(स्वामी रामतीर्थ)
देव-यज्ञ से ठीक-ठीक अभिप्राय अपनी व्यष्टि इन्द्रियों को ब्रह्माण्ड की समष्टि इन्द्रियों में अर्पण करना है। इन्द्र-देवता को आहुति देने से तात्पर्य इस भूमि पर समस्त हाथों के हित में अपना व्यष्टि हाथ अर्पण करना है। अर्थात् देश के सब हाथों के हित में काम करना इन्द्र-देव-यज्ञ है। आदित्य देवता को आहुति देने से अभिप्राय ब्रह्माण्ड के सब नेत्रों में ईश्वर का अस्तित्व भान करना है, अर्थात् सब नेत्रों का समान आदर करना, अपने अनुचित व्यवहार से किसी की दृष्टि को कुपित न करना, बल्कि जिस किसी की भी दृष्टि अपने पर पड़े, उससे प्रसन्नता, आशीर्वाद और प्रेम से पेश आना, अपनी व्यष्टि नेत्र इन्द्रिय को ब्रह्माण्ड की समष्टि नेत्र-इन्द्रिय के लिये ऐसी अत्यन्त प्रीति व भक्ति से अर्पण करना कि परिच्छन्न अहंकार का अधिकार निताँत लुप्त हो जाय और समष्टि नेत्र (आदित्य) स्वयं आपके नेत्रों द्वारा ही भासमान होने लगे, यह आदित्य-देव-यज्ञ है। बृहस्पति देवता को आहुति देने से अभिप्राय अपनी व्यष्टि बुद्धि को देश की समष्टि बुद्धि के अर्पण करना है, अथवा देश की भलाई में इस प्रकार चिन्तन करना है कि जिससे हममें और हमारे देश-निवासियों में कोई अंतर न रहे और देश के कल्याण में अपना कल्याण तथा देश के आनन्द में अपना आनन्द भान होने लगे।
संक्षेपतः यज्ञ से अभिप्राय अपने आपको ठीक अपने पड़ौसी से, अपने आपको समस्त से अभेद तथा सबका आत्म-स्वरूप होने में अपने तुच्छ अहंकार का नाश अनुभव करते हुए सबको कार्य में परिणत करना है। यही है, स्वार्थता का सूली पर चढ़ना और यही है समष्टि आत्मा का पुनरुत्थान। इसका एक अंग साधारणतः भक्ति ओर दूसरा अंग ज्ञान कहलाता है।
आप स्वदेशानुरागी व स्वदेश-भक्त हुआ चाहते हैं? तब अपने आपको देश तथा देश-बन्धुओं के प्रेम में एक ताल करो, उनके साथ अपनी एकता अनुभव करो। आपकी यह परिच्छिन्न व्यक्ति की छाया भी आप में और आपके देश बन्धुओं में एक पतला काँच का पर्दा तक न होने पाये। अपने प्राणों को स्वदेश-हित में अर्पण करते हुए आप एक सच्चे आध्यात्मिक योद्धा बनिये। क्षुद्र अहंकार के त्याग स्वयं समस्त देश रूप होने पर आपके मन में जो विचार उत्पन्न होगा, वह आपका ही नहीं, किन्तु सारे देश का होगा। आप चलें, देश आपके साथ चलेगा। आप चित्त में स्वास्थ्य का ख्याल करो, आपके देश-बन्धु स्वस्थ हो जायेंगे। आपका बल उनके नस-नाड़ी में धधकने लगेगा। ओह! मुझे निश्चय करने दीजिये कि-
मैं भारतवर्ष, समस्त भारतवर्ष हूँ। भारत-भूमि मेरा अपना शरीर है। कन्याकुमारी मेरा पाँव है। हिमांचल मेरा सिर है। मेरे बालों से श्री गंगा जी बहती हैं। मेरे सिर से सिन्धु और ब्रह्मपुत्र नद निकलते हैं। विन्ध्याचल मेरी कमर के गिर्द कमर है। कुरु मण्डल मेरी दाहिनी और मालाबर मेरी बाँयी जंघा (टाँगें) हैं। मैं समस्त भारतवर्ष हूँ। इसकी पूर्व और पश्चिम दिशाएं मेरी दोनों भुजाएं हैं। मनुष्य जाति को आलिंगन करने के लिए मैं उन भुजाओं को सीधा फैलाता हूँ। आहा! मेरे शरीर का ढांचा (व आकार) है। यह सीधा खड़ा है और अनन्त आकाश की ओर दृष्टि दौड़ा रहा है। परन्तु मेरी वास्तविक आत्मा सारे भारतवर्ष की आत्मा है। जब मैं चलता हूँ, तो अनुभव करता हूँ कि यह भारतवर्ष बोल रहा है। मैं श्वास लेता हूँ, तो महसूस करता हूँ कि भारतवर्ष श्वास ले रहा है। मैं भारतवर्ष हूँ, मैं सत्य हूँ, मैं शिव हूँ।”
स्वदेश-भक्ति का यह अति उच्च अनुभव है और यही व्यावहारिक वेदान्त है।
वृद्धावस्था तथा लकवे की बीमारी के कारण श्री राज नारायण वसु राज गृही में ही रहने लगे। अब उनका बाहर आना बिल्कुल ही बन्द हो गया। उनके परम-प्रिय शिष्य अश्विनीकुमार को इस बात का पता चला कि गुरु देव बीमार हैं तो वे तुरन्त उनके दर्शनों के लिये चले गये। अश्विनी बाबू कमरे में प्रवेश करते हुए काफी गंभीर हो गये। दुःख भरे स्वर में उन्होंने गुरुदेव को प्रणाम किया और आशीर्वाद पाकर समीप की चारपाई पर बैठ गये।
एक ब्राह्मण बड़ा निर्धन था। उसने एक सन्त की इस लिए बड़ी सेवा की कि उसके आशीर्वाद से उसका धनाभाव दूर हो जायगा। बहुत काल तक सेवा करने के बाद महात्मा प्रसन्न हुए और पूछा- “वत्स! बोल तूने मेरी इतनी सेवा क्यों की, मैं तेरी इच्छा पूरी करना चाहता हूँ।” निर्धन ने कहा- भगवन्! मैंने आपकी सेवा इसलिए की है कि आप मुझे कोई ऐसा आशीर्वाद दें, जिससे मेरा धनाभाव दूर हो जाये और मैं इस नगर का सबसे बड़ा सेठ हो जाऊँ।
एक व्यक्ति ने अज्ञान में बहुत पाप किये। कुछ दिन में उसकी भेंट एक ईश्वर भक्त से हो गई। इन महात्मा के उपदेश से उस व्यक्ति की आंखें खुलीं और संसार के सच्चे स्वरूप का ज्ञान हुआ। इस प्रकार का आत्म-बोध हुआ तो सबसे पहले अपने पापों पर बड़ा दुःख हुआ। उसने महात्मा से प्रायश्चित का उपाय पूछा। उन्होंने बताया कि यदि वह गंगा स्नान कर ले तो उसके पाप दूर हो सकते हैं। इस पर वह व्यक्ति बड़ा प्रसन्न हुआ और गंगा स्नान के लिए चल पड़ा।
इन दिनों मोटर-गाड़ियों का प्रचलन न हुआ था। गंगा जी वहाँ से काफी दूर थीं। उस आदमी को गंगा जी का पता-ठिकाना भी मालूम न था, उसे केवल यही अनुमान था कि गंगा जी कोई बड़े जलाशय का नाम है। दिन भर चलते रहने के बाद तीसरे पहर उसे एक बड़ा तालाब मिला, उसने सोचा- बस यही गंगा जी हैं। बड़े प्रेम से कपड़े उतारे, स्नान किया और फिर कपड़े पहन कर घर लौटने की तैयारी करने लगा। तभी एक दूसरा व्यक्ति वहाँ आ पहुँचा, जिससे मालूम पड़ा कि गंगा जी तो अभी बहुत दूर है।
यात्री ने दूसरे दिन फिर पद-यात्रा प्रारम्भ की। कई दिन लगातार चलते रहने के बाद उसे एक नाला मिला। उसने उसे ही गंगा जी समझ कर स्नान किया और फिर प्रसन्नता पूर्वक घर लौटने की तैयारी करने लगा। पर एक बालक ने बताया कि वह तो एक मामूली नाला है, गंगा जी तो यहाँ से बहुत दूर हैं।
वह आदमी फिर यात्रा पर चल पड़ा। कई सप्ताह चलते रहने के बाद उसे एक बड़ी नदी मिली। इस बार उसे पक्का विश्वास हो गया कि यही गंगा जी हैं। भक्त ने बड़ी श्रद्धा के साथ स्नान किया और फिर घर लौटने की तैयारी करने लगा। इसी समय एक स्त्री ने उस नदी का नाम लेकर जयकार लगाई। यह सुनकर उस आदमी को बड़ा विस्मय हुआ कि वह जिसे गंगा समझ रहा था, वह तो एक दूसरी नदी निकली।
मृत मनुष्य के विषय में सारा संसार संशय-शील है। कोई लोग मृत्यु को ही जीवन की इति मानते हैं, कोई कहते हैं कि शरीर, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि के अतिरिक्त कोई आत्मा है जो मृत्यु के पश्चात् लोक-लोकान्तरों में भ्रमण करती है। प्रत्यक्ष या अनुमान से इसका कोई उचित निर्णय नहीं दे पाता। इस गूढ़ प्रश्न को लेकर एक दिन महर्षि उद्दालक के पुत्र नचिकेता ने यमाचार्य के पास जाकर अत्यन्त विनीत भाव से पूछा— “देव! आप मृत्यु के देवता हैं अतएव मैं यह आत्म-तत्व आप से जानता चाहता हूँ।”
ऋषि बालक की जिज्ञासा पर एक-क्षण यमाचार्य को बड़ी प्रसन्नता हुई। पर दूसरे ही क्षण वे प्रश्न की गहराई में डूब गये। यमाचार्य ने पंचागिन-विद्या का ज्ञान बड़ी कठोर तपश्चर्या के बाद प्राप्त किया था, वे साधना-पथ की कठिनाइयों से पूरी तरह अवगत थे। बालक की दृढ़ता पर वे एकाएक विश्वास न कर सके अतः उन्होंने नचिकेता को सम्बोधित करते हुये कहा—”वत्स! तुम इस आत्म-ज्ञान को प्राप्त कर क्या करोगे, मैं तुम्हें सुख-सामग्रियों से भरपूर राज्य कोष, घोड़े, हाथी, रूपवती स्त्रियाँ और सौ वर्ष जीने वाले बहुत से पुत्र दे सकता हूँ, तुम चाहो तो इन्हें प्राप्त कर बहुत दिनों तक इस धरती का सुखोपभोग करो। यह आत्म-ज्ञान बड़ा कठिन है तुम ऐसी तपश्चर्या क्यों करना चाहते हो? दीर्घ-जीवन व्यापी सामर्थ्य प्राप्त कर इस संसार के सुखोपभोग क्यों नहीं माँग लेते।”
यमाचार्य की इन प्रलोभनपूर्ण बातों का नचिकेता पर कोई प्रभाव नहीं हुआ। उसने कहा -भगवन्! यह वस्तुएँ जो आप मुझे देना चाहते हैं, पता नहीं कब तक मेरा साथ देंगी, फिर भोग तो शक्तियों को नष्ट करने वाले ही होते हैं और शक्तियों के नाश से मनुष्य निश्चय ही दुःखी होता है और मृत्यु की ओर अग्रसर होता है। मैं इस मृत्यु-रूपी भय से छुटकारा पाना चाहता हूँ। शरीर के सौंदर्य और विषय भोग को अनित्य और क्षणभंगुर समझकर ऐसा कौन बुद्धिमान होगा जो आत्म-ज्ञान की अपेक्षा दीर्घ-जीवन और साँसारिक वैभव विलास को बड़ा मानेगा?
नचिकेता की प्रबल आत्म-जिज्ञासा के भाव को देखकर यमाचार्य सन्तुष्ट हुये और उन्होंने नचिकेता को आत्म-तत्व का उपदेश दिया।
जिस बात को यमाचार्य और नचिकेता के इस कथानक में बताया गया है, आत्म-साक्षात्कार के साधक के जीवन में भी वैसी ही घटनायें घटित होती हैं। मनुष्य की साधारण जिज्ञासा और आत्म-साक्षात्कार के बीच में जीवन शोधन की जो आवश्यक शर्त लगी हुई है वह अति दुस्तर है, इसीलिये शास्त्रकार ने कहा है—
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया- दुर्ग पथस्तत्कवयो वदन्ति।
“यह आत्म-ज्ञान का मार्ग छुरे की धार पर चलने के समान कठिन है, ऐसा कवि-मनीषियों का निश्चित मत है।”
बात भी प्रायः ऐसी ही है, क्योंकि मनुष्य की स्वाभाविक जीवन-क्रम में चलते रहने की प्रवृत्ति होती है। जल को किसी स्थान पर लुढ़का दिया जाय जो वह अपना रास्ता आप बना लेता है। नीचे की ओर बहने में उसे कोई कठिनाई नहीं होती। संक्षेप में हमारा जैसा जीवन-क्रम चल रहा है उसे वैसे ही चलता रहने दें तो इसमें न कोई असुविधा होगी न कठिनाई। कठिनता तो अपने आप को ऊपर उठाने में ही होती है। पानी को अपनी सतह से ऊँचे उठाना हो तो उसे विशेष यत्नपूर्वक बड़ी कठिनाइयों के साथ ऊपर चढ़ा पाते हैं। आत्मा को लघुता से विभुता की ओर अग्रसर करने में भी ठीक ऐसी ही कठिनाई आती है।
सबसे पहली आत्म-साधना जीवन को शुद्ध बनाना है। पाप और विकार ही आत्मा के बन्धन माने गये हैं अतः उनसे मुक्ति पाने का प्रयत्न किया जाता है। पीछे जो पाप हो गये हैं उनके प्रक्षालन के लिए प्रायश्चित और तपश्चर्या करनी पड़ती है। इसके बिना आत्म-ज्ञान के लिए जिस एकाग्रता और दृढ़ता की आवश्यकता होती है वह नहीं हो पाती। पापों में रत और चित्तवृत्तियों का शोधन न करने वालों के मन सदैव अशान्त रहते हैं। ऐसी अवस्था में शब्द पाण्डित्य या केवल सैद्धान्तिक ज्ञान काम नहीं देता आत्म साक्षात्कार के लिये इन्द्रिय लालसाओं से मुक्त होना, शुद्ध, संयत और समाहित होना अत्यन्त आवश्यक है। पर इन्द्रिय विजय योंही नहीं हो जाती। जप, तप, व्रत, उपवास, तितीक्षा आदि के द्वारा आत्मा का शुद्धिकरण होता है, प्राणायाम, ध्यान, धारणा आदि के द्वारा उसे शक्तिशाली बनाया जाता है। यह कार्य ऐसे नहीं होते जिन्हें मनुष्य का मन आसानी से स्वीकृति देता रहे और उनका किंचित विरोध न करे।
बुद्धि पाप, इच्छाओं और वासनाओं पर लगाम लगाती हैं,उन्हें बार-बार नियंत्रण में लाती है किन्तु इन्द्रियाँ और उनके विषय भी बड़े शक्तिशाली और प्रमथनकारी होते हैं। चोट खाये हुए सर्प तथा हारे हुये जुआरी की तरह वे बार-बार दाँव लगाते हैं और परिस्थितियाँ पाकर मनुष्य की सारी बुद्धि और विवेक में घमासान हलचल मचा देते हैं। काम और क्रोध, लोभ और मोह,भय और आशंका के तूफान एक क्षण मनुष्य की बुद्धि पर पर्दा डाल देते हैं, उसे साधना से विचलित करने का हर संभव प्रयत्न करते हैं। कुचली हुई वासनाओं को जब भी अवकाश मिलता है वे ऐसे-ऐसे प्रलोभनकारी रूपक रचकर मनुष्य को लुभाती हैं कि आत्म-ज्ञान का सारा महत्व उसकी आँखों से ओझल हो जाता है, बात की बात में साधक पथभ्रष्ट होकर रह जाता है।
ऐसे कठिन समय में जिनकी बुद्धि में विवेक होता है, जिनका मन एकाग्र और समाहित होता है उसी की इन्द्रियाँ सावधान रहती हैं और वही आत्म-साधना के पथ पर धैर्यपूर्वक अन्त तक टिके रह पाते हैं।
आत्म-ज्ञान की इच्छा करने वालों को स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि जो अनावश्यक जान पड़ती हों कम से कम उन कामनाओं का तो परित्याग करना ही पड़ता है। अपनी बुद्धि को यथा संभव एकाग्र और निर्मल बनाने की वैसी ही आवश्यकता होती है जिस प्रकार भरे हुए जल में अपना प्रतिबिम्ब देखने के लिए लहरों का रोकना आवश्यक होता है। कामनायें एक प्रकार की लहरें ही होती हैं जिनके रहते हुए आत्मा का प्रतिबिम्ब साफ नहीं झलकता। इस बात का पक्का और पूर्ण विश्वास हो जाने पर किसी मार्गदर्शक की आवश्यकता नहीं रहती। इसके बाद आत्मा स्वयं अपना गुरु, नेता या मार्गदर्शक हो जाता है और सभी सदाचरण स्वतः उसमें प्रकट होने लगते हैं। वह स्वयं ही सत्य और शुद्ध चरित्र मय बनने लगता है।
भय और लोभ आत्म-विकास के मार्ग में निरन्तर बाधाएं पहुँचाते रहते हैं। बहिर्मुखी इन्द्रियाँ भी चैन से नहीं बैठने देतीं। अन्तरात्मा को देखने की दूर दृष्टि थोड़ी देर के लिए जागृत होती है अन्यथा अधिकाँश समय यह इन्द्रियाँ तरह-तरह के बाहरी प्रलोभनों की ओर ही आकर्षित होती रहती हैं। अच्छे अच्छे स्वाद-युक्त भोज्य पदार्थ, अधिक धन, विपुल ऐश्वर्य कुच और कंचन की अतृप्त तृष्णा बार-बार अन्तर्मुखी इन्द्रियों को बहकाती रहती हैं। अज्ञानी लोग बाह्य विषयों के प्रलोभनों में फँस जाते हैं, इसीलिए बताया गया है कि यह मार्ग अति कठिन है और उसे पार पा जाना कोई आसान बात नहीं है।
पर अमृतत्व की तीव्र आकाँक्षा रखने वाले साहसी पुरुष इन्द्रियों की क्षणिक लोलुपता और मन के विद्रोह के आगे नहीं झुकते। वे नचिकेता की तरह ही निष्ठा भाव से आध्यात्मिक विकास की साधना में संलग्न रहते हैं और आत्म-ज्ञान का लाभ प्राप्त करते हैं। यह मार्ग कायरों के लिए कठिन है पर पुरुषार्थियों के लिए कठिन नहीं होता। वे इन कठिनाइयों में भी अपने जीवन का आनन्द ढूँढ़ लेते हैं और अन्त तक तत्परतापूर्वक अभ्यास करते रहते हैं। यह आत्मा अन्त में उन्हीं वीर पुरुषों को प्राप्त होता है। वही स्वर्ग और मुक्ति के अधिकारी होते हैं।
जीवन-यापन और जीवन-लक्ष्य दो भिन्न बातें हैं। प्रायः सामान्य लोगों का लक्ष्य जीवन-यापन ही रहता है। खाना-कमाना, ब्याह-शादी, लेन-देन, व्यवहार-व्यापार आदि साधारण जीवन-क्रमों को पूरा करते हुए मृत्यु तक पहुँच जाना, बस इसके अतिरिक्त उनका अन्य कोई लक्ष्य नहीं होता। एक जीविका का साधन जुटा लेना एक परिवार बसा लेना और बच्चों का पालन-पोषण करते हुए शादी-ब्याह कर देना मात्र ही साधारणतया लोगों ने जीवन-लक्ष्य मान लिया है।
वस्तुतः यह जीवन-यापन की साधारण प्रक्रिया मात्र है, जीवन-लक्ष्य नहीं। जीवन-लक्ष्य उसी सुनिश्चित विचार को ही कहा जायेगा, जो संसार के साधारण कार्यक्रम से कुछ अलग, कुछ ऊँचा हो और जिसे पूरा करने में कुछ अतिरिक्त पुरुषार्थ करना पड़े।
जीवन में कोई सुनिश्चित लक्ष्य, कुछ विशेष ध्येय धारण करके चलने वालों को असाधारण व्यक्तियों की कोटि में ही रक्खा जाता है। उनकी विशेषता तथा महानता केवल यही होती है कि परम्परा से साधारण जीवन के अभ्यस्त व्यक्तियों में से उनने कुछ आगे बढ़कर, कुछ असामान्यता ग्रहण की है। लोग उसको महान इसलिये मान लेते हैं कि जहाँ सामान्य लोग समझी-बुझी तथा एक ही लीक पर चलती चली जा रही जीवन-गाड़ी में न जाने कितनी दुःख-तकलीफें अनुभव करते हैं, तब उस व्यक्ति ने एक अन्य, अनजाना एवं असामान्य मार्ग चुना है। उसका साहस एवं कष्ट सहिष्णुता कुछ अधिक बढ़ी-चढ़ी है।
जीवन-यापन की साधारण प्रक्रिया को भी यदि एक असामान्य दृष्टिकोण से लेकर चला जाय तो वह भी एक प्रकार का जीवन-लक्ष बन जाती है। इस साधारण प्रक्रिया का असाधारणत्व केवल यही हो सकता है कि जीवन इस प्रकार से बिताया जाये, जिसमें मनुष्य पतन के गर्भ में न गिर कर एक आदर्श-जीवन बिताता हुआ उसकी परिसमाप्ति तक पहुँच जाये। जिसने जीवन को आहों, आँसुओं तथा विषादों से मुक्त करके हास, उल्लास, हर्ष, प्रमोद तथा उत्साह के साथ बिता लिया है उसने भी मानो सफल जीवन-यापन का एक लक्ष्य ही प्राप्त कर लिया है। जिसने सन्तोषपूर्वक हँसते हुए जीवन-परिधि के बाहर पैर रक्खा है, उसका जीवन सफल ही माना जायेगा। इसके विपरीत जिसने जीवन-परिधि को रोते, बिलखते, तड़पते तथा तरसते हुए पार किया, मानों उसका जीवन घोर असफल ही हुआ।
जीवन की सफलता का प्रमाण जहाँ किसी के कार्य और कर्तृत्व से दिया करते हैं, वहाँ उसकी अन्तिम श्वास में सन्निहित शाँति एवं सन्तोष की मात्रा भी उसका एक सुन्दर प्रमाण है।
जीवन-यापन को ही जीवन-लक्ष्य मानने वाले भी जब तक अपने जीवन में एक व्यवस्था, एक अनुशासन और एक सुन्दरता नहीं लायेंगे, तब तक जीवन जीने की स्वाभाविक प्रक्रिया में भी सफल न हो सकेंगे। जिस जीवन में हास, उल्लास तथा उत्साह की मात्रा जितनी अधिक होगी, वह उतना ही सुन्दर होगा। प्रसन्नता ही जीवन की सुन्दरता का दूसरा नाम है। जिस जीवन में हास नहीं, उत्साह एवं उल्लास नहीं, उसमें क्यों न संसार भर के सुख-साधन हों, क्यों न वह विशुद्ध सोने से निर्मित किया गया हो, सुन्दर नहीं कहा जा सकता।
ऊँची कोठी, सजे कमरे, सुन्दर वस्त्र, परिपूर्ण तिजोरियाँ और रंग-रूप से भरी रँगरेलियाँ भले ही किसी के जीवन को दूसरों के लिये आकर्षक बना दें, किन्तु यह उपादान उसके स्वयं के लिये जीवन की सुन्दरता का सृजन नहीं कर सकते।
जीवन की सुन्दरता बाहरी वैभव में नहीं, मनुष्य के आन्तरिक संसार में हुआ करती है। जिसके गुण, कर्म, स्वभाव जितने ही सात्विक और सुरुचिपूर्ण होंगे, उसका जीवन उतना ही प्रसन्न, उतना ही सुन्दर होगा। जो अविचारी, व्यभिचारी अथवा अवगुणी है, वह कितना ही धनवान, शान−शौकत वाला, सुन्दर शरीर और रहन-सहन वाला क्यों न हो सुन्दर जीवन की परिधि में नहीं आ सकता। इसके विपरीत जो सामान्य स्थिति का है, गरीब है, बहुत सुन्दर शरीर वाला भी नहीं है, यदि वह शिष्ट, सभ्य, श्लील, संतुष्ट और शान्त है तो वह अधिक सुन्दर जीवन वाला कहा जायेगा।
जीवन को सफल एवं सुन्दर बनाने के लिये जीवन जीने को एक कला के रूप में ग्रहण करना होगा। इस कला की सबसे प्रमुख मान्यता यह है कि मनुष्य के जीवन तत्व का शोषण करने वाली चिन्ता को पास न आने दिया जाये! जिसके जीवन तत्व को चिन्ताओं ने सोख डाला है वह जीवन के किसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। जो शक्तियाँ जीवन को उन्नत और सुरुचिपूर्ण बनाने वाली होती हैं चिन्ता सबसे पहले उन्हीं को दबाकर बैठ जाती है। चिन्ताग्रस्त मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ होकर किसी कार्य के योग्य नहीं रहता। जीवन की सारी सुन्दरताओं का मूल स्वास्थ्य चिन्ता के विष से भस्म हो जाता है। विविध प्रकार के रोग मनुष्य को घेर लेते हें। रोगी मनुष्य का स्वभाव जीवन-कला के अनुरूप हो ही नहीं सकता। वह चिड़-चिड़ा, झक्की, क्रोधी एवं सनकी बन जायेगा। मनुष्य स्वभाव की यह विकृति उसको पतन की ओर ही धकेलती है।
कार्य में मनोयोगता प्राप्त करने के लिये मनुष्य का तन मन से स्वस्थ बहुत आवश्यक है। इस प्रकार के स्वास्थ्य की उपलब्धि के लिये व्यवस्थित एवं संयमित जीवन क्रम की बहुत आवश्यकता है। जो अस्त-व्यस्त है, जिसने समय एवं श्रम में संतुलन नहीं बना रक्खा है, वह व्यवस्थित जीवन नहीं रख सकता। असंयम स्वास्थ्य का सबसे बड़ा शत्रु है। असंयम से पाचन-क्रिया बिगड़ जाती है और पाचन-क्रिया के बिगड़ते ही शारीरिक स्वास्थ्य की सारी संभावनाएं जाती रहती हैं। जो अस्वस्थ है उसका मानसिक सन्तुलन अवश्य बिगड़ जाता है। इससे उत्तेजना, क्रोध और क्षोभ की बहुतायत हो जाती है। जरा-जरा सी बात पर बिगड़ उठना, विध्वंसक दिशा में सोचना, द्वेष मान लेना और प्रतिशोध की भावना में जलते रहना मानसिक रोगी का सबसे बड़ा लक्षण है।
यों तो साधारण चिन्ताओं से मुक्त रहने का सबसे सरल उपाय कार्य-व्यस्त रहना है, किन्तु चिन्ता जब इतनी बढ़ जाये कि वह सम्पूर्ण जीवन पर अपना अधिकार करके मनुष्य को अपना दास बना ले तब केवल काम में लगे रहने भर से भी काम न चलेगा। जब चिन्ता, विषाद, निराशा और हतोत्साह को लेकर स्थायी रूप से जीवन में घर कर जाये, तो मनुष्य को जीवन से अरुचि एवं ग्लानि होने लगे, तब उसे अध्यात्म का सहारा लेकर अपना त्राण करना चाहिये। दृष्टिकोण के आध्यात्मिक होते ही मनुष्य की आत्मशक्ति प्रबुद्ध होने लगती है। ईश्वर के प्रति विश्वास और श्रद्धा बढ़ने लगती है। आत्म-विश्वास का उदय होता है। आशा के साथ आत्म-विश्वास की किरणें फैलते ही मनुष्य जीवन में नया प्रभात होता है और वह एक नये उत्साह के साथ जीवन पथ पर बढ़ चलता है।
अनियंत्रित इच्छायें भी चिन्ता का एक विशेष कारण है। जिसकी इच्छायें बहुत हैं, जिसने तरह-तरह की आकाँक्षायें पाल रखी हैं वह कभी भी निश्चिन्त नहीं रह सकता। एक के बाद एक इच्छा उसके मन मस्तिष्क को मथती ही रहेगी। इच्छाओं के बोझ से उसकी इन्द्रियाँ शिथिल होकर काम करने योग्य नहीं रह सकतीं फलस्वरूप अकर्मण्यता की वृद्धि होगी ही! जहाँ अकर्मण्यता होगी वहाँ चिन्ताएँ अवश्य रहेंगी और जहाँ चिन्तायें होगी, वहाँ प्रसन्नता ठहर ही नहीं सकती। प्रसन्नता के अभाव में मनुष्य जीवन की असफलता निश्चित है।
जीवन की सफलता के लिये मनुष्य को कम-से-कम इच्छाओं के साथ अनुशासित संयमित एवं कटी छँटी जिन्दगी को लेकर प्रसन्नतापूर्वक कार्यरत रहना चाहिये। इस प्रकार की अबोझिल जिन्दगी में न असंतोष होता है और न क्षोभ। उसकी जिन्दगी हर ओर सुन्दर बनकर कलापूर्ण बन जाती है।
