परमात्मा का स्वरूप विराट् विश्व

जगत परमात्मा का व्यक्त रूप है। इसमें परमात्मा का एक महान उद्देश्य निहित है। वह जगत के उदाहरण से अर्थात् अपने दृश्यमान स्वरूप से मनुष्य को सृजन की शिक्षा देना चाहता है। जगत की उत्पत्ति तथा लय को परमात्मा का स्पन्दन भाव ही समझना चाहिए।

जगत परमात्मा का व्यक्त रूप है तो इसके प्रत्येक प्राणी में आत्मिक भाव होना स्वाभाविक है। ऐसी दशा में बाह्य व्यवहार में समता होना ही चाहिए। जो व्यक्ति जगत के प्राणियों में समता का व्यवहार नहीं करता, वह परमात्मा से ठीक उसी प्रकार विद्रोह करता है, जिस प्रकार कोई अपने भाई से द्रोह कर, अप्रत्यक्षतः पिता ही से द्रोह करता है।

इस प्रकार के विद्रोही भाव का कारण है- अपने मूल स्वरूप का ज्ञान न होना। यदि हम यह समझ लें के हम परमात्मा रूपी सागर में बिखरी बूँदें, उठी लहरें और तैरते बुलबुले हैं तो परस्पर विषम भाव अथवा व्यवहार का कोई कारण ही न रह जाये।

-रवीन्द्रनाथ टैगोर


सच्ची उपासना का स्वरूप

उपासना में आनन्द कब नहीं आता? जब कोई मनुष्य उसे सामान्य जीवन क्रम से भिन्न एक विशेष कर्तव्य समझ-कर करता है। ऐसा भाव रहने से कुछ समय बाद उपासना उसे एक अनावश्यक बेगार-सी अनुभव होने लगती है, जिससे वह आनन्द अनुभव करने के स्थान पर थकान अनुभव करने लगता है और कुछ ही समय में उसे छोड़-छाड़ कर बैठ रहता है।

मनुष्य का सहज स्वभाव है कि जो कार्य उसके जीवन-क्रम में रमे नहीं होते अथवा जिनका वह अभ्यस्त नहीं होता, उनके करने में वह खिन्नता ही अनुभव करता है। यहाँ तक कि रोजमर्रा के बँधे टके कामों में भी यदि कोई काम आकस्मिक आवश्यकता वश बढ़ जाता है तो वह उसे करता भले ही है, किन्तु एक बेगार, एक बोझ की तरह।

यही नियम उपासना के विषय में भी लागू रहता है। अतएव उपासना जीवन-क्रम से भिन्न किसी विशेष कर्तव्य की भाँति नहीं, जीवन-क्रम से भिन्न किसी विशेष कर्तव्य की भाँति नहीं, जीवन-क्रम के एक अभिन्न अंश की भाँति करना चाहिये। उपासना जब जीवन का एक आवश्यक अंग बन जाती है तब उसकी पूर्ति करने में वैसी ही तृप्ति होती है, जैसी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति में। जीवन का अंग बना उपासना को जब तक पूरा नहीं कर लिया जाता, तब तक हृदय में उसी प्रकार की छटपटाहट रहती है, जैसे किसी प्रियतम से मिलने की इच्छा में। उपासना मनुष्य जीवन का एक अभिन्न अंग है। उसे इसी रूप में ग्रहण करना चाहिए। उपासना को किसी विशेष कर्तव्य के रूप में ग्रहण करने से भिन्नता का भाव रहता है। पूरे समय यह विचार घेरे रहता है कि मैं कोई विशेष काम अंजाम दे रहा हूँ, जिसके कारण उसमें एकाग्रता प्राप्त नहीं हो पाती, जिसके अभाव में उसमें अपेक्षित आनन्द की उपलब्धि नहीं होती! स्वाभाविक है कि जिस कार्य में अरुचि पूर्ण निरानन्दता रहती है वह देर तक नहीं चल पाता, और यदि खींच-तान कर चलाया भी गया तो उसमें किसी बड़े फल की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

उपासना में तब भी कोई आनन्द नहीं आता जब वह किसी लाभ अथवा लोभ के लिये की जाती है। किसी स्वार्थ के वशीभूत होकर जब उपासना की जाती है तब उपासक का ध्यान इष्ट के प्रति लगा रहने के स्थान पर अभीष्ट के प्रति लगा रहता है। जिससे भावनाओं का वेग इष्ट की ओर उन्मुख रहने के बजाय लोभ की ओर गतिवान रहता है। इससे इष्ट की समीपता प्राप्त होने के बजाय लोभ को बल मिलता है, जिससे वह उत्तरोत्तर दुर्निवार होता जाता है और कल्याणवती उपासना प्रतिकूल दिशा में फलीभूत होने लगती है। मनुष्य लोभ, लाभ, स्वार्थ एवं कामनाओं का भंडार बन कर स्वयं अपने लिये भयंकर बन जाता है।

इस प्रकार के संभ्रमित उपासक अपनी सकामता के कारण जब दुखद दुरितों से शिकार बन जाते हैं, तब उपासना अथवा इष्ट को दोष देकर यह धारणा बना लेते हैं कि अधिक पूजा, पाठ करने वाला दुःख, दरिद्रता और दीनता का भागी बनता जाता है। इस प्रकार की धारणा भयंकर भूल है।

जो उपासक दीन, दुखी, दरिद्री अथवा दयनीय दिखाई दे, उसके विषय में निःसंकोच समझ लेना चाहिये कि इसकी उपासना में लोभ क्रियाशील है। इसकी वंचक उपासना ने ही इसको इस दशा में भेजा है। अन्यथा उपासना का फल है-तेजस्विता, ओजस्विता, सबलता, सम्पन्नता आदि दिव्य गुण।

इसके अतिरिक्त सकाम उपासक की उपासना निःसार होकर बहुत समय तक नहीं चल पाती। वह दिन प्रति दिन साधना को कामनाओं की कसौटी पर कसता रहता है और जब उसकी कामनायें फलीभूत होती नहीं दीखतीं तो वह धीरे-धीरे उपासना से ऊबने लगता है और शीघ्र ही निरर्थक कार्य समझ कर उससे विरत हो जाता है। कामनाओं के कारण उपासना से विरत हुआ उपासक मृत्यु से भयभीत और जीवन से निराश कायर की तरह त्रासपूर्ण जिन्दगी बिताता है।

उस उपासना की भी निरन्तरता निरापद नहीं है, जो एक विस्तृत कर्मकाण्ड और आडम्बर पर आधारित होती है। एक तो इस प्रकार की उपासना के लिये एक लम्बे समय की आवश्यकता है, जिसका मनुष्य के व्यस्त जीवन में प्रायः अभाव ही रहता है। दूसरे, बहुत प्रकार के उपकारण एवं उपादान एकत्र करने में काफी धन की आवश्यकता है। आज के महार्घ जीवन में जीवन की सीमान्त आवश्यकतायें ही जुटाना कठिन हो रहा है, तब महंगी उपासना को मनुष्य कब तक चला सकता है? ऐसी उपासना सम्पन्न करने के लिए एक सामान्य स्थिति के व्यक्ति को अपने पारिवारिक व्यय में कुछ कोताही करनी पड़ेगी, जिससे उसको तथा उसके परिवार को प्रत्यक्ष में न सही, परोक्ष में तो कुछ न कुछ तकलीफ होगी ही। उपासना के लिये खर्च जुटाने में उसे अपना ध्यान घर के बजट में कतरव्योंत करने में लगाना पड़ेगा। इस प्रकार उक्त महंगी उपासना एक आर्थिक योजना बनकर रह जायेगी, जिससे आत्मिक शान्ति के स्थान पर मानसिक उद्विग्नता बढ़ सकती है और ऐसी स्थिति में उपासना का दीर्घकाल तक चल सकना संदिग्ध होगा।

उपासना के लिये अधिक आडम्बर भी ठीक नहीं। असामान्य रूप में रहने वाला उपासक समाज में अन्यथा दृष्टिकोण से देखा जाता है। कोई उसे कुतूहल की दृष्टि से, कोई आदर की दृष्टि से, तो कोई उपहास की दृष्टि से देखता है। इससे उपासक की मानसिक स्थिति जब तक अपेक्षित कोटि में न पहुँचे जाये, उस पर उसके मानसिक भावों पर वाँछित प्रभाव नहीं पड़ता। समाज में साँकेतिक स्थल बन कर कभी वह हर्ष और कभी अमर्ष के वशीभूत होकर आँदोलित होता रहता है, जो कि उसकी साधना के लिये हितकर नहीं होता।

इसके अतिरिक्त आडम्बरित साधक स्वयं भी समाज में अपने को एक विशिष्ट व्यक्ति अनुभव करता है, अपने को जन-साधारण से कुछ ऊँचा, कुछ अधिक पवित्र समझता है। कभी-कभी आडम्बर की अपेक्षा उसे अपने इस भाव की अभिव्यक्ति भी करनी होती है। अपने को विशिष्ट अथवा कुछ ऊँचा अनुभव करने के कारण उसमें अहंकार की वृद्धि हो जाती है, जो उपासना के अमृत में विष का काम करता है।

अन्दर से असामान्य होने पर भी बाहर से सहज सामान्य रहना ही उपासक के लिये अधिक हितकर है। अपने स्वभाव एवं संस्कारों के कारण जन-साधारण आडम्बर की ओर अधिक ध्यान देने लगता है।

समय एवं साधना का असंयम भी ऐसा कारण है, जो उपासक में वाँछित गम्भीरता नहीं आने देता, मन और मस्तिष्क पर वे अपेक्षित संस्कार नहीं पड़ने देता, जिनके बल पर उपासना में निरन्तरता आती है और उपासक अध्यात्म लाभ की ओर अग्रसर होता है। कभी किसी समय उपासना करना उसी प्रकार की धार्मिक अथवा अध्यात्मिक अनियमितता है, जिस प्रकार आहार-बिहार की। इस प्रकार की अनियमित उपासना व्यक्ति को विशुद्ध आध्यात्मिक न बना कर आध्यात्मिक रोगी बना देती है, जिससे किसी सुख शान्ति की आशा करना असामान्य कल्पना मात्र ही होगी।

उपासना में इष्ट की अदला-बदली का अर्थ है कि आप उसकी गरिमा को कोई महत्व न देते हुये दैवी शक्तियों के साथ खिलौनों की तरह खेलते हैं। उनका महत्व आपकी रुचि पर निर्भर है। साथ ही इष्ट की अदला-बदली से यह भाव भी प्रकट होता है कि आप किसी एक दैवी विभूति को किसी दूसरी से कम या ज्यादा समझते हैं। उपासना के क्षेत्र में विषमता का यह भाव सबसे अधिक घातक है। इस प्रकार की चेष्टा से मानसिक चाँचल्य की वृद्धि होती है, जिसके कारण न उपासना में मन स्थिर हो पाता है और न उसका कोई फल होता है।

निष्काम भाव से किसी भी एक इष्ट में सर्वेश्वर की सत्ता का विश्वास रख कर एक विधि, एक मन से जीवन का अभिन्न अंग समझकर संयम एवं सामान्यता पूर्वक नियमित उपासना करना ही वास्तव में उपासना है, जो जीवन-भर चलती भी और फलवती भी होती है।


आत्मविकास के लिए लोक सेवा आवश्यक

आत्म विस्तार ही अध्यात्म का मुख्य उद्देश्य है। अध्यात्म साधन के अंतर्गत जो भी जप-तप साधना और संयम किए जाते हैं, वे सब आत्म विस्तार के लिए ही किये जाते हैं। साधारणतः लोग इस जप तप तथा संयम नियम को ही अध्यात्म का सच्चा स्वरूप समझ लेते हैं। जप-तप पूजा पाठ करने पर वे अपने को अध्यात्मिक व्यक्ति समझ लेते हैं। जब कि ये सारी क्रियायें आध्यात्मिक प्रगति करने के लिये एक आँशिक प्रयत्न मात्र हैं।

आवश्यक क्रियाओं द्वारा जब मनुष्य मनो-निग्रह कर के वाँछित गुणों की उपलब्धि कर लेता है, तब वास्तव में यह आध्यात्मिक होता है। आध्यात्मिकता क्रिया नहीं परिणाम है। बुरी से बुरी बात सुन कर क्रोध न आना, बड़े से बड़े प्रलोभन से लोभ न होना, आपत्तियों से घिर जाने पर भयभीत न होना, असफल होने पर निराश न होना और वियोग में अधीर न होना आदि स्थितियाँ ही आध्यात्मिकता है। जब पुण्य का स्वभाव स्थिर और मन प्रतिक्रिया रहित हो जाता है, तब वह आध्यात्मिक माना जाता है।

हृदय में कसक रख कर किसी के कटु वचन सह लेना, आन्तरिक दुःख को रोक कर कोई त्याग करना, चाहते हुये भी किसी प्रलोभन की उपेक्षा कर देना अथवा हठ पूर्वक आकर्षण से बचे रहना आध्यात्मिक नहीं है। यह आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त करने का अभ्यास मात्र है।

प्रशंसा अथवा निन्दा से कोई प्रतिक्रिया न होना, सुन्दरता असुन्दरता के प्रति आकर्षण विकर्षण न होना, लाभ हानि से विचलित न होना, आदि का जो स्वभाव है, वह ही आध्यात्मिकता के लक्षण हैं। स्वादहीन भोजन करना अस्वाद वृत्ति नहीं है, बल्कि दोनों प्रकार के भोजन में समान रुचि ही अस्वादता है, जो कि आध्यात्मिकता का एक लक्षण है। जिसका मन शाँत है, बुद्धि स्थिर है, चित्त प्रतिक्रिया रहित और दृष्टिकोण अविषम है, वास्तव में आध्यात्मिक वही है। बाकी अन्य या तो धार्मिक है अथवा साधक।

आध्यात्मिकता मानव आत्मा की एक उन्नत, उत्कृष्ट एवं उत्तम स्थिति है। इस स्थिति को प्राप्त व्यक्ति निर्द्वन्द्व, निर्विघ्न, निर्भय एवं निर्मोह हो कर एक स्वर्गीय जीवन यापन करता है। उसे न कभी रोष होता है और न क्षोभ। निरन्तर निर्विकार एवं निर्विरोध आनन्द का अनुभव करता हुआ वह चिर प्रसन्न रहता है।

एक स्थायी एवं निरपेक्ष सुख−शांति पूर्ण आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त करना ही मानव जीवन का धर्म है, ध्येय है। इस प्रकार का निरपेक्ष भाव एवं प्रतिक्रिया शून्य मनः स्थिति आत्मविस्तार से ही प्राप्त होती है।

आत्मविस्तार इच्छाओं एवं आवश्यकताओं को बढ़ा देने वाली प्रक्रिया नहीं है और न आत्मा कोई ऐसा पदार्थ, वस्तु है, जिसको यों ही किसी क्रिया अथवा कौशल से बढ़ाया जा सकता है। आत्मविस्तार की ओर पहला कदम है -आत्म विकास। जिसका अर्थ है, अपने को शरीर न समझ कर आत्मा समझना।

जब मनुष्य अपने को आत्म रूप समझने लगता है, तब उसका दृष्टिकोण विस्तृत होता है, जिससे अहंभाव, परभाव मिटने लगता है और आत्मीय भाव बढ़ने लगता है। आत्मीयता के विकास से मनुष्य को संसार में दुख-सुख ही अपना नहीं अपना स्वरूप दीखने लगता है। कवि, दार्शनिक एवं चिन्तक आदि कभी-कभी इस आत्मीयता की स्थिति में पहुँच तो जाते हैं, किन्तु इससे वे पूर्ण आध्यात्मिक नहीं हो जाते। यह आत्मीयता, उनकी तन्मयता, तल्लीनता तथा विभोरता का क्षणिक फल होता है। जिस समय वे अपनी विचारधारा पर आसीन हो कर अनन्त की ओर अभियान करते हैं, उस समय अपने को भूल कर समस्त सृष्टि के साथ एक रूप हो जाते हैं। किन्तु ज्यों ही उनकी विचार धारा का वेग कम होता हैं, कल्पना का ज्वार उतरता है, वे पुनः एक साधारण प्राणी मात्र बन जाते हैं, दुख सुख एवं हर्ष विमर्ष की प्रतिक्रियायें उन्हें प्रभावित करने लगती हैं। इतना होने पर भी अपनी इस क्षणिक आत्मीयता के कारण ही कवि, दार्शनिक एवं चिन्तक जन साधारण से कुछ ऊपर उठे हुये व्यक्ति माने जाते हैं और निःसन्देह उनकी मनःस्थिति कुछ अधिक सुखपूर्ण होती भी है। जिस क्षणिक आत्मीयता का इतना महत्व और आनन्द है, यदि वह स्थाई रूप और सच्चे स्वरूप में प्राप्त हो जाये तो मनुष्य क्या से क्या हो सकता है?

आत्म विकास के लिये ईर्ष्या, द्वेष, लोभ, मोह अहंकार व मत्सर आदि का त्याग पहली आवश्यकता है। इन विकारों को एक स्थान पर बैठ कर जप, तप, पूजा, पाठ आदि कर के दूर नहीं किया जा सकता। इस प्रकार एक स्थान पर इन विकारों को जीतने का प्रयत्न करने से इन से एक भयानक मानसिक द्वन्द्व प्रारम्भ हो जाता है और मनुष्य की बहुत सी शक्तियाँ, क्षमताएं तथा समय इसी संघर्ष से निपटते-निपटते व्यय हो जाती हैं। कुछ समय में ही मनुष्य थक जाता है और साधना उसे बोझ मालूम होने लगती है।

इन विकारों को विजय करने का सबसे सरल तथा सही उपाय यही है कि मनुष्य समाज में अपने को मिला दे। जन सेवा का भाव लेकर क्षेत्र में उतर पड़े। समाज में घुस कर रहने से उसमें सक्रिय व्यवहार अपनाने से हानि लाभ, दुख सुख हर्ष शोक क्रोध आदि के हजारों कारण आयेंगे। लाखों प्रतिकूल परिस्थितियों से हो कर जाना पड़ेगा। प्रतिक्रियाओं की परिस्थितियों के अवसर पर अपने विकारों का संयम करने से एक स्वस्थ एवं सफल अभ्यास प्राप्त होगा। एकान्त में बैठ कर मानसिक द्वन्द्वों द्वारा विकारों के जीतने के प्रयास में मनुष्य मन ही मन हारता और जीतता रहता है, जिससे कोई विशेष लाभ नहीं होता, स्थिति वही रहती है। समाज के भीतर क्रोध के कारण आने पर यदि आपने उसको सहन कर लिया तो उससे आपकी आत्मा में जो शीतलता अनुभव होगी, वह आगे क्रोध को जीतने के लिये रुचि उत्पन्न करेगी और उत्साहित करेगी। किसी बात का व्यवहारिक अनुभव उसके बौद्धिक अनुभव से कई गुना सशक्त, स्थायी एवं उपयोगी होता है, विकारों की स्थिति में ही विकारों से युद्ध करने पर उनको क्रमशः शीघ्र ही परास्त किया जा सकता है।

जहाँ तक समाज में घुसने, उसमें उतरने का प्रश्न है, उसके लिये न तो यों ही दौड़ कर घुस जाना है और न निरर्थक घूमते-फिरते हुये विकारों से युद्ध का अवसर खोजते फिरना है। इसके लिये मनुष्यों के साथ सक्रिय सम्बन्ध रखना है। समाज के लिये उपयोगी बन कर तथा जन सेवा का भाव लेकर समाज में व्यवहार करना ही उपयुक्त होगा। समाज में जो भी व्यापार अथवा व्यवसाय किया जावे, वह विशुद्ध सेवा भाव से हो। सेवा भाव से किये हुये किसी भी काम में मनुष्य का अहं नहीं रहता, जिससे वह अनायास ही सफलता प्राप्त करने के साथ-साथ दूसरों की सद्भावना का भी अधिकारी बन जाता है।

मनुष्य को जिस समय दूसरों की सद्भावना प्राप्त होने लगती है, दूसरों की दृष्टि में उसका मूल्य एवं महत्व बढ़ जाता है, तब उसमें अपने आचरण के प्रति एक उत्तर दायित्व जाग उठता है, जिस से वह स्वयं ही सहनशील बन जाता है। उसका जीवन अपना न रह कर सारे समाज का हो जाता है, जिससे विकृत करने का उसे कोई अधिकार नहीं रहता। इस प्रकार आचरण, सहिष्णुता तथा संयम की सिद्धि होते ही मनुष्य की आत्मा का विकास प्रारम्भ हो जाता है।

मनुष्य ज्यों-ज्यों जन सेवा की ओर बढ़ता है त्यों-त्यों उसमें अधिकाधिक सद्भावनाएँ बढ़ती जाती हैं और वह उत्तरदायी हो कर संयमी होता जाता है। और ज्यों-ज्यों संयमी होता है, उसे आचरण की सिद्धि होती जाती है, और आचरण की सिद्धि का ही दूसरा नाम है विकास।

आत्मविकास प्रारम्भ होते ही उसका विस्तार होने लगता है और धीरे धीरे आत्म विस्तृत मनुष्य स्वयं से समाज, समाज से संसार और संसार से बढ़कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और ब्रह्माण्ड से बढ़ कर परमात्म-तत्व तक पहुँच जाता है। उसके सम्पूर्ण विकार ही नहीं समग्र भौतिक भाव तिरोहित हो जाता है, वह आध्यात्मिक हो जाता है और परमानन्द प्राप्त कर लेता है।


तटस्थ रहिए- दुःख मत हूजिये

“संसार-दुख-सागर है,”-ऐसी मान्यता रखने वाले प्रायः वे ही लोग हुआ करते हैं, जो अपनी दुर्बलताओं के कारण संसार में सुख दर्शन नहीं कर पाते। उनकी यह मान्यता ही बतलाती है कि वे कितने दुखी रहने वाले व्यक्ति होंगे। ऐसे व्यक्तियों के लिये संसार की प्रत्येक क्रिया-प्रतिक्रिया, प्रत्येक परिस्थिति तथा घटना दुःखदायी ही होती है-और होनी भी चाहिये। जिसका विश्वास बन चुका है कि संसार दुःख-सागर है, उसे इस दुनिया में सिवाय दुःख के और क्या हाथ आ सकता है? ऐसी निराशापूर्ण भावना बना लेने वाला जीवन भर रोने, झींकने, चिढ़ाने और कुढ़ाने के अतिरिक्त और कर ही क्या सकता है? दूसरे को हँसते, खेलते, खाते-पीते, बोलते, बात करते और प्रसन्न रहते देख कर ईर्ष्या करता और मन ही मन जलता रहता है। ऐसे व्यक्ति को औरों का हँसना, बोलना अपने पर व्यंग मालूम होता है, अपना उपहास-सा प्रतीत होता है। हँसना, बोलना ही नहीं दूसरों का रोना धोना भी उसे अच्छा नहीं लगता। किसी का हँसना प्रसन्न होना तो ईर्ष्या के कारण नहीं भाता और खुद के दुःख को उत्तेजित करने के कारण किसी के रोने-धोने में भी बुरा मानता है। निःसन्देह, ऐसे दुःख-प्रवण व्यक्तियों का जीवन एक भयंकर अभिशाप बन जाता है।

दुःखों के कारणों में दुर्भावनायें भी बहुत बड़े कारण हैं। दुर्भावनायें एक भयंकर रोग की तरह हैं। जिसको लग जाती हैं, जिसके हृदय में बस जाती हैं, उसे कहीं का नहीं रखती हैं। दुर्भावना वाले व्यक्ति का जीवन प्रतिक्षण दुःखी रहता है।

दुर्भावनाओं में अधिकतर दूसरों का अहित करने का ही भाव निहित रहता है। दुर्भावनाओं वाला व्यक्ति किसी का थोड़ा सा भी अभ्युदय नहीं देख सकता। किसी के अभ्युदय से अपनी कोई हानि न होने पर भी ऐसा व्यक्ति यही प्रयत्न करता है कि अमुक व्यक्ति की उन्नति न हो, विकास न हो, उसे कोई सफलता न मिले। किन्तु जो प्रयत्नशील है, परिश्रम कर रहा है, उसकी उन्नति तो होती है। ऐसी दशा में रोड़े अटकाने, कोसने अथवा चाहने पर भी जब किसी की उन्नति नहीं रोक पाता तो दुर्भावी व्यक्ति के लिये जलने, कुढ़ने तथा दुःखी होने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं रह जाता। इस प्रकार दुर्भावना रखने वाला व्यक्ति दुहरा दुःख पाता है- एक तो किसी का अहित चाहने पर भी उसकी असफलता तथा आत्म-प्रताड़ना दण्डित करती है। दूसरे, जिस का उसने अहित चाहा, उसकी उन्नति उसे दिन-रात चैन न लेने देगी।

दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति अपने निजी सुख के लिये कुछ ऐसे काम भी करने की कामना कर सकता है, जो शासन तथा रामाजडडडड की दृष्टि में अवाँछनीय हों। दुर्भावनायें प्रायः होती ही समाज विरोधिनी हैं। ऐसी दशा है, जब वह दण्ड के भय से उन्हें नहीं कर पाता तो मन ही मन दुःखी होता रहता है और उसके पाले हुये अविचारों के अतृप्त प्रेत उसे प्रति क्षण पीड़ा देते रहते हैं। अविचारी का अपना कोई मित्र नहीं होता। सारा मानव समाज ऐसे व्यक्ति से घृणा किया करता है और ऐसी दशा में किसी का दुःखी न होना किस प्रकार सम्भव हो सकता है?

इसके विपरीत जो व्यक्ति सद्भावना पूर्ण है, जिसके हृदय में दूसरों के लिये हितकर भाव है, जो सबको अपना समझता है, सबके हित में अपना हित मानता है, वह डाह, ईर्ष्या तथा द्वेष से सर्वथा मुक्त रहता है। जिसका हृदय स्वच्छ है, निर्मल है, उसके हृदय में मलीनताजन्य कीटाणु उत्पन्न ही न होंगे। निर्विकार हृदय व्यक्ति को न ईर्ष्या के सर्प डसते हैं और न डाह के बिच्छू डंक मारते हैं। यह सदा सुखी तथा प्रसन्न रहता है।

सबके प्रति सद्भावना रखने वाला बदले में सद्भावना ही पता है, जो उसे सब प्रकार से शीतल और शाँत रखती है। सब के हित में अपना हित देखने वाला प्रत्येक के अभ्युदय से प्रसन्न ही होता है। दूसरों की उन्नति में सहायता करता है और बदले में सहयोग पाकर सुखी व सन्तुष्ट होता है। दुर्भावना तथा सद्भावना रखने वाले दो व्यक्तियों की स्थिति में वही अन्तर रहता है, जो विष से मरणासन्न और अमृत से परितृप्त तथा प्रसन्न व्यक्ति में।

सुख की अत्यधिक चाह भी दुःख का एक कारण है। हर समय, हर क्षण तथा हर परिस्थिति में सुख के लिये लालायित रहना एक निकृष्ट हीन भावना है। इस क्षण-क्षण परिवर्तनशील तथा द्वन्द्वात्मक संसार में हर समय सुख कहाँ? जो सम्भव नहीं उसकी कामना करना असंगत ही नहीं अबुद्धिमत्ता भी है। दुःख उठा कर ही सुख पाया जा सकता है। साथ ही, दुःख के अत्यन्ताभाव में सुख का कोई मूल्य महत्व भी नहीं है। विश्राँति के बाद ही विश्राम का मूल्य है। भूख प्यास से विकल होने पर ही भोजन का स्वाद है।

जिस प्रकार आवश्यकता को आविष्कार की जननी कहा जाता है, इसी प्रकार दुःख को सुख का जनक मान लिया जाय तो अनुचित न होगा। जिसके सम्मुख दुःख आते है, वही सुख के लिये प्रयत्न करता है। जिसने गरीबी से टक्कर ली है, वही अर्थाभाव दूर करने के लिये अग्रसर होगा। दुःख, तकलीफ ही पुरुषार्थी व्यक्ति की क्रियाशीलता पर धार रखती है, उस पर पानी चढ़ाती है। अन्यथा मनुष्य निकम्मा तथा निर्जीव हो कर एक मृतक तुल्य ही बन कर रह जाये।

सुख में अत्यधिक प्रसन्न होना, हर्षित होना भी दुःख का एक विशेष कारण है। यह साधारण नियम है कि जो अनुकूल परिस्थितियों में खुशी से पागल हो उठेगा, उसी अनुपात से प्रतिकूल परिस्थितियों में दुःखी होगा। सुख प्रसन्नता का कारण होता है, किन्तु इसका अर्थ कदापि नहीं कि आप उसमें इतना प्रसन्न हो जायें कि आपकी अनुभूतियाँ सुख की ही गुलाम बन कर रह जाये। वे प्रसन्नता परक परिस्थितियों की ही अभ्यस्त हो जायें। ऐसा होने से आपकी सहन शक्ति समाप्त हो जायेगी और जरा-सी भी कारण उपस्थिति होते ही आप अत्यधिक दुःखी होने लगेंगे। अस्तु दुःख से बचने का एक उपाय यह भी है कि सुख की दशा में भी बहुत प्रसन्न न हुआ जाये। सन्तुलन पूर्ण तटस्थ अवस्था का अभ्यास इस दिशा में बहुत उपयोगी सिद्ध होगा। तटस्थ भाव सिद्ध करने के लिये दुःख से नहीं सुख से अभ्यास करना होगा। जब-जब मनोनुकूल परिस्थितियाँ प्राप्त हों, सुख का अवसर मिले, तब तब साधारण मनोभाव से उसका स्वागत कीजिये। हर्षातिरेकता में न आइये। इस प्रकार प्रसन्नतापूर्ण वातावरण में किया हुआ अभ्यास अधिक सफल होता है। प्रसन्नावस्था में जो कार्य किया अथवा सीखा जाता है, वह जल्दी सीखा जा सकता है।

हर्ष के समय जो अपना संतुलन बनाये रखता है, विषाद के अवसर पर भी वह सुरक्षित रहता है। दुःख-सुख में समान रूप से तटस्थ रहना इस लिये भी आवश्यक है कि अतिरेकता के समय किसी बात का ठीक निर्णय नहीं किया जा सकता। हर्ष के समय गलत बात भी ठीक लगने लगती है और विषाद के समय ठीक बात भी गलत लगती है। इस प्रकार बुद्धि भ्रम हो जाने से दुःख के कारणों की कोई कमी नहीं रहती। हर्ष के समय जब हमें किसी की कोई बात अथवा काम गलत होने पर भी ठीक लगेगी तो फिर भ्रम वश किसी समय भी वैसा कर सकते हैं और तब हमें क्षोभ होगा, जिससे दुखी होना स्वाभाविक ही है।

किसी मनुष्य की भावुकता जब अपनी सीमा पार कर जाती है तो वह भी दुःख का एक विशेष कारण बन जाती है। अत्यधिक भावुक तुनकमिज़ाज हो जाता है। एक बार वह सुख में भले ही प्रसन्न न हो, किन्तु मन के प्रतिकूल परिस्थितियों में वह अत्यधिक दुःखी हुआ करता है। अत्यधिक भावुक कल्पनाशील भी हुआ करता है। वे इसके एक छोटे से आघात को पहाड़ जैसा अनुभव करता है। एक क्षण दुख के लिये घंटों दुःखी रहता है। जिन बहुत सी घटनाओं को लोग महत्वहीन समझ कर दूसरे दिन ही भूल जाया करते है, भावुक व्यक्ति उनको अपने जीवन का एक अंग बना लेता है, स्वभाव का एक व्यसन बना लिया करता है।

भावुक व्यक्ति आवश्यकता से अधिक संवेदनशील होता है। यहाँ तक कि एक बार दुःखी व्यक्ति तो अपना दुःख भूल सकता है किन्तु, भावुक व्यक्ति उसके दुःख को अपना कर महीनों दुःखी होता रहता है। आवश्यक भावुकता तथा संवेदनशीलता ठीक है, किन्तु इसका सीमा से आगे बढ़ जाना दुःख का कारण बन जाता है।

महान कर्मयोगी-

भगवान बाल गंगाधर तिलक

लोकमान्य तिलक का निर्माण जिस पवित्र मिट्टी से हुआ था, वह मानवता के महान तत्वों से बनी थी। अध्ययन, अव्यवसाय, आत्म-विश्वास, अदम्यता और अभय उनके प्रमुख गुण थे। भगवान तिलक के सम्पूर्ण जीवन में एक दिन भी ऐसा न आया, जिसमें उन्होंने लोक सेवा का कार्य छोड़कर कोई अन्य कार्य किया हो अथवा अपने व्यक्तिगत लाभ के लिये, प्रयत्न के लिये, किसी प्रयत्न में लगे हों। वे लोक सेवा और जनहित के साकार रूप थे। उन्होंने आदि से लेकर अन्त तक विद्या, बुद्धि, बल, वैभव, ओज, तेज, तप और त्याग आदि की जो भी क्षमताएँ उनमें थीं, सबकी सब उन्होंने एक मात्र भारतीय स्वाधीनता तथा लोकोपयोगी कार्यों में ही लगा दीं। भारत-भक्ति और उसकी स्वाधीनता की अभिलाषा उनके जीवन की श्वास-प्रश्वास बन गई थी। वे देश के लिये ही उत्पन्न हुये, देश के लिये ही जिये और उसी के लिये मरे।

