जब कोई शिल्पी किसी मूर्ति को बनाता है तब उसका यही ध्येय रहता है कि उसकी रचना इतनी सजीव, इतनी सुन्दर और इतनी पूर्ण बने कि जिसे देख कर लोग ठगे से रह जावें और जिन हाथों ने उसे तैयार किया है, उनकी प्रतिज्ञा किये बिना न रहे!
जब एक साधारण शिल्पी की यह भावना हो सकती है तब उस परम शिल्पी, निस्पृह एवं निर्विकार शिल्पी परमात्मा की भावना में यह शंका कैसे की जा सकती है कि मनुष्य की रचना करते समय उसका यह भाव न रहा होगा कि उसकी रचना भी उसके ही अनुरूप सुन्दर और महान न हो। तब क्या कारण है कि परमात्मा की रचना मनुष्य ही सबसे निकृष्ट सिद्ध होती जा रही है। उसने जीवन को इतना कुरूप कलुषित बना डाला है कि जिसे देखकर उसका रचयिता अवश्य लज्जित हो रहा होगा। मनुष्य अपने कुकर्म से रचयिता की बदनामी कर रहा है। कितना अच्छा होता किसी शिल्पी की प्रस्तर मूर्ति के समान मनुष्य भी अपने सुन्दर निर्माण को यथावत सुन्दर रखकर अपने रचयिता को प्रसन्न करता।
-बाल्डविन
स्मृतेः सकलकल्याण भाजनं यस्य जायते। पुरुषस्तमजं नित्यं व्रजामि शरणं हरिम्॥
जिसके स्मरण करने से सर्वत्र कल्याण की कल्याण होता है। उस अजर अमर, सदा सर्वत्र विद्यमान, ऐसे ब्रह्म की शरण में मैं उपस्थित होता हूँ। क्योंकि वही सब कल्याणों का करने वाला है।
नायात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुँस्वाम्॥
वह परमात्मा प्रवचन के द्वारा भी नहीं प्राप्त किया जा सकता। वह न मेधा से प्राप्त किया जाता है और न बहुत अनुभव या ज्ञान से प्राप्त किया जाता है, अपितु जिस श्रेष्ठ कर्म करने वाले धर्मात्मा भक्त को वह वरण करता है वही उस ब्रह्म का साक्षात्कार करता है। वही भक्त उस परमात्मा का साक्षात्कार करके मोक्ष को प्राप्त कर सकता है।
यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः॥
जिस ब्रह्मज्ञान की दशा में समस्त जीव प्राणी अपनी आत्मा के समान ही हो जाते हैं अर्थात् सब जीव अपने समान दीखने लगते हैं उस समानता को सर्वदा देखने वाले उस विशेष आत्मज्ञानी पुरुष को उस दशा में फिर कौन-सा मोह और कौन-सा शोक रह सकता है।
दिव्यो ह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्यभ्यन्तरा ह्यजः। अप्राणा ह्यमनः शुभ्री ह्यक्षरात्परतः परः॥
वह ब्रह्म दिव्य है वह निराकार सर्व सामर्थ्य वाला है सबके अन्दर तथा बाहर व्यापक है। वह अज है। वह प्राण तथा मन से भिन्न है प्रवृत्ति से परे जो जीव उससे भी परे वह देदीप्यमान परम पुरुष है।
एतद्धयेवाक्षरं ब्रह्म एतदेवाक्षरं परम्। एतद्धयेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्॥
यह ॐ अक्षर ही ब्रह्म है और यही ॐ परम अक्षर ही ब्रह्म है और वही ॐ परम अक्षर है। इसी ॐ अक्षर को जानकर मनुष्य जो कुछ चाहता है उसे वही मिल जाता है।
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः। छित्रद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥
क्षीण हुए पापों वाले, संशयहीन अपने आपको वश में किये हुए सब प्राणियों के हित में लीन ऋषि लोग ब्रह्म निर्वाण को प्राप्त होते हैं।
ईशा वास्यमिंद सर्व यत्किंच जगत्याँ जगत्। तेन त्यक्तेन भुज्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्॥
सारे विश्व में अंतर्यामी भगवान् व्याप्त हैं। कर्म करने पर ईश्वर द्वारा जो भी फल प्राप्त हो उसका तुम उपभोग करो। जो दूसरे को प्राप्त है, उस पर अपना मन मत चलाओ।
एकः प्रजायते जन्तुरेक एव प्रलीयते। एको नु भुंक्ते सुकृतमेक एव च्च दुष्कृतम्॥
इस संसार में जन्तु अकेला ही उत्पन्न होता है और अकेला ही मरता है। अपने अन्दर स्थित परमेश्वर को जो धीर लोग साक्षात् करते है, उन्हीं को शाश्वत सुख मिलता है, अन्यों को नहीं।
अयमात्मा स्वयं साक्षाद् गुणरत्नमहार्णवः। सर्वज्ञः सर्वदृक् सार्वः परमेष्ठी निरंजनः॥
यह आत्मा स्वयं साक्षात् गुण-रूपी रत्नों से भरा हुआ समुद्र है; यह सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सर्वत्र गतिवाला, परमपद में स्थित (=परमेष्ठी), और सब प्रकार की कालिमा से रहित (=निरंजन) है।
न जायते म्रियते वा विपश्चिन् नायं कुतश्चिन्न वभूव कश्चित्। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो, न हन्यतें हन्यमाने शरीरे।।
यह चेतन आत्मा न तो उत्पन्न होता है और न मरता है। यह न तो किसी अन्य कारण से उत्पन्न हुआ है न स्वतः ही बना है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत (सर्वदा रहने वाला) और पुरातन है और शरीर के मारे जाने पर भी स्वयं नहीं मरता।
जिस प्रकार कोई भी कला कृति अपने निर्माता के अस्तित्व तथा व्यक्तित्व को प्रकट करती है, उसी प्रकार यह सृष्टि भी अपने रचयिता, अपने शिल्पी, परमात्मा को व्यक्त करती है। जिसका निर्माण हुआ है उसका निर्माता अवश्य है। इसमें किसी प्रकार की शंका अथवा तर्क का कोई अवसर नहीं है।
यह समस्त सृष्टि एक सुनिश्चित रचना है। इस रचना का अणु-अणु एक निश्चित नियमावली से अनुशासित है, नियंत्रित है। हजारों प्रकार की वनस्पतियाँ और लाखों प्रकार के प्राणी अपने-अपने नियमानुसार बनते और बिगड़ते रहते हैं। पर क्या मजाल कि उसकी रचना में तनिक सी निन्दा अथवा गड़बड़ी हो जाये।
सूर्य समय पर निकलता, समय पर अस्त होता है। गुलाब के पौधे में गुलाब और गेंदे के पौधे में गेंदे के ही फूल खिलते हैं। आम के वृक्ष में आम और अमरूद के वृक्ष में अमरूद के ही फल लगते हैं। उसमें भी जिन वृक्षों से जिस प्रकार के फल अपेक्षित हैं उसी प्रकार के ही फल पैदा होंगे। एक रंग, एक आकार और एक स्वाद। खट्टे वृक्षों में खट्टे और मीठे फल ही उत्पन्न होंगे। निश्चित भूमि, निश्चित जलवायु और निश्चित ऋतु में ही वे उत्पन्न होंगे और निश्चित समय पर ही समाप्त होंगे।
एक जंगल में लाखों प्रकार की वनस्पतियाँ होती हैं। हजारों प्रकार के पेड़ एक के बाद एक उत्पन्न होते हैं, किन्तु उनकी एक पत्ती की बनावट में भूल नहीं होती। इमली से लेकर केले तक की पत्तियों का एक निश्चित आकार प्रकार होता है। एक पेड़ की पत्ती संसार के किसी दूसरे पेड़ की पत्ती से नहीं मिलती। उनमें कोई न कोई किसी प्रकार का थोड़ा बहुत अन्तर अवश्य होगा। इतनी विविधता और इतने प्रकार जानने वाला वह कलाकार चैतन्य और कितना सामर्थ्य होगा, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है। विश्व की इतनी बड़ी रचना को देखकर और उसके संचालन की अविकार विधि देखकर ऐसा कोना अभागा होगा जो रचियता के अस्तित्व में संदेह करेगा।
किसी भी वृक्ष का बीज देखिये। उसके स्तर-स्तर अलग कर डालिये। उसका रेशा-रेशा चीर डालिये कहीं भी आपको वृक्ष का कोई आकार, उसकी कोई भी तस्वीर, उसका कोई भी अस्तित्व दृष्टिगोचर न होगा। कितना विलक्षण है, कितना अद्भुत है कि जब वह धरती में बो दिया जाता है तब उसमें विविध प्रकार के वृक्ष उत्पन्न हो उठते हैं। बीज मिट्टी में मिलकर वृक्ष को जन्म देता है। जब वृक्ष अस्तित्व में आता है तब बीज मिट चुका होता है। किन्तु पुनरपि वह वृक्षों द्वारा उत्पन्न फलों में अपना अस्तित्व, अपना स्वरूप प्राप्त कर लेता है। प्रकृति की यह प्रक्रिया कितनी विलक्षण, अद्भुत और विस्मयवर्धक है। ध्यानपूर्वक इसको देखने, विचार करने और मनन करने से इसके नियामक, निर्माता और पालनकर्ता का ध्यान आये बिना नहीं रहता। कैसा अखण्ड अनुशासन है कि एक ही मिट्टी से ईख मिठास, मिर्च कड़ुवाहट और करौंदा खटास प्राप्त करता है। मिट्टी को चखिये, उसमें इस प्रकार का कोई रस, कोई स्वाद आपको नहीं मिलेगा। इतने रस, इतने स्वाद और इतने गुण एक ही मिट्टी में कहाँ से आ जाते हैं? ये सारे रस, आकार-प्रकार, गुण आदि और कुछ नहीं एक उसी परमात्म शिल्पी का अपना व्यक्तित्व, अपना अस्तित्व है। वह स्वयं धरती है, स्वयं मिट्टी है, स्वयं बीज, वृक्ष और फल है। वह ही स्वयं रस, स्वाद और गुण भी है।
संसार में लाखों पशु-पक्षी और जीव-जन्तु मौजूद है। सब एक दूसरे से भिन्न। आकार प्रकार बनावट स्वभाव विचित्र। जितने प्रकार के पक्षी उतने प्रकार के रंग, उतनी प्रकार की बोलियाँ और उतने ही प्रकार के गुण व स्वभाव। इन सब बातों में इतनी अनन्तता, इतनी असीमता और अपरिमितता एक उसी विराट की याद दिलाती है।
रात-दिन, प्रकाश अन्धकार, गर्मी, सर्दी जल-थल आदि सब उसी की साक्षी देते हैं, उसी के अस्तित्व को प्रकट करते है। अग्नि जलाता है, पानी बुझाता है, वायु कम्पित करती हैं, जीवन जिलाता है और मृत्यु मारती है। किसके आदेश से किसके संकेत से? एक उसी बिन्दु की इंगित मात्र से ये सारे कार्य कलाप होते हैं, सारी प्रक्रियाएँ चलती हैं। बिना उसके संकेत के एक पत्ती भी नहीं हिल सकती, एक श्वाँस का भी आवागमन नहीं हो सकता!
इतनी बड़ी रचना, इतनी महान कृति को उसने किस उद्देश्य, किस हेतु से, किसके लिये निर्मित किया है? यह एक गहन प्रश्न है। एक गूढ़ रहस्य है। मनीषियों का मत है कि यह सब एक उस ही परमात्मा ने अपने से अपने में अपने लिए ही उत्पन्न किया है।
सृष्टि में हर ओर से ओत-प्रोत परमात्मा और परमात्मा में हर प्रकार से समाहित यह सम्पूर्ण रचना, मनुष्य के समझने के लिये है। समझ कर उस रचियता का ज्ञान प्राप्त कर आनन्द पाने के लिये है !
सृष्टि के प्रत्येक प्रत्यक्ष पदार्थ में जो अप्रत्यक्ष निराकार विस्मय है, विलक्षणता है, कुतूहल है, वही परमात्मा की एक झलक है। जिसके सहारे मनुष्य उस चिदानन्द परमात्मा तक पहुँचता है। अपना हृदय विशाल कीजिये। अपनी दृष्टि निर्मल कीजिये और देखिये आपको सृष्टि के प्रत्येक अणु में उस विराट बिन्दु की झाँकी देखने को मिलेगी !
परमात्मा सत्+चित्+आनन्द अर्थात् सच्चिदानन्द रूप है। उनका उद्देश्य प्राणी-मात्र को आनन्द प्रदान करना है। मनुष्य को छोड़कर संसार का हर प्राणी एक नैसर्गिक आनन्द को प्राप्त करता है! एक मनुष्य ही ऐसा है जो स्वतः आनन्दित नहीं दिखलाई देता। इसका स्पष्ट कारण यह है कि परमात्मा की इच्छा है कि वह उसके सम्पूर्ण स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करके आनन्द की अनुभूति प्राप्त करे! अर्थात्, केवल आनन्द नहीं सच्चिदानन्द परमात्मा की पूर्ण अनुभूति करे। सत्, चित् अर्थात् उसके अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त करके आनन्द की अनुभूति प्राप्त करे! अन्य पशु-पक्षियों की भाँति मनुष्य परमात्मा का ज्ञान प्राप्त किये बिना आनन्द को प्राप्त नहीं कर सकता। उसे सच्चा आनन्द तब ही प्राप्त हो सकता है, जब वह परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर ले!
अपनी इच्छा के अनुरूप ही उसने मनुष्य को उपादान भी दिये हैं। अद्भुत शरीर और विलक्षण विवेक बुद्धि। इनका उपयोग कर मनुष्य सहज की परमात्मा का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। अपनी विवेक शक्ति को विकृतियों से मुक्त कर मनुष्य यदि प्रत्यक्ष संसार को एक गहरी अनुभूति से देखे, उस पर चिन्तन करे तो सहज ही वह परमात्मा के अस्तित्व का ज्ञान प्राप्त कर सकता है।
मनुष्य को आनन्द की खोज करने की आवश्यकता नहीं, वह तो सच्चिदानन्द परमात्मा से उत्पन्न इस आनन्द क्या, सृष्टि में स्वयं ही ओत-प्रोत है! मनुष्य को केवल अपनी अनुभव शक्ति को प्रबुद्ध भर करना है। अनुभव शक्ति के प्रबोध के लिये उसे कोई विशेष तपस्या अथवा साधना नहीं करनी है। वह एक विस्मय मूलक दृष्टि-कोण से उसकी रचना इस संसार को देखे और परम शिल्पी की परम रचना समझकर उसका सम्मान करे, इतना भर कर लेने से उसकी अनुभव शक्ति स्वतः प्रबुद्ध हो उठेगी, और एक बार प्रबुद्ध हो जाने पर वह शक्ति पुनः निहित नहीं होगी।
स्त्री-पुरुष, पशु-पक्षी, पेड़ पौधे, फल-फूल जिसको भी देखें एक विस्मय और कुतूहल से देखता हुआ निर्माता की सराहना में गद्-गद् हृदय हुआ मनुष्य एक दिन बिना किसी विशेष साधन के परमानन्द को अवश्य पा लेगा!
अपने सहित सृष्टि के बाहर सच्चिदानन्द परमात्मा का अस्तित्व कल्पना करने वाले जन्म-जन्मान्तर उसकी अनुभूति प्राप्त नहीं कर सकते। परमात्मा इस सृष्टि में ही है। सृष्टि में जो कुछ है वह सब उसी का स्वरूप है, उसी का अस्तित्व है।
जब तक हम स्वयं अपने छोटे-छोटे दीपकों को न जलायें, तब तक आकाश का दीप-जगत व्यर्थ है, और जब तक हम स्वयं अपनी तैयारियाँ न करें, तब तक संसार की तैयारियों की सारी विधि उसी तरह प्रतीक्षा करती रहती है जैसे वीणा अँगुली के स्पर्श की राह देखती है।
-टैगोर
परमात्मा की शरणागति में आ जाने के बाद भी आन्तरिक मलिनतायें और अहंकार के आघात जीवात्मा को पूर्ण आनन्द का असीम सुख प्राप्त नहीं होने देते। मनुष्य कभी पदार्थ और कभी ब्रह्म की ओर खिंचता रहता है। यद्यपि उस समय लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति ही होता है तथापि ब्रह्म-तत्व में विलय के लिए जो पवित्रता आपेक्षित थी वह न बन सकने के कारण ही यह द्वन्द्वात्मक स्थिति बनी रहती है। “मैं परमात्मा की उपासना करता हूँ” इतना भी अहंभाव जब तक शेष रहता है तब तक पूर्ण समर्पण में कमी है। देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि और अहंकार-इन सब पर जब पूर्ण रूप से परमात्मा का अधिकार हो जाता है तभी पूर्ण समर्पण की असीम सुखदायिनी स्थिति मिल जाती है। उस समय “मैं” और “मेरा” यह भाव समाप्त हो जाता है। जो कुछ है सब तेरा है। “तेरा तुझे सौंपने में ही” जीवात्मा आनन्द लेने लगे तो यह समझना चाहिये कि उसके मल-विक्षेप धुल गये हैं। दिव्य शरणागति की प्राप्ति हो गई है।
मनुष्य जब तक साँसारिक अभिमान में भूला रहता है तब तक उसकी शक्ति और सामर्थ्य बिल्कुल तुच्छ और नगण्य होती है। जीवन के सारे अधिकार जब ईश्वर के हाथ सौंप देते हैं तो पूर्ण निश्चिन्तता आ जाती है। कोई भय नहीं, कोई आकाँक्षा नहीं। न कुछ दुःख और न ही किसी प्रकार का सुख शेष रहता है। पूर्ण तृप्ति और अलौकिक आनन्द की अनुभूति तब होती है जब जीवन की बागडोर परमात्मा को सौंप देते हैं। तब उसे बुलाना भी नहीं पड़ता। वह स्वयं ही आकर पहरेदारी करते हैं। भक्त के प्रत्येक अवयव में स्थित होकर अपना कार्य करने लगते हैं। इस स्थिति को ही पूर्ण समर्पण कहते हैं।
इस स्थिति को प्राप्त करने के लिये शरणागति की साधना करनी होती है। जीवन के जिस भाग को शुद्ध करते चलते हैं उसी में परमात्मा का प्रकाश झलकने लगता है और बढ़ने का साहस मिलने लगता है। श्रद्धा और विश्वास की प्रशस्ति निरन्तर बढ़ती रहती है तो लक्ष्य की समीपता भी बढ़ती है और पूर्ण समर्पण की स्थिति दिखाई देने लगती है।
अनन्य भाव से परमात्मा की उपासना शरणागति मुख्य आधार है। ईश्वर के समीप बैठने से वैसी दिव्यता उपासक को भी प्राप्त होती है और उसके सन्ताप गलकर नष्ट होने लगते हैं। नित्य-निरन्तर अभ्यास चलाने से ही जीवन में वह शुद्धता आ पाती है जो पूर्ण शरणागति के लिए आवश्यक होती है।
परमात्मा की ही सत्ता इस संसार के कण-कण में समायी है। प्रत्येक वस्तु में ओत-प्रोत है। वृक्ष-वनस्पति जीव-जन्तु, सूर्य-चन्द्रमा, आकाश-पाताल सब उसी लीलामय प्रभु के विविध रूप हैं। प्रत्येक वस्तु में उसी निवास, उसी की झाँकी देखनी चाहिए, इससे उसकी भावना प्रगाढ़ होती है। दया, करुणा और न्याय मनुष्य तभी कर सकता है जब वह सर्वत्र परमात्मा को विराजमान देखे। इस स्थिति को प्राप्त करना मनुष्य का प्रमुख कर्त्तव्य है। इसके लिए वह अनन्य भक्ति प्राप्त करने का अधिकारी भी नहीं हो सकता।
भावनाओं के द्वारा जिस तरह सब में अपना ही स्वार्थ देखने की आत्मीयता जगाई थी कर्म में भी वैसी ही स्वच्छता लानी पड़ती है। जिससे किसी का जी दुःखता हो वह कार्य कभी हितकर नहीं हो सकता क्योंकि जीवमात्र के प्रति अन्याय का अर्थ परमात्मा के नियमों की अवज्ञा करना है। ईश्वर की आज्ञाओं का तिरस्कार करके भी कोई उसे पा सका है ? इस संसार का पत्ता-पत्ता उसी का है फिर किसी के प्रति धृष्टता, अन्याय और अत्याचार भला वह क्यों सहन करेगा। हमें अपने कर्मों के द्वारा उसके सौंदर्य को नष्ट नहीं होने देना चाहिए। हम वह कार्य करें जिससे संसार की भलाई हो, यहाँ की सुन्दरता बढ़े तभी तो उसके प्रिय-पात्र बनने का सौभाग्य हमें प्राप्त हो सकेगा।
दुष्कर्म मनुष्य अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए करता है। उसे अपना शरीर, अपना हित और अपने सुख अधिक प्रिय होते हैं इसी से औरों के सुख छीनने-झपटने का वह प्रयत्न करता है। पर जिन्हें परमात्मा से प्यार होगा उसे अपने सुख तो तुच्छ ही जान पड़ेंगे। हर प्रेमी की इच्छा यही होती है कि अपने प्रियतम की कौन-सी साघ पूरी करें। परमात्मा हमारा प्रियतम होगा तो उसकी इच्छा पूरी करने में कौन-सी कठिनाई रहेगी। परमात्मा अपने सभी बच्चों की परवरिश समान रूप से करना चाहता है। यही इच्छा अपनी भी बने तो समझें कि हम भी उसे प्यार करते हैं। ईश्वर के प्रति अपनी आत्मीयता बनाये रखना चाहते हो तो यह जरूरी है कि उसके पुत्रों के प्रति भी आत्मीयता रखें। कोई ऐसा काम न करें जिससे किसी का जी दुखता हो। किसी को कष्ट या क्लेश पहुँचा कर ईश्वर की भक्ति प्राप्त कर लेना बिलकुल असम्भव है। शुद्ध, सात्विक, सत्कर्मों से ही उसे प्रसन्न किया जा सकता है।
सत्कर्म दिखावे के लिये ही न करें। उनके प्रति हमारी गहन निष्ठा भी होनी चाहिये। ईश्वर के प्रति जितना अधिक विश्वास होगा उतना ही अधिक सत्कर्मों में प्रीति बनी रहेगी। जब भी कभी उसे भूल जाते हैं तभी दुष्कर्म बन पड़ते हैं। ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ आस्था रखेंगे तभी कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्कर्म और कर्त्तव्य-पालन से विचलित न होंगे। प्रलोभनों में वही फँसते हैं जिनका ईश्वर-विश्वास डगमगाता रहता है, पर जिसने चिन्तन-मनन और विचार द्वारा हृदय-आत्मा से ईश्वरीय स्थिति को स्वीकार कर लिया है उससे भूलकर भी कोई ऐसा कार्य न होगा जिससे किसी को कष्ट पहुँचता हो।
कर्म की प्रेरणा मनुष्य को प्रायः इच्छाओं, आकाँक्षाओं से ही मिलती है। जैसी कामनायें करते हैं कर्म भी वैसे ही बन पड़ते हैं। भोग-वासना से प्रेरित होकर ही लोग असंयम और व्यभिचार बढ़ाते हैं। स्वास्थ्य की खराबी का कारण अखाद्य पदार्थों को नहीं मानेंगे वरन् स्वादप्रियता को कहेंगे जिससे प्रभावित होकर मनुष्य कम-ज्यादा का ध्यान न देकर अच्छी-बुरी वस्तुओं को उदरस्थ करता रहता है। कर्म का मूल मनुष्य की इच्छा है, अतः कामनाओं पर नियंत्रण रखना अत्यन्त आवश्यक है। ऐसा न करें तो जीवन-लक्ष्य की साधना में शिथिलता आ जाती है।
स्वार्थ की संकीर्णता का परित्याग कर दें तो मामूली सी आवश्यकताओं ही शेष बचती हैं इनके लिये कोई बड़ी दौड़-धूप नहीं करनी होती। व्यर्थ की आपा-धापी बढ़ाने से ही मनुष्य अपने मस्तिष्क, अपने सात्विक लक्ष्य को भूल जाते हैं। ऋषियों का जीवन इसीलिए सदैव त्यागमय रहा है। जीवनयापन के साधनों में थोड़ा-सा समय लगाकर शेष समय का सदुपयोग वे विश्व-रहस्य जानने तथा ब्रह्म का सान्निध्य प्राप्त करने में बिताते थे। भारतीय संस्कृति को गौरव प्रदान करने का यह महानतम कार्य ऋषियों ने अपनी आवश्यकता का घटाकर किया था। आज भी वही मार्ग श्रेष्ठ है, उसी पर चलकर अपनी आध्यात्मिक प्यास बुझा सकते हैं।
अपनी कामनाओं को जितना ही बढ़ाते हैं परिस्थितियों का दबाव उतना ही अधिक पड़ता है। फलस्वरूप लोग दैव को दोष लगाते हैं। परमात्मा की अकृपा समझते है किन्तु विचारपूर्वक देखें तो बात ऐसी नहीं है। परमात्मा का विधान सबके लिए सदैव मंगलदायक ही होता है। हमें उसी की रचना, उसी के विधि-विधान के साथ अपने जीवन का तालमेल पैदा करना चाहिए। वह जो कुछ भी करेगा हमारे हित के लिए ही करेगा इस विश्वास से आत्मा में बड़ा बल बढ़ता है।
देह के साधनों और सम्बन्धों को ही सत्य मानना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। शरीर के सुख की ही बात सोचना बुद्धि संगत कदापि नहीं हो सकता। हमें जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद वाले स्वरूप का भी विचार करना पड़ेगा। दृष्टि से हमारा पिता, हमारी माता, भाई, स्वजन स्नेही सब कुछ वही है। वह हमारा संरक्षक है। उसी ने हमें जीवन दिया है। सुख के अनेकों साधन भी उसी ने जुटाये हैं। परम कृपालु स्वामी, सहृदय सखा भी वही है। उससे भिन्न मनुष्य का कुछ भी तो अस्तित्व नहीं है। मनुष्य जीवन देकर उसने हमारा कितना बड़ा उपकार किया है ? क्या हमें इस कृतज्ञता को भूल जाना चाहिए? क्या उससे विलग रहकर हम कभी सुखी रह सकेंगे? एक ही उत्तर है कि उसकी शरणागति के बिना सुख नहीं मिल सकता। उसे पाने के लिए तो पूर्ण रूप से समर्पण करना ही पड़ेगा।
एम. ए. की परीक्षा देने के लिये, यह आवश्यक है कि पढ़ाई का प्रारम्भ कक्षा ‘एक’ से हो। वर्णमाला सीखे बिना अगली कक्षाओं में प्रवेश पाना कठिन होता है। एम. ए. पास छात्र को यह आवश्यकता भले ही न हो किन्तु यह निश्चित है कि पूर्व में क, ख, ग, का अभ्यास किये बिना कोई अन्तिम श्रेणी तक नहीं पहुँच सकता है।
रेल का ड्राइवर पहले प्रशिक्षण केन्द्र में रहकर गाड़ी चलाना सीखता है। हवा में उड़ने वाले पाइलट पहले धरती में जहाज चलाना सीखते हैं फिर क्रमशः ऊँची उड़ानों के लिये तैनात किये जाते हैं। कच्चा सिपाही जब तक युद्ध कला का भली, भाँति प्रशिक्षण प्राप्त नहीं कर लेता तब तक ‘रेंगरुट’ कहलाता है। सिपाही बनने का सौभाग्य प्रारम्भिक स्थिति को कुशलता पूर्वक पार करने और आगे की स्थिति का सही अनुभव मिल जाने पर ही उपलब्ध होता है।
जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में क्रमिक विकास का सिद्धान्त कार्य करता है। ऐसा नहीं होता कि कोई मनुष्य पहले बुड्ढा होकर जन्म ले फिर बालक बन जाय और अन्तिम अवस्था में नवयुवक हो जाय। उदय से अस्त तक एक क्रमिक ढलान होती है। उसके अनुसार बर्ताव करने पर ही सुविधा पूर्वक किसी लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
माता-पिता बालक को पहले घुटनों चलना सिखाते हैं। फिर उसकी एक उँगली पकड़कर चलाते हैं। जब बच्चा इस योग्य हो जाता है कि वह स्वतंत्र होकर चल फिर सके, तभी माता-पिता उसे बाहर जाने की अनुमति देते हैं। इसके पूर्व तो उसकी यात्रा गोद में, या किसी अन्य वाहन के माध्यम से ही होती है।
विद्यार्थी को प्रारम्भ में ही बी. ए., एम. ए. की पुस्तकें सौंप दी जाय, तो वह उन्हें केवल खेलने की वस्तु समझेगा। ड्राइवर को किसी पूर्व प्रशिक्षण के बिना मोटर चलाने को दे दिया जाय तो वह एक ही दिन में सैंकड़ों दुर्घटनायें कर बैठेगा। बच्चे को जन्म के एक साल बाद ही एक मील की यात्रा सौंप दी जाय, तो वह बालक के बूते पूरी न हो सकेगी। प्रारम्भिक भार से कितनी ही सरल साधना क्यों न हो, वह कर्त्ता को दबा देगी, ऊँचे उठाने के बजाय नीचे गिरा देगी।
आत्म-साक्षात्कार की साधना का अभ्यास भी क्रमेक पद्धति से होता है। सर्वं प्रथम पूजा में जप करना बताया जाता है। कई व्यक्ति इसे अनावश्यक, उपहासास्पद एवं काल्पनिक मानते हैं किन्तु आत्म साक्षात्कार के लिये जप प्रारम्भिक शर्त है उसके बिना ऊँची कक्षा में प्रवेश पाना कठिन पड़ता है।
जप साधना की पूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है। शुरू-शुरू में यह बताया जाता है कि अमुक चित्र का, गायत्री माता या भगवान राम के चित्र का दोनों भौंहों के बीच ध्यान किया करो। उस ध्यान में इष्ट का साक्षात्कार भले ही न होता हो पर आत्म-विवेचन की, विचार-मंथन क्रिया उसी समय से प्रारम्भ हो जाती है। जापक का मन पहले पहल इधर-उधर दौड़ता है तो मन में विचित्र स्थिति उत्पन्न होती है। वह हर एक वस्तु को संदिग्ध रूप से देखने लगता है। हर वस्तु पर विचार की स्थिति का उदय होता है। यह वृक्ष कैसे उगा, पहाड़ कैसे बन गये, नक्षत्र क्या हैं, सूर्य क्या है, शरीर कैसे बना, इसका उद्देश्य क्या है, भावनायें कहाँ से उठती हैं, भोगों की इच्छा क्यों होती है- आदि अनेकों प्रकार के भाव-भ्रमर मस्तिष्क में उठते हैं और वस्तु स्थिति जानने की आकुलता पैदा करते हैं। इस प्रकार की जिज्ञासा का जन्म होना कक्षा एक की पढ़ाई है। आत्म साक्षात्कार की भूमिका वस्तु और संसार के प्रति कौतूहल का भाव पैदा होना होता है। जप इस प्रथम कक्षा के लिये उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी है।
आत्मा की अनेक शक्तियों में मन का बल सबसे अधिक हैं। मन इन्द्रियों का शासन करता है। प्राण-वेधन और आत्म साक्षात्कार की साधनायें मन को पकड़ कर ही की जाती हैं इस लिये ध्यान की प्रक्रिया अत्यन्त आवश्यक है। ध्यान से मन की एकाग्रता बढ़ती है और मनुष्य लक्ष्यवेध के लिये तैयार होता है।
निग्रहीत मन में वह शक्ति और क्षमता होती है कि उसे जिस कार्य में प्रयुक्त किया जाय उसके अनेक गुण दोष अपने आप स्पष्ट होने लगते हैं और जिस दिशा में उसे मोड़ दिया जाता है उसका और उससे संबंधित अनेक प्रकार का ज्ञान ऐसे उपलब्ध करा देता है जैसे कोई दैवी शक्ति अन्तःकरण में संकेत द्वारा सारी स्थिति स्पष्ट करती चलती हो।
जप का अर्थ है कि मनुष्य विभिन्न दिशाओं में भटकते हुये मन को एक स्थान में एकाग्र करे और उसकी शक्ति को समेट कर रखे ताकि आगे का प्रयोजन सफलतापूर्वक पूरा होता चला जाय। यह ऐसे ही है जैसे रेलगाड़ी चलाने के पूर्व ड्राइवर उसमें भाप की पर्याप्त मात्रा पैदा कर लेते हैं। आत्म-साक्षात्कार की यात्रा के लिये भी निग्रहीत मन की शक्ति जरूरी है और उसकी एक मात्र प्रक्रिया ध्यान भी इस दृष्टि से परम आवश्यक है।
जप से किसी वस्तु को गहरी दृष्टि से देखने का अभ्यास होता है। हम प्रति दिन अनेकों ऐसे दृश्य देखते हैं जो मनुष्य जीवन पर विचार करने की तीव्र प्रेरणा देते है। किन्तु चूँकि घटनाओं के प्रति मनुष्य की दृष्टि बिल्कुल उथली होती है। इसीलिये घटनायें भी किसी उपयोग में नहीं आतीं पर जप का साधक प्रत्येक वस्तु को बड़े ध्यान से देखता है और “ऐसा क्यों हुआ?” यह प्रश्न कर स्वयं ही उसका उत्तर प्राप्त करने का प्रयत्न करता है। इस जानकारी के लिये तीव्र बेचैनी उत्पन्न करना वस्तुतः जप द्वारा तपाये मन का ही कार्य होता है।