समस्या बन कर सामने आने वाले संयोगों तथा परिस्थितियों का उत्तरदायित्व अधिकतर मनुष्य के अपने विचारों पर ही होता है। संसार में पर-प्रेरित परिस्थितियाँ बहुत कम होती हैं। और जो पर-प्रेरित परिस्थितियाँ भी होती हैं उनमें प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप में मनुष्य के विचारों का हाथ रहता है।
विचार मनुष्य की इन्द्रियों द्वारा क्रिया बनकर उद्भूत होते हैं। विचार अच्छे होंगे तो कर्म अच्छे होंगे, विचार बुरे होंगे तो कार्य भी उन्हीं के अनुसार के ही सम्पादित होंगे। यदि किसी के विचार द्वेषपूर्ण हैं तो उसका द्वेष किसी न किसी समय अवसर पाकर किसी न किसी क्रिया द्वारा प्रकट अवश्य होगा। मनुष्य कितना ही प्रयत्न क्यों न करे उसका द्वेष अभिव्यक्ति पाये बिना नहीं रह सकता। विचारों की प्रेरणा शरीर कदापि नहीं रोक सकता। उसकी इन्द्रियाँ विचारों के वेग को रोक सकने में कदापि सफल नहीं हो सकतीं। विचारों की प्रेरणा रोककर यदि मनुष्य उसके विपरीत क्रिया करने का प्रयत्न करेगा तो उसमें एक मानसिक तनाव उत्पन्न हो जायेगा जिसको देर तक सह सकना मनुष्य के वश की बात नहीं है। कुछ समय तो वह आग्रहपूर्वक अपनी क्रिया को चलाता रहेगा, बाद में उसके विचारों की अभिव्यक्ति धीरे-धीरे उसके कार्यों में परिलक्षित होने लगती हैं। मानिए एक व्यक्ति किसी से शत्रुता मानता है और संयोगवश किसी दबाव से उसका कोई काम करना पड़ता है तो उसका किया हुआ काम किसी दशा में भी उतना ठीक न हो सकेगा जितना कि होना चाहिये। दूसरे यदि किसी गलती पर उसे रोका जायेगा तो उसका विरोध बाहर आ जायेगा, और कुछ न सही वह अपनी गलती का गलत प्रतिपादन ही करने लगेगा।
किसी के प्रति प्रेम रखने वाले व्यक्ति की भावना अवसर पाकर बात-बात में प्रकट हुये बिना नहीं रहेगी। अपने प्रिय जन की बुराई का विरोध, अयाचित हित के कार्य ऐसी क्रियाएं हैं जो किसी के प्रति किसी के विचारों को ही प्रकट करती हैं।
सामने आई हुई अच्छी बुरी परिस्थितियों का कारण मनुष्य के अपने विचार, उसकी भावनाएँ ही होती हैं। मनुष्य की वाणी तथा कर्म ही परिस्थितियों का निर्माण किया करते हैं। कटुवादी तथा कुकर्मी को समाज में प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना ही होगा। कोई कितना ही विद्वान, बुद्धिमान तथा धनवान क्यों न हो यदि वह कटुवादी है, दुराचारी है तो कोई भी उसके संपर्क में आना, उससे सहयोग करना पसन्द न करेगा। असहयोग तथा संपर्कहीनता से उत्पन्न परिस्थितियाँ बड़ी ही कठोर तथा कठिन होती हैं।
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। उसका जीवन पारस्परिक सहअस्तित्व पर निर्भर है। यदि यह आधार ही समाप्त हो जाये तो उसका जीना ही दूभर हो जायेगा। दुर्भावनाएं रखने वाला व्यक्ति अवश्य कामी, क्रोधी, लोभी अथवा स्वार्थी होगा, और यह विकार कार्य में साकार हुये बिना न रहेंगे, जिससे सामाजिक असहयोग की हर समय सम्भावना है और सहयोग के अभाव में जीवन किन-किन परिस्थितियों में फँस जायेगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है।
समाज द्वारा बहिष्कृत तिरस्कृत तथा त्यक्त व्यक्ति की सारी दशाएं बिगड़ जाती हैं और वह तेज हीन होकर बुझे दीपक के समान धूमिल जिन्दगी काटा करता है। बिना सामाजिक सहयोग के कोई भी व्यक्ति आजकल सफल नहीं हो सका। जन सहयोग के अभाव में बड़े-बड़े नेताओं का पतन और ग्राहकों के असहयोग से करोड़पति व्यापारियों को दरिद्री होते देखा जा सकता है। जनता के सहयोग व असहयोग से संसार में बड़े-बड़े साम्राज्यों का उत्थान-पतन होता रहता है।
इस प्रकार का सहयोग तथा असहयोग मनुष्य के अपने व्यवहार पर और मनुष्य का व्यवहार उसके अपने विचारों के स्वरूप पर निर्भर करता है इसलिए मनुष्य की सफलता, असफलता का प्रमुख हेतु विचारों को ही मानना उचित होगा।,
संसार में पर प्रेरित परिस्थितियाँ भी असम्भाव्य नहीं हैं। कोई भी दुष्ट किसी सज्जन को अकारण ही दुखी करने के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। यद्यपि उन परिस्थितियों में सज्जन के विचारों का कोई दोष नहीं तथापि कष्टकर परिस्थितियाँ उसके सामने आई। पर यह सत्य है कि अपने निर्विकार विचारों के कारण वह उनसे प्रभावित न होगा और शीघ्र ही उन पर विजय प्राप्त कर लेगा। जो परिस्थितियाँ मनुष्य को व्यग्र नहीं कर सकतीं अथवा उसकी गति नहीं रोक सकतीं उनका आना न आना बराबर ही है।
मनुष्य की मानसिक दशा के अनुसार ही उसके आसपास का संसार भी बन जाता है। जिसका हृदय क्रुद्ध है, निराश है अथवा असंतुष्ट है उसको संसार में चारों ओर क्षोभ, अन्धकार तथा अभाव ही दिखाई देगा। चित्त की व्यग्रता के कारण उसकी किसी स्थान पर अच्छा न लगेगा। किसी की प्रसन्नता की प्रतिक्रिया भी उसके हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगी। निराश व्यक्ति के सामने यदि आशापूर्ण बातें की जायें तो वह उसे निरर्थक प्रलाप जैसा ही अनुभव होगा। दुःखी हृदय व्यक्ति को सुन्दर दृश्य, सुन्दर से सुन्दर कार्यक्रम भी भार स्वरूप लगने लगेंगे।
बाहर के संसार में वास्तविक सुख-दुःख कुछ भी नहीं होते। यह मनुष्य की अनुभवशीलता पर ही निर्भर करते हैं। जिसका हृदय निर्बल है, दोषपूर्ण है उसको दुःख का छोटा-सा कारण भी बुरी तरह आहत कर डालता है। एक छोटी-सी प्रतिकूलता से ही रोने-चिल्लाने लगता है और हाथ-पाँव छोड़कर बैठ जाता। भयभीत होने, निराश होने और विषाद करने के अतिरिक्त उसको कोई चारा ही नहीं दीखता। एक साधारण-सी घटना उसके दुर्बल मनोदर्पण पर असाधारण जैसी प्रतिबिम्बित हो उठती है। कोई कारण उतना बड़ा नहीं होता जितना कि उसकी मानसिक दुर्बलता मिलकर उसे बना देती है। संकीर्ण हृदय में एक छोटा-सा भय बहुत बड़ा दीखता है। जिस प्रकार एक रोगी को एक छोटा-सा झटका बुरी तरह बेहाल और बेताब कर देता है उसी प्रकार विकारों से अस्वस्थ मन को एक छोटी-सी प्रतिक्रिया बुरी तरह दहला देती है।
जिसका हृदय विशाल है, उच्च विचारों से भरा-पूरा है उसमें दुःख के किसी कारण का प्रवेश ही नहीं हो पाता और यदि वह किसी तरह से प्रवेश भी पा लेता है। स्वस्थ मन की प्रसन्नता उसे दीक्षित कर अपने अनुकूल बना लेती है, उल्लास एवं प्रसाद से उसके विषैले प्रभाव को दूर कर देती है। प्रसन्न-मन व्यक्ति सदा सुखी ही रहता है, संसार की कोई प्रतिकूलता उसे व्यग्र नहीं कर पाती।
प्रसन्नता का वास्तविक अर्थ है निर्मलता एवं निर्विकारता। जो हृदय निर्मल है निर्विकार है वही प्रसन्न है और जो प्रसन्न है वही सदा सुखी है। अस्तु जीवन में सुख शान्ति के स्थायित्व के लिए मनुष्य को अपने हृदय को सदा निर्मल एवं निर्विकार ही रखना चाहिये।
ईर्ष्या, द्वेष, छल-कपट, काम-क्रोध आदि विकार मन के मल हैं। इनको दूर कर देने से मनुष्य का हृदय निर्मल हो जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि विकारों को दूर करने के लिये विचार बल का ही अवलम्बन लेना होगा। अपने विचारों को ऊँचा उठाइए, उनकी सहायता के लिये स्वाध्याय सत्संग तथा सत्कर्मों का ग्रहण कीजिए। कुविचार उत्पन्न करने वाले वातावरण से दूर हटिये। लोभ आने पर त्याग कीजिये दान दीजिये, क्रोध होने पर करुणाजनक प्रसंग पढ़िये, कामावेग के समक्ष निर्वेद का सहारा लीजिये और मोह से बचने के लिए ईश्वर का चिन्तन करिये। निरन्तर इस प्रकार का क्रम चलाते रहने से कुछ ही समय में आपका हृदय निर्मल होने लगेगा। निर्मलता की प्रसन्नता का थोड़ा-सा आभास पाते ही फिर मन पुनः अपना परिमार्जन करने में तत्पर हो जायेगा।
परिस्थितियों को सुलझाने और प्रतिकूलताओं से लड़ने के लिए मनोबल की बहुत बड़ी आवश्यकता होती है। मनोबल का विकास केवल प्रसन्नता से ही हो सकता है। मानसिक प्रसन्नता की सिद्धि कीजिये और अपने चारों ओर के सुन्दर संसार के बीच निर्द्वन्द्व, निर्भय तथा सदा सुखी होकर जीवन को सफल एवं सार्थक बनाइये।
परिवर्तन संसार का स्वाभाविक गुण है। यह एक रस कदापि नहीं रह सकता। ऋतुओं का परिवर्तन, रात-दिन, धूप-छाँह की अदल-बदल यही प्रकट करते हैं कि संसार की शोभा भी इसके परिवर्तनशील होने में है। हर परिवर्तन एक नवीन जिन्दगी लेकर आता है। जब संसार ग्रीष्म में तप कर व्याकुल हो उठता है, तब बरसात उसका ताप दूर करके एक नव-जीवन ‘नये सुख’ का संचार करती है। बरसात से जब नदियाँ बढ़ जाती हैं, रास्ते बन्द हो जाते हैं, पानी गँदला हो जाता है, कीड़े-मकोड़े बढ़ जाते हैं, तब इनका निवारण करने के लिये शरद् ऋतु आती है और बरसात से ऊबा हुआ मनुष्य पुनः एक नवीन जीवन का अनुभव करता है। इसी प्रकार जब जाड़ा प्राणलेवा बन जाता है, तब पुनः शीत रहित ऋतु का आगमन होता है। आशय यह कि एक-सी स्थिति में रहते संसार के प्राणी ऊब कर विरक्त न होने लगें, इसलिये परमात्मा ने संसार में परिवर्तन का एक अनिवार्य नियम बना दिया है।
संसार का एक अंग होने से मनुष्य का जीवन भी परिवर्तनशील है। बचपन, जवानी, बुढ़ापा आदि का परिवर्तन। तृषा तृप्ति, काम, आराम, निद्रा, जागरण तथा जीवन-मरण के अनेक परिवर्तन मानव जीवन से जुड़े हुए हैं। इसी प्रकार सफलता-असफलता तथा सुख-दुःख भी इसी परिवर्तनशील मानव जीवन के एक अभिन्न अंग हैं।
परिवर्तन जीवन का चिन्ह है। अपरिवर्तन जड़ता का लक्षण है। जो जीवित है, उसमें परिवर्तन आयेगा ही। इस परिवर्तन में ही रुचि का भाव रहता है। एकरसता हर क्षेत्र में ऊब और अरुचि उत्पन्न कर देती है।
कठिनाइयों का आगमन भी इसी परिवर्तनशीलता के ही अंतर्गत हुआ करता है। मानव जीवन संघर्ष पूर्ण प्रक्रिया है। अधिकतर लोग संघर्ष को बुरा मानते हैं, उससे बचने का प्रयत्न करते हैं। किन्तु यह संघर्ष ही मनुष्य जीवन के विकास एवं सफलता का कारण है। यदि संघर्ष न हो तो कोई शक्तिशाली विद्वान, पुरुषार्थी अथवा परिश्रमी बनने का प्रयत्न ही न करें। स्पर्धा रूपी संघर्ष ही मनुष्य को एक दूसरे से ऊँचा कलाकार कार्यकर्त्ता तथा शिल्पकार बनने की प्रेरणा देता है। यदि मनुष्य को बिना श्रम किये भोजन मिल जाया करे, प्रकृति की कठोरता से संघर्ष किये बिना ही यदि उसकी आवश्यकताएं पूरी हो जाया करतीं, तो मनुष्य कितना काहिल और कितना निकम्मा होता, इसका अनुमान लगा सकना कठिन है।
प्राकृतिक कठोरताओं के संघर्ष से ही प्रेरित होकर मनुष्य ने जीवन में सुख-सुविधाओं के रूप में बड़ी-बड़ी सभ्यताओं एवं संस्कृतियों का निर्माण कर डाला है। प्रकृति से छिड़े हुए संघर्ष ने ही संसार में आश्चर्य चकित कर देने वाले शिल्पों को जन्म दिया है। संघर्ष संसार की न केवल स्वाभाविक प्रक्रिया है, बल्कि परिवर्तन की तरह यह आवश्यक भी है। इसके बिना मनुष्य का विकास रुक जाता, भौंचक्की कर देने वाली विज्ञान एवं ज्ञान की प्रगति न होती।
किन्तु कितना आश्चर्य है कि मानव-विकास की इस अनिवार्य आवश्यकता से न जाने मनुष्य क्यों डरता है? परिवर्तन से डरना और संघर्ष से कतरना मनुष्य की बहुत बड़ी कायरता है।
मनुष्य जब तक जीवित है, उसे परिवर्तन पूर्ण उतार-चढ़ाव और बनने-बिगड़ने वाली अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना ही होगा। दुःख-सुख, हानि लाभ, सफलता असफलता, सुविधा एवं कठिनाइयों के बीच से गुजरना ही होगा। लाख चाहने और प्रयत्न करने पर भी वह इनको आने से नहीं रोक सकता। यह आयेगी ही और मनुष्य को इनसे जूझना ही होगा।
यह बात दूसरी है कि कोई कायर इनकी मार खाकर रोता-चिल्लाता हुआ इनको पार करता है और कोई साहसी अपने आत्म-बल एवं पुरुषार्थ के सम्बल का सहारा लेकर या तो इनको अपने अनुकूल बना लेता है या इनका मुख मोड़ देता है।
रोना-धोना, शोक, चिन्ता और विषाद करने से कोई परिस्थिति नहीं बदलती, कोई कठिनाई दूर नहीं होती। बल्कि वे कमजोर मनोभूमि पाकर और भी विकराल रूप में अपना ताण्डव करती हुई कायर के भय से मनोरंजन किया करती हैं। जहाँ उनके ठहरने का समय दिन-दो-दिन होता है, वहाँ वे महीनों वर्षों के लिये अपना टिकाना लगा देती है। रोना झींकना, भयभीत होना अथवा भागना एक प्रकार से कठिनाइयों एवं आपत्तियों के प्रति आत्मसमर्पण करना है और किसी शत्रु के सम्मुख आत्म समर्पण करने का जो फल होता है वही उसे भोगना पड़ता है। ऐसे दुर्बल व्यक्ति का आत्म समर्पण पाकर आपत्तियाँ उसका सर्वस्व हरण कर लेती हैं। उसकी मानसिक शक्तियों, आत्मिक बल, प्रसन्नता, आशा, उल्लास आदिक सम्पत्तियों को हड़प कर निताँत दरिद्री बना देती हैं।
परिवर्तन के नियम और संघर्ष में प्रबलता के कारण जब जीवन में कठिनाइयाँ परेशानियों और आपत्तियों का आना अनिवार्य ही है तब रोने-धोने, भागने, भयभीत होने के स्थान पर उनसे लड़ना और टकराना ही उचित मालूम होता है।
बिना कठिनाइयों के मनुष्य का पुरुषार्थ नहीं खिलता, उसके आत्म-बल का विकास नहीं होता उसके साहस और परिश्रम के पंख नहीं लगते उसकी कार्य क्षमता का विकास नहीं होता। यदि कठिनाइयां न आवें तो मनुष्य साधारण रूप से रेलगाड़ी के पहिये की तरह निरुत्साह के साथ ढुलकता चला जाये। उसकी अलौकिक शक्तियों, उसकी दिव्य क्षमताओं, उसकी अद्भुत बुद्धि और शक्तिशाली विवेक के चमत्कारों को देखने का अवसर ही न मिले। उसकी सारी विलक्षणताएं अद्भुत कलायें और विस्मयकारक योग्यताएँ धरती के गर्भ में पड़े रत्नों की तरह की पड़ी-पड़ी निरुपयोगी हो जातीं।
निःसन्देह यह आपत्तियों तथा कठिनाइयों की कृपा है जो मनुष्य अपनी शक्तियों तथा अपने स्वरूप को पहचान सका है। कठिनाइयाँ ही मनुष्य के मस्तिष्क को जगाती उसकी आत्मा को प्रबुद्ध करती और उसको विकास के पथ पर अग्रसर करती हैं। मनुष्य को आपत्तियों से घृणा नहीं बल्कि प्रेम करना चाहिये। उनका आभार मानना चाहिये, उन्हें धन्यवाद देना चाहिए।
मनुष्य के ज्ञान वर्धन में कठिनाइयों का बहुत हाथ है। आपत्ति के समय ही मनुष्य को ठोस अनुभव होते हैं। आपत्ति काल में ही उसे अपने परायों की मनुष्यता एवं पशुता की परख होती है। कठिनाइयाँ तथा आपत्तियाँ ही संसार के वास्तविक रूप को उसके सामने प्रकट करती हैं। कठिनाइयाँ ही मनुष्य को अपने प्रति बहुत से भ्रमों को दूर कर देती हैं। आपत्ति के बीच अपनी दशा देखकर ही मनुष्य ठीक-ठीक समझ पाता है कि वह कितने पानी में है। बड़े-बड़े साहसी अपने को कायर और अपने को कायर तथा कमजोर समझने वाले देखते हैं कि उनमें तो काफी साहस है। इस प्रकार कठिनाइयाँ मनुष्य के लिए हर प्रकार से सहायक तथा उपयोगी ही होती हैं।
किन्तु किसके लिये? क्या उसके लिये जो उनको देखते ही दुम-दबाकर भागते या रोते चिल्लाते हैं। क्या आपत्तियों में जिनकी बुद्धि विकल एवं भ्रष्ट हो जाती है, मन का सारा साहस कूच कर जाता है? क्या उनके लिये जो भीरु है, सुकुमार हैं, असहिष्णु अथवा सुख लिप्सु हैं? नहीं? कठिनाइयों का सहन कर सकना निर्बल हृदय व्यक्ति के वश की बात नहीं और जो उनको सहन नहीं कर सकता वह सिद्धि पाना तो दूर उनसे लाभ उठाना तो क्या, उलटे उनमें जलकर भस्म ही हो जायेगा। आपत्तियों का झंझा बात जहाँ नरसिंहों को झकझोर कर उनका प्रमाद दूर करके पुरुषार्थ के लिये खड़ा कर देता है वहाँ शृगाल-शशकों को भयभीत करके जीवन रण में परास्त कर देता है।
आपत्तियाँ संसार का स्वाभाविक धर्म हैं। वे आती हैं और सदा आती रहेंगी। उनसे न तो भयभीत होइये और न भागने की कोशिश करिये, बल्कि अपने पूरे आत्म-बल साहस और शूरता से उनका सामना कीजिये, उन पर विजय प्राप्त कीजिये और जीवन में बड़ा से बड़ा लाभ उठाइए।
प्रगतिशीलता जीवन का लक्षण है और जड़ता मृत्यु का। जो राष्ट्र और समाज प्रगतिशीलता के हामी होते और उसको अपने आचार-विचार में क्रियान्वित करते हैं, वे संसार में अग्रणी बने रहते हैं। अन्य समाजों एवं राष्ट्रों पर उनका प्रभाव बना रहता है। ऐसे प्रभावशाली राष्ट्रों एवं समाजों के व्यक्ति संसार के जिस कोने में जाते हैं, आदर पाते हैं। प्रगतिशील राष्ट्रों की ही सभ्यता-संस्कृति संसार में प्रसार पाती है और इतिहास के अक्षरों से लेकर धरती के वक्ष-स्थल पर प्रगतिशील राष्ट्र व समाज अनन्त काल तक चिरंजीवी बनकर अमिट रहते हैं।
संसार में शायद ही कोई ऐसा राष्ट्र व समाज हो, जो चिरन्तन आयु और अपनी सभ्यता-संस्कृति का प्रसार इस धरा-धाम में न चाहता हो। किन्तु यह सौभाग्य कोई-कोई पाता है। यह सौभाग्य पाने वालों में होते वही समाज एवं राष्ट्र हैं, जो प्रगतिशील होते हैं। एक बार यदि संसार के सारे राष्ट्र व समाज समान रूप से प्रगतिशील बन जायें तो शीघ्र ही संसार से शोषण, उत्पीड़न और गुलामी के दोष दूर हो जायें। किन्तु मुश्किल तो यह है कि एक समय में कुछेक राष्ट्र व समाज प्रगतिशील हो पाते हैं, बाकी अपनी सड़ी-गली पुरातन परम्परा की बेड़ी में जकड़े यथास्थान घसीटते रहते हैं, जिसका फल यह होता है कि वे कतिपय प्रगतिशील समाज व राष्ट्र शेष संसार पर हावी हो बैठते हैं और उसे मनमाने ढंग से हाँकते और उसका शोषण किया करते हैं। ऐसी दशा में शोक-सन्तापों की अभिवृद्धि के कारण यह संसार जलता हुआ नरक-कुण्ड बना रहता है।
प्रगतिशील बनने के लिये इसका ठीक-ठीक अर्थ समझ लेना भी आवश्यक है। क्योंकि इसके नाम पर आज बहुत-सी कुप्रवृत्तियों को आश्रय दिया जाने लगा है। आज लोग आदर्शवाद को छोड़कर भोगवाद और सारल्य-सौम्यता को त्याग कर प्रदर्शन वाद को ही प्रगतिशीलता मानने लगे हैं। मनमाने ढंग से जीवन बिताना और किसी सामान्य सामाजिक अनुशासन को न मानना भी प्रगतिशीलता का लक्षण माना जाने लगा है। जबकि यह प्रगतिशीलता नहीं, बल्कि उच्छृंखलता है।
वास्तविक प्रगतिशीलता उस क्रियाशील विवेक बुद्धि को कहते हैं, जो मनुष्य को आगे देखने और सानुकूल उन्नति पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा और शक्ति सामर्थ्य प्रदान कर सके। जिन मनुष्यों को अपने प्रत्येक व्यवहार में उसके अच्छे बुरे परिणाम का ध्यान रहता है, जिनको यह ज्ञान रहता है कि वे क्या करना चाहते हैं, क्या कर रहे हैं, किस लिये कर रहे हैं और उसका क्या लाभ है? वे वास्तव में प्रगतिशील व्यक्ति हैं। जिसको कोई व्यवहार करते समय उसके हानि-लाभ का ज्ञान न हो और केवल आदतन, देखा-देखी अथवा परम्परा-पालन रूप करता चला जाये वह प्रगतिशील नहीं, जड़ मात्र ही माना जायेगा।
आज भारतीय समाज निःसन्देह इन मानों में बहुत कुछ जड़ हो गया है। उसकी बौद्धिक प्रगतिशीलता कुण्ठित हो गई है। उसका वह स्वतन्त्र चिन्तन धूमिल हो गया, जिसके बल पर वह आज की वास्तविक आवश्यकतायें समझ सके और उनको पूरा करने के लिये प्रयत्न कर सके। आज शताब्दियों से वह जिस दुर्गति के गर्त में पड़ा सड़ रहा है, उसी में पड़े रहने में सन्तोष अनुभव कर रहा है। जीवन को अच्छी प्रकार एक सुव्यवस्थित ढंग से जीने की प्रौढ़ चेतना उसमें दृष्टिगोचर नहीं होती। वह जैसे-तैसे अस्त व्यस्तता के साथ बहुमूल्य जीवन को ठेल कर ठिकाने भर लगा देना ही जिन्दगी का लक्ष्य समझ रहा है। उसे संसार में आगे बढ़ना है। दूसरे के प्रभाव से मुक्त होना है, अपने में उन्नति एवं विकास की परिस्थितियाँ उत्पन्न करनी हैं और एक ऐसा आदर्श-जीवन जीना है, जो दूसरों के लिये अनुकरणीय बनकर उनको वास्तविक सुख-शाँति की ओर ले जा सके।
भारतीय समाज में जब तक यह जड़ता बनी रहेगी, वह किसी भी क्षेत्र में उन्नति न कर सकेगा। स्वतन्त्र हो जाने पर भी अन्य लोग उसकी अप्रगति शीलता से लाभ उठाते हुए अपने प्रभाव में रक्खे रहेंगे, उसे डराते, धमकाते और विविध प्रकार की कुटिल एवं कूटनीतियों से उसका शोषण करते रहेंगे। केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता-भर मिल जाने से ही समाज व राष्ट्र की उन्नति नहीं हो सकती। राजनीतिक स्वतंत्रता तो उन्नति एवं विकास करने का एक अवसर मात्र है, जिसका उपयोग करके उन्नति तो भारतीय समाज को अपने सत्प्रयत्नों के बल पर ही करनी होगी।
भारतीय समाज की गणना आज संसार के पिछड़े समाजों में की जाती है और ईमानदारी की बात तो यह है कि हमारा समाज वास्तव में एक पिछड़ा समाज है। इस सत्य को स्वीकार करते हुए आज भारतीयों का प्रमुख कर्तव्य है कि वह इस कलंक को अपने सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन पर से धो डालें।
संसार के प्रगतिशील राष्ट्रों के समकक्ष होने, उनसे बराबरी का व्यवहार पाने और अपने राष्ट्रीय स्वाभिमान को निरापद करने के लिये आवश्यक है कि हम अपनी वैयक्तिक एवं सामाजिक दुर्बलताओं को दूर करें और अपने में वास्तविक प्रगतिशीलता का गुण उत्पन्न करें।
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि प्रगतिशीलता की प्राप्ति अपने में स्वतन्त्र चिन्तन विकसित किये बिना नहीं हो सकती, परम्पराओं, प्रथाओं एवं चली आ रही पुरानी रीति, नीतियों एवं अन्ध-परम्पराओं से प्रेरित होकर चलना छोड़कर किसी रीति-नीति को अपनी स्वतंत्र चिंतन से औचित्य के तराजू पर तोल कर अपनाना ही प्रगतिशीलता है। कोई परम्परा अथवा प्रथा केवल इसलिये अपनाये रहना कि वह प्राचीन काल से चली आ रही है अथवा किसी रीति-नीति को केवल इसलिये अपना लेना कि वह आधुनिक है, अप्रगति शीलता है। प्रगतिशीलता तो इसमें है कि हम किसी भी रीति-नीति को प्राचीनता अथवा अर्वाचीनता के आधार पर न अपनाकर उसकी उपयोगिता के आधार पर अपनायें। अनुपयोगी प्राचीन परम्परा को छोड़ने और उपयोगी आधुनिकता को अपनाने का साहस रखने वाले ही प्रगतिशील कहे जा सकते हैं।
आज यदि भारतीय समाज को उन्नति करनी है, एक सबल एवं सशक्त राष्ट्र बनकर, दूसरों के प्रभाव एवं निर्भरता से मुक्त होकर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व प्राप्त करना है, संसार के अन्य उन्नत राष्ट्रों के समकक्ष अपना सम्मानपूर्ण स्थान बनाना है, तो उसे प्रगतिशील बनकर अपनी सारी अन्ध-परम्पराओं को निकाल फेंकना होगा, अनुपयोगी एवं हानिकारक प्रथाओं को त्यागना होगा और तिलाँजलि देनी ही होगी उन कुरीतियों को जो प्रगति-पथ पर चट्टान की तरह अड़ी हुई मार्ग रोके हुए हैं।
