जीवन का हर प्रभात एक सच्चे मित्र की तरह नित्य अभिनव उपहार लेकर आता है। वह चाहता है कि आप वे उपहार ग्रहण करें और उनसे अपने उस शुभ दिन का शृंगार करें। उसकी इच्छा रहती है कि जब दूसरे दिन वह आये तो आपका एक बढ़ा हुआ कदम देखे और उसके दिये हुए उपहारों के ठीक उपयोग के साथ नये उपहार लेने के लिए प्रस्तुत पाये! किन्तु जब आदर-पूर्वक उठकर उत्साह से उसका स्वागत नहीं किया जाता है तो वह निराशा होकर द्वार से लौट जाता है और दूसरे दिन आने में न उसको वह उत्साह रहता है और न उसके उपहारों में वह सौंदर्य! बार-बार निराश होने पर वह आता और अपरिचित राही की तरह द्वार के सामने से निकल जाता है।
ईश्वर मनुष्य को एक साथ इकठ्ठा जीवन न देकर क्षणों के रूप में देता है। एक नया क्षण देने के पूर्व वह पुराना क्षण वापिस ले लेता है। अतएव मिले हुए प्रत्येक क्षण का ठीक-ठीक सदुपयोग करो जिससे तुम्हें नित्य नए क्षण मिलते रहें।
पास ही क्षितिज तट पर तुम्हारा लक्ष्य जगमगा रहा है। किन्तु उसको तुम स्पष्ट नहीं देख पाते, क्योंकि उस पर तुम्हारी कमजोरियों के बादल छाये हुए हैं।
—रवीन्द्रनाथ टैगोर
आज का मनुष्य औरों की अपेक्षा अपने प्रति अधिक भयानक हो गया है। उसने अपने हृदय में द्वेष, द्वन्द्व, छल-कपट, ईर्ष्या और मत्सरता के इतने बीज बो लिए हैं कि उसकी सुगन्धित हृदय-वाटिका विषैली वनस्थली बन गई है। इसका मुख्य कारण है उसकी कामशक्ति।
जो मनुष्य जितनी अधिक कामना रखता है, वह उतना ही अधिक दरिद्र रखता है। उसकी व्यग्रता उतनी बढ़ जाती है और उसका मन विविध तृष्णाओं की और दौड़ता रहता है। मनुष्य की विषय विविधता ही उसको पतन की ओर ले जाती है और पतनोन्मुख मनुष्य से किसी सदाशयता की आशा नहीं की जा सकती। उसका सन्तोष नष्ट हो जाता है और इस प्रकार उसे संसार में सभी प्राणी अपने से अधिक सुखी दिखाई देते हैं, जिससे उसे औरों से ईर्ष्या और अपने से खीझ होने लगती है। वह हर समय हर बात पर असंतुष्ट रहता है, जिससे उसमें क्रोध का बाहुल्य हो जाता है। क्रोध से विवेक नष्ट हो जाता है और विवेक के विनाश से वह सर्वनाश की ओर बड़ी तीव्र गति से अग्रसर हो पड़ता है।
मनुष्य को अपने विनाश रोकने के लिए कामनापूर्ण विषयासक्ति को छोड़ना ही पड़ेगा। मनुष्य की विषय वृत्ति की सन्तुष्टि नहीं हो सकती। इसके विषय में प्रकृति का कुछ ऐसा नियम है कि विषयों को जितना सन्तुष्ट करने का प्रयत्न किया जाता है, वे उतने ही अधिक बढ़ते हैं। अस्तु इनका त्याग ही इनसे पीछा छुड़ाने का एक मात्र उपाय है।
विषय वासनायें हाथ में पकड़ी हुई छड़ी की तरह तो हैं नहीं कि हाथ खोल दीजिए वह स्वतः गिर जायेंगी। यह जन्म-जन्मान्तर का कलुष है, जो मनोदर्पण पर सञ्चित हो कर स्थायी बन जाता है। इसे मल-मल कर ही धोना पड़ेगा। जिस प्रकार मैल को मैल से साफ नहीं कर सकते उसी प्रकार विषयों को वासनात्मकता से नहीं धोया जा सकता। इनको धोने के लिये निर्मल भावनाओं की आवश्यकता होगी।
निर्मल भावनाओं में करुणा की भावना सर्वोत्कृष्ट है। मनुष्य को अपने में अधिक से अधिक करुणा का स्फुरण करना चाहिए। करुणा एक दैवी गुण है, आत्मा का प्रकाश है। इसकी उत्पत्ति होते ही, मनुष्य के सारे मानसिक मल धुल जाते हैं और उसका हृदय-दर्पण अपनी स्वर्गीय छटा से चमक उठता है, जिसमें वह आत्मा रूप परमात्मा का दर्शन कर सकता है।
इस करुणा को प्रस्फुटित करने के लिए मनुष्य को सर्व प्रथम विनम्रतापूर्ण दया दाक्षिण की उपासना करना होगी। संसार का कोई भी धर्म अथवा मत-मतान्तर ऐसा नहीं है, जिसमें विनम्रता, दया, क्षमा, सहानुभूति आदि गुणों को महत्ता न दी गई हो।
करुणा लाने के लिए मनुष्य को करुणा-वरुणालय भगवान का आश्रय लेना होगा। विनम्रता पूर्वक उसकी शरण जाना होगा। प्रेम पूर्वक उसकी सृष्टि को दया से ओत-प्रोत करना होगा। विनम्रता को अपनाना होगा।
यह सारे गुण परमात्मा को आतुर कातरता पूर्वक स्मरण करने से अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। उसे याद करिए, पुकारिये, अपनी याद दिलाइये, उसकी अनुनय-विनय करिये।
साँसारिक व्यक्तियों की अनुनय-विनय करने से जो दैत्य मनुष्य में आता है, वह आत्मा को कलुषित और निर्बल बनाता है, किन्तु इसके विपरीत परमात्मा की अनुनय-विनय करने से जो दैन्य प्राप्त होता है, उससे आत्मा का परिमार्जन होता है, उसमें प्रकाश आता है।
अपने अनुनय-विनय में यदि आप परमात्मा से भौतिक सुख साधनों की याचना करेंगे तो फिर अपने ध्येय मार्ग करुणा की प्राप्ति से विचलित हो जायेंगे। पुनः उन्हीं विषय वासनाओं की ओर उन्मुख हो चलेंगे, जिन्हें छोड़ने के लिए आपने परमात्मा की पुकार प्रारम्भ की है। यदि याचना ही करना है तो केवल अपने ध्येय के विषय की याचना करें, अन्यथा एक मात्र उसकी प्रसन्नता के लिए प्रार्थना करिये। उसकी कृपा कोर से क्या लौकिक क्या पारलौकिक कोई भी ऐसा पदार्थ नहीं है, जिसकी उपलब्धि न हो जावे। किन्तु फिर भी उसकी दी हुई उपलब्धियों में से आप केवल महान् गुण-सम्पत्ति की ओर ही आकर्षित रहिए और उन्हें अधिक से अधिक प्राप्त करने की कोशिश कीजिए।
परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए प्रार्थना सबसे सरल साधन है। एक निश्चित समय पर पवित्र तन-मन से उसे विह्वलता-पूर्वक याद करते हुए कातर वाणी से उसकी प्रार्थना कीजिए। प्रार्थना के शब्द अधिक से अधिक करुणा-जनक, सरल एवं सरल हों, और उनका तात्पर्य तो नितान्त पवित्र निष्काम और उसके उदार नामों से परिपूर्ण हो उनके अर्थों से एक निस्पृह आनन्द का उद्रेक होता है। उसका संगीत सहज गेय और मनोहर हो, प्रार्थनायें की तो गद्य में भी जा सकती हैं, किन्तु भावना की अभिव्यक्ति जितनी सुन्दरता से पद्य में होती है उतनी गद्य में नहीं। आपकी प्रार्थना से हृदय भावों की जितनी तीव्र समाविष्टि होगी, जितनी तन्मयता होगी उतना ही शीघ्र आप उस परम प्रभु की करुणा और कृपा को प्राप्त कर लेंगे।
प्रार्थना अधिक जोर से गाने की आवश्यकता नहीं। उसको एक ऐसे सम स्वर से गाइये जिससे आपके कण्ठ को न तो अधिक श्रम करना पड़े और वह आपको स्वयं भी स्पष्टतया सुनाई भी दे।
प्रार्थना करते समय हर ओर से निश्चित रहिए और समस्त संसार को भुलाकर इतने एकाग्र चित्त से तन्मय होइये कि उस समय आपके लिए एक प्रार्थना के अतिरिक्त और कुछ शेष न रह जाये। प्रार्थना में एकाग्रता मूल मन्त्र है।
आप जितनी विह्वलता से परमात्मा को याद करेंगे उतनी आतुरता से वह आपका स्मरण करेगा। आप ज्यों-ज्यों उसकी ओर आकर्षित होंगे त्यों-त्यों वह आपकी ओर आकर्षित होगा। इस प्रकार दोनों ओर का पारस्परिक आकर्षण बीच के व्यवधान और दूरी को बहुत शीघ्र समाप्त कर देगा। और आप आत्मा में आनन्द के रूप में उसका साक्षात्कार कर सकेंगे।
उपासनाओं में प्रार्थना का बहुत बड़ा महत्व है। संसार को कोई भी ऐसा महात्मा अथवा धर्म-प्रवर्तक नहीं हुआ, जिसने किसी न किसी रूप में परमात्मा की प्रार्थना न की हो। यहाँ तक कि देवतागण भी एक-दूसरे की प्रार्थना करते रहते हैं। विष्णु, महेश की, महेश विष्णु की, ब्रह्मा विष्णु और महेश की तो ब्रह्मा की प्रार्थना विष्णु और महेश किया करते हैं। बिना परमात्मा की प्रार्थना किए कोई भी ध्येय पूरा नहीं हो सकता। महात्मा गाँधी कहा करते थे कि—”प्रार्थना मेरा प्राण है, जीवन है। मैं भोजन छोड़ सकता हूँ, पानी छोड़ सकता हूँ, संसार की सारी चीजें छोड़ सकता हूँ किन्तु प्रार्थना नहीं छोड़ सकता। प्रार्थना करने से मैं अपने अन्दर एक सुख, शान्ति, शक्ति और सम्पूर्णता का अनुभव करता हूँ। जिस दिन प्रार्थना में विलम्ब हो जाता है या किसी कारणवश नहीं कर पाता हूँ, वह दिन मेरे लिए, सबसे खराब दिन होता है, मुझे लगता है जैसे में निर्जीव हो गया हूँ, अशक्त हो गया हूँ, न मैंने कुछ किया है और न कुछ कर सकता हूँ। अपने अन्दर एक भयानक खोखलापन पाने लगता हूँ। और प्रार्थना कर लेने पर तत्काल सारी दुर्बलतायें दूर हो जाती हैं और अपने अन्दर फिर पूर्णता का अनुभव करने लगता हूँ।” उनका कहना था कि—”मैं सारे दुःख, सारे कष्ट और सारे संघर्ष प्रार्थना के बल पर ही हँसते-हँसते सहन कर लेता हूँ। मुझे कभी आभास ही नहीं होता कि मैं किसी संघर्ष अथवा दुःख में हूँ। हर प्रकार से प्रसन्न और प्रफुल्लित रहता हूँ।”
कहने का तात्पर्य यह है कि ईश प्रार्थना में सारी शक्तियों और सारे सुख सन्निहित रहते हैं। महात्मा गाँधी की सारी सफलता के कारणों में प्रभु प्रार्थना एक प्रमुख कारण है। इसी के बल पर उन्होंने इतने बड़े राष्ट्र का नेतृत्व किया, स्वतन्त्रता का संग्राम जीता और विविध धर्मावलम्बियों को एकता के सूत्र में बाँध दिया। उन्होंने इस प्रार्थना के बल पर ही बड़े-बड़े भौतिकवादी विदेशी राजनीतिज्ञों को द्रवित करके झुका दिया।
परमात्मा का करुण वरदान प्राणिमात्र को उपलब्ध होता है। बिना किसी प्रतिफल की भावना के परमेश्वर प्रत्येक जीव पर अपनी अनन्त करुणा बिखेरता रहता है। प्राणियों के सुखों की अभिवृद्धि और कष्टों की निवृत्ति के लिए उसने अनेक प्रकार के अनुदान पग-पग पर प्रस्तुत किए हैं। उन्हीं के सहारे जीव-धारियों की जीवन-लीला चल पाती है। शरीर और मन की विलक्षण रचना इतने उत्तम प्रकार से न हुई होती तो जीवों का अस्तित्व ही प्रकट न हो पाता और प्रकट भी हो पाता तो वे आनन्दपूर्ण रीति से जीवन का रसास्वादन कर सकने में समर्थ न हुए होते। एक शब्द में इसी बात को यों भी कहा जा सकता है कि परम प्रभु की करुण अनुकम्पा के सहारे ही जीवनधारी अपना शील क्षेम करते हुए, सरल जीवन बिता रहे हैं।
प्रभु की अनन्त अनुकम्पा और करुणा प्राप्त करने वाले मनुष्य के लिए यह उचित ही है कि उस अनुदान का अंश दूसरे असहाय, असमर्थ और बिछड़े हुओं को प्रदान कर अपनी सत्पात्रता सिद्ध करता रहे। यह ठीक है कि परमात्मा को उसकी करुणा का बदला नहीं चुकाया जा सकता, पर इतना तो हो ही सकता है कि उसकी दुर्बल सन्तानों को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए हम आवश्यक सहृदयता का परिचय देते रहें और अपने से जो बन पड़े उतना लोक कल्याण के लिए प्रयत्न करते रहें।
करुणा को सहानुभूति और सहृदयता का रूप मिलना ही चाहिए। भावना वही सार्थक है, जो कार्यान्वित हो सके। संसार में पीड़ा बहुत है, यदि हम दूसरों की पीड़ा का एक अंश बँटा सके और अपनी सद्भावना से टूटे हृदयों को जोड़ सकें तो यह मानवोचित महानता ही होगी। ईश्वर प्रार्थना केवल पूजा के समय प्रकट किए जाने वाले, गुनगुनाए या दुहराये जाने वाले शब्दों को ही नहीं कहते। सच्ची प्रार्थना वह है जो चिरस्थायी सद्भावना का रूप धारण कर प्राणी मात्र की कामनाओं के लिए सहानुभूति बनकर विचलित होती है।
हम प्रभु से प्रार्थना करें—करुणा पूर्ण भावना के साथ और उनसे एक ही याचना करें कि हमारी अन्तरात्मा में उस करुणा का एक छोटा-सा झरना प्रस्फुटित करे जिसमें वे प्राणीमात्र को स्नान कराके उन्हें निरन्तर सुखी, समृद्ध और सुविकसित बनाते रहते हैं।
शास्त्र-चर्चा
न ह्येष दूर नाभ्याशे नालभ्यो विषमे न च।
स्वानन्दाभास रुपो ऽसौ स्वदेहा देव लभ्यते॥
—योगवशिष्ठ 3। 6। 3
परमात्मा न तो दूर है और न कठिनाई से प्राप्त होता है। वह अपनी देह के भीतर ही है और आत्मानंद के रूप में प्रत्यक्ष है।
ज्योतिपामषि त ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञान ज्ञेयं ज्ञान गम्यं हृदि सर्वस्य विष्टितम्॥
—गीता 13। 17
वह परमात्मा अज्ञानांधकार से परे ज्योति की भी ज्योति है। वह सबका सुहृद, सब में विराजमान है और वह ज्ञान स्वरूप परमात्मा ज्ञान से ही देखा जाता है।
एष देवो विश्वकर्मा महात्मा
सदा जनानाँ हृदये संनिविष्टः।
हृदा हृदिस्थं मनसा य एव
मेवं विदुर मृनास्ते भवन्ति॥
—श्वेता0 4।17, 20
संसार की रचना करने वाला वह परमात्मा सदैव प्राणियों के हृदय में स्थित है। इस महात्मा (परमात्मा) को जो शुद्ध हृदय और निर्मल मन से अपने भीतर विद्यमान देखते हैं वे अमृतत्व को प्राप्त कर लेते हैं।
न शास्त्रैर्नापि गुरुणा दृश्यते परमेश्वरः।
दृश्यते स्वात्मनैतात्मा त्वया मस्तवस्थायाधिया॥
—योग वशिष्ठ 6। 118 । 4
परमात्मा का दर्शन न शास्त्र करा सकते हैं न गुरु। उनका दर्शन तो अपनी आत्मा को स्वस्थ बनाने से ही होता है।
न संदृशे निष्ठति रूप मस्य न।
वक्षुपा पश्यति कश्चनैनम्॥
—श्वेताश्वत 4। 20
उस ईश्वर को कोई इन चर्म चक्षुओं से नहीं देख सकता।
कठोपनिषद् की भृगु बल्ली में यम और नचिकेता का संवाद होता है। यम जानना चाहते हैं कि राजकुमार की जिज्ञासा कहीं कामनावश तो नहीं है? किन्तु जो आकाँक्षा नचिकेता ने व्यक्त की थी वह सचमुच उसे ब्रह्म विद्या का अधिकारी सिद्ध करने में समर्थ हुई। समर्थ गुरु यमाचार्य से प्राप्त करने योग्य एक ही वस्तु थी उसके लिए नचिकेता ने कहा—
अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मादन्यभास्मात्कृताकृतात्।
अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद् वद्॥
अर्थात्—हे भगवान्! जो धर्म-अधर्म, कृत-अकृत और कार्य-कारण के बन्धन से रहित है, भूत, भविष्यत् और वर्तमान की काल सीमायें जिसे बाँधने में समर्थ नहीं हैं, उस ब्रह्म-तत्व का उपदेश मुझे दीजिए।
ईश्वर-दर्शन की आकाँक्षा मनुष्य की सम्पूर्ण कामनाओं की साधक है, इसमें कुछ भी संदेह नहीं है। किन्तु यह आकाँक्षा इतनी प्रबल हो कि उसके समक्ष साँसारिक प्रलोभनों का प्रभाव मिट जाय। सच्ची जिज्ञासा से ही भगवान् मिलते हैं। इस आन्तरिक भूख, आत्म तत्व की प्राप्ति की प्रबल आकाँक्षा की परीक्षा यमाचार्य ने इस तरह की—
एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वरं
वृणीष्व वित्तं चिरजीविकाँ च।
महाभूमौ नचिकेतस्त्वमेधि
कामानाँ त्वा कामभाजं करोमि॥
‘हे नचिकेता! धन-वैभव और चिर-काल तक जीवन आदि जो चाहो, इस आत्म-ज्ञान संबंधी वर के बदले में माँग लो। तुम इस भूलोक में महान् ऐश्वर्यशाली बनो। मैं तुम्हें सम्पूर्ण भोगों को भोगने में समर्थ बनाये देता हूँ।”
यह परीक्षा हर ईश्वरनिष्ठ के समक्ष आती है। पग-पग पर प्रलोभन और आकर्षण अपनी ओर खींचते हैं। मनुष्य काम-वासना की ओर, धन-वैभव और वस्तु-साधनों के उपभोग के सुख प्राप्त करने के लोभ में अपने जीवन-लक्ष्य से गिर जाता है। ईश्वर प्राप्ति की आकाँक्षा प्रबल न हुई तो साँसारिक प्रलोभनों के आगे मनुष्य एक पल भी टिक नहीं सकेगा। हमारी ब्रह्म-दर्शन की आकाँक्षा इतनी प्रबल हो कि यमाचार्य के रूप में मौत की छाया हर क्षण आँखों के आगे घूमती रहे और जब भी कोई साँसारिक-वासना जागृत हो तो उस मृत्यु से हमारे अन्तःकरण का नचिकेता यह कह सके—”यत्तत्पश्यसि तद्वद्व”—हे मृत्यु! जिससे देखती हो, मुझे उसका ही उपदेश दो अर्थात् मृत्यु को ध्यान में रखकर उस परम अविनाशी तत्व को ही प्राप्त करने का प्रयत्न करते रहें।
क्षणिक सुख के लिए अपने जीवन लक्ष्य को भूल जाना बुद्धिमानी नहीं मान सकते। साँसारिक कामनायें अमृत तत्व की प्राप्ति नहीं करा सकतीं। उनका प्राप्त कर लेना किसी प्रकार श्रेयस्कर नहीं हो सकता। मनुष्य अपनी मूल सत्ता से बिछुड़ जाने के कारण दुःखी है। चिरन्तन शान्ति के लिए उसी परमात्मा की ही शरण लेनी होगी।
शरीर के भीतर ही प्रकाश स्वरूप परमात्मा अवस्थित है। सत्य-भाषण, तप, ब्रह्मचर्य और यथार्थ ज्ञान से उसकी प्राप्ति संभव है। सब तरह के दोषों से विमुक्त हो कर ही मनुष्य उसे प्राप्त कर सकते हैं। यह धारणा गहराई तक हमारे हृदय में प्रविष्ट हो। आकाँक्षा जिस क्षण शिथिल हो जाती है, उसी समय वासनाओं के तीखे आघात मनुष्य को परेशान करने लगते हैं। शक्ति का मुकाबला शक्ति से किया जाता है। लोहे को काटने के लिए लोहे की ही छैनी बनानी पड़ती है। कुटिल विचारों और कुत्सित कर्मों को मार भगाने के लिए प्रबल-आकाँक्षा की गदा हर समय तैयार रहनी चाहिए।
भगवान् कृष्ण का आदेश है—
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्॥
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्व भूतहिते रतः॥
अर्थात्—इन्द्रियों के विषयों को वश में रखकर, सर्वत्र समत्व का पालन करते हुए जो दृढ़, अचल और अचिन्त्य,सर्वव्यापी, अवर्णनीय और अविनाशी स्वरूप की उपासना करते हैं, वे सब प्राणियों के हित में लगे हुए मुझे ही पाते हैं।” यहाँ ईश्वर के प्रति निष्ठा और परोपकार का समन्वय किया करते है। निष्काम-कर्म का यही स्वरूप है कि मनुष्य उस परमात्मा पर अटल विश्वास रखकर कामनारहित कर्म करे।
कर्म करते हुए मनुष्य से अज्ञान-वश त्रुटियाँ हो सकती हैं, किन्तु निष्काम भावना के कारण उसके सात्विक लक्ष्य पर किसी तरह का आक्षेप नहीं आता। लक्ष्य की स्थिरता ईश्वर के प्रति अनन्य भाव रखने से आती है। दोषों, त्रुटियों और भूलों से बचाव करना भी ईश्वरीय-ज्ञान के प्रकाश में ही संभव है।
साँसारिक आघातों से विकल होकर जब मनुष्य परमात्मा की शरणागति प्राप्त करता है तब हृदय की भावनाओं में परमात्मा की प्रेरणायें और उसके निर्देश प्राप्त होने लगते हैं। समर्पण या शरणागति का भाव जितना सजीव होगा परमात्मा की अनुभूति भी उतनी ही प्रखर होगी। संसार की पीड़ा और विपत्तियों से सकुशल बचे रहने के लिए परमात्मा की शरण अनिवार्य है। पर इतने से ही जीवन लक्ष्य की सिद्धि संभव नहीं है। अभी भावनाओं में उसका आवागमन होना बाकी है। आप देखते रहें कि मलिनतायें आपकी आकाँक्षाओं को कहीं दबाती तो नहीं? सुख की इच्छा और भोगों की कामनायें उठने लगेंगी तो आप किसी भी क्षण अपने लक्ष्य से भटक जायेंगे। यह सावधानी मनुष्य को पूर्णता की प्राप्ति तक रखनी पड़ती है।
कोतवाल के साथ रहने पर जिस तरह चारों का भय नहीं सताता, उसी प्रकार साँसारिक भव-बन्धनों से वही निवृत्त रह सकता है जिससे हृदय में परमात्मा का प्रयाश ओत-प्रोत हो रहा है। वह ब्रह्म ही सम्पूर्ण शक्तियों का स्वामी, सारी सृष्टि का नियामक और कारण स्वरूप है।
आत्मा चेतन पदार्थ तो है, किन्तु वह सत्तामात्र होने के कारण स्वतः क्रियाशील नहीं है। किन्तु आत्म-दान से मनुष्य अपने आपको परमात्मा में मिला देना सीख जाता है। ईश्वर की सत्ता में अपने आपको विलीन कर देने से मनुष्य को ईश्वरीय शक्तियों का अनुभव होने लगता है। उस समय उसके सारे विकार मिट जाते हैं और अनिर्वचनीय आनन्द की सुखानुभूति होने लगती है। जो कुछ भी शक्ति, सामर्थ्य और सम्पन्नता है, वह परमात्मा में है। उसके पास बैठने के कारण ही यह श्रेष्ठतायें मनुष्य में भी आ जाती हैं। इस नियम को भूल जाने के कारण ही जीव क्षुद्र बन जाता है। परमात्मा की याद बार-बार न करते रहें, उसे अपने जीवन का अंग न बना लें तो यह जड़ता आ जाना संभव है।
संसार में रहकर मनुष्य तरह-तरह की कामनायें किया करता है। जिधर उसे सौंदर्य, सुख और संतोष दिखाई देता है उधर ही वह चल पड़ता है किन्तु विवेक की कसौटी यह है कि जो कुछ सत्य है वही ग्रहणीय है, जिससे अंतःकरण की मलिनतायें मिट जाती हों वही अभीष्ट है। वह तत्व आत्म-तत्व ही हो सकता है। विचार के द्वारा इस आवश्यकता को समझ तो सकते हैं, एक क्षीण-सी जिज्ञासा भी उठती है इसके लिए, किन्तु सुखों की प्रतिद्वन्द्विता में आत्म-ज्ञान की आकाँक्षा मूर्छित रह जाती है। किसी एक लक्ष्य को प्रधान बनाये बिना काम चलता नहीं। इसलिए यह बात भली प्रकार विचार कर लेने की है कि आपका लक्ष्य क्या है? फिर उस पर दृढ़तापूर्वक चलते रहना चाहिए।
ईश्वर को प्राप्त करना और अपने अन्तःकरण में ईश्वरीय प्रकाश जागृत करना ही मनुष्य जीवन का ध्येय है। इस मार्ग में विघ्न बाधायें आती हैं, किन्तु जिनके विचारों में निष्ठा होती है, जो प्रबल जिज्ञासा रखते हैं और जिनकी आकाँक्षायें इतनी बलवान् होती हैं कि दुनिया की-कठिनाइयों से सहज ही मुकाबला कर सकें व अपना जीवन-ध्येय पूरा कर लेते हैं। परमात्मा बहुत दूर नहीं है, वह हमारे समीप, हमारी साँस में समाया हुआ है। उसे प्राप्त किया जा सकता है पर इसके लिए साधन की आकाँक्षा अत्यन्त प्रबल होनी चाहिए।
आत्म-ज्ञान या शाश्वत जीवन का बोध व्रताचरण के द्वारा होता है। ऊपर चढ़ने की जरूरत पड़ती है तो सीढ़ी लगाते हैं। एक डंडे को हाथ में पकड़ कर दूसरे पर पैर रखते हुये ऊपर आसानी से चढ़ जाते हैं। जीवन में क्रमिक रूप से छोटे-छोटे व्रतों से प्रारंभ करके अन्त में महा-व्रत की परिधि प्राप्त करना अन्य साधनों की अपेक्षा अधिक सरल है। शास्त्रकार का कथन है—
व्रतेन प्राप्यते दीक्षा दक्षिणा दीक्षपाप्यते।
तया च प्राप्यते श्रद्धा श्रद्धया सत्यमाप्यते॥
अर्थात्—उन्नत जीवन की योग्यता मनुष्य को व्रत से प्राप्त होती है। इसे दीक्षा कहते हैं। दीक्षा से दक्षिणा अर्थात् जो कुछ कर रहे हैं, उसके सफल परिणाम मिलते हैं। सफलता के द्वारा आदर्श और अनुष्ठान के प्रति श्रद्धा जाग्रत होती है और श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है।”
सत्य का अर्थ मनुष्य के जीवन लक्ष्य से है। यह एक क्रमिक विकास की पद्धति है। व्रत जिसका प्रारम्भ और सत्य प्राप्ति ही जिसका अन्तिम निष्कर्ष है।
व्रत का आध्यात्मिक अर्थ उन आचरणों से है जो शुद्ध, सरल और सात्विक हों और उनका पालन विशेष मनोयोगपूर्वक किया गया हो। यह देखा गया है कि व्यावहारिक जीवन में सभी लोग अधिकाँश सत्य बोलते हैं और सत्य का ही आचरण भी करते हैं, किन्तु कुछ क्षण ऐसे आ जाते हैं जब सच बोल देना स्वार्थ और इच्छा पूर्ति में बाधा उत्पन्न करता है, उस समय लोग झूठ बोल देते हैं या असत्य आचरण कर डालते हैं। निजी स्वार्थ के लिये सत्य की अवहेलना कर देने का तात्पर्य यह हुआ कि आपकी निष्ठा उस आचरण में नहीं है। इसे ही यों कहेंगे कि व्रतशील नहीं हैं।
बात अपने हित की हो अथवा दूसरे की जो शुद्ध और न्यायपूर्ण हो, उसका निष्ठा पूर्वक पालन करना ही व्रत कहलाता है। संक्षेप में आचरण शुद्धता को कठिन परिस्थितियों में भी न छोड़ना व्रत कहलाता है। संकल्प का छोटा रूप व्रत है। संकल्प की शक्ति व्यापक होती है और व्रत उसका एक अध्याय होती है। वस्तुतः व्रत और संकल्प दोनों एक ही समान हैं।
विपरीत परिस्थितियों में ही हँसी-खुशी का जीवन बिताने का अभ्यास व्रत कहलाता है। इससे मनुष्य में श्रेष्ठ कर्मों के सम्पादन की योग्यता आती है। थोड़ी सी कठिनाइयों में कर्म-विमुख होना मनुष्य की अल्प-शक्ति का बोधक है, जो कठिनाइयों में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहे, ऐसी शक्ति व्रत में होती है।
नियम-पालन से मनुष्य में आत्म-विश्वास और अनुशासन की भावना आती है। जीवन के उत्थान और विकास के लिये यह दोनों शक्तियाँ अनिवार्य हैं। आत्मशक्ति या आत्म-विश्वास के अभाव में मनुष्य छोटे-छोटे भौतिक प्रयोजनों में ही लगा रहता है। अनुशासन के बिना जीवन अस्त−व्यस्त हो जाता है। शक्ति और चेष्टाओं का केन्द्रीकरण न हो पाने के कारण कोई महत्वपूर्ण सफलता नहीं बन पाती। आध्यात्मिक-लक्ष्य की प्राप्ति के लिये बिखरी हुई शक्तियों को एकत्रित करना और उन्हें मनोयोगपूर्वक जीवन-ध्येय की ओर लगाये रखना आचरण में नियम-बद्धता से ही हो पाता है। नियमितता व्यवस्थित जीवन का प्रमुख आधार है। आत्मशोधन की प्रक्रिया इसी से पूरी होती है। आत्म-वादी पुरुष का कथन है—
उत्तरोत्तर मुर्त्कषं जीवने लब्धुमुत्सुकः॥
प्रतिजाने चरिष्यामि व्रतमात्मविशुद्धये॥
मैं जीवन में उत्तरोत्तर उत्कर्ष प्राप्त करने की प्रबल इच्छा रखता हूँ। यह कार्य पवित्र आचरण या आत्मा को शुद्ध बनाने से ही पूरा होता है, इसलिये मैं व्रताचरण की प्रतिज्ञा लेता हूँ।
व्रत-पालन से आत्म विश्वास के साथ संयम की वृत्ति भी आती है। आत्म-विश्वास शक्तियों का संचय बढ़ाता है और संयम से शक्तियों का अपव्यय रुकता है। इस तरह जब विपुल शक्ति का भण्डार आत्म-कोष में भर जाता है तो आत्मा अपने आप प्रकट हो जाती है। शक्ति के बिना आत्मा को धारण करने की क्षमता नहीं आती। व्रत शक्ति का स्रोत है इसलिये आत्म-शोधन की वह प्रमुख आवश्यकता है। अपनी शक्ति और स्वरूप का ज्ञान मनुष्य को न हो तो वह जीवन में किसी तरह का उत्थान नहीं कर सकता है। शक्ति आती है तभी आत्मा विश्वास की भावना का उदय होता है और मनुष्य विकास की ओर तेजी से बढ़ता चला जाता है।
व्रत जीवन की त्रुटियों और भूलों को सुधार कर मनुष्य को शुद्ध बनाता है। असंयमित जीवन के कारण जो अनियमिततायें और अशुद्धियाँ आ जाती हैं उनका एक सफल उपचार है—व्रताचरण। गान्धी जी का प्रारम्भिक जीवन बिलकुल अस्त व्यस्त रहा है। इसलिये उन दिनों में वे कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाये। पहला व्रत उन्होंने 36 वर्ष की अवस्था में धारण किया। ब्रह्मचर्य से उनकी प्रसुप्त शक्तियाँ जागीं और उनका जीवन क्रम व्यवस्थित होने लगा। व्यवस्थित जीवनचर्या और आन्तरिक शक्तियों के जागरण से महात्मा गान्धी असाधारण कार्य कर सके। महापुरुषों का जीवन सदैव व्रतशील रहा है। आत्म-निर्माण के साधकों को भी सफलता के लिये आचरण की शिखा ग्रहण करनी ही पड़ती है।
जीवन की सफलता के लिये जिन-जिन विचारकों ने अपने अनुभव दिये हैं, उन सब ने पहले उसे कसौटी पर कसा होता है। उन नियमों की सत्यता के लिये हमें लम्बे परीक्षण की आवश्यकता नहीं है। इसमें समय बर्बाद करने की अपेक्षा यह अधिक श्रेष्ठ है कि उदाहरण और विवेक के द्वारा नियमों की परख करलें और उन्हें प्रयोग करने लगें, इतने से ही हम अपने श्रेष्ठ जीवन का निर्माण कर सकते हैं।
पूर्व जन्मों के संस्कारों के थोड़े से अपवाद हो सकते हैं, किन्तु अधिकाँश लोगों के लिये आत्म-ज्ञान प्राप्त करने का जो एक सरल रास्ता निश्चित किया हुआ है, वह है—नियम पालन की योग्यता। मनुष्य के जीवन में आत्म-रक्षा वृत्ति से लेकर समाज-वृत्ति तक जो मर्यादायें निश्चित हैं, उन्हीं के भीतर रहकर ही आत्म विकास करने में सुगमता होती है। एक व्यक्ति के लिये नहीं, सामूहिक हित साधना का कार्यक्रम इसी प्रकार पूरा होता है। व्यक्ति का निजी स्वार्थ भी इसी में सुरक्षित है कि सबके लिये समान व्रत का पालन करे। दूसरों को धोखे में डालकर आत्म-कल्याण का मार्ग प्राप्त नहीं किया जा सकता। साथ-साथ चल कर लक्ष्य तक पहुँचने में जो सुगमता और आनन्द है, वह अकेले चलने में नहीं है। अनुशासन और नियम पूर्वक चलते रहने से समाज में एक व्यक्ति के भी हितों की रक्षा हो जाती है और दूसरों की उन्नति का मार्ग भी अवरुद्ध नहीं होता।
सृष्टि का संचालन नियमपूर्वक चल रहा है। सूर्य अपने निर्धारित नियम के अनुसार चलता रहता है, चन्द्रमा की कलाओं का घटना बढ़ना सदैव एक सा रहता है। सारे के सारे ग्रह नक्षत्र अपने निर्धारित पथ पर ही चलते हैं, इसी से सारा संसार ठीक ठीक चल रहा है। यदि अपनी-2 मर्यादायें छोड़ दें तो आपस में टकरा कर विश्व नाश के दृश्य उपस्थिति कर दें। अग्नि-वायु समुद्र, पृथ्वी आदि सभी अपना अपना व्रत धारण किये हुये हैं। नियमों की अवज्ञा करना उन्होंने शुरू कर दिया होता तो सृष्टि-संचालन का कार्य कभी का रुक गया होता। अपने कर्तव्य का अविचल भाव से पालन करने के कारण ही देव-शक्तियाँ “अमृत-भोजी” कहलाती हैं। इन्हीं नियमों का पालन करते हुये मनुष्य भी अपना लौकिक और पारलौकिक जीवन सुखी तथा समुन्नत बना सकता है।
ऊँचे उठने की आकाँक्षा मनुष्य की आध्यात्मिक प्रतिक्रिया है। पूर्णता प्राप्त करने की कामना मनुष्य का प्राकृतिक गुण है, किन्तु हम जीवन को अस्त−व्यस्त बनाकर लक्ष्य-विमुख हो जाते हैं। हर कार्य की शुरुआत छोटी कक्षा से होती है तब कहीं श्रेष्ठता की और बढ़ पाते हैं। आत्म-ज्ञान के महान् लक्ष्य को प्राप्त करने की प्रारम्भिक कक्षा व्रत-पालन ही है। इसी से हम मनुष्य जीवन को सार्थक बना सकते है। व्रताचरण से ही मनुष्य महान बनता है, यह पाठ जितनी जल्दी सीखलें उतना ही श्रेयस्कर है।
प्रातः सूर्य के उदय होते ही जिन्दगी का एक नया दिन शुरू होता है और सूर्यास्त होते तक दिन समाप्त हो जाता है। इस तरह रोज एक दिन उम्र से घट जाता है। जन्म लेने के बाद से ही आयु-क्षय का यह कार्यक्रम शुरू हो जाता है, किन्तु अनेक प्रकार के कार्यभार से बढ़े हुये विभिन्न क्रिया-व्यापारों में लगे रहने के कारण इस बीतते हुये समय का पता नहीं चलता। ऐसे अवसर प्रायः प्रतिदिन आते हैं जब जीवों के जन्म, वृद्धावस्था, विपत्ति, रोग और मृत्यु के कारुणिक, विचार-प्रेरक दृश्य देखते हैं, किन्तु कितना मदान्ध, कामनाग्रस्त और अविवेकी है इस धरती पर मनुष्य कि वह सब कुछ देखते हुये भी आँखों से, विवेक और विचार की आँखों से अन्धा ही बना हुआ है। मोह और साँसारिक प्रसाद में लिप्त मनुष्य घड़ी भर एकान्त में बैठकर इतना भी नहीं सोचता कि इस कौतुहलपूर्ण नर-तनु में जन्म लेने का उद्देश्य क्या है, हम कौन हैं, कहाँ से आये और कहाँ जा रहे हैं?