उदाहरणार्थ एक मनुष्य का शव देखकर वह सोचता है यह मनुष्य क्यों मरा, कैसे मरा ? मर कर इसका क्या हुआ, मुझे भी जब मृत्यु आयेगी तो मेरी कैसी स्थिति होगी? आदि-आदि। इस दीर्घ दृष्टि के उदय होने पर तीव्र बेचैनी उत्पन्न होती है। साँसारिक भोगों के प्रति वैराग्य उत्पन्न करने का यह प्रमुख साधन है। बुराइयों से हटकर ज्ञान की खोज का यह असामान्य तरीका है।
आत्म-साक्षात्कार के मार्ग में दुष्प्रवृत्तियाँ सबसे अधिक बाधक है। तपश्चर्या का उद्देश्य मनुष्य को शील स्वभाव, सहृदय और सद्प्रवृत्तियों में रुचि लेने वाला बनाना होता है। इच्छाओं का स्वेच्छापूर्वक दमन करना सीख जाय तो पग-पग पर आने वाले इन्द्रिय प्रलोभनों से वह बच सकता है। तपश्चर्या से इन्द्रियाँ वशवर्ती होती है और विषयों पर मनुष्य का स्वामित्व होता है। आत्म-कल्याण के लिये यह स्थिति बहुत जरूरी है।
मनुष्य के जीवन में तप शक्ति का स्रोत माना जाता है। तपश्चर्या द्वारा मनोनिग्रह के साथ ही साथ शारीरिक, मानसिक और आत्मिक बल बढ़ता है। शक्ति का संचय जितनी द्रुतगति से होगा, आत्म-विकास की प्रक्रिया भी उतना ही शीघ्रगामी होगी।
शास्त्रकार ने कहा है “दिव मारुहत तपसा तपस्वी।” अर्थात् तप करो, बिना तप किये हुये आत्म दर्शन नहीं हो सकता है। तप का महत्व भारतीय संस्कृति में इसी लिये अत्यधिक है कि उससे सुषुप्त शक्तियों का विकास होता है।
जप और तप की महिमा का शास्त्रों में भंडार भरा पड़ा है। दोनों का महत्व एक दूसरे से बढ़ चढ़कर बताया गया है। दोनों ही आत्म-साक्षात्कार के दो आवश्यक अंग हैं। यह यज्ञ के समान बताये गये हैं और आत्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिये इनका अभ्यास आवश्यक बताया गया है।
जप मनोनिग्रह के उद्देश्य के लिये और तप शक्तियों के जागरण के लिये। इस प्रकार की स्थिति बन जाय तो आत्म-कल्याण की उच्च कक्षाओं में अग्रसर होना आसान हो जाता है। साधना की बढ़ती हुई कठिनता के अनुरूप शक्ति और सामर्थ्य जप और तप द्वारा पूरी होती है। साधना की इस वैज्ञानिक पद्धति को छोड़कर कोई भी व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता।
इसलिये यह नहीं मानना चाहिये कि जप और तप व्यर्थ की बातें हैं, वरन् उनका प्रभाव मनुष्य जीवन पर तत्काल परिलक्षित होता है और उस प्रभाव के क्रमिक विकास द्वारा वह आत्मसाक्षात्कार की स्थिति तक जा पहुँचता है।
इस क्रम में और भी अनेकों प्रकार की साधनायें प्रयुक्त होती हैं, किन्तु उनका मूल जप और तप है। इन दो पहियों के सहारे ही आत्म-विकास की यात्रा पूरी होती है। इन्हें लक्ष्यवेध का मुख्य अंग मानकर अपनाना चाहिये।
महामनीषियों, ऋषियों और तत्ववेत्ताओं ने मानव-जीवन का जो सार खोज निकाला है, वह सत्यं, शिवं, सुन्दरम् की त्रिपुटी में सन्निहित है। जिस मनुष्य के जीवन में सत्य, शिव और सुन्दर की अवतारणा हो गई वह हर प्रकार से धन्य ही माना जायेगा। क्या लोक, क्या परलोक उसके लिए हर प्रकार से सार्थक तथा सुखदायक बन जाते हैं।
सत्यं, शिवं, सुन्दरम् की अनुभूति प्राप्त कर लेने पर फिर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। जीवात्मा जिस अनन्त एवं अक्षय आनन्द के लिए छटपटाता रहता है वह इन्हीं त्रितत्वों के अधीन रहता है। इनको पा लेने का अर्थ है आनन्द पा लेना।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के क्रम में जिस प्रकार धर्म प्रथम है उसी प्रकार सत्यं, शिवं, सुन्दरम् क्रम में सत्य का प्रथम स्थान है। इन क्रमों में प्राथमिकता का अर्थ है प्रधानता। बिना धर्म के अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति असंभव है और बिना सत्य के शिवं एवं सुन्दरम् का कोई अस्तित्व नहीं है। जो सत्य है वही शिव और सुन्दर है और जो शिव तथा सुन्दर है उसको सत्य होना ही चाहिए। शिव एवं सुन्दरम् को सत्य का ही परिणाम मानना चाहिए। जो सत्य का उपासक है उसे शिवं तथा सुन्दरम् की प्राप्ति स्वयं ही हो जाती है। अस्तु जीवन की सफलता तथा सार्थकता के लिए मनुष्य को सत्य की खोज और उसकी उपासना में ही संलग्न होना चाहिये।
सत्य क्या है उसका निवास कहाँ है और उसे किस प्रकार पाया जा सकता है ? इन प्रश्नों का उत्तर है कि सत्य किसी भी वस्तु-विषय का वह अंतिम स्वरूप हैं जिसमें किसी विकार अथवा परिवर्तन का अवसर न हो। सत्य का निवास संसार के प्रत्येक अणु में है और वह विश्वासपूर्ण जिज्ञासा के बल पर पाया जा सकता है।
इस संपूर्ण सृष्टि में जो कुछ प्रत्यक्ष रूप में दिखाई दे रहा है वह चिरन्तन सत्य नहीं है। क्यों कि वह किसी विषय का विकृत स्वरूप है और प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है। सत्य की खोज करने के लिये किसी विषय के बाह्य स्वरूप से हटकर उसके अन्तःरूप की ओर दृष्टि डालनी होगी। उसके आदिम तथा अन्तिम रूप को खोज निकालना होगा। हम जो कुछ भी चर-अचर एवं जड़ चेतन प्रत्यक्ष रूप में देख रहे हैं वह सृजन है, निर्माण है, जो किसी तत्व विशेष द्वारा निर्मित हुआ है। किसी भी वस्तु का वह आदि तत्व ही चिरन्तन सत्य है जो आज में पुनः अपने आदि स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाए तो क्या मनुष्य, क्या वनस्पति, क्या पशु, क्या पक्षी अपने वर्तमान रूप में सत्य नहीं है। इनका सत्य स्वरूप उस तत्व में निहित है जिसकी सहायता से इन सबका सृजन हुआ है और वह तत्व एक मात्र परमात्मा ही है। परमात्मा की उपासना सत्य की उपासना और सत्य की उपासना परमात्मा की उपासना है।
उपयुक्त सत्य की जो विवेचना की गई है वह तात्विक दृष्टि से चरम सत्य की विवेचना है। किन्तु यही चरम सत्य संसार में जब व्यावहारिकता का रूप धारण करता है तब इसका स्वरूप उसी प्रकार से कुछ बदल जाता है जिस प्रकार ईश्वर रूप होते हुए भी मनुष्य-विग्रह में उसकी उपाधि मनुष्य ही है। मनुष्य ईश्वर का व्यावहारिक रूप है जो सृष्टि की सहायता से आत्म-स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिये ही सारे व्यवहार करता है। मनुष्य का सारा क्रिया कलाप अपने सत्य स्वरूप को ही प्राप्त करने का उपक्रम मात्र है।
इस विविधता पूर्ण संसार में सत्य के भी विविध रूप हैं, जिनका व्यवहार करते हुए मनुष्य एक दूसरे को आत्म रूप की ओर अग्रसर होने में सहयोग करते हैं।
संसार में जो भी व्यवहार व्यापार अथवा आचार किया जाय वह सत्य ही होना चाहिए। क्योंकि सत्य से शून्य कोई भी आचार व्यवहार मनुष्य को प्रतिकूल दिशा की ओर ले जाता है जिससे वह आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के स्थान पर आत्म-विस्मृत के अन्धकार में फँस जाता है। यही कारण है कि तत्ववेत्ताओं ने मिथ्याचार को हर स्थिति में सर्वथा वर्जित ही बताया है।
मनुष्य का वह प्रत्येक कार्य मिथ्याचार ही है जो किसी भी काल में उसको अथवा किसी दूसरे को दुःखदायी होता है। व्यवहार जगत में ऐसे अनेक अवसर आ जाया करते हैं जब सत्य, असत्य के और असत्य सत्य के रूप अर्थ में लिया जा सकता है। मानिये कोई आततायी किसी को मारने के लिये उसका पीछा करता हुआ आता है और वह आदमी आपके देखते एक स्थान पर छिप जाता है। आततायी आकर आपसे पूछता है कि क्या आपने देखा है कि वह आदमी कहाँ छिप गया है। आप ठीक-ठीक जानते हुए कि वह कहाँ छिपा हुआ है-आततायी को क्या उत्तर देंगे? यदि आप उस आदमी का ठीक-ठीक पता बतला देते हैं तो वह आदमी मारा जायेगा और आप हत्या के भागीदार बनेंगे और यदि आप ठीक ठीक पता नहीं बतलाते तो झूठ बोलते हैं। ऐसे अवसर पर कोई भी करणीय अथवा अकरणीय के असमंजस में पड़ जायेगा।
इस प्रकार के असमंजस के समय आपको निर्णय करने से पहले यह विचार करना होगा कि आप उस समय व्यवहार जगत में वर्त रहे हैं अथवा अध्यात्म जगत में। यदि अध्यात्म जगत में वर्त रहे हैं तो निर्लिप्त भाव होने से ‘हाँ’ और ‘न’ दोनों स्थितियों में आप पाप के भागी न बनेंगे। उस समय आपका वही उत्तर सत्य होगा जो सहसा प्रथम बार ही आपके अन्तःकरण में प्रतिध्वनित होगा। ‘हाँ’ अथवा ‘न’ कोई भी उत्तर देने के बाद यदि आपके अन्तःकरण में कोई द्वन्द्व नहीं उठता और तत्काल उस घटना को भूलकर आत्मस्थ हो जाते हैं तो आपका कोई भी उत्तर निष्फल होगा जिसका परिणाम न पाप होगा और न पुण्य!
यदि आप उस समय व्यवहार जगत में चेष्टावान हैं तो आपको अपने कथन की उपयोगिता एवं परिणाम देख कर उत्तर देना होगा जिसमें अधिक से अधिक मानवीय हित का समावेश हो आपका वही उत्तर उचित होगा।
उपरोक्त स्थिति विशेष में आपका निषेधात्मक उत्तर ही ठीक है क्योंकि उस प्रकार किसी एक निरपराध की जीवन रक्षा होगी और आततायी तात्कालिक हत्या के पाप से बच जायेगा और इस प्रकार आप एक सामयिक सत्य की रक्षा करेंगे।
इसके अतिरिक्त यदि आप आततायी से भयभीत होकर प्रच्छन्न व्यक्ति का पता बतला देते हैं और यह सोच लेते हैं कि वह व्यक्ति मारा जायेगा, तो मारा जाये, मैंने तो सत्य ही बोला है तो आपका वह सत्य घोर असत्य है, जिसके लिये आप पाप के भागी होंगे।
इसी प्रकार की एक अन्य स्थिति में यदि कोई अपराधी आपकी जान में छिपा हुआ है और उसकी तलाश में पुलिस आप से पूछती है तो आपका यह सोचकर न बतलाना कि बेचारा पुलिस के फंदे में फँसकर दण्ड पायेगा-तो आप की वह दया एक घोर असत्य ही है ! निरपराधी तथा अपराधी की रक्षा में समानता नहीं हो सकती। फिर चाहे एक में आपको असत्य और दूसरे में सत्य कथन का सहारा ही क्यों न लेना पड़ा हो।
जिस व्यवहार जगत में हम बर्तते हैं उसमें कथन की हितकारिता ही सत्य का स्वरूप है और यही ‘सत्यं’ के साथ ‘शिवं’ का समावेश है। किन्तु कथन की हितकारिता में किसी स्वार्थ, भय, क्रोध अथवा मोह का पुट नहीं होना चाहिये।
जिस प्रकार सत्यं के साथ हितकारिता के रूप में ‘शिवं’ आवश्यक है उसी प्रकार ‘सुन्दरम्’ अर्थात् मृदुता एवं मधुरता भी सत्य का एक अभिन्न अंग है। सत्य के इस अंश ‘सुन्दरम्’ का संबंध भाषा तथा अभिव्यक्ति से है। किसी सत्य को विकृति, अतिरेकता आवेश, कटुता अथवा उपहासात्मक व्यंग के साथ सामने रखना अथवा स्वयं समझना भी एक प्रकार से असत्य की ही सेवा है। किसी नग्न सत्य को भी शिष्टता का जामा पहना कर ही सामने लाना ठीक है अन्यथा कटुता के कारण किसी को अनावश्यक कष्ट देने वाला सत्य भी असत्य का ही रूप है। इस प्रकार सत्य का स्वरूप तभी पूर्ण होता है जब वह-शिवं एवं ‘सुन्दरम्’ के साथ ही हो।
उपवास और प्रार्थना के समान शक्तिशाली वस्तु दुनिया में और कोई नहीं है। उनसे हमारे जीवन में आवश्यक अनुशासन पैदा होता है। आत्मत्याग की भावना बढ़ती है तथा नम्रता और संकल्प की दृढ़ता उत्पन्न होती है।
-महात्मा गान्धी
एक समय था जब अपने देश भारतवर्ष को जगद्गुरु का पद मिला हुआ था। यह पद केवल एक ही विषय अध्यात्म में ही नहीं अपितु अनेकों भौतिक शिल्पों में भी मिला हुआ था। भारत की स्थापत्य कला, वस्त्र, शिल्प, शस्त्र कौशल और कृषि कार्य सदा से संसार का पथ-दर्शक रहा है। जिस समय संसार पशु-अवस्था और सभ्यता रहित स्थिति में था, भारत उस समय सभ्यता, संस्कृति तथा विविध शिल्पों के शिखर पर पहुँच चुका था।
संसार की अन्य जातियाँ जिस समय आखेट युग में कच्चे पशु माँस पर जीवित रह रही थीं उस समय भारत अग्नि का उपयोग ही नहीं अपितु सम्पूर्ण यज्ञ विधान रच चुका था। जिस समय संसार संकेतों और मौखिक ध्वनियों से वार्तालाप कर रहा था, भारत छन्दों के विधि विधान सहित ऋग्, यजु, अथर्व की रचना और सामवेद की सिद्धि कर चुका था। जिस समय संसार नग्नावस्था में विचरण कर रहा था भारत कौशेय तथा पट्ट वस्त्रों के विविध प्रकार तैयार कर चुका था।
आज संसार में जो कुछ सभ्यता और संस्कृति में ही है और संसार में जितनी भाषाएं बोली जाती हैं उनका उद्गम वेदों की देववाणी में ही है। संसार में दीखने वाली आज की सारी मनुष्यता भारतीय ऋषि मुनियों की देन है।
आत्मा, परमात्मा, प्रकृति एवं जीव, जड़ और चेतन आदि का तत्व-ज्ञान सर्वप्रथम मनीषियों ने ही खोज निकाला। मानव शरीर के मूल वैज्ञानिक तत्व “छिति, जल, पावक, गगन, समीरा” की खोज करने वाले भारतीय विज्ञानवेत्ता ही थे और मनोविज्ञान के आधार मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय के अन्वेषक भारतीय मनीषी ही थे।
भारतीय संस्कृति और मानव सभ्यता के जन्मदाता महात्माओं ने जो प्राप्त किया था वह केवल अपने तक अथवा अपने देशवासियों तक ही सीमित नहीं रक्खा, बल्कि हाथ में कमंडलु और कंठ में “कृण्वन्तु विश्वम् आर्यम्” का उद्घोष लेकर निकले और वनचरों को मनुष्यता का पाठ पढ़ाया। यही कारण है कि संसार भारत को अपना गुरु मानने पर विवश हुआ।
भारत में जहाँ एक ओर ज्ञान का विपुल भंडार था वहाँ दूसरी ओर अनन्त धन-धान्य भरा हुआ था। सर्व सम्पन्न भारतीयों को क्या आवश्यकता थी कि वे सहज सुलभ सुख साधनों का उपभोग छोड़कर ज्ञानार्जन करते और उसे संसार में फैलाते! ईश्वर की अनुभूति कर लेने वाले और अक्षय आनन्द का मार्ग निकालने वाले भारतवासियों ने साँसारिक सुख-साधनों की निःसारता बहुत शीघ्र अनुभव कर ली थी। फिर भला वे किस प्रकार उनमें लिप्त होकर अपने को सच्चे आनन्द से वंचित कर सकते थे और “वसुधैव कुटुम्बकम्” का सिद्धान्त मानने वाले आर्य किस प्रकार देख सकते थे कि उनके बन्धु अन्य मानव पशुता की कोटि में रहें। विश्व कल्याण की भावना से प्रेरित भारतीयों ने त्याग का मार्ग ग्रहण किया और संसार की तथा मानव जाति की अतुलनीय सेवा की।
भारत वर्ष का यह अनन्त गौरवपूर्ण जगद्गुरु का पद सहस्रों वर्षों तक बना रहा या यों कहना चाहिये कि वह जब तक त्याग और तपस्या का मार्ग ग्रहण किये रहा वह जगद्गुरु के प्रतिष्ठित पद पर आसीन रहा। किन्तु जब भारतवासियों ने अध्यात्मज्ञान को व्यावहारिक जीवन से निकाल कर यथार्थ के स्थान पर कल्पना लोक की वस्तु बना दिया, धर्म का स्वरूप विकृत कर दिया, तभी से उसका पतन प्रारम्भ हो गया।
इधर भारतवासियों की धर्म के नाम पर लिप्सा पूर्ण गतिविधियों और उधर भारतीय ज्ञान से तेज पाकर अनेक विश्वास घातिनी जातियों के निरन्तर आक्रमणों ने मिलकर देश के सम्मुख एक ऐसी परिस्थिति रख दी जिसे परतन्त्रता कहा जाता है। भारत को लगभग एक सहस्र वर्ष तक अपने अधःपतन का कुफल गुलामी के रूप में भोगना पड़ा।
पराधीनता की पतित अवस्था में भी भारतभूमि तत्वदर्शी और त्यागी महात्माओं के प्रसाद से वंचित न रह सकी। यही कारण था कि गुलामी के प्रलयंकर काल में भी विदेशियों, विधर्मियों एवं विजातियों की दुरभिसंधियों के बावजूद भी भारतीयता अपना स्वरूप न खो सकी।
एक ओर पतित मनोवृत्ति के देशवासी पद, प्रतिष्ठा, सुख और साधनों के लोभ के वशीभूत होकर वैदेशिकता को अन्तःकरण से स्वीकार करने और जनता को स्वीकार कराने का प्रयत्न कर रहे थे और दूसरी ओर त्यागी तपस्वी तथा निस्पृह देशभक्त महात्मा जनता को ठीक मार्ग पर चला रहे थे। यह संघर्ष सदियों तक चलता रहा और अन्त में त्याग तथा तपस्या की विजय हुई और देश स्वाधीन हुआ।
भारत स्वाधीन हुआ। किन्तु जब वह स्वाधीन हुआ उस समय तक उसका अधःपतन अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था। देश हर प्रकार से खोखला हो चुका था। शासन सत्ता हाथ में आने पर भारतीयों का पहला कर्त्तव्य यह था कि वे अपना मूल भूत सुधार करते। देश में ऐसी परिस्थितियाँ और अवस्थाएँ उत्पन्न करते जिस से जनता का गिरा हुआ चरित्र बल समुन्नत होता और देश पुनः उन आदर्शों को प्राप्त कर सकता जिनके बल पर वह जगद्गुरु बना था।
स्वाधीनता प्राप्त करने के बाद हम भारतीय जन्म-जन्म के विभुक्षुओं की भाँति रोटी, कपड़ा और सुख-सुविधाओं की लोलुपता में बुरी तरह डूब गये। यही कारण है कि देश का दिन-दिन पतन ही दृष्टिगोचर हो रहा है।
इस भोजन भोग की लोलुपता पूर्ण तृष्णा का फल यह हुआ कि देश और भी दरिद्र बन गया। वाँछित उपलब्धियाँ तो प्राप्त न हो सकीं, उलटा चरित्र तथा आचरण का घोरतम पतन हो गया, जिससे देश की रही-सही शक्तियाँ भी क्षीण होती जा रही हैं।
अब भी कुछ बिगड़ा नहीं है। यदि सुबह का भूला शाम को घर आ जाये तो वह भूला नहीं कहा जा सकता। अभी समय है। राष्ट्र को चाहिये कि वह लोलुपतापूर्ण तथा स्वार्थजन्य एषणाओं को छोड़कर अपने पूर्व पुरुषों की भाँति त्याग और तपस्या का जीवन ग्रहण कर अपना चरित्र बल ऊँचा करे, जिससे कि देश की गिरती हुई दशा में सुधार की सम्भावनाएँ उत्पन्न हों। देश का जब तक धार्मिक, अध्यात्मिक तथा चारित्रिक पुनरुद्धार नहीं होगा सुधार तथा उन्नति की कोई भी आशा मृग मरीचिका ही सिद्ध होगी। जब तक भोगवादी दृष्टिकोण को सामने रखते हुये भौतिक सुख साधनों को महत्ता दी जायेगी तब तक भारत का सत्य स्वरूप मिलना असम्भव सा-ही है।
इतना सब कुछ होते हुये भी यह नहीं कहा जा सकता कि देश के चारित्रिक निर्माण के लिए कुछ काम नहीं हो रहा है। जिस प्रकार पराधीनता काल में गुलामी पसन्द और स्वतन्त्रता प्रिय लोगों के अपने-अपने प्रयत्न चलते रहे हैं उसी प्रकार आज भी भोगवादी और त्यागवादियों के अपने-अपने प्रयत्न चल रहे हैं और यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि जिस प्रकार तब तपस्वियों की विजय हुई थी आज भी उनकी ही विजय होगी।
आज भी देश के कोने-कोने में भारत माता के सच्चे सपूत त्याग, तपस्या, बलिदान, उत्सर्ग, नैतिकता, धार्मिकता, अध्यात्मिकता तथा मनुष्यता का शंख फूँकते हुये चरित्रबल पर भारत को एक बार पुनः जगद्गुरु के पद पर प्रतिष्ठित कराने का प्रयत्न कर रहे हैं। उनका यह सत्प्रयत्न सफल होगा, इसमें संदेह की कोई गुँजाइश नहीं है।
इस स्थूल शरीर के लिये स्वास्थ्य का सुझाव दो और वह शरीर निश्चय ही स्वस्थ हो जायगा। इस कारण शरीर को ईश्वरीय चेतना से भरने का संकल्प करो और मनुष्य निश्चय ही भविष्य-वक्ता बन जाएगा। यदि इसमें गुलामी और कमजोरी के विचार आयेंगे तो यह स्थूल शरीर निश्चय ही कमजोर और गुलाम बन जायगा। मनुष्य बनाई हुई वस्तुओं का स्वयं कारीगर है जितना कि वह अपने शरीर के लिये सभी वातावरण में उत्तरदायी है।
-स्वामी रामतीर्थ
जीवन में कठिनाइयाँ तथा मुसीबतें तब पैदा होती हैं जब मनुष्य उसे जटिल, दुरूह और अधिक आडम्बरपूर्ण बना लिया करता है। जीवन की सरलता ही सुखद है। व्यवहार में सरलता, विचार और आचरण में स्पष्टता बनी रहे तो मनुष्य के जीवन में कहीं कुछ भी कठिनाइयाँ परेशानियाँ नहीं है।
सरलता का अर्थ विश्व को ऐसे रूप में निदर्शन करना है जिसमें वह यथार्थ हो। यथार्थ परिस्थिति से भिन्न रूप बनाना ही जटिलता पैदा करना है। इसी से मुसीबतों का जन्म होता है। क्या आपने उस क्लर्क की कहानी पढ़ी है जिसने अपनी धर्मपत्नी पर अपनी आत्मश्लाघा के फलस्वरूप अपना वास्तविक रूप प्रकट नहीं किया। अधिक आय बताकर उसने दाम्पत्य जीवन में खाई पैदा कर ली। किसी विवाहोत्सव में सम्मिलित होने के लिये पत्नी ने हार की याचना की जिसे वह क्लर्क पूरा नहीं कर सकता था किन्तु अपनी महत्वाकाँक्षा छिपाने के लिये किसी परिचित से हार माँग कर अपनी धर्मपत्नी की इच्छा पूरी की। घटनावश वह हार उत्सव पर खो जाता है और उसकी कीमत चुकाने में उस क्लर्क को अपनी आय का आधा हिस्सा प्रतिमास देना पड़ता है। आधी आय से उन्हें नितान्त गरीब का सा अभावग्रस्त जीवन जीना पड़ता है।
आज ऐसी ही कहानियाँ सर्वत्र देखने को मिल सकती हैं। साधारण जीवन व्यवहार से लेकर उत्सवों, विवाहों, पर्वों पर, विद्यार्थी जीवन से लेकर सामाजिक व्यवहार तक सब जगह अस्पष्टता के दर्शन होते हैं। जिनकी आय 50 रुपये है वह उसे छिपाकर 150 रुपये बताने में अधिक गौरव मानता है। घर की माली हालत अच्छी नहीं है पर बाहर निकलने के लिए वह सुसज्जित वेष-भूषा चाहता है। इस जटिलता के कारण पारिवारिक जीवन में, सामाजिक तथा राष्ट्रीय जीवन में अनेकों समस्याएँ खड़ी होती हैं और मनुष्य का जीवन भारस्वरूप हो जाता है। उससे न खुद को कोई प्रसन्नता होती है न औरों को। दाम्पत्य जीवन में विद्वेष, पारिवारिक जीवन में कलह तथा कटुता, व्यक्तिगत जीवन में ऊब, उत्तेजना अव्यवस्था, खर्चे की तंगी, बच्चों की शिक्षा का पूरा न कर पाना आदि अनेकों कठिनाइयाँ केवल इसलिये खड़ी हो रही हैं कि मनुष्य जिस स्थिति में है उससे बहुत अधिक बढ़ चढ़ कर अपने आप को व्यक्त करना चाहता है। यह बनावटीपन जहाँ भी पैदा होगा वहाँ के जीवन में भोंडापन अवश्य आयेगा। उसके फलस्वरूप मनुष्य का जीवन कठिनाइयों, चिन्ताओं तथा दुरुहताओं में ही फँसता चला जायेगा।
मनुष्य का यह अहंभाव यदि समाप्त हो जाता है तो वह अपने सरल जीवन में आ जाता है। इसमें उसे कुछ हानि नहीं होती। लोग छोटा मानेंगे ऐसी बात नहीं। ऋषियों के जीवन में बड़ी सादगी और सरलता थी इस कारण उनका गौरव सर्वमान्य ही है। दरअसल बनावटीपन, शेखी खोरी तथा अहंभावना की निन्दा की जाती है। नकली चेहरा लगाकर आने वालों पर ही संसार हँसता है। जिसके अन्दर सार्वभौम यथार्थता निर्दोष बनकर प्रतिबिम्बित होती है उसका जीवन आदर्श एवं अनुकरणीय होता है। वह जागृत हो जाता है और दूसरों के लिये नमूना बनता है। उसकी अनेक परेशानी उससे दूर रहती हैं और वह मस्ती का जीवन बिताता है।
जिसे हम स्वाभिमान या आत्माभिमान कहते हैं वह इसी जीवन सरलता का परिणाम है। हम जिस स्थिति में हैं उसी में सन्तुष्ट रहें तो दूसरों के आगे न हाथ फैलाना पड़े न सहायता माँगनी पड़े। आध्यात्मिक प्रवृत्तियां केवल इसीलिए जागृत नहीं होती क्योंकि लोगों को बाहरी बनावट से ही फुरसत नहीं मिलती। गुणों का विकास भी इसीलिये नहीं होता क्योंकि लोग अपने आपको बढ़ा चढ़ाकर प्रदर्शित करने में ही जीवन को सफल मानते हैं और इसमें जिसको जितना सम्मान मिल जाता है उसी में गर्व और सन्तोष का अनुभव कर लेते हैं। बुद्धि का जो भाग जीवन-विकास और आध्यात्मिक शक्तियों के जागरण में लगना चाहिए था वह बाह्य विडम्बना और आत्म-प्रताड़ना में ही बीतता रहता है। बौद्धिक स्तर का इससे विकास भले ही हो जाय किन्तु आत्मिक स्तर दिन-दिन गिरता जाता है। नैतिक दृष्टि से ऐसे व्यक्तियों को पिछड़ा हुआ ही मानना चाहिये।
आहार-विहार, रहन-सहन, वेष-भूषा, विचार तथा जीवन निर्माण में मौलिक सरलता का समावेश होना नितान्त आवश्यक है। मनुष्य का जीवन एक उद्देश्य है जिसे निष्प्रयोजन नहीं होने देना चाहिये। आत्मा को आन्तरिक स्फुरणा के साथ मनुष्य विकसित हो यह उसकी मूल आवश्यकता है। उसके जीवन में स्नेह, प्रेम, आत्मीयता, दया, करुणा, उदारता, सौमनस्यता तथा सहिष्णुता का आदान-प्रदान बना रहे इसके लिए यह आवश्यक है कि उसका जीवन शुद्ध और सरल बना रहे। इससे उसका मनोबल क्षीण न होगा। वह हतोत्साहित, परावलम्बी तथा उदासीन न होगा। उसके जीवन में निरन्तर एक ऐसी दैवी प्रतिमा का विकास होता रहेगा, जिसकी समीपता में उसके उपरोक्त मानवीय गुण फलते-फूलते तथा अभिसिंचित होते रहेंगे।
जटिलता जीवन-वृत्तियों को बाह्योपचार में लगती है सरलता आत्मिक-स्तर को, अन्तःकरण को विशाल बनाती है। सत्य का व्यवहारिक स्वरूप सरलता है। इससे मनुष्य का हृदय विस्तीर्ण होता है, भावनायें परिष्कृत होती हैं। जैसे-जैसे उसकी वृत्तियाँ अन्तःवर्ती होती जाती हैं वैसे ही वैसे वह संसार को भी अत्यन्त स्वच्छ और स्पष्ट रूप में देखने लगता है। संसार के सच्चे रूप को देखना ही आत्मा की मूल आवश्यकता है। ईश्वर की आकाँक्षा को कोई व्यक्ति भुलाकर सर्वव्याप्त सद्गुणों को ही अपने अंतर्गत अवगाहन करता रहे तो आस्तिकता की सारी आवश्यकतायें इसी से पूर्ण हो जाती हैं। मनुष्य के जीवन में जब मिथ्याहंकार तथा खोखलापन आता है तभी वह सत्य की वास्तविकता से विभ्रम होता है और नास्तिकता के कूट-चक्र में फँसकर जीवन को कठिन बना डालता है।
मानसिक अशान्ति का कारण क्या है? मनुष्य चाहते हैं कि संसार के सब पदार्थ अपने अपने स्वभाव को छोड़ कर उन्हीं की इच्छानुकूल बर्ताव करने लग जायें, परन्तु पदार्थ ऐसा करने से लाचार हैं। वे जिन प्राकृतिक नियमों से बँधे हैं उनका उल्लंघन नहीं कर सकते। इसलिये जब वे मनुष्य की इच्छा पूर्ति नहीं करते तभी वह दुःखी होने लगता है। भलाई तो इसमें थी कि वह वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को देखकर अपनी आवश्यकताओं को उनके अनुकूल बनाने का प्रयत्न करता। परन्तु यह तभी सम्भव है जब अपनी मानसिक वृत्तियों का नियंत्रण किया जाय और उन्हें स्थिति की परिधि से बाहर ने होने दिया जाये। इच्छायें, आकाँक्षायें बढ़ें, इसमें हर्ज नहीं पर वे साधनों के घेरे को तोड़कर बाहर न फैलने पावें, इतना ध्यान बना रहे तो कोई भी प्रगति अनर्थकारक न होगी। सम्पन्नता, शक्ति और समृद्धि हमारी शान तो हैं किन्तु वे यथार्थ होनी चाहिये। केवल प्रदर्शन मात्र न होना चाहिए। बाहरी और भीतरी साधन और विस्तार में पारस्परिक मेल−मिलाप बना रहे तो वह उन्नति सर्वांगीण की जायेगी।
मौलिक सरलता इतनी सजीव होती है कि मनुष्य जब प्रत्येक वस्तु से अपना अधिकार छोड़ देता है और परिस्थितियों के साथ संयोग करता है तभी उसे अपने भीतर का खोखलापन अनुभव हो जाता है और विनम्रता, धैर्य, करुणा तथा विवेक का जागरण होने लगता है। आत्मा सरल है और उसके समर्थन के लिये तर्क की आवश्यकता नहीं। जटिलता तो केवल दुर्गुणों तथा पाप-वृत्तियों के कारण उत्पन्न होती है। अतः मनुष्य जब तक स्वयं पूर्ण जीवन अभिव्यक्त न कर लें, उन्हें अपने मनोविकारों के शोधन परिमार्जन में ही लगे रहना चाहिये। अन्तःकरण में कलुष न रह जाय और बाह्य जीवन में दम्भ न शेष बचे उसी पुरुष का जीवन निश्चयात्मक शान्त एवं दैवी प्रतिभा से ओत-प्रोत होता है।
आध्यात्मिक उन्नति और सच्चे सुख को प्राप्त करने का राजमार्ग वृत्तियों का शासन है। जो लोग वृत्तियों के दास बनकर अपनी इच्छाओं की पूर्ति के प्रयत्नों में उचित अनुचित का विचार नहीं करते उनकी आत्मा दुर्बल रहती है। आवश्यक सामग्री के उपस्थित न होने पर उन्हें जैसा, जितना तीव्र दुःख होता है उसकी प्रतिक्रिया औरों पर भी उसी गति से होती है। कपटता में अकेले एक व्यक्ति नहीं अनेकों और भी संलग्न हो जाते हैं। इस दुःख में फँसकर लोग अनर्थ करने लगते हैं। इससे छुटकारा तभी संभव है जब मनुष्य इच्छाओं की दासता को अस्वीकार कर केवल औचित्य पर ध्यान दें।
