धर्म और धार्मिकता की कसौटी

धर्म का ध्येय है प्राणीमात्र को सुख-शाँति देना, उनके शोक सन्तापों को अधिक से अधिक कम करना। उन्हें सच्ची राह बतलाना। ऐसी राह बतलाना जिस पर चलकर वे निरापद भाव से सुख-शाँति के लक्ष्य पर पहुँच सकें। यह कार्य सेवा से भी हो सकता है, सान्त्वना से भी और उपदेश देकर भी।

जो व्यक्ति इस मार्ग को अपनाता है वही धर्मात्मा कहा जायेगा। फिर चाहे वह कोई अनहोना काम दिखा पाता है या नहीं! किन्तु संसार ऐसा विचित्र है कि वह धर्मात्मा की कसौटी चमत्कार अथवा किसी आश्चर्य चकित कर देने वाले काम को ही मानता है। संसार सुख-शाँति का कोई सीधा-सरल मार्ग नहीं चाहता बल्कि कुछ विलक्षण, अद्भुत और चमत्कार को ही मान्यता देना चाहता है। वह धर्मात्मा की परीक्षा किसी चमत्कार से करना चाहता है।

खेद है ऐसी दुनिया पर कि जो कुछ ऐसा कर दिखाने वाले पर श्रद्धा करती है जो उसकी समझ में न आया और वह स्वयं न कर सके, फिर चाहे वह ठग ही क्यों न हो, पापी ही क्यों न हो।

—भगवान बुद्ध


आस्तिकता का सच्चा स्वरूप

‘ईश्वर है’—केवल इतना मान लेना मात्र ही आस्तिकता नहीं है। ईश्वर की सत्ता में विश्वास कर लेना भी आस्तिकता नहीं है। क्योंकि आस्तिकता विश्वास नहीं अपितु एक अनुभूति है।

‘ईश्वर है’ यह बौद्धिक विश्वास है। ईश्वर को अपने हृदय में अनुभव करना, उसकी सत्ता को संपूर्ण सचराचर जगत् में ओत-प्रोत देखना और उसकी अनुभूति से रोमाँचित हो उठना ही सच्ची आस्तिकता है। आस्तिकता की अनुभूति ईश्वर की समीपता का अनुभव कराती है। आस्तिक व्यक्ति जगत को ईश्वर में, और ईश्वर को जगत में, ओत-प्रोत देखता है। वह ईश्वर को अपने से और अपने को ईश्वर से भिन्न अनुभव नहीं करता। उसके लिये जड़-चेतनमय सारा संसार ईश्वर रूप ही होता है। वह ईश्वर के अतिरिक्त किसी भिन्न सत्ता अथवा पदार्थ का अस्तित्व ही नहीं मानता।

प्रायः जिन लोगों को धर्म करते देखा जाता है उन्हें आस्तिक मान लिया जाता है। यह बात सही है कि आस्तिकता से धर्म प्रवृत्ति का जागरण होता है। किन्तु यह आवश्यक नहीं कि जो धर्म-कर्म करता हो वह आस्तिक भी हो। अनेक लोग प्रदर्शन के लिये भी धर्म कार्य किया करते हैं। वे ईश्वर के प्रति अपना विश्वास, श्रद्धा तथा भक्ति को व्यक्त भी किया करते हैं। किन्तु उनकी वह अभिव्यक्ति मिथ्या एवं प्रदर्शन भर ही हुआ करती है—ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार लोग आवश्यकता, परिस्थिति, शिष्टाचार अथवा स्वार्थवश किसी के प्रति भाव न होने पर भी स्नेह, प्रेम, श्रद्धा अथवा भक्ति दिखाया करते हैं।

आस्तिकता से उत्पन्न धर्म में प्रदर्शन सम्भव नहीं। जो अणु-अणु में ईश्वर की उपस्थिति अनुभव करता है, उससे प्रेम रखता है वह मिथ्या प्रदर्शन का साहस कर ही नहीं सकता। जो उस प्रेमास्पद सर्व शक्तिमान को ही अन्दर बाहर सब जगह विद्यमान देखता है वह उसके लिये किसी अप्रिय व्यवहार को किस प्रकार कर सकता है? वह उसके अप्रसन्न हो जाने का भय मानेगा। सच्चे धार्मिक जिनकी धार्मिकता का जन्म आस्तिकता से होता है स्वतः धर्माचरण में प्रवृत्त रहते हैं, उन्हें प्रयत्न-पूर्वक वैसा करने की आवश्यकता नहीं होती। उनका प्रत्येक कार्य, प्रत्येक व्यवहार धर्मसम्मत एवं उसी से प्रेरित होता है। जीव मात्र को आत्मवत् तथा सम्पूर्ण जगत को परमात्मा का रूप मानने वाले धर्मात्मा से असंगत, अनुचित अथवा अकरणीय कार्य होना सम्भव नहीं।

प्रदर्शनकारी धर्म ध्वजियों में आस्तिकता का विश्वास करना एक बड़ा भ्रम है। लोग इसी भ्रम के वशीभूत होकर उनकी पूजा प्रतिष्ठा तथा आदर सत्कार करने लगते हैं । वे उसे भगवान का बड़ा भक्त समझते हैं। अपनी अंध-श्रद्धा के कारण लोग धर्मध्वजियों के उन कृत्यों को नहीं देखते जो किसी भी धार्मिक के लिये सर्वथा अनुचित होते हैं। प्रातः काल दो-दो घंटे घंटी बजाने वाले बड़ी-बड़ी प्रार्थनायें करने और आसन प्राणायाम करने वाले अपने व्यावहारिक जीवन में निकृष्ट स्वार्थों एवं संकीर्णताओं का आश्रय लिया करते हैं। तनिक-तनिक बात में झूठ बोलना, एक पैसे के लिये किसी का बड़े से बड़ा अहित कर देना, सह-सामाजिकों के साथ असहयोग करना, उनसे स्पर्धा मानना और उनके प्रति ईर्ष्या द्वेष मानना, हर समय लोभ, क्रोध, मोह से प्रेरित रहना उनका दैनिक जीवन का अंग बन जाता है। ऐसे आदमी भी यदि थोड़ी देर पूजा पाठ का प्रदर्शन कर देने पर धार्मिक अथवा आस्तिक माने जा सकते हैं तो फिर यह मान लेने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये कि पूरा संसार आस्तिक है, और अपनी-अपनी तरह से धर्मात्मा भी।

एक क्षण भी धर्म कर्म न करने वाला यदि मनुष्यों का ठीक-ठीक मूल्याँकन करता है, समाज के प्रति अपने दायित्व का पालन करता है, सब को ईश्वर का रूप मानकर ईर्ष्या द्वेष नहीं रखता, जिसका हृदय प्रेम सहानुभूति तथा संवेदना से भरा है वही सच्चा धार्मिक तथा आस्तिक है। किन्तु खेद है कि लोग धार्मिकता तथा आस्तिकता के मूल तत्व न देखकर प्रदर्शन के प्रवाह में बह जाते हैं।


चरित्र ही संसार की सर्वोत्तम उपलब्धि है।

यह कम खेद का विषय नहीं है कि लोग धन की लिप्सा में चरित्र को भूलते चले जा रहे हैं। न जाने लोग इस सत्य को समझने का प्रयत्न क्यों नहीं करते कि चरित्र के अभाव में धन एक भयानक अभिशाप बन जाता है।

आवश्यकता से अधिक धन की लिप्सा पूरी करने में लोग इतने बावले हो जाते हैं कि उन्हें उचित अनुचित का तनिक भी ध्यान नहीं रहता। इस प्रयत्न में वे यह भी भूल जाते हैं कि उनके ये कृत्य उनकी आत्मा को दिन-दिन गिराते हुए उनके लिये एक ज्वलन्त नरक का निर्माण कर रहे हैं।

निश्चित है जब मनुष्य आवश्यकता से अधिक धन एकत्र करना चाहेगा तो उसे शोषक, क्रूर एवं अनुदार बनना ही होगा। उसे दूसरों का हिस्सा छीनकर, लूटकर अथवा ठग कर अपनी थैली मोटी करनी पड़ेगी। उसे दया सहानुभूति, सहायता, संवेदना, एवं उदारता के मानवीय गुणों को तिलाँजलि देकर अपने को पाषाण-खण्ड की तरह नीरस एवं निर्मम बनाना होगा। उसे अपने व्यवसाय में बेईमानी और कारोबार में मक्कारी को प्रश्रय देना होगा। धन के लिये मानवीय गुणों को छोड़कर इन आसुरी दुर्गुणों को अपने में लाने में लोग कौन सी बुद्धिमानी मानते हैं यह बात किसी भी विचारवान व्यक्ति की समझ में नहीं आ सकती?

चरित्र की महत्ता पैसे से कहीं बढ़कर है। जिसने धन के लोभ में चरित्र खो दिया है अथवा चरित्र को खो कर धन कमाया है उसने पाप ही कमाया है। चरित्रहीन व्यक्ति का संसार में कहीं भी आदर नहीं होता फिर उसका बैंक बैलेंस कितना ही लम्बा-चौड़ा क्यों न हो। यह चरित्र एवं सदाचरण का ही प्रभाव होता था कि पूर्व काल में किसी ऋषि अथवा मुनि के आ जाने पर बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट उनके आदर में सिंहासन छोड़कर खड़े हो जाते थे। पूर्व काल ही क्यों आज भी तो जब कोई विश्वस्त महात्मा अथवा आचरणवान व्यक्ति आ जाता है तो लोग उसके प्रति अहैतुक आदर भाव प्रदर्शित करने लगते हैं। कहाँ दयनीय वेशभूषा में धन वैभव से रहित महात्मा गाँधी और कहाँ संसार का सबसे शक्तिशाली सम्राट पंचम जार्ज किन्तु महात्मा गाँधी के उज्ज्वल चरित्र एवं सत्याचरण का ही चमत्कार था कि उक्त सम्राट को अपनी राज-परम्परा की उपेक्षा करके उनसे समानता के स्तर पर आकर और खड़े होकर हाथ मिलाना पड़ा। यह शक्ति एवं वैभव पर चरित्र की विजय थी। अनेक लोग इस घटना का अवमूल्यन करने के लिये कह सकते हैं कि गाँधी जी की उस मान्यता के पीछे भारत के विशाल जनमत की श्रद्धा का बल था। किन्तु जनमत की श्रद्धा जोतने के पीछे किसका बल था? निश्चय ही वह बल महात्मा के चरित्र एवं उज्ज्वल आचरण का ही था, जिसका, संसार के सारे धन-वैभव की अचाहना करके, उन्होंने प्रयत्नपूर्वक विकास किया था। जिस विवेक बल पर गाँधी जी भारत का लोक नायकत्व प्राप्त कर सके थे, यदि वे चाहते, तो उसी विवेक के बल पर असंख्य-पति बन सकते थे, जिस प्रकार लोग बने और बनने का प्रयत्न कर रहे हैं। किन्तु तब उनकी यह चरित्र रहित धनाढ्यता उनके लिये उस विशाल सम्मान का उत्पादन न कर सकती थी जो उन्हें मिला और संसार न उन्हें दिया।

धनी मानी वह नहीं है जिसके पास सोने-चाँदी अथवा मुद्राओं की बहुतायत है, और न धनी मानी उसे ही माना जा सकता जिसका कारोबार लम्बा -चौड़ा है, धनी मानी वास्तव में वही है जिसके पास चरित्र रूपी धन है। माननीय यदि संसार में कोई वस्तु हुई है और आगे भी होगी वह मनुष्य का महान चरित्र ही है। धनी का आदर तो लोग स्वार्थवश करते हैं—वह भी वे लोग जिनमें धन लिप्सा की दुर्बलता होती है। स्वार्थ निकल जाने अथवा आशा न रहने से स्वार्थी व्यक्ति तक उस धनवान का आदर करना छोड़ देते हैं जिसके पीछे चरित्र की विपुलता नहीं होती ।

सच्चरित्रता से मनुष्य की आन्तरिक शक्तियों का विकास होता है। चरित्रवान व्यक्ति संसार में कहीं भी निर्भयतापूर्वक विचरण कर सकता है। भय, अवमानना अथवा अप्रतिष्ठा की तुच्छ शंका उसके पास से होकर नहीं जाती । चरित्रवान की आत्मा इतनी उज्ज्वल एवं बलिष्ठ हो जाती है, उसका आत्म-विश्वास इतना ऊँचा हो जाता है कि वह निर्धन होते हुये भी धनवानों के बीच निःसंकोच होकर आता जाता, बात करता और समुचित सम्मान पाता है। चरित्रवान व्यक्ति अल्पबल होने पर भी बड़े-बड़े बलवानों के बीच निर्भयता का प्रमाण ही नहीं देता अपितु उन्हें प्रभावित किया करता है। किसी चरित्रवान व्यक्ति को कभी कोई चरित्रहीन बलवान निरस्त कर सका है ऐसा, इतिहास आज तक कोई भी प्रणाम प्रस्तुत नहीं कर सका है।

अभय, चरित्र की विशेष देन है। चरित्रवान व्यक्ति संसार में किसी से भयभीत नहीं होता। उसे अपने तथा अपने आचरण पर अखण्ड विश्वास रहता है। उसे मालूम रहता है कि उसने कोई भी अनुचित काम नहीं किया और यह भी जानता है कि वह कोई गलत करेगा भी नहीं। मन-वचन-कर्म से औचित्य का पालन करने वाले के पास भय नामक दुर्बलता आ ही नहीं सकती।

अपनी पोल का बहुत अधिक विरोध करते देखकर पोप ने प्रसिद्ध धर्म प्रचारक महात्मा मार्टिन लूथर के पास संदेश भेजा कि या तो वह पोप के विरुद्ध प्रचार करना बंद करदे नहीं तो उसका सर कटवा लिया जायेगा। सत्याचरण के विश्वासी मार्टिन लुथर ने कहला भेजा कि ‘मुझे खेद है कि मेरे पास एक ही सिर है, यदि हजार सिर होते और वे सब इस धर्म-सुधार की पुण्य वेदी पर बलिदान हो जाते तो मैं अपने को अधिक धन्य समझता।”

महात्मा लूथर की यह निर्भीकता उनके उच्च चरित्र तथा सत्याचरण का ही प्रसाद था। कोई भी चरित्रहीन व्यक्ति, एक तो धर्म-सुधार के असि मार्ग पर चलने का साहस ही नहीं करता और यदि वह किसी कारणवश चल भी देता तो पोप की यह धमकी सुनकर उसके पैर डगमगा जाते और वह मैदान से भागकर किसी कोने में छिपा रहता अथवा पोप के ही पैरों पर जा गिरता। किन्तु धन्य है सच्चरित्रता को जिसने एक सामान्य जैसे व्यक्ति लूथर को महात्मा बनाकर इतना साहसी, निर्भीक एवं आत्म विश्वासी बना दिया कि वह पोप जैसे शक्तिशाली व्यक्ति की चुनौती हँसते-हँसते स्वीकार कर सका।

चरित्रवान व्यक्ति को अखण्ड विश्वास रहता है कि उसके सदाचरण से आकर्षित होकर जनमत उसके पक्ष में ही रहेगा। वह जानता है कि वह सच्ची निष्ठा के साथ वही काम कर रहा है जिसकी मानव जाति को आवश्यकता है और उसके लिये पूरी तरह हितकर है। उसे अपने मन, वचन, कर्म में इतना पवित्र विश्वास रहता है कि संसार में उसका कोई शत्रु हो ही नहीं सकता। और यदि कोई खल अथवा दुष्ट उसके साथ विश्वासघात करेगा भी तो उसकी वह मृत्यु बलिदान मानी जायेगी, लोक में उसकी स्मृति पूजी जायेगी और परलोक में सद्गति का अधिकारी बनेगा। इस प्रकार चरित्रवान व्यक्ति अपने मन, वचन, कर्म की सत्य-सदाशयता के बल पर निर्भय रहता है। न उसे लोक का भय सताता है और न परलोक का।

धन के अभाव में मनुष्य ऊँचा उठ सकता है, विद्या के बिना निर्वाह कर सकता है, किन्तु आचरण हीनता की दशा में वह सदैव हेय एवं घृणित ही बना रहेगा। ढेरों धन कमा लेने और गाड़ियों ज्ञान प्राप्त कर लेने पर भी यदि मनुष्य अपने चरित्र को उज्ज्वल न रख सका तो लोग उसके धन से घृणा करेंगे और ज्ञान में अविश्वास। वह जहाँ भी जायेगा एक आदर पूर्ण भाव-बिन्दु के लिये तरसेगा। वह चाहेगा कि लोग उसे प्रेम से अपने पास बिठालें और विश्वासपूर्वक बात करें। किन्तु उसकी यह इच्छा कहीं पूरी नहीं होगी। वह लोगों पर अपने धन का प्रभाव डालने के लिये सहायता का हाथ बढ़ायेगा किन्तु लोग उसकी उस सहायता-भावना में शंका करेंगे, कोई कुत्सित मन्तव्य का भय मानेंगे। चरित्रहीन के सत्कर्म तक लोगों के लिये शंका एवं सन्देह का विषय होते हैं।

चरित्रहीन के पास ईमान अथवा सिद्धान्त नाम की कोई वस्तु नहीं होती। उसका ईमान अधिकतर पैसा और सिद्धान्त केवल स्वार्थ होता है। चरित्रहीन ईमानदारी दिखलाता है किसी को धोखा देने के लिये, सिद्धान्त की दुहाई देता है स्वार्थ सिद्धि के लिये। उसका कोई भी कार्य अथवा कथन किसी प्रकार विश्वसनीय नहीं होता। चरित्रहीन के साथ कितना ही उपकार क्यों न किया जाये, उस पर कितना ही विश्वास क्यों न किया जाये पर अवसर पाते ही वह डंक नहीं मारेगा ऐसा विश्वास नहीं किया जा सकता। ऐसी अविश्वसनीय स्थिति किसी भी मनुष्य के लिये प्रत्यक्ष नरक ही कही जा सकती है। जीने को तो संसार में चरित्रहीन व्यक्ति भी जीते हैं किन्तु अविश्वास, संदेह, शंका, कलंक अथवा लाँछना पूर्ण जीवन—जीवन नहीं है। यह कोई अत्युक्ति पूर्ण कथन नहीं है, एक तथ्य है जिसको भद्र पुरुष ही नहीं चरित्रहीन व्यक्ति भी भली प्रकार जानता है।

चरित्र मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति तथा सम्पदा है। संसार की अनन्त सम्पदाओं का स्वामी होने पर भी यदि कोई चरित्रहीन है तो वह हर अर्थ में विपन्न ही माना जायेगा। निर्धन एवं साधनहीन होने पर भी चरित्रवान का मस्तक समाज में सदैव ऊँचा रहता है, उसकी आँखों में चमक और मुख पर तेज विराजमान रहता है। इसके विपरीत चरित्रहीन का व्यक्तित्व अपनी मलीनता को मखमल में भी नहीं छिपा सकता।

संसार में उल्लेखनीय कार्य करने वालों में से एक भी व्यक्ति नहीं रहा है जो पूरी तरह से चरित्रवान न हो। जन नेतृत्व करने अथवा समाज की गति बदल देने की शक्ति केवल चरित्र से ही प्राप्त हो सकती है। मानव समाज का जो भी विकास आज तक हुआ है या जो उन्नति और विकास आगे होगा उसके पीछे चरित्र धनी सदाचारी लोगों का ही कर्तव्य रहा है और आगे भी रहेगा।

चरित्रबल संसार में सब बलों से श्रेष्ठ और सारी सम्पत्तियों में मूल्यवान सम्पत्ति है। इसे पाने में मनुष्य का कुछ भी तो खर्च नहीं होता। सदाचार एवं चारित्र्य मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। स्वभावतः संसार का कोई भी मनुष्य दुश्चरित्र होकर नहीं जन्मता। चरित्रहीनता मनुष्य का आरोपित दोष है। हर मनुष्य का सहज कर्तव्य है कि वह हर मूल्य पर अपने चरित्र की रक्षा करे और यदि वह किसी कारण से विक्षत हो गया है तो हर मूल्य एवं हर प्रयत्न पर उसे शुद्ध एवं स्वस्थ करना चाहिये। इस नश्वर मानव जीवन में चरित्र ही अमर उपलब्धि है। वह मनुष्य को नर से नारायण बना देता है।


धीर, वीर और नेमीः

धीर, वीर और नेमीः-

घटना सन् 1946 की है। बम्बई बन्दरगाह के नौ–सैनिकों ने विद्रोह का झंडा ऊँचा कर दिया था। अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें गोली से भून देने की धमकी दी थी साथ ही भारतीय नौ–सैनिकों ने जवाब में उनको खाक कर देने की चुनौती दे रक्खी थी।

बड़ी भयानक स्थिति थी। उस समय बम्बई का नेतृत्व सरदार पटेल के हाथ में था। लोग उनकी तरफ बड़ी घबराई नजरों से देख रहे थे। किन्तु सरदार पर परिस्थिति का रंच-मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा था। न तो वे अधीर थे और न विचलित।

बम्बई के गवर्नर ने उन्हें बुलाया और काफी तुर्सी दिखाई। इस पर सरदार ने शेर की तरह दहाड़ कर गवर्नर से कह दिया कि वह अपनी सरकार से पूछ लें कि अंग्रेज भारत से मित्रों के रूप में विदा होंगे या लाशों के रूप में।

अंग्रेज गवर्नर सरदार का रुद्र रूप देखकर काँप उठा और फिर उसने कुछ ऐसा किया कि बम्बई प्रसंग में अंग्रेज सरकार को समझौता करते ही बना।


भारत संसार का भावनात्मक नेतृत्व करे

संसार का प्राचीनतम देश भारत जो कि कभी जगद्गुरु कहा जाता था आज जिस दुर्दशा में पहुँचता जा रहा है उसे देखकर किसी भी देशभक्त का हृदय भर उठता है। यह वही तो आर्य देश भारत है जो अपनी महान संस्कृति, विशाल सभ्यता, और अपने अध्यात्म ज्ञान के लिये पूजनीय रहा है। जहाँ के अनन्त ऐश्वर्य, पावन धर्म और उदात्त आदर्शों की हर उस यात्री ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है जो प्राचीन काल में समय-समय पर इसके दर्शन करने के लिये आते रहे थे।

