मानव जीवन को सार्थक बनायें

मानव जीवन भगवान् का दिया हुआ अनुपम वरदान है। अगणित योनियों में भ्रमण करने के पश्चात् यह अलभ्य अवसर चिरकाल के पश्चात् मिलता है। दुरुपयोग करने पर यह छिन जाता है और फिर निम्न योनियों में भ्रमण करने के लिए चिरकाल तक अधोगति में रहना पड़ता है। जो सुविधायें इस शरीर में प्राप्त हैं, वे अन्य किसी शरीर में नहीं। जो अवसर अन्य किसी जीवधारी के प्राप्त न हो, उसे मनुष्य को प्रदान करते हुए भगवान् ने कुछ विशेष उत्तरदायित्व भी इसे सौंपे हैं। उचित यही हैं कि वह उनकी अवहेलना न करे।

पेट पालने और सुख चैन के साधन जुटाने की सुविधा एवं प्रतिभा तो पशु पक्षियों को भी प्राप्त है। मनुष्य की विशेषता यह कि वह विवेकवान् संयमी, सद्गुणी और उदार बने। अपना आत्मिक स्तर ऊँचा उठाते हुए—अपूर्णता से पूर्णता की ओर चले। इस दिशा में जितनी प्रगति होगी, उतना ही उसका जीवन सार्थक माना जायगा।

आत्मिक विभूतियों की अभिवृद्धि इस बात पर निर्भर है कि वह दूसरों के साथ कितना उदार व्यवहार करता है। आत्मिक सद्गुणों में आत्म-संयम और परोपकार ये दो ही प्रधान हैं। जो इन दोनों की उपलब्धि में जितना अधिक निरत है, समझना चाहिये कि उसके उतना ही अधिक मानव जीवन का महत्व समझा और उसे प्राप्त करने में आगे बढ़ा है।

—स्वामी विशुद्धानन्द भारती


उसकी प्रार्थना में बड़ा बल है

मनुष्य कितना दीन-हीन, स्वल्प शक्ति वाला, कमजोर प्राणी है, यह प्रतिदिन के उसके जीवन से पता चलता है। उसे पग-पग पर परिस्थितियों का आश्रित होना पड़ता है। कितने ही समय तो ऐसे आते हैं, जब औरों से सहयोग न मिले तो उसकी मृत्यु तक हो सकती है। इस तरह विचार करने से तो मनुष्य की लघुता का ही आभास होता है। किन्तु मनुष्य के पास एक ऐसी भी शक्ति है जिसके सहारे वह लोक-परलोक की अनन्त सिद्धियों सामर्थ्यों का स्वामी बनता है। यह है प्रार्थना की शक्ति -परमात्मा के प्रति अविचल श्रद्धा और अटूट विश्वास की शक्ति । मनुष्य प्रार्थना से अपने को बदलता है, शक्ति प्राप्त करता है और अपने भाग्य में परिवर्तन कर लेता है। विश्वासपूर्वक की गई प्रार्थना पर परमात्मा दौड़े चले आते हैं। सचमुच उनकी प्रार्थना में बड़ा बल है, अलौकिक शक्ति और अनन्त सामर्थ्य है।

प्रार्थना विश्वास की प्रतिध्वनि है। रथ के पहियों में जितना अधिक भार होता है, उतना ही तेज निशान वे धरती में बना देते हैं। प्रार्थना की रेखायें लक्ष्य तक दौड़ी जाती हैं—और मनोवाँछित सफलता खींच लाती हैं। विश्वास जितना उत्कट होगा परिणाम भी उतने ही सत्वर और प्रभावशाली होंगे।

प्रार्थना आत्मा की आध्यात्मिक भूख है। शरीर की भूख अन्न से मिटती है, इससे शरीर को शक्ति मिलती है। उसी तरह आत्मा की अकुशलता को मिटाने और उसमें बल भरने की सत-साधना परमात्मा की ध्यान-आराधना ही है। इससे अपनी आत्मा में परमात्मा का सूक्ष्म दिव्यतत्व झलकने लगता है और अपूर्व शक्ति की अनुभूति होती है। जीवन के किसी भी क्षेत्र में प्रार्थना से प्राप्त शक्ति का सदुपयोग आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति कर सकते हैं। नियमपूर्वक की गई प्रार्थना कभी असफल नहीं हो सकती।

आत्म-शुद्धि का आवाहन भी प्रार्थना ही है। इससे मनुष्य के अन्तःकरण में देवत्व का विकास होता है, विनम्रता आती है और सद्गुणों के प्रकाश में व्याकुल आत्मा का भय दूर होकर साहस बढ़ने लगता है। ऐसा महसूस होता है, जैसे कोई असाधारण शक्ति सदैव हमारे साथ रहती है। हम जब उससे अपनी रक्षा की याचना, दुःखों से परित्राण और अभावों की पूर्ति के लिए अपनी विनय प्रकट करते हैं, तो सद्यः प्रभाव दिखलाई देता है और आत्म-सन्तोष का भाव पैदा होता है।

असन्तोष और दुःख का भाव जीव को तब तक परेशान करता है, जब तक वह क्षुद्रता और संकीर्णता में ग्रस्त है। भेद-भाव की नीति ही सम्पूर्ण अनर्थों की जड़ है। प्रार्थना इन परेशानियों से बचने की रामबाण औषधि है। भगवान् की प्रार्थना में सारे भेदों को भूल जाने का अभ्यास हो जाता है। सृष्टि के सारे जीवों के प्रति ममता आती है, इससे पाप की भावना का लोप होता है।

जब अपनी असमर्थता समझ लेते हैं और अपने जीवन के अधिकार परमात्मा को सौंप देते है तो यही रामर्पण का भाव प्रार्थना बन जाता है। दुर्गुणों का चिन्तन और परमात्मा के उपकारों को स्मरण रखना ही मनुष्य की सच्ची प्रार्थना है। महात्मा गाँधी कहा करते थे—मैं कोई काम बिना प्रार्थना के नहीं करता। मेरी आत्मा के लिए प्रार्थना उतनी ही अनिवार्य है, जितना शरीर के लिए भोजन।

मनुष्य के जीवन में अच्छी बुरी दोनों तरह की वृत्तियां रहती हैं, आत्मा के गहन अन्तराल में तो सत्-तत्व पाया जाता है। इस शुभ, शिव और परमतत्व से एकाकार प्रार्थना से होता है, जिससे आसुरी वृत्तियों का लोप और दैवी गुणों का प्रादुर्भाव होता है। प्रार्थना से ही अंतरतम में प्रवेश मिलता है और बुद्धि की सूक्ष्म ग्रहणशीलता उपजती है। इस परिवर्तनशील जगत के सारे रहस्य खुलने लगते है तथा मोह की दुरभिसन्धि मिटकर सत्य प्रकाशित होने लगता है।

प्रार्थना प्रयत्न और ईश्वरतत्व का सुन्दर समन्वय है। मानवीय प्रयत्न अपने आप में अधूरे हैं क्योंकि पुरुषार्थ के साथ संयोग भी आपेक्षित है। यदि संयोग-सिद्धि न हुई तो कामनायें अपूर्ण ही रहती हैं। इसी तरह संयोग मिले और प्रयत्न न करें तो भी काम नहीं चलता। प्रार्थना से इन दोनों में मेल पैदा होता है। सुखी और समुन्नत जीवन का यही आधार है कि हम क्रियाशील भी रहें और दैवी विधान से सुसंबद्ध रहने का भी प्रयास करें। धन की आकाँक्षा हो तो व्यवसाय और उद्यम करना होता है साथ ही उसके लिए अनुकूल परिस्थितियाँ भी चाहिए ही। जगह का मिलना, पूँजी लगाना, स्वामिभक्त और ईमानदार नौकर, कारबार की सफलता के लिए भी चाहिए ही। ये सारी बातें संयोग पर अवलम्बित हैं। प्रयत्न और संयोग का जहाँ मिलाप हुआ वहीं सुख होगा, वहीं सफलता भी होगी।

यह अनिवार्य नहीं कि प्रार्थना पूर्णतया निष्काम हों। सकाम प्रार्थनाओं का भी विधान है किन्तु सांसारिक कामनाओं के लिए की गई प्रार्थना में वह तल्लीनता नहीं आ पाती जो परमात्मा तक अपना सन्देश ले जा सके। ऐसी प्रार्थनायें भोग के निविड़ में भटक कर रह जाती हैं परिणामतः समय का अपव्यय और शक्ति का दुरुपयोग ही होता है। परोपकार, आत्म-कल्याण और जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही प्रार्थना का सदुपयोग होना चाहिए। ऐसी प्रार्थनाओं में सजीवता होती है, चुम्बकत्व होता है और परमात्मा को प्राप्त करने की प्रबल आकुलता होती है, ये कभी निष्फल नहीं जातीं। सदुद्देश्यों के लिए की गई हृदय, आत्मा की पुकार अनसुनी नहीं जाती। परमात्मा उसे जरूर पूरा करते हैं।

अभी तक जो शक्तियाँ मिलीं और जो मानव जीवन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है, इसमें भी अपनी पूर्व भावनाओं की सौम्यता ही प्रतीत होती है। हमने उनका आश्रय छोड़ दिया होता तो अन्य जीवधारियों के समान हम भी कहीं भटक रहे होते किन्तु यह अभूतपूर्व संयोग मिलना निश्चय ही उनकी कृपा का फल है। प्राप्त परिस्थितियों का सदुपयोग तब है जब इन साधनों का उपयोग आत्म-विकास में कर सकें। इसके लिए हमारा सम्पूर्ण जीवन एक प्रार्थना हो। हम अनन्य भाव से अपने आपको उस परमात्मा के प्रति समर्पित किए रहें और उनकी दुनिया को सुन्दर और सरस बनाने के लिए अपने कर्त्तव्यों का यथा-रीति पालन करते रहें।

हृदयहीन मुखर प्रार्थना नहीं चाहिए। जिसमें केवल स्वर का महत्व प्रकट होता है वह प्रार्थना नहीं, वह तो विडम्बना हुई, प्रार्थना वह होती है जो हृदय से निकल कर सारे आकाश को प्रभावित करती और परमात्मा के हृदय में भी उथल-पुथल मचा कर रख देती है। ऐसी प्रार्थना निष्काम, सच्ची और सजीव ही हो सकती है। वर्षा का जल गिरता है तो सारी धरती गीली हो जाती है। प्रार्थना के प्रभाव से परमात्मा का अन्तःकरण द्रवित होता है और साधक की उपासना से अधिक परिणाम प्राप्त होता है। सन्त टेनीसन ने लिखा है-”जितना संसार समझता है, प्रार्थना से उससे अधिक कार्य होता है।” इसलिए अपनी प्रार्थना ऐसी हो कि हे प्रभु! तेरी शरण आए हैं तुझसे वह प्रकाश प्राप्त करना चाहते हैं जिससे अन्धकार में भटकते हुए मनुष्यों के दुःख और सन्ताप दूर कर सकें।

असहाय अवस्था में जब मनुष्य को चारों तरफ से निराशा ही दिखाई देती है, शक्तियाँ काम नहीं देती, भाग्य की कुटिलता पग-पग पर सताने लगती है, अपने भी पराये बन जाते हैं, तब प्रार्थना ही उसका मित्र बनती है। प्रार्थना दुर्दिनों का सहारा, अँधियारे का पाथेय और दुःख की साथी है। जब किसी तरह मनुष्य के प्रयत्न काम नहीं देते तब प्रार्थना से ही उसे बल मिलता है। सच्ची करुण प्रार्थना का उत्तर तत्काल ही मिलता है।

दुष्ट दुर्भावनाओं को दूर करने में प्रार्थना एक अमोघ साधन है। कामुकता, क्रोध,मोह और अहंकार के मनोविकार प्रार्थना की आग में जल कर खाक हो जाते हैं। स्वार्थ की क्षुद्रता घटती है और आन्तरिक विशालता बढ़ती है। जीवन-शोधन की यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रणाली है। प्रार्थना एक अभूतपूर्व शक्ति है जिसे अपनी भावनाओं के द्वारा कोई भी उत्पन्न कर सकता है। आग का गुण है कि वह जहाँ रहती है, वहाँ उष्णता भी रहती है। प्रार्थना के ताप के पास पाप रह नहीं सकते।

पापों का प्रायश्चित करना प्रार्थना का ही करुण स्वरूप है। जब हम अपने पापों को सच्चे हृदय से स्वीकार कर लेते हैं तो उनके कठोर परिणाम भोग लेने की क्षमता आ जाती है। इससे अगले जीवन का प्रकाश आँखों के आगे झलकने लगता है, आशा जागती है। जिससे कठिन परिस्थितियों में भी आत्म-सन्तोष और अलौकिक शान्ति बनी रहती है। इसलिए प्रत्येक धर्म में प्रार्थना को प्रमुखता दी गई है। आत्म-विकास की प्रक्रियाओं में इसका सर्वप्रथम स्थान है। दूसरी योजनाओं के लिए इसी से बल मिलता है। इसलिए कोई भी शुभारम्भ करने के पूर्व प्रार्थना अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होती है, इससे एक तरह का बल, विश्वास और आशा जागृत होती है जो किसी भी काम की पूर्णता में सहायक होती है।

आसुरी शक्तियों से आत्म-रक्षा और सद्गुणों के विकास के लिए इस युग में प्रार्थना का महत्व और भी अधिक है। झगड़े की आवश्यकता नहीं है कि अमूल प्रार्थना अच्छी और अमुक खराब है, सद्बुद्धि की प्रार्थना ही परमेश्वर की सच्ची उपासना है। जिसकी वाणी में सम्पूर्ण प्राणियों के कल्याण की भावना सन्निहित है वही परमात्मा की सच्ची प्रार्थना है। स्वार्थपूर्ण कामनायें इस विशालता में बाधा उत्पन्न करती हैं, इसलिए इनसे ऊपर उठ कर हमारी भावनायें ऐसी हों जो आत्म-कल्याण और संसार की भलाई से प्रेरित हों। यही प्रार्थना सार्थक हो सकती है कि “हे भगवान् ! हमें असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से मुझे अमरत्व की ओर ले चलो।” जब इस तरह के उद्गार अन्तःकरण से उठेंगे तो जीवन में एक नया प्रकाश प्रस्फुटित होगा। उनकी प्रार्थना में वह शक्ति है जो तुम्हारे सारे कष्टों को दूर कर देगी। हम उस परमात्मा को कभी न भूलें, हमारा जीवन भी एक सच्ची प्रार्थना हो।


शास्त्र-चर्चा

यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो ने विजुगुप्सते॥

जो समस्त प्राणियों में आपको और अपने में समस्त प्राणियों को देखता है, वह उपर्युक्त एकात्मक-दर्शन के कारण किसी को घृणा या उपेक्षा का पात्र नहीं समझता। अर्थात् वह सबके हित में ही अपने हित को समझता है।

अयं निजः परो वेति गणनाँ लघुचेतसाम् । उदारचरितानाँ तु वसुधैव कुटुम्बकम् ॥

और दूसरे यह अपना है वा यह पराया है, यह अल्पबुद्धियों की गिनती है। उदार चरित वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही कुटुम्ब है।

परेषाँ सुख सौकर्य सर्वदा चिन्तयेन्नरः। स्वार्थ एक सदा लग्नः समाजार्हे भवेन्नच॥

मनुष्य को सर्वथा दूसरों के सुख एवं सुविधा की और पूर्ण विचार करना चाहिए। जो व्यक्ति सदा अपने ही मतलब के कार्य में लगा रहता है और दूसरों का बिल्कुल ध्यान ही नहीं रखता ऐसा मनुष्य समाज में रहने योग्य नहीं होता।

दुःखं ददाति योऽन्यस्य ध्रुवं दुखं स विन्दति। तस्मान्न कस्यचित् दुखं दातव्यं दुःखभीरुण॥

जो मनुष्य दूसरे को दुख देता है निश्चय ही वह स्वयं दुख पाता है, इसलिए दुःख से डरने वाले मनुष्य को चाहिए कि वह दूसरों को दुःख न दे।

प्राणा यथात्मनोऽभीष्टा भूतानामपि ते तथा। आत्मौपम्येन भूतेषु दयाँ कुर्वन्ति साधवा॥

जिस प्रकार अपने प्राण प्यारे हैं, वैसे ही और प्राणियों को भी अपने-अपने प्राण प्यारे हैं, इसलिए साधुजन अपने प्राणों के समान दूसरों पर दया करते हैं।

श्रू यताँ धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्॥

उपदेशक कहता है कि तुम धर्म का उपदेश सुनो उसे सुनकर चित्त में धारण करो। जो आत्मा के विरुद्ध हैं, जिन कामों को हम अपने लिए बुरा समझते हैं वे कार्य दूसरों के साथ भी नहीं करने चाहिए। जो अपने विरुद्ध कर्म हैं वे दूसरों के लिए भी भले नहीं हैं यह समझना चाहिए।


सुख के आधार वे स्वयं है।

मृत्यु के आखिरी क्षण तक मनुष्य की एक ही कामना होती है कि उसे सुख मिले। सुख को स्थूल रूप में देखें तो सुन्दर स्वादयुक्त भोजन, धन, भोग की पूर्ति सुन्दर मकान, सौंदर्यवान स्त्री-इन्हें ही सुख कहेंगे। पर यह देखा गया है कि मनोवाँछित वस्तुएं, भोग की सामग्रियाँ होते हुए भी मनुष्य सुखी दिखाई नहीं देता। हेनरीफोर्ड के पास अतुलित धन था पर उसे सुख नहीं मिला, डकैत दिन रात सुन्दर दृश्यों वाले वनों पर्वतों और एकान्त शान्त स्थलों में घूमते रहते हैं पर उन्हें शान्ति नहीं होती, सौंदर्य को विवशता के हाथों परेशान होते देखा गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि साधन और सामग्रियों में सुख का अभाव है। बाहर से दिखाई देने वाला सुख, सुख नहीं कल्पना मात्र है।

एक ही परिस्थिति में मनःस्थिति के परिवर्तन से सुख और दुःख बदलते रहते हैं। दो मनुष्य हैं दोनों के पास बेटे हैं बहुएं भी हैं। एक-सी परिस्थितियाँ दोनों को प्राप्त हैं, किन्तु एक गृह कलह से परेशान है दूसरे के पास धन का अभाव है। इसी तरह दो धनियों में एक के पास भले मित्र और अच्छे कर्मचारी नहीं हैं दूसरे को कोई बालक नहीं हुआ। संत प्रत्येक परिस्थिति को पूर्व जन्मों का संस्कार या परमात्मा की इच्छा मान लेते हैं इससे उनका दुःख भाव मिट जाता है सुख-दुख इसलिए कल्पित हैं कि वे एक ही मनोवृत्ति के घटने और बढ़ने से आपस में रूप-परिवर्तन करते रहते हैं, कभी दुःख सुख में बदल जाता है, सुख भी दूसरे क्षण दुख देने लगता है। अतः इन दोनों में से किसी को भी जीवन का साध्य नहीं मान सकते, परिस्थितियों के उतार चढ़ाव हैं, आते हैं और चले जाते हैं।

संकल्प-पूर्ति को वस्तुतः सुख माना गया है किन्तु इसका सदैव रहना असम्भव है। मनुष्य श्रम योग्यता और पुरुषार्थ से अपने संकल्पों का एक अंश पूरा कर भी सकता है किन्तु संकल्पों की पूर्ति में परिस्थितियों की अनुकूलता भी अपेक्षित है। इस प्राकृतिक विधान को मनुष्य बदल नहीं सकता इसलिए प्रत्येक परिस्थिति में संतोष का भाव बनाये रखना ही श्रेयस्कर लगता है। ऐसा न किया जाय तो मनुष्य के जीवन में निरे दुःख ही दुःख, अभाव और विपदाओं के अम्बार ही बने रहेंगे।

संतोष करने का अर्थ है कि आपने प्रकृति के साथ मित्रता कर ली है। कुछ दिन इस तरह का अभ्यास डाल लेने से सुख और दुःख दानों का स्तर समान हो जायगा। तब केवल अपना ध्येय जीवन-लक्ष्य प्राप्त करना ही शेष रहेगा, इसलिये समझाना पड़ता है कि दुःख सुख इनमें से किसी के प्रभाव में न पड़ो । दोनों का मिला जुला जीवन ही मनुष्य को लक्ष्य तक पहुंचाता है। जीवन-लक्ष्य का प्रादुर्भाव दुःख और सुख के सम्मिलन से होता है।

संकल्प-पूर्ति के बाद जो जीवन में जड़ता आ जाती है उसके कारण सुख सार्थक नहीं है। सुख का सदुपयोग अपनी उदारता जागृत करने के लिये है। सभी को अपनाकर, मिले सुख को वितरित कर, आत्म-भाव को फैलाने का वह माध्यम है। इससे मनुष्य के सद्गुण जागृत होते हैं। यदि केवल सुखों का प्रयोग अपने ही भोग के बन्धनों में सीमित हो जाये तो वह सुख तत्काल दुःख में बदल जाता है। स्वार्थ की प्रवृत्ति को इसी से हानिकारक मानते हैं कि उसमें सामूहिकता अथवा आत्म-भावना का अन्त हो जाता है। भेदभाव की यही नीति मनुष्य के दुःख और उसके पतन का भी कारण बन जाती है।

जीवन की समस्याओं का हल उदारता में है, प्रेम में है। पर उदारता अपने जीवन में तभी आती है जब सुख और दुःख को अवस्था मानते हैं, जीवन नहीं। हरिश्चन्द्र, कर्ण भीष्म आदि ने यदि यही दृष्टिकोण न बनाया होता तो उन्हें अमरत्व का सौभाग्य कदाचित न मिला होता, यश और अपयश पीछे की बातें हैं पर मनुष्य जो यशस्वी बनते हैं उनके मूल में उनकी उदारता की वृत्ति ही क्रियाशील रही होती है। प्राप्त सुखों को विश्वहित और विश्व सुख के लिये होम कर देने से ही चिर सुख का विकास होता है। इसके लिये साँसारिक सुख और दुःख से बँधकर नहीं रहना चाहिये। दोनों का ही सहर्ष स्वागत करना उचित है। इन उभय परिस्थितियों की आशा परित्याग कर देना ही निर्भयता प्राप्त करना है। चित्त सुख की आकांक्षा में जब तक डाँवाडोल रहेगा तब तक कायर, डरपोक और भयभीत बने रहेंगे। सारा ध्यान सारी मनः शक्तियाँ एक ही दिशा में लगी रहेंगी। फल यह होगा कि न तो आन्तरिक विकास संभव होगा और न ही निर्भयता प्राप्त होगी। सुख का मूल है निर्भयता, दुःख का कारण है अधैर्य। इन दोनों को उचित मात्रा में प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का क्रम है। इसके लिये सुख की आकाँक्षाओं का दमन और दुख के क्षणों का स्वागत करना भी होगा। इसके सिवाय निराकरण का मार्ग मनुष्य के लिये कुछ भी नहीं है।

क्या आप सुखों से बँधे हैं? यदि आप इन्द्रियों के पराधीन होंगे, साधनों के लिये परेशान घूम रहे होंगे तो आपके जीवन में निर्द्वन्दता बिलकुल भी न होगी। अब सोचिये सुख के पीछे दौड़ने में आपको सुख मिला? नहीं। आप दुखों से घबराते हैं, परिस्थितियों की विपन्नता से डरते हैं, इससे आपकी कठिनाइयाँ हल न होंगी। आने वाली समस्या आपको बिना प्रभावित किये नहीं छोड़ सकती। प्राकृतिक विधान सबके लिये एक-सा है उसी के अनुकूल चलने से ही धैर्य और निर्द्वन्दता प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा न हुआ तो आप के जीवन में कोई मस्ती न होगी, कोई सजीवता न होगी, आप अपने ही सूनेपन से बेखबर और परेशान हो रहे होंगे।

पराधीनता मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं है, मुक्त बनने की अभिलाषा मनुष्य ही नहीं मूक पक्षियों तक में होती है। यह एक अपराध ही है कि मनुष्य इतनी शक्तियों से सम्पन्न होकर भी दीन-हीन जीवन बिताता है। थोड़े से जीवन में सुखों के पीछे अंधी दौड़ लगाने और दुःखों से डरने काँपने और पछताने से मनुष्य की समस्याओं का समाधान नहीं होता। मनुष्य और अधिक जटिलताओं के निविड़ में भटक जाता है। जिस राह उसे जाना था उससे हटकर वह दुनियावी झंझटों में फंसकर मनुष्य जीवन की अमूल्य निधि को बरबाद करता है। सारा जीवन व्यर्थ गया और सुख नहीं मिले तो क्यों इन मायावियों के पीछे पड़े।

सत्य को प्राप्त करने की जिज्ञासा पैदा करने वाले क्षण प्रत्येक मनुष्य के जीवन में आते हैं। श्मशान घाट की ओर जाते हुये शव सभी ने देखे होंगे। वृद्धावस्था की यातनायें जिन्होंने अभी नहीं उठाई वे भी इसका व्यावहारिक अनुमान लगा सकते हैं। पर क्या कारण है कि हम गौतम बुद्ध की तरह, शुकदेव और शंकराचार्य की तरह इन पर विचार नहीं कर पाते। एक ही उत्तर है भौतिक सुखों की आसक्ति और साँसारिक दुःखों से कातरता। इस संसार को सब कुछ समझने की भूल का यदि सुधार कर सकें तो हमारी प्रशस्ति का द्वार भी खुला हुआ मिलेगा।

यह बुद्धि जब जागृत होने लगती है तो मनुष्य का दृष्टिकोण भी परिवर्तित होने लगता है। भौतिक आकाँक्षाओं में तब असंतोष दिखाई देने लगता है और आध्यात्मिक रसानुभूति मिलने लगती है। जब भी इस प्रकार का असन्तोष मानव-अन्तःकरण में उठा है तब-तब उसने अपने जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किये हैं। सुखों दुखों के कारण प्रभावित होने वाली आन्तरिक चेतना को मोड़कर उसने आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर लगाया है। इसलिये हमें देखना है कि कहीं हमारा जीवन एकाँगी दृष्टिकोण का नहीं हो जाए। किसी भी अवस्था में इन परिस्थितियों से बच नहीं सकते, इसलिये इन्हें जीवन की सामान्य गतिविधियों में ही सम्मिलित कर लेना चाहिये। महाकवि कालिदास ने लिखा है :—

कस्यात्यन्तं सुखमुपन्तं दुखमेकान्ततो वा। नीचैर्गच्छत्युपरि च दशा चक्रनेमिक्रमेण॥

अर्थात् किसी को न तो सुख ही सुख मिलते हैं और न ही एक मात्र दुःख ही मिलते हैं। रथ के पहिये की भाँति सुख और दुःख आते जाते रहते हैं।

सुख का मूल है परमात्मा का सान्निध्य प्राप्त करना। आग के पास बैठते हैं तो उसकी गर्मी का असर शरीर पर होता है। परमात्मा के समीप बैठने से जीवन का परिहार होता है, व्यावहारिक जीवन में शुद्धता आती है, इससे आत्मिक सुख की अनुभूति होने लगती है। परमात्मा की उपासना से आन्तरिक दिव्यता प्रबुद्ध होकर व्यक्ति के सद्गुणों को जगाती है यह अवस्था सर्वथा न तो सुखमय ही होती है न दुःखमय। इसमें एक अलौकिक आनन्द होता है, प्रेम की गुदगुदी से अन्तरात्मा विभोर रहती है। जिसे इस सुख का क्षणिक आभास भी मिल जाता है उसका मनुष्य जीवन धन्य हो जाता है।


आत्म-भावना से आत्म-कल्याण

मनुष्य के अतिरिक्त इस सृष्टि में और भी अनेकों जीव-जन्तु हैं। शेर, हाथी, खरगोश, सियार, भेड़िया, भालू, मोर, कौवा, तीतर, बटेर, सर्प, मछलियाँ, चमगादड़ असंख्य असंख्य योनियाँ इस वसुमती-वसुन्धरा में विद्यमान हैं। इनमें से कोई शक्ति में मनुष्य से बड़ा है, कोई सौंदर्य में, किसी को घ्राण-शक्ति अधिक मिली है किसी में स्वर-सौंदर्य अधिक है। किन्तु मनुष्य को छोड़कर दूसरे प्राणियों में अपना कल्याण चिन्तन करने की योग्यता नहीं है। प्राकृतिक प्रेरणा से अन्य जीव, सामयिक प्रयोजन के अनुसार आहार, निद्रा, भय और विहार में रत रहते हैं। इससे अतिरिक्त आत्म-कल्याण की बात सोच लेना अन्य जीवों के वश की बात नहीं है। ऐसी विकेन्द्रित शक्ति और क्षमताएं भी उन्हें नहीं मिली हैं।

इतना सब कुछ होते हुए भी मनुष्येत्तर प्राणियों में आत्मोद्धार की भावना नहीं होती। इसका उन्हें ज्ञान भी नहीं होता। पर मनुष्य में अनेक शक्तियाँ एक साथ आकर संकलित हुई हैं। इन शक्तियों का यदि आत्म-कल्याण के लिये सदुपयोग न हो और मनुष्य भी अन्य जीवों की तरह आहार, निद्रा, कलह, काम आदि में ही प्रवृत्त रहे तो इसे उसकी बुद्धिमत्ता न कहेंगे। यही समझा जायगा कि उसने जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने के मूल उद्देश्य की अवहेलना की है।

देश, काल और कार्य-कारण भाव से परे प्रत्येक व्यक्ति में एक तत्व उपस्थित है। यह तत्व सभी की आत्मा है। मनुष्य शरीर नहीं है। वह परमात्मा का अविनाशी-अंश जीवात्मा है। देश काल आदि से परे होने के कारण वह सर्वत्र एक ही है। यह तत्व बुद्धि से भी परे है। बुद्धि का काम केवल दृश्यमान जगत तक ही सीमित है किन्तु आत्म-तत्व सम्पूर्ण विश्व में समाविष्ट है। बुद्धि को जब उसी में अन्तर्हित कर देते हैं तब वह परिलक्षित होता है। यद्यपि वह मन के संकल्प-विकल्प से परे है तो भी मन को जब उसमें विलय कर देते हैं तो आत्मानुभूति होने लगती है।

आत्मा जिस प्रकार अपने आप में विद्यमान है उसी तरह सम्पूर्ण प्राणियों में भी वही समाया है। एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से प्रेम होना एकत्व का भाव है जो आत्मा की ही देन है। प्रत्येक व्यक्ति इस तरह दूसरों से जो प्रेम करता है वह प्रेम उसे ही मिलता है। सबके लिये उपकार की, भलाई की भावनायें अपने लिये ही लौट आती हैं। बाह्य दृष्टि से कोई यह भले ही सोचे कि उपकार-कर्त्ता को, श्रेय का दान करने वाले को, घाटा उठाना पड़ता है किन्तु ऐसी बात नहीं है। लोक-सेवा एक प्रकार की आत्म-सेवा ही है, इससे मनुष्य के आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

सभी जीव सुख चाहते हैं, आनन्द की खोज में हैं, किन्तु सभी का सुख समान नहीं है। दुष्ट प्रकृति के व्यक्ति विषय-सुख के लिये लालायित रहते हैं और उसी में आकंठ डूबे रहते हैं। पशुओं की तरह भविष्य की, पारलौकिक जीवन की उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती। जैसे भी हो अपनी सुख-सामग्री जुटाने में ही व्यस्त रहते हैं। इसके लिये वे झूठ, चोरी, ठगी, डकैती, हत्या, बलात्कार आदि कोई भी पाप करने से नहीं हिचकिचाते। दूसरे के हित कल्याण की बात उनकी कल्पना तक में नहीं आती। इन्द्रियों के उन्मत्त सेवक, भोग के लिये ही जीते हैं और उसी में रोते-झींकते मर-खप कर स्वाहा हो जाते हैं।

दूसरों का अनिष्ट करके, उन्हें कष्ट और क्लेश पहुँचा कर अपने सुख-साधन की चेष्टा करना उचित नहीं है। इसमें स्वयं को भी दुःख, कष्ट तो उठाना पड़ता ही है, पापों का एक बना बनाया गट्ठर सिर पर और सवार हो जाता है। उसके लिये चतुर्दिक् भय और यातनाओं के ही दिग्दर्शन होंगे। कभी शारीरिक कष्ट, कभी राज-दण्ड का भय। लोक-निन्दा तथा घृणा का पात्र बनकर समाज में रहना कठिन हो जाता है। यह स्थिति मनुष्य अपने क्षुद्र स्वार्थ, अनात्म-भावना से बनाता है और उसका दण्ड भी स्वयं ही भोगता है।

ऐसे व्यक्तियों का जीवन नारकीय कहा गया है और उनकी बड़ी भर्त्सना की गई है। छान्दोग्य उपनिषद् में शास्त्रकार ने एक कथोपकथन प्रस्तुत किया है—श्वेतकेतु के पिता उसे समझाते हुए कहते हैं—

“तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो हयत्ते रमणीयाँ योनिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनिं वा क्षत्रिय योनिं वा वैश्य योनिं वाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूय योनिमा-पद्येरञ्श्वयोनिं वा सूकरयोनिं वा चाण्डालयोनिं वा।”

अर्थात्-इन जीवों में जो इस लोक में-आत्मभावना से शुभ आचरण वाले होते हैं वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि उत्तम योनि को प्राप्त होते हैं किन्तु जो अधम कृत्य और दुष्ट आचरण वाले होते हैं उन्हें अधम योनि में ही जन्म धारण करना पड़ता है वे कुत्ते, सुअर या चाण्डाल योनि को प्राप्त होते हैं।”

यह स्पष्ट है कि मनुष्य स्वार्थवश ही दुष्कर्म करते हैं, इसी से उनकी दुर्गति होती है किन्तु जो सम्पूर्ण प्राणियों को आत्म दृष्टि से देखते हैं उनके लिये जीव-जन्तु कीट-पतंग का कोई भाव नहीं आता। सभी प्राणी ईश्वर के बालक हैं। परमात्मा ही उन सब में आत्म-रूप से विराजित हैं। इसलिये उन सभी का आदर करना चाहिये, सुख पहुँचाना चाहिये। किसी को दुःख न मिले, किसी को त्रास न दें। सबके साथ मधुरता का व्यवहार हो, तो इसे ईश्वर की सच्ची सेवा मानेंगे और उसके प्रतिफल भी आत्म-कल्याण-कारक ही होंगे।

