंकि धर्म के रूप में ही उन सिद्धान्तों का निर्माण हुआ है जिनका हमारे दैनिक जीवन में तथा समाज के सम्बन्धों में पालन करना आवश्यक है। स्वामी रामतीर्थ ने धर्म को मनुष्य के चरित्र में अटल बल प्रदान करने वाला बताया है।

निःसन्देह धर्म व्यवस्था मानव जीवन को सभी भाँति समुन्नत, प्रकाशमान बनाने की पद्धति है। डॉ. राधाकृष्णन ने कहा है-”धर्म उस आध्यात्मिक अग्नि की ज्वाला को प्रज्ज्वलित करने में सहायता करता है जो प्रत्येक व्यक्ति के अन्दर जलती है ।” इसलिए धर्म ही संसार में सबसे श्रेष्ठ है।

“धर्मो हि परमो लोकेधर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्”

धर्म ही संसार में सर्वश्रेष्ठ है। धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है।

इस तरह धर्म ही मनुष्य को मनुष्यता प्रदान करने वाला है। शास्त्रकार ने लिखा है-

आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्य मेतन् पशुभिर्नराणाम।

धर्मोहि तेषामधिको विशेषः धर्मेण हीनाः

पशुभिसमानाः॥

खाने, सोने, डरने, मैथुन के बारे में पशु और मनुष्य परस्पर समान हैं। केवल धर्म ही मनुष्यों में विशेष है। यदि वह भी न रहे तो फिर मनुष्य पशु के समान ही है। धर्म ही मानव-जीवन को संस्कारित कर उसे उत्कृष्ट बनाता है।

हमारे यहाँ धर्म की धारणा में वे सब अनुष्ठान गतिविधियाँ आती हैं जो मनुष्य के जीवन को गढ़ती हैं, उसे बनाती हैं। समाज में प्रत्येक व्यक्ति की इच्छाएँ, आकाँक्षायें भिन्न-भिन्न होती है। परस्पर विरोधी आवश्यकताएँ भी होती हैं लेकिन धर्म इन सबको नियन्त्रित कर उन्हें जीवन की सही दिशाओं में प्रेरित करता है। धर्म का नियम जीवन में आध्यात्मिक सत्य की प्रतिष्ठापना करता है। लेकिन संसार से विरक्त करके नहीं, अपितु जीवन के सम्पूर्ण व्यवसाय, कार्यक्रम को आध्यात्मिक विश्वासों के द्वारा नियन्त्रित करके आनन्द, व्यवसाय, काम आदि सभी की प्राप्ति इसी विश्वास के द्वारा कराता है, इन्हें उपेक्षित नहीं बनाता। धर्म जीवन की शाश्वतता को आधार मानकर चलता है। जीवन में इहलौकिक (साँसारिक) अथवा पारलौकिक भेद कोई भेद नहीं है। धर्म, भक्ति और मुक्ति को अलग-अलग नहीं मानता, धर्म दैनिक जीवन के सामान्य व्यवसाय को भी सच्चे अर्थों में भगवान् की सेवा बना देता है। वह काम, अर्थ, मोक्ष का संगम भी है। धर्म सामान्य कृत्यों को भी अपनी विशेषता से मुनियों की साधना की तरह ही प्रभावशाली बना देता है।

धर्म तपस्या को ही सर्वोपरि नहीं मानता न शारीरिक सुखों के निष्प्रयोजन परित्याग को महत्व देता है, वह जीवन को आनन्दमय देखना चाहता है। आनन्द इन्द्रियग्राह्य भी हो सकता है और आत्मिक भी। इस तरह का कोई भी आनन्द धर्म की मर्यादा में निन्दनीय नहीं है। इसी तरह धन-सम्पत्ति आदि भी अपने आप में कोई पाप नहीं है। धर्म इसके लिए रोक नहीं लगाता। लेकिन धन संग्रह करने के उपायों से किसी दूसरे का अहित होता हो तो वह धर्म की दृष्टि में निन्दनीय है। धर्म इस तरह के प्रयत्नों को बुरा बताकर उन पर रोक लगाता है और सही मार्ग बताता है। इसी तरह उत्तम संतान लाभ के लिए विवाह करना धर्म द्वारा अच्छा माना गया है। किसी भी रूप में धर्मपरायणता, सुखभोग, सम्पत्ति, विवाह आदि जीवन की पूर्णता के अवरोधक नहीं हैं, जब वे आत्म-कल्याण और समाज हित के लिए किए जाते हो। लेकिन जब इनका प्रयोजन जीवन की समृद्धि, विकास से दूर हटकर अपने आप में केन्द्रित हो जाता है तभी ये अच्छे नहीं माने जाते। धर्म आचार शास्त्र ऐसी अनुमति नहीं देता।

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, धर्म सम्पूर्ण जीवन का, हमारे समस्त क्रिया-कलापों का नियन्त्रण करता है आध्यात्मिक मान्यता और विश्वासों के द्वारा। वह आध्यात्मिक मान्यता है-मनुष्य का आत्मिक गौरव। प्रत्येक प्राणी परमात्मा का चैतन्य अंश है। इसीलिए धर्म कहता है- “सब प्राणियों के हृदय में परमात्मा अंश रूप से विराजमान है।” धर्म शास्त्र के प्रणेता ऋषि ने कहा है-

भगवान् वासुदेवो हि सर्व भूतेष्ववस्थितः। एतज्ज्ञानं हि सर्वस्य मूलं धर्मस्य शाश्वतम्॥

“शाश्वत धर्म का यही मूल है कि भगवान् वासुदेव ही सर्व भूतों में निवास करते हैं।”

श्रूयताँ धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँन समाचरेत्॥

“समझ लो धर्म का सार यही है और फिर इसी के अनुसार आचरण करो। दूसरों के प्रति वैसा व्यवहार मत करो जैसा तुम अपने लिए नहीं चाहते।”

महाभारतकार ने कहा है :-

सर्वेषाँ यः सुहृन्नित्यं सर्वेषाँच हिते रतः। कर्मणा मनसा वाचा स धर्म वेद जाजले॥

-शाँति पर्व 261-9

“हमें दूसरों को अपने जैसा ही समझना चाहिए जो अपने मन वचन कर्म से निरन्तर दूसरों के कल्याण में लगे रहते है, जो सदा दूसरों का मित्र रहता है। हे जाजलि, वह धर्म को ठीक-ठीक समझता है।”

दूसरे शब्दों में धर्म व्यक्तिगत जीवन के उत्कर्ष के साथ-साथ सामाजिक जीवन की विधिव्यवस्था का भी इस प्रकार निर्माण करता है कि सभी को जीने, विकसित होने का समानाधिकार मिले। धर्म एक आचार शास्त्र और पथ-प्रदर्शक है जिसके द्वारा वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में मुख-शाँति आनन्द प्रगति की साधना निर्वाध रूप से की जा सके बिना किसी को हानि पहुँचाये।

धर्म और मानव-जीवन का अनन्य सम्बन्ध है। क्योंकि धर्म ही उन क्रिया, अनुष्ठान, आचार पद्धति का भण्डार है जिनके द्वारा मनुष्य को मनुष्य बनाया जा सकता है। इस लिए किसी भी कारण धर्म को नहीं छोड़ना चाहिए। धर्म के लिए मर जाना अच्छा है। गीता कहती है “स्वधर्मे निधनं श्रेय।” महर्षि व्यास कहते हैं-

धर्म एवं हतो हन्ति, धर्मों रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मोन हन्तव्यो मा नो धर्मों हतो वधीन॥

मारा हुआ धर्म ही हमेशा मारता है, हम से रक्षा किया हुआ धर्म ही हमारी रक्षा करता है, इसीलिए धर्म का हनन नहीं करना चाहिए जिससे तिरस्कृत धर्म हमारा विनाश न करे।”

सचमुच अपने धर्म की उपेक्षा करने पर मनुष्य नष्ट हो जाता है। महात्मा गाँधी ने कहा है- जहाँ धर्म नहीं वहाँ विद्या, लक्ष्मी, स्वास्थ्य आदि का अभाव होता है। धर्म रहित स्थिति में बिल्कुल शून्यता होती है।”


शुभ-संस्कार संचित कीजिये

जैसा मनुष्य का स्वभाव होता है उसी के अनुरूप उसकी मनोदशा बनती रहती है और जब वही आदत अपने जीवन का अंग बन जाती है तो उसे संस्कार मान लेते हैं। शराब पीना प्रारम्भ में एक छोटी सी आदत दीखती है किन्तु जब वही आदत गहराई तक जक जाती है, तो शराब के सम्बन्ध में अनेकों प्रकार की विचार रेखायें मस्तिष्क में बनती चली जाती हैं जो एक स्थिति समाप्त हो जाने पर भी प्रेरणा के रूप में मस्तिष्क में उठा करती हैं। जैसे कोई कामुक प्रवृत्ति का मनुष्य स्वास्थ्य सुधार या किसी अन्य कारण से प्रभावित होकर ब्रह्मचर्य रहना चाहता है। इसके लिये वह तरह-तरह की योजनायें और कार्यक्रम भी बनाता है तो भी उसके पूर्व जीवन के कामुक विचार उठने से रुकते नहीं और वह न चाहते हुये भी उस प्रकार के विचारों और प्रभाव से टकराता रहता है।

यह संस्कार जैसे भी बन जाते है वैसा ही मनुष्य का व्यवहार होगा। यहाँ यह न समझना चाहिये कि यदि पुराने संस्कार बुरे पड़ गये हैं, विचारों में केवल हीनता भरी है, तो मनुष्य सद्व्यवहार नहीं कर सकता। यदि पूर्व जीवन के कुसंस्कार जीवन सुधार में किसी प्रकार का रोड़ा अटकाते है तो भी हार नहीं माननी है। चूँकि अब तक अच्छे कर्म नहीं किये थे इसलिये यह पुराने कुविचार परेशान करते हैं किन्तु यदि अब विचार और व्यवहार में अच्छाइयों का समावेश करते हैं तो यही एक दिन हमारे लिए शुभ संस्कार बन जायगा। तब यदि कुकर्मों की ओर बढ़ना चाहेंगे तो एक जबर्दस्त प्रेरणा अन्तःकरण में उठेगी और हमें बुरे रास्ते में भटकने से बचा लेगी।

महर्षि वाल्मीकि, सन्त तुलसीदास, भिक्षु अंगुलिमाल, गणिका, अजामिल आदि अनेकों कुसंस्कारों में ग्रसित व्यक्ति भी जब सन्मार्ग पर चलने लगे तो उनका जीवन पुण्यमय, प्रकाशमय बन गया। मनुष्य संस्कारों का गुलाम हो जाय, अपने स्वभाव में परिवर्तन न कर सके, यह असम्भव नहीं है। मनुष्य के विचार गीली मिट्टी और संस्कार उस मिट्टी से बने बर्तन के समान होते है। पिछले कुसंस्कारों का बड़ा तोड़कर नये विचारों की मिट्टी से नव-जीवन घट का निर्माण कर सकते हैं। इसमें राई-रत्ती भर भी सन्देह न करना चाहिये।

मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि आत्म विश्लेषण और आत्मनिरीक्षण द्वारा इन दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। आत्म विश्लेषण का अर्थ है प्रवृत्तियों के मूल कारण की तलाश करना। अर्थात् द्वेषपूर्ण भावनायें जिस आधार पर उठीं, उस आधार को ढूँढ़ना और उसे नष्ट करना। आत्म निरीक्षण का अर्थ है अपने विचारों और कार्यों की न्यायपूर्ण समीक्षा करना। बुराइयाँ पक्षपातपूर्ण विचार पद्धति के कारण ही उठती हैं। मनुष्य की यह सबसे बड़ी भूल है कि वह जिस वस्तु को चाहता है उसे किसी न किसी भूमिका के साथ टिका देता है। इसी को विचार और कार्यों का पक्षपात कहते हैं। जैसे बीड़ी, सिगरेट, या अन्य कोई मादक पदार्थ सेवन करने वालों की हमेशा यह दलील रहती है कि उससे उन्हें शान्ति मिलती है या मानसिक तनाव दूर होता है। कई तो यहाँ तक कहते हैं बीड़ी सिगरेट न पियें तो पाचन क्रिया ठीक प्रकार काम नहीं करती। पर यदि कठोरतापूर्वक विचार करें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि शराब, सिगरेट के पक्ष में जो दलीलें देते रहते हैं वे सर्वथा निस्सार हैं। यह तो मन बहलाव के लिए गढ़ी बातें हैं। वस्तुतः उनसे मानसिक परेशानियाँ तथा स्वास्थ्य और पाचन प्रणाली में शिथिलता ही आती है।

अपने गुण और दोष देखने में जब तक ईमानदारी और सच्चा दृष्टिकोण नहीं अपनाते संस्कार परिवर्तन में तभी तक परेशानी रहती है। मनुष्य आत्म दुर्बल तभी तक रहता है जब तक वह आत्म विवेचन का सच्चा स्वरूप ग्रहण नहीं करता। झूठे प्रदर्शनों और स्वार्थपूर्ण आचरण के कारण ही जीवन में परेशानियाँ आती हैं। सच्चाई की मस्ती ही अनुपम है। उसकी एक बार जो क्षणिक अनुभूति कर लेता है वह उसे जीवनपर्यन्त छोड़ता नहीं। सत्य मनुष्य को ऊँचा उठाता है, साधारण स्थिति से उठाकर परमात्मा के समीप पहुँचा देता है। सत् संस्कारों का बल, कुसंस्कारों की अपेक्षा अनन्त गुना अधिक होता है किन्तु कुसंस्कारों में जो क्षणिक सुख और तृप्ति दिखाई देती है उसी के कारण लोग दुष्कर्मों की ओर बड़ी जल्दी खिंच जाते हैं। अतएव जब कभी ऐसे अनिष्टकारी विचार मस्तिष्क में उठें तब उनसे भागने या शीघ्र निर्णय का प्रयत्न करना चाहिए। किसी बुराई से डरने या भागने से वह जीवन का अंग बन जाती हैं किन्तु जब विचारों में मौलिक परिवर्तन करते हैं और बुराई की गहराई तक छान-बीन करते हैं तो अन्तःकरण की दिव्य ज्योति के समक्ष सच और झूठ की स्वतः अभिव्यक्ति हो जाती है। लोग बुराइयों से सावधान हो जाते हैं। आत्मनिरीक्षण के साथ विचार पद्धति शुभ संस्कार बढ़ाने का दूसरा उपाय है। इसके लिये यह आवश्यक है कि जो भी व्यवसाय करें पहले उस पर अथ से इति तक विचार कर लें और यदि वह वस्तु उपयोगी दिखाई दे तो उसे प्रयत्नपूर्वक अपने जीवन में धारण करें, अन्यथा उसे त्याग दें।

आत्म निरीक्षण और विचार पद्धति का कार्य उसी प्रकार चलाना चाहिए जिस प्रकार साहूकार अपनी आय और व्यय का ठीक-ठीक खाता रखते हैं। हमारी दुर्बलताओं और कुचेष्टाओं का खर्च-खाता भी हो और विवेक सत्याचरण तथा आत्म परिष्कार का जमा-खाता भी होना चाहिये। बचत का ठीक-ठीक अनुमान तभी लग सकता है। यदि अपनी जमा अधिक है तो आप सुसंस्कार बढ़ा रहे है। खर्च की अधिकता आप के संस्कारों का दीवालियापन प्रकट करती है। संस्कारों रुची धन एकत्रित करने के लिये सदाचरण की पूँजी बढ़ाना नितान्त आवश्यक है।

जब तक गम्भीरता से आत्म विवेचन का कार्यक्रम नहीं बनाते तब तक गुण, कर्म और स्वभाव में परिवर्तन लाना आसान नहीं रहता। उदाहरण के लिये इस प्रकार विचार कीजिये- “मान लीजिये आप तम्बाकू पीते हैं। दिन भर में चार आने की तम्बाकू पी लेते हैं। एक माह में साढ़े सात रुपये के हिसाब से प्रति वर्ष आप 90 रुपये की तम्बाकू पी जाते है और लाभ क्या होता है? आपके शरीर में निकोटीन विष भरता चला जाता है जो कभी-कभी कैन्सर का कारण बन सकता है। सरदर्द, अपच, आँखों की शक्ति का कमजोर होना, वीर्य रोग, दन्त रोग, आदि कितनी व्याधियाँ उत्पन्न होती रहती हैं। इससे अपना और अपने बाल-बच्चों और समाज का कितना बड़ा अहित होता है”। आप जब इस प्रकार गहराई से विचार करने का अभ्यास प्रारम्भ करेंगे तो विश्वास कीजिये आपके जीवन में कितनी ही बुराइयाँ, क्यों न जड़ जमा चुकी हों, उन्हें आज नहीं तो कल अपना बोरिया बिस्तर बाँधना ही पड़ेगा।

=कोटेशन===========================

न पिशाचा न रक्षाँसि न दैत्या न च शत्रवः। न च व्याघ्र भुजंगा वा द्विषन्ति शम शालिनम्॥

-योग वाशिष्ठ

जिसने अपने मन का शमन कर लिया उससे पिशाच, राक्षस, दैत्य, शत्रु, व्याघ्र, भुजंग आदि कोई भी बैर नहीं करते।

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तात्पर्य यह है कि आप जिस कार्य के लिये भी पूर्ण रुचि लगन और तत्परता के साथ काम करेंगे उसमें सफलता अवश्य मिलेगी। बुराइयों से बचाव और अच्छाइयों को धारण करने के लिये अपनी संपूर्ण चेष्टाओं को एकत्रित करके ही कुछ कार्यक्रम चलाये जा सकते है उन्हीं से स्थायी लाभ मिलता है।

अपने जीवन में अशुभ संस्कारों के निवारण के लिए स्मृतियों, अनुभवों और आदतों का विश्लेषण करना चाहिए ताकि वस्तुस्थिति का सच्चा ज्ञान मिले। मनुष्य प्रायः अज्ञान में ही बुराइयाँ करता है। इसलिए वह दुख भी पाता है। बुरे संस्कारों का परिणाम भी सदैव दुःखदाई ही होता है। इसलिए बुराई त्याग करने के लिए साहस और धैर्य का आत्म विवेचन करते रहना चाहिए।

शुभ संस्कारों के परिणाम सदैव सुखकर ही होते हैं। इन्हीं से मनुष्य का सच्चा आध्यात्मिक विकास होता है। व्यक्तिगत सुख और सामाजिक सुव्यवस्था का आधार भी यही है। अतएव अपने जीवन में शुभ संस्कारों का संचय और अशुभ-संस्कारों के निष्कासन का अभ्यास करते रहना चाहिए।


संस्कृति का स्वरूप और लक्ष्य

संसार के सभी विद्वानों ने ‘संस्कृति’ शब्द की विभिन्न परिभाषायें, व्याख्यायें की हैं। कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं मिल पाती फिर भी इतना तो स्पष्ट ही है कि “संस्कृति” उन भूषण रूपी सम्यक् चेष्टाओं का नाम है जिनके द्वारा मानव समूह अपने आन्तरिक और बाह्य जीवन को, अपनी शारीरिक मानसिक शक्तियों को संस्कारवान, विकसित और दृढ़ बनाता है। वस्तुतः संस्कृति इतनी व्यापक और बृहद् चेष्टाओं का भण्डार है जो सनातन काल से क्रमिक रूप में निखरती आई है और जिन्होंने मानव के सर्वांगीण विकास में पूरा-पूरा योगदान भी दिया है। संस्कृति मानव समूह के उन आचार-विचारों की प्रणाली का प्रतिनिधित्व करती है जो मनुष्य को सुसंस्कृत बनाकर उसे सभी प्रकार योग्य समर्थ बनाती है।

संस्कृति की परिभाषा बतलाते हुए श्री टायलर ने कहा है- “समाज के सदस्य के नाते मनुष्य जो ज्ञान, विश्वास, कला, नीति, कानून, रीति रिवाज या अन्य कोई योग्यता प्राप्त करता है, उन सबके जटिलता पूर्ण संग्रह को संस्कृति कहते हैं।”

मैथ्यू अर्नाल्ड ने लिखा है-”विश्व के सर्वोत्कृष्ट कथनों और विचारों का ज्ञान भण्डार ही संस्कृति है।”

श्री नेहरू ने लिखा है - “संस्कृति, शारीरिक मानसिक शक्तियों के प्रशिक्षण, दृढ़ीकरण या विकास परम्परा और उससे उत्पन्न अवस्था है।”

श्री राजगोपालाचार्य ने संस्कृति की परिभाषा करते हुए लिखा है-”किसी भी जाति अथवा राष्ट्र के शिष्ट पुरुषों में विचार, वाणी एवं क्रिया का जो रूप व्याप्त रहता है, उसी का नाम संस्कृति है।”

एक अन्य विद्वान ने कहा है- “संस्कृति का उद्गम संस्कार शब्द है। संस्कार का अर्थ है वह क्रिया जिससे वस्तु के मल (दोष) दूर होकर वह शुद्ध बन जाय। मानव के मल-दोषों को दूर कर उसे निर्मल बनाने वाली प्रक्रियाओं का संग्रहीत कोष ही संस्कृति है।”

एक वाक्य में सभ्यता, सज्जनता, शिष्टता, जो हमें दूसरों के साथ रहने की विशेषता, दूसरों के साथ जीने में आनन्द की कला सिखावे वही संस्कृति है।

इसी तरह की बहुत-सी परिभाषायें मिलती हैं, बहुत से अर्थ मिलते हैं। वस्तुतः संस्कृति इतना व्यापक अर्थ वाला शब्द है जिससे एक बहुत बड़े मानव समुदाय के उन समतोलों का बोध होता है, एक लम्बे अनुभव से सिद्ध उन सम्यक् चेष्टाओं का ज्ञान मिलता है जो उसके आचार, विचार, व्यवहार को उत्कृष्ट बनाते हैं, उसकी संस्थाओं को चलाते हैं। जिनके ऊपर उसका आन्तरिक बाह्य विकास निर्भर करता है। संक्षेप में संस्कृति मानव समुदाय के जीवन यापन की वह परम्परागत किंतु निरन्तर विकासोन्मुखी शैली है जिसका प्रशिक्षण पाकर मनुष्य संस्कारित सुघड़ प्रौढ़ और विकसित बनता है।

संस्कृति ही किसी राष्ट्र या समाज की अमूल्य सम्पत्ति होती है। युग युगान्तर के अनवरत अध्यवसाय, प्रयोग, अनुभवों का खजाना है संस्कृति। यह किसी एक व्यक्ति के प्रयत्नों का परिणाम नहीं हैं या किसी एक युग की ही उपज नहीं होती है संस्कृति। मनुष्य और परिवार, काल कवलित होते हैं चले जाते हैं। समाज बनते हैं और बिगड़ते हैं किंतु संस्कृति न तो एक युग में बन जाती है और न बिगड़ती ही है। वह युगों-युगों की गोद में पलती है उसके पन्नों में अनेकों उत्थान, पतन आघात, अवरोधों का इतिहास होता है।

संस्कृति ही किसी देश, समाज या जाति का प्राण है। वहीं से इन्हें जीवन मिलता है। किसी भी देश की सामाजिक प्रथायें, व्यवहार, आचार-विचार, पर्व, त्यौहार, सामुदायिक जीवन का सम्पूर्ण ढाँचा ही संस्कृति की नींव पर खड़ा रहता है। यह संस्कृति की अजस्र धारा जिस दिन टूट जाती है, उसी दिन से उस समाज का बाह्य ढाँचा भी बदल जाता है। संस्कृति के नष्ट होते ही किसी सभ्यता का भवन ही लड़खड़ा कर गिर जाता है।

संस्कृति ही मानव समाज के उस बाह्य ढाँचे का निर्माण करती है जिसे ‘सभ्यता’ कहते हैं। वस्तुतः सभ्यता संस्कृति का ही बहिरंग रूपांतर है। किसी समाज का रहन-सहन, व्यवहार, आचार-शास्त्र, नियम, मर्यादायें ही उसकी संस्कृति का बाह्य परिचय प्रदान करते हैं। इस तरह सभ्यता और संस्कृति दोनों एक ही हैं। सभ्यता संस्कृति का परिचय देती है तो संस्कृति सभ्यता को जीवन देती है। दोनों की एकरूपता में ही किसी भी समाज, राष्ट्र का जीवन निर्भर करता है।

संस्कृति ही मानव जीवन के विकास, आनन्द, उत्कर्ष का आधार होती है। जिस तरह जन्म देने वाली माता के रक्त, रस, गुणों का मनुष्य के निर्माण में स्थान होता है उसी तरह अपने समाज- राष्ट्र की संस्कृति से ही व्यक्ति का कल्याण होता है। यही व्यक्ति के जीवन की निर्मात्री-धात्री होती है। मनुष्य को संस्कृति से विलग कर दीजिए वह आदिमयुग-बर्बरयुग का पशुमात्र ही रह जाएगा। संस्कृति के द्वारा संस्कृत होकर ही मनुष्य-मनुष्य बनता है। असंस्कृत तो निरा पशु ही माना जाता है। निःसंदेह संस्कृति व्यक्ति-समाज-राष्ट्र के जीवन का सिंचन कर उसे पल्लवित पुष्पित फलयुक्त बनाने वाली अमृत स्रोतस्विनी चिरप्रवाहिता सरिता है। सभ्यता और संस्कृति के प्रवाह-संस्कार ही व्यक्ति के जीवन की दिशा निर्धारित करते हैं। इनसे विलग रहकर मनुष्य जीवन को सार्थक नहीं बना सकता इसलिए अपनी सभ्यता और संस्कृति का परिचय प्राप्त करना, उनसे अपने जीवन की प्रेरणा प्राप्त करना, प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक एवं अनिवार्य है।

युगों-युगों से चली आ रही परिस्थितियों, जीवन-दर्शन, व्यक्तिगत और सामुदायिक विशेषताओं, भूगोल, ज्ञान-विज्ञान के विकास क्रम आदि के कारण भिन्न-भिन्न राष्ट्र, समाज, जातियों की अपनी-अपनी संस्कृति होती है। यह भिन्नता विभिन्नता सहज और स्वाभाविक है। फिर भी प्रत्येक संस्कृति के कुछ सार्वभौमिक आधार हैं, जिनके कारण वह जीवित रहती है। जिसमें ये सार्वभौम गुण जितने प्रचुर मात्रा में होते हैं, उतनी वह संस्कृति व्यापक और प्रभावशाली बन जाती हैं। सार्वभौमिक सत्यों पर ही संस्कृति अजर-अमर रहती है वह कभी नहीं मरती। भले ही समाज-राष्ट्र मर जाये। संकीर्णता-क्षुद्रता पर आधारित संस्कृतियाँ नष्ट हो जाती हैं। अतः किसी भी संस्कृति की महानता इस पर निर्भर करती है कि वह कितने सार्वभौमिक सत्यों पर खड़ी है? और इसी कारण वह सब ओर गतिशील होती है।

संस्कृति की अमरता इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह कितनी विकासोन्मुखी है। स्मरण रहे किन्हीं प्राचीन परम्पराओं, रूढ़िवाद या किन्हीं बंधे-बँधाये नियमों को संस्कृति नहीं माना जा सकता। संस्कृति तो एक निरन्तर विकासोन्मुखी धारा है जो प्रत्येक युग के घाट पर अपनी स्थिति में परिवर्तन कर लेती है। जिस संस्कृति में युग की माँग के अनुसार विकसित और रूपांतरित होने की क्षमता नहीं होती वह पिछड़ जाती है और एक दिन नष्ट हो जाती है।

प्रत्येक संस्कृति का जीवन सामर्थ्य उसकी सूक्ष्मता पर भी निर्भर करता है। जो संस्कृति वस्तु, पदार्थ, शरीर, संसार को ही आधार बना कर चलती है, वह अधिक समय जीवित नहीं रह सकती। इनके नष्ट होते ही संस्कृति भी नष्ट हो जाती है पर तत्वों को अपने प्रयोग का, कर्म क्षेत्र का आधार बनाकर चलने वाली संस्कृति सदा-सदा जीवित रहती है और अधिक सामर्थ्यवान होती है। वह व्यक्ति-समाज के मूल को ही प्रेरणा देकर सम्पूर्ण बाह्य ढाँचा बदल देती है।

संस्कृति तो एक मूर्तिवान, सजीव, चेतनायुक्त प्राण परम्परा है जो युगों -युगों से हमारे जीवन को प्रकाशित करती आई है। समस्त इतिहास- साहित्य, सभ्यता, ज्ञान-विज्ञान, नीति, दर्शन, धर्म, कला-कौशल, सम्पूर्ण विकास गाथा ही संस्कृति के अंग उपाँग हैं। इतनी व्यापक और विशाल है यह संस्कृति।

उक्त परिभाषाओं, सीमाओं, गुणों के आधार पर हमें अपनी संस्कृति के बारे में आवश्यक जानकारी प्राप्त करना जरूरी है। युग की माँग के अनुसार साँस्कृतिक प्रयोगों को करके नवीन सत्यों की खोज करनी है। अपने तथा समाज के जीवन में साँस्कृतिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना करना हमारा आज का बहुत बड़ा कर्तव्य है।


हम संयमी बनें-शक्ति का अपव्यय न करें

शक्ति धारण करने का सिद्धान्त यह है कि एक ओर विविध साधनों से उसे प्राप्त करें और दूसरी ओर से अपव्यय को रोक दें। धन अर्जित करना हो तो किसी उद्यम रोजगार से उसे प्राप्त करते हैं और मितव्ययी बनते हैं। दोनों क्रियाओं के सम्मिश्रण से धनवान बनना सरल हो जाता है। किसी बड़े बर्तन में पानी भरना चाहते हों और उसके छिद्र बन्द न करें तो पानी देर तक टिका न रहेगा। यह सिद्धान्त जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू होता है। एक क्रिया रचनात्मक होती है, दूसरी में निषेध का बर्ताव करना होता है, तभी कुछ सफलता प्राप्त की जा सकती है। समाज में प्रतिष्ठावान् बनने के लिए यह जरूरी है कि अधिक से अधिक सद्गुणों का विकास करें और दूसरों के साथ दुर्व्यवहार तथा असम्मान का आचरण न करें।