यह वही भारत है जिसका सत्य, जिसका शौर्य, जिसका तप और जिसका त्याग संसार के लिये आश्चर्य का विषय बना है। श्रद्धा, प्रेम तथा सहानुभूति तो भारतीय राष्ट्र का विशेष गुण था। आध्यात्मिक चिन्तन और ईश्वर में अखण्ड विश्वास यहाँ का जीवन प्राण बना हुआ था। सच्चरित्रता तथा सादा जीवन तो इसके अणु-अणु में परिव्याप्त था। छल-कपट, जारी, मक्कारी, स्वार्थ आदि की कुत्सित भावनाओं का भारत वासियों से स्वप्न का भी सम्बंध नहीं था। सरलता, शिष्टता तथा शालीनता भारतीय चरित्र की शोभा थी।

भारतवर्ष की इस उन्नतशील अवस्था का आधार था धर्म-धारण, सच्ची एवं निष्काम धर्म धारणा। तब भारतवासियों का धर्म प्रदर्शन का नहीं आचरण का विषय था। वर्णाश्रम के अनुसार भारतवासी बचपन से ही अपने जीवन में धर्म को ढालना प्रारम्भ कर देते थे। वे तप एवं साधना का कठोर व्रत लेकर धार्मिक जीवन की सिद्धि करते थे और तब ही अपने को उस समय के उन्नत समाज का सदस्य होने योग्य समझते थे।

आस्तिक भाव, धर्माचरण तथा आध्यात्मिक विचारधारा मनुष्य के सारे लौकिक एवं पारलौकिक अभ्युदय का अमोध उपाय है। यही गुण मनुष्य को सच्चे एवं सुखी जीवन की ओर अग्रसर करने वाले हैं। या तो मनुष्य धर्माचरण द्वारा सुखी जीवन का अधिकारी बन सकता है अथवा अधार्मिक जीवन पद्धति अपनाकर दुखी एवं दरिद्री? बीच का ऐसा कोई मध्य मार्ग नहीं है जिससे मनुष्य न धर्म करके सुखी ही हो और न अधर्म करके दुखी। मनुष्य जीवन की दो ही गतियाँ हैं सुख अथवा दुःख। बीच की तटस्थ स्थिति का कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है।

मानव जीवन का सर्वोपरि उद्देश्य है उन्नत स्थिति के साथ शाश्वत सुख की प्राप्ति करना। मनुष्य के इस उद्देश्य की पूर्ति केवल धर्माचरण के आधार पर ही हो सकती है। मानव अपने जीवन लक्ष्य ‘सुख’ को प्राप्त करने के लिये आज पहले से भी अधिक प्रयत्नशील दिखाई देता है। सुख शाँति के लिये आज जितनी दौड़-धूप, आपाधापी तथा हलचल दिखाई दे रही है उतनी शायद पूर्वकाल के किसी भी खण्ड में न हुई होगी। आज विज्ञान के बल पर मनुष्य ने मनुष्य के लिये सुख-सुविधाओं के भंडार उड़ेल दिये हैं। पंच तत्वों की शक्ति को अपने कार्य वाहन के लिये हस्तगत कर लिया है। तब भी आज जैसा मनुष्य कभी भी दीन दुखी न रहा होगा।

प्रयत्नों की इस विफलता एवं विपरीत-गामिता का कारण एकमात्र धर्माचरण का अभाव ही है। अधिकाँश लोग तो आज-ईश्वर तथा धर्म को अपनी लौकिक उन्नति में बाधक मानने लगे हैं और पारलौकिक उन्नति से कोई सरोकार नहीं रखते। किन्तु जो कुछ लोग धर्म कर्म करने वाले देखे जाते हैं, वे भी सही अर्थों में धार्मिक नहीं हैं। उनमें भी प्रदर्शन, बाह्याडम्बर की भावनाएँ पाई जाती हैं। अधिक तो क्या केवल एक सच्चा व्यक्ति धार्मिक समाज को बदलकर रख देता है, गिरे हुओं को उठा देता है, अधार्मिकों को धार्मिक तथा नास्तिकों को आस्तिक बना देता है। एक गौतम बुद्ध ने अहिंसा धर्म की स्थापना कर दी। एक सच्चे धार्मिक ईसा ने योरोप को सभ्य कर दिया और एक धर्म धारी महात्मा गाँधी ने भारत का भाग्य ही बदल डाला। यह होती है सच्ची ईश्वर भक्ति और सत्य धर्माचरण की अपरिमेय शक्ति।

लोग ईश्वर भक्ति तथा धर्म कर्म करते देखे जाते हैं, किन्तु धर्म का मूल उद्देश्य जीवन उद्दात्त एवं आदर्श बनाने की भावना का उनमें नितान्त अभाव ही रहता है। वे धर्म द्वारा धर्म की सिद्धि रूप शाश्वत सुख शाँति की इच्छा नहीं करते। धर्म सिद्धि के रूप के उनकी कामना रहती है- धन दौलत, भोग विलास, पूजा प्रतिष्ठा तथा पुत्र कलत्र आदि प्राप्त करने की। वे यह नहीं सोच पाते कि निःस्वार्थ धर्माचारी को तो यह भौतिक उपलब्धियाँ स्वयं ही बिना कामना किए ही प्राप्त हो जाती हैं तब धर्म के मूल उद्देश्य भगवत् भक्ति अथवा अहैतुक सुख शाँति को पाने में इन नश्वर कामनाओं की बाड़ क्यों लगाई जाये?

अन्य शेष संसार तो सदा से ही भौतिक एवं भोगवादी रहा ही है,उसकी जीवन पद्धति का विकास ही इस विकृति के आधार पर हुआ है। इसके लिये उन पर अधिक आरोप नहीं किया जा सकता। किन्तु भारत जैसे आध्यात्मिक एवं धर्म प्राण देश को इस अंध भोगवाद के लिये आक्षेप से मुक्त नहीं किया जा सकता । दैवी संपदं के अनुयायी भारत को अपना सुधार करना और विश्व में सच्चे मानव धर्म की स्थापना का अपना ईश्वरीय कर्तव्य पूरा करना ही चाहिये।

किन्तु खेद है कि भारत भी अपने इस गम्भीर दायित्व को नहीं समझ रहा है। वह दिन-दिन अपने सत्य स्वरूप को खोता हुआ विपरीत दिशा में भागा चला जा रहा है। आज देश में जिधर भी दृष्टि जाती है दुःख, अशाँति, असफलता, असत्यता, भ्रष्टाचार, ईर्ष्या-द्वेष, क्लेश कलह, बेकारी और बीमारी की ज्वाला जलती दिखाई दे रही है। दिन रात भर खप कर लोग सुख शाँति पाने का प्रयत्न कर रहे हैं, किन्तु उनका उद्देश्य उनसे दूर ही भागता जा रहा है।

यदि भारत को सच्चे मानों में निराशा, निरुत्साह, पतन, अशाँति तथा अवहेलना के आसुरी आघातों से मुक्त होना है तो उसे अपने जीवन में प्राचीन पुनीत धर्म की प्रतिस्थापना करनी ही होगी। अपने चरित्र को निष्कलंक एवं निःस्वार्थ बनाना ही होगा। भोगवाद से योग वाद तथा नास्तिकता से आस्तिकता की ओर आना ही होगा।

लौकिक उन्नति में धर्म को बाधक मानने वाले भारतीयों को विश्वास करना ही होगा कि सुख स्वार्थपरता से नहीं निःस्वार्थ धर्म भावना से ओत प्रोत सदाचार से ही मिल सकता है। जिस दिन भारतीय अपने जीवन में पुनः अपने पावन धर्म की अवतारणा कर लेंगे और पूर्ववत् उसका संदेश संसार को देने का अपना कर्तव्य पालन करने लगेंगे भारत ही नहीं सारे संसार से असुख एवं अशाँति का वातावरण दूर हो जायेगा। आज की व्यस्त जनता रोग शोक से मुक्त होकर अपनी-अपनी धारणा के अनुसार रामराज्य का आनन्द पाने लगेगी।

सामाजिक भावना का तिरोधान हो जाने का एक मात्र कारण यही है कि समाज से सच्ची धर्म भावना निकल गई। आज भोगवाद के वातावरण में धर्म भावना डूब गई है। भगवान के प्रति लोगों की भक्ति तथा भय नष्ट हो गया है। कोई नैतिक अंकुश न रहने से पूरा समाज गलत दिशा में दौड़ा चला जा रहा है। उसे अपने कार्यों में कर्तव्य-अकर्तव्य का ध्यान ही नहीं आता।

भौतिकता की परिस्थिति भोगवाद में होना स्वाभाविक है, सो वह हो भी रही है। आज धर्म भावना एवं धर्म कर्म की आधुनिकता के रंग में रंगे युवक पुरानी बातें तथा कार्य निरर्थक मानने लगे हैं। सबेरे से शाम तक भौतिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने अथवा उसके विषय में बात करने में ही उनका सारा समय चला जा रहा है।

नास्तिकता एवं अधार्मिकता के कारण देश निराधार एवं निरंकुश होकर बुरी तरह अविवेकता की ओर झुक गया है। समाज के इस अयुक्त झुकाव को तत्काल रोकने की आवश्यकता है। इसके रोकने का एक ही उपाय है लोगों की प्रसुप्त धर्म भावना को उत्तेजित किया जाय। उन्हें व्यक्तिगत तथा सामूहिक धर्म योजनाओं को कार्यान्वित करने की प्रेरणा दी जानी चाहिये। धार्मिक प्रवृत्ति के लोग धर्म के सच्चे स्वरूप को समझें, उसे ही धारण करें और अपने उदाहरण तथा प्रेरणा से अपने पास पड़ोस तथा परिचितों में धर्म भावना जागृत करने का प्रयत्न करें।


सच्ची लोक-प्रियता इस तरह मिलती है।

लोकप्रियता जीवन की सफलता का एक प्रामाणिक मानदण्ड है। अनेक लोग धन-दौलत, परिवार प्रतिष्ठा आदि अनेक अन्य बातों को जीवन की सफलता का चिन्ह मानते हैं। किन्तु यह सब बातें प्रभाव एवं अपने में एक सामान्य संतोष पैदा करने वाली तो हो सकती हैं किन्तु इन्हें जीवन की सफलता का प्रामाणिक लक्षण नहीं कहा जा सकता।

धनवान लोग समाज में अपनी पूछ तथा प्रभाव देखकर लोकप्रियता के भ्रम में पड़ जाते हैं। यह बात सही है कि लोग उन्हें देखते ही नमस्कार करते, गोष्ठियों अथवा आयोजनों में विशेष स्थान देते हैं। अनेक दानों अनुदानों के लिये उनकी दहलीज पर सिर झुकाते और कोशिश करते हैं कि उनको प्रसन्न किया जाये। किन्तु इस घेराघारी को लोकप्रियता समझना भारी भूल होगी। लोगों द्वारा दी जाने वाली यह सारी विशेषता वास्तव में उस व्यक्ति के लिये नहीं बल्कि उसके उस धन के लिये होती है जिसे लोग प्राप्त करना चाहते हैं। कल को यदि ऐसे आदमियों के पास से धन अथवा अधिकार चला जाये तो कोई उसका समाचार तक पूछने न जायेगा। जब तक उनके पास धन अथवा अन्य प्रकार के साधन, जिनसे किसी का स्वार्थ सिद्ध हो सकता है, बने रहते हैं लोग उसे हाथों-हाथ लेने और चाटुकारी करने का प्रयत्न किया करते हैं। स्वार्थ निकल जाने अथवा निराश हो जाने या उक्त व्यक्ति का वैभव नष्ट हो जाने पर लोग उसे ऐसे भूल जाते हैं मानों वह इस धरती पर है ही नहीं और यह उपेक्षा यहाँ तक बढ़ जाती है कि लोग उसे पहचान कर भी अनजान जैसा भाव व्यक्त करते हैं। किसी आधार पर निर्भर प्रभाव लोकप्रियता नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार के साधनावलम्बी व्यक्ति कभी-कभी अविकल वैभव रहने पर भी लोगों द्वारा उपेक्षित कर दिये जाते हैं। उनकी अपेक्षा अधिक दाता, अधिकारी अथवा वैभव वान व्यक्ति मिल जाने पर उसे छोड़कर लोग उस आधिक्य वाले व्यक्ति की ओर उन्मुख हो जाते हैं। सवा सौ देने के मुकाबले में लोग सौ देने वाले को बात की बात में भुला देते हैं। पहले वाले की ओर से अपनी सारी प्रियता पसन्दगी तथा चाटुकारी हटाकर दूसरों की ओर बढ़ा देते हैं। कभी-कभी तो प्रियता क्या परिचय तक छीनकर नये उपयोगी व्यक्ति को दे दिया जाता है। कम दे सकने वाला पूर्व परिचित अपरिचित तथा अधिक देने वाला नवागन्तुक अधिक परिचित हो जाता है। इस प्रकार अपने साधनों, धन तथा अधिकारों के बल पर पाये बहु परिचय को लोकप्रियता समझने की भूल करने वाले एक दिन भ्रम दूर हो जाने पर मानसिक कष्ट पाया करते हैं।

अनेक लोग-प्रियता पाने के लिए दान-दक्षिणा का कार्यक्रम चलाया करते हैं। वे लोगों की श्रद्धा-भक्ति अथवा आकर्षण पाने के लिये गरीबों को भोजन कराते हैं अवसर उपस्थित कर ब्राह्मणों अथवा साधु-सन्तों को दान दक्षिणा दिया करते हैं, तीर्थों पर सदावर्त लगाया करते हैं। संस्थाओं की सहायता करके अपना नाम खुदवाया करते हैं। कोई लोग निस्पृहता का आडम्बर करने के लिये गुप्तदान देकर अन्य लोगों से जिक्र किया करते हैं। इससे वे कुछ सामयिक प्रशंसा अथवा प्रतिष्ठा तो अवश्य पा लेते हैं किन्तु इसे यदि वे लोक-प्रियता समझते हैं तो भूल ही करते हैं।

दान-दक्षिण देना अथवा अन्य प्रकार के उदारता के काम करना निःसन्देह अच्छी बात है। किन्तु यही परमार्थ अथवा परोपकार तब एक व्यापार बन जाता है जब लोग लोक-प्रियता के रूप में इसका लाभ उठाना चाहते हैं। इस प्रकार की मन्तव्य पूर्ण उदारता लोकप्रियता का कारण तो नहीं ही बनती है, परमार्थ एवं परोपकार के पुण्य से भी वंचित रह जाती है। दान दिया जाये, सदावर्त लगाया जाये, भूखे-नंगों को अन्न वस्त्र दिया जाये, लेकिन केवल उनकी आत्मा अथवा उनकी आत्मा के ब्याज से परमात्मा को प्रसन्न करने के लिये। इस प्रकार का निस्पृह परोपकार तथा परमार्थ ही सार्थक हो सकता है। व्यावसायिक उदारता के कृत्य निष्फल ही चले जाते हैं।

बहुधा लोग धन-दौलत तथा परिवार अधिकार की उपलब्धि ही जीवन की सफलता समझ लेते हैं। उनका जीवन उनके अपने संतोष के लिये तो सफल हो सकता है किन्तु समाज अथवा संसार की दृष्टि से वह सफल नहीं माना जा सकता। किसी का जीवन ठीक रूप में तभी माना जा सकता। जब उसका जीवन औरों के लिए भी उसी प्रकार सहानुभूति एवं संवेदना का विषय हो, जिस प्रकार स्वयं उनके लिए। जीवन की यह सफलता लोक-प्रियता के अतिरिक्त किसी प्रकार नहीं मिल सकती।

लोग समझते हैं कि उनके पास एक बड़ा परिवार है, धन-दौलत तथा अन्य अनेक प्रकार के अधिकार एवं साधन सुविधायें हैं। वे मनमाने आराम से अपना जीवनयापन कर रहे हैं इसलिए उनका जीवन सफल है। यह विचार भ्रामक है। केवल वैभव, विभूति पा लेने और सुख सुविधापूर्वक जीवन बिताने की परिस्थिति मिल जाने से ही किसी का जीवन सफल नहीं कहा जा सकता।

धनवान, शक्तिवान एवं जन वान हो जाने से, जिसे लोग जीवन की सफलता समझते हैं , प्रायः लोगों में घमंड, दम्भ, प्रदर्शन, क्रोध, रोष, स्पर्धा एवं ईर्ष्या की बुराई आ जाती है। धन, जन अथवा बल के मद में चूर होकर लोग दूसरों को सताने, दबाने तथा नीचा दिखाने में ही अपनी विशेषता समझने लगते हैं। साधन सम्पन्न व्यक्ति यही चाहता रहता है कि उसके सिवाय संसार में न तो कोई उन्नति कर पाये और न आगे बढ़ पाये। संसार का हर व्यक्ति उससे नीचे तथा आतंक में रहे। इसीलिए यदि उनकी दृष्टि किसी उठते हुये आदमी पर पड़ती है तो वे उससे ईर्ष्या करने और द्वेष मानने लगते हैं। इस बात की कोशिश करते हैं कि किसी प्रकार यह उठने न पाये। वे उसके मार्ग में अवरोध उत्पन्न करते, रोड़े अटकाते और काँटे बिछाते हैं। दूसरे को नीचे गिराने में अपनी शक्ति एवं साधन का दुरुपयोग करते हैं। जिस धन-दौलत तथा अधिकार शक्ति से इस प्रकार दोष उत्पन्न हो सकते हैं उसे जीवन की सफलता का लक्षण मानना भूल नहीं तो क्या कहा जा सकता है?

जीवन की वास्तविक सफलता लोक-प्रियता पाने के लिये धन-दौलत अथवा शक्ति सम्बल की आवश्यकता नहीं, उसके लिये आवश्यकता है गुण, कर्म स्वभाव की श्रेष्ठता की। जब तक गुण, कर्म, स्वभाव में श्रेष्ठता का समावेश नहीं होगा, बहुत कुछ धन-दौलत एवं शक्ति सम्पन्नता होने पर भी मनुष्य वास्तविक लोकप्रियता नहीं पा सकता।

जो गुणी है उसका आदर क्या धनवान और क्या निर्धन, दोनों ही करते हैं। उसकी पूजा प्रतिष्ठा किसी बाह्य आधार पर नहीं होती, आन्तरिक गुणों के कारण ही होती है। सहानुभूति , संवेदना, सहयोग, सेवा के गुण मनुष्य को सहज ही लोक-प्रिय बना देते हैं। गुणी मनुष्य की एक सद्भावना ही उसे इतनी लोकप्रियता प्राप्त करा सकती है जो एक धनवान लाखों हजारों खर्च करके भी नहीं पा सकता। सहानुभूति का एक शब्द, सम्वेदना का एक आँसू और सेवा का एक कार्य सौ भार स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान है। शोक के समय किसी को दिया हुआ सान्त्वना का एक शब्द , दीन दुखी अथवा आपत्ति पीड़ित व्यक्ति की सेवा आर्थिक सहायता से कहीं अधिक सन्तोषदायक होती है। एक निर्धन, एक धनाढ्य की अपेक्षा कहीं अधिक लोक-प्रियता पा सकता है यदि वह अपने में वास्तविक गुणों का विकास कर लेता है। धनवान का धन समाज में लोक-प्रियता का सम्पादन सच्ची सहानुभूति अथवा सम्वेदना का गुण न होगा। लोक-प्रियता यथार्थ में धन के दान से नहीं मिलती बल्कि वह मिलती है उस सद्भावना के गुण के कारण जो उस दान के पीछे दमकती रहती है। बिना सद्भावना का दान एक दम्भ होता है जो लोक-प्रियता लाने के स्थान पर अधिकतर लोकापवाद ही लाया करता है।

जो सदाचारी है, सुकर्मवान् है, उसका आचरण ही उसको लोक-प्रिय बना देगा। लोग उस पर विश्वास करेंगे, उसे आदर की दृष्टि से देखेंगे और उसकी चर्चा करेंगे। कर्मों की श्रेष्ठता एवं निष्कलंकता में आस्था रखने वाला मनुष्य बड़े से बड़ा कष्ट उठाकर किसी को धोखा नहीं देगा, मिथ्याचरण अथवा आडम्बर का अवलम्बन न लेगा। कोई भी ऐसा काम न करेगा जिससे वह, उसका परिवार, समाज, राष्ट्र अथवा मानवता लाँछित होती हो। सुकृती के हृदय में छल-कपट, ईर्ष्या-द्वेष, काम-क्रोध आदि विकारों का वेग नहीं रहता। ऐसे चारु-चरितं लोग अपने कर्तव्यों, अधिकारों अथवा शक्तियों का प्रयोग ऐसी दिशा में नहीं करते जिससे उनकी नागरिकता एवं नैतिकता पर आँच आए। ऐसे श्रेष्ठ लोगों की तरफ लोक चित आकर्षित होने लगता है।

जिसका स्वभाव मधुर है, जो क्रोध के कारण पर भी शाँत एवं संतुलित रहता है, छोटे-बड़े सभी व्यक्तियों से समान प्रसन्नता से मिलता और बात करता है, किसी की निन्दा अथवा छिद्रान्वेषण करना जिसके स्वभाव का अंग नहीं होता, जो परदोष-दर्शी न होकर पर गुण गायक होता है, वह व्यक्ति सहज ही अपने श्रेष्ठ स्वभाव के कारण लोक-प्रियता पा लेता है। पावन स्वभाव के लोग निश्चय ही परमार्थ कर्मों में विश्वास रखते हैं। परमार्थ अथवा परोपकार का छोटा-सा भी अवसर आने पर सुकृत स्वभाव का व्यक्ति बिना किसी प्रोत्साहन के स्वतः उसमें लग जाता है। किसी का दुःख देख आँसू भर लाना और हर्ष देखकर पुलकित हो उठना श्रेष्ठ स्वभाव व्यक्तियों की एक प्राकृतिक विशेषता होती है। ऐसे पुनीत पुरुषों को भला कौन न जानेगा और कौन न याद करेगा। धन-वैभव एवं सुविधा, साधनों से रहित होने पर भी गुण, कर्म,स्वभाव से श्रेष्ठ व्यक्तियों को लोग सभा, समाजों में प्रमुख स्थान ही देते हैं।