आज केवल अतीत गौरव के नशे में झूमते रहने से काम नहीं चलेगा। आज संसार की परिस्थिति को खुली आँखों से देखना होगा और वस्तु-स्थिति को स्वतन्त्र बुद्धि से समझना ही होगा, तभी हममें वह चेतना जागृत हो सकेगी, जिसके प्रकाश में अपने कर्तव्य को ठीक-ठीक देख सकेंगे और यदि अतीत की समीपता हमें वाँछनीय है तो फिर हमको निकट अतीत तक ही नहीं, अपने देश के आदिम अतीत तक की यात्रा करनी होगी, और अपने समाज की नव-रचना के लिये उन वैदिक युगीन परम्पराओं एवं रीतियों-नीतियों को लाना होगा, जो आज के समय की आवश्यकता पूरी कर सके और एक उज्ज्वल सामाजिक भविष्य के लिये उपयोगी हो सकें।
चार-छः सौ साल अथवा हजार-दो-हजार वर्ष तक के अतीत काल को वर्तमान अथवा भविष्य के लिये सामाजिक आधार बनाना ठीक न होगा। क्योंकि यह अवधि भारत का अंधकार युग है और इस समय में शुद्ध, सात्विक तथा उपयोगी वैदिक रीति-नीतियाँ, आक्रान्ताओं के षड़यंत्रों एवं मतमतान्तरों के दूषित प्रभाव से विकृत हो गई हैं और आज तक उसी परम्परा में हमारे समाज को जकड़े चली आ रही हैं।
अब भारत स्वाधीन हो गया है। जिस प्रकार पराधीनता के अन्ध-युग की परम्पराओं एवं सामाजिक विकृतियों को हम विवशतापूर्वक अब तक ढोते चले आये हैं, उसी प्रकार उनको आज के स्वाधीन प्रकाश में त्याग दें। इसी में उन्नति है, प्रगति है और कल्याण है।
कर्म का महत्व और समय का मूल्य समझने वाले सुबुद्धिमान कर्म-योगी जितना काम थोड़ी-सी आयु में भी कर जाते हैं, उसका शताँश काम, मृत्यु के मानो भुलाये हुये से—रगड़ जिन्दगी और घिस-घिस करने वाले—अनेक अकर्मण्य जन्म-जन्मान्तर में नहीं कर सकते।
खाते-पीते, सोते-जागते, हँसते-बोलते तो सभी हैं, क्या कर्मठ और क्या निठल्ले, किन्तु अन्तर केवल यह होता है कि कर्मठ व्यक्ति यह सब कुछ काम करने के लिये नई शक्ति और ताजगी पाने के लिये करते हैं और निठल्ला इसी के लिये यह सब कुछ करता है।
केशवचन्द्र सेन ऐसे ही कर्मवीरों में से एक थे जो चालीस-पैंतालीस साल की छोटी-सी आयु पाने पर भी इतना काम कर गये हैं कि समाज युग-युग उसका लाभ उठाता रहेगा।
केशवचन्द्र सेन एक धार्मिक प्रवृत्ति तथा आध्यात्मिक विचार धारा के सामाजिक कार्यकर्ता थे। किन्तु उन्हें धर्म पर वाद-विवाद करने और उसे किसी संकीर्ण सीमा में बाँधने वालों के प्रति बड़ी नापसंदगी थी। उनका कहना था कि धर्म वाद-विवाद का नहीं कर्म का विषय है और उसकी परिधि किन्हीं विशिष्ट नियमों तक ही सीमित नहीं है बल्कि वह एक ऐसा सार्वभौमिक सत्य है जो तीनों कालों में सबके लिये—सब जगह, समान रूप से, मान्य एवं मंगलमय है।
मानव मात्र का धर्म एक है। दो हो ही नहीं सकते। जिन कर्मों और जिन विचारों से मानव द्वारा मानव ही नहीं प्राणी मात्र को सुख और शान्ति मिले वह ही धर्म है, अन्य सब बातें अधर्म हैं।
इस प्रकार की उदात्त एवं उदार विचार धारा और तदनुकूल एवं तदर्थ ही कार्य करने वाले केशवचन्द्र सेन का जन्म कलकत्ते के एक भरे-पूरे परिवार में 19 नवम्बर सन् 1838 ई. को हुआ।
सेन महोदय अपने पिता एवं पितामह के बड़े लाड़ले बच्चे थे। किन्तु फिर भी उन्होंने केशवचन्द्र सेन को लाड़ करने में कभी कोई ऐसी भूल नहीं की जिससे कि प्रायः बच्चे बिगड़ जाते हैं। उनके पितामह दीवान रामकमल सेन अपने समय के अद्वितीय विद्वान और एक कर्मठ समाज सेवक थे। उनकी विद्वता तथा सेवा को देखते हुए उन्हें भारतीय होने पर भी ‘एशियाटिक सोसायटी’ का मन्त्री चुना गया था।
दीवान रामकमल सेन अपने पौत्र को अधिकतर अपनी देख-रेख में ही रखते थे और सामाजिक कार्यक्रमों के समय सभा-सोसाइटियों में अपने साथ ले जाया करते थे, जिससे केशवचन्द्र सेन में शीघ्र ही सामाजिक चेतना जाग उठी और आयु के साथ उनकी विचार-शक्ति भी आत्म-निर्भर होने लगी। आगे चलकर उन्होंने सामाजिक कुरीतियाँ, धार्मिक भ्राँतियाँ, अन्धविश्वासों तथा ऊँच-नीच का भाव मिटाने के लिए बहुत ही सराहनीय काम किया।
कहना न होगा कि जिन बच्चों के अभिभावक अपने बच्चों को उन्नत बनाने के निश्चित ध्येय से पालते हैं, एक तो वे स्वयं ही समाज के लिये बहुत कुछ करके एक आदर्श उपस्थित करते हैं, दूसरे बच्चों को दिन-रात इसकी प्रेरणा देते रहते हैं। इस प्रकार पाले हुये बच्चे, निःसन्देह समाज में अपना एक उच्च स्थान बनाते हैं और संसार में अपने देश का नाम ऊँचा करते हैं।
उन्नीस वर्ष की अवस्था में पहुँचते-पहुँचते केशवचन्द्र सेन समाज-सेवा के क्षेत्र में उतर पड़े।
उनका चिन्तन रुझान एवं कार्यक्रम देखकर घर वालों को चिन्ता होने लगी। वे चाहते थे कि लड़का कमाये, खाये, मौज करे, कमाई से घर भरे। उन्होंने केशवचन्द्र को उनके इस स्वभाव से विरत करना चाहा, किन्तु बहुत कुछ प्रयत्न करने पर भी वे सफल न हो सके। केशवचन्द्र सेन को जो लगन लग गई सो लग गई। वास्तव में ऐसी ही अटल निष्ठा वाले व्यक्ति संसार में कुछ काम कर भी सकते हैं। ढुलमुल विचारधारा वाले न आज तक कोई काम कर सके हैं और न कभी कर पायेंगे।
अपने अध्ययन कार्यक्रम में केशवचन्द्र सेन पर जिस विचारधारा का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा वह थी ‘ब्राह्मसमाजी’ विचारधारा। इस विचारधारा से केशवचन्द्र सेन को प्रभावित करने वाली राज नारायण वसु द्वारा लिखित पुस्तक “ब्राह्मवाद क्या है?” रही है। इस पुस्तक के अध्ययन से श्री सेन को पता चला कि ब्रह्म-समाज एक ऐसी संस्था है जिसका उद्देश्य भारतीयों की आध्यात्मिक सामाजिक उन्नति करना है। समाज-सेवा करने को लालायित केशवचन्द्र सेन को एक दिशा मिली और वे तत्काल ब्रह्म-समाज के सदस्य बन गये।
नया रक्त, नया उत्साह और नवीन कार्यक्षमता लेकर आये हुये केशवचन्द्र सेन ने संस्था में एक नवीन प्राण फूँक दिये। जिसके आगमन से यदि किसी संस्था में एक नया जागरण और अग्रगामी प्रगति के लक्षण नहीं आते तो समझ लेना चाहिए कि वह व्यक्ति संस्था में कुछ काम करने के लिए नहीं, कोई स्वार्थ साधन के लिए आया है। जिसमें काम करने की लगन होगी संस्था का उद्देश्य सफल बनाने का जोश होगा, उसके पदार्पण करने से उसमें नवजीवन अवश्य आ जायेगा। ऐसे ही कार्यकर्ताओं की समाज एवं संस्थाओं को वास्तविक आवश्यकता रहती है, वैसे तो उनकी सदस्य-संख्या बढ़ाने-घटाने के लिए सैकड़ों लोग आते-जाते ही रहते हैं।
अधिक नहीं केवल दो वर्ष के कामों से ही केशवचन्द्र सेन राजा राममोहन राय की स्थापित की हुई और ईश्वर चन्द्र विद्यासागर जैसे प्रकाण्ड पंडितों की प्रचण्ड कर्मठता से पाली हुई संस्था ‘ब्रह्म-समाज’ के प्रमुख कार्यकर्ता बन गये। यह कोई साधारण उपलब्धि न थी, किन्तु सच्चे कार्यकर्ता और ऊँचे उद्देश्य रखने वाले केशवचन्द्र सेन के लिए यह अभी श्री गणेश से भी कम था।
जो समाज से कुरीतियाँ, अन्ध-विश्वास और अवाँछित एवं अहितकर बीमारियाँ मिटाकर उसका काया-कल्प कर डालने का संकल्प लेकर तन, मन, धन से मैदान में उतरा हो वह संस्था में अपनी प्रमुखता से प्रसन्न हो उठे यह कैसे हो सकता है, और यदि ऐसा होता है तो उसके इरादे छोटे और विचार ओछे हैं। मान-वृद्धि का अर्थ—आराम-वृद्धि नहीं, कार्य-वृद्धि होता है।
संस्था में प्रमुखता पाते ही केशवचन्द्र सेन और अधिक सक्रिय एवं सजग हो उठे क्योंकि वे जानते थे कि अब संस्था का मानापमान उनके नाम के साथ जुड़ गया है। उनकी इस अधिकाधिक उत्तरदायित्व भावना एवं सक्रियता का फल यह हुआ कि वयोवृद्ध देवेन्द्र ठाकुर जैसे महान व्यक्ति के साथ इक्कीस वर्ष की अवस्था में ही संयुक्त मंत्री चुन लिये गये। जिस उत्तरदायित्व को महर्षि कहे जाने वाले देवेन्द्र ठाकुर ने सफेद हो जाने पर पाया वह केशवचन्द्र सेन ने इतनी कम आयु और इतने कम समय में पा लिया।
केशवचन्द्र सेन की योग्यता एवं कार्य क्षमता ने उन्हें केवल संस्था का ही नहीं, बल्कि देवेन्द्र ठाकुर का भी दाहिना हाथ बना दिया और वे बहुत कुछ उन पर निर्भर रहने लगे। 1859 के साल में जिस समय देवेन्द्र ठाकुर पर लंका में प्रचार कार्य का भार डाला गया तो वे तब तक वहाँ जाने को तैयार न हुये जब तक कि संस्था केशवचन्द्र सेन को उनके साथ भेजने को तैयार न हो गई।
लंका में श्री केशवचन्द्र सेन ने संस्था के उद्देश्यों का इस योग्यता के साथ प्रचार किया कि वहाँ बहुत से लोग उसके अनुयायी बन गये। अनुभव और आदर पाकर लंका से लौटने पर उन्होंने “ब्रह्म-समाजी-विचार धारा” पर अनेक उपयोगी पुस्तकें लिखीं जिसमें से “युवा बंगाल! यह तुम्हारे लिये”—ने इतना व्यापक प्रभाव डाला कि संस्था की सदस्य संख्या कुछ ही दिनों में हजारों की तादाद में बढ़ गई।
इस समय कतिपय परिस्थितियों तथा वयोवृद्धता के कारण पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने संस्था से त्याग पत्र दे दिया। श्री केशवचन्द्र सेन अपनी पात्रता प्रमाणित ही कर चुके थे। निदान विद्यासागर ने विश्वास पूर्वक उन्हें ही भारत की विधवाओं का उद्धार करने का महान उत्तरदायित्व सौंपकर संतोष की श्वाँस ली। श्री केशवचन्द्र सेन भी पद लोलुपता को पाप समझते थे और समझते अपने उत्तरदायित्व। निदान विद्यासागर को दिये अपने वचन के अनुसार विधवाओं के उद्धार-कार्य में पूरी तरह से जुट गये।
विधवाओं के उद्धार कार्य में विधाता विवाह उन्हें सबसे सार्थक कार्य लगा और वे विविध प्रकार से इसके प्रचार में लग गये। उन्होंने इसके समर्थन में भाषण दिये, लेख लिखे और नाटक खिलाये। विचार गोष्ठियों में लोगों को समझाया, प्रेरित किया और विधवा विवाह के लिए तैयार किया। उनके इस धुआँधार प्रचार से समाज में विधवा-विवाहों का प्रचलन होने लगा और श्री केशवचन्द्र सेन का सम्मान बढ़ गया।
जनमत को केशवचन्द्र सेन के पक्ष में होते और जनमानस में उनका स्थान बनते देखकर बंगाली नौजवानों से भयभीत रहने वाली तात्कालिक बंगाल सरकार के कान खड़े हो गये। उसने सोचा यदि केशवचन्द्र जैसा तेजस्वी कार्यकर्ता कहीं गोरी सरकार की अनीतियों की ओर मुड़ गया तो सरकार को लेने के देने पड़ जायेंगे। निदान उसने उनको उपकृत करने के लिए “बैंक आफ बंगाल” में एक प्रतिष्ठित पद देने का प्रस्ताव किया। किन्तु समाजसेवा में अपना सर्वस्व अर्पण कर देने वाले केशवचन्द्र सेन ने उसे स्वीकार न किया। केशवचन्द्र के इस त्याग ने समाज में उनका विश्वास तथा सम्मान और भी बढ़ा दिया।
उसी समय देश के पश्चिमोत्तर प्रदेशों में भीषण अकाल पड़ा। हजारों आदमी भूखों मरने लगे। श्री केशवचन्द्र सेन संसार के सारे काम छोड़कर अकाल-पीड़ितों की सेवा में जुट गये। उन्होंने पूरे पीड़ित-क्षेत्र का दौरा किया। भूखों के लिए अन्न-धन, सहानुभूति तथा सहायक इकट्ठे किये, और एक सहायता-कोष की स्थापना की। अकाल-पीड़ितों की सहायता में केशवचन्द्र सेन ने न केवल श्रम एवं सहानुभूति का ही दान दिया, बल्कि अपने बहुत से पैसे को भी उनकी सेवा में लगा दिया।
1870 में श्री सेन इंग्लैंड गये। वहाँ पर उन्होंने भारत की आध्यात्मिक विचारधारा का इतनी सरलता एवं सफलता के साथ प्रचार तथा प्रतिपादन किया कि उन्हें “भारत का आध्यात्मिक राजदूत” कहा जाने लगा।
श्री केशवचन्द्र सेन इंग्लैंड केवल सैर-सपाटे के लिए नहीं गये थे। बल्कि वे वहाँ समाज का अध्ययन करने उसकी अच्छाई बुराई को देखने और उसके सुधार के उपायों का आधुनिक दृष्टिकोण पाने गये थे। अस्तु अपने उद्देश्य पूर्ति के बाद वे भारत वापस आये और यहाँ “इण्डियन रिफार्म एसोसियेशन” नाम की एक समाज-सुधारक संस्था और स्थापित की। इसके अतिरिक्त उन्होंने “सुलभ समाचार” तथा “मदन गरल” नामक दो पत्र-पत्रिकायें भी निकाली।
स्त्रियों के हित के लिए श्री केशवचन्द्र सेन ने जहाँ विधवा-विवाह का प्रचलन कराया वहाँ उनकी शिक्षा के लिए अनेक पाठशालायों, विद्यालयों एवं विक्टोरिया कॉलेज जैसी शिक्षा संस्थाओं की स्थापना कराई। अनेक अस्पताल तथा शिल्प-कला-भवन बन गये।
सभी धर्मों की एकता के हामी तथा उदार विचारधारा के होने पर भी श्री केशवचन्द्र सेन हिन्दू धर्म पर ईसाई पादरियों के औंधे एवं विरोधात्मक प्रहार सहन न कर सके और 1862-63 में उन्होंने ईसाई पादरियों की ऐसी खबर ली कि वे हिन्दू धर्म के विरुद्ध प्रचार करना ही भूल गये। इसी समय भारत में शिक्षा प्रसार तथा सच्चे धर्म का स्वरूप दिखाने और उसका प्रचार करने के लिए ‘इण्डियन मिरर’ नाम का एक समाचार-पत्र भी निकाला।
श्री केशवचन्द्र सेन ने अपने त्याग और तपस्या से अपनी प्रतिभा एवं व्यक्तित्व पर जो पानी चढ़ाया था उसने उन्हें एक ऐसे स्तर पर पहुँचा दिया जहाँ से लोग उन्हें देवदूत की दृष्टि से देखने लगे। उन्होंने, समाज-सुधार शिक्षा, स्त्री-शिक्षा, धर्म तथा अध्यात्म क्षेत्र में इतना काम किया कि लोग उन्हें युग-युग तक नहीं भूल सकते।
इस प्रकार आजीवन समाज की सेवा करते-करते जब वे 8 जनवरी 1883 में केवल 46 वर्ष की अवस्था में स्वर्ग सिधारे उससे पूर्व बंगाल के तरुणों में नवीन भावना, नवीन विचार और नया जोश भरने के लिये “भारत-आश्रम” और “ब्राह्म-निकेतन” नाम की दो संस्थायें और स्थापित कर गये।
महापुरुष आते है, सुधार कर जाते हैं और सन्देश देकर चले जाते हैं। अब यह उस समाज का भाग्य अथवा दुर्भाग्य होता है कि वह उन सन्देशों से लाभ उठाता है या नहीं।
यह वह समय था, जब भारत में अंग्रेजी राज्य की जड़े मजबूत करने के लिये शिक्षा को साधन रूप में प्रयुक्त किया जा रहा था। 1857 के बाद अंग्रेज कूटनीतिज्ञों ने यह बात अच्छी तरह समझ ली थी कि जब तक भारतीयता को नष्ट करके भारत में अंग्रेजियत का प्रचार नहीं किया जायेगा, अंग्रेजों का राज्य चिरस्थायी नहीं हो सकता।
अंग्रेजों ने इसके दो मार्ग निकाले, एक तो धर्म-प्रिय साधारण जनता को ईसाईयत की विशेषता बतलाकर और उनकी सामाजिक परिस्थिति तथा आर्थिक दशा का लाभ उठा कर ईसाई बनाना दूसरे अपेक्षाकृत सम्पन्न तथा जागरूक जनता में से तरुण वर्ग को शिक्षा के माध्यम से अंग्रेजियत में रंग कर अपना मानसिक गुलाम बनाना।
निदान सरकार ने शिक्षा प्रसार का दायित्व अपने पर लेने के बहाने से जनता के बीच जन-सहयोग से चलने वाली सभी छोटी-बड़ी शिक्षा-संस्थाओं को बन्द कर दिया, जिनमें धर्म के माध्यम से जीवन के सभी अंगों की शिक्षा दी जाती थी। सरकारी स्कूल स्थापित किये गये और उनमें बाबूशाहों का निर्माण होने लगा। ईसाईयत सिखाई जाने लगी।
सरकार की यह योजन सफल हुई और नवयुवक अंग्रेजी राज्य के अनुकूल शिक्षा पा-पाकर उसके यंत्र बनने लगे। थोड़ी अंग्रेजी पढ़ने और अंग्रेजियत को अपनाने वालों को अच्छे-अच्छे सरकारी पद मिलने लगे और वे लोग इसे अपना भाग्य समझने लगे।
उस समय सरकार की इस भयंकर योजना का विरोध करना शेर के दाँत गिनने के समान था। सरकार सन् 1857 के आघात से आहत होकर बौरा चुकी थी और जरा-सा भी विरोध करने वाले को राज-द्रोही ठहरा कर तरह-तरह के त्रास देकर बर्बाद कर रही थी। बड़ा विषम समय था। एक ओर भारतीयता थी और दूसरी ओर प्राणों का भय। स्वातंत्र्य-संग्राम की विफलता ने जनता में एक निराशा की भावना पैदा कर दी थी। लोग किसी भी अत्याचार को ईश्वरीर इच्छा समझ कर सह लेने में खैरियत समझते थे।
ऐसी भयंकर परिस्थिति में जो व्यक्ति अपने बुद्धि एवं साहस के बल पर राष्ट्र की रक्षा कर सके, वे वास्तव में परमात्मा के रूप ही थे।
जहाँ एक और लोग भय से किंकर्तव्य विमूढ़ होकर अनचाहे भी सरकारी शिक्षा योजना में सहयोग कर रहे थे, वहाँ एक आत्म-विश्वासी व्यक्ति ऐसा भी था, जो प्राणों को दाँव पर लगाकर सरकार की इस विषय योजना को सफल होने से रोक देने के लिए मन ही मन संकल्प पूर्ण तैयारी कर रहा था वह व्यक्ति था- नव-युवक हँसराज!
हँसराज, जो आगे चलकर- महात्मा हँसराज के नाम से प्रसिद्ध हुए। यह जिस समय शिक्षा पा रहे थे, उस समय सर का की इस नीति का भी अध्ययन कर रहे थे। वे सरकार की इस शिक्षा-प्रणाली के प्रारम्भ से ही विरोधी थे, किन्तु उन्होंने उसका बहिष्कार नहीं किया प्रयुक्त अधिकाधिक संलग्नता से विद्या प्राप्त की, अंग्रेजी पढ़ी। वे जानते थे कि कोई भी भाषा क्यों न हो, यदि वह ऊँचे स्तर तक पढ़ी जाती है तो कोई ऐसी हानि नहीं पहुँच सकती, जैसी कि हानि, पूर्णता से नहीं, अपूर्णता से होती है।
यही बात किसी धार्मिक दर्शन के संबंध में भी होती है। जिस धार्मिक शिक्षा की ऊपरी बातों तक ही सीमित रहा जायेगा, उसका कुछ ऐसा प्रभाव भले पड़ जाये, जिससे कोई एक विश्वास अथवा पद्धति से हटकर दूसरे विश्वास अथवा पद्धति पर चला जाये, किंतु जब उसकी गहराई में उतर कर उसका साँगोपाँग अध्ययन तथा मनन किया जाता है, तब उसकी सारी असलियत सामने आ जाती है और उस दशा में यदि वह दर्शन सत्य पर आधारित है तो उसके अपनाने में किसी हानि की संभावना नहीं रहती और वह यदि यों ही कपोल कल्पित चिंतन पर आधारित होगा तो किसी भी विवेकशील व्यक्ति पर प्रभाव न डाल सकेगा।
महात्मा हंसराज अंग्रेजी का पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर उसी के माध्यम से अंग्रेजी को समझने और उनकी चाल को विफल करना चाहते थे। साथ ही ईसाईयत के प्रभाव का उन्हें कोई भय न था। इसके लिये वे भारतीय-धर्म तथा वैदिक-साहित्य को अच्छी तरह पढ़ चुके थे और स्वामी दयानन्द की तीव्र तर्क-पद्धति की अपने मस्तिष्क में प्रति-स्थापना कर चुके थे।
महात्मा हंसराज ने ईसाईयत के बीच अंग्रेजी पढ़ी और इतना गम्भीर अध्ययन किया कि जिस समय उन्होंने उत्तम श्रेणी में बी.ए. पास किया तो उन्हें अपने में लाने और उनकी योग्यता का लाभ उठाने के लिये सरकार के मुँह में पानी आ गया। निदान बी.ए. की उपाधि लेते ही उसने महात्मा हंसराज की ओर बड़ी से बड़ी सरकारी नौकरी की फूल-मालायें बढ़ाई। सरकार को पूरी आशा थी कि उनकी मादक-गन्ध से एक भारतीय युवक अवश्य मोहित होकर आकर्षित होगा और अंग्रेजी राज्य की जड़ें मजबूत करने में सहायक बनेगा।
किन्तु महात्मा हंसराज उन युवकों में न थे, जिनके सामने मौज लेने के अतिरिक्त जीवन का कोई अन्य लक्ष्य ही नहीं होता। उस समय जब अंग्रेज सरकार शिक्षा के कुठार से भारतीयता की जड़ें काट कर अंग्रेजियत बो रही थी और किसी भी माई के लाल के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही थी, तब भला भारतीयता के प्रति भयंकर खतरा अनुभव कर लेने पर भी वह किस मुँह से मौज-मजा लेते और चैन की नींद सोते। अन्याय एवं अनुचित के प्रति बलिदान की परम्परा जगाते रखने के लिये कोई न कोई बलि-वेदी पर आता ही रहना चाहिये। अन्यथा राष्ट्रीयता मिट जायेगी, देश निर्जीव हो जायेगा और समाज की तेजस्विता नष्ट हो जायेगी।
जिसने खतरा अनुभव किया, उसका कर्तव्य था कि वह आगे बढ़े। महात्मा हंसराज ने बड़ी गम्भीरता से विचार करके तथा समाज की मनोवृत्ति का ठीक-ठीक अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला कि सरकार की इस जटिल शिक्षा नीति का विरोध किसी आन्दोलन, संघर्ष अथवा खुली चुनौती के रूप में करना ठीक न होगा। सरकारी शिक्षा-प्रणाली को किसी समानान्तर शिक्षा-प्रणाली से ही निरस्त करना ठीक होगा।
अध्ययन से निवृत्त होकर चल पड़ा, भारतीयता के संरक्षण का व्रती। किधर? रोटी-रोजी और मौज-मजे की तलाश में—नहीं—एक ऐसे बिन्दु की तलाश में, जहाँ से वह अपना शुभ अभियान प्रारम्भ करे। जिस दिन निस्पृह एवं निष्कलंक समाज-सेवियों, धर्म-निष्ठों तथा देश-भक्तों को रोटी की कमी पड़ने लगेगी, उस दिन संसार से राष्ट्रीयता की संज्ञा ही उठ जायेगी। देश और धर्म की चिन्ता करने वाले मनीषियों को चाहिये ही क्या? केवल मुट्ठी भर अन्न और वह भी इसलिये कि जन-सेवा के लिये वे कल भी जी सकें। जिस आत्म-त्यागी की सारी कामनाएं, वासनाएं और आवश्यकताएं किसी जन-कल्याण के यज्ञ में आहुति बन चुकी हों, उसे अपनी सुध रहती ही कब है? उसकी खोज-खबर लेने का दायित्व तो उन कोटि-कोटि व्यक्तियों पर आ जाता है, जिनके हित के लिये वह अपने को खपा रहा है।
ला. हंसराज के सामने केवल एक उद्देश्य था कि कोई ऐसी योजना बनाई जाये, जिससे जन-साधारण को भारतीय राष्ट्र के अनुकूल शिक्षित करके उनमें आत्मविश्वास, देश-भक्ति तथा स्वाभिमान की भावना जगाई जा सके। भारतीयता के प्रति बढ़ती हुई उनकी हीन-भावना और ईसाईयत से ओत-प्रोत अँग्रेजियत के प्रति बढ़ती हुई आस्था को रोका जा सके। महात्मा हंसराज के बुद्धिमत्तापूर्ण इस एक उद्देश्य में ही राष्ट्र की सारी आवश्यकताएं सन्निहित थीं। देखने में छोटा लगने वाला यह उद्देश्य कितना व्यापक था? इसको कोई दूरदर्शी बुद्धिमान ही देख सकता था। वे कोई लम्बी-चौड़ी योजना सामने रखकर जनता को भयभीत करना तथा सरकार को चुकाना न चाहते थे।
एक समय में कोई एक ही विचार, किसी एक ही मस्तिष्क में नहीं आता, लाखों के मस्तिष्क में 19-20 के अनुपात तथा बुद्धि की पात्रता के अनुसार एक साथ अवतरित होता है। और जब कोई एक साहसी उसकी समीचीनता की घोषणा करने के लिये खड़ा होता है तो उसके झंडे के नीचे सजातीय विचारवानों को एक बड़ी संख्या में इकट्ठा होते देर नहीं लगती।
लाहौर में कुछ विचारवानों ने स्वामी दयानन्द कॉलेज कमेटी की स्थापना कर रक्खी थी और चाहते थे कि किसी प्रकार स्वामी दयानन्द के नाम पर ऐसा विद्यालय प्रारम्भ किया जाये, जिसमें ठीक-ठीक राष्ट्रीय शिक्षा दी जा सके। कोई कमेटी बना लेना एक बात है और उसके उद्देश्यों को कार्यान्वित करना दूसरी बात। कमेटी तो बना ली किंतु सरकारी भय के कारण उसके सदस्य यह न समझ पाते थे कि स्कूल की स्थापना करके उसे कैसे चलाया जाये?