आत्मबुद्धि एवं आत्म विकास का कार्य नियमपूर्वक चलाने के लिए साथ-साथ संयमित जीवनचर्या भी परमावश्यक है। रेलगाड़ी के चलाने के लिए पहले भाप को एकत्रित करते हैं और सावधानी से उसे ‘पिस्टन’ तक पहुँचाते हैं। यह शक्ति यदि इधर-उधर विश्रृंखलित हो जाय, तो बेचारा इंजन रेलगाड़ी को खींचने की असमर्थता ही प्रकट करेगा। आत्मा की सान्निध्यता में पहुँच कर हम जिस शक्ति की कल्पना करते हैं, वह भी ठीक इसी प्रकार है। अपनी सम्पूर्ण चेष्टाओं को केन्द्रीभूत करना पड़ता है। इस सामूहिक शक्ति को जीवन के जिस क्षेत्र, जिस कार्य में लगा देते हैं, वहीं महत्वपूर्ण सफलता के दर्शन होने लगते हैं।

शक्ति के इस अपव्यय को रोकने का नाम ही ‘संयम’ है। किसी वस्तु को प्राप्त करना निस्संदेह कठिन व महत्वपूर्ण बात है, किन्तु संग्रहीत वस्तु को सुरक्षित बनाये रखना उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है। संग्रह और त्याग की दोनों क्रियाएं साथ-साथ चलती रहें तो कहीं भी शक्ति एकत्रित न होगी। शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक दृष्टि से शक्तिवान बनने का एक ही तरीका है कि इनकी क्रिया शक्ति का दुरुपयोग न हो, तभी मनोवाँछित ध्येय सिद्धि या सफलता मिल सकती है।

नियन्त्रित जीवन का आधार संयम है। इससे समस्त शक्तियाँ केन्द्रीभूत होती हैं, इन्हें जिधर ही लगा दो, उधर ही चमत्कारिक परिणाम उपलब्ध किये जा सकते हैं। संयम से शक्ति, स्वास्थ्य, मन की पवित्रता, बुद्धि की सूक्ष्मता और भावना की सुन्दरता जागृत होती है। इसके लिए अपने जीवन में दृढ़ इच्छा, शील व जीवनचर्या पर पर्याप्त ध्यान देना पड़ता है। आइये अब यह विचार करें कि हमें यह सावधानी कहाँ-कहाँ रखनी है, किन-किन अवस्थाओं में किस प्रकार संयम की उपयोगिता है।

आत्म-निर्माण के तीन क्षेत्र हैं- शरीर, मन और समाज। सुव्यवस्थित जीवन जीने के लिए स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की रचना अनिवार्य है। शरीर दुर्बल और रोग ग्रस्त है तो कोई सुखी न रहेगा। मन अपवित्र है तो द्वेष, दुर्भावना व कलह का ही वातावरण बना रहेगा। हमारे समाज में कुरीतियाँ और अनाचार फैल रहे हैं तो हम उनसे अछूते बचे रहेंगे, ऐसी कोई सुविधा इस संसार में नहीं है। इन तीनों अवस्थाओं के नियन्त्रण को ही ऋषियों ने मन, वचन और कर्म का संयम कहा है।

यह सत्य है कि संसार के सभी पदार्थ भोग के लिए हैं, किंतु इसकी भी एक सीमा और मर्यादा होती है। आहार शरीर को शक्ति प्रदान करता है किंतु चाहे भूख न हो, जो मिले खाते जाइए तो अपच का होना स्वाभाविक है। पेट की शक्ति के अनुरूप आहार की एक सीमा निर्धारित कर दी गई है, उतने में रहे तो यह आहार अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा। इससे स्वास्थ्य आरोग्य स्थिर रहेगा, किंतु जहाँ मर्यादा का उल्लंघन हुआ कि रोग-शोक के लक्षण दिखाई देने लगेंगे। इसलिए स्वास्थ्य विद्या के आचार्यों ने आहार ग्रहण करने के तरीकों पर अधिक संयम व सावधानी रखने को कहा है।

शरीर-विज्ञान और आचार-शास्त्र के नियमों से भी यही बात पुष्ट होती है। इहलौकिक और पारलौकिक सुख-सफलताओं का आधार-स्वस्थ शरीर है, किंतु नवयुवक और नव-युवतियों में यह भाव पाया जाता है कि ‘संयम’ कोई असाधारण और असम्भव वस्तु है। इस सम्बन्ध में वे काम-वासना की प्रबलता का उदाहरण भी देते हैं। कई तो इसे शरीर हित के लिए हानिकारक भी बताते हैं, किंतु डॉ. ई. मेरियर के शब्दों से यह संदेह दूर हो जाता है। उन्होंने लिखा है-”पूर्व संयम अनिष्टकारी होता है, यह धारणा भ्रान्त और काल्पनिक होती है। इसका घोर प्रतिवाद होना आवश्यक है। इस भ्रान्त धारण से बालकों का ही नहीं, अभिभावकों का भी अहित हो सकता है।” इन्द्रिय संयम की आवश्यकता पर जोर डालते हुए गीताकार ने लिखा है-

इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थं राग द्वेषौ व्यवस्थितौ।

तयोर्न यशमागच्छतौ ह्यस्य परि पन्थिनौ॥

अर्थात्- मनुष्य को चाहिए कि इन्द्रिय के अर्थ में अर्थात् सभी इन्द्रियों के भोगों में स्थिति जो राग-द्वेष है, उन दोनों के वश में नहीं होवे, क्योंकि ये दोनों ही कल्याणकारी मार्ग में विघ्न पैदा करने वाले शत्रु हैं।

अनियन्त्रित काम-वासना के दुष्परिणाम सर्वविदित हैं। असंयम से आलस्य और प्रमाद उत्पन्न होता है। शरीर में विकृति व अनेकों रोगों में ग्रस्त हो जाने की आशंका बढ़ जाती है, जो कई पीढ़ियों तक चलती रहती है। ऐसी भूल करना आप पर घोर अत्याचार करना है। नाड़ी दौर्बल्य के रोगियों की संख्या उन लोगों में अधिक पाई जाती हैं जो अत्यधिक विषय होते हैं, जिनके खान-पान और रहन-सहन में कोई आचार-विचार नहीं होता। पीछे यह बीमारी परम्परागत बँध जाती है, जो कई पीढ़ियों तक दुःख देती है।

इसके विपरीत जिनके आचरण संयमित होते है, उनमें शक्ति होती है। संयम में सूक्ष्म दृष्टि विकसित होती है। डॉ. मौन्टे गाजा फ्रान्स ने लिखा है- “चारित्रिक पवित्रता से उत्पन्न हुए किसी रोग का मुझे ज्ञान नहीं है। समस्त व्यक्ति और विशेषकर नव-युवक व नव-युवतियाँ संयम से तत्काल उत्पन्न होने वाले लाभों से लाभान्वित हो सकते है। ब्रह्मचर्य से स्मृति, शान्त और ताजी बनी रहती है। इच्छा-शक्ति में स्फूर्ति, शरीर में बल और मस्तिष्क में सुदृढ़ विचार बने रहते हैं। इनके कारण समस्त शरीर में सौंदर्य और आकर्षण परिलक्षित होने लगता हैं।

जिह्वा और कामेन्द्रिय की उत्तेजना को यदि साध लें तो स्वास्थ्य रक्षा की प्रक्रिया बड़ी आसानी से पूरी की जा सकती है। भोजन भूख मिटाने या शक्ति प्राप्त करने के लिए करते हैं, जीभ के स्वाद के लिए नहीं। भोगी व्यक्तियों की रुचि स्वादयुक्त व्यंजनों में बनी रहती है, किंतु संयमशील व्यक्ति का आहार केवल जीवन धारण किये रहने के लिए होता है, जिसमें स्वाद, चटपटे मसालों, विविध व्यंजनों की राई-रत्तीभर भी गुँजाइश नहीं होती। शराब, माँस और दूसरे मादक द्रव्यों का सेवन हानिकारक होता है। ये पदार्थ व्यक्ति की विवेक बुद्धि को समाप्त कर देते है।

जो सदैव ईर्ष्या-द्वेष, परछिद्रान्वेषण के विचारों में डूबे रहते है, वे अकारण ही अपनी मानसिक शक्तियों का अपव्यय करते रहते हैं। उन्हें न तो किसी प्रकार का भौतिक सुख मिलता है, न आध्यात्मिक लाभ। सामाजिक-कलह अव्यवस्था का कारण भी ऐसे ही लोग होते है, जिनके विचार संयमित नहीं होते।

शारीरिक और मानसिक शक्तियों का नियन्त्रण कर लें तो सामाजिक नियन्त्रणों की बात अपने आप पूरी हो जाती है। इन दोनों का मिश्रित रूप ही समाज की व्यवस्था का कारण बनता है। व्यक्ति से ही समाज बनता है। जिस समाज के व्यक्तियों में भले विचार होंगे, वहाँ शांति व सुव्यवस्था अवश्य होगी। अनियंत्रित स्वेच्छाचारी मनुष्य ही स्थान-स्थान पर कलह व कटुता उत्पन्न करते हैं। इसलिए जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में नियन्त्रण की आवश्यकता है, इसी से शक्ति सन्तुलन व सुव्यवस्था बनी रह सकती है। इस पुण्य प्रक्रिया का प्रारम्भ आत्म संयम से ही करना होगा। पीछे इसके लाभों को देखते हुए दूसरे भी चल पड़ेंगे, पर पहले हमें यह पग स्वयं बढ़ाना पड़ेगा।


स्वाध्याय सन्दोह - - जीवन का सदुपयोग कीजिए

समय का मूल्य समझिये-

हम लोग प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा करके जो समय खो दिया करते हैं, वह पहले तो सामान्य ही जान पड़ता है, पर यदि हम अपने जीवन के अंतिम भाग में पहुँच कर इस प्रकार के खोये समय का हिसाब लगायें, तो उसका विशाल परिणाम देखकर आश्चर्य होगा। जिन क्षणों को छोटा समझकर हम व्यर्थ खो देते हैं उन्हीं छोटे क्षणों को काम में लाकर अनेक व्यक्तियों ने बड़े-बड़े महत्वपूर्ण कार्य कर दिखाए हैं। संसार में अनेक विद्वान ऐसे हुए हैं जिन्होंने इसी प्रकार प्रतिदिन दस-दस, बीस-बीस मिनट का समय बचाकर नई भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया है, महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिख डाले हैं, या कोई कार्य कर दिखलाया है। अगर हम यह कहें कि संसार में जितने महापुरुष हुये हैं उनकी सफलता की कुँजी वास्तव में उनके समय के सदुपयोग में ही है तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं। संसार के अनेक प्रसिद्ध व्यक्ति ऐसे भी हुए हैं जिनमें कोई विशेष प्रतिभा अथवा असाधारण जन्मजात गुण नहीं था तो भी वे अविश्रान्त परिश्रम तथा समय के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करके ही इतिहास में अपना नाम स्थायी कर गये हैं।

-जीवन संग्राम में विजय

अवसर न चूकिए-

जीवन में सिद्धि प्राप्त करनी हो तो एक क्षण भी व्यर्थ नहीं गँवाना चाहिए। समय का सदुपयोग करना हमारे हाथ में है। बाजार में जाकर हम रुपये देकर कोई चीज खरीदते हैं। इस तरह हम उन रुपयों को गँवाते नहीं हैं, बल्कि वस्तु के रूप में वे हमारे पास ही बने रहते हैं। समय की भी यही बात है। समय का का सदुपयोग करके हमने यदि शक्ति, सामर्थ्य और सद्गुणों की प्राप्ति की तो हमारा वह समय व्यर्थ नहीं गया, लेकिन शक्ति, सामर्थ्य और सद्गुणों के रूप में हमारे ही पास है। जिन्होंने इस प्रकार समय का सदुपयोग किया है, उन्हें अपने जीवन में शान्ति, प्रसन्नता, धन्यता और कुतार्थता का अनुभव होता है। यही यथार्थ जीवन है। ऐसा जीवन बिताने वाले को मृत्यु का भय भी नहीं लगेगा। उस अवसर पर भी वह शान्त और स्थिर रह सकेगा। जिसने मानव-जीवन का महत्व समझकर संयम का पालन करके मानवता प्राप्त की है, वह कभी चिन्ताग्रस्त या बेचैन नहीं रहता।

मनुष्य को धन, विद्या, सत्ता, सामर्थ्य आदि का अनेक प्रकार का मद चढ़ता है। लेकिन उच्च तथा उदात्त जीवन की आकाँक्षा रखने वाला मनुष्य भिन्न प्रकार के आत्म गौरव का अनुभव करता है। वह कठिन प्रसंगों में, मृत्यु के समय भी शान्त रह सकता है। ऐसे प्रसंगों में उसका तेज बढ़ता है। यदि वह ऐसे अवसर पर निर्बल बनता है तो उसके आत्म-विश्वास में कमी समझी जायेगी। शूर का तेज रण में जाग्रत होता है, पक्षी को आकाश का भय नहीं होता, सिंह को जंगल का भय नहीं लगता। मछली पानी से नहीं डरती। इसी तरह सज्जन को संकट का भय नहीं होता। उसमें भी वह शांति का अनुभव करता है। मृत्यु के समय भी शान्ति और प्रसन्नता का भाव रह सके तभी जीवन सार्थक हुआ ऐसा कह सकते हैं।

-विचार दर्शन

बूँद-बूँद करके घड़ा भर जाता है-

छोटे से छोटे काम को भी निर्लिप्त भाव से मन लगा कर करने में न केवल सुख ही मिलता है वरन् काम करने की बहुत बड़ी ताकत भी प्राप्त होती है। जिस प्रकार बूँद-बूँद करके घड़ा भर जाता है, कण-कण मिल कर नदी बन जाती है, उसी प्रकार हमारा समस्त जीवन भी छोटी-छोटी बातों के मिलने से बना है। ईंट पर ईंट रखने और उन्हें गुनिया द्वारा ठीक प्रकार से जमा देने पर अन्त में एक सुन्दर मकान तैयार हो जाता है। छोटे-छोटे से मिलकर ही बड़ा बनता है। छोटा बड़े का गुलाम नहीं है वरन् उसका मार्गदर्शक तथा स्वामी है। बच्चा ही मनुष्य का बाप है। स्वार्थी और घमण्डी लोग बड़ा बनना तो चाहते हैं, कोई बड़ा काम भी करना चाहते है किन्तु छोटे-छोटे कामों को टालते जाते हैं, उन्हें तुच्छ समझते हैं। वे उनको साधारण और छोटा समझकर उनमें हाथ लगाने में हीनता अनुभव करते हैं। ऐसे व्यक्तियों में चूँकि नम्रता नहीं होती इसीलिए उनमें वास्तविक बुद्धि और योग्यता का भी अभाव होता है। वे तेजी से भूलकर ऐसे कामों में हाथ डाल देते है जिनको पूरा करने की न उनमें शक्ति है, न योग्यता।

बड़ा व्यक्ति इसीलिये बड़ा बन सका है कि उसने छोटे-छोटे कामों को दिल लगाकर किया है। अपने स्वार्थ, अभिमान, नाम और वाहवाही की चिन्ता नहीं की है। उसने साँसारिक ऐश्वर्य और प्रशंसा को कभी नहीं ढूँढ़ा, वरन् सत्य, निष्ठा, श्रद्धा, सत्यता, निर्लिप्तता, भक्ति और समानता के भाव से ऐसे कामों को पूरा किया है, जिनके करने में न तो उसकी प्रशंसा ही हुई, न कोई शाबाशी ही मिली और न कोई पारितोषिक ही प्राप्त हुआ। ऐसा व्यक्ति कोई मतलब न रखकर सत्य का पक्ष लेता है और नित्यप्रति के साधारण कर्तव्यों को पूरा करता हुआ अज्ञात प्रेरणा से अच्छों से अच्छा बनता चला जाता है और अन्त में स्वयमेव ही महानता की चोटी पर जा पहुँचता है। महानता प्राप्त करने के लिये सदैव बड़े से बड़ा काम ही करने की आवश्यकता नहीं हैं वरन् साधारण कर्तव्यों को भी ईमानदारी से पूरा करने की आवश्यकता है। यदि काम में स्वार्थपरता की भावना न आने पाये तो प्रशंसा स्वयं चरण चूमती है।

- आनन्द पथ

समय ही हमारी सच्ची सम्पत्ति है-

यदि संसार में कोई ऐसा पदार्थ है जो मनुष्य के हिस्से में बहुत थोड़ा आया है और जिसका सबसे अधिक अपव्यय और नाश होता है, तो वह समय ही है। जब हम इस बात का ध्यान करते हैं कि जीवन में हमें कितना कम समय मिला है, तो हमें उसके अपव्यय का बड़ा आश्चर्य और खेद होता है। और बातों में हम लोग बहुत कुछ सावधानी से काम लेते हैं, पर समय को नष्ट करने की चिन्ता बहुत कम करते हैं। यदि आप अपने समय के उचित या अनुचित उपयोग या व्यर्थ उपयोग का हिसाब लगावें तो आपको अपनी भूल और असावधानी पर पश्चाताप ही करना पड़ेगा।

मनुष्य जब समय की उपयोगिता समझने लगता है तो उसमें महत्ता, योग्यता आदि सद्गुणों की वृद्धि होने लगती है। मनुष्य में चाहे अन्य कितने ही गुण क्यों न हो, पर जब तक उसमें समय के सदुपयोग करने का गुण न होगा, तब तक वह अपने जीवन को सार्थक नहीं बना सकता और न उपस्थित होने वाले अवसरों से लाभ उठा सकता है।

-सफलता और उसकी साधना

छोटे कामों से बड़प्पन की जाँच होती है-

दूसरों को सहायता देने वालों को एक दिव्य सन्तोष और सुख मिलता है। उनके शरीर में स्फूर्ति आ जाती है, वाणी में निश्चयात्मक भावना और स्पष्टता समा जाती है। उनकी चेष्टाएँ एक स्थिर आदर्श का संकेत करती हैं, उसकी हँसी में भी एक गम्भीरता की झलक जान पड़ती है। उनके चेहरे पर संसार के सुख-दुख, छाया, प्रकाशमय जीवन का सच्चा चित्र खिंच जाता है, जीवन का सम्पूर्ण सौंदर्य उनके दिल पर चित्र की तरह चित्रित हो जाता है।

निःस्वार्थ, निराभिमानी व्यक्ति सबका प्रिय होता है। उसे सब लोग अपने सुख का भागी बनाना चाहते हैं। उसकी सम्मति पूछते हैं और सम्मति का सम्मान करते हैं जब वह घर से बाहर जाता है तो सब लोग उसे बुलाते हैं, उसका स्वागत करते हैं, उसके विपरीत स्वार्थी से सब डरते है। यह कभी रास्ते में मिल जाय तो बचकर निकल जाते हैं। उसके बुलाने पर भी लोग पास नहीं जाते। उसकी सम्मति को कोई पूछता। वह एक बहिष्कृत व्यक्ति के समान अकेला जाता है। आप इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों में कौन सा बनना चाहते हैं?

हमें छोटे कामों में ही स्वार्थ को छोड़कर परार्थ की भावना बनानी चाहिये। अच्छे कामों का प्रारम्भ अपने निकट से ही किया जा सकता है, दूर जाने की जरूरत नहीं। मनुष्य का बड़प्पन छोटे कामों में ही जाँचा जाता है। दैनिक कार्यों में ही मनुष्य बड़े काम कर सकता है।

- चरित्र निर्माण


मृत्यु हमारे जीवन का अन्तिम अतिथि

मृत्यु और जीवन एक ही तथ्य के दो पहलू हैं। मृत्यु जीवन का उद्गम है तो जीवन का पर्यवसान भी मृत्यु की गोद में ही होता है। रात्रि के गर्भ से ही दिन का उदय होता है, जीवन भी मृत्यु की कोख से पैदा होता है। दिन का अन्त रात्रि में होता है उसी तरह जीवन का अन्त मृत्यु में। वस्तुतः मरण ही दूसरे अर्थों में जन्म है। पं. नेहरू ने कहा है- “मृत्यु से नया जीवन मिलता है। केवल वहीं से, जहाँ मनुष्य मृत्यु की गोद में सोता है पुनरुत्थान का शुभारम्भ होता है”

पाश्चात्य विचारक कोल्टन के शब्दों में “मृत्यु उन्हें मुक्त कर देती है जिन्हें स्वतन्त्रता भी मुक्त नहीं कर सकती। यह उनकी प्रभावशाली चिकित्सा है जिन्हें औषधियाँ ठीक नहीं कर सकतीं। यह उनके लिए आनन्द और शांति की विश्राम-स्थली है जिन्हें समय सान्त्वना नहीं दे पाता।”

दिन भर काम-काज करके हम थके-थकाये निद्रादेवी की गोद में सोते हैं और सुबह उठने पर नई ताजगी, स्फूर्ति, आशा, उत्साह से काम में जुट जाते हैं। मृत्यु भी ऐसी ही निद्रा हैं- महानिद्रा, जिसके अज्ञात किन्तु सुखकर अंग में हम जीवन भर की दौड़-धूप से क्लान्त, परेशान होकर, थककर, शरीर से जीर्ण-शीर्ण होकर सोते हैं और फिर नव जन्म के द्वारा जाग पड़ते हैं, एक शिशु की किलकारियाँ भरते, उछलकूद करते, नया ताजा शरीर लेकर, नई चेतना, नई स्फूर्ति लेकर।

बालक दिन भर अपने खिलौनों से अपने मित्रों में खेलता है। कई बार वह अपनी भूख-प्यास, आराम की बात भी भूल जाता है लेकिन उसकी हित-चिन्तक माँ समय पर उसकी ओर ध्यान देती है, उसके न चाहते हुए भी उनका खिलौनों में, साथियों में, मन भटकते रहने पर भी मचलते, रोने-चीखने, चिल्लाने पर भी वह अपने प्यारे पुत्र को गोद में उठा लेती है। थपकियाँ देकर प्यार से सुला देती है और सोते में ही उसे आँचल का दूध पिला कर पुष्ट कर देती है। आहा! प्रकृति माता भी कितना ध्यान रखती है प्राणियों का। वह अपने मौत के प्यार भरे हाथों में उठा लेती है हमें हमारे न चाहते हुए भी, और अपनो अंक में सुला लेती है तब तक जब तक हमारी थकान मिटकर हम जाग नहीं पाते। जागने पर वह नहला-धुलाकर नये वस्त्र पहनाकर, नव-शृंगार करके फिर हमें जग के क्रीडाँगन में खेलने को भेज देती है जहाँ बहुत से साथी मिल जाते हैं खेलने के विविध वस्तु पदार्थ मिल जाते हैं।

मृत्यु मानो छुट्टी मनाना है। लोग अपने काम से छुट्टी लेकर नदी, समुद्र में गोता लगाने, सैर-सपाटे करने जाते हैं, मृत्यु के द्वारा भी हम अनन्त जीवन के समुद्र में गोता लगाने एक सुरम्य प्रदेश की यात्रा करने जाते हैं जिसकी कल्पना भी हम नहीं कर पाते। मरण एक महायात्रा है, महा प्रस्थान है, महानिद्रा है- जीवन और जगत के कार्य व्यापार से विरत होकर एक लम्बी छुट्टी बिताना है।

गीताकार ने मृत्यु को मानो वस्त्र बदलना बतलाया है। जिस तरह फटे जीर्ण-शीर्ण वस्त्र को उतार कर हम नया वस्त्र धारण करते है उसी तरह मृत्यु भी जीर्ण-शीर्ण जर्जर, असमर्थ, अशक्त शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करना है। प्रकृति माता मनुष्य को मृत्यु के रूप में बुलाती है, नये वस्त्र पहनाकर फिर भेज देती है।

छत पर पहुँचने के लिए सीढ़ियों पर होकर जाना पड़ता है। जीवन के परम लक्ष्य की पूर्णता प्राप्ति तक जाने के लिए भी हमें जन्म मरण के सोपानों पर से गुजरना पड़ता है। मरण मानो वर्तमान सीढ़ी से आगे की सीढ़ी पर पहुँचने के लिए पैर उठाना है, जन्म मानो सामने वाली सीढ़ी का आधार लेकर ऊपर पहुँचने की तैयारी करनी है।

व्यापारी अपनी दुकान में तरह-तरह का सामान रखता है और बेचने खरीदने का क्रम रात दिन जारी रखता है लेकिन साल में एक बार कुछ समय के लिए वह खरीद-फरोख्त का काम बन्द करके अपने सामान का चिट्ठा बनाता है। क्या खरीदा, क्या बेचा और कितना लाभ कमाया? ऐसा हिसाब प्रत्येक व्यापारी वर्ष में एक बार लगाता है। मृत्यु भी मानो जीवन के हिसाब-किताब और लाभ पर विचार करने का अवसर है। कई वर्षों से चल रहे जीवन व्यापार का आखिर कभी तो हिसाब होना ही चाहिए और मृत्यु ही ऐसा अवसर है जब हम अपने लाभ हानि पर विचार करके फिर से दुकान लगाने एवं भूल सुधारने का कार्य सम्पन्न करते हैं।

मृत्यु मानो भगवान का निमन्त्रण है। विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा है- “मृत्यु तो प्रभु का आमन्त्रण है। जब वह आये तो उसका द्वार खोलकर स्वागत करो, चरणों में हृदय-धन सौंप कर प्रभु का अभिवादन करो।” माता जब श्रावण में अपनी बेटी को उसकी ससुराल से बुलाती है तो बेटी के हृदय में कितनी प्रसन्नता उत्सुकता पैदा होती है। उसका हृदय भी माता के यहाँ जाने के लिए सावन के बादलों की तरह उमड़ने लगता है। पीहर जाकर वह स्वतन्त्रता के साथ आनन्द उल्लास का जीवन बिताती है। मृत्यु भी मानो महा-माता द्वारा अपने घर बुलाने के लिए निमन्त्रण होता है हमारे लिए।

मृत्यु जीवन का एक बहुत ही आवश्यक और अनिवार्य अंग है। यदि मृत्यु न हो तो यह जीवन भार बन जाय। यह संसार काँटों की तरह चुभने लगे। हीन से हीन व्यक्ति में भी जीने की जो चाह है वह मृत्यु की कृपा से ही है। मृत्यु को हटा दीजिए जीवन से लोग ऊबने लगेंगे। यदि मृत्यु का अस्तित्व न रहे तो कल्पना कीजिए कि उन लोगों का क्या हाल हो जो अनेकों कष्ट पा रहे होते हैं। रोग, शोक, अभाव, कठिनाइयों की असह्य मार से मृत्यु देवता ही तो बचाता है। जीर्ण-शीर्ण परावलम्बी असमर्थ वृद्ध शरीर से छुटकारा मरण देवता ही दिलाते है। शारीरिक असमर्थता के कारण परावलम्बी हो जाने वाले लोगों का मुक्तिदाता, असाध्य रोगों से ग्रस्त लोग जिनकी कोई चिकित्सा नहीं हो सकती, उनका धन्वन्तरि, परमदयालु मृत्यु देवता ही है। संसार जिन्हें ठुकरा देता है, समय जिनके आनन्द खुशी को छीन लेता है उन्हें मौत ही अपने अंग में बिना किसी भेद-भाव के स्थान देती है।

=कोटेशन===========================

अयो खल्वाहुः काम मय एवाऽयं पुरुष इति। स यथा कामो भवति तत्क्रतुमवति। यत्क्रतुर्भवति तर्त्कम कुरुते। यत्कर्म कुरुते तदभि सम्पद्यते।

- वृहदारण्यक 30 । 4। 4। 5

यह मनुष्य भावनामय है। जैसी कामना करता है वैसे विचार आने लगते हैं। जैसे विचार उठते हैं वैसा निश्चय करता है। जैसा निश्चय करता है वैसे काम होने लगते हैं। जैसे काम करता है वैसा फल भोगता है।

यह मनुष्य भावनामय है। जैसी कामना करता है वैसे विचार आने लगते हैं। जैसे विचार उठते हैं वैसा निश्चय करता है। जैसा निश्चय करता है वैसे काम होने लगते हैं। जैसे काम करता है वैसा फल भोगता है।

यह मनुष्य भावनामय है। जैसी कामना करता है वैसे विचार आने लगते हैं। जैसे विचार उठते हैं वैसा निश्चय करता है। जैसा निश्चय करता है वैसे काम होने लगते हैं। जैसे काम करता है वैसा फल भोगता है।

मृत्यु से ही इस संसार में सौंदर्य का आकर्षण बना हुआ है। इसी के कारण प्रेम है। यदि मृत्यु न होती, सब अमर होते तो एक दूसरों की तरफ स्नेह भरे हृदय से देखते भी नहीं। कठोरता, रूखापन, फैल जाता। कोई किसी को अपना नहीं कहता। बहुत बार बुराइयों से लोग इसलिए बचे रहते हैं कि उन्हें मृत्यु का, अपनी छोटी सी जिन्दगी का ख्याल हो जाता है। और इस तरह संसार में अनेक बुराइयां पनप ही नहीं पातीं। यदि मनुष्य अमर हो जाय तो कुछ भी करने में नहीं चूके। यदि मनुष्य के पाँव कही रुकते हैं तो मौत के दरवाजे पर।

मृत्यु मनुष्य के लिए त्याग उत्सर्ग का पाठ सिखाती है। साथ ही अनासक्त होने का व्यवहारिक प्रयोग है यह। मनुष्य जीवन भर वस्तु-व्यापार में लीन रहता है। इनका इस तरह संग्रह करता है मानो उसे सदा-सदा इसी धरती पर रहना है। नीति अनीति जैसे भी बने, कमाने, संग्रह करने, सुख-साधन जुटाने में ही हमारा जीवन लगा रहता है लेकिन मौत आती है और चुपके से हमें अपने अज्ञात हाथों में उठा लेती है। सब कुछ यहीं धरा रह जाता है, छोड़ देना पड़ता है। लेकिन मृत्यु कोई कठोरता क्रूरता नहीं है जो बलपूर्वक मनुष्य को यह त्याग कराती है, वरन् यह तो मंगलकारिणी है जो अनेक आसक्ति, मोह, तृष्णा के दलदल में फँसे मनुष्य को निकाल कर उसे मुक्त करती हैं। जगत के वस्तु पदार्थों के संग से लगे कल्मषों को मृत्यु माता ही अपने हाथों से धोती है, उन्हें छुड़ा देती है ठीक उसी तरह जैसे कोई माँ अपने बच्चे के शरीर में लगी गन्दगी को साफ करती है।

अन्य देशों में जहाँ मृत्यु को जीवन का अन्त माना जाता है वहाँ हमारे यहाँ मृत्यु को विश्राम, निद्रा मात्र समझा जाता है। मृत्यु पर भी हमारे यहाँ जन्म की तरह खुशियाँ मनाने, जुलूस निकालने, कीर्तन गान करने आदि का विधान है। सोया हुआ बालक फिर उठकर अपने खिलौने से खेलने लगता है। मृत्यु के बाद फिर से हम नया जीवन शुरू करते हैं। पिछले जीवन में जहाँ अध्याय छोड़ा था उससे आगे नये अध्याय का प्रारम्भ फिर करते हैं। रात को अधबुनी चादर छोड़कर सो जाने वाला जुलाहा दूसरे दिन फिर वहीं से अपनी चादर बुनना शुरू करता है जहाँ उसने छोड़ी थी। पूर्व-जन्म के ज्ञान संस्कार स्वभाव आदि की कमाई नये जनम में फिर से मिल जाती है। इस तरह मौत सबकी समाप्ति नहीं है अपितु शरीर रूपी साधन को दुरुस्त करके नये उत्साह, नई शक्ति से मंजिल की ओर गतिशील होने की प्रक्रिया है मौत।


सत्य में अपवाद

सत्यं न सत्यं खलु यत्र हिंसा,

दयान्वितं चानृतमेव सत्यम्।

हितं नराणाँ भवतीह येन,

तदेव सत्यं न तथाऽन्यथैव॥

- देवी भागवत 3 । 11। 36

वह सत्य, सत्य नहीं जिसके कारण हिंसा होती हो। दया से सना हुआ असत्य भी सत्य है। जिसमें मनुष्यों का हित होता हो वही सत्य है इसके विपरीत जिसके अवाँछनीय परिणाम निकले, वह सत्य भी असत्य ही है।

या पश्यति न सा ब्रूते या ब्रूते सा न पाश्यति

अहो व्याघ स्वकार्याथिन् किं पृच्छसि पुनः पुनः।

ये प्यायेन जिहीर्षन्तो धर्ममिच्छन्ति कर्हिचित्

अकूजनेन मोक्षं वा नानुकूजेत् कथंचन।

अवश्यं कूजितव्ये वा शंकरेन्नप्य कूजितः।

श्रेयस्तन्नानृंत वक्तुँ तत्सत्यमविचारितम्।

- महा. कर्तव्य 9। 59 । 60

न्याय की रक्षा करने वाला कार्य करना ही धर्म है। इसके लिए कभी चुप रहना पड़े तो वैसा ही करना चाहिए। यदि चुप रहने से सन्देह उत्पन्न होता हो तो झूठ बोल दे। न्याय की रक्षा के लिए वैसा करना भी निस्सन्देह सत्य ही कहा जायेगा।

अधर्म नात्र पश्यन्ति धर्म तत्वार्थ दर्शिनः। यत्स्तेनैः सह सम्बन्धान्मुच्यते शपथैरपि। श्रेयस्तन्नानृतं वक्तुँ तत्सत्यम् विचारितम्। न च तेभ्यो धनं देयं शक्ये सतं कथंचन। पापेभ्यो हि धनं दत्तं दातारमपि पीडयेतू।

तस्माद् धर्मार्थमनृत मुक्त्वानानृत भाग् भवेत।

- महा. कर्ण 69। 63-64-6

यदि दुष्टों से पाला पड़े तो झूठी शपथ खाकर भी उनसे अपना पीछा छुड़ाले। उनसे अपने धन तथा प्राण की रक्षा करने के लिए बोला हुआ झूठ झूठ नहीं है। अपना बस रहते प्राणियों के हाथ अनीतिपूर्वक अपना धर्म अपहरण न होने देना चाहिए। धर्म के लिए झूठ बोलने से मनुष्य झूठा नहीं कहलाता।


मधु-संचय


मधु-संचय (Kavita)

रुकें कभी नहीं चरण!