गुण, कर्म, स्वभाव तीनों की श्रेष्ठता से ही वास्तविक लोक-प्रियता मिलती है। कोई यदि बहुत कुछ गुणी है, बड़ा दयालु तथा दर्दीला है, उसकी सहानुभूति एवं संवेदना जागृत होने में देर नहीं लगती, किन्तु उसके कर्म गुणों के अनुरूप नहीं है तो उसके गुण मिथ्यात्व के दोष भागी होंगे। किसी के आँसू देखकर आँसू तो भर लिए किन्तु उन्हें दूर करने, पोंछने अथवा बन्द करने के योग्य कोई छोटा-सा भी करणीय कार्य नहीं किया तो वह सहानुभूति उसकी अपनी मानसिक दुर्बलता जन्य भावुकता ही मानी जायेगी। ऐसी निष्क्रिय भावुकता सच्ची लोक-प्रियता प्राप्त नहीं कर सकती। जो गुणी भी है तो लोग उसे भी पसन्द न करना चाहेंगे। किसी से सहानुभूति रखकर उसकी सक्रिय सहायता करने वाला यदि भावावेश में उससे कोई कठोर बात या व्यवहार कर बैठेगा तो उसके सारे किये कराये पर पानी फिर जायेगा। परूप, कठोर, कर्कश अथवा निराश एवं निरुत्साही व्यक्ति से कोई किसी प्रकार का संपर्क रखना पसन्द नहीं करेगा। अस्तु वास्तविक लोक-प्रियता प्राप्त करने के लिए गुण, कर्म, स्वभाव तीनों का श्रेष्ठ होना आवश्यक है।

जीवन की सफलता यह नहीं है कि किसी ने कितना धन, कितना वैभव, कितनी शक्ति तथा कितना अधिकार प्राप्त कर लिया, बल्कि जीवन की सफलता यह है कि उसने कितने लोगों का हृदय जीत लिया है, कितनों के हृदय पर मनुष्यत्व की अमिट छाप छोड़ी है, कितने लोगों का विश्वास किस सीमा तक जीता है? उसने अपने आचरण से कितने लोगों को याद करने के लिये विवश कर लिया है आदि अहैतुक लोक-प्रियता ही जीवन की वास्तविक सफलता है और यह लोक-प्रियता गुण, कर्म, स्वभाव तीनों की श्रेष्ठता से ही प्राप्त हो सकती है।


Quotation

शास्त्र पढ़कर भी लोग मूर्ख होते हैं, किन्तु जो उसके अनुसार आचरण करता है वस्तुतः वही विद्वान है। रोगियों के लिए भली-भाँति सोचकर निश्चित की हुई औषधि नाम उच्चारण करने मात्र से (बिना खिलाये) किसी को निरोग नहीं कर सकती।

—हितोपदेश


समय के सदुपयोग की महत्ता समझिये

समय संसार की सबसे मूल्यवान सम्पदा है। विद्वानों एवं महापुरुषों ने समय को ही सारी विभूतियों का कारणभूत हेतु माना है। समय का सदुपयोग करने वाले व्यक्ति कभी भी निर्धन अथवा दुःखी नहीं रह सकते। कहने को कहा जा सकता है कि श्रम से ही सम्पत्ति की उपलब्धि होती है। किन्तु श्रम का अर्थ भी समय का सदुपयोग ही है। असमय का श्रम पारिश्रमिक से अधिक थकान लाया करता है।

मनुष्य कितना ही परिश्रमी क्यों न हो यदि वह अपने परिश्रम के साथ ठीक समय का सामंजस्य नहीं करेगा तो निश्चय ही उसका श्रम या तो निष्फल चला जाएगा अथवा अपेक्षित फल न ला सकेगा। किसान परिश्रमी है, किन्तु यदि वह अपने श्रम को समय पर काम में नहीं लाता तो वह अपने परिश्रम का पूरा लाभ नहीं उठा सकता। समय पर न जोतकर असमय जोता खेत अपनी उर्वरता को प्रकट नहीं कर पाता। असमय बोया हुआ बीज बेकार चला जाता है। समय पर न काटी गई फसल नष्ट हो जाती है। संसार में प्रत्येक काम के लिए निश्चित समय पर न किया हुआ काम कितना भी परिश्रम करने पर भी सफल नहीं होता।

प्रकृति का प्रत्येक कार्य एक निश्चित समय पर होता है। समय पर ग्रीष्म तपता है, समय पर ही पानी बरसता है, समय पर ही शीत आती है। समय पर ही शिशिर होता और समय पर ही बसंत आकर वनस्पतियों को फूलों से सजा देता है। प्रकृति के इस ऋतु क्रम में जरा-सा भी व्यवधान पड़ जाने से न जाने कितने प्रकार के रोगों एवं इति भीति प्रकोप हो जाता है। चाँद-सूरज, ग्रह नक्षत्र सब समय पर ही उदय अस्त होते, समय के अनुसार ही अपनी परिधि एवं कक्षा में परिभ्रमण किया करते हैं। इनकी सामयिकता में जरा-सा व्यवधान पड़ने से सृष्टि में अनेक उपद्रव खड़े हो जाते हैं और प्रलय के दृश्य दीखने लगते हैं। समय पालन ईश्वरीय नियमों में सबसे महत्वपूर्ण एवं प्रमुख नियम है।

समय की बरबादी का अर्थ है अपने जीवन को बरबाद करना। जीवन के जो क्षण मनुष्य यों ही आलस्य अथवा उन्माद में खो देता है वे फिर कभी लौटकर वापस नहीं आते। जीवन-प्याले से क्षणों के जितने बूँद गिर जाते हैं प्याला उतना ही खाली हो जाता है। प्याले की वह रिक्तता फिर किसी भी प्रकार भी भरी नहीं जा सकती। मनुष्य जीवन के जितने क्षणों को बरबाद कर देता है उतने क्षणों में वह जितना काम कर सकता था उसकी कमी फिर वह किसी प्रकार भी पूरी नहीं कर सकता।

जीवन का हर क्षण एक उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना लेकर आता है। हर एक घड़ी महान मोड़ का समय हो सकती है। मनुष्य यह निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता कि जिस समय, जिस क्षण और जिस पल को वह यों ही व्यर्थ में खो रहा है वह ही क्षण—वह ही समय—उसके भाग्योदय का समय नहीं है? क्या पता जिस क्षण को हम व्यर्थ समझकर बरबाद कर रहे हैं वह ही हमारे लिये अपनी झोली में सुन्दर सौभाग्य की सफलता लाया हो।

सब के जीवन में एक परिवर्तनकारी समय आया करता है। किन्तु मनुष्य उसके आगमन से अनभिज्ञ रहा करता है। इसीलिये हर बुद्धिमान मनुष्य, हर क्षण को बहुमूल्य समझकर व्यर्थ नहीं जाने देता। कोई भी क्षण व्यर्थ न जाने देने से निश्चय ही वह क्षण हाथ से छूटकर नहीं जा सकता जो जीवन में वाँछित परिवर्तन का संदेशवाहक होगा। सिद्धि की अनिश्चित घड़ी से अनभिज्ञ साधक जिस प्रकार हर समय लौ लगाये रहने से उसको पकड़ लेता है ठीक उसी प्रकार हर क्षण को सौभाग्य के द्वार खोल देने वाला समझकर महत्वाकाँक्षी कर्मवीर जीवन के एक छोटे से भी क्षण की उपेक्षा नहीं करता और निश्चय ही सौभाग्य का अधिकारी बनता है।

कोई भी दीर्घ-सूत्री व्यक्ति संसार में आज तक सफल होते देखा सुना नहीं गया है। जीवन में उन्नति करने और सफलता पाने वाले व्यक्तियों की जीवन गाथा का निरीक्षण करने पर निश्चय ही उनके उन गुणों में समय के पालन एवं सदुपयोग को प्रमुख स्थान मिलेगा जो जीवन की उन्नति के लिये अपेक्षित होते हैं। दीर्घ-सूत्री व्यक्ति जिस समय को बरबाद कर चुका है, कर रहा है अथवा करने का इरादा कर रहा है निश्चय ही वही समय उसके भाग्योदय का था, है, और होगा। जो व्यक्ति आये हुये समय का समादर नहीं करता उसके लिये आने वाला समय कोई भी उपहार लेकर नहीं आता। क्योंकि वह जानता है कि जब इस आलसी ने आये हुये समय का ही आदर नहीं किया, उठ कर श्रम-जल से उसको अर्घ्य नहीं दिया तब वह मेरा भी क्या स्वागत करेगा? ऐसे दुर्भाग्य दोषी के लिये कोई भी पुरस्कार ले चलना व्यर्थ है।

आलसी अथवा दीर्घ सूत्री व्यक्ति बहुधा किसी उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करते-करते ही सारी जिंदगी खो देते हैं और उन्हें कभी भी उपयुक्त अवसर नहीं मिल पाता। प्रमाद के मद में वे यह नहीं सोच पाते कि जीवन का प्रत्येक क्षण एक स्वर्ण-अवसर है। अवसर यों ही चुपचाप आते और चले जाते हैं। किसी भी सुअवसर के आगे चारण अथवा परिचायक नहीं चलता जो प्रमादियों को यह बतलाये कि —’सावधान हो जाइये आपके जीवन का स्वर्ण अवसर आ गया है।’ और नाहीं समय के सिर पर अवसर अथवा अनवसर का साइनबोर्ड ही लगा रहता है। उसकी परख एवं प्राप्ति तो हर क्षण को कर्मण्यता की कसौटी पर कसकर ही की जाती है। जब तक जिस क्षण का सदुपयोग करके परखा नहीं जायेगा तब तक निश्चयपूर्वक यह कैसे कहा जा सकता है कि अमुक समय उपयुक्त अवसर नहीं है। कर्म वादियों का हर क्षण उपयुक्तता के विशेषण से विभूषित होकर आता है जब कि अकर्मण्य, आलसी एवं दीर्घसूत्री की सारी जिन्दगी एक अनुपयुक्त अवसर की भाँति निकल जाती है। जीवन का प्रत्येक क्षण एक सुअवसर ही है यदि उसका ठीक ठीक उपयोग किया जाये। नहीं तो गा-बजा कर आये हुये स्वर्ण अवसर भी उपयोगी सिद्ध नहीं होते।

हर मनुष्य को समय के छोटे से छोटे क्षण का मूल्य एवं महत्व समझना चाहिये। जीवन का समय सीमित है और काम बहुत है। अपने से लेकर परिवार,समाज एवं राष्ट्र के दायित्व-पूर्ण कर्तव्यों के साथ मुक्ति की साधना तक कामों की एक लम्बी शृंखला चली गई है। कर्तव्यों की इस अनिवार्य परम्परा को पूरा किये बिना मनुष्य का कल्याण नहीं। इस कर्म-क्रम को इसी एक जीवन के सीमित समय में ही पूरा कर डालना है क्योंकि आत्मा की मुक्ति मानव जीवन के अतिरिक्त अन्य किसी जीवन में नहीं हो सकती और मुक्ति का प्रयास तभी सफल हो सकता है जब वह उसके सहायक पूर्व प्रयासों को पूरा करता है। अस्तु जीवन के चरम लक्ष्य मुक्ति को पाने के लिये उसकी साधना के अतिरिक्त सारे कर्तव्य क्रम को इसी जीवन के सीमित समय में ही पूरा करना होगा।

इतने विशाल कर्तव्य क्रम को मनुष्य पूरा तब ही कर सकता है जब वह जीवन के एक-एक क्षण एक पल और एक-एक निमेष को सावधानी के साथ उपयोगी एवं उपयुक्त दिशा में प्रयुक्त करे। नहीं तो किसने देखा है कि उसके जीवन का अन्तिम छोर कितनी दूरी पर ठहरा हुआ है। जीवन की अवधि सीमित होने के साथ अनिश्चित एवं अज्ञान भी है। जो क्षण हमारे पास है हृदय के जिस स्पन्दन में गति है, वही हमारा है श्वास का एक आगमन ही हमारा है बाकी सब पराये हैं, न जाने दूसरे क्षण हमारे बन पायेंगे या नहीं। अतएव हर बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिये कि जो क्षण, जो श्वास, उसके अधिकार में है उसे भगवान की महती कृपा और जीवन का उच्चतम अंतिम अवसर समझकर इस सावधानी एवं संलग्नता से उपयोग करे कि मानों इसी एक क्षण में सब कुछ कर डालना है। अपने वर्तमान, क्षण को छोड़कर भविष्य की युगीन अवधि पर विश्वास करना विवेक का बहुत बड़ा अपमान है। जिस भविष्य पर आप अपने जीवन विकास के कार्यों, अपने महान कर्तव्यों को स्थगित करने की सोच रहे हैं वह आ ही जायेगा, यह जीवन की निश्चित अनिश्चितता के बीच निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता।

कर्तव्यों के विषय में आने वाले कल की कल्पना एक अंधविश्वास है। उसकी प्रतीक्षा करने वाले नासमझ इस (page no. 21 to 26 missing from master copy)


परिवार को सुसंस्कृत बनायें

जिस प्रकार वृक्ष की सफलता उसकी जड़ पर निर्भर है उसी प्रकार मनुष्य की सफलता एवं सुख-शाँति परिवार पर निर्भर है। यदि वृक्ष की जड़ कमजोर, अव्यवस्थित, शुष्क अथवा अनुपयुक्त हो तो वृक्ष किसी भी दशा में विकसित होकर फल फूल नहीं सकता। परिवार के व्यवस्थित , सुसंस्कृत तथा उपयुक्त होने पर ही व्यक्ति जीवन में वाँछित उन्नति की ओर बढ़ सकता है। मनुष्य के जीवन विकास में परिवार का महत्वपूर्ण योगदान भी एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

गृहस्थ-जीवन को पृथ्वी पर स्वर्ग कहा गया है। मनुष्य का युग-युग का अनुभव बतलाता है कि जो सुख पारिवारिक जीवन जीने में है वह किसी अन्य प्रकार की जीवन पद्धति में नहीं है। आश्रम व्यवस्था का प्रचलन करने वाले ऋषि मुनियों ने गृहस्थ आश्रम को सबसे पुनीत एवं उपयोगी बताया है। जीवन की सारी व्यवस्था परिवार पर निर्भर रहती है। शेष तीन आश्रम भी गृहस्थ आश्रम पर निर्भर रहते आये हैं।

पारिवारिक जीवन एक प्रकार की सुन्दर स्वस्थ सहकारी जीवन पद्धति है। परिवार के प्रत्येक सदस्य का सुख-दुख प्रत्येक से जुड़ा रहता है। सभी एक दूसरे की सुख-सुविधा में सहायक होते हैं। गृहपति यदि परिवार चलाने के लिये श्रम करता है तो गृह-स्वामिनी उसके लिये समय पर भोजन तथा आराम की व्यवस्था किया करती है। पति जो कुछ कमा कर लाता है पत्नी उसे संजोती तथा उसका इस प्रकार से अधिक से अधिक सदुपयोग करती है जिससे कि घर की व्यवस्था रोचक, मनोरम एवं सम्पन्नता पूर्ण बनी रहे। माता-पिता बच्चों का पालन पोषण करने में श्रम करते हैं तो बच्चे भी उन्हें अपनी किलकारियों तथा आज्ञानु वर्तन से आनन्दित करते रहते हैं। बूढ़े हो जाने पर अपने माता-पिता के हाथ पाँव बनकर उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होने देते। सम्मिलित परिवारों में अनेकों की कमाई एक साथ घर आती और एक साथ भोजन व्यवस्था होने से घरबार भरापूरा बना रहता है। एक सदस्य के बीमार अथवा अलील हो जाने पर सारे सदस्य उसकी चिन्ता एवं सेवा सुश्रूषा करते हैं जिससे रोगी बड़ा ही आश्वस्त अनुभव करता और शीघ्र अच्छा हो जाता है। सदस्यों के मिलजुल कर रहने से परिवार की प्रतिष्ठा एवं शक्ति बढ़ती है जिससे कोई दुष्ट अनायास उसे हानि पहुँचाने की हिम्मत नहीं कर पाता। इस प्रकार यदि परिवार संगठित, सुव्यवस्थित तथा सुमति पूर्ण है तो उसकी तुलना में स्वर्ग का सुख भी तुच्छ आँका जायेगा।

पारिवारिक जीवन में न केवल भौतिक सुख-सुविधा के लाभ हैं अपितु आध्यात्मिक लाभ भी कुछ कम नहीं है। पारिवारिक जीवन में हर मनुष्य अपनी व्यक्तिगत स्वार्थपरता त्यागकर दूसरों की सुख-सुविधा का ध्यान रखने का अभ्यास सिद्ध करता है। अतिथि सेवा, परोपकार, दान पुण्य का जितना अवसर गृहस्थ जीवन में मिलता है उतना अन्य जीवन में नहीं। गृहस्थ लोग निहंगों की अपेक्षा कहीं अधिक सहिष्णु, सदाचारी तथा सौहार्द पूर्ण हो जाया करते हैं। प्रेम का प्रकाश जितना गृहस्थ के भाग्य में होता है उतना गृहस्थ हीन व्यक्ति के भाग्य में नहीं। गृहस्थी में माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन, चाचा, ताऊ आदि सारे सदस्य एक दूसरे को स्नेह तथा प्रेम किया करते हैं। जितना बड़ा परिवार होता है सदस्यों के प्रेम का दायरा उतना ही बड़ा होता है। जिस गृहस्थ के बेटा-बेटी, नाती-पोते हैं तो वह उनको प्रेम करने के स्वभाव के कारण दूसरे के बच्चों को भी प्रेम करता है। माँ, बहन, बेटी, बहू वाला सद्गृहस्थ उसी दृष्टि से दूसरे की बहू बेटियों को देखता है। परिवार निःसन्देह मनुष्य के नैतिक प्रशिक्षण का एक सुन्दर केन्द्र है।

बेटे बेटियों तथा नाती पोतों की ब्याह शादी होने पर गृहस्थ के स्नेह सम्बन्धों की परिधि और भी बढ़ जाती है। यदि वह बुद्धिमान इनमें स्वार्थ तथा संकीर्णता से दूषित अपनत्व न रक्खे और सारे संगों एवं सम्बन्धियों को विश्व विराट् का घटक मानकर निश्छल प्रेम करे और उनके लिये सहायता सहयोग के लिये निस्वार्थ भाव से तत्पर रहे तो उसकी यह आत्मीयता विश्वप्रेम में परिणत हो जाये और वह “वसुधैव कुटुम्बकम्” वाला एक आध्यात्मिक व्यक्ति बन जाये। त्याग भावना पारिवारिक जीवन का विशेष गुण है। यों तो मूल-मानव पशुओं की तरह स्वार्थी होता था उसे किसी दूसरे की सुख सुविधा का जरा भी ध्यान नहीं रहता था। किन्तु जब वह स्वार्थी मानव गृहस्थ जीवन में स्त्री-बच्चों तथा भाई बहनों के बीच बसता है तब अपेक्षाकृत अधिक निःस्वार्थी हो जाता है। अपने से पहले उसे अपने स्त्री-बच्चों तथा भाई-बहनों एवं माता-पिता की सुख-सुविधा का ध्यान रहता है और वह सुखपूर्वक उनके लिए कुछ भी त्याग करने के लिये तैयार रहता है। प्रेम अथवा ममतावश ही सही त्याग भावना का विकास होना हर प्रकार से कल्याणकारी है।

किन्तु यह सब सुख स्वर्ग मय भौतिक तथा आध्यात्मिक लाभ होते तभी हैं जब परिवार सुसंगठित, व्यवस्थित तथा सुसंस्कृत होता है। अन्यथा अव्यवस्थित एवं असभ्य परिवारों से बड़ा कोई नरक नहीं है। असफल गृहस्थी गले की फाँसी बन जाती है। अशिष्ट पत्नी, उच्छृंखल संतानें, स्वार्थी भाई और क्रूर माता-पिता किसी भी व्यक्ति का सम्पूर्ण जीवन स्वाहा कर देने के लिये विकट वैश्वानर के समान ही होते हैं। जब तक परिवारों में अपेक्षित अनुशासन, वाँछित व्यवस्था और आवश्यक शिक्षा दीक्षा के साथ शुभ संस्कारों की परम्परा बनी रही, पारिवारिक जीवन स्वर्ग सुख का सार बना रहा— और सद्गृहस्थ देवताओं जैसा सुख पाते हुये बड़े-बड़े महात्मा एवं लोकसेवी बनते रहे। किन्तु जब से परिवारों को प्रयास पूर्वक सुसंस्कृत बनाने के कर्तव्य की उपेक्षा की जाने लगी गृहस्थ-जीवन जीता जागता नरक कुँड बन गया है।

आज जिधर भी दृष्टि डालिए लोग पारिवारिक जीवन से ऊबे, शोक सन्ताप में डूबे अपने भाग्य को कोसते नजर आते हैं। बहुत ही कम परिवार ऐसे होंगे जिनमें स्नेह सौभाग्य की सुधा बहती दिखाई पड़े। अन्यथा घर-घर में कलह, कलेश, कहा सुनी, झगड़े, टंटे, मार पीट, रोया धोई, टूट फूट, बाँट बटवारा और रार, जिद फैली दीखती है। सास पतोहू, पिता-पुत्र, भाई-भाई, ननद भाभी, देवर-भौजाई यहाँ तक कि पति-पत्नी तथा बच्चों एवं बूढ़ों में टूट-फूट, लड़ाई-झगड़ा द्वैष वैमनस्य तथा मनोमालिन्य उठता और फैलता दिखाई देता है। आज का पारिवारिक जीवन जितना कलुषित, कुटिल, और कलहपूर्ण हो गया है कदाचित ऐसा निकृष्ट जीवन पहले कभी भी नहीं रहा होगा। स्वर्ग-सुख के प्रतिबिम्ब गृहस्थ जीवन की यह नारकीय दुर्दशा, आश्चर्य, खेद तथा चिन्ता का विषय है। हम गृहस्थों को इस अवाँछित गृहस्थ जीवन पर शर्म करनी चाहिये और आत्म कल्याण से लेकर राष्ट्रीय कल्याण की दृष्टि तक इसे शीघ्र से शीघ्र सुधार कर आदर्श गृहस्थ का रूप दे देना चाहिये।