प्रकृति-प्रवाह की अबूझ परम्परा में प्रवाहित मनुष्य संसार के सुखों को, इन्द्रियों के भोगों को, पदार्थों के स्वामित्व को, धन, पुत्र तथा विविध कामनाओं को ही जीवन का लक्ष्य बनाकर इस बहुमूल्य अवसर को खो देता है। अन्ततः काल की घड़ी जब सामने आती है और विदा होते समय सिर पर पापों, दुष्कर्मों का भयंकर बोझ चढ़ा दिखाई देता है तो भारी पश्चाताप, घोर-संताप और आन्तरिक अशान्ति होती है। सौदा बिक गया और फिर कीमत लगाई भी तो क्या? विशाल-वैभव अपार धन-धान्य राशि पुत्र-कलत्रादि को कोई भी साथ नहीं देता। यह सारा संसार, यहाँ की परिस्थितियाँ सब ज्यों की त्यों दिखाई देती हैं, किन्तु वह सब उस समय उपयोग के बाहर होती हैं। अपना शरीर भी साथ नहीं देता। केवल अच्छे-बुरे संस्कारों का बोझ लादे हुये जीवन परवश यहाँ से उठ जाता है। कितनी अस्थिरता होती होगी उस समय यह कोई भुक्तभोगी ही समझता होगा।
मनुष्य के जीवन में यह जो विस्मृति है, वह सब असत् के संग से है। ज्ञान का आदर करने से हमारे भीतर से प्रश्न उठेंगे। हमारा कौन है? हम क्या हैं? हमें क्या नहीं करना चाहिये? इसका ज्ञान हमारे अन्दर मौजूद है, पर अपने जीवन का कोई सही दृष्टिकोण न बना सकने के कारण वह सारी ज्ञान-शक्ति विशृंखलित और बेकाम पड़ी हुई है। मनुष्य का पहला पुरुषार्थ है-जीवन लक्ष्य में प्रमाद न होने देना। यह तभी संभव है जब कर्त्तव्यों का उचित और सम्यक् ज्ञान हो। कर्त्तव्यों की विस्मृति मनुष्य ने अपने आप ही की है। जब वह कुछ करना चाहता है तो उसे औरों की आवश्यकता का ध्यान नहीं होता वरन् वह यह जानना चाहता है कि इसमें मेरा लाभ क्या है। अपने लाभ की अपेक्षा औरों के लाभ की बात सोचे तो कर्त्तव्य की विस्मृति न हो। इस कर्तव्य और अकर्तव्य के ज्ञान पर ही मनुष्य का उत्थान और पतन अवलम्बित है।
व्यावहारिक जीवन में कोई नीचे नहीं गिरना चाहता। सभी ऊँचे, बहुत ऊँचे उठने की आकाँक्षा लिये हुये हैं। प्रत्येक मनुष्य अपने आपको ऊँचा सिद्ध करना चाहता है। इसके लिये अपनी-अपनी तरह के पुष्टि और प्रमाण भी एकत्रित करते हैं और समय पड़ने पर उन्हें व्यक्त भी करते हैं। ऊँचे उठना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म भी है, पर यदि किसी से यह पूछा जाय कि क्या उसने इस गम्भीर प्रश्न पर गहराई से विचार किया है? क्या कभी उसने यह भी सोचा है कि इस आकाँक्षा की पूर्ति के लिये उसने क्या योजना बनाई है? तो अधिकाँश व्यक्ति इस गूढ़ प्रश्न की गहराई का भेदन भी न कर सकेंगे। बात सीधी-सी है। महानता मनुष्य के अन्दर छिपी हुई है और व्यक्त होने का रास्ता ढूँढ़ती है, पर साँसारिक कामनाओं में ग्रस्त मनुष्य उस आत्म-प्रेरणा को भुला देना चाहता है, ठुकराये रखना चाहता है। अपमानित आत्मा चुपचाप शरीर के भीतर सुस्त पड़ी रहती है और मनुष्य केवल विडम्बनाओं के प्रपंच में ही पड़ा रह जाता है।
शारीरिक दृष्टि से मनुष्य कितना ही बली हो जाय, बौद्धिक दृष्टि से वह कितना ही तर्कशील क्यों न हो, धन के जखीरे भले ही लगे हों, पर आत्मा-सम्पदा के अभाव में वह मणि-विहीन सर्प की तरह अर्द्ध विकसित कहा जायगा। आत्म बल की उपलब्धि का एक सुख, संसार के करोड़ों सुखों से भी बढ़कर होता है। आत्मिक सम्पदाओं वाले नेतृत्व करते हैं, जन मार्ग दर्शन करते हैं। निर्धन-फकीर होने पर भी बड़े-बड़े महलों वाले उनके पैरों में गिरकर दया की भीख माँगते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य की महानता वाह्य नहीं आन्तरिक है। उसकी शक्ति गुण-विकास पर छिपी है। आन्तरिक श्रेष्ठता के आधार पर ही उसकी श्रेष्ठता प्रमाणित होती है। भौतिक सम्पदायें तुच्छ हैं, थोड़े समय महानता या बड़प्पन जताकर नष्ट हो जाती हैं।
मनुष्य-शरीर जैसा अलभ्य अवसर पाकर भी यदि उसका उद्देश्य नहीं जाना गया तो क्या मनुष्य का शरीर, क्या पशु का शरीर। आत्म-कल्याण की साधना जो इस जीवन में नहीं कर लेता उसके लिये इस सुर-दुर्लभ अवसर का कुछ भी उपयोग नहीं, श्रीमद्भागवत में बताया है—
यः प्राप्य मानुषं देहं मुक्ति द्वारमपावृतम्।
गृहेषु खगवत् सक्तस्तमारुढच्युतं विदुः॥
11 । 6 । 74
अर्थात्—”मोक्ष के खुले द्वार रूप मनुष्य शरीर को पाकर भी जो पक्षियों की तरह अज्ञान के घेरे में कैद है, उसे लक्ष्य से निरस्त ही समझना चाहिये।”
थोड़ा बाहर आकर देखिये, यह संसार कितना विस्तृत है, कितना विशाल है। रात्रि के खुले आसमान के नीचे खड़े होकर थोड़ा चारों ओर दृष्टि तो दौड़ाइये, कितने ग्रह—नक्षत्र बिखरे पड़े हैं। कितना बड़ा फैलाव है इस संसार का। पर इन सब बातों पर विचार करने का समय तभी मिलेगा जब भोगोन्मुख वृत्ति से चित्त हटा कर इन अपार्थिव विषयों की ओर भी थोड़ी दृष्टि जमायेंगे। कामनायें ही हैं, जो हमारी राह रोके खड़ी हैं। स्वार्थ ही है—जो आत्म-विकास के मार्ग पर आड़े अड़ा खड़ा है। ईर्ष्या द्वेष, काम, क्रोध , भय, लोभों वाले निविड़ में भटक गये हैं हम, इसलिये इस महानता की ओर अग्रसर नहीं हो पा रहे।
हम उदार बनें, साहस पैदा करें और आध्यात्मिक जीवन की कठिनाइयों को झेलने के लिये उठकर खड़े हो जायँ, फिर देखें कि जिस महानता की, उपलब्धि के लिए हम निरन्तर लालायित रहते हैं, वह सच्चे स्वरूप में मिलती है या नहीं। सत्य हमारे अन्दर छुपा है। उसे धर्म के द्वारा जागृत करो। शक्ति तुम्हारे भीतर सोई पड़ी है, उसे साधना से जगाओ, जीवन की सार्थकता का यही एक मात्र मार्ग है।
जिसे धारण करने से भय-रहित शान्ति मिले, वही धर्म है, वही लक्ष्य है। दूसरों के अधिकार हमारे द्वारा सुरक्षित रहें। स्वयं अधिकार की लोलुपता से मुक्त रहें। अपना कल्याण तृष्णा-रहित वासना-रहित एवं निष्काम होने में है। बन्धन में तो कामनायें ही बाँधती हैं। इसी से भूल होती है। इसी से अवनति होती है। इसी से मनुष्य सब प्रकार से दीन-हीन होकर कष्ट और क्लेश का झंझटों भरा जीवन बिताता रहता है। सुख और शान्ति भोग विलास में नहीं मनुष्य की सच्चरित्रता, ईमानदारी और पवित्रता में है। सद्गुणों में ही मनुष्य का वैभव छिपा हुआ है जिसे प्राप्त कर जीवन के सभी अभाव दूर हो जाते हैं।
जीवन-लक्ष्य के प्रति मनुष्य की दृढ़ता प्रबल होनी चाहिये। उसे विचार और विवेक के द्वारा सुदृढ़ बना कर अपने जीवन में गहराई तक ढाल देना पड़ेगा तभी जीवन लक्ष्य की प्राप्त कर सकने वाली सफलता प्राप्त की जा सकेगी। यह संसार और यहाँ की परिस्थितियों पर जितना अधिक विचार करेंगे उतना ही विवेक बढ़ेगा, समझ आयेगी और आत्म कल्याण का रास्ता साफ होगा। जब मनुष्य वस्तु स्थिति को समझ लेता है तो उसे मानने और अपनाने में भी कोई दिक्कत नहीं होती। पर जीवन-लक्ष्य की दृढ़ता और आत्म-विश्लेषण का विवेक इतना परिमार्जित होना चाहिये कि साँसारिक बाधाओं का, भोगों के प्रलोभनों का उस पर प्रभाव न पड़ सके तभी स्थिरता-पूर्वक उस महानता की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है जिसके लिये मनुष्य योनि में जीवात्मा का अवतार होता है।
सुख-प्राप्ति ही मनुष्य की मूलभूत आकाँक्षा है। उसका सारा जीवन प्रायः इसी के प्रयत्न में बीतता है। जिस वस्तु परिस्थिति में मनुष्य को सुख दिखाई देता है, उसी की प्राप्ति में ही उसकी सारी प्रवृत्तियाँ, सारी चेष्टायें काम किया करती हैं। पर अधिकाँश व्यक्ति सुख प्राप्ति के सच्चे उपाय को जान नहीं पाते हैं। अज्ञानवश वह तात्कालिक सुखोपभोग की कामना से प्रायः दूसरों के हित का भी ध्यान नहीं रखते। अधर्मी लोग सुख प्राप्ति स्वार्थपूर्ण दृष्टिकोण के द्वारा ही करते हैं, किन्तु इससे कठिन समस्यायें, विवाद और बुराइयाँ उठ खड़ी होती हैं, फलस्वरूप मूलभूत आकाँक्षा का पतन हो जाता है। सुख ढूँढ़ने चलते हैं, फँस जाते हैं विपत्तियों के जंजाल में।
सुख का आधार धर्म और सदाचार है। इसके बिना मनुष्य वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर सकता। शास्त्रकार का उपदेश है—
सुखार्थाः सर्वभूतानाँ मताः सर्वाः प्रवृत्तयः।
सुखं च न बिना धर्मात् तस्मार्द्धमपरो भवेत्॥
अर्थात् “सुख सभी चाहते हैं कि धर्म के बिना सुख प्राप्त करना—असम्भव ही है।” इसलिये अपनी चेष्टाओं की बड़ी सावधानी से देख-रेख करते रहना चाहिए।
पाप वृत्तियाँ और देवत्त्व दोनों ही मनुष्य के अन्तः करण में निवास करते हैं। आसुरी शक्तियों में आकर्षण और तात्कालिक प्रलोभन का भाव अधिक होता है, इससे मनुष्य बलात् बुराइयों की ओर खिंच जाता है। यह बुराइयाँ जब स्वभाव में गहराई तक प्रवेश कर जाती हैं तो वे संस्कार बन जाती हैं। यह कुसंस्कार ही मनुष्य को जन्म जन्मान्तरों तक जन्म-मरण और साँसारिक दुःखों में—आवृत्त किए रहते हैं। मनुष्य बार-बार पाप करता है। बार-बार दुःख पाता है। इस भ्रम-जाल में वह अपने वास्तविक लक्ष्य को भूल जाता है, परिणाम यह होता है कि मनुष्य जीवन मिलने पर भी यह सामान्य प्राणियों जैसे ही आचरण करता रहता है। उसका विचार, उसका विवेक उसकी सद्बुद्धि अधर्माचार के कारागार में बँधी पड़ी रहती है। बेचारा जीव तरह-तरह के दुःख सहन करता हुआ भाग्य और ईश्वर को दोष लगाता रहता है।
विषयों में प्रवृत्ति के कारण ही प्रायः लोग पापकर्म करते हैं। इसलिए भगवान कृष्ण ने यह निर्देश किया है—
रागद्वेववियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।
आत्मवश्यैविधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥
प्रसादे सर्वदु खानाँ हानिरस्योपजायते।
अर्थात् “अपने अन्तःकरण में उठने वाली दुष्प्रवृत्तियों के वशीभूत न होकर, स्वच्छन्द—अन्तःकरण वाले बनिए। जब तक ऐसा नहीं करेंगे, राग-द्वेष से तब तक निवृत्ति नहीं होगी। जब तुम इन्द्रियों का स्वामित्व प्राप्त कर लोगे तभी प्रसन्नता प्राप्त होगी। इस दिव्य आनन्द के द्वारा ही जीवन का सच्चा सुख प्राप्त कर सकोगे।
पाप और अधर्म की दुष्प्रवृत्तियों से जो समय रहते सावधान हो गया वही सच्चा साधक, सच्चा आध्यात्मवादी कहा जा सकता है। मोह माया के क्षुद्र जीवन से ऊपर उठने के लिए सदाचार आवश्यक है जो केवल अपरिपक्व, अस्थिर, क्षुद्र और छोटी-छोटी बातों में ही जीवन गँवाते रहते हैं उन्हें अज्ञानी ही माना जायेगा। उनको इस लोक में दुःख भोगने पड़ते हैं और परलौकिक अनुभूतियों से भी वञ्चित रहना पड़ता है।
प्रसिद्ध फ्राँसीसी विद्वान् बर्थेलो ने एक बार अपने प्रवचन में कहा—”मनुष्य-जाति की सर्वोपरि प्रेरक शक्तियाँ हैं—शक्ति और धर्म।” आत्मा का अस्तित्व इन्हीं से जाना जा सकता है।” आत्मा का अस्तित्व इन्हीं से जाना जा सकता है।” मनुष्य को जिस सुख की कामना है वह यथार्थ में कोई बाह्य वस्तु या परिस्थिति नहीं है। मनुष्य अपनी रुचि के अनुसार जिन वस्तुओं में तृप्ति देखता है, उन्हीं को सुख का साधन मान लेता है। यहाँ यह भूल जाते हैं, कि हमारा मूल विषय निजत्व का ज्ञान प्राप्त करना है।
अर्थात् हम तब तक सुख प्राप्ति नहीं कर सकते जब तक यह नहीं जान लेते कि हम क्या हैं, कौन हैं और हमारा शाश्वत स्वरूप क्या है। यह अज्ञानता ही दुःख का कारण है, क्योंकि लोग पाप और दुष्कर्म अज्ञानवश ही करते हैं। आत्मा की सही स्थिति का ज्ञान होते ही मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ शुद्ध और पवित्र होने लगती हैं, इसीलिए सुख प्राप्ति के लिए भी शुद्ध जीवन की आवश्यकता पर अधिक जोर दिया जाता है।
दुःख—जिसे कोई नहीं चाहता—वह मनुष्यों के अधर्म और पाप कर्मों का ही परिणाम होता है। सुख की प्राप्ति सुयोग्य आचरण से होती है और पाप-सम्पादन से त्रास बढ़ता है। पर मनुष्य सदैव इससे विपरीत ही आचरण—करता है, इसलिए शास्त्राकार ने निर्देश दिया—
पुण्यस्य फलमिच्छन्ति पुण्यं नेच्छन्तिमानवाः।
न पापफल मिच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नतः॥
अर्थात् “मनुष्य सुखों की, पुण्य फल की इच्छा तो करता है, किन्तु स्वयं पुण्य अर्जित नहीं करता है। पाप के दुष्परिणामों से डरता है, किन्तु यत्नपूर्वक करता दुष्कर्म ही है।” ऐसी स्थिति रहते हुए भला किसी को सुख मिल सकता है? आम का फल आम होता है, बबूल नहीं। इसलिए सुख वही प्राप्त कर सकते हैं, जिनकी प्रवृत्तियाँ भी सन्मार्गगामी होती हैं।
मनुष्य संकुचित दृष्टिकोण के कारण पाप करता है। तत्काल के लाभ प्राप्त करने के लिए जब दूरगामी परिणाम दिखाई नहीं देते तभी मनुष्य दुष्कर्म करता है। चोरी करने वाला यदि यह जान ले कि उसे इसके बदले में जेल जाना पड़ेगा, पकड़े जाने पर तरह-तरह के दण्ड दिए जा सकते हैं, तो यह संभव है कि उस दुष्कर्म से बच जाय। किंतु संकुचित दृष्टिकोण के कारण वह यह समझता है कि उसे कोई नहीं देखता, किन्तु उसका हृदयस्थ आत्म इस दुष्कृत्य को देखता रहता है, जो बाद में उसके पश्चाताप, ग्लानि और विक्षोभ का कारण बनता है। भगवान् मनु ने लिखा है—
मन्यन्ते वै पापकृतो न कश्चित्पश्यतीतिनः।
ताँस्तु देवाः प्रपश्यन्ति स्वस्यैवान्तरपुरुषः॥
अर्थात् “पाप करने वालो! यह न समझो—कि तुम्हें कोई देख नहीं रहा है। तुम्हारे हृदय में बैठा हुआ तुम्हारा आत्मा ही सब कुछ देख रहा है।” अतः मनुष्य सबसे प्रथम इस सत्य को स्वीकार करे कि संसार के सभी मनुष्य समान हैं। सबके साथ न्याय का बर्ताव करना चाहिए। जब तक ऐसी धर्म बुद्धि नहीं तब तक मनुष्य बुरे कर्म ही करता है और उनके दुष्परिणाम भोगता रहता है।
सच्चे धर्म के सिद्धान्त सभी के लिए इतने स्वाभाविक हैं कि जैसे ही उन्हें लोगों के आगे रखा जाता है, लोग उन्हें इस प्रकार स्वीकार कर लेते हैं, जैसे इससे बहुत समय से परिचित रहे हैं। धर्म आत्मा की आध्यात्मिक प्यास है। उसे धर्म में ही सुख मिलता है। इसलिए जब भी वह अपने शुद्ध स्वरूप को समझ पाता है, तभी से उसके शुद्ध जीवन की प्रशस्ति प्रारम्भ हो जाती है। सम्प्रदायवाद की विविधता में भी धर्म का स्वरूप अविच्छिन्न है। धर्म वह है जो मनुष्य को क्षुद्र जीवन से उठाकर डडडडडडड और आत्मदर्शी बनाता है।
भले-बुरे कर्मों के द्वारा मनुष्य अपने ईश्वरीय अंश को चाहे तो बढ़ा ले, चाहे घटा ले। ईश्वरीय-ज्योति को विकसित करने के लिए वासनाओं का दमन करना पड़ता है और अपने अन्दर प्रेम-भाव, अहिंसा और उदारता के सद्गुणों का जागरण करना होता है। यह सिद्धान्त पूर्णतया सर्व-धार्मिक और सार्वभौमिक है। मतमतान्तर का इसमें किसी प्रकार झगड़ा नहीं है।
धर्म सिखाता है कि मनुष्य का और संसार के समस्त पदार्थों का परमात्मा से क्या संबंध है। धर्म मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों को जगाता है। सही ज्ञान और आन्तरिक शक्तियों के समन्वय से ही मनुष्य का जीवन सर्वांगपूर्ण बनता है।
मना पापसंकल्प सोडूनि द्यावा।
मना सत्यसंकल्प जीवी घरावा॥
अर्थात् हे मन! तू अपने पाप-संकल्पों को त्याग कर सत्य-संकल्प धारण कर। यह निर्विवाद सत्य है, कि हमारा जीवन लक्ष्य बाह्य सुखोपभोग तक ही सीमित नहीं है। अपना एक सात्त्विक लक्ष्य भी है—वह है, आत्म-ज्ञान और आध्यात्मिक-सुख की प्राप्ति। इस लक्ष्य को पूरा करना हो तो अधर्म और पापाचार से बचकर सत्य-संकल्पों को ही जीवन में प्रथम स्थान देना होगा।
भारतीय धर्म, संस्कृति और सभ्यता का जिन्होंने अध्ययन, अनुभव एवं अवगाहन किया है, उसके मूल तक पहुँचे हैं, उन्होंने इसकी सार्वभौमिकता, विशालता तथा पवित्रता से इनकार नहीं किया। हमारा दर्शन सम्पूर्ण विश्व के लिए प्रकाश है। उस प्रकाश का लाभ सभी जातियों ने पाया है। अपने ज्ञान, अपनी साधना और अपनी तपश्चर्या के लाभ हमने सारे संसार को बाँट दिये हैं। उस अनुदान का लाभ सारा विश्व उठा रहा है, किन्तु हमने तो अपने प्राचीन गौरव को ही भुला दिया। अपने आदर्शों से च्युत होकर अपनी सारी भौतिक विभूतियाँ एवं आध्यात्मिक सम्पदायें खोकर रख दीं। समय उन्हें फिर से जागृत करने का संदेश दे रहा है। वह युग आ गया है जब इस आवाहन को अनसुना कर टाल नहीं सकते।
हीरे की परख जौहरी को होती है। हम जिस अतीत को आज भूलकर बैठे हैं। उसके महत्व को पाश्चात्य मनीषियों ने, कला-पारखियों ने समझा और उसकी प्रशंसा की है इतिहास में ऐसे अनेकों वर्णन, विश्लेषण एवं विज्ञप्तियाँ भरी पड़ी हैं। उनका अध्ययन करने से आँखें खुल जाती हैं और अपने सही रूप का पता चल जाता है। प्रख्यात् जर्मन-दार्शनिक मैक्समूलर ने लिखा है—
“यदि कोई मुझसे पूछे कि वह कौन-सा देश है जिसे प्रकृति ने सर्व-सम्पन्न, शक्तिशाली एवं सुन्दर बनाया है तो मेरा संकेत भारतवर्ष की ओर होगा। जिन्होंने प्लेटो और कान्ट के दर्शन का अध्ययन किया है उन्हें भी, अपने मुख्यतम गुणों का विकास करने वाली, जीवन की सबसे महत्वपूर्ण समस्याओं पर गहराई से सोच-विचार करने वाली, भारतीय-संस्कृति के अध्ययन की जरूरत है। अपने जीवन को अधिक पूर्ण, अधिक विस्तृत और अधिक व्यापक बनाने के लिए भारतीय-विचार पर्याप्त हैं, न केवल इस जीवन के वरन् मनुष्य के अनन्त जीवन के पूर्ण वैज्ञानिक विश्लेषण की क्षमता केवल भारतवर्ष में है।”
मैक्समूलर ने इन पंक्तियों में हमारी आध्यात्मिक शोधों की ओर संकेत किया है। इन तथ्यों का विस्तृत विश्लेषण, जिसकी अभी तक कोई थाह नहीं पा सका, वह सब हमारे वेदों में सम्पादित है। वेद हिन्दू धर्म के मूल आधार हैं। इनमें मनुष्य की आध्यात्मिक तथा भौतिक आवश्यकताओं के सभी विषयों का समावेश है। यह ज्ञान अन्त में अनेकों धाराओं में प्रवाहित होकर बहा जिससे न केवल यहाँ का आध्यात्मिक जीवन समृद्ध बना अपितु भौतिक सम्पन्नता भी अपने ही अनुकूल विशेषण लेकर प्रस्तुत हुई। “इंडियन रिव्यू” में विद्वान् अमरीकी लेखक मि. डेलभार ने लिखा है—
“पश्चिमी चीजों को जिन बातों पर अभिमान है वे सब भारतवर्ष से आयी हैं। और तो और फल-फूल, पेड़-पौधे तक जो इस समय यूरोप में पैदा होते हैं, वे भारतवर्ष से ही लाकर यहाँ लगाये गये हैं। घोड़े, मलमल, रेशम , टीन, लोहा तथा सीसे का प्रचार भी योरोप में भारतवर्ष से ही हुआ है। इतना ही नहीं, ज्योतिष, वैद्यक, अंक गणित, चित्रकारी तथा कानून भी भारतवासियों ने हम योरोपियनों को सिख लाया।”
भारतवर्ष केवल हिन्दू धर्म का ही घर नहीं, उस संसार की सभ्यता का आदि भंडार है। यहाँ का जीव सरल, महत्वपूर्ण तथा अति प्राचीन है। श्रद्धा और भक्ति विश्वास और निश्चय से भरा हुआ यह अपना भारतवर्ष किसी समय ज्ञान-विज्ञान का सम्राट बना हुआ था। यह मनुष्य की शाश्वत आशायें और सांत्वनाएं घनीभूत थीं ऋषियों की गंभीरता को हृदयंगम कर पाना भी कठिन था जिन्होंने सर्वप्रथम इस संसार में विचार और विवेक जन्म दिया था। वास्तविक जीवन के सिद्धान्तों का अनुसंधान इसी पवित्र भूमि में हुआ है। इसलिये सारे संसार ने इसे शीश झुकाया, इसकी अभ्यर्थना की है। एम. जेकोलियट ने लिखा है—
“ऐ प्राचीन भारत वसुन्धरे! मनुष्य जाति का पालन करने वाली, पोषणदायिनी तुझे प्रणाम है। शताब्दियों से चलने वाले आघात भी तेरी पवित्रता को मलिन नहीं कर पाये। श्रद्धा, प्रेम, कला और विज्ञान को जन्म देने वाली भारत-भूमि को मेरा कोटिशः नमस्कार है।”
भारतवर्ष का सम्मान और इसकी प्रतिष्ठा का मूल कारण यहाँ का धर्म है। इसे औरों ने सम्प्रदाय के रूप में भले ही देखा हो, किन्तु वस्तुतः हिन्दू धर्म का मूल सिद्धान्त है, मानवीय आत्मा के गौरव को प्राप्त करना और फिर उसी के अनुसार आचरण करना। शास्त्रकार ने लिखा है—
श्रूयताँ धर्म सर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्॥
अर्थात् सुनो, धर्म का सार यह है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार मत करो जैसा तुम नहीं चाहते कि तुम्हारे प्रति किया जाय, इसको सुनो ही नहीं आचरण भी करो।”
धर्म का यही स्वरूप सुखद व सर्व-हित में है। इसमें प्राणिमात्र के जीवन-रक्षा और सुखोपभोग की व्यवहारिक कल्पना है। अपने इसी रूप में हमारा अतीत उज्ज्वल, सुखी और शान्तिमय रहा है। आज भी सारे विश्व को इसी की आवश्यकता है।
धर्म के जिस रूप की यहाँ व्याख्या की गई है, वह आदर्श है, किन्तु वह बिना किसी महान् शक्ति के आश्रय में रहे हुये स्थिर नहीं रह सकता। मानवीय हितों की सुरक्षा की आज भी सारे संसार में व्यवस्था है किन्तु उसका परिपालन पूर्णतया कहीं भी नहीं है। इसी से सर्वत्र अस्त-व्यस्तता है। जो शक्तियाँ इन कार्यों के लिये नियुक्त भी हैं, वे भी पूर्णतया विध्वंसक हैं। भारतीय धर्म पूर्ण-शक्ति समन्वययुक्त है। इसीलिए इसमें समाज के एक व्यक्ति को भी सुरक्षा रही है। वह शक्ति यहाँ की आध्यात्मिक शक्ति ही है। शक्ति का विकास गुण-विकास पर भी है और उसका एक नितान्त वैज्ञानिक अंग भी है। ऐसी विशेषता केवल हमारे यहाँ ही है। “धर्म” के साथ “साधना” का शब्द जोड़ दिया जाता है, वह इसी शक्ति का ही बोधक है। आध्यात्मिक शक्तियों के विकास पर ही सम्पूर्ण प्राणियों के हित का सिद्धान्त निश्चयात्मक रूप से चल सकता है। बिना इसके सामाजिक जीवन की सुव्यवस्था का और कोई दूसरा ठोस आधार हो नहीं सकता। इसी रूप में हम अपने आपको पूर्ण शक्ति-सम्पन्न, श्रेष्ठ और शिरोमणि सिद्ध कर सके हैं। विक्टर कोसिन ने इसी तथ्य का दावा करते हुए लिखा है—
“जब हम भारत की साहित्यिक एवं दार्शनिक कृतियों का अवलोकन करते हैं, तब हमें ऐसे अनेक गम्भीर सत्यों का पता चलता है, जहाँ पर पहुँच कर योरोपीय ज्ञान की शक्ति शिथिल पड़ जाती है। हमें भारतवर्ष के इसी तत्व के आगे अपने घुटने टेक देने पड़ते हैं।”
काल प्रभाव से यद्यपि अब वैसी शक्ति और सामर्थ्य हम में नहीं रही जो हमारे अतीत का गौरव थी, किन्तु अभी न तो वह ज्ञान ही नष्ट हुआ है और न विज्ञान ही पूर्णतया समाप्त हुआ है। हमारी वृत्तियों में जो भौतिकवादी निकम्मापन भर गया है उसी के कारण आज यह दुर्दशा हो रही है कि हमारा न तो व्यक्तिगत जीवन ही कुशल है, न सामाजिक ढाँचा ही व्यवस्थित है। जिन तथ्यों को विदेशियों ने समझ लिया है उन पर अभी हमारे अपने ही लोगों की गहरी दृष्टि नहीं पड़ी। हमारे आदर्शों की गहराई में पहुँचने वाले किसी भी व्यक्ति को खाली हाथ नहीं लौटना पड़ा। उन्हें कुछ न कुछ मिला ही है। अतः अपनी शक्ति का आभास होना पुनर्जागरण की इस पुण्य वेला में प्रत्येक दृष्टि से आवश्यक है।
वे चरित्र और आदर्श जो यहाँ के मानस का संस्कार देते हैं, भले ही प्रसुप्त हों पर अभी भी जीवित हैं। यदि ऐसा न रहा होता तो हमारा धर्म, संस्कृति तथा सभ्यता कभी की टूटकर बिखर गई होती, जैसा कि और जातियों की संस्कृतियों के साथ हुआ। अपने दृढ़ सिद्धान्तों और पुष्ट संस्कारों के कारण ही वह आज भी अटूट और अडिग बनी हुई है। अब उन आदर्शों को पुनः जागृत करना होगा। खोये हुए अतीत को पुनः प्रतिष्ठित करना होगा, उसी से हमारा और समस्त संसार का कल्याण होगा।
वैयक्तिक शक्ति से परे, सनातन सत्ता को यदि स्वीकार न करें तो इसे हमारा अहंकार ही माना जायगा। यह भूल मनुष्य को करनी भी नहीं चाहिए। इस सृष्टि के कण-कण का विधान परमात्मा के हाथ में है। उसे चाहे अटल नियम कहें, काल कहें, विधाता या परमेश्वर कहें बात एक ही है। उसे मानना अवश्य पड़ता है, इससे बुद्धि को एक स्थिति प्राप्त होती है। इससे बिना मनुष्य को न तो विश्राम मिलता है, न अहंकार छूटता है। बुद्धि भी भ्रमित रहती है।
किन्तु मनुष्य का निज का भी अपने भाग्य-विधान से कुछ संबंध अवश्य है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मनुष्य स्वाधीन नहीं है, उसका जीवन परमात्मा के विधान के अनुसार ही चलता है। न्याय की दृष्टि से उसका विधान भी स्वतंत्र होना चाहिए। यह बात ठीक भी है। ईश्वर ने कर्म-फल का एक सुदृढ़ नियम बना दिया है। इसी के अनुसार मनुष्य का भाग्य बनता बिगड़ता है।
भ्रम इस बात से पैदा हो जाता है कि कई बार प्रत्यक्ष रूप से कर्म करने पर भी विपरीत परिणाम प्राप्त हो जाते हैं, तो लोग उसे भाग्य-चक्र मानकर परमात्मा को दोष देने लगते हैं। किन्तु यह भाग्य तो अपने पूर्व संचित कर्मों का ही परिणाम है। यहाँ मनुष्य जीवन के विराट् रूप की कल्पना की गई है और एक जीवन का दूसरे जीवन से संस्कार-जन्य संबंध माना गया है। इस दृष्टि से भी जिसे आज भाग्य कहकर पुकारते हैं, यह भी कल के अपने ही कर्म का परिणाम है। सृष्टि के प्राणियों में चेष्टा न हो तो अब तक जो ऐतिहासिक विकास हुआ है उसकी कल्पना न की जा सकती थी।
भाग्य का रोना रोने का अर्थ तो इतना ही समझ में आता है कि हम अपने कर्म के लिये सचेत नहीं हो पाये हैं। अपनी शक्तियों का दुरुपयोग ‘अब’ नहीं तो ‘तब’ किया था, जिसका कटु आघात भोगना पड़ रहा है। पर प्राकृतिक विधान के अनुसार तो यह भाग्य अपनी ही रचना है। अपने ही किए हुए का प्रतिफल है। मनुष्य भाग्य के वश में नहीं है, उसका निर्माता मनुष्य स्वयं है। परमात्मा के न्याय में अभेद देखें तो यही बात पुष्ट होती है कि भाग्य स्वयं हमारे द्वारा अपने को सम्पन्न करता है। उसका स्वतंत्र अस्तित्व कुछ भी नहीं है।
वास्तव में हमें शिक्षा लेनी चाहिए कि कर्म-फल किसी भी दशा में नष्ट नहीं होता। किसी न किसी समय वह अवश्य सामने आता है। विवशतावश उस समय उसे भले ही भाग्य कह कर टाल दिया जाय, पर इससे कर्म-फल का सिद्धान्त तो नहीं मिट सकता। हम जैसा करेंगे वैसा ही तो भरेंगे। यदि स्वेच्छापूर्वक परमात्मा ही जिसे जो जी चाहे देने लगे तो इस सृष्टि की सारी न्याय-व्यवस्था बिगड़ जायेगी। हम उस स्वतंत्रता को किस तरह काम में लावें यह एक अलग बात है, किन्तु अपना कल्याण करने का अधिकार हमें ही है। न इसके लिए किसी को दोषी ठहराया जा सकता है और न किसी के भरोसे ही बैठा जा सकता है।
अपने सुख-दुख, उन्नति-अवनति, कल्याण- अकल्याण, स्वर्ग और नर्क का कारण मनुष्य स्वयं है, फिर दुःख या आपत्ति के समय भाग्य के नाम पर संतोष कर लेना और भावी सुधार के प्रति अकर्मण्य बन जाना ठीक नहीं है। ऐसी स्थिति आने पर तो हमें यह अनुभव करना चाहिए कि हम से जरूर कोई भूल हुई है और उस पर पश्चाताप करना चाहिए।
यथा, संयम न रखने के कारण आपका स्वास्थ्य गिर गया है। शरीर में ऋतु-परिवर्तन को भी बर्दाश्त करने की शक्ति नहीं रही, थोड़ी-सी असावधानी से कभी पेट में गड़बड़ी पैदा हो जाती है, कभी सिर दर्द करता है, जुकाम हो जाता है, सर्दी लग जाती है। आप कहेंगे क्या करें हमारा भाग्य ही खराब है। वस्तुतः यह भाग्य का दोष नहीं है। आप थोड़ा-सा भी निष्पक्षता और कठोर सत्य की साक्षी में विचार करें तो आप यह मानने के लिए विवश होंगे कि आपने असंयम के कारण ही वह स्थिति बनाली है जिसके कारण आपको इन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। यदि आप संकल्प से काम लें जिह्वा तथा कामेन्द्रियों पर कसकर अंकुश रखें तो आपका खोया हुआ स्वास्थ्य फिर से वापस आ सकता है। पाना या खोना भाग्य के हाथ की बात नहीं है। वह तो मनुष्य के पौरुष-अपौरुष का फल है। इसे ही बाद में चाहें तो भाग्य कह सकते हैं।
दूसरे व्यक्ति अपने पास के साधन सम्पन्न व्यक्तियों को देखकर ईर्ष्या से जलते रहते हैं। सोचते हैं, यह व्यक्ति कितना भाग्यशाली है। भगवान् ने उसे मोटर दी है, रहने के लिए सुसज्जित कोठी है, नौकर-चाकर सभी कुछ हैं। धन से तिजोरियाँ भरी पड़ी हैं, किन्तु अपना तो जीवन ही कठिनाई से बीतता है। बड़ा कष्ट है। एक-एक पैसे के लिए दूसरों का मुँह ताकना पड़ता है। सच है, आप बड़ी मुसीबत में हैं, किन्तु दरअसल क्या आप उन गहराइयों में गए हैं, जिसके कारण आप निर्धन हैं। संसार के 80 प्रतिशत व्यक्ति विधिवत् खाते-कमाते हैं। आप ही क्यों परेशान हैं? आप देखिए आपके जीव में जरूर कहीं आलस्य, अकर्मण्यता, निरुद्योगता का चोर छुपा हुआ है। इसे भगाइए, इस दुष्ट ने ही आपको निर्धन बनाया है। भगवान् को तो आप नाहक कोसते हैं। महान् विचारक वर्जिल ने कहा है—’भाग्य साहसी और कर्मठ व्यक्ति की सहायता करता है।” डिजरायली का भी ऐसा ही मत है—”हम अपना ऐश्वर्य स्वयं बनाते हैं और उसी को अपना भाग्य कहते हैं।”
भाग्यवाद का नाम से कर अपने जीवन में निराशा निरुत्साह के लिए स्थान मत दीजिए। आपका गौरव निरन्तर आगे बढ़ते रहने में है। भगवान् का वरद-हस्त सदैव आपके मस्तक पर है। वह तो आपका पिता अभिभावक, संरक्षक, पालक सभी कुछ है। उसकी अकृपा आप पर भला क्यों होगी? क्या यह सच नहीं है कि उसने आपको यह अमूल्य मनुष्य शरीर दिया है। बुद्धि दी है, विवेक दिया है। कुछ अपनी इन शक्तियों से भी काम लीजिए, देखिए आपका भाग्य बनता है या नहीं? भाग्य सदैव पुरुषार्थ का ही साथ देता है।
परिस्थिति-वश यदि प्रयत्न करने पर भी आपको उचित सफलता नहीं मिली तो आप इसे अपने पूर्वकृत-कर्मों का फल मानकर तात्कालिक सन्तोष प्राप्त कर सकते हैं, किन्तु अपने प्रयत्नों को यों ही ढीला मत छोड़िए। आज जो कर लेंगे, वही तो कल भाग्य बनेगा। कल आप अधिक सुख प्राप्त करें, इसकी तैयारी आज नहीं करेंगे, तो कब करेंगे? प्राणी की प्रकृति ही उसके कर्मों का कारण कही जाती है, इसलिए आज आप अपनी विश्वास-शक्ति को जगा कर अपने जीवन के सद्गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए। इससे आपका भावी जीवन निश्चय ही सुखी तथा समुन्नत हो सकेगा।
दुर्भाग्य के प्रमुख कारण मनुष्य के मनोविकार हैं। इन्हीं के जीवन बर्बाद होता है। काम, क्रोध, लोभ तथा मोह आदि के द्वारा ही मनुष्य का जीवन अपवित्र बनता है। संक्षेप में इसी को ही दुर्भाग्य की संज्ञा दी सकती है। अतः मनुष्य को चाहिए कि वह इन्द्रिय, मन और बुद्धि की अस्वच्छता को शुद्ध बनाने का सदैव अभ्यास करता रहे, इससे वह भविष्य सुन्दर बना सकता है। अनावश्यक वस्तुओं के अधिक से अधिक संचय को ही भाग्य नहीं कहते। वह मनुष्य जीवन में अच्छाइयों का विकास है, इसी से उससे शाश्वत सुख और शान्ति की उपलब्धि होती है। सत्कर्मों का आश्रय ही एक प्रकार से सौभाग्य का निर्माण करता है।
कर्म चाहे वह आज के हों अथवा पूर्व जीवन के उनका फल असंदिग्ध है। परिणाम से मनुष्य बच नहीं सकता। दुष्कर्मों का भोग जिस तरह भोगना ही पड़ता है, शुभ कर्मों से उसी तरह श्री—सौभाग्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह सुअवसर जिसे उपलब्ध हो, वही सच्चा भाग्यशाली है और इसके लिए किसी दैव के भरोसे नहीं बैठना पड़ता। कर्मों का सम्पादन मनुष्य स्वयं करता है। अतः अपने अच्छे-बुरे भाग्य का—निर्णायक भी वही है। अपने भाग्य को वह कर्मों द्वारा बनाया-बिगाड़ा करता है। हमारा श्रेय इसमें है कि सत्कर्मों के द्वारा अपना भविष्य सुधार लें। जो इस बात को समझ लेंगे और इस पर आचरण करेंगे उनको कभी दुर्भाग्य का रोना नहीं रोना पड़ेगा।
यश और सम्मान प्राप्त करने की अभिलाषा प्रत्येक मनुष्य को होती है। किन्तु जिन कार्यों से सम्पादन मिलना संभव होता है, उन्हें करने के लिए बहुत कम लोग राजी होते हैं। झूठे सम्मान के लोभी व्यक्तियों को बहुत प्रयास करने पर भी असफलता ही हाथ लगती है। जिस योग्यता पर यश मिलता और सम्मान बढ़ता है, उसे बढ़ाया न जाय तो यह महत्वाकांक्षा अधूरी ही बनी रहेगी। उचित योग्यता के अभाव में भला किसी को सम्मान मिला भी है?