अपार हिम-शिखिर सदैव पंथ पर अड़ा रहे, अथाह सिन्धु मुक्त राह रोक के पड़ा रहे, बनी रहे परन्तु साधना पुनीत आमरण।

न फूल माँग किंतु भय कभी न मान शूल से, छिपा न तू भविष्य शून्य भाग्य के दुकूल से,

सदैव शक्तिमान ने किया है भूमि का वरण।

पुकार भानु कह रहा प्रभात है, प्रकाश है, नवीन राह, प्रेरणा नई, नया प्रयास है, नवीन विश्व का नवीन कुम्भकार कर सृजन।

रुके कभी नहीं चरण!!

- विद्यावती मिश्र


वह खिलौना (Kavita)

रोशनी पूँजी नहीं है जो तिजोरी में समाये, वह खिलौना भी न, जिसका दाम हर ग्राहक लगाये,

वह पसीने की है वह शहीदों की उमर है, जो नया सूरज उगाये जब तड़प कर तिलमिलाये,

उग रही लौ को न टोको, ज्योति के रथ को न रोको,

यह सुबह का दूत हर तम को निगलकर ही रहेगा। जल गया है दीप तो अँधियार ढलकर ही रहेगा ॥

- ‘नीरज’


कुटिल कुनीति (Kavita)

दुर्भाव, दम्भ, दुर्गुण-दुर्दुग बिदारें,

कुटिल कुनीति को बार-बार धिक्कारें।

समता, शुचिता, नैतिकता नित अपनायें,

हों स्वस्थ सुखी, सब स्नेह मेह बरसायें।

भ्रष्टाचारों का घोर विरोध करें हम,

दीनों दुखियों के दारुण दुःख हरें हम।

प्यारा ‘स्वराज्य’ सुखमय ‘सुराज्य’ बन जाये,

भगवान भि ता भगे एकता आये।

- हरिशंकर शर्मा


उठो फूट के पात्र को फोड़ डालो (Kavita)

उठो फूट के पात्र को फोड़ डालो,

अभी भेद की शृंखला तोड़ डालो,

भटकते दिलों को पुनः जोड़ डालो,

समय की प्रबल धार को मोड़ डालो,

विषैली विषमता मिटाते चलो तुम।

सभी को गले से लगाते चलो तुम॥

स्वयं जाग कर दूसरों को जगा दो,

अभी नाव को तुम किनारे लगा दो,

उठो इस धरा को गगन में उठा दो,

नहीं तो गगन ही धरा पर झुका दो,

नयी नींव खोदो नये घर बनाओ।

नई रागिनी में नये गीत गाओ॥

- उदयभानु ‘हंस’


नव जीवन (Kavita)

आशायें देतीं नव जीवन, सुख के स्वप्न दिखाती हैं,

उन सपनों की प्राप्ति हेतु ये, साधन भी बतलाती है।

और कहा करतीं, मनुष्य से, बनो साहसी, वीर, उदार!

आशायें जीवन का संबल, मानव मन में करो विचार!!

गहन निराशा, के तुम में भी, आशा दीपक लिये चलो,

दुख दानव से डरो न किंचित उन्नति पथ पर चले

चलो,

समय स्वयं कर देगा तुम पर, धन यश की सुखमय बौछार!

आशायें जीवन का संबल, मानव मन में करो विचार!!

- भगवतीप्रसाद सोनी ‘गुँजन’


मुझे रुकना नहीं (Kavita)

मिल गया है पथ मुझे रुकना नहीं जो जानता है,

जो न राही को चलाता आप चलना ठानता है।

साथ चलता है कि जिसके क्रान्ति का तूफान भारी,

जो बदल देता जगत को हाथ में ले शक्ति सारी।

हैं हुये बलिदान कितने रक्तरंजित राह है यह,

जो सदा विश्वास को दृढ़तर बनाती चाह है यह।

हार हो कितनी कभी आशा न मन की टूटती है,

आँधियों का वेग लेकर जो थकावट लूटती है।

-रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’


महत्वाकाँक्षायें अनियन्त्रित न होने पावें

आजकल हमारा जीवन संघर्ष इतना बढ़ गया है कि हमें जीवन में सन्तोष और शान्ति का अनुभव ही नहीं हो पाता। बहुत से लोग जीवनभर विकल और विक्षुब्ध रहते हैं। हम जीवन में दिन-रात दौड़ते हैं, नाना प्रयत्नों में जुटे रहते हैं। कभी इधर, कभी उधर हमारी घुड़दौड़ निरन्तर चालू ही रहती है। किन्तु फिर भी हममें से बहुत कम ही जीवन की प्रेरणाओं का स्त्रोत ढूँढ़ पाते हैं, विरले ही जीवन की यथार्थता का साक्षात्कार कर पाते हैं। जहाँ हमें सहज शान्ति और सन्तोष की उपलब्धि होती है, वहाँ बहुत ही कम पहुँच पाते हैं। आजीवन निरन्तर सचेष्ट रहते हुए भी हमसे से बहुतों को अन्त में पश्चाताप और खिन्नता के साथ ही जीवन छोड़ना पड़ता है।

हमें लक्ष्य भ्रष्ट करने में विकृत महत्वाकाँक्षाओं का बड़ा हाथ है। ये हमें जीवन के सहज और स्वाभाविक मार्ग से भटका कर गलत मार्ग पर ले जाती है। इनके कारण हमें जो करना चाहिए, उसकी तो हम अपेक्षा कर देते हैं और जो हमें नहीं करना चाहिए, वह करने लगते है।

यों जीवन में आकाँक्षाओं का होना आवश्यक है क्योंकि इनके पिता तो जीवन जड़ बन जायगा। प्रगति का द्वार ही बन्द हो जायगा। आज संसार का जो विकसित प्रगतिशील स्वरूप दिखाई देता है, वह बहुत से व्यक्तियों की आकाँक्षाओं का ही परिणाम है। किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में जब यह प्रश्न उठता है कि यह क्या है, कैसा है, कैसे चल रहा है, तो उसे जानने के लिए मचल उठना, उसके लिए तन्मय होकर अपने को अन्त तक लगाये रखना, संसार में महान वैज्ञानिक आश्चर्यों का द्वार खोल देता है।

साहित्यकार के मन में जब भावनाओं का उद्रेक होता है तो यह भी जगत के समक्ष उन्हें व्यक्त कर देने के लिए आतुर हो उठता है और यही आकाँक्षा काव्य के रूप में निखर उठती है। कोई भी क्षेत्र हो विज्ञान का, दर्शन या धर्म का, कला या कृति का सभी क्षेत्रों में जो उपलब्धियाँ आज तक हो पाई हैं, वे मनुष्य की महत्वाकाँक्षाओं की प्रेरणा का ही परिणाम हैं। संसार में जितने भी बड़े काम हुए हैं, वे सब महत्वाकाँक्षाओं ने ही कराये हैं।

यद्यपि कुछ न कुछ आकांक्षाएं सभी में होती हैं, तथापि हर आकाँक्षा को महत् नहीं कहा जा सकता। आकांक्षाएं जब स्वयं व्यक्ति और समाज के लिए कल्याणकारी हित-साधक होती हैं तभी वे महत्वाकांक्षाएं हैं। किसी को नुकसान पहुँचाने या डाकू बन कर लूटपाट करने के लिए केवल अपने ही लाभ में लिए किये जाने वाले दुस्साहस को महत्वाकाँक्षा नहीं कहा जा सकता। स्वर्गीय चितरंजनदास के शब्दों में “महत्वाकांक्षाएं जब पदार्थ प्रेरित होती हैं, तभी तक वे महत् हैं।” जिनसे समाज का अहित होता हो, जो रचनात्मक न होकर विनाशात्मक हों, ऐसी महत्वाकाँक्षा रावण, कंस, दुर्योधन की महत्वाकाँक्षा है, जो जगत के लिए हानिकारक और स्वयं उनके जीवन में भी विनाशकारी ही सिद्ध होती हैं। ऐसी दुस्साहसी आकाँक्षाओं का अवलम्बन लेकर कोई व्यक्ति जीवन में सन्तोष, शान्ति का अनुभव कर सके, यह असम्भव है।

एक व्यक्ति धार्मिक जीवन इसलिए बिताता है कि इससे उसका जीवन शुद्ध निर्मल बनेगा, आत्मा का विकास होगा, ईश्वर का साक्षात्कार होगा, तो उसकी ऐसी महत्वाकाँक्षा उत्तम है। आवश्यक है। लेकिन बहुत से लोग धार्मिक क्षेत्र में इसलिए घुसते हैं कि इससे उनकी पूजा-प्रतिष्ठा होगी, लोग भेंट चढावेंगे, जय-जय करेंगे। कई लोगों को राजनीति में इसलिए आना पड़ता है कि इससे वे अपने देश और समाज की स्वतन्त्रता, अधिकारों की रक्षा और विकास के लिए ठोस प्रयत्न कर सकेंगे। किन्तु ऐसे व्यक्तियों की भी कमी नहीं है जो राजनीति को अपनी नेतागिरी जमाने, नाम कमाने, बंगले और कोठियाँ बनाने, जायदाद इकट्ठी करने का साधन बनाते हैं।

किसी क्षेत्र में अपने स्वार्थ और दूसरों को हानि पहुँचा कर आगे बढ़ने की आकाँक्षाएँ महत् नहीं, इन्हें निकृष्ट और हेय ही माना जाना चाहिए, इनका परिणाम सदैव दुःखद और असन्तोषजनक ही है। इन विकृत महत्वाकाँक्षाओं के कारण ही हम जीवनभर सहज मार्ग नहीं अपना पाते। हमें जो करना चाहिए उसकी तो उपेक्षा करने लगते हैं और जो नहीं करना चाहिए उनमें हाथ डालने का दुस्साहस विकृत महत्वाकाँक्षाओं से ही प्रेरित होता हैं। शान्ति, सन्तोष, स्थायी सफलता की कामना रखने वाले साधक को इन भूल-भुलैयों से बचना चाहिए।

एक सज्जन थे, जो चुनावों में दो बार हार जाने का रोना रोते हुए कह रहे थे-” क्या करें साहब, राजनीति का ऐसा नशा है- जो छुड़ाये नहीं छूटता।” स्मरण रहे मनुष्य की जो प्रवृत्तियाँ किसी नशे से प्रेरित होंगी, उनका परिणाम क्या उस नशेबाज की स्थिति पैदा नहीं कर देगा, जो एक दिन औंधे मुँह गन्दी नाली में गिर पड़ता है, लोग उसके ऊपर हँसते हैं? जिन आकाँक्षाओं के पीछे कोई नशा काम करता है, वह महत्वाकाँक्षा कैसे हो सकती है? महत्वाकाँक्षा तो उत्कृष्ट महान आदर्श के साकार करने का साहस तथा कर्मठतायुक्त अभियान है, जिसके गर्भ में स्वस्थ और सन्तुलित मनोभूमि, जागरुक चेतना, विवेकयुक्त बुद्धि काम करती है।

विकृत महत्वाकाँक्षा निम्न-गामिनी होती है- इस आइने में जब मनुष्य अपनी तस्वीर देखकर उस ओर उन्मत्त होकर दौड़ता है तो परिणाम में उसकी स्थिति उस बाज की सी ही हो जाती है, जो आकाश से मकान या धरती पर पड़े शीशे के टुकड़े में अपना प्रतिबिम्ब देखकर उस और झपटता है, शीशे से टकरा कर घायल हो जाता है। विकृत महत्वाकाँक्षाएँ मनुष्य को मृग मरीचिका की तरह भटकाती हैं। यथार्थ को भुलाकर स्वप्न लोक की दुनिया में भटकाती हैं। ये हवा के उस बगुले की तरह है- जो एक सूखे पत्ते को आसमान में उठा देता है, लेकिन ज्यों की बगुला नष्ट होता है, पत्ता धरती पर आ पड़ता है।

अपनी महत्वाकाँक्षाओं के बारे में हमें विवेकपूर्ण बुद्धि से सोचना चाहिए कि वे कितनी यथार्थ और कितनी उपयोगी हैं? कहीं उन्होंने हमें भुलावे में तो नहीं डाल रखा है? वे हमें जीवन के सही रास्ते पर ले जा रही हैं या हमें पथ भ्रष्ट कर रही हैं। किन्हीं प्रलोभनों के पीछे कोई स्वार्थबुद्धि तो काम नहीं कर रही? यह सब विचारणीय है। महत्वाकाँक्षाएँ यदि निकृष्ट स्तर की हों तो उन्हें त्याग देना चाहिए। श्रेयस्कर तो केवल श्रेष्ठता की ओर ले जाने वाला महत् आकाँक्षाएँ ही हो सकती हैं।


वाणी का ठीक उपयोग करना सीखें

मनुष्य में अन्य सब प्राणियों से एक विशेषता यह है कि वह वाणी द्वारा अपनी अनुभूति और भावनाओं को अच्छी तरह प्रकट कर दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। यह परमात्मा की मनुष्य को सबसे बड़ी देन है। पर हम देखते हैं कि आजकल लोग इस अमूल्य निधि का नित्य दुरुपयोग कर संसार में अनेक प्रकार के कष्ट, दुःख, अपमान, निन्दा आदि सहन कर रहे हैं तथा अपने जीवन को भी गर्हित और पतित बनाते जा रहे है। हमें आज इसी विषय पर गम्भीरतापूर्वक सोचना है कि हम अपनी वाणी के दुरुपयोग को रोककर उसे किस तरह सुसंस्कृत, सुमंगलकारी, सर्वकल्याणकारी बना सके, और छल, कपट, पीड़ा, और असन्तोष के स्थान पर स्वर्गीय आनन्द और उल्लासपूर्ण वातावरण का निर्माण कर सकें।

शास्त्रों में शब्द को ब्रह्मा की उपमा दी गई है। वास्तव में शब्दों में बड़ी सामर्थ्य हैं। हम जब किसी शब्द का उच्चारण करते है, तो उनका प्रभाव न केवल हमारे गुप्त मन पर अपितु सारे संसार पर पड़ता है, क्योंकि शब्द का कभी लोप नहीं होता, प्रत्येक शब्द वायुमण्डल में गूँजता रहता है और वह समानधर्मी व्यक्ति के गुप्त मन से टकराकर उसमें तदनुकूल प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। यह अनुभव सिद्ध बात है कि जिसके प्रति हम शब्दों द्वारा अच्छी भावना प्रकट करते हैं, वह व्यक्ति अच्छी अनजाने ही हमारा प्रेमी और शुभ चिन्तक बन जाता है। इसके विपरीत जिसके बारे में हमारे विचार या शब्द कलुषित होते हैं, वे अनायास ही हमारे अहित चिन्तक, शत्रु बन जाते हैं। अर्थात् शुभ एवं अमंगल वाणी से आप्तजनों एवं सर्वसाधारण समाज में सद्भावना का प्रचार होता है जिससे समाज का वातावरण आनन्द और उल्लासपूर्ण बनता है।

अच्छे और बुरे शब्दों का मनुष्य के जीवन पर बड़ा गहरा असर पड़ता है। अच्छे शब्द बोलने वाले व्यक्ति प्रायः निर्भय, प्रशान्त, प्रफुल्लित एवं आनन्दित पाये जाते हैं जबकि कटु एवं बुरे शब्दों का उच्चारण करने वाले व्यक्ति क्रोधी, ईर्ष्यालु, दम्भी, असन्तुष्ट एवं कर्कश स्वभाव के होते है।

बुरे एवं गन्दे शब्दों के उच्चारण का अबोध बालकों पर बड़ा बुरा असर पड़ता है, जिससे उनके चरित्र का क्रमशः पतन होता जाता है। क्योंकि छोटे बालक जैसे शब्द बड़ों के मुँह से सुनते हैं, वे उन्हीं का बिना अर्थ समझे बूझे अनुकरण करने लगते हैं। परिणामस्वरूप उनके गुप्त मन में उन बुरे शब्दों के संस्कार बीज रूप से जम जाते हैं, जो बड़े होने पर उनको पतन के गहरे गर्त में गिरा देते हैं। आजकल बालकों में सिनेमा के अश्लील एवं गन्दे गीतों को गुनगुनाने की प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यह बड़ी ही अनिष्टकर बात है। आगे चलकर इस प्रकार के अश्लील भाव संस्कार के रूप में उनके मन को कलुषित कर उनके जीवन को ही मटियामेट करने का सामर्थ्य रखते हैं।

इसके विपरीत सुमधुर, शान्त एवं पवित्र शब्दों का उच्चारण करने वाले व्यक्ति अपने शब्दों द्वारा न केवल अपने विचारों, भावनाओं एवं संस्कारों को परिमार्जित करते हैं अपितु अन्य अनेक व्यक्तियों को प्रभावित कर उनके जीवन में भी नयी स्फूर्ति नयी प्रेरणा एवं नया मोड़ उत्पन्न करते हैं। अच्छे लेखों एवं कविताओं से अनेक व्यक्तियों को सत्प्रेरणायें मिली हैं और उनका जीवन परिवर्तन हुआ है, इससे शब्दों के अतुल सामर्थ्य की कल्पना की जा सकती है।

हमारे मनस्वी ऋषियों ने मन्त्र शक्ति द्वारा अनेक आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न किये हैं। मन्त्र आखिर सशक्त तेजस्वी एवं गूढ़ शब्दों की ध्वनियाँ ही तो हैं, पर इन शब्दों से न केवल मानसिक वरन् भौतिक जगत में भारी उलटफेर हुए हैं। इसका एकमात्र कारण मन्त्रों के पीछे ऋषियों की अनुभव जन्य ज्ञान-युक्त वाणी की प्रबल शक्ति है।

मन्त्रों के नियमित और श्रद्धापूर्वक जप से नयी शक्ति और अनेक सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, इसका एकमात्र कारण यह है कि उत्तम एवं पवित्र शब्दों में महान गुणकारी शक्ति समाई रहती है और उसके द्वारा एक ऐसा अदृश्य वातावरण पैदा होता है, जो जीवन की दिशा को ही मोड़ देता है। आप जिस प्रकार के शब्द का उच्चारण करेंगे, वैसे ही भाव आपके मन और शरीर के अंग और प्रत्यंगों में फैल जायेंगे और आपकी आत्मा भी उसी उच्च या निम्न स्थिति में आ जायेगी।

तात्पर्य, हमारा प्रत्येक शब्द हमारे अन्तःकरण पर एक अमिट गुप्त छाप छोड़ जाता है, जो हमारे स्वभाव और चरित्र के निर्माण में योग देता है। हमारे मनीषियों और उपनिषदों ने प्रत्येक शब्द के प्रति अत्यन्त सावधान रहने का संकेत किया है क्योंकि शब्दों में अतुल सामर्थ्य है। जो काम हम वर्षों में नहीं कर पाते उसे मनस्वी और पुरुषार्थी व्यक्ति अपने चुने हुए शब्दों की शक्ति से अल्पावधि में सम्पन्न कर डालते हैं। इसका कारण भी यही है। अतएव हमें शब्दों के इस असीम सामर्थ्य का ध्यान रखते हुए वाणी को सदा मधुर, पवित्र और हितकारी बनाये रखने का प्रयत्न करना चाहिए।

तैत्तिरीय उपनिषद् में कहा गया है-

‘जिह्वा में मधुमत्तमा’ अर्थात् हे ईश्वर! मेरी यह जिह्वा सदा मधुर वचन बोले। मैं कभी कटु, कर्कश और कुवचन द्वारा अपनी वाणी को कलंकित न करूं। अतः हम सदा अपने जीवन में, घर में, समाज में, प्रत्येक व्यवहार के समय ऐसे ही शब्दों का प्रयोग करें जो मधुर, शिष्ट, उत्साहप्रद एवं हितकारी हों,। गोस्वामी तुलसीदास जी ने क्या ही अच्छा कहा है-

तुलसी मीठे वचन ते, सुख उपजत चहुँ ओर।

वशीकरण एक मन्त्र है, तज दे वचन कठोर॥

मीठे और हितकारी वचन वास्तव में ऐसा वशीकरण मन्त्र हैं, जिससे हमारे इष्ट मित्र, स्वजन परिजन ही नहीं, सारे संसार के लोग हमारी ओर आकर्षित होकर हम पर अपना स्नेह लुटा सकते हैं। फिर क्यों व्यर्थ ही हम कटु, अभद्र एवं अशिष्ट शब्दों के उच्चारण द्वारा अपने चारों ओर के वातावरण को कलुषित और अमंगलजनक बनाकर अपने तथा दूसरों के जीवन को कष्टप्रद एवं अशान्त बनाने की चेष्टा करें।

मन में सदा अच्छे संकल्प करते रहिये और वाणी से सदा मधुर एवं हितकारी वचन ही बोलिए। अपने मन को हमेशा सत्संकल्पपूर्ण वाणी से सम्बोधित करते हुए उसे सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहें। मन को एकाग्र और शान्त कर एकान्त में ऐसे शब्दों का उच्चारण कीजिए जिससे उसे नई चेतना और नयी प्रेरणा मिले। जैसे कहिये कि - “मेरा मन असीम शक्ति का भण्डार है, मैं उससे अपनी इच्छानुकूल कार्य ले सकता हूँ। मेरा मन इन्द्रियों का दास नहीं, उनका स्वामी है। वह इन्द्रियों को विषयों की ओर कदापि नहीं बढ़ने देगा। मन इन्द्रियों का स्वामी है पर मैं मन का भी स्वामी हूँ अर्थात् मन पूर्णतः मेरे वश में है। मैं उसे हर प्रलोभन से बचाये रखने की क्षमता रखता हूँ और उसे कुमार्ग से हटाकर सन्मार्ग पर चलाने की भी मुझ में पूर्ण शक्ति है। सारी इन्द्रियाँ और मन मेरे आज्ञाकारी हैं और मैं इन्हें हरदम ठीक रास्ते पर चलने की ही प्रेरणा दिया करता हूँ।”

आप इस प्रकार के आत्मनिर्देशपूर्ण शब्दों द्वारा अपनी मानसिक शक्ति और आत्मबल को पर्याप्त मात्रा में बढ़ाकर जीवन को पवित्र, सुखी और सम्पन्न बना सकते हैं।

शब्द अमृत और विष का काम करते हैं। जो वाणी मधुर तथा हितकर होगी वही अमृतमय कहलायेगी। इसके विपरीत जिस वाणी में कठोरता अहंमन्यता, उपहास, कटुता, द्वेषभाव, छिछोरापन आदि होगा वह अपने और दूसरों के लिए भी विषमय एवं हानिकारक होगी।

वाणी का दुरुपयोग कभी न किया जाय। हो सके तो सप्ताह में या महीने में एक दिन का मौन रखें और उस दिन केवल आत्मचिन्तन, सच्चिन्तन में मन को लगायें। मौन में बड़ी शक्ति है जो व्यक्ति वाणी का संयम कर यथासम्भव मौन का पालन करता है, उसकी वाणी में बड़ा रस आता है।


दान-आत्म-कल्याण की एक श्रेष्ठ साधना

हमारे धर्म, संस्कृति में दान का बहुत महत्वपूर्ण स्थान माना गया है। दान को जीवन का आवश्यक धर्म नियम घोषित किया था हमारे पूर्वज मनीषियों ने। ऋषियों से लेकर सभी महापुरुष, सन्त महात्माओं ने समाज को दान की शिक्षा दी। अथर्ववेद में बताया गया है ‘शतहस्त समाहर सहस्रहस्त संकिर’ सैकड़ों हाथों से इकट्ठा करो और हजारों हाथों से बाँट दो। जो बिना दान किए हुए ही सम्पत्ति का भोग करता है उसे शास्त्रकारों ने चोर कहा है। दान यज्ञ के उपरान्त शेष का उपभोग करने वाला ही सच्चे अर्थों में भोग करता है।

सन्त कबीरदास जी ने कहा है :-

ज्यों जल बाढ़े नाव में घर में बाढ़े दाम।

दोऊ हाथ उलीचिए यही सयानो काम॥

अर्थ की शुद्धि के लिए दान आवश्यक है। जिस तरह बहता हुआ पानी शुद्ध रहता है उसी तरह धन भी गतिशील रहने से शुद्ध होता है। पैदा करना और उसे शुभ कार्यों में लगा देना अर्थ शुद्धि के लिए आवश्यक है। यदि उसका संग्रह ही एक मात्र होता रहेगा तो सम्भव है एक दिन उस नाव की तरह मनुष्य को डुबो देगा जिसमें पानी भर जाता है। नाव का पानी न उलीचा जाय तो निश्चय ही वह डूब जायगी। धन के संग्रह से भी अनेकों व्यक्तिगत और सामाजिक बुराइयाँ पैदा हो जाती हैं जिनसे बोझिल होकर मनुष्य कल्याण पथ से भटक जाता है, जीवन की राह पर फिसल पड़ता है। इसीलिए कमाने के साथ-साथ धन को दान के माध्यम से परमार्थ में उन्मुक्त होकर लुटा देने का आदेश हमारे शास्त्रकारों ने दिया है।

दान समाज की आर्थिक विषमताओं को दूर कर जन जीवन में समत्व पैदा करने की रचनात्मक प्रणाली है। तथाकथित साम्यवाद में जहाँ गरीब अभावग्रस्त लोगों द्वारा धनवानों से बलपूर्वक पूँजी छीन लेने का विधान है वहाँ दान पूँजीपति को, धनवान को ही अपना धन अभावग्रस्त जरूरतमंदों को लुटा देने की प्रेरणा देता है। हम जो कुछ भी कमाते हैं, प्राप्त करते हैं उसे अपने लिए ही न सँजोकर, जब समाज के हितार्थ उसका उत्सर्ग करने में कंजूसी न करेंगे, तो फिर संघर्ष का प्रश्न ही कहाँ रहेगा? उल्टे परस्पर सद्भावना, आत्मीयता को बढ़ावा मिलेगा जब कि साम्यवादी ढंग से पूँजी छीनने के प्रयत्न में जनसमाज एक संघर्ष के दौर से गुजरता है, उसमें एक पक्ष को नष्ट होना ही पड़ता हैं। फिर भी संघर्ष की जड़ें और गहरी बनती जाती है। हमारे पूर्वज दूरदर्शी मनीषियों ने बहुत पहले ही उस सामाजिक समस्या का, जो अर्थ प्रधान है, दान के रूप में हल निकाल लिया था। हम जो कुछ भी कमावें, उसका एक निश्चित भाग तो दान के रूप में अवश्य ही खर्च कर दें ऐसा विधान उन्होंने बनाया। इस तरह दान सामाजिक संघर्ष को ही नष्ट कर देता है।

शास्त्रकार ने कहा है-

“दाने न भूतानि वशी भवन्ति,

दाने न वैराण्यपियान्ति नाशम।

परोपि बन्धुत्वमुपैति दानै,

दानं हि सर्व व्यसनानि हन्ति॥”

“दान से सभी प्राणी वश में हो जाते है। दान से शत्रुता का नाश हो जाता है। दान से पराया भी अपना बन जाता है। अधिक क्या कहें, दान से सभी विपत्तियों का नाश हो जाता है।”

सच है, जब हम अनावश्यक संग्रह न करके सामाजिक विषमता ही न रहने देंगे तो फिर संघर्ष किस बात का? जब हमारे पास जो कुछ है, उसका समाज के लिए उन्मुक्त भाव से दान करेंगे तो फिर शत्रुता, परायापन किसी से हानि पहुँचने की सम्भावना ही क्यों रहेगी? इसीलिए दान का विधान किया गया होगा। देखा जाय तो समाज में शत्रुता, द्वेष भाव, संघर्ष का मूल कारण अर्थ है। यदि आर्थिक व्यवस्था सन्तुलित और स्वस्थ हो तो सामाजिक अशान्ति, संघर्ष आदि बहुत बड़ी मात्रा में कम हो जायें। इसमें कोई सन्देह नहीं कि दान समाज में आर्थिक सन्तुलन पैदा करने, विषमतायें दूर करने का रचनात्मक विधान है।

दान धन को गतिशील सामर्थ्यवान बनाता है। जिस टंकी से पानी निकाला ही न जायगा उसमें आने वाला पानी का स्त्रोत भी ठण्डा पड़ जायेगा। जब पानी वितरित होता रहता है तभी टंकी में जल आने की गुंजाइश रहती है। इसी तथ्य को व्यक्त करते हुए स्वामी रामतीर्थ ने कहा है- “ दान देना ही आमदनी का एकमात्र द्वार है।” सचमुच जहाँ दिया नहीं जाता, खर्च नहीं किया जाता वहाँ धीरे-धीरे आमदनी के मार्ग भी बन्द हो जाते हैं, यह प्रकृति का एक महत्वपूर्ण नियम है। आमदनी का स्त्रोत उन्मुक्त भाव से उन्हीं के लिए खुला रहता है जो दान करते हैं। उसे समाज के लिए खर्च करते हैं।

दान व्यावहारिक जीवन में एक ऐसी साधना पद्धति है कि उसके माध्यम से हम अपने आप में अनेकों आध्यात्मिक, मानसिक, चारित्रिक गुण, विशेषताओं का अर्जन कर सकते हैं। विक्टर ह्यूगो ने कहा है “ज्यों-ज्यों धन की थैली दान में खाली हो जाती है त्यों-त्यों दिल भरता जाता है।” क्या दान के बाद मिलने वाला सन्तोष, प्रसन्नता का धन भौतिक सम्पत्ति से कम मूल्यवान है? स्वामी विवेकानन्द अमेरिका प्रवास में थे। एक दिन की बात है वे अपना भोजन बनाकर ही चुके थे कि बच्चों की एक टोली हँसती -खेलती आ निकली। स्वामी जी से नहीं रहा गया और उन्होंने सब बच्चों को अपने पास बैठाकर सारा भोजन खिला दिया जो उन्होंने बनाया था। एक अन्य सज्जन जो यह सब देख रहे थे, बोले “स्वामी जी आप तो अब भूखे ही रह गये।” स्वामी जी ने कहा- “इन बच्चों को भोजन कराकर जो तृप्ति मुझे हुई है वह उस भोजन से कभी भी नहीं हो पाती” सचमुच दान के द्वारा एक बहुत बड़ा आत्मसन्तोष, प्रसन्नता, आन्तरिक सुख मिलता है जिसका मूल्य किसी भी भौतिक सम्पत्ति से कहीं अधिक होता है, उस पाषाण हृदय को जो सम्पदा जोड़-जोड़ कर रखता जाता है। क्या मालूम कि दान में कितना अलौकिक आनन्द निहित है। दान अपने आप में आत्मकल्याण की एक साधना है। सचाई, ईमानदारी से धन कमाना और उसे जन कल्याण के लिए लुटा देना क्या कम तपस्या है?