आत्म-भाव के चिन्तन से साधारण मानसिक चिन्तायें नष्ट हो जाती हैं। बाह्य जगत का चिन्तन करते रहने के कारण ही मनुष्य हानि-लाभ के व्यापार में फँस जाता है। पहले तो वह इन साँसारिक विषयों का चिन्तन करता है, किन्तु वह व्यापार जब पूर्ण रूप से अभ्यास में आ जाता है तो विषय स्वयं ही उसे आबद्ध कर लेते हैं। इस बात का अनुभव तब होता है जब यह महसूस करते हैं कि हम गलत दिशा में भटक रहे हैं और मन पर नियंत्रण करने की चेष्टा करते हैं। वे उतनी ही तेजी से प्रत्याक्रमण करते हैं और जीव को बार-बार अपनी ओर घसीटते हैं इससे मानसिक द्वंद्व बढ़ता है, बौद्धिक, क्षमता घटती है और अशान्ति बढ़ती जाती है। थक जाने से जिस तरह शारीरिक शक्ति का पतन होता है और निर्बलता अनुभव होती है, विषय चिन्तन से ठीक उसी प्रकार मानसिक-थकावट बढ़ती है और सही सोचने की मानसिक शक्ति बिल्कुल नष्ट हो जाती है।

मानसिक थकावट का स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। नींद नहीं आती, पाचन संस्थान खराब हो जाता है। परिणाम स्वरूप और भी अशान्ति बढ़ जाती है।

आत्म-भावना के मनन से मनुष्य की अन्तर्मुखी दृष्टि जागृत होती है। वह समझने लगता है कि नाशवान् शरीर के प्रयोजन उतने आवश्यक नहीं जितने आत्म-कल्याण के। इससे उसमें निश्चयात्मक वृत्ति आती है और वह धीरे-धीरे मन को वशवर्ती बनाने की अभ्यास करने लगता है। मन अभ्यास का गुलाम है, उसे तो आप जिधर ही लगा देंगे उधर ही आपकी आज्ञाओं का पालन करने लगता है। खुली छूट और स्वेच्छाचारिता बरतने देने से ही मन उद्दण्ड और विषय लोलुप बनता है। अतः उसे बार-बार आत्म-चिन्तन की ओर मोड़ना चाहिये। बुराई के प्रति भय दिखाते रहना चाहिये।

अंतर्मुखी होना भावनात्मक प्रक्रिया है। इसे कर्म द्वारा तभी व्यक्त कर सकते हैं जब वैसे उत्कृष्ट भाव मस्तिष्क में पहले से ही विद्यमान हों। स्वामी रामकृष्ण परमहंस सदैव इस बात पर जोर देते रहते थे कि अद्वैत दृष्टि भाव में है, क्रिया में नहीं। तात्विक दृष्टि से गाय और बाघ भी आत्मा हैं किन्तु आत्म-भावना न होने से ही बाघ गाय को खा जाता है। तात्पर्य यह है कि अद्वैत की भावना यदि नहीं आती तो मानसिक हिंसा होगी और दुष्परिणाम भी भोगने ही पड़ेंगे।

आत्म-भावना मनुष्य को सन्मार्गगामी बनाती है और उसकी आन्तरिक शक्तियों को विकसित कर पारमार्थिक लक्ष्य की ओर अग्रसर करती है, यह ठीक है किन्तु लोक-व्यवहार सदैव शरीर तथा स्वभाव के अनुसार ही करना चाहिये। हाथी, बाघ, अजगर आदि में भी वही आत्मा विद्यमान है किन्तु उनका स्वभाव इस योग्य नहीं होता कि उनके साथ किसी तरह का भलमनसाहत का व्यवहार किया जाय। उन्हें आदर या सम्मान नहीं दिया जा सकता। इससे आत्म-भावना को अधूरा नहीं समझना चाहिये। आपकी भावनाओं का लाभ तो आपको मिलेगा ही पर लोक-व्यवहार में गुण,कर्म और स्वभाव को ही देखकर अपने कर्तव्य का अनुमान किया जाता है।


आत्म विकास की विचार-साधना

उत्तर गीता के एक प्रसंग में कहा है—

ज्ञानावृतेन तृप्तस्य कृतकृत्यस्य योगिनः। नैवास्ति किंचित कर्तव्यमस्ति चैन्नसतत्ववित्॥

अर्थात्— ‘जो योगी ज्ञान रूपी अमृत से तृप्त हो गया है और इस प्रकार उसे जो कुछ करना था कर चुका है, ऐसे तत्वज्ञानी के लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता है।’

ज्ञान क्या है यह समझने की जरूरत है। किसी वस्तु का सम्यक् दर्शन होना ही ज्ञान है। मैं देह हूँ यह मानने से पदार्थ और साँसारिक सुखों के प्रति आसक्ति उत्पन्न होती है। अनेकों कुटिलतायें और परेशानियाँ अपने प्रपंच में फँसाकर दिग्भ्रांत करती हैं, यह अज्ञान का स्वरूप है। मैं आत्मा हूँ, परमात्मा का अविच्छिन्न अंश हूँ, यह तत्व-ज्ञान या सम्यक् ज्ञान है। ज्ञान और अज्ञान को व्यक्त करना विचार-साधना का कार्य है, अतः संसार में रह कर यहाँ की परिस्थितियों का सही लाभ प्राप्त करने के लिए विचारों के महत्व को स्वीकार किया जाता है। ज्ञान प्राप्त करने के लिए विचार शक्ति के सदुपयोग की जरूरत होती है, इससे मुमुक्षता प्राप्त होती है।

प्रत्येक विचार, शक्ति की अनुकूल दिशा में फैलकर प्रभाव डालता है। अपने रूप के अनुसार, उधर से वह उसी प्रकार का बल लाता है जिससे सजातीय विचारों की, तदनुरूप गुण-धर्म की पुष्टि होती है। पवित्र और स्वार्थ रहित विचार शान्ति और प्रसन्नता की प्रच्छन्न स्थिति का निर्माण करते हैं। स्वर्ग और नर्क सब विचारों की ही महिमा है। पाप या पुण्य प्रकाश या अन्धकार, दुःख या सुख की ओर मनुष्य अपने विचार पथ के द्वारा ही अग्रसर होता है। आन्तरिक अपवित्रता की दुर्गन्ध या पवित्रता की सुगन्ध भी विचारों के द्वारा ही फैलती है। गुण-अवगुण सब मनुष्य के विचारों का ही फल है। विचारों में ही मनुष्य का भला बुरा अस्तित्व होता है। मन का विचारों के साथ अटूट सम्बन्ध है अतः विचारों में विवेक और शुद्धता रखने से मन को संस्कारवान् शुद्ध और ज्ञानवान् बनाने की प्रक्रिया स्वतः पूरी हो जाती है। बिना सोचे-समझे जैसे कुछ विचार उठें उन्हीं के पीछे-पीछे चलना ही मनुष्य के अज्ञान का प्रतीक है।

विचार एक शक्ति है। आज तक संसार में जो परिवर्तन हुए और जो शक्ति दिखाई दे रही है, वह सब विचार की ही शक्ति है। इस शक्ति का स्वरूप जब तक सद् में स्थित रहता है तब तक रचनात्मक प्रवृत्तियाँ विकसित होती रहती हैं और मनुष्य समाज की सुख-सुविधाओं में अभिवृद्धि होती रहती है किन्तु जब उनमें विकृति आ जाती है तो सर्वनाश के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। अतः सद्विचार को ही रचनात्मक विचार कहेंगे। विचार का अनादर करना अर्थात् उसे विकृत करना भयंकर भूल है, इससे मनुष्य का अहित ही होता है।

विचारों का अर्थ यह नहीं है कि अनेक योजनायें बनाते रहें, वरन् किसी उद्देश्य की गहराई में घुसकर वस्तु स्थिति का सही ज्ञान प्राप्त कर लेना है। परीक्षा में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होने की इच्छा हुई, यह आपका उद्देश्य हुआ। अब आप यह देखें कि उसके लिए आपके पास पर्याप्त परिस्थितियाँ हैं या नहीं? आपका स्वास्थ्य इस योग्य है कि रात में भी जाग कर पढ़ सकें, इतना धन है कि अच्छी-अच्छी पुस्तकें खरीद सकें या ट्यूशन लगा सकें। केवल योजनायें बनाने से काम नहीं चलता, जब तक उनकी सम्भावनाओं और उन पर अमल करने की सामर्थ्य पर पूर्ण खोज-बीन न कर ली जाय। विचार मनुष्य की शक्ति और सामर्थ्य के अनुकूल दिशा निर्देश करने में मदद देते हैं। अविचारपूर्वक किए गये कार्यों में सफलता की सम्भावना कम रहती है। इंजीनियर लोग कोई काम शुरू करने के पहले उसका एक प्रस्तावित प्रारूप तैयार कर लेते हैं, इससे उन्हें कार्य की अड़चनों का पूर्वाभास हो जाता है जिसे क्रियान्वित होने पर वे सावधानी से दूर कर लेते हैं। जीवन-निर्माण के लिए विचार भी ऐसी ही प्रक्रिया है। सुव्यवस्थित जीवन के लिए अपने जीवन-क्रम पर बारीकियों से विचार करते रहना मनुष्य की समझदारी का काम है।

सफल व्यक्ति अपने आन्तरिक विचार तथा बाह्य कार्यों में पर्याप्त समन्वय करने की अपूर्व क्षमता रखते हैं। उनके पास क्रियात्मक विचारों की शक्ति होती है अर्थात् वे हर प्रश्न का विचार करते हैं, तब प्रत्यक्ष जीवन में उतारते हैं। इस प्रणाली को विचार नियन्त्रण कहा जाय तो उचित होगा। नियन्त्रित विचारों से ही ठोस लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।

मनुष्य जो कुछ भी सोचता विचारता है, उसका एक ठोस आकार उसके अन्तःकरण में बन जाता है। कहावत है “जिसका जैसा विचार, उसका वैसा संसार।” अर्थात् प्रत्येक विचार मनुष्य के संस्कारों का अंग बन जाता है। इतना ही नहीं व्यक्तिगत विचारों का प्रभाव विश्व-चेतना पर भी पड़ता है। विश्व के सूक्ष्म आकाश में विचारों की भी एक स्थिति रहती है। वैज्ञानिक इस प्रयास में है कि वे सदियों पूर्व लोगों के विचारों का ‘टेप-रिकार्ड’ कर सकें। उनका दावा है कि अच्छे बुरे किसी भी विचार का अस्तित्व समाप्त नहीं होता। वे विचार सूक्ष्म कम्पनों के रूप में आकाश में विचरण करते रहते हैं और अपने अनुरूप विचारों वाले मस्तिष्क की ओर आकर्षित हो कर अदृश्य सहायता किया करते हैं। किसी विषय पर विचार करने से वैसे विचारों की एक शृंखला सी बन जाती है, यह सब सूक्ष्म जगत में विचरण करने वाली तरंगें होती हैं जिन से अनेकों गुप्त रहस्यों का प्रकटीकरण मस्तिष्क में स्वयं हो जाया करता है।

यह संसार जो हम देख रहे हैं वह अव्यक्त का व्यक्त स्वरूप है। अव्यक्त में जैसे विचार उठें, जैसा संकल्प उदय हुआ, जैसी स्फुरणा और वासना जगी व्यक्त में आकर वही रूप धारण कर लेता है। भला-बुरा जैसा भी संसार हमारे चारों तरफ फैल रहा है, उसमें लोगों के विचार ही रूप धारण किये दिखाई पड़ रहे हैं। हमारा विचार जैसा भी भला-बुरा है, उसी के अनुरूप ही यह संसार है। यदि हम विचारों का संयम करना जान जायें और उन्हें अच्छाइयों की ओर लगाना सीख जायें तो निःसन्देह इस संसार को सुन्दर प्रिय और पवित्र बना सकते हैं।

दुःख का दूसरा नाम है—अशान्ति! इसकी यदि समीक्षा करें तो यह देखेंगे वह विचारों की अस्त-व्यस्तता और कुरूपता के कारण उत्पन्न होती है। अशान्त को कभी सुख नहीं होता अतः दुःख से बचने का यह सबसे अच्छा उपाय है कि कुविचारों से सदैव दूर रहें। न खुद अशान्त हों न औरों की शान्ति भंग करें। किन्तु आज-कल अशान्ति पैदा करने में गौरव ही नहीं समझा जा रहा वरन् इसकी लोगों में होड़ लगी है। बुरे कर्मों को, अपनी नीचता और धृष्टता प्रकट करते हुए लोग ऐसा गर्व अनुभव करते हैं मानों उन्हें कोई इन्द्रासन प्राप्त हो गया हो। शान्ति के अर्थ को लोग भूल से गए हैं। लगता है कि इस पर कभी विचार ही नहीं किया जाता और लोग अविवेकी पशुओं की तरह सींग-भिड़ाकर लड़ने-झगड़ने में ही अपनी शान समझते हैं।

दूषित विचारों से वातावरण की सारी सुन्दरता नष्ट हो गई है। अब मनुष्य जीवन का कुछ मूल्य नहीं रहा हैं, क्योंकि कुविचारों के फेर में इतनी अधिक अशान्ति उत्पन्न कर ली गई है कि उसमें थोड़े से सद्-विचारवान् व्यक्तियों को भी चैन से रहने का अवसर नहीं मिलता। इस संसार की सुखद रचना और इसके सौंदर्य को जागृत करना चाहते हों तो वैयक्तिक तथा सामाजिक जीवन में सद्-विचारों की प्रतिष्ठा करनी ही पड़ेगी और इसके लिए केवल कुछ व्यक्तियों को नहीं वरन् बुराइयों की तुलना में कुछ अधिक प्रभावशाली सामूहिक प्रयास करने पड़ेंगे। तभी सबके हित संरक्षित रह सकेंगे।

यह कल्पना तभी साकार हो सकेगी जब अपने विचारों के परिवर्तन से सभ्य-सुसंस्कृत समाज की रचना का प्रयत्न करोगे। हम उसी पदार्थ को अपनी ओर आकृष्ट करते हैं जिसके लिए अन्तर में विचार होते हैं। अब तक बुरे विचार उठ रहे थे। अतः वातावरण भी कुरूप-सा अशान्त सा लग रहा है। भ्रम और द्वेषपूर्ण विचारों से दुर्भावनाओं को मार्ग मिलता रहा। अब इसे छोड़ने का क्रम अपनाना चाहिए और शुभ-विचारों की परम्परा डालनी चाहिए। प्रेममय विचारों से हम अपने प्रेमास्पद को आकृष्ट करते हैं। यह विचार भी अप्रकट न रह सकेंगे। शीघ्र ही स्वभाव रूप में प्रकट होंगे और शीघ्र ही स्वभाव,प्रक्रिया तथा कर्म रूप में परिणत हो कर वैसे परिणाम उपस्थित कर देंगे।


लोक का ही नहीं, परलोक का भी ध्यान रहे

यह संसार दो रूपों में विभक्त है, दृश्य और अदृश्य। दृश्य स्थूल नेत्रों से दिखाई देने वाला सम्पूर्ण भौतिक जगत है। अदृश्य तत्व परमात्मा है जो प्राण-रूप में सर्वत्र व्याप्त होकर विविध खेल रचना करता है। परमात्मा सब कालों में एक-सी स्थिति में रहता है, किन्तु प्रकृति परिवर्तनशील है, उसका स्वरूप बदलता रहता है इसलिए उसे मिथ्या कहा है। सुखोपभोग की स्थूल-वासना और आसक्ति की दृष्टि से उसे मिथ्या, असार, या मनोमात्र कहना अनुचित नहीं है। इस संसार के विषयों में ही मनुष्य जब भटक जाता है, तब ऐसा प्रतीत होता है कि यह संसार भ्रम है, धोखा है, मृग-मरीचिका है। इससे अलिप्त रहने में ही कल्याण है।

शास्त्रकार ने भी कहा है—

लोक एव विषयानुरंजनं दुःखगर्भमपि मन्यते सुखम्। आमिषं बडिशगर्भमप्यहो मोहतो ग्रसति यद्वदण्डजः॥

अर्थात्— मछली जिस प्रकार माँस को—देखती है, उसके नीचे छिपे हुये काँटे को नहीं। वैसे ही संसार विषयों के आकर्षण को ही देखता है। विषयों के परिणाम स्वरूप अवश्यम्भावी दुःख की ओर वह दृष्टिपात भी नहीं करता। जगत का मिथ्यात्व इसी दृष्टि से है क्योंकि यहाँ मनुष्य सुख की मृगतृष्णा में भटक जाता है और पाप करने लगता है, जिससे वह अपने जीवन लक्ष्य से पतित होकर जन्म-जन्मान्तरों तक यहाँ के दुःख और कष्ट के भोग, भोगता रहता है।

श्री गौडपादाचार्य ने लिखा है—

आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिता॥

स्वप्नमापे यथा दृष्टे गर्न्धव नगरं यथा। तथा विश्व मिदं दृष्टं वेदान्तेषु विचक्षणैः॥

अर्थात्— जो वस्तु उत्पत्ति में पूर्व न रही हो, नाश हो जाने पर भी न रहती हो, किन्तु बीच में सत्य प्रतीत होती हो, उसको सत्य नहीं मानना चाहिए जिस तरह स्वप्न में गंधर्व नगरी के से सुन्दर दृश्य दिखाई देते हैं, किन्तु जाग जाने पर कुछ भी शेष नहीं रहता, संसार भी उसी तरह दृश्य मात्र है। आज इसे जिस रूप में देखते हैं मृत्यु के अनन्तर वह किसी दूसरे ही रूप में दिखाई देगा।

मनुष्य का ज्ञान जितना बढ़ता जाता है उतना वह अपने शरीर को अधिक महत्व देता चला जाता है, इसी को नहलाने-धुलाने खिलाने-पिलाने सजाने—आदि में ही सारा जीवन बर्बाद कर देता है। उसको प्रतीति होती है कि वह शरीर नहीं हैं, किन्तु चूंकि जीवन धारण के पूर्व उसकी स्थिति शरीर नहीं थी मृत्यु के अनन्तर भी शरीर शेष नहीं रहता केवल जीवन के क्षणों में ही वह सत्य जैसा प्रतीत होता है, इसलिये धर्माचार्यों ने बार-बार समझाया है कि यह संसार और यहाँ की वस्तुयें छल हैं, प्रपंच हैं। इनमें धोखा नहीं खाना चाहिए। साधनों को निस्सार समझ कर उनके पीछे भागने की अपेक्षा अपने मानव जीवन को सार्थक बनाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए।

सती मदालसा ने अपने बच्चों को बड़ा मार्मिक उपदेश दिया है—

शुद्धोऽसि, बुद्धोऽसि, निरञ्जनोऽसि

संसार माया परिवर्जितोऽसि।

संसार स्वप्नं त्याग मोह निद्राँ

मदालसा वाक्यमुवाच पुत्रम्॥

“हे पुत्र, तू मेरे वचन को सुन—तुम स्वरूप से शुद्ध, बुद्ध मुक्त हो। इस मायामय संसार के साथ गठबन्धन से तुम्हारा कोई सम्बन्ध नहीं है। यह दिखाई देने वाला संसार स्वप्न मात्र है इसलिए मोह रूपी निद्रा का परित्याग कर अपने शाश्वत स्वरूप को पहचानने का प्रयत्न करो।” वास्तव में यह उपदेश हम में से प्रत्येक के लिए सारपूर्ण है हम जब तक अपने आपको नहीं पहचानते तब तक इस मनुष्य शरीर का कुछ उपयोग नहीं है। इसलिए उचित है कि विषय विकारों का परित्याग कर पारलौकिक जीवन की शोध की ओर उन्मुख हों। परिवर्तन हमारे देखने में न जाते हों ऐसा तो नहीं है किन्तु दुःख है कि उन पर विचार नहीं किया जाता। शरीर की तीन अवस्थायें,जन्म, वृद्ध, और मरण के अनेकानेक दृश्य प्रत्येक को देखने को मिलते हैं। यह भी सभी जानते हैं कि मृत्यु के मुख से कोई बचता नहीं फिर भी पारलौकिक जीवन की ओर हम में से बहुत थोड़े ही उन्मुख होते हैं। अधिकाँश लोग काम, क्रोध, मोह और शोक के पीछे अन्त तक भटकते रहते हैं परिणाम स्वरूप जीवात्मा को मृत्यु के अनन्तर यहीं भटकते रहना पड़ता है। उससे बड़ी अशान्ति व असन्तोष होता है। पर तब तक मानव जीवन का अलभ्य अवसर हाथ से निकल गया होता है। अतः केवल पश्चाताप ही शेष रहता है।

इस संसार की हवा में एक विषैला नशा है। सौंदर्य की चमक-दमक में कुछ अजीब-सा आकर्षण है, इससे मनुष्य धोखा खा जाता है। अन्धेरे में पड़ी हुई रस्सी के जिस तरह से सर्प होने का भ्रम होता है उसी तरह यहाँ के प्रत्येक पदार्थ में एक प्रकार का मोहक भ्रम भरा पड़ा है, इसी से लोग उन्हीं में भटकते रहते हैं। आकर्षण रूप समाप्त होता है, दूसरा नया, उससे भी आकर्षण रूप सामने आ जाता है। न पहले से तृप्ति होती है न दूसरे से तृष्णा ही समाप्त होती है। बावला इन्सान इसी रूप-छल की भूल-भुलैया में गोते मारता रहता है। उसे अपने मूल-रूप की ओर ध्यान देने का अवसर भी नहीं मिल पाता। यह स्थिति बड़ी ही दुःखद है।

वेदान्त दर्शन का मत है कि आँख से दिखाई देने वाले दृश्य, नाक से सूँघे जाने वाली गन्ध, जीभ से चखा जाने वाला स्वाद-यह सभी मिथ्या है, परिवर्तनशील हैं। फूल देखने में बड़ा सुन्दर लगता है। किन्तु मुरझा जाने पर वही कूड़ा-करकट सा लगता है। तब उसकी सुगन्ध भी लुप्त हो जाती है। इसी तरह वृक्ष-वनस्पति, नदी पहाड़, पशु-पक्षी सभी बदलते रहते हैं, एक रूप में स्थिर रहने वाली कोई भी वस्तु दिखाई नहीं देती। सूर्य चन्द्रमाओं तक की विभिन्न कलायें अस्थिरता और चंचलता ही हैं। जीवात्मा जबतक अपने परम-पद को नहीं प्राप्त कर लेता तब तक उसे स्थायी प्रसन्नता, शाश्वत सुख और चिरस्थायी शान्ति नहीं मिलती। इसलिए प्रतिभासिक सत्ता को साधन मात्र समझ कर अपने पारलौकिक हित-चिन्तन में लगे रहना चाहिए।

जहाँ माया मोह के विचार सहज न छूट रहे हों वहाँ यह सोचना चाहिये कि इस मकान, जमीन, बाग-बगीचे आदि पर अब तक कितने ‘दाखिल- खारिज’ हो चुके हैं पर इन्हें कोई स्थायी तौर पर प्राप्त नहीं कर सका तो हमें ही यह वस्तुयें कब तक साथ दे सकेंगी। साँसारिक खेल-मात्र में इन सभी वस्तुओं की उपादेयता है इन्हें इसी रूप में ही देखना भी चाहिये और अपने चरम-कल्याण में तत्परता पूर्वक स्थिर रहना चाहिये।

इस संसार की यदि कुछ सार्थकता है तो वह परमात्मा का विराट रूप होने से है। शास्त्रकार का कथन है—’सर्वं खल्विदं ब्रह्म।’ इदं सर्व खलु ब्रह्म-यह जो कुछ भी दिखाई देता है वह सारा जगत ब्रह्म रूप है। परमात्मा हमारी सेवा और पुण्यार्जन का आधार है अतः इस संसार को भी इसी रूप में ही देखना चाहिये। इसे परमात्मा का स्वरूप समझ कर सत्कर्मों द्वारा यदि कुछ प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण कर सकें तो यह संसार ही हमारी जीवन मुक्ति में सहायक हो सकता है।

“संसार माया है” यह कहने का तात्पर्य मनुष्य को उसके जीवन लक्ष्य की याद दिलाते रहना है ऐसा न हो कि प्राणी साँसारिक भोग-वासनाओं में ही भटकता रहे और पारलौकिक सुख को भूल जाय, इस दृष्टि से इस संसार को स्वप्नवत् बताना उचित ही है।

सृष्टि का दूसरा स्वरूप ईश्वर-मय है। वह हमारे कर्त्तव्य-पालन के लिये है। माया-माया कहकर यदि कर्मों का परित्याग कर दिया जाय तो सारी सृष्टि व्यवस्था में गड़बड़ी उत्पन्न हो सकती है। जीवात्मा जिन सुखों के भोग के लिये यहाँ आया कर्त्तव्य-पालन के अभाव में वह भी तो पूरे नहीं होते अतः इस संसार को परमात्मा का ही प्रतिरूप समझकर निष्काम भावना से अपने कर्त्तव्य-कर्मों का पालन करते रहना चाहिये। इस तरह मनुष्य इह-लोक के सुख और पारलौकिक शान्ति सुगमता से उपलब्ध कर सकता है।


उस मोह को धन्यवाद दीजिये

मनुष्य शरीर की रचना सृष्टिकार की सर्वोत्तम कृति है, इसका एक-एक अंग इतना उपयोगी और आवश्यक है कि कोई उन्हें हजारों की कीमत पर भी बेचने को तैयार नहीं होता। ठीक भी है, परमात्मा के दिये हुये वरदान को इस तरह बेरहमी से बर्बाद करके कोई कष्ट क्यों उठाये, दुःख क्यों मोल ले। बड़ी सुखदायक वस्तु है यह शरीर, इसकी सुंदरता और उपयोगिता के लालच में देवता तक नर-तनु धारण करने के लिये तरसते रहते हैं । पर यदि शरीर के अंग प्रत्यंग का विश्लेषण प्रारम्भ करें तो उसमें बुराइयाँ भी अच्छाइयों की अपेक्षा कम नहीं मिलेंगी। एक जगह पर गन्दी काम-वासना, एक जगह पर क्रोध, कहीं आलस्य, कहीं दुर्विचार सब इसी प्रकार शरीर में आश्रय लिये हुये हैं। पदार्थ की दृष्टि से भी उसमें हाड़-माँस, मल-मूत्र, कफ -पित्त आदि अनेकों दुर्गन्धित वस्तुयें ही भरी पड़ी हैं। प्राण निकाल जाने पर इस दुर्गन्धित शरीर के पास सगे-सम्बन्धी भी अधिक देर तक ठहरने का साहस नहीं करेंगे।

एक वस्तु के दो रूप-परमात्मा की सृष्टि में यह विचित्रता सर्वत्र विद्यमान है। आग में जीवन भी है, मृत्यु भी, विद्युत में प्रकाश के साथ ही प्राण-घातक शक्ति भी है। वर्षा से अन्न की वृद्धि होती है, फसलें भी बरबाद हो जाती हैं। अन्न में अमृत भी है, विष भी। सर्व-गुण-सम्पन्न कोई भी वस्तु इस संसार में नहीं है। कोई वस्तु नितान्त बुरी भी नहीं। घृणित से घृणित वस्तु का भी कुछ न कुछ उपयोग है।

प्रत्येक वस्तु को अपनी बुद्धि और विवेक के द्वारा जिस रूप में देखते हैं वह वैसी ही दिखाई देने लगती है किन्तु गुण की दृष्टि से कोई भी वस्तु बेकार नहीं होती। अपनी भावनाओं के द्वारा जिस वस्तु को जिस रूप में देखिये वह वैसी ही प्रतीत होने लगेगी। शरीर में सुखद भावों की कल्पना से ही यह प्रिय लगता है अन्यथा क्या इसमें बुराइयाँ कुछ कम हैं। काम, क्रोध, लोभ और मोह का भी अपना औचित्य है । परमात्मा ने इन्हें बिलकुल बेकार समझ कर नहीं बनाया। काम की इतनी निन्दा की जाती है पर कौन नहीं जानता कि सृष्टि संचालन के लिये वह कितने उपयोग की वस्तु है। क्रोध न होता तो सद्-प्रवृत्तियों और सत्कर्मों की रक्षा के लिये शायद कोई भी तत्पर न होता। लोभ के द्वारा संचय से ही जीवन की अनेकों सुविधायें मनुष्य प्राप्त करता है। यह भाव भी उतने ही आवश्यक हैं जितने कि अन्य सद्-भाव। बुरा तो उनका विकृत रूप है। काम, क्रोध या लोभ की आसक्ति या अनुचित मात्रा बुरी है। नियन्त्रित रूप से इन्हें अपने जीवन में धारण करें तो यह सभी समान उपयोग की वस्तुयें हैं।

शास्त्रों में मोह को बड़ी निन्दा की गई है और स्थान-स्थान पर उससे बचकर रहने की सलाह दी गई है किन्तु यहाँ बिल्कुल शब्दार्थ पर न जाकर उसके भावार्थ पर जाने की भी बड़ी जरूरत है तभी वस्तुस्थिति को ठीक प्रकार से समझा जा सकता है। मोह के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उससे बुद्धि का नाश होता है, धर्म और अर्थ दोनों नष्ट होते, मनुष्य में इससे नास्तिकता आती है दुराचार में प्रवृत्त होते हैं, भय का कारण है आदि-आदि। पर इस प्रकार की भर्त्सना मोह के विकृत रूप अर्थात् मोहासक्ति की, की गई है स्वाभाविक जीवन में जिस प्रकार काम और क्रोध आवश्यक हैं उसी तरह मोह न होता तो सम्भवतः अब तक संसार की सारी व्यवस्था ही बिगड़ गई होती। प्रेम, स्नेह, दया, कर्त्तव्य पालन, उदारता, सदाचार आदि सद्गुणों का विकास मोह की ही पृष्ठभूमि पर होता है सत्य का मोह, आदर्श का मोह, राष्ट्र भावना का मोह, धर्म का मोह—क्या इन सब मोह-स्वरूपों को कोई अनुचित ठहरा सकता है और तो और महान् योगियों को भी तो अपने जीवन लक्ष्य और परमात्मा की प्राप्ति का मोह होता है जिसके लिये वे सामाजिक मोह- ममत्व को भी ठुकरा देते हैं।

मोह को अनुचित बता कर घर से भाग जाना वस्तुतः बन्धन-मुक्ति का लक्षण नहीं, कर्त्तव्य-पलायन है। अपने पीछे बालक बच्चों, पत्नी परिवार को निराश्रय कर जाने की अपेक्षा उस व्यक्ति का जीवन बेहतर मानेंगे जो दिन-रात अपने बाल-बच्चों की सेवा एवं कर्त्तव्य पालन में लगा रहता है। अपने प्रति-परिवार समाज और राष्ट्र के प्रति-अपने उत्तरदायित्व का पालन करने वाले सद्-गृहस्थों का वह मोह उचित है जिसके कारण वे सम्पूर्ण जीवन कर्त्तव्य कर्म करते रहते हैं। साधारण मनुष्यों के लिये वह मोह ही सबसे बड़ा ज्ञान है, जिससे वे एक निश्चित ढाँचे में रहकर, सदैव कर्त्तव्य पालन करने में ही सुख का अनुभव करते हैं। उन बेचारों की भावनायें बहुत ऊँची न हों तो न सही पर कर्त्तव्य निर्वाह का श्रेय तो उन्हें मिलता ही है।

घर छोड़कर भाग खड़े होने वाले के पीछे बिलखते हुये परिवार को देखकर कोई भी व्यक्ति यही कहेगा कि जिन्हें हम मोहग्रस्त कहते हैं वह भी इनसे अच्छे हैं। भले ही अनजान में, पर समाज-सेवा का एक छोटा-सा रूप तो वे अपनाये ही हैं। औरों के आश्रित रहकर जीवन निर्वाह करने वाले धर्मध्वजी व्यक्तियों की अपेक्षा, जो मोह को बन्धन का कारण बताते रहते हैं, वे गृहस्थ अच्छे जो अपना निर्वाह स्वतः कर लेते हैं और राष्ट्रीय-व्यवस्था में योगदान देते हैं। परमात्मा के समीप पुत्र-मनुष्य सब समान हैं। किसी के प्रति उपेक्षा, उदासीनता या कर्त्तव्य पलायन परमात्मा को प्रिय लगेगा, यह सोचना नितान्त भ्रम है। उसकी सच्ची सेवा प्राणि- मात्र की सेवा में ही सन्निहित है। प्राणियों की सेवा अर्थात् अपने कर्त्तव्य कर्म की अवहेलना करना भारी भूल है इस भूल से अधिकाँश व्यक्तियों को बचाने वाला यह मोह ही है जिनके कारण मनुष्य अपने पारिवारिक जीवन में बँधा रहता है और मृत्यु का ध्यान किये बिना अन्त तक अपने कर्त्तव्य का जिन्दा-दिली के साथ पालन करता रहता है।

मोह अपने स्वाभाविक रूप में बुरा नहीं है। बुरा केवल इतना ही है कि जब कर्त्तव्य-पालन में भावना नहीं रहती और अपने को अधिकारी पात्र समझकर ही कोई काम करते हैं तो उससे गलती पैदा होती है, और अपराध होने का भय रहता है। मोह के इसी रूप में विष है। बालक के प्रति मनुष्य की अनेक जिम्मेदारियाँ होती हैं, पर इन जिम्मेदारियों का पालन संकुचित हृदय से किया जाना ही बुरा है। अपना ही बालक हो तो उसके साथ अच्छा व्यवहार, बर्ताव करें यह भेद-बुद्धि ही मोहासक्ति उत्पन्न करती है। जब तक कर्त्तव्यों का पालन हृदय को विशाल रखकर किया जाता है तब तक एक छोटे क्षेत्र में रहकर कर्त्तव्य पालन भी बुरा नहीं, वरन् उससे जीवन की स्वाभाविकता बनी रहती है।