अपने पैरों खड़े होते ही पुत्र असमर्थ माता-पिता को छोड़कर अलग घर बसा लेता है। भाई-भाई की उन्नति एवं समृद्धि शत्रु की आँखों से देखता है। पत्नी पति को चैन नहीं लेने देती। बहू बेटियाँ फैशन प्रदर्शन सन्निपात से ग्रस्त हो रही हैं। छोटी संतानें, जिद्दी, अनुशासनहीन तथा मूढ़ बनती जा रही हैं। परिवारों के सदस्यों के व्यय तथा व्यसन बढ़ते जा रहे हैं। कुटुम्ब कबीले वाले कौटुम्बिक प्रतिष्ठा का कोई महत्व देते दृष्टिगोचर नहीं होते। निःसन्देह यह एक भयावह स्थिति है। परिवार टूटते, बिखरते जा रहे हैं। चिन्ताशील सद्गृहस्थ इस विष पूर्ण विषम स्थिति में शरीर एवं मन से चूर होते जा रहे हैं। गृहस्थ धर्म एक पाप बनकर उनके सामने खड़ा हो गया है। अनेक समाज हितैषी, लोकसेवी परोपकार की भावना रखने वाले सद्गृहस्थ इस असहनीय पारिवारिक परिस्थिति के कारण अपने जीवन लक्ष्य की और न बढ़ सकने के कारण अपने दुर्भाग्य को धिक्कार रहे हैं।

इस अपुनीत पारिवारिक परिस्थिति में यदि कोई यह आशा करता है कि वह सुख शाँति एवं प्रसन्नता पूर्ण गृहस्थ का सुख लेकर अवस्थानुसार कुछ आध्यात्मिक लाभ का प्रयत्न करेगा तो उसकी आशा को दुराशा ही कहना होगा। ऐसे नारकीय पारिवारिक जीवन में सुख शाँति की परिस्थितियाँ पा सकना, संतोष सौहार्द की उपलब्धि कर सकना सम्भव नहीं दीखता। इसके लिये सड़े-गले पारिवारिक ढर्रे को बदलना होगा, साहसपूर्वक उसे शिक्षित, प्रशिक्षित तथा सुसंस्कृत बनाना होगा। तभी कुछ निस्तार की सम्भावना सम्भव हो सकती है। सड़े गले पुराने ढर्रे पर अभ्यासपूर्वक चलते रहने से परिस्थिति का स्वयं सँभलना तो दूर दिन-दिन और बिगड़ती जायेगी? यदि आज हम घर से बाहर निकल कर समाज, राष्ट्र तथा विश्व की कोई सेवा नहीं कर सकते, उसकी सुधार संभाल नहीं कर सकते, तो कम से कम अपने परिवार, जिस पर कि हमारी सुख, समृद्धि तथा उन्नति विकास निर्भर है, की तो साज सँभाल करें ही। परिवार को सुधार कर सुव्यवस्थित तथा सुसंस्कृत बना लेने पर भी परोक्ष ही नहीं प्रत्यक्ष रूप से समाज-सेवकों की सूची में आ जायेंगे। क्योंकि परिवार समाज का ही एक अभिन्न अंग है।

पारिवारिक जीवन की इस पतन पूर्ण दयनीय दशा के कारण खोजने पर पता चलता है कि इसका दायित्व हम गृहस्थों पर ही है जिन्होंने परिवार परम्परा का मुख्य उद्देश्य विस्मरण कर दिया है और इसे एक टूटी-फूटी गाड़ी समझकर खींचते रहना ही अपना कर्तव्य समझ लिया है।

परिवार बसा लेना आसान है, लोग आये दिन बसाते ही रहते हैं। उसका पालन भी कोई विशेष कठिन नहीं, सभी उसका पालन करते हैं। किन्तु परिवार को समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिये उसका निर्माण करना एक धर्म साध्य कर्तव्य है। अधिकतर लोग परिजनों के लिये अधिकाधिक सुख सुविधायें देने, उनके लिए अच्छा भोजन, अच्छे वस्त्र तथा आराम की चीजें जुटाना ही पारिवारिक जीवन का उद्देश्य मान बैठे हैं। उनका ध्यान परिवार की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए धनोपार्जन तक ही सीमित रहता है। वे यह कभी नहीं सोच पाते कि भोजन, वस्त्र तथा शिक्षा स्वास्थ्य के साथ परिवार की एक सर्वोपरि आवश्यकता भी है और वह है उसे सद्गुणी बनाना। असद्गुणी परिजन न तो परिवार की प्रतिष्ठा सुरक्षित रख पाते हैं और न उसमें सुख शाँति का ही आगमन होने देते हैं। खाने पीने, पहनने, ओढ़ने और मौज मजा के आदी परिजन कभी भी अनुशासित तथा संगठित नहीं रह सकते। अवश्य ही उनमें स्वार्थपरता बढ़ जायेगी और वे जरा-जरा सी बात पर एक दूसरे से कलह, क्लेश तथा ईर्ष्या डाह करेंगे। खाने-पीने , पहनने ओढ़ने तथा मौज मजा तक अपने दृष्टिकोण को केन्द्रित रखने वाला व्यक्ति कभी भी त्यागी, परोपकारी,स्नेही तथा उदार नहीं हो सकता! इन गुणों का अभाव किसी भी परिवार की सुख शाँति में आग लगा देने के लिए काफी है। अस्तु आवश्यक है कि जहाँ स्थिति के अनुसार परिजनों को अधिक से अधिक सुख-सुविधा पहुँचाई जाये वहाँ इससे यह अनिवार्य है कि उन्हें गुणी, व्यवस्थित, अनुशासित तथा मर्यादित बनाने का प्रयत्न किया जाये। परिवार का निर्माण परिवार पालन से शत सहस्र गुना महत्वपूर्ण है।

सद्गृहस्थ को चाहिए कि वह अपने परिवार को एक वाटिका तथा अपने को उसका उत्तरदायी माली समझे। जिस प्रकार एक माली अपने बाग को सींचता, उसमें खाद देता और एक-एक फूल-पत्ती की देखभाल एवं साज संभाल करता हुआ इस बात का भी ध्यान रखता है कि उसके पौधों में कोई कीड़ा तो नहीं लग रहा है, उसके बाग में निरर्थक झाड़ झंखाड़ तो नहीं उगे आ रहे हैं—और यदि वह इसके लक्षण देखता है तो तुरन्त ही सावधान होकर उनको दूर करने के उपाय करता है। इसी प्रकार सद्गृहस्थ को चाहिये कि वह अपने परिवार का पालन करे, उसे भोजन, वस्त्र दे, शिक्षा दीक्षा दिलवाये किन्तु इस पर भी पूरा ध्यान रखे कि उसके परिवार का कोई व्यक्ति व्यसनी, स्वार्थी अथवा संकीर्ण तो नहीं हो रहा है, उसके घर में कलह, कलेश तथा टूट-फूट के कारण तो नहीं उभर रहे हैं। यदि उसे ऐसे कोई संकेत मिलें तो तुरन्त सुधार में तत्पर हो जाये। स्नेह, सख्ती, शासन अनुशासन जिस उपाय से बने समाहित होती हुई विकृतियों को दूर करे! परिवार में पनपती हुई विकृतियों की उपेक्षा करना अथवा उन्हें दूर करने में प्रमाद करना परिवार को नरक बनाने की असावधानी होगी। किन्तु कोई भी सद्गृहस्थ अपने परिवार को सुख सौरभ पूर्ण हरी-भरी वाटिका का रूप देने में तभी सफल हो सकता है जब वह अपना जीवन आदर्श बनाकर परिजनों के सम्मुख उदाहरण के रूप में रक्खे। सदाचारी, सद्गृहस्थ का परिवार सुख-शाँति का घर बन जा सकता है। आज ही से सदाचारी, सद्गृहस्थ बन जाइये कल ही आपका परिवार नरक कुँड से बदल कर स्वर्ग सुख का आवास बन जायेगा।


मित्रता अच्छी हैः—पर करें समझ-बूझकर

अन्य आवश्यकताओं की तरह मनुष्य को मित्रों की भी आवश्यकता होती है। जीवन में सर्वथा अकेला रह सकना कठिन है। भावनाओं, तथा विचारों को प्रकट करने के लिये मित्र की आवश्यकता है। मनुष्य के हृदय में अनेक भावनायें तथा विचार रहते हैं जिनको प्रकट किये बिना चैन नहीं आता। उनको सुनने और समझने वाले, ऐसे संवेदनशील व्यक्तियों की आवश्यकता अनुभव होती है जो विश्वासनीय हों और भावनाओं को ठीक से समझ सकें। ऐसा उपयुक्त व्यक्ति ही वह मित्र हो सकता है जिसके सम्मुख विश्वासपूर्वक हृदय खोला जा सके।

मित्रों का महत्व बहुत माना गया है। मित्र ही संसार में सबसे अधिक हितैषी, संवेदनशील, सच्चा सहायक तथा दुःख का समान संवाहक होते हैं। समान भावनाओं, विचारों तथा वयस्क होने से मित्र से मिलकर हार्दिक प्रसन्नता होती है। मित्रों के साथ मिलकर हंसने बोलने में अनिवर्चनीय हर्ष होता है। मित्र के संपर्क में आकर मनुष्य अपने बड़े से बड़े दुःख भूल जाता है। मित्र साहस तथा उत्साह का प्रेरक, शुभचिन्तक तथा विपथ से बचाने वाला अभिभावक होता है। सच्चे मित्र पाकर मनुष्य संसार में एकाकी अनुभव नहीं करता। मित्र मित्र की उन्नति एवं विकास में सच्चा सहायक तथा विपत्ति में हाथ बटाने वाला कहा गया है।

समान विचारों तथा भावनाओं वाले लोग मिलकर क्लब समितियाँ तथा गोष्ठियाँ बनाते हैं और एक दूसरे की सहायता, सहयोग से सामाजिक, उन्नति तथा समाज सेवा के पुण्य कार्य किया करते हैं। संसार में मित्रता के अनेक लाभ हैं और उसकी मनुष्य के लिये आवश्यकता भी है। किन्तु यह सब सम्भव तभी है जब सच्चे, शुभेच्छु, निःस्वार्थी तथा निष्कपट मित्र मिल जायें। संसार के चार-छह ऊँचे लाभों में एक मित्र लाभ भी है। विद्वानों ने शारीरिक स्वास्थ्य, पतिव्रता पत्नी, आज्ञाकारी पुत्र तथा, ‘सच्चा मित्र’ मिलना जन्म-जन्म के पुण्यों का फल बतलाया है। निःसन्देह जिसको, सच्चे एवं निष्कपट मित्र मिल जायें वह बड़ा ही सौभाग्यशाली माना जायेगा।

किन्तु आज हम जिस दुर्भाग्यपूर्ण युग में निवास कर रहे हैं उसमें अधिकाँश बातें उल्टी हो गई हैं। आज अधिकतर लोग अच्छाई के नाम पर बुराई का ही पोषण करने लगे हैं। परमार्थ के नाम पर स्वार्थ सिद्धि का बोलबाला हो रहा है। जिधर देखो, पुण्य के नाम पर पाप पाला जा रहा है। करुणा, दया, सहानुभूति, संवेदना उदारता, ईमानदारी आदि गुणों की आड़ में विपरीत प्रवृत्तियों एवं अवगुणों को आगे बढ़ाया जा रहा है। लोग धर्मादा के नाम पर धन इकट्ठा करते और अपनी जेबें भरते हैं। गौओं के नाम पर भीख माँग लाते और अपने पेट में रख लेते हैं, विधवाओं, अनाथों तथा अपंगों के नाम पर सच्चों की सहानुभूति को भुनाकर धनवान बनते हैं। देश, धर्म और समाज की सेवा के नाम पर ठगते और अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। आज के स्वार्थपूर्ण समय में आदमी किस अच्छाई को किंचित लाभ के लिये नीलाम नहीं करने लगा है? आज युग के इस विपरीत प्रवाह में अच्छाइयों तथा गुणों का मूल्याँकन एवं आदर बड़ा ही भयप्रद बन गया है। इसलिये आज हर समझदार आदमी को इस बात से सावधान रहना चाहिये कि कहीं वह अच्छाई के नाम पर बुराई की वेदी पर बलिदान न हो जाये।

जिस प्रकार अन्य शुभ एवं परोपकार पूर्ण प्रवृत्तियों के नाम पर खल लोग भोले एवं भले लोगों को ठगते तथा शोषण करते हैं उसी प्रकार मित्रता के नाम पर भी अनेक लोग भावना तथा भाव-प्रवण व्यक्तियों को ठगने तथा शोषण करने को व्यावहारिक कला मानने लगे हैं। आज के प्रतिकूल युग में मनुष्य को तथाकथित मित्रों से सदा सावधान रहना चाहिये। मात्र मित्रता के नाम अथवा उसके पूर्व आदर्श की भावुकता में बहकर अपने चारों ओर मित्रवेषी वंचकों को इकट्ठा न होने देना चाहिये। इन्हीं मित्रवेषी वंचकों से घबराकर किसी अनुभवी ने ठीक ही कहा है। ‘हे परमात्मा! मुझे मित्रों से बचा, शत्रुओं से मैं अपनी रक्षा आप कर लूँगा।”

आज का मित्र मित्रता के रूप में शत्रुता का व्यवहार करता है। शत्रु से अपनी रक्षा कर लेना सरल है, किन्तु मित्र वेश में प्रच्छन्न शत्रु से रक्षा करना कठिन हो गया है। स्पष्ट होने से मनुष्य शत्रु से सावधान रह सकता है। किन्तु मित्र वेश में छिपे शत्रु से सावधान रहने की ज्यादा गुंजाइश नहीं होती। इसलिये उसे ठीक से समझने, जानने और पहचानने में धोखा नहीं होता। शत्रु की वाणी व्यवहार तथा विचार अधिकार विरुद्धता को खुले रूप में ही व्यक्त करते हैं जिससे कोई भी उन्हें जानकर उनका प्रतिकार करने का उपाय सोच सकता है। किन्तु प्रच्छन्न शत्रु-मित्र के विषय में ऐसी सम्भावना नहीं रहती। उसकी चाटुकारिता से भरी चिकनी चुपड़ी बातें सद्भावना, भ्रामक नाटकीय व्यवहार तथा अन्तरंगता से रंगे विचार, अपना यथार्थ स्वरूप समझने ही नहीं देते और कोई भी बेचारा भावुक एवं भला व्यक्ति उनके इन्द्रजाल में फँसकर मारा जाता है।

शत्रुता अच्छी चीज नहीं है फिर भी उसका निर्वाह करने के लिये साहस की अपेक्षा है। शत्रु खुल कर मैदान में आता और अपनी हर क्रिया, प्रतिक्रिया से पुकार-पुकार कर कहता है कि मैं विरोधी एवं अशुभ चिन्तक हूँ मुझ से सावधान रहने में प्रमाद न करना, अन्यथा किसी भी समय कोई हानि उठानी पड़ सकती है। किन्तु आज का स्वार्थी मित्र जिसे कमजोर एवं कायर शत्रु ही कहना चाहिये इस प्रकार का साहस नहीं दिखा पाता। वह भाई, हितैषी तथा शुभचिन्तक होने की डुग्गी पीटता और मित्रता के नाम पर हानियों में घसीटता रहता है। जब कोई कायर एवं कमजोर शत्रु अपने मलीन मन्तव्यों को पूरा नहीं कर पाता तब वह मित्रता का लबादा ओढ़कर बरबाद करने का प्रयत्न करता है। ऐसे वेशधारी मित्रों से सावधान रहने में भूल करने वाले, जीवन में अक्सर बड़ी-बड़ी हानियाँ उठाया करते हैं।

अनेक चालाक लोग अपना मतलब बनाने के लिए सम्पन्न, सुशील, सज्जन, भावुक तथा उदारमना व्यक्तियों के मित्र बन जाया करते हैं। वे उनकी कोई कमजोरी पकड़ लेते और उसी के आधार पर तरह-तरह से शोषण किया करते हैं। अपना वक्त काटने तथा मनोरंजन करने के लिये उनके पास जा पहुँचते हैं। तरह-तरह की गप मारते, चाय शर्बत, भंग आदि की अपनी हाजत पूरी करते हैं। अपनी विवशता तथा कठिनाई को अतिरंजन के साथ सामने रखकर भोले भावुक में सहानुभूति पूर्ण उदारता जगाते और अपना आर्थिक उल्लू सीधा करते हैं। अनेक चालाक लोग मित्र बनकर निर्व्यसनी व्यक्तियों को व्यसनी बना डालते हैं। कुछ दिन कुछ अपने पास से खर्च करके फिर जीवन भर उसका लाभ ब्याज के साथ उठाया और मौज उड़ाया करते हैं और इस प्रकार भोले, भावुक तथा विश्वासी व्यक्तियों को न जाने कितनी चारित्रिक तथा आर्थिक हानि पहुँचाया करते हैं। इस प्रकार की प्रवंचना वृत्ति आज अपवाद नहीं रह गई है। आज की दुष्ट दुनिया में यह चालाकी आम हो गई है। आये दिन खल व्यक्ति इसका प्रयोग करते और सज्जन व्यक्ति शिकार बनते रहते हैं जब तक कोई भावुक व्यक्ति वंचक मित्रों की स्वार्थपूर्ण चतुराई को सार्थक बनाने में समर्थ रहता है उसकी महफिल दोस्तों से आबाद रहती हैं। पर ज्यों ही उसका प्याला खाली हो जाता है तो ये तथा-कथित मित्र ऐसे छोड़ देते हैं जैसे रक्त रहित प्राणी को जोंक छोड़ देती है और वह अपनी महफिल में एकाकी बैठा हुआ अपनी उदार यारवासी पर पछताया करता है। किन्तु तब “चिड़िया चुग गई खेत” के बाद उसका पश्चाताप एक पीड़ा बनने के अतिरिक्त किसी काम नहीं आता। इसलिए मनुष्य को समय रहते ही वंचक मित्रों से अपनी रक्षा कर प्रबंध कर लेना चाहिये।

अधिकतर निकम्मे एवं निठल्ले व्यक्ति ही लोगों को मित्र बनाते फिरते हैं। उनके पास समय का सदुपयोग करने के लिये कोई योग्य काम तो होता नहीं, इसलिये निरुपयोगी एवं फालतू समय काटने के लिये स्थान तथा ऐसे व्यक्तियों की आवश्यकता रहती है जहाँ निःसंकोच जाकर बैठा जा सके और जिनसे अधिकारपूर्वक गप लड़ाई जा सके। संसार में सब तरह के व्यक्ति मौजूद हैं। अस्तु निठल्ले लोग भोले, भावुक तथा सहनशील लोगों को खोजकर किसी न किसी बहाने उनके मित्र बन जाते हैं और अपना फालतू समय यापन करने का प्रबंध कर लेते हैं।

निकम्मे आदमियों के पास समय ही समय होता है। घर बैठकर काटने में जी ऊबता है। किसी रेस्टोरेन्ट में जाने पर कुछ खाना पीना होगा। सिनेमा के लिये टिकट खरीदना होगा। सैर सपाटे के लिये भी साथी तथा पैसा चाहिये। पढ़ने लिखने से उनका सम्बंध नहीं होता, पुस्तकालय तथा वाचनालय उन्हें काटते, विद्वान तथा साधु जनों के सत्संग में न तो उन्हें रस आता है और न उन मनीषियों के संपर्क में आने का साहस होता है समाज सेवा, देश सेवा, अथवा जन सेवा उनके लिए बेकार की चीज होती हैं— तो आखिर फालतू समय कैसे और किसके पास काटा जायें? इसके लिए सबसे उपयुक्त तथा सरल वे ही सहनशील व्यक्ति हो सकते हैं जो नैतिक उदारता में इतने बढ़ गये होते हैं कि उनका वह गुण दोष बन जाता है और जिन्हें निरन्तर पुनरावृत्ति के साथ समय तथा पैसे की हानि कि लिये सहनशीलता का अभ्यस्त बना लिया गया होता है। निदान निठल्ले लोग ऐसे अनिषेधशील व्यक्तियों को खोज लेते, उनके मित्र बन जाते, और बिना इस विचार के कि इन बेचारों के पास कोई काम भी होगा अपना फालतू समय यापन-करने के लिए दूसरों के समय की बरबादी किया करते हैं। किसी भी सावधान आदमी को ऐसे निठल्ले व्यक्तियों की मित्रता से अपनी, अपने पैसे तथा अपने समय की -रक्षा करनी ही चाहिये।

इस प्रकार के तथा-कथित निठल्ले मित्र मनुष्य की नैतिक, चारित्रिक, आर्थिक हानि किया करते हैं सो तो किया ही करते हैं, सबसे बड़ी शत्रुता यह करते हैं कि किसी से नाम मात्र के मनोमालिन्य को बढ़ाकर शत्रुता की सीमा तक बढ़ा देते हैं। वे जानते हैं कि विरोधी की बुराई करने से कोई भी व्यक्ति ‘शत्रु का शत्रु मित्र’- के सिद्धान्तानुसार मित्र ही नहीं बन जाता बल्कि घनिष्ठ एवं विश्वासी मित्र बन जाता है। और ऐसी स्थिति में आसानी से उसका शोषण किया जा सकता है। वंचक मित्र पिशुनता के माध्यम से किसी भी व्यक्ति को निन्दारसिक बना देता है। इसके साथ मित्र एक बड़ी हानि और भी करते हैं— वह है छलपूर्वक मिथ्या प्रशंसा करके किसी को अहंकारी बना देना। वे विविध प्रकार से चाटुकारी करके किसी भी व्यक्ति को उसके सत्य स्वरूप से भटका देते हैं और उसको एक ऐसी वातुलता पर पहुँचा देते हैं जहाँ से वह यथार्थ की भूमि पर उतर ही नहीं पाता और झूठे स्वप्नों के संसार में भटकता हुआ अपने को वह सब कुछ समझने लगता है, जो वह यथार्थ में होता नहीं। वंचक मित्रों की इस प्रकार की चाटुकारी जहाँ किसी में दम्भ एवं अहंकार की निर्बलता पैदा कर देती है वह चाटुकार को अन्तरंग प्रिय जन बना देती है, जिससे उसे अनेक प्रकार के लाभ उठा सकने का अवसर रहता है। इस प्रकार निन्दा प्रशंसा के आधार पर घनिष्ठता पाने के लिये प्रयत्नशील मित्रों से हर समझदार व्यक्ति को सावधान रहना चाहिये।