विद्वान हंसराज ने कमेटी में प्रवेश किया और एक छोटा सा विद्यालय स्थापित करके उसमें अवैतनिक शिक्षक बन गये। सच्ची भावना से योजना का सूत्रपात हो गया और उसकी प्रगति के साथ विरोध भी प्रारम्भ हो चला। किन्तु इससे क्या? जन-साधारण का विरोध योजना की महानता का प्रमाण-पत्र होता है। जिस योजना का विरोध नहीं होता, जिस नियोजन की आलोचना नहीं होती, समझ लेना चाहिये कि उस योजना में कोई जीवन नहीं है, कोई नवीनता नहीं है।
उक्त नवजात संस्था को मिटा सकने के लिये सरकार कोई बहाना न पाकर केवल इतना ही कर सकी कि उसने कोई आर्थिक सहायता देने से इन्कार कर दिया। इसको संस्था के संस्थापकों ने शुभ ही समझा। क्योंकि वे स्वयं ही सरकार से कोई सहायता न लेना चाहते थे, क्योंकि उस दशा में उन्हें सरकारी नियमों के पचड़े में पड़ना होता, जिससे संभव था कि उन्हें अपने उद्देश्य में कुछ हेर-फेर करना पड़ता। उद्देश्य की न्यूनता के साथ पाई हुई किसी सुविधा की अपेक्षा उद्देश्य की रक्षा में पाई असुविधा अधिक श्रेयस्कर होती है।
सरकार ने न केवल अनुदान देने में ही विमुखता दिखलाई, बल्कि उक्त विद्यालय को मान्यता देने में भी अनुदारता वर्ती। किन्तु सुयोग्य शिक्षक महात्मा हंसराज अपना काम करते रहे। शीघ्र ही उनके परिश्रम का फल जन-साधारण की चर्चा के रूप में फलीभूत हुआ और लोग संस्था की ओर आकर्षित होने लगे। आत्म अनुशासित तथा त्यागी शिक्षक के पढ़ाये हुए छात्र चमकते हुए हीरों की तरह निकलने लगे, जिससे अभिभावकों की आस्था दिनों-दिन बढ़ती गई और छोटा-सा प्रारम्भिक स्कूल विस्तार एवं विकास पाने लगा।
कुछ समय बाद उस शिक्षा संस्था को डी. ए. वी. स्कूल के नाम से ख्याति प्राप्त हुई और उसके शिक्षा अभियान को डी.ए.वी. आन्दोलन का नाम मिला। डी.ए.वी. स्कूल की वेग से बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखकर सरकार को शर्म आई और उसने जन-आलोचना के भय से स्कूल को मान्यता दे दी। मान्यता के प्रथम वर्ष में ही सुयोग्य शिक्षक के पढ़ाये विद्यार्थियों ने हाई स्कूल की सारी छात्र वृत्तियाँ जीत लीं।
महात्मा हंसराज की भावनापूर्ण तपस्या फलीभूत हुई, उनका त्याग अंकुरित हुआ और देश में डी.ए.वी. स्कूलों तथा कालेजों को जाल बिछने लगा। अनेक बैंकों, बीमा कम्पनियों तथा उद्योगों ने मुक्त हस्त दान देना प्रारम्भ कर दिया और स्कूल— कालेजों में बदलने लगे।
महात्मा हंसराज के जीवन-काल में डी.ए.वी. मिशन के अनेक शिल्प विद्यालय, टेकनिकल स्कूल, आयुर्वेदिक कॉलेज, नार्मल स्कूल, वैदिक शोध संस्थान, कला-विज्ञान कॉलेज तथा वैदिक धर्म प्रचारकों की शिक्षण संस्थायें बन गई। इसके अतिरिक्त डी ए.वी. आन्दोलन के अंतर्गत उसके अपने बैंक, बीमा कम्पनी तथा अनेक उद्योग भी चलने लगे।
महात्मा हंसराज की तपस्या का यह हाहाकारी अपनी लोक-प्रियता बनाये रखने के लिये सरकारी शिक्षाप्रणाली में परिवर्तन करना पड़ा। महात्मा हंसराज का मिशन पूरा हुआ। भारतीयता की रक्षा हुई और अंग्रेज कूटनीतिज्ञों की दूरगामी योजना विफल हुई। डी.ए.वी. आन्दोलन के रूप में देश को महात्मा हंसराज की देन अनुपम है, जिसके लिये—क्या भारतीयता और क्या भारतीयता, युग-युग उनकी आभारी रहेगी।
आज से लगभग 27-28 वर्ष पूर्व संसार से वह महान् आत्मा दिवंगत हो गई, किन्तु डी.ए.वी. शिक्षा संस्थाओं तथा आन्दोलन के अंतर्गत चलती हुई योजनायें उसे सदा अमर रखेंगी।
शिष्टता मनुष्यता की सबसे बड़ी पहचान है। मनुष्य को मनुष्य की तरह ही रहना शोभा देता है। जो मनुष्य होता हुआ भी अपने शील स्वभाव को उसके अनुरूप नहीं ढालता वह पशु से भी गया गुजरा होता है।
पशु तो पशु होता है। उसमें वह विवेक बुद्धि नहीं होती जिसके बल पर वह अपने आचार को सुन्दरता के साँचे में ढाल सके। उसको प्रकृति ने जैसा बना दिया, वह आदि से अन्त तक उसी प्रकार का बना रहता है। इस नैसर्गिक विवशता के कारण उसको किसी आचार के लिये दोष भी नहीं दिया जा सकता।
किन्तु मनुष्य को परमात्मा ने एक विशेष विवेक-बुद्धि दी है—इसलिए कि वह अपनी जड़ता का परिष्कार करके सुन्दर एवं सभ्य बने। यदि वह अपनी इस विवेक विशेषता को काम में लाकर अपने शील स्वभाव को परिष्कृत नहीं करता तो उसे उसी प्रकार क्षमा नहीं किया जा सकता जिस प्रकार हाथ-पैर सक्षम एवं अक्षत रहने पर भी पराश्रित व्यक्ति के आलस्य एवं प्रमाद को। मनुष्य कितना ही महान एवं धनवान क्यों न हो यदि वह अकारण आलस्यवश किसी पर करणीय कार्यों के लिए बोझ बना रहता है तो आलोचना का पात्र है। उसको कोई भी पसन्द नहीं करेगा।
इसी प्रकार बुद्धि विवेक के अक्षत होने पर भी जो असभ्य हैं, अशिष्ट और शील रहित है वह भर्त्सना का पात्र है। यह बात दूसरी है कि अन्य लोग परिस्थिति वश उसकी अशिष्टता अथवा दुःशीलता को शिष्टता और सभ्यता के नाते भले ही सहन कर लें और उस पर कोई टीका-टिप्पणी न करें, किन्तु मन ही मन उससे घृणा अवश्य किया करते हैं। उसके संपर्क में आने से बचते हैं। यह भी एक प्रकार का मानसिक बहिष्कार है। जिसको कोई अपनी धृष्टता अथवा दुर्बोधता के कारण भले ही महत्व न दे पर यह होता है बहुत ही अपमानजनक दण्ड।
मौन मानसिक बहिष्कार, खुले बहिष्कार से कहीं अधिक भयानक होता है। खुले बहिष्कार में मनुष्य को अपनी स्थिति तथा उसमें होने वाली हानियों का ज्ञान रहता है जिससे उसको अपने सुधार की प्रेरणा मिलती रहती है और आगे पीछे वह अपना सुधार कर भी सकता है। किन्तु जो मौन मानसिक बहिष्कार का शिकार होता है उसे अपनी स्थिति की जानकारी नहीं रहती जिससे वह आत्म-सुधार की प्रेरणा से भी वंचित रह जाता है।
यह भी कोई जिन्दगी है कि लोग शील-स्वभाव की गन्दगी के कारण हमें घृणा करें। सामने आने पर बचने का प्रयत्न करें। बात करने से मुँह बचायें और कम से कम संपर्क में आने का प्रयत्न करें। अब कोई यदि ऐसी जिन्दगी अपने अशिष्टाचार के कारण बनाये रखना चाहता है तो उस पर तरस खाने के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?
मानवीय जिन्दगी तो वास्तव में यह है कि लोग देखते ही खुश हो जायें। मिलते ही स्वागत करें। बात करने में आनन्द अनुभव करें और साथ संपर्क से तृप्त न हों। एक बार मिलने पर दुबारा मिलने के लिए लालायित रहें। फिर मिलने का वचन माँगें। इस प्रकार की प्रियता पूर्ण जिन्दगी उसी को मिलती है जो मनुष्यता के पहले लक्षण शिष्टाचार को अपने व्यवहार में स्थान देता है।
अशिष्टाचारी से तो लोग मरखने बैल की तरह बचने का प्रयत्न करते हैं। न जाने किस समय वह ऐसी बात कह दे जो तीर की तरह चुभ जाये, न जाने वह किस वक्त अपमान कर बैठे और न जाने वह किस वक्त कोई ऐसी हरकत, ऐसी मुद्रा और ऐसा प्रदर्शन कर उठे जिससे मानसिक विषण्णता और हार्दिक विक्षोभ उत्पन्न हो जाये। कोई किसी से अकारण अपमानित अथवा क्षोभ-विक्षोभ पाने के लिए क्यों तैयार होगा? और क्यों कोई उसको पसन्द करेगा? असभ्य तथा अशिष्टाचारी से इस प्रकार की सम्भावना हर समय बनी रहती है। इससे हर भला आदमी उससे बचे रहने में ही कल्याण देखता है।
अशिष्ट और शिष्ट के विषय में उनके मिलने पर होने वाली मानसिक प्रतिक्रिया को गोस्वामी तुलसीदास जी ने जिन मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है वह सर्वथा उचित ही है—
मिलत एक दारुण दुख देहीं। विछुरत एक प्रान हरि लेहीं॥
वास्तव में अशिष्ट का मिलन एक बड़े दुःख का ही कारण होता है। अशिष्ट स्वभावतः धृष्ट भी होता है और उसकी धृष्टता को तब तक सन्तोष नहीं होता, तब तक चैन नहीं पड़ती जब तक वह किसी के अकारण कष्ट अथवा अपमान का हेतु नहीं बन लेती।
मर्यादाहीन रहना, नियमों का पालन न करना और अनधिकार चेष्टा करना कोई भी अशिष्ट अपना अधिकार समझता है। कठोर तथा तीखे वचन बोलना, दुराग्रह करना, किसी की दुःख तकलीफ का उपहास उड़ाना, किसी की कमी से मनोरंजन करना, किसी की मान-मर्यादा का विचार न रखना, सबको एक लकड़ी से हाँकना, अपने को सबसे ऊपर मानना, यह सब अशिष्टता के ही लक्षण हैं।
शिष्ट व्यक्ति सबसे यथोचित व्यवहार करता है। वह अपनी और दूसरों की सीमाओं का ध्यान रखता है। मर्यादा के उल्लंघन को बुरा मानता है। हर बात को हल्के और व्यंग-विनोद के ढंग से लेना ओछापन समझना है। कठोर वचन और कर्कश व्यवहार उसकी आचार परिधि में नहीं आते। सभ्यता एवं सामयिकता का निर्वाह वह मनुष्यता का विशेष लक्षण मानता है। अपने किसी व्यवहार से किसी को कष्ट न देने में विश्वास करता है। “न दुःख दो और न दुःख पाओ” उसका जीवन सिद्धाँत रहा करता है।
यथौचित्य का विचार रखने वाला, दूसरे की मान मर्यादा तथा मान्यताओं का आदर करने वाला, संसार में सबकी सद्भावना, सहायता एवं सहयोग का सहज अधिकारी बना रहता है। जो किसी का सम्मान करता है, उसकी मर्यादा एवं मान्यताओं की रक्षा करता है वह बदले में अपनी मर्यादा एवं मान्यताओं की सुरक्षा पाता है।
बड़ों के प्रति आदरपूर्वक विनम्रता दिखाना छोटों को स्नेहित व्यवहार से गदगद करने में अपनी जेब से क्या जाता है? किन्तु मिलता क्या है—वृद्धों की करुण आत्मा से निकले हुये हजारों आशीष, लाखों सद्भावनायें और अपरिमित सद्भावनायें। छोटों की सारी सेवा-भावना और आदर भाव की मूल्यवान् निधि आप से आप मिल जाती है।
अपने से बड़ों को दादा, बाबा, पूज्यनीय, आदरणीय मान्य, श्रीमान् आदि सम्मान सूचक सम्बोधनों को देने—बराबर वालों को भाई, बन्धु, प्रियवर कहने—छोटों को बेटे, पुत्र, बच्चे, बाबू आदि प्रिय शब्द प्रयोग करने और उनके साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार करने में क्या खर्च होता है? उल्टा अपने हृदय में ही एक शीतलता, सुख और मधुरता का अनुभव होता है।
नारियों के प्रति संकोच शील रहने, आयु एवं स्थिति के अनुसार उन्हें माता, बहन, बेटी आदि उपयुक्त शब्दों से सम्बोधित करने में जाता तो क्या है—उल्टे उनका आशीर्वाद एवं स्नेह सौजन्य ही प्राप्त होता है।
बिना किसी विशेष प्रयत्न अथवा व्यय के जो शिष्टाचार समाज में आदर, सम्मान, सहानुभूति तथा सद्भावना उपलब्ध करा सकता है उसे अपनाया न जाये—यह बात किसी प्रकार भी समझ में नहीं आती। शिष्टाचारी सहज ही सामाजिकता तथा नागरिकता के अधिकार पाये रहता है।
शिष्टाचार कोई दुरूह विज्ञान नहीं है जिसे विशेष प्रकार से सीखना अथवा अभ्यास करना पड़े। वह तो एक साधारण व्यवहार मात्र है। आदर तथा स्नेहपूर्ण यथौचित्य का निर्वाह करते रहना ही शिष्टाचार है। विनम्रता, मधुरता तथा सौहार्द का सार व्यवहार शिष्टाचार है और इसके विरुद्ध कर्कश अनुचित तथा कष्टकर व्यवहार अशिष्टता है।
क्या व्यवहार शिष्ट है और क्या अशिष्ट है, इसको हर एक सहज रूप से जानता है। कोई यह नहीं कह सकता कि वह शिष्टाचार के नियम नहीं जानता। जिस व्यवहार में किसी को किसी प्रकार का कष्ट होने का भय है और जो व्यवहार दूसरों को शीतल, सन्तुष्ट तथा सुखी करे वह शिष्टाचार है। यह मोटी-सी परिभाषा समझ लेना कठिन नहीं। व्यवहार करते समय उसे अपने पर घटाकर परख लिया जाये कि यह किसी के लिए कष्टकर होगा अथवा सुखकर, बस उसी अनुभव के आधार पर शिष्टाचार तथा अशिष्टाचार का ध्यान रखकर व्यवहार करें। कभी भूल न होगी।
संसार में सुख कोई भिन्न वस्तु नहीं है। दुःख का अभाव ही वास्तव में सुख है। सुख पाने के सारे निमित्त एवं प्रयास दुःख दूर करने के ही उपाय हुआ करते हैं।
विशुद्ध एवं विशिष्ट आध्यात्मिक क्षेत्र को छोड़कर यदि हम अपने सामान्य साँसारिक क्षेत्र, जिसमें कि हम रह ही रहे हैं, में आ जावें और युक्त दृष्टिकोण से विचार करें तो पता चलेगा कि पैसे की सुविधा हमारे बहुत से दुःख दूर रखने में एक बड़ी सीमा तक सहायक हुआ करती है।
पैसे की सहायता से ही हम अपने तथा अपने परिवार के लिये भोजन, वस्त्र एवं निवास की व्यवस्था करते हैं। पैसे के बल पर ही शिक्षा, स्वास्थ्य तथा सामाजिक सज्जनता के साधन जुटाते हैं। ब्याह-शादी, जन्म-मृत्यु, समागत-स्वागत, दान-पुण्य, तीर्थ-यात्रा आदि सारे आचार-व्यवहार पैसे के सहारे ही कर सकना सम्भव होता है। यदि हमारे पास पैसे का अत्यंतिक अभाव हो जाये तो हम हर प्रकार से किंकर्तव्य विमूढ़ होकर एक स्थान पर खड़े हो जायें, हमारे जग-जीवन की गाड़ी रुक जाये और तब ऐसी निरुपायता की स्थिति में हमारे दुःख-दर्दों का पारावार ही न रह जाये।
साँसारिक जीवन में पैसे का इतना महत्व होने पर भी जो व्यक्ति उसकी बेकदरी करते हैं, अथवा व्यर्थ-व्यर्थता के हवाले कर देते हैं, उन्हें बुद्धिमान तो नहीं ही कहा जा सकता और सच पूछा जाये तो ऐसे अपव्ययी लोग दया के साथ खेद के विषय भी हैं।
संसार में कोई भी पैसे से सर्वथा वंचित नहीं रहता। ऐसा शायद ही कोई अकर्मण्य अभागा हो, जिसे सदा ही पैसे का अत्यंतंभाव रहता हो, नहीं तो अपनी स्थिति, योग्यता एवं पात्रता के अनुसार सभी के पास आता रहता है। किसी के पास अधिक तो किसी के पास कम। सुख-दुःख का आधार वास्तव में प्राप्त पैसे की ज्यादा-कम मात्रा नहीं होती। सुख-दुःख वस्तुतः उसकी व्यय विधि पर निर्भर रहता है। जो बुद्धिमान पैसे का समुचित सदुपयोग जानते हैं, वे उस अधिक पैसे वाले की तुलना में अधिक सुखी एवं सन्तुष्ट रहा करते हैं, जो उसके सदुपयोग की कला नहीं जानते। खर्च करने में नादानी से काम लेते हैं।
प्रदर्शन पूर्ण जिन्दगी आर्थिक क्षेत्र में एक पाप है। यह अपव्यय जनक पाप जिसको भी लग जाता है, उसका संपूर्ण जीवन अभिशाप बना दिया करता है। दीवाली-सी जगमगाती हुई आलीशान कोठी, प्रदर्शनी की तरह सजे हुए कक्ष-प्रतिकक्ष, चाँदी, चन्द्रमा और उजले की तरह चमचमाते हुए वस्त्र, नित्य-नये प्रयोगों के साथ विविध व्यंजनों से भरे थाल, पकवान एवं स्वादों के आविष्कार, भोजन से भरपूर रसोई-घर, अस्वाभाविक समारोहों के साथ शादी-ब्याह, कोलाहल से भरे जन्मोत्सव, लश्करी लंगर की तरह मृतक-भोज, बड़े-बड़े वाहन और ऊँचे से ऊँचा रहन-सहन यह सब क्या है? प्रदर्शन का अन्धकार और शान-शेखी का विकार है। वैसे साधारणतया इन अर्थ-हत्या पूर्ण समारोहों से इस पंच-भौतिक शरीर में न तो छः तत्व हो जाते हैं और न इसके दीर्घ आयु अथवा निरामय रहने का प्रमाण-पत्र मिलता है। इस मानव शरीर को साधारण रूप से चलते रहने के लिये थोड़े-से अन्न-वस्त्र और निवास व्यवस्था के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिये। वैसे इस मिट्टी की मूरत पर चढ़ाने को हीरे-मोती क्यों न चढ़ाये जायें, किन्तु इस प्रकार का कृत्रिम वैभव न तो इसके किसी काम आता है और न इसकी इसे कोई आवश्यकता ही है। यह मनुष्य का एक मात्र मोह, अहंकार है। जो वह मायावियों की तरह अपने सरल, सुचारु एवं सादे जीवन की सुन्दरता को विस्मय युक्त विभ्रम में छिपा लेता है।
समझने को कोई भी इस बेकार बड़प्पन में सुख सुविधा समझ ले, पर वास्तविक बात तो यह है कि इस प्रकार के आडम्बरित जीवन के आस-पास भी सुख का निवास नहीं रहता और यदि सूक्ष्म एवं वास्तविक दृष्टिकोण से खोज की जाये तो ढेर का ढेर दुःख जरूर पाया जा सकता है।
यदि परोपकार एवं परमार्थ का दृष्टिकोण न भी लिया जाये तब भी इस प्रकार की अपव्ययिता व्यक्तिगत जीवन में दुःख की ही सृष्टि करती है। मलमलें वस्त्र पहने हुए, झलमले कमरों में, मखमली गद्दों पर पड़े रहकर विविध व्यंजनों का स्वाद चखते रहना अपने जीवन को निकम्मा बना लेना है। इस प्रकार के आलसी और विलासी व्यक्तियों के पास पुरुषार्थ एवं स्वावलम्बन नाम की कोई वस्तु नहीं रहती। वे तन-मन से रोगी बने नौकर-चाकरों के बल पर जीवन बिताया करते हैं। जरा-सी सर्दी-गर्मी और हवा-धूप के लगते ही चारपाई पकड़ लेते हैं और अपनी आप बढ़ाई हुई सुकुमारता के कारण महीनों डॉक्टरों के बिल भुगताया करते हैं। ऐसी असहनीय जिन्दगी को कोई सुख कहे तो कहा करे, किन्तु होती वह वास्तव में दुःख मूलक ही है।
साथ ही जब इस प्रकार की व्यर्थ-व्ययिता से घर की लक्ष्मी की इतिश्री हो जाती है, तब अपनी विडम्बना को बनाये रखने के लिए कर्ज लेते, कर्ज लेकर कर्ज चुकाते और दिन-दूने, रात चौगुने कर्जदार होते जाते हैं। अन्त में एक दिन ऐसा आता है कि सारे प्रदर्शन पूर्ण साधनों के साथ सर्वस्व लेनदार का हो जाता है, तब इस प्रकार के लोग या तो समाज में उपहासात्मक संकेतों के लक्ष्य बनते हैं अथवा लाँछना के अभिशाप से बचने के लिए आत्महत्या का पाप करते हैं।
इसके विपरीत जो बुद्धिमान, धनाढ्य पैसे का मूल्य जानते हैं, उसके सदुपयोग की विधि जानते हैं और मितव्ययितापूर्ण सादी जिन्दगी पसन्द करते हैं, वे अपने कुल का भविष्य सुरक्षित रखते हैं, सो तो रखते ही हैं, समाज एवं राष्ट्र की संपत्ति बढ़ा कर, परोपकार एवं परमार्थ करके आदर और सम्मान की वास्तविक जिन्दगी जीते हैं। उन्हें उस प्रकार से किसी दुःख का मुख नहीं देखना पड़ता, जो किसी प्रदर्शनवादी अतिव्याधी को बर्बादी के साथ देखना पड़ता है। किसी प्रकार की भी अपव्ययिता में क्षणिक हर्ष अथवा प्रसन्नता के पीछे दुःखों की एक ऐसी परंपरा लगी रहती है, जिसका अन्त जीवन के अन्त के साथ ही हो पाता है अशान्त अथवा असन्तुष्ट स्थिति में लोक से यात्रा करने वाले का परलोक भी संदिग्ध ही होता है।
हथछुट खर्च करने वाले, चौबीस घण्टों में पच्चीस घण्टे पैसे की कमी का रोना रोते देखे जाते हैं। उनकी सारी जिन्दगी नकल करते और सजाते-सँभालते ही निकल जाती है। जो चीज देखी उसी के लिए लालायित हो उठे। एक चीज ले ली तो दो के लिए तरस रहे हैं। अभी चाट खाई तो फिर मिठाई खाने की इच्छा है। अभी सोडा पिया तो थोड़ी देर बाद लस्सी चाहिए। कल की पोशाक आज अच्छी नहीं लगती, आज की कल उतर जानी है। यह कपड़ा मुलायम है तो वह चमकीला है वह रंगदार है तो उसका चलन ज्यादा है। आज यह वस्त्र चाहिए तो कल वह डिजाइन। आज बुशशर्ट पहनी है तो कल फ्लाइंग शर्ट पहनना है। सिनेमा देखा तो नाटक रह गया। नाटक देखा तो संगीत कार्यक्रम होना चाहिये। मतलब यह है कि इसी प्रकार की अदला-बदली और संग्रह त्याग में न केवल समय, सरलता एवं समरसता ही खोते रहते हैं बल्कि पैसा भी बरबाद करते रहते हैं। ऐसे अपव्ययी की न अपनी आवश्यकतायें पूरी होती हैं और न लालसायें। हर चीज की आवश्यकता, हर चीज की लालसा उन्हें हर समय असंतुष्ट एवं अशान्त बनाये रहती है। विविध प्रकार की वस्तुओं से भरी हुई दुनिया उन्हें शूल के समान सालती रहती है। इससे ईर्ष्या, द्वेष, डाह जैसे न जाने कितने दोषों के वशीभूत होकर आजीवन दुःखी होते रहते हैं।
जो मितव्ययी है, उसे संसार की निरर्थक लिप्साएं लोलुप बनाकर व्यग्र नहीं करने पातीं। उसकी सहायता की लक्ष्मण रेखा में निरर्थकताओं का प्रवेश नहीं हो पाता। वह अपनी आर्थिक परिधि में पाँव पसारे निश्चिन्त सोया करता है और निर्द्वन्द्व विहार किया करता है। उसे केवल उतना ही चाहिए, जितना उसके पास होता है। संसार की बाकी चीजों से न उसे कोई लगाव होता है और न वास्ता। ऐसे निश्चिंत एवं निर्लिप्त मितव्ययी के सिवाय आज की अर्थ प्रधान दुनिया में दूसरा सुखी नहीं रह सकता।
डा. अर्ल्बट श्वाइत्जर का जन्म जर्मनी के आल्सीसी प्रान्त में सन् 1875 में हुआ था किन्तु उन्होंने अपना सारा जीवन अफ्रीका के फ्रान्सीसी काँगों में लाम्वार्ने नामक स्थान पर हब्शियों की सेवा में लगा दिया। उनकी करुणा, दया और सेवा-भावना की गहराई को समझने वाले श्रद्धावश उन्हें बोधिसत्व की संज्ञा देते हैं और ध्यानपूर्वक उनके जीवन-दर्शन और जीव के प्रति दया भाव को निष्पक्ष रूप से देखा जाये तो वे बोधिसत्व के ही रूप प्रतीत होंगे।
“भगवान बोधिसत्व ने अपने एक प्रवचन में कहा था—जब तक संसार के दूसरे प्राणी कष्ट से पीड़ित हो रहे हैं, तब तक हमें सुखोपभोग का अधिकार नहीं है।” और श्री अर्ल्बट श्वाइत्जर का कथन है-’मरणान्तक पीड़ा से तड़पता हुआ रोगी जब मेरे सामने आता है उस समय मेरी भावनायें करुणा की शत-सहस्र धाराओं में बह उठती हैं। मैं सोचने लगता हूँ कि यह पीड़ित मनुष्य यह आशा करता है कि इस असहाय प्रदेश में मैं ही एक अकेला ऐसा व्यक्ति हूँ जो उसकी कुछ सहायता कर सकता हूँ। इसका आशय यह नहीं कि मैं उसके जीवन की रक्षा कर सकता हूँ। हम सभी को एक न एक दिन मृत्यु की गोद में जाना है। विशेष बात तो यह है कि वह यह आशा लेकर आता है कि मैं उसकी पीड़ा हर सकता हूँ, कम कर सकता हूँ। यही मेरा महान और चिरनूतन अधिकार बन गया है। मृत्यु की अपेक्षा पीड़ा मनुष्य को कहीं अधिक दुःखी करती है।”
डा. अर्ल्बट श्वाइत्जर एक जर्मन वंशज थे किन्तु उनका पालन पोषण फ्रांस में हुआ था। उनकी इच्छा धर्माचार्य और महान संगीतज्ञ बनने की थी और इसीलिये उन्होंने धर्म शास्त्र, दर्शन-शास्त्र तथा संगीत शास्त्र का अध्ययन कर पारंगति प्राप्त की थी। किन्तु एक छोटी-सी घटना ने उनकी जीवन धारा बदल दी, जिससे वे धर्माचार्य तथा संगीतज्ञ के रूप में ख्याति प्राप्ति की जिज्ञासा छोड़कर चिकित्सा शास्त्र का अध्ययन करके एक डॉक्टर बने।
एक बार एक मित्र से मिलने के लिये वे पेरिस गये। तब उनकी दृष्टि मेज पर पड़ी एक ‘जर्नल दे मिशन्स एवेन्जेलीक्स’ नामक पत्रिका पर पड़ी। उन्होंने उसको हाथ में लेकर पन्ना उल्टा ही था कि उनकी नजर उसमें छपी इस अपील पर पड़ गई—”अफ्रीका में प्रशिक्षित चिकित्सकों का बहुत अभाव है। वहाँ के असहाय लोग भयानक रोगों से पीड़ित होकर नारकीय मृत्यु मर रहे हैं। जिन्हें अपनी आत्मा में यह अनुभव हो कि परमात्मा ने उन्हें उन असहाय मानव की सेवा करने के लिये पहले से चुन लिया है, वे इस ओर ध्यान दें।”
डा. श्वाइत्जर को लगा जैसे ईश्वर ने उन्हें ही इस काम के लिये चुना है। बस फिर क्या था उस आत्मनिष्ठ महामानव ने अपने जीवन का चरम उद्देश्य निश्चित कर लिया। उन्होंने जीवन में व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं को विदा कर दिया और चिकित्सा-शास्त्र का अध्ययन करने लगे। सात वर्ष तक चिकित्सा-शास्त्र का अखण्ड अध्ययन करने के बाद उन्होंने पत्नी, परिवार तथा इष्ट मित्रों के मना करने और समझाने पर भी अफ्रीका में असहाय मानवों की सेवा करने के लिये 1913 में प्रस्थान कर दिया। उनकी पत्नी ने जब समझ लिया कि उनके महान पति ने मानव हित के लिये अपना जीवन समर्पित कर दिया है तो वे भी पति के महान कार्य में सहयोग देने के लिये नर्स के रूप में प्रशिक्षित होकर तैयार हो गई।
महान मानव दम्पत्ति अफ्रीका में लाम्वार्ने नामक स्थान पर पहुँचे और अपना चिकित्सालय एक टूटे-फूटे मकान के खण्डहर में खोल दिया। वह स्थान क्या था एक प्रकार से दो-तीन तरफ टूटी-फूटी दीवारों से घिरा एक छोटा-सा मैदान ही था। न उस पर छत थी और न कोई खिड़की अथवा रोशन दान। डा. श्वाइत्जर को स्थानाभाव से कुछ परेशानी हुई। किन्तु उनकी पत्नी ने उत्साहित करते हुये कहा—”परमात्मा ने हम लोगों को मानवता की सेवा करने के लिये चुना है। उसने जो कम ज्यादा साधन दिये हैं हम उन्हीं के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करेंगे।” पत्नी के पवित्र शब्द सुनकर डा. श्वाइत्जर का रोम-रोम आनन्द विभोर हो उठा और वे समग्र तन-मन से पीड़ितों की सेवा में संलग्न हो गये। उन दोनों पति-पत्नी ने घास-फूस का छप्पर डालकर अपने चिकित्सालय पर छाया कर ली।
अभी उनका चिकित्सालय खुला ही था कि सौ-सौ मील के इर्द गिर्द से रोग पीड़ित नीग्रो उन परमात्मा के भेजे हुये देवदूत के पास आने लगे और डॉक्टर श्वाइत्जर ने उनकी चिकित्सा करनी शुरू कर दी। उन्होंने आठ-नौ माह की अवधि में ही लगभग दो ढाई सौ असाध्य रोगियों को नया जीवन दे दिया। डा.श्वाइत्जर के इस पुण्य कार्य ने उनको न केवल ख्यातिनामा बना दिया बल्कि वे देवता की तरह हब्शियों के श्रद्धा-भाजन बन गये।
तन्मयता से पीड़ितों की चिकित्सा करते करते डा.श्वाइत्जर का सेवा कार्य आध्यात्मिक साधना के रूप में बदल गया। अभी तक ये अपने विचार से पीड़ितों की सेवा कर अपने मानवीय कर्तव्य का पालन करते थे, किन्तु अब उनका विश्वास हो गया कि मानव-सेवा के माध्यम से साक्षात् परमात्मा की ही भक्ति कर रहे हैं। उन्होंने अपनी इस आध्यात्मिक अनुभूति को व्यक्त करते हुये कहा-
“अभी तक मैं एक धर्म-शिक्षक के रूप में शब्दों द्वारा आत्म-दान करता रहा था। प्रेम-योग की शाब्दिक चर्चा करते हुये आनन्द पाता रहा था। परन्तु अब मैं अपने इस सेवा कार्य को प्रेम-योग की चर्चा करके पूरा नहीं कर सकता। यह प्रेम के व्यावहारिक प्रयोग का क्षेत्र है। मैं धर्माचार्य न बनकर चिकित्सक इसलिये बना कि बिना बोले सेवा कर सकूँ। अपनी इस मौन प्रधान सेवा को मैं आध्यात्मिक साधना ही मानता हूँ।”
इस प्रकार डॉक्टर श्वाइत्जर आध्यात्मिक विश्वास के साथ-सेवा करते-करते मानापमान और हानि लाभ से परे होकर सच्चे योगी बन गए और उनका चिकित्सालय सेवा-आश्रम। डा.श्वाइत्जर साढ़े छः बजे बिस्तर छोड़ देते और अपने दिन भर के कार्य क्रम की योजना बनाते। वे पहले से ही कोई योजना तैयार न रखते थे। आवश्यकतानुसार तत्काल बनाया करते थे। क्योंकि वे जानते थे कि उनका कार्य ही कुछ इस प्रकार का है कि न जाने किस समय उन्हें क्या करना या कहाँ जाना पड़ जाये। ऐसी दशा में निश्चित कार्यक्रम में विघ्न अथवा अनियमितता आ जाने से उन्हें परेशानी होगी। उनकी दिनचर्या का मूल उद्देश्य सेवा करना था उसको वे नियमित रूप से बिना पूर्व कार्यक्रम के किया करते थे। साढ़े छः बजे से साढ़े सात तक नित्य-नैमित्तिक से निवृत्त होते। आठ बजे तक नाश्ता करके सहयोगियों को दिन भर का काम बताते डिस्पेन्सरी और औजार ठीक करते। दस बजे तक बागवानी, सड़क की मरम्मत, भवन निर्माण और वृक्षारोपण के काम करते और फिर अपने चिकित्सालय में आकर रोगियों की सेवा में संलग्न हो जाते। सवा बारह तक चिकित्सालय का काम निबटा कर दो बजे तक भोजन और आराम से निवृत्त होकर पुनः चिकित्सालय में आ जाते और साढ़े छः बजे तक काम में लगे रहते। उसके बाद भोजन आदि से निवृत्त होकर रोगियों की देख-भाल करने निकल जाते और इस प्रकार उनका यह कार्यक्रम साढ़े ग्यारह बजे रात तक चलता रहता। डा. श्वाइत्जर ने अपने इस व्यस्त कार्यक्रम को पूरे नब्बे वर्षों तक चलाया। उन्होंने अपने कार्य के घंटों में से न तो एक मिनट कभी कम दिया और न आराम के समय को बढ़ाया। अपनी इस एकान्त कार्य निष्ठा के कारण डा.श्वाइत्जर नब्बे वर्ष की आयु तक पूर्ण स्वस्थ एवं समर्थ बने रहे। वे अपने जीवन में बहुत कम बीमार पड़े और यदि कभी ऐसा संयोग हुआ भी तो भी उन्होंने पड़कर आराम कभी न किया। उनकी इस अखण्ड कार्य व्यस्तता को देखकर एक दिन उनकी पत्नी ने पूछा “आप कब तक इस प्रकार अविश्रान्त काम करते रहेंगे।”डा.श्वाइत्जर ने बड़े सरल भाव में उत्तर दिया-”जीवन की अन्तिम श्वाँस तक।” और निःसन्देह उन्होंने अपने वचन को पूर्ण रूपेण निवाहा कर दिखा दिया।