स्वाध्याय सन्दोह-
हम अपनी भलाई का भी ध्यान रखें-
संसार में ऐसे व्यक्ति बहुत थोड़े होते हैं जिनमें आत्मबल है, जिनको अपनी शक्ति पर विश्वास है, जो बलपूर्वक किसी काम को करना जानते हैं, जीवन की कठिनाइयों का वीरतापूर्वक सामना करते हैं तथा समय और अवसर को हाथ से कभी नहीं जाने देते। इसलिये यदि हम अपने को उत्कृष्ट अवस्था में रखना चाहते हैं, अपनी शक्तियों को उच्चकोटि की बनाना चाहते हैं तो यह उचित है कि हम अपने विषय में सदैव उत्तम विचार रखें और मानसिक दृष्टि से अपने हितैषी बनें। यदि हम अपने विषय में तुच्छ विचार रखते हैं अपनी बेकदरी करते हैं, तो यह एक प्रकार से ईश्वर की निन्दा करना है। क्योंकि सभी धर्मों में यह बतलाया गया है कि मनुष्य ईश्वर की सर्वोत्तम कृति है और उसने उसको पूर्ण बनाया है। ऐसी अवस्था में यदि हम अपने विषय में उत्तम विचार नहीं रखते, परमात्मा का अंश होने की दृष्टि से अपने को पवित्र नहीं समझते तो अवश्य ही हमारी उन्नति का मार्ग अवरुद्ध हो जायेगा और हम वास्तव में दुर्बल और प्रभावशून्य व्यक्तित्व वाले बन जायेंगे।
अपने मन में मनुष्य जैसा विचार करता रहता है वैसा ही वह स्वयं बन जाता है। मन के विचारों का जीवन पर और जीवन का शरीर पर प्रभाव पड़ता है। अतएव जब कभी आप अपने विषय में विचार करें तो सदा अपने को साफ, सुन्दर और स्वस्थ समझें। जिस बात से आपका गौरव या महत्व घटता है, उस पर ध्यान न दें। क्योंकि अपने विषय में आप जो कुछ विचार रखते हैं, अपना जैसा चित्र आप अपने मन में खींचते हैं उसका आपके ऊपर दूसरों की बातों की अपेक्षा बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। यदि आप जीवन को वास्तव में उपयोगी बनाना चाहते हैं, यदि अपनी शक्ति को वास्तव में कुछ कर सकने लायक रूप में परिवर्तित करना चाहते हैं, तो आपको सदा अपने संबंध में भलाई की बातें ही सोचनी चाहिये, और अपने शरीर तथा स्वास्थ्य के विषय में भी श्रेष्ठ भावना रखनी चाहिये।
-”आत्म हितैषी बनें”
हमारे जीवन के दो पहलू-
हमारे जीवन के- हमारे विचारों के दो भाग होते हैं- एक काल्पनिक और दूसरा क्रियात्मक। आप किसी आदर्श को पाने की मन में इच्छा करते हैं, उसकी प्राप्ति के लिये बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं और आपने अपना आदर्श भी सच्चे संकल्प से स्थिर किया है, किन्तु फिर भी आपकी ये सद्भावनाएं पानी के बुलबुलों के समान मन की मन में ही शान्त हो जाती हैं। इसका अर्थ यह है कि आप जीवन के काल्पनिक पहलू पर तो विशेष ध्यान देते हैं, पर उसके क्रियात्मक स्वरूप की तरफ से उदासीन रहते हैं। अपने सद्विचारों को नित्य प्रति के व्यवहार में न लाने के कारण ही आपको पूर्ण सफलता नहीं मिल रही है। संसार में सभी बड़े काम अपने सिद्धान्तों को प्रयोग में लाने से ही संपन्न हुआ करते हैं। काल्पनिक बौद्धिक विचार के साथ क्रियात्मक स्वरूप के उत्तम सामंजस्य से ही विचार समूचा बनता है और उसमें पूर्ण उत्पादक शक्ति का समावेश होता है। अभिलाषाएँ, विचार, योजनाएँ तब तक उत्पादक नहीं बन सकतीं, जब तक वे मनुष्य की क्रिया के रूप में परिवर्तित न कर दी जायें। विचार का क्रिया के साथ सम्मेलन होने से ही उत्पादक बल का प्रादुर्भाव होता है। पठन-पाठन और वाचन का ज्ञान चाहे कितना भी अधिक क्यों न हो, अन्ततः पुस्तक में ही रह जायेगा। छटाँक भर क्रियात्मक ज्ञान, सेर भर पण्डिताई से बहुत श्रेष्ठ है।
अनेक अस्थिर और चंचल प्रकृति के व्यक्ति बड़े उत्कृष्ट आदर्शों को लेकर निकलते हैं और बहुत कुछ करने की इच्छा रखते हैं, किन्तु वे संपूर्ण मन, वचन और काया के साथ अपने विचारों को कार्य रूप में परिणित नहीं कर पाते। जिस मूल्य द्वारा किसी कार्य में सफलता प्राप्त होती है, उस मूल्य अर्थात् ठोस कर्म, परिणाम, उद्योग, क्रियाशीलता को दिये बिना ही वे इच्छित पदार्थ को पाना चाहते हैं और फलतः असफल रहते हैं।
-”स्वर्ण पथ”
अपरिग्रह की अनिवार्य आवश्यकता-
जिसकी लोभ-भावना जितनी तीव्र होगी वह उतना ही अधिक संग्रह करने का संकल्प रहेगा। संग्रह कर सकेगा या नहीं यह व्यक्ति की अपनी तथा समाज की तात्कालिक परिस्थितियों पर निर्भर है। यदि वह विवशता अथवा शक्तिहीनता के कारण जितना चाहता है उतना संग्रह नहीं कर सकता, परन्तु उसकी लोभ-भावना बनी रहती है, तो उसे अपरिग्रह नहीं कहा जा सकता। आज जो वस्तु नहीं मिल सकती वह कल मिल सकती है, अतः जो विवशता से वस्तु को छोड़ता है, वह बाधा हट जाने पर संग्रह की तरफ और भी अधिक तीव्रता से बढ़ता है। किन्तु जो साधन होते हुये भी स्वेच्छा से संग्रह की लोभ-भावना का शान्त करके वस्तु का त्याग करता है, वही वास्तविक अपरिग्रही है।
-”नैतिकता की ओर”
बुरे विचारों को ठहरने न दें-
मनुष्य का कार्य प्रत्येक उसके किसी विचार का परिणाम है। जिस कार्य का जितना अधिक विचार किया जाता है वह धीरे-धीरे आदत का रूप धारण करने लगता है। अनेक आदतों के समूह का नाम ही चरित्र है। इसलिये तुम जिस तरह के काम करना चाहते हो उसी तरह के विचार तुम्हारे मन में आने चाहिये। जो काम तुम करना नहीं चाहते हो, जिस आदत को तुम ग्रहण करना नहीं चाहते हो, उनके पैदा करने वाले विचार कभी क्षण मात्र के लिये भी मन में न आने दो। यदि आवें तो उन्हें तत्काल निकाल बाहर करो।
यह एक मानी हुई बात है और इसमें किसी को तनिक भी विवाद नहीं है कि यदि मन में कोई विचार कुछ समय तक बराबर आता रहे तो वह विचार धीरे-धीरे मस्तक के उस भाग में पहुँच जायगा कि जहाँ वह अन्त में कार्य का रूप अवश्य धारण कर लेगा, अर्थात् जहाँ पहुँचकर वह शरीर को अपने अनुसार कार्य करने के लिये लाचार कर देगा। अब यदि यह विचार अच्छा है तो उसका फल भी अच्छा होगा और यदि विचार बुरा है तो परिणाम भी ठीक नहीं होगा। संसार में जितने भी बुरे कर्म हैं सब इसी तरह होते हैं और इनके विपरीत जितने उत्तम कार्य हैं, वे भी इसी तरह होते हैं।
-”चरित्र गठन और मनोबल”
बात नहीं काम करो-
उपदेश तो बहुत पा चुके हो, किन्तु उसके अनुसार क्या तुम कार्य करते हो। अपने चरित्र का संशोधन करने में अभी भी क्या किसी अन्य की राह देख रहे हो? तुम तो अब श्रेष्ठ कार्य करने की योग्यता प्राप्त करो। विवेक बुद्धि की किसी प्रकार अब उपेक्षा न करो। अपने चरित्र का संशोधन करने में लापरवाही करोगे या प्रयत्न में ढिलाई करोगे, तो उन्नति कैसे हो सकती है?
तुम्हें बराबर प्रतिज्ञा पर प्रतिज्ञा करनी होगी और प्रतिदिन यही सोचना होगा कि हम जो कुछ भी विचार, संकल्प, क्रिया करेंगे वह हमारे जीवन को उन्नति-पथ में ले जाने के लिये प्रकाश का काम देंगे। हम हत्भागी अथवा जीवनन्मृत व्यक्तियों की तरह नहीं, स्वाभिमानी, कर्तव्य-परायण, विवेकी, शिष्ट, सदाचारी बनेंगे। हम जो कुछ उत्तम समझते हैं उसे जीवन का बीज मन्त्र बनायेंगे।
तुम्हें अपने समय को व्यर्थ नहीं गँवाना होगा। अपने शुभ अवसरों को न खोकर जीवन रण-क्षेत्र में प्रबल पराक्रम से निरन्तर अग्रसर होकर विजय प्राप्त करने के लिये सदैव तत्पर रहना सीखो। तुम क्या यह नहीं जानते कि संग्राम ही जीवन का एक मात्र भूषण है।
-”आत्मोपदेश”
हम संसार में जो कुछ देखते हैं, हमें जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है वह सब विचारों का ही मूर्त रूप है। यह समस्त सृष्टि विचारों का ही चमत्कार है। जड़ चेतनमय जो कुछ चराचर जगत है उसको ऋषियों ने परमात्मा के विचारों का स्फुरण बतलाया है।
हमने आज तक जो कुछ किया है, जो कुछ कर रहे हैं और आगे भी जो कुछ करेंगे वह सब विचारों की ही परिणित होगी। प्रत्येक क्रिया के संचालक विचार ही होते हैं। बिना विचार के कोई भी कार्य सम्भव नहीं है।
इतने-इतने बड़े भवन, कल-कारखाने, पुल-बाँध आदि जो देखते ही मनुष्य को चकित कर देते हैं, सब मनुष्य के विचारों के फल हैं। कोई भी रचना करने से पूर्व रचनाकार के मस्तिष्क में तत्सम्बन्धी विचारों का ही जन्म होता है। विचार परिपक्व हो जाने पर ही वह सृजन की दिशा में अग्रसर होता है। विचार शून्यता मनुष्य को अकर्मण्य और निकम्मा बना देती है। जो कुछ कला-कौशल और साहित्य शिल्प दिखाई दे रहा है वह सब विचार-वृक्ष की ही उपज है।
किसी भी कार्य के प्रेरक होने से कार्य की सफलता-असफलता, अच्छाई-बुराई और उच्चता-निम्नता के हेतु भी मनुष्य के अपने विचार ही हैं। जिस प्रकार के विचार होंगे सृजन भी उसी प्रकार का होगा।
नित्य प्रति देखने में आता है कि एक ही प्रकार का काम दो आदमी करते हैं। उनमें से एक कार्य सुन्दर, सफल और सुघड़ होता है और दूसरे का नहीं। एक से हाथ-पैर, उपादान और साधनों के होते हुये भी दो मनुष्यों के एक ही कार्य में विषमता क्यों होती है? इसका एक मात्र कारण उनकी अपनी-अपनी विचार प्रेरणा है। जिसके कार्य सम्बन्धी विचार जितने सुन्दर, सुघड़ और सुलझे हुये होंगे उसका कार्य भी उसी के अनुसार उद्दात्त होगा।
जितने भी शिल्पों, शास्त्रों तथा साहित्य का सृजन हुआ है वह सब विचारों की ही विभूति है। चित्रकार नित्य नये-नये चित्र बनाता है, कवि नित्य नये काव्य रचता है, शिल्पकार नित्य नये मॉडल और नमूने तैयार करता है। यह सब विचारों का ही निर्माण है। कोई भी रचनाकार जो नया निर्माण करता है, वह कहीं से उतार कर नहीं लाता और न कोई अदृश्य देव ही उसकी सहायता करता है। वह यह सब नवीन रचनायें अपने विचार के ही बल पर करता है। विचार ही वह अद्भुत शक्ति है जो मनुष्य को नित्य नवीन प्रेरणा दिया करती है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान में जो कुछ दिखलाई दिया, दिखलाई देगा और दिखलाई दे रहा है वह सब विचारों में वर्तमान रहा है, वर्तमान रहेगा और वर्तमान है। तात्पर्य यह कि समग्रत्रयकालिक कतृत्य मनुष्य के विचार पटल पर अंकित रहता है। विचारों के प्रतिबिंब को ही मनुष्य बाहर के संसार में उतारा करता है। जिसकी विचार स्फुरणा जितनी शक्तिमती होगी उसकी रचना भी उतनी ही सबल एवं सफल होगी। विचार-शक्ति जितनी उज्ज्वल होगी, बाह्य प्रतिबिंब भी उतने ही स्पष्ट और सुबोध होंगे।
मनुष्य की विचार पुटी में संसार के सारे श्रेय एक प्रेय सन्निहित रहते हैं। यही कारण है कि मनुष्य ने न केवल एक अपितु असंख्यों क्षेत्रों में चमत्कार कर दिखाये हैं। जिन विचारों के बल पर मनुष्य साहित्य का सृजन करते है उन्हीं विचारों के बल पर कल-कारखाने चलाता है जिन विचारों के बल पर आत्मा और परमात्मा की खोज कर लेता है, उन्हीं विचारों के बल पर खेती करता है और विविध प्रकार के धन-धान्य उत्पन्न करता है, व्यापार और व्यवसाय करता है। यही नहीं, जिन विचारों की प्रेरणा से वह संत, सज्जन और महात्मा बनता है उन्हीं विचारों की प्रेरणा से वह निर्दय अपराधी भी बन जाता है। इस प्रकार सहज ही समझा जा सकता है कि मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व तथा कर्तृत्व में उसकी विचारशक्ति ही काम कर रही है।
एक दिन पशुओं की भाँति सारी क्रियाओं में पूर्ण मनुष्य आज इस सभ्यता के उन्नति शिखर पर किस प्रकार पहुँच गया? अपनी विचार-शक्ति की सहायता से। विचारशक्ति की अद्भुत उपलब्धि इस सृष्टि में केवल मानव को ही प्राप्त हुई है। यही कारण है कि किसी दिन पशुओं के समकक्ष मनुष्य आज महान उन्नत दशा में पहुँच गया है और अन्य सारे पशु-पक्षी आज भी अपनी आदि स्थिति में उसी प्रकार रह रहे हैं। पशु-पक्षी नीड़ों और निविड़ों में पूर्ववत ही निवास कर रहे हैं, किन्तु मनुष्य बड़े-बड़े नगर बनाकर अनन्त सुविधाओं के साथ रह रहा है। यह सब विचार-कला का ही विस्मय है!
विचारों के बल पर मनुष्य न केवल पशु से मनुष्य बना है वह मनुष्य से देवता भी बन सकता है। और विचारप्रधान ऋषि, मुनि, महात्मा और संत मनुष्य से देवकोटि में पहुंचे हैं और पहुँचते रहेंगे।
मनुष्य आज जिस उन्नत अवस्था में पहुँचा है वह एक साथ एक दिन की घटना नहीं है। वह धीरे-धीरे क्रमानुसार विचारों के परिष्कार के साथ आज इस स्थिति में पहुँच सका है। ज्यों-ज्यों उसके विचार परिष्कृत, पवित्र तथा उन्नत होते गये उसी प्रकार अपने साधनों के साथ उसका जीवन परिष्कृत तथा पुरस्कृत होता गया। व्यक्ति-व्यक्ति के रूप में भी हम देख सकते हैं कि एक मनुष्य जितना सभ्य, सुशील और सुसंस्कृत है अपेक्षाकृत दूसरा उतना नहीं। समाज में जहाँ आज भी सन्तों और सज्जनों की कमी नहीं है वहाँ चोर, उचक्के भी पाये जाते हैं। जहाँ बड़े-बड़े शिल्पकार और साहित्यकार मौजूद हैं वहाँ गोबर गणेशों की भी कमी नहीं है। मनुष्यों की यह वैयक्तिक विषमता भी विचारों, संस्कारों के अनुपात से परिमार्जित हो रहे हैं वह उसी अनुपात से पशु से मनुष्य और मनुष्य से देवता बनता जा रहा है।
विचार-शक्ति के समान कोई भी शक्ति संसार में नहीं है। अरबों का उत्पादन करने वाले दैत्याकार कारखानों का संचालन, उद्वेलित जन-समुदाय का नियंत्रण, दुर्धर्ष सेनाओं का अनुशासन और बड़े-बड़े साम्राज्यों का शासन और असंख्यों जनता का नेतृत्व एक विचार बल पर ही किया जाता है, अन्यथा एक मनुष्य में एक मनुष्य के योग्य ही सीमित शक्ति रहती है, वह असंख्यों का अनुशासन किस प्रकार कर सकता है? बड़े बड़े आततायी हुकुमरानों और सुदृढ़ साम्राज्यों को विचार बल से ही उलट दिया गया। बड़े-बड़े हिंस्र पशुओं और अत्याचारियों को विचार बल से प्रभावित कर सुशील बना लिया जाता है। विचार-शक्ति से बढ़कर कोई भी शक्ति संसार में नहीं है। विचारों की शक्ति अपरिमित तथा अपराजेय है।
विचार एक शक्ति है, विशुद्ध विद्युत शक्ति। जो इस पर समुचित नियंत्रण कर ठीक दिशा में संचालन कर सकता है वह बिजली की भाँति इससे बड़े-बड़े काम ले सकता है। किन्तु जो इसको ठीक से अनुशासित नहीं कर सकता वह उल्टा इसका शिकार बन जाता है। अपनी ही शक्ति से स्वयं नष्ट हो जाता है अपनी ही आग में जलकर भस्म हो जाता है। इसीलिये मनीषियों ने नियंत्रित विचारों को मनुष्य का मित्र और अनियन्त्रित विचारों को उसका शत्रु बतलाया है।
समस्त शुभ और अशुभ सुख और दुःख की परिस्थितियों के हेतु तथा उत्थान पतन के मुख्य कारण विचारों को वश में रखना मनुष्य का प्रमुख कर्तव्य है। विचारों को उन्नत कीजिये उनको मंगल मूलक बनाइये, उनका परिष्कार एवं परिमार्जन कीजिये और वे आपको स्वर्ग की सुखद परिस्थितियों में पहुँचा देंगे। इसके विपरीत यदि आप ने विचारों को स्वतन्त्र छोड़ दिया उन्हें कलुषित एवं कलंकित होने दिया तो आपको हर समय नरक की ज्वाला में जलने के लिये तैयार रहना चाहिये। विचारों की चपेट से आपको संसार की कोई शक्ति नहीं बचा सकती।
विचारों का तेज ही आपको ओजस्वी बनाता है और जीवन संग्राम में एक कुशल योद्धा की भाँति विजय भी दिलाता है। इसके विपरीत आपके मुर्दा विचार आपको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पराजित करके जीवित मृत्यु के अभिशाप के हवाले कर देंगे। जिसके विचार प्रबुद्ध हैं उसकी आत्मा प्रबुद्ध है और जिसकी आत्मा प्रबुद्ध है उससे परमात्मा दूर नहीं है।
विचारों को जाग्रत कीजिये, उन्हें परिष्कृत कीजिये और जीवन के हर क्षेत्र में पुरस्कृत होकर देवताओं के तुल्य ही जीवन व्यतीत करिये। विचारों की पवित्रता से ही मनुष्य का जीवन उज्ज्वल एवं उन्नत बनता है इसके अतिरिक्त जीवन को सफल बनाने का कोई उपाय मनुष्य के पास नहीं है।
युग की आवश्यकता के अनुसार भारत वर्ष में समय-समय पर अनेक धर्मों का प्रादुर्भाव हुआ है। उनके सिद्धान्तों और आदर्शों में थोड़ा बहुत अन्तर भी रहा है किन्तु वे किसी न किसी रूप में भारतीय संस्कृति को लेकर ही पनपे हैं। बौद्ध धर्म, जैन धर्म आदि की मान्यताएं वेदों से भिन्न अवश्य हैं पर सर्वांश में नहीं। वे सनातन धर्म के किसी अंग को ही आधार मानकर चले हैं, इसलिये उनका उपयोग और महत्व भी जन कल्याण की दृष्टि से कम नहीं है।
‘जैन धर्म’ ने यद्यपि अपना एक स्वतन्त्र अस्तित्व बनाया है किन्तु संस्कृति की दृष्टि से वह हिन्दू धर्म से भिन्न नहीं है। जैन लोग जीव को शाश्वत मानते हैं। उनका विश्वास है कि जीव को अपने कर्मों के अनुसार अच्छे या बुरे फल भोगने पड़ते हैं। अहिंसा को वे प्रमुख मानते हैं और मोक्ष प्राप्ति के लिये वैराग्य को सबसे उपयुक्त साधन मानते हैं। सम्यक् ज्ञान, दर्शन और चरित्र में उनका विश्वास है। हिन्दू धर्म की मान्यताएं भी प्रायः यही हैं।
जैन धर्म के प्रवर्तक और उसके धर्म नेता को “तीर्थंकर” के विशिष्ट नाम से पुकारा जाता है। इस शृंखला के 24 वें और अन्तिम तीर्थंकर भगवान महावीर हुये हैं।
भारतवर्ष में एक समय ऐसा आया जब यहाँ के लोगों में आध्यात्मिक आस्थायें बिल्कुल भी शेष न रहीं। धर्म का जो रूप शेष बचा था वह भी कुरीतिग्रस्त और घोर आडम्बरपूर्ण था। भौतिक सुखों की आपा-धापी में लोग आत्मतत्व को बिल्कुल ही भूल बैठे थे। भोग और केवल भोग ही लोगों का लक्ष्य बन गया था। हिंसा, साम्प्रदायिकता और जाति कुल आदि का अभिमान मनुष्य में इतना अधिक बढ़ गया था कि इनको लेकर बात-बात में पारस्परिक संघर्ष तथा कलह होते रहते थे, फलस्वरूप व्यक्ति, कुटुम्ब, समाज तथा जातीय जीवन में अशान्ति का अन्धकार पूरी तरह से छा गया था।
अज्ञान, अत्याचार और अनाचार के इस युग में लोग तात्विक एवं आचरणीय मार्ग से विपरीत चलने लगे थे। साँसारिक सुख की तृप्ति के लिये अपने से हीन व मूक प्राणियों की हिंसा करते थे। लोगों की स्वेच्छाचारिता के परिणाम स्वरूप धार्मिक स्वरूप कुँठित हो चला था।
ऐसे समय में बिहार प्रान्त के कुण्डलपुर नगर में राजा सिद्धार्थ के घर वर्द्धमान महावीर का जन्म हुआ। जैसे-जैसे उनका ज्ञान और साँसारिक परिस्थितियों का अनुभव बढ़ा, उन्होंने जीवों के कल्याण, सुख व शान्ति के लिये उपाय करने का निश्चय किया।
इस निश्चय से ही वह तीर्थंकर बन सके। तीर्थ का अर्थ है दुःखों से उद्धार पाने का यथार्थ मार्ग। उस मार्ग का जो नेतृत्व करते हैं उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है। यह पद उन्हें 12 वर्ष की घोर तपस्या, आत्म-साधना के बाद प्राप्त हुआ था। जब तक कोई अपने आपको शक्ति सम्पन्न न बना ले, अभ्यन्तर शत्रु-राग, द्वेष मोह और इन्द्रियों पर विजय न पा ले तब तक वह विश्व-कल्याण के लिये कुछ ठोस निर्देशन कर भी नहीं सकता। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत साधना के द्वारा इस सत्य को सिद्ध किया और लोक शिक्षण के मार्ग पर तभी प्रवृत्त हुये जब उन्हें जितेन्द्रिय होने का अधिकार मिला। आत्म-साधना द्वारा ज्ञान और अनुभव में परिपक्व हुये ‘वर्द्धमान’ ने देखा चारों ओर किस कदर हाहाकार उठा हुआ है। लोग अज्ञानान्धकार में इधर-उधर भटक रहे हैं। उनको एक आन्तरिक प्रेरणा हुई कि वे विश्व के अज्ञानी प्राणियों के कल्याण के लिये कोई युग के अनुरूप मार्ग खोज निकालें।
बहुत दिन तक चिन्तन करने के बाद उन्होंने निश्चय किया कि सर्व-साधारण तक आत्म-ज्ञान का लाभ पहुँचाने के लिये भ्रमण करना चाहिये। इस निश्चय के साथ ही उन्होंने परिव्राजन प्रारम्भ किया और घूम-घूम कर लोगों को उपदेश देने लगे। उनके उपदेशों को सुनकर लोग बहुत प्रभावित होने लगे और यह अनुभव करने लगे कि भोग ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं है। मनुष्य जिन परिस्थितियों को लेकर जन्मा है वे सब आत्म-कल्याण के लिये हैं और उनका उपयोग भी अवश्य होना चाहिये।
मनुष्य के सुख और भलाई के नियम शाश्वत और अपरिवर्तनशील हैं। सत्य की महत्ता प्रत्येक काल में एक जैसी ही होती है। अहिंसा, दया, क्षमा, समता, सहिष्णुता जैसे सद्गुणों की आवश्यकता किसी भी युग में एक जैसी ही होती है। महापुरुष युग की आवश्यकता के अनुरूप इनमें कुछ अंशों को अधिक महत्व दे देते हैं कुछ को कम, पर इससे दूसरे गुणों का महत्व कम नहीं हो जाता। वे तो अपने स्थान पर ही स्थिर रहते हैं। जब देश में हिंसात्मक प्रवृत्तियाँ बढ़ जाती हैं तब अहिंसा का महत्व बढ़ जाता है पर इससे दया, क्षमा आदि का महत्व घट नहीं जाता। इसी प्रकार भ्रष्टाचार के युग में ईमानदारी और सच्चाई प्रमुख हो जाते हैं और अन्य गौण। किसी विशेष सिद्धान्त की सर्वोपरिता महापुरुषों की नहीं युग की देन हुआ करती है।
जाति, कुल के हिसाब से अपने को बड़ा मानने और दूसरों के साथ घृणा करने को वे अमानवीय कृत्य मानते थे। उनका कहना था कि घृणित वह नहीं जिससे घृणा की जाती है परन्तु घृणित वह है जो घृणा करता है और समाज में घृणा के बीज बोता है।
महावीर मनुष्यता को धर्म और जातीय मान्यताओं से ऊँचा मानते थे। दूसरों की भलाई करने, पीड़ितों की रक्षा करने, सहायता करने और पददलितों को सन्मार्ग की राह दिखाने को ही वे धर्म की आन्तरिक क्रियायें मानते थे।
महावीर की दृष्टि और विचार में सब लोग समान कहे गये हैं। हमेशा कोई पतित नहीं होता। कारण या परिस्थिति वश कदाचित कोई व्यक्ति धर्मच्युत हो गया है तो उसे शुद्ध कर लेना अनुचित नहीं। ऊँच-नीच, काले-गोरे, अमीर-गरीब का भेद भाव नहीं किया जाना चाहिये। अहिंसा पालन के लिए भी समान व्यवहार की आवश्यकता प्रतिपादित की है। अपने जीवन कार्य से भी उन्होंने इस बात को सिद्ध कर दिखाया है। उनके शिष्य किसी एक ही वर्ग के न थे वरन् उनमें कुम्हार, जुलाहे, लुहार, माली, चोर, डाकू तथा वेश्यायें भी सम्मिलित थीं और वे सब को समान रूप से धर्म आचरण की शिक्षा दिया करते थे।
“स्याद्वाद” महावीर का एक प्रमुख उपदेश था। इसे वे कथानक के रूप में प्रस्तुत करते थे। इस कहानी में आपने बताया कि संसार के सभी धर्म समान हैं। कोई एक दूसरे से बड़ा या छोटा नहीं है इसलिए विभिन्न धर्मावलम्बियों को एक दूसरे के धर्म से घृणा न करके धर्मों का आदर करना चाहिये। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को ऊँचे उठाना है, इस रूप में दुनिया के किसी भी कोने का धर्म त्याज्य नहीं, उन सबका अपना महत्व है। इस महत्व को कभी भी घृणा या अनादर की दृष्टि से न देखना चाहिए।
उनके जीवन की कुछ विशेषतायें उन्हें अन्य महापुरुषों से भी अधिक सम्मानास्पद घोषित करती है। धार्मिक सन्तों में थोड़े ऐसे हुये हैं जिन्होंने स्त्रियों को भी आत्म-कल्याण के लिये समान अधिकार दिये हों। स्त्री सदैव से ही अपवित्र और उपेक्षित समझी गई है भले ही लोग इसकी वास्तविकता न समझ पायें हों। भगवान महावीर ने इस तर्क का जोरदार खंडन किया। वे कहते थे कि स्त्रियों को भी पुरुषों की भाँति व्रत धारण करने का सुअवसर मिलना चाहिए पुरुष और स्त्री आत्मा की दृष्टि से एक समान हैं और दोनों का आत्म-कल्याण के लिए समान अधिकार है।
महावीर ने अहिंसा को बड़े व्यापक अर्थ में लिया है। प्राणियों का वध करना ही उनकी दृष्टि में हिंसा नहीं वरन् जिन कारणों से दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुँचती हो, कष्ट और दुख पहुँचता हो वह सब हिंसा है और ऐसा कोई कर्म न करना जिससे किसी को शारीरिक या मानसिक आघात पहुँचता हो अहिंसा के अंतर्गत आता है।
भगवान महावीर आदर्श पुरुष थे। उन्होंने मानवता को एक नई दिशा दी है। उनके बताये हुये अहिंसा, तप, सत्य आदि मार्गों पर चलकर विश्व में शान्ति हो सकती है। उनके उपदेशों का अनुसरण करके कोई भी मनुष्य अपना तथा औरों का कल्याण कर सकता है।
जो भी जीवित है, सजग है, सचेत तथा स्वस्थ मस्तिष्क वाला है उसमें निरन्तर बढ़ने, महान बनने की इच्छा रहती है। जो व्यक्ति जिस स्थिति में है उससे ऊपर उठने का प्रयत्न करना ही वास्तविक कर्मशीलता है। उन्नति की अभिलाषा ही अधिकाँश में मनुष्य की क्रियाशीलता को उत्तेजित करती है। सामान्य से सामान्य व्यक्ति को ही क्यों न देख लिया जाय, चाहे वह रोटी दाल तक ही क्यों न सीमित हो, तब भी वह आज की अपेक्षा कल अच्छी रोटी पाने की कामना रखता है। जिसमें अपनी वर्तमान स्थिति से आगे बढ़ने की इच्छा नहीं है उसे इस प्रकार से मृत ही मानना चाहिये। अगति जड़ता का लक्षण है जीवन का नहीं। जो जीवन है, वह एक स्थान पर खड़ा ही नहीं रह सकता।
जीवन में आगे बढ़ना, प्रगति करना कोई आकस्मिक घटना नहीं है और न यह कोई स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसके प्रवाह में कोई आगे बढ़ ही जायेगा। आगे बढ़ना, उन्नति करना एक सुनियोजित कर्तव्य है। मनुष्य अपने बल पर संघर्ष करता हुआ एक-एक कदम ही आगे बढ़ पाता है। इस भीड़ से भरी दुनिया में जहाँ लोग एक दूसरे को ढकेल कर अपना स्थान बनाने का प्रयत्न कर रहे हैं वहाँ किसी लक्षित स्थान पर पहुँच सकना कोई ऐसा काम नहीं है जो यों ही बैठे बैठाये हो जायेगा! इसके लिये मनुष्य को परिश्रम, पुरुषार्थ तथा त्याग और तपस्या करनी पड़ती है। जो संघर्ष-भीरु है, स्वार्थी है, सुख-लोलुप और पलायनवादी है वह कभी भी उन्नति पथ पर अग्रसर नहीं हो सकता! उन्नति और प्रगति कर्मवीरों का ही लक्ष्य है।
संसार में, उन्नतियाँ, प्रगतियाँ तथा सफलताएँ असंख्यों प्रकार की हो सकती है! नित्य हो लोग उन्नति करते देखे जाते हैं। छोटी-सी दुकान बड़ी फर्म में बदल जाती है, मशीन मिस्त्री मिल मालिक बन जाता है। झोपड़ी में रहने वाला कोठी पा लेता है और निर्धन धनवान बन जाता है, संसार में नित्य ही यह परिवर्तन होते रहते हैं। किंतु इनको वास्तविक उन्नति नहीं कहा जा सकता। वास्तविक उन्नति वह है, जिसमें अवनति अथवा ह्रास का कोई अवसर न हो ! जिस प्रकार मनुष्य निर्धन से धनवान बनता है उसी प्रकार धनवान से निर्धन बन सकता है। कोठी बिक सकती है, मिल मिट सकती है और फर्म बन्द हो सकती है।
इस प्रकार की उन्नतियाँ साँसारिक व्यवहार तथा गतिविधियों का फल है। पुरुषार्थ तथा परिश्रम का समन्वय होने पर भी ये उन्नति को उस कोटि में नहीं आती जिनके आधार पर कोई व्यक्ति महान कहा जाता है। मनुष्य की महानता कोई सामयिक वस्तु नहीं है- कि आज वह है, कल रहेगी! पतन तथा परिवर्तन से मुक्त उच्चता ही वास्तविक उन्नति है महानता है!