आज की दुनिया में जहाँ हर चीज नकली होती जा रही है मित्र भी नकली होने लगे हैं। इसलिए मित्रता स्थापित करने में मनुष्य को आवेगपूर्ण भावुकता से काम नहीं लेना चाहिए। जहाँ तक हो कम से कम मित्र बनाए और जिन्हें बनाए उन्हें अच्छी प्रकार से समझ परख ले। मित्र बनाने में अनियंत्रित उदारता बरतना अपने चारों ओर प्रच्छन्न शोषकों तथा शत्रुओं को इक करना है।

किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि आज सच्चे मित्रों का सर्वथा अभाव हो गया है अथवा हर किसी का हर मित्र प्रवंचक ही होता है। संसार में सच्चे और अच्छे मित्र भी होते हैं किन्तु उनकी संख्या विरल हो चली है। फिर भी लोगों को वास्तविक मित्र मिलते हैं जिसके लिये वे बधाई के पात्र हैं। फिर भी राह चलते हर व्यक्ति अथवा आकस्मिक संपर्क में आ गये किसी भी व्यक्ति से भावुकता वश मित्रता स्थापित कर लेने के अभ्यस्त ‘यार-बाश’ लोग घाटे में रहते और जीवन में बहुत बार धोखा खाकर अपना सुधार कर पाते हैं।


मनुष्य जीवन में वृक्षों का आध्यात्मिक महत्व

बहुत समय से हम भारतवासी वनों एवं वृक्षों का महत्व भूल गये हैं। हमारे देश की समग्र सभ्यता, संस्कृति, धर्म एवं अध्यात्म-दर्शन का विकास वनों में वृक्षों, के नीचे ही हुआ है। हम सब वैदिक सभ्यता के अनुयायी हैं, और हमारा धर्म भी वैदिक ही है।

इस वैदिक धर्म एवं वैदिक सभ्यता के प्रणेता ऋषि मुनियों ने वनों के बीच वृक्षों के नीचे बैठकर ही चिन्तन, मनन एवं ग्रहण किया था। वैदिक ज्ञान के वाँग्मय में आरण्यक ग्रन्थों का विशेष स्थान है। ग्रन्थों का यह आरण्यक नाम ही इस बात का द्योतक है कि इनका प्रणयन वनों में ही किया गया है। अरण्य का अर्थ वन ही होता है।

जिन वृक्षों के नीचे बैठकर ऋषियों ने ईश्वरीय ज्ञान की प्राप्ति की और हमारे सामाजिक जीवन की रूप-रेखा बनाई, वन के बीच बने आश्रमों के जिन वृक्षों के नीचे गुरुकुलों में राष्ट्र के कर्णधारों, राजाओं, अमात्यों, राज गुरुओं, सेनापतियों, राजनीतिज्ञों, विद्वानों, कवियों, दार्शनिकों एवं कलाकारों का निर्माण किया गया, जो वृक्ष उन गुरुकुलों की भोजन व्यवस्था, छाया तथा निर्माण-सामग्री के साधक बने, उन वृक्षों के महत्व का विस्मरण कर देना हम भारत-वासियों के लिये कृतघ्नता के समान पाप है। वृक्षों के पूजन एवं आरोपण की जो पुण्य परम्परा भारतीय धर्म-विधान में पाई जाती है वह वृक्षों के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति ही है।

इस परम्परा को चलाने में ऋषियों का उद्देश्य यह रहा है कि जनसाधारण धर्माचार के माध्यम से वृक्षों के संपर्क में आता रहे जिससे उनके लाभ उनकी उपयोगिता, उनके महत्व एवं उनके उपकार से अवगत रहे। उनकी रक्षा करे और उनके उच्छेद करने को पाप समझता रहे।

किन्तु खेद है कि ऋषियों का यह मन्तव्य आज लीक मात्र पीटने के रूप में रह गया है। वृक्ष पूजा के मूल मन्तव्य को पूरी तरह भुला दिया गया है। अब तो लोगों का दुःसाहस यहाँ तक बढ़ गया है कि जिन वृक्षों की पूजा करते हैं, जिन पर जल एवं चन्दन रोली चढ़ाते हैं, जिनको सूत्र दान करते और हाथ जोड़कर प्रदक्षिणा करते हैं, उन्हें थोड़े से स्वार्थ के लिये काट तक डालते हैं। वृक्षों के प्रति भारतीयों की यह अधार्मिक बुद्धि सोच का विषय है।

आज संसार में सबसे अधिक वृक्ष भारतवर्ष में ही काटे जाते हैं। चकबन्दी की चर्चा होते ही बाग के बाग साफ कर दिये गये हैं, जंगल के जंगल काटकर गिरा दिए गये हैं और नित्य प्रति गिराये जा रहे हैं। वृक्षों के प्रति भारतीयों की यह निर्दयता अशोभनीय है। जीवों की भाँति ही वृक्षों पर भी दया करनी चाहिए। हरे वृक्षों को काटना न केवल वनस्पति के रूप में देश की सम्पत्ति को हानि पहुँचाना है, अपितु यह जीव हत्या के समान एक पाप भी है।

यदि जड़ जीवन की बात छोड़ भी दी जाये तो भी संसार का अनन्त उपकार करने वाले वृक्षों का ह्रास करना मानव-समाज ही नहीं सम्पूर्ण जीव-जगत को हानि पहुँचाना है। यदि एक बार वृक्षों को जड़ भी मान लिया जाये तब भी यह सोच सकने का अवसर है कि जड़ होकर भी वृक्ष संसार का कितना उपकार करते हैं और हम चेतन होकर भी उस अनबोल उपकारी पर कुल्हाड़ी चलाते हैं।

वृक्षों को काटने अथवा नष्ट करने वालों की तुलना दुष्ट तथा क्रूर पक्षी बाज से की गई है, जो सुकुमार पक्षियों को मार डालता है। वेद के ऋषि ने कहा है —

मा का कम्बीर मुहृ हो वनस्पतिन शस्तीर्वि हिनीनशः। मोत सूरो अह एवा चन ग्रीवा अदधते वेः॥

अर्थात् - जिस प्रकार दुष्ट बाज पक्षी दूसरे पक्षियों की गर्दन तोड़कर उन्हें कष्ट पहुँचाता और मार डालता है, तुम उस प्रकार के न बनो। इन वृक्षों को कष्ट न दो और न इन्हें काटो ही क्योंकि यह वृक्ष पशु-पक्षियों तथा अन्य जीव जन्तुओं को शरण देते हैं।

आध्यात्मिक उन्नति के लिये मनुष्य का परोपकारी होना आवश्यक है। मनुष्य का स्वयं परोपकारी होना और किसी परोपकारी के प्रति आदर भाव रखना, श्रद्धा करना अथवा उसकी रक्षा करना भी परोपकार ही है और यदि विचारपूर्वक देखा जावे तो पता चलेगा कि किसी की सेवा करना, भला अथवा सहायता करना एकधा परोपकार करना है, किन्तु किसी परोपकारी, समाज सेवी, दानी, दयालु आदि परमार्थी व्यक्तियों के प्रति श्रद्धा रखना, आपत्ति के समय उनकी रक्षा में सहायक होना, उनके पुण्य कार्यों में सहयोग करना द्विधा परोपकार है। एक तो व्यक्ति का पोषण, परिवर्धन, रक्षा करना, परोक्ष रूप में उन सब लोगों की सेवा सहायता में मूल परोपकारी के माध्यम से भागीदार बनना है।

इस द्विधा परोपकार का पुण्यफल पाने के लिये मनुष्यों को वृक्ष जैसे निःस्वार्थ परोपकारी की हर प्रकार से सेवा, सहायता तथा सुरक्षा करनी चाहिए। वृक्षों के परोपकार का यदि लेखा-जोखा लिया जाये तो पता चलेगा कि जीव जन्तुओं तथा पक्षियों को शरण तथा भोजन-वास देने के अतिरिक्त वृक्ष मनुष्य जीवन के प्रायः सभी क्षेत्रों में किसी न किसी रूप में उपयोगी होते हैं। छाया, फल-फूल, ईंधन, कोयला, इमारती लकड़ी, गंध औषधियाँ, गोंद, लाख, राल, शहद आदि न जाने जीवनोपयोगी कितनी चीजें वृक्षों से ही पाई जाती हैं। मेवे, मसाले आदि सब वृक्षों से ही मिलते हैं। अब तो कागज एवं कपड़ा भी वृक्षों के गूदे, छाल, पत्तियों तथा रेशों से बनने लगा है। हल से लेकर खुरपी तक और बैलगाड़ी से लेकर हवाई जहाज तक के निर्माण में वृक्षों से प्राप्त होने वाली लकड़ी का विशेष स्थान है।

धार्मिक एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में उपयोग होने वाली अधिकाँश वस्तुयें काठ की ही बनती हैं। यज्ञ के उपकरण, उपादान तथा सामग्री वृक्षों की सहायता से ही उपलब्ध की जाती हैं। प्राण-रक्षक ऑक्सीजन गैस का देना और घातक गैस कार्बन डायऑक्साइड गैस का शोषण करना वृक्षों का ही पुण्य कार्य है। यदि ऐसा न हो तो पृथ्वी पर प्राणियों का जीवन असम्भव हो जाये। वृक्ष मेघों के बनने और बरसने में किस सीमा तक सहायक होते हैं इस सत्य को विज्ञान का बाल-विद्यार्थी तक जानता है। जंगल न केवल बाढ़ रोकने के ही पुण्य कार्य का सम्पादन करते हैं बल्कि वे धरती के क्षरण तथा मरु वर्धन को भी रोकते हैं। पृथ्वी की उर्वरा शक्ति में वृक्ष अनेक प्रकार से सहायक होते हैं। उनसे उपकारी वृक्षों को पालना, उनकी रक्षा करना तथा उनको लगाना कितना महान पुण्य हो सकता है और इनका काटना तथा उजाड़ना कितना जघन्त पाप हो सकता है इसको कोई भी आध्यात्मिक उन्नति का आकाँक्षी व्यक्ति सहज ही में समझ सकता है। प्राणीमात्र के परमोपकारी वृक्षों को पाल पोस तथा आरोपण करके अध्यात्म दिशा में उल्लेखनीय लाभ उठाया जा सकता है।

पूर्वकाल में गुरु-आश्रम तथा गुरुकुल, में वन वृक्षों के बीच की स्थापित किये जाते थे। विद्यार्थी स्वयं अपने हाथों से वृक्षों को लगाते तथा सींचते थे। उन्हीं के नीचे बैठकर पढ़ते तथा उन्हीं की छाया में शयन भी करते थे। ऐसे नियम का कारण यही था कि जहाँ इस प्रकार वे प्रकृति के संसर्ग में रहकर मन, बुद्धि तथा आत्मा से शुद्ध रहते थे वहाँ शरीर से स्वस्थ भी रहते थे। वृक्ष साधकों की आध्यात्मिक भावनाएँ जगाने, बढ़ाने तथा स्थिर रखने में स्वाभाविक रूप से सहायक होते थे। यही कारण है कि उन-दिन वृक्षों के बीच स्थापित गुरुकुलों से पढ़कर निकलने वाले स्नातक एवं आचार्य बड़े ही स्वस्थ सुन्दर, सबल, विद्वान तथा चरित्रवान होते थे। अरण्य विद्यालयों में शिक्षित एवं दीक्षित विद्यार्थी काम, क्रोध, मोह, लोभ आदि किसी प्रकार के विचारों से आजीवन परास्त न होते थे। वृक्षों का यह उपयोगी आध्यात्मिक महत्व आज भी कम नहीं है। उनके उन दिव्य गुणों में किसी प्रकार की कमी नहीं आई है। आज भी विद्यालयों, गृहों तथा धार्मिक स्थानों को यथासम्भव हरे भरे वृक्षों से संकुल रखने का प्रयत्न किया जाता है। कमी केवल यह हो गई है मनुष्य ने वृक्षों के इस आध्यात्मिक महत्व को भुला दिया है। वह उन्हें और अधिक पालने-पोषने तथा लगाने में पुनःप्रवृत्त हो जाये तो वनस्पति के अधिकाधिक संपर्क मात्र से ही वह न जाने कितना आध्यात्मिक लाभ उठालें।

फूलों फलों एवं हरीतिमा से भरी हुई वृक्षावली मनुष्य की सौंदर्य चेतना को उद्बुद्ध करने में सबसे अधिक सफल सहायक है। संसार का सारा सौंदर्य प्रकृति की सुन्दरता का ही प्रतिबिम्ब है। जिस समय फली फूली एवं रंग-बिरंगी प्रकृति पर मनुष्य की दृष्टि पड़ती है, उस समय उसकी आत्मा में जो सात्विक सौन्दर्यानुभूति होती है वह आध्यात्मिक अनुभूति ही होती है। उस समय उसके प्राणों में स्वयं परमात्मा ही सौंदर्य बोध में प्रबुद्ध हुआ करता है। निःसन्देह, यदि मनुष्य की वह सौन्दर्यानुभूति स्थायी हो जाये तो उसकी पावन पुलक उसे जीवनमुक्त ही बना दे। प्राकृतिक सौंदर्य जहाँ मनुष्य को प्रसन्न बनाता है वहाँ उसके मन, बुद्धि तथा आत्मा को निर्विकारता भी प्रदान करता है, मनुष्य की यह त्रिविधि निर्विकारता आध्यात्मिक उन्नति की आधार-भूत भूमिका है।

वृक्षों के इसी अनिवर्चनीय महत्व के कारण भारत वर्ष के अध्यात्म प्रणेता ऋषि मुनियों ने वृक्षारोपण एवं उनके पालन पोषण को एक धार्मिक पुण्य तथा उनके उन्मूलन एवं विनष्ट करने को भयानक पाप बतलाया है। वृक्षों का महत्व बतलाते हुये विष्णु-स्मृति में वर्णन किया है-

वृक्षारोपतितुवृक्षाः परलोके पुत्रा भवन्ति। वृक्षप्रदो वृक्ष प्रसूनैर्द्देवान् प्रीणायति फलैश्चातिथीन् छाययाचाभ्यागतान् देवे वर्षन्युदकेन पितृान। पुष्प प्रदानेन श्रीमान् भवति। कूपाराम तडागेषु देवतायतनेषुच। पुनः संस्कार कर्त्ता च लभते मौलिकं फलम्॥

अर्थात्- जो मनुष्य वृक्ष लगाता है, वे वृक्ष परलोक में उसके पुत्र बनकर जन्म लेते हैं। वृक्षों का दान देने वाला उसके फूलों से देवताओं को प्रसन्न करता है। फलों द्वारा अतिथियों को सन्तुष्ट करता है और वर्षा में छाया द्वारा पथिकों को सुख देता है। तथा जल द्वारा पितरों को प्रसन्न करता है। पुष्पों फूलों का दान करने वाला श्रीमन्त और कुआँ, तालाब तथा देवस्थानों का संस्कार कराने वाला नया बनवाने के समान पुण्यफल प्राप्त किया करता है।

इस प्रकार वृक्षारोपण तथा पोषण के आध्यात्मिक महत्व को समझते हुए प्रत्येक-धर्म-प्रेमी तथा आध्यात्मिक जिज्ञासु को अपने जीवन में अनेक वृक्ष लगाने चाहिये और उन्हें पुत्र की तरह प्रेम से पालन करना चाहिए और जहाँ तक सम्भव हो किसी लाभ, लोभ, अथवा आवश्यकता से कोई हरा वृक्ष तो काटना ही नहीं चाहिये। इन दिनों वर्षा ऋतु चल रही है जिनके लिए संभव हो खाली जमीन पर वृक्ष लगाकर एक श्रेष्ठ पुण्य परमार्थ उपार्जित करना चाहिए।


पं. नेहरू का पुस्तक प्रेम

पंडित नेहरू को पुस्तकों से बहुत प्रेम था। वे पुस्तकों को इतना सँभाल कर रखते थे कि वर्षों नई बनी रहती थी। एक बार लखनऊ में वे अपने एक मित्र श्री मोहनलाल सक्सेना के यहाँ ठहरे। स्वभाव के अनुसार उनकी नजर उनकी पुस्तकों की अलमारी पर गई। अलमारी में पुस्तकें बहुत ही बेतरतीब और उल्टी-सीधी पड़ी हुई थीं। उन पर धूल भी जम रही थी।

वे उठे और अलमारी की सारी पुस्तकें निकाली और झाड़-पोंछकर उन्हें तरीके और तरतीब से लगाते हुये, अपने मित्र से नाराजगी के साथ कहने लगे—”क्यों मोहनलाल! क्या तुम यह नहीं मानते कि पुस्तकें जीवित वस्तु हैं। इनका सदा ही आदर सम्मान करना चाहिये। पुस्तकों के साथ इस प्रकार से दुर्व्यवहार करना शोभनीय बात नहीं।”


अन्न-संकट दूर करने के लिए हम यह करें

देश में अन्न संकट छाया हुआ है। क्या भौतिकवादी और क्या अध्यात्मवादी सभी इस संकट से व्यग्र एवं त्रस्त हैं। ऐसी स्थिति में न तो भौतिक उन्नति की जा सकती है और न आध्यात्मिक। शाँति एवं सुविधापूर्ण स्थिति—जिसमें कि मनुष्य के मन मस्तिष्क संतुलित रहें —में ही किसी प्रकार की उन्नति की सम्भावना हो सकती है। अन्न की समस्या एक मूल समस्या है जिससे संसार की अधिकाँश समस्याओं का जन्म होता है। एक अकेले अन्न संकट ने ही इस समय देश में राजनीतिक, आर्थिक, नैतिक तथा चारित्रिक न जाने कितनी समस्याओं को फैला रक्खा है। हम सबका मन मस्तिष्क इन समस्याओं में इस बुरी तरह उलझा हुआ है कि हम आन्तरिक अथवा बाह्य किसी प्रकार की भी उन्नति कर सकने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। यदि किसी प्रकार एक अन्न की कमी की समस्या ही सुलझ जाये तो अनेक प्रकार की समस्याओं का तो समाधान स्वयं हो जाये। मनुष्यों का मन मस्तिष्क मुक्त हो, महंगाई का कुचक्र टूटे,शान्तिमय जीवनयापन-कर सकने की स्थिति उत्पन्न हो और भौतिक तथा आन्तरिक प्रगति की दिशा में कुछ ठोस काम कर सकने का अवसर मिले और वे अपने आत्मोद्धार कर सकने योग्य हो सकें।

केवल संकट-संकट चिल्लाने अथवा विदेशों पर अन्न पूर्ति के लिये निर्भर रहने से समस्या का समाधान न हो सकेगा। हमें ऐसे उपाय खोज निकालने होंगे जो अन्नाभाव कम करने में सहायक हो सकें।

इस समय देश में अन्न आपूर्ति के आँकड़े दस से बारह प्रतिशत तक अनुमान किये जा रहे हैं। यह नगण्य प्रतिशत इतना साधारण है कि यदि थोड़ा-सा भी प्रयास किया जाये तो देश की अन्न सम्बंधी वैदेशिक निर्भरता देखते ही देखते अस्तित्वहीन हो जाये। इस धर्मप्राण तथा तप-त्याग के महत्व वाले भारत देश को आत्म संयम एवं परमार्थ,पुरुषार्थ के आध्यात्मिक गुणों का अवलम्ब लेकर अन्नीय परावलम्बन से अपने राष्ट्रीय गौरव के साथ मन, मस्तिष्क तथा आत्मा को मुक्त कर ही लेना चाहिये। यह पारमार्थिक पुण्य उन्हें लौकिक तथा पारलौकिक दोनों दृष्टियों से मंगलदायक होगा। लौकिक लाभ तो यह कि देश अन्नदाताओं के प्रभाव से मुक्त होकर अपनी कठिनाइयों को पार करते हुए सम्मान, उन्नति की ओर स्थिर प्रगति कर सकेगा। और पारलौकिक लाभ यह कि दान धान्य के कुसंस्कारों एवं अभाव की चिन्ता से मुक्त होकर हम सब शाँतिपूर्वक अपना अभीष्ट निर्माण कर सकेंगे।

देश की जन-संख्या के अनुपात से निःसन्देह उत्पादन कम है। उत्पादन कम होने के जहाँ अन्य अनेक कारण हो सकते हैं वहाँ वर्षा की कमी, अनियमितता तथा सिंचाई के साधनों की कमी,भी एक बड़ा कारण है। वर्षा की प्रचुरता और उसकी अनियमितता दूर करने के लिये सबसे सरल,सुरम्य एवं धार्मिक उपाय यह है कि घर-घर में नियमित रूप से ‘यज्ञ’ किया जाय और प्रत्येक पर्व के अवसर पर सामूहिक यज्ञों का आयोजन किया जाये। जब तक देश में बड़े बड़े अग्निहोत्र होते रहे समयानुसार नियमित रूप से आवश्यक वर्षा होती रही है। सतयुग, त्रेता, द्वापर युगों में जब यज्ञों का महत्व था, सर्व साधारण से लेकर राज स्तर तक यज्ञ अनुष्ठान होते रहते थे और लोग तदनुसार यज्ञीय जीवन जीते थे, अनावृष्टि, अतिवृष्टि अथवा अकाल वृद्धि की घटनाएं नहीं होती थीं। भारत की इस वैदिक मान्यता में अणु मात्र भी असत्य नहीं है कि यज्ञ से देवता प्रसन्न होते हैं, जिसके फलस्वरूप धन-धान्य देने वाली वर्षा होती है। वेदों में यज्ञों को मनोवाँछित फलदाता कहा गया है। प्रचुर एवं नियमित वर्षा भावना से यदि जन-जनीय अथवा सार्वजनिक यज्ञ किये जाते रहें तो कोई कारण नहीं कि वर्षा सम्बन्धी दोष दूर न हो जाये। सार्वजनिक लाभ अथवा मंगल कामना से किया हुआ यज्ञ सकाम यज्ञ की कोटि में नहीं उतारा जा सकता। लोक मंगल की कामना से किया यज्ञ अग्निहोत्री को निष्काम यज्ञ का ही फल प्रदान करेगा।

