मनुष्य के सारे अच्छे बुरे कार्यों का साक्षी उसका अन्तःकरण ही है। अन्तःकरण के निर्णय की अवहेलना करके जो मनमानी करता है वह अवश्य ही अपने लिए विनाश के बीज बोता है।
मानव का अन्तःकरण उसके शरीर कोई अवयव मात्र नहीं है। वह मानव शरीर में ईश्वर का प्रतिनिधि है जो हर समय मनुष्य के कर्मों का लेखा जोखा तैयार किया करता है। मनुष्य का अन्तःकरण एक ऐसा अलौकिक यन्त्र है जिसके माध्यम से ईश्वर मनुष्य के लिए अपना सन्देश भेजा करता है। मनुष्य से वार्तालाप करता है। अब यह मनुष्य का अपना दुर्भाग्य है कि वह इस ईश्वरीय यन्त्र की कद्र न करके दूषित बना देता है जिससे वह दिव्य सन्देश को नहीं सुन पाता।
जिस प्रकार पवित्र निर्विकार एवं निर्मल अन्तःकरण ईश्वर का सन्देश वाहक है उसी प्रकार मलिन एवं दूषित अन्तःकरण पैशाचिकता का केन्द्र है नारकीय खण्डहर है जिसमें पापात्माओं की प्रेतवाणी गूँजती रहती है जो मनुष्य को पतन की ओर ही प्रेरित करती है।
-ऋषि तिरुवल्लुवर
आर्द्र संतानता त्याग कार्य वाक् चेतसाँ दम। स्वार्थ बुद्धि परार्थेष पर्याप्त मितिसद् व्रतस्॥
कोमलता, कृपा का बर्ताव, उदारता, शरीर, वाणी, मन को पाप कर्मों से बचाना, पुण्य कार्यों को अपने ही समझकर उनके बनाने का प्रयत्न करना, इतना सदाचार काफी है।
आहार शयनाष्ब्रह्मचर्यै युक्त्या प्रयोजितैः। शरीरं धार्य ते नित्यमागार मिवधारणैः॥
आहार, नींद, मैथुन ये तीन बातें शरीर के धारण में कारण हैं, जैसे खम्भे मकान को धारण किये रहते हैं।
सत्यवादिनमक्रोधमध्यात्म प्रवणेन्द्रियम। शान्तं सद्वृत्त निरतं विद्यान्निप्यं रसायनम्॥
सत्यवादी अक्रोधी, जितेन्द्रिय, शान्तचित्त, सदाचारी ऐसे लक्षण वाला पुरुष नित्य ही मानो रसायन सेवन करता है।
यथा खरश्चन्दन भारवाही,भारस्य वेत्तानतुचन्दनस्य।
एवंहि शस्त्राणि, बहून्यधीत्य, चार्थेषु मूढाःखरवद् वहंति॥
जैसे गधे पर चन्दन लदा हो तो वह उसको बोझ ही समझता है, चन्दन नहीं समझता। इसी प्रकार बहुत से शास्त्र पढ़ लिये पर वास्तविक अर्थ नहीं समझा तो वह गधे के समान बोझ ढोना ही है।
ईर्ष्या भय क्रोध परिक्षतेन लुब्धेन शुग् दैन्यनिपीडितेन।
प्रद्वेषयुक्तेन च सेव्यमान मन्नं न सम्यक परिपाकमेति॥
डाह (जलन) भय, क्रोध से युक्त अन्य की बढ़ती देखकर दुखी, लोभी, चिन्तित, दीनतायुक्त द्वेषी- ऐसे पुरुष को खाया हुआ अन्न भली प्रकार नहीं पचता।
इन्द्रियाणाँ विचरताँ विषयेष्वपहारिषु ।
संयसे यत्न मातिष्ठेद् विद्वान् यन्तेववाजिनान्॥
जिस प्रकार सारथी अपने रथ के घोड़ों को वश में रखता है, वैसे ही विद्वान विषयों में दौड़ने वाली इन्द्रियों को यत्नपूर्वक वश में रखे।
न जातु कामः कामानामुप भोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते॥
कभी विषयों के उपभोग से इच्छा शान्त नहीं होती भोगने से वह इस प्रकार बढ़ती है कि जैसे घृत की आहुति से अग्नि।
वेदास्त्यागश्च यज्ञाश्च नियमाश्च तपाँसि च।
न विप्र दुष्टभावस्य सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित॥
वेद, त्याग, यज्ञ, नियम और तप यह सब भी दुष्ट भाव वाले विषयी मनुष्य को कदापि सिद्धि नहीं देते।
वशे कृत्येन्द्रिय ग्रामं सयम्व च मनस्तया। सर्वान् संसाधयेदर्थान क्षिण्वन्योगतस्तनुम॥
इन्द्रियों को वश में करके मन को रोक कर शरीर को पीड़ा न देकर सम्पूर्ण अर्थों (प्रयोजनों) की सिद्धि करे।
दशकामः समुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च। व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत् ॥
दश प्रकार का कामज और आठ प्रकार का क्रोधज यह 18 प्रकार को व्यसन है। इन (परिणाम में हानि-कारक) व्यसनों को तुरन्त यत्न पूर्वक त्याग देवे।
मृगया ष्क्षोदिवास्वप्नः परि वादः स्त्रियोमदः। तौर्यत्रिकं वृथाढय़ा च कामजोदशको गणः।
शिकार खेलना- जुआ- दिनका सोना- निन्दा- स्त्रियों में अधिक आसक्ति,- शराब आदि का नशा- नाच, गाना- अति- वृथा भ्रमण, ये 10 कामज व्यसन हैं।
पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्याऽसूयार्थ दूषणम्। वाग्दण्डञ्च पारुष्यं क्रोध जोऽपि गणोष्टकः॥
चुगलखोरी, उतावलेपन से काम करना, द्रोह (दूसरे का अनिष्ट चिन्तन) असूया (किसी के गुण में दोष लगना) किसी के धन को हर लेना, वाणी और दण्ड की कठोरता-ये 8 क्रोध से उत्पन्न होने वाले व्यसन हैं।
चील अपने शिकार की खोज के लिये आसमान की ओर उड़ान भरती हैं। एक निश्चित ऊँचाई पर जाकर वह गोलाई में चक्कर लगाना प्रारम्भ करती है। वहाँ से उसे अधिक दूर-दूर तक की चीजें देखने में सुगमता मिलती हैं। चील उस ऊंचाई से जमीन की प्रत्येक दृश्य वस्तु को बड़ी सूक्ष्मता से परखती है और जब उसे अपने शिकार का पता चल जाता है तो वह तेज झपट्टा मारकर उसे पकड़ ले जाती है।
चील यह कार्य जमीन में या कम ऊंचाई वाले वृक्षों पर बैठकर भी कर सकती थी, पर छोटी ऊंचाई से छोटे स्थान का ही अवलोकन किया जा सकता हैं। छोटी-सी जगह में शिकार मिले या न मिले, इस सन्देह से बचने के लिये ही व ऊंचे उड़ती, नीचे देखती और आसानी से अपना शिकार ढूँढ़ लेती है।
मनुष्य की स्थिति भी ठीक ऐसी ही है। अपने आस-पास की वस्तुओं को वह स्थूल आँख और छोटे विवेक से परखता है, इसलिये मनुष्य जीवन में आने का वह अपना लक्ष्य अधिक निश्चयपूर्वक खोज नहीं पाता। अपने जीवनोद्देश्य से अपरिचित रहे व्यक्ति का तौर-तरीका, रहन-सहन और विचार-व्यवहार भी प्रायः अस्त-व्यस्त श्रेणी के होते हैं। जिस मनुष्य ने सही लक्ष्य का ज्ञान प्राप्त न किया हो, उसका जीवन व्यर्थ ही समझना चाहिये।
ईश्वर उपासना से मनुष्य को वह स्थिति प्राप्त होती है जहाँ से वह अधिक सूक्ष्मता, दूरदर्शिता एवं विवेक के साथ संसार और उसकी परिस्थितियों का निरीक्षण करता है। अपने ही क्षुद्र अहंकार से संसार की तुलना करने से मनुष्य के प्रत्येक कार्य में संकीर्णता रहती है और संकीर्णता, के कारण आत्मा अपनी विशालता का अपनी शक्ति और सामर्थ्य का आनन्द नहीं लूट पाती। मनुष्य तुच्छ-सा बना रहता है, ठीक उसी तरह जिस तरह सृष्टि के अन्य जीव-जन्तु। आत्मा के सच्चे स्वरूप के ज्ञान के लिये वह ऊंचाई अपेक्षित है जो ईश्वर उपासना से मिलती है। सही लक्ष्य का ज्ञान उस स्थिति का बार-बार मनन किये बिना प्राप्त नहीं होता।
जब भी कोई ईश्वर उपासना के लिये तत्पर होता है तो वह इस आधार को लेकर ही चलता है कि इस संसार की कोई मुख्य नियामक शक्ति अवश्य होनी चाहिये। प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई रचयिता होता हैं, विश्व का तब सृजनहार भी अवश्य कोई होगा। जब इस तरह की मान्यता अन्तःकरण में उदय होती है तो तत्काल मनुष्य के सोचने के ढंग में परिवर्तन होता है। जब तक वह जिन वस्तुओं से अनावश्यक लगाव रख रहा था अब उनके प्रति कौतूहल पैदा होता है। अब तक जो वस्तुयें उसे सामान्य-सी प्रतीत होती थी अब उनमें विशद विज्ञान भरा पड़ा दिखाई देने लगता हैं। इस तरह मनुष्य का ज्ञान विकसित होता है और विश्व के सच्चे रूप को जानने की छटपटाहट भी। यह दोनों बातें मनुष्य के सही लक्ष्य के चुनाव के लिये आवश्यक थीं। दोनों ही ईश्वर उपासना से मिलती हैं।
उदाहरणार्थ सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, सागर, नदियाँ, पहाड़ आदि प्राकृतिक वस्तुयें, जिन्हें साधारण मनुष्य यों ही देखकर छोड़ देते हैं, ईश्वर उपासक उन्हें विराट् रूप में देखता है। वह सोचता है कि इतना बड़ा संसार बना कैसे, यह पदार्थ क्या है, यह शरीर कहाँ से आया और इसके भीतर निवास करने वाले अहंकार का स्वरूप क्या है? उपासना का स्तर जितना विकसित होता हैं गूढ़ प्रश्न उतने ही अधिक मात्रा में प्रस्फुटित होते हैं। विचार करने की क्षमता भी उसी अनुपात में बढ़ती है और यह निश्चय है की तब मनुष्य अपने जीवनोद्देश्य की समीपता की ओर भी तीव्रता से अग्रसर होने लगता है।
साधारण व्यक्ति इस संसार के भौतिक पदार्थों में सुख ढूँढ़ते हैं, ज्ञान का उनकी दृष्टि में कोई महत्व नहीं होता, पर इससे मनुष्य जीवन में विकार पैदा होते हैं। बुराइयाँ आती और कठिनाइयाँ बढ़ती हैं। जब तक मनुष्य भौतिक सुखों में भटकता है तब तक वह अपने परेशानियाँ ही बढ़ाता है। उसे यह ज्ञान नहीं होता कि सुख और दुःख में अन्तर क्या है? सुख समझकर भोगी जाने वाले भोग और इन्द्रियाँ ही जब मनुष्य की मृत्यु का कारण बन जाती हैं, तब यह पता चलता है कि आत्म-अज्ञानता के कारण ही यह स्थिति आई और उसका निराकरण एक ही तरीके से संभव है-उसी का नाम है ईश्वर उपासना, जहाँ से ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है।
ईश्वर उपासना में लगी हुई बुद्धि मनुष्य में इतना विवेक भरती है जिससे वह संसार की क्षुद्र वासनाओं से बचने का प्रयत्न करता है और विश्व के सर्वोच्च सत्य को पहचानने का प्रयत्न करता है। सच्चाई का अनुभव किये बिना सुख कहाँ? अज्ञान तो मनुष्य के दुःख का ही कारण बताया गया है।
अपनी आँख से अपनी आँख को देख पाना बड़ी कठिन बात हैं। जब कोई ऐसी आवश्यकता पड़ती हैं तो दर्पण ढूँढ़ते हैं और उसके माध्यम से आँख की स्थिति का पता लगाते हैं। मनुष्य इसी तरह अपने भीतर ही बैठकर अपनी स्थिति का सही अन्दाज नहीं लगा सकता। अपनी जानकारी ही पर्याप्त नहीं, अपने पास-पड़ोस की वस्तुयें, वह परिस्थितियाँ जिनसे मनुष्य प्रतिक्षण प्रभावित होता है उनकी भी जानकारी आवश्यक है। इन सब का ज्ञान किसी सबसे ऊँची जगह पर बैठकर ही किया जा सकता है। वह स्थिति ब्रह्म ही हो सकती है। ब्रह्म की अनुभूति के साथ-साथ ही संसार के सच्चे ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है।
ईश्वर उपासना का अर्थ है- अपने आपको विकसित करना। चील की तरह ऊपर उठकर अपनी निरीक्षण वृत्ति को चौड़ा करना। जो जितनी ऊँचाई पर उठकर देखता है उसे उतना ही दूरदर्शी, विवेकवान समझा जाता है। जब सारी वस्तुओं की स्थिति का सही पता चल जाता है तो फिर यह कठिनाई नहीं रहती कि किसे चुनें, किसे न चुनें। इस प्रकार का ज्ञान पैदा हुये बिना मनुष्य अपनी जिन्दगी सुख पूर्वक बिता नहीं सकता।
साधारणतया मनुष्य शरीर को ही सब कुछ मानते हैं और सारा जीवन इस शरीर की इन्द्रिय लिप्सा को शान्त करने में ही बिता देते हैं। इतने से लौकिक आवश्यकता, संभव है किसी हद तक पूरी हो जाती हो, किन्तु परलोक बिलकुल भूला हुआ-सा रह जाता हैं। परलोक की मान्यतायें सर्वथा निराधार है, ऐसा कहा भी नहीं जा सकता। विज्ञान सिद्ध कर रहा है कि अन्य ग्रहों में भी जीवन संभव है। ऐसी स्थिति में स्वर्ग और नर्क की कल्पना का भी कुछ आधार होना ही चाहिये। इस आधारभूत ज्ञान के लिये लौकिक जीवन ही पर्याप्त नहीं वरन् अपने भीतर के चेतन तत्व पर विचार-दृष्टि डालना भी आवश्यक है। इस आन्तरिक चेतना के लिये ब्रह्म दर्पण है। ईश्वर की मान्यता में व्यक्ति अपने निजत्व को पहचानने का प्रयत्न करता है और उसके सहारे पारलौकिक जीवन का भी ज्ञान प्राप्त करता है।
परमात्मा से तादात्म्य होना आत्मा को विशाल बनाने की महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। अहंकार मिटाये बिना मनुष्य का पारलौकिक हित सम्पन्न नहीं होता। मनुष्य जब अपने आप को भुलाता हैं तो वह सम्पूर्ण विश्व को ही आत्म-स्वरूप में देखने लगता है। सब उसे अपने ही नाना रूप दिखाई देते हैं। जब सब अपने होंगे तो फिर किसी के साथ न तो छल होगा न कपट, न क्रोध आयेगा, न प्रतिशोध की भावना। सबके सुख में सुख मिलेगा। सब प्यारे लगेंगे, सब अपने सम्बन्धी से जान पड़ेंगे।
इस आन्तरिक विशता में ही जीवात्मा को सच्चा आनन्द, सच्चा संतोष और सच्ची तृप्ति मिलती है। यह स्थिति पाकर मनुष्य का जीवन सार्थक हो जाता है। मनुष्य आनन्द से उत्पन्न हुआ था, पर बीच में मार्ग भटक जाने के कारण वह दुःखग्रस्त हो गया था। अब फिर से सही रास्ते पर जाने और अन्त में उसी आनन्द में विलीन हो जाने के लिये ईश्वर को जानना आवश्यक हुआ। परमात्मा सम्पूर्ण दृष्टि का मूल है। उसे जानने से ही आन्तरिक प्यास की बुझती है, संतोष मिलता है और सद्गति मिलती है। इससे अन्यत्र आत्म-कल्याण का मार्ग नहीं। परमात्मा की शरणागति पाये बिना मनुष्य जीवन जैसा बहुमूल्य अवसर भी बेकार में ही बीत जाता है।
दुःख का एक कारण है अज्ञान। अज्ञान-अर्थात् किसी वस्तु के वास्तविक स्वरूप को न जानना। वास्तविक का ज्ञान न होने से ही मनुष्य गलती करता है और दंड पाता है। यही दुःख का स्वरूप है अन्यथा परमात्मा न किसी को दुःख देता है न सुख। वह निर्विकार है, उसकी किसी से शत्रुता नहीं जो किसी को कष्ट दे, दंड दे।
प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है, इसलिये वह उपासनीय है। परमात्मा प्रकाश रूप में, ज्ञान रूप में ही सर्वत्र व्याप्त है। जो उसे इस रूप में जानते और भजन करते है, उनका अज्ञान दूर होता है। अज्ञान दूर होने से मनोविकार मिटते है, दोषपूर्ण कार्य नहीं होते, फल स्वरूप उन्हें किसी प्रकार की यातना भी नहीं भुगतनी पड़ती। ज्ञानवान परमात्मा की सृष्टि को मंगलमय रूप में देखता है। उसके लिए इस सृष्टि में आनन्द ही आनन्द होता है।
भारतीय-संस्कृति में दीपक का जो असाधारण महत्व है, वह इसी दृष्टि से है। दीपक जीवन के ऊर्ध्वगामी होने, ऊँचे उठने और अन्धकार को मिटा डालने की प्रेरणा देता है। कार्य में प्रतिष्ठित होता है। भावार्थ यह है कि मनुष्य इसलिये वह प्रत्येक मंगल प्रकाश की व्याख्या को समझे। संसार में जो अंतर्निहित ज्ञान है, उसे अपने हृदय में प्रवेश होने दे। जब तक मनुष्य के लिये यह सत्य प्रकट नहीं होता तब तक उसके जीवन का कुछ मूल्य नहीं होता। दीपक कहता है कि तुम्हारे अन्दर जो प्राण जलता है, जो सत, चित और आनन्दमय है, तुम उसे ढूँढ़ो जानो और अपने जीवन के अभावों को दूर कर लो। प्रकाश में सब कुछ साफ और स्पष्ट दिखाई देता है। भय नहीं लगता। ज्ञान से मनोविकार शान्त होते हैं और साँसारिक शूल मिटते हैं। इसलिये जब यह कहा जाता है कि दीपक की उपासना करो तो उसका संकेत ज्ञान की उपासना ही होती है। ज्ञान-अर्थात् प्रकाश ही परमात्मा का दिग्दर्शक स्वरूप है इसलिये प्रकाश की पूजा परमात्मा की ही पूजा हुई।
प्रकाश ही एक तत्व है जो विभक्त होकर दृश्य और दृष्टा बन गया है। वह परमात्मा भी है और मनुष्य शरीर में प्रतिष्ठित आत्म चेतना भी। ऋग्वेद का मन्त्र-द्रष्टा लिखता है-
अयं कविरकविषु प्रचेता-
मतेप्वग्निरमृतो नि धायि।
समानो अत्र जुहुरः सहस्वः
सदा त्वे सुमनसः स्याम॥
-ऋग्वेद 7। 4। 4
अर्थात्-हे प्रकाश रूप परमात्मन्! तुम अकवियों कवि होकर, मृत्यों में अमृत बनकर निवास करते हो। हे प्रकाश स्वरूप! तुम से हमारा यह जीवन दुःख न पाये। हम सदैव सुखी बने रहें।
विश्व में व्याप्त परम-तेज की गाथा ऋषि दार्शनिकों ने पग-पग पर की है। माण्डूक्य उपनिषद् में सृष्टि और तेज दोनों को कार्य और कारण माना है। सृष्टि फल है तो प्रकाश उसका बीज। दोनों एक दूसरे में लिपटे हुये हैं। न प्रकाश से संसार विलग है, न संसार से प्रकाश अलग है। दोनों प्रेम और परमात्मा की तरह दो दिखाई देते हुये भी एक रूप है।
पर हम उस पूर्ण प्रकाश को देख नहीं पाते, क्यों? इसलिये कि हमारा गमन अन्धकार की ओर है। अन्धकार अज्ञान का वैसा ही प्रतीक है जैसे ज्ञान का प्रकाश। वाह्य जीवन में बुरी तरह भटके होने का नाम अज्ञान है। आन्तरिक सत्य को न ढूँढ़ कर भौतिक सुखों से चिपटे हुये हैं। उन्हें छोड़ने का जी नहीं करता वह अन्धकार की ओर बढ़ना हुआ। अँधियारे में साफ नहीं सूझता। कहीं पत्थर से टकरा जाते हैं, कहीं ऊँचे-नीचे में लड़खड़ा जाते हैं। पाँव को काँटा चुभ जाता हैं तो कहीं फिसल कर गिर पड़ते हैं। अन्धकार के गर्भ में दुःख ही दुःख भरा है, इसलिये वह अवाँछनीय है, घृणित और त्याग देने योग्य है।
अग्नि में यह शक्ति है कि वह लोहे के किसी भी टुकड़े को पिघला कर टुकड़ा-टुकड़ा कर दे या अनेक टुकड़ों को जोड़कर एक कर दे। कण कण में जीवन बिखेरने या उन्हें समेट कर एक कर देने का कार्य प्रकाश द्वारा होता है।
वह वाह्य और अन्तरंग दोनों कक्षाओं में प्रतिष्ठित हैं पर उसका बाह्य स्वरूप स्थूल और भ्रामक है। इसलिये वह अन्धकार कहलाया और उससे बचकर चलने की प्रेरणा दी गई। इसमें वस्तुओं का स्वरूप बदलता रहता है, स्थिरता नहीं होती पर आकर्षण होता है। इसलिये मनुष्य उसकी ओर जल्दी खिंच जाता है, पर जब उसका रूप बदल जाता है तो उसे दुःख का अनुभव होता है। किन्तु जो आन्तरिक स्वरूप हैं वह अपरिवर्तनशील और चिर सत्य हैं। उसे ढूंढ़ने से परिवर्तनशील जगत के सुख भी भोगने को तो मिलते रहते हैं, पर उनमें आसक्ति न होने से दुःख का आभास नहीं होता। सामान्य दृष्टि से उसके कार्य-कलाप भी अन्य लोगों जैसे ही होते हैं किन्तु आन्तरिक दृष्टि से वह पूर्ण शान्त, स्थिर चित्त तथा पूर्ण आनन्द की अवस्था में होता है। प्रकाश के कारण वह अज्ञान-मूलक कर्मों में भटकता नहीं।
साँसारिक भोगों को अज्ञान कहा गया है। इसमें स्थिरता नहीं होती। इनका रूप बदलता रहता है जो लोग इनके पीछे-पीछे चलते हैं, उन्हें तरह-तरह के नाच नाचने पड़ते हैं, पर आन्तरिक प्यास बुझती नहीं। सूर्य की विपरीत दिशा में छाया की ओर बढ़ने पर न तो छाया ही हाथ आती है और सूर्य भी दूर हटता जाता है। पर जब सूर्य की ओर बढ़ते हैं तो रास्ता भी साफ दिखाई देता है, सूर्य की समीपता अनुभव करते हैं और भोग-रूपी छाया भी पीछे-पीछे चलने लगती है। जिस प्रकाश के न होने से मार्ग भ्रम हो जाता है, वह यह आत्म ज्ञान या ईश्वर-प्राप्ति ही है। इसलिये प्रार्थना की जाती है -
तव त्रिधातु पृथिवी उतद्यौर्वैश्वानर
व्रतमग्ने सचन्त।
त्वम भास रोदसी
अततन्थजस्त्रेण शोचिषा शोशुचानः॥
-ऋग॰ 7। 5। 4
अर्थात्-”हे वैश्वानर देव! यह पृथ्वी अन्तरिक्ष तथा द्युलोक तुम्हारा ही अनुशासन मानते हैं। तुम प्रकाश द्वारा व्यक्त होकर सर्वत्र व्याप्त हो। तुम्हारा तेज ही सर्वत्र सद्भासित हो रहा है, हम तुम्हें कभी न भूलें।”
ईश्वर-उपासना की आवश्यकता यों है कि उस सत्य को भुला न दिया जाय। वह सामने रहेगा तो अन्धकार का जीवन में प्रवेश न हो सकेगा। काम, क्रोध, लोभ, मनस्ताप, दुश्चिन्ता, अशक्तता, आलस्य सब उस प्रकाश को देखकर भाग जाते हैं। वह जहाँ रहता है वहाँ कष्ट नहीं होते, दरिद्रता नहीं होती। दुर्बलता दूर रहती है। आसक्ति परेशान नहीं करती। कर्त्तव्य ही उसका जीवन बन जाता है। वह निर्भय होकर रहता है।
नीराजन, दीपदान या आरती की भावना इस आत्मदान की ही उद्बोधक हैं। मैं जो कुछ हूँ , वह तेरे लिये हूँ, तुझे समर्पित हूँ ऐसी भावना उस ईश्वर की आरती में है। यह जो प्रकाश है, उसे हाथों द्वारा मुख और मस्तिष्क में धारण करते हैं। उसमें एक ही तथ्य सन्निहित है कि तुम्हारा तेज हमसे दूर न रहे। तुम मुझ में ओत-प्रोत रहो। मुझ में कान्ति बन कर मेरा मार्ग-दर्शन करते रहो। यह मंगल भावना अनिष्टों से बचाने वाली और क्लेशों से छुड़ाने वाली है।
प्रकाश की अन्तश्चेतना में सत्य और चेतना के साथ सौंदर्य भी है। अज्ञान अन्धा और कुरूप है, उस पर सदैव प्रकाश शासन किया करता है। व्यवहारिक जीवन में ही ज्ञानवान ही अज्ञानियों पर विजयी होते हैं। ज्ञान का ही सर्वत्र आदर होता है वह इसी रूप में हैं। सौंदर्य सबको मधुर और प्यारा लगता है। सब उसकी ओर आकर्षित होते हैं और उसके समीप कुछ क्षण बिताने का जी करते हैं। अपने इस रूप में वह लौकिक सुखों का भी दाता बन जाता है।
अपने लिये वह किसी भी रूप में हो, पर आवश्यक है। वह न रहेगा तो साँसारिक व्याधियाँ अवश्य सतायेंगी। मद, मोह और मत्सर जरूर परेशान करेंगे। यदि ऐसा हुआ तो परमात्मा की यह सृष्टि दुःख रूप हो जायेगी और मनुष्य शरीर पाने का कोई उद्देश्य पूरा न होगा। परमात्मा मंगलमय है, उसकी सृष्टि भी मंगलमय है। इस मंगलदाय जगत में सुखोपभोग के लिये हम आकाश से उतर कर आये हैं। उसे भोगें पर भटके नहीं। इसलिये यह आवश्यक हो जाता है कि अन्धकार की ओर न जाकर प्रकाश की ओर गमन करें। तब यह प्रकाश ही जीवन में आनन्द बनकर ओत-प्रोत हो जाता है।
परमात्मा की शरणागति और आन्तरिक सामर्थ्य के विकास की अनिवार्य प्रक्रियाओं में से हृदय शुद्धि प्रमुख है। ध्यान, धारणा, ब्रह्मचर्य, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि सबका प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आन्तरिक शुद्धि से ही सम्बन्ध है। परमात्मा पूर्ण शुद्ध है, सात्विक है। उससे मिलने के लिये आत्म-गति भी वैसी ही होनी चाहिये।
भावनाओं का निवास हृदय में माना जाता है। आत्मा का ब्रह्म तत्व में प्रवेश भी भावनाओं के माध्यम से होता है। भावनायें शुद्ध हों, इसके लिये यह आवश्यक हैं कि उनका मूल स्रोत भी शुद्ध हो। शुद्ध अन्तःकरण से प्रस्फुटित भावनायें ही शुद्ध हो सकती हैं और वे ही शाश्वत आनन्द की प्राप्ति करा सकती हैं।
हृदय की शुद्धि असंभव वस्तु नहीं है। प्राकृतिक नियम के अनुसार सर्वांश में किसी भी व्यक्ति में असमर्थता नहीं होती। कुछ नियम पालन करने से हृदय शुद्धि की समस्या हल हो सकती है। सामर्थ्य का दुरुपयोग न किया जाय तो हृदय शुद्धि स्वतः होने लगती है। इसलिये साधना की वह सभी अन्तरंग क्रियायें अनिवार्य हैं जिनसे सामर्थ्य का विकास होता है।
इन क्रियाओं को मूलतः दो भागों में बाँटते हैं-1. शारीरिक सामर्थ्य का विकास 2. संकल्प। प्रथक का मनुष्य के स्थूल रहन-सहन, आहार-बिहार आदि से सम्बन्ध है और दूसरा विचार और भावना पर आधारित है। जहाँ इन दोनों का मिलाप हो जाता हैं वहीं पूर्णता की स्थिति बन जाती है।
हृदय का सम्बन्ध शरीर की प्रकृति से है, इसलिये शारीरिक शुद्धता और शक्ति का विकास भी आवश्यक है। तात्पर्य यह है कि अन्नमय कोश के परिमार्जन के साधनों को छोड़कर आत्म-कल्याण की साधना संभव नहीं हो सकती।
प्राणायाम का हृदय की शुद्धि से सम्बन्ध है। उससे प्राणबल बढ़ता है और हृदय में दृढ़ता आती है। स्नायु-मंडल, रक्त शुद्धि, कोष्ठ शुद्धि आदि अनेकों शुद्धियों का सीधा सम्बन्ध प्राण साधना से हैं।
प्रत्याहार, उपवास का सम्बन्ध भी आन्तरिक सफाई और शुद्धता से है, इसलिए कोई व्यक्ति आहार में अनियमितता रखकर हृदय शुद्धि नहीं कर सकता। यह भी आवश्यक क्रियायें हैं उनका पालन भी जरूरी है।
शौच शुद्धि, स्नान, वस्त्रों की सफाई, व्यायाम, आसन आदि क्रियायें जिनका शरीर की प्राकृतिक शुद्धि और उसके सामर्थ्य विकास से कम या ज्यादा संबंध है, उनमें से कोई भी अग्रहणीय नहीं। छोटी-छोटी साधनायें मिलकर ही शरीर शुद्धि, हृदय की शुद्धि में सहायक होती हैं। इसलिए यह सभी ईश्वर प्राप्ति के उपयोगी तत्व हैं। जीवात्मा के ऊपर यह प्रकृति का आवरण चढ़ा हुआ है। उसका भेदन किये बिना कोई व्यक्ति केवल भावनाओं द्वारा ईश्वर को प्राप्त नहीं कर सकता क्योंकि प्रकृति शुद्ध हुये बिना हृदय से प्रस्फुटित होने वाले विचार पूर्ण एकाकी नहीं हो सकते कामनायें और वासनायें शान्त नहीं हो सकतीं। इच्छाओं के रहते हुए ब्रह्म की ओर प्रयाण कर पाना संभव भी नहीं हैं।
यद्यपि यह साधनायें भी संकल्प पर ही आधारित हैं, पर वे इतनी कठोर नहीं हैं जितना विचारधाराओं का प्रवाह मोड़ना कठिन होता है। इसलिए इन्हें आवश्यकता और स्थिति के अनुसार घटाया, बढ़ाया भी जा सकता हैं। ये साधनायें व्रत कहलाती हैं। व्रत यद्यपि संकल्प का ही रूप है, पर वह अपेक्षाकृत छोटा और कोमल होता है। उसमें परिवर्तन भी किया जा सकता है।
पर भावनाओं में किसी प्रकार की त्रुटि रखने से ईश्वर प्राप्ति में कठिनता आती है। उसके लिए मनुष्य का हृदय शुद्ध होना ही चाहिए। हृदय की शुद्धि के लिए अत्यन्त आवश्यक वस्तु है पूर्ण सत्यनिष्ठा। अपने भीतर छल, कपट नहीं होना चाहिए। विचार और वाणी, क्रिया और भावना में असंगति नहीं होना चाहिए। जो सत्य है उसे हृदय स्वीकार करे और साथ ही आचरण भी। सिद्धान्त जब तक व्यवहार रूप में प्रकट नहीं होते तब तक उनका कोई महत्व नहीं। भीतर बाहर एक जैसी स्थिति होनी चाहिए आदर्श कुछ और व्यवहार कुछ, इससे न भगवान प्रसन्न हो सकते हैं न आत्मा। अपने आप से, भगवान से कोई लुकाव-छिपाव न रखकर अपनी गतिविधियों में सीधी और उद्देश्यपूर्ण नजर रखनी चाहिये।
अब जब सत्यनिष्ठा आ जाय तो आत्म-दान की कक्षा में प्रवेश करना चाहिये। हृदय की शुद्धि में अहंकार का शेष रहना अपनी साधना को दूषित करना हैं। “मैं” ओर “मेरे” का भाव जब तक रहता है, तब तक आत्मोत्सर्ग की भावना दृढ़ नहीं होती। ईश्वर उपासक को “मेरा कुछ नहीं जो कुछ है सब तेरा है” की धारणा अपनानी पड़ती है। यह धारणा जितनी बलवती होती है, उतनी ही विनम्रता आती है। यह स्थिति बन जाती है तो विश्वास आदि भाव सहज रूप से उठने लगते हैं और आनन्द की अनुभूति होने लगती है। फिर अन्य कोई ऐसी शक्ति नहीं जो साधक को आसानी से लक्ष्य-विमुख कर सके या उसकी शक्ति को घटा सकें। आत्म-दान की स्थिति का क्षणिक सुख भी इतना मनमोहक होता है कि जिसे उसकी अनुभूति हो जाती है, उसे साँसारिक सुख नीरस प्रतीत होने लगते हैं और भोगों से अरुचि होने लगती है।
मनुष्य को जब तक यह भाव रहता हैं कि मैं तपस्या कर रहा हूँ, मुझ में तत्परता है तो बस कठिनाई का यही स्थल है। मनुष्य की अपनी शक्ति बहुत स्वल्प है वह कोई भी उत्तरदायित्व अपने आप पूर्ण करने में समर्थ नहीं है। यदि वह अपने आपको पूर्णतः ईश्वरीय सत्ता के हाथ सौंप देता है तो उसका साहस बहुत चौड़ा हो जाता है और फिर साधना का सम्पूर्ण भार ईश्वर पर आ जाता है। यह अभ्यास करते हुए साधक भी ईश्वर-बोध की स्थिति तक सरलतापूर्वक पहुँच जाता है।
