*******
जब कभी अकस्मात् ऐसा आभास हो कि आपको किसी ने आवाज दी हो, और आस-पास देखने और खोजने पर भी पुकारने वाले का पता न चले तो निश्चित रूप से यह समझिए कि आपको अपनी अन्तरात्मा ने आवाज दी है, और उस आवाज का केवल एक ही तात्पर्य है “कि ऐ अमुक! अपने को समझ और मुझको पहचान!” अपने को समझने का अर्थ है- यह देखो कि हम अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार हैं या नहीं? यदि नहीं तो तत्काल ही विवेचना कीजिए उन्हें सुधारिए और एक नये उत्साह से लक्ष्य की ओर बढ़ते जाइये! आत्मा तुम्हारे भीतर तुम्हारे विवरण लेने के लिए जाग्राक है, साथ ही वह एक हृदय पहले की तरह एक दिबा लिए तुम्हारे पर प्रकाश बिखेर रही है। डरो मत तुम्हारे पथ में अन्धकार तो तब हो जाता है जब कोई आँख बन्द करके चलता है। जिसकी आंखें ठीक खुली हैं उसके सामने अन्धकार का कोई प्रश्न नहीं है। कोई डडडड डडडड को सावधान करने डडडड अपनी ओर डडडड करने का डडडड ही देना है। आत्मा की आवाज भी लिए कभी-कभी सुनाई देती है कि मनुष्य और अपनी ओर उन्मुख करने की ही आवाज देता है। ......की आवाज भी ....... लिए कभी-कभी सुनाई देती है कि मनुष्य सावधान होकर ....उसकी ओर उन्मुख हो। सचमुच हो। समय डडडड से गुजर रहा है इसलिए वह प्रमोद से सावधान होकर जीवन लक्ष्य की ओर अग्रसर है। जिसने आत्मा की आवाज सुनी, इसका अनुकरण किया उन्होंने ही मानव जीवन को सार्थक बनाया है और जो जीवन की उपेक्षा करते रहे उन्होंने डडडड कर पछताते रह जाना पड़ा है।
ऋषि विरु बल्लुवर
----***----
परमात्मा का प्रेम पूर्ण है, पवित्र है।
*******
मनुष्य के जीवनोद्देश्य का जितनी गहराई से अध्ययन करें उतना ही यह स्पष्ट हो जाता है कि “अतिशय आनन्द” ही उसकी मूलभूत आकाँक्षा या जीवन का लक्ष्य है। जिस वस्तु में मनुष्य को आनन्द का आभास होता है। वह उधर ही दौड़ता रहता है। यह बात दूसरी है कि अल्प बुद्धि, अविकसित हृदय एवं प्रसुप्त विवेक के कारण वह सच्चे आनन्द को न समझ-पा सके किन्तु चिर-सुख की अभिलाषा प्रत्येक मनुष्य करता है और इसी लक्ष्य की पूर्ति में ही उसका सारा जीवन बीत जाता है।
जिन वस्तुओं में आनन्द दिखाई देता है उसके प्रति प्रेम होना, अनुराग होना मनुष्य-स्वभाव की विशेषता है। लेकिन जिस आनन्द की अभिलाषा से मनुष्य पदार्थों से प्रेम करता है उस आनन्द की पूर्ति आदि न हो तो यह समझना चाहिये कि उससे जीवन-लक्ष्य हल नहीं होता। वह अग्राह्य है। विषय वासनाओं में सुख तो जरूर है पर वह क्षणिक है और मनुष्य की लालसा यह है कि वह ऐसा सुख प्राप्त करे जो कभी नष्ट न हो, जिससे उसे कभी भी विमुख न होना पड़े।
धन आनन्द की वस्तु है पर वह स्थायी नहीं है। थोड़ा-सा आनन्द देने के बाद धन अपना साथ छोड़ कर भाग जाता है। सब की आँखों में धूल झोंकती हुई लक्ष्मी देवी कभी इसके पास, कभी उसके पास डोलती रहती है, न उससे एक को ही पूरा आनन्द मिलता है न दूसरे को ही। धन का सुख, सुख नहीं मृगतृष्णा है, भुलावा है। अतः धन के प्रेम को भी साध्य नहीं कहा जा सकता।
स्त्री, पुत्र, साँसारिक भोग, धन, आदि सभी सुख के साधन समझे जाने वाले पदार्थ अपना रूप बदलते रहते हैं, परिवर्तनशील हैं अतः इन वस्तुओं में प्रेम का सार नहीं है। द्वेष अखण्ड-आनन्द की अभिव्यक्ति है तो वह वियोग-शील वस्तुओं से कैसे बँधकर रह सकता है। पदार्थों से, प्रियजनों से, धन या भोग-पदार्थों से बिछोह होने पर दुःख पैदा होता है, जलन पैदा होती है, ईर्ष्या द्वेष कलह, मद और मत्सर पैदा होते हैं, तो इन्हें शाश्वत द्वेष की वस्तु कैसे माना जा सकता है। पूर्ण प्रेम तो परमात्मा का ही है, उसी में मनुष्य को सच्चे आनन्द के दर्शन हो सकते हैं। श्रीमद्भागवत में कहा गया है—
एतावानेव लोकेऽस्मिन् पुँसः स्वार्थः परः स्मृतः।
एकान्त भक्ति गोन्दे यत् सर्वत्र तदोक्षणम्॥
7। 7। 55
अर्थात्- इस संसार में मनुष्य का सबसे बड़ा और सच्चा स्वार्थ इतना ही माना गया है कि वह परमात्मा की अनन्य भक्ति, अनन्य प्रेम प्राप्त करे। उस प्रेम का स्वरूप है सर्वदा सर्वत्र सब वस्तुओं में समान रूप से भगवान् का दर्शन करें।”
प्रेमी-भक्त के लिए विविध साधनाओं एवं कष्ट-दायक प्रक्रियाओं की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि उसकी सभी साँसारिक कामनायें नष्ट हो जाती हैं। उसके लिए ईश्वर का प्रेम ही लक्ष्य बन जाता है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
तेषाँ ज्ञानी नित्ययुक्त एक भक्तिर्विशिष्यतं।
प्रियो हिज्ञानिनोऽर्त्यथमहं स च मम प्रियः॥
(7 । 17)
अर्थात्- नित्य मुझ में एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेम-भक्ति वाला ज्ञानी अति उत्तम है। क्योंकि मुझको सत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है।”
परमात्मा से प्रीति करने वाले के सभी दुःख दारिद्रय मिट जाते हैं। प्राणी रंक से राजा हो जाता है। राज्य-सुख, धन या वैभव का उपभोग मनुष्य अकेले नहीं करता। तमाम इष्ट-मित्रों, प्रियजनों-परिजनों को उसका लाभ देने में सुख मिलता है। परमात्मा अनन्त सुख-वैभव के स्रोत हैं। जो लोग उनके समीप जाते हैं वे निहाल हो जाते हैं। उनका संपर्क इतना प्रभावशाली होता है कि मनुष्य की क्षुद्रतायें समाप्त हो जाती हैं। जिसके जीवन में अक्षुण्ण सुख ओत-प्रोत हो रहा हो उसे विविध कामनाओं से क्या प्रयोजन। परमात्मा के सान्निध्य में मनुष्य की इच्छायें ऐसे ही पूर्ण
----***----
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
वर्ष 26 सम्पादक - श्री राम शर्मा आचार्य अंक 6
*******
जब कभी आकस्मिक ऐसा आभास हो कि आपको किसी ने आवाज दी हो, और आस-पास देखने ओर खोजने पर भी पुकारने वाले का पता न चले तो निश्चित रूप से यह समझ लीजिए कि आपको अपनी अन्तरात्मा ने आवाज दी है, और उस आवाज का केवल एक ही डडडड है “कि ऐ अमुक! अपने को समझ ओर मुझको पहचान!” अपने को समझने का अवसर दे। यह देखो कि हम अपने लक्ष्य के प्रति ईमानदार हैं या नहीं? यदि नहीं तो तत्काल ही विवेचना कीजिए उन्हें उन्हें सुधारिए ओर एक नये उत्साह से लक्ष्य की ओर बढ़ते जाइये! आत्मा तुम्हारे भीतर तुम्हारे से विवरण लेने के लिए डडडड है, साथ ही वह एक डडडड डडडड एक डडडड लिए तुम्हारे डडडड प्रकाश बिखेर रही है। डडडड डडडड तुम्हारे डडडड में डडडड डडडड हो जाता है जब की आँख बन्द डडडड चलता है। जिसकी आंखें ठीक खुली डडडड उसके सामने अन्धकार का कोई प्रश्न नहीं है। कोई डडडड डडडड डडडड करने डडडड अपनी ओर डडडड करने का डडडड ही देना है। आत्मा की आवाज भी लिए कभी-कभी सुनाई देती है कि मनुष्य डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड सचमुच हो। समय डडडड से डडडड रहा है इसलिए वह डडडड से सावधान हो कर जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ता है। जिसने आत्मा डडडड आवाज सुनी, इसका अनुकरण किया उन्होंने ही मानव जीवन को सार्थक बनाया है और जो जीवन की उपेक्षा करते रहे उन्होंने डडडड कर पछताने डडडड जाना पड़ा है।
ऋषि विरु बल्लुवर
----***----
होती है कि फिर उनके लिए औरों के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।
भगवान का प्रेम जीवन के सत्य को देखता है। भगवान का प्रेम मनुष्य के शिव को देखता है। भगवान का प्रेम आपके जीवन के सौंदर्य को देखता है। आप परमात्मा की अभिव्यक्ति हैं, अतः उनके हो जाने में उनके गुणों का उभार आपके जीवन में होना स्वाभाविक है। गंगा, यमुना, कृष्णा, कावेरी, ताप्ती, नर्मदा, गोदावरी आदि नदियाँ तब तक स्थल-खण्ड में इधर-उधर विचरण करती रहती हैं जब तक उन्हें नदियों के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जाता। उनकी शक्ति और सामर्थ्य भी तब तक उतनी ही होती है किन्तु जब वे सब मिलकर एक स्थान में केन्द्रीभूत हो जाती हैं तो उनका अस्तित्व समुद्र जितना विशाल, रत्नाकर जैसा सम्पन्न, सिंधु सा अनन्त बन जाता है। अपने आप को परमात्मा में समर्पित कर देने पर मनुष्य का जीवन भी वैसा ही अनन्त, विशाल, सत्य, शिव एवं सुन्दर हो जाता है। उन्हें पाकर मनुष्य का जीवन धन्य हो जाता है।
मनुष्य की जगत् में उत्पत्ति हुई है, इसमें भगवान् का प्रेम ही हेतु है। निश्छल भाव से वे मनुष्य का भरण-पोषण करते रहते हैं। अन्न, फल-फूल, जल, वायु, अग्नि, ताप, वर्षा वृक्ष-वनस्पति, प्रकाश आदि की व्यवस्था करने वाले परमात्मा के हृदय की गति को जो न पहचान सके, वह अभागा है। मनुष्य के लिए डडडड असंख्य अनुदान जुटाने में परमात्मा का प्रेम का ही परिचायक है। उन्होंने अपने प्राणों को विश्व के हित और कल्याण के लिये उत्सर्ग किया है। फिर मनुष्य यदि उन उपकारों का बदला न चुकाये तो उसे हृदय हीन ही कहा जायेगा। परमात्मा को प्रेम की भूख है। वे प्रेम के प्यासे होकर हर प्राणी के द्वार-द्वार भटकते घूमते हैं। जहाँ उन्हें डडडडनिर्मल प्रेम मिल जाता है वहीं वे रम जाते हैं और अपनी सभी शक्तियों की चाभी उसे ही सौंप देते हैं।
कितना हृदय-हीन है मनुष्य, जो परमात्मा से भोग की वस्तुयें माँगता है। साँसारिक स्वार्थ भ्रम है, उनमें स्थिरता डडडड जिस क्षण आप परमात्मा के प्रेम को अपनाने के लिए डडडड डडडडउद्धत हो जाते हैं उसी क्षण भगवान् के प्रेम का आपके जीवन एवं क्रियाओं में सक्रिय होने का अवसर प्राप्त हो जायेगा।
लौकिक दृष्टि से अपनी कामनायें पैदा करना ही तो हमारी भूल है इसी से मनुष्य अपने मूल-लक्ष्य से भटकता और आनन्द से वंचित होता है। आत्मा को शरीर मानने से उद्देश्य में गड़बड़ी पैदा होती है। शरीर आत्मा का वाहन, सेवक और उपकरण मात्र है जिस पर सवार होकर जीवात्मा इस नन्दन-वन के असीम-आनन्द का सुखोपभोग करने आया है। यह सुख परमात्मा में ही ओत-प्रोत है और उसी के हो जाने पर मिलता है। अपने मालिक, स्वामी पिता और सर्वस्व से दूर रहकर मनुष्य को सुख मिल भी कहाँ सकता है? हम शरीर नहीं आत्मा हैं। प्रेम आत्मा की आध्यात्मिक प्यास है। उसे प्रेम में ही आनन्द मिलता है। और सच्चा प्रेम, पूर्ण प्रेम, पवित्र प्रेम, परमात्मा में ही मिल सकता है। इससे भिन्न में डडडड वासना कहलाता है, क्योंकि उसमें शारीरिक सुख की प्रधानता और स्वार्थपरता रहती है। शारीरिक भोग की दृष्टि से किया हुआ प्रेम निम्न श्रेणी का है उसमें पवित्रता और आत्म-त्याग की भावना नहीं होती।
एक राजकुमार की बड़ी मार्मिक कहानी है। उसके नगर में नटों का बेड़ा आया था। बेड़े में एक अत्यन्त रूपवती युवती थी। राजकुमार उस पर आसक्त हो गया और इसी दुःख में वह दुःखी होकर अत्यन्त दुर्बल पड़ गया। राजा ने अपने बेटे की इच्छा जानी तो नट-राज के पास विवाह प्रस्ताव भेज दिया। नट ने एक शर्त लगा दी कि यदि राजकुमार नटों की कला से पूर्ण दक्ष होने तक उनके दल में रहे तो वह सम्बन्ध स्वीकार कर सकता है। राजकुमार ने शर्तें मान ली। अनेक वर्षों तक घोर परिश्रम करने के बाद वह नट-कला में प्रवीण हो गया। पहला प्रदर्शन उसका वाराणसी के राजदरबार में होना था। राजकुमार एक ऊँचे बाँस में चढ़कर किसी उत्कृष्ट कला का प्रदर्शन कर रहा था। उसी समय उसने दूर एक मकान में उससे भी अधिक सुन्दर मातायुवती को किसी साधु को भिक्षा देते हुये देखा। उसने देखा उस महात्मा के मुख पर कितना सरल व वात्सल्य का भाव है। क्षुद्र प्रेभमडडडड पर राजकुमार को बड़ी घृणा हुई और उसने अधिक श्रेष्ठ सौंदर्य की प्रति-मूर्ति परमात्मा के साथ अधिक उत्कृष्ट स्तर का प्रेम करना आरम्भ कर दिया।
अवास्तविक सौंदर्य के लिए राजकुमार जिस प्रकार नट बन जाता है उसी तरह संसार के प्राणी आत्महित से विमुख होकर साँसारिक पदार्थों से आनन्द ढूंढ़ते है पर मिलता कुछ नहीं। न ही ईश्वर से प्रेम ही हो पाता है और न डडडड शारीरिक हित ही सुरक्षित रहते हैं। नैसर्गिक, आत्मिक शारीरिक वयाडडडडड भावात्मक आदि किसी भी अभाव से परमात्मा का प्रेम श्रेष्ठ है, महान् है।
भगवान बहुत थोड़े से प्रसन्न हो जाते हैं। थोड़ी सी व्याकुल आराधना, जिसमें जीवात्मा अपनी स्थिति को भूल कर अपने आपको उन में मिला दे, बस उसी प्रेम के भूखे हैं भगवान! व्याकुलता उसी के लिये होती है जिसे चित्त चाहता है। मनुष्य परमात्मा की ओर तभी उन्मुख हो सकता है जब वह अपने आपको सदैव आत्मा की दृष्टि से देखे। आत्मा का चिन्तन करने से ही ईश्वर-प्रेम प्राप्त पैदा होता है। आत्मा का परमात्मा से चिर-सम्बन्ध है, अतः आत्मस्वरूप की जानकारी के साथ उनके साथ उनका प्रेम डडडड जागृत होना भी स्वाभाविक ही है।
परमात्मा के प्रेम डडडड अद्भुत शक्ति है। उसी के सहारे मनुष्य डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड प्रत्येक दुख पर विजय प्राप्त कर सकता है। जिस प्रकार से दुष्टता निवारण दया से ही जाता है उसी तरह से सच्चे प्रेम के प्रभाव से दुर्विचारों का नाश हो जाता है। डडडड डडडडप्रेम में भक्ति है, डडडड डडडडसुख और आनन्द है किन्तु यह कथन डडडड डडडड डडडड केवल निस्वार्थ परमात्मा के प्रेम से ही है। प्रभु डडडड डडडडमनुष्य के जीवन बिना आन्तरिक शुद्धता और भावनात्मक परिष्कार नहीं हो पाता।
मनुष्य का और परमात्मा का सम्बन्ध पिता और पुत्र का सम्बन्ध होता है। बृहद् परमात्मा का एक रूप आत्मा है उनका चिर सम्बन्ध है। “पिता नोऽसि” का ही मन्त्र अतः मनुष्य को सुख दे पाता है। यह मेरा पिता है। उन्हीं से उन्हीं से कहूँगा,जिन्दगी डडडड मांगूंगा, उन्हीं से हठ करूंगा। उन्हीं से हर डडडड मांगूंगा। बार-बार डडडड आत्मबोध की याचना उन परमपिता से करूंगा। मनुष्य जीवन में इन मूल मन्त्रों का समावेश हो जाय तो डडडड उसका मनुष्य तन जीवन सार्थक हुआ समझना चाहिए।
स्वामी का सेवक से, राजा का प्रजा से, पिता का पुत्र से, जो सम्बन्ध होता है, उसमें अस्वाभाविकता नहीं होती। अतः वहाँ व्यवहार भी निष्कपट होता है। पुत्र में पिता का ही प्राण संचरित होता है अतः वहाँ कोई बनावटीपन नहीं होता। परमात्मा और मनुष्य का प्रेम भी वैसे ही आधार भूत और डडडड छल रहित होता है। इसी कारण उसकी प्रतिष्ठा और उसका आनन्द है।
“वेश्रोमुण्डोकपनिषद् में प्रश्न किया गया है कि “डडडड केन प्राणः प्रथमः प्रेडडडडतियुक्त?” अर्थात् प्राण को किसके द्वारा प्रेम प्राप्त हुआ है। प्रश्न के उत्तर में बताया है- जो महा प्राण डडडडडडडड उनके द्वारा। महाप्राणा परमात्मा की स्थिति का डडडड संकेत है।
मनुष्य अपने आप में बहुत ही छोटा अल्प शक्ति और सामर्थ्य वाला है। पग-पग पर उससे गलतियाँ और डडडड अशुद्धियाँ होती रहती हैं। पर जब कभी वह अपने आपको उस परम पिता को ही अनन्य भाव से सौंप डडडड सम्मान देता है तो उसकी सारी डडडड कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं।
भगवान् के प्रेम के सहारे जियें वनडडडड भगवान के प्रेम के जीवित रहें। ने उन्हीं के स्मरण, चिन्तन और आदेश पालन को प्रमुख अपने जीवन का धर्मान समझें। डडडडकिसी भी डडडडनिराशा में भगवान् का प्रेम महान् है। इसी बात को गीता में भगवान् कृष्ण ने कहा है, “ऐ मनुष्य! डडडड डडडडतू सम्पूर्ण धर्मों का पग पग डडडड डडडड परित्याग कर केवल मेरी शरण में आ जायेगा। मैं तेरे सभी पापों का बिना डडडड विनाश कर तुझे पवित्र तथा डडडड बंधन मुक्त कर दूँगा।”
योग कर्म में कुशलता प्राप्त करने का नाम है। अच्छी भावपूर्ण कविता लिख लेने वाले को कहते हैं कि वह एक कुशल कवि है। अच्छा मकान बना लेने वाला कुशल कारीगर, नाटक में कुशल भाव अभिनय प्रदर्शन कर सकने वाला उसे कुशल कलाकार मानते हैं। किसी काम की दक्षता प्राप्त कर लेना ही उस कर्म की कुशलता हुई। आध्यात्मिक भाषा में इसे ही योग कहते हैं।
नट तरह-तरह की कलाबाजी दिखाता है, बाँस पर चढ़ने, तार पर नाचने, उछलने कूदने की क्रियाओं का सफल प्रदर्शन करता है वह। इन कार्यों में उससे राई रत्ती भर चूक नहीं होती है। जिस कार्य में कर्त्ता को पूर्ण दक्ष कहे जाने का यश मिले यह उस की कुशलता हुई। काम न बिगड़े और सामान्य व्यक्तियों से उसमें कुछ अधिक सफलता दिखाई दे तो कहेंगे इसे इस कार्य में कुशलता प्राप्त है। इसे यों भी कह सकते हैं कि वह अमुक कार्य का योगी है।
काम करते समय हमारी कर्मेंद्रियां, ज्ञानेन्द्रियाँ, मन या चित्त ये सब एक ही दिशा में क्रियाशील रहते हैं। किसी दीवार की चूने से पुताई करनी हो तो एक हाथ से बाल्टी पकड़ते हैं, पैरों से सीढ़ी पर खड़े होकर दूसरे हाथ से पुताई करते हैं। भिन्न-भिन्न कार्य होते हुए भी हाथ, पाँव, उंगलियों आदि अवयवों का लक्ष्य एक ही था, पुताई करना। आंखें यह बताती जाती थीं कि अभी यह जगह छूट गई है इतनी जगह बाकी है, यहाँ बाल्टी है यहाँ चूना है। चित्त की दिशा भी उसी में थी कि चूना गाढ़ा है, ठीक है, पानी कम तो नहीं, पुताई कितनी सुन्दर है इस तरह से चित्त वृत्तियाँ सजग योग थी। क्रियात्मक, निरीक्षणात्मक और विश्लेषणात्मक तीनों प्रक्रियाओं के साथ चलते रहने के कारण दीवार की सुन्दर पुताई संभव हो सकी। इनमें से एक विभाग भी काम करने से इनकार कर देता तो काम में गड़बड़ी फैलती और उसका पूरा किया जाना सम्भव न होता।
इन्द्रियाँ कार्य को पूर्ण करने में स्वतः समर्थ नहीं होती मन उसका संचालन और नियंत्रण करता है इसलिए सफलता या असफलता का कारण उसे ही मानते हैं, सवार बैलगाड़ी को ले जाकर किसी खड्डे में डाल दे तो दोष गाड़ी का नहीं। बैलगाड़ी को क्योंकि उसे ज्ञान नहीं होता, वह स्वतः चालित नहीं होती। बेलों को भी दोष नहीं दे सकते- उनका बेचारों का कसूर भी क्या था जिधर नकेल घुमादी उधर चल पड़े। ‘डडडडनाथ’ पड़ी थी उनके नथुनों में, जिधर का इशारा मिलता था उधर ही चलते थे। दोष यदि हो सकता है तो वह सवार का है। क्योंकि गाड़ी चलाने की सम्पूर्ण जिम्मेदारी उसी की थी। शरीर द्वारा किसी काम को सफल बनाने में मन का ही उत्तरदायित्व अधिक माना जाता है क्योंकि वह संचालक है। उसी से आज्ञा पाकर दूसरे अवयव डडडड काम पर जुटते हैं।
डडडड दोष युक्त कर्म डडडड यों असफलता का कारण होता है- मन की विखंडित दशा। अस्त-व्यस्त, अनेकाग्र होकर काम करने से ही प्रायः गलत परिणाम निकलते हैं। जब भी काम अपूर्ण रहेगा तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मन ही दोषी ठहराया जायेगा। ज्ञान और अनुभव की कमी के कारण या दत्त-चित्त न होकर यों ही बिखरे-बिखरे रह कर काम करेंगे तो कार्य की यथोचित पूर्णता सन्दिग्ध ही रहेगी। कार्य का न होना, पूर्णतया चित्त की अस्थिरता और असावधानी के कारण ही होता है।
जिस काम को जानते ही न हो उसमें भूल सम्भव है, उसे सीखना पड़ता है किन्तु सीखने के बाद भी काम की सारी जटिलतायें दूर हो जायेंगी ऐसा नहीं कहा जा सकता। इन कठिनाइयों का हल भी स्थिर चित्त और मन को पूर्ण एकाग्र करने से हो जाता है। भिन्न हल करने का नियम एक ही है। विद्यार्थी जानते हैं कि पहले -”मोटी लकीर” फिर “कोष्ट” फिर “का” “भाग“ “गुणा” और तब “धन” तथा “ऋण” को हल करते हैं। “भिन्न” हल करने का यह सामान्य नियम प्रत्येक विद्यार्थी याद कर लेते हैं किन्तु नियमों की तोड़-फोड़ करते समय एक विद्यार्थी गलती कर जाता है, दूसरा उसे नियमानुसार हल करता जाता है। दूसरा उसे नियमानुसार हल करता जाता है। एक का उत्तर सही होता है दूसरे का गलत। नियमों का ठीक-ठीक जिसने पालन किया सवाल उसी का सही था। अस्थिरता के कारण दूसरे ने सही ढंग से काम नहीं किया बीच की क्रियायें गलत कर दीं, फलस्वरूप सवाल गलत हो गया। यह सिद्धाँत जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में लागू होता है। जिस उद्देश्य को पूर्ण तन्मयता के साथ हल करते हैं वह जरूर सिद्ध होता है। बिना लगन, बिना तत्परता काम करने की सही दिशा का निर्माण नहीं होता। एकाग्रता कार्य की सफलता के लिए सदैव अपेक्षित है, इसके बिना परिणाम प्रायः सही नहीं निकलते।
किसी वस्तु के स्वरूप के विषय में मनुष्य अनजान हो सकता है किन्तु कर्म में असफलता का कारण मनुष्य की अनस्थिरता को ही कहा जायेगा। चित्त का निरोध न करके पागलपन से जो काम किये जाते हैं उनमें असफलता मिले तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है?