“स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है” का उद्घोष ऊँचा करने वाले लोकमान्य तिलक का सम्पूर्ण जीवन कष्ट तथा सहिष्णुता की एक अविच्छिन्न शृंखला है। उनका परिवार महाराष्ट्र के एक सम्पन्न परिवारों में से था। उसके पास न केवल धन ही था, अपितु अतुलनीय सम्मान भी था। तिलक परिवार के पास अपनी इतनी जमीन जायदाद थी कि उसका हर सदस्य उसके सहारे सुखपूर्वक जीवन-यापन कर सकता था। भगवान तिलक को भी वह सम्पन्न उत्तराधिकार में मिली थी। इसके साथ उनकी स्वयं की प्रतिभा भी इतनी प्रखर, उनका पाँडित्य इतना पूर्ण तथा प्रभाव इतना प्रसारित था कि यदि वे चाहते तो अनन्त धन राशि उपार्जित कर आनन्द और उल्लासपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते थे। उनके लिये यह कोई बड़ी बात न थी कि वे उस समय की अंग्रेज सरकार में ऊँचे से ऊँचा पद पा सकते थे।

किन्तु जो धर्मात्मा मनुष्य की आँखों से मानवता का दुःख देख लेते हैं, उनके जीवन-कोश से विश्राम एवं विलास के शब्द उठ जाते हैं और उनके स्थान पर अविश्राँति तथा बलिदान के शब्द लिख जाया करते हैं।

विश्व-साहित्य की महान कृति के रूप में गीता रहस्य लिखने वाले बाल गंगाधर तिलक ने स्वयं एक स्थान पर कहा है कि उनकी प्रमुख इच्छा जीवन में कवि बनने की थी। किन्तु देश की करुण पुकार ने उनके कवि बनने की इच्छा के अरुणोदय को कर्म तथा कर्मठता के कठोर मध्याह्न में बदल दिया। धर्म की छाया में पली हुई उनकी महान आत्मा ने यह स्वीकार न किया कि जहाँ कि एक ओर अत्याचार से पीड़ित जनता का चीत्कार उठ रहा है, वहाँ दूसरी ओर वे उसके प्रति कान मूँदकर कल्पना के मनोरम उपवन में बिहार करते रहें। जनता के चीत्कार और आत्मा की पुकार पर उन्होंने अपने कवित्व-कामी जीवन को कर्म के महाकाव्य में बदल दिया और देश-भक्ति पूर्ण लोक सेवा के क्रियात्मक गीत गाने प्रारम्भ कर दिये।

उन्होंने देश सेवा के क्षेत्र में जो सबसे पहला काम किया, वह था जन-जागरण के लिये ‘केसरी’ का प्रकाशन। ‘केसरी’ के माध्यम से उन्होंने अपनी ओजस्वी विचार धारा को जन-मानस में पहुँचाना प्रारम्भ किया, जिसने देश की सोती हुई जनता में एक ज्वलन्त जागरण ला दिया। ‘केसरी’ की तीखी टिप्पणियों तथा क्राँतिकारी लेखों से जहाँ एक ओर जन-जागरण हुआ, वहाँ दूसरी ओर अंग्रेज शासन को भय की अनुभूति हुई। और उसके अधिकारियों ने उसके प्रकाशन तथा मुद्रण पर प्रतिबन्ध लगा दिया। किन्तु क्या सरकार का यह अनुचित प्रतिबन्ध लोकमान्य तिलक के उस अमोघ अस्त्र की कुँठित कर सका? छपने-छपाने की कठिनाई हो जाने पर लगन के सच्चे धनी भगवान तिलक ने केसरी की हस्तलिखित प्रतियों को प्रसारित करना प्रारम्भ कर दिया। अपने जनोपयोगी पत्र ‘केसरी’ की जीवन रक्षा में लोकमान्य ने अपने जीवन को कठोर से कठोर कठिनाइयों में भी डालने में संकोच नहीं किया। उन्होंने अनेकों बार उसके लिये सहस्रों रुपयों का द्रव्य दिया और अनेक बार जेल की यातनायें सहीं। जनता के लिए सच्चा लोक सेवक अपने जीवन के हजार दिन भी बलिदान कर देने में लाभ ही देखता है।

भगवान तिलक, एकनिष्ठ कर्तृत्व के कितने बड़े उपासक थे, इसका प्रमाण उनके जीवन की अनेक ऐसी हृदयद्रावक घटनाओं में मिल सकता है, जिनके बीच कोई भी मनुष्य अपना धैर्य खोये बिना नहीं रह सकता। एक बार वे केसरी के लिये लेख लिख रहे थे, तभी डाकिये ने आकर उन्हें एक तार दिया, जिसे पढ़कर उन्होंने नौकर को भीतर दे आने के लिये दे दिया और फिर अपने लेख में लग गये। लेख पूरा होने पर उन्हें पता चला कि भीतर घर में रोना-धोना मचा हुआ है। पूछने पर पता चला कि जो तार उन्होंने भीतर भेजा था, उसमें उनके पुत्र की मृत्यु का समाचार था। धन्य है उस एकाग्रता एवं कार्यरतता को जिसके कारण धैर्य-धुरीण तिलक तार में पुत्र मृत्यु का समाचार पढ़ कर भी विचारों की तल्लीनता में इतने खोये रहे कि उन्हें याद ही न रहा कि अभी तार में उन्होंने क्या समाचार पढ़ा था। जन-हित के विचारों से परिपूर्ण उनके हृदय को मानों अपने कर्तव्य के अतिरिक्त संसार की किसी भी साधारण, असाधारण घटना से कोई सम्बन्ध ही न हो। इसी प्रकार प्लेग की भेंट चढ़े अपने एक पुत्र को चिता पर रख कर आने के तुरन्त बाद वे बिना किसी अतिरिक्त भाव के केसरी के लिये लिखने बैठ गये। शोक-संवेदन के लिये आये हुये उनके मित्रों को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने कहा कि क्या आपको पुत्र-मृत्यु का जरा भी शोक नहीं हुआ। धृति धर्म के धनी तिलक ने सहज भाव से उत्तर दिया- महामारी की जिस होलिका में हजारों माता-पिताओं के लाल ईंधन बनते जा रहे हैं, वहाँ मैं भी उसमें एक लकड़ी डालकर चला आया, इसमें शोक की क्या बात थी? मेरे जिस हृदय ने देश की दुर्दशा की पीड़ा अनुभव कर ली है, उसमें अब और किसी पीड़ा के लिये स्थान शेष नहीं है।

मित्रता क्या होती है, सहृदयता किसे कहते हैं और कृतज्ञता का क्या मूल्य है, यदि कोई इसको जानना चाहे तो वह तिलक के उस समय के त्यागपूर्ण साहस को देख ले, जो उन्होंने सरकार की कोपाग्नि से अपने एक सहयोगी को बचाने के लिये दिखाया था। केसरी में प्रकाशित एक लेख के कारण सरकार ने लेखक पर मुकदमा चलाया। यद्यपि वह लेख तिलक का लिखा हुआ न था, तथापि उसे उन्होंने अपना बताकर अभियोग अपने ऊपर ले लिया, जिसके फल-स्वरूप उन्हें छः वर्ष के कठोर कारागार का दण्ड दिया गया। देश के लिये उनकी उपयोगिता देखते हुये, जब उनके हितैषी मित्रों ने उनसे वैसा न करने के लिये अनुरोध किया, तब उन्होंने कहा- जिन्होंने मेरी विचारधारा में योग दिया, ‘केसरी’ में सहयोग किया, उन्हें आपत्ति में फँसा देना कहाँ की मनुष्यता है?

लोकमान्य तिलक जन्मजात धार्मिक थे। इसका कारण उनके घर का धार्मिक वातावरण ही था। इनके पिता गंगाधर तिलक पूर्ण धर्मात्मा, संस्कृत के अखण्ड विद्वान तथा वेद शास्त्रों के ज्ञाता थे। उन्होंने अपने पुत्र की शिक्षा दीक्षा अपने कुलीन ब्राह्मण वंश के अनुसार ही अपने तत्वावधान में कराई, जिसके फलस्वरूप लोकमान्य तिलक के हृदय में सनातन हिन्दू धर्म की जड़ें बहुत गहराई तक पहुँच गई थीं। धर्म की पवित्रता ने उनकी आत्मा को इतना

परिष्कृत और हृदय को इतना उदार बना दिया था कि सनातन धर्मानुयायी होते हुये भी अछूतों से लेकर मुसलमानों व ईसाइयों के प्रति भी उनके मन में कोई हीन भावना नहीं थी। यही कारण था कि अनेक ईसाई व मुसलमान भी उनके अनुयायी थे। वे अपने विपक्षियों की आलोचना करते हुये भी उनके प्रति द्वेष की भावना न रखते थे।

1880 में विश्व विद्यालय की उच्च शिक्षा पूर्ण करने पर जहाँ लोकमान्य के लिये अपनी व्यक्तिगत उन्नति के अनेक मार्ग खुल गये थे, वहाँ वे निस्वार्थ भाव से देश की सेवा करने के मन्तव्य से उस समय के महान विद्वान, निःस्वार्थ लोक-सेवक और अदम्य पत्रकार श्री विष्णु शास्त्री चिपलुणकर के पास पूना चले गये, और बताया कि वे भोग-विलास और ऐशो-आराम का जीवन बिताने के स्थान पर आजीवन निर्धन रहकर देश-समाज की सेवा करना चाहते हैं। श्री विष्णु शास्त्री ने उनकी भावनाओं का स्वागत किया और उन्हें त्याग तपस्यापूर्ण लोक-सेवा का मार्ग दिखलाया, जिस पर आजीवन चलकर उन्होंने अपने मानव-जीवन को धन्य बनाया।

लोकमान्य बालगंगाधर तिलक के राजनीतिक जीवन के कार्यों की यदि गणना न भी कि जाये, तब भी उन्होंने राष्ट्र एवं सामाजिक हित के लिये जो स्थापनाएं कीं, वे ही उनके व्यक्तित्व को महान ही नहीं महानतम बनाने के लिये पर्याप्त हैं।

पूना के हाईस्कूल, डेक्कन एजुकेशनल सोसाइटी, फर्ग्युसन कॉलेज और होमरुल लीग की स्थापना का श्रेय लोकमान्य बालगंगाधर तिलक को ही है। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र में पड़े अकाल और प्लेग के प्रकोप के समय उन्होंने आपत्ति पीड़ित जनता की जो सेवा की थी, उससे प्रभावित होकर उनकी प्राण-शत्रु ब्रिटिश सरकार ने भी उनकी सराहना की और अनेक सहायक संस्थाओं का भार उन्हें सौंपा।

उन्होंने उस समय भी सरकार की अनुचित अथवा स्वार्थी नीति की आलोचना करना न छोड़ा और स्वयं गाँव-गाँव जाकर प्लेग पीड़ितों की सेवा एवं सहायता की तथा डॉक्टर मित्रों के सहयोग से एक अस्पताल की स्थापना की।

महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश के ‘रत्नागिरि’ नामक नगर तथा 23 जुलाई 1856 के दिन को अपने जन्म से धन्य करने वाले, “स्वाधीनता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है,” का नारा देने वाले और भारत ही क्या संसार की ‘गीता रहस्य’ के रूप में गीता के कर्मयोग का रहस्य बतलाने वाले भगवान तिलक ने 1 अगस्त 1920 को संसार से विदा लेकर भारतीय जन-मानस का साम्राज्य प्राप्त किया।


Quotation

मैंने कहा है कि अभी भी हमारे पास कुछ ऐसी बाते हैं, जिनकी शिक्षा हम संसार को दे सकते हैं। यही कारण है कि सैकड़ों वर्ष तक अत्याचारों को सहने, लगभग हजार वर्ष तक विदेशी शासन में रहने और विदेशियों द्वारा पीड़ित होने पर भी यह देश आज तक जीवित रहा है। उसके अभी भी अस्तित्व में रहने का कारण यही है कि वह सदैव और अभी भी ईश्वर का आश्रय लिए हुए है, तथा धर्म एवं आध्यात्मिकता के अमूल्य भण्डार का अनुसरण करता आया है।

-विवेकानन्द

लघु कथा-


प्रयत्न करो

वासन्ती वायु का एक झोंका आया और मेरे तन मन को शीतल सुगन्ध से भर कर चला गया। मैं उसके पीछे यह कहता हुआ दौड़ा-”ऐ शीतल समीर मुझे अपने साथ ले लो, मुझे अपने जैसा बना लो।” तभी वायु का एक गर्म झकोरा आया और मेरे तन, मन को झुलसाता और यह कहता हुआ निकला गया-तुम मूर्ख हो। मैं युगों-युगों से इसके पीछे, इसकी शीलता और सुगन्ध को प्राप्त करने के लिये भाग रहा हूँ, किन्तु अब तक सफल न हो सका। न मैं शीतल हो सका और न सुगन्धित।

मैंने कोई उत्तर न दिया और चुपचाप फिर शीतल समीर की प्रतीक्षा करने लगा- वह आई। मैंने फिर याचना की- उसने बाँसों के एक झुरमुट में प्रवेश करके कहा-मनुष्य! याचना और अनुकरण से कुछ नहीं मिलता। मेरी तरह शीतलता और सुगन्ध तुम्हारे अन्दर भरी है। प्रयत्न करो- तुम भी शीतल और सुगन्धित हो जाओगे।


जो तू वही मैं

एक अनन्त काल पूर्व-ऊपर खगोल में एक आवाज उठी-”तू कौन है?” “सारा जीव-संसार चकित होकर ऊपर देखने लगा-खगोल फिर गूँजा-”तू कौन हैं “-अबकी बार सारे प्राणी खगोल की ओर देखकर कुछ सोचने लगे। खगोल न फिर प्रश्न किया-”तू कौन हैं?” संसार प्रश्न को अनसुना कर अपना काम करता रहा-किन्तु मनुष्य चिन्तित हो उठा-विचार करने लगा-”मैं कौन हूँ?” एक-दूसरे की ओर देखते और प्रश्न करते “मैं कौन हूँ?”

उस अज्ञात पूर्व काल का यह साधारण प्रश्न आज तक प्रश्न बना हुआ मनुष्य की विचार क्रिया को गतिमती बनाये हुये है? नियति के उस एक प्रश्न ने फलकर असंख्यों प्रश्नों का रूप धारण कर लिया है और एक उत्तर “मैं कौन हूँ” ने अनेकता से प्रभावित होकर अपना मौलिक रूप खो दिया।

कितना अच्छा होता-आकाश के “तू कौन है?” जैसे साधारण प्रश्न का साधारण उत्तर देकर मनुष्य निश्चिन्त हो जाता-”जो तू है वही में हूँ।”


हम शक्तिशाली बनें, निर्बल नहीं

जीवन का दूसरा नाम शक्ति ही है, बिना शक्ति के एक तो जीवन होना ही कठिन है, फिर यदि जीवन रहे भी तो निःशक्त जीवन मृत्यु से भी अधिक बुरा है।

अशक्त व्यक्ति संसार का कोई भी कार्य नहीं कर सकता और न वह जीवन की कोई विभूति प्राप्त कर सकता है। यहाँ तक कि अशक्त व्यक्ति भोजन, निद्रा आदि जैसी सामान्य सुख सुविधाओं का भी उपभोग नहीं कर सकता। अशक्त व्यक्ति, पराश्रित तथा पराधीन होकर दुःखपूर्ण जीवन ही बिताता है। अशक्तता को दुःखों का भंडार ही समझना चाहिये।

जो सुखी रहना चाहता है, प्रसन्न रहना चाहता है, सन्तुष्ट रहना चाहता है, उसे सशक्त बनना चाहिये। अशक्त व्यक्ति पर सुख की प्रतिक्रिया भी विपरीत ही होती है। जो अशक्त है, निर्जीव है, रोगी है, उसके सम्मुख यदि हर्ष का वातावरण उपस्थित होता है और दूसरे अन्य लोग हँसे व प्रसन्न होते हैं तो उसे दुःख ही होता है। इसलिये शिष्टाचार के अंतर्गत यह एक नैतिक नियम है कि निःशक्त रोगी आदि व्यक्तियों के सम्मुख हँसना न चाहिये। कितना भयंकर अभिशाप है कि अशक्त व्यक्ति स्वयं तो नहीं ही हँस-बोल सकता, दूसरों को भी प्रसन्न नहीं होने देता।

अशक्त व्यक्ति जहाँ स्वयं पर बोझ होता है, वहाँ दूसरों पर भी भार स्वरूप बन जाता है। दूसरों के काम तो आना दूर रहा, उल्टे दूसरों की सेवा पर ही स्वयं निर्भर रहता है। अशक्तता भीषण पाप है। मनुष्य को उससे बचने का हर सम्भव उपाय करना चाहिये। अशक्त व्यक्ति ही दूसरों की कृपा, दया और सहानुभूति का पात्र बनता है। अशक्त समाजों का ही पतन होता है और अशक्त राष्ट्र ही पराधीन बना करते हैं। अशक्त व्यक्ति ही अत्याचारों को आमंत्रित करता है और उनका शिकार बनकर दयनीय जीवन बिताता है।

शक्ति मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। जिसे जीवन मिला है, उसे शक्ति भी मिली है, ऐसा मानना चाहिये। मनुष्य जीवन का मन्तव्य है, कर्म करना और कर्म का सम्पादन शक्ति से ही होता है। बिना शक्ति से संसार का कोई भी कार्य नहीं हो सकता है। शक्ति से धरती अन्न देती है, शक्ति से सारे कल-कारखाने चलते हैं। शक्ति से ही वनस्पति फलती फूलती और शक्ति से ही विश्व-ब्रह्माण्ड का संचालन होता है। बिना शक्ति से संसार का एक पत्ता भी नहीं हिल सकता। स्वच्छन्द, कम्पन, सिहरन व संचलन आदि सारी क्रियायें शक्ति के ही लक्षण हैं। जो शक्ति सम्पन्न है, वही जीवित है और जो निःशक्त है वह निर्जीव है, मृत है। चलती हुई वायु, जलती हुई आग, झरते हुये झरने और गरजते हुये सागर सब शक्ति का ही संदेश देते हैं। शक्ति के अस्तित्व से ही मनुष्य, मनुष्य है, अन्यथा वह एक शव है, मिट्टी ही है।

मनुष्य की उन्नतियाँ, सफलतायें और मनोवांछाएं शक्ति के सहारे ही पायी जा सकती हैं। जिसमें शक्ति नहीं, जो अशक्त है, निर्जीव है, वह न कोई उन्नति कर सकता है और न कोई सफलता पा सकता है। संसार में प्रगति करने के लिये, उन्नति करने के लिये छाती से छाती अड़ी हुई है, कन्धे से कन्धे रगड़ रहे हैं। तब भला ऐसी दशा में जो अशक्त है वह कैसे ठहर सकता है? संसार के इस संघर्षपूर्ण जीवन में जो निर्बल है, निःशक्त है, वह गिर जायेगा, कुचल जायेगा और नष्ट हो जायेगा।

अशक्त व्यक्ति न भौतिक उन्नति कर सकता है और न आध्यात्मिक। यदि कोई अशक्त व्यक्ति यह चाहे कि संसार के संघर्ष में वह नहीं टिक सका तो एकान्त में बैठकर, संसार से दूर रहकर आध्यात्मिक लाभ ही कर लेगा, तो वह भूल करता है। अध्यात्म क्षेत्र में भौतिक क्षेत्र से भी अधिक शक्ति की आवश्यकता है। संयम, नियम, नियंत्रण एवं निग्रह आदि की साधना के लिये अनन्य मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक शक्ति की आवश्यकता है। जो संसार में रहकर शारीरिक समर न जीत सका, वह अध्यात्म क्षेत्र के साधना-समर को क्या जीत सकेगा?

शक्ति का रहस्य कर्म में छिपा हुआ है। जो क्रियाशील है, वही शक्तिशाली है, जो अकर्मण्य है, निकम्मा है, वह निर्जीव है, जड़ है। परमात्म ने जिसे उत्पन्न किया है, जीवन दिया है, उसे शक्ति भी दी है। शक्ति के आधार पर ही शिशु बढ़ता हुआ पूर्ण मनुष्य बनता है। जिस शिशु की शक्ति क्षीण हो जाती है, उसका विकास रुक जाता है। शक्ति क्षीण हो जाने पर पेड़ सूख जाते हैं, धरती ऊसर और बीज अनुपजाऊ हो जाते हैं। शक्ति क्षीण हो जाने पर आग बुझ जाती है और पानी सड़ जाता है।

निरन्तर गतिशीलता, क्रियाशीलता ही शक्ति सम्वर्धन तथा सुरक्षित रहने का एक मात्र उपाय है। मनुष्य में शक्ति का एक अपार भंडार भरा हुआ है। किन्तु यदि उसका उपयोग न किया जाये तो वह बेकार हो जाता है। जिस प्रकार आहुति पर आहुति देते रहने से ज्वाला जलती रहती है, उसी प्रकार कर्म की क्षमता बनी रहती है। यदि अग्नि को आहुति न दी जाये तो उसे भस्म करने के अपने कर्तव्य से रहित होकर अग्नि शाँत हो जाती है, निर्जीव हो जाती है। उसी प्रकार यदि शरीर से कार्य न लिया जाय तो वह निस्तेज होकर व्यर्थ हो जाता है। पानी रुक कर सड़ने लगता है और गतिहीन हो जाने से हवा दूषित हो जाती है।

कर्म तथा शक्ति जहाँ एक-दूसरे पर निर्भर है, वहाँ परस्पर पूरक भी है। शक्ति के बिना कर्म नहीं और कर्म रहित शक्ति का ह्रास हो जाता है। अतएव शक्तिशाली बने रहने के लिये मनुष्य को निरन्तर कर्म करते रहना चाहिये।

कर्महीन मनुष्य जहाँ एक ओर जीवन की महान विभूतियों से वंचित रहते हैं, वहाँ दूसरी ओर दुष्कर्मों के भंडार बन जाते है। ऐसी दशा में उनका जीवन और भी कंटकाकीर्ण बन जाता हैं। उन्हें पग-पग पर पीड़ा और त्रास मिलता है। अकर्मण्यता सारे पापों की जननी है। बेकार पड़े हुये व्यक्ति में आलस्य प्रसाद आदि प्रवृत्तियां बढ़ जाती हैं, जिनके वशीभूत होकर वह गलत मार्ग पर चल निकलता है। इसके विपरीत जो क्रियाशील है, व्यस्त है, उसे बेकार की बातों के लिये अवकाश ही नहीं मिलता। किस मनुष्य में क्या कर सकने की क्षमता छिपी हुई है, इसे कोई भी नहीं जानता। कर्म में प्रवृत्त होने पर ही उसकी शक्ति का उद्घाटन होता है। कोई भी व्यक्ति कितना ही बलवान कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, जब तक वह कोई काम नहीं करता, उसकी शक्ति की अभिव्यक्ति नहीं होती।

संसार में जितने भी महापुरुष हुये हैं, महापुरुष होने से पहले उनमें से कोई भी यह नहीं जानता था कि उनमें इतनी अपार शक्ति भरी हुई है। अपनी इस शक्ति की पहचान उन्हें तब ही हुई, जब उन्होंने कर्म क्षेत्र में पदार्पण किया। कर्म में प्रवृत्त होते ही मनुष्य के शक्ति कोष खुल जाते हैं। ज्यों-ज्यों मनुष्य कर्म-मार्ग पर बढ़ता जाता है, ज्यों-ज्यों उसकी शक्ति सामर्थ्य के स्तर एक के बाद दूसरे खुलते जाते हैं। कर्म-शक्ति रूपी अग्नि का ईंधन है मनुष्य ज्यों-ज्यों कर्म करता जाता है, उसकी शक्ति प्रज्वलित होती जाती है। कर्म से शक्ति और शक्ति से कर्म का संवर्धन हुआ करता है।

निरर्थक एवं निकम्मा बैठा हुआ व्यक्ति किसी के आदर अथवा स्नेह का पात्र नहीं बन सकता। कोई कितना ही धनवान एवं साधन सम्पन्न क्यों न हो, यदि अकर्मण्य होकर बैठा रहेगा तो वह भी किसी को अच्छा न लगेगा। लोग लालचवश उसका कुछ भी आदर क्यों न करें, पर सब दिखावा मात्र होगा। किसी भी व्यक्ति को वह श्रद्धा नहीं मिलती, जो एक कर्मवीर को मिला करती है।

कर्मठता शरीर को पुष्ट, मन को बलवान, बुद्धि को प्रखर और आत्मा को उन्नत बनाती है। अकर्मण्य व्यक्ति का सौभाग्य सो जाता है। हो सकता है, वह संयोग, प्रारब्ध अथवा परिस्थितियों वश बहुत कुछ सम्पदा पा भी जाता है और उसके प्रमाद में भूलकर अपने को निकम्मा बनाये रखता है तो वर्तमान जीवन को तो नीरस और निर्जीव बना ही लेगा अपने आगामी जीवन के लिये भी दुर्भाग्य के बीज बो लेगा। जिन्हें सुविधायें तथा सम्भावनायें उपलब्ध हैं, उन्हें तो और भी कर्मशील होना चाहिये। आर्थिक अवरोध तथा अन्य साधारण चिन्तायें न रहने से उनके लिये अनेक महान कार्य करने का अवसर रहता है।

कर्म ही जीवन है, जीवन ही शक्ति है और शक्ति ही सारी उपलब्धियों एवं उन्नतियों का मूल है। अस्तु मनुष्य को श्रेय प्राप्त करने के लिये, शक्तिशाली बने रहने के लिये निरन्तर ही अपने अनुरूप कर्म करते रहना चाहिये।


शक्ति और भक्ति के मूर्त-रूप गुरु गोविन्द सिंह

स्वधर्म और स्वराष्ट्र की रक्षा के लिये सन्त और सिपाही- दोनों के समन्वय की कल्पना, विश्व की एक अनोखी कल्पना है। अपने शिष्य के एक हाथ में माला और दूसरे हाथ में तलवार पकड़ा कर मानवता की रक्षा का अजीब प्रयोग करने का श्रेय गुरु गोविन्द सिंह को है। गुरु गोविन्द सिंह पीड़ित मानवता के त्राता और सच्चे सुधारक थे। उनका सारा जीवन समाज में फैले हुये अज्ञान और अन्याय के विरुद्ध धर्म को उभारने और दुष्टता का नाश करने में लगा। वीर संत के रूप में वे भारतीय इतिहास के पन्नों में युगों तक अमर रहेंगे।

गुरु गोविन्द सिंह का जन्म जिस समय हुआ, उस समय जनता दोहरे कष्ट से पीड़ित थी। औरंगजेब के क्रूर शासन में लोग बुरी तरह पिस रहे थे, प्रतिदिन हजारों की संख्या में हिन्दू मुसलमान बनने के लिये विवश किये जाते थे, जो ऐसा नहीं करते थे, उन्हें राज्याधिकारी तंग करते और उनसे ‘जजिया’ कर वसूल किया जाता था। हिन्दू धर्म का नाम जबान पर लाने में भी लोग घबराते थे।

एक ओर राजनैतिक दबाव के कारण लोग दुःख पा रहे थे तो दूसरी ओर लोगों के जीवन में बड़ी निराशा छा रही थी। एक मनुष्य का दूसरे के प्रति विश्वास नहीं रहा था। आत्मीयता और स्नेह के बन्धन समाप्त हो गये थे। धर्म-कर्म की लोगों को स्वतन्त्रता न थी, फलस्वरूप धर्म-प्राण हिन्दू जनता भीतर ही भीतर घुटता हुआ सा अनुभव कर रही थी। जिसके पास जितने बड़े अधिकार थे, वे उतने ही निष्ठुर और निर्दयी होते थे। समाज की शाँति पूर्ण रूप से अविच्छिन्न हो चुकी थी।

गुरु गोविन्द सिंह का बचपन का नाम गोविन्द राम था। उनका जन्म 1706 की पौष सुदी सप्तमी को पटना शहर में हुआ। आप गुरु तेगबहादुर के इकलौते पुत्र थे। इनके जन्म के समय तेग बहादुर आसाम में थे। बाद में पंजाब में लौटने पर उन्होंने इनकी माता गुजरी समेत उन्हें पंजाब बुला लिया। यहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और उस समय की प्रचलित कुरीति के अनुसार सात वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह कर दिया गया।

गुरु तेग बहादुर जिस समय औरंगजेब के अत्याचार से शहीद हुये थे, उस समय गोविन्द सिंह 15 वर्ष के थे। इस घटना ने उनके मर्म को झकझोर डाला। हिन्दुओं पर हो रहे मुसलमानों के नृशंस अत्याचारों के खिलाफ उनका हृदय विद्रोह कर उठा और उसी समय से एक शक्तिशाली संगठन बनाने के प्रयत्न में प्राण-पण में जुट गये। बीस वर्ष तक पहाड़ियों में रह कर शक्ति अर्जित करते रहे।

वे इस बात को जानते थे कि औरंगजेब के अत्याचारों से प्रजा को मुक्ति दिलाने के लिये सैन्य शक्ति ही पर्याप्त नहीं, वरन् जनता के मानसिक अवसाद का निराकरण कर, उनमें नैतिक बल भरना भी जरूरी है।

इसके लिये उन्होंने सेना को धार्मिक रूप देने का निश्चय किया। यह कार्य गोविन्द सिंह ने बड़ी दृढ़ता व निश्चयात्मक बुद्धि से पूरा किया।

बैसाख सुदी 1 संवत् 1726 को गुरु गोविन्द सिंह ने बैसाखी के मेले पर विशाल यज्ञायोजन रखा। इस अवसर पर उन्होंने धर्म की रक्षा के लिये उपस्थिति जनों से आत्मबलिदान के लिये आगे बढ़ कर आने का आवाहन किया। सारी सभा से ऐसे पाँच व्यक्ति सामने आये। इस संगठन को जातीय भेद-भाव से दूर रखने का स्पष्ट प्रमाण यही है। कि वह पाँचों आत्मदानी विभिन्न वर्ण के थे। उन्होंने सर्व-प्रथम इन जाट, खत्री और नाई आदि पाँच शिष्यों को दीक्षित किया और “सिख-धर्म” की नींव डाली। इस संगठन के पीछे उनका कोई साम्प्रदायिक उद्देश्य न था, यह घटना ही इस बात का प्रमाण है। संगठन तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति की दृष्टि से बना, जो समयोचित भी था।

जो लोग उनके जीवन और दर्शन से अनभिज्ञ हैं, वे उन्हें साम्प्रदायिक होने का दोष लगाते हैं। उन्हें समझना चाहिये कि गुरुगोविन्द सिंह वस्तुतः इन सारी संकीर्णताओं से बहुत ऊपर थे। वे सच्चे अर्थों में मनुष्यता का परित्राण करना चाहते थे। उन्होंने अपने जीवन उद्देश्य पर प्रकाश डालते हुये स्वयं लिखा है :-

जहाँ तहाँ तुम धर्म विथारो। दुष्ट देखियत पकर पछारो॥ याही काज धरा हम जनम। समझ लेहु साधु सब मरम॥

अर्थात्-धर्म के अशुद्ध रूप और उसे बिगाड़ने वालों का संहार करने के लिये ही मेरा जन्म हुआ है, सज्जन पुरुषों को निश्चय पूर्वक यह जान लेना चाहिये।

आपने ऐसी अनेक सामाजिक रूढ़ियों को खतम किया, जिनसे समाज में विकार उत्पन्न होते थे। रहन-सहन, खान-पान, व्यवहार तथा आचरण में उन्होंने क्रान्तिकारी परिवर्तन किये, जिनका प्रभाव आज भी सिखों में स्पष्ट देखा जा सकता है।

पर धर्म के मामले में गुरु गोविन्द सिंह चट्टान की तरह अडिग थे। उनका संकल्प अपरिवर्तनशील था। “प्राण जाय पर धर्म न जाय” की नीति पर ही उनका सम्पूर्ण जीवन आधारित था। उनकी इस धर्म-निष्ठा का प्रभाव उनके प्रत्येक समीपवर्ती पर था। इसका प्रमाण उनके वीर पुत्रों ने दिया, जिनकी गौरव-पूर्ण गाथा कहने और सुनने में आज प्रत्येक भारतीय का सिर ऊँचा हो जाता है।

गुरु गोविन्द सिंह सिख-संगठन को मजबूत बनाने के प्रयत्न में लगे थे, इसकी सूचना पाते ही औरंगजेब ने उन पर हमला का दिया कुछ पहाड़ी राजे भी औरंगजेब के साथ हो गये। यह युद्ध आनन्दपुर की गढ़ी में हुआ। मुसलमानों की भारी सेना के कारण उनके प्रायः सब सैनिक मारे गये, पर वे अपने पच्चीस चुने हुये सैनिकों के साथ बाहर निकल आये। इस बीच किसी को पता न चल पाया। उनकी माता गुजरी तथा पुत्र अजीतसिंह और फतेह सिंह रसोइये गंगा राम के साथ छूट गये। रसोइये न दोनों बेटों को लालच वश वजीर खाँ को, जो अभी चमकौर के युद्ध से लौटा था, सौंप दिये। चमकौर के युद्ध में भी उनके जुझारसिंह और जोरावर सिंह शहीद हुये थे। यही धमकी वजीर खाँ ने इन बेटों को भी दी और उन्हें प्रलोभन दिया कि यदि वे धर्म परिवर्तन स्वीकार कर लें तो उन्हें मुक्ति ही नहीं अच्छी जागीर भी दी जा सकती है। पर सपूत बेटों को यह स्वीकार न हुआ। “चोटी सिर के साथ जायेगी” यह उनका प्रण था। पौष वदी 13 सं. 17-62 को दोनों बालक जीवित दीवार में चिन दिये गये, किन्तु उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार न किया। उनकी वृद्ध माता ने भी इसी तरह आत्माहुति दे दी, पर इससे वे किंचित भी विचलित न हुयीं। आप लेश-मात्र भी दुःखी न हुये और कहने लगे-

“भगवान तेरी अमानत जो बच्चों के रूप में मेरे पास तैंने रखी थी तेरे हुक्म से ही लौटा दी गई हैं।” इसी तेजस्विता तथा आत्म-त्याग की भावना द्वारा उन्होंने कायरों को भी महावीर बना कर दिखा दिया।

गुरु गोविन्द सिंह राजनैतिक विषमता से लड़े, साथ ही सामाजिक दुर्बलता से भी लड़े। उनके जीवन में शौर्य ही न था, सत्य-प्रेम, सेवा, सहायता और कठिनता भी उसी मात्रा में विद्यमान थी। दीन-दुखियों की सेवा करने में भी वे सदैव तत्पर बने रहे। अपने शिष्यों को उन्होंने भीख माँगकर खाने से सदैव दूर रहने की शिक्षा दी, जो आज भी अधिकाँश में उसी रूप में पालन की जा रही है। उन्होंने कहा-”मेरे शिष्य कभी निष्क्रिय न बैठे, दूसरों का न खायें।”

हिन्दू धर्म के प्रति उनके हृदय में कितनी श्रद्धा और विश्वास का भाव था, यह उनके कृत्यों से पता चलता है। देश की सोई हुई आत्मा को जगाने और वीरता के भाव भरने के लिये उन्होंने गीता, रामायण, महाभारत आदि का सरल भाषा में अनुवाद कराया। और भी अनेक धर्म-ग्रन्थ जो केवल उच्चवर्णों की ही विरासत समझे जाते थे, उनका सरल भाषा में अनुवाद करा कर सर्व-साधारण को लाभ देने योग्य बनवाने का गुरुतर कार्य उन्होंने विद्वान पण्डितों से पूरा कराया।

गुरु गोविंद सिंह जी गुरु द्रोणाचार्य की प्रति-मूर्ति थे। उनके एक हाथ में धर्म, दूसरे में कर्म था। शक्ति और भक्ति की, शौर्य और ज्ञान की जो प्रतिभा गुरु द्रोणाचार्य में थी, ठीक वहीं गुरु गोविन्द सिंह में थी। उन्होंने भारतीय इतिहास में अपने चरित्र की गाथा जोड़ कर उसके गौरव को बढ़ाया और उसकी शानदार परम्परा को जीवित रखा।


निकृष्ट स्वार्थ के विषधर से बचे रहिए

हम जो कुछ जैसा चाहें, वैसा ही हमारे सामने आये, ऐसा सोचना हमारी दम्भपूर्ण मूर्खता तथा स्वार्थपूर्ण भावना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। परिस्थितियाँ किसी की गुलाम नहीं, सम्भावनाएँ किसी की अनुचरी नहीं। संयोग किसी के हाथ बिके नहीं हैं। और आकस्मिकतायें किसी के पास बन्धक नहीं हैं। फिर भला हमारा यह सोचना, कि हम जिस प्रकार की परिस्थितियाँ चाहें, वैसी ही हमारे सामने आवें, उपहासास्पद मूर्खता के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है?