दान एक बहुत बड़े सामाजिक कर्तव्य की पूर्ति है। समाज की भूख शान्त करने का विधान है दान। समाज में एक ऐसा वर्ग होता है जो अपना सम्पूर्ण जीवन समाज को परिपुष्ट करने, उसे आवश्यक मार्गदर्शन करने, उसे शक्तिशाली समृद्ध और शिक्षित बनाने में लगा देता है। इस तरह के परमार्थजीवी व्यक्ति जब लोक संग्रह, अर्थोपार्जन में न लगकर इन पुण्य कार्यों में लगे रहते हैं तो निश्चित उन्हें अभावग्रस्त रहना पड़ेगा। इसलिए समाज का उत्तरदायित्व है कि वह इनके अभाव की पूर्ति करें ऋषियों ने व्यावहारिक जीवन में इसीलिए दान परम्परा को स्थायी बनाया था कि इन पुण्यजीवी लोगों का निर्वाह समाज करता रहे और वे समाज को परिपुष्ट, समर्थ, शक्तिशाली बनाने में पूरा-पूरा योगदान देते रहें। वस्तुतः परोपकार में लीन कर्मवीर मानव ज्ञान की बुद्धि के लिए एकाग्र तत्वज्ञानी, विद्याज्ञान में रत विद्वान्, कला-काव्य की साधना में निमग्न कलाकार, देश को एक सूत्र में बाँधकर उन्नति प्रगति की ओर अग्रसर करने वाले राजनीतिज्ञ की अभावग्रस्तता समाज की भूख है इसे तृप्त करना समाज का उत्तरदायित्व है। यदि ये लोग इन महान कार्यों को छोड़ कर जन साधारण की तरह अपने पेट पालन में लगे रहेंगे तो समाज का विकास रुक जायगा। ये लोग जनकल्याण के लिए अपनी साधना निश्चिन्त होकर जारी रख सकें इसके लिए आवश्यक है कि समाज उनका निर्वाह, भरण पोषण करता रहे। दान की परम्परा इसीलिए कायम हुई। इन लोगों का निर्वाह करना ठीक समाज की ही भूख बुझाता है। जब इनके माध्यम से समाज के पेट में दिया गया दान पाचन होकर रस रूप में परिवर्तित होता है, वह समाज के ही अंग-अंग में समा जाता है। यह समाज को ही पुष्ट करता है।

दान से एक और बहुत बड़ा जन कल्याण का काम होता है। वह समाज के अनेकों अभावग्रस्त, अपाहिज, दीन-हीन, वृद्ध लोगों को दान के माध्यम से जीवन मिलता है। किसी भी समाज में सभी तो कमाने की स्थिति में नहीं होते, अस्तु दान समाज के दुर्बल अंग को जीवन देता है। यदि संसार में चल रही दान व्यवस्थायें बन्द कर दी जायें तो मानव समाज के एक बहुत बड़े अंश को नष्ट हो जाने के लिए मजबूर होना पड़े।


विवाह एक व्रत है- एक संकल्प भी।

मनुष्य जीवन की पूर्णता पाणिग्रहण-संस्कार के बाद प्रारम्भ होती है। जब तक मनुष्य अकेला रहता है, तब तक वह अपूर्ण रहता है, उसका जीवन स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों में ही बीतता है। नैतिक जीवन के जो संस्कार मनुष्य में बाल्यावस्था में पड़ते है उनका विकास गृहस्थ जीवन में ही होता है। प्रेम और निष्ठा, तप और त्याग, श्रम और पालन, शील और सहिष्णुता आदि सद्गुणों का उन्नयन पूर्ण रूप से गृहस्थ जीवन में ही होता है। गृहस्थी मनुष्य की सर्वांगपूर्णता का विद्यालय है और विवाह उसका प्रवेश। जिस प्रकार शिक्षा की प्रारम्भिक नींव विद्यार्थी के लिये अधिक महत्वपूर्ण होती है उसी प्रकार गृहस्थ जीवन के सुचारु संचालन के लिये विवाह की परम्परा भी बड़े महत्व की होती है। इस उद्देश्य की स्मृति दिलाने के लिये वेद ने पाणिगृहीत पुरुष से कहाया है-

गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मयापत्या जरदष्टिर्यथासः। भगोऽर्य्यमा सविता पुरन्धिर्मह्मं त्वादुर्गार्हपत्या देवाः॥

“हे प्रियतमे! जीवन के इस पुण्य पर्व पर मैं देवताओं की सुखद साक्षी में तुम्हारा हाथ अपने में लेता हूँ। हे सुहागिनि! तुम चिरकाल तक मेरे साथ सौभाग्यशालिनी बन कर रहो। मैं अपनी गृहस्थी का संचालन तुम्हारे हाथ में देता हूँ, सुखपूर्वक इसका निर्वाह करो।”

वह समय सचमुच कितना सुखद होता है, जब मनुष्य देवताओं की साक्षी में उपर्युक्त व्रत धारण करता है। मनुष्य का एकाकीकरण उसकी उदासीनता समाप्त होती है और एक ऐसे जीवन का सूत्रपात होता है जिसमें वह अपने जीवन-ध्येय की प्राप्ति के सभी साधन प्राप्त कर लेता है।

उस दिन मनुष्य का क्षेत्र विभाजन होता है। पुरुष आजीविका और उदर पोषण के सात्विक कर्मों में लगता है और स्त्री गृह कार्य सम्भालती है। इन कार्यों में विवेक, सत्यनिष्ठा और विचार से ही गृहस्थ जीवन सफल होता है। रस्म के रूप में केवल भाँवरें डालकर अस्त−व्यस्त गृहस्थ जीवन बिताना भारतीय परम्परा के सर्वथा प्रतिकूल है। हमारे सिद्धांत ऐसे है जिनमें विवाह जीवन की अग्नि परीक्षा का प्रारम्भ है अतः इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने से ही गृहस्थ जीवन सार्थक हो सकता है।

त्याग और तपस्या की यह भूमिका भी बड़ी सुखदायी होती है। मनुष्य यदि विवाह काल में किये गये संकल्पों का पालन करता रहे तो सचमुच गृहस्थ जीवन में स्वर्गीय सुख का वातावरण उत्पन्न कर सकता है। पत्नी साक्षात् लक्ष्मी स्वरूप होती है। इस धन, इस लक्ष्मी के अभाव में मनुष्य का जीवन नीरस व निष्प्राण ही बना रहता है। प्रणयी का यह कथन किसी भाँति असत्य नहीं कि-

असोऽमस्मि मात्वं मात्वमस्यमोऽहम्।

सामाहमस्मि ऋक् त्वं द्यौरहं पृथ्वी त्वम्॥

“तुम लक्ष्मी हो। मैं तुम्हारे बिना दीन था। सत्य ही तुम्हारे बिना उस जीवन में कुछ भी सुख न था। सौम्ये! हमारा सम्मिलन साम और उसकी ऋचा, धरती और आकाश के समान है। “

उपर्युक्त शब्दों में सृष्टा ने विवाह की सबसे महत्वपूर्ण व्याख्या की है। विवाह का प्रश्न किसी व्यक्ति का प्रश्न नहीं वह सम्पूर्ण समाज से सम्बद्ध है। इसलिये उन विवाहों को, जो व्यक्ति और समाज के हित को विचार करके न किये गये हों, दोषयुक्त ही मानना चाहिए।

सुख प्राप्ति की आकांक्षा केवल भोग-विलास से पूरी नहीं होती। मनुष्यत्व का विकास भोग से नहीं संयम से होता हैं। इसलिये विवाह का हेतु भी भोगेच्छा की पूर्ति नहीं हो सकती। राष्ट्र की सम्पत्ति, श्रेष्ठ नागरिकों के जन्म देने के लिए संयमित जीवन जीने की जो शर्त लगा दी गई है, उससे विवाह का हेतु भोग-विलास कदापि नहीं हो सकता। विवाह एक संकल्प है जो राष्ट्र के भावी बल सत्ता और सम्मान को जागृत रखने के लिये लिया जाता है।

शास्त्रकार का कथन है :-

तावेहि विवहावहै सह रेतो दधावहै।

प्रजाँ प्रजनयावहै पुत्रान् विन्दावहै बहून्॥

अर्थात् “विवाह का उद्देश्य परस्पर प्रीति युक्त रह कर राष्ट्र को सुसन्तति देना है।” ऐसी परम्परा को जीवित रखने के लिये ही “पाणिग्रहण” को संस्कार का रूप दिया जाता है। किंतु आज जो पद्धति अपनाई जा रही है उसमें बहुधा कोई उद्देश्य नहीं होता। बाल-विवाह की प्रथा से तो और भी अनर्थ होता है। अल्पव्य के किशोर बालक जिन्हें यह ज्ञात नहीं होता कि विवाह एक व्रत है, दाम्पत्य-जीवन को खिलवाड़ में ही बिताते हैं। फलस्वरूप अनेकों तरह की सामाजिक कुरीतियाँ, अनर्थ और अनैतिकता का ही प्रसार होता है।

प्रेम-विवाह की आधुनिकतम परम्परा भी सोद्देश्य नहीं, एक आवेश मात्र है जिसके परिणाम कुछ दिन में बड़े ही भयानक निकलते हैं। असफल ग्रहण और तलाक के अधिकाँश मामले प्रेम-विवाह वालों में ही पाये जाते हैं। ऐसे विवाह चंचलता और उच्छृंखलता पर अधिक आधारित होते है जो आजीविका या विचार-वैषम्य की गम्भीर परिस्थिति आते ही मनुष्य को इस तरह बर्बाद करते हैं कि उसकी तमाम शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं।

ऐसे विवाह केवल आकर्षण से होते हैं। प्रेम को आकर्षण नहीं कह सकते। इस दृष्टि से इन विवाहों को आकर्षण-विवाह कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। यह आकर्षण सौंदर्य या धन के लिये होता है जिसमें स्थिरता नहीं होती, इसलिये इन विवाहों का प्रचलन भी हमारे समाज के अहित का कारण है।

बेमेल, बाल या आकर्षण विवाहों की पद्धति भारतीय नहीं है। इन्हें एक सामाजिक अभिशाप ही कहा जा सकता है। इनसे विवाह की पवित्रता, विवाह के संकल्प का लक्ष्य पूरा होना तो दूर रहा, अनेकों अनर्थ और उपद्रव ही खड़े बने रहते हैं।

यह अनियमिततायें देश काल परिस्थिति और बाह्य-संस्कृति के प्रवेश के कारण उत्पन्न हुई है इसलिये ये परिवर्तनीय है।

सही पद्धति वह है जिसमें व्यक्ति और समाज के स्वास्थ्य, बली, शारीरिक-बौद्धिक और मानसिक उन्नति, मनुष्य जाति की चिरन्तनता, स्फूर्ति, एकता, तेजस्विता, प्रसन्नता और चिरस्थायी सुख का विचार किया जाता है। विचार-हीन पद्धति चाहे वह नयी हो या पुरानी, उसे प्रमाण मान लेना हमारी सबसे बड़ी भूल है। हमें इन परम्पराओं की तुलना में विवेक का आश्रय लेना अधिक उचित प्रतीत होता है।

सफल वैवाहिक परम्परा वह है जिसमें इन्द्रिय-लालसा और भोग-भाव मर्यादित रहे, भावों में शुद्धि रहे। संयम से त्याग की ओर मनुष्य की प्रवृत्ति हो। संतानोत्पत्ति से वंश-रक्षा, प्रेम की पूर्णता में पारिवारिक सरलता और उल्लास के द्वारा गृहस्थ की पवित्रता ही विवाह का सही दृष्टिकोण होना चाहिये। दूसरों के हित के लिये त्यागमय जीवन का अभ्यास और अंत में जीवन सिद्धि ही विवाह का पवित्र उद्देश्य होना चाहिये।

हिंदू-विवाहों की आर्ष परम्परा पूर्ण वैज्ञानिक थी, उस में आज की तरह स्त्री-पुरुष का भेदभाव न किया जाता था। पुरुष को अधिक श्रेष्ठ और नारी को अपवित्र मानना, कलंकित ठहराना, यह इस युग का सबसे बड़ा दूषण है। हमारे यहाँ विवाहों में पत्नी का समाद्दत स्थान है। इनमें से एक को प्रमुख और दूसरे को गौण मानने की नीति अज्ञानी लोगों की चलाई है। स्त्री-पुरुष का संयोग ही पारिवारिक विकास का मूल है। इस नैसर्गिक प्रवृत्ति की पूर्ति के लिए भेद-भाव की परम्परा असामाजिक है, इसको दूर किया ही जाना चाहिए।

मंगल-मय जीवन का सूत्राधार है-

ते सन्तु जरदृष्टयःसम्प्रियो रोम्यंष्मू सुमनष्यमानी। पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शतं श्रृणुयाम् शरदः शतम्॥

“हम सौंदर्य युक्त होकर परस्पर प्रीति पूर्वक जीवनयापन करें। हमारी भावनायें मंगलकारक हों। हम सौ वर्ष देखें, सौ वर्ष जियें और सौ वर्ष तक जीवन के संगीत का मधुर राग सुनते रहे।” नीतिकार ने उपयुक्त वचनों में स्पष्ट कर दिया है कि सुखमय गृहस्थी का आधार स्त्री-पुरुष की एकता, आत्मीयता और प्रेम भावना है। इसके लिये विवाह को कौतुक नहीं, एक व्रत मानना है और उसे ज्वलन्त संकल्प की भाँति जीवनपर्यन्त धारण किये रहना है, पारिवारिक सुदृढ़ता की यही सर्वांगपूर्ण भूमिका है।


निराशा से दूर ही रहिए

रात और दिन की तरह मनुष्य के जीवन में आशा, निराशा के क्षण आते जाते रहते हैं। आशा जहाँ जीवन में संजीवनी शक्ति का संचार करती है, वहाँ निराशा मनुष्य को मृत्यु की ओर ले जाती है, क्योंकि निराश व्यक्ति जीवन से उदासीन और विरक्त होने लगता है। उसे अपने चारों ओर अंधकार फैला हुआ दीखता है। एक दिन निराशा आत्महत्या तक के लिए मजबूर कर देती है मनुष्य को, जब कि मृत्यु के मुँह में जाता हुआ व्यक्ति भी आशावादी विचारों के कारण जी उठता है। श्रेयार्थी को निराशा की बीमारी से बचना आवश्यक है अन्यथा यह तन और मन दोनों को ही नष्ट कर देती है।

निराशा का बहुत कुछ सम्बन्ध मानसिक शिथिलता में भी होता है, जो किसी बीमारी या शरीर की गड़बड़ी से पैदा हो जाती है। कभी कई अप्रत्यक्ष रूप से भी शरीर की आन्तरिक स्थिति में परिवर्तन होते रहते है और उनका प्रभाव मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। शरीर की तनिक-सी गड़बड़ी का प्रभाव भी मन पर पड़ता है। किसी बीमारी के बाद भी अक्सर हममें निराशा-भावना हो सकती है। कभी कभी कब्ज, गंदी वायु, विश्राम का अभाव, दौड़−धूप का जीवन आदि के कारण भी निराशा, उदासीनता पैदा हो जाती है।

लेकिन उपर्युक्त बातें ऐसी है जिन्हें सरलता से एक सामान्य ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी ठीक कर सकता है। अपने स्वास्थ्य का सुधार, व्यवस्थित संतुलित जीवन, प्राकृतिक पदार्थों का अवलम्बन लेकर निराशा के इन दुःखों को सरलता से दूर किया जा सकता है। स्वास्थ्य ठीक होते ही मन भी स्वस्थ हो जाता है। फिर उस पर ऐसे निषेधात्मक प्रभाव नहीं होते।

कई बार निराशा का सम्बन्ध मनुष्य की अनुभूतियों से उत्पन्न प्रतिक्रिया या अंतर्मन में छिपा हुआ असंतोष अशाँति आदि होते हैं। कइयों की मानसिक स्थिति बड़ी जटिल होती है। निम्न बातों का ध्यान रखकर निराशा से बचा ही नहीं जा सकता, उसे सर्वथा दूर भी किया जा सकता है।

हमारी निराशा का बहुत कुछ कारण होता है- यथार्थ को स्वीकार न करना, अपनी कल्पना और मनोभावों की दुनिया में रहना। यह ठीक है कि मनुष्य की कुछ अपनी भावनायें, कल्पनायें होती हैं किंतु सारा संसार वैसा ही बन जायगा यह सम्भव नहीं होता। हाँ अपनी अलग बात है। किंतु दूसरे भी वैसा ही करने लगें वैसे ही बन जाय यह कठिन है। यह ठीक इसी तरह है जैसे कोई व्यक्ति चाहे रात न हो केवल दिन ही दिन रहे या बरसात होवे नहीं। संसार परिवर्तनशील और वैभिन्यपूर्ण है। अपने मत से भिन्न व्यक्ति का भी संपर्क होता है धरती पर मनुष्य के न चाहने पर भी बुढ़ापा, मृत्यु, संयोग-वियोग लाभ-हानि के क्षण देखने पड़ते हैं।

जीवन जैसा है उसी रूप में स्वीकार करने पर ही यहाँ जीवित रहा जा सकता है। यथार्थ का सामना करके ही आप जीवन-पथ पर चल सकते हैं। ऐसा हो नहीं सकता कि जीवन रहे और मनुष्य को विपरीतताओं का सामना न करना पड़े। यदि आप जीवन में आई विरोधी परिस्थितियों से हार बैठे है, अपनी भावनाओं के प्रतिकूल घटनाओं से ठोकर खा चुके हैं और फिर जीवन की उज्ज्वल सम्भावनाओं से निराश हो बैठे हैं तो उद्धार का एक ही मार्ग है- उठिए और जीवनपथ की कठोरताओं को स्वीकार कर आगे बढ़िए। तभी कहीं आप उच्च मंज़िल तक पहुँच सकते हैं। जीना है तो यथार्थ को अपनाना ही पड़ेगा। और कोई दूसरा मार्ग नहीं है जो बिना इसके मंजिल तक पहुँचा दे। कई बार अप्रिय बातों को अक्सर हम रोक नहीं सकते।

बहुत से व्यक्ति अपने बीते हुए जीवन की गलतियाँ, अपमान, हानि, पीड़ाओं का चिन्तन करके निराश हो जाते हैं। और कई भविष्य के खतरों की कल्पना करके अवसादग्रस्त हो जाते है। लेकिन यह दोनों ही स्थितियाँ मानसिक अस्वस्थता के चिह्न है। जो बातें हो चुकीं, जो घटनाएं बीत गई, उन पर विचार करना, उन्हें स्मरण करना उतनी ही बड़ी भूल है, जितना गड़े मुर्दे उखाड़ना। जो बातें बीत चुकीं उन्हें भुला देने के सिवा और कोई रास्ता नहीं है। इसी तरह भविष्य की भयावह तस्वीर बना लेना भी भूल है। कई बार वे बातें होती ही नहीं जिनकी हम पहले से कल्पना करके परेशान होते रहते हैं। आगे क्या होगा यह तो भविष्य ही बतायेगा किंतु निराशा से दूर रहने और जीवन को सरस आशावादी बनाये रखने का यह मार्ग है कि भविष्य के प्रति उज्ज्वल सम्भावनाओं का विचार किया जाय। प्रसन्नता और सुख के जो क्षण आवें उनका पूरा-पूरा उपयोग किया जाये। सुखद-भविष्य की कल्पनायें मानस-पटल पर संजोयी जायें।

यह हो नहीं सकता कि किसी व्यक्ति के जीवन में केवल परेशानियाँ ही आये, अन्धेरा ही हो। जीवन में उज्ज्वल पक्ष भी होता है। हम इस उज्ज्वल पक्ष को देखें। इस पर विचार करें तो निराशा पास नहीं फटक सकती। लेकिन हम जीवन के अंधेरे पहलू को ही सामने रखकर विचार करते हैं और फलस्वरूप निराशा ही हाथ लगती है।

निराशा का मनुष्य के दृष्टिकोण से अधिक सम्बन्ध होता है। जैसी उसकी भावनाएँ होती है वैसी ही उसको प्रेरणाएँ भी मिलती हैं। जिनका दृष्टिकोण भावनाएँ स्वार्थप्रधान होती हैं, जो अपने ही लाभ के लिये जीवन भर व्यस्त रहते हैं, उन्हें निराशा, असंतोष अवसाद ही परिणाम में मिलता है, यह एक बहुत बड़ा मनोवैज्ञानिक सत्य है। जिनके जीवन में परमार्थ, सेवा, जन-कल्याण की भावनायें काम करती हैं उनमें आशा, उत्साह, प्रसन्नता की धारा निसृत होती रहती है। अतः हम दूसरों की सेवा करके, जरूरतमंदों की मदद करके, दूसरों के लिए भले काम करके, निराशा से पीछा छुड़ा सकते हैं। परमार्थ-जीवी व्यक्तियों के जीवन में कभी निराशा पैदा नहीं होती, यह उतना ही सत्य है जितना सूर्य अपनी यात्रा से कभी नहीं थकता। बड़े से बड़ा स्वार्थ सिद्ध होने पर भी मनुष्य को जीवन में एक अभाव महसूस होता है और उससे प्रेरित निराशा, अवसाद उसे ग्रस्त कर लेते हैं। स्वार्थ प्रधान जीवन ही निराशा के लिए उर्वरक क्षेत्र होता है।

किसी बँधे बँधाये खास ढर्रे पर चलते रहने से भी निराशा उत्पन्न हो जाती है। अक्सर सरकारी नौकरी से निवृत्त होने वालों में से बहुत से जीवन के अंतिम दिन बड़ी निराशा में बिताते है। इसी तरह केवल अपने रोज़गार में या किसी अन्य काम में एकाकी लगे रहने पर जीवन से ऊब पैदा हो जाती है और फिर यही निराशा का कारण बन जाता है। जीवन-निर्वाह के लिये हम कुछ भी काम करें यह बुरा नहीं है किंतु जीवन की अन्य प्रवृत्तियों को कुण्ठित कर लेना निराशा के लिए जिम्मेदार है। कला, संगीत, साहित्य, खेल, मनोरंजन, सामाजिक संपर्क, यात्रा, तीर्थाटन, धार्मिक कृत्य आदि जीवन के अनेक पहलू है जिन्हें अपने दैनिक-क्रम में स्थान देना आवश्यक है।

निराशा का सम्बन्ध अपने बारे में बहुत ज्यादा सोचते रहने से भी है। क्योंकि इससे अपराध भावना जोर पकड़ती है। मनुष्य अपने आपको अपराधी, कुकर्मी, पाप करने वाला समझता है। यों हर मनुष्य अपने जीवन में कभी-न-कभी बुराइयाँ कर बैठता है। बुरे काम हो जाते हैं। लेकिन यह एक मानसिक कमज़ोरी है कि हम अपनी बुराइयों पर अधिक सोच विचार करने लग जाते हैं। इससे बचपन में भूलवश किये गये मामूली कुकर्म भी भारी अपराध जान पड़ते हैं और हम अपने आपको एक बहुत बड़ा अपराधी समझने लगते है। इससे मनुष्य का मन गिर जाता है, हीनता की भावना पैदा होती है और फिर निराशा धर दबाती है। अपने बारे में अधिक सोच विचार न करें। जीवन को एक खेल समझकर जियें जिसमें भूल भी हो सकती है। हार भी होती है तो जीत भी। बचपन के कुसंग, अज्ञान प्रेरित भूलों के कारण भविष्य में होने वाले महापुरुष भी बड़ी-बड़ी बुराइयाँ कर सकते है। अज्ञान नासमझी की अवस्था में कुछ भी होना सम्भव है। समझ आने पर उसे दूर भी किया जा सकता है। किंतु एक सामयिक गलती को जीवन भर रटते रहना अपने मनोबल को क्षीण करना है और उससे फिर निराशा ही पल्ले पड़ सकती है।


जीवन संग्राम में पुरुषार्थ की आवश्यकता

यह संसार और मानव-जीवन संघर्षमय है। संघर्ष ही इनका स्वभाव है। जीवन भर मनुष्य को कुछ न कुछ करना ही पड़ता है। बिना संघर्ष के जीवन पथ पर एक कदम भी आगे बढ़ना सम्भव नहीं होता। गति का अभाव ही मृत्यु है। जो जीवन में विशेष सफलतायें अर्जित करना चाहते हैं, उन्हें तो और भी अधिक संघर्ष करना पड़ता है। कोई व्यक्ति चाहे कि मैं संघर्षशून्य जीवन बिता लूँ तो यह असम्भव है। इस संसार की बनावट ही कुछ ऐसी है जहाँ संघर्षहीन व्यक्ति को एक ही रास्ता है विनाश और पतन का। क्योंकि संघर्ष से बचकर भागने से एक ओर तो जीवन-निर्वाह की गति का ही क्षय होने लगता है, दूसरे बुराइयों की विरोधी शक्तियों को प्रोत्साहन मिलता है जो मनुष्य को शाँत और चुपचाप नहीं बैठने देती। इसलिए मनुष्य के सामने सम्मान सहित जीवित रहने का एक ही मार्ग है संघर्ष का, मुकाबला किया जाय पूरी शक्ति, साहस और दृढ़ता से। इस तरह के सजीव प्रयत्न को पुरुषार्थ कहते हैं। पुरुषार्थ ही जीवन का मूल मंत्र है। यही मनुष्य का सच्चा सहायक है-

अभिमानवतो मनस्विनः प्रियमुच्चैः पद्धासरुक्षतः।

विनिपात निवर्त्तनक्षमं मतमालम्बनमात्म पौरुषम्॥

“उन्नति के पद को प्राप्त करने के इच्छुक, सम्मानयुक्त धीर पुरुष आपत्ति निवारण करने में समर्थ अपने पुरुषार्थ का आश्रय लेना ही उचित मानते हैं। पुरुषार्थ ही शूरवीरों का सच्चा सहायक होता है।”

पुरुषार्थी सफलता के लिए किसी के सहारे या भाग्य कृपा की प्रतीक्षा नहीं करता वह कहता है -

कृतं में दक्षिणे हस्ते जयो में सव्य आहितः।

गोजिद् भूयासमश्वजिद् धनंज्यों हिरण्यजित्॥

“दाहिने हाथ में मैं अपना पुरुषार्थ लिए हूँ और बाँये हाथ में सफलता। प्रभु कृपा से, अपने परिश्रम से गोधन अश्वधन स्वर्ण आदि का विजेता मैं स्वयं ही होऊँ।”