पातंजलि योग में आया है-”योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अर्थात् चित्त की वृत्तियों को वश में रखना ही योग है। दूसरे शब्दों में इसे पूर्ण तन्मयता भी कह सकते हैं। हल ढूंढ़ने में पूर्ण रूप से तन्मय हो जाना ही योग है। गीता में इसी भाव को इस तरह प्रस्तुत किया गया है “योगः कर्मसु कौशलम्” अर्थात् कर्म में कुशलता प्राप्त करना ही योग है। दोनों बातें एक-सी हैं। चाहे कर्म की कुशलता को योग कहें या चित्त वृत्तियों के निरोध को। चित्त वृत्तियों के निरोध से, एकाग्रता से ही कर्म की पूर्ण सफलता प्राप्त होती है, इसलिए दोनों बातें एक जैसी ही हैं। भाव प्रत्येक अवस्था में यही है कि किसी भी विषय की सफलता के लिए चित्त की स्थिरता या पूर्ण तन्मयता होनी चाहिए।
भूल प्रायः अशाँत चित्त होने से ही होती है। एकाग्र चित्त होकर काम करने से वह अच्छे से अच्छे ढंग से होता है। भूल करने का पता भी तभी चलता है जब चित्त शान्त होता है। अशान्त मन से काम करने में संचालन की स्थिति ही कहीं अन्यत्र होती है इसलिए फल के विषय डडडड जागरुक नहीं रहते। ऐसी दशा में बनते भी उलटे सीधे डडडड परिणाम ही हैं। अन्यमनस्कता के कारण कोई काम ढंग से सहूर से नहीं होता। सही स्थिति से किये कार्यों के ही सही परिणाम निकलते हैं।
सीखने और जानने के लिए भी सही तरीका यही है कि बताने या सिखाने वाले की बातों को ध्यानपूर्वक सुनते हैं या नहीं। स्वाध्याय में जो केवल पढ़ जाने की क्रिया पूरी करता है उससे किसी तरह का मानसिक या चारित्रिक विकास नहीं होता। कोई विद्यार्थी यह कहे कि उसने दो-दो बार सारी पुस्तक पढ़ी है फिर किस तरह उसे फेल कर दिया गया, तो यही समझना चाहिए कि उसने पढ़ा है, मनन नहीं किया। शब्द दुहराते चले जायें और आशय कुछ न निकालें तो उस अध्ययन का लाभ ही क्या होगा? जो कुछ पढ़ें, उसे भली प्रकार मनन करें तो वह बात परिपक्व होकर ज्ञान का रूप धारण करती है। विचारों को तदनुरूप कर्मों में प्रसारित करें “स्वाध्याय” शब्द तब कहीं सार्थक होता है। अक्षरों को शब्द रूप दे देना ही काफी नहीं है। उनका अर्थ भी समझें तो आपका सीखना सही माना जायेगा।
बिना विश्राम से किया हुआ कर्म, अनिच्छा पूर्वक तथा पाप की भावना से किए गये कृत्य कभी मनुष्य को सुखी नहीं रख सकते। व्यग्रता बढ़ाने वाले कर्म भला किसी को सन्तोष दे पायें हैं? शान्ति प्राप्त करने के लिए सत्कर्मों में कुशल होना अनिवार्य है।
भोगवाद मनुष्य के दुष्कर्मों को बढ़ावा देता है। ऐसी अभिनय-शीलता आज लोगों में प्रचुर मात्रा में आ गई है, इसलिये इस समाज को योग-भ्रष्ट समाज कहना ही उपयुक्त होगा। शरीर और मन की शक्याँ विशृंखलित होकर समाज में बुराइयाँ पैदा कर रही हैं मनुष्य के दुःखों का डडडडशतशः कारण यही है।
शान्ति पाने के लिए हमें अतीत को जागृत करना पड़ेगा। अतीत का अर्थ उन विचारणाओं से है जिनमें राष्ट्र का डडडडकी सद्वृत्तियाँ जागृत हो। लोगों का विवेक ज्ञान और वैभव समृद्ध बने तो बडडडड सच्चे योग के दर्शन दिखाई देने लगेंगे। चिर शाँति को आधार डडडड मनुष्यों में सत्कर्मों के प्रति गहन और डडडड इस विश्वास को जगायें तो हमारी वह कमियाँ दूर हो सकती हैं जिनसे आधुनिक जीवन में उदासीनता और निग्राणता छाई हुई है।
शारीरिक अंग-प्रत्यंग और इन्द्रियाँ संसार में सबको समान रूप से मिली हैं। किन्तु फिर भी मनुष्य के जीवन क्रम और गतिविधियों में भारी अन्तर पाया जाता है। जय-पराजय, सफलता-असफलता, जीवन और मृत्यु के द्वन्द्व निरन्तर चलते रहते हैं। जो व्यक्ति अपने आन्तरिक क्षेत्र में फैली हुई संकल्प शक्ति का प्रयोग नहीं करते उन्हें पराजय, असफलता और मृत्यु प्राप्त होती है पर जिनके संस्कारों में दृढ़ता, तीव्र मनोबल और सुदृढ़ संकल्प शक्ति विद्यमान है जय, जीवन और सफलता सदैव उनकी दासी बनकर काम करती है। संकल्पवान् पुरुष ही जीवन-संग्राम विजय करते हैं, कमजोर इच्छा शक्ति वालों का साथ प्रकृति भी नहीं देती है।
उपरोक्त पंक्तियों में हमारा अभिप्राय गरीबी या अमीरी के साथ उन्नति या जीवन की असफलता का संबन्ध जोड़ने का नहीं है। हमारा अभिप्राय केवल यह बताने का है कि जहाँ जिस वातावरण में संकल्प की कमी रहेगी वहाँ विभूतियाँ न हो सकेंगी। जहाँ दृढ़ इच्छा शक्ति होगी, तीव्र आकाँक्षा या अभिरुचि होगी वहाँ पैसे का, साधन और सहयोग का अभाव भले ही हो पर धीरे-धीरे अनुकूल वातावरण एकत्रित हो जायेगा और मनोवाँछित सिद्धि मिलकर रहेगी।
पुराणों में ऐसा वर्णन आता है कि स्वर्ग में एक कल्प-वृक्ष है जिसके पास जाने में कोई भी कामना अपूर्ण नहीं रहती है। ऐसा एक कल्पवृक्ष इस पृथ्वी में भी है वह है- संकल्प का कल्पवृक्ष। जब किसी लक्ष्य की, ध्येय की, कामना की पूर्ति का हम संकल्प लेते हैं तो सजातीय विचारों, सुझावों की एक शृंखला दौड़ी हुई चली आती है और अपने लिए उपयुक्त रास्ता बनाना सुगम हो जाता है। बरसात का पानी उधर ही दौड़ता है जिधर गड्ढे होते हैं। सफलता के लिए अपेक्षित परिस्थितियाँ ढूंढ़ने की शक्ति संकल्प में है।
संध्या, उपासना, दान, अनुष्ठान, यज्ञ, पुरश्चरण आदि में आचार्य यजमान को संकल्प ग्रहण कराते हैं उससे उनके उद्देश्य में कोई सटिकता भले ही न आती हो पर डडडडसारी मानसिक चेष्टायें एक ही लक्ष्य की ओर लग जाती हैं, फलस्वरूप आने वाली बाधा, कठिनाई का विचार डडडड डडडड करने से आ जाता है, जिससे प्रतिकूल परिणाम डडडड डडडड से डडड आते डडडड हैं मानसिक शक्तियों का विकेन्द्रीकरण करना महत्वपूर्ण होता है कि उसे जिस कार्य में लगा दिया जाय डडडड डडडडउधर ही आशा सन्तोषजनक सफलता मिलने लगती है।
संकल्प क्रिया शक्ति में तन्मय की प्रतिष्ठा का डडडड मार्ग है। “यह मेरा संकल्प है” का अर्थ है अब मैं इस कार्य में प्राण, मन और समग्र शक्ति के साथ संलग्न हो रहा हूँ। इस प्रकार की विचारणा, दृढ़ता ही सफलता भी बनती है। संकल्प तप का, क्रिया शक्ति का विधायक है इसी से उसमें अनेकों सिद्धियाँ और वरदान समाहित हैं।
जिन विचारों से मनोभूमि में स्थायी प्रभाव पड़ता है और जिनसे अन्तःकरण में अमिट छाप पड़ती है वे पुनरावृत्ति के कारण स्वभाव के एक अंग बन जाते हैं। ऐसे विचारों का अपना एक विशेष महत्व होता है। इन विचारों को क्रमबद्ध रीति से सजाने की क्रिया डडडड डडडड जिन्हें ज्ञात होती हैं वे अपना भाग्य, दृष्टिकोण और वातावरण परिवर्तित कर सकते हैं और इस परिवर्तन के फलस्वरूप जीवन में कोई विशेष दृश्य डडडडया स्थिति डडडड उत्पन्न कर सकते हैं।
आवश्यकता को आविष्कार की जननी कहा जाता है, जब क्रिया किसी डडडड बात की तीव्र इच्छा होती है तो उसे पूर्ण करने के लिए साधनों की तलाश आरम्भ होती है, अतः कोई ने कोई उपाय भी निकल ही आता है। यह इच्छा यदि प्रेरक है, उसे पूरा करने की भूख यदि भीतर से उठी है और उसके पीछे डडडड पर्याप्त प्राण और जीवन लगा हुआ है कि “मैं उस वस्तु को प्राप्त करके रहूँगा, चाहे कितनी ही बाधायें क्यों न आयें, प्रयत्न निरन्तर जारी रखूँगा डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड डडडड निराश करने वाले अक्सर क्यों न आयें इस प्रकार के डडडड संकल्प की यदि मन में रहने और सूक्ष्म डडडड स्थापना हो जाय तो लक्ष्य तक पहुँचना बहुत सरल हो जाता है। डडडड दूसरों के लिए कठिन जान पड़ने वाला डडडड जो कर्म भी उस संकल्पवान् के लिये सामान्य क्रिया से अधिक नहीं रह जाता।
बराबर आगे बढ़ते रहने के लिये, बराबर नई शक्ति प्राप्त करते रहना भी आवश्यक है। उन्नति का क्रम टूटना नहीं चाहिये, आगे बढ़ने से रुकना या हिचकिचाना नहीं चाहिये। पर यह तभी संभव है जब हमारा संकल्प, हमारा उद्देश्य, अटूट साहस, श्रद्धा एवं शक्ति से ओत-प्रोत हो। आधे मन से, उदासीन होकर काम करने वाला फूहड़ कहा जाता है। उसे कोई विशेष सफलता मिल भी नहीं पाती।
“अगर मुझे अमुक सुविधायें मिलती तो मैं ऐसा करता” इस प्रकार की कोरी कल्पनायें गढ़ने वाले आत्म-प्रवंचना किया करते हैं। भाग्य दूसरों के सहारे विकसित नहीं होता। आपका भार ढोने के लिए इस संसार में कोई दूसरा तैयार न होगा। हम यह यात्रा अपने पैरों से ही पूरी कर सकते हैं। दूसरे का अवलम्बन लोगे तो हमारा जीवन कठिन हो जायेगा। हमारे भीतर जो एक महान चेतना कार्य कर रही है उसकी शक्ति अनन्त है, उसी का आश्रय ग्रहण करें तो प्रत्यक्ष आत्म-विश्वास जाग जायेगा। तब तुम दूसरों के भरोसे भी नहीं होगे। संकल्प का ही दूसरा रूप है आत्म-विश्वास। वह जागृत हो जाय तो अपना विकास तेजी से, अपने आप पूरा कर सकेंगे। आज हम जैसे कुछ हैं अपने जीवन को जिस स्थिति में रखे हुये हैं अपने निजी विचारों के परिणाम हैं। जैसे विचार होंगे भविष्य का निर्माण भी उसी तरह ही होगा।
संकल्प का सम्बन्ध सत्य और धर्म से होता है। उसका प्रयोग अधर्म और अत्याचार के लिये नहीं हो सकता। अधर्म पतन की ओर ले जाता है पर यह संकल्प का स्वभाव नहीं है। अधर्म से धर्म की ओर, अन्याय से न्याय की ओर, कामुकता से संयम की ओर, मृत्यु से जीवन की ओर अग्रसर होने में संकल्प की सार्थकता है। आचार्यों ने उसे इसी रूप में लिया है। भारतीय धर्म में अनुशासन की उस उद्दात्त परम्परा का ध्यान रखते हुए ही गुरु जन “सत्यं वद” “धर्म चर” का संकल्प अपने शिष्यों से कराते रहे हैं। आध्यात्मिक तत्वों की अभिवृद्धि की तरह ही भौतिक की नैतिक आकाँक्षा को बढ़ाना भी संकल्प के अंतर्गत ही आता है। अपने स्वार्थों के लिये अधर्माचरण शुरू कर दिया जाता है वहाँ संकल्प का लोप हो जाता है और वह कृत्य अमानुषिक, आसुरी, हीन और निकृष्ट डडडड बन जाता है। संकल्प के साथ जीवन-शुद्धता की अनिवार्यता भी जुड़ी हुई है। संकल्प की इस परम्परा में अपनी उज्ज्वल गाथाओं डडडड को ही जोड़ा जा सकता है। निकृष्टता के, पाप के, स्वार्थ की संकीर्णता और अत्याचार द्वारा संकल्पमयी डडडड डडडड नहीं बना जा सकता।
डडडड डडडड डडडड अन्यमनस्कता, पराधीनता और डडडडमुर्दादिली को छोड़कर ऊँचे उठने की कल्पना मन क्षेत्र को डडडड सतेज करती है। इससे साहस, शौर्य, कर्मठता, उत्पादन शक्ति निपुणता आदि गुणों का आविर्भाव होता है। इन गुणों में शक्तियों का वह स्रोत छुपा हुआ है जिससे सांसारिक सुख और आनन्द का प्रति क्षण रसास्वादन किया जा सकता है। निकृष्टता मनुष्यों में दुर्गुण पैदा करता है और इससे चारों ओर से कष्ट और क्लेश, के परिणाम ही दिखाई दे सकते हैं। संकल्प का इसी लिये जीवन की उत्कृष्टता का मन्त्र समझना चाहिये, उसका प्रयोग मनुष्य जीवन के गुण विकास के लिये होना चाहिये।
अपने को असमर्थ, अशक्त डडडड एवं असहाय मत समझिये। “साधनों के अभाव में हम किस प्रकार आगे बढ़ सकेंगे” ऐसे कमजोर विचारों का परित्याग कर दीजिये। स्मरण डडडड रखिए शक्ति का स्रोत साधनों में नहीं संकल्प में है। यदि उन्नति करने की, आगे बढ़ने की इच्छायें तीव्र हो रही होंगी तो आप को जिन साधनों का आज अभाव दिखाई पड़ता है केवल निश्चय ही दूर हुये दिखाई देंगे। संकल्प में सूर्य रश्मियों का तेज है, वह जागृत चेतना का शृंगार है, विजय का हेतु और सफलता का जनक है। संकल्प से प्राप्त मन डडडड के बल द्वारा स्वल्प साधनों में भी मनुष्य अधिकतम विकास कर सकता है, और मस्ती का जीवन बिता सकता है।
उन्नति की आकाँक्षा रखना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है, उसे आगे बढ़ना भी चाहिये, पर यह तभी संभव है जब मनुष्य का संकल्प बल जागृत हो। जो लोग अपने को दीन, हीन, असफल और पराभूत समझते हों संकल्प उनके लिये अमोघ अस्त्र है। संकल्प के द्वारा प्रत्येक मनुष्य जय जीवन और सफलता प्राप्त कर सकता है।
आनन्द प्राप्त करना हमारा मुख्य लक्ष्य है। दिन रात उसी की प्राप्ति में लगे रहते हैं। जो जिस स्थिति में है उसे उसी स्थिति में आनन्द की अनुभूति हो रही है। गाँव का रहने वाला इसलिये प्रफुल्ल है कि उसे मुक्त प्रकृति, स्वस्थ आव-हवा और अनेक प्राकृतिक साधनों का भोग भोगने को मिलता है। शहर का निवासी भी उससे कम प्रसन्न नहीं। उसे अपनी तरह के साधन प्राप्त हैं। शिक्षा, अस्पताल, सिनेमा, पार्क आदि कई तरह के प्रसाधनों की दृष्टि से वह अपेक्षाकृत अधिक सुख अनुभव करता है। कोई एक स्थान पर स्थायी रहकर सुखी है किसी को चलते रहने में आनन्द आता है। किसी को कृषि में आनन्द है, किसी को रोजगार में। सैनिक को अपना ही जीवन प्रिय है, दुकानदार को अपनी स्थिति। अपनी मौज की सामग्री हर कोई ढूंढ़ कर उसमें ही आनन्द का अनुभव करते रहते हैं। जानवर को भी अपनी स्थिति से असन्तोष नहीं है क्योंकि मृत्यु से उसे भी भय है, वह भी चोला बदलने से हिचकिचाहट जताता है। तात्पर्य यह है कि यहाँ सभी आनन्द का ही जीवन जी रहे हैं। आनन्द सार्थक है या नहीं, उचित है या अनुचित, सात्विक है या असात्विक-विचारने के लिये इतना ही शेष रह जाता है।
स्वाभाविक आनन्द से ही यदि आत्मतृप्ति हो जाती तो सम्भवतः यह प्रश्न उतना महत्वपूर्ण न होता, जितना लोगों के सामने है। स्वादिष्ट भोजन आनन्ददायक होता है इसलिये सभी की यह कल्पना रहती है कि तरह-तरह की मिठाइयाँ, नमकीन, पकवान आदि प्राप्त किये जायें। उनसे इन्द्रियजन्य सुख मिलता भी है किन्तु इस आनन्द में दोष है। “भोग से रोग उत्पन्न होते है” इस कहावत के अनुसार उन सभी सुखों को जिनसे इन्द्रियों के विषय तृप्त होते हों, वास्तविक आनन्द की कोटि में नहीं रखा जायेगा।
पूर्ण आनन्द वह है जहाँ विकृति न हो। किसी तरह की आशंका, अभाव या परेशानी न उठानी पड़ती डडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडडउसमें हमारा अभ्यास बन गया है इसलिये वह अनुचित हो तो भी वैसा नहीं लगता। इसलिये आनन्द की परख की कसौटी नियत की गई है। आनन्द से शुद्धतम आनन्द प्राप्ति के लिए दृष्टिकोण परिमार्जन की आवश्यकता अनुभव की जाती है।
लौकिक आनन्द सिद्ध दाता नहीं है। इससे जीवन का उद्देश्य पूरा नहीं होता। विचार, बुद्धि, तर्क, विवेक की जो साधारण तथा असामान्य शक्तियाँ मनुष्य को प्राप्त होती हैं ये केवल भौतिक सुखों के अर्जन में ही लगी ‘रहें’ तो इसमें कुछ अनोखापन नहीं। देखने वाली बात यह है कि जीवन दीपक बुझाने के पूर्व क्या हमने अपने आपको पहचान लिया है कि “हम कौन हैं”? इस प्रश्न का सुलझ जाना ही तो सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। आत्मज्ञान आनन्द का मूल है। इस विषय में अज्ञान बना रहा तो लौकिक जीवन में ही भटकते रहना पड़ेगा। सिद्धि आत्मा की शरण में ही जाने से मिल सकती है। मनुष्य की अन्यान्य आशंकायें आत्म-ज्ञान के अभाव में दूर होना सम्भव भी नहीं हैं। इससे यह निर्विवाद सिद्ध है कि लौकिक सुखों में ही आनन्द की पूर्णता न होकर निजत्व के ज्ञान में उसका प्रतिभास होता है। यह बात दृष्टिकोण बदल देने से भली भाँति मालूम पड़ जाती है।
हम वह जो प्रतिदिन आनन्द प्राप्ति के साधनों में परिवर्तन और प्रयोग किया करते हैं उससे भी यह स्पष्ट है कि हमें थोड़े आनन्द की उपेक्षा अधिक शुद्ध और पूर्ण आनन्द की तलाश है। एक कपड़ा पहनते हैं तो दूसरी बार उस कपड़े की अच्छाइयाँ, बुराइयाँ ज्ञात हो जाती हैं और दुबारा कपड़ा खरीदते समय यह ध्यान रहता है कि इस बार का कपड़ा पिछले दोषों से रहित और कुछ अधिक आकर्षक डडडड डडडड हो। की भी शुद्धि होती है। आनन्द की भी शुद्धि होती है और हम एक ऐसा आनन्द चाहते हैं जो पूर्ण ओर स्थायी हो। ऐसा आनन्द लौकिक जीवन में उपलब्ध नहीं है। तब फिर पारलौकिक जीवन की डडडडडडडड डडडडड डडडडडड डडडड जगने लगता है। यह सिद्धि भगवान की शरण में जाने से मिल सकती है।
फिर भी लोगों की समझ में यह बात नहीं आती और वे लौकिक सुखों में ही आसक्त बने रहते हैं। कारण कि हमारा दृष्टिकोण जैसा बन गया है उसमें कुछ परिवर्तन नहीं करना चाहते। सूर्य प्रतिदिन अपने उसी क्रम से निकलता है उसके प्रति हमारा दृष्टिकोण प्रतिदिन उगते रहने वाले सूर्य के जैसा ही होता है, किन्तु यदि अपना थोड़ा दृष्टिकोण बदलें और विराट जगत के महान् क्रिया-शील शक्ति तत्व के रूप में उस सूर्य का चिन्तन करें तो वह महाप्राण, अनेक विचित्रताओं से संयुक्त और जीवन दाता समझ में आयेगा। दृष्टिकोण के परिवर्तन से समझने की स्थिति बदलती है और क्रमशः अधिक आनन्द की ओर अग्रसर होने लगते हैं। दैनिक जीवन में ऐसी अनेकों बातें आती हैं जो यों सामान्य-सी लगती हैं किन्तु वे अपने भीतर बहुत बड़ा अनोखापन और विज्ञान छिपाये होती है। हमारा दृष्टिकोण बोधक न होकर उथला, रिपट जाने वाला होता है इसलिये अत्यन्त महत्व पूर्ण वस्तुओं को छोड़ जाते हैं और केवल उन्हीं सुखों के चिन्तन में लगे रहते हैं जो स्थूल प्रयोग में आ चुके होते हैं।
दृष्टिकोण बदलता है तो सारी चीजें बदली नजर आती हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य ने बताया है- “ यह संसार मरुभूमि है। इसमें सुख चाहते हो तो भगवान् की शरण लो। आयु, श्री, यश और साँसारिक सुखों की उपलब्धि ईश्वर परायणता या आत्म चिन्तन में ही है। यही दैवी सम्पत्ति है। पर यह बात समझ में नहीं आयेगी क्योंकि अभी तक हमने सुख और संसार के प्रति अपना रुख नहीं बदला। दृष्टिकोण बदल जायेगा तो सर्वत्र आनन्द ही बिखरा दिखाई देगा।”
हम भोग में आनन्द अनुभव करते हुये नहीं जानते कि इस संसार में और भी कुछ श्रेष्ठतायें हैं। विचार द्वारा यदि आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व की बात समझ में आये तो भोग की अपेक्षा त्याग में आनन्द का अनुभव करने लगेंगे और तब दिन प्रतिदिन मूल लक्ष्य की ही ओर बढ़ते भी चलेंगे। फिर यह शिकायत न रहेगी कि ईश्वर चिन्तन में आनन्द नहीं आता। दृष्टिकोण की उत्कृष्टता का सवाल है, जिस तरह सम्पूर्ण चेष्टायें भौतिक उन्नति में लगी हैं उसी तरह आध्यात्मिक उपलब्धियों में भी मन लग सकता है पर पहले अपना लक्ष्य निर्धारित करना पड़ेगा। अपना हर कार्य इस दृष्टि से पूरा करना पड़ेगा कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं।
आध्यात्मिक आनन्द भौतिक और स्थूल आनन्द की अपेक्षा सहस्र गुना अधिक है। भोग से त्याग में अधिक आनन्द है। शरीर से आत्मा में आनन्द भाव अधिक है, इस लिये विज्ञजन सदैव ही यह प्रेरणा देते रहते हैं कि मनुष्य शारीरिक हितों को ही पूरा करने में संलग्न न बना रहे, वरन् मनुष्य जीवन जैसी असाधारण घटना पर भी आन्तरिक दृष्टि से कुछ विचार करे। वह जो सुख विषयों में अनुभव होता है वह उन्मुक्त नहीं है। इसमें साधनों की विवशता है, अज्ञान के कारण जिसे हम उचित समझते हैं, वही व्याधिकारक होती हैं, फलतः क्लेश और कठिनाइयों का वातावरण उमड़ आता है। आनन्द की कल्पना से किया हुआ कर्म यदि विक्षेप उत्पन्न करे तो उस आनन्द को शुद्ध, पूर्ण और मनुष्योचित नहीं समझा जायेगा।
प्रश्न यह नहीं है कि हम आनन्द की प्राप्ति की ओर बढ़ें। वह तो हम कर ही रहे हैं। हर घड़ी आनन्द की खोज में ही हमारी जीवन यात्रा पूरी हो रही है। जो शर्त है वह यह कि हमारा आनन्द शाश्वत, निरन्तर और पूर्ण किस तरह हो? इसके लिये कुछ बड़े परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है। घर और गृहस्थ का परित्याग भी नहीं करना, विचित्र वेष भूषा भी नहीं बनानी, केवल इस जीवन का मूल्याँकन सच्चे दृष्टिकोण से करने की आवश्यकता है। हम शरीर के हित तो पूरे करें किन्तु शरीर में व्याप्त यह जो आत्मा है उसे विस्मृत न करें। आत्मा हमारे अज्ञान, आसक्ति और अभावों को दूर करने में सक्षम है। यह तीन परेशानियाँ विघ्न न पैदा करें तो जिस आनन्द की तलाश में हैं वह इसी जीवन क्रम से उपलब्ध हो सकता है। इसके लिये हमें और कुछ नहीं करना, केवल दृष्टिकोण को परिमार्जित करना है। हम इस तरह अपना दृष्टिकोण बदल सकें तो शाश्वत आनन्द की उपलब्धि इसी जीवन में हो सकती है।
“मेरे लिये अपने हृदय का द्वार खोल दो जिससे मैं उनमें प्रवेश कर सकूँ। डडडड जैसे ही मेरा तुम्हारे साथ संपर्क हुआ कि तुम देखोगे कि ज्ञान का असत्य का अन्धकार विलीन हो रहा है, अनपेक्षित ज्ञान विलुप्त हो रहा है और तुम्हारी दृष्टि स्पष्ट तथा समझ निर्भ्रांत हो रही है” सर रिचर्ड डडडड शिरहल की इन दिव्य भावनाओं में प्रीति की बड़ी ही सुन्दर व्याख्या हुई है। प्रेम हृदय के समस्त सद्भावों का डडडड,शाँत, स्थिर एवं उद्गार विहीन समावेश है, जिसमें मनुष्य, जीवन के सारे दुःख, धर्म, अभाव भूल जाता है। धन और वैभव हृदय की प्यास नहीं बुझा सकते, उसके लिये निर्मल प्रेम की आवश्यकता है। प्रेम पाकर मनुष्य का जीवन रस विभोर हो जाता है।
मनुष्य जीवन में एक सर्वोत्कृष्ट बल है, वह है- प्रीति का बल। इसके प्रयोग से प्रत्येक मनुष्य उसे ही प्राप्त कर लेता है। जिसे वह अपने लिये सुखद मानता है। प्रेम वशीकरण मन्त्र है, जो शत्रु को भी मित्र बनाने की क्षमता रखता है। प्रीतिमात्र वस्तु अथवा व्यक्ति के मिलने में पुण्य कर्म सहायक होते हैं तथा पाप कर्म-बाधक बनते हैं। सच्ची प्रीति में समस्त बाधाओं, कठिनाइयों तथा दुःखों को पार कर जाने की शक्ति होती है।
मनुष्य जब तक प्रेम का आश्रय ग्रहण नहीं करता तब तक उसे स्वतन्त्रता का बोध नहीं होता। अर्थात् वह अपने शारीरिक स्वार्थ और भोग की लालसा में ही पड़ा हुआ डडडड डडडड आत्म-ज्ञान डडडड बना रहता है। किन्तु प्रेम के उदय होते ही त्याग, तप, दान के डडडड समस्त सद्गुणों का विकास होने लगता है। सच्चा प्रेमी पूर्ण डडडड, तपस्वी और दानी होता है, उसे डडडड आत्मा की सच्ची डडडड इमानडडडड होने लगती है तभी तो वह डडडड आत्मोत्सर्ग कर देने के लिये समुद्यत होता है। आगे-पीछे का चिन्तन वह क्यों करेगा? भय उसका क्या करेगा जिसके मन हृदय और आत्मा में प्रेम का प्रकाश उदय हो गया है। वह दूसरों में दोष दुर्गुण नहीं सच्चे सौंदर्य के दर्शन करता है। मनुष्य जीवन की प्रेम ही सच्ची दृष्टि है।
जिस तरह इस संसार में सर्वत्र प्रकाश है पर जहाँ वह नहीं, वहीं अन्धकार दिखाई देने लगता है। अन्धकार दिखाई देने लगता है। अन्धकार का अस्तित्व प्रकाश का न होना ही है, उसी तरह सम्पूर्ण मनोविकारों का अस्तित्व केवल इसलिये है कि हृदय में प्रीति का प्रकाश नहीं हैं। दया के सामने दुष्टता का नाश हो जाता है वैसे ही प्रेम और सहानुभूति के सामने बुरे मनोविकार अपने आप भाग जाते हैं। प्रेम का वरदान मिलते ही जीवन का सौंदर्य निखर उठता है। मनुष्य पहले की तरह ही सार्थकता और सफलता अनुभव करता है। उदासी कोसों दूर भाग जाती है। प्रेम की मधुरता में जीवन के सम्पूर्ण आनन्द समाये हुये हैं।
मनुष्य में सारी योग्यता प्रीति के सदुपयोग से आती है। दोष इसी के दुरुपयोग से बढ़ते हैं। प्रेम का एक रूप छल भी है। इसे वासना भी कह सकते हैं। धूर्त लोग इसे अपनी स्वार्थ-पूर्ति का साधन बना कर भोले लोगों को दिग्भ्रांत कर देते है। प्रत्यक्ष में देखने पर ऐसे व्यक्ति क्षणिक सुख भले ही प्राप्त कर लें पर अंततः उन्हें डडउडडरौख नरक ही भोगना पड़ता है। प्रेम-परमेश्वर का स्वरूप है। जिस प्रकार दूसरे लोग अपमान सहन नहीं कर पाते, परमात्मा भी इस जालसाजी को पसन्द नहीं करता और धूर्तों को कड़ा दण्ड देता है। सावधान! कभी प्रेम का आश्रय लेकर किसी सज्जन व्यक्ति को ठगें नहीं किसी सुशीला, साध्वी का पथ-भ्रष्ट न करें, अन्यथा परमात्मा के कोप का भाजन बनना पड़ेगा। वह पाप-फल मिलेंगे जिनसे सारे जीवन भर आँसू बहाने, तड़पने, और कलपने के अतिरिक्त कुछ भी हाथ नहीं लगेगा।
प्रीति, धन, शरीर, अधिकार-वैभव या ऐश्वर्य के प्रति न कीजिये, प्रेम तो प्रेम स्वरूप की प्राप्ति के लिये किया जाता है। प्रेम अपनी हस्ती मिटाने के लिये किया जाता है। जलती ज्योति पर जल जाने वाले शलभ की प्रीति सच्ची है। उसे कभी डडडडड विलगला में आनंद नहीं आता। स्थूल प्रेम में विलगला डडडड से दुःख होता है अतः यह डडडड परवशता हुई। प्रेम तो चिर-उन्मुक्त है, उसे इसी रूप में प्राप्त किया जाना चाहियें । प्रेम को परमात्मा का प्रतीक मान कर उसकी उपासना की जानी चाहिये। प्रेम में मृत्यु की सी यन्त्रणा है पर उसमें स्वर्गीय आनंद है, जो प्रेम करता हैं वही सच्चा सुखी और भाग्यवान है।
प्रेम शान्ति-रूप, कल्याण स्वरूप है उसे प्राप्त कर मनुष्य की अशान्ति भाग जाती है क्योंकि उसे वास्तविक ज्ञान तथा अलौकिक दर्शन मिल जाता है। उसे इस सुख को शब्दों से व्यक्त करने की आवश्यकता भी नहीं होती। सेवा, सेवा, सेवा, त्याग, त्याग, त्याग। सब कुछ अपने प्रेमी की इच्छा पर न्यौछावर कर देने का महान् सुख भोगता है वह। उसे अपने प्रिय-तम की सेवा का असीम आनन्द मिलता है। कौन जानता है इस अवस्था को? वही जिसने प्रेम किया है, प्रेम रस का रसास्वादन किया है।
दुःख कातरता की औषधि है प्रेम। वह हृदय में संचरित होता है और सारे शरीर को स्वस्थ तथा सजीव कर देता है। शरीर और मन की सारी थकावट मिट जाती है प्रेम से। प्रेम मनुष्य जीवन का सर्व श्रेष्ठ वरदान है। वह मनुष्य के अन्दर समझने वाली, प्रेम करने वाली तथा उल्लास उत्पन्न करने वाली शक्ति है। वह जीवन को रचनात्मक प्रवाह की ओर गतिशील करने वाली शक्ति है। प्रेम मनुष्य की दुर्बलता, दरिद्रता और दुख को शक्तिमत्ता,पता, सम्पन्नता और सुख में परिवर्तित कर देता है।
मनोवैज्ञानिक अनुसंधानकर्त्ताओं का मत कि आगे चल कर अपराधी बनने वाले मनुष्य प्रायः वे होते हैं जिन्हें बाल्यावस्था में प्रेम नहीं मिला होता है। इससे उनकी हिंसात्मक प्रवृत्तियाँ भड़क उठती हैं और सद्भावों के लिए कोई स्थान शेष नहीं रह जाता। इसीलिये उनका मन बुरी भावनाओं से घिरा रहता है और वे अनैतिक आचरण किया करते हैं। सामाजिक जीवन की सुव्यवस्था का प्रमुख आचार यह है कि मनुष्य मात्र एक दूसरे के प्रति दयाभाव एवं सहिष्णुता रखा करे पर यदि देखा जाय तो दया और सहिष्णुता का उद्रेक प्रेम ही है। जिन्हें प्रेम नहीं मिलता उनके हृदय के कोमल भाव मुरझा कर नष्ट हो जाते हैं और द्वेष पूर्ण प्रवृत्तियाँ शक्ति शाली होकर अभद्र कार्यों की ओर प्रेरित करने लगती हैं। प्रेम न मिलना मनुष्य के अधःपतन का प्रमुख कारण है।
बालकों की डडडड उद्दंडता और पारिवारिक कलह मिटाने के लिये प्रेम पूर्ण व्यवहार की अत्यन्त आवश्यकता होती है। सौहार्द्र पूर्ण वातावरण में बालकों का मानसिक विकास तेजी से होता है और उनमें स्वावलम्बन भी डडड आता हैं। जिस परिवार डडडडड में परिजनों में एक दूसरे का दुःख का दर्द अनुभव करने की आत्मीयता होती है, उन डडडड कुटुम्बों में स्वर्गीय सुख से दर्शन किये जा सकते हैं। डडडडड प्रेम हृदय की विशालता का लक्षण है। उसमें स्वार्थ और संकीर्णता का जरा भी स्थान नहीं होता। सभी के सुख में ही अपना सुख अनुभव करने की उदारता किसी प्रेमी हृदय में ही हो सकती है। केवल अपने सुख, अपनी सुविधायें चाहने वाले लोगों के हृदय बिलकुल ओछे होते हैं, वे जहाँ भी रहते हैं सारी शान्ति और सुव्यवस्था को बिगाड़ कर रख देते हैं।
इस प्रकार के विचारों से जब हमारा जीवन ओत-प्रोत हो जायगा, तभी हम संसार को एक नए रूप से देखने लगेंगे। हमारी सेवाओं की इस धरती को बहुत जरूरत है, हर-कण हमें डडडड अतृप्त और प्यासी निगाहों से देखकर पूँछ रहा है क्या तुम मुझे प्रेम दे सकोगे? तब हम विश्वात्मा के साथ हृदय-मिलन का सुख पा सकते हैं, पर हमारा हृदय इतना विशाल होना चाहिये कि एक छोटा सा पंछी भी निर्भीक बनकर पास बैठ सके।
अपनी मर्जी के अनुसार इस विश्व के लोग लोकाचार में संलग्न हैं पर सचमुच उनमें से वास्तविक सुख के भागीदार बहुत थोड़े हैं। सुख उन्हें मिलता है जो प्रेमी हैं। प्रीति की रीति का अनुसरण करने वालों को ही परमात्मा का प्रकाश मिलता है। सत्य हमसे दूर नहीं, ईश्वर अपने ही अन्तस्तल में समाया हुआ है उसे जानने के लिये और उसका दर्शन करने के लिये केवल नेक बनने की जरूरत है। प्रेमी होकर ही आप उसके दर्शन कर सकते हैं। आप अपने आप से प्रेम कीजिये, परिजनों से प्रेम कीजिये, नगर गाँव और राष्ट्र से प्रेम कीजिये। प्रेम की भावना इतनी विस्तृत हो कि प्राणिमात्र में प्रेम स्वरूप की झाँकी होने लगे, उसी दिन आप भी परमात्मा के दर्शन के अधिकारी बन जायेंगे। उसी दिन ईश्वर आपकी रग-रग में समा जायेगा।
आज जैसी भी डडडड कुछ हमारी स्थिति है वह सब हमारी मानसिक स्थिति का परिणाम है। मन कर्त्ता है। संसार की सम्पूर्ण बाह्य रचना की शक्ति और आधार मन है। हमारा आहार, रहन-सहन, चाल-चलन व्यवहार-विचार, शिक्षा-समुन्नति यह सारी बातें हमारी मानसिक दशा के अनुरूप ही होती हैं। जैसा कुछ चिन्तन करते हैं, विचार करते हैं वैसे ही क्रिया-कलाप भी होते हैं, और तद्नुसार वैसे ही अच्छे बुरे कर्म भी बन पड़ते हैं। सुख और दुःख बन्धन और मुक्ति चूँकि इन्हीं कर्मों का परिणाम हैं इसलिये हमारे उद्धार और पतन का कारण भी हमारा मन ही है।
