शान्ति का सच्चा उपाय-परोपकार

मानव सेवा से बढ़ कर, सुख और शान्तिदायक कोई उपाय संसार में नहीं है। जब किसी की सेवा करके उसका दुख दूर कर दिया जाता है, तो उसकी आत्मा से अद्भुत आनन्द की तरंग वातावरण को प्रभावित करती हैं, जिससे संसार में मानवों के हृदय पर अनुकूल प्रतिक्रिया होती।

मन में जब सुख और शान्ति का समावेश हो जाता है, तब उसका प्रतिबिम्ब बाहर भी दिखाई देता है। इसलिए हर मनुष्य को यथा सम्भव मानवता की सेवा करने में तत्पर रहना चाहिए। जिसे भी आवश्यकता है, उसके लिए कुछ न कुछ करना चाहिए।

बिना मानवता की सेवा किये कोई भी सच्ची सुख शान्ति नहीं पा सकता। मनुष्य की सेवा करना अपनी सेवा करना है। फिर क्यों न अपने तक सीमित रहने के स्थान पर सामाजिक परिधि के माध्यम से अपनी सेवा की जाये। आत्मा का विकास परोपकार भावना और उसी के अनुसार कार्य करने से ही होता है। वैसे न उस विकास की सरल सम्भावना रहती है और न उसका कोई महत्व है।

-रवीन्द्रनाथ टैगोर


सर्वशक्तिमान परमेश्वर और उसका सान्निध्य

प्रत्येक कर्म का कोई अधिष्ठाता जरूर होता है। परिवार के वयोवृद्ध मुखिया के हाथ सारी गृहस्थी का नियंत्रण होता हैं,मिलों-कारखानों की देख−रेख के लिये मैनेजर होते हैं, राज्यपाल-प्रान्त के शासन की बागडोर संभालते हैं, राष्ट्रपति सम्पूर्ण राष्ट्र का स्वामी होता है। जिसके हाथ में जैसी विधि-व्यवस्था होती हैं, उसी के अनुरूप उसे अधिकार भी मिले होते है। अपराधियों की दंड-व्यवस्था, सम्पूर्ण प्रजा के पालन-पोषण और न्याय के लिये उन्हें उसी अनुपात से वैधानिक या सैद्धान्तिक अधिकार प्राप्त होते हैं। अधिकार न दिये जायें तो लोग स्वेच्छाचारिता, छल-कपट और निर्दयता का व्यवहार करने लगें। न्याय-व्यवस्था के लिये शक्ति और सत्तावान होना उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है।

इतना बड़ा संसार एक निश्चित व्यवस्था पर ठीक-ठिकाने चल रहा है। सूरज प्रतिदिन ठीक समय से निकल आता है, चन्द्रमा की क्या औकात जो अपनी माहबारी ड्यूटी में रत्ती भर फरक डाल दे, ऋतुयें अपना समय आते ही आती और लौट जाती हैं, आम का बोर बसंत में ही आता है, टेसू गर्मी में ही फूलते है, वर्षा तभी होती है जब समुद्र से मानसून बनता है। सारी प्रकृति, सम्पूर्ण संसार ठीक व्यवस्था से चल रहा है। जो जरा-सा इधर-उधर हुआ कि उसने मार खाई। अपनी कक्षा से जरा डाँवाडोल हुये कि एक तारे को दूसरा खा गया। जीवन-क्रम में थोड़ी भूल हुई कि रोग-शोक, बीमारी और अकाल-मृत्यु ने झपट्टा मारा। इतने बड़े संसार का नियामक परमात्मा सचमुच बड़ा शक्तिशाली है। सत्तावान न होता तो कौन उसकी बात सुनता। दंड देने में उसने चूक की होती तो अनियमितता, अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था ही रही होती। उसकी दृष्टि से कोई भी छुपकर पाप और अत्याचार नहीं कर सकता। बड़ा कठोर है वह। दुष्ट को कभी क्षमा नहीं करता। इसीलिये वेद ने आग्रह किया है :-

यस्येम हिमवन्तों महित्वा यस्य समुद्रं रसयासहाहुः।

यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहु कस्मैदेवाय हविषाविधेम॥

हे मनुष्यों! बर्फ से आच्छादित पहाड़, नदियाँ, समुद्र जिसकी महिमा का गुणगान करते हैं। दिशायें जिसकी भुजायें हैं हम उस विराट् विश्व पुरुष परमात्मा को कभी न भूलें।

गिता के “येन सर्वमिदं ततम्” अर्थात् “यह जो कुछ है, परमात्मा से व्याप्त है” की विशद व्याख्या करते हुये योगीराज अरविन्द ने लिखा है-

“यह सम्पूर्ण संसार परमात्मा की ही सावरण अभिव्यञ्जना है। जीव की पूर्णता या मुक्ति और कुछ नहीं भगवान के साथ चेतना, ज्ञान, इच्छा, प्रेम और आध्यात्मिक सुख में एकता प्राप्त करना तथा भगवती शक्ति के कार्य सम्पादन में अज्ञान, पाप आदि से मुक्त होकर सहयोग देना है। यह स्थिति उसे तब तक प्राप्त नहीं होती है, जब तक आत्मा अहंकार के पिंजरे में कैद है, अज्ञान में आवृत्त है, तथा उसे आध्यात्मिक शक्तियों की सत्यता पर विश्वास नहीं होता। अहंकार का जाल, मन, शरीर, जीवन, भाव, इच्छा, विचार, सुख और दुःख के संघर्ष, पाप, पुण्य, अपना, पराया आदि के जटिल प्रपंच सभी मनुष्य में स्थित एक उच्चतर आध्यात्मिक शक्ति के बाह्य और अपूर्ण रूपमात्र हैं। महत्ता इसी शक्ति की है, मनुष्य की नहीं, जो प्रच्छन्न रूप से आत्मा में अधिगत हैं।”

योगिराज के इस निबन्ध से तीन अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्धान्त व्यक्त होते हैं। 1. यह जो संसार है, परमात्मा से व्याप्त है। उसके अतिरिक्त और सब मिथ्या है माया है, भ्रम है, स्वप्न है। 2. मनुष्य को उसकी इच्छानुसार सृष्टि-संचालन के लिये कार्य करते रहना चाहिये 3. मनुष्य में जो श्रेष्ठता, शक्ति या सौंदर्य है, वह उसके दैवी गुणों के विकास पर ही है।

मनुष्य जीवन के सुख और उसकी शांति के लिये इन तीनों सिद्धान्तों का पालन ऐसा ही पुण्य फलदायक है जैसा त्रिवेणी स्नान करना। मनुष्य दुष्कर्म अहंकार से प्रेरित होकर करता है, पर वह बड़ा क्षुद्र प्राणी है। जब परमात्मा की मार उस पर पड़ती है तो बेहाल होकर रोता-चिल्लाता है। सुख तो उसकी इच्छाओं के अनुकूल सात्विक दिशा में चलन में, प्राकृतिक नियमों के पालन करने में ही है। अपनी क्षणिक शक्ति के घमंड में आया हुआ मनुष्य कभी सही मार्ग पर नहीं चलता, इसीलिये उसे साँसारिक कष्ट भोगने पड़ते हैं। परमात्मा ने यह व्यवस्था इतनी शानदार बनाई है कि यदि सभी मनुष्य इसका पालन करने लगें तो इस संसार में एक भी प्राणी दुःखी और अभावग्रस्त न रहे।

कालोऽस्मि लोक क्षय कृत्प्रवृद्धो,

लोकान्समाहतु मिह प्रवृत्तः।

ऋतेऽपि त्वाँ न भविष्यन्ति सर्वे,

येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥

(गीता 11। 32)

अर्थात्- मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोगों को नष्ट करने के लिये प्रवृत्त हुआ हूँ, इसलिये हे अर्जुन। जो यह प्रतिपक्षी सेना है वह तेरे न मारने पर भी जीवित नहीं बचेंगे। बिना युद्ध के भी इनका नाश हो जायगा।”

वह परमात्मा सचमुच बड़ा शक्तिशाली, बड़ा बलवान है। उसकी अवज्ञा करके कोई बच नहीं सकता। अतः उसी के होकर रहें, उसी की आज्ञाओं का पालन करें, इसी में मनुष्य मात्र का कल्याण है।


ईश्वर और उसकी अनुभूति

इस संसार में रहते हुये मनुष्य सफलताओं के लिये नाना प्रयत्न करता है किन्तु उसकी निजी इच्छायें प्रायः परिस्थितियों की परतंत्रता के कारण पूर्ण नहीं होतीं। उद्योग करने से भी अभीष्ट लाभ नहीं होता तो भाग्य के अस्तित्व को स्वीकार करना पड़ता है, जिससे मनुष्य जीवन की अवधि अपरिचित सी दिखाई देने लगती है। जीव की अमरता और उसकी परतंत्रता- इन दो वस्तुओं पर विचार करने के उपरान्त हम इस तथ्य पर पहुँचते हैं कि एक शक्ति ऐसी भी है जो इस सृष्टि का नियमन करती है। बालक का जन्म होता है तो सामान्य मनुष्य उसे एक सामान्य संयोग मानकर साँसारिक प्रपंचों में लग जाते हैं को किन्तु विचारवान् व्यक्ति के लिये यही सबसे महत्वपूर्ण घटना भी हो सकती है। हाड़-माँस के इस छोटे से पिंड का गर्भ स्थान जैसी अपर्याप्त जगह में किस तरह पालन-पोषण होता है? किस तरह वह साँस ग्रहण करता होगा? कहाँ से प्रकाश मिलता होगा? रस, रक्त आदि का संचालन किस तरह होता होगा? माँस के कटघरे में आबद्ध जीव के लिये इतनी कठिन व्यवस्थाओं पर विचार करने से हैरत में रह जाना पड़ता है। लगता है कोई अदृश्य शक्ति ही इस संसार के भाग्य और परिस्थितियों का निर्माण करती रहती है।

सब कुछ चमत्कार-सा लगता है, पर है सत्य। अपने अन्दर की खोज करते हैं तो केवल हाड़-माँस, रक्त, मल-मज्जा को ही सार-भूत नहीं पाते। इससे भी उच्चतर किसी चेतन तत्व का आभास होता है। यह अन्तर्बोध कहाँ से आया? यह प्रश्न बार-बार उठता है, ईश्वर की धारणा को अस्तित्व में मान लेने से ही संतोष नहीं होता। उसकी खोज भी करनी पड़ती है। इसके लिये ध्यान निजत्व पर टिकता है। अपने आपको जानने से संभवतः ईश्वर विषयक ठोस निष्कर्ष निकले, यह समझ कर सारा ध्यान अन्तर्चेतना पर जमा देते हैं, तो उसकी स्थिति के साथ-साथ किसी प्रेरक सत्ता का ज्ञान होता है। ईश्वर का अस्तित्व स्पष्ट नजर आने लगता है। उसकी सत्ता का अनुभव जिधर दृष्टि जाती है उधर ही होने लगता है। ध्यानपूर्वक देखने से प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक प्राणी में ईश्वरता और उसकी समर्थता प्रकट होती है।

सूर्य, चन्द्रमा, आकाश, पहाड़, नदियाँ, पशु- पक्षी और इनसे सम्बन्धित अनेक क्रियायें-भरण-पोषण उत्पादन संरक्षण आदि में उस सर्वव्यापक सत्ता का ही हस्तक्षेप कार्य कर रहा दिखाई देता है। इसे प्रकृति या निसर्ग कह कर टाला नहीं जा सकता, क्योंकि प्रकृति अपने आप में अपूर्ण है। वह स्वतः गतिशील नहीं है। जहाँ भी क्रियाशीलता दिखाई देती है वहीं प्रकृति के साथ-साथ विश्व-चेतना का भी प्रादुर्भाव दिखाई देने लगता है।

महात्मा टॉलस्टाय ने लिखा है “मैंने पहले अनेक तर्कों के द्वारा ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करना चाहा किन्तु उनसे बोध न हुआ, पर इससे एक बात मेरी समझ में आई कि संसार का कारण देश या काल की भाँति कोई वस्तु नहीं है। यदि “मैं” हूँ तो इसका कारण भी कुछ जरूर होगा। यह कारण भी किसी आदि कारण पर आधारित होंगे। सम्पूर्ण सृष्टि का जो मूल कारण होगा उसे ही लोगों ने ईश्वर कहा है। यह विचार मुझे पसंद आ गया और इसे ही समझने में अपनी सारी चेष्टा लगा दी। इन प्रश्नों के सुलझाने में मैं जितना ही उलझता गया उतना ही एक बात मेरी बुद्धि में स्थिर होती गई कि ईश्वर स्रष्टा हैं, वही संसार का पालन करता है। इस विश्वास ने मेरी क्षुद्रता प्रकट कर दी तबसे मैं निरन्तर परमेश्वर से ही प्रार्थना किया करता हूँ “प्रभो! मुझे शक्ति दो, ज्ञान दो ताकि मेरे जीवन की गति रुकने न पाये।”

नास्तिकता और अज्ञेयवाद के झूठे वितण्डावादों की अपेक्षा घटनाओं की विद्यमानता अधिक बलवत्तर है। हमारी अन्तर्चेतना यह सिद्ध करती है कि कोई समष्टि मन इस विश्व में अवश्य विद्यमान है, जो सारे संसार को एक क्रम व्यवस्था से चलाता रहता है। यह प्रकृति की तरह जड़ नहीं है। स्वार्थी या कठोर भी नहीं है प्रत्युत अनन्त शक्तिशाली, सर्व ज्ञानी तथा प्रेम स्वरूप है। यह सत्ता न होती तो मनुष्यों के हृदय में प्रेम की अजस्र सत्ता कहाँ से आती। सौंदर्य की आध्यात्मिक आकाँक्षा का उदय उस परम सुन्दर की अनुभूति का अंश ही तो है। इन सिद्धान्तों का खण्डन किसी भी तरह नहीं किया जा सकता। चेतना का नियमन करने वाली कोई कारण-सत्ता है जरूर।

प्रेम और सौंदर्य की तरह प्रत्येक व्यक्ति में ज्ञान की जो स्फूर्ति हुआ करती है वह भी तो परमात्मा के प्रकाश की ही स्थिति है। जागृत अवस्था में प्रत्येक वस्तु जिस तरह व्यवहृत होती है उसका ठीक वैसा ही आकार-प्रकार, डोल-ढाँचा मस्तिष्क में बनता बिगड़ता रहता है। सुप्त- अवस्था में भी एक अहं-भावना कार्य किया करती है जिसकी प्रत्येक गतिविधि का आभास निद्रा टूट जाने के बाद भी होता रहता है, इससे क्या ज्ञान की अविरलता का बोध नहीं होता। यह ज्ञान आखिर कहीं से प्रभासित ही हुआ होगा? उसका भी कुछ न कुछ अस्तित्व होगा? यह विचार यदि अविचल भाव से चलते रहें तो भी अन्त में हम ईश्वरीय-अस्तित्व की परिधि में ही पहुँचेंगे। वही सर्वत्र अपनी चेतना का प्रकाश फैला रहा है, इस विश्वास के साथ ही अपना ज्ञान परिपूर्ण बनता है।

हर तरफ से टकराकर मनुष्य बार-बार इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि बिना किसी कारण के इस संसार का निर्माण हो नहीं सकता। बिना किसी हेतु के मनुष्य का यहाँ आगमन सम्भव नहीं है। इस बात को कहाँ तक टाला जा सकता है, किसी ने हमें जन्म दिया है, हमारा लालन-पालन किया है, हमें प्रेम किया है। मनुष्य की निजी इच्छायें परवश हैं। वह प्रत्येक कार्य कर गुजरने के लिये पूर्ण क्षमतावान् नहीं है। फिर उसके पास मानवीय संदेहों, शंकाओं की समाधान शक्ति भी तो नहीं है। ऐसी अवस्था में इसे कोई कैसे मानेगा कि मनुष्य का जन्म प्रकृति का कार्य है। प्रत्येक कार्य ठीक विधि-व्यवस्था पर चल रहा है अतः उसका संचालन कर्त्ता भी निःसंदेह हमारे मन की तरह ही विचारपूर्ण होना चाहिये।

ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास कर लेने से सदैव उसकी पुष्टि ही हुई है। भारतीय तत्व-वेत्ताओं ने गहन अनुसंधान के बाद सबसे पहला आदेश यही दिया है। “ईश्वर पर विश्वास करो।” और इस संसार को ही उसके होने का प्रमाण समझो। विश्वास बना लेने के बाद मनुष्य की चेतना अन्तर्मुखी हो जाती है, फलस्वरूप तर्क और अविश्वास की छाया आपने आप हटने लगती है और मनुष्य पूर्ण-प्रकाश की ओर शनैः शनैः बढ़ने लगता हैं। सिद्धि प्राप्ति के तुरन्त बाद ही “ईश्वर पर विश्वास करो” का सर्व-निश्चयात्मक आदेश प्रामाणिक कहा जा सकता है। क्योंकि उन महापुरुषों के जीवन से हमें दिव्यता, असीमता और पूर्णता का आभास मिलता है। सभी कालों और देशों के मनुष्यों ने परमात्म-सत्ता को माना है। ऊपर,नीचे, भीतर-बाहर, अन्तरिक्ष, आकाश, सूर्य-चन्द्रमा में सर्वत्र उसी के प्रकाश का बखान किया है। जिन वेदान्तियों तार्किक तथा दार्शनिकों ने मानव बुद्धि का यथा साध्य प्रयोग किया है उन्होंने उसके अस्तित्व को प्रमाणित किया है। योगियों ने उसी अंतर्ज्योति को अनुभव किया है।

कितने ही विरोध उत्पन्न किये जायें किन्तु जीवन की चेतनशीलता के आगे आकर सारे अज्ञेय-विचार समाप्त होने को मजबूर हो जाते हैं। जहाँ मनुष्य की विवशता है, वहीं ईश्वर की स्थिति है। जहाँ मनुष्य की बुद्धि तथा शक्तियाँ कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं कर पातीं किन्तु गतिविधियाँ बराबर चलती रहती हैं, वहीं परमात्मा विराजमान है यह तथ्य भुलाया या ठुकराया नहीं जा सकता।

अनेक उपलब्धियों, अन्वेषणों तथा गहन जीवन- दर्शन के परिणामस्वरूप उस परमात्मा को बुद्धि संगत और निश्चित ठहरा कर ही महापुरुषों ने उसे जानने की शिक्षा दी है। शास्त्रकार का कथन है-

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति,

न चेदीहावेदीन्महती विनष्टिः।

भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः,

प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥

“अर्थात्-यदि इस जीवन में परमात्मा को जान लिया तो यह जन्म सार्थक हुआ। और यदि उसे न जान पाये तो यह निश्चय ही बहुत बड़ी हानि है। बुद्धिमान व्यक्ति प्रत्येक प्राणी में उसी का दर्शन करते हुये अजर अमर हो जाते हैं।”


सामूहिक धर्मानुष्ठानों का बल

एकाकीपन की अपेक्षा सामूहिकता में अधिक बल है। लोहे की लम्बी शहतीर को एक व्यक्ति उठाना चाहे तो नहीं उठा सकता। अनेक आदमी मिलकर बड़े-बड़े पहाड़ उठा देते हैं, नदियों में बाँध बना देते हैं। बड़ी-बड़ी शक्तियों को भी कुचल देने की क्षमता केवल सामूहिकता में है। एक से चार का बल बड़ा होना ही चाहिये।

प्रार्थना के सम्बन्ध में भी यही सिद्धान्त लागू होता है। आत्म कल्याण के लिये की गई करुण पुकार पर परमात्मा द्रवित होता है, किन्तु जब इस पुकार में सैकड़ों मनुष्यों का करुण स्वर समा जाता है तो अनन्त गुनी शक्ति प्रादुर्भूत होती है। सामूहिकता की प्रतीक दुर्गा-शक्ति का भी यही रहस्य है कि परमात्मा एक की अपेक्षा अनेकों की पुकार पर अधिक ध्यान देते हैं। सामूहिकता का प्रभाव तात्कालिक होता है।

सुख में, दुःख में, मंगल में, संकट में मिलजुल कर देवताओं का आवाहन करना, उनके पूजन आराधन का विधान, स्तवन और कीर्तन के विविध धर्मानुष्ठानों का वर्णन शास्त्रों में आया है। वैदिक काल के ऋषि-महर्षि और सर्व साधारण जन मिलकर सामूहिक प्रार्थना किया करते थे। यज्ञों पर सामूहिक तौर पर विशेष स्वर-तालों द्वारा अनेकों प्रयोजनों की सद्यः सिद्धि के उदाहरण धर्म ग्रन्थों में पाये जाते हैं। ईश्वराँशों के अवतार सामूहिक प्रार्थनाओं के प्रभाव से हुये हैं। अभावों की पूर्ति, मनोरथों की सिद्धि के लिये, अपने विघ्नों को निवारण करने के लिये, बाधा-विपत्तियों को दूर भगाने के लिये जो प्रभाव मिल-जुलकर की गई प्रार्थना से होता है, वह अकेले से नहीं बन पाता।

श्रुति का आदेश है ‘सहस्रं साकमर्चत’ ‘है पुरुषों सहस्रों मिलकर देवार्चन करो।’ ऋग्वेद संसार की सबसे प्राचीनतम रचना है उसमें जो सूत्र व्यक्त हुये हैं। सामगान की ऋचायें भी सामूहिक रूप से ही गाई गई हैं।

सन्त मैकेरियस ने लिखा है कि “तुम अकेले गाओगे तो तुम्हारी आवाज थोड़ी दूर तक जाकर नष्ट हो जायगी-मिलकर प्रार्थना करोगे तो उसका नाद प्रत्येक दिशा में व्याप्त होगा।” प्रार्थना करने का वैज्ञानिक रहस्य यह है कि हमारे पास उतनी सामर्थ्य नहीं है जितने से बाधाओं का विमोचन कर सकें, इसलिये अनन्त शक्तिशाली परमात्मा से शक्ति-तत्व खींचकर हम सफलता की कामना करते है। आवाज जितने अधिक लोगों की होगी उतनी ही बुलन्द होगी, प्रार्थना में जितने अधिक व्यक्तियों का भावपूर्ण स्वर सम्मिलित होगा उतनी ही अधिक बड़ी शक्ति प्रादुर्भूत होगी। महात्मा गाँधीजी कहा करते थे जब तक एकता स्थापित न कर लें, तब तक प्रार्थना, उपवास, जप-तप आदि निर्जीव से हैं। शास्त्रकार का भी कथन है-

बहूनामल्य साराणाँ समवायो हि दुर्जयः।

तृणैरावेष्ट्यते रज्जुः बध्यन्ते तेन दन्तिनः॥

“क्षुद्र और कमजोर आदमियों की सामूहिकता भी अजेय बन जाती है। कमजोर तिनकों से बनायी गई रस्सी परस्पर मिल जाने के कारण इतनी मजबूत हो जाती है कि उससे हाथी भी बँधा रहता है।”

वेद भगवान ने भी मनुष्यों को एक होकर प्रार्थना करने का आदेश दिया है। सम्पूर्ण मानव समाज एक दूसरे से इस तरह सम्बद्ध है कि अपने स्वार्थ को सर्वोपरि समझ कर सबके हित की भावना का तिरस्कार नहीं किया जा सकता। जब-जब मनुष्य का यह ओछापन ऊपर आया है तब-तब मानवता की बड़ी हानि हुई। स्वार्थ से समाज में जड़ता, निकृष्टता और असंतोष फैलता है इसलिये वेद ने ऐसी प्रार्थना सिखाई है-धियो योनः प्रचोदयात्” अर्थात्- “हे भगवान् हमारी बुद्धियों को आप सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।’ सामूहिकता का यह गायत्री स्वर इतना शक्तिशाली है कि यदि इसे लोग अपने अन्तःकरण की आवाज बना लें तो इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण होने में जरा भी देर न लगे। हमारे पूर्वज पुरुष समुदाय में बैठकर, समूह के समूह सम्मिलित होकर बड़ी भारी संख्या में, बड़े समारोह से ईश्वर की आराधना किया करते थे।

इस समुदाय भावना का- वैज्ञानिक प्रभाव तो होता ही था व्यवहारिक जीवन में भी स्वच्छता आती थी। लोग हिल-मिलकर काम करने में सुख अनुभव करते थे। पारस्परिक स्नेह, प्रेम, सौजन्य, सौहार्द और आत्मीयता का परिष्कार होता था। लोगों के हृदय कमल की तरह खिले होते थे। स्वार्थ की संकीर्णता फैलने न पाती थी। यदि कोई इन सामाजिक नियमों की अवहेलना करता था तो उसे बहुमत का विरोध सहन करना पड़ता था। इस भय से लोग अनुचित कदम उठाने का कभी साहस तक नहीं करते थे।

आपस में एक साथ बैठ कर प्रार्थना करने से आत्माओं का सम्मिलन होता है, इससे अन्याय के कारणों का निवारण होता है और मंगल भावनायें जागती हैं। काम करने की भावना पैदा होती है। उमंग आती है, उत्साह बढ़ता है, स्फूर्ति जागृत होती है। इससे सुख और संतोष के सत्परिणाम सभी ओर दिखाई देने लगते हैं।

ब्राह्मण-ग्रन्थों में ऐसे आख्यान हैं जिनसे उस समय के लोगों की निश्चयात्मक बुद्धि का पता चलता है। वे लोग अपने परिणामों की पूर्व घोषणा बड़ी दृढ़ता के साथ करते थे, इसके बाद अपने आराध्य देवता का यजन स्थान में आवाहन, विहित कर्मों का संचालन करते थे। वे ऐसा निश्चय कर लेते थे कि अमुक कार्य पूरा होना ही है तो ऐसा ही होता था। इस बात का गहन अनुसन्धान करते हैं- तो यह पता चलता है कि ब्राह्मणों का सामूहिक तौर पर इन शक्तियों के साथ बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध था। इन ग्रन्थों का यह मत है कि देवता सामूहिक रूप से, सबके कल्याण की इच्छा करते हैं, एक व्यक्ति के हित के लिये अनेकों के हितों का मर्दन उनके लिये प्रिय नहीं होता- यह बात हमारे ग्रन्थों में दी गई है। सम्भवतः इसीलिये हमारी संस्कृति में ही सर्वप्रथम सामूहिक उपासना का प्रचलन हुआ है।

सामूहिक यज्ञ और धर्मानुष्ठान लोगों की उदार-वृत्ति को लगाये रखने के लिये उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी हैं। क्योंकि इनमें व्यक्ति का साँसारिकता की ओर लगा हुआ धन एक झटके के साथ खिंचता है और उसे अपने तात्विक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करने के लिये विवश होना ही पड़ता है। साधारण तौर पर सबमें ऐसी बुद्धि नहीं होती कि वे आत्म-ज्ञान की ओर स्वेच्छा से उन्मुख हो सकें। उनमें भी शुभ-संस्कार और ज्ञान के बीज बोने के लिये सामूहिक आयोजनों का प्रचलन पूर्ण मनोवैज्ञानिक है। इससे मनुष्यों की धर्म-चेतना प्रवाहमान बनी रहती है।

प्रार्थना-काल की सूक्ष्म प्राण प्रक्रिया से वे लोग भी प्रभावित होते हैं जो केवल दर्शन मात्र की आकाँक्षा से एकत्रित हुये होते हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि सामूहिक प्रार्थनाओं की प्रतिक्रिया उतने ही क्षेत्र में क्रियाशील नहीं रहती वरन् वह एक ऐसा वातावरण विनिर्मित करती है जो दूर-दूर तक के मनुष्यों, पशुओं, जीवधारियों तथा वृक्ष-वनस्पति और अन्न को भी शुद्ध, सात्त्विक और ओजस्वी बनाती है। इससे स्पष्ट होता है कि आत्मिक दृष्टि से लोगों को बलवान बनाने का यह सबसे कारगर तरीका है। सामूहिक आयोजनों से निश्चय ही शक्ति संवर्द्धन होता है।

देव-शक्तियों के साथ ऋषियों के गहन सम्बन्ध को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि जो वस्तु चैतन्य है, शक्ति रूप, सामर्थ्य सहित है, स्वतंत्र और निर्बाध है, यह हो नहीं सकता कि सच्ची उपासना से किसी न किसी प्रकार से उसका पावन प्रकाश अवतरित न हो। अनेकों उदाहरण ऐसे सामने आ चुके हैं, जब इस युग में भी सामूहिक प्रार्थनाओं के सत्परिणाम देखने को मिले हैं। आज के समूहवादी युग में एकता और साम्य-भावना का विस्तार करने के लिये ऐसे आयोजनों का निःसन्देह बहुत अधिक लाभ हो सकता है।

प्रार्थना मनुष्य जीवन का प्रकाश है, इसमें जब अधिक जन शक्ति लग जाती है तो वह प्रकाश और भी प्रकीर्ण हो उठता है। धरती पर स्वर्ग का विस्तार करने और परमात्मा के साथ स्वात्मा का सच्चा सम्बन्ध जोड़ने का सबसे सरल, सुलभ और सुगम साधन है- सामूहिक प्रार्थना। हमें इन आयोजनों और धर्मानुष्ठानों को भुलाना नहीं है। इनसे आत्मा विस्तीर्ण होती है और लोगों को सन्मार्ग की प्रेरणा मिलती है।


संकल्प की महान शक्ति

जीवन-निर्माण के प्रत्येक क्षेत्र में संकल्प शक्ति को विशिष्ट स्थान मिला है। यों प्रत्येक इच्छा एक तरह की संकल्प ही होती है, किन्तु तो भी इच्छायें संकल्प की सीमा का स्पर्श नहीं कर पातीं। उनमें पूर्ति का बल नहीं होता, अतः वे निर्जीव मानी जाती हैं। वहीं इच्छायें जब बुद्धि, विचार और दृढ़ भावना द्वारा परिष्कृत हो जाती हैं तो संकल्प बन जाती हैं। ध्येय सिद्धि के लिये इच्छा की अपेक्षा संकल्प में अधिक शक्ति होती है। संकल्प उस दुर्ग के समान है जो भयंकर प्रलोभन, दुर्बल एवं डाँवाडोल परिस्थितियों से भी रक्षा करता हैं और सफलता के द्वार तक पहुँचाने में मदद करता है। शास्त्रकार ने “सकल्प मूलः कामौं” अर्थात् कामना पूर्ति का मूल-संकल्प बताया है। इसमें संदेह नहीं है, प्रतिज्ञा, नियमाचरण तथा धार्मिक अनुष्ठानों से भी वृहत्तर शक्ति संकल्प में होती है।

महान विचारक एमर्सन ने लिखा है, “इतिहास इस बात का साक्षी है कि मनुष्य की संकल्प शक्ति के सम्मुख देव, दनुज सभी पराजित होते रहे हैं।”

उत्कृष्ट या निकृष्ट जीवन यथार्थतः मनुष्य के विचारों पर निर्भर है। कर्म हमारे विचारों के रूप हैं। जिस बात की मन में प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, वह अपनी पसन्द या दृढ़ इच्छा के कारण गहरी नींव पकड़ लेती है, उसी के अनुसार बाह्य जीवन का निर्माण होने लगता है।

विचार यों अव्यक्त मन से भी प्रस्फुटित होते हैं, किन्तु वे प्रभावशाली नहीं होते। संकल्प भी एक तरह की विचार उत्पादक शक्ति है। इस तरह के विचार क्रमिक एवं योजना-बद्ध होते हैं। अव्यक्त विचारों की अपेक्षा उनकी शक्ति भी अधिक प्रखर होती है। इसलिये जो काम विशेष संकल्प के साथ किये जाते है, वे प्रायः असफल नहीं होते।

यहाँ संकल्प-शक्ति के स्वरूप को समझने की आवश्यकता है। हवा के आघात से जिस प्रकार जल में तरंगें उठा करती हैं और एक कौने से दूसरे कौने तक दौड़ा करती हैं, जो लहरें अधिक शक्तिशाली होती हैं वे अधिक वेग और कम्पन के साथ किनारों से थपेड़े भारती हैं, उसी तरह मन में भी शुभ-अशुभ विचारों के कम्पन या तरंग उठा करती हैं जो सूक्ष्म आकाश में सुदूर तक प्रसारित होती रहती हैं। प्रत्येक विचार का एक निश्चित स्वरूप होता है, जो दूसरे सजातीय प्रवाहों के साथ मिलकर और भी शक्तिशाली बनता रहता है। इस तरह के अनेक संकल्प-विकल्प इस सूक्ष्म जगत में विद्यमान हैं, पर उनका लाभ मनुष्य को तब मिल पाता हैं, जब वह विशेष मनोयोगपूर्वक किसी एक इच्छा की पूर्ति की ओर प्रवृत्त होता है। इस तरह का मस्तिष्क उन सजातीय विचार-तरंगों को सूक्ष्म-आकाश से उसी तरह खींचता है, जैसे भूखा अजगर साँस की तेजी के साथ छोटे-छोटे अनेक जीव-जन्तु, कीट-पतंगों को खींच लेता हैं। सजातीय तत्वों की एक अदृश्य शक्ति काम करने लगती है और सफलता के अनेक मार्ग अपने आप सूझने लगते हैं। ऐसा लगता हैं कोई दैवी-शक्ति आपका साथ दे रही है किन्तु वह शक्ति संकल्प की ही होती है जो मस्तिष्क में अनेक पुरुषों की वैसी ही कल्पनायें तथा सूझ-बूझ ढूंढ़-ढूंढ़कर लाती रहती है और विचारवान व्यक्ति उनमें से अपनी परिस्थितियों के अनुरूप साधनों को ग्रहण करता हुआ चला जाता हैं। इससे सफलता प्राप्त करने में कुछ अधिक देर नहीं लगती।

इस संसार में भलाई अधिक है। अतः भले विचारों के सूक्ष्म-प्रवाह भी सूक्ष्म-आकाश में अधिक विद्यमान है, अतः अच्छे काम को करने में धन की आवश्यकता उतनी नहीं, जितने शुद्ध हृदय और सात्विक संकल्प की आवश्यकता होती है। जब संकल्प दृढ़ हो जाता है और अध्यवसाय में भी कुछ शिथिलता नहीं रहती तो उद्देश्य की सफलता भी निश्चित हो जाती है। निश्चयात्मक विचारों का कार्यसिद्धि में बड़ा महत्व है।

एकबार खूब अच्छी तरह से विचार करने के बाद कोई संकल्प कर लें और फिर उसे छोड़ें नहीं तो कैसा ही कठिन कार्य हो उसमें भी सफलता की बहुत कुछ संभावनायें बढ़ जाती हैं।

पर इसके लिये उचित उद्योग तथा साध्य की तत्परता होना भी आवश्यक है। इसके बिना संकल्प में वह सामर्थ्य नहीं आ पाती जो सफलता के लिये अभीष्ट होती है। जिस बात का संकल्प लिया जाय, उस पर उसी क्षण से अमल भी होना चाहिये। विचार और क्रिया, दोनों के सम्मिश्रण से ही सफलता मिलती है।

मान लीजिये आपने संकल्प लिया है कि इस वर्ष अच्छे नंबरों से परीक्षा पास करेंगे तो इसके लिये आपको प्रातःकाल उठना भी पड़ेगा, पढ़ाई भी करनी पड़ेगी। इसमें ढील देने से आपकी कामना अधूरी ही रहेगी। दृढ़ संकल्प में मनुष्य की मति स्थिर और शरीर क्रियाशील बना रहना चाहिये। यदि हमारा मन बलवान है और कार्य करने की लगन है। तो कोई अशुभ या अवरोधक विचार सफलता के रास्ते में अपना प्रभाव नहीं डाल सकता। अपने मन को तूफानी आघातों से, भीषण गर्मी बरसात ओलों के बीच अडिग, अटूट रहने वाली चट्टान की तरह बनालें, तो परिस्थितियाँ और साँसारिक अड़चनें आपका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकेगी।

इंग्लैंड के प्रधान मंत्री सर विंस्टन चर्चिल ने अपनी डायरी में लिखा है “मेरे पुनः स्वस्थ हो जाने का कारण कोई नई दवा नहीं थी, दवा का काम तो मेरी दृढ़-संकल्प शक्ति ने किया। मुझे दृढ़ विश्वास था कि परमात्मा ने अभी भी मेरे लिये कुछ काम शेष रखा है और उसे मुझे पूरा करना ही है।” कहते हैं यह बात उन्होंने अपनी पक्षाघात की बीमारी के समय सन् 1655 में लिखी थी, जब उनके प्रायः सभी मित्रों ने यह विश्वास कर लिया था कि उनके दाहिने हाथ का पक्षाघात ठीक नहीं होगा। किन्तु चर्चिल की संकल्प-शक्ति के आगे पक्षाघात को झुकना ही पड़ा।

साहस और निश्चयात्मक विश्वास संकल्प के दो पहलू हैं, इन्हीं से मनुष्य की जीत होती है। साहस निरन्तर आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है। इससे कर्म में गति बनी रहती है। निश्चयात्मक विचार डाँवाडोल परिस्थितियों में भी सन्तुलन बनाये रहते हैं, इस तरह से मनुष्य अविचल भाव से अपने इच्छित कर्म पर लगा रहता है।

स्वास्थ्य की तरह शिक्षा, उद्योग, साधना आदि अनेकों क्षेत्रों में संकल्प शक्ति से द्रुतगामी सफलता अर्जित की जा सकती है।

किन्तु यह न भूलना चाहिये कि कभी-कभी परिस्थितियों की गम्भीरता का संकल्प के साथ संघर्ष हो जाता है। अपने साधनों को दृष्टि में रखकर भी जो संकल्प लिये जाते हैं, उनमें भी आकस्मिक रुकावटें आ सकती हैं। ऐसी अवस्था में मनुष्य की सारी विचार-शक्ति लड़खड़ा जाने का खतरा रहता हैं। ऐसे अवसर जब भी कभी आयें, उस समय दैवी-संकल्प को महत्तर समझकर धैर्य करना ही लाभदायक होता है। घबराहट की कोई बात क्यों हो? आगे के लिये फिर कोई नया मार्ग तलाश कर लेना चाहिये। विवशता या विभ्रम से बचने के लिये यह पहले अनुमान कर लेना ही ठीक है कि आप जो कार्य करने जा रहे हैं या जिस बात का आप बीड़ा उठा रहे हैं, उसके पूरा करने में कितनी शक्ति आप में है। यदि संकल्प करते रहें किन्तु तदनुसार कार्य न हो तो आत्म शक्ति का ह्रास हो जाता है। जब कोई संकल्प लिया जाय, तो जहाँ तक बन पड़े उसे पूरा ही करके छोड़ना चाहिये।

संकल्प की शक्ति निःसंदेह बहुत अधिक है, किन्तु यह बात न भूलें कि अशुभ संकल्पों की प्रतिक्रिया व्यक्ति और समाज दोनों के लिये ही अहितकर होती है। चोरी, डकैती व्यभिचार, छल, कपट के प्रेरक अशुभ संकल्प ही होते हैं, इनसे मनुष्य का जीवन दूषित और दुःखमय बनता है। समीपवर्ती व्यक्ति भी दुःख पाते हैं। अशुभ-विचारों की अशुभ प्रतिक्रिया को ही ध्यान में रखते हुये शास्त्रकार ने लिखा है :-

यत् प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च,

यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु।

यस्मान्नऋते किंचन कर्म क्रियते,

तन्मेमनः शिव संकल्पमस्तु॥

“अर्थात् जिस मन से अनुभव, चिन्तन तथा धैर्य धारण किया जाता है, जो इन्द्रियों में एक तरह की ज्योति है, वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।”


कमी किस बात की है।

यदि आपका दृष्टिकोण बदला हुआ हो तो यह सारी धरती आपकी ही है। आपके लिये यहाँ किसी वस्तु का अभाव क्यों होगा? जो कुछ न्यूनतायें हैं, वह सिर्फ आपकी संकीर्ण मनोवृत्ति के कारण हैं। अपने आप को सीमित बना लेने के कारण मनुष्य बिलकुल छोटा, अधिकारविहीन जान पड़ता है। सब कुछ अपने लिये हो, इस हीनता के भाव ने शेष दुनिया के साथ सम्बन्ध विच्छेद करा दिया है। एकाकीपन-सा है, सूनापन अनुभव कर रहे हैं, कोई प्रसन्नता देने वाला नहीं, कोई प्यार करने वाला नहीं है। आखिर ऐसा क्यों है? क्या विचार किया है अपने इस पर। जरूर कोई कमी होगी अन्यथा एक व्यक्ति के पीछे हजारों को चलते देखा है, एक व्यक्ति की पुकार पर लोगों ने अपना सर्वस्व निछावर कर दिया है। ऐसे व्यक्ति हुये हैं, जिन्हें सारे संसार का प्यार मिला है, जिनके इशारे मात्र से लोगों ने सब कुछ समर्पित कर दिया है।

संसार में कोई भी वस्तु ऐसी दुर्लभ नहीं है जिसे आप प्राप्त न कर सकते हों, पर इसके लिये आपका हृदय परमात्मा जितना विशाल होना चाहिये। आपको अपनी आत्म-स्थिति घुलाकर परमात्मा के साथ तादात्म्य की अवस्था बनाने में देर है। इतना उदार दृष्टिकोण आप का हुआ कि सारी धरती पर आपका अधिकार हुआ। सबको प्यार कीजिये, सब आपके हैं, जी चाहे जहाँ विचरण कीजिये, सारी धरती आपके पिता परमात्मा की है। सबको अपना समझने, सबको पवित्र दृष्टि से देखने, जीव मात्र के प्रति प्रेम और आत्मीयता का व्यवहार करने से आप यह उत्तराधिकार पा सकेंगे। आप जहाँ जायेंगे लोग आपके स्वागत के लिये खड़े होंगे, कमी केवल देवत्व के जागरण की है। उतना कर लें तो सारी धरती आपका घर है, सभी आपके आत्मीयजन हैं।

अपने आप को छोटा, दीन-हीन और तुच्छ समझना निपट नादानी की बात हैं। इससे लाभ तो कुछ मिलता नहीं, छोटा बन कर आत्म-विकास की संभावनाओं को भी चौपट कर डालते हैं। निराश होना अपनी लघुता का प्रतीक हैं। अपनी शक्तियों को छोटा मान निराशा के जंजाल से बचिये, अन्यथा आपका जीवन दुःखी, उदास और खिन्न बनता चला जायगा।

अपनी महान बनने की आकाँक्षा को जगाइये। अपनी विचार-शक्ति का सदुपयोग करना सीखिये और अपनी भावनाओं को इतना ऊँचा उठाने का प्रयत्न कीजिये कि यह सारा संसार आपको एक कुटुम्ब की भाँति दिखाई देने लगे। सभी अपने होंगे तो किसी के साथ अन्याय क्यों करेंगे? असम्मान क्यों प्रदर्शित करेंगे? क्यों आप किसी को पथ-भ्रष्ट करने का प्रयास करेंगे?

सद्गृहस्थ की इच्छा होती है कि परिवार के सभी सदस्य सभ्य, सुशिक्षित, शीलवान, सुसंस्कृत और सुखी हों। इस के लिये वह अपनी शक्तियों को उनके हित के कार्यों में लगाता है। अपनी योग्यताओं का लाभ उन्हें पहुँचाता है। इस उदारता के फलस्वरूप सभी उसका सम्मान करते हैं, उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं। हर सदस्य की इच्छा बनी रहती है कि इनकी कृतज्ञता और उपकारों का बदला किस तरह चुकायें। विश्व कुटुम्ब के परिजनों से भी आपको ऐसी ही सहानुभूति, प्रेम और आत्मीयता मिलती है, इसके लिये केवल अपने दृष्टि कोण को परिष्कृत करने की आवश्यकता है।

मनुष्य को इन भावनाओं का दमन करते देखते हैं तो बड़ा दुःख होता है। परमात्मा से प्राप्त शक्तियों पर लोग विश्वास न करें, तो यह अपराध ही माना जायगा। आप सबको अपना समझेंगे, सबके हित में अपना हित समझेंगे, तो आप लुट जायेंगे, आपकी सुख-सुविधायें छिन जायेंगी, यह सोचने की भूल न करें तो अच्छा हो। छोटे से घर में आत्मीयता के विस्तार से लोगों को इतना सुख मिलता है तो महत-विश्व के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ने से आपको कितना आनन्द मिल सकता है, इसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। अब आप हीनता के आत्म घाती विचारों का परित्याग कर दीजिये और अपनी महानता की आकाँक्षाओं को मूर्त रूप देने का अभ्यास करिये सचमुच आपको असीम तृप्ति का अनुभव होगा।

परोपकार मनुष्य की सबसे बड़ी योग्यता हैं। श्रेष्ठ योग्यता के लिये बड़े अधिकार दिये जाना इस संसार का दैवीय विधान है। कलक्टर की अपेक्षा राज्यपाल के अधिकार अधिक हैं, क्योंकि उस पर कर्त्तव्य पालन की जिम्मेदारियाँ अधिक हैं। इस पर उसे सम्मान और पारिश्रमिक भी अधिक मिलता है। ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के किये सत्कर्म करने वालों को परमात्मा भी अधिक अधिकार दे, तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है। हृदय की विशालता, दैवी प्रतिभा, बुद्धि की सूक्ष्मता और भावनाओं की उच्चतम स्थिति से प्राप्त आनन्द परोपकार के पारमार्थिक कर्त्तव्यों के पारिश्रमिक स्वरूप मिलता हैं। इस सुख का मूल्य किसी भी भौतिक सुख से बढ़कर है। आत्मा की इस कक्षा में प्रवेश पाने का अधिकार सभी को है।

कमजोरी और कायरता का कारण लोगों में सही दृष्टिकोण का अभाव है। मनुष्य शरीर के अभिमान में पड़कर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को भूल जाने के कारण ही व्यवहार में इतना संकीर्ण हो रहा है। जाति-पाँति, भाषा-भाव के भेद के कारण हमने पारस्परिक विलगाव पैदा कर लिया है, इसी से हम छोटे हैं, हमारी शक्तियाँ अल्प हैं। किन्तु जब आत्म-ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं तो संसार का स्वरूप ही बदल जाता है। भेदभाव की नासमझी निजत्व के ज्ञान के प्रकाश में मिट जाती हैं। सब अपने ही समान, अपने ही भाई और एक ही परमात्मा के अंश होंगे तो फिर किसी के साथ धृष्टता करने का साहस किस तरह पैदा होगा। इस आत्म-तत्व का जागरण ही इसलिये हमारी मूल आवश्यकता है।

पूर्णता प्राप्त करना परमात्मा का आदेश है। लघुता में जीव को शान्ति नहीं मिलती। आत्म-तत्व पर अधिकार प्राप्त किये बिना संतोष नहीं मिलता। जब तक एक भी व्यक्ति दुःखी दिखाई देता है, तब तक सुख नहीं मिलता, किन्तु जिस क्षण सब के दुःखों में हाथ बँटाने लगते हैं, गर्व से छाती फुलाकर कहते हैं कि जन-जन पर हमारा अधिकार है, मैं सबकी सेवा करूंगा, तो एक अनिर्वचनीय आनन्द की अनुभूति होने लगती है। जीव की क्षुद्रता मिटने लगती है और वह पूर्णता की ओर तेजी से अग्रसर होने लगता है। यह अभ्यास हमारे जीवन का भी अंग होना चाहिए।

यह संकल्प जितना बलवान बनेगा आत्म- शक्तियाँ उतना ही बढ़ेंगी, निराशा, निरुत्साह और अनुदारता के क्षय-कारक विचार कम होंगे। एक ओर आत्म-तत्व की जागृति और दूसरी ओर अपवित्रताओं का विस्तार-इससे आपकी श्रेष्ठता बढ़ती चली जायेगी। आप हर दूसरे क्षण एक नई प्रेरणा, नई जागृति और नई शक्ति अनुभव करेंगे।

जो काम अपने हाथ में लो उसी में सब के हित का भाव ढूंढ़ते रहो। जहाँ भी दूसरे की भलाई की आवश्यकता समझ में आये, अपना कंधा लगाकर सहयोग और सहानुभूति प्रकट करो। संसार आपकी भलाई भूल नहीं सकेगा। सभी आपको आदर की, प्यार की दृष्टि से देखेंगे। आप अपने हृदय में विश्वात्मा को स्थापित करके तो देखिये।

बीज विकसित होता हैं तो वृक्ष के रूप में दिखाई देता है। वृक्ष की विशालता प्राप्त करने का श्रेय बीज को तब मिलता है जब वह अपनी क्षुद्रता ओर अहंता को मिटाकर फूल-पत्तियों में फूट पड़ता है। मनुष्य अपनी लघुता को विश्व हित में समर्पित करने का अभ्यास बना ले तो वृक्ष के समान ही पूर्णता प्राप्त करने का गौरव उसे मिलता है। वह स्थिति बड़ी ही सुखद होती है, जब इस विश्व के कण-कण में अपना अधिकार होता है किसी बात की कमी नहीं रह जाती, सब कुछ अपना हो जाता है। यह पूर्णता प्राप्त हो तो इस मनुष्य देह की सार्थकता है। सामान्य जीवन जीना भी कोई मुश्किल बात हैं! पूर्णता तो असाधारण बनने में है, इसी का अभ्यास करना मनुष्य मात्र का धर्म है।


प्रेम और सेवा ही तो धर्म है।

शरीर और प्राण मिलकर जिस तरह पूर्ण पुरुष बनता है, धर्म भी उसी तरह बाह्य और आन्तरिक दो स्वरूपों में विभक्त है। बाह्य रूप है पूजा-अर्चा, दीप-आरती आदि कर्मकाण्ड, किन्तु उसका आन्तरिक स्वरूप भावनात्मक है, जिसका निर्माण प्रेम और सेवा से होता है। कर्मकाण्ड के बाह्य साधन निर्जीव-अल्पकालीन और स्थूल होते हैं। शरीर कालान्तर में नष्ट हो जाता है और मनुष्य ‘प्राण’ में परिवर्तित हो जाता है। कर्मकाण्ड भी उसी तरह कुछ दिन ही चलता है, आगे तो इससे ऊँची भावनात्मक कक्षा में प्रवेश लेना होता है, जहाँ मनुष्य को प्रेम और सेवा का पाठ पढ़ाया जाता है। धर्म-प्रशिक्षण की परिपूर्णता जीवन को प्रेममय तथा सेवामय बनाने से ही आती है इनके बिना धर्म मृत है, निर्जीव है। धर्म का प्राण है सेवा और प्रेम। इन्हीं से वह अपने सही स्वरूप में स्थिर हो पाता है।

महात्मा गाँधी का कथन हैं-”धर्म का मतलब, सत्य अर्थात् ईश्वर की प्राप्ति है। धर्म प्रेम का पन्थ है, फिर घृणा कैसी, द्वेष कैसा, मिथ्याभिमान कैसा? मनुष्य एक ओर तो ईश्वर की पूजा करे, दूसरी ओर मनुष्य का तिरस्कार करे, यह बात बनने लायक नहीं।”

मनुष्य दूसरों को नैतिक उपदेश ही देता रहे, तो उससे किसी का काम नहीं बनता। समय पर सहायता मिलना, मुश्किलें और कठिनाइयाँ दूर करना, उपदेश देने की अपेक्षा अधिक उपयोगी हैं। इसी से किसी को कुछ ठोस लाभ प्राप्त हो सकता है। यही ईश्वर की सच्ची पूजा है।

किसी तालाब में एक बालक डूब रहा था। दैवयोग से उसके अध्यापक उधर से गुजरे। बालक को डूबता हुआ देखकर सीढ़ियों पर खड़े होकर डांटने लगे-”क्यों रे! मैंने तो मना किया था गहरे पानी में नहीं उतरना चाहिये, फिर तू क्यों पानी में कूदा। भले आदमी पहले तैरना सीख लेता तब गहरे पानी में जाता।” अध्यापक जी न जाने कब तक उपदेश जारी रखते, तभी एक किसान पानी में कूदा और बालक को बाहर निकाल लाया। किसान बोला-”पंडित जी उपदेश स्कूल में दिये जाते हैं, यहाँ तो बच्चे को डूबने से बचाने की आवश्यकता थी।”

बेचारे अध्यापक की तरह उपदेशदाताओं की आज भी कमी नहीं है। ऐसे धर्म भी बहुत हैं, जिनमें उपदेश और शिक्षाओं से किताबों की किताबें भरी पड़ी हैं। जगह-जगह धार्मिक सभायें भी खूब होती रहती हैं। नाटक, रामलीला आदि के द्वारा भी तरह-तरह की शिक्षायें दी जाती रहती हैं, पर सामान्य जनों के लिये उपदेशों का कोई प्रभाव नहीं होता। और तो और पोथी धारी पंडित भी व्यवहारिक तथ्यों का अनुशीलन नहीं कर पाते। इस दृष्टि से तो कबीर दासजी की ही वाणी सत्य और बुद्धि संगत प्रतीत होती है। उन्होंने लिखा हैं-

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ पंडित हुआ न कोय।

ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।

पुस्तकें पढ़ लेने से ही कोई धर्म-निष्ठ नहीं बन जाता है। सच्चा धर्म तो प्रेम है, जिससे मानव मात्र के दुखों की अनुभूति होती है। किसी के दुःख में दुःखी न हुआ, वह भी कोई इन्सान हैं? उसे तो पाषाण-हृदय ही कहना अधिक उपयुक्त होगा, फिर उसने चाहे जितने ग्रन्थों का अवलोकन क्यों न किया हो।

हमारी आँखों के आगे से प्रतिदिन अनेकों प्राणी ऐसे गुजरते रहते हैं, जिन्हें हमारी सहानुभूति की अपेक्षा होती है। भूखे, प्यासे, वस्त्र विहीन, अशिक्षित, साधन विहीन हमसे सहयोग की आशा रखते हैं, किन्तु कितना कठोर होगा वह मनुष्य जो इन्हें तनिक भी सेवा नहीं दे सकता। जो ‘सेवा’ धर्म का सार है, उसे ही लोग छोटेपन का चिन्ह समझते है। परोपकार से बढ़कर दूसरा धर्म नहीं, दूसरों की सेवा से बढ़कर परमात्मा की सच्ची पूजा और कुछ हो नहीं सकती।

परमात्मा सम्पूर्ण विश्व में निवास करता है, उसके लिये एक मंदिर बनवा दिया तो कौन सा भारी काम कर दिया? जो असंख्यों जीवधारियों को भोजन देता रहता है, उसके लिये भोग की थोड़ी-सी मिठाई न भी मिले तो भी कुछ हर्ज नहीं। परमात्मा सबको जीवन-दान देता है, उसे क्या भेंट-पूजा चढ़ाकर भी कोई प्रसन्न कर सकता है? उसकी सच्ची पूजा तो सद्व्यवहार है। दीन-दुखियों के रूप में वह अपने भक्तों की सेवा पाने के लिए दर-दर भटकता रहता है। उसे दरिद्र नारायण के रूप में देख सकें, तो सर्वत्र ही आपकी पूजा पाने को वह प्रतीक्षा करता हुआ मिलेगा। पीड़ित और पिछड़े हुए मनुष्य के लिए प्रेम और सद्भावनापूर्वक कुछ सहयोग दे दिया जाय, तो उससे अपने को जो आन्तरिक आह्लाद मिलता है, वह परमात्मा का बधाई-संदेश नहीं तो और क्या है? दुःखी मनुष्य का आन्तरिक आशीर्वाद पाने से जो हृदय में विशालता व प्रसन्नता आती है, वही तो परमात्मा की सच्ची अनुभूमि होती है। भूल में हैं वे लोग जो परमात्मा की इस सच्ची उपासना से वंचित रहकर केवल कर्मकाण्ड के पीछे पड़े हुए अपने बड़प्पन की डींग हाँकते रहते हैं। सचमुच, जो असहायों के हृदय स्पर्श न कर सका, संसार को सद्व्यवहार न दे सका, उसकी उपासना अधूरी है। उसे कभी भगवान मिलेंगे यह सोचना भी गलत है।

परमात्मा से सच्चे हृदय से जो प्रीति रखते हैं उन्हें सृष्टि के प्रत्येक प्राणी में उन्हीं की छाया दिखाई देती है। क्या ऊँचा क्या नीचा! सारा संसार उन्हीं से तो ओत-प्रोत हो रहा है। छोटे-बड़े, ऊँचे-नीचे का भेदभाव परमात्मा के प्रति अन्याय है। सर्वत्र व्यापी प्रभु को समदर्शी पुरुष ही जान पाते हैं। जो प्राणि मात्र को प्रेम की दृष्टि से देखता है, वही ईश्वर का प्यारा हैं। अपने पत्नी-बच्चों, रिश्तेदारों तक ही प्रेम को प्रतिबन्धित रखना स्वार्थ हैं। प्रेम का क्षेत्र असीम है, अनन्त है। उसे प्राणी मात्र के हृदय में देखना ही ईश्वर निष्ठा का सबूत है। वह कभी किसी को अप्रिय नहीं कह सकता, किसी को दुःखी देखकर उसका कलेजा आँखों में उतर आता है। उसने तो सबमें ही अपने राम को रमा हुआ देख लिया है।

सेवा और भक्ति वस्तुतः दो वस्तुयें नहीं है, वे एक दूसरे के पूरक हैं, एक दूसरे पर आश्रित हैं। प्रेम जब मन और वाणी से उतर कर आता है, तो उसे सेवा रूप में देखा जाता है। सच्चा प्रेम वह है, जो केवल शब्दों से ही मधुरता न टपकाता रहे, वरन् अपने प्रेमी के दुःख-दर्द में कुछ हाथ भी बटाये। कर्त्तव्य पालन में कष्ट स्वाभाविक हैं। कष्ट को अपेक्षित करके भी जो कर्त्तव्य पालन कर सकता हो, सच्ची सेवा का पुण्य फल उसे ही प्राप्त होता है। माता अपने बेटे के लिए कितना कष्ट सहती हैं, पर बदले में कभी कुछ चाहती नहीं। यही सेवा का सच्चा स्वरूप है। इसमें देना ही देना है, पाना कुछ नहीं है। जो अपना सब कुछ न्यौछावर कर सकते हों, उन्हीं को तो परमात्मा का सान्निध्य सुख प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता है।

परिवार की देख-रेख, स्वजनों के पालन-पोषण की व्यवस्था, बालकों को शिक्षित विकसित बनाना यह सब सेवा कार्य ही हैं। किन्तु यह कार्य करते हुए अहं-भावना न आनी चाहिए। निष्काम कर्म को ही सेवा कहेंगे। जिससे अपना स्वार्थ सधता हो, वह कभी सेवा नहीं हो सकती।

व्यक्तिगत और पारिवारिक क्षेत्र से ही मनुष्य आगे की उत्कृष्ट सेवा का आधार बनाता है। यह क्षेत्र आगे बढ़कर प्राणि मात्र के हित और त्याग भावना के रूप में फैल जाता है। प्रारम्भ काल में जो अहंकार शेष रह गया था, विश्व-सेवा भावना से वह सभी धुल जाता है और मनुष्य प्रेम की पूर्णता का रसास्वादन करने लगता है।

पारमार्थिक सेवा का स्वरूप काम-भाव तथा अहंकार के विग्रह से मुक्त होना है। वहाँ केवल अपनी योग्यता का लाभ दूसरों को देना रह जाता है। मैं कुछ नहीं हूँ, जो कुछ है वह है। मैं कुछ नहीं करता, यह सब परमात्मा ही करता है। “मैं” तो एक यंत्र मात्र हूँ, जो उसके इशारे मात्र से काम करता रहता हूँ। मैं व्यक्ति या समाज पर कोई एहसान नहीं करता हूँ, इससे मुझे आन्तरिक आनन्द प्राप्त होता हैं। यही मेरी सेवा का मूल्य है, जो परमात्मा मुझे निरन्तर देता रहता है।

धर्म का यही रूप सही है। इस पूर्णता को प्राप्त करने के लिए शेष कर्मकाण्ड अभ्यास मात्र हैं। हमें धर्म को कर्मकाण्डों तक ही बाँधकर नहीं रखना चाहिए। हमारे हृदय में प्रेम और सेवा-भावना का उदय हो तो समझना चाहिए कि धर्म के प्राण को भी समझ लिया है। तभी सच्चे अर्थों में धर्म-निष्ठ कहलाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकते हैं।


शुद्ध व्यवहार, पवित्र आचार

आप कितना ही पढ़े-लिखे क्यों न हों, कितना ही धन-सम्पन्न और पद में बड़े क्यों न हों, आपका हृदय उदार नहीं तो लोग आपको अन्तःकरण से प्यार न करेंगे। एक ओर मनुष्य का स्वार्थ है, तो दूसरी ओर उसका जिन-जिन से सम्बन्ध आता है, उनके प्रति कर्त्तव्य भी। अपनी स्थिति का ध्यान प्रायः सबको रहता है। सब यह चाहते हैं कि दूसरी उसके साथ सच्चाई से पेश आयें, छल-कपट न करें, गाली न दें, दुर्वचन न बोले, धोखा न दें, नम्र बोलें, मीठा बोलें। यह सब केवल दिखाने के लिये, बनावटी या प्रपंच मात्र न हो, वरन् उस व्यवहार में सत्यनिष्ठा होनी चाहिए। शुद्ध व्यवहार की जो अभिलाषा हम करते हैं, वही दूसरे भी। अतः हमें “दो और लो” वाली नीति का पालन करना चाहिए। अच्छा-बुरा जैसा भी व्यवहार दूसरों के साथ होगा, उसी का प्रतिफल हमें भी भोगना पड़ता है। इस बात को सदैव गाँठ बाँधकर रखना चाहिए।

सत्यनिष्ठा का अर्थ आमतौर से सच बोलना लगाया जाता है, पर सत्य शब्द बड़े विशाल अर्थ में प्रयुक्त होता है। विचार में, वाणी में, आचार में सत्य ही सत्य हो। इस सत्य को सम्पूर्णतया समझने वाले को दुनिया में दूसरा कुछ भी जानना नहीं रहता, क्योंकि सारा ज्ञान इसी में समाया हुआ है। यदि व्यवहार में हमें सच्चे आनन्द का अनुभव नहीं होता तो हमें समझना चाहिए कहीं भूल है। सत्य आचरण के बिना वह तुष्टि मिल भी कैसे सकती है। यदि हम इस कसौटी का प्रयोग करना सीख जायें तो तुरन्त ही हमें पता चलने लगे कि कौन-सी प्रवृत्ति, कौन-सा विचार और कौन-सा आचरण उचित है और कौन अनुचित। सुख की सात्विक उपलब्धि के लिए इतना जानना प्रत्येक का धर्म है।

दुनिया की वर्तमान स्थितियोँ के अध्ययन और विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकलता है कि कोरा भौतिक विकास कष्टकारक है, हानिप्रद है। विशुद्ध जीवन का आधार है, व्यवहारिक दृष्टिकोण। दृष्टि शुद्ध होती है तो ज्ञान शुद्ध होता है, चरित्र शुद्ध होता है। दृष्टि खराब होगी तो ज्ञान भी विकृत होगा और चरित्र भी। एक व्यक्ति दूसरे को घृणा की दृष्टि से देखे, क्या यह उचित है? अपने को उच्च मानने वाले दूसरों को नीच मानकर उनसे घृणा करते हैं, क्या इसे दृष्टि दोष न कहेंगे? इसके फलस्वरूप होने वाले समाज विघटन और पारस्परिक असहयोग से क्या कोई अपने आपको बचा सकता है? मनुष्य, मनुष्य के प्रति द्वेष रखें और दुष्टता का बर्ताव करे इससे बढ़कर पशुता और क्या हो सकती है? व्यवहारिक सच्चाई धार्मिक जीवन का प्रथम शिक्षण है। धर्माचरण का असर जितना व्यक्ति पर होता है, उतना ही समाज पर होता है। अशुद्ध व्यवहार त्यागने का असर जितना व्यक्ति पर होता है, उतना ही समाज पर भी होता है, इसलिए शुद्धता, सच्चाई धर्म भी है और व्यवहार भी।

मनुष्य की एक सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि वह हर गलती का दोष औरों में ढूँढ़ता है और स्वयं निर्दोष होने का कोई न कोई मार्ग तलाश लेता हैं। इस अपूर्णता के कारण कभी-कभी यह अनुमान करना कठिन हो जाता हैं कि कौन-सा व्यवहार ग्राह्य है और कौन-सा त्याज्य। जीवन में कई बार ऐसी उलझन भरी समस्यायें खड़ी हो जाती हैं, जब उचित व्यवहार का निर्णय कठिन हो जाता है। ऐसे समय हमें अपने आपको न्याय के कटघरे में बन्द करके सोचना चाहिए। निःस्वार्थभाव से यदि अपने दोषों को भी स्वीकार करने की भूल न करें, तो अनेक समस्याओं और कठिनाइयों का उचित समाधान निकल आ सकता है और हम अवश्यम्भावी परेशानियों से निकलकर बाहर आ सकते हैं।

जो मन साफ रखकर व्यवहार करते हैं, उनका व्यक्तित्व दिन-दिन निखरता चला आता है। जो स्वार्थ छोड़ने को तैयार ही नहीं और जिसे अपने दोष, गुण सरीखे दिखलाई देते हैं, उनसे सभ्य व्यवहार की आशा नहीं रखना चाहिए। ऐसे मनुष्य समाज के लिए अभिशाप ही सिद्ध होते हैं। स्वार्थ त्याग का अर्थ साँसारिक जीवन का परित्याग नहीं है, वरन् जीवन की प्रत्येक क्रिया में औरों के हित को भी ध्यान में रखना है। ऐसा व्यक्ति किसी के साथ धोखेबाजी न करेगा, किसी को नीचा दिखाने की बात न सोचेगा। सादगी से रहेगा और समभाव बरतेगा। इसमें उसकी हानि नहीं लाभ ही लाभ है।

मानवीय आचरण की शुद्धता और पवित्रता में समाज, राष्ट्र और देश के कायाकल्प करने की शक्ति विद्यमान है। यह कार्य व्यक्ति-स्तर से ही शुरू होना चाहिए। हमें पहले आत्म-निर्माण पर ध्यान देना चाहिए, समाज का विशुद्धि-करण उसी का परिवर्द्धित रूप है। कोई संस्था, समुदाय या योजना एक साथ सारे व्यक्तियों का उत्थान और चरित्र निर्माण नहीं कर सकती। होना यह चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को पूरा करे। व्यक्तिगत आचरण को सुधारा जायेगा तो सामाजिक विषमतायें अपने आप दूर होंगी, इसलिए व्यक्ति सुधार और उसकी अन्तः-शुद्धि की योजना प्रमुख है। एक व्यक्ति सुधर जाय, तो उससे एक समाज के सुधरने की शक्ति आयेगी क्योंकि वह अपने व्यवहार द्वारा ही अनेक लोगों का नैतिक प्रशिक्षण करता रहेगा। यह पद्धति कहीं अधिक प्रभावशील है।

स्टेशन पर टिकट खरीदने के लिए लाइन लगती है, इसमें सबका भला है। सबकी एक राय है कि जो जिस क्रम से आता जाय, टिकट खरीदे और चलता जाय। एक महाशय ने अपना बक्स एक तरफ रखा और बीच में घुस पड़े कि जल्दी टिकट खरीदकर आगे निकल जायँ। इस पर दूसरे खड़े लोगों का क्षुब्ध होना स्वाभाविक है। कोई असहिष्णु होगा तो वह भी अपनी जगह छोड़कर आगे बढ़ने का प्रयत्न करेगा, इससे बड़ी गड़बड़ी उठ खड़ी होगी। व्यवस्था इस बात में थी कि सब व्यवहारिक सत्य को मानते और लाइन में खड़े रहते। उसमें स्टेशन बाबू को भी काम की सहूलियत रहती और सब लोग परेशानी, धक्का-मुक्की से बच जाते। थोड़े से लोगों की यह स्वार्थ परायणता परेशानी की चीज हैं। जो व्यक्ति समाज को व्यवस्था दे सकता है, अशुद्ध आचरण द्वारा वही उस व्यवस्था को भंग भी कर देता है जो अन्यायपूर्ण एवं अनुचित है।

धर्म जिस तरह अपने लिए है, वैसे ही समाज की धारणा के लिए भी है। अतः समाज के प्रति अपना कर्त्तव्य पालन करने के लिये उसे अपने अन्तःकरण की शुद्धि के साथ-साथ समाजोपयोगी सद्गुणों का विकास भी करना चाहिए। प्रेम, दया, सेवा, परोपकार आदि द्वारा अन्तःकरण को औरों पर भी आरोपित किया जाना चाहिए। अन्तःकरण की शुद्धि और उसका बाहरी व्यवहार, दोनों मिलकर सुखद वातावरण तैयार करते हैं। उसमें व्यक्ति का भी हित रहता है और सामाजिक जीवन में शान्ति और और सम्पन्नता दिखाई देती है। विशुद्ध धर्म का उद्देश्य भी यही हैं।

किन्तु जहाँ स्वार्थ सिद्धि का प्रसंग आता है, वहाँ मनुष्य एकदम व्यक्तिवादी रहता है। वह सोचता है-मैं सुखी बनूँ, मुझे धन और सुविधायें मिलें, मेरी प्रतिष्ठा हो। इस बीच परिवार के, पड़ोस के, समाज के तथा राष्ट्र के व्यक्तियों का चाहे कितना बड़ा अहित क्यों न हो। पर सोचने की बात है कि क्या आस-पास के वातावरण से प्रभावित हुए बिना हम रह जायेंगे? विद्रोह की आग में स्वार्थी लोगों का मान-मर्दन हो जायगा, तो उन्हें बड़ी पीड़ा होगी इसलिए पहले से ही यह प्रयत्न होना चाहिए कि जिस तरह हम सुखी रखें, उसी तरह दूसरे भी। धन का, साधनों का, ज्ञान का, पद और प्रतिष्ठा का एक निश्चित कम में मिल बाँटकर उपयोग होना चाहिए। यदि इस तरह समता, मैत्री और एकत्व की भावना बढ़ेगी, तो व्यक्ति समाज और राष्ट्र सभी सुधर जायेंगे। हमें इसी भावना को लेकर आगे बढ़ना चाहिए।

शुद्ध व्यवहार और सदाचार समाज की सुदृढ़ स्थिति के दो आधार स्तम्भ हैं। इन से व्यक्ति का भाग्य और समाज का भविष्य विकसित होता है। शिक्षा, धन एवं भौतिक समुन्नति का सुख भी इस बात पर ही निर्भर है कि लोग सद्गुणी और सदाचारी बनें। सामाजिक परिवर्तन का आधार व्यक्ति के अन्तःकरण की शुद्धि है। यही समाज में स्वच्छ आचरण और सुन्दर व्यवहार के रूप में प्रस्फुटित होकर सुख और जन-सन्तोष के परिणाम प्रस्तुत करती है। अतः जीवन विकास की भौतिक पृष्ठभूमि के साथ ही यह आध्यात्मिक कार्यक्रम भी चलना चाहिए। शुद्ध व्यवहार और आचार की पवित्रता से ही मानवीय व्यवस्था संभव है, इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए।


शक्ति के स्रोत-आत्मा को मानिए

हमारे पुरखे ज्ञान-विज्ञान में आज के वैज्ञानिकों की अपेक्षा कहीं अधिक प्रवीण थे, किन्तु वे समझते थे विज्ञान अन्ततोगत्वा मनुष्य की वृत्तियों को पाशविक, भोगवादी ही बनाता है, अतः उन्होंने धर्म और अध्यात्म पर आधारित जीवन की रचना की थी। इस जीवन में प्राण था, शक्ति थी, समुन्नति थी और वह सब कुछ था जिससे मनुष्य का जीवन पूर्ण सुखी, स्वस्थ और सन्तुष्ट कहा जा सकता है।

आत्मा को ही सब कुछ मानकर अनित्य शरीर के प्रति वैराग्यमूलक मनोवृत्ति धारण कर लेने की शिक्षा देना हमारा उद्देश्य भले ही न हो, किन्तु भौतिक सुख और इन्द्रियों की पराधीनता भी मनुष्य जीवन के लिए नितान्त उपयोगी नहीं कहे जा सकते। आत्म-ज्ञान की आवश्यकता इसलिए है कि उससे साँसारिक विषयों में स्वामित्व और नियंत्रण की शक्ति आती है। भौतिक सुखों की रथ के उन घोड़ों से तुलना की जा सकती है, जिनमें यदि आत्म-ज्ञान की लगाम न लगी हो तो वे सवार समेत रथ को किसी विनाश के गड्ढे में ही ले जा पटकेंगे। जगत की सत्ता से विच्छिन्न मनुष्य की सत्ता व्यक्ति-परिच्छिन्न मात्र नहीं है, वह केवल व्यष्टि ही नहीं, वरन् समष्टि भी है, उसमें अनन्त, सत्य शिव और सौंदर्य समाहित है, उसे जाने बिना मनुष्य के बाह्यान्तरिक कोई भी प्रयोजन पूरे नहीं होते। आत्म-ज्ञान इसलिए मनुष्य जीवन का प्रमुख लक्ष्य है।

शरीर के सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंगों की स्थूल जानकारी, पदार्थ और उसके गुण-भेद की जानकारी ग्रह-नक्षत्रों से सम्बन्धित गणित और उनके वैज्ञानिक तथ्य जानने से मनुष्य की सुविधायें भले ही बढ़ गई हों, पर उसने अपने आप का ज्ञान प्राप्त नहीं किया यही दुःख का प्रधान कारण है। मनुष्य शरीर ही नहीं, वरन् परिस्थितियाँ बताती हैं कि वह कुछ अन्य वस्तु भी है, आत्मा है। इस आत्मा या “अहंभाव” का ज्ञान प्राप्त किये बिना दुनिया का सारा ज्ञान-विज्ञान अधूरा है। बिना इंजन लगी हुई मोटर की तरह वह ज्ञान किसी तरह का लाभ नहीं दे सकता है।

आत्मा शक्ति का अनादि स्रोत हैं। शौर्य, प्रेम और पौरुष की अनन्त शक्ति उसमें भरी हुई है, अतः आत्म-ज्ञान में लगाये हुए समय, श्रम और साधनों को निरर्थक नहीं बताया जा सकता। आत्म-शक्ति को पाकर मनुष्य के सारे अभाव, दुःख-दारिद्रय, साँसारिक आधि-व्याधियाँ, समाप्त हो जाती हैं। भगवान कृष्ण ने आत्म-ज्ञानी पुरुष को ही सच्चा बताते हुये कहा है-

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।

विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञान चक्षुषः॥

(गीता 15। 10)

अर्थात्-हे अर्जुन! उस आत्मा को शरीर छोड़कर जाते हुए, शरीर में स्थित हुए, विषयों को भोगते हुए अथवा तीनों गुणों से युक्त हुये भी अज्ञानी लोग नहीं जानते। उस तत्व रूप आत्मा को केवल ज्ञानी ही जानते हैं।

मनुष्य शरीर नहीं वरन् वह शरीर का संचालक है। वह मन भी नहीं क्योंकि मन को प्रेरणा देकर, आदेश, देकर किसी भी अच्छे बुरे कर्म में लगाया जाता है। सत्-असत् का ज्ञान देने वाली बुद्धि को भी आत्मा कैसे मानें? विश्लेषण करने पर पता चलता है यह शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि पंचभूतों के सत-रज-तम अंश को लेकर बने हैं। पंच-भूत जड़ पदार्थ हैं, अतः आत्मा इनमें भी विलक्षण और शक्तिवान है। वह संचालक है, सूक्ष्मतम है और शक्ति का उत्पादक है, अजर-अमर सर्वव्यापी तत्व है। जो इस तत्व को जानता है उसके सारे दुःख मिट जाते हैं।

मानव-जगत का अधिकाँश भाग इस कारण अधोगति को प्राप्त हो रहा है कि उसे जो कार्य सम्पादन करना चाहिए, वह नहीं करता। सबसे बड़े दुःख की बात तो यही है कि पूर्ण परिपक्व और बुद्धिमान होकर भी उस मार्ग का अनुसरण नहीं करते, जो कल्याणकारी है और जो जीवन में सुख की वृद्धि कर सकता है। थोड़े से मोह के चक्र में फँसकर नासमझ लोग अयोग्य कार्यों की ओर प्रेरित होते हैं और उन्हें ही सुख का मूल समझकर अपने भीतर सिमटी, दुबकी हुई जो आत्मा बैठी है उसे भूल जाते हैं। इसी ऐश्वर्य और भोग में जीवन की इतिश्री कर देते हैं। कभी गहराई में उतरकर आत्म-तत्व पर विचार नहीं करते। मनुष्य की इस विडम्बना को, इस मूढ़ता को क्या कहें जो बड़ा ज्ञानी होने का दावा करता है पर जानता खुद को भी नहीं है।

साराँश यह है कि जड़ पदार्थों के सम्बन्ध में आज लोगों ने खूब उन्नति की है, वहाँ चेतन पदार्थों के सम्बन्ध में वह अभी प्रारम्भिक अवस्था में ही है। विज्ञान ने भौतिक एवं मानसिक जगत को रूपांतरित कर दिया है, इसका प्रभाव मनुष्य पर गम्भीर रूप से पड़ा है, क्योंकि आज जो भी कार्यक्रम बनाये जा रहे हैं, उनमें मनुष्य की मूल प्रकृति पर विचार नहीं किया जाता। यही कारण है कि भौतिक विज्ञान तथा रसायन शास्त्र ने परम्परागत जीवन प्रणाली में विक्षिप्त रूप से परिवर्तन ला दिया है। मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति की कसौटी पर ही विषयों का चयन किया जाता तो अधिक बुद्धिमत्ता रहती। आत्मज्ञान ही वह प्रक्रिया है जिससे इस समस्या का हल निकाला जा सकता है।

बाहर की वस्तुओं का ही अवलोकन न कीजिए, यह भी सोचिए कि शरीर के भीतर कैसी विचित्र हलचल चल रही है। आहार पेट में जाता है, फिर न जाने कैसे वह रस, रक्त, माँस, अस्थि आदि सप्त धातुओं में परिणत हो जाता है। कितनी हानिकारक वस्तुओं का भक्षण करते हुये मनुष्य जीवित रहता है। वह कौन-सा विलक्षण अमृततत्त्व है जो शरीर जैसी महत्वपूर्ण मशीनरी को चला रहा है। आप इसे जान जायेंगे तो सारे संसार को जान जायेंगे। उस आत्मा में ही यह सम्पूर्ण विश्व व्यवस्थित हैं। ब्रह्मोपनिषद् के छठवें अध्याय में शास्त्रकार ने बताया हैं-

आत्मनोऽन्या गतिर्नास्ति सर्वमात्ममयं जगत्। आत्मनोऽन्यन्नहि क्वापि आत्मनोऽन्यतृणं न हि॥

अर्थात्-”आत्मा से भिन्न गति नहीं है, सब जगत् आत्मामय है, आत्मा से विलग कुछ भी नहीं है, आत्मा से भिन्न एक तिनका भी नहीं है।”

विश्व-व्यापी चैतन्य अनादि तत्व आत्मा को जाने बिना मनुष्य को शान्ति और स्थिरता की उपलब्धि नहीं हो सकती। सफल जीवन जीने के अभिलाषी को इस पर बार-बार विचार करना चाहिए। प्राचीन धर्म ग्रन्थ, सृष्टि और अध्यात्म की खोज करनी चाहिए। अपने आपको पहचानने के लिए अपनी आत्मा, मनोवृत्तियाँ, स्वभाव तथा विचारों का निरीक्षण करना चाहिए। आत्म-भाव जागृत करने के लिए सुन्दर पुस्तकों का स्वाध्याय करना चाहिए।

आत्मा के साथ जन्म-मरण, सुख-दुःख, भोग-रोग आदि की जो अनेक विलक्षणतायें विद्यमान हैं, वह मनुष्य को यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि खा-पीकर, इन्द्रियों के भोग भोगकर दिन पूरे कर लेना मात्र जिन्दगी का उद्देश्य नहीं है। रूप और शारीरिक सौंदर्य की झिलमिली में शरीर और प्राण के अनुपम संयोग की स्थिति को दूषित किया जाना किसी भी तरह भला नहीं है। यह अमूल्य मानव जीवन पाकर भी यदि आत्म-कल्याण न किया जा सकता तो न जाने कितने वर्षों तक फिर अनेकों कष्ट-साध्य योनियों में भटकना पड़ेगा। जिसे ऐसी बुद्धि मिल जाय, उसे अपने आपको परमात्मा का कृपा-पात्र ही समझना चाहिए। आत्म-ज्ञान प्राप्त करने से मनुष्य जीवन धन्य हो जाता है।

मनुष्य दैवी अंश युक्त है। सत्-चित्त आनन्द स्वरूप है। निष्फलता, दुःख, रोग-शोक तो निम्न विचारों, दूषित कल्पनाओं तथा भोगवादी दृष्टिकोण के फलस्वरूप पैदा होते हैं, अन्यथा इन अभावों का इस जीवन से क्या प्रयोजन? अपने अमृतत्व की खोज करने के लिए काम, क्रोध, भय, लोभ, तिरस्कार, शंका तथा द्विविधाओं की कीचड़ से निकलकर हमें सत्य, प्रेम, निश्छलता और पवित्रता का आदर्श अपनाना पड़ेगा। उत्कृष्ट स्वस्थ तथा दिव्य विचारों का वरण करना होगा। आत्मा अत्यन्त विशाल और शक्तिशाली है। उसे प्राप्त करने के लिये, उसमें विलय होने के लिए हमें भी उतना ही निर्मल, हितकारक तथा विस्तृत बनना होगा। जिस दिन ऐसी स्थिति बना लेंगे, उस दिन किसी तरह की कमी महसूस नहीं होगी। सारा जीवन शक्ति और सौंदर्य से भर जायगा। उसे प्राप्त करने पर ही हमारा जीवन सफल होता है। हम अपने भीतर छिपी हुई आत्मा को ढूँढ़ने का प्रयास करें, तो वह सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं, जिसकी तलाश में हमें निरन्तर भटकना और जिसके अभाव में सदा दुःखी रहना पड़ता है।


चरित्र बल बढ़े तो राष्ट्र ऊँचा उठे

सदियों की गुलामी की जंजीरें तोड़कर हम स्वतन्त्र हुए हैं। स्वतन्त्रता का लाभ तभी है, जब हम प्रत्येक दिशा में विकास की समुचित व्यवस्था जुटावें। प्रसन्नता की बात है कि उस दिशा में कुछ प्रयत्न भी हो रहे हैं। आवश्यकता इस बात की है कि औद्योगिक विकास से खूब अच्छी-अच्छी वस्तुओं के उत्पादन की व्यवस्था होने लगे, कृषि में विकास हो, उपज बढ़े, स्वास्थ्य और आरोग्य के साधन बढ़ें, वैज्ञानिक शोधों में हिस्सा लें। साथ ही एक बात इनसे भी आवश्यक है और वह है राष्ट्र के चरित्र का विकास। भौतिक समृद्धि के साथ नैतिकता का अवगाहन न किया गया, तो वह स्थिति हमारे लिये विनाश का कारण बन सकती है।

चरित्र-बल मानवीय शक्ति का मूलाधार है। पारस्परिक सहयोग द्वारा उद्वेगों को आगे बढ़ाना और अर्थ-व्यवस्था को सुधारना समाज सुधार के एक अधिक आवश्यक अंग की पूर्ति करना है। समाज का वास्तविक उत्थान तभी हो सकता है, जब जन-जन में कर्त्तव्य परायणता, धार्मिक सहिष्णुता, सच्चाई और सच्चरित्रता की भावनाओं का भरपूर समावेश हो जाय। भारतीय संस्कृति की यही विशेषता रही है कि लोग स्वयं का संयम करना सीखें। बढ़ी हुई शक्तियों को सीधे-से पचा ले जाना यह संयम से ही संभव हैं। केवल साधनों की तृष्णा बढ़ती रहे और गुण विकास न हो तो उन्नति का मूल उद्देश्य नष्ट होकर दुर्भावनाओं का विकास होने लगेगा। साधन होंगे पर लोग सुखी न होंगे।

गीताकार ने अपना यह कठोर निर्णय दिया है कि सुखाकाँक्षी का जीवन शुद्ध और उसका प्रत्येक कर्म यज्ञीय भावना के साथ होना चाहिए। स्वार्थ के साथ परमार्थ का भी पर्याप्त होना आवश्यक है। मनुष्य सदा समाज का ऋणी रहता है। जन्म से ही अगणित ऋणों का देनदार है। परमार्थ ऋण चुकाने की भावना को कहते हैं। मनुष्य के हित की दृष्टि से उसके सामाजिक जीवन में परमार्थ का आयोजन बना रहे, तो उसमें सबका कल्याण रहता है। यह अपेक्षाकृत अधिक सरल मार्ग है, जिसमें मनुष्य स्वल्प साधनों में भी विपुल सुख प्राप्त कर लेता है। सामाजिक जिम्मेदारी पूरी न करने का नाम है- कामचोरी। कर्त्तव्य से परामुख होना निठल्लापन और बेईमानी हैं। राष्ट्र की समृद्धि में भरपूर श्रम और पुरुषार्थ में परमार्थ की भावना प्रमुख रूप से बनी रहनी चाहिए।

लोग कहते हैं-बड़ा दुर्भाग्य है, रोटी नहीं मिलती, कपड़ा नहीं मिलता, जरूरतें पूरी नहीं होतीं, बड़ी असमानता है, यह नहीं होता, वह नहीं होता। कुछ हद तक संभव है ऐसा भी हो किन्तु अधिकाँश कमी यह है कि लोग अपना दोष स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होते। संघर्ष यह है कि जरूरतें आवश्यकता से अधिक बढ़ गई हैं। अनैतिकता पर कोई नियन्त्रण नहीं है। मन स्वतन्त्र है, इन्द्रियाँ स्वतन्त्र है। कामनाओं के दल-बल स्वच्छ विवरण कर रहे हैं, संयम मूलक प्रवृत्तियों के नष्ट हो जाने के कारण ही यह अभाव घिरे हैं अन्यथा न तो उत्पादन कम हुआ है न जरूरत की चीजें कम पड़ी हैं। सब कुछ पहले से अधिक है पर क्या करें लोगों की भूख इतनी बढ़े हुए साधनों से भी काम्य प्रयोजन पूरे नहीं हो पा रहे। इस देश में आत्मदर्शी ऋषियों की परम्परायें चलती आई हैं। आरम्भ, परिग्रह और भोग से दूर रहकर उन्होंने जो सत्य पाया, समाधान पाया, सुख और शान्ति का अनुभव पाया, उसी को यहाँ के जन-जीवन में उतारा है। उसका सम्पूर्ण सार है-चरित्र बल। चरित्र में ही सुखी जीवन के सारे रहस्य छिपे हुये हैं। चरित्र ही मनुष्य की श्रेष्ठता का उत्तम मापदंड है।

एक ओर मनुष्य के साथ स्वार्थ भावना है, तो दूसरी ओर उसका जिन-जिन के साथ सम्बन्ध आता है, उनके प्रति कर्त्तव्य भी है। कर्त्तव्य बुद्धि द्वारा स्वार्थ का नियन्त्रण होना चाहिये। प्रत्येक मनुष्य चाहता है कि दूसरा कोई उसके साथ छल-कपट का व्यवहार न करे, झूठ न बोले, धोखा न दे, सताये नहीं, दबाने की चेष्टा न करे! ऐसी अवस्था में उसका भी यह कर्त्तव्य हो जाता है कि वह भी मन, वचन और क्रिया द्वारा सच्चाई का ही प्रदर्शन करे। हमारे अन्तःकरण की वृत्तियाँ सत्यमय हो जाती हैं, व्यवहार शुद्ध हो जाता है, तो उसमें औरों का भला तो होता ही हैं खुद अपना बहुत भला होता है। ईमानदारी और सच्चाई में सबका फायदा है, व्यावहारिक जीवन में यह बात कभी नहीं भूलना चाहिये।

जो नीतियाँ उन्नत समाज के लिये कही जाती हैं, वे चरित्र के अंतर्गत ही आ जाती हैं। नेकी, ईमानदारी, व्यवहार शुद्धि, सत्य, सहयोग और सहानुभूति, यह सब उसके अंग हैं। भारतीय जीवन में जब तक यह श्रेष्ठता विद्यमान रही, तब तक यह देश प्रत्येक क्षेत्र में संसार-भर का मुखिया बना रहा, किन्तु पिछले दिनों यहाँ कई संस्कृतियों ने प्रभाव डाला, कई तरह के शासक वर्ग आये और उन्होंने यहाँ की जीवन गति को ही अशुद्ध बना डाला। जो सिद्धान्त मानवता के विपरीत पड़ते हैं, पश्चिमी-सभ्यता के प्रभाव से वह अधिक तेजी से विकसित हुये। धन-दौलत को अधिक महत्व दिया गया, जिससे अर्थ यहाँ के आकर्षण का मूल बिन्दु बन गया। इस गलत दृष्टिकोण के कारण अनेक समाज-विरोधी कुप्रवृत्तियाँ पनप उठीं। भ्रष्टाचार की इन दिनों व्यापक चर्चा हो रही हैं। सरकारी मशीनरी उसे रोकने के लिए लगी भी हुई है, किन्तु उसके सुधार की कोई सम्भावना नजर नहीं आती। प्रश्न यह बन गया है कि जो रक्षक है या जिसके हाथ में उत्तरदायित्व है वही भ्रष्ट हो गये हैं। ऐसी दशा में नैतिक जीवन का कोई मूल्य नहीं रह गया है, इसीलिए विकास के अनेक साधन जुटाने पर भी मूल समस्या ज्यों कि त्यों उलझी हुई है। समाज के संतुलन और उसकी सुव्यवस्था का आधार व्यक्ति-निर्माण है। व्यक्ति-व्यक्ति से ही समाज बनता हैं। जिस समाज के लोग परिश्रमी, ईमानदार, सत्यनिष्ठ एवं आदर्श प्रिय होंगे, वह अपने आप उत्तरोत्तर उन्नत होता चला जायगा और राष्ट्र के विकास का वातावरण निखरता हुआ चला आयेगा।

पीछे जो हमें सिखाया गया है, वह हितकर नहीं है। पारस्परिक मत-भेद, ईर्ष्या-द्वेष, फूट कलह का तन्तु जाल हमारा अपना बनाया नहीं है। परिस्थितियों के विक्षेप और विदेशी सत्ता के कारण ऐसा करने को हम मजबूर हुये हैं। आज बात बात पर भाषावाद, जाति-भेज, पदलोलुपता, प्रान्तवाद के नाम लोग लड़ने-झगड़ने लगते हैं, क्या इससे संगठन शक्ति अक्षुण्ण रह सकती है? क्या इससे कोई विकास की समस्या हल हो सकती है? राष्ट्र का जीवन व्यक्तियों के जीवन से विनिर्मित होता है। राष्ट्र की गरिमा में व्यक्तियों का आत्म-बल, मनोबल और शरीर बल गिना जाता है, पर यह तभी संभव है जब राष्ट्र के नागरिक चरित्रवान और आत्मजयी हों। राष्ट्र को धन या रुपया, पैसा ऊँचा नहीं उठाता, वहाँ के नागरिकों की चरित्रनिष्ठा में वह शक्ति होती है, जो उसके गौरव को ऊँचा उठाती है, शिरोमणि बनाती हैं।


Quotation

चिन्तनेनैधते चिन्ता त्विन्धनेनेव पावकः।

नश्यत्यचिन्तनेनैव विनेन्धनमिवानलः॥

ईंधन से जैसे अग्नि बढ़ती है, ऐसे ही सोचने से चिन्ता बढ़ती है। न सोचने से चिन्ता वैसे ही नष्ट हो जाती है, जैसे ईंधन के बिना अग्नि नष्ट हो जाती है।

राष्ट्र विकास की इस चर्चा में आर्थिक समुन्नति का ध्यान रहे यह ठीक है। हमें गरीबी को मिटाना ही चाहिए, पर यह नहीं भूलना चाहिए कि चारित्र्यक विकास के बिना कोई भी भौतिक सफलता स्थिर नहीं रह सकती हैं। बढ़ी हुई शक्ति का सन्तुलन, उदार हृदय, चौड़े मस्तिष्क और आत्म-निष्ठा के साथ हो तो ही उनका लाभ प्राप्त किया जा सकता है अन्यथा भौतिक उन्नति का कुछ लाभ न निकलेगा। उससे हमारी परेशानियाँ ही बढ़ेंगी। राष्ट्र का गौरव बढ़ाने के लिए अन्य साधनों के साथ चरित्र बल बढ़ाना आवश्यक अंग बन गया है। चरित्र सम्पूर्ण विकास की जड़ है, उसका अभिसिंचन होना ही चाहिए।


जीने का आनन्द उत्साह से मिलेगा

अतुलित-वैभव, अनन्त-धन, और अगणित सुविधाओं के होते हुए भी निराश-व्यक्ति का जीवन इस संसार में भार-तुल्य ही होता है। निराशा महा व्याधि है, जो व्यक्ति की संपूर्ण आध्यात्मिक तथा मानसिक शक्तियों को नष्ट करके रख देती है। आशा, उल्लास और उत्साह विहीन जीवन में आनन्द नहीं आता। निराशा को शास्त्रों में पाप बताया गया है। जिससे स्वयं को आनन्द न मिले, औरों को भी कुछ प्रसन्नता न मिले उस निराशा से आखिर फायदा भी क्या हो सकता है?

जिन शक्तियों से मनुष्य जीवन के निर्माण कार्य पूरे होते है, उत्साह उनमें प्रमुख है। इससे रचनात्मक प्रवृत्तियाँ जागती हैं और सफलता का मार्ग खुलता हैं उत्साह के द्वारा स्वल्प साधन और बिगड़ी हुई परिस्थितियों में भी लोग आत्मोन्नति का मार्ग निकाल लेते हैं। बाल्मीकि-रामायण का एक सुभाषित हैं-

उत्साहों बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्।

सोत्साहस्य त्रिलोकेषु नकिञ्चदपि दुर्लभम्॥

अर्थात्- “हे आर्य! उत्साह में बड़ा बल होता हैं, उत्साह से बढ़कर अन्य कोई बल नहीं है। उत्साही व्यक्ति के लिये संसार में कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है।”

कार्य कैसा भी क्यों न हो, उसे पूरा करने के लिये उत्साह जरूर चाहिये। आप अपने जीवन को सफल बनाना चाहते हों तो आपको अपने उद्देश्य के प्रति उत्साही बनना पड़ेगा, अपनी संपूर्ण सामर्थ्य से उसे प्राप्त करने का प्रयत्न करना होगा। अरुचि और अनुत्साह से काम करेंगे तो थोड़ी बहुत जो सफलता मिलने वाली भी होगी, वह भी न मिलेगी। इसके विपरीत यदि रुचि और साहस के साथ काम करेंगे तो कठिन कामों को पूरा करने के लिये भी एक सहज-स्थिति प्राप्त हो जायगी।

यह निर्विवाद सत्य है कि आत्मोत्थान की सिद्धि, कार्य क्षमता बढ़ाने की इच्छा, लोकप्रिय बनने की भावना तथा सफलता और मार्गदर्शन की महत्वाकांक्षा- यह सभी मनुष्य के चरित्र निर्माण में प्रभाव डालती हैं। इन आवश्यक गुणों का जागरण मनुष्य अपने स्वाभिमान और आत्म विश्वास के द्वारा करता है, पर इनके धारण करने की क्षमता केवल उत्साह में है। स्वाभिमानी व्यक्ति, भले ही वह डकैत ही क्यों न हों, कायर व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक लगन के साथ कार्य करते हैं। इसीलिए उन्हें प्रायः अपनी इच्छायें पूरी करने में और अपनी महत्ता प्रदर्शित करने में सहायता मिल जाती है। भले कार्यों में तो स्वाभिमान और लगन से और वृहत्तर शक्ति आती है। इससे नई शक्ति, नवीन प्रेरणा प्रतिक्षण मिलती रहती है। वे अपने लक्ष्य के प्रति अधिक उत्साह से प्रयत्नशील होते हैं।

निराश व्यक्ति अपने कर्त्तव्यों को भी अनिच्छा तथा हीनता की भावना से देखते हैं, फलस्वरूप उनके जीवन में किसी तरह की सुन्दरता का, संपन्नता का उदय नहीं हो पता। उनके आश्रित और सहारे में पल रहे स्वजन परिजन भी अविकसित रह जाते हैं, इसलिये उत्साह हीनता को एक तरह का अपराध ही कहा जायगा। कर्त्तव्य को बोझ और विवशता समझकर नहीं, जीवन का लक्ष्य समझ कर किया जाना चाहिए। किसी सत्य, तथ्य या आदर्श के प्रति कोई कह देने मात्र से वफादार नहीं समझा जायगा, वरन् उन कार्यों और आदर्शों की पूर्ति के लिये उसे उत्साह भी प्रदर्शित करना होगा। तभी उसकी मान्यतायें पुष्ट मानी जा सकती हैं और उनमें औरों को भी प्रेरणा मिल सकती है। “विद्याध्ययन बड़ी अच्छी चीज है” इतना कह देने मात्र से आपके बच्चे उसके प्रति अपनी रुचि प्रदर्शित नहीं करेंगे। वे तो आपकी निष्ठा से प्रभावित होते हैं। आपमें सचमुच यदि किसी आदर्श के प्रति गहरी दिलचस्पी है, तो दूसरों को इसके अनुसरण की शिक्षा न देनी पड़ेगी। संसार में साहसी और निष्ठावान व्यक्तियों के पीछे स्वतः लोग अनुगमन करते हैं, उन आदर्शों को जीवन में धारण करने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं।

इतिहास को मोड़ देने वाले व्यक्ति ऐसे ही हुये हैं। नव-निर्माण की रूप रेखा बनाने वाले बहुत मिल सकते हैं किन्तु जब तक कोई उत्साही पुरुष उसमें प्राण नहीं फूंकता तब तक कोई ठोस निष्कर्ष नहीं निकलते। स्वराज्य के प्रति आस्था रखने वाले व्यक्ति बापू जी से पहले भी हुये हैं, धार्मिक निष्ठा जगद्गुरु शंकराचार्य के पूर्व भी थी, पर राजनीतिक जीवन में हलचल उत्पन्न करके स्वराज्य प्राप्त करने का श्रेय गाँधी जी को ही दिया जाता है। उसी तरह अध्यात्मिक आस्थाओं को विशाल भू-भाग में पुनर्जीवित करने का महान कार्य जगद्गुरु शंकराचार्य ही कर सके थे।

कैसी ही दुखदायक और विषम परिस्थिति क्यों न आ जाय, उत्साह सदैव हमारा सहायक सिद्ध होता है। संसार के इतिहास में जितने अमर, महापुरुष हुये हैं, उनमें अपनी-अपनी तरह के धार्मिक, राजनैतिक, समाज सुधारक कैसे ही गुण और विशेषतायें रही हों, पर एक गुण जो सब में समान रूप से दिखाई देता है, वह है उत्साह! उत्साह का अर्थ है, अपनी मान्यताओं के प्रति दृढ़ता। हम जो कहते हैं, उसको कितने अंशों में पूरा कर सकते हैं इससे उस कार्य के प्रति अपना विश्वास प्रकट होता है और उसी के अनुरूप प्रभाव भी उत्पन्न होता है। उत्साह कहने की नहीं करने की शैली का नाम है।

हम किस तरह उत्साही बनें, यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। किसी को भाग्यवश, धन या साधनों के बदले इस महान गुण ही उपलब्धि होती हो, यह तो संभव नहीं दिखाई देता। ऐसा रहा होता तो वह कुछ व्यक्तियों की ही विरासत रही होती। सीमित शक्ति, सामर्थ्य और साधनों वाले व्यक्ति भी अपने अन्तर का उत्साह जगा सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि वह मानवीय व्यक्तित्व का सहज गुण है, जिसे प्रयत्न और परिस्थितियों द्वारा जगाया जा सकता है। मान लीजिए एक कक्षा के दो विद्यार्थी परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाते हैं। यह घटना दोनों के लिए समान है। एक इस घटना से निराश होकर पढ़ाई छोड़कर घर बैठ जाता हैं और सामान्य श्रेणी का जीवन जीने लगता हैं, दूसरे का उत्साह ठंडा नहीं हुआ। उसने परिस्थितियों का मुकाबला किया और दूसरे वर्ष फिर पढ़ाई में लग गया। कठिनाइयाँ जरूर आईं, पर अन्ततः उसको सफलता मिल गई और वह अच्छी नौकरी पाने के योग्य हो गया। प्रयास और परिस्थितियों ने दो व्यक्तियों के जीवन में इतना अन्तर ला दिया। ऐसी अनेक घटनायें व्यवहारिक जीवन में रोज ही सामने आती हैं। लोग कहते हैं, अमुक व्यक्ति का भाग्य अच्छा था, पर यदि सचमुच देखा जाय, कारणों की गहराई में धँसा जाय तो यह सिद्ध होगा कि सफल व्यक्ति ने अपना भाग्य अपने उत्साह के बल पर बनाया है। पुरुषार्थ और प्रयत्न से ही भाग्य निर्मित होते हैं। यश, श्री और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

स्वाभाविक कार्य प्रायः सभी पूरे करते हैं। उनमें किसी तरह की रुचि अपेक्षित नहीं होती। पर जब कहीं कोई कठिनाई उत्पन्न हो जाती है, उस समय उस चुनौती को स्वीकार करने के लिये एक अन्तः प्रेरणा उठती है। निर्बल प्राण व्यक्ति आत्मा की इस आवाज को ठुकरा देते हैं, जिससे उनका जीवन भी दीन-दुःखी और असहाय-अनाथों जैसा बना रहता है। पर जिनके हृदय में कठिनाइयों से संघर्ष करने का उत्साह होता है, वे लोग बाजी मार ले जाते हैं और अपने जीवन को सब तरह से सुखी एवं समुन्नत बनाते हैं। निराश व्यक्ति केवल ईर्ष्या-द्वेष की भावनायें ही फैला सकते हैं, किन्तु उत्साही पुरुषों को किसी से शिकायत नहीं होती। अपना पथ स्वयं निर्धारित करते हैं और अपने उत्साह बल से उसे पूरा करके दिखा देते हैं।

मनुष्य की जिन्दगी निराशा के अंधियारे में नष्ट कर डालने की वस्तु नहीं हैं। जीवन एक साहसपूर्ण अभियान है। उसका वास्तविक आनन्द संघर्षों में है। निराशा और कुछ नहीं, मौत है पर लगन और उत्साह से तो मौत को भी जीत लिया जाता हैं। इस जीवन में भी निराश हो कर जीना कायरता नहीं तो और क्या है। परमात्मा ने हमें इसलिए नहीं पैदा किया कि हम पग-पग के विवशताओं पर आँसू बहाते फिरे। हमें सिंह पुरुषों की तरह जीना चाहिए। उत्साह पूर्वक जीना चाहिए, इस महा मंत्र को यदि अच्छी प्रकार सीखलें तो आपको धन की झींक, साधनों का अभाव-यह कुछ भी परेशान करने वाले नहीं। आपके हृदय में उत्साह का बल होना चाहिये। यह बल आप पा गये तो इस जीवन में आपको सुख ही सुख रहेगा। आप सदैव प्रसन्नता में आत्म-विभोर बने रहेंगे।


नेक बनें, नेकी की राह पर चलें

जीवन की सार्थकता पर कठोपनिषद् में बाजिश्रवा के पुत्र नचिकेता और यमाचार्य के बीच बड़ा ही महत्वपूर्ण कथोपकथन आया है। यम कहते हैं-

अन्यच्छ्रे पोऽन्यदुतैव प्रेय-

स्ते उमे नानार्थे पुरुष œसिनीतः।

तयोः श्रेय आददानस्य साधु

भवति दीपतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते॥ । 1। 2। 1

“हे नचिकेता! कल्याण के साधन को ग्रहण करने वाले पुरुष का कल्याण होता है और जो साँसारिक भोगों में फँसते हैं, वे सत्य-लाभ से गिर जाते हैं। क्योंकि नेकी के साधनों में और साँसारिक भोग के साधनों में विभिन्नता है। दोनों ही पृथक-पृथक फल देने वाले हैं।”

श्रेय और प्रेय दोनों विभिन्न प्रयोजन वाले हैं और दोनों ही पुरुष को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। परन्तु उनमें से जो अच्छाई का मार्ग अपनाते हैं, उन्हें इस संसार में सुख मिलता है। लौकिक तृष्णाओं की ओर भागने वालों को इस मनुष्य-देह धारण करने का कोई आनन्द नहीं मिलता। प्रेय चाहने वाले व्यक्ति मनुष्यत्व से गिर जाते हैं। वे अपने लिए खाई खोदते हैं, दूसरे भी उसमें गिर जाते हैं।

साँसारिक सुखों की लालसा और फल की कामनायें मनुष्य की स्वार्थी बनाती हैं। अहंकार में फँसकर मनुष्य कर्त्तव्य पालन से गिर जाता है और जीवन में अशान्ति तथा अव्यवस्था छा जाती हैं। इस संसार की रचना इस प्रकार हुई है कि सब लोग मिल-बाँटकर यहाँ के सुखों का उपभोग करें। ऐसा तभी सम्भव है, जब मनुष्य अपने निजी सुखों की अपेक्षा कर्त्तव्य-पालन का महत्व अधिक समझे। यदि ऐसा न हुआ तो कलह बढ़ेंगे, छीना-झपटी होगी, राग-द्वेष, ईर्ष्या-प्रमाद और दुर्भावनायें बढ़ेगी और इस तरह जो थोड़े से सुख होंगे, उनका भी पतन हो जायगा।

संसार में जितने भी भौतिक पदार्थ मनुष्य को उसके उपयोग के लिये मिले है, उनकी एक परिमित मात्रा ही उसे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये काम में लानी हैं। यदि किसी के पास आवश्यकताओं से अधिक जमा हो जाय तो उसे वहाँ लगा देना चाहिये, जहाँ उसकी कमी पड़ रही हो या दूसरे लोग आवश्यकता अनुभव कर रहे हों। सारा मनुष्य-परिवार एक है। आत्मा अपने व्यक्तिगत शरीर और परिवार तक ही सीमित नहीं, बल्कि वह विराट जगत का अधिष्ठाता है और सबके सुखी रहने में ही उसे सुख मिलता है। स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियाँ उसे प्रिय नहीं। नेकी की राह चलने वाले को ही वह अपने वरदान देकर सुखी संतुष्ट और पूर्ण तृप्त बनाता है।

ईमानदारी के मार्ग में आत्मा की दैवी शक्तियों का सहयोग मिलता है। यह सोचना भूल है कि सन्मार्ग में बाधायें हैं, कष्ट और असुविधायें हैं। सच्चे व्यक्ति को किसी भी गुप्त भेद के प्रकट होने का कोई भय नहीं रहता। वह तो खरा होता है। अपने स्वाभिमान के आगे इन्द्रासन को लात मारकर दूर कर देता है। क्या करेंगी बाधायें भला उस इन्सान का जिसमें सत्य का, श्रेय का बल होगा। हरिश्चन्द्र की तरह वे अपनी अग्नि परीक्षाओं में सफल होकर संसार में ऐसे चमकते हैं, जैसे सूर्य, चन्द्रमा। लोग तो रोज ही मरते हैं पर उनकी मौत पर बहुत थोड़े ही आँसू बहाते हैं पर श्रेय और सत्य का अनुसरण करने वाले जब इस संसार से विदा होते है, तो सारी दुनिया की आंखें गीली हो जाती हैं। भगवान, राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसा, सुकरात, महात्मा गान्धी आदि महापुरुषों का स्मरण करते हुए आज भी लोगों के गले भर आते हैं। वे शान से जीते हैं और शान से मरते हैं। किसी भी कसौटी पर चढ़ा देने पर भी वे चमकते ही रहते हैं।

जो व्यक्ति यह समझता है कि बेईमानी से, लोगों की आँखों में धूल झोंककर बढ़ता रहेगा, वह वास्तव में बड़ी भूल करता है। अनीति एक प्रकार की अग्नि है, जिससे अपना लोक और परलोक नष्ट ही होता हैं।

सबको अपना समझते हुये, उनके, सुख-दुःख में हाथ बटाते हुये तथा तन, मन, धन से औरों की सहायता करते हुये लोग अपना ही भला करते हैं, अपने आपको विस्तीर्ण करते हैं-फैलाते हैं, सीमा से उन्मुक्त हो कर अनन्तता की और, असीमत्व की और पदार्पण करते हैं। सर्वात्मभावपूर्वक सुखों के उपभोग में वह आनन्द आता है। जिसका शताँश भी अकेले भोग करने में नहीं आता। बेटे से बाप का दर्जा भी इसीलिए बड़ा है कि वह अपनी तृप्ति अपने बेटे की तृप्ति में मानता है। इस आत्म-भाव का नैतिक सद्गुणों के रूप में जितना अधिक विकास होता है, उतना ही आत्मा पुलकित और प्रफुल्लित होती है।

फल, आशक्ति, अहंता, ममता से रहित होकर संसार के हित के उद्देश्य से कर्त्तव्य-कर्म करना ही मनुष्य जीवन का मूल-लक्ष्य है। गीता में भक्तियोग, ज्ञान योग तथा कर्म योग-इन सब साधनों का प्रधान उद्देश्य यह है कि किसी का परम हित हो। इस उद्देश्य की पूर्ति तभी हो सकती है, जब लोग स्वार्थ और अभियान से रहित होकर सम्पूर्ण प्राणियों के साथ त्याग, समता, सहिष्णुता, उदारता, प्रेम और विनय-युक्त व्यवहार करें। उत्तम आचरण और अन्तःकरण के उत्तम भावों से ही मनुष्य की मनुष्यता विकसित होती है। यह न हो तो फिर मनुष्य और शैतान में अन्तर ही क्या रह जाता है।

सत्याग्रह और सदाचरण आत्मा के दो बेटे हैं। इन्हें मारकर कोई भी व्यक्ति आत्म-निष्ठा का लाभ प्राप्त नहीं कर सकता। हनन की हुई आत्मा ही अनीति की ओर प्रेरित करती और दुष्कर्म कराती है। असत्य कर्म करते रहने से धीरे-धीरे आत्मा मूर्छित हो जाती है, तब फिर उसमें अधर्म का प्रतिरोध करने की भी क्षमता नहीं रहती।

पाप का फल भोगे बिना कोई मनुष्य बच नहीं सकता। गीता का “अवश्यमेव भोक्तव्यं कर्म फल शुभाशुभं” सिद्धान्त अटल है। मनुष्य दुष्कर्मों का दुष्परिणाम भोगे बिना बच नहीं सकता। आग में उँगली देने वाला जले नहीं, ऐसा कभी हुआ नहीं। प्राकृतिक नियम अमिट हैं। गलती करने वालों को दण्ड मिलना स्वाभाविक भी है। अतः मनुष्य की समझदारी इसमें है कि सत्यता और ईमानदारी का ही बर्ताव अन्त तक करता रहे। ईमानदारी की रूखी रोटियाँ बेईमानी के पकवानों से अधिक स्वादिष्ट होती हैं, क्योंकि उनमें निर्भयता, निश्छलता और आत्मा का तेज समाविष्ट होता है।

यदि किसी ने भोग को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान लिया है और उसके लिये हर उचित- अनुचित साधन अपनाने के आतुर रहता हैं तो उसकी भी कुछ हद होती हैं। अनियंत्रित भोग की कामना से भोग भोगने की क्षमता नष्ट हो जाती हैं। इन्द्रियाँ निर्बल और निस्तेज हो जाती है। मन बेकाबू हो जाता है। बुद्धि का नाश हो जाता है। शरीर और मन के अनेकों विकार उठ खड़े होते हैं और अनेकों आपत्तियाँ घेरकर खड़ी हो जाती हैं। कहते हैं “पहले मनुष्य भोग भोगता है, बाद में भोग मनुष्य को भोगते हैं।” अर्थात् मनुष्य केवल इच्छाओं और वासनाओं का दास होकर रह जाता है और इस तरह उसे अकाल ही काल के गाल में चले जाने का दुर्भाग्य प्राप्त होता है।

मनुष्य सत्य-पथ का, प्रकाश-पथ का यात्री है। झूठ और मिथ्याचार के आकर्षण में फँसकर उसे अपने जीवनोद्देश्य से क्यों पतित होना चाहिये? अधर्म से धन जमा करने की अपेक्षा यही अच्छा है कि मनुष्य सत्य आचरण करता हुआ गरीब बना रहे। जो साधन अधर्मपूर्वक प्राप्त किये जाते हैं, वे मनुष्य को अन्ततः रुलाये बिना नहीं छोड़ते।

जीवन जीने के दो ही रास्ते हैं, एक नीति का दूसरा अनीति का, एक नेकी का दूसरा बदी का। एक का नाम श्रेय है, दूसरा प्रेय। श्रेय पर चलने वाले सीधी सड़क पर चलते हुये, जीवन के सात्विक सुखों का उपभोग करते हुये सुविधापूर्वक अपने लक्ष्य तक पहुँच जाते हैं। यह मार्ग सर्व कामना सिद्ध है। दूसरा है इन्द्रियों को जो भाये, जिधर चलायें उधर चलने वाला मार्ग। कोई लक्ष्य नहीं, कोई उद्देश्य नहीं। ऐसा मनुष्य अन्त में कष्ट और कठिनाइयों के बीहड़ बन में भटक कर तरह-तरह के क्लेश पाता है। उसके लिये यह मनुष्य जीवन भार की तरह हो जाता है। यह स्थिति अवाँछनीय है। हम वह राह क्यों चलें जिसमें कष्ट हों, काँटे बिछे हुये हों। नेकी की राह एक ऐसा राजमार्ग है, जिस पर चलकर परमात्मा का राज- कुमार मनुष्य हँसते, खेलते, मौज लेते हुये जिन्दगी का रास्ता तय कर लेता है, और पूर्ण-सुख, चिर-विश्राम की शान्तिदायिनी स्थिति को प्राप्त कर लेता है।


प्रतिशोध की भावना छोड़िये

अच्छे-बुरे जैसे भी परिणाम मनुष्य को इस जीवन में मिलते हैं, उनमें इस जन्म के कर्मफल के साथ पूर्व जन्मों के प्रारब्ध भी संयुक्त होते हैं। देखने में लगता है कि यह दण्ड हमें अकारण मिल रहा है, अतः बिगाड़ पैदा करने वाले के प्रति बदले की भावना आती है। असफलता या बुरे परिणाम का दोष किसी न किसी के मत्थे मढ़ देते हैं और उसका बदला लेने के लिये क्रुद्ध सर्प की तरह इधर-उधर फन पटकते घूमते हैं। इससे प्रतिद्वन्द्वी की कितनी हानि होती है, यह तो दूसरी बात हैं, पर प्रतिशोध की भावना अपने आपको ही मलिन, दुष्ट और दुराचारी बना देती है, अतः इसका परित्याग ही किया जाना अच्छा है।

अभी तक किसी महापुरुष के जीवन से ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिला जहाँ घृणा, द्वेष, पर दोष दर्शन तथा प्रतिशोध के द्वारा किसी मंगल कार्य की सिद्धि हुई हो। प्रतिशोध से मनुष्य की बुद्धि नष्ट होती है, विवेक चला जाता है। जीवन की सारी शान्ति और आनन्द नष्ट हो जाता है। इस तरह के दोषपूर्ण विचार मानवीय प्रगति को रोक देते हैं। मनुष्य न तो साँसारिक उन्नति को पाता है और न ही आध्यात्मिक उद्देश्य पूरा कर पाता है। इससे मानसिक जड़ता आती है और सारी क्रिया-शक्ति बर्बाद हो जाती है।

प्रतिशोध की भावना तब आती है, जब किसी से शत्रुता होती है, किन्तु यदि सचमुच देखा जाय तो इस संसार में न कोई किसी का शत्रु है न मित्र। स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों के कारण ही यह विरोधाभास दिखाई देता है। अपने मन और इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखा जा सके, तो यहाँ कोई भी शत्रु नहीं दिखाई देगा। सभी परमात्मा के अंश हैं। एक ही आत्मा के गठबन्धन में सब बँधे हुये हैं। जो यह समझ लेता है, वह अपने पूर्व-जन्मों के कर्मों के फल तो इस जीवन में भोगता है, किन्तु आगे के लिए इन अनिष्टकारी मनोविकारों को अपने मस्तिष्क में नहीं आने देता।

हिरण्यकशिपु के दुष्ट पुरोहित षण्डामर्क ने प्रहलाद को जीवित जला डालने के लिये प्रचण्ड अग्नि ‘कृत्या’ को जलाया। प्रहलाद को अग्नि में फेंक दिया गया, पर परमात्मा की कृपा से अग्नि प्रहलाद का कुछ न कर सकी, उलटे पुरोहित उसमें जलने लगे। गुरु पुत्रों को जलते देखकर प्रहलाद का सन्त-हृदय चीत्कार कर उठा। उसने करुण-हृदय से परमात्मा को पुकार की और उन पुरोहितों को मृत्यु से त्राण दिलाया। जिसके हृदय में शत्रु के प्रति भी शत्रुता का भाव उत्पन्न न हो, वही तो परमात्मा का सच्चा सेवक हैं। यह स्थिति अभिमान रहित होती है। जब तक अभिमान शेष रहता है तब तक बदले की भावनायें जरूर उठती हैं। श्रेय-पथ की यह एक बहुत बड़ी बाधा है। इसे दूर करने में ही शाश्वत सत्य की अनुभूति सम्भव है।

मनुष्य की शोभा तो परोपकार और परसेवा से होती है। अपने हित और स्वार्थ के लिये झगड़ते रहने की अपेक्षा अपने हितों को निरहंकारिता पूर्वक त्याग देना ही मनुष्य के बड़प्पन की कसौटी है। बैर-भावना तो पशु-पक्षियों तक में होती है। मनुष्य भी इससे ग्रसित हों तो इसमें विशेषता भी क्या हुई। सब को गले लगाने, आत्मीयता विकसित करने, सहानुभूति प्रदर्शित करने तथा सहयोग देने से ही मनुष्य का जीवन धन्य होता है।

इसी प्रकार मनुष्य को नरक में ढकेलने वाला कोई व्यक्ति नहीं होता, दैव भी किसी को ऐसी प्रेरणा नहीं देता। यह सोचना भ्रमपूर्ण है कि बुराइयों की ओर ले जाने वाला परमात्मा ही होता है। अच्छे बुरे कर्मों का संकलन कर्ता मनुष्य स्वयं है और इन्हीं के अनुसार उसे दण्ड या वरदान प्राप्त होते हैं। दुष्कर्मों का फल ही नरक है और इसकी प्रेरणा पर दोष दर्शन, घृणा, द्वेष प्रतिशोध बैर तथा हिंसावृत्तियों से आती है। बुरे विचार मनुष्य की शान्ति को नष्ट कर देते हैं, भारी अनर्थ खड़ा कर देते हैं, व्यक्ति समाज और राष्ट्र तक का सर्वनाश कर देते हैं।

इतिहास बताता है कि द्रौपदी के आठ अक्षरों “अंधों के अन्धे होते हैं” ने दुर्योधन के हृदय में जो प्रतिशोध की ज्वाला उत्पन्न की थी, उसी के परिणाम स्वरूप महाभारत के मैदान में अठारह अक्षौहिणी सेना का संहार हुआ था। परोक्ष रूप से इस युद्ध से प्रभावित होने वालों की संख्या दी जानी भी असम्भव है। कहते हैं इस युद्ध के पश्चात ही अधर्माचार का सूत्रपात इस देश में हुआ हैं। प्रतिशोध की भावना इतना असन्तुलन मस्तिष्क में पैदा कर देती है कि यह भी ध्यान नहीं रहता है कि अमुक व्यक्ति अपना कितना हितैषी है। लोग क्रोध में पागल होकर दूसरों का अहित तो करते ही हैं, अपना सर्वनाश पहले कर डालते हैं। प्रति-शोध प्रतिद्वन्द्वी को ही नहीं जन्मदाता को भी खा कर ही छोड़ता है। विद्वान बेकन का कथन सत्य ही है “प्रतिशोध लेने से मनुष्य अपने शत्रु के समान हो जाता है, परन्तु न लेने से उससे श्रेष्ठ बनता है।”

लोग समझते हैं, दुश्मन से बदला चुकाना शान की बात है। इसे वे साहस का कार्य भी समझते हैं। परन्तु प्रति-शोध साहस नहीं है, साहस तो तब है जब आप उसे सहन कर जायें।

इस तरह की सहन-शीलता मनुष्य की अन्तःमुखी प्रवृत्तियों को विकसित करती है, मनुष्य को विचारशील बनाती है, उसे कष्टों से बचाती है, उन्नति की ओर अग्रसर करती है, उसके लिये संसार में से शत्रुता का नाम ही मिट गया, जिसने कड़ुवाहट को भी उदारता पूर्वक पी जान सीख लिया।

महापुरुष ईसा क्रूस पर चढ़ा दिये गये थे। अत्याचारी राजा ने उनके हाथ, पाँव तथा सारे शरीर को कीलों से गड़वा दिया था, फिर भी वे परमात्मा से बार-बार यही प्रार्थना करते रहे-’हे प्रभु ये नासमझ हैं, तू इन्हें क्षमा कर देना।” विशाल हृदय होगा उस सन्त का, जो अपने दुश्मनों के प्रति भी कभी अपने मन में दुर्भावनायें न लाता हो। महानता प्राप्त करने के लिये मनुष्य को द्वेष तथा दुर्भावना का परित्याग सर्वप्रथम करना पड़ता है। इसके बिना अन्तःकरण प्रकाशित नहीं हो पाता।

अन्य दूषणों की अपेक्षा प्रतिशोध इसलिये अधिक हानिकारक है क्योंकि वह मनुष्य के साथ बहुत दूर तक जाता है। दूसरे जन्मों में भी वह साथ नहीं छोड़ता। वह तरह-तरह के पाप मनुष्य से कराता रहता है। इसलिये यह न समझिये कि यदि अपना क्रोध शान्त कर लेंगे, तो लोग आपको कायर, शक्तिहीन तथा छोटा समझेंगे। इसमें आपका बहुत बड़ा हित छुपा है। अतः जब कभी बदले की भावना उगती दिखाई दे, उसे प्रेमपूर्ण विचारों से तुरन्त नष्ट कर डालिये। इतना ही नहीं अवकाश मिले तो आपके प्रति अभद्रता प्रकट करने वालों की भी आप यथा-शक्ति भलाई कीजिये, उन्हें सहायता दीजिये, दुःख में हाथ बँटाइये। ऐसा करने से वह व्यक्ति आपके प्रति विनीत ही नहीं होगा, वरन् उसके अन्तःकरण में भी सद्भावनाओं की तीव्र जागृति होगी।

विरोधी बातों को कभी मस्तिष्क में टिकने न दिया कीजिये, यह न जाने कब विद्रोह पैदा कर दें। परदोष दर्शन, घृणा तथा द्वेष करके भी मन में प्रतिशोध के भाव न रहने दीजिये। प्रत्येक व्यक्ति में अच्छाई ढूँढ़ा कीजिये। गुण ग्राहकता से आपके सद्गुण बढ़ेंगे। घृणा के बदले प्रेम किया कीजिये। किसी का अहित न सोचिये, बन पड़े तो उपकार कीजिये, हित करिये। कोई अपराध भी करता है तो उसे भी क्षमा कर दीजिये, यह मत सोचिये कि इससे आपको हानि होगी। सद्गुणों और सद्विचारों की कीमत कई गुना होकर लोटती है और मनुष्य को अन्तःकरण को शीतल बना देती है।

यह सारा संसार परमात्मा से ही ओत-प्रोत है जिस तरह एक ही सूरज पानी के कई घड़ों में एक ही तरह से दिखाई देता है उसी तरह शरीर की विविधता होते हुये भी प्राणिमात्र उस अव्यय परमात्मा के ही प्रतिबिम्ब हैं। इनसे दुराव करने का तात्पर्य यह है कि आप परमात्मा को दोष लगाते हैं। किसी के प्रति बैर-भाव का अर्थ परमात्मा से विद्रोह पैदा करना है। आप इन भावनाओं को मन से निकाल कर सदैव मंगल ही सोचा करें। सद्-भाव सारे वातावरण में फैलकर आपके हृदय में पवित्रता, शान्ति तथा मैत्री का विस्तार करेंगे। इस तरह के मंगल कर्म करने वालों की कभी दुर्गति नहीं होती। वह चिर-कला तक धरती के सुखों का उपभोग करते रहते हैं।


सम्बन्धों में सात्विकता भी हो, मधुरता भी

गृहस्थी एक प्रकार का प्रजातन्त्र है। राज्य संचालन के लिये अनेक कर्मचारी नियुक्त होते हैं। कोई मन्त्री होता है, कोई राज्यपाल, कोई सचिव होता है। कोई डायरेक्टर, कोई कलक्टर, कोई सिपाही। योग्यता और अनुभव के आधार पर पद विभक्त किये गये है। उद्देश्य सब का एक ही होता है, शासन-तंत्र में सुव्यवस्था और अनुशासन बनाये रखना। जब तक कर्त्तव्य भावना से अपने अधिकारों का प्रयोग चलता रहता है, तब तक राज्य-तन्त्र में किसी तरह की गड़बड़ी नहीं आने पाती।

गृहस्थ भी किसी प्रजातन्त्र से कम नहीं है। परिवार का सबसे वयोवृद्ध मुखिया होता है। किसी को कृषि का काम मिला होता है, कोई दुग्ध मंत्रालय का काम संभालता है, इसी तरह घर की सारी व्यवस्था चलती रहती है। शासन में कानूनी नियम होते हैं। गृहस्थी में सम्पूर्ण कर्त्तव्यों का निर्वाह आध्यात्मिक सम्बन्धों पर निर्धारित रहता हैं। इन सम्बन्धों में यदि शुद्धता और सात्विकता बनी रहे तो गृहस्थी में एक सुखद वातावरण बना रहता है।

इन सम्बन्धों में यदि खटाई उत्पन्न हो गई तो वही गृहस्थ नारकीय यंत्रणाओं में घिर जाता है। परिवार के अमन-चैन मिट जाते हैं। सारा घर लड़ाई का अखाड़ा बन जाता है, सारे श्री-सौभाग्य धूल में मिल जाते हैं। उन्नति रुक जाती है और लोग निर्धनता का दीन-हीन जीवन बिताने को विवश हो जाते हैं।

परिवार में जब अपने-अपने स्वार्थ का भ्रष्टाचार बढ़ता है और लोग कर्त्तव्य की आध्यात्मिक भावना को भुला देते हैं, तभी गृहस्थ की दुर्दशा होती हैं। कितने कृतघ्न होंगे वे लोग जो अपने स्वार्थ के लिये परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व भुलाकर अपना चूल्हा-चौका अलग रखने में अपनी बुद्धिमानी समझते हैं। किसी ने ऐसे कुटिल व्यक्तियों को कभी फलते-फूलते भी नहीं देखा होगा जो फूट के बीज बोकर सारी पारिवारिक व्यवस्था को तहस-नहस कर डालते हैं।

पिता अपने पुत्र के लिये सारे जीवन-भर क्या नहीं करता? श्रम करता है, जब वह खुद सो रहा होता है, तब गये रात उठकर खेतों में जाता है, हल चलाता है, मजदूरी करता है, नौकरी बजाता है। क्या सब कुछ अपने लिये करता है? नहीं। एक व्यक्ति का पेट पालना हो तो चार- छः आने की मजदूरी काफी है। दिन-भर श्रम करने का क्या लाभ? पर बेचारा बाप सोचता है, बच्चों के लिए दूध की व्यवस्था करनी है, दवा लानी है, कपड़े सिलाने हैं, फीस देना हैं, पुस्तकें लाना है और उसके भावी जीवन की सुख-सुविधा के लिए कुछ छोड़ भी जाना है। जब तक शक्तियाँ काम देती हैं, कोई कसर नहीं उठा रखता। अपने पेट को गौण मानकर बेटे के लिये आजीवन, अनवरत श्रम करने का साहस कोई बाप ही कर सकता है।

पाल-पोसकर बड़ा कर दिया। शिक्षा-दीक्षा पूरी कराई, विवाह-शादी करा दी, धन्धा लग गया। पिता से पुत्र की कमाई बढ़ गई। उसके अपने बेटे हो गये, स्त्री की आकाँक्षायें बढ़ीं, बेटे ने बाप के सारे उपकारों पर पानी फेर दिया। कोई न कोई बहाना बनाकर बाप से अलग हो गया। हाय री! तृष्णा, हाय रे अभागे इंसान तू कितना नीच है, कितना पतित है! जिस बाप ने तेरे लिये इतना सब कुछ किया और तू उसकी वृद्धावस्था का पाथेय भी न बन सका। इस कृतघ्नता से बढ़कर इस संसार में और कौन-सा पाप हो सकता है? अपने स्वार्थ, भोग, लिप्सा, स्वेच्छाचारिता के लिये बाप को ठुकरा देने वालों को पामर न कहा जाय तो और कौन-सा सम्बोधन उचित हो सकता है।

पिता परिवार का अधिष्ठाता, आदेशकर्त्ता और संरक्षक होता है। उसकी जिम्मेदारियाँ बड़ी होती हैं। सबकी देख-रेख, सबके प्रति न्याय, सबकी सुरक्षा रखने वाला पिता होता है। क्या उसके प्रति उपेक्षा का भाव मानवीय हो सकता है? कोई राक्षस वृत्ति का मनुष्य ही ऐसा कर सकता है, जो अपने माता-पिता को उनकी वृद्धावस्था में असहाय छोड़ देता हैं।

परिवार में पिता को सम्मान मिलता है, तो उसके दीर्घकालीन अनुभव, योग्य संचालन, पथ प्रदर्शन, भावी योजनाओं को नियंत्रित करने का लाभ भी परिवार को मिलता है। अपने प्रेम, वात्सल्य, करुणा, उदारता, संगठनात्मक बुद्धि से वह सब पर छाया किये रहता है। वह परिवार का पालन करता है। पिता की पूजा करना, उसकी उचित सेवा-टहल और देख-रेख रखना परमात्मा की उपासना से कम फलदायक नहीं होती। पिता का आशीर्वाद पाकर पुत्र की आकाँक्षायें तृप्त होती हैं, जीवन सुमधुर, नियंत्रित और बाधा रहित बनता है।

इस युग में पिता ओर पुत्र के सम्बन्धों में जो कड़वाहट आ गई है, वह मनुष्य के संकुचित दृष्टिकोण और स्वार्थपूर्ण प्रवृत्ति के परिणाम स्वरूप ही है। पिता पुत्र के लिये अपना सर्वस्व अर्पित कर दे और पुत्र व्यक्तिगत स्वतन्त्रता तथा अनुशासन-अवज्ञा करे तो उस बेटे को निन्दनीय ही समझा जाना चाहिये।

मनुष्य का सबसे शुभचिन्तक मित्र, हितैषी, पथ प्रदर्शक, उदार जीवन रक्षक पिता ही होता है। वह समझता है कि बेटे को किस रास्ते लगाया जाय कि वह सुखी हो, समुन्नत हो, क्योंकि उसकी त्रुटियों का ज्ञान पिता को ही होता है। जो इन विशेषताओं का लाभ नहीं उठाते, उन्हें अन्त में दुःख और दैन्यताओं का ही मुँह देखना पड़ता है।

पिता और पुत्र, पिता और पुत्री के सम्बन्ध बड़े कोमल, मधुर और सात्विक होते हैं। इस आध्यात्मिक सम्बन्ध का सहृदयतापूर्वक पालन करने वाले व्यक्ति देव-श्रेणी में आते हैं। उनका मान और प्रतिष्ठा होनी ही चाहिये।

परिवार में माता का स्थान पिता के समतुल्य ही होता है। एक से दूसरे को बड़ा-छोटा नहीं कहा जा सकता। पिता कर्म है तो माता भावना। कर्म और भावना के सम्मिश्रण से जीवन में पूर्णता आती है। गृहस्थी की पूर्णता तब है, जब उसमें पिता और माता दोनों को समान रूप से सम्मान मिले। माता का महत्व किसी भी अवस्था में कम नहीं हो सकता।

व्यक्ति का भावनात्मक प्रशिक्षण माता करती है। उसी के रक्त, माँस और ओजस से बालक का निर्माण होता है। कितने कष्ट सहती है वह बेटे के लिए। स्वयं गीले बिस्तर में सोकर बच्चे को सूखे में सुलाते रहने की कष्ट-साध्य क्रिया पूरी करने की हिम्मत भला है किसी में? माता का हृदय दया और पवित्रता से ओत-प्रोत होता है, उसे जलाओ तो भी दया की ही सुगन्ध निकलती है, पीसो तो दया का ही रस निकलता है। ऐसा दया और ममत्व की मूर्ति माता को जिसने पूज्यभाव से नहीं देखा, उसका सम्मान नहीं किया, आदर की भावनायें व्यक्त नहीं की, वह मनुष्य नर-पिशाच ही कहलाने योग्य हो सकता है।

इस विकृति को फिर से सुधारना है। राम और भरत, गोरा और बादल के आदर्श भ्रातृ-प्रेम को फिर से पुनरुज्जीवित करना है। इससे हमारी शक्ति हमारी सद्भावनायें जागृत होंगी, हमारा साहस बढ़ेगा और पुरुषार्थ पनपेगा।

स्नेहमयी बहिन, उदारता की मूर्ति भावजों को भी उसी तरह सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए, जिस तरह माता के प्रति अपनी आत्मीयता पूर्ण भावनायें हों।

घर का वातावरण कुछ इस तरह का शील-संयुक्त, हँसमुख और उदार बने, जिससे सारा परिवार हरा-भरा नजर आये। इसके लिए धन आदि उपकरणों की उतनी आवश्यकता नहीं है, जितनी अपने सम्बन्धियों के प्रति कर्त्तव्य और सेवा भावना की। परिवार में सौमनस्य हो तो वहाँ न तो सुख की कमी रहेगी, न शान्ति की। आह्लाद फूटा पड़ रहा होगा उस घर में जहाँ, सबके दिल मिले होंगे। हमारा घर भी ऐसा ही हो, तो हम समझें कि पारिवारिक जीवन के प्रति अपने उत्तरदायित्व भली प्रकार पूरे किये है। यही परमात्मा की सच्चा पूजा है। इसे तिरस्कृत न किया जाना चाहिए।


स्वास्थ्य के लिये स्नान और जल की उपयोगिता

मनुष्य जीवन के निर्माणकारी तत्वों में जल का प्रमुख स्थान है। शारीरिक स्वास्थ्य, बाह्य और भीतरी अंगों की सफाई, शारीरिक शुद्धि और पवित्रता के लिये जल का उपयोग आदि-काल से किया जाता रहा है। कटे हुये स्थानों में गीले कपड़े की पट्टी बाँधने की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है।

इंग्लैंड में सर जॉनसन क्लेयर ने सत्रहवीं शताब्दी में स्नान को स्वास्थ्य और दीर्घायु जीवन का महत्वपूर्ण साधन बताया था। “फेब्रिकुगम मेगनम” के विद्वान लेखक जानहेन काक ने चेचक और ज्वर में ठंडे पानी पीने को बहुत लाभकारी बताया है। मुसलिम देशों में गैलन के महत्वपूर्ण सिद्धान्त को आज भी मानते हैं और अनेकों बीमारियों में शीतल जल प्रयोग करने को अत्यन्त लाभदायक मानते हैं।

शरीर में खून की सफाई, मलों की सफाई और काँति प्रदान करने वाली वस्तु जल है। जल जब आँतों में पहुँचता है तो इसका एक अंश पाचन क्रिया में भाग लेता है। आहार को रसयुक्त बनाकर पाचन क्रिया में मदद देता है और मल को गीला बनाकर मल-द्वार की ओर धकेल देता है।

इस बीच जल-चूषक कोशिकायें अपना कार्य प्रारम्भ करती हैं और जल से ऑक्सीजन प्राप्त कर सारे शरीर को कान्तिवान, रक्त को शुद्ध और शिराओं को प्रवाहमान बनाती हैं। इसलिये संतुलित आहार में आधा भाग पेट आहार और चौथाई भाग जल से भरने की उपयोगिता बताई जाती है। आहार के बाद एक-एक घंटे में कई बार थोड़ा-थोड़ा पानी पीना स्वास्थ्य के लिये बड़ा हितकर होता है। प्रातःकाल उषापान, अर्थात् चारपाई से उठते ही एक गिलास शीतल जल का प्रयोग स्वास्थ्य के लिये अमृत तुल्य माना जाता है। इससे आँखों की ज्योति बढ़ती है और मस्तिष्क की ताजगी दिनभर बनी रहती है।

ठंडा पानी जब आँतों में पहुँचता है या जब किसी विशेष स्थान में शीतल जल या बर्फ का प्रयोग करते हैं तो दूसरे अंगों का रक्त उस स्थान की ओर खिंच जाता है, जिससे वह स्थान मजबूत बनता है और उस स्थान का विष या रोग वर्द्धक शक्ति समाप्त हो जाती है। आमाशय की यह क्रिया आँतों को मजबूत करती है और पाचन-क्रिया को सशक्त बनाती है। उपवास काल में जल के अधिकाधिक प्रयोग से संचित मल गीला होकर बाहर निकल जाता है।

जल से स्वास्थ्य बनाये रखने के साथ-साथ उसका प्रयोग अनेकों बीमारियाँ दूर करने में भी होता हैं। फिलाडेल्फिया के प्रसिद्ध चिकित्सक बेंजामिन रश ने ठंडे पानी के प्रयोग से पीले ज्वर, गठिया, चेचक तथा शीतला माता का सफल इलाज किया है। बर्फ से भरी हुई थैली का प्रयोग रश के सिद्धान्त के अनुसार ही सन् 1794 में प्रचलित हुआ, जो अब डाक्टरी चिकित्सा का एक अंग माना जाता है। गीली पट्टी बनाकर घाव या चोट में रखना भी ऐसी ही पद्धति है। इससे उस स्थान में रक्त की रोग-निरोधक ऊष्मा बढ़ती है, जिससे तात्कालिक लाभ मिलता हैं। इन प्रयोगों से जल के महत्व पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

शरीर में जल का उपयोग मुख्यतया दो प्रकार से होता है। आहार की तरह जल पीने से और स्नान के द्वारा शरीर जल के सूक्ष्म और स्थूल प्रभाव ग्रहण करता है। यह दोनों ही साधन अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। स्वास्थ्य के लिये इन दोनों का विकास आवश्यक है।

स्नान स्वास्थ्य से सम्बन्ध रखने वाली एक प्रमुख क्रिया है। सम्भवतः इसीलिये हमारे यहाँ इसे एक धार्मिक साँस्कृतिक और सामाजिक कर्तव्य माना जाता है और जो नियमित रूप से स्नान नहीं करता उसे स्पर्श करना भी बुरा माना जाता है। भले ही इस अवहेलना का कोई वैज्ञानिक आधार न हो, किन्तु मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से कोई भी इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया से वंचित न रहे, इस सिद्धाँत का प्रचलन कोई बुरा नहीं है। भारत उष्ण प्रकृति का देश है, इसलिये यहाँ प्रत्येक ऋतु में स्नान करना उपयोगी तो है ही आवश्यकता भी है।

अठारहवीं शताब्दी के उत्तरकाल में दो अंग्रेज चिकित्सक क्यूरी और जैक्सन ने भी यह साबित किया कि शीतल जल से स्नान करना स्वास्थ्य के लिये बड़ा लाभदायक होता है। उन्होंने लिखा है, “ठंडे पानी से स्नान करने से शरीर को विश्राम मिलता है और स्फूर्ति बढ़ती है। इस क्रिया से शरीर को शक्ति और सजीवता प्राप्त होती है।” इससे भी पूर्व सन् 1780 के लगभग डॉ0 क्राफोर्ड ने ठंडे पानी से स्नान के मनोवैज्ञानिक प्रभाव तथा प्राण वायु सम्बन्धी महत्व पर प्रकाश डाला था। शीतल जल से स्नान करने के पश्चात रक्तवाहिनी नाड़ियों में एक प्रकार की गति उत्पन्न होती है और रक्त के रंग में परिवर्तन होने लगता है।

सन् 1801 ई॰ में गर्म पानी के प्रयोग पर पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी के मेडिकल फैकल्टी (स्वास्थ्य-संगठन) के ट्रस्टियों के समक्ष थेसिम के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसमें विभिन्न प्रकार के प्रयोग सम्मिलित थे और कम से कम व अधिक से अधिक फारेनहाइट तापमान पर नाड़ियों की गति के आँकड़े प्रस्तुत किये गये थे और यह निश्चय किया गया था कि जब जल का तापमान धीरे-धीरे बढ़ाकर 110 डिग्री फारेनहाइट तक कर दिया जाता है, तो नाड़ी की गति 83 से लेकर 153 तक हो जाती है इससे रक्त संचालन में तीव्रता आने से मस्तिष्क में दर्द होने लगता है।

शीतल जल में स्नान करने से शरीर में हल्कापन आता है, रोमकूप साफ हो जाते हैं, शरीर की गन्दगी मिट जाती है और दिनभर काम करने से उत्पन्न थकान व रात्रि में सोने से उत्पन्न शिथिलता समाप्त हो जाती है। शरीर में ताजगी तथा नव-जीवन का संचार होने लगता है। प्रातःकाल का स्नान इस दृष्टि से अधिक उपयोगी माना जाता है। सायंकालीन स्नान से शरीर का पसीना, चिपचिपापन और सुस्ती दूर हो जाती है। इससे थकावट दूर होती है और भूख खुलकर लगती है। रात्रि में पूरी नींद लेने के लिये सायंकालीन स्नान लाभदायक होता है।

स्नान से शरीर की माँसपेशियों की शिथिलता दूर होती हैं और सारे शरीर में “विशिवा” नामक चैतन्य विद्युत का प्रवाह दौड़ जाता है, जिससे शरीर को स्फूर्ति मिलती है। रोम कूप खुल जाते हैं, जिससे रक्ताभिषरण में मदद मिलती है। स्नान से केवल त्वचा और बाहरी अंगों की ही सफाई होती हो, केवल त्वचा और बाहरी अंगों की शुद्धि होती हो, इतना ही नहीं, वरन् आन्तरिक चेतना भी प्रादुर्भूत होती है। इससे जठराग्नि प्रदीप्त होती है और पेट सम्बन्धी शिकायतें दूर होती हैं।

प्रातःकाल स्नान करने के बाद सूर्य की बाल-किरणों से शरीर को सेंकने से प्राकृतिक विटामिन प्राप्त होते हैं और शरीर में स्निग्धता आती है और त्वचा की कोमलता बढ़ती है। इसलिये स्नान के बाद कुछ देर तक शरीर को वस्त्र विहीन रखना चाहिये, ताकि वायु के द्वारा जो जल की आर्द्रता शरीर में शेष रह गई है, वह समाप्त हो जाय, अन्यथा, दाद, खुजली और चकत्ते पड़ने की शिकायतें उठ खड़ी होती हैं।

स्नान के लिये तालाब का जल उतना अच्छा नहीं होता। तालाबों में गन्दगी सड़ती रहने से पानी खराब हो जाता है और छोटे-छोटे कीड़े पड़ जाते हैं। कुएं का जल या बहता हुआ जल स्नान के लिये अधिक उपयुक्त होता है। बहते हुये जल में चूँकि सल्फेट जैसे खनिज तत्व बहुतायत से मिले होते हैं, इसलिए उसका स्वास्थ्य पर हितकर प्रभाव पड़ता है। कुएं का जल तालाब की अपेक्षा अधिक शीतल रहता हैं, इससे कुएं के जल में अधिक शक्ति व स्फूर्ति होती है। इससे चमड़ी, दिमाग तथा आँखों को तरावट मिलती है। गर्म जल से स्नान करना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। इससे शरीर में प्रतिकूल प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है और शरीर बल, नेत्र-ज्योति तथा मानसिक शक्ति घटती है।

स्नान करने का वैज्ञानिक तरीका यह है कि पहले खूब रगड़कर शुद्ध सरसों के तेल की मालिश करें, फिर थोड़ी देर विश्राम कर लें ताकि मालिश से उत्पन्न खून की गर्मी कम हो जाय। अब आप अपने पैरों से ऊपर हृदय की ओर के अंगों को खूब रगड़कर धोना प्रारम्भ करें। शरीर को खूब मल-मलकर धोना चाहिये और पानी की कमी का संकोच न करना चाहिए। साबुन का उपयोग स्वास्थ्य की दृष्टि से उतना उपयोगी नहीं माना जाता। यह आवश्यकता मुल्तानी मिट्टी से पूरी कर सकते हैं, मिट्टी में विष खींचने की अपूर्व शक्ति होती है, पर साबुन में कुछ रासायनिक तत्त्व ऐसे होते हैं, जो शरीर पर बुरा प्रभाव डालते हैं। कास्टिक की अधिकता वाले साबुनों का प्रयोग तो बिलकुल भी नहीं करना चाहिये।

स्नान करने के उपरान्त किसी खद्दर या रोंयेदार मोटे तौलिये से शरीर के अंग-प्रत्यंग को इतना रगड़कर सुखाना चाहिये कि रक्त का उभार स्पष्ट दिखाई देने लगे। इससे शरीर में गर्मी दौड़ जाती है और थकावट दूर होकर शरीर में हलकापन आ जाता है।

तैरकर स्नान करने से स्वास्थ्य को दोहरा लाभ होता है। तैरना एक प्रकार का रोचक व्यायाम है इससे शरीर के सभी अंग-प्रत्यंगों का संचालन होता है और श्वास-प्रश्वास की क्रिया में गति उत्पन्न होती है। तैरने से छाती चौड़ी होती है और फेफड़े मजबूत होते है। तैरने से मनुष्य को दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। मारकर्ड (दक्षिणी अफ्रीका) की दो जुड़वाँ बहनों ने जिनकी उम्र 90 से अधिक हो चुकी है, अपने जन्म दिवस पर उपस्थित अतिथियों को अपने दीर्घ जीवन के रहस्य पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उन्होंने अपनी दिनचर्या में नियमित रूप से तैरने को भी प्रमुख स्थान दिया है। बावेरिया (बोन) के श्रम मन्त्री भी बाल्टर स्टाय ने अपने स्टाफ के लोगों को स्वास्थ्य सुधारने के लिये यह आदेश दिया कि वे काम के घंटों के बीच ही सप्ताह में एक दिन अनिवार्य रूप से तैर कर मनोरंजन प्राप्त किया करें।

जल के नीचे फव्वारों में बैठकर स्नान करना भी स्वास्थ्य के लिये अच्छा होता है। वर्षा में दो तीन जल-वृष्टि के बाद बरसते पानी से स्नान करना भी अच्छा होता है। छोटे बालकों को छोटे टब में स्वच्छ जल भर कर उछल-कूद करते हुए स्नान करने देना चाहिये। इससे मानसिक प्रसन्नता भी साथ-साथ बढ़ती है।

जल का स्वास्थ्य से बड़ा गहरा सम्बन्ध है। यों भी कह सकते हैं कि जल ही जीवन है। इसकी प्रामाणिकता कुछ दिन स्नान न करने या कम जल पीने से ही सिद्ध हो जाती है। अतः हमें अपने आहार के साथ जल भी पर्याप्त मात्रा में लेने का स्वभाव बनाना चाहिए। स्नान के द्वारा बाह्य और भीतरी अंगों की सफाई, शक्ति और सजीवता भी बनाये रखना चाहिये।


हिन्दू-धर्म की आन्तरिक शक्ति, उसकी वैज्ञानिकता

हिन्दू-धर्म की ज्येष्ठता व श्रेष्ठता संसार में सर्वत्र मान्य हैं। विश्व के अगणित विद्वानों, विचारकों तथा दार्शनिकों ने इस तथ्य को स्वीकार किया है कि यह धर्म कुछ सिद्धान्तों, संस्कारों या विश्वासों की धर्म-व्यवस्था मात्र नहीं, वरन् उन आधारभूत वैज्ञानिक तथ्यों पर व्यवस्थित है, जिनसे युग-युगान्तरों से यहाँ का नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन विकसित होता रहा हैं, और उनसे यह विशाल भू-खण्ड शक्ति एवं सम्पन्नता अनुभव करता रहा है। जो ज्ञान इस ऋषि-देश में प्रादुर्भूत हुआ है, वह कल्पना-भूत नहीं साधना-निर्गत होने के कारण ही प्रामाणिक माना गया हैं। उस में शंकाओं के लिये कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई। जो सिद्धान्त बनाये गये है, वे पूर्ण वैज्ञानिक हैं। यही कारण है कि अनेक ऐतिहासिक आघातों के बावजूद आज भी यह फल-फूल रहा है। कठिनाइयों में भी उसकी आन्तरिक शक्ति ज्यों की त्यों विद्यमान रही है और आगे भी बनी रहेगी।

इस जीवन व्यवस्था को “हिन्दू-धर्म” नाम देने से उसे मर्यादित या सीमा बद्ध नहीं मानना चाहिये। इसमें सम्प्रदायवाद या कुछ थोड़े से व्यक्तियों के हित संरक्षण की ही बात नहीं है, जैसा कि प्रायः संसार के सब धर्मों में पाया जाता है, वरन् विश्व-कल्याण की उद्दात्त भावनाओं से वह ओत-प्रोत है। एक नाम उसका ‘सनातन-धर्म’, भी है जिसका अर्थ ही है- आदि धर्म। अर्थात् जीवन की उत्पत्ति के साथ ही जो सार्वभौमिक व्यवस्था बनी, उसी को सनातन धर्म कहते हैं। आदि व्यवस्था का तात्पर्य है कि देश, जाति की संकीर्णता का भाव उसमें नहीं है। आज जो लोग उसे इस संकीर्ण रूप में देखते हैं, दरअसल उन्होंने उसकी वैज्ञानिकता पर दृष्टिपात नहीं किया, अन्यथा शंका करने जैसी कोई बात नहीं है। हिन्दू-धर्म विशुद्ध दर्पण की तरह है जिसमें जिसका जैसा चेहरा है, उसे वैसी ही शक्ल दिखाई देती है। छल-कपट या बनावट का उसमें कुछ भी स्थान नहीं है।

हिन्दू-धर्म शुद्ध तथा साँस्कृतिक जीवन पद्धति का नाम है और वह इसी रूप में विकसित हुआ है, अतः वह जाति-गत संकीर्णताओं से प्रतिबन्धित नहीं हुआ है। उन सिद्धान्तों को स्वीकार करने वालों का एक वर्ग, जाति या देश भले ही बन गया हो, पर इससे उसका स्वरूप परिवर्तित नहीं होता। हिन्दुओं की एक विशिष्ट जाति बन जाने के बावजूद भी उसमें भेद-भाव या पक्षपात नहीं है। कारण यह है कि वह पूर्णतया सनातन नियमों पर आधारित है। यहाँ जीव के आत्म-स्वरूप की कल्पना की गई है। शरीर और उसके हितों को आत्मा की दृष्टि से ही मान्यता और सेवा मिली है। शेष सारा जीवन ही आनन्द की सात्विक उपलब्धि, आत्म-कल्याण और विश्व की भलाई की भावना से ओत-प्रोत होता है, अतः इसमें अन्य देश, वर्ण जाति के मनुष्य भी जब कभी मिले हैं तो वे इस रंग में ऐसे रंग गये हैं कि अपनी सम्पूर्ण आत्म-शक्तियाँ इसी को समर्पित कर दी हैं।

अपनी विशिष्टता के कारण उसे गहन प्रतिशोधों का सामना करना पड़ा है। बार-बार खुली चुनौतियाँ उसने स्वीकार की हैं और जिस प्रकार पुनर्व्यवस्थित हुआ है, उससे उसकी महान् शक्ति और क्षमता का ही परिचय और प्रमाण मिलता है। हमारी यह मान्यता है कि जब तक पूर्ण रूप से एक भी हिन्दू इस संसार में बना रहेगा, तब तक इस धर्म का अन्त होना असम्भव ही है। हिन्दू-धर्म की यह विशेषता उसके सत्य, शील और शक्ति के कारण है। इन तीनों महा गुणों का विकास आत्म-शोध की पूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया पर होता है। इसका स्पष्ट दर्शन यहाँ के योग ग्रन्थों से मिलता है। ऐसे उदाहरण यहाँ बहुत हैं, जब जाति की प्रसुप्त चेतना को एक व्यक्ति ने जगाया है। उसको दयनीय अवस्था से ऊँचा उठाया है। सभी जानते हैं कि महायानी बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव काल में जबकि हिन्दू-धर्म के बहुत थोड़े अवशेष बचे थे, तब तरुण तपस्वी जगतगुरु शंकराचार्य ने धार्मिक-ज्योति को प्रज्ज्वलित किया था और सम्पूर्ण देश में उसे नव-चेतना देने में सफल हुये थे। स्वामी रामतीर्थ, विवेकानन्द या ऋषि दयानन्द ने उतना काम करके दिखाया, जिसके लिये एक विधिवत मिशन लगाना पड़ सकता था। जो समाज और समूह की शक्ति हो सकती है, वह एक व्यक्ति में भी हो सकती है, यह मान्यता इस सनातन धर्म की कुछ विचित्र अवश्य जान पड़ती है, किन्तु शक्ति के आविर्भाव की योग पद्धति का जिन्हें थोड़ा भी अनुमान होगा, वे इस तथ्य को अस्वीकार न कर सकेंगे।

भारतीय बौद्धिक क्षमता और दर्शन संसार के अन्य दर्शनों से विलक्षण है। जो बातें आज भौतिक विज्ञान प्रदर्शित कर रहा है, उसे यहाँ केवल बालकों का खेल समझा जाता रहा है। रावण, भस्मासुर, सहस्रबाहु, यह सब ऐसे ही वैज्ञानिक थे जिनके कृत्यों को वहाँ बहुत छोटा माना गया है। पाश्चात्य जगत में जो शोध जड़ अणु की हुई है, वह यहाँ चेतन परमाणु की हुई है। जड़ से चेतन की शक्ति असंख्यों गुनी अधिक है। योग-पद्धति में सर्वत्र उसी शक्ति का विश्लेषण हुआ है, जिसे पाकर लोग अनन्त शक्ति के भाण्डागार बने विचरण करते थे। यहाँ प्रायः ऋषि से कम तो कोई होता ही नहीं था।

काल प्रभाव से इस साधना शक्ति का ह्रास हुआ। 16 वीं शताब्दी से लेकर 18वीं शताब्दी तक हिन्दू-धर्म पर निरन्तर प्रहार होते रहे, जिससे साधना का दक्षिण मार्ग प्रायः विलुप्त हो गया। मुसलिम शासकों ने हिन्दुओं को हीन जाति मानकर हमारे मन्दिरों को भ्रष्ट तथा शिक्षण पद्धति को नष्ट करके ऐसे भ्रामक तथ्य भर दिये, जिससे हिन्दुओं ने भी अपने आप पर अविश्वास करना प्रारम्भ कर दिया। असंरक्षित धर्म इस तरह गिरता ही चला गया। वेद लुटे, स्मृतियों, पुराणों में स्वार्थी और चाटुकार हिन्दुओं ने ही भ्रम पैदा करने वाले श्लोक गढ़-गढ़कर भर दिये। तप और उसके प्रभाव को इतना बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया कि या तो उसे लोग असम्भव ही मान बैठें या उन पर पूरी तरह से अविश्वास करने लगें। धर्म, आत्मा, ईश्वर यदि हैं तो उनका एक निश्चित विज्ञान भी होना चाहिये। हिन्दू-धर्म के इस विज्ञान पक्ष को सब तरह से निर्बल बनाने का प्रयत्न किया गया, किन्तु फिर भी अपनी विशेषताओं के कारण वह समूल नष्ट न हो सका।

सिकन्दर, औरंगजेब तथा इब्राहीम लोदी आदि विदेशी शासकों ने जो धार्मिक आस्थाओं और धर्म मन्दिरों को ध्वंस किया, उसे चैतन्य महाप्रभु ने पुनः जीवन दान दिया। इस अवधि में भक्ति-धारा का विकास हुआ। साँस्कृतिक एकता के अनेक केन्द्रों से वह सम्पूर्ण राष्ट्र में पुनः फूटी।

इसी बीच एक तीसरी शक्ति का प्रवेश इस देश में हुआ। अँगरेज भारत में आये और ईसाई मिशनरियों ने धर्म- परिवर्तन का कार्य शुरू कर दिया। यह ठीक है कि उन्होंने धर्म पर आक्षेप नहीं किया, किन्तु ईसाई-संस्कृति को मान्यता और प्रोत्साहन ने वही काम किया जो मुसलमानों के आघातों ने किया था। उन्होंने कठोरता पूर्वक दमन किया, इन्होंने प्रलोभन देकर वही काम किया। ईसाई मिशनरियों की प्रसार पद्धति की आकर्षक विशेषता के कारण कुछ लोगों ने धर्म-परिवर्तन किये और हिन्दू-धर्म को हीन प्रमाणित करने की कोशिश की। दूसरी तरफ शासक वर्ग ने अँगरेजी विचार धारायें, रीति-रिवाज और रहन-सहन भरना शुरू कर दिया। इस तरह हिन्दू-धर्म की मान्यतायें बिलकुल ही नष्ट हो चली। ईश्वर, धर्म और लोक-परलोक की प्राप्ति को सस्ता सौदा मान लिया गया। इस प्रकार उसमें जो वैज्ञानिकता थी वह पूरी तरह उपेक्षित होती गई। लोगों का जीवन विलासी बनता गया। ऐसे ही सिद्धान्त यहाँ फैलाये गये जिससे तप और शक्ति की साधनाओं को लोग बिलकुल ही भूल गये। धर्मान्तर ने इस ह्रास को और सहयोग दिया। कुल मिला कर साधना शक्ति का यहाँ लोप-सा हो गया।

हिन्दू धर्म के प्रति उपेक्षा एवं विरोध की यह भावनायें जितना अधिक बढ़ीं, उतना ही लोगों में संकीर्णता, स्वार्थ, लोभ, घृणा, अनुभूति, विलासिता आदि दुष्प्रवृत्तियां भी-बढ़ी और अशान्ति के लक्षण दिखाई देने लगे। सुखभोग के साधन बढ़े, पर विडंबना यह है कि सुख में वृद्धि नहीं हुई। धर्म का स्वरूप यदि विकृत हो जाय, तो सुख की आशा की भी नहीं की जा सकती हैं। वह धर्म ही है जो मनुष्य की भावनाओं और विचारों को शुद्ध करता है। स्वार्थ-हीन तथा गौरवपूर्ण जीवन जीने की प्रेरणा देता है। व्यक्ति और समाज को शुद्ध रखने की शक्ति केवल धर्म से ही है। आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता को बल या कानून द्वारा कभी नहीं दबाया जा सकता। धर्म ही उस आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है।

हिन्दू धर्म राष्ट्रीय एकता की रीढ़ है पर दुःख है कि धर्म-शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है। इसमें किसी को दोष देने की भी आवश्यकता नहीं, वरन् उन कारणों को ढूँढ़ना है, जिससे धर्म की अवनति हुई है। उन्हें यदि समाज के सामने वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया जाय तो लोगों की सुषुप्त धार्मिक आस्थायें पुनः जागृत हो सकती हैं। यह प्रसार सैद्धान्तिक और संस्कारात्मक तो हो, पर उसके साथ में साधना के पूर्ण वैज्ञानिक अभ्यासों का भी समावेश होना चाहिये। धर्म की रक्षा भी शक्ति से ही होती है। वह शक्ति व्यक्ति की भी हो सकती है, और समाज की भी। पर भारतीय धर्म में साधना-शक्ति का जो सुन्दर योग रहा है, वह अधिक श्रेष्ठ है, अब उसी के विकास का आवश्यकता भी अधिक है।

हिन्दू धर्म की आन्तरिक शक्ति, उसके विज्ञान की अवहेलना करने से ही हिन्दू-धर्म का पतन हुआ है। आज भी इस चेतना को यदि जागृत किया जा सके तो यहाँ हाइड्रोजन या एटमबम बनाने की जरूरत न रहे। हर व्यक्ति शक्ति चेतना का पुँज बना हुआ हो तो किसी भी बाहरी आक्रमण की आशंका न रहेगी। राष्ट्र का यह साधना बल जागृत हो जाय तो हिन्दू धर्म पुनः अपना पूर्व गौरव प्राप्त कर सकता है। इसे ही अब जगाना शेष रहा है।


नई और पुरानी पीढ़ी का संघर्ष

इन चालीस-पचास वर्षों में विज्ञान की सहायता से दुनिया परस्पर बहुत निकट आ गई है। अनेकों संस्कृति सभ्यताओं का मिलन हुआ, जिसका प्रभाव हमारे सामाजिक ढाँचे पर भी काफी पड़ा है। नई शिक्षा, सभ्यता, सामाजिक व्यवस्था से प्रभावित वर्तमान पीढ़ी पिछली पीढ़ी के जमाने के स्वभाव, संस्कारों से सर्वथा भिन्न है। नई विचार धारा पुराने जमाने की विचार धारा से बहुत कुछ भिन्न है। इससे पुरानी और नई पीढ़ी में आज जमीन आसमान का अन्तर पड़ गया है। स्कूल, कालेजों से निकलने वाले शिक्षित युवक-युवतियाँ, नवीन सभ्यता से प्रभावित नयी पीढ़ी और पुरानी परम्परा, विचार धारा संस्कारों से ओत-प्रोत पुरानी पीढ़ी-दोनों में एक संघर्ष, खींचातानी-सी आज चल रही है और परस्पर एक दूसरे से असन्तुष्ट परेशान हैं।

नई सभ्यता में पले हुए युवक-युवतियों से वृद्ध-जन, पुरानी पीढ़ी के लोग अपनो ही जमाने की-सी परम्पराओं का अनुगमन चाहते हैं। ऐसा न करने पर वे उन्हें कोसते हैं, गाली देते हैं, उल्टा-सीधा कहते हैं। नये जमाने के स्वतन्त्र और आजाद तबियत के युवक-युवतियों को वृद्धजनों की यह रोकथाम बुरी लगती है, अतः वे अनुशासन-हीनता, लापरवाही, उपेक्षा, अनादर का रास्ता अपनाते हैं। पुरानी और नई पीढ़ी का यह संघर्ष एक आम चीज हैं। पुराने जमाने में पली हुई सास तो अपने समय की मर्यादा, मान्यता, परिस्थितियों में बहुओं को कसना चाहती है, दूसरी ओर आजकल के स्वतन्त्रता समानाधिकार के वातावरण से प्रभावित आधुनिक नारी अपने जीवन के कुछ और ही स्वप्न लेकर आती है। दोनों पक्षों में परस्पर प्रतिकूलता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है और इसी से संघर्ष का सूत्रपात हो जाता है।

वस्तुतः पुरानी और नई पीढ़ी का संघर्ष नूतन और पुरातन का संघर्ष है, जो थोड़ी बहुत मात्रा में सदैव रहता है। किन्तु वर्तमान युग में अचानक भारी परिवर्तन हो जाने के कारण टकराव की परिस्थितियाँ अधिक स्पष्ट और प्रभावशाली बन गई हैं, जिससे संघर्ष को और भी अधिक बल मिला है। आज एक ही परिवार की माँ और बेटी में जमीन-आसमान का अन्तर हो गया है। जिस माँ ने घर की चहारदीवारी में, पर्दे की ओट में, दिन-रात गृहस्थी की चक्की चलाकर, अपने सुख सुविधाओं का ध्यान रखे बिना ही रूखा-सूखा खाकर फटा-टूटा पहनकर जीवन बिताया, उसकी ही बेटी शिक्षित होकर, आधुनिक रहन-सहन, व्यवहार, स्वतन्त्रता की अभ्यस्त बन गई है। वह सामूहिक कार्यक्रमों में भी भाग लेती है। माँ की अपेक्षा उसके जीवन की गति विभिन्न विस्तृत क्षेत्रों तक फैल गई है। इसी तरह पिता और पुत्र में भी यही असमानता पैदा हो गई है। जो पिता मेहनत, मजदूरी करके साधारण गरीबी का जीवन बिताता रहा, जिसके जीवन की सीमित आवश्यकता और सीमित दायरा रहा, उसी का पुत्र शिक्षित होकर उच्च पद पर नौकरी करता हैं अथवा बड़ा व्यापार करता है, राजनीति में भाग लेता है, सामूहिक कार्यक्रमों में हाथ बंटाता है। उसका रहन-सहन, मानसिक स्तर, बोलचाल, व्यवहार, जीवन स्तर के ढाँचे में भी बहुत बड़ा परिवर्तन हुआ हैं। इस बहुत बड़े परिवर्तन से पुरानी और नई पीढ़ी के बीच बहुत बड़ा अन्तर हो गया है। इसके साथ ही पुरानी पीढ़ी की पुरातन के और नई पीढ़ी की नवीनता के प्रति अनन्य आस्था, अन्ध निष्ठा, आसक्ति का होना दोनों के संघर्ष को और भी तूल दे देते हैं।

इस संक्रमण काल में जब कि नई और पुरानी पीढ़ी एक साथ समानान्तर रूप से चल रही हैं दोनों में सामञ्जस्य, एकता, परस्पर सहयोग, स्नेह, सौहार्द का वातावरण बनाना आवश्यक है। इसी से मानव जाति के विकास का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इसके लिए दोनों पक्षों को अपने-अपने दृष्टिकोण में थोड़ा बहुत परिवर्तन करना ही पड़ेगा। पुरानी पीढ़ी को समय के अनुसार अपने आपको ढालना होगा, और नई पीढ़ी को एक सीमा तक अपनी इच्छानुसार रहन-सहन अपनाने की छूट भी देनी होगी।

नई पीढ़ी के जीवन जीने के तौर-तरीकों में अनावश्यक हस्तक्षेप भी न किया जाय, खासकर व्यक्तिगत जीवन की बातों में तो जहाँ तक बने ध्यान ही नहीं देना चाहिए। जहाँ नई बहुओं के जीवन की छोटी-छोटी बातों पर टीका टिप्पणी की जाती है, आलोचनायें होती हैं, उनके जीवन की स्वाभाविक बातों, मानवीय अधिकारों पर चोट की जाती है, तो सहज ही संघर्ष और कलह एवं अशाँति की आग भड़क उठती है।

नई पीढ़ी के युवक-युवतियों को भी वृद्ध-जनों के प्रति अपने कर्त्तव्य, उत्तरदायित्व आदरभाव, अनुशासन के लिए सतर्क और सावधान रहना आवश्यक है। अपने थोड़े बहुत शाब्दिक ज्ञान, दिमागी विकास के बल पर झूठा गर्व करके वृद्ध-जनों के लम्बे अनुभवों, व्यावहारिक जीवन की ठोस शिक्षा के प्रति उपेक्षा नहीं बरतनी चाहिए। आदर और अनुशासन के द्वारा वे वृद्ध जनों के अनुभव, व्यवहारिक ज्ञान का प्रश्रय लेकर जीवन में अधिक उन्नत हो सकते हैं। आदर, सत्कार, अनुशासन और सहिष्णुता के द्वारा तो वृद्ध-जनों के हृदय को सहज ही जीता जा सकता है। नई सभ्यता, जो अभी मानव-जीवन के व्यवहारिक, क्रियात्मक पहलू पर ठीक-ठीक नहीं उत्तर पाई है उसके बाह्य ढांचे पर मोहित होकर पुरातन व्यवस्था नियम मर्यादाओं को उखाड़ फेंकना बड़ी भारी भूल होगी। यह अपने लिए उस रास्ते वा अवलम्बन लेना होगा जिसके भविष्य का ठीक-ठीक पता नहीं हैं। असुरक्षा और अनिश्चितता का रास्ता पकड़ना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। पुरातन का सहयोग लेकर, उसके तथ्यों की कसौटी पर नवीन को कसकर, उसे उपयोगी बनाने का काम पूरा होने पर ही उसे छोड़ा जा सकता है। इसी काम की जिम्मेदारी नई पीढ़ी पर है, और वह है पुरातन और नवीन के संयोग से उपयुक्त पथ का निर्माण करना।

संघर्ष का सरल समाधान समन्वय है। ‘लें’ और ‘दें’ की समझौतावादी नीति से क्लेश कलहपूर्ण अनेकों गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं। थोड़ा-थोड़ा दोनों झुकें, तो मिलन का एक केन्द्र सहज ही मिल जाता है। नई पीढ़ी को उग्र और उच्छृंखल नहीं होना चाहिए। उसे भारतीय परम्पराओं का मूल्य और महत्व समझना चाहिए, जिससे शिष्टता, सभ्यता और सामाजिक सुरक्षा की बहुमूल्य मर्यादाओं में रहते हुए उसे शान्ति व्यवस्था और प्रगति का समुचित अवसर प्राप्त होता रहे। इसके साथ-साथ पुरानी पीढ़ी को भी बच्चों के स्वभाव, चरित्र पर ही विशेष ध्यान देना चाहिये। पहनने-ओढ़ने या हँसने-खेलने में वे आधुनिक तरीके अपनाते हैं तो उन पर इतना नियन्त्रण भी नहीं करना चाहिए, जिससे वे विरोधी, विद्रोही, उपद्रवी या अवज्ञाकारी के रूप में सामने आवें। इस विषय में थोड़ा ढीला छोड़ना ही बुद्धिमानी है।

स्वभाव, विचार, परम्पराओं की आस्था, दृष्टिकोण के साथ-साथ पुरानी ओर नई पीढ़ी के संघर्ष का एक कारण मानव-जीवन में बढ़ती हुई संकुचितता, संकीर्णता भी मुख्य है। विज्ञान के साथ-साथ मनुष्य की गति दूर-दूर तक सम्भव हुई, किन्तु उसी अनुपात में उसका हृदय संकुचित और संकीर्ण बन गया। नई पीढ़ी की वृत्ति अपने आप तक सीमित होने लगी है, अपना सुख, अपना आराम, अपना लाभ। अपनेपन और अपने लाभ को प्रमुखता देने वालों के लिए असमर्थ, जराजीर्ण, अकर्मण्य, वृद्धजनों का पड़े-पड़े चारपाई तोड़ना अच्छा नहीं लगता। रोग-ग्रस्त, अन्धा, अपाहिज हो जाने पर तो वृद्ध-जनों का जीवन और भी कठिन हो जाता है। बेटे बहुओं द्वारा होने वाला तिरस्कार, निरादर कुछ कम कष्टकारक नहीं होता। उधर वृद्ध-जन भी मानसिक शिथिलतावश, चिड़चिड़ाहट युक्त आलोचना, यहाँ तक कि गाली-गालोच से पेश आते हैं। अधिकाँश घरों में यह संघर्ष चलता रहता है। वृद्ध-जन, पुरानी पीढ़ी के लोग नई पीढ़ी के लिए सर दर्द बने हुए हैं, तो पुरानी पीढ़ी को जीवन निर्वाह की चिंता युक्त शिकायत है।

इसके निवारण के लिए दोनों ही पक्षों को विवेकयुक्त कदम उठाने चाहिए। जिन्होंने अपना सर्वस्व लुटाकर प्यार दुलार के साथ नई पीढ़ी के निर्माण में योग दिया, उन वृद्ध-जनों को, चाहे वे जरावस्थावश किसी भी हालत में हों, देवताओं की तरह सेवा पूजा करके उन्हें सन्तुष्ट रखना नई पीढ़ी का आवश्यक कर्त्तव्य है, उनकी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना उन्हें स्वयं कष्ट सहकर भी पूर्ण करने का प्रयत्न करना चाहिए। ऋषियों ने ‘मातृ देवो भव’ पितृ दवो भव ‘आचार्य देवो भव’ का सन्देश इसी अर्थ से दिया होगा। दूसरी ओर वृद्धजनों को भी जीवन में ऐसी तैयारी करनी चाहिए, जिससे वे नई पीढ़ी के लिए भार रूप तिरस्कार का कारण न बनें, वरन् अपने जीवन की ठोस अनुभवयुक्त शिक्षा, योग्यता से नई पीढ़ी को जीवन यात्रा का सही मार्ग दिखायें। वानप्रस्थ और संन्यास का विधान इसीलिए रखा गया था। इसमें पुरानी पीढ़ी नई को अपने ज्ञान अनुभवों से मानव मात्र को सही शिक्षा देकर, सद्ज्ञान की प्रेरणा देकर उन्नति एवं कल्याण की ओर अग्रसर करती रही है। घर में पड़े-पड़े चारपाई तोड़ना, बेटे-बहुओं के वाक्य दंशों से पीड़ित होना, उनके स्वतन्त्र जीवन में रोड़ा बनकर खटकते रहना, मोह से ग्रस्त होकर दिनों दिन बच्चों में लिपटना मानव जीवन की उत्कृष्ट स्थिति-वृद्धावस्था का अपमान करना है। इससे जीवन में दुःख, अशान्ति, क्लेश, पीड़ा का सामना करना स्वाभाविक ही है। पुरानी पीढ़ी के लिए यदि अपने सदुपयोग, सम्मान, उत्कृष्टता का कोई रास्ता है, तो वही है जो हमारे पूर्व मनीषियों ने बुझाया था। घर में बन्धन, स्वजनों में मोह आसक्ति, वस्तुओं के आकर्षण से मुक्त होकर वानप्रस्थ या संन्यास जीवन बिताना और अपने अनुभव, ज्ञान, योग्यता से जन समाज को सही सही रास्ता बताना, इसी में पुरानी पीढ़ी के जीवन का सदुपयोग है।


भावी पीढ़ी का निर्माण यों कीजिए

‘भावी पीढ़ी का निर्माण करिये’ का अर्थ है, बच्चों को अच्छा बनाइये, क्योंकि बच्चे ही कुछ समय में सयाने होकर आप की जगह समाज और राष्ट्र का सारा भार अपने ऊपर लेंगे। लेंगे ही क्या, वह तो स्वभावतः उन पर आ ही जायेगा। किन्तु एक सामाजिक एवं राष्ट्रीय चेतना से स्वभावतः आने वाला भार भी जब दायित्वपूर्ण ढंग से संभाला जाता है, तो उसका वहन सरलता और सुन्दरता से किया जा सकता है और आने वाला भार जब अनजाने ही ऊपर आ पड़ता है तो उसको सँभालने की ठीक ठीक तैयारी न होने से वह एक दुर्वह बोझ ही बन जाता है, जिसे वहन तो करना ही पड़ता है, किन्तु उसमें वह वाँछित सुख सुन्दरता नहीं रहती, जो होनी चाहिये।

आज हम अपने को ही देख लें कि हम में से कितने ऐसे हैं, जो समाज में बर्तते हुए भी अपना दृष्टिकोण सामाजिक रखते हैं। हम जब भी कोई विचार करते हैं, केवल अपने को आगे रखकर सोचते हैं। जो कुछ करते हैं, अपने लिये और जो कुछ चाहते हैं, अपने लिए ही। इस निजत्व की प्रधानता के कारण ही आज हम में सामाजिकता का नितान्त अभाव हो गया है। हर आदमी अपने चारों ओर स्वार्थ का कुँडल मारकर सर्प की भाँति स्थित हो गया है, और इसी संकीर्णता के कारण पारस्परिकता का सारा भाव उठता चला जा रहा है।

जिस समाज में पारस्परिकता का अभाव हो जाता है, वह ऊपर से एक जैसा दीखता हुआ भी अन्दर से विश्रृंखलित होता है और विशृंखल समाज अपनी अथवा अपने राष्ट्र की रक्षा में असमर्थ रहने के कारण सदा सशंकित रहा करता है। उसका प्रत्येक सदस्य अपने को हर प्रकार से असुरक्षित एवं असहाय अनुभव किया करता है।

समाज को सुरक्षित बनाने के लिए वर्तमान पीढ़ी को अपने तुरन्त बाद अपने वाली पीढ़ी को एक सुनिश्चित सामाजिक चेतना के साथ आगे बढ़ाना चाहिए-अर्थात् आने बच्चों का निर्माण इस प्रकार करना चाहिए कि वे अपने को अपने समाज का एक महत्वपूर्ण अंग समझें, वे जो कुछ सोचें, सामाजिक दृष्टिकोण से और जो कुछ करें समाज को ध्यान में रखते हुए ही करें।

समाज में बुराइयों का जन्म ही तब होता है, जब उसके सदस्यों में सामाजिक भावना का अभाव हो जाता है। हर व्यक्ति निरंकुश रूप से मनमाने ढंग से बर्ताव करने लगता है। उसको अपने बर्ताव से दूसरे को होने वाले कष्टों का ध्यान ही नहीं रहता, जिससे कदम-कदम पर संघर्ष होने लगता है और जीवन सुखमय बनने के स्थान पर दुःखमय बन जाता है।

आज भारतीय समाज दिन-दिन दुःखमय बनता चला जा रहा है। उन्नति और प्रगति के प्रचुर साधन होने पर भी इसकी उन्नति एवं प्रगति के सारे मार्ग अवरुद्ध-से दिखाई देते हैं। दिन-दिन इसमें बुराइयों की वृद्धि होने से संसार में इसकी साख घटती जा रही है। एक दिन संसार में सर्वोपरि कहा जाने वाला भारतीय समाज आज निम्नतर हो गया है। इसका क्या कारण है कि इसके सारे आदर्श, सारी संस्कृति और सारे साधन मौजूद हैं, फिर भी यह दिन-दिन गिरता जा रहा है? इसका एक मात्र कारण है इसकी सामाजिक भावना का ह्रास हो जाना।

लोग धर्म का अनुगमन करते हैं, संस्कृति एवं सभ्यता की बात करते हैं, किन्तु अलग-अलग केवल अपने तक सीमित होकर। बड़े-बड़े व्यापारी, बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ, प्रकाण्ड विद्वान और महान से महान व्यक्तित्व होने पर भी हमारा भारतीय समाज समग्र रूप से फिर भी कुछ नहीं दीखता। संसार में इसकी गणना पिछड़े हुये समाजों में ही की जाती है।

अस्तु, समाज को प्रगतिशील बनाने के लिए आगामी पीढ़ी का नया निर्माण करना बहुत आवश्यक है। समाज में सुधार लाने के लिए निरन्तर प्रयत्न हो रहे हैं, किन्तु उनका कोई महत्वपूर्ण प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं हो रहा है। इसका कारण यह है कि जो पीढ़ी आज समाज को चला रही है, वह केवल अपने सुधार में लगी हुई है। जब कि आवश्यक यह है कि अपना सुधार करने के साथ-साथ बच्चों पर सबसे अधिक ध्यान देना चाहिये।

प्रौढ़ों की अपेक्षा बच्चों का निर्माण अधिक सरल होता है। उनका मानसिक धरातल इतना कोमल और निर्विकार कार होता है कि उसमें बोये हुए बीज आसानी से फल फूल सकते हैं। इसलिये सामाजिक कल्याण के लिए बच्चों का एक निश्चित रूप से निर्माण किया जाना चाहिये।

बच्चों के निर्माण के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उनके लिए कोई निर्माण करने वाली संस्थायें खोली जायें, या उन्हें समय-समय पर एक जगह इकट्ठा करके किसी सामान की तरह उनका निर्माण किया जाये। बच्चों के निर्माण की जो संस्थायें हैं, उनका लाभ तो उठाया ही जाना चाहिए, किन्तु उन पर सर्वथा निर्भर नहीं रहना चाहिये। बच्चों का सब से स्थायी और प्रभावपूर्ण-निर्माण घर पर अभिभावकों के द्वारा ही हो सकता है।

बच्चों को प्रारम्भ से ही एक ऐसे वातावरण में रखना चाहिए, जिससे उनमें उदार भावनाओं का विकास हो। उनको भाई-बहनों से समता का व्यवहार सिखाया जाना चाहिये। जिन घरों में अनेक बच्चे होते हैं, वहाँ बहुधा देखा जाता है कि कोई एक बच्चा माता-पिता का अधिक प्यारा होता हैं। उसको अन्य बच्चों की अपेक्षा अधिक विशेषता दी जाती है। यह व्यवहार उचित नहीं। इससे अन्य बच्चों में असमानता का भाव जागता है और वे आपस में एक दूसरे से असमानतापूर्ण व्यवहार करना सीख जाते है।

बहुत बार छोटे बच्चों को बड़े बच्चों का इतना मातहत बना दिया जाता है कि बड़ा बच्चा दूसरे छोटे भाई-बहनों को बिल्कुल अपना सेवक समझ लेता है और अपना हर काम उनमें लेने का प्रयत्न करने लगता है। इससे बड़े बच्चे में अनुचित अधिकार और परावलम्बन की भावना पनपने लगती हैं और दूसरी ओर छोटे बच्चे में एक हीन भावना घर करने लगती है।

अनेकों बार ऐसा होता हैं कि बच्चों की शिकायत सुनते समय अभिभावक किसी बच्चे का अनुचित पक्षपात कर बैठते हैं जिससे एक बच्चा ढीठ और दूसरा कायर हो जाता है। यदि इसी प्रकार के पक्षपात की पुनरावृत्ति बहुत बार होती हैं तो बच्चों में न्याय के प्रति अश्रद्धा का भाव पैदा हो जाता है।

अस्तु अनेक बच्चों के परिवार में बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाना चाहिये जिससे उनमें समता, सत्यता, न्याय और पारस्परिकता का भाव जागे।

बच्चों को धीरे-धीरे क्रम से ऐसे काम लेने और सौंपने चाहिये, जिससे वे करते समय अपने अन्दर एक उत्तरदायित्व अनुभव करें। इन कामों में से एक काम घर का हिसाब रखना भी हो सकता है। किन्हीं मित्रों अथवा सम्बन्धियों को प्रीतिभोज अथवा खाने के समय उन्हें भोजन परोसने में मदद करना आदि। अधिकतर लोग करते यह हैं इस तरह के उत्तरदायित्वपूर्ण कार्यों और अवसरों पर बच्चों को अधिक से अधिक दूर रखते हैं, जब कि उत्तरदायी बनाने के लिये उन्हें यथा सम्भव इन कामों में शामिल करना चाहिए।

उनको रहन-सहन, ओढ़ने-पहनने और उठने-बैठने का एक सलीका सिखाना चाहिए, जिससे उनमें अस्त-व्यस्तता अथवा लापरवाही का विकार पैदा न होने पावे। शिष्टाचार और मिलनसारियत सिखाने के लिये सम्बन्धियों और मित्रों के यहाँ जाते समय यथा सम्भव उन्हें साथ ले जाना चाहिये। इससे उनमें परिचय की जिज्ञासा का जन्म होगा और उनके परिचय का क्षेत्र बढ़ेगा।

यह ऐसी कुछ बाते हैं, जिनका सम्बन्ध घर के लोगों के बीच व्यवहार से है। बच्चों को बाहर व्यवहार में आने वाली कुछ छोटी-मोटी बातों का भी ध्यान रखना चाहियें। जैसे वह अपने साथियों के साथ कैसा व्यवहार करता है? बाहर अपने से बड़ी आयु वालों के साथ कैसे पेश आता है? वह कहाँ किन-किन बातों में दूसरों से दबता है और कहाँ किन-किन बातों में दूसरों को दबाने का प्रयत्न करता है? यदि बच्चों सम्बन्धी ऐसी बातों का पता लगे तो उनमें तत्काल आवश्यक सुधार किया जाना चाहिए। उसके बाह्य व्यवहारों में एक सन्तुलन पैदा किया जाना चाहिए।

बच्चों में सामाजिकता और पारस्परिक स्नेह भाव उत्पन्न करने के लिए कभी-कभी पर्व आदिकों पर उसे अवसर दिया जाना चाहिए कि वह अपने साथियों को अपने घर चाय पानी करने या भोजन करने के लिए आमंत्रित करे। इससे उनमें आपस में स्नेह और विश्वास बढ़ेगा और अभिभावकों को उसके साथियों को पहचानने का अवसर मिलेगा।

अधिकतर अभिभावक बच्चों पर चारों ओर से एक घेरा डाले रहते हैं, जिससे उनका व्यक्तित्व दबकर रह जाता है। उनकी अच्छी बुरी संगत पर ध्यान रखते हुये, उन्हें अपने अनुरूप समाज में घुलने-मिलने और एक-दूसरे को जानने समझने में बाधा न दी जानी चाहिये।

यह सब बातें अपने बच्चों के साथ बर्ताव में लाने की हैं। कुछ ऐसी आवश्यक बातें भी हैं, जो दूसरों के बच्चों के साथ व्यवहार में लाई जानी चाहिए। उनमें से सबसे पहली और महत्वपूर्ण बात यह है कि हर बच्चे को बिल्कुल अपने बच्चे के समान समझना और उससे प्यार करना चाहिए। कोई भी बच्चा किसी अभिभावक के सामने आकर यह न अनुभव करे कि वह किसी गैर के सामने खड़ा है उसे ऐसा अनुभव होना चाहिए कि वह अपने माता-पिता अथवा सगे-सम्बन्धी के सामने हैं। किसी भी बच्चे को कोई गलती या बुरा काम करते देखें, तो उसे ठीक उसी प्रकार सुधारने की कोशिश की जानी चाहिए, जैसे अपने बच्चे को।

अधिकतर देखने में आता है कि आपस में दो मित्र एक दूसरे के अभिभावकों से या तो डरते हैं, या अजहद शरमाते हैं। यदि दो मित्र आपस में बैठे हैं और उनमें से किसी के अभिभावक आ जाते हैं तो वे दोनों एकदम सिटपिटा जाते हैं। एक दूसरे के घरों पर बैठे होने पर अभिभावकों के आने का समय होने पर खिसक चलते हैं। इसका मूल कारण यह है कि अभिभावक अपने बच्चों के मित्रों से परिचित नहीं होते और होते भी हैं तो उनसे ठीक अपने बच्चे जैसा व्यवहार नहीं करते।

इस प्रकार क्या अपना और क्या पराया, हर समय हर बच्चे का नव-निर्माण ध्यान में रखते हुये हर समय व्यवहार किया जाना चाहिये, जिससे कि बच्चों की आने वाली नागरिक पीढ़ी कुछ सुधर कर आ सके।


गुणेषु क्रियताँ यत्न

यह सृष्टि गुण-अवगुण-दोनों के समन्वय से बनी है। यहाँ अच्छाई भी है, बुराई भी। अच्छाइयों की महत्ता प्रतिपादित करने के लिए ही संभवतः बुराइयों का जन्म हुआ होगा, पर एक बात निश्चित है कि अवगुणों का परिणाम दुःख है और गुण-विकास से सुख-सुविधायें बढ़ती हैं। इसलिए चतुर जन सदैव गुणों को ही देखते हैं, गुण ही ग्रहण करते हैं।

प्रत्येक मनुष्य के अन्दर महान् मानसिक शक्तियाँ छिपी हैं। इन शक्तियों का सदुपयोग नहीं होता, इसी से मनुष्य दीन और दुःखी रहता है। दुर्विचार के कारण इन शक्तियों का ह्रास होता है। सदुपयोग करने पर जो शक्ति हमारा तथा दूसरों का भारी काम कर सकती है, वह गुण-ग्राहकता से उद्दीप्त होती है। अनिष्टकारक विचारों तथा दूसरों के दोष ढूँढ़ते रहने से उसी शक्ति का दुरुपयोग होता है और अनेकों कष्ट बढ़ जाते हैं। स्वस्थ-चित्त हो कर विचार किया जाय तो ‘पर दोष दर्शन’ से अपने को कुछ भी लाभ नहीं होता, पर गुण-ग्रहण से लाभ ही लाभ है। फिर जिस वस्तु से अपना लाभ न हो, मानसिक शक्तियाँ नष्ट होती हों, उसे क्यों अपनाया जाय?

अपने शास्त्र भी यही निर्देश देते हैं-

गुणेषु क्रियताँ यत्नः किमाटोपैः प्रयोजनम्।

विक्रायन्ते न घण्टा भिर्गावः क्षीर विवर्जिताः॥

अर्थात्-आप तो गुण-ग्रहण में ही यत्न करिये। बाह्याडम्बर में क्या रखा है। बिना दूध की गाय को सुन्दर घण्टा बाँध देने पर भी उसको कोई नहीं खरीदता, क्योंकि उसका मूल्य तो दूध पर निर्भर है।

इसी तरह प्रत्येक मनुष्य से हमें वही गुण ही खरीदने चाहिए। बाहरी टीपटाप दिखावट और वाचालता से क्या लाभ? इनसे कोई सम्मान तो मिलता नहीं। सम्मान तो गुणों का ही किया जाता है, अतः गुण ढूंढ़ें और गुणों को ही अपने जीवन में धारण करने का यत्न करें।

कौरवों तथा पाण्डवों में युधिष्ठिर को सर्वाधिक सम्मान मिला है। वे सभी के विश्वास-पात्र थे। इसका कारण उनका निजी जीवन में गुण-विकास ही था। महा भारत में उन्होंने स्वयं कहा है-

सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मों भ्राता दया सखा।

शान्तिः पत्नी क्षमा पुत्रः पड़ेते मम बन्धिया॥

अर्थात्-मेरी दृष्टि में मेरे सगे-सम्बन्धों ये छः हैं- सत्य मेरी माता है, ज्ञान मेरा पिता है, धर्म मेरा भाई, दया मित्र और शान्ति मेरी पत्नी हैं, क्षमा मेरा पुत्र है। इन शब्दों में राजन ने यह स्वीकार किया है कि गुण ही मनुष्य के सच्चे हितैषी हैं। समय पर गुण ही काम आते हैं। गुणों का महत्व परिवार से भी अधिक हैं। सद्गुण जिसकी सम्पत्ति है, वह कहीं भी, किसी भी स्थान में बाधित नहीं हो सकता। गुण ही उसकी सेवा के लिए सदैव तैयार रहेंगे।

शास्त्र का निर्णित सत्य है तथा संतत उपदेश हैं- “महानिति भावयन् महान् भवति” जो मनुष्य महान होने की भावना किया करता है वह एक दिन अवश्यमेव महान् बन जाता है। गुण-ग्राहकता के उन्नत विचार उसे प्रत्येक क्षण ऊपर उठने की प्रेरणा देते रहते हैं, जिससे वे अपनो कार्य के साधन में दुगुने जोश से लगे रहते हैं। शुभ विचारों को टटोल-टटोल कर ढूँढ़ने और उन्हें जीवन में जमा करने की जरूरत है।

गुण-ग्राहकता एक विशेष भावना है। यदि सभी विचारों को अलग करके मनुष्य इसी में ध्यानपूर्वक अपनी मनः शक्ति को केन्द्रित कर दे और प्रतिदिन अपनी भावना को दृढ़ करता रहे, तो वह सद्गुणों का दृश्यमान पुतला बन जाता है। उसकी मानसिक शक्तियाँ बढ़ जाती हैं, बैर घट जाता है, पराये अपने हो जाते हैं, दुख मिटते और सुख बढ़ने लगते हैं।

महात्माओं के ध्यान का लाभ यथार्थ में उनके गुणों के मनन, चिन्तन तथा जीवन में धारण करने से मिलता है। ‘हनुमान-चालीसा’ पढ़ने से शायद उतना लाभ नहीं मिले, किन्तु जो बजरंगी की तरह संयमित जीवन, कठोर परिश्रम, मोटा-झोटा खाना, उसी में मस्त रहना सीख जाता है, वह हनुमान स्तोत्र का पाठ न करे, तो भी स्वस्थ, बलिष्ठ हो जाता है।

ध्यान के लाभ में जो शर्त लगी है, वह है गुण-विकास। परमात्मा की उपासना न करे और प्राणियों को दुःख दे, स्वार्थपरता का बर्ताव करे, छल कपट रखे, विषयों में भटकता रहे तो कितना ही “षोडश अक्षर मन्त्र” का जप क्यों न किया जाय, परमात्मा का प्रकाश मिलना कठिन है। उपासना का मूल हैं-गुण-विकास। ऐच्छिक-लाभ प्राप्त करने का मूल हैं-गुण-विकास। गुण-विकास ही सम्पूर्ण सुखों का जनक है।

चार्ल्स श्वेव का कथन है “मनुष्य के भीतर जो कुछ सर्वोत्तम है, उसका विकास, गुण-ग्राहकता एवं प्रोत्साहन द्वारा ही किया जा सकता है।” डेलकारनेगी ने वहीं परिभाषा भी कर दी है। उन्होंने लिखा है “गुण-ग्राहकता और चापलूसी में अन्तर हैं। गुण-ग्रहण जीवन का सच्चा ध्येय है, चापलूसी झूठा। गुण-ग्राहकता हृदय से निकलती है, चापलूसी दाँतों से। प्रथम निस्वार्थ एवं आत्म-कल्याण के लिए है, दूसरी स्वार्थ, छल और कपट के लिए। एक प्रशंसनीय है, दूसरी निन्दनीय।”

विशेषताओं तथा श्रेष्ठता कुछ न कुछ हर व्यक्ति में होती है। हमें चाहिए कि किसी से मिलते समय अपनी नजर उसकी भलाइयों में ही दौड़ायें और जो कुछ अच्छाई दिखाई दे, शिक्षा मिले उसे चुपचाप ग्रहण कर लें।

मनुष्य कितना ही तप करे, सत्संग करे, शास्त्रों का स्वाध्याय करे, विविध कष्ट सहे, किन्तु यदि वह गुणानुरागी नहीं बनता, तो उसकी सारी तपश्चर्या व्यर्थ है। दूसरों के सद्गुण देख कर प्रसन्न होना, आत्म-कल्याण की दृष्टि से ऐसा ही है जैसा कोई पनघट से भी प्यासा लौट जाय। मनुष्य के सारे मोक्ष प्राप्ति के साधन बेकार ही सिद्ध होंगे यदि उसने सद्गुणों का अपने जीवन में विकास नहीं किया। जैन धर्म की प्रसिद्ध पुस्तक “गुणानुराग कुलक” में लिखा है-’जिस पुरुष के हृदय में उत्तम गुणों से प्रेम रहता है, उसे परमात्मा की प्राप्ति दुर्लभ नहीं है, अपितु सुलभ है। गुणानुरागी पुरुष धन्य हैं, उसे कृतपुण्य समझना चाहिए।” गुण-निष्ठा की चरम कसौटी को ही एक प्रकार से सिद्धि समझनी चाहिए फिर उसका विषय चाहे जो कुछ हो।

मनुष्य का अधिकाँश जीवन किसी न किसी से अनुकरण किया हुआ ही होता है। जिन व्यक्तियों के समीप रहना होता है, उन्हीं के गुण-दोष ग्रहण करते रहते हैं। मौलिक प्रतिभायें मनुष्य में बहुत कम होती हैं। गुण-दोष में जिसका अभ्यास मनुष्य करता है, वही परिपक्व हो कर मनुष्य का स्वभाव बन जाता है। दुष्ट आशय से ग्रहण किए हुए पराए दोष-आत्मा को निरर्थक पाप-बन्धनों में बाँधते हैं और सम्पूर्ण मनुष्य-जीवन के सुख छीन कर उसे अनेक यातनाओं में ढकेल देते हैं।

अतः भूल कर भी कभी किसी से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए। उसके जो दोष हैं आप चाहें तो उनका सुधार करने का प्रयत्न भले ही करे, किन्तु ऐसा न करें कि स्वयं भी उन दुष्कर्मों में लिप्त होकर अपना जीवन बर्बाद कर डालें। द्वेष पूर्ण जीवन कई गुणों के होने पर भी व्यर्थ है, अशोभनीय है।

आत्म-कल्याण के लिए अग्रसर होने वाले साधकों के लिए गुणानुराग ही गौरव का मार्ग है। निन्दा का त्याग, सज्जनों की प्रशंसा, नम्रता, विनयशीलता, मैत्री, करुणा जैसे दिव्य भाव जिसके हृदय में होंगे, उसे सम्मान की भरमना करने से क्या प्रयोजन? शास्त्रकार का कथन है-

गुणैरुत्तुँगताँ याति नोच्चैरासन संस्थितः।

प्रासाद शिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडायते॥

अर्थात्- उच्चासन पर बैठने से ही कोई गौरव का अधिकारी नहीं बन जाता। गौरव तो गुण से मिलता है। कौवा यदि महल के शिखर पर बैठ जाय तो भी वह गरुड़ के सम्मान को नहीं प्राप्त कर सकता।

हम जबकि श्रेय मार्ग पर चले हैं तो हमारे लिए यही उचित है कि कभी किसी पर द्वेष भाव न लायें, दुष्टता से उदासीन एवं उपेक्षा भाव ही रखें। हम गुणानुरागी बन कर सन्मार्ग-गामी हों ताकि मनुष्य जीवन का सच्चा सदुपयोग करते हुए परमात्मा के घर जाने का सौभाग्य प्राप्त कर सकें।


महाजनों येन गतः स पन्था

इतिहास, भूगोल, नागरिक-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र, भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, स्वास्थ्य विज्ञान, साहित्य, कला आदि अनेकों विषय मनुष्य के बौद्धिक-विकास और व्यापार-जगत की क्रियाओं में प्रतिष्ठा की दृष्टि से उपयोगी माने जा सकते हैं। इनसे भी एक अंश तक आध्यात्मिक लक्ष्य की पूर्ति में सहायता मिलती है। किन्तु जीवन-कला की जानकारी के अभाव में मनुष्य को भौतिक सम्पन्नता किसी प्रकार भी सुख नहीं दे पाती है। तरह-तरह के आहार सामने रखे हों और पेट खराब हो तो पाक-शास्त्र का क्या महत्व? घर में विपुल सम्पत्ति भरी हो और लोगों में पारस्परिक सौहार्द प्रेम और विश्वास न हो, तो बेचारा अर्थ-शास्त्र कितना सुख देगा? समाज घृणित और गन्दे विचारों से भर रहा हो तो हम नागरिक-शास्त्र के सिद्धान्तों का ढोल पीटते रहने पर व्यवस्था को स्थिर बनाये न रख सकेंगे। जीवन जीने की कला ही वह समग्र विद्या है, जिसके द्वारा लोग निर्धनता और अभाव में भी सुखपूर्वक जीवन जीते हुए अपना लक्ष्य पूरा कर लेते हैं। अतः सर्वोपरि विद्या ‘जीवन कला’ ही है।

यह विद्या महापुरुषों की जीवनियों से उपलब्ध होती है। भारतीय धर्म के आचार्यों ने इस बात पर सदैव जोर दिया है कि मनुष्य का निज का अंश बहुत स्वल्प होता है, विवेक बुद्धि की कमी के कारण भी जीवन-पथ निर्धारित करना मुश्किल हो जाता है। इसलिए किसी आदर्श पुरुष को अपने सिद्धान्तों का प्रतीक मानकर जीवन जीने में सुविधा सरलता और गतिशीलता बनी रहती है। पग-पग पर आने वाली विघ्न-बाधाओं का हल महापुरुषों के जीवन से मिलता है। इस सम्बन्ध में महाभारतकार का मत हैं-

वेदाभिभिन्ना, स्मृतयाभिभिन्ना,

नासौमुनिर्यस्य यस्य मतम न भिन्नम्।

धर्मस्य तत्त्वम निहितं गुहायाम,

महाजनों येन गतः स पन्था ॥

अर्थात्-मनुष्य उस रास्ते पर चले जो वेद सम्मत हो, स्मृति जिसका आदेश देती, जो ऋषियों, मुनियों द्वारा प्रदर्शित किया गया हो। जिस पथ पर महापुरुष चले हैं मनुष्यों को उसी धर्म-पथ पर चलना चाहिए।”

प्राचीनकाल में गुरुकुल की शिक्षा समाप्त कर लेने के बाद जो दीक्षान्त समारोह हुआ करते थे उसमें आचार्य अपने शिष्यों को उपदेश दिया करते थे-

“अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात। ये तत्र ब्राह्मणः सम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्त्तेरन। तथा तत्र वर्तेथाः। अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाःसम्मर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तेषु वर्तेरन्। तथा तेषु वर्तेंथाः। एष आदेशः। एव उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एवमुपासितव्यम्। एवमुचैतदुपास्यम्।

अर्थात्-कर्त्तव्य-निश्चय अथवा सदाचार के सम्बन्ध में तुम्हें जब कभी शंका उत्पन्न हो तो समाज में जो विद्वान परामर्शशील, सत्कर्मशील, धर्माभिलाषी, पवित्रात्मा श्रेष्ठ पुरुष हों, वे कर्मों में जैसा आचरण करते हों, तुम भी वैसा ही करना। यदि किसी दोष से दूषित मनुष्य के साथ व्यवहार करने में सन्देह हो तो समाज में जो विद्वान, परामर्श देने में कुशल सत्कर्मशील, पवित्रात्मा, धर्माभिलाषी श्रेष्ठ पुरुष हों, वे जैसा व्यवहार करते हों तुम्हें भी वैसा ही करना चाहिए। यही शास्त्राज्ञा है, यही वेदों का रहस्य है, यही उपदेश और परम्परागत शिक्षा है, तुम्हारा अनुष्ठान भी इसी प्रकार का हो।”

कर्त्तव्य पालन करते हुए जीवन जीने की ही आर्ष परम्परा रही है। अपनी बुराइयों, कमजोरियों और पापों का संशोधन करते हुए गृहस्थ जीवन में भी उच्च आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। श्रेष्ठ संस्कारों का उदय सामाजिक जीवन में रहकर ही किया जा सकता है। यही मार्ग सुविधाजनक और सरलतापूर्वक पार कर सकने के योग्य है।

किन्तु सामाजिक जीवन में भी आज अनेकों बुराइयाँ आ गई हैं। लोग धन, पद और वाक्पटुता को ही प्रतिष्ठा का आधार मानते हैं। इनके लिए आज चारों ओर दौड़-धूप और प्रतिद्वन्द्विता चल रही है। अनीतिपूर्वक धन कमाने मैं लोग बड़े चतुर बनते हैं, पद प्राप्ति के लिए अनुचित मार्ग अपनाने से भी चूकते नहीं। इनसे अहंकार, ईर्ष्या द्वेष, कलह, कटुता, संघर्ष, प्रतिशोध जैसी कितनी बुराइयां आज जन-मानस में प्रवेश कर गई हैं। लोग सभी तरफ दुःख, कष्ट और परेशानियाँ अनुभव करते दिखाई देते हैं।

प्रतिष्ठा का आधार मनुष्य की आन्तरिक श्रेष्ठता है। जो निर्धन रहकर भी दूसरों की सेवा करने में अपना गौरव अनुभव करते हैं, प्रतिष्ठा उन्हें ही मिलती है। सन्त तुकाराम के पास कोई बड़ा खजाना नहीं था, महात्मा गान्धी जी कोई वायसराय नहीं थे, फिर भी समाज ने उनकी कितनी प्रतिष्ठा की है यह सर्वविदित है। गुण, कर्म और स्वभाव की श्रेष्ठता के अनुरूप ही मनुष्यों को सम्मान मिलता है, यह शिक्षा हमें महापुरुषों के जीवन से मिलती है।

ऋषियों का आदेश है ‘घृणा पापी से नहीं, पाप से करो”। यथार्थ में पापी कोई मनुष्य नहीं होता वरन् पाप मनुष्य की एक अवस्था है। इसलिए यदि संशोधन करना हो तो पाप का ही करना चाहिए। अपराधी को यदि दंड देना हो तो उसे सुधारने के लिए ही दिया जाना चाहिए। मनुष्य सामाजिक प्राणी है, समाज की प्रत्येक अवस्था का उस पर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए किसी को घृणापूर्वक बहिष्कृत कर देने से समस्या का समाधान नहीं होता, वरन् बुराई का शोधन करके, अच्छे व्यक्तियों का निर्माण करने से ही उस अवस्था का नाश किया जा सकता है, जो घृणित हैं, हेय हैं और जिससे सामाजिक जीवन में विष पैदा होता है।

अपराध मानवीय अज्ञान के कारण होते हैं, इसीलिए आत्मज्ञान की आवश्यकता अत्यधिक है। अपने अन्तःकरण की पवित्रता जागृत कर लेने से मानव मात्र के प्रति समता का भाव उत्पन्न होता है इसलिए बाह्य बनावट और कृत्रिमता की अपेक्षा आन्तरिक संशोधन के द्वारा जब हम अपने विकारों को दूर कर लेते हैं, तो दोष-दर्शन का भाव समाप्त हो जाता है। नानक का वचन है- “अन्तर तीरथ नानका, सोधत नाहीं मूढ।” अर्थात् साँसारिक अज्ञान को अपने आत्म-विकास द्वारा दूर करें, जो ऐसा नहीं करते वे मूढ़ हैं।

स्वात्माभिमान की रक्षा का पाठ भी हम महापुरुषों के जीवन में पढ़ते हैं। आत्म-हीनता पतन की पहली सीढ़ी है। सच पूछा जाय तो मनुष्य की प्रतिष्ठा पर आक्षेप तब आता है, जब वह भय या स्वार्थ वश अपने को तुच्छ बना लेता हैं। मनुष्य अनैतिक कर्मों के द्वारा अपना सम्मान खो देते है इसलिए अपने कर्मों में सदैव कड़ाई का रुख और विचारों में स्वात्माभिमान बनाये रखने से आत्मा के हितों की रक्षा होती है। विचारों से पतित हुये मनुष्यों को दुष्कर्मों के जाल में फँसते देर न लगेगी। चारों ओर से निराशायें ही उन्हें घेरे रहती हैं, जिनके विचार घृणित, तुच्छ एवं संकीर्ण होते हैं।

सत्पुरुष कष्ट सहकर भी अपने आत्माभिमान की रक्षा करते हैं। इसके लिए वे कोई संबल-आधार ढूंढ़ते हैं। यह आधार अपने निर्मल चरित्र की गरिमा ही हो सकती है। बाह्य साधन बहुत थोड़ी सहायता दे सकते है, अधिकाँश सफलता तो स्वावलम्बन से ही मिलती है। इसलिये दूसरों के भरोसे रहने की अपेक्षा यह श्रेष्ठतर है कि अपनी शक्तियों को जागृत करें और स्वावलम्बन का आश्रय लें।

गुण ग्राहकता, सही क्रिया पद्धति, आत्म- शक्तियों का उपयोग, यह सभी महा मानवों की जीवनियों में देखने को मिलता है। जो भी मनुष्य इन नैतिक सद्गुणों का विकास अपने जीवन में करने का प्रयास करते हैं, उनकी महानता दिन-दिन प्रस्फुटित होती रहती है। उनके जीवन में अनेकों प्रकार के अभाव होते हुये सुख, सौंदर्य शान्ति और सफलता के दृश्य दिखाई देते रहते हैं। इससे पता चलता है कि जीवन लक्ष्य की प्राप्ति के लिये गुण, कर्म और स्वभाव के परिष्कार की आवश्यकता सर्वप्रथम है। यह शिक्षा, यह आदर्श महापुरुषों के जीवन से मिलता है इसलिए राह वह चलें जिस पर महापुरुष चलें हैं। इसी में मानव जाति का उत्थान और कल्याण सन्निहित है।


रोग, शरीर का शत्रु ही नहीं मित्र भी है।

पक्षी जब किसी हिंसक जन्तु को अपनी ओर आता हुआ देखते हैं तो एक विशेष प्रकार से शोरगुल मचाते हैं। इससे दूसरे पक्षी या रास्तागीर सावधान हो जाते है। वे समझ लेते हैं कि इस स्थान पर सर्प, नेवला या कोई ऊदबिलाव आदि है, इससे वे आकस्मिक हमले से बचाव कर लेते हैं। पक्षियों के शोरगुल की तरह ही रोग मनुष्य शरीर की आवश्यकता है। रोग किसी वस्तु का नाम नहीं है। यह एक प्रकार की स्थिति का नाम है जो किसी शारीरिक विकृति रुकावट या हलचल को प्रकट करती है। इससे लोग सावधान हो जाते हैं और अपना इलाज प्रारम्भ कर उस खराबी को दूर कर देते हैं।

इससे यह प्रकट है कि रोग मनुष्य का अभिशाप नहीं वरदान है। प्रकृति ने शरीर में जो सन्तुलन पैदा किया है, उसमें गड़बड़ी होने से ही मृत्यु होती है। रोग इस गड़बड़ी का पूर्वाभास है। यह न हो तो मनुष्य को पता भी न चले और अल्पायु में ही उसकी मृत्यु हो जाय। क्योंकि आन्तरिक अंगों की सम्यक् सफाई और देख-रेख कर सकना मनुष्य के वश की बात नहीं है। वह अपने भीतरी अवयवों को देख तक नहीं सकता। इस अवस्था में यदि रोग उत्पन्न न हो तो मनुष्य शारीरिक असन्तुलन को समझ नहीं सकता और अपना स्वास्थ्य कायम नहीं रख सकता ।

मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि जो लोग अपने प्रियजनों की मृत्यु या विछोह अथवा अन्य दुःखद स्थिति में रोते नहीं, उनके मानसिक विकारों का धुआँ आँखों में छा जाता है और उन्हें कमजोर बना देता है। कठोर हृदय के व्यक्तियों की आंखें अधिक खराब होने के पीछे यही मनोवैज्ञानिक तथ्य कार्य किया करता है।

यह स्थिति शरीर के प्रत्येक भाग में होती है। दाँतों में मैल जमने लगेगा तो पायरिया होगा। पेट में मल बढ़ेगा तो अजीर्ण अपच और कोष्ठबद्धता के दुष्परिणाम दिखाई देंगे। रक्त में उत्पन्न विकार ही दाद, खाज और एक्जिमा का कारण होता है। रोग कोई भी हो, वह अंग-विशेष में उत्पन्न विकार को प्रकट करता है। इस दृष्टि से रोग को अपना सहायक, सचेतक ही मानना चाहिए।

प्रोफेसर एडमण्ड जैकली ने अपनी पुस्तक में वाशिंगटन की डी. सी. बोर्ड आफ एजुकेशन के स्कूलों के बालक-बालिकाओं की रिपोर्ट से विभिन्न आँकड़े प्रस्तुत करते हुए स्पष्ट किया है कि रोग मनुष्य शरीर की प्राकृतिक आवश्यकता है। जो आँकड़े दिखाए हैं, इस प्रकार हैं :-

दांतों की खराबी से- 100 लाख पीड़ित

टाँसिल, एडिनाड व

अन्य ग्लैंड रोग 30 लाख “

साधारण रोगों से 50 लाख “

आहार की अनियमितता 40 लाख “

रीढ़ के रोग 10 लाख “

क्षय रोग 10 लाख “

विविध स्थायी रोग 4 लाख “

इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि अधिकाँश लोगों को कोई न कोई रोग अवश्य होता है। रोग शरीर का एक प्रकार का धर्म है जो उत्पन्न विकारों के अधर्म से शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा करता है। रोग स्वास्थ्य और जीवन-शक्ति का रक्षक है। इसलिए इससे कभी दुःखी, चिन्तित तथा निराश नहीं होना चाहिए। देखना यह चाहिए कि रोग का उद्देश्य क्या है। अर्थात् यह रोग किस प्रकार के मल विकार या शारीरिक गड़बड़ी को प्रकट करता है। उस विकार को दूर करना और आगे के लिए उस स्थान पर मजबूत मोर्चेबन्दी करना, यही रोग का उद्देश्य है।

अमेरिका के प्रसिद्ध डॉ0 बनेडिल लस्ट का कथन है कि “स्वास्थ्य एक प्रकार का बहुमूल्य खजाना है, किन्तु उसकी जाँच तभी होती है, जब वह खोता है, अर्थात् रोग पैदा होता है।” स्वास्थ्य वस्तुतः अच्छे रहन-सहन पर निर्भर है पर यदि रोग उत्पन्न होता है, तो यह समझना चाहिए कि हमारे खान-पान, आहार-विहार, व्यायाम, निद्रा आदि में कहीं कोई गड़बड़ी है।

रोग किसी आकस्मिक घटना से उत्पन्न नहीं होता। यह शरीर के विकारों के रूप में धीरे-धीरे जमा होता है। जब इन विकारों का परिपाक हो जाता है या जब शरीर के लिए असह्य हो उठता है तो कहने लगते हैं अमुक रोग हो गया है। प्राकृतिक चिकित्सक रोग का कारण केवल पेट को ही मानते हैं। उनके सिद्धान्त के अनुसार अनुचित मिर्च-मसाले और अप्राकृतिक भोजन के कारण पेट के पाचक अम्ल विकृत हो जाते हैं और पाचन-क्रिया पर उनका दूषित असर पड़ता है। इससे पेट में मल बढ़ना शुरू हो जाता है। इस मल में से एक प्रकार का विषैला पदार्थ निकल-निकलकर रुधिर के साथ मिल जाता है। इस विजातीय पदार्थ के कोषाणु भारी होते हैं जो किसी कोमल स्थान पर पहुँचते ही आगे बढ़ने से इनकार कर देते हैं, जिससे रक्त संचालन के मार्ग में रुकावट पैदा होती है। विजातीय द्रव्य आ-आकर इस रुकावट में फँसता जाता है। इस प्रकार जब एक स्थान पर यह दूषित पदार्थ अधिक मात्रा में एकत्रित हो जाता है तो वह गड़बड़ी पैदा करने लगता है। चकत्ते पड़ जाना, खुजली, मवाद, एक्जिमा, गठिया, आदि इस मल के अधिक मात्रा में जमा हो जाने के कारण ही हो जाते है।

जब तक पेट में मल का सड़ना भयंकर रूप से शुरू नहीं हो जाता, तब तक रोग की स्थिति सामान्य रहती है, किन्तु आंतों और मल के बीच की दीवार में जब संपर्क स्थापित हो जाता है तो इस मल के छोटे-छोटे कीटाणु रक्त और माँस में प्रवेश पा जाते हैं। यहाँ उनके अंडे, बच्चे बनने लगते हैं और नियमित रूप से रोग के कीटाणुओं का परिवार बढ़ने लगता है। जब इनकी सेना बढ़ जाती है तो ये सारे शरीर में फैलना शुरू हो जाते हैं। परिणामस्वरूप शरीर में घातक हलचल होने लगती है। ज्वर आने लगता है। वात, पित्त और कफ के अनुपात से कोई विशेष रोग बन कर तैयार हो जाता हैं। जब तक रक्त के शुद्ध जीवनदायी जीवाणु सशक्त रहते हैं, वे इन कीटाणुओं से लड़ते हैं, किन्तु यदि शारीरिक शक्ति निर्बल पड़ गई तो वह शुद्ध जीवाणु भी कीटाणुओं का कार्य करने लगते हैं और शरीर का रोग गम्भीर रूप में परिलक्षित होने लगता है।

इसलिये रोग हमें प्रकृति के नियमों को पालन करने में एक प्रकार का निरीक्षक का कार्य करता है। जो मनुष्य इन नियमों का सही-सही पालन करता है वह सदैव स्वस्थ रहता है, जो इनका उल्लंघन करता है रोग उन्हें डरा देता है।

उदाहरण के लिए दो नवयुवकों को लीजिए। एक को पूरी तरह भूख लगती है, ठीक प्रकार शौच हो जाता है, शरीर में आलस्य नहीं रहता, खूब स्वस्थ रहता है। कारण का पता लगाते हैं तो मालूम पड़ता है कि वह नवयुवक खूब श्रम करता है, खुले खेतों में, कड़ी धूप में काम करता है। भूख लगने पर ही खाता है, पर्याप्त निद्रा जब तक नहीं ले लेता तब तक दूसरा काम नहीं करता, उसका आहार सादा होता है, स्नान सफाई का भी उसे ध्यान है। इन प्राकृतिक नियमों के पालन से ही वह पूर्ण स्वस्थ और बलिष्ठ है। पर उसकी बगल में एक दूसरा लड़का रहता है। दिन चढ़े तक सोना, कडुआ, कसैला भोजन करना। परिश्रम से वह बेतरह घबड़ाता है। बड़ी अस्त-व्यस्त दिनचर्या है उसकी। इसीलिए तो उसे कब्ज बन रहता है, भूख तो जैसे बिलकुल ही मर गई हो। आलस्य के मारे दिन-भर चारपाई नहीं छोड़ता। शरीर में जान नहीं रह गई है। यह स्थिति इसलिए हो गई कि उसने प्रकृति की मर्यादाओं का पालन करने में आनाकानी की। अब उसने पड़ोसी की हालत देखकर समझ लिया है कि रोग से बचना है तो पर्याप्त श्रम जरूर करना होगा, निद्रा, विश्राम, सफाई और खान-पान में भी पूर्ण सावधानी रखनी पड़ेगी।

रोग हमें प्राकृतिक नियमों पर चलने-अर्थात् स्वस्थ रहने की शिक्षा देता है, किन्तु जो इस आवाज को सुनते, परखते नहीं, वह धोखा उठाते हैं। जो रोग की प्रारम्भिक अवस्था में ही संभल कर अपना स्वास्थ्य सुधार लेते हैं, उन्हें ही बुद्धिमान कहा जायेगा। हमें किसी भी हालत में रोग की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।


युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति

जना करती हैं जिस दिन के लिए सन्तान सिंहनियाँ-

मेरे शेरों से कह देना कि-”वह दिन आ गया, बेटा।”

राष्ट्र आज जिन परिस्थितियों में जकड़ा हुआ है, उससे छुटकारा पाने के लिए उसकी अन्तरात्मा तड़प रही है। हम जिन शारीरिक, मानसिक, आर्थिक सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय विपन्नताओं में फँसे हुए हैं, उनसे मुक्ति पाने की तड़पन तेजी से बढ़ती चली जा रही है।

हमारी दुर्दशा और दुर्गति-

अस्वस्थता और दुर्बलता जन-जन के शरीरों में घुसी हुई उन्हें खोखला बनाती चल रही है। अस्पतालों, औषधियों और चिकित्सकों की तूफानी बाढ़ के बावजूद रोग बढ़ ही रहे हैं, घटे नहीं। कठोर श्रम करने पर भी, नीति-अनीति की उपेक्षा करके भी हम अर्थ चिन्ता से छुटकारा पा नहीं रहे हैं। आमदनी की न्यूनता और खर्चों की बढ़ोतरी के बीच तालमेल बिठाना दिन-दिन कठिन होता चला जा रहा है। उत्पादन के विविध प्रयत्नों पर भरसक ध्यान देते हुए भी गरीबी में कमी नहीं आ रही है। बेकारी और बुभुक्षा का मुँह सुरसा के मुँह की तरह अधिक ही फटता चलता है।

लम्बी अवधि बीत जाने पर भी शिक्षा प्रसार की सफलता बीस प्रतिशत के लगभग पहुँच पाई है। सौ में से 80 व्यक्ति निरक्षर हैं। मानसिक विकास की दृष्टि से प्रबुद्ध लोगों की गणना-एक प्रतिशत भी न होगी, फिर जिनने अपना व्यक्तित्व विकसित करने में सफलता पाई हो गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से अपने को परिष्कृत किया हो, ऐसे नर रत्नों को तो मशाल लेकर ही खोजना पड़ेगा। वस्तुतः स्थिति यह है कि व्यसनी, दुर्गुणी, आलसी, अहंकारी, अर्ध विक्षिप्त, भीरु, संकीर्ण एवं मनोविकार पीड़ित लोगों से ही सारा समाज भरा पड़ा है। क्या पढ़े, क्या बिना पढ़े इस दृष्टि से दोनों को ही एक तराजू में तो जा सकता है। सुसंस्कृत व्यक्तित्वों से विहीन राष्ट्र वस्तुतः गया गुजरा ही माना जाता है।

सामाजिक दृष्टि से हमारी स्थिति समस्त विश्व में उपहासास्पद हैं। प्राचीनकाल में हम कितने ही महान क्यों न रहे हों, आज तो चिन्ताजनक स्थिति में जा पहुँचे हैं। कुरीतियों और अन्धविश्वासों ने संसार के पिछड़े लोगों की पंक्ति में लेजाकर बिठा दिया है। एक ही देश, भाषा समाज एवं धर्म के लोग आपस में छूने तक के लिए तैयार न हों, इस घृणा का उदाहरण सारी पृथ्वी पर कहाँ मिलेगा। विवाह-शादियों के नाम पर अपनी आमदनी का एक तिहाई भाग उन्मादियों की तरह होली फूँक कर त्याग कर दें, ऐसे पागल आदमी हिन्दुस्तान के अतिरिक्त और कहीं न मिलेंगे। घर के लोगों के मर जाने पर है हजारों आदमियों की दावतों का सरंजाम करने वाले लोग या तो जीवनमुक्त, परमहंस, ब्रह्मज्ञानी कहलाने के अधिकारी हैं या फिर भावना रहित जड़ पाषाण। आत्मा को शान्ति एवं ज्योति प्रदान करने के उद्देश्य से विद्यमान देवता की पूजा जो लोग, निरीह पशु-पक्षियों की बलि देकर करने लगे उनकी पूजा को वीभत्स और पूज्य को नृशंस यही कोई बताने लगे तो उसे किस मुँह से रोका जा सकता हैं। अन्धविश्वासों के आधार पर जहाँ लाखों-करोड़ों लोग भ्रान्त की तरह अपनी आर्थिक, मानसिक, चारित्र्यक, नैतिक बर्बादी करते हों, उन्हें कौन सम्मान की दृष्टि से देखेगा?

किसी समय समस्त विश्व में अपनी विशेषता एवं महानता की विजय पताका लहराने वाली संस्कृति आज धर्मध्वजी रंगे सियारों की लूट-खसोट का आधार मात्र बन कर रह गई है। विविध विधि आडम्बरों द्वारा भोले लोगों को बहकाकर उनका समय और धन बर्बाद करना, यही आज के हमारे धर्म का स्वरूप हैं। संस्कृति के नाम पर चौका-चूल्हा, तिलक-छाप और ऐसे ही कुछ अन्य प्रतीक हाथ में रह गये हैं। परस्पर विलगाव, संकीर्णता और फूट ने जाति पाँति के नाम पर एक जाति को हजारों जातियों में बाँट दिया। अपने धर्म एवं दर्शन के नीचे समस्त विश्व को दीक्षित करने के प्रयत्न में लाखों वर्षों से संलग्न जीवित जाति ने जब यह नीति अपनाली कि जिस पर विधर्मी की छाया पड़ जाय उसे बहिष्कृत कर दिया जाय, तो संग्रहणी के रोगी की तरह उसे दिन-दिन क्षीण होना ही ठहरा। एक हजार वर्ष पूर्व केवल पन्द्रह सौ मुसलमान भारत में आये थे, उनकी छाया पड़ने से बहिष्कृत नर-नारियों को हमने धकेल-धकेलकर विधर्मी बनाया। आज भारत और पाकिस्तान में उनकी संख्या 20 करोड़ से ऊपर है।

दुर्भाग्य ने हमें कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया-

जहाँ संसार में अन्य धर्मों ने पिछले एक-दो हजार वर्षों में आशातीत आश्चर्यजनक प्रगति की है, वहाँ हिन्दू धर्म बेतरह क्षीण हुआ है। आज से 1900 वर्ष पूर्व जन्में ईसाई धर्मानुयायियों की संख्या 3 अरब की आबादी वाली इस पृथ्वी पर लगभग एक अरब के करीब जा पहुँची। तेरह सौ वर्ष पूर्व जन्मा इस्लाम आज संसार में 50 करोड़ लोगों का धर्म है। दो हजार वर्ष पूर्व बने बौद्ध धर्मानुयायी भी 40 करोड़ हैं और हिन्दू धर्म जो किसी समय समस्त विश्व का धर्म था, अब सबसे पिछड़ा, केवल मात्र 34 करोड़ लोगों का धर्म रह गया है। जो बचा है, उसे ईसाई तेजी से हड़पे जा रहे हैं। पिछड़ी हुई जातियाँ जिस तेजी से ईसाई बन रही हैं, उसे देखते हुए लगता है कि नागालैण्ड जैसे ‘ईसाई-स्थान’ भी जगह-जगह बनाने पड़ेंगे और हिन्दू जाति दस-बीस करोड़ की एक छोटी-सी मृत प्रायः जाति रह जायगी।

राजनैतिक दृष्टि में भी हमारी स्थिति कुछ अच्छी नहीं। चीन और पाकिस्तान के खूँखार दाँत दिन-दिन अधिक बाहर निकलते चले आ रहे हैं। योजनाओं के नाम पर लिया हुआ कर्ज एक प्रकार से भारत को गिरवी रखने जैसा चिन्ता का विषय बनता जा रहा है। पंचमार्गी, देशद्रोही भीतर ही भीतर गर्भस्थ बिच्छुओं द्वारा अपनी माँ का पेट खाकर बाहर निकलने की नीति अपना रहे हैं। वे शत्रुओं के इशारे पर अपने राष्ट्र का कोई भी अहित करने में चूकने वाले नहीं है। भाषाओं के नाम पर, जातियों के नाम पर, प्रान्तवाद के नाम पर विगठनवादी शक्तियाँ राष्ट्रीय एकता में पलीता लगाने के लिए जुटी हुई हैं। भ्रष्टाचार किस सीमा तक जा पहुँचा है, इसके बारे में कुछ न कहना ही उत्तम है। शासक दल की आन्तरिक फूट उसे दिन-दिन लुञ्ज-पुञ्ज बनाती जा रही है और दुर्भाग्य यह है कि उसे सचेत रखने या सुधारने में समर्थ अन्य कोई मजबूत विरोधी दल भी बन नहीं पा रहा है। इस प्रकार की अनेकों राष्ट्रीय दुर्बलताएँ मौजूद हैं, जिनने हमारे भविष्य की उज्ज्वल आशा को ग्रहण की तरह ग्रस्त कर रखा है। अन्तर्राष्ट्रीय जगत में हम अपनी साख तेजी से खोते चले जा रहे हैं।

यों स्वतन्त्रता मिलने के बाद पिछले 17 वर्षों में प्रगति के नाम पर बहुत कुछ किया गया है। उसका कुछ न कुछ सत्परिणाम भी हुआ है। जहाँ-तहाँ कृषि, उद्योग, सिंचाई, बिजली, सड़क, अस्पताल, स्कूल जैसी प्रवृत्तियाँ बनी और बढ़ी भी हैं, पर उनके द्वारा राष्ट्र की समग्र चेतना, सशक्तता, समृद्धि, एकता एवं उत्कृष्टता की अभिवृद्धि में कितना योग दान मिला है, इस प्रश्न पर जब विचार करते हैं तो प्रस्तुत प्रयत्नों का परिणाम नगण्य आँका जाने लायक ही प्रतीत होता है।

उत्कृष्ट व्यक्तियों से राष्ट्र को सशक्तता-

किसी राष्ट्र की सशक्तता उसके अर्थ साधनों एवं टीम-टिमाकों से नहीं, वरन् उसके मनोबल, चरित्र, देशभक्ति, दूरदर्शिता, एकता, स्वाभिमान जैसे सद्गुणों के आधार पर नापी जा सकती है। जहाँ इन तत्वों का अभाव हो, वहाँ ऊपरी समृद्धि कितनी ही बढ़ी-चढ़ी हो, उसकी तुलना बालू की भीत से ही की जायगी जो जरा-सा आघात लगने पर तहस-नहस हो सकती है। संसार का इतिहास साक्षी है कि प्रबल व्यक्तियों ने स्वल्प-साधनों से आशातीत प्रगति कर दिखाई है और जहाँ ओछे एवं हीन स्तर के लोगों का बाहुल्य रहा है, वहाँ बढ़ी हुई समृद्धि भी टिक नहीं सकी है। इसलिए सुविकसित राष्ट्र का निर्माण करने के लिए इस अनिवार्य तथ्य को ध्यान में रखना पड़ता है कि उसके नागरिक भावनात्मक दृष्टि से सशक्त एवं उत्कृष्ट बनें। इस दिशा में प्रगति हुए बिना और किसी प्रकार सच्ची एवं स्थायी सशक्तता की आशा नहीं जा सकती।

प्रस्तुत अगणित उलझनों का एक मात्र कारण राष्ट्रीय चरित्र का स्तर गिरा हुआ होना है। पेट में कब्ज रहने पर शरीर के अन्य सब अवयव दुर्बल एवं रुग्ण बन जाते हैं, इसी प्रकार आन्तरिक स्तर की निकृष्टता व्यक्ति एवं समाज के सामने अगणित समस्याओं, कठिनाइयों एवं आपत्तियों के रूप में प्रस्तुत होती हैं। पन्द्रह सौ विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा भारत जैसे महाद्वीप पर आठ सौ वर्ष तक नृशंस शासन कर सकना वैसे एक असंभव बात प्रतीत होती है, पर स्तर की दुर्बलता ने उसे भी संभव करके दिखा दिया। यदि हमारा समाज पिछले दिनों भावना, दूरदर्शिता एवं चरित्र की दृष्टि से समर्थ रहा होता, तो आज उसकी स्थिति दूसरी ही होती। एक सौ वर्षों के भीतर अमेरिका कहाँ से कहाँ जा पहुँचा, रूस को पचास वर्ष भी नहीं हुए, चीन पच्चीस वर्षों के प्रयत्न में हुँकार रहा है। भारत यदि आन्तरिक दुर्बलता से ग्रस्त न रहा होता, तो लाखों वर्षों से संचित अपनी श्रेष्ठता के कारण उसका स्थान विश्व में सर्वोपरि रहा होता। यहाँ और किसी बात की कुछ भी कभी नहीं है। हर वस्तु, हर सुविधा यहाँ प्रचुर मात्रा में मौजूद है। यदि किसी बात की कमी है तो वह केवल एक ही है-भावना, विवेक एवं व्यक्तित्व का अभाव। इसकी पूर्ति जब तक न होगी, तब तक हम उत्थान की दिशा में एक कदम भी न बढ़ सकेंगे। समृद्धि उत्पादनों के प्रयासों को हमारे घटिया व्यक्तित्व भीतर ही भीतर खोखला करते रहेंगे। यदि वे कुछ सफल भी हुए तो दुर्गुणी व्यक्तियों के हाथ में पहुँची हुई समृद्धि जो अनर्थ करती है वही सब कुछ हमें भी भुगतना पड़ेगा।

बीमारियाँ असंयम से पैदा होती हैं। जब तक लोग असंयमी और अस्त-व्यस्त, विलासी बने रहेंगे, तब तक हर व्यक्ति के पीछे एक डॉक्टर नियुक्त कर देने पर भी उसका निरोग रह सकना संभव नहीं। अपव्ययी, आलसी और अव्यवस्थित व्यक्ति बड़ी आमदनी होने पर भी गरीब एवं अभावग्रस्त ही रहेंगे, जब कि व्यवस्थापूर्वक चलने वाले कम आमदनी में भी आनन्द का जीवन व्यतीत करते हैं। भीरु, कायर और अधीर व्यक्ति राई रत्ती जैसी कठिनाई से ही कातर, चिन्ता निमग्न एवं निराश हो बैठते हैं, जब कि साहसी और पुरुषार्थी वैसी छोटी बातों को नगण्य मान कर उसकी परवाह न करते हुए हँसते-खेलते अपने मार्ग पर बढ़ते चले जाते हैं। जिनमें आदर्शवाद के प्रति, ईश्वर एवं धर्म के प्रति निष्ठा हो, उनमें देश भक्ति, लोक सेवा, कर्त्तव्य परायणता, ईमानदारी जैसे गुणों की कमी क्यों रहेगी? वे किसी भी भय या प्रलोभन के सामने अपनी श्रेष्ठता एवं मानवता पर आँच क्यों आने देंगे? जहाँ विवेक एवं औचित्य का आदर होगा, वहाँ न कोई सामाजिक कुरीति ठहर सकेगी और न अन्धविश्वास का पता चलेगा।

अनेक कठिनाइयों का एक मात्र कारण-

भावनात्मक दृष्टि से सशक्त, संगठित एवं राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा के लिए मर-मिटने की उमंगों से भरपूर नागरिक जहाँ होते हैं, उस राष्ट्र की ओर किसी बाहरी शत्रु के आक्रमण का साहस नहीं होता, यदि होता है तो उसके दाँत तोड़ दिये जाते हैं। इंग्लैंड जैसे छोटे देश जर्मनी का प्रचंड प्रहार सहना पड़ा, जापान के दुर्भाग्य वश उस पर अमेरिका का आक्रमण थोपा। फिर भी वे परास्त न हुये। चोटें खाकर भी वे फिर तुर्त फुर्त उठ खड़े हुए और अपने अस्तित्व एवं गौरव को यथावत बनाये हुये हैं। यह उनके राष्ट्रीय चरित्र की विशेषता है। यदि वहाँ औद्दे और कमीने लोगों का बाहुल्य रहा होता, तो निश्चय ही उनकी बुरी से बुरी दुर्गति हुई होती। हमारे सामने बाहरी और भीतरी शत्रुओं का संकट उपस्थित है सीमा पर आक्रमण और भीतर ही भीतर गृह युद्ध जैसी अन्तःकलह हमें चिन्तित बनाये हुए है, इसका हल हमारी ज्वलन्त देश भक्ति की भावनाएँ प्रबल हुये बिना और किसी तरह संभव नहीं हो सकता। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में राष्ट्र की प्रतिष्ठा और किसी कारण नहीं केवल भीतरी दुर्बलताओं के कारण गिरी हैं। यदि हम अमरीकी, रूसी, जर्मनी, जापानी, अंग्रेज नागरिकों की तरह देशभक्त और संगठित रहे होते तो अन्य समस्त कमियों के होते, हुये भी विश्व में हमारा भारी सम्मान रहा होता।

खाद्य समस्या, भ्रष्टाचार, महंगाई जैसी समस्याओं का वास्तविक कारण बहुत स्वल्प हैं। हमारे नैतिक स्तर की न्यूनता ने ही इन्हें इतना विकराल बना रखा है। विवाह शादियों के नाम पर होने वाले अपव्यय जैसी कुरीतियों ने आर्थिक दृष्टि से राष्ट्र की कमर तोड़कर रख दी है। यदि लोगों में थोड़ा भी विवेक और थोड़ा भी साहस रहा होता, तो इस पागलपन से वर्षों पहले छुटकारा पा लिया गया होता। 56 लाख पेशेवर धर्मजीवी यदि 30 प्रौढ़ लोगों को एक वर्ष में साक्षर बनाने का व्रत लेकर उठ खड़े होते तो एक वर्ष के अन्दर निरक्षरता की समस्या हल हो गई होती।

अपराधों की संख्या दिन-दिन बढ़ती चला जा रही है। नशेबाजी के आँकड़े देखने से प्रतीत होता है कि शारीरिक, मानसिक और आर्थिक बर्बादी के मार्ग पर हम कितनी तेजी से घुड़दौड़ लगाये हुये हैं। विलासिता, फैशन परस्ती, कामचोरी, हरामखोरी जैसी बुराइयाँ तेजी से बढ़ रही हैं। ईमानदारी और वफादारी की भावनाएँ गिर जाने से एक व्यक्ति दूसरे की दृष्टि में अविश्वस्त बना हुआ है और इसी कारण कोई संगठित साझेदारी के प्रयत्न सफल नहीं हो पा रहें हैं। स्वार्थी, संकीर्ण और ओछे लोगों के सामने जो-जो अड़चने आनी चाहिए, वे सभी आज हमारे सामने उपस्थित हो रही हैं भले ही हम उन्हें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, सामाजिक राष्ट्रीय कठिनाइयाँ कहें, पर थोड़ा विचार करने पर स्पष्ट हो जाता है कि वस्तुतः यह हमारी भावनात्मक एवं चारित्र्यक दुर्बलताएं ही हैं, जो अनेक नाम रूप धारण कर विविध विभीषिकाओं के रूप में हमें पग-पग पर संत्रस्त करती रहती हैं।

विकास तो हुआ, पर अधूरा-

पिछले दिनों राष्ट्रीय विकास की दृष्टि से सरकारी गैरसरकारी क्षेत्रों में बहुत काम हुआ है। हमें उसका मूल्य कम नहीं आँकना चाहिये। हमारे नेताओं, शासकों ने अपनी बुद्धि के अनुसार कृषि, उद्योग, परिवहन, विद्युत, शिक्षा, चिकित्सा, उत्पादन, न्याय-व्यवस्था आदि की दृष्टि से बहुत कुछ किया है। उनके प्रयत्नों की प्रशंसा की जानी चाहिए। हम उनका मूल्य घटा नहीं रहे, वरन् कह यह रहे हैं कि-भावनात्मक उत्कर्ष की आवश्यकता जब तक पूर्ण न की जायगी, तब तक इस भौतिक प्रगति का कोई वास्तविक लाभ न मिल सकेगा। मनुष्य वस्तुतः आत्मा है। उसकी शक्ति का स्रोत बाहर नहीं भीतर है। भीतरी दृष्टि से निष्प्राण व्यक्ति बाहरी दृष्टि में कितना ही सुसज्जित क्यों न हो, उसकी सुन्दरता एवं उपयोगिता नगण्य ही रहेगी, इसके विपरीत भीतर से सशक्त कोई प्राणवान्, स्वस्थ एवं चैतन्य व्यक्ति बाहर से फटे-टूटे परिधान धारण करने पर भी अपनी महत्ता अक्षुण्य बनाये रहेगा।

आत्मा की तुलना में शरीर का मूल्य स्वल्प है। उसी प्रकार भावनात्मक सशक्तता की तुलना में भौतिक समृद्धि का प्रतिफल तुच्छ है। भौतिक उन्नति के बड़े से बड़े प्रयत्न तब तक नगण्य ही माने जाते रहेंगे, जब तक उनकी अपेक्षा अनेक गुना प्रयास आन्तरिक विकास के लिए न किया जाय। आज हमारी यही सबसे बड़ी भूल है। इसी आवश्यकता का महत्व कम आँक कर हमने कोल्हू के बैल की तरह बहुत श्रम करने के उपरान्त भी कोई बड़ी मंजिल तय करने में सफलता नहीं पाई है। अब समय आ पहुँचा जब कि यह भूल सुधारने के लिये हमें अविलम्ब कटिबद्ध हो जाना चाहिए।

यह एक स्पष्ट तथ्य है कि भावनात्मक परिवर्तन धर्म तन्त्र के माध्यम से ही होना संभव है। भय और आतंक के बल पर अधिनायकवाद द्वारा लोगों को किसी मार्ग पर चलने के लिये विवश किया जा सकता है, पर इस प्रकार भी भावना बदलना संभव नहीं। उत्पीड़न के भय से लोगों के शरीर ही काम करने लगते हैं, मन नहीं बदलता। भीतर छिपा हुआ चोर अवसर पाते ही उभर आता है और दाव लगने पर अधिक जहरीला डंक मारता है। अच्छा तरीका यही है कि आदर्शवाद की उत्कृष्टता से श्रद्धा-धर्म और ईश्वर में सच्ची आस्था उत्पन्न कर जन-साधारण को कर्त्तव्यनिष्ठ, धर्मनिष्ठ, समाजनिष्ठ बनाया जाय। यह कार्य राजनैतिक लोगों का नहीं। उन्हें पग-पग पर कूटनीति अपनानी पड़ती है, फलस्वरूप लोग उन्हें प्रतिभावान तो मानते हैं पर आदर्शवान् नहीं। राजनीति में गान्धी जैसे संत कोई विरले ही होते हैं, शेष तो दिन-रात हेर-फेर चलाने वाले होते हैं, इसलिये वे लोगों में उत्साह तो उत्पन्न कर सकते हैं, पर आस्थाएं विनिर्मित करने में सफल नहीं हो सकते। यह कार्य धर्म तन्त्र का है। धर्म क्षेत्र में कार्य करने वाले, उत्कृष्ट चरित्र एवं आस्थावान व्यक्ति ही अपने चरित्र एवं उदाहरण से जन-साधारण को भावनात्मक प्रगति के लिये प्रेरणा दे सकते हैं। उन्हीं के उपदेशों का कुछ ठोस प्रभाव भी पड़ सकता है।

सामान्य मनुष्यों के कथन की अपेक्षा भगवान या शास्त्रों के द्वारा कहे हुये निर्देश लोगों को अधिक प्रभावित करते हैं, इसलिये सामान्य प्रवचनों की अपेक्षा शास्त्र कथा-यदि ढंग से कही जा सके तो उसका अधिक प्रभाव पड़ता है। प्राचीनकाल में महान तत्ववेत्ता ऋषियों ने मानव अन्तःकरण को उत्कृष्ट बनाने की आवश्यकता का अनुभव किया था और उसके लिये जो सांगोपांग विधि व्यवस्था मानव तत्वों की गहन शोधों के आधार पर बनाई, उसे ही धर्म तन्त्र घोषित किया गया। इसे आज की आडम्बरपूर्ण स्थिति में उपहासास्पद भले ही माना जाता हो, पर वस्तुतः उसका मूल स्वरूप समग्र वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर विनिर्मित है। इसका अवलम्बन लेकर मनुष्य भीतरी दृष्टि से इतना समर्थ एवं सुविकसित हो सकता है कि बाह्य समृद्धि उसके पीछे-पीछे भागी फिरे।

धर्म-तन्त्र और उसकी सामर्थ्य-

आज की राष्ट्रीय विपन्न परिस्थितियों में हमें यही करना होगा। भावनात्मक उत्कृष्टता की अभिवृद्धि के लिये धर्म तन्त्र का सहारा लेना होगा ताकि जन-मानस के गहन अन्तराल का कोमल स्पर्श करके उसके प्रसुप्त देवत्व को जागृत किया जा सके। इसी प्रकाश से हमारी अगणित कठिनाइयों की अँधियारी दूर हो सकेगी। मनुष्य भीतर से महान बनेगा तो बाहर से भी उसकी समृद्धि एवं शक्ति असीम होकर रहेगी।

हम राजनीति की चकाचौंध को देखते हैं और उसी के आधार पर समस्याओं को हल करने बात सोचते हैं। धर्म-तन्त्र की शक्ति और संभावना से हम एक प्रकार से अपरिचित जैसे हो चले हैं। बेशक राजनीति की तरह धर्मनीति में भी भारी विकृतियाँ और भ्रष्टताएँ घुस पढ़ी हैं, उन्हें सुधारना और बदलना पड़ेगा। शुद्ध स्वरूप में धर्म इतना सामर्थ्यवान है कि राजनीति की सामर्थ्य उसकी तुलना में नगण्य ही ठहरती है। शासन संचालन में लगभग 27 लाख कर्मचारी संलग्न हैं, जब कि धर्म को आजीविका बनाकर गुजारा करने वालों की संख्या विगत जनगणना के अनुसार 56 लाख है। जितना टैक्स सरकार वसूल करती है, उससे लगभग दूना धन धर्म कार्यों में खर्च होता है। तीर्थयात्रा, पर्वस्नान, कुँभ जैसे धार्मिक मेले, यज्ञ, सम्मेलन, कथा-वार्ता, मन्दिर, मठ, साधुओं की जमातें, धर्मानुष्ठानों के अवसरों पर किये जाने वाले दान, पूजा, उपकरण, धर्म ग्रन्थ, प्रतिमाएँ आदि सब मिलाकर धर्म के नाम पर जनता प्रचुर मात्रा में खुशी-खुशी धन खर्च करती है। जप, तप, आह्वान, संयम, नियम आदि के लिये लोग कष्ट भी सहते हैं। धर्म प्रयोजनों के लिये मंदिर आदि की इतनी अधिक इमारतें बनी हुई हैं जो सरकारी इमारतों से किसी प्रकार कम नहीं। धर्म प्रयोजनों में जनता की श्रद्धा भी कम नहीं। समय आने पर वह उसके लिए बहुत कुछ त्याग करने को भी तैयार हो जाती है।

सच तो यह है कि हमने स्वाधीनता संग्राम भी धर्म के नाम पर लड़ा है। महात्मा’ गान्धी के नाम के साथ ‘महात्मा’ शब्द न होता तो संभवतः उन्हें इतना जन-सहयोग न मिल सका होता। रामराज्य की स्थापना की उनकी घोषणा के आधार पर भारत की जनता मर-मिटने को तैयार हुई थी। सन् 57 का स्वतन्त्रता-संग्राम चमड़े के कारतूस मुँह में लगाने में धर्म भ्रष्टता अनुभव करने वाले सैनिकों द्वारा ही भड़का था। क्रान्तिकारियों ने गीता की पुस्तकें छाती से बाँधकर फाँसी के तख्ते पर चढ़ते हुये जनता की श्रद्धा अर्जित की थी।

इसी शस्त्र का उपयोग किया जाय-

बेशक, आज धर्म तन्त्र बुरी दशा में विकृत बना लुँज-पुँज पड़ा है और अपनी उपयोगिता खो बैठा है। फिर भी यह संभावना पूरी तरह विद्यमान है कि यदि उसे सुव्यवस्थित बनाया जा सके और प्रबुद्ध व्यक्तियों द्वारा नव निर्माण के प्रयोजन में प्रयुक्त किया जा सके, तो इसका परिणाम आशाजनक सफलता ही होगा। इतिहास बताता है कि धर्म तन्त्र सृष्टि के आदि से अब तक कितना शक्तिशाली रहा है। उसने सदा से राज तन्त्र पर नियन्त्रण करने की अपनी वरिष्ठता को कायम रखा है। समय बतावेगा कि उसी के द्वारा मानव-जाति की आत्यंतिक समस्याओं का समाधान होगा। आज राजनीति को कितनी ही प्रमुखता क्यों न मिली हो, कल धर्म को उसकी महत्ता के अनुरूप-प्रतिष्ठा मिलने ही वाली है। कारण स्पष्ट है, मानव-जाति की भौतिक आवश्यकताएँ और समस्याएं स्वल्प हैं। उन्हें बुद्धिमान मानव प्राणी आसानी से हल कर सकता है। जिस विभीषिका ने अगणित गुत्थियाँ उलझा रखी हैं, वह भावनात्मक विकृति ही है। मनुष्य का आन्तरिक स्तर गिर जाने से उसने पशु एवं पिशाच वृत्ति अपना रखी हैं। इसी से पग-पग पर कलह और क्लेश के आडम्बर खड़े दिखाई पड़ते हैं। यदि भावनात्मक उत्कृष्टता संसार में बढ़ जाय, तो आज हर मनुष्य देवताओं जैसा महान दिखाई दे और सर्वत्र स्वर्गीय सुख शान्ति का वातावरण दृष्टिगोचर होने लगे। समस्त रोगों का निदान यह एक ही है, समस्त समस्याओं का हल यह एक ही है।

हमें जड़ का पहुँचना होगा और उसी को सींचना होगा। रोग के अनुरूप चिकित्सा ढूँढ़नी होगी। जहाँ छेद हैं, वहाँ बन्द करना होगा, अन्यथा सुख शान्ति के व प्रगति एवं समृद्धि के स्वप्न कभी भी साकार न हो सकेंगे। बालू के महल रोज बनते बिगड़ते रहेंगे, पर उनसे प्रयोजन कुछ भी सिद्ध न होगा। भारत के पुनरुत्थान में निश्चित रूप से धर्म को ही महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करनी पड़ेगी, क्योंकि जन-साधारण की प्रसुप्त आन्तरिक सत्प्रवृत्तियों को इसी आधार पर जगाया जा सकना संभव होगा। जितनी जल्दी इस तथ्य को हम हृदयंगम कर लें, उतना ही उत्तम है।

चुनौती स्वीकार करें-

राष्ट्र के अतीत गौरव के अनुरूप हमें पुनः अपने उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करना ही होगा। प्रबुद्ध आत्माओं के सामने यह चुनौती प्रस्तुत हुई है कि वे अपनी तुच्छ तृष्णाओं तक सीमाबद्ध संकीर्ण जीवन बिता देने की अपेक्षा किसी तरह संतोष से गुजारा चलाते हुये अपनी बढ़ती शक्तियों का उपयोग, अपने युग की विषम समस्याओं को सुलझाने के लिये करने को तत्पर हों। चारों और आग लगी हो और उसे बुझाने की अपेक्षा अपनी चैन की बंशी बजाने में जो संलग्न हों, उस प्रतिभावान की, सामर्थ्यवान की विकृत गतिविधियों पर विश्व मानव की घृणा ही बरसेगी। भावी पीढ़ियाँ उसे फटकारेंगी। कर्त्तव्य से विमुख रहने के कारण अन्तरात्मा उसे कोसती ही रहेगी।

हम सौभाग्य या दुर्भाग्य से अग्नि परीक्षा के युग में पैदा हुये हैं। इसलिये सामान्य काल की अपेक्षा हमारे सामने उत्तरदायित्व भी अत्यधिक हैं, अतएव उपेक्षा करने का दण्ड भी अधिक है। संकटकाल के कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व, प्रतिबंध एवं दण्ड विधान भी विशेष होते हैं। आज वैसी ही स्थिति है। मानव जाति अपनी दुर्बुद्धि से ऐसे दल-दल में फँस गई है, जिसमें से बाहर निकलना उसके लिये कठिन हो रहा है। मर्मान्तक पीड़ा से उसे करुण क्रन्दन करना पड़ रहा है। परिस्थितियाँ उन सभी समर्थ व्यक्तियों को पुकारती हैं कि इस विश्व संकट की घड़ी में उसे कुछ साहस और त्याग का परिचय देना ही चाहिये, पतन को उत्थान में बदलने के लिये उसे कुछ करना ही चाहिये। हम चाहें तो थोड़ा-थोड़ा सहयोग देकर देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति के पुनरुत्थान के लिये बहुत कुछ कर सकते हैं और नया संसार, सुन्दर संसार, उत्कृष्ट संसार बनाने के लिये एक चतुर शिल्पी की तरह अपनी सहृदय कलाकारिता का परिचय दे सकते है। पेट भरने के लिये पशु की तरह जीवित रहना, आज की परिस्थितियों में किसी निष्ठुर पाषाण के लिये ही संभव हो सकता हैं। अखण्ड-ज्योति के पाठकों में से शायद ही कोई इस तरह अभिशाप जैसा जीना पसन्द करे।

ऐतिहासिक भूमिका सम्पादन करें-

धर्म का स्वरूप आज पूजा, पाठ, तिलक, छाप, जटा, कमंडल, स्नान, मन्दिर दर्शन या थोड़ा-सा दान-पुण्य कर देना मात्र मान लिया गया है। इतना कुछ कर लेने वाले अपने को धर्मात्मा समझने लगते हैं। हमें समझना और समझाना होगा कि यह धर्म का एक नगण्य अंश हैं। समग्र धर्म की धारणा, आत्म-संयम, उज्ज्वल चरित्र, उदारता, ज्वलन्त देशभक्ति एवं लोक सेवा की तत्परता में ही संभव है। धर्मात्मा के लिये दयालु क्षमाशील बनना ही पर्याप्त नहीं, वरन् उसके लिए सद्गुणी, शिष्ट, ईमानदार, कर्त्तव्य परायण, साहसी, विवेकशील, अनीति के विरुद्ध लोहा लेने का शौर्य एवं कठोर श्रम करने का उत्साह भी अनिवार्य अंग है। जब तक इन गुणों का विकास न हो, तब तक कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में कदापि धर्मात्मा कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता।

हमें जन-साधारण को धर्म का वास्तविक स्वरूप समझाना पड़ेगा और बताना पड़ेगा कि सुख शान्ति का एक मात्र अवलम्बन धर्म ही है। जो धर्म की रक्षा करता है, उसकी रक्षा होती है और जो धर्म को मारता है-धर्म उसे भी मार ही डालता है। अधर्म के मार्ग पर न कोई अब तक फला-फूला है और न सुख शान्ति से रहा हैं। आगे भी यही क्रम अनन्तकाल तक चलता रहने वाला है। यह आस्था जब तक जन-मानस में गहराई तक प्रवेश न करेगी, तब तक मानव जाति की समस्याओं एवं कठिनाइयों का हल न हो सकेगा। हमें अच्छा मनुष्य बनना चाहिये। नेक मनुष्य बनना चाहियें और सशक्त मनुष्य बनना चाहिये। शक्ति, नेकी और व्यवस्था यह तीनों ही धर्म के गुण हैं। व्यक्तित्व का समग्र विकास ही धर्म का उद्देश्य है।

धर्म तन्त्र को सशक्त बनाना संसार की सबसे बड़ी सेवा है, ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है। हमें इसी के लिये कटिबद्ध होना चाहिये। अपने समय और धन का एक अंश नियमित रूप से इस कार्य के लिये लगाना चाहिये। रोटी कमाने और बच्चे पैदा करने तक ही जो जीवन सीमित रह गये, उन्होंने नर तन पाने का महत्व नहीं समझा यही कहना पड़ेगा। ऐसे अभागे लोग अपनी दुर्बुद्धि पर हाथ मल-मल कर पश्चाताप करते हुये ही विदा होंगे। अच्छा हो हम समय रहते चेतें। अपने को धर्म परायण बनाने और जन-मानस में धर्म धारणा उत्पन्न करने के लिये ऐसा प्रयास करें, जिससे अपना आत्मा संतुष्ट हो और दूसरे लोग प्रकाश एवं प्रेरणा प्राप्त करके, कल्याण मार्ग पर अग्रसर हो सकें। ऐसी ही गतिविधि अपनाना हमारे लिए उचित है।

वह जो आपको ही करना है-

हम संगठित रूप से दुस्साहसपूर्ण कदम उठाने चलें हैं। इसके लिये आवश्यक शौर्य एवं साहस हमें एकत्रित करना ही होगा। कितनी ही व्यस्तता एवं कठिनाई क्यों न हो हमें यह व्रत ले ही लेना चाहिये कि धर्म कि अभिवृद्धि करना भी हमारे जीवन का एक आवश्यक, अनिवार्य एवं अविभाज्य अंग है। अतीव उपयोगी एवं लाभदायी कार्यों में ही एक कार्य धर्म सेवा को भी समझेंगे और उसके लिए किसी भी कठिनाई का सामना करते हुए कुछ समय नियमित रूप से लगाते रहेंगे। जीवन यज्ञ की सफलता समय दान की आहुतियों पर निर्भर है। हमें इस पवित्र कर्त्तव्य से विमुख नहीं ही होना चाहिये।

अप्रैल की अखण्ड-ज्योति में पृष्ठ 45 से 52 तक 10 आवश्यक कार्यों की पूर्ति के लिए परिजनों का आह्वान किया गया है। उनकी ओर हम में से प्रत्येक को पूरा-पूरा ध्यान देना चाहिए और प्रस्तुत कार्यक्रमों में से जो कुछ बन पड़े उसके लिए अधिकारिक उत्साह प्रदर्शित करना चाहिए।

ता0 15 मई से 30 मई तक होने वाला धर्म प्रचारक शिविर, 31 मई से 14 जून तक होने वाला लेखन शिक्षण शिविर तथा 17, 18, 19 जून का सामाजिक क्रान्ति सम्मेलन अपने ढंग के अनोखे हैं। इनमें सम्मिलित होने के लिये प्रबुद्ध परिजनों को-विशेषतया प्रतिनिधि उत्तराधिकारियों को अभी से तैयारी करनी चाहिए। विवाहोन्माद के उन्मूलक तथा आदर्श विवाहों के प्रचलन का जो धर्मयुद्ध आरम्भ किया जा रहा है, वह यद्यपि गान्धी जी के नमक सत्याग्रह की तरह एकाँगी है पर धीरे धीरे सामाजिक एवं बौद्धिक क्रान्ति प्रचण्ड दावानल के रूप परिणत होगी और तब तक जलती रहेगी, जब तक कि वर्तमान की समस्त दुष्प्रवृत्तियाँ जल-बल कर उसमें भस्म न हो जायँ। इस युग के इस महान् धर्म युद्ध का- महाभारत का नेतृत्व करने के लिए मनस्वी धर्म सैनिकों की आज अत्यधिक आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इसकी पूर्ति के लिये परिवार के कर्मठ व्यक्तियों को साहसपूर्वक आगे बढ़कर आना चाहिये।

युग नेतृत्व का आह्वान-

समय आ पहुँचा, जब जन नेतृत्व का भार धर्म तन्त्र के कंधों पर लादा जायगा। धर्म क्षेत्र में काम करने वाले व्यक्ति नव-निर्माण की वास्तविक भूमिका का सम्पादन करेंगे। मानव जाति को असीम पीड़ाओं से उन्मुक्त करने का श्रेय इसी मोर्चे पर लड़ने वालों को मिलेगा। इसलिए युग पुकारता है कि प्रत्येक प्रबुद्ध आत्मा आगे बढ़े, धर्म के वर्तमान स्वरूप को परिष्कृत करे, उस पर लदी हुई अनुपयोगिता की मलीनता को हटाकर स्वच्छता का वातावरण उत्पन्न करें। इसी शस्त्र से प्रस्तुत विभीषिकाओं का अन्त किया जाना संभव है, इसीलिये उसे चमकती धार वाला तीक्ष्ण भी रखना ही पड़ेगा। जंग लगे व भोंथरे हथियार अपना वास्तविक प्रयोजन हल कहाँ कर पाते हैं। धर्म तन्त्र का आज जो स्वरूप है, उससे किसी को कोई आशा नहीं हो सकती हैं। इसे तो बदलना-पलटना एवं सुधारना अनिवार्य ही होगा।

सुधरे हुये धर्म तन्त्र का उपयोग, सुधरे हुये अन्तःकरण वाले प्रबुद्ध व्यक्ति, सुधरे हुये ढंग से करें तो उससे विश्व संकट के हल करने और धरती पर स्वर्ग-नर से नारायण अवतरण करने का अभीष्ट उद्देश्य पूरा होकर ही रहेगा। सुधरी हुई परिस्थितियों की गंगा का अवतरण करने के लिये आज भागीरथों की अनेकों आवश्यकता हैं। यह आवश्यकता कौन पूरी करें? माता भारती हमारी ओर आशा भरी आँखों से देखती है। अन्तरिक्ष में उसकी अभिलाषा इन शब्दों में गूँजती है-

जना करती हैं, जिस दिन के लिए सन्तान सिंहनियां

मेरे शेरों से कह देना कि वह दिन आ गया, बेटा॥

युग पुकार के अनुरूप क्या प्रत्युत्तर दिया जाय, यह हमें निर्णय करना ही होगा और उस निर्णय का आज ही उपयुक्त अवसर हैं।


VigyapanSuchana

प्रतिनिधियों एवं उत्तराधिकारियों को सामाजिक क्रान्ति सम्मेलन का विशेष निमंत्रण

युग-निर्माण की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति परिवार अगले दिनों ऐतिहासिक कदम उठाने जा रहा हैं। उस अवसर पर हम अपने सभी प्रतिनिधियों एवं उत्तराधिकारियों से विशेष परामर्श करना चाहते हैं। अतएव 17, 18,19 जून को उन्हें मथुरा पधारने के लिये इन पंक्तियों द्वारा सादर आमंत्रण भेजते हैं।

तारीख अभी से नोट कीजिए-तैयारी अभी से आरंभ कीजिए

-श्रीराम शर्मा आचार्य


सस्ती, सुन्दर श्रेष्ठ एवं उपयोगी पुस्तकें

मानवी जीवन को आनन्द मय, एवं सुविकसित बनाने के लिए, अनुभवपूर्ण प्रशिक्षण इन पुस्तकों में दिया गया है। प्रस्तुत ज्ञान को अपना कर पाठक अपने भविष्य को उत्कृष्ट बनाने की दिशा में, आशा जनक प्रगति कर सकते हैं।

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दीर्घ जीवन के रहस्य

उन्नति का मूलमन्त्र ब्रह्मचर्य

आसन और प्राणायाम

क्या खायें? क्यों खायें?

दूध की आश्चर्यजनक शक्ति

यौवन चिरस्थायी कैसे हो?

पंचतत्वों से सम्पूर्ण रोगों का निवारण

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स्त्री रोगों को चिकित्सा

बाल रोगों की चिकित्सा

नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा

घरेलू चिकित्सा विज्ञान

सूर्य चिकित्सा विज्ञान

प्राण चिकित्सा विज्ञान

स्वप्नदोष की चिकित्सा

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पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि

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श्री, समृद्धि, सफलता और सिद्धि दायक अलभ्य साहित्य

परकाया प्रवेश

मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा

वशीकरण की सच्ची सिद्धि

जीव जन्तुओं की भाषा

ईश्वर कौन है? कहाँ है? कैसा है?

क्या धर्म? क्या अधर्म?

गृहस्थ योग

हस्तरेखा विज्ञान

आकृति देखकर मनुष्य की पहचान

अमृत पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति

धनवान बनने के गुप्त रहस्य

मित्रभाव बढ़ाने की कला

चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग

दाम्पत्ति जीवन का स्वर्ग

हम वक्ता कैसे बनें?

लेखक बनने की कला

शिखा और सूत्र की विवेचना

वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ

सफलता के तीन साधन

मनुष्य शरीर की बिजली के चमत्कार

दस रुपये से कम मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ। इससे कम लेने पर डाक खर्च मंगाने वाले को देना होगा, जो पुस्तकों के मूल्य से लगभग एक चौथाई और बढ़ जाता है।

पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।


नये क्षितिज पर पुनः उदित हो


नये क्षितिज पर पुनः उदित हो (Kavita)

जीवन के इस विषम-क्षेत्र को, सम कर-चरण धरो!

प्रेम-शान्ति समता के जलधर-बन, संचरण करो!!

युग का पथ कंटकाकीर्ण अति, तम छाया भारी।

पथ प्रशस्त करना ही होगा, सुन्दर-सुखकारी॥

तुम हो कवि, युग के निर्माता! सृष्टा, सत्य-पुजारी।

करो प्रज्वलित चेतनता की, नव-मशाल शुभ प्यारी॥

नई क्रान्ति के लिए आज -फिर, नव-उपकरण धरो।

गत से ले विश्वास, अनागत का अनुकरण करो॥

कथनी तज, करना कुछ होगा-नया समाज बनाने।

बढ़ना होगा भेद-भाव तज, मानवता अपनाने॥

प्रान्त-देश की सीमाओं में, बँधे अगर अनजाने

तो उद्धार असंभव, देखो सुमन लगे मुरझाने॥

आज एकता सोमनस्य का, मत अपहरण करो!

कटुताओं का विष विश्व-सम पी, जग संभरण करो!!

नये क्षितिज पर पुनः उदित हो, नूतन-सा दिनमान।

श्रम की भागीरथी प्रवाहित हो, कर कल-कल गान॥

‘अब आराम हराम’ न कर लें-जब तक नव-निर्माण।

गूँज उठे घर-घर यह नारा, हो नभ का अवसान॥

मृत्युञ्जय तुम, आज मृत्यु का हँस-हँस वरण करो।

बलिवेदो को सिर-सुमनों से भर, निज चरण धरो॥

-रामस्वरूप खरे

*समाप्त*