जिसमें पूरी शक्ति से काम करने की दृढ़ लगन है उसके मार्ग में चाहे कितना प्रबल विरोध का प्रवाह आये, वह उसकी गति को अवरुद्ध नहीं कर सकता, पीछे नहीं हटा सकता। आप आगे बढ़ने का प्रयत्न जितनी दृढ़ता के साथ करेंगे। सफलता उतनी ही आपके समीप आती जायगी। पुरुषार्थ सब अभावों की पूर्ति करता है। इसीलिए कहा है- “उद्योगे नास्ति दारिद्रयम्” पुरुषार्थ करने पर दरिद्रता नहीं रहती। महर्षि वेदव्यास ने कहा है-

तथा स्वर्गश्च भोगश्च निष्ठाया च मनीषिता।

सर्व पुरुष कारेण कृते नेहोपलभ्यते ॥

“पुरुषार्थी को स्वर्ग, भोग, धन में निष्ठा, बुद्धिमत्ता इन सबकी उपलब्धि होती है।”

आप में योग्यता की कितनी ही कमी हो, यदि आप में वह शक्ति है जो किसी भी निर्दिष्ट लक्ष्य से हटना नहीं जानती, जो कार्य आपने शुरू किया है उसे छोड़ना नहीं जानती तो आप एक दिन सफलता की मंजिल तक पहुँच ही जाएँगे। इसके विपरीत काफी योग्यता रखते हुए भी शिथिल प्रयत्न, अधूरे मन से काम में लगने वाले, असफल हों तो इसमें किसी का क्या दोष।

कई लोग बड़े-बड़े काम करना चाहते हैं। बड़ी-बड़ी योजनायें बनाते है, भविष्य का महान नक्शा खींचते हैं किंतु उसके लिए उतना प्रयत्न नहीं करना चाहते। जितनी शक्ति और प्रयत्न की आवश्यकता होती है उतना नहीं लगाते। फलस्वरूप उन्हें पूर्ण सफलता भी प्राप्त नहीं होती-

अर्थों वा मित्र वर्गों वा ऐश्वर्य या कुलान्वितम्।

श्रीश्चापि दुर्लभा भोक्तुँ तथैवा कृतकर्मभिः॥

स्मरण रहे जितना हम पुरुषार्थ करेंगे उतनी ही सफलता के हम भागीदार होंगे। जितना गुड़ डाला जाता है उतनी मिठास बढ़ती जाती है। सिंह जब अपने शिकार पर झपटता है तो पहले धनुष की तरह पीछे की ओर तनता है और फिर सम्पूर्ण वेग से उछल जाता है। हम किसी भी काम में जितना जोर मारेंगे, उतनी ही हमारी गति तीव्र होगी। जो लोग अपने काम में पूरी शक्ति का उपयोग नहीं करते, पूर्ण पुरुषार्थ नहीं करते वे प्रायः असफल ही होते हैं।

कई बार लोग उपयुक्त अवसर तथा बाहरी सहायता की ताक में बैठे रहते हैं। लेकिन ऐसे लोगों के लिए न तो उपयुक्त अवसर आता ही है और न किसी की सहायता ही मिलती है। जो अपनी शक्ति का उपयोग नहीं करता स्वयं पुरुषार्थ नहीं करता, उसकी सहायता कौन करेगा? न इस तरह की मनोवृत्ति से सफलता ही मिलती है। सफलता तो प्रयत्नशील व्यक्तियों को ही मिलती है। नीतिकार ने कहा है-

उद्यमेन हि सिद्धयन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

उद्यम अर्थात् पुरुषार्थ से ही सम्पूर्ण कार्य सफल होते हैं, मनोरथों से नहीं। किसी काम के बारे में कल्पना कर लेना ही पर्याप्त नहीं होता, उसके लिए पूरी मेहनत करनी पड़ती है। ऐसे लोग जो अपने भाग्य या अवसर की प्रतीक्षा में बैठे रहते है वे असफलता की तैयारी और अपनी शक्तियों को कुँठित कर देने के सिवा कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाते। यदि अपवादस्वरूप किसी को कुछ सफलता प्राप्त हो भी जाय तो वह टिकाऊ नहीं होती। और यह भी निश्चित है जिन्हें स्वयं कुछ करने का विश्वास नहीं, उन्हें सहायता के कितने ही अवसर आयें वे उनसे लाभ नहीं उठा सके। सफलता प्राप्त करने वाले दूसरे ही होते हैं, जो अपने साहस और पुरुषार्थ का सहारा लेकर चलते हैं। वे किसी का मुँह नहीं ताकते, भाग्य की कृपा या अवसर की प्रतीक्षा में नहीं बैठते। जो काम हाथ में लेते हैं उसे प्राणपण से पूरा-पूरा करने में जुट जाते हैं। चाहे कितनी ही बाधायें आयें उनके मार्ग में वे आगे बढ़ते ही जाते हैं। बहानेबाजी आलसियों का अवलम्बन है। जो काम करने से जी चुराते हैं, वे भाग्य और अवसर तथा किसी के सहारे की आशा लगाये बैठे रहते हैं।

पुरुषार्थ ही जीवन है। इसका अभाव ही मृत्यु है। पुरुषार्थहीन व्यक्ति जीवित रहते हुए भी मरे के ही समान होता है-

विपदोऽभिभवन्त्य विक्रमं रहयत्या पदुपेतमायतिः।

नियता लघुता निरातेरगरीयान्न पदं नृपद्मियः॥

“पुरुषार्थहीन व्यक्ति को विपत्तियाँ आक्रान्त कर लेती हैं और विपत्तियों से ग्रस्त होने पर उसकी भावी उन्नति रुक जाती है जिससे उसका गौरव नष्ट हो जाता है। गौरव नष्ट होने पर राज्यश्री के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता जिसका वह आश्रय ले सके।”

वस्तुतः विपत्तियों से घिरे हुए आश्रयहीन साथ ही पुरुषार्थहीन व्यक्तियों के लिए जीते हुए भी मरण का सा दुःख सहना पड़ता है।

अक्सर लोग गलत चिन्तन और अकर्मण्यता के कारण भाग्य के भरोसे बैठे रहते हैं। उसकी मनौतियाँ करते रहते हैं किन्तु भाग्य की अपनी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। न भाग्य मनुष्य को परवश पशु की तरह ही हाँकता है। हमारा पूर्व पुरुषार्थ ही आज का भाग्य बन कर आता है और आज का पुरुषार्थ भावी भाग्य रेखायें खींचता हैं। महर्षि वाल्मीकि ने लिखा है-

“पूर्व जन्म कृतं कर्म तददैवमिति कथ्यते। तस्मात पुरुषयत्नेन बिना दैवं न सिध्यति ॥”

(बा.रा.)

“पूर्व जन्म में किया हुआ कर्म ही भाग्य कहलाता है इसलिए बिना पुरुषार्थ के भाग्य का निर्माण नहीं हो सकता।”

इतना ही नहीं पुरुषार्थ पूर्व कर्म को भी क्षय कर देता है-

“कृतं चाप्यकृतं किंचित कृते कर्माणि सिद्धचति।

सुकृतं दुष्कृतं कर्म न यथायं प्रपद्यते ॥”

(महाभारत)

“प्रबल पुरुषार्थ करने से पहले किया हुआ कोई भी कर्म अकर्म सा हो जाता है और यह प्रबल कर्म ही सिद्ध होकर अपना फल देता है। इस तरह पुण्य या पाप कर्म अपने यथार्थ फल को नहीं दे पाते।” भाग्य खुद कैसा भी पाशा फेंके किन्तु उसे प्रभावहीन निष्क्रिय बनाने की शक्ति मनुष्य के पुरुषार्थ में ही है।

इतना ही नहीं, भाग्य कितना ही महान अवसर प्रदान करे, पुरुषार्थ के अभाव में वह मनुष्य की कुछ भी सहायता नहीं कर सकता। महर्षि व्यास ने कहा है-

कृतः पुरुषकारस्तु दैवमेवानु वर्तते ।

न दैवमकृते किंचित कस्यचिद् दातुभर्हति॥

(महाभारत)

“किया हुआ पुरुषार्थ ही दैव का अनुकरण करता है। लेकिन पुरुषार्थहीन को भाग्य कुछ भी नहीं दे सकता।” भाग्य भी पुरुषार्थ का सहारा पाकर ही फलता है-

यथाग्निः पवनोद्वूतः सुसूक्ष्मोऽपि महान भवेत।

तथा कर्म समादुक्त दैवं साधु विवर्धते॥

‘जैसे थोड़ी सी अग्नि वायु का संयोग पाकर बहुत बढ़ जाती है उसी प्रकार पुरुषार्थ का सहारा पाकर भाग्य का बल भी विशेष बढ़ जाता है।”

अस्तु दोनों ही स्थितियों में भाग्य चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, हम किसी भी शर्त पर अपने पुरुषार्थ का अवलम्बन न छोड़ें। क्योंकि अनुकूलता की स्थिति में पुरुषार्थ के द्वारा उसका अधिक लाभ उठाया जा सकता है और प्रतिकूलता की दशा में उसे प्रभावशून्य निष्क्रिय किया जा सकता है, ऐसी दुधारी शक्ति है पुरुषार्थ की-

दैव पुरुषकारेणयः समयः प्रबाधितुम॥

“प्रयत्नशील व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से भाग्य को भी दवा देने की शक्ति रखता है।”

पुरुषार्थ ही स्वतन्त्रता और समता का रक्षक है। जो लोग पुरुषार्थी नहीं होते, उनकी स्वतन्त्रता और समानता के हक छिन जाते हैं। उन्हें परतन्त्र और निम्न भेदभाव पूर्ण तिरस्कृत जीवन बिताना पड़ता है। इतिहास साक्षी है कि हमने पुरुषार्थ को छोड़कर जब प्रमादी जीवन बिताना शुरू किया, अपनी शक्ति और क्षमता पर भरोसा न रखकर दूसरों से सहायता की आशा रखी, भाग्य कृपा का आश्रय लिया, तब-तब ही हमें परतन्त्र जीवन बिताना पड़ा, गुलामी के दिन काटने पड़े, दूसरों द्वारा शोषित होना पड़ा, ठोकरें खानी पड़ीं। जब हमारा सामूहिक पुरुषार्थ जगा हमने परतन्त्रता के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा तो फिर स्वतन्त्रता और समानता के अधिकार प्राप्त कर लिए।

जो यह चाहते है कि कोई हमारी सहायता करे, हमें जीवन पथ पर चलने की दिशा दिखावे, जो सोचते हैं कैसे करूं, वे अन्धकार में ही निवास करते हैं। ऐसी स्थिति से समाज में दासवृत्ति को जीवन और पोषण मिलता हैं क्योंकि तब हम दूसरों का मुँह ताकते है। दूसरों की आशा करते है। ऐसे परावलंबी व्यक्ति कभी सफलता प्राप्त नहीं कर सकते, न अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा ही कर सकते है। हमें अपने ही पैरों पर आगे बढ़ना होगा, अपने आप ही अपनी मंजिल का रास्ता खोजना होगा। अपने पुरुषार्थ से ही अपने अधिकारों की रक्षा करनी होगी।

आज के युग में जीवन संघर्ष और भी अधिक बढ़ गया है। आज मनुष्य के लिए दो ही मार्ग रह गये हैं एक ठेलने वाला, दूसरा ठेले जाने वाला। या तो दूसरों की ठोकरों में लुढ़कने के लिए अपने आपको छोड़ दें। हम दृढ़प्रतिज्ञ होकर कुछ करें, कर दिखायें या फिर उदासीन होकर भाग्य और दूसरों की आशा लगाये जिन्दगी के दिन पूरे करते रहें, पराधीनता के रूप में जीवित मृत्यु की यन्त्रणा भुगतते रहें।

पुरुषार्थ ही हमारी स्वतन्त्रता और सभ्यता की रक्षा करने के लिए दृढ़ दुर्ग है जिसे कोई भी बेध नहीं सकता। हमें अपनी शक्ति पर भरोसा रखकर, पुरुषार्थ के बल जीवन संघर्ष में आगे बढ़ना होगा। यदि हमें कुछ करना है, स्वतन्त्र रहना है, जीवित रहना है तो एक ही रास्ता है- पुरुषार्थ की उपासना का। पुरुषार्थ ही हमारे जीवन का मूल मन्त्र होना आवश्यक है।


नम्रता और सहिष्णुता

एकनाथ किसी पर क्रोध न करने के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी नम्रता और सहिष्णुता की सभी प्रशंसा करते ।

एक दिन कुछ शरारती लोगों ने उन्हें क्रुद्ध करने की ठानी। उसके लिए एक उत्पाती व्यक्ति को चुना गया। और क्रुद्ध कर देने पर इनाम मिलने का लालच दिया गया।

एकनाथ जी जहाँ भजन कर रहे थे, वहाँ उत्पाती व्यक्ति पहुँचा और उनके कन्धे पर चढ़ बैठा।

सन्त ने आँखें खोलीं और मुसकराते हुए कहा- बन्धु! आप जैसी आत्मीयता दरसाने वाला तो कोई अतिथि मेरे घर आज तक नहीं पधारा। अब आपको भोजन कराये बिना मैं वापिस जाने नहीं दूँगा।


टहलना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।

स्वास्थ्य रक्षा के लिए जितना सन्तुलित आहार, जल, वायु, सूर्यताप, निद्रा, विश्राम आदि की आवश्यकता होती है, व्यायाम की उससे कम नहीं। यह सर्वमान्य एवं निरापद तथ्य है कि यदि मनुष्य परिश्रम न करे तो उसके सम्पूर्ण शारीरिक अवयव अपनी शक्ति खोने लगते हैं। लोहे को किसी जगह यों ही पड़ा रहने दें तो उसमें जंग लग जाती है, उसकी सारी शक्ति व मजबूती समाप्त हो जाती है। ऐसे ही अपने अंग प्रत्यंगों को हिलाते डुलाते क्रियाशील न बनाये रहें तो इस शरीर में भी जंग लग जाने जैसी बुराई उत्पन्न होने का खतरा रहता है। इससे स्वास्थ्य का गिर जाना, रोगी हो जाना भी स्वाभाविक ही है।

शरीर को व्यायाम की, कसरत की, आवश्यकता है, यह ठीक है किन्तु ऐसे व्यायाम जो शारीरिक दृष्टि से कड़े पड़ते हों या जिनमें रुचि का अभाव हो लोगों को अधिक दिन तक अच्छे नहीं लगते। इनके लिए महंगे आहार की भी व्यवस्था करनी पड़ती है जो हर किसी के लिये सुलभ भी नहीं। इन्हें कोई उत्साह में आकर शुरू भले ही कर दे किन्तु अधिक दिनों तक इन नियमों का पालन नहीं कर सकता, क्योंकि यह आर्थिक, रुचि व समय की दृष्टि से महंगे पड़ते हैं।

अंग प्रत्यंगों को स्वाभाविक रूप में सशक्त रखने वाली कसरत टहलना है। यह सरलतम व्यायाम है। यह सर्वसाधारण के लिए सुलभ व उपयोगी है। शारीरिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्ति, स्त्री, बच्चे, बूढ़े सभी अपनी-अपनी अवस्था के अनुकूल इससे लाभ उठा सकते हैं। इसमें किसी को भी हानि की सम्भावना नहीं है। घूमना जितना स्वास्थ्य के लिए उपयोगी हो सकता है, उतना ही रुचिकर भी होता है। इससे मानसिक प्रसन्नता व शारीरिक स्वास्थ्य की दोहरी प्रक्रिया पूरी होती है इसलिए संसार के सभी स्वास्थ्य विशेषज्ञों तथा महापुरुषों ने इसे सर्वोत्तम व्यायाम माना है और सभी ने इसका दैनिक जीवन में प्रयोग किया है। उन लोगों के लिए, जिन्हें प्रतिदिन दफ्तरों में बैठकर काम करना होता है, घूमना अत्यन्त आवश्यक है। दिन भर दुकानों में बैठने वालों, बुद्धिजीवी व्यक्तियों के लिये भी यह उतना ही उपयोगी है। इससे कुदरती तौर पर सम्पूर्ण शरीर का व्यायाम होता है।

कुश्ती लड़ना, दण्ड बैठक लगाना, डंबल, मुगदर भाँजना आदि व्यायाम हैं, तो उपयोगी, किन्तु इनसे शरीर के कुछ खास-खास स्थानों की माँसपेशियों का ही व्यायाम होता है। इससे ये स्थान तो सुडौल बन जाते है किन्तु दूसरे ऐसे स्थान जहाँ इन व्यायामों से हलचल उत्पन्न नहीं होती, शिथिल बने रहते हैं और एक बार जैसे ही इन्हें छोड़ा कि जिस तेजी से शरीर का विकास हुआ था उसी गति से शरीर का पतन हो जाता है। फिर ऐसे व्यायामों में मौसम की प्रतिकूलता का भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। किन्तु टहलने से सम्पूर्ण शरीर की स्वाभाविक तौर पर कसरत होने से रक्त का संचार धीरे-धीरे बढ़ता है जिससे हल्की हल्की मालिश जैसी क्रिया सम्पूर्ण अंगों प्रत्यंगों में उत्पन्न होती है और सम्पूर्ण अवयव पर्याप्त ऊष्मा प्राप्त कर लेते हैं। अप्राकृतिक व्यायामों से एक ओर जो शारीरिक अपव्यय होता था उससे भी शरीर बचा रहता है। यही कारण है कि दूसरे व्यायामों के बाद सम्पूर्ण शरीर शिथिल पड़ जाते हैं, लोग थकावट महसूस करने लगते हैं, किन्तु आप कुछ दूर टहलकर आइये, आपको बिल्कुल भी थकावट मालूम नहीं पड़ेगी।

टहलने से सारे शरीर की सजीवता बनी रहती है। फेफड़े व हृदय की शक्ति बढ़ती है। भोजन पचता है और शरीर की सफाई में लगे हुए अवयव तेजी से अपना काम पूरा करते हैं। इसका सीधा दबाव हड्डियों व माँसपेशियों पर पड़ता है जिससे ये मजबूत बनती हैं और शरीर में विद्युत शक्ति का संचार होने लगता है जिससे त्वचा में स्निग्धता आती है, आभा झलकने लगती है। गालों पर लाली और चेहरे की चमक बढ़ती है। यह सब खून की शुद्धता के कारण ही होता है।

दिन भर के थके हुए शरीर को गति प्रदान करने के लिए यह आवश्यक है कि प्रतिदिन नियमित रूप से कुछ दूर घूम आया करें। नियमित वायुसेवन और टहलने से दीर्घ जीवन का लाभ मिलता है। इससे मानसिक स्फूर्ति बढ़ती है। जो अंग कार्य की अधिकता से मुरझा गये थे या शिथिल पड़ गये थे, वे दुबारा प्रफुल्लित व उत्साहित होकर कार्य करने लगते हैं। इन परिस्थितियों में स्वास्थ्य का बना रहना, बीमारियों से बचा रहना प्रायः निश्चित ही मानना चाहिए।

नियमित रूप से टहलने से जिनके शरीर दुर्बल होते हैं, उन्हें स्वास्थ्य लाभ मिलता है। जिनका शरीर अधिक मोटा हो जाता है वे सुडौल बनते हैं। इस दृष्टि से तो टहलने को ही सर्वांगपूर्ण व्यायाम मानना पड़ता है। श्वास प्रश्वास की दोनों प्रकार की क्रियाएँ उद्दीप्त होती जिससे व्यायाम और प्राणायाम के दोनों ही उद्देश्य हो जाते हैं। व्यायाम का अर्थ है प्रत्येक अंग को क्रियाशील रखना और प्राणायाम का तात्पर्य है प्राकृतिक विद्युत शक्ति या प्राण-शक्ति को धारण करना। इस प्रकार शरीर और प्राण दोनों की पुष्टि होने से यह सभी दृष्टियों से उपयुक्त है। श्वास-प्रश्वास में तेजी आने से शरीर की अनावश्यक वसा जल- भुनकर समाप्त हो जाती है, जिससे कब्ज, अग्निमन्दता में शीघ्रता से लाभ होता है। तेजी से गहरी साँस लेते हुए टहलना कब्ज की अचूक औषधि है। दुःस्वप्नों की निवृत्ति, भरपूर नींद आना इसी कारण से होता है। वीर्य सम्बन्धी रोगों में प्रातःकाल का घूमना अतीव लाभदायक होता है। सर्दी के दिनों में जब ओस गिरती है तो नंगे पाँव हरी दूब पर टहलने से आँखों की ज्योति बढ़ती है, मस्तिष्क, ताजा रहता है और सारे शरीर को कुदरती विद्युत बड़ी सुगमता से मिल जाती है। इससे शारीरिक सौंदर्य बढ़ता है, ओठों, गालों पर लाली आती है और आलस्य दूर हो जाता है।

अपने लिये सुविधा का समय निकाल कर प्रतिदिन टहलना सभी के लिये लाभदायक होता है किन्तु आरोग्य लाभ के विशेष इच्छुक व्यक्तियों को प्रातःकाल का घूमना अच्छा होता है। दिन भर का अस्त-व्यस्त वातावरण, धूल आदि के कण आधी रात तक जमीन में बैठ जाते है जिससे प्रातःकालीन स्वच्छ वायु का अमूल्य लाभ मिलता है इससे मानसिक प्रसन्नता भी बढ़ती है जिससे स्वास्थ्य विकास तेजी से होता है। एक साथ स्वच्छ वायु, परिपुष्ट व्यायाम और मानसिक प्रफुल्लता का प्रभाव पड़ने से शरीर का रोगमुक्त बनना स्वाभाविक है।

भोजन करने के उपरान्त टहलने से रक्त संवहन में तेजी आती है और पाचन क्रिया में सहायता मिलती है। सायंकाल-आहार लेने के बाद घूमने से आहार की उष्णता का स्वतः शमन हो जात है जिससे रात में बुरे स्वप्न नहीं आते और भरपूर नींद आ जाती है। इसका प्रभाव दूसरे दिन शरीर की चैतन्यता पर पड़ता है। जब आप सोकर उठते हैं तो शरीर बिल्कुल हल्का, स्वस्थ व प्रसन्न होता है। पर अधिक रात गये घूमने से स्नायविक शिथिलता उत्पन्न होती है, साथ ही अशुभ विचार उत्पन्न होते हैं, इसलिये यह क्रिया ठीक समय के अंदर ही पूरी कर लेनी चाहिए।

टहलने के नियम सामान्य हैं। जहाँ तक सम्भव है, सभी अपनी शारीरिक स्थिति के अनुरूप यह क्रिया करते हैं। किंतु जो अधिक दुर्बल या कमजोर शरीर के नहीं हैं उन्हें तेजी से कमर सीधी रखकर टहलना चाहिये। हाथ स्वाभाविक तौर पर हिलते रहें। इस क्रिया में तेजी हो और उन्हें सामने छाती तक ले जाये। आगे पीछे हाथ से जाने की क्रिया घड़ी के पेण्डुलम के समान एक-सी हो, आपकी छाती फूली रहे और सांसें भी गहरी लें ताकि फुफ्फसों में प्राणवायु का अभिगमन तेजी से होता रहे। टहलते समय यह ध्यान रहे कि न तो आपकी चाल इतनी तेज हो कि थोड़ी ही दूर चलकर थक जायें, इतनी धीमी हो कि शारीरिक अंग-प्रत्यंगों की कसरत भी न हो पाये। एक घण्टे में चार मील की रफ्तार तक प्रायः हर स्वास्थ व्यक्ति को चलना चाहिये।

टहलने का सीधा प्रभाव पेट के अवयवों पर पड़ता है और यह क्रिया हाथों के आगे पीछे ले जाने से पूरी होती है। इसी से चलने की गति भी कम ज्यादा होती है इसीलिए हाथों की इस क्रिया पर ध्यान देना आवश्यक है। हाथ आपके शरीर के साथ लगे रहें और पूरी तेजी से आगे पीछे जाते रहें तो पेट के सभी भागों का व्यायाम उनकी आवश्यकता के अनुरूप हो जाता है और यकृत की भी हल्की मालिश हो जाती है।

घूमने का स्थान तथा वहाँ की प्राकृतिक सुषमा और सौंदर्य का भी उतना ही प्रभाव होता है। इसलिये आप जिस रास्ते का घूमने के लिए चुनाव करें वह ऐसा हो जहाँ आप सुविधापूर्वक भ्रमण कर सकें। अधिक मोटर ठेले चलने वाली सड़कें इसके लिए अधिक उपयोगी नहीं कही जा सकतीं। उनका उपयोग प्रातःकाल जब ट्रैफिक मंद पड़ जाता है तभी करें तो ठीक, अन्यथा हानि की सम्भावना रहती है। इसलिए किसी ग्रामीण क्षेत्र का चुनाव करें तो अच्छा है। घूमते के मार्ग को बदलते रहा करें तो इससे रुचि बढ़ती है। अनेक दृश्य देखने को मिलते हैं और अपने उद्देश्य के प्रति उत्सुकता भी बनी रहती है। घूमते समय अधिक बात करना अच्छा नहीं होता यदि सम्भव हो तो अकेले ही टहलने के लिए निकलें पर कदाचित यह सम्भव न हो तो टहलते समय अधिक से अधिक चुप रहना चाहिये।

किसी जलाशय के नम वातावरण में, फूलों वाले वनों-उपवनों में घूमना स्वास्थ्य के लिये हितकर होता है। पर यह ध्यान रखें कि यह स्थान विषम न हो। ऊँचे नीचे स्थानों में अंधेरे में घूमना अच्छा नहीं। अपवित्र स्थानों की ओर जाने से मस्तिष्क पर दूषित प्रभाव पड़ता है। इसलिये ऐसे स्थानों से बचना चाहिए। जिन स्थानों में पशु-वध आदि दुष्कर्म होते हों तथा गंदगी का बाहुल्य हो ऐसे अपवित्र स्थानों की ओर भूलकर भी नहीं जाना चाहिए। इसी प्रकार जहाँ बाल, हड्डियाँ पत्थर, काँटे, कूड़ा, कचरा आदि जमा हो ऐसे स्थानों में घूमने न जाना ही उचित है। इन स्थानों के सूक्ष्म संस्कार अपनी मानसिक स्थिति पर कुप्रभाव छोड़ते है।

ऋतु का प्रभाव शरीर पर पड़ता रहे इसलिये शरीर में बहुत मोटे या चुस्त कपड़े पहनकर घूमने नहीं निकलना चाहिए। इससे शरीर की अपनी क्रियाशीलता में भी रुकावट पड़ती है और बाह्य वातावरण के सीधे प्रभाव से भी वञ्चित रह जाते हैं। साफ पगडण्डियों में यदि नंगे पाँव टहलें तो अच्छा है किन्तु यदि जूतों की आवश्यकता पड़े भी, तो हल्के व कुछ ढीले जूते पहन लें। घूम कर आये तो एकदम कोई भारी वस्तु न खानी चाहिए।

टहलने से लौटने के बाद यदि पसीना आ जा तो इसे बन्द कमरे में रगड़कर किसी मोटे वस्त्र से सुखा ले और थोड़ी देर के बाद स्नान कर लें। पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति यदि चाहें तो दोनों ऋतुओं में स्नान कर सकते हैं किंतु जिनके शरीर इस योग्य नहीं, उन्हें स्नान नहीं करना चाहिए क्योंकि उन्हें शीत लग जाने का भय होता है।

इन सभी नियमों का पालन करते समय अपनी स्थिति के अनुरूप ही चुनाव करना चाहिए। यह विषय इतना सरल है कि किन्हीं लम्ब-चौड़े उपकरणों की या ऊँचे ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती। सामान्य नियमों का पालन हर कोई अपनी स्थिति के अनुकूल कर सकता है।

इसमें संदेह नहीं है कि स्वास्थ्य रक्षा के लिए टहलता अत्यन्त आवश्यक सरल व सर्वोपयोगी सुलभ व्यायाम है। इससे शरीर की शुद्धि होती है, प्राण-शक्ति बढ़ती है। तेज और ओज प्राप्त करने का यह सरल साधन है। व्यायाम और प्राणायाम की उभय क्रियाओं का समावेश सचमुच ऐसा है जो शरीर को शुद्ध करता है तो सदाचरण की शुद्धि भी जागृत करता है। इससे शरीर स्वस्थ बनता है और मन स्वच्छ। इतना सीधा सरल अन्य व्यायाम नहीं इसलिए हममें से प्रत्येक को प्रतिदिन कुछ न कुछ घूमने-टहलने का स्वभाव बनाना चाहिए।


आत्म-ग्लानि में मत डूबे रहिए

आत्म-ग्लानि मनुष्य के मन की एक भावना ग्रन्थि है जो जाने-अनजाने, भूलवश या असावधानी में किए गये पापों पर अत्यधिक पश्चाताप करने से पैदा हो जाती है। वैसे किसी भी दुष्कृत्य, पाप-कर्म पर मनुष्य को पश्चाताप अवश्य होता है और उस सीमा तक यह आवश्यक भी है जब मनुष्य भविष्य में वैसा न करने का संकल्प करता है, पाप कर्मों से बचने के लिए भूल सुधार का दृढ़ प्रयत्न होता है। ऐसी स्थिति में पश्चाताप मनुष्य का पाप से उद्धार भी कर देता है। लेकिन जब यह सीमा से अधिक बढ़ जाता है तब आत्म-ग्लानि का रूप धारण कर लेता है। आत्म-ग्लानि की स्थिति में मनुष्य सुधार की ओर अग्रसर नहीं होता वरन् अपने आपको पापी, दुराचारी मान बैठता है। इस हीन भावना से उसकी कार्यक्षमता, सृजन-शक्ति व्यर्थ ही नष्ट होने लगती है। हीन विचारों में डूबे रहने से कई शारीरिक और मानसिक व्याधियां उत्पन्न हो जाती है।