जगत के प्राणी पदार्थों में हमारी जो आसक्ति है, राग है इसी को अज्ञान कहते हैं। नाशवान् पदार्थों के प्रति आसक्ति न हो इसीलिये मोह को अनुचित कहा गया है। पारिवारिक या सामाजिक दृष्टि से कर्त्तव्य पालन मोह नहीं। लोकाचार रहे तो फिर साँसारिक सुखों का महत्व ही क्या रहेगा? अनुकूल के प्रति झुकाव और प्रतिकूल के प्रति जो विराग है उसी का नाम ‘मोह’ है और इसी मोह की निन्दा की गई है ताकि मनुष्य का जीवन एक पक्षीय अर्थात् केवल भोगवादी ही न रहे। विपरीत परिस्थितियों से टक्कर लेने में भी उसकी उतनी ही रुचि होनी चाहिये जितनी सुखों की ओर। इस प्रकार के जीवन को कभी मोह या माया नहीं कहेंगे। ऐसे ही जीवन में सही आनन्द होता है।

परिवार के बिना जीवित नहीं रहेंगे, धन-सम्पत्ति ही सर्व सुख है, ऊँचे से ऊँचा पद मिलना ही चाहिये, मान-सम्मान, पद प्रतिष्ठा, डिग्री जाति, कुल सौंदर्य, वर्ण आदि के प्रति अनियन्त्रित अनुराग का नाम मोह है और मोह का यही रूप दुःखद है। स्वाभाविक दृष्टि से पारिवारिक जीवन, धनार्जन, पद, प्रतिष्ठा, कुल, परम्पराओं का निर्वाह करने में व्यक्तिगत तथा सामाजिक सभी तरह की व्यवस्थायें रहती हैं।

जीवन के इन नियमों का यदि यथावत् पालन न किया गया होता और सम्बद्ध जीवन को मोह और ममत्व बताकर पलायनवादी नीति पूर्व पुरुषों ने अपनायी होती, तो आज कहीं भी व्यवस्थित जीवन न पाते। मनुष्य जीवन में जिन सुखों एवं पुण्यों के अर्जन की कल्पना की जाती है वह परिस्थितियाँ मृतप्राय हो गई होतीं। आज जिस विकसित रूप में मनुष्य बढ़ रहा है इसके लिये उसकी निन्दा नहीं धन्यवाद ही देना चाहिये। मोह को यदि विशुद्ध रूप से कर्त्तव्य पालन समझें तो इस रूप में वह हमारे पुण्य और कल्याण की ही वस्तु है।


संयमी ही आत्मजयी होते हैं।

परमाणु-शक्ति को धारण करने वाला बम, कहते हैं कि इतनी शक्ति शाली धातु का बना होता है कि उस पर बाहरी आघात का कोई प्रभाव नहीं होता इतनी कड़ी और मजबूत धातु का आवरण उस पर न चढ़ाया जाय तो उस बम के किसी भी क्षण विस्फोट हो जाने का खतरा बना रहेगा। मानसिक शक्ति, के संगठन से आत्मा की चैतन्य शक्ति भी बढ़ती है। इस शक्ति को धारण करने के लिये भी पुष्टिमान शरीर की आवश्यकता होती है अतः आत्म-विजय के साधक को शक्तियों पर नियन्त्रण करने की विद्या आनी चाहिये। एक ओर शक्ति को श्रम, साधना और एकाग्रता से संचय करें और उसे इन्द्रिय-छिद्रों से निर्बाध बहजाने दे तो शक्ति शाली बन सकने का अनुमान गलत ही सिद्ध होगा। प्रयत्न और परिश्रम का फल संयम से मिलता है । जो अपने आवेगों, भावों और इच्छाओं को वश में रखता है, आत्म-विजय की कीर्ति का वही सच्चा अधिकारी है।

आवेगों को निरन्तर काबू में रखने की सहन शक्ति का ही पर्याय है संयम। आवेग और इच्छायें मनमें पैदा होती हैं, फिर उनका प्रभाव और प्रतिक्रिया इन्द्रियों पर पड़ती है। इसलिए विपरीत परिस्थितियों से निरन्तर संघर्ष करने की मानसिक दक्षता होनी चाहिये। अवाँछित बातों का प्रभाव मस्तिष्क को उत्तेजित न करे यही संयम की कसौटी है।

यूनान के विख्यात दार्शनिक ‘पैरी क्लीज’ के पास एक दिन कोई क्रोधी व्यक्ति आया। वह पैरीक्लीज से किसी बात पर नाराज हो गया और वहीं खड़ा होकर गालियाँ बकने लगा। पर पैरीक्लीज ने उसका जरा भी प्रतिवाद न किया। क्रोधी व्यक्ति शाम तक गालियाँ देता रहा। अँधेरा हो गया तो घर की ओर चल पड़ा पैरीक्लीज ने अपने नौकर को लालटेन लेकर उसे घर तक पहुँचा आने के लिये भेज दिया। इस आँतरिक सहानुभूति से उस व्यक्ति का क्रोध पानी-पानी हो गया ।

सामान्य श्रेणी का व्यक्ति होता तो वह भी लड़ बैठता और हिंसा भड़क उठती । दोनों पक्षों की हानि होती, शक्ति खर्च होती । आत्म-संयम, मनुष्य को अनेक झगड़ों से बचा कर शक्ति का अपव्यय रोक देता है।

मानसिक संयम, शारीरिक संयम की बुनियाद है। मन इच्छानुवर्ती हो जाता है और उसकी दिशा संयम की ओर मुड़ जाती है तो शारीरिक शक्तियों का असाधारण विकास होना संभव है। यौगिक साधनाओं के लिये तो संयम साक्षात् कामधेनु है। बड़े-बड़े चमत्कार दिखाने वाले पहलवान राममूर्ति संयम के बल से बड़ी-बड़ी गाड़ी मोटरों को रोक लेते थे। हाथी को छाती पर चढ़ा लेना उनके लिये सहज कार्य था। संयम ही वस्तुतः साधना की पृष्ठ भूमि है इसके बिना कोई विशेष शक्ति पाना प्रायः असम्भव ही है।

अपनी वासनाओं पर विजय प्राप्त कर लेना मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट साधना है। इन्द्रियों की लालसायें, क्रोध, मोह, पापकर्म आदि से जो लोग घिरे रहते हैं उनके शरीर और मन का पतन निश्चित है। इस कारण उन्हें व्याधियाँ सताती रहें तो यह कुछ अनहोनी बात न कही जायेगी। हीनता, दुर्बलता और मानसिक दुर्दशा का कारण ये वासनायें ही हैं उनसे मुक्त हुये बिना आत्म-कल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं होता। मनमें जब तक क्रोध है, तब तक विष की क्या आवश्यकता? ईर्ष्या अग्नि के समान जलाती रहती है। इन्हीं में पड़े रहने से मनुष्य जीवन का कोई भी लक्ष्य पूर्ण नहीं होता। कठोपनिषद् में इस सम्बन्ध में बड़ी मार्मिक उक्ति दी है। लिखा है :—

विज्ञान सारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान् नरः।

सोऽध्वनः पारमाप्नोतितद्विष्णों: परमं पदम्॥

[1। 3। 9 ]

अर्थात् जो मनुष्य विवेकी सारथि के समान जागृत बुद्धि के द्वारा मन की लगाम को वश में रखता है वह इस संसार से पार होकर परमेश्वर का परम पद प्राप्त करता है।”

असंयम का प्रभाव मनुष्य जीवन पर सदैव ही दूषित होता है। गुस्से में या अपमान जनक बात सुनने के बाद उस पर तुरन्त अपना मन्तव्य प्रकट करना या अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करना भला नहीं होता। कामुकता पर भी इसी तरह सद्यः निर्णय पतनकारी होता है। आप पर उस समय जो आरोप लगाये गए हैं, अथवा किसी कामुक विचार ने यदि आक्रमण किया है तो उसी वक्त उसे मत मान लीजिये। थोड़ी देर रुककर, एकान्त में जाकर उस पर विचार कर लीजिये। हित-अहित का यथोचित विचार किए बिना प्रायः हानि ही उठानी पड़ती है। आक्रमण परिस्थिति को कुछ देर तक के लिए टाल देने से तुरन्त के आवेग से आप बच जाते हैं और निर्णय के लिये समय मिल जाता है। विपक्षी का व्यवहार भी तब तक शाँत हो जाता है अपने मानसिक आवेशों को भी इसी तरह भुलाया बहकाया जा सकता है। भावुकता से दूर रहकर विषय को हर दृष्टि से परख लेने से समस्या का एक अच्छा हल निकल आता है और व्यर्थ के शक्ति -व्यय से बच जाते हैं।

मनुष्य की इन्द्रियाँ रात-दिन उसे अपनी ओर खींचती रहती हैं। जीभ चाहती है कि तरह-तरह के मिठाई-पकवान और स्वादिष्ट व्यंजन खाने को मिलें। सुन्दर दृश्य देखने के लिये आंखें बार-बार उत्सुक रहती हैं, कानों को हमेशा मधुर संगीत की खोज रहती है। इन्द्रियाँ और मन के विषय असीम हैं। इनसे मनुष्य की कभी तृप्ति नहीं होती है, वरन् जीवन दिशा पूर्णतया साँसारिक हो जाती है और आत्म-ज्ञान की महत्वपूर्ण आवश्यकता बीच में ही छूट जाती है। अनन्त सुख-सामर्थ्य सौंदर्य और माधुर्य का भण्डार हमारी आत्मा है। वह नित्य शाश्वत, अव्यय और अविनाशी है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, राग द्वेष, ईर्ष्या आदि हीन वृत्तियों के आधीन होकर आत्म-विजय की मूलभूत आकाँक्षा को मनुष्य ठुकरा देता है। कदाचित यह ज्ञान मनुष्य को मिल भी जाय तो भी वह इन प्रलोभनों से जल्दी ही नहीं छूट पाता। संयमी व्यक्ति ही आत्मोन्नति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

मान लीजिये थोड़ी देर के लिये आप इन्द्रियों का सुख प्राप्त कर ही लेते हैं तो क्या शक्ति के अपव्यय से निराशा, उत्तेजना और असंतोष पैदा नहीं होता।? इन्द्रियों के सुख कभी मनुष्य को तृप्त नहीं कर पायें हैं इसलिये उधर से मुख मोड़ने में ही मनुष्य का परम कल्याण है। वासनाओं की तृप्ति के लिये जिस तरह अभ्यास पड़ जाता है उसी तरह आत्म-संयम की प्रवृत्ति को प्रखर बनाया जा सकता है। अपने उद्यम, पुरुषार्थ, साहस, संलग्नता, विवेक आदि से उच्च आध्यात्मिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं किन्तु इन्द्रिय लोलुपता को सर्व प्रथम दमन करना होगा। इसके बिना कोई तपश्चर्या चाहे वह अध्यात्मिक हो अथवा साँसारिक उन्नति सम्बन्धी कभी भी फलदायक नहीं होगी। संयम-ही सफलता का मूल-मन्त्र है।

प्रायः लोगों की शिकायत रहती है कि क्या करें , हम से तो संयम होता ही नहीं। अधिकाँश व्यक्तियों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि लोगों की संकल्प शक्ति इतनी कमजोर होती है कि वे किसी उच्च विचार पर देर तक स्थिर नहीं रह पाते। एफ. डब्ल्यू, रावर्टसन ने लिखा है “चरित्र बल दो शक्तियों पर अवलम्बित है, दृढ़ संकल्प और आत्म-दमन। सशक्त भावों के साथ-साथ उन पर दृढ़ अधिकार होना भी सच्चरित्रता के आवश्यक अंग हैं।”

आत्मा हमें सुपथ पर ले जाती है पर उसकी बात अनसुनी कर देने की मनुष्य में बहुत बड़ी कमजोरी है। उसकी तलाश तात्कालिक सुखों की ही होती है। दूरगामी परिणामों के प्रति स्थिरता न होने के कारण ही जीवन सारा विशृंखलित होता है। आत्म-संयम की वृत्ति देखने में कठोर रूखी, नीरस भले ही प्रतीत हो पर कालाँतर में जब शक्ति का प्रवाह हमारे अन्दर फूट पड़ता है तो सारा जीवन उल्लास और प्रसन्नता से परिपूर्ण हो जाता है।

किसी भी प्रकार हो, हमें जीवन लक्ष्य में उच्च-भावना से मन को एकाग्र करके मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने का प्रयत्न करना चाहिये। इसके लिये अनेकों मार्ग धर्म-प्रणेताओं ने निर्धारित किये हैं। अपनी शक्ति, योग्यता के अनुसार कोई भी रास्ता चुन सकते हैं। किन्तु उस पर पूर्ण एकाग्रता से चलना पड़ेगा। सारी शक्तियों को केन्द्रित- करके जब शर-सन्धान किया जाता है तभी लक्ष्यपूर्ति होनी है। शक्ति-संचय का मार्ग है संयम। संयमित जीवन में ही सफलता के सारे रहस्य खुलते हैं। इसी से आत्म-जय की आकाँक्षा पूर्ण होती है।


अशान्ति से चिर शान्ति की ओर

दिन-भर काम करते रहने से जो थकावट उत्पन्न होती है, प्रगाढ़ निद्रा उसे दूर कर देती है, राहगीर चलते- चलते थक जाते हैं तो थोड़ी देर किसी वृक्ष की शीतल छाया में विश्राम कर लेते हैं, कल- कारखानों में काम करने वाले मजदूर-श्रमिक शाम को किसी पार्क के एकान्त कोने में बैठकर आश्वस्त होते हैं, थकावट चाहे शारीरिक हो या मानसिक, विश्राम से ही दूर होती है। उस समय सारी वृत्तियाँ निश्चेष्ट होनी चाहिए, किसी तरह का शारीरिक या मानसिक बोझ, तनाव या उत्तेजना अनुभव नहीं होनी चाहिए। ऐसे विश्राम से खोयी हुई शक्ति वापस आती है और शरीर तथा मन की थकावट दूर हो जाती है।

सामान्य जीवन में जो बात दिन-भर के श्रम से उत्पन्न थकावट के बारे में लागू होती है जीवात्मा के सम्बन्ध में वही बात सम्पूर्ण जीवन को एक दृष्टि में रखकर सोची जाती है। “हमारे जीवन का उद्देश्य यह है कि हम असीम आनन्द की प्राप्ति करें” यह कहना या “ हम चिर-शान्ति उपलब्ध करना चाहते हैं” यह दोनों ही वस्तुतः एक उद्देश्य के दो पहलू हैं। जीवन-भर की उलझनों, परेशानियों, ईर्ष्या द्वेष, काम, क्रोध, मद, मत्सर, मलीनता, अस्वस्थता, हानि, अपमान, दंड, अव्यवस्था आदि से जो मानसिक थकावट पैदा हो जाती है, आत्मिक दुर्बलता पैदा हो जाती है उससे विश्राम पाने की लालसा हर एक व्यक्ति को होती है। कोई न भी चाहे तो प्राकृतिक नियम उसे ऐसा करने के लिये बाध्य करेंगे क्योंकि शान्ति और विश्राम पाये बिना मनुष्य अगला जीवन धारण किये रहने में समर्थ नहीं हो सकता । अशान्त अवस्था में वह सामान्य जीवन की प्रक्रियायें भी पूरी नहीं कर सकेगा।

इस शान्ति परायण की बात को समझ लेना नितान्त आवश्यक है। मनुष्य का बुद्धि कौशल भी इसी में है कि वह अनुभव करे कि यह जो प्रति क्षण शान्ति और विश्राम प्राप्त करने की उत्कंठा जागृत होती है उसका संकेत मूल लक्ष्य से है अर्थात् उसे उन सभी कारणों को जान लेना चाहिये जिससे यह जीवन समाप्त होने के बाद आत्मा को इन्द्रियों के विषयों, सुख भोग तथा मोह वृत्तियों में भटकते रहना न पड़े। संक्षेप में बन्धन मुक्ति प्राप्त करना या स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त करना ही मुख्य उद्देश्य है।

यह उद्देश्य मानव की समस्त प्रवृत्तियों को विश्वात्मक नीति-धर्म के साथ जोड़ देता है और उसे संघर्षमय जीवन के लिये सशक्त होने की प्रेरणा देता है। यह शक्ति मृत्यु या विनाश का प्रयोग नहीं होती वरन् मनुष्य जीवन का सर्वांगीण विकास करने के लिये हैं। विकास की उस स्थिति को प्राप्त करने के लिये मनुष्य को अपने मन, बुद्धि तथा शरीर की रचनात्मक शक्ति का प्रयोग करना आवश्यक है। सर्वतोन्मुखी विकास, आत्मा के विकेन्द्रीकरण पर अवलम्बित है यह अवस्था है। इसी पर मनुष्य जीवन की चिर-शान्ति निहित है।

शान्ति का बाधक है उन्माद या व्यामोह। वैयक्तिक उन्माद के रहते व्यक्ति को शान्ति नहीं मिलती। यही दशा जाति और राष्ट्र की है। व्यक्ति की जीवन धारा जाति,प्रदेश, राष्ट्र और धर्म के साथ जुड़ी होती है। इसलिये उसे इन सब के साथ सम्बन्ध रूप में देखा जाता है। जहाँ व्यक्ति अपने सामान्य जीवन क्रम में, समाज के साथ, राष्ट्र और जाति के साथ धार्मिक गठबन्धन को तोड़ता है, और उसकी स्वार्थमूलक या विध्वंसात्मक प्रवृत्तियाँ पनपने लगती हैं वहीं शान्ति भंग हो जाती है एक व्यक्ति दूसरे के हितों का शोषण करेगा तो इससे जो अशान्ति उत्पन्न होगी उससे व्यक्ति और समाज सभी में निराशा उत्पन्न होगी। दूसरों को हीन समझ कर उन्हें तिरस्कृत करना यह वैयक्तिक उन्माद है। शान्ति अपने नियंत्रण से मिलती है पर अपनी सुख सुविधाओं को ही सर्वोपरि मानकर चलने वाले अपने पर नियन्त्रण नहीं रख सकते। अति संचय, अति भोग, अति विलास तथा चरित्र को लाँछित करने वाली सारी वृत्तियाँ अशान्ति पैदा करती हैं। इन्हें व्यक्तिगत जीवन से लेकर सामाजिक जीवन तक दोष माना गया है।

एक राष्ट्र जब दूसरे राष्ट्र के प्रति ऐसी ही भ्रमपूर्ण नीति अपनाता है तो अशांति और उपद्रव का एक बहुत शक्ति शाली रूप सामने आता है इससे प्राणि मात्र के हितों में, जीवन पद्धति में गम्भीर खतरा उत्पन्न हो जाता है। इस स्थिति में रहते हुये सुख, संतोष एवं शान्ति की स्थिति प्राप्त नहीं की जा सकती।

सफल राष्ट्र के प्रयोग पहले व्यक्ति से शुरू होने चाहिये। इन्द्रियों पर विजय पाना ही मनुष्य का सम्पूर्ण स्वरूप है। भारतीय विद्या के आचार्यों ने इसीलिये मानवीय जीवन के साथ धर्म की ऐसी व्यवस्था स्थापित की है जिससे एक व्यक्ति ही राष्ट्र के क्षेत्र की कसौटी है। जहाँ व्यक्ति स्वस्थ और सकुशल रहता है वहाँ राष्ट्र भी इसी मार्ग पर बढ़ता है और एक स्थिर प्रगति के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। यह स्थिति अधिक शक्तिशाली और सुनियोजित है। धर्म ही एक ऐसा विशुद्ध तन्त्र है जिससे विश्व के सम्पूर्ण प्राणियों के हित सुरक्षित रहते हैं। जब तक किसी व्यक्ति के हितों पर आघात नहीं पड़ता तब तक अशान्ति की स्थिति नहीं उत्पन्न होती किन्तु जब कुछ लोगों का लोभ और दम्भ आवश्यकता से अधिक मात्रा में बढ़ जाता है तो उसका सामूहिक रूप से विषैला प्रभाव पड़ता है। आज के युग में जो व्यापक अशान्ति छाई हुई है वह इसी का प्रभाव है जब भी ऐसी परिस्थितियाँ उभरेंगी तो मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों का पतन निश्चय रूप से होगा। यह स्थिति गम्भीर अशान्ति पैदा करने वाले होती है।

दुर्बुद्धि ही अशान्ति का मूल कारण है। वह जितना अधिक बढ़ती है उतने ही भयंकर परिणाम सामने आते हैं और उनसे व्यक्त तथा अव्यक्त रूप से सम्पूर्ण मानव समाज को कष्ट मिलता है। दुर्बुद्धि की विष-बेलि जहाँ फैलती है वहीं कष्ट, क्लेश और कलह उत्पन्न होंगे । पर जिन परिवारों में, शहर, मुहल्लों या गाँवों में लोग मिलकर, एक कुटुम्ब की तरह जीवन यापन करते हैं, निरभिमान होकर सद्भावनापूर्वक एक दूसरे से मिलते, और सबके सुख-दुःख में हाथ बँटाते हैं, वहीं स्वर्गीय शान्ति की परिस्थितियां उमड़ती दिखाई देने लगती हैं। गहन दर्शन और उच्च साधनायें मनुष्य की अन्तिम आवश्यकतायें पूरी करती हैं किन्तु सद्भावनाओं तथा सद्गुणों में ऐसी विलक्षण प्रतिभा होती है जिससे मनुष्य के बाह्य एवं आन्तरिक दोनों तरह के जीवन का मूलभूत उद्देश्य भी सिद्ध हो जाता है। धर्म की प्रारम्भिक शिक्षा यह होती है कि मनुष्य अपनी सद्बुद्धि का विकास करे और उसका अन्तिम उद्देश्य पूर्ण शान्ति की प्राप्ति होती है।

यह मार्ग पूर्ण वैज्ञानिक एवं क्रमबद्ध है। जीवन में शक्ति और प्रवाह बना रहे तो अशान्ति के उत्पन्न होने का कहीं कुछ खतरा नहीं रहेगा। ऐसी बुद्धि केवल धर्म ही जागृत कर सकता है। धर्म सद्प्रवृत्तियों के जागरण की प्रेरणा देता है। हिन्दुओं में यह एक साधारण शिक्षा थी, गाँव के लोग भी कहा करते थे कि भगवान सब में है । इससे समाज में सभ्य आचरण की प्रतिष्ठा बनी रहती थी। सब सबसे अच्छा बर्ताव करना चाहते थे। रहन-सहन,आचार-विचार, बोली-व्यवहार में सर्वत्र विनम्रता एवं नीति-निपुणता बनी रहने से किसी प्रकार के झंझटों की गुँजाइश नहीं रहती थी और लोग इस धरती में सुखी तथा सन्तुष्ट रहकर पारलौकिक शान्ति की उपलब्धि में तत्परतापूर्वक लगे रहा करते थे।

हमारा जीवन इसलिये नहीं है कि इन बहुमूल्य क्षणों को अशान्ति और असन्तुष्टि में नष्ट करदें। हमें एक निश्चित आधार ढूंढ़ना पड़ेगा ताकि इस जीवन का सही सद्उपयोग कर सकें। सुख और शान्तिपूर्वक जीने की अभिलाषा पूर्ण आध्यात्मिक है इसे पूरा भी किया जाना चाहिये, किन्तु उसका एक ही उपाय है और वह है व्यक्तिगत जीवन में धर्म का प्रयोग।

यह स्थिति विकसित होती हुई आत्मा को परमात्मा की समीपता की ओर अग्रसर कराती है। वहाँ पहुँच कर सारे दोष-दूषण समाप्त हो जाते हैं, और जीवन की सारी थकावटें दूर होकर चिर-शान्ति की उपलब्धि हो जाती है। इसी स्थिति की प्राप्ति के लिये ही मनुष्य को अनेक विशेषतायें मिली हैं। चिर-शान्ति हमारे जीवन का आधार है उसे प्राप्त करने के लिये ही इस नर-देह में जीवात्मा का अवतरण होता है।


समता में सब की व्यवस्था है।

युवा पिता स्वपरुद्र एपा, सुदृधा पृश्निः सदिना मरुद्भ्यः।

-ऋ. 5। 60। 5

अर्थात्—” संसार में न कोई बड़ा है न छोटा, परमात्मा के पुत्र, सभी मनुष्य भाई-भाई हैं। सब मनुष्य आपस में मिलकर जीवन सुखमय बनाने का प्रयत्न करें। एक ही प्रकृति माता की गोद से उत्पन्न सब समान हैं कोई ऊँच नहीं, कोई नीच नहीं।”

समता मनुष्य समाज के सुख,शान्ति और सुव्यवस्था का प्रमुख आधार है। लोगों में जब भी और जहाँ भी ऐसी प्रवृत्तियाँ विकसित हो रही होंगी वहाँ देवत्व की प्रचुर मात्रा विद्यमान होगी। जातियों को एक सूत्र में पिरोये रखने का आधार समता की भावना है। जिन जातियों में छोटे-बड़े, ऊँच-नीच का भेदभाव नहीं रहता ये लौह-जंजीर की भाँति कभी न टूटने वाली रही हैं, और आगे भी उन्हीं का अस्तित्व शेष रहेगा। भेद-नीति, फूट, कलह, कटुता और पतन का कारण बनती है। हिन्दू-जाति में जब से वर्ण-व्यवस्था में गुण, कर्म और स्वभाव से उत्कृष्टता का माप-दण्ड खतम हुआ और ऊँच-नीच छोटे-बड़े की स्वतंत्र नीति बरती जाने लगी है, तभी से उसका आन्तरिक संगठन ध्वस्त हुआ और उसका पूर्व गौरव नष्ट प्रायः हो चला है। समता संगठन की रीढ़ है जिससे जातिगत शक्ति जीवित रहती है। आँतरिक सक्षमता और भौतिक समृद्धि का मूल कारण भी यही है।

पारस्परिक घृणा, अहंकार और कूटनीति के कारण लोग एक दूसरे के शत्रु बन जाते है और आपस में भीषण प्रतिशोध उठ खड़ा होता है। फलस्वरूप समय, धन और बुद्धि का अधिकाँश भाग इस बदले की भावना को शाँत करने में ही लग जाता है। जो शक्ति और साधन मानवीय उन्नति में सहायक हो सकते थे वे न केवल व्यर्थ जाते हैं वरन् समाज में पैतृक अव्यवस्था पैदा कर जाते हैं जिससे ईर्ष्या, द्वेष, कलह, कटुता, छल, कपट आदि अवगुण उस समाज के स्थायी अंग बन जाते है और जातीय जीवन को पनपने से रोक देते हैं। असमानता ही इस पतन की जड़ है। मनुष्य में जब बड़े होने की महत्वाकाँक्षा विकृत उत्पन्न हो जाती है तभी उसे सब तरह के स्वार्थ घेरते हैं। मैं सब से बड़ा हूँ-इस भावना के कारण दूसरों को छोटा; उपेक्षित समझने की हीन-भावना उदय होती है। स्वार्थ की पूर्ति के लिये ऐसे लोग धर्म और न्याय के नाम पर स्वच्छंदता का व्यवहार करते हैं। तात्कालिक शक्ति और सत्ता के बल पर यह तो सम्भव है कि कुछ समय तक ऐसे स्वार्थी, मिथ्याचारी लोग किन्हीं को दबाकर रखें या उनसे मनमाना काम लें, सतायें, परेशान करें, सामन्तवादिता और नौकरशाही प्रदर्शित करें। किन्तु दलित वर्ग पर जब इस तरह का दबाव पड़ेगा तो उसकी आँतरिक शक्तियाँ विद्रोह करने से चूकेंगी नहीं। जब भी उन्हें अवसर मिलेगा वे समाज के खिलाफ नृशंसता के खिलाफ विद्रोह कर देंगे और समाज में असंतुलन पैदा कर देंगे। धन एक स्थान पर जमा होगा तो चोरी और नीति में पक्षपात का बर्ताव होगा, तो जनता विद्रोह करने से नहीं चूकेगी, इससे आँतरिक व्यवस्था जरूर अस्त-व्यस्त होगी। ऊँच-नीच, छूत-छात की भावना स्वार्थियों की देन है। जातियों का संगठन बचाये रखने के लिये इस विरोध भावना को दूर करने में ही कल्याण है।

यह बात अधिकतर हमारे विचारने की है क्योंकि हिन्दू जाति में ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य, और शूद्र की वर्ण व्यवस्था को ऐसा विकृत रूप दिया जाता है। गुण,कर्म, और स्वभाव के अनुरूप श्रेष्ठता, अश्रेष्ठता की भावना अब नहीं रही। जन्म से कोई ब्राह्मण है और कर्म भले ही शूद्रों जैसे हों तो भी श्रेष्ठता का सम्मान उसे ही मिलेगा, इस भूल को यदि हम समझ पायें तो अन्य जातियों के समक्ष हमारी जो मानहानि हुई है उससे निकल सकते हैं और हिन्दू संगठन को पुनः जीवित और जागृत कर सकते हैं।

हिन्दू धर्म जिस सूत्र पर आधारित है वह वस्तुतः समता का ही सिद्धाँत है। सच्चे साम्यवाद के दर्शन भारतीय संस्कृति में ही देखने को मिलते हैं। समाज निर्माण के लिये समान व्यक्तित्व निर्माण की आवश्यकता होती है। जब अपने लिये, समाज के लिये, प्राणिमात्र के लिये और ईश्वरीय विधान के लिये सहयोगी के रूप में कर्त्तव्य पालन करता है तभी ऊँच-नीच की अज्ञानता मिटनी संभव होती है। एक के लिये शेष तीन को त्यागा नहीं जा सकता। व्यक्तिगत सुख, साधन और श्रेष्ठतायें अधिकतम मात्रा में अर्जित की जा सकती हैं किन्तु उससे, समाज को दोष न लगना चाहिए, प्राणियों को पीड़ा न पहुँचनी चाहिये, ईश्वरीय नियमों की अवहेलना भी न होनी चाहिए।

मनुष्यों ने यह जो जाति-पाँति, भाषा-भाव, प्राँत-वाद धर्म-विचार की संकीर्णता पैदा की है उससे ईश्वरीय नियमों की उपेक्षा होती है। बाहरी दृष्टि से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र दिखाई देने वालो जिस तरह आत्मिक दृष्टि से समान हैं उसी तरह अन्य जीव-जन्तु, पशु-पक्षी, भी हम से आपसे भिन्न नहीं हैं। आफिस का बाबू अपने काम का अलग वेतन पाता है, फैक्टरी का कर्मचारी अलग। अपनी अपनी योग्यता का लाभ उतने ही अंश में दोनों को मिल रहा है फिर दफ्तर का बाबू यदि बड़ा बनने का अभिमान प्रदर्शित करे तो उसे उसका मिथ्या-दर्प ही कहा जायगा। इसी प्रकार बैल को यही क्या कम सजा है कि वह मूक होकर आपकी सेवा करने को विवश किया गया है, आपको इतना ही अधिकार हो सकता है कि उसकी सेवायें ले लीजिये। उसे मारने,दिन-रात काम लेने और जीवनयापन की पूरी सुविधायें न देने के हकदार आप ही हैं। मनुष्य का दृष्टिकोण जब तक इतना विशाल,इतना खुला हुआ नहीं बनता तब तक उसके जीवन में शाँति और सुव्यवस्था का अभाव ही बना रहेगा।

प्रकृति अपने अनुदान समान रूप से बाँटती है। हवा बहती है— वह सबके लिए,वर्षा होती है, वह सबके लिये, फल उगते हैं, वह सबके लिए। अग्नि कभी किसी के साथ पक्षपात नहीं करती। सूर्य किसी एक घर को ही प्रकाशित नहीं करता। चन्द्रमा का औषधि-तत्व सम्पूर्ण वृक्ष-वनस्पति चूसते रहते हैं। परमात्मा का प्राण संसार के सम्पूर्ण प्राणियों के लिए समान रूप से बिखरा पड़ा हैं जिसकी जितनी इच्छा हो उतना उपभोग करें। प्रकृति कभी किसी के साथ अन्याय नहीं करती। असहाय, साधन विहीन पशु-पक्षियों के लिये भी वह आहार आदि की व्यवस्था करती है। मनुष्य है जो केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिये विषमता के बीज बोकर समाज में अशाँति और अव्यवस्था पैदा करता है। साम्यावस्था को प्रकृति और विषमता को विकृति कहते हैं। समता ही धर्म है और विषमता ही अधर्म है। विषमता बढ़ती है तो सर्व-साधारण को सुविधापूर्वक जीवन बिताना भी कठिन हो जाता है। कुछ लोग ऐश्वर्य-वाली होकर विलासिता का जीवन बितायें और पड़ौस का दूसरा व्यक्ति एक समय का भरपेट भोजन भी न पाये, तो उस मनुष्य को, उस समाज को कलंकित ही ठहराया जायगा। प्राचीन काल में जिनके पास अधिक धन, अन्न और वस्त्र आदि होते थे वे अपनी आवश्यकताओं से शेष बचे हिस्से कसो उदारतापूर्वक उन लोगों को बाँट देते थे जिन्हें उसकी आवश्यकता होती थी। इस तरह व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का संरक्षण भी होता था और समाज में ईर्ष्या-द्वेष की भावनायें भी नहीं बढ़ती थीं।

जिस तरह मनुष्य-मनुष्य के बीच में, देश, जाति, भाषा धर्म, काले, गोरे ऊँच-नीच, धनी, निर्धन आदि का भेदभाव देखा जाता है वैसी ही यह भी संकीर्णता है कि मनुष्य अपने आपको शेष प्राणियों से अलग कि ये हुए हैं। संसार के अन्य जीवधारी भी यदि देखा जाय तो उसी प्रकृति माता के पुत्र हैं जिसके गर्भ से मनुष्य जीवन पाता है। उनमें भी कितनी ही ऐसी विशेषतायें देखने को मिलती हैं जो मनुष्य की बुद्धि और उपलब्धि से भी बढ़कर होती हैं। वे भी इस धरती में समान रूप से जीवित रहने के अधिकारी हैं। उनके इन अधिकारों को छोड़कर, उन्हें अपने उपभोग और आहार की वस्तु समझ कर मनुष्य ने बड़ा अपयश कमाया है। अन्य जीवधारियों के शोषण का पाप मनुष्य के सिर पर है। उसे मिटाना तभी संभव है जब वह मनुष्य की और अन्य प्राणियों की आत्मिक एकता को समझे और सबके साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह अपने लिए औरों से अपेक्षा करता है।