इस प्रकार की महानतायें केवल वे ही व्यक्ति प्राप्त कर सकते हैं, जिनके जीवन का प्रत्येक अखण्ड क्षण परहित के लिये ही होता है। जो मनुष्य मात्र की उन्नति के लिये अपने जीवन का दाँव लगा देते हैं अपना सर्वस्व समष्टि को समर्पित कर देते हैं, वे ही उस उच्च शिखर पर पहुँचते हैं जहाँ से पतन की कोई आशंका नहीं रहती।
उच्चता के अविनत-शिखर पर पहुँचने के लिये मनुष्य को अपने जीवन को एक सुगढ़ साँचे में ढालना होता है। जो अपने जीवन को सुघड़ सुन्दर और सन्नद्ध नहीं बना सकता वह कितना ही प्रतिभावान धनवान और जनवान क्यों न हो महानता की कोटि में नहीं पहुँच सकता।
महानता के उपयुक्त साँचे में ढलने के लिये मनुष्य को सबसे पहले अपने व्यक्तित्व का विकास करना होगा। जिसका व्यक्तित्व अविकसित है, अपूर्ण है, वह बहुत कुछ आगे बढ़ जाने पर भी पीछे हट सकता है। जब तक उसे निम्न अथवा समकक्ष व्यक्तित्वों से पाला पड़ता रहेगा, तब तक तो वह बढ़ता जा सकता है, किंतु ऊँचा व्यक्तित्व सामने आते ही उसे ठिठक जाना पड़ेगा। अथवा जब वह सामान्य समूह से उठकर स्तरीय समाज में पहुँचेगा तब उसके व्यक्तित्व के दब जाने की सम्भावना रहेगी।
अस्तु, उन्नति के प्रथम सोपान-व्यक्तित्व को पूर्ण विकसित कर लेना बहुत आवश्यक है। व्यक्तित्व विकास की सबसे पहली शर्त है स्पष्ट एवं असंदिग्ध होना। मनुष्य जो कुछ है, वह साफ दिखाई देना चाहिये, जो साफ नहीं दिखाई देता वह समाज का विश्वास पात्र नहीं बन पाता। ईमानदार होते हुये भी लोग उसे गैर ईमानदार तथा महान होने पर भी निम्न समझ सकते हैं।
व्यक्तित्व की दूसरी शर्त है- एक समता। मनुष्य जो स्वरूप समाज के सामने रखता है उसका आचरण भी वैसा ही होना चाहिये। दूसरों को कितना ही सन्मार्ग दिखलाने वाला, कितना ही हित चाहने वाला यदि अपने निजी आचरण में यथावत नहीं है, तो लोग उसे छली, मतलबी अथवा स्वार्थी समझ कर, दूर भागेंगे!
व्यक्तित्व की तीसरी शर्त है-शिक्षा, स्वास्थ्य स्वच्छता, सुघड़ता, शिष्टता, सभ्यता आदि गुण। जो अशिक्षित है, रोगी है, मलीन अथवा अनगढ़ है, लोग सहज ही उसकी ओर आकर्षित नहीं होते। किसी भी फूहड़ अवस्था में फूहड़ भाषा अथवा फूहड़ शैली में कितनी ही महान एवं हितकारी बात क्यों न कही जाये कोई उसे सुनना पसंद न करेगा और यदि उसकी बात सुनी भी जायगी, तो उपहास की दृष्टि से, जिसका न कोई प्रभाव होगा और न फल।
उन्नति का दूसरा सोपान है-शक्ति! जिसका शरीर, मन और आत्मा शक्तिशाली है वह ही उन्नति पथ पर आये अवरोधों से टकरा सकता है। समाज विरोधी तत्वों से मोर्चा ले सकेगा ! जो निर्बल है, साहसहीन है वह एक छोटे से विरोध को भी सहन न कर सकेगा और शीघ्र ही मैदान छोड़कर भाग जायेगा! जो संयमी है, ज्ञानवान है, निस्पृह और निःस्वार्थ है, मन प्राण, शरीर और आत्मा उस ही के स्वस्थ एवं समर्थ हो सकते हैं। इसके विपरीत जो असंयमी है, अज्ञानी है लिप्सालु और लोलुप है, उसका निर्बल होना निश्चित है, अटल है।
उन्नति का तीसरा सोपान है- अनुशासन। जो व्यक्ति अनुशासन हीन है, अस्त-व्यस्त है, बिखरे मन, चंचल बुद्धि और कम्पित आत्मा वाला है उसके विचारों तथा कर्मों में वाँछित तेज नहीं आ पाता, जिसके अभाव में वह जन-मानस में प्रवेश कर सकने में असफल रहता है, मन जीते बिना जन-समुदाय को अनुशासित रखकर उपयुक्त दिशा में नहीं चलाया जा सकता। अनुशासनहीन व्यक्ति कितना ही शक्तिशाली, प्रतिभाशाली, प्रभावान और प्रतापवान् क्यों न हो किसी को अपने वश में नहीं रख सकता। उन्नति के इच्छुक व्यक्ति के लिये आत्मानुशासन उतना ही आवश्यक है जितनी समुद्र के लिये मर्यादा।
उन्नति का चौथा सोपान है- परिश्रम तथा पुरुषार्थ। इन दोनों गुणों से रहित व्यक्ति आलसी, प्रमादी तथा दीर्घ-सूत्री होता है। जो उन्नति-पथ में पहाड़ जैसे अवरोध हैं, उन्नति पथ के पथिकों के लिये क्या दिन क्या रात, क्या जाड़ा क्या गरमी, क्या धूप और क्या छाया समान होता है। उसके पास हर समय काम रहता है और हर समय उस काम का समय है। जो आलसी है, प्रमादी और दीर्घ-सूत्री है वह आज के काम को कल टालेगा, दूसरों पर निर्भर रहेगा। ऐसी दशा में उन्नति के शिखर पर चढ़ने का उसका स्वप्न ही रहेगा। बिना पुरुषार्थ, परिश्रम तथा तत्परता के संसार का कोई भी काम नहीं हो सकता।
उन्नति का पंचम सोपान है- निष्काम कर्म प्रभाव! निष्काम कर्म प्रभाव के बिना कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से काम नहीं कर सकता। कभी उसे सफलता असफलता आन्दोलित करेगी, कभी निन्दा रुष्ट और प्रशंसा प्रसन्न करेगी। महान पथ पर जिस राग द्वेष से रहित होना आवश्यक है, बिना निष्काम कर्म प्रभाव तभी प्राप्त हो सकता है, जब मनुष्य अपने प्रत्येक कर्तव्य को परम प्रभु का आदेश समझकर उसकी शक्ति से ही, उसके लिये ही करता हुआ अनुभव करे! जो अपने प्रत्येक कर्म को परमात्मा का ही काम समझकर करेगा वह उसे पूर्ण दक्षता, पूर्ण मनोयोग तथा पूर्ण श्रद्धा से करेगा। जिसके फल स्वरूप उसे उस सर्व शक्तिमान से सामर्थ्य एवं शक्ति प्राप्त होती रहेगी। जिसने अपनी सीमित शक्ति को ईश्वर की परम शक्ति में तिरोधान कर दिया है वह उन्नति के किस शिखर पर पहुँच सकता है यह बतलाना कठिन है।
इस प्रकार जो व्यक्ति उन्नति के इन पाँच सोपानों पर पाँव रखता हुआ आगे बढ़ता है, वह निश्चय ही उस महानता को प्राप्त कर लेता है जिसका न ह्रास होता है और न पतन। ऐसी ही महानता के पद पर प्रतिष्ठित महापुरुषों को इतिहास लिखता है और संसार याद करता है।
पूर्व जन्मों के प्रारब्धवश इस जीवन में जो काम, संयोग और परिस्थितियाँ मनुष्य को उपलब्ध हों, उनमें संतोष रखते हुये आगे की उन्नति के लिये उद्योग करना धर्म है। शरीर जिस साधना में तत्पर हो उसी को पूरा करना मनुष्य का कर्त्तव्य है। अपनी परिस्थितियों से बहुत अधिक की कामना करना ही मनुष्य की दुःखद स्थिति का कारण है। अनियन्त्रित मनोरथ का त्याग करना ही अपने पूर्व-प्रारब्ध के लिये संतोष करने का अच्छा उपाय है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि आगे के लिये अधिक सुँदर परिस्थितियाँ प्राप्त करने की चेष्टा न करे। श्रेय की इच्छा करने वाले मनुष्य को न तो निष्क्रिय रहना चाहिये और न ही विविध कामनायें करनी चाहिये।
सेना में सिपाही की योग्यता के अनुसार कमाण्डर उसे कोई एक काम सौंप देता है। योग्यता बढ़ा लेने पर कमाण्डर क्रमशः उसे उच्च पद देता चला जाता है किंतु सिपाही की स्थिति में रहते हुये सेनानायक के पद की आकाँक्षा करने से न तो वह सिपाही के कर्त्तव्यों का भली-भाँति पालन कर सकेगा और न ही सेनानायक का पद ही मिल सकेगा। इससे दुःख तो मिलेगा ही दुष्परिणाम भी उपस्थित हो सकते हैं।
एक ही परिस्थिति में यदि दत्तचित्त से लगे रहें तो उसमें भी आशाजनक परिणाम प्राप्त कर सकते हैं। कभी इधर, कभी उधर की दौड़ भाग करना मनुष्य की अस्थिरता का चिह्न है। जो तरह-तरह की कामनायें मन में करते रहते हैं उन्हें ही यह परेशानी भुगतनी पड़ती है। अधिक से अधिक धन, अधिक सुख सुविधाओं की लिप्सा ही मनुष्य को कमजोर और दुःखी बनाती है क्योंकि यदि उन्नति की उचित योग्यता, शक्ति और परिस्थितियाँ न हुई तो आकाँक्षाओं की कभी पूर्ति नहीं हो सकेगी और उससे दुःखी अधीर चिन्तित और निराश ही बने रहेंगे।
दूसरों को अधिक सुखी और सम्पन्न देखकर ईर्ष्या करना और परमात्मा को दोषी ठहराना, मनुष्य की बहुत बड़ी भूल है। ऐसा वह इसलिए करता है कि उसे केवल अपने अधिकार प्रिय हैं। पूर्व जीवन में उसने क्या किया है इस की भी तो कुछ संगत होनी चाहिए। किसी को कम किसी को अधिक देने का अन्याय भला परमात्मा क्यों करेगा? मनुष्य अपने ही कर्मों का लाभ या घाटा उठाता है। एक रुपया देकर किसी को भला पाँच रुपए की कीमत की भी कोई वस्तु मिली है? योग्यता से अधिक दे देने की भूल भला परमात्मा क्यों करेगा? ऐसा यदि हो तो उसे लोग अन्यायी ही तो कहेंगे। यही क्या कुछ कम उपकार है जो उसने आपको मनुष्य जीवन जैसा अलभ्य अवसर प्रदान किया है। आप चाहें तो अपने जीवन का मूल्य बढ़ा सकते हैं और कर्त्तव्य पालन तथा अन्य सद्गुणों द्वारा आगे के लिए शुभ परिस्थितियाँ, अच्छे परिणाम और मंगल संयोग प्राप्त कर सकते हैं।
काम बदलने की चिन्ता आप मत कीजिए। यह एक प्रकार की ‘कर्म-हिंसा’ है। इसी में पुरुषार्थ करते रहिये। भली परिस्थितियों के संयोग ईश्वरीय प्रेरणा से स्वतः प्राप्त हो जाते हैं उसके लिये कोई जोड़-तोड़ नहीं करनी पड़ती। आप क्रियाशील रहिये, उद्योग करते जाइये, उन्नति के अवसर आपके जीवन में जरूर आयेंगे। पर कदाचित आपके प्रारब्ध कुछ इस तरह के नहीं हैं कि आप अधिक उन्नति कर सकें तो खीझ और उत्तेजना से प्राप्त परिस्थिति का संतोष भी आपको नहीं मिल सकेगा। इसीलिये फल-प्राप्ति की कामना को गीताकार ने दोष बताया है और मनुष्य को निरन्तर कर्म करने की प्रेरणा दी है।
जागृत मनुष्य कभी क्रिया हीन नहीं रहेगा। प्राप्त परिस्थितियों में जो लोग प्रसन्नतापूर्वक लगे रहते हैं जीवन का सुख उन्हीं को मिलता है। सुख किसी वस्तु या परिस्थिति विशेष में नहीं है। वह एक मानसिक भाव है जो प्रत्येक स्थिति में प्रसन्न रहने से मिल जाता है। छोटी-छोटी बातों में दुःखी रहने का तात्पर्य यह है कि आप परमात्मा के विधान की अवहेलना करना चाहते हैं। यों न सोचिये वरन् अपने से दयनीय स्थिति के व्यक्तियों से अपनी तुलना कीजिए और पूर्ण प्रसन्न रहने का प्रयत्न कीजिए। पुरुषार्थ करने की आप में शक्ति होगी तो अच्छे परिणाम भी मिल जायेंगे पर परिणाम की ओर अपना ध्यान बनाए रखकर प्राप्त आनन्द को क्यों छोड़ते हैं? जागृत पुरुष इसीलिए प्रत्येक परिस्थिति में सुख का अनुभव करते हैं और तप, त्याग, परोपकार द्वारा अपनी भावनाओं को उत्कृष्ट बनाकर आगे के लिए शुभ-फल संचय कर लेते हैं। इस जीवन की बढ़ी हुई योग्यता ही तो अन्य जन्मों के संस्कार रूप में दिखाई देती है।
दूसरी अवस्था में मनुष्य की कर्म-भावना का विश्लेषण आता है। पुरुषार्थ अपनी शारीरिक या पारिवारिक आवश्यकतायें पूर्ण कर लेने को ही नहीं कहते। मनुष्य इस संसार में रहकर यहाँ के हवा, पानी, धरती, प्रकाश आदि का स्वच्छन्द उपभोग करता है, इस तरह वह धरती माता का भी ऋणी है। जो उपकार प्रकृति और परमात्मा ने उस पर किये हैं उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का सही तरीका यह है कि मनुष्य भी प्राणिमात्र की सेवा और उपकार भावना से काम करे। स्वार्थों तक ही सीमित रहने से पशु और मनुष्य में भेद भी कुछ नहीं रह जाता । परमात्मा का श्रेष्ठ पुत्र कहलाने का सौभाग्य तो तब मिलता है जब निष्काम भावना से सृष्टि के अन्य प्राणियों के साथ समता, न्याय और कर्त्तव्य पालन की उदारता बनी रहे।
बच्चों का पालन-पोषण, व्यापार, देश-रक्षा, मेहनत-मजदूरी, ज्ञान-सम्पादन और जन-मार्गदर्शन, इन कर्मों में से ऊँच-नीच, छोटे-बड़े, कम महत्वपूर्ण या अधिक महत्वपूर्ण होने की एक ही कसौटी है और वह है मनुष्य की भावना। स्वार्थ सम्मुख रखकर परोपकार दिखाई देने वाले कर्म भी फलदायक नहीं होते। निष्काम भाव से की हुई बच्चों की सेवा और प्राणिमात्र के हित के लिये किया गया उपदेश दोनों का ही फल समान है क्योंकि उनकी भावना एक ही है। कर्म की विविधता में उसका मूल्य भावना स्तर पर आँका जाता है। किसी व्यक्ति की आप चोरों से रक्षा करें और बदले में आधा धन माँगने लगें तो आपकी यह सेवा प्रभावशील न रहेगी। कर्म का महत्व फल त्याग से है। सच्चा सुख, संतोष तो तब मिलता है जब मनुष्य अपने आप को परमात्मा का एक उपकरण मान कर विशुद्ध त्याग-भावना से परोपकार करता है। जीवन-मुक्त का लक्षण फल-प्राप्ति की कामना का परित्याग ही बताया गया है।
मुक्ति के लिये मनुष्य को तरह-तरह के साधन ढूंढ़ने की आवश्यकता नहीं है। भेष बदलना या काम छोड़ देना भी बुद्धि संगत नहीं है। ऐसा करके भी मनुष्य निष्क्रिय हो नहीं सकता। खाने-पीने, उठने-बैठने के सामान्य कर्म तो मनुष्य को प्रत्येक अवस्था में करने ही पड़ते हैं। कर्म करते हुये फल प्राप्ति की वासना अथवा मनोरथ का परित्याग होना चाहिये। क्योंकि आकाँक्षायें स्वार्थपरता की जननी है। इस तरह से लोकोपकारी कर्त्तव्य कर्मों का सम्पादन नहीं हो सकता।
प्रकृति हमें नित्य, निरन्तर निष्काम कर्म करने की शिक्षा देती रहती है। सूर्य चन्द्रमा प्रकाश देते हैं। बदले में कुछ प्राप्त करने की उनकी कोई भावना नहीं होती। वृक्ष अपने फलों का उपभोग अपने लिये नहीं करते। पहाड़ लोगों को असीम खनिज देते है, नदियाँ शीतल जल से लोगों को तृप्त करती रहती हैं। इन्हें कभी किसी तरह की कोई भी कामना नहीं होती। लोक-कल्याण के लिये निरन्तर एक सी-स्थिति में चलते रहना ही उनका धर्म है। मनुष्य की दशा भी इसी तरह की होनी चाहिये। सुख कर्म में है फल तो उसके विनाश का प्रारम्भ मात्र है।
मुक्ति-एक लक्ष्य है जो निरन्तर चलते रहने से प्राप्त होता है। उच्च स्थिति प्राप्त करने के लिये मनुष्य छलाँग से काम नहीं ले सकता। बीच की साधनावस्था से होकर आगे बढ़ना ही स्वाभाविक नियम है। अकुलाहट, तीव्रता या चित्त में विकार आना मनोरथ पूरा न होने का लक्षण है।
आत्म-कल्याण के विविध साधनों में प्रत्येक स्थिति में हर मनुष्य के लिये सरल और सुलभ साधना-निष्काम कर्म की भावना ही है। कठोर साधनों की अपेक्षा यह मार्ग अधिक सरल है जिसे गीता में “निष्काम कर्म योग” के नाम से प्रतिपादित किया गया है। कर्तव्य भावना का ज्ञान और मनोरथ के परित्याग से परमात्मा की स्थिति का बोध हो जाता है और मनुष्य जन्म मरण के भव बन्धन से मुक्ति पा लेता है। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसके लिये निष्काम-कर्म से बढ़कर और कोई दूसरा उपाय श्रेष्ठ नहीं है।
श्री रामकृष्ण परमहंस की गणना अवतारी पुरुषों में की जाती है। कोई बहुत बड़े अस्त्र-शस्त्र लेकर या अलौकिकताओं तथा चमत्कारों के साथ जन्म लेना, अवतार लेना लोगों की भ्रम बुद्धि को चमत्कृत भले ही करता हो, उसमें वस्तुतः कुछ भी तथ्य नहीं है। सामान्य एवं साधारण मनुष्य की तरह जन्म लेने वाला व्यक्ति भी अपने महान कार्यों द्वारा अवतारी पुरुष बन सकता है। चमत्कार की शक्ति किसी के पास हो भी तो उससे किसी कार्य का सम्पादन करना उतना महान नहीं है जितना कि परिस्थितियों, आकस्मिकताओं और प्रतिकूलताओं से लड़ते हुये किसी लोक हितकारी कार्य का सम्पादन करना। श्री रामकृष्ण परमहंस एक ऐसे ही व्यक्ति थे जिन्होंने अपने कर्त्तव्य की महानता से ही अवतार पद प्राप्त किया था।
विख्यात है कि श्री रामकृष्ण परमहंस ने केवल छः वर्ष की आयु में ही भगवदानुभूति प्राप्त कर ली थी। सुनने में यह बात निःसंदेह विलक्षण लगती है और सहसा यह भाव मन में आता है कि छः वर्ष के अबोध बालक के हृदय में भगवदानुभूति का कारण केवल मात्र भगवान की कृपा ही हो सकती है। नहीं तो छः वर्ष का एक बालक जिससे कि एक साधारण बात समझने की आशा नहीं की जा सकती भगवदानुभूति को किस प्रकार प्राप्त कर सकता है। छः वर्ष का बालक उक्त अलौकिक उपलब्धि के लिये कौन-सी ऐसी बड़ी साधना कर सकता है।
निःसंदेह किसी भी बड़ी उपलब्धि में भगवत् कृपा एक प्रधान हेतु होती है किंतु इस कृपा को प्राप्त करने में मनुष्य का पुरुषार्थ ही एक मात्र कारण होता है। मनुष्य जीवन कोई पहली और अन्तिम उपलब्धि नहीं होती। यह जन्म-जन्मान्तरों की एक शृंखला होती है। इसी शृंखला के अंतर्गत मनुष्येत्तर योनियाँ भी आती हैं। अनेक अपने कर्मानुसार अन्य योनियों में भटकते फिरते हैं और बहुत से अपने सुकर्मों के फलस्वरूप बार-बार मनुष्यता का अवसर पाते हैं।
जन्म-जन्मान्तरों में मनुष्य जिस अनुपात से अपने पुरुषार्थ द्वारा अपनी आत्मा का परिष्कार करता आता है उसी अनुपात से वह आगामी जीवन में बुद्धि, विद्या, विवेक, श्रद्धा और भक्ति की अनुभूति प्राप्त करता है। श्री रामकृष्ण परमहंस अवश्य ही पूर्व जन्म नहीं बल्कि जन्म-जन्मों में मनुष्य ही रहे थे और निरन्तर अपनी आत्मा के परिष्कार का प्रयत्न करते रहे। यह उनके पूर्व जन्म के सुकर्मों का ही फल था कि उन्होंने छः वर्ष की आयु में ही भगवदानुभूति प्राप्त कर ली। यही कारण है कि भारतीय ऋषि-मुनियों ने मनुष्य जीवन को एक दुर्लभ अवसर कहा है और निर्देश किया है कि मनुष्य को अपने जीवन का सीमान्त सदुपयोग करके त्याग और तपस्या द्वारा भगवान का साक्षात्कार कर लेना चाहिये। और यदि वह कर्म-न्यूनता के कारण किसी प्रकार प्रभु का साक्षात्कार नहीं भी कर पाता तो अवश्य ही पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेकर या तो साक्षात्कार प्राप्त करेगा अथवा उस दिशा में अपने प्रयत्नों को आगे बढ़ायेगा। अस्तु मनुष्य को सावधानता पूर्वक साक्षात्कार होगा या नहीं होगा, यह तर्क -वितर्क त्याग कर, मनुष्य जीवन का सदुपयोग कर, अगले जीवन में साक्षात्कार की आशा पर पूर्ण प्रयत्नरत रहना चाहिये। इसमें प्रमाद करने वाले ही आगामी जीवन की सारी सम्भावनायें खोकर चौरासी के चक्कर में घूमते हैं।
अपने पूर्व पुरुषार्थ के फलस्वरूप जब श्री रामकृष्ण परमहंस ने अल्प आयु में ही भगवान की भक्ति प्राप्त कर ली तो वे उसी दिन से उसका साक्षात्कार करने के लिये साधना करने लगे। साधना के रूप में उन्होंने उपासना का मार्ग अपनाया। स्वयं अपनी विधि एवं बुद्धि से की हुई उपासना जब कोई उत्साहवर्धक फल लाते दिखलाई न दी तब उन्होंने क्रम से भारती ब्रह्मचारी और नग्न वेदान्ती तोतपुरी से सगुण साधना तथा निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश लिया। अनन्तर उन्होंने इस्लाम तथा ईसाई उपासना पद्धतियों का भी प्रयोग किया, किंतु पाया कि उन्हें इन उपासनाओं से कोई विशेष लाभ नहीं हुआ। अन्त में वे अपने स्वयं के चिन्तन और मनन के आधार पर नर-नारायण की उपासना के निष्कर्ष पर पहुँचे।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस की उज्ज्वल एवं उन्नत आत्मा ने जिस दिन मनुष्य सेवा के रूप में परमात्मा की सेवा स्वीकार की उसी दिन से उन्होंने अपने में एक स्थायी सुख-शान्ति तथा सन्तोष का अनुभव किया । भगवत् प्राप्ति का अमोघ उपाय पाकर उन्होंने सारी उपासना पद्धतियों को छोड़ दिया और नर-नारायण की सेवा में लग गये।
रोगियों की परिचर्या, अपंगों की सेवा और निर्धनों की सहायता करना उनका विशेष कार्यक्रम बन गया । जहाँ भी वे किसी रोगी को कराहते देखते, अपने हाथों से उसकी परिचर्या करते। अपंगों एवं विकलाँगों के पास जाकर उनकी सहायता करते, दुखी और दीन जनों को अपनी सुधा सिक्त सहानुभूति से शीतल करते। साधारण रोगियों से लेकर क्षय एवं कुष्ठ रोगियों तक की सेवा सुश्रूषा करने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था। दीन-दुखियों को हृदय से लगाने में उन्हें एक स्वर्गीय सुख-शान्ति का अनुभव होता था। दरिद्रों को भोजन कराना और उनके साथ बैठकर प्रेमपूर्वक बातें करने में वे जिस आनन्द का अनुभव किया करते थे वैसा आनन्द उन्होंने अपनी ऐकान्तिक साधना में कभी नहीं पाया था।
एक तो अध्यात्म साधना से निर्विकार एवं निर्मल हृदय, दूसरे दीन दरिद्रों तथा आकुल समाकुलों की सेवा, फिर क्यों न उनको एक ऐसी कारुणिक अनुभूति का लाभ होता जो युग-युग की साधना के बाद पाये आत्मानन्द से किसी दशा में कम नहीं थी। दीन दुखियों के साथ बैठकर सच्ची सहानुभूति से उनका दुख बटाने में जो आनन्द है उसका अनुभव वे भाग्यवान ही कर सकते हैं जिनका हृदय पर-पीड़ा से कातर हो उठता है। जिसने लोभ, मोह, काम, क्रोध और अहंकार के शत्रुओं को परास्त कर लिया उसका हृदय अवश्य ही विश्व प्रेम से भरकर धन्य हो उठेगा। जो सुख चाहता है शान्ति की कामना रखता है वह निःसार साधनाओं को छोड़कर स्वामी रामकृष्ण परमहंस की तरह जाये और दीन दुखियों की सेवा करता हुआ उनकी कातर तथा करुणा मूर्ति में परमात्मा की झाँकी प्राप्त करे। जिसे आनन्द की प्यास हो वह दुखियों के पास जाये और अनुभव करे कि दूसरे का दुख बटाने पर हृदय में किस दिव्य आनन्द का उद्रेक होता है?