मनुष्य की बड़ी इच्छा होती है कि वह प्रधान मन्त्री बन जाय। सेनापति या कोई वरिष्ठ पद पाने की कामना तो बहुत लोग करते हैं, पर राज्य-संचालन, सैन्य-व्यवस्था की उचित योग्यता न हुई तो यह अधिकार कैसे मिल सकेंगे? संयोगवश यदि मिल भी जायें तो बन्दर के हाथ में तलवार के समान आफतों को बुलावा देना ही होगा। इस तरह मिला सम्मान दुःख, क्लेश और अशान्ति ही दे सकता है। उससे मनुष्य की आकाँक्षा किसी भी तरह पूरी नहीं होती।
इस संसार को व्यवस्थित रखने के लिए प्रकृति ने एक कानून लागू किया है।—विनिमय का अधिनियम। एक वस्तु दो, तब दूसरी मिलती है। रुपया दो तो खाद्य, वस्त्र आदि कोई भी वस्तु खरीद सकते हैं। श्रम और योग्यता के बदले में कुछ मिलता है। निष्क्रिय होकर किसी वस्तु की कामना बालबुद्धि की परिचायक है। उचित मूल्य चुकाये बिना इस संसार में कुछ भी नहीं मिलता। इस नियम का उल्लंघन हम कभी भी नहीं कर सकते। सीधा उपाय यह है कि जो वस्तु आप प्राप्त करना चाहते हैं उसके लिए वैसी योग्यता भी प्राप्त कीजिए। योग्यता अपने आप अभीष्ट स्थान तक पहुँचा देती है। अयोग्य की कामनायें कभी पूर्ण नहीं होतीं।
आप यदि यह चाहते हैं कि आप सम्मानित व्यक्ति ठहराये जायँ, आपकी प्रशंसा हो, सभी आपको आदर दें, तो आदरणीय पुरुषों की विशेषताओं का आपको अध्ययन करना होगा। जिन गुणों के आधार पर लोग आदर के पात्र गिने जाते हैं, उनका अनुसरण करेंगे तो आपका गौरव भी जागृत होगा और बड़प्पन मिलेगा। किन्तु यदि आप बाहरी टीम-टाम के द्वारा लोगों को भ्रम में डालकर सम्मान प्राप्त करने की कामना करेंगे तो महँगा मोल चुकाकर भी आपके हाथ कुछ न आयेगा। धूर्त व्यक्ति अपनी चालाकियों से कुछ देर के लिए बड़ी-बड़ी बातें बनाकर, धन का अभिमान जताकर, रूप-गुण की झूठी प्रदर्शनी लगा कर कुछ थोड़ा-सा सम्मान प्राप्त कर भी ले तो वह आन्तरिक उल्लास नहीं मिल सकेगा जो मिलना चाहिए था। उल्टे जब इस नाटक का पर्दाफाश होता है तो लोग धूर्त और पाखण्डी ठहराकर तरह-तरह से भर्त्सना, उपहास और निन्दा करते हैं। कागज की नाव कब तक चलती? उसे डूबना ही था। धूर्तता की जालसाजी का पर्दा खुल जाता है तो भारी अशान्ति होती है। सम्मान तो मिलता नहीं, अपमान ही भोगना होता है।
गुणों को विकास करने में प्रयत्नशील हों तो सन्देह नहीं आप सम्मान प्राप्त करेंगे। लोग गुणों की पूजा करते हैं, व्यक्ति की नहीं। सच्चाई को सिर झुकाते हैं बनावटीपन को नहीं। टेसू का फूल देखने में बड़ा आकर्षक होता है, किन्तु लोग गुलाब की सुवास को अधिक पसन्द करते हैं।
आप में सद्गुणों का विकास हो तो आप अवश्य ही प्रशंसा के पात्र हैं। गुणों की मात्रा जितनी बढ़ती है, जितनी मनुष्य की योग्यता विकसित होती है, उसी अनुपात में लोग उधर आकर्षित होते हैं। अच्छा काम करने वालों की सर्वत्र प्रशंसा होती है। विद्वान सिसरो का कथन है—”सम्मान सद्गुण का पुरस्कार है।” यह बात अक्षरशः सत्य है कि सच्चा सम्मान गुणवान् को ही प्राप्त होता है।
आपके किसी एक गुण का विकास सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों से जितना अधिक होगा उतना ही आपको अधिक यश मिलेगा। कर्ण के युग में दान देने की परम्परा सामान्य थी, किन्तु यह प्रवृत्ति कर्ण में विलक्षणता लिए हुये थी। दान की परम्परा में वह श्रेष्ठतम प्रमाण बना, इसलिये उसे “दानवीर” कहलाने का सौभाग्य मिल सका।
माता-पिता के प्रति आदर और सम्मान की भावनायें अधिकाँश लोगों में होती हैं। लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार उनकी सेवा सुश्रूषा भी करते हैं, किन्तु श्रवणकुमार की पितृभक्ति पराकाष्ठा का स्पर्श करने लगी थी, इसलिए उसे सर्वोच्च ख्याति मिली। सद्गुणों के प्रति निष्ठावान् होने से ही सर्वोपरि सम्मान मिलता है।
यों मानवता के प्रति उत्सर्ग की भावना कुछ न कुछ सभी में होती है। अपनी-अपनी सामर्थ्य और योग्यता के अनुसार लोग इस आध्यात्मिक सद्गुण को अपनाते भी हैं, किन्तु देवत्व की स्थापना में अपने आप को जीवित होम कर देने के कारण जो बड़प्पन, गौरव और उच्च पद महर्षि दधीचि को मिल गया, वह अन्य किसी को नहीं। यश की साधना में किसी एक सद्गुण पर पूर्ण रूप से निष्ठावान् होना पड़ता है। आजीवन ब्रह्मचर्य रहने वाले भीष्मपितामह, परम भक्त हनुमान, महासती अनुसुइया, तपस्वी दुर्वासा, सत्य वाही हरिश्चन्द्र अपने विशिष्ट गुणों के कारण ही उच्चतम सम्मान पाने के अधिकारी बन सके थे। गुणों की विशिष्टता के कारण ही पूज्य-पद प्राप्त होते आये हैं। यह सनातन नियम आगे भी इसी तरह चलता रहेगा।
विशेषता-रहित व्यक्ति को कभी लोग पूछते भी नहीं। अपने ही परिवार के एक-दो पीढ़ी के ऊपर के पूर्वजों का लोग नाम तक नहीं जानते। इसका एक ही कारण है कि उनमें कोई विशिष्टता नहीं रही होती। किन्तु रघु, अज और दिलीप आदि का अपनी अनेक पीढ़ियों को ज्ञान होना उनकी अपनी ही विशिष्टता के कारण था।
विलक्षणता अभ्यास और परिश्रम से मिलती है, किन्तु सर्वप्रथम इसके लिए अतुलनीय साहस उत्पन्न करना पड़ता है। साहस के बिना वह शक्ति नहीं आती जो विपन्न स्थिति में धैर्य स्थिर रख सके। सर्वोपरिता प्राप्त करे के लिए घोर कष्टों का सामना किये बिना कोई बच नहीं सकता। साहस से कष्ट सहिष्णुता आती है जिससे लोग हँसते हुए उन कठिनाइयों को झेल लेते हैं जो किसी गुण को उच्चतम नैतिक स्तर पर धारण करने से आती है। जब इस तरह का विशाल हृदय मनुष्य का बन जाता है तो यश स्वयमेव आकर उसके पाँव चूमने लगता है। यह उच्चता सम्मान की अभिलाषा से न हो। कर्त्तव्य बुद्धि के परिष्कार से ही गुणों की पराकाष्ठा तक पहुँच पाना संभव है। यश का लोभ कामना पूर्ति में विलम्ब होते या विघ्न आते देखकर बीच में ही गिरा देता है। इसलिए उसे त्याज्य कहा गया है। यश की अभिलाषा आन्तरिक हो और किसी आदर्श पर प्रतिरोपित हो तो ही मनुष्य कठिनाइयों के उच्च शिखर पर चढ़ता चला जाता है।
श्रेष्ठता प्राप्त करने का अभ्यास आवेश या अंधानुकरण पर आधारित न हो अन्यथा अधिक देर तक उस सत्कर्म में टिके रहना संभव न होगा और उतना परिश्रम व्यर्थ चल जायेगा। साथ ही निन्दा के पात्र बनेंगे। लोग उपहास करेंगे। इसलिए विचार करें कि अपनी प्रकृति, स्थिति और शक्ति के अनुसार कौन-सी विशेषता सहज ही में प्रकट कर सकेंगे। दान, सेवा, भक्ति, चरित्र की निर्मलता, ब्रह्मचर्य आदि का चुनाव अपनी स्थिति को ध्यान में रखकर करें। विपरीत स्थिति और शक्ति से बढ़कर किए गए प्रयास प्रायः निष्फल होते हैं। या फिर साहस इतना बुलन्द हो कि हर स्थिति की कठोरता को अन्त तक सहन कर सकें। इससे अच्छा यही है कि अपनी सामर्थ्य को ध्यान में रखकर ही गुणों का रचनात्मक विकास करें।
सामान्य स्तर के व्यक्ति के लिए भी जीवन में सम्मान प्राप्त करने का एक सीधा-सच्चा उपाय है और वह है—सबके प्रति आदर और शुभ-अभिलाषा का भाव। किसी के प्रति वैर-भाव, ईर्ष्या-द्वेष और प्रतिशोध की भावना न रखना, सबके साथ मिलकर, प्रेम, न्याय, दया, करुणा और सहृदयता से रहकर यह स्थिति सहज ही में प्राप्त हो जाती है। ऐसे निर्मल स्वभाव के व्यक्तियों का किसी के साथ विरोध नहीं होता। उन्हें सभी ओर से सम्मान मिलता है।
सम्मान प्राप्ति की आध्यात्मिक भूख को बुझाने के लिए हमें अपनी श्रेष्ठताएँ और विशेषताएँ निरन्तर बढ़ानी चाहिए। अपना चरित्र अपेक्षाकृत अधिक उज्ज्वल बनाने के लिए और जनहित के लिए अधिक त्याग करने का आवश्यक साहस संचय करना चाहिए। उत्कृष्टता के मूल्य पर ही कोई व्यक्ति जन-साधारण की श्रद्धा का पात्र बन सकता है।
शरीर में विजातीय द्रव्य जमा हो जाता है तो उसकी विकृति बीमारी के रूप में फूट पड़ती है। रोग शरीर की एक आवश्यकता है, जिससे अपनी जीवनी शक्ति का आभास होता है। यह ज्ञान मनुष्य को न मिले और विजातीय तत्व भीतर ही बढ़ते रहें तो अकाल मृत्यु सुनिश्चित हो जाती है। मनुष्य जीवन का ऐसा ही संकेत है, जो मनुष्य को इस बात के लिए सचेत करता रहता है कि उसका लक्ष्य कुछ और है। मनुष्य शरीर रूप में एक आत्मा है, इस आत्म तत्व की ओर संकेत का भाव मात्र है दुःख। इसलिए वह ग्रहणीय है। दुःख के बिना इस जीवन का महत्व भी कुछ नहीं रह जाता है।
महाभारत में कहा है—
विपदः सन्तु न शाश्वत् तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतौ दर्शनं यत्स्यादपुनर्भव दर्शनम्॥
हे जगद्गुरो! विपत्तियाँ हमारे जीवन में पग-पग पर आती रहें क्योंकि आपके दर्शन विपदाओं में ही होते हैं। आपके दर्शन मिल जाते हैं तो मनुष्य जन्म-मरण के बन्धनों से विमुक्त हो जाता है।
इस दृष्टिकोण को समझने के लिए दुःख और उसके प्रभाव पर, आइये विचार करें। कामनाओं की पूर्ति न होना, दुःख का कारण है और इससे विकल होना ही दुःख का प्रभाव है। दीन-हीन की तरह दुःख को केवल भोगते रहना यह अभिशाप है, किन्तु उसके प्रभाव से प्रभावित होकर सचेत होना निश्चय ही जीवन का वरदान है। सच मानिये यदि विपदायें मनुष्य के जीवन में न आयें तो उसकी अन्तर्मुखी चेष्टायें कभी भी जागृत न हों और जिस लक्ष्य को लेकर उसे यह मानव देह मिलती है, वह साध्य सदैव अधूरा ही बना रहे। धन पाकर उसका उपयोग न करे तो उस धन और मिट्टी के ठीकरे में कोई अन्तर नहीं होना चाहिए। मनुष्य का जीवन पाकर भी आत्म-ज्ञान से विमुख होना मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। दुःख जीवन निर्माण का सन्देश-वाहक है, उसका सत्कार होना ही चाहिए। सुख और दुःख दोनों समान रूप से इसीलिए परमात्मा की ओर से मिले हैं कि इससे मनुष्य का जीवन एकाँगी न हो।
प्राकृतिक नियमानुसार आँशिक सुख और दुःख सबके जीवन में हैं। पर जो मनुष्य कामनाओं की पूर्ति से आसक्त अर्थात् सुख को ही साध्य मान लेते हैं, उनके लिए सुख ही दुःख स्वरूप हो जाता है क्योंकि परिस्थितियों की विपरीतता के कारण सदैव कामनाओं की पूर्ति होते रहना निश्चित नहीं है। सभी कामनायें पूरी नहीं होतीं इसलिए दुःख पैदा होना स्वाभाविक है। एक बात यह भी है कि प्रत्येक कामना की पूर्ति एक नई कामना पैदा कर जाती है, इससे सारी चेष्टायें साँसारिक गोरख-धन्धों में ही लगी रह जाती हैं और जीवन ध्येय की ओर मनुष्य का बिल्कुल भी ध्यान नहीं आकृष्ट हो पाता।
दुःखों से भी केवल प्रभावित होते रहना—इससे भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता जब तक उसके मूल कारण पर आध्यात्मिक दृष्टि से विचार नहीं करते। धन के अभाव में कितने ही व्यक्ति इतने विकल रहते हैं कि सिवाय धन के और कुछ भी आँखों के आगे दिखाई नहीं देता। एक दृष्टिकोण यह भी है कि हमसे भी दयनीय स्थिति के दूसरे व्यक्ति हैं। हम रूखी ही सही, दो वक्त खाते तो भी हैं, किन्तु कितने लोग ऐसे हैं जो एक समय आधा पेट भोजन और वह भी मुश्किल से प्राप्त करते हैं। यह चिन्तन अपने आत्मविकास का साधन है। संसार इससे और उसकी परिस्थितियों पर विचार करने की शक्ति आती है। भौतिकता से हट कर संसार की सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं की ओर ध्यान जाता है। एक बार जैसे ही आत्म-ज्ञान के लिए असंतोष पैदा हुआ कि यों समझिये आपके आध्यात्मिक जीवन का सूत्रपात हुआ। यह परिस्थिति बन जाय तो जीवन लक्ष्य की ओर उन्मुख होना निश्चय ही समझिये।
दुःख के समय सुख की भावी सम्भावना मात्र से दुःख सहते रहते हैं। सुख के समय भी ऐसी ही चेतना जागृत हो कि सुख और दुःख दोनों धूप-छाँह की तरह आने-जाने वाले हैं, ऐसी जागृति आने पर आपका जीवन सुख और दुःख दोनों से अतीत हो जायगा और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने की निर्द्वन्दता आ जायगी।
विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने आती है। इससे हृदय में जो पीड़ा, आकुलता और छटपटाहट उत्पन्न होती है, उससे चाहें तो अपना सद्ज्ञान जागृत कर सकते हैं। भगवान को प्राप्त करने के लिए जिस साहस और सहनशीलता की आवश्यकता होती है, दुःख उसकी कसौटी मात्र है। विपत्तियों की तुला पर जो अपनी सहन-शक्तियों को तौलते रहते हैं, वही अन्त में विजयी होते हैं, उन्हीं को इस संसार में कोई सफलता प्राप्त होती है।
दुःख का प्रभाव सच्चे सुख की अनुभूति कराता है। एक बार जब सुख के सही स्वरूप का बोध हो जाता है तो सुख-लोलुपता मिट जाती है। दुःख को अनिवार्य और आवश्यकता बताने का यह अर्थ नहीं कि सुख-प्राप्ति के उपाय त्याग दें। जीवन को ऊँचा उठाने का प्रयत्न तो हो ही, किन्तु निष्काम-कर्म से गिरा देने वाली जो सुख की तृष्णा होती है उससे बचना मानव-जीवन की शुद्धता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। इसका आभास दुःख के क्षणों में सरलता से प्राप्त कर लेते हैं इसलिए दुःख सापेक्ष है, किन्तु सुख उचित होते हुए भी साध्य नहीं है।
मनुष्य की वास्तविक आवश्यकता कामनाओं की पूर्ति का सुख नहीं है क्योंकि सुखी अवस्था में भी भय का अन्त नहीं होता। और नहीं तो मृत्यु के भय से तो कोई बच भी नहीं सकता। इससे यह प्रतीत होता है कि निर्भयता सुख प्राप्ति से बढ़कर है। दुख निवृत्ति, चिर-विश्राम, पूर्ण स्वाधीनता और प्रेमस्वरूप की प्राप्ति—ये चार वस्तुयें जीवन की चतुर्मुखी आवश्यकतायें हैं। इन चारों की उपलब्धि उसे होती है जो परमात्मा की प्राप्ति के लिए, उसके आदेशों का पालन करने के लिए स्वेच्छापूर्वक, प्रसन्नतापूर्वक तत्पर होते हैं। तपश्चर्या इसी स्थिति का नाम है। परमपिता को हमारी किसी वस्तु की आकाँक्षा नहीं है। वे हमसे प्यार चाहते हैं, हमारी आकुल प्रार्थना पर ही वे रीझते हैं। विषयों में आसक्त जीवात्मा से वैसी प्रार्थना के उद्गार बन नहीं पाते, इसलिए तप का महत्व है। तप का एक ही अर्थ दुःख पैदा करना है। दुःख इसलिए अभीष्ट है कि इससे अन्तःकरण का सत्य प्रतिभासित होता है। मनुष्य जीवन का विराम इसी सत्य को पाता है। अपने आन्तरिक उद्गारों को सतत् प्रार्थनाशील रखने के लिए दुःख चाहिए, कष्ट चाहिए, निरन्तर हृदय में उमड़ने वाली वेदना चाहिए। यह दुःख जिसे मिले उसे यही समझना चाहिए कि उस पर परमात्मा का असीम अनुग्रह है। जिससे वे मिलना चाहते हैं, उसे पहले दुःख का दूत भेजकर मिलने की स्वीकृति माँगते हैं। धन्य हैं वे लोग जो दुःख को परमात्मा का प्रसाद समझ कर उसे अपने शीश पर धारण कर लेते हैं।
दुःख हमारे पुरुषार्थ को जगाने आता है। सुखी मनुष्य विलासी और व्यसनी, आलसी और प्रमादी बन जाता है। अहंकार उसे घेर लेता है और तृष्णाओं के पर्वत सामने आकर खड़े हो जाते हैं, किन्तु जब दुःख सामने आते हैं तो मनुष्य को उनका प्रतिरोध करने के लिए अपनी प्रसुप्त शक्तियों को जागृत करना पड़ता है। पौरुष का निखार इन्हीं परिस्थितियों में होता है। सोने को अग्नि में तपाकर उसके मल विकार जलाये जाते हैं। इसी प्रकार दुःखों की अग्नि में तपा हुआ मनुष्य अपने अनेक दोष दुर्गुणों से सहज ही छुटकारा पा जाता है।
सुखों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहना मनुष्य का स्वभाव है। वह अन्तःप्रकृति की प्रेरणा से हर एक को करना ही होता है। करना भी चाहिए, पर जब दुःख के अवसर आवें तब घबराना तनिक भी नहीं चाहिए वरन् अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का एक सुअवसर आया जानकर उसे भी शिरोधार्य करना चाहिए। दुःखों की हानि तभी है जब मनुष्य उनका अभ्यस्त बन कर दीन−हीन बन जाय और अकर्मण्य बन उनसे छुटकारा पाने का प्रयास ही छोड़ बैठे। यह स्थिति न आने पावे तो दुःखों से परिस्थितियाँ मनुष्य को अधिक सुदृढ़, अधिक पुरुषार्थी अधिक सहिष्णु एवं अधिक पवित्र बनाने में बड़ी उपयोगी एवं आवश्यक सिद्ध होती हैं। परमार्थ के लिए किये गये तप, त्याग में जो दुःख स्वेच्छा से वरण किया जाता है, वह तो आत्मा के लिए अमृत की तरह मंगलमय सिद्ध होता है। ऐसे दुःख की याचना यदि परमात्मा से की जाय तो इस में जीव का कल्याण ही है।
सद्गुण मनुष्य जीवन की प्रमुख आवश्यकता है। इससे मनुष्य के सुखों में अभिवृद्धि होती है, समाज में व्यवस्था रहती है और सर्वत्र सुखद वातावरण विनिर्मित होता है। सद्गुणी मनुष्य के लिए इस संसार में कुछ भी अभाव नहीं हैं। उसे आन्तरिक शान्ति होती है। संतोष मिलता है। सहज ही में आत्म ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
किन्तु मनुष्य जिन परिस्थितियों में जन्म लेता है, उनमें पूर्णरूप से गुण-युक्त बने रहना प्रायः असंभव-सा है। दैनिक व्यवहार और लोकाचार में भूलें, त्रुटियाँ और अपराध होने भी संभव हैं। अच्छे-बुरे का विवेक सदैव नहीं रहता। मनोविकार उठते हैं तो मनुष्य दुष्कर्मों की ओर प्रेरित होता है। कुछ न कुछ दोष-ऐब सभी में होते हैं। पूर्ण रूप से सद्गुणी और सदाचारी व्यक्ति बहुत ही थोड़े मिलेंगे। अधिकाँश व्यक्तियों के स्वभाव में कुछ न कुछ बुराइयाँ जरूर होती हैं। यह संसार गुण दोषमय है, एक-सी स्थिति यहाँ कहीं नहीं है।
दोष मनुष्य जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है किन्तु निन्यानवे प्रति सैकड़ा अवस्थाओं में कोई भी मनुष्य अपने को दोषी नहीं ठहराता, चाहे उससे कितनी ही भारी भूल क्यों न हुई हो।
भूल को स्वीकार कर लेने में हानि कुछ भी नहीं है। अपना मन निर्मल हो जाता है, और आगे के जीवन के लिए स्वस्थ-चित्त एवं जागरुक हो जाते हैं। किन्तु दोष को जब दोष मानकर स्वीकार नहीं किया जाता तो मनुष्य का दुस्साहस उद्दीप्त होता है और उसे अपराध करने में ही आनन्द आने लगता है। छिपाई हुई भूल भी अनेकों दूसरे प्रकार के अनर्थों को जन्म देती है। इस तरह पाप और दोष-दुष्कर्म से प्रत्यक्ष में उतना विषैला वातावरण नहीं बनता जितना उसे छिपाने से होता है।
छिपाये हुये अस्वीकृत दोष की जड़ें मनुष्य के मस्तिष्क में गहराई तक प्रवेश करके मजबूत स्थिति बना लेती हैं जो एक बार क्या बार-बार दंड देने से भी दूर नहीं होतीं। बाँध लगा कर रोके गये पानी की तरह उसे जिधर से असावधानी और कमजोरी दिखाई पड़ती है, उधर ही बार-बार फूट पड़ता है। इससे मनुष्य की अशान्ति बढ़ती है, सारी शक्ति इस शक्ति-अपव्यय की चौकसी में ही खर्च होती रहती है और रचनात्मक या गुणात्मक जीवन के सारे सुख और आनन्द तिरोहित हो जाते हैं। आत्म-कल्याण के इच्छुक को मनोगत दोषों को सुधारने में बहुत परेशान होना पड़ता है, किन्तु यदि इन दोषों को प्रकट कर दिया जाय तो मस्तिष्क का बहुत-सा बोझ हलका हो जाता है और आत्म-विकास का नैतिक पथ प्रशस्त होने लगता है।
अपने दोष स्वीकार कर लेने का अर्थ है सच्चाई के प्रति प्रेम। सच्चाई मनुष्य के बाह्य-आन्तरिक विकास में परमोपयोगी गुण है। अगर सच्चाई न हो तो मनुष्य एक पग भी आगे नहीं बढ़ सकता। सच्चाई प्रथम आवश्यक वस्तु है। इसका परित्याग कर देने की विश्वात्मा की अनुभूति संभव नहीं हो सकती है। मनुष्य डरा-डरा सा रहेगा। झूठ में हृदय काँपता है। चारों ओर से कोई न कोई अपनी ओर उँगली ही उठाता जान पड़ता है। हर संकेत पर, प्रत्येक इशारे पर यही संशय होता है कि वह अपनी कोई बुराई कर रहा है, चाहे वहाँ बात किसी अन्य पुरुष की ही चल रही हो। निर्भीकता सच्चाई में होती है। जिसे सच बोलने का अभ्यास होगा वह भला किसी की निन्दा से क्यों घबराएगा। सच्चे आदमी सदैव साहसी होते हैं। सन्त सुकरात कहा करते थे कि—जो अपने आपको व्यक्त कर सकता है, उसे मैं सर्वोपरि साहसी मानता हूँ। मुझे विश्वास हो जाता है कि वह एक दिन जरूर अपना जीवन लक्ष्य प्राप्त कर लेगा क्योंकि अब उसका हृदय साफ हो गया है और परमात्मा को धारण करने की स्थिति बन गई होती है।
पाप जब तक मनुष्य के मन में ही चक्कर काटते रहते हैं, वह उन्हें प्रकट नहीं कर पाता तो उसकी दया बहुत गिरी-गिरी सी दबैल और दिग्भ्रांत जैसी बनी रहती है। किसी सही निष्कर्ष पर पहुँच सकने की उसकी शक्ति नहीं होती। विचार नहीं उठते, जो उठते भी हैं, वह टूटे-टूटे, बिखरे-बिखरे। ऐसा गतिशील विचार प्रवाह उसमें नहीं आता जो वह कुछ विशेष कार्य कर सके।
इसलिए मनुष्य के मन में जब तक दोषों की विचार-तरंगें उठती रहती हैं, तब तक वह उतने ही सीमा क्षेत्र में घूमता रहता है। उसकी दृष्टि अन्तर्मुखी नहीं हो पाती। बाह्य-जीवन के सुखोपभोग की चाह पर ही वह टकराया करता है। इस स्थिति के रहते मनुष्य का सामान्य जीवन क्रम भी व्यस्त और विशृंखलित ही बना रहता है। उसके जीवन में सच्चा आनन्द नहीं उमड़ पाता है। अतः अपनी बात को भी प्रकट होने देने का अवसर मिलना चाहिए। अपने दोषों को भी कबूल कर लेना चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो जाय कि सच्चाई के प्रति आप में साहस है और दुर्गुणों को आप अच्छी दृष्टि से नहीं देखते, चाहे वह अपने ही क्यों न हों। बुराइयों के लिये लज्जा का अनुभव होना ही चाहिए।
अपनी बातों को ठीक मानने का अर्थ तो यही होता है कि दूसरे सब झूठे हैं, गलत हैं। इस प्रकार का अहंकार, अज्ञान का द्योतक है। इस असहिष्णुता से घृणा और विरोध बढ़ता है, सत्य की प्राप्ति, नहीं होती। सत्य की प्राप्ति होनी तभी सम्भव है, जब हम अपनी भूलों, त्रुटियों और कमियों को निष्पक्ष भाव से देखें। अपने विश्वासों का निरीक्षण और परीक्षण भी करना चाहिए। मनुष्य का मन ऐसा हो जैसा किसी बाग का रखवाला—माली होता है। माली का काम केवल पौधे लगाना ही नहीं वरन् फूलों के पौधों के आस-पास उगने वाली अनावश्यक झाड़-झंखाड़ को भी उखाड़ कर बाहर फेंकना है। गुणों को पौध भी तभी अंकुरित, एवं पल्लवित हो सकती है, जब मानसिक-विद्वेषों को समय-समय पर मस्तिष्क से निकाला जाता रहे। इससे चित्त स्वस्थ, मन प्रसन्न और मस्तिष्क विकास-शील बना रहता है।
मनुष्य जीवन की पवित्रता के लिए शारीरिक स्वच्छता ही काफी नहीं है, आन्तरिक सफाई भी चाहिए। शास्त्र मर्यादा में इसे यों कहा है—
वसताँ ना पवित्रः सन् बाह्मतोऽभ्यन्तस्तथा।
यतः पवित्रताया हि रिजतेऽति प्रसन्नता॥
अर्थात् “मनुष्य को भीतर और बाहर सभी ओर से पवित्र होना चाहिए। पवित्रता में ही प्रसन्नता समाविष्ट है।”
बाह्य पवित्रता का अर्थ व्यावहारिक जीवन की शुद्धि है और आन्तरिक स्वच्छता, विचार और भावनायें स्वच्छ रखने से आती है। विचारों का शुद्धिकरण मन के मैल धोने, बुराइयों को मन से निकाल देने से ही सम्भव है। कूड़ा-करकट, मैल विकार, पाप गन्दगी, दुर्गन्ध, सड़न, अव्यवस्था और घिच-पिच से मनुष्य की आन्तरिक-निष्कृष्टता प्रकट होती है। पवित्रता में चित्त की प्रसन्नता, शीतलता, शाँति, निश्चिन्तता—प्रतिष्ठा और सचाई छिपी रहती है। इस सदुद्देश्य का जीवन में आयत्तडडडडडडड होना चाहिए।
अपने दोष व्यक्त करते हुए आन्तरिक निष्कपटता पा लेना जितना जरूरी है, उतना ही दोषान्वेषण की प्रवृत्ति के परित्याग में भी सावधान रहना चाहिए। मन की भरी हुई बुराइयों की सडाँद से कुछ कम घातक प्रभाव दोष-दर्शन का नहीं होता। यह ठीक पहली स्थिति जैसी ही खतरनाक बात है। मन को दोषों में रस नहीं लेने देना चाहिए फिर वे चाहे अपने हों चाहे पराये। दूसरों में दोष न निकालना, दूसरों को इतना उन दोषों से नहीं बचाता जितना अपने आपने को बचाता है। दूसरों में दोष नहीं ढूँढ़ते वरन् अपने लिये जी की जलन और विक्षोभ ढूँढ़ते हैं—जिसे पाकर मनुष्य का जीवन न सन्तुष्ट होता है न सुखी। उसकी वाणी और व्यवहार से सदैव ओछापन ही टपकता है।
गुणों का चिन्तन न करें केवल अवगुणों पर ही दृष्टिपात करें तो अपना प्रत्येक प्रियजन भी अनेकों बुराइयों दोषों में ही ग्रस्त दिखाई देगा। अतः स्नेह, आत्मीयता, सौजन्यता तथा प्रेमपूर्ण व्यवहार में कमी आयेगी, जिससे जीवन के सुखों का अभाव हो जायगा। अपने बच्चों के छोटे-मोटे दोष भूल जाने की पिता की दृष्टि ही सच्ची होती है। माँ यदि बेटों की गलतियाँ ढूँढ़ा करे तो उसे दण्ड देने से ही फुरसत न मिले। अवगुणों को उपेक्षा की दृष्टि से ही देखना उचित है। पराये दोषों को भुला देना बड़प्पन का ही चिन्ह माना जायगा।
मनुष्य! तुम्हें शरीर इसलिए नहीं मिला कि तुम उस पर अत्याचार करते हुए उसकी मिट्टी खराब कर दो! तुम्हें संसार के भोग इसलिए नहीं दिये गए कि तुम उन पर वुभुक्षित पशुओं की भाँति टूट पड़ो। तुम्हें मन, बुद्धि और आत्मा इसलिए नहीं मिली कि तुम उनमें द्वन्द्व कराओ। तुम्हें रात और दिन, आलोक और अन्धकार इसलिए नहीं दिये गए कि तुम उनको जैसे चाहो प्रयोग में लाओ। तुम्हारे साथ विवेक और सदाशयता को इसलिए नहीं भेजा गया कि तुम उन्हें धोखा दो। संसार में तुम्हारा अवतरण इसलिये नहीं हुआ कि तुम उसे धधकता नरक कुण्ड बना दो।
मनुष्य! तुम संसार में, मनुष्यता के एक निश्चित संविधान के साथ, किसी उद्देश्य से भेजे गए हो। तुम यह नहीं कह सकते कि तुम्हें उस उद्देश्य का पता नहीं। तुम्हें पता है। तुम अवश्य जानते हो किन्तु अपने को धोखा देते हो।
मानव! तुम्हें संसार में इसलिए भेजा गया है कि अणु-अणु में छिपे भगवान को पहचानो, उसका साक्षात्कार करो और दूसरों को कराओ। इसके लिए तुम्हें परमात्मा के असंख्य रूपों का ज्ञान करा दिया गया है। उसका मार्ग बतला दिया गया है। उसके साधन दे दिए गये हैं। किन्तु क्या तुमने कभी स्वप्न में भी उसे खोजने की जिज्ञासा की है? क्या उपलब्ध साधनों को अपने परम उद्देश्य की ओर लगाया है? यदि नहीं—तो यह एक प्रकार से कृतघ्नता ही तो रही।
तो क्या तुम कृतघ्न कहलाना चाहते हो? ‘यदि हाँ’ तब तो बात ही समाप्त हो गई। अन्यथा आओ, यदि सुबह का भूला शाम को भी घर आ जाये तो उसे भूला नहीं कहा जा सकता। आज से ही अपने उद्देश्य के लिए प्रयत्न आरम्भ करो।
परमात्मा के असंख्य रूपों—धर्म, कर्म, योग, तप, सिद्धि, समृद्धि आनन्द, आलोक, सुख, शान्ति, मुक्ति, मोक्ष, दया, करुणा, शक्ति सत्ता, दैवत्व, मानवत्व आदि में से जिस रूप को भी देखना चाहो, तो साथ आया हुआ “आत्म-संयम” नाम का नैसर्गिक संविधान खोलो और अपना काम प्रारम्भ कर दो। ईश्वर के किसी भी रूप का साक्षात्कार करने के लिए केवल एक ही नैसर्गिक विधान है—“आत्म-संयम।”
अब तक तो तुम असंयम के कुफलों का काफी अनुभव कर चुके होगे। तुम यदि अपने दुश्मन नहीं हो, आत्म-हिंसा को पाप समझते हो और अपने को कृतघ्नता के कलंक से बचाना चाहते हो तो आत्म-संयम के वरदानों को अनुभव कर लेना चाहिए।
लो! अपने पर दृष्टिपात करो। क्या तुम कह सकते हो कि ऐसा ही जर्जर, जीर्ण शीर्ण, रूप-रंग रहित शरीर लेकर आये थे। नहीं, तुम्हारा शरीर रंग-रूप से भरा-पूरा और शक्तिवान था। वह इसलिए ऐसा हो गया कि तुमने आत्म-संयम के संविधान का उल्लंघन किया, उसकी अवहेलना की, जिसके दण्ड स्वरूप तुम से जीवनीशक्ति ले ली गई और मिट्टी तुम्हारे पास भार स्वरूप ढोने को छोड़ दी गई।
तुमने प्रातःकाल उठकर उपादेवी के दर्शन नहीं किये, तुमने रात्रि में बरसे हुए अमृत से स्नाता हरी-भरी वनस्पति के बीच विहार नहीं किया। तुमने व्यायाम का मखौल उड़ाया! शरीर प्रक्षालन का महत्व तुमने जाना ही नहीं। दो मिनट बैठकर उस प्रभु का स्मरण नहीं किया, जिसका साक्षात्कार तुम्हारा ध्येय था। भोजन-रूप अन्न का अनादर किया। स्वाद और जायके के लिए रोष प्रकट किया। तुमने जीवन के ये सारे काम किए न किए के ही समान किए। नियमों से विद्रोह करते हुए तुम सदा अपने पर बलात्कार ही करते रहे। तुमने अपने शरीर-नाश के जितने भी बीज हो सकते थे उनका वपन बड़ी तत्परता से किया।
शरीर के अतिरिक्त मन, बुद्धि और आत्मा पर तुमने क्या अत्याचार नहीं किया? मन के पोषक पदार्थ थे—प्रसन्नता, प्रफुल्लता, निश्चिन्तता, निर्मलता, सुन्दरता और सुधारता, किन्तु तुमने उसे दिया क्या? खेद, पश्चाताप, दुश्चिन्ता मलीनता, अश्लीलता, अनगढ़ता आदि। बुद्धि की आवश्यकता थी—तर्क, निर्णय, निश्चय, चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग और विवेक आदि। किन्तु तुमने उसे दिया क्या? कुतर्क, असमञ्जस, स्थगन, अकर्मण्यता, अविद्या, कुसंग और अज्ञान आदि। आत्मा की माँग थी—परिमार्जन, परिष्कार, संस्कार, शोधन, साधन, धर्म, धीरता, कर्म, परोपकार व सदाचार आदि। किन्तु तुमने उसे इसके विपरीत दिया—अन्धकार, अज्ञान, कलुष, अवज्ञा, उपेक्षा, अवहेलना और तिरस्कार आदि! फलतः यह सब तुम से विमुख होकर बुझे दीपक की भाँति तुम्हारे पास रह गये।
अब तुम्हारा सारा जीवन, एक विषाद, निराश, असहायता, भीरुता, दुख, पीड़ा, क्षोभ, ग्लानि, अरुचि आदि से भरा हुआ एक नरक-कुण्ड बनकर रह गया। तुम व्याधियों से परेशान हो, खीझते हो, हाँफते हो, थकते हो, कुढ़ते हो और कराहते हो। किन्तु तुम्हारा कोई वश नहीं चलता। अब तुम वीरों की इस कर्म भूमि को ठीक-ठीक भव-सागर के रूप में अनुभव करते हुये उससे निस्तार पाने के लिये छटपटाते हो, झींकते हो और अपने पर खीझते हो।
पर इससे काम नहीं चलेगा! जिस तत्परता से तुमने अपने विनाश के बीज बोये हैं, उसी उत्साह से आज ही आत्म-संयम में लग जाओ। इन्द्रियों की बाग रोको, स्वादों को नमस्कार करो, दुर्भावनाओं को विदा दो, बुद्धि को जगाओ और विवेक को आवाज दो। आत्मा का सम्मान करो और परमात्मा से क्षमा माँगो। अपने ध्येय को विवेक के आलोक में देखो और चल पड़ो उसे पाने के लिये।
नित्य नियमों के तप से आत्म-संयम की सिद्धि करो। बुद्धि की वृद्धि और आत्मा की शुद्धि का संकल्प लो। प्रकृति से प्यार करते हुये सदाचार का व्यवहार करो—और देखो अल्पकाल में ही तुम्हारे स्वास्थ्य की धरोहर तुम्हें लौटा दी जायेगी।
और फिर; फिर तो मानो तुमने सारी निधियों की कुञ्जी ही पाली, ध्येय के धरातल पर पदार्पण हो गया। अब कौन तुम्हें तुम्हारे लक्ष्य पर पहुँचने से रोक सकता है। स्वस्थ शरीर के सन्नद्ध रथ पर आरुढ़ होकर चलो-वासनाओं के गर्त और विषयों के गढ़ों से सावधान रहो! पूर्वजों के पूर्व-प्रणीत दिए हुये शास्त्रों और सत्साहित्य में दिये धर्म रूपी मानचित्र के सहारे पथ भ्रान्ति से बचो। पीछे नहीं आगे के मार्ग पर दृष्टि रखो। पुरुषार्थ के मापदण्ड से यात्रा की पूर्ति नापो। पापों के पड़ाव पर अभियान का अवरोध भयानक अबोध होगा। सुहावने प्रलोभनों और भव्य भोगों के हाट-बाट से तुम्हारा रथ निर्विघ्न निकलता जाये! रथ रोकने के लिये हाथ उठाकर वञ्चक-व्यसनों को, पीछे दौड़ती हुई धूल रूपी परित्यक्त तृष्णा को अनदेखा करदो।
प्रातः काल ठीक समय पर उठो! उदय होते हुये भगवान भुवन भास्कर के दर्शन करते हुये, प्रकृति के अंचल में विहार करो। व्यायाम करो, स्नान करो और नियम पूर्वक परमात्मा का सच्चे मन से स्मरण करो। आत्म-कल्याण के लिए उससे अनुनय विनय करो। ठीक समय पर अपनी जीविका पर जाओ और संसार को भूलकर मनोयोग से काम प्रारम्भ करो। अवश्य ही इतना काम करो जिससे तुम्हें सच्चा सन्तोष मिले!