मनुष्य-जीवन का अमूल्य यात्रा-पथ

मनुष्यता परमात्मा की अलौकिक कलाकृति है। वह विश्वम्भरा परमात्मा देव की महान रचना है। जीवात्मा अपनी यात्रा का अधिकाँश भाग मनुष्य शरीर में ही पूरा करता है। अन्य योनियों से इसमें उसे सुविधायें भी अधिक मिली हुई होती हैं। यह जीवन अत्यन्त सुविधाजनक है। सारी सुविधायें और अनन्त शक्तियाँ यहाँ आकर केन्द्रित हो गई हैं ताकि मनुष्य को यह शिकायत न रहे कि परमात्मा ने उसे किसी प्रकार की सुविधा और सावधानी से वंचित रक्खा है। ऐसी अमूल्य मानव देह पाकर भी जो अन्धकार में ही डूबता उतराता रहे उसे भाग्यहीन न कहें तो और क्या कहा जा सकता है।

आत्मज्ञान से विमुख होकर इस मनुष्य जीवन में भी जड़-योनियों की तरह काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि की कैद में पड़े रहना, सचमुच बड़े दुर्भाग्य की बात है। किन्तु इतना होने पर भी मनुष्य को दोष देने का जी नहीं करता। बुराई में नहीं, वह तो अपने स्वाभाविक रूप में सत्, चित एवं आनन्दमय ही है। शिशु के रूप में वह बिलकुल अपनी इसी मूल-प्रकृति को लेकर जन्म लेता है किन्तु माता-पिता की असावधानी, हानिकारक शिक्षा, बुरी संगति, विषैले वातावरण तथा दुर्दशाग्रस्त समाज की लपेट में आकर वह अपने उद्देश्य से भटक जाता है और एक तुच्छ प्राणी का सा अविवेकपूर्ण जीवन व्यतीत करने लग जाता है।

इसलिये निन्दा मनुष्य की नहीं दुष्टता की, दुर्गुणों की, की जानी चाहिये जो मनुष्य को प्रकाश से अन्धकार में ढकेल देते हैं। मनुष्य का जीवन तो सामाजिक जीवन के साँचे में ढाले गए किसी उपकरण की तरह है जिसके अच्छे-बुरे होने का श्रेय सामाजिक शिक्षा एवं तात्कालिक परिस्थितियों को ही देना उचित प्रतीत होता है। यदि मनुष्य को सदाचरण युक्त एवं आदर्शों से प्रेरित देखना चाहते हों तो द्वेष, दुर्गुणों को मिटाकर सुन्दर प्रकाशयुक्त वातावरण पैदा करने का प्रयास करना चाहिये। अपनी महत्वाकाँक्षा की पूर्ति के लिये किसी वर्ग, व्यक्ति या समाज पर आत्म-हीनता का भार लादना उचित नहीं। इससे मानवता कलंकित होती है। हम वह करें जिससे यह अज्ञान का पर्दा नष्ट हो और दिव्य-ज्ञान का प्रकाश चारों तरफ झिलमिलाने लगे।

सुविधाजनक यात्रा का सामान्य नियम यह है कि समय समय पर यात्री अपना स्थान दूसरों के लिये छोड़ते जायँ। उतरते-चढ़ते रहने की प्रक्रिया से ही कोई यात्रा विधिपूर्वक सम्पन्न हो सकती है। ऐसी ही व्यवस्था मनुष्य जीवन में भी होनी चाहिये। परमात्मा ने अपना यह नियम बना दिया है कि मनुष्य एक निश्चित समय तक ही इस वाहन का उपयोग करे और आगे के लिये उस स्थान को किसी दूसरे के लिये सुरक्षित छोड़ जाय। यह एक प्रकार की उसकी जिम्मेदारी है कि आगन्तुकों का, भावी नागरिकों का निर्माण चतुराई और बुद्धिमत्ता के साथ करें। केवल अपने ही स्वार्थ का ध्यान न रखकर आने वाले यात्री के लिये इस प्रकार का वातावरण छोड़ जाय ताकि वह भी अपनी यात्रा सुविधा और समझदारी के साथ पूरी कर सकें।

बालकों के निर्माण की जिम्मेदारी अभिभावकों की है। वे जिस तरह उँगली पकड़ कर चलना सिखा जाते हैं उम्र भर वैसे ही चलते रहते हैं। बाप दादाओं की अशिक्षा अन्ध-परम्परा रूढ़िवादिता को तो वे ढोते ही हैं इन बुराइयों में बाल-बच्चे और भी साथ में जुड़ जाते हैं, फलस्वरूप मनुष्य जीवन की यात्रा पूरी तरह से भारयुक्त कष्टदायक और बे-मजेदार हो जाती है। पीछे इसकी परम्परा सी पड़ जाती है और हर आने वाली पीढ़ी इसी ढर्रे में पड़कर पिसती-घिसटती चली जाती है। अपने बुजुर्गों को कोसते हुये चले जाते हैं कि हमें इस योग्य भी नहीं बना सके कि सुखपूर्वक चैन और मस्ती की जिन्दगी तो जी पाते। बालकों के पाप का, उन्हें बुराइयों की आग में झोंक देने का बहुत कुछ अपराध उसके बाप को ही दिया जा सकता है जिसने उन बेचारों की खैर ख्वाहिश न रखकर केवल अपने स्वार्थ और सुख को ही सर्वोपरि माना है। अतः जीवन-यात्रा के हर मुसाफिर का पहला काम भावी यात्री के लिये उचित, विवेकयुक्त , धर्मयुक्त वातावरण का निर्माण कर जाना है।

कर्तव्य की इतिश्री इतने से ही नहीं हो जाती। अपने साथ अनेकों दूसरे यात्री भी सफर तय कर रहे होते हैं। मानवता के नाते उन्हें भी आपकी तरह, सुविधापूर्वक यात्रा करने का अधिकार मिला हुआ होता है। यदि आपको कुछ अधिक शक्ति और सामर्थ्य मिली है तो इसका यह मतलब नहीं कि आप औरों को बलपूर्वक सतायें, उन्हें परेशान करें। खुद तो मौज मजा उड़ाते रहें और दूसरों को बैठने की भी सुविधा न दें। हमारे ऋषियों ने एक व्यवस्था स्थापित की थी कि प्रत्येक नागरिक उतनी ही वस्तु ग्रहण करे जितने से उसकी आवश्यकतायें पूरी हो जायँ। शेष भाग समाज के अन्य पीड़ित प्राणियों, अभावग्रस्त लोगों को बाँट दीया जायँ, ताकि समाज में किसी तरह की गड़बड़ी न फैले। विषमता चाहे वह धन की हो, चाहे जमीन जायदाद की हो, हर अभावग्रस्त के मन में विद्रोह ही पैदा करेगी और उससे सामाजिक बुराइयाँ ही फैलेंगी। इसलिए सबके हित में ही अपना भी हित समझकर मनुष्य को मनुष्यता से विमुख नहीं होना चाहिए। इसी में शाँति है सुख और सुव्यवस्था है।

मनुष्य इन बुराइयों से बचता रहे इसके लिये उसे हर घड़ी अपना लक्ष्य, अपना उद्देश्य सामने रखना चाहिए। यात्रा में गड़बड़ी तब फैलती है जब अपना मूल-लक्ष्य भुला दिया जाता है। मनुष्य जीवन में जो अधिकार एवं विशेषतायें प्राप्त हैं वह किसी विशेष प्रयोजन के लिए हैं। इतनी सहूलियतें अन्य प्राणियों को नहीं मिलीं। मनुष्य ही ऐसा प्राणी हैं जिसको सुन्दर शरीर, विचार, विवेक भाषा आदि के बहुमूल्य उपहार मिले हैं, इनकी सार्थकता तब है जब मनुष्य इनका सही उपयोग कर ले। मनुष्य-देह जैसा अलभ्य अवसर प्राप्त करके भी यदि वह अपने पारमार्थिक लक्ष्य को पूरा नहीं करता तो उसे अन्य प्राणियों की ही कोटि का समझा जाना चाहिये। जन्म-जन्मान्तरों की थकान मिटाने के लिए यह बहुमूल्य अवसर है जब मनुष्य अपने प्राप्त ज्ञान और साधनों का उपयोग कर ईश्वर-प्राप्ति की परम शान्ति दायिनी स्थिति को प्राप्त कर सकता है। जिन्हें साधन-निष्ठा की इतनी शक्ति नहीं मिली या जो कठिन तपश्चर्याओं को मार्ग पर नहीं जाना चाहते वे भी इस जीवन में उत्तम संस्कार सद्भावनायें और श्रद्धा भक्ति तो पैदाकर ही सकते हैं ताकि अगले जीवन में परिस्थितियों की अनुकूलता और भी बढ़ जाय और धीर-धीरे अपने जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ने का कार्यक्रम चालू रख सकें।

पर इस अभागे इन्सान को क्या कहें जो आत्म-स्वरूप को भूलकर उसके वाहन ‘शरीर’ को ही सजाने में आनन्द ले रहा है। मनुष्य यह देखते हुये भी कि यह शरीर नाशवान है और अन्य जीवधारियों के समान इसे भी किसी न किसी दिन धूल में मिल जाना है फिर भी वह शारीरिक सुखों की मृगतृष्णा में इस तरह पागल हो रहा है कि उसको आप अपने सही स्वरूप तक का ज्ञान नहीं है। शारीरिक सुखों के सम्पादन में ही वह जीवन का अधिकाँश भाग नष्ट कर देता है। जब तक शक्ति और यौवन रहता है तब तक उसकी यह समझदारी की आँख खुलती तक नहीं बाद में जब संस्कारों की जड़ें गहरी जम जाती हैं और शरीर में शिथिलता आ जाती है तब फिर समझ आने से भी क्या बनता है। चतुरता तो तब है जब अवसर रहते मनुष्य सद्गुणों का संचय करके इस योग्य बन जाय कि यह यात्रा संतोषपूर्वक पूरी करके लौटने में कोई बाधा शेष न रहे।

आत्मा का सहज धर्म यह है कि वह इस जीवन में प्रकाश की अर्चना करे और उसी की ओर अग्रसर हो। इसमें कुछ देर लगे पर जब भी उसे एक नया जीवन मिले वह प्रकाश की ओर ही गतिमान बना रहे। मनुष्य का दृढ़ निश्चय उसके साथ बना रहना चाहिए। उसका विवेक-कुतुबनुमा की सुई की भाँति ठीक जीवन लक्ष्य की ओर लगा रहना चाहिये ताकि वह अपनी इस यात्रा में भूले-भटके नहीं।

इस जीवन में काम, क्रोध लोभ तथा मोह आदि के मल विक्षेप आत्म-पवित्रता को मलिन करते रहते हैं। इस अपवित्रता को ब्रह्मचर्य श्रद्धा, श्रम और प्रेम के दिव्य-गुणों द्वारा दूर करने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। मार्ग, इस में संदेह नहीं, कठिनाइयों और जटिलताओं से, ग्रस्त है पर यदि सचाई, श्रद्धा, भक्ति एवं आत्म समर्पण के द्वारा ईश्वर के सतोगुणी प्रकाश की ओर बढ़ते रहें तो यह कठिनाइयाँ मनुष्य का कुछ बिगाड़ नहीं सकतीं।


मैत्री भावना का विकास करें

विश्वा उतत्वया वयं धारा उदन्या इव अति गाहे महि

द्वषः॥ ऋग्वेद 2। 6। 3

“पानी की धारा एक स्थान पर नहीं टिकती, ऐसे ही वैर-भावनायें एक जगह पर रुकने न पावें। शत्रुभाव त्याग कर मित्र भाव जागृत करना चाहिए।”

निःस्वार्थ त्याग और उदारता की प्रतीक मनुष्य की मैत्री भावनाओं को कहना अधिक बुद्धिसंगत है क्योंकि अन्य सभी सम्बन्ध किसी न किसी स्वार्थ पर ही स्थिर होने हैं। मित्रता विशुद्ध हृदय की अभिव्यक्ति है। उसमें छल कपट या मोह भावना नहीं। मैत्री कर्तव्य पालन की शिक्षा देने वाली उत्कृष्ट भावना है अतः सामाजिक जीवन में उसकी विशेष प्रतिष्ठा है। दूसरों की प्रति वैर-भाव रखने से मानसिक उत्तेजना पैदा होती है जिस से मनुष्यों के स्वभाव में मूढ़ता आती है और सामाजिक सन्तुलन बिगड़ता है। जिन व्यक्तियों से शत्रुता रखते हैं मन ही मन से उन्हें नीचा दिखाने के कुचक्र चलाते रहते हैं जिससे अपनी मनोभूमि गन्दी होती है। शारीरिक शक्ति का अपव्यय होता है और स्वास्थ्य पर दूषित प्रभाव पड़ता है। दुर्भावनायें प्रत्यक्ष नरक हैं जिनमें मनुष्य अपनी प्रसन्नता तो खो ही देता है साथ ही अपनी सारी उन्नति का मार्ग अवरुद्ध बना लेता है।

मित्रता अपनी आत्मा को विकसित करने का पुण्य साधन है जिसके हृदय में प्रेम दया, सहानुभूति, करुणा आदि दैवी गुणों का विकास होता रहता है और उस मनुष्य के जीवन में सुख सम्पदाओं की कोई कमी नहीं रहती। कुविचारी व्यक्तियों को लोग घोर तकलीफ में भी देखकर उसके पास जाने से हिचकिचाते हैं। साँप के समीप जाते हुये डर लगना स्वाभाविक ही है किन्तु मित्रतापूर्ण भावनाओं के द्वारा यदि कोई अपनी आत्मा का परिष्कार कर लेता है तो एक मामूली उँगली पक जाने पर भी सहानुभूति प्रकट करने वाले दौड़ पड़ते हैं।

जिसने मैत्री भावनायें प्राप्त कर लीं उसके लिये संसार परिवार हो गया। स्वामी रामतीर्थ अमेरिका की यात्रा कर रहे थे। उनके पास अपने शरीर और उस पर पड़े हुए थोड़े से वस्त्रों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं था। किसी सज्जन ने उनसे पूछा आपका अमेरिका में कोई सम्बन्धी नहीं है, आपके पास धन भी नहीं है वहाँ किस तरह निर्वाह करेंगे? “राम” ने आगन्तुक की ओर देखकर कहा मेरा एक मित्र है। वह कौन है? उस व्यक्ति ने फिर पूछा। आप हैं वह मित्र जिनके यहाँ मुझे सारी सुविधायें मिल जायेंगी। और सचमुच ‘राम “ की वाणी, उनकी आत्मीयता का कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि वह व्यक्ति स्वामी रामतीर्थ का घनिष्ठ मित्र बन गया।

मित्रता की चाह प्रत्येक मनुष्य को होती है। पर वह ठहरती उन्हीं के पास है जिनका हृदय शुद्ध होता है। जो स्वार्थ और कामनाओं में ग्रसित होते हैं उनके सम्बन्धों में स्थायित्व नहीं होता। रोज एक मित्र बनाते हैं दूसरे दिन मित्रता टूट जाती है। यह मनुष्य के दुर्भाग्य का लक्षण है। जिसे सच्ची मैत्री उपलब्ध हुयी उसे सौभाग्यशाली ही कहेंगे।

अमेरिका के किसी पत्रकार ने एक भेंट में धन-कुबेर श्री हेनरी फोर्ड से पूछा क्या आपके जीवन में ऐसी भी वस्तु है जिसे आप प्राप्त न कर सके हों? श्री हेनरी फोर्ड ने उत्तर दिया—”यदि मुझे अपना जीवन फिर से शुरू करना पड़े तो मैं मित्रों की तलाश करूंगा। मेरे धन ने मुझे मित्रों से नहीं मिलने दिया।”

धन या कोई अन्य वस्तु देकर मैत्री खरीदी नहीं जा सकती। मनुष्य के गुण देख कर वह स्वतः मिल जाती है। जो गरीब, दुःखी और असहाय जनों को सहायता देता है। गिरे हुओं को उठाता और उनसे सहानुभूति प्रकट करता है, निराश्रितों की रक्षा करता है और उन्हें प्यार करता है उसे सच्ची मैत्री प्राप्त होती है।

पारिवारिक सुख मैत्री भावनाओं का आधार ढूँढ़ता है। पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-भाई, सास-बहू में जहाँ जिस कुटुम्ब में प्रगाढ़ मैत्री होगी वह परिवार सुख से सराबोर हो रहा है। आज इस बात का नितान्त अभाव है। कौटुम्बिक जीवन में आत्मीयता, प्रेम और सौजन्यता का नितान्त अभाव है इसी कारण द्रोह, कटुता बैर और क्षमता पर दूषित प्रभाव पड़ता है। उपार्जन मन्द पड़ जाता है फलस्वरूप चारों ओर से अभाव घेर लेते हैं और कुटुम्ब नरक के रूप में बदल जाते हैं। परिवार को एक सूत्र में पिरोकर रखने वाली भावना का नाम मैत्री है जो इसे जान गया उसने लक्ष्मी को सिद्ध कर लिया, यही समझना चाहिये।

पति-पत्नी के बीच सबसे अधिक पूर्ण निश्छल और स्वाभाविक मैत्री होती है किन्तु मिथ्या मान, हृदयहीन भ्रान्तियों के कारण मनुष्य इस आनन्द से वंचित रह जाता है। मनुष्य सोचता है कि मैं बड़ा हूँ मुझे मान मिलना चाहिये अतः वह पत्नी के साथ दासी का-सा व्यवहार करता है जहाँ ऐसी कुरूपता उत्पन्न हुई वहाँ तरह-तरह की दुर्बल आशंकायें उत्पन्न होना स्वाभाविक है और इस तरह दाम्पत्य जीवन की मधुरता क्लेश और कटुता में परिवर्तित हो जाती है।

अनात्म भावना की गन्दी विचार लहरें धीरे-धीरे वातावरण में तनावपूर्ण स्थिति पैदा कर देती हैं। उस दम घुटने वाले वातावरण में रहकर किसी को भी सुख नहीं मिला। इस तरह मनुष्य का विकास रुक जाता है। ऐसी परम्परायें, रीति-रिवाज हमारे समाज में चल पड़ी है जिन्होंने नारी और पुरुष की मित्रता और सहृदयता को असंभव सा बना दिया है। इस बात की बड़ी आवश्यकता है स्त्री-पुरुष एक दूसरे को समान समझें और एक दूसरे के हितों का उदारतापूर्वक ध्यान रखें। वेद भगवान का आदेश है—

इषे राये रमस्व संहसे द्युम्नऊर्जे अपत्याय।

साश्राऽसि स्वराऽसि सारस्वतौ त्वोत्सौ प्रावताम्॥

—यजु0 13। 35

अर्थात्—विवाह के वाद पति-पत्नी प्रीतिपूर्वक रहें।

विद्यमान तथा धनवान बनें। श्रेष्ठ गुणों को धारण कर एक दूसरे की मंगल कामना करें। धर्मानुसार सुसन्तति को जन्म दें। इस तरह वे सुखमय जीवन जियें।

पति-पत्नी की तरह ही कुटुम्ब के अन्य सदस्यों में भी स्नेह और सौजन्यता चाहिए। कटुता से कटुता बढ़ती है। हिंसा से हिंसा फैलती है, विद्वेष से विद्वेष ही पनपता है और सुखी जीवन के सम्पूर्ण आधार क्षत-विक्षत हो जाते हैं। अपार धन-सम्पत्ति होते हुये भी लोग अतृप्त, उदासीन और खिन्नता का जीवन-यापन करते हैं। सुखी जीवन के लिये वाध्य साधन कम आपेक्षित है। प्रमुख वस्तु पारिवारिक सौहार्द है। मैत्री भावनाओं से कुटुम्ब फलते-फूलते और अटूट सुख का उपभोग करते हैं।

मित्रता मनुष्य जाति का गौरव है जो जाति, जो राष्ट्र इस गौरव को बनाये रखता है उसका कभी विनाश नहीं होता। सबके हित में अपना हित सोचने में ही मनुष्य उन्नति की ओर अग्रसर होता है। अन्यायपूर्वक किसी को दबाना अच्छा नहीं होता। दुष्टता, दुष्ट को ही खा जाती हैं।

मित्रता बढ़ाने से शत्रुता कम होती है और सद्गुणों का विकास होता है। सच्ची मित्रता में भावनाओं की निपुणता और परख होती है। माता अपने बेटे के पालन में जितना धैर्य, जितनी कोमलता रखती है सच्ची मित्रता का निर्वाह भी अटूट धैर्य और मधुर भावनाओं से होता है। मित्रता का अर्थ है मेरा कोई शत्रु नहीं है, मैं सबको आत्म-भाव से देखता हूँ। सभी मेरे हितैषी हैं। मेरे ऊपर सबकी कृपा है। मैं भी लोगों के प्रति सद्भावनायें रखता हूँ, सबके उन्नति की बात सोचता हूँ। मैं समाज का हितैषी हूँ और अपनी योग्यताओं के एक अंश का लाभ समाज को भी देता हूँ। सबके साथ मुझे प्रेम पूर्ण व्यवहार, नम्रता पूर्वक वार्तालाप और शिष्ट आचार करना भाता है। इसमें मुझे पूर्ण सुख है। सब तरह सम्पन्न हूँ। मित्रता की भावना के कारण मैंने अनन्त की अनुभूति प्राप्त कर ली है। वह मित्रता मेरे सम्पूर्ण जीवन में ओत-प्रोत हो रही है।


आत्मघात न करें इसी में आपका भला है।

मनुष्य का जीवन कितना श्रेष्ठ तथा सामर्थ्यवान है इसका अनुमान संभवतः अन्य जीव-जन्तुओं को अधिक होगा। शरीर और बुद्धि की शक्तियों का विस्तार करके कितने विचित्र अनुसंधान किये हैं उसने, कि सूर्य, चन्द्रमा भी उसके तीखे प्रहारों से भयभीत हो रहे हैं। विचार-विनिमय, साहित्य, संगीत, आहार-विहार में कितनी ही विशेषतायें उसे मिली हैं इनसे वह परमात्मा का सर्वश्रेष्ठ पुत्र कहलाने का निःसन्देह अधिकारी है।

किन्तु विचार करके देखते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य का जीवन अन्य जीव-जन्तुओं की अपेक्षा भी अधिक गयाबीता है। आचार-विचार, बर्ताव-व्यवहार, व्यवसाय, खान-पान और रहन-सहन में उसने इतने दुष्टतापूर्ण कृत्यों का समावेश कर लिया है कि वह स्वयं दीन-हीन, रोगी, कुरूप, अशक्त , अभाव-ग्रस्त तो है ही दूसरे जीवों को भी आतंकित कर रखा है। दुःख और पतन का कारण मनुष्य स्वयं है, अपने साथ दुर्व्यवहार स्वयं मनुष्य ने ही किया है। आत्म-घात का दोषी वह स्वयं ही है। इसके लिये न दैव दोषी है न परिस्थितियाँ। अपना शत्रु या मित्र मनुष्य स्वयं है, इसका उत्तरदायित्व किसी दूसरे पर नहीं है।

संसार में दो तरह के व्यक्ति होते हैं। (1) सदाचारी (2 ) दुराचारी। सद्व्यवहारशील पुरुष वह होते हैं जो सबकी भलाई में अपनी भलाई देखते हैं। अपने शरीर तथा मन की शक्तियों को विकसित करके दूसरों को सुख पहुँचाते हैं। परोपकार की इस भावना के कारण वे स्वयं भी सुखों से ओत-प्रोत रहते हैं। अपने पास-पड़ोसियों को भी संतुष्ट रखते हैं। किन्तु दुर्जन अपने अभद्र व्यवहार, अश्लील आचरण और अत्याचार करते हुए दूसरों को पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। दुर्व्यवहार का अन्तिम परिणाम दुःख है। दूसरों के साथ दुष्टता करने वाले अपने हितों का सर्वनाश पहले कर लेते हैं।

अपने हित की बात होती है तो सभी सुख और शान्ति चाहते हैं किन्तु व्यवहार में वह दूसरों के साथ भी ऐसा ही चाहें, तो हम मानेंगे कि वह नेक हैं और उनकी कामनायें सही हैं। दुर्व्यवहार का कुफल दुःख और बेचैनी है। फिर वह चाहे अपने साथ हो या दूसरे के साथ, दुःखद ही होगा। भलाई की बात यह है कि आप जो औरों से अपने लिये चाहते हैं वैसा ही बर्ताव दूसरों के साथ भी करें।

बुद्धि और विचार की शक्ति मनुष्य में इतर प्राणियों की अपेक्षा अधिक है इसलिए वह अपनी भलाई का विचार कर सकता है। बुद्धि के सदुपयोग या दुरुपयोग से ही वह सुख शान्ति या क्लेश और कलह की परिस्थितियाँ तैयार करता है। इसका दोषारोपण किसी दूसरे पर करना मनुष्य की जड़ता का ही चिह्न समझा जायगा। मनुष्य अपने कर्मों का फल आप भोगता है इसके लिए किसी दूसरे को अपराधी नहीं कह सकते।

अपनी शारीरिक त्रुटियों पर विचार कीजिए? कितनी गन्दी आदतों का समावेश हो गया है आज के जन-जीवन में। पान, बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू, मिर्च मसाले, मिठाई, खटाई, अंडे, माँस आदि कितने अभक्ष्य पदार्थों का सेवन लोग करते हैं। इससे लोगों के स्वास्थ्य खराब हों तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है। रोज नई-नई बीमारियाँ उठती आ रही हैं तो इसका दोषी और कौन होगा? दूध, घी जैसी जीवनोपयोगी चीजों में कितनी मिलावट होने लगी है? शक्ति और सार तत्व नष्ट हो गये हैं पर कटोरियाँ सजाने का फैशन बढ़ गया है। एक और खाद्य पदार्थों में दूषित तत्वों का प्रवेश और दूसरी ओर बढ़ती हुई असंयम की प्रवृत्ति। दोनों ने मिलकर स्वास्थ्य की ऐसी बरबादी मचाई है कि लोगों में चलने-फिरने जितनी ही शक्ति शेष बची है। मौसम के हलके परिवर्तन को भी सहन करने की शक्ति तक नहीं रही मनुष्यों के शरीरों में। शरीर के प्रति आत्म-घात के इतने भयानक परिणाम मनुष्य के नाम पर कलंक ही लगा रहे हैं।

संसार का सबसे धनी देश अमेरिका, जहाँ धन और साधनों की किसी तरह की कमी नहीं है, उसे धन-सम्पन्न नहीं, रोग-सम्पन्न कहना अधिक उपयुक्त होगा। न्यूयार्क के ‘जेरिआट्रिओज क्लिनिक’—मेट्रोपालिटन अस्पताल के डॉ0 डब्ल्यू कोड़ा मार्टिन के कथनानुसार रजिस्टर पर अंकित जीर्ण रोगियों की संख्या 188 95 534 है। सन् 1954 की गणना के अनुसार कैंसर से मरने वाले अमेरिकियों की संख्या प्रतिवर्ष 250000, हृदय रोग से 817000 है। 7000000 से अधिक व्यक्ति संधि-प्रदाह तथा अन्य वात रोगों से ग्रसित हैं। 231 व्यक्तियों में से 10 व्यक्ति उपदंश या प्रमेह के रोगी, 60 प्रतिशत लोगों की आंखें खराब होना निःसन्देह अमेरिका के लिये कलंक की बात है। जिस देश में प्रतिवर्ष 100000000 डालर निद्रा लाने वाली औषधियों में खर्च होते हों वह देश सुखी होगा ऐसी कल्पना भी नहीं की जा सकती। यह अवस्था सर्व-सम्पन्न देश अमेरिका की है तो शेष दुनिया के अभावग्रस्त देशों की स्थिति कैसी होगी इस का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।

मनुष्य की इन परेशानियों का कारण केवल आहार सम्बन्धी दोष नहीं है। मनुष्य का नैतिक स्तर गिर जाना सबसे बड़ा कारण है। अश्लील साहित्य, सिनेमा के गन्दे गाने और भद्दे चित्रों से कामोत्तेजना के कारण मनुष्य का शरीर तो बरबाद होता ही है, मानसिक संस्थान भी दूषित होता है जिसके फलस्वरूप सारा जीवन दुःख, शोक और रोगों के रूप में दिखाई देता है। लोगों की शान-शौकत, तड़क-भड़क, शृंगार प्रियता के कारण चारित्रिक पतन भी अपनी सीमा पर पहुँच गया है। आर्थिक व्यवस्था भी लड़खड़ा रही है। मनुष्य को किसी तरफ चैन या संतोष नहीं मिल रहा, बेचारा विक्षिप्त-सा होकर इधर-उधर भटक रहा है।

भ्रष्टाचार के कारण आज सभी दुःखी हैं फिर भी नैतिक साहस किसी में नहीं आता। सभी स्वार्थ साधनों में लिप्त हैं। स्वयं कुछ न देकर, दूसरों से ऐंठ लेने की नीति के कारण न तो कहीं सहयोग रह गया है न सहानुभूति। मुसीबतों में सच्चे हृदय से सहानुभूति दिखाने वाले भी नहीं रहे। मानवता का इतना अधःपतन शायद ही किसी युग में हुआ हो। उसी अनुपात में लोगों का कष्ट और पीड़ाओं से परेशान होना भी स्वाभाविक ही है।

सद्विचारों की अवहेलना, धन का लालच, आपसी दुर्व्यवहार और नैतिक पतन के कारण मनुष्यों के शरीर और मन पर दूषित असर पड़ा है। चिन्ता, भय, विषाद रोग, शोक, कष्ट और निराशा के दुर्विचार मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ते इसी कारण मनुष्य निरन्तर अस्त-व्यस्त और अशान्त रहता है। दुर्व्यवहार की बड़ी दूषित प्रतिक्रिया छाई है इस संसार में। यहाँ रहते हुये मनुष्य का दम घुट रहा हो तो इसका अपराधी मनुष्य के अतिरिक्त भला और कौन होगा।

इन भौतिक जंजालों में मनुष्य इस तरह ग्रसित हो गया है कि उसे जीवन का सात्विक लक्ष्य प्राप्त करने की कभी सुध भी नहीं आती। विज्ञानवाद के फेर में पड़कर मनुष्य आत्मा की सत्ता से ही इनकार कर बैठा है। भोग-परक मानवीय प्रवृत्तियाँ तो बढ़ रही हैं किन्तु शील और सदाचार की तरफ देखने को भी लोगों को फुरसत नहीं, मिल रही। दूसरों को कष्ट पहुँचा कर मनमाने ढंग से सुख लूटने की कुत्सित कामनाओं के कारण लोक-जीवन के सारे सुख लगभग नष्ट हो चुके हैं। अब मनुष्य अपना ही विनाश करने पर तुला हुआ है। यह समस्यायें ऐसी ही बनी रहीं तो सर्वनाश हो जाना संभव ही है।

अपने सुखों को बरबाद कर डालने की जिम्मेदारी मनुष्य पर ही है। आत्म-कल्याण की आवश्यकता और उसके लिये उचित प्रयत्नों की बात भुलाकर मनुष्य असुरता की ओर बढ़ रहा है। इसी से वह दुःखी है। छुटकारे का उपाय एक ही है कि वह इन पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियों का परित्याग करे और सदाचारी जीवन जीने में सुख और संतोष अनुभव करे।

यह कार्य हमें स्वयं ही करना होगा। अपनी परिस्थितियों का निर्माता मनुष्य स्वयं है। सुख और समुन्नति के लिये आत्म-घातिनी दुष्प्रवृत्तियों से दूर रहने और सत्य, न्याय, समता आदि सद्गुणों का प्रसार उसे ही करना पड़ेगा। हमारी भलाई भी इसी में है। सदाचरण को अपनाकर ही हम सुखी रह सकते हैं।


सर्वोत्तम विभूति--विद्वता

शास्त्रकार ने सन्देश दिया है—

गतेऽपि वयसि ग्राह्या विद्या सर्वात्मना बुधैः। यद्यपि स्यान्न फलदा, सुलभा सान्यजन्मनि॥

“हे मनुष्यों! उम्र बीत जाने पर भी यदि विद्या प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हो तो तुम निश्चय ही बुद्धिमान हो। विद्या इस जीवन में फलवती न हुई तो भी दूसरे जन्मों में वह आपके लिये सुलभ बन जायगी।” मनुष्य का सबसे बड़ा विवेक, गौरव और उसकी विभूति उसकी विद्वता है, इससे बढ़कर और कोई सम्पत्ति इस संसार में नहीं है।

विद्या शब्द ज्ञान की सार्थकता का पर्याय है। जो ज्ञान मनुष्य को लौकिक बन्धनों से मुक्त करे और उसे जीवात्मा की वस्तु स्थिति की बूझ कराये वस्तुतः वही विद्या सार्थक है। दुःख क्लेश और अभाव हमें तब तक पीड़ित करते हैं जब तक आत्म-स्वरूप का हमें ज्ञान नहीं होता। विद्या के प्रकाश में सब कुछ ऐसे झलकने लगता है जैसे सूर्य के प्रकाश से सारा संसार जगमग हो उठता है। मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी इसलिए धन नहीं, सत्ता और रूप सौंदर्य भी नहीं है। विद्या, बुद्धि, सद्ज्ञान, सद्बुद्धि और विवेक के मापदण्ड से ही व्यक्तित्व की श्रेष्ठता की परख होती है। बुद्धिमान ही सच्चे धनी होते हैं योग्यता, विद्वता और प्रतिभा ही बड़प्पन की कसौटी है।

महान् पुरुष सदैव ऐसे ही अधिकारी पुरुषों का सान्निध्य प्राप्त करने की अभिलाषा करते हैं जिन्हें विद्या के माध्यम से ही प्रवीणता प्राप्त हुई हो। महाराज धृतराष्ट्र को कौरवों तथा पाँडवों को शस्त्र-प्रशिक्षण के लिए किसी सुयोग्य आचार्य की आवश्यकता थी किन्तु कोई विद्वान् राजगुरु उन्हें दिखाई न दिया। एक दिन द्रोणाचार्य भी उनकी सभा में आये धनुर्विद्या में प्रवीण आचार्य का पाँडित्य देखकर महाराज मुग्ध हो गये और उन्होंने समझ लिया कि इनके समीप रहकर बालकों के चरित्र का विकास हो सकेगा। अकेले शस्त्र प्रशिक्षण की बात रही होती तो वह कार्य कोई भी कर सकता था। नैतिक स्तर ऊँचा उठाने के लिए विद्वता भी तो आपेक्षित है।