आत्म-ग्लानि पैदा हो जाने पर मनुष्य अपने आपको पापी, दुष्ट समझकर धिक्कारता रहता है। वह सामाजिक जीवन में उत्तर कर कोई काम करने में एक प्रकार का भय और घबराहट सी महसूस करता है। अब जो आत्म-ग्लानि के आधिक्य से दबा हुआ है चाहे कितना ही योग्य, अनुभवी, जानकार क्यों न हो, वह प्रगति के पथ पर आगे न बढ़ सकेगा क्योंकि जो आगे कदम रखने से पूर्व ही अपने आपको पापी मान बैठा है, दूसरों के साथ चार आँखें करने की जिसमें हिम्मत नहीं है, संकोच, शंकायें, भय जिसे कुछ करने नहीं देते, ऐसा व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में सफल हो सके यह सम्भव नहीं। अत्यधिक पश्चाताप अथवा आत्म-ग्लानि के कारण हम कई बार बिना अपराध के भी अपने आपको अपराधी मान बैठते हैं। कभी बचपन में या किशोरावस्था में कोई भूल हो बैठी हो, कोई बुरी आदत पड़ गई हो, कोई बुरा काम बन पड़ा हो उसे जीवन भर रटते रहना अपने को कोसते रहना, स्वयं को बुरा समझ बैठना सचमुच ऐसी ही भूल है। ऐसी स्थिति में रास्ते में, बाजार में चलते हुए भी मनुष्य यह अनुभव करने लगता है कि दूसरे लोग उसकी बुराइयों को देख रहे है और उसे बुरा समझ रहे हैं। इस भय के कारण वह दूसरों से नीची निगाह रखता है। कुछ बोलने से पूर्व हड़बड़ा जाता है।

इस तरह के लोग जीवन भर आत्म-ग्लानि में डूबे रहते है। उनके जीवन की महत्वपूर्ण सम्भावनायें नष्ट हो जाती हैं। उसकी महत्वाकांक्षायें, आशा, अभिलाषायें, उमंगें असमय ही मुरझा जाती हैं। ऐसे होनहार, प्रतिभावान, जीवट सम्पन्न युवकों की संख्या कम नहीं है जो आत्म-ग्लानि के शिकार होकर अपने जीवन को नष्ट कर लेते हैं। किसी सामान्य-सी भूल को बहुत महत्व देकर जीवन भर लज्जा, शोक में डूबे रहकर अपराधी की तरह मानसिक परेशानी में डूबे रहते हैं। अपनी अबोध अवस्था में या अज्ञानवश किये गये किसी पाप पर जीवन भर पश्चाताप करते रहते हैं, दुःखी बने रहते हैं।

जैसा कि उत्तर बताया जा चुका है किसी भूल अथवा बुरे काम के सम्बन्ध में पश्चाताप करना उत्तम है, लेकिन यह तारक होना चाहिए। भविष्य में ऐसा न करने का संकल्प करके सदैव उससे बचते रहने का प्रयत्न करना, ऐसे वातावरण, संग-साथ एवं साधनों से दूर रहना जो बुराई की ओर प्रवृत्त करें, इसके लिए आवश्यक होता है। पिछली भूल से शिक्षा लेकर आगे के लिए उसका सुधार कर लेना और फिर पाप की भावना सदा के लिए भुला देना, पश्चाताप का सच्चा स्वरूप है।

आप से जो कुछ बुराई हो चुकी उसे भूल जाइये। मैन्सफील्ड ने कहा है- “आप इसे अपनी जिंदगी का नियम बना लें कि बीती हुई बातों को भूल जाएँगे, कभी पश्चाताप न करेंगे। बिगड़ी हुई बातों को याद करना कीचड़ से सने रहने के समान है।” भूतकाल में हमसे जो कुछ भी बुराई हो गई हो उसे “बीती ताहि बिसार दे” के अनुसार भुलाने में ही कल्याण है।

आत्म-ग्लानि को बढ़ने न दें, अन्यथा यह एक ऐसी मानसिक दुर्बलता के रूप में जम जायगी जो कुछ भी न करने देगी। कोई भी बुराई क्यों न हो गई हो उसे अनावश्यक तूल न दीजिए। कीचड़ में गिर पड़ने पर उठकर उसे धो लेना ही श्रेयष्कर है। कीचड़ में पड़े रहने का पश्चाताप करने में लग जाना, उसी का रोना रोते रहना ठीक नहीं। पूर्णतः पाक-साफ, दूध का धुला हुआ कोई नहीं होता। भूलें, बुराइयाँ, पाप बन जाना मनुष्य की स्वाभाविक कमजोरी है। प्रत्येक मनुष्य पैदा होने से मरने तक कोई न कोई बुरा काम कर ही बैठता है। गिर कर उठने में, बुराई से भलाई की ओर आगे बढ़ने में ही मनुष्य की श्रेष्ठता है। अपने पापों पर पश्चाताप कर आत्मग्लानि में न डूबें। याद रखिये प्रत्येक बहुत से दूसरे व्यक्ति भी इन्हीं बुराइयों के मार्ग से गुजरे हैं और जीवन में बहुत आगे बढ़े हैं।

कई बार हम घटनाओं, परिस्थितियों को अपने ही पापदण्ड से नापने का व्यर्थ प्रयत्न करते हैं। जब इनका परिणाम अपने मनोनुकूल नहीं निकलता तो इस पर पश्चाताप करते हैं और धीरे-धीरे आत्मग्लानि के शिकार बन जाते हैं। किन्तु यह तो असम्भव बात है कि जीवन की घटनाओं का हमारी रुचि के अनुसार ही परिणाम निकले। क्योंकि इनका सम्बन्ध केवल हमारी रुचि से ही तो नहीं होता वरन् बहुत-सी बातों से होता है और जब तक सबका तालमेल नहीं बैठता, सफलता नहीं मिलती। अपना एक लक्ष्य एवं निश्चित कार्यक्रम बनाकर उसमें लगे रहें। अनुकूलता पर गर्व भी न करें तो प्रतिकूल परिस्थितियों में पश्चाताप भी न करें। यही आगे बढ़ने का मध्यम मार्ग है।

आत्म-ग्लानि से बचने के लिए आत्म-विश्वास और उत्साह को बढ़ाइये। मिल्टन पावेल ने बताया है कि-”आत्म-ग्लानि से मनुष्य को बचाने के लिए उसके मन में धँसी हुई भय की भावना और भीरुता को दूर करना आवश्यक है।” अपनी शक्तियों पर, योग्यता और क्षमता पर विश्वास कीजिए। आप सब कुछ कर सकते हैं, उसी तरह ऊँचे उठ सकते है जिस तरह दूसरे मनस्वी लोग उठते हैं। अपने आत्म-विश्वास को जगाइये। आत्म-ग्लानि से बचने के लिए भय की भावना को दूर कीजिए। जब तक हम अपने आपको असमर्थ, दीन-हीन, अयोग्य मानते रहेंगे तब तक संसार में दूसरा कोई हमें कैसे महत्वपूर्ण मानेगा? यह सच है कि हम जैसा स्वयं अपने आपको समझते हैं उसी दृष्टि से हमें दुनिया भी देखती है। उत्साही विचार, दिव्य संकेत, आत्म-विश्वास की भावनाओं का नित्य अभ्यास करना चाहिए।

दुनिया से भागने में या एकान्त की शरण लेने से भी काम नहीं चलेगा। सामाजिक जीवन में खुलकर भाग लेने पर ही आत्म-ग्लानि की भावना से पीछा छुड़ाया जा सकता है। किन्हीं सभा-समितियों में जाने, बोलने, गाने-बजाने, खेलने-कूदने के अवसर मिलें तो उनका बेधड़क होकर उपयोग करना चाहिए। कदाचित प्रारम्भ में कई बार हँसी भी हो तो उससे न घबरा कर सदैव ऐसे अवसरों की तलाश में रहना चाहिए और अपना अभ्यास जारी रखना चाहिए। आप देखेंगे कि एक दिन आप में लोगों को प्रभावित करने की महत्वपूर्ण क्षमता पैदा हो जाएगी, जिसकी सम्भावना ही प्रारम्भ में झेंप जाने या घबरा जाने से नष्ट हो सकती है।

अपने शरीर को सदा स्वस्थ और तरो-ताजा रखें। इससे मस्तिष्क भी स्वस्थ रहेगा। और आप अनावश्यक सोच विचार, पश्चाताप से बचे रहेंगे। कमजोर, बीमार जीर्ण रोगी व्यक्तियों में आत्म-ग्लानि की भावना अधिक होती है, उन्हें अपने आप से असन्तोष एवं घृणा रहती है। इसका कारण उनका मनः संस्थान दुर्बल हो जाना है। प्रकृति की गोद में, खुले वातावरण में, खुले आकाश की छाया में खूब घूमें, संसार के सौंदर्य एवं सरलता पर विचार करके प्रसन्न होते रहें।

लज्जा, भय, संकोच को दूर करें, पुराने पापों को भूल जायें। मन में आत्म-विश्वास, साहस की भावनाओं को जगायें, आत्म-ग्लानि से बचने के लिए। स्मरण रहे कि इससे मनुष्य की मौलिक शक्तियों और क्षमताओं का बहुत ज्यादा ह्रास होता है अतः सफल जीवन के लिए आत्म-ग्लानि से बचें।


प्राणवान बनना है तो प्राणायाम कीजिए

मनुष्य की आयु, आरोग्य और स्वास्थ्य का श्वास क्रिया से बड़ा सम्बन्ध है। श्वास-प्रश्वास की क्रिया से प्राणिमात्र जीवित रहते हैं। स्वच्छ वायु फेफड़ों में जाकर रोग-वर्द्धक कीटाणुओं का नाश करती है। इसी से रक्त की सफाई होती है। जब तक रक्तकण तेज, सशक्त व सजीव रहते हैं, तब तक स्वास्थ्य में कोई खराबी नहीं आती। शारीरिक शक्ति, विचार-शक्ति और मानसिक दृढ़ता प्राणायाम के प्रत्यक्ष चमत्कार हैं। इससे केवल फेफड़ों का व्यायाम ही नहीं होता वरन् प्राणायाम आयु, बल को बढ़ाने वाला, रक्त-शोधक और मन को शक्ति व स्फूर्ति प्रदान करने वाला है। यह प्रत्येक स्वस्थ जीवन की कामना रखने वालों के लिए एक उपयोगी साधन है।

प्राणायाम की प्रारम्भिक शिक्षा यह है कि हमें पूरी और गहरी साँस लेनी चाहिए। यह साँस पूरी तौर पर यदि फेफड़ों में ना गई तो फेफड़ों का एक भाग बिल्कुल बेकार पड़ा रहता है। घर के जिस भाग की सफाई नहीं की जानी वहाँ मकड़ी, छिपकली, कनखजूरे बर्रे आदि अपना अड्डा जमा लेते हैं। फेफड़े के जिस भाग में वायु का अभिगमन नहीं हो पाता उसमें जुकाम, खाँसी, क्षय, उरक्षन, कफ व दमा आदि के कीटाणु पैदा हो जाते हैं। धीरे-धीरे थे वायु- कोष्ठों में इस प्रकार अड्डा जमा लेते हैं कि इनको निकालना ही मुश्किल हो जाता है।

भरपूर साँस लेने से फेफड़ों के सभी वायु-कोटर हवा से भर जाते है। इस तरह हवा अपनी ऑक्सीजन-प्राण रक्त में छोड़ दूषित पदार्थ-कार्बोनिक एसिड गैस को चूस कर बाहर निकाल देती है। यह ऑक्सीजन तत्व खून के साथ मिलकर सारे शरीर का दौरा करता रहता है जिससे शक्ति, स्वास्थ्य व आरोग्य स्थिर बना रहता है। शुद्ध खून का एक चौथाई भाग ऑक्सीजन होता है। इस मात्रा में यदि कमी पड़ जाय तो इसका पाचन-प्रणाली पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। ऐसे व्यक्तियों की जठराग्नि मन्द पड़ जाती है। इससे यह स्पष्ट होता है कि दूषित पदार्थ निकालने, रक्त में ऑक्सीजन का पर्याप्त सम्मिश्रण रखने तथा पाचन-संस्थान को मजबूत बनाये रखने के लिए गहरी पूरी साँस लेना अनिवार्य हैं। यह किया प्राणायाम के द्वारा पूरी होती है।

बाइबल की पुरानी राख गिराई न जाय तो भाप बनना बन्द हो जाता है। इससे इंजन का काम रुक जाता है। हमारे फेफड़े ठीक बाँइलर का काम करते हैं। इससे इंजन अर्थात् हृदय की क्रिया प्रभावित होती है। दूषित मल विकार जो रक्त के साथ हृदय से फेफड़ों में पहुँचाया जाता है उसकी पूरी व गहरी साँस द्वारा सफाई न कर दी जाय तो फिर वही अशुद्ध रक्त हृदय को लौट आता है। यह गन्दगी धमनियों द्वारा शरीर में फैल जाती हैं और बीमारी, रोग व दुर्बलता के रूप में फूट पड़ती हैं। किन्तु पूरी साँस का यदि अभ्यास डाल लें तो इससे छाती चौड़ी होती है, फेफड़े मजबूत होते हैं, और वजन बढ़ता है। शुद्ध रक्त-संचार से हृदय की दुर्बलता दूर होने लगती है। इसलिए प्राणायाम द्वारा गहरी साँस लेने का अभ्यास बना लेना स्वास्थ्य के लिये अतीव लाभदायक होता हैं।

साधारण अवस्था में साँस के साथ 30 घन इंच हवा फेफड़ों में पहुँचती है। इससे अधिक गहरी साँस लें तो कुल मिलाकर 130 घन इंच तक वायु फेफड़ों में पहुँच जाती है किन्तु साँस छोड़ते समय 100 घन इंच वायु छाती में रह जाती है। इस प्रकार कुल 230 घन इंच की जगह शरीर में होती है। तात्पर्य यह है कि साधारण साँस की अपेक्षा आठ गुनी साँस ली जा सकती है। इससे आठ गुनी सफाई में वृद्धि होगी, आठ गुना ऑक्सीजन शरीर को मिलेगा तो आठ गुना स्वास्थ्य का सुधार भी होगा ही।

जो लाभ अधिक से अधिक साँस फेफड़ों में पहुँचाने से होता है, ऐसा ही एक लाभ फेफड़ों को कुछ देर वायुरहित छोड़ने से भी होता है। एक जर्मन यहूदी डॉक्टर का मत है कि इससे फेफड़ों के कीटाणु वायु न मिलने पर मर जाते हैं और कार्बोनिक एसिड गैस के साथ मिल कर बाहर निकल जाते हैं।

दूसरा अभ्यास नाक से साँस लेने का होता है। नाक से साँस लेने से वायु में मिले स्थूल गन्दगी के कण नाक के छोटे-छोटे बालों में रुक जाते हैं। इससे आगे एक पतला तरल पदार्थ स्रवित हुआ करता है, जो शेष गन्दगी को जैसे नाइट्रोजन व धूल आदि के कणों को चिपका लेता है। अब वायु पूरी तौर पर स्वच्छ होकर श्वास-नली में प्रवेश करती है। यहाँ यदि वायु गर्म थी तो शीतल और अधिक शीतल थी तो गर्म होकर सामान्य तथा सह्य ताप में परिवर्तित हो जाती है। वायु अभिगमन का यह मार्ग जो नाक से मस्तिष्क के रास्ते फेफड़ों तक पहुँचता है काफी लम्बा पड़ जाता है, इतनी देर में वायु का तापमान सह्य हो जाता है। इससे फेफड़ों में पहुंचकर रक्त शुद्धि के कार्य में उसे कोई बाधा नहीं पड़ती। पर मुँह से साँस लेन से गन्दगी भी श्वास-नली के रास्ते फेफड़ों में पहुँच जाती है और ताप भी शीतल-गर्म जैसा कुछ था, वैसे ही फेफड़ों को उत्तेजित करता रहता है। चेचक की बीमारी व जुकाम आदि से पीड़ित रहने वाले अधिकाँश मुँह से साँस लेने वाले लोग होते हैं।

प्राणायामों के अनेकों भेद हैं। शीतली, शीतकारी, भ्रामरी, उज्जायी, अनुलोम-विलोम, सूर्य वेधक, प्राणाकर्षक तथा नाड़ी-शोधन आदि अनेकों प्राणायाम की विधियाँ भारतीय आध्यात्म ग्रन्थों में भरी पड़ी हैं। इन सबका उल्लेख तो यहाँ सम्भव नहीं है, जो सर्व सुलभ और सर्वथा हानि-रहित हैं जिन्हें बालक वृद्ध स्त्री व पुरुष कोई भी कर लें, ऐसे ही प्राणाकर्ष प्राणायाम की विधि यहाँ दी जाती है।

प्राणायाम के चार भाग है-(1) पूरक (2) अन्तर कुम्भक (3) रेचक तथा (4) बाह्य कुम्भक। साँस को खींचकर भीतर धारण करने को पूरक कहते हैं। यह क्रिया तेजी या झटके के साथ नहीं की जानी चाहिए। धीरे-धीरे फेफड़ों में जितनी साँस भर सकें भरें। इस क्रिया को पूरक कहते हैं। अन्तर कुम्भक वायु को भीतर रोके रहने को कहते हैं। जब तक सरलता पूर्वक रोके रख सकें उतनी ही देर अन्तर कुम्भक करते हैं जबर्दस्ती प्राण-वायु को नहीं रोकना चाहिये। धीरे धीरे बढ़ाने का अभ्यास किया जा सकता है। वायु को बाहर निकालने को रेचक कहते हैं। पूरक के सामान ही यह क्रिया भी धीरे-धीरे करनी चाहिए। साँस रोक कर बाह्य कुम्भक करते हैं अर्थात् कुछ देर बिना साँस के रहा है। पूरक और रेचक का समय, बाह्य-कुम्भक और अन्तर कुम्भक का समय समान होना चाहिये।

अभ्यास करने के पूर्व किसी स्वच्छ पवित्र व शान्त स्थान पर आसन, तखत या कम्बल आदि पर पूर्वाभिमुख बैठे। स्थान जितना ही एकान्त हो उतना ही अच्छा है ताकि बाहरी शोरगुल से आपकी एकाग्रता भंग न हो। पालथी मारकर सरल पद्मासन पर बैठिये। दायें हाथ के अंगूठे से नासिका के दायें छिद्र को बन्द कर बायें से पूरक कीजिये। फिर मध्यमा तथा अनामिका उँगलियों से बाँये छिद्र को भी बन्द कर अन्तर कुम्भक पूरा कीजिये। अब दायें छिद्र से अंगूठे को हटाकर रेचक कीजिये, फिर दूसरी बार जैसी क्रिया की थी, दोनों नासिका छिद्र बन्द करके बाह्य-कुम्भक कीजिये। यह आपका एक प्राणायाम हुआ। आरम्भ में पाँच प्राणायाम करें, धीरे-धीरे आधा घण्टा तक समय बढ़ा सकते हैं।

स्वास्थ्य के साथ-साथ प्राणायाम आत्मोन्नति का भी एक महत्वपूर्ण व उपयोगी साधन है। इससे प्राण-साधना के साथ ही साथ चित्त की एकाग्रता, स्थिरता, दृढ़ता और मानसिक गुणों का विकास होता है। आगे चलकर प्राणायाम से प्राण पर नियन्त्रण प्राप्त करते हैं और शरीरस्थ प्राणों को जागृत करते हैं। इनका स्वास्थ्य पर विलक्षण प्रभाव पड़ता है जिसे एक प्रकार से चमत्कार ही माना जा सकता है। हमारे यहाँ इस सम्बन्ध में बड़ी तत्परतापूर्वक खोज की गई है।

देश, काल और परिस्थिति के अनुसार उतना तो हर किसी के लिए सम्भव नहीं है। किन्तु रक्त शुद्धि व दूषित तत्वों के निष्कासन से स्वास्थ्य व आरोग्य प्राप्त करना हर किसी के लिए सम्भव है। नियमित रूप से प्राणायाम करने से स्वास्थ्य स्थिर रहता है, बीमारियाँ दूर भागती है, शक्ति और स्फूर्ति आती है। हमसे से प्रत्येक को प्राणायाम से लाभ उठाना चाहिये।


साँस्कृतिक उत्थान की नींव बाल-उत्थान

भूलों, त्रुटियों और पापपूर्ण जीवन को कठोर तपश्चर्या और गहन पश्चाताप के बाद भी उतना पवित्र और निर्मल नहीं बना सकते जितना प्रारम्भिक जीवन के चरित्र निर्माण से ही मनुष्य का जीवन शुद्ध होता है। अंतर्मन में प्रसुप्त कुसंस्कार जब भी अनुकूल परिस्थिति पाते हैं, तभी मस्तिष्क में घोर क्रान्ति उत्पन्न कर देते हैं जिससे आन्तरिक पवित्रता पर बार-बार मल-विकारों का उतार चढ़ाव बना रहता है। इस स्थिति के रहते स्वाभाविक उज्ज्वलता आ नहीं पाती। इसलिये भारतीय धर्म का निरूपण करने वाले आचार्यों ने यह व्यवस्था पहले ही बना दी थी कि लोगों के चरित्र उनके शैशव काल में ही दृढ़ कर दिये जाएँ। आयु बढ़ने के साथ उनमें चारित्र्यक प्रौढ़ता आती जाती थी। ऐसे मनुष्य ही आगे चलकर महान्, मनस्वी, तेजवान् तथा आत्म-बल सम्पन्न होते थे। जब तक यह परम्परा देश में यथावत् चलती रही, तब तक यहाँ सुख शान्ति और समृद्धि में किसी बात में कमी नहीं रही।

किन्तु आज जिस रूप में बालकों को इतना उपेक्षित देखते हैं, उससे प्रत्येक विचारवान् को गहरा धक्का लगता है। बालकों के नैतिक अपराध आज जिस गति से बढ़ रहे है, उन्हें देखते हुए, समाज सुधारकों का चिन्तित होना स्वाभाविक ही है। स्वभाव में जब द्वेष तथा दुर्गुण गहराई तक जम जाते हैं तो यदि किसी प्रकार के सुधार के कार्यक्रम बनाये भी जाएँ तो उनमें भारी शक्ति लगाकर भी मनोवाँछित सफलता मिलती नहीं है। व्यवहारिक कठिनाई यह है कि हमारे अभिभावक इस जिम्मेदारी को उदारतापूर्वक वहन नहीं करते। अधिकाँश को तो इस विषय में ज्ञान ही नहीं होता कि बालकों का चारित्र्यक विकास किस प्रकार करें। स्वेच्छाचारी बालक समाज के द्वेष-दुर्गुणों को ही ग्रहण कर लेते हैं क्योंकि यही सब तो उनके आस-पास जमा होते हैं। बालकों का निर्माण गर्भावस्था में आने से ही होने लगता है। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुये ही भारतीय आचार्यों ने संस्कार-पद्धति चलाई थी। इससे बालकों के नैतिक-प्रशिक्षण में किसी प्रकार की कठिनाई उत्पन्न नहीं होती थी।

दार्शनिक सुकरात के पास एक स्त्री गई। उसने पूछा गुरुदेव! अपने बच्चे की शिक्षा मैं कब से प्रारम्भ करूं?

“बच्चे की उम्र क्या है?” सुकरात ने पूछा।

‘चार वर्ष।’ स्त्री ने सरलता से उत्तर दिया।

“तब तो आप चार वर्ष नौ माह, बच्चे को शिक्षा देने में पीछे रह गई।” सुकरात ने उसका समाधान किया। माता के आहार विहार आदि से बच्चे के संस्कार बनना प्रारम्भ हो जाते है, अतएव यह कहना अत्युक्ति नहीं कि गर्भावस्था से ही बच्चों की शिक्षा प्रारम्भ कर देनी चाहिये। हमारे यहाँ यह पद्धति क्रमिक और वैज्ञानिक थी। यही कारण था कि घर-घर ध्रुव, प्रह्लाद, भरत, अभिमन्यु जैसे प्रतिभाशाली बच्चे जन्म लिया करते हैं अब उन प्रथाओं को फिर से जाग्रत करने की आवश्यकता है। साँस्कृतिक उत्थान की नींव बालकों के उत्थान से प्रारम्भ करें तभी चारित्र्यक समृद्धि अपने मौलिक रूप में आ सकेगी।

बालकों को संस्कारवान् बनाने का अभ्यास उनके गर्भ में आने से ही प्रारम्भ करना चाहिये। माता-पिता की मनोदशा का बालक की मनोदशा पर प्रभाव पड़ता है। माता के शरीर से रस और रक्त लेकर उसका स्वास्थ्य बनता है। उनके रहन-सहन का सूक्ष्म प्रभाव बालकों की आत्मा पर पड़ता है। अतएव खान-पान, रहन-सहन तथा व्यवहार में माता-पिता को गर्भावस्था में बालक के आते ही सात्विकता का पर्याप्त समावेश कर लेना चाहिये। जो माताएँ मिर्च मसाले, खटाई, तीखे, कसैले बासी भोजन का प्रयोग करती हैं उनके बच्चे अधिकाँश क्रोधी, दुष्ट तथा तामसी प्रकृति के होते हैं। वस्त्र, आभूषण, बोली भाषा आदि का भी गर्भस्थ बच्चे पर प्रभाव पड़ता है। पति-पत्नी में प्रेम और सदाचार न हो तो बच्चे भी दुर्गुणी, नास्तिक तथा चिड़चिड़े प्रकृति के होते है। इन सभी बातों का माता-पिता को पूर्ण ज्ञान होना आवश्यक है।

जन्म लेने के पश्चात् किशोरावस्था में आने तक बच्चा अधिकाँश माता के ही संरक्षण में रहता है। उस समय माता की चेष्टाओं और क्रियाकलापों का बालक बड़ी सूक्ष्मता से अवलोकन करता रहता है, इसलिए यह समय माता की सब से बड़ी जिम्मेदारी का होता है। इस अवस्था में बच्चों को भय दिखाना, अपवित्र रखना, उन्हें निद्रा आदि के लिये नशीली, वस्तुयें खिलाना हानिकारक होता है। कामजन्य चेष्टायें, क्रोध, कलह आदि का दूषित प्रभाव बालक पर पड़े बिना रहता नहीं। जिन स्त्री-पुरुषों में पारस्परिक स्नेह, प्रेम और मैत्री की भावना नहीं, उनके बच्चे स्वभावतया उद्दण्ड और स्वेच्छाचारी ही बनते हैं अतएव यह हमेशा ध्यान बना रहे कि आप कोई ऐसी चेष्टा नहीं करते जो बालक के कोमल मस्तिष्क पर अपना बुरा असर जमा ले।

पाँच वर्ष की अवस्था आ जाने पर बालक की ज्ञान-पिपासा बढ़ने लगती है। अभी तक जिन वस्तुओं को मात्र खेल और तोड़-फोड़ की जरूरत समझता था, अब उनके प्रति उसका जिज्ञासा भाव बढ़ने लगता हैं। इस उम्र में बच्चों को चित्र, कथा कहानियाँ बहुत पसन्द आती है। लोरियाँ व मधुर संगीत के प्रति भी उनकी रुचि जागृत होती है। इनके लिये वे कभी-कभी हठ भी करते हैं। इस समय बालकों को सुन्दर-सुन्दर चित्र, जिसमें महापुरुषों के चित्र, प्राकृतिक दृश्य आदि हों, दिखाने चाहिये। कलात्मक वस्तुओं से अपने निवास को सजाना और बालकों में उसकी रुचि पैदा करनी चाहिये। महापुरुषों की जीवनियाँ सरल व सुबोध ढंग से सुनानी चाहिये। करुण, शान्त और मनोरंजक लोरियों से बालकों का मन-बहलाव भी होता है और उनके मनोजगत में सात्विक संस्कारों का आविर्भाव भी होने लगता है। इस अवस्था में चाहें तो बच्चे का मस्तिष्क किसी भी दिशा में लगा सकते हैं।

इस युग में शिक्षा का उद्देश्य अर्थ-उपार्जन हो गया है अतएव यह तो सम्भव नहीं है कि गुरुकुल प्रथा का एकाएक प्रचलन हो जाये पर इतना तो प्रत्येक अभिभावक कर ही सकते है कि बालकों को पूर्ण ब्रह्मचर्य और संयम के साथ रखकर उन्हें शिक्षित तथा विचारवान् तो बना दें। अपरिपक्व अवस्था में विवाह या साँसारिक व्यवसाय आदि में लगा देना भारी भूल है। अनुभवहीनता के कारण ऐसे बच्चों का जीवन प्रायः असफल ही रहता है और उन्हें जीवन भर तरह-तरह के दुख, कष्ट और क्लेश भुगतने पड़ते है। गृहस्थ की दुर्दशा का एक जबर्दस्त कारण यह भी है कि गृहस्थी की बागडोर जैसे मजबूत हाथों में पड़नी चाहिए थी वैसे, हाथ मजबूत हो नहीं पाते। अनियन्त्रित घोड़ों वाले रथ की जो दशा होती है, ठीक वैसी ही दुर्दशा उस गृहस्थी की भी होती है जिसके सदस्यों को न तो जीवन जीने की कला ही आती है, न उनमें इतना ज्ञान और अनुभव ही होता है। अंधपरंपराओं के रूप में चल रही आज की गृहस्थियों में किस प्रकार के द्वन्द्व छाये हैं, यह किसी से छुपा नहीं है।

शिक्षा मनुष्य के जीवन को सत्यवादी और कर्मशील बनाती है। यह शिक्षा यदि धार्मिकता से अनुगणित रहे तो गृहस्थ जीवन में वह आनन्द आता है कि मनुष्य की बार-बार इस भूमि में आकर जन्म लेने की इच्छा होती है। सामाजिक प्रगति और राष्ट्रीय उत्थान के लिए भी यह आवश्यक बात है कि यहाँ का प्रत्येक नागरिक शिक्षित तथा धर्म-दीक्षित बने। शिक्षा मनुष्य का बौद्धिक विकास करती है और आध्यात्मिकता लौकिक तथा पारलौकिक सुखों का आधार बनाती है। इस प्रकार मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों ही सुधरते हैं। जीवन के समग्र-विकास का सबसे अच्छा उपाय और कुछ हो नहीं सकता।

साँस्कृतिक उत्थान के लिए आत्म निरीक्षण और जीवन शोधन के द्वारा अपना जीवन समुन्नत बनायें, पर यह न भूलें कि इतने से ही अपनी संस्कृति को आर्ष रूप में लाना सम्भव न होगा। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि हमारे बालकों का चारित्रिक विकास हो। बालकों का नैतिक-उत्थान होगा तो वह परिस्थितियाँ आते देर न लगेगी जिनमें हमारे समाज का गौरव फिर से अपने पूर्व-रूप में झिलमिलाने लगेगा।


जनसंख्या वृद्धि का अभिशाप

दिनों दिन तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या हमारे वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय जीवन के लिए गम्भीर समस्या बनती जा रही है। विशेषज्ञों का दावा है कि यदि इस पर नियन्त्रण नहीं किया गया तो हमारी विकास की योजनायें धरी रह जाएंगी। व्यक्ति का जीवनस्तर भी ऊँचा नहीं उठ पाएगा। अभी भी हमारे यहाँ दो तिहाई लोगों को पर्याप्त भोजन, वस्त्र नहीं मिलता। जो मिलता है वह बहुत ही घटिया और पौष्टिक तत्वों से रहित मिल पाता है।

हमारा देश अभी भी एक अभावग्रस्त अविकसित देश है जिसके सामने बहुत सी समस्याएँ हैं। तीन पंचवर्षीय योजनाओं के बावजूद भी अभी हम अन्न उत्पादन और आर्थिक विकास उद्योग के क्षेत्र में आत्म निर्भर नहीं बन पाये हैं। अतिरिक्त उत्पादन तो दूर रहा अभी भी हमें अन्न बाहर से मँगाना पड़ता है। कई जीवनोपयोगी वस्तुओं के लिये विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है। इसका मुख्य कारण है हमारे यहाँ की तेजी से बढ़ने वाली जनसंख्या।

पिछली दो योजनाओं के मध्य अर्थात् एक दशाब्दी में हमारे यहाँ लगभग 6 करोड़ की वृद्धि हुई है बढ़ी हुई जनसंख्या विकास योजनाओं से मिलने वाले परिलाभ को खाती रही हैं। अर्थशास्त्र विशेषज्ञों का मत है कि “बढ़ती हुई जनसंख्या” को नियन्त्रित किये बिना हमारी विकास योजनाओं से विशेष लाभकारी परिणाम नहीं निकलेगा। इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारे देश के समक्ष तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या एक बहुत बड़ी समस्या, एक चुनौती के रूप में मौजूद है। राष्ट्रीय-सामाजिक-जीवन में भी अधिक बच्चे होना आज के युग में मनुष्य का कम दुर्भाग्य नहीं है। जिस रफ्तार से एक गृहस्थ के यहाँ बच्चों की संख्या बढ़ती है, उस क्रम से उनके जीवन-निर्वाह के साधन और आमदनी में बढ़ोतरी नहीं होती। एक किसान अपनी जमीन में औसत पैदावार ही कर पायेगा। एक नौकरी−पेशा आदमी को तो अपनी बँधायी ही तनख्वाह मिलेगी। बड़े-बड़े उद्योग-धन्धे करने वाले जो अधिक कमा सकते हैं, उनकी संख्या ही हमारे देश में कितनी-सी है। अधिकाँश लोगों की आय का स्त्रोत तो बँधा-बँधाया ही होता है। इसकी तुलना में हमारे यहाँ हर गृहस्थ में औसतन दो या तीन साल में एक बच्चा पैदा हो ही जाता है। इसके साथ-साथ आज के वैज्ञानिक साधनों, चिकित्सों सुविधाओं के कारण मृत्यु-संख्या भी पूर्वापेक्षा घट गई है।

जिस अनुपात से हमारे यहाँ बच्चों का जन्म होता है उस अनुपात से हमारी उत्पादन क्षमता, आर्थिक सामर्थ्य नहीं बढ़ती। यदि 10 वर्ष में किसी गृहस्थ के चार बच्चे हो गये तो उसकी आमदनी चौगुनी होने के बजाय चालीस, पचास प्रतिशत भी नहीं बढ़ती। परिणाम यह होता है कि प्रत्येक बच्चे के जन्म के साथ ही घर के सभी सदस्यों को कुछ तंगी में गुजारा करना पड़ता है। जरा उस गरीब आदमी की कल्पना कीजिए जिसकी गिनी-चुनी मजदूरी पर घर के पाँच बच्चे, वह स्वयं, घर वाले निर्भर करते हों ? निश्चय ही उसे अभाव और कष्टों में जीवन बिताना पड़ेगा।

अभाव और आर्थिक तंगी के कारण फिर बच्चों का पालन-पोषण, उनकी शिक्षा, उनका जीवन-निर्माण भली प्रकार नहीं हो पाता। विचार कीजिए, जो व्यक्ति अपने चार-पाँच बच्चों और घर वालों को उपयुक्त भोजन, वस्त्र, मकान आदि की ही व्यवस्था नहीं कर सकता, वह कैसे उनकी उचित शिक्षा-दीक्षा का प्रबन्ध करेगा? बच्चों को पर्याप्त दूध, पोषक भोजन, शिक्षा की उचित व्यवस्था वह बेचारा कहाँ से, कैसे, कर पायेगा?

