ज्वार आता है और सागर-तट पर बने पद चिह्नों को मिटा कर चला जाता है। वायु आती है और वृक्ष के नीचे पड़े पत्तों को उड़ा ले जाती है। जीवन आता है और समय के वक्षस्थल पर अपने पद चित्त छाप देता है। किन्तु मृत्यु आती है और उन्हें बिगाड़ कर चली जाती है।
यह बनने और बिगड़ने का क्रम अनादि काल से चला आता है और अनन्त काल तक चलता जायेगा। निसर्ग के इन दो विपरीत क्रियाओं में क्या सत्य है और क्या असत्य? क्या वाँछनीय है और क्या अवाँछनीय?
जीवन एवं निर्माण को देखकर हम प्रसन्न होते हैं और मृत्यु एवं निर्वाण को देखकर उदास। ऐसा क्यों? क्योंकि हम इन दोनों क्रियाओं को भिन्न-भिन्न देखते हैं; जबकि यह दोनों क्रियाओं एक ही हैं। निर्माण के लिये निर्वाण अपेक्षित है और जीवन के लिये मृत्यु आवश्यक। यदि मृत्यु न हो तो जीवन निकम्मा और निष्क्रिय होकर बोझ बन जाये। नवीनता से वंचित होकर जड़ता का अभिशाप बन कर रह जाये। न रहने की सम्भावना में ही हम कर्म रूप में रहने का प्रयन्त करते हैं।
—रोम्याँ रोला
जन्म से बालक में जो गुण और संस्कार पाये जाते हैं वे अधिकाँश उसके पिता के गुणों और संस्कारों की प्रतिच्छाया ही होते हैं। बीज और फल में शक्ति, गुण और स्वाद की विशेषतायें प्रायः एक जैसी ही होती हैं। मीठे फल के बीज से उत्पन्न वृक्ष भी मीठे फल ही प्रदान करने वाले होते हैं। वातावरण, जलवायु तथा वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का मत है कि सन्तान के शरीर के न केवल सूक्ष्म गुणों में ही समानता पाई जाती है वरन् स्थूल द्रव्य में भी एकता के सभी लक्षण दिखाई दे जाते हैं।
जीवात्मा के सम्बन्ध में आत्म-विद्या-विशारद आचार्यों का भी यही मत है। वेद, शास्त्र, उपनिषद्, गीता, पुराण, रामायण—इन सब ग्रन्थों में आत्मा के सम्बन्ध में जो विवेचन हुआ है वह एक जैसा ही है। सबने स्वीकार किया है कि जीव अविनाशी तत्व है वह ईश्वर का अंश है। उसमें परमात्मा के सब गुण बीज रूप से विद्यमान है। जीव को अनन्त सुखी, चेतन तथा निर्मल बताया गया है। यह गुण उसके अपने पिता परमात्मा के ही गुण हैं।
किन्तु यदि किसी मनुष्य के जीवन को देखें तो उसमें इन गुणों का अभाव ही दिखाई देता है। आजकल तो विषमता और भी तीव्र हो गई है। सुख की चिर-अभिलाषा रखते हुये भी लोग दुःखी हैं। कष्ट और पीड़ाओं से छटपटा रहे हैं। हर व्यक्ति अशान्त और उद्विग्न ही दिखाई देता है ऐसी स्थिति में कोई भी यह मानने के लिये तैयार न होगा कि प्रस्तुत जीवन में भी ईश्वरीय चेतना का अंश विद्यमान है।
जीव का दूसरा गुण चेतनता, विचार और भावनाओं की शक्ति भी यद्यपि बीज रूप में उनमें देखने को मिलेगी पर यह गुण भी प्रायः किसी में, उपयुक्त मात्रा में, देखने को नहीं मिलता। लोगों में विचार और भावनायें तो उठती हैं पर उनमें अनन्त आकाश को मथ डालने की शक्ति नहीं होती। विचारों की शक्ति किसी से छिपी नहीं है। विचारों में संसार में भयानक हलचल करने वाली शक्ति है, वैसी ही शक्ति भावनाओं में है। भावनाओं की शक्ति से इस देश में भक्ति के ऐसे सूक्ष्म पर सशक्त स्पन्दन पैदा किये गये हैं—जो इस अधःपतित युग में भी धर्म और संस्कृति को निरन्तर जीवन प्रदान कर रहे हैं। जहाँ इन दोनों गुणों का मेल होता होगा वहाँ की शक्ति का तो कहना ही क्या? जीव में चेतनता का यह गुण बड़ा महत्व रखता है पर वह आज बहुत कम लोगों में देखने को मिलता है।