प्राचीनकाल में अध्यापन कार्य इसीलिये सबसे कठिन कार्य माना जाता था और कोई विद्वान् पुरुष ही शिक्षक बनने का साहस कर सकते थे। ऐसे व्यक्तियों को शिक्षण का कार्य सौंपा जाता था जो अक्षर ज्ञान के साथ मनुष्य की प्रतिभा विकसित करने के लिये सामर्थ्यवान् हो सकते। वह वस्तु विद्या ही है जो मनुष्य को श्रेष्ठ बनाती और ऊँचे उठाती है। गिरे हुए समाज के उद्धार के लिये भी विद्या एक अनिवार्य आवश्यकता है।

आधुनिक विद्या का स्वरूप कुछ बदल गया है वह पूर्णतया अशक्त हो चुकी है। लोगों का चरित्र-बल, कर्मशक्ति , आशा, विश्वास, उत्साह, पौरुष, संयम और सात्विकता जागृत करने की शक्ति उसमें नहीं रही। जिस विद्या में कर्तव्य-शक्ति को प्रेरणा न मिलती हो, स्वतन्त्र रूप से विचार करने की बुद्धि न आती हो, परिस्थितियों से टकराने की सामर्थ्य जो न दे सके वह विद्या निस्तेज है, निष्प्राण है। आज का युग कुछ ऐसा ही हो रहा है। विद्यार्थी डिग्रियाँ प्राप्त करके निकलते हैं तो उनमें छल-कपट धूर्तता, दुश्चरित्रता, फैशन परस्ती, विलासिता और द्वेष, अहंकार के अतिरिक्त कुछ दिखाई नहीं देता। स्वतंत्र चिन्तन का उनमें बिलकुल अभाव होता है। विचारों की पराधीनता का नाम अविद्या है। जो मनुष्य को स्वाधीन बनाये सर्वोपरि साहसी बनाये, विद्या कहलाने का गौरव उसे ही मिल सकता है।

अध्यात्म रामायण में बड़े सुन्दर शब्दों में उल्लेख मिलता है—

देहोऽहमिति या बुद्धिरविद्या सा प्रकीर्तिता। नाहं देहश्चिदात्मेति बुद्धिर्विद्येति भन्यते॥

अर्थात्-”मैं देह हूँ” इस बुद्धि का नाम अविद्या है। मैं देह नहीं चेतन आत्मा हूँ इसका ज्ञान प्राप्त करना ही सच्ची विद्या है।

देह, उसकी विशेषतायें और उस के सुखों के प्रति जब मनुष्य की चेतना एकमुखी हो जाती है तो उसकी प्रतिभा का विकास रुक जाता है। विकास का अर्थ इहलौकिक सम्पदाओं की विपुलता प्राप्त कर लेना नहीं है, वह विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक जागृति का लक्षण है। मनुष्य का स्वत्व है उसकी आत्मा और उसकी विशेषतायें-सद्गुण, सद्प्रवृत्ति और सदाचार। आत्मा की इन विशेषताओं को उपलब्ध करना ही इस जन्म का उद्देश्य है और जो इस दिशा में हमारी चेतना को अग्रसर करे वही सच्ची विद्या है।

यह ज्ञान वैदिक साहित्य में कूट-कूट कर भरा हैं किंतु बाह्य शक्तियों के संघात के कारण परिस्थितियाँ ऐसी बन गई है कि यह वांग्मय आधुनिक शिक्षा के मलबे में दबकर रह गया है। इससे जीवन का आध्यात्मिक क्षेत्र बिलकुल उपेक्षित बनकर रह रहा है। सर्वत्र दुःख क्लेश और अशाँति के लिए इस युग का भौतिकतावादी दृष्टिकोण ही अधिक दोषी है। एक कठिनाई यह है कि इस ज्ञान को व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करने के प्रयत्न भी बिलकुल निर्बल और कमजोर हो गये हैं, जहाँ-तहाँ कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ चलती भी हैं किन्तु व्यक्तित्व के अभाव के कारण वह प्रभाव उत्पन्न नहीं हो पाता जो जन-जीवन की दिशा बदल सके। भारतीय संस्कृति का पतन भी व्यक्तित्व के अभाव में ही हुआ है। देवालयों, शिक्षालयों, बिहार श्रामण और संघों से लोगों की आस्था उठ जाने का कारण यही था कि उनमें व्यक्तित्व न रहा। देव-मन्दिर जड़ थे भला वे, साँस्कृतिक शक्तियों के संघर्ष का जवाब कैसे दे सकते थे। इससे धर्म के प्रति लोगों की आस्था उठ गई और सर्वत्र अविद्या का ही अंधकार छाकर रह गया।

वह विद्या जो मनुष्य को सही दिशा सही मार्ग और सच्चा प्रकाश दिखाती है उसे अध्यात्म कहते हैं। इस अध्यात्म को जागृत करने का काम अपने आपसे शुरू करना होगा इसके लिये विद्वता प्राप्त करना हमारी पहली आवश्यकता है। दुनियावी शिक्षा के रंग-ढंग तो बहुत देख चुके इनसे कोई समस्या हल न हो सकी। निष्कर्ष निकलता भी कैसे? आत्म-ज्ञान के बिना परिस्थितियाँ बदल भी तो नहीं सकती। विवेक जगाने वाली विद्या न रही तो पतित होना स्वाभाविक ही था। इस पतन से जी उकता उठा है, प्रत्येक साँस के साथ जो गन्दगी भीतर जा रही है उसके कारण अब जनजीवन बुरी तरह बेचैन है, छटपटा रहा है। इस घुटन को दूर करने का एक ही उपाय है और वह है आध्यात्म विद्या की प्रवीणता। साधना से और व्यवहार से जब तक जीवन की दिशा सात्विक नहीं होती, गुण, कर्म और स्वभाव में सद्तत्वों का समावेश नहीं होता, जड़ता तब तक दूर हो नहीं सकती। आत्म-विद्या के देवालय में प्रवेश प्राप्त किये बिना न तो शाँति मिल सकती है न संतोष। विद्या सुखी जीवन की प्रमुख आवश्यकता है इसे यों ही ठुकराया नहीं जा सकता।

जिस विद्वता से मनुष्य स्वयं ही अपना योग्य साथी बनता है उसे प्राप्त करने के लिये अधिक अनुभव सहनशीलता और अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। अनुभव का उपयोग जीवन को शुद्ध बनाने के लिये है, कदम-कदम पर जो कठिनाइयाँ मनुष्य का रास्ता रोकती हैं उनसे बचते रहने का ज्ञान प्राप्त करना ही अनुभवी होना है। अनुभव विवेक का बड़ा भाई है, सत्य-असत्य की शिक्षा उसी से मिलती है इसलिये प्रत्येक गतिविधि को एक पाठ समझकर उसकी विलक्षणताओं का अध्ययन सूक्ष्मता से करते रहना चाहिये। असंगत वस्तुओं का ज्ञान इसी तरह होगा।

विद्या आत्मा की प्यास है। इसकी पूर्णाहुति आत्म-ज्ञान से ही होती है। अतः यह कहा जा सकता है कि अपने जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए विद्या प्रमुख आवश्यकता है। कठोर प्रयत्नों से भी इसे प्राप्त किया जाना चाहिए। जो इसकी ओर ध्यान नहीं देता और अपने समय को व्यर्थ ही नष्ट किया करता है वह सदा मनुष्य-जन्म के फल से वंचित रहता है। विद्या मनुष्य की मलिनताओं को मिटा कर उसे कान्तिवान् बनाती है। आग में तपाये हुये सोने की शुद्धता में कोई संदेह नहीं रहता। आत्मज्ञान का लक्षण विद्वता है, वह मनुष्य की सर्वोत्तम विभूति है, उसे प्राप्त करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। विद्या से विनम्रता आती है, विनम्रता से योग्यता बढ़ती है, योग्यता से धन और धन से सुख मिलता है यह आप्त पुरुषों का कथन है। हमें भी इस सुख से वंचित न रहना चाहिए।


श्रम ही नहीं विश्राम भी

श्रम की उपयोगिता निःसन्देह बहुत अधिक है। शारीरिक अंगों के परिचालन, रक्त -संचार में क्रिया-शीलता तथा पाचन संयन्त्रों को मजबूत बनाये रखने के लिये परिश्रम का बड़ा महत्व है। इसमें आलस्य करने से स्वास्थ्य गिरता है, शक्ति क्षीण होती है और स्फूर्ति चली जाती है। आलस्य और प्रमाद से जीवन का हर एक पहलू प्रभावित हुये बिना नहीं रह पाता। इससे शारीरिक शक्तियाँ शिथिल पड़ जाती हैं, मनोबल गिरता है और समाज का गौरव नष्ट हो जाता है। सचमुच परिश्रम जीवन का प्रकाश है जिससे मनुष्य सरलतापूर्वक अपनी विकास-यात्रा पूरी कर लेता है।

किन्तु इसका एक दूसरा पहलू भी है। वह यह है कि निरन्तर श्रम करते रहने से शारीरिक शक्ति का एक निश्चित अंश खर्च हो जाता है। इससे शिथिलता आ जाती है और शरीर टूटने लगता है। नैसर्गिक रूप से पुनः जीवन शक्ति प्राप्त करने के लिये स्वयं प्रकृति हमें विश्राम करने लिए विवश कर देती है। श्रम के बाद विश्राम की इसलिये अतीव आवश्यकता है। दिन के बाद रात, जीवन और मृत्यु का क्रम इसी सिद्धान्त पर आधारित है कि अति श्रम से उत्पन्न शक्ति-ह्रास दूर करके अगले जीवन के लिये पर्याप्त शक्ति व सजीवता प्राप्त करली जाये। श्रम का विश्राम से ऐसा ही सम्बन्ध है। संयत-जीवन का आधार यही है कि हम परिश्रम तो करें किन्तु विश्राम करना भी न भूलें। इससे शक्ति और शान्ति मिलती है।

बड़ी-बड़ी मशीनों को भी निश्चित समय के बाद विश्राम देना पड़ता है। सप्ताह में एक दिन रविवार का अवकाश इसलिये दिया जाता है कि शेष 6 दिन तक जो शरीर शिथिल होता रहा, मानसिक तनाव पैदा हुआ, शक्ति खोई उसे एक दिन पूर्ण विश्राम देकर फिर से ठीक कर लें। श्रम एक प्रकार का ध्वंस कार्य है। हर श्रमयुक्त कार्य से शरीर का कुछ न कुछ अंश अवश्य क्षय होता है। इसे पुनः प्राप्त करने के लिये ही यह अवकाश देने की पद्धति चलाई गई है। इससे खोयी हुई सामर्थ्य शक्ति व क्षमता आसानी से पूरी हो जाती है। इस प्रकार विश्राम में बिताया हुआ समय कभी भी निरर्थक नहीं जाता। वरन् आगे के लिये शक्ति -संचय करली जाती है।

मानव-जीवन में ऐसा सुयोग सरल नहीं है इस युग में तो यह समस्या और भी जटिल रूप धारण कर चुकी है। आज की परिस्थितियों में आवश्यकतायें इतनी बढ़ गई हैं कि उन्हें ही जुटाने से मनुष्य को फुरसत नहीं मिलती। अभाव और दरिद्रता, लोभ और प्रभुत्व की महत्वाकांक्षाओं के कारण लोगों में बड़ी बेचैनी उठ रही है। सभी उतावले होकर इन अनियन्त्रित कामनाओं के पीछे बुरी तरह पागल हो रहे हैं। इसका मनुष्य के स्वास्थ्य पर कितना दूषित प्रभाव पड़ा है यह किसी से छुपा नहीं है। आठ घण्टे आफिस में काम करके आये हैं तो घड़ी भर चैन से बैठे नहीं कि ट्यूशन पढ़ाने चल दिये। वहाँ से लौट कर आये तो दूसरे भारी काम करने पड़े। हारा थका शरीर किसी प्रकार विवश होकर आज्ञायें तो पूर्ण करता रहता है किन्तु यह क्रम देर तक नहीं चल पाता कि कोई बीमारी, कमजोरी या रोग आ दबोचता है। फिर अति-श्रम से कमाया हुआ यह धन डाक्टरों की भेंट में ही स्वाहा कर देना पड़ता है। स्वास्थ्य की खराबी हुई, शक्ति का पतन हुआ सो एक तरफ ।

कार्य-व्यस्तता बुरी नहीं, किन्तु समुचित विश्राम भर तो मिले। कड़ी धूप में कठोर शारीरिक श्रम करने वालो किसान हर थोड़ी देर के बाद किसी घने वृक्ष की शीतल छाया में आराम कर लेते हैं तो दुबारा काम करने की शक्ति मिल जाती है। ऐसा अभ्यास बनाया जा सकता है कि चार घण्टे के परिश्रम के बाद आधा घन्टे बैठकर या लेटकर विश्राम भी कर लें। इससे स्वास्थ्य स्थिर बना रहता है।

कार्य से शारीरिक शक्ति का पतन उतना नहीं हो जितना जल्दबाजी और चिन्ता से। एक कहावत है-”आदमी कैसे मरा? काम के बोझ से? नहीं जल्दबाजी और उद्वेग से।” दूसरों से आगे बढ़ जाने की प्रतियोगिता पूर्ण महत्वाकांक्षा के कारण मनुष्य को इतनी उतावला इतनी जल्दबाजी मचती है कि वह एक दिन में सारी आवश्यकताओं की अधिक से अधिक पूर्ति कर लेना चाहता है। इस दौड़ धूप के कारण बेचारा आधी घड़ी विश्राम भी नहीं कर पाता। व्यर्थ ही शारीरिक शक्तियों को घुलाता रहता है। इसका परिणाम थोड़े ही दिनों में स्वास्थ्य की खराबी के रूप में दिखाई पड़ने लगता है तो बुरी तरह पछताते दुःखी एवं चिन्तित होते हैं। आखिर इस जल्दबाजी में क्या रखा है, यह एक विचारणीय बात है। यह मानसिक अस्थिरता कभी भी विश्राम नहीं लेने देती। इससे बचने में ही श्रेय है, इसी से स्वास्थ्य सुरक्षित रखा जा सकता है।

विश्राम का यह अर्थ कदापि नहीं होता कि जब काम से थक जाय तो बैठकर या लेटकर शारीरिक थकान तो दूर करें किन्तु मन में बुरी तरह दुश्चिन्तायें घूमती रहें। विद्वेष, क्रोध, प्रतिशोध और हिंसा की भावनायें उठ रही हों तो शारीरिक दृष्टि से विश्राम करते हुये भी आराम न मिलेगा। मानसिक बेचैनी का शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे धमनियाँ शिथिल पड़ जाती हैं, खून खराब होने लगता है और स्वास्थ्य गिर जाता है।

विश्राम की सार्थकता मानसिक तनाव से बच कर शारीरिक थकान को मिटाने से होती है। यह उद्देश्य सो जाने या निष्क्रिय बैठ जाने मात्र से नहीं पूरा होता। इस समय वे सभी साधन, जो मानसिक थकान को दूर करते मनोरंजन, प्रसन्नता, उत्साह और प्रफुल्लता प्रदान करते हों, उन्हें भी अपनाया जाना चाहिये ताकि शरीर और मन दोनों का विश्राम हो जाय।

सामूहिक रूप से हँसते गाते और मनोरंजन करते हुए किसान दिन भर कड़ी मेहनत करते रहते हैं। सैनिकों में मनो-विनोद की आदत पड़ जाती है जिससे वे चौबीसों घण्टे कार्य कर सकने की क्षमता रखते हैं। इससे यह पता चलता है कि मानसिक विश्राम शारीरिक विश्राम से भी आवश्यक है। स्वास्थ्य को सुस्थिर बनाये रखने के लिये इन दोनों की ही आवश्यकता है, डॉ0 हरबर्ट ए॰ रेमन का कथन है कि शारीरिक विश्राम का मानसिक विश्राम से मेल होने पर ही शरीर को पूर्ण विश्राम का सौभाग्य मिलता है।

मानसिक तनाव के कारण देखा गया है कि प्रायः लोगों को बड़ी देर तक नींद नहीं आती। यद्यपि शरीर चारपाई पर लेटा हुआ रहता है, पर इससे विश्राम की आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती है। जब कभी ऐसी स्थिति आये तो शरीर को शिथिल करने का प्रयत्न करना चाहिये। यह विचार बार-बार मन में लाना चाहिये कि—”मेरे जीवन में कोई समस्यायें नहीं हैं। मैं पूर्ण सुखी हूँ, मेरा भविष्य सब प्रकार उज्ज्वल है।” इस प्रकार सुखद विचारों में मस्तिष्क को उलझा देने से शरीर शिथिल होने लगेगा और थोड़ी देर में नींद आ जायेगी।

विश्राम करने के पूर्व अपने मन को चिन्ता-शून्य बना लेना चाहिये। सारे शरीर को शिथिल बनाते हुए दोनों आँखें मूँद लेनी चाहिये। अब आप शरीर के किसी एक ही अंग का चिन्तन करना प्रारम्भ करें। आप देखेंगे कि अन्दर ही अन्दर उस अंग में क्षणिक उत्तेजना जागृत होनी है और वह अंग शिथिल पड़ने लगता है। इसी प्रकार क्रम से सारे अंगों को शिथिल बनाकर पूर्ण विश्राम का आनन्द प्राप्त करना आसान हो जायेगा। एक दो सप्ताह में यह क्रिया स्वाभाविक हो जायेगी। सोने या विश्राम करने के पूर्व शरीर को इस प्रकार शिथिल कर लेने से सच्ची व गहरी नींद आती है। और उसी अनुपात से शरीर शक्ति प्राप्त कर लेता है और आगे के कार्य के लिये सजीव हो उठता है।

जिस प्रकार अधिक परिश्रम से विश्राम करने का जी करता है उसी प्रकार किसी रोग की अवस्था में भी विश्राम की आवश्यकता है। विश्राम एक प्रकार रोग का प्राकृतिक इलाज है। डॉ0 सैमुएल जैक्सन ने लिखा हैं—”पूर्ण विश्राम सभी बीमारियों का अचूक इलाज है।” इससे स्नायु स्निग्ध होते हैं और उनकी शिथिलता दूर हो जाती है फलतः रोग दूर होने लगते हैं।

विश्राम स्वास्थ्य के लिये उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है किन्तु इसकी अति न होने पावे इसका सदैव ध्यान बना रहे। अति विश्राम का अर्थ है आलस्य और अकर्मण्यता, जो विकास के महान् शत्रु हैं। हमें अपने शारीरिक स्वास्थ्य के लिये तथा खोयी हुई शक्ति प्राप्त करने के लिये ही विश्राम करना चाहिये। इसी दृष्टि से इसकी उपयोगिता है।


गृहस्थ की समुन्नति के लिये समय का सदुपयोग

धन गृहस्थ जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है। परिजनों की योग्यता बढ़ाने के लिये, उन्हें खुशहाल रखने, अच्छा खाने और अच्छा पहनने का एक मात्र साधन धन है। धन के अभाव में गृहस्थी की अनेकों आवश्यकतायें अधूरी रह जाती हैं। अविकसित परिवार में किसी तरह की चेतना नहीं होती, किसी तरह का आनन्द नहीं होता। पारिवारिक प्रसन्नता के लिये भी धन की अत्यन्त आवश्यकता है। इसकी कमाई की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिये।

निर्धारित व्यवसाय से कई बार मध्यम श्रेणी के लोगों की आवश्यकतायें पूरी नहीं हो पातीं। किसान, मिलों में काम करने वाले मजदूर, कारीगर, कार्यालय में काम करने कर्मचारियों की आय इतनी नहीं होती कि जीवन-यापन की आवश्यक वस्तुओं से कुछ आगे बढ़कर अपनी योग्यता का विकास करने की सुविधायें प्राप्त कर सकें। कई बार तो यहाँ तक होता है कि भोजन, निवास की समस्या ही कठिनाई से सुलझ पाती है। ऐसी अवस्था में न तो बच्चों की शिक्षा की व्यवस्था ही बन पाती है ने लोगों के रहन-सहन का स्तर ही ऊँचा उठ पाता है।

इस देश में कुटीर उद्योग धन्धों का भी विकास नहीं हो पाया। फलस्वरूप कोई सहायक धन्धा न होने के कारण लोगों का दैनिक व्यवसाय के अतिरिक्त अधिकाँश समय बेकार चला जाता है। इस बेकार समय में लोगों में फालतू झगड़े-फसाद, मार-पीट, दंगे आदि की शिकायतें बढ़ जाती हैं जिससे मुकदमेबाजी बढ़ती है। लोग ऋणी हो जाते हैं। वैसे ही निर्धनता थी, कार्यक्षमता भी घट गई, कर्जदार भी हो गये। सारी कमाई ब्याज के रूप में सेठ, साहूकारों के हाथों लुट जाती है। औसत दर्जे का परिवार इन्हीं कठिनाइयों से घिरा रहता है।

अनिवार्य दिनचर्या के अतिरिक्त पुरुषों के पास कम से कम दो घण्टे और स्त्रियों के पास आठ घण्टे फुरसत के बच जाते हैं। पुरुष इस समय को मटरगश्ती, ताश, चौपड़ आदि में गँवा देते हैं, स्त्रियाँ बेकार की गपशप, सोने और बच्चों की देख-रेख में इस समय को बरबाद करती रहती हैं। आर्थिक कठिनाई के इस युग में समय की बरबादी नितान्त अविवेकपूर्ण है। इस समय का सदुपयोग किया ही जाना चाहिये।

इन आठ और दो, दस घण्टों से कोई पूरक धन्धा चलाने में प्रत्येक परिवार को सुविधा मिल सकती है। इसके लिये अपनी दिनचर्या को कार्यक्रमबद्ध बनाना चाहिये। अपने जीवन की एक निश्चित रूपरेखा बनाकर चलने में इस समय का सुन्दर उपभोग हो सकता है और स्वजनों की योग्यता बढ़ाने का अवसर प्राप्त किया जा सकता है। यह चुनाव अपनी परिस्थितियों के अनुरूप सभी को कर लेना चाहिये।

इस समय का पहला सदुपयोग प्रौढ़ प्रशिक्षण हो सकता है। घर में जितने लोग निरक्षर हैं उनको साक्षर बनाने के लिये कुछ समय नियत कर दिया जाय। घर के जो व्यक्ति पढ़े-लिखे हों उन्हें चाहिये कि नियमित रूप से प्रतिदिन उतने समय घर के सभी अशिक्षित स्त्री-पुरुषों की पाठशाला चलाया करें। धीरे-धीरे इनमें मनोरंजक कार्यक्रम भी प्रस्तुत कि ये जा सकते हैं किन्तु पहला काम साक्षरता का भी होना चाहिये। जो लोग बुड्ढे हों और शिक्षा को अपने लिये अनावश्यक बताते हों उन्हें भी समझाना चाहिये कि शिक्षा का प्रभाव संस्कार रूप में दूसरे जन्मों में भी साथ रहता है इसलिये यह कार्यक्रम तो सभी को अपनाना ही चाहिये। घर-घर ऐसी पाठशालायें चलने लगें तो अविद्या का अन्धकार दूर होते देर न लगे।

जो लोग पढ़ने से आनाकानी करें उनके लिये भी इतना तो होना ही चाहिये कि किसी विचारपूर्ण पुस्तक का कुछ अंश प्रतिदिन पढ़कर सुनाया जाया करे। मनोरंजक, शिक्षाप्रद कहानियाँ, रामायण आदि का स्वरमय पाठ भी होता रहे। इन कृत्यों को सामूहिक धर्मानुष्ठान का रूप भी दे सकते हैं। शिक्षा के साथ सामूहिक प्रार्थना, पूजा और उपासना के कार्यक्रम भी चलते रहें तो स्नेह बन्धनों को मजबूत बनाने में तथा आत्मिक परिष्कार में सुविधा ही मिलेगी।

पठन-पाठन की सामग्री का चयन धार्मिकता पर आधारित हो तो अधिक अच्छा है पर यह ध्यान बना रहे कि सिनेमा जैसे गन्दे साहित्य का समावेश कदापि न होने पावे। जो शिक्षा उच्छृंखल प्रवृत्ति जगाती हो उसे छुपाकर ही रखना श्रेयस्कर हो सकता है। समाचार-पत्र मँगाकर भी लोगों का ज्ञान बढ़ाया जा सकता है।

जो भी काम करें उसे मात्र खिलवाड़ समझकर न करें। पूरी दिलचस्पी और लगन के साथ यदि एक व्यक्ति को साक्षर बनाया जा सके तो श्रम को सार्थक ही कहेंगे। किन्तु “काम बहुत किया हासिल कुछ न हुआ” वाली कहावत हुई तो यह भी समय का अपव्यय ही रहा। सम्पन्न परिवार के व्यक्ति बाहर से भी अध्यापक की व्यवस्था कर लें तो इससे यह काम जिम्मेदारी का बन जायगा और फिर आनाकानी करने या उपेक्षा दिखाने का कोई कारण ही शेष न रहेगा। जैसे भी बने इस समय का उपयोग यदि साक्षरता बढ़ाने में कर सकें तो इसे बुद्धिमत्ता का कार्य माना जायगा।

दूसरी तरह से समय का सदुपयोग सहायक धन्धे चला कर किया जा सकता है। ग्रामीण-क्षेत्रों के रहने वाले पशु-पालन तथा सनकी रस्सी बनाने का धन्धा चला सकते हैं इससे खेती के अतिरिक्त थोड़ी और भी आय हो जाती है। स्त्रियाँ चरखा चलाकर सूत निकालने का काम कर सकती हैं। इसमें सरकारी सुविधायें भी हैं। अम्बर चर्खे के द्वारा चार घण्टा, पाँच घन्टा, प्रतिदिन काम करके स्त्रियाँ साठ रुपया मासिक तक की आमदनी कर लेती हैं। जो रुपया न लेना चाहें वे घर भर के लिये शुद्ध कपड़ा ही तैयार कर सकती हैं और दुकानों में जाने वाले पैसे को बचा सकती हैं।

पढ़ी लिखी स्त्रियाँ दस्तकारी सीखें। हाथ की मशीन कोई भी गृहिणी चलाकर थोड़ी-सी पूरक आय भी कमा सकती है। घर के कपड़ों की सिलाई इसमें बचती है और फटे कपड़ों की मरम्मत करके उन्हें कुछ दिन और उपयोग में लाने योग्य बना सकते हैं।

पढ़े लिखे लोग फुरसत के समय लेखन सम्पादन का काम करके अपनी योग्यता भी बढ़ा सकते हैं और सहायक पूँजी भी कमा सकते हैं। जिनमें इतनी योग्यता हो कि पुस्तकें लिख सकें वे ऐसा भी कर सकते हैं। अपनी सामर्थ्य और योग्यतानुसार कोई न कोई काम जरूर चला सकते हैं।

एक किसान के बेटे के पास कुल पाँच बीघे जमीन थी इससे उसके परिवार का किसी तरह गुजारा न चलता था। बालक ने एक युक्ति निकाली। एक बीघे खेत में बाग लगाना शुरू कर दिया। किनारे-किनारे पपीते और केले के पौधे रोप दिये और बीच में नीबू, नारंगी, मुसम्मी, अमरूद आदि के पेड़ लगा दिये। इससे एक बीघा खेती तो कम हो हो गई पर पपीते आदि के कुछ पौधे दूसरे ही वर्ष से फल देने लगे और उनकी काफी आमदनी होने लगी। बाग लगाने का काम वह हमेशा किसानी से बचे हुए समय में करता था। जब भी थोड़ा समय मिलता उस बगीचे को सींचने, खाद देने, काँटे लगाने का काम करने लगता। इस समय उस बगीचे से किसान को इतनी आमदनी है जितनी उन चार बीघे खेतों से भी नहीं हो पाती। फुरसत के समय का यह भी सदुपयोग हो सकता है।

जिन्हें कुछ भी काम न मिले वे संगीत का अभ्यास, स्वास्थ्य सुधार के लिये मालिश, प्राणायाम, आसन तथा घूमने टहलने का ही कार्यक्रम बना सकते हैं। कथा-प्रवचन द्वारा भी फालतू समय में ज्ञानदान की परम्परा चला सकते हैं।

अपनी इच्छा, योग्यता और परिस्थितियों के अनुरूप किसी भी पूरक व्यवसाय का चुनाव हर दृष्टि से लाभदायक ही रहेगा। सम्पन्न व्यक्तियों के लिये यह समय श्रेष्ठ संस्कार पैदा करने, साँस्कृतिक मनोरंजन प्राप्त करने के भी काम आ सकता है। इस तरह निर्धन परिवार अपनी आजीविका बढ़ाकर धनी परिवार अपनी योग्यता बढ़ाकर अपने गृहस्थ को सुव्यवस्थित रखने में सहयोग दे सकते हैं। इन रचनात्मक प्रवृत्तियों को हमें अपने जीवन में कोई न कोई स्थान देना ही होगा।


सत्साहित्य से शक्ति और समुन्नति

वर्तमान अवस्था से ऊँचे उठकर समुन्नत बनने की, शक्ति शाली बनने की भावना एक आध्यात्मिक तथ्य है। उत्थान ही जीवात्मा का मूलभूत उद्देश्य है इसी की पूर्ति में लोग लगे भी रहते हैं। यह एक दूसरी बात है कि वास्तविक प्रगति का सच्चा स्वरूप हम न समझ पायें, किन्तु आगे बढ़ने, उन्नत होने की आकाँक्षा सभी में होती है।

विचारकों का कथन है कि संसार में निर्बल प्राणियों के लिये कोई स्थान नहीं है। प्रकृति के सारे आघात भी निर्बलों पर ही होते हैं। संसार के संघर्ष में योग्य व्यक्ति साहसी और शूरमा ही ठहर सकते हैं। जीवन के लिये शक्ति अवश्य चाहिये। शास्त्रकार का कथन है—

या विभर्ति जगर्त्सवमीश्वरेच्छाह्यलौकिकी। सैव धर्मो हि सुभगे! नेह कश्चन संशयः। योग्यता वच्छिन्ना धर्मिणः शक्ति रेव धर्मः॥

अर्थात्- इस संसार को परमात्मा ने अपनी अलौकिक शक्ति से धारण किया है। मनुष्य के लिये भी योग्यता बढ़ा कर शक्ति सम्पन्न होना यही सबसे बड़ा धर्म है।

शक्ति उस साधन को कहते हैं जिससे विजय मिलती है। यों धन, जन, पशु आदि का होना भी लौकिक दृष्टि से शक्तिवान् होने का सबूत है, शारीरिक बल को भी मनुष्य की योग्यता ही मानते हैं, किन्तु यह देख चुके हैं कि समुन्नति के मार्ग में धन-जन का न होना अवरोधक नहीं है। गौतम बुद्ध तब शक्तिवंत बन सके, जब उन्होंने लौकिक शक्तियों का परित्याग कर दिया। करोड़ों धनी, सत्तावानों की तुलना में उनकी महत्ता सर्वश्रेष्ठ घोषित हुई। उस समय के सम्राट अशोक तक ने उनके समक्ष अपने घुटने टेके थे। गान्धी जी शरीर से बड़े दुबले-पतले और निर्बल थे। कुल 96 पौंड वजन के गाँधीजी ने उस ब्रिटिश साम्राज्य को परास्त कर दिखाया जिसके शासन में कभी सूर्यास्त नहीं होता था। अतः धन की शक्ति, जन और शारीरिक शक्तियाँ अल्प हैं, अपूर्ण हैं, इनसे शक्तिशाली कहलाने का गौरव कभी भी नहीं मिल सकता।

संसार की सर्वश्रेष्ठ शक्ति का नाम है विचार। जैसे हमारे विचार होते हैं वैसी ही हमारी शारीरिक स्थिति होती है। आँतरिक स्थिति का निर्माण भी विचारों के ही अनुरूप होता है। गुण, कर्म और स्वभाव की त्रिवेणी में भी विचारों का यही जल बहता है। कोई व्यक्ति चाहे कि हमारी स्थिति इसके विपरीत हो तो यह असंभव है। निश्चयात्मक विचारों से ही निर्माण शक्ति का विकास होता है। स्वस्थ बनने को विचार न उठे, तो व्यायाम करने, मालिश करने और पुष्टिकारक आहार जुटाने का कष्ट-साध्य, श्रम और समयसाध्य कर्म मनुष्य क्यों करे। सत्याग्रह के दृढ़ विचारों से प्रभावित होकर ही महात्मागान्धी स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूदे थे। विचारों की आवश्यकता पर ही सम्पूर्ण राष्ट्र ने उनके इस महान् कार्य में हाथ बंटाया था।

विचारों का बल निःसन्देह बहुत बढ़-चढ़ कर है। दार्शनिक एमर्सन का कथन है—”आध्यात्मिक शक्ति भौतिक शक्तियों से बड़ी है, विचार ही संसार पर शासन करते हैं।” अच्छे विचारों और प्रयासों का परिणाम भी श्रेष्ठतर होता है। भविष्य का निर्माण भी विचारों के अनुरूप ही होता है। विचार ही शक्ति का स्रोत है, इस बात को संसार के सभी मनीषियों ने स्वीकार किया है। किसी भी उच्च साधना की सफलता के लिये विचारों की आवश्यकता प्रमुख है। विचार संचालन करते हैं इसलिये वे श्रेष्ठ हैं इस बात से इनकार करने का कोई कारण भी खोज में नहीं आया।

विचारों की शक्ति अलौकिक है यह निर्विवाद सत्य है, किन्तु यह न भूलना चाहिये कि व्यक्ति के पतन का कारण भी उसके विचार ही होते हैं। हीन विचारों के कारण मनुष्य दुष्कर्म करता है। शक्ति का अपव्यय करता है जिस से उसकी योग्यता फीकी पड़ जाती है। अतः उत्थान के लिये शक्तिशाली विचार चाहिये, ऊर्ध्वगामी विचार चाहिये।

विचार की योग्यता मनुष्य में साहित्य के द्वारा आती है। साहित्य में वह शक्ति होती है कि समाज की रूप-रेखा बदलने में उसका महत्व सर्वोपरि है। यह कथन असत्य नहीं कि “साहित्य ही समाज का दर्पण है” अर्थात् किसी भी समाज की शक्ति और योग्यता की परख उसके साहित्य से होती है। विचारों को ऊँचा उठाने वाला साहित्य यदि उपलब्ध हो सके तो आत्मोन्नति का प्रथम प्रयास सफल ही समझना है।