डा. श्वाइत्जर के आश्रम में जहाँ एक ओर रोगी हब्शियों की चारपाइयाँ पड़ी रहती थीं, वहाँ दूसरी ओर बहुत से पशु-पक्षी भी रह रहे थे। हिरन, चीतर, गुरिल्ला, चिम्पाँजी, बत्तख, मुर्गी, उल्लू आदि न जाने कितने पशु-पक्षी उनके परिवार के सदस्य बने हुये थे। यह सब पशु-पक्षी वही थे जो एक बार रोगी होने के कारण जंगल से पकड़कर उपचार के लिए डा. श्वाइत्जर के पास लाए गए थे और फिर चंगे होकर अपने प्रेमी सेवक को छोड़कर दुबारा जंगल में नहीं गए।
सन्त श्वाइत्जर को मानव जाति की तरह ही अन्य जीवों से भी प्यार था। उन्हें उनकी भावनाओं का कितना ख्याल रहता था यह इस छोटी घटना से ही प्रकट हो जाता है। एक बार वे अपने कमरे में जा रहे थे। रास्ते में एक मुर्गी अपने बच्चों को प्यार कर रही थी। वे रुक गए। किन्तु जब मुर्गी ने रास्ता नहीं दिया तब उन्होंने उसके कान में धीरे से कहा-माँ मुर्गी, मुझे चले जाने के लिए रास्ता दे दो। किन्तु जब वह तब भी नहीं हटी तो वे उसके ऊपर से लाँघ कर इस प्रकार धीरे से निकल गये कि मुर्गी के कार्यक्रम में तनिक भी बाधा नहीं पड़ी। इस छोटी से घटना में डा. श्वाइत्जर के हृदय की विशालता का कितना सुन्दर तथा स्पष्ट चित्र प्रतिबिम्बित होता है इसे भावुक व्यक्ति ही समझ सकते है। वे स्वयं तो माँस नहीं हो खाते थे। उन्होंने हब्शियों को भी कभी किसी पशु-पक्षी को मारने नहीं दिया। उनके आश्रम में भोजन से पूर्व प्रार्थना होती थी और व्यालू के बाद सामूहिक प्रार्थना। उनका चिकित्सालय पूर्ण रूप से एक ऋषि आश्रम के समान ही था।
मानव सेवा के इस सराहनीय कार्य के लिये डा. श्वाइत्जर को 1948 में नोवुल पुरस्कार दिया गया जिसकी समग्र धनराशि से उन्होंने चिकित्सालय से थोड़ी दूर महारोगी (कुष्ट) सेवा श्रम खोलने में लगा दी। इस नये सेवा श्रम में उन्होंने पाँच सौ कोढ़ियों के रहने के लिये व्यवस्था कर दी। उसी अवसर पर जब वे ओसलो गये तो अपने सम्मान समारोह में बोलते हुये उन्होंने कहा था- “मानव की आत्मा अभी मरी नहीं है। वह उन जीवों के प्रति दया एवं करुणा भावना से परिचित है जिसमें सम्पूर्ण नैतिकता सन्निहित है। यह जीव दया तभी सार्थक होती है जब कोई मानव-जाति से ऊपर उठकर सारी जीव-सृष्टि को अपने शीतल अंचल की छाया में ले ले। मनुष्य ने विज्ञान के बल पर अतिमानव शक्तियाँ तो प्राप्त कर ली हैं किन्तु वह अभी वाँछित अतिमानवी बुद्धि का विकास नहीं कर सकता है। इसीलिये उस वैज्ञानिक शक्ति के घातक परिणाम सामने आने की सम्भावना दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। अब हम मानवता के भविष्य को अधिक समय तक टाल नहीं सकते। इसके लिये सबसे महत्वपूर्ण एवं मूल बात यह है कि हम सब एक स्वर से स्वीकार करें, कि हम सब अमानवीय आचार के अपराधी हैं। यही एक उपाय है जिससे कि हम उस मार्ग पर आगे बढ़ सकेंगे जो एक युद्ध-विहीन जगत की ओर जाता है।”
इसके पूर्व भी जब वे जर्मन विद्वान गेटे की शताब्दी के उपलक्ष में फ्रेंकफर्ट महोत्सव में बोलने के लिये आमंत्रित किए गए थे उन्होंने बड़े ही मार्मिक सत्यों को उद्घाटित करते हुये कहा था- “मनुष्य एक आध्यात्मिक व्यक्तित्व है और उसे उसी रूप में मानकर व्यवहार किया जाना चाहिए। उसे हठात् पदार्थवादी सभ्यता के घूरे में दबाना सरासर अन्याय एवं अनर्थ है।” इस पर जर्मन डिक्टेटर हिटलर बहुत कुछ लाल-ताल हुआ किन्तु उन्होंने उसकी जरा भी चिन्ता नहीं की।
इसी प्रकार एक बार आनफोर्ड में हिबर्ट भाषण करते हुए उन्होंने केवल चार छोटे वाक्यों में पश्चिमी सभ्यता का सार रखकर उत्सव में उपस्थित लोगों को न केवल स्तब्ध ही कर दिया, बल्कि वक्ताओं की वाचालता समाप्त कर दी। उन्होंने कहा- “क्या आज हमारे जीवन में धर्म का कोई अस्तित्व है? नहीं! प्रमाण! युद्ध।” इतना कहकर उन्होंने अपना भाषण समाप्त कर दिया और फिर उसके बाद कोई भी बोलने खड़ा नहीं हुआ।
इस प्रकार आधुनिक बोधिसत्व सन्त श्वाइत्जर आजीवन मानव सेवा करते और सत्य का सन्देश देते हुये नब्बे वर्ष की आयु में 4 दिसम्बर 1965 को मानव देह से मुक्त हो गए।
पठतो नास्ति मूर्खत्वं जपतो नास्ति पातकम्।
जाग्रतस्तु भयं नास्ति कलहो नास्ति मोनिनः॥
जो निरन्तर अध्ययन शील होता है उसमें मूर्खता नहीं रहती है। जो बराबर जप करता रहता है उसमें कोई भी पातक नहीं रह सकता है। जो जागता रहता है उसे किसी का भी भय नहीं हो सकता है। जो मौन धारण करने वाला होता है उससे किसी का भी कलह नहीं होता है।
“क्या गृह-कार्य और समाज-सेवा के कार्य एक साथ किये जा सकते हैं?” इसी प्रकार क्या एक ही नारी, पारिवारिक क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र में स्निग्ध समन्वय स्थापित कर सकती है? -”यह प्रश्न तारा चेरियन से उनकी एक परिचिता ने किये।”
“आसानी से किए जा सकते हैं। इसमें कोई कठिनाई नहीं है। यदि ऐसा सम्भव न होता तो मैं करती और कैसे अन्य नारियों ने किए और कैसे आज भी अनेक कर रही हैं।” यह उत्तर था श्रीमती तारा चेरियन का- जो इस समय मद्रास महानगर पालिका की अध्यक्षा है।
अपने पारिवारिक तथा सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों में सफल कार्य विधियों का रहस्य बतलाते हुए वे जब-तब कहा करती हैं- “मनुष्य की कार्य क्षमता का कोई परिणाम नहीं। यदि मनुष्य में अपना आत्म-विश्वास है, वह आलसी, प्रमादी अथवा दीर्घ-सूत्री नहीं है, श्रमशील और संतुलित मनः स्थिति वाला है तो कितना भी काम उस पर क्यों न आ जाय वह प्रसन्नता पूर्वक कर सकता है। इसके विपरीत जो आलसी है, निरुत्साही और अस्त-व्यस्त मनोवृत्ति वाला है वह एक घण्टे का काम भी एक दिन में नहीं कर सकता। मैं जिस समय जो काम हाथ में लेती हूँ, उसे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मानकर करती हूँ और एक छोटे से छोटे काम को भी अपने पूरे तन-मन से निवृत्त-चित्त होकर करती हूँ। काम करने की मेरी एक क्रमिक योजना है, जिसके अनुसार मैं एक समय में एक ही काम करती हूँ और जब तक एक काम पूरा नहीं कर लेती तब तक किसी दूसरे कार्य की ओर ध्यान नहीं बंटने देती। घर के कार्यों में सार्वजनिक और सार्वजनिक कार्यों में घर के कार्य भूल जाती हूँ।”
निःसन्देह तारा चेरियन का जीवन चक्र ठीक-ठीक संतुलित गति से कर्म क्षेत्र में घूमता है। इसी तन-मन और मस्तिष्क की संतुलित अवस्था ने उन्हें घर से लेकर बाहर तक सफलताओं की मालाओं से सुसज्जित कर दिया। पाँच बच्चों की माँ और इक्यावन वर्ष की आयु होने तक वे परिवार से लेकर सार्वजनिक क्षेत्रों तक एक उत्साह और एक निष्ठा से कार्य करती आ रही है। न तो उनके किसी कार्य में निरुत्साह दिखाई देता है और न शैथिल्य।
श्रीमती तारा चेरियन मद्रास निवासिनी हैं और वीमेन्ट्र क्रिश्चियन कॉलेज की स्नातिका है। अपने शिक्षा काल में श्रीमती तारा चेरियन केवल किताबी कीड़ा ही नहीं बनी रहीं। वे कॉलेज के विविध कार्य क्रमों से लेकर खेल-कूद तक में भाग लेती थीं। उनका सदैव यह विश्वास रहा है कि जो अपने जीवन में कोई विशेष उन्नति करना चाहता है, अपने व्यक्तित्व को ठीक-ठीक विकसित करना चाहता है, तो उसे उपलब्ध कार्य-क्रमों में पूरे मन से भाग लेना चाहिए निःसंकोच और निर्मुक्त भावना से सबसे मिलना और विचार विनिमय करना चाहिये। उसे चाहिये कि वह जीभर निश्छल बालकों की तरह हँसे खेले और मनोरंजन करे। ऐसा करने से मनुष्य के मन में एक अहैतुक प्रसन्नता का निवास हो जाता है जिससे उसके स्वास्थ्य पर बड़ा ही उत्तम प्रभाव पड़ता है। व्यक्तित्व में एक चमक और प्रतिभा में प्रौढ़ता आती है। बिना हास-उल्लास और मनोरंजन के मनुष्य में एक उदासी, एक मलीनता और एक निर्जीवता घर कर बैठती है जिससे वह जीवन के किसी क्षेत्र में सफलता नहीं पा पाता।
अपने इसी विश्वास के आधार पर वे अपने कॉलेज की मूर्धन्य कार्यकर्त्री रहीं और अनेक बार मद्रास विश्व विद्यालय के सीनेट की सदस्या चुनी गई। अपनी कुशाग्रता, तत्परता और निःसंकोचता से वे अपने कॉलेज की गौरव बनी रहीं। कॉलेज की प्रत्येक प्रतियोगिता में भाग लेना, प्रत्येक कार्यक्रम में सम्मिलित होना उन्होंने अपना एक नैतिक कर्त्तव्य बना लिया था। अनेक बार प्रतियोगिताओं में असफल होने पर जब कोई उनसे पूछता क्यों तारा, अब आगे की प्रतियोगिता के लिए क्या इरादा है? तो उनका केवल एक ही उत्तर रहता था कि प्रतियोगिता की हार-जीत से प्रभावित होने वाले निर्बल-हृदय व्यक्ति होते हैं। मैं तो प्रत्येक प्रतियोगिता में बुद्धि-विकास के दृष्टिकोण से भाग लेती हूँ, किसी पुरस्कार के लोभ से नहीं।
अपने विद्यार्थी जीवन-काल के सदुपयोग का लाभ उठा कर श्रीमती तारा चेरियन ने गार्हस्थ्य-जीवन में प्रवेश किया और वे तात्कालिक मद्रास के गवर्नर की पत्नी बनीं। राजनीतिक क्षेत्र के एक महिमा पदाधिकारी की पत्नी का उत्तरदायित्व और तदनुकूल एक बड़े घर की व्यवस्था तथा प्रबन्ध कोई हँसी-खेल न था। किन्तु श्रीमती तारा की सुविकसित मनोभूमि पर उसका कोई भार न पड़ा और उन्होंने सामान्य रूप से वह महत् उत्तरदायित्व संभाल लिया। हाँ यदि श्रीमती चेरियन ने अपने कौमार्य काल में अपना मनोविकास न किया होता, तब तो यह उत्तरदायित्व उनको एक चिन्ता का विषय बन जाता, जिसको वहन करने में वे शीघ्र ही दब कर जर्जर हो जातीं।
अपने विद्यार्थी-काल में सार्वजनिक जीवन के जिस आनन्दमय सौंदर्य का दर्शन उन्होंने किया था, वह अपने पारिवारिक जीवन में न भूल सकीं। उसकी आत्मा निरंतर जन-सेवा के कार्य करने के लिये सदैव लालायित रहती। वे अपनी योग्यताओं और क्षमताओं को सार्वजनिक कार्यों में उपयोग करना चाहती थीं। उनको अपनी इच्छा के लिये कोई प्रतिबन्ध अथवा बाधा तो थी नहीं। तब भी अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व को तिलाँजलि देकर उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र में उतरना उचित नहीं समझा।
कुछ समय बाद जब बच्चे कुछ सयाने हो गये, तब उन्होंने सार्वजनिक कार्यों में अभिरुचि लेना प्रारम्भ किया। सबसे पहले अपनी विद्या, बुद्धि एवं अनुभव के विकास के लिये उन्होंने विदेश यात्रा की। जिसमें वे ब्रिटेन, बर्लिन और सान्फ्राँसिस्को में विशेष रूप से घूमी। अपनी विदेश-यात्रा के समय उन्होंने मनोरंजक स्थानों की अपेक्षा जन-सेवी संस्थाओं को अधिक महत्व दिया। मनोरंजक कार्यक्रमों में भाग लेने के बजाय उन्होंने समाज-सेवा के स्थलों और कार्य-विधियों का गम्भीरता के साथ अध्ययन किया। जिसका लाभ उन्होंने अपनी समाज-सेवाओं में उठाया।
विदेशों से वापिस आने पर उनकी योग्यता का लाभ उठाने के लिये अनेक संस्थाओं ने उन्हें अपने में सम्मिलित करने के लिये आमन्त्रित किया। श्रीमती तारा चेरियन ने पहले ‘एग्मोर’ स्थित महिलाओं और बच्चों के अस्पताल के सलाहकार मण्डल की अध्यक्षा के रूप में पदार्पण किया। अपनी कार्यकुशलता से श्रीमती चेरियन ने संस्था में चार-चाँद लगा दिये। उनका कार्यक्रम अध्यक्ष के कार्यालय तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि वे अस्पताल में प्रत्येक स्त्री-बच्चे के पास स्वयं जातीं, उनका दुःख-सुख पूछतीं और यथासम्भव दूर करने का प्रयत्न करतीं। उन्होंने अस्पताल की कमियों को दूर किया और अपने उदाहरण से कार्यकर्त्ताओं तथा कर्म-चारियों में सच्ची सेवा-भावना का जागरण किया। श्रीमती चेरियन की सहानुभूतिपूर्ण सेवा भावना का ही यह परिणाम है कि वे उक्त अस्पताल के सलाहकार-मण्डल की बीस वर्ष तक अध्यक्षा रहीं।
श्रीमती तारा चेरियन के सेवा कार्यों से प्रभावित होकर नगर की हर संस्था ने किसी न किसी रूप में उन्हें अपने में पाकर अहोभाग्य माना। इस समय वे नगर की किसी संस्था की अध्यक्षा हैं, तो किसी की मन्त्राणी! निरन्तर सेवा कार्यों में निरत रहने से श्रीमती तारा चेरियन इतनी लोक-प्रिय हो गई कि अभी हाल के चुनाव में मद्रास की जनता ने उन्हें नगर-महापालिका का अध्यक्ष मनोनीत किया।
अध्यक्ष पद का कार्य-भार सँभालते समय श्रीमती चेरियन ने जो कहा, वह वास्तव में किसी भी समाज-सेवी संस्था अथवा व्यक्ति के लिये अनुकरणीय है। उन्होंने कहा-मद्रास की स्नेही जनता ने जो गम्भीर उत्तरदायित्व मुझे सौंपा है, वह कोई साधारण कार्य नहीं है। यों तो यदि साधारण दृष्टि से देखा जाये तो महा-नगरपालिका का अध्यक्ष-पद एक अभिमाननीय नागरिक सम्मान है। और यदि अनुत्तर दायित्वपूर्ण ढंग से इस पद का सुख लिया जाये तो यह फूलों की सेज जैसा सुखद लग सकता है। किन्तु यह सम्मान, यह गौरव मुझ जैसे उत्तरदायी बुद्धि वाले व्यक्ति के लिए किसी काँटों की सेज से कम नहीं है। नगर के जन-जन के स्वास्थ्य-सुविधा की चिन्ता, बच्चों की शिक्षा, जनता के कष्ट निवारण की व्यवस्था की जिम्मेवारी कोई सुखदायक प्रसंग नहीं है। अच्छा होता, यदि मुझे इस पर न चुना जाता। किन्तु जब जनता ने मुझे इस उत्तरदायित्व योग्य समझा है तो मैं अपने सच्चे तन-मन से इसका निर्वाह करने में कोई कमी न रहने दूँगी।
महा-नगरपालिका का अध्यक्ष पद सँभालने के दिन से ही श्रीमती तारा चेरियन ने अपने नगर-कल्याण के सेवा-कार्यों में स्वयं को डुबा दिया। वे जब तब नगर का दौरा करतीं, गन्दी और गरीब बस्तियों को देखतीं, उनके सुधार की व्यवस्था करतीं और असहायों को सहानुभूति के साथ सहायता प्रदान करतीं। विकलाँगों की सहायता उनके कार्यक्रम का विशेष अंग है। जो निरुपाय, असहाय, पराश्रित हैं, ऐसे अपंगों की सेवा मानवता की सबसे महान सेवा है। यह एक समाज-सुधार कार्य होने के साथ धार्मिक पुण्य भी है।
जो विकलाँग अनुपयोगी होकर समाज पर एक भार बने रहते हैं, वे जब सहायता, सहानुभूति पाकर उपयोगी बन जाते हैं, तब समाज को उससे अधिक लाभ पहुँचाते हैं, जितना कि एक शुभाँग व्यक्ति पहुँचा सकता है। विकलाँगों की इन्द्रियाँ स्वभावतः संयमित एवं वृत्तियाँ एकाग्र होती हैं। वे जिस काम को अपनाते हैं, उसमें शीघ्र ही दक्षता प्राप्त कर लेते हैं और एक अनुकरणीय तल्लीनता से कार्य करते हैं। साथ ही जो व्यक्ति उनके साथ सहानुभूति दिखलाता है, उनकी सेवा और सहायता करता है, वह भी स्वभावतः संयमित वृत्तियों वाला बन जाता है। उनको देखकर जो करुणा उत्पन्न होती है, उससे आत्मा परिष्कृत एवं परिमार्जित होती है। मनुष्य उनकी असहायता की तुलना में अपने पूर्णांग देखकर परम पिता परमात्मा के प्रति कृतज्ञ होता है, जिससे उसमें श्रद्धा तथा भक्ति का उद्रेक होता है। इसके अतिरिक्त विकलाँगों की निश्छल आत्मा से निकला हुआ आशीर्वाद समाज-सेवियों के हित में एक आध्यात्मिक कल्याण का सम्पादन किया करता है।
श्रीमती तारा चेरियन विकलाँग सेवा के इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं। उन्होंने उनके लिये अनेक आश्रमों एवं कार्य-शालाओं की स्थापना का प्रयास किया, उनकी आर्थिक तथा शारीरिक सहायता की व्यवस्था की।
एक सुसंस्कृत, संभ्रान्त एवं सभ्य समाज की रचना के दृष्टिकोण से उन्होंने स्कूली बच्चों की ओर समुचित ध्यान दिया, उनकी शिक्षा पद्धति में सरलता एवं सानुकूलता का समावेश कराया। उनके स्वास्थ्य के लिये दोपहर में पोषक तत्वों से पूर्ण स्वल्पाहार की व्यवस्था कराई, जिसके फलस्वरूप बच्चों के स्वास्थ्य में ध्यानाकर्षण सुधार हुआ। स्वास्थ्य में सुधार होने से बच्चों में पढ़ने की रुचि बढ़ने लगी, जिसको देखकर प्रायः सभी नागरिक अपने बच्चों को पाठशाला भेजने के लिये समुत्सुक होने लगे।
महा नगरपालिका की अध्यक्षा होने के साथ-साथ श्रीमती तारा चेरियन—महिला कल्याण विभाग, बाल मन्दिर, स्कूल आफ शोसल-वर्कस एण्ड द गिल्ड आफ सर्विस, भारतीय समाज सेवा संगठन, अखिल भारतीय महिला खाद्यान्न परिषद्, क्षेत्रीय पर्यटन सलाहकार समिति तथा जीवन-बीमा निगम की सलाहकार परिषद् की अभिभाविका एवं कार्यकर्त्री भी हैं।
इन सारी संस्थाओं का कार्य वे आत्म-विश्वास, परिश्रम, कार्य-निष्ठा और सत्य-सेवा-भाव के बल पर सुचारु रुप से कर रही हैं।
जिस देश अथवा राष्ट्र में नारी पूजा नहीं वह देश या राष्ट्र कभी महान या उन्नत नहीं हो सकता। नारी रूपी शक्ति की अवमानना करने से ही आज हमारा अधःपतन हुआ है। स्त्रियाँ माता की प्रतिमा हैं, जब तक उनका उद्धार न होगा, हमारे देश का उद्धार होना असम्भव है।
—स्वामी विवेकानन्द
भारतीय ऋषि-मुनियों ने अपने अनुभव के आधार पर मनुष्य की सामान्य आयु एक सौ पच्चीस वर्ष घोषित की है। यदि उन नियम-निष्ठा तथा तपोपूत ऋषि-मुनियों के विशिष्ट जीवन से तुलना न भी की जाये तब भी संसार के सामान्य मनुष्यों की एक सौ साल आयु सर्वमान्य है। संसार के सभी प्राणिशास्त्री, अनुभवी तत्व-वेत्ता तथा आयुर्वेद-विज्ञ एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि मनुष्य की औसत आयु सौ साल होनी चाहिए।
यह मात्र कथन, कल्पना अथवा आदर्श ही नहीं है, एक सत्य है, जिसको हजारों व्यक्तियों के शत-शारदीय ही नहीं इससे भी अधिक जीवन में अनेक बार अनेक स्थानों में देखा गया है और आज भी देखा जा रहा है। जबसे इस आयु-अनुपात की दिलचस्पी खोजियों में पैदा हुई है नित्य ही शतायु लोगों की खबरें नाम निवास के साथ अखबारों में छपती रहती हैं। आए दिन प्रमाण के साथ पत्र-पत्रिकाओं में लेख छपते रहते हैं। क्या यह कोरी गप अथवा झूठा प्रचार है। हाँ, यह उनके लिए गप अथवा झूठा प्रचार हो सकता है जो मनुष्य की दीर्घ कालीन जीवनी शक्ति में विश्वास नहीं रखते और शरीर को अनियंत्रित वासनाओं का माध्यम मात्र मानकर इसे शीघ्र क्षयमान मानते हैं। किन्तु शतायुषा की बात निःसन्देह उन मानव-मनीषियों के लिए एक ज्वलन्त सत्य है जो उसमें विश्वास करते हैं और अपना इस अधिकार के उपभोग की क्षमता के लिए आवश्यक कर्तव्यों का पालन करने में तत्पर रहते हैं। इसमें सन्देह नहीं कि इस प्रकार के अखण्ड आत्मविश्वासी इस शत शारदीय सत्य के दर्शन करते हैं, कर रहे हैं और आगे भी करते रहेंगे।
अधिक तूल में जाने की आवश्यकता नहीं। यदि शतशारदीय का जीवित प्रमाण पाना चाहता है तो ‘हाथ कंगन को आरसी ही क्या।’ मिश्र में सिकंदरिया से दक्षिण-पूर्व में लगभग एक सौ चालीस-बयालीस मील पर बसे गाजियाना गाँव में चला जाय और एक सौ सात वर्ष से भी चार छः महीने ज्यादा आयु वाले रजा-वका से मिल लें।
रजा वका आज कल अमेरिका, स्वीडन, केलीफोर्निया आदि अनेक देशों के स्वास्थ्य-विशेषज्ञों तथा प्राणि शास्त्रियों के लिए एक आकर्षण-बिन्दु बने हुए हैं। नित्य ही डॉक्टरों तथा अन्वेषकों के दल के दल रजा-वका से मिलने जा रहे हैं, उनकी दिन-चर्या देख रहे हैं और दीर्घ आयु का रहस्य खोज निकालने का प्रयत्न कर रहे हैं। संसार के सारे परिचित स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने रजा-वका को मानव वैचित्र्य की उपाधि दे रक्खी है। निःसन्देह रजा वका मानव वैचित्र्य ही हैं और उन्होंने आज की स्वास्थ्य सम्बन्धी मान्यताओं, धारणाओं तथा न जाने कितने विश्वासों को अपनी स्वस्थ आयुता से चुनौती दे दी है।
रजा वका केवल दीर्घजीवी ही नहीं हैं, स्वास्थ्य के हर लक्षण से भरपूर एक तरुण हैं। उनकी आयु तो एक सौ सात-आठ की है ही। उनका बदन छरहरा और स्फूर्ति पूर्ण है। वजन एक सौ तेईस चौबीस पौंड। लम्बाई पाँच फुट आठ इंच है। एक स्वस्थ व्यक्ति के यह सब लक्षण होने के साथ जो सबसे विशेष बात है वह यह कि इस आयु में भी उनकी त्वचा में एक भी झुर्री नहीं है। कमर बिलकुल सीधी और लोचदार है। एक-एक बाल काला और प्रत्येक दाँत दृढ़ और पूर्ण है। अवयव सुडौल और आँखों की रोशनी पूरी तरह सुरक्षित है। आरोग्य तथा शरीर शास्त्र के अधीन जाँच करने वाले डॉक्टरों ने बतलाया है कि इस लम्बी आयु में रजा वका में तीस साल के परिपुष्ट तरुण की सारी विशेषतायें पूरी तरह से विद्यमान हैं। रजा वका आज भी उतना ही श्रम कर लेते हैं, जितना कि वे तीस बत्तीस साल की तरुण आयु में कर लेते थे। उनकी शारीरिक अथवा मानसिक शक्तियों में किसी प्रकार का भी ह्रास नहीं हुआ है।
आज के अस्वस्थ एवं अल्पजीवी जन समुदाय के लिए रजा वका आश्चर्य अथवा अपवाद हो सकते हैं किन्तु वास्तविकता यह है कि वे मानव जीवन के सही और सच्चे नमूने हैं। सामान्यतः मनुष्य का जीवन ऐसा ही होना चाहिए। आश्चर्य अथवा अपवाद तो उस पर आरोपित अस्वास्थ्य एवं अल्पायु से होता है।
फ्रांस के प्रसिद्ध सर्जन डा. वेताँ रोशे ने चार दिन तक रजा वका के संपर्क में रहकर और उनके शरीर के विभिन्न परीक्षण के बाद जो बात कही है, वह वास्तव में बड़ी ही सत्य, महत्वपूर्ण तथा ध्यान देने योग्य है। उन्होंने कहा—”रजा बका से मिलने, उनका परीक्षण कर, दिनचर्या एवं रहन-सहन देखने और अपने सहयोगी डॉक्टरों से विचार-विमर्श करने के बाद मैं जिस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ वह यह है कि रजा वका का स्वास्थ्य आज के न जाने कितने स्वास्थ्य सम्बन्धी सिद्धान्तों एवं स्थापनाओं के समक्ष एक पर्वताकार चुनौती है। ऐसा लगता है कि स्वास्थ्य जैसे सरल एवं सामान्य विषय को आज हमने बहुत ही जटिल बना डाला है।”
स्वयं रजा वका का कथन और भी अधिक प्रामाणिक तथा उनके आरोग्य पूर्ण दीर्घजीवन का रहस्य उद्घाटित करने के लिए उपयुक्त है। उन्होंने एक साक्षात्कार के अवसर पर अपने विषय में बतलाते हुए कहा कि—वे एक गरीब किसान हैं। पढ़ना लिखना हमारी पीढ़ी आज की पीढ़ी की तरह रोगशोक से दुखी नहीं रही है। मेरी सारी जिन्दगी खेतों पर ही बीती है और आज भी आठ घंटे से कम खेतों पर काम नहीं करता। मुझे अपने जानवरों से बहुत प्यार है। इसीलिए माँस नहीं खाता। मैं ही नहीं मेरे परिवार में कोई भी माँस नहीं खाता। कम से कम पका हुआ भोजन करता हूँ और दोनों समय बकरी अथवा गाय का दूध पीता हूँ। अनाज से ज्यादा शाक भाजी खाता हूं। शराब या किसी नशे के नाम पर मैंने आज तक कोई चीज नहीं छुई। कुरान की हिदायत के अनुसार शराब पीना पाप समझता हूँ। खुदा के नाते हर आदमी को अपना भाई समझकर प्यार करता हूँ। अपने बारे में कभी शिकायत नहीं करता। खुदा जिस तरह रखता है उसी तरह रहकर खुश रहता हूँ। खुले में सोता हूँ और नौ गज कपड़े में साल काट लेता हूँ। जहाँ तक बनता है दूसरों तथा जरूरत मंदों की मदद करता हूँ। जरूरत की जगहों पर मैंने अब तक नौ कुयें अपने हाथ से खोदे हैं।
इन सब बातों को सुनते समझते हुए यही मानना पड़ता है कि अपने आरोग्य तथा अल्पायु का कारण हमारा अनियमित खान-पान तथा रहन-सहन है। नहीं तो कोई कारण नहीं कि जिस प्राकृतिक जीवन से कोई एक दीर्घजीवी होकर स्वस्थ रह सकता है तो हम सब क्यों नहीं रह सकते? हम आज जितना-जितना प्राकृतिक जीवन से हटकर कृत्रिम जीवन की ओर बढ़ते जाते हैं, स्वास्थ्य के साथ अपनी आयु भी कम करते जाते है। मनुष्य मात्र एक प्राणी ही नहीं बल्कि प्रकृति का प्यारा पुत्र है, तब कोई कारण नहीं कि प्रकृति माता ने जो सौ साल की औसत आयु अपने पुत्र को दे रक्खी है, उसमें से किसी-किसी को पूरी तथा किसी -किसी को अल्प आयु दे। प्रकृति ऐसा अन्यायपूर्ण पक्षपात नहीं कर सकती। उसने अपने सभी पुत्रों के लिए एक समान ही दीर्घ आयु निर्धारित की है। यह हम सब ही हैं जो उसके नियमों का उल्लंघन करके अपनी आयु घटा और स्वास्थ्य चौपट कर लेते हैं। यदि आज से ही हम अधिक से अधिक प्रकृति के निकट रहने और सहज जीवन से रहने लग जायें तो हमारी आयु की क्षीणता दूर होने लगे। स्वास्थ्य तथा दीर्घ जीवन का रहस्य प्राकृतिक जीवन ही है। आज का कृत्रिम जीवन आरोग्य एवं आयु का बहुत बड़ा दुश्मन है।
प्रकृति ने जो आहार हमारे लिए निर्धारित किया है उसे खायें और जीवन के आवश्यक नियम संयम का निर्वाह करते हुये मनोबल के साथ आत्म विश्वास बढ़ाते रहें तो अवश्य ही सौ साल तक स्वस्थ एवं सुखकर जीवन जी सकते हैं। जब सृष्टि के सारे जीव सामान्यतः अपनी निर्धारित आयु अपेक्षित स्वास्थ्य के साथ जीते हैं तो मनुष्य अपनी निर्धारित शतशारदीय आयु का भोग क्यों नहीं कर सकता? कर सकता है, किन्तु तभी जब वह उस अधिकार के सम्बन्ध में अपने सारे कर्तव्यों का ईमानदारी के साथ पालन करे।
कोई भी समाज नारी-पुरुष के युग्म से बनता है, समाज ही क्यों, सच्ची बात तो यह है कि सृष्टि के क्रम का मूलभूत कारण ही यह जोड़ा है। इसमें भी नारी का स्थान प्रमुख है। क्योंकि संसार एवं सृष्टि क्रम में पुरुष एक साधारण-सा हेतु है, बाकी सारा काम एक मात्र नारी को ही करना पड़ता है।
सन्तान धारण करने का काम से लेकर उसको जन्म देने और पालन करने का सारा दायित्व एक मात्र नारी ही उठाया करती है। सन्तान का प्रजनन एवं पालन मात्र नारी की कृपा पर ही निर्भर है। घर बसाना, उसे चलाना और उसकी व्यवस्था रखना नारी के हाथ में ही है। यदि वह अपने इस दायित्व से विमुख हो जाये अथवा इसमें उपेक्षा बरतने लगे तो कुछ ही समय में यह व्यवस्थित दिखलाई देने वाला समाज अस्त-व्यस्त और ऊबड़-खाबड़ दिखाई देने लगे। इस प्रकार यदि ध्यान से विचार किया जाये तो पता चलेगा, सृष्टि से लेकर समाज तक का संचालन क्रम मुख्यतः नारी पर निर्भर है। पुरुष तो इसके एक सहायक हेतु है। तब ऐसी नारी निर्मात्री, धात्री और व्यवस्थापिका जैसी पूजा-पत्री का तिरस्कार, अपमान, उपेक्षा अथवा अवहेलना करना कहाँ तक उचित है?