समाज में असंख्यों व्यक्ति रहते हैं। उनकी असंख्य प्रकार की कामनाएँ हो सकती हैं। मनुष्यों की वे कामनाएँ एक दूसरे की विरोधी हो सकती हैं। एक बात जो हमारे लिये अनुकूल हो सकती है, वह दूसरों के लिये प्रतिकूल भी हो सकती है। संसार के सभी व्यक्ति अपनी-अपनी तरह से सुख सुविधाओं की कामना कर सकते हैं। मानिए एक व्यक्ति को एक ऐसे स्थान पर मकान बनाने में सुविधा है, जहाँ से किसी दूसरे की बेपरदगी या असुविधा होती है, तो क्या उसकी वह कामना उचित मानी जायेगी? ऐसी अनुचित कामना के लिए कहना किसी प्रकार भी बुद्धिमानी नहीं है। यदि किसी एक मनुष्य की मनचाही कल्पनाएँ पूरी हो जायँ तो वह किसी दूसरे को सुख सुविधापूर्वक रहने ही न दे। हर काम को अपने अनुकूल कर के दूसरों के लिये जीना ही दूभर कर दे।

अपनी कामनाओं के दर्पण में मनुष्य अपने सच्चे स्वरूप की झाँकी स्पष्ट रूप से देख सकता है। जिस प्रकार की कामनाएँ किसी मनुष्य की होती हैं, ठीक उसी प्रकार का उसका आचरण होता है। भले ही कोई चतुर व्यक्ति अपनी कामनाओं के विपरीत आचरण दिखा कर अपने चरित्र को तब्दीली के साथ समाज के सम्मुख रक्खे, किन्तु वस्तुतः वह वैसा नहीं होता। यह कृत्रिम आचरण कुछ समय तक तो चल सकता है, किन्तु शीघ्र ही ऐसा दिन आ जाता है, जब कामनायें मनुष्य का सच्चा रूप प्रकट कर देती है। अस्तु मनुष्य को अपनी कामनाओं की विवेचना करके अपने को समझ लेना चाहिये। यदि वास्तव में वह अपने को दोष-पूर्ण पाता है तो उसे सबसे पहले अपना सुधार करना चाहिये। सुधरे हुये व्यक्ति की कामनायें नियन्त्रित रहती है, जिसके फलस्वरूप उसे कम दुःख, परेशानी होती है।

स्वार्थ की अधिकता दुःख का बहुत बड़ा कारण है। यह संसार सबके लिये समान रूप से है। अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार इसके साधनों का उपयोग करने का सब को अधिकार है। जो स्वार्थी है, पहले तो वह हर वस्तु को केवल अपने लिये चाहता है, फिर अधिक से अधिक साधन उचित अनुचित हर उपाय से संचित कर लेता है। इसके बाद भी जब वह अन्य व्यक्तियों को साँसारिक साधनों का उपयोग करता देखता है तो बुरा मानता है, ईर्ष्या करता है। स्वार्थी व्यक्ति को दुनिया की पराई चीज अपनी दीखती है और जब किसी दूसरे को उसका उपयोग करते देखता है तो ऐसा अनुभव करता है, मानो वह व्यक्ति उसकी चीज छीन रहा हो, उसे लूट रहा हो।

स्वार्थी व्यक्ति सबसे बड़ा असहयोगी होता है। एक बार अवसर आने पर कोई शत्रु तो सहयोग कर सकता है, किन्तु स्वार्थी सहयोग करने से अवश्य मुँह फेर जाएगा। इसका स्पष्ट कारण यह है कि स्वार्थी व्यक्ति अत्यधिक संकीर्ण होता है। शत्रुता एक प्रतिक्रिया है, किन्तु स्वार्थ एक संकीर्ण मनोवृत्ति है, एक स्वभाव है, एक संस्कार है। प्रतिक्रिया का वेग शिथिल पड़ सकता है, किन्तु संस्कार अपना प्रभाव नहीं त्यागता, स्वभाव बदलता नहीं और वृत्ति बहुत स्थायी होती है।

इसके विपरीत स्वयं असहयोगी होने पर भी स्वार्थी व्यक्ति संसार में हर व्यक्ति से सहयोग की अपेक्षा करता है। प्रत्येक व्यक्ति से अपना काम निकालने की ताक में रहता है। इसके लिये वह अपने स्वाभिमान को बलिदान देकर बेशर्मी तक करता रहता है। उचित, अनुचित, अच्छे-बुरे, छोटे-बड़े हर तरह के व्यक्ति के सम्मुख दाँत निकालता, गिड़गिड़ाता, खुशामद करता, हाथ जोड़ता और पाँव पड़ता है। स्वार्थी बार-बार धक्के खा कर भी उस द्वार पर नाक रगड़ता है, जहाँ से उसका कोई कुछ स्वार्थ सिद्ध हो सकता है। मतलब के लिये गधे को बाप बनाने वाली लोकोक्ति इसी प्रकार के स्वार्थी व्यक्तियों के लिए ही बनी है।

स्वार्थान्ध व्यक्ति का न तो कोई आदर्श होता है और न नैतिक चरित्र। आज जिससे उसका स्वार्थ अटका है, उसके तलवों की धूल सिर पर चढ़ायेगा। और काम निकल जाने पर ऐसे आँख फेर लेगा, मानो उसे कभी देखा ही न हो। स्वार्थी न केवल स्वयं भ्रष्टाचारी होता है, बल्कि भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाला पापी भी होता है। अपना काम निकालने के लिये रिश्वत देना, भेट चढ़ाना, दावत देना, सैर कराना, स्वार्थी व्यक्ति के बाँये हाथ का खेल है। इससे वह समाज में लोभ लालच का प्रचार करता है, भ्रष्टाचार बढ़ाता है और उस पर लज्जित होने के स्थान पर इसको अपनी व्यवहार नीति समझ कर प्रसन्न होता है।

एक स्वाभिमानी नागरिक के लिये अपने सामान्य अधिकार की रक्षा के लिये भ्रष्टाचार का सहारा लेने से बढ़ कर कोई कष्ट नहीं होता। अपने नैतिक पतन न करने और राष्ट्र के प्रति विश्वासघात न करने के इच्छुक नागरिक के लिये केवल एक ही विकल्प रह जाता है। वह अपने काम को बिगाड़े और अधिकार का त्याग करे। यही कारण है कि समाज में आज धूर्त, मक्कार और भ्रष्टाचारी तो सुख, सुविधाओं में देखे जाते हैं और स्वाभिमानी एवं सच्चे नागरिक कष्ट और परेशानियाँ उठा रहे हैं।

स्वार्थपरता न केवल एक नैतिक अपराध है, अपितु वह एक अध्यात्मिक पाप भी है। स्वार्थी व्यक्ति का लोभ अपनी सीमा पार कर जाता है। वह पाप-पुण्य अथवा लोक परलोक की बावत कुछ सोच ही नहीं पाता। निरन्तर स्वार्थ सिद्ध की दिशा में सोचते-सोचते उसकी आत्मा जड़ या मृत जैसी हो जाती है। उसकी ईश्वरी चेतना पर लोभ का पर्दा पड़ जाता है। स्वार्थी व्यक्ति अपने स्वार्थ साधन में माता-पिता, भाई-बहन, पुत्र-पुत्री किसी को भी धोखा दे सकता है। मित्रों से विश्वासघात कर सकता है और निर्बलों को सता सकता है। सता सकता ही नहीं, वह दिन-रात ऐसा किया करता है।

बूढ़े माता-पिता को भार समझना, भाई-बहन को भागीदार शत्रु मानना, पत्नी और पुत्र को सेवक मानना और मित्रों को मूर्ख बनाना, उसका स्वभाव बन जाता है। स्वार्थी व्यक्ति की वृत्ति चोर जैसी हो जाती है। वह अपनी सिद्धियों को अपने निकटतम व्यक्तियों से छिपाता है, उन्हें गलत सूचनाएं देता है। साधनों को किसी को मालूम न होने देने के लिये छिपाये रहता है। जो कुछ खाता-पीता अथवा खर्च करता है, वह मित्र तथा परिजनों से छिप कर करता है। सब कुछ होते हुये भी उसका लाभ किसी को भी उठाने नहीं देता।

निरन्तर स्वार्थ साधन के लिये उचित अनुचित उपाय करते रहने से दूषित संस्कारों के रूप में उसके मनो-दर्पण पर ढेरों मैल इकट्ठा हो जाता है, जिनसे वह अन्दर ही अन्दर अशाँत और दुःखी रहता है, और अन्त में जब उसका समय आता है, तब तड़प-तड़प कर इस संसार से विदा होता है। अन्तिम समय में सबकी तरह उसका भी विवेक जागता है और वह उसे विविध प्रश्न कर के उसे अपने किये की याद दिलाता है। विवेक पूछता है, क्या तुमने स्वार्थ साधन के लिये अमुक अनुचित कार्य किया? स्वार्थी की अपराधी आत्मा स्वीकार करती है और पश्चाताप की आग में छटपटाती है। विवेक उसे याद दिलाता है कि क्या तुमने अपने छोटे से स्वार्थ के लिये अमुक विश्वासी मित्र के साथ विश्वासघात नहीं किया? स्वार्थी स्वीकार करता है और ग्लानि की भयंकर आग में जलता है। इसी प्रकार स्वार्थी का विवेक अन्तिम समय में उसको एक एक करके कि ये हुये पापों की याद दिलाता है। जिससे वह घोरतम वेदना, पीड़ा और पश्चाताप के बीच प्राण छोड़ता है। ग्लानि और पश्चाताप ले कर परलोक यात्रा करने वाले को भावनानुसार नरक मिलता ही है। स्वार्थ का पाप मनुष्य को न तो लोक में शुभ काम करने देता और न परलोक में शुभ गति पाने देता है। हर बुद्धिमान व्यक्ति को स्वार्थ के इस भयानक विषधर से अपनी रक्षा करते रहना चाहिये।

धर्मोद्धारक-


राघवेन्द्र स्वामी

पुत्र के निर्माण में माता-पिता की भावनायें एक विशेष महत्व रखती हैं। माता-पिता की भावनायें ही सन्तान में संस्कार बनकर आत्मानुसार उसके आचरण की रचना करती हैं।

जिन अभिभावकों को राष्ट्र से प्रेम और समाज से स्नेह होता है, जो यह चाहते हैं कि उनका राष्ट्र संसार में मस्तक ऊँचा करके खड़ा हो, राष्ट्र का हर घटक अपने में एक पूर्ण मनुष्य बने, वे देश को अच्छे नागरिक देने के अपने कर्तव्य को बड़ी जागरुकता से निभाते हुये सन्तान का निर्माण किया करते हैं।

देश को एक होनहार नागरिक प्रदान करना बहुत बड़ी राष्ट्र-सेवा है। यदि देश के सारे माता-पिता समाज को उपयुक्त नागरिक देने के अपने उत्तरदायित्व को समझने लगे तो कुछ अन्य प्रयत्न किये बिना शीघ्र ही देश व समाज का कल्याण हो जाये।

राघवेन्द्र स्वामी के पिता श्री तिम्मण्ण भट्ट एक ऐसे ही उत्तरदायी व्यक्ति थे। समाज का वे जो कुछ थोड़ा- बहुत हित कर सकते थे, वह तो उन्होंने अपनी परिस्थितियों के अनुसार किया ही, साथ ही देश को एक महान नागरिक देने के लिये कुछ कम प्रयत्न नहीं किया।

पुत्र की कामना सबको होती है। किन्तु उनकी यह कामना केवल अपने स्वार्थ तथा हर्ष के लिये ही होती है। ऐसे कितने बुद्धिमान होते हैं, जो पुत्र की कामना इसलिये करते हों कि वे एक ऐसे मनुष्य, एक ऐसे नागरिक का निर्माण कर देश को प्रदान करने के अपने राष्ट्रीय-कर्तव्य को पूरा कर सकें, जो कि युग-आवश्यकता को पूर्ण करने में अपना तन, मन, धन सब कुछ न्यौछावर कर दे। अपने स्वार्थ-साधन को न देख कर पुत्र को समाज सेवा के लिये प्रदान कर देना एक महान तपोपूर्ण त्याग ही है।

तेरहवीं शताब्दी में महाराष्ट्र में महात्मा माध्वाचार्य जी द्वारा भक्ति का उद्धार करने के लिये जिस वैष्णव मत की स्थापना की गई थी, वह लगभग तीन सौ वर्ष की यात्रा करके सोलहवीं शताब्दी में आकर लड़खड़ाने लगी। श्री माध्वाचार्य का यह वैष्णव भक्ति मार्ग कोई साधारण उपासना प्रणाली मात्र ही नहीं था, बल्कि यह उन माँगलिक साधनों में से एक था, जिसने यवन बादशाहों के अत्याचार पूर्ण प्रयत्नों द्वारा तीव्रता से बढ़ते हुये इस्लामी प्रभाव से शिखा-सूत्र की रक्षा की थी। यह मत एक धार्मिक धरोहर थी, जिसे हिन्दुत्व में चिर जीवन फूँकने के लिये सुरक्षित रखना आवश्यक था।

भक्ति-प्राण तिम्मण्ण भट्ट ने वैष्णव मत की जीर्णता को पहचान लिया और उनकी आत्मा उसकी रक्षा के लिये छटपटा उठी। किन्तु वे आयु, पारिवारिक परिस्थिति, योग्यता एवं समय की कमी के कारण इच्छा होते हुये भी उतना कुछ नहीं कर पाते थे, जितना कि सम्प्रदाय की रक्षा के लिये करना आवश्यक था।

श्री तिम्मण्ण भट्ट के कोई पुत्र नहीं था, और न उन्हें पुत्र की कोई कामना ही थी। वे निरन्तर भगवत्-भजन में लीन रहने से निस्पृह, निष्काम तथा एषणाओं से रहित हो चुके थे। किन्तु, जिस भक्ति का फल वे आत्मानन्द के रूप में भोगते हुये संसार के दुःख द्वन्द्वों से दूर हो चुके थे, उसी सर्व सुख सम्पन्न वैष्णव भक्ति का तिरोधान होते देख कर विचलित हो उठे और एक ऐसे पुत्र की कामना करने लगे, जो समाज के कल्याण और उनकी आत्म-शान्ति के लिये उक्त भक्ति मार्ग को पुनरुज्जीवित कर सके।

निष्काम भक्त ने पुत्र की कामना से आराधना प्रारम्भ की और अपनी परमार्थपूर्ण इच्छा की प्रबलता से अपने विश्वासानुसार भगवान वेंकटेश से इस वरदान के साथ पुत्र रत्न प्राप्त कर ही लिया-कि उनका पुत्र संसार के विषय वासनाओं से विरक्त रहकर अपने कर्तृत्वों द्वारा देश और धर्म का उद्धार करे।

अपनी समस्त मंगल कामनाओं के साथ मन-मार्ग द्वारा अपने पुत्र में समाहित होकर श्री तिम्मण्ण भट्ट इस प्रसन्नता के साथ शीघ्र ही अंतर्हित हो गये कि यदि भगवान वेंकटेश की इच्छा धर्मोद्धार की न होती तो वे मुझे इस उतरती आयु में माँगने पर पुत्ररत्न प्रदान न करते।

भगवान वेंकटेश के नाम पर अभिधानित पितृहीन वेंकटनाथ के लालन-पालन का भार उनकी विधवा माता पर आ पड़ा। पति को पुत्र रूप में पाकर गोपा देवी ने अपने वैधव्य पर रोते रहना अयोग्य समझकर पति की भावनाओं को पुत्र में निष्ठापूर्ण कर्तव्य के रूप में रच देना ही पतिव्रत के अनुरूप समझा।

भक्त के पास विभूति का क्या काम? वेंकटनाथ के पिता ने अपने पीछे कोई सम्पत्ति तो छोड़ी न थी, अतएव उनकी माता ने अपने परिश्रम के बल पर जीविका की व्यवस्था करके संतोषपूर्वक पुत्र का पालन प्रारम्भ कर दिया। उनके पुत्र-पालन का अर्थ था, अवस्थानुसार विविध उपायों द्वारा पुत्र के मनोविकास के साथ उसमें पति की भावनाओं की स्थापना करना। यद्यपि वे कुछ पढ़ी-लिखी न थीं, तथापि पुत्र को स्वयं ही प्रारम्भिक शिक्षा देने के मन्तव्य से थोड़ा-बहुत पढ़ाना-लिखाना शुरू कर दिया और जब पुत्र वर्णमाल की आयु में पहुँचा तो वे उसके हृदय में विद्या की आधार शिला रखने की योग्यता प्राप्त कर चुकी थीं।

प्रारम्भिक शिक्षा देकर गोपा देवी ने अपने मोह को दबाकर पुत्र को उच्च शिक्षा के लिए अपने विद्वान दामाद पं0 लक्ष्मी नरसिंहाचार्य के पास भेज दिया। किसी महान मन्तव्य के लिए सुरक्षित की हुई पति की धरोहर को आत्म-सन्तोष के लिए अपने तक सीमित रखने का अधिकार गोपा देवी को नहीं था। इस बात को वे अच्छी तरह जानती थीं और इसीलिए अपने भविष्य की चिन्ता छोड़कर उन्होंने पुत्र को उसी मार्ग पर अग्रसर किया जिस पर चलकर वह अपने स्वर्गीय पिता की इच्छा पूर्ण करके कुल को उज्ज्वल करे। गोपा देवी अच्छी तरह जानती थीं कि उन्होंने पुत्र में जिन संस्कारों का जागरण किया है और जिस मार्ग पर उसे अग्रसर किया है, उससे वापस आकर वह उन्हें पुनः प्राप्त नहीं हो सकता। किन्तु देश-धर्म की धरोहर उसे सौंपकर उन्होंने सन्तोष ही पाया।

माता द्वारा निर्मित मनोभूमि की उर्वरता मस्तिष्क की प्रखरता तथा पिता की इच्छा के प्रतिनिधित्व भाव ने मिल कर वेंकटनाथ में एक ऐसी लगन उत्पन्न कर दी, जिससे वह आगामी कर्तव्यों के योग्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए विद्यावारिधि में आमूल निमग्न हो गया। शीघ्र ही उसने धर्म के सारे अंगों-उपाँगों के साथ साहित्य, व्याकरण, न्याय, वेदान्त आदि में निपुणता प्राप्त कर ली।

विद्या विदग्ध होने के साथ-साथ तरुण होकर आए, अपने पुत्र को देखकर गोपा देवी के हृदय में हर्ष के साथ मोह की भी पुनरावृत्ति हो उठी और वे कम से कम पुत्र को विवाह बन्धन में बाँधकर उसको सपत्नीक देखने की अपनी इच्छा को न रोक सकीं। कोई इच्छा अथवा आवश्यकता न होने पर भी ज्ञान-गरिमा के पुण्य-प्रभाव से वीतराग हुए वेंकटनाथ ने माता की प्रथमान्त इच्छा को पूर्ण करना अपना धर्म-कर्तव्य की समझा।

अपनी सहधर्मिणी के रूप में विद्वान वेंकटनाथ ने जिस सरस्वती नामक कन्या का चुनाव किया, वह देखने में सुन्दर तो नहीं थी, किन्तु विद्या, बुद्धि और पति-परायणता में हजार सुन्दरियों से बढ़कर थी। वेंकटनाथ के इस चुनाव की जब लोग चर्चा करते तो वे एक ही उत्तर देते थे कि ‘मुझे अपने चुनाव-चातुर्य पर न केवल सन्तोष ही है, अपितु गर्व भी है। जो व्यक्ति नारी के आन्तरिक सौंदर्य की अपेक्षा बाह्य सौंदर्य को अधिक महत्व देते हैं, वे अधिक बुद्धिमान नहीं कहे जा सकते। नारी का वास्तविक सौंदर्य तो उसके गुण हैं, बाह्य सौंदर्य अचिर-जीवी विभ्रम के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।’

ध्येय-धर्म की तैयारी करके और माता को तोष देकर श्री वेंकटनाथ अपने कर्तव्य मार्ग पर चल पड़े। इसके पहले कि वे जनता में धर्म प्रचार का कार्य आरम्भ करते, उन्होंने अपने गुरु श्री सुधीन्द्रतीर्थ जी का आशीर्वाद ले लेना आवश्यक समझा। गुरु ने वेंकटनाथ का उद्देश्य सुनकर तथा उस पर गहराई से विचार करके उन्हें अपने पास रोक लिया और शास्त्रों की पुनरावृत्ति का परामर्श दिया। यद्यपि वेंकटनाथ को अपने शास्त्रीय ज्ञान में कोई सन्देह न था, तथापि वे गुरु की आज्ञा में किसी महान मंगल का समावेश समझकर रुक गये और शास्त्रों के पुनर्मन्थन के साथ गुरु की सेवा में तल्लीन हो गये।

गुरु आश्रम में रहकर उन्होंने न केवल अपने ज्ञान को ही परिपुष्ट किया, अपितु वक्तव्य-विकास के लिये अनेक शिष्यों को भी बढ़ाया। विद्या और वाणी पर समान रूप से अधिकार पाकर वेंकटनाथ ने गुरु से पुनः धर्माभियान की अनुमति माँगी। गुरु ने आश्वस्त होकर न केवल अनुमति ही दी, अपितु अपने विश्वस्त शिष्य को स्वयं साथ लेकर पुण्य-पर्यटन पर चल पड़े।

सबसे पहले वेंकटनाथ अपने गुरु के साथ धर्म-जिज्ञासुओं के सम्मेलन तथा व्यवसायिक धर्म-प्रचारकों के केन्द्र स्थल तीर्थों पर अन्धविश्वास तथा भ्राँतियों को दूर करने के लिये गये। यद्यपि तीर्थों पर उन्हें धन्धकों के विकट विरोध का सामना करना पड़ा, तथापि उन्होंने अपने साहस, आत्म-विश्वास तथा विद्या के बल पर पुण्य स्थलों को मायावियों से मुक्त कर दिया। उन्होंने वर्षानुवर्ष सच्चे वैष्णव धर्म का प्रतिपादन करके भजन-कीर्तन तथा पूजा-पाठ के रूप में अपना सत्य सन्देश देश के कोने-कोने में पहुँचा दिया। उनकी ख्याति से उत्तेजित होकर अनेक धर्माधिकारियों तथा सम्प्रदायवादियों ने उन्हें शास्त्रार्थ के लिये ललकारा। चुनौती स्वीकार करके उन्होंने सैकड़ों शास्त्रार्थ किये और अपने अमोघ वक्तव्यों द्वारा विरोधियों के न केवल मुँह ही बन्द कर दिये, बल्कि उन्हें वैष्णव मत का प्रचारक बना दिया।

श्री वेंकटनाथ की अविचल निष्ठा, अनवरत प्रयत्न एवं अप्रतिम प्रतिभा ने तात्कालिक धार्मिक क्षेत्र में एक क्राँति उपस्थित कर दी, जिसकी हलचल ने भ्राँतिपूर्ण विश्वासों को भागने पर विवश कर दिया। ध्येय के प्रति अर्पितात्मा वेंकटनाथ की धाक सारे देश में बैठ गई और वे वैष्णव मत के पुनरुद्धारक के रूप में पूजे जाने लगे।

धार्मिक क्षेत्र में वाँछित परिवर्तन लाकर श्री वेंकटनाथ ने संन्यास ले लिया और कृतकृत्यता के सन्तोष के साथ राघवेन्द्र स्वामी के नाम से गुरु आश्रम में रह कर शान्ति पूर्वक लोक शिक्षण की व्यवस्था करने लगे।

सेवा धर्म अपना कर आत्म साक्षात्कार तक पहुँचे हुये श्री राघवेन्द्र स्वामी ने लोक शिक्षा के लिये अन्तिम दिन तक आश्रम के नियमों का निर्वाह किया। वे नित्य ब्रह्ममुहूर्त में उठते, कावेरी में स्नान करके गीता, ब्रह्मसूत्र तथा उपनिषदों का प्रवचन करते। शिष्यों को पढ़ाते तथा कीर्तन-भजन के लिये पदों की रचना करते।

वैष्णव मत की रक्षा करके और अनेक भविष्य-रक्षकों का निर्माण करने के बाद श्री राघवेन्द्र स्वामी ने संसार में आगे अपनी आवश्यकता न समझकर तुँगभद्रा के तट पर मंचाली ग्राम में वृन्दावन नामक स्वरचित समाधि-संधि के बीच निर्धारित समय पर भजन करते हुये ब्रह्म समाधि प्राप्त की। उनके शिष्यों ने गुरु के आदेशानुसार बारह सौ शालिग्रामों से उन्हें ढक दिया और समाधि-संधि बन्द करके पत्थर पर-”यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत...” का भगवद्-वाक्य अंकित कर दिया। स्वामी जी धर्म की स्थापना के लिये अवतरित हुये थे, उस कर्तव्य को अन्तिम श्वांस चलने तक वे पूरा करते रहे।


Quotation

केवल एक ही कर्तव्य है और एक ही सुरक्षित मार्ग है और वह है, ठीक होने का प्रयत्न करना और जो कुछ तुम ठीक समझते हो, उसे करने या कहने में भय न करना।

-चर्चिल

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प्रत्येक कार्य में यह गुँजाइश होती है कि उससे बढ़कर कार्य किया जा सके।

-इमर्सन

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हमारा सबसे बड़ा काम, निश्चित रूप से यह नहीं है कि दूर की धुँधली वस्तु को देखें, किन्तु जो चीज साफ-साफ पास ही दिखाई देती है, उसे करें।

-कार्लाइल

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वे समस्त महान कार्य इच्छित मार्ग पर चले जाते हैं, जो अपनी कमियों के होते हुए भी भले प्रकार प्रारम्भ होते हैं।

-मेसिंजर

आत्म-निर्माता-


श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय

संसार में असंख्यों ऐसे महान पुरुष हो गये होंगे, जिनको संसार न जान सका। कहना न होगा कि ख्याति, कीर्ति, प्रशंसा और पूजा से दूर रह कर यथासाध्य समाज की सेवा कर के संसार से चले जाने वाले मौन-साधक उन तथाकथित सिद्धों से कही अधिक महान होते हैं, जो अपनी सेवाओं का मूल्य कम से कम प्रशंसा के रूप में तो प्राप्त करने का प्रयत्न किया ही करते हैं।

श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय एक ऐसे ही मौन साधक थे। उन्होंने अपने जीवन का अणु क्षण देश व समाज की सेवा में समर्पित कर दिया, किन्तु कभी भी यह न चाहा कि लोग उनकी प्रशंसा करे। उन पर श्रद्धा के फूल चढ़ाये।

श्रीमदा मोहन मालवीय, तेज बहादुर, सप्रू, मोती लाल नेहरू, सी. वाई. चिन्तामणि द्विजेन्द्र नाथ, रविन्द्र नाथ टैगोर, प्रफुल्ल चन्द्र राय, सी. एफ. एण्ड्रूज तथा भगिनी निवेदिता के समकक्ष जैसे युग-व्यक्तियों के परिचित श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय कोई जन्मजात बड़े आदमी नहीं थे। उनके समय में बहुत ही कम व्यक्ति ऐसे थे, जो साधारण स्थिति में जन्म लेकर अपने परिश्रम, पुरुषार्थ एवं अध्यवसाय के बल पर सम्मान उपार्जित कर सके हों। अन्यथा इस समय के लगभग सभी शिखरस्थ व्यक्ति प्रचुर साधन सम्पन्न परिवारों में जन्मे थे। उनके जीवन विकास में कोई अभाव जैसा प्रतिरोध कभी नहीं आया। साधनों की प्रचुरता का समुचित उपयोग कर के उन्नति की पराकाष्ठा पर पहुँचना एक बात है और अभावों के बीच आशा और उत्साह का सम्बल लेकर तिल-तिल मार्ग तय करते हुये ध्यानाकर्षण स्थिति में पहुँचना एक दूसरी बात है।

जहाँ एक ओर लोग अपने अल्प ज्ञान को चातुर्य पूर्ण ढंग से सामने रख कर समाज में अपनी प्रतिष्ठा का निर्माण किया करते हैं और कोई नगण्य सेवा कार्य भी हार फूलों से सजा कर समय-समय तथा स्थान-स्थान पर लोकेषणा से प्रेरित हो कर प्रदर्शित करने में तत्पर रहते हैं वहाँ श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय ने केवल कार्य करने की इच्छा से सदा ही आत्म-गोपन किया। जिनको काम करने की लगन होती है, जो वास्तव में कर्म-योगी होते हैं, वे अपनी समय-संपत्ति और विचार विभूति को उपासकों की निरुपयोगी श्रद्धा भक्ति से बचाने के लिए अपने को अधिक से अधिक छिपाने का प्रयत्न करते हैं। इसके विपरीत जिनको नाम की लगन होती है, लोकेषणा और ख्याति-तृष्णा होती है, वे काम छोड़ कर नाम के लिये स्वयं ही आत्म-प्रकाशन किया करते हैं।

जिन रामानन्द चट्टोपाध्याय ने बी. ए. पास कर प्रयाग विश्व-विद्यालय में फेलोशिप प्राप्त की और लगभग एक दर्जन पत्रिकाओं का सफल सम्पादन किया। उन्होंने जब पाठशाला में पदार्पण किया, उस समय वे शिक्षा शुल्क दे सकने में असमर्थ थे। निदान एक निःशुल्क (फ्री स्कूल) पाठशाला में प्रवेश लेना पड़ा। किसी फ्री स्कूल में प्रवेश लेना किसी के लिये भी अप्रतिष्ठा का प्रसंग था। किन्तु ज्ञान के भूखे रामानन्द चट्टोपाध्याय को प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा से क्या मतलब था। एक तो किसी शिक्षार्थी वटुक का इससे कोई सम्बन्ध नहीं होता, फिर उनका ध्येय तो शिक्षा प्राप्त करना था न कि प्रतिष्ठा-अप्रतिष्ठा की देखभाल करना। किसी महान उद्देश्य के लिये आवश्यकता पड़ने पर स्वाभिमान की परिधि से निकल कर दो कदम अवमान्य की ओर चल लेना कोई निन्दा का विषय नहीं है, बल्कि निरहंकारिता का संसूचक कार्य है, जो हर प्रकार से सराहनीय है। शुभ कार्य में आड़े आया हुआ स्वाभिमान वास्तव में स्वाभिमान नहीं अहंकार अथवा दम्भ ही होता है, जो माध्यमिक लगन वाले व्यक्ति को प्रायः पदच्छेद कर ही देता है।

प्रारम्भिक पाठशाला में बालक रामानन्द का कार्य किसी प्रकार चलता रहा, किन्तु दस वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उसे आर्थिक कठिनाई के काट अधिक खटकने लगे। चेतनाशील चट्टोपाध्याय ने स्वावलम्बन का सहारा लिया। उसने अपने पाठ्य-क्रम के अतिरिक्त घोर परिश्रम कर के एक छात्रवृत्ति-परीक्षा उत्तीर्ण की, जिसके फलस्वरूप उसे चार रुपये मासिक की वृत्ति मिलने लगी।

स्वावलम्बन पूर्ण पुरुषार्थ का मीठा फल पाते ही बालक का विश्वास इस दिशा में उद्दीप्त हो उठा और उसने अपने जीवन में परिश्रम की प्रतिस्थापना कर ली। जिस विद्या-विभूति की एक शिशु किरण ने उसके जीवन में आलोक की खिड़की खोल दी, उसका मध्याह्न कितना प्रकाश पूर्ण होगा, इसका अनुमान लगाने में रामानन्द को अधिक कठिनाई नहीं हुई।

अध्ययन एवं अध्यवसाय में लगे हुए रामानन्द की आत्मा-’विद्या-विद्या-विद्या’ का मंत्र जपती हुई उसे उसी ओर बढ़ाने लगी, जिससे उसकी प्रतिभा उत्तरोत्तर प्रखरतम होती चली गई और वह पाठशाला का एक चमकीला छात्र गिना जाने लगा।

अंग्रेजी की दूसरी कक्षा में एक बार देश के ख्यातिनामा विद्वान श्रीरमेश चन्द्र दत्त ने रामानन्द की प्रतिभा से पुलकित हो कर उसका चमत्कार देखने के लिये बड़े ही जटिल प्रश्नों से उसकी परीक्षा ली। अपने परिश्रमी स्वभाव और निष्ठा-पूर्ण लगन के कारण सदैव सन्नद्ध बालक रामानन्द ने वह चुनौती स्वीकार की और अंग्रेजी में पिच्यानवे प्रतिशत अंक लाकर श्री दत्त को वह सोचने पर विवश कर दिया कि क्या आपने बाल्यकाल में वे कभी किसी परख-परीक्षा में इतने अंक ला सके थे?