साहित्य का अर्थ यहाँ उस साहित्य से है जिससे मनुष्य का चरित्र ऊंचा उठ सके और उसमें उच्च नैतिक सद्गुणों का समावेश हो। जीवन निर्माण के लिये ऐसे साहित्य की आवश्यकता होती है जो हमारी भावनाओं को ऊँचा उठाने की क्षमता रखता हो। स्कूली किताबें, नाटक भजन या धर्म की लकीर पीटने वाली पुस्तकें ही इसके लिए पर्याप्त नहीं हैं, एक ऐसे साहित्य की आवश्यकता होती है जो वैज्ञानिक हो और सन्मार्ग प्रेरक हो। जिस साहित्य से हमारी सुरुचि नहीं जागती, आध्यात्मिक और मानसिक तृप्ति नहीं मिलती उसे साहित्य कहने में संकोच होता है। जो साहित्य व्यक्ति और समाज में गति और शक्ति न पैदा कर सके, सौंदर्य-प्रेम समुन्नत न कर सके वह साहित्य नहीं प्रवंचना है। हमारा तात्पर्य उस साहित्य से है जो सच्चा संकल्प और कठिनाईयों पर विजय पाने की दृढ़ता उत्पन्न करे। सच्चा साहित्य उसे कहते हैं जिसके पढ़ने से पाठक का अन्तःकरण फूल की तरह सुविकसित हो जाय और उसके हृदय-मन में आध्यात्मिक सुवास छा जाय।

पतनकारी साहित्य से व्यक्ति और राष्ट्र की शक्ति नष्ट होती है। आज इस बात के प्रमाण चारों तरफ फैले दिखाई दे रहे हैं। विलासिता, कामुकता और अनाचार फैलाने वाले साहित्य की जो बाढ़ आई हुई है, उससे सामाजिक सामर्थ्यों का कितना विनाश हो रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। लोगों का चरित्र इतनी तेजी से गिरता जा रहा है कि विचारवान् लोगों के हृदय इस आशंका से काँपने लगे हैं कि कहीं सामाजिक विद्रोह की ज्वाला न भड़क उठे। आज का अश्लील साहित्य भी बहुत कुछ इसके लिये जिम्मेदार है। ऐसे साहित्य से जितना ही बच सकें उतना ही अपना परम सौभाग्य समझना चाहिए।

सत्साहित्य से सद्विचार ग्रहण करते रहने की परम्परा चल पड़े तो मानसिक उत्थान होता रहेगा और दुर्गुणों से बचते रहेंगे। आज के युग में जब कि सन्त-जनों और सहृदय पुरुषों का नितान्त अभाव है प्रेरणाप्रद विचार प्राप्त करने के लिये साहित्य का ही आश्रय लेना पड़ेगा किन्तु यह ध्यान बना रहे कि साहित्य वही उपयोगी हो सकता है जो हमें ऊँचा उठा सके। हमारे अन्तःकरण में प्रकाश उत्पन्न कर सके। जहाँ कोई अन्य साधन न हों वहाँ नियमित रूप से सद्ग्रन्थों, आत्मनिर्माण करने वाली पुस्तकों का स्वाध्याय करते रहना चाहिये। इससे भी मन बुरे विचारों से बचा रहता है और सद्भावनायें उत्पन्न होती हैं।

साहित्य की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए विद्वान सिसरो ने लिखा है—”साहित्य का अध्ययन युवकों का पालन पोषण करता है, वृद्धों का मनोरंजन करता है, उन्नति का द्वार खोलता है, विपत्ति में धैर्य बँधाता है, घर में प्रमुदित रखना और बाहर विनीत रखना साहित्य का ही काम है।”

उस सारे वाङ्मय को ऐसे साहित्य की श्रेणी में ले लेते हैं जिससे अर्थ बोध के साथ भावनाओं का परिष्कार भी होता हो और प्रत्येक तथ्य की समीक्षात्मक व्याख्या भी होती हो। केवल गूढ़ शब्दों को रट लेना मात्र पर्याप्त नहीं है। पढ़ना और उसे समझना, समझकर उसके सत्यासत्य पर विचार करना तथा जीवन शोधक व्यावहारिकता का अनुसरण करना —इतना कर सकें तो यह समझें कि साहित्य की आवश्यकता को हमने समझ लिया है। रामायण पढ़ने का लाभ तब है जब हम भी राम, भरत या लक्ष्मण के सदृश बनने का प्रयत्न करें और रामायण का महत्व इसलिए है कि उससे आँतरिक मलिनताओं पर द्वन्द्व उत्पन्न होता है और सदाचार की प्रेरणा मिलती है। इस तरह का तालमेल यदि बन सके तो विचार-दृष्टि से शक्ति शाली बनने में कोई कठिनाई न रहेगी।

बुरे संयोग से बचने के लिये और अपनी महानता जगाने के लिये हमें भी विचारवान् बनना है। इसके लिये दूसरे साधनों की उतनी आवश्यकता नहीं है जितना कि ज्ञान-साधना की जरूरत है। इस जरूरत को पूरा करना है तो साहित्य की शरण लेनी ही पड़ेगी। ऐसा साहित्य खोजना पड़ेगा जिससे ज्ञान संवर्द्धन हो और आत्मा का परिष्कार हो। साहित्य हमारी शक्ति का उद्रेक है हमें साहित्य के द्वारा अपनी प्रतिभा जगाने का कार्य अविलम्ब शुरू कर देना चाहिये।


बच्चों को व्यवहारकुशल बनाइये

बच्चों को व्यवहारकुशल बनाने के लिये उनमें उत्तर-दायित्व की भावना का विकास करना बहुत आवश्यक है। जिन बच्चों में उत्तरदायित्व का भाव जाग जाता है वे हर काम बड़ी होशियारी से करते हैं। हर समय इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनसे कोई काम बिगड़ न जाये। उन पर कोई उंगली न उठा सके अथवा किसी समय वे उपहासास्पद न बन जायें।

व्यवहारकुशलता का सीधा-सा अर्थ, है कोई ऐसी बात या कोई ऐसा काम न करना जिससे किसी को कोई तकलीफ पहुँचे अथवा वे आलोचना या उपहास के पात्र बन सकें।

यद्यपि सारे क्षेत्रों में किसी का पूर्णरूपेण कुशल हो सकना असम्भव के समकक्ष जैसी बात है, तथापि समाज में साधारण व्यवहार कुशलता प्राप्त कर लेना सबके लिये सुसाध्य एवं आवश्यक है। जो सामान्य सामाजिक व्यवहार में कुशल नहीं होते वे अन्दर से अच्छे होते हुये भी समाज में उचित स्थान नहीं पा सकते । लोग उनके विषय में यह कहकर आलोचना किया करते हैं कि ‘अमुक व्यक्ति हो सकता है अन्दर से अच्छा हो किन्तु व्यवहार से अच्छा प्रतीत नहीं होता’ और समाज में इस प्रकार की धारणा लोगों को उसके प्रति शंकालु ही बनाये रखती है।

समाज में विनिमय , वार्तालाप, सम्बन्ध एवं सामंजस्य चार ऐसी बातें है जिनकी पृष्ठभूमि पर ही सारे सामाजिक व्यवहार आधारित रहते हैं। इन चार बातों को ठीक से व्यवहार कर सकने की योग्यता प्राप्त कर लेना ही व्यवहार दक्षता है।

विनिमय का अर्थ है, आदान-प्रदान अथवा लेन-देन। जो पैसे का , वस्तु का, भावनाओं का अथवा विचारों का हो सकता है। विनिमय के व्यवहार में जहाँ तक हो सके सीमान्त स्पष्टता एवं ईमानदारी रखनी चाहिये। जैसे कोई वस्तु खरीदते समय अपनी चतुरता अथवा हीलो- हुज्जत से दुकानदार को साधारण भाव से कम कीमत देने का प्रयत्न न करना चाहिये। क्योंकि इससे दुकानदार अपना नुकसान तो करेगा नहीं उल्टे अच्छा ग्राहक न समझ कर ऐसे व्यक्ति के हाथ कोई चीज बेचना पसन्द न करेगा। और यदि एक बार, वह ग्राहक बनाने के लिये दब भी जायेगा तो दूसरी बार एक पैसे के दो पैसे वसूल कर लेगा और सबसे पहले घटिया चीज भिड़ाने की कोशिश करेगा। बार-बार ऐसा करने वाले व्यक्ति की साख ग्राहक के रूप में बाजार में कम हो जाती है और हजारों रुपये का सामान खरीदने पर भी वह आदर नहीं पा पाता जो उसे मिलना चाहिये।

अब रही कोई चीज बेचने की बात। कोई वस्तु बेचते समय सामान्य भाव से अधिक पैसे लेने के लिये बढ़ा चढ़ा कर मूल्य बतलाना, घटिया चीज भिड़ाना या असन्तोषजनक ढंग से विक्रय करने वाले की, दुकानदार के रूप में साख खराब हो जाती है और वह एक बड़ा दुकानदार होने पर भी न तो अपेक्षित बड़प्पन पा सकता है और न अधिक समय तक अपनी स्थिति बनाये रख पाता है। धीरे-धीरे ग्राहक संख्या कम करता हुआ छोटा-सा दुकानदार रह जाता है।

इसी प्रकार पैसा लेने-देने में समय और परिणाम में यथा-सम्भव हेर-फेर करने का प्रयत्न न करना चाहिये। और यदि किसी भ्रम, भूल या परिस्थितिवश ऐसा हो जाये या करना पड़े तो ईमानदारी से उसका स्पष्टीकरण करने में संकोच न करना चाहिये।

वार्तालाप में सत्यता, शिष्टता एवं देशकाल का विचार रखना चाहिये। सत्य यदि शिष्ट नहीं है अथवा शिष्टता, सत्यता से परे है या यह दोनों बातें देश काल के अनुकूल नहीं हैं तो अनुचित ही मानी जायेंगी।

सम्बन्ध मूलतः छोटे,समान,बड़े,पद,योग्यता एवं विशेषता के अनुसार छः प्रकार के होते हैं। जो जिस योग्य हो उससे उसी प्रकार का व्यवहार अपेक्षित है। इसके प्रतिकूल व्यवहार करना किसी भी दशा में ठीक नहीं है। जो जिस योग्य है उसको उसके अनुरूप स्थान देना बहुत बड़ी व्यवहार कुशलता है। छोटों से स्नेहिल, समानों से निःसंकोच और बड़ों से आदरपूर्वक बर्ताव करना चाहिए। पद में बड़े और आयु में छोटे व्यक्ति भी आदर और अदब के अधिकारी होते हैं। अपने से अधिक योग्यता अथवा किसी क्षेत्र में विशेषता (जैसे कला आदि) रखने वाले व्यक्ति भी अपने से बड़े अथवा उच्च पद पर न होते हुये भी सम्मान एवं सद्व्यवहार के पात्र होते हैं। उनसे व्यवहार करने में इन बातों का ध्यान रखना न केवल आवश्यक ही अपितु अनिवार्य भी है।

सामंजस्य का अर्थ है अपने को इस तरह का बनाना कि हर व्यक्ति हर परिस्थिति तथा हर स्थान से समुचित समानता दिखला सके। जैसे दूसरे के दुःख में दुःख, सुख में सुख, परिस्थिति से अनुकूलता स्थान से निरपेक्षता का भाव प्रकट कर सकें। किसी के सुख-दुःख में उदासीन रहना, प्रतिकूल परिस्थिति में अधैर्य अथवा अयोग्य स्थान पर क्षोभ अथवा घृणा व्यक्त करना ठीक नहीं है। अपने अवाँछित मानसिक आवेगों पर नियन्त्रण रखना व्यवहार कुशलता की एक महत्वपूर्ण शर्त है।

इस प्रकार इन व्यवहार सम्बन्धी आवश्यक बातों की शिक्षा देते हुये यदि बच्चों का पालन किया जाये तो कोई कारण नहीं कि वे व्यवहार करने की आयु तक पहुँचते-पहुँचते दक्षता प्राप्त कर लेंगे। जिन बच्चों में इन बातों का विकास प्रारम्भ से नहीं किया जायेगा वे बच्चे उस आयु तक आवश्यक दक्षता प्राप्त न कर सकेंगे जिसमें पहुँच कर उनका कोई भी व्यवहार महत्व रखता है और अच्छा या बुरा माना जा सकता है।

बच्चे जब कुछ समझदार होने लगें यह कार्यक्रम तभी से शुरू कर दिया जाना चाहिये। सबसे पहले उन्हें परिवार के सदस्यों का परिचय कराया जाना चाहियें और उसी अनुसार उनसे व्यवहार का अभ्यास । यह माता है, यह पिता है, यह बड़ी बहन है, यह बड़े भाई हैं, आदि बतलाते हुये यह भी बतलाना चाहिये कि उनके चरण छूना, उनके प्रति आदर रखना उनकी आज्ञा मानना उसका परम कर्तव्य है। जो अपने से बड़े हैं, शिष्ट और अच्छे बच्चे उनसे तुम नहीं आप कहकर बोलते हैं। उनसे गुस्सा नहीं करते और न कभी उनका तिरस्कार करते हैं। इसका अभ्यास कराने के लिये जब भी इनमें से किसी को बुलवायें या उसे उनके पास किसी काम से भेजें तब कभी भी ऐसा निर्देश न दिया जाना चाहिये, जिससे उसमें कोई अनादर का भाव पैदा होने की सम्भावना रहे। जैसे “मुनिया को बुला लाओ” “विमलेश को आवाज देना” या ‘देखना, अम्मा क्या करती है?’ इसके विपरीत कहना इस तरह चाहिये कि ‘अपनी दीदी जी को बुला लाइये’ ‘अपने दद्दा, बड़े भाई साहब या दादाजी को आवाज दीजिये’ “जरा देखकर आइये कि आप की माताजी क्या कर रही हैं?” कहने का तात्पर्य यह कि इस प्रकार निर्देश देने से उसमें उस समय आदर की भावना ताजी हो उठेगी और उन्हीं शब्दों में उनसे बोलेगा, क्योंकि बच्चों के प्रारम्भिक शब्द और सम्बोधन परिवार के गुरुजनों के ही दिये होते हैं। इस प्रकार हर समय इस बात का ध्यान रखने से वह कुछ ही समय में गुरुजनों से आदर पूर्वक व्यवहार करना सीख जायेगा।

व्यवहार में वार्तालाप का एक प्रमुख स्थान है। जिन बच्चों को शुरू में ही शब्दों और स्वर के संयम का अभ्यास करा दिया जाता है वे आगे चलकर बड़े मधुर तथा उपयुक्त भाषी हो जाते है । शब्दों का गलत उच्चारण करना स्वर को अनावश्यक रूप में ऊंचा नीचा करके बोलना अथवा वाक्यों को पूर्ण और ठीक न बोलना सम्भाषण का आकर्षण समाप्त कर देता है, जिससे दूसरों को उसकी बात न समझ में ठीक से आती है और न वे पसन्द ही करते हैं। अस्तु, शब्द स्वर और वाक्य विन्यास ठीक रखने के लिये उसे बहुत पहले से प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये।

सम्भाषण में नम्रता तथा देश काल और सम्बन्ध का विशेष ध्यान रखना चाहिये। किन्तु जिस भाषण में अधिक से अधिक सत्यता का समावेश नहीं है, वह नम्र और संयत होने पर भी अच्छा ठीक नहीं है। इससे बच्चा दूसरों की नजर में झूठा, गप्पी और अविश्वस्त हो जाता है और समाज में उसका आदर नहीं होता है।

इस प्रकार जो बच्चे, विनिमय, वार्तालाप, सम्बन्ध और सामंजस्य के ज्ञान से परिपूर्ण कर दिये जाते हैं ये निस्सन्देह व्यवहार कुशल होकर समाज में अच्छे नागरिक बनकर अपना निश्चित स्थान प्राप्त कर लेते हैं।


मौत से न डरिये, वह तो आपकी मित्र है।

मृत्यु के बारे में सामान्य व्यक्तियों की कल्पनायें बड़ी भयावह होती हैं। सारा भय संसार में मौत का ही है। अँधेरे में पाँव रखते जी काँपता है सोचते हैं कहीं सर्प न काट ले। साधारण-सी बीमारी से व्याकुल हो जाते हैं सोचते हैं कहीं हृदय गति न रुक जाय। दुश्मन से घबड़ाते हैं, कहीं प्राण न हर ले। सर्वत्र मौत का ही भय समाया है। खाते, पीते, चलते, फिरते, उठते, बैठते एक ही आशंका परेशान रखती है, कहीं कुछ हो न जाय जो मौत के मुँह में जाना पड़े।

मौत का विश्लेषण करने से पहले कुछ आत्मतत्व पर विचार कर लें। यह देखते हैं कि सम्पूर्ण शरीर किन्हीं दो वस्तुओं के सम्मिश्रण से बना है। शरीर और उसकी चेतना — यह दो अलग-अलग वस्तुयें हैं। भ्रम इसलिये होता है कि शरीर की तरह ही चेतन-तत्व दृश्य नहीं है। उसे इन स्थूल आंखों से नहीं देखा जा सकता। फिर भी उसके अस्तित्व से तो इनकार नहीं किया जा सकता। यदि शरीर ही सब कुछ होता तो संभवतः मृत्यु ही नहीं होती या फिर उसका स्वरूप ही कुछ और होता। शरीर की विभिन्न क्रियाओं और चेष्टाओं से भी यह बात सिद्ध हो जाती है कि वह किसी भिन्न तत्व से परामष्ट है। यह मूलतः आत्मा या सूक्ष्म शरीर ही हो सकता है। भेद सिर्फ इसलिये है कि वह अदृश्य है और हम विश्वास केवल दृश्य पदार्थों पर ही करते हैं।

किसी बैटरी के सेल तोड़कर देखिये आपको कहीं भी विद्युत दिखाई नहीं देगी। रासायनिक तत्व, जिंक, पीतल या ताँबे की छड़ आप भले ही देख लीजिये पर बिजली नाम की कोई वस्तु देखने को नहीं मिलेगी। जिन तारों से बिजली दौड़ रही हो उन्हें गौर से देखिये आपको कोई भी वस्तु रेंगती हुई दिखाई न देगी। किन्तु “टंग्स्टन” तारों में वही बिजली प्रवाहित होकर प्रकाश के रूप में दिखाई देने लगती है। अतः किसी भी अवस्था में बिजली के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं कर सकते।

ठीक यही अवस्था शरीर में आत्म-तत्व की है। वह जो चेतन है वही “मैं” हूँ—इसे जानना चाहिये। जब यह जान लेते हैं कि मनुष्य शरीर नहीं शक्ति है तो हमारे सारे लक्ष्य परिवर्तित हो जाते हैं। दृष्टिकोण ही बदल जाता है। इतनी-सी बात को समझाने के लिये ही मनुष्य के आगे तरह-तरह की घटनायें, ज्ञान और विवेक रखा जाता है।

मृत्यु का भय केवल इसलिये है कि शरीर चला जायगा। हम समझते हैं कि शरीर चला गया तो सारे सुख चले गये पर यह नहीं सोचते कि सुख चेतना की अनुभूति मात्र हैं। भोक्ता शरीर नहीं है। शरीर केवल वाहन है। वह एक प्रकार से हमारी सवारी है। शास्त्रकार ने इसी बात को इस तरह कहा है—

वासाँसि जीर्णानि यथा विहाय

नवानि गृहणाति नरोपराणि।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा

न्यन्यानि संयाति नवनि देही॥

( गीता 2 / 22)

अर्थात् “जिस तरह मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग कर दूसरे नये वस्त्रों को ग्रहण करता है उसी तरह जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नये शरीरों को प्राप्त होता है।”

यह बात जान लेने की है कि आत्मा अजर अमर है तो शरीर के प्रति आसक्ति का भाव नहीं होना चाहिये। शरीर वह साधन मात्र है जिससे हम चाहें तो परमात्मा को प्राप्त कर सकते हैं किन्तु जब मूल लक्ष्य भूल जाता है और शरीर के सुख ही साध्य हो जाते हैं तो मनुष्य को मौत का भय सताने लगता है। यह एक तरह से मनुष्य का अज्ञान ही है अन्यथा मृत्यु मनुष्य के लिये हितकारक ही है। जीर्ण-शीर्ण शरीर की उपयोगिता भी क्या हो सकती है? प्रकृति हमें नया शरीर देने के लिये ही तो अपने पास बुलाती है। “नया शरीर प्राप्त होगा” —इससे तो प्रसन्नता ही होनी चाहिये। दुःख की इसमें क्या बात है। अच्छी वस्तु प्राप्त करने में ही तो हर्ष ही होना चाहिये।

महात्मा गान्धी ने लिखा है ‘मुझे तो बहुत बार ऐसा लगता है कि मृत्यु को जन्म की अपेक्षा अधिक सुन्दर होना चाहिये। जन्म के पूर्व माँ के गर्भ में जो यातना भोगनी पड़ती है उसे छोड़ देता हूँ, पर जन्म लेने के बाद तो सारे जीवन-भर यातनायें ही भुगतनी पड़ती हैं। उसका तो हमें प्रत्यक्ष अनुभव है। जीवन की पराधीनता हर मनुष्य के लिये एक-सी है। जीवन यदि स्वच्छ रहा है तो मृत्यु के बाद पराधीनता जैसी कोई बात न होनी चाहिये। बालक जन्म लेता है, तो उसमें किसी तरह का ज्ञान नहीं होता। ज्ञान के लिये कितना परिश्रम करना पड़ता है फिर भी आत्म-ज्ञान नहीं हो पाता, पर मृत्यु के बाद तो ब्राह्मी स्थिति का बोध सहज ही हो जाता है। यह दूसरी बात है कि विकारयुक्त होने के कारण उसका लाभ न उठा सकें किन्तु जिनका जीवन शुद्ध और पवित्र होता है उन्हें तो उस समय बन्धन-मुक्त ही समझना चाहिये। सदाचार का अभ्यास इसीलिये तो जीवन में आवश्यक बताया जाता है ताकि मृत्यु होते ही शाश्वत शान्ति की स्थिति प्राप्त कर ले।”

दार्शनिक सुकरात का भी ऐसा ही कथन है। उन्होंने लिखा है—”मृत्यु के बारे में सदैव प्रसन्न रहो, और इसे सत्य मानो कि भले आदमी पर जीवन या मृत्यु के पश्चात् कोई बुराई नहीं आ सकती।” इसलिये मृत्यु से घबड़ाने का कोई कारण हमारी समझ में नहीं आता। मृत्यु से एक शिक्षा हमें मिलती है और वह यह है कि हमसे जितना शीघ्र हो सके परमात्मा को जान लें क्योंकि उसके जाने बिना, जीवन के पाप और बुराइयाँ साथ नहीं छोड़तीं। तरह-तरह की आकाँक्षायें पीछे पड़ी रहती हैं। शरीर इस दृष्टि से एक अत्यन्त उपयोगी यन्त्र है। जीवन साधना के समस्त उपयोगी उपकरण इसमें मौजूद हैं अतः शरीर की यदि कुछ उपयोगिता हो सकती है तो वह इतनी ही है कि अपने ज्ञान, बुद्धि और विवेक के द्वारा, शिक्षा, विचार और वाणी के द्वारा बाह्य और आन्तरिक स्थिति का सही ज्ञान प्राप्त कर लें ताकि फिर दूसरी योनियों में भटकना न पड़े। शरीर के सुख इस दृष्टि से न तो आवश्यक ही हैं और न उपयोगी ही हैं। हमारा उद्देश्य जीवन-शोधन और पारमार्थिक लक्ष्य की प्राप्ति ही होना चाहिये। मृत्यु से डरने की आवश्यकता इसलिये भी नहीं है कि वह एक अनिवार्य स्थिति है। मनुष्य यदि डरे भी तो भी उससे छुटकारा नहीं मिल सकता। जितना जीवन आप को मिला है उससे अधिक कदापि नहीं प्राप्त कर सकते। फिर आप डरें क्यों? बुद्धिमानी तो इसमें है कि आप इस अनिवार्य स्थिति का लाभ उठा लें। आप मृत्यु को बुराइयों से आगाह करते रहने वाला मित्र समझें ताकि इस संसार में रहकर आत्म-कल्याण और परमार्थ के कार्य सुचारु रूप से कर सकें । जितनी जल्दी हो सके आप शुभ कर्मों का अधिक से अधिक संचय कर लें ताकि पटाक्षेप के बाद आप को किसी तरह पछताना न पड़े।

मनुष्य जीवन का कोई भरोसा नहीं है। मृत्यु किस क्षण आ जाय, इसका कोई ठिकाना नहीं है। पल भर में ही परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। कबीरदास जी ने सच ही लिखा है—

कबिरा यह जग कुछ नहीं खिन खारा खिन मीठ।

कालि जो बैठा मंडपै आज मसानै दीठ॥

इस तरह हमारा अधिकार केवल मृत्यु से शिक्षा लेना ही है। अनिवार्य स्थिति का मुकाबला करने के लिये तो हम में साहस ही होना चाहिये।

दिन-भर काम करते हुये शरीर थक जाता है तो रात्रि में विश्राम की आवश्यकता पड़ती है। सोना एक प्रकार से थकावट मिटाने की क्रिया है। रात में पूरी नींद पा लेने से शरीर अगले दिन के लिये पूर्ण स्वस्थ और ताजा हो जाता है। एक नई शक्ति और नवीन प्राण भर जाता है जिससे दूसरे दिन शाम तक अथक परिश्रम करते रहते हैं। मृत्यु भी जीवात्मा की ठीक ऐसी ही स्थिति है। जीवन-भर की थकावट मृत्यु की गोद में ही जाकर दूर होती है। अगले जीवन के लिये शक्ति दायिनी स्थिति का नाम ही मृत्यु है। फिर इसे शत्रुवत् क्यों देखें। परम विश्राम की अवस्था से हमें प्यार होना चाहिये। फिर इससे हमें लाभ ही तो हैं। नया जीवन, नई चेतना और नई स्फूर्ति मृत्यु के उपरान्त ही प्राप्त होती है।


एकाग्रता व संलग्नता से ही लक्ष्य सिद्ध होगी

मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन एक तरह से लक्ष्यवेध की साधना है। उद्देश्य उसका भौतिक है या आध्यात्मिक यह दूसरी बात है पर जीवन की एक दिशा होती जरूर है। प्रत्येक उद्देश्य की पूर्ति के लिये जो उपक्रम किये जाते हैं, सफलता के लिये उनमें एकाग्रता तथा संलग्नता बहुत जरूरी है। शिकारी तीर चलाने के पूर्व साँस रोक कर सारा ध्यान अपने शिकार पर जमा देता है। मनोयोग थोड़ा-सा भी अस्थिर हो जाय तो तीर कहीं का कहीं जा गिरे। लक्ष्य पर ठीक तरह से निशाना साधे बिना जिस तरह कोई सफलता नहीं मिलती, दृढ़ मन्तव्य बिना मनुष्य का जीवन भी खेल मात्र दिखाई देता है। उससे किसी प्रकार की सफलता की आशा नहीं की जा सकती।

प्रतिदिन कोई न कोई मन्तव्य बनाते रहें और हर दूसरे दिन उसे बदलते रहें तो कोई समस्या हल न होगी। हर प्रयत्न में विचलित बने रहेंगे। कहावत है “आधी छोड़ सारी को धावे, आधी रहे न सारी पावै” अर्थात् अनेक कल्पनायें करने की अपेक्षा किसी एक विचार पर स्थिर रहना अधिक लाभदायक होता है। चाहे वह थोड़े ही लाभ की बात हो पर उसमें भी दृढ़तापूर्वक संलग्न रहेंगे तभी सफलता मिलेगी।

जीवन का एक व्यवसाय निश्चित कर लें फिर उसमें तत्परता पूर्वक सारी शक्ति लगादें। पूर्ण एकाग्रता तथा संलग्नता के बिना सफलता नहीं मिलती। नित्य नये व्यवसाय बदलते रहना मनुष्य की अवनति का प्रमुख कारण है। काम की विशेष योग्यता और मार्गदर्शक अनुभव संलग्नता से ही प्राप्त होते हैं।

किसी व्यक्ति की बहुत बड़ी सफलता देखकर या किसी महत्वाकाँक्षा से प्रेरित होकर लोग बहुत बड़े संकल्प कर लेते हैं। पर कुछ ही दिनों में उन्हें असफल हुआ या संकल्पच्युत हुआ पाते हैं, तो इसके कारण पर विचार करने की इच्छा होती है। सफल पुरुषों के जीवन से इसका आसानी से समाधान हो जाता है। सफलता प्राप्त करने के लिये आवश्यक है कि मनुष्य अपने तन, मन, धन की सारी शक्ति संकल्प को सफल बनाने में लगा दे। मनोवृत्तियाँ पल-पल पर बदलती रहें, शरीर से क्रियाशील न हों और उचित साधन न जुटायें तो सफलता कैसे मिल सकेगी। जिस मन की स्थिति डाँवाडोल रहती है वह कभी एक काम, फिर दूसरा, फिर तीसरा इस तरह से इधर-उधर चक्कर काटता रहता है और जिस बात की प्रतिज्ञा की थी वह यों ही अधूरी रह जाती है।

युद्ध में लड़ने का काम सैनिक करते हैं। किन्तु विजय का श्रेय कमाण्डर को मिलता है। कोई अल्प बुद्धि का व्यक्ति ऐसी आशंका प्रकट कर सकता है कि ऐसा क्यों होता है। पर समझदार लोग जानते हैं कि युद्ध की सारी रूप-रेखा सेनापति ही बनाता है। वही यह निश्चित करता है कि किस टुकड़ी को कहाँ लगायें, कहाँ गोला, बारूद पहुँचे, कहाँ की संचार व्यवस्था कैसी हो? सेनापति लड़ने नहीं जाता पर सारा युद्ध उसके मस्तिष्क में चित्रपट की भाँति घूमता रहता है। पूर्ण एकाग्रता से उस पर विश्लेषण करता रहता है तब कहीं विजय का श्रेय उसे मिल पाता है। संलग्नता, लक्ष्य बुद्धि और तन्मयता के द्वारा ही सेनापति युद्ध का ठीक परिचालन कर पाते हैं। ठीक उसी तरह जीवन संग्राम में विजयश्री प्राप्त करने के लिये मन की एकाग्रता व संकल्पशीलता आपेक्षित है।

बार-बार जो मन की स्थिति बदलती रहती है उसे सर्वप्रथम काबू करने की आवश्यकता है किसी लक्ष्य पर जब मन केन्द्रित रहता है तो सफलता की अनेक योजनायें सूझती रहती हैं। वैज्ञानिक शोध कार्यों में इतने दत्तचित्त तथा एकाग्र होकर कार्य करते हैं कि उन्हें लैबोरेटरी के बाहर की दुनिया का भी ज्ञान नहीं होता। एक-एक सिद्धान्त के रहस्यों पर घुसते चले जाते हैं और कोई नई चीज ढूंढ़ कर निकाल लाते हैं। एक ही बात जब तक मस्तिष्क में रहती है तब तक उसी के अनेक साधनों की सूझ होती रहती है। उनमें से उपयोगी बातों की पकड़ एकाग्रता से ही होती है। शरीर-मन की सारी क्रियाओं को साधकर बगुला एक प्रकार से निश्चेष्ट-सा हो जाता है, इसी धोखे में मछली बाहर आ जाती है। बगुला को तो इसी की ताक रहती ही है खट से उसे पकड़ लेता है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता के लिये मनुष्य को भी इसी तरह “को-ध्यानी” बनना आवश्यक है।

एक ही दिशा में अपनी सारी चित्त-वृत्तियाँ आरोपित रखने से नये महत्व की बातों का ज्ञान तो होता ही है वह भूलें और त्रुटियाँ भी समझ में आ जाती हैं जिनसे काम में गड़बड़ी उत्पन्न होने की आशंका होती है। इसी अनुभव के आधार पर कठिनाइयों से पहले ही बच जाना सम्भव होता है। रोज एक नया काम बदलने से तो किसी तरह का भी ज्ञान प्राप्त नहीं होता, न अनुभव विकसित होते हैं।

आकाश में उड़ने वाले जहाज के कप्तान को कुतुबनुमा की सुई के सहारे चलना पड़ता है। कोई ऐसे चिह्न नहीं होते जिस तरह सड़क पर मोटरें दौड़ती हैं। फिर बादलों से बचाव, हवा के कटाव आदि में पंखों को भी ऊपर नीचे करना पड़ता है। पाइलट यदि वहाँ कोई उपन्यास पढ़ना चाहे तो जहाज के गिर जाने का ही खतरा पैदा हो सकता है, इसलिये उसका सारा ध्यान जहाज को ठीक तरह चलाने में ही लगा रहता है। बिना लक्ष्य पर स्थिर हुये जहाज के कप्तान को कोस भर की यात्रा करना भी दुस्साध्य हो जायगा।

यह मशीनों का युग है। अब मनुष्य का बहुत-सा काम कल-कारखाने पूरा करते हैं भारी उत्पादन के कारखानों के कल पुर्जे देखकर मस्तिष्क चक्कर काटने लगता है। इतनी सारी मशीनरी का नियन्त्रण कौन कर सकेगा। पर वह क्षमता इंजीनियर में होती है। इंजीनियर भी दूसरे मनुष्यों की तरह ही होते हैं पर उनमें यह विशेषता होती है कि काम करने के समय उनका सारा ध्यान मशीन के कल पुर्जों के साथ बँध जाता है। फरनेस में ईंधन जा रहा है, डायनेमो ठीक काम कर रहा है या नहीं, कोयला, पानी, तेल आदि पर्याप्त मात्रा में हैं या नहीं। एक-एक हिस्से पर पूरा-पूरा ध्यान रखकर ही सारी मशीनरी को वह अपने नियन्त्रण में रख पाता है। ध्यान इधर-उधर बँटा रहे तो रोज ही कारखानों में विस्फोट होता रहे।

काम करते हुये बहुत समय बीत जाय और पूर्ण संलग्नता के बावजूद भी यदि कोई सफलता न मिले तो समझना चाहिए कोई जबर्दस्त कमी है। यदि कारण इतना बलवान हो जिसे आसानी से न हटाया जा सकता हो, तो फिर उसे बदल ही देना चाहिये। संलग्नता का मतलब यह कदापि नहीं कि असम्भव कार्य के पीछे ही पड़े रहें।