मनुष्य की स्थिति यथार्थतया परमात्मा से भिन्न नहीं है, किन्तु चूँकि उसका अहंकार प्रबल होता है इसलिए यह क्षुद्र और संकीर्ण बना रहता है। ईश्वर अनुभूति के इस “अहंभाव” को नष्ट करना ही हृदय शुद्धि का उद्देश्य है। मनुष्य को यह अनुभव होना चाहिए कि कर्त्ता वह स्वयं नहीं है। प्रेरणायें अन्यत्र से आती है। वह क्रियाशील है, पर कर्म की प्रेरणा कहीं दूर से आती है। इतनी-सी भेद की बात है उसे ही समझना साधना का मुख्य उद्देश्य हैं।
जहाँ हम यह समझते है, आत्मोत्सर्ग से हमारा लक्ष्य, हमारा परमात्मा हमारे सामने रहता है, वहाँ यह भी जानना अनिवार्य है कि अपनी महत्वाकांक्षायें, मिथ्याभिमान भी अपनी सम्पूर्ण शक्तियों के साथ साधक के अन्तस्तल को अस्त-व्यस्त कर डालने के यत्न में लगे रहते हैं। आपका उद्देश्य धर्म तत्व से कुछ पाने का या आध्यात्मिक पुरुष बनने का हो तो गुह्य आध्यात्मिक शक्तियों का आवाहन करो, किन्तु इस उद्देश्य के पीछे ताँत्रिक, रहस्यमय, योग विद्या के अभिमान की बात नहीं आनी चाहिए। यही भावनात्मक परिशुद्धि को दूषित करने वाले हैं। अन्य कामनायें अशेष रहती हैं तो भी इस प्रकार की महत्वाकांक्षा अंतर्मन में प्रसुप्त पड़ी रहती है और वह बार-बार छलती रहती है। हृदय शुद्धि का उद्देश्य है इस महत्वाकांक्षा को कुचल डालना और अतिशय आनन्द की प्राप्ति के संकल्प को भीतर ही भीतर प्रोत्साहित करते रहना, यह दोहरी प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए। एक ओर शुद्धि का कार्य चले और दूसरी ओर सजावट का तो फिर लक्ष्य सिद्धि भी असंदिग्ध हो जाती है।
इन दोनों स्थितियों का सन्तुलन रखने का एक तीसरा महत्वपूर्ण पहलू है, आत्मालोचन। “शुद्धि और सामर्थ्य विकास” की प्रत्येक क्रिया पर सीधी नजर रखना। हम प्रत्येक नियम का पालन दृढ़तापूर्वक करते हैं या नहीं यह आत्मालोचन का उद्देश्य हैं। हम अपने मार्ग से हटते तो नहीं, उद्देश्य तो नहीं भूल रहे यह बात भी आत्मालोचन द्वारा ही निर्दिष्ट रहती है। दो घोड़ों को जिस तरह एक हाथ की रास सम्हालती है, उसी प्रकार इन परिस्थितियों से साधक का बचाव रखने के लिए यह आवश्यक है कि समय-समय पर उनका गम्भीरतापूर्वक अध्ययन होता रहे। हृदय शुद्धि के संस्कारों में इसलिए अन्य साधनों के साथ सच्चाई पूर्वक अपने आपको परखते रहने का कार्य भी चलते रहना चाहिए तभी शुद्धि और सामर्थ्य विकास की उभयनिष्ठ साधना सफल हो सकती और परमात्मा की शरणागति प्राप्त हो सकती है।
किसी भी मनुष्य अथवा समाज की उन्नति का लक्षण है-सुख-शान्ति और सम्पन्नता। ये तीनों बातें एक दूसरे पर उसी प्रकार निर्भर है जिस प्रकार किरणें सूर्य पर और सूर्य किरणों पर निर्भर है। जिस प्रकार किरणों के अभाव में सूर्य का अस्तित्व नहीं और सूर्य के अभाव में किरणों का अस्तित्व नहीं, उसी प्रकार बिना सुख-शान्ति के सम्पन्नता की सम्भावना नहीं और बिना सम्पन्नता के सुख-शान्ति का अभाव रहता है।
यदि गम्भीर-दृष्टि से देखा जाये तो पता चलेगा कि आरामदेह जीवन की सुविधायें सुख-शान्ति का कारण नहीं हैं बल्कि निर्विघ्न तथा निर्द्वन्द्व जीवन प्रवाह की स्निग्ध गति ही सुख-शान्ति का हेतु है। जिसका जीवन एक स्निग्ध तथा स्वाभाविक गति से बहता जा रहा है सुख-शान्ति उसी को प्राप्त होती है। इसके विपरीत जो अस्वाभाविक एवं उद्वेगपूर्ण जीवन-यापन करता है वह दुःखी तथा अशान्त रहता है। विविध प्रकार के कष्ट और क्लेश उसे घेरे रहते हैं। ऐसा व्यक्ति एक क्षण को भी सुख चैन के लिये कलपता रहता है। कभी उसे शारीरिक व्याधियाँ व्यस्त करती हैं तो कभी वह मानसिक यातनाओं से पीड़ित होता है।
जो बेचैन है, अशान्त है, पीड़ित है, वह सम्पन्नता उपार्जित करने के साधन जुटा ही नहीं सकता। उसे यातनाओं से संघर्ष करने से अवकाश ही नहीं मिलेगा। फिर भला वह सम्पन्नता का स्वप्न किस प्रकार पूर्ण कर सकता है। जो शान्त है, स्थिर है, निर्द्वन्द्व है वही कुछ कर सकने में समर्थ हो सकता है। यदि परिस्थितिवश अथवा संयोगवश किसी को सम्पन्नता प्राप्त भी हो जाये तो अशान्त एवं व्यग्र व्यक्ति के लिये उसका कोई उपयोग नहीं। जिस वस्तु का जीवन में कोई उपयोग नहीं, जो वस्तु किसी के काम नहीं आती, उसका होना भी उसके लिये न होने के समान ही है! अस्तु, सम्पन्नता प्राप्त करने के लिये शान्तिपूर्ण परिस्थितियों की आवश्यकता है और सुख-शान्ति के लिये सम्पन्नता की अपेक्षा है।
इस सम्पन्नता का अर्थ बहुत अधिक धन दौलत से न होने पर भी आवश्यकताओं की सहज पूर्ति से तो है ही। जो नितान्त निर्धन है, दरिद्री है, वह सुख-शान्ति के लिये कितना ही मानसिक उद्योग क्यों न करे, उसे प्राप्त नहीं कर सकता। जब भूख लगेगी तब वह किसी साधन, समाधि अथवा भजन-पूजन से दूर न होगी। उसके लिये तो भोजन की आवश्यकता होगी। क्षुधित मनुष्य कब तक अपना मानसिक संतुलन बनाये रखेगा, कब तक उसका विवेक उसे विकल होने से बचा सकेगा? एक सीमा के बाद प्रज्ञावान से प्रज्ञावान शक्ति भी विचलित हो उठेगा। उपयुक्त आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति और मनुष्य का अपना संतोष दोनों मिल कर किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति के लिये सम्पन्नता ही है। जो निःस्वार्थ, निर्लोभ और अलोलुप है, वही वास्तव में सम्पन्न है। इसके विपरीत जो लालची है, अतिकाम है, लिप्सालु है, वह धनवान होने पर भी दरिद्र है, असम्पन्न है।
उन्नत जीवन के लिये जिस सुख-शान्ति एवं सम्पन्नता की आवश्यकता है, उसे प्राप्त करने के लिये मनुष्य को प्राकृतिक अनुशासन में रह कर ही क्रियाशील होना पड़ेगा। मनुष्य जीवन की तुलना में यदि हम प्रकृति के जीवन, उसके अस्तित्व को देखें तो पता चलेगा कि जड़ होते हुए भी प्रकृति कितनी हरी भरी और फल-फूलों से सम्पन्न है। किन्तु मनुष्य सचेतन प्राणी होते हुए भी कितना दीन और दुःखी है।
इसका मूल कारण है प्रकृति का निश्चित नियमों के अंतर्गत अनुशासित हो कर चलना। समस्त नक्षत्र, तारा तथा ग्रह-उपग्रह एक सुनिश्चित व्यवस्था तथा विधान के अनुसार ही क्रियाशील रहते हैं। वे अपने निश्चित विधान का व्यतिक्रम नहीं करते। कोई लाख प्रयत्न क्यों न करे कोई भी ग्रह अथवा उपग्रह अपने उदय, अस्त तथा परिभ्रमण की गति-विधि में कोई परिवर्तन नहीं करेंगे। लाख घड़ा से सींचने पर भी कोई पेड़ पौधा बिना ऋतु के फल-फूल उत्पन्न न करेगा।
जो विश्व-विधान समस्त सृष्टि पर लागू है, उसका एक अंश होने से वही विश्व-विधान मनुष्य पर भी लागू है। जिस प्रकार निश्चित नियम का उल्लंघन करते हो सितारे टूट पड़ते हैं, धरती हिल उठती है, उसी प्रकार अपने नैतिक नियमों का उल्लंघन करने पर मनुष्य का सारा जीवन ही अस्त-व्यस्त हो जाता है। शारीरिक स्वास्थ्य नष्ट हो जाता है, मानसिक शान्ति समाप्त हो जाती है और आत्मा का अधःपतन हो जाता है। मनुष्य सुख-शान्ति का पात्र बनने के स्थान पर दुःख-दर्द और कष्ट-क्लेशों का भण्डार बन जाता है।
मनुष्य को सृष्टि एवं साधन के रूप में जो कुछ मिला है वह समुचित उपयोग के लिये ही मिला हैं। वह सब इस लिये है कि इसकी सहायता से मनुष्य जीवन को अधिकाधिक समुन्नत तथा सुन्दर बनाये। सुख-शान्ति पूर्वक अपनी पूरी आयु का उपयोग करे। मनुष्य जीवन अल्पायु अथवा अपरूपता के लिये नहीं मिला है। वह अपने में सत्यं-शिवं सुन्दरम् की उपलब्धि करने के लिये ही प्राप्त हुआ है। नियामक ने मनुष्य को विवेक शक्ति देकर अवश्य ही यह अपेक्षा की होगी कि वह संसार का सब से स्वस्थ सुन्दर और शक्ति सम्पन्न प्रतीक बने। वह अपने कर्त्तव्य से संसार को सुंदरतम बनाये और निर्माता का सच्चा प्रतिनिधित्व करे। किन्तु मनुष्य का स्वरूप तथा उसका कार्य-कलाप इस अपेक्षा के बिल्कुल विपरीत दृष्टिगोचर होता है। यह दिन-दिन अस्वस्थ, असुन्दर और अस्त-व्यस्त होता जा रहा है।
यह निर्विवाद सत्य है कि मनुष्य जब तक नियति-नियमों के अनुशासन में हो कर नहीं चलेगा तब तक दिन-दिन उसका पतन ही होता जायेगा। वह दिन-दिन और अधिक विपन्नता पूर्ण अशान्ति से घिरता जायेगा। वह यों ही रोयेगा, चिल्लायेगा और पग-पग पर नारकीय यातना पाता हुआ कीड़े मकोड़े की तरह मरता रहेगा।
जब सृष्टि के सारे साधन, सारे उपकरण और समस्त सम्पदायें सुख साधन करने के लिये ही मिली हैं तो क्या कारण है कि उनके बीच रहते उनका उपयोग करते हुए भी मनुष्य दीनता दयनीयता और दुःख को प्राप्त होता जा रहा है। जो दूध, दही, घी, अन्न आदि पदार्थ मनुष्य को बच्चे से बड़ा कर, जवान कर स्वास्थ्य एवं सुन्दरता प्रदान करते है एक दिन मनुष्य उन्हीं का उपयोग करता करता रोगी बन जाता है, क्षीण हो जाता है और सारी शक्ति खो देता है।
इसका कारण है मनुष्य का असंयम एवं नियति नियमों के प्रति विद्रोह। जो विद्युत शक्ति मनुष्य के बड़े-बड़े कार्य सम्पादित करती है, वही बिजली अनियमपूर्वक छूने अथवा अनियमित रूप से उपयोग करने पर विनाश का कारण बन जाती है। जो अन्न मनुष्य को जीवन देता है, उसका प्राण कहा जाता है? उसका अनियमित उपयोग प्राणों का संकट बन जाता है।
नियम-नियमनों के अनुकूल चलने और नैसर्गिक अनुशासन मानने पर ही मनुष्य उन्नति एवं समृद्धि की दिशा में अग्रसर हो सकता है। इसके अतिरिक्त ऐसा कोई अन्य उपाय नहीं है, जो मनुष्य को सुखी अथवा शान्त बना सके।
मनुष्य की केवल दो ही गतियाँ हैं। या तो वह ऊपर चढ़ेगा या नीचे गिरेगा। उसके लिये बीच का कोई मार्ग नहीं हैं। मनुष्य जीवन को यह छूट नहीं हैं कि वह कुछ अनुशासन में रह कर और कुछ अनुशासनहीन होकर बिना विशेष कष्ट क्लेशों के चुपचाप मध्य मार्ग से निकल जाये। मनुष्य जीवन या तो उत्कृष्ट ही होगा अथवा निकृष्ट। जो उत्कृष्ट नहीं है वह अवश्य ही निकृष्ट है। उत्कृष्टता और निकृष्टता के बीच उसकी कोई स्थिति नहीं है।
जब मनुष्य जीवन का उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट ही होना निश्चित है तो उत्कृष्टता प्राप्त करने को बुद्धिमत्ता कहा जायेगा। ऐसा कौन अभागा होगा जो सहज सुलभ उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट जीवनों में से उत्कृष्ट जीवन कौन चुने।
उत्कृष्ट जीवन प्राप्त करने के लिये मनुष्य को नियति-चक्र का अनुसरण और नैतिक नियमों का पालन करना ही होगा। इसके अतिरिक्त उसके सामने कोई उपाय नहीं है। मनुष्य को चाहिये कि वह शुभ संकल्पी, शुभदर्शी और शुभाचार वाला बने। अतिचार तथा अत्याचार को त्याग कर परोपकारी, परिश्रमी तथा पुरुषार्थी बने। जो आचरण शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक अथवा अध्यात्मिक हानि करे उसे छोड़ कर ऐसे आचार विचार अपनाने चाहिये जिससे इन चारों तथ्यों का विकास हो।
महान मानव-
श्री महादेव गोविन्द रानाडे के पिता अमृतराव बड़ी साधारण स्थिति के व्यक्ति थे। वे नासिक जिले के निफाद तालुक्के के जमींदार के यहाँ प्रधान मुँशी थे। महादेव गोविन्द रानाडे का जन्म 18 जनवरी, सन् 1840 ई॰ का हुआ।
अपने बाल्यकाल में महादेव गोविन्द रानाडे ने किसी विशेष प्रतिभा का परिचय नहीं दिया। इनको देखकर सब लोग यही कहा करते थे कि यह लड़का अपने जीवन में क्या करेगा! यह बड़े ही सुस्त तथा मौन रहा करते थे। इनके माता-पिता एक प्रकार से इनके भविष्य के विषय में सदैव निराश एवं चिंतित रहा करते थे।
प्रारम्भिक शिक्षा पिता द्वारा मराठी में पाकर ग्यारह वर्ष की आयु में इन्होंने अंग्रेजी पढ़ना प्रारम्भ किया और क्रम से हाई स्कूल, एफ॰ ए0, बी0 ए॰ तथा इतिहास में एम॰ ए॰ की परीक्षा पास की। अनन्तर 1866 में आनर सहित एल॰ एल॰ बी0 के परीक्षा पास कर उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी कर ली।
महादेव गोविन्द रानाडे किसी नैसर्गिक प्रतिभा के धनी नहीं थे। इन्होंने जो भी परीक्षायें पास कीं और जो भी योग्यता प्राप्त की, वह इनकी उद्योग-शीलता तथा परिश्रम का ही प्रसाद था। जिस समय यह पढ़ने बैठते थे अपने को अध्ययन में बिल्कुल डुबो देते थे। जब तक अपना अध्ययन पूर्ण न कर लेते थे, खाने-पीने तक का ध्यान न करते थे। सारे संसार को भूलकर किसी काम में संलग्न होने का जो निश्चित फल होता है, वह उनका मिला और वे कॉलेज के एक गौरवशाली छात्र समझे जाने लगे। अनेक वर्षों तक 60- मासिक जूनियर फेलोशिप पाने के बाद वे तीन वर्ष तक 125- मासिक सीनियर फेलोशिप पाते रहे। अपने परिश्रम तथा लगन के बल पर इन्होंने प्रिंस आफ ग्रेजुएट्स (स्नातकों के राजकुमार) की सम्मानित उपाधि उपार्जित की थी।
अपने छात्र जीवन में रानाडे केवल पाठ्यक्रम पुस्तकों तक ही सीमित न रहा करते थे। वे अपने पाठ्य के अतिरिक्त कम-से-कम किसी अन्य विषय की एक पुस्तक नित्य अवश्य पढ़ा करते थे। रानाडे की व्यस्तता देखकर लोग आश्चर्य किया करते थे। वे अपना एक क्षण भी कभी खराब न करते थे। यहाँ तक कि कॉलेज में जब छुट्टियाँ पड़ जाती थीं तब भी यह सदैव पढ़ने-लिखने में व्यस्त रहा करते थे और कॉलेज खुले रहने के दिनों से अधिक पढ़ा करते थे। कॉलेज के अवकाश के दिनों में ही उन्होंने इतिहास, अर्थशास्त्र, विज्ञान, दर्शन तथा नाटक शास्त्र की तैयारी की थी।
ज्ञान गरिमा के साथ-साथ रानाडे में आत्मगौरव तथा स्वदेशाभिमान का भी समुचित विकास होता गया, जिसका प्रमाण उन्होंने उस समय दिया जिस समय अलेक्जेन्डर ग्राँट नामक एक अंग्रेज शिक्षक के दिये एक इतिहास के प्रश्न का उत्तर उन्होंने किसी प्रकार की शंका से मुक्त होकर उत्तर पुस्तिका में लिखा।
ग्रान्ट महोदय महादेव गोविन्द रानाडे पर बहुत ही कृपालु थे। रानाडे भी यह बात जानते थे कि ग्रान्ट महोदय की कृपा से ही वे साधन रहित होते हुये भी अध्ययन की अनेक सुविधायें प्राप्त कर सके थे। यद्यपि गुणों का अपना मूल्य एवं महत्व तो है ही, फिर भी उसके प्रशंसित एवं पुरस्कृत होने में किसी कृपालु गुण-ग्राहक का भी आभार रहता है और शिष्टाचार तथा व्यवहार एवं मनुष्यता के नाते गुण ग्राहक को भी धन्यवाद पूर्वक प्रसन्न रखना ही पड़ता है।
ग्रान्ट महोदय का प्रश्न था-”अंग्रेजी राज्य तथा मराठा राज्य की तुलनात्मक विवेचना।” सभी विद्यार्थियों ने अपने प्रभावशाली अंग्रेज अध्यापक श्री ग्रान्ट को प्रसन्न करने के लिये प्रश्न के उत्तर में मराठों के राज्य की तुलना में अंग्रेज राज्य की प्रशंसा की। किन्तु महादेव गोविन्द रानाडे के स्वाभिमान तथा राष्ट्रीय गौरव ने अंग्रेजी राज्य की झूठी प्रशंसा करना स्वीकार न किया और उन्होंने सत्य समीक्षक के रूप में अंग्रेजी राज्य की आलोचना करते हुये मराठा राज्य की प्रशंसा की।
स्वयं न्यायप्रिय तथा निष्पक्ष होने के कारण उन्हें यह आशा न थी कि उनके महान अध्यापक श्री ग्रान्ट साहब उनके निष्पक्ष उत्तर पर अप्रसन्न हो जाएंगे। किन्तु जब ग्रान्ट महोदय ने रानाडे को बुलाकर कहा कि युवक! तुम्हें उस अंग्रेजी सरकार की निन्दा नहीं करनी चाहिये जो तुम्हें शिक्षित बना रही है और तुम्हारे देश को उन्नत कर रही है। महादेव गोविन्द रानाडे को ग्रान्ट महोदय की नाराजगी का उतना दुःख नहीं हुआ जितना कि दुःख उन्हें यह देखकर हुआ कि जिन ग्रान्ट महोदय को वह एक निष्पक्ष, न्यायशील तथा विशाल हृदय का महामानव समझते थे, वे जातीयता के कारण इतने संकीर्ण तथा पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण के व्यक्ति निकले।
रानाडे ने अधिक कुछ न कहकर केवल इतना ही कहा कि-’मान्य महोदय! मैंने अंग्रेजों तथा मराठों के बीच किसी भेद बुद्धि रख कर प्रश्न का उत्तर नहीं लिखा, बल्कि जो वास्तविक सत्य था उसको ही प्रकट किया है।’ किन्तु ग्रान्ट महोदय अपने जातीय अभिमान में इतने बह गये कि उन्होंने रानाडे के न केवल अंक ही काट लिये बल्कि उनकी छात्रवृत्ति भी बन्द करा दी। उन्हें आशा थी कि रानाडे सुविधायें छिन जाने से परेशान होकर अपने उत्तर के लिये क्षमा माँगेगा। किन्तु ग्रान्ट महोदय का जातीय पक्षपात देखकर उनका राष्ट्रीय स्वाभिमान शिला की तरह दृढ़ हो गया और उनमें देश के प्रति आकर्षण और भी सघन हो गया।
अपने अध्यवसाय के बल पर महादेव गोविन्द रानाडे ने विद्यार्थी जीवन से जिस विचार संपत्ति का संचय किया था उसे वे केवल अपने तक ही सीमित नहीं रखना चाहते थे बल्कि जनता में प्रचार करने की भावना रखते थे। उनकी दृष्टि में योग्यता पूर्ण विचारों का केवल एक ही उपयोग था और वह यह कि वे जन-साधारण में जाकर उनका मानसिक तथा बौद्धिक स्तर ऊँचा करें। आये हुये सद्विचारों को वे अधिक समय तक अपने मस्तिष्क में रोक रखना भी उचित नहीं समझते थे क्योंकि इससे एक तो जन-साधारण बहुत समय तक उनके लाभ से वंचित रहता है, दूसरे जब तक एक विचार क्रियात्मक रूप में नहीं बदलते तब तक दूसरे विचार मस्तिष्क में अवकाश नहीं पाते और यदि अन्य विचार आ भी जाते हैं तो उनसे एक ऐसी भीड़-भाड़ इकट्ठी हो जाती है जिससे एक बौद्धिक उलझन उत्पन्न होने लगती है, और तब मनुष्य का मस्तिष्क ठीक से काम करने में असमर्थ होने लगता है। इसलिये आवश्यक है कि मस्तिष्क में आये हुये सद्विचारों को तत्काल जन-साधारण में वितरित करके उनको क्रियात्मक रूप दे दें। निरन्तर प्रसारित होते रहने से विचारों में दिनों दिन तथ्यता तथा तेजस्विता का समावेश होता रहता है जिससे कि वे अपना प्रभाव डालने में सर्वथा समर्थ बन जाते हैं।
अपनी इन्हीं धारणाओं के आधार पर महादेव गोविन्द रानाडे ने विद्यार्थी काल ही में “इन्दुप्रकाश” नामक एक पत्र भी निकाला और जिसके अंग्रेजी विभाग के सम्पादन का उत्तरदायित्व स्वयं सँभाला। अपने इस पत्र का प्रकाशन श्री रानाडे ने इतनी लगन तथा परिश्रम से किया कि विद्यार्थियों का वह पत्र अच्छे-अच्छे सामयिक पत्र-पत्रिकाओं का प्रशंसा पात्र बन गया।
कॉलेज छोड़ने के बाद बम्बई सरकार ने रानाडे को शिक्षा विभाग के अंतर्गत मराठी भाषा के अनुवादक के पद पर नियुक्त किया जहाँ पर वे अमौलिक कार्यक्रम होने के कारण शीघ्र ही ऊब गये। उनका ध्येय केवल जीविका उपार्जन नहीं विचार प्रसारण था। अनन्तर अनेक अन्य पदों पर होते हुये वे एलफिंस्टन कॉलेज में चार सौ रुपये मासिक पर प्रोफेसर हो गये। यहाँ उन्होंने योग्यता के प्रदर्शन का अवसर पाकर अपना सिक्का जमा दिया। जिस समय रानाडे कक्षा में भाषण दिया करते थे उस समय बड़े-बड़े अंग्रेज प्रोफेसर उनका भाषण सुनने और लाभ उठाने के लिये उनकी कक्षा में इकट्ठे हो जाते थे। जहाँ भी योग्यता का प्रकाश होगा जिज्ञासु पतंगों की तरह उसके चारों ओर इकट्ठे हो ही जायेंगे।
यद्यपि महादेव गोविन्द रानाडे अपने अध्यापक के पद पर पूर्ण रूप से संतुष्ट थे तथापि सरकार के अनुरोध पर वे बम्बई हाई कोर्ट के रिपोर्टर के पद पर चले गये और बहुत समय तक पुलिस मजिस्ट्रेट तथा सहायक जज का काम भी करते रहे। इस वृत्ति परिवर्तन में रानाडे का अन्य कोई उद्देश्य नहीं था, केवल यह विचार था कि वे उक्त उत्तरदायित्वपूर्ण पदों पर पहुँच कर भारतीय प्रतिभा का परिचय देने के साथ-साथ कानूनी भ्रष्टाचार को कम करने का प्रयत्न करें।
कानूनी क्षेत्र में पहुँचने पर उन्होंने बैरिस्टरी की परीक्षा पास की और सरकारी अनुरोध पर पूना के न्यायाधीश का पद संभाला। उक्त पद पर उन्होंने अपनी योग्यता का जो परिचय दिया उसके पुरस्कार स्वरूप सरकार ने उन्हें राय बहादुर की उपाधि दी। अनन्तर वे मातहत अदालतों के प्रधान जज, स्पेशल जज, बम्बई प्रेजीडेन्सी मजिस्ट्रेट, तथा सब जज आदि के पद पार करते हुये बम्बई हाईकोर्ट के जज के पद पर जा पहुँचे।
इन निरन्तर उन्नतियों में सरकार की कृपा कारण नहीं थी, बल्कि यह रानाडे की अपनी परिश्रमशीलता, न्यायप्रियता, तथा सच्ची कर्तव्यनिष्ठा की विशेषता थी जिसने कि सरकार को उन्हें उन्नत पद देने के लिये विवश कर दिया। वैसे साधारणतः अँग्रेज सरकार, राष्ट्रीय भावनाएँ, भारत-भक्ति तथा स्वदेशी आन्दोलन के समर्थक होने के कारण उनसे मन ही मन अप्रसन्न रहती थी, किन्तु स्पृहणीय योग्यता एवं अनुकरणीय कार्य कुशलता पहाड़ों के बीच भी अपना मार्ग बना कर विरोधियों की वज्र मुट्ठी से अपना अधिकार निकाल लेती है।
महादेव गोविन्द रानाडे ने बाल्य काल से ही जिस सरल आचरण का विकास एवं अभ्यास किया था, वह आजीवन उनका सबल सहायक तथा साथी बना रहा। यह उनके सरल आचरण तथा उदात्त चरित्र का ही चमत्कार था कि उस समय बम्बई हाईकोर्ट के न्यायाधीश करण के पद पर पहुँच कर भी वे इतने निरभिमान एवं निश्छल प्राण बने रहे कि एक बार प्रायः वायु सेवन से वापस आते समय एक बनिये ने उन्हें साधारण ब्राह्मण समझ कर कहा कि आज एकादशी है, महाराज! एक सीधा लेते जाइये। महान महादेव गोविन्द रानाडे के गम्भीर स्वाभिमान पर कोई धक्का न लगा और उन्होंने ठीक एक साधारण ब्राह्मण की तरह उस बनिये के दिये हुये आटा-दाल को अपने गमछे में बाँध कर उसे माँगलिक आशीर्वाद दिया।
बम्बई हाईकोर्ट के जज तथा उन्नीसवीं शताब्दी में लगभग ढाई हजार वेतन पाने वाले महादेव गोविन्द रानाडे की यह रोमाँचकारी सरलता देख कर किसका मस्तक श्रद्धा से न झुक जायेगा। किन्तु यही सार रूप वह गुण है जो किसी भी व्यक्ति को उन्नति के शिखर पर पहुँचा देता है, जो सरल हैं वह सुशील है और जो सुशील है वह चरित्रवान है और जो चरित्रवान है, उसका भाग्यवान होना निश्चित है। सरलता तथा सादगी मानव जीवन के वे सुभग सोपान हैं जिनकी दिशा में ही सफलता पूर्ण अभ्युदय निवास करता हैं।
महादेव गोविन्द रानाडे के पास काम की बहुतायत के कारण अधिक समय तो था नहीं अतएव उन्होंने बंगला अपने बंगाली हज्जाम से उस समय सीखना शुरू किया जिस समय वह उनकी हजामत करता होता था, यद्यपि उनकी पत्नी ने उन्हें उनके जज तथा फाइनेन्स कमेटी के मेम्बर होने की याद दिलाते हुये कहा कि आपको इस प्रकार नाई से पढ़ना शोभा नहीं देता। महादेव गोविन्द रानाडे ने पत्नी को केवल यही एक छोटा-सी उत्तर दिया कि कोई भी अच्छा गुण सीखने के लिये किसी भी स्थिति के व्यक्ति को गुरु का आदर दिये जाने में उच्चता ही है, निम्नता नहीं। गुण ऐसे मूल्यवान रत्न हैं जो किसी से भी प्राप्त किये जा सकते हैं। गुण ग्राहकता में जो अभिमान के वशीभूत रहते हैं, वे जीवन में कभी उन्नति नहीं कर सकते।
इसी प्रकार उन्होंने अनेक प्रसंगों में अपने पिता की सिफारिशों की अवहेलना करके अपनी अपूर्व न्यायशीलता का परिचय दिया।
अपने व्यक्तिगत गुणों का प्रदर्शन करने के साथ-साथ महादेव गोविन्द रानाडे ने समाज-सेवा के अनेक सराहनीय कार्य किये। उन्होंने आजीवन विधवा-विवाह का समर्थन तथा बाल-विवाह तथा अनमेल विवाह का विरोध किया तथा धार्मिक उदारता को प्रोत्साहित किया। भारतीय स्वतन्त्रता के प्रयत्नों को सक्रिय सहयोग दिया, स्त्री शिक्षा तथा अस्पृश्यता निवारण के वे एकान्त समर्थक थे। अपने इन्हीं महान गुणों तथा प्रयत्न के कारण वे अपने समय के एक महानतम व्यक्ति माने जाते हैं।
जिस समय 16 जनवरी 1901 को वे संसार से विदा हुये तो पूरे भारत ने शोक में अपना सारा कारोबार बंद रखा।
लौह पुरुष-
सरदार वल्लभ भाई पटेल की शिक्षा का श्री गणेश हल की गति के साथ ही हुआ। जिस समय इनके पिता प्रातःकाल खेत पर हल लेकर जाते सरदार भी उनके साथ जाते और पिता से पहाड़ा सीखा करते थे।
सरदार वल्लभ भाई पटेल के पिता श्री झवेरभाई एक साधारण किसान थे, किन्तु सन 1857 के स्वातन्त्र्य संग्राम में महारानी लक्ष्मीबाई की सेना में रहने से देश-प्रेम की भावनायें इनके हृदय में गहराई तक बसी हुई थीं। पिता की इन भावनाओं का प्रभाव पुत्र पर पड़ा और वे बाल्यकाल से ही स्वाधीनताप्रिय देशभक्त बन गये।
परिश्रमपूर्ण वातावरण के बीच प्रारम्भिक शिक्षा स्वयं देकर श्री झवेरभाई ने अपने पुत्र को पेटलाद की पाठशाला में भरती कराया। परिश्रम तथा कर्मठता मानों सरदार वल्लभ पटेल को घुट्टी में ही पिला दी गई थी। अतएव उसके बल पर उन्होंने पाठशाला की परीक्षायें उच्च श्रेणी में उत्तीर्ण कर नडियाद के हाई स्कूल में दाखिल हुये।
साहस, निर्भीकता तथा उत्साह आपके पैतृक गुण थे जिससे नये-नये शहर में आकर भी उनमें कोई हीन भावना संकोच अथवा दब्बूपन नहीं आया। वे निर्भीकता से स्कूल में रहते, लगन से अध्ययन करते और भविष्य जीवन की सार्थकता के लिये विचार करते। किन्तु एक अन्यायपूर्ण व्यवहार किये जाने से अनेक अध्यापकों की इनसे अनबन हो गई जिससे यह कॉलेज छोड़कर पुनः नडियाद वापस आ गये और वहीं से इन्ट्रेंस की परीक्षा पास की।
इन्ट्रेंस की शिक्षा तक जिन वल्लभ भाई ने पिता का व्यय का कष्ट दिया था, वह अब आगे उनको कष्ट न देना चाहते थे। उनका कहना था कि जो किशोर अपने पैरों पर खड़ा होने लायक हो जाये, उसे किसी पर भार स्वरूप होकर रहने का कोई अधिकार नहीं है। बढ़ने का रास्ता मिल जाने पर हर नवयुवक को अपने पैरों बढ़ना चाहिये, किसी का सहारा लेकर नहीं।
निदान उन्होंने इन्ट्रेंस पास करने के बाद आगे न पढ़कर मुखतारी की परीक्षा पास की ओर गोधरा में वकालत करने लगे। जिसके हृदय में काम करने का उत्साह है, शरीर में परिश्रम की स्फूर्ति है, मस्तिष्क में स्वावलम्बन का स्वाभिमान है, वह पुरुषार्थ के बल पर पानी पर राह बना लेता है, बालू में तेल खोज लेता है।
वकालत का आर्थिक मार्ग पाकर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने परिवार से उस निर्धनता नाम की पिशाचिनी को सदा के लिए खदेड़ देने का संकल्प करके मुकदमों के कार्यों में अपने को डुबा दिया जिसने आगे पढ़ने से रोक दिया था। वे पैरवी के लिये मस्तिष्क के अंतिम छोर तक सोचते है और तथ्य को तेजस्विता के साथ प्रतिपादित करते जिससे उनकी वकालत में सफलताओं की होड़ सी लग गई। जो परिश्रमी है, जिसने लगन के साथ मस्तिष्क में योग्यता के स्वस्थ एवं उर्वर बीज बोये हैं जो अपने विषय का सच्चा जानकार और कार्य को ईमानदारी-तल्लीनता से करने में विश्वास करता है सफलता उसके पास न आकर क्या संदिग्ध योग्यता, अपूर्ण, अभ्यास वाले और श्रमहीन आलसी के पास जायेगी?