सत्रह वर्ष की स्वल्प आयु में रामानन्द ने न केवल प्रवेशिका की परीक्षा ही उत्तीर्ण की, बल्कि सम्पूर्ण विश्व विद्यालय में आवश्यक पुस्तकों तथा अन्य सामग्री का अभाव होते हुए भी चौथा स्थान पाया। रामानन्द की यह सराहनीय सफलता बीस रुपये मासिक की छात्रवृत्ति में फलीभूत हुई, जिससे वे अपने बड़े भाई रामशंकर चट्टोपाध्याय की पीठ पर से अपना सम्पूर्ण भार हटा लेने में कृत-कृत्य हुये और मितव्ययिता के साथ अपने अध्ययन का कार्यक्रम सुविधा पूर्वक चला सकने में आत्म-निर्भर हो गये।

प्रवेशिका की परीक्षा देने से पूर्व ही उनके पिता का देहावसान हो चुका था, जिसके शोक ने रामानन्द का जीवन और भी सजग एवं सचेष्ट बना दिया। रामानन्द सारा काम अपने हाथ से करते थे और अपने पर कम से कम खर्च किया करते थे। वे केवल दस रुपये में अपने भोजन, वस्त्र और पढ़ाई का खर्च चलाते थे। तेल की बचत के लिये वे अपना सारा काम दिन में ही पूर्ण कर लिया करते थे।

छात्र जीवन में भी रामानन्द चट्टोपाध्याय का स्वच्छता एक विशेष गुण था। अत्यधिक अर्थाभाव के बीच भी उनके वस्त्र चाँदी की तरह स्वच्छ तथा चमकदार रहा करते थे। उनके वस्त्रों को देख कर अनेक साथियों को सन्देह हुआ कि इनके पास कई जोड़े कपड़े होंगे। उन्होंने एक दिन अवसर पाकर संदूक खोला तो पता चला कि एक जोड़ा कपड़ों के अतिरिक्त उनके पास कोई दूसरा वस्त्र न था। उनके साथियों ने वस्त्रों का सीमान्त अभाव होने पर भी उनकी इस शुक्ल वस्त्रता का रहस्य पूछा! उन्होंने साथियों को बतलाया कि वे नित्य प्रति अपने वस्त्रों को स्वयं ही धोते हैं और बड़ी परवाह के साथ पहनते हैं। मुझे गन्दगी से घोर घृणा है, इसमें दरिद्रता का निवास रहता है और इसीलिये इससे बचने के लिये मैं नित्य घण्टा, आध घण्टा, वस्त्रों पर परिश्रम किया करता हूँ। गंदगी तथा मलीनता बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को मन्द बुद्धि बना देती है। गन्दगी से बचना छात्र जीवन की पहली शर्त है।

एफ. ए. पास करने पर उन्हें पच्चीस रुपये मासिक वृत्ति मिलने लगी और कलकत्ता के सिटी कॉलेज से बी. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने पर स्टेट स्कालर-शिप दे कर उन्हें विलायत भेजे जाने के प्रस्ताव होने लगे। किन्तु जब यह प्रस्ताव श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय के सम्मुख आया तो उन्होंने विनम्रता पूर्वक इनकार कर दिया। अनेक हितैषियों ने उनकी इस इनकारी को बुद्धिमत्ता नहीं माना और विलायत चले जाने के लिये दबाव डालने लगे। विलायत हो कर आने पर एक ऊँची सरकारी नौकरी की निश्चित सम्भावना को तिलाँजलि न देने के लिये अनुरोध करने लगे। किन्तु स्वाभिमानी, देश भक्त श्रीरामानन्द ने यह कहकर सब का समाधान कर दिया कि मैं सरकारी छात्र वृत्ति पर विलायत जाने की कृतज्ञत रूप सरकारी दासता नहीं कर सकता। जिस पुनीत विद्या को मैंने बड़ी कठिनाई से प्राप्त किया है, उसे देश में विदेशी शासन की सहायता में लगाकर कलंकित नहीं करना चाहता, इसके द्वारा स्वतन्त्र रूप से मैं स्वयं अपने देश और समाज की सेवा करूंगा।

जहाँ तक ऊँचे ओहदे और घने वेतन का प्रश्न है, उसकी मुझे कोई कामना नहीं है। जन-सेवा को मैं सबसे ऊँचा पद और सन्तोष पूर्ण मितव्ययिता को सबसे बड़ी सम्पन्नता मानता हूँ। अपने अभाव की पराकाष्ठा में जो धन हमें लालायित न कर सका, वह भला अब क्या लालायित कर सकता है, जब संसार की समृद्धियों की मूल विद्या देवी की कृपा प्राप्त कर चुका हूँ।

निदान उन्होंने आई. सी. एस. की सम्भावना को छोड़ कर सिटी कालेज में अवैतनिक शिक्षक के रूप में अपना सेवा कार्य प्रारम्भ किया और इस प्रकार अपने शिक्षा मन्दिर का ऋण चुकाते हुये कायस्थ कॉलेज में एक घण्टा पढ़ा कर, पाये हुए सौ रुपये मासिक में अपना काम चलाने लगे, अनन्तर शिक्षा क्षेत्र से वे पत्रकारिता के क्षेत्र में उतर आये। विद्यालयों में निर्धारित पाठ्यक्रम के अतिरिक्त वे विद्यार्थियों को अपनी ओजस्वी विचार धारा में दीक्षित न कर सकते थे। अपने विचार जन-जन तक पहुँचाने और स्वतन्त्र रूप से उनकी सेवा कर सकने के लिये वे अध्यापन के सीमित क्षेत्र से निकल पत्रकारिता के व्यापक विस्तृत एवं विचार-प्रधान क्षेत्र में आ गये।

सबसे पहले उन्होंने अमर चन्द्र वसु द्वारा प्रकाशित ‘ब्राह्म-बन्धु’ नामक मासिक पत्रिका का कार्य अपने हाथ में लिया। अनन्तर “ब्राह्मो पब्लिक ओपीनियन” “इण्डियन मेसेनजर” तथा “तत्व कौमुदी” नामक पत्रों का सम्पादन संभाला। ‘शिशु पाठ’, ‘इण्डिपेन्डेन्ट’, ‘मॉर्डन रिव्यू’ आदि पत्रिकाओं का भार उन्हें अनुरोध पूर्वक सौंपा गया।

जहाँ तक इन पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादन का सम्बन्ध है, उसके विषय में केवल यही कहा जा सकता है कि जिस पत्र-पत्रिका को श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय का संपर्क प्राप्त हुआ, वे अपने समय की क्राँतिकारी पत्रिकायें बन गई। पत्र पत्रिकाओं के माध्यम से जिस समय श्री चट्टोपाध्याय के विचार प्रकाश में आये तो क्या देश और क्या विदेश के बड़े-बड़े विद्वानों का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो उठा।

स्वाभिमानी चट्टोपाध्याय ने अपने विचार स्वातंत्र्य के लिये अपने को किसी भी स्थिति में बेचा नहीं। जिस समय वे ‘लीग आफ नेशन्स’ के कार्य निरीक्षक बन कर जर्मनी, फ्रांस, इंग्लैंड, चैकोस्लोविया, आस्ट्रेलिया और इटली आदि देशों के दौरे पर गये, उस समय उन्होंने ‘लीग आफ नेशन्स’ से अपना भ्रमण व्यय नहीं लिया। जहाँ उनके इस त्याग में निःस्वार्थ सेवा का भाव था, वहाँ यह विचार भी था कि यदि वे ‘लीग आफ नेशन्स’ से अपना व्यय ले लेंगे तो एक प्रकार से उसके वेतन भोगी बन जायेंगे और तब ऐसी दशा में उसकी निष्पक्ष आलोचना न कर सकेंगे।

विश्व-ख्याति और विश्व-प्रतिष्ठा के व्यक्ति होने पर भी श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय बड़े ही सरल एवं निरहंकारी पुरुष थे। श्रीक्षीरोद चन्द्र पाल, शरच्चनन्द्र राय तथा उनकी पत्नियों एवं सम्भ्राँत व्यक्तियों ने मिलकर पथभ्रान्त तथा रोगी व्यक्तियों की सेवा-शुश्रूषा करने के लिये एक आश्रम की स्थापना की। इस आश्रम का नाम “दासाश्रम” रक्खा गया। इस आश्रम के संस्थापक सभी कुलीन ब्राह्मण वंश के थे। अतएव उन पथ हीनों, नीचों तथा रोगियों की सेवा करने में सबको संकोच हो रहा था।

निरहंकार चेतन तथा सच्चे भावी श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय ने उस समस्या का समाधान बड़ी सरलता से कर दिया। उन्होंने कहा-ब्राह्मणत्व अथवा क्षत्रियत्व का तो अधिकारी मैं नहीं हूँ। मैं तो अपने को एक सेवक एक शूद्र समझता हूँ। अतएव आश्रम का सेवा कार्य मुझको सौंपा जाना चाहिये। श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय स्वयं भी एक कुलीन ब्राह्मण थे, किन्तु अन्यों की तरह वे संकुचित तथा संकीर्ण भावना वाले व्यक्ति नहीं थे। उन्होंने ज्ञान के प्रकाश में सेवा के महत्व को समझा और ऊँच-नीच, ब्राह्मण, शूद्र आदि की रूढ़ि-भावना की अपेक्षा विवेक को अधिक महत्व दिया।

आत्म-विश्वास, परिश्रम एवं पुरुषार्थ के बल पर आत्म-निर्माता श्रीरामानन्द चट्टोपाध्याय एक साथ विद्वान, सेवक, अध्यापक, नेता और पत्रकार आदि सभी कुछ थे।

इनका जन्म बंगाल प्रान्त में बाँकुड़ा की पाइक पल्ली में सन 1865 की 16 ज्येष्ठ तिथि को हुआ था।


आप घाटे में हैं, इसका दुःख मत मानिए।

इसमें किसी प्रकार के शंका, सन्देह की गुंजाइश नहीं है कि दुःख का कारण परिस्थितियाँ नहीं मनुष्य की अपनी आन्तरिक स्थिति ही है। यदि आपके मानसिक यन्त्र की गति दुःखानुभूति की दिशा में है तो जरा-जरा सी बात में आप क्षुब्ध एवं व्यग्र हो उठेंगे और यदि उसकी गति अनुकूल दिशा में है तो बड़ा से बड़ा कारण आने पर भी आपको दुःख का अनुभव नहीं होगा।

मनुष्य के मानसिक यन्त्र की यह दुःख-सुखमय दिशायें क्या हैं? निराशा, विषाद, अधीरता, असन्तोष आदि की दिशायें दुःखमयी हैं और आशा, प्रसन्नता, अविचलता, गम्भीरता तथा सन्तोष सुखपूर्ण दिशायें मानी गई हैं।

व्यापार में घाटा, योग्यता का अवमूल्यन, आवश्यकता की आपूर्ति, इच्छाओं का हनन, उद्योग अथवा प्रयास में असफलता आदि अप्रिय परिस्थितियाँ मोटे रूप से दुःख का कारण मानी जाती हैं।

मान लीजिए आपको व्यापार में घाटा हो गया है, तो क्या उसके लिए रोने-कलपने और हाय-हाय करने से वह पूरा हो जायगा। जब आपने व्यापार में पदार्पण किया था, तब घाटे की कल्पना आपके लिए असम्भाव्य नहीं थी। नफा-नुकसान को समान रूप से अंगीकार करने का व्रत लेकर ही आपने व्यापार क्षेत्र में प्रवेश किया होगा। घाटा आपके लिए कोई असम्भाव्य घटना नहीं है, फिर आप उसके लिये क्यों रोते कलपते हैं? ऐसा करने से तो एक प्रकार से आप अपनी आत्मा के सम्मुख दिए वचन से फिरते हैं।

पचास बार मुनाफा उठाकर जो कमाई आपने की है, उससे कौन-सा ऐसा बड़ा काम कर डाला है, जो अब घाटे की अवस्था में न करने से आप दुखी हो रहे हैं। माना घाटा आपको गरीब बना देगा- तब भी ऐसी कौन-सी विचित्रता हो जाएगी। व्यापार करने से पहले भी आप गरीब ही थे और उसी गरीबी ने आप को प्रेरणा देकर अमीर बनाया था, तो फिर यदि वह प्रेरक गरीबी एक बार फिर गई तो इसमें दुखी होने की क्या बात है? साथ ही जब आप गरीब थे, अभावग्रस्त थे, तब इतना दुखी न होते थे, जितना कि आज घाटा होने पर हो रहे हैं। इसका ठीक-ठीक यही अर्थ है कि जिस सम्पन्नता के लिए आप रोते हैं, वह वास्तव में ऐसा रोग है, जो आपको अन्दर ही अन्दर कमजोर बना रहा है। मुनाफा उठाते-उठाते आप पैसे के इतने गुलाम बन गए हैं कि उसकी कमी होते ही मृत पुत्र विधवा की तरह आँसू बहाने लगे।

एक कारण यह भी हो सकता है कि घाटा हो जाने से आपका पैसा चला गया। समाज में आपकी साख कम हो गई। प्रतिष्ठा चली जायेगी, इस विचार से आप दुखी हो रहे हैं। व्यापार के प्रारम्भिक दिनों में जब आपके पास पैसा नहीं था, तब आप की साख समाज में कैसे बनी? ईमानदारी ही तो उस समय आपकी सहायक रही थी। यदि आज आप अपनी उस ईमानदारी पर भरोसा नहीं करते तो इसका तो यही अर्थ है कि या तो आप उसे खो चुके हैं या कलंकित कर चुके हैं। आप अपनी गैर ईमानदारी की याद करते हैं और रोते है कि अब आप पर कोई विश्वास नहीं करेगा। क्या धन का उपार्जन गैर ईमानदार और बेईमान बनने के लिये किया जाता है? यदि ऐसा है तो उस धन को धिक्कार है।

जहाँ तक समाज में प्रतिष्ठा का प्रश्न है। अव्वल तो धन द्वारा कोई प्रतिष्ठा नहीं मिलती और यदि मिलती भी है तो वह झूठी ही होती है। मनुष्य को वास्तविक प्रतिष्ठा उसके उपयोगी एवं सत्कर्मों से मिलती है। यदि आपने अपने सुकाल में जनोपयोगी कार्य किये होते तो आज निर्धन होने पर आपको अपनी प्रतिष्ठा की ओर से कोई शंका नहीं होती।

इसके अतिरिक्त एक बात यह भी है कि प्रतिष्ठा की आकाँक्षा लेकर रोने से प्रकट होता है कि आप में अहंकार की मात्रा बहुत बढ़ गई है। यह वास्तव में आप प्रतिष्ठा के लिये नहीं बेचैन हैं, बल्कि अपने ‘अहं’ की पुष्टि से उत्पन्न होने वाले असात्विक सुख के लिये लालायित हैं। यदि लाभानुलाभ का यही परिणाम है कि मनुष्य बेईमान, अहंकारी और निर्बल बने तो जीवन में घाटा आना बहुत आवश्यक ही नहीं उपयोगी भी है। व्यापार में बहुत अधिक धन पाने से जब मनुष्य में विविध दोषों का समावेश हो जाता है, तब उसका सुधार करने के लिये घाटा ईश्वर का भेजा हुआ दूत ही होता है, ऐसा समझना चाहिए।

इस प्रकार का उज्ज्वल एवं आशाजनक भाव रखने वाले को घाटे का दुःख, अभाव का कष्ट अथवा निर्धनता की ग्लानि कदापि प्रभावित नहीं कर सकती।

अब योग्यता के अवमूल्यन का प्रश्न ले लिया जाये। हजारों, लाखों व्यक्ति इस बात को लेकर दुःखी देखे जाते हैं कि समाज ने उनकी योग्यता का ठीक-ठीक मूल्याँकन नहीं किया। उनको वह पद व प्रतिष्ठा नहीं दी गई, जिसके वे अधिकारी हैं। और जो कुछ उन्हें दिया गया है, वह बहुत कम है, उससे कहीं अधिक उन्हें मिलना चाहिये।

जिसकी योग्यता असंदिग्ध है, उपयोगी है, उसके लिये कोई ऐसा कारण नहीं कि समाज में उसका कम मूल्य लगाया जाये। फिर भी यदि संयोगवश उसको अपनी योग्यता से कम वाले पद पर कार्य करना पड़ता है और पारिश्रमिक भी कम मिलता है, तब भी दुखी होने का कोई कारण नहीं। ऐसी स्थिति में दुख तभी होता है, जब अवमूल्यन के साथ-साथ आपका अपना असन्तोष भी सम्मिलित रहता है। वास्तव में वह अवमूल्यनात्मक संयोग दुःख नहीं देता, दुःख देता है मनुष्य का वह असन्तोष, जिसको लेकर वह अपने से ऊँचे पदों पर के व्यक्तियों की ओर दृष्टिपात करता हुआ ईर्ष्या करता है और सोचता है कि मुझ से कम योग्यता वाले व्यक्ति ऊँचे पद पर है और मैं निम्न पद पर काम कर रहा हूँ।

ऐसी दशा में यदि आप परिस्थिति पर सन्तोष कर अपनी सम्पूर्ण योग्यता लगाकर अपने छोटे काम को भी इस दक्षता के साथ करते हैं कि वह महान बन जाय तो निम्न पद पर होते हुये भी आप का महत्व बढ़ जायेगा। अन्य श्रेष्ठ पदाधिकारी भी आप का आदर तथा लिहाज करने लगेंगे। बात-बात में आप से परामर्श मांगेंगे, राय लेंगे और निर्देशानुसार कार्य करेंगे। इस प्रकार वे आप को एक प्रकार से अपने से ऊँचा पद ही दे देंगे। योग्यताओं का मूल्य मुद्रा ही में मिले, न तो ऐसा अनिवार्य ही है और न वाँछनीय ही। योग्यता का मूल्य आदर, सम्मान एवं महत्व के रूप में मिलना भी कम श्रेयस्कर नहीं है।

इतना सब आदर होने पर भी यदि आप फिर भी दुखी रहते हैं तो वास्तव में दया के पात्र हैं। आप मुद्रा चाहते हैं महत्व नहीं। जो व्यसनी नहीं है, विलासी नहीं है, प्रदर्शन प्रिय नहीं है और अपव्ययी नहीं है, उसमें पैसे की प्यास बहुत कम होगी। यदि आप इन सब दोषों की तुष्टि के लिये अधिक पैसा चाहते हैं तो कृपया अपने पर दया कीजिये, प्राप्त में सन्तोष कीजिये, योग्यता से अपना महत्व बढ़ाइये और पतन के गर्त में गिरने से अपने को बचाइये। यदि आप ईमानदार हैं, समाज के प्रति सच्चे हैं, अन्दर से निर्दोष हैं तो योग्यता का अवमूल्यन आप के लिये एक वरदान है, जो बिना किसी विशेषता के एक विशेष क्षेत्र में आपका महत्व बढ़ाकर समादृत बना देता है। वह दुःख का नहीं हर्ष का विषय है।

इसी प्रकार यदि आवश्यकता अथवा अभाव की आपूर्ति, किसी प्रयत्न में असफलता अथवा अप्रिय परिस्थितियों को ले लिया जाये तो भी इसमें दुःख का कारण दृष्टिकोण का ही दोष होगा। इच्छाओं की वृद्धि, आवश्यकताओं का अनौचित्य ही दुःख का कारण हुआ करता है। उचित इच्छाओं एवं वाँछनीय आवश्यकताओं की पूर्ति अवश्य ही होती रहती है। किसी मनुष्य को इनकी आपूर्ति तभी दिखाई देती है, जब वह इनकी पूर्ति की कोई सीमा नहीं बाँधता, मर्यादित नहीं करता।

और यदि किसी कारणवश एक बार उचित इच्छाओं अथवा आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं भी होती तो उनके लिये दुःखी होना पुरुषार्थ नहीं, कायरता है। इस आपूर्ति के कारण की खोज करें और उसे दूर करने का प्रयत्न करें। दुखी होने से किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता, बल्कि बुद्धि विलुप्त हो जाने से समस्यायें और अधिक बढ़ जाती हैं।

बाहुओं में पुरुषार्थ, मस्तिष्क में संतुलन और हृदय में संतोष रखकर जीवन संघर्ष में भाग लीजिये और आशा का सम्बल लेकर उत्साह के साथ बढ़े चलिये, दुःख आपके समीप नहीं आ सकता।


अपने आपको विकसित होने दीजिये।

अवन्तिका की विशाल जन-सभा समाप्त हो गई थी, थोड़े से बौद्ध भिक्षु और श्रेष्ठि, सामन्त जन शेष रहे थे। यह विचारवान वर्ग था। सब अपनी-अपनी शंकाओं का समाधान तथागत से करा रहे थे। एक बालक जो अति जिज्ञासु दिखाई देता था, वहीं समीप ही खड़ा था। अवसर मिलते ही उसने पूछा-’भगवन्! संसार में सबसे छोटा कौन है?’ बालक की प्रतिभा देखकर भगवान बुद्ध कुछ गम्भीर हुये और बोले-

“जो केवल अपनी बात सोचता है, अपने स्वार्थ को सर्वोपरि मानता है।”

इन शब्दों में भिक्षुराज ने व्यवहारिक अध्यात्म की रूपरेखा थोड़े और सरल शब्दों में समझा दी है। आत्म-निर्माण का उद्देश्य यह है कि मनुष्य की इच्छायें, लालसायें और मनोवृत्तियाँ उसके निजी सुख और उपभोग तक ही सीमित न रहें, वरन् उनका विस्तार हो। लेने-लेने में ही सब आनन्द नहीं है। जब तक केवल पाने की अभिलाषा रहती है, तब तक मनुष्य बिलकुल छोटा, दीन, असहाय, अकाम और बेकार-सा लगता है। किन्तु जैसे ही उसके शरीर, मन, बुद्धि और सम्पूर्ण साधनों की दिशा चतुर्मुखी होने लगती है, चारों ओर फैलने लगती है, वैसे ही वैसे उसकी महानता भी निखरने लगती है और वह अपने जीवन-लक्ष्य की ओर अग्रसर होने लगता है।

मनुष्य में यह एक बहुत बड़ी कमजोरी है कि वह भाषा, प्रान्त, वर्ण और राष्ट्रीयता के भेद-भाव के साथ अपने आपको शेष समाज से अलग रखने का प्रयत्न करता है। जहाँ पाने की बात आती है, वहाँ नीति धर्म आदर्श और सदाचार की बात रखने में सभी बल देते हैं, किन्तु देने के नाम पर हाथ सिकोड़ते हुये न लज्जा आती है, न संकोच। अपने बच्चों की चोंच में दाना डालने का कार्य तो साधारण पक्षी भी कर लेते हैं, अपनी ही भूख तो हर पशु मिटा लेता है। ऐसी ही धारणायें मनुष्य में भी रहें तो अन्य प्राणियों के सामने उसकी विशेषता कहाँ रही? एक जाति के पक्षी जिस डाल पर बैठे होते हैं, उस पर कोई दूसरी जाति वाला बैठ जाय तो उसकी खैर नहीं होती। कुत्ते अपने सजातीय को खाते हुये फूटी आँखों नहीं देख सकता और उस पर झपटकर बलपूर्वक उसके मुख का टुकड़ा छीनकर खुद खा जाता है। ऐसा ही क्षुद्रतम प्रवृत्तियाँ, बुद्धिधारी मनुष्य की भी हों तो उसे इन पशुओं की कोटि का ही समझना चाहिये। मनुष्य के अन्तःकरण में परमात्मा ने जो विचार पैदा किया है, बुद्धि दी है, ज्ञान दिया है, तार्किक कुशलता दी है, वे सब इसलिये हैं, कि इस श्रेणी पर पहुँचकर अपनी स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों के अनौचित्य को समझे और उन्हें दूर करने का प्रयत्न भी करें।

अपने से दूसरों के साथ सम्बन्ध जोड़े बिना हमारा काम नहीं चल सकता। पेट में भोजन पहुँचता है तो उसका लाभ सारे शरीर को मिलता है। कोई एक अंग ही पोषण पाता रहे और अन्य अंग जीवन तत्व से वंचित रहे तो शरीर का नष्ट हो जाना निश्चित है। परिवार में कमाई करने वाले परिजन होते हैं, वह उस कमाई का अधिकाँश अपने आश्रितों पर व्यय करते हैं। इसमें आत्मिक-विकास की पहली अवस्था का भेदन होता है, यह न हो तो पारिवारिक जीवन में अशान्ति तथा विद्रोह उत्पन्न हो जाय। शरीर और परिवार की तरह समाज, राष्ट्र और विश्व के प्राणी-मात्र हमारी उस आत्मीयता के अधिकारी हैं जैसी हम औरों से चाहा करते हैं। अपनी वर्तमान दुर्गति का कारण यही है कि लोगों की व्यवहारिक गतिविधियाँ स्वार्थपूर्ण हैं। औरों से बहुत चाहते हैं, पर स्वयं कुछ नहीं देना चाहते। इस तरह सामाजिक व्यवस्था में ताल-मेल नहीं बैठता और अव्यवस्था फैल जाती है।

प्रत्येक व्यक्ति को अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये दूसरों को कुछ देना ही होगा। पा भी वही सकता है, जो देता है। मनुष्य जीवित भी इसीलिये है कि वह सदैव से ही देता आया है। सब लोग अपनी-अपनी सम्पत्ति, शक्ति और सामर्थ्यों को चुपचाप दाबते गये होते तो यह जो विस्तार निरन्तर बढ़ता जा रहा है, वह कहीं दिखाई न देता। तब न कोई सभ्यता होती, न संस्कृति। अन्य वन्य-पशुओं की भाँति मनुष्य भटकता फिर रहा होता। धर्म, दर्शन, ज्ञान और आध्यात्मिकता को हम निरन्तर बाँटते चले आते हैं, इसीलिये मनुष्य जाति दिनों-दिन विकास की ओर अग्रसर होती चली जा रही है।

यही विचार प्रत्येक व्यक्ति के लिये उचित है कि आत्मोत्सर्ग की पुण्यता में किसी से पीछे न रहे। हम औरों को दें और विनियम में जो मिले उसे स्वीकार करें, इसी सिद्धान्त पर मानवता विकसित होती चली आती है और आगे भी इसी प्रक्रिया पर विकास का मार्ग प्रशस्त बना रह सकता है। जिन्हें अपनी बुद्धि पर बड़ा अभिमान होता है, जो छल, कपट, मिलावट, बनावट तथा ढोंगपूर्वक केवल अपनी प्रभु-सत्ता बढ़ाना चाहेंगे, उनका मानसिक सन्तुलन कभी भी ठीक न रहेगा। उन्हें कभी किसी की सच्ची आत्मीयता न मिलेगी, कोई प्यार न करेगा, सहायता न देगा, सहानुभूति न प्रदर्शित करेगा। विपुल सम्पत्ति का स्वामी बनकर भी वह अभागा असन्तुष्ट ही बना पड़ा रहेगा। भय, आशंका और आपत्तियों में फँसते वही देखे जाते हैं, जो लेवता होते हैं, देने के सिद्धान्त पर जिन्हें विश्वास नहीं होता।

आत्म-विस्तार सुखी जीवन की पूर्ण मनोवैज्ञानिक पद्धति है। यह तय है कि सुख और शान्ति बाह्योपचारों में नहीं है। सुख मनुष्य की ऊर्ध्वगामी भावनाओं तथा विचारणाओं में पाया जाता है। सद्गुणों के विकास से ही सच्ची शान्ति मिलती है। उनके भाग्य का क्या कहना-जिन्हें इस जगत में औरों का प्यार मिला है, स्नेह प्राप्त हुआ है, सहयोग और ममत्व उपलब्ध हुआ है। उन्हें जरा भी कष्ट होता है तो लोग दौड़े-दौड़े चले आते हैं, मानो यह कष्ट उन्हें ही हुआ हो। सद्गुणशील व्यक्ति के लिये प्रत्येक व्यक्ति की सेवायें स्वतः समर्पित होती हैं। जिन्हें ऐसी आत्मीयता प्राप्त हो, उन्हें भला भौतिक समृद्धियों की क्या कमी रहेगी? साँसारिक लालसाओं से प्रयोजन भी क्या रहेगा?