कोई भी बड़ा कार्य, श्रेष्ठ सत्कर्म या उन्नति करनी हो तो उसके अनुरूप मानसिक शक्ति की ही आराधना करनी पड़ेगी। मन की शक्तियों को यत्न पूर्वक उस दिशा में प्रवृत्त करना पड़ेगा। जो लोग यह कहते रहते हैं कि “क्या करें हमारा तो मन ही नहीं मानता” उन्हें यह जानना चाहिये कि मानसिक शक्तियाँ सर्वथा स्वच्छन्द नहीं हैं। मन इच्छा शक्ति के अधीन है। इच्छाओं के आकार-प्रकार पर उनकी क्रिया शक्ति सम्भावित है। एक व्यक्ति उच्च शिक्षा प्राप्त कर लेता है दूसरा निम्न कक्षाओं से ही अध्ययन छोड़ बैठता है, एक धनी है दूसरा निर्धन, एक डॉक्टर है दूसरा वकील, जिसकी जो स्थिति है वह उसकी इच्छा के फलस्वरूप ही है। यदि किसी को अनिच्छा पूर्वक किसी स्थिति में रहना पड़ रहा है तो इससे एक ही अर्थ निकाला जायेगा कि उस व्यक्ति ने इच्छाओं के अनुरूप कार्य शक्ति में मन को प्रयुक्त नहीं किया। जिसकी मानसिक शक्तियां विश्रृंखलित रहेंगी वह न तो कोई सफलता ही प्राप्त कर सकेगा और न ही उसकी कोई इच्छा पूर्ण होगी।
असफलता या दुर्भाग्य केवल मनोबल की कमी का ही परिणाम है। यत्न करते हुये थोड़ी सी परेशानी ही प्रयत्न से विचलित कर देने के लिये काफी होती है। थोड़ा-सा शारीरिक दबाव, धन हानि, व्यापार में घाटा शिक्षा में अनुत्तीर्णता जैसी निराशा जनक घटनायें आई कि प्रयत्न छोड़ बैठे। यह घटिया मनोबल का लक्षण है कि मनुष्य अल्प श्रम से अधिक परिणाम प्राप्त करना चाहे। इच्छाओं का आकार-प्रकार जितना बड़ा है उतने ही बड़े प्रयत्नों की अपेक्षा की जाती है, यदि उतने प्रयत्न न किये जा सके तो सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।
विद्यार्थी परीक्षा उत्तीर्ण करने की दृष्टि से अध्ययन करते हैं। फीस के लिये पैसे जुटाते हैं, समय लगाते हैं सभी शारीरिक सुख त्यागकर अध्ययन में लगे रहते हैं कदाचित् परीक्षा में ऐसा कोई विद्यार्थी फेल ही हो जाय तो यह नहीं समझना चाहिये कि अपना श्रम, धन और समय व्यर्थ चला गया। परीक्षा में उत्तीर्ण होने का प्रमाण पत्र नहीं मिला यह बात महत्त्वपूर्ण नहीं है। मन के महत्त्व का प्रश्न है। महत्व इस बात का है कि उस शिक्षा से बौद्धिक बल बढ़ा, विचार शक्ति आई और अनेक उलझनों को महत्वपूर्ण सामर्थ्य प्राप्त हुई या नहीं? प्रमाणपत्र इन्हीं बातों की गारन्टी का ही नाम तो है जो यदि न भी मिले तो यह नहीं समझना चाहिये कि हमारा प्रयत्न निष्फल चला गया।
परिस्थितियाँ यदि प्रतिकूल हैं तो भी साधनों का उपयोग करते रहना चाहिये। थोड़ी-सी पूँजी से बढ़कर उच्च-स्तर के व्यापार तक पहुँचा जा सकता है किन्तु मानसिक शक्ति अपने साथ बनी रहनी चाहिये। कार्य करते समय ऊबो नहीं और उत्तेजित भी न हों। यह समझ लें कि हमें तो लक्ष्य तक पहुँचना है। जितनी बार गिरो उतनी बार उठो। एक बार गिरने से उसका कारण मालूम पड़ जायेगा तो दुबारा उधर से सावधान हो जाओगे। यह स्थिति निरन्तर चलती रहे तो अनेक बाधाओं के रहते हुए भी अपने लिये उन्नति का मार्ग निकाला जा सकता है। हार मन के हारने से होती है। मन यदि बलवान है तो इच्छा-पूर्ति भी अधिक सुनिश्चित समझनी चाहिये।
आज यदि स्थिति ठीक नहीं है तो भविष्य में भी वह ऐसी ही बनी रहेगी, ऐसा कमजोर बनाने वाला विचार अपने मस्तिष्क से निकाल दें। श्रेष्ठता अन्दर सुप्तावस्था में पड़ी हुई है। इसमें संशय नहीं कि हम हर आवश्यकता अपने आप पूरी कर सकते हैं पर इसके लिये सतत् अभ्यास की आवश्यकता है। अपना उद्योग बन्द न करें। अकर्मण्यता और आलस्य का, अधीरता और प्रयत्न हीनता का साथ छोड़कर “यत्न देवो भव” की उपासना आरम्भ कर दोगे तो पुरुषार्थ का देवता ही अपने लिये अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देगा। काम करने में शिथिलता न व्यक्त करें। ढिलाई न करें। चिन्तित न हों। आत्म विश्वास न खोओ। धैर्य के साथ ‘यत्न’ देव का आश्रय पकड़े रहें तो यह निश्चय है कि आज की यह दीन-हीन अवस्था कल श्री सम्पन्न अवस्था में बदल कर रहेगी।
ऊँचे से ऊँची इमारत की नींव भी नीचे ही रखी होती है। ऊँचे उठने का शुभारम्भ निचली पृष्ठभूमि से किया जाता है। निर्धन धनकुबेर होते हैं। पहलवान कोई माँ के पेट से बनकर नहीं आता। उसके लिये तो विधिवत् उपासना करनी पड़ती है।
यह ठीक है कि आज अपनी दशा अच्छी नहीं, कोई विशेष गुण भी दिखाई नहीं देता फिर भी निराशा का कोई कारण नहीं। एक शक्ति अभी भी अपने पास है और वह अन्त तक पास रहेगी। वह है मन। मन की शक्ति को सम्पादन करने का तरीका जानने का प्रयत्न करें। छोटे-छोटे कामों में मनोयोग का प्रयोग किया करें। एक दिन मनोबल इतना बढ़ जायेगा जब ऊँचा से भी ऊँचा कार्य करने में भी हिचक नहीं होगी। और उत्साह पूर्वक, दृढ़तापूर्वक सफलता की मंजिलें पार करते हुये आगे बढ़ सकें। श्रेष्ठतायें अन्दर छिपी पड़ी हैं उनका समर्थन और अभिवर्धन करें, दूसरों की ओर देखें वे किस तरह आगे बढ़े हैं। दूसरों से उदाहरण लें कि उन्होंने कैसे सफलतायें पाई हैं। बिना हाथ पाँव डुलाये किसी के भाग्य देवता ने साथ नहीं दिया। चुप चाप बैठे रहेंगे तो उन्नति का अवसर पास से गुजर कर चला जायगा, आपको केवल हाथ मसलकर रह जाना पड़ेगा।
आत्म संयम करें, इससे बिखरा हुआ मानसिक संस्थान जागेगा। निश्चेष्ट मनुष्य इसलिये होता है कि उस की शक्तियाँ इधर उधर बिखरी हुई होती हैं। मामूली सी शक्ति से कोई काम भी नहीं बनता। बिखरती हुई सूर्य की किरणें सारे-शरीर पर असंख्य मात्रा में गिरती हैं तो भी उससे कुछ विशेष हलचल उत्पन्न नहीं होती पर यदि एक-डेढ़ इञ्च जगह की किरणों को आतिशी शीशे से एक जगह पर एकत्रित कर दिया जाय तो इससे डडडड दावानल का रूप धारण कर एकता की डडडड क्षमता से सम्पन्न आग पैदा हो जायेगी। हम अपनी शक्तियों को इधर उधर के बेकार के कार्यों में खर्च करते रहते हैं जिससे जीवन में कोई विशेषता नहीं बन पाती। आत्म संशय डडडड से बिखरी हुई शक्ति एक स्थान पर एकत्रित होकर अभिष्ट परिणाम के लिये उपयुक्त वातावरण तैयार करती है। मन की सूक्ष्म शक्तियों का जागरण आत्म-संयम से होता है।
किसी समय भारतवर्ष ने मन की शक्तियों का सम्पादन करके अनेकों आश्चर्यजनक शक्तियाँ और सिद्धियाँ प्राप्त की थीं। एकाग्रता के अभ्यास द्वारा वह सम्भावनायें अब भी जागृत की जा सकती हैं। इसके लिये अपने आपको गति देने की आवश्यकता है। जी-तोड़ परिश्रम करने की आवश्यकता है। प्रयत्न पर प्रयत्न करने की जरूरत है। हमारे भीतर जो सिद्धियाँ बिखरी हुई पड़ी हैं उन्हें कार्य क्षेत्र में लगाने भर की देर है, बस हमारी यह विषम परिस्थितियाँ अधिक दिनों तक ठहरने वाली नहीं हैं।
उन्नति के लिये चाहे कितने ही व्यक्ति सहानुभूति व्यक्त क्यों न करें पर यह निर्विवाद है कि हमारा इससे कुछ काम न चलेगा। हमें अपनी स्थिति स्वयं सुधारनी होगी। स्वयं कठिनाइयों से लड़कर नया निर्माण करना पड़ेगा। विशृंखलित शक्तियों को जुटाकर आगे बढ़ने का कार्यक्रम बनाना पड़ेगा। यह बात यदि समझ में आ जाय तो सफलता की आधी मंजिल तय करली, ऐसा समझना चाहिये। शेष आधे के लिये मनोबल जुटाकर यत्नपूर्वक आगे बढ़िये आपका सौभाग्य आपके मंगल मिलन के लिये प्रतीक्षा कर रहा है, स्वागत के लिये आगे खड़ा है।
जो वस्तु मनुष्य को सबसे अधिक दुःखी बनाती है उसका नाम है “ तृष्णा”। जीवन निर्वाह के आवश्यक साधनों के लिये न तो अधिक श्रम ही करना पड़ता है और न कोई दौड़-धूप करनी होती है। पशु-पक्षी तक उदरपोषण और निवास आदि की समुचित व्यवस्था कर लेते हैं पर मनुष्य की कामनायें बड़ी विशाल होती हैं। पूर्णतया अनियंत्रित कामनायें बड़ी विशाल होती है। पूर्णतया अनियंत्रित कामनाओं का नाम ही बड़ी तृष्णा है, इसी से मनुष्य जीवन में तरह-तरह की जटिलतायें, दुःख और परेशानियाँ आती हैं।
आवश्यकताओं की तात्कालिक पूर्ति में ही मनुष्य को सन्तोष नहीं होता। जितना अधिक उसमें बोलने, विचार करने की शक्ति तथा मन और बुद्धि का विकास हुआ है उतना ही उसकी आवश्यकतायें बढ़ी हैं। एक बार की इच्छा पूर्ति से उसे तृप्ति नहीं मिलती। वह हर दूसरी बार पहले से उच्चतर साधनों की माँग करता रहता है। आज साइकिल तो कल मोटर साइकिल हो, फिर मोटरकार -तात्पर्य यह कि इच्छाओं का तारतम्य नहीं टूटता। मनुष्य इसी गोरखधन्धे में फँसा विक्षिप्त, निराश्रित-सा बना रहता है। उसे कभी शान्ति नहीं मिलती, कभी सन्तोष नहीं होता।
बढ़ती हुई तृष्णा ही मनुष्य के दुःख का कारण है इसमें जरा भी सन्देह नहीं है। वर्तमान में ही खाने, पीने, शौक, मौज करने तक उसकी इच्छायें सीमित नहीं रहतीं। बहुत लम्बे समय के लिये पुत्रों और प्रपौत्रों के लिये संग्रह करके छोड़ जाने की मानवीय प्यास ही अस्त व्यस्तता और दुःख का कारण होती है। इससे न तो आत्म कल्याण ही होता है और न बच्चों का ही किसी प्रकार का विकास हो पाता है। बिना परिश्रम की कमाई से मनुष्य में अनेकों दुर्बलतायें आती हैं और विकास करने की योग्यता नष्ट हो जाती है।
अपने ही सम्बन्ध में बहुत दूर तक सोचना मनुष्य का स्वार्थी होना बताता है। इस स्वार्थ के परित्याग से जो सन्तोष शेष बचता है वही मनुष्य का सच्चा सुख है। महर्षि गौतम ने कहा है :-
असन्तोषं परं दुखं संतोषः परमं सुखम्।
सुखार्थी पुरुषस्तस्मात् संतुष्टः सततं भवेत्॥
अर्थात्-हे मनुष्य! इस संसार में दुःख का कारण असन्तोष है और सन्तोष ही सुख है। जिन्हें सुख की कामना हो वे सन्तुष्ट रहा करें। “
सन्तोष एक महान् आध्यात्मिक भाव है जो मनुष्य के हृदय की विशालता को व्यक्त करता है। धैर्य, सहनशक्ति, त्याग और उदारता ये सब सन्तोष का अनुगमन करते हैं। सन्तोषी पुरुषों में शेष सभी सद्गुण और शुभ संस्कार स्वतः आ जाते हैं।
मनुष्य ने यद्यपि ज्ञान-विज्ञान और शक्तियों का उपयोग करके सुख के अनेक साधन ढूंढ़े हैं, नव निर्माण के द्वारा उसे अनेक उपलब्धियाँ हस्तगत भी हुई हैं किन्तु सुख की कल्पना अभी तक नितान्त अधूरी पड़ी है। इच्छायें अनन्त हैं वे कभी समाप्त नहीं होती हैं। और जब तक किसी भी तरह की इच्छा मनुष्य के हृदय में शेष रहेंगी तब तक उसका ध्यान पारमार्थिक जीवन की ओर कदापि नहीं जायगा। मन की शक्ति एक ही है उसे चाहे भोग-विलास, खान-पान, और शौक- मौज के कार्यों में लगाये रहें या आत्मज्ञान के हित सम्पादन में लगादें। कामनाओं के कारण मनुष्य जीवन उलझनों में फँसता चला जाता है पर पारलौकिक जीवन की सुखानुभूति प्राप्त करने के लिये तो उनका त्याग ही करना पड़ता है। इच्छायें स्वतः कभी समाप्त नहीं होती, तृष्णाओं का अन्त कभी अपने आप नहीं होता, उन्हें मारने के लिये सन्तोष का भाव चाहिये। हर परि स्थिति में सुख अनुभव करना चाहिये।
विपुल धन-सम्पत्ति, रोजगार भोग और विलास हो ने पर भी लोगों के जीवन में शान्ति नहीं दिखाई देती। अमीर भी घोर-अशान्ति में पड़े देखे गये हैं। विश्व-सिद्धिवदित धन कुबेर हेनरी फोर्ड की दुःख भरी घटना सभी जानते हैं। साधन कभी सुख नहीं दे सकते यह पूर्णतया प्रमाणित हो चुका है। सुख तो सचमुच आत्म-ज्ञान प्राप्त करने में ही है। पर आपको इसके लिये आत्म-शोधन ज्ञान की प्रक्रिया जरूर पूरी करनी पड़ेगी। आपको इसके डडडड साँसारिक जीवन में अधिकाँश में मुक्ति लेनी पड़ेगी और शोक थोड़े से साँसारिक साधनों में ही संतोष का भाव व्यक्त करना होगा। तभी तो इतना अवसर निकल सकेगा जब आत्म चिंतन कर सकेंगे। जीवन यापन के स्थूल साधनों तक ही सीमित रहे तो चित्तवृत्तियां भी उन्हीं का ज्ञान और अनुभव प्राप्त करने में जुटी रहेंगी और आपका विकास एकाँगी रह जायगा। आध्यात्मिक जीवन का प्रकाश आपके जीवन में न आया तो आप भौतिक सुखों के झमेले में ही भटकते, ठोकरें खाते फिरते रहेंगे।
इस संसार में स्थिर चित रहने के लिये एक मात्र संतोष का ही आश्रय लेना पड़ेगा। आपके पास बहुत धन है यह ठीक है किन्तु क्या परिजनों के बिछोह, बीमारी या मृत्यु से आप बच सकेंगे? कपूत बेटा, कुलक्षणी स्त्री, कलह-प्रिय परिवार और अत्याचारी तत्वों से समाज दूषित हो रहा हो तो क्या आपका वैभव, धन, शिक्षा आदि कुछ काम दे सकेंगे। प्रत्येक परिस्थिति में मुँह की खानी पड़ेगी, आप जरूर उद्विग्न होंगे, निराश होंगे और असीम दुःख का अनुभव करेंगे। पर दुःख एक ऐसा भाव है जो आपकी चित्तवृत्तियों को अन्तर्मुखी बना देता है इसी लिये कुसंयोग, विरह और अभावों का मानसिक कष्ट उसे नहीं होता।
बहुतेरे श्रमिकों को देखा है कि जितना दिन भर में कमाते हैं उसे शाम तक खा लेते हैं। कल के लिये उन्हें जरा भी चिंता नहीं होती। खूब सुख और शाँति देखकर यों प्रतीत होता है कि ये दुनिया में सब से अधिक सुखी हैं। यह सुख साधन-जन्य नहीं होता वरन् सन्तोष की मस्ती में ही वे इस तरह विनोद-रत होते हैं। चिन्तायें तो उन्हें ही घेरे रहती हैं जिनकी तृष्णायें विशाल होती हैं। पर जिन्हें आज की स्थिति से संतोष और कल की चिन्ता नहीं है दुःख भला उनका कर भी क्या सकेगा? सुख का मूल तो सन्तोष ही है।
विद्वान डब्लू सीकर का मत है मनुष्य को रखने के लिये सन्तोष एक सर्वोत्तम योग्य पदार्थ है रोगी को नीरोग करने के लिये सर्वोत्तम औषधि है। सन्तोष पूर्वक लाई गई रूखी सूखी रोटी का अभाव भी शरीर में दूध जैसा होता है, कड़वाहट, चिड़चिड़ापन आदि के कारण अभीष्ट व्यक्तियों का स्वास्थ्य कभी अच्छा नहीं रहेगा।
संत तुलसी दास ने इसे—
बिनु सन्तोष न काम नसाहीं।
काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं॥
कहकर व्यक्त किया है। बिना सन्तोष आये कामनाओं का अन्त नहीं होता। कामनाओं डडडड का सुख संभव नहीं है।
चाणक्य ने लिखा है—
क्रोधो वैवस्वतो राजा तृष्णा दैतरणौ नदी।
विद्या कामद्रुधा धेनुः सन्तोषो नंदनं वनम्॥
अर्थात्—मनुष्य का विनाश क्रोध के कारण और तृष्णा वैतरणी नदी के समान है जिसका कभी अन्त नहीं होता। विद्या कामधेनु के समान है तथा सन्तोष नन्दन वन के समान हैं :-
आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करें अथवा भौतिक दृष्टि से दोनों ही अवस्थाओं में सन्तोषमय जीवन का महत्व सर्वोपरि है। इससे मनुष्य के सद्गुणों का विकास होकर आत्म ज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है। जो इस संसार का रहस्य और निजत्व का ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें सर्वप्रथम संतोषी बनना पड़ेगा। ईश्वर निष्ठा का प्रवेश द्वार डडडड डडडड डडडड डडडड
मनुष्य व्यक्तिगत रूप से जितना समाज को देता है। सामूहिक रूप से उससे कई गुना वह समाज से प्राप्त करता है। विचार करते हैं तो यों लगता है कि आज पालन पोषण, शिक्षा-दीक्षा, कृषि-विज्ञान की सुविधायें डडडड हो रही है वह सब पूर्व पुरुषों के परिश्रम और अध्यवसाय का परिणाम है। प्राप्त ज्ञान और साधनों को उन्होंने वितरित न किया होता तो आज की कल्याण-परम्परायें अतीत के गर्त में ही विलीन रही होती।
वर्तमान विकास, साधन और सुविधायें पूर्वजनों ने कृपापूर्वक दी हैं। हम उनके चिर ऋणी रहेंगे इसमें सन्देह नहीं। किन्तु कर्त्तव्य की इति यहीं समाप्त नहीं होती। हमें भी इस पुण्य परम्परा को जागृत रखता है तभी तो मानवता जीवित रह सकेगी। खेत से उगाये हुये अन्न को किसान बार-बार छितराता है फलस्वरूप अन्न का भण्डार खाली नहीं होता। परोपकार की अन्य निधि विलुप्त न हो इसलिये उसे बार-बार मनुष्यता रूपी खेतों में बिखेरते रहना है।
मानव जीवन की सार्थकता, अपने आप को घुला कर अपने अस्तित्व को मिटाकर परहित के लिये आत्म-बलिदान करने की भावना में है। गोस्वामी तुलसी दास परोपकार को मानव धर्म का रूप देते हुये लिखते है—
परहित सरिस धर्म नहिं भाई।
नहिं पर पीड़ा सम अधमाई॥
अर्थात्—दूसरों की भलाई से बढ़कर संसार में धर्म नहीं है और दूसरों को पीड़ा देने से बड़ा अपराध इस धरती में नहीं है।
परोपकार मनुष्य का आध्यात्मिक सद्गुण है। इसी सद्भावना पर संसार का सृजन, व्यवस्था और उत्थान सन्निहित है। माता-पिता यह जानते हुए भी कि यह पुत्र हमें सुख देगा, ऐसी कोई सत्यता नहीं, फिर भी वे कितने सहज, स्नेह, प्रेम और दुलार से उसका पालन-पोषण करते हैं। मनुष्य का सम्पूर्ण विकास पारस्परिक भावना में ही निहित है। मनुष्य की आध्यात्मिक भूख परोपकार से ही मिटती है। जब तक परहित की भावना मनुष्य के अन्तःकरण में जागृत नहीं होती, तब तक अनेकों कर्मकाण्ड पूजा-प्रक्रियायें करता हुआ भी वह शाँति, सुख और संतोष नहीं प्राप्त कर पाता।
किसी प्राणी को संकट से बचा लेने, समय पर सहायता देने, भूखे को भोजन करा देने, रोगी की सेवा सुश्रूषा करने से जो उस व्यक्ति को आँतरिक शाँति मिलती है उसी का प्रतिफल कर्त्ता के अन्तःकरण को प्रभावित करता है। इसी से आत्मा को असीम तृप्ति का अनुभव होता है।
परोपकार वह है जो निःस्वार्थ भाव से किया जाय। उसमें कर्त्तव्य भावना की विशालता अन्तर्हित हो। स्वार्थ की भावना और भविष्य में अपने लिये अनुकूल साधन प्राप्त की दृष्टि से जो सेवा की जाती है वह परोपकार नहीं प्रवंचना है।
सूर्य प्रतिदिन आकाश में चलता है और अपनी ऊष्मा धरती में बिखेरता है उससे यहाँ के लोगों को जीवन मिलता है। इसके बदले में उसने मनुष्य से कभी कुछ नहीं माँगा। चन्द्रमा, वायु, नदियाँ, वृक्ष सभी किसी न किसी रूप में संसार के हित और कल्याण में लगे हैं अपनी इस सेवा के बदले वे कभी भी कुछ नहीं माँगते। तिनके खाकर दूध देने वाली गाय की कर्त्तव्य भावना ही सराहनीय मानी जायगी। कुछ प्राप्त करने या अपने उद्देश्यों की पूर्ति की दृष्टि से किये गये उपकारों में वह शक्ति नहीं होती जो बिना किसी मूल्य पर किये गये सत्कर्मों में होती है।
प्राकृतिक अनुदानों के प्रति अपना दयाभाव प्रकट करने का यही तरीका है कि वैसा ही अनुसरण हम भी करें। प्राकृतिक सुविधायें देकर परमात्मा ने मनुष्य की बाह्य व्यवस्थाओं को पूर्ण किया है, आँतरिक व्यवस्थाएँ हमें स्वयं सहयोग, सहानुभूति और कर्त्तव्य पालन के आधार पर करनी हैं। व्यक्ति का विकास और सामाजिक उत्थान का मूल कारण कर्त्तव्यनिष्ठा है,यह उदारता समाज में जितनी अधिक फैलती है उतना ही समाज सुखी और समुन्नत बनता है। और जब भी इसके विपरीत स्वार्थ डडडड, पर पीड़ा की उच्छृंखल गतिविधियाँ फैलने लगती हैं, तभी इस धरती में क्लेश और कठिनाइयों का गहरा कोहरा छा जाता है।
मनुष्य का व्यक्तित्व और उसका वैभव परोपकार है।
डडडड का श्लोक है—
न पिवन्ति नद्यः स्वमेव नोदकं,
न फ लानि खादन्ति स्वयमेव वृक्ष।
धराधरो वर्षति नात्महेतवे,
परोपकारायाँ सताँ विभूतया॥
अर्थात्— “जिस तरह नदियाँ अपने लिये नहीं बहतीं, वृक्ष अपने फलों का उपभोग स्वतः नहीं करते, बादल अपने लिए नहीं बरसते उसी तरह सज्जन और विशाल हृदय मनुष्य सदैव परोपकार में लगे रहते हैं।” प्रसिद्ध संत नोओत्जेू’ के सम्बन्ध में दार्शनिक मैन्सियद ने कहा था की “यदि उनके शरीर को पीस डालने से संसार का हित होता तो वे सहर्ष अपने आपको पिसवा डालते”
यह बात तो मात्र मान्यता है। हमारे यहाँ तो वह व्यवहार में आ चुका है। दधीचि ने हँसते-हँसते अपना शरीर देवताओं की रक्षा के लिये कटवा दिया। शिवि, हरिश्चंद्र, कर्ण, मोरध्वज, दिलीप आदि महापुरुषों ने मानवता की सिद्धि के लिये जो साधनायें जगाईं उनका प्रकाश आज भी हमारी संस्कृति को प्रकाशमान बनाये है। इस पुण्य की परम्परा की भागीदारी हमें भी प्राप्त करना है ताकि हमारे देश की आध्यात्मिक आस्थायें, हमारा भविष्य ऊँचा, बहुत ऊँचा उठे। सभी महापुरुषों का यही उद्देश्य रहा है, अपना भी लक्ष्य ऐसा ही हो।
हम परोपकार को संत महात्माओं की बात मानते हैं वस्तुतः वह प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है। मनुष्य के चरित्र की परीक्षा इसी से होती है। जो मनुष्य सबके दुःखों में हाथ बढ़ाने की जितनी लगन रखता है वह उतना ही सभ्य, सुसंस्कृत तथा उच्च विचार वाला माना जाता है। परोपकार मनुष्य को उन्नत, स्वच्छ और निर्मल बना देता है। उसके चरित्र में सतोगुणी तत्व का समावेश बढ़ता जाता है और वह एक दिन आध्यात्मिकता के उच्च से उच्च आदर्शों का स्पर्श करने लगता है। यह भावना जितनी उच्च, अधिक विशाल होती जाती है उतनी ही अधिक परमात्मा और उसके विस्तार की अनुभूति बढ़ने लगती है। यह सुख अवर्णनीय है। धन्य हैं वे लोग जिनका जीवन परोपकार के हवन कुण्ड में समिधा बनकर जल जाता है।
सेवा, त्याग, प्रेम सहृदयता, कष्ट, सहिष्णुता, आदि परोपकार के अंग हैं। इन सम्पूर्ण गुणों का जहाँ सम्मिलन होता है वही परोपकार का प्रादुर्भाव होता है। एक दिन किसी को रंचक सहायता दे देने मात्र से कोई परोपकारी नहीं बन जाता। यह जीवन साधना है इसके लिये अपना शरीर, अपना साधन और अपनी सम्पदायें भोगनी पड़ती हैं। जो जितने अंशों में इन नियमों का पालन करता है उसका हृदय उतना ही खुला हुआ, साहसी और विशाल होता है।
हमें प्रेम का अभ्यास करना है। प्रेम की प्रशस्ति का ही दूसरा स्वरूप है परोपकार। प्रेम के विकास के साथ-साथ परोपकारी भावनायें पनपती हैं। प्रेम बीज है परोपकार वृक्ष। प्रेम की जड़ सींचने से परोपकार की पौध स्वतः लहलहाने लगती है।
प्राणिमात्र का हित, उपकार, मन से चिंतन करना तथा वाणी और शरीर से लोक-हित तथा परोपकार के कार्य यथाशक्ति करना, किसी का अहित या किसी को पीड़ा न पहुँचाना यही परोपकार का सदुपयोग है। यह भावना साँसारिक न होनी चाहिये। विश्व कल्याण की सजीवता ही परोपकार का प्राण है। कवि के शब्दों में परमात्मा का सान्निध्य सुख भी उसे ही मिलता है।
यह शरीर इसलिये मिला है कि इसके द्वारा संसार के दुःखी, पीड़ित और अभावग्रस्त मनुष्यों का कुछ कल्याण हो। यह योग्यतायें फिर मिलेंगी या नहीं यह तो संदिग्ध ही है पर आज की सामर्थ्यों का यथा शक्ति उपयोग करलें इसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं है। अतः हमें परहित की साधना में लगने में विलम्ब नहीं करना चाहिये। यह शरीर परोपकार के लिये मिला है और परोपकार में ही इसकी इति होनी चाहिये।
यह अथर्ववेद का सूक्त है, जिसमें मंत्रदृष्टा ने बताया है कि ब्रह्मचर्य की साधना से विद्वान लोग मृत्यु को जीत सकते हैं। इसी प्रकार युग-पुरुष भगवान कृष्ण ने भी कहा है—यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति। अर्थात्-जो परमात्मा को प्राप्त करना चाहते हो, तो ब्रह्मचर्य का पालन किया करो।
उपरोक्त दो सूक्तों से दो शिक्षायें मिलती हैं (1) पहली यह कि ब्रह्मचर्य से मनुष्य को आयुर्बल मिलता है, अकाल मृत्यु नहीं होती, इच्छानुकूल मृत्यु होती है। (2)ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्म की, सत्य की, शोध में चर्या अर्थात् तत्सम्बन्धी आचरण। यह दोनों ही बातें ऐसी हैं जिनकी सत्यता को भारतीय संस्कृति के प्रादुर्भाव काल से अब तक लोग मानते आये हैं। देश, काल और परिस्थिति के अनुकूल ईश्वर प्राप्ति की साधना में अन्तर आ सकता है किन्तु ब्रह्मचर्य किसी न किसी स्थिति में प्रत्येक विधि के साथ आवश्यक कहा गया है।
यह बातें ज्ञान और विज्ञान की ठहरीं। किन्तु व्यावहारिक जीवन और साँसारिक कार्यक्रमों में जिस शक्ति और स्वास्थ्य, मेधा-बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है उसके लिये भी ब्रह्मचर्य उतना ही आवश्यक है जितना पहली दो स्थितियों में। गृहस्थ जीवन में जिस सुख की कल्पना की जाती है उसका श्रेय बहुत कुछ ब्रह्मचर्य व्रत को ही कह सकते हैं। मनुष्य विचारशील प्राणी है उसे अपना आगा-पीछा, हित-अहित सोचकर चलने की क्षमता प्राप्त है। मनुष्य जीवन के सुख प्राप्त करने के लिये जीवन को सुव्यवस्थित न रखें तो सुख की कितनी ही कामना करें दुःख ही भोगना पड़ता है। शारीरिक उत्तेजनाओं से उत्तेजित होकर तथा मानसिक निर्बलताओं से प्रेरित होकर बहुमूल्य जीवनी शक्ति को यों ही बर्बाद कर देना, मनुष्य की घोर अज्ञानता का चिन्ह है। वह जीवन शुष्क, नीरस अन्धकारमय, उच्छिष्ट, अपवित्र और मृततुल्य है जिसमें मनुष्य ने शरीर सुख की क्षणिक तृप्ति के लिये हाड़-माँस के पुतले से चिपट-चिपट कर अपना जीवन स्वत्व बर्बाद कर दिया होता है। थोड़े ही दिन में जब शरीर शिथिल पड़ जाता है, इन्द्रियाँ जवाब देने लगती हैं तब होश आता है, किन्तु अकाल-मृत्यु को दरवाजे पर बुला कर पछताने से होता भी क्या है। अतः आवश्यक है कि हम मंत्रदृष्टा ऋषि की वाणी हृदयंगम करें और अधिक से अधिक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया करें।
मनुष्य को तभी बुद्धिमान कह सकते है जब वह साँसारिक पदार्थों एवं घटनाओं का अध्ययन करके अपनी मानसिक उत्तेजनाओं का समाधान कर लिया करे। प्रतिदिन अनेकों ऐसे लोगों को देखते हैं जिनके शरीर सूखे, निर्बल और शक्तिहीन दिखाई देते हैं। दूसरी ओर कुछ हट्टे-कट्टे, स्वस्थ और बलिष्ठ व्यक्ति भी दिखाई देते हैं। संभव है कुछ स्वस्थ पुरुषों को खान-पान की अच्छी सुविधायें रहीं किन्तु यदि आचरण की गहराई में जाकर देखें तो यही मालूम पड़ेगा कि दुर्बल व्यक्तियों ने असंयम किया है। शरीर की विद्युत-शक्ति ,प्राण-शक्ति का अनावश्यक दुरुपयोग किया है। इसी कारण वे अप्रिय, दुःखी, रोगी एवं अप्रसन्न दिखाई देते हैं। यह बात प्रायः हर व्यक्ति जानता और अनुभव करता है पर चतुर वे हैं जो इन विचारों का लाभ अपने व्यावहारिक जीवन में प्राप्त करते हैं।
“क्षणिक रस के लिये मैं शक्ति हीन क्यों बनूँ? जिस वीर्य में सन्तानोत्पादन की शक्ति भरी पड़ी है उसे क्यों नष्ट करूं? जीवन को आह्लादित उल्लसित एवं चमकदार रखने वाले द्रव्य का पतन क्या अच्छी बात है? परमात्मा की इस शक्ति को विनष्ट करना सचमुच गैर जिम्मेदारी है, अपराध है, मैं यह अपराध नहीं करूंगा।” इस तरह के विचारों को प्रतिदिन ध्यान में लाना चाहिये। मानसिक विग्रह की स्थिति में इन पर बार-बार और गहराई से विचार करना चाहिये। वीर्य रक्षा करने वाले मनुष्य ही इस संसार के भोग भोगते हैं।
संसार के किसी भी बाह्य पदार्थ को अपने सुख का कारण न मानना मनुष्य के सर्वोत्कृष्ट ज्ञान का परिचायक है। सुख विचार की वस्तु है, भावना से प्राप्त होता है। स्वस्थ भावनायें और बलिष्ठ विचारों से आमोद उत्पन्न होता है पर विचारों की सक्रियता और भावनाओं की मस्ती तो ब्रह्मचर्य से ही प्राप्त होती है। शक्ति ही सुख का मूल है, यह समझ कर अपनी शारीरिक शक्ति के अपव्यय को रोकने में ही चतुरता है। बाह्य वाले पदार्थों को सुख का आधार बनाकर रहना मनुष्य की बन्धन-दशा तथा अज्ञान की अब्रह्मचारिणी स्थिति है, इसमें मनुष्य का पतन ही संभव है।
कामुकता प्रायः अशुभ-चिन्तन से, अश्लील दृश्यों के अवलोकन या बार-बार मनन करने से आती है। आचरण का बीज है विचार। विचारों को यदि सत्य की ओर या रचनात्मक प्रवृत्तियों में लगाये रहें और उन्हीं में सुख अनुभव करें तो ब्रह्मचर्य धारण की एक बहुत बड़ी कठिनाई हल हो जाती है। गाँधीजी कहा करते थे कि “आलसी मनुष्य कभी भी ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकता। वीर्य संग्रह करने वालों में एक अमोघ शक्ति पैदा होती है। उसका उपयोग अपने शरीर और मन का निरन्तर कार्य रत रखने में ही करना चाहिये, अतः प्रत्येक मनुष्य को कोई ऐसा कार्य क्षेत्र निर्धारित कर लेना चाहिये जिससे विषय-वासना की ओर भटकने के लिये मन को रंचमात्र भी समय न मिले।”
जिसका मन किसी वस्तु या व्यक्ति में आसक्त हो जाता है। उसके न रहने या न मिलने पर दुःख अनुभव करता है। उसका ही आश्रित, परावलम्बी बन जाता है तो यही स्थिति अब्रह्मचर्य का कारण बन जाती है। अतः अपने आत्मा के स्वरूप को सदैव ध्यान में रखकर आत्मतृप्ति की अवस्था में जीवन-क्रम चलाना चाहिये तभी ब्रह्मचर्य की नैष्ठिक स्थिति प्राप्त की जा सकती है।
स्त्री-पुरुष के शरीरों की भिन्नता और स्त्री सौंदर्य के प्रति आकर्षण से मनुष्य को विचार उत्तेजना आती है। प्रेरित और प्रभावित होकर अक्सर लोग वासना के शिकार हो जाते हैं। पर यदि भली प्रकार चिन्तन करें तो यह मालूम पड़ता है कि शरीर की विविधता या आवरण में भी पौरुष या आत्मा ही विद्यमान है। अविनश्वर आत्मा के कल्याण के लिये शरीर के प्रति आकर्षण मानवोचित नहीं हैं। यह सोचना चाहिये कि इस शरीर में हाड़, माँस, मल-मूत्र आदि गन्दी वस्तुयें ही भरी पड़ी है। रुपहली चमक के पीछे अपनी आत्मा के कल्याण को विस्मृत नहीं किया जा सकता है। दो क्षण के इन्द्रिय सुख के लिये जीवन के बहुमूल्य हित पर कुठाराघात नहीं किया जा सकता। वह करना चाहिये जिससे आत्म-ज्ञान बढ़े। मोह और काम के भाव ‘आत्म-हित’ को बेच डालना कभी विवेकपूर्ण नहीं कहा जा सकता।
विषय-सुखों में भटकने वाला मनुष्य का स्वेच्छाचारी और अहंकारी मन होता है। मनोनिग्रह की समस्या, ब्रह्मचर्य-पालन की प्रमुख समस्या है। इसके लिये ऊँचा आदर्श सामने रखना और उसके लिये संयमी जीवन का आचरण करना मनोनिग्रह का सर्वोत्तम उपाय है। किन्तु यह उपाय उन्हें ही लाभ दे सकता है जो कुछ विचारशील हैं और जिन्होंने मनुष्य-जीवन को नाशवान् समझ कर तुच्छ स्वार्थों को ठुकरा देने का साहस पैदा किया है।