पर यदि लक्ष्य स्थिर कर लिया जाय और जिस रास्ते में चल रहे हैं उसी में कुछ कमी दिखाई दे तो किसी दूसरे मार्ग से उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए। मान लीजिये आप हाई-स्कूल पास कर चुके हैं और एम.ए. पास करने की इच्छा है। पर घर की आर्थिक कठिनाइयों के कारण स्कूल में नहीं पढ़ सकते। कुछ दिन कालेज गये भी पर फीस देने की व्यवस्था नहीं हो पाई तब आप अपना रास्ता बदल दीजिये। देखिये आपको कहीं शिक्षण-कार्य मिल सकता है क्या? यदि ऐसी व्यवस्था हो जाय तो आप घर की आर्थिक कठिनाई में भी कुछ सहयोग दे सकते हैं और बचे हुए समय का सदुपयोग अध्ययन में करके प्राइवेट परीक्षा भी दे सकते हैं। इस तरह की परिस्थितियों में केवल मार्ग बदलना पड़ता है बाकी सफलता की बुनियादी बातें ज्यों-की-त्यों बनी रहती हैं।

इसमें सन्देह नहीं है कि मनुष्य के कठिन श्रम, एकाग्रता और सतत अभ्यास से बड़े-बड़े काम हल हो जाते हैं पर उद्देश्य जो निश्चित किये जावें, उनके औचित्य पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार कर लेना चाहिये। अपनी शारीरिक स्थिति, बुद्धि, योग्यता और परिस्थितियों के अनुकूल लक्ष्य निर्धारित करने से ही सफलता मिल सकती है। शक्ति से बहुत चढ़-बढ़ कर बनाये गये लक्ष्य असफल रहे तो इसमें सन्देह न होना चाहिये क्योंकि मनुष्य के पुरुषार्थ के साथ प्राकृतिक संयोग भी काम करते रहते हैं। असम्भव उद्देश्य न निश्चित करना ही मनुष्य की बुद्धिमानी है।

पर जिन्हें हम पूरा कर सकने की स्थिति में हों और उनसे मनुष्य जीवन सार्थक होता हो तो ऐसे लक्ष्य-जीवन में बनाकर उन पर पूर्ण लगन, एकाग्रता व संलग्नता के साथ तब तक लगे रहना चाहिये जब तक सफलता न मिल जाय। एकाग्रता और संलग्नता में ही सफलता का सारा रहस्य छुपा हुआ है। मनुष्य जीवन के ये दो भूषण हैं जिससे उसका व्यक्तित्व निखरता है और वह कुछ असामान्य कार्य भी सम्पन्न कर लेता है।

युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति

जेष्ठ में महत्वपूर्ण शिक्षण शिविर

गायत्री तपोभूमि में सम्पन्न हुए इस बार के जेष्ठ शिविर में बहुत ही महत्वपूर्ण आयोजन सम्पन्न हुए। पन्द्रह-पन्द्रह दिन के दो शिविर रखे गये थे अधिकाँश शिक्षार्थी ऐसे आये जो दोनों में ही सम्मिलित रहे। श्रद्धापूर्वक चान्द्रायण व्रत किया और साथ ही गायत्री पुरश्चरण भी। व्यवहारिक आध्यात्म एवं संजीवन विद्या के प्रशिक्षण का अनुपम लाभ भी लेते रहे। नया प्रवचन कक्ष तथा सपरिवार ठहरने लायक 10 नये कमरे बन जाने से अधिक शिक्षार्थियों को स्वीकृति दे सकना संभव हो गया और पिछले शिविरों में जितने शिक्षार्थी आया करते थे, इस बार उससे ठीक दूने थे। नया प्रवचन हाल भी ठसाठस भर जाता था। एक महीना इतने आनन्दपूर्वक बीता कि जाते समय लोग आँसू भरे ही विदा हो रहे थे।

चान्द्रायण व्रत से शरीर और मन का स्वास्थ्य सुधारने में जो आश्चर्यजनक लाभ होता है उसका अनुभव गत तीन वर्षों में लगभग 1000 व्यक्ति कर चुके हैं। एक से चर्चा सुनकर दूसरे की इच्छा होती है और लोगों को इस अव्यय तपश्चर्या का लाभ उठाने की आकाँक्षा उत्पन्न होती है। इन शिविरों में अधिक उपस्थिति होते चलने का एक कारण यह भी है।

बैसाख सुदी 15 को नये प्रवचन हाल का उद्घाटन, विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन का प्रत्यक्ष दृश्य उपस्थित करते हुए सम्पन्न हुआ। कान्यकुब्ज समाज के एक प्रतिभाशाली बी. ए. के अन्तिम वर्ष में पढ़ने वाले और अच्छी नौकरी से लगे हुए संगम नामक, स्वस्थ, सुन्दर और सुशील लड़के का विवाह मैट्रिक तक पढ़ी हुई सरला नामक लड़की के साथ सम्पन्न हुआ। दोनों ही फर्रुखाबाद जिले के हैं। उनके अभिभावक एवं सम्बन्धी उपस्थिति थे। दहेज के नाम पर एक रुपया मात्र दिया गया। ऐसे लड़कों पर उस समाज में बहुत अधिक दहेज माँगा जाता है, पर आदर्शवाद के लिए त्याग का साहस करने वाले लोग भी तो आखिर इस संसार में बिलकुल मिट नहीं गये हैं, यह बात इस विवाह को देखकर दर्शकों ने समझी और अवसर आने पर वैसा ही अनुकरण करने की प्रेरणा स्वयं भी प्राप्त की। उस शुभ शकुन के साथ शिक्षण शिविर एवं प्रवचन हाल का शुभारम्भ होने से लोगों ने कल्पना की कि यह नया अभियान सफलतापूर्वक आगे बढ़ेगा और भारतीय समाज के नये निर्माण की महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करेगा।

शिक्षण का प्रधान विषय यद्यपि संजीवन विद्या-जीवन जीने की कला ही था, पर इस बार धर्म प्रचार की विशेष शिक्षा देने का भी प्रबन्ध किया गया था जिसे शिक्षार्थियों ने बहुत पसन्द किया।

नई ‘गीता कथा’के प्रवचनों में सैकड़ों ऐतिहासिक, पौराणिक कथाएं दृष्टान्त, नीति श्लोक, रामायण की चौपाइयाँ जुड़ जाने से उसका प्रवचन बहुत ही आकर्षक एवं हृदयग्राही बन गया। कथा सामूहिक पारायण किये जाने का स्वरूप भी बड़ा सुन्दर बन पड़ता था। यह गीता कथा सुन कर सभी को यह निश्चय हो गया कि भागवत सप्ताहों की तरह गीता सप्ताहों का आयोजन भी लोकप्रिय हो सकता है और उससे जन-जागरण का उद्देश्य भली भाँति पूरा हो सकता है।

एक दिन नवनिर्मित सत्य नारायण कथा भी बड़े उत्साहपूर्ण वातावरण में हुई। कथानक लीलावती, कलावती आदि के पुराने ही हैं, पर कथा पात्रों के पारस्परिक संवादों में जीवन निर्माण की प्रायः सभी महत्वपूर्ण शिक्षाएं भर दी गई हैं। यह कथा जिनने सुनी, उनने विश्वास किया कि यदि यह कथा घर-घर सुनाई जाने लगे तो धर्म और संस्कृति के पुनरुत्थान में भारी योगदान मिल सकता है।

दैनिक यज्ञ के उपरान्त प्रतिदिन एक संस्कार कराया जाता था। आगन्तुकों में से जिन्हें अपने या अपने स्त्री-बच्चों के संस्कार कराने थे, उनने नियत तिथियों पर बड़े उत्साहपूर्वक कराये। गर्भवती स्त्रियों का पुंसवन संस्कार और छोटे बच्चों का नामकरण, अन्न प्राशन, मुँडन, विद्यारम्भ आदि किये गये। कितनों के ही यज्ञोपवीत संस्कार हुए। 17 पुरुषों और 2 महिलाओं ने वानप्रस्थ लिये और प्रतिज्ञा की कि वे नियमित रूप से लोक मंगल के लिए सेवा संलग्न रहेंगे और अपना अधिकाँश समय जन जागरण में लगावेंगे। 24 कलशों द्वारा इन पीत वस्त्र धारी वानप्रस्थों का अभिषेक देखकर प्राचीनकाल जैसे कर्मयोगी, साधु ब्राह्मणों का स्मरण हो आता था। अंत्येष्टि और मरणोत्तर संस्कार आटे का बड़ा-सा पुतला बना कर सिखाया गया। आज कल लोग, मुर्दों को ऐसे ही जला देते हैं, जब कि उनका विधिवत् यज्ञ के साथ अंत्येष्टि संस्कार होना चाहिए। नकली पुतले का दाह संस्कार, चिता जलाया जाना आदि कृत्य जहाँ लोगों के कौतूहल का विषय बने हुये थे, वहाँ उससे आवश्यकता के साथ उस संस्कार को ठीक तरह से करने का ज्ञानवर्धन भी हुआ।

संस्कार समाप्त हो जाने पर प्रतिदिन एक पर्व मनाने की शिक्षा आरम्भ की गई। गुरुपूर्णिमा, श्रावणी, पितृ अमावस्या, विजय दशमी, दिवाली, गीता जयन्ती, वसन्त पंचमी, शिवरात्रि, होली, गायत्री जयन्ती पर्वों को किस प्रकार मनाया जाय और उनके माध्यम से समाज शिक्षण किस प्रकार किया जाए, यह सारी पद्धति शिक्षार्थियों ने मनोयोग पूर्वक सीखी। धर्म से जन जागरण का उद्देश्य पूरा करने के लिये यह सारा शिक्षण आवश्यक भी था।

लेखन शिविर यथाक्रम चलता रहा। अखण्ड ज्योति परिवार के दो प्रमुख साहित्य सेवी डॉ0 रामचरण महेन्द्र और श्री सत्यभक्त जी का सार्वजनिक अभिनन्दन किया गया। उन्हें मान-पत्र दिये गये। समारोह में मथुरा के प्रायः सभी साहित्यकार और गण्यमान्य लोकसेवी उपस्थिति थे।

आगन्तुकों को वृज की तीर्थ यात्रा करने के लिए बस किराये पर कर दी गई थी, जिसने वृन्दावन, गोकुल, महावन, दाऊजी, गोवर्धन, नन्दगाँव, बरसाना, जतीपुरा आदि सभी तीर्थ दिखाये। किराये और समय की दृष्टि से इसमें बहुत बचत रही।

जेष्ठ का एक मास तक चलने वाला शिविर प्रत्येक दृष्टि से बहुत सफल रहा। 17, 18, 19 जून के होने वाले समाज सुधार सम्मेलन की तैयारी की जा रही है। चूँकि अखण्ड-ज्योति का यह अंक तब तक छप चुकेगा। सिलाई, कटाई, पैकिंग आदि के लिये समय रहे, इसलिये हर महीने वह 20 तारीख तक छप जाती है। इसलिये इस अंक में सम्मेलन के समाचार न जा सकेंगे उसका उल्लेख अगले अंक में होगा। यह सम्मेलन भी भारतीय समाज के नव-निर्माण की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण सिद्ध होगा, ऐसी आशा है।


आश्विन का आगामी शिक्षण शिविर

अब अगला शिविर 15 दिन का होगा, आश्विन सुदी 1 से पूर्णिमा तक। अँग्रेजी तारीखों के हिसाब से वह 26 सितम्बर से आरम्भ होकर 10 अक्टूबर तक चलेगा। नवरात्रि, विजया दशमी और शरद पूर्णिमा यह तीन पर्व उसी अवधि में पड़ेंगे। जो शिक्षण जेष्ठ के एक महीने में पूरा हुआ है, उसमें से लेखन शिक्षण को छोड़कर शेष सब कुछ 15 दिन में ही सिखाने का प्रयत्न किया जायगा। गीता कथा, सत्य नारायण कथा, षोडश संस्कार, पर्व और त्यौहार मनाना, गायत्री यज्ञ आदि धर्म मंच से हो सकने वाले कार्यक्रमों को इन्हीं दिनों सीखा जा सकता है। नवरात्रि का गायत्री पुरश्चरण भी इन्हीं दिनों हो सकता है। जीवन जीने की कला का प्रशिक्षण एवं व्यक्ति गत समस्याओं के समाधान का परामर्श क्रम इन दिनों चलता ही रहता है। जिन्हें अपना या अपने स्त्री, बच्चों का कोई संस्कार कराना हो, वे भी उन्हीं दिनों में आ सकते हैं।

आश्विन के इस 15 दिवसीय शिविर में जिन्हें आना हो, अभी से स्वीकृति प्राप्त कर लें। संख्या पूरी हो जाने हो अभी से स्वीकृति मिलना कठिन होता है।

उपरोक्त जो शिक्षण 15 दिन में दिया जाना है वह केवल अपनी ओर से बता देने मात्र का होगा। धर्म-प्रचारक एवं कर्मकाण्डी पण्डित बनने के लिए इन शिक्षाओं का अभ्यास करना होगा। अभ्यास के लिए कम से कम पाँच महीने का समय चाहिए। इतने से कम में इतने विषयों में अभ्यस्त बन सकना सम्भव नहीं। इसलिए प्रस्तुत विषयों में जिन्हें निष्णात बनना हो, वे आश्विन के 15 दिवसीय शिविर के साथ अपना अभ्यास आरम्भ करें और माघ में होने वाले 15 दिवसीय शिविर के अन्त तक माघ सुदी 15 तक मथुरा रहें। इस अवधि में वे दो शिविर भी अपनी आँखों देख लेंगे और बीच में 4 महीनों में अभ्यास भी बढ़ा लेंगे। इस अभ्यास क्रम में काम चलाऊ संगीत शिक्षण भी शामिल है। जिनका गला ठीक है, वे हारमोनियम, तबला, खंजरी, खड़ताल, मजीरा, इकतारा आदि का अभ्यास करके एक अच्छे भजनोपदेशक भी बन सकते हैं। संगीत शिक्षण के लिए एक विशेष अध्यापक नियुक्त किया जायगा।

इस धर्म-प्रचारक शिक्षा में 5 महीने के लिए आने वाले व्यक्तियों में यदि कोई आर्थिक दृष्टि से असमर्थ होंगे, तो उन्हें 15- मासिक छात्र वृत्ति भी दी जायगी। इसमें अपने हाथ से बनाकर रूखा-सूखा भोजन कर शिक्षण क्रम जारी रखा जा सकता है। यह शिक्षण भी 26 सितम्बर से ही आरम्भ होगा। जिन्हें आना हो पूर्व स्वीकृति प्राप्त करें।


विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन

समाज का निर्माण परिवार से होता है और परिवार का विवाह से । हर नया विवाह एक नये समाज की रचना करता है। जिस प्रकार छोटी-छोटी कड़ियों को मिलाकर एक जंजीर बनती है, उसी तरह इन छोटे-छोटे परिवारों का समूह ही समाज कहलाता है। यदि सभ्य, सुविकसित, सुसंस्कृत समाज का निर्माण करना हो तो उसके लिए परिवारों के निर्माण पर ध्यान देना होगा। इस संदर्भ में यह आवश्यक है, कि विवाह का शुभारम्भ श्रीगणेश ऐसे वातावरण में हो, जो अन्त तक मंगलमय परिणाम ही उत्पन्न करता है। कहते है कि अच्छी शुरुआत में सफलता की आधी सम्भावना सन्निहित रहती है। जिसका आरम्भ ही दुर्बुद्धि एवं दुर्भावना के साथ होगा उसका विकास भी असन्तोष और संघर्षों के बीच होगा और यह क्रम अन्ततः उसे असफल ही बना देगा।

आज के अधिकाँश विवाह आगे चल कर असफल ही सिद्ध होते हैं। ऐसे कम ही जोड़े निकलेंगे जो एक मन दो शरीर बन कर रहते हों। परस्पर द्वेष दुर्भाव भरे हुए वे किसी तरह अपनी गाड़ी तो घसीटते रहते हैं, पर उसमें भीतर ही भीतर असन्तोष एवं अविश्वास की आग सुलगती रहती है। ऐसे असफल गृहस्थों की शृंखला सभ्य समाज की, सुविकसित एवं सुसंस्कृत समाज की रचना में भला क्या सहायक बन सकती है? आज यही विषम परिस्थिति चारों ओर फैली हुई है ।

समाज निर्माण की आवश्यकता सर्वत्र अनुभव की जा रही है। हर कोई जानता है कि व्यक्ति और समाज का उज्ज्वल भविष्य इसी बात पर निर्भर है कि समाज में श्रेष्ठ परम्पराएं प्रचलित हों। कोई मनस्वी व्यक्ति अपनी प्रतिभा से समाज का वातावरण बदलते हुये भी सफल होते हैं, पर अधिकतर होता यह है कि समाज की जैसी भी स्थिति एवं परम्परा होती है, उसी के अनुरूप व्यक्तियों का बनना और ढलना जारी रहता है। तदनुसार ही उस देश, समाज या जाति का उत्थान एवं पतन होता रहता है। यदि हमें नये समाज का निर्माण वस्तुतः करना हो, तो उसके मूल विवाद पर अत्यधिक ध्यान देना होगा। उसमें जो विषमता विशृंखलता एवं विकृति उत्पन्न हो गई है, उसे सुधारना होगा। इसके बिना समाज निर्माण, मानव प्रगति एवं विश्व शान्ति के सपने साकार न हो सकेंगे।

हिन्दू समाज में विवाहों का आरम्भ आज जिस ढंग से, जिस विचारधारा के साथ आरम्भ किया जाता है, उसे अत्यन्त निराशाजनक एवं दुर्भाग्यपूर्ण ही कहना चाहिए। उपयुक्त जोड़ी ढूँढ़ने से लेकर दोनों कुटुम्बों में परस्पर अगाध स्नेह सहानुभूति रहने तक जो उल्लासपूर्ण वातावरण रहना चाहिए और दो आत्माओं के आत्मसमर्पण यज्ञ की जो परम पवित्र धार्मिक सद्भावना पूर्ण परिस्थितियाँ रहनी चाहिए, उनका कहीं ढूँढ़े भी दर्शन नहीं होता। सच तो यह है कि सब कुछ इससे विपरीत होता है। छोटे-छोटे अबोध बालकों को गृहस्थ निर्माण का भार वहन करने के लिए विवाह वेदी पर प्रस्तुत कर दिया जाता है। युवावस्था आने से पूर्व विवाह करना, अबोध बालकों का बाल विवाह भी भला कोई विवाह है। उसे तो एक श्रेष्ठ परम्परा का थोथा प्रदर्शन मात्र कहा जा सकता है। इसी प्रकार अनमेल विवाह भर्त्सना के योग्य है। अधेड़ एवं बूढ़े आदमी यदि अपनी बेटी, पोतियों की आयु की बच्चियों से विवाह करें तो उसमें क्या तो नैतिकता मानी जायगी और क्या मानवता एवं क्या सामाजिकता? कई-कई बच्चे होते हुए भी पुरुष एक के बाद दूसरे कई-कई विवाह करते चले जायें, पर स्त्री यदि अल्पायु में भी विधवा हो जाय तो उसे उस प्रकार की सुविधा न मिले। इस तरह के पक्षपात एवं अन्याय युक्त कानून जिस समाज में प्रचलित हों और उसके लोग इस अनीति का समर्थन भी करते हों, तो उसे अपने को धर्मवान कहलाने का भला क्या अधिकार हो सकता है?

आज जिस ढंग से, जिस आडम्बर, अहंकार और तामसी वातावरण में विवाह-शादियाँ होती हैं, उन्हें देखकर किसी भी प्रकार यह नहीं कहा जा सकता कि यह दो आत्माओं के आत्म-समर्पण के लिए आयोजित सर्वमेध यज्ञ का धर्मानुष्ठान है। उन दिनों तमोगुण की ही घटायें छाई रहती हैं। अश्लील गीत, गन्दे नाच, ओछे मखौल, पान, बीड़ी, भाँग शराब की धूम, देखकर उसकी संगति यज्ञ से कैसे बिठाई जाय?

यह हलका-फुलका धर्म कृत्य मानव-जीवन की एक साधारण-सी आवश्यकता है। जिस प्रकार मुण्डन अन्न प्राशन, विद्यारम्भ, जनेऊ वानप्रस्थ आदि अन्य संस्कार होते हैं, वैसा ही विवाह भी एक साधारण-सा धर्मानुष्ठान है। उसमें संस्कार का कुछ बड़ा आयोजन रह सकता है, हर्ष उल्लास का छोटा-मोटा आयोजन भी रह सकता है, पर वह इतना खर्चीला और उलझन भरा कदापि न होना चाहिए कि आर्थिक दृष्टि से दोनों पक्षों का कचूमर ही निकल जाय। बारातियों की सर्वथा अनावश्यक भीड़ को इधर से उधर ठेले फिरने, उनके ठहराने, अनेक तरह की सुविधाएं जुटाने एवं कीमती प्रीति-भोजों का खर्चीला भार उठाने में किसका क्या लाभ होता है यह समझ में नहीं आता? बाराती यह समझते हैं कि हमने अपना वक्त बर्बाद कर के और इतनी किल्लत उठाकर बेटे वाले पर अहसान किया। बेटे वाला बरात के लाने, ले जाने की कष्टसाध्य व्यवस्था जुटाता है। बेटी वाले का तो उनकी आव-भगत में कचूमर ही निकल जाता है। इस मूर्खतापूर्ण हंगामे का उस पवित्र धर्मानुष्ठान के साथ कोई तुक नहीं बैठता, फिर भी बरातों की दौड़ धूप चलती ही रहती है। अनावश्यक गाजे-बाजे, महंगी सवारियाँ, आतिशबाजी, फूल पट्टी आदि में ढेरों पैसा बर्बाद होता है। इस बर्बादी का भारत जैसे गरीब देश के गरीब लोगों पर आर्थिक दृष्टि से कितना बुरा असर पड़ता है इसे हर विचार-शील व्यक्ति आसानी से समझ सकता है।

इतने से ही काम चल जाता तब भी भुगता जाता। समस्या तो और भी भयानक तब सिद्ध होती है जब वरपक्ष की ओर से मोटी रकम दहेज के रूप में माँगी जाती है, उसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाता है। नकदी, जेवर, सामान के रूप में यह माँग आमतौर से इतनी बड़ी होती है कि औसत आर्थिक स्थिति का कोई कन्या का पिता छाती पर पत्थर रखकर ही उसकी पूर्ति कर सकता है। जिन्हें दो-चार कन्याओं के लगातार विवाह करने पड़े हैं और जिनके पास कहीं से अनाप-शनाप आमदनी नहीं होती, वे जानते हैं कि दहेज किस पिशाच का नाम है और उस कोल्हू में पेले जाने पर लड़की के परिवार का तेल किस करुण क्रन्दन के साथ निकलता है। आज जो लड़के वाला बनकर दहेज माँगता है, कल उसे भी अपनी लड़की का विवाह करने पर उसी चक्की में पिसना पड़ता है। इस दुर्गति को जानते हुए भी न जाने क्यों हमारी आँखें नहीं खुलतीं और रोते कलपते उसी दुर्दशा के कुचक्र में पिलते- पिसते रहते हैं।

कन्या पक्ष वाले भी अपने ढंग से लगभग दहेज से मिलती-जुलती दूसरी घात चलते रहते हैं। उनकी प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप से यह माँग अवश्य रहती है कि जितने अधिक जेवर, जितने अधिक कीमती कपड़े उसकी बेटी पर चढ़ाये जावें, उतना ही अच्छा है। उनके दरवाजे पर बेटे वाले अपनी अमीरी का ऐसा प्रदर्शन करें ताकि उसे यह शेखी जताने का मौका मिले कि उसकी लड़की कितने अमीर घर में ब्याही गई है। लड़की वाले की यह माँगें पूरा करने के लिए लड़के वालों को अपनी आर्थिक बर्बादी करनी पड़ती है। इसका बदला वे दहेज की माँग को बढ़ा-चढ़ा कर करते रहते हैं। इस प्रकार दोनों ही पक्ष न्यूनाधिक मात्रा में इस पाप में हाथ साने रहते हैं और विवाह का स्वरूप सब मिला कर एक प्रकार के सामाजिक उन्माद जैसा बन जाता है। होली के दिनों में लोग कीचड़ उछालते, गन्दे गीत, गाते, अन्ट-सन्ट बकते और उद्धत आचरण करते देखे जाते हैं। विवाह के दिनों में लोगों की जो विचारणा और कार्यपद्धति देखी जाती है, उसे भी उद्धत आचरण ही माना जा सकता है। यह एक प्रकार का उन्माद ही तो है। भला चंगा आदमी उन्माद रोग से ग्रस्त होने पर अपार हानि सहता है। हिन्दू-समाज को भी विवाहोन्माद के कारण कितनी अधिक हानि उठानी पड़ी है, कितनी उठानी पड़ रही है, कितनी उठानी पड़ेगी, इसका अनुमान लगाने पर विचारशील व्यक्ति का मस्तक चकराने लगता है। जिसके हृदय में देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति के प्रति तनिक भी दर्द है, उसे यही सोचने को विवश होना पड़ता है कि इस उन्माद का जितनी जल्दी अन्त हो उतना ही अच्छा है।

अब समय आ गया जब कि हमें इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठाने ही चाहिए। अखण्ड-ज्योति परिवार की युग-निर्माण योजना के सदस्यों का उत्तरदायित्व इस सम्बन्ध में बहुत अधिक है। उन्होंने नव-निर्माण की जो शपथ ली है, उसके अनुसार विवाहोन्माद को चुपचाप सहते रहना- उसका प्रतिरोध न करना किसी प्रकार उचित न होगा। उन्हें आगे बढ़कर कदम उठाने ही चाहिए। प्रसन्नता की बात है कि वह उठाये भी जा रहे हैं। ‘विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन’ का विधिवत् उद्घाटन किया गया है। 17, 18, 19 जून को गायत्री तपोभूमि में जो परिवार के कर्मठ कार्य-कर्ताओं का समाज-सुधार सम्मेलन हुआ, उसमें यह निश्चय किया गया कि अब इस प्राणघातक सामाजिक बीमारी से भारतीय समाज को छुड़ाने के लिए हम लोग भावनाशील स्वयं-सेवकों की तरह एक जुट होकर काम करेंगे। कुरीतियों की जड़ें बेशक गहरी होती हैं और वे देर में समूल नष्ट हो पाती हैं, पर इससे क्या? जब अटूट निष्ठा के साथ काम किया जायगा तो आज न सही तो कल उसका सत्परिणाम प्रस्तुत होगा ही।

अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को दो दो चार-चार की टोलियों में और जहाँ वैसा प्रबन्धन हो सके वहाँ अकेले ही विवाहोन्माद के विरुद्ध वातावरण बनाने के लिए कार्य संलग्न होना है। इस प्रयोजन के लिए (1) ऐसे प्रतिज्ञापत्र छपाये गये हैं, जिसमें एक ओर विवाहों में आज कल प्रचलित बुराइयों का दिग्दर्शन कराया गया है और दूसरी और उन बुराइयों को परित्याग करने का प्रतिज्ञा पत्र है। (2) 10 ट्रैक्ट गत मास इसी संदर्भ में लिखे और छापे जा चुके हैं। (3) जो विवाहोन्माद त्यागने की प्रतिज्ञा करेंगे, उनके लिए अभिनन्दन-पत्रों जैसी 20-20 पन्नों की छोटी पुस्तिकाएँ छपी हैं। प्रतिज्ञा कर्ताओं को यह अभिनन्दन-पत्र उनके उत्साह एवं संकल्प को बढ़ाने के लिए दिये जाया करेंगे। इन तीनों उपकरणों को लेकर हमें प्रचार कार्य के लिए निकलना होगा। टोलियाँ माध्यमिक स्कूलों, हाई स्कूलों एवं कालेजों में जायेंगी और जो किशोर लड़के विवाह योग्य होते जाते हैं, उन्हें दसों ‘ट्रैक्ट’ पढ़ाने का प्रबन्ध करेंगी। इन ट्रैक्टों में प्रस्तुत विषय की इतनी विचारणा एवं प्रेरणा भरी हुई है कि उसे पढ़ने के बाद कोई बिरला ही आन्दोलन की उपयोगिता से असहमति प्रकट कर सकेगा। ट्रैक्ट पढ़ने के अतिरिक्त प्रवचन एवं विचार विनिमय का क्रम भी चलाया जाना चाहिए और जो भी नव-युवक प्रस्तुत विचार-धारा को अपनाने के लिए तैयार हो जायें, उनसे प्रतिज्ञा-पत्र भरवाने चाहिए। लगे हाथों उत्साह अभिवर्धन के लिए प्रतिज्ञा-पत्र के उत्तर में अभिनन्दन-पत्र भी दे दिया जाय। जो नव-युवक प्रतिज्ञा लें, उन्हें अधिक उत्साहित कर अपनी कक्षा में या अपने स्कूल में इस आन्दोलन को अधिक पनपाने का प्रयत्न करने के लिए तैयार करना चाहिए। 10 पुस्तिकाओं का एक सैट भी जिस छात्र के पास होगा, वह एक बार में एक छात्र को एक पुस्तक पढ़ाने का क्रम चलाये और एक की पुस्तक बदल कर दूसरे को प्रतिदिन देता रहे तो दस दिन दस छात्र उसे पढ़ सकते हैं। अर्थात् प्रतिदिन एक छात्र का औसत एक सैट हो। साल में आसानी से 200 छात्रों को एक सैट से प्रभावित किया जा सकता है। यदि इस तरह के कई छात्र प्रचारक हो जाय और अपने-अपने ट्रैक्ट सैट रखें तो उनसे सारे विद्यालय के छात्रों को एक-दो महीने में ही प्रशिक्षित किया जा सकता है। दो रुपये में डाक खर्च समेत मिलने वाला यह ट्रैक्ट सैट खरीदना ऊँची कक्षा के किसी भी छात्र के लिए कुछ अधिक कष्टकर नहीं हो सकता। फिर कई छात्र मिलकर भी कई सैट खरीदने की व्यवस्था बना सकते हैं। छात्र न सही अपने प्रचारक भी अपनी ओर से यह प्रबन्ध कर सकते हैं। अपना अंश दान का जमा हुआ पैसा अथवा दूसरों से थोड़ा-थोड़ा करके चन्दा इकट्ठा करके कई सैट मंगाये जा सकते हैं और उन्हें स्कूल कालेज में पढ़ाने के लिए किन्हीं उत्तरदायी एवं भाग्य शाली छात्रों को दिया जा सकता है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि हर विद्यालय में यह विचारधारा तेजी से फैले और हर अविवाहित नव-युवक उससे प्रभावित होकर विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन में सम्मिलित हो। अपना निज का विवाह आदर्श रीति से ही करने के लिये कटिबद्ध हो, फिर भले ही उसके लिये उसे घर वालों का कितना ही विरोध क्यों न रहना पड़े। हर घर में ऐसे प्रह्लाद उत्पन्न किये जाने चाहिए, जो साहस पूर्वक अपने अभिभावकों को भी सन्मार्ग पर चलाने का सत्याग्रह कर सकने का साहस प्रदर्शित कर सकें। यह आन्दोलन छात्राओं तक भी पहुँचना चाहिए। वे विवाहोन्माद में ग्रसित पागलों के साथ विवाह करने या उनके घर जाने की अपेक्षा अविवाहित रहना श्रेयस्कर मानें तो यह उनकी आदर्शवादिता एवं गर्व-गौरव भरी प्रतिज्ञा ही होगी।

यह आन्दोलन छात्रों तक ही सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसके लिये घर-घर अलख जगाया जाना चाहिये। पढ़े लिखे लोगों को प्रस्तुत 10 ट्रैक्ट पढ़ाये जाये और बिना पढ़ों को उन्हें सुनाया जाना चाहिए। गोष्ठियों में, व्याख्यान मालाओं का आयोजन जगह-जगह होना चाहिए। विवाहोन्माद के फलस्वरूप होने वाली हानियों का दिग्दर्शन कराने वाली चित्र प्रदर्शनियों का आयोजन करना चाहिए। जहाँ अभिनय, नाटक, एकाँकी, नौटंकी, कवि सम्मेलन, गायन आदि का प्रबन्ध हो सकता हो, वहाँ इसी विचार धारा में अनुरूप प्रेरणाएं प्रस्तुत करनी चाहिए। जहाँ आदर्श रीति से विवाह हों, उनका अधिकाधिक प्रचार किया जाय और ऐसे आदर्शवादियों का सार्वजनिक अभिनन्दन करने में पूरे उत्साह के साथ प्रबन्ध करना चाहिए। ‘युग-निर्माण योजना’ (पाक्षिक) में ऐसे समानान्तर और वर-वधुओं के एवं उनके अभिभावकों के चित्र सहर्ष छापे जाते हैं।

जो भी अन्य तरीके सूझ पड़ें, उन्हें सोचा जाना चाहिए और अपने-अपने ढंग से सर्वत्र विवाहोन्माद विरोधी आन्दोलन को पनपाने के लिए भूमिका तैयार करनी चाहिए। युग की यह माँग और पुकार आज की घड़ी में अत्यन्त महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है, उसे पूरा करने के लिए हम में से हर एक को पूरी तत्परता और निष्ठा के साथ प्रयत्न करना चाहिए।