संध्या समय भी ठीक समय पर नित्य नैमित्तिक कार्य करो! सन्ध्या वन्दन करो, टहलने जाओ। स्वाध्याय करो, पुस्तकालयों और सत्सभाओं में सम्मिलित होओ! सबसे अधिक सेवा कार्यों में सम्मिलित होओ! ठीक समय पर पुनः सन्तुलित भोजन करो। थोड़ा संचरण करो। दूसरे दिन के कार्य पर विचार करो, और ठीक समय पर परमात्मा का स्मरण करते हुये निश्चिंत निद्रा में से जाओ!
इस प्रकार अपने सामान्य दैनिक जीवन में अनुशासन का विकास करो। थोड़े दिनों में तुम ठीक मार्ग पर चल पड़ोगे और अपनी खोई हुई शक्तियों को पुनः प्राप्त कर लोगे।
इच्छा और वासनाओं को बहिष्कृत करके मन, बुद्धि, और आत्मा को हल्का बनाओ। प्रसन्नता पूर्वक हँसो बोलो और दूसरों से बात करो। विषाद अथवा विवाद के किसी कारण को पास न आने दो, हर काम को उत्साहपूर्वक करो।
वाणी को नियंत्रित करो। सत्य, सरल और मधुर संभाषण करो। कटुवचन, अपशब्द और विवादात्मक शैली का प्रयोग मत करो। वाद-विवाद अथवा अनर्गल-वार्तालाप का त्याग करो। दूसरों का आदर करो और गुरुजनों के प्रति श्रद्धा रक्खो। सद्गुणों को अपने व्यावहारिक जीवन में दिनों-दिन विकसित करते चलो।
तुम कभी अस्वस्थ, अशक्त अथवा दुखी नहीं रहना चाहते, और बीमार होने पर तत्काल डॉक्टर की शरण में जाते हो। औषधि लेते हो और पथ्य का पालन करते हो। तब क्यों न पहले ही से संयमपूर्वक रहो जिससे रोगी होने का अवसर ही न आये। रोगी होकर स्वास्थ्य की चिन्ता करना उल्टी बात है।
प्रकृति का अखंड नियम है कि वह असंयम करने वाले को तत्काल दण्ड न देकर सुधरने का अवसर तो देती है किन्तु क्षमा कभी नहीं करती।
मनुष्य का एक स्वभाव है कि वह महापुरुषों के प्रति श्रद्धा तो रखता है, उन्हें बड़ी अचम्भे की दृष्टि से देखता है, किन्तु उनके जीवन पर दृष्टि नहीं डालता। किसी क्षेत्र में महान कहा जाने वाला कोई भी ऐसा व्यक्ति संसार में नहीं हुआ जिसने आत्म-संयम के व्रत का कठोरतापूर्वक पालन न किया हो। आत्म-संयम और अध्यवसाय दो ऐसे नियम हैं जिनका सच्चाई से पालन करने वाला कोई भी व्यक्ति महान हो सकता है।
किन्तु, आत्म-संयम का यह अर्थ कदापि नहीं है कि तुम संसार के समस्त भोगों से अपने को सर्वथा वंचित कर दो। उनको भोगो। परन्तु प्राकृतिक नियमों के साथ अनुशासित होकर। उनका दास बन जाना अथवा उनको जीवन का ध्येय बना लेना ही बुरा है।
किसी बात की उपयोगिता, आवश्यकता और सीमा समझ कर उपयोग करना आत्म-संयम की मोटी-सी परिभाषा है। इसके विपरीत उसका उपयोग असंयम है।
आत्म-संयम करना कोई दुःसाहस का काम नहीं है, अपितु यह तो मनुष्य का सहज स्वभाव है। परमात्मा उसको आत्म-संयमी बना कर भेजता है। इसके विपरीत वह वस्तुतः कुसंगति या कुरीतियों से प्रभावित होकर असंयम का अभ्यास कर लेता है। अधिक भोजन, अधिक निद्रा, विवाद, विषाद, अथवा दुर्भावनाओं और दुर्गुणों को लेकर मनुष्य पैदा नहीं होता। जब तक वह अबोध रहता है तब तक यह असंयम उसमें पैदा नहीं होता है। कितने आश्चर्य का विषय है कि मनुष्य में असंयम का दोष तब पैदा होता है जब उसकी बुद्धि विकसित होने लगती है। वास्तव में होना तो यह चाहिए कि अबोधतावश जो दोष उसमें आ गये हैं वे बोध पाते ही दूर कर दिये जायें, किन्तु होता इसके प्रतिकूल है। इसको मानव-भाग्य की विडम्बना के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है।
खैर, जो कुछ भी सही, असंयम के दोषों का जब भी ज्ञान हो, उन्हें तत्काल दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। आत्म-संयम से जीवन-काल में सुख रहता ही है, भारतीय विश्वास के अनुसार पुनर्जन्म में भी उसको इसका लाभ होता है। क्योंकि मनुष्य जिस प्रकार का शरीर छोड़ता है और जिस प्रकार की भावनायें लेकर संसार से विदा होता है, उसी प्रकार का शरीर और भावों के अनुरूप ही मन, बुद्धि और आत्मा की प्राप्ति होती है। जब ऐसा है तो क्यों न इस जीवन में आत्म-संयम का सुख भोगकर पुनर्जन्म में नियमानुसार स्वस्थ शरीर, प्रसन्न मन, सशक्त बुद्धि और उज्ज्वल आत्मा की प्राप्ति की जाये।
मनुष्य! तुम कीड़े-मकोड़ों की तरह जिन्दगी के दिन पूरे करने के लिए नहीं, एक महान उद्देश्य के लिए अवतरित हुये हो। इसलिए विडम्बनायें छोड़ो, दुर्बुद्धि से बचो, दुर्गुणों को छोड़ो, और जीवन-क्रम इस प्रकार बनाओ जिससे तुम्हें अपने लक्ष्य की प्राप्ति हो सके।
मनुष्य का निर्माण उसकी भावनाओं की पृष्ठभूमि पर होता है। जैसा वह सोचता, समझता और विचार करता है, प्रायः वैसा ही बन जाता है। भलाई की भावना लोगों को उच्चस्तर की ओर, महानता की ओर अग्रसर करती है। अनिष्टकारी, दीन और निकृष्ट भावनाओं से मनुष्य का जीवन दुःखी, उदासीन तथा पतनोन्मुख होता है। क्योंकि भीतरी भावनाओं के अनुरूप ही बाहरी क्रियाकलाप होते हैं और वैसे ही परिणाम भी उत्पन्न होते हैं। काम से अधिक उस भावना का महत्व होता है जो उस क्रिया का संचालन करती है। जो काम शुद्ध हृदय से होता है, देखने में वह छोटा भले ही हो परन्तु उसका फल बड़ा ही महत्वपूर्ण होता है। बड़े से बड़ा काम भी अगर हीन आदर्श लेकर किया जाय तो उसकी कोई बड़ी कीमत नहीं हो सकती।
बुराइयों के प्रति लोगों में जिस तरह आकर्षण होता है, उसी तरह यदि ऐसा दृढ़ भाव हो जाय कि हमें अमुक शुभ-कर्म अपने जीवन में पूरा करना ही है तो उस कार्य की सफलता असंदिग्ध हो जायगी। यदि सिनेमा न देखने का, बीड़ी-सिगरेट न पीने का, जुआ न खेलने का, माँस-मदिरा न सेवन करने का व्रत ठाना जाय और उस व्रत का दृढ़तापूर्वक पालन किया जाय तो इन दुर्गुणों के कारण मलिन होने वाले स्वभाव में स्वच्छता आयेगी, स्वास्थ्य ठीक रहेगा, मानसिक सन्तुलन बना रहेगा। यह लाभ मिल सकते हैं, किन्तु उन्हें सत्संकल्पों द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।
झूठ बोलना अब लोग व्यावहारिक समझने लगे हैं इसी कारण से सात्विक-जीवन के अनेक उद्देश्य इच्छा रखते हुये ही पूरे नहीं हो पाते। बीड़ी पीना स्वास्थ्य और आर्थिक अपव्यय की दृष्टि से नितांत हानिकारक है, यह हर बीड़ी पीने वाला समझता है और उसके अनौचित्य तथा दुष्परिणामों से प्रभावित होकर धूम्रपान न करने की शपथ भी लेता है किन्तु दृढ़ भावना के अभाव में वह प्रतिज्ञा निभ नहीं पाती, पूरी नहीं हो पाती। सत्य के लिए श्रद्धा होती और उद्देश्य में कुछ सबलता रही होती तो यह कार्य ऐसे नहीं हैं जिन्हें करने पर मनुष्य को कुछ हानि होती। उल्टे इसमें फायदा ही है। पर लोगों का मनोबल इतना दुर्बल होता है कि वे संकल्प कर लेने के बाद देर तक उसमें टिक नहीं पाते। शपथ या संकल्प की विजय दृढ़-निश्चय और सुदृढ़ भावना से होती है।
महापुरुषों की सफलता में उनकी दृढ़-भावना, उच्चतम उद्देश्य के लिए अन्यतम कष्ट, सहिष्णुता ही प्रधान कारण होती है। महाराणा प्रताप ने सौगन्ध खाई थी कि मेवाड़ को वापस न लेने तक वे राजसी-जीवन को धारण नहीं करेंगे। महात्मा गांधी का स्वतन्त्रता आन्दोलन उनके दृढ़-निश्चय का प्रतीक था। महर्षि दयानन्द के हृदय में अपने धर्म, संस्कृति के उत्थान की प्रबल भावना थी—तभी इन महापुरुषों ने अपने लक्ष्य को पूरा भी किया। हवा के एक झोंके में बुझ जाने वाला दीपक नहीं, निरन्तर संकल्पशील सूर्य ही संसार को प्रकाश दे पाता है। जीवन में किसी सद्-उद्देश्य की सफलता के लिए दृढ़-निश्चय होना परमावश्यक है।
दृढ़-भावना रचनात्मक प्रवृत्तियों का विकास करती है। उससे सफलता के अनेकों नये-नये मार्ग स्वतः सूझ पड़ते हैं, जिन्हें सामान्य श्रेणी के व्यक्ति बड़े कौतूहल से देखते हैं। जीवन में जो कुछ करना है उसके लिए यदि मनुष्य का साहस जाग जाय तो शायद ही कोई बाधा उसे उसके निश्चय से हटा सके। विद्याबाँकुरे ईश्वरचन्द्र विद्यासागर अत्यन्त निर्धन परिवार के थे, मुश्किल से फीस और किताबों के पैसे जुटा पाते थे किन्तु विद्याध्ययन की जो उनमें उत्कट चाह थी उससे उनकी वह मनोकामना भी पूरी हुई। विद्यासागर चौराहे की लालटेन के प्रकाश में बैठकर अपना पाठ याद किया करते थे। अपने अदम्य उत्साह और परिस्थितियों से संघर्ष करने की शक्ति के बल पर ही वे सिद्ध मनोरथ हो सके।
मनुष्य के अनेक कर्मों में भावना का सम्मिश्रित होना अनिवार्य है। दृढ़-भावना और कार्य करने की क्षमता के संयोग से ही पूर्ण सफलता संभव है। वृक्ष दो तरह से जीवन तत्व ग्रहण करता है। जड़े पृथ्वी से रस खींचती हैं और पत्तियाँ सूक्ष्म आकाश से प्राण-शक्ति का अवगाहन करती हैं। इन दोनों क्रियाओं के साथ-साथ चलते रहने के कारण ही वृक्ष फल-फूल पैदा करने में सफल हो पाता है मनुष्य का जीवन भी हरा-भरा सुखी-सम्पन्न बना रहे इसके लिए उसमें कर्म और भावना का सम्मिश्रण होना जरूरी है। भावना के अभाव में वे क्रियायें पूरी नहीं हो सकती जो समृद्धि और सम्पन्नता के लिए आवश्यक हैं। चाहे अपना उद्देश्य आध्यात्मिक हो चाहे भौतिक, भावनाओं में दृढ़ता रहेगी तभी कुछ बन सकेगा, कुछ सफलता मिल सकेगी।
मनुष्य की असलियत का संबोधन उसकी आन्तरिक भावनायें कराती हैं। भावनाओं का प्रभाव बाह्य शरीर पर भी लक्षित हुये बिना नहीं रहता। पापी, कुकर्मी तथा आततायी पुरुषों की मुखाकृति ही बतला देती है कि वह कैसा आदमी है। गम्भीर व्यक्तियों को देखने से ही उनके प्रभाव का पता चल जाता है। मनुष्य की निकृष्टता या उत्कृष्टता के भाव उसकी प्रत्येक क्रिया रहन-सहन व बोलचाल से परिलक्षित होते हैं। इन्हीं के आधार पर औरों से मान-सम्मान, मैत्री, आत्मीयता आदि की प्राप्ति होती है। जिनकी भावनायें भौंड़ी और कुरूप होती हैं उनसे लोग घृणा करते हैं। जिनकी भावनायें ऊँची होती हैं, दृढ़ और रचनात्मक होती हैं उनकी समीपता से लोगों को प्रेरणा मिलती है।
कर्त्ता की भावना जब लक्ष्यवान होती है तो वह भीतर ही भीतर प्राण व शक्ति का संचार करती है इससे उसे अनेक अनुभव और ज्ञातव्य प्राप्त होते हैं। इन्हें वह चुपचाप धारण करता है, पोषण करता है पर व्यक्त नहीं करता। इसी शक्ति द्वारा प्राणों का जो विस्तार होता है उसे ही निष्ठा कहते हैं। यह चरित्र निर्माण की मूल आवश्यकता है। वहाँ पल-पल, छिन-छिन बदलते रहने वाले इन्द्रियों को आवेश कामयाब नहीं होते। थोड़ी-थोड़ी दूर पर जो प्रलोभन भरे प्रश्न आते हैं उनका हल स्वतः होता है और बाधायें उस दृढ़ता में टकराकर चकनाचूर हो जाती हैं। दृढ़ता का स्वभाव है गम्भीरता की ओर प्रेरित करना। इसी से मनुष्य के जीवन में आत्म-निर्भरता, सत्यता, कष्ट सहिष्णुता एवं देवत्व की जागृति होती है। मनुष्य के चारित्रिक विकास में भी उसकी भावना ही मुख्य है।
मनुष्य के जीवन में इस प्रकार भावनाओं की गहराई न रहे तो उसका चारित्रिक पतन हो सकता है। शील और सदाचार का अविचलित-अविच्छिन्न योग न रहे, तो वे सभी भाव-संस्पर्श उसके लिए घातक ही सिद्ध होंगे अर्थात् उसके जीवन से सद्प्रवृत्तियों का भाग नष्ट हो जायगा। और कुविचार एवं कुचेष्टायें बढ़ने लगेंगी। ऐसी स्थिति में मनुष्य का जीवन बरबाद और निरर्थक हो जाता है, जिस तरह हरे पेड़ को काट देने पर सूर्य का ताप उसे सुखा देता है। इस प्रकार उत्पन्न हुई चारित्रिक दुर्बलता लोगों को विषय-सुख और भोगों की ओर प्रेरित करेगी, परिणामस्वरूप जीवन के सात्विक लक्ष्य पूर्ण न होंगे और सफलता की पुष्टि का मार्ग बन्द हो जायगा। दुर्बल तथा क्षीण चित्त के लिए ज्ञान का भी कुछ लाभ नहीं है। वह ज्ञान पूर्णतया लौकिक कामनाओं में ही लगा रहेगा। अतः बुरे परिणाम पैदा होने में कोई सन्देह न रहेगा।
भावनायें मनुष्य का जीवन होती हैं। इनके बिना उसमें किसी रस या उल्लास का आनन्द मनुष्य को नहीं मिलता। वह केवल प्रगल्भ विचारों के ही आसपास चक्कर काटता रहता है जिससे मनुष्य का जीवन केवल साँसारिक ही बना रहता है। इसलिए अब जीवन-निर्माण में तब की अपेक्षा अधिक सतर्कता की आवश्यकता है। सत्पथ पर चलते हुए भी मनुष्य धोखा खा सकता है, पथभ्रष्ट हो सकता है अतः अपने जीवन-लक्ष्य का निर्धारण हमें पूरी सावधानी के साथ करना चाहिए और आध्यात्मिक जीवन की आवश्यकता को स्वीकार कर लेने के बाद दृढ़तापूर्वक, मनोयोगपूर्वक उसमें लगा रहना चाहिए। आपकी भावनायें दृढ़ बनी रहेंगी, निश्चय बलवान बना रहेगा तो अनेक कठिनाइयों में भी आप निर्भयतापूर्वक अपने जीवन-लक्ष्य की ओर बढ़ते रहेंगे। मनुष्य का पौरुष दृढ़ निश्चय में है। सुदृढ़ भावनाओं वाले व्यक्ति ही आत्मजयी होते हैं।
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पट बन्द हों ऐश्वर्यता के अब सदा को आज से।
भगवान अब बाहर न होगा लोक और समाज से॥
मैं चाहती अनगित स्वरों में विश्व को दूँ, बता!
इन्सान मेरा देवता!!
रवि के प्रबलतम ताप ने श्रम को पसीना कर दिया,
प्रत्येक जिसकी बूँद ने जीवन धरा पर भर दिया,
वह मूर्ति पौरुष की बने चिर अर्चिता॥1॥
घनघोर तीव्र प्रहार से जब बज्र-सा लोहा कटा,
तब आग की चिनगी उठी व्यापक युगों का तन कटा,
इस साधना की है नियम भी अनुगता ॥ 2 ॥
पट बन्द हों ऐश्वर्यता के अब सदा को आज से,
भगवान अब बाहर न होगा लोक और समाज से,
देवत्व का ही नाम होगा मनुजता ॥ 3 ॥
इन्सान मेरा देवता!!
-विद्यावती मिश्र
अगम जल-धार है नाविक! सम्हल कर नाव ले जाना!
तरंगों के थपेड़ों से बचा लाना, बचा लाना!
भँवर से तीव्र फेरे हैं,
कहीं जल जन्तु घेरे हैं,
अन्धेरी शून्य बेला में,
न संगी—संग तेरे हैं।
किसी भी यत्न से होगा न तट पर लौट कर आना।
अगम जल-धार है नाविक! सम्हल कर नाव ले जाना।
करो फिर भी न मन में भय,
सफलता है निकट, निश्चय
तेरी दृढ़ता और, लगन पर,
कहेगा विश्व भर जय-जय
शिलाओं से तुम्हारा व्यर्थ जायेगा न टकराना।
अगम जल-धार है नाविक। सम्हल कर नाव ले जाना।
—प्रमुदरंजन मिश्र “प्रमुद”
सब सूरत है तुम दर्शन हो,
सब पवित्र है तुम पावन हो,
ऋतुओं में जैसे सावन हो,
दर्शन विमल तुम्हारा इतना, मैं मन्दिर तक चला गया।
बूंद-बूंद में बहते-बहते मैं सागर तक चला गया।
—महेन्द्र मधुकर
कितना रूप संवारो सब ढक जायेगा,
दर्पण का प्रतिबिम्ब सिर्फ छल पायेगा,
मन की घाटी में कितना कोलाहल है।
साँसों का सौदागर सब ले जायेगा।
क्षण भर का यह कोलाहल, यह चहल पहल;
कितने सूने लगते, उजड़े राजमहल;
कितना तेज निशाना समय शिकारी का
मनशा उतर जाता है प्रणय-पुजारी का।
—प्रो0 प्रकाश आतुर
जीवन में सुख-दुख का समान डेरा है;
यों हर्ष विषादों ने यह जग घेरा है।
अज्ञानी व्याकुल होते घबराते हैं,
ज्ञानी जन कष्टों में भी सुख पाते हैं।
है वीर वही जो द्वन्द्व सहर्ष सहेगा।
सुख नहीं रहा तो दुःख भी नहीं रहेगा॥
—श्याम कुमारी गुप्ता
टिमटिमाती रोशनी क्या रास्ते रोशन करेगी?
और कृत्रिम मुसकराहट भार जीवन का हरेगी?
यदि जलाने दीप हैं तो हृदय-कुटिया में जलाओ,
और अपना आचरण इतना अधिक ऊँचा उठाओ,
अप्सरा बनकर गिरावट लाख दे तुमको प्रलोभन,
पर न तुमको डिगा पाए स्वयं ही हो जाय अर्पण,
एकता का तेल डालो विश्व के सूखे दिए में,
बैर का गुल झाड़ कर देखो भगा जाता अन्धेरा।
—शान्ति सहाय ‘नलिनी’
गृहस्थ जीवन में जितने भी सुख हैं, वे सब दाम्पत्य जीवन की सफलता पर सन्निहित हैं। दाम्पत्य जीवन सुखी न हुआ तो अनेक तरह के वैभव होने पर भी मनुष्य सुखी, सन्तुष्ट तथा स्थिरचित्त न रह सकेगा। जिनके दाम्पत्य जीवन में किसी रह का क्लेश कटुता तथा संघर्ष नहीं होता वे लोग बल, उत्साह और साहसयुक्त बने रहते हैं। गरीबी में भी मौज का जीवन बिताने की क्षमता दाम्पत्य जीवन की सफलता पर निर्भर है, इसे प्राप्त किया ही जाना चाहिए।
वैवाहिक जीवन की असफलता में आर्थिक सामाजिक और संस्कारजन्य कारण भी होते हैं, किन्तु मुख्यतया—मनोवैज्ञानिक-व्यवहार की कमी के कारण ही दाम्पत्य जीवन असफल होता है। वस्तुओं का अभाव परेशानियाँ जरूर पैदा कर सकता है, किन्तु यदि पत्नी में पूर्ण प्रेम हो तो गृहस्थ जीवन में स्वर्ग तुल्य सुखोपभोग इसी धरती पर प्राप्त किए जा सकते हैं। दुःख का कारण केवल अनास्था और त्रुटिपूर्ण व्यवहार ही होता है। इसे सुधार लें तो दाम्पत्य जीवन शत-प्रतिशत सफल हो सकता है।
सुखी दाम्पत्य का आधार है, पति-पत्नी का शुद्ध सात्विक प्रेम। जब दोनों एक दूसरे के लिए अपनी स्वार्थ भावना का परित्याग कर देते हैं, तब हृदय परस्पर मिले-जुले रहते हैं। प्रेम में अहंकार का भाव नहीं होता है। त्याग ही त्याग चाहिए विशुद्ध प्रेम के लिए। एक दूसरे के लिए जितने गहन तल से समर्पण की भावना होगी उतना ही प्रगाढ़ प्रेम होना चाहिए। दाम्पत्य सुख प्राप्त करने के लिए प्रेम का प्रयोग करना चाहिए। यह प्रेम त्याग भावना, कर्त्तव्य भावना से ही हो। सौंदर्य और वासना का प्रेम, प्रेम नहीं कहलाता। वह एक तरह का धोखा है। जो इस जंजाल में फँस जाते हैं, उनका दाम्पत्य जीवन बुरी तरह बेहाल हो जाता है। प्रेम आत्मा से करते हैं, शरीर ने नहीं, कर्त्तव्य से करते हैं, कामुकता से नहीं। प्रेम में किसी तरह का विकार नहीं होना चाहिए। शुद्ध निर्मल और निश्छल प्रेम से ही स्त्री-पति एक सूत्र में बंधे रह सकेंगे। सुखी जीवन का यह प्रमुख आधार है।
इस सद्भावना का प्रमुख शत्रु है, अपना विषमय मन; बड़ा शंकातुर होता है, वह बात-बात पर सन्देह प्रकट करता है। लिंग-भेद के कारण स्त्री-पुरुषों में कुछ न कुछ छिपाव होता ही है, हलके स्वभाव के व्यक्ति इन बातों को अपनी कटुता का आधार बनाते हैं। तरह-तरह की कुत्सित कल्पनाओं से सन्देह के बीज बोते और वैमनस्य पैदा करते रहते हैं। स्त्री और पुरुष के बीच में एक विश्वास होना चाहिए। अविचलित विश्वास बना रहेगा तो दुर्भावनायें अपने आप दूर रहेंगी और दाम्पत्य जीवन का वातावरण विषाक्त होने से बच जायेगा।
वेद भगवान का आदेश है कि स्त्री-पुरुष सदैव साथ-साथ रहें वे कभी विलग न हों। विलगता ही सन्देह उत्पन्न करती है। कुटिल शंकाओं की घात तभी लगती है, जब दाम्पत्य जीवन में अलगाव बना रहता है, स्त्रियाँ कभी-कभी अपने माता-पिता के घर चली जाया करें। यहाँ तक तो उचित है, किन्तु सामूहिक जलसों, मेले-ठेलों, सिनेमाओं आदि में दोनों का साथ रहना आवश्यक है। इसी तरह दुःख-सुख के क्षणों में, संपद-विपद में भी एक साथ रहकर अपनी आत्मीयता अक्षुण्ण रखनी चाहिए। यह सम्मिलन होता ही इसलिए है कि सुख का सहयोगी और विपत्ति में धैर्य बँधाने वाला एक साथी चाहिए। भारतीय संस्कृति का यह नियम है कि यहाँ का कोई भी धार्मिक अनुष्ठान स्त्री-पुरुष दोनों के बिना पूरी नहीं होगा। यज्ञ कार्यों में भी यह साहचर्य आवश्यक माना गया है।
निस्वार्थ सेवा भाव हमारे प्रेम-बन्धनों को मजबूत बनाता है। सेवा मनुष्य का सबसे बड़ा कर्त्तव्य है। दाम्पत्य सुख की सुरक्षा में तो वह अपना विशिष्ट स्थान रखता है। सेवा का अर्थ जो यह लगाते हैं कि वह केवल सहधर्मिणी का ही कर्त्तव्य है, वे भूल में हैं। गृह कार्यों का सञ्चालन स्त्री की सेवा है और धन कमाना तथा उसे अपनी पत्नी की इच्छायें पूर्ण करने में पुरुष की सेवा मानी जाती है। इन कर्मों का पालन कर्त्तव्य भावना से हो। दासियों की तरह स्त्रियों से अपनी शारीरिक सेवा लेना बज्रमूर्खता है। बीमारी या विवशता में तो ऐसा सम्भव है किन्तु इसे प्रतिदिन का व्यापार बना लेना उन अविवेकियों का ही काम हो सकता है, जो दाम्पत्य जीवन को एक पवित्र आध्यात्मिक संबन्ध न मानकर केवल जड़ता की दृष्टि से देखते हैं। ऐसे कर्म करें, तो फिर मनुष्य और पशुओं में अन्तर ही क्या रहेगा?