सामान्य व्यक्तियों के लिये मन को वशवर्त्ती बनाने के लिये आहार शुद्धि पर अधिक ध्यान देना चाहिये। मन वस्तुतः आहार की ही सूक्ष्मतम अवस्था का नाम है अतः जैसा लोगों का आहार होता है वैसे ही उनका मन भी और तदनुरूप उनके आचरण भी होते हैं। प्रत्येक मनुष्य को अपने आहार पर काबू रखना चाहिये। भोजन केवल शरीर रक्षा, प्रसाद और औषधि रूप में ही ग्रहण किया जाना चाहिये। अधिक कड़ुवे, तीखे, बासी-बुसे, मिर्च मसालेदार, चटपटे भोजन की उपयोगिता स्वास्थ्य और आरोग्य की दृष्टि से भी नहीं है। आध्यात्मिक दृष्टि से तो ऐसे भोजन का कुछ महत्व नहीं है। मादक पदार्थ, खुले बाजारू खाद्य-पदार्थों में केवल रोग के कीटाणु ही नहीं फैल जाते वरन् उनमें आने जाने वाले लोगों के दूषित संस्कार भी प्रवेश कर जाते हैं।
ब्रह्मचर्य मनुष्य जीवन के सभी लौकिक व पारमार्थिक सुखों का साधन है, हमें अपने जीवन को ब्रह्मचर्यमय रखकर शक्तिवान्, कान्तिवान्, मेधावान् तथा विचारवान् बनने का सदैव प्रयत्न करते रहना चाहिये। जिसने इस मूलमन्त्र को समझ लिया उसके जीवन में सुखों की कोई कमी न होनी चाहिये।
देवत्व के प्रति प्रगाढ़ निष्ठा और सम्मान की भावना भारतीय संस्कृति की प्राचीन परम्परा है। देवत्व का अर्थ है विश्व कल्याण की कामना। जो सबके हित में अपने हितों का होम कर दें वह देव-पुरुष हैं, ऐसे माननीय पुरुषों को सम्मान देना योग्य बात है। समाज को सुखी और समुन्नत बनने की कला सिखाने वाले और उस संकल्प की पूर्ति के लिये जीवन-दान देने वालों की जितनी पूजा की जाय, वह कम ही है। महान् सेवा के लिये महान् श्रद्धा व्यक्त होनी ही चाहिये।
देवत्व के प्रति श्रद्धा और पारस्परिक सद्भावना के प्रतीक के रूप में देव-मन्दिरों के निर्माण का विधान है। सद्भावना का लोक-जीवन की सम्पन्नता से घनिष्ठ सम्बन्ध है। सामाजिक आचरण में जब दुर्भावनायें, अनाचरण, व्यामोह, विक्षिप्तता, पारस्परिक वैमनस्य तथा आध्यात्मिक विकृति पैदा हो जाती है तो जन जीवन में दुःख क्षोभ और असन्तोष उमड़ पड़ता है। आज का लोक जीवन इन आसुरी प्रभावों से पूर्णतया सराबोर है। इसी से लोकतान्त्रिक ढाँचा लड़खड़ाता हुआ नजर आता है। इस मूढ़ता का कारण लोगों का भौतिकतावादी दृष्टिकोण है। विवेक या विचार शक्ति की न्यूनता के कारण लोग अपने मूल लक्ष्य से भटकते हैं। देव मूर्तियाँ लोगों के सद्भाव को जागृत करने में अलौकिक शक्ति रखती हैं, किन्तु उनके पीछे यदि किसी महान् व्यक्तित्त्व का हाथ न रहा तो केवल प्रतीक से किसी प्रकार के बचाव की संभावना न की जानी चाहिये। यह भूल यहाँ हुई है पर आगे इससे सबक लेना है।
मोहम्मद गजनवी ने सोमनाथ के मन्दिर पर आक्रमण किया। सोमनाथ के साथ करोड़ों रुपये की जागीरें थी। बड़े-बड़े सन्त महात्मा वहाँ निवास करते थे, किन्तु मूर्तिवाद के नाम पर फैले आडम्बर के कारण वह स्थान लोगों की श्रद्धा बनाये न रख सका। बेचारी मूर्ति कैसे प्रतिवाद करती? उसे तोड़ कर मोहम्मद गजनवी हीरे जवाहरातों के जखीरे भर ले गया। धन गया यह इतनी दुःखद घटना नहीं जितनी आस्थाओं पर आघात हुआ, यह हृदय छेदने वाली बात है। हिन्दुत्व के प्रति जिन्हें भी थोड़ी बहुत प्रीति होगी उनके दिलों में इस प्रकार की कसक उठना स्वाभाविक है।
इस में एक बात सीखने को मिलती है कि देवालय बनें किन्तु उनके साथ व्यक्तित्व का भी शिलान्यास हो। मूर्तियाँ भी उनके साथ जोड़ी जायें। विचार और व्यवहार में शिक्षा से पूर्णता आती है। भावना के साथ कर्म की शक्ति भी चाहिये। देवालय शरीर का काम करते हैं, सद्भावनायें जागृत करने वाली प्रवृत्तियाँ उनमें “प्राण” का काम करती हैं। देह और प्राण के सम्मिश्रण से चैतन्यता आती है। अकेली देह निर्जीव है। हम देवालयों के महत्व को अस्वीकार नहीं करते, पर यह प्राण विहीन भी न हों।
इन दिनों देव मन्दिरों में दिखावट और ढोंग बनाकर लोगों की श्रद्धा और उनके विश्वास छीन लेने की जो चोरबाजारी चल रही है उसे किस तरह दूर किया जाय, यह एक विकट समस्या है। अधार्मिक लोगों का अन्ध श्रद्धा वालों के साथ गठबन्धन जो चल रहा है इसे कैसे दूर किया जाय? समाज में सौमनस्य साँस्कृतिक उन्नयन और सदाचार जगाने की विवेकपूर्ण प्रवृत्तियाँ किस तरह जागरुक हों? न समस्याओं का समाधान न हुआ तो भारतीय अध्यात्म की जड़ें निरन्तर खोखली होती चली जायेंगी और जो धर्म के बचे खुचे अंकुर शेष हैं उन्हें भी नष्ट होने में कितनी देर लगेगी।
अब यह तथ्य लोगों को समझ ही लेना चाहिये कि तीर्थ-यात्रा और देवमन्दिरों के दर्शन का जो प्रयोजन लोग लेकर चलते हैं वह वास्तव में सिद्ध नहीं होता। तीर्थ-यात्रा के बाद भी लोगों को नैतिकता का, अच्छे रहन-सहन और व्यावहारिक आध्यात्म का विकास न हो तो कौन कह सकता है कि आपका भ्रमण सफल रहा। इससे तो यही समझा जायगा कि लोगों ने समय, श्रम और धन का ही अपव्यय किया है। इस जीवन में देवत्व को प्राप्त न कर सके तो कौन जाने मृत्यु के बाद कोई पारलौकिक सुख मिलेगा भी या नहीं। कोई भी विचारवान् व्यक्ति इस बात पर विश्वास कर लेगा ऐसा समझना कठिन है।
देव-स्थानों का निर्माण लोगों में श्रेष्ठ संस्कार जागृत करने की दृष्टि से किया जाता है। यह आशा की जाती है कि महापुरुषों का सत्संग लाभ लोगों को अधिक मिले इसलिये सत्संग, स्वाध्याय, ठीक संगठन आदि का अखण्ड यज्ञ देवालयों में चलता रहे। पर व्यवहार में यह सब कुछ नहीं होता। लोग आते हैं, चन्दन, अक्षत पुष्प, पाई पैसा की सस्ती भेंट चढ़ाकर अपनी अन्ध श्रद्धा व्यक्त करके चले जाते हैं। उनके लौकिक जीवन में किसी प्रकार का प्रकाश उत्पन्न नहीं होता। वही आसक्ति , वही वासना, क्रोध, मोह, सब कुछ वहीं। न पारिवारिक जीवन में किसी तरह का उल्लास आया न गन्दी आदतें छूटीं। अन्तः करण में अच्छे संस्कार न बढ़े और आप यह मान्यता बनाये बैठे हों कि परलोक में आपको स्वर्ग मिलेगा तो इस पर कोई भी विश्वास नहीं करेगा। आत्मबल, उत्सर्ग, संयम त्याग और सद्भावना की प्रामाणिकता इस जीवन में न मिली तो परमात्मा की अकृपा ही समझना चाहिये। इसके बिना जीव का किसी प्रकार कल्याण सम्भव नहीं है।
लोक जीवन में जिस निवृत्ति की कामना करते हैं उसका आधार है विवेक, जो आत्म-ज्ञान पैदा करता है। इस जीवन में आत्म-ज्ञान का संपादन न हो और परलोक की जीवन मुक्ति पर विश्वास करें तो इसे हास्यास्पद ही माना जायगा। निवृत्ति या मोक्ष—मनुष्य के आत्मज्ञान और सद्प्रवृत्तियों के रूप में दिखाई देता है। इन्हीं के आधार पर पारलौकिक मुक्ति पर विश्वास किया जा सकता है।
देवालयों का महत्व इसलिये नहीं होता कि उनमें परमात्मा की मूर्ति स्थापित होती है। प्रतिमा परमात्मा का प्रतीक मात्र है। अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिये ईश्वर के बाह्य कलेवर को मूर्ति रूप में मान लेते हैं किन्तु उसकी आत्मा सद्-भावनाओं में सन्निहित है। देवालय का अर्थ- जहाँ देवपुरुषों का निवास हो। उनके सत्संग से ही परमात्मा के आन्तरिक कलेवर को प्राप्त करते हैं, इसी दृष्टि से देव-स्थानों का महत्व होता है।
जड़ में भी परमात्मा का अस्तित्व मानने की अपूर्व श्रद्धा और देवालयों की भावनात्मक विशेषता के परिणामस्वरूप दर्शक में जो संस्कारों की सूक्ष्म प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है उसी से लोक कल्याण का पथ प्रशस्त होता है। अखिल विश्व में परमात्मा की व्याप्ति, भावनाओं की शुद्धि और गार्हस्थ्य जीवन की सफलता के लिए विवेकपूर्ण प्रवृत्तियों का संचालन हो तो देव-मन्दिरों की सार्थकता है।
शिक्षा, सद्भावना और जीवन दिशा का प्रशिक्षण देने का उत्तरदायित्व वहन करने वाले देवालय के पुजारी हैं, उन्हीं से कुछ लोकोपकार की कामना, की जा सकती है। चरित्र, प्रेम, मैत्री, करुणा, दया प्रतिमा मेधा और मनस्विता की शिक्षा देने का गुरुतर कार्य देव मन्दिरों की जिम्मेदारी है। लोक जीवन में समृद्धि संस्कारों की प्रशस्ति का उत्तरदायित्व देवालयों का है। इन्हीं के आधार पर उनको इतना महत्वपूर्ण स्थान मिला है। आध्यात्मिक प्रशिक्षण के, ब्रह्मकर्म के निर्वाह कारण ही उनका महत्व-सर्वोपरि है। इस गौरव को प्राप्त न कर सके तो देव-मन्दिर की अपेक्षा किसी ऐसे सद्गृहस्थ के घर को ही अच्छा मान लेना चाहिये, जिसमें पारस्परिक प्रेम, इन्साफ , दया और धर्म भर रहा हो। उन घरों को ही उपासनालय मानलें तो कहीं अधिक लाभ की गुँजाइश रहेगी।
बाह्य कलेवर की अपेक्षा आन्तरिक भावनाओं की उपासना अधिक फलवती होगी। हमें पाषाण नहीं देवत्व की आत्मा को मूर्ति रूप में पूजना है और उन पर अपनी सद्भावनाओं की अर्घ्य चढ़ाना है। इतना कर सकें तो अनैतिकता और भ्रष्टाचार दूर करने में अपना बहुत बड़ा योगदान समझा जायेगा। मन्दिरों की सार्थकता इन्हीं सत्यप्रवृत्तियों के विकसित करने में है।
जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति में अहंकार एक प्रबल शत्रु है क्योंकि सभी भेद “अहम्” भावना से ही उत्पन्न होते हैं, जिसके उत्पन्न होते ही काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकार उठ खड़े होते हैं। इन्हें बाहर से बुलाना नहीं पड़ता। अहंकार स्वतः भेद-बुद्धि के प्रसंग से इन्हें अन्तःस्थल में पैदा कर देता है। मनुष्य परिस्थितियों को दोष देता है या किसी दूसरे व्यक्ति के मत्थे दोष मढ़ने का प्रयत्न करता है, किन्तु यह दोष अपने अहंकार का है जो अन्य विकारों की तरह आपको साधन-भ्रष्ट बना देता है। अतः आप इसे ही मारने का प्रयत्न करिये।
अहंकार का नाश करने में मनुष्य को सर्व प्रथम तत्पर होना चाहिये क्योंकि यही सारे अनर्थों का मूल है। रावण की शक्ति का कुछ ठिकाना न था, कंस का बल और पराक्रम जगत् विख्यात है। दुर्योधन, शिशुपाल, नैपोलियन, हिटलर आदि की शक्तियों के आगे संसार काँपता था किन्तु उनका अहंकार ही उन्हें खा गया। मनुष्य को पतन की ओर ले जाने में अहंकार का ही हाथ रहता है। श्रेय के साधक को इससे दूर ही रहना चाहिये। भगवान् सबसे पहले अभिमान ही नष्ट करते हैं। अहंकारी व्यक्ति को कभी उनका प्रकाश नहीं मिल सकता।
अहंकार एक प्रकार की संग्रह वृत्ति है। अहं के योग से मनुष्य जगत की प्रत्येक वस्तु पर एकाधिकार चाहता है। उसका लाभ वह अकेले ही उठाना चाहता है। किसी दूसरे का हस्तक्षेप करते या लाभ उठाते देख कर वह जल-भुन उठता है और प्रतिकार के लिये तैयार हो जाता है। जब तक यह पाप पराकाष्ठा तक नहीं पहुँच जाता तब तक भले ही कोई शोषण, दमन, अपहरण तथा अनैतिक भोग भोगता रहे किन्तु अन्ततः सभी लोग उसका साथ छोड़ देते हैं। साधन और परिस्थितियाँ शीघ्र ही विपरीत हो जाती हैं, तब मनुष्य को हार माननी पड़ती है, मुँह की खानी पड़ती है और कभी-कभी तो सर्वनाश के ही दर्शन करने पड़ते हैं।
परमात्मा किसी भी वस्तु का संग्रह नहीं करता। वह लोक हितार्थ अपने दान अनुदान विस्तीर्ण करता रहता है। इसी में उसे आनन्द मिलता है। मनुष्य की महानता भी इसी में है कि अपनी सम्पूर्ण शक्तियों को दान-रूप में विकीर्ण करता रहे। इसी से उसे सच्चा आनन्द प्राप्त हो सकता है। किन्तु जब यह दानवृत्ति संकीर्ण होकर केवल अपने भोग तक ही सीमित हो जाती है तो उसे अनेक बाधाओं का सामना करना पड़ता है। इन बाधाओं को नष्ट करने में उसे शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है। जहाँ तक संचय परोपकार के लिये किया जाता है वहाँ तक अहंभावना उचित है, पर उसे पर-पीड़न से रहित होना चाहिये। शुद्ध भाव से वस्तुओं का संग्रह और उन्हें लोक कल्याण के लिये दान कर देने में कोई हानि नहीं वरन् इस से आत्मा विकसित होती है। पर यहाँ भी साँसारिक-यश की कामना का विग्रह उत्पन्न हो सकता है अतः दान की वृत्ति भी उदार और निरहंकार होनी चाहिये।
यह स्थिति तब आती है जब अपना कर्त्ता-भाव पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है। कर्त्तव्य तो सभी करते हैं किन्तु जो अपने अधिकार ईश्वर के लिये छोड़ देते हैं और समष्टि रूप से इस बात के लिये राजी हो जाते हैं कि-”इस संपूर्ण का कर्त्ता-धर्ता परमात्मा ही है, उसी की शक्ति , संकल्प और प्रेरणा से संसार की गतिविधियाँ चल रही है, मनुष्य तो निमित्त मात्र है, मशीन के एक छोटे से पुर्जे की तरह उसे चलते रहने में ही गौरव अनुभव करना चाहिये।” यद्यपि मशीन में उस पुर्जे का भी उतना ही महत्व है उसके बिना सारी मशीन तक ठप हो सकती है किन्तु उसका भी अस्तित्व तो आखिर उस मशीन में ही है और उस पुर्जे के सहयोग मात्र से है।
यदि ऐसा न समझा जाय तो मनुष्य-मात्र में जो प्रेम, सहयोग और मैत्री की भावना कायम है वह न रहे और मनुष्य अकेला दुःख पाता रहे। संसार के निन्यानवे प्रतिशत दुःख अहंभावना के परित्याग के साथ ही मिट जाते हैं क्योंकि तब स्वार्थ का भाव मिट जाता है। उस स्थिति में दुःख पास नहीं आता। यह संसार ही स्वर्ग के समान सुखमय हो जाता है।
फिर जीवात्मा का अपना अस्तित्व भी तो कुछ नहीं है जिनके लिये वह अहंकार करे। दर्पण, जल या स्फटिक में जिस प्रकार सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है, जीव की चेतना भी उसी तरह परमात्मा का प्रतिबिम्ब मात्र है। देखने में स्वच्छ वस्तुओं पर पड़ने वाले प्रतिबिम्ब-प्रकाश में भी वही विशेषताएँ विद्यमान होती हैं जो सूर्य में, किन्तु दर्शक यह जानते हैं कि प्रतिबिम्ब का अस्तित्व तभी तक है जब तक सूर्य है। सूर्य के न रहने पर प्रतिच्छाया भी समाप्त हो जाती है, उसी तरह मनुष्य के अन्तस्थल में भी परमात्मा प्रकाशित है उसे आत्म-शक्तियों के रूप में अपने भीतर अवस्थित समझना चाहिये। यह शक्तियाँ आत्म-कल्याण के लिये मिली हैं और इसी में उनका सदुपयोग भी होना चाहिये। शास्त्रकार ने इसे और भी स्पष्ट किया :—
कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्त् प्रतिविम्बकः।
प्राणानाँ धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते॥
अहंकार का अन्त करने में प्रत्येक मनुष्य स्वाधीन और समर्थ है, जिनके उत्कर्ष से स्वार्थीपन, एकाधिकार की उद्दण्ड भावना नष्ट हो जाती है। पराधीनता तथा असमर्थता उसी के लिये है जो इन शक्तियों, सामर्थ्यों तथा योग्यताओं को अप्राप्त समझता हो, उन पर विश्वास न करता हो। जीवात्मा तत्व ज्ञान को समझे और पदार्थों से विमुख होने का प्रयास करे तो अहंकार अपने आप मिटने लगता है। स्वच्छ जल में प्रतिबिम्ब भी साफ नजर आता है। पवित्र और निर्मल आत्मा में भी दैवी प्रकाश स्पष्ट झलकता है। वहाँ लोभ, मोह के मनोविकार उदय नहीं होते, फलस्वरूप अहं-वासना का अन्त स्वतः ही हो जाता है। अहंकार तभी तक जीवित है जब तक साँसारिक वस्तुओं से आसक्ति है। यह लगाव घटा कि अभिमान समाप्त हुआ।
यह नहीं समझें कि इसके लिये कर्त्तव्य-कर्मों का सम्पादन अनावश्यक है। कर्म तो किये ही जाना चाहिये, साँसारिक भोग भी अनावश्यक नहीं बनाये गये हैं—किन्तु कर्मों में आसक्ति व भोगों में अनुराग का सर्वथा त्याग होना चाहिये। अपनी जैसी भी कुछ स्थिति है, उसी में सन्तोष का अनुभव करना मनुष्य की महान् जिम्मेदारी है। इसका पालन करने वाला सभी तरह के अभिमानों से विमुख हो जाता है।
परमात्मा अपनी शक्तियाँ पर-हिताय दान करता है। जीवन को भी सेवा का पालन वैसे ही करना चाहिये। सेवा वही कर सकता है जो किसी का अनादर न करे, किसी को दुःख न पहुँचावे। किसी के प्रति बुरे विचार जिसके मन में नहीं होंगे वही सेवा का सच्चा अधिकारी है। यह अधिकार जिसे मिल गया उसका अभिमान छूट गया। लोकोपकार ही उसके लिये इस संसार में शेष रह जाता है। उसे ही परमात्मा की सच्ची प्रेरणा मिलती है। इसके लिये यहाँ देना ही अधिक पड़ता है। अपनी सभी वस्तुयें दूसरों के लिये न्यौछावर कर देनी पड़ती है। तब इस अहंकार के सर्वस्व दान में ही असीम सुख का बोध होता है।
किन्तु यदि अहंकार का स्वभाव केवल मात्र लेने का बन जाय और दान-वृत्ति का अन्त हो जाय तो निर्लोभता नहीं रहती। वस्तुओं की ललक-लोलुपता बढ़ जाती है। इस जग में केवल रोना, झगड़ना और भय आदि ही दिखाई देने लगते हैं। दरिद्रता आ घेरती है और शाश्वत सुख से वंचित हो जाते हैं। तब देने की अपेक्षा लेने की महत्ता मालूम होती है। यह दुष्प्रवृत्तियाँ जितनी ही प्रबल होती हैं, यह बन्धन उतने ही मजबूत होते और जकड़ते चले जाते हैं।
परमात्मा ने इस सृष्टि की रचना की है, किन्तु वह इससे निर्बन्ध है। उसे भोग में आनन्द नहीं आया इसलिये अपने प्राणों को उत्सर्ग करना प्रारम्भ किया है। आत्मा भी विस्तीर्ण हो कर ही उन्मुक्त बनता है। ग्रहण बन्धन है क्योंकि उसमें अहंभाव है और त्याग मुक्ति है क्योंकि उसमें आत्मा विस्तीर्ण हो जाती है। इसलिये “अहं” तभी आत्मा का यथार्थ प्रकाश बनता है जब आत्मा उसे उत्सर्ग कर देता है।
मनुष्य अपने अधिकार की रक्षा का दावा तो कर सकता है किन्तु वह किसी के अधिकार छीनने का हकदार नहीं है। जो केवल अपना हित चाहते हैं और दूसरों के हितों की रक्षा नहीं करना चाहते, उनकी आवश्यकता न किसी व्यक्ति को होती है न समाज को। किन्तु जब वे अपने सारे अधिकार समाज के लिये सौंप कर अपने लिये केवल कर्त्तव्य, क्षमा और सन्तोष माँग लेते हैं तो उनका जीवन स्वाधीनता तथा प्रेम से परिपूर्ण हो जाता है।
इस तरह मनुष्य की व्यक्ति गत शान्ति तथा सुन्दर समाज के निर्माण की दृष्टि से अहं का नाश आवश्यक है। इसी में स्वाधीनता, चिन्मयता तथा अमरत्व की उपलब्धि सन्निहित है। जिस मनुष्य के जीवन में अहंकार नहीं होता उसे प्रेम का आनन्द आत्म विभोर बना देता है। इस आनन्द की प्राप्ति के लिये आप यदि अहंकार का परित्याग कर सकें तो आप यह मनुष्य-शरीर सार्थक बनाने के अधिकारी हैं। इसी से आप को जीवन-लक्ष की भी प्राप्त हो सकती है।
कुछ वस्तुयें इस जगत में ऐसी हैं जो अत्यधिक सुखद, आकर्षक और प्रिय होती हैं, कुछ ऐसी हैं जिन्हें मनुष्य पसन्द नहीं करता। किन्तु उपयोग की दृष्टि से प्रिय-अप्रिय दोनों ही परिस्थितियाँ आवश्यक हैं। दिन भर काम करने के उपरान्त मनुष्य जब थक कर चकनाचूर हो जाता है तो उसे निद्रादेवी की गोद में विश्रान्ति मिलती है। सोने में सुख मिला है, पर किया क्या जाय उसे भी त्यागना पड़ता है और पुनः कर्म में जुटना पड़ता है। स्वाद-युक्त भोजन, सुखद स्पर्श, प्रिय-मिलन, आदि की ओर मनुष्य की स्वाभाविक रुचि होती है किन्तु उसे यह सभी सर्वदा उपलब्ध नहीं। मिल भी जायँ तो जीवन अधिक दिन तक ठहर नहीं सकता। सुखवादी व्यक्तियों का दृष्टिकोण प्रायः ऐसा स्थूल होता है किन्तु इससे वे जीवन के एक पक्ष, बाह्य भाग को ही देख पाते हैं। आन्तरिक दृष्टि, सच्ची दृष्टि के लिये मनुष्य को संयोग और वियोग, सुख और दुःख, सुविधाओं और कठिनाइयों की संगति परमावश्यक है। यह स्थिति बनाये रखना निष्काम कर्मयोग की आवश्यक शर्त है।
अन्य परिस्थितियों की तरह मनुष्य के सामाजिक जीवन में भी यह उभयनिष्ठ स्थिति आवश्यक है। जीवन-विकास और जीवन-लक्ष्य के कार्यक्रम साथ-साथ चलें तभी मनुष्य जीवन की सार्थकता है। सदैव सामाजिक जीवन, प्रिय परिजनों में ही लिप्त, आसक्त बने रहने में स्थूल दृष्टि से सुख अधिक है किन्तु साहचर्य आत्मा के लिये कभी सर्वाधिक प्रेरणादायक होता है, और कभी-कभी आत्म-कल्याण की सर्वाधिक प्रेरणा एकान्त में रहने से मिलती है। अतएव मनुष्य का जीवन इस तरह का होना चाहिये कि वह अपने कर्त्तव्यों का पालन साहचर्य में रहकर करता रहे किन्तु आत्म चिन्तन के लिये कुछ एकान्त की भी व्यवस्था बनाये रखें ताकि वह जीवन साफल्य के आवश्यक प्रश्नों पर गहराई से छानबीन कर सके।
ऋषियों का जीवन हमारे लिये अनुकरणीय है। सब की तरह वे भी गृहस्थ थे। पारिवारिक जीवन में रहते हुये भी जो उन्होंने आत्म-तत्व की विशद व्याख्या की है, उसका कारण वही था कि वे एकान्त-चिन्तन और आत्म शोधन के लिये भी पर्याप्त समय निकालते थे। वह उत्तर जो हमें भी आन्तरिक शान्ति दे सकती है उसे बाह्य वस्तुओं में पाया जाना असम्भव है। आत्म-जगत, परमात्मा और जग को अधिक समीप से देखने के लिये कोलाहलपूर्ण वातावरण नहीं, एकान्त चाहिये, जहाँ मनुष्य निर्विघ्न, उदासीनतापूर्वक प्रश्न की गहराइयों में डूब जाय और विचारों के उमड़ते हुये समुद्र में से सत्य की सीपी ढूँढ़ कर बाहर निकल आये। आने वाली रात को सुन्दर बनाने वाले तारागणों की, ग्रह-नक्षत्र और उल्काओं की वैज्ञानिक शोध हमारे ऋषियों ने घाटियों, पहाड़ियों की निस्तब्ध निर्जनता में ही की थी।
भावनात्मक विकास के लिये नितान्त एकान्त भी अच्छा नहीं है। संगति और साहचर्य भी मनुष्य के विचारों को विशाल बनाने के लिये आवश्यक है। आत्मतत्व की खोज भले ही एकान्त में हो सकती हो किन्तु मानवोचित सद्गुणों का परिष्कार तभी सम्भव है जब वह समाज में रहकर अपनी भावनाओं को व्यावहारिकता प्रदान करे। एकान्त ईश्वर निष्ठा के लिये चाहिए पर प्रेम की सीख एकान्त में कैसे हो सकती है उसके लिए कुछ आधार भी होना चाहिये। स्नेह, उदारता, आत्मीयता, सहिष्णुता, सौम्यता आदि का विकास साहचर्य में सम्भव है। सेवा-सहानुभूति, दान-दया के मंगलदायक सत्कर्म समाज में रहकर ही सम्भव हैं। अतः साहचर्य और एकान्त में एक प्रकार का ताल-मेल होना चाहिये। दोनों के समन्वय से एक सच्ची जीवन-सिद्धि की कल्पना की जा सकती है।
तप और तितिक्षा के औचित्य से जहाँ इनकार नहीं किया जा सकता है वहाँ यह भी कहना गलत नहीं है कि सुख और भोग निरर्थक हैं। दोनों अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण स्थितियाँ हैं इन्हें स्वाभाविक और स्वस्थ साधनों से ही शान्त किया जाना चाहिये। बलपूर्वक किसी कार्य में रुचि नहीं पैदा की जा सकती। भोग की इच्छा चल रही है तो उस समय तप नहीं किया जा सकता। इसी तरह आन्तरिक प्रेरणाओं को निरस्त कर भोगवादी दृष्टिकोण रखना भी उचित नहीं है।
अवसर का उपयोग मनुष्य के हाथ की बात और उसकी सबसे बड़ी चतुराई है। मनुष्य को नियन्त्रण का कार्य करना चाहिये। उसे आत्मा की आवश्यकता के अनुरूप ही जीवन को गति देना चाहिये। जीवन निर्माण का अनुभव इतना ठोस नहीं है। अनुभव साथियों, सहचरों की संगति में ही प्राप्त किए जा सकते हैं। परीक्षा के प्रश्न पत्र हल करने के लिये जिस तरह विद्यार्थी एक वर्ष तक पढ़ता है और फिर उसे तीन घन्टों में व्यक्त करते हुये अपनी सफलता या असफलता का प्रमाण-पत्र प्राप्त करता है उसी तरह एकान्त में आत्म-चिन्तन और जीवन शोध के लिये सामाजिक जीवन का अनुभव और अध्ययन जरूरी है। इसी के आधार पर आत्म-शोध और ईश्वर प्राप्ति की पात्रता प्राप्त कर पाता है।
जीवन के प्रति एक स्वस्थ, स्वाभाविक व सामान्य दृष्टिकोण स्त्री-पुरुषों के साहचर्य से निकल कर आता है। एक साथ रहने और पारस्परिक आदान-प्रदान की क्रिया जारी रखने से सच्ची गम्भीरता एवं पवित्रता आती है। आत्म-प्रेरणाओं की अधिक मात्रा एकत्र कर उनसे विधिवत् लाभ प्राप्त करने के लिये साहचर्य जरूरी है। बिलकुल एकान्त में रहकर अपनी इच्छायें भले ही शान्त करलें किन्तु वासनाओं का पूर्ण दमन इस तरह सम्भव नहीं है। अनुरूप परिस्थितियाँ प्राप्त होने पर योगियों की चित्तवृत्तियाँ तक स्खलित हो जाती हैं पर पारिवारिक जीवन में ऐसी कोई भी आशंका नहीं रहती। विषयों में अनुरक्त न हो और थोड़ा-थोड़ा समय एकान्त चिन्तन के लिये भी मिलता रहे तो आत्म-ज्ञान की उच्च-कक्षा मनुष्य स्वाभाविक तौर पर उत्तीर्ण कर सकता है।
साहचर्य पर इतना बल देने का तात्पर्य यह नहीं कि मनुष्य का जीवन पूर्णतया आसक्त और भोगी ही बन जाय। छूट और स्वाधीनता, साहस और शक्ति की परीक्षा के लिये है जिनमें उत्तीर्ण होने का विश्वास मनुष्य कुछ क्षण एकान्त में व्यतीत करने से ही प्राप्त कर सकता है। उस समय यदि स्थिर चित्त रहकर आत्मा के विषयों को मनन कर सकें, काम, क्रोध, लोभ, और मोह के रागात्मक भाव यदि मन में न आयें तो ही यह मानना चाहिये कि हम ईश्वर प्राप्ति या जीवन-लक्ष्य सिद्धि के अधिकारी हैं। किन्तु यदि मन उस अवस्था में जाकर भी विचलित हो तो केवल एकान्त में रहना छल मात्र है। इस स्थिति का सुधार पुनः व्यावहारिक जीवन में आकर भावनाओं के परिष्कार द्वारा ही किया जा सकता है।
इस प्रकार का अनुभव मस्तिष्क और चरित्र के विकास के लिये निताँत आवश्यक है। व्यक्ति का विकास पूर्ण रूप से उसको प्राप्त प्रेरणाओं पर ही निर्भर है इसलिये एक अत्यन्त स्वस्थः, सुदृढ़, तथा विवेकपूर्ण सामाजिक स्थिति की तो जरूरत है पर पूर्ण रूप से असामाजिक रहकर सच्चे विकास की उतनी सुविधायें प्राप्त नहीं होती। प्रेरणाएँ सहवास से मिलती हैं। संगति से मनुष्य का जीवन निर्मित होता है अतः उसे भले लोगों का साहचर्य प्रत्येक अवस्था में चाहिये ही। इसके बिना मनुष्य का सर्वतोन्मुखी विकास कठिन रहेगा।
साहचर्य में इच्छाओं की मधुरता का आनन्द मिलता है, पर इच्छायें अपने आप में अतृप्त हैं। उनमें एक स्वाभाविक कमी यह भी है कि वे क्रमिक रूप से बढ़ती जाती हैं, सम्भवतः इसीलिये उनसे आँशिक सुख का ही अनुभव हो पाता है। इस अवस्था में यदि मनुष्य का दिमागी सन्तुलन बिगड़ जाय तो उसका पतन बहुत ही दुःखद स्थिति में होता है। भौतिक सुखों की लालसा को ही बढ़ाते जाना तथा आध्यात्मिक भूख का उपचार न करने का परिणाम दुःख और विपत्तियों के रूप में प्रकट होता है। आत्मा को वास्तविक सुख और सच्ची शान्ति आध्यात्मिकता में ही मिलती है। इसके लिये इच्छाओं के माधुर्य का परित्याग कर भावनाओं की उच्च स्थिति प्राप्त करना जरूरी है। आन्तरिक प्रसन्नता, विचार एवं पारस्परिक मेल मिलाप या क्रिया-संघर्ष से उत्पन्न थकावट को दूर करने के लिये एकान्त भी चाहिये। यह आवश्यकता शरीर को निद्रा द्वारा स्वस्थ बनाने के समान ही है। एकान्त में विचारों को एक ही स्थिति में छोड़ देने से मानसिक-संघर्ष रुकता है जिससे मनुष्य को हलकापन महसूस होता है। आध्यात्मिक जीवन को नियमित रखने के लिये अतः एकान्त भी बहुत आवश्यक है।
स्वास्थ्य की सुरक्षा का सामान्य नियम है कि शक्ति संवर्द्धन के लिये आहार भी ग्रहण करें और भीतरी अवयवों की सफाई के लिये कभी-कभी आहार का परित्याग भी करते रहें। दोनों प्रक्रियायें समान रूप से आवश्यक हैं जिसे छोड़ेंगे उधर ही गड़बड़ी पैदा होगी। आध्यात्मिक जीवन को नियमित रखने के लिये गुण-विकास की क्रिया साहचर्य में रहकर पूरी की जाती है। आत्मचिन्तन के नितान्त आन्तरिक, आरम्भिक और अलौकिक सत्य तक पहुँचने के लिये कुछ समय एकान्त में भी बिताना चाहिये। इसी तरह के जीवन क्रम से अपनी पवित्रता और शान्ति को स्थायी रख सकना सम्भव होता है।
मनुष्य की जिन्दगी उमंगों की एक दरिया है। नदी की बाढ़ की तरह भावनाओं में उत्तेजना भी आनी स्वाभाविक है पर यदि इन भावनाओं को नियन्त्रण में न रखा जाय और आन्तरिक पवित्रता को अक्षुण्ण न रखा जाय जो व्यक्तिगत जीवन में अनेकों बुराइयाँ पैदा होंगी। भावनाओं को धारावाहिक रूप देने के लिये और अपवित्रताओं से संघर्ष करने के लिये मनुष्य के जीवन में अच्छी-बुरी दोनों परिस्थितियों का समन्वय जरूरी है। हम सुख भोगों पर दुखों का सहर्ष स्वागत करने के लिये तैयार रहें, सुविधायें प्राप्त करें पर कठिनाइयों से जूझने की हिम्मत भी रखें। समाज और साहचर्य में रहकर जीवन को शुद्ध और पवित्र बनाने का क्रम जारी रहे और एकान्त में आत्म-चिन्तन, आत्म निरीक्षण की साधना भी चलती रहे तो मनुष्य स्वस्थ और स्वाभाविक जीवन जीते हुये भी अपना जन्म उद्देश्य पूरा कर सकता है, शाश्वत शान्ति प्राप्त कर सकता है।
यत्पृथिव्याँ ब्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः।
एकस्थापिन पर्य्याप्तं तस्मातृष्णाँ परित्यगेत्॥
जितना भी इस पृथ्वी पर ब्रीहि, यव तथा अन्न है और जितना भी सुवर्ण, पशु, या स्त्रियाँ हैं इतना मिलने पर भी किसी मनुष्य की तृप्ति नहीं होती। यह एक के लिये भी अपर्याप्त रहता है इसलिये तृष्णा का त्याग कर देना चाहिये।
अपकारिणि कोपश्चेत्कोपे कोषः कथं न ते।
धर्मार्थं काम मोक्षाणाँ प्रसह्य परिपन्थिनि॥
यदि तू अपकारी पर क्रोध करता है तो इस क्रोध पर ही क्रोध क्यों नहीं करता, जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मार्ग पर चलते हुये तेरा सदा अपकार ही करता है, क्रोध सर्वदा तेरा शत्रु है उसी पर क्रोध करके उसे ही वश में कर।
कच्चे भोजन में जो जीवन तत्व होता है वह तले-उबले, सूखे-भुने, पकाये और तपाये पदार्थों में सम्भव नहीं, यह सर्वमान्य व निरापद तथ्य है। खाद्य पदार्थों को आग पर पकाने से उसके प्रकृति दत्त तत्वों में कमी आ जाती है। कई बार तो एक तरह से सम्पूर्ण जीवन तत्व ही समाप्त हो जाता है। तीव्र आँच में औटाया हुआ दूध खोया बना लेने पर कितना गरिष्ठ, भारी व पाचन क्रिया को खराब करने वाला होता है इसे सभी जानते हैं। अधिक मिठाई सेवन का परिणाम शरीर की स्थूलता से प्रकट होता है। भुने चने, घी, तेल में तले व्यंजन एक अंश तक स्वाद की प्रक्रिया तो पूरी कर देते हैं किन्तु अन्ततोगत्वा मल-विकार बढ़ा देने, पेट के श्लैष्मिक संयंत्रों को शिथिल कर देने जैसी प्रक्रियाओं के अतिरिक्त कुछ और हाथ नहीं आता। आहार की इस कलापूर्ण प्रवृत्ति, व्यंजन बनाने की पद्धति के कारण लोग किसी भी खाद्य को नैसर्गिक रूप में ग्रहण नहीं कर पाते।