जहाँ परिश्रम-चोर, अयोग्य वकील मजिस्ट्रेटों और जजों की चाटुकारिता कर अपने मुकदमे जीतते और अधिकारियों को अन्याय का प्रश्रय देते, वहाँ सरदार वल्लभ भाई पटेल अपने शक्तिशाली तर्कों तथा परिपूर्ण विधि के बल पर अपना विषय प्रतिपादित करते। एक तो सत्य योंही तेजवान होता है, किन्तु जब वह किसी चरित्रवान की वाणी से निसृत होता है, तो वह अपना असाधारण प्रभाव छोड़ता है। सरदार पटेल के तर्कों का भी न्यायाधीशों पर विशेष प्रभाव पड़ता था।
वकालत के साथ-साथ वल्लभ भाई पटेल अवसर आने पर जन-सेवा का पुण्य लाभ करने से भी नहीं चूकते थे। जिन दिनों उन्हें अपने मुकदमों से फुर्सत न मिलती थी, उन्हीं दिनों गोधरा में महामारी का प्रकोप हो गया और प्लेग पीड़ितों की सेवा करते-करते स्वयं प्रभावित हो गये। फिर भी जब तक रोग शय्या पर पड़ कर विवश नहीं हो गये अपना सेवा कार्य नहीं छोड़ा। अपने आत्म-विश्वास, आत्म-बल तथा आत्म संयम के साथ उपचार पूर्ण उपायों से स्वयं तो शीघ्र ही अच्छे हो गये, किन्तु प्रभावित पत्नी को आप्रेशन के लिये बम्बई भेजना पड़ा। कार्य और कर्तव्य की बहुतायत से स्वयं साथ न जा सके।
पत्नी को भेजने के बाद उन्हें अपने कर्तव्य के अतिरिक्त कुछ याद ही नहीं रहा। मुकदमों की पैरवी में इस सीमा तक तन्मय हो गये कि जिस समय एक बहस के दौरान उन्हें पत्नी की मृत्यु का तार मिला तो उन्होंने उसे पढ़ कर मेज पर रख दिया और फिर यथावत स्थिति में बहस करने लगे। सफलता और समृद्धि की देवियाँ ऐसे ही संयमी, संतुलित, शान्त एवं आत्मवान्, कर्तव्य-निष्ठ व्यक्तियों को वरण करने के लिए गली-गली घूमा करती हैं।
आवश्यक धन उपार्जित करने के बाद प्रगति-प्रिय सरदार जी ने विलायत जाकर बैरिस्टरी पास करने के लिये पासपोर्ट बनवाया किन्तु अपने बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल की इच्छा देख अपना जाना स्थगित करके पासपोर्ट उनके नाम करा दिया और उनके वापस आने पर स्वयं गये।
विदेश में देश की प्रतिभा की धाक जमाने के लिये सरदार वल्लभ पटेल ने अपनी परिश्रमशीलता को कई गुना बढ़ा दिया। वे अपने निवास-स्थान से ग्यारह मील दूर उत्तर टेम्पुल के सम्पन्न पुस्तकालय को लन्दन की विकट सरदी में प्रातःकाल उठ कर जाते, दोपहर का भोजन वहीं करते और सत्रह-सत्रह घंटे निरन्तर अध्ययन करने के बाद पैदल लौटकर आते। इस तपोपूर्ण परिश्रम का फल यह हुआ कि बैरिस्टरी की परीक्षा में वे सर्व प्रथम उत्तीर्ण हुए, जिससे शुल्क मुक्ति के साथ पचास पौंड की छात्रवृत्ति से पुरस्कृत किये गये।
विलायत से वापस आने के बाद सरदार वल्लभ भाई अहमदाबाद में पुनः वकालत करने लगे, जिससे वे कुछ ही समय में इतने धनवान हो गये कि राजाओं जैसे ठाठ-बाट से रहने लगे। परिवार से गरीबी को मार भगाने का उनका संकल्प पूरा हो गया। किन्तु फिर भी सब कुछ सम्पन्नता, सम्मान और शान-शौकत होने पर भी उनकी आत्मा में एक अनजान असंतोष करवट लिया करता था जिसको वे यदा-कदा अनुभव तो करते थे, किन्तु समझ न पाते थे।
कुछ समय बाद गाँधी जी के संपर्क में आने पर उन्हें अपने अनजाने असन्तोष का स्पष्ट स्वरूप दिखाई पड़ा, जिसको दूर करने और पूर्णता-पूर्ण मानसिक शाँति तथा आत्म-संतोष होने के लिये सरलता और सादगी से सुशोभित जीवन अपना लिया। जीवन के सच्चे और अकृत्रिम मार्ग पर आने पर उन्हें पता चला कि ऐश्वर्य के विभ्रम में वे जिस प्रदर्शन पूर्ण जीवन क्रम को अपनाते चले जा रहे थे, उसमें आगे चलकर प्रमाद-जन्य पतन के कितने गहरे गर्तों की सम्भावना थी? किन्तु शीघ्र ही सुरक्षित दिशा में आ जाने पर उन्हें ऐसा संतोष हुआ मानो संयोगवश किसी भयंकर खतरे में पड़ते-पड़ते बच गये हों। प्राप्त संतोष की इस पुलक पूर्ण अनुभूति ने उनके सादगी पूर्ण सहज जीवन क्रम को मुहरबंद कर दिया।
गाँधी जी के संपर्क में आकर जहाँ सरदार ने सादगी का सौंदर्य देखा वहाँ जन-सेवा का महत्व भी समझा। उनके हृदय में पीड़ित मानवता के प्रति एक हार्दिक करुणा उमड़ पड़ी और वे अपने व्यवसाय से समय निकाल कर सेवा कार्य करने लगे। जन-सेवा का उनका पहला काम था-गुजरात से बेगार प्रथा का उठवा देना। बेगार प्रथा जमींदारी शासन का भयंकर अभिशाप था। हर जमींदार अपनी जमींदारी में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर अपना स्वत्व समझते थे। अपने किसी भी छोटे-बड़े काम के लिये गरीब आदमियों को बुला लेते और दिन-दिन भर काम लेकर उन्हें यों ही भूखा-प्यास मजदूरी का बिना कोई पैसा दिये भगा देते थे। इस प्रकार यह बेगार प्रथा सारे देश में फैली हुई थी। इस घोर पराधीनता पूर्ण बेगार प्रथा से कराहती मानवता को मुक्त कराने के लिये सरदार वल्लभ भाई पटेल व्याकुल हो उठे और गोधरा के प्रान्तीय राजनीतिक सम्मेलन के सभापति की हैसियत से उन्होंने उसके विरुद्ध कार्यवाहियाँ करनी शुरू कर दीं। इस विषय में सरदार वल्लभ भाई पटेल की संकल्प शक्ति से भयभीत होकर सरकार ने गुजरात में बेगार प्रथा को अवैध घोषित कर दिया।
इसी बीच गुजरात के खेड़ा क्षेत्र में अकाल पड़ गया और जनता भूख की ज्वाला में आहुति बनने लगी। चारों ओर हाहाकार मचने लगा। उस पर सरकार लगान वसूली की सख्ती कर रही थी। जनता पर यह अन्याय देखकर सरदार पटेल की मनुष्यता आहत हो गई और उन्होंने खेड़ा की जनता को संगठित करके लगान वसूली के विरुद्ध आँदोलन छेड़ दिया जिसका फल यह हुआ कि सरदार पटेल के सुयोग्य नेतृत्व में जनता की विजय हुई और किसानों से लगान वसूली माफ हो गई। इसके अतिरिक्त उन्होंने गाँव-गाँव घूमकर नंगों, भूखों के लिये अन्न-वस्त्र की व्यवस्था की। इस प्रकार अकाल पीड़ित जनता की सहायता के लिये याचना की झोली फैलाते संकोच न हुआ। यही नहीं उन्होंने अपनी सम्पत्ति का एक बड़ा भाग अकाल पीड़ितों की सेवा में खर्च किया।
गाँधी जी द्वारा स्वतन्त्रता प्राप्ति के प्रयत्नस्वरूप छेड़े गये असहयोग तथा बहिष्कार आन्दोलन के समय देश सेवा की भावना तथा समय की पुकार पर अपनी हजारों रुपयों माहवार की वकालत छोड़ दी। यद्यपि उस समय अपने पुत्र और पुत्री को पढ़ने के लिये विलायत भेजने वाले थे तथापि उन्होंने भारत माता के हजारों लाखों पुत्र-पुत्रियों की मंगल-कामना में अपनी सन्तान के व्यक्तिगत उत्कर्ष की सम्भावना को न्यौछावर कर दिया।
बहिष्कार आन्दोलन से प्रेरित स्कूल, कॉलेज छोड़ देने वाले विद्यार्थियों की शिक्षा का प्रश्न उपस्थित होने पर सरदार बल्लभ भाई पटेल ने राष्ट्रीय स्कूलों की स्थापना की योजना चलाई, जिसके लिये आवश्यक धन राशि इकट्ठी करने के लिये संपूर्ण देश से लेकर बर्मा तक का दौरा किया और जब तक दस लाख रुपये इकट्ठे नहीं कर लिये चैन की साँस नहीं ली। अनेक राष्ट्रीय स्कूलों की स्थापना के साथ उन्होंने गुजरात विद्यापीठ की भी स्थापना की जिससे विद्यार्थियों की शिक्षा का प्रश्न बहुत दूर तक हल हो गया।
गुजरात के बोरसद तालुका में डाकुओं का आतंक फैल गया। सरकार उनको पकड़ने में असफल हो रही थी। उस इलाके में सरकार ने गाँवों की रक्षा के लिये जो पुलिस तैनात की थी, उसका खर्च वह ग्रामवासियों से लेती थी। एक ओर डाकू धन लूट रहे थे, दूसरी और सुरक्षा के बहाने सरकार ने लूटना प्रारम्भ कर दिया। इस दोहरी मार से त्रस्त होकर जनता ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को याद किया। जनता पर भयानक संकट का समाचार पाते ही सरदार बिना किसी भय अथवा विलम्ब के बोरसद जा पहुँचे। अपने विश्वस्त एवं वीर नेता को अपने बीच पाकर जनता का साहस बढ़ गया। सरदार ने दो सौ स्वयं सेवकों का एक दल बनाया और ग्राम रक्षा में नियुक्त करके ग्रामवासियों में आत्म-विश्वास तथा आत्म-रक्षा की भावना जगाई जिससे शीघ्र ही इलाके से डाकुओं का आतंक समाप्त हो गया।
नागपुर झंडा सत्याग्रह में विजयी होकर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने अहमदाबाद म्युनिसिपल बोर्ड का सभापति पद संभाला और नगर के कायाकल्प में लग गये। उन्होंने मोहल्ले-मोहल्ले, गली-गली घूमकर जनता को सफाई और स्वच्छता का महत्व समझाया और स्वयं भी नगर की सफाई के कार्यक्रमों में भाग लिया जिससे नगर की सारी गन्दगी दूर हो गई और जनता में सफाई की एक स्थायी चेतना जाग्रत हुई। इस काल में उन्होंने बच्चों की प्रारम्भिक शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया और नगरपालिका की पाठशालाओं में आवश्यक सुधार किये। अनेक नयी पाठशालायें खुलवाई और बच्चों के स्वास्थ्य की देख−रेख का प्रबन्ध किया।
सरदार वल्लभ भाई पटेल के अहमदाबाद नगरपालिका के सभापतित्व काल में गुजरात में भयंकर बाढ़ आ गई। गाँव के गाँव बह गये, लोगों के घर तबाह हो गये। जगह-जगह जनता असाध्य परिस्थितियों में फँसकर भूखों मरने लगी। ज्यों ही सरदार पटेल को इसकी खबर लगी, वे दो हजार स्वयं-सेवक लेकर बाढ़ पीड़ित क्षेत्र में जा पहुँचे और लोगों को अपनी सेवा तथा सहायता से सान्त्वना देने लगे। सरदार अपने स्वयं-सेवकों के साथ, पानी के बीच फँसे मनुष्यों तथा पशुओं को बचाने के लिये बिना किसी साधन के स्वयं तैर कर जाते और उनको निकाल कर लाते।
इस प्रकार वे अपने महान जन-सेवा की भावना के बल पर हजारों जीवों के प्राण बचाने में सफल हुए।
अभी बाढ़ के प्रकोप से गुजरात की जनता की रक्षा करने की व्यस्तता कम न होने पाई थी कि तब तक अकाल तथा भुखमरी से मरती हुई जनता ने अपने सहायक तथा निष्काम सेवक-सरदार वल्लभ भाई पटेल को पुकारा! बिना एक क्षण का विलम्ब किये सरदार पटेल अकाल पीड़ितों की सहायता करने चल पड़े। बाढ़ के समय सरदार की सच्ची सेवा देखकर सरकार ने अपना विरोधी होने पर भी डेढ़ करोड़ रुपये की धन राशि अकाल पीड़ितों की सहायता के लिये सरदार पटेल के ही हाथ में दी, जिसका समुचित उपयोग कर सरदार ने शीघ्र ही अकाल पर नियन्त्रण कर लिया। इसके अतिरिक्त जो उन्होंने तीन लाख रुपया स्वयं चन्दा किया था उसका भी एक-एक पैसा खर्च कर नंगे-भूखों तथा बेघरबार व्यक्तियों के लिये अन्न वस्त्र तथा मकानों का प्रबन्ध किया। अनवरत प्रयत्नों के विश्वासी सरदार पटेल जिस काम में भी लग जाते उसे पूरा किये बिना चैन न लेते।
समाज सेवा के साथ-साथ सरदार पटेल राजनीति के माने हुए नेता थे। वे खेड़ा सत्याग्रह, असहयोग आन्दोलन, नागपुर झंडा सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह आदि आन्दोलनों के प्रमुख नेता, संचालक तथा प्रबन्धक रहे। अपनी देश-सेवा के सिलसिले में वे अनेकों बार जेल गये और अगणित यातनाएं सहीं।
सरदार पटेल अपनी लगन, ध्येय तथा लक्ष्य के पक्के सैनिक थे। वे अपने अविचलित आत्म-विश्वास, अडिग निष्ठा, अटूट कर्त्तव्यशीलता, महान मानसिक बल, स्पष्टवादिता तथा निर्भीकता के कारण लौह-पुरुष कहे जाते थे। देश की स्वतन्त्रता के बाद से वे जीवन-भर भारत के सुयोग्य एवं संकल्पवान गृहमन्त्री रहे। अपने मन्त्रित्व-काल में उन्होंने राष्ट्र की जो सबसे महान उपयोगी तथा स्थायी सेवा की वह है-”लगभग साढ़े छः सौ देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलयन।” देश की अविभाज्य अखंडता के इस कार्य के लिये राष्ट्र युग-युग तक उनका आभारी रहेगा।
इच्छा मनुष्य जीवन की संचालिका शक्ति हैं। यही वह प्रेरणादायक अनुभूति है जिसके बल पर कभी-कभी मनुष्य अपनी सामान्य क्षमता से अधिक कार्य कर दिखाता है।
संसार में यदि इच्छा का अस्तित्व न रहे तो इसकी सारी क्रियायें ठहर जायें। सारा जड़ चेतन संसार केवल मात्र जड़ चेतन होकर रह जाये। न कोई कुछ काम करे और न कोई सम्बन्ध रखे। संसार की उत्पत्ति, स्थिति एवं लय तीनों अवस्थायें एक मात्र इच्छा शक्ति पर निर्भर करती हैं। संसार के प्रत्येक कार्य का कारण एक मात्र इच्छा ही है। मनुष्य कुछ चाहता है तभी वह किसी कर्म में प्रवृत्त होती है।
विचारकों ने इच्छा को शक्ति की जन्मदात्री बताया है। जहाँ इच्छा नहीं वहाँ शक्ति नहीं और जहाँ शक्ति नहीं वहाँ कर्म नहीं, जहाँ कर्म नहीं वहाँ जीवन नहीं। इसे इस प्रकार एक वाक्य में भी कहा जा सकता है कि जहाँ इच्छा नहीं वहाँ जीवन नहीं। इच्छाओं की हलचल जीवन के अस्तित्व को ही प्रकट करती है।
मनुष्य की इच्छाओं की कोई सीमा नहीं। उसमें प्रतिपल इच्छाओं का उदय अस्त होता रहता है। किन्तु उसकी असंख्य इच्छाओं में से केवल कतिपय इच्छायें ही पूरी हो पाती हैं। इसका मुख्य कारण यही है कि जिस इच्छा में दृढ़ता होगी, तीव्रता और उत्सुकता होगी उसमें एक शक्ति का निवास होता है, जो हर परिस्थिति में अपना मार्ग प्रशस्त कर लेती हैं।
जीवन में लक्ष्य की सिद्धि इच्छा शक्ति की प्रबलता पर निर्भर रहती है। यदि इच्छाओं में प्रबलता नहीं, तो वे कदापि सफल नहीं हो सकतीं। निर्बल इच्छायें वास्तव में लोलुपता मात्र ही होती हैं। लोलुप व्यक्ति में सक्षम शक्तियों का प्रायः अभाव ही रहता हैं। मनुष्य की इच्छा ज्यों-ज्यों बलवती होती हुई संकल्प के रूप में बदलती जाती है त्यों-त्यों उसका लक्ष्य समीपतर होता है। इच्छा की परिपक्व अवस्था का ही नाम संकल्प हैं। संकल्पवान व्यक्ति की सारी क्षमतायें एकाग्र होकर ध्येय पथ की ओर ही गतिशील रहती हैं और शक्तियों का संगठित अभियान ही किसी भी सफलता का एक मात्र मूलमंत्र है।
संकल्पवान सैनिक सेनापति बन सकता है और संकल्पवान मुमुक्षु मुक्ति प्राप्त कर लेता है। संसार के समस्त महापुरुष साधनों की अपेक्षा अपनी संकल्प शक्ति से अधिक आगे बढ़े हैं। संसार में अनेकों ऐसे महापुरुष हुये हैं जिन के साधनों और ध्येय में जमीन आसमान का अन्तर है, किन्तु उन्होंने संकल्प शक्ति के बल पर असम्भव को सम्भव कर दिखाया है। कहाँ साधन विहीन चाणक्य और कहाँ समस्त साधन-सम्पन्न मगध राज महा पद्यनन्द। किन्तु एक अकेले चाणक्य ने मगध राज का उन्मूलन करके ही छोड़ा। अन्यायी शासक के विरुद्ध साधनहीन जनता का संघर्ष संकल्प-बल पर ही सफल होता है। संकल्प का बल लेकर उठा हुआ व्यक्ति कुछ ही समय में एक अखण्ड संगठन खड़ा कर देता है। लाखों करोड़ों व्यक्तियों को एक ध्येय और एक सूत्र में आबद्ध कर देता है।
दृढ़ इच्छा-शक्ति के चमत्कारों से यह संसार भरा पड़ा है। संसार में जो कुछ उन्नति और इतिहास में जो कुछ महान दिखाई देता है, वह वास्तव में मनुष्य की इच्छा शक्ति का ही प्रतिफल है। पहाड़ों की चोटियों पर बने मंदिर, जल के नीचे बने महल, पर्वतों के उदर से निकले हुये मार्ग और कुछ नहीं मनुष्य की दृढ़ इच्छा शक्ति का ही प्रमाण है।
जिसकी समस्त इच्छायें किसी एक महान इच्छा में समाहित होकर एकीभूत हो गई हैं और वह एक इच्छा दृढ़तम होकर यदि संकल्प में बदल चुकी है, तो निश्चय है कि ऐसे एकनिष्ठ व्यक्ति का मार्ग मनुष्य तो क्या स्वयं विधाता भी नहीं रोक सकता। कहाँ हिमाच्छादित गगनचुम्बी हिमालय का गौरीशंकर शिखर और कहाँ मनुष्य के नन्हे-नन्हे कदम! असंख्यों अवरोधों से भरे हुये मार्गहीन पर्वतों के आरोहण में मनुष्य का शरीर कदापि सक्षम नहीं था, फिर भी मनुष्यों ने जो उसके शिखरों को पद-दलित किया है, वह केवल अपनी इच्छा शक्ति और संकल्प के बल पर। अनन्त एवं अज्ञात महासागरों की छाती पर अकस्मात चल देने वाले जिन साहसिक नाविकों ने नये-नये महाद्वीपों की खोज की है, वह केवल अपनी संकल्प शक्ति से ही तो।
मनुष्य में करने, और कर डालने की इच्छा भर होनी चाहिये, शेष सारे साधन और शक्तियाँ स्वयं संकल्प ही इकट्ठा कर लेता है। एक बार किसी में कुछ करने की इच्छा जगा दीजिये उसकी संकल्प शक्ति को सजग कर दीजिये फिर देखिये कि वह व्यक्ति हर प्रकार से साधन हीन होने पर भी बड़े-से बड़ा कार्य कर दिखायेगा। निर्बल विद्यार्थियों अकर्मण्य शिष्यों को सक्षम एवं सफल बनाने के लिये गुरुओं के पास एक ही उपाय रहता है-उनकी संकल्प शक्ति का जागरण कर देना। तुलसी, सूर और कालिदास जैसे विषयासक्त एवं जड़ बुद्धि व्यक्तियों ने संकल्प शक्ति के बल पर ही संसार में महाकवियों का प्रतिष्ठित पद पाया है। हृदय में अविचल संकल्प लेकर चलने वाले व्यक्ति के मार्ग से अवरोध उसी प्रकार हट जाते हैं जिस प्रकार प्रबल जल-प्रपात के मार्ग में पड़े हुये शिलाखण्ड।
जिसमें दृढ़ इच्छा शक्ति की कमी है संकल्प-शक्ति का अभाव हैं, वह वास्तव में नास्तिक है। जो नास्तिक है वह निर्बल है और जो निर्बल हैं वह निकम्मा है, निरर्थक है, धरती पर भार स्वरूप है। संकल्प-शक्ति वास्तव में एक दैवी शक्ति हैं। उसकी उपासना न करने वाला संसार में सबसे निकृष्ट व्यक्ति है। मनुष्य का जन्म ही संसार में कुछ ऊँचा कार्य सम्पादित करने के लिये हुआ है। जो अपने इस कर्तव्य को पूरा नहीं करता, संसार को सुन्दर एवं समुन्नत बनाने में अपना अंश दान नहीं करता, उसे कर्तव्यघाती के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता हैं। जिसकी इच्छाओं में दृढ़ता नहीं, संकल्प में शक्ति नहीं, वह संसार में कोई भी श्रेयस्कर कार्य सम्पादित नहीं कर सकता। इस प्रकार का संकल्पहीन व्यक्ति जानवरों की तरह उत्पन्न होता है, उन्हीं की तरह जीवन-यापन करता और अन्त में अहमत्त्वपूर्ण मृत्यु मर कर चला जाता है। इस प्रकार की अस्मरणशील मृत्यु आत्म-हत्या से किसी प्रकार कम नहीं।
साधारण एवं असाधारण व्यक्तियों में जो अन्तर दिखाई देता है, उसका मूलभूत कारण उनकी अपनी-अपनी इच्छा शक्ति ही है। जिन्होंने अपने संकल्पों को ऊँचा, बनाया, इच्छाओं को स्वार्थ के दायरे से निकाल कर परमार्थ की ओर निसृत किया उन्होंने जीवन में महानता पाई और जिन्होंने अपनी इच्छाओं को स्वार्थपूर्ण बना कर निकृष्ट भोगों तक ही सीमित रक्खा, खाने-पीने और उड़ाने को ही जीवन का लक्ष्य माना वह उन्हीं तक सीमित रहकर निकृष्ट बन गया।
जिस सीमा तक मनुष्य की इच्छाओं की परिधि फैलती है, उस सीमा तक वह स्वयं भी बढ़ जाता हैं। जिसकी इच्छाएं व्यापक हैं वह व्यापक और जिसके संकल्प ऊँचे हैं वह ऊँचा बने बिना नहीं रह सकता।
पवित्र इच्छायें मनुष्य के जीवन को पवित्र और अपवित्र कामनायें उसे निकृष्टतम बनाए बिना नहीं छोड़तीं। खाना-पीना, सोना-जागना मजा और मौज मनुष्य का निसर्ग-प्रदत्त स्वभाव हैं। मनुष्य की यह सहज प्रवृत्तियाँ है। फिर इन्हीं में लगे रहना इन्हीं को बढ़ाते रहने में क्या विशेषता है? विशेषता तो इस बात में है कि मनुष्य इन प्रकृति प्रवृत्तियों को परिमार्जित करे, संस्कृत करे और अपने इस सहज स्वभाव को उदात्त बना कर संसार में कुछ कर दिखावे। भोजन सब करते हैं। किन्तु स्वार्थी अपने लिये और परमार्थी दूसरों के लिये। स्वार्थी, लोलुप और निकृष्ट इच्छाओं वाला व्यक्ति शरीर को शरीर भोगों के लिये ही पालता और पोसता है जबकि परमार्थी दूसरों की सेवा, औरों की उपयोगिता के लिये ही अपने जीवन की रक्षा करता है।
मनुष्य उस चरम चेतन का सम्पूर्ण प्रतिबिम्ब है। उसका प्रतिनिधि हैं। इतना बड़ा होने पर यदि वह निकृष्ट उद्देश्य के लिये जीता है तो वह अपनी महानतम पदवी ‘मनुष्यता’ को कलंकित करता है। अपनी इच्छा को सुसंस्कृत, पवित्र एवं शक्ति-सम्पन्न बना कर परमेश्वर के प्रधान अंश मनुष्य को उन्नत संकल्पों के साथ सराहनीय जीवन यापन करना चाहिये। यही उसकी मनुष्यता और यही उसकी विशेषता है।
प्राचीन भारतीय साहित्य सदाचार पूर्ण जीवन बिताने की आवश्यकता तथा उपयोगिता के उल्लेखों से भरा पड़ा है। नैतिक व्यवस्था के देवता वरुण की प्रार्थना अत्यन्त विनम्र शब्दों में इस उद्देश्य से की जाती थी कि वह निष्ठापूर्वक सत्य तथा माँगलिकता से पूर्ण जीवन बिताने में मनुष्य की सहायता कर सके । ऋषि ने बताया-
दृते दृœहमा मित्रस्य मा चक्षुषा
सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्।
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
मित्रस्य चक्षुषा समीक्षा महे॥
यजु0 36। 18
हे परमेश्वर! हम सम्पूर्ण प्राणियों में अपना ही आत्मा समाया हुआ देखें, किसी से द्वेष न करें और जिस प्रकार एकत्रित एक मित्र दूसरे मित्र का आदर करता है वैसे ही हम भी सदैव सभी का सत्कार करें।
सद्जीवन की व्याख्या स्वरूप महाभारत के वन-पर्व में विचारपूर्ण विवरण मिलता है। महाराज युधिष्ठिर से एक यक्ष पूछता है। ‘भगवन्! दिशा क्या है?” इस पर युधिष्ठिर ने बड़ा ही उद्देश्यपूर्ण उत्तर दिया है कि “जो शुभ है वहीं दिशा है”। अर्थात् मनुष्य जीवन का उद्देश्य ही सदाचार है और सद्जीवन जीते हुये बिना किसी कष्टसाध्य साधनों के वह जीवनमुक्ति प्राप्त कर सकता है। जिसके व्यवहार, क्रिया और सम्भाषण आदि में मधुरता होती है, उन्हें इस संसार के सुखोपभोग की भी कमी नहीं रहती।
सदाचार का अर्थ है, मानव मात्र की भलाई की भावना रखना। सब के हित को अपना हित समझकर तद्नुकूल आचरण करना। शास्त्रकार के शब्दों में :-
सर्वेऽत्र सुखिनः सन्तु सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत॥
अर्थात्- इस संसार में सबकी सबके प्रति सद्भावना रहे। यह विचार रखना चाहिये कि सभी सुखी हों, सभी निरोग हों, सभी आत्म-कल्याण को प्राप्त करें और किसी को दुःख न हो। यह शुभ कामनायें ही सद्जीवन का मूल है। इसमें प्राणि मात्र का हित समाया हुआ है।
सदाचार घाटे का सौदा नहीं। कर्त्ता की भावना के अनुरूप सदाचारिता का लाभ मिलता अवश्य है। सहयोग, सहानुभूति, स्नेह, आत्मीयता तथा मैत्री की उसे कमी नहीं रहती जिसके जीवन में सब के कल्याण की भावनायें आई हुई हों। इसके विपरीत जिनके जीवन दुराचरणपूर्ण रहे हैं, उन्हें उसका दण्ड भी अवश्यमेव भोगना पड़ा है। रावण अपने असंख्य पुत्र-पौत्रों समेत मारा गया। दुराचारी दुर्योधन की अनेक अक्षोहिणी सेना भी उसे विजय न दिला सकी। अनियन्त्रित वासना के शिकार हुये विश्वामित्र को अपनी दीर्घकालीन तपश्चर्या के फल से वंचित होना पड़ा। वाजिश्रवा का प्रमाद उसी की पराजय का कारण बना। वसिष्ठ के पुत्र प्रचेता का क्रोध उन्हें ही खा गया। इतिहास के पन्ने-पन्ने में ऐसे असंख्यों उदाहरण मौजूद हैं जिनसे विदित होता है कि पाप और दुराचार मनुष्य की दुर्गति का ही कारण बनता है। उसे जहाँ आत्म-असंतोष बना रहता है वहाँ दूसरे लोग भी उलटा होकर प्रतिकार करने के लिये तैयार बने रहते हैं। दुराचार का दुष्परिणाम कर्त्ता के पास स्वयं ही लौट आता है।
धन मनुष्य को सुखी नहीं रख सकता, क्योंकि वह जहाँ भी रहेगा। वहाँ ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, भय, असन्तोष, विषय और वासनायें भी जरूर होंगी। इनसे मनुष्य के अन्तःकरण में सदैव खिन्नता बनी रहेगी। शारीरिक शक्ति, पद या अन्य कोई भौतिक समृद्धि एक निश्चित सीमा तक ही सुख दे सकती है, किन्तु सदाचारी का आत्मा तो सदैव ही प्रफुल्ल रहता है। वह निडर और निर्भीक होता है। श्रेष्ठ पुरुष दूसरे पापाचारी प्राणियों के पाप को ग्रहण नहीं करता। उन्हें अपराधी मान कर उनसे बदला भी लेना नहीं चाहता मन की रक्षा सदाचार स्वयं ही करता है। क्योंकि सदाचार ही मनुष्य का सच्चा साथी और सत्पुरुषों का भूषण होता है।