स्वामी रामकृष्ण ने न केवल भक्ति पूर्ण उपासना ही की, प्रत्युत आत्म शान्ति तथा अन्य चमत्कारिक सिद्धियों के लिये तान्त्रिक साधना भी की। इस तान्त्रिक साधना में जो सिद्धियाँ उन्हें प्राप्त हुई वे नर-नारायण की सेवा में प्राप्त सुख की तुलना में बड़ी ही तुच्छ तथा हेय थीं। उनमें उतना ही अन्तर था जितना एक लोलुप धनवान और आत्म तुष्ट योगी में हो सकता है। इस निःसारता का अनुभव करके उन्होंने तृण के समान तुच्छ तान्त्रिक साधना को त्याग कर जन सेवा की महान गुणमयी साधना को अपना लिया।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस निःसन्देह एक दिव्यदर्शी सिद्ध पुरुष थे और पंचभूत त्यागने के बाद उन्होंने मोक्ष पद ही पाया होगा। उनकी साधना बड़ी और तप महान था। उन्होंने जन -सेवा द्वारा भगवत् प्राप्ति का जो मार्ग निकाला वह कोई कल्पना अथवा मात्र धारणा नहीं थी बल्कि एक चिरन्तन वास्तविकता तथा त्रयकालिक सत्य था। नर-नारायण की सेवा का निर्देश स्वयं उनका नहीं था। वह अवश्य ही उनकी निर्विकार आत्मा में प्रतिध्वनित परमात्मा का ही आदेश था, जिसका पालन उन्होंने स्वयं किया और वैसे ही करने का उपदेश अपने शिष्यों, भक्तों एवं अनुयायियों को भी दिया।
स्वामी रामकृष्ण परमहंस के निश्छल हृदय से निकली हुई पुकार-”रामकृष्ण मिशनों, मठों एवं आश्रमों में मूर्ति भली हुई, और आज क्या देश और क्या विदेश सभी जगह सैकड़ों की संख्या में श्री रामकृष्ण मिशन, सेवाश्रम तथा वेदान्त केन्द्र सहस्रों रोगियों को परिचर्या और दुखियों को सहायता और पथ भ्रान्तों को आलोक दे रहे हैं।
कहना न होगा कि वैयक्तिक साधना से मोक्ष पाकर गये हुये रामकृष्ण परमहंस से न संसार को कोई लाभ होता और न संसार उन्हें जानता। इसके विपरीत नर-नारायण की उपासना तथा भक्ति करने पर उन्हें मोक्ष तो मिला ही होगा, इसके अतिरिक्त संसार उनकी सेवाओं का लाभ पाकर उन्हें एक अवतारी पुरुष के रूप में याद करता रहेगा।
संसार में कोई किसी को उतना परेशान नहीं करता जितना कि मनुष्य के अपने दुर्गुण और दुर्भावनायें। एक तो दुर्गुण रूपी शत्रु हर समय मनुष्य के पीछे लगे रहते हैं, वे किसी समय उसे चैन नहीं लेने देते।
सबसे दुर्गुणी व्यक्ति दुर्व्यसनी होता है। दुर्व्यसन मनुष्य के शारीरिक तथा मानसिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्यों के शत्रु होते हैं। शराब, जुआ, व्यभिचार ही नहीं बल्कि, आलस्य, प्रमाद, पिशुनता आदि भी भयानक दुर्व्यसन ही हैं।
यदि मनुष्य शराब पीता है या अन्य किसी प्रकार का नशा करता है, जुआ खेलता है अथवा व्यभिचार में प्रवृत्त है तो वह न केवल धन का क्षय करता है अपितु अनेक प्रकार की शारीरिक मानसिक एवं बौद्धिक व्याधियों को भी आमंत्रित करता है।
मद्यप कितना ही स्वस्थ एवं सम्पन्न क्यों न हो, उसकी लत उसे निर्बल तथा निर्धन बनाकर ही छोड़ेगी। जब तक शरीर में शक्ति रहती है, धन की गर्मी रहती है, मद्य का विषैला प्रभाव अनुभव नहीं होता। पर ज्यों ही इनकी कमी होने लगती है शराब का जहरवाद फैलना शुरू हो जाता है। धन की कमी हो जाने से उसकी मद्य का स्तर गिरने के साथ ही स्वास्थ्य का पतन उत्तरोत्तर तीव्र होता जाता है, शीघ्र ही एक दिन ऐसा आता है कि जीवन की कृत्रिम आवश्यकता बनी शराब का न मिलना उसके लिये मौत की पीड़ा बन जाती है। शराब के अभाव में वह तड़पता, घर की चीजें बेचता, दूसरों के आगे हाथ फैलाता और अपनी मान प्रतिष्ठा को भी बलिदान कर देने के लिये तैयार हो जाता है। शरीर उसका रोगी और जीवन एक भार बन जाता है।
मद्यप आंखें रहते हुये भी अंधा और बुद्धि होते हुये भी मूर्ख होता है। उसे भूत भविष्यत् वर्तमान कुछ भी दिखलाई नहीं देता। यदि भूतकाल को वह देख सके तो बीते हुये शराबियों की दशा, अपनी सम्पन्नता के ह्रास और तुलनात्मक दृष्टि से अपने गिरते हुये स्वास्थ्य से शिक्षा ले सकता है। यदि वर्तमान उसे दिखाई दे सके तो समाज में अपनी प्रतिष्ठा, परिवार की दुर्दशा और चारों ओर अभाव का कारागृह देख कर सुधर सकता है। यदि भविष्य उसको दिखाई दे सके तो बच्चों की अशिक्षा, बेटियों के विवाह, बुढ़ापे की तैयारी आदि की चिंता से सावधान हो सकता है। किंतु मद्यप तो त्रयकालिक अंध होता है। उसे यदि कुछ दीखता है तो बोतल और उसकी मादकता के विष से अपनी मूर्छावस्था का काल्पनिक सुख।
शराबी की चिन्ताओं का कोई ओर-छोर नहीं रहता। जब वह अपने होश में होता है तो एक भले आदमी की तरह कल्याणकर चिन्ता के बीच से गुजरता है। किन्तु वह किसी चिन्ता को दूर करने की स्थिति में तो रहता नहीं, अतएव ये सारी चिन्तायें उसे नई-नई नागिनों की तरह ही डंसती रहती हैं। चिन्ताओं से परेशान होकर मद्यप पुनः शराब की ओर दौड़ता न मिलने पर तड़पता और मिल जाने पर उसे पीता और जीवन शून्य होकर पड़ा रहता है। आवश्यक चिन्ताओं से छूटने के लिए वह शराब की चिन्ता करता और शराब की चिन्ता पूरी होने पर आवश्यक चिन्ता में लग जाता है। चिन्ता और केवल चिन्ता करना उसका जीवन क्रम बन जाता है। निवारण की शक्ति तो उसमें रहती ही नहीं, अतएव एक मात्र चिन्ताओं की चक्की में पिस-पिस कर मरना ही उसका भाग्य बन जाता है। कितना घोर, कितना कष्टकर और कितना भयानक जीवन होता है एक मद्यप का। वह वास्तव में जिन्दगी जीता नहीं, मरता है।
जुआ संसार के सारे व्यसनों का राजा है। जुआरी प्रतिक्षण जीता और मरता रहता है। क्षण-क्षण पर एक नया आघात सहता हुआ भयानक जीवन बिताता है। कानून से त्रस्त समाज से भयभीत और परिवार से डरा हुआ वह किसी गुप्त स्थान पर नोटों के रूप में अपनी और अपने परिवार की जिन्दगी में आग लगाया करता है। दाँव पर बैठे हुये उसके हृदय की धक्-धक् में जीवन मृत्यु का स्पन्दन रहता है। दाँव हारने की सम्भावना उसका रक्त सुखाती और जीतने की खुशी उसे कुचल कर रख देती है।
जुए की जीत हार से भी बुरी होती है। हारने पर वह हताश हो सकता है, निराश होकर कुछ देर के लिये उससे जुआ छूट सकता है। किन्तु जीतने पर होश ठिकाने नहीं रहते। वह विक्षिप्त की तरह दाँव लगाता अहंकारपूर्ण बात करता और पागलों की तरह चाल चलता है। यदि जीत का उन्माद हार के तमाचे से विचलित हो जाता है तब तो वह पागल कुत्ते की तरह भयानक हो उठता है। अपना सर्वस्व दाँव पर रख कर भी वह एक बार जीतना चाहता है और इसी क्रम में भिखारी बन जाता, समाज की दृष्टि में गिरता और कानून के पंजे में फँसता है। परिवार बिलखता, पत्नी रोती और बच्चे भूखों मरते हैं। द्यूत व्यसनी की यह दशा अपवाद नहीं, हर जुआरी की परिसीमा इसी दुर्दशा में है।
जुआरी की एक मात्र चिन्ता दाँव के लिए धन जुटाने की रहती है। अन्य चिन्ताओं का हल वह अपने दाँव में ही देखता है। उसे हर दाँव पर जीतने की आशा रहती है। वह यही सोचा करता है कि अब की नहीं तो अबकी दाँव पर वह दोगुना, तीन-गुना और चार गुना वापस कर लेगा, और उसी धन से सारी समस्याओं का समाधान कर लेगा। उसे बच्चों की शिक्षा, शादी-ब्याह, रहने-सहने और खाने-पीने की सारी समस्याओं का हल एक मात्र अपने एक आगामी दाँव में ही दीखता है। यह आशा कितना बड़ा धोखा, कितनी गहरी विडम्बना और कितनी भयानक आत्म प्रवंचना है।
जहाँ हार जुआरी को भिखारी बना देती है वहाँ जीत उसे शराबी, व्यभिचारी, अहंकारी और अपराधी बना देती है। हार-जीत में एक सा ही भयंकर परिणाम देने वाले व्यसन जुए के जाल में फँसा हुआ व्यक्ति दीन-हीन ऋणी होकर तिल-तिल जलता और मरता रहता है। अभिशाप है एक जुआरी की जिन्दगी। जुआ जैसे व्यसन को दुर्भाग्य एवं दुर्दैव की फटकार समझकर उससे दूर रहने में ही कल्याण है।
व्यभिचार वृत्ति का व्यक्ति किस दुर्दशा को प्राप्त नहीं होता। व्यभिचारी की दृष्टि में पाप का निवास होता है। वह लम्पट एवं लोलुप होता है। व्यभिचारी को क्या अपनी और क्या पराई किसी की भी प्रतिष्ठा का विचार नहीं रहता। मर्यादा, नैतिकता, आदि पूजनीय शब्दों के प्रति उसका कोई सद्भाव नहीं होता।
व्यभिचारी जहाँ विविध व्याधियों का शिकार बनता है वहाँ समाज में घोर अप्रतिष्ठा का पात्र। निकट से निकट सम्बन्धी और घनिष्ठ से घनिष्ठ मित्र उसका विश्वास नहीं करते। व्यभिचारी व्यक्ति कितना ही पद और पदवी वाला क्यों न हो कोई भी उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता। व्यभिचारी के आगमन पर हर्ष होने के बजाय लोगों को शंका एवं घृणा होती है।
व्यभिचारी अपने इस असम्मान को पूर्ण रूप से देखता अनुभव करता और पीड़ा पाता किन्तु अपनी दुवृत्ति के कारण मजबूरन सहन करता है। अश्लीलता, असभ्यता, आवारागर्दी उसके स्वभाव के अंग बन जाते हैं। लज्जा, शील, दया और शर्म नामक मानवीय गुण व्यभिचारी को छोड़कर चले जाते हैं और वह कुल कलंक समाज का शत्रु हजार बार अपमानित होने, दण्ड पाने और बहिष्कृत होने पर भी अपनी नीच हरकत नहीं छोड़ता है।
व्यभिचारी समाज को सब से अधिक हानि पहुँचाता है। अपनी विषैली वृत्तियों से समाज का वातावरण दूषित करता है। लोगों में दुर्गुण जगाता और अपने जैसे नर पिशाचों को लेकर न जाने किन-किन बुरी बातों को फैलाने का प्रयत्न करता है। दूसरों की इज्जत पर हाथ डालने का प्रयत्न करने वाले व्यभिचारी बदले में अपने कुल की प्रतिष्ठा खोकर अधिकतर आत्महत्या में ही उसका प्रायश्चित्त करते हैं।
सद्गुणी व्यक्ति को सारा समाज हाथों हाथ लिए रहता है, आदर सम्मान और प्रतिष्ठा उसके नाम लिख जाती है, सहयोग, सौहार्द एवं सहानुभूति उसकी अपनी सम्पत्ति बन जाती है। सद्गुणी न कभी निर्धन रहता है और न परेशान। वह सदैव स्वस्थ तथा सुखी रहा करता है।
सेवा मूर्ति -
यह बात सही है कि पति के किसी प्रतिष्ठित पद पर पहुँचने पर उसका आदर सम्मान पत्नी को स्वभावतः योंही मिल जाता है, और कुछ न होते हुए भी पति की पूजा प्रतिष्ठा एवं गौरव का उपभोग करती है। किंतु माता कस्तूरबा के सम्बन्ध में यह बात सब अंशों में लागू नहीं होती! माता कस्तूरबा को राष्ट्र माता का पद इसलिए ही नहीं मिल गया कि उनके पति महात्मा गाँधी राष्ट्र-पिता के महान पद पर प्रतिष्ठित थे। माता कस्तूरबा ने यह पदवी स्वयं अपने त्याग और ममतामयी सेवा भावना से प्राप्त की थी।
यों तो सभी नारियों में मातृत्व की भावना रहती है, किंतु राष्ट्र-माता कस्तूरबा में यह एक विशेष सीमा तक बढ़ी हुई थी! उनका हृदय आकाश की तरह विशाल, सागर की तरह उदार और गंगा की तरह पवित्र था। वे केवल हृदय से ही माता नहीं थी, बल्कि सम्पूर्ण आकार प्रकार से एक ममतामयी माता थी। सम्पूर्ण तन मन से मातृत्व की यह उपलब्धि माता कस्तूरबा के उस सात्विक जीवन की देन थी जिसका निर्माण उन्होंने होश सँभालते ही कर लिया था!
माता कस्तूरबा किसी निर्धन परिवार की पुत्री नहीं थी। उनका परिवार हर प्रकार से भरा पूरा था। किंतु कस्तूरबा ने कभी भी दिखाऊ तथा आलसी जीवन व्यतीत नहीं किया। वे अधिक सरल एवं सादा जीवन पसन्द करती थीं।
माता कस्तूरबा के कुमारी जीवन में कोई ऐसी विशेषता नहीं थी जिसका कि संस्मरण के रूपों में उल्लेख किया जा सके। यहाँ तक कि शिक्षा के क्षेत्र में भी वे कोई लम्बा डग न रख सकी थी। इसका प्रमुख कारण यह था कि उनका विवाह चौदह वर्ष की अवस्था में ही हो गया था।
साधारण स्त्रियों की तरह बा ने भी अनेक प्रकार के स्वप्न लेकर दाम्पत्य-जीवन में प्रवेश किया। पति का प्यार, विलासपूर्ण जीवन और अधिकारपूर्ण गृह-शासन की कामना बा में भी थी किंतु पति के घर पहुँचते ही कुछ समय बाद ही बा को अनुभव हो गया कि उनके पति श्री मोहनदास करमचन्द गाँधी कुछ भिन्न प्रकार के व्यक्ति हैं। उनके रंगीन स्वप्नों की पटरी उनके विचारों के साथ न बैठ सकेगी ! यह विषम परिस्थिति थी। एक ओर जीवन के रंगीन स्वप्न और दूसरी ओर पति का आदर्श!
माता कस्तूरबा ने इस मानसिक उथल-पुथल को बड़े धैर्य पूर्वक सँभाला! यह एक ऐसी परिस्थिति थी जिसमें यदि प्रत्यक्ष कलह न भी होती तब भी एक मानसिक वैषम्य तो उत्पन्न हो ही सकता था। और जहाँ पति-पत्नी के बीच मानसिक वैषम्य हो, वहाँ सुख शाँति की सम्भावना ही कहाँ रह सकती है।
बहुत कुछ पढ़ी लिखी न होने पर भी एक भारतीय नारी के नाते माता कस्तूरबा संस्कारवश ही इतना समझती थी कि पत्नी का सबसे प्रथम तथा प्रमुख कर्तव्य है सब प्रकार से पति के अनुकूल रहना! उन्होंने पत्नी जीवन के इस मूलाधार को ही अपने जीवन का ध्येय बना लिया और हर प्रकार से अपने पति महात्मा गाँधी से सानुकूलता स्थापित करने का व्रत ले लिया।
यह बात सही है कि संस्कार, स्वभाव तथा इच्छाओं के विरुद्ध किसी व्रत के पालन में कुछ असुविधा अथवा अरुचिता अवश्य होती है। किन्तु यही असुविधा सहन करना व्रत पालन का तप है जिसका पुण्यफल हर प्रकार से मंगलमय ही होता है। जीवन में साग्रह धारण किये हुए संकल्प जब सफलता पूर्वक व्यवहार हो जाते हैं तब मनुष्य की आत्मा में आनन्द के द्वार खुलने लगते हैं और उसका जीवन हर प्रकार से सफल एवं सार्थक बन जाता है।
विवाह के कुछ समय बाद ही बा को अपनी स्वाभाविक जीवन धारा को पति द्वारा अपनाए गये एक विशेष एवं विलक्षण प्रकार के जीवन ढाँचे में ढालना पड़ा! जब तक महात्मा गाँधी घर रहे तब तक तो वे एक साधारण शिक्षित व्यक्ति की तरह वैभवपूर्ण जीवन चलाते रहे जिसके अनुसार माता बा भी खूब शान-शौकत से रहती रही। किंतु अफ्रीका यात्रा के समय से उनका जीवन जो बदला तो दिन-दिन बदलता ही चला गया! इसका कारण था त्रस्त मानवता की वह करुण पुकार जो दक्षिणी अफ्रीका में महात्मा गाँधी के हृदय में उतर गयी थी। दक्षिणी अफ्रीका के भारतीयों के साथ गोरों का अमानवीय व्यवहार देख कर उन्हें जैसे याद आ गया कि वे साधारण साँसारिक जीवन में व्यर्थ उलझे हुये हैं उन्हें तो त्रस्त मानवता का उद्धार करने और उसकी सेवा करने के लिए ही भूमि पर भेजा गया है। बस फिर क्या था उन्होंने बैरिस्टरी का बाना उतारकर रख दिया और एक संत-सिपाही का बाना धारण कर लिया!
पत्नी धर्म के अनुसार माता कस्तूरबा को भी वैसा करना ही था और उन्होंने किया भी!! महात्मा गाँधी की भाँति उन्होंने भी भोग विलास एवं सुख सुविधा की सारी चीजें त्याग दीं। जीवन की आवश्यकताओं एवं आकाँक्षाओं को काट गिराया। सादे से सादे सीमित वस्त्र और लघु से लघु स्वल्पतम् भोजन उनके जीवन की आवश्यकता रह गई।
यद्यपि माता कस्तूरबा ऐसा करने के लिए मजबूर नहीं थीं और न पति अथवा परिवार की ओर से उन्हें ऐसा करने का निर्देश था और न कोई ऐसा सामाजिक प्रतिबन्ध था कि जिससे ऐसा किये बिना उन्हें अपवाद अथवा लाँछना का लक्ष्य बनना पड़ता । किन्तु उन्होंने यह सारा त्याग अपनी स्वतन्त्र इच्छा से स्वीकार किया। उन्हें पति के साथ हर प्रकार से सानुकूलता स्थापित करने का अपना संकल्प याद था।
अब यदि एक क्षण के लिए बापू और बा के इस समान त्याग की तुलना करके देखा जाये तो बा का त्याग बापू की अपेक्षा अधिक महान एवं अहेतुक सिद्ध होगा! महात्मा गाँधी ने दक्षिणी अफ्रीका में मानवता की दुर्दशा देखी और उसकी पुकार सुनी, जिसने उनके हृदय को द्रवीभूत कर दिया। मानवता की पीड़ा से स्वयं पीड़ित होकर उन्होंने एक प्रकार से उसकी प्रतिक्रिया से प्रेरित होकर जीवन की सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया।
ऐसा करने में उनकी पीड़ा को सान्त्वना मिली, उनकी आत्मा को शाँति मिली। वैसा करने में वे अपनी एक प्राकृतिक एवं प्रेरक जिज्ञासा के वशीभूत थे।
दक्षिणी अफ्रीका से लौटने पर तो महात्मा गाँधी का सम्पूर्ण जीवन ही त्याग, कर्तव्य तथा सेवा का एक जीता जागता इतिहास ही बन गया! बापू ने जन सेवा का जो पथ ग्रहण किया उसमें काँटे ही काँटे बिछे हुए थे। बा को उस पथ का अनुसरण करने के लिए कोई मजबूरी नहीं थी फिर भी उन्होंने उसका अनुसरण किया और किसी भी क्षेत्र में महात्मा गाँधी से पीछे नहीं रहीं। बा की इस त्याग तथा तपस्या के पीछे कोई लोकेषणा अथवा पूजा प्रतिष्ठा की प्यास नहीं थी। उनके सारे त्याग एवं तपस्या के पीछे उनका वही- ‘पति से अनुकूलता’ का एक व्रत काम करता था।
बा के सत्याग्रही स्वभाव के विषय में स्वयं बापू ने एक स्थान पर कहा है “मेरे न चाहने पर भी बा हठपूर्वक अपनी इच्छा से मुझ में समा गई है। मेरा यह आग्रह कभी नहीं रहा कि वे मेरे अनुरूप ही अपने जीवन को बना लें किन्तु यह सब उन्होंने महज अपनी इच्छा से कर लिया है!”