दूसरे अन्य जीव जन्तु जो प्रकृति के अधिक सान्निध्य में रहते हैं अपना आहार पूर्ण प्राकृतिक रूप में लेते हैं और उस उदरस्थ आहार का तीन चौथाई से लेकर 90 प्रतिशत तक पचा डालते हैं। अधिक कठोर, शारीरिक श्रम करने वाले मनुष्य भले ही 50 प्रतिशत अन्न पचा लेते हों अन्यथा आज की स्थिति ऐसी हो गई है जिसमें 70-80 प्रतिशत तक जीवन तत्व मल के रूप में निरर्थक चला जाता है।
स्वास्थ्य की दृष्टि से कच्चे पदार्थों का बड़ा महत्व है। सच तो यह है कि हम जिसे कच्चा भोजन कहते हैं प्राकृतिक साधनों द्वारा ग्रहण करने योग्य पहले ही बना दिये जाते हैं। फल डाल से तब तक नहीं टूटता जब तक उसका रस पूर्ण परिपक्व नहीं बन जाता, सूर्य के ताप द्वारा पूर्ण रूप से पक जाने के बाद ही फसलें काटी जाती हैं। टमाटर, मोसम्मी, सन्तरा, अनार, अमरूद आदि जब तक पक नहीं जाते पेड़ से बँधे रहते हैं। इस प्रकार के अन्न, दालें तथा फलों का जीवन तत्व ज्यों का त्यों बना रहता है।
कच्चे भोजन की सेवन विधि को सर्वांगपूर्ण आहार-क्रिया कहें तो अत्युक्ति न होगी। इसे स्वाभाविक आहार भी कहा जा सकता है। किन्तु फिर भी इसे व्यावहारिक रूप में शतशः स्थान दे पाना आज की परिस्थितियों को देखते हुए कठिन दिखाई पड़ता है। बिना पकाये रोटी नहीं खाई जा सकती। बिना पीसे गेहूँ नहीं खाया जाता। यदि कोई ऐसा साहस करे भी तो उसे अधिक दिन निर्वाह नहीं कर सकता। इसलिये सही मार्ग यही हो सकता है कि प्राकृतिक आहार और उसकी पाक पद्धति में समन्वय बना रहे। कुछ वस्तुयें ऐसी हैं जिन्हें बिना किसी परिवर्तन किये ग्रहण कर सकते हैं तो उन्हें वैसे ही रूप में लें या कम से कम परिवर्तन के बाद ले सकते हैं। जैसे गाय या बकरी का दूध है। इसे यदि धारोष्ण रूप में पीलें तो उस समय उसका वही तापमान होता है जो “पास्ट्यूरीकरण” क्रिया से अथवा लगभग 50-60 सेन्टीग्रेड तापक्रम तक करने से होता है। ऐसे दूध में रोगों के संक्रमण की बिलकुल सम्भावना नहीं रहती। प्राकृतिक रूप से पके पदार्थों में रोग के कीटाणु नहीं होते। उनका आविर्भाव तो सड़ जाने या बासी हो जाने पर ही होता है।
खाद्य पदार्थों में शक्ति और स्निग्धता, प्राण और लावण्य उसमें रहने वाला रस अर्थात्-जल तत्व होता है। यह जल वृक्ष अपनी जड़ों के द्वारा धरती के गर्भ से चूस-चूस कर फल की कोशिकाओं में जमा करता रहता है। यह पके हुये फलों का सौंदर्य है। सन्तरा तभी तक अच्छा लगता है जब तक उसकी कोशिकाओं का यह जल सूख नहीं जाता। बेर को सुखा लेने का रिवाज है जिससे दूसरे मौसमों में भी उसे उबाल कर खाने का स्वाद ले सकें। दुबारा पानी के संसर्ग में लाने से सूखी हुई कोशिकायें पानी खींचती तो हैं किन्तु वह अपने प्राकृतिक रूप से किसी भी अवस्था में नहीं आ पातीं। जिस पदार्थ के इस जल तत्व को पका सुखा कर जितना ही कम कर देंगे उस का जीवन तत्व उसी अनुपात में समाप्त हो जाता है तलने या चिकनाई से तो पदार्थ की कोशिकाओं का संबन्ध ही जल से टूट जाता है, फलतः ऐसे पदार्थ निष्प्राण ही माने जा सकते हैं। ऐसी वस्तुएं पेट में अधिक विष उत्पन्न करती हैं।
कृत्रिम तरीकों से खाद्य पदार्थों में रंग डालने या मिर्च मसाले मिलाने से वस्तु कभी भी अपने प्राकृतिक स्वरूप को कायम नहीं रख पाती। हरे व स्वाभाविक रूप से पके नींबू, मूली, गाजर, टमाटर, खीरे, ककड़ी, अमरूद, नारंगी, सेब, चीकू अथवा अंगूर की तुलना में बंगाली या पंजाबी मिठाइयाँ भला कहाँ टिक सकती हैं? इनमें दिखावा, जायका और आकर्षण भले ही हो, आहार का मूल उद्देश्य तो उनसे पूरा हो नहीं पाता है।
आहार का दूसरा महत्वपूर्ण खाद्याँश ‘स्टार्च’ है। कच्चे अनाज में निस्सन्देह स्टार्च अधिक होता है, जिस से अनाजों, चावल, आलू, अरबी आदि को उबाल कर ले लें तो कोई हानि नहीं। किन्तु अधिकाँश खाद्य पदार्थ ऐसे हैं, जिनके मूल रूप में सेवन से ही 25 प्रतिशत तक स्टार्च बड़ी सुगमता से प्राप्त किया जा सकता है। इन्हें कुछ खाद्य पदार्थों को समूहों में इस प्रकार विभक्त कर सकते हैं।
1) प्रकृति द्वारा पकाये गये फल आम, अमरूद, टमाटर, सेब, संतरा, बेर, ककड़ी, खरबूजा आदि।
2) मेवे जैसे छुहारा, बादाम, पिस्ता आदि जो सुखाकर खाने योग्य बना लिए जाते हैं।
3) साग-सब्जी, गाजर, मूली, हरी वनस्पतियाँ गोभी पालक, लौकी आदि इन्हें केवल उबाल कर पर्याप्त मात्रा में लिया जा सकता है। इसी वर्ग में चने का साग, बथुए का साग, धनिया पोदीना आदि भी लिये जा सकते हैं। इन्हें उबाल लेने मात्र से स्टार्च झुलसता नहीं और सरलता से पच भी जाते हैं। ऐसे पदार्थों को अधिक चिकनाई देने या मसाले डाल कर खाने से स्टार्च की वह मात्रा नहीं प्राप्त की जा सकती तो कच्चा या उबाल कर खाने में अपेक्षित थी।
4) कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं जिन्हें उबालकर या हलकी आँच में भूनकर भी ले सकते हैं जैसे हरे गेहूँ, चने, टमाटर, ज्वार या बाजरे की बालें, हरा दूधिया मक्के का भुट्टा।
उपरोक्त चारों वर्गों के पदार्थ ऐसे होते हैं जिनमें अधिक परिवर्तन की आवश्यकता नहीं पड़ती, इसलिये इन्हें जितना अधिक से अधिक उनके नैसर्गिक रूप में लिया जाय स्टार्च की उतनी ही मात्रा शरीर के लिए प्राप्त हो सकती है। इनसे शरीर को प्रोटीन, विटामिन्स और चर्बी की मात्रा भले ही अल्प मात्रा में मिले पर ये शरीर के विजातीय द्रव्य को बाहर निकाल देने में भारी सहायता पहुँचाते हैं। 2-3 तोले प्रतिदिन अंकुरित चना लें तो इससे स्वास्थ्य पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। रुचि भी बनी रहती है। सिंघाड़ों से पकवान बनाने की क्रिया भी ऐसी गलत है इन्हें भी यदि कच्चा ही खायें तो अधिक उपयुक्त है।
ऐसे पदार्थों में जिनमें चिकनाई होती है उनका मक्खन निकाल कर छाछ या मट्ठे के रूप में लेना गुणकारी होता है। मट्ठा स्वास्थ्य के लिये अतीव लाभदायक है। दूध को कई उबाल देने और मलाई की मोटी पर्त जम जाने से स्वाद तो मिल सकता है किंतु जितनी सरलता से छाछ या मट्ठा पच जाता है उतना यह औटाया हुआ दूध कहाँ पचता है?
लौकी, तोरई, कद्दू आदि के बीज लोग प्रायः फेंक देते हैं किन्तु इन्हें पीसकर या कुचल कर ठंडाई जैसे रुचिकर पेय बनाये जा सकते हैं। इन्हें अधिक रुचिकर बनाने के लिये शहद, दूध, शक्कर या मिश्री मिला सकते हैं। गर्मियों के दिनों में नींबू की “शिकंजवी” लाभदायक पेय माना गया है। गाजर, कुम्हड़ा या काशीफल की काँजी को भी स्वाद युक्त बनाकर लेने में दूध या छाछ जैसी ही सरलता प्राप्त होती है। कच्चे गाजर की काँजी में किण्वन क्रिया से ‘यीस्ट’, जैसा विशेष तत्व उभर आता है जो विटामिन्स के अभाव को पूरा करता है।
खाद्य पदार्थों का रूपांतर करने या जला भून कर खाने का एक ही अर्थ होता है कि उसमें अधिक रुचि या स्वाद उत्पन्न हो और सेवन में मुँह, दाँत, दाढ़ों को विशेष बल न लगाना पड़े किन्तु स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मतानुसार किसी भी वस्तु को इतना चबाया जाना चाहिये कि सम्पूर्ण आहार गले में उतरने के पूर्व पूर्णतया रस में परिवर्तित हो जाय। रस बनाने की क्रिया जीभ से निकलने वाली ‘लार’ करती है पर खाद्य अप्राकृतिक पाक पद्धति से पकाया गया तो वह स्वाद की हड़बड़ी में जल्दी ही गले से नीचे उतर जायगा। ठीक तरह चबाये न जाने पर पाचन क्रिया में विद्रूप खड़ा हो जाता है। कच्चे पदार्थों के सेवन से यह शिकायत अपने आप दूर हो जाती है। अधिक देर तक खाने से हर घड़ी एक नये स्वाद की अनुभूति होती है डडडड के अवयवों का व्यायाम हो जाता है, पर्याप्त लार मिल कर सुविधापूर्वक रस बनकर पेट में पहुँचता है, आंतें उसे आसानी से पचा देती हैं।
कच्चे भोजन का अभ्यास हो जाने पर मन उसे ही पसंद करता है और चटोरपन की ओर से रुचि हट जाती है। इससे स्वास्थ्य का सुधार तो होता ही है साथ ही मनोविकारों का, काम, क्रोध के दुर्गुणों का भी शमन होता है और मनोबल बढ़ता है। इस दृष्टि से कच्चे आहार का आध्यात्मिक महत्व भी है। इससे सद् विचारों को बल मिलता है। सादगी, सरलता एवं सदाचरण के प्रति प्रीति उत्पन्न होती है। आँशिक उपवासों में कच्चे उबले या पेड़ों पर ही पके फल खाने की उपयोगिता भी इसी दृष्टिकोण को सामने रखकर प्रचलित हुई है।
कच्चा भोजन सेवन करना भी एक कला है। इसे स्वाभाविक भोजन कहें तो भी अतिशयोक्ति न होगी। आज कल प्रचलित मनुष्य कृत पाक-कला की तुलना में यह कला कुछ किसी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं है।
इससे आपके शारीरिक एवं मानसिक सभी प्रकार के स्वास्थ्य की सम्भावना बढ़ेगी। इसलिये आहार ग्रहण के नैसर्गिक सिद्धान्तों का अनुसरण करना ही हमारे लिये परम श्रेयस्कर होगा।
विचारपूर्वक देखा जाय और मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का गहन अध्ययन किया जाय तो मनुष्य की अवस्था चार भागों में विभाजित होती है। (1) डडडड और विकास की अवस्था। (2) उद्योग और डडडड की अवस्था। (3) ज्ञान और अनुभव में सामंजस्य काल। (4) आत्म कल्याण की धारणा। इन्हीं बातों को लेकर यह जीवन पूर्ण होता है। इन अवस्थाओं में नियन्त्रण न रखा जाय तो मनुष्य की स्वाभाविक प्रकृति अधोगामी बन सकती है, इस विचार से ही इन्हें कर्त्तव्यों की सीमा में बाँधने का प्रयत्न किया है। ये विभाग वास्तव में मानव की शक्ति और उसके कामों को ही अनुसरण करके बनाये गये हैं। इस जीवन में कहीं कोई विकार नहीं है। मनुष्य इन चारों अवस्थाओं का रसास्वादन करता हुआ कल्याण की स्थिति प्राप्त कर सकता है। यदि इस तरह से भारतीय जीवन को प्रेरित न किया गया होता तो यहाँ भी अन्य देशों की तरह भोगवाद प्रधान रहा होता। जो शुद्धता, पवित्रता, डडडड, उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, शक्ति और विशेषता यहाँ के जीवन में रही है वह न होती। यहाँ के लोग वह समृद्धि, सुख और आनन्द प्राप्त न कर सके होते जिसके लालच में जीवनमुक्त आत्मायें भी यहाँ लौट-लौटकर आई हैं। इस जीवन पद्धति में कोई त्रुटि नहीं, कोई शिकायत नहीं। सम्पूर्ण व्यवस्थित जीवन का नाम है आश्रम-व्यवस्था। यह जीवन पद्धति की उत्कृष्ट कला का विकास है।
हिन्दू धर्म में मनुष्य जीवन को लक्ष्य सिद्धि का परम पुरुषार्थ माना गया है। इस क्रम में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आते हैं। इन चारों अवस्थाओं का क्रमशः लाभ प्राप्त करता हुआ मनुष्य शाश्वत, बन्धन मुक्ति , सिद्धि, स्वर्ग या मोक्ष प्राप्त कर ले इस हिसाब से जीवन को भी चार भागों में विभक्त किया गया है जो अवस्था और विकास से संगत और क्रमशः है। धर्म, अर्थ काम और मोक्ष, इन चार उद्देश्यों का विस्तार ही (1) ब्रह्मचर्य। (2) गृहस्थ, (3) वानप्रस्थ और (4) संन्यास है। नीचे उस अवस्था और स्थिति पर प्रकाश डालेंगे, जिससे यह पता चलेगा कि भारतीय जीवन पद्धति का विकास कितनी बुद्धिमत्ता के साथ हुआ है और आज की अवस्था में उसकी कितनी आवश्यकता है।
प्रारम्भ काल में बालक की जिज्ञासायें अशान्त होती हैं। वह संसार और यहाँ के अनेक पदार्थों का रहस्य जानने के लिये उत्सुक होता है। साथ ही चूँकि वह प्रकृति के अत्यधिक समीप होता है अतः उसे भले-बुरे का ज्ञान भी नहीं होता। इन्द्रियाँ भी विकास की ओर उन्मुख होती है इसलिये शक्ति-संचय और संयम के लिये ब्रह्मचर्य की आवश्यकता होती है। जिज्ञासाओं की तृप्ति के लिये साधन, अवस्था, स्वाभाविक प्रवृत्तियों को सुनियोजित और नियन्त्रित रखने के लिये, शक्तियों के संचय के लिये ब्रह्मचर्य की आवश्यकता होती है। ब्रह्मचर्य का अर्थ केवल इन्द्रिय संयम ही नहीं वरन् ब्रह्म प्राप्ति के सम्पूर्ण आचरणों का नाम ब्रह्मचर्य है। यह साधनावस्था है इसलिये गम्भीर देख−रेख तथा पूर्ण नियन्त्रण की आवश्यकता पड़ती है।
प्रारम्भिक अवस्था में बालक के विचार, संस्कार और संकल्प बहुत कोमल होते हैं, इसलिये उनके पिछले जीवन के कठिन संस्कारों को भी मोड़ा जाना संभव होता है। किन्तु यह संस्कार यदि स्वभाव की गहराई में धँस गये तो उनको उखाड़ कर बाहर निकालना कठिन हो जाता है। बालकों में श्रद्धा की मात्रा इतनी पर्याप्त है कि वह संस्कारों के विकास में गुरुओं के कठोर नियन्त्रण में बने रह सकें और आत्मसिद्धि की कठोर साधनायें पूर्ण निष्ठा के साथ करते रहें।
ब्रह्मचर्य का दूसरा उद्देश्य है साँसारिक सुखोपभोग के लिये शक्ति -संचय। ब्रह्म-ज्ञान हो जाने पर जो विशुद्ध कर्त्तव्य पालन शेष रह जाता है उसे सुविधाजनक स्थिति में चलते रहने देने की दृष्टि से शारीरिक शक्ति अपेक्षित है। जीव की शेष जीवन यात्रा शरीर द्वारा ही पूरी होती है इसलिये उसका सुदृढ़ और मजबूत होना नितान्त आवश्यक है। गुरुकुलों के जीवन में इन्द्रिय असंयम के कोई भी कारण शेष नहीं रहते थे। उन वातावरणों को यज्ञादि से और भी बल प्रदायक बनाया जाता था। फलस्वरूप एक निश्चित समय तक वहाँ रहने से ब्रह्मचारी का मन, बुद्धि, शरीर सब पूर्ण पुष्ट और परिपक्व हो जाता था। ज्ञान की दृष्टि से, शारीरिक दृढ़ता की दृष्टि से वह पूर्ण होकर आश्रम से निकल कर आते थे और एक उत्तरदायी जीवन-गृहस्थ जीवन के लिये सारी तैयारियाँ पूर्ण कर लेते थे।
दूसरा आश्रम गृहस्थ है। वह उद्योग, अर्थोपार्जन और सुखोपभोग का जीवन होता है। साँसारिक सुखों का भी एक निश्चित सीमा में औचित्य है। उनका उपभोग किया जाना भी अधर्म नहीं है। सन्तानोत्पत्ति की दृष्टि से पति−पत्नी का संयोग दोषपूर्ण नहीं है। इससे वंश चलते हैं, समाज, राज्य और राष्ट्र का निर्माण होता है। लौकिक जीवन में मनुष्य का सहयोग भी धर्म है। राष्ट्र को सबल और सुशिक्षित, सुदृढ़ और चरित्रवान नागरिक देने की आध्यात्मिक प्रवृत्तियाँ गृहस्थ जीवन में परिपूर्ण होती हैं। ब्रह्मचर्य काल में व्रतधारी को जो शिक्षायें मिली होती हैं व्यवहार में उनका अनुभव गृहस्थ में होता है। प्रेम, दया, करुणा, मैत्री, उदारता, क्षमा, सहिष्णुता कष्ट परायणता आदि की व्यावहारिक रसानुभूति गृहस्थ जीवन में ही पूरी होती है। स्त्री पुरुष मिलकर निर्माण कार्यों में प्रवृत्त होते हैं, और राष्ट्र की सर्वांगीण प्रगति में सहयोग करते हैं। गृहस्थ इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य की आध्यात्मिक चेतना जागृत है और कर्त्तव्यपालन के लिए उसमें समुचित साहस है। अपनी भावनाओं का विकास भी इसी क्षेत्र में रह कर होता है। कष्ट और कठिनाइयों में मनुष्य की आत्मा विकसित होती चली जाती है।
बोधायन धर्म सूत्र में गृहस्थाश्रम के अनेक प्रयोजनों को पूरा करने वाला सर्वोच्च आश्रम माना है। इसमें सुखोपभोग के साथ-साथ धर्म का भी समन्वय होने से महर्षि गौतम ने गृहस्थाश्रम को सब आश्रमों का मूल कहा है। जिन लोगों का यह कथन है कि गृहस्थ जीवन जंजाल है, व्यर्थ है, इसमें रहकर ईश्वर उपासना का लाभ नहीं उठाया जा सकता, उन्हें जानना चाहिये कि महर्षि कण्व, जमदग्नि, विश्वामित्र, वशिष्ठ, भरद्वाज, गौतम, शंख, दक्ष आदि अनेक ऋषि गृहस्थ ही थे और गृहस्थ में रहकर ही उन्होंने उच्च तत्वों की शोध की थी। वस्तुतः मनुष्य के विकास में परिवार पहली और सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। अनेक कष्ट और कठिनाइयाँ भी गृहस्थ जीवन में हँसी खुशी के साथ काट ली जाती हैं। दूसरे तीनों आश्रमों के संचालन की व्यवस्था भी इसी से पूरी होती है।
तैरना सीखने की आवश्यकता जल में ही पूरी होती है। जमीन में लेटकर कोई तैरना नहीं जान सकता। जीवन में परोपकार और धर्मपालन की आवश्यकता भी इसी तरह पारिवारिक जीवन से अलग रह कर नहीं की जा सकती। अर्थ का आचरण भी उतना ही आवश्यक है, यदि इसका कोई प्रयोग न किया जाय तो यह जो साँसारिक गतिविधियाँ चल रही हैं यह सब बन्द हो जायें और यह संसार बिलकुल, शुष्क, नीरस और जनहीन हो जाय। तब यह संसार ही जड़वत् दिखाई देने लगे।
वानप्रस्थ :—गृहस्थ में रहते हुये एक अवस्था ऐसी आती है जब उसके लिये अपनी आवश्यकता घटने लगती है। गृहस्थी के संचालन का उत्तराधिकार सन्तान ले लेती है। अर्थ और काम्य प्रयोजनों को पूरा कर लेने से इन्द्रियों के विषय भी काफी तृप्त हो चुके होते हैं। शास्त्रों में यह अवस्था 50 के लगभग मानी जाती है, जब लोगों को अपने कन्धों का भार उतार कर परिवार के ज्येष्ठ प्रतिनिधि को सौंप देना चाहिये और लोक हित के कार्यों में अधिक रुचि लेना चाहिये। अधिक आयु के पुरुषों तथा युवकों के विचारों में प्रायः साम्य नहीं होता इसलिये पारिवारिक जीवन को अकारण कलह से बचाने के लिये भी यह आवश्यक है कि उतरती उम्र के व्यक्ति अपना जीवन समाज के लिये समर्पित कर दें। उदर-पोषण के लिये या जब तक उत्तराधिकारी पूर्ण रूप से विकसित न हो जाय और उस व्यक्ति के मार्गदर्शन की आवश्यकता बनी रहें तब तक कोई व्यक्ति पारिवारिक संपर्क में बना रह सकता है पर उसे केवल अपने आपको व्यवस्थापक रह कर ही चलना चाहिये और जीवन का अधिकाँश भाग आत्म चिन्तन तथा लोकोपकारी साधनाओं में खर्च करना चाहिये। अनावश्यक आसक्ति और मोह के कारण प्रायः लोग परिवार को छोड़ना नहीं चाहते, उसी से चिपटे रहना चाहते हैं। उन्हें यह गलतफहमी होती है कि यदि वे नहीं रहेंगे तो शायद बालकों का जीवित रहना कठिन हो जायगा। यह मोह-बुद्धि परिवार में अनेक बखेड़ों का कारण बनती है। गृहस्थी का संचालन सुचारु रूप से चलते रहने देने की दृष्टि से अपना शरीर परिवार से हटा लेना कुछ बुरा नहीं, वरन् यह एक नैतिक धर्म कर्त्तव्य है। नये की स्थापना के लिये पुराने को वहाँ से हट ही जाना चाहिये।
संन्यास :—संसार में रहते हुये धर्म अर्थ, काम के त्रिविध प्रयोजन पूरे हो जाने के बाद आत्म कल्याण की स्थिति आती है। मनुष्य शरीर में जीवात्मा का अवतरण बन्धन से मुक्ति या मोक्ष प्राप्ति के लिये होता है। समाज और संसार में रहते हुये मानसिक उलझनें, उत्तेजनायें आदि रहनी स्वाभाविक थीं। अधर्म की पहिचान होते हुये भी कई बार औरों के हित की दृष्टि से उसे करना पड़ जाता है इससे अकारण आत्म-वेदना मिलती है। अतः चौथी अवस्था में प्राणी को संसार के शेष बन्धनों को भी त्यागकर अपने आपको पूर्णतया परमात्मा की इच्छा के सहारे छोड़ देना चाहिये। उस समय मनुष्य का ज्ञान पक जाता है और इन्द्रियाँ अशक्त हो जाती हैं, अतः विषयों से भी छुटकारा मिल जाता है। अकारण पैदा होने वाली दुर्भावनायें भी सामाजिक संपर्क से दूर हो जाने से छूट जाती हैं। न कुछ मोह रह जाता है न आसक्ति । किसी तरह का कोई कर्त्तव्य भी शेष नहीं रह जाता। परमात्मा के चिन्तन में विचरण करता हुआ मनुष्य अन्त में संन्यास की स्थिति में प्राण त्यागकर आनन्द की अन्तिम स्थिति में विलीन हो जाता है।
यह आश्रमों की परम्परा जब तक हमारे देश में जीवित रही तब तक यश, श्री और सौभाग्य में यह राष्ट्र सर्व शिरोमणि बना रहा। श्रेय और प्रेय का इतना सुन्दर सामञ्जस्य किसी अन्य जाति या धर्म में मिलना कठिन है। हमारी कल्पना है कि मनुष्य आनन्द में जन्म लेता है, आनन्द से जीवित रहता और अन्त में आनन्द में ही विलीन हो जाता है। मनुष्य का लक्ष्य भी यही है। इस आवश्यकता की पूर्ति आश्रम व्यवस्था में ही सन्निहित है। समाज की सुदृढ़ रचना और मनुष्य के जीवन ध्येय की पूर्ति के लिये आश्रम-व्यवस्था का पुनर्जागरण अत्यन्त आवश्यक है।
विवाह मानव जीवन की एक बहुत बड़ी घटना है। इससे मनुष्य के जीवन में एक बहुत बड़ा मोड़ आता है। विवाह सम्बन्धों पर जन साधारण के जीवन की सफलता, असफलता, सुख, शान्ति, उन्नति, विकास आदि निर्भर करते हैं। पति पत्नी का ठीक-ठीक चुनाव होगा तो वे एक दूसरे के लिए सहायक सिद्ध होंगे। उनका जीवन आनन्दमय रहेगा। दोनों अपने सम्मिलित प्रयत्नों से उन्नति की ओर अग्रसर हो सकेंगे। इसके विपरीत वर कन्या के चुनाव में असमानता, अनियमितता रहेगी तो, दोनों का जीवन दूभर हो जायगा। उनके जीवन में नारकीय वातावरण बन जायगा। परस्पर एक दूसरे के लिए बोझ बन जायेंगे। उन्नति के लिए बाधक सिद्ध होंगे। इसलिए वर कन्या का ठीक ठीक चुनाव एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी, सूझबूझ का काम है। इसमें की गई तनिक-सी भूल दोनों के जीवन को बिगाड़ देती है।
एक समय था जब हमारे यहाँ विवाह वर कन्या की बहुत छोटी अवस्था में ही कर दिया जाता था। इससे एक लाभ था कि कन्या बचपन से ही पति गृह में रहने की और वहाँ के वातावरण के अनुकूल बनने की अभ्यस्त हो जाती थी। लेकिन इससे लड़के, लड़कियों के जीवन विकास की सम्भावनायें ही प्रायः नष्ट हो जाती थीं। लड़कियाँ केवल घर की व्यवस्था करने की मशीन मात्र बन कर चहारदीवारी में घिरी रहती थी, लड़के भी असमय में ही गृहस्थी के भार से दब जाते थे।
आज की बदलती हुई सामाजिक परिस्थितियों व्यवस्थाओं, मान्यताओं के कारण पुराने आधार प्रायः अनुपयुक्त होते जा रहे हैं। शिक्षा, औद्योगिक विकास, संसार की विभिन्न संस्कृतियों के सम्मेलन के कारण विवाह सम्बन्धों के आधार भी बदलते जा रहे हैं। टूटती हुई सम्मिलित परिवार व्यवस्था के कारण यह आवश्यक हो गया है कि लड़के लड़की योग्य और समर्थ हों अपना भार स्वयं वहन करने में। बढ़ते हुए बुद्धिवाद, विचारशीलता के कारण यह भी आवश्यक हो गया है कि लड़के-लड़की एक दूसरे को समझा कर विवाह सूत्रों में बँधे। अन्यथा अब वह समय नहीं रहा जब कि एक के अयोग्य होने पर भी दाम्पत्य जीवन-निभता रहता था। आजकल पति-पत्नी का मतभेद, कलह, अशान्ति, तलाक, आत्महत्या तक के परिणाम उपस्थित कर देता है। हमारे यहाँ अभी यह प्रणाली चल रही है कि विवाह सम्बन्ध माता पिता या अभिभावकगण तय कर लेते हैं लेकिन इसके दूरगामी परिणाम निकलते हैं और उनके दाम्पत्य जीवन की गाड़ी का चलना मुश्किल हो जाता है। पति पत्नी के स्वभाव, विचार, रहन-सहन में एकरसता नहीं रहती। इसी तरह बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो अपनी सभ्यता संस्कृति की मर्यादाओं को भूल कर विदेशी परम्पराओं का अनुगमन करते हैं। लड़के लड़कियों में तनिक प्रेम हुआ कि विवाह का प्रस्ताव पैदा हुआ। चटपट विवाह भी हो गये। लेकिन ऐसे प्रेम विवाहों की सफलता अभी तक संदिग्ध रही है। अधिकाँश का परिणाम तलाक और पारस्परिक संघर्ष के रूप में ही मिलता है। इसी तरह विवाह सम्बन्धों में वर वधू के चुनाव के आधार, मान्यतायें बहुत कुछ बदल गई हैं किन्तु अभी इन्हें स्पष्ट और सर्वसम्मत नहीं माना जा सकता। पुरानी परम्पराओं का ही न तो आँख मींच कर अनुसरण किया जा सकता है, न नई मान्यताओं को ही एक दम अपनाया जा सकता है। वर कन्या के चुनाव में हमें मध्यम मार्ग का अनुसरण करना पड़ेगा। प्राचीन और अर्वाचीन मान्यताओं को ध्यान में रखकर इस पर निर्णय करना होगा।
क्या वर कन्या का चुनाव माँ बाप अथवा अभिभावकगण करें या यह प्रश्न केवल लड़के लड़कियों पर छोड़ दिया जाय? ये दोनों ही व्यवस्थायें अपने आप में अपूर्ण हैं। क्योंकि गृहस्थ की गाड़ी लड़के लड़कियों पर ही चलेगी माँ बाप पर नहीं। इसलिए उन्हें एक दूसरे को समझने बूझने की आवश्यकता है। विवाह सूत्र में बँधने से पूर्व विवाह का उद्देश्य, महत्व, उसका उत्तरदायित्व समझने की क्षमता भी उनमें होनी चाहिए। जब माँ बाप अपनी रुचि के अनुसार वर कन्या का चुनाव कर देते हैं तो आगे चलकर इनमें से बहुतों का दाम्पत्य जीवन विषाक्त हो जाता है, पति पत्नी के स्वभाव, संस्कार, विचार, भावनायें आगे चलकर नहीं मिलते। लेकिन यह भी निश्चित है कि अनुभवहीन लड़के लड़की अक्सर भावनाओं के आवेग में बह जाते हैं वे एक दूसरे को नहीं समझ पाते और गलत निर्णय कर डालते हैं। और इस तरह के विवाह भी आगे चलकर परिणाम में अहितकर ही सिद्ध होते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि दोनों के मध्य का मार्ग अपनाया जाय।
लड़के लड़कियों को परस्पर एक-दूसरे को समझने बुझने का अवसर दिया जाय यह आवश्यक है। यह अच्छा है कि वे एक दूसरे का समझलें, जानलें। परस्पर के विचार आदर्शों से परिचित हो जायें किन्तु यह स्वतन्त्र न होकर माता पिता की सहमति से ही होना चाहिए।
इस सम्बन्ध में देवदास गाँधी (महात्मा गाँधी के पुत्र) के विवाह की घटना प्रेरणास्पद है। निकट संपर्क में रहने पर देवदास जी और चक्रवर्ती राजगोपालाचारी की पुत्री में प्रेम हो गया, जो आगे चलकर दोनों के अभिभावकों के समक्ष विवाह प्रस्ताव के रूप में आया। गाँधी जी और राजाजी ने इस सम्बन्ध में विचार करके निर्णय किया कि पाँच साल तक यदि इनका प्रेम स्थायी रहा तो विवाह कर देंगे। दोनों ने पाँच साल तक प्रतीक्षा की और पवित्र जीवन बिताया। इस परीक्षा के बाद भी जब इनका प्रेम स्थायी पाया गया तो विवाह कर दिया गया। इसी तरह जब तक प्रेम की परीक्षा न हो जाय, वह आन्तरिक और शुद्ध न हो तब तक प्रेम विवाहों को टाल देना ही श्रेयस्कर होता है। स्मरण रहे भावावेश का नाम प्रेम नहीं है।
ऐसे विवाह तो हमारी संस्कृति और आदर्शों तथा भावी दुष्परिणामों की दृष्टि से सर्वथा त्याज्य हैं जिनमें अनुभवहीन बालक बालिकायें माँ बाप की नजर बचाकर अपने पड़ोस में या कहीं संपर्क में आने पर परस्पर प्रेम कर बैठते हैं। इससे कई लड़कियाँ अनघड़, असंस्कृत, आवारा लड़कों के प्रेम में फँस जाती हैं तो कई लड़के चरित्रहीन, उच्छृंखल लड़कियों के चक्कर में उलझ जाते हैं।
विवाह सम्बन्धों में धन को कभी महत्व न दिया जाय। वर वधू का चुनाव इस दृष्टि से करना कि वर अधिक धन सम्पत्तिवान् है, या वधू के यहाँ से दहेज अधिक मिलेगा तो यह बड़ी भूल है। धन को प्रतिष्ठा देकर वर वधू के गुण, कर्म, स्वभाव, स्वास्थ्य आदि के प्रति उपेक्षा बरतना उनका भावी जीवन नष्ट करना है। क्योंकि धनवान होकर भी लड़का चरित्रहीन, लम्पट, बदमाश, गुण्डा हो सकता है। उधर अधिक दहेज का लोभ देकर कई शारीरिक दृष्टि से अयोग्य, खराब स्वभाव की लड़कियाँ सरलता से ब्याही जा सकती हैं। इसके अतिरिक्त धनी घरानों की लड़कियों के रहन सहन का स्तर, उनकी माँगें बहुत महँगी होती हैं जिन्हें पूरा करने की गम्भीर समस्या आगे चलकर पैदा हो आती है। अतः वर वधू के चुनाव में धन का मूल्यांकन गलत है। इस सम्बन्ध में इतना तो देखना चाहिए कि लड़का खाता कमाता हो, अपने जीवन निर्वाह में सक्षम हो। इससे अधिक माली हालत को गौण समझना चाहिए।
विवाह कब किया जाय? इसका एक ही उत्तर है कि जब लड़के लड़की सयाने हो जायें, अपने जीवन, उत्तरदायित्व का भार स्वयं वहन करने में समर्थ हो जायें। वयस्क हों किन्तु अपना भार स्वयं उठाने में असमर्थ हों तो ऐसे लड़के लड़कियों का विवाह भी आज के युग में अनुपयुक्त ही है। बाल विवाह, अल्प वयस्कों के विवाह के लिए तो कोई गुंजाइश ही नहीं है। इस तरह के विवाह तो सभी भाँति बुरे हैं।
वर वधू के चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण बात स्वास्थ्य के विषय में देखने की है। दोनों में से कोई भी शारीरिक दृष्टि से अयोग्य अथवा रुग्ण हो तो विवाह नहीं करना चाहिए। क्योंकि इससे उन दोनों का ही नहीं दो परिवारों का जीवन दुःखद बन जाता है। उनकी सन्तान भी रुग्ण पैदा होती है जिससे इन बच्चों को तथा सारे समाज को उनके भार का वास ही सहना पड़ता है। शारीरिक या मानसिक दृष्टि से अशक्त अक्षम लोगों को विवाह नहीं ही करना चाहिए। हर बालक का विवाह अवश्य ही किया जाना चाहिये यह मनुष्य की भारी भूल है। जो गृहस्थ की जिम्मेदारियों को शारीरिक मानसिक या आर्थिक कारणों से ठीक तरह उठा सकने में असमर्थ है उनके लिए विवाह से बचे रहना, अविवाहित रहकर आनन्द से जीवन यापन करना ही उचित है।
समुचित विकास का अर्थ है बच्चे की शारीरिक , मानसिक एवं बौद्धिक वृद्धि। जब तक जिसमें इन तीनों शक्तियों का संतुलित विकास नहीं होता उसका व्यक्तित्व अपनी चरम सीमा पर नहीं पहुँचता। और जब तक व्यक्तित्व की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं होती मनुष्य जीवन की महान् उपलब्धियों को प्राप्त नहीं कर पाता। समाज उसको या तो समझ ही नहीं पाता या समझने में भूल करता है। जिसका जितना ही उज्ज्वल चित्र समाज के सामने रहता है वह उतना ठीक पहचाना जाता है।
समुचित विकास के लिये बच्चे को प्रेरणा देने से पहले यह आवश्यक है कि शारीरिक विकास मानसिक विकास और बौद्धिक विकास का क्या अर्थ है? यह समझ लेना चाहिये।
शारीरिक विकास का अर्थ है-शरीर का सुधर, स्वस्थ और सशक्त होना। मानसिक विकास का अर्थ है मन का प्रसन्न, प्रफुल्ल, निर्भीक, साहसिक, विश्वस्त और स्थिर होना। बौद्धिक विकास का अर्थ है-किसी बात के ठीक-ठीक समझने-समझाने और निर्णय में बुद्धि का सक्षम होना। और समुचित विकास का अर्थ है इन तीनों बातों का साथ-साथ समान रूप से वृद्धि पाना!