दुष्प्रवृत्ति निरोध आन्दोलन

विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन आज के हिन्दू समाज की सबसे बड़ी एवं सबसे प्रमुख आवश्यकता है। उसकी पूर्ति के लिए हमें अगले दिनों बहुत कुछ करना होगा। हमारा यह प्रयत्न निश्चित रूप में सफल होगा। अगले दिनों हवा बदलेगी और आज की खर्चीली वैवाहिक कुरीतियाँ पीढ़ी वालों के लिए एक कौतूहल की बात रह जायगी। कुछ वर्षों बाद भावी सन्तान को यह खोज करनी पड़ेगी कि हमारे पूर्वज थे तो बुद्धिमान पर ऐसी मूर्खतापूर्ण रीति-रिवाज के जंजाल में फँसकर इतना कमर तोड़ अपव्यय आखिर करते क्यों थे? वह दिन निश्चित रूप में आने हैं। समय की माँग, युग की पुकार इतनी प्रबल होती है कि उसके द्वारा बड़े-बड़े प्रवाह मोड़ दिये जाते हैं। इस परिवर्तन का लाभ अगली पीढ़ी को मिलेगा, हमें तो इसके लिए भागीरथ तप ही करना है और प्रतिरोध करते हुए गोली न हो तो कम से कम गाली तो खाते ही रहना है। अन्ध मान्यताओं की भी नशेबाजी जैसी लत होती है, वह मुश्किल से छूटती है। इसलिए काम बहुत कठिन है। पर कठिन काम भी मनुष्य ही करते हैं। हम कठिनाइयों को चीरते हुए आगे बढ़ेंगे और समय को बदल डालने की प्रतिज्ञा पूरी करके रहेंगे।

विवाहोन्माद की जड़े काफी गहरी हैं। उन्माद रोगग्रस्त व्यक्ति के गले कोई बात उतारना काफी कठिन होता है। रूढ़ियों की चुड़ैल जिनकी गर्दन पर सवार है उनके लिए समझ की बात मानना अपनाना काफी कठिन होगा। यह प्रचार करते हुए जहाँ जाया जाय वहाँ प्रथम बार में ही सफलता मिल जाय, इसकी आशा कम ही होगी। कितनी ही बार प्रचारक को निराश और तिरस्कृत होकर लौटना पड़ेगा। ऐसी दशा में मानव मनोविज्ञान के अनुसार यह हो सकता है कि तिरस्कृत करने वाले और तिरस्कार सहने वाले के बीच मनोमालिन्य का अंकुर उत्पन्न हो जाय और उसके कारण आगे मिलने-जुलने या मधुर सम्बन्ध बनाये रहने में बाधा उत्पन्न होने लगे। यदि ऐसा हुआ तो उससे अपने मिशन को नुकसान ही पहुँचेगा।

इस समस्या का हल करने के लिए यह आवश्यक प्रतीत हुआ है कि विवाहोन्माद प्रतिरोध आन्दोलन के साथ-साथ एक छोटा सहायक आन्दोलन और भी चालू रखा जाय। जिससे जो लोग आदर्श विवाहों की पद्धति अपनाने के लिए तैयार न हो सकें उन्हें उस सहायक आन्दोलन के किसी अंश के साथ सहमत करने का प्रयत्न किया जाय। किसी न किसी बात पर यदि व्यक्ति को सहमत कर लिया जाय तो विदाई के समय मधुरता बनी रहती है और आगे के प्रेम सम्बन्धों में अन्तर नहीं आता। आज की थोड़ी सहमति आगे चलकर बड़ी सहमतियों के रूप में परिणत हो सकती है। अतएव एक सरल आन्दोलन भी साथ-साथ चलते रहने की आवश्यकता अनुभव की गई है।

इस सहायक आन्दोलन का नाम है—”दुष्प्रवृत्ति निरोध आन्दोलन” यों इसकी उपयोगिता, आवश्यकता एवं महत्ता भी किसी प्रकार कम नहीं। समाज निर्माण एवं सुधार के लिए दूसरा सहायक आन्दोलन के अंतर्गत आने वाले काम भी कम महत्व के नहीं हैं। चरित्र निर्माण, व्यक्ति निर्माण एवं समाज निर्माण में इनका भी भारी योगदान रहेगा। पर सहायक आन्दोलन उसे इसलिए कहा गया है कि उसमें बताये हुये दस कार्यों में से किसी न किसी के लिये कोई भी व्यक्ति आसानी से सहमत किया जा सकता है और बिना अधिक कठिनाई के आन्दोलन में सम्मिलित होने वाला, कोई एक प्रतिज्ञा लेने वाला बन सकता है।

दुष्प्रवृत्ति निरोध आन्दोलन के अंतर्गत दस कार्यक्रम रखे गये हैं—

माँसाहार—माँस, मछली, अण्डे एवं काटे हुए पशुओं के चमड़े का उपयोग।

नशेबाजी—तम्बाकू, भाँग, गाँजा, अफीम, शराब आदि नशों का सेवन।

पशुबलि—देवी देवताओं के नाम पर निरीह पशु-पक्षियों की हत्या।

मृत्यु भोज—मृतक के नाम पर धूमधाम भरी दावतों का अपव्यय।

ऊँच-नीच—गुणों की अपेक्षा पद, वंश, जाति के कारण किसी को ऊँचा या नीच मानना।

नारी तिरस्कार—पुरुष की तुलना में नारी का गौरव, महत्व, सम्मान या अधिकार कम मानना।

बेईमानी-चोरी, छल, जुआ, समर्थ होते हुए भी अपने लिये भिक्षा याचना अनीति एवं बिना परिश्रम की कमाई।

अपव्यय-फैशन, जेवर, आडम्बर, विलासिता एवं व्यसनों की फिजूलखर्ची।

अन्ध विश्वास— भूत-पलीत, टोना, टोटके शकुन-अपशकुन जैसी मूढ़ मान्यतायें।

असभ्यता—गाली-गलौज, गन्दगी, आलस-अशिष्टता, कृतघ्नता, आवेश जैसे दुर्गुण।

इन दोष-दुर्गुणों में से कुछ न कुछ तो हर व्यक्ति में पाये जाते हैं। उनमें से एक-दो को भी छोड़ दिया जाय तो उससे व्यक्ति एवं समाज के उत्थान में बड़ी सहायता मिलती है। जिस प्रकार बुरी आदतें छूत की बीमारी की तरह फैलती हैं और दूसरों को भी वही लत लगाती है उसी प्रकार उनका त्याग करने और आदर्शवाद अपनाने की प्रवृत्ति भी यदि पनपे तो उसका प्रभाव अनेक लोगों पर पड़ता है और वे भी उसी प्रकार प्रभावित होते हैं और यह शृंखला तेजी के साथ आगे चलने लगती है।

‘दुष्प्रवृत्ति निरोध आन्दोलन’ भी साथ-साथ ही हमें चलाना है। इसके लिये विवाहोन्माद आन्दोलन जैसे प्रतिज्ञा पत्र भी छपाये गये हैं और उन्हें भरने वालों के लिये प्रमाण पत्र जैसे छोटे-छोटे अभिनन्दन पत्र भी। इस संदर्भ में भी 10 ट्रैक्ट लिखे और छापे जा रहे हैं। वे भी दो महीने के भीतर तैयार हो जायेंगे। इस प्रकार इन 10 दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध प्रचार करना और वातावरण बनाना भी संभव हो जायगा। जब तक बिना ट्रैक्टों के भी प्रवचनों एवं विचार विनिमय द्वारा लोगों को आवश्यक तथ्य समझाये जा सकते हैं और इन बुराइयों को छुड़ाने का आन्दोलन चलाया जा सकता है।

नव निर्माण की दिशा में यह दूसरा आन्दोलन भी महत्वपूर्ण है। दोनों मिलकर सोने में सुगंध का कार्य करेंगे। टोलियाँ बनाकर या अकेले भी इन आन्दोलनों से जनता को परिचित एवं प्रभावित करने के लिये उनमें सम्मिलित एवं प्रतिज्ञाबद्ध करने के लिये हमें जुट जाना चाहिये। हमारा आज का श्रम उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएं प्रस्तुत करेगा। आज का अपना

काम बीज के गलने पर वृक्ष की उत्पत्ति का उदाहरण बनेगा


हम में से हर एक को यह करना ही चाहिये

अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को गत 26 वर्षों में जिस अध्यात्म एवं आत्म-कल्याण की शिक्षा दी जाती रही है उसका एक आवश्यक एवं अनिवार्य अंग ‘लोक सेवा’ को बताया जाता रहा है। विश्व मानव ही भगवान का विराट रूप है। जब तक सहृदयता, परोपकार, लोक मंगल के लिए कुछ,त्याग करने की वृत्ति उत्पन्न न हो तब तक यही कहना होगा कि भजन पूजन में रुचि बढ़ जाने पर भी सच्चे अध्यात्म का उदय नहीं हुआ। जिसमें आस्तिकता, धर्मबुद्धि एवं मानवता का एक कण भी जगा होगा वह लोक मंगल के लिये कुछ किये बिना रह ही न सकेगा। देश,धर्म, समाज और संस्कृति को सुविकसित बनाने के लिये प्रत्येक भावनाशील व्यक्ति की अन्तरात्मा उसे कचोटती ही है और अपनी अन्तः प्रेरणा से विवश होकर कुछ समय, श्रम एवं धन लोकमंगल के लिए खर्च करना ही पड़ता है। इसी प्रकृति के विकसित होने पर किसी व्यक्ति की आत्मिक स्थिति के उत्थान-पतन का अनुमान लगाया जाता है।

अब समय आ गया है जब कि हम आत्म परीक्षण करें और अपने गत 26 वर्षों के श्रम की सफलता, असफलता का लेखा-जोखा बनावें। अखण्ड-ज्योति जो कुछ कहती सिखाती रही है उसे कितनों ने हृदयंगम किया है अब इसकी जाँच की जानी आवश्यक है। लेख अच्छे होते हैं, पसन्द भी आते हैं ऐसा कहने वाले बहुत लोग हैं, उनकी गणना ‘प्रशंसकों’ में की जा सकती है। संसार में अनेक रुचियों के लोग हैं। कुछ ऐसे भी हैं जो धर्म, अध्यात्म, सदाचार आदि का विषय पढ़ना, सुनना पसन्द करते हैं। मनोरंजन का यह भी एक विषय या तरीका हो सकता है। पर इससे कुछ अधिक बनता नहीं। प्रयोजन तब पूरा होता है जब इन प्रेरणाओं को हृदयंगम किया जाय और उसके अनुसार कुछ करने के लिये कुछ कष्ट सहने के लिये, थोड़ा त्याग जैसा साहस दिखाने का भी साहस उत्पन्न हो सके। परख की कसौटी इसी तथ्य को बनाया जा सकता है।

युग निर्माण योजना के माध्यम से हमने अपने परिजनों की आन्तरिक स्थिति को परखना आरम्भ किया है। देश, धर्म, संस्कृति एवं समाज के पुनरुत्थान की इस पुण्य वेला में हमें स्वजनों के श्रम एवं सहयोग की अत्यधिक आवश्यकता है। इसके लिए समय-समय पर संकेत भी किया जाता रहा है पर अब युग निर्माण योजना का द्वितीय वर्ष समाप्त होकर तृतीय वर्ष आरम्भ होने जा रहा है, तब अगली गुरु पूर्णिमा (13 जुलाई 65) से हम अपने अन्तरंग आत्मीय जनों से इस सम्बन्ध में कुछ अधिक नियमित और अधिक स्पष्ट आशा करना आरम्भ करेंगे। “एक घण्टा, एक आना” नित्य देने के लिये गत अंक में अनुरोध किया गया है। वह उपेक्षणीय नहीं अत्यधिक आवश्यक है। आज की घड़ियाँ अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं, उनमें जागृत आत्माओं की अकर्मण्यता सहन नहीं की जा सकती। जब पड़ौस के छप्परों में आग लग रही हो तब किसी का अकर्मण्य पड़े रहना ठीक नहीं। हर व्यक्ति के सामने अपनी व्यक्तिगत समस्याएं हो सकती हैं, पारिवारिक एवं आजीविका सम्बन्धी उलझनों में व्यस्त रहने या आर्थिक शारीरिक, मानसिक चिन्ता में डूबे रहने की कठिनाई हो सकती है। पर इन सब को हल करने के लिये मनुष्य किसी न किसी तरह समय निकालता, श्रम करता एवं उपाय सोचता है। इन्हीं आवश्यक समस्याओं में एक समस्या लोक मंगल के परम पवित्र कर्तव्य का पालन करने के लिये नियमित रूप में थोड़ा त्याग करते रहने की भी मानी जानी चाहिये और उसे हल करने के लिए भी कुछ न कुछ किया ही जाना चाहिये। जो लोग फुरसत न मिलने और आर्थिक कठिनाई रहने का बहाना परमार्थ कार्य करने के लिये बनाया करते हैं उनका वास्तविक प्रयोजन यह होता है कि हमारे व्यक्तिगत कार्य ही हमारे लिये आवश्यक हैं। परमार्थ कार्य तो निरर्थक एवं पराये हैं, उनके लिये यदि बहुत अधिक फालतू समय या फालतू पैसा बचता होगा तो ही इन बेकार बातों पर ध्यान देंगे। जिनकी ऐसी मान्यता होती है उन्हीं के मुँह यह बात शोभा देती है कि हमें लोक मंगल का धर्म कर्तव्य पालन करने के लिये कुछ भी करने का अवसर नहीं है।

अपने परिवार को हमने आरम्भ से ही यह सिखाया है कि हम अपने आवश्यक से आवश्यक कार्यों से भी लोक मंगल के कार्य को कम महत्व न दें। जीवन की सफलता और असफलता का यह निर्णायक तथ्य है। राष्ट्र के जीवन मरण की समस्या है। मानव जाति का भविष्य उज्ज्वल या अन्धकारमय होना इसी बात पर निर्भर है। विचारशील और भावना सम्पन्न व्यक्ति यदि लोक मंगल के लिये नियमित रूप से समय दान करना एक अत्यन्त आवश्यक धर्म कर्तव्य न मानेंगे और व्यक्ति गत स्वार्थ संकीर्ण सीमा में उलझे हुये ही अपनी सारी शक्तियों की इतिश्री करते रहेंगे तो यही मानना होगा कि अभी जागरण पर्व दूर है, अभी उज्ज्वल भविष्य की आशा करने के दिन नहीं आये। पढ़ने या सुनने से नहीं, कुछ करने से भाग्य का निर्माण होता है। जब करने का समय आवे तब हम बहाने बनावें तो फिर यह कहना होगा कि ऐसे स्वार्थी लोगों से भरे समाज में दिन पलटने की आशा नहीं करनी चाहिये।

यद्यपि आज बाहुल्य ऐसे ही लोगों का है जो अध्यात्म का अर्थ ‘व्यक्तिगत लाभ’ मात्र मानते हैं। देवताओं का वरदान, स्वर्ग, मुक्ति या ऋद्धि-सिद्धि तक ही उनकी दृष्टि सीमित रहती है, परमार्थ का नाम सुनकर कन्नी काटते हैं, फिर भी ऐसा नहीं सोचना चाहिये कि अध्यात्म का वास्तविक तात्पर्य और उसकी उपयोगिता समझने वालों का सर्वथा अन्त हो गया है। इस अन्धकार के घटाटोप में भी टिमटिमाते सितारे विद्यमान है । अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य उसी श्रेणी में है। उन्होंने आरम्भ से ही यह सीखा है कि आत्मा की प्रगति और ईश्वर की प्रसन्नता तब तक संभव नहीं जब तक कि व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत संकीर्णता एवं स्वार्थपरता के दायरे से निकल कर ‘लोक मंगल’ की ओर कदम बढ़ाते हुये अपनी आदर्शवादिता, सहृदयता, उदारता एवं श्रेष्ठता, का परिचय न दे। इसलिये उसके लिये देशभक्ति एवं समाज सेवा उपेक्षणीय नहीं रहती वरन् व्यक्तिगत कार्यों से भी अधिक आवश्यक, उपयोगी एवं आनन्ददायक प्रतीत होती रहती है।

अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों में से अधिकाँश इसी स्तर एवं इसी मनोभूमि के हैं। इसलिये हमें विश्वास बना रहता है कि अपने इन परिजनों की सहायता से नवनिर्माण के बड़े से बड़े कार्यक्रमों को आसानी से सफल बना सकेंगे। अब युग निर्माण योजना का तृतीय वर्ष आरम्भ होने पर हमारी इस मान्यता का निर्णयात्मक निश्चय भी हो जायगा। गत अंक में पूछा गया था कि ‘एक घण्टा एक आना” नित्य देने के लिए हममें से प्रत्येक को तैयार होना चाहिये। अब गुरु पूर्णिमा आ पहुँची, इसी 13 जुलाई को वह पर्व है। सामने प्रस्तुत चुनौती का ‘ना’ या ‘हाँ’ में उत्तर मिल जाना चाहिये। इस अंक के साथ एक पत्रिका संलग्न है। उसे गुरु पूर्णिमा की गुरु दक्षिणा के रूप में युग निर्माण योजना के सन्मुख प्रस्तुत किया ही जाना चाहिये। यह भार ऐसा नहीं है जिसे उठाया न जा सके। हम बहुत-सा वक्त यों ही आलस-प्रमाद में बर्बाद करते हैं उसमें से बचाकर क्या एक घण्टा जन संपर्क के लिए मंगल के लिये नहीं दिया जा सकता? मन हो तो समय अवश्य निकलेगा। फुरसत उसी काम के लिये नहीं मिला करती जिसे हम बेकार समझते हैं। नव निर्माण में सहयोग करना ‘बेकार बात’ नहीं है जो यह अनुभव करेगा वह निश्चय ही इतना समय निकाल लेगा। प्रतिदिन एक घण्टा न निकलता हो तो साप्ताहिक छुट्टी के दिन सात घण्टे इकट्ठे लगाते रहने से भी काम चल सकता है। महीने में 30 घण्टों का कोई न कोई सुविधा का समय निकल ही सकता है।

इसी प्रकार एक आना रोज अर्थात् लगभग दो रुपया मासिक भी किसी भावनाशील व्यक्ति के लिये कठिन नहीं हो सकता। यों जिस कार्य की उपयोगिता पर आस्था न हो उसके लिये एक पाई भी भारी पड़ती है। कितने ही लोग ‘अखण्ड-ज्योति’ का चन्दा भेजने तक में हर महीने 30 नये पैसे, नित्य एक नया पैसा खर्च करने तक में आर्थिक संकट का रोना रोया करते हैं। ऐसे अश्रद्धालुओं के बारे में तो कुछ न कहना ही ठीक है। पर हम में से अधिकाँश उस स्तर के नहीं हैं। जो एक घन्टा का कीमती समय खर्च कर सकने का साहस कर सकता है उसके लिये एक आना जैसा छोटा खर्च कर सकना भी भारी नहीं पड़ेगा। इस महंगाई के जमाने में एक आना कुछ माने नहीं रखता। एक पान या एक सिगरेट की यह कीमत है। एक बच्चा इतने से कम जेब खर्च लिये बिना सन्तुष्ट नहीं होता। ‘युग-निर्माण योजना’ को भी अपना एक बच्चा मान लिया जाय तो उसके भरण-पोषण के लिये न सही जेब खर्च के लिये इतनी छोटी रकम देना किसे भारी पड़ेगा? माना कि आजकल अर्थ संकट बहुत है और हर किसी को पैसे की तंगी रहती है पर यह भी ठीक है कि इतने महत्वपूर्ण कार्य का मूल्य समझने वाले के लिये इतना खर्च कर सकना कुछ भी असम्भव नहीं है। गरीब व्यक्ति भी अपनी रोटी में से एक छटाँक आटा कम करके इतना अनुदान जुटा सकता है बशर्ते कि उसमें श्रद्धा विद्यमान है। ‘अखण्ड-ज्योति’ के पाठकों की श्रद्धा असन्दिग्ध है इसलिये इन्हें इसमें कुछ भी कठिनाई अनुभव नहीं हो सकती।

अगले दिनों हम लोगों को ‘नव-निर्माण योजना’ के जन-जागरण का अलख घर-घर जगाना है। लोगों के पास जाना है और विवाहोन्माद एवं दुष्प्रवृत्तियों के परित्याग का अनुरोध करना है। हम 40 हजार व्यक्ति यदि अपने प्रभाव, ज्ञान एवं श्रम का उपयोग करेंगे और एक महीने में एक-एक वर्ष में 12 व्यक्तियों को भी अपने विचारों का बनाने की सफलता प्राप्त कर लेंगे तो अगली गुरु -पूर्णिमा पर हम 40 हजार से बढ़कर 5 लाख होंगे। यही क्रम जारी रहा तो अगले 5 वर्ष में भारत नहीं सारे संसार तक नव-जागरण का संदेश पहुँचाया जाना सम्भव हो सकेगा। नैतिक-क्राँति बौद्धिक क्राँति, सामाजिक क्रांति, का आज बहुत कठिन दीखने वाला कार्य तब इतना सरल बन जायगा कि देखने वाले आश्चर्य करेंगे। समय दान बहुत बड़ा दान है। इसे ‘अखण्ड-ज्योति’ के सदस्यों ने अपना लिया और एक घण्टा नित्य का संकल्प कर लिया तो 40000 घण्टे प्रतिदिन का सामूहिक श्रम जनता की भावनाओं और प्रवृत्तियों को उलट-पलट कर रख देने के लिये बहुत ही कारगर सिद्ध होगा।

प्रचार कार्य, जन-जन के पास नव-जीवन का सन्देश सुनाने का कार्य हमारे समयदान पर ही निर्भर है। फिर हमें परस्पर संगठन भी तो मजबूत करना है। अन्य कितनी ही रचनात्मक प्रवृत्तियों को भी तो जन्म देना है। शाखाओं का संगठन, हर व्यक्ति के षोडश संस्कारों का आयोजन, हर पर्व-त्यौहार का सामूहिक उत्सव, जन्मदिन मनाने की प्रथा प्रचलित कर घर-घर में पारिवारिक सत्संगों का आयोजन, समय-समय पर अभीष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिये विशेष आयोजन करने ही होंगे। इन सब कार्यों में समय तो चाहिये ही। हम लोग समय न देंगे तो फिर यह सब होगा कैसे? कैसे तो संगठन बनेगा और कैसे जनजागरण का क्रम चलेगा? इसलिये समय-दान निताँत आवश्यक है। इसके लिये हमें साहसपूर्वक अपनी वास्तविक महानता का परिचय देते हुए इतना त्याग करते रहने का व्रत लेना ही चाहिये। अगली गुरु -पूर्णिमा यही सन्देश लेकर आ रही है।

समय दान की भाँति ही आर्थिक अंश दान भी आवश्यक है। उपरोक्त कार्यक्रमों में कुछ तो खर्च लगेगा ही। नये समाज की नई रचना के लिये प्रेरणाप्रद साहित्य अनिवार्य रूप से आवश्यक है। उसके बिना एक कदम भी आगे बढ़ना सम्भव नहीं हो सकता। इस प्रयोजन के लिये ‘युग-निर्माण योजना’ के अंतर्गत जो अत्यन्त प्रेरणा भरे ट्रैक्ट तूफानी गति से छापे जो रहे हैं वे यद्यपि अत्यन्त सस्ते रक्खे गये हैं, लाभ की एक रत्ती भी उनमें नहीं रक्खी गई। फिर भी कागज छपाई तो लगेगी ही उसका साधन तो जुटाना ही पड़ेगा। हम में से हर प्रचारक वह साहित्य अपने पास रक्खेगा ही, अपने विचार परिष्कृत करने से लेकर दूसरों को प्रेरणा देने तक का प्रयोजन इन ट्रैक्टों के बिना कैसे पूरा होगा? इन्हें मँगाना ही पड़ेगा। फिर प्रतिज्ञा-पत्रों को वितरण करना, उन्हें भराना, जिनने प्रतिज्ञायें की हैं उन्हें अभिनन्दन पत्र देना, यह प्रचार साहित्य भी तो चाहिये ही । विवाहोन्माद प्रतिरोध और दुष्प्रवृत्ति निरोध के दो-दो आन्दोलन एक साथ चलेंगे तो उनके लिए पर्चे पोस्टर, प्रतिज्ञा पत्र, अभिनन्दन पत्र, ट्रैक्ट आदि न जाने कितने छोटे-बड़े प्रचार साहित्य की जरूरत पड़ेगी। इस आवश्यकता की पूर्ति कहाँ से होगी? अपना प्रतिदिन बचाया हुआ एक आना ही इस जरूरत को पूरा करेगा। निश्चय ही यह पैसा किसी दूसरे को देना नहीं है कहीं दान का मनीआर्डर भी नहीं भेजना है, पर अपने प्रचार कार्य का साधन जुटाने में ही पैसे खर्च किये जायेंगे। यह अंशदान न किया जाय तो भावना रहते हुये भी कोई व्यक्ति विचार विस्तार की दृष्टि से कुछ विशेष कार्य न कर सकेगा। इसलिये समयदान के साथ-साथ ही आर्थिक अंशदान भी—एक आना रोज निकालते रहना भी आवश्यक है। यों सम्पन्न लोग इससे कई गुना दान कर सकते हैं और उन्हें करना भी चाहिये। शाखा संचालन में अनेक खर्चों की आवश्यकता पड़ेगी, इसकी पूर्ति परस्पर मिलजुल कर ही तो शाखा सदस्य करेंगे। इसलिये अधिक उदार लोगों को अधिक सहयोग भी चाहिये ही। पर न्यूनतम अंशदान एक आना प्रतिदिन का तो होना ही चाहिये। श्रमदान और अर्थदान दोनों मिलाकर ही एक प्रचंड शक्ति उत्पन्न होगी, जिसके द्वारा युग निर्माण जैसे महान प्रयोजन की पूर्ति की जा सके।

काम करना ही ठहरा तो उसे पूरे मन से करना चाहिए। अब तक जो परिजन अधूरे मन से नव-निर्माण योजना में योगदान देते रहे हैं उन्हें अब अपनी गतिविधि बदल देनी चाहिए। अगली गुरुपूर्णिमा से “एक घण्टा— एक आना” प्रतिदिन देने का व्रत लेकर अपने आपको एक युग-निर्माता सैनिकों की शृंखला में सम्मिलित करना चाहिए। गुरुपर्व पर इससे बड़ी श्रद्धाँजलि और कोई हो नहीं सकती। युग की पुकार हमें सुननी ही चाहिए और प्रस्तुत चुनौती को स्वीकार करना ही चाहिए। साथ में संलग्न श्रद्धाँजलि फार्म को गुरु पूर्णिमा (13 जुलाई) को भर कर मथुरा से भेजना ही चाहिए।


छह प्रान्तों में युग-निर्माण सम्मेलनों की शृंखला

युग-निर्माण योजना का उद्देश्य स्वरूप, सन्देश और कार्यक्रम ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सभी परिजनों और उसके संपर्क में आने वाले विचारशील लोगों को समझाने के लिए हमने आगामी शीत ऋतु में चार महीने का दौरा करने का निश्चय किया है। माघ सुदी प्रतिपदा से पूर्णिमा तक तो 15 दिन का शिविर तपोभूमि में चलेगा इन 15 दिनों को छोड़कर कार्तिक मार्गशीर्ष पौष, और माघ इन चार महीनों में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात इन छह प्रान्तों में जहाँ व्यवस्था और आवश्यकता होगी वहाँ जाने का प्रयत्न करेंगे। मार्गशीर्ष का पूरा महीना उत्तर प्रदेश । पौष में 15 दिन बिहार । पौष सुदी प्रतिपदा से माघ की अमावस्या तक एक महीने मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र, तथा फाल्गुन का महीना राजस्थान और गुजरात के लिए रखने का विचार किया गया है।

एक महीने में एक क्षेत्र का कार्यक्रम रहने से एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने में समय और खर्च की बचत होती है। इसलिये कार्यक्रम शृंखलाबद्ध ही बनाये जाने चाहिए।

यह छोटे सम्मेलन वस्तुतः विचारगोष्ठियों के रूप में होने चाहिए। इन्हें और उस क्षेत्र के ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के परिजनों एवं विचारशील लोगों को विशेष रूप से निमन्त्रण पत्र भेजकर बुलाया जाय। उनके ठहरने, खाने-पीने आदि का प्रबन्ध किया जाय। प्रातःकाल एक कुण्डी या पाँच कुण्ड हवन भी रखा जा सकता है। पर उसमें सवेरे का थोड़ा ही समय लगाया जाय ताकि बाकी समय विचार विनियम के लिये रह सके। सम्मेलन दो दिन का रहना पर्याप्त है। जिन्हें सम्मिलित होना हो वे दोनों दिन उपस्थित रहें ऐसा प्रबन्ध किया जाना चाहिये। यदि दूर से लोग आने हों तो उन्हें सम्मेलन के पूर्व ही शाम तक आ जाना चाहिये ताकि पूरी बात सुनना और समझना उनके लिए सम्भव हो सके।

अपने निजी गाँव में ही सम्मेलन बुलाने की खींचतान नहीं करनी चाहिए वरन् स्थान ऐसा रखा जाना चाहिए जहाँ यातायात की सुविधा हो और इस क्षेत्र में दूर-दूर से आने वाले लोग बिना किसी कठिनाई के आ सकें, उन्हें सवारी की सुविधा हो सके। जहाँ यातायात के साधन नहीं है ऐसे गहराई में अवस्थित देहातों में दूर के लोग नहीं पहुँच पाते और फलतः उस आयोजन का उद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। जहाँ तक हो सके रेलवे स्टेशनों के समीप ही स्थान रखा जाय। बसों में लम्बी यात्रा करने में हमें उलटी आती है और बीमार पड़ जाते हैं, इसलिये जहाँ लम्बी यात्रा हो वहाँ भी कार्य न रक्खे जाय।

जिन शाखाओं को अपने यहाँ इस प्रकार के सम्मेलन बुलाने की सुविधा हो, उन्हें अपने निमन्त्रण हमें इस जुलाई मास में ही भेज देने चाहिए। ताकि उन सब की शृंखला जोड़कर अगस्त में तिथियाँ निश्चित कर सकना हमारे लिये सम्भव हो सके। निश्चित रूप से शाखाएं ऐसे सम्मेलन उत्साहपूर्वक अधिक संख्या में बुलाना चाहेंगी और अपना समय सीमित ही रहेगा, इसलिये सभी के निमन्त्रण स्वीकार नहीं किये जा सकेंगे। बहुतों को अगले वर्षों के लिये भी स्थगित रखना होगा इसलिये जहाँ अधिक उत्साह और व्यवस्था हो उन शाखाओं को अपना निमन्त्रण योजना में आवश्यक विलम्ब न करके जुलाई में ही परस्पर परामर्श करके अपने निश्चय की सूचना दे देना चाहिये। निश्चित प्रोग्राम बन जाने पर उसमें परिवर्तन करना सम्भव नहीं रहता। इसलिये समय से पीछे आये अनुरोधों को स्वीकार कर सकना आशक्य हो जाता है।

इस दौरे में हम इन छह प्रान्तों के प्रायः सभी परिजनों से, उनके परिवार वालों से मिलना चाहेंगे। इसलिए तिथियों के प्रोग्राम 15 अगस्त तक निश्चित कर दिये जायेंगे और उनकी सूचना 1 सितम्बर के अंक में छाप दी जायगी, जिससे इस क्षेत्र के सब प्रदेशों के लोग वहाँ पहुँचने की तैयारी कर सकें।

युग-निर्माण की महत्ता और उसमें ‘अखण्ड-ज्योति’ परिजनों का योग यह दोनों ही तथ्य अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इसके द्वारा ऐतिहासिक परिवर्तन होने वाले हैं। इसलिये यह प्रचार यात्रा कार्यक्रम की विशेषता एवं उपयोगिता की दृष्टियों से बहुत-चढ़ी सिद्ध होगी।


VigyapanSuchana

पुस्तकें मंगाने के नियमों में परिवर्तन

“अखण्ड-ज्योति” द्वारा प्रकाशित पुस्तकों पर अब तक 10) से अधिक की पुस्तकें मंगाने पर डाक खर्च फ्री होने का नियम था। वह अब पिछले चार महीने से बदल दिया गया है।

अब हर पार्सल पर डाक खर्च मंगाने वालों को देना होगा। किन्तु 10) से अधिक की पुस्तकें लेने पर 15 प्रतिशत कमीशन मिला करेगा।

इसमें पहिले कि अपेक्षा पाठकों को कुछ घाटा रहेगा। पर पोस्टेज के रेट अन्धाधुन्ध बढ़ जाने से उसका कुछ भार मंगाने वाले को भी सहन करना ही होगा।

“अखण्ड-ज्योति परिवार” के कर्मठ परिजनों द्वारा


गुरु पूर्णिमा की श्रद्धाञ्जलि

‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ द्वारा संचालित ‘युग-निर्माण योजना’ का द्वितीय वर्ष समाप्त होकर इस गुरु पूर्णिमा -13 जुलाई 65 को तृतीय वर्ष आरम्भ होता है। इस पुण्य अवसर पर मैंने अनुभव किया है कि हम ‘अखण्ड-ज्योति’ सदस्यों का आज की विषम परिस्थितियों को बदलने का विशेष उत्तरदायित्व है। इस उत्तरदायित्व को पूरी श्रद्धा और तत्परता के साथ निबाहने का मैं आज के पुण्य पर्व पर प्रतिज्ञापूर्वक व्रत ग्रहण करता हूँ।

‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ का कर्मठ सदस्य होने के नाते मुझे ‘एक घण्टा समय एक आना नकद’ की माँग सहर्ष स्वीकार है। जन-जागरण के लिए घर-घर अलख जगाने के लिए एक घण्टा प्रतिदिन के हिसाब से मैं अपना समय लगाया करूंगा। अकेला या टोली बनाकर जैसे भी बनेगा-नव-निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य पढ़ाने और सुनाने लोगों के पास जाया करूंगा। इस प्रयोजन के लिए प्रचार सामग्री खरीदने में जो आवश्यक खर्च पड़ेगा उसकी पूर्ति, अपने दैनिक न्यूनतम अनुदान-’एक आना’ से करूंगा। समयानुसार इससे अधिक भी खर्च किया करूंगा, ताकि कार्य की अधिक प्रगति सम्भव हो सके।

इस गुरु पूर्णिमा की श्रद्धाञ्जलि के रूप में एक घण्टा समय व एक आना नित्य देने का जो व्रत ले रहा हूँ उसे “आजीवन निबाहने का बल मिले” ऐसी परमात्मा से प्रार्थना है।”

गुरु पूर्णिमा

13 जुलाई, सन् 1965....................................................................

हस्ताक्षर

पूरा नाम :- .......................................................................................................................................

पता:- ...................................................................................................................................................................................................................................................................................................

अखण्ड-ज्योति ग्राहक संख्या :- .............................................................................................................

युग निर्माण योजना (पाक्षिक) ग्राहक संख्या :- ...........................................................................................

जन्म तिथि :- ....................................................................................................................................

*समाप्त*