समाज और संसार तो सदैव ही आपके स्वागत के लिए तैयार है, किन्तु अपनी आत्मा को विस्तृत तो होने दें। उसे खोलिए, चौड़ा करिए, ताकि प्रत्येक मनुष्य उसमें समा जाय। सभी आपके हृदय में अपना स्वरूप देखें। आपका मन औरों की भलाई की भावनाओं से भरा रहना चाहिये। दूसरों के कष्ट को देखकर आपकी आँखें छलक उठें तो विश्वास कीजिये, ऐसी कोई आँख न होगी, जिस में आपकी छाया न बस रही हो। सब आपके कल्याण-कामना के लिये विनीत होंगे। सब आपका सान्निध्य सुख प्राप्त करने के लिये परमात्मा से विनती कर रहे होंगे।

ऐसा न कहिए कि आज तो सारा संसार ही स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियों में रत है, फिर हम भी क्यों न वैसा ही करें। यह बात ठीक नहीं है। सामने वाला अन्धा है, इसलिये हम भी अन्धे हो जायें, यह कोई तर्क नहीं है। दूसरे का अनुकरण करना सभ्यता या उन्नति का लक्षण नहीं है। सिंह की खाल ओढ़ लेने से गधा सिंह नहीं हो सकता। कायरतापूर्ण अनुकरण कभी उन्नति की बात नहीं हो सकती। इस से आत्म-विश्वास नष्ट होता है। अपने से ही घृणा होने लगती है। अपना ही अधःपतन होता है। बुराइयों का अनुकरण कभी हितकर नहीं होता, उनसे तो मनुष्य उलटे जंजाल में ही उलझकर अपना स्वत्व खो बैठता है।

मनुष्य का जीवन काल बहुत थोड़ा होता है, किन्तु कामनाओं की कोई सीमा नहीं। इच्छायें कभी पूर्ण नहीं होतीं। भोगों से आज तक कभी आत्म-सन्तुष्टि नहीं मिली, फिर इन्हीं तक अपने जीवन को संकुचित कर डालना कोई बुद्धिमानी की बात नहीं है। मनुष्य जीवन मिलता है, देश के लिये, धर्म, जाति और संस्कृति के लिये। बहुत बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिये यह शरीर मिला है। हमें यह बात खूब देर तक विचारनी चाहिये और उस लक्ष्य को पूरा करने के लिये तपने की, गलने की, विस्तृत होने की परम्परा डालनी चाहिये। आत्म-विस्तार के द्वारा ही मनुष्य वह स्थिति प्राप्त कर सकता है, जिसके लिये मनुष्य जीवन जैसा अलभ्य अवसर मिलता है।


विचारों की हरियाली उगाइये

महाकवि शेक्सपीयर ने लिखा है-”दृश्य और अदृश्य का ज्ञान विचारों से होता है, संसार में अच्छा या बुरा जो कुछ भी है, वह विचारों की ही देन है।” इससे दो बातें समझ में आती हैं। एक तो यह कि संसार का यथार्थ ज्ञान पैदा करने के लिए विचार शक्ति चाहिये। दूसरे, अच्छी परिस्थितियाँ, सुखी जीवन और सुसंस्कृत समाज की रचना के लिये स्वस्थ और नवोदित विचार चाहिये। यह जो रचना हम करते रहते हैं, उसकी एक काल्पनिक छाया हमारे मस्तिष्क में आती रहती है, उसी को क्रियात्मक रूप दे देने से अच्छे-बुरे परिणाम सामने आते हैं।

तालाब ऊपर तक भरा होता है, चारों ओर से घिरा रहता है, तब उसमें किसी तरह की लहर नहीं उठती। तालाब के पानी में कम्पन पैदा करना है तो एक कंकड़ी उठाइये और उसे पानी में फेंक दीजिये। लहरें उठने लगेंगी। तालाब की गन्दगी किनारे को हटाने लगेगी। पुराने सड़े, गले, जीर्ण, शीर्ण, अशुभ, निराशापूर्ण विचारों को भगाने के लिये ऐसी ही गति मस्तिष्क में भी करनी पड़ेगी। दिमाग में जो ज्ञान-तत्व भरा हुआ है, उसे सजग करने के लिये एक विचार की कंकड़ी फेंकनी पड़ेगी। चिन्तन का सूत्रपात करेंगे तो विचारों की शृंखला बँध जायगी। पक्ष के भी विचार आयेंगे, विपक्ष के भी आयेंगे। आप अपनी निर्णायक शक्ति द्वारा भले-बुरे की छटनी करते रहिये। अशुभ विचारों को छोड़ दीजिये और भले विचारों को क्रिया में परिवर्तित कर दीजिये। धीरे-धीरे सही सोचने और सही करने का अभ्यास बन जायगा।

मान लीजिये आपके सामने रोजगार की समस्या है। अब आप इस तरह सोचना प्रारम्भ करें कि इस समस्या का हल किस तरह निकले? अपनी योग्यता, पूँजी, समय आदि प्रत्येक पहलू पर गहराई से विचार करते चले जाइये। जो बातें ऐसी हों, जिन्हें आप पूरा न कर सकते हों, उनको छोड़ते जाइये और जिनसे कुछ अच्छे परिणाम निकल सकते हों, उनकी प्रत्येक सम्भावनाओं की खोज-बीन कर डालिये। कोई न कोई रास्ता जरूर निकल आयेगा। आपकी समस्या सुलझाने का यही सही तरीका होगा।

यह याद रखिये कि आपकी ज्ञान-शक्ति जितनी विस्तृत होगी, उतने ही व्यापक और महत्वपूर्ण विचार उठेंगे। विचार की खाद है ज्ञान। इसलिये जिस विषय के विचार आप चाहते हैं, उस व्यवसाय के जानकर पुरुषों का साथ प्राप्त करना चाहिये या साहित्य के माध्यम से उसे अर्जित किया जाना चाहिये। सम्बन्धित विषय की प्रतिपाद्य पुस्तकों में सोचने के लिये प्रचुर सामग्री मिल जायगी। उनका अपनी स्थिति के अनुरूप चुनाव करने में आपको विचार मदद देंगे। उत्तम स्वास्थ्य की अभिलाषा हो तो आरोग्य वर्द्धक पुस्तक और पत्रिकायें प्राप्त कीजिये। स्वास्थ्य-संस्मरण, व्यायाम, आहार, संयम, प्राणायाम, सफाई आदि जितने भी विषय स्वास्थ्य से सम्बन्धित हों, उन पर एक गहरी दृष्टि डालिये, आपको अपनी स्थिति के अनुरूप कोई न कोई हल जरूर मिलेगा। किसी स्वास्थ्य-विशेषज्ञ डॉक्टर या प्राकृतिक चिकित्सक से भी सलाह लें तो आपकी समस्या और भी आसान होगी। विरोध करने वाले विचार न पैदा कीजिये, अन्यथा निराशा बढ़ेगी और परिश्रम व्यर्थ चला जायगा। आपको केवल रचनात्मक पहलू पर ध्यान देना है।

जाने हुये तथ्यों पर अनेक प्रकार से विचार करने से एक लाभ तो यह होता है कि विचार क्रमबद्ध हो जाते हैं, दूसरे नये तथ्यों की खोज होती है, इसलिए ज्ञान और अनुभव बढ़ता है। मस्तिष्क की उपजाऊ शक्ति बढ़ाने का भी यह अच्छा उपाय है।

विचारों की उड़ान को बिल्कुल काल्पनिक बनाने का प्रयास भी न कीजिए, क्योंकि इससे कोई सही हल नहीं निकल सकेगा। हर समय ध्यान इस बात पर केन्द्रित रहना चाहिए कि जैसे ही आप को कोई निष्कर्ष दिखाई दे, वैसे ही विचारों की गति मोड़कर उन्हें विराम दे दीजिए और उसके क्रियात्मक-क्षेत्र में उतर जाइए। जो सोचकर निर्धारित किया था, उसे पूरा करने के लिए अमल करना जरूरी है, तभी विचार करने का पूर्ण लाभ मिलेगा।

जब एक काम पूरा हो जाता है तो दूसरा उठाइये। एक साथ अनेक विषयों पर चिन्तन करने से आपके ज्ञान-तन्तु लड़खड़ा जायेंगे और आप एक भी विषय का हल ढूँढ़ न सकेंगे। खाने का प्रश्न उठे तो केवल खाद्य के ही विषयों पर विचार कीजिए। उस समय पढ़ाई, भ्रमण या मकान बनाने की समस्या पर मानसिक शक्तियों को लगाने से एक भी समस्या का सही और पूर्ण हल न पा सकेंगे। एक काम रहेगा तो मन एकाग्र हो जायगा। इससे वह काम अच्छा बन सकेगा, पर थोड़ा-थोड़ा सभी ओर दौड़ने से कोई भी काम पूरा नहीं हो सकेगा और आपका उतना समय और श्रम व्यर्थ चला जायगा।

मन की एकाग्रता में बड़ी शक्ति है। जब पूर्ण निश्चिन्त होकर दत्त-चित्त से किसी विषय को लेते हैं, उसे पूरा करने का एक प्रवाह बन जाता है। रुडयार्ड किप्लिंग ने छोटी-छोटी कहानियों को एकत्रित करके उसे एक अत्यन्त उत्कृष्ट रचना का रूप दिया तो किसी मित्र ने उससे इस सफलता का रहस्य पूछा। किप्लिंग ने बताया कि वह जो कुछ लिख लेता था, उसे चुपचाप रख ही नहीं देता था, वरन् उसे बार-बार पढ़ता, उसकी अशुद्धियाँ दूर करता और अनुपयुक्त शब्दों को हटाकर सुन्दर शब्दों का समावेश करता रहता। पूरे समय उसी विषय पर ध्यान केन्द्रित रखने के कारण ही उसकी पुस्तक महान कृति बन सकी। काम करने की भावना और उस पर पूर्ण एकाग्रता से ही महान सफलतायें मिलती हैं। लाँग्रथिम (लघुगणक) के सिद्धान्त की खोज करने में नेपियर को बीस वर्ष तक कठिन परिश्रम करना पड़ा था। उसने लिखा है कि “इस अवधि में उसने किसी अन्य विषय को मस्तिष्क में प्रवेश नहीं होने दिया।”

एक विषय पर ही बार-बार उलट-पलटकर विचार करने से ही तल्लीनता बन पाती है। इस चिन्तन काल में सार्थक विचारों का एक पूरा समूह ही मस्तिष्क में काम करने लग जाता है, जो किसी भी नये अनुसन्धान में मदद करता है। इसलिये जान-बूझकर किसी समस्या के अच्छे-बुरे सभी पहलुओं पर बारीकी से विचार करना चाहिये। इससे सूक्ष्म-विचार तरंगों को पकड़ने वाली बुद्धि का विकास होता है और नये-नये विचार पैदा होने की अनेक सम्भावनायें बढ़ जाती हैं।

माइक्रोस्कोप किसी छोटी वस्तु को कई गुना बढ़ाकर दिखाता है, जिससे स्थूल आँखों से छिप जाने वाले विभागों का भी खुलासा मिल जाता है। विचार करने का दृष्टिकोण भी जितना विकसित होगा तथ्यों की जानकारी उतनी ही अधिक बढ़ेगी। उलझनों और जटिलताओं में भी एक सही हल निकलता हुआ दिखाई देने लगता है। किसानी के नये नये अनुभव, तथ्य और आँकड़े प्राप्त करने के लिए एक किसान से ही पूछ ताछ करना पर्याप्त नहीं होता। किसी को खाद सम्बन्धी जानकारी अधिक होती है, किसी को उपकरणों का ज्ञान अच्छा होता है। बीज बोना, निराई, कटाई आदि की विधिवत जानकारी के लिये कई किसानों का परामर्श आवश्यक है, उसी तरह नये विचारों को पैदा करने के लिये एक विषय को अनेक तरह से सोचना पड़ता है।

हमेशा एक तरह के विचारों में घिरे रहना मनुष्य के विकास को सीमित कर देता है। उन्नति की परम्परा यह है कि आपका मस्तिष्क उपजाऊ बने। सुन्दर जीवन का निर्माण करने में नये नये विचार पैदा करना हर दृष्टि से लाभकारी होता है। ज्ञान और अनुभव बढ़ता है, व्यवस्था आती है और अशुभ परिणामों से बच जाते हैं। विचारों की नई हरियाली में सारा जीवन हरा-भरा दिखाई देता है। इस परम्परा को जगाकर आपको भी अब पूर्ण विकसित होने का अधिकार पाने का प्रयास करना ही चाहिए। विचारशील बनना, सही विचार करने की पद्धति जान लेना, जीवन विकास के लिए कितना आवश्यक एवं कितना उपयोगी है, इसका अनुभव कोई भी व्यक्ति कर सकता है।


जिन्होंने साहसपूर्वक अपने को बदला-वे स्वामी श्रद्धानन्द

मुन्शीराम से स्वामी श्रद्धानन्द बनने वाले के यदि सम्पूर्ण जीवन की समीक्षा की जावे तो पता चलेगा कि मनुष्य मूल रूप से बुरा नहीं होता। वह अपने आस-पास के विकृत वातावरण से ही बुराइयों को ग्रहण करता है। संगति, परिस्थिति अथवा वातावरण के अवाँछनीय तत्व ग्रहण कर लेने पर भी यदि व्यक्ति में अच्छाई का एक भी बीज शेष है, उसकी बुद्धि पूर्ण रूप से भ्रष्ट नहीं हो गई है तो अवश्य ही उसके जीवन में एक ऐसा सशक्त मोड़ आ सकता है, जो उसके सम्पूर्ण जीवन को ही बदल कर रख दे।

जिसमें मानवता के अंकुर शेष है, जिसके अर्ध-चेतन अथवा अवचेतन में भी धर्म के प्रति जिज्ञासा और अच्छाई के प्रति अनुभूति है, तो एक दिन किसी घटना अथवा आत्मानुभूति से उसके जीवन में एक क्राँतिकारी परिवर्तन आ सकता है।

स्वामी श्रद्धानन्द का पूर्वनाम मुँशीराम था और वे तालवन (जालन्धर) नामक गाँव के एक धनी मानी परिवार के पुत्र थे। उनके पिता उस समय के ब्रिटिश राज्य के कोतवाल थे। पैसे अथवा साधनों की कमी नहीं थी। निदान पैसे की बहुतायत से परिवार की संतानों पर प्रायः जो कुछ प्रभाव पड़ने की सम्भावना रहती है, मुँशीराम उससे अछूते न रह सके। उनकी संगत बिगड़ गई। निकम्मे और आदर्शहीन मित्र उन्हें घेरे रहने लगे, जिसके फलस्वरूप वे शराब तक पीने लगे और माँस से भी परहेज करना छोड़ दिया।

यद्यपि मुँशीराम का आचरण खराब होता जा रहा था, तथापि उनके आस्तिक माता-पिता को पूरा विश्वास था कि उनका पुत्र एक न एक दिन ठीक रास्ते पर अवश्य आयेगा। मुँशीराम के माता-पिता का विश्वास किसी काल्पनिक आधार पर नहीं था। उनका यह विश्वास धर्म की उस अखण्ड निष्ठा पर आधारित था, जिसका निर्वाह वे हर परिस्थिति में किया करते थे। उनकी माता तो धर्म निष्ठ थी ही, उनके पिता कोतवाल का पद सँभालते हुए भी ईश्वर में लवलीन होकर बहुत देर तक पूजा किया करते थे। अपनी पूजा के अवसर पर वे अपने पुत्र के सुधार की प्रार्थना भी किया करते थे।

इधर पिता पुत्र की कल्याण कामना किया करते थे और उधर मुँशीराम की विचार धारा बिगड़ते-बिगड़ते नास्तिकता की सीमा तक पहुँच गई। यह परिवार में एक प्रकार से सत्य और असत्य, अच्छाई और बुराई तथा आस्तिकता तथा नास्तिकता की लड़ाई छिड़ गई थी। जहाँ मुँशीराम को जीवन के किसी आदर्श में विश्वास न था वहाँ उनके पिता को अच्छाई की जीत और सत्य की विजय में पूर्ण विश्वास था। पिता-पुत्र के बीच यह भावना-संघर्ष कुछ समय तक चलता रहा और आखिर सत्य की आस्तिकता की ओर एक निष्ठ विश्वास की विजय हुई और मुँशीराम के जीवन में परिवर्तन प्रारम्भ हो गया।

जहाँ पैतृक संस्कारों में शुभ का निवास है, जहाँ घर का वातावरण कलह रहित सात्विकता से परि-पूर्ण है, वहाँ संगतिवश बिगड़ गयी संतान का सुधार न हो, यह असंभव है। निदान एक दिन संस्कार जागरण का क्षण आया और मुँशीराम ने एक कसाई के सिर पर कटे पशुओं की लटकती टाँगे और टपकता रक्त देख लिया। बस फिर क्या था, सात्विक विवेक ने ललकारा-देखते हो मनुष्य-तुम स्वाद और वह भी पैशाचिक स्वाद के वशीभूत हो कर क्या खाते हो? मुँशीराम के मानव-विवेक ने आंखें खोलीं और अपने माँसभोजी स्वरूप की तस्वीर देख कर खाने और उसका विरोध करने की शपथ ले ली।

यह कोई अलौकिकता से पूर्ण घटना नहीं थी। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य था। मनुष्य का विवेक और उसकी अन्तरात्मा सदैव ही उसे गलत रास्ते पर जाने से रोकती रहती है। मनुष्य उसकी आवाज को दबा कर ही किसी बुराई को अपनाता है। यदि उसने अपनी आत्मा को बिल्कुल नष्ट नहीं कर डाला, विवेक को पूर्णतया बहिष्कृत नहीं कर दिया है तो कोई कारण नहीं कि अवसर पाकर उसकी अन्तरात्मा उसे एक दिन सावधान कर के ठीक रास्ते पर न लावे। बुराई में फँसा होने पर भी जो व्यक्ति उसे अन्तरात्मा से स्वीकार नहीं करता, अपने विवेक को उसके प्रति समर्पण नहीं कर देता, एक दिन उसका सुधार अवश्य होता है।

एक बुराई से विरत होते ही मुँशीराम की विकृत वृत्तियों का संगठन टूट गया, सद्वृत्तियाँ बलवती हो उठीं और धीरे-धीरे सारी बुराइयाँ दूर होने लगी। माँस खाना छोड़ देने पर भी मुँशीराम शराब पीना न छोड़ सके। किन्तु इस बुरे व्यसन की खबर एक दिन उनकी पत्नी की सात्विक सेवा भावना ने ली और एक रात में ही मद्य पान की आदत को पति से लाख कोस दूर भगा दिया।

काफी रात गये मुँशीराम अपने स्वभावानुसार एक दिन नशे में बेहोश होने पर आये। घर आते ही वे गिर पड़े और उल्टी करने लगे। नियमानुसार प्रतीक्षा में जागती हुई पत्नी ने उन्हें सँभाला, हाथ पैर और मुँह धुलाया। कपड़े बदल कर आराम से लिटाया और धीरे-धीरे सिर में मालिश करने लगी। ब्रह्म मुहूर्त में मुँशीराम को होश आया और उन्होंने बिना कुछ खाये पिये अपनी पतिव्रता को सेवा में जागते हुये देखा तो उन्होंने कहा, पता चलता है कि तुमने अभी तक भोजन नहीं किया और योंही मेरा सिर दबाते हुये रात भर जागती रही हो।

पत्नी ने प्रेम पूर्वक मुस्कराते हुये उत्तर दिया, आप तो जानते ही हैं कि आपको भोजन कराये बिना मैं कभी भोजन नहीं करती और जब तक आप होश में न आ जाते, मेरे सोने का प्रश्न ही नहीं उठता। मुँशी राम का ‘मनुष्य’ मरा नहीं था, केवल दुर्व्यसनों के विष से मूर्छित हो गया था, सो पतिव्रता पत्नी की निश्छल प्रेम भरो मुस्कान का पियूष पाकर सचेत हो उठा। उन्हें अपने पर बड़ा क्षोभ हुआ और तत्काल पत्नी के सम्मुख हर बुराई को त्याग देने और अपने जीवन को आमूल बदल देने की प्रतिज्ञा कर के उसी मंगल प्रभात में सारी बुराइयों से सदा के लिये छुट्टी पाई।

व्यसन-विकारों से छुट्टी पाते ही मुँशीराम में उद्दात्त भावनाओं का उद्रेक हुआ और उनका ध्यान समाज सेवा की ओर घूम गया। ऐसा होना स्वाभाविक ही था। पतन के गर्त से उठने वाला मनुष्य देवत्व की ओर ही जाता है। मुँशीराम में ज्ञान पिपासा जाग उठी और वे ज्ञान पूर्ण पुस्तकों के लिये विद्वानों तथा पुस्तकालयों की धूल छानने लगे। उन्होंने ढूंढ़कर धर्म विषयक पुस्तकें पढ़ डाली, किन्तु ज्ञान पिपासा शान्त न हुई। अन्त में जब उन्होंने स्वामी दयानन्द का लिखा हुआ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पढ़ा तो उसमें युग धर्म का सत्य देख कर उनकी आत्मा तृप्त हो गई। फलतः उनका झुकाव आर्यसमाज की ओर हो गया। इसी बीच उन्हें बरेली में स्वामी दयानन्द के दर्शन करने तथा उनका ओजस्वी भाषण सुनने का अवसर मिला, जिसने उनके जीवन में आमूल परिवर्तन ही कर दिया। मनुष्य की मनोभूमि जब कोई अच्छी बात सहन करने के लिए तैयार होती है तो ज्ञान की एक छोटी बात भी फल फूल कर विस्तृत हो जाती है और मनुष्य की अपनी मौलिक विचार धारा मिलकर उसे बहुत महत्वपूर्ण बना देती है। निर्विकार मनो-दर्पणकर प्रतिबिम्बित हुई ज्ञान की एक छोटी-सी किरण भी जीवन में अनन्त आलोक भर देती है।

ईश्वर ने पिता की प्रार्थना सुनी और पुत्र ठीक रास्ते पर आ गया। निदान उन्होंने प्रयत्न करके मुँशीराम को तहसीलदारी का पद दिला दिया। उस समय तहसीलदारी का पद कोई साधारण बात न थी, किन्तु मुँशीराम की जिस आत्मा का उत्थान हो चुका था, जो जीवन के प्रज्ज्वलित सत्य के दर्शन कर चुका था, वह जहाँ जायेगा, जिस स्थान पर रहेगा, सत्य का समर्थन करेगा, न्याय की रक्षा करेगा।

बरेली से कुछ दूर अंग्रेजी सेना ने पड़ाव डाला, उसकी रसद के प्रबन्ध का उत्तरदायित्व के क्षेत्र के तहसीलदार मुँशीराम पर आया। मुँशीराम ने अपने प्रभाव से रसद का ही प्रबन्ध नहीं किया, बल्कि एक पूरे बाजार की व्यवस्था कर दी। अंग्रेज कर्नल ने उनका प्रभाव और प्रबन्ध कुशलता देख कर बड़ी प्रशंसा की। इसी बीच मुँशीराम को पता चला कि कुछ गोरे सैनिकों ने एक गरीब अण्डे वाले के सब अण्डे छीन लिये और पैसों के नाम पर उसे डरा धमका कर भगा दिया।

महानता की परिधि में पहुँचे हुये मुँशीराम को भला वह अन्याय पूर्ण अत्याचार किस प्रकार सहन हो सकता था। निदान वे कर्नल के पास गये और स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि या तो अंडे वाले का मूल्य दिलाया जाय अथवा वे सारे दुकानदारों को वापिस कर देंगे।

एक काले तहसीलदार की चुनौती सुनकर अंग्रेज कर्नल भौचक्का रह गया। किसी प्रकार भी उसकी यह समझ में न आ सका कि हिन्दुस्तानी तहसीलदार एक अंग्रेज कर्नल के सामने इस प्रकार की बात करने का साहस किस प्रकार कर सका? उस बेचारे को क्या पता था कि उस समय मुँशी राम के रूप में न कोई काला बोल रहा था और न गोरा बल्कि उनकी वाणी के माध्यम से एक निर्विकार सत्य बोल रहा था, एक न्याय घोषणा कर रहा था। कर्नल बहुत कुछ गुर्राया, किन्तु सत्य-सिंह के सम्मुख वह गीदड़-भवकी कोई काम न कर सकी। महान मुँशीराम ने दुकानदारों को वापस कर दिया और अन्यायी अंग्रेज सरकार की नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। जिस पद की रक्षा में गरीब प्रजा को लूटने और शोषण करने में अन्यायियों का सहयोग करना पड़े, उस पर लानत भेज कर मुँशीराम को सन्तोष हुआ।

अन्दर बाहर दोनों प्रकार से निर्द्वन्द्व होकर महात्मा मुँशीराम ने समाज सुधार के लिये आर्य-समाज और स्वतन्त्रता संग्राम के लिये काँग्रेस में प्रवेश किया। इन संस्थाओं में कुछ काम करने के बाद 1927 में संन्यास ले लिया, जिससे उनके जीवन में ओजस्विता एवं प्रखरता आ गई। संन्यास लेते समय उन्होंने हृदय प्रधान होने वाले श्रद्धानन्द के नाम से अपना नया नाम संस्करण किया।

1919 में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह में दिल्ली क्षेत्र का उत्तरदायित्व स्वामी श्रद्धानन्द जी ने संभाला। स्वामी जी के दिल्ली पहुँचते ही अंग्रेज सरकार काँप उठी, न “जाने क्या हो जाये” की शंका से राजधानी में गोरी फौज लगा दी। अपने निःस्वार्थ सेवा भावना और निर्भीक देश भक्ति के तेज से देदीप्यमान स्वामीजी अंग्रेज हुकूमत को केवल एक व्यक्ति ही नहीं, एक पूरी विजय वाहिनी दिखलाई दिये, जिसका सामना करने के लिये उसने गन मशीनों तक का प्रबन्ध किया। धन्य मनुष्य के उस आत्म-बल को जिसे एक अकेला व्यक्ति हजारों लाखों की संख्या में सन्नद्ध अन्यायियों तथा अत्याचारियों को एक पूरी सेना जैसा दीखने लगता है।

दिल्ली में हड़ताल हुई और लगभग पचास हजार जनता का शान्त जुलूस स्वामी जी के पीछे चला। आगे संगीन ताने हुए गोरी टुकड़ी ने रोका ओर कहा यदि एक कदम आगे बढ़ने का प्रयत्न किया तो गोली सीने से पार हो जायेगी। देश का निर्भीक सेनानी मुस्कुराया और तनी हुई संगीन से छाती अड़ाकर बोला, यद्यपि इस अन्यायी सरकार की गोलियाँ लोगों की छाती को चीर सकती है, पर न्याय की पुकार को कोई मान नहीं सकता। भारत की आत्मा ऐसी लाखों गोलियों से भी नहीं चीरी जा सकेगी। गोरे फौजी नायक के हाथ काँप उठे और संगीन स्वयं नीची हो गई। तभी नगर रक्षक अफसर आया और जुलूस का रास्ता दिला कर परिस्थिति सँभाली।

काँग्रेस के एक सम्मानित एवं लोकप्रिय नेता होते हुये भी उन्हें काँग्रेस से त्यागपत्र देते देर न लगी, जब धर्म की उपेक्षा के विषय में उससे उनका मतभेद हो गया। जिस धार्मिक भावना ने मुँशीराम को पतन के गहरे गर्त से निकाल कर लोक रंजन के उन्नत शिखर पर बैठा दिया, नेतृत्व के लोभ में उस धर्म का तिरस्कार सह सकना स्वामी श्रद्धानन्द के वश की बात न थी।

काँग्रेस से हटकर वे आर्यसमाज के माध्यम से धर्म रक्षा में लग गये और अछूतोद्धार तथा शुद्धि के कार्यक्रमों का सम्पादन करते हुए बलिदान हो गये।

अन्य देश सेवाओं के साथ स्वामी श्रद्धानन्द ने जन सेवा का जो सबसे बड़ा काम किया, वह था गुरुकुल काँगड़ी की स्थापना, जिसका निर्माण उन्होंने जनता से एक-एक पैसा माँग कर किया था। गुरुकुल काँगड़ी के रूप में मूर्तिमती हुई स्वामी श्रद्धानन्द की उज्ज्वल भावनाएँ स्नातक और ब्रह्मचारियों के वेश में अवतार लेती हुई युग-युग देश और समाज की सेवा करती रहेंगी और उनकी ही तरह प्रत्येक व्यक्ति को एक निर्भीक मनुष्य बनने की प्रेरणा देती रहेगी।

आजीवन कर्मव्रती-


देशबन्धु चितरंजनदास

देशबन्धु चितरंजनदास का जन्म कलकत्ता के एक धन एवं सम्मान सम्पन्न परिवार में हुआ था। घर में अतुल धनराशि भरी पड़ी थी। किन्तु कर्मप्रिय चितरंजन दास ने उस पारिवारिक वैभव पर आनन्दपूर्वक जीवनयापन करना पुरुषार्थ का अपमान समझा। वे घर से केवल उतना पैसा ही लेते थे, जितना कि पढ़ाई के लिये अनिवार्य होता था। पैतृक सम्पत्ति पर अपना अधिकार समझकर उसे खाने-उड़ाने में उन्हें कोई औचित्य न दीखता था। उनका कहना था कि जो केवल अपनी पैतृक सम्पत्ति पर जीता है और उसके सम्मान का उपभोग करता है, वह वास्तव में पुरुष कहलाने योग्य नहीं है। अपने परिश्रम से कमाना और अपनी समाज-सेवाओं से सम्मानित होना ही सच्ची मनुष्यता है। उत्तराधिकार में पाया हुआ कोई भी यश वैभव श्रेयस्कर नहीं कहा जा सकता।

अपने इस महान विश्वास को कार्यान्वित करने के लिये उन्होंने अपने में सुयोग्य क्षमताओं को विकसित करने के लिये खूब जी लगाकर पढ़ना प्रारम्भ किया।

देशबन्धु चितरंजनदास ने आठ वर्ष की आयु में पढ़ना प्रारम्भ किया और पन्द्रह साल की आयु में मैट्रिक की परीक्षा पास की। अनन्तर उच्च शिक्षा के लिये उन्होंने प्रेसीडेन्सी कॉलेज में प्रवेश लिया।

कॉलेज जीवन में चितरंजनदास ने जो महत्वपूर्ण दो कार्य किये, वे थे अन्डर ग्रेजुएट एसोसिएशन तथा स्टूडेंट एसोसिएशन नामक दो संस्थाओं की स्थापना। इन दोनों संस्थाओं का उद्देश्य था, नवयुवक छात्रों का अनुशासनपूर्ण संगठन तथा मातृ भाषा बंगला को कॉलेज के विषयों का माध्यम बनवाना।

यद्यपि इन दोनों संस्थाओं की स्थापना में चितरंजन दास को बड़े विकट विरोध का सामना करना पड़ा था, किन्तु लगन के पक्के उन्होंने सामाजिक हित के उन दोनों कार्यों को विरोध की परवाह किये बिना सम्पादित किया। उनके इन कार्यों के विरोधियों में कलकत्ता विश्व विद्यालय के वाइस चाँसलर डॉ. सर गुरुदास बैनर्जी तक थे। फिर भी सत्य की विजय हुई। बंगला इन्ट्रेन्स तक ही नहीं, बल्कि एफ. ए. तक शिक्षा की माध्यम स्वीकार कर ली गई।

अपने इन महान कार्यों से देशबन्धु चितरंजनदास न केवल कॉलेज ही में अपितु जनता के बीच भी लोकप्रिय हो गये। स्कूल और कॉलेजों के विद्यार्थियों के वे एक प्रकार से सर्वमान्य नेता ही बन गये। श्री चितरंजन दास के स्थान पर यदि कोई स्वार्थी व्यक्ति होता तो अपनी लोक-प्रियता का लाभ उठाकर अनेक स्वार्थ सिद्ध करता और अपने इस प्रभाव को समर्पित कर विश्व-विद्यालय के अधिकारियों की कृपा प्राप्त कर सकता था। किन्तु उन्होंने लोक-सेवा की निःस्वार्थ भावना की महानता के समक्ष विश्व-विद्यालय के अधिकारियों की लाभकारी कृपा को तुच्छ समझा। जिनका हृदय निर्मल है, जिन्होंने अपने चरित्र का निर्माण उच्च स्तर पर किया है, जिनने अपने निजी स्वार्थ को जनहित के परमार्थ में विलय कर दिया है और जिन्होंने निःस्वार्थ सेवा के सुख को अनुभव कर लिया है, उन्हें संसार का कोई प्रलोभन पुण्य-पथ से विचलित नहीं कर सकता।

इसके पूर्व कि देशबन्धु चितरंजनदास अपनी शिक्षा-दीक्षा पूर्ण करके किसी उपार्जन आयोजन में संलग्न होते कतिपय संयोगों तथा परिस्थितियों के उत्थान-पतन से उनके पिता लगभग चालीस हजार रुपये के ऋण से दब गये और बहुत कुछ प्रयत्न करने पर भी जब वे उससे किसी प्रकार उऋण न हो सके तो उन्होंने निराश होकर अपने को दिवालिया घोषित कर दिया। देशबन्धु चितरंजनदास के परिवार की प्रतिष्ठा पर यह एक गहरा आघात था। किन्तु उन्होंने इस विषम एवं अपमानजनक परिस्थिति में विचलित अथवा व्यग्र होने के बजाय अपने परिवार की प्रतिष्ठा के पुनरावर्तन का संकल्प किया और सौगुने उत्साह से अपने कार्यों में जुट गये।

वे बी. ए. पास कर चुके थे। उनकी इच्छा थी कि वे भारतीय सिविल सर्विस की परीक्षा के लिये लन्दन जा सकें। घर की परिस्थिति दिन-दिन गिरती जा रही थी इसलिये उन्होंने एक मात्र अपने मस्तिष्क तथा पुरुषार्थ का सहारा लिया और विभिन्न प्रतियोगिताओं में अपनी प्रतिभा का ऐसा चमत्कारी परिचय दिया कि वे सरकार की ओर से भारतीय सिविल सर्विस की परीक्षा के लिये लन्दन भेज दिये गये। किन्तु अपनी ज्वलन्त देश भक्ति और स्वतन्त्र विचार धारा के कारण उसमें कृतकृत्य न हो सके। इसका कारण उनकी कोई अयोग्यता अथवा अदक्षता न थी। सिविल-सर्विस परीक्षा में उनकी असफलता का कारण अंग्रेज सरकार का भय था, जो कि चितरंजनदास के उस विरोध से उत्पन्न हुआ था, जिसकी कि अभिव्यक्ति उन्होंने उस समय की थी, जब लन्दन पार्लियामेंट में जेम्स मेक्लिन नामक एक सदस्य ने वक्तव्य देते हुये यह कहा था कि अंग्रेजों ने भारत को तलवार की ताकत से जीता है और तलवार के बल पर ही उस पर शासन किया जा सकता है।

भला एक सच्चा देशभक्त एक ऊँची सरकारी नौकरी के लोभ में देश के प्रति ऐसे अपमानजनक शब्द कैसे सुन सकता था? देशबन्धु चितरंजनदास ने उक्त वक्तव्य का इतनी तीव्र एवं उपयुक्त भाषा में विरोध किया कि उक्त सदस्य को अपने कथन पर लज्जित होना पड़ा।