बच्चों से ही जिम्मेदार नागरिक बनते हैं लेकिन बिना साधनों के वे कैसे कुशल व्यक्ति बन सकते हैं? बच्चे तो बढ़ रहे हों लेकिन अभिभावकों में उनके पालन-पोषण, जीवन-निर्माण की क्षमता का सामर्थ्य न हो, तो वे देश और समाज के लिये अयोग्य, भारस्वरूप ही सिद्ध होंगे। कोई माँ-बाप यह नहीं चाहता कि उसका बालक उच्च-शिक्षा प्राप्त न करे, उसे अच्छा भोजन न मिले, लेकिन गरीबी, अभाव और तंगी के कारण अधिकाँश लोग इसमें असमर्थ रहते हैं। जब बालक को उचित खाद्य, खेलने-कूदने के स्थान, साधन, शिक्षा की पर्याप्त व्यवस्था, जीवन-निर्माण का उपयुक्त वातावरण नहीं मिलेगा तो कैसे वह उत्कृष्ट नागरिक बन सकता है?

साधन सम्पन्नता न बढ़े लेकिन बच्चे खूब पैदा होते रहें तो माँ-बाप के व्यक्तिगत जीवन में तंगी, अभावग्रस्तता के साथ-साथ बच्चे का अयोग्य, अविकसित रहना, गैर-जिम्मेदार नागरिक बनना अवश्यंभावी है। व्यक्ति के साथ-साथ इसका देश और समाज पर भी प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता क्योंकि व्यक्ति की स्थिति पर ही देश और समाज की स्थिति निर्भर करती है।

अन्धाधुन्ध सन्तान पैदा करने के कारण मनुष्य का महत्वपूर्ण जीवन, उसकी महान् शक्तियाँ किसी महान् कार्य में न लगकर, कमाने और बच्चों का पालन करने में ही लगी रहती है। जब कोई आदमी अभाव के दलदल में फंसा हुआ वहाँ से निकलने के लिए ही परेशान रहे तो जन-सेवा, राष्ट्रोत्थान समाज-कल्याण, आत्म-विकास जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में कैसे लग सकता है? यह भी एक मुख्य कारण है कि हमारे देश का नागरिक बहुत कुछ सुनते, जानते, समझते-बूझते भी उत्कृष्ट कार्यों से उपेक्षित रहता है। अनियन्त्रित जनसंख्या व्यक्ति और समाज की शक्ति को ऊर्ध्वगामी नहीं होने देती, न किसी महान् लक्ष्य की ओर सोचने का अवकाश देती है। अपना और परिवार का पेट-पालन ही औसत नागरिक के जीवन का लक्ष्य बना रहता है ऐसी स्थिति में।

इसमें कोई सन्देह नहीं कि दिनों दिन बढ़ती हुई जनसंख्या, अनियन्त्रित सन्तान वृद्धि हमारे वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय जीवन के लिए अनेकों समस्याएँ पैदा कर देती है। सन्तान वृद्धि की अनियन्त्रित बाढ़ के कारण हमारी विकास योजनाएँ पंगु बन जाती हैं। कई सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक सुधार के प्रयत्न व्यर्थ सिद्ध हो जाते हैं। जब समाज में सबको भरपेट भोजन, तन ढकने को कपड़ा नहीं मिलेगा, न शिक्षा-दीक्षा की ही व्यवस्था होगी तो सुख-शान्ति, विकास की बातें एक काल्पनिक आदर्शमात्र ही बनी रहेंगी। भूखा, अभावग्रस्त आदमी अनैतिक मार्ग अपनाने में भी नहीं हिचकिचायेगा। इसलिये बढ़ती हुई जनसंख्या हमारे लिए एक गम्भीर समस्या है। हमें इसे व्यक्तिगत, समाजिक स्तर पर हल करना होगा। यदि हमें राष्ट्र को प्रबल समर्थ विकसित बनाना है, यदि हमें सुविधापूर्ण जीवन जीना है, यदि हमें अपनी सन्तान को योग्य एवं कुशल नागरिक, स्वस्थ मनुष्य बनाना है, यदि हमें आर्थिक, आत्म-निर्माण शक्ति प्राप्त करनी है तो अविलम्ब अनियमित तौर पर बढ़ती हुई सन्तान वृद्धि पर रोक लगानी होगी। प्रत्येक दम्पत्ति की यह मानवीय जिम्मेदारी है कि वह उतनी ही सन्तान पैदा करे जिसका पालन-पोषण, शिक्षण, संवर्धन वह सरलता से कर सके। सचमुच आज कम से कम बच्चे पैदा करना एक बहुत बड़ा सामाजिक कर्तव्य है, देशभक्ति है।


खाद्य-पदार्थों में मिलावट कैसे दूर हो।

वस्तुओं में खासकर खाद्य-पदार्थों में मिलावट रोकने के लिए सरकारी प्रयत्न तो होने ही चाहिए। सरकार कड़े कानून बनाकर, मिलावट करने वाले अपराधियों को कड़ा दण्ड देकर, इस रोग को समाज से दूर करने के लिए बहुत कुछ कर सकती है। सरकारी क्षेत्र से इस तरह के प्रयत्न चल भी रहे हैं। लेकिन लोकतन्त्र में किसी भी समस्या को सरकार के ऊपर ही नहीं छोड़ा जा सकता। कानून और दण्ड से ही बुराइयों को नहीं मिटाया जा सकता। हाँ, एक अंश रूप में ये समस्या को निपटने के लिए सहायक हो सकते है लेकिन समस्या के स्थायी समाधान के लिए लोकमत को जागृत होना पड़ेगा। खाद्य-पदार्थों में मिलावट का मसला सरकार पर ही पूर्णतया नहीं छोड़ा जा सकता। हमें व्यक्तिगत और सामाजिक स्तर पर इसका मुकाबला करना होगा। बुराइयाँ अपराध तभी समाप्त किये जा सकते हैं जब कि समाज में उन्हें सहन न करने की जागृति आये।

बुराइयों के फलने-फूलने और बढ़ने का एक और कारण हैं, वह है-समाज की नपुँसक वृत्ति, प्रतिरोध करने की क्षमता का अभाव। जब हम चुपचाप, व्यापारी या दुकानदार से मिलावट किये हुये सामान खरीद कर चुपचाप नीचा मुँह किये चले जाते हैं, घी में डालडा, हल्दी में पीली मिट्टी, दूध में अरारोट, आटे में सेलखड़ी, बूरे में पाउडर आदि का चुपचाप, सब कुछ जानबूझ कर भी उपयोग करते रहते हैं तो फिर क्यों न मिलावट करने वालों का हौसला बढ़ेगा ? क्यों न अधिक मिलावट करने वालों के लिए उनका उत्साह बढ़ेगा ?

लोकतन्त्र में बुराइयों को जब तक जनता का समर्थन मिलेगा या समाज उन्हें चुपचाप सहन करता रहेगा तो सरकार कितने ही प्रयत्न करे उन्हें दूर नहीं किया जा सकता। मिलावट की समस्या का हल तभी हो सकेगा जब इस तरह की असामाजिक प्रवृत्तियों को सहन न करने की सामर्थ्य हममें पैदा होगी।

यद्यपि किसी भी देशव्यापी समस्या को देखकर हम हिम्मत हार बैठते हैं कि इतनी बड़ी समस्या के लिए कुछ लोग क्या कर सकते हैं, लोगों को अपने कामों से ही फुर्सत नहीं मिलती। लेकिन इस प्रकार सोचने से भी तो काम नहीं चलता हैं। ठीक है, हम देशव्यापी समस्या का हल नहीं कर सकते लेकिन अपने पड़ौस, अपने गाँव, शहर और कस्बे में तो इसके लिए प्रयत्न कर सकते हैं। जहाँ हम रहते हैं, वहीं उपभोक्ताओं का संगठन बनाकर, इस अन्याय का मुकाबला कर सकते हैं “अपने क्षेत्र में मिलावट नहीं होने देंगे।” इस संकल्प के साथ यदि उपभोक्ता लोग एक होकर काम करें तो बेचने वाले की कोई हिम्मत नहीं हो सकती कि हमें विषाक्त पदार्थ दे। मिलावट करने वाले व्यापारियों का बहिष्कार करना, उनके विरुद्ध सामूहिक आन्दोलन, प्रदर्शन करना इसके लिए उपयुक्त रहेगा। इसके साथ-साथ जन-साधारण में मिलावटी वस्तुओं कौन खरीदने की जागृति पैदा करनी होगी। उन्हें शिक्षित करना होगा कि अपनी गाढ़ी कमाई के बदले बाजार से मिलावटी पदार्थों का विष नहीं खरीदना है। जिस समाज में इस तरह की चेतना, जागृति पैदा हो जाय तो फिर कोई आधार नहीं रह जाता कि विक्रेता उसे अधिक समय धोखा देता रहे।

मिलावट करने वाले व्यापारी उद्योगपतियों का विरोध, उनके साथ असहयोग आदि के साथ-साथ हमें रचनात्मक दृष्टि से भी विचार करना होगा। वस्तुएँ शुद्ध रूप में मिल सकें, इसके लिए उपभोक्ताओं को अपने सहकारी भण्डार, दुकानें आदि चालू करने चाहिए। सरकारी सहयोग भी इस सम्बन्ध में मिल सकता है। वस्तुतः स्वास्थ्यप्रद, ताजा, शुद्ध वस्तुयें उपयुक्त मूल्य पर जनसाधारण को मुहैया करना भी आज के युग में कोई कम सेवा नहीं है समाज की।

प्रत्येक व्यापारी, उद्योगपति का भी अपने देश, समाज, मानवता के प्रति कुछ कर्तव्य होता है, कुछ उत्तरदायित्व होता है। इन सामाजिक उत्तरदायित्वों, मानवीय कर्तव्यों को चाँदी के चन्द टुकड़ों के लिए उपेक्षित नहीं करना चाहिए। उनके द्वारा समाज को होने वाली हानि पर सोचना चाहिए। कदाचित् ठण्डे दिल से कोई व्यापारी ऐसा सोचे तो फिर उसकी आत्मा इस अनुचित कार्य के लिए आज्ञा नहीं दे सकती।

यह भी सत्य है कि मिलावट करने वाले व्यापारियों को मजदूर, नौकर, सहयोगी के रूप में हम लोगों में से ही सहायता मिलती है। अपनी आँखों के आगे ही इस तरह सामाजिक पाप को होते हम नित्य देखते हैं। कदाचित् दुकानों, उद्योग संस्थानों, मिल फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर, नौकर उन्हें सहयोग न दें, मिलावट के पाप कृत्य में सहायक न बनें तो समस्या बहुत कुछ हल हो सकती है। व्यापारियों की संख्या नगण्य है। वस्तुतः उनका कारोबार चलाने वाले तो हम ही लोगों में से होते है। यदि हम सहयोग न देकर इस दुष्कृत्य के लिए उनका विरोध करें, काम बन्द कर दें तो अकेला विक्रेता भी कुछ नहीं कर पाएगा यह निश्चित है।

खाद्य पदार्थों के उत्पादन का कार्य व्यक्तिगत स्वरूप में न रहकर सामाजिक अधिकार के अंतर्गत हो। क्योंकि व्यक्तिगत क्षेत्र में इसका उद्देश्य मुनाफा कमाना, अपना अधिक से अधिक लाभ निकालना हो सकता है। ऐसी स्थिति में कई बार आवश्यकता से अधिक मात्रा में वस्तुएँ तैयार की जाती हैं, जिन्हें सड़ने या बासी होने से बचाने के लिए कई रसायन द्रव्यों का उपयोग किया जाता है। एक तो पुराना बासी पदार्थ, फिर उसमें रसायनों की मिलावट, दोनों ही उसके विषाक्त होने के कारण बन जाते हैं। फिर व्यक्तिगत केन्द्रीय संस्थानों में मिलावट करने की सरलता, सुविधा रहती है। क्योंकि यह सब परोक्ष रूप से होते हैं। लेकिन सामूहिक क्षेत्रों में जहाँ वस्तुओं का उत्पादन लाभ के लिए नहीं वरन् उपयोग के लिए किया जाय, मिलावट या उनके सड़ने के लिए कोई गुँजाइश नहीं रहती। उपभोक्ताओं की माँग के अनुसार ही वहाँ उत्पादन हो और वह तुरन्त बट जाना चाहिए। उत्पादन पर व्यक्तिगत नियन्त्रण न रहकर सामाजिक नियन्त्रण रहे तो भी मिलावट की समस्या बहुत कुछ हल हो सकती है।

खाद्य-पदार्थों में मिलावट को रोकने के लिए हमें लोकमत जागृत करना पड़ेगा, मिलावट करने वालों के प्रति विरोध, असहयोग, बहिष्कार करना होगा, सहकारी उपभोक्ता स्टोर खोलने होंगे, व्यक्ति का मूल्य पैसे से नहीं उसके चरित्र से देखा जाएगा, उत्पादन का कार्य विकेन्द्रित कर सामाजिक नियन्त्रण में लाना होगा तभी हम इस बुराई को मिटा सकेंगे। और सबसे आवश्यक बात यह है कि हमें इसके लिए दृढ़ विश्वास, लगन, उत्साह से काम करना होगा। अपना नुकसान उठाकर, कई खतरे झेल कर हमें इस समस्या के विरुद्ध संघर्ष छेड़ना होगा तभी हम अपने समाज, देश, जन-जीवन को नष्ट, रुग्ण, क्षीण होने से और शोषण होने से बचा सकेंगे। सचमुच मिलावट का यह रोग हमारे लिए एक चुनौती है जिसे हम सभी को स्वीकार करना चाहिए।


युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति

उत्तराधिकार और प्रतिनिधित्व का प्रयोजन

नवम्बर और दिसम्बर की अखण्ड-ज्योति में इसी स्तम्भ के अंतर्गत ‘प्रतिनिधियों की नियुक्ति’ वाली योजना छपी है। प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उसे गम्भीरता-पूर्वक समझा और ग्रहण किया है। बात सचमुच ऐसी है भी कि उस पर विचार करना हर सदस्य के लिए आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है।

‘अखण्ड-ज्योति’ छपे कागजों का व्यापार नहीं है। न उसके पाठक इस तरह के मनचले लोग ही है कि मनोरंजन के लिए, खाली समय काटने के लिये कुछ भी पढ़ते रहने की तरह इस पत्रिका को मँगाते हों। हमने विशेष प्रयत्न और मनोयोगपूर्वक पिछले पच्चीस वर्ष के परिश्रम से इस विशाल जनसमुद्र में से थोड़े से मोती चने हैं। वे ही अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं। जिनकी अन्तरात्मा में पूर्व जन्मों की संग्रहीत उत्कृष्टता मौजूद है, जिन्होंने इस जन्म में भी अपनी अन्तरात्मा को परिष्कृत किया है - जिनके सामने मानव-जीवन की महत्ता और उसकी सार्थकता का प्रश्न उपस्थित रहता है-ऐसे ही लोग इस परिवार के सदस्य बन सके हैं और इन प्रबुद्ध आत्माओं की अन्तःप्रेरणा को जागृत एवं समुन्नत बनाने के लिए एक उपयुक्त साधन के रूप में “अखण्ड-ज्योति” अपना अस्तित्व बनाये हुए है और इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये वह जीवित है

जागृत आत्माओं का चुनाव

जागृत आत्माओं को ढूंढ़ने और संग्रह करने में हमको ‘अखण्ड-ज्योति’ के 25 वर्ष पूरे हो गये। अब उसे दूसरे कदम उठाने हैं। जिन विचारों का पिछले वर्षों में प्रचार किया जाता रहा है अब उन्हें मूर्त रूप देने के लिये ठोस गतिविधियाँ अपनानी हैं, और रचनात्मक कार्य खड़े करने हैं। यह सब हम अकेले ही न कर लेंगे, प्रस्तुत योजना की पूर्ति के लिए अनेक सहचरों का श्रम एवं मनोयोग आवश्यक होगा। ऐसे लोग कौन हो सकते हैं, यही चुनावक्रम इन दिनों चल रहा है। तीस हजार अखण्ड-ज्योति सदस्यों में से सभी इतने उत्साही और निष्ठावान नहीं हैं जिन पर इतना भार डाला जा सके कि वे इस मिशन को गतिशील बनाये रहने के लिये हमारी ही तरह कुछ करने के लिये कटिबद्ध हो जाएँ। यों परिवार के सभी परिजन, अखण्ड ज्योति के प्रायः सभी सदस्य अपनी आध्यात्मिक विशेषताओं से सम्पन्न हैं। पर बड़े उत्तरदायित्व संभालने की क्षमता हर किसी में नहीं हैं। बूढ़ा बाप, परिवार के बड़े लड़कों को गृह व्यवस्था चलाने का उत्तरदायित्व सौंपता है, इसको अर्थ यह नहीं कि घर के शेष सब लोगों का महत्व कम है। आगे चलकर छोटे बच्चे भी होनहार हो सकते हैं-वे बूढ़े बाप से भी अधिक योग्य सिद्ध हो सकते हैं, पर आज तो जो भी कंधे पर बोझ ढोने की क्षमता रखते होंगे, उन्हें ही कार्यभार सौंपा जाएगा

उत्तराधिकार का पात्रत्व

अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों में से जिन विशिष्ट परिजनों का हम अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुनाव कर रहे हैं, उनमें प्रमुख गुण यही होना चाहिए कि अपनी ही उलझनों तक सुलझे रहने में सीमित न रखकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” की प्रवृत्ति को समुचित मात्रा में धारण किए हुए हों। घर का बड़ा वही कहलाता है जो अपने छोटे भाई बहिनों, अशक्त असमर्थों का भी पूरा ध्यान रखे। ऐसे ही गृहपति प्रशंसनीय कहे जाते हैं और वे ही उसे कुटुम्ब का ठीक तरह पालन पोषण कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। जो व्यक्ति अपनी निजी इच्छाओं, कामनाओं को ही सर्वोपरि स्थान देता हो और उतनी ही परिधि में सोचता विचारता हो, ऐसे स्वार्थी के हाथ में यदि बूढ़े पिता का उत्तरदायित्व आ जाय तो घर के छोटे लोगों को क्या प्रसन्नता होगी ? वे सब घाटे में ही रहेंगे और संकट में ही पड़ेंगे। बूढ़ा बाप भी इतना समझदार तो होता ही है कि जिसे अपना उत्तरदायित्व सौंपे, उसमें स्वार्थपरता की मात्रा कम ही होनी चाहिए।

उपासना की दृष्टि से कई लोग काफी बढ़े-चढ़े होते हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि जहाँ दूसरे लोग भगवान् को बिल्कुल ही भूल बैठे हैं वहाँ वह व्यक्ति ईश्वर का स्मरण तो करता है, औरों से तो अच्छा है। इसी प्रकार जो बदमाशियों से बचा है, अनीति और अव्यवस्था नहीं फैलाता, संयम और मर्यादा में रहता है, वह भी भला है। उसे बुद्धिमान कहा जायगा क्योंकि दुर्बुद्धि को अपनाने से जो अगणित विपत्तियाँ उस पर टूटने वाली थीं, उनसे बच गया। स्वयं भी उद्विग्न नहीं हुआ और दूसरों को भी विक्षुब्ध न करने की भलमनसाहत बरतता रहा। यह दोनों ही बातें अच्छी हैं- ईश्वर का नाम लेना और भलमनसाहत से रहना एक अच्छे मनुष्य के लिये योग्य कार्य हैं। उतना तो हर समझदार आदमी को करना ही चाहिए था। जो उतना ही करता है उसकी उतनी तो प्रशंसा ही की जायगी कि उसने अनिवार्य कर्तव्यों की उपेक्षा नहीं की और दुष्ट दुरात्माओं की होने वाली दुर्गति से अपने को बचा लिया।

अध्यात्म की प्रधान कसौटी

किन्तु किसी व्यक्ति की महानता के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है। महामानवों में एक अतिरिक्त गुण होता है और वह है परमार्थ। दूसरों को दुखी या अधःपतित देखकर जिसकी करुणा विचलित हो उठती है, जिसे औरों की पीड़ा अपनी पीड़ा की तरह कष्टकर लगती है, जिसे दूसरों के सुख में अपने सुख की आनन्दमयी अनुभूति होती है, वस्तुतः वही महामानव, देवता, ऋषि, सन्त, ब्राह्मण, अथवा ईश्वर-भक्त है। निष्ठुर व्यक्ति, जिसे अपनी खुदगर्जी के अतिरिक्त दूसरी बात सूझती ही नहीं, जो अपनी सुख सुविधा से आगे की बात सोच ही नहीं सकता ऐसा अभागा व्यक्ति निष्कृष्ट कोटि के जीव जन्तुओं की मनोभूमि का होने के कारण तात्विक दृष्टि से ‘नर-पशु’ ही गिना जायगा। ऐसे नर-पशु कितना भजन करते हैं, कितना ब्रह्मचर्य रहते है, इसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। भावनाओं का दरिद्र व्यक्ति ईश्वर के दरबार में एक कोढ़ी कंगले का रूप बनाकर ही पहुँचेगा। उसे वहाँ क्या कोई मान मिलेगा ? भक्ति का भूखा, भावना का लोभी भगवान् केवल भक्त की उदात्त भावनाओं को परखता है और उन्हीं से रीझता है। माला और चन्दन, दर्शन और स्नान उसकी भक्ति के चिह्न नहीं, हृदय की विशालता और अन्तःकरण की करुणा ही किसी व्यक्ति के भावनाशील होने का प्रमाण है और ऐसे ही व्यक्ति को, केवल ऐसे ही व्यक्ति को ईश्वर के राज्य में प्रवेश पाने का अधिकार मिलता है।

हमें अपने परिवार में से अब ऐसे ही व्यक्ति ढूंढ़ने हैं जिन्होंने अध्यात्म का वास्तविक स्वरूप समझ लिया हो और जीवन की सार्थकता के लिए चुकाए जाने वाले मूल्य के बारे में जिन्होंने अपने भीतर आवश्यक साहस एकत्रित करना आरम्भ कर दिया हो। हम अपना उत्तराधिकार उन्हें ही सौंपेंगे। बेशक, धन-दौलत की दृष्टि को कुछ भी मिलने वाला नहीं है, हमारे अन्तःकरण में जलने वाली आग की एक चिंगारी ही उनके हिस्से में आवेगी पर वह इतनी अधिक मूल्यवान है कि उसे पाकर कोई भी व्यक्ति धन्य हो सकता है।

खरे खोटे की कसौटी

जिनकी दृष्टि से विराट् ब्रह्म की उपासना का वास्तविक स्वरूप विश्व-मानव की सेवा के रूप में आ गया हों वे हमारी कसौटी पर खरे उतरेंगे। जिनके मन में अपनी शक्ति सामर्थ्य का एक अंश पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने के लिये लगाने की भावना उठने लगी हो उन्हीं के बारे में ऐसा सोचा जा सकता है कि मानवीय श्रेष्ठता की एक किरण उनके भीतर जगमगाई है। ऐसे ही प्रकाश पुँज व्यक्ति संसार के देवताओं में गिने जाने योग्य होते हैं। उन्हीं के व्यक्तित्व का प्रकाश मानव-जाति के लिये मार्ग-दर्शक बनता हैं। उन्हीं का नाम इतिहास के पृष्ठों पर अजर अमर बना हुआ हैं। प्रतिनिधियों के चुनाव में हम अपने परिवार में से इन्हीं विशेषताओं से युक्त आत्माओं की खोज कर रहे हैं। हमारे गुरुदेव ने हमें इसी कसौटी पर कसा और जब यह विश्वास कर लिया कि प्राप्त हुई आध्यात्मिक उपलब्धियों का उपयोग यह व्यक्ति लोक कल्याण में ही करेगा तब उन्होंने अपनी अजस्र ममता हमारे ऊपर उड़ेली और अपनी गाढ़ी कमाई का एक अंश प्रदान किया। वैसा ही पात्रत्व का अंश उन लोगों में होना चाहिए जो हमारे उत्तराधिकारी का भार ग्रहण करें।

उपहासास्पद ओछे दृष्टिकोण-

यों ऐसे भी लोग हमारे संपर्क में आते हैं जो ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने के लिए कुण्डलिनी जागरण, चक्र जागरण और न जाने क्या-क्या आध्यात्मिक लाभ चुटकी मारते प्राप्त करने के लिए अपनी अधीरता व्यक्त करते हैं। ऐसे लोग भी कम नहीं जो ईश्वर दर्शन से कम तो कुछ चाहते ही नहीं और वह भी चन्द घण्टों या मिनटों में। भौतिक दृष्टि से अगणित प्रकार के लाभ प्राप्त करने के लिए लालायित, अपनी दरिद्रता और विपन्न स्थिति से छुटकारा पाने की कामना से इधर-उधर भटकते लोग भी कभी-कभी मन्त्र-तन्त्र की तलाश में इधर आ निकलते हैं। इन दीन दुखियों की जो सहायता बन पड़ती है वह होती भी है। इस कटौती पर इस प्रकार के लोग खोटे सिक्के ही माने जा सकते है। अध्यात्म की चर्चा वे करते हैं पर पृष्ठभूमि तो उसकी होती नहीं। ऐसी स्थिति में कोई काम की वस्तु उनके हाथ लग भी नहीं पाती, पवित्रता रहित लालची व्यक्ति जैसे अनेक मनोरथों का पोट सिर पर बाँधे यहाँ वहाँ भटकते रहते हैं, ठीक वही स्थिति उनकी भी होती है। मोती वाली सीप में ही स्वाति बूँद का पड़ना मोती उत्पन्न करता है। अन्य सीपें स्वाति बूँदों का कोई लाभ नहीं उठा पातीं। उदात्त आत्माएँ ही अध्यात्म का लाभ लेती हैं। उन्हें ही ईश्वर का अनुग्रह उपलब्ध होता हैं। और उस उदात्त अधिकारी मनो-भूमि की एकमात्र परख है मनुष्यत्त्व में करुणा विगलित एवं परमार्थी होना। जिसके अंतःकरण में यह तत्व नहीं जगा, उसे कोल्हू के बैल तरह साधना पथ का पथिक तो कहा जा सकता है पर उसे मिलने वाली उपलब्धियों के बारे में निराशा ही व्यक्त की जा सकती है।