बा एक साधारण भारतीय नारी थी। उनमें कोई ऐसी असाधारण विशेषतायें नहीं थीं जिन्होंने उन्हें राष्ट्र की पूज्य माता की पदवी पर पहुँचा दिया हो। बा ने अपनी त्याग-तपस्या से यह सारे गुण अपने में उत्पन्न किए थे बापू के अनुरूप अपने को बनाने में बा ने जिन उपायों का सहारा लिया था उनमें आत्म-त्याग, पति निष्ठा और निष्काम सेवा भाव प्रमुख थे! बा ने जिस दिन से सानुकूलता का व्रत लिया उसी दिन से अपने सम्पूर्ण अस्तित्व एवं व्यक्तित्व को हठ पूर्वक बापू में विसर्जित कर दिया, जिससे न तो उनकी कोई अपनी आवश्यकता रह गई और न कामना। फलतः उन्हें कोई भी त्याग करते समय कोई विशेष कष्ट न होता था। निष्काम सेवा कार्य-क्रमों से माता कस्तूरबा के हृदय का विकास इस सीमा तक हो गया कि वे जन-जन के लिए माता थी और जन-जन उनके लिए पुत्र बन गया।
किसी भी महापुरुष का जीवन उठा कर देख लीजिए वह कठिनाइयों का एक जीता-जागता इतिहास मिलेगा। किसी सदुद्देश्य के लिए जीवन भर कठिनाइयों से जूझते रहना ही महापुरुष होना है। कठिनाइयों से गुजरे बिना कोई भी अपने लक्ष्य को नहीं पा सकता। विद्वानों का कहना है कि जिस उद्देश्य का मार्ग कठिनाइयों के बीच से नहीं जाता उसकी उच्चता में सन्देह करना चाहिये।
ऐसा नहीं कि संसार के सारे महापुरुष असुविधापूर्ण परिस्थिति में ही जन्मे और पले हों। ऐसे अनेकों महापुरुष हुए हैं जिनका जन्म बहुत ही सम्पन्न स्थिति में हुआ और वे जीवन भर सम्पन्नता पूर्ण परिस्थिति में ही रहे। यदि वे चाहते तो कठिनाइयों से बच कर भी बहुत से कार्य कर सकते थे। किन्तु उन्होंने वैसा नहीं किया। जो असुविधा पूर्ण परिस्थिति में रहे उन्हें तो कठिनाइयों का सामना करना ही पड़ा। साथ ही जिन्हें किसी प्रकार की असुविधा नहीं थी उन्होंने भी कठिन कामों को हाथ में लेकर कठिनाइयों को इच्छापूर्वक आमंत्रित किया।
वास्तव में बात यह है कि कठिनाइयों के बीच से गुजरे बिना मनुष्य का व्यक्तित्व अपने पूर्ण चमत्कार में नहीं आता और न सुविधा पूर्वक पाया हुआ लक्ष्य ही किसी को पूर्ण संतोष देता है। कठिनाइयाँ एक ऐसी खरीद की तरह है जो मनुष्य के व्यक्तित्व को तराश कर चमका दिया करती हैं। कठिनाइयों से लड़ने और उन पर विजय प्राप्त करने से मनुष्य में जिस आत्म बल का विकास होता है वह एक अमूल्य सम्पत्ति होती है जिसको पाकर मनुष्य को अपार संतोष होता है। कठिनाइयों से संघर्ष पाकर जीवन में एक ऐसी तेजी उत्पन्न हो जाती है जो पथ के समस्त झाड़-झंखाड़ों को काटकर दूर कर देती है। एक चट्टान से टकरा कर बढ़ी हुई नदी की धारा मार्ग के दूसरे अवरोध को सहज ही पार कर जाती है।
अपने व्यक्तित्व को पूर्णता की चरमावधि पर पहुँचाने के लिए ही भारतीय ऋषि मुनियों ने तपस्या का कष्टसाध्य जीवन अपनाया। घर की सुख-सुविधाओं को छोड़कर अरण्य-आश्रमों का कठिन जीवन स्वीकार किया। भारतीय राजा महाराजाओं की यह परम्परा रही है कि वे जीवन का एक भाग तपस्यापूर्ण कार्यक्रम में लगाया करते थे। यही नहीं भारत के हर आर्य गृहस्थ का धार्मिक कर्तव्य रहा है कि वह जीवन का अन्तिम चरण सुख सुविधाओं को त्याग कर कठिन परिस्थितियों में व्यतीत करने के लिए वानप्रस्थ तथा संन्यास ग्रहण किया करते थे। भारतीय आश्रम धर्म के निर्माण में एक उद्देश्य यह भी रहा है कि घर गृहस्थी में सुख सुविधाओं के बीच रहते -रहते मनुष्य के व्यक्तित्व में जो निस्तेजता और ढीलापन आ जाता है वह संन्यस्त जीवन की कठोरता से दूर ही जाये और व्यक्ति अपने परलोक साधना के योग्य हो सके। कठिनाइयाँ मनुष्य को चमकाने और उसे तेजवान बनाने के लिए ही आती हैं। कठिनाइयों का जीवन में वही महत्व है जो उद्योग में श्रम का और भोजन में रस का।
जीवन को अधिकाधिक कठोर और कर्मठ बनाने में कठिनाइयों की जिस प्रकार आवश्यकता है उसी प्रकार चरित्र निर्माण के लिये भी कठिनाइयों की उपयोगिता है। मनुष्य का सहज स्वभाव है कि उसे जितनी ही अधिक छूट मिलती है, सुख-सुविधायें प्राप्त होती है वह उतना ही निकम्मा और आलसी बनता जाता है, और एक प्रमादपूर्ण जीवन संसार की सारी बुराइयों और व्यसनों का श्रमदाता है। खाली और निठल्ला बैठा हुआ व्यक्ति सिवाय खुराफात करने के और क्या कर सकता है। यही कारण है कि उत्तराधिकार में सफलता पाये हुये व्यक्ति अधिकतर व्यसनी और विलासी हो जाते हैं।
किन्तु जो कठिनाइयों से जूझ रहा है, परिस्थितियों से टक्कर ले रहा है असुविधाओं को चुनौती दे रहा है उसे संसार की फिजूल बातों के लिये अवकाश कहाँ। उसके लिये एक-एक क्षण का मूल्य है जीवन की एक -एक बूँद का महत्व है। जिस प्रकार मोर्चे पर डटे हुये सैनिकों की साहस और उत्साह की वृत्तियों के अतिरिक्त अन्य सारी वृत्तियाँ सो जाती हैं उसी प्रकार कठिनाइयों के मोर्चे पर अड़े हुये व्यक्ति की समस्त प्रमादपूर्ण वृत्तियाँ सो जाती हैं।
कष्ट और कठिनाइयों का अनुभव पाया हुआ व्यक्ति दूसरे के दुख दर्द को ठीक-ठीक समझ लेता है और सामर्थ्य भर सहायता करने की कोशिश करता है। उसमें सहानुभूति, सौहार्द, सहयोग तथा संवेदना जैसे दैवी गुण आ जाते हैं। कष्ट पाया हुआ व्यक्ति दूसरे को सताने और दुख देने से डरता है। कष्ट और कठिनाइयाँ मनुष्य के अहंकार को नष्ट करके उसमें विनम्रता, श्रद्धा और भक्ति के भाव भर देती हैं। कठिनाइयों की कृपा से ऐसे अनेक गुण पाकर मनुष्य का चरित्र चमक उठता है और वह मनुष्यता से देवत्व की ओर बढ़ने लगता है।
कठिनाइयाँ मनुष्य को स्वस्थ और सुदृढ़ बनाती हैं। कठिनाइयों से निकलने के लिए मनुष्य को जो श्रम करना पड़ता है वह स्वास्थ्य के लिए अनमोल रसायन सिद्ध होता है। जो परिश्रम करेगा वह स्वस्थ रहेगा ही इस तथ्य में किसी भी तर्क-वितर्क की गुंजाइश नहीं है।
कठिनाई से उपार्जित सुख साधनों में जितना संतोष होता है उतना सहज उपलब्ध साधनों में नहीं। परिश्रम पूर्ण कमाई से दो रुपये पाकर एक मजदूर जितना प्रसन्न और संतुष्ट होता है उतना ब्याज के दो हजार रुपये पाकर एक साहूकार नहीं।
कठिनाइयाँ मनुष्य जीवन के लिये वरदान रूप ही होती हैं किंतु इन अमोघ वरदानों का लाभ वही उठा सकता है जो इनको सँभालने और वहन कर सकने की सामर्थ्य रखता है। अन्यथा यह बोझ बन कर मनुष्य को कुचल भी देती है। जो परिश्रमी है, पुरुषार्थी है, साहसी और उत्साही है वह इनको फलीभूत करके संसार की अनेक विभूतियों को उपलब्ध कर लेता है। जो आलसी, प्रमादी, कायर और अकर्मण्य है वह इनकी चपेट में आकर जीवन की समस्त सुख-शाँति से हाथ धो बैठता है। कठिनाइयों का मूल्य बहुत गहरा है। जो इन्हें विजय कर लेता है वह बहुत कुछ पा लेता है और जो इनसे हार बैठता है उसे बहुत कुछ चुकाना पड़ता है।
कष्ट और कठिनाइयों को जो व्यक्ति विवेक और पुरुषार्थ की कसौटी समझ पर परीक्षा देने में नहीं हिचकते वे जीवन की वास्तविक सुख शाँति को प्राप्त कर लेते हैं। किंतु जो कायर हैं, क्लीव हैं, आत्म-बल से हीन हैं, वे इस परीक्षा बिंदु को देख डर जाते हैं जिसके फलस्वरूप ‘हाय-हाय’ करते हुये जीवन के दिन पूरे करते हैं। न उन्हें कभी शाँति मिलती है और न सुख। सुखों का वास्तविक सूर्य दुःखों के घने बादलों के पीछे ही रहता है। जो इन बादलों को पार कर सकता है वही उसके दर्शन पाता है और जो दुःखों के गम्भीर बादलों की गड़गड़ाहट से भयभीत होकर दूर खड़ा रहता है वह जीवन भर सुख-सूर्य के दर्शन नहीं कर सकता। वास्तविक सुख को प्राप्त करने के लिये आवश्यक है संसार के दुःखों का झूठा परदाफास किया जावे। शीतलता का सुख लेन के लिए गरमी को सहन करना ही होगा।
केवल मात्र सुख सुविधाओं से भरा जीवन अधूरा है। जब तक मनुष्य दुःखों का अनुभव नहीं करता, कष्टों को नहीं सहता वह अपूर्ण ही रहता है। मनुष्य की पूर्णता के लिये दुःख तकलीफों का होना आवश्यक है। दुःखों की आग में तपे बिना मनुष्य के मानसिक मल दूर नहीं होते, और जब तक मल दूर नहीं होते मनुष्य अपने वास्तविक रूप में नहीं आ पाता।
इसके अतिरिक्त कष्ट-क्लेशों का सबसे महत्वपूर्ण उपयोग यह है कि उनके आगमन पर गरीब को बड़ी तीव्रता से ईश्वर की याद आती है। दुःख की तीव्रता मनुष्य में ईश्वरीय अनुभूति उत्पन्न कर उसके समीप पहुँचा देती है। कष्ट और क्लेशों के रूप में मनुष्य अपने संचित कर्म फलों को भोगता हुआ शनैः शनैः परलोक का पथ प्रशस्त किया करता है। जहाँ दुःख की अनुभूति नहीं वहाँ ईश्वर की अनुभूति असम्भव है। यही कारण है कि भक्तों ने ईश्वर के समीप रहने के साधन रूप दुःख को सहर्ष स्वीकार किया है।
कष्ट और कठिनाइयों को दुःखमूलक मान कर जो इनसे भागता है उसे यह दुःख रूप में ही लग जाती है; और जो बुद्धिमान इन्हें सुख मूलक मान कर इनका स्वागत करता है उसके लिए यह देवदूतों के समान वरदायिनी होती है।
भगवान कृष्ण ने मोहित-चित्त अर्जुन को उपदेश देना प्रारम्भ किया। एक-एक आध्यात्मिक तत्व की विशद और गूढ़ विवेचना की उन्होंने। संसार की नश्वरता, अनासक्ति, ज्ञान, अज्ञान, श्रद्धा, संकल्प, विचार, विवेक, तप, साधना, राग, वैराग्य, निष्काम कर्मयोग और आत्मा-परमात्मा की प्रमाणयुक्त विवेचना करने पर भी अर्जुन का मोह-भाव समाप्त न हुआ, आसक्ति न गई, अहंकार न मिटा, तो भगवान को अपना अंतिम अस्त्र उठाना पड़ा। अपने विराट् रूप का प्रदर्शन किया भगवान ने। उनके विकराल रूप का दर्शन कर अर्जुन काँपने लगा। उसने साश्चर्य देखा- वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, सूर्य, चन्द्रमा सब उसी विराट के नन्हें-नन्हें टुकड़े हैं। सारा संसार उन्हीं में समाया हुआ है। उनके भय से मृत्यु भी काँपती है, ग्रह−नक्षत्र एक स्थान पर रुकने से भय खाते हैं, दिक्पाल उनकी स्तुति करते हैं, उनका काल-उदय सम्पूर्ण प्राणियों के शरीरों को भक्षण करता चला जा रहा है। एक तिनका भी उनकी मर्जी के बिना हिलने-डुलने तक में असमर्थ है।
परमात्मा के विराट् रूप का दर्शन करने पर अर्जुन को अपनी लघुता का ज्ञान हुआ। उसने समझ लिया यह संसार पंचतत्वों के निर्माण और विनाश का खेल मात्र है, बादलों से बनते हुये विविध चित्रों के समान इस संसार का भी रूप परिवर्तित होता रहता है। शरीर, सुख, भोग, वासनायें, तृष्णायें, आकाँक्षायें सब तुच्छ और क्षणिक हैं। सत्य तो केवल परमात्मा है। उसकी अभिन्न सत्ता होने के नाते आत्मा भी चिरन्तन, अजर, अमर अक्षर और अविनाशी है। उसे ही जानने का प्रयत्न करना चाहिये। जो बात भगवान कृष्ण के उपदेश से अर्जुन की समझ में नहीं आई उसे परमात्मा के विश्व-रूप ने उसे समझा दिया। विशाल ब्रह्माण्ड के साथ अपनी तुलना करने पर अपनी लघुता का, शारीरिक नश्वरता का, पार्थिव सुखों की अनित्यता का बोध हो जाता है। मनुष्य को अपने जीवन लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
रामायण में ऐसा ही एक प्रसंग आता है। वह घटना काकभुशुंडि के सम्मोह की है। तब भगवान राम ने अपने विराट रूप की झाँकी दी थी। परमात्मा के उदर में ही अगणित विशालकाय ब्रह्माण्डों को उनमें स्थिति नदी, पहाड़, समुद्र आदि को देखकर ही उन्हें अनुमान हुआ था कि मनुष्य कितना असमर्थ, अशक्त और छोटा-सा जीव है। उसमें यदि कुछ शक्ति विशेषता और अमरता है तो वह उसके प्राण, मन और आत्मा के कारण ही है। उसमें कुछ प्राणियों से भिन्न विशेषतायें न रही होती तो इस विराट-विश्व में उसका अस्तित्व कीड़े-मकोड़ों, भुनगों, मक्खियों, मच्छरों जैसा ही रहा होता। करोड़ों मन की तुलना में जो स्थान एक रत्ती का हो सकता है, विश्व की तुलना में मनुष्य उससे भी करोड़ों गुना छोटा ही है।
अर्जुन और काकभुशुंडि की तरह कौशल्या और यशोदा ने भी भगवान के उस स्वरूप का दर्शन पाया है। ऐसी कथायें रामायण, भागवत आदि में आती हैं। इन कथानकों द्वारा मनुष्य के वास्तविक रूप का दिग्दर्शन कराने का कवियों, शास्त्रकारों ने बड़ा ही कलापूर्ण सच्चा और उद्देश्यपूर्ण विवेचन किया है। इससे उनकी बुद्धि की सूक्ष्म ग्रहणशीलता का ही पता चलता है। पर यह घटना केवल इन्हीं दो-चार व्यक्तियों के साथ घटित हुई हों, अन्यों को ईश्वर के इस विराट रूप के दर्शन न हुये हों, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इस विराट ब्रह्माण्ड की झाँकी हर क्षण, प्रत्येक मनुष्य को होती रहती है किंतु वह बाह्य जगत में, भौतिकता में, कामनाओं, तृष्णाओं और भोग विलास में इस तरह ग्रस्त है कि अर्जुन, काकभुशुंडि, नारद, गरुड़, यशोदा और कौशल्या की तरह उनकी विवेक वाली आँख खुलती नहीं। लोग देखकर भी अनदेखी करते हैं। विराट स्वरूप पर चिन्तन, मनन और उसके प्रभाव आदि पर कुछ भी ध्यान न देकर केवल भोगों की काम-क्रीड़ा में लगे रहते हैं।
यह धरती इतनी बड़ी है कि यदि कोई इस पर चलना प्रारम्भ करे तो संभवतः जीवन समाप्त हो जाय और वह इसका ओर-छोर न पा सके। यह पृथ्वी विराट सौर-मण्डल का एक अंश मानी गई है। सौर-मण्डल के दो खरब नक्षत्रों में अकेला सूर्य ही पृथ्वी से 13 लाख गुना है, ‘अण्टलारि’ तारे के सम्बन्ध में कहा जाता है उसमें 21000 लाख पृथ्वियाँ समा जायँ फिर भी काफी जगह बाकी बची रहे। शुक्र में लोगों ने जीवन होने की कल्पना की है। मंगल ग्रह की यात्रा की तैयारियाँ रूस और अमेरिका में चल रही है। इस यात्रा में चन्द्रमा एक स्टेशन के रूप में प्रयुक्त होगा। यह पृथ्वी के आस-पास के ग्रहों का एक छोटा-सा रूप है। इससे भी विशद विश्व अन्यत्र विद्यमान है, जिसकी कल्पना भी मनुष्य के वश की बात नहीं है।
मनुष्य की आँखों में जो लेन्स लगा है उसकी शक्ति इतनी बड़ी नहीं है कि आकाश में दिखाई देने वाले प्रत्येक नक्षत्र को उतना ही बड़ा देख सके, जितने बड़े वे हैं। उनका बिलकुल छोटा-सा रूप इस पृथ्वी पर दिखाई देता है किंतु बुद्धि बल और गणित के द्वारा जो आँकड़े प्राप्त होते हैं उनसे इन नक्षत्रों के पूरे परिमाण का पता चलता है। एक-एक ग्रह-नक्षत्र इतना बड़ा है कि इनकी नाप, तौल, दूरी, लम्बाई और चौड़ाई जानना तो कठिन ही है। इस दिशा में वैज्ञानिकों ने अनेक प्रयोग किये और “त्रिकोण पद्धति” द्वारा पदार्थों की दूरी निकालना आसान हो गया। पर अमल में यह सिद्धान्त भी कठिन निकला। चन्द्रमा की दूरी निकालना हो तो चार हजार मील की आधार रेखा चाहिये, तारों की दूरी की पड़ताल करने के लिये साढ़े अठारह करोड़ मील की आधार रेखा की जरूरत पड़ेगी जो इस धरती में किसी तरह भी संभव न होगी। पृथ्वी जिस कक्ष में सूर्य की परिक्रमा करती है उसके आमने-सामने के दो बिन्दुओं की दूरी अठारह करोड़ मील होती है। इन दूरियों के औसत आदि निकाल कर विभिन्न शक्तियों की दूरबीनों और खगोल यन्त्रों द्वारा यह कठिनाई दूर कर ली गई है किंतु यह दूरियाँ इतनी बड़ी हैं कि उनको अंकित करने के लिये गिनती भी थक जाय। बताया जाता है कि सूर्य के बाद जो दूसरा तारा पृथ्वी से सबसे नजदीक है उसकी दूरी 2, 50, 00 00 00 00 000 मील दूर है। इससे आगे के नक्षत्रों की दूरी निकालना हो तो असंख्य शून्य लगते चले जायेंगे पर समस्या फिर भी हल न होगी।
आकाश गंगा में जितने ग्रह-नक्षत्र और नीहारिकायें अपना स्थान घेरे हुए हैं वह सिर्फ 1 प्रतिशत स्थान में हैं शेष 99 प्रतिशत स्थान शून्य है और साधारणतया एक तारे से दूसरे की दूरी कम से कम 250 00 00 00 00 000 मील होती है। इनमें से कई नक्षत्र जोड़ी बनाकर, कई 5-5, 6-6 के गुच्छकों में रहते हैं और सम्मिलित परिभ्रमण करते हैं। एक ऐसे “काले तारे” की खोज हुई है जिसका व्यास 230 00 00 000 मील बताया जाता है। यह सूर्य से भी 20 गुना बड़ा है।
इन आकाशस्थ ग्रह-नक्षत्रों के जीवन पर दृष्टि दौड़ाते हैं तो बुद्धि लड़खड़ाने लगती है। उसकी विशालता का अनुमान तक करने की शक्ति नहीं रह जाती है। भारतीय आध्यात्म ग्रन्थों में जो ब्रह्माँड का उल्लेख मिलता है वह और भी अधिक विस्मय पैदा करने वाला है। शास्त्रों के अनुसार सूर्य अपने उपग्रहों को लेकर कृतिका की ओर बढ़ रहा है, ‘कृतिका’ इसी तरह ‘अभिजित’ की ओर, इस तरह यह विशाल ब्रह्माण्डव्यापी प्रक्रिया चल रही है जिस की कल्पना अर्जुन व काकभुशुंडि की तरह ही डरा देने वाली है। मनुष्य का मन इन विलक्षणताओं को देखकर विस्मय से भर जाता है। तब उसे ज्ञान होता है कि वह इस सृष्टि की तुलना में कितना छोटा है तुच्छ है।
जितना विलक्षण यह संसार है, मनुष्य उससे कम नहीं है। पर उसकी सारी विशेषता आत्म-तत्व के कारण ही है। शरीर की दृष्टि से तो वह बिल्कुल तुच्छ, दीन−हीन और पतित है। शक्ति का स्वरूप उसकी आत्मा है इसे ही जानने का प्रयत्न करना चाहिये। इसकी सत्यता का अनुमान अपनी तुलना इस विराट जगत के साथ करने में सहज ही हो जाता है।
सारे धर्म भगवान के चरण हैं, इतना जानने वाला व्यक्ति ही धर्म के रहस्य को जानता है। फिर उसके लिये न पुराण पढ़ने की जरूरत है और न कुरान।
- विनोबा
अधिक धन और अनियमित जीवन क्रम, काफी थे कार्नेरो को एक ऐसी दशा में पहुँचा देने को, जिसमें जीवित अवस्था में भी क्षण-क्षण पर, मृत्यु के दर्शन होते रहें। और हुआ भी वैसा ही। रुग्ण शय्या पर पड़े-पड़े, लगे देखने एक टक छत की ओर। एक निराशा से सबसे बात करते, और हर समय अब चला कि तब चला का चिन्तन करते हुए, आँखें डबडबाये रहते। सारे मित्र, सारे प्रियजन और परिजन किसी समय भी छूटते दीखते। डाक्टरों ने जवाब दे दिया, सारे परिवार वाले निराश हो गये। अनन्त धन व्यय करने और उपचार की हद करने पर भी कोई लाभ न हुआ। परिचितों ने उस जाने की तैयारी में पड़े कार्नेरो के पास आना जाना कम कर दिया। जाये भी क्या कोई? किसी के पास आते ही आँखों में आँसू और विदाई की चर्चा। कौन दुखी होने के लिए बार-बार पास आता जाता। मृत्यु के घोर अन्धकार से घिरा हुआ कार्नेरो केवल सैंतीस वर्ष को तरुण अवस्था में असहाय होकर बोरिया-बिस्तर बाँधने की तैयारी करने लगा।
अपनी मृत्यु निश्चित समझकर कार्नेरो ने जीवन की आशा में तड़पना व्यर्थ समझा और अपने को शाँत कर लिया तथा धीरे-धीरे ईश्वर का ध्यान करने लगा। ज्यों-ज्यों चित्त शाँत होता गया त्यों-त्यों उसके विचार उज्ज्वल होने लगे और वह अपने में एक आराम अनुभव करने लगा! अब वह कोई दुखदायी विचार अपने अंदर न आने देता! उसने धीरे-धीरे अपने पिछले जीवन पर विचार करना शुरू किया।
पहले उसे अपने एक अनुभवी शुभ-चिन्तक की बात याद आई। जिसने कहा था- ‘कार्नेरो! तुम अभी समझते नहीं कि तुम्हारे इस अत्यन्त अनियमित जीवनक्रम का क्या फल होगा ! तुम खाने-पीने-सोने-जागने किसी बात में भी ध्यान नहीं रखते। एक दिन तुम्हें पछताना होगा’- और तब उसने उन वयोवृद्ध हितैषी का उपहास करते हुए कहा था- “बूढ़ों का स्वभाव होता है कि वे तरुणों को मौज उड़ाते देखकर चिढ़ते हैं और अपनी वह चिढ़ तरह-तरह के उपदेश देकर और आलोचना करके निकाला करते हैं। वे चाहते हैं कि तरुण भी अपनी मौज मस्ती को छोड़कर उनकी तरह ही बुढ़ापे का जीवन अपना लें। नाप तोलकर खायें, घड़ी देखकर सोयें जागे और मौज मारने की चीजों से परहेज करे। यह भी कोई जिन्दगी है। खामख्वाह अपने को एक कैदी बना लिया जाये ! जिन्दगी तो मौज करने के लिये है। मन-माना खाओ पियो और आनन्द करो!”
उसे अपनी कल्पना में स्पष्ट दिखाई देने लगा कि वह किस प्रकार बेतहाशा जिंदगी बिता रहा है। जाने क्या क्या और कितना खा-पी रहा है। जाने कहाँ-कहाँ घूम-फिर रहा है और न जाने क्या-क्या कर-धर रहा है! इस समय वह एक दर्शन की तरह अपनी पिछली जिंदगी अपनी कल्पना में देखता हुआ विचार कर रहा था। वह देखने लगा कि कब-कब कौन-सा अतिचार करने से उसे क्या हानि हुई है और कैसे वह धीरे-धीरे शिथिल होता हुआ इस दशा में पहुँचा है?
उसे अपने पिछले जीवन पर बड़ा खेद हुआ, किंतु अब क्या हो सकता था। “अब यदि उसे भविष्य मिल जाये तो वह कुछ कर दिखायेगा”- इस भाव से जीवन के लिये छटपटा उठा।
वह ज्यों-ज्यों सृजनात्मक ढंग से सोचता त्यों-त्यों उसके विचार उज्ज्वल होते जाते, ओर ज्यों-ज्यों भविष्य में नियम निर्वाह और उपयोगी जीवन की सोचता त्यों-त्यों उसके मन में एक उत्साह जागता। जिससे वह अपने आप को कभी-कभी निरोग अनुभव करने लगता। धीरे-धीरे उसे अपने स्वस्थ हो जाने में विश्वास हो गया! उसने दवायें कम कर दीं, पथ्य पालन को प्रधानता दीं और निराशापूर्ण चिन्तन का त्याग कर हितकर सुन्दर साहित्य पढ़ना और उपयुक्त दिशा में विचार करना प्रारम्भ कर दिया!
इस परिवर्तन का उसके स्वास्थ्य पर इतना अनुकूल प्रभाव पड़ा कि उसे जीवन में अखण्ड विश्वास हो गया।
पुनर्जीवन पाकर उसने जिन्दगी को नये सिरे से प्रारम्भ किया। अब वह प्राकृतिक नियमों का पालन करता। खाने के लिये नहीं जीता बल्कि जीने के लिये खाता। जीवन के लिये आवश्यक एवं उपयुक्त वस्तुयें ही संयमित सीमा तक सेवन करता। प्रत्येक कार्य में समय का पालन करता, प्रसन्न रहता और उपयोगी दिशा में सोचता।
उसने अपने अनुभवों का लाभ दूसरों को देने के लिये साहित्य लिखा, सभा समितियों का गठन किया और स्वास्थ्य सम्बन्धी प्रवचनों एवं भाषणों का आयोजन किया। उसने व्यायाम एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी संस्थायें बनाई और उनका संचालन किया।
जहाँ उसने शारीरिक स्वास्थ्य के लिये बहुत से कार्य किये वहाँ जन रुचि को परिष्कृत करने और मानसिक विकास करने के लिये मनोरंजन कार्य-क्रमों को भी प्रोत्साहित किया। उसने कलाकारों, संगीतज्ञों और शिल्पकारों को इस दिशा में बहुत बढ़ाया। अनेक कलाकार और शिल्पकार उसके आश्रय में रहते थे जो अन्तिम दिन तक उसके साथ रहे।
उसके मित्र-वर्ग में तरुणों की संख्या अधिक रहती थी जिन्हें वह हर तरह से स्वस्थ रहने की शिक्षा देता। अस्वस्थ होने पर उनकी सहायता करता, उनका मनोबल बढ़ाता और समाज के लिये उपयोगी बनाने का प्रयत्न करता। वह न कभी निठल्ला बैठता और न व्यर्थ के कार्य करता।
कार्नेरो ने अपने एक शिल्पकार मित्र फालकोनेटो की सहायता से अनेक सुन्दर भवनों और संस्थाओं का निर्माण कराया। कृषि का विकास किया। उस पर पुस्तकें लिखीं और सरकार को योजनायें दीं। उसने अपनी बहुत-सी दलदली भूमि को सुखाकर उस पर गाँव बसाये। वह कृषकों और मजदूरों के साथ स्वयं काम करता और उन्हें काम का सुन्दर से सुन्दर ढंग बतलाता।
आयु के साथ कार्नेरो की कार्यदक्षता, फुरती और प्रसन्नता बढ़ती हुई देखकर बहुत से मित्र उससे पूछा करते थे कि क्या कारण है कि ज्यों-ज्यों आप बुढ़ापे की ओर बढ़ते जाते हैं, त्यों-त्यों तरुणों की भाँति फुर्तीले और कार्य चतुर होते जाते हैं? आपकी कार्य शक्ति कम होने के बजाय बढ़ती जाती है।
इसके उत्तर में वह कहता, बुढ़ापा नाम की वस्तु मनुष्य के जीवन में नहीं है। कार्य-क्षमता के ह्रास और जीवनी शक्ति की क्षीणता को वृद्धता कहा जाता है जो व्यक्ति इन दोनों की रक्षा करता रहता है वह कभी बूढ़ा नहीं हो सकता है। सत्य बात तो यह है कि साधारणतः जिस आयु को लोग बुढ़ापा कहा करते हैं और सबसे अधिक कष्टदायक मानते हैं, मनुष्य की वह आयु ही वास्तव में सबसे अधिक सुख और प्रसन्नता की आयु होती है। उस आयु में पहुँच कर मनुष्य बड़ा ही सीमित, संयमित और शाँत हो जाता है। यौवन-काल की उच्छृंखलता और अनुत्तरदायित्व की भावना नष्ट हो जाने से वह निश्चित और प्रसन्न रहता है। जवानी के बाद इच्छाओं, महत्वाकाँक्षाओं और वासनाओं की कमी होने से वह बड़ा सुखी हो जाता है। उसके सारे उद्वेग और क्रोधादि विकार नष्ट हो जाते हैं।
रोग शैय्या से उठने के बाद कार्नेरो ने अपना विवाह किया और उससे प्राप्त अपनी एक मात्र प्राण-प्रिय पुत्री के बच्चों से बहुत समय तक घिरे रहने के बाद हाथ में क्रास लेकर हँसते-हँसते शरीर छोड़ा था। लोगों का कहना था कि कार्नेरो ने पूर्व निश्चित योजना के अनुसार ही जीवन और मरण दोनों हँसते-हँसते वरण किया है। यदि वे चाहते तो इससे भी अधिक जीवित रह सकते थे किंतु एक दृष्टिकोण से वे सौ साल की जिंदगी मनुष्य के लिये पर्याप्त मानते थे।
मरते समय कार्नेरो ने कहा था कि जो मनुष्य मेरे आत्म-अनुभूत जीवन के सात मूल-मंत्रों के अनुसार अपना जीवन संचालित करेगा- मेरा आशीर्वाद है कि वह कम से कम सौ साल की स्वस्थ जिंदगी भोग कर सुख पूर्वक संसार से विदा होगा। कार्नेरो के अनुभूत सात महामंत्र ये है-
(1) निसर्ग सामंजस्य, (2) समय-संयम, (3) युक्त-आहार, (4) परिष्कृत विचार, (5) पवित्र आचार, (6) पुरुषार्थ एवं (7) परोपकार।
कुछ लोगों की ऐसी मान्यता है कि धार्मिक व्यक्ति को धन से विरक्ति होनी चाहिये। जहाँ तक आध्यात्मिक आनन्द की प्राप्ति का प्रश्न है धन के प्रति अत्यधिक लगाव न रखना उचित भी है किन्तु गृहस्थी की सुख-सुविधाओं के लिये, धार्मिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिये, धन अत्यधिक आवश्यक वस्तु है, धन के बिना न धर्म संभव है न कर्त्तव्य पालन। इस दृष्टि से निर्धनता अभिशाप है। हमारे आध्यात्मिक जीवन में धन का उतना ही महत्व है जितना ईश्वर उपासना का। लक्ष्मी को परमात्मा का वामाँग मानते हैं। इसलिये उपासना को तब पूर्ण समझना चाहिये जब लक्ष्मी-नारायण दोनों की प्रतिष्ठा हो। जहाँ लक्ष्मी नहीं वहाँ का परमात्मा भी बेचैन रहता है। लक्ष्मी रहती है तो परमात्मा की प्राप्ति में सुविधा मिलती है, हमारी मान्यता इस प्रकार की होनी चाहिये।
आर्थिक दृष्टि से मनुष्य दूसरों का गुलाम बने यह न तो उपयुक्त ही है और न परमात्मा की ही ऐसी इच्छा है। उन्होंने अपने प्रत्येक पुत्र को समान साधन दिये हैं, समान क्षमतायें दी हैं तो उसका एक ही उद्देश्य रहा है कि आत्म-कल्याण और जीवन-यापन में प्रत्येक व्यक्ति आत्म निर्भर रहे। ईश्वरनिष्ठ को पराश्रित होना उचित भी नहीं, अपनी आजीविका का प्रबन्ध उसे स्वयं करना चाहिये।
निर्धनता एक प्रकार की आध्यात्मिक विकृति है। धन न कमाना त्याग का लक्षण नहीं। यह मनुष्य में दैवी गुणों की कमी का परिचायक है। हर व्यक्ति को विशुद्ध धार्मिक भावना से अर्थोपार्जन करना चाहिये। यह क्रिया आत्म-विकास के अंतर्गत ही आती है। “पीस पावर और प्लेन्टी” (शाँति, शक्ति और समृद्धि) नामक पुस्तक के रचयिता श्री ओरिसम मॉर्डन ने लिखा है - “जो दरिद्र होते हैं उनमें न आत्म-विश्वास होता है और न श्रद्धा। लोग अपनी स्थिति बदल सकते हैं पर उन्हें अपनी शक्तियों पर भरोसा करना आना चाहिये। आशा, साहस, उत्साह और कर्मशीलता के द्वारा कोई भी व्यक्ति श्री सम्पन्न बन सकता है।”
धन के सुख का साधन मानकर उसे ईमानदारी और परिश्रम के द्वारा कमाया जाय तो वह आत्म-विकास में भी सहायक होता है। धन प्राप्ति का एक दोष भी है अनावश्यक “लोभ”। वित्तेषणा के कारण लोग अनुचित तरीकों से धन कमाना चाहते हैं। बेईमानी के द्वारा कमाया हुआ धन मनुष्य को व्यसनों की ओर आकर्षित करता है। जुआ, सट्टा, लाटरी, नशा, वेश्यावृत्ति में धन का अपव्यय करने वाले प्रायः सभी अनुचित तरीकों से धनार्जन करते हैं। इस प्रकार की कमाई मनुष्य की दुर्गति करती है। इस तरह का धन हेय कहा गया है और उस धन से निर्धन होना ही अच्छा बताया गया है।
अर्थोपार्जन में जिन आध्यात्मिक गुणों का समावेश होना चाहिये शास्त्रकार ने उन्हें बड़े अलंकारिक ढंग से प्रस्तुत किया है। लक्ष्मी को वे देवी मानते हैं। उन्हें कमल पुष्प पर आसीन, ऊपर से फूलों की वर्षा होती हुई दिखाया गया है। कमल पवित्रता और सौंदर्य का प्रतीक है। लक्ष्मी पवित्रता और सौंदर्य अर्थात् ईमानदारी और सच्चाई पर विराजमान हैं। उनका वाहन उल्लू है। उल्लू मूर्खता का प्रतीक है। मूर्खतापूर्ण स्वभाव वाले या अवगुणी व्यक्तियों के लिये यह लक्ष्मी भार स्वरूप, दुःख रूप होती है। यह दिग्दर्शन उनके चित्र में कराया गया है।