देशबंधु चितरंजनदास की इन महान राष्ट्रीय भावनाओं से उत्पन्न अँग्रेजों के भय को उनके उस प्रभाव ने और भी बढ़ा दिया, जो उन्होंने पार्लियामेन्ट की सदस्यता के लिये भारतीय प्रत्याशी दादा भाई नौरोजी के पक्ष में प्रयोग किया था और बड़े-बड़े दिग्गज अंग्रेज नेताओं के विरोध के बावजूद भी उन्हें सफल कराया था। अंग्रेज सरकार ने भारतीयों के लिये सिविल सर्विस का सम्मोहन इसलिये फैलाया था कि उसके लोभ, मोह में फँसकर भार की प्रखर प्रतिभाएं उन्हें देश के शोषण में सहयोग दें, न कि इसलिये कि उक्त पदों पर पहुँच कर देशभक्त भारत में अंग्रेजी शासन के नाम पर भारतीय राज्य की स्थापना कर दें। निदान सिविल सर्विस की परीक्षा में उन्हें षडयंत्रपूर्वक असफल कर दिया गया।

देश के सम्मानपूर्ण गौरव पर सिविल सर्विस के सुन्दर स्वप्न प्रसन्नतापूर्वक न्यौछावर कर उन्नतात्मा चितरंजन दास ने उसी वर्ष बैरिस्टरी की परीक्षा पास की और स्वदेश लौट आये, और कलकत्ता हाई कोई में अपनी प्रैक्टिस प्रारम्भ की दी।

इसी बीच अपने भाई बसन्तरंजनदास के अपने चाचा काली मोहनदास के यहाँ गोद चले जाने और उनके उत्तराधिकारी के रूप में पाई अतुल सम्पत्ति को अपनी माता को सौंप कर स्वर्ग सिधार जाने से श्री चितरंजनदास को पैसे की सुविधा हो गई। किन्तु उन्हें इस शोक-सम्पत्ति से कोई प्रसन्नता नहीं हुई और न उसे वे अपने व्यक्तिगत उपयोग में ही लाए।

एक लम्बे समय से आर्थिक असुविधा रहने तथा बैरिस्टरी छेड़ देने पर भी चितरंजनदास ने अनायास पाये हुये धन को अपने निजी खर्च में नहीं लिया। एक तो उस धन के साथ भाई की शोकपूर्ण स्मृति जुड़ी हुई थी, दूसरे वह उनके अपने निजी परिश्रम का नहीं था। भाई के मूल्य पर पाये पैसे पर आराम करने की अपेक्षा उन्होंने आर्थिक कठिनाइयों के बीच जीवन-यापन करना अधिक पसन्द किया। फिर पिता का कर्ज जिसके कारण उनको दिवालिया होना पड़ा था, उनके हृदय में एक दर्द बनकर कसक रहा था। अपने स्वर्गीय पिता के नाम पर लगे उस कलंक को वे हर मूल्य पर परिमार्जित कर देना चाहते थे। निदान भाई के उत्तराधिकार का वह पैसा जो उन्हें माता द्वारा मिला था, स्वर्गीय पिता का कर्ज चुकाने में खर्च कर दिया।

जहाँ लोग नियमानुसार लिये हुये अपने कर्ज को चुकाने में तत्परता नहीं बर्तते, नीयत खराब कर लेने पर मुकर जाने और अदालत की नौबत ले आने की मूर्खतायें करते हुये अपनी अमानवीय कृतघ्नता का परिचय देते हैं। विविध प्रकार की असम्मानपूर्ण परिस्थितियों के बीच भी पैसा होते हुये भी कर्ज न देने की कोशिश करते हैं, वहाँ श्री चितरंजनदास ने पिता के उस ऋण को चिन्ता करके चुका दिया, जिससे मुक्त होने के लिये मजबूर होकर उन्हें दिवालिया बनना पड़ा था और जिसको चुकता करने के लिये चितरंजनदास पर कोई कानूनी बंदिश नहीं थी।

बैरिस्टरी से विरत होकर श्री चितरंजनदास ने अपने अनुभवों, विचारों, सामाजिक परिस्थितियों, समस्याओं तथा उनके समाधानों का प्रसार करने के लिये साहित्य सृजन प्रारम्भ किया। ‘मालञ्च’ नाम की उनकी जो प्रथम काव्य पुस्तक प्रकाशित हुई, उसकी सुधारपूर्ण भावनाओं ओर तीव्र अभिव्यक्तियों ने रूढ़िवादी ब्रह्म-समाज के विरुद्ध एक हलचल खड़ी कर दी, जिससे पुरातन पंथियों ने एक बड़े संगठन के रूप में उनका विरोध प्रारम्भ कर दिया, जिससे शंकाओं का समाधान तथा अपनी विचार धारा प्रतिपादन करने में उनका बहुत-सा अमूल्य समय नष्ट होने लगा, अतएव समय की तुलना में काव्य का उपयोग कम देखकर उन्होंने उसका प्रणयन बन्द कर दिया।

देशबंधु चितरंजनदास के चरित्र की यह बहुत बड़ी विशेषता थी कि कदम-कदम पर असफलता तथा निराशा के कारण उपस्थित होने पर भी वे हतोत्साह नहीं होते थे और एक के बाद, समाज सेवा का दूसरा मार्ग निकाल लेते थे।

बंगाल के नौजवानों की उठती राष्ट्रीय भावनाओं को दबाने के लिये अंग्रेज सरकार ने बंग-भंग की योजना बनाई और देशबंधु चितरंजनदास ने अधिकाधिक एकता का शंखनाद किया। उनके आह्वान पर बंगाल ही नहीं सम्पूर्ण भारत के राजनीतिक नेता तथा नौजवान संगठित होकर सरकार की उस विनाशकारी नीति का विरोध करने लगे। श्री चितरंजनदास ने जन-जागरण के लिये “वन्दे मातरम्” ‘संध्या’ तथा ‘युगान्तर’ नाम के तीन राष्ट्रीय पत्रों की स्थापना की, जिनके प्रकाशन ने देश में एक नवीन क्रान्ति का सूत्रपात कर दिया। सरकार के पाशविक दमन के बावजूद भी जब बंग-भंग का विरोध दबाया न जा सका तो सरकार को अपनी नीति बदलनी पड़ी और तात्कालिक वायसराय लार्ड कर्जन को त्यागपत्र देना पड़ा। उनके स्थान पर आये लार्ड मिन्टो ने चितरंजनदास द्वारा स्थापित पत्रों को आपत्तिजनक कहकर मुकदमा चलाया, जिसमें उन्होंने इस कुशलता से पैरवी की कि राजनीतिक क्षेत्र में उनकी धाक जम गई।

श्री चितरंजनदास के सुयोग्य नेतृत्व, परिश्रम, पुरुषार्थ तथा दूरदर्शिता का बल पाकर स्वराज्य दल को विकसित होते देर न लगी। और शीघ्र ही वह दिन आया कि कलकत्ता कौंसिल के चुनाव में चालीस स्थान जीत कर उसने लोकप्रियता के ज्वलन्त प्रमाण के साथ अपना बहुमत स्थापित किया। तात्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड लिटन ने उन्हें अपना मन्त्रिमंडल गठित करने के लिये आमंत्रित किया। किन्तु उसके लिये वे तैयार न हुये। वे कौंसिल में रहकर नौकरशाही को नीचा दिखाना चाहते थे, न कि मन्त्रिमंडल के रूप में उससे सहयोग करना। उद्देश्य के लिए, चितरंजनदास के इस त्याग ने जनता जनार्दन के बीच उनके लिए एक महान सम्मान का उपार्जन किया।

कलकत्ता नगर की गिरती हुई दशा तथा उसकी दुरावस्था देखकर जन सेवा के लिये उनका ध्यान कलकत्ता कार्पोरेशन की ओर गया और 1924 के चुनाव में पचहत्तर सीटों में से पचपन सीटें जीतकर कार्पोरेशन के मेयर बने। कार्पोरेशन के मेयर पद से श्री चितरंजनदास ने नगर की जो सेवा की, उसका अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि उसके बाद से उनमें सदा ही इन्हीं की विचारधारा वाले राष्ट्रीय दल का बहुमत रहा। शिक्षा, सफाई तथा स्वास्थ्य की व्यवस्था में उन्होंने जनता के हित में रात-दिन एक करके कलकत्ते का कायाकल्प ही कर दिया।

समाज के सुधार, राष्ट्र की स्वाधीनता तथा विदेशी राज्य के अत्याचारों को मिटाने के लिये 20 वर्ष तक अनवरत रूप से कार्य रत रहने वाले देशबन्धु चितरंजनदास का स्वास्थ्य पचपन वर्ष की अवस्था में ही गिर गया और फिर बहुत कुछ उपचार करने पर भी वे खुले संघर्ष के लिये अपने को मैदान में लाने लायक न बना सके। निदान मृत्यु से पूर्व अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति का एक ट्रस्ट बनाकर उसे समाज को दान कर दिया और महिलाओं के लिये डाक्टरी की उच्च शिक्षा तथा एक विशाल चिकित्सालय का प्रबन्ध करके 14 जून 1925 को संसार से विदा हो गये।


पतिव्रत धर्म की महान् महत्ता

महर्षि दयानन्द कहा करते थे “हिन्दू धर्म यहाँ की स्त्रियों के कारण जीवित है। यहाँ की नारियाँ शील और सद्धर्म पालन में अग्रणी न रही होतीं तो आर्य जाति का गौरव कभी का विलुप्त हो गया होता।”

शास्त्रीय इतिहास नारियों के पतिव्रत धर्म और उनके जाज्वल्यमान चरित्र से भरा पड़ा है। ऐसी अनेक कथायें हैं, जब स्त्रियों की अलौकिक शील निष्ठा के समक्ष बड़े-बड़े देवताओं को भी नत हो जाना पड़ा। स्त्रियों के कर्त्तव्य धर्म का विवेचन करते हुये शास्त्रकार ने बताया है कि पति-परायण नारी योगी-यती, सन्त-संन्यासियों से भी उत्तम गति को प्राप्त करती हैं।

मन्त्रदृष्टा अपाला ने अपनी शक्ति से मरुद्गणों का आवाहन कर सोम रस पान किया, सती अनुसुइया के आँगन में ब्रह्मा, विष्णु, महेश बालक बनकर खेले, सावित्री यम से लड़ी, शाण्डिली ने सूर्य देव का रथ रोक दिया, सुकन्या की पति निष्ठा से संतुष्ट होकर अश्विनीकुमारों को धरती में उतर कर च्यवन ऋषि की वृद्धावस्था को यौवन में बदलना पड़ा।

महासती सीता भगवान राम के साथ वन-वन घूमीं, दमयन्ती ने वन की कठोर यातनायें सहीं, पर नल से वियुक्त होना स्वीकार न किया। पति को अन्धा न देख सकने वाली गान्धारी ने आजीवन आँखों में पट्टी बाँधकर रखी। यह है भारतीय नारियों का आदर्श चरित्र। यहाँ की मातृ शक्ति के सामने पुरुषत्व ने अनेक बार घुटने टेके और उनकी स्तुति की।

मातायें ऐसी शीलवान न होतीं तो भरत, अर्जुन, ध्रुव, प्रह्लाद, अभिमन्यु, बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, विवेकानन्द, महाराणाप्रताप, शिवाजी, रणजीतसिंह आदि महान सन्तानों को कौन जन्म देता? सिंहनियाँ सिंह ही जनती हैं, उनकी कोख से शृंगाल नहीं आते। स्त्रियाँ चरित्रवान थीं, इसलिये यहाँ के पुरुषों के जीवन भी बड़े उदात्त और चरित्र निष्ठा से ओत-प्रोत रहे हैं।

दीपक की ज्योति मन्द हुई है, किन्तु उसका प्रकाश अभी भी घर-घर मौजूद है। आज भारत में नारियों की स्थिति भोंड़ी हो चली है, किन्तु अपनी माताओं के प्रताप से अभी भी वह चिनगारी बुझी नहीं, जो सहस्रों वर्ष पूर्व उन सन्नारियों ने जागृत की थी, जिनके इतिहास से भारतीय संस्कृति का इतिहास विश्व के आकाश पर उज्ज्वल नक्षत्र की भाँति चमक रहा है।

चिता में जीवित जलने का मर्मान्तक कष्ट सहकर भी भावनाओं को ऊँचा उठाये रहने का श्रेय नारी जाति ने प्राप्त किया। जौहर की ज्वाला में जीवित आत्म-समर्पण कर देने वाली पद्मिनियों का इतिहास जब भी खोला जायगा तो यहाँ के पुरुषों को दैवी प्रेरणा और प्रकाश दिये बिना न रहेगा। भारतीय नारी ने आदर्शवाद के लिये जो कष्ट सहे हैं, वे व्यर्थ नहीं जा सकते, उनका प्रभाव बहुत काल तक इस संसार में रहेगा।

स्त्रियाँ सच्चरित्र और पतिपरायणा हों, इस बात की आवश्यकता पहले भी थी और आज भी है। समाज को एक शिष्य के रूप में देखा जाय तो नारी ही उसका गुरु होगी। स्त्री, पुरुष को दीक्षा देती है। प्राण, संकल्प, बल और विचार देती है। वह जिस साँचे में चाहे पुरुष को ढाल दे। समाज की वह निर्मात्री है, पर इस निर्माण कार्य में प्रमुख वस्तु उसका चरित्र है। चरित्रवान नारियाँ ही गुरु के रूप में अपने समाज-शिष्य का सही मार्गदर्शन तथा निर्माण कर सकती है।

पतिव्रत धर्म एक प्रकार की उच्च स्तरीय भाव-साधना है, जिससे स्त्री का आत्म-बल उद्दीप्त होता है, आध्यात्मिक गुणों का आविर्भाव होता और कर्त्तव्यपालन की दृढ़ता आती है। इन विशिष्टताओं को धारण करके ही नारी समाज के दीक्षा-कर्म को उत्तम रीति से निभा सकती है।

यह साधना किसी योग से कम नहीं। पुरुष, परमात्मा का स्नेह और साहचर्य प्राप्त करने के लिये आत्म-समर्पण करता है, अपनी सारी कामनायें परमेश्वर को सौंपकर केवल कर्त्तव्यपालन में सुख अनुभव करता है। नारी पुरुष को देवता मानकर इसी आत्म-समर्पण की भावना का विस्तार करती है तो परमात्मा की उपासना के सत्परिणाम उसके जीवन में उतरते हैं। आत्मिक सुख, सन्तोष और शान्ति की उसे तुरन्त प्राप्ति होती है, यही सद्गति के आधार है और इन्हीं से समाज निर्माण के कार्य भली भाँति चल पाते हैं।

योग साधना के प्रथम चरण में भक्त अपने गुरु पर अपनी भावनाएं आरोपित कर उन्हें भगवान के रूप में पूजता है तो उसे ईश्वर उपासना के पूर्ण लाभ प्राप्त होते हैं। किसी देव प्रतिमा, पीपल या तुलसी की उपासना और अर्घ्यदान की अपेक्षा यदि स्त्रियाँ अपने पतियों को उस भाव से देखा करें तो इससे जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, उससे पारस्परिक आनन्द, बाल-निर्माण और समाज की सुव्यवस्था का वातावरण भी बनता है।

पतिव्रत धर्म यौन-सदाचार तक ही सीमित नहीं है, वह तो उसका एक अत्यावश्यक अंग है, पर व्यवहारिक रूप से नारियों के पतिव्रत का अर्थ जीवन की सम्पूर्ण समस्याओं पर आधार बनकर रहना है। जिस रूप में उन्हें लगा दिया जाय, जैसी पति की स्थिति हो, उसी के अनुरूप अपने आपको ढाल देना और उसी में सुख अनुभव करना ही उद्देश्य है। वस्तुतः यह साधना ही पतिव्रत का मुख्य अंग है और इसी के कारण चरित्र निष्ठा की गम्भीरता बढ़ती है। केवल ‘यौन-सदाचार’ स्थिर रखकर ही इस मर्यादा की पूर्णता नहीं हो जाती, वरन् वह सामूहिक विकास के आधार रूप में जीवन-भर चलती है। इसलिये इसका महत्व ही बहुत बड़ा है और तभी इसे योग साधना का रूप भी माना गया है।

पश्चिम की स्थिति का अध्ययन इस सम्बन्ध में गम्भीर बातें प्रकट करती हैं। वहाँ स्त्रियाँ पतियों की अवहेलना तथा आलोचना करने के लिये स्वतन्त्र हैं। इस लिये वे विवाह के बाद से ही एक-दूसरे को शंकास्पद दृष्टि से देखना प्रारम्भ करते हैं। संघर्ष के लिये इतना ही काफी है। पुरुष स्वाभिमानवश झुके नहीं और राजनैतिक सहयोग स्त्रियों को झुकने न देता हो तो फिर समझौते की कोई संभावना नहीं शेष रहती। यही कारण है कि उनके जीवन तलाक से भरे पड़े हैं और वहाँ का दाम्पत्य-जीवन बड़ा क्लेशपूर्ण पाया जाता है।

इस देश में पति-पत्नी का सम्बन्ध आत्मा-आत्मा का सम्बन्ध माना गया है। और उसकी परिपूर्णता के लिये सौंदर्य, धन, लक्ष्मी, भोग आदि को गौण स्थान दिया गया है, इसलिये यहाँ के दाम्पत्य जीवन में सौष्ठव पाया जाता है, भावनायें पाई जाती हैं। इन्हीं के सहारे पतिव्रत धर्म का निर्वाह भी सुख रूप हो गया है और उसमें भौतिक कारण प्रतिबन्ध नहीं डाल पाते।

पश्चिम और मध्यकालीन दासता के प्रभाव यद्यपि अब भारतीय जीवन को भी दूषित करने लगे हैं और हमारी बेटियाँ पति निष्ठा के एकाँगी स्वरूप अर्थात् काम-सदाचार को ही मानने लगी हैं, दूसरा व्यवहारिक पहलू अब उपेक्षित-सा हो चला है, इसलिये यहाँ भी दाम्पत्य-जीवन में कष्ट, कलह और क्लेश बढ़ने लगा है। पूर्व नारियों जैसी दृढ़ता अब उनमें नहीं रही। कुछ शिक्षा का अभाव और कुछ रूढ़िवादिता के फलस्वरूप भी पति-पत्नी के बीच भेद-भाव की स्थिति पैदा होने लगी है।

पतिव्रत धर्म का पालन सुसन्तति को जन्म देने की दृष्टि से भी परमावश्यक है। वर्ण संकर सन्तान से सब प्रकार की क्षति पर प्रकाश डालते हुये गीता में कहा गया है-

दोषैरेतैः कुलघ्नानाँ, वर्णसंकर कारकैः। उत्साद्यन्ते जाति धर्माः कुलधर्माञ्च शाश्वताः॥ उत्पन्नकुल धर्माणाँ मनुष्याणाँ जनार्दन। नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥

गीता । 2। 43। 44।

अर्थात्- इन वर्णसंकर कारक दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल धर्म (आचार-विचार) और जाति धर्म (व्यवहार) नष्ट हो जाते हैं और इस तरह जिन सन्तानों का आचरण और विचार भ्रष्ट हो जाता है, उनके पितर अनन्तकाल तक नरक में निवास करते हैं।”

हिन्दू धर्म में नारियों का बड़ा पूज्य स्थान है। उनके बिना लोक परलोक कुछ भी नहीं सधता। स्त्रियाँ लौकिक सुख तथा आत्म-विकास दोनों में समान रूप से सहायक होती हैं। इस दिशा में अब तक उनका जो आदर्श रहा है, उसे आगे भी यथावत चलना चाहिये, तभी हमारा आत्म-गौरव, हमारी संस्कृति की रक्षा और हमारे धर्म का प्राण जीवित बना रह सकता है।


बाल अपराध बढ़े तो राष्ट्र गिर जायगा।

राष्ट्र का भावी विकास और निर्माण आज के व्यक्तियों पर उतना अवलम्बित नहीं है, जितना कल की पीढ़ी पर। विशाल स्तर पर चल रहे कार्यक्रमों का आधार स्तम्भ हमारे बालक हैं, जिनके लिये अनेक योजनायें बनाते हुये चले जा रहे हैं। जिस आधार स्तम्भ पर यह निर्माण कार्य चल रहा है, वही विश्रृंखलित, अस्त-व्यस्त और कमजोर हुआ तो ऐसी हजार योजनाएं बनें, लाभ कुछ न होगा, राष्ट्र उठेगा और उठकर गिर जायेगा। निर्माण का भवन बनेगा और बनकर धराशायी हो जायेगा।

जंगलों के बीच बसे हुये गाँवों से लेकर शहर के विद्यार्थियों तक उद्दण्डता, उच्छृंखलता और अनुशासनहीनता आज बिल्कुल सामान्य हो गई है। उनके चरित्र की झाँकी ले तो छुटपन से ही अश्लीलताओं, वासनाओं, दुर्व्यसनों की दुर्गन्ध उड़ती दिखाई देगी। छोटे-छोटे बच्चों को बीड़ी पीते देखकर ऐसा लगता है कि सारा राष्ट्र बीड़ी पी रहा है। युवतियों के पीछे अश्लील शब्द उछालता है तो लगता है, सम्पूर्ण राष्ट्र काम-वासना से उद्दीप्त हो रहा है। अपराधी बालकों ने आज सारे समाज को ही कलंकित करके रख दिया है।

न अभिभावकों के प्रति सम्मान और श्रद्धा और न समवयस्कों के साथ प्रेम और सहयोग। अध्यापक और बाजार में बैठे दुकानदार उनके लिये एक समान हैं। कुछ शेष रहा है तो फैशन, शौकीनी, सिनेमा, ताश, चौपड़ और मटरगस्ती।

बाल अपराध के आँकड़े उठाकर देखते हुये हाथ काँपते हैं, कलेजा मुँह को आता है। सन् 1958 में यह संख्या 15 हजार थी, जबकि इनसे कई गुने प्रकाश में नहीं आये हुये होंगे या जानबूझकर छुपा दिये गये होंगे। सन् 1961 में यह संख्या बढ़कर 33 हजार तक पहुँची और विगत चार वर्षों में भी इसी क्रम से अपराध हुये होंगे तो अब यह संख्या 54 हजार होनी चाहिये। इस दिशा में सरकारी और गैरसरकारी तौर पर प्रयास भी किये गये, किन्तु लाभ कुछ न निकला, समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती और उलझती ही गई।

परिपक्व व्यक्ति की मानसिक स्थिति का अनुमान करना आसान होता है, अतः उन्हें दण्ड से भी, शिक्षा से भी सुधारा जा सकता है। किन्तु बाल-अपराधों का सही कारण ज्ञात करना भी कठिन कार्य है, इसलिये यह समस्या अधिक दुरूह ओर गम्भीर हो रही है।

हम इस समस्या का अध्ययन प्रारम्भिक स्थिति से करते हैं और बालकों के अपराध का दोषी उनके माता-पिता तथा परिवार बालों को मानते हैं। यों तो समाज-प्रवेश के बाद बालक अपनी गतिविधियों का निर्माण दूसरों को देखकर भी करता है, पर यह उसकी रुचि के अनुरूप होता हैं और अच्छी या बुरी, विकासशील या अधोगामी रुचि की उत्पत्ति का मूल केन्द्र बालक के माता-पिता ही होते हैं। सच कहा जाय तो पिता माता की महत्वाकाँक्षायें ही बालक की रूप बनकर उभरती हैं और इन्हीं से उसके चरित्र का विकास होता है। ‘बर्ट’ तथा ‘टैपन’ आदि प्रमुख पाश्चात्य बाल अपराध शास्त्रियों ने भी इस बात की पुष्टि की है कि बालक के शारीरिक व मानसिक दोष वंशानुगत होते हैं। इन्हीं का आश्रय लेकर वह अपराधों की ओर प्रवृत्त होता है। वातावरण केवल साहस पैदा करता है। पास-पड़ोस स्कूल, मित्र, सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियाँ सहयोग तो देती हैं, किन्तु अपराधों का मूल कारण उनके परिवार वालों का रहन-सहन और उनकी आदतें ही होती हैं।

उदाहरण के तौर पर जिन घरों के लोग बीड़ी, सिगरेट, गाँजा भाँग या शराब पीते हैं उनके बालक भी इन से कोई नशा करना सीख जाते हैं। जिन घरों में मास पकाया जाता है, उन्हीं घरों के बच्चे माँस खाते हैं। ऐसा बहुत कम होता है कि माता-पिता शाकाहारी हों और बच्चे माँसाहारी हो जायँ। अवगुण अधिकाँशतः वंश परम्परा से ही विकसित होते हैं।

परिवार की निर्धनता जैसी कमियाँ, बुरे लोगों के संग, अवाँछित पड़ोस, नैतिकता को गिराने वाली सिनेमा जैसी प्रवृत्तियाँ, स्कूल के अविवेकपूर्ण वातावरण आदि भी बालक की मानसिक स्थिति का संगठन होता है किन्तु यदि माता-पिता पूर्व में बालकों में अधिक शक्ति-शाली संस्कार भर सकें तो बाहरी परिस्थितियाँ उतना प्रभाव नहीं डाल सकतीं और बच्चा बुराइयों से अधिकाँश बचा रह सकता है।

इस सम्बन्ध में कुछ उपयोगी सुझाव हैं, जिन्हें प्रयोग में लाया जा सकता है और उससे बालकों का चरित्रबल और मनोबल बढ़ाया जा सकता है।

जो लोग बालक की उपस्थिति में कैसा भी उचित-अनुचित कार्य किया जाना अयुक्त नहीं समझते वे भूल करते हैं। उनकी यह आम धारणा होती है कि बालक अज्ञान है, कुछ जानता नहीं पर वस्तुस्थिति इससे बिल्कुल विपरीत होती है। बालक सबसे चतुर विद्यार्थी, संवेदन-शील एवं ग्रहणशील बुद्धि वाला होता है। वह माता-पिता की प्रत्येक हरकत को बड़े गौर से देखता है कि वे क्या कर रहे हैं और फिर स्वयं भी वैसी ही चेष्टायें दिखाता है। कभी-कभी वह प्रारम्भ में वैसी रुचि भले ही न प्रदर्शित करे तो भी उसके अंतर्मन में वैसी ग्रन्थि बन जाती है, जो अवस्था के साथ विकसित होकर स्वभाव में परिवर्तित हो जाती है।

अपने घर से भेद-भाव की मंथरा को दूर रखें, अन्यथा वह राम और भरत का संग्राम उठा देगी। एक बच्चे को अधिक प्यार दूसरे को कम। पढ़ने वाले बच्चे को अच्छे कपड़े और जो घर में रहता है, उसे कम अच्छे कपड़े-आप इस बात से सावधान रहें। बच्चे आप से पूरा न्याय चाहते हैं। उन्हें समानता न देंगे तो उनकी विग्रह-बुद्धि बढ़ेगी और अपराधों की दिशा में अग्रसर करेगी।

अपने व्यवहार से बच्चे को साँवेगिक असुरक्षा का शिकार न बनाइये। आपके दुर्व्यवहार से, कटुता से, छल से तंग आकर कहीं ऐसा न हो कि वह विद्रोह खड़ा कर दे। अपना जीवन संकट में डाल ले और अपनी मनोवृत्तियों को दूषित बना ले। अनुचित व्यवहार की तरह अनुचित प्यार भी करना बालक के लिये हितकर नहीं होता क्योंकि ऐसा करने से वह अपने आपको विशेष महत्व समझने लगता है और जब आर्थिक जीवन में पहुँचने पर उसकी इस क्षेत्र में उपेक्षा की जाने लगती है तो वह विद्रोह कर देता है और समाज के प्रति उसके भी हृदय में उपेक्षा का भाव जागृत हो जाता है।

बच्चे के गुण, साहस और शौर्य की प्रशंसा में कृपण मत हूजिये। इन कार्यों में प्रशंसा से उसकी आन्तरिक प्रसन्नता होती है और यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह आत्मप्रशंसा के लिये बल प्रयोग के मार्ग का अवलम्बन ले सकता है।

बच्चे पर अविश्वास न कीजिये और उससे कुछ छुपाइये नहीं। अर्थ अनुशासन की उसे शिक्षा मिले यह तो ठीक है, पर यदि उसकी पुस्तकों के लिये या फीस के लिये पैसे देने हों तो उसे टोकिये मत, न ही ऐसा विचार व्यक्त कीजिये कि वह इस पैसे का दुरुपयोग तो नहीं करेगा? बच्चा यदि अपनी स्वाभाविक दुर्बलता के कारण कभी ऐसी गलती कर भी दे तो सुधार का एक तरीका है कि आप उसे अधिक बड़ी जिम्मेदारी दीजिये। उत्तरदायित्व सम्भालने में बालक प्रसन्न भी होते हैं और इससे उनमें कर्मठता भी आती है।

उनमें कुछ छिपाना इसलिये नहीं चाहिये क्योंकि इससे उनके हृदय में भी भेद-भावना उत्पन्न होगी और मानसिक कटुता बढ़ेगी। मन असंतुलित रहा तो उसके कार्य भी असंतुलित होंगे और उससे बालक का अहित ही होगा।

अपने घर का वातावरण और बालक के प्रति व्यवहार यदि आपने दुरुस्त कर लिया तो यह समझिये कि बालक को आपने 90 प्रतिशत अपराधी प्रवृत्ति से बचा लिया। आज बाल अपराधों में अभिवृद्धि का कारण लोगों की पारिवारिक अव्यवस्था ही है। इसमें सुधार हो जाये तो बालकों के चरित्र का विकास कोई कठिन बात न रह जाये।

शेष 10 प्रतिशत अपराधों का कारण समाज की बुराइयाँ होती हैं। बच्चे को बुरे लोगों की बैठक से बचाकर, सिनेमा आदि के स्थान पर साहित्यिक या अन्य कोई रचनात्मक आदत डालकर सुधारा जा सकता है। यह कार्य कोई मुश्किल कार्य नहीं। थोड़ा-सा ध्यान रहे तो बाल-अपराध बढ़े नहीं क्योंकि इनका कारण कोई और नहीं होता। अपने उत्तरदायित्व का समुचित पालन न करने से लोग स्वयं ही अपने बालकों को अपराधी बनाते हैं तो सुधार का श्रीगणेश भी अपने आप से ही किया जाना चाहिये।


उधार सौदा-ऋण समान

आर्थिक तंगी से बचने के लिये आप अपने बजट के मुताबिक खर्च करने की आदत डालिये। खर्च के मद में जीवनोपयोगी वस्तुओं को ही प्रमुख स्थान दीजिये। आकर्षण या विलासिता के सामान खरीदकर न अपव्यय कीजिये न अपनी कठिनाइयाँ बढ़ाइये। प्रदर्शन से कुछ लाभ नहीं होता। इस ओछी भावना को छोड़िये और उतना खर्च किया कीजिये जितनी आपकी आय है, जितना आप वेतन पाते हैं।

आप अनावश्यक वस्तुयें खरीद लाते हैं या जरूरत से ज्यादा सामान खरीद कर उसे बेकार करते रहते हैं। देखिये, कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको उधार लेने की आदत पड़ गई है।

अपनी आय से तो आप अपनी जरूरत ही पूरी कर सकते थे, फिर यह घड़ी, यह कैमरा, पंखा, कुर्सी, मेज, अलमारी, भारी बर्तन आपने कहाँ से खरीद लिये? दो ही साधन हो सकते हैं या तो आपने बेईमानी की हो या फिर उधार या किश्त में सौदा खरीद लिया हो। प्रायः इन्हीं दो कारणों से मनुष्यों का आर्थिक सन्तुलन बिगड़ता है। इन पर थोड़ा ध्यान दौड़ाइये कि आप ठीक कर रहे हैं या आर्थिक बोझ तो नहीं लाद रहे हैं।

प्रो. स्टुअर्ट केञ्जी ने अपनी पुस्तक “आपका जीवन” में आप बीती घटना पर प्रकाश डालते हुये लिखा है-”जब से हमने उधार लेना बन्द कर दिया, कुछ पैसा बचने लगा है। बचत का यह निर्दोष और सरल उपाय है। हमारे पास उधार की खरीद की वस्तुओं से दो स्टोर भर गये हैं। इन्हें आवश्यक समझकर नहीं खरीदा था। दुकानदार ने इनका लालच दिखाया और हमारी दिलचस्पी का अनुचित लाभ उठाकर हमारे हवाले कर दिया। उस समय तो प्रतीत नहीं हुआ, पर जब बिल भुगतान करना पड़ा तो मालूम हुआ, भारी गलती हो गई। अब मेरी धर्मपत्नी सौदा खरीदती हैं। सब नकद सौदा, उधार नहीं। हमारे पास पैसे उतने ही होते हैं, जितने से उपयोगी वस्तुयें खरीद सकें। शौक और मजेदारी की चीजें खरीदना छोड़ दिया है। अब न स्टोर सम्भालने की कठिनाई रही और न आर्थिक तंगी। नकद खरीदने की आदत ने सब ठीक कर दिया है।”

ऋण, साहूकार इस लालच से देता है कि एवज में उससे कुछ अधिक पैसे मिलेंगे। ब्याज न मिले तो बहुत कम लोग दूसरों की आर्थिक सहायता करना चाहेंगे। सौदागर भी ठीक ऐसे ही होते हैं। उन्हें मालूम होता है कि आपको वेतन कब मिलता है। उतने समय के लिये उधार वस्तु इस हिसाब से देंगे कि जितने की आपने वस्तु खरीदी है, उसका ब्याज भी साथ में जोड़ लेंगे। इस तरह 1 रु. की वस्तु सवा 1 रु. में देना तो सामान्य बात होगी, पर यदि दुकानदार अधिक लालची है तो वह ड्योढ़े दाम तक वसूल करता है। आप यह समझते हैं कि आपका काम चल गया पर दरअसल ऐसा समझना भारी भूल है। जितने पैसे से आप महीने भर का गुजारा कर सकते थे, उधार लेने से आपको उस पैसे से ड्योढ़े की जरूरत पड़ेगी। इस अतिरिक्त व्यय की पूर्ति दो ही तरह से हो सकती है, या तो आप सदैव कर्ज में बने रहें या फिर अवाँछनीय तरीके से रुपया कमाने का प्रयत्न करें। यह दोनों ही अवस्थायें दुःखदायी होती हैं। दोनों से मनुष्य के कष्ट और क्लेश बढ़ जाते हैं।

ऐसा भी होता है कि आप एक पर्चा लिखकर दुकान से सामान मँगा लेते हैं, अपने पास उसका कोई लिखित हिसाब नहीं रखते। दुकानदार उस पर्चे का सामान आपको दे देता है और कीमत से अधिक पैसे अपनी बही में आपके नाम चढ़ाकर पर्चे को फाड़कर फेंक देता है। महीने-भर बाद जब हिसाब होता है और आपको अनुमान से अधिक पैसे देने पड़ते हैं तो हिसाब पूँछते है पर एक-एक तारीख में आपने क्या मँगाया है, इसका आपके पास कोई प्रमाण नहीं होता। दुकानदार अपनी बही दिखा देता है-देखिये महाशय! अमुक तारीख में इतने का सौदा गया अमुक में इतने का-कुल इतना पैसा हुआ। इसके बाद पैसा भुगतान कर देने या लड़ाई-झगड़े के अतिरिक्त आपके पास कोई चारा नहीं रह जाता। आपको दुबारा फिर उसी दुकान में जाना है, इसलिये आपको ही हार मानकर पैसा चुकता करना पड़ता है। एक का डेढ़ देना पड़ता है।

किश्त पर सौदा लेने की प्रथा का इन दिनों बहुत विस्तार हो गया है। दुकानदारों की उसमें उदारता हो, ऐसी बात नहीं, यह तो लोगों को सौदा खरीदने के लिये लालच देने का तरीका है। आप की इच्छा थी कि रेडियो खरीद लेते पर वह तीन सौ रुपये में आता है। आपका वेतन कुल दो सौ रुपये मासिक है, इस पर आवश्यक खर्चे भी हैं। ऐसी अवस्था में रेडियो कैसे खरीद पाते? आपने विज्ञापन देखा कि रेडियो किश्त में मिलता है। तीन किश्तें हैं। प्रति किश्त में सवा सौ रुपये देने होंगे। इतना पैसा आप किसी तरह बचा सकते हैं, इसलिये झट से दुकान पहुँचे और आर्डर दे दिया। 6 महीने की तीन किश्तें हो गई हैं। कुल मिलाकर तीन सौ पचहत्तर रुपये देने पड़े। तीन सौ रुपये का रेडियो तीन सौ पचहत्तर रुपये में लिया। 6 महीने में पचहत्तर रुपये गँवा दिये। इतने से कोई बड़ा काम ले सकते थे, पर आपने ऐसा सोचा कहाँ? आपको तो रेडियो की जल्दी थी। यह रुपये बच्चों की पढ़ाई के काम आयेंगे, इस पर आपने विचार ही कब किया?