जो धारिका, धात्री और निर्मात्री है, यदि वह अपने तन-मन से प्रसन्न और प्रफुल्ल रहेगी तो उसकी सृष्टि भी उसी प्रकार की प्रसन्न एवं प्रफुल्ल होगी और यदि वह मलीन रहती है, तो उसका सृजन भी उतना ही मलीन और अयोग्य होगा। इसीलिये बुद्धिमान व्यक्ति , नारी का समुचित आदर करते हुए उसे प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं।
जब-जब जिन समाजों में नारी का समुचित स्थान रहा है, उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक तथा आत्मिक विकास की व्यवस्था रक्खी गई है, तब तब वे समाज, संसार में समुन्नत होकर आगे बढ़े हैं और जब-जब इसके प्रतिकूल आचरण किया गया है, तब-तब समाजों का पतन होता है।
नारी जन्मदात्री है। समाज का प्रत्येक भावी सदस्य उसकी गोद में पल कर संसार में खड़ा होता है। उसके स्तन का अमृत पीकर पुष्ट होता है। उसकी हँसी से हँसना और उसकी वाणी से बोलना सीखता है। उसकी कृपा से ही जीकर और उसके ही अच्छे-बुरे संस्कार लेकर अपने जीवन क्षेत्र में उतरता है। तात्पर्य यह कि जैसी माँ होगी, सन्तान अधिकाँशतः उसी प्रकार की होगी।
भारत के अतीत-कालीन गौरव में नारियों का बहुत कुछ अंश-दान रहा है। उस समय संतान की अच्छाई-बुराई का सम्बन्ध माँ की मर्यादा के साथ जुड़ा था। वह अपनी मान-मर्यादा की प्रतिष्ठा के लिये सन्तान को बड़े उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से पालती थी। देश, काल और समाज की आवश्यकता के अनुरूप सन्तान देना अपना परम-पावन कर्तव्य समझती थी। यही कारण है कि जब-जब युगानुसार सन्त, महात्मा, त्यागी, दानी योद्धा, वीर और बलिदानियों की आवश्यकता पड़ी, उसने अपनी गोद में पाल-पाल कर दिये।
किन्तु वह अपने इस दायित्व को निभा तब ही सकी है। जब उसको स्वयं अपना विकास करने का अवसर दिया गया है। जिस माँ का स्वयं अपना विकास न हुआ हो, वह भला विकासशील संतान दे भी कैसे सकती है। जिसको देश-काल की आवश्यकता और समाज की स्थिति और संसार की गतिविधि का ज्ञान ही न हो, वह उसके अनुसार अपनी सन्तान को किस प्रकार बना सकती है? अपने इस दायित्व को ठीक प्रकार से निभा सकने के लिये आवश्यक है कि नारी को सारे शैक्षणिक एवं सामाजिक अधिकार समुचित रूप से दिये जायें।
प्राचीन काल में भारत में नारी को यह सब अधिकार मिले हुए थे। उनके लिये शिक्षा की समुचित व्यवस्था थी, समाज में आने-जाने और उसकी गतिविधियों में भाग लेने की पूरी स्वतन्त्रता थी। वे पुरुषों के साथ वेद पढ़ती-पढ़ाती थीं, यज्ञ में होता, ऋत्विज् तथा यज्वा के रूप में योगदान किया करती थीं। यही कारण था कि वे गुण, कर्म, स्वभाव में पुरुषों के समान ही उन्नत हुआ करती थीं और तभी समान एवं समकक्ष स्त्री-पुरुष की सम्मिलित सन्तान भी उन्हीं की तरह गुणवती होती थीं। जब तक समाज में इस प्रकार की मंगल परम्परा चलती रही, भारत का वह समय देव-युग के समान सुख-शान्ति और सम्पन्नता पूर्ण बना रहा, किन्तु ज्योंही इस पुण्य-परम्परा में व्यवधान आया, नारी को उसके समुचित एवं आवश्यक अधिकारों से वंचित किया गया, भारतीय समाज का पतन होना प्रारम्भ हो गया और ज्यों नारी को दयनीय बनाया जाता रहा, समाज अधोगति को प्राप्त होता गया और अन्त में एक ऐसा अन्धकार-युग आया कि भारत का सारा गौरव और उसकी सारी साँस्कृतिक गरिमा मिट्टी में मिल गई।
कहना न होगा कि जिस प्रकार शिखा सहित ही दीपक, दीपक है, उसी प्रकार सुयोग्य, सुशील और सुगृहिणी के रूप में ही पत्नी, पत्नी मानी जायगी। अयोग्य विवाहितायें वास्तव में पुरुष रूपी शरीर में पक्षाघात के समान ही हैं। जीवनरूपी रथ में टूटे पहिये और उन्नति अभियान में विखण्डित पक्ष की तरह ही बेकार हैं।
इस रूप में पुरुष की पूर्ति नारी तब ही कर सकती है, जब उन्हें इस कर्तव्य के योग्य विकसित होने का अवसर दिया जाये। जहाँ स्त्रियों को केवल बच्चा पैदा करने की मशीन, विषय-विष का समाधान और चूल्हे-चौके की दासी-भर समझकर रक्खा जायेगा, वहाँ उससे उपर्युक्त पतित्व की अपेक्षा करना मूर्खता होगी।
हमारे समाज में आज एक लम्बे युग से नारी की उपेक्षा होती चली आ रही है। जिसके फल स्वरूप धर्म भार्या के रूप में उसके सारे गुण और समाज निर्मात्री के रूप में सारी योग्यताएं समाप्त हो गई हैं। उसे पैर की जूती बनाकर रक्खा जाने लगा, जिससे वास्तव में जूती से अधिक उसकी कोई उपयोगिता रह भी नहीं गई है। ऐसी निम्न कोटि में पहुँचाई गई नारी से यदि आज का स्वार्थी एवं अनुदार पुरुष यह आशा करे कि वह गृह-लक्ष्मी बनकर उसके घर को सुख-शान्तिपूर्ण स्वर्ग का एक कोना बना दे, उसकी सन्तानों की सुयोग्य, तो वह दिन के सपने देखता है, आकाश-कुसुम की कामना करता है।
यदि मनुष्य सच्ची सुख-शान्ति चाहता है और चाहता है कि उसकी उसकी नारी अन्नपूर्णा बनकर उसकी कमाई में प्रकाण्डता भरे, उसके मन को माधुर्य और प्राणों को प्रसन्नता दे! उसके परिश्रान्त जीवन में श्री बनकर हँसे और संसार-समर में शक्ति बनकर साहस दे, तो उसे पैरों से उठाकर अर्धांग में सम्मान देना ही होगा। अन्यथा टूटे पहिये की गाड़ी के समान उसकी जिन्दगी धचके खाती हुई ही घिसटेगी। घरबार उसे बेकार का बोझ बनकर त्रस्त करता रहेगा। अयोग्य एवं अनाचारी बच्चों की भीड़ दुश्मन की तरह उसके पीछे पड़ी रहेगी।
इस प्रकार देश, समाज, घर-गृहस्थी तथा वैयक्तिक विकास तथा सुख-शान्ति के लिये नारी की इस आवश्यकता जानकर भी जो उसे अधिकारहीन करके पैर की जूती बनाये रखने की सोचता है, वह उसे समाज का ही नहीं, अपनी आत्मा का भी हितैषी नहीं कहा जा सकता।
अपने राष्ट्र का मंगल, समाज का कल्याण और अपना वैयक्तिक हित ध्यान में रखते हुए नारी को अज्ञान के अन्धकार से निकाल कर प्रकाश में लाना होगा। चेतना देने के लिये उसे शिक्षित करना होगा। सामाजिक एवं नागरिक प्रबोध के लिये उसके प्रतिबंध हटाने होंगे और भारत की भावी सन्तान के लिये उसे ठीक-ठीक जननी का आदर देना ही होगा। समाज के सर्वांगीण विकास और राष्ट्र की समुन्नति के लिए यह एक सबसे सरल, सुलभ और समुचित उपाय है जिसे घर-घर में प्रत्येक भारतवासी को काम में लाकर अपना कर्त्तव्य पूर्ण करना चाहिये। यही आज की सबसे बड़ी सभ्यता सामाजिकता, नागरिकता और मानवता है। वैसे घर में नारी के प्रति संकीर्ण होकर यदि कोई बाहर समाज में उदारता और मानवता का प्रदर्शन करता है तो वह दम्भी है, आडम्बरी और मिथ्याचारी है।
गृहस्थ-जीवन की सम्पूर्ण आधार शिला आत्मीयता है। बच्चे रूखा-सूखा पाते हैं पर माता-पिता का साथ छोड़कर नहीं जाते। अपने सुख, अपनी सुविधायें विस्मृत कर स्त्री दिन-रात अपने पति अपने बच्चों की सेवा टहल करती है। एक ही भूख, एक ही प्यास—ममत्व। एक ही बन्धन—आत्मीयता ही है जो कष्ट की स्थिति में भी मनुष्य-मनुष्य को जोड़कर रखता है। पारस्परिक प्रेम, अपनत्व, स्नेह, सौहार्द, प्यार, दुलार पाकर निरे अभावग्रस्त परिवारों से भी लोग सम्बन्ध विच्छेद नहीं करना चाहते, पर आत्मीयता के अभाव में साधन सम्पन्न व्यक्ति भी परस्पर टकराते और भीतर ही भीतर घुला करते हैं।
ऐसी शिकायतें आये दिन सुनने को मिलती रहती हैं कि “हम भाइयों-भाइयों के बीच नहीं बनती”, “हमारा दाम्पत्य-जीवन बड़ा दुःखी है” “हमारे घर में ऐसा कलह छाया रहता है कि घर की चहारदीवारी में दम घुटता है।” ऐसी शिकायतें आज आम हो गई हैं। उन परिस्थितियों की कल्पना करते हैं जिनमें ऐसे लोग रह रहे होंगे तो इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि आज का समाज निःसन्देह बहुत दुःखी है और उसका कुछ उपचार भी अवश्य होना चाहिए।
क्या कोई बाहरी हस्तक्षेप कारगर हो सकता है?—नहीं। आपकी यह समस्या किसी बिचौलिये से ठीक होने वाली नहीं। मनोवृत्तियाँ विकृत हो रही हों तो कोई देवता भी उस स्थिति को ठीक नहीं कर सकता। किसी अन्य से शिकायत करने की अपेक्षा अपने आप में ही यदि उस कारण को ढूँढ़ा जाय तो सारा उत्पात उत्पन्न करता है और उसे दूर किया जाय तब सम्बन्ध-सुधार की आशा भी बढ़ जाती है और उसके परिणाम भी कुछ अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।
दो भाइयों की कलह-ग्रस्त स्थिति जिसमें एक भाई अपने सगे भाई की जान लेने पर उतारू हो जाता है, और दूसरी ओर भाई की कष्ट-ग्रस्तता के समाचार से दूसरा भाई समाहित हो जाता है और उसकी विपत्ति दूर करने के लिए बड़े से बड़ा त्याग करने की तैयारी करता है—ये दोनों परिस्थितियाँ जमीन-आसमान जैसे अन्तर की हैं। इस अन्तर पर विचार करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि इन दोनों स्थितियों में आत्मीयता का प्रगाढ़ होना और आत्मीयता न होना यह दो ही कारण हो सकते हैं अन्यथा धन दौलत किसी के सम्बन्ध खराब नहीं कर सकते। बटवारे का झगड़ा तब होता है जब स्वार्थ पैदा होता है। न्यायपूर्वक लोग उपभोग करते रहें तो ऐसी लड़ाई ही क्यों हो? अपने आपको बड़ा मानने और दूसरे को नीचा मानने की अमानवीय प्रकृति ही कलह उत्पन्न करती है। एक मनुष्य यदि दूसरे मनुष्य की स्थिति भी ठीक अपनी ही जैसी अनुभव करे तो फिर क्यों झगड़ा हो,क्यों सम्बन्ध खराब हों।
कमी कूद न कुछ प्रत्येक व्यक्ति में होती है। जो बेटा दिन-भर खेतों में काम करता है, कठिनाइयों में संघर्ष करते रहने के कारण संभव है वह कुछ तीखी आवाज में बोलता हो, माँ उसे अपने बेटे का गुण मानती है, दुर्गुण नहीं। पत्नी यदि अपनी सेवाओं के बदले कुछ अधिकार चाहती हो तो इसे उसकी स्वाभाविक वृत्ति मानना चाहिए न कि उसका दोष। इन स्वाभाविकताओं को माँ की दृष्टि से देखा जाय और उसके अनुरूप ही अपने आपको ढाल लिया जाय तो इसमें हर्ज ही क्या है। सेवा के बदले बड़ाई, परिश्रम के बदले प्यार देना, मनुष्य का धर्म है। इन सद् गुणों के बीच यदि कोई कटु लगने वाली बात जान पड़ती हो तो उसकी उपेक्षा ऐसे ही की जानी चाहिए जैसे नीम के गुणों के बीच उसकी कड़ुवाहट की उपेक्षा कर दी जाती है।
मानवीय अधिकारों की भूख सभी को होती है। बच्चा प्रातःकाल से लेकर सायंकाल तक तोड़-फोड़ वस्तु-खराबी और खर्च ही कराता है, इतना करते हुए भी वह माता-पिता से बराबर प्रेम और स्नेह का अधिकार रखता है। बच्चे को वह प्यार मिलता भी है, क्योंकि यह उसका मानवीय अधिकार था। बच्चे की ही तरह बड़ों के श्रम की प्रशंसा, उनके कार्य में सहयोग, अभावों की पूर्ति भी ऐसे ही मानवीय अधिकारों के अंतर्गत आती है। इसे पूरा करने में जब लोग कंजूसी दिखाते हैं तो स्वभावतः उसकी प्रतिक्रिया विपरीत होती है और आत्मीय-सम्बन्धों में विकृति आती है।
त्याग और उदारता का मानवीय अधिकार केवल वे लोग ही नहीं माँगते जो अधिक उपयोगी होते हैं अथवा जिनके पास किसी प्रकार की सत्ता होती है, वरन् यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि उसकी अपेक्षा समाज का हर व्यक्ति करता है। यह कहा जा सकता है कि जो कोई काम न आता हो या अनुपयोगी हो उसके प्रति परोपकार से क्या लाभ? पर बात ऐसी नहीं। त्याग और उदारता किसी भी व्यक्ति के साथ बरती जाय वह कभी निष्प्रभाव नहीं जाती। इतिहास साक्षी है कि इस उदारता के द्वारा कई पातकी व्यक्तियों को भी सुधारा जा सका है। बाल्मीकि और अंगुलिमाल जैसे हिंसक प्रवृत्ति के व्यक्तियों को भी मनुष्य की दया, क्षमा, त्याग और उदारता ने बदलकर रख दिया तो परिवार की छोटी-छोटी कमियों वाले व्यक्तियों को बदलना और भी आसान होना चाहिए।
माँ का हृदय बड़ा विशाल कहा जाता है क्योंकि वह लायक और नालायक दोनों बेटों को एक आँख, एक भावना से देखती है। अच्छे, चरित्रवान और सुशील बेटे के लिए जितनी मुहब्बत उसके हृदय में होती है, नालायक बेटे के लिए उससे कम नहीं। कुछ अंशों में तो वह उसका और भी अधिक हितचिन्तन करती है। माँ की तरह हम सब व्यक्तियों का हृदय उदार हो सकता है। यदि हमारा अहंकार सचमुच बड़ा है और हम अपने आपको अन्य लोगों की अपेक्षा कुछ बड़ा समझदार और सुधरा हुआ समझते हैं तो अयोग्य को भी आदर देने की योग्यता हम में होनी ही चाहिए।
स्वार्थ वृत्ति का उन्मूलन और त्याग वृत्ति का परिष्कार आत्मीयता बढ़ाने की दो धारायें हैं। यह दो स्वर्ण-सूत्र हैं जिन्हें अपनाकर खोये हुए सम्बन्धों को सुधारा जा सकता है, सुधरे हुए सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाया जा सकता है। पारिवारिक जीवन में यदि समता, सौमनस्यता, सुव्यवस्था, सुख और शान्ति बनाये रखनी हो तो इन बातों का पाठ प्रत्येक सदस्य को पढ़ाना ही पड़ेगा।
भावनाओं को ऊँचे उठाना कुछ कठिन बात नहीं इससे आपको घाटा होता हो ऐसी बात नहीं। अपनी ओर से उदारता व्यक्त करने वाला व्यक्ति बाहर से भले ही कुछ घाटे में जान पड़े पर यदि यह तत्व उसके जीवन में ओत-प्रोत हो जाते हैं तो उसके जीवन में अभूतपूर्व आत्म-संतोष का उभार देखा जा सकता है। आध्यात्मिक ही नहीं अनेक भौतिक लाभों से भी वह लाभान्वित होता है।
पारिवारिक संगठन के लिए आत्मीयता अनिवार्य शर्त है, उसे पूरा कर लिया जाय तो सुख और सम्पत्ति का उस गृहस्थ को कोई अभाव नहीं रह सकता। पर यह क्रिया बाह्य संदर्भ से न आनी चाहिये। आत्मीयता हमारी भावनाओं का प्रसार है। हम अपनी धर्मपत्नी के प्रति अपने भाई-बहनों और बच्चों के प्रति जैसी भावनायें रखते हैं उसी के अनुरूप आत्म-सम्बन्ध भी ढीले या प्रगाढ़ होते हैं। अच्छी भावनाओं का अच्छा प्रतिफल तुरन्त देखा जा सकता है जबकि दुर्भावनाओं से पारस्परिक सम्बन्ध और भी खराब होते हैं।
पारिवारिक संगठन गृहस्थ की समुन्नति का मेरुदण्ड है। वह जितना सुदृढ़ होगा, व्यक्ति , समाज और राष्ट्र भी उतना ही समुन्नत होगा। मनुष्य-जीवन की सुख-सुविधायें भी उसी में सन्निहित हैं। हमारे पास घर और साधन प्रचुर मात्रा में न हों तो कुछ हर्ज नहीं। बहुत अच्छा मकान, बहुत ऊँची शिक्षा न हो तो भी काम चल सकता है, पर पारिवारिक सौजन्यता के बिना हम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकते। सुखी गृहस्थ के लिए भाई-भाई में अटूट प्रेम, पिता-पुत्र में गहन आत्मीयता पति-पत्नी के बीच पूर्ण एकता और विश्वास होना आवश्यक है। इसे उपलब्ध कर सकें तो स्वर्ग इसी धरती में है उसे ढूँढ़ने के लिए कहीं अन्यत्र जाने की आवश्यकता न होगी।
क्या व्यक्ति, क्या समाज और क्या राष्ट्र सबकी प्रगति का भौतिक आधार अर्थ ही है। अर्थहीनता की दशा में इनमें से कोई भी भौतिक प्रगति अथवा उन्नति नहीं कर सकता। अर्थ के आधार पर ही मनुष्य की जीविका चलती है, जोकि जीवन गति की ही पूरक है। जब कोई व्यक्ति, समाज अथवा राष्ट्र अपनी आर्थिक समस्याओं में ही उलझा रहता है, तब वह संसार में होने वाली प्रगति का अनुसरण नहीं कर सकता और जो प्रगतिहीन है, वह किसी प्रकार की सुख-शान्ति नहीं पा सकता। अर्थ पर ही मनुष्य के भौतिक एवं आत्मिक विकास का होना निर्भर है। अस्तु आज ही नहीं, संसार के प्रगतिशील राष्ट्र सदा से अपनी आर्थिक उन्नति की ओर समुचित ध्यान देते चले आ रहे हैं, आगे भी देते रहेंगे।
आर्थिक उन्नति के अनेक साधन होते हैं। उत्पादन एवं व्यापार-व्यवसाय इसकी उन्नति के प्रमुख उपाय हैं। किन्तु इसके साथ यह भी न भूल जाना चाहिए कि मितव्ययता एवं किफायतशारी भी आर्थिक उन्नति का एक महत्वपूर्ण साधन है। एक ओर से अर्थागमन का मार्ग खोला जाये और दूसरी ओर उसके निकल जाने का भी मार्ग बना दिया जायेगा तो वह फूटे पात्र में दूध दुहने के समान ही होगा। एक ओर से पैसा आयेगा और दूसरी ओर से निकल जायेगा। इस प्रकार आपके लाख साधन इकट्ठे कर लेने पर भी जब तक धन के दुरुपयोग का नियन्त्रण न किया जायेगा, आर्थिक उन्नति में स्थायित्व न आ सकेगा। इसलिये अर्थागमन के साधन जुटाने के साथ ही अपव्ययता का मार्ग भी बन्द करना होगा।
अपने समाज में विवाह के नाम पर अपव्ययता का अभिशाप बुरी तरह फैला हुआ है और पूरे का पूरा समाज इसकी चक्की में बुरी तरह पिसा जा रहा है। हिन्दू समाज में व्यवसाय, व्यापार, उद्योग, धन्धों की इतनी कमी नहीं है, जितना कि यह गरीब बना हुआ है। यदि इस समाज के पास कारोबार के साधन बहुत अधिक संख्या में नहीं हैं, तो इतने कम भी नहीं हैं कि जिसके कारण पूरा समाज नंगा-भूखा दीखता है।
आय के साधन होते हुए भी अपने समाज की गरीबी का एक मुख्य हेतु अनेक ऐसी कुरीतियाँ एवं प्रथाएं भी हैं, जिनमें अतोल धन खर्च करना पड़ता है। उनमें से विवाह के नाम पर चलने वाली कुरीतियाँ भी हैं। विवाहों में धूम-धाम, रोशनी, आतिशबाजी, बाजा-गाजा, साज-बनाव करने में इतना खर्च किया जाता है कि एक-दो विवाह करने के बाद ही कोई भी सामान्य परिवार, कंगाल बन जाता है, कर्जदार हो जाता है, जिससे उसे और उसके ब्याज चुकाने में ही सारी कमाई लगने लगती है, जिससे परिवार की उन्नति का हर मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। तब यह तो स्वयं सिद्ध ही है कि जहाँ उन्नति एवं विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जायेगा वहाँ अन्य उन्नतियाँ तो दूर, आर्थिक उन्नति भी नहीं हो पाती।
यदि औसत लगाया जाये तो पता चलेगा कि अपने समाज में एक विवाह में दो-चार हजार रुपया सहज ही खर्च करने पड़ते हैं। इस प्रकार जिस परिवार में तीन शादियाँ भी करनी हुई तो उसे औसतन आठ-दस हजार रुपया तो खर्च करना ही पड़ेगा। किसी साधारण परिवार से यह आठ-दस हजार रुपया निकल जाना कोई साधारण बात नहीं हैं। जिस देश के लोगों की औसतन आय चार छः आना प्रतिदिन हो, उसे जब शादी-ब्याह के नाम पर इस प्रकार आठ-दस हजार का दण्ड भुगतना पड़ता है, तब उस पर एक स्थायी कंगाली आने के अतिरिक्त और क्या हो सकता है?