सदाचारी के लिये औरों को नेकी की राह पर चलाने के लिये प्रवचन या उपदेश की आवश्यकता नहीं होती। उनकी निष्ठा ही औरों को प्रेरित करती आर सन्मार्ग की ओर अग्रसर करती है। आचरण विहीन व्यक्तियों द्वारा लाखों उपदेशों का भी कोई महत्व नहीं होता। कौत्स के लिये कुबेर से भी युद्ध करने वाले रघुवंशी दिलीप की दान भावना युग-युगान्तरों तक अक्षुण्ण रहेगी और उससे अनेकों औरों को भी दान करने की प्रेरणा निरन्तर मिलती रहेगी। पितृ-भक्ति, त्याग और आत्म-संयम का जो उदाहरण भीष्म पितामह ने दिखाया उससे अनेकों दलित आत्माओं को भी प्रकाश मिलता रहेगा। महात्मा गांधी की देश भक्ति अब अनेकों देशवासियों के दिलों में घुसकर काम कर रही है। सदाचार सदैव ही अमिट रहता है और निष्ठा के अनुरूप बहुत काल तक लोगों का आन्तरिक और प्रभावशाली मार्ग दर्शन करता रहता है।
सर्वोच्च आध्यात्मिक सिद्धियों की प्राप्ति सदाचार से ही सम्भव है। तप, त्याग, कष्टसहिष्णुता, दान, दया, संयम आदि से ही आन्तरिक शक्तियों का जागरण होता है। यह सारे सदाचार के ही विभिन्न अंग हैं। संसार के समस्त धर्मों का उद्देश्य मनुष्य को सदाचार की शिक्षा ही है। परमात्मा की उपासना भले ही न करे पर यदि कोई व्यक्ति अन्य प्राणियों के साथ आत्मीयता, दया, करुणा, शुचिता और सच्चरित्रता का व्यवहार करता है तो वह किसी उपासना से कम फलदायक न होगा। सद्गुणों के द्वारा सुख और ईश्वर की प्राप्ति यह एक अचल दैवी विधान है। इसे कोई मिटा नहीं सकता।
धार्मिक संगठनों की रचना चरित्र शुद्धि के आधार पर होती है। अमुक प्रकार की आध्यात्मिक योग्यता होने पर ही व्यक्ति उच्च श्रेणी में आ सकता है। कर्त्तव्य की दृष्टि से संकुचित होने पर व्यक्ति और समाज सभी की व्यवस्था में गड़बड़ी फैलती है। इसलिये धर्म सबको सदाचार और स्थिरता का सन्देश देता है। मनुष्य जब अपने स्वार्थ के लिये जात-पाँत, वेष-भूषा, सम्प्रदाय या वाह्य क्रियाकाण्ड को महत्व देने लगता है, तब वह अपने लक्ष्य से गिर जाता है। सदाचार का अर्थ है व्यक्तिगत विकास और सामाजिक व्यवस्था। इससे भिन्न और कोई रास्ता नहीं हैं जिसमें चलकर मनुष्य पूर्णतया सुखी जीवन का रसास्वादन कर सके। धार्मिक संगठनों का उद्देश्य सद्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देना ही है इसलिये धर्म को मानव की मूल प्रकृति के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया गया है।
अपना विकास, अपनी प्रगति और केवल अपने लिये ही सुख की आकाँक्षा किया जाना स्वार्थ वृद्धि है। सबकी भलाई हो यह एक उद्दात्त भावना है। यह मनुष्य की महानता का प्रतीक है कि उसकी भावनायें कितनी ऊर्ध्वगामी है। अब लोगों की ममत्व अथवा अपनत्व की भावनायें बहुत ही संकीर्ण हो गई है इसीलिये एक दूसरे के दुःख और असुविधा का अनुभव नहीं कर पाते। अपना काम बने दूसरों का कितना ही अहित क्यों न हो इस आत्मप्रवंचना के कारण ही लोगों का आत्म विकास रुका पड़ा है।
मनुष्य का आचरण उन विभिन्न शक्तियों का परिणाम है जो उसके जीवन पर अपनी क्रियाएं और प्रतिक्रियाएँ करती हैं, और हम स्वयं ही जिसका केन्द्र-बिन्दु हैं- चूल हैं, प्रधान आधार हैं। ऐसे ही परिणामों के संयुक्त फलों से समाज का या समाजिक विधान का निर्माण होता हैं।
-डॉ0 पट्टाभी
सदाचार भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। यह हमें अपने पूर्व पुरुषों से बहुत बड़ी जायदाद के रूप में मिला है। विश्व में हमारी सर्वोपरिता का कारण भी यही हैं। गीता, रामायण आदि सभी ग्रन्थों ने इस बात को माना है कि व्यक्ति के विकास में सद्जीवन का योग ही धर्म हैं। लगन, त्याग, अध्ययन, शान्ति, प्रेम, शालीनता, संयम, पावनता, शक्ति, क्षमा-यह सब सद्जीवन के गुण माने गये हैं। हमारा जीवन इनसे विमुख न होना चाहिये। हमें ऋषियों ने यही सिखाया हैं। हम इस मार्ग पर बढ़ें तो फिर पूर्व सम्पदाओं के स्वामी बन सकते है। अपनी खोई हुई उच्च आध्यात्मिक स्थिति पुनः प्राप्त कर सकते हैं।
महामना पं0 मदनमोहन मालवीय का जन्म 25 दिसम्बर, 1861 को इलाहाबाद में हुआ। इनके पूर्वज मालवा के रहने वाले थे। अतएव इस परिवार के लोग अपने नाम के साथ मालवीय लिखा करते है।
मालवीय जी के पिता पं0 ब्रजलाल संस्कृत के उद्भट विद्वान थे। उनकी विद्वता का प्रभाव पुत्र पर बड़ी गहराई तक पड़ा और आगे चलकर वह अपने परिश्रम के बल पर संस्कृत के साथ अंग्रेजी का महान विद्वान बना। जिस प्रकार मालवीय जी पर पिता के पाण्डित्य का प्रभाव पड़ा उसी प्रकार उनकी माता मुन्नीदेवी की धार्मिकता का भी पूर्ण प्रभाव पड़ा।
ज्ञान पूर्ण धार्मिक जीवन ने मालवीय जी को मानवता की मूर्ति बना दिया और उनके हृदय में मानव जाति के लिये अपार प्रेम तथा सहानुभूति का सागर उमड़ पड़ा। अपने पूरे जीवन भर वे राजनीति धर्म तथा समाज के मंचों से देश, धर्म, समाज और संसार की सेवा करते रहे।
अपनी प्रारम्भिक शिक्षा इलाहाबाद में पूर्ण करके कलकत्ता से मैट्रिक की परीक्षा पास की और म्योर कालेज इलाहाबाद से बी0 ए0 किया।
अपने विद्यार्थी-काल से ही मालवीय जी ने समाज सेवा की आवश्यकता तथा उसका महत्व समझ लिया था। जिस समय वे कॉलेज में पढ़ रहे थे, उसी समय उन्होंने अपने सहपाठियों के सहयोग से “हिन्दू-समाज” नामक एक लोक-हितकारी संस्था की स्थापना की थी।
पण्डित मदनमोहन मालवीय बाल्य-काल से ही हिन्दू, हिन्दी, हिन्दुस्तान के उपासक थे। हिन्दुत्व के प्रति उनका यह उपासना भाव केवल इसलिए नहीं था कि वे स्वयं एक हिन्दू थे। उनकी इस भावना का कारण हिन्दू-संस्कृति का वह गौरव तथा हिन्दू-धर्म के मानवतापूर्ण वे सिद्धान्त तथा सन्देश थे जिनको उन्होंने गम्भीरता-पूर्वक अध्ययन किया था और अपने जीवन में उनको उतार कर उनकी यथार्थता तथा महानता का अनुभव किया था।
मालवीय जी के परिवार की माली हालत अच्छी नहीं थी। उनके पिता जितने विद्वान थे, उतने ही त्यागी तथा परोपकारी व्यक्ति भी थे। एक तो वे अपनी विद्वता का मूल्य नहीं लेते थे और यदि कुछ थोड़ा-बहुत पाते भी थे उसका अधिकाँश भाग परोपकार में व्यय कर देते थे। उनका विश्वास था-’विद्वता प्राप्त करने में गरीबी एक वरदान सिद्ध होती हैं।’ गरीबी मनुष्य को परिश्रमी, पुरुषार्थी तथा सन्तोषी बना देती है।
बी0 ए0 पास करने के बाद उन्होंने इलाहाबाद में ही गवर्नमेंट स्कूल में पचास रुपये माहवार पर अध्यापक का पद ग्रहण कर लिया। मितव्ययी तथा सदाचारी प्रवृत्ति के मालवीय जी के लिये यह पचास रुपये का वेतन भी पर्याप्त था। उन्होंने इस छोटी-सी आय में ही ऐसी व्यवस्था बना ली कि वे अपने घर का सारा खर्च पूरा करके परोपकार के कामों में खर्च करने के लिये कुछ न कुछ बचा लेते थे। वे अपनी बचत से गरीब विद्यार्थियों को फीस तथा पुस्तकों की सहायता किया करते थे और रोगियों को दवा बाँटते थे।
अपनी दया, उदारता तथा संवेदनशीलता से मालवीय जी शीघ्र ही, न केवल स्कूल ही में बल्कि जनता में भी लोक प्रिय हो गये। अपने अध्यापन-काल में मालवीय जी पढ़ाने के साथ-साथ देश-सेवा तथा समाज-सेवा के कार्य भी किया करते थे। देश की सक्रिय सेवा करने के लिये उन्होंने काँग्रेस ही सदस्यता स्वीकार कर ली और उसकी हर गतिविधि में अपना योग देने लगे। वे उसके आन्दोलनों से लेकर अधिवेशनों तक में उत्साहपूर्वक भाग लेते थे।
काँग्रेस में उस समय देश के छंटे हुए विद्वान सम्मिलित थे, जिनकी योग्यता को चुनौती देकर काँग्रेस का पदाधिकारी हो सकना कठिन काम था, लेकिन मालवीय जी ने अपनी योग्यता तथा महानता का प्रमाण देकर शीघ्र ही काँग्रेस में प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली।
कलकत्ता-काँग्रेस के द्वितीय अधिवेशन में उन्होंने जिस योग्यता से देश की परिस्थिति का विवेचन किया उसको सुनकर सारा उपस्थित वर्ग प्रभावित हो उठा। उस अधिवेशन में कालाकाँकर के राजा रामपाल भी उपस्थित थे। वे मालवीय जी के विचारों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनको अपने साप्ताहिक पत्र ‘हिन्दुस्तान’ का सम्पादक नियुक्त कर लिया। मालवीय जी ने यह पद इस शर्त पर स्वीकार किया कि राजा साहब उनको नशे की हालत में न मिलने आयेंगे और न बुलायेंगे। राजा साहब ने यह शर्त मंजूर कर ली और मालवीय जी पत्र का सम्पादन करने लगे।
किन्तु कुछ समय बाद राजा रामपालसिंह अपनी शर्त भूल गये और एक दिन उन्होंने आवश्यक काम से मालवीय जी को उस समय बुला लिया-जिस समय वह शराब पिये हुए थे। मालवीय जी ने उनको शर्त की याद दिलाई और तत्काल दो सौ रुपया मासिक की सम्पादकी छोड़ कर चले आये।
सम्पादक का पद छोड़ने के बाद मालवीय जी ने नौकरी न करने का निश्चय करके वकालत पास की और अल्प समय में ही अपनी परिश्रमशीलता से अच्छे वकीलों की सूची में आ गये। उन्हें इस वकालत व्यवसाय में हजारों रुपये मासिक की आय होने लगी। किन्तु इस आय वृद्धि से उनकी सादगी में कोई परिवर्तन नहीं आया। अपने पर व्यय करने वाली धन-राशि की मात्रा तो उतनी ही रही- ‘जितनी कि पचास रुपये मासिक की आय में करते थे।’ हाँ आय के अनुपात से परोपकार पर व्यय होने वाली धन राशि अवश्य बढ़ गई।
वकालत का व्यस्त व्यवसाय करते हुए भी वे लोक-सेवा के कार्य करते और काँग्रेस के हर अधिवेशन में भाग लेते रहे। वे मद्रास, बम्बई, कलकत्ता तथा नागपुर के काँग्रेस अधिवेशनों में शामिल हुए और अपनी वाक्पटुता तथा दूरदर्शी विचारों से काँग्रेस के चोटी के नेताओं के साथ जनता का बहुत विश्वास प्राप्त कर लिया। निदान 1902 में वे प्रान्तीय कौंसिल के सदस्य निर्वाचित किये गए और अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की अध्यक्ष बनाये गये और जब लाहौर काँग्रेस में उन्होंने काँग्रेस की कार्य-विधि, देश की आवश्यकता एवं राजनीति की दिशा की समीक्षा करते हुए सार-गर्भित भाषण दिया तब तो उन्हें दिल्ली काँग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया।
मालवीय जी की यह उन्नति किसी को कृपा अथवा उदारता के कारण नहीं हुई थी। यह उनकी योग्यता, दूरदर्शिता, कर्तव्य-निष्ठा तथा परिश्रमशीलता का फल था। वे जिस काम को अपने हाथ में लेते थे उसे पूरा करने में जी-जान से जुट जाया करते थे और जब तक उसे पूरा नहीं कर लेते थे-’चैन से न बैठते थे।’ अपने हाथ के काम में वे अपनी सारी योग्यता तथा विद्या बुद्धि लगा देते थे, जिससे उनका हर काम पराकाष्ठा तक सफल होता था।
जिस समय वे सरकार की व्यवस्थापिका-सभा के सदस्य थे उस समय वे बात-बात पर अपने साहस तथा देश-भक्ति का प्रमाण देते रहे। कोई भी ऐसा प्रस्ताव जो लोकमत अथवा जन-हित के विरुद्ध होता था उनकी तीव्र आलोचना तथा विरोध से न बच पाता था।
1931 में मालवीय जी ‘राउण्ड टेबल कांफ्रेंस’ में भाग लेने लन्दन गये। राउण्ड टेबल कांफ्रेंस का उत्तरदायित्व वहन करते हुए भी उन्होंने अंग्रेज जनता के सामने ईश्वर तथा हिन्दू-धर्म की विशेषताओं पर अनेक ओजस्वी भाषण दिये जिससे विदेशियों की दृष्टि में देश का स्तर ऊँचा हुआ।
राजनीतिक क्षेत्र के अतिरिक्त मालवीय जी ने शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में जो कार्य किये हैं, वे भारत के इतिहास में सदा अमर रहेंगे। काशी का हिन्दू-विश्व-विद्यालय पं0 मदनमोहन मालवीय जी की देश को महान देन हैं। मालवीय जी को इस बात का बहुत दुःख रहा करता था कि देश में कोई ऐसी शिक्षा संस्थायें नहीं हैं जो भारतीय तरुणों का आदर्श निर्माण कर उन्हें भारतीय धर्म तथा सभ्यता, संस्कृति का पुनरुत्थान कर सकें।
इस अभाव पर एक लम्बे समय तक विचार करने के बाद उन्होंने एक विश्वविद्यालय स्थापित करने का निश्चय किया और आत्म-विश्वास के बल पर वह महान कार्य करने के लिये ‘खाली हाथ उठ खड़े हुए।’ उन्होंने विश्वविद्यालय के लिये धन एकत्र करने के लिये पूरे देश का दौरा किया और एक-एक पैसा माँग कर लगभग एक करोड़ रुपया जमा किया और 4 फरवरी, 1916 को वसंत पंचमी के दिन काशी विश्वविद्यालय का शिलान्यास करना। उन्होंने केवल इतना ही नहीं किया अपितु आजीवन उसके अवैतनिक उपकुलपति रहकर संस्था की सेवा भी की।
हिन्दी के प्रसार तथा प्रचार के लिए उन्होंने साहित्यिक सभा की स्थापना की। ‘अभ्युदय’ तथा ‘मर्यादा’ नामक दो पत्र प्रकाशित किये और अपने प्रभाव तथा सतत प्रयासों से उर्दू के साथ हिन्दी को भी अदालतों की भाषा बनवाया। उनके इन महान कार्यों के लिये हिन्दी सदैव ही उनकी आभारी बनी रहेगी।
मालवीय जी अपने धर्म तथा धार्मिक नियमों के यथावत मानने वाले थे। उनकी सम्पूर्ण दिनचर्या शास्त्र-विहित ही होती थी और शास्त्र-विहित नियमों में ही वे विश्वास किया करते थे। फिर भी धार्मिक संकीर्णता तथा कट्टर-पन्थी उन्हें छू तक नहीं गई थी। वे अछूतों के समर्थक तथा छुआ-छूत के विरुद्ध थे। वे हरिजनों को हिन्दू-समाज का एक अभिन्न अंग मानते थे और उनके मानवोचित अधिकारों के समर्थक थे। यही कारण हैं कि उन्होंने बहुत से कट्टर-पन्थियों के विरोध के बावजूद भी कलकत्ता में अछूतों को मन्त्र दिया था।
वे हिन्दू-जाति को अपने प्राणों से अधिक प्यार करते थे। वे जहाँ भी हिन्दुओं पर अत्याचार होते सुनते, वहीं पहुँच जाते। जिस हिन्दू जाति और हिन्दुस्तान की वे जीवन-भर सेवा करते रहे अन्त में उसी की पीड़ा में प्राण देकर स्वर्ग सिधार गये। भारत के विभाजन के बाद नोआखाली आदि स्थानों पर जो नृशंस संहार हुआ उसका समाचार सुन वे सहन न कर सके और कुछ ही समय के बाद स्वर्ग सिधार गये।
सद्ज्ञान के प्रबल प्रचारक
यूनान के महान दार्शनिक महात्मा सुकरात को आज संसार में कौन नहीं जानता। वे विचारों से दार्शनिक तथा आचार से संत थे। उनका जन्म यूनान के एथेन्स नगर में 469 ई॰ पू0 हुआ था। इनके पिता एक साधारण शिल्पी थे और छोटी-छोटी मूर्तियाँ बनाकर बेचा करते थे। उनके परिवार का गुजर-बसर बड़ी कठिनता से होता था।
कुछ सयाने होने पर वे अपने पिता के काम में हाथ बँटाने लगे। काम से फुरसत पाकर वे एकान्त में चले जाते और घण्टों बैठकर जीवन, जगत और अमीरी-गरीबी पर विचार करते रहते थे। गरीबी के कारण उन्हें पढ़ने-लिखने का अवसर न मिल सका था, किन्तु निरन्तर चिन्तन करते-करते उनके मस्तिष्क के सूक्ष्म से सूक्ष्म तन्तु खुलने लगे और वे हर विषय पर गहराई से विचार कर सकने में समर्थ हो गये।
इसी बीच यौवन में प्रवेश करते ही यूनान के राज नियम के अनुसार उन्हें फौज में भरती होना पड़ा। कोई दार्शनिक विचारधारा वाला यदि सैनिकों के कठिन तथा कठोर जीवन में पहुँच जाये तो उसकी क्या दुर्गति हो सकती है उसका अनुमान लगा सकना कोई कठिन बात नहीं है। कहाँ विचारों की उड़ान और कहाँ अस्त्र-शस्त्रों की कर्कश आवाज।
किन्तु सुकरात थोथी विचारधारा के दार्शनिक नहीं थे। वे कर्म और कर्तव्य की महत्ता को जानते थे और यह भी जानते थे कि संसार में कभी भावनाओं के उद्यान से निकल कर यथार्थ के तत्व मरुस्थल में भी कदम रखना पड़ता है। जो सच्चा विचारक है, वास्तविक दार्शनिक है, वह हर स्थिति में समान रूप से प्रसन्न तथा क्रियाशील रहता है। दार्शनिकता का सच्चा अर्थ है भी यही कि जीवन के किसी भी संयोग को आवश्यकता की दृष्टि से देखे। हर दशा में धैर्यवान तथा आत्मवान् बना रहे।
सेना में भर्ती होकर सुकरात ने एक सच्चे सैनिक की भाँति अपना कर्तव्य-पालन किया। स्वभाव के सर्वथा विपरीत वातावरण में वे न तो एक क्षण को कभी उदास हुये और न उन्होंने निराशा का अनुभव किया। सेना में रहकर भी उन्होंने जीवन के उस मृत्युमय अंश का भी गम्भीरता से अध्ययन किया और उनके आवश्यक निष्कर्ष निकाले। हर स्थिति में सम- भाव से रहना सुकरात के चरित्र की एक प्रमुख विशेषता थी। धैर्य उनका मित्र तथा अक्रोध उनका सहायक बन्धु था। किसी भी दशा में विचलित होना तो वे जानते ही न थे।
किसी में यह विशेषतायें जन्मजात हो सकती हैं, किन्तु सन्त सुकरात ने यह गुण अपने में प्रयत्नपूर्वक विकसित किये थे। वे निर्धन थे, उनके पिता गरीब थे। यहाँ तक कि रोटी भी कठिनता से मिल पाती थी। सुकरात ने अपनी इस गरीबी को दुःख का नहीं, चिन्तन का विषय बनाया और उसे अपने धैर्य की कसौटी समझकर प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया। क्षुधा का आक्रमण होने पर वे चुपचाप एक ओर बैठ जाते और अपने पर उसकी क्रिया प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करते। इस प्रकार अध्ययन करते-करते वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य में जहाँ भूख, प्यास की पीड़ा अनुभव करने वाला एक अंश हैं वहाँ एक अंश ऐसा भी है जिस पर इन सब बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता और यदि मनुष्य अपने उस प्रभाव-शून्य अंश के साथ मित्रता रख कर रहे तो उसे संसार का कोई भी दुःख पीड़ा नहीं पहुँचा सकता। वह हर दशा में पूर्ण प्रसन्न तथा सन्तुष्ट रह सकता है। स्पष्ट है मनुष्य के ये दोनों अंश शरीर और आत्मा हैं। शरीर आवश्यकताओं की पीड़ा अनुभव करता हैं, दुःख की अनुभूति करता है, किन्तु आत्मा सदैव ही एक रस निर्विवाद रहा करती है। अपनी इस आत्मा का मित्र बनकर रहने वाला मनुष्य दुःखों के बीच भी सुख का ही अनुभव करता हैं।
शरीर के विषय में भी उनका निष्कर्ष था कि उसकी आवश्यकतायें बहुत कम होती हैं। मनुष्य उन्हें स्वयं हठ पूर्वक बढ़ा लिया करता है। यदि मनुष्य केवल शरीर रक्षा भर की ही आवश्यकताओं को महत्व दे तो वह न तो कभी करीब हो सकता है और न अभावग्रस्त।
सैनिक जीवन का त्याग कर देने के बाद सन्त सुकरात का चिन्तन और भी गहरा तथा यथार्थपरक हो गया।
सुकरात एक दार्शनिक थे, चिन्तक थे, किन्तु अपने लिये ही नहीं। उनका दर्शन, चिन्तन तथा ज्ञान जन-साधारण के लिये था। वे एथेन्स की गली गली में घूमते और जहाँ भी चार-छः आदमियों को इकट्ठा देखते वहीं अपने विचार प्रकट करने लगते। वे गहरे से गहरे विचार इस प्रकार साधारण बातचीत के रूप में रखते थे कि सामान्य से सामान्य व्यक्ति भी उसे दैनिक व्यवहार के रूप में ग्रहण कर लेता था। इस प्रकार वे वास्तव में जनता को उपदेश नहीं देते थे बल्कि एक शिल्पी की तरह जन-जन का निर्माण करते घूमते थे। वे स्त्री, पुरुष धनी और निर्धन तथा ऊँच और नीच से समान रूप से बातचीत किया करते थे।
सन्त सुकरात देखने में बड़े कुरूप थे, नाटा कद, मोटा पेट और चेचक के निशानों से भरा कुरूप चेहरा, तिस पर वेश-भूषा और भी विचित्र। एक फटे पुराने लम्बे से कोट से पूरा शरीर ढंके नंगे सिर और नंगे पैर एथेन्स की गली-कूचों में ज्ञान का भंडार बाँटते घूमते थे। उनके फटे पुराने मैले कुचैले कपड़े तथा कुरूप चेहरे तथा भौंड़े शरीर को देख कर कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि वे ज्ञान की चलती फिरती निधि थे। वे बच्चों के लिये एक तमाशा और सयानों के लिये देवता थे। वे जिज्ञासु भक्तों से घिरे परमहंस सिद्ध जैसे अपने को भूले हुये जन-साधारण को उपदेश दिया करते थे। एथेन्स के मात्र मानव ही नहीं गली, कूचों के कुत्ते-बिल्ली तक उनसे परिचित थे। ज्ञान गौरव से परिपूर्ण वह सरलता की प्रतिमूर्ति सन्त जब एथेन्स की सड़कों पर घूमता होगा तब न जाने कैसा लगता होगा? जिस समय वह किसी चौराहे पर घिरा हुआ मनुष्यों के प्रश्नों का उत्तर देता, उनकी शंकायें समाधान करता और ज्ञान के घूँट बाँटता होगा तब अवश्य ही उसके चारों ओर का वातावरण ऐसा हो जाता होगा, मानो इस पृथ्वी का वह भाग संसार से भिन्न किसी आत्मलोक का कोना है। आत्मीयता का आगार और सहानुभूति की वह चलती-फिरती तस्वीर यद्यपि आज संसार में नहीं है, किन्तु उनके उपदेशों की निधि जाता हुआ अतीत आते हुये भविष्य को देकर उन्हें सदा वर्तमान रखता है और जब तक संसार में ज्ञान की जिज्ञासा बनी रहेगी, मानवता पूर्णता का प्रयत्न करती रहेगी, सन्त सुकरात अपने कथनों के रूप में सदैव अमर रहेंगे।
उनके उपदेश अलौकिकता की अनबूझ पहेलियाँ नहीं होती थीं और न कोई स्वर्गीय सन्देश। उनकी एक-एक बात, एक-एक शब्द केवल मानवता के हिमायती और संसार को सुन्दर बनाने के सूत्र होते थे।
सुकरात सद्गुणों, सत्य तथा निर्भयता के उपासक थे। अपने उपदेशों में वे मनुष्यों को अपने में सद्गुण उपजाकर श्रेष्ठ बनने की प्रेरणा दिया करते थे और कहा करते थे- श्रेष्ठता कोई ऐसा अलौकिक दान नहीं है जो किसी को भाग्यवश अथवा संयोगवश मिलता हो। श्रेष्ठता एक राजमहल की तरह है जिसका निर्माण सद्गुणों के उपकरणों से किया जाता है जिसका निर्माण सद्गुणों के उपकरणों से किया जाता हैं। अपने में सद्गुणों का विकास करने से कोई भी व्यक्ति श्रेष्ठ बन सकता हैं। संसार में एक ही पाप है और वह हैं अज्ञान। ज्ञान पुण्य है और उसको प्राप्त किये बिना कोई भी श्रेष्ठ नहीं हो सकता। केवल किसी अच्छे कुल अथवा धनवान घर में जन्म लेने से ही कोई प्रतिष्ठा का पात्र नहीं हो जाता। सच्ची प्रतिष्ठा तो मनुष्य को अपने गुणों से ही मिलती है।
आशावाद आस्तिकता है, सिर्फ नास्तिक ही निराशावादी हो सकता हैं। आशावादी ईश्वर से डरता हैं, विनय पूर्वक उसे अपनी पुकार सुनाता हैं और भीतरी पुकार के अनुसार बरतता हैं। वह मानता हैं कि ईश्वर जो करता हैं, अच्छे के लिये ही करता हैं।
-महात्मा गाँधी
सन्त सुकरात पराकाष्ठा तक सादे रहते थे। उनकी आवश्यकतायें बहुत कम थीं। वे कहा करते थे कि आवश्यकता रहित व्यक्ति देवताओं का मित्र होता है, सदा सम्पन्नता अनुभव करता और कभी दुःखी नहीं होता। अधिक आवश्यकताएं मानसिक दरिद्रता की द्योतक है। मनुष्य को इनसे बचकर रहना चाहिये। मनुष्य को धन वैभव तथा मान-सम्मान की लालसा पर लज्जा आनी चाहिये जबकि वह सत्य और ज्ञान का साक्षात्कार करके अपनी आत्मा को पवित्र बनाने की चिन्ता बिल्कुल नहीं करता।
उनके अनोखे चरित्र, विचित्र वेश-भूषा और नूतन विचारधारा ने लगभग समस्त एथेन्स वासियों को अपना भक्त बना लिया था। जन-साधारण एथेन्स के शासक से भी अधिक सुकरात का सम्मान करते थे। एथेन्स के युवक तो उनके मुख से जीवन के नवीन संवाद सुनकर उनके महान भक्त बन गये। उनकी यह लोकप्रियता देखकर एथेन्स के प्रतिक्रियावादी तथा शासक वर्ग भयभीत हो गये। उन्हें ऐसा लगने लगा कि यदि सुकरात का यही प्रभाव बना रहा और तरुण वर्ग उसके प्रभाव में रहा तो एक दिन वह एथेन्स की सत्ता उलट सकता है। पापात्मा व्यक्तियों ने सन्त सुकरात के विरुद्ध षडयंत्र करना शुरू कर दिया।
उनके गुर्गे तथा किराये के टट्टू उस जन-हितैषी तथा निस्पृह सन्त को तरह-तरह से त्रास देने लगे। वे उनका उपहास उड़ाते, उन पर ईंट, पत्थर, धूल, मिट्टी तथा कीचड़ फेंकते। उनके उपदेशों में विघ्न डालते और ताली बजा-बजाकर उन्हें पागल पुकारते। किन्तु मूर्ख मनुष्यों की इन हरकतों से उस वीतराग सन्त पर कोई प्रतिक्रिया न होती। व शान्त भाव से अपना उपदेश देते रहते अथवा अपने रास्ते चले जाते। न तो उन्हें क्रोध आता और न वे किसी का विरोध अथवा प्रतिरोध किया करते थे।
एथेन्स की जनता ने दुष्टों की इन अनुचित कार्यवाहियों का विरोध करना चाहा। युवकों ने संघर्ष की तैयारी कर ली। किन्तु सुकरात ने उन सबको यह कह कर शान्त कर दिया कि जो कुछ वे करते हैं, यदि हम सब भी वही सब कुछ करने लगे तो हम में और उनमें, भले और बुरे में क्या अन्तर रह जायेगा? यदि कोई गधा तुम्हारे लात मारे तो क्या बदले में तुम भी उसके लात मारोगे? उनकी कार्यवाहियों से उत्तेजित न होना ही हमारी जीत है। हमारी सहिष्णुता ही उनकी हार तथा उनके किये का पूरा-पूरा दण्ड है। हम जितने ही शान्त रहेंगे वे उतने ही अशान्त होंगे।