उधार लेने के बजाय आप प्रति मास अपनी आय से पचास रुपये पोस्ट ऑफिस में डाल देते तो शेष पैसों से आपका महीने-भर का खर्च भी आराम से चलता रहता और छः महीने पीछे रेडियो जितनी कीमत आराम से जमा हो जाती। पचहत्तर रुपये भी न जाते और छः महीने में पोस्ट ऑफिस से 300) पर ब्याज और मिल जाता। तीस वर्ष तक आपका घर बिना रेडियो का रहा तो क्या छः महीने और नहीं रह सकता था। आप जल्दी न किया करें और मनचाही वस्तुओं को किश्त पर खरीदने की अपेक्षा उतना पैसा बचाकर खरीद लिया करें, यह आपके आर्थिक सन्तुलन में कहीं अधिक सहायक हो सकता है।

नकद वस्तु खरीदना बड़ी समझदारी की बात है इससे आपकी आवश्यकतायें सीमित रहती हैं और किसी तरह के कोई झगड़े नहीं बढ़ते। एक रुपये की चीज एक रुपये में ही मिल जाती है और अनावश्यक सामान का स्टोर जमा करने की बुराई से भी बचे रहते हैं।

नकद सौदा खरीदने में दुकानदारों में भी आपकी साख बनी रहती है और वे सहसा आपको ठगने का साहस नहीं कर सकते। आप अपनी ही कमजोर नीति के शिकार होते हैं और उसी से दुकानदारों को आप से अधिक पैसा ठग लेने का साहस होता है।

बाजार में ऐसे भी दुकानदार होते हैं, जो ईमानदार आदमी को वाक्पटुता द्वारा, कलेंडर, चित्र या तस्वीर देकर अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं। कुछ दिन अच्छा सामान देते हैं, बाद में बुरा सामान देने की धूर्तता भी करने लगते हैं और यह उदारता दिखाने लगते हैं कि आप जब चाहें, उनके यहाँ से उधार सामान खरीद ले जायें। कोई नई चीज मँगायेंगे तो आपको दिखाकर कहेंगे-औरों को तो इस दाम देते पर आपको कम में इतने में दे देंगे। ऊँची कीमत की वस्तु आपको उधार में दे देंगे। आप यह समझेंगे कि कम कीमत में चीज मिल रही है, बाद में ही पैसे दे देंगे तो क्या हर्ज है? पर ऐसा करना भी भूल है। दुकानदार अपनी आमदनी देखता है और ग्राहक बनाने के लिये प्रायः हर किसी से वह ऐसी ही प्रलोभनपूर्ण बातें करता है। आपको उसकी दिखावटी आत्मीयता पर नहीं आकर्षित होना चाहिये। अगर कोई वस्तु दरअसल उपयोगी ही हो और उस समय आपके पास पैसे न हों तो उसके निर्माता का पता जान लीजिये और बाद में स्वयं जाकर या पोस्ट द्वारा मँगा लीजिये। अच्छी खरीद का यह अच्छा तरीका है। इससे निर्माता और उपभोक्ता का सीधा सम्बन्ध हो जाने के कारण बीच में दुकानदार द्वारा गड़बड़ी पैदा करने की सम्भावना भी दूर रहती है। ऐसी चतुरता आर्थिक सन्तुलन की दृष्टि से हर गृहस्थ को बरतनी चाहिये।

छोटी-छोटी आदतें दुरुस्त हो जायें तो कम आय के लोग भी आराम की जिन्दगी जी सकते हैं। उधार सौदा लेना बुरा स्वभाव है, यह ऋण से कम नहीं। जहाँ तक संभव हो, हमें नकद खरीदने की ही आदम डालनी चाहिये।


परिजनों का पालन ही नहीं, निर्माण भी

हमारी, आये दिन अनेक ऐसे व्यक्तियों से भेंट होती रहती है जो गृह-कलह, पुत्रों की स्वेच्छाचारिता, धर्मपत्नी से विचार न मिलने का दुःख प्रकट किया करते हैं। उनके घरों में धन और साधनों का अभाव रहता हो सो बात नहीं, सम्पन्न परिवारों में भी यह दुर्दशा सामान्य हो गई है। इसका एक ही कारण है परिवार और उसके सदस्यों के निर्माण पर ध्यान न देना। धन, मकान जायदाद आदि का उत्तराधिकार परिजनों को दे जाना उतना महत्व नहीं रखता, जितना उनको सद्गुणी, सुशील बनाना महत्व रखता है। चरित्र के साँचे में ढाले गये कम साधनों में भी पूर्ण प्रसन्नता का जीवन व्यतीत कर लेते हैं। दुर्गुणी व्यक्तियों के लिये तो सम्पन्नता अभिशाप ही सिद्ध होती है।

देवदास एक सम्पन्न परिवार का स्वामी था, घर में किसी बात की कमी न थी। धन, रुपया, मकान, स्त्री, बच्चे आदि किसी बात की कमी न थी पर उसका घर सुखी न था। सब आपस में खींचातानी रखते थे, भाई-भाई में नहीं बनती थी। सास-बहुओं में नहीं पटती थी। घर कोलाहल से भरा रहता था, शान्ति का नाम निशान तक न था।

देवदास एक सन्त के पास गया और जाकर बोला-भगवन्! मैंने खूब धन कमाया, मुझे किसी बात की कमी नहीं, फिर भी परिवार वालों से तंग आ गया हूँ। महाराज! बताइये क्या मेरी ग्रह-दशा ठीक नहीं है अथवा किसी ने कोई तान्त्रिक प्रयोग कर दिया है?

सन्त ने खूब विचार किया और उत्तर देने के लिये देवदास को शाम तक के लिये रोक लिया।

सन्त की कुटी के आगे से प्रतिदिन कुछ स्त्रियाँ लकड़ियों को बोझ लेकर गुजरती थीं और उधर थोड़ी देर तक बैठकर सुस्ताया करती थीं। नियमानुसार वे आज भी आईं। उनकी दशा पहले दिन जैसी ही थी। किसी का बोझ अधखुला, किसी की लकड़ियाँ उलझी हुईं। कई बेचारी अब तक दो-दो तीन-तीन बार बोझ बाँध चुकी थीं पर बोझ थे कि बार-बार अस्त-व्यस्त हो जाते थे। उन्हें सम्भालना कठिन था। स्त्रियों के मुख भी उसी तरह अस्त-व्यस्त और मुरझाये हुये थे।

उनमें एक सोलह वर्ष का बालक भी था। बोझ तो औरों से उसका छोटा था पर करीने के साथ बँधा हुआ। एक एक लकड़ी सुन्दर ढँग से सजाई हुई। सब एक मजबूत रस्से से बँधी हुई, क्या मजाल कि कोई लकड़ी इधर-उधर खिसक जाय। छाया में बैठते ही स्त्रियाँ आराम करने के बजाय अपने बोझ ठीक करने में लगी थी और वह बालक उनकी इस कमजोरी की चुटकी ले लेकर हँस रहा था।

महात्मा ने देवदास को बुलाया और बताया- देखो भाई, इन स्त्रियों की तरह अधिक से अधिक लकड़ियाँ काट लेने में ही सफलता नहीं वरन् उन्हें इस बच्चे की तरह सुदृढ़ और सुव्यवस्थित ढंग से बाँधना भी चाहिए। आपकी असफलता का रहस्य भी ऐसा ही है। अब जाओ और उसे सुव्यवस्थित करने का प्रयत्न करो, तभी आपकी कठिनाई दूर हो सकती है।

देवदास की तरह परिवार बना लेना कोई कठिन बात नहीं है। बच्चे तो पशु-पक्षी भी पैदा कर लेते हैं। धन उत्तराधिकार में बिना परिश्रम भी मिल सकता है। पर इन सब से पारिवारिक व्यवस्था का कोई सम्बन्ध नहीं है। परिवार में स्वर्गीय सुख का वातावरण उतारने के लिये उसका निर्माण आवश्यक है। आपके घर में कम व्यक्ति हों, कम रुपया पैसा हो, कम जमीन हो तो भी कुछ हर्ज की बात नहीं। यदि आप परिवार के निर्माण पर ध्यान देते हैं तो आप निश्चित मान लीजिये कि आर्थिक तंगी में भी बड़ा सुख प्राप्त कर सकते हैं।

कुछ मनुष्यों का ऐसा विश्वास हो जाता है कि अमुक दोष, त्रुटि, अमुक न्यूनता मेरे परिवार में आ गई है। मैं विवश हूँ। क्या कर सकता हूँ। अब तो कोई भी मेरे कहने पर नहीं आते। यह गलत विचारधारा हैं। मनुष्य स्वभाव, गुण और चरित्र को जब जैसे चाहे आत्म बल से नये मार्गों में मोड़ सकता है। विवशता की गलत विचारधारा मन से निकाल देने में ही लाभ है। आप फिर से परिजनों के उत्थान में प्रवृत्त हूजिये। अभी भी आप में वह शक्ति और क्षमता है, जिससे परिजनों का निर्माण आप भली भाँति कर सकते हैं।

आपके लिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक सदस्य के साथ सच्चाई का व्यवहार किया कीजिये। ऐसा होता है कि जो अपने अधिक नजदीकी रिश्ते होते हैं, उनकी भलाई और सुख का अधिक ध्यान दिया जाता है और दूसरों का कम। बेटे की शिक्षा और उसके कपड़ों पर अधिक व्यय करते है, जब कि छोटे भाई के लिये वैसा नहीं करते। अपनी धर्म पत्नी के लिये अच्छी किस्म की साड़ी लाते हैं, घर की स्त्रियों को कम अच्छी। कभी-कभी यह काम आप चोरी-छिपे भी करते हैं, पर विश्वास कीजिये सच्चाई उस सूर्य की तरह है, जिसे बहुत देर तक बादलों की ओट में नहीं रख सकते। चालाकी एक न एक दिन खुलती अवश्य है और फिर उसके फल स्वरूप लड़ाई-झगड़े, दंगे-फसाद भी होते हैं।

यदि आप चाहते हैं कि आपका बच्चा सच्चाई और ईमानदारी का व्यवहार करे तो सर्वप्रथम उसका प्रयोग आपको स्वयं ही करना पड़ेगा। आप छल करेंगे, बच्चा अवश्य करेगा, आप झूठ बोलेंगे, बच्चा अवश्य झूठ बोलेगा। उसे जैसा वातावरण मिला है, उससे बाहर जायेगा कैसे? आप अपने परिजनों को सद्गुणी बनाना चाहते हों तो कृपया यह अभ्यास पहले अपने जीवन से ही प्रारम्भ करिये, तभी कुछ सफलता मिल सकेगी अन्यथा परिवार निर्माण का आपका स्वप्न अधूरा ही रहेगा।

बच्चों को श्रमशील बनाना आपका काम है। यह रुचि बच्चों में प्रकृतिदत्त होती है। छोटी अवस्था में ही बच्चों में कुछ न कुछ करते रहने की प्रवृत्ति होती है। इस प्रवृत्ति को अच्छी दिशा दे दी जाय तो बच्चे स्वयं परिश्रमशील बन जाते हैं। जब उन्हें कोई मार्ग-दर्शन नहीं मिलता तो ही वे बुराइयों की खटपट शुरू करते, बुरे बनते और दुष्परिणाम भुगतते हैं। आप अपने परिवार के प्रत्येक व्यक्ति को कुछ रचनात्मक कार्य दिया करें और उससे उत्पन्न होने वाला फल भी उन्हें दे दिया करें, इससे उनकी रचनात्मक क्रियाशीलता विकसित होती रहेगी। जो व्यक्ति दिन भर काम करे और उसका मूल्य न मिले तो संभव है, वह गड़बड़ पैदा करे। इसलिये श्रम के साथ संपत्ति का उचित बंटवारा रखना भी उन्हें बताइये। सद्गुणों की अभिवृद्धि के साथ स्वजनों में यह श्रमशीलता का भाव भी आप उत्पन्न कर सकें तो यह आपकी बड़ी और सार्थक देन होगी।

परिवार में स्वच्छता और सफाई का महत्व भी कम नहीं। इससे हमारे आचरण प्रभावित होते हैं और परिजनों की मानसिक स्थिति का निर्माण होता है। स्वास्थ्य और रोग से रक्षा तो इसके स्थूल लाभ हैं। वस्तुतः स्वच्छता और सफाई से मनुष्य की कार्य-क्षमता बढ़ती है और अच्छे गुणों का विकास होता है।

घर की स्वच्छता की जिम्मेदारी घर के सदस्यों को सौंप दीजिये। कम से कम प्रति रविवार के दिन तो घर की सामूहिक सफाई होनी ही चाहिये। व्यक्तिगत सफाई का भी ध्यान न भूलें। सबके स्नान, साबुन आदि की व्यवस्था भी रहनी चाहिये।

सत्यनिष्ठा, सद्गुणों के प्रति रुचि, श्रमशीलता और स्वच्छता, सफाई के चार बहुमूल्य हीरे परिवार को देने के पश्चात् उन्हें अनुशासन में रहने का ढंग और सिखा दीजिये। परिवार में एक बच्चे से लेकर बूढ़े तक सबको अनुशासन का, नियमबद्धता का जीवन जीना चाहिये। ऐसा कोई भी कार्य उन्हें न करना चाहिये, जिससे परिवार की प्रतिष्ठा में धक्का लगता हो। शिष्टाचार, सद्भाव और परस्पर एक दूसरे का अवस्था के अनुसार सम्मान होना चाहिये। परिवार में अभिवादन करने और बड़ों की आज्ञा मानने की भी प्रथा अनिवार्य रूप से चलती रहनी चाहिए। यह सब अनुशासन के अंतर्गत आती हैं, इनका पालन भी कड़ाई के साथ ही होना चाहिये।

ये पाँच नियम ऐसे हैं, जिनसे परिवार के सदस्य उसी तरह व्यवस्थित और संबद्ध बने रहते हैं, जैसे कोई लकड़ियों का बोझ भली प्रकार बाँधकर सुविधापूर्वक कोसों तक लेता चला जाता है। इन नियमों में बंधे हुये परिवार विशृंखलित न होकर बहुत काल तक सुसंगठित बने रहते और सुख का जीवन जीते रहते हैं।

युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति


वर्तमान युद्ध और हमारा कर्त्तव्य

पाकिस्तान द्वारा थोपे हुए युद्ध में आत्मरक्षा के लिए हमें विवश होकर लड़ना पड़ रहा है। मातृभूमि की अखण्डता और सुरक्षा के लिए हमारे रणबांकुरे युद्ध भूमि में अपने जौहर दिखा रहे हैं। अनीति के विरुद्ध न्याय और मनुष्यता की रक्षा के लिए लड़े जाने वाले इस युद्ध में जीत हमारी ही होगी। पाण्डवों की विजय उनके आदर्श की सत्यता के कारण हुई थी। रावण और कंस विपुल शक्ति होते हुए भी न्याय और नीति से विरत होने के कारण परास्त हुए थे। वर्तमान युद्ध का अन्तिम परिणाम भी यही होगा।

स्वर्ण की आभा कसौटी पर कसे जाने और अग्नि से तपाये जाने पर निखरती है। जातियों को भी अपनी समर्थता एवं पात्रता की परीक्षा समय-समय पर देनी पड़ती है। इसी से उनका शौर्य, पराक्रम एवं गौरव निखरता है। भारतीय राष्ट्र को आज ऐसी ही अग्नि परीक्षा में होकर गुजरना पड़ रहा है।

पुराने समय में युद्ध दो दलों की सेनाओं के बीच होते थे। सेनाओं के बाहुबल पर हार-जीत निर्भर रहती थी पर अब परिस्थितियाँ बदल गई हैं। सेना के साथ-साथ दूसरे मोर्चे पर देश की जनता को लड़ना पड़ता है। अब युद्धों में शस्त्र बल ही एकमात्र आधार नहीं रहा, वरन् उसके पीछे अन्य अनेक महत्वपूर्ण पहलू भी जुड़ गए हैं। जनता के सहयोग से ही कोई बड़ा युद्ध लड़ा जा सकता है। सैनिकों की वीरता तथा प्रचुरता जन उत्साह पर निर्भर है। इसी प्रकार युद्ध में काम आने वाली विपुल साधन-सामग्री को भी हमें जुटाना पड़ता है। सैनिकों की निपुणता ही नहीं, अब युद्ध की निर्णायक भूमिका में युद्धरत देशों की प्रजा की तत्परता का महत्वपूर्ण स्थान रहता है। भारतीय नागरिकों को भी अपने स्तर की दूसरे मोर्चे की लड़ाई लड़नी पड़ती है।

सैनिकों को भर्ती, प्रशिक्षण, शस्त्रों की उपलब्धि, मोर्चे का चुनाव एवं युद्ध कौशल, आर्थिक प्रबन्ध, आवश्यक सामान का जुटाना, आन्तरिक शान्ति, जन उत्साह, कूट-नीति के ऊहापोह जैसे कार्य प्रधानतया सरकार को सम्भालने पड़ते हैं। इसलिए हर देशभक्त नागरिक का कर्तव्य है कि अपनी सरकार को इन साधनों के जुटाने में पूरा-पूरा सहयोग दे। सरकार की शक्ति जन सहयोग पर निर्भर रहती है। इसलिए इस धर्म युद्ध में अपनी सरकार को सफल बनाने के लिए जो भारतीय नागरिक जिस क्षमता का हो, उसे उसी स्तर पर अपनी सामर्थ्य भर सरकार को सहयोग देना चाहिये।

जो सेना में भर्ती होने योग्य हो, उन्हें वीरतापूर्वक इसके लिए अपने को प्रस्तुत करना चाहिए। टैंक तोड़ने वाली तोपों और शत्रु के दाँत खट्टे करने वाले वायुयानों के खरीदने के लिए धन की जरूरत पड़ती है। गोला बारूद के लिए और सैन्य व्यवस्था के लिए पैसा चाहिये उसके लिए सरकार टैक्स लगावे उसे तो अब कठिनाइयों को सहते हुए भी सहन करना ही चाहिए, साथ ही अपनी विशेष देशभक्ति के प्रमाण स्वरूप अपनी स्थिति के अनुरूप सुरक्षा कोष में भी धन देना चाहिए । घायल सैनिकों को जीवन रक्षा के लिए रक्त चढ़ाना पड़ता है। हम अपने शरीर का थोड़ा सा रक्त देकर बिना कोई जोखिम उठाये राष्ट्र रक्षा में महत्वपूर्ण योग दे सकते हैं। जगह-जगह नागरिक सुरक्षा दल स्थापित दल स्थापित हो रहे हैं, उनमें स्वयं सेवक के रूप में भर्ती होकर आन्तरिक सुरक्षा की दृष्टि में बहुत काम कर सकते हैं। शत्रु के एजेन्ट, जासूस ऐसे अवसरों पर भारी हानि पहुँचाते हैं। एजेन्टों के रूप में पाकिस्तान ने तो छतरीधारी सैनिकों के रूप में बहुत लोग भेजे हैं। इनकी पूरी-पूरी खोज खबर रखनी चाहिए और जिसे राष्ट्र विरोधी हरकत करते देखा जाय उसे पुलिस के सुपुर्द किया जाय। अफवाहें हानिकारक होती हैं। ऐसी अफवाहें जो भ्रम एवं आतंक उत्पन्न करती हैं, फैलने नहीं देनी चाहिए। इनसे बड़ी हानि पहुँचती है। अपराधों और उपद्रवों के बढ़ने की ऐसे समय सम्भावना रहती है, इसलिए हर देश भक्त को चाहिए कि ऐसे कटु प्रसंग उत्पन्न होने की जहाँ भी सम्भावना हो, वहाँ उनकी सम्भावना समाप्त करने के लिए संगठित प्रयत्न करें।

युद्ध के दिनों में खेतों और कारखानों, दुकानों और बाजारों के मोर्चे पर ही हर नागरिक को जूझना पड़ता है। किसान अधिकाधिक खाद्य उत्पन्न करे ताकि विदेशों से आने वाले अन्न की आवश्यकता न पड़े। सर्व साधारण की अन्न का उपयोग कम और शाक भाजियों का प्रयोग बढ़ाना चाहिए क्योंकि ऐसी विषम परिस्थितियों में बाहर से अन्न आने से भी ऐसी ही रोक लग सकती है, जैसी शस्त्रों पर लगी है। ऐसी दशा में खाद्य की दृष्टि से देश का स्वावलम्बी होना आवश्यक है। व्यापारियों का कर्तव्य है कि वे राष्ट्रीय संकट के समय मुनाफाखोरी, जमाखोरी, अति लाभ, चोरबाजारी को पनपने न दें। न वस्तुओं के दाम बढ़ने दें। जीवन भर रुपया कमाया है, आगे भी कमायेंगे, ऐसे विषम समय में कम नफा या बिना नफा के भी काम चलाने का साहस करना चाहिए। श्रमिकों का कर्त्तव्य है कि कारखानों, फैक्ट्रियों एवं उद्योगों का उत्पादन अधिकाधिक बढ़ायें। अधिक श्रम करें और अधिक सावधानी बरतें। औद्योगिक झगड़े इन दिनों न बढ़ने दें। विवादों को शान्ति से सुलझावें। हड़ताल या ताला बन्दी जैसे अवसर न आने दें। सर्वसाधारण को वस्तुओं का उपयोग कम से कम करना चाहिए। ताकि उस बचत से देश की अन्य आवश्यकतायें पूर्ण हो सकें। कहीं कोई ऐसा काम न होने देना चाहिए, जिससे सरकार की शक्ति युद्ध मोर्चे से हट कर घरेलू झंझटों में लगे। इन दिनों उपभोग की वस्तुओं पर नियन्त्रण लग सकते हैं, ‘रोशनी गुल’ जैसे प्रतिबन्ध लग सकते है, उन्हें सच्चे मन से पालन करना चाहिए । अनावश्यक यातायात नहीं बढ़ाना चाहिए, ताकि परिवहन साधनों एवं रेल-मोटर की सड़कों को लड़ाई सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति में प्राथमिकता मिल सके।

युद्ध के दिनों योद्धा सैनिक मोर्चे पर लड़ते हैं, पर प्रजाजनों को भी अपने को दूसरे मोर्चे का सैनिक ही मानना पड़ता है। देश भक्ति की, राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों की परीक्षा ऐसे ही समय होती है। मातृ भूमि पर आये हुए संकट के समय उसमें प्रत्येक भारतवासी को उत्तीर्ण होने का प्रयत्न करना चाहिए। जिसकी जो स्थिति है, उसे अपनी सामर्थ्य के अनुरूप राष्ट्र को हर प्रकार शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों का इन संकट की घड़ियों में विशेष कर्त्तव्य है। वे नव-निर्माण योजना के व्रतधारी सदस्य हैं। निर्माण के लिए सुरक्षा सबसे पहले चाहिए। आक्रमण से होने वाले विनाश को रोका जाय, तभी तो कुछ निर्माण होगा। इसलिए जिस श्रद्धा और लगन के साथ हम लोग नैतिक, सामाजिक एवं बौद्धिक स्तर का नव-निर्माण के प्रयास कर रहे थे, वैसे ही वरन् उससे भी अधिक उत्साह के साथ हमें वर्तमान युद्ध में मातृ-भूमि की स्वाधीनता एवं सुरक्षा के लिए प्राणपण से कार्य करना चाहिए। उपरोक्त कर्त्तव्यों को स्वयं तो पालन करना ही चाहिए, साथ ही जन-साधारण में भी वही प्रवृत्तियां उत्पन्न करनी चाहिए। आमतौर से लोगों की प्रवृत्तियां स्वार्थपरता एवं संकीर्णता के दायरे तक ही सीमित रहती है। लोकहित की उपेक्षा की जाती रहती है। लोक मानस को इस स्तर से ऊँचा उठाने और उसमें देश भक्ति की, त्याग-बलिदान की भावनाएँ उभारने के लिए प्रबुद्ध लोगों के विशेष प्रयत्नों की आवश्यकता होती है। हमें वही करना चाहिए अपने-अपने क्षेत्रों में वह वातावरण बनाना चाहिए, जिससे लोग आज की अग्नि-परीक्षा के समय अधिकाधिक शौर्य, साहस, त्याग एवं बलिदान का परिचय देने के लिए समुद्यत हो सकें। इस दृष्टि से जहाँ जो कार्यक्रम बन सकें, वह बनाने चाहिए। ऐसे प्रयासों को संगठित रूप से कार्यान्वित करने का प्रयत्न किया जाय तो उसमें बहुत काम होता है। युग-निर्माण शाखाओं के संगठन हर जगह मौजूद हैं, इन संगठनों को यह देखना है कि वे अपने क्षेत्र में क्या कर सकते हैं? जहाँ जैसी संभावना हो, वहाँ उस तरह की गतिविधियाँ तत्काल आरम्भ कर देनी चाहिए। समय की इस माँग को पूरा करने में हमें तनिक भी आलस्य- प्रमाद न करना चाहिए।

पिछले चीन आक्रमण के समय अखण्ड- ज्योति परिवार के सदस्यों ने इतना काम किया था कि उसका लेखा-जोखा यदि प्रकाशित किया जाय तो उस पर प्रत्येक देशभक्त को गर्व हो सकता है। अब की बार भी हमें बहुत कुछ करना है। भारत सरकार के रक्षा मन्त्री श्री चौहान को पत्र लिख कर हमने अपनी व्यक्तिगत सेवाएं अर्पित की हैं और लिखा है कि वे हमारे शरीर एवं साधनों का राष्ट्र रक्षा के लिए जो भी उपयोग करना चाहें करें। साथ ही एक हजार सैनिक, एक मन रक्त तथा एक लाख से ऊपर सुरक्षा कोष जुटाने के लिए आश्वासन दिया है। धन के लिए कोई फंड अलग से नहीं खोला जायेगा, वरन् जिन्हें जो भेजना होगा-सेक्रेटरी, राष्ट्रीय सुरक्षा कोष, दिल्ली के पते पर भेज दें। चीनी आक्रमण के समय धन संग्रह कर्ताओं की कई गड़बड़ियों की चर्चा सुनी गई थी। वैसा अवसर न आने पावे, इसलिए मनीआर्डर, चैक, ड्राफ्ट आदि से सीधा ही धन भेजना अधिक उपयुक्त है।

व्यक्तिगत रूप से इन दिनों हम सुरक्षा कार्यों को मजबूत बनाने के लिए अपना सारा ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। इसलिए कई आवश्यक कार्यक्रमों को भी अस्थायी तौर से स्थगित कर दिया है। जाड़े के दिनों में विभिन्न प्रान्तों का दौरा करने का कार्यक्रम बनाया गया था। वह स्थगित कर दिया गया है। कहीं कोई कार्यक्रम हो तो बात दूसरी है पर अब अपनी ओर से हम दौरा करेंगे। मथुरा रहकर 3000 शाखाओं में प्रेरणा भरने तथा परिवार के कर्तव्यों का आवश्यक मार्ग दर्शन करने सम्बन्धी कार्य अधिक अच्छी तरह हो सकता है। बाहर चले जाने पर जहाँ जाते, वहाँ तो कार्य होता, पर देश भर से स्वजनों का मार्ग दर्शन करने, उन्हें पन्नों द्वारा आवश्यक मार्ग-दर्शन करने का सिलसिला ही बन्द हो जाता, फिर देश के विशिष्ट व्यक्तियों के साथ परामर्श, उनके एवं देशव्यापी नागरिक मोर्चे की योजनाबद्ध रूप से अग्रगामी बनाने के लिए भी यह आवश्यक था कि दौरा इन दिनों स्थगित रखा जाय और सुरक्षात्मक कार्यक्रमों में अपनी शक्ति लगा दी जाय। हमारा व्यक्तित्व बना ही इस ढंग का है कि राष्ट्रीय रक्षा एवं सम्मान के लिए जो सामयिक कर्तव्य सामने आवे उनकी उपेक्षा हो ही नहीं सकती। अंग्रेजी सरकार के विराट् स्वाधीनता संग्राम में पौने चार वर्ष तक जेल की यन्त्रणाएं सहीं। चीन का आक्रमण जितने दिन रहा उतने दिन पूरी तरह नागरिक मोर्चे को मजबूत बनाने के लिए काम करते रहे। अब वर्तमान इस राष्ट्रीय सम्मान के दाँव पर लगा देने वाले संघर्ष में भी हम पीछे नहीं रह सकते। पूजा, उपासना हमें प्राणों से अधिक प्रिय हैं, पर उसके साथ-साथ देश-सेवा के सामयिक कर्तव्यों का पालन करते रहने में हमें कोई अड़चन नहीं दिखाई पड़ती।

जिन शाखाओं ने जाड़े के दिनों में अपने यहाँ हमारे दौरे के संदर्भ में सम्मेलन आदि रखे थे, वे अब उन्हें स्थगित समझें। यदि पीछे उनकी आवश्यकता हुई तो नये सिरे से इस सम्बन्ध में विचार किया जायगा।