नित्य प्रति यज्ञ करते रहने से सब में यज्ञीय संस्कारों की वृद्धि होगी। हृदयों में परमार्थ की भावना बढ़ेगी जिससे सार्वजनिक एवं सार्वदेशिक कल्याण की परिस्थितियाँ आपसे आप प्रकट होने लगेंगी। जिस देश की जनता पुण्यवती तथा परमार्थ निरत हो वहाँ बड़े-बड़े दुर्विपाकों को ठहरने का साहस नहीं हो सकता,यह दस प्रतिशत अन्नाभाव तो किस गिनती में है।

वनों ,उपवनों एवं वनस्पतियों की हरीतिमा तथा इनसे निकले हुये उच्छावास और स्पर्श कर चलते हुये वातास वैज्ञानिक रूप से मेघों को बनने और समय पर बरसने के लिये सहायक होते हैं। लोग घर-घर पादप,बेलें तथा फुलवारियाँ लगायें, एकाकी अथवा सामूहिक रूप से वृक्षारोपण के कार्यक्रम चलायें,सूखते हुये वृक्षों पर पानी दें और हरे वृक्ष काटने का निषेध रखें तो अवश्य ही वन देव एवं देवियाँ प्रसन्न होंगी जिसके फलस्वरूप मनुष्यों को पुण्य मिलेगा और पृथ्वी को जल। वृक्षारोपण एक पारमार्थिक पुण्य है। वृक्ष लगाने वाला धूप से व्याकुल और भूख से विक्षुब्ध प्राणियों को छाया तथा फल देता है। मनुष्यों के लिए बनाए गए धर्मशालाओं की तरह ही पक्षियों के लिये नीड़ों एवं बसेरों के लिये आयोजन करता है। इस प्रकार जीवों को सुख देना एक बड़ा परोपकार है जिसका फल मनुष्य की आत्मा में उदात्तता के साथ-साथ प्रकाश का भी समावेश करता है।

जिस प्रकार लोग पुण्य परमार्थ एवं परोपकार के लिये कूप तड़ाग-वापी आदि बनवाने पर धन खर्च करते हैं उसी प्रकार सिंचाई के योग्य स्थानों पर कुयें तालाब बनवा सकते हैं, नहरों तथा नालियों की व्यवस्था करा कर पुण्य कमा सकते हैं। किसी गरीब खेतिहर के खेत में कुआँ बनवा देना, रहट अथवा पाइप लगवा देना भी सार्वजनिक उपकार ही है और उसका भी फल किसी तीर्थ अथवा यात्रा स्थल पर पानी का प्रबंध कर देने से किसी प्रकार कम नहीं होगा। इसके अतिरिक्त परमार्थ-प्रिय लोग देहातों में जाकर श्रमदान द्वारा छोटी-मोटी नहर, नाली अथवा बाँध का निर्माण करने में सहायता देकर पुण्य के भागी बन सकते हैं। सार्वजनिक हित में किया हुआ कोई कार्य परोपकार ही है।

अन्न की खपत कम करने के लिये पर्वों, उत्सवों तथा अनुष्ठानों के समय निश्चित उपवासों के अतिरिक्त अनेक अन्य सामयिक उपवासों का व्रत लिया जा सकता है। यथासम्भव भोजन में शाकों तथा फलों की मात्रा बढ़ाकर अन्न की खपत कम की जा सकती है। उपवास,व्रत निश्चित रूप से एक धार्मिक अनुष्ठान ही है जिसका पालन करने से मनुष्य को अनेक आत्मिक लाभ होते हैं। जिन कर्तव्यों को ऋषियों ने धर्म में स्थान दिया है वे किसी भी रूप में क्यों न किये जायें पारमार्थिक पुण्यदाता ही होते हैं। भारतीय धर्म में किसी भी नियम का निर्माण निश्चित रूप से आध्यात्मिक लाभ को दृष्टि में ही रखकर किया गया है। उपवास एक धार्मिक नियम है इसका पालन करने से अन्न की बचत तो होगी ही साथ ही आध्यात्मिक लाभ से भी वंचित नहीं रह सकते। फलाहार तथा शाकाहार ऋषि भोजन हैं। इसी के आधार पर अपनी सात्विक वृत्तियों को तेजवती बनाकर भारत के ऋषि मुनियों ने ईश्वरीय ज्ञान की उपलब्धि की है। तो भी सप्ताह में एक-दो फल एवं शाकाहार का क्रम अपना लिया जाये तो हम ऋषियों के स्तर पर नहीं पहुंच सकते तो कम से कम उनके आध्यात्मिक अनुयायी कहलाने की पात्रता तो प्राप्त कर सकते हैं।

जनसंख्या की वृद्धि न करना भी अन्न की खपत कम करने की दिशा में एक पुण्य प्रयास है। आत्मसंयम एवं ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने से तो यह पुण्य सहज ही में कमाया जा सकता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में आत्मसंयम तथा ब्रह्मचर्य की कितनी महिमा है यह किसी से छिपा नहीं हैं। यज्ञ, उपवास एवं फलाहार का व्रत ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने में बहुत सहायक होगा। जिनको परमात्मा ने एक-दो बच्चे दे दिये हैं, वे तो आत्मसंयम द्वारा राष्ट्रीय खाद्य संकट को हल करने में सहायक होने के पुण्य अधिकारी बन सकते हैं। किसी भी विचारशील को अधिक बच्चों की कामना द्वारा अन्न संकट बढ़ाने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये। संतानवान् लोगों को अवश्य ही ब्रह्मचर्य द्वारा “बिन्दु ही ब्रह्म” है की वैदिक सूक्ति को अपने व्यक्तिगत जीवन में चरितार्थ होते देखने का अवसर छोड़ना नहीं चाहिये। जिन महानुभावों को संतान न भी हो, उन्हें इसके लिये खेद नहीं करना चाहिये, वे दूसरों के बच्चों को अपना बच्चा समझें और इस बात का हर्ष मनाएँ कि हमारी निःसन्तानता इस संकट काल में देश की जन वृद्धि में बाधक है और इस मिष से हम दूसरों बच्चों को अधिक भोजन का अवसर देकर पुण्य लाभ ही कर रहे हैं। इस समय सार्वजनिक कल्याण की दृष्टि से अपनी निःसन्तानता पर खेद न करना निश्चय ही साहसपूर्ण कार्य है।

अन्न को नष्ट होने से बचाना किसी भी पुण्य कार्य से कम नहीं है। अन्न मनुष्यों का प्राण है। उसका नष्ट किया जाना परोक्ष रूप से मनुष्य प्राणों पर आघात करना है। इतना ही क्यों अन्न को शास्त्र में देवता माना गया है। निश्चय ही अन्न देवता है। ओज, तेज, बल, वीर्य तथा प्राण देने वाला अन्न देवता ही है। गायत्री के “भर्गो देवस्य” मंत्र खंड की व्यवस्था में महर्षि मुद्गल ने बताया है कि अन्न ही देवता का भर्ग अर्थात् तेज है। ऐसे देव रूप अन्न का नष्ट किया जाना देव प्रतिमा को नष्ट करने के समान पाप और रक्षा करना देव मूर्ति की रक्षा करने के समान पुण्य है। हम सबको इस पाप से बचकर पुण्य ही कमाना चाहिये।

अन्न का एक-एक दाना सँभाल कर रखना, जूठन, माड, अथवा बासी के रूप में उसे नष्ट होने से बचाना, चूहों, जानवरों तथा कीड़ों से उसकी रक्षा करना हम सबका पुण्य कर्तव्य है। महर्षि कणाद फसल उठ जाने के बाद खेतों में पड़े रह गये अन्न के एक-एक दाने को बीन लाते थे और संजोकर रखते थे और सावधानीपूर्वक उसी पर अपना निर्वाह करते थे। इसी पुण्य कार्य के आधार पर ही उनका नाम कणाद प्रसिद्ध हुआ। उनकी इस कणाद वृत्ति का कारण उनकी निर्धनता नहीं थी बल्कि अन्न देव के प्रति यह उनका आदर भाव था, जिसने कौन कह सकता है कि उन्हें ऋषित्व प्राप्त करने में सहायता न की होगी। ऋषियों के अनुयायी हम सब भारतवासियों को भी कणाद वृत्ति का अनुसरण करना चाहिये। किसी प्रकार किसी रूप में भी अन्न का एक कण तक बेकार नहीं जाने देना चाहिये।

इस प्रकार यदि इन धार्मिक उपायों को काम में लाया जाय तो कोई कारण नहीं कि इतनी विशाल जनसंख्या की नगण्य अन्न आपूर्ति दूर न हो जाये और आध्यात्मिकता के धनी भारतवासियों की आत्मा अन्न के लिये विदेश में भिक्षा वृत्ति की आत्मा ग्लानि से मुक्त न हो जाये।


हरि कथा का मूल्य

पद्मनाभ बहुत गरीब ब्राह्मण थे। किन्तु ब्राह्मण होने के नाते हर समय यह बात उनके मस्तिष्क रहा करती थी कि उनका कर्तव्य जन-जन को ज्ञान प्रदान करना है। बिना स्वयं ज्ञान प्राप्त किए किसी अन्य को ज्ञान किस प्रकार दिया जा सकता है। यही सोचकर भूखे नंगे रहकर भी किसी प्रकार संस्कृत का ज्ञान प्राप्त कर लिया।

पद्मनाभ जब अपना अध्ययन पूरा कर चुके तो जनता को ज्ञान देने का माध्यम कथा बाँचना बनाया। वे जन-स्थानों पर जाते और स्वयं कथा बाँचना प्रारम्भ कर दिया करते थे। वे निरन्तर निष्काम भाव से भगवान की भक्ति जन मानस में जाग्रत करने के लिये सुन्दर से सुन्दर अर्थ और विवेचना किया करते थे। लोग उनकी ओर आकर्षित होकर कथा सुनने लगे। कथा में जो कुछ थोड़ा बहुत चढ़ावा आता उसी से वे अपना और अपने परिवार का पोषण करते हुये ज्ञान का प्रसार करते रहे। एक बार उन्होंने यह सिद्धान्त वाक्य कि “ज्ञानदान का प्रतिफल धन के रूप में नहीं ग्रहण करना चाहिये” एक पुस्तक में देख लिया। वे बड़े दुखी होने लगे। उन्होंने सोचा कि अब तक जो कथा कहकर उसमें प्राप्त धन को ग्रहण करता रहता हूँ वह एक तरह से ज्ञान का प्रतिदान ही लेता रहा हूँ। अतएव मेरा अब तक का सारा श्रम व्यर्थ गया। आगे पद्मनाभ ने कथा में मिला पैसा अपने खर्च में न लगाकर गुरुकुल आदि जन संस्थाओं को देना शुरू कर दिया और अपना व अपने परिवार के जीवन -निर्वाह के लिए जंगल से लकड़ी काटकर बेचना शुरू कर दिया। इस प्रकार नितान्त निःस्वार्थ होकर पद्मनाभ आजीवन ज्ञान प्रसार का अपना कर्तव्य पूरा करते रहे।


फूल लगाइये, फल उगाइये

भारत एक धार्मिक देश है। यहाँ की जीवन-पद्धति में फूलों और फलों का अत्यधिक महत्व रहा है। मनुष्य जीवन की भावनात्मक सुन्दरताओं के प्रतीक के रूप में ही नहीं, मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इसका मुख्य स्थान रहा है। ऋग्-वेद में फल-फूल संवर्धन का अनेक स्थानों पर वर्णन है। ऋषियों के आश्रम फूलों और फलों से आच्छादित निकुँज कहलाते थे। उन्हें परमात्मा की अनुपम कृति के रूप में इनसे अद्भुत प्यार था। परमात्मा को समर्पित करने वाली वस्तुओं में इन्हें सर्वोत्तम समझा जाता था।

मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की साँस्कृतिक विशेषताओं में फूलों और फलों का प्रमुख स्थान है। मथुरा, कुषाण तथा भरहुत की मूर्ति कलाओं में अनेक प्रकार के पुष्पों, वृक्षों और लताओं का दिग्दर्शन है। बौद्ध-मठ उद्यानों में स्थापित किये जाते थे। प्राचीन-काल में माली आदि जातियों का यह मुख्य व्यवसाय ही समझा जाता था। राजपूतों और मुगलों के शासन काल में भी बागवानी का बड़ा महत्व रहा है।

संसार के प्रत्येक धर्म और संस्कृति में फूलों के प्रति गहन प्यार प्रदर्शित किया गया है। आज के युग में भी फूल मनुष्य को मानसिक शान्ति और आरोग्य प्रदान करने में वही महत्व रखते हैं। हिन्दू धर्म में एक बाग लगाने का पुण्य फल सौ यज्ञों के फल के बराबर माना गया है। इस कथन में आध्यात्मिक अलंकार चाहे कुछ भी हो पर मनुष्य-जीवन में फूल और फलों के पौधे जो प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं उसे देखते हुये इस कथन को अतिशयोक्ति नहीं मान सकते।

बागवानी जीविकोपार्जन का एक बड़ा सुन्दर साधन है। इसे सहायक व्यवसाय या प्रमुख धन्धे के रूप में भी अपनाया जा सकता है। नियमित बागवानी से कमाई हुई आमदनी अच्छी खेती से कहीं बढ़कर होती है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जिनसे यह बात पूर्णतया सिद्ध भी हो जाती है। बेंगलूर शहर को अकेले ‘कट फ्लावर’ बेचने से प्रतिवर्ष एक करोड़ रुपये की आमदनी हो जाती है। भारतवर्ष प्रतिवर्ष आम और दूसरे फलों का निर्यात करता है और करोड़ों रुपये की विदेशी मुद्रा पैदा करता है विदेशों की यह रकम अप्रत्यक्ष रूप से फलोत्पादकों तक पहुँचती है। कृषि-विशेषज्ञों का अनुमान है कि एक एक नारंगी के बाग से प्रतिवर्ष 4 हजार की बचत और अमरूद-पपीते आदि से एक हजार से लेकर 2 हजार रुपये तक की वार्षिक बचत हो सकती है। यह आमदनी अन्य जिन्स उपजाने की अपेक्षा बहुत अधिक है।

इस महत्व को दरअसल विदेशों ने हमसे ग्रहण किया और उसका प्रचुर लाभ उठाया, जब कि हमारे देश में बागवानी का निरन्तर ह्रास हो रहा है। जंगलों और वृक्षों का यहाँ तेजी से सफाया किया जा रहा है जिससे फूलों और फलों का अभाव बढ़ता जा रहा है।

वृक्षों का प्राकृतिक जलवायु से भी गहन सम्बन्ध है। वृक्ष वातावरण में मनुष्यों और पशुओं द्वारा पैदा की हुई कार्बनडाइ-आक्साइड स्वयं पीकर उनके लिये स्वास्थ्यवर्धक प्राणवायु निष्कासित करते रहते हैं। भारतवर्ष में नीम एक ऐसा वृक्ष है जो रात में भी आक्सीजन छोड़ता है और दिन की तरह रात में भी समीप रहने वालों को प्राणवायु प्रदान करता है। फूलों में चम्पा, अम्लता, कचनार, गेंदा, गुलमुहर, सोनमुखी, गुलाब, मोंगरे आदि की सुगन्धि और मादकता मनुष्य में एक नई स्फूर्ति, नई ताजगी और नवजीवन भरते रहते हैं। फूलों के बीच पहुँचकर दुःखी मनुष्य के जीवन में भी उत्साह आ जाता है। फूलों और फलों का आध्यात्मिक महत्व इतना अधिक है जिसका वर्णन भी नहीं किया जा सकता।

जलवृष्टि में जंगलों को सर्वोपरि महत्व दिया जाता है। जहाँ प्रकृति की सघनता होती है, वहाँ वर्षा भी नियमित होती है, इसके विपरीत वीरान प्रदेश जहाँ पेड़-पौधों का अभाव होता है अनियमित वर्षा होती है जिससे न तो फसलों का ही लाभ होता है और न सिंचाई के अन्य साधनों के लिये वर्षभर के लिये पर्याप्त जल की व्यवस्था हो पाती है।

सब्जियाँ, विटामिन, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, चर्बी और खनिज तत्वों का महत्वपूर्ण स्रोत होती हैं। संतुलित आहार और अच्छे स्वास्थ्य के लिये इनका जितना अधिक उपयोग किया जाय, उतना अच्छा है। पेट को साफ रखने में सब्जियाँ तथा फल अद्वितीय स्थान रखते हैं। वर्तमान खाद्य संकट को दूर करने के लिये भी इनका जितना अधिक से अधिक उपयोग हो सके उतना ही अच्छा। सब्जी और फलों का उत्पादन जितना बढ़ेगा, अन्न का दबाव और खपत उतनी ही कम होगी, फलस्वरूप विदेशों से निर्यात होने वाला गेहूँ बन्द हो जायगा और राष्ट्रीय आमदनी की बचत होगी जिससे विकास आयोजनों के लिये पैसा बचेगा।

एक या अधिक बीघे जमीन में 10 गज की दूरी पर एक सीध में गड्ढे खोद लेने चाहिये। यह कार्य बरसात के दिनों करना चाहिये। पौधों की प्रारम्भिक सुरक्षा और आवश्यकताओं की दृष्टि से तथा कम परिश्रम में अधिक काम की दृष्टि से भी यह ऋतु बागवानी के बहुत उपयुक्त पड़ती है। इन थहलों में खाद डालकर नीचे की मिट्टी की कई बार गोड़ाई करके उन्हें पौध लगाने के उपयुक्त बना लेना चाहिये।

खेत के चारों ओर मिट्टी या काँटेदार झाड़ियां जैसे नागफनी आदि से घेर देना चाहिये और पहली पंक्ति में चारों ओर घने केले तथा पपीते के पौधे लगा देने चाहिये, फिर बीच के थहलों में सन्तरे, नीबू, नासपाती, मौसमी, अमरूद तथा आम की पौध मँगाकर लगा देनी चाहिये। बरसात के दिनों में यह पौध जड़ पकड़ लेती है, इसके बाद केवल सिंचाई गौड़ाई और सामान्य सुरक्षा की आवश्यकता रह जाती है इसे बहुत आसानी से अवकाश के समय में बच्चे तथा स्त्रियाँ भी कर सकती हैं। बच्चों में यह शौक पैदा कर दिया जाय तो वे बड़ी रुचि लेते हैं।

बीच के खाली स्थानों में तुलसी और विभिन्न फूलों के पौधे लगा देना चाहिये, जिससे वहाँ के वातावरण में चारुता उत्पन्न होती है। फूलों में स्वास्थ्य संवर्धन एवं मानसिक प्रसन्नता देने की प्रचुर शक्ति होती है इसलिये यह कार्य कष्टकर भी नहीं हो सकता।

यह बात तो उनके लिये रही जिनको पर्याप्त जमीन उपलब्ध हो पर जिनके पास जमीन अधिक न हो या शहरों में रहते हों, उन्हें घर के आसपास पड़ी बेकार जमीन, कुयें के आसपास के स्थान तथा गमलों का प्रयोग करना चाहिये। घर के आसपास फूल लगाये जा सकते हैं। बरसात के दिनों में जहाँ छप्परों से वर्षा का जल टपकता है उन ओरोतियों के पास छोटे-छोटे गड्ढे खोदकर उनमें लौकी, तोरई, कद्दू, चचींडे, टमाटर आदि सब्जियाँ लगा देनी चाहिये और इनकी बेलों को बाँस की लकड़ियों या दीवार के सहारे से छत पर चढ़ा देना चाहिये। वहाँ वे बेलें अपना पूरा फैलाव भी ले लेती हैं, धूप भी लगती है और सब्जियाँ भी सुरक्षित रह सकती हैं इस प्रकार बहुत सी सब्जी का उत्पादन कर सहायक धन्धा या खाद्य की कमी को दूर किया जा सकता है।

घरेलू उद्यानों में खर्च की लागत भी नहीं आती। सिंचाई भी श्रमसाध्य नहीं होती और आसपास का कूड़ा-करकट खाद का काम कर देता है। प्रत्येक फसल में बीज के लिये एक दो फल छोड़ रखे जायँ तो उसकी भी परेशानी नहीं रहती। धनिया, मेथी, अरुई, गोभी, बैंगन टमाटर आदि प्रत्येक व्यक्ति घर के आस-पास बड़ी आसानी से उगा सकते हैं। मनोरंजन, स्वास्थ्य, वातावरण की सुन्दरता, शुद्ध वायु आदि सभी दृष्टियों से इस में लाभ ही लाभ है।

शहरों में जहाँ स्थान की नितान्त कमी होती है वहाँ भी गमलों में सुन्दर-सुन्दर फूल उगाकर रखे जा सकते हैं। कुछ हलकी सब्जियाँ तथा तुलसी के पौधे वहाँ भी उगाकर वायु-शुद्धि, कड़ी धूप, लू तथा ठंडक से बचाव के लिये वायु-अवरोधक के रूप में लाभ उठाया जा सकता है।

आध्यात्मिक, धार्मिक, आर्थिक तथा नैतिक सभी दृष्टियों से बागवानी करना सभी के लिये अति लाभदायक है। लोग इसे शौक में, सहायक व्यवसाय या प्रमुख व्यवसाय के रूप में भी अपना सकते हैं इसमें व्यक्तिगत, समाज और राष्ट्र सभी का भला है।