यह दस हजार का औसत व्यय तो केवल एक व्यक्ति के परिवार का है। इसी प्रकार यदि एक कुटुम्ब का हिसाब लगाया जाये तो भाई-भतीजे, चाचा-ताऊ के बच्चों का हिसाब लगाया जाये तो यह व्यय लाखों की संख्या में पहुँच जायेगा। इस प्रकार जिस समाज के एक मध्यम कुटुम्ब से लाखों की रकम ब्याह-शादियों के नाम पर बर्बाद हो जाये, उसकी आर्थिक स्थिति किस प्रकार ठीक रह सकती है? उसका गरीब, कंगाल और भुखमरा होना सहज स्वाभाविक ही है। इस प्रकार इन साधारण आँकड़ों के प्रकाश में यदि एक विशाल दृष्टिकोण से देखें तो पता चलेगा कि अपने समाज में करोड़ों-अरबों की सम्पत्ति ब्याह-शादियों के नाम पर होने वाली कुरीतियों को पूरा करने में स्वाहा हो जाती है।
यदि विवाह के नाम पर चलने वाली अपव्यय की कुरीतियों को रोक दिया जाये तो कहना होगा कि कुछ एक वर्षों में ही हमारा समाज, हमारा राष्ट्र आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में बहुत कुछ प्रगति करता दिखाई देने लगे।
आज हमें जो योजनायें पूरी करने और अन्य साधनों को जुटाने के लिये विदेशों से कर्ज लेना पड़ता है, वह न लेना पड़े और इसके कारण जो अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में अपने ऋण-दाताओं के अनुचित दबाव को सहना पड़ता है, वह न सहना पड़े। इस प्रकार कहना न होगा कि केवल शादी-ब्याहों में होने वाले अपव्यय को रोक देने से ही हमारे राष्ट्र की बहुत-सी समस्यायें हल हो सकती हैं, राष्ट्रीय गौरव बढ़ सकता है।
आर्थिक हानि के अतिरिक्त अपने समाज को अन्य और भी तरह की अनेक हानियाँ होती हैं। इसी प्रकार की अपव्ययता पूर्ण कुरीतियों के कारण घबड़ा कर बहुत से हिन्दू नित्य ही ईसाई एवं मुसलमान होते चले जा रहे हैं, जिससे अपने समाज की संख्या दिन पर दिन घटती और परकीय समाज की संख्या बढ़ती चली जाती है। अन्य समाज के लोग भी जो अपने समाज में शामिल नहीं होते, उसका कारण भी विवाह आदि के नाम पर अनावश्यक अनुपयोगी एवं असहनीय कुरीतियाँ ही हैं। इस प्रकार हम अपनी इन कुरीतियों के कारण अपने समाज की कितनी हानि कर रहे हैं, इसका अनुमान लगा सकना भी कठिन हो रहा है। किन्तु सामने खड़ी हुई भयावह परिस्थितियाँ एवं आर्थिक कंगाली फिर भी इसका कुछ अनुमान दे ही रही हैं। अपने समाज की रक्षा करने और उसकी उन्नति के लिये आज हमको अपने समाज से कुरीतियों एवं हानिकारक प्रथा, परम्पराओं को निकाल फेंकना ही होगा। नहीं तो, वह समय दूर नहीं, जब हिन्दू समाज इतना गिर जायेगा, इतना निकम्मा हो जायेगा कि फिर इसका उठ सकना कठिन ही नहीं, असम्भव ही हो जायेगा।
कुटुम्ब पीछे लाखों का धन बचाने के लिये जो सबसे सरल उपाय है, वह है—आदर्श-विवाहों का प्रचलन! यदि मितव्ययी आदर्श-विवाहों का प्रचलन प्रारम्भ हो जाये तो बिना कोई अन्य साधन जुटाये प्रति परिवार कम से कम आठ-दस हजार की बचत होना निश्चित हो जाये और यह बचत बेटे-पोतों में चलती हुई कुछ ही समय में लाखों में पहुँच जाये और इतनी बड़ी अहैतुक आय किसी भी परिवार को उन्नति के चरम-शिखर पर पहुँचा देने के लिये कम न होगी।
जिस प्रकार नकद रुपया मिलने और किसी प्रकार रोजगार में लाभ होने से आय बढ़ती है, उसी प्रकार अपव्यय से बचाये हुए धन को भी एक अतिरिक्त आय ही माना जाता है। जब तक सादगीपूर्ण आदर्श-विवाहों का प्रचलन नहीं होता, हर परिवार को आठ-दस हजार का प्रबन्ध करना ही होगा और उसे विवाह के नाम पर फूँक देना होगा। यदि उसे इस प्रबन्ध अथवा विवाह के लिये बचाए हुए पैसे को खर्च करने की मजबूरी न हो तो यह पैसा उसकी आय के रूप में ही उसके पास बना रहेगा। यही नहीं, जब इतनी बड़ी रकम किसी कार-रोजगार को बढ़ाने में लगा दी जायेगी, तब तो कुछ ही समय में उससे होने वाली आय का ठिकाना ही न रहे। यह सुविधा जब हर परिवार उठाने लगेगा तब सहज ही सोचा जा सकता है कि अपने समाज की आर्थिक दयनीयता कितनी जल्दी दूर हो जायेगी?
यदि एक बार भी यह मान लिया जाय कि विवाहों में होने वाले खर्च की मजबूरी से ही लोग पैसा बचाते हैं, वैसे बचाने योग्य आमदनी आज के कठिन दिनों में किसे होती है? तब भी तो जो बच्चों का पेट काट कर, उनकी शिक्षा में न्यूनता करके धन बचाने की कठिनाई है, उससे तो छुटकारा मिल ही जाये और जब निश्चिन्ततापूर्वक परिवार खायेगा, पहनेगा और बच्चों की समुचित पढ़ाई-लिखाई होने लगेगी तो परिवार का विकास आप से आप ही होने लगेगा। जिस परिवार के लोग प्रसन्न, स्वस्थ एवं शिक्षित होंगे, उसकी आय बढ़ते और गरीबी दूर होते क्या देर लगेगी? अस्तु आज समय का सबसे बड़ा तकाजा है कि महंगी विवाह-पद्धति बंद की जाये और आदर्श-विवाहों का प्रचलन किया जाये।
शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि संसारमाया परिवर्जितोऽसि। संसारस्वप्नं त्यज मोहनिद्राँ मदालसा वाक्यमुवाच पुत्रम्॥
“हे पुत्र! तू अपनी जननी मदालसा के शब्द सुन! तू शुद्ध है, बुद्ध है, निरञ्जन है, संसार की माया से रहित है। यह संसार स्वप्न मात्र है। उठ, जाग्रत हो, मोह निद्रा का परित्याग कर। तू सच्चिदानन्द आत्मा है, अपने स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर।”
देवी मदालसा का नाम भारतवर्ष की उन आदर्श नारियों में लिया जाता है जिन्होंने अपने बालकों के निर्माण में आत्म-ज्ञानी गुरु की भूमिका निभाई है। वस्तुतः पुत्र के लिये पथ-प्रदर्शक, मार्ग-दर्शन, सृष्टा और निर्माता सब माता ही है। शरीर का रस रक्त-जीवन प्राण-तत्व लेने के साथ ही गुण और साँसारिक ज्ञान भी बच्चे को प्रायः माता से ही प्राप्त होते हैं। बच्चा बहुत दिनों तक, जब तक कि उसकी स्वतन्त्र विचार-शक्ति पकने नहीं लगती तब तक वह माता के पास ही रहता है। गुण और संस्कारों का परिपाक बाद में होता है पर उनका निर्माण तो माँ ही करती है। संस्कारों की पूर्व सूत्रधार माता ही है। वह जिस तरह के संकल्प और विचार बच्चे में पैदा करती है, वैसी ही उसमें ग्रहणशीलता का आविर्भाव हो जाता है और बाद में उसी तरह के तत्व वह संसार में ढूँढ़कर अपने संस्कार जन्य गुणों का अभिवर्द्धन करता है इसलिये यही कहना पड़ेगा कि मनुष्य आज जिस स्थिति में है उसका श्रेय अधिकाँश उसकी माता को ही है। संस्कारवान माताएं बच्चों के चरित्र की नींव बाल्यावस्था में डालती हैं जबकि उन्हें दिक्भ्रान्त कर आचरणहीन बनाने में भी प्रमुख हाथ उन्हीं का रहता है।
सन्तान के रूप में जीवात्मा का अवतरण और उसकी विकास-यात्रा में योग देना माता-पिता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। पिता गर्भ-धारण में केवल सहयोग प्रदान करता है बाद में उस गर्भ को पकाने का कार्य माता ही करती है, इसलिए पिता की अपेक्षा माता का उत्तरदायित्व अधिक है। बिना उचित ज्ञान और स्थिति की जानकारी हुए माता इस कर्त्तव्य का भली-भाँति पालन कर सकती होंगी यह अविश्वस्त है। अतएव महिलाओं को यह ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है कि सन्तान काम-वासना का परिणाम नहीं है, काम तो एकमात्र प्रेरक तत्व है जो एक आत्मा के अवतरण के लिए माता-पिता को प्रेरित करता है।
गर्भ में आने पर सन्तान का शरीर बढ़ता है, शरीर में उसका मस्तिष्क का भाग भी है इसलिए मानसिक-क्रिया का संचालन भी उसी समय से प्रारम्भ हो जाता है। जीव अनेक योनियों में रहने के बाद जब साँसारिक विषमताओं से थक जाता है तो उसकी इच्छा होती है कि वह आत्मकल्याण प्राप्त करे, ऐसा सुयोग केवल मनुष्य-जीवन में ही सम्भव है क्योंकि आत्म-विकास के सम्पूर्ण साधनों का संकलन केवल मनुष्य देह में हुआ है। शरीर की स्थिति सामान्य जीवों की तरह होते हुए भी बौद्धिक ज्ञान का आविर्भाव होना, उसके लिए सबसे बड़ा सहयोग है उसी के द्वारा वह मनुष्य योनि में अपना ज्ञान विकसित करता है और ज्ञान के आधार पर ही आचरण करता है। दोनों का ठीक समन्वय होने पर ही आत्म-कल्याण की स्थिति प्राप्त करना सम्भव है। ज्ञान और आचरण श्रेष्ठ तभी हो सकता है जब पूर्व में बच्चे को तद्नुकूल शिक्षा दी गई हो। जिस प्रकार संस्कृत की शिक्षा प्राप्त बच्चा अंग्रेजी नहीं बोल सकता, उसी प्रकार यदि बच्चे को पूर्व में ही संस्कारवान नहीं बनाया गया तो बाद में उसके ज्ञान और आचरण में श्रेष्ठता पैदा करना प्रायः असम्भव ही होता है।
गर्भावस्था में बच्चा अपने माता के केवल प्रकट आचरण से ही प्रभावित नहीं होता, उससे तो बहुत हलका असर बालक की मनोभूमि पर पड़ता है, अधिकाँश प्रभाव तो मानसिक भावनाओं और विचारणाओं का होता है। नारी की मनोभूमि को व्यवस्थित रखने में उसके पति और परिजनों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है, पर प्राणवान और संकल्पशील माताएं अपने बच्चे के लिए परिस्थितियों की अपेक्षा भी कर सकती हैं जो उसके मस्तिष्क में विषाद उत्पन्न कर सकती थीं। घर के अमंगल वातावरण को भी वे गर्भस्थ बच्चे के कल्याण के लिये पचा सकती हैं और उनकी अपने पर छाप न पड़ने देकर निष्ठापूर्वक अच्छे विचार अच्छी भावनायें और पवित्र जीवन बिता सकती हैं। इसी निष्ठा का बालक के निर्माण में उपयुक्त प्रभाव होता है। ऐसे ही बच्चे दृढ़-निश्चयी, मनोजयी और संकल्पवान् होते हैं, वही आगे चलकर श्रेष्ठ और प्रतिभावान भी बनते हैं।
यह तभी सम्भव है जब माँ यह ध्यान करे कि उसकी कोख में आई हुई सन्तान माँस-पिण्ड नहीं है। उसे अपनी सम्पत्ति भी न समझे। यह नासमझ उसे गलत कर्त्तव्य के लिये भी उत्साहित कर सकती हैं। वस्तुतः सन्तान परमात्मा की धरोहर के रूप में मिलती है। यदि उससे आत्म-कल्याण में सहयोग बन पड़े तो यह परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ सेवा हुई। कदाचित उसकी उपेक्षा हुई तो यह मानना पड़ता है कि माँ ने मातृत्व की कसौटी को सही सिद्ध नहीं किया। उसने वस्तु स्थिति समझने में भूल की।
सुयोग्य बालक ही राष्ट्र के सुयोग्य नागरिक बनते हैं। अच्छे बीजों से उत्पन्न खेती ही अच्छी होती है। सुयोग्य सन्तान होना बहुत कुछ इस बात पर अवलम्बित है कि माताएं भी सुयोग्य हों और बालक के निर्माण की प्रचुर क्षमता और आवश्यक ज्ञान भी उन्हें हो। स्वास्थ्य रहने, स्वच्छता प्रिय होने, व्यवहार कुशल, मधुर-भाषिणि, कर्मनिष्ठ, सादगी प्रिय होना यह सभी आवश्यक गुण एक सुयोग्य माता में हों पर साथ-साथ उसका संकल्प बल भी प्रखर हो और वह संकल्प शिशु को एक आत्मा के रूप में ध्यान रखकर ही हो। संकल्प तो साँसारिक और स्वार्थपरक भी हो सकता है पर ऐसा होना एक प्रकार का विकार है जो जीवात्मा के दुःख का कारण भी हो सकता है। सुयोग्यता का आधार पवित्रता और आध्यात्मिकता ही होना चाहिए।
आध्यात्मिकता का अर्थ है नारी में मातृत्व के सभी आवश्यक गुणों का समावेश होना। प्रेम, स्नेह, आत्मीयता, वात्सल्य, आस्तिकता आदि सभी गुण उसी के अंतर्गत हैं। नारी जीवन में इसका समावेश होने पर ही यह सम्भव है कि वह अपने बच्चे को शुद्ध, प्रबुद्ध निरंजन और आत्म-स्थित होने का उपदेश दे सके। आत्मवादी या ब्रह्म-परायण होना, साँसारिक कर्त्तव्यों से विमुख होना नहीं है वरन् उसमें दिव्य जीवन के प्रति दृढ़ता उत्पन्न करना है इसीलिए माताओं को कर्त्तव्य-परायण होने के साथ-साथ ईश्वर-परायण होना भी आवश्यक है। इस प्रकार का समन्वय होने से ही गर्भस्थ शिशु के निर्माण की आवश्यकता को पूरा किया जा सकता है।
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फार्म 4
प्रकाशन का स्थान— मथुरा
प्रकाशन का अवधि क्रम-मासिक
मुद्रक का नाम— श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता— भारतीय
पता— बम्बई भूषण प्रेस, मथुरा।
प्रकाशक का नाम— श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता—भारतीय
पता—अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा।
5. सम्पादक का नाम—श्रीराम शर्मा आचार्य
राष्ट्रीयता—भारतीय
पता—अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा।
6. स्वत्वाधिकारी—श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा।
मैं, श्रीराम शर्मा आचार्य यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिये गये सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य हैं।
हस्ताक्षर-
श्रीराम शर्मा आचार्य
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युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति
“विचारों की शक्ति महान् है। हाड़-माँस के बने शरीर में जो कुछ भी विशेषता और विलक्षणता है, उसे विचारों का ही प्रकाश कहना चाहिए। जिसमें विचारों की उत्कृष्टता नहीं, उसे नर-पशु ही मानना चाहिए।”
इस तथ्य को ध्यान में रखकर ऋषियों ने शास्त्र और दर्शन का, अध्यात्म एवं धर्म का सृजन किया। ब्राह्मणों एवं सन्तों का जीवन, लोक-जीवन में विचार-शक्ति का उत्कर्ष करने में ही लगता रहा है। मानव जाति की यही सबसे बड़ी सेवा है।
“अखण्ड-ज्योति” विगत 27 वर्षों से इसी सेवासाधना में संलग्न है। अपने पाठकों में वह हर मास ऐसी प्रेरणा एवं ज्योति प्रदीप्त करती है, जिससे आदर्शवादिता के मानवोचित सत्पथ पर चलते हुए जीवन को सार्थक बना सकना सम्भव हो सके। यह प्रेरणा किसने कितनी ग्रहण की? इसकी परख इसी कसौटी पर की जा सकती है कि कौन उस प्रेरणा को अपने व्यावहारिक जीवन में किस सीमा तक कार्यान्वित कर रहा है? विचारों में विलक्षण शक्ति तो अवश्य है, पर वह सजीव तभी होती है, जब कार्य रूप में परिणत होती चले। हमें उत्कृष्ट विचारों का शक्ति भर प्रसार करना चाहिए, पर साथ ही यह भी देखना चाहिए कि यह पठन-पाठन एक व्यसन मात्र ही बनकर तो नहीं रह रहा है? पाठक उसे हृदयंगम भी कर रहे हैं या नहीं?
इस कसौटी को “युग-निर्माण योजना” के रूप में प्रस्तुत किया गया है। परिजनों ने “अखण्ड-ज्योति” की प्रेरणाओं को कितना अपनाया? इन प्रश्न का उत्तर इसी तरह मिलेगा कि उनमें व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण के लिये कितनी लगन, श्रद्धा, स्फूर्ति एवं भावना उत्पन्न हुई? यदि ऐसा कुछ न हुआ हो तो समझना चाहिए कि परिजन केवल पाठक मात्र हैं और केवल पाठ तो अखण्ड-ज्योति तो क्या, वेद-शास्त्र या स्तोत्र-कीर्तन का भी करते रहा जाय तो कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। काम तो काम से ही चलता है। सद् विचारों का उद्देश्य— सत्कर्म का उद्भव है। जो बीज अंकुर न उत्पन्न कर सके, उसकी क्या सार्थकता है, जो विचार—कर्म में परिणत न हो सके उसे निर्जीव एवं निरर्थक ही कहा जायगा। परिजनों के अन्तःकरण में जो सद्प्रेरणाओं का बीजारोपण अखण्ड-ज्योति करती रही है, उसकी सार्थकता, निरर्थकता परखने का समय अब आ पहुँचा। हमें अपने श्रम के परिणामों का लेखा-जोखा अब देखना-ढूँढ़ना ही चाहिये।
आध्यात्मिक उन्नति के पथ पर आज तक जितने भी व्यक्ति अग्रसर हुए हैं, उनमें से प्रत्येक को जीवन-शोधन का अवलम्बन लेना पड़ा है। ऐसा हो ही नहीं सकता कि अपने अन्दर सद्भावनाएं एवं सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाये बिना कोई व्यक्ति —ईश्वर या आत्मा की प्राप्ति कर सके। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक इसी राज-मार्ग पर हर साधक को चलना पड़ा है। इससे बच निकलने का और कोई सीधा जल्दी का ‘शार्टकट’ न सम्भव हुआ है और न हो सकता है। आज कुछ लोग थोड़ा-सा मन्त्र-तन्त्र करके उन ऋद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करने के सपने देखा करते हैं, जो आत्मबल बढ़े बिना किसी को भी, कभी भी, प्राप्त नहीं हो सकतीं। मन्त्र-तन्त्र तो एक प्रकार के कारतूस हैं, जो बढ़िया बन्दूक द्वारा चलाये जाने पर ही अपना चमत्कार दिखाते हैं। ओछे, स्वार्थी, घटिया और कमीने व्यक्तित्व रखकर कोई व्यक्ति किसी पूजा विधान का कोई लाभ नहीं उठा सकता। यह एक अकाट्य एवं सुनिश्चित तथ्य है।
हम अपने परिजनों को अध्यात्म प्रगति की दिशा में वस्तुतः अग्रसर करने के लिये लालायित हैं। क्योंकि इस संसार में इससे बढ़कर लाभदायक और कोई उपाय मार्ग नहीं है। जितना सुख, जितना आनन्द एवं जितना वैभव अध्यात्म-मार्ग के पथिक को मिल सकता है, उतना और किसी को नहीं। अन्य व्यवसायों की अपेक्षा यह सरल ही है, कठिन नहीं। इसलिए अखण्ड-ज्योति केवल विचार निर्माण का कर्तव्य पूरा करके ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मान लेती, वरन् उस पथ का निर्माण भी करती है। जिस पर चलकर कल्याण-पथ के पथिकों को अभीष्ट उद्देश्यों की प्राप्ति हो सके। जिस मार्ग पर, जिस प्रकार चलते हुए हम जितनी सफलता स्वयं प्राप्त कर सके हैं, उसका रहस्य तो हमें बता ही देना है। कोई सुने चाहे न सुने, विश्वास करे या न करे पर हम यह कहते ही रहेंगे कि उपासना, आत्म-कल्याण में तभी सहायक हो सकती है, जब उसके साथ-साथ जीवन को उत्कृष्ट बनाने का साधना-क्रम भी जुड़ा हुआ हो। जीवन-साधना के बिना उपासना अधूरी है। आज लाखों धर्म-जीवी केवल कुछ थोड़ा-सी उपासना की टंट-घंट करके आत्म-कल्याण की आशा लगाये रहते हैं, फलतः उन्हें सर्वथा निराश एवं असफल ही रहना पड़ता है। हमें जानना चाहिए कि अध्यात्म-लाभ बड़ा लाभ है, अतएव उसकी कीमत भी बड़ी है। आत्म-शोधन, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास के लिए प्रयत्न करने से कम मूल्य पर उस लाभ को प्राप्त नहीं किया जा सकता। सोना सस्ता नहीं बिकता और न हीरा कम दाम में खरीदा जाता है। अध्यात्म भी सोना और हीरा है, जो जीवन निर्माण के मूल्य पर ही किसी को उपलब्ध हो सकता है।
उपासना की विधियाँ अन्य अनेक लोग भी अपने-अपने ढंग से बताते हैं। हमने गायत्री उपासना का महत्व देखा, समझा और अनुभव किया है। इसलिए उसकी विवेचना के साथ साथ प्रेरणा करते रहते हैं। पर साथ ही यह भी कहते हैं कि जितना ध्यान उपासना में दिया जाय, जितना माहात्म्य उपासना का समझा जाय उससे कहीं अधिक ध्यान जीवन-साधना पर दिया जाय और कहीं अधिक माहात्म्य उस आत्म-निर्माण के प्रयास का समझा जाय। अखण्ड-ज्योति इसी दिशा में अपने परिवार का पथ-प्रदर्शन करती है। हम पत्रिका एवं पुस्तकों से विचार-क्षेत्र को परिष्कृत करने का प्रयत्न करते हैं। पर साथ ही यह भी सुझाया जा रहा है कि आत्म-निर्माण का अभ्यास तत्परतापूर्वक जारी रखें। इसे न तो गौण समझें और न महत्वहीन वरन् सच तो यह है कि उपासना का प्राण भाग, हृदय संस्थान यह जीवन साधना ही है। इसमें जिसकी जितनी निष्ठा एवं तत्परता होगी, उसे उतने ही बड़े स्तर का अध्यात्म लाभ होगा, और इस लाभ से वह उतना आनन्द प्राप्त कर रहा होगा।
जीवन-साधना में उसके दो अंग हैं। (1) दोष दुर्गुणों का निवारण एवं (2) सद्गुणों का अभिवर्धन। गाड़ी दो पहियों से चलती है, उसी प्रकार जीवन-साधना के भी यह दो ही अवलम्बन हैं। जीव रूपी पक्षी इन दो पंखों के सहारे ही आत्म-कल्याण के आकाश में उड़ता है। दोष दुर्गुणों से रहित होने के लिए कई व्यक्ति प्रयत्न करते हैं और उसमें सफल भी हो जाते हैं। चोरी, व्यभिचार, असत्य भाषण, जुआ, चुगली आदि छोड़ देते हैं। यह छोड़ने का प्रयत्न आत्मिक प्रगति की आधी आवश्यकता पूरी करता है। देह में रोग घुसा हो, तो शरीर पुष्ट कैसे होगा, रोग हटाने पर वह क्षय रुक जाता है जो शरीर को दिन-दिन गलाये डाल रहा था। पर रोग से मुक्ति प्राप्त कर लेना ही मात्र स्वास्थ्य संवर्धन के लिए पर्याप्त नहीं है। व्यायाम, पौष्टिक आहार आदि की आवश्यकता पूरी किये बिना कोई रोगमुक्त व्यक्ति भी शारीरिक दृष्टि से बलिष्ठ नहीं हो सकता। सद्गुणों का अभिवर्धन इस प्रकार का आत्मिक आहार एवं व्यायाम है जो साधक का आत्म बल बढ़ाकर उसे दिव्य विभूतियों एवं ईश्वरीय विशिष्ट अनुग्रहों का अधिकारी बनाता है।
दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने का प्रयत्न आत्मिक प्रगति का आधा अंग है, शेष आधा अंग तब पूरा होता है जब सत्प्रवृत्तियों में अभिवर्धन का अभ्यास किया जाता है। इसके लिए एकमात्र साधन “संसार में सद्भावना अभिवृद्धि की सेवा” साधना में संलग्न होना ही है। प्राचीनकाल में प्रत्येक संत और ब्राह्मण को इसी मार्ग पर चलना पड़ा है। उनमें से हर एक ने लोक-सेवा का व्रत लिया और उसे आजीवन निवाहा है। परोपकार एक विशुद्ध आध्यात्मिक साधना है। सेवा धर्म को अपनाये बिना किसी आत्मा में से आन्तरिक उल्लास प्रस्फुटित नहीं हो सकता। आज इस धूर्तता के युग में निठल्ले, कामचोर व्यक्ति संसार को मिथ्या बताकर मुफ्त के गुलछर्रे उड़ाते और आलस में पड़े रहने का नाम त्याग, वैराग्य बताते हैं। यह कलियुगी परिभाषा है। आज लाखों व्यक्ति इस अनाचार से ग्रसित होकर उत्थान की तो बात ही कहाँ उल्टे पतन के गहरे गर्त में गिरते चले जा रहे हैं। जिसमें सेवा के लिए उत्साह एवं निष्ठा न हो वह न तो संत है, न ब्राह्मण, न योगी, न ज्ञानी। यहाँ तक कि उसे अध्यात्म तत्व-ज्ञान से परिचित भी नहीं कहा जा सकता। सच्चे अध्यात्म की ऋषि पद्धति को जानने के लिये हमने वेदों का, उपनिषदों का, शास्त्रों का, दर्शनों का, स्मृतियों का, पुराणों का मन्थन अवगाहन किया है। उन्हें अनुवादित और प्रकाशित करने की भी व्यवस्था की है ताकि लोग आज की प्रचलित भ्रान्त धारणाओं को बहिष्कृत कर आत्मिक प्रगति के वास्तविक मार्ग को जानने, उस पर चलने और लाभ उठाने में समर्थ हो सके।
हर सच्चे अध्यात्मवादी एवं साधक की तरह हमने निज के जीवन में (1) उपासना (2) जीवन-साधना (3) परमार्थ-तीनों ही साधना क्रमों को अपनाया है और उस समग्र साधना का वैसा ही लाभ देखा है, जैसा कि प्राचीनकाल के साधकों को मिलता था, अथवा शास्त्रों में जैसा लिखा है। हमने केवल भजन ही नहीं किया है, वरन् अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में कम श्रम नहीं किया है। इसके लिये लोक-मंगल के लिये सेवा संलग्न रहने की प्रवृत्तियों में तनिक भी कमी नहीं आने दी है। जीवनोत्कर्ष की प्रेरणा भर देने वाले साहित्य का सृजन, संगठन, प्रशिक्षण एवं व्यक्तिगत रूप से भी जो जिसकी जितनी सेवा सहायता बन पड़े उसके लिए अपना तप पूँजी का अनुदान, यह प्रक्रिया सदा से ही हमने चलाई है और यह माना है कि जीवन-शोधन एवं लोक सेवा के यह दोनों कार्य भी उपासना के अविच्छिन्न अंग हैं। इन अंगों को हटा दिया जाय और चौबीस घण्टे केवल भजन करते रहा जाय तो वह भजन ऐसा ही अपूर्ण होगा जैसा सिर और पैर काट देने के उपरान्त पड़ा हुआ बीच वाला धड़। उस धड़ से वह आशा नहीं की जा सकती जो सर्वांगपूर्ण शरीर से। सर्वांगपूर्ण साधना के तीनों ही अंग समान रूप से उपयोगी हैं। इन तीनों का सम्मिश्रित स्वरूप ही समाज साधना कहलाता है और उसी से सर्वांगपूर्ण आध्यात्मिक प्रगति होती है। अध्यात्म तत्व-ज्ञान का यही रहस्य एवं मार्ग है। जिनने इसके शार्टकट निकाले हैं उनने भारी भूल की है। जो केवल थोड़े से भजन का, टंट-घंट का सहारा लिये बैठे हैं और वह लाभ पाने की आशा करते हैं—जो त्रिविध समग्र साधना करने पर ही किसी को मिल सकती है—तो इसे एक भूल ही कहना चाहिए। हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति का एक पाठक भी इस भूल या भ्रम में न रहे। यदि उनसे उपासना में निष्ठा प्रदर्शित की है जो फिर दो कदम और भी आगे बढ़ाने चाहियें। जीवन-शोधन और परमार्थ के लिये भी उसे उतना ही मन, उतना ही अपना ध्यान, समय और श्रम संलग्न करना चाहिये। जहाँ वह त्रिविध समन्वय हुआ कि अध्यात्म का आशाजनक, आश्चर्यमय एवं उत्साहवर्धक परिणाम सामने आना आरम्भ हो जायगा।