विरोधी जब इस प्रकार संत सुकरात को परास्त न कर सके तो उन्होंने राज सत्ता को भड़का कर उन्हें राज द्रोही घोषित करा दिया। सुकरात को बन्दी बना लिया गया। उनके शिष्यों ने उन्हें भाग जाने के लिये अनेक बार व्यवस्था बनाई, किन्तु उन्होंने भागने से स्पष्ट इनकार करते हुये कहा-तुम मुझे भागने को कहते हो। किन्तु मैं भाग कर कायरता का परिचय नहीं दूँगा। मुझे मृत्यु दण्ड मिलेगा, इसे मैं अच्छी प्रकार जानता हूँ। मुझे मृत्यु की किंचित चिन्ता नहीं है। मैं आत्मा की अमरता में पूर्ण विश्वास करता हूँ।
जीवन एक संग्राम हैं। इस जीवन में वही विजयी होता है जो सीना तानकर आफतों का मुकाबला कर सकता है, आफतों की घनघोर घटाओं में बिजली की तरह मुस्करा सकता है, परिस्थितियों का दास न बनकर उनका स्वामी बनता है तथा जो टूट जाना पसन्द करता है पर झुकना नहीं।
-श्रुति
अन्त में जिस समय मृत्यु दण्ड के पालन में सुकरात को विष पीने के लिये दिया गया, उस समय भी वे उसे मधु के समान स्वाद ले लेकर पीते हुये हँसते और शिष्यों से बातें करते रहे। विष का प्याला खाली करके सुकरात उठ कर धीरे-धीरे कमरे में टहलने लगे। उन पर विष का प्रभाव होते देखकर उनके शिष्य रोने लगे। उन्होंने शिष्यों को धीरज बँधाया और शान्त रहने के लिये कहा। पूर्ण रूप से विषाकाँत हो जाने पर वे लेट गये और शिष्यों को मौन रहकर ईश्वर का ध्यान करने के लिये कहा। सबके ध्यानस्थ हो जाने पर सन्त सुकरात ने भी शान्तिपूर्वक आँखें बन्द कर लीं और यह कहते हुये सदा के लिये सो गये-’सत्य की विजय हो’- ‘आत्मा अमर है।’
खिन्नता एक मानसिक संताप है जो मनुष्य को हर समय जलाया करता है। खिन्नता के कारण न कुछ अच्छा लगता है, न कोई काम करने को जी करता हैं। बात करने में अरुचि होती है, किसी के पास बैठने को जी नहीं चाहता। हर समय मन में एक संभार बना रहता हैं। एक रोष, क्षोभ और तनाव बना रहता है, जिससे सारा जीवन जड़ बन कर म्रियमाण-सा बन जाता है। खिन्न व्यक्ति का कहीं चित्त नहीं लगता। घर में बाल-बच्चों का कोलाहल अखरता है, बाहर दुनिया काटने को दौड़ती है। शून्य एकान्त में श्मशान जैसी भयानकता अनुभव होती है। पढ़ने में जी नहीं लगता, घूमने, फिरने में थकान आती है।
खिन्न-मना व्यक्ति क्षण-क्षण पर घर से बाहर जाता है, बाहर से घर आता है। एक काम छोड़कर दूसरा काम करना चाहता है, किन्तु उसका मन नहीं लगता। उसे न कहीं विश्राम मिलता है और न चैन। सुख-शान्ति तो उसके लिये आकाश-कुसुम हो जाती है। यदि उसका मन लगता है केवल एक बात में कि दुनिया से लुक-छिप कर कहीं बैठ जाये और अपनी मानसिक जलन में तिल-तिल जलकर जीवन की आहुति देता रहे। न उसे कोई काम करना पड़े और न संसार का कोई व्यवहार निभाना पड़े।
खिन्न मन व्यक्ति जब कोई काम करता है तो उसकी ऐसी बेगार टालता है कि काम बनने के बजाय बिगड़ जाता है। जब किसी से बात करता है तब मानों या तो रोता है या लड़ता है। दूसरे का मधुर कथन कटु लगता है और स्वयं की मधुर बात को भी कडुआ करके व्यक्त करता है। खिन्नता, कटुता एवं अरुचिता की जननी है ऐसे व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन ही नीरस और तिक्त बन जाता है। उसकी हर बात और हर काम या तो निर्जीवों जैसा होगा अथवा विक्षिप्तों जैसा। वह मानसिक विक्षेप के वशीभूत होकर किसी काम के योग्य नहीं रहता। यह है खिन्न-मना मनुष्य की दशा।
संसार में खिन्नता के एक नहीं, हजार कारण हो सकते हैं। कोई नुकसान हो सकता है। कोई कुछ कह सकता है, स्वाभिमान को ठेस लग सकती है। कोई परिजन बीमार हो सकता है। पैसे की कमी पड़ सकती है। कोई धोखा दे सकता है, चोरी कर सकता है, निराश कर सकता है, रोग या रंज हो सकता है। इस अनन्त भीड़-भाड़ और विविधताओं से भरी दुनिया में पग-पग पर खिन्नता के कारण सामने आ सकते हैं। कोई भी उनसे नहीं बच सकता।
संसार की विषम परिस्थितियाँ सबके लिये एक जैसी हैं। किसी को भी खिन्नता अथवा विषाद घेर सकता है। सभी लोगों को निराशा एवं प्रतिकूलताओं के बीच से गुजरना पड़ता है। किन्तु संसार के सारे आदमी खिन्न और व्यग्र नहीं दिखाई देते। लोग हँसते, बोलते और उत्साहपूर्वक काम करते हैं। यही नहीं खिन्नता के कारणों के बीच में रहते हुये भी अनेक लोग प्रसन्न दिखाई देते हैं। यदि परिस्थिति के प्रभाव से संसार के सभी व्यक्ति खिन्न रहने लगें तो क्या यह संसार एक पल को भी चल सकता है? प्रत्येक व्यक्ति अपना काम छोड़कर एकान्त में बैठ जाये और खिन्नता की जलन का स्वाद लिया करे। व्यग्रता, खिन्नता निराशा और अप्रियता आदि सबको साथ लेकर चलना ही पड़ता हैं। संसार के सारे काम करने की पड़ते हैं। यदि खिन्नता आते ही सब विरक्ति एवं वेदनापूर्ण स्थिति ग्रहण कर लें तो दूसरे ही क्षण संसार की सारी गतिविधियाँ रुक जायें और यह चलता हुआ, आगे बढ़ता हुआ संसार जड़ होकर जहाँ का तहाँ रुक जाये और नष्ट हो जाये।
संसार कर्मभूमि है। यहाँ सबको कार्य करना ही पड़ता है। बिना काम किसी का गुजारा नहीं हो सकता। आदमी प्रसन्न है तब भी काम करना होगा और खिन्न है, तब भी कार्य से नहीं बच सकता। संसार का सारा विधान ही काम पर निर्भर रहता है। जो जितना कर्मठ है, वह उतना ही आगे बढ़ता है और जो जितना काम से मुँह चुराता है, वह उतना ही असफल रहा करता है। सफलता मिले अथवा असफलता, मनुष्य को काम तो करना ही पड़ेगा। जब तक श्वास चलती है तब तक काम करना पड़ता है। यदि शारीरिक काम बन्द हो जाता हैं तो मानसिक क्रिया-कलाप शुरू हो जाता है। क्या सफल और क्या असफल, क्या प्रसन्न और क्या खिन्न, काम से कोई नहीं बच सकता-संसार के व्यवहार से विरत नहीं रह सकता।
कर्मों की सफलता ही जीवन की सफलता है। कर्मों का विस्तार ही अभ्युदय है और इनकी आधार शिला हैं मानसिक प्रसन्नता। खिन्न मन रहकर कोई भी कार्य कुशलतापूर्वक नहीं किया जा सकता और जब तक कार्य कुशलता की सिद्धि नहीं होती, जीवन की सफलता की कोई आशा नहीं की जा सकती। अस्तु, जीवन में सफलता का श्रेय पाने के लिये मानसिक प्रसन्नता को अक्षुण्ण बनाए रखना बहुत आवश्यक है।
खिन्न व्यक्ति हर समय मन ही मन कुढ़ता, रोता और विषाद करता रहता है। उसका सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता है। जीवन में कोई आशा नहीं रहती। चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखलाई देता है।
संसार में सभी को कभी न कभी खिन्न होना ही पड़ता है, साथ ही उसे उससे छूटकर फिर अपनी स्थिति में आना पड़ता है। बिना खिन्नता से छूटे किसी का काम नहीं चल सकता। निरन्तर खिन्नता की स्थिति में रहने वाला व्यक्ति एक प्रकार से निर्जीव ही हो जाता हैं। जिस जीवन में उल्लास नहीं, उत्साह और प्रसन्नता नहीं, वह मृत ही माना जायेगा। जीवन का अर्थ हैं हँसी-खुशी से जीना और उत्साहपूर्वक काम करना।
जब खिन्नता से छूटे बिना मनुष्य का काम नहीं चल सकता तो फिर उसे जीवन में एक क्षण को भी क्यों अवसर दिया जाय? मनुष्य के मन में जितनी देर भी खिन्नता का विक्षेप रहता है उतनी देर ही वह एक भीषण आग में जलता रहता है, जिससे जीवन का बहुत-सा तत्व नष्ट हो जाता है। खिन्नता एक दिन में जितना जीवन तत्व जला देती है उतना जीवन तत्व एक महीने में भी प्राप्त होना कठिन है। जितना समय खिन्नता में व्यर्थ चला जाता है। उसका उपयोग एक अच्छा काम करने में किया जा सकता है।
किसी प्रतिकूलता अथवा अप्रियता के प्रभाव से खिन्न होकर बैठ रहना उससे छूटने का उपाय नहीं है। किसी बीती घटना की याद करना, उसके लिये रोना, कल्पना या चिन्ता करना ठीक नहीं। भूतकाल की किसी अप्रिय घटना से त्रस्त होकर बैठ जाने और उसके चिन्तन में समय खराब करने का अर्थ है आप अपने उज्ज्वल भविष्य के लिये भी अन्धकार का प्रबन्ध कर रहे हैं। जितनी देर आप बैठकर खिन्नता की क्रिया-प्रतिक्रियाओं को सहन करते और पीड़ित होते हैं, उतनी देर यदि प्रसन्न चित्त रहकर काम करें तो जीवन में अनेक सफल कदम आगे बढ़ सकते हैं।
जीवन को सुखी और सफल बनाने का एक ही उपाय है कि आप एक क्षण को भी खिन्नता के वशीभूत न हों। अप्रिय परिस्थिति उत्पन्न होने पर भी प्रसन्न चित्त रहिये। संसार के प्रति अपना दृष्टिकोण इस प्रकार का बनाइये कि आप को प्रतिकूलताओं में भी सफलता और समुन्नति के पद-चिह्न दिखाई दें। अपना मानसिक स्तर इतना ऊँचा उठाइये कि संसार की छोटी-बड़ी कोई भी प्रतिकूलता आप का मानसिक संतुलन अस्त-व्यस्त न कर सके। प्रतिकूलताओं में भी हँसिये, कठिनाइयों में मुस्कुराइये और असफलता में सफलता की सम्भावना देखिये। विरोध को विरोध के रूप में न लेकर उसे प्रेरणा के रूप में स्वीकार कीजिये। कटुता का उत्तर मधुरता में दीजिये। हानि-लाभ सुख-दुःख, उत्कर्ष और अपकर्ष में तटस्थ रहिये। इनसे उस सीमा तक प्रभावित न होइये कि आप के लिये विषाद, निराशा, निरुत्साह अथवा व्यग्रता का कारण बन जाये। सामने आई हुई द्विविधाओं को संसार का सहज घटना चक्र समझकर निर्विकार भाव से सहन कीजिये और तब देखिये कि बड़े से बड़ा कारण आने पर भी आप खिन्न नहीं होंगे।
खिन्नता हर तरह के शोक-संतापों की जड़ है। इसको आश्रय देते ही सम्पूर्ण जीवन-दुःखों का भंडार बन जायेगा। खिन्नता कायर मन की अभिव्यक्ति है। वीर वह है जो संसार के सारे दुःख-द्वंद्वों को तटस्थ भाव से सहन करता हुआ सदा प्रसन्न रहता है।
भारतीय संस्कृति में पतिव्रत धर्म नारियों की सर्वोच्च उत्कृष्टता का प्रमाण है। उनके लिये शास्त्रकार ने बताया है कि वे ईश्वर की विधिवत उपासना भले ही न करें पर यदि वे अपने पतियों के प्रति निष्ठावान हैं तो सहज सद्गति प्राप्त कर सकती हैं। परिवार को स्वर्ग बनाकर रखना, सुसन्तति को जन्म देना भी इस व्रत के अंतर्गत हैं। जिस समाज में ऐसी पति पारायण नारियों की कमी नहीं रहती वे समाज, वे जातियाँ निश्चय ही श्री, समृद्धि और सफलता प्राप्त करती हैं।
जो लाभ स्त्रियों को और समाज को शीलवान बनाने से हो सकते हैं, पत्नीव्रत का पालन करने वाले पुरुषों को भी वही लाभ होते हैं। नर-नारी जीवन विकास के समान उत्तरदायित्व लेकर धरती में आते हैं। अलग-अलग दोनों अपूर्ण हैं। दोनों का युग्म ही पूर्णता की स्थिति उत्पन्न कर सकने में समर्थ होता है। स्त्री भावना है, पुरुष कर्त्तव्य, स्त्री शक्ति, पुरुष पौरुष। दोनों एक दूसरे के अविभाज्य अंग हैं। एक के बिना दूसरा जीवित नहीं रह सकता। संसार में न केवल स्त्रियाँ ही स्त्रियाँ रह सकती हैं और न पुरुष ही पुरुष। प्रकृति और प्राण की तरह स्त्री और पुरुष दोनों के सम्मिलन से ही सृष्टि का आविर्भाव हुआ है और अन्त तक वे साथ ही बने रहेंगे।
स्त्रियों की सद्गति पुरुष को आत्मसमर्पण कर देने से आसान हो जाती है। उसी तरह पुरुष के आत्म-विकास में स्त्रियों का भी योगदान कम महत्व का नहीं। जिन ऋषियों ने शोध कार्यों के लिये अत्यधिक एकान्त वास की आवश्यकता समझी उन्हें छोड़कर प्रायः सभी ऋषि गृहस्थ थे। गृहस्थ में रहकर ही उन्होंने आत्म-कल्याण की साधनायें की थीं। वशिष्ठ के सौ पुत्र थे, उनकी पत्नी न रही होती तो ये बच्चे कहाँ से आते। महर्षि जमदग्नि की पत्नी रेणुका थी, गौतम की अहिल्या, अत्रि की अनुसुइया आदि अधिकाँश ऋषि पत्नीव्रत पालन करने वाले हुये हैं। बीच में जब बुद्ध धर्म का प्रभाव इस देश में बढ़ा उस समय कुछ भ्रान्त धारणायें समाज में फैलीं और नारी को अभिशाप समझा जाने लगा। यह कहना वस्तुतः अपने कर्त्तव्य से विमुख होना ही था। स्त्री बच्चों को त्याग कर आत्म- कल्याण के लिये जंगल भाग जाना त्याग नहीं। पलायनवाद धर्म नहीं, अकर्मण्यता ही कही जा सकती है।
पुरुष सदाचारपूर्वक गृहस्थ धर्म का पालन करता हुआ आत्म-कल्याण की स्थिति प्राप्त कर सकता है। यहाँ जो बात स्त्री के लिये कर्त्तव्य होती है, वही बात पुरुष के लिए भी। चारित्रिक पवित्रता स्त्री में और पुरुष में नहीं होती तो पारस्परिक सम्बन्ध मधुर रह सकेंगे, यह अनिश्चित माना जाता है। स्त्री का कलंक पुरुष को असह्य हो सकता तो पुरुष का प्रेम कोई अन्य स्त्री प्राप्त करे, यह उसकी धर्म पत्नी ही कैसे देख सकती है? मानवीय कमजोरियाँ स्त्री-पुरुष दोनों में समान रूप से होती हैं। पुरुष की दुश्चरित्रता से कितनी ही पति-परायण स्त्री हो उसे दुःख, क्षेत्र और बोझ अनुभव न हो, यह असंभव ही है।
अकेली धर्मपत्नी शील और सदाचार का पालन पारिवारिक जीवन को सुव्यवस्थित नहीं रख सकती पुरुष का समान सहयोग भी आवश्यक है। दोनों गाड़ी के दो पहियों के समान है। एक पहिया लुढ़कता जाए और दूसरा तनिक भी जोर न देता हो, तो गाड़ी जहाँ की तहाँ रहेगी और जीवन की यात्रा पूरी न हो सकेगी। स्त्री पुरुष दोनों मिलकर जोर लगाते हैं तो जीवन की यात्रा खुशी और प्रसन्नता पूर्वक तय हो सकती है।
पत्नीव्रत का पालन, ईश्वर की आज्ञाओं का पालन इसमें पुरुष में पौरुष का विकास होता हैं। । सत्य, दया, कर्त्तव्यपालन, कष्ट, सहिष्णुता, आत्मीयता व सहानुभूति जैसे सद्गुणों का प्रयोग परिवार में रहकर किया जा सकता है और उससे आत्मनिष्ठा को व्यापक बनाया जा सकता है। गृहस्थ धर्म का पालन इसमें किसी तरह की बाधा नहीं उत्पन्न करता।
आत्म-विकास के साथ पारिवारिक जीवन को सुन्दर बनाने का आधार भी यही है कि स्त्री की तरह पुरुष में भी चारित्रिक दृढ़ता हो। प्रेम तभी रह सकता हैं।
सन्देह की स्थिति न बने और यह तभी संभव हैं जब व्यक्ति के जीवन में बनावट न हो। वह शुद्ध अन्तःकरण हो, नाटक न करता हो। घर में स्त्री की एक निष्ठा चाहने वाले और स्वयं बाहर मनमानी करने वालों को अपनी धर्म-पत्नी का विश्वास प्राप्त नहीं हो सकता। हर बार शंका उत्पन्न होगी और आत्मीयता का सूत्र खंडित होता रहेगा।
प्रजनन जैसे कार्य, बालकों के पालन-पोषण का भार और परिवार में सबका ध्यान रखने का कार्य स्त्री करती है। यह कार्य पुरुषों के कार्यों की अपेक्षा अधिक कष्टकारक और बड़े होते हैं। पुरुष यह कार्य नहीं कर सकता। स्त्री के इस कठिन जीवन के प्रति पुरुष को कृतज्ञ, विनम्र और उदार होना चाहिये। उसे स्त्री को अपना प्रेम और स्नेह बराबर देते रहना चाहिये। स्त्री दया की, रक्षा की पात्र है। उसे पुरुष के भी आत्म-समर्पण की अभिलाषा रहती है। अपनी सेवाओं के बदले पुरुष का प्रेम पाने की उसकी हार्दिक कामना होती है।
पतिव्रत पालन की सीमा जिस तरह काम सदाचार तक ही सीमित न रहकर पति के प्रति पूर्ण कर्त्तव्य निष्ठा का भाव जागृत करना है, पुरुष के लिये यही बात पत्नीव्रत के अंतर्गत आती हैं। चारित्रिक दृढ़ता के साथ यह भी आवश्यक है कि स्त्री को पर्याप्त सम्मान मिले और उसकी भी भावनाओं की इज्जत की जाय। अपने जीवन साथी को उत्साहित करना, ऊँचा उठाना, शिक्षित, सुसंस्कृत, सभ्य नागरिक बनाने का पूरा-पूरा प्रयत्न किया जाना चाहिये। पुरुषों में बड़ा बनने की हीन महत्वाकांक्षा होती है। वह अपने सम्मान के विपरीत हर छोटी बात को पकड़ता और बात-बात पर धर्म-पत्नी पर झल्लाता रहता है। पति के चिड़चिड़े स्वभाव से स्त्रियाँ दुःखित हो जाती हैं फलस्वरूप वहाँ वैमनस्यता का वातावरण उठ खड़ा होता है।
स्त्री के हर अच्छे कार्य की प्रशंसा करना पुरुष का धर्म है। अपनी आत्मीयता प्रकट करने में किसी को जरा सी संकोच न करना चाहिये। आप यह समझ लीजिये कि आपकी धर्म-पत्नी वैसी ही है जैसा आपका बच्चा। बच्चे की प्रसन्नता के लिये क्या कुछ नहीं किया जाता। यही आत्म-भाव नारी के लिये भी होना चाहिये और उसकी उन्नति से सच्चा सुख अनुभव किया जाना चाहिये।
आप यह चाहते हैं कि आपकी धर्म-पत्नी आपके प्रति सहिष्णु रहे, नम्रता से बात करे, साफ-सुथरी रहे, आपके बाहर से आने पर आपकी कुशलता की खैर पूछा करे तो आप भी कृपया उसके साथ ऐसा ही व्यवहार किया कीजिये। आपको यह अनुभव करना चाहिये कि नारी आपन की दासी बनकर आपकी सेवा में हाजिर नहीं हुई। कुछ सेवायें आप उससे चाहते हैं तो कुछ उसकी भी सेवायें करिये। ताली एक हाथ से नहीं बजती, गाड़ी एक पहिये से नहीं चलती। स्त्री-पुरुष एक दूसरे के पूरक बनकर रहें-दाम्पत्य जीवन की सुख-सुविधाओं के लिये यह बहुत जरूरी बात है।
जो कमाकर लाते हैं, उसे अपनी धर्म-पत्नी को सौंपिये, बच्चों की शादी में उससे लीजिये। मकान बनवाना हो, चाहे दुकान खोलनी हो-प्रत्येक कार्य की शुरुआत में धर्म-पत्नी की इच्छा वैसी ही होनी चाहिये जैसी राजा अपने मन्त्री की इच्छाओं और योजनाओं का समादर करता है। इसमें पुरुष की हानि नहीं होती वरन् बोझ कुछ हल्का हो जाता है। धन और घर के आन्तरिक मामलों का न्यायकर्ता तो जहाँ तक संभव हो स्त्री को ही रखना चाहिये। इससे उसे यह अनुभव होता रहेगा कि मेरा भी इस घर में समान अधिकार है। नारियों को प्रायः ऐसी पिपासा सर्वत्र होती है और यह उचित भी है।
परिवार में जैसी भी कुछ स्थिति बन जाती है, वह सब पुरुष के चरित्र और व्यक्तित्व की ही देन होती हैं। अपनी भावनाओं और कर्त्तव्य कर्मों के उचित- अनुचित निर्वाह पर उसकी गृहस्थी का समुन्नत होना निर्भर करता है। पुरुष की सद्भावनाओं से परिवार की सद्भावनायें बढ़ती हैं, प्रेम से प्रेम का विस्तार होता है। द्वेष से द्वेष बढ़ता है। जैसी भी पुरुष की मानसिक स्थिति होगी, दाम्पत्य-जीवन की स्थिति भी वैसी ही होगी क्योंकि पुरुष संचालक है, गृहस्थी का नियामक है। अतः उसका चरित्र उसकी भावनायें और आचरण सब शुद्ध, पवित्र एवं सहयोगात्मक होने चाहिये। गृहस्थ की समुन्नति, सुसन्तति का निर्माण केवल स्त्री के पतिव्रत द्वारा ही पूरा नहीं हो जाता, उसके लिये पत्नीव्रत भी चाहिये। इसमें से कोई भी अंग छोड़ा नहीं जा सकता। व्यवस्था को एकाँगी बनाने से पूर्णता का लाभ भी नहीं उठाया जा सकता।
स्वतन्त्रता की प्रतिमा-
पन्द्रहवीं शताब्दी का प्रथम चरण था। फ्राँस पराधीन था। अंग्रेज जाति का अत्याचारी शासन उस पर चल रहा था। फ्राँस की जनता त्राहि-त्राहि करती हुई रक्षा के लिये प्रभु से प्रार्थना कर रही थी। चारों ओर अन्धकार तथा निराशा का वातावरण छाया हुआ था। हर व्यक्ति अरक्षित तथा अशान्त था।
अंग्रेज जहाँ जिस गाँव में जाते, वहाँ की जनता पर अत्याचार करते। घरों में घुस जाते ओर माल असबाब के साथ स्त्रियों की इज्जत भी लूटते। अंग्रेज सैनिकों के आगमन का समाचार सुनकर लोग घर-बार छोड़कर जंगलों में छिप जाते और जब उद्धत सैनिक मनमानी करके चले जाते तो जंगलों से निकल कर आते और उनके बिगाड़े हुये को बनाते। फ्राँस की जनता का यह एक साधारण कार्यक्रम बन गया था। प्रजा सोचती थी उसका कोई रक्षक राजा नहीं और राजा सोचता था कि उसकी कोई राजभक्त प्रजा नहीं। बड़ा भयंकर तथा वीभत्स समय था। फ्राँस की जनता के लिये एक ईश्वर को छोड़कर अन्य कोई सहारा न रह गया था।
फ्राँस की देवी जोन आफ आर्क का जन्म ऐसे ही संक्रामक समय में हुआ था। कुछ तो अंग्रेजों के स्थायी आतंक और कुछ अपने स्वभाव के कारण जोन के माता-पिता नित्य प्रति भगवान का भजन तथा प्रार्थना किया करते थे। वे दोनों अधिक से अधिक पवित्र रहने का प्रयत्न किया करते थे। जोन की माता तो एक प्रकार से भगवद्भक्ति की जीती-जागती प्रतिमा ही थी।
देवी जोन जब कुछ सयानी हुई तब वह प्रार्थना पूजा के समय अपनी माता के पास बैठती और बड़े ध्यान से पूजा देखती तथा प्रार्थना सुनती। वह धीरे-धीरे माता का अनुकरण करती हुई स्वयं भी उन जैसा क्रिया-कलाप करती और अस्फुट भाषा में प्रार्थना गुनगुनाती। बेटी की यह क्रियायें देखकर माता बड़ी प्रसन्न होती और अपने पास बिठाकर उसे बाइबिल सुनाती और महापुरुषों तथा बलिदानी वीरों के चरित्र सुनाती।
माता के इन्हीं कार्यक्रमों के साथ देवी जोन ने बाल्यकाल की पौरि पार की। अब वह न केवल बाइबिल ओर कथायें सुनती ही थी अपितु उनकी प्रतिक्रिया से संचालित होती। वह बलिदान की कथायें सुनकर कभी रोमाँचित होती तो कभी आँसू बहाती।
किशोरावस्था में आते ही देवी जोन सब कुछ देख, सुनने तथा समझने लगी। लारेन्स प्रान्त के छोटे से गाँव डुमरिम में कोई शिक्षा का प्रबन्ध न होने से जोन की पढ़ाई लिखाई न हो सकी। उसकी माता ने अपनी योग्यतानुसार ही उसे इतना अवश्य पढ़ा दिया था कि अब वह आप ही बाइबिल तथा अन्य वीरों तथा वीर बालाओं की गाथायें पढ़ लेती थी।
अंग्रेजों के अत्याचार की कहानियाँ देवी जोन कानों में भी आने लगीं, जिन पर विचार करते-करते वह आंसू बहाने, रोने लगती और देशवासियों के उद्धार के लिए परमात्मा से प्रार्थना करने लगती। देवी जोन का अधिकाँश समय देशवासियों के उद्धार के लिये ईश्वर की प्रार्थना करने में ही व्यतीत होता। वह खेत पर पिता को भोजन पहुँचाने तथा घर के काम में माता का हाथ बटाने के बाद जो भी समय बचता उसे देशोद्धार की चिन्ता तथा प्रार्थना में ही लगाती।
देशोद्धार तथा मानवता की कल्याण कामना से दिन रात प्रभु चिन्तन में लगे रहने से जोन की आत्मा प्रकाशित हो उठी जिसकी चमक उसके भोले मुख पर एक विलक्षण सौंदर्य बनकर दमकने लगी जिससे वह साकार रूप देवी की तरह आकर्षक हो उठी। उसका पवित्र हृदय प्रसाद, प्रसन्नता बनकर उसके अंग-प्रत्यंग में स्फुरित होने लगा।
देवी जोन के माता-पिता की हार्दिक इच्छा थी कि अपना विवाह कर ले और सुख-चैन का जीवन बिताये, किन्तु जिसके हृदय में देशोद्धार की आग लग चुकी है, जिसके कानों में पीड़ित मानवता की पुकार समा चुकी है, उसे विवाह जैसे सामान्य तथा साधारण संयोगों में सुख-शान्ति कहाँ? उसे सुख-शान्ति तो उसी मार्ग में मिल सकती है जिस पर चलते हुए बलिदान वीरों के चरण घायल करने के लिये मानवता के शत्रुओं ने काँटे बिछा रखे हों। उसे शान्ति तो उसी बलिवेदी पर मिल सकती है जिस पर से कहे हुये उसके अन्तिम शब्द मानवोद्धार के ऐसे मन्त्र बन कर गूंजे जो पीड़ितों को प्रकाश बनकर आततायियों के हृदय में विनाश का विश्वास बन कर ठहर जायें। उसके लिये दाम्पत्य जीवन की सुख सेज पर चैन कहाँ? उसका सुख-चैन तो दीन-दुखियों के उन आँसुओं में निवास करता है जिनको वह उनकी आँखों से अपनी आँखों में भर ले।
देवी जोन के दिव्यतामय रूप लावण्य की प्रशंसा सुन कर अनेकों युवक उससे प्रणय याचना करने आये किन्तु सबको निराश होकर लौटना पड़ा। उसने अपने माता-पिता से स्पष्ट बतला दिया कि वह ‘वर्जिन मेरी’ की तरह आजीवन कुमारी रहकर भगवान के भरोसे मातृ-भूमि का उद्धार करने का प्रयत्न करेगी।
एक तो यों ही देवी जोन अंग्रेजों के अत्याचार की कहानियाँ सुन-सुनकर दुःखी हो रही थी कि तब तक एक अंग्रेज सैनिक टुकड़ी ने जोन के गाँव पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने घर लूटे, जलाये और नारियों को अपमानित किया। अंग्रेजों का अत्याचार देखकर देवी जोन का करुण हृदय द्रवीभूत होकर शत-शत धाराओं में वह उठा। उन्होंने परमात्मा से प्रार्थना की कि, ‘हे करुणाकर भगवान! या तो मुझे अत्याचार मिटाने की शक्ति दे अथवा इस पृथ्वी पर से उठा ले।’ मुझ से मानवता की यह दुर्दशा देखी नहीं जाती।
इस प्रकार देवी जोन घण्टों एकान्त में बैठ कर देशोद्धार के लिये परमात्मा से प्रार्थना करती, आँसू बहाती और आहें भरती। वह बहुत कुछ करना चाहती पर साधनहीन अबला होने से कुछ करते न बनता। एक मात्र, साधन, सम्बल और सामर्थ्य जो कुछ भी देवी जोन के पास था वह था ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ विश्वास। वह अपने अखण्ड विश्वास के साथ प्रभु प्रार्थना तथा उसकी उपासना में लगी रहती।