जीव के मूल स्वरूप में प्रकट न होने में मुख्य कारण उसमें तीसरे गुण अर्थात् निर्मलता का अभाव है। माया, अविद्या या अज्ञान सब इसी के नाम हैं। मनुष्य को चाहे जिन शब्दों से निन्दित किया जाय पर मुख्य बात एक ही है कि उसने अपने आपको अन्धकारमय, अज्ञानमय अथवा विकारयुक्त कर लिया है इसीलिये वह अपने मूल-स्वरूप को पहचानने में असमर्थ है। गन्दे जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब नहीं दिखाई देता, दर्पण मैला हो तो मुखाकृति साफ न दिखाई देगी। जीव मायाग्रस्त, अविद्या या मल ग्रस्त हो तो उसकी भी ऐसी ही दशा होती है। वह अपने ईश्वरीय स्वरूप को पहचानने में असफल ही रहता है।
शाश्वत, मुक्त और अमर जीवात्मा आत्मा ज्ञानता या माया के वश में होकर वैसी ही क्रियायें करता रहता है जैसे बन्दर वाला बन्दर को बाँध कर नचाता रहता है। यद्यपि यह माया कोई दृश्य रूप में नहीं है फिर भी वह लोगों को नचाती रहती है यह कहने की अपेक्षा अब यह कहना अधिक उपयुक्त है कि लोग स्वयं ही अज्ञान में भटक रहे हैं। “हमें क्या करना चाहिए” इस ज्ञान का अभाव ही अविद्या है इसी के कारण लोग गलत कार्य करते और दंड भुगतते हैं।
जिह्वा के स्वाद, नेत्रों की सौंदर्य-लिप्सा, कानों की मधुर संगीत सुनने की इच्छा तथा काम वासना आदि विषयों में आसक्ति हो जाने के कारण विद्या-अविद्या की बात विलुप्त हो गई। जड़ और चेतन में ऐसी गाँठ पड़ गई कि उनका पृथक अस्तित्व भी समझ में न आने लगा।
चेतना ने अपने आपको जड़ मान लिया और जड़ता के काम करने लगे। यद्यपि जड़त्व की, अपने आपको मात्र शरीर मानने की बात नितान्त मिथ्या, भ्रम, अज्ञान है तो भी लोग उसे छोड़ने के लिये तैयार नहीं। युग-युगान्तरों से अभ्यास में आने वाला स्वभाव-गुण एकाएक छूट भी नहीं सकते। जीव ने संसारी होने का अपना विश्वास इतना पुष्ट कर लिया है कि जड़-चेतनता के बीच जो ग्रन्थि पड़ गई है वह छूटती नहीं और जब तक यह भ्रम दूर नहीं होता तब तक कष्ट भी दूर नहीं होते।
महापुरुषों, श्रुतियों, पुराणों ने तरह-तरह के उपाय, अनेक प्रकार के साधन बताये पर जीव के हृदय में साँसारिक सुख, लोभ, मोह आदि का अन्धकार इतना सघन होकर छा गया कि वह इनसे छूटने का प्रयत्न करने की अपेक्षा और भी उलझता गया। मुक्त होने के लिये उसने कुछ प्रयास भी न करना चाहा।
ईश्वर की कृपा या किन्हीं देव-पुरुषों के अनुग्रह से कदाचित इस प्रकार का विचार मन में आ जाय कि आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए, अपना रहस्य जानना चाहिये, परमात्मा का दर्शन करना चाहिये तो उसे अनेक जन्मों के शुभ संस्कारों का प्रतिफल या ईश्वर की कृपा दृष्टि ही समझनी चाहिये। उस पर यदि किसी के अन्तः करण में श्रद्धा जागृत हो जाय तो उसे अपना बड़ा सौभाग्य मानना चाहिये।
श्रद्धा का उदय होना निश्चय ही अनेक जन्मों के पुण्यों का प्रतीक है पर अकेली श्