अपनों से अपनी बात—


हमारा छटनी-कार्यक्रम और उसका प्रयोजन

गत अंक में “हमारे और आपके सम्बन्ध क्या हों?” शीर्षक हमारा लेख पढ़कर पाठकों में से कितनों ने ही कई प्रकार की भावनाएं एवं जिज्ञासाएँ प्रकट की हैं। जिनने वियोगजन्य दुख प्रकट किया है, उनकी आत्मीयता एवं ममता की गहराई को हम समझते हैं। मिलने पर हर्ष और वियोग में दुख होना, प्रेम की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। हम लोग विगत 27 वर्षों से भावनात्मक दृष्टि से एक घनिष्ठ आत्मीयता के बंधनों में बंधे चले आ रहे हैं। विचारों की एकता—अन्य सब प्रकार की एकताओं में अधिक तथ्यपूर्ण एवं चिरस्थायी होती है। उच्च आदर्शों की ओर उत्कृष्टता के पथ पर हम लोग साथी सहचर की तरह एक लम्बी अवधि से साथ-साथ चलते चले आ रहे हैं। इस मंजिल में समय-समय पर एक दूसरे का यथासम्भव सहयोग एवं साहाय्य भी करते रहते हैं। सज्जनों की मित्रता स्वभावतः दिन-दिन अधिक घनिष्ठ ही होती जाती है। हम लोग इस अवधि में—अंश-वंश आधार पर बने हुए कुटुम्बों से भी अधिक सच्चे और समीपवर्त्ती हो गये हैं। ऐसी दशा में वह लम्बी अवधि से चला आ रहा पारस्परिक मिलन क्रम जब टूटने को हो तो व्यथा-वेदना का होना स्वाभाविक ही है। इस संदर्भ से हमारा मन भी परिजनों की तरह ही भारी है। ममता से हमारा अन्तस् आर्द्र हो उठता है।

हमारी जीवन प्रक्रिया पवित्र कर्तव्यों के बंधनों में बँधी चली आ रही है। जब से होश सँभाला तभी से मार्ग-दर्शक शक्ति हमें छोटे बच्चे की तरह उंगली पकड़ कर चलाती चली आ रही है। अब जब कि आयुष्य का अवस्थान काल आ पहुँचा, उंगली छुड़ाने की अपनी कोई इच्छा नहीं है। शेष थोड़ा-सा समय भी उसी तरह पूरा करना होगा जिस तरह कि अब तक का सारा समय पूरा कर लिया। इस लिये उस महान प्रकाश का अनुमान करना ही हमारे लिये एकमात्र रास्ता है। परिजनों की हमारी व्यथा-वेदना भावुकता पर आधारित हो सकती है पर उस महान् प्रकाश का निर्देश हम सबके परम कल्याण के लिए ही है, यह सोचकर खिन्न या प्रसन्न मन से निर्धारित विधि व्यवस्था को शिरोधार्य करना ही होगा।

संसार छोड़कर एकान्त में अपनी मुक्ति आदि के लिए भजन ध्यान करते रहने में हमारी तनिक भी आस्था नहीं है। न हमारे मार्ग-दर्शक ही आज जैसे जलते हुए संध्याकाल में ऐसी गतिविधि अपनाने पर विश्वास करते हैं। फिर भी हमें उस तरह की क्रिया पद्धति अपनानी होगी, शेष जीवन कठोर एकान्त तपश्चर्या में लगाना होगा। इस विसंगति से आश्चर्य लग सकता है पर तथ्य यह है कि वह एकान्त सेवन या तप साधन भी व्यक्तिगत स्वर्ग मुक्ति के लिए नहीं—अधिक लोककल्याण कर सकने के लिये अधिक सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए है। आत्मबल संसार का सबसे बड़ा, सबसे महत्वपूर्ण बल है। युग परिवर्तन जैसे महान कार्यों के लिए व्यक्तियों में, वातावरण में जिस प्रचण्ड शक्ति का संचार आवश्यक है, उसका उत्पादन किसी बड़ी योजनाबद्ध तपश्चर्या से ही सम्भव है।

स्वराज्य आन्दोलन की सफलता का श्रेय यों राजनैतिक नेताओं को मिला है, पर जो सूक्ष्म विज्ञान को जानते हैं उन्हें विदित है कि इसमें योगीराज अरविन्द, महर्षि रमण आदि की प्रचण्ड तपश्चर्या ही प्रधान आधार थी। अगले दिनों भारत को युग-परिवर्तन की महान भूमिका प्रस्तुत करनी है। इस देश का भावनात्मक कायाकल्प ही नहीं— समस्त संसार का मार्ग-दर्शन भी भारत भूमि को ही करना है। इस अमृत वर्षा के लिए जो घनघोर घटाएं उठाई जानी हैं, उनको उपयुक्त व्यक्तियों की ग्रीष्म ऋतु जैसी प्रचंड तपश्चर्या की अनिवार्य आवश्यकता है। हमें यदि इसके लिए उस शक्ति ने उपयुक्त माना है तो इसे अनुपम सौभाग्य के अतिरिक्त और क्या माना जा सकता है। इसके लिए तत्वतः हम सबको गर्व और आनन्द ही अनुभव करना चाहिए।

पाँच वर्ष बाद हम शरीर से ही परिजनों से दूर होंगे, आत्मा से नहीं। तपश्चर्या से आत्मा की शक्ति अनेक गुनी बढ़ जाती है। परिजनों को जो प्रेम एवं सहयोग शरीर से निकट होते हुए भी हम अभी तक नहीं दे सके वह पीछे कर सकेंगे और अपने इस परिवार का जो भावनात्मक ऋण है, उसे अधिक बहुमूल्य प्रत्युपकार करके चुका सकेंगे, इस तथ्य का स्मरण करके हम अपना चित्त हलका कर लेते हैं। जब जन्म-जन्मान्तरों तक सच्ची आत्मीयता स्थिर रह सकती है तो हमें तो अभी जीवित भी रहना है, तब उस ममता को तोड़ कैसे देंगे? जिनके मन में हमारे प्रति सच्ची भावना है, वे विश्वास रखें पाँच वर्ष बाद हमें आज की अपेक्षा भी अपने अधिक समीप अनुभव करते रहेंगे। हम न तो निर्मोही हैं और न कृतघ्न। प्यार का प्रतिदान प्यार में चुकाने की परम्परा को हम जन्म-जन्मान्तरों से अपनाये हुए हैं इसे परित्याग कर सकना तब तक हमारे लिए सम्भव नहीं, जब तक कि हमारे अस्तित्व का एक कण भी कहीं-किसी रूप से इस संसार में विद्यमान रहेगा।

हमारा इस जीवन का कार्यक्रम दो भागों में विभक्त हैं। पूर्वार्ध पूरा हो चला उत्तरार्ध आरम्भ होने वाला है। पिछले दिनों प्रचारात्मक कार्य बहुत हुआ है। भारतीय संस्कृति की जननी गायत्री माता और भारतीय धर्म के जनक यज्ञ पिता के ज्ञान-विज्ञान को भारत ही नहीं संसार के कौने-कौने में क्रमबद्ध रूप से प्रचारित किया है और उसमें आशातीत- आश्चर्यजनक —सफलता भी मिली है। 24 लाख व्यक्तियों को गायत्री उपासना में लगा देना, 24000 कुण्डों में गायत्री यज्ञ की 24 अरब आहुतियों का आयोजन, मथुरा में एक हजार कुण्डों का इस युग का अनुपम यज्ञ, गायत्री तपोभूमि की स्थापना, चारों वेदों का भाष्य तथा प्रसार, 108 उपनिषदों, छहों दर्शन 20 स्मृतियों और अब 18 पुराणों का भाष्य, युगनिर्माण योजना का बीजारोपण आदि अनेकों ऐसे कार्य हैं जिनके सम्बन्ध में सर्वसाधारण को बहुत कुछ जानकारी है। ऐसे भी बहुत कार्य हुए हैं जिनकी न तो किसी को जानकारी है और न उन्हें जानने की किसी को आवश्यकता ही है। इतने थोड़े दिनों में—अपने नगण्य व्यक्तित्व के द्वारा—इतने महान कार्य सम्पन्न हो सके इसके मूल में आरम्भिक जीवन के 24 वर्षों के गायत्री पुरश्चरणों की शक्ति ही एकमात्र निमित्त थी। यदि वह तपश्चर्या न हुई होती तो निश्चय ही हमारे जैसा अयोग्य व्यक्ति उपरोक्त अद्भुत कार्यों में से एक को भी ठीक तरह पूरा न कर सका होता। महता व्यक्ति की नहीं शक्ति की है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि इस संसार में सब से बढ़कर यदि कोई शक्ति हो सकती है तो वह तपश्चर्या से उत्पन्न हो सकने वाली आत्म-शक्ति ही है।

अब हमारे जीवन का उत्तरार्ध-पाँच वर्ष बाद आरम्भ होता है। उसमें आँखों से दिखाई देने वाले—कानों से सुनाई पड़ने वाले स्थूल कार्य न होंगे वरन् सूक्ष्म जगत् में हमारी क्रिया पद्धति का आरम्भ होगा। विश्व में जो आज भावनात्मक दुर्भिक्ष फैला हुआ है उसे निवारण करने के लिए बड़ी सृजनात्मक योजना बन रही है। राजा सगर के नरकगामी 60 हजार पुत्रों का उद्धार करने के लिए भागीरथ को तप करके गंगावतरण का महान अनुष्ठान करना पड़ा है। विश्व-मानवों की श्रेय साधना के लिए भी शक्तिशाली आत्माएँ एक ऐसा ही एक महान् अनुष्ठान आरम्भ कर रही हैं। सूक्ष्म जगत के वर्तमान स्वरूप को बदल देने के लिये ऐसे ही आयोजन सृष्टि के इतिहास में समय-समय पर होते आये हैं। इस बार भी ऐसी ही व्यवस्था सामर्थ्यवान् प्रकाश-पुञ्जों द्वारा की गई है। उसमें भाग लेने का अवसर हम जैसे अकिंचन व्यक्ति को भी मिल रहा है। हमारी भावी तपश्चर्या इसी निमित्त से है। विश्व के नवनिर्माण में यह भूमिका अपना महत्वपूर्ण योगदान करेगी।

युग-परिवर्तन आन्दोलन का इन दिनों सूत्रपात हुआ है। इसे बीजारोपण ही कहना चाहिये। इस फसल को लहलहाने और पकने में अभी समय लगेगा। अभी जो बीज बोये जा रहे हैं वे सन् 2000 में—आज से 34 वर्ष बाद—पुष्पित एवं फलित होंगे। तब सब कुछ बदला हुआ होगा। अखण्ड ज्योति के किशोर पाठक नोट करके रख लें कि 34 वर्ष के बाद की दुनिया आज की तुलना में लगभग हर दृष्टि से बदली हुई होगी। उस समय युगपरिवर्तन के दृश्य खुली आँखों से देखे जा सकेंगे, अभी तो सूक्ष्म जगत में उनका बीजारोपण मात्र हो रहा है।

भारत में राजनैतिक स्वराज्य आन्दोलन अपने बीजारोपण के दिन से लेकर 50 वर्ष में फलित हुआ था। युगनिर्माण आन्दोलन का श्रीगणेश सहस्रकुण्डी गायत्री यज्ञ के साथ किया गया था, वह 40 वर्ष में सन् 2000 के लगभग फलित होगा। तब तक अनेक हजारों लाखों प्रबुद्ध व्यक्ति अपने-अपने ढंग से इस आन्दोलन को सींचते, रहेंगे और बढ़ाते रहेंगे, समय आने पर वह विशाल वृक्ष के रूप में परिणित हो जायगा। यह महाअभियान न तो अधूरा रह सकता है और न असफल हो सकता है। युगनिर्माण आन्दोलन की परिपूर्ण सफलता अपने समय पर पूर्ण सुनिश्चित है।

अगले 34 वर्ष काफी कष्ट के हैं। प्रसव पीड़ा की तरह सभी को बड़ी आपत्तियाँ उठानी पड़ेंगी। महंगाई, अनावृष्टि, बीमारियाँ, दुर्घटनाएं, आन्तरिक कलह आदि विविध विधि विग्रह उपद्रव सामने आते रहेंगे और उनसे जनसाधारण को नित नई मुसीबतें सहनी पड़ती रहेंगी। दुष्टता भरे दुष्कर्म बढ़ते रहेंगे, फलस्वरूप आतंक, अनाचार के दुखद दुष्परिणाम सामने आते रहेंगे। इसी बीच एक महायुद्ध भी होगा, जिसकी लपेट में सारा संसार आ जायेगा। वर्तमान जनसंख्या का बहुत बड़ा भाग इन्हीं विपत्तियों में नष्ट हो जायगा। इन विपत्तियों की चोटें खाकर घायल जनता धर्म और ईश्वर का अवलम्बन पकड़ेगी। यह क्रम अगले थोड़े ही दिनों में पूरा हो जायगा और विपत्ति के गर्भ में से सम्पत्ति का उदय होगा। यह पुण्य प्रक्रिया ठीक तरह पूरी हो सके इसके लिए भागीरथ-तप की पुनरावृत्ति पुनः आवश्यक हो गई है। इस महत्वपूर्ण कार्य में यदि अपना उपयोग हो रहा है तो वियोग जन्य व्यथा को सहते हुए भी हमें उसके लिए सहर्ष उद्यत होना ही होगा।

भारत की समृद्धि वहाँ के अध्यात्म-विज्ञान पर निर्भर रही है। आज भौतिक विज्ञान की उपलब्धियों ने पाश्चात्य देशों को समर्थ और समृद्ध बनाया है, प्राचीन काल में भौतिक-विज्ञान की तुलना में सहस्रों गुने अधिक शक्तिशाली अध्यात्म-विज्ञान के पारंगत हमारे ऋषि-मुनि थे। इसी बल पर यह भारत भूमि स्वर्गादपि गरीयसी बनी हुई थी और यहाँ का हर नागरिक संसारवासियों की दृष्टि में एक देवता गिना जाता था। दुर्भाग्य से वह महान् विज्ञान आज लुप्त हो गया है और हम मणिहीन सर्प की तरह निस्तेज बने दुर्दशा ग्रसित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। पुनरुत्थान की अगली मंगल बेला से हमें उस शक्तिशाली अध्यात्म-विज्ञान की भी आवश्यकता पड़ेगी, जिसके बल पर हमारे पूर्वज उन्नति के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे थे। यह शोध कार्य एकान्त तपश्चर्याओं द्वारा ही संभव होगा। उन खोए हुए दिव्य रहस्यों को पुनः उपलब्ध करने के लिए इसी कठिन मार्ग को अपनाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।

पाँच वर्ष बाद का हमारा कार्यक्रम इन्हीं सूक्ष्म प्रयोजनों की पूर्ति के लिए निर्धारित है। पूर्वार्ध का लक्ष्य अब पूरा होने जा रहा है। प्रचारात्मक-स्थूल जगत का क्रिया−कलाप अब हम समेट लेंगे और मजबूत हाथों तथा कन्धों पर उस परम्परा को सौंप देंगे। अगले दिन हमें इसी उधेड़ बुन तथा व्यवस्था में लगाने हैं। कार्यों को बढ़ाना नहीं, समेटना है। जो कार्य आरम्भ किया गया है,उसे व्यवस्थित रूप से चलते रहने की व्यवस्था बनानी है भले ही वह थोड़ी या सीमित क्यों न हो। इसी संदर्भ में यह उचित प्रतीत हुआ कि काम के उपयुक्त व्यक्ति ही अगले दिनों हमारे साथी सहचर के रूप में रह जायें। अनावश्यक भीड़ छँट जाय। छटनी की दृष्टि से ही गत अंक में दो बन्दिशें छापी गई हैं। एक घण्टा समय जो दिया करें और डेढ़ छटाँक आटे की कीमत दस नया पैसा रोज नव निर्माण के लिए खर्च किया करें वही अपना सहचर माना जायगा। यह शर्त यद्यपि भावनाशील व्यक्तियों के लिए अतीव सरल है तो भी जिनका भावनात्मक स्तर दुर्बल होगा उन्हें यह भी असह्य भार लगेगा और वे इतनी छोटी कसौटी को देखकर भी भाग खड़े होंगे। इस प्रकार छटनी का हमारा उद्देश्य सहज ही पूरा हो जायगा। सीमित व्यक्तियों पर अधिक ध्यान दे सकना इसी प्रकार सम्भव होगा। आज तो भावनात्मक दृष्टि से खोटे और ओछे व्यक्ति भी अपने निजी लाभ को दृष्टि से हमें घेरे रहते हैं। अधिक भीड़ उन्हीं की रहती है। यह भीड़ छट जाने से जो शक्ति बचेगी उसे सीमित क्षेत्र में अधिक सावधानी से लगाया जा सकेगा और उसका लाभ भी बहुत होगा।

जहाँ सर्वत्र परिवार को बढ़ाने की धूम है वहाँ इस प्रकार की छटनी आश्चर्यजनक लग सकती है। पर थोड़ा विचार करने पर प्रतीत होगा कि उससे हानि कुछ नहीं लाभ ही है। इसी दृष्टि से हमने अपने सभी प्रबुद्ध परिजनों से अनुरोध किया है कि वे इस छटनी के कार्य को जल्दी पूरा करा देने में हमारी सहायता करें। जिन लोगों का अपने परिवार से अब सम्बन्ध है या कभी रहा है, उन सब को गत जुलाई और इस अगस्त के अंक में छापी जा रही इस प्रक्रिया का परिचय करा दिया जाना चाहिये। कई परिजन आलस्य या ढीलपोल में सम्भवतः इस ओर ध्यान न दे सके होंगे। कई की अखण्ड ज्योति बन्द हो गई होगी। कई इन लेखों का अभिप्राय ठीक तरह समझ न सके होंगे। इन सभी तक हमारी यह वर्तमान विचारणा ठीक तरह—ठीक समय पर—पहुँच जाय इसके लिए यह आवश्यक है कि हर जगह कुछ प्रबुद्ध व्यक्ति उठ खड़े हों और अखण्ड-ज्योति के भूतपूर्व एवं वर्तमान सदस्यों को इस विधि व्यवस्था का ठीक तरह परिचय करा दें। जिन लोगों ने अभी तक जुलाई मास में संलग्न फार्म न भरा हो, उनसे भविष्य में सदस्य रहने न रहने की सूचना उस फार्म द्वारा भिजवा दें। इस महीने का यह एक आवश्यक कार्य है। प्रबुद्ध परिजन—सक्रिय कार्यकर्ता-अकेले, या टोली बनाकर या मीटिंग बुलाकर स्थानीय तथा आसपास के सदस्यों का इस सम्बन्ध में निर्णय लेने और भिजवाने का प्रबन्ध कर दें तो हमारी दृष्टि से यह एक सामयिक एवं सराहनीय सहयोग होगा।

इस छटनी के पीछे एक रहस्यपूर्ण प्रयोजन और भी है जिसकी चर्चा हमने अज्ञातवास से लौटते ही कर दी थी। वह यह कि युग निर्माण का प्रयोजन साधारण मनोभूमि के घटिया, स्वार्थी, ओछे, कायर और कमजोर प्रकृति के लोग न कर सकेंगे। इसके लिए समर्थ, तेजस्वी आत्मायें अवतरित होंगी और वे ही इस कार्य को पूरा करेंगी। सीमेंट, लोहे का लेन्टर डालकर छत्ते पाटी जाती हैं तो उसका वजन उठाने के लिए बाँस-बल्ली का ढाँचा खड़ा कर लेते हैं, छत डालते समय वजन वही उठाता है, पीछे जब छत पक जाती है तब उस ढाँचे को निकाल कर अलग कर देते हैं। युग परिवर्तन का महान कार्य तेजस्वी, मनस्वी एवं तपस्वी आत्माओं द्वारा सम्भव होगा। हम लोग जो तनिक-सा त्याग, बलिदान का प्रसंग आ जाने पर बगलें झाँकने लग जाते हैं, उतने बड़े कार्य को कर सकने के योग्य नहीं। जिस मिट्टी से हम बने हैं रेतीली और कमजोर है कोई टिकाऊ चीज उससे कैसे बन सकती है। जो एक-दो माला जप करने मात्र से तीनों लोक की ऋद्धि-सिद्धियाँ लूटने की आशा लगाये बैठे रहते हैं और जीवन-शोधन तथा परमार्थ की बात सुनते ही काठ हो जाते हैं ऐसे ओछे आदमी अध्यात्म का क, ख, ग, घ, भी नहीं जानते। आत्मबल तो उनके पास होगा ही कहाँ से। जिसके पास आत्मबल नहीं वह युग-परिवर्तन की भूमिका में कोई कहने लायक योगदान दे भी कहाँ से सकेगा? इस तथ्य से हम भली प्रकार अवगत हैं। अपनों की नसनब्ज हमें भली प्रकार मालूम है। इसलिए उनसे इतनी ही आशा करते हैं कि छत का लेन्टर बनाने से बाँस-बल्ली की तरह थोड़ी देर अपना उपयोग कर लेने दें तो बाँस बहुत हैं। छत तो सीमेंट, कंक्रीट, लोहे की छड़ आदि के योग से बनेगी और उसे कुशल कारीगर बनावेंगे। बाँस-बल्ली का ढाँचा तो मामूली मजदूर भी बाँध देता है पर लेन्टर को बढ़िया कारीगर इंजीनियर ही ठीक तरह डाल सकते हैं। हम युग-निर्माण योजना के विशाल भवन का ढाँचा खड़ा करने वाले मामूली से मजदूर मात्र हैं। परिजन जिस मिट्टी से बने हैं उसे देखते हुए उन्हें भी हम बाँस-बल्ली मात्र ही मानते हैं। थोड़ा-सा वजन पड़ने पर जो लचक जाय, जरासी परख का अवसर आये तो दाँत निकाल दें, ऐसे लुँजपुँज व्यक्ति युग-परिवर्तन जैसी कठोर प्रक्रिया को कैसे पूरा करेंगे? जिसमें निज की कड़क नहीं वह वजन कैसे उठावेगा ?