ज्यों-ज्यों देवी जोन ईश्वर में लीन होती त्यों-त्यों उनमें एक शक्ति आती जाती। ज्यों-ज्यों वे प्रभु का स्मरण करतीं, त्यों-त्यों उनकी आत्मा में एक ध्वनि उठती जाती। धीरे-धीरे उनकी वह आन्तरिक आवाज उन्हें स्पष्ट सुनाई देने लगी। उन्हें ऐसा आभास होने लगा मानो कोई आकाशवाणी उनसे कह रही है-’जोन! तू आचरणवती रहकर ईश्वर पर भरोसा रख।’ उसकी स्वयं की भावनायें देवदूतों का रूप रखकर उसके सामने प्रकट होकर कहने लगीं-’जोन! डीफन की सहायता के लिये युद्ध में प्रवृत्त हो और पतित देश का उद्धार कर।’ जोन ने अबला होने तथा युद्ध कला से अनभिज्ञता प्रकट करते हुये कहा-”एक युद्ध कला अनभिज्ञ अबला किस प्रकार युद्ध कर सकती है?” इस शंका का समाधान करते हुये उसकी अन्तरात्मा ने उत्तर दिया- स्त्री अबला नहीं, वह एक जीवन्त ज्वाला है। जब तक वह अपने स्वरूप से अनभिज्ञ रहती हैं अबला और भीरु बनी रहती हैं। पर ज्यों ही वह अपना स्वरूप पहचानती है, शक्ति की साकार प्रतिमा बन जाती है। अब समय आ गया है, उठ और अपने शक्तिवान स्वरूप को पहचान कर फ्राँस के उद्धार के लिये आगे बढ़ और आतताइयों को संसार से मार भगा। तेरे आगे बढ़ते ही पूरा फ्राँस तेरी सहायता के लिये उठ खड़ा होगा। तू अपने कर्त्तव्य-पथ पर आगे बढ़, देवता तेरी सहायता करेंगे।
देवी जोन को विश्वास हो गया कि फ्राँस के उद्धार के लिये उसे ईश्वरीय आदेश प्राप्त हुआ हैं। ईश्वरीय आदेश की भावना आते ही उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा। उसकी लवंग वल्लरी-सी सुकुमार देहयष्टि में शक्ति का विद्युत प्रवाह बहने लगा। वह उठी और उस सर्वशक्तिमान को नमस्कार करके कर्त्तव्य कर्म में प्रवृत्त होने का संकल्प किया।
जोन ने अपने आत्मालाप को अद्भुत अनुभव की तरह माता-पिता को सुनाया और देशोद्धार की आज्ञा माँगी। अपनी पन्द्रह वर्ष की बेटी के मुख से ऐसी बातें सुनकर माता ने तो विश्वास कर लिया किन्तु पिता ने उसे उसका भ्रम बतलाते हुये घर रहने के लिये प्रेरित किया।
किन्तु जोन को लगन लग चुकी थी, उसका विश्वास अटल हो चुका था। अब घर ठहरना उसके लिये असम्भव था। वह अपनी बीमार चाची की सेवा-सुश्रूषा करने के बहाने पिता से आज्ञा लेकर अपने चाचा के पास वेकुलियर्स चली गई। वहाँ चाचा की सहायता से अनेक अधिकारियों तथा शासनकर्त्ताओं से सहायता पाकर वह ड्यूक आफ लारेन्स तथा चीन जाकर राजा डफिन से मिली। राजा डफिन तथा ड्यूक दोनों ही उसके दिव्य व्यक्तित्व से प्रभावित हुये और परीक्षा लेने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि कुमारी जोन अवश्य ही देवी है और उसका यह कथन सर्वथा ठीक है कि फ्राँस का उद्धार करने के लिये उसे ईश्वरीय आदेश प्राप्त हुआ हैं। तपस्या पूर्ण जीवन में वास्तव में एक ऐसा दिव्य चमत्कार आ ही जाता है कि जो भी उसके संपर्क में आता है, वह प्रभावित हुये बिना नहीं रहता।
चीन के शासक ने एक घोषणा पत्र निकाल कर जन-साधारण को देवी जोन, उसके चरित्र, व्यक्तित्व तथा मन्तव्य से परिचित करा दिया। देवी जोन के विषय में जानकारी पाकर जनता में उसके प्रति श्रद्धा उमड़ पड़ी और वह स्वतन्त्रता संग्राम में उसके साथ पूरा सहयोग करने को कटिबद्ध हो उठी।
चीन में रहकर देवी जोन ने कुछ समय युद्ध-शिक्षा ली और शीघ्र ही उसमें पारंगत होकर, सैनिकों के वीर-वेष में एक काले घोड़े पर सवार होकर ब्लोइन्स नगर की ओर चल पड़ी। वहाँ की जनता ने उत्साहित होकर उसका अभूतपूर्व स्वागत किया और स्वतन्त्रता की देवी कहकर उसे सिर नवाया।
अनन्तर देवी जोन ने आर्लिन्स नगर के उद्धार से फ्राँस की स्वतन्त्रता का संग्राम छेड़ा। आर्लिन्स नगर में प्रवेश करते समय अंग्रेजों ने उसका विरोध नहीं किया, किन्तु जब उसने नगर प्रवेश के बाद अंग्रेजों को इस आशय का पत्र लिखा कि वह रक्तपात को पाप समझती है और इसी लिये अंग्रेजी से अनुरोध करती है कि वे हम फ्राँसीसियों का देश छोड़कर अपने देश चले जायें-तब उनमें युद्ध की उत्तेजना फैल गई। देवी जोन ने ईश्वरीय इच्छा समझ-कर युद्ध प्रारम्भ किया और कुछ ही समय में नगर पर अधिकार कर लिया। नगर के विजय-उत्सव में देवी जोन ने एक सामूहिक प्रार्थना सभा का आयोजन किया और ईश्वर को धन्यवाद दिया।
अनन्तर देवी जोन ने रीम्स, जार्गो, वर्गेसी तथा पेटे आदि नगरों तथा किलों पर अधिकार कर लिया, जिससे देवी जोन की कीर्ति पताका सारे फ्राँस में फहराने लगी। उसने रीम्स के प्राचीन धर्म मन्दिर में राजा डफिन को चार्ल्स सप्तम के नाम से फ्राँस के सम्राट पद पर स्वयं अभिषिक्त किया।
इस प्रकार फ्राँस की स्वतन्त्रता निश्चित करके देवी जोन ने अनुभव किया कि उसका कर्तव्य पूरा हो चुका था। अस्तु उसने चार्ल्स सप्तम से अपने गाँव जाने तथा माता-पिता के पास रहने की अनुमति माँगी। किन्तु चार्ल्स ने उसे अनुमति न दी और पेरिस पर आक्रमण करने की प्रार्थना की। देवी जोन सम्राट के उस अनुरोध को अस्वीकार न कर सकी।
देवी जोन ने इसे भी ईश्वर की इच्छा समझकर और यह विश्वास करके पेरिस के लिये प्रस्थान किया कि परमात्मा अब स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर उसका बलिदान चाहता है।
देवी जोन घायल होकर गिरफ्तार हो गई। एक वर्ष तक कारागार की भयानक यातनायें देने के बाद अंग्रेजों ने उस पर मुकदमा चलाया और कोई भी अपराध सिद्ध न होने पर भी आतताइयों ने उसे 29 मई को रायन नगर के एक पुराने बाजार के चौराहें पर जिन्दा जला का फ्राँस ही नहीं मानवता के महान इतिहास में अमर कर दिया।
देवी जोन के बलिदान के छब्बीस वर्ष बाद फ्राँस में जन क्राँति हुई और जहाँ देवी जोन को जलाया गया था, वहाँ फ्राँस की जनता ने उसकी एक प्रतिमा बनाकर स्वतन्त्रता की देवी की उपाधि दी। आज भी उधर से आते जाते नागरिक उस देवी को अनन्त श्रद्धा के साथ अभिवादन करते हैं।
विश्व-साहित्य में जिनकी रचनायें तारों की तरह जगमगाती हैं, जिनके वाक्य आज संसार में सूत्रों की तरह माने जाते हैं और जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन साहित्य के माध्यम से मानवता का उपकार, उद्धार तथा सेवा करने में लगा दिया उन रोमाँ-रोलाँ का जन्म 29 जनवरी 1866 को क्लामेंसी में हुआ।
वे एक सुप्रसिद्ध वकील के पुत्र थे और बड़े प्यार से पाले गये थे। उनके पिता की हार्दिक इच्छा थी कि वे उन्हीं की तरह पढ़-लिखकर एक अच्छे वकील बनें और अधिक से अधिक पैसा कमाकर संसार के बहुत बड़े धनवान बनें। किन्तु रोमाँ-रोलाँ के विचार इसके विपरीत थे। वे साधारण अवस्था में रहकर अपनी विचार सम्पत्ति से संसार को सम्पन्न बनाना चाहते थे और लेखनी द्वारा मानवता की सेवा करना चाहते थे।
कुछ समय तक अपने जन्म-स्थान क्लामेंसी के स्कूलों में पढ़ने के बाद उन्होंने पेरिस जाकर विद्याध्ययन करने का विचार प्रकट किया। उनके माता-पिता उनके विचारों से तथा उनके जीवन ध्येय से पूरी तरह परिचित हो चुके थे और यह भी जान चुके थे कि यदि उसका विरोध किया गया तो अपनी लगन का पक्का उनका पुत्र हाथ-बेहाथ हो सकता है। जन-सेवा के जिस मार्ग का निर्धारण वह कर चुका है, उसे बदल सकना असम्भव है। अस्तु वे लोग रोमाँ-रोलाँ को लेकर पेरिस चले गये।
पेरिस आकर रोमाँ-रोलाँ ने नार्मल स्कूल में प्रवेश लिया। किन्तु संगीत से रुचि हो जाने से वे उसके ही अभ्यास में दिन-रात लगे रहने लगे जिसके फलस्वरूप वे नार्मल की प्रवेशिका परीक्षा में दो वर्ष तक असफल रहे। अपनी इस असफलता पर उन्हें बड़ा दुःख हुआ। किन्तु वे न तो निराश हुये और न हतोत्साह। उन्होंने अपनी असफलता पर गम्भीरता से विचार किया और और पाया कि उन्होंने अपने विद्याध्ययन के लक्ष्य को संगीत के शौक में बदल दिया और इसी बिखरी हुई लगन तथा ध्येयहीनता के कारण उन्हें असफलता का मुँह देखना पड़ा है। तीसरी बार उन्होंने पुनः परीक्षा की तैयारी की और अब की बार उन्होंने एक मात्र अध्ययन के और किसी प्रकार की रुचि को अपने पास फटकने तक नहीं दिया जिसके परिणामस्वरूप अब की बार वे न केवल उत्तीर्ण ही हुये बल्कि प्रथम श्रेणी में स्थान पाया। इस प्रकार उन्होंने अपनी दो साल की असफलता का सारा मूल्य अपने अध्यवसाय के बल पर प्रथम स्थान पाकर वसूल कर लिया।
चूँकि उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य एक सच्चा साहित्यकार बनना बनाया था इसलिये उसकी प्राप्ति के लिये सम्पूर्ण तन-मन से विद्याध्ययन में जुट गये। अध्ययन की तन्मयता ने उन्हें इतना प्रखर बुद्धि बना दिया कि वे विद्यालय के एक जगमगाते हुये छात्र गिने जाने लगे और शिक्षकों को उनकी प्रतिभा पर बड़ा विश्वास होने लगा।
अपने तीन साल के छात्र जीवन में ही रोमाँ-रोलाँ ने अपनी योग्यता का सिक्का जमा दिया और उनको रोम के ऐतिहासिक अन्वेषण का कार्य सौंपा गया और उसके लिये पर्याप्त छात्रवृत्ति भी दी गई। अपने विषय का सच्चा तथा पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिये रोमाँ-रोलाँ से सम्पूर्ण इटली का भ्रमण किया और बड़े-बड़े, ऐतिहासिक महत्व के रहस्य खोज निकाले। इटली की इस ऐतिहासिक यात्रा ने जहाँ उनको अपने अन्वेषण कार्य में मदद की वहाँ इटली के सुन्दर दृश्यों ने उनके साहित्यकार को भी उद्बुद्ध किया।
अपना भ्रमण तथा कार्य समाप्त करने के बाद, पेरिस में उन्होंने अपने शिक्षा संस्थान नार्मल स्कूल में गान विद्या के इतिहास के शिक्षक का स्थान ग्रहण किया। कुछ वर्षों तक शिक्षक का कार्य निष्ठापूर्वक करने के बाद वे सौर्बोन विद्यालय में बुला लिये गये जहाँ उनकी योग्यतापूर्ण परिश्रमी वृत्ति से प्रभावित होकर भाषा विज्ञान के अध्यापक श्री माइकेल ब्रील ने उनसे अपनी पुत्री का विवाह कर दिया।
जिस समय रोमाँ-रोला ने निश्चिन्त होकर साहित्य सृजन की ओर ध्यान दिया, उसी समय फ्राँस में राजनीतिक उथल-पुथल प्रारम्भ हो गई। फ्राँस की जनता ने निरंकुश राजतन्त्र के विरुद्ध आवाज उठाई। ऐसी दशा में जनता की आवाज की उपेक्षा करके रोमाँ-रोलाँ एकाकी रहकर किस प्रकार साहित्य साधना कर सकते थे? जनता की न्यायपूर्ण आवाज का समर्थन न करके, उस समय किसी अन्य प्रकार के साहित्य का सृजन करना स्वयं एक अन्याय होता। अतएव उन्होंने जन आन्दोलनों में सक्रिय भाग लेना अपना परम कर्तव्य समझा। इसके साथ ही उन्होंने अपने कुछ मित्रों के साथ मिलकर एक पत्रिका भी निकाली जिसके लिये लेख वे स्वयं ही लिखा करते थे। उनके तथ्यपूर्ण लेखों से अधिकारों के लिये संघर्ष करने वाली जनता को बड़ा बल मिला। अपनी पत्रिका द्वारा रोमाँ-रोलाँ ने जनता का जो हित सम्पादन किया, वह किसी को अच्छे से अच्छे साहित्यिक कार्य से किसी प्रकार भी कम न था।
अपनी इस पत्रिका द्वारा रोमाँ-रोलाँ ने फ्राँसीसी नवयुवकों को जीवन की सच्ची दिशा दी। अपने अधिकार तथा कर्तव्यों के प्रति जागरुक किया। उनकी व्यसन वृत्ति को कम करके उनमें चारित्रिक चेतना जागृत की और पारस्परिक सहयोग तथा सहायता का भाव पैदा किया।
जहाँ एक ओर रोमाँ-रोलाँ के प्रज्ज्वलित लेखों ने फ्राँस की कोटि-कोटि जनता को प्रकाश दिया वहाँ प्रतिक्रियावादी तथा वामपक्षियों को ही नहीं शत्रु बना दिया बल्कि अपना भी शत्रु बना लिया। निदान, जन-विरोधियों ने रोमाँ-रोलाँ को तरह-तरह से परेशान करना तथा सताना शुरू किया। यद्यपि ध्येय के धनी रोमाँ-रोलाँ जन-जागरण के अपने पथ पर अविचल रहे तथापि उनके साथी विरोधियों के अत्याचारों की गर्मी नहीं सह सके और पत्रिका से सर्वथा विमुख हो गये। फलतः सहयोग के अभाव में उस जनवादी पत्रिका का अस्तित्व समाप्त हो गया।
रोमाँ-रोलाँ इस दुःख से निवृत्त न हो पाये थे कि उनकी पत्नी ने अपने पति के राजद्रोह की ओर बढ़ने के भ्रम में पड़कर विवाह विच्छेद करा लिया। पत्नी के इस व्यवहार की चोट भी उनके हृदय पर कुछ कम न लगी तथापि उन्होंने हिम्मत न हारी, और एक प्रकार से विवाह-विच्छेद को अपनी मुक्ति मानकर स्वच्छन्दता की श्वाँस लेकर मन ही मन पूर्ण रूपेण साहित्य सेवी बन जाने का संकल्प कर लिया।
रोमाँ-रोलाँ एक ऐसे विद्वान थे, जो अपनी विद्या का उपयोग मानवता की एकता के लिये किया करते थे। वे किसी देश अथवा राष्ट्र की भौगोलिक सीमाओं को मानवता के विभाजन की रेखा न मानते थे और न वे किसी विशिष्ट सभ्यता अथवा संस्कृति के हिमायती थे। वे ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के हामी और एक मानव सभ्यता के समर्थक थे। उन्होंने संसार की प्रायः समस्त विचार-धाराओं का अध्ययन किया और जिन विचारधाराओं से प्रभावित हुये उनमें भारतीय विचार धारा का प्रमुख स्थान हैं, जिसकी अभिव्यक्ति उन्होंने रामकृष्ण परमहंस तथा महात्मा गाँधी के जीवन चरित्र लिख कर की। कवीन्द्र-रवीन्द्र तथा योगी अरविन्द के तो वे एक प्रकार से भक्त ही थे।
शिक्षा विविध जानकारियों का ढेर नहीं है, जो तुम्हारे मस्तिष्क में ठूँस दिया गया है और जो आत्मसात हुए बिना वहाँ आजन्म पड़ा रहकर गड़बड़ मचाया करता है। हमें उन विचारों की अनुभूति कर लेने की आवश्यकता है, जो जीवन-निर्माण, ‘मनुष्य’-निर्माण तथा चरित्र-निर्माण में सहायक हों। यदि आप केवल पाँच ही परखे हुए विचार आत्मसात कर उनके अनुसार अपने जीवन और चरित्र का निर्माण कर लेते हैं, तो आप एक पूरे ग्रन्थालय को कण्ठस्थ करने वाले की अपेक्षा अधिक शिक्षित हैं।”
-विवेकानन्द
भारतीय विचारधारा के इस प्रभाव का कारण जहाँ रोमाँ-रोलाँ की निष्पक्ष ज्ञान-जिज्ञासा थी वहाँ भारतीय विचारधारा की सार्वभौमिकता तथा पूर्णता को भी कम श्रेय नहीं हैं। वेद, शास्त्र, उपनिषद् तथा गीता का ज्ञान ही कुछ ऐसा चमत्कारिक है कि जो भी सच्चे हृदय से इसके संपर्क में आयेगा उसकी संकीर्ण सीमाएं टूटे बिना न रहेंगी और अवश्य ही वह सम्पूर्ण संसार को अपना घर मानने लगेगा। सारी मानवता उसकी अपनी आत्मा बन जायेगी। भारतीय विचारधारा के इसी पुण्य प्रसाद से रोमाँ-रोलाँ आज संसार-भर के अपने नागरिक माने जाते हैं।
रोमाँ-रोलाँ की महत्वपूर्ण साहित्यिक रचनाओं में उनकी नोबुल पुरस्कार प्राप्त पुस्तक ‘जाँ क्रिस्तफ’ के अतिरिक्त उनके वे पत्र भी हैं जो उन्होंने समय-समय पर संसार के कोने-कोने से आये पत्रों के उत्तर में लिखे थे। उनके पत्र निराशों में आशा, और जीवन के प्रति हताश व्यक्तियों में प्राण फूँकने वाले मन्त्रों से भरे रहते थे। विश्व-विख्यात तथा पराकाष्ठा तक व्यस्त रहने वाले विद्वान रोमाँ-रोलाँ को अभिमान छू तक नहीं गया था। ज्यों ही किसी का पत्र उनके पास आया नहीं कि उन्होंने सारा कार्य छोड़कर उसका उत्तर दिया नहीं। रोमाँ-रोलाँ के पास अधिकतर ऐसे व्यक्तियों के ही पत्र आते थे जो जीवन-संघर्ष से ऊब कर अन्धकार में भटकते होते थे। लोग अपनी वैयक्तिक समस्याओं का हल रोमाँ-रोलाँ से माँगा करते थे। हजारों युवक उनमें अपनी स्थिति तथा परिस्थिति के अनुरूप उनसे मार्ग पूछते और प्रकाश माँगा करते थे।
रोमाँ-रोलाँ ने कभी भी पत्रोत्तर में विलम्ब कर कभी किसी को निराश नहीं किया। वे जानते थे कि लोग उन पर तथा उनके परामर्श पर विश्वास करते हैं और आशा करते हैं कि वे उनकी समस्याओं को हल कर सकते हैं। लोगों के इस विश्वास की रक्षा में रोमाँ-रोलाँ ने कभी कोई कसर उठा रखी। क्योंकि वे जानते थे कि किसी आतुर व्यक्ति के विषय में उपेक्षा बरतने का अर्थ है उसे अन्धकार से और भी अधिक गम्भीर तथा सघन अंधकार में ढकेल देना। व्यथित तथा व्यग्र व्यक्तियों को सान्त्वना देने में उन्होंने कभी भी अपने बहुमूल्य समय का अपव्यय नहीं माना। अपने पत्रों द्वारा रोमाँ-रोलाँ ने मानवता की जितनी सेवा की है उतनी सेवा कदाचित ही कोई अपने तन-मन से कर सका हो।
रोमाँ-रोलाँ की प्रतिज्ञा थी कि जो भी व्यक्ति संकट के समय मुझ से सहायता तथा परामर्श माँगेगा, वह उसे तत्काल हजार काम छोड़कर और अपनी बड़ी से बड़ी हानि करके उसकी सेवा करेंगे। किसी भी कलाकार का प्रथम कर्तव्य है कि वह किसी भी आत्मा की पुकार पर उसे हर प्रकार से सहायता करने के लिये कटिबद्ध रहना चाहिये। अपने को साहित्यकार कहने वाला यदि किसी की करुण पुकार पर सहायता के लिये दौड़ नहीं पड़ता तो वह वास्तव में सच्चा साहित्यकार नहीं है। वह भावनाओं का ठग तथा शब्दों का व्यवसायी है।
साहित्य सेवा के अतिरिक्त रोमाँ-रोलाँ उन मानववादियों में थे जो क्या फ्राँस, क्या इटली, क्या इंग्लैंड और क्या भारत जहाँ भी अत्याचार की गूँज- सुनते थे, मानवता की सेवा के लिये दौड़े जाते थे। वे अपने, पराये के संकीर्ण भाव से सर्वथा मुक्त एक महामानव थे।
मनुष्यता में जो कुछ महान और सत्य है, वह सदा हमारे द्वार पर प्रतीक्षा करता रहता है कि हम उसको निमंत्रित करें। उससे यह प्रश्न करना कि वह किस देश का है, हमारा काम नहीं है, किन्तु उसका अपने घर में स्वागत करना और जो कुछ उत्तम से उत्तम वस्तु हमारे पास है, वह उसके सम्मुख भेंट करना ही हमारा कर्त्तव्य है। ‘अतिथि देवो भव’।
-टैगोर
उनका कहना था कि आंखें खोलो, अपने चारों और देखो, निर्भीक बनो और अपना पथ आप निर्धारित करो। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह अपनी समस्याओं का आप मुकाबला करे। जीवन के सत्य की खोज स्वयं ही करे। स्वयं खोजा हुआ आधा सत्य भी दूसरों के बतलाये हुये पूरे सत्य से अधिक मूल्यवान होता है। स्वयं स्वाधीन बनो। आत्मा की स्वाधीनता ही सर्वश्रेष्ठ निधि हैं, सर्वोत्तम उपलब्धि है।
भारतीय गणतंत्र का जब संविधान बना था तो नीति निर्देशक तत्वों में “मद्यपान बहिष्कार” का संकल्प भी संयुक्त किया गया था। आजादी के पूरे 17 वर्ष बीत गये, किन्तु हमारा संकल्प पूरा होना तो दूर उलटे इन दुष्ट व्यसनों का प्रसार और भी बढ़ गया। शराब, सुलफा, गाँजा, भाँग, अफीम, बीड़ी, सिगरेट, चाय-काफी आदि का इस्तेमाल करने वालों की संख्या इतनी अधिक बढ़ी कि उसके लिये न जाने कितने उद्योग-धन्धे खोलने पड़े। उद्योगों की बढ़ोत्तरी से विज्ञापन बढ़ा और नशार्थियों का एक नियमित प्रशिक्षण ही होता चला आया। यह समस्या अब इतनी जटिल हो गई है कि उससे जन-स्वास्थ्य को भारी खतरा उत्पन्न हो गया। क्या पढ़े, क्या अनपढ़ जनता, नेता, समाज सुधारक सबके सब इन व्यसनों में जकड़े पड़े हैं और आने वाली पीढ़ी का गलत मार्ग-दर्शन करने में लगे हुये हैं। यह इस देश के नाम पर बहुत बड़ा कलंक है।
नशा कोई भी हो यह अनिष्टकारी और त्याज्य ही होता है, किन्तु शराब तो आर्थिक, सामाजिक तथा नैतिक बुराइयों की जड़ ही है। पढ़े लिखे लोग भी इसका प्रयोग करते हैं। इसे मानवीय सभ्यता के विनाश की पूतना ही समझना चाहिये। महात्मा गाँधी नशाबन्दी तथा मद्य-निषेध के कट्टर समर्थक थे। वे कहा करते थे-”यदि मुझे कुछ घण्टों के लिये ही भारत का राज्य चलाने को मिल जाय तो मैं पहला काम यह करूंगा कि सारे देश में शराब-बन्दी हो जाय और शराब का व्यवसाय सदा के लिये बन्द कर दिया जाय। “ महात्मा गाँधी शराब से होने वाली अनैतिकता को खूब भली- प्रकार समझते थे। इसीलिये सत्याग्रह आन्दोलनों में उन्होंने शराब की दुकानों में धरना देने और लोगों को शराब न पीने की बात समझाने की भी व्यवस्था की थी।
नशे का सीधा प्रभाव मनुष्य के शरीर और मन पर पड़ता है जिससे लोगों का स्वास्थ्य उसी समय से गिरने लगता है, जीवन तत्व नष्ट होता है, आयु घटने लगती है। नशा खाने या पीने से जो शरीर के खून में एकाएक तेज उत्तेजना आती है उससे कुछ देर के लिये खून की नाड़ियों में तथा हृदय में तीव्र हलचल पैदा होती है। यह प्रतिक्रिया उस तूफान की तरह होती है जो सारे वातावरण को उखाड़-पछाड़ कर रख देती हैं। इस प्रतिक्रिया से उत्पन्न होने वाली गैस ही मस्तिष्क में भरकर मदहोशी, उन्माद तथा मानसिक कमजोरी का रूप धारण करती है। जब नशा उतर जाता है तो सारी नस-नाड़ियाँ शिथिल पड़ जाती हैं। खून का प्रवाह मन्द पड़ जाता हैं और उसके विषैले तत्व उमड़ आते है और सारे शरीर को रोग और दुर्बलता का अड्डा बना लेते हैं।
पाचन संस्थान पर नशों का हानिकारक प्रभाव पड़ता है। मंदाग्नि हो जाती है। भोजन में अरुचि उत्पन्न होने लगती है जिससे शरीर के लिये पोषण प्राप्त करने का द्वार धीरे-धीरे बन्द होने लगता है। शरीर दिनों-दिन दुर्बल होता जाता है।
मन पर होने वाला आघात शारीरिक आघात से बढ़कर है। नशेबाजी से मन विषयोँ की ओर बढ़ता है। व्यसन और वासना का घनिष्ठतम सम्बन्ध है। अतः एक ओर नशे को तीव्र प्रतिक्रिया से जहाँ शारीरिक शिथिलता उत्पन्न होती है वहाँ मनोविकार जड़ जमाते हैं और मनुष्य को बुराइयों की ओर प्रेरित करते हैं। लोग इस कुप्रभाव में आकर वीर्य जैसी शारीरिक शक्ति को बरबाद करते हैं ओर स्वास्थ्य को खोखला बनाते हैं। जन-संख्या बढ़ने का एक प्रबल कारण यह नशा भी है जिसके कारण अधिकाँश लोग काम वासनाओं में घिरे रहते हैं।
हर प्रकार का नशा मनुष्य शरीर के लिये हानिकारक है। उसके कारण न केवल मनुष्य शरीर के साथ, बल्कि मानव-आत्मा के साथ भी भारी द्रोह होता है। जिस राज्य या राष्ट्र के नागरिक नाना प्रकार के व्यसनों में डूबे रहते है। उसका जीवन न सिर्फ अपने लिये, वरन् समूचे समाज और राष्ट्र के लिये भी भार-रूप बन जाता है। वे स्वयं तो अपने नागरिक धर्म और कर्त्तव्य का पालन करने में असमर्थ हो ही जाते हैं पर इसके साथ ही इस असमर्थता का बोझ परिवार, समाज और राष्ट्र को लम्बे-समय तक ढोना पड़ता है। नशाखोर आदमी के जीवन में जिन अनेकानेक दुर्गुणों, दोषों और दुराचरणों का प्रवेश होता है, उनके कारण समाज को कई प्रकार की हानियाँ उठानी पड़ती है और राष्ट्र को समाज की सुव्यवस्था तथा सुरक्षा के लिये भारी खर्च उठाना पड़ता है। इसका बोझ लौटकर नागरिकों पर ही पड़ता है। इस दोहरी मार के कारण समाज और शासन के स्वस्थ विकास की गति कुँठित होती रहती है और जिन आयोजनों से राष्ट्र का विकास हो सकता था उन्हें रोक देना पड़ता है।
हमारे देश में पहले ही बहुत निर्धनता है। अपनी विकास-समस्याओं के लिये उसे दूसरों से कर्ज लेना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में इस आन्तरिक कमजोरी को बढ़ाना एक प्रकार से राष्ट्र-द्रोह ही माना जायगा। यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारी आय इतनी कमजोर होते हुये भी केवल नशेबाजी की पूर्ति के लिये विदेशों से बढ़िया किस्म की महँगी शराब मँगाई जाती हैं। जिस राष्ट्र में इस तरह के व्यसनी नागरिक हों, उसका विकास संतोषजनक नहीं माना जाता क्योंकि उनमें कर्त्तव्यनिष्ठा का अभाव होना ही समझा जाता है।
नशा स्वास्थ्य को गिराता है, मन को अनैतिक बुराइयों की ओर प्रोत्साहित करता है। इससे भी बड़ी बुराई यह है कि इस से आलस्य और प्रमाद बढ़ता है तथा समय का भारों अपव्यय होता है। कार्यक्षमता पर समय नष्ट करने का बुरा प्रभाव पड़ता है। जितने समय में लोग कोई आर्थिक धन्धा कर सकते थे, उसे प्रमाद में या मूर्छित अवस्था में बिगाड़ते रहते हैं। यही कारण है कि केन्द्रीय शासन के योजना आयोग ने नशाखोरी की गम्भीर समस्या पर पूरी तरह से सोच-विचार करके यह तय किया कि पंचवर्षीय योजनाओं को सफलतापूर्वक चलाने के लिये नशा-बन्दी पर पूरा, अमल किया जाय। बिना इसके कार्य-क्षमता न बढ़ेगी। इस सम्बन्ध में राज्यों के नाम केन्द्र से अनेक आश्वासन भी दिये गये किन्तु यह समस्या घटने के स्थान पर दिनों-दिन बढ़ती ही जा रही है और उसके कारण राष्ट्रीय चेतना को जबर्दस्त धक्का लग रहा है।