सबसे पहले बच्चे का शारीरिक विकास प्रारम्भ होता है। उसके बाद बौद्धिक और तत्पश्चात् मानसिक। इस क्रम से विकास होने के कारण शारीरिक विकास अन्य दोनों विकासों की आधार भूमि मानी जाती है। अतएव अभिभावकों का पहला कर्तव्य है बच्चे के शारीरिक विकास पर समुचित ध्यान देना!
बच्चे को उसकी आयु के अनुरूप शुद्ध और सुपाच्य वस्तुयें खिलाना चाहिये, क्योंकि प्रौढ़ों की पाचन शक्ति में अन्तर होता है। अधिकतर सभी घरों में सब को एक ही समान भोजन दिया जाता है। क्या बच्चे क्या प्रौढ़ एक ही प्रकार की बनी रसोई खाते हैं। न किसी के अलग भोजन की व्यवस्था होती है और न इसकी आवश्यकता अथवा महत्व समझा जाता है?
प्रायः सभी अभिभावक वही चीजें बच्चों को भी खिलाते हैं जो उन्हें पसन्द होती हैं। बच्चा यदि अपनी प्रकृति अथवा आयु के प्रतिकूल यदि कोई चीज नापसन्द भी करता है तब भी उसे थोड़ी-थोड़ी और बार-बार खिला कर उन चीजों का अभ्यास कराते हैं। वे सदैव यह चाहते रहते हैं कि बच्चा ठीक उनके ही प्रति रूप बने। समान भोजन का अभ्यस्त बना लेने में उन्हें एक सबसे बड़ी सुविधा यह दीखती है कि बच्चे के लिये अलग से भिन्न प्रकार की वस्तुएं बनाने का झंझट नहीं करना पड़ता। वे इसमें श्रम, समय और पैसे की बचत की सुविधा देखते हैं, बच्चे के स्वास्थ्य को नहीं देखते। मिर्च मसालों वाला भोजन भी बच्चे को खिलाने में संकोच नहीं करते। यद्यपि वह मिर्च आदि मुँह में लगते ही रोने बिलबिलाने लगता है, तथापि उनको यह विचार नहीं आता कि यह चीज उसके प्रतिकूल है, नहीं खिलानी चाहिये। इसके विपरीत बहुतों का यह विश्वास होता है कि मिर्च मसालों से बच्चों की पाचन क्रिया को शक्ति मिलती है और उसकी जुबान खुलती है। यह भूल है। मिर्च मसाले बच्चे की पाचन क्रिया खराब कर देते हैं और उसके स्वस्थ बनने में बाधक होते हैं।
जब बच्चे का शारीरिक विकास समुचित रूप से होता चलेगा तो अन्य दो विकास भी ठीक-ठीक होंगे। भोजन का प्रभाव मन और मस्तिष्क पर भी पड़ता है। जिस प्रकार का भोजन बच्चे को दिया जायेगा उसी प्रकार का उसका मन और मस्तिष्क बनेगा। “स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन और मस्तिष्क होता है” इस सिद्धान्त के अनुसार उसे केवल वे ही चीजें खिलाई जानी चाहिये जो उसके शरीर, मन और मस्तिष्क के अनुकूल हों। जिससे शरीर स्वस्थ, मन सबल और बुद्धि प्रखर बने!
बौद्धिक विकास के लिये उसे ऐसे वातावरण में रखना चाहिये जो उसके अनुकूल हो। उससे बुद्धि वर्धक बातें की जानी चाहिये और ऐसे खिलाया जाना चाहिये जिससे उसे थोड़ी बहुत बुद्धि का प्रयोग करना पड़े। व्यावहारिक बातों में, क्या कैसे होता है, ऐसा क्या है, ऐसा क्यों नहीं होना चाहिये आदि तर्क पद्धति से सोचने और समझने का अभ्यस्त बनाना चाहिये। इससे उसमें विचार शक्ति का उदय होगा और वह हर बात पर विचार करने लगेगा। बुद्धि का अधिक से अधिक उपयोग ही बौद्धिक विकास का सबसे अच्छा साधन है!
उसे सामान्य रूप से उपयोग और प्रयोग में आने वाली चीजों का प्रारम्भिक ज्ञान कराया जा सकता है। जैसे दूध कैसे प्राप्त होता है, उसकी क्या उपयोगिता है? वह कब हानि और कब लाभ करता है? अच्छे और खराब दूध की क्या पहचान है? अन्न कैसे उत्पन्न होता है, कौन सा अन्न कैसा होता है और उसकी क्या पहचान है? सब्जियाँ कैसे उगाई जाती हैं, कपड़ा कैसे बनता है, कापी, कागज, किताबें आदि किस प्रकार इस रूप में आती हैं आदि? तात्पर्य यह कि नित्य प्रति प्रयोग में आने वाली चीजों के माध्यम से उसमें ज्ञानोपार्जन की एक प्रकृति का जागरण किया जा सकता है, जिससे आगे चलकर उसमें अधिकाधिक ज्ञान की जिज्ञासा उत्पन्न हो जायेगी और वह अध्ययनशील एवं अन्वेषणशील बन जायेगा जिससे उसके बौद्धिक विकास को पर्याप्त लाभ होगा!
पाठशाला में भेजने से पूर्व बच्चे को साल दो साल घर पर पढ़ा लेना चाहिये, जिससे कि शिक्षा के अनुकूल उसका बौद्धिक धरातल तैयार हो जाये। घर पर शिक्षा देने से इस बात का भी पता लग जायेगा कि किन विषयों में उसकी विशेष रुचि है और कौन से विषय उसे कठिन पड़ते हैं। इसका पता लग जाने से शिक्षकों को उससे अवगत कराया जा सकता है जिससे शिक्षक को उसे समझने और पढ़ाने में सुविधा रहेगी! साथ ही जब कोई बच्चा कुछ अपनी योग्यता लेकर घर से पाठशाला जायेगा तो पढ़ना उसके लिये एक दम कोई नई वस्तु न होगी और वह कक्षा में ठीक से चल सकेगा। अधिकतर बच्चे 6, 7 वर्ष की आयु परपाटी पुजाकर पाठशाला की ओर हाँक दिये जाते हैं, जिससे वह नये काम और नई जगह के कारण घबड़ाता है रोता है और बचना चाहता है! नित्य प्रति पाठशाला जाने के समय अनुरोध का झंझट पैदा होता है जिससे अभिभावक को झल्लाहट और बच्चे की अरुचि पैदा होती है। और कभी-कभी तो माता-पिता परेशान होकर उसे शिक्षा के अयोग्य समझ कर इस ओर से उदासीन हो जाते हैं और यह धारणा बना कर पढ़ने से बिठा लेते हैं कि इसके भाग्य में विद्या है ही नहीं। अस्तु पाठशाला भेजने से पहले यदि उसके अनुकूल उसका बौद्धिक धरातल घर पर ही तैयार कर दिया जाये तो इस प्रकार की सम्भावनाओं का अवसर ही न आये!
शिक्षा के विषय में केवल शिक्षालयों तथा शिक्षा पर ही निर्भर न रहना चाहिये। स्वयं भी देखना चाहिये कि उनका बच्चा पढ़ाई लिखाई में क्या प्रगति कर रहा है। कमजोर बच्चों को अभिभावकों को स्वयं पढ़ाई में कुछ न कुछ सहायता करनी चाहिये! साल बचाने के लिये एक कक्षा से दूसरी कक्षा में पहुँचाने के लिये व्यर्थ प्रयत्न न करना चाहिये! शिक्षा की योग्यता के मापदण्ड से नापना चाहिये न कि कक्षा की श्रेणी से। आशय यह है कि बच्चे के लिये शिक्षा की ऐसी अवस्थाओं और व्यवस्थाओं का प्रबंध करना चाहिये जिससे कि वे दिनों दिन योग्य बन सकें।
मानसिक विकास के लिये उन्हें अधिक से अधिक प्रसन्न एवं विशुद्ध वातावरण में रखने का प्रयत्न करना चाहिये। न उन पर इतना नियंत्रण करना चाहिये कि वे मुरदा-मन हो जाये और न इतनी छूट देना चाहिये कि वे उच्छृंखल हो जाये। इन्हें भय से मुक्त करने के लिये साहस की कथायें सुनाई जानी चाहिये और उदाहरण देने चाहिये। उन्हें किसी बात से सावधान तो करना चाहिये किन्तु भयभीत नहीं। धीरे धीरे कठिन कामों का अभ्यस्त बनाना चाहिये। काम बिगड़ जाने पर उनका उपहास न करके उसके सुधार की शिक्षा देनी चाहिये और समुचित सराहना से प्रोत्साहित करना चाहिये। उनके सामने क्रोध, लोभ, स्वार्थ अथवा असद्भावनाओं की परिस्थितियाँ न आने देना चाहिये। उन्हें अच्छी बातों के लिये प्रोत्साहित और बुरी बातों के लिये हतोत्साहित करना चाहिये। उनके सामने कभी भी ऐसी बातें न की जानी चाहिये जिससे उनके मन पर कोई बुरा प्रभाव पड़े! अभिभावकों को अपने व्यसनों की तुष्टि उनकी नजर बचाकर करना चाहिये क्योंकि ऐसा न करने से वे भी व्यसनी बन सकते हैं और तब उन पर समझाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा!
भारतीय जीवन में नारी-आदर्श की शानदार परम्परा रही है। पुरुषों की अपेक्षा सद्गुण शील और सच्चरित्रता में स्त्रियाँ अग्रणी रही है। यही कारण था कि उन्हें देवी” नाम से सम्बोधित करने की परम्परा डाली गई थी जो अब तक इसी तरह से चल रही है। भारतवर्ष में धर्म, संस्कृति और नैतिकता की सर्वोपरिता का अधिकाँश श्रेय हमारी माताओं, बहनों तथा बेटियों को प्राप्त है। समाज निर्माण में उनका सहयोग पुरुषों से कम न था। भौतिक विकास में ये पुरुष के कन्धे से कन्धा मिलाकर चलती थीं। स्त्री पुरुषों की पारस्परिक अभिन्नता के कारण ही यह सब देश समृद्धि की चरम सीमा तक पहुँचा हुआ था। नारियाँ सदैव से ही पुरुषों के लिये प्रेरणा का प्रकाश रही हैं। यही कारण है कि शक्ति की उपासना का प्रतीक भी नारी को ही माना गया है।
हमारी जीवन-पद्धति में बुराइयाँ बढ़ने लगी तो नारी जीवन भी उससे अछूता न रह सका और वे अस्ततः पुरुषों की दासी, भोग विलास की सामग्री और न जाने कैसी हेय वस्तु सी बन कर रह गईं। अशिक्षा, पर्दा, अन्ध विश्वास, आलस्य, विलासिता, फैशनपरस्ती आदि अनेकों बुराइयाँ उनमें बढ़ी। इन सबसे बड़ी बुराई रही उनकी आभूषण प्रियता, जिसने न केवल हमारे आर्थिक-सन्तुलन को बिगाड़ा वरन् उससे अनेकों सामाजिक बुराइयों का प्रचलन हुआ। स्त्रियों की कार्यक्षमता घटी और मानसिक कमजोरियाँ बढ़ने लगी। यह बहुत बड़े दुःख की बात है कि हमारी बहू-बेटियाँ अब गुणों से दूर होती जा रही हैं और नित्य नये शृंगार आभूषणों की माँगकर राष्ट्रीय ढाँचे को असंतुलित बनाने में लगी हैं।
भारतीय सम्पत्ति का इतना बड़ा भाग जेवरों के रूप में बँधा पड़ा कि यदि उसे खोल दिया जाय तो राष्ट्र की आर्थिक समस्या का हल सुविधापूर्वक हो जाय। दुःख की बात है कि यह क्रम अब भी उसी तरह चल रहा है। अशिक्षितों की बात दूसरी थी पर अब तो पढ़े लिखे और विचारवान् व्यक्ति भी सिद्धान्त रूप में भले ही विरोध करते हों किन्तु व्यवहार में सब इस गन्दी प्रथा को अपनाये हुये हैं और हमारी आय का आधा भाग केवल स्त्रियों के गहने बनाने में चला जाता है। यह बात नारी और राष्ट्र दोनों ही के लिये नितान्त दुर्भाग्यपूर्ण है।
धन के अभाव में लोग कोई उत्तम उद्योग नहीं कर पाते, बालकों को शिक्षित नहीं बना पाते, पौष्टिक आहार प्राप्त नहीं कर पाते, जीवन स्तर ऊँचा नहीं कर पाते। पर यदि विचारपूर्वक देखा जाय तो हमारे पास ऐसा कोई अभाव है नहीं। हमने जानबूझ कर ही यह समस्या खड़ी की है। हिन्दुस्तान में शायद ही ऐसा कोई अभागा घर हो जिसमें इतना जेवर न हो जिससे सामान्यतः एक परिवार के उदर पोषण के उपयुक्त आर्थिक धन्धा चलाया जा सके। पर स्त्रियों के असहयोग के कारण यह आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती। वे बुरी तरह से इन मिट्टी के ढेलों को छाती से चिपकाये हुये अपने बच्चों को, पतियों को आर्थिक विषमता की चक्की में पिसता हुआ देखती रहती हैं किन्तु इस हानिकारक कुप्रथा को छोड़ने के लिये तैयार नहीं।
आभूषणों से सौंदर्य बढ़ता हो, सम्मान मिलता हो ऐसी कोई बात तो समझ में आती नहीं। उलटे शरीर के अंग दुखते हैं। चोरों का भय बना रहता हैं। आपस में ईर्ष्या-द्वेष और पारिवारिक कलह ही बढ़ता है। परिवार के पालन करने लायक आय से, बच्चों का पेट काटकर इस मूढ़ता में फँसा दिया जाना बुद्धि संगत बात नहीं। यह हमारी बेटियों के अविवेक का ही लक्षण है।
आभूषणों से स्त्रियाँ नहीं सजतीं, यदि ऐसा रहा होता और इससे कुछ लाभ रहे होते तो हमारे पूर्व पुरुषों में भी इस प्रथा का प्रचलन रहा होता। साधारण मंगल आभूषणों के अतिरिक्त भारी सोने, चाँदी के जेवरों का प्रचलन हमारी अपनी संस्कृति से नहीं हुआ वरन् यवनों ने यह विकृति भारतीय जीवन में पैदा की है। स्त्रियाँ सरल और स्वाभाविक शृंगार फूल और पत्तों से कर लेती थीं उनमें वासना को बढ़ाने वाला कोई दोष नहीं होता था और न उनसे सामाजिक तथा राष्ट्रीय व्यवस्था में किसी तरह की गड़बड़ी पैदा होती थी। स्त्रियाँ अपने गुणों से सजती हैं। मन की निर्मलता और स्वभाव की पवित्रता से ही उनका सच्चा शृंगार होता है।
सच पूछा जाय तो नारी का सतीत्व ही वह आभूषण है जिसके द्वारा वे अपने पतियों को अपना आज्ञानुवर्ती बनाये रख सकती हैं। इससे वे समाज की भावी पीढ़ी, अपने बालकों का निर्माण अधिक पवित्रता, एकाग्रता एवं निपुणता के साथ कर सकती हैं। इस तरह वे अपने व्यक्तिगत कर्तव्यों का यथाविधि पालन करती रह सकती हैं।
पुरुष वर्ग यदि आभूषणों की चिन्ता से मुक्त किया जा सके तो उनकी कार्य क्षमता बढ़ सकती है और रहन सहन का स्तर ऊँचा उठ सकता है। यह कार्य बहू-बेटियाँ ही कर सकती हैं।
लज्जा और विनय भारत की देवियों के आभूषण कहे गये हैं। यह उनके गुण विकास की दृष्टि से ही कहा जाता है। कोई भी गुणशील स्त्री अपनी अपनी गृहस्थी को अधिक संयत और सुखी रख सकती है। वेद-नियंता का आदेश है—
अघोर चक्षुर पतिघ्नी स्योना शग्मा सुशेवा सुयमा गृहेभ्यः।
वीर सूर्देवृकामा सं त्वयैधिषीमहि सुमनस्य माना॥
—अथर्व 14। 2। 17
हे वधू! तू प्रियदर्शिनी होकर शुद्ध अन्तःकरण से परिवार जनों का हित कर। इससे घर में सुख और सम्पत्ति की वृद्धि होगी।”
हमारी संतानें ज्ञानवान्, धर्मवान्, धनवान और शक्ति सम्पन्न बनें इसके लिये स्त्रियों का जीवन विलासिता की सामग्री से नहीं गुण और कष्ट सहिष्णुता से ओत-प्रोत होना चाहिये। स्त्रियाँ शिक्षित हों, विचारवान् हों तभी उनसे राष्ट्र निर्माण के कार्यक्रमों में सहयोग की आशा की जा सकती है। इसके लिये सर्व प्रमुख आवश्यकता तो यही है कि वे ऐसी संकीर्ण विचारधाराओं से उन्मुक्त हों और कर्त्तव्य पालन की ओर उनका ध्यान अधिक से अधिक रहे। कर्त्तव्य में वह सारे उत्तरदायित्व आ जाते हैं जिनका पारिवारिक सुव्यवस्था से सम्बन्ध है। पर आभूषणों से अधिक लगाव होना यह एक ऐसी समस्या है जिससे शेष सभी क्षेत्रों पर कुप्रभाव पड़ता है। अर्थ-व्यवस्था में ही नहीं मनुष्य का नैतिक जीवन भी इस कुरीति के कारण विकृत हुये बिना नहीं रहता। समाज और राष्ट्र की व्यवस्था में भी इससे गड़बड़ी ही उत्पन्न होती है।
नारी जाति स्नेह और सौजन्य की देवी है, वह पुरुष की निर्मात्री है। किसी भी राष्ट्र का उदय नारी जाति के उत्थान से ही होता है इसलिये अब इस कुरीति का उन्मूलन कर उन्हें निर्माण क्षेत्र में आगे बढ़ाने की बड़ी तीव्र आवश्यकता अनुभव की जा रही है। पर इसमें कोई बाह्य हस्तक्षेप कारगर नहीं हो सकता। इस कुरीति को कोई दूसरा नहीं दूर कर सकता। जेवर और गहनों के प्रति अरुचि उनमें समझ उत्पन्न करने से ही हो सकती है। विचारवान् स्त्रियों को स्वयं ही इस दिशा में कुछ करने के लिये प्रोत्साहन मिलना चाहिये। जिनकी समझ में आभूषणों की निरर्थकता की बात आ जाये, उन्हें इस शिक्षा का प्रसार तेजी से करना चाहिये।
यावट् भ्रियेत जठरं तावत्स्वत्वं हि देहिनाम्।
अधिकं योऽभिमन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति॥
अपने पेट के भरने के लिए (—अपनी प्राण-रक्षा के लिए) जितने पदार्थ की आवश्यकता है प्राणियों का स्वत्व उतने में ही है। उसकी अपेक्षा जो अधिक में आसक्ति करता है वह चोर है और दण्डनीय है।
न संरम्भेण सिध्यन्ति सर्वेऽर्थाः सान्त्वया यथा।
सब काम जैसे शान्ति से सिद्ध होते हैं, वैसे अशाँति से नहीं।
यह युग हमारे विकास का युग है। राजनैतिक स्वाधीनता मिले हुये हमें काफी दिन हो गये पर परम्परागत कुरीतियाँ अभी ज्यों की त्यों हैं। इन्हें दूर करने से ही अपनी सर्वांगीण उन्नति का द्वार खुल सकता है। यह उन शिक्षित नारियों के लिये आवाहन है कि वे भारतवर्ष के आर्थिक तथा नैतिक स्तर के विकास में अपना सहयोग दें। इस पुण्य कार्य के लिये सुवर्ण या रजत के आभूषणों की आवश्यकता नहीं, वरन् उन्हें गुणों से अलंकृत होना होगा। गुण ही नारी का सच्चा आभूषण है। शीलवान् होना किसी भी अलंकार से बढ़कर है। अब उन्हें ऐसे ही गहने ग्रहण करने चाहिये।
वेद भारतीय धर्म के मूल हैं। हिन्दू संस्कृति का आदि स्रोत उन्हीं से प्रवाहित होता है बाद में प्रस्तुत सम्पूर्ण शास्त्र उनकी व्याख्या मात्र हैं। सैद्धान्तिक जीवन की प्रेरणा देने वाले धर्म ग्रन्थों की, शास्त्रों की हमारे यहाँ कमी नहीं है किन्तु इस युग के अनुरूप व्यावहारिक जीवन की शिक्षा देने वाले ग्रन्थों में रामायण से बढ़कर उपयोगी दूसरा ग्रन्थ नहीं है। इसकी व्याख्यायें इतनी सरल हैं कि शिक्षित अशिक्षित सभी उसे आसानी से समझ लेते हैं। भाषा और गति की दृष्टि से वह रोचक है और कथा का प्रवाह इतना मधुर और सुव्यवस्थित है कि पाठक अन्त तक उसे रुचि, आह्लाद, और जिज्ञासापूर्वक पढ़ता है। इसमें कहीं नीरसता नहीं है।
रामायण की इस उपयोगिता को देखते हुए उसके पारायण और अखण्ड पाठ लाभ-दायक तो हैं किन्तु उसका वास्तविक उपयोग तब है जब मनुष्य उसे अपने जीवन में उतारने का प्रयत्न भी करे। केवल पाठ कर जाना उतना आवश्यक नहीं जितना उसे पढ़ना, पढ़कर उस पर चिन्तन करना और उसकी व्यावहारिक बातों पर आचरण करना महत्वपूर्ण है। रामायण को जीवन में उतारने से मनुष्य अधिक सरलतापूर्वक धर्म-तत्व का अवगाहन कर सकता है, वही कारण है कि अनेक धार्मिक नेता, सुधारक तथा संतजन रामायण के माध्यम से ही लोगों को सन्मार्ग की प्रेरणा देते हैं। ऐसे पाठ, पारायण तथा प्रवचनों का लाभ निःसंदेह बहुत अधिक है पर वह मिलेगा तभी जब उन्हें जीवन में अवतरित होने का अवसर भी मिलेगा।
अध्यात्म के प्रत्येक आवश्यक एवं उपयोगी अंग की विवेचना रामायण में हुई है। वह एक तरह का सर्वांगपूर्ण धर्मग्रन्थ है और मनुष्य जीवन को सुखी, समुन्नत तथा युक्त बनाने वाले सभी सिद्धान्तों का उसमें समावेश है।
भारतीय शैली के अनुरूप ही कथा का प्रारम्भ ईश वन्दना से होता है। परमात्मा के स्मरण, चिन्तन और गुण कीर्तन के साथ किसी कार्य का शुभारम्भ करने से मनुष्य को सच्चा आत्म-बल मिलता है। वह बुराइयों से सावधान होता है और साँसारिक बन्धनों में लिप्त न होकर सम्पूर्ण कर्त्तव्यों का पालन एक दार्शनिक की भाँति करता है। रामायण का प्रारम्भ इसी शैली में हुआ है। यह व्यावहारिक प्रशिक्षण है कि प्रत्येक शुभ कर्म में पहले ईश्वर-आराधना की जाये ताकि मनुष्य का कदम दोषपूर्ण ने हो जाय। वह स्थिरतापूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता चले।
आस्तिकता मनुष्य जीवन की प्रारम्भिक शर्त है किन्तु उसका ज्ञान किसी को स्वयमेव नहीं होता। कविवर तुलसी दास जी ने सत्संग को ईश्वरीय ज्ञान का माध्यम बताया है। उन्होंने लिखा है :—
सुनि आचरज करै जनि कोई।
सतसंगति महिमा नहिं गोई॥
जलचर थलचर नभचर नाना।
जे जड़ चेतन जीव जहाना॥
मति कीरति गति भूति भलाई।
जब जेहि जतन जहाँ जेहि पाई॥
सो जानव सत्संग प्रभाऊ।
लोकन्हुँ वेद न आन उपाऊ॥
सत संगत मुद मंगल मूला।
सोई फल सिधि सब साधन फूला॥
अर्थात्—सत्संग की महिमा पर जो प्रकाश डाला जाता है वह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं हैं। सत्संग का महत्व असाधारण है। जल, थल या आकाश में रहने वाले किसी भी प्राणी को बुद्धि, यश, मोक्ष, वैभव तथा भलाई की प्राप्ति केवल संतजनों के सान्निध्य से ही संभव है। सत्संग सब सिद्धियों का दाता है इससे बढ़कर और कुछ दूसरा उपाय नहीं है।
सठ सुधरर्हि सतसंगति पाई ।
पारस परसि कुधातु सुहाई ॥
विधिवश सुजन कुसंगत परहीं ।
फनि मनि समनिज गुण अनुसरही ॥
अर्थात्—इस संसार में स्वतः कोई बुरा नहीं, संयोग वश लोग बुरी संगति में पड़कर सद्गुणों का परित्याग कर देते हैं। वे सत्संगति से फिर वैसे ही ठीक हो जाते हैं जैसे पारस के स्पर्श से कम मूल्य की धातु भी सोना बन जाती है।
मनुष्य को इस तरह की उच्च स्थिति मिल सकती है। संतजनों के प्रभाव से जब ईश्वरीय ज्ञान का प्रकाश अन्तःकरण में प्रस्फुटित होता है तब उसकी शक्ति और सीमा ब्रह्ममय हो जाती है। पुरुष स्वयं ही वृहद् शक्ति पुँज है किन्तु वह स्वार्थवश, मायावश, संकीर्णतावश अल्पशक्ति वाला, सब प्रकार से दीन और दुःखी बना हुआ है। माया कोई साकार वस्तु नहीं वरन्-
मैं अरुमोर तोर तैं माया।
जेहि सब कीन्हें जीव निकाया॥
गो गोचर जहँ लगि मन जाई।
सो सब माया जानेहु भाई॥
एक दुष्ट अतिसय दुख रुपा।
जाबस जीव परा भव कूपा॥
एक रचइ जग गुन बस जाकें।
प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें॥
अर्थात्—इस संसार में “मैं” और “मेरे” का अभिमान ही माया है, इसी के वश होकर जीव बन्धनों में पड़ते और दुःख भोगते हैं। एक व्यक्ति यह समझता है कि यह जो कुछ है उसका कर्त्ता मैं हूँ, इस अभिमान के कारण संसार में जो कुछ है वह सब उसके लिये बन्धन रूप बन जाता है। दूसरा यह समझता है कि यह जो कुछ है वह ईश्वरीय प्रसाद है। वह व्यक्ति संसार को कल्याण रूप में देखता और सुखोपभोग प्राप्त करता है।
उपरोक्त पंक्तियों में निष्काम कर्म योग की गूढ़ व्याख्या हुई है। अर्थात् मनुष्य उन सभी मंगल कार्यों को करे जिससे लोक हित होता हो किन्तु उसे कर्तापन का अभिमान नहीं होना चाहिये अन्यथा वह कर्म के फल से बँध जायेगा और दुःख भुगतता रहेगा।
इसलिये धर्मवान् बनो ताकि संसार में लिप्त न हो, योग के द्वारा ज्ञान प्राप्त करो इससे मोक्ष मिलेगा और परमात्मा के प्रति भक्ति जागृत होगी। ईश्वर की साक्षी प्राप्त कर लेना, भक्त और शरणागत होना ही मनुष्य जीवन का उद्देश्य है। भगवान् राम ने भक्ति के साधनों और उसके प्रभाव पर प्रकाश डालते हुये बताया—
प्रथमहि विप्र चरन अति प्रीती।
निज निज कर्म निरत श्रुति नीति॥
एहिकर फल पुनि विषय विरागा।
तब मम धर्म उपज अनुरागा॥
श्रवणादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं।
मम लीला रति अति मन माहीं॥
संत चरण पंकज अति प्रेमा।
मन क्रम वचन भजन दृढ़ नेमा॥
गुरु पितु मातु बंधु पति देवा।
सब मोहिं कहँ जाने दृढ़ सेवा॥
काम आदि मद दंभ न जाकें।
तात निरन्तर बस मैं ताकें॥
वचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निष्काम।
तिन्ह के हृदय कमल महँ करऊँ सदा विश्राम॥
अर्थात्—”ब्राह्मण [तत्व वेत्ता] का समागम प्राप्त करना, अपने-अपने कर्म में नीति धर्म के अनुसार लगे रहना ही साँसारिक विषयों से दूर रहने का उपाय है। ऐसा करने से धर्म के प्रति श्रद्धा व प्रेम बना रहता है। जिससे श्रवण, मनन आदि ईश्वर-चिन्तन में मनुष्य की बुद्धि सुख का अनुभव करती है। इस तरह मेरी उपासना करते हुये जो लोग गुरुजन, माता, पिता, भाई, पत्नी एवं देवताओं की समुचित सेवा करते रहते हैं, ऐसा करते हुये जिन्हें तनिक भी अभिमान नहीं होता वे निष्काम भाव से मुझे ही भजते हैं, तब मैं भी सदैव उन्हीं के हृदय में विश्राम किया करता हूँ। सदैव उस कर्मयोगी के अन्तःकरण में ही ओतप्रोत रहता हूँ।”
इसके विपरीत यदि मनुष्य धर्म से विमुख होता है और स्वार्थ को, अपने सुख को ही प्रमुखता देता है तो उसे दुःख मिलता है। तुलसी दास जी कहते हैं :—
इमि कुपंथ पग देत खगेसा ।
रह न तेज, तनु बुद्धि लव लेसा॥
जो बुरी राह चलते हैं उनके शरीरों का तेज नष्ट हो जाता है और बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है इसी से उन्हें इस संसार में दुःख ही दुःख मिलता है।
उपरोक्त उद्धरणों में मनुष्य जीवन में धर्म की आवश्यकता एवं बुराइयों के प्रति सावधान रहने की प्रेरणा दी है। इसे व्यावहारिक जीवन में ढालने वाले व्यक्ति को साँसारिक सुखों की भी कोई कभी न रहेगी यह सुनिश्चित है।
अब अवगुणों पर प्रकाश डालते हैं। उनसे दूर रहने के लिये ईश्वर निष्ठा की आवश्यकता प्रतिपादित की है—
तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरुलोभ।
मुनि विज्ञान धाम मन करहिं निमिष महुँ क्षोभ॥
लोभ के इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि।
क्रोध के परुष वचन बल मुनिवर कहहिं विचारि॥
क्रोध मनोज लोभ मद माया।
छूटहि सकल राम की दाया॥
अर्थात्—काम, क्रोध और लोभ यह तीन ही दुष्ट विकार हैं यही लोगों के मनों को क्षण भर में विभ्रमित कर देते हैं। वासना से दीनता उत्पन्न होती है, क्रोध के कारण कठोर वचन निकलते हैं। यह सब दुःख और बन्धन रूप हैं। इनसे छुटकारा पाने का उपाय ईश्वर की शरणागति ही है और उनके लिये यह मनुष्य शरीर बन्धन का कारण नहीं होता जो—
षट विकार जित अनघ अकामा।
अचल अकिंचन सुचि सुख धामा॥
अमित बोध अनीह मित-भोगी।
सत्यसार- कवि कोविद जोगी॥
सावधान मानद मद हीना ।
धीर धर्म गति परम प्रवीना ॥
गुनागार संसार दुख रहित विगत संदेह।
तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह॥
साधु पुरुषों के लक्षण वर्णन करते हुये अरण्य काण्ड में तुलसी दास जी ने लिखा है :—
निज गुन श्रवन सुनत सकुचाहीं।
पर गुन सुनत अधिक हरपाहीं॥
सम सीतल नहिं त्यागाहिं नीती।
सरल सुभाउ सबहिं सन प्रीती॥
जप तप व्रत दम संजम नेमा।
गुरु गोविंद विप्र पद प्रेमा॥
श्रद्धा क्षमा मयत्रो दाया।
मुदिता मम पद प्रीति अमाया॥
विरति विवेक विनय विग्याना।
बोध जथारथ वेद पुराना।
दंभ मान मद करर्हि न काऊ।
भूलि न देहि कुमारग पाऊँ॥
उन्हें अपनी प्रशंसा सुनने से हर्ष नहीं होता। दूसरों की प्रशंसा से वे सुखी होते हैं। सरल स्वभाव, सबसे प्रेम और नीति का पालन करते हैं। जप, तप, व्रत, दुर्गुण निवारण संयम-नियम के साथ, गुरुदेव ईश्वर और ब्राह्मणों से प्रेम करते हैं। वे श्रद्धावान, क्षमावान, मित्रवान तथा दयावान् होते हैं। विवेकी, विनम्र वैरागी तथा विज्ञानी होते हैं। स्वाध्याय में उनकी रुचि होती है। उन्हें दंभ पाखंड नहीं आता। वे भूलकर भी कुमार्ग में पाँव नहीं देते।