भारतीय महान गौरव एवं वर्चस्व को पुनः अपने स्थान पर प्रतिष्ठापित करने के लिए अगले दिनों विभिन्न क्षेत्रों में काम करने वाली आत्माएं आवश्यक संख्या में इस देश में अवतरित होंगी। व्यास, वशिष्ठ, भारद्वाज, याज्ञवल्क्य, कपिल, कणाद, विश्वामित्र, दधीच जैसे ऋषि, भीम, अर्जुन, हनुमान, अंगद, जैसे योद्धा, नागार्जुन, रावण, जैसे वैज्ञानिक गाँधी, तिलक, मालवीय, लाजपतराय जैसे नेता, शिवाजी, प्रताप, गोविन्दसिंह, जैसे देशभक्त अरविन्द, विवेकानन्द, रामतीर्थ जैसे ज्ञानी, चरक, सुश्रुत, वागभट्ट जैसे चिकित्सक, सीता, सावित्री, अरुन्धती, अनुसूया, गाँधारी, द्रौपदी, लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई जैसी नारियाँ अगले दिनों अवतरित होंगी। जब कभी भी युग-परिवर्तन के समय आये हैं तब इस महान प्रयोजन को पूरा कर सकने में समर्थ आत्माओं का भी अवतरण हुआ है। अब भी वही होने जा रहा है।

ऐसी आत्माएं जब अवतरित होती हैं जब अपने योग्य वातावरण ढूँढ़ती हैं। मधुमक्खियाँ और भौंरे पुष्प कुञ्जों के आधार पर ही जीवित रहते हैं,मछली को जलाशय चाहिए, यह परिस्थितियाँ न मिलें तो वे जीवित न रहेंगे। महान आत्माएं केवल अच्छे पारिवारिक वातावरण में जन्मती हैं। यदि प्रारब्धवश किसी अनुपयुक्त परिवार में जन्म लेती हैं तो अल्पायु में ही चली जाती हैं। दशरथ और कौशल्या ने भगवान राम को अपनी गोद में खिलाने के लिये तीन जन्मों तक लगातार तप किया था, तब उन दोनों का गुण-कर्म स्वभाव ऐसा बना था कि उसमें उच्च आत्माओं का अवतरण सम्भव हो सके। धन ऐश्वर्य भले ही न हो, गरीबी कितनी ही क्यों न हो,पर भावनात्मक दृष्टि से जहाँ का वातावरण उपयुक्त हैं,वहीं दिव्य आत्माओं का जन्म ले सकना सम्भव होगा। गिद्ध और सियार मृत लाश की गंध पाकर दूर-दूर से इकट्ठे हो जाते हैं इसी प्रकार परिष्कृत पारिवारिक वातावरण की तलाश में दिव्य आत्माएं घूमती रहती हैं और जब उपयुक्त स्थान मिल जाता है तो वे प्रसन्नतापूर्वक वहाँ जन्मती हैं। कहना न होगा कि जिन घरों में ऐसी उच्च आत्माएं जन्में उसके यश, गौरव, महत्व एवं आनन्द का बार-पार नहीं रहता।

अगले दिनों जो दिव्य आत्माएं युगनिर्माण का महान-आयोजन पूरा करने लिए अवतरित होने वाली हैं उन्हें अपने उपयुक्त परिस्थितियों की आवश्यकता पड़ेगी। इस आवश्यकता की पूर्ति हमें करनी चाहिए जिसमें कोई ऊँची जीवात्मा आवे तो वह घुटन अनुभव न करे। जिससे उसे अपने अनुकूल भावात्मक वातावरण मिल सके। जहाँ ऐसा वातावरण बन जायगा, वहाँ फिर इस बात की भी व्यवस्था हो सकती है कि वहाँ कोई महान् विभूति जन्म ले।

यह समाज सेवा का भी एक ठोस तरीका है। घर के सदस्य सुसंस्कृत हों, भावात्मक दृष्टि से परिष्कृत हों तो उस घर के लोगों को ही नहीं,समस्त समाज को उल्लास मिलेगा। परिवारों से मिलकर ही समाज बनता है। यदि परिवार की इकाइयाँ ठीक होंगी तो उनका समूह-समाज भी प्रगति एवं समृद्धि से भरा-पूरा होगा। उस घर के सभी सदस्य प्रेम, सद्भाव, वैभव यश एवं आनन्द का स्वर्गीय सुख लाभ कर रहे होंगे। इसके अतिरिक्त ऐसे वातावरण में दिव्य आत्माओं के अवतरण की भी पूरी-पूरी सम्भावना रहेगी। परिवार निर्माण एक पवित्र कर्तव्य का पालन तो है ही।

षोडश संस्कारों को पुनर्जीवित करने के लिए जो युग-निर्माण योजना द्वारा बहुत अधिक जोर दिया जा रहा है उसके पीछे लोक-शिक्षण ही नहीं यह भी एक महत्वपूर्ण रहस्य है कि आगामी वर्षों में इस अध्यात्म विज्ञान-सम्मत प्रक्रिया द्वारा जनसाधारण के अन्तरंग में समाये हुए कुसंस्कारों का शमन-समाधान किया जा सके और उसके स्थान पर सुसंस्कारों की प्रतिष्ठापना हो सके। जन्मदिन और विवाह दिन मनाने का प्रचलन करने में जहाँ जीवन का महत्व समझने,जो समय शेष है उसका सदुपयोग करने दांपत्ति-जीवन में श्रद्धा सद्भावना प्रेम और सोमनस का बीजारोपण करना एक सामान्य अभिप्राय है, वहाँ रहस्यपूर्ण प्रयोजन यह भी है कि पति-पत्नी के शरीरों में इन संस्कारों द्वारा ऐसे सूक्ष्म तत्व विकसित हों जो भावी संतान को प्रबुद्ध बनाने में सहायक हो सकें।

सुसंतति प्राप्त करने के लिए प्राचीनकाल में अगणित व्यक्तियों के,दीर्घकालीन कठोर तप करने वाले पति-पत्नियों के अनेकों प्रमाण हमारे प्राचीन पुराण साहित्य में मिलते हैं। उतना न बन पड़े तो भी कम से कम इतना तो आज भी करना होगा जितना कि हमने अपने पाठकों को सुझाया है। घर के वातावरण में उत्कृष्ट विचारधारा का संचार हर दृष्टि से आवश्यक है, इसके लिए हर विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह थोड़ा बहुत श्रम करे, कष्ट सहे और त्याग करे। प्रस्तुत सुझाव और कार्यक्रम इसी दृष्टि से हैं। हमें हर प्रबुद्ध व्यक्ति से आशा करनी चाहिए कि वह पैसा कमाने, शरीर चर्चा और शौक-मौज में ही सारी शक्ति खर्च न करदें वरन् परिवार निर्माण जैसे अत्यन्त आवश्यक कर्तव्यों के लिए भी कुछ न कुछ प्रयास आरम्भ करें। समाज सेवा, परोपकार, पुण्य-धर्म यदि बाहर के लोगों के साथ नहीं बन पड़ता तो कम से कम परिवार के क्षेत्र में तो इन प्रक्रियाओं का प्रयोग करना ही चाहिए। बाहर के लोगों की सेवा करने में अपना कुछ लाभ न दीखे यह हो सकता है। पर अपनी और अपने परिवार की सुख-शान्ति, प्रगति और समृद्धि के लिए इतना तो करना चाहिए कि उत्कृष्ट विचारों की पृष्ठभूमि तैयार की जाय और उसके लिए एक घंटा समय नियमित रूप से लगाया जाय। अभ्यास होने पर यह कार्य भी ताश खेलने की तरह मनोरंजक और हलका-फुलका लगने लगेगा। कठिनाई तभी तक दीखेगी जब तक उसे आरम्भ नहीं किया जाता।

इन सब बातों को ध्यान में रखकर युग-निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रमों में से परिवार निर्माण के कार्य को हमने अपने प्रिय परिजनों के लिए एक प्रकार से अनिवार्य कर दिया है। प्रस्तुत योजना के एक घंटा रोज नवनिर्माण के लिये देने का कहा गया है। यह परिवार निर्माण के लिये लगाया जाना चाहिए। पत्नी, पुत्र, पुत्रियाँ ,माता, पिता, भाई, बहिन, भाभी, नानी, भतीजे, भतीजी आदि से भरे-पूरे घरों में शाम को एक घंटा कथा-कहानी कहने में—नवनिर्माण का साहित्य सुनाने में लगाया जाना चाहिए। घर में जो भी पढ़ा-लिखा हो उसे जीवन जीने की कला का ज्ञान कराने वाली पुस्तकें पढ़ने के लिए देनी चाहिए। इनमें रुचि न हो तो आग्रह और अनुरोधपूर्वक रुचि उत्पन्न करनी चाहिए। जो पढ़े न हों उन्हें सुनाने के लिए एक घंटा समय देना उनका और अपना दोनों का बढ़िया मनोरंजन करना है। इस प्रक्रिया को यदि लगातार उपनाए रहा जाये तो कुछ ही दिन में आश्चर्यजनक परिणाम उपस्थित होगा। हमारे विचारों में व्यक्ति, प्रकाश, प्रेरणा और वास्तविकता की प्रचुर मात्रा भरी पड़ी है, उनके संपर्क में जो भी आया है, बदले बिना—मुड़े बिना नहीं रहा। जो व्यक्ति अपने परिवार को इन विचारों के संपर्क में रख रहे होंगे, वे परिवार-निर्माण का एक ऐसा महत्वपूर्ण सेवा कार्य कर रहे होंगे जो उनके निज के लिए परिवार-सदस्यों के लिए,समस्त समाज एवं विश्व के लिए महान उपयोगी सिद्ध होगा।

परिवार प्रशिक्षण प्रत्येक गृहपति का आवश्यक धर्म-कर्तव्य है। उसकी उपेक्षा करना अपने लोक और परलोक को बिगाड़ना है। हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य इसे निबाहने में तत्परता प्रकट करें। उनके इस कार्य में हम भी पूरा-पूरा सहयोग देंगे। अगले 5 वर्ष तक हम अत्यन्त सस्ता किन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण साहित्य छोटे-छोटे ट्रैक्टों के रूप में लिखेंगे। 10 नया पैसा प्रतिदिन इसी साहित्य को खरीदने के लिए बचाने का अनुरोध किया गया है। यह पैसे किसी बाहर के व्यक्ति को दान नहीं करने हैं वरन् अपने ही घर में सत्साहित्य के रूप में घरेलू पुस्तकालय के लिए प्रयुक्त करने हैं। इस साहित्य का लाभ पड़ोसी, मित्र, रिश्तेदार, स्वजन, संबंधी परिचित अपरिचित उठाते रहेंगे तो कितनों का ही भला होगा। यह सद्ज्ञान सम्पत्ति अपने उत्तराधिकारियों के लिए हीरे,मोती से भरी तिजोरी से भी अधिक कीमती धरोहर के रूप में छोड़ी जा सकती है। अगले 100 वर्ष तक—चार-पाँच पीढ़ियों तक—हमारा शिक्षण कार्य उस परिवार में चलता रहे तो इससे बढ़कर और कोई स्मारक हमारा नहीं हो सकता।

एक घन्टा—दस पैसा—वाला कार्यक्रम अनेक दृष्टियों से अत्यधिक महत्वपूर्ण है। पर जिन्हें क्षणिक स्वार्थों का तो ध्यान है, पर कर्तव्य का नहीं, उनके लिए इतनी छोटी बात भी—कष्ट-साध्य ही नहीं, असम्भव जैसी लगेगी। ऐसे लोगों को हमारा साथी या सहचर बनने का व्यर्थ दिखावा नहीं करना चाहिए। हम व्यक्ति नहीं विचार हैं। जो हमारे व्यक्तित्व तक ही अपना सम्बन्ध रखना चाहते हैं, विचारों का तिरस्कार करते हैं उन्हें हमारा साथ छोड़ देना चाहिए। इसके लिए आज का दिन ही सब से उपयुक्त है। ‘छटनी’ योजना अनावश्यक जंजाल सिर से हटा देने के लिए बनाई है ताकि हलके होकर अधिक वास्तविक रूप से अधिक अच्छी तरह अपना सामयिक कर्तव्य-पालन कर सकें।

अभिमन्यु को गर्भावस्था में युद्ध विद्या ‘चक्रव्यूह वेधन’ का ज्ञान मिला था। इसका अर्थ यह नहीं है कि एक दिन या एक घन्टे में अर्जुन ने सुभद्रा को सब कुछ बता दिया होगा और अभिमन्यु ने उतनी ही देर में सब कुछ सीख लिया होगा। मस्तिष्क और अन्तःकरण का प्रशिक्षण श्रम-साध्य और समय साध्य है। उसके लिए लगातार बहुत दिनों तक प्रयत्न करना होता है। सच तो यह है कि माता-पिता को वह सब कुछ अपने मस्तिष्क और अन्तःकरण में गहराई तक धारण करना होता है जो बच्चों में उतारना है। इसलिए यह शिक्षा-क्रम हर परिवार में निरन्तर जारी रहना चाहिए। प्राचीनकाल में ऐसी ही व्यवस्था थी। अब हमें नव-निर्माण के लिए उसी आवश्यकता की पूर्ति करनी है।

जिन व्यक्तियों के साथ हमने पिछले 27 वर्ष व्यतीत किये उन्हें, उनके परिवारों को जैसी की तैसी स्थिति में छोड़कर चले जाना हमारे लिए लज्जा और कलंक की बात होगी। किसी भी सामयिक कठिनाई में कुछ आत्मिक या भौतिक सहायता कर देने से तत्काल थोड़ी देर तक कष्ट मुक्त कर सकता है पर सुख शान्ति की स्थायी आधार शिला तो सद्विचारों और सत्कर्मों पर की जाती है। इस प्रक्रिया में यदि हम स्वजनों को न लगा सके तो उनका जीवनोद्देश्य और किसी प्रकार भी सफल नहीं हो सकता। कड़ुई दवा खाये बिना कष्टसाध्य रोग कैसे दूर हो? एक-दो माला घुमा देने से समस्त समस्याओं का हल ढूँढ़ने की आशा करने वाले मिथ्या कल्पना से भरे मूर्खों के स्वर्ग में उड़ते हैं। सुख-शान्ति का उपार्जन कठोर कर्तव्यों का पालन करने की रचनात्मक गतिविधियाँ अपनाने से ही सम्भव होता है। सच्ची साधना का यही मार्ग है। हम अपने प्रिय परिजनों को अब उपासना से आगे बढ़ाकर जीवन-साधना के क्षेत्र में संलग्न करना चाहते हैं ताकि वे आध्यात्मिकता के सच्चे और चिरस्थायी लाभों से लाभान्वित हो सके। अपने प्रियजनों को सुखी बनाने के लिए हर कुलपति प्रयत्न करता है, हम भी इसी दृष्टि से इन दिनों अपना प्रयत्न तीव्र कर रहे हैं। यदि कुछ ठोस लाभ दिये बिना हमें विदा होना पड़ा, तो अपने प्रिय परिवार के प्रति हमारा उत्तरदायित्व पूरा न हो सकेगा और उसकी लज्जा एवं वेदना हमें देर तक कष्ट देती रहेगी। इस व्यथा से छुटकारा पाने के लिए वर्तमान छटनी पर बहुत जोर दे रहे हैं। जो हमारी बात तो सुन सकते हैं पर बताये मार्ग पर चलने के लिए तनिक भी तैयार नहीं,उनके साथ उलझे रहने की अपेक्षा अब हमें ऐसे लोगों को साथ रखना है जो कुछ काम कर सकने लायक श्रद्धा और आत्मीयता हमारे प्रति उत्पन्न कर चुके हैं। अधिक न सही तो कम से कम इतनी सेवा हम अपने इन प्रिय परिजनों की करेंगे ही कि उनके वर्तमान परिवार सुसंस्कृत बनें और परिवार को तथा हमारे अन्तःकरण को प्रसन्नता प्रदान कर सकें।


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आश्विन नवरात्रि और साधना शिविर-

आश्विन की नवरात्रि ता. 15 अक्टूबर शनिवार से प्रारम्भ होकर ता. 23 अक्टूबर रविवार तक चलेगी। इन 9 दिनों में जिनसे बन पड़े 24 हजार गायत्री पुरश्चरण करना चाहिए। साधना की दृष्टि से नवरात्रि का समय बहुत ही महत्वपूर्ण है।

इन दिनों जो लोग गायत्री तपोभूमि में आना चाहें वे इस सिद्ध पीठ में रहकर अपनी साधना को विशेष फलवती बना सकते है। इन्हीं दिनों 9 दिन का एक छोटा शिविर भी होगा। जिसमें ज्येष्ठ शिविर में कही गई और सिखाई गई सभी महत्वपूर्ण बातें सिखा समझा दी जायेंगी। जिनका ज्येष्ठ शिविर में आना न हो सका वे इस अवसर पर आ सकते हैं। आने वालों को पहले से स्वीकृति प्राप्त कर लेनी चाहिए। बिना स्वीकृति के अन्य शिविरों की भाँति इस अवसर पर भी प्रवेश नहीं मिलेगा।


प्रतिज्ञा-पालन तत्काल आरम्भ किया जाय

जिन सज्जनों ने पाँच वर्ष तक हमारे विचार परिवार में नियमित रूप से सदस्य बने रहने का प्रतिज्ञा-पत्र भरा है, उन्हें उस प्रतिज्ञा को पूरी श्रद्धा और तत्परता के साथ निबाहना चाहिए। कई व्यक्ति कौतूहलवश फार्म भरने में बड़ा उत्साह दिखाते हैं और पीछे उसे निवाहते नहीं। यह बुरी बात है। पिछली कई बार ऐसे कितने ही सज्जनों के कटु अनुभव हमें है। इसलिए इस बार बहुत जोर देकर कहा जा रहा है कि जिनने प्रतिज्ञा-पत्र भेजा हो, वे उसे एक आवश्यक कर्तव्य समझें भली प्रकार स्मरण रखें और दैनिक जीवन में एक अनिवार्य नित्य-कर्म की तरह सम्मिलित रखें।

परिवार निर्माण पर पूरा ध्यान दिया जाना चाहिए। रात्रि का आमतौर से सभी को अवकाश रहता है। एक घंटा इसके लिए निर्धारित कर लेना चाहिए कि अमुक समय परिवार के लोगों को इकट्ठे करके उन्हें कुछ सुनाया करेंगे। यह भी हो सकता है कि एक-एक दिन बारी-बारी से यह सुनाने का काम घर के पढ़े-लिखे लोगों को क्रम बाँध कर सौंप दिया जाय। महिलाएं, लड़कियाँ, लड़के घरों में पढ़े-लिखे होते हैं, पढ़ने बोलने, समझने का अवसर मिले, इसलिए यह क्रम अधिक उपयुक्त है। दिन में भी जब जिसके पास अवकाश हो उस समय उन्हें नव-निर्माण का साहित्य पढ़ने की प्रेरणा करनी चाहिए। प्रयत्न यह होना चाहिए कि अपने घर का कोई भी व्यक्ति ऐसा न हो जो नव-निर्माण की विचारधारा का लाभ न उठा रहा हो। सुधरे हुये जीवन-क्रम को अपनाना युग-निर्माण कार्यक्रम का प्रधान अंग है और वर्तमान परिस्थिति में उसकी जानकारी का मुख्य उपाय जीवन निर्माण करने वाले सत्साहित्य का स्वाध्याय और प्रसार ही होना चाहिए।

सायंकाल की परिवार गोष्ठी में पढ़े हुए विषयों पर प्रश्नोत्तर एवं शंका समाधान का क्रम भी रखा जा सकता है। कोई कठिन प्रसंग हो तो बीच-बीच में उसकी व्याख्या करते चलना चाहिए ताकि विषय अच्छी समझ में आ जाय।

अपने मित्रों, पड़ौसियों, परिचितों और संबंधियों में से ऐसे लोगों के नाम नोट करने चाहिए जो विचारशील हों। इन नोट किये लोगों की लिस्ट जितनी बड़ी हो सके उतनी ही प्रसन्नता की बात है। इन लोगों से जब भी किसी प्रसंगवश मिलना-जुलना हो तब नई पुस्तकें देने और पुरानी वापिस लेने का सिलसिला भी जारी रखना चाहिए। जो पुस्तकें उन लोगों ने पढ़ी हैं उनके विषयों पर समयानुसार विचार-विनिमय भी करते रहना चाहिए। इस प्रकार घर में तथा संबंधित व्यक्तियों में ज्ञान प्रसार यज्ञ के लिए एक घंटा समय लगाने का सिलसिला तुरन्त जारी कर देना चाहिए। कभी आवश्यक कार्य हो तो बात दूसरी है अन्यथा घर में चलने वाली परिवार गोष्ठी का समय तो नियत ही रहना चाहिए। बाहर के लोगों से संपर्क बनाने में जब भी अवकाश हो तब सुविधानुसार यह ज्ञान प्रसार की प्रक्रिया की जा सकती है। समय दान प्रतिज्ञा का आवश्यक अंग है, उसे प्रतिज्ञापत्र भरने वाले तुरन्त आरम्भ कर दें।

अब तक 20 नया पैसा सीरीज के 70 ट्रैक्ट छप चुके हैं। इनका मूल्य 14 होता है। 15 प्रतिशत कमीशन घटाकर और पोस्टेज जोड़कर यह वी. पी. 14)20 की बैठेगी। प्रथम सत्र आरम्भ करने के लिए यह सैट मँगाने का आर्डर भेज देना चाहिए। जिनके पास जो ट्रैक्ट हैं वे उनके नाम लिख दें तो शेष वी. पी. कर दिये जायेंगे।

युग-निर्माण योजना मासिक का वर्ष जुलाई से आरम्भ होता है। अब वह मासिक छप रहा है और चन्दा 4) है। प्रतिज्ञापत्र भरने वाले उसे भी मंगाते रहें, चन्दा अभी न भेजा हो तो अब भेज दें। इस प्रकार दोनों पत्रिकाओं तथा प्रस्तुत ट्रैक्टों के आधार पर नवनिर्माण की पुण्य प्रक्रिया अपने-अपने घरों से हर एक को आरम्भ कर देनी चाहिए। आशा है इसमें आलस्य-प्रमाद न किया जायगा।

*समाप्त*