अखण्ड-ज्योति परिवार में पचास सौ ऐसे व्यक्ति भी आ फँसते है जो पत्रिका को कोई जादू, मनोरंजन आदि समझते हैं, कोई आचार्यजी को प्रसन्न करने के लिए दान स्वरूप खर्च करके उसे मँगा लेते हैं। विचारों की श्रेष्ठता और शक्ति की महत्ता से अपरिचित होने के कारण वे उसे पढ़ते भी नहीं। ऐसे ही लोग आर्थिक तंगी, पढ़ने की फुरसत न मिलने आदि का बहाना बना कर उसे मँगाना बन्द करते रहते है। यह वर्ग बहुत ही छोटा होता हैं, इसलिए उसे एक कौतूहल की वस्तु मात्र ही समझ लिया जाता है। अधिकाँश पाठक ऐसे है जो विचारों की शक्ति को समझते हैं और एक दो दिन भी पत्रिका लेट पहुँचे तो विचलित हो उठते हैं। न पहुँचने की शिकायत तार से देते हैं। ऐसे लोगों को ही हम अपना सच्चा परिजन समझते हैं। जिनने विचारों का मूल समझ लिया केवल वे ही लोग इस कठिन पथ पर बढ़ चलने में समर्थ हो सकेंगे। जिन्हें विचार व्यर्थ मालूम पड़ते हैं और एक-दो माला फेर कर आकाश के तारे तोड़ना चाहते हैं उनकी बाल-बुद्धि पर खेद ही अनुभव किया जा सकता है।

परीक्षा की वेला आ गई-

पिछले दो अंक पढ़कर पाठक वस्तुस्थिति को समझ गये होंगे। हम अपना उत्तरदायित्व उन कन्धों पर सौंपने जा रहे है जो उसके लिए उपयुक्त हों। युग परिवर्तन की इस सन्धि वेला में आध्यात्मिक व्यक्तियों पर ही सबसे बड़ी जिम्मेदारी आई है। वे उसे पूरा करने में प्रमाद बरतेंगे तो ईश्वर उन्हें कभी क्षमा न करेगा। स्वर्ग, मुक्ति, ऋद्धि, सिद्धि साक्षात्कार, कुण्डलिनी एवं लौकिक सुख-सुविधाओं के लिए नहीं इन दिनों हर सच्चे अध्यात्मवादी की साधना देशधर्म, समाज एवं संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए होनी चाहिए। उसी के उपयुक्त अपने विचारों और कार्यक्रमों को ढालने के लिए हर आध्यात्मिक व्यक्ति को कटिबद्ध होना चाहिए।

साल में एक बार छात्रों की परीक्षा होती है, उस पर उनके आगामी वर्ष का आधार बनता है। प्रबुद्ध आत्माओं की परीक्षा का भी कभी-कभी समय आया करता है। त्रेता में दूसरे लोग कायरताग्रस्त हो चुप हो बैठे थे, तब रीछ बन्दरों ने वह परीक्षा उत्तीर्ण की थी। द्वापर में पाँच पाण्डवों ने भगवान का मनोरथ पूरा किया था। पिछले दिनों गुरु गोविन्दसिंह के साथी सिखों ने और समर्थ गुरु रामदास के शिवाजी आदि मराठा शिष्यों ने ईश्वर भक्ति की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। गायत्री की पुकार पर भी कितनों ने ही अपनी श्रेष्ठता का परिचय दिया था। नव-निर्माण की ऐतिहासिक वेला में अब फिर प्रबुद्ध तेजस्वी, जागृत और उदात्त आध्यात्मिक भूमिका वाले ईश्वर भक्तों की पुकार हुई है। समय आने पर दूध पीने वाले मजनुओं की तरह हमें आंखें नहीं चुरानी चाहिए। यह समय ईश्वर से नाना प्रकार के मनोरथ पूरे करने के लिए अनुनय विनय करने का नहीं, वरन् उसकी परीक्षा कसौटी पर चढ़कर खरे उतरने का है। युग की पुकार ईश्वर की इच्छा का ही सन्देश लेकर आई है। माँगने की अपेक्षा देने का प्रश्न सामने उपस्थित किया है और अपनी भक्ति एवं आध्यात्मिकता को खरी सिद्ध करने की चुनौती प्रस्तुत की है। इस विषम बेला में हमें विचलित नहीं होना है वरन् श्रद्धापूर्वक आगे बढ़ना है।

जिनमें साहस हो आगे आवें-

हमारा निज का कुछ भी कार्य या प्रयोजन नहीं है। मानवता का पुनरुत्थान होने जा रहा है। ईश्वर उसे पूरा करने वाले हैं। दिव्य आत्माएँ उसी दिशा में कार्य कर भी रही हैं। उज्ज्वल भविष्य की आत्मा उदय हो रही है, पुण्य प्रभाव का उदय होना सुनिश्चित है। हम चाहे तो उसका श्रेय ले सकते हैं और अपने आपको यशस्वी बना सकते हैं। देश को स्वाधीनता मिली, उसमें योगदान देने वाले अमर हो गये। यदि वे नहीं भी आगे आते तो भी स्वराज्य तो आता ही वे बेचारे और अभागे मात्र बनकर रह जाते। ठीक वैसा ही अवसर अब है। बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति अवश्यम्भावी है। उसका मोर्चा राजनैतिक लोग नहीं धार्मिक कार्यकर्त्ता संभालेंगे। यह प्रक्रिया युग-निर्माण योजना के रूप में आरम्भ हुई है। हम चाहते हैं इसके संचालन का भार मजबूत हाथों में चला जाए। ऐसे लोग अपने परिवार में जितने भी हों, जो भी हों, जहाँ भी हों, एकत्रित हो जाएँ और अपना काम सँभाल लें। उत्तर-दायित्व सौंपने की, प्रतिनिधि नियुक्त करने की योजना के पीछे हमारा यही उद्देश्य है।


अगले वर्ष की विशिष्ट साधना

केवल उपयुक्त मनोभूमि बालों के लिए

गत अंक में यह बताया जा चुका है कि अपने प्रतिनिधियों को हम आगामी बसंत पंचमी से कुछ विशिष्ट साधना आरम्भ कराने वाले हैं और उसमें उनका ही नहीं हमारा भी योग रहेगा।

साधना और उसकी सफलता-

साधना मार्ग का यह एक प्रकट रहस्य है कि साधक अकेला ही, केवल अपने जप-तप के बल पर ही तेजी के साथ सफलता की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। उसे कभी मार्ग-दर्शक ही नहीं, अनुदान-दाता की भी आवश्यकता होती है। यदि वह न मिले तो मंजिल कठिन पड़ती है। यों असम्भव तो कुछ भी नहीं, आत्मा में अपरिमित शक्ति विद्यमान है, वह बिना सहायता के भी अपने प्रबल पुरुषार्थ और अविच्छिन्न मनोयोग के बल पर सब कुछ कर सकने में समर्थ हो सकती है। फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि इस प्रकार के एकाकी प्रयत्न कष्टसाध्य अवश्य हैं। अनाथ बच्चे भी किसी प्रकार पल जाते हैं और आशाजनक उन्नति भी कर लेते हैं पर इतना तो मानना ही पड़ेगा कि जिन बच्चों के अभिभावक मौजूद हों और उन्नति की आवश्यकता सुविधाएँ उपलब्ध हों तो वे अनाथ बालकों की तुलना में अपेक्षा कृत अधिक मात्रा में, अधिक तेजी से, अधिक शीघ्र प्रगति कर सकते हैं। आध्यात्मिक उपासना और जीवन साधना का मार्ग भी ऐसा ही है। इसमें सहचर, स्नेही, मार्गदर्शक ही नहीं अनुदान दाता की आवश्यकता भी पड़ती है और जब यह आवश्यकता पूरी हो जाय तो सफलता की सम्भावना अधिक असंदिग्ध हो जाती है।

मार्गदर्शन ही नहीं अनुदान भी-

पिता-माता को बच्चे को स्नेह देना पड़ता है, मार्ग दर्शन करना पड़ता है, साथ ही उनकी प्रगति के लिए आवश्यक वस्तुएँ, साधना सामग्री भी जुटानी पड़ती हैं। यदि कोई पिता बच्चे को स्नेह तो दे, उपदेश भी दिया करे पर उसके लिए पुस्तक, फीस, भोजन, वस्त्र आदि की व्यवस्था न करे, तो बालक की प्रगति का उद्देश्य पूरा न हो सकेगा। बिल्कुल यही बात आध्यात्मिक क्षेत्र में लागू होती है। साधना कैसे करनी चाहिए इसका विधान बना देना ही पर्याप्त नहीं, यह उद्देश्य तो पुस्तकों से भी पूरा हो सकता है। मार्ग-दर्शक या गुरु की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि वह रुकी हुई गाड़ी को गतिशील बनाने के लिए शिक्षा मात्र ही न दिया करें वरन् अपनी सामर्थ्य एवं तपश्चर्या का अनुदान देकर साधक को मंजिल तक पहुँचाने के लिए सक्रिय सहायता देता रहे।

पिता-पुत्र की परम्परा यही है। पिता अपनी कमाई अपने पुत्र के लिए खर्च करता है। वह पुत्र बड़ा होने पर अपना उपार्जन अपने बच्चों के लिए खर्च करता है इसी सिद्धान्त पर वंश-परम्परा चलती रहती है। गुरु -परम्परा की भी क्रम यही है। गुरु अपनी तपश्चर्या का अंश शिष्य को देकर उसे गतिशील बनाता है। फिर वह जब समर्थ हो जाता है, तब पूर्व क्रम के अनुसार अपनी सामर्थ्य अपने शिष्यों के लिए छोड़ता है। इस प्रकार वह परम्परा भी चलती रहती है। जहाँ यह परम्पराएँ टूटीं कि नई पीढ़ी की प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है।

आध्यात्मिक क्षेत्र में गुरु परम्परा एक प्रकार से अवरुद्ध पड़ी हुई है। यों कहने को तो कानफूँका गुरु और कण्ठीधारी चेला सर्वत्र भरे पड़े हैं, पर उस विडम्बना में एक लकीर पीटने के अतिरिक्त सार कुछ नहीं। इसके लिए दूर आवश्यकताओं को देखना समझना पड़ेगा।

अध्यात्म का उद्देश्य और लक्ष्य-

अध्यात्म का उद्देश्य आत्मा की संकीर्णता एवं संकुचित स्वार्थपरता को दूर करके उसे अणु से विभु, तुच्छ से महान्, आत्मा से परमात्मा, स्वार्थी से परमार्थी बनाना है। इस महान् तथ्य को हृदयंगम करने वाला व्यक्ति तेजी से ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की ओर बढ़ता है और उसकी विचारणा एवं कार्यपद्धति विश्व मानव के कल्याणार्थ गतिशील होने लगती है। भाँग खाने पर नशा चढ़ना ही चाहिए। जिसके पीने से नशा न आवे वह शराब कैसी ? इसी प्रकार अध्यात्मवादी का परमार्थी होना निश्चित है। जिसकी आत्मा में अध्यात्म का प्रकाश चमकेगा वह अपनी प्रभा से दूसरों को प्रकाश दिये बिना रह ही न सकेगा। यह हो नहीं सकता कि कोई व्यक्ति आध्यात्मवादी तो हो पर उसकी विचारणा और कार्य पद्धति स्वार्थ की संकुचित सीमा में अवरुद्ध बनी रहे।

आज अध्यात्म के नाम पर जो भ्रम जंजाल चारों ओर फैला फिर रहा है उसमें वास्तविकता नहीं के बराबर और आडम्बर पहाड़ के बराबर भरा पड़ा है। लोग इसलिए अध्यात्म-मार्ग को नहीं अपनाते कि उन्हें ऐसा उत्कृष्ट आत्म-बल मिले जिससे महापुरुषों के पथ का अनुगमन करते हुए अपना जीवन लक्ष्य पूरा करें और संसार को समुन्नत बनाने में अधिकाधिक त्याग बलिदान कर सकने का सौभाग्य प्राप्त हो। आज तो लोक-परलोक में स्वार्थ, मुक्ति चाहते हैं, ऋषि-सिद्धियों से सम्पन्न चमत्कारी सिद्ध बनना चाहते हैं, संसार में धन, सन्तान, यश, बल, सत्ता आदि चाहते हैं, ऐसी अगणित स्वार्थपरताएँ और कामनाएँ उनके रोम-रोम में भरी पड़ी रहती हैं। उन्हीं की पूर्ति का एक सस्ता उपाय उन्हें अध्यात्म दीखता हैं। महीने दो महीने, दस-पाँच माला फेर कर वे न जाने कितने मनोरथ पूरे करना चाहते हैं। उसी के लिए वे कोई जन्त्र-मन्त्र जपते हैं, किसी देवी देवता पर भोग प्रसाद चढ़ाते, किसी तीर्थ, देव का दर्शन करते देखे जाते हैं।

उपयुक्त मनोभूमि की आवश्यकता-

गहराई से विश्लेषण करने पर यह स्पष्ट हो जाता हैं कि उपरोक्त प्रकार की मनोभूमि को विशुद्ध रूप से भौतिकवादी मनोभूमि ही कह सकते है। जिसका लक्ष्य भौतिक हो, सीमित स्वार्थपरता हो, उसे अध्यात्म कहना वस्तुतः अध्यात्मिकता को अपमानित करने के समान है। जब लोगों का उद्देश्य ही अध्यात्म नहीं रहा तो उस क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाले गुरु शिष्य भी क्या होंगे ? लक्ष्य सही है तो अध्यात्म की चर्चा करना उचित है। अन्यथा यहाँ भी वैसी ही लूट खसोट रहेगी जैसी भौतिक जगत के हर क्षेत्र में चलती है। शिष्य चाहेगा कि गुरु की तपश्चर्या लूटी खसोंट कर उनसे अपने भौतिक प्रयोजन सिद्ध कर लूँ। गुरु चाहेगा शिष्य को किसी प्रपंच में फाँसकर उसकी गाँठ काटने के लिए जो भी तरकीब हो सकती हो उसे बरत लूँ। ऐसी आपा-धापी जहाँ फैली हो, वहाँ अध्यात्म साधना, गुरु, शिष्य, ईश्वर सिद्धि आदि शब्दों की दुर्गति हो रही ही कही जा सकती है। उन परिस्थितियों में गुरु-परम्परा क्या निभेगी। उस नकली साधना का फल भी किसी को क्या मिलेगा ?

दीन नहीं दानी बनें-

दीन दुखियों की सहायता आवश्यक है। जिस प्रकार धनी लोग निर्धनों की एक सीमा तक सहायता करते हैं, उसी तरह तपस्वी लोग दूसरों की कठिनाइयों में भी एक सीमा तक सहायता करते रहते हैं, करनी भी चाहिए। यह एक मानवीय प्रश्न है। ईश्वर भी इसी प्रकार अपनी करुणा के परिचय दीन दुखियों के लिए देता रहता है। इस दृष्टि से की हुई प्रार्थना भी कुछ न कुछ लाभ ही करती है। पर इन बातों को अध्यात्म या साधना नहीं कहना चाहिए। क्योंकि उनका उद्देश्य ही भिन्न है। आत्मा की मलिनता और संकीर्णता का परिष्कार कर उसे उदात्त, महान् एवं परमार्थ परायण बनाना ही अध्यात्म होता है। इस दिशा में जितनी आकांक्षा प्रबल हो, जितना प्रयत्न प्रबल हो, जितनी प्रगति हो रही हो, वहाँ उतनी ही अध्यात्म की विद्यमानता माननी चाहिए। ऐसा अध्यात्म ही कल्प-वृक्ष, अमृत, पारस आदि के नाम से पुकारा जाता है, उसी को पाकर जीव ईश्वर बनता है। भिखमंगे, लालचियों का अध्यात्म उन्हें कुछ टुकड़े दिलाने के अतिरिक्त और किसी प्रकार की उपलब्धियों से लाभान्वित नहीं कर सकता। इस श्रेणी के लोग ईश्वर के कृपा पात्र भी नहीं बन सकते जब उनकी भक्ति ही झूठी हैं तो बदले में ईश्वर का पक्का प्यार भी कैसे मिल सकता है ? इतिहास में जितने भी महान् ईश्वर भक्त हुए हैं उनके जीवन पर दृष्टि डालने से स्पष्ट हो जाता है कि उनमें से हर एक को स्वार्थपरता के क्षेत्र से आगे बढ़कर परमार्थ परायणता का परिचय देना ही पड़ा है। यह मार्ग लालचियों का नहीं, दानियों का है। यहाँ हरिश्चन्द्र, दधीचि, बुद्ध और गांधी जैसों को प्रवेश मिलता है। ईश्वर की जेब काट लेने के फेर में पड़े हुए लोगों को खाली हाथ ही रहना पड़ता है। आखिर ईश्वर भी कुछ तो बुद्धि रखता ही है, उसे सहज ही उल्लू नहीं बनाया जा सकता।

उपासना के विविध स्तर-

हम अब तक गायत्री उपासना की विविध विधि शिक्षायें देते रहे है। साधारण लौकिक कष्टों को दूर करने वाली सकाम उपासनायें दीन-दुखियों के कल्याणार्थ थीं। सूक्ष्म शरीर के पाँच आवरणों को हटाने के लिए पंचकोष की साधनाएँ हैं इनसे मानवीय शक्तियों के गुप्त केन्द्रों का प्रकाश प्रस्फुटित होने में सहायता मिलती है। शास्त्रकारों ने जिस विधि-विधान का उल्लेख किया है, उन विधानों को सही रूप में जन-साधारण तक पहुँचाना हमारा कर्तव्य था। ऋषि ऋण से उऋण होने के लिए यह हमें करना ही चाहिए था। किया भी है और करते भी रहेंगे। अब गुरु परम्परा का प्रश्न आता है। हमारे प्रातः स्मरणीय गुरु देव ने हमें अपनी परम्परा के अनुसार गायत्री उपासना का सम्वल थमाया और साथ ही अपना अनन्त वात्सल्य एवं अजस्र अनुदान भी समय-समय पर प्रदान किया। यदि वह सब प्राप्त न हुआ होता तो इस जीवन में जितनी मंजिल पार कर ली गई हैं उसका सौवाँ भाग भी अपने निज के पुरुषार्थ से पूरा न हो सका होता।

बसन्त पंचमी से शुभारम्भ-

अब चूँकि हमारा कार्यक्रम पूर्ण होने जा रहा है, इसलिए यह आवश्यक हो गया है कि इस साधना परम्परा को आगे बढ़ाने के लिए दूसरे मजबूत हाथों में सौंप दिया जाय। जो उपयुक्त व्यक्ति होंगे उन्हें इसी बसन्त पंचमी से उस साधन क्रम का आरम्भ भी करा देंगे। साधना का विस्तृत विवरण फरवरी के अंक में होगा। बसन्त पंचमी 4 फरवरी की है। तब तक शायद सब के पास अखण्ड-ज्योति न पहुँच पाये ऐसी दशा में उस दिन इतना ही करना पर्याप्त होगा कि उस दिन उपवास रखा जाय। दूध, दही, शाक, फल पर रहा जाय। प्रातःकाल सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व उठकर शरीर को शान्त और मन को स्थिर रखकर ऐसा ध्यान किया जाय कि-”हमारे चारों ओर एक प्रकाश पुंज आच्छादित है और उसकी सूक्ष्म तरंग हमारे शरीर एवं मन के कण-कण में प्रवेश करती हुई नया प्रकाश, नया उल्लास एवं नया सन्देश धारण करा रही है।” यह भावना जितनी गहरी श्रद्धा और जितने अधिक विश्वासपूर्वक की जायेगी, उतना ही उत्तम होगा।

सूर्य उदय से पूर्व यह ध्यान समाप्त कर लेना चाहिए। शौच आदि से निवृत्त होकर बैठना चाहिए। जिनके शरीर दुर्बल हैं वे बिना स्नान के भी बैठ सकते हैं। बसन्त पंचमी के दिन इतना ही ध्यान पर्याप्त है। बाकी अपना नित्य कर्म करें और जो उपासना क्रम चल रहा हो उसे चालू रखें। फरवरी अंक पहुँचने पर अपनी साधना योजना उस आधार पर बनावें।


प्रतिनिधि फार्म इसी महीने आ जाय

इस अंक के अंतिम पृष्ठों पर प्रतिनिधियों की नियुक्ति संबंधी फार्म लगा है। जहाँ से अभी उसे भर कर भेजा न गया हो, वहाँ के सदस्य मिल-जुलकर विचार करें और इस प्रतिनिधि फार्म को भर कर इसी महीने भेज दें। अखण्ड-ज्योति का पच्चीसवाँ वर्ष-रजत-जयन्ती वर्ष इसी बसन्त पंचमी को समाप्त होकर 26वाँ लगेगा। इस अवधि तक प्रतिनिधियों की नियुक्ति का कार्य सम्पन्न हो जाना चाहिए।

जहाँ एक भी प्रति अखण्ड-ज्योति की पहुँचती है वहाँ अपना एक प्रतिनिधि तो होना ही चाहिए। अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को अपने को किसी अखबार का ग्राहक मात्र नहीं समझना चाहिए, वरन् इस युग की ऐतिहासिक घटना-’युग-निर्माण योजना’ का सदस्य मानना चाहिए। एवं इस सदस्यता के साथ ही जो उत्तरदायित्व उसके कन्धे पर आते हैं उनका भी अनुभव करना चाहिए।

परिवार के हर सदस्य के कन्धे पर यह सुनिश्चित जिम्मेदारी सौंपी जा रही है कि विचार क्रान्ति के महान् अभियान में उसे हमारा साथी सहयोगी बनना चाहिए। अखण्ड-ज्योति तथा युग-निर्माण पत्रिकाओं के माध्यम से दूर रहने को इस प्रकार परिवर्तित करने एवं आवर्धक प्रयत्न किया जा रहा है कि जो व्यक्ति इन चारों से प्रभावित हो वह नव-निर्माण के कार्य में भी उपयोगी सिद्ध हो सके। विचार-सम्पत्ति से रहित व्यक्ति उत्साह में कुछ काम कर भी जायें तो उनका वह आवेश क्षणिक होता है, अस्तु हमारा सबसे पहला, सबसे महत्वपूर्ण सबसे कठिन कार्य यह है कि नव-निर्माण की विचार धारा से अधिक लोगों को प्रभावित करके बौद्धिक क्रान्ति की भूमिका तैयार कर लें।

हर प्रतिनिधि को अपने जिम्मेदार व्यक्तियों तक युग-निर्माण की विचारधारा पहुँचाते रहने का उत्तरदायित्व उठाना चाहिए। अपनी पत्रिकाएँ कम से कम दस व्यक्तियों को पढ़ानी या सुनानी चाहिए और फिर समय-समय पर उनसे विचार विमर्श करने का अवसर निकाल कर वे धारणायें परिपक्व कराने का प्रयत्न करना चाहिए, जो पत्रिकाओं के माध्यम से निरन्तर भेजी जाया करती हैं। संगठन में नियमितता बना लेनी चाहिए। शाखा कार्यालय के लिए हर जगह स्थान नियत हो जाने चाहिए जहाँ सदस्यगण एक क्लब की तरह एकत्रित होकर परस्पर विचार विनिमय किया करें। शाखा का पुस्तकालय, वाचनालय भी केन्द्र पर हो जहाँ से नव-निर्माण का साहित्य सदस्यगण लेते और वापिस करते हैं

जन्मदिन मानने की प्रथा इस वर्ष हर जगह चल पड़नी चाहिए। जहाँ संभव हो वहाँ विवाहोत्सव मनाये जाया करें। षोडश संस्कारों को ठीक तरह मनाने की प्रथा अब अपने परिवारों में चल ही पड़नी चाहिए। इन माध्यमों से हर घर में नव-निर्माण की प्रेरणाओं का प्रकाश प्रवेश करेगा। त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाया जाया करें। आरम्भ में अपने सदस्य ही एकत्रित हों तो हर्ज नहीं, बात उपयोगी होगी तो उसे जनता स्वतः अपनाने लगेगी। पुरानी सत्यनारायण कथा का थोड़ा परिष्कार करके उसे बहुत ही प्रेरणाप्रद और शिक्षाप्रद बना दिया गया है उसमें युग-निर्माण प्रेरणा के समस्त बीज समाविष्ट कर दिये गये हैं। इस कथा को हर जगह प्रचलित किया जाना चाहिए। शाखायें अपना वार्षिकोत्सव गीता सप्ताह आयोजन के साथ मनाया करें। सौ, दो सौ रुपये के खर्च में एक पंच कुण्डी गायत्री यज्ञ और सात दिन तक एक प्रकार का शिक्षण शिविर होने का लाभ ऐसा है जिसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए।

यह कार्य विचार क्रान्ति के बीजारोपण के लिए है। उपरोक्त माध्यमों से छोटे-छोटे जन-समूह एकत्रित करने और धार्मिक श्रद्धा को रचनात्मक दिशा में मोड़ने का अवसर प्राप्त हो सकता है। इसके बिना जन-जागरण का उद्देश्य पूरा न होगा। सभाओं, भाषणों एवं लेखों से आवेश तो उत्पन्न होता है, जानकारी तो मिलती है पर ठोस कार्य छोटी विचार गोष्ठियों में ही होता है। संस्कार, त्यौहार, जन्मदिन, वार्षिकोत्सव आदि आयोजनों से यही व्यवस्था बनती है। अतएव इनका महत्व सामान्य नहीं असामान्य है। इन प्रयोजनों को ठीक तरह पूरा कर सकने वाले अनुभवी कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पड़ेगी। उनका प्रशिक्षण गायत्री तपोभूमि में करने की व्यवस्था कर दी गयी है। एक महीने के लिए हर जगह से कम से कम एक व्यक्ति शिक्षा प्राप्त करने के लिए आना चाहिए। वक्तृत्व संगीत आदि का जिन्हें अभ्यास भी यहाँ करना हो उन्हें चार महीने रहने की तैयारी करके आना चाहिए।

संगठन एवं विचारों गोष्ठियों की व्यवस्था चल पड़ने का काम जैसे ही आरम्भ हो गया, जैसे ही बौद्धिक क्रान्ति का यह क्रम ठीक प्रकार चल पड़ा वैसे ही सामाजिक एवं नैतिक क्रान्ति का मूर्त रूप सामने खड़ा होने में विलम्ब न लगेगा। भूमि की तैयारी ठीक हो जाने पर बोये हुए बीज चार सप्ताहों में हरियाली का रूप धारण कर लेते हैं। कठिन कार्य तो भूमि की तैयारी का ही होता है। हमें पहली मंजिल में वहीं तो पूरा करना है।

विवाहों में होने वाला अपव्यय हमारे समाज के लिए सबसे अधिक कष्टकर, सबसे अधिक अनैतिक, सबसे अधिक मूर्खतापूर्ण है। इस पागलपन को जितनी जल्दी मिटाया जा सके उतना ही अच्छा है। हमारे अगले कदम इस पागलपन का इलाज करने के लिए ही उठने वाले है। पर इलाज से पूर्व चिकित्सा के आवश्यक उपकरण भी होने चाहिए। संगठन और प्रचार के माध्यमों को ठीक कर लेने से सामाजिक कुरीतियों के उन्मूलन का, उनसे लड़ पाने का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा। हम हिन्दू-जाति को विवेकशील लोगों की तरह सोचने और करने के अभ्यासी बनते हुए देखकर ही मरना चाहेंगे। इसके बाद तीसरा कदम नैतिक क्राँति का है। हर व्यक्ति सज्जनता, क्षमता और मानवता के आदर्शों के अनुकूल जीवन जीने के लिए विवश हो ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करना नैतिक क्रान्ति का स्वरूप होगा। चारों ओर भ्रष्टाचार का वातावरण फैला हो तो उपदेशात्मक सदाचार एक सस्ते मनोरंजन की बात बनकर रह जाती है। आज ऐसी ही मखौलबाजी हो रही है। हर बेईमान आदमी दूसरों को ईमानदारी का उपदेश देता है। इससे कुछ भी प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है।

हमें इस प्रकार का वातावरण बनाना पड़ेगा, ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करनी पड़ेंगी, इतना प्रबल लोकमत जागृत करना पड़ेगा, जन-साधारण की सुरुचि को इतना विकसित करना पड़ेगा कि किसी बेईमान आदमी को एक कदम उठा सकना असंभव हो जाय। ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न किये बिना सदाचार-भ्रष्टाचार की बहस का न कोई मूल्य है और न कोई महत्व। दहेज माँगने वालों का मुँह काला होने की तरह अनैतिकता बरतने वालों का जीवित रहना असंभव हो जाने की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने लिए हमें रचनात्मक कार्य करने होंगे।

इन सब कार्यों में योगदान देने के लिए हमारे प्रतिनिधियों और उत्तराधिकारियों को कटिबद्ध रहना होगा। योगदान भले ही कम हो, पर पूर्ण निष्क्रिय उन्हें नहीं रहना होगा। इस मार्ग पर कदम उठाने पर उन्हें क्या मिलेगा? क्या लाभ होगा? यह अभी न पूछा जाय। समय ही बताएगा कि उन्हें, क्या मिला। हमें सच्चे अध्यात्म का अवलंबन करने के कारण ही कुछ मिला है। जो मिला है, उस पर हमें संतोष और गर्व है। अपने प्रत्येक प्रतिनिधि को हम विश्वास दिला सकते है कि हमारी तरह उन्हें भी बहुत मिलेगा। और वह ऐसा होगा जिस पर वे हमारी ही तरह गर्व ओर संतोष कर सकेंगे। उत्तराधिकार की यही हमारी पूँजी तो उन्हें मिलने वाली है। ईश्वर के उत्तराधिकार पाने का प्रयत्न करने वाले ईश्वर तुल्य बन जाते हैं तो हमारे उत्तराधिकारी बनने का प्रयत्न करने वाले कम से कम हम सरीखे तो सहज ही बन सकते हैं।

प्रतिनिधित्व के फार्म भर कर प्रत्येक स्थान से इसी महीने आ जाने की यहाँ उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा की जायेगी।

*समाप्त*