जीवन शोधन का उपदेश रामायण में अनेक स्थलों पर मिलता है। तुलसी दास की यह शैली भी कम मोहक नहीं है। बड़े ही सरल सुस्पष्ट शब्दों में वे बताते हैं कि किस तरह दुर्गुणों द्वेषों के स्थान पर सद्गुणों का अभ्यास किया जाय। किष्किन्धा काण्ड में ऐसा ही वर्णन है जिसमें लोभ को सन्तोष से, मद मोह को सहृदयता से, ममता को ज्ञान से जीतने की प्रेरणा दी है और दुष्कर्मों के प्रभाव का भी वर्णन करते हैं लिखा है—
उदित अर्गास्त पंथ जल सोखा।
जिमि लोभहिं सोषइ संतोषा॥
सरिता सर निर्मल जल सोहा।
संत हृदय जस गत मद मोहा॥
रस रस सूख सरित सर पानी।
ममता त्याग करहिं जिमि ग्यानी॥
जानि शरद ऋतु खंजन आये।
पाइ समय जिमि सुकृत सुहाये॥
पंक न रेनु सोह असि धरनी।
नीति निपुन नृप कै जसि करनी॥
जल संकोच बिकल भई मीना।
अबुध कुटुम्बी जिमि धन हीना॥
चक्रवाक मन दुख निमि पेखी।
जिमि दुर्जन पर सम्पति देखी॥
भूमि जीव संकुल रहे गये सरद रितु पाइ।
सदगुरु मिलें जाहिं जिमि संसय भ्रम समुदाइ॥
उपमाओं के माध्यम से इस तरह की शिक्षा न केवल पाठक का हृदय मोह लेती है वरन् उससे अन्तःकरण में ध्यान का अभ्युदय होता है। यद्यपि विचार और व्यवहार में न लाने से वह आदर्श चिरस्थाई नहीं रह पाता। पर यदि इन प्रेरणाओं को व्यवहृत होने का अवसर मिले तो मनुष्य-जीवन की समुन्नत शैली का प्रवाह रामायण में ही मिल जाता है, अन्यत्र भटकने की आवश्यकता नहीं होती। अध्यात्म जिन सिद्धान्तों की प्रेरणा देता है ठीक वही रामायण में भी प्रतिपादित हुआ है। जिस तरह अध्यात्म बुराइयों की निन्दा करता और भलाई का समर्थन करता है वैसा ही रामायण में भी कथोपकथनों के माध्यम से वर्णन हुआ है। दुष्कर्म निरत मनुष्य को जीवित ही मृत्युतुल्य बताया है। लंकाकाण्ड में अंगद और रावण के संवाद में आता है :—
कौल काम बस कृपिन बिमूढ़ा।
अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥
सदा रोग बस संतत क्रोधी।
विष्णु विमुख श्रुति संत विरोधी॥
तनु पोषक, निंदक अघ खानी।
जीवन शव सम चौदह प्राणी॥
अर्थात्—दुराचारी, विषयी, कृपण, मूर्ख, दरिद्र, दुष्कर्मी, रोगी, क्रोधी नास्तिक, दुर्जन, निंदक पापी और केवल अपना ही पेट भरने वाले प्राणी जीवित रहते हुये भी मृततुल्य हैं अर्थात् उनसे व्यक्ति , समाज और राष्ट्र का कोई हित नहीं होता। वे केवल भार रूप ही इस संसार में जीते और मर जाते हैं।
इस तरह मनुष्य-जीवन के सर्वांग समन्वय युक्त स्वरूप का वर्णन रामायण में मिलता है। गूढ़ दार्शनिक तत्वों के विश्लेषण के साथ-साथ व्यावहारिक जीवन के आचरणों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। कोई भी क्षेत्र ऐसा नहीं जिसकी व्याख्या रामायण में न हुई हो। स्त्रियों के लिये पग-पग पर उपदेश मिलते हैं। श्रेष्ठ साध्वी नारियों के मुँह से उन्हें गृह-कर्त्तव्य और पातिव्रत धर्म की शिक्षा दी जाती है। उन्हें नारियाँ अपने जीवन में ढालें तो वे घरों का वातावरण स्वर्गीय बना सकती हैं। ऐसा ही एक प्रसंग अत्रि ऋषि के आश्रम का है। महासती अनुसुइया जी ने सीता जी को समझाया—
कह रिषि बधू सरस मृदुबानी।
नारि धर्म कछु ब्याज बखानी॥
मातु पिता भ्राता हितकारी।
हितप्रद सब सुनु राजकुमारी॥
अमित दानि भर्ता वयदेही।
अधम सो नारि जो सेव न तेही॥
उत्तम के अस बस मन माहीं।
सपनेहु आन पुरुष जग नाहीं॥
मध्यम पर पति देखइ कैसे।
भ्राता पिता पुत्र निज जैसे॥
बिनु श्रम नारि परम गति लहई।
पतिव्रत धर्म छाडि छल गहई॥
इस तरह रामायण में मनुष्य और उससे सम्बन्धित कोई भी क्षेत्र नहीं जिसकी समुचित व्याख्या न की गई हो। अन्य ग्रन्थों की ही भाँति वह हिन्दुओं का प्रिय धर्म ग्रन्थ है इसमें किंचित मात्र संदेह नहीं है और उसे हिन्दू समाज में जो स्थान मिला वह उसके व्यक्तित्व के अनुरूप ही है। पर उसका जो लाभ व्यावहारिक जीवन में होना चाहिये वह नहीं दिखाई देता तो निराशा होती है। केवल पाठ और पारायण से वह लाभ नहीं मिलता जो अध्यात्म चाहता है। रामायण यदि आध्यात्मिक जीवन का प्रशिक्षण करने वाला ग्रन्थ है तो उससे मनुष्य के जीवन में प्रकाश भी आना चाहिये। यह संभव भी है किन्तु तभी जब कि उसे व्यवहार में उतरने का अवसर मिले। रामायण की शिक्षा है कि ऐ मनुष्य! तू राम बनने का प्रयत्न कर। राम के आदर्शों को जीवन में ढालने का प्रयत्न कर। ऐसा कर सका तो सुखपूर्वक उस स्थिति को प्राप्त कर लेगा जिसके लिये नर-तनु धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है।
हमारा देश इन दिनों जितना अधिक अन्न संकट से पीड़ित है उतनी गम्भीर और कोई दूसरी समस्या नहीं है। प्रति वर्ष 70 लाख टन से भी अधिक खाद्यान्न विदेशों से मँगाना पड़ता है फिर भी राशन व्यवस्था भली प्रकार से पूरी नहीं हो पाती। यदि किसी कारणवश यह विदेशी आयात बन्द हो जाय तो हजारों लोगों के भूख से मरने की नौबत आ सकती है। राष्ट्र के इस अन्न-संकट काल में अन्न की बरबादी को एक महान् नैतिक-अपराध तथा देशद्रोह ही कहा जा सकता है। अन्न की उपज बढ़े, विदेशों से क्रय किया जा कर देश-वासियों को उदर पोषण की सुविधायें मिलें यह तो अच्छी बात है किन्तु इस अन्न-संकट के जमाने में अन्न का अनावश्यक खर्च और बेतुकी बरबादी भली नहीं कही जा सकती है। उससे व्यक्ति समाज और राष्ट्र सभी का अहित हो जाता है।
एक ओर अनेकों को पेट भरना मुश्किल हो रहा है दूसरी ओर अधिकांश बच्चों को जिगर, तिल्ली, अपच की बीमारियाँ घेरे हुये हैं। इन बीमारियों का मूल कारण है अति भोजन। पेट की आवश्यकता से अधिक आहार देकर भोजन तो बरबाद करते ही हैं रोगों को अलग से निमंत्रण देते रहते हैं। एक ओर अन्न की बर्बादी, दूसरी ओर औषधियों की माँग और आर्थिक असंतुलन-सभी मिलकर सामाजिक विकास के मार्ग में आड़े खड़े हो जाते हैं। छोटे बच्चों को कम आहार दिया जाय, अधिकाँश दूध मट्ठा जैसे पेय पदार्थ दिये जायँ तो इससे उनकी खेलने की शक्ति बनी रहती है, फलस्वरूप शारीरिक अवयवों का विकास और रक्त में तेजस्विता की तेजी से वृद्धि होती है। बच्चे खूब स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं। अभिभावक भी निश्चिन्त और अपने कार्यों में भली प्रकार लगे रहते हैं। अन्न-बर्बादी का एक स्रोत है बालकों का अति भोजन। इसे दूर करें तो उसके साथ अनेकों दूसरी समस्यायें भी दूर होती हैं। बालकों को परिमित भोजन देने की आदत डाल दी जाये तो अनेक रोगों से बचेंगे और खाद्यान्न की बचत होगी।
यह बुराई बालकों में ही हो सो बात नहीं । उनकी आहार की मात्रा की दृष्टि से यह अपव्यय तो बहुत ही कम समझा जाता है। पर अधिक उम्र के लोगों में भी कुछ ऐसी गलत धारणायें होती है कि जो अधिक खाता है वह अधिक स्वस्थ रहता, थाली में भोजन छोड़ना भी बड़े होने का लक्षण मानते हैं। एक कमजोरी यह भी है कि थाली में एक बार में अनेक स्वादों के अनेक भोजन सजाते हैं। इससे भी अति भोजन और अन्न की बरबादी ही होती हैं। यह मानना गलत है कि अति-भोजन से स्वास्थ्य अच्छा रहता है। मनुस्मृति में इस सम्बन्ध में लिखा गया है—
अनारोग्य-मनायुष्यमर्स्वगं चाति भोजनम् ।
अपुण्यं लोक विद्विष्टम् तस्मात्तत् परिवर्जयेत्॥
अर्थात्—अति भोजन स्वास्थ्य के विनाश का कारण, आयु नाश करने वाला, स्वर्ग का विरोधी, पुण्य नष्ट करने वाला तथा अपयश प्रदान करता है। अतः उससे दूर रहें और मितभोजी बनें।
स्वल्पाहारी व्यक्ति सदैव ही निरोग रहते हैं उनकी आयु लम्बी होती है, संयम सध जाता है, शारीरिक व मानसिक शक्तियाँ प्रदीप्त होती हैं और साँसारिक सुख प्राप्त होते हैं। पर अति-भोजन से अपच, अजीर्ण, बद्ध-कोष्ठ रक्त विकार आदि बीमारियाँ ही पैदा होती हैं। उपवास का प्रयोजन अति भोजन से उत्पन्न पाचन संस्थान की थकावट को दूर कर उसे कार्य सक्षम बनाना होता है अतएव यह नहीं कहा जा सकता कि अति-भोजन स्वास्थ्य और बल प्रदान करता है वरन् इसके विपरीत जो कम खाते हैं उन्हें ही आयुर्बल, उत्तम स्वास्थ्य आदि की प्राप्ति होती है।
अति भोजन अन्न की बरबादी के अतिरिक्त और कुछ नहीं। अतः यह सभी का राष्ट्रीय उत्तरदायित्व भी है कि वे आहार में आवश्यकता से कुछ कम मात्रा ही लिया करें और सप्ताह में कम से कम एक प्रहर का आँशिक उपवास भी किया करें।
थाली में जूठन छोड़ने की आदत भी अत्यन्त निकृष्ट होती है। इसका कारण भी अति-भोजन की प्रवृत्ति, प्रियता या परोसने वालों की असावधानी ही कही जायगी। इसमें एक अंश दोष स्त्रियों का भी है कि वे आवश्यकता से अधिक भोजन तैयार कर लेती हैं फिर उसका अधिकाँश भाग जूठन में बर्बाद होता है या उसे कई दिन तक खाया जाता है। देहातों में तो यह रीति चल पड़ी है कि प्रातः काल चारपाई से सोकर उठते ही बच्चों को पहले दिन की बासी रोटियाँ दे दी जाती हैं। यह सारा कुछ बर्बादी का ही लक्षण है। इसमें एक ओर तो बहुत-सा भोजन कटोरियों और नापदानों में बह जाता है दूसरी ओर उदर में विकार बन कर फूटता और स्वास्थ्य की समस्या जटिल बना डालता है।
चाहिये यह कि थाली में कम भोजन परोसा जाय और यदि परोस दिया जाय उसे छोड़ा न जाय। बाद में यदि थोड़ी-सी भूख शेष रह जाती है तो पेट का उतना हिस्सा खाली रखना कोई बुरी बात नहीं है, उससे किसी का शरीर कमजोर नहीं होगा। अधिक भूख लगे तो थोड़ा-थोड़ा भोजन दो के बजाय तीन बार किया जा सकता है किन्तु एक बार में ही आवश्यकता से अधिक भोजन थाली में परोस लेना, फिर उसे जूठन के रूप में छोड़ना या अधिक उदरस्थ कर जाना यह सभी आदतें हानिकारक हैं। मनुष्य को दिन में दो बार भोजन करना चाहिये और वह भी जितना हल्का और सुपाच्य रहे उतना ही अच्छा।
पार्टियों, सहभोजों, विवाह-बारातों, ब्रह्म भोजों में तो अन्न की और भी दुर्दशा देखने को मिलती है। भारतवर्ष में गोत्र और वंश के नाम पर चलने वाले भोजों में इतने अधिक आदमी इकट्ठा हो जाते हैं कि बेचारे मेजबान की सारी कोठियाँ ही खाली कर जाते हैं। भोज करने वाले इसे अपनी शान, और पुण्य वृद्धि का साधन मानते हैं कि इस तरह बाद में उन्हें कितना पारिवारिक संकट उठाना पड़ता है यह किसी से छुपा नहीं। घर वाले भूखों मरें, बालकों का विकास रुकें , कर्ज बढ़े आदि अनेकों परेशानियाँ उठती हैं।
बड़े-बड़े भोजों में अन्न की बरबादी एक अक्षम्य अपराध है। किसी भोज में यदि 100 व्यक्ति भी सम्मिलित हों और प्रति व्यक्ति औसत एक छटाँक अपव्यय माना जाय तो 100 छटाँक अर्थात् सवा छह सेर अन्न की बरबादी हुई। 46 करोड़ की आबादी वाले देश में यदि ऐसे 10 हजार पार्टियाँ और उत्सव प्रति वर्ष के हिसाब से रखे जायँ तो 62500 सेर अर्थात् 1562 मन 20 सेर अन्न केवल जूठन में चला गया। यह अनुमान कम से कम है फिर एक साथ इतने व्यक्ति बैठकर खायें और उनका औसत आधा सेर प्रति व्यक्ति की खुराक रखी जाय तो अन्न की बर्बादी हजारों टन तक पहुँचेगी। यह बर्बादी विदेशों से मँगाये जा रहे खाद्यान्न से किसी भी तरह कम न होगी। हमारे ऊपर लादने वाला विदेशी कर्जे का बोझ हमारी अज्ञानता के कारण ही है अन्यथा अपने देश में अन्न की पैदावार खपत से कम होती हो यह नहीं कहा जा सकता है। यदि उचित रीति से खर्च किया जाय तो यहाँ की खाद्यान्न की पूर्ति की समस्या यहीं हल हो सकती है और इससे विदेशों से मँगाने की परेशानी और खर्च की भी बचत हो सकती है।
इस अति भोजन और अनुशासित “जेवनार” पद्धति का आर्थिक दृष्टि से विचार करना बहुत जरूरी है। इससे हमारा अधिक पैसा बर्बाद होता है। इस बात को लोग समझें और इस अपव्यय को रोकें तो हमारा काफी धन बचे और राष्ट्रीय संपत्ति का अपव्यय रुके। दवाओं आदि पर जो खर्चे का अनावश्यक दबाव पड़ता है वह भी न पड़े और हमारे रहन-सहन का स्तर भी ऊँचा हो।
अति भोजन, जूठन, भोज अथवा अविवेकपूर्ण दान किसी भी तरह अन्न की बर्बादी हो तो इसे एक घोर अनैतिक अपराध ही कहेंगे। यह मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन में भी कठिनाइयाँ पैदा करता है और उससे राष्ट्रीय आर्थिक-व्यवस्था में भी दबाव पड़ता है ऐसी स्थिति में इसे रोकना भी एक धर्मकृत्य बन गया है। हम इस राष्ट्रीय समस्या को हल कर सकें तो शेष समस्यायें अपने आप ही हल हो जायेंगी।
युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति
हमारी वास्तविकता को परखने फिर आ पहुँचा
‘युग-निर्माण योजना’ की जन्म तिथि गुरु पूर्णिमा है। इसी दिन इस युग के इस महान अभियान का शुभारम्भ उस परम प्रेरक दिव्य शक्ति के द्वारा किया गया था। बसन्त पंचमी के दिन अखण्ड-ज्योति प्रारम्भ हुई और गुरु पूर्णिमा के दिन ‘युग-निर्माण योजना’। अपने परिवार के लिए ये दो कौटुम्बिक पर्व हैं। यों इनका व्यापक महत्व है। भारतीय संस्कृति की सुविस्तृत प्रक्रिया इन दो के ऊपर निर्भर है। ज्ञान और कर्म के यह दो पुनीत पर्व हैं। माता सरस्वती का जन्म दिन हमारा ज्ञान पर्व है और उस ज्ञान को कर्म रूप में परिणित करने की प्रेरणा देने वाले परम गुरु भगवान व्यास का जन्म दिन-गुरु पूर्णिमा-कर्म पर्व है। ज्ञान और कर्म का मानव जीवन में असाधारण महत्व है। प्रतीक रूप से वही महत्व इन दो पर्वों का भी है। यों हमारे सभी पर्व एक से एक बढ़कर हैं पर जहाँ तक अपने परिवार की गतिविधियों का संबंध है इन दो को हम विशेष महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि अपनी गतिविधियों की प्रेरणा इन दो से ही हम विशेष रूप से प्राप्त किया करते हैं।
सरकारी विकास-योजनाओं का अपना महत्व है। ‘युग-निर्माण योजना’ का संचालन भले ही छोटे समझे जाने वाले और अर्थ साधनों से विहीन लोगों द्वारा किया जा रहा हो, पर उसका भी अपना महत्व है। भौतिक समृद्धि की अपेक्षा मानवीय उत्कृष्टता कहीं अधिक मूल्यवान है। उसकी अभिवृद्धि अगणित समृद्धियों को जन्म देती है। इसलिए जब कभी कार्य पद्धतियों का विश्लेषण एवं मूल्याँकन किया जायगा, युग-निर्माण योजना को अपने समय की एक अनुपम घटना ठहराया जायगा। इतनी विशालकाय संभावनाओं से परिपूर्ण प्रक्रिया को आरम्भ कर सकने के साहस का श्रेय अखण्ड-ज्योति परिवार को मिलता है। उसका हर सदस्य गर्वोन्नत मस्तक से यह कह सकेगा कि अपने युग की चुनौती और जिम्मेदारी को उसने समझा और स्वीकार किया। राष्ट्र की पुकार का समुचित प्रत्युत्तर देने का आत्म संतोष उसे मिलता ही है। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए जो अनुपम प्रयत्न किया गया है, उस महान यज्ञ का होता—अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य—अपनी जीवन साधना को सार्थक समझे तो यह उचित ही होगा। भले ही छोटे दिखाई पड़ें पर हमारे प्रयत्न निस्संदेह महान हैं।
पिछले हजार वर्ष तक राष्ट्र को अज्ञानांधकार में भटकना पड़ा है। उन दिनों हमने बहुत कुछ खोया है। अनेकों दोष दुर्गुण उन्हीं दिनों हमारे पीछे लग गये हैं। अब समय आ गया है कि उनका प्रतिकार और परिष्कार करें। दुर्बलताओं को भगावें और समर्थ प्रबुद्ध व्यक्तियों जैसी गतिविधियाँ अपनावें। भारतीय राष्ट्र को यही गतिविधियाँ अपनानी पड़ेंगी। इसके बिना उसे न तो वर्तमान विपन्नताओं से त्राण मिलेगा और न उज्ज्वल भविष्य की ज्योतिर्मय आभा ही दृष्टिगोचर होगी। जीवन-मरण की समस्या सामने हैं। यदि हम पुनरुत्थान के लिए, नव-निर्माण के लिए प्रयत्न नहीं करते तो प्रगति के पथ पर बढ़ रहे संसार की घुड़दौड़ में इतने पिछड़ जायेंगे कि दूसरों के समकक्ष पहुँच सकना कभी भी संभव न रहेगा।
जो जितना प्रबुद्ध है उसकी उतनी ही अधिक जिम्मेदारी है। ईश्वर, आत्मा और समाज के सामने उनके उत्तरदायित्व बहुत कुछ बढ़े-चढ़े होते हैं। मूढ़ता और पशुता की स्थिति में पड़े हुए मनुष्यों की न कोई भर्त्सना है और न महिमा। वे जीते भर हैं। खाने और कमाने भर तक उनकी गतिविधियाँ सीमित रहती हैं। ऐसे लोग कुछ बड़ी बात सोच नहीं पाते, इसलिए कुछ बड़ा काम कर सकना भी उनके लिए संभव नहीं होता। संसार उनकी इस विवशता को जानता है इसलिए उन्हें कुछ श्रेय, दोष भी नहीं देता। पर जिन्हें भगवान ने विचारणा दी है, उनकी स्थिति भिन्न है। प्रबुद्ध लोग यदि अपने समय की समस्याओं की उपेक्षा करने लगें तो उनका अपराध अक्षम्य माना जायगा। फौजी अधिकारियों की छोटी-सी भूल राष्ट्रीय स्वाधीनता को खतरे में डाल सकती है। इसलिए उनसे अधिक सतर्कता एवं जिम्मेदारी की आशा की जाती है। यदि वह थोड़ा भी प्रमाद करता है तो उसे सहन नहीं किया जा सकता। सरकारी अन्य विभागों के कर्मचारी ढील-पोल बरतने पर चेतावनी या नगण्य-सा अर्थ दंड पाकर छुटकारा पा जाते हैं पर फौजी अफसर का तो ‘कोर्ट मार्शल’ ही होता है। उसे अपनी छोटी-सी लापरवाही के लिए मृत्यु दंड भुगतना पड़ता है।
सौभाग्य या दुर्भाग्य से ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों को ऐसी ही उत्तरदायित्वपूर्ण परिस्थिति प्राप्त हुई हैं। भगवान ने उन्हें प्रबुद्धता की चेतना दी है। साथ ही कुछ जिम्मेदारी भी सौंपी है। उनके लिए लापरवाही बरतने का अवसर नहीं। बेशक सामाजिक नागरिकों की तरह हम लोगों को भी पारिवारिक जिम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं। यह अर्थ उपार्जन आदि का प्रबन्ध करना पड़ता है। पर इसका यह अर्थ किसी प्रकार भी नहीं होता कि नव-निर्माण के कार्यों में भाग लेने के लिए उसे तनिक भी अवकाश नहीं मिलता। इस बहानेबाजी को कोई स्वीकार नहीं कर सकता। संसार के प्रायः सभी महापुरुष गृहस्थ थे और उन्हें पारिवारिक व्यवस्था जुटाने का भी ध्यान रखना पड़ता था। पर उनमें से किसी ने यह बहाना नहीं बनाया कि राष्ट्रीय कर्तव्यों की पूर्ति के लिए हमारे पास तनिक भी अवकाश नहीं। इस प्रकार की झूठी धोखेबाजी से केवल अपनी अन्तरात्मा को झुठलाया जा सकता है और किसी को नहीं। जिसकी आत्मा में थोड़ी भी समाज निष्ठा एवं कर्तव्य-निष्ठा होगी वह बुरी से बुरी परिस्थितियों में रहते हुए भी विश्व मानव की किसी न किसी प्रकार सेवा कर ही सकेगा। जहाँ इच्छा हो वहाँ रास्ता निकलता ही है। जिस ओर सच्ची आन्तरिक श्रद्धा होगी उस ओर चलने का भी कुछ न कुछ प्रबन्ध बन जाना निश्चित है।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य उस कसौटी पर खोटे नहीं खरे उतरते रहे हैं। हम सभी गृहस्थ हैं और व्यस्तता के बीच भी अवकाश निकालकर इतना कुछ करते रहे हैं कि सारा राष्ट्र आश्चर्यचकित है। यदि फुरसत वाले साधु सन्त हम लोग होते तो शायद इतना भी न कर पाते जितना अब करते हैं। तब संभवतः संसार को माया मिथ्या बताकर आलस्य और अवसाद में पड़े रहने को ही मन करता। प्रश्न परिस्थितियों का नहीं भावना का है। युग के उत्तरदायित्वों के समझने की-अनुभव करने की— चेतना जिनके अन्तःकरण में जागृत हो चुकी है, उन्हें न समय का अभाव रहता है, न कठिनाइयों का रोना, रोना पड़ता है। आकाँक्षा अपना रास्ता बनाती है। यह तथ्य कितना सत्य है, इसका अनुभव हम सब इन दिनों भली प्रकार करते रहते हैं। वर्तमान काल की आर्थिक तंगी तथा पारिवारिक जीवन की उलझनों से जूझते हुए भी नव-निर्माण के लिए कितना अधिक कर लेते हैं। इस प्रयोग ने उन लोगों का मुँह बन्द ही कर दिया है जो सामयिक उत्तरदायित्वों के प्रति निष्ठावान न होने के कारण उत्पन्न हुई अकर्मण्यता को फुरसत न मिलने, अमुक कठिनाई रहने जैसे बहानों की चादर उठाने की उपहासास्पद चेष्टा करते रहते हैं।
राजनैतिक स्वाधीनता के लिए आत्माहुति देने वाले पिछली पीढ़ी के शहीद अपनी जलाई हुई मशाल हमारे हाथों में थमा कर गये हैं। जिनने अपने प्राण, परिवार, शरीर, धन आदि का मोह छोड़कर भारत माता को पराधीनता पाश से मुक्त करने के लिए अपना सर्वस्व निछावर कर दिया, उनकी आत्माएं भारतीय राष्ट्र के उज्ज्वल भविष्य की आशा लेकर इस संसार से विदा हुई हैं। उन्हें विश्वास था कि अगली पीढ़ी हमारे छोड़े हुए काम को पूरा करेगी। नैतिक क्रान्ति ,बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति की अभी तीन मंजिलें पार करनी हैं। राजनैतिक क्रान्ति की अभी एक ही मंजिल तो पार हुई है। तीन चौथाई काम करना बाकी पड़ा है। यदि वैयक्तिक स्वार्थपरता तक सीमित रह कर हम उन सार्वजनिक उत्तरदायित्वों को उठाने से इनकार करेंगे, बहाने बनायेंगे तो निश्चय ही यह उन स्वर्गीय शहीदों के प्रति विश्वासघात होगा। इतिहास हमारे इस ओछेपन को सहन न करेंगे। भावी पीढ़ियाँ इस अकर्मण्यता को घृणा भरी दृष्टि से देखती रहेंगी।
मानव जीवन का गौरव समझने वाला कोई भावनाशील व्यक्ति अपने को इस घृणित परिस्थिति में रखना पसंद न करेगा—अखण्ड-ज्योति परिवार का कोई सदस्य तो निश्चित रूप में नहीं । हम लोग जिस भी परिस्थिति में है देश, धर्म, समाज और संस्कृति के पुनरुत्थान अभियान में भाग लेते हुए बहुत कुछ करते रहे हैं, आगे बढ़ती हुई जिम्मेदारियों के अनुरूप और भी अधिक करेंगे। त्रिविध क्रान्तियों को सम्पन्न करने की तीन अग्नि परीक्षाओं में होकर जब गुजरना ही ठहरा तो झंझट किस बात का, जो करना हो उसे करेंगे ही।
आगामी गुरुपूर्णिमा (13 जुलाई 1965) हमसे कुछ अधिक खरी और अधिक स्पष्ट बात करने आ रही है। अब तक लड़खड़ाते हुए चलने की बात निभती रही, पर अब तो सीना तान कर ही चलना पड़ेगा। अब ‘यदा कदा’ के स्थान पर निश्चितता और नियमित की नीति बदलनी पड़ेगी। जिस प्रकार शरीर को नित्य ही नहाते, खिलाते, सुलाते हैं, जिस प्रकार परिवार की दैनिक जिम्मेदारियों को नियमित रूप से वहन करते हैं उसी प्रकार हमें नव निर्माण के उत्तरदायित्व भी एक प्रकार से दैनिक नित्य कर्मों में सम्मिलित करने पड़ेंगे और जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता बनाना पड़ेगा। अपने दृष्टिकोण में जब तक यह परिवर्तन न हो तब तक युग-परिवर्तन अभिमान के एक उत्तरदायी सदस्य के ऊपर आने वाली जिम्मेदारियों को हम समुचित रूप से पूरा कर ही न सकेंगे।
गुरुपूर्णिमा पर्व अखण्ड-ज्योति का हर सदस्य सदा से मनाता आया है। सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, गुरु पूजन, सत्संकल्प पाठ, दीप दान आदि औपचारिक कर्म काण्ड प्रायः सभी शाखाओं में आयोजित किये जाते हैं। जहाँ शाखाएं नहीं हैं वहाँ वह कार्यक्रम वैयक्तिक रूप से किया जाता है। इस पर्व पर श्रद्धाञ्जलि के रूप में गुरुदक्षिणा देने की भी प्रथा है। मातृऋण, पितृ ऋण की तरह गुरु ऋण भी रहता है और उसे अपने धर्म एवं अपनी संस्कृति के प्रति आस्था रखने वाले किसी न किसी रूप में चुकाकर अपने को आँशिक रूप से उऋण बनाने का प्रयत्न किया करते हैं। स्वर्गीय पितरों के वार्षिक श्राद्ध की तरह गुरुदक्षिणा भी गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देनी ही पड़ती है। नहीं तो एक धार्मिक ऋण हमारे ऊपर चढ़ा ही रह जाता है।
गत वर्षों में अपनी-अपनी श्रद्धा और स्थिति के अनुरूप अखण्ड-ज्योति के सदस्य जिस प्रकार भी इस पुनीत पर्व पर जो भी श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते रहे हों, वह बात अलग है। पर इस वर्ष तो हम सभी को एक ही प्रकार अपनाना है। वह है नव-निर्माण के लिए ‘यदा कदा’ कुछ कर देने की ढील-पोल छोड़कर निश्चित और नियमित रूप से कुछ न कुछ करते रहने का व्रत लेना। शरीर में कई अंग होते हैं उन सबको रक्त देना पड़ता है, परिवार में कई सदस्य होते हैं उन सब का भरण पोषण करना होता है, दैनिक क्रम में अनेकों समस्याएं रहती हैं, उन सब को सुलझाना पड़ता है। इन्हीं दैनिक आवश्यकताओं में एक नव निर्माण के राष्ट्रीय कर्तव्यों की आवश्यकता को भी जोड़ लेना चाहिये। उसे दैनिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता का स्थान देना चाहिये। यदि इतना किया जा सका तो यह ठोस गुरु पूर्णिमा होगी। यह व्रत लिया जा सका तो गुरु ऋण, राष्ट्रीय ऋण, समाज ऋण, धर्म ऋण सभी से उऋण होने का अवसर मिलेगा।
हमारी माँग यह है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य “एक घंटा समय तथा एक आना नित्य” नव निर्माण योजना के धर्म कर्तव्यों को पूरा करने के लिए दान किया करें। दान, भारतीय धर्म का अंग है। दान से विमुख कृपण की सद्गति नहीं होती। कुपात्रों को विडम्बनाओं को दान तो हम बहुत दिन से देते आ रहे हैं पर अब आदर्श एवं कर्त्तव्य के लिये अपनी परमार्थ बुद्धि को प्रयुक्त करना पड़ेगा। देखा-देखी के निरर्थक आडम्बरों में हम न जाने कितना धन और समय लगाते रहते हैं, पर तात्विक सत् प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकना विवेकवानों के लिये ही संभव होता है। नामवरी और स्वर्ग-सिद्धि के लिये तो लोभी दुनिया न जाने क्या-क्या लुटाती रहती है पर जिससे मानवता का मुख उज्ज्वल हो सके ऐसे तात्विक परमार्थ को अपना सकना केवल विवेकशील, जागृत आस्थाओं का ही काम है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को इस श्रेणी में गिना जा सकता है इसलिये इन से इस प्रकार की याचना एवं आशा करना भी हमारे लिये उचित ही है।