मनुष्य किस प्रकार समृद्ध बने इसका आध्यात्मिक विवेचन शास्त्रकार ने स्वयं लक्ष्मी जी के मुखारविन्द से कराया है। वर्णन भले ही अलंकारिक हो पर उसमें जिन सिद्धान्तों का समावेश हुआ है वे अटल हैं। उनकी उपेक्षा करने से कोई भी व्यक्ति न तो धनी हो सकता है और न उस धन से सुख, शाँति और संतोष ही प्राप्त कर सकता है।
एक साधक के प्रश्न का उत्तर देती हुई लक्ष्मी जी कहती है-
वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मण वर्त्तमाने। अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे, जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्ण सत्वे॥
अर्थात् - “मैं सुन्दर स्वभाव वाले, चतुर मधुरभाषी, कर्त्तव्यनिष्ठ, क्रोधहीन, भगवत्परायण, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय और बलशाली लोगों के पास नित्य निवास करती हूँ।”
धन का कमाना, उसे बचाकर रखना और उससे अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति उपरोक्त गुणों पर आधारित है। उनमें से एक भी उपेक्षणीय नहीं। रोजगार करें या नौकरी, खेती करें या अन्य कोई रोजगार चतुरता, विनम्रता, कर्त्तव्य-परायणता आदि सभी गुण चाहिये। बात-बात पर झगड़ा करने, कर्त्तव्य की उपेक्षा करने या अपने सहयोगियों से मिलकर न रहने से न तो रोजगार पनप सकता है और न कोई अधिक देर तक नौकरी में ही रख सकता है।
लक्ष्मी के दूसरे कृपापात्र परिश्रमी व्यक्ति होते हैं। जब कोई व्यक्ति उद्योग-धंधा, व्यापार या परिश्रम त्याग देता है तो उसके पास की लक्ष्मी नाराज होकर लौट जाती है। “उद्योगिनं पुरुषं सिंह मुपैति लक्ष्मीः” की कहावत प्रसिद्ध है। धनाभाव होना यह बताता है कि वह व्यक्ति परिश्रम नहीं कर रहा। उद्योगी और परिश्रमी व्यक्ति सदा समृद्ध देखे जाते हैं।
परिश्रम और उद्योग करते हुये अनैतिक रास्तों का अनुकरण भी नहीं करना चाहिये अन्यथा ऐसे बखेड़े, झगड़े, या आपत्तिपूर्ण अवसर आ जायेंगे जिससे बढ़ी हुई आय कुछ ही दिनों में नष्ट हो जायगी। एक अनय सूक्त में कहा है-
स्थिता पुण्यवताँ गेहे सुनीति पथवे दिनाम्। गृहस्थानाँ नृपाणाँ वा पुत्रवत्पालयामि तान्॥
अर्थात्-” मैं नीति पर चलने वाले, पुण्य कर्म करने वाले गृहस्थों के घर बनी रहती हूँ और उनका पुत्र के समान पालन करती हूँ।”
कुछ व्यक्तियों की “जो मिला सो खर्च कर डाला” की आदत होती है। वे धन को वासनाओं और व्यसनों की पूर्ति में बर्बाद करते हैं। जो व्यक्ति केवल आज की चिन्ता करता है, कल की बात नहीं सोचता इन्द्रिय सुखों और वासनात्मक तृप्ति के लिये आमदनी से अधिक, कर्ज लेकर खर्च करता रहता है, धन उनके लिये अभिशाप बन जाता है। सजा के रूप वे शारीरिक रोग, द्वेष, शत्रुता, व्यसन, पारिवारिक कलह, दुर्गुण, व्यभिचार, चिन्तायें, बुरी आदतें, उद्दण्डता, अहंकार, तृष्णा आदि के शिकार बने रहते हैं।
धन, समृद्धि चाहने वालों के जीवन में आचरण उत्कृष्टता अनिवार्य है। उनका नैतिक एवं चारित्रिक जीवन जितना उद्दात्त होगा, वे उतनी ही तेजी से आर्थिक प्रगति करेंगे किन्तु धन के साधक में व्यक्तिगत मैलापन भी नहीं चाहिये। कमल पवित्रता के साथ सौंदर्य का भी प्रतीक है। सौंदर्य का अर्थ मनुष्य का शारीरिक स्वास्थ्य और स्वच्छता है। लक्ष्मी के प्रिय पात्र बनने के लिए व्यक्तिगत आचरण, रहन-सहन, खान-पान में भी स्वच्छता, सरलता और सादगी होनी चाहिये। लक्ष्मी जी कहती हैं-
कुचैलिनं दन्तलोपधारिणं वध्वाविंन निष्ठुर भाषिणं च। सूर्योदये चास्तमिते शयानं। जहाति लक्ष्मीर्यदि शार्गंपाणिः॥
अर्थात्- “गन्दे वस्त्र पहनने वाले, दांतों की सफाई न करने वाले, निष्ठुर भाषण करने वाले, जो सूर्योदय के पूर्व उठें नहीं और सूर्यास्त के समय सोते हों ऐसे व्यक्ति चाहे वह भगवान ही क्यों न हों लक्ष्मी जी उन्हें छोड़ जाती हैं।”
लक्ष्मी जी के चित्र, आसन, वाहन आदि में अलंकारित रूप में ऐसे ही आध्यात्मिक गुण पिरोये हुये हैं। जो इन रहस्यों को जानकर धन-प्राप्ति के लिए प्रयत्न करता है उस पर लक्ष्मी जी अनुग्रह करती हैं और वह आर्थिक समृद्धि द्वारा अपने सुख और सन्तोष को बढ़ाता है। इस प्रकार नीतिपूर्वक श्रम और ईमानदारी से कमाया हुआ धन मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति में बड़ा सहायक होता है। इन नैतिक मूल्यों का कभी उल्लंघन न करें तो यह धन मनुष्य के बड़े काम का है। उससे मनुष्य की सर्वतोन्मुखी प्रगति होती है।
वास्तव में उन व्यक्तियों का हृदय कितना विशाल और आत्मा कितनी महान होती होगी, जो बिना किसी प्रयोजन अथवा स्वार्थ के किसी की प्रेरणा के बिना यों ही अपना जीवन-समाज, राष्ट्र अथवा मानवता की सेवा में समर्पण कर देते हैं। निःसन्देह ऐसे व्यक्ति मनुष्य योनि में होते हुये भी देवता ही होते हैं। महात्मा भगवानदीन भी एक ऐसे मनुष्य रूपी देवता थे।
महात्मा भगवानदीन बाल्यकाल से ही कुछ विशेष विचारशील थे। अन्य आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर वे थोड़ी देर बैठकर कुछ न कुछ चिन्तन अवश्य किया करते थे। उस समय तो लोग उनके इस काम को एक पागलपन समझते थे और कहा करते थे कि यह लड़का अकेले में बैठ कर न जाने क्या सोचा करता है। पर बाद में आगे चल कर उनके कामों को देखकर लोगों को पता चला कि वह बालक यों ही निरर्थक कल्पना लोक में विहार नहीं करता था, बल्कि देश और धर्म के विषय पर बड़े ही क्रियात्मक ढंग से विचार करता था।
विचार क्रिया की एकाग्रता की उपलब्धि करके महात्मा भगवान दीन ने सबसे पहले जैन धर्म और जैन शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। जिस अभ्यास बल से उन्होंने विचार क्रिया की सिद्धि की थी उसी अभ्यास ने उन्हें शास्त्र मंथन में बड़ी सहायता की। जिस समय वे किसी शास्त्र का अध्ययन करने के लिए बैठते थे, तो केवल उसका साधारण पाठ ही नहीं करते थे बल्कि उसके एक-एक वाक्य, एक-एक अक्षर की गहराई में उतरते थे। शास्त्रों में इस पैठ की विशेषता उनको अपनी ज्ञान-जिज्ञासा के जागरण से सहज प्राप्त हो गई थी! जो ज्ञान का इच्छुक है, आत्मा और परमात्मा के रहस्यों को जानना चाहता है, वह ज्ञान की किसी भी पुस्तक में स्वयं ही नहीं उतरता बल्कि उसकी शिक्षाओं को भी अपने जीवन और अपने व्यवहार में उतार लेता है।
उदार दृष्टिकोण और समर्पित मनोबुद्धि से शास्त्र मंथन का जो परिणाम होता है वह महात्मा भगवानदीन को भी प्राप्त हुआ! मन, बुद्धि, ज्ञान से सराबोर होकर वे स्थिर हो गये, आत्मा के रहस्यों का उद्घाटन होने लगा, जिससे स्वभावतः उनकी चित्तवृत्तियाँ अन्तर्मुखी हो गई पर महात्मा भगवानदीन के अन्तर्मुखी होने का यह अर्थ कदापि नहीं था कि बस अब उनको आत्मानन्द प्राप्त हो गया और वे उसी में लीन होकर संसार को तिलाँजलि देकर उसे उसके भाग्य पर छोड़कर स्वयं एकान्त वास कर लें, संन्यास ले लें।
महात्मा भगवानदीन ने जब आत्मानन्द की अनुभूति की तब उन्होंने ठीक प्रकार से जाना कि वास्तव में उनके मानव बन्धु संसार में गलत भावना से लिपटे हुए कितना भयंकर दुख भोग रहे हैं। अपने आत्म सुख की तुलना में मनुष्यों के दुख की समीक्षा करते-करते वे बड़े ही करुणार्द्र हो उठे! अपने मानव बन्धुओं को उनकी दुर्दशा में छोड़ कर अन्धकार में भटकने देकर आत्म सुख का उपभोग करने में उन्हें बड़ा ही जघन्य स्वार्थ मालूम पड़ा। उन्होंने अपने महानतम आत्मानन्द को जन सेवा में बदल देने का निश्चय कर लिया।
जनसेवा का व्रत लेकर उन्होंने उसकी रूप रेखा निर्धारित करने के लिए विचार करना शुरू कर दिया। विचार करते-करते वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जब तक देश के बच्चों तथा तरुणों के चरित्र का ठीक-ठीक निर्माण नहीं होगा समाज का सच्चा कल्याण नहीं हो सकता। एक अच्छे समाज के निर्माता बच्चे तथा तरुण ही हुआ करते हैं और इनका समुचित निर्माण चरित्र के सुधार से ही हो सकता है। इस प्रकार समाज का निर्माण व्यक्तियों के चरित्र निर्माण पर ही निर्भर करता है।
एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँच कर उन्होंने हस्तिनापुर में ऋषभ-ब्रह्मचर्याश्रम नाम से एक चरित्र- निर्मात्री संस्था की स्थापना की। इस आश्रम के नियम बनाते समय महात्मा भगवानदीन ने बड़ी ही बुद्धिमानी, सावधानी तथा सतर्कता से काम लिया। वे आश्रम के कोई ऐसे जटिल नियम न बनाना चाहते थे जो व्यवहार में न लाये जा सकें, अथवा जिनको देख सुनकर तरुण वर्ग आश्रम को दूर से ही हाथ जोड़ लें। साथ ही वे इतने अधिक नियम न बनाना चाहते थे जो अपनी दीर्घ संख्या के कारण किसी आश्रमाश्रित को चारों ओर से एक बड़े जाल की तरह घेर लें।
एक सीमित संख्या में सर्वाशय-सम्पादक ऐसे नियम बना सकना, जो कि पूर्ण रूप से सरल एवं व्यवहार्य हो, कोई आसान काम न था। किंतु व्यवस्थित मस्तिष्क, संतुलित चित्त और सकर्मक विचार रखने के कारण महात्मा भगवानदीन को इसमें कोई कठिनाई नहीं हुई। जिसने अपने मन, मस्तिष्क तथा आचार व्यवहार को संतुलित एवं व्यवस्थित कर लिया है मानों उसने जीवन की समग्र समस्याओं का समाधान अपनी मुट्ठी में कर लिया है।
उन्होंने आश्रम के लिये केवल चार नियम बनाये- (1) ब्रह्मचर्य पालन, (2) स्वावलम्बन, (3) मितव्ययिता तथा (4) सेवा। निःसंदेह यह चार नियम ही वे चार स्तम्भ हैं जिन पर जीवन-निर्माण का बड़े से बड़ा भवन खड़ा किया जा सकता है।
ब्रह्मचर्य के पालन से मनुष्य के शारीरिक, मानसिक तथा बौद्धिक तीनों प्रकारों के स्वास्थ्यों की उन्नति होती है। मन के बलवान और शरीर के बलिष्ठ होने से मनुष्य में साहस की वृद्धि होती है जिससे वह संसार में निर्भीकता पूर्वक किसी भी कठिन कार्य को अनवरत रूप से करता रह सकता है और अनवरत कार्यरत रहने का अर्थ है “सफलता” जिससे मनुष्य को एक अनिर्वचनीय प्रसन्नता की उपलब्धि होती है। जहाँ चित्त प्रसन्न है, जहाँ बुद्धि स्थिर है और जहाँ बुद्धि चंचल नहीं है वहाँ दुर्गुणों अथवा दुर्विकारों का प्रश्न ही नहीं उठता।
स्वावलम्बन मनुष्य को आत्म-विश्वासी एवं आत्म-निष्ठ बनाता है। हर कार्य अपने हाथ से करने में अभ्यास बढ़ता है जिससे कार्य-कौशल की उपलब्धि होती है। सारे काम अपने हाथ से करने वाला परमुखापेक्षी होकर कभी पराधीन नहीं होता और पराधीनता का दुःख तथा स्वाधीनता का सुख भुक्तभोगी ही जान सकते हैं। पर-निर्भरता न होने से स्वावलम्बी के सारे कार्य समय से स्वेच्छापूर्वक होते है, जिससे मन को एक मधुर संतोष का सुख मिलता है। स्वावलंबी स्वभावतः परिश्रमी एवं पुरुषार्थी बनकर आलस्य, प्रमाद, विलम्ब अथवा स्थगन जैसे व्यसनों के वशीभूत नहीं होता और जो व्यसनी नहीं होता उनका जीवन निर्मल एवं निर्विरोध जल धारा की तरह बहता चला जाता है।
मितव्ययिता का दूसरा अर्थ सम्पन्नता ही मानना चाहिये। जो मितव्ययी है उसकी आवश्यकतायें सीमित रहती हैं और जिसकी आवश्यकतायें सीमित हैं उसको अभाव अथवा अधन की पीड़ा कभी सहन नहीं करनी पड़ती। मितव्ययी पैसे का मूल्य जानता है अतएव बुद्धिमत्ता पूर्वक उसका समुचित उपयोग करता है। पैसे का समुचित उपयोग करने की कला जानने वाला कम से कम साधनों में सुन्दर से सुन्दर ढंग से रह सकता है। मितव्ययी के स्वभाव में सरलता और रहन-सहन में सादगी का समावेश हो जाता है। मितव्ययिता का गुण ब्रह्मचर्य पालन एवं स्वावलम्बन के निर्वाह में सहायक होता है। मितव्ययी को दरिद्रता, दीनता, दयनीयता अथवा अदेयता का कलंक नहीं लगने पाता जिससे वह निष्कलंक, निर्युक्त एवं निर्द्वन्द्व जीवनयापन करता हुआ सदा सुखी रहता है।
धार्मिक सहिष्णुता के वे बड़े जबरदस्त समर्थक थे। उन्होंने अपने तत्वावधान में अनेक अन्तर्जातीय विवाह कराये और समाज विरोधी अनेक अनावश्यक तथा हानिकारक रूढ़ियों व रीतियों का मूलोच्छेदन किया।
महात्मा भगवानदीन आध्यात्मिक क्षेत्र में एक सम्पूर्ण महात्मा, सामाजिक क्षेत्र के श्रेष्ठ नागरिक और राष्ट्रीय क्षेत्र में महान देश-भक्त थे। जीवन के प्रारम्भिक काल में उन्होंने संयम, परिश्रम एवं पुरुषार्थ के गुणों के साथ अपने जिस जीवन का निर्माण किया था अस्सी वर्ष की आयु तक उसका ठीक-ठीक उपयोग करके चार नवंबर सन् 1964 को स्वर्ग सिधार गये। महात्मा भगवानदीन का पंच भौतिक शरीर आज अवश्य नहीं है किंतु देश के असंख्यों नागरिकों के चरित्र तथा साहित्य में विचारों के रूप में वे आज भी हमारे बीच मौजूद हैं।
युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति-
अखण्ड-ज्योति परिवार के सक्रिय सदस्यों को अपने स्वाध्याय और अपनी साधना तक ही सीमित रहने से काम न चलेगा, उन्हें नव-निर्माण का उत्तरदायित्व भी वहन करना होगा। उन्हें एक संगठनकर्ता, धर्मोपदेशक एवं युग-निर्माता के रूप में परिणत होना चाहिए। अपने व्यक्तिगत कार्य करते हुए इन प्रयोजनों के लिये भी उन्हें समय निकालना ही चाहिये। सेवा के बिना मानव जीवन की सार्थकता नहीं। ईश्वर की भक्ति का सच्चा स्वरूप मानव प्राणी का आन्तरिक स्तर उठाने के लिए किया गया प्रयत्न ही हो सकता है। भजन का अपना महत्व है, पर वह भजन जिह्वा की नोंक तक ही सीमित है या अन्तःकरण में भी उतरा, इसकी परीक्षा इसी बात में है कि वह लोक मंगल की दिशा में सहृदयता एवं उदारता को अपनाकर कुछ कदम आगे चलने को तत्पर हुआ या नहीं।
कहना न होगा कि संसार में सबसे बड़ी सेवा, भावनाओं के उत्कर्ष में सहायक होने की ही हो सकती है। आध्यात्मिक ज्ञान से बढ़ कर और कोई ज्ञान नहीं और जीवन को सम्मानित बनाने वाली प्रेरणा से बढ़कर और कोई अनुदान नहीं। इन परमार्थों का पुण्य फल असीम है। समस्त कर्मकाण्डों का प्रतिफल मिला कर उतना नहीं हो सकता, जितना मानवीय श्रेष्ठता का स्तर ऊँचा उठाने के लिए किए गए पुरुषार्थ साधन का होता है। ईश्वर की प्रसन्नता और भक्ति भावना की सफलता में भी इन्हीं तथ्यों की प्रधानता रहती है। पूर्व काल के मनीषियों की रीति−नीति यही थी।
अखण्ड-ज्योति पिछले 26 वर्षों से निरन्तर यह बताती चली आ रही है कि आध्यात्मिकता, आस्तिकता, साधना उपासना के साथ ‘लोक सेवा’ भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उसकी उपेक्षा करने पर न किसी की साधना सफल हुई है और न होगी। हमने स्वयं इसी मार्ग का अवलम्बन किया है और जब तक जीवित है इसी मार्ग पर चलते रहेंगे। उपासना को जितना महत्व हम देते हैं उससे कम जीवन शोधन और लोक सेवा को नहीं देते। हमारी जीवन साधना में उपरोक्त तीनों तथ्य समान रूप से गुंथे रहे हैं। फलस्वरूप अधिक नहीं तो इतना कहा जा सकता है कि हमारी साधना निरर्थक नहीं गई, सार्थक हुई है। दूसरे लोग हैं जो दिन-रात माला ही फेरते हैं और जनकल्याण के पुनीत धर्म कर्तव्य का महत्व नहीं समझते। उनकी उसी भूल ने उनके सारे भजन-पूजन में किये गये श्रम को एक प्रकार से निरर्थक बनाकर नष्ट कर दिया। हम ऐसे हजारों मनुष्यों को जानते हैं जो भजन हम से अधिक करते हैं, यों कहना चाहिये कि भजन के अतिरिक्त और कुछ काम ही उनके पास नहीं है। इतने पर भी वे आत्मिक प्रगति के नाम पर छूँछ ही बने हुए हैं। गुण कर्म स्वभाव से इतना भी परिष्कार नहीं हुआ, फिर कैसे कहा जाय कि वे आत्मिक दृष्टि से आगे बढ़े।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को आरम्भ से ही यह प्रशिक्षण दिया जाता रहा है कि उन्हें मानव जीवन की सार्थकता के लिए अपने नित्य कर्मों में उपासना, जीवन शोधन एवं परमार्थ के विविध कार्यक्रमों को भी अनिवार्य कर्तव्यों की तरह सम्मिलित करना चाहिए। इसके बिना वे आत्मिक प्रगति के महान लाभ से लाभान्वित न हो सकेंगे। प्रसन्नता की बात है कि यह शिक्षा परिवार के प्रत्येक सदस्य ने हृदयंगम की है और सेवा धर्म को अपनाना जीवन की सार्थकता का अमोघ उपाय माना है। विभिन्न परिस्थितियों के व्यक्ति आर्थिक एवं शारीरिक साधनों से भी कुछ लोक सेवा करते ही हैं पर हमारे इस संगठन ने यह समझा और माना है कि आज की बुद्धि भ्रम-ग्रस्त जनता के ढोंग का एक मात्र कारण उसके पास विवेक दृष्टि का अभाव होना ही है। इस कमी की पूर्ति की जा सके तो संसार के समस्त अभावों, कष्टों एवं क्लेशों को दूर किया जा सकता है। जब तक भावनात्मक शुद्धि न होगी तब तक आन्तरिक विष बाह्य जीवन में अगणित कष्ट क्लेशों का, उलझन समस्याओं का, रोग शोकों का रूप धारण कर सामने आता रहेगा तब तक व्यक्ति तथा समाज के दुखों को मिटाया जा सकना संभव न होगा। अतएव हमें सामूहिक रूप से जन मानस को उत्कृष्ट एवं परिष्कृत बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
सन्तोष की बात है कि नव निर्माण योजना के अंतर्गत इस वर्ष का लोक शिक्षण व्रत प्रायः सभी सदस्यों ने लिया है। ऐसे लोग कम ही है जो हिचकिचाते और बगलें झाँकते हैं। “एक घण्टा समय और एक आना नित्य” की माँग इतनी छोटी है कि आज की विषम परिस्थितियों में परिवर्तन लाने के लिए कोई उतना छोटा त्याग करने के लिए भी तैयार न हो सके।
विचार क्रान्ति के लिए सब से बड़ी आवश्यकता समय की ही तो है। चौबीसों घण्टे अपने व्यक्तिगत कामों में ही खर्च कर डालें और लोक मण्डल की सच्ची ईश्वर पूजा के लिए एक घण्टा भी न निकाल सकें तो हमारे लिए यह एक लज्जाजनक बात ही होगी। इसमें फुरसत मिलने का प्रश्न नहीं, केवल अभिरुचि की शिथिलता एवं न्यूनता की बात है। जिनमें देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति के लिए थोड़ा भी दर्द एवं प्रेम है वे तो इतना त्याग आसानी से कर सकते हैं। भावनाशील लोगों ने पिछले दिनों अपने जीवन प्राण, धन एवं परिवार को मातृभूमि की बलिवेदी पर हँसते-हँसते समर्पित किया है, उनकी वंशावली से सम्बद्ध रक्त इतना स्वार्थी नहीं हो सकता कि इतने छोटे त्याग के बारे में भी यह सोचें कि हमसे इतना न बन पड़ेगा। यदि हम इतना करने लगें तो काम में बहुत हर्ज हो जायेगा, बड़े घाटे में रहेंगे। यदि परमार्थ के लिए इतना सा भी छोटा त्याग दिल दहला देता है तो समझना चाहिये वे जिस घाटे से डर रहे हैं, आदि से अन्त तक वह घाटा ही घाटा उनके बहुमूल्य जीवन को नष्ट कर रहा है। राष्ट्र के लिए अनिवार्य धर्म कर्तव्य का पालन करने में थोड़ा सा समय लगाना भी यदि घाटे का काम है तो पता नहीं लाभ आखिर है किस चिड़िया का नाम?
पिछले अंक में अखण्ड-ज्योति परिवार का यह साहसिक कदम बड़े गर्व एवं गौरव के साथ उद्घोषित किया गया है कि 10 हजार परिजनों ने बौद्धिक शिक्षण के लिए दस-दस का जिम्मा लेकर एवं एक लाख व्यक्तियों को जीवन कला से प्रशिक्षित करने का उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठा लिया है। यह बहुत बड़ी बात है। एक लाख व्यक्ति नियमित रूप से इस विचार क्रान्ति के विश्वविद्यालय में पढ़ेंगे। उसका परिणाम कितना आशाजनक होगा यह कुछ ही दिनों में सामने आ जायगा। अगले कदम हमारे और भी महत्वपूर्ण होंगे। सामाजिक कुरीतियों का उन्मूलन, अनैतिकताओं का, दुष्प्रवृत्तियों का प्रतिरोध, अनुपयुक्त मान्यताओं एवं भ्रान्तियों का निराकरण जैसे कितने ही काम करने शेष हैं। हमें समाज का नया निर्माण करने से पहले कूड़ा कचरा भी तो साफ करना ही होगा। इसके लिए कई सुसंगठित आन्दोलन चलाने पड़ेंगे। इन प्रयत्नों की पूर्व तैयारी बौद्धिक क्षेत्र में ही करनी होगी। पहला काम विचार परिवर्तन ही तो है। विचार बदलने पर ही तो काम बदलते हैं। एक लाख व्यक्तियों पर जो विचार परिवर्तन का प्रयोग आरम्भ किया गया है वह आगे अपना विशालकाय प्रतिफल उत्पन्न करेगा।
एक घण्टा समय देने वाली बात आमतौर से इस प्रकार निभाई जा रही है कि उस समय में व्रतधारी कार्यकर्ता अकेले या टोलियाँ बनाकर उन लोगों के घरों पर जाते हैं जिनमें धार्मिक संस्कार एवं विचारशीलता के अंकुर विद्यमान हैं। घरों पर जाकर नव निर्माण की बात कहने, प्रस्तुत कार्यक्रमों पर चर्चा करने, साहित्य पढ़ने देने का प्रयास विशेष सफल होता है क्योंकि निस्वार्थ भाव से किसी के यहाँ जाया जाय और लोक हित की उपयोगी बात कही जाय तो उस नेकनीयती से लोग प्रभावित होते हैं और उसकी बात ध्यानपूर्वक सुनते हैं। यह प्रयास निरन्तर जारी रखा जाय तो लोगों के मस्तिष्क बदलने में आश्चर्यजनक सफलता मिलती देखी गई है। यह बड़ा ही प्रभावशाली तरीका है।
दूसरा तरीका यह है कि जो घरों पर जाने की स्थिति में नहीं हैं वे अपने संपर्क में आने वाले लोगों से प्रस्तुत विषयों पर चर्चा किया करें, साहित्य पढ़ने के लिए प्रोत्साहन दिया करें। व्यापारी, अध्यापक, चिकित्सक, श्रमिक आदि प्रायः सभी वर्गों के लोगों को प्रतिदिन कितने ही परिचित-अपरिचित लोगों से मिलना पड़ता है। जब भी अवसर मिले, वार्ता प्रसंग में अपने आदर्शों एवं कार्यक्रम का थोड़ा बहुत परिचय कराया जा सकता है। अपने सम्बन्धी कुटुम्बी, मित्र रिश्तेदारों से जब भी मिलना हो, पत्र लिखना हो तो वैयक्तिक बातों के अतिरिक्त सैद्धांतिक चर्चा भी कुछ न कुछ होनी चाहिये, इस तरह व्यस्त व्यक्ति भी थोड़ी-थोड़ी मिनटों को मिलाकर एक घण्टा प्रतिदिन विचार निर्माण के लिए खर्च कर सकते हैं।
प्रतिदिन एक घण्टा न बन पड़े तो सप्ताह में सात घण्टे, महीने में तीस घण्टे किसी भी प्रकार कोई न कोई ढंग से दिये जा सकते हैं। किसी प्रकार इस वर्ष कमी रह जाय तो उसे अगले वर्षों में पूरा करने का प्रयत्न किया जा सकता है। यदि मन में संकल्प होगा तो भगवान उसकी पूर्ति का अवसर भी निकाल देंगे। जब हमारे दृढ़ संकल्प पूरे होते रहते हैं तो सत्संकल्प भी अवश्य पूरे होंगे।
इस ज्ञान यज्ञ के महान अभियान में कुछ खर्च भी पड़ता ही है। प्रचार साहित्य तो हर हालत में चाहिये ही। बन्दूक बिना सैनिक, हथौड़ा बिना लुहार, बैल बिना किसान अधूरा है उसी प्रकार ज्ञान-यज्ञ के होता को भी सत्साहित्य चाहिये ही। उसी के आधार पर तो उसे अपना निज का मस्तिष्क परिष्कृत करना है, उसी को पढ़ाकर लोगों के मस्तिष्क बदलने हैं। यह साहित्य कितना ही सस्ता क्यों न हो, लागत मात्र ही उसका मूल्य क्यों न हो, पर कागज छपाई तो लगेगी ही। इसके लिए एक आना प्रति दिन खर्च कर सकना किसी के लिए भी अशक्य नहीं है। लगभग एक छटाँक गेहूँ की लागत भला कौन ऐसा है जो खर्च न कर सकेगा आधी रोटी कम खाकर भी एक राशि बचाई जा सकती है। इन दिनों एक रोटी की लागत 10 नये पैसा आती है। एक आने का अर्थ लगभग आधी रोटी की बचत है। गरीब से गरीब आदमी भी अपने पेट को इतना खाली रख कर राष्ट्र-निर्माण में अपने हिस्से की श्रद्धाँजलि अर्पित कर सकता है। श्रद्धा न हो तो एक आना तो दूर एक कानी कौड़ी भी पहाड़ दिखाई देगी और उसका बोझ उठाये न उठ सकेगा।
युग-निर्माण योजना के तीसरे वर्ष में प्रवेश करते हुये हमने अपने प्रत्येक परिजन से यह आशा की है कि वह ‘एक घंटा समय एक आना नित्य’ का अनुदान देना आरम्भ कर दे। देखने में यह बहुत छोटी चीज है पर अपना संगठित परिवार क्रमबद्ध रूप से इतना भी करने लगे तो जनमानस का कायाकल्प करके रख देना हमारे लिये कुछ अधिक कठिन न रहेगा। अब तक 10 हजार व्यक्तियों ने सक्रिय सेवा का व्रत लेकर 1 लाख व्यक्तियों के प्रशिक्षण का कार्य आरम्भ किया है। 40 हजार परिजनों में से प्रत्येक जब यही करने लगेंगे तो इसी वर्ष यह प्रशिक्षण चार गुना, चार लाख हो जायगा। इसका प्रतिफल कितना महान होगा इसकी कल्पना मात्र से किसी देशभक्त का अन्तःकरण उल्लसित हो ही सकता है।
इस वर्ष हमारी एक ही आकाँक्षा है कि अखण्ड-ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य नव निर्माण का सक्रिय सैनिक बने और समय एवं धन का नियमित उपयोग आरम्भ कर दे। जिनने यह प्रारम्भ कर दिया उनका हार्दिक अभिनन्दन। जो अभी नहीं कर सके हैं, सोच-विचार में पड़े हैं, उनसे अनुरोध है कि इतने छोटे त्याग के लिए इतना सोच विचार न करें। आध्यात्मिकता, धार्मिकता, त्याग एवं सेवा पर अवलम्बित है। यदि अखण्ड-ज्योति की शिक्षा उन्हें पसंद आती है तो उन्हें व्यवहार में भी उतरना ही चाहिये और वह इतना तो होना ही चाहिये जितना कि इस वर्ष के लिए हमने अपने प्रिय परिजनों से आशा की है।
जनमानस में से अनीति, अश्रद्धा, एवं अविवेक का उन्मूलन करने के लिए जिस विचार क्रान्ति का आयोजन युग निर्माण योजना के अंतर्गत किया गया है उसका विस्तार धार्मिकता के आधार पर ही होगा। भारतीय जनता में धार्मिकता के प्रति परम्परागत श्रद्धा है। आज भले ही उसका दुरुपयोग हो रहा है पर जब कभी भी भारत की आत्म जगेगी उसका माध्यम धर्म ही होगा। राजनैतिक स्वाधीनता की लड़ाई हमने महात्मा गाँधी की प्रेरणा से राम राज्य आने की आशा में लड़ी थी। सत्य अहिंसा हमारे सम्बल थे। परिणाम उसके चाहे राजनैतिक ही हुए हों पर वह वस्तुतः धर्म युद्ध था। गाँधी जी ने अपने आन्दोलन को ऐसा ही रूप दिया था, अतएव वह सफल भी हुआ। यदि बैरिस्टर गान्धी ने अंग्रेजों के उखाड़ने के लिए पश्चिमी ढंग की राजनैतिक लड़ाई लड़ी होती तो स्वाधीनता इतनी जल्दी और इतनी सरलता से कदापि न मिली होती।
राजनैतिक क्रान्ति सम्पन्न होने के बाद अभी हमें मानसिक, सामाजिक, नैतिक, बौद्धिक, आर्थिक क्रान्ति और भी करनी शेष है और इसके लिए सबसे पहले विचार क्रान्ति द्वारा जनता की मनोभूमि को ऐसा उर्वर बनाना है जिसमें प्रगति एवं विवेक के बीज बोये एवं लगाये जा सकें। यह प्रथम चरण सम्पन्न होने पर आगे की मंजिल बिल्कुल आसान हो जायगी।
80 प्रतिशत भारतीय जनता देहात में रहती है। अशिक्षितों की संख्या भी देश में लगभग 80 प्रतिशत ही है। शहरों और पढ़े लिखे लोगों में काम करने के लिए अनेकों वैयक्तिक एवं सामूहिक प्रयत्न चल रहे हैं। नेताओं और संस्थाओं की घुड़दौड़ भी उसी क्षेत्र में है। किन्तु साधनहीन देहात सूने पड़े हैं। वास्तविक भारत वहीं रहता है। जागरण उसी का किया जाना है। विचार-क्रान्ति का उपयुक्त क्षेत्र वही है क्योंकि नेताशाही अभी वहाँ बुद्धि भ्रम फैलाने में बहुत अधिक समर्थ नहीं हुई है। इस क्षेत्र में यदि विचारों का कुछ विस्तार किया जाना है तो उसका आधार धर्म ही होगा। भारत की अशिक्षित एवं अल्पशिक्षित ग्रामीण जनता धर्मवाद के अतिरिक्त और किसी बाद को समझती भी तो नहीं।
जन मानस को उत्कृष्ट एवं परिष्कृत बनाने के लिए सुलझे हुए विचारों के धर्मोपदेशकों की अत्यधिक आवश्यकता है। भावी जननेतृत्व उन्हीं के हाथ में जाने वाला है। इसलिए ऐसे साहसी, प्रतिभाशाली, कर्मठ एवं श्रद्धावानों को इस उत्तरदायित्व को अपने कन्धों पर उठाने के लिए आगे आना चाहिये और धर्म-मंच द्वारा लोक शिक्षण की कार्य पद्धति का प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने-अपने क्षेत्रों में कार्य करने के लिए जुट जाना चाहिए।
पिछले अंकों में धर्मोपदेशक शिक्षण क्रम गायत्री तपोभूमि में आरम्भ होने की विज्ञप्ति की गई है। यह पाठ्यक्रम हर दृष्टि से बहुत ही उपयोगी है। आर्थिक दृष्टि से उसमें किसी भी प्रतिभाशाली व्यक्ति के स्वावलम्बी होने की पूरी-पूरी गुँजाइश है। अब तक के पंडित पुरोहित जिन्हें मन्त्र पढ़ने और पूजन कराने के अतिरिक्त, उन कर्म काण्डों का महत्व रहस्य और संदेश समझाना जरा भी नहीं आता, अपनी गुजर सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक अच्छी तरह कर रहे हैं। फिर क्रमबद्ध रूप से शिक्षा पाये हुए व्यक्ति के सामने आर्थिक कठिनाई क्यों आवेगी? वे भली प्रकार अपने परिवार का निर्वाह इन्हीं कार्यक्रमों से कर लेंगे।
लोक सम्मान, जन नेतृत्व, धर्म सेवा आदि लाभ भी इस कार्यक्रम में ऐसे जुटे हुए हैं जो व्यक्तित्व को निखारते हैं और आत्म सन्तोष प्रदान करते हैं। औसत भारतीय जब किसी प्रकार पेट ही पाल पाता है तो जिस कार्य में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों ही सिद्ध होते हैं उसे क्यों नहीं अपनाना चाहिये?