मनुष्य की योग्यता बहुत ही स्वल्प है। कुछ न कुछ कमी सभी में होती है। छोटी-छोटी भूलों, त्रुटियों को तूल देकर जीवन भर के साथी के साथ बिगाड़ पैदा कर लेना मनुष्योचित कर्म नहीं। एक दूसरे की आलोचना करना, खोटी सुनाना—ये आदतें निन्दनीय हैं, इनसे स्त्री-पुरुषों के बीच खाई पड़ जाती है, जिससे सारा जीवन दुःख, क्लेश और कठिनाइयों से ग्रसित हो जाता है। द्वेष दर्शन का परित्याग करें और गुणग्राहकता का स्वभाव बनायें। छोटी-छोटी भूलें के लिए लोग बच्चों को क्षमा कर देते हैं, अपनी त्रुटियों को भी उदारतापूर्वक क्षमा किया जा सके तो पारस्परिक सौजन्यता बनी रह सकती है। जो गुण दिखाई दें, उनकी प्रशंसा करनी चाहिए। जिस वस्तु से किसी को प्रसन्नता मिले, अपनी ओर से उसे पूरा करने की कंजूसी दिखाना उचित नहीं है। अपनी उदारता और क्षमा भावना के द्वारा अपने संबंध दृढ़तर करने का प्रयास दाम्पत्य जीवन की सफलता के लिए प्रत्येक दशा में अपेक्षित है।
सदैव गम्भीर बने रहना, खिन्न मन रहना और उदासीनता व्यक्त करना भी अच्छा नहीं होता। दाम्पत्य जीवन में उल्लास भी हो, हास और विलास भी होना चाहिए। निरंतर काम करते रहने से, श्रम ओर संघर्ष से जो थकान, ऊब और ढीलापन आता है, उसे समाप्त करने का एकमात्र उपाय है—मनोविनोद। पति काम से थक कर जब शाम को घर पहुँचे तो पत्नी का चेहरा हँसता हुआ, खिला-सा दिखाई दे। कुढ़ा हुआ मानसिक थकावट को और भी बढ़ा देता है, इसलिए सदैव हंसमुख और मनोविनोदी भी होना चाहिए। मनोविनोद कर्म-मार्ग का एक अद्भुत संबल है, इससे थकावट दूर भाग जाती है, हम दूसरे दिन के लिए नई ताजगी और स्वस्थता प्राप्त कर लेते हैं। हँसना जीवन शक्ति को बढ़ाता है, शरीर में बल और साहस का सञ्चार होता है। इसी तरह मृदुल हास से स्वभाव, शरीर और आत्मा दृढ़ होती है। इन्हें अपने जीवन में प्रयुक्त किए रहने से संबंध मधुर बने रहते हैं।
दैनिक जीवन में शिष्टाचार, छोटी-छोटी भावनाओं में प्रियजनों की इच्छाओं का समादर भी हो। किसी को छोटा किसी को बड़ा मानने की आदत गलत है। आत्मीयता के परिष्कार के लिए सबको समान इज्जत और प्रेम मिलना अत्यन्त जरूरी है।
अन्तः शातलायाँतुलब्धयाँ शीतलं जगत्।
—योग वशिष्ठ
जिसने अन्तःकरण को शीतल बना लिया उसके लिए सारा संसार ही शीतल है।
शरीर बल, चरित्र बल और मनोबल के द्वारा पुरुष अपना सौमनस्य स्थापित रखे तो सम्पत्ति और समाज की बहिर्मुखी कठिनाइयाँ दाम्पत्य-सुख, को परास्त न कर पायेंगी। अपने जीवन में सदाशयता का प्रयोग करना है ताकि हमारा जीवन सुखी सन्तुष्ट तथा उन्मुक्त बन सके। ऐसा कर सके तो यही समझें कि आपका स्वर्ग आपके घर में ही आने वाला है।
छोटे-बड़े पढ़े-अनपढ़े, धनी-निर्धन का भेद-भाव रखना मनुष्य की सबसे बड़ी कुटिलता है। इससे मनुष्य की उच्छृंखल प्रकृति व्यक्त होती है। वन्य पशु तथा दाम्पत्य जीवन में बँध कर रहने वाले पक्षियों में ऐसा किसी तरह का भेद नहीं होता। मनुष्य में यह भेद-नीति उसके भौतिकवादी दृष्टिकोण के कारण होती है। स्त्री-पुरुष का संबंध विशुद्ध रूप से आध्यात्मिकता से ओत-प्रोत होना चाहिए। इस बात को याद रखने के लिए समय-समय पर धर्मानुष्ठान तीर्थ, यात्रा, पूजा-अर्चा के आयोजन भी होते रहें जिससे आत्मिक पवित्रता का परिष्कार हो। विवाह-जयन्ती मनाने का प्रचलन भी किया जा सकता है इसमें—एक दूसरे के प्रति निष्ठावान बने रहने का संकल्प दोहराते रहना चाहिए।
सुख की अनेक मृग-तृष्णाओं में से पुत्र-प्राप्ति की लालसा भी बड़ी जबर्दस्त है। पुत्र न होना इस अभागे समाज में दुर्भाग्य समझा जाता है अतः विवाह होने के दो-चार वर्ष बाद ही यदि किसी के बच्चा पैदा नहीं हुआ तो लोग विक्षुब्ध होने लगते हैं। तरह-तरह की मनौतियां मनाते हैं। डाक्टरों और देवी-देवताओं की शरण में धन फूँकते रहते हैं। किन्तु परमात्मा के अधिकार की बात, यदि पूरी नहीं हुई, पुत्र का जन्म नहीं हुआ, तो बेतरह बेचैन होते हैं। कई पुत्र गोद लेने की बात करते हैं, कई दूसरी शादी करते हैं।
प्रजनन प्रकृति को अपनी सृष्टि संचालन व्यवस्था को चलाते रहने के रूप में आवश्यक है। इसलिए उसने प्राणियों को एक ऐसे जाल-जंजाल में जकड़ दिया है कि आमतौर से उन्हें उसी गोरखधन्धे को सुलझाने में अपना जीवन-क्रम पूरा करना पड़ता है। पुरुषों में प्रबल कामेच्छा और स्त्रियों में तीव्र मातृत्व की भावना नहीं होती तो सम्भवतः इस सृष्टि का क्रम पहले ही रुक गया होता। विषय भोग की इच्छायें ही सन्तान के प्रति ममता, नाना प्रकार की तृष्णाओं तथा माया-मोह के जाल में मनुष्य को फँसाये रखती हैं और इस संसार के सारे काम विधिवत् चलते रहते है। संसार के बहुत थोड़े से व्यक्ति कोई महान् उद्देश्य लेकर जीवन जीते हैं, अधिकाँश लोग तो इसी भूल-भुलैया में पड़े हुए जीवन यापन करते रहते हैं। विषय भोग, नारी का आकर्षण और सन्तान सुख की झूठी कल्पनाओं में ही मनुष्य जीवन का सारा ताना-बाना चलता रहता है।
जहाँ तक प्राकृतिक जीवन की बात है विषय-वासना और सन्तानोत्पत्ति कोई अपराध नहीं हैं बल्कि यह एक प्रकार से कालक्षेप करने का अच्छा मनोविनोद ही है। किन्तु सन्तान के लिए अनुचित मोह मनुष्य के लिए उचित नहीं है। जिनके यहाँ कोई सन्तान नहीं है उन्हें समझना चाहिए कि परमात्मा ने उनके लिए धर्म-कर्म और जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अधिक सुअवसर प्रदान किया है।
पिण्डदान और सन्तान के द्वारा तर्पण आदि से जो स्वर्ग और मोक्ष की अभिलाषा करते हैं उन्हें यह समझना चाहिए कि परमात्मा कर्मकाण्ड के बाह्य स्वरूप को देखकर ही किसी के लिए पुण्य-फल और स्वर्ग-मुक्ति की व्यवस्था नहीं कर देता। अपने ही अच्छे-बुरे कर्मों का फल मनुष्य भोगता है। फिर प्रत्येक सन्तान सद्गुणी ही होगी इसका भी तो कुछ ठीक-ठीक पता नहीं है। सन्तान के द्वारा स्वर्ग-मुक्ति की कल्पना इस दृष्टि से प्रवंचना मात्र है, इसके लिए दुःखी होना मनुष्य के लिए उचित नहीं।
जिस तरह अनियंत्रित कामवासना अधर्म है उसी तरह सन्तान के लिए मोह-भाव बन्धन का कारण है। मनुष्य जीवन का यह तुच्छ सा उपयोग है। हमारा जीवन इससे ऊँचे उठ कर जब विशुद्ध पारमार्थिक कर्मों में प्रवृत्त होता है तभी सुख-स्वर्ग की कल्पना की जा सकती है। इसके लिए सन्तान हो ही यह कोई जरूरी नहीं है। सन्तान पालन के लिए जो जीवन विविध कर्मों में फँसा देना पड़ता है वह, यदि सन्तान न हों, तो बचाकर श्रेय की साधना पूरी कर सकता है। अतः इन से वैराग्य उत्पन्न करने और इनकी ओर चित्तवृत्तियों को न भटकने देने में ही कल्याण है। जिनके सन्तान है उन्हें तो अपने कर्त्तव्य का पालन करना ही चाहिए पर जिन्हें सन्तान उपलब्ध नहीं हुई उन्हें अकारण परेशान नहीं रहना चाहिए। “पुत्र होता तो सुख मिलता” यह कल्पना सर्वथा निराधार है। अनेक व्यक्तियों को सन्तान के द्वारा कष्ट पाते देखा गया है। इसके विपरीत कितने ही ऐसे हुये हैं जिन्होंने सन्तान न होने पर भी अपेक्षाकृत अधिक आनन्द अनुभव करते हुए सुविकसित जीवन बिताया है।
राजा महेन्द्र प्रताप ऐसे ही व्यक्तियों में से एक हैं। कहते हैं उनके कोई सन्तान नहीं थी फिर भी एक दिन उन्होंने सभी नाते-रिश्तेदारों को पुत्र के नामकरण संस्कार में सम्मिलित होने का निमंत्रण भेज दिया। आचार्य के रूप में महामना मदनमोहन मालवीय जी आमंत्रित थे। उत्सव में सारे-उपक्रम जुटाये जा चुके थे पर सभी को एक ही हैरानी हो रही थी कि राजा साहब के तो कोई सन्तान है ही नहीं फिर नामकरण संस्कार किसका किया जायगा? सभी कौतूहल में थे, तभी मालवीय जी ने घोषणा की कि राजा साहब ने सन्तान के रूप में एक विद्यालय को जन्म दिया है उसी का नामकरण किया जाना है।
पुत्र रहा होता तो सम्भवतः राजा साहब को कोई जानता भी नहीं किन्तु जिस “प्रेम महाविद्यालय” को उन्होंने जन्म दिया उसके कारण देश-विदेश में सर्वत्र उनको लोग श्रद्धा से सिर झुकाते हैं।
बालक आगे चलकर पिता का नाम रोशन करता है, यह सोचना नितान्त भ्रमपूर्ण है। विचार करके देख सकते हैं कि अब तक संसार में कितने लोग मर कर चले गये इनमें से कितने सौभाग्यवान ऐसे हैं जिन्हें पुत्रों को द्वारा यश मिला है? ऐसे व्यक्ति बहुत ही थोड़े होंगे। यश मनुष्य को तप, त्याग और श्रेष्ठ कर्मों के सम्पादन से मिलता है। इसके लिए निःसन्तान होना कोई बाधा नहीं है।
बालक के पालन-पोषण, सेवा-शुश्रूषा में जो झंझट उठाने पड़ते हैं उनसे दाम्पत्य-जीवन का सारा आनन्द ही चला जाता है। लोग चाहें तो इस अवसर का लाभ ज्ञान-वृद्धि के रूप में प्राप्त कर सकते हैं। समय का सदुपयोग व्यक्तिगत योग्यता बढ़ाने से लेकर जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति तक किसी में भी किया जा सकता है। पति-पत्नी आपस में अधिक स्नेह, आत्मीयता और सहानुभूति अनुभव कर सकते हैं।
कई बार मनुष्य अपनी अतृप्त इच्छाओं की पूर्ति पुत्र या पुत्री के माध्यम से पूर्ण हुआ देखना चाहते हैं। जिन्हें परिस्थितिवश अधिक शिक्षा प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला वे सोचा करते हैं कि अपने बच्चे को खूब पढ़ा-लिखा कर विद्वान बना देंगे, ताकि सर्वत्र उसका सम्मान किया जाय। इसमें लोग अपना गौरव भी समझते हैं। पुत्री की अपेक्षा पुत्र से यह सौभाग्य प्राप्त करने की अधिक आशा की जाती है। यह दृष्टिकोण सन्तान के प्रति और भी मोह उत्पन्न करने वाला है। परन्तु यह मनुष्य का बिलकुल ओछा दृष्टिकोण है। अपने ही बालक हों तो उनकी शिक्षा तथा विकास में सुख देखने की धारणा मनुष्य के स्वार्थीपन का लक्षण है। समाज में कितने ही बालक ऐसे होंगे जो साधनों के अभाव में अविकसित रह रहे होंगे। विकास के लक्षण होते हुए भी उनकी परिस्थितियाँ अनुकूल न बन पाती होंगी। इन बालकों के उत्थान के लिए यदि निःसन्तान व्यक्ति कुछ योग दे सकें तो यह उनके लिए अधिक सुख तथा संतोष की बात होगी। हमें अपने आप तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए। यह सोचना चाहिए। कि यह सारा संसार अपना ही घर है। यहाँ सभी अपने भाई, मित्र, पड़ोसी और बालक हैं। यह सोचकर सभी के हित और कल्याण की दृष्टि से जब कर्त्तव्य-पालन किया जाता है तो अपेक्षाकृत अधिक सुख का अनुभव होता है।
वृद्धावस्था में पुत्र सुख देगा ही अब इसकी भी कोई गारण्टी नहीं रह गई। बालक कुसंस्कारी हो तो मनुष्य तरह-तरह के झंझटों, कलह और मुसीबतों में ही पड़े रहते हैं। यौवन के उन्माद में आजकल के युवक प्रायः अशिष्टता का ही बर्ताव करते हैं। अधिकाँश बालक तो यही सोचते हैं कि कब बाप मरे और उसकी सम्पत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त हो। शौक और मौज के लिए कई स्वेच्छाचारी तो अपने अभिभावकों के प्राण तक लेने से नहीं चूकते।
आप यदि निःसन्तान है तो सन्तोष अनुभव कीजिए कि आप अनेकों, झंझटों से मुक्त हैं। संसार में बालकों की भी कोई कमी है। इन सभी को अपना ही अनुभव किया कीजिये और उन्हें वात्सल्य दान दिया कीजिए। इससे आप कहीं अधिक सुख का अनुभव कर सकेंगे। संसार में आत्मा की दृष्टि से सब एक ही हैं। अपने पराये का कहीं कोई भेद-भाव नहीं है। अपने हृदय की विशालता अनुभव कीजिए और पुत्र-प्राप्ति का अनावश्यक मोह छोड़कर अपना आध्यात्मिक लक्ष्य पूरा कीजिए। सन्तान न होना कोई दुर्भाग्य नहीं है। आप सभी के बालकों को अपना ही समझा करें। इससे आपको सुख मिलेगा, सन्तोष बढ़ेगा और शान्ति उपलब्ध हो सकेगी।
संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं, जिसे जीवन में कभी मुसीबतों का, विपत्तियों का सामना न करना पड़ा हो। दिन और रात के समान सुख-दुख का कालचक्र सदा घूमता ही रहता है। जैसे दिन के बाद रात्रि का आना अवश्यम्भावी है, वैसे ही सुख के बाद दुःख का भी आना अनिवार्य है। दुःख भी आध्यात्मिकता की परीक्षा होती है। जैसे सुवर्ण अग्नि में तपकर अधिक सतेज बनता है, वैसे ही धैर्यवान मनुष्य विपत्तियों का साहस के साथ सामना करते हुए जीवन संग्राम में विजय प्राप्त करता है। विपत्तियों की हम किस तरह उपेक्षा कर सकते हैं और अनिवार्य होने पर उनका किस तरह मुकाबला कर सकते हैं, इस पर हम विचार करें।
विपत्तियाँ वास्तव में कुछ नहीं, केवल हमारी प्रतिकूलताएँ हैं। हम जिन वस्तुओं की जिन परिस्थितियों की इच्छा करते हैं, उनका प्राप्त न होना ही विपत्तियाँ कहलाता है। हमारी इच्छा के प्रतिकूल, हमारे स्वार्थ के प्रतिकूल जो भी बात सामने आई, उसे ही हम विपत्ति मान लेते हैं। यदि हम अपने स्वार्थ को, मोह-ममता को और इच्छाओं को मर्यादित और संयमित रखें तो हमें जीवन में बहुत कम मुसीबतों का सामना करना पड़ेगा। हमारा जीवन सदा, स्वावलंबी और सहिष्णु बनने पर विपत्तियों से हमें बहुत कम पाला पड़ेगा और यदि पाला पड़ा भी तो हम उसे हँसते हुए सहज भाव से स्वीकार कर उन पर हावी हो सकेंगे।
विपत्तियाँ साहस के साथ कर्मक्षेत्र में बढ़ने के लिए चुनौती हैं। हम उनसे घबरायें नहीं। बहुत-सी मुसीबतें तो केवल काल्पनिक होती हैं। छोटी-मोटी बातों को तूल देकर हम व्यर्थ ही अपने चारों ओर भय का भूत खड़ा कर लेते हैं। किसी भी कार्य को हाथ में लेने के पहले ही हम उसकी असफलता का चित्र अपने मनःचक्षु के सम्मुख उपस्थित कर लेते हैं और केवल मजबूर होकर उस कार्य को बेमन से किया करते हैं। ऐसी दशा में कार्य में सफलता कैसे प्राप्त होगी? और फिर असफल होने पर भाग्य को कोसते हुए निराश होकर बैठ जाते हैं। हमारी बहुत-सी विपत्तियाँ इसी प्रकार के हमारे अधूरे मन की उपज हुआ करती हैं। इनके अतिरिक्त परिस्थिति, भाग्य, अज्ञान या अन्य अनभिज्ञ कारणों से भी मनुष्य को विपत्तियों का सामना करना पड़ता है। पर यदि हम इन्हें ईश्वर द्वारा हमारी आस्तिकता, आत्म-विश्वास, धैर्य एवं सहिष्णुता की परीक्षा के लिए प्रदत्त उपकरण मानकर हँसते हुए साहस के साथ सहने का अभ्यास डाल लें तो कोई भी मुसीबत, मुसीबत नहीं मालूम पड़ेगी बल्कि उन्हें हम हँसी-खेल समझ कर आसानी से झेलते हुए अपने कर्तव्य मार्ग पर अबाधित गति से अग्रसर होते रहेंगे।
ऐसी भी कई विपत्तियाँ हो सकती हैं, जिनका साहसपूर्वक मुकाबला करने पर भी हमारा घोर अनिष्ट कर दें, पर हमें उसे भी ईश्वरी विधान मानकर सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। इससे हमारा आँतरिक मनोबल बढ़ेगा और हम कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति अर्जित कर सकेंगे। हमें हर परिस्थिति में अपने मन को सन्तुलित, शान्त और स्थिर रखने का प्रयत्न करना चाहिए। हमें अपने से अधिक सम्पन्न और सुखी व्यक्तियों को देखकर ईर्ष्यालु एवं खिन्न होने की बजाय करोड़ों अपने से अधिक साधनहीन दुःखी एवं अभावग्रस्त लोगों की ओर देखकर संतोष मानना चाहिए कि हम पर भगवान की बड़ी दया है।
किसी वस्तु के अभाव का नाम ही विपत्ति है अतः अभाव के लिए रात-दिन चिंता करते रहना व्यर्थ है। हम अपनी परिस्थिति को सुधारने का भरसक प्रयत्न करते रहें और उसके मार्ग में आने वाली संकटों का धैर्यपूर्वक मुकाबला करें। पर यदि प्रयत्नों के बावजूद हमारी आकाँक्षा और इच्छाओं के अनुसार हमारी परिस्थिति में किसी अज्ञात कारणवश शीघ्र वाँछित परिवर्तन या सुधार नहीं होता है, तो हमें घबराकर प्रयत्नों को नहीं छोड़ देना चाहिए बल्कि दुगने उत्साह के साथ हमें अपनी उद्देश्य-प्राप्ति में जुट जाना चाहिए। कष्ट या विपत्ति के आने पर कभी-कभी हमारी विचार- शक्ति भ्रमित और कुँठित सी हो जाती है, ऐसे समय हम अपने आत्म मित्र एवं हितचिंतकों से इस विषय में परामर्श और मार्गदर्शन प्राप्त करने का प्रयत्न करें। संभव है उनकी सूझबूझ और सहायता से हमारे संकट का अनायास निवारण हो जाय। समस्या को हम अपने परिवार के सदस्यों के सन्मुख उपस्थित कर उनकी सलाह भी लें। इस प्रकार हमें कहीं न कहीं से ऐसे प्रेरक विचार मिल जायेंगे, जिनके द्वारा हम अपनी कठिनाई का आसानी से निवारण कर सकेंगे।
जीवन एक संग्राम है। इसमें वही व्यक्ति विजय प्राप्त कर सकता है, जो या तो परिस्थिति के अनुकूल अपने को ढाल लेता है या जो अपने पुरुषार्थ के बल पर परिस्थिति को बदल देता है। हम इन दोनों में से किसी भी एक मार्ग का या समयानुसार दोनों मार्गों का उपयोग कर जीवन-संग्राम में विजयी हो सकते हैं।
स्मरण रखिए, विपत्तियाँ केवल कमजोर, कायर, डरपोक और निठल्ले व्यक्तियों को ही डराती, चमकाती और पराजित करती हैं और उन लोगों के वश में रहती हैं जो उनसे जूझने के लिए कमर कसकर तैयार रहते हैं। ऐसे व्यक्ति भली-भाँति जानते हैं कि जीवन यह फूलों की सेज नहीं वरन् रणभूमि है, जहाँ हमें प्रतिक्षण दुर्भावनाओं, दुष्प्रवृत्तियों और आपत्ति से निडर होकर जूझना है। वे इस संघर्ष में सूझबूझ से काम लेते हुए अपना जीवन-क्रम तदनुसार ढाँचे में ढालने का प्रयास करते रहते हैं और हमेशा इस बात का स्मरण रखते हैं कि किसी भी तात्कालिक पराजय को पराजय न माना जाय बल्कि हर हार से उचित शिक्षा ग्रहण कर नये मोर्चे पर युद्ध जारी रखा जाय और अन्तिम विजयश्री का वरण किया जाय। इस प्रकार के दृढ़ संकल्प वाले कर्मठ व्यक्ति कभी अपने जीवन में निराश नहीं होते अपितु वे दूसरे निराश एवं हताश व्यक्तियों के लिए प्रेरणा के केन्द्र बन जाते हैं।
बहुत से मनुष्य अकारण ही अपने मार्ग में काल्पनिक विघ्न, बाधाओं का ख्याल करते रहते हैं। इससे उनका मन कमजोर हो जाता है। उनमें किसी प्रकार का साहस नहीं रहता और उनकी बौद्धिक शक्ति भी नष्ट हो जाती है उनका मन निषेधात्मक हो जाता है। ऐसे मनुष्यों को अपने चारों ओर विघ्न, बाधायें ही दिखाई देने लगती हैं। उनका आत्म-विश्वास नष्ट हो जाता है और वे सारा जीवन रोते-झींकते निराशा में व्यतीत करते रहते हैं। वास्तव में आशा और आत्म-विश्वास ही महान् शक्तियाँ हैं, जिनके बल पर हम अनेक महान और कठिन दिखाई देने वाले कार्यों को आसानी से एवं सफलतापूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं।
जीवन संग्राम में विजय प्राप्त करने के लिए अपने कार्यक्षेत्र रूपी अखाड़े में निडर होकर खम ठोंक कर लड़ते रहने की आवश्यकता है। इसी तरीके से आप सभी सामान्य संकटों और विपत्तियों से लोहा लेकर उन्हें परास्त कर सकते हैं। राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध, ईसा, मोहम्मद, स्वामी दयानन्द, महात्मा गाँधी आदि महापुरुषों के जीवन संकटों और विपत्तियों से भरे हुए थे, पर वे संकटों की तनिक भी परवाह न करते हुए अपने कर्त्तव्य मार्ग पर अविचल और अबाध गति से अग्रसर होते रहे। फलतः वे अपने उद्देश्य में सफल हुए और आज संसार उन्हें ईश्वरी अवतार मानकर पूजता है।
विपत्तियों एवं कठिनाइयों से जूझने में ही हमारा पुरुषार्थ है। हमारे राष्ट्र नायक पं0 जवाहर लाल नेहरू का कथन है ‘हमेशा खतरों से भरा जीवन जियो’ बिना संकटों के मनुष्य का जीवन निखर नहीं सकता और न उसमें त्याग, तितिक्षा एवं सहिष्णुता का ही विकास हो पाता है। अतः कठिनाइयों को खिलवाड़ समझकर उनका हँसते-हँसते मुकाबला करना सीखिए। धैर्य की परीक्षा आपत्तिकाल में ही होती है—
धीरज, धर्म, मित्र, अरु नारी।
आपतिकाल परखिए चारी॥
रामायण की इस चौपाई को हम अहर्निश ध्यान में रखते हुए आने वाली हर मुसीबत का निर्भीकता और दृढ़ता के साथ सामना करें। आप देखेंगे कि ज्यों ही हम विपत्तियों का मुकाबला करने के लिए कटिबद्ध होंगे, त्यों ही विपत्तियाँ दुम दबाकर भाग खड़ी होंगी, संकटों के सब बादल छँट जाएंगे और परिस्थिति निष्कंटक होकर हमारे लिए अनुकूल हो जायगी।
आज के घोर आर्थिक युग में प्रायः यह देखने में आता है कि जिस प्रकार हर बात का मापदण्ड पैसा बन गया है, उसी प्रकार बच्चों के लाड़-प्यार का मापदण्ड भी पैसा बन गया है। जो व्यक्ति अपने बच्चों पर जितना अधिक खर्च करता है और जितना अधिक खर्च करने को देता है, मानो वह उन्हें उतना ही अधिक प्यार करता है।
जहाँ माता-पिता बच्चों के प्रति अपने प्यार को इस प्रकार आँकते और अँकवाते हैं, वहाँ बच्चों ने भी अपने माता-पिता के प्यार का मापदण्ड पैसा बना लिया है। बहुधा देखा जाता है कि जितने माता-पिता अपने बच्चों पर जिस अनुपात से खर्च करते हैं और उनको खर्च करने को देते हैं, बच्चे उसी अनुपात से उनकी ओर आकर्षित रहते हैं, और दोनों पक्ष इस स्वार्थ-जन्य आकर्षण को प्यार समझने के भ्रम में भूले रहते हैं।
स्कूलों और कॉलेजों के लड़के अपने माता-पिता की अच्छाई-बुराई की विवेचना अधिकतर आर्थिक आधार पर करते पाये जाते हैं। जो लड़के अच्छे-अच्छे कपड़े पहनने और ज्यादा से ज्यादा पैसा खर्च करने को पाते हैं, वे तो बढ़-चढ़ कर अपने माता-पिता की तारीफ करते हैं, और जो बेचारे इससे वंचित रहते हैं वे वास्तविक रूप से अच्छे होने पर भी अपने माता-पिता की प्रशंसा करने में शर्म महसूस करते हैं।
आज अर्थ-जन्य प्यार का इतना बोलबाला हो गया है कि वे माता-पिता अपने बच्चों की सहज श्रद्धा से भी वंचित रहने लगे हैं, जिनके पास एक अच्छा आर्थिक आधार नहीं होता, अपितु कभी-कभी उन्हें अपनी सन्तानों की तुरसी और तिरस्कार का भी पात्र बनना पड़ता है।
धनाढ्य माता-पिता आत्म-अध्ययन के अनुभव पर अपने आर्थिक आधार को जीवन-भर बड़ी दृढ़ता से पकड़े हुये, आर्थिक-लोभ से उत्पन्न बच्चों की प्रतिस्पर्धी श्रद्धा को बनाये रखने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ तक कि वसीयत करते समय “जब तक जिऊँ, मेरे मरने के बाद” आदि वाक्यों की व्यवस्था बड़ी सावधानी से करा लेते हैं। उन्हें सन्तानों से अधिक अपने पैसे पर अधिक भरोसा रहता है। यह सब अर्थ के प्रति बच्चों का गलत दृष्टिकोण विकसित करा देने का ही फल है।
बच्चों के जरा रोने, रूठने अथवा नाराज होने पर तुरन्त देकर मनाने का अभ्यास उनके भविष्य के लिए एक भयानक भूमिका है। इस प्रकार वे पैसे के लोभी बन जाते हैं, और बेबात तक पर रूठ कर माँ बाप का आर्थिक शोषण करने के आदी हो जाते हैं, जो आगे चलकर परिस्थितिवश उनके बीच नापसन्दगी का कारण बन सकता है।
जो माँ-बाप अपने बच्चों को बिना समझे-बूझे मनमाना पैसा खर्च करने को देते हैं, वे न केवल उनके जीवन के साथ खिलवाड़ करते हैं, वरन् परोक्ष रूप से समाज में फैली बुराइयों को भी बढ़ावा देते हैं।
बच्चों की भोजन, वस्त्र, दूध, नाश्ता, पुस्तकें, फीस आदि की प्रायः सारी आवश्यकतायें जब घर पर ही पूरी हो जाती हैं, तब उन्हें अलग से और पैसा देने की आवश्यकता समझ में नहीं आती। यह निश्चित है कि अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाने के बाद जो धन उन्हें अलग से खर्च करने के लिए दिया जावेगा, उसको वे अनावश्यक चीजों पर ही खर्च करके अपनी आदत बिगाड़ लेंगे। वे उस पैसे से चाट खायेंगे, पतंग-उड़ायेंगे, सिनेमा देखेंगे, पान-सिगरेट का प्रयोग करेंगे और होटल व रेस्टोरेन्टों में यार-दोस्तों के साथ बैठकर खाने न खाने वाली चीजें खायेंगे, चाय पियेंगे और गप्प मारते हुए समय गंवाएंगे और न जाने इस प्रकार की कितनी बुरी बातों के आदी बन जायेंगे
हाथ में अनावश्यक पैसा होने से उनकी वृत्तियाँ चंचल हो उठेंगी और उनका मन पढ़ने-लिखने के बजाय घूमने-फिरने और सैर-सपाटे की ओर दौड़ेगा। अपने स्वार्थी मित्रों से घिरे रहने के कारण दुर्व्यसनी बन जावेंगे। जो आगे चलकर उनकी दुःखपूर्ण आर्थिक अस्त-व्यस्तता का कारण बनेगा।
किन्तु इसका यह मतलब कदापि नहीं है कि मनुष्य के बच्चों की आवश्यकतायें भी उतनी ही सीमित आवश्यकतायें हैं जितनी कि एक गाय के बच्चे की- आवश्यकता भर दाना-पानी और रात को एक झूल बस।
आज के समय में जिस प्रकार विविध वस्तुओं की बढ़ती हो गई है, उसी प्रकार सबकी आवश्यकताएं भी बढ़ गई हैं। बच्चा खेलने के लिए गेंद-बल्ला चाह सकता है, स्कूल की प्रदर्शिनी में लगी बाजार में क्रय-विक्रय करने की इच्छा रख सकता है। किसी आयोजित पिकनिक में जाते समय जेब में पैसा होना जरूरी हो सकता है, मेले में कोई सुन्दर वस्तु खरीदने के लिए लालायित हो सकता है। कभी-कभी सिनेमा देखने को जी कर सकता है। विद्यार्थी संघों अथवा समितियों में चन्दे की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी बहुत-सी चीजें खाने की इच्छा कर सकता है जो घर पर अच्छी प्रकार अथवा सुविधापूर्वक नहीं बनाई जा सकतीं। कोई अच्छी पुस्तक अथवा पत्रिका पढ़ने को मन हो सकता है, अथवा जेब में पैसा रहने के सुखद-संतोष की कामना कर सकता है, आदि बच्चे की ऐसी बहुत-सी अतिरिक्त एवं सामयिक आवश्यकतायें हो सकती हैं।
बच्चे को पैसे के दर्शन न करना अथवा उसकी सामयिक एवं अतिरिक्त आवश्यकताओं के लिए पैसा न देना भी उसके साथ अन्याय करना होगा। बच्चे को पैसे की बुराई से बचाने के लिए आर्थिक पाश को इतना न कसिये कि वह कसमसा कर दरिद्र भावना का शिकार हो जाये, पैसे पैसे को तरस जाये, और इस प्रकार तो वह अनुचित ढंग से पैसा पाने का प्रयत्न करने लगेगा।
आप बच्चे को पैसा दीजिये किन्तु एक निश्चित सीमा तक जिम्मेदारी के साथ। उसे “हर बात पर पैसा हर बात पर पैसा”—का आदी न बनाइये, और नाहीं उसके बार-बार माँगने पर पैसा देकर पीछा छुड़ाने की कोशिश कीजिए। और यह बात तो अपने मस्तिष्क से बिलकुल ही निकाल दीजिए कि बच्चे को बहुत अधिक शान-शौकत से रखना अथवा खर्च के लिए अधिक से अधिक धन देना कोई आर्थिक गौरव अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा की बात है।
बच्चे की अतिरिक्त आवश्यकता के औचित्य, अनौचित्य का पता इस ढंग से लगाइये कि वह यह न समझने पावे कि उसकी माँग पर सन्देह किया जा रहा है, अथवा उसकी जासूसी की जा रही है। बच्चा जब पैसा माँगे तब प्यार से उसकी जरूरत की बाबत पूछिये, यदि उसकी आवश्यकता अनुचित होगी तो वह खुद अचकचा जायेगा, तब उसे न तो झिड़किये और न शर्मिन्दा कीजिए, वरन् प्यार से कहिये कि देखो तुम जिस काम के लिए पैसे चाहते हो उसको स्वयं बुरा समझते हो। बच्चे पर इसकी स्वस्थ प्रतिक्रिया होगी, और शरमा कर फिर कभी दुरुपयोग के लिए पैसा की माँग नहीं करेगा। और यदि आप देखें कि उसकी माँग उचित है तो अवश्य उसे पूरा करने का भरसक प्रयत्न कीजिए।
यस्मान् त्रयो ऽप्याश्रमिणो नान्नेन चान्वहम्।
गृहस्थे नैवधार्यन्ने तस्माज्येष्ठा श्रमो गृही॥
—मनु. 3 । 78
ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, संन्यासी इन तीनों आश्रमों का पालन गृहस्थी के ही ज्ञान और अन्न से होता है। इसलिए गृहस्थ श्रम ही सबसे बड़ा है।
किं बहूक्तेन लोके ऽस्प्रिन्साधनं यद्धिविद्यते।
ब्रह्मचर्ये तु तर्त्सयमर्न्तभवति सर्वथा॥
ब्रह्मचर्य की महत्ता के विषय में जितना कहा जाय कम है। इस संसार में सुख-सुविधाएँ प्राप्त कराने वाले जितने भी साधन हैं उन सब में श्रेष्ठ साधन ब्रह्मचर्य है। अन्य सब साधन तुच्छ हैं।
बच्चे को अपने साथ बाजार ले जाइये। कोई वस्तु खरीदने में इस ढंग से उसकी राय लीजिए कि उसकी राय आपकी राय से साम्य खा जाये, और यदि कोई विशेष अड़चन न हो तो अपनी देख-रेख में पैसे उससे गिनाकर दिलाइये इससे बच्चे में आर्थिक लेन-देन की चेतना का विकास होगा, और वह अपने अन्दर एक जिम्मेदारी महसूस करेगा। कोई भी वस्तु जिसे आप अधिक मूल्य के कारण खरीदना न चाहें उसमें बच्चे की अस्वीकृति शामिल कीजिए। इससे उसमें मितव्ययिता का भाव बढ़ेगा और पैसे का महत्व समझेगा।