एक घंटा समय किस कार्य में लगाया जाय? इसका उत्तर यही है- ‘जन जागृति में’-विचार क्रान्ति का अलख जगाने में। बौद्धिक कुण्ठा ही राष्ट्रीय अवसाद का एकमात्र कारण है। भावनाएं जग पड़े तो सब ओर जागृति ही जागृति होगी। सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश दृष्टिगोचर होगा। अन्तःकरण न जगे तो बाहरी हलचलें कुछ ही दिन चमक कर बुझ जाती हैं। जो भीतर से प्रकाशवान है वह आँधी तूफान में भी ज्योतिर्मय बना रहता है, इसलिये हमें दीपक से दीपक जलाने की धर्म परम्परा प्रचलित करने के लिये अपने समय दान का सदुपयोग करना चाहिये। अपने मित्रों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों, परिचित-अपरिचितों के नामों में से छाँटकर एक लिस्ट ऐसे लोगों की बनानी चाहिये जिनमें विचारशीलता एवं सद्भावना के बीजाँकुर पहले से ही किसी अंश में मौजूद हैं। उन लोगों से संपर्क बनाकर उन तक नव निर्माण की प्रौढ़ विचारधारा पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिये। इस अभिनव ज्ञान दान द्वारा हम उन स्वजनों की सच्ची सेवा करते हैं। भाव जागृति द्वारा किसी व्यक्ति में उत्कृष्टता उत्पन्न कर देना ऐसा परोपकार है जिससे बढ़कर और कुछ अनुदान दिया ही नहीं जा सकता। राष्ट्र की तीन आवश्यकताएं नैतिक, क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति का सूत्रपात यहीं से होता है। भाव जागृति के बिना मानव जाति की कुण्ठाओं और विकृतियों को और किसी प्रकार दूर नहीं किया जा सकता।
लिस्ट में अंकित व्यक्ति प्रथम बार में भी कम से कम दस तो होने ही चाहिये। उनके पास जाने एवं संपर्क बनाने की पहल अपने को ही करनी चाहिये। मीटिंग में जिन्हें बुलाया जाता है, उन आने वालों का अपने ऊपर अहसान होता है और जिनके घर हम स्वयं जाते हैं वे हमारी सद्भावना से प्रभावित होते हैं। इस मनोवैज्ञानिक तथ्य को हमें समझ ही लेना चाहिये। इसलिये जिन्हें प्रेरणा देनी हो, उनके पास स्वयं जाने का क्रम बनाना ही होगा। मीटिंग में इकट्ठे करने से यह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। धर्म फेरी का पुण्य हमें ही लेना चाहिये। जन-जागरण के लिए लोगों से संपर्क बनाने एवं उनके घरों पर जाने का क्रम हमें ही बनाना चाहिये।
जिनके घर जाया जाय उनसे कुशल क्षेम पूछने के साधारण शिष्टाचार के उपरान्त अभीष्ट उद्देश्य के लिये आवश्यक प्रेरणा देनी आरंभ कर देनी चाहिये। जो पढ़े-लिखे हैं उन्हें अपनी अखण्ड-ज्योति व युग निर्माण योजना के पिछले अंक पढ़ने को देना चाहिये। जो पढ़े नहीं हैं उन्हें प्रेरणाप्रद लेख, समाचार एवं प्रसंग सुनाने चाहिये। अवसर हो तो उन विषयों पर चर्चा भी आरंभ करनी चाहिये। पुरानी अखण्ड-ज्योति की प्रतियाँ युग निर्माण योजना के अंक सभी के पास होंगे, उनके ऊपर अच्छे मोटे कवर चढ़ा चिपका लेने चाहिये ताकि अनेक लोगों में पढ़े जाने पर वे खराब न हों। आदर्शवादी विचार आमतौर से रूखे और नीरस माने जाते हैं। उन्हें पढ़ना, सुनना बहुत कम लोग पसंद करते हैं। यह काम अपना है कि विषय की महानता एवं गरिमा को आकर्षक तथा प्रभावशाली ढंग से समझा कर लोगों में यह अभिरुचि उत्पन्न करें। व्यापक दृष्टिकोण को समझने और विचारने की आकांक्षा जब जागृत हो जाय तब समझना चाहिये कि यह व्यक्ति राष्ट्र के लिये कुछ उपयोगी सिद्ध हो सकने की स्थिति में पहुँचा। इतनी सफलता मिल जाने पर आगे की प्रगति बहुत सरल हो जाती है। जिसके मनोभाव सोये पड़े हैं उसमें विचारशीलता की अभिरुचि जागृत कर देना हमारे लिये भारी गौरव, गर्व एवं संतोष की बात होगी।
त्रिविध क्रान्ति की आवश्यकता पूर्ण कर सकने लायक प्रौढ़ विचारधारा से सम्पन्न एक ट्रैक्ट माला इन्हीं दिनों हमने लिखनी और छापनी आरंभ की है। मोटे ग्लेज कागज के 24 पृष्ठ, मोनो पतले नये टाइप में छपाई, रंगीन कार्ड-बोर्ड के मोटे कवर, तार की पूरी खुलने वाली सिलाई आदि विशेषताओं के कारण यह ट्रैक्ट देखने में बड़े सुन्दर एवं आकर्षक बन पड़े हैं। देखते ही पढ़ने को मन होता है। फिर उनमें भीतर लिखी सामग्री के बारे में तो कहना ही क्या है। अपनी अन्तरात्मा की सारी आग उड़ेल कर इन पत्रों में भर रहे हैं। आशा यह की जानी चाहिये कि इन्हें पढ़ेगा, तिलमिलाये बिना न रहेगा। युग परिवर्तन के लिए जिस प्रेरणा, स्फूर्ति, तर्क एवं तथ्यों की आवश्यकता है, यथासंभव वह सब कुछ इनमें भरा जा रहा है। यह अंक पाठकों के हाथों में पहुँचने तक 10 ऐसे ट्रैक्ट छप चुके होंगे। आगे हर महीने 5 नियमित रूप से छपते रहेंगे। अखण्ड-ज्योति में एक विषय पर थोड़ा-थोड़ा करके कई अंकों में लिखा जाता रहता है, पर इन ट्रैक्टों में एक बात ही एक ट्रैक्ट में पूरी तरह लिखे जाने से पाठक को यह पूरी तरह समझ लेना संभव हो जाता है। अतएव इन ट्रैक्टों की अनिवार्य आवश्यकता अनुभव करके उनका प्रकाशन आरम्भ किया गया है।
ट्रैक्ट भारी होने के कारण इन पर पोस्टेज पाँच नया पैसा लग जाता है। इसलिए पोस्टेज समेत उनका मूल्य बीस नये पैसे रखना पड़ा है। मथुरा आकर ले जाने से पोस्टेज बच जाता है और यह ट्रैक्ट पन्द्रह नये पैसे में मिल सकते हैं। बड़ी संख्या में कई सदस्य मिल कर दो-चार सौ इकट्ठे रेलवे पार्सल से मँगालें तो भी डाक खर्च में किफायत हो सकती है। यह विशेष सुविधा की बात विशेष व्यवस्था की बात हुई। साधारणतः पोस्टेज समेत उनका मूल्य प्रायः बीस नया पैसा होने से, हर महीने पाँच ट्रैक्ट छपने से उनका मूल्य एक रुपया होगा। उन्हें हम सभी मंगावें और अपनी संपर्क लिस्ट के पाँच व्यक्तियों को बारी-बारी पढ़ाते रहें तो कुछ समय में उनकी विचारधारा में भारी परिवर्तन दृष्टिगोचर होगा और बदले हुए विचार वाले व्यक्ति के कार्य भी बदलेंगे ही। युग परिवर्तन का आरम्भ इसी छोटी प्रक्रिया से आरम्भ होता है। चिंगारी छोटी ही क्यों न हो समयानुसार प्रबल होकर वही ‘दावानल’ का रूप धारण करती है। हमारा यह छोटा-सा विचार परिवर्तन प्रयास अगले दिनों मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य की भूमिका प्रस्तुत करने वाला- युग परिवर्तन बन कर सामने होगा।
गुरु पूर्णिमा पर्व पर (जो मंगलवार 13 जुलाई सन् 1965 को पड़ेगा) गुरु दक्षिणा में देने के लिए इस वर्ष हमें एक घंटा समय और एक आना प्रतिदिन दान करने का व्रत लेना चाहिए। एक आना (छह नया पैसा) प्रतिदिन देने से एक महीने में 180 नया पैसा होता है। वर्ष भर में लगभग बाईस रुपया। 4) की अखण्ड-ज्योति 3) की युग-निर्माण योजना एवं 12) के 60 ट्रैक्ट इस प्रकार 22) हुआ। यह खर्च भी हमें नव-निर्माण के लिए करना ही चाहिए। यह पैसे बाहर किसी को देने नहीं हैं। वरन् इन्हें अत्यन्त सस्ते लागत से भी कम मूल्य में मिलने वाले सत्साहित्य के रूप में परिणित कर लेना है। यह अमानत अपने ही पास जमा रहती है। भण्डार बढ़ता रहेगा और उसका लाभ अब से लेकर आगामी पचास सौ वर्ष तक अनेक लोग उठाते रहेंगे। विवेक सम्पन्न दान का यह सर्वश्रेष्ठ तरीका है। छोटे बच्चे भी आमतौर से स्कूल जाते समय एक आना जेब खर्च ले जाते हैं। समझना चाहिए कि युग-निर्माण अभियान भी हमारा एक बच्चा है। चाहे तो ऐसा भी मान सकते हैं कि आचार्य जी हमारे एक बच्चे हैं और उन्हें एक आना प्रतिदिन जेब खर्च के लिए दिया जाता है। मन को समझाने के हजार प्रकार हो सकते हैं। भावना यदि विद्यमान हो तो इतना खर्च कर सकना गरीब से गरीब के लिए भी भारी नहीं पड़ता। एक आने का अनाज तो हर घर में चूहे, कीड़े भी खा जाते हैं। इतना तो सभी को सहन करना पड़ता है। भावना जाग पड़े तो इतना छोटा खर्च भी क्या किसी को भारी पड़ेगा।
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रबुद्ध सदस्यों को इस गुरु पूर्णिमा से यह व्रत लेना चाहिये। एक घण्टा समय, एक आना नकद, यह त्याग कुछ इतना बड़ा नहीं है, जिसे लक्ष्य की महानता को देखते हुए, कर सकना हमारे लिए कठिन होना चाहिये। नियमितता में बड़ी शक्ति होती है। महीने में 30 घण्टे यदि जन संपर्क के लिए सुरक्षित रख लिये जायें और प्रतिदिन या साप्ताहिक अवकाश के दिन उन्हें ठीक तरह प्रचार कार्य में लगाया जाय तो इसका चमत्कारी परिणाम कितना महान होता है इसे कोई भी प्रत्यक्ष देख सकता है। दान अनेक प्रकार करने पड़ते हैं पर यह प्रेरक साहित्य संग्रह करने के लिए किया गया साहस विश्व मानव का भाग्य बदलने के लिए कितना उपयोगी सिद्ध होता है इसे कुछ ही दिनों में मूर्तिमान देखा जा सकेगा।
आगे हमें बहुत कुछ करना है। अनैतिकता, मूढ़ता, अन्ध परम्परा, अस्वस्थता, अशिक्षा, दरिद्रता, अकर्मण्यता आदि अगणित विकृतियों से डटकर लोहा लेना है। हमारा देश किसी समय सर्वश्रेष्ठ मानवों का निवास स्थान, समस्त संसार का मार्ग दर्शक, देवलोक के लिये भी स्पर्धा का विषय माना जाता था। पर इन्हीं कुरीतियों, हानिकारक अन्ध परम्पराओं के कारण आज वह निकृष्ट, दीन−हीन स्थिति को प्राप्त हो गया है। यदि हमको इस दुरावस्था से बाहर निकल फिर दुनिया के प्रगतिशील देशों की श्रेणी में अपनी गणना करानी है तो हमको अवश्य ही इन हीन प्रवृत्तियों से छुटकारा पाना चाहिये। उसके लिए अगले दिनों व्यापक योजनाएं बनाई जानी हैं और उन्हें कार्य रूप में परिणित किया जाना है। पर इसके लिए आवश्यक जन-शक्ति तो अपने पास होनी चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति हमारी यह प्रथम प्रक्रिया ही पूर्ण करेगी। एक घण्टा समय, एक आना नकद की माँग को पूरा करने के लिए यदि हम साहस कर सकें तो इस अवसर पर बढ़ा हुआ शौर्य आगे की कठिन मंजिलों को भी पार कर सकने में समर्थ होगा। पर यदि इतना भी न बन पड़ा तो हमारी वाक्शूरता ऊसर में डाले गये बीज की तरह ही नपुंसक सिद्ध होगी।
अब समय कम ही रह गया है। इसलिए आज से ही विचारना आरम्भ कीजिए कि इस पुण्य पर्व के उपलक्ष में उपरोक्त प्रथम आवश्यकता की पूर्ति के लिये ‘एक घण्टा एक आना’ की माँग पूरी करेंगे क्या? यदि कर सके तो उसकी सूचना गुरुपूर्णिमा को श्रद्धाञ्जलि के रूप में समय से पूर्व ही भेज दें ताकि उस दिन उन्हें छाती से लगाकर अपार आनन्द प्राप्त किया जा सके।
आगामी गुरु पूर्णिमा हमारी परीक्षा लेने आ रही है। क्या करना है, क्या करेंगे, इसका निर्णय करने के लिये अभी से सोच विचार आरम्भ कर देना चाहिये।
धर्म प्रचारक शिक्षार्थियों को छात्रवृत्ति
इन दिनों गायत्री तपोभूमि में धर्म प्रचारकों का शिविर चल रहा है। नया बना हुआ गीता प्रशिक्षण भवन शिक्षार्थियों से ठसाठस भरा रहता है। एक महीने में सामान्यतः वह शिक्षा देने का प्रयत्न किया जा रहा है कि यहाँ से निकलने के बाद शिक्षार्थी राष्ट्रीय नव-जागरण का उद्देश्य पूर्ण करने वाली गीता-कथा तथा अन्य धर्मानुष्ठानों के माध्यम से नव-निर्माण की भावनाएं जन-जन में जागृत कर सकें।
एक महीने में बताया सिखाया तो बहुत कुछ जायगा, पर उस प्रशिक्षण का अभ्यास अपने-अपने घर जाकर ही करना होगा। जो लोग प्रस्तुत विषयों का—अभ्यास भी करना चाहें उन्हें इसके लिए कम से कम छह महीने यहाँ ठहरना चाहिए। इतने अधिक विषयों का—जिनमें संगीत भी सम्मिलित है—अभ्यास करने के लिए उसमें निष्णात होने के लिए इतना समय तो चाहिए। धर्म प्रचारक बनने का अभ्यास इतने से कम समय में पूरा नहीं हो सकता।
जिन्हें धर्म प्रचार की लगन है पर आर्थिक कठिनाई के कारण इतने दिन यहाँ रह नहीं सकते। उनके लिए 15) मासिक छात्रवृत्ति की व्यवस्था कर दी जायगी। अपने हाथ से बनाने पर इतने पैसे में गरीबों जैसा भोजन बन सकता है। इस सुविधा से जिन्हें लाभ उठाना हो, अपना आवेदन भेजें और स्वीकृति प्राप्त करने के उपरान्त मथुरा चले आवें।
पाक्षिक पत्रिका का वर्ष पूरा हो गया
गत वर्ष ‘युग-निर्माण योजना’ पाक्षिक का निकलना 7 जुलाई से आरम्भ हुआ था। अब 22 जून के अंक के साथ उसका एक वर्ष पूरा हो जाता है। उसके अधिकाँश ग्राहक प्रथम अंक से ही बने थे। उनका चंदा समाप्त होता है। उन्हें अगले वर्ष के लिए 6) मनीआर्डर से भेज देने चाहिये।
‘युग-निर्माण योजना’ अखण्ड-ज्योति परिवार का एक शानदार एवं ऐतिहासिक कार्य है। उसका मार्ग-दर्शन, एवं प्रचार ठीक तरह होता रहे इसके लिए यह पाक्षिक एक अनिवार्य माध्यम है। इसे भी अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक को पढ़ना चाहिए। जहाँ यह अभी तक न पहुँचती हो वहाँ इस वर्ष उसे अवश्य ही मँगाना आरम्भ कर दिया जाना चाहिए।
गुरुपूर्णिमा (13 जुलाई 1965) के अवसर पर युग-निर्माण योजना को अपना विशेषांक निकालना है। साधारण अंक 20 पृष्ठ का होता है पर वह 48 पृष्ठों का होगा। लगभग ढाई गुना। यों निकालना इसे जुलाई में ही चाहते थे पर हमारे जेष्ठ शिविर तथा समाज सुधार सम्मेलन में व्यस्त रहने के कारण उसे कुछ लेट करना पड़ेगा। 7 अगस्त का अंक विशेषांक निकल सकेगा।
इस अंक को समाज सुधार अंक बनाया जा रहा है। सामाजिक प्रगति पर व्यक्ति की प्रगति निर्भर है। सामाजिक वातावरण यदि अच्छा होगा तो उसमें रहने वाले व्यक्तियों को भी टकसाल में ढलने वाले सिक्कों की तरह वैसा ही ढलते चलना पड़ेगा। बुरी रिवाजों और बुरी परिस्थितियों से भरे हुए समाज में बुराइयों से भरे हुए निकृष्ट व्यक्ति ही उत्पन्न होते हैं। यदि वातावरण बदल दिया जाय तो उसकी छाप बचपन से ही पड़ना शुरू हो जाती है और उन्हीं संस्कारों में परिपोषित होते चलने के कारण मनुष्य का स्तर उन्हीं परम्पराओं के अनुरूप बन जाता है। नर भक्षी जंगली लोगों से लेकर, मल त्याग कर जल शुद्धि न करने वाले भीलों तक, गाड़ियाँ लुहारों से लेकर जुर्म करते जिन्दगी बिताने वाले कंजड़ों तक जो अगणित प्रकार की अव्यवस्थाएं फैली पड़ी हैं उनका मूल कारण उस समाज की प्रचलित परंपराएं ही हैं।
यह ठीक है कि मनस्वी व्यक्ति अपने मनोबल से परिस्थितियों को बदलने और परम्पराओं को ठुकरा कर नया मार्ग बनाने में समर्थ होते हैं पर ऐसे होते बिरले ही हैं। सर्वसाधारण में न तो इतना मनोबल होता है और न विवेक। वे जिस वातावरण में रहते हैं, जो कुछ देखते सुनते हैं, उसे ही सर्वोत्तम मान लेते हैं और उसी का अनुकरण करने लगते हैं। ऐसी दशा में यह नितान्त आवश्यक है कि मनुष्यों में श्रेष्ठता एवं सज्जनता उत्पन्न करने योग्य सामाजिक परिस्थितियाँ उत्पन्न की जायें। जब कभी यह परिस्थितियाँ बिगड़ जाती हैं तब उनका सुधारना आवश्यक होता है। आज वैसी अनिवार्य आवश्यकता सामने आ खड़ी हुई है। जिस समाज में हम रहते हैं उसे पिछले दो हजार वर्षों से अज्ञानांधकार युग में भटकना पड़ा है। फलस्वरूप इतनी विकृतियाँ सामने आई हैं कि उनके कारण समाज का ढर्रा अनुपयुक्त मार्ग पर लुढ़कने लगा है। इसे सुधारा ही जाना चाहिए। पर यह चंद व्यक्तियों को सुधार देने मात्र से संभव न होगा। इसके लिए सारा वातावरण ही बदलना पड़ेगा। समय-समय पर ऐसे परिवर्तन प्राचीनकाल में भी होते रहे हैं। आज भी वैसे ही समाज सुधार के-सामाजिक क्रान्ति के अभियान की आवश्यकता है। युग-निर्माण योजना के माध्यम से यही किया भी जा रहा है।
नैतिक क्रान्ति, बौद्धिक क्रान्ति वैयक्तिक हैं, उनका दृश्य स्वरूप, बाह्य कलेवर, व्यावहारिक प्रयोग सामाजिक क्रान्ति के रूप में ही हो सकता है। उसकी पृष्ठ भूमि में नैतिक एवं बौद्धिक परिवर्तन सन्निहित ही होगा इनके बिना सामाजिक क्रान्ति संभव ही न होगी। अस्तु यह मानना तो होगा कि सामाजिक क्रान्ति के माध्यम से हम नैतिक क्रान्ति एवं बौद्धिक क्रान्ति की आवश्यकता भी पूर्ण करते हैं। वर्तमान युग की यह सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए 17,18,19 जून को परिवार के प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं का सम्मेलन भी बुलाया गया है।
समाज सुधार अभियान में अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को सम्मिलित होना है, इसलिए उसे आन्दोलन की आवश्यकता, उपयोगिता, स्वरूप, कार्यक्रम एवं प्रयोग के बारे में भी समुचित जानकारी प्राप्त कर ही लेनी चाहिए। अतएव युग-निर्माण योजना पाक्षिक का यह विशेषांक निकाला जाना निश्चित किया गया। कहना न होगा कि प्रस्तुतः अंक पाठकों को अभिनव जानकारी देगा और इनके सामने एक प्रेरणाप्रद, प्रकाश एवं ओजस्वी मार्ग दर्शन प्रस्तुत करेगा। कलेवर की दृष्टि से भी बड़े साइज के 48 पृष्ठ बहुत होते हैं। उसमें आवश्यक चित्रों का भी बाहुल्य रहेगा। पाठ्य सामग्री की उत्कृष्टता का अनुमान तो पाठक दो महीने बाद उसे देखकर स्वयं लगा लेंगे, अभी से कुछ कहना व्यर्थ है।
इस अंक में छपने वाली सामग्री पाठकों को ही जुटानी चाहिए। उन्हें अपने क्षेत्र की स्थिति का अध्ययन करना चाहिए और निम्न बातों के उत्तर विस्तारपूर्वक लिखकर भेजने चाहिए। उसी सूचना के आधार पर सुव्यवस्थित लेख तैयार कर लिये जायेंगे।
(1) आपके क्षेत्र में किस-किस जाति में ऐसी क्या-क्या कुरीतियाँ प्रचलित हैं। उनके कारण क्या-क्या हानि होती हैं। इन हानियों के कुछ प्रामाणिक उदाहरण एवं घटनाएं भी लिखे।
(2) विशेषता विवाहों में तथा उससे आगे पीछे बरती जाने वाली कुरीतियों का उल्लेख करें। प्रथाएं हर बिरादरी में अलग-अलग प्रकार की होती हैं, इसलिए उनकी चर्चा भी उसी क्रम से की जानी चाहिये। इन कुरीतियों का शिकार बनकर जिन्हें कष्टकर उत्पीड़न सहने पड़े हों, ऐसी घटनाएं अवश्य लिखी जायें।
(3) इन कुरीतियों को मानने से जिन्होंने इनकार किया हो, और बहती हुई धारा से उलटे चलने का साहस दिखाया हो उनके साहस का विस्तृत विवरण लिखें।
(4) संगठित रूप से समाज सुधार के लिए जो प्रयत्न किये गये हों और उनमें जो सफलता मिली हो उसकी विस्तृत सूचना भेजें।
(5) बहुत दिन पहले आपके क्षेत्र में कौन-कौन-सी ऐसी उत्तम प्रथाएं प्रचलित थीं, जिनके कारण समाज को लाभ होता था। पर अब वे प्रथाएं लुप्त हो गईं।
(6) बहुत दिन पहले ऐसी कौन-कौन बुरी प्रथाएं उस क्षेत्र में प्रचलित थीं, जिनके कारण उन दिनों लोगों को बहुत कष्ट होता था, पर समयानुसार वे कुरीतियाँ अपनी अनुपयोगिता एवं लोक विरोध के कारण अपनी मौत मर गई।
(7) उपरोक्त प्रकार की घटनाओं से सम्बन्धित व्यक्तियों, के घटनाओं के फोटो भी यदि उपलब्ध हो सकें तो वह भी भेजे जायँ।
(8) अगले दिनों आप किन श्रेष्ठ परम्पराओं को समाज में प्रचलित करना पसंद करेंगे जो इन दिनों नहीं हैं। उस प्रचलन से लोगों को क्या लाभ होंगे?
(9) अपने संगठन के सदस्यों ने क्या कोई समाज सुधार संबंधी कार्य किये हैं? यदि किये हों तो उनका उल्लेख कीजिए।
(10) अगले दिनों आप लोग इस दिशा में क्या करने की योजना बना रहे हैं, और उसे किस प्रकार कार्य रूप में परिणित करेंगे।
गायत्री जयन्ती पर्व
भारतीय धर्म का मूल वेद है, और वेदों का बीज गायत्री। इसलिए हिन्दू संस्कृति का उद्गम गायत्री से माना गया है। इस महाशक्ति को हम अपनी आध्यात्मिक जन्मदात्री-ज्ञान गंगा, माता-मानते हैं। उसके अवतरण का पुण्य पर्व गायत्री जयन्ती-जेष्ठ सुदी
10 को आता है। इस वर्ष यह ता॰ 8 जून मंगलवार का है। यही दिन गंगा के अवतरण का भी है। इसलिए उसे गंगा दशहरा भी कहा जाता है।
इस पुण्य पर्व के अवसर पर हमें विशेष रूप से सामूहिक जप, अनुदान, हवन, दीपदान आदि का आयोजन रखना चाहिए। और गायत्री ज्ञान का अधिकाधिक प्रचार करने के लिए जो संभव हो, सो कार्यक्रम इस अवसर पर करना चाहिए।
उपरोक्त दस प्रश्नों में से जिनका उत्तर विचारपूर्वक दिया जा सके उसे लेख रूप में अविलम्ब भेजना चाहिए। जून के अंत तक यह सभी जानकारी मिल जायगी तो उनके आधार पर सम्पादन और छपाई प्रारम्भ की जायगी, तभी तो अगस्त में वह विशेषांक निकल सकेगा। आशा है उपरोक्त प्रकार की जानकारी पाठक अविलम्ब भेजेंगे।ताकि विशेषांक सर्वांग सुन्दर बनाया जा सके।
युग-निर्माण के लिए धर्म मंच से रचनात्मक कार्य करने के लिये निम्न पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है इस माध्यम से जन-जागरण के लिए बहुत कुछ कार्य किया जा सकता है तथा जनता को सही अर्थों में धार्मिक बनाया जा सकता है।
1—गीता-कथा
गीता सप्ताह के आधार पर आयोजित धर्मानुष्ठान में प्रवचन करने योग्य 12 प्रसंग। प्रत्येक में पौराणिक, ऐतिहासिक कथाओं एवं दृष्टान्तों का समावेश है। प्रसंग की पुष्टि के लिए श्लोक, दोहे, रामायण के प्रसंग भी दिये गये है। सजिल्द, 34 पौंड बढ़िया कागज, बड़ा साइज, मूल्य 6) रु॰।
2—गीता पद्यानुवाद
राधेश्याम तर्ज पर गीता के श्लोकों का अनुवाद, मूल श्लोकों सहित। गीता पारायण के रिवाजों के साथ सामूहिक गान के उद्देश्य से इसे बनाया गया है। सजिल्द, 34 पौंड ग्लेज बढ़िया कागज। बड़ा साइज। मूल्य 3) रु॰
3—अभिनव संस्कारपद्धति
सभी संस्कारों के मनाने को सरल सुविधाजनक एवं सर्वोपयोगी पद्धति। प्रत्येक संस्कार के महत्व का वर्णन है। जन्म दिन तथा विवाह दिन मनाने की पद्धति का विधि-विधान भी सम्मिलित है। डडडड संस्कार कराते समय क्या शिक्षा उस व्यक्ति को तथा उपस्थित लोगों को दी जानी चाहिए और उनका व्यक्ति गत जीवन किस प्रकार समुन्नत बनने की प्रेरणा मिलनी चाहिये इसका समुचित उल्लेख है। बढ़िया मोटा ग्लेज कागज। कार्डबोर्ड की जिल्द मूल्य 2॥)रु॰
4—पर्वों की प्रेरणा और पद्धति
प्रमुख त्यौहार पर्वों को सामूहिक रीति से मनाने का सरल विधि विधान। पर्व त्यौहारों में सन्निहित उन सिद्धान्तों की शिक्षाओं तथा प्रेरणाओं का उल्लेख है जिसे उपस्थित लोगों को समझाकर उन्हें सामाजिकता की शिक्षा दी जा सके। समाज निर्माण का धार्मिक मंच से यह एक प्रभावपूर्ण प्रयास है। बढ़िया कागज, कार्डबोर्ड की जिल्द। मूल्य 2॥)
5—सामूहिक गायत्री हवन
सामूहिक गायत्री यज्ञ करने की आदि से अन्त तक सारी विधि व्यवस्था बहुत सरल और सुबोध ढंग से समझाई गई है। इस विधि से साधारण शिक्षा वाला व्यक्ति भी विधिवत् गायत्री यज्ञ भली प्रकार करा सकता है और जनता में अनेकों बुराइयों को छुड़ाने तथा अनेकों अच्छाइयाँ बढ़ाने के प्रेरणा कर सकता है। बढ़िया कागज कार्डबोर्ड की जिल्द। मूल्य 2)
6—सत्यनारायण कथा
प्रचलित सत्यनारायण कथा का मूल उपाख्यान ज्यों का त्यों रखते हुए भी उनके संवादों में साँस्कृतिक धार्मिक एवं बौद्धिक उत्कर्ष की बड़ी ही महत्वपूर्ण विचारधारा का समावेश कर दिया गया है। इसके आधार पर कही हुई कथा को सुनने वालों में जीवन निर्माण का एक नवीन दृष्टिकोण उत्पन्न हो सकता है। मूल्य 75 न॰ पै॰।
दस रुपये से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ ।
पता—अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
है, असीम क्षमता मनुष्य में जो चाहे वह ही बन जाए।
पौरुष जागे पार्थ बने नर, मन का अँधियारा मिट जाए॥
भरी अथक संघर्ष-शक्ति है, सहिष्णुता-विश्वास वहाँ है।
और कहो, सन्तुलित-समन्वित जीवन का आवास कहाँ है॥
धरती के कुल भोग वीर हो, निश्चयतः भोगा करते हैं।
दुर्बल दीन-हीन रोने में, ही जीवन खोया करते हैं॥
नहीं वीर; जो शस्त्र उठा लेता है निःशस्त्रों पर कर में।
वह कायर है जो हथियारों को लखकर घुस जाता घर में॥
बात-बात पर आपस में ही, कट-मरने वालो—ठहरो तो!
मूल्याँकन कुछ करो प्राण का, प्रेम-सरोवर में—लहरो तो!!
निर्मल मानस से निकली, मुसकान शत्रुता से बढ़कर है।
जिसके आगे विश्व पराजित, वश हो जाता जगदीश्वर है॥
निस्सन्देह उजागर, शाश्वत-सत्य सदा अविचल रहता है।
मानव क्यों, विषमय विषयों की, धारा में अविरल बहता है॥
युवकों, अब सारा भारत ही, प्रभु का मन्दिर बना जा रहा।
नये-नये तीर्थों-पर्वों का, नित नूतन उल्लास छा-रहा॥
जाग रहा है कर्म देश में, कण-कण है श्रमगीत गा रहा।
जन-जन में भगवान जग रहे, नव जीवन सुविकास पा रहा॥
लो, कृतित्व उभराया फिर से, प्रज्ञावादी भगे जा रहे।
सार्व-भौम निर्माण कार्य में, भारतवासी लगे जा रहे॥
उठो, बढ़-चलो ज्योति मार्ग-पर, भारत माता है पुकारती।
प्राणों के निर्मल कुसुमों से, एक बार फिर सजे आरती॥
सखे, शौर्य भाव से भर कर, नव शंख-ध्वनि गुँजित कर दो।
मातृ भूमि को रक्त दान दो, पुण्य-धरा अनुरंजित कर दो॥
—आचार्य सर्वे
*समाप्त*