शिक्षण क्रम का पाठ्य क्रम साढ़े चार महीनों का रखा गया है। इस अवधि में भजनोपदेश कर सकने, योग्य संगीत शिक्षा, भाषण देने का व्यवहारिक अभ्यास, षोडश संस्कार कराना, दसों पर्व मनाना, सत्य नारायण कथा, गीता सप्ताह कथा, छोटे बड़े गायत्री यज्ञ कराना, लाठी चलाना, आसन, प्राणायाम जैसे स्वास्थ्यवर्धक प्रयोगों की जानकारी तथा कितने ही उपयोगी विषय सिखाये जाने हैं। जो यह शिक्षण प्राप्त करेंगे, अपने जीवन में एक नई विशेषता उपलब्ध हुई अनुभव करेगा।
प्रस्तुत प्रशिक्षण 26 सितम्बर (आश्विन शुक्ल 1) से आरम्भ होकर 5 फरवरी (माघ सुदी 15) तक साढ़े चार महीने चलेगा। इतना अधिक कर्मकाण्ड, उसका व्यवहारिक अभ्यास, संगीत, भाषण आदि कार्य सीखने में काफी समय लगना चाहिए, पर प्रयत्नपूर्वक सिखाने और श्रमपूर्वक सीखने से यह साढ़े चार महीनों में भी पूरा हो सकता है। आज की व्यस्त परिस्थितियों में अधिक दिन बाहर रह सकना हर किसी के लिए संभव न हो सकेगा इसलिए इतनी कम अवधि का पाठ्यक्रम एक आश्चर्य जैसा ही है, पर हमारा विश्वास है कि उत्साहपूर्वक यह सब किया गया तो इतने दिनों में भी आशातीत सफलता प्राप्त कर ली जायगी।
हर क्षेत्र में हर शाखा में ऐसे प्रशिक्षित कार्यकर्ता होने चाहिये। यह आवश्यक नहीं कि पूरा समय इन्हीं कार्यों के लिए दिया जाय, या इन्हें आजीविका का माध्यम ही बनाया जाय। यह भी हो सकता है कि अवकाश का समय इस साँस्कृतिक सेवा के लिए लगाया जाता रहे और अपने क्षेत्र में धार्मिक भावनाओं का संचार किया जा सके। साढ़े चार महीने का समय यों कार्यव्यस्त लोग भी निकाल सकते हैं। हारी, बीमारी, मकान बनाने या दूसरे जरूरी कामों के लिए सरकारी नौकर भी छुट्टी ले लेते हैं। इस कार्य को जो आवश्यक समझें उन्हें किसी न किसी प्रकार इस प्रशिक्षण के लिये अवकाश निकाल लेना चाहिए।
जिनको आर्थिक कठिनाई है वे 15 रुपये मासिक छात्र-वृत्ति भी प्राप्त कर सकेंगे। इसमें बिना घी की रोटी दाल का खर्च चल सकता है।
हमें प्रयत्न यह करना चाहिये कि इस प्रकार के शिक्षार्थी अपने क्षेत्र में तैयार करें, उत्साह भरें, प्रेरणा दें और उन्हें प्रशिक्षण के लिए मथुरा भिजवावें। जिनमें इस प्रकार की रुचि एवं योग्यता देखें उन्हें विशेष रूप से प्रोत्साहित करना चाहिये। वृक्ष लगाना, कुआँ, धर्मशाला बनवाना आदि जिस तरह पुण्य कार्य हैं, उसी तरह धर्म एवं संस्कृति की सेवा कर सकने की क्षमता में सम्पन्न धर्मोपदेशक उत्पन्न करना भी एक पुण्य कार्य है। यदि यह कार्य अपनी ढूँढ़, खोज, कहने, सुनने, समझाने-बुझाने, प्रेरणा, प्रोत्साहन देने से बनता है तो समझना चाहिये कि एक धर्मोपदेशक उपजाने का पुण्य अपने को भी मिल गया। जो आर्थिक स्थिति की कठिनाई के कारण शिक्षण में न आ सकते हों उनके लिए वैसा प्रबन्ध भी स्थानीय लोगों को मिल जुलकर कर देना चाहिये। इस तरह का दान सार्थक दान ही माना जायगा।
अश्विन का शिविर 26 सितम्बर से 10 अक्टूबर तक का है। इसमें आने वाले, अपनी गायत्री तपश्चर्या के साथ-साथ संक्षेप में धर्मोपदेशक पाठ्य क्रम की मोटी रूप रेखा भी इतनी समझ-सीख सकेंगे कि यदि बताये हुए आधार पर घर रहकर अभ्यास करते रहा जाय तो भी किसी हद तक धर्मोपदेशक का कार्य किया जा सकें।
आश्विन के शिविर में तथा साढ़े चार महीने के शिविर में आने के लिए जिन्हें सुविधा हो उन्हें अवश्य प्रयत्न करना चाहिये।
प्रतिनिधियों, उत्तराधिकारियों और व्रतधारियों का हमारा काफिला नव निर्माण की दिशा में एक क्रमबद्ध योजना के साथ निर्धारित लक्ष्य की ओर उत्साहपूर्वक बढ़ता चला जा रहा है। हम सब अपने कर्तव्यों के पालन में इसी प्रकार सतर्क सावधान, निष्ठावान बने रहे तो इस महान अभियान की सफलता सुनिश्चित है।
यों अभी एक घण्टा समय और एक आना नित्य का छोटा सा कार्य परिजनों को अनिवार्य रूप में सौंपा है, पर इतने से भी उज्ज्वल भविष्य की जो सम्भावनायें सामने आ रही हैं उन्हें देखते हुये अगले लक्ष्य और भी उल्लास भरे होंगे। जिनने वह छोटा सा व्रत इस समय लिया है, उनसे हम यह भी आशा करते हैं कि समयानुसार वे वानप्रस्थ भी ग्रहण करेंगे और जब 40 हजार व्यक्ति अपना अधिकाँश समय युग निर्माण के लिये लगाने लगेंगे तब रचनात्मक कार्यों की बाढ़ आ जायगी। एक से एक श्रेष्ठ कार्यक्रमों का संचालन होगा। अनेक अभिनव आन्दोलन पनपेंगे, असुरता के विरुद्ध अनेक मोर्चे खुलेंगे और जन मानस में धरती पर स्वर्ग अवतरित करने की महत्वाकाँक्षा का समुद्र हिलोरें ले रहा होगा। आज युग परिवर्तन की बात असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य दिखाई पड़ती है। पर जब अपने परिवार के आज के उत्तराधिकारी, प्रतिनिधि एवं व्रतधारी आश्रम में प्रवेश कर अपनी पूरी शक्तियों को इधर लगावेंगे तो परिणाम जादू भरा होगा और जो कार्य आज असंभव दीख रहा है कल संभव होकर रहेगा।
यह तो बात आगे की रही, व्यवस्था आज की करनी है। आज यह होना चाहिये कि अपना एक भी परिजन ऐसा न हो जो एक घंटा समय जैसे छोटे कर्तव्य पालन से विमुख रह रहा हो। गत गुरु पूर्णिमा से जिनने व्रत ग्रहण किया है उनमें से प्रत्येक को ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक का नियमित ग्राहक बन जाना चाहिये क्योंकि उनका व्यवहारिक मार्ग दर्शन इसी के द्वारा संभव होगा। अखण्ड-ज्योति से विचार निर्माण का कार्य होता है पर उन्हें व्यवहार रूप में कैसे लाया जाय, कैसे लाया जा रहा है, यह तो पाक्षिक पत्रिका ही बताती है। विचारों को कार्य रूप में परिणत करने का मार्ग दर्शन करना उसी के द्वारा सिखलाया, समझाया जा रहा है। जो उसे नहीं पढ़ते वे कैसे जान पायेंगे कि हमें क्या करना है, किस प्रकार करना है, कार्य करते समय जो कठिनाइयाँ आती हैं उनका हल बताने के लिये इस प्रकार की पत्रिका की आवश्यकता अनुभव हुई, तभी तो उसे निकालने का आयोजन किया गया। 22 अगस्त को युग निर्माण योजना का जो समाज सुधार अंक निकला है वह तो 104 पृष्ठों की इतनी महत्वपूर्ण सामग्री से सुसज्जित है कि समाज सुधार से तनिक भी दिलचस्पी रखने वाला व्यक्ति उसे पाकर प्रसन्न हुये बिना नहीं रह सकता।
संभवतः सभी व्रतधारी युग निर्माण पत्रिका मँगाते होंगे जो न मँगाते हो उन्हें तुरन्त ही उसे आरम्भ कर देना चाहिये। वर्ष का चन्दा 6 रुपये जो न भेज सके वे छः महीने का 3 रुपये तो भेज ही सकते हैं। शेष पीछे भेज सकते हैं, पर उसका नियमित पाठक तो बन ही जाना चाहिये। अखण्ड-ज्योति में व्यवहारिक मार्ग दर्शन की जो कमी रहती है उसे इस पाक्षिक के द्वारा पूरा कर ही लेना चाहिये।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विवाहोन्माद उन्मूलन आन्दोलन के लिये 10 ट्रैक्ट छापे गये थे। उन्हें जिनने पढ़ा है, इस विचारधारा से अतिशय प्रभावित हुए हैं। दो महीनों में ही उन्हें हजारों व्यक्ति पढ़ चुके और एक से लेकर दूसरा उसे पढ़ता ही चला जा रहा है। यह अभिरुचि अगले दिनों आन्दोलन का रूप धारण करेगी और हिन्दू समाज के उज्ज्वल मुख पर कलंक कालिमा की तरह लगी हुई उस घृणित बुराई का उन्मूलन करके रहेगी।
अब इन दिनों अन्य दुष्प्रवृत्तियों के विरुद्ध 20 नये ट्रैक्ट लिखे जा रहे हैं जो सितम्बर के अन्त तक तैयार हो जायेंगे। अक्टूबर के प्रथम सप्ताह में इन्हें व्रतधारियों के पास भेज दिया जायगा। डाक व्यय समेत 20 नये पैसे के यह ट्रैक्ट अब 30 हो जायेंगे, जिनका मूल्य छः रुपये हो जायगा। जो विवाहोन्माद वाले ट्रैक्ट ले चुके हैं उन्हें अगले 20 ही मँगाने हैं। उसका 4 रुपया हुआ। यह अगले ट्रैक्ट भी उतने ही क्रान्तिकारी हैं जितने विवाहोन्माद वाले थे। प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों को इनमें आड़े हाथों लिया गया है और विषय का प्रतिपादन इस ढंग से किया गया है जिसे पढ़कर उन्हें छोड़ने के लिये भावनायें उमड़ने ही लगें। व्रतधारी अपने संपर्क के क्षेत्र में इन्हें भी पढ़ाने का उसी उत्साह के साथ प्रयत्न करें जैसा कि इन दिनों उन्होंने विवाहोन्माद वाले ट्रैक्टों को पढ़ाने में दिखाया है।
एक आना प्रतिदिन की बचत इसी प्रकार के साहित्य के लिये है। इसी बचत में से इस महीने युग निर्माण योजना का चन्दा भेजना चाहिये तथा इन्हीं दिनों प्रकाशित ट्रैक्टों को मंगा लेना चाहिये। यह साहित्य व्रतधारी सैनिकों के लिये अस्त्र-शस्त्रों की तरह आवश्यक है। उनके द्वारा अपने, अपने परिवार के तथा समीपवर्ती क्षेत्र में विचारशील लोगों की भावनाओं में उत्साहवर्धक परिवर्तन लाया जा सकता है। अतएव उसका उपयोग करने में तनिक भी ढील-ढाल या आलस नहीं करना चाहिये। जो करना ही ठहरा उसे समय पर और मुस्तैदी के साथ क्यों न किया जाए?
शीत ऋतु में हमारे दौरे का प्रयोजन कई शाखाओं ने ठीक तरह समझा नहीं है, इसलिये उनने उसे भिन्न दृष्टिकोणों से देखा है और वैसी ही तैयारी करने लगे हैं। कई ने समझा है जैसे साधुओं की जमात तीर्थ यात्रा का भ्रमण करते हुये जहाँ-तहाँ जाती और पड़ाव डालती है वैसे ही आचार्य जी भी यहाँ आवेंगे, कथा, कीर्तन करेंगे, जनता को उनकी बातें सुनने का मौका मिलेगा। हमारा दायित्व तो इतना भर है कि उनके ठहरने, भोजन आदि की व्यवस्था कर दें। कई ने इसे अपना व्यक्तिगत सौभाग्य माना है कि आचार्य जी हमारा घर पवित्र करेंगे। कइयों ने उन्हीं दिनों ऐसे सम्मेलन रच दिये हैं जिनमें विभिन्न विचार धाराओं के वक्ता एकत्रित हों और विभिन्न प्रकार की बोली बोलकर जनता का विविध विधि मनोरंजन करें। उन्हीं में से एक वक्ता आचार्य जी भी हों, आदि आदि।
इन भ्रान्तियों का सर्वथा दूर कर दिया जाना चाहिये। हमारा उद्देश्य एक क्षेत्र के स्वजनों का एक उपयुक्त जगह पर इकट्ठे करके उनके साथ विचार विमर्श एवं परामर्श करना मात्र है। अखण्ड-ज्योति परिवार बहुत बड़ा है वह दूर-दूर तक बिखरा हुआ है। इन परिजनों में से दूरवर्ती लोग बहुत कम संख्या में मथुरा आ पाते हैं। आर्थिक कठिनाई सबको वैसा नहीं करने देती, अतएव व्यक्तिगत संपर्क नहीं बन पाता। अखण्ड-ज्योति के माध्यम से जो विचारधारा उन तक पहुँच जाती है उतना मात्र ही सम्बन्ध रहता है। व्यक्तिगत सान्निध्य की फिर भी आवश्यकता रहती ही है। उसकी भी अपनी उपयोगिता एवं आवश्यकता रहती है। जिसे मथुरा आने वाले थोड़े ही लोग पूरी कर पाते हैं। इसलिये सोचा यह गया है कि सर्दी की ऋतु में ऐसे आयोजन रखे जायँ जिनमें एक-एक, दो-दो दिन ठहरते हुये हम रेलवे लाइन के हिसाब से आगे बढ़ते चले जायें, और उस थोड़ी-सी अवधि में उस क्षेत्र के सभी स्वजन, परिजन एक स्थान पर इकट्ठे होकर हम से मिल लें, हमारे विचार उन्हें सुनने को मिलें और उनकी बातें हमें सुनने समझने को मिलें परस्पर विचार विनिमय से ऐसा मार्ग खोज निकाला जाय जिससे इस परिवार के स्वजनों, परिजनों का जीवन क्रम एवं दृष्टिकोण अधिक परिष्कृत एवं अधिक सुख शाँतिमय बन सके।
इस दौरे में कहाँ ठहरा जाय, कहाँ न ठहरा जाय, यह इस बात पर निर्भर है कि उस क्षेत्र में अखण्ड-ज्योति परिवार के कितने सदस्य हैं और उनका वहाँ एकत्रित हो सकना संभव हो सकता है या नहीं? इस कसौटी पर जो स्थान खरे उतरेंगे वहीं ठहरने का विचार है। हमें सभी शाखायें प्रिय हैं, सभी स्वजन प्रिय हैं। पर 40 हजार परिजनों के घरों पर या 3000 शाखाओं में ठहरना संभव नहीं। उद्देश्य को आगे रखकर यह कार्यक्रम बनाया जा रहा है, व्यक्तिगत प्रेम परिचय के आधार पर नहीं। इसलिये जिन्हें निमंत्रण भेजना हो वे उपरोक्त जिम्मेदारी उठाने को तत्पर हों तभी ठीक रहेगा।
1 सितम्बर तक दौरे का निर्धारित कार्यक्रम निश्चित हो जाना चाहिये था। पर कठिनाई यह सामने आ गई कि निमंत्रण इतने अधिक आ गये हैं जिससे यह पता चलता है कि लोगों ने भावावेश में पत्र लिख दिये हैं। दौरे का उद्देश्य और उसे सफल बनाने के लिये उनका जो उत्तरदायित्व है वह ठीक तरह समझ नहीं सके हैं। इसलिये यह पंक्तियाँ फिर लिखनी पड़ीं। इन निमंत्रणों में से यह छाँट करनी बाकी है कि कितनों ने भावावेश में पत्र लिखे हैं, कितनों ने उसका उद्देश्य समझा है। इस बात ही छाँट करने में अभी एक महीना और लग जायगा।
जिनने निमंत्रण भेजे हैं वे निम्न बातों पर पुनः विचार करें और तद्नुसार स्वयं विचार करके दुबारा निमंत्रण भेजें। यदि वैसी सुविधा न बन सके तो अपने निमंत्रण वापिस ले लें, ताकि हमारा बहुमूल्य समय और उनकी परेशानी दोनों ही बच जाय।
(1) अपनी मन मर्जी से हम कहीं भी ठहरने रुकने का प्रोग्राम नहीं बना रहे हैं इसलिये यह नहीं लिखना चाहिये कि - “इधर से निकलें तब एक दिन हमारे यहाँ भी रुकते जावें।” जहाँ व्यवस्थापूर्वक कुछ आयोजन रखा जा रहा होगा केवल वहीं ठहरने का विचार है।
(2) जहाँ हमें रुकना है वहाँ उस क्षेत्र के अखण्ड-ज्योति परिजनों को आग्रहपूर्वक बुलाना चाहिए और उनके ठहरने, भोजन आदि का प्रबन्ध करना चाहिये।
(3) उस अवसर पर यज्ञ करना हो तो वह एक या पाँच कुण्ड से बड़ा न हो। बड़े आयोजनों में कार्यकर्ताओं को बड़ी व्यवस्था करने में लगे रहना पड़ता है और आवश्यक विचार विमर्श उन लोगों के साथ नहीं हो पाता।
(4) अखण्ड -ज्योति परिवार के उस क्षेत्र के लोग तो बुलाये ही जायँ, इसके अतिरिक्त विचारशील धार्मिक प्रकृति के अन्य लोगों को भी व्यक्तिगत रूप में निमंत्रित करके बुलाया जाय ताकि उस परामर्श विचार विनिमय में सम्मिलित होकर वे भी लाभ उठा सकें।
(5) आम जनता के भाषण न रखे जायँ क्योंकि दो दिन का थोड़ा-सा समय तथा बोलने की अपनी जो सीमित क्षमता है उसे सारी की सारी हम स्वजन, परिजनों के साथ विचार विनिमय में ही खर्च करना चाहते हैं। यदि जनता की सार्वजनिक सभायें रखी जायँ तो परिजनों के साथ उतना ही कम परामर्श होगा, यह उचित नहीं।
(6) बस की यात्रा हमारे लिये बिल्कुल उपयुक्त नहीं पड़ती। थोड़ी यात्रा में ही उल्टी आने लगती है। सिर दर्द होता है और बीमार पड़ जाते हैं। इसलिये निमंत्रण वहीं के लिए भेजा जाय जहाँ रेलवे स्टेशन की समीपता हो। बसों की लम्बी यात्रा न करनी पड़े। जीप जैसे साधन कहीं हो तो ही सड़क मार्ग से जाना संभव होगा। छोटे देहात जहाँ उस क्षेत्र के लोग भी यातायात साधनों के अभाव से नहीं पहुँच पाते वहाँ इसलिए हमें न बुलाया जाना चाहिए कि वह उनका गाँव है। इसलिए वहाँ जरूर आना चाहिए। पहुँचने वाले परिजनों की तथा हमारी सुविधा देखकर ही निमंत्रण के स्थान चुने जाने चाहिये।
(7) इस वर्ष सभी जगह जा सकना संभव न होगा, इसलिए जिन निमंत्रणों को स्वीकार न किया जा सकेगा उन्हें अगले वर्ष समय देने का प्रयत्न करेंगे। इसलिये सभी निमंत्रण भेजने वालों को इसी वर्ष के लिये आग्रह नहीं करना चाहिये।
(8) आमतौर से लोग चाहते हैं कि उनके यहाँ जो दो दिन रखे गये हैं उनमें एक रविवार अवश्य हो ताकि सरकारी कर्मचारी भी उसमें भाग ले सकें। यह इच्छा प्रायः सभी ने व्यक्त की है। पर चूँकि हमें दौरा लगातार करना है इसलिये यह माँग स्वीकार कर सकना कठिन है। प्रोग्राम रात्रि में रखे जा सकते हैं जिसमें छुट्टी वाले और न छुट्टी वाले समान सुविधा से उसमें सम्मिलित हो सकें। फिर जो कार्य आवश्यक समझे जाते हैं उनके लिये छुट्टी ले लेना भी कोई बड़ी बात नहीं है।
ऐसे सम्मेलनों की जहाँ सुविधा हो, वहीं से निमंत्रण भेजे जाने चाहिये। अब तक इतने अधिक निमंत्रण आ गये हैं, उनसे वस्तुस्थिति का पता लगाना कठिन हो रहा है। इसलिये यह पंक्तियाँ लिखनी पड़ी कि जिनने अब तक निमंत्रण भेजे हैं वे उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुये अपने निमंत्रण पर पुनर्विचार करके फिर से लिखें। उन पर विचार करके तभी अन्तिम स्वीकृति दी जायगी। तद्नुसार ही सबको अपनी तैयारी आरम्भ करनी चाहिये। उस क्षेत्र में अखण्ड-ज्योति परिवार के कितने सदस्य हैं इसकी सूची पत्र लिखकर मथुरा से मँगाई जा सकती है। -
आश्विन नवरात्रि की साधना
आश्विन की नवरात्रि 26 सितम्बर शनिवार से आरम्भ होकर ता. 3 अक्टूबर रविवार तक चलेगी। इस वर्ष नवरात्रियों में एक तिथि घटी एक बढ़ी है। पर इस घट−बढ़ का गायत्री उपासना पर प्रभाव नहीं पड़ता वह पूरी नौ रात्रि तक करनी पड़ती है। किसी-किसी पंचांग के अनुसार 25 सितम्बर से भी नवरात्रि आरम्भ मानी गई है, पर हमारे मतानुसार 26 से ही आरम्भ होना ठीक है।
सदा की भाँति इन नवरात्रियों में भी 24 हजार गायत्री जप का अनुष्ठान किया जाना चाहिये। ब्रह्मचर्य, उपवास, भूमिशयन, चमड़े का त्याग, अपनी शारीरिक सेवायें आप स्वयं करना इन पाँच व्रतों में से जो जितना पालन कर सके, उसके लिए प्रयत्न करे। अन्तिम दिन 240 आहुतियों का हवन, कन्या भोजन एवं सत्साहित्य का प्रसाद वितरण, प्रवचन, युग निर्माण सत्संकल्प का पाठ आदि कार्यक्रमों द्वारा उसकी पूर्णाहुति करनी चाहिये। 2400 मन्त्र लेखन एवं 240 गायत्री चालीसा पाठ का भी अनुष्ठान हो सकता है।
1.ईश्वर और उसकी प्राप्ति 1)
2. वेदों का दिव्य सन्देश 1)
3. पन्थ अनेक लक्ष्य एक 1)
4. आप सर्व शक्तिमान हैं 1)
5. आत्म-कल्याण का राज मार्ग 1)
6. जिन्दगी कैसे जियें 1)
7. सद्गुणों की सच्ची सम्पत्ति 1)
8. अपना उद्धार आप करें 1)
9.आशा को जीवन ज्योति 1)
10. विचारों की अलौकिक शक्ति 1)
11. संकल्प शक्ति के अद्भुत चमत्कार 1)
12. प्रगति के पथ पर 1)
13. मनुष्य का मूल्याँकन 1)
14. चिन्ता छोड़िये- प्रसन्न रहिए 1)
15. इन दुर्गुणों को छोड़िए 1)
नव निर्माण का दर्शन एवं मार्ग
1. हम बदलें तो दुनिया बदले 1)
2. समाज की अभिनव रचना 1)
3. समस्त समस्याओं का एक ही हल 1)
4. नए युग की नई प्रेरणा 1)
5. हमारी युग-निर्माण योजना 1)
6. नए युग का सूत्रपात 1)
7. विष से अमृत की ओर 1)
8. शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य 1)
9. मनुष्य में ईश्वर की झाँकी 1)
10. जीवन संग्राम में कैसे जीतें?1)
आरोग्य रक्षा और प्राकृतिक चिकित्सा
1. आरोग्य रक्षा के रहस्य 1)
2. क्या खाएँ? कैसे खायें?1)
3. बलवर्धक व्यायाम 1)
4. शक्ति का स्त्रोत प्राणायाम 1)
5. कब्ज कैसे दूर हो?1)
6. प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान 1)
7. कल्प चिकित्सा 1)
8. तम्बाकू घातक विष है।1)
9. तुलसी के चमत्कारी गुण 1)
बाल-निर्माण साहित्य
1. शिशु जन्म से पूर्व 1)
2. शिशु और अभिभावक 1)
3. हमारे महान् उत्तराधिकारी 1)
4. बच्चे और उनका मनोविज्ञान 1)
5. बालकों का नव निर्माण 1)
6. बाल विकास की समस्याएँ 1)
7. बच्चों को कैसे सुधारा जाये?1)
8. बच्चों की शिक्षा दीक्षा 1)
9. बालकों को इन दुर्गुणों से बचाइए 1)
10. बच्चे सद्गुणी कैसे बनें?1)
11. बालकों को इस तरह सुधारिए 1)
पारिवारिक समस्याओं का हल
1. परिवार और उसका निर्माण 1)
2. सुख शान्तिमय गृहस्थ 1)
3. सुसंतुलित परिवार 1)
4. मितव्ययी बनिए - सुखी रहिए 1)
कथा इतिहास और जीवन चरित्र
1. धर्म पुराणों की सत् कथाएँ।1)
2. चरित्र निर्माण की कथाएँ 1)
3. भारत की महान् विभूतियाँ 1)
4. संसार के महापुरुष 1)
5. बड़ों की बड़ी बातें 1)
6. व्रत और त्यौहार 1)
कविता और गायन
1. युग सन्देश 1)
2. युग गायन 1)
3. युग वीणा 1)
4. उद्बोधन 1)
5. दोहा अंताक्षरी 1)
डाक खर्च सब हर हालत में पुस्तकें मंगाने वालों को ही देना पड़ता है। हाँ, 10 रुपये से अधिक की पुस्तकें मंगाने पर 15 प्रतिशत कमीशन मिलता है।
पता - अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा।
भारत माँ का सुत हूँ मैं तो, निज कर्तव्य निभाऊँगा, चाहे प्राण भले ही जायें, कायर नहीं कहाऊँगा॥
इस जीवन के दीर्घ पथों पर जब चौराहें आते हैं। लक्ष्य हीन नर मार्ग भ्रमित हो भटक भटक मर जाते हैं॥
भ्राँति दूर कर पथ शूलों को फूल समझ मुसकाऊँगा। चाहे प्राण भले ही जायें कायर नहीं कहाऊँगा॥
चौराहे पर सही दिशा ले जो आगे बढ़ जाते हैं। हर उलझन को सुलझा कर वे अविरत बढ़ते जाते हैं॥
जीवन के सब संघर्षों में नित ही भिड़ता जाऊँगा। चाहे प्राण भले ही जायें निज कर्तव्य निभाऊँगा॥
भरतपुत्र हूँ शेर खिलाता हुलसित होकर आँगन में। सीने पर हूँ खड्ग झेलता पुलकित होकर के मन में॥
भारत माँ के चरणों में निज जीवन सुमन चढ़ाऊँगा॥ चाहे प्राण भले ही जायें, कायर नहीं कहाऊँगा॥
ज्वलित ज्योति उर देश प्रेम की, भरित शौर्य सुषमा तनमें। बल पौरुष पीयूष छलकता नव चेतन मय यौवन में॥
दानवता के दलन हेतु शिव प्रलयंकर बन जाऊँगा। चाहे प्राण भले ही जायें निज कर्तव्य निभाऊँगा॥
मैं न भार हूँ भारत भू पर, हार सुशोभित जननी का। देता हार सदा दुश्मन को, मातृ भाल का जय टीका॥
नवलसृजन पथ से भारत को श्रेय शिखर पहुँचाऊँगा। चाहे प्राण भले ही जायें, कायर नहीं कहाऊँगा॥
-यज्ञदत्त अक्षय
*समाप्त*