इस अव्यवस्था को अधिक काल तक चलते रहने दिया गया तो जिस औसत से उसका प्रशिक्षण और उद्योग बंद रहा है, उससे लगता हैं कि आने वाले भारत का प्रत्येक नागरिक व्यसनी होगा। कम से कम धूम्रपान की आदत तो सभी में होगी। इस तरह यदि हमारा आर्थिक ढाँचा किसी तरह से संतुलित हो भी जाय तो चारित्रिक दृढ़ता की बात पूरी न हो पायेगी। दुर्बल और बाह्य अनुकरण के विचारों वाले लोग कितना ही धन सम्पन्न क्यों न हो जायँ, वे आन्तरिक दृष्टि से सुदृढ़ न रह सकेंगे ओर उनकी भी ऐसी ही अवस्था बन जायेगी जैसी आज दूसरे धन-सम्पन्न योरोपीय देशों में हो रही है। हमारी नासमझी पर हमारी भावी सन्तानें ही हमें कोसेंगी और बुरा भला कहेंगी।
हम यदि उस व्यसन से दूर हैं तो यह नहीं सोचना चाहिये कि दूसरा यदि कुटेबों में ग्रसित है तो हमें उससे क्या प्रयोजन? वरन् हम समाज से इस तरह सम्बद्ध हैं कि उसकी किसी भी बुराई से हम अछूते नहीं बच पाते। बीड़ी-सिगरेट का छोड़ा हुआ धुँआ प्रत्यक्ष न सही अप्रत्यक्ष रूप से हमारे पेट के अन्दर पहुँचता है और कम ज्यादा प्रभाव तो डालता ही है। दुर्व्यसनों से होने वाली नैतिक भ्रष्टता से हम और हमारे परिवार बचे रहेंगे ऐसी कोई गारन्टी नहीं है। बदमाश के लिये सब एक से है बुराई अवसर पाने पर हर किसी को धौंसती हैं। वह कभी भले या नेक व्यक्ति का विचार नहीं करती।
अतः प्रत्येक विचारवान व्यक्ति का यह व्यक्तिगत तथा राष्ट्रीय उत्तरदायित्व है कि वह नशे की बुराइयों को समझ कर उनसे दूर भी रहे और साथ-साथ जो इनके शिकार हो चुके हैं, उन्हें भी उनसे निकालने का प्रयत्न करे। सामाजिक आचरण में पवित्रता लाने के लिये सरकार का मुँह कब तक ताकेंगे? यह कार्य अब नागरिक स्तर से ही शुरू किया जाना चाहिये। हमें यह आन्दोलन अपने आप, परिजनों एवं पड़ौसियों से ही उठाना चाहिये कि नशा आत्म द्रोह है। उससे बचने में ही अपना, समाज और राष्ट्र का कल्याण है।
अहार से मन पर पड़ने वाले सूक्ष्म प्रभाव को देख कर हिन्दू धर्म में खान-पान की शुद्धता को अत्यधिक महत्व दिया गया है। जी चाहे जहाँ और जिसके हाथ का शुद्ध-अशुद्ध आहार प्राप्त करने में निषेध पूर्ण वैज्ञानिक है। हिन्दुओं के रीति रिवाजों का अध्ययन करने वाले विदेशी अन्वेषकों ने भी यह मान लिया है कि अनुचित स्थानों में गन्दगी से भरा भोजन करना शारीरिक तथा मानसिक दोनों तरह से स्वास्थ्य के लिये हानिकारक होता है। किन्तु इस विशाल और पवित्र देश में आहार की सफाई के क्षेत्र में व्यापक उदासीनता नजर आती है। विदेशी ढंग के भयंकर गन्दगी भरे होटल, रेस्तराँ तथा सिनेमाओं में भोजन तथा जलपान करने की घृणित दुष्प्रवृत्ति यहाँ भी निरन्तर बढ़ती जा रही है। पाश्चात्य नकल और हमारी लापरवाही के कारण चारों ओर गन्दगी का यह घिनौना वातावरण बढ़ता जा रहा है और इससे जन स्वास्थ्य को भयंकर खतरा उपस्थित हो रहा है।
आधुनिक सभ्यता की होड़ में इस समय नैतिक मर्यादाओं का कितना उल्लंघन हो रहा है, इसका प्रत्यक्ष दर्शन शहरों में हो जाता है। चूल्हे, चौके की सफाई मिटा कर लोग घृणित होटलों में खाना पसन्द करते हैं। सार्वजनिक स्थानों की गन्दगी के बीच जिस उत्साह के साथ लोग खान-पान करते हैं, वह ऐसी समस्या है जिसे रोकना समाज की स्वास्थ्य-स्थिरता की दृष्टि से तो उपयोगी है ही, नैतिक दृष्टि से भी कम महत्व पूर्ण नहीं। इस कुरीति में अब महिलायें तथा बालिकायें भी साथ देने लगी हैं। अतः इस समस्या का निदान ढूँढ़ना अब नितान्त आवश्यक हो गया है।
शहरी की किसी गली में जाइये उधर ही शानदार बोर्ड लगे होटल दिखाई देंगे। जहाँ जाइये, जिधर जाइये, आपको भोजन तैयार मिलेगा। मजदूर, नौकरी पेशे वालों के अतिरिक्त अब गृहस्थ तथा विद्यार्थी आदि भी इन स्थानों में भोजन करना पसन्द करते हैं। चाय तथा अन्य पेय पदार्थों का प्रचलन आम हो गया है। इतना तो प्रायः हर शहरी कर लेता है। होटलों की बढ़ोतरी से ही पता चल जाता है कि उनकी बिक्री कितनी तेजी से हो रही है, जिस गति से होटलों की संख्या बढ़ रही है उसी गति उनकी गन्दगी और स्वास्थ्य का खतरा भी बढ़ रहा है। उनकी आन्तरिक व्यवस्था को देखकर लोगों से यह अनुरोध करने को विवश होना पड़ता है कि स्वास्थ्य एवं समाज की नैतिकता को बचाये रखने के लिये वे इनका उपयोग करें तो अच्छा है।
किसी भी होटल में जाइये भीड़ का ताँता देखते ही बनता है। इनमें सब तरह के बीमार, गन्दे, अस्वस्थ व्यक्ति बराबर आते रहते हैं और वस्त्रों तथा जूतों के साथ लाई हुई गन्दगी का एक अंश छोड़ते जाते हैं। शाम तक बाहरी गन्दगी से होटल पूरी तरह भर जाता है और इस तरह उस गन्दगी का पूरा संग्रहालय बन जाता है।
इसके बाद फर्नीचर की स्थिति पर नजर दौड़ाइये। इसे न तो कभी बाहर निकाल कर धूप से सेका जाता है न ही गर्म जल से इसकी सफाई की जाती है। जहाँ भोजन पकता है, वहाँ एक प्रकार के कीड़े पैदा हो जाते हैं जो इन फर्नीचरों की दराजों में छुपे रहते हैं। कुछ कीटाणु इतने छोटे होते हैं जो दिखाई तो नहीं देते किन्तु वहाँ की वायु में समाये हुए रहते हैं और जो भी लोग वहाँ जाते हैं, साँस के साथ उनके शरीर में प्रवेश करते रहते हैं। मेजों, कुर्सियों की जिस ढंग से सफाई की जाती है, वह और भी घृणित है। कई दिनों का पुराना कपड़ा जो जूठन से भरा हुआ होता है- उस कपड़े से और भोजनकर्त्ताओं द्वारा मेजों पर गिराये गये जल से उन्हें साफ कर दिया जाता है। इस प्रकार वह सफाई भी गन्दगी बढ़ाने वाली होती है। मेजों में अजीब किस्म की सड़ाँद पैदा हो जाती है।
फर्नीचर की तरह आले, अलमारी, दराज तथा नित्य प्रयोग में आने वाले बर्तनों की भी यही अवस्था होती है। उनमें रोज की गन्दगी का कुछ न कुछ अंश शेष बचा रह जाता है, जो हर दूसरे दिन के ताजे भोजन को भी गन्दा करने में पूरी मदद देता है। खान-पान की वस्तुओं में उससे अधिक लापरवाही बरती जाती है। अपना लाभ देखने वाले होटल मालिकों को औरों के स्वास्थ्य का कुछ भी ध्यान नहीं रहता। शाम तक जो सब्जी शेष रह जाती है, उसे दूसरे दिन की सब्जी तथा दाल में मिलाकर उसमें मिर्च, मसाले, खटाई आदि मिलाकर इस योग्य बना दिया जाता है कि लोग यह न समझ सकें कि इसमें बासी भोजन मिला दिया गया है। कई बार तो ऐसे भोजन पकड़े गये हैं जिनमें कीड़े-मकोड़े तथा अखाद्य पदार्थ तक पाये गये हैं। दाल-सब्जी की तरह गूंथे हुये आटे का प्रयोग कई दिनों तक किया जाता रहता है। आटे को ढकने वाले कपड़े, तथा अन्य खुले गन्दे खाद्य पदार्थों को देखकर अरुचि होती है, लगता है कैसे इन गन्दे पदार्थों को लोग उदरस्थ करते होंगे।
जिस स्थान पर होटल का नौकर जूठे बर्तनों की सफाई करता है, उसे देखने का अवसर मिल जाय तो किसी को भी घृणा आये बिना न रहेगी। खचाखच भीड़ में बार-बार स्वच्छ जल पाकर बर्तनों को धोने की फुरसत किसे होती है? एक टब या बड़े-से बर्तन में कई दिनों का गन्दा पानी भरा होता है। वहीं पास में कोई गन्दा कपड़ा पड़ा हुआ होता है। साफ करने वाला लड़का जूठे बर्तनों तथा प्लेटों को उस गन्दे पानी में डुबो कर बाहर निकाल लेता है और उसी गन्दे कपड़े से पोंछकर दुबारा इस्तेमाल के योग्य बना लेता है। किन्तु यदि किसी खुर्दबीन जैसे यन्त्र से देखा जाय तो इन बर्तनों में असंख्यों कीटाणु तथा गन्दगी के कण शेष रह जाते हैं। उन्हीं में बार-बार लोग भोजन करते रहते हैं।
होटलों में आने वाले लोगों में कितने ही ऐसे भी होते हैं जिन्हें कोई छूत की बीमारी होती हैं मुँह की गन्दगी तो प्रायः सभी में होती है। चाय आदि के जो गिलास इस्तेमाल किये जाते है उनमें, सफाई का उचित प्रबन्ध न होने के कारण दूसरों की बीमारी के कीटाणु लटके रह जाते हैं और इस तरह गन्दगी तथा बीमारी के कीटाणुओं का आदान-प्रदान चलता रहता है।
कभी-कभी इस क्रिया में होटलों में नौकर, वैरे या वेटर भी पूरा साथ देते हैं। खाये हुये व्यक्ति की जूठी थाली उठाकर ले जाते हैं और बिना हाथ साफ किये हुये नये मेहमान को नई थाली लगाकर पेश कर देते हैं। पहले की गन्दगी हर दूसरे तक पहुँचाने का कार्य ऐसे वैरे कुशलतापूर्वक पूरा करते रहते हैं।
भीतरी गन्दगी तो होती है, प्रायः खाद्य पदार्थ भी खुले रखे जाते हैं जिनमें मक्खियाँ भिनभिनाती रहती हैं। सड़क पर चलने वाले तेज वाहनों द्वारा उड़ाई हुई धूल, धुआँ आदि के कारण भी वह आहार अशुद्ध होता रहता है और उसका दुष्प्रभाव खाने वालों पर पड़ता रहता है।
होटल के रसोई भाग पर काम करने वाले लोगों की दशा भी कम दयनीय नहीं होती। गन्दे लोगों द्वारा पकाया भोजन भी गन्दा ही हो सकता है। गन्दे हाथों से आटा गूंथना, बीड़ी पीते हुए रोटियाँ पकाना, बीच-बीच उनके भी खाने-पीने का दौर चलता रहता है। इस तरह होटलों में सच पूछा जाय तो गन्दगी पकती और गन्दगी ही खिलाई जाती है। इस तरह लोगों के शरीरों पर उसका दूषित प्रभाव ही पड़ता है जो नियमित भोजन करने वालों के लिये स्वास्थ्य की खराबी की समस्या पैदा करता है।
यह गन्दगी लोगों से छुपी रहती हो सो बात नहीं, पर लोग इस दिशा में इतने लापरवाह होते हैं या यों कहना चाहिये कि वे आधुनिक सभ्यता के रंग में इतना रंगे हुये हैं कि उन्हें यह सोचने का अवसर भी नहीं मिलता कि यह गन्दगी कितनी हानिकारक हो सकती है।
आहार न केवल स्वास्थ्य के लिये वरन् आत्म-विकास, दीर्घ-जीवन तथा मनोबल की प्राप्ति का भी साधन है। शास्त्रकार ने आहार से जीवन की प्रत्येक गति विधि को प्रभावित होना बताया है। भारतीय जीवन में इसीलिये भोजन में अनेक धार्मिक प्रतिबन्ध लगाये गये हैं। कोई स्वच्छ होटल भी हो सकते हैं, उन्हें छोड़कर इन गन्दे होटलों तथा मलीन सार्वजनिक स्थानों में आहार लेना इस दृष्टि से बहुत हानिकारक है। आहार की शुद्धता पर हमारा ध्यान जाना ही चाहिये। चूल्हे- चौके को जितना शुद्ध व पवित्र रखा जाय उतना ही अच्छा। आहार की गन्दगी से हमें स्वास्थ्य व नैतिक जीवन का संरक्षण जरूर करना चाहिये।
युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति
भारतीय जनता के लिये यह अग्नि परीक्षा का समय है। स्वतन्त्रता प्राप्त करना जितना कठिन है, उससे भी कठिन उसकी रक्षा कर सकना है। पिछली पीढ़ी के गान्धी, तिलक, सुभाष, नेहरू, मालवीय आदि नेताओं ने स्वाधीनता संग्राम जीता। अब इस पीढ़ी पर उसकी रक्षा की जिम्मेदारी है। पिछली पीढ़ी ने कुछ भी साधन न होते हुये अपने बल-बूते उन दिनों के सबसे समर्थ राष्ट्र इंग्लैण्ड से लोह लिया था। अब हमारे पास बहुत साधन हैं, विदेशों की भी सहायता है, ऐसी दशा में चीन और पाकिस्तान से निपट सकना उतना कठिन नहीं होना चाहिये। स्वतन्त्रता की रक्षा के लिये भौतिक साधनों की दृष्टि से हम समुचित समर्थ एवं सुविधा प्राप्त हैं, ऐसी दशा में पिछली पीढ़ी के स्वतन्त्रता सेनानियों की तरह इस पीढ़ी के राष्ट्र नेताओं को भी जीतना ही चाहिये।
सैन्य सज्जा की दृष्टि से देश अब उस स्थिति में पहुँचता जाता है जब कि वह आक्रमणकारियों को उनके ठिकानों तक खदेड़ कर अपनी प्रादेशिक अखण्डता एवं प्रभु रक्षा अक्षुण्ण बनाये रह सके। इस दिशा में सरकार तथा राजनेता आवश्यक प्रयत्न भी कर रहें हैं। इन प्रयत्नों का अच्छा परिणाम निकलेगा, यही आशा हमें करनी चाहिये।
इस संदर्भ में हमें मूल समस्या को आँखों से ओझल नहीं करना चाहिये। अब कोई राष्ट्र वहाँ के सरकारी साधनों के आधार पर समर्थ नहीं माना जाता। सरकार बदली और पलटी जाती रहती हैं। अन्तःराष्ट्रीय दबाव से सरकारों के आसन हिलते-डुलते भी रहते हैं। उतार-चढ़ाव के समय सरकारों के जीवन में आते और जाते रहते हैं। समर्थता का आधार वस्तुतः जनता का मनोबल एवं चरित्र होता है। उसके नीचे और ऊँचे होने के आधार पर किसी देश की शक्ति आँकी-नापी जाती है। यदि किसी राष्ट्र के प्रजाजन मानसिक और चारित्रिक दृष्टि से पिछड़े हुये हैं, तो उसे दुर्बल एवँ असमर्थ ही कहा जायगा। उसके भीतर न संगठन रहेगा और न शान्ति। विपत्ति की घड़ी में जब प्रजाजन अपनी चारित्रिक दुर्बलता के कारण असंतुलित हो उठेंगे तो बाह्य आक्रमणकारियों से निपटने की अपेक्षा आन्तरिक परिस्थितियों को संभालना और भी अधिक कठिन हो जाता है। इसके विपरीत यदि प्रजाजन देश भक्ति एवं राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों के प्रति निष्ठावान हैं तो वे न केवल आन्तरिक शान्ति व्यवस्था ही बनाये रहते हैँ वरन् अपने छोटे-छोटे साधनों को रक्षा कार्यों में लगाकर सरकार की शक्ति चौगुनी-सौगुनी बढ़ा देते हैं।
इन परिस्थितियों में कोई दुर्बल राष्ट्र भी किसी बड़े से बड़े संकट का सामना कर सकता है। जापान जैसा छोटा देश पिछले युद्ध में अमेरिका द्वारा परास्त किया गया था- तब उसे गुलाम जैसी स्थिति में भी पहुँचना पड़ा। पर कुछ ही वर्षों में उसने अपनी पूर्व स्थिति पुनः प्राप्त कर ली। परास्त जर्मनी दबाया, कुचला, खंडित एवं भेदित किया गया पर उसे पुनः उभर आने में देर न लगी। अब वह पुनः समर्थ राष्ट्रों की गणना में आ खड़ा हुआ है। परास्त जापान और जर्मनी को पुनः पूर्व स्थिति में पहुँचाने का श्रेय वहाँ की जनता के मनोबल एवं राष्ट्रीय चरित्र को है। रूस और चीन ने इतने थोड़े दिनों में इतनी गई गुजरी स्थिति से ऊपर उठकर जो अद्भुत क्षमता प्राप्त की है, उसके पीछे जनता का मनोबल ही काम कर रहा है।
प्रचुर शक्ति की आवश्यकता-
भारतीय राष्ट्र के सम्मुख आज की सबसे बड़ी आवश्यकता सर्वतोमुखी समर्थता प्राप्त करना है। आक्रमणकारियों के दाँत तोड़ने के लिए शक्ति चाहिये। सरकार इस कार्य को सैन्य मोर्चे तथा राजनैतिक मोर्चे पर किस कुशलता-पूर्वक करती है, यह उत्तरदायित्व राजनेताओं का है। जनता उसमें पूरा सहयोग करे यह आवश्यक है। देश-भक्त प्रजाजनों की तरह इस आपत्तिकाल में हमें सरकार की हर माँग को पूरा करना चाहिये। आन्तरिक शान्ति बनाये रहने से लेकर, उत्पादन बढ़ाने तक और धन से लेकर सर हथेली पर रखकर शत्रु से जूझने तक हर कार्य अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिये। पर साथ ही यह भी भूल न जाना चाहिये कि राष्ट्रीय शक्ति का अज्ञान स्रोत वस्तुतः जनता के मनोबल एवं चरित्रबल पर निर्भर रहता है। इसलिए इस दिशा में वैसा ही प्रयत्न होना चाहिये जैसा कि सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिये किया जाता है।
राजनैतिक एवं सैन्य मोर्चे की योजना एवं व्यवस्था वरिष्ठ नेता ही बना सकते हैं। पर जनता में समर्थता उत्पन्न करने के नागरिक मोर्चे पर हम में से हर कोई नेता, सेनापति या योद्धा की तरह पूरी छूट और तत्परता के साथ काम कर सकता है। इसमें किसी विशेष प्रशिक्षण, तैयारी या योग्यता की भी आवश्यकता नहीं हैं। जो व्यक्ति जहाँ हैं, जिस स्थिति में है, वहीं से अपने समीपवर्ती क्षेत्र में बहुत कुछ कर सकता है। हर व्यक्ति में कुछ न कुछ सामर्थ्य होती है और यदि वह उसका एक अंश अपने से पिछड़े हुये लोगों को ऊँचा उठाने में लगाने के लिये तत्पर हो जाय तो उससे बहुत काम हो सकता है। तिनका-तिनका जमा होने से मजबूत रस्सी बन जाती है, बूँद-बूँद जोड़ने से घड़ा भर जाता है। रचनात्मक दिशा में किये गये छोटे-छोटे प्रयत्न भी यदि व्यवस्थित रीति से किये जाते रहें तो उनका प्रभाव, परिणाम, आशाजनक एवं उत्साहवर्धक हो सकता है।
किसी राष्ट्र की आन्तरिक शक्ति इस बात से आँकी जाती है कि, उसके प्रजाजन सामूहिक उत्कर्ष में कितनी रुचि लेते हैं, कितना ध्यान देते हैं और कितना त्याग करते हैं। देश भक्ति, पुण्य, परमार्थ, धर्म, अध्यात्म, महानता उत्कृष्टता की एक ही कसौटी है कि मनुष्य अपने व्यक्तिगत गोरखधन्धे में ही अपनी सारी शक्ति न लगा दे, वरन् निर्वाह क्रम को सीमित, संयमित करके अपनी क्षमताओं का अधिकाधिक उपयोग सामूहिक उत्कर्ष के लिये समर्पित करता रहे। मनुष्य समाज का ऋणी है। सामाजिक सहयोग से ही उसे समस्त सुख साधन उपलब्ध हुए हैं। उस ऋण से उऋण होने के लिये सामूहिक उन्नति के कार्यों में हर व्यक्ति का भावनापूर्ण योगदान होना चाहिये। फिर मनुष्य की अन्तरात्मा में एक उत्कृष्टता की भावना भी रहती है। उसे पुष्ट एवं विकसित करने के लिये उसे परमार्थिक कार्यों में योगदान करना चाहिये। पुण्य और परमार्थ का एक ही माध्यम है- लोक सेवा। धर्म और अध्यात्म की एक ही कसौटी है-लोक कल्याण में अधिकाधिक योगदान। तपश्चर्या का प्रयोजन अपने आपको कष्टसाध्य जीवनयापन के लिये तैयार करना ही है ताकि अपनी सुविधायें न्यूनतम रखते हुये सामाजिक सुविधाओं के बढ़ाने में अधिकाधिक योगदान किया जा सके। ईश्वर भजन की साधना के मूल में एक ही तथ्य काम करता हैं कि-प्राणिमात्र में प्रभु की झाँकी करते हुए उन्हें सुखी एवं समुन्नत करने के लिये श्रद्धापूर्वक संलग्न होना। भक्ति शब्द का स्पष्ट अर्थ सेवा हैं। ‘भज सेवायाँ’ धातु से यही अर्थ निकलता है कि सेवा-संलग्नता का अर्थ ही भजन है।
भारतीय संस्कृति का आदर्श-
भारतीय संस्कृति एवं दर्शन का मूल यही आदर्श है कि व्यक्ति अपनी निजी इच्छाओं, आवश्यकताओं और सुविधाओं को जितना अधिक घटा सकता है, घटावे और लोक-कल्याण के लिये जितना अधिक त्याग कर सकता हो करे। जब तक इस देश के निवासी इन आदर्शों को यथार्थ रूप में समझते, अपनाते रहे, तब यह देश समर्थता एवं समृद्धि के उच्च शिखर पर व्यवस्थित बना रहा। अब जबकि वे आदर्श भुला दिये गये है, हम अधोगति के गर्त में दिन-दिन अधिक गहरे गिरते चले जा रहे हैं। राष्ट्रीय अशक्तता का एक ही चिह्न है कि उसके प्रजाजन अपनी वैयक्तिक सुख सुविधाओं, कामना, आकांक्षाओं, वासना, तृष्णाओं में निमग्न रहें, सामूहिक उत्कर्ष की उपेक्षा करें और जब लोक मंगल के कार्यों में कुछ त्याग करने का अवसर आवे तो बगलें झाँकने लगें। ऐसे लोग मनुष्य आकृति में रहते हुये भी वस्तुतः मनुष्य कहलाने के योग्य नहीं। जिसका लक्ष्य संकीर्ण स्वार्थपरता तक ही अवरुद्ध है, जो लोक मंगल की ओर ध्यान देने की उपयोगिता एवं आवश्यकता नहीं समझता, उसे निकृष्ट कोटि का घृणित प्राणी ही कहना चाहिये। ऐसे घृणित प्राणी जिस देश में भरे पड़े हों, उसमें दुर्बलता का ही साम्राज्य रहेगा, और कोई बाहरी शत्रु उसे नहीं भी छेड़े तो भी आन्तरिक दुर्बलता एवं विकृतियाँ उसे दुख दारिद्र में, क्लेश द्वेष में, दुर्गति में ही पटक कर सदा जलाकर नष्ट करती रहेगी।
हमें अपने देश के हर नागरिक में राष्ट्रीयता, देशभक्ति, समाजनिष्ठा, एवं लोक-सेवा की भावनायें उत्पन्न करनी चाहिये। इन्हीं भावनाओं का शास्त्रीय नाम धार्मिकता एवं आध्यात्मिकता है। विडम्बनाओं से भरे आलसी, हरामी, स्वार्थी एवं अहंकारी लोगों को छुटपुट धार्मिक कर्मकाण्ड करते रहने के कारण किसी ने धार्मिक या अध्यात्मवादी भले ही घोषित कर दिया हो, वास्तविकता ऐसी ही नहीं। जिसकी आत्मा में धर्म या अध्यात्म का एक कण भी विद्यमान होगा, वह लोक- मंगल की भावनाओं में ओत-प्रोत हुये बिना, उस दिशा में कुछ त्याग बलिदान किये बिना रह ही नहीं सकता। जप और ध्यान आवश्यक हैं, पर यह भूलना न चाहिये कि जो इन साधनाओं का तत्व-ज्ञान समझ सका होगा उसके लिये लोक सेवा ईश्वर भक्ति का सर्वोपरि माध्यम बनी हुई होगी। जिसके पत्थर जैसे मन में इस प्रकार की भावनायें नहीं उठतीं, समझना चाहिये कि उस ऊसर में अध्यात्म का अमृत जल बरसा ही नहीं। जप ध्यान के बहाने वह कुछ ताना-बाना जरूर बुन रहा है पर है वह क्रिया कृत्य माक्ष ही और क्रियाकृत्य का तब तक कोई मूल्य नहीं जब तक उसके पीछे भावनाओं का उभार न हो। देवताओं को लूट लेने के लिये मन्त्र-तन्त्र की रिश्वत से काम चलाने की बात सोचते रहने वाले लोग अध्यात्मवादी नहीं हो सकते। यह त्यागी और बलिदानियों का मार्ग है- लुटेरों का नहीं। जो ईश्वर की बात सोचेगा उसे भौतिक कामनाओं के जंजाल से मुक्त होकर ईश्वर की इच्छा एवं आज्ञानुवर्ती बनकर अपने आपको लोक मंगल के लिये समर्पित करने की भावना उत्पन्न करनी ही पड़ेगी। ईश्वर की प्रसन्नता एवं समीपता इस प्रकार की आन्तरिक उत्कृष्टता के आधार पर ही संभव होती रही है। अब भी और आगे भी इसका एक मात्र मार्ग यही रहेगा।
उत्कृष्टता की भावनाओं का अभिवर्धन-
वर्तमान राष्ट्रीय संकट की घड़ी में इन मानवीय उत्कृष्टता की भावनाओं का अभिवर्धन आवश्यक है क्योंकि वास्तविक शक्ति और समर्थता इन्हीं से उत्पन्न होगी भावनाओं का बाहुल्य होता है तो क्रिया सहज ही तदनुरूप होने लगती है। भावनाओं का अभाव हो तो यदि वैसा कुछ काम भी किया जाय तो वह लँगड़ा, लूला-दिखावट बनकर रह जाता है। जिनमें आदर्शवादिता की जड़ें अन्तरात्मा तक नहीं गई हैं, वे यश, कीर्ति या कोई परोक्ष लाभ उठाने की घात में लोकहित के काम करते रहते हैं, जब वह लाभ नहीं मिलता तो उसे छोड़कर अलग हो जाते हैं, इतना ही नहीं खीजवश उस क्रिया कलाप को बिगाड़ने भी लगते हैं। इसके विपरीत यदि आदर्शवादी आस्था सुदृढ़ हो तो व्यक्ति जहाँ भी जिस किसी परिस्थिति में रहेगा परमार्थिक मार्थिक आदर्शों की पूर्ति के लिये अपनी सामर्थ्यानुसार कुछ न कुछ करता ही रहेगा।
आज आवश्यकता इसी बात की है। देश में जिस बात की सबसे अधिक न्यूनता है, उसकी पूर्ति में हम लग जायँ। देशभक्ति मौखिक चर्चा का विचार न रहकर हमारे जीवन का लक्ष्य बने तभी काम चलेगा। आध्यात्मिकता के आदर्श को देश, धर्म, समाज, संस्कृति के क्षेत्रों में कार्यान्वित कर लगें तो उसे देशभक्ति, लोक सेवा या विश्व कल्याण किसी भी नाम से पुकारा जाय बात एक ही है। यह तत्व जब हमारे अन्तःकरणों में बढ़ता पनपता जायगा तब वह शक्ति उत्पन्न होगी जिससे वर्तमान आक्रमणकारियों को परास्त करने तक ही हमारी सफलता सीमित न रहेगी वरन् उस लक्ष्य तक भी पहुँचा देगी जिस पर पहुँच कर भारत किसी समय जगद्गुरु एवं विश्व शिरोमणि बना हुआ था।
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को इस दिशा में पहल करनी होगी। आज के सुरक्षात्मक कार्यों में हम किसी से पीछे न रहें। धन, रक्त, समय, श्रम एवं प्राण देने के लिये हम अपनी परिस्थिति के अनुसार समय की आवश्यकता पूरी करें। साथ ही यह भी संकल्प करें। कि देश को चिरस्थायी रूप से समर्थ, सबल, समृद्ध एवं सुसंस्कृत बनाना है। यह उद्देश्य रचनात्मक कार्यक्रमों के अपनाने से ही संभव होगी। कथनी छोड़कर अब हमें करनी के लिये उतारू होना चाहिये। अपने समय और धन का अधिकाधिक अंश हमें रचनात्मक कार्यों के लिये नियोजित करना चाहिये। दूसरों को उपदेश देने के साथ-साथ, अपने को पहला उपदेश दें, और अन्तरात्मा को साक्षी देकर यह सोचें कि राष्ट्र को सशक्त बनाने के लिये हम जितना त्याग कर सकते थे उतना करते हैं या नहीं? यदि नहीं, तो अपने को धिक्कारना चाहिये और इस अभाव की पूर्ति के लिये आज ही कटिबद्ध हो जाना चाहिये। सोचते, कहते और पढ़ते रहने भर से प्रयोजन सिद्ध न होगा। हमें कुछ काम करना चाहिये। इस जौहर की घड़ी में असंख्यों व्यक्ति एक से एक बड़ा बलिदान करके आत्मा और परमात्मा के सामने, देश और संसार के सामने अपना मस्तक गर्व से ऊँचा कर रहे हैं तब क्या हमारे लिये यह उचित न होगा कि हम भी कुछ करें और अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता का प्रमाण अपने कार्यों द्वारा प्रस्तुत करें। अब बातों का जमाना गया, काम का आ गया। आज हर व्यक्ति उसके कार्यों से ही परखा जा रहा हैं। हमें भी कर्मवीर ही होना चाहिये।