युग निर्माण योजना—विशुद्ध रूप से एक साधना-पद्धति है। परिजनों को हम बहुत जोर देकर कहते रहते हैं कि वे प्रातः उठते समय यह योजना बनाया करें कि आज का दिन एक समग्र जीवन है, इसे रात्रि की मृत्यु आने तक कितने अच्छे ढंग से व्यतीत किया जा सकता है, यह सोचे और करे। प्रातः इस आधार पर बनाई गई योजना को रात्रि तक कड़ाई के साथ पालन किया जाय। दिनचर्या पूरी करते हुये बराबर यह ध्यान रखा जाय कि प्रातः निर्धारित कार्य-पद्धति में कहीं भूल तो नहीं हो रही है। चूक को तुरन्त सँभाला जाय। रात्रि को सोते समय दिन-भर के मन द्वारा किये गये विचारों और शरीर द्वारा किये गये कार्यों का लेखा-जोखा लिया जाय। जो उचित हुआ हो उसके लिए अपने आपको सराहा जाय और जो अनुचित हुआ हो उनके लिये धिक्कारा जाय। दूसरे दिन आज से भी अच्छी योजना बनाने की बात सोचकर सो जाया जाय। यह क्रम जितना भी चल रहा होगा वे अपनी कमियों और कठिनाइयाँ को जीतते हुये निश्चय ही जीवन-शोधन की साधना पर बढ़ रहे होंगे, और उनकी आध्यात्मिक प्रगति का एक तिहाई पथ प्रशस्त हो रहा होगा।
उपासना आवश्यक है। एक घण्टा भी यदि वह ठीक तरह हो सके तो पर्याप्त है। एक घण्टे का व्यायाम किसी भी शरीर को परिपुष्ट रख सकता है। एक घंटे की उपासना यदि वह भावपूर्वक की गई है तो आत्मा में पर्याप्त बल एवं प्रकाश उत्पन्न कर सकती है।
एक तिहाई साधना की पूर्ति परमार्थ के द्वारा ही होगी। आज की सामयिक आवश्यकता जन मानस में प्रेरणाप्रद भावनाओं का बीज बोने की है। हमें उसी को पूरा करना चाहिये। युग निर्माण योजना, इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए है। वैसे ही अपना काम धंधा करते हुए जिनसे भी संपर्क हो उन्हें नव-निर्माण की प्रेरणा देते रहना कुछ कठिन नहीं है, और इसे स्वभाव एवं अभ्यास में सम्मिलित कर लिया जाय तो बहुत काम हो सकता है। यह तो करते ही रहना चाहिये। साथ ही नित्य एक घंटा समय एवं एक आना प्रतिदिन वाली बौद्धिक कार्य-पद्धति का भी मजबूती से ध्यान रखना चाहिये। ईश्वर का सदा ध्यान रखना उचित है पर एक नियत समय भजन के लिये भी होना चाहिये। इसी प्रकार हम दिन-भर जन-जागरण के लिये प्रयत्न करते रहें पर एक घंटा तो उसके लिये विशेष रूप से निश्चित निर्धारित रहना ही चाहिये। परिजनों के सम्मुख इस समय-अनुदान को भी एक आवश्यक माँग के रूप में रखा गया है, और सन्तोष की बात है कि उसे अधिकाँश ने स्वीकार भी किया है। प्रतिज्ञा-पत्र भी भरा है। पर आदत के अनुसार फिर वह ढील-पोल चलने लगी है। जिनने प्रतिज्ञा-पत्र भरे थे वे भी शिथिलता एवं लापरवाही बरतने लगे हैं। यह उचित नहीं, जन-जागरण को, लोक-सेवा को उपासना का अविच्छिन्न अंग मानना चाहिये और यह विश्वास रखना चाहिये कि भजन से ईश्वर जितना प्रसन्न होता है, भजन से जितना आत्म-बल बढ़ता है—ठीक उतना ही इस लोक मंगल में भावनापूर्वक संलग्न रहने से भी होता है। अतएव यह उपेक्षणीय नहीं, वरन् साधना की अविच्छिन्न शर्त के रूप में अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
अखण्ड-ज्योति अपने परिजनों को अध्यात्म आश्चर्यजनक लाभ उपलब्ध कराने के लिये सचेष्ट है। हमारे प्रेरक एवं मार्ग दर्शक ने जो रास्ता हमें बताया है वही हम अपने परिजनों को बता रहे हैं। वह ऋषि-प्रणीत, शास्त्र-सम्मत सुनिश्चित राज मार्ग है। आध्यात्मिक प्रगति का और कोई सीधा रास्ता हो नहीं सकता। भजन जादू नहीं है, जिसकी फूँक लगने से ही तरह-तरह के चमत्कार सामने आ उपस्थित हों। जादूगरी की बालबुद्धि हमें छोड़नी चाहिये, वस्तुस्थिति को समझना चाहिये और सही रास्ते पर चलना चाहिये ताकि सही सत्परिणाम का परिपूर्ण लाभ भी प्राप्त किया जा सके।
परिजनों को यह तथ्य हृदयंगम करने चाहियें। अखण्ड-ज्योति में छपने वाले सद्विचारों को वे पढ़ते और पसन्द करते हैं तो इतने मात्र से ही उन्हें सन्तुष्ट नहीं हो जाना चाहिये। मंजिल के अगले कदम भी उठाने चाहियें। जीवन-शोधन की पुनीत प्रक्रिया को तीव्र करना चाहिये। अपने साथ अधिक कड़ाई बरतने और भीतरी शत्रुओं के साथ अधिक बहादुरी से लड़ने का संकल्प करना चाहिये। मानव-जीवन पाया है तो उसी के अनुरूप मनःस्थिति बनानी चाहिये। यह सुरदुर्लभ अवसर यों ही निरर्थक नहीं जाने देना चाहिये। जो बीत गया सो गया, अभी जितना जीवन शेष है वह भी कम नहीं, सदुपयोग के लिये तत्परता बरती जाय तो इतने से भी बहुत कुछ हो सकता है। सेवा रहित जीवन गन्ध रहित पुष्प के समान, जलरहित सरोवर के समान महत्वहीन है। हमारी प्रकृति में लोक-मंगल के लिये अधिक तत्परता का समावेश होना चाहिये। युग निर्माण योजना को कोई बाहरी कार्य-पद्धति नहीं वरन् व्यक्तिगत जीवन को आध्यात्मिक दिशा में परिष्कृत करने की एक अनुभूत साधना-पद्धति मानना चाहिये। यह आस्था हमारे मनों में इतनी गहरी जमे कि उसे क्रियान्वित किए बिना किसी से रहा ही न जा सके तो अखण्ड-ज्योति अपने प्रयत्नों की सार्थकता माने और हम अपने श्रम को सफल हुआ समझें।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों के सम्मुख इस वर्ष जो कार्यक्रम प्रस्तुत किये गये हैं, प्रसन्नता की बात है कि परिजनों ने उनके प्रति आशाजनक उत्साह दिखाया है। कदम इसी प्रकार बढ़ते रहे तो यह कहा जा सकता है कि अपना परिवार नव निर्माण की दशा में ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करेगा
पाँच रचनात्मक कार्यक्रम
(1) शक्ति पुरश्चरण कार्यक्रम बहुत ही व्यवस्थित और सुचारु रूप से चल रहा है। 24 करोड़ गायत्री महामंत्र का शान्ति बीज के साथ जप नियमित रूप से चल रहा है। इसका चमत्कार सीमा संघर्ष में भारत का पक्ष भारी रहने के रूप से सामने आया है। अभी और भी अनेक कठिनाइयाँ शेष हैं। उनके समाधान के लिए यह पूरे एक वर्ष चलना है। शरद पूर्णिमा को इसे आरम्भ किया था, उसी दिन उसकी पूर्णाहुति भी होगी। जहाँ यह साधना-क्रम चल रहा है वहाँ उत्साहपूर्वक जारी रखा जाय और जिन्होंने अभी भाग नहीं लिया हो वे अब लेना आरम्भ कर दें।
(2) प्राप्तः सोकर उठते समय शारीरिक और मानसिक दिनचर्या बनाने और रात को सोते समय उसका लेखा-जोखा लेने की साधना हम में से हर एक को आरम्भ कर देनी चाहिए। जीवन-शोधन की आधार शिला इस दैनिक आत्म-चिन्तन पर ही अवलम्बित है।
(3) एक घंटा समय और एक आना नित्य नव-निर्माण के लिये नियमित रूप से निकालने में तनिक भी शिथिलता न बरती जाय। अपने समीपवर्त्ती, परिचित, प्रियजनों को नव निर्माण का साहित्य पढ़ाने, सुनाने का क्रम एक धर्म कर्तव्य माना जाय और उसमें वह एक घंटा लगाया जाय। नये ट्रैक्टों का घरेलू पुस्तकालय हम में से हर एक के यहाँ होना चाहिये। हमें एक से दस बनाने का लक्ष्य पूरा करना ही चाहिए।
(4) जन्म दिन मनाने की कार्य-पद्धति हर जगह प्रचलित की जाय। जहाँ भी अखण्ड-ज्योति परिवार के थोड़े भी सदस्य हों वहाँ यह प्रथा अवश्य चलने लगे। इससे परस्पर संगठन सूत्र में बँधने तथा मिल-जुलकर बहुत कुछ कर सकने का पथ प्रशस्त होगा। जहाँ अन्य संस्कारों का प्रचलन भी संभव हो वहाँ उसकी व्यवस्था की जाय।
(5) अखण्ड ज्योति में केवल विचार प्रेरणायें रहती हैं। इन प्रेरणाओं को कार्य रूप में कैसे परिणित किया जा सकता है या किया जा रहा है इसका व्यवहारिक मार्गदर्शन ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक पत्रिका में रहता है। इस प्रकार एक दूसरे की पूरक हैं। एक के बिना दूसरी अपूर्ण रहती है। इसलिए अखण्ड ज्योति के प्रत्येक पाठक को युग निर्माण योजना को भी नियमित रूप से पढ़ते रहना चाहिए।
इन पाँच रचनात्मक कार्यों की पूर्ति आगामी गुरु-पूर्णिमा तक हर जगह हो जानी चाहिये। योजना का आरंभ गुरु पूर्णिमा को हुआ था। हर वर्ष उसकी एक वर्षीय योजना बन जाती है।
पाँच प्रशिक्षणात्मक कार्यक्रम
प्रशिक्षण के लिए जो पाँच कार्यक्रम इस वर्ष बनाये गये हैं, उनसे अधिकाधिक लाभ उठाने की चेष्टा हमें करनी चाहिए।
(1) जेष्ठ में प्रायः अधिकाँश लोगों को अवकाश रहता है। उस समय 20 दिन का गायत्री तपोभूमि में शिक्षण शिविर रखा गया है। ता॰ 25 मई से 13 जून तक वह चलेगा। साल के 345 दिनों में परिजन अपने काम में लगे रहें और 20 दिन हमारे पास रहें तो इससे हम लोगों के बीच कौटुम्बिकता, आत्मीयता भी बनी रहेगी—बढ़ती रहेगी और साथ ही जीवन जीने की कला का व्यवहारिक आध्यात्मिक अभ्यास भी बढ़ेगा। यह प्रशिक्षण हर परिजन के लिए सच्चे सत्संग एवं प्रेरणा प्रयोग का अनुपम लाभ देगा। इसमें सम्मिलित होने का प्रयत्न किया जाय।
(2) संस्कार और पर्वों के मानने का प्रचलन हमारे साँस्कृतिक पुनरुत्थान आयोजन का प्राण है। इसी माध्यम से हम जन-जागरण एवं निर्माण का प्रयोजन पूर्ण कर सकेंगे। यह प्रचलन सर्वत्र होना चाहिये। इसके लिये ऐसे प्रशिक्षित कार्यकर्ता होने चाहिए जो इन विधानों को ठीक तरह से करा सकें और साथ-साथ उनमें छिपे रहस्यों एवं उद्देश्यों को सिखा समझा सकें। इन कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या सब जगह हो जाय इसलिए चार दिवसीय शिविरों की शृंखला शाखाओं में चलनी चाहिए। जहाँ से माँग आवेगी वहाँ के लिए मथुरा से प्रशिक्षक भेजा जायगा। और सुविधा एवं क्रम के अनुसार शिविर की तारीखें निश्चित कर दी जावेंगी। इन शिविरों की हर जगह व्यवस्था सोची जाय।
(3) एक वर्षीय प्रशिक्षण योजना मार्च की अखण्ड-ज्योति में छपी है। जिन्हें इतना अवकाश हो उसमें सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। इस शिक्षा में अपने व्यक्तित्व को प्रतिभाशाली बनाने, जीवन में महत्वपूर्ण कार्य कर सकने, आजीविका की समस्या सुलझाने तथा आत्मबल संग्रह करने के सभी लाभ विद्यमान हैं। हमारे द्वारा एक वर्ष तक प्रशिक्षित व्यक्ति अपने जीवन में असाधारण प्रगति कर सकने वाले बनेंगे। यह प्रशिक्षण किसी को अखरेगा नहीं, वरन् हर शिक्षार्थी को अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ सदुपयोग होने के रूप में ही यह एक वर्ष सदा स्मरण रहेगा।
(4) जो लोग पारिवारिक जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके हैं और गुजारे के साधन जिनके पास हैं उन सभी निवृत्त लोगों को वैसे तो सदा के लिए ही साधना, स्वाध्याय, सेवा और संयम की साधना करने के लिए मथुरा रहना ही चाहिए, पर यदि इतना न बन पड़े तो एक वर्ष तो रहना ही चाहिए। इस एक वर्ष में वे अपने गायत्री पुरश्चरण अधिक उत्तम रीति से कर सकते हैं। साथ ही गीता, रामायण, वेद, शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन आदि का सार-तत्व भी एक नियमित पाठ्यक्रम के रूप में बढ़ाया जायगा। गृहस्थ में प्रवेश करने से पूर्व जिस प्रकार बालकों को हिसाब, भूगोल, भाषा आदि की पढ़ाई पढ़नी पड़ती है उसी प्रकार पारलौकिक जीवन में प्रवेश करने से पूर्व—ब्रह्मविद्या की शिक्षा भी प्राप्त करनी चाहिए। यह प्रशिक्षण एक वर्ष का तो होना चाहिए। जिनकी गृह पारिवारिक जिम्मेदारियों को उठाने वाले घर पर मौजूद हैं, वे एक वर्ष के लिए ब्रह्मविद्या की शिक्षा एवं गायत्री तपश्चर्या द्वारा अध्यात्मिक प्रकाश उपलब्ध करने के लिए मथुरा आवें।
दोनों ही प्रकार के एक वर्षीय पाठ्यक्रमों में जो लोग सम्मिलित होना चाहें। उन्हें भी 24 मई को मथुरा आना चाहिए। शिविर में सम्मिलित रहने के उपरान्त यह दोनों ही प्रशिक्षण प्राप्त करना वे आरम्भ कर देंगे।
(5) जिन्हें अपने बच्चों से नौकरी नहीं करानी है, जिनके पास अपने बच्चों के लिए कृषि, व्यवसाय आदि की व्यवस्था है वे अपने बच्चों को चार वर्ष की शिक्षा के लिए मथुरा भेजें। जिस प्रकार डॉक्टरी, इंजीनियरी के चार वर्षीय पाठ्यक्रम हैं, वैसे ही इस जीवन-समस्याओं को सुलझा सकने वाले, प्रगति के पथ पर हर क्षेत्र के विकसित करने वाले पाठ्यक्रम में भी चार वर्ष लगेंगे। हमारे यहाँ पढ़ाई जाने वाली यह शिक्षा—हायर सेकेन्डरी स्तर तक की होगी, साथ ही बहुत कुछ और भी पढ़ा दिया जायगा जो अन्यत्र दिखाई नहीं पड़ता। प्राचीनकाल के गुरुकुलों का एक वास्तविक स्वरूप प्रस्तुत करने का हमारा मन है। इसमें 14 वर्ष से अधिक आयु के बच्चे ही लिये जावेंगे।
जो अभिभावक अपने बच्चों को इस शिक्षा के लिए भेजना चाहें, नाम नोट करा दें। इस वर्ष सम्भव हो सका तो इस वर्ष नहीं तो आगे भी सुविधानुसार यह शिक्षा आरम्भ की जा सकती है। नाम नोट रहेंगे तो उन्हें समय पर बुलाया जा सकेगा।
उपरोक्त सभी प्रकार की शिक्षाओं के शिक्षार्थी अपने भोजन, वस्त्र आदि का व्यय भार स्वयं उठावेंगे। मिल-जुल कर कई शिक्षार्थी अपना भोजन आसानी से बना सकते हैं इससे यह कला भी सीखने को मिलती है और आर्थिक बचत भी काफी रहती है। जो बना न सकेंगे उनके लिए उचित मूल्य पर बने भोजन का भी प्रबन्ध हो सकता है। निवास, रोशनी, पानी, सफाई एवं शिक्षा की व्यवस्था निःशुल्क रहेगी।
उपरोक्त पाँचों प्रकार की शिक्षाओं की व्यवस्था उन्हीं के लिए हो सकेगी जो पूर्व सूचना भेजकर स्वीकृति प्राप्त कर लेंगे। बिना स्वीकृति के किसी को भी न आना चाहिए।
जन्मदिन मनाने की परम्परा सभी सभ्य देशों में है। इसकी उपयोगिता भी है और आवश्यकता भी। अखण्ड-ज्योति परिवार में इस प्रथा का प्रचलन, सामूहिक एवं व्यवस्थित रीति से आरम्भ किया जाय। इससे पारस्परिक प्रेम, सद्भाव एवं संगठन बढ़ेगा। साथ ही इस शुभ अवसर पर एकत्रित लोगों में जन-जागरण की भावनाएं जागृत करने का अवसर मिलेगा। इसके लिए विधि व्यवस्था इस प्रकार बनाई जाय।
(1) जहाँ भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ के सदस्यों में से तीन या पाँच उत्साही कार्यकर्ताओं की एक समिति सदस्यों के जन्मदिन मनाने का कार्य सुचारु रूप से चलाये।
(2) समिति सभी सदस्यों के जन्मदिन नोट कर ले। जिनके तारीखों के हिसाब से हों, वे तारीखों के हिसाब से और जिनके तिथियों के हिसाब से हों वे उस तरह नोट कर लिये जायँ। फिर उनको बारह महीनों में विभक्त करके सभी सदस्यों के पास एक निश्चित सूची की तरह पहुँचा दिये जाँय, ताकि सभी को उनकी जानकारी पहले से ही बनी रहे।
(3) जिसका जन्मदिन हो वह अपने घर पर नियत तिथि पर छोटे आयोजन की व्यवस्था करे। छोटा हवन, जन्मदिन विधान, गायन, सामूहिक जप, सत्संकल्प पाठ एवं प्रवचनों की व्यवस्था रहे। शाखा के सदस्यों के अतिरिक्त अपने निजी मित्र, परिचित, सम्बन्धी, पड़ौसी आदि भी आमंत्रित किये जाँय। उनके बैठने आदि का उचित प्रबन्ध रहे।
(4) इस समारोह में अतिथियों का स्वागत गर्मियों में शरबत, जाड़ों में तुलसी आदि की चाय जैसे सस्ते साधनों से ही किया जाय। मिष्ठान, पकवान अथवा अन्य महंगी चीजें प्रयुक्त न हों। वैसे सुपाड़ी, इलायची, सौंफ जैसी सस्ती वस्तुओं से भी काम चल सकता है। महंगी चीजें आतिथ्य में एक जगह प्रयोग हों तो दूसरी जगह उसकी प्रतिस्पर्धा चल पड़ती है और अधिक खर्चीले कार्य लोकप्रिय नहीं हो सकते।
(5) उत्सव का समय ऐसा रखा जाय जिसमें पहुँचना सबके लिए सुविधाजनक हो। प्रातः 9 बजे से पूर्व अथवा सायंकाल सूर्य अस्त के बाद का समय आमतौर से ठीक रहता है। उसमें सब लोग आसानी से सम्मिलित हो सकते हैं।
(6) हवन में जन्मदिन वाले सज्जन और उनकी पत्नी या अन्य कोई सम्बन्धी दो ही व्यक्ति आहुतियाँ दें। शेष उपस्थित लोग मन्त्रोच्चारण करें। पूर्णाहुति की आहुति सभी उपस्थित लोग दें। इस प्रकार का हवन लगभग एक रुपये में आसानी से सम्पन्न हो जाता है।
(7) आयोजन में दो-तीन घंटे से अधिक समय न लगाया जाय। आधा समय हवन आदि कर्म-काण्ड के लिए और आधा प्रवचन के लिए सुरक्षित रखा जाय। घड़ी की सहायता से सब काम हो ताकि समय का सदुपयोग हो सके।
(8) जन्मदिन संस्कार की कम से कम 10 विधान पुस्तिकाएं हर शाखा के पास रहें। जो शिक्षित व्यक्ति मंत्रोच्चारण कर सकें उन सभी के हाथ में पुस्तकें रहें। सभी लोग एक स्वर से, एक साथ मन्त्रोच्चारण करें। विधान की जानकारी इन पुस्तकों में दी गई है। जो कमी हो सो सीख लेनी चाहिए। पूजा विधान, हवन, दीपदान, पंचतत्व पूजन, मृत्युँजय हवन, व्रत धारण आदि कृत्यों का अभ्यास पहले से ही कराने वालों को होना चाहिए। पुस्तकें सभी उपस्थित शिक्षितों के हाथ में हों तो और भी अच्छा है ताकि वे लोग भी इस विधान को कराने की पद्धति से परिचित हो जाँय।
(9) आगन्तुक फूलमाला, गुलदस्ता या फूल लेकर आवें। उत्सव के अन्त में उपस्थित लोग यजमान को यह पुष्प भेंट करें, और यजमान सबको यथोचित प्रणाम अभिवादन करें।
(10) जिसका जन्मदिन हो वह इस वर्ष से एक नई अच्छी आदत अपने अभ्यास में लाने की प्रतिज्ञा करे। जल्दी सोना, जल्दी उठना, नियमित व्यायाम, नियमित गायत्री जप, स्वाध्याय, सबको आप कहना, बड़ों के चरण-स्पर्श, वेष-भूषा में सादगी, खादी पहनना, एक घंटे का पारिवारिक प्रशिक्षण आदि अनेकों अच्छाइयाँ ऐसी हो सकती हैं जो उस दिन से अभ्यास में समाविष्ट की जायँ। कोई बुराइयाँ अपने में हों तो उनमें से भी एक छोड़ी जा सकती है। इस प्रकार एक व्रत भी उस दिन लिया जाय और फिर उस पर निष्ठापूर्वक दृढ़ रहा जाय।
(11) कोई सुयोग्य व्यक्ति जीवन के महत्व एवं सदुपयोग के सम्बन्ध में प्रवचन करें। ताकि यजमान ही नहीं उपस्थित सभी लोगों को मानव जन्म के सुरदुर्लभ अवसर का श्रेष्ठतम उपयोग करने की प्रेरणा मिले। जन्मदिन पद्धति में जो श्लोक इस सम्बन्ध में दिये गये हैं उनकी व्याख्या यदि ठीक ढंग से की जा सके तो बहुत बढ़िया प्रवचन बन सकता है।
इस आवश्यकता की पूर्ति के सम्बन्ध में एक विधान व्यवस्था पुस्तक और एक उसी संदर्भ में प्रवचन पुस्तक भी इसी महीने छापी जा रही हैं। इन्हें मँगा लेने से जन्मदिन की व्यवस्था बनाने तथा प्रवचन करने में और भी अधिक सुविधा रहेगी।
(12) प्रत्येक उत्सव में उपस्थित लोगों को अगला जन्मोत्सव कहाँ, किसका कब मनाया जायगा, इसकी सूचना दे दी जाय। उपस्थित लोगों से उसमें सम्मिलित होने का अनुरोध किया जाय।
(13) जन्मोत्सवों का आरम्भ अभी उन्हीं लोगों से आरम्भ किया जाय जो अखण्ड-ज्योति के सदस्य हैं। आगे चलकर समिति अपनी सुविधा के अनुसार अन्य अनुरोध कर्ताओं के यहाँ भी वैसा प्रबन्ध कर सकती है।
छोटे बच्चों के जन्मदिन घर के लोग स्वयं ही इसी विधि-विधान से मना लिया करें। उनके लिए समिति व्यवस्था न करे। इन आयोजनों का प्रयोजन किन्हीं विचारशील व्यक्तियों को आदर्शवादिता के मार्ग पर चलने की विशेष प्रेरणा देना शाखा संगठन को सुदृढ़ बनाना है। इसलिए वह सीमित लोगों तक ही सम्भव है। अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में कराते रहें। इस प्रकार बच्चों के, महिलाओं के जन्मोत्सवों का व्यापक प्रचलन हो जायगा तो अपने आप एक प्रेरणाप्रद लहर फैलने लगेगी। शाखा समितियाँ इसका शुभारम्भ मात्र करने का श्रेय लेंगी।
(14) यज्ञ के प्रसाद स्वरूप दूध, दही, शक्कर, जल, तुलसी पत्र से बना पंचामृत और भुने आटे की शकर मिली ‘पंजीरी’ इतना ही पर्याप्त समझा जाय। महंगे प्रसादों का प्रचलन न हो। किसी परम्परा के व्यापक बनाने में उसका सस्ता होना आवश्यक है।
(15) जीवन विद्या से विभिन्न पहलुओं पर प्रवचनों की तैयारी कार्यकर्ताओं को करनी चाहिये। ‘गीता-कथा’ के अनेक कथानक इस प्रयोजन को पूरा कर सकते हैं। किन्हीं सद्गुणों एवं सत्प्रवृत्तियों पर प्रकाश डाला जा सकता है। जिन उपायों से जीवन सुविकसित हो, ऐसे विषयों पर शाखा सदस्य प्रवचन करने का पूर्वाभ्यास करते रहें। एक ही बात हर जगह हर आयोजन में कहते रहने से वह नीरस हो जायगी।
(16) जिस प्रकार जन्मोत्सव मनाया जाता है। उसी प्रकार यदि संभव हो तो विवाहोत्सव भी मनाये जायँ। नये समाज का निर्माण प्रत्येक दाम्पत्ति-जीवन के साथ आरम्भ होता है। यदि दाम्पत्ति-जीवन की आधारशिला सुदृढ़ हो, दोनों अपने कर्तव्य वाले और एक शरीर के दो अंग बनकर रहें तो गृहस्थ में स्वर्ग का अवतरण हो सकता है और नई पीढ़ियों में श्रेष्ठ सद्गुणों का बीज बोया जा सकता है। बेकार की झिझक एवं उपहास का भय छोड़कर हममें से कुछ लोग विवाहदिनोत्सव मनाने को तैयार हो जायँ तो देखा-देखी कुछ दिनों में इसका भी प्रचलन साधारण एवं स्वाभाविक लगने लगेगा।
मनुज ने कहा एक दिन-देव! हमें दें भक्ति भाव, सद्ज्ञान! ताकि हम सुविधा से कर सकें आत्म-जीवन का अभ्युत्थान॥ शक्ति सामर्थ्य देव की अतुल तुच्छ सी थी मानव की माँग, किन्तु याचकता को क्या कहें हो गया सुर को अति अभिमान॥
मनुज भी था कुछ अधिक अधीर प्रश्न था अब तक पहला शेष। देव की ओर जोड़कर पुनः किये कातर निज दृग उन्मेष॥ कहा प्रभु बल दें, साहस विपुल, प्राण दें, दें जीवन की शक्ति, करें आरोग्य युक्त हे श्रेष्ठ! मिटायें जन के कष्ट कलेश॥
देव को आती कैसे दया उन्हें तो और हो गया गर्व। हमारे स्ववश विचारा जीवन जिन्दगी आश्रित हम पर सर्व॥ हठी था मनुज न चुप ही रहा जलाये अगणित पूजा-दीप, देव का किया बहुत सम्मान मनाकर उसने अगणित पर्व॥
विनय कर माँगी धन सम्पत्ति, पुत्र, पत्नी साधन सम्मान। माँग पर माँगें जितना बढ़ीं देव का उतना बढ़ा गुमान॥ दान तो पाना था अति दूर देव दे सके न तनिक प्रबोध, अन्तक हुआ मनुज को रोष समझकर पौरुष का अपमान॥
भाव हैं मुझ में अभिनव शेष भला फिर माँगे हम क्यों भक्ति। शक्ति की क्यों माँगे हम भीख कर्म की जब तक पास प्रवृत्ति॥ विधाता ने है दिया शरीर, बाहु-द्वय, बुद्धि अनंत विचार, देव निर्तन देंगे फिर मुझे भला क्या साधन या सम्पत्ति॥
आत्मा का उद्बोधन हुआ भीरुता हुई मनुज की दूर। भक्ति अपनी, अपना ही ज्ञान, देह में अपनी शक्ति सिंदूर॥ भुलाया आलस औ अज्ञान, अगाया श्रम साहस सम्मान- दिव्य जीवन का बहा प्रवाह हीनता का कर चकनाचूर॥
देखकर मानव का पुरुषार्थ गल गया देवों का अभिमान। लगे बरसाने उस पर कृपा प्राण बल, जीवन ज्ञान महान्॥ देखकर यह अजीब संदर्भ हँसे उस दिन विभुवर अखिलेख पराजित हुये विचारे देव! हुआ विजयी भू-सुत इन्सान॥
—बलराम सिंह परिहार
*समाप्त*