एक बात स्पष्ट है, हमें राष्ट्र को अधिक सबल एवं समर्थ बनाने के लिए रचनात्मक कार्यक्रमों में पहले से भी अधिक तत्परता के साथ लगना होगा। राष्ट्र संघ के प्रयत्न से फिर युद्ध विराम होता है या नहीं? लड़ाई देर तक चलती है या जल्दी बन्द होती है, इसका कोई महत्व नहीं। जब तक हमारे देश का प्रत्येक घर लोह-दर्ग और प्रत्येक नागरिक लौह-पुरुष नहीं बन जाता तब तक आक्रमणों की सम्भावना सदा ही बनी रहेगी। गरम युद्ध शीत युद्ध में और शीत युद्ध, गरम युद्धों में बदलते रहेंगे। जब तक ईर्ष्यालु लोग यह अनुभव न कर लें कि लड़ने में उन्हीं की हानि है, तब तक वे अनुचित लाभ उठाने की दुरभिसंधियाँ करते ही रहेंगे। संसार का नियम ही कुछ ऐसा है-’दुर्बल का दैव भी घातक होता है’, की उक्ति सार्थक ही सिद्ध होती हैं। चीन ने कुछ दिन गरम युद्ध किया था, अब बहुत-सा भू-भाग दबा कर शीत युद्ध जारी रख रहा है। पाकिस्तान अठारह वर्ष से शीत युद्ध लड़ रहा था, अब उसने गरम युद्ध छेड़ दिया है। शीत युद्ध भी कम खर्चीला और चिन्ता का विषय नहीं होता। ऐसे संघर्ष में भारत को अभी काफी समय तक संलग्न रहना पड़ेगा। युद्ध विराम चीन ने भी कर लिया है पर इसके साथ लड़ाई जारी है। पाकिस्तान पहले भी युद्ध विराम कर चुका है, अपनी जान बचाने के लिए फिर भी कर सकता है, पर इससे भी युद्ध का अन्त न होगा। वास्तविक हल तब निकलेगा, जब आक्रान्ता यह अनुभव करेंगे कि लूट-खसोट की घात लगाने में नहीं, भारत के साथ मित्रता करने में उनका लाभ है। यह स्थिति तब आवेगी जब हम सैन्य दृष्टि से ही नहीं, सामाजिक, शारीरिक, आर्थिक, नैतिक, बौद्धिक सभी दृष्टियों से सुसम्पन्न एवं समर्थ होंगे। युग निर्माण का उद्देश्य ऐसी ही विशिष्टता एवं बलिष्ठता प्राप्त करना है। इसलिए इन प्रयासों को दिन-दूने रात-चौगुने उत्साह के साथ आगे बढ़ना होगा। वास्तविक शक्ति का स्रोत यही हैं। जब राष्ट्र का हर नागरिक लौह-पुरुष सिद्ध होगा तो उसकी शक्ति अजेय होगी, कोई शत्रु उसकी ओर आँख न उठा सकेगा। जब तक वह स्थिति नहीं आयेगी, खतरा इधर से न सही, उधर से बना ही रहेगा। राज्य अपने क्षेत्र में समर्थता उत्पन्न करता है। धर्म को अपना मोर्चा संभालना चाहिए। नैतिक शक्ति के लिए राज्य-तन्त्र और आन्तरिक शक्ति के लिये धर्म-तन्त्र दोनों ही समान रूप से कार्य करते हैं। धर्म-तन्त्र की यद्यपि इन दिनों कम दुर्दशा नहीं है, फिर भी हमें जोड़-तोड़ कर उसे उपयोगी बनाना ही होगा। मानव जाति की भौतिक प्रगति राज्य-तन्त्र द्वारा भले ही सम्भव हो, पर उसकी आन्तरिक प्रगति एवं समर्थता धर्म-तन्त्र की सहायता के बिना अन्य किसी प्रकार भी उपलब्ध नहीं हो सकती। आन्तरिक समर्थता के बिना नैतिक बल बालू की भीति की तरह है। आक्रमणों का स्थायी अन्त करने के लिये जिस सर्वांगीण समर्थता की आवश्यकता है उसको उत्पन्न करने के लिए हमें प्राणपण से जुट जाना होगा। उसमें उपेक्षा करने से फिर वैसे ही दुर्दिन देखने पड़ सकते हैं, जैसे गत एक हजार वर्षों तक खून के आँसू बहाते हुए हमने देखे हैं।

युग निर्माण योजना का प्रयोजन यही है, उसके शतसूत्री कार्यक्रमों में से प्रत्येक इसी दृष्टि से प्रस्तुत किया गया है कि हम वैयक्तिक एवं सामूहिक दृष्टि से, शारीरिक, बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से सर्वतोन्मुखी, सुसम्पन्नता उपलब्ध कर सकें। युद्ध के प्रत्यक्ष स्वरूप से निपटने के लिये जहाँ हमें सुरक्षात्मक मोर्चे को मजबूत बनाने के लिये सामयिक कदम उठाने हैं वहाँ आक्रमणों की जड़ उखाड़ने वाली समर्थता प्राप्त करने के लिये रचनात्मक मोर्चे के महत्व को भी स्मरण रखना है। क्योंकि टिकाऊ शक्ति तो उसी से प्राप्त होगी और दीर्घकालीन समस्याओं का चिरस्थायी हल तो उसी से निकलेगा। नव-निर्माण कार्यक्रमों में अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को तेजी लानी चाहिए। यह कार्य संकीर्ण स्वार्थपरता की कीचड़ में गन्दे कीड़ों की तरह बुजबुजाने से नहीं, वरन् अपने समय और साधनों को लोक-मंगल के लिये लगाने का मानवोचित साहस दिखाने से ही सम्भव होगा। परिजनों ने-हमारे उत्तराधिकारी और प्रतिनिधियों ने-एक घण्टा समय और एक आना रोज नव-निर्माण के लिये लगाने का व्रत लिया है, उसे उन्हें एक परम पवित्र धर्म प्रतिज्ञा समझ कर नियमित रूप से कार्यान्वित करते रहना चाहिये। युग-निर्माण योजना पाक्षिक के द्वारा रचनात्मक कार्यक्रमों का नियमित मार्ग-दर्शन होता रहता है। उसे ध्यानपूर्वक पढ़ते रहना चाहिये। अखण्ड-ज्योति के सदस्यों में से एक भी ऐसा न रहे जो पाक्षिक-पत्रिका को न पढ़ता हो। राष्ट्र को विजयी बनाने वाले रचनात्मक कार्यक्रमों की ट्रेनिंग एवं प्रेरणा तो उसी से प्राप्त करते है। परिजनों ने जो व्रत लिया है वह राष्ट्र-रक्षा के लिये लगे हुए युद्ध-मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की तरह ही कठोर एवं महान् है। उसे सच्चाई के साथ निवाहा जाना चाहिये। वर्तमान परिस्थितियाँ इसके लिये अधिकाधिक तत्पर होने के लिये प्रत्येक प्रबुद्ध परिजन को विवश कर रही हैं। इन उत्तरदायित्वों को हमें पूरी श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ निवाहना चाहिए।


अगले वर्ष के लिए एक महान् पुरश्चरण-

उपासना की दृष्टि से इस वर्ष राष्ट्र की प्रतिरोधात्मक शक्ति को उत्पन्न करने के लिये अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को गायत्री महातत्व की ‘क्लीं’ शक्ति की सामूहिक उपासना करनी चाहिए। अध्यात्म विद्या के जानकारों को पता है कि ह्रीं सरस्वती, बुद्धि का, श्रीं लक्ष्मी, समृद्धि का तथा क्लीं काली, दुरित संहार का बीज-मन्त्र है। गायत्री महाशक्ति में समय-समय पर विशेष प्रयोजनों के लिए इन्हें प्रयुक्त किया जाता है। वर्तमान परिस्थितियों में शुँभ-निशुँभ, महिषासुर, मधुकैटभ की तरह आक्रमणकारी दुर्दान्त दस्युओं को परास्त करने वाली दुर्गा शक्ति से भारतीय जन-मानस को ओत-प्रोत करने की आवश्यकता है। इसलिये उसका उद्भव के लिये इसे आश्विन सुदी पूर्णिमा-शरद पूर्णिमा से एक वर्ष के लिये राष्ट्र व्यापी 24-24 करोड़ जप के प्रतिमास दो क्लीं महापुरश्चरण आरम्भ कराये जा रहे हैं। इसमें परिवार के प्रत्येक परिजन को भाग लेना चाहिये।

ॐ भूर्भुवः स्वः क्लीं क्लीं क्लीं तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् क्लीं क्लीं क्लीं ॐ। ‘ यह शत्रु एवं शत्रुता संहारक शक्ति मन्त्र है। इसकी एक मन्त्र की प्रति दिन 8 माला जपने से एक महीने में एक 24 हजार का अनुष्ठान पूरा हो जाता है । एक घण्टा में मंत्र की आढ़ मालाएं हो सकती हैं। जिनके पास इतना समय है, वे अकेले ही, अन्यथा अपने कुटुम्ब के सदस्यों में से एक-एक, दो-दो माला करके भी 8 माला का कार्यक्रम बनाया जा सकता है। परिजन अपने परिवार से एक महीने में एक अनुष्ठान पूरा करा लेने का प्रयत्न करें। यों अखण्ड-ज्योति परिवार के 40 हजार सदस्य है पर हम 10 हजार सदस्यों से यह आशा करेंगे कि वे एक-एक अनुष्ठान हर महीने कराते रहेंगे। 24 करोड़ अनुष्ठान प्रतिमास होता रहेगा। ऐसे 12 अनुष्ठान अगले एक वर्ष में पूरे करने हैं।

छोटे बच्चे महिलाएं तथा अशिक्षित परिजनों के लिए लघु क्लीं मन्त्र हैं। ‘ॐ क्लीं भूः ॐ क्तीं भूः ॐ क्लीं स्वः ॐ।’ यह दश अक्षरी क्लीं मन्त्र उनके लिये है, जिनको शिक्षा अथवा समय के अभाव में पूरा मन्त्र जपने में कठिनाई होती है। इस मन्त्र की 20 मालाएं एक घण्टे में हो सकती हैं। एक व्यक्ति इतना समय न लगा सके तो एक परिवार मिलकर तो इतना कर ही सकता है। 20 माला के हिसाब से 6 दिन में एक अनुष्ठान 24 हजार का हो सकता है। अर्थात् महीने में पाँच। इस तरह के 2 हजार व्यक्ति अथवा परिवार इस लघु क्लीं अनुष्ठान में सहज ही लग सकेंगे, ऐसा विश्वास है। इस प्रकार 24 करोड़ के 12 अनुष्ठान इसके भी हो जायेंगे।

इस उपासना में सिंह वाहिनी ॐ ध्वजधारी गायत्री की क्लीं शक्ति का ध्यान करना चाहिये। अखण्ड-ज्योति के मुख पृष्ठों पर इस वर्ष तथा गत वर्ष कई बार इस चित्र को प्रकाशित किया जाता रहा है। साधक उसे काट कर शीशे में मढ़ा ले और उसकी पूजा-अर्चना किया करें। यह चित्र अलग से भी छपाया गया है। पुस्तकें आदि मँगाते समय उनके साथ ही यह चित्र भी मँगाया जा सकता है।

10 हजार व्यक्तियों अथवा परिवारों द्वारा 1 घण्टा समय नित्य लगाये जाने पर हर महीने 24 करोड़ का पूर्ण क्लीं बीज सहित गायत्री महातत्व अनुष्ठान ही होगा। इस शरद पूर्णिमा से अगली शरद पूर्णिमा तक एक वर्ष में ऐसे 12 अनुष्ठान हो जायेंगे। इसी प्रकार 2 हजार लघु क्लीं मन्त्र का अनुष्ठान करने वाले 2 करोड़ जप होते रहेंगे। एक वर्ष में 12 अनुष्ठान यह भी हो जायेंगे। इस प्रकार 24 करोड़ के 12 +12=24 अनुष्ठान का महान महापुरश्चरण पूरा होगा। इसका प्रतिफल राष्ट्रीय सुरक्षा एवं शक्ति अभिवर्धन की दृष्टि से बहुत ही आशाजनक होगा।

प्राचीनकाल में असुरों के दुरभिसंधिपूर्ण आक्रमणों से जब देवता परास्त हो गये तो वे आत्म-रक्षा का उपाय पूछने प्रजापति के पास गये। उन्होंने सबकी थोड़ी-थोड़ी शक्ति लेकर एक सामूहिक महाशक्ति का निर्माण किया उसका नाम ‘काली’ रखा। इस क्लीं काली ने शुंभ-निशुंभ, महिषासुर, मधुकैटभ असुरों का उनकी सेना समेत संहार कर डाला। उस पौराणिक गाथा की यह पुनरावृत्ति है। आज भी लगभग वैसा ही विषम समय है। आध्यात्मिक उपचारों में वही उपाय फिर काम में लाया जा रहा हैं। 10 हजार भारी और 2 हजार हल्के देव परिजनों द्वारा उनकी शक्ति का एकत्रीकरण करके यह महापुरश्चरण आरम्भ कराया जा रहा है। इससे भी पूर्वकाल जैसी क्लीं काली शक्ति का प्रादुर्भाव होगा और राष्ट्रीय संकट को टालने में ‘आसुरी’ आक्रमण को परास्त करने में भारी सहायता मिलेगी। उस शक्ति का पुनः प्रादुर्भाव होगा जो जन-मानस में शौर्य, पौरुष, पराक्रम एवं तेज उत्पन्न कर सके। इससे राष्ट्र का लाभ तो होगा ही। उन भागीदारों की व्यक्तिगत आपत्तियों एवं कठिनाइयों के समाधान में भी सहायता मिलेगी। उनके व्यक्तिगत जीवन में जो शत्रुओं एवं शत्रुताओं के कारण जो अड़चनें उत्पन्न हो रही हों, उनका भी समाधान होगा।

इस अनुष्ठान के एक हजार विशिष्ट ‘ऋत्विज्’ नियुक्ति किये जा रहे हैं उन्हें एक वर्ष तक (1) ब्रह्मचर्य का पालन (2) एक अन्न एक शाक का उपवास, यह दो व्रत निवाहने पड़ेंगे। यों आवाहन के पाँच नियम में से, जिससे जो कुछ निभ सके वे, उसे निभायें। ब्रह्मचर्य में अधिकाधिक कठोरता बरतें। भोजन में एक अन्न और एक शाक का नियम रखना भी एक प्रकार का उपवास ही है। आज यदि गेहूँ की रोटी और आलू का शाक लिया है तो दोनों समय वही लेना चाहिये। कल यदि शाक, दाल या अन्न बदलना हो तो बदल सकते हैं। यह भी एक उपास ही है। रविवार को फलाहार शाक, फल, दूध का निरन्तर आहार करना चाहिये। अपनी शारीरिक सेवा आप करना, चमड़े का त्याग यह पाँच नियम अनुष्ठान के हैं, इनमें से सबका या एक-दो का, जिससे पालन हो सके, वे उसे कर सकते हैं। यह स्वेच्छा व्रत है, प्रतिबन्धित नहीं। एक हजार ऋत्विजों पर इस प्रकार के प्रतिबन्ध रहेंगे। उन्हें ब्रह्मचर्य, उपवास के दो नियम अनिवार्यतः पालन करने होंगे, शेष 3 को भी जो पालन कर सकें, स्वेच्छापूर्वक करें।

शरद पूर्णिमा 10 अक्टूबर की है। तब तक यह अंक सभी पाठकों के हाथों पहुँच जायेगा। उस दिन से जो जितना भाग इस महान अनुष्ठान में ले सके, लेना आरम्भ कर देना चाहिये। शाखाओं की मीटिंग बुलाकर जो जितना भाग ले सके, उसकी प्रेरणा देनी चाहिये। जो शरद पूर्णिमा से आरम्भ न कर सकें, वे आगे भी आरम्भ कर सकते हैं, पर जितना जप पीछे छूट गया होगा उसकी पूर्ति अगले वर्ष में पूरी कर लेनी होगी। जितने-जितने जप का जिस प्रकार व्रत लिया हो, उसकी सूचना उन्हें मथुरा भेज देनी चाहिये, ताकि उसमें रही हुई त्रुटियों का दोष परिमार्जन तथा संरक्षण यहाँ होता रहे।

हर महीने एक हवन उपरोक्त मन्त्र से ही सामूहिक रूप से करना चाहिये। पूर्णिमा या महीने का अन्तिम रविवार या और कोई सुविधा का दिन नियत कर लिया जाये, जिससे उपरोक्त पुरश्चरण का हवन होता रहे। न्यूनतम 240 आहुतियाँ तो होनी ही चाहिये। अधिक जितनी भी हो सके, उत्तम है।

नित्य प्रार्थना उपासना में इस धर्म युद्ध में भारतीय राष्ट्र की विजय की भी माता से प्रार्थना करनी चाहिये। मन्दिरों में, धर्मस्थानों में, सत्संग, कथा, कीर्तनों में भी समय-समय पर ऐसी ही सामूहिक प्रार्थनाओं का आयोजन करना चाहिये।

इस वर्ष पंचकोशी साधना का नया पाठ्यक्रम नहीं बनाया जा रहा है। गत वर्ष जो क्रम चला था वही इस वर्ष भी चलने देना चाहिये। पिछले तीन वर्षों से अन्नमय कोश, मनोमय कोश, प्राणमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश के अनावरण की जो साधना चल रही थी, उसे ही इस वर्ष परिपक्व कर लेना चाहिये। आगामी साधना क्रम अगले वर्ष बतावेंगे।

युद्ध एक बार फिर होगा

देहरादून के एक साधक श्री आर॰ एम॰ दत ने भविष्यवाणी की है कि अक्टूबर की 15 तारीख तक आक्रमणकारी अयूब की सत्ता क्षीण हो जायगी। इस समय राष्ट्र-संघ के प्रयत्न से संघर्ष रुक सकता है, पर 1966 के अन्त में यह युद्ध पुनः भड़क उठेगा और तभी पाकिस्तान को ऐसी सद्बुद्धि आयेगी, जिससे वह भारत के साथ मिलकर रह सकेगा।


युद्ध-विराम से सुरक्षा-कार्य शिथिल न हों।

राष्ट्र की शक्ति बढ़ाने के लिए हम प्राण-प्रण से प्रयत्न करते रहें

परिस्थितियों ने पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध-विराम करा दिया। गोली चलना 23 सितम्बर से बन्द होने की दोनों ओर से घोषणा हो गई। राष्ट्र-संघ के प्रस्ताव का वह अंश दोनों पक्षों ने मान लिया जिसके अंतर्गत गोली चलाना बन्द करने का आदेश दिया गया था। इस प्रकार प्रत्यक्ष रक्तपात बन्द हो गया और लड़ाई की जो गर्मी, बेचैनी वातावरण में छा रही थी, वह हल्की हो गई। खून खराबी का बन्द होना अच्छी बात है,जब भी, जहाँ भी, जितने दिन के लिए भी वह बन्द हो जाये, वह स्वागत के योग्य है, उस पर प्रसन्नता ही व्यक्त की जा सकती है।

किन्तु इतने मात्र से यह न समझ लेना चाहिए कि युद्ध समाप्त हो गया। विराम हुआ है, समाप्ति नहीं। स्थायी समाप्ति के लिए जो आधार होना चाहिए, वह अभी नहीं है। पाकिस्तान के शासकों की भारत के प्रति जो द्वेष, घृणा और शत्रुता की भावना आरम्भ से ही रही और जिसके कारण वे आरम्भ से ही दुरभि-संधियाँ करते रहे हैं, वह मनोवृत्ति ज्यों की त्यों है। हृदय परिवर्तन जैसी चीज अभी दूर है। घृणा और द्वेष विद्यमान् हो तो अवसर मिलते ही ठण्डी या गरम लड़ाई उठ खड़ी होती है। फिर अभी मूल समस्या जहाँ की तहाँ बनी हुई हैं। कश्मीर के बारे में भारत और पाकिस्तान के बीच में इतनी बड़ी खाई है कि मतभेदों को सुलझाना अभी काफी कठिन है। युद्ध विराम के बाद जो समस्यायें सामने आवेंगी, उनका हल होना सरल नहीं है।

फिर चीन भी तो चैन से बैठने देने वाला नहीं है। सन् 62 के आक्रमण में वह लाभ उठा चुका है, वैसे ही वह और लाभ उठाने की घात में है। अगले दिनों उसकी गति-विधियाँ भारत के प्रतिकूल ही रहेंगी। हमें पाकिस्तान और चीन दोनों से कड़े शीत युद्ध में देर तक जूझना पड़ेगा, कह नहीं सकते कि कब फिर यह रस्साकशी उग्र रूप धारण कर ले और कब दुबारा फिर आग भड़क उठे।

वर्तमान युद्ध विराम के साथ वे आशाएं और सम्भावनाएं प्रकट नहीं हुई हैं, जिनके आधार पर सोचा जाये कि अब शान्ति की घड़ी निकट आई। लड़ाई के दाव घातों में शीत युद्ध और गरम युद्ध के उतार चढ़ाव आते रहते हैं। वर्तमान युद्ध विराम वैसा ही उतार चढ़ाव है। आक्रमणकारियों के इरादों में कोई अन्तर नहीं आया है। बीच-बचाव करने वालों ने आड़े आकर दोनों को प्रत्यक्ष हाथापाई से हटा दिया है, पर आक्रामकों की द्वेषाग्नि अभी भी पहले की तरह ही जल रही है। ऐसी दशा में वह दिन दूर ही है जब कि शान्ति का स्थायी वातावरण उत्पन्न होगा।

वर्तमान परिस्थितियों में सुरक्षात्मक कार्यों में तनिक भी शिथिलता आने देना भयानक भूल होगी। चीन की बन्दूकें तनी हुई हैं, न जाने वे कब बारूद उगलने लगे। पाकिस्तानी घुसपैठिये न जाने कब क्या करने लगें। हमें स्वल्प सन्तोषी नहीं, दूरदर्शी होना चाहिए। इस विराम से झूठा आत्म-सन्तोष नहीं करना चाहिए। अभी शान्ति और सन्तोष करने योग्य प्रकाश की एक भी किरण कहीं से प्रस्फुटित नहीं हुई है।

हमें अपनी शक्ति और समर्थता बढ़ाने के लिए दिन दूना रात चौगुना प्रयत्न करना चाहिए। सैन्य सज्जा का उत्तरदायित्त्व सरकार का है। सैन्य बल से हम दुर्बल न रहें, उसकी तैयारी सरकार करेगी, उसमें हमें पूरा-पूरा सहयोग देना चाहिये और आँतरिक शान्ति बनाये रहने के लिए वह सब कुछ करना चाहिए, जिससे सरकार पूरा ध्यान और समस्त साधन सुरक्षा कार्यों में लगा सके। अधिक उत्पादन, देश-द्रोहियों की गतिविधियों की देखभाल, वस्तुओं की कीमतें न बढ़ने देना, नागरिक रक्षा-दलों का गठन, जैसे कार्य बराबर जारी रहने चाहिए ताकि किसी भी क्षण आ उपस्थित होने वाले खतरे का मुकाबला भली प्रकार किया जा सके।

ये सामयिक कार्य हैं, जो वर्तमान तनावपूर्ण स्थिति में पूरे उत्साह के साथ किये जाते रहने चाहिए। रक्त, धन, सैनिक जो भी सुरक्षात्मक कार्यों के लिए आवश्यक हो, वह समुचित मात्रा में समय पर उपलब्ध रहे, ऐसी तैयारी करते रहना, देशभक्त नागरिकों का आवश्यक कर्तव्य है। उसमें शिथिलता दिखाना आत्मघातक ही होगा।

साथ ही राष्ट्र की स्थायी समर्थता बढ़ाने वाले कार्यों को हमें युद्ध प्रयत्नों से भी अधिक तत्परता के साथ करने के लिए तत्पर होना चाहिए। कोई राष्ट्र केवल सेना के बलबूते ही विजयी नहीं होता, वरन् उसके पीछे नागरिकों की दृढ़ता, मनस्विता, देशभक्ति एवं शारीरिक मानसिक समर्थता का बल भी होना चाहिए। एकता और संगठन में भी न्यूनता न रहनी चाहिए। समर्थ नागरिकों से ही कोई राष्ट्र समर्थ बनता है और यह समर्थता ही किसी देश या जाति को हर खतरे से जूझते हुए भी अपना अस्तित्व अक्षुण्य बनाये रहने की सामर्थ्य प्रदान करती है। पिछले दिनों जिन आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण हमें लम्बे समय तक पराधीन रहना पड़ा, उनका एक कारण भी अब हमारे भीतर शेष न रहना चाहिए। किसी देश को बाहरी शत्रुओं से उतना खतरा नहीं होता, जितना अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं से। जापान, जर्मनी आदि गत युद्ध में हारे हुए देश अपनी आन्तरिक दृढ़ता के कारण थोड़े ही दिनों में फिर समर्थ एवं स्वतन्त्र देशों की पंक्ति में खड़े हो गये। आन्तरिक दुर्बलता से ग्रसित अनेकों एशियाई और अफ्रीकी देश स्वतन्त्र कहलाते हुए भी पराधीनों से गई गुजरी स्थिति में हैं। युग की माँग एक ही है-समर्थता, समर्थता, समर्थता। इसके बिना उद्धार का और कोई मार्ग नहीं। भगवान् की सहायता भी समर्थता के अनुरूप ही मिलती है, इस तथ्य को हमें भली भाँति हृदयंगम कर लेना चाहिए।

राष्ट्र की आन्तरिक समर्थता बढ़ाने के लिए युग निर्माण योजना का विशाल कार्यक्रम अपने परिवार द्वारा चल रहा है। राष्ट्र के हर व्यक्ति को शारीरिक मानसिक, आत्मिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से सबल बनाया जाना आवश्यक है। एक लौह पुरुष हजार पैटन टैंकों से अधिक शक्तिशाली होता है। हमें भारत के हर बच्चे को लौह पुरुषों के रूप में हर घर-घर को एक लौह दुर्ग के रूप में परिणत करना होगा। इसका उपाय एक ही है कि जनमानस में घुसी हुई संकीर्णता, स्वार्थपरता, मूढ़ता, रूढ़िवादिता, दीनता, जैसी प्रवृत्तियों को हटाने के लिए प्राण-प्रण से प्रयत्न किया जाये और ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाये जिनमें जनसाधारण को चरित्रवान, देशभक्त, दूरदर्शी, साहसी, विवेकवान् सद्गुणी एवं त्याग बलिदान की भावनाओं से ओत-प्रोत बनने का अवसर मिले। युगनिर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रमों में से प्रत्येक इसी दृष्टि से है।

सरकारी प्रयास सुरक्षात्मक कार्यों एवं कूटनीतिक गति विधियों में संलग्न रहेंगे। यह प्रथम मोर्चा है। दूसरा मोर्चा गैर सरकारी लोगों को खोलना है। युद्ध सामग्री फैक्ट्रियों में तैयार होती है, सेना की ट्रेनिंग छावनियों में दी जाती है। नागरिकों को समर्थ बनाने का महान् अभियान हम धार्मिक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को करना चाहिए। जन-जन से संपर्क स्थापित करना चाहिए, रचनात्मक कार्यक्रमों का सुसंगठित योजनाबद्ध ऐसा प्रयास करना चाहिए कि हर भारतीय नागरिक अपनी वैयक्तिक दुर्बलता छोड़ने और महान् राष्ट्र के महान् नागरिक जैसी समर्थता से परिपूर्ण होने की स्थिति तक पहुँच सके।

इस दृष्टि से हमें इन दिनों अपने शतसूत्री रचनात्मक कार्यों पर अत्यधिक बल देना चाहिए और पूरी तत्परता के साथ उन्हें सफल बनाने में जुट जाना चाहिए। ‘क्लीं’ शक्ति का उपासनात्मक जो कार्यक्रम शरद पूर्णिमा से आरम्भ किया जाना है, उसके लिये अखंड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को भाग लेना चाहिए। रचनात्मक कार्यक्रमों की भाँति यह आध्यात्मिक कार्यक्रम नितान्त आवश्यक और अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इससे राष्ट्र में शक्ति एवं समर्थता का वातावरण उत्पन्न होगा। शीत ऋतु का हमारा दौरा वहीं होगा जहाँ अनिवार्य आवश्यकता समझी जायगी । 100 से अधिक स्थानों में जाने का जो कार्यक्रम बनाया था वह इस वर्ष नहीं हो सकेगा। इस साल तो दूसरे मोर्चे को सफल बनाने के लिए शतसूत्री कार्यक्रमों की, देश-व्यापी योजना बनाने की, व्यवस्था चलाने में हमें प्राण-प्रण से तन्मय रहना है। पाठक भी वही करें।


धर्म मंच से युग-निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य

युग-निर्माण के लिए धर्म मंच से रचनात्मक कार्य करने के लिये निम्न पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है, इस माध्यम से जन-जागरण के लिए बहुत कुछ कार्य किया जा सकता है तथा जनता को सच्चे अर्थों में धार्मिक बनाया जा सकता है।

1-गीता-कथा

गीता सप्ताह के आधार पर आयोजित धर्मानुष्ठान में प्रवचन करने योग्य 12 प्रसंग। प्रत्येक में ढेरों पौराणिक, ऐतिहासिक कथाओं एवं दृष्टान्तों का समावेश है। प्रसंग की पुष्टि के लिए श्लोक, दोहे तथा रामायण के प्रसंग भी दिये गये हैं। सजिल्द, 34 पौंड बढ़िया कागज, बड़ा साइज, मूल्य 6) रु.।

2-गीता पद्यानुवाद

राधेश्याम तर्ज पर गीता के श्लोकों का अनुवाद, मूल श्लोकों सहित। गीता पारायण के लयबाजी के साथ सामूहिक गान के उद्देश्य से इसे बनाया गया है। सजिल्द, 34 पौंड ग्लेज बढ़िया कागज। बड़ा साइज। मूल्य 3)

3-अभिनव संस्कार पद्धति

सभी संस्कारों के मनाने को सरल सुविधाजनक एवं सर्वोपयोगी पद्धति। प्रत्येक संस्कार के महत्व का वर्णन है। जन्म दिन तथा विवाह दिन मनाने की पद्धति का विधि-विधान भी सम्मिलित है। तथा संस्कार कराते समय क्या शिक्षा उस व्यक्ति को तथा उपस्थित लोगों को दी जानी चाहिए और उनका व्यक्तिगत जीवन किस प्रकार समुन्नत बनने की प्रेरणा मिलनी चाहिए इसका समुचित उल्लेख है। बढ़िया मोटा ग्लेज कागज। कार्डबोर्ड की जिल्द मूल्य 2॥)

4-पर्वों की प्रेरणा और पद्धति

प्रमुख त्यौहार पर्वों को सामूहिक रीति से मनाने का सरल विधि विधान। पर्व त्यौहारों में सन्निहित उन सिद्धान्तों की शिक्षाओं तथा प्रेरणाओं का उल्लेख है, जिसे उपस्थित लोगों को समझाकर उन्हें सामाजिकता को शिक्षा दी जा सके। समाज निर्माण का धार्मिक मंच से यह एक प्रभावपूर्ण प्रयास है। बढ़िया कागज, कार्डबोर्ड की जिल्द। मूल्य 2॥)

5-सामूहिक गायत्री हवन

सामूहिक गायत्री यज्ञ करने की आदि से अन्त तक सारी विधि व्यवस्था बहुत सरल और सुबोध ढंग से समझाई गई है। इस विधि से साधारण शिक्षा वाला व्यक्ति भी विधिवत् गायत्री यज्ञ भली प्रकार करा सकता है और जनता में अनेकों बुराइयों को छुड़ाने तथा अनेकों अच्छाइयाँ बढ़ाने की प्रेरणा कर सकता है। बढ़िया कागज कार्डबोर्ड की जिल्द। मूल्य 2)

6-सत्यनारायण कथा

प्रचलित सत्यनारायण कथा का मूल उपाख्यान ज्यों का त्यों रखते हुए भी उनके संवादों में नैतिक धार्मिक एवं बौद्धिक उत्कर्ष की बड़ी ही महत्वपूर्ण विचारधारा का समावेश कर दिया गया है। इसके आधार पर कही हुई कथा को सुनने वालों में जीवन निर्माण का एक नवीन दृष्टिकोण उत्पन्न हो सकता है। मूल्य 75 न॰ पै0।

दस रुपये से अधिक मूल्य की पुस्तकें लेने पर डाक खर्च माफ ।

पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।


उद्बोधन


उद्बोधन (kavita)

जागृत करें सत्य, संयम, दम, शुचिता और विवेक।

आओ चलें करें अपनी नव-संस्कृति का अभिषेक॥

आत्म-भावना का जन-जन में करें पुण्य विस्तार।

हर मनुष्य का हर मनुष्य से बढ़े प्रेम-व्यवहार॥

ममता बढ़े, पवित्र बनें नर, करें सभी शुभ कर्म।

लक्ष्य ही एक हो जीवन का और एक ही धर्म॥

भेद रहे मानव-मानव में ऐसी भी क्या बात।

क्यों न सजायें फिर नव-युग का बन्धन मुक्त प्रभात॥

पर कुरीतियाँ बहुत अधिक फैली हम सबके बीच।

यह विकास की बाधायें ही रहे पतन का सींच॥

यह सच है न किसी से हमको लेना है प्रतिशोध।

दुष्प्रवृत्तियों का करना ही होगा किन्तु विरोध॥

सबके प्रति सम्मान भावना हो सबका साभार।

पर यह भी हो ध्यान किसी का लुटे नहीं अधिकार॥

नारी रहे अभिन्न पुरुष से बढ़े परस्पर प्रीति॥

सुख दुःख के साथी बन निबहें टूटे नहीं प्रतीति॥

पाँव-पाँव, मन-मन, अन्तर से हो पावन सम्बन्ध।

विषय वासनाओं से हों वह दूर और निर्बन्ध॥

बँधे एक विश्वास रज्जु में करें आत्म-कल्याण।

विलग न कर पायें पथ में हों शूल या कि पाषाण॥

व्रतधारी, साधना-निष्ठ हों सभी, राष्ट्र के लोग।

सुख-संपत्ति का न्याय भाव के साथ करें उपभोग॥

विद्यावान् गुणी सुशील सम्भ्रान्त बनें सब साथ।

शक्ति-शौर्य से रहे अलंकृत, उन्नत अपना माथ॥

करके फिर साकार दिखादें ऋषियों की अभिव्यक्ति।

एक हाथ में दीप हमारे एक हाथ में शक्ति॥

--बलरामसिंह परिहार

*समाप्त*