बच्चे को पैसा दीजिए और माँ के पास जमा कराने की आदत डालिये। कभी-कभी अपने पास पैसे की कमी बतला कर उससे उधार माँगिये और उसकी बचत की सराहना करते हुए कहिये—”वाह भाई इस समय तुम्हारी बचत ने हमारा अटकाव दूर कर दिया”। इस प्रकार उसमें आकस्मिक आवश्यकता के लिए बचत करने का उत्साह बढ़ेगा।
उसकी बचत से उसे स्थायी शोभा, स्थायी उपयोगिता अथवा स्थायी अभिरुचि की चीजें खरीदवाइये, जिससे उसमें उपयोगिता तथा सौंदर्य के प्रति अभिरुचि उत्पन्न होगी।
अधिकतर बच्चे के अतिरिक्त व्यय की मात्रा निश्चित धन राशि में रखिये और उसको घर का आय-व्ययक बनाते समय पास बिठाइये, इस प्रकार उसमें अपने व्यय का बजट बनाने की अभिरुचि उत्पन्न होगी, जिससे वह पैसे के उपयोग की कला सीखेगा।
जहाँ तक हो सके उसे अतिरिक्त व्यय किसी ऐसे काम के लिए दीजिए जिसे वह कर सके ओर जो उसके विकास के लिए उपयोगी भी हो। इस प्रकार उसमें श्रम की आदत तो पड़ेगी ही, साथ ही वह धनोपार्जन की कठिनता को भी समझने लगेगा।
इस प्रकार यदि बच्चे में आर्थिक अनुशासन की प्रवृत्तियाँ बाल्य-काल से ही विकसित कर दी जाती हैं तो वे आगे चलकर उसके जीवन के लिए बड़ी उपयोगी सिद्ध होती हैं। यदि बच्चे में आपने अर्थ-नियन्त्रण की क्षमता का विकास कर दिया तो समझिए आपने उसके आगामी जीवन की बहुत-सी कठिनाइयाँ प्रारम्भ में ही दूर कर दीं।
किन्तु इसके लिए वह नितान्त आवश्यक है कि माता−पिता इस विषय में स्वयं भी पूर्णतया अनुशासित रहें किसी क्षेत्र में पैसे का अपव्यय तो नहीं ही करें, अपितु कोई ऐसी वस्तु भी न खरीदें जो एकमात्र उनकी एकाकी अभिरुचि की हो, और यदि उसे खरीदते ही बने तो उसमें घुमा-फिरा कर बच्चे की रुचि शामिल कर लीजिये।
समझ लीजिए कि जीवन निर्माण एक शिल्प है जिसका अच्छा बुरा होना बहुत कुछ आर्थिक-नियंत्रण पर निर्भर करता है। बिना समझे-बूझे बच्चे के बार-बार जिद पर पैसा देकर पीछा छुड़ाने की कोशिश न कीजिए उसके बुरे स्वभाव के सामने आत्म-समर्पण की शीघ्रता उसके स्वभाव को और भी बिगाड़ देगी।
किसी हद तक ठीक होने पर भी इस भावना से कदापि प्रेरित न होइये—”कि जो कुछ है या जो कुछ कमाते हैं, है तो सब बच्चों के ही लिए, खाने-उड़ाने दो।’ आपकी यह असंस्कृत उदारता बच्चों के लिए हानिकारक सिद्ध होगी। वैसे तो समाज में जिसके पास जो कुछ है उसके कुछ न कुछ अंश पर, धर्म, देश, समाज एवं परोपकार का नैतिक अधिकार है, फिर भी यदि आप अपने प्रत्येक पैसे पर केवल अपने बच्चों का ही अधिकार मानते हैं, तो भी उसे खाने-उड़ाने की स्वतन्त्रता देकर उनकी आर्थिक बहबूदी को कमजोर करते हैं।
अन्य दुर्व्यसनों की भाँति आर्थिक अपव्ययता भी एक ऐसा व्यसन है जो बचपन से लग जाने पर आजीवन पीछा नहीं छोड़ता। अतएव, अपने बच्चों को अर्थ-अनुशासन की स्वस्थ शिक्षा देकर उनका हित कीजिए। उन्हें न तो पैसे का दुश्मन ही बनाइये और न दास ही, अपितु एक सच्चा मित्र बनाकर अभिभावक का ठीक-ठीक कर्तव्य पालन कीजिये।
दैवी ज्ञान हुए बिना मनुष्य को अपनी कीमत नहीं मालूम होती और इसलिए अपने विषय में वह औरों से जानना चाहता है। जब कि अपने संबंध में वह अपनी आत्मा से विश्वस्त किन्तु दृढ़तापूर्वक जानकारी कर सकता है। साँसारिक दृश्य पर देव मोहित नहीं होते क्योंकि निरन्तर अन्तर दृष्टि रखने के कारण उन्हें अपने भीतर ही उससे अधिक महत्वपूर्ण चीजें मिल जाती हैं।
—महर्षि रमण
हमारे जीवन-निर्वाह के लिए सदा धन की आवश्यकता पड़ा करती है। छोटा-बड़ा, गरीब-अमीर कैसा भी मनुष्य क्यों न हो, वह धन को अवश्य महत्व देता है और अनुभव करता है कि इसके बिना हमारा काम नहीं चल सकता। वर्तमान समय में तो धन की महिमा इतनी अधिक बढ़ गई है कि लोग चाँदी-सोने के चन्द टुकड़ों के लिए कैसा भी काम करने को तैयार हो जाते हैं। जहाँ धन का प्रश्न सामने आता है अधिकाँश लोग सच-झूठ, धर्म-अधर्म, नीति-अनीति संबंधी समस्त विचारों को उठाकर ताक पर रख देते हैं। ऐसे लोग खुले आम कहते हैं कि पास में पैसा होगा तो सब कोई हमारी बात पूछेगा, पर पैसा न हो तो कोई कौड़ी के तीन भी न लेगा, चाहे हम कैसे भी भले और पुण्यात्मा क्यों न हों।
धन के संबंध में लोगों की उक्त धारणा को हम सोलह आना तो सच नहीं मान सकते पर इसमें सन्देह नहीं कि धन की आवश्यकता सदा से सबको रही है और आजकल तो ऐसा जमाना आ गया है कि बिना रुपये-पैसे कि एक दिन भी गुजारा होना सम्भव नहीं है। इस समय सब प्रकार की साधन सामग्री प्राप्त हो सकने का एकमात्र माध्यम रुपया ही बना दिया है, उसके द्वारा सभी कामों के सम्पन्न होने में पूर्ण सुविधा होती है, और इसलिए एक साधारण स्थिति का आदमी सबसे पहले उसी के लिए इच्छा करता है।
धन की आवश्यकता तथा उपयोग को स्वीकार करते हुए भी हम यह बतलाना चाहते हैं कि उसके प्रति लोगों ने जो दृष्टिकोण अपना रखा है वह वास्तव में सही नहीं है, और उसके कारण संसार का उत्थान होने की बजाय वह एक बड़ी दुर्दशा में फँस गया है। धन के लोभ ने मनुष्यों में सैकड़ों प्रकार के दुर्गुण पैदा कर दिये हैं और अनेक मानवीय विशेषताओं का खात्मा कर दिया है। चोरी, हिंसा, बेईमानी, ईर्ष्या, द्वेष, अविश्वास, दम्भ आदि अनेक दोषों की वृद्धि का कारण यह धन का अनुचित महत्व ही है। लोग तो धन को सुख का साधन मानते हैं, पर जरा गहराई से उतर कर विचार किया जाय तो आज धन ने सब लोगों का जीवन विपत्ति ग्रस्त और दुखी बना दिया है। धनवानों को अपने धन की रक्षा की चिन्ता रहती है, वे सभी को अपने धन पर ताक लगाये समझकर अविश्वास करने लगते हैं और इस कल्पना से बड़ा दुख पाते रहते हैं कि यदि किसी कारणवश हमारा धन जाता रहा तो हमारी क्या दशा होगी। दूसरी तरफ गरीब धन के अभाव से किसी तरह की उन्नति करने में असमर्थ रहते हैं, उनके विकास की गति ही रुक जाती है। उनको बचपन से ही पढ़-लिख कर एक सभ्य नागरिक बनने की बजाय किसी तरह रुपया, आठ आना कमाकर पेट के गड्ढे को भरने की फिक्र लग जाती है। वे भी धन के अभाव से अनेक प्रकार के असत्य व्यवहार करने को बाध्य होते हैं और अमीरों की खुशामद, लड़ना, झगड़ना आदि अनुचित कार्य का आश्रय लेने लगते हैं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि धन को गलत तरीके से जो सर्वोच्च स्थान दे दिया गया। और उसके कारण लोगों की धन संबंधी तृष्णा जिस प्रकार बढ़ती जाती है उसके परिणामस्वरूप मनुष्य के सुखी-जीवन का अन्त हो गया है। अनेक लोग धन के द्वारा अमीरों को बढ़िया बँगले, मोटरें, कीमती भोजन, चमचमाते वस्त्र, नौकर चाकर आदि भोग-सामग्री प्राप्त होते देखकर उनको बड़ा सुखी और आनन्द का उपभोग करने वाला समझ लेते हैं। पर वे यह नहीं समझते कि वास्तव में सुख इन जड़ वस्तुओं भौतिक सामग्री में नहीं हो सकता। सुख तो मन की वृत्ति है और वह तभी प्राप्त हो सकता है जबकि हमको किसी उपाय से शान्ति और संतोष मिल सके। केवल धन के कारण कभी किसी का सच्चा सुख प्राप्त नहीं हो सकता, हाँ धन के अनुचित प्रयोग से अनेकों को घोर विपत्ति में फँसते अवश्य देखा गया है।
पर धन की प्रधानता ने हमारा इससे भी बढ़कर अहित किया है। साँसारिक सुखी-जीवन को नष्ट करके वह अब हमारी आत्मा को भी नष्ट कर रहा है। इस तथ्य को समझाते हुए एक विद्वान ने लिखा है कि—”तुम ईश्वर और शैतान दोनों की एक साथ उपासना नहीं कर सकते। न जाने किस बुरी सायत में रुपया-पैसा संसार में आया कि आज हम उसके दास बन गये हैं। यदि मैं कहूँ कि संसार के समृद्धिशाली और सुखी बन सकने में सबसे बड़ी बाधा धन यानी रुपया है तो पुराने खयालों के लोग चौंक पड़ेंगे। पर आज संसार में जो कुछ पीड़ा है वह इस नीच देवता के कारण है। खाद्य-सामग्री का संकट, रोग, व्याधि सबका कारण यही है। चूँकि सभी सुख की वस्तुएँ इसी से प्राप्त की जा सकती हैं, इसीलिए संसार में इतना कष्ट है। जितना समय उपभोग की सामग्री के उत्पादन में लगता है, उससे कई गुना अधिक समय उन वस्तुओं को बेचने के दाव-पेंच में लगता है। व्यापार की दुनिया में ऐसे करोड़ों नर-नारी लगे हुये हैं जो उत्पादन के नाम पर कुछ नहीं करते। आज लाखों आदमी हिसाब- किताब, बही-खाते और प्रचारक बन कर घूमने के काम में परेशान हैं, और लाखों आदमी फौज, पल्टन या पुलिस में केवल इसलिए नियुक्त हैं कि बही खाते वालों की तथा उनके कोष की रक्षा करें। जेल तथा पुलिस की आवश्यकता रुपये की दुनिया में होती है।”
वास्तव में आज की दुनिया की सबसे बड़ी कठिनाई यही है कि लोगों ने रुपये को भगवान समझ कर उस ईश्वरीय आदेश को भुला दिया है कि मनुष्य मात्र एक ही परम पिता की सन्तान हैं और इस दृष्टि से परस्पर में भाई-भाई हैं। अगर मनुष्य इस सचाई को समझकर एक दूसरे को प्यार करने लग जाय और अपने लिए अधिक से अधिक अपनाने की स्वार्थी भावना को त्याग कर प्रतिदान की भावना को ग्रहण करले तो संसार की कायापलट हो जाय। आज जो करोड़ों की सम्पत्ति, किले और महलों, बैंक तथा बीमा कम्पनियों, सेना, पुलिस, जेल तथा चौकीदारों के विशाल दल में खर्च हो रही है वह यदि संसार के पेट भरने में खर्च होने लगे तो शायद कोई भूखा, नंगा या गरीब दिखाई न दे। यदि हम स्वार्थ के स्थान पर परार्थ, भोग के स्थान पर त्याग का भाव कुछ अंशों में भी अपना लें तो संसार के अधिकाँश कष्टों का अन्त हो सकता है।
भारतवर्ष के मनीषियों ने धन की प्रधानता के इन दोषों को आरम्भ में ही समझ लिया था, इसलिए उन्होंने धनोपार्जन के साथ उसके सदुपयोग को भी अनिवार्य बतलाया था। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा कर दी थी कि वही धन सार्थक है जो दीन-दुखी, असहाय और कष्टों में पड़े व्यक्तियों के उद्धार के कामों में खर्च किया जाय। वे धन को परमात्मा का एक धरोहर बतलाते थे, जो हमको इसीलिए दिया गया है कि हम उसे भगवान की बनाई दुनिया की सुव्यवस्था और सेवा के लिए खर्च करें ऐसा करने से धन भी हमारे लिए कल्याणकारी बन जाता है और उससे हमारा आत्म-विकास होता जाता है। यही कारण है कि भारतीय कथाओं में ऐसे अनेक व्यक्तियों का वर्णन मिलता है जिन्होंने दूसरों के हितार्थ अपना सर्वस्व दान कर दिया। हरिश्चन्द्र, कर्ण, हर्ष, भामाशाह आदि के नाम आज भी अत्यन्त आदर और श्रद्धा के साथ इसीलिए याद किए जाते हैं कि उन्होंने लोकोपकार के लिए अपनी सम्पत्ति को तिनके की तरह त्याग दिया था। यह बात नहीं है कि उस समय उनसे बढ़कर अन्य धनवान नहीं थे, या आजकल उनसे बड़े धनी मौजूद नहीं है, पर लोग प्रशंसा उन्हीं की करते हैं जिनका धन दूसरों के हितार्थ व्यय किया जाता है।
पर आजकल का आदर्श इससे सर्वथा विपरीत हो गया है। प्रत्येक व्यक्ति अपने पास एकत्रित धन को अपने और अपने बाप-दादों का बतलाता है और किसी अन्य का उसमें से एक कौड़ी का हकदार भी स्वीकार करने को तैयार नहीं होता। यही कारण है कि उसे अपने धन की रक्षा के लिए तहखानों, तिजोरियों, पहरेदारों, और बन्दूकों की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा व्यक्ति दूसरों को कष्ट देकर उन्हें अभावग्रस्त बनाकर धन इकट्ठा करने में भी कोई बुरा नहीं समझता। इस दृष्टि से उसका धन लोकोपकार की बजाय संसार में दुःख, दैन्य और अव्यवस्था उत्पन्न करने वाला सिद्ध होता है। इस प्रकार का आचरण ईश्वरीय विधान के प्रतिकूल ही है और उससे मनुष्य का आत्म विकास होने के बजाय उसमें कठोरता, कृपणता, क्रूरता के भावों की ही वृद्धि होती है। ऐसे व्यक्ति आन्तरिक शान्ति और संतोष प्राप्त करने के स्थान पर या तो धन अहंकार से उन्मत्त होकर भाँति-भाँति के दुराचरणों के शिकार बन जाते हैं अथवा सदैव धन को बढ़ाते जाने और उसकी रक्षा करने में ही डूब जाते हैं। देखने वाले कहते हैं कि वे अपने धन पर साँप बनकर बैठे हुये हैं।
वास्तव में यह एक बड़ा संकीर्णता का विचार है कि मनुष्य धन को सद्गुणों और सचाई से भी बढ़कर समझने लगे और उसकी प्राप्ति के लिए धर्म-अधर्म और पाप-पुण्य के विचार को भी त्याग दे। ऐसे ही धन लोलुप, अज्ञानी व्यक्तियों की दशा को देखकर भारतीय सन्त यह कहने लगे थे—”अर्थमनर्थ भाविय नित्यम्” अर्थात् अर्थ (धन) को सदैव अनर्थ (पाप) का मूल समझो। निस्सन्देह जिन लोगों की तृष्णा, हविस इतनी अधिक बढ़ जाती है कि वह पैसे को ही सब कुछ समझ कर उसके पीछे दीन दुनिया का ध्यान भी छोड़ देते हैं तो वह पैसा उसके सुख, कल्याण, उत्थान के बजाय उन्हें विवेकशून्य और हीन मनोवृत्ति का बनाने वाला ही सिद्ध होता है। ऐसे लोगों को चाहे कुबेर का भण्डार भी मिल जाय तो भी न तो उनकी तृष्णा शान्त होती है और न वे उससे वास्तविक सुख, आनन्द उठा सकते हैं। ऐसे लोग जन्म भर बुरे से बुरे काम करके धन इकट्ठा करते हैं और मरते समय कारुँ और महमूद गजनवी की तरह उसे देखकर रोते और विलाप करते हैं। ऐसे लोग आगामी जन्म में सचमुच साँप बनकर अपने धन पर बैठते हों तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।
हमको अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि धन किसी का नहीं है। जो उसे अपना समझकर पकड़कर रखना चाहता है वह बड़ा मूर्ख है। हमारे शास्त्रों में लक्ष्मी को ‘चंचला’ बतलाया गया है और कहा है कि जो उसे अपनी समझता है वह अज्ञानी है। सच तो यह है कि यह उसी जगह ठहरती और वृद्धि को प्राप्त होती है जहाँ उसका सदुपयोग किया जाता है। वेदों में उच्च स्वर से यह घोषणा की गई है कि—”सौ हाथों से कमाओ और हजार हाथों से खर्च करो।” इसका आशय यही है कि धनोपार्जन में कोई बुराई नहीं है, मनुष्य को अवश्य ही उद्योगी और कर्मशील बनकर उसका उपार्जन करना चाहिए, पर उसे कंजूस के समान पकड़ कर बैठ जाने के बजाय उचित और आवश्यक कामों में खर्च करते रहना चाहिए। इस प्रकार का गतिशील धन बहती हुई नदी के जल के समान गन्दगी से बचा रहता है और समाज की आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक बनता है। इस प्रकार के व्यवहार से धन को कमाने वाला और उसका संचालन करने वाला भी सर्वसाधारण की प्रतिष्ठा का पात्र बनते हुए आत्मसुख और सन्तोष प्राप्त करता है। ऐसे धनी की सम्पत्ति ही सार्थक और लोक-परलोक में कल्याणकारी मानी जाती है।
निष्फल कर्मों में श्रम खर्च करना व्यर्थ है। क्रिया-शक्ति और पौरुष का इसमें फिजूल नाश हो जाता है। मुझे बहुत लोगों को इकट्ठा करके दिन-रात उपदेश देते रहना अच्छा नहीं लगता। बुरे को सीख देना अपनी वाणी खोना है। समय तो नष्ट होता ही है कभी-कभी अकारण वैर-भाव भी ठन जाता है। इसलिए शिक्षा देते समय यह ध्यान दे लेना बहुत उपयोगी होता है कि उस पर, जिसे उपदेश दिया जा रहा है कुछ प्रभाव भी पड़ता है। ऊसर में बीज बिखेरने से क्या लाभ, गन्दी नाली में एक बाल्टी पानी से कहीं सफाई होती है? दुष्ट को उपदेश देने से क्या लाभ? दुर्जन को अच्छी-अच्छी शिक्षा दी जाय तब भी वह साधु नहीं हो सकता जैसे नीम के पेड़ को यदि घी और दूध से भी खींचा जाय तो भी वह मधुर नहीं होगा।
तुम शिक्षा देने का क्रम बन्द न करना पर यह देखने में भी भूल नहीं करना कि श्रोतागण आपकी शिक्षा ग्रहण करने के लिए उत्कंठित हैं अथवा तुमने वैसी उत्कंठा उसमें पैदा कर दी है। बीज जोती हुई जमीन में डालते हैं तो यह उगता ही है, बढ़ता, फलता-फूलता और समय पर फल भी देता है। किन्तु पत्थरों में बीज बिखेरने का कोई फल नहीं, महत्व नहीं। ऐसा करोगे तो तुम्हारी गाँठ का बीज भी बेकार जाएगा। दुर्जनों के पास जाकर मौन हो जाना अच्छा है ताकि अपनी वाणी-शक्ति का कम से कम दुरुपयोग तो न हो
स्त्रियों की अपेक्षा पुरुषों का कार्य-क्षेत्र कुछ अधिक दुरूह, जटिल और कठिनाइयों से पूर्ण होता है। अकेले श्रम की ही बात होती तो संभवतः उतनी जटिलतायें पुरुष वर्ग के सामने न होती किन्तु लोक-व्यवहार, लेन-देन, गृहस्थी के लिए आपा-धापी, धन-जुटाना, कचहरी मुकदमें आदि करना, इनमें उसे बार-बार निराशा का सामना करना होता है। कितने ही जगह उसे लताड़े मिलती हैं, कई जगह अपमान होता है। कहीं थकावट, कहीं पीड़ा। दिनभर तमाम मुसीबतों, कठिनाइयों का कामना करना पड़ता है। इतनी सारी परेशानियों का बोझ सिर पर उठा कर चलना निःसन्देह पुरुष का ही काम है। सचमुच उसे अधिक कष्ट उठाने पड़ते हैं।
दिन-भर का हारा-थका आदमी अपनी पत्नी और बच्चों से स्नेह और आत्मीयता की आशा रखकर घर पहुँचता है। सोचता है—घर पहुँचते ही पत्नी उसका स्वागत करेगी, कुछ ममत्व प्रकट करेगी, अपने दुःख को सुनकर कुछ प्रबोध देगी, धीरज बंधायेगी तो कुछ सान्त्वना मिलेगी। थके हुए आदमी को एक लोटा जल मिल जाता है तो उसका सारा श्रम दूर हो जाता है। पत्नी के इतना पूँछ लेने से “आज आपका मुख उदास क्यों है, कुछ कष्ट तो नहीं है।” मनुष्य की सारी बेचैनी दूर हो जाती है। अपना जीवन-साथी, चिर-सहचर होने का यही अर्थ तो है कि एक के दुःख-दर्द को दूसरा बँटाये, आपत्ति में कुछ धैर्य दे और उसकी पीड़ा को अपनी पीड़ा समझकर कुछ सेवा शुश्रूषा करे।
इतना करना तो दूर रहा यदि स्त्रियाँ अपने पुरुषों से ठीक तरह बात भी न करें, उन्हें बात-बात पर ताने, झिड़कियाँ देती रहें तो उस मनुष्य को कितनी पीड़ा, कितनी व्यथा होती होगी यह वह बेबस भुक्त-भोगी ही समझता होगा। ऐसी दशा में क्या कभी दाम्पत्य जीवन सुखी रह सकता है? क्या कभी स्त्रियाँ यह कल्पना कर सकती हैं कि उन्हें पुरुष का प्यार मिलेगा? ऐसे परिवारों में कभी सौजन्यता रहती होगी वह सोचा भी नहीं जा सकता।
मानते हैं कि स्त्रियों के अपने भी कुछ अधिकार हैं। उन्हें भी अपनी भावनायें व्यक्त करने के लिए आवश्यक वस्तुयें चाहिए। उन्हें भी काम करना पड़ता है, उनके लिए मान सम्मान का भी एक क्षेत्र है किन्तु अपनी परिस्थितियों को भी तो देखना, समझना ही चाहिए। अपनी आमदनी यदि सिर्फ इतनी है कि कठिनाई से बाल-बच्चों का पेट पालन हो सके, किन्तु स्त्री अधिक अच्छे कपड़े, जेवर-जकड़ों की माँग करे तो फिर कर्ज ही तो लेना होगा। यह नहीं तो कहीं चोरी-झपटी करनी पड़ेगी। इन अशुभ कृत्यों के दंड से क्या सारे परिवार का वातावरण दुःखमय, बोझयुक्त और मलिन नहीं बनता? इस तरह की माँगें कभी भी उचित नहीं कही जा सकती। स्त्रियाँ अपने लिए उतनी ही अपेक्षा कर सकती हैं जितना संभव है। नाजायज की कल्पना करना बेजा है। इससे सम्पूर्ण गृहस्थी चौपट होने का भय रहता है।
चिन्ताओं से घिरा हुआ मनुष्य कभी ठीक तरह से सोच नहीं सकता। उसकी कार्य-क्षमता दिन-प्रतिदिन घटती जाती है। शरीर गिर जाता है। कई व्यक्ति तो हार मानकर घर छोड़कर भाग जाते हैं, कई आत्महत्यायें कर डालते हैं। कितने ही अपने शरीर को सुखा-सुखाकर अकाल मौत के घाट उतर जाते हैं। स्त्रियों को पुरुषों के मस्तिष्क में इस प्रकार की चिन्तायें पैदा करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।
इतना तो कम क्या अनपढ़ स्त्रियाँ भी समझती हैं कि जैसी भी कुछ परिस्थिति है, जैसा भी कुछ रूप-कुरूप आदमी है, है तो अपना ही। अपनों के साथ भी यदि प्रेम-पूर्ण व्यवहार न किया जाय तो गृहस्थ-जीवन में सरसता कैसे आयेगी? हर व्यक्ति अपनी पत्नी-बच्चों से अपेक्षाकृत अधिक मधुर तथा सहृदय व्यवहार की आशा रखता है। यदि वह प्यार और आत्मीयता उसे न मिले तो मनुष्य गृहस्थी के मामलों में भी पूरी लगन से दिलचस्पी न लेगा। वह परिवार सदा डाँवाडोल परिस्थिति में ही पड़ा रहेगा।
क्या हमारी बेटियों की अवस्था सती शाँडिली से भी गई बीती होगी। अपने कोढ़ी पति को सम्पूर्ण प्यार उत्सर्ग कर देने वाली इस सती-कन्या से बढ़कर विपरीत परिस्थिति आज तक शायद ही किसी नारी को मिली होगी। सहज स्नेह, स्वाभाविक निश्छलता और मधुर व्यवहार स्त्रियों के आभूषण हैं। नम्रता, विनयशीलता तथा मधुर शब्दों से वह अपने दुष्ट से भी दुष्ट पतियों के हृदय जीत सकती हैं। उनकी महानता पुरुष बनाने में है न कि उन्हें शैतान। यह उत्तरदायित्व बहुत कुछ स्त्रियों पर भी है। उन्हीं के गौरव से आज भी भारत का गौरव है। उन्हीं की शक्ति और तपश्चर्या के प्रभाव से भारतीय संस्कृति आज भी जीवित है और युगान्तरों तक अमर रहेगी।
किन्तु इन दिनों परिस्थिति विपरीत होती जा रही है। अशिक्षा और रूढ़िवादी अन्ध परम्पराओं के फलस्वरूप अब स्त्रियों में भी वह कर्त्तव्य भावना घट रही है। पुरुष स्वभाव से कुछ अधिक स्वाभिमानी होते हैं। थोड़ा-सा भी यदि मान-सम्मान उन्हें अपनी पत्नियों से मिलता रहे तो दाम्पत्य-जीवन के अधिकाँश कलह दूर हो सकते हैं।
दाम्पत्य-जीवन का सच्चा सार है—पारस्परिक प्रेम, सहानुभूति और आत्मीयता। उन्हें यह दृढ़ प्रतिज्ञा लेनी चाहिए कि हम प्रत्येक स्थिति में प्रेम, सहानुभूति, त्याग, शील-आदान-प्रदान, आशा, विश्वास, सहिष्णुता आदि का परित्याग नहीं करेंगे और इसका सजगता के साथ निर्वाह करना चाहिये।
भावना की दृष्टि से स्त्रियाँ अधिक कोमल होती हैं, किन्तु पुरुषों में कार्यक्षेत्र की जटिलता के कारण कठोरता कुछ अधिक होती है। अतः गृहस्थ को सुखी रखने की अधिकाँश जिम्मेदारी स्त्रियों पर आती है। उन्हें अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु मधुर-भाषी तथा व्यवहारकुशल होना चाहिए। स्त्री को अनन्य भावना से पति में लीन हो जाने में ही सुख मानना चाहिए। समर्पण नारी का बड़प्पन है इससे उसे सम्मान भी मिलता है, प्रेम भी। सारा परिवार जो सुख से भरा-पूरा रहता है वह इस तरह के स्त्री पुरुषों के आध्यात्मिक सम्मिलन से ही होता है।
जीवन संघर्ष में पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियों का संपर्क अधिक होता है। पुरुषों का क्षेत्र रोजगार तथा कमाई धन्धे तक ही सीमित है किन्तु स्त्रियाँ समाज का निर्माण करती हैं अतः उनके शिक्षित होने का महत्व अधिक है। उनके लिए कल्पना मूलक शिक्षा की उतनी आवश्यकता नहीं है। घर में तथा समाज के यथायोग्य निर्माण का काम नारी को करना पड़ता है, इसलिए उसे कर्त्तव्य मूलक शिक्षा की आवश्यकता होती है। इसके लिए यह जरूरी है कि उन्हें स्कूली शिक्षा के साथ रचनात्मक व्यवहार की भी शिक्षा मिलनी चाहिए।
हमारे धर्म-ग्रन्थों और विज्ञजनों का यह कथन पूर्णतया सत्य है कि गृहस्थ जीवन का, और इस दृष्टि से मनुष्य समाज का सुचारु रूप से संचालन, सद्गुणी पत्नियों पर ही आधार रखता है। इसलिए स्त्रियों को सुयोग्य गृहिणी का पद प्राप्त करने की सदैव चेष्टा करनी चाहिए। बालकों के निर्माण और इस दृष्टि से सम्पूर्ण राष्ट्र के निर्माण का उत्तरदायित्व स्त्रियों पर आता है। यह जिम्मेदारी सचमुच बहुत बड़ी है इसका निर्वाह पूर्ण समझदारी के साथ ही किया जा सकता है।
आज सम्पूर्ण नारी जाति का कर्त्तव्य है कि निन्दनीय वातावरण छोड़कर आगे बढ़े, और समाज सुधार, नैतिक उत्थान तथा धार्मिक पुनर्जागरण का संदेश मानवता को दें। उन्हें इस ढंग से कार्य करना होगा कि पुरुषों को बल मिले, उनकी खोई हुई शक्तियाँ जागें। इसके लिए उन्हें पुरुषों के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर आगे बढ़ना होगा। अपने कार्यक्षेत्र का सफलतापूर्वक निर्वाह किये बिना विकास की गति को स्त्रियाँ प्रवाहमान नहीं रख सकतीं। उन्हें सारे उत्तरदायित्व समझदारी से निभाने पड़ेंगे।
यह शिक्षा हमारी बच्चियों को प्रारम्भ से ही मिलनी चाहिए। सुशील सुन्दर आचरणयुक्त एवं मधुर-भाषिणी स्त्रियाँ जहाँ भी जाती हैं वहीं स्वर्ग उतर आता है। विपरीत परिस्थितियों, गरीबी और अभाव में भी विनम्र पत्नियाँ, घरेलू वातावरण को खुशहाल तथा उल्लासमय बना सकती हैं। हमारी बेटियाँ सत्य, शिव और सौंदर्य गुणों को धारण करें तो हमारा देश पुनः वही प्राचीन गौरव प्राप्त कर सकता है।
कुरूपता इस विश्व में किसी को भी प्रिय नहीं है। सुन्दर व्यक्ति की ओर ही नहीं वस्तुओं की ओर भी लोग खिंचे चले जाते हैं। प्रातःकाल बगीचे में जब फूल खिले हुए होते हैं तो वे कितने सुन्दर लगते हैं कि आँखें फेरने का जी भी नहीं करता, प्रकृति जहाँ सुरभित, पुष्पित और पल्लवित होती है, झरने झरते हैं, पक्षी कूकते हैं, वहाँ का दृश्य देखकर आत्म विभोर हो उठते हैं। सौंदर्य आत्मा की चिर-पिपासा है। सौंदर्य में ही जीव को आनन्द मिलता है। सुन्दर बनने की अभिलाषा भी आध्यात्मिक है। इसलिए इसे प्राप्त करना मनुष्य का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव ही है।
सौंदर्य की परिभाषा करते हुये प्रसिद्ध कवि कीट्स ने लिखा है—”सौंदर्य ही सत्य है और सत्य ही सौंदर्य है।” इससे वह स्पष्ट है कि सत्यस्वरूप परमात्मा का प्रकाश ही सौंदर्य के रूप में परिलक्षित होती है। अतः सौंदर्य की कामना मनुष्य की आत्मिक आवश्यकता है। सौंदर्य के बिना इस जीवन का महत्व भी कुछ नहीं है। सत्य, शिव और सुन्दर ये सब परमात्मा के ही स्वरूप हैं इसलिए इन्हें प्राप्त करने का प्रयास करना परमात्मा को प्राप्त करने का ही प्रयास हुआ।
भूल यह है कि मनुष्य ने पदार्थ की गढ़न को सौंदर्य मानकर उसका एक काल्पनिक ढाँचा बना कर रक्खा है। परमात्मा अनित्य और सर्वकालिक है इसलिए बदलते रहने वाले स्वरूप को सौंदर्य नहीं मानेंगे। स्वरूप में प्राण की आकर्षक स्थिति का नाम ही सौंदर्य है। सौंदर्य सत्य है इसलिए वह भौतिक नहीं हो सकता, अपवित्र नहीं हो सकता। विचारणीय है कि आज जो सौंदर्य की परिभाषा की जा रही है क्या इसमें भी कुछ सत्यता है।
“आत्मकथा” में महात्मा गान्धी जी ने लिखा है—”वास्तविक सौंदर्य हृदय की पवित्रता में है। बाह्य बनावट और प्रदर्शन से उसका कोई संबंध नहीं है। यह जो रूप की सजावट, वेष विन्यास में विचित्रता का प्रसार बढ़ रहा है यह आन्तरिक सौंदर्य को छलता है, इससे बचना चाहिए।” डॉ0 क्वार्ल्स का भी मत ऐसा ही है। वे लिखते हैं—’सुन्दरता का सद्गुणों के साथ संयोग होना, हृदय का स्वर्ग है। यदि उसके साथ दुर्गुण हैं तो वह आत्मा के नरक के समान है। मूर्ख लोग सौंदर्य के बाह्य स्वरूप की पूजा करते हैं इसलिए वे निन्दा के पात्र बनते हैं।”
मनीषियों की सम्मतियाँ यह व्यक्त करती हैं कि अपनी चमक-दमक बढ़ाकर सुन्दरता का प्रदर्शन भौंड़ी बात है। आजकल जो सौंदर्य प्रसाधनों पर करोड़ों रुपये लोग व्यय कर रहे हैं, उससे दुश्चिन्ताओं और दुर्गुणों के अम्बार ही खड़े हो रहे हैं। जितना इन कृत्रिम साधनों की माँग बढ़ रही है उतनी ही इनकी उपज में धन लगता है। जिस धन से योग्यतायें बढ़ सकती थीं, शिक्षा का प्रसार और स्वास्थ्य संगठन के लिए शक्ति संचय किया जा सकता था, वही इन प्रसाधनों में अपव्यय होता है। शौकीनी बढ़ती है तो लोग आलसी और अकर्मण्य बनते हैं, समय बरबाद करते हैं और शक्तियों का पतन कर लेते हैं। चमड़ी की चमचमाहट के लिए स्नो, क्रीम, पाउडर, लिपिस्टिक आदि का प्रयोग करके लोग सुन्दर बनने का प्रयत्न करते हैं। अपनी बदसूरती को शृंगार-साधनों से छिपाने का प्रयत्न करना ओछेपन का प्रतीक है। भोले लोग यह भी नहीं समझते कि शारीरिक सौंदर्य स्वास्थ्य पर अवलम्बित है। स्वास्थ्य अच्छा न हुआ तो चमड़ी की सजावट कभी आपको संतोष नहीं दे सकेगी। कृपया इस भूल को समझने और सुधारने का प्रयत्न कीजिए।
आय का एक बड़ा भाग इन बेजान वस्तुओं में खर्च करना अपने अभिभावकों के साथ अत्याचार करना ही ठहराया जायगा। पैसे का सदुपयोग, स्वास्थ्य, सफाई, शिक्षा और सद्गुणों के विकास के लिए किया जाता तो गाढ़े परिश्रम की कमाई भी सार्थक होती है। इन बुराइयों पर विचार कीजिए, रोइए और खिन्न हूजिए। कितना अच्छा होता यदि आप आन्तरिक सौंदर्य की महत्ता को समझ पाते?
आप खुलकर काम कीजिए। बँधे-बँधे से न रहिए, अपने हाथ-पाँवों को थोड़ा इधर-उधर हिलाइए डुलाइए। आपका रक्त संचालन ठीक रहेगा, नाड़ियाँ ठीक काम करेंगी, शरीर साफ रहेगा तो आपके शरीर में प्राण और ओज बना रहेगा। प्राणवान् व्यक्ति काले-कलूटे होने पर भी बड़े मोहक लगते हैं। बाहरी बनावट से थोड़ी देर के लिए भले ही प्रसन्न हो सकें अन्ततः कोई लाभ न निकलेगा। उद्विग्नतायें ही परेशान करती रहेंगी। फारसी कहावत है—”हाजते मश्शाता नेस्त रुम दिलाराम रा।” अर्थात् सौंदर्य को सजावट की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे ही सौंदर्य को प्राप्त करने का प्रयास करें तो हम सच्चे सौंदर्य पारखी माने जायेंगे।
स्वस्थ स्वभाव से सौंदर्य मिलता है। मानसिक कमजोरियाँ ही कुरूपता का कारण है। भली आदतों का संबंध मनुष्य की मानसिक शुद्धता से है, मानसिक चेष्टायें सत्कर्मों में आनन्द लेती रहती हैं तो शरीर और मन की शक्तियाँ प्रखर बनी रहती हैं। इससे अपनी सुन्दरता भी अक्षुण्ण रहती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि शक्तियों का संचय ही सौंदर्यवान होने का लक्षण है। दीन-दुर्बल और मानसिक उत्तेजनाओं में घिरे रहने वाले व्यक्तियों की न तो बाहरी सुन्दरता स्थिर रहेगी और न आन्तरिक ही।
सुन्दरता आपकी प्रसन्नता, मुस्कुराहट, उत्तम स्वास्थ्य, आशायुक्त निश्चित जीवन, हर्ष और उल्लास में छिपी हुई है। अपने जीवन को मनहूस बनाना, साधनों, वस्तुओं के लिए बुरी तरह रोते-झींकते रहना बड़ा बुरा लगता है, ऐसे लोगों के पास किसी भी मनुष्य का बैठने का जी नहीं करता। हँसमुख व्यक्तियों को लोग हर वक्त घेरे रहते हैं क्योंकि उनके जीवन में उल्लास होता है। ऐसे भावों की स्थिरता सुन्दर बनने के लिए अत्यन्त आवश्यक है। तनावपूर्ण मानसिक स्थिति एक प्रकार का विकार है जिससे सौंदर्ययुक्त चेहरों पर भी उदासी छाई रहती है। ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, घृणा, चिन्ता, उत्तेजना आदि से मनुष्य का व्यक्तित्व अनाकर्षक बनता है इससे मनुष्य का आन्तरिक सौंदर्य नष्ट होता है इनसे दूर ही रहना चाहिए।
सौंदर्य महानता का चिन्ह है। हिन्दुओं के देवी देवताओं के मुख पर एक प्रकार का प्रकाश दर्शाया जाता है इसे “तेजोवलय” कहते हैं। दूसरी संस्कृतियों में भी इसी तरह के मुख-मंडल चित्रित किये जाते हैं। इससे अनुमान होता है कि सौंदर्य दैवी तत्व है और वह तेज तथा शक्ति के रूप में महापुरुषों में विद्यमान होता है। उनकी ओजस्विता, मृदुता और दया भाव से इस सौंदर्य का आभास होता है। वैसी ही विचारणायें अपनाकर हम भी अपनी तेजस्विता जागृत करें तो सौंदर्य का संतोष हम भी प्राप्त कर सकते हैं। मनुष्य की गति सुन्दर वस्तुओं से सुन्दर भावनाओं की ओर, सुन्दर मनोभावों से सुन्दर जीवन की ओर होती है। जीवन की सुन्दरता ही पूर्ण सौंदर्य के दर्शन कराने में समर्थ होती है।
सुन्दर गतिविधियों का तात्पर्य मनुष्य की सरलता से है। उसकी निश्छलता, सरसता, गुण-ग्राहकता और मधुरता पर लोगों का अन्तःकरण बरबस ही आकर्षित हो जाता है। खूबसूरत डाकू के मुख पर जो आतंक का भाव छाया रहता है उससे लोग भयभीत हो जाते हैं, इस सौंदर्य को कुटिलता मानकर लोग पास भी नहीं जाते। कामुकता भी इसी तरह सौंदर्य का महान् दुर्गुण है। आकर्षक व्यक्तित्व तो शील और सद्गुणों के प्रकाश से बनता है। प्रेम में, दया और ईमानदारी में जो सुन्दरता भरी है लोग उसी से प्रभावित होते हैं। नकली चेहरे सजाकर बच्चों का मनोरंजन करने से अधिक लाभ नहीं हो सकता। शील स्वभाव में वह चुम्बकत्व होता है जो सभी के दिलों को मोह लेता है। भलमनसाहत लोगों को प्रिय लगती है। इन्हें ही सौंदर्य के उपकरण मान सकते हैं।
प्रेम-भावनाओं का सौंदर्य बड़ा आकर्षक है। ऋषियों के आश्रमों में प्रेम और आत्मीयता के प्रबल संकल्प गूँजा करते थे इसी कारण वन्य पशु भी निर्भय होकर वहाँ विचरण करते थे। ऋषियों के बालक स्वच्छन्दतापूर्वक हिंसक पशुओं से खेला करते थे और उनसे मैत्री स्थापित कर लेते थे। आन्तरिक सौंदर्य की आभा बोलती थी वहाँ, इसी से आकर्षित होकर जीव−जंतु भी वहाँ रहना अधिक पसन्द किया करते थे।
डॉ. ड्राइडेन का यह कथन नितान्त सत्य है—”जब सौंदर्य रक्त में उबाल पैदा करता है तब प्रेम मस्तिष्क को बहुत ऊँचे उठा देता है।” सौंदर्य भेद-भाव की कटुता का बहिष्कार करता है। इसी एक सार्वभौमिक सत्य पर इस संसार की व्यवस्था अनेक युगों से चलती चली आ रही है और जब तक सौंदर्य का एक ही कण इस धरती पर जीवित रहेगा, यह क्रम निरन्तर इसी तरह चलता रहेगा। सृजन की इस शक्ति को बनाये रखने के लिए प्रेम, दया, सेवा, उदारता, सहयोग, करुण, स्वच्छता आदि दैवी गुणों का अभ्यास बनाये रहना होगा।
दुष्टता, मलिनता, अस्वच्छता और मानसिक दुर्भावनाओं के कारण जो अपनी शक्तियों का ह्रास करते हैं उससे कुरूपता बढ़ती है। धन और सम्पत्ति के अभाव में भी यदि अपने सद्गुणों को विकसित रखा जाय तो अपनी मोहक शक्ति ज्यों की त्यों बनी रहेगी। धनवान होना सौंदर्य का लक्षण नहीं, शरीर की सजावट में भी आकर्षण नहीं है। जो वस्तु बलात् अपनी ओर खींच लेती है वह है व्यक्ति की सद्भावनायें। आन्तरिक निर्मलता पल में दूसरों को मोह लेती है, लोग पीछे दौड़े चले आते हैं।
अपने मन की चिन्तायें हटाइये, जीवन की जटिलताओं में प्रवेश पाने की कामना का परित्याग कर दीजिए, आप निश्चय ही अपनी सुन्दरता प्राप्त कर सकेंगे। सुखद विचारों की भाव-तरंगें, सादगी के उपकरण मिलकर सौंदर्य का निर्माण करते हैं। प्रेम और कर्त्तव्य-भावना से सुन्दरता का विकास होता है। मन को सद्गुणों से आरोपित करने में ही मनुष्य का सच्चा सौंदर्य सन्निहित है। इस सुन्दरता पर दुर्भावनाओं, ईर्ष्या, छिद्रान्वेषण की मलिनता न पड़ने दीजिए। इस कुरूपता से सदैव दूर ही रखने का प्रयत्न करते रहिये। प्रसन्नता और आशापूर्ण सुखद विचारों को जितना अधिक अपने मस्तिष्क में स्थान देंगे उतना ही आपके शरीर और मन में तेजस्विता बनी रहेगी, यही सौंदर्य का गुण है।
सुन्दर बनने के लिए बाहरी साधन जरूरी नहीं है। इस भ्रान्त धारणा को-कि अधिक बनाव शृंगार करेंगे तो अधिक लोग आकर्षित होंगे—अपने मस्तिष्क से निकाल कर अपने अंतःकरण के सौंदर्य को खोजने का प्रयत्न कीजिए। आपकी प्रसन्नता में, आपके सुखद विचारों में सुन्दरता भरी हुई है उसे जागृत कीजिए। सच्चा सौंदर्य मनुष्य के सद्गुणों में है। हम गुणवान् बनें, तेजस्वी बनें तो सौंदर्य हमारा साथ कभी न छोड़ेगा।
इस बार देवताओं की प्रार्थना स्वीकार हो गई। लक्ष्मी जी असुरों का वास-स्थान सदैव के लिए परित्याग कर देवताओं के आश्रम में पहुँच गई। देवराज इन्द्र ने सविस्मय पूछा। “देवि! असुरों के पास से आपके चले जाने का कारण जानने की प्रबल उत्कंठा है।” आगे बढ़कर स्वागत करते हुए इन्द्र ने और भी कहा—अंबे पहले आपने हमारी विनती नहीं सुनी, इसका भी कारण बताइए?
इन्द्रदेव के आमंत्रण से महादेवी लक्ष्मी गदगद हो गई और अपना वरद हस्त उठा कर बोलीं—
“देवराज! जब किसी राष्ट्र में प्रजा सदाचार खो देती है, तो वहाँ की भूमि, जल, अग्नि कोई भी मुझे स्थिर नहीं रख सकते। मैं लोक-श्री हूँ मुझे लोक सिंहासन चाहिए। मुझे आलस्य, अकर्मण्यता, फूट, कलह, कटुता पसन्द नहीं। व्यक्ति के सदाचारी मानस में ही मैं अचल निवास करती हूँ। जहाँ छोड़ती, पर जहाँ अकारण बैर-भाव, हिंसा, क्रोध, प्रमाद, अत्याचार आदि बढ़ जाते हैं उस स्थान को छोड़कर मैं तत्काल अन्यत्र चली जाती हूँ। मैं शुभ कार्यों से उत्पन्न होती हूँ, उद्योग से बढ़ती हूँ और संयम से स्थिर रहती हूँ जहाँ इन गुणों का अभाव होता है उस स्थान को छोड़ जाती हूँ। बस इतने से ही मेरे असुरों का निवास छोड़ने और देवताओं की प्रार्थना स्वीकार कर लेने का रहस्य जान लेना।”
क्या आपने कभी विचार किया है नींद के बारे में? वह नींद जिसके अथाह सागर में हम अपने समस्त दुःख, द्वन्द्व, परेशानियों को एक बारगी डुबो देते हैं, और फिर स्वस्थ स्फूर्तिमय तरो-ताजा होकर नव-शक्ति के साथ जीवन-पथ पर चलने लगते हैं। प्रकृति की कैसी महान देन है निद्रा, मनुष्य के लिए। शेक्सपीयर ने कहा है—”निद्रा प्रतिदिन के जीवन के लिए मृत्यु, कठिन परिश्रम के लिये स्नान, घायल मस्तिष्क के लिए शान्तिदायिनी औषधि और क्षतिपूर्ण शरीर के लिये अमृतकुण्ड है?” वस्तुतः मृत्यु के अनन्तर भी हम एक लंबे विकास की स्थिति में होते हैं और जिस तरह हँसते, खेलते शिशु के रूप में पुनः जीवन धारण करते हैं उसी तरह प्रतिदिन की नींद के बाद भी नव-चेतना नव जीवन प्राप्त कर अपने काम-काज में लग जाते हैं। कैसा अद्भुत खेल है यह ? कैसी महान कृपा है, निद्रा देवी की मनुष्य पर। वह हारा थका चूर-चूर होकर संसार की परेशानियों से क्लाँत होकर निद्रादेवी की गोद में सोता है लेकिन नव शक्ति स्फूर्ति, नव-जीवन, प्रसन्नता उत्साह लेकर उठता है। इस महान् उपकार के बदले हमें कुछ भी नहीं देना पड़ता। नित नव-जीवन प्राप्त करने का हमारा कैसा जन्मसिद्ध अधिकार है। जिसकी तुलना में संसार का कोई भी पदार्थ समर्थ नहीं है। यदि कुछ दिनों मनुष्य को लगातार जागना पड़े तो उसकी मृत्यु हो सकती है वह पागल हो सकता है। कितनी आवश्यक है नींद हमारे जीवन के लिए।
निद्रा प्रकृति देवी का निःशुल्क उपहार है, जिसके लिए हमें कुछ खर्चना नहीं पड़ता न कोई कष्ट उठाना पड़ता है न कुछ करना पड़ता है, लेकिन फिर भी हम में से बहुत से इसका लाभ नहीं उठा पाते। उन्हें अनिद्रा की शिकायत बनी रहती है। कई बार नींद के लिए हम कृत्रिम उपाय करते हैं लेकिन उसका यह लाभ नहीं उठा पाते जो सहज रूप में नींद आने पर प्राप्त होता है।
नींद के लिए शास्त्रकार ने कुछ नैतिक आवश्यकतायें बताते हुए लिखा है—
ब्रह्मचर्येरतेर्ग्राम्यसुख निस्पृहचेतसः।
निद्रा सन्तोषतृप्तस्य स्वकालं नातिवर्तते॥
“जो मनुष्य सदाचारी है विषय भोग से निस्पृह और सन्तोष से तृप्त है उसको समय पर निद्रा आये बिना नहीं रह सकती।”
सचमुच सदाचारी विषय भोगों से निस्पृह सन्तोषी व्यक्ति ही निद्रा का वास्तविक लाभ उठा सकता है। उसे समय पर नींद आयेगी जिस तरह समय पर सूरज डूबता है रात्रि होती है। हमें नींद क्यों नहीं आती, अनिद्रा की बीमारी समाज में क्यों फैलती जा रही है? इसलिये कि हमारा आचरण दूषित होता जा रहा है, हम विषय-भोगों में रात-दिन आसक्त रहते हैं, असन्तोष की न बुझने वाली ज्वाला हमारे अन्तर में दहकती रहती है फिर कैसे हमें स्वस्थ नींद आ सकती है? इसमें कोई सन्देह नहीं कि स्वस्थ नींद के लिए शरीर और मन का स्वस्थ सन्तुलित होना, व्यवस्थित दिनचर्या आवश्यक है। जो जीवन के सहज क्रम को छोड़कर किसी भी क्षेत्र में अति करते हैं उन्हें अनिद्रा की शिकायत होना स्वाभाविक है।
बहुत से व्यक्ति स्वभाव से अत्यधिक चिन्तनशील प्रकृति के होते हैं। दिन-रात उनका दिमाग किसी उधेड़-बुन में ही डूबा रहता है। ऐसे लोग चारपाई पर पड़कर करवटें बदलते हैं, चुपचाप होकर पलकें बन्द करते हैं किन्तु उनके चिन्तन का क्रम एकान्त पाकर अधिक तीव्र होता है और उन्हें नींद नहीं आती। इसके विपरीत दिन-भर का हारा थका मजदूर कठोर भूमि में भी तत्काल सो जाता है। क्योंकि वह चिन्तन के अधिक झगड़े में नहीं पड़ता। इसके माने यह नहीं कि चिन्तन बुरा है। मनुष्य को सोच विचार ही नहीं करना चाहिये। नहीं, मनुष्य का चिन्तनशील होना बहुत ही महत्वपूर्ण है। चिन्तन के क्षणों में ही नव अन्वेषण का कार्य होता है, लेकिन इसकी सीमा भी होनी चाहिए। कम से कम उस समय तक तो आप अपने चिन्तन के विषय और बोझ को दिमाग से बाहर ही उतार कर रख दें जब सोने के लिए शय्या पर पैर रक्खें।
चिन्तन, विचारशीलता चाहे अच्छी दिशा में चले या बुरी में उसका आप पर अधिकार नहीं होना चाहिए। जब आप चाहें तब सोचें और जब न चाहें तब सोचना बन्द कर दें ऐसा अभ्यास होने पर ही यह आपकी निद्रा में बाधक नहीं बन सकते। महात्मा गाँधी कितने उच्च विचारक थे लेकिन जब उन्हें विश्राम करना होता था तो तत्काल सो जाते थे इतना संयम था उन्हें अपने मन पर।
वस्तुतः अनियमित अनियन्त्रित, सोच-विचार- चिन्तन से मनुष्य के स्नायु अत्यधिक उत्तेजित हो जाते हैं। मन का स्वभाव है वह जिस विषय को पकड़ लेता है उसका ही ताना-बाना बुनने लगता है और बरबस मनुष्य विचारों में खो जाता है। ऐसे व्यक्ति को कुछ झपकी लग भी जाय तो उसकी नसें इतनी उत्तेजित रहती हैं कि स्वप्न के माध्यम से वे अपना काम करने लगती हैं। और इससे नींद अपूर्ण ही रह जाती है। जो रात स्वप्नों में बीती हो उस दिन उठने पर आपका बदन थका-थका अलसाया सा होगा।
अतः सोने से पूर्व सभी प्रकार की चिन्ता, विचार आदि को मन से निकाल दीजिए, स्वस्थ और खाली मन से शय्या पर विश्राम की अवस्था में लेटते हुए अपने मस्तिष्क को पूर्णतया शून्य बनाने का प्रयत्न करें और निद्रा के प्रत्येक झोंके के साथ उस शून्य में विलीन हो जायँ जहाँ आप, आपका संसार दीन दुनिया की बातें सब विलीन हो जाती हैं।
अनिद्रा का कारण शारीरिक श्रम न करना भी है। आज के तथाकथित वैज्ञानिक सभ्यता के युग में हमारे एक बहुत बड़े दुर्भाग्य का उदय हुआ है। वह यह है कि हम शरीर श्रम को बुरा, छोटेपन की निशानी समझते हैं और उससे बचते हैं। श्रम के अभाव में शरीर में रक्त भ्रमण ठीक से नहीं होता। गन्दगी विषाक्त तत्व शरीर में एकत्र होने लगते हैं तो हमारे हृदय, स्नायु मस्तिष्क आदि को उत्तेजित कर देते हैं और इससे नींद आने में बाधा पड़ती है। आप परीक्षण करें तो आपको मालूम होगा कि नींद न आने की बीमारी अधिकतर शरीरश्रम न करने वालों को ही होती है।
स्वस्थ नींद लेनी है तो पर्याप्त शरीरश्रम भी करें। काम करें। घूमने जायें, खेलें। जो अपनी सुविधा और रुचि के अनुकूल हो ऐसा शरीर निष्ठ श्रम अवश्य करें।
समय पर स्वस्थ नींद के लिए अपनी दिनचर्या का नियमित और व्यवस्थित होना आवश्यक है। समय पर उठिए, समय पर अपना काम कीजिए, समय पर भोजन कीजिए, टहलने जाइये। समय पर नियमित रूप से सो जाइए आप ठीक समय पर स्वस्थ नींद ले सकेंगे। जिन लोगों को उठने, बैठने, खाने, पीने, काम करने, सोने, जागने का कोई समय नहीं होता जो अस्त-व्यस्त जीवन बिताते हैं, रात-रातभर जाग-जाग कर सिनेमा देखते हैं, ताश पत्ता खेलते हैं, उन्हें स्वस्थ नींद से प्रायः वंचित ही रहना पड़ता है। समय पर पूर्ण विश्राम मिले इसके लिए आवश्यक है कि आप अपना सम्पूर्ण जीवनक्रम व्यवस्थित, नियमित रखें।
बुरे विचार और बुरे कार्य भी नींद के शत्रु माने गये हैं। ऊपर कहा जा चुका है—सदाचारी को, सन्तोषी को, स्वस्थ नींद आए बिना नहीं रह सकती। गन्दे विचार, उन्हें पैदा करने वाला गन्दा साहित्य, उपन्यास अश्लील वार्तालाप, अभद्र व्यवहार गन्दे चित्रों से मनुष्य को बचना चाहिए। चरित्र का संयमी सदाचारी होना भी आवश्यक है। आधुनिक युग में हम लोगों का चारित्रिक पतन और दुराचार पूर्ण, गन्दा जीवन, गन्दे विचार अश्लील कल्पनाएँ एवं द्वेष, आवेश, संशय, भय अविश्वास आदि अनिद्रा की बीमारी के मुख्य कारण हैं।
स्वस्थ नींद के लिए मनुष्य को सभी तरह के नशीले उत्तेजक पदार्थों का त्याग कर देना चाहिये। चाय, बीड़ी, सिगरेट, कहवा, शराब आदि का उपयोग भी अनिद्रा का कारण बन जाता है। इन्हें जितनी मात्रा में छोड़ा जा सके स्वस्थ नींद के लिये उत्तम होगा। खासकर सोने के पूर्व तो इनका उपयोग करना ही नहीं चाहिए।
यह भी ध्रुव सत्य है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ नींद का आगमन होता है। शरीर में कोई बीमारी है, अथवा कोई दोष है तो इससे मनुष्य को समय पर नींद नहीं आती। रोग, शरीर दोष जितना तीव्र होता है उतनी ही अनिद्रा की शिकायत बढ़ जाती है। अस्तु अपने शरीर को स्वस्थ रखिये।
भोजन जो हम करते हैं उसका भी हमारी नींद पर भारी प्रभाव पड़ता है। भारी, देर से पचने वाले भोजन करके सो जाने पर पेट के अवयव तेजी से काम करने लगते हैं। ऐसी स्थिति में मनुष्य को नींद देर में, कठिनाई से आती है तथा स्वप्नों में, रात काटनी पड़ती है जिससे विश्राम का उद्देश्य पूरा नहीं हो पाता। अस्तु हल्का, सुपाच्य, पौष्टिक भोजन कीजिये और सोने से करीब तीन घण्टे पूर्व ही उससे निवृत्त हो लीजिए। शारीरिक वेग जैसे टट्टी, पेशाब की शिकायत को तुरन्त दूर करके सोयें।
सोने के स्थान और वातावरण का भी बहुत प्रभाव पड़ता है। जहाँ तक हो कोलाहलशून्य, शान्त, स्वस्थ स्थान हो सोने के लिए। शुद्ध वायु का पूरी तरह आवागमन हो। किसी तरह के कीड़े-मकोड़े, पिस्सू, खटमल, मच्छर आदि से युक्त सोने का स्थान न हो।
किसको कितना सोना चाहिए, कब सोना चाहिए, यह मनुष्य को अपनी शारीरिक माँग, समय और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं निर्णय कर लेना चाहिए।
निद्रा के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात है शयन कक्ष में जाने से पूर्व अपने मन को पूर्णतया निर्विकार, शान्त, संकल्पहीन, शान्त बनाने की। इसके लिए किसी अच्छे ग्रन्थ का पाठ, ईश स्मरण, शुभ संकल्प करते हुए अपने आपको निद्रा देवी की गोद में सौंपकर शून्य में विलीन हो जाने का अभ्यास उत्तम है। नींद के लिए भूलकर भी किन्हीं दवाओं का उपयोग न करें। इससे आपके शरीर पर बड़ा दुष्प्रभाव पड़ेगा और नींद न आने की बीमारी अधिक बढ़ेगी।
फ्रेडरिक महान शासक होने के साथ-साथ कुछ नाटक लिखने का भी शौक रखता था। वह अपने लिखे नाटक अपने दरबारियों को सुनाया करता था। दरबारी नाटक अच्छा न होने पर भी उसकी तारीफ के पुल बाँध दिया करते थे। इससे फ्रेडरिक को अपने बहुत बड़े नाटककार होने का भ्रम हो गया।
उसी के समय में “व्हाल्टायर” नाम का एक बहुत ही जाना-माना प्रसिद्ध नाटककार था। फ्रेडरिक-द-ग्रेट ने एक बार उक्त नाटककार को आमंत्रित कर बड़े गर्व से अपना नाटक सुनाया। उसे आशा थी ‘व्हाल्टायर’ भी अन्य दरबारियों की तरह राज-रचना होने के कारण प्रभावित हो प्रशंसा करेगा।
किन्तु उस नाटक-मर्मज्ञ व्हाल्टायर ने उसका नाटक सुनकर बड़ी ही स्पष्टता से असफल और रद्दी कह दिया। इस पर फ्रेडरिक को बहुत बुरा लगा और उसने व्हाल्टायर को जेल भिजवा दिया।
कुछ समय बाद फ्रेडरिक ने एक और नाटक लिखा, और उसने व्हाल्टायर को बन्दीगृह से बुलवाकर अपना नया नाटक सुनाया। उसे विश्वास था कि व्हाल्टायर का दिमाग जेल की यातनाओं से बदल गया होगा और अब वह अवश्य नाटक की तारीफ करेगा।
किन्तु व्हाल्टायर नाटक सुनते-सुनते बीच में ही उठ कर चल दिया। फ्रेडरिक ने पूछा—”कहाँ जा रहे हो?” इस पर उस नाटककार ने उत्तर दिया कि—”आपका यह नाटक सुनने से तो जेल की यातना अच्छी है।”
उसकी इस प्रकार निर्भीक स्पष्टोक्ति से फ्रेडरिक महान बहुत प्रभावित हुआ और व्हाल्टायर को जेल से मुक्त करके उसे अपना साहित्यिक गुरु मान लिया।
नव-निर्माण अभियान का व्यापक सूत्रपात
माघ मास का शिक्षण शिविर गायत्री तपोभूमि में अभूतपूर्व सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। यों अब तक अनेकों शिविर समय-समय पर होते रहे हैं और उनके आशाजनक परिणाम भी होते रहे हैं, पर इस माघ मास के शिविर की अपनी अनोखी ही विशेषताएँ थीं।
वसन्त पञ्चमी हमारे कार्यक्रमों की जन्मदात्री पुण्य तिथि रही है। लगभग सभी महत्वपूर्ण कार्य हमने इसी शुभ मुहूर्त में आरम्भ किये हैं। अब से पच्चीस वर्ष पूर्व “अखण्ड ज्योति” पत्रिका का प्रकाशन इसी दिन से आरम्भ किया गया था। प्रथम वर्ष वह केवल 500 छपती थी अब उसके सदस्यों की संख्या 30 हजार से ऊपर निकल रही है। उसने लाखों व्यक्तियों के अन्धेरे में पड़े हुए मानसिक धरातल को आलोकित किया है और अपना एवं समाज का कल्याण करने की शिक्षाओं पर साहसपूर्ण कदम उठाने वाले शूरवीरों की पंक्ति में उन्हें ला खड़ा किया है। इस परिवार के सदस्यों ने नैतिक एवं साँस्कृतिक पुनरुत्थान की दृष्टि से पिछले दिनों जो भूमिका प्रस्तुत की है, उसे धार्मिक जगत में अनुपम कहा जा सकता। धीरे-धीरे यह परिवार जिस संगठित रूप में विकसित होता चला जा रहा है और जो तैयारियाँ युग-निर्माण के महाअभियान को पूर्ण करने के लिए कर रहा है, उसे भारत में एक ऐतिहासिक घटना माना जायगा।
अखण्ड ज्योति संस्थान में ‘अखण्ड दीप’ की स्थापना और गायत्री तपोभूमि में ‘अखण्ड अग्नि’ की स्थापना वसन्त पञ्चमी के दिन हुई थी। इन दोनों ज्योतियों ने उपासना क्षेत्र में उत्साहवर्धक सहायता दी है। ‘अखण्ड दीप’ का सम्बल लेकर अपनी निज की गायत्री उपासना करते हुए हमने अपना पथ अधिक सफलतापूर्वक अधिक दूरी तक पार किया। यदि यह साधन न रहा होता तो जितना कुछ मिल सका उसकी सम्भावना न रही होती।
इसी प्रकार गायत्री तपोभूमि में रहने वाली ‘अखण्ड अग्नि’ के सान्निध्य में रह कर जिन आध्यात्मिक मार्ग में पथिकों ने अपनी तपश्चर्याएँ की हैं, उनमें से अधिकाँश को वैसा प्रकाश मिला है, जिसके लिए वे सदा अपने भाग्य की सदैव सराहना करते रहेंगे। इन दोनों अग्नि ज्योतियों ने हमें व्यक्तिगत रूप से आगे बढ़ाया है और हमारे विशाल परिवार को नव जीवन की अभिनव चेतना से प्रकाशवान बना दिया है। ऐसे पुण्य माध्यमों की जन्म जयन्ती का दिन वसन्त पञ्चमी अपने आप में कुछ महत्व रखेगी ही और हमें उसका उल्लासपूर्ण अभिनन्दन करना ही होगा।
गायत्री तपोभूमि के निर्माण का शिलान्यास उसी दिन हुआ था। शतकुण्डी गायत्री यज्ञ का शुभारम्भ उसी पर्व पर किया गया था। चारों वेदों के भाष्य का आरम्भ वसन्त पञ्चमी को करके उसकी पूर्णता इसी दिन की गई थी। और भी ऐसी अनेक प्रकट, अप्रकट हमारे जीवन की प्रक्रियाएँ हैं, जो अपना विशेष महत्व रखती हैं। उन्हें भी संयोगवश या जान बूझ कर वसन्त पञ्चमी को ही आरम्भ किया गया था। युग-निर्माण योजना का विधिवत उद्घाटन गुरु पूर्णिमा के दिन आरम्भ हुआ। हमारे गुरुदेव की प्रेरणा का पर्व वही है। इसी से वसन्त पञ्चमी की तरह दूसरा पर्व हम गुरु पूर्णिमा को मानते हैं। पर विचारात्मक दृष्टि से आज से तीन वर्ष पूर्व अखण्ड ज्योति के माध्यम से योजना की रूप-रेखा वसन्त पञ्चमी के अवसर पर ही जन साधारण के सामने रखी गई थी और उसी दिन से उसका प्रचार कार्य आदि किया था। इस प्रकार भगवती सरस्वती का ही नहीं, युग-निर्माण योजना का शुभारम्भ भी इसी अवसर पर होता है। अज्ञातवास से लौटने के बाद हम हर वर्ष इस पर्व को ही नहीं, पूरे माघ-मास को विशेष भावनाओं के साथ मानते आ रहे हैं। इस मास चांद्रायण व्रत करने के लिए विशिष्ट साधक आते हैं। पिछले कितने ही वर्षों की भाँति इस वर्ष भी वैसा ही आयोजन किया गया और प्रसन्नता की बात है कि वह अब तक के सभी शिविरों की अपेक्षा अधिक सफल रहा।
संख्या की दृष्टि से शिविर में उतने ही व्यक्ति थे, जितनों को बुलाने की योजना पहले से ही बना रखी गई है। 70 से अधिक व्यक्ति वर्तमान स्थिति में यहाँ ठीक तरह एक महीने नहीं रह सकते। प्रवचन- कथा में तो इतने व्यक्ति भी बड़ी कठिनाई एवं ठूँस-ठाँस से आते हैं। फिर आगन्तुकों के साथ व्यक्तिगत परामर्श भी करना पड़ता है, जो सीमित संख्या में ही सम्भव है। अतएव प्रायः इतने व्यक्तियों को आने की स्वीकृति दी जाती है, जितनों की व्यवस्था ठीक तरह हो सके। गर्मियों के शिविरों में यह संख्या 100 तक भी हो जाती है पर माघ में इसे सीमित ही रक्खा गया और उतने ही आने दिए गए जितनों के लिए कि उपयुक्त स्थान था। बड़े आनन्द से यह महीना व्यतीत हो गया। शिविर में सम्मिलित होने वालों ने बड़ी श्रद्धापूर्वक इस युग की सबसे कठिन एवं सबसे महत्वपूर्ण इस तपश्चर्या को पूरा किया। साथ ही सवा-सवा लक्ष गायत्री पुरश्चरण भी विधिवत् सम्पन्न किये। जिन दुर्बल शरीर एवं गिरे हुए स्वास्थ्य के नर-नारियों को इतनी लम्बी उतनी कठिन तपश्चर्या आरम्भ में बहुत कठिन प्रतीत होती थी उन्होंने हँसते-खेलते हुए पूरा कर लिया और तनिक भी कठिनाई अनुभव न की। किसी के भी स्वास्थ्य पर कोई बुरा प्रभाव न पड़ा । वरन् जो सुधार होने वाला है, उसका प्रत्यक्ष अनुभव हर एक ने कर लिया। अगले दिनों साधकों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में जो सुधार होने वाला है, उसे तो आने वाले दिन ही बतायेंगे । पर शिविर में सम्मिलित प्रत्येक साधक ने उसकी सम्भावना का आरम्भ इन्हीं दिनों देख लिया और प्रत्येक साधक आशा पूर्ण उल्लास लेकर अपनी तपश्चर्या पूर्ण करते हुए विदा हुआ।
एक महीने तक जीवन निर्माण की कला का सांगोपांग प्रशिक्षण किया जाता रहा। एक सप्ताह गीता कथा कही गई। नव निर्मित सत्यनारायण व्रत कथा भी एक दिन बड़े उत्साह पूर्ण वातावरण से हुई। भारतीय धर्म के दस प्रमुख पर्वों को समाज को सुसंस्कृत बनाने का लक्ष्य रख कर किस प्रकार मनाया जाना चाहिए इसका पूरा विधि-विधान समझाया गया। जन्म से लेकर मरण पर्यन्त सभी संस्कार किस तरह से मनाए जाने पर व्यक्ति निर्माण एवं परिवार निर्माण की आवश्यकता पूर्ण कर सकते हैं, यह विधान विस्तार-पूर्वक बताया गया। गीता सप्ताहों के माध्यम से सामूहिक समारोह मनाने एवं जन-जागृति के लिए प्रेरणाप्रद शिविर लगाने का धर्मानुष्ठान किस प्रकार हो सकता है और उसे 100 — 150 रुपए के स्पष्ट व्यय से किस प्रकार संपन्न किया जा सकता है उसकी व्यावहारिक रूपरेखा बताई गई। इस सारे प्रशिक्षण से शिक्षार्थी वह योग्यता प्राप्त करके गये कि वे यदि चाहें तो एक सुयोग्य धर्म प्रचारक का काम कर सकते हैं।
इसी वसन्त पञ्चमी से प्रतिनिधियों एवं उत्तराधिकारियों के लिये जो ज्योति अवतरण साधना आरंभ की गई है, उसका क्रियात्मक स्वरूप इस शिविर में उपस्थित व्यक्ति और भी अधिक व्याख्या एवं विवेचना के साथ समझ सके। यों फरवरी अंक को पढ़-कर देश भर में बिखरे हुए विशिष्ट परिजनों ने उसे आरम्भ कर ही दिया है, पर शिविर में रहने वाले साधक चूँकि व्यक्तिगत रूप से भी यहाँ उपस्थिति थे इसलिए इन्हें इस प्रकाश का अनुभव अधिक प्रत्यक्ष रूप से करने का अवसर मिला।
वानप्रस्थ परम्परा का नवजागरण—
भारतीय धर्म संस्कृति के पुनर्जागरण का प्रयोजन उच्चस्तर के भावनाशील कार्यकर्ताओं पर निर्भर है। यह आवश्यकता वानप्रस्थ आश्रम की परम्परा सजीव करने से ही संभव हो सकती है। प्राचीनकाल में यह प्रथा थी कि बच्चों के समर्थ होते ही ढलती आयु का प्रत्येक व्यक्ति अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र में कूद पड़ता था और अपनी अनुभवपूर्ण योग्यता का निःशुल्क अनुदान देकर समाज को प्रत्येक दृष्टि से सुविकसित करने में आश्चर्यजनक योगदान देता था, प्राचीन भारत का गौरवपूर्ण इतिहास यहाँ के साधु, ब्राह्मणों एवं लोकसेवी वानप्रस्थों का ही इतिहास है। उन्हीं के अनवरत प्रयत्नों का यह प्रतिफल था कि जनता का चरित्र, मनोबल एवं विवेक उच्च स्तर पर टिका रहता था। अब जब कि इन वर्गों का एक प्रकार से लोप हो गया तो लोक मानस में गिरावट आनी ही थी और उसका प्रतिफल हर प्रकार की दुर्दशा के रूप में हमें भोगना ही था। सो ही हुआ भी।
अब जब उठने की बारी आई है तो उठाने वाले माध्यमों पर लगी हुई जंग भी छुड़ानी पड़ेगी और उन्हें पुनः सतेज बनाना पड़ेगा। आज की परिस्थितियों में कोई वंश या वर्ण राष्ट्रीय पुनरुत्थान का कार्य अपने कन्धे पर उठा सकेगा यह तो कठिन दीखता है पर यह सरल है कि ढलती आयु के वे व्यक्ति जिनके पारिवारिक एवं आर्थिक उत्तरदायित्वों के सँभालने वाले मौजूद हैं, वे “वानप्रस्थ” लेकर अपनी जिम्मेदारी एवं वफादारी समाज निर्माण के लिए सौंप दें। इसी प्रकार हमें अनुभवी, सच्चे और निःस्वार्थी लोक सेवी मिलेंगे और उसी आधार पर इस निर्माण का प्रयोजन पूरा होगा। इसके लिए अखण्ड ज्योति परिवार के उपरोक्त स्थिति वाले प्रत्येक नर-नारी को इन दिनों हम प्रबल प्रेरणा दे रहे हैं कि वे उचित अवसर पर वानप्रस्थ लेकर आत्म कल्याण एवं राष्ट्र के नव-निर्माण को अपना लक्ष्य बनायें और उसी में तत्परतापूर्वक संलग्न हों। यह कार्य घर में रहते हुए, अपने परिवार को भी समाज का एक अंग मानकर उसकी भी देखभाल एवं सेवा करते हुए हो सकता है। असल में यही उचित भी है कि अपनी आजीविका अपने घर में चलाई जाय और बचत का अधिकाधिक समय लोक सेवा के लिए लगाया जाय।
वानप्रस्थाश्रम की धर्म परम्परा का व्यापक पैमाने पर आरम्भ किया जाना आज की अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है। इस दिशा में सर्वत्र अति उत्साहपूर्वक कदम उठाने ही होंगे। प्रसन्नता की बात है कि यह कार्य माघ-मास के शिविर के साथ आरम्भ हो गया।
उन्नाव (उ.प्र.) के सुप्रसिद्ध डॉक्टर श्री राजेन्द्र सहाय अपना निज का सफल अस्पताल चलाते हैं। उनकी प्रतिष्ठा एवं आजीविका बढ़ी-चढ़ी है। आध्यात्मिक दृष्टि से उनकी साधना योगियों जैसी है। गृहस्थ में रहकर उन्होंने घर को ही गुफा बनाकर कठिन तपश्चर्याएँ एवं साधनाएँ की हैं। साँसारिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से उन्हें एक सफल व्यक्ति कहा जा सकता है। वे इसी शिविर के अन्तिम दिन वानप्रस्थ संस्कार कराने मथुरा आये। ता0 14 फरवरी को उनके जीवन का 50 वाँ वर्ष पूरा होकर 51 वाँ आरम्भ होता है। प्रचलित परम्पराओं के आधार पर किसी व्यक्ति या संस्था के जन्म से 25 वे वर्ष में रजत-जयन्ती, 50 वे वर्ष में स्वर्ण-जयन्ती, 75 वे वर्ष में हीरक-जयन्ती और 100 वे वर्ष में शताब्दी मनाई जाती है। गत वर्ष अखण्ड ज्योति के 25 वें वर्ष में हम लोगों ने उसकी रजत-जयन्ती मनाई भी है। डॉक्टर साहब के जन्म का यह 50 वाँ वर्ष था अतएव उसका हर्षोल्लास मनाना उचित भी था। युग निर्माण के वे कर्मठ सदस्य हैं। यों उनका निज का भी समुन्नत परिवार है। पर उससे घनिष्ठ उनका आध्यात्मिक परिवार अखण्ड-ज्योति परिवार भी है। अतएव उन्होंने यह उचित ही समझा कि अपनी स्वर्ण-जयन्ती के अवसर पर मथुरा पहुँचे। शिविर के साधकों ने इस पर बड़ा हर्ष माना और 50 पुष्प हार से उन्हें लाद दिया। 50 दीपक उनके जीवन को अधिक प्रकाशवान करने के लिए जलाये गये तथा संस्था में उनका विशिष्ट अभिनंदन किया। उसी अवसर पर डॉक्टर साहब ने भारतीय परम्पराओं के आधार पर अपनी ढलती आयु के साथ लोकसेवा का व्रत ग्रहण करते हुए वानप्रस्थ भी ग्रहण किया। यज्ञ वेदी पर वे संस्था की ओर से दिये गये पीत परिधान पहने, धर्म देह धारण किये ऋषि हो जैसे दृष्टिगोचर हो रहे थे। 24 कलशों से वेद मन्त्रों की ध्वनियों के समक्ष उनका अभिषेक किया गया, पुष्पलता से लाद दिया गया। संस्कार के बाद डॉक्टर साहब ने अपने भावी जीवन की रूप रेखा समझाई तो उपस्थित लोग भाव विभोर हो उठे। वह दृश्य कितना स्वाभाविक, कितना मनोरम और कितना भावनापूर्ण था कि उस स्थिति का चित्रण पंक्तियों में संभव नहीं।
मानव जीवन की सार्थकता के लिए इस प्रकार उठाये गये कदम ने दूसरों को भी बड़ी प्रेरणा दी और उन्होंने भी इसका अनुकरण किया। शिविर में उपस्थित कई व्यक्ति पहले से ही इस प्रकार का निश्चय कर चुके थे और लगभग वैसा ही जीवन यापन कर भी रहे थे। पर इस अनुपम दृश्य को देखकर उनकी भी भावनाएँ उमड़ पड़ी और ता. 15 को शिविर की पूर्णाहुति के दिन 9 अन्य कर्मठ परिजनों ने भी वानप्रस्थ ग्रहण कर लिया। जिनके परिचय एवं चित्र युग निर्माण योजना में छपे हैं। इन्हीं वानप्रस्थियों लेने वालों में मस्तीचक (बिहार) के सुयोग्य डॉक्टर एवं प्रतिभाशाली विद्वान श्री रमेश चन्द्र शुक्ल भी हैं जो काफी दिनों से अपना जीवन धर्म संस्कृति की सेवा के लिए उत्सर्ग किए हुए हैं। इन्हीं वानप्रस्थों में देहरादून के प्रथम श्रेणी के उच्च परिवार की सुसंस्कृत महिला श्रीमती सुशीला देवी भी हैं जिनका पुत्र एवं पुत्र-वधू दोनों ही डॉक्टर हैं और चिकित्सा विभाग में विशेष योग्यताएँ प्राप्त करने के लिए दोनों ही अमेरिका गये हुए हैं। उनकी धार्मिकता एवं समाज सेवा की वृत्ति पहले से ही थी पर अब तो उनने पूरा समय जन-जागरण के लिए ही लगाना निश्चय कर लिया है। इसी प्रकार के अन्य सभी वानप्रस्थी हैं, जिनकी शिक्षा, प्रतिभा, साधना एवं सामाजिक स्थिति निखरी हुई है।
वानप्रस्थ आन्दोलन का शुभारम्भ जिस शुभ मुहूर्त में हुआ है, जिन लोगों ने पहल की है, उसे देखते हुए यह लगता है कि यह भावना आँधी, तूफान की तरह फैलेगी और देश भर में विशेषतया अखण्ड-ज्योति परिवार में, सहस्रों व्यक्ति अगले ही दिनों वानप्रस्थ ग्रहण करने के लिए भावान्वित होंगे और देश की इस विषम परिस्थिति को बदल डालने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादन करेंगे।
धर्म प्रचार का रचनात्मक अभियान—
इस माघ शिविर में उस योजना का भी विधिवत् उद्घाटन हो गया जिसके अनुसार धर्म तंत्र के माध्यम से जन-जागरण का प्रयोजन पूरा करने के लिए धर्म प्रचारकों की, युग निर्माताओं की एक बड़ी सेना खड़ी की जानी है। पिछले अंकों में यह बताया जा चुका है कि राजतंत्र से भी अधिक शक्तिशाली धर्मतंत्र है। लोक भावनाओं का परिष्कार यदि वस्तुतः संभव हो सकता है तो उसका माध्यम धर्मतंत्र ही है। हमें धर्म मंत्र का आश्रय लेकर ही लोक मानस का पुनर्निर्माण करना होगा। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए ऐसे प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है जो धर्मानुष्ठानों के विधि-विधानों की प्रक्रियाओं में पारंगत होने के साथ-साथ जन-जीवन में प्रबुद्ध भावनाएँ उत्पन्न कर सकने में भी समर्थ हों। धर्मानुष्ठानों के माध्यम से आजीविका किसी की भी बड़ी अच्छी तरह चल सकती है। जब निरर्थक भार रूप धर्म वेषधारी लाखों, करोड़ों की संख्या में गुलछर्रे उड़ा रहे हैं तो क्या अपने को खपा देने वाले सच्चे लोक सेवक, सच्चे कर्मनिष्ठ ब्राह्मणों को आजीविका न मिलेगी। वह मिलती रहे, उसके लिए हमारे पूर्व पुरुष दान-दक्षिणा की आवश्यक परम्परा पहले से ही प्रचलित करके रख गये हैं।
(1) जन्म से लेकर मरण पर्यन्त षोडश संस्कारों की प्रक्रिया पुनः जागृत करके व्यक्ति निर्माण एवं परिवार निर्माण का प्रशिक्षण प्रारंभ करना (2) पर्व और त्यौहारों के अवसर पर सामूहिक धर्मानुष्ठानों का आयोजन करके समाज में विविध सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करना (3) सत्य नारायण व्रत कथा में सन्निहित, नैतिक, बौद्धिक क्रान्ति को घर-घर में प्रज्ज्वलित करना (4) गीता सप्ताह कथा आयोजनों से एक सप्ताह के रचनात्मक शिविरों का तथा प्रस्तुत 3000 शाखाओं के वार्षिकोत्सवों का आयोजन करना (5) जन्म दिन, विवाह दिन एवं संस्कारों के माध्यम से प्रत्येक शाखा में पारिवारिक सत्संगों का प्रचलन तथा संगठनात्मक उद्देश्य को पूर्ण करना (6) पंच कुण्डी छोटे गायत्री यज्ञों द्वारा कम खर्च में जगह-जगह विशेष उत्साहवर्धक धर्म सम्मेलनों का आयोजन करना। यह कार्यक्रम तत्काल ही क्रियान्वित किये जाने थे। प्रसन्नता की बात है कि इसकी सुव्यवस्थित रूप रेखा बना दी गई और इस माघ शिविर में उसका व्यावहारिक प्रशिक्षण भी आरंभ कर दिया गया।
उपरोक्त प्रयोजन के लिए छह अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तकें छप कर इसी महीने में तैयार हुई हैं, जिनकी सूचना इसी अंक के पिछले टाइटल पृष्ठ पर विज्ञापन रूप में छपी है। यह साहित्य इस ढंग से लिखा गया है कि इसके आधार पर उपरोक्त सभी कार्यक्रम चलाने की शिक्षा घर बैठे भी प्राप्त की जा सकती है और कोई भी उत्साही एवं धर्म प्रेमी व्यक्ति अपनी आजीविका कमाते हुए लोक निर्माण के कार्य में तत्परतापूर्वक संलग्न हो सकता है। शाखाएँ अपने-अपने यहाँ ऐसे प्रचारक नियुक्त कर सकती हैं। दान इन संगठनों को प्राप्त हो और वे संगठन प्रचारकों को आजीविका दिया करे तो उत्तम रहेगा। यों गीता कथा के साप्ताहिक आयोजनों से भी आमदनी हो सकती है। पहले सोचा गया था कि सात दिन के आयोजन में उन्हें 40) दक्षिणा से काम चला जायगा और सोचने पर तथा विचार करने पर मालूम हुआ कि इस महंगाई के जमाने में सुयोग्य व्यक्ति उतने सस्ते नहीं हो सकते। उनकी दक्षिणा 50) तो रखनी ही होगी। महीने में दो तीन सप्ताहों से अधिक एक प्रचारक काम नहीं कर सकता। उसकी आय सौ-डेढ़ सौ रुपए से भी क्या कम होनी चाहिए। इस दृष्टि अब ऐसे प्रचारकों की दक्षिणा 50) नियत कर देने पर दोनों ओर से कोई हिचकिचाहट वाली बात न रह जायगी और जो प्रचार के इस क्षेत्र में उतरेंगे वे अधिक उत्साह एवं मनोयोग पूर्वक अपना कार्य चला सकेंगे। आयोजन कर्ताओं के लिए भी यह रकम अन्य प्रचारकों की अपेक्षा अत्यधिक कम एवं सुविधाजनक ही प्रतीत होगी।
इस महीने में प्रकाशित छह पुस्तकों के आधार पर वे लोग जिन्हें धर्म प्रचारक बनना है, घर बैठे अपनी तैयारी आरम्भ कर सकते हैं और सुविधा हो तो जेष्ठ के शिविर में मथुरा आकर उस प्रशिक्षण को और भी अधिक स्पष्टतापूर्वक समझ सकते हैं तथा प्रत्यक्ष देख सकते हैं। जो कमियाँ रह गई होंगी वे सब दूर हो जायेंगी। आमतौर से इन पुस्तकों के आधार पर बिना ट्रेनिंग के भी काम लिया जा सकता है क्योंकि उन्हें लिखा ही इस ढंग से गया है कि अजनबी व्यक्ति भी इस प्रक्रिया को सरलता पूर्वक कार्यान्वित कर सकें। शाखाएँ इन छह पुस्तकों के सैट और अपने यहाँ मंगाकर रख लेंगे तो उन्हें इन आयोजनों को प्रचलित करने में तनिक भी असुविधा न होगी।
धर्म प्रचारकों की एक बड़ी सेना तैयार करने का उद्देश्य यह नव प्रकाशित साहित्य बड़ी सुविधा पूर्वक पूर्ण करेगा। व्यावहारिक प्रशिक्षण की व्यवस्था भी मथुरा में रहेगी ही। इस प्रकार आशा की जा सकती है कि हम अगले वर्ष एक हजार धर्म प्रचारक देश के कोने-कोने में फैला सकने की स्थिति में हो सकेंगे। शाखाएँ अपने यहाँ पर एक प्रचारक व्यक्ति को रखेंगी ही। जो लोग बाहर नहीं जा सकते वे अपने निज के परिवार में अथवा शाखा संगठन के माध्यम से अपने समीपवर्ती यज्ञों में प्रचार कार्य करेंगे ही। इस प्रकार यह असम्भव नहीं कि अगले वर्षों में छोटे बड़े दस हजार धर्म प्रचारक युग-निर्माण जन जागरण की अपनी अभिनव योजना को कार्यान्वित करने के लिए खड़े हो जायं।
सामाजिक क्रान्ति की व्यापक योजना—
इस प्रचार तन्त्र के समर्थ एवं सुव्यवस्थित होने पर सामाजिक क्रान्ति का उद्देश्य पूरा कर सकना
कुछ कठिन न रह जायगा। विवाह-शादियों के नाम पर होने वाला अपव्यय जैसी अगणित सामाजिक कुरीतियाँ ऐसी हैं, जिनने अपनी जाति को खोखला करके रख दिया है। इनकी कमर तोड़नी आवश्यक है। धन की प्रतिष्ठा को गिराना और चरित्र एवं सेवा की महत्ता को अपना न आवश्यक है।
हमें ऐसे आयोजन करने होंगे, जिसमें उपेक्षित आदर्शवादियों को सम्मान एवं प्रोत्साहन मिले और अनीति अपनाने वालों को तिरस्कृत होना पड़े। शिक्षा के क्षेत्र क्रान्ति में होनी बाकी है। हमारी विचारणाएँ सज्जनोचित नहीं रही और न पारस्परिक संबंध में ही मानवोचित सौहार्द रह गया है, यह स्थिति बदली जानी चाहिए यह बदलाव संगठित विशाल प्रयत्नों एवं व्यापक अभियानों से ही सम्भव होंगे। यह संगठित शक्ति विकसित करने के लिए शाखाओं द्वारा एवं धर्म प्रचारकों द्वारा व्यापक बनाया गया अभियान कितना अधिक कारगर होगा, इसका साकार स्वरूप कुछ ही दिनों में आँखों से देखने के लिए हमें तैयार रहना चाहिये।
चैत्र मास की नवरात्रि ता0 2 अप्रैल शुक्रवार से आरम्भ होकर ता0 10 अप्रैल शनिवार को समाप्त होगी। इन 9 दिनों में गायत्री उपासना के लिये विशेष प्रयत्न करना चाहिये। 27 माला प्रति दिन जपने से इस अवधि में 24 हजार का गायत्री पुरश्चरण हो सकता है। नवरात्रियों का पुण्य पर्व गायत्री उपासना के लिये अतीव उपयुक्त एवं फलदायी होता है।
माघ मास के बाद अब आगामी शिविर ज्येष्ठ मास में होगा। ता. 15 मई से 14 जून तक यह चलेगा। जिन्हें चान्द्रायण व्रत के साथ सवालक्ष अनुष्ठान करना हो उन्हें ता0 14 मई की शाम तक मथुरा आ जाना चाहिए। इस एक महीने में संजीवन विद्या का प्रशिक्षण तथा लेखन एवं भाषण द्वारा लोक शिक्षण की व्यवस्थित कार्य-पद्धति से लाभ उठाने का अवसर मिलेगा।
धर्म प्रचारक युग निर्माता तैयार करना इस शिविर का विशेष उद्देश्य है। वाणी और लेखनी को माध्यम बना कर युग निर्माण के लिए रचनात्मक कार्यकर्ताओं का सृजन करना नितान्त आवश्यक है। व्यक्तियों के बिना युग निर्माण योजना को साकार स्वरूप न दिया जा सकेगा। अतएव ज्येष्ठ के शिविर को 15—15 दिन के दो भागों में विभाजित किया गया है। ता. 15 से 30 मई तक धर्म मंच का अवलंबन कर प्रवचन कर सकने की क्षमता उत्पन्न करने का प्रशिक्षण दिया जायगा। (1) गीता की सप्ताह कथा (2) सत्य नारायण कथा (3) पर्वोत्सव मनाने को व्याख्यान तथा विधान (4) षोडश संस्कारों के विधान तथा उन अवसरों पर किये जाने वाले प्रवचन (5) सामूहिक गायत्री यज्ञों का विधान तथा उन्हें करने के साथ लोक शिक्षण का अभ्यास, यह पंच सूत्री प्रशिक्षण आरम्भिक पन्द्रह दिनों में चलेगा। इन विषयों पर हमारे भाषण सुनने को मिलेंगे तथा विधि-विधानों को प्रत्यक्ष रूप से कराके दिखाया जायगा। शिक्षार्थियों को उपरोक्त विषयों पर स्वयं बोलने तथा क्रियाकाण्डों के करने का अवसर मिलेगा। जो त्रुटियाँ रहेंगी उन्हें ठीक कराया जायगा। ताकि यहाँ से जाने से बाद शिक्षार्थी अपने-अपने कार्य क्षेत्रों में धड़ल्ले के साथ प्रस्तुत योजना के अनुसार कार्य कर सकने में समर्थ हो सकें।
शिविर का उत्तरार्ध लेखन प्रशिक्षण के लिए सुरक्षित है। ता. 31 मई से 14 जून तक यह शिविर चलेगा। नवोदित समाज के लिए प्रेरणाप्रद साहित्य की अत्यधिक आवश्यकता है। खेद की बात है कि आज जो कुछ लिखा या छापा जा रहा है उसमें से अधिकाँश कूड़ा-करकट की श्रेणी का है और उसका बहुत-सा भाग ऐसा है जिसे अश्लील एवं पथभ्रष्ट करने वाला कहा जाय तो कुछ भी अनुचित न होगा। नये समाज की अभिनव रचना के लिए जिस प्रकार के साहित्य की आवश्यकता है उसका सृजन नहीं के बराबर ही हो रहा है। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए हमें नये साहित्यकारों एवं लेखकों का निर्माण करना होगा। परिवार में कितने ही सुशिक्षित व्यक्ति ऐसे हैं जिनमें इस प्रकार की क्षमता विद्यमान है पर उनका समुचित पथ-प्रदर्शन न होने से वे कुछ कर पाने में समर्थ नहीं होते। इस शिविर में उन्हें लेखन संबंधी वह सारी शिक्षा सार रूप से दी जायगी जो हमने अपने 35 वर्ष के साहित्य जीवन में अनेक कटु, मधुर अनुभवों के बाद संचित की है।
भारत में लगभग 3000 हिन्दी की और 5000 अन्य भाषाओं की पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होती हैं। इनके पाठक करीब 5 करोड़ हैं। विचार यह है कि युग निर्माण योजना की विचारधारा को इन सभी पत्रों में लेख रूप में नियमित रूप से छपना आरम्भ करा दिया जाय।
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फार्म 4
मैं, श्रीराम शर्मा आचार्य यह घोषित करता हूँ कि नीचे दिये गये सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य हैं।
प्रकाशन का स्थान — मथुरा
प्रकाशन का अवधि -क्रम—मासिक
मुद्रक का नाम—श्री राम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता—भारतीय
पता—बम्बई भूषण प्रेस, मथुरा।
प्रकाशक का नाम—श्री राम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता—भारतीय
पता—अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
संपादक का नाम—श्री राम शर्म आचार्य
राष्ट्रीयता—भारतीय
पता—अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
स्वत्वाधिकारी—श्री राम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
(हस्ता.) श्रीराम शर्मा आचार्य
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हमने स्वयं अब तक 25 वर्षों में बहुत कुछ लिखा है। उन्हीं विचारों को नये रूप से लिख कर नये लेखक इन पत्रों में अपने नाम से छपाना आरम्भ करेंगे तो उनका उत्साह बढ़ेगा, पत्रों को मैटर मिलेगा और हमारा उद्देश्यपूर्ण होगा। भारत की प्रायः सभी पत्रिकाएँ हमारे यहाँ मौजूद हैं। उनमें से 5—5 अखबार एक-एक लेखक के जिम्मे कर देंगे और ऐसा प्रबन्ध कर देंगे कि उनके लेखों को सम्पादक लोग छापते रहें। इस तरह नये लेखकों का उत्साह एवं अनुभव बढ़ता चलेगा और वे धीरे-धीरे साहित्य क्षेत्र में अपनी प्रतिभा विकसित करते हुए राष्ट्र के नव निर्माण में महत्वपूर्ण योग दे सकेंगे। पुस्तकों और ग्रन्थों का प्रणयन, कठिनताएँ, प्रकाशन व्यवसाय, सम्पादन, संवाददाता होने की जानकारी, प्रेस चलाने का अनुभव आदि कितने ही अपने अनुभवों के वे निचोड़ हम इस 15 दिन की अवधि में सिखा देंगे जो जीवन-भर प्रयत्न करते रहने पर भी साधारणतया प्राप्त नहीं होते।
जो लोग पूरे एक महीने रहना चाहें वे प्रसन्नतापूर्वक दोनों प्रशिक्षणों का लाभ उठा सकते हैं। जिनके पास समय कम हो वे अपने अभीष्ट एक शिविर में भी रह सकने को स्वतंत्र हैं। जिन्हें चान्द्रायण व्रत करना हो करें जिन्हें न करना हो न करें। पर जो कुछ भी करना सीखना हो, जितने दिन रहना हो उसकी पूरी सूचना देकर पूर्ण स्वीकृति अवश्य प्राप्त कर लेनी चाहिए। बिना स्वीकृति के किसी को भी लिया न जायगा। आगन्तुक अपने स्त्री, बच्चों को साथ लाना चाहें तो भी ला सकेंगे भोजन व्यय सबको अपना करना होगा। अच्छा हो कुछ लोग मिल-जुल कर अपने भोजन बनाने का प्रबंध स्वयं कर लिया करें। इसमें सस्ता भी पड़ेगा और अच्छा रहेगा।
विवाह शादियों में होने वाला अपव्यय, दहेज, चढ़ावा, दिखावा आदि का ढोंग अब इतना भारी एवं घातक हो चला है कि इस नासूर का आपरेशन जल्दी से जल्दी किया जाना चाहिए। उसके लिए आदर्श विवाहों की योजना बनाई गई है। अब उसे व्यापक रूप से कार्यान्वित करना है। इसके लिए अलग-अलग जातियों के प्रगतिशील संगठन आवश्यक हैं, क्योंकि आमतौर से अभी विवाह, शादी का क्षेत्र अपनी-अपनी जाति-उपजाति तक ही सीमित है। किस जाति में कौन व्यक्ति प्रगतिशील विचारों के हैं, यह अभी पता न चलने से इस प्रकार के वर-कन्या ढूंढ़ना कठिन होता है जो आदर्श रीति से बिना खर्च का विवाह करना पसन्द करें। एक पक्ष सुधारवादी हो और दूसरा न हो तो फिर वह एकांकी सुधारवादिता कुछ कारगर नहीं रह जाती। इस कठिनाई का एकमात्र हल यही है कि प्रत्येक जाति के प्रगतिशील संगठन अलग-अलग बना दिए जायं जिनका कार्य प्रगतिशील विचारों के लोगों को संगठित कर उनके बीच आदर्श विवाहों की परम्परा आरम्भ करना हो।
इस कार्य के लिए प्रथम सम्मेलन 17, 18, 19 को रख रहे हैं। यह प्रधानता “सनाढय” ब्राह्मणो का होगा। चूँकि हम स्वयं सनाढय हैं, इसलिए अपने समीपवर्ती क्षेत्र से सेवा कार्य आरम्भ करने की नीति के अनुसार शुरुआत यहीं से करना उचित है। अखण्ड-ज्योति परिवार में जो भी प्रगतिशील विचारों के सनाढय ब्राह्मण हों उपरोक्त तिथियों में मथुरा पधारने के लिए हम सबको आमंत्रित करते हैं। सम्मेलन में एक अखिल भारतीय संगठन बना दिया जायगा, और आवश्यक विचार−विनिमय के उपरान्त जातीय क्षेत्र में जो सुधार और आवश्यक होंगे उन्हें प्रसारित करने के लिए कार्य आरम्भ कर दिया जायगा।
यों यह त्रिदिवसीय सम्मेलन सनाढय ब्राह्मणों के लिए होगा, पर वही रूपरेखा एवं पद्धति अन्य सभी जाती प्रजातियों की भी अगले दिनों बनाई जानी है, अतएव यह आवश्यक है कि इन सुधार कार्यों में अभिरुचि रखने वाले अन्य जातियों के परिजन भी सम्मिलित हों। इस सम्मेलन को प्रत्यक्ष देखकर वे भी अपनी जाति का उसी ढंग से संगठन करने तथा कार्यक्रम बनाने की तैयारी करें।
अलग निमंत्रण पत्रों की प्रतीक्षा न कर उन सभी प्रगतिशील विचारों के अखण्ड-ज्योति सदस्यों को इसमें सम्मिलित होने की तैयारी करनी चाहिए और अपने आने की सूचना भेज देनी चाहिए ताकि उनके ठहरने आदि का समुचित प्रबन्ध किया जा सके।
भारत में सहस्रों जातियाँ और उपजातियाँ हैं, उनमें अलग-अलग प्रकार की कुरीतियाँ प्रचलित हैं। एक ही नगर में बसने वाले लोगों में जाति भिन्नता के कारण अलग-अलग प्रकार की विडम्बनाएं घुसी पड़ी हैं। रीति-रिवाजों में काफी अन्तर है। इसलिए सुधार कार्य एक स्तर पर नहीं हो सकता और न एक प्रकार के प्रस्ताव सबकी समस्याओं को हल कर सकते हैं। नाते-रिश्ते एवं कुटुम्ब परिवार के कारण अपने-अपने वर्ण के लोगों के साथ जुड़ा रहना पड़ता है और उनमें प्रचलित कुरीतियों के आगे सिर झुकाना पड़ता है। सुधार कार्य यदि जातीय स्तर पर हों तो उससे समस्याओं का समाधान अधिक आसानी से हो सकता है।
वैसे बहुत-सी जातीय सभाएं पहले से ही बनी हुई हैं। पर उन पर कब्जा प्रायः पुराने खयाल के पंच, चौधरियों का ही होता है। जब जातीय सम्मेलन होते हैं तब विद्या, धन या प्रतिभा की दृष्टि से जो बड़े होते हैं उन्हें ही पदाधिकारी बना दिया, चुन लिया जाता है। यह कोई नहीं देखता कि इनके विचार सुधारवादी हैं या नहीं? फल यह होता है कि उन पर रूढ़िवादी लोगों का ही कब्जा बना रहता है। छोटे-मोटे सुधारों के अलावा कोई क्रान्तिकारी कदम उठा सकना उनके लिए संभव नहीं होता। इन तथाकथित बड़े आदमियों में क्रान्ति भावना होती भी नहीं। फिर उनके निहित स्वार्थ भी होते हैं। दहेज लेने-देने में उनकी कुछ हानि भी नहीं, जिनके पास पैसा है वे क्यों न उसकी होली खेलने का मजा लूटें। इसलिए उन तथाकथित चौधरी पंचों का मुँह ताकने की अपेक्षा भावनाशील, प्रगतिशील लोगों को लेकर कार्य आरम्भ करना है। भले ही वे गरीब स्तर के क्यों न हों। कठिनाइयाँ भी तो उसी वर्ग की हैं। अतएव आगे भी उन्हें ही बढ़ना होगा।
किसी जाति में पहले से बनी हुई कोई सभा है या नहीं, इससे हमें कोई वास्ता नहीं। जो सभाएं बनी हुई हैं उनसे न हमें राग होना चाहिए न द्वेष। वरन् अपना प्रगतिशील मार्ग स्वयं ही निर्धारित करना चाहिए। अपने द्वारा संगठित, संगठनों के आगे प्रगतिशील शब्द जुड़ा होगा और उसका अन्य जातीय संगठनों से स्वतन्त्र अस्तित्व रहेगा। ताकि दूसरे प्रतिगामी विचारों के लोग उस पर हावी न हो सकें। जिन्हें आदर्शवादिता पसंद है, जो सुधार चाहते हैं उन्हें ही इन संगठनों की सदस्यता पर हस्ताक्षर करने के उपरान्त इन सभाओं में सम्मिलित होने का अधिकार मिलेगा। जो उन प्रतिज्ञाओं को तोड़ेंगे वे उसकी सदस्यता से वंचित हो जायेंगे इस प्रकार यह संगठन प्रगतिशील लोगों के ही हाथों में अन्त तक बने रहेंगे और जो कुछ कहने का अपना मन है उसकी प्रक्रिया निर्बाध गति से चलती रहेगी।
इन संगठनों का प्रथम कार्य यह होगा कि आदर्शवादी विवाहों की मान्यता को स्वीकार करने वाले लोगों को तलाश किया जाय, या प्रचार द्वारा उन्हें वैसी मान्यता बनाने के लिए सहमत किया जाय। सदस्यों की संख्या के अनुसार उनकी शाखा, उपशाखाएं बना दी जायँ। इन शाखाओं में लड़के-लड़कियों की आवश्यक जानकारियाँ संग्रहीत रहें ताकि तलाश करने वालों को बहुत-सी जानकारी उनके केन्द्रों से ही मिल जाया करे। इन संगठनों द्वारा आदर्श विवाह कराने, उनका प्रचार विज्ञापन करने, इस मार्ग पर चलने वालो को यशस्वी बनाने, समय-समय पर सम्मेलन करने, सामूहिक यज्ञोपवीत आदि कराने तथा बौद्धिक एवं नैतिक क्रान्ति के लिए आवश्यक पृष्ठभूमि तैयार करने की बहुमुखी योजना सामने रहेगी। उपजातियों का भेदभाव दूर करके एक जाति के अंतर्गत विविध छोटे वर्गों में परस्पर विवाहों का प्रचलन भी इनका एक कार्यक्रम रहेगा।
कुंए में गिरे को निकालने के लिए कुंए में उतरना पड़ता है, काँटे को निकालने के लिए काँटे का उपयोग करना होता है। जातिगत कुरीतियों को मिटाने के लिए इस प्रकार के जातीय संगठन उपयोगी ही सिद्ध होंगे। इस उठते हुए कदम के साथ जिनकी सहमति हो उन सभी उत्साही एवं विचारशील लोगों को हम इन पंक्तियों द्वारा 17, 18, 19 जून को होने वाले इस प्रथम सम्मेलन में पुनः सादर आमंत्रित करते हैं।
युग-निर्माण के लिए धर्म मंच से रचनात्मक कार्य करने के लिये निम्न पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है। इस माध्यम से जन-जागरण के लिए बहुत कुछ कार्य किया जा सकता है तथा जनता को सच्चे अर्थों में धार्मिक बनाया जा सकता है।
1—गीता-कथा
गीता सप्ताह के आधार पर आयोजित धर्मानुष्ठान में प्रवचन करने योग्य 12 प्रसंग। प्रत्येक में ढेरों पौराणिक, ऐतिहासिक कथाओं एवं दृष्टान्तों का समावेश है। प्रसंग की पुष्टि के लिए श्लोक, दोहे तथा रामायण के प्रसंग भी दिये गये हैं। सजिल्द, 34 पौंड बढ़िया कागज, बड़ा साइज, मूल्य 6) रु.।
2—गीता पद्यानुवाद
राधेश्याम तर्ज पर गीता के श्लोकों का अनुवाद, मूल श्लोकों सहित। गीता परायण के लयबाजी के साथ सामूहिक गान के उद्देश्य से इसे बनाया गया है। सजिल्द, 34 पौंड ग्लेज बढ़िया कागज। जड़ा साइज। मूल्य 3)
3—अभिनव संस्कारपद्धति
सभी संस्कारों के मनाने की सरल सुविधाजनक एवं सर्वोपयोगी पद्धति। प्रत्येक संस्कार के महत्व का वर्णन है। जन्म दिन तथा विवाह दिन मनाने की पद्धति का विधि-विधान भी सम्मिलित है तथा संस्कार कराते समय क्या शिक्षा उस व्यक्ति को तथा उपस्थित लोगों को दी जानी चाहिए और बढ़िया मोटा ग्लेज कागज। कार्डबोड की जिल्द, मूल्य 2॥)
4—पर्वों की प्रेरणा और पद्धति
प्रमुख त्यौहार पर्वों को सामूहिक रीति से मनाने का सरल विधान। पर्व त्यौहारों में सन्निहित उन सिद्धान्तों शिक्षाओं तथा प्रेरणाओं का उल्लेख है जिसे उपस्थित लोगों को समझकर उन्हें सामाजिकता की शिक्षा दी जा सके। समाज निर्माण का धार्मिक मंच से यह एक प्रभावपूर्ण प्रयास है। बढ़िया कागज, कार्ड बोर्ड की जिल्द। मूल्य 2)
5—सामूहिक गायत्री हवन
सामूहिक गायत्री यज्ञ करने की आदि से अन्त तक सारी विधि व्यवस्था बहुत सरल और सुबोध ढंग से समझाई गई है। इस विधि से साधारण शिक्षा वाला व्यक्ति भी विधिवत् गायत्री यज्ञ भली प्रकार करा सकता है और जनता में अनेकों बुराइयों को छुड़ाने तथा अनेकों अच्छाइयों बढ़ाने की प्रेरणा कर सकता है। बढ़िया कागज कार्ड की जिल्द, मूल्य 2)
6—सत्यनारायण कथा
प्रचलित सत्यनारायण कथा का मूल उपाख्यान ज्यों का ज्यों रखते हुए भी उनके संवादों में नैतिक धार्मिक एवं बौद्धिक उत्कर्ष की बड़ी ही महत्वपूर्ण विचारधारा का समावेश कर दिया गया है। इसके आधार पर कही हुई कथा को सुनने वालों में जीवन निर्माण का एक नवीन दृष्टिकोण उत्पन्न हो सकता है।
मूल्य 75 न. पै.।
इस रुपये से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ।
पता—अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा।
हम सफर ! आज अन्तर-पट अपने खोलो,
मैं तुमको विप्लव गान सुनाने आया हूँ।
तुम माफ करो शत-बार धृष्टता यह मेरी,
मैं पारस हूँ और स्वर्ण बनाने आया हूँ॥
किस विद्रोही ने बम-बारूद सजाये हैं?
किसने मानवता के जीवन से खेला है?
यह लेकर आया कौन हाथ में चिनगारी?
किसके कारन यह फैला घोर झमेला है?
मैं जग का, जीवन का, मानव का साथी हूँ,
मैं सारे जग की ज्वाल बुझाने आया हूँ॥
यह सर्वनाश का बढ़ता रेगिस्तान देख,
तुम कहो न मुझ से इस सावन से क्या होगा।
इस जग में छाया गहन घोर अन्धेरा है,
तुम कहो न मुझको एक किरन से क्या होगा।
मैं एक किरन से तिमिर जवनिका तोड़ूंगा,
अब अंधकार की लाश जलाने आया हूँ॥
ओ आँधी! सुन ले मैं अब छोटा दीप नहीं,
जो तेरी लहर-झकोरों से बुझ जाऊँगा।
मैं अग्नि-ज्वाल का पुँज महा तेजस्वी हैं,
मैं तुझे लिपट कर नभ से जा टकराऊँगा।
तुम घर-घर यह संदेश सुना देना साथी!
इस धरती को मैं स्वर्ग बनाने आया हूँ।
तुम माफ करो शत-बार धृष्टता यह मेरी,
मैं पारस हूँ और स्वर्ण बनाने आया हूँ॥
—प्रकाश गज्जर.
*समाप्त*