जन-जागरण की आवश्यकता-
जन-जागरण का नागरिक मोर्चा, सैन्य मोर्चे से कम महत्वपूर्ण नहीं। युद्ध बन्द होने पर- सैन्य सज्जा का महत्व कम भी हो सकता है पर नागरिक मोर्चे की उपयोगिता, आवश्यकता दिन-दूनी, रात चौगुनी बढ़ती रहेगी। भारतीय समाज बहुत पिछड़ा हुआ है। उसका उत्कर्ष भावनात्मक उत्कृष्टता बढ़ाने से ही संभव होगा। इसलिये हमें ऐसे रचनात्मक कार्यों में लगना चाहिये जिनसे जन-साधारण को देशभक्ति के आदर्शों को समझने में ही नहीं, कार्यान्वित करने का भी अवसर मिले। लोग उदार, सच्चरित्र, विवेकवान और आदर्शवादी बनें इसके लिये लेखनी और वाणी से उन्हें हर संभव प्रेरणा देनी चाहिये। साथ ही जो इस आवश्यकता को अनुभव करें, सहमत हों, उन्हें ऐसे कार्यों में लगाना चाहिये जो लोक मंगल के लिये आवश्यक हैं। समय, श्रम और धन का एक अंश जब लोग किसी कार्य में लगाते हैं तभी उनकी भावनायें बढ़ती और परिपक्व होती हैं। विचारों का मूल्य तभी है जब वे कर्म रूप से परिणत हों। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को स्वयं तो नव निर्माण के रचनात्मक कार्यों में लगना ही चाहिये साथ ही अपने संपर्क के प्रभाव क्षेत्र- के दूसरे लोगों को भी उनमें लगाना चाहिये।
युग निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रमों का निर्धारण इसी प्रयोजन के लिये है कि हर व्यक्ति अपनी स्थिति के अनुरूप नव निर्माण के लिये कुछ न कुछ कर सके। यह कार्य सामूहिक संगठित रूप में हों तो उनका मूल्य महत्व एवं परिणाम और भी अधिक होता है। इसलिये प्रयास यह होना चाहिये कि हर जगह एक छोटा संगठन बनावें उसे परिपुष्ट करें और उसके द्वारा रचनात्मक कार्यों का किसी न किसी रूप में समारंभ कर दें।
अग्नि परीक्षा की इन घड़ियों में हमें अपनी उत्कृष्टता सिद्ध करनी है। स्वाधीनता की रक्षा कर सकने की अपनी पात्रता को प्रमाणित करना है और यह कार्य अकेले सैन्य मोर्चे पर ही नहीं, नागरिक मोर्चे पर भी सम्पन्न किया जाना है। जन-साधारण में देश भक्ति की-लोक मंगल की-भावनाएं जागें और जन जागरण के प्रमाणस्वरूप वे कुछ क्रियात्मक कदम उठावें तो उज्ज्वल भविष्य की आशा बँधेगी। इस महत्वपूर्ण प्रक्रिया की पूर्ति के लिये हमें आज से ही तत्पर होना चाहिये। खरे-खोटे की इस परीक्षा घड़ी में हमें खोटा नहीं खरा सिद्ध होना चाहिये।
देश में अन्न की इन दिनों कमी है। जितना उत्पादन होता है, उससे काम नहीं चलता। 8 से 12 प्रतिशत तक बाहर से मंगाना पड़ता है। इसमें से अधिकाँश अमेरिका से खरीदना पड़ता है और उसके बदले बड़ी कठिनाई से प्राप्त होने वाली विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। इन दिनों अमेरिका भारत पर यह दबाव डाल रहा है कि यदि उसे उसके यहाँ से गेहूँ लेना हो तो पाकिस्तान को काश्मीर देने के उसके प्रस्ताव को माने अन्यथा गेहूँ बन्द कर दिया जायगा।
ऐसी स्थिति में हमें अपने राष्ट्रीय गौरव की प्रभुसत्ता की और प्रादेशिक अखण्डता की रक्षा करने के लिये इस प्रकार के दबावों को भी समाप्त करना होगा। अन्न की दृष्टि से स्वावलम्बी होना, आज की हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है। इसे किसी भी कीमत पर पूरा करना चाहिये।
किसान अन्न उगाने को प्राथमिकता दें। जो फसलें जल्दी आती हैं और अधिक पैदा होती है उन्हें बोवें। सिंचाई के साधन बढावें। कोई जमीन बिना बोई न रहने दें, तथा शाक-भाजी अधिक उगावें। अनाज इस प्रकार सुरक्षित रखा जाय कि चूहे और कीड़े उसे बर्बाद न करने पावें। बड़ी दावतें बिलकुल बन्द कर दी जायें। थाली में झूठन छोड़ने की गन्दी आदत एकदम बदल दी जाय। कितने ही प्रकार के व्यंजन बनाने की बजाय थाली में कम से कम किस्म की चीजें रहें। इस प्रकार अन्न की बचत हो सकती है। उत्पादन बढ़ाने के लिये खाद, सिंचाई आदि के जो साधन हो सकते हों, उन्हें बढ़ाना चाहिये। घरों में, बगीचों में, आँगनों में जहाँ कहीं भी थोड़ी खाली जगह हो, वहाँ शाक-भाजी उगाने चाहिये। इस प्रकार उत्पादन बढ़ाने में थोड़ा-थोड़ा सहयोग हर दिशा से हो तो समस्या का हल आसानी से हो सकता है। अधिक सन्तान उत्पादन न करके खाने वालों की संख्या बढ़ाने को भी यदि रोकने का प्रयत्न किया जाय तो यह भी एक देशभक्तिपूर्ण कार्य होगा।
सर्व-साधारण को सप्ताह में एक दिन या एक समय अन्नाहार छोड़कर निराहार या शाकाहार पर रहने का ‘विजय व्रत’ करने के लिये तैयार होना चाहिये। व्रत-उपवासों का भारतीय धर्म शास्त्रों में बड़ा महत्व एवं महात्म्य बताया गया है। इससे आत्मा की शुद्धि होती है और भगवान प्रसन्न होते हैं। पार्वती जी ने शंकर से विवाह करने जैसे कठिन कार्य को व्रत उपवास के द्वारा पूर्ण कर लिया था। राष्ट्र रक्षा के लिये धार्मिक दृष्टि से भी विजय व्रत का बहुत महात्म्य है। इससे राष्ट्रीय विजय में निश्चित रूप से सहायता मिलेगी। आध्यात्मिक उपचार की दृष्टि से इसे हर नर-नारी, बाल-वृद्ध को करना चाहिये। देश-भक्ति की दृष्टि से आज की संकट बेला में इतना त्याग तो हमें करना ही चाहिये कि सप्ताह में एक दिन या एक समय निराहार न सही शाकाहार से तो काम चला ही लें। अन्न न लें। इस प्रकार अन्न की जो बचत होगी उससे उत्पादन न बढ़ने पर भी काम चल जायगा और अमेरिका आदि से अन्न मँगाने को न तो विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ेगी और न काश्मीर देने का दबाव सहना पड़ेगा।
अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को यह व्रत तुरन्त आरम्भ कर देना चाहिये। अपने परिवार के लोगों को इसके लिये तैयार करना चाहिये और इस आन्दोलन को व्यापक बनाने के लिए प्रचार, पर्चे, भाषण, प्रतिज्ञा पत्र आदि जहाँ जो संभव हो, वह करना चाहिये। विजय व्रत व्यापक बनाने में हमें कुछ उठा न रखना चाहिये। इस व्रत को ग्रहण करने वालों में स्वभावतः देशभक्ति की भावना बढ़ेगी, वे अपने राष्ट्रीय कर्तव्यों को समझेंगे और यह समझदारी आगे चलकर अन्य राष्ट्र-उन्नति के कार्यों में सहायक होगी।
आध्यात्मिक उपचारों से सामयिक वातावरण बनाने और बदलने में बड़ी सहायता मिलती है। प्राचीनकाल में सामयिक विपन्नता एवं विपरीतता को बदलने एवं सुधारने के लिये समय-समय पर विशेष धर्मानुष्ठान होते रहे हैं। शास्त्रों में ऐसे विधान भी हैं।
वर्तमान काल की राष्ट्र रक्षा समस्या को हल करने के लिए जहाँ भौतिक साधनों को जुटाया जा रहा है, वहाँ आध्यात्मिक आयोजनों की भी आवश्यकता है। भौतिक शक्ति से आध्यात्मिक शक्ति का महत्व कम नहीं। देवी शक्ति की सहायता से बड़े-बड़े कठिन कार्य सरल होते हैं फिर वर्तमान समस्याओं के समाधान में उनसे सहायता क्यों न मिलेगी?
अखण्ड-ज्योति परिवार द्वारा विगत शरद पूर्णिमा शक्ति से साधना महापुरश्चरण प्रारम्भ किया गया है। गायत्री सर्वोपरि शक्ति है। उसके साथ कुछ विशिष्ट बीज मन्त्र एवं सम्पुट जोड़ने से उसे विभिन्न भौतिक कार्यों के लिये भी प्रयुक्त किया जा सकता है। ‘श्रीं’ बीज सफलता एवं समृद्धि के लिये, ‘ह्रीं’ बीज बुद्धि एवं भावना, विकास के लिये और ‘क्लीं’ बीज शक्ति सम्पन्नता एवं अनिष्ट निवारण के लिये किया जाता है। वर्तमान परिस्थितियों में देश में सर्वतोमुखी बल, साहस, शौर्य एवं पराक्रम का बढ़ना आवश्यक है। साथ ही शत्रुओं का दमन एवं शमन भी होना चाहिये। इन दोनों प्रयोजनों के लिये ‘क्लीं’ तत्व अपेक्षित है। गायत्री महामन्त्र के साथ क्लीं बीज तथा सम्पुट जोड़ देने से एक ऐसी विशिष्ट मन्त्र शक्ति बनती है जो आज की उपरोक्त दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
गत अंक में प्रकाशित सूचना के आधार पर साधना में श्रद्धा रखने वाले परिवारों ने प्रतिदिन आठ माला के हिसाब से एक महीने में एक 24 हजार शक्ति पुरश्चरण आरम्भ कर दिया है। परिवार के लगभग आधे सदस्य उस साधना क्रम में लग गये हैं। यह प्रसन्नता की बात है। कुछ लोगों ने समय सम्बन्धी कठिनाई के कारण उतना करने में असमर्थता प्रकट की है और साधारण रीति से एक माला करते रहने की बात कही है। ‘न कुछ से कुछ अच्छा,’ एक माला करके भी पुरश्चरण में भागीदार रहा जा सकता है ‘ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं क्लीं ॐ’ इस शक्ति मन्त्र की एक माला तो हम को जब तक संकट की घड़ियां विद्यमान हैं तब तक करते ही ही रहना चाहियें।
राष्ट्रीय संकट के हल करने में हम सबका योगदान होना चाहिये। उपरोक्त मन्त्र की एक माला जपने में दस मिनट लगते हैं। इतना समय तो हर व्यक्ति स्नान करने के उपरान्त इस साधना को दे ही सकता है। जो जप न कर सकें, वे प्रतिदिन 24 मन्त्र लिखने का क्रम भी बना सकते हैं। किसी न किसी रूप में उस धर्मानुष्ठान में हमें सम्मिलित रहना चाहिये। वर्तमान संघर्ष ऐसे लोगों के विरुद्ध है जिनसे परास्त होने पर हमारा धर्म और संस्कृति भी सुरक्षित नहीं है। इसलिये इस उपासना क्रम को धर्म रक्षा का एक आवश्यक अंग मानकर ही करना चाहिये। अखण्ड-ज्योति परिवार के लोग स्वयं तो करेंगे ही, अन्य जो लोग उनकी पहुँच तथा प्रभाव प्रेरणा के क्षेत्र में आते हों, उन्हें भी इसके लिये प्रोत्साहित करना चाहिये।
मनुष्य की सबलता, दुर्बलता उसकी भावनाओं पर निर्भर रहती है। महापुरुष और दीन-हीनों में शारीरिक दृष्टि से कोई विशेष अन्तर नहीं होता, अन्तर केवल भावनाओं का ही रहता है। जिसकी भावनाएँ उत्कृष्ट हैं, उसे नर-नारायण या पुरुष पुरुषोत्तम ही कहना चाहिये।
पिछले हजार वर्ष में हमारे निरन्तर हुये अधःपतन का एक मात्र कारण भावनास्तर का गिर जाना ही है। लोग व्यक्तिगत स्वार्थ में इतने निमग्न हुये कि उन्हें सामूहिक उत्कर्ष एवं सामाजिक विकास के उत्तरदायित्वों का स्मरण ही न रहा। व्यक्तिवाद की संकीर्णता चरम सीमा तक पहुँच जाने पर इंसान अपना स्तर खो बैठता है और हैवान-शैतान बन जाता है। आज लोगों की मनोभूमि पर स्वार्थपरता, संकीर्णता एवं विवेकहीनता का ग्रहण लगा हुआ है। फलस्वरूप नैतिकता का स्तर गिरने से अपराध बढ़ रहे हैं और विवेक हीनता के कारण उत्पन्न हुई सामाजिक कुरीतियों ने हमें खोखला बना दिया है। चरित्र और विवेक घट जाने से राष्ट्रीय दुर्बलता उत्पन्न होती है और उससे शत्रुओं को घात लगाने का अवसर मिलता है। हमें भी इन्हीं कारणों से विपत्ति में पड़ना पड़ा है।
भारतीय समाज के जन-मानस में क्रान्तिकारी सुधार एवं परिवर्तन आवश्यक है। विचारों को पलट देने से ही जमाना बदलता है। युगनिर्माण के जिस महान् अभियान को पूर्ण करने के लिए हम कटिबद्ध हुए हैं, उसका प्रधान आधार लोक-मानस में आदर्शवादी परिवर्तन उत्पन्न करना ही है। विचार क्राँति के बिना, राजनैतिक एवं आर्थिक क्रान्तियाँ अधूरी ही मानी जायेगी। अखण्ड-ज्योति परिवार के हर सदस्य को विचार-क्रान्ति के अग्रदूत-युग निर्माता की भूमिका अदा करनी चाहिए। उसे अपना यह एक धर्म-कर्तव्य मान लेना चाहिए कि वह अपने निज के, अपने परिवार के तथा सम्बन्धित व्यक्तियों के विचारों में विवेकशीलता एवं उत्कृष्टता उत्पन्न करने के लिए कुछ न कुछ कार्य नित्य, निरन्तर, नियमित रूप से करता रहेगा। वैयक्तिक उद्देश्य से जिनके साथ संपर्क बनाया जाय उन सबको सामान्य वार्तालाप के बीच ही सुधारात्मक विचारधारा का प्रकाश देना चाहिए। जिस प्रकार खाद्य पदार्थों में नमक या शकर मिला कर वे स्वादिष्ट बनाए जाते हैं, उसी प्रकार हमारा वार्तालाप, व्यवहार, कार्यकलाप किसी के साथ भी-किसी भी प्रयोजन से क्यों न हो, उसमें कुछ न कुछ पुट ऐसा अवश्य होना चाहिए जिससे घटिया स्तर के विचारों से विरत होकर उन्हें ऊँचे स्तर पर विचार करने की प्रेरणा मिले। स्वार्थपरता, संकीर्णता, अनैतिकता एवं मूढ़ता से लोक-मानस को मुक्त कराया ही जाना चाहिए और उसके लिए प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति को अपने संपर्क क्षेत्र में निरन्तर कार्य करना चाहिए।
हम में से अधिकांश व्यक्ति एक आना प्रतिदिन जन-जागरण के लिए लगाते रहने की प्रतिज्ञा ले चुके हैं। इस पैसे से युग निर्माण के उपयुक्त प्रेरणाप्रद साहित्य खरीदते रहना चाहिए और उसे जितने अधिक लोगों को पढ़ाया-सुनाया जाना सम्भव हो सके-उसका प्रयास करना चाहिए। नव-निर्माण की उपयुक्त विचारधारा अपने भीतर विकसित करने के लिए हमें प्रेरणाप्रद साहित्य का अध्ययन-आहार, स्नान की भाँति ही अनिवार्य आवश्यकता मानना चाहिए। परिवार के लोगों को प्रतिदिन एक घण्टा कथा, कहानी जीवन चरित्र, समाचार एवं घटनाक्रम सुना कर उसके मनोरंजन के अतिरिक्त विचार-निर्माण भी करना चाहिए। मित्र, परिचितों और सम्बन्धियों में से एक भी ऐसा न बचे, जिसे युग-निर्माण साहित्य पढ़ने-सुनने के लिए सहमत न कर लिया हो। जन-जागरण की दृष्टि से यह प्रयास नितान्त आवश्यक है। इन्हें हम दैनिक जीवन में अनिवार्य धर्म-कर्तव्य की तरह सम्मिलित कर लें, तो राष्ट्र की वास्तविक बल-वृद्धि होगी और हम भावनात्मक स्तर पर इतने समर्थ हो जायेंगे कि कोई शत्रु कभी भी आँख उठा कर हमारी ओर न देख सके।
छोटे दुर्बल बालक को उँगली पकड़ कर खड़ा करना और गोदी में लेकर चलाना परिवार के समर्थ लोगों का कर्तव्य होता है। पिछड़ापन तभी दूर होता है जब उस क्षेत्र के समर्थ लोग अपने से दुर्बलों की सहायता करने को उदारता दिखावें। अपना देश अनेक दृष्टियों से पिछड़ा हुआ है, इसी से उसे अंतर्कलह और बाह्य आक्रमण का बार-बार शिकार बनना पड़ता है। यदि ऐसी बात न होती तो रूस, अमेरिका की तरह भारत भी अपनी अगणित विशेषताओं के कारण संसार के अग्रणी राष्ट्रों में गिना जाता। इस पिछड़ेपन को मिटाने के लिए हम में से प्रत्येक प्रबुद्ध, समृद्ध एवं संस्कृत व्यक्ति को बहुत कुछ करना चाहिए। घर के बड़े लोग अपनी सुविधाओं में कमी करके छोटे बालकों, बीमारों एवं वयोवृद्धों की सुविधा जुटाते हैं, वैसी ही उदारता हमें भी दिखानी चाहिए। इस मार्ग पर चलने से ही राष्ट्रीय सशक्तता उत्पन्न की जा सकेगी।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों ने प्रतिदिन नव-निर्माण के लिए एक घण्टा समय लगाते रहने का व्रत लिया है। इस समय को संगठनात्मक एवं रचनात्मक कार्यों से लगाते रहने के लिए पूरे-पूरे उत्साह के साथ कार्य आरम्भ कर देना चाहिए। संगठन इस युग की सबसे बड़ी शक्ति है। इस अस्त्र को हाथ में लिए बिना न व्यक्तिगत उत्कर्ष हो सकता है, न सामाजिक प्रगति हो सकती है, न धर्म एवं संस्कृति का पुनरुत्थान हो सकता है और न सुरक्षा प्रयत्न सफल हो सकते हैं। राष्ट्र की सर्वतोमुखी समर्थता के लिए सज्जनों का सदुद्देश्य के लिए प्रयत्न अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य जहाँ कहीं भी जितने भी हैं वे एक संगठन बना लें। जहाँ युग-निर्माण शाखायें अभी नहीं हैं वहाँ तुरन्त बन जानी चाहिये। इन संगठनों द्वारा उस क्षेत्र में षोडश संस्कार मनाने के लिये हर घर में प्रेरणा देना चाहिये, जहाँ संभव हो सके आयोजन करने चाहिये। परिवारों को नैतिक एवं सामाजिक दृष्टि से प्रशिक्षित करने का यह बड़ा ही प्रभावशाली तरीका है। उसी प्रकार पर्व-त्यौहारों को सामूहिक रूप से मनाया जाय जिससे इन महान अवसरों में सामाजिक उत्कर्ष के जो महान सूत्र संदेश छिपे पड़े हैं उन्हें फिर भारतीय जनता अपना सके और सच्चे अर्थों में सबल एवं समृद्ध बन सके। पर्व और संस्कारों के विधि विधान की छोटी-बड़ी पुस्तकें छप चुकी हैं और उनका साँगोपाँग प्रशिक्षण गायत्री तपोभूमि में हो भी रहा है। हर शाखा से एक-एक प्रतिनिधि इसमें शिक्षण प्राप्त करने के लिये भेजा जाना चाहिये।
पुस्तकालय, प्रौढ़ पाठशालाओं और व्यायामशालाओं की स्थापना हर जगह होनी चाहिये। कोई जगह ऐसी न रहे जहाँ यह रचनात्मक प्रवृत्तियां चल न रही हों।
समाज सुधार के लिये विवाहोन्माद विरोधी आन्दोलन चलाया जाना चाहिये। आदर्श विवाहों की परम्परा आरम्भ करनी चाहिये। इसके लिये टोलियाँ बनाकर प्रबुद्ध कार्यकर्ताओं को घर-घर, गाँव-गाँव और स्कूल-स्कूल में घूमना चाहिये। विवाहों में नेग-जोग, अपव्यय की हानियाँ समझानी चाहिये और जो सहमत हो जाय उनसे विवाहोन्माद की घृणित प्रथा का बहिष्कार करने की प्रतिज्ञायें करानी चाहिये।
माँसाहार, नशेबाजी, जुआ, जाति और लिंगगत असमानता, पर्दा, बाल विवाह, अनमेल विवाह, गन्दगी, आलस, अन्ध विश्वास, बेईमानी, फैशनपरस्ती, उद्दंडता, अशिष्टता, अश्लीलता आदि दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन के लिये भी युद्ध स्तर पर योजना बनानी चाहिये। यह दुष्ट प्रवृत्तियां भी देशद्रोही, पंचभागी, शत्रु के छत्री-सैनिकों से कम भयंकर नहीं है। इनका उन्मूलन करने के लिये हमें कम से कम एक घंटा और अधिक से अधिक जितना संभव हो अपना समय नियमित रूप से निष्ठापूर्वक देते रहना चाहिये।
जिन आदर्शों को हम उपयुक्त मानते हैं, अब उन्हें कार्यान्वित करने का समय आ गया । हमें कर्मवीर बनना होगा। (1) विजय व्रत (2) शक्ति पुरश्चरण (3) जन जागरण (4) समय दान, यह चारों ही कार्य परिजनों के लिये उनकी निष्ठा की कसौटी के रूप में सामने प्रस्तुत हैं। इनसे विमुख नहीं होना चाहिये।
रचनात्मक मोर्चे को सफल बनाने के लिये ऐसे धर्म सैनिकों की भारी आवश्यकता है जो राष्ट्र को सबल तथा प्रबुद्ध बनाने का लक्ष्य पूर्ण कर सके। युग की इस महान आवश्यकता की पूर्ति के लिये अखण्ड-ज्योति परिवार के धर्मवीर सदस्यों को आगे बढ़ना चाहिये और धर्मोपदेशक के रूप में रचनात्मक कार्यों को गतिशील बनाने में संलग्न हो जाना चाहिये। ऐसे धर्मवीरों का महत्व युद्धक्षेत्र में आत्मोत्सर्ग करने वाले योद्धाओं से कम नहीं समझा जा सकता।
इस कार्य के लिये प्रवचन कला की आवश्यकता होती है। इसके प्रशिक्षण की गायत्री तपोभूमि में व्यवस्था की गई है। रामायण के माध्यम से भाषण करना, सब श्रेणियों के लोगों, देहाती और शहरी जनता के लिये समान रूप से उपयुक्त रहता है। गायत्री तपोभूमि में रामायण के कथा प्रसंगों के आधार पर ही जन जागरण के उपयुक्त प्रवचन शैली की शिक्षा दी जाती है। साथ ही भजनोपदेश करने के लिये हारमोनियम आदि बाजे बजा सकने तथा प्रेरणाप्रद भजन, संगीत गा सकने का भी प्रबन्ध है। जिनमें इस प्रकार की रुचि तथा योग्यता हो वे कुछ ही महीनों में भाषण और भजनोपदेश का इतना अभ्यास कर सकते हैं कि जिसके द्वारा राष्ट्र के नव निर्माण के कार्य में प्रशंसनीय योग दे सकें।
इस प्रशिक्षण के साथ ही गीता सप्ताह, प्रवचन, संस्कार एवं पर्व मनाने का कर्मकाण्ड, गायत्री-यज्ञ का विधि विधान आदि की विधियाँ भी सिखा दी जाती हैं। उपरोक्त शिक्षण द्वारा कोई भी भावनाशील व्यक्ति अपना जीवन सार्थक करते हुये सुविधा-पूर्वक अपने निर्वाह की व्यवस्था को भी हल कर सकता है। इस प्रशिक्षण के लिये योग्य व्यक्ति पत्र व्यवहार द्वारा आवश्यक बातें मालूम कर लें।
मानव जीवन को आनन्द मय, एवं सुविकसित बनाने के लिए अनुभव पूर्ण प्रशिक्षण इन पुस्तकों में दिया गया है। प्रस्तुत ज्ञान को अपनाकर पाठक अपने भविष्य को उत्कृष्ट बनाने की दिशा में आशा जनक प्रगति कर सकते हैं।
स्वास्थ्य, सौंदर्य, दीर्घजीवन और आनन्द की पथ-प्रदर्शक पुस्तकें
स्वस्थ बनने की विद्या मूल्य पैसे 38
बिना औषधि के कायाकल्प 38
दीर्घ जीवन के रहस्य 38
उन्नति का मूलमन्त्र ब्रह्मचर्य 38
आसन और प्राणायाम 38
क्या खायें? क्यों खायें?38
दूध की आश्चर्यजनक शक्ति 38
यौवन चिरस्थायी कैसे हो? 38
पंचतत्वों से संपूर्ण रोकों का निवारण 38
कब्ज की सरल चिकित्सा 38
स्त्री रोगों को चिकित्सा 38
बाल रोगों की चिकित्सा 38
नेत्र रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा 38
घरेलू चिकित्सा विज्ञान 38
सूर्य चिकित्सा विज्ञान 38
प्राण चिकित्सा विज्ञान 38
स्वप्नदोष की चिकित्सा 38
भोग में योग 38
पुत्र या पुत्री उत्पन्न करने की विधि 38
मनचाही सन्तान 38
श्री, समृद्धि, सफलता और सिद्धिदायक अलभ्य साहित्य
परकाया प्रवेश 38
मैस्मरेजम की अनुभवपूर्ण शिक्षा 38
वशीकरण की सच्ची सिद्धि 38
जीव जन्तुओं की भाषा 38
ईश्वर कौन है? कहाँ हैं? कैसा हैं?38
क्या धर्म ? क्या अधर्म ?38
गृहस्थ योग 38
हस्तरेखा विज्ञान 38
आकृति देखकर मनुष्य की पहचान 38
अमृत पारस और कल्पवृक्ष की प्राप्ति 38
धनवान बनने के गुप्त रहस्य 38
मित्रभाव बढ़ाने की कला 38
चिन्ताओं से छुटकारे का मार्ग 38
दांपत्ति जीवन का स्वर्ग 38
हम वक्ता कैसे बनें? 38
लेखक बनने की कला 38
शिखा और सूत्र की विवेचना 38
वेदों की स्वर्णिम सूक्तियाँ 38
सफलता के तीन साधन 38
मनुष्य शरीर को बिजली के चमत्कार 38
दस रुपये से अधिक मूल्य को पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ। इससे कम लेने पर डाक खर्च मँगाने वाले को देना होगा जो पुस्तकों के मूल्य से लगभग एक चौथाई और बढ़ जाता है।
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
उस दिन सूरज बोला-लो अब मैं जाता हूँ, चलते चलते थक गया तनिक सुस्ताता हूँ।
लो चाँद सम्हालो राज पाट इस धरती का, अब तुम पर है दायित्व तिमिर-मय जगती का॥
सुन कर सूरज की बात हुआ कृश गात चाँद, सहमा सहमा बोला-सूरज से बात चाँद।
हो गये चतुर्दश दिवस क्षीण हो रही कला, लो आ पहुँचा अबसान निगलने तिमिर चला॥
मैं चरण मृत्यु की ओर अमा में धरता हूँ, फिर लूँगा नूतन जन्म अभी तो मरता हूँ।
रवि राशि का सुन संबाद, मृतिका करण बोले, धरती से शीश निकाल प्राणपण से बोले॥
तुम दोनों ही विश्राम करो, हम जागेंगे, हम नहीं ज्योति कण आज किसी से मांगेंगे।
हमने प्रण ठाना है तम तोम निगलने का, हम लेते हैं दायित्व अमा में जलने का॥
हम धरती का अपमान नहीं होने देंगे, अब अपनों पर अहसान नहीं होने देंगे।
हम माटी के कण हैं पर सब कुछ वारेंगे, तुम डर जाओ हम नहीं तिमिर से हारेंगे॥
वक्षस्थल चीरेंगे हम रजनी काली का, जग पर्व मनायेगा युग युग दीवाली का।
हम नई ज्योति भर भू-अम्बर में जागेंगे, तब अमा क्षमा मानेगी नर वर मांगेंगे॥
उस दिन दीपों की छवि यह धरा निहारेगी, जब ऊषा रानी खुद आरती उतारेगी।
यह कहकर शत-शत दीपों का अभिमान जगा, वे तिमिर-अणों को लगे चीर ने ध्यान लगा॥
तमने ताना काला बितान भूमण्डल पर, जग उठे मृत्तिका दीप ज्योति के शर लेकर।
उनकी लघुता पर, साहस पर हंस उठा तिमिर, मुझसे लड़ने आये दीपक किस क्षमता पर॥
जब छुपे सूर्य और चाँद आज मुझसे डरकर, तो इनकी क्या सामर्थ्य हिला पायें तिलभर।
पर दीप मौन व्रत धार लगे तिल-तिल जलने, तम की छाती फट उठी लगा पल-पल घुलने॥
हो गया पराजित तिमिर भोर तक जले दीप, तम झंझाओं के बीच अकम्पित जले दीप।
तब से दीपों का विजय पर्व ये आता है, तम से लड़ने वाला ही पूजा जाता है॥
--श्री लाखन सिंह जी भदौरिया ‘शैलेन्द्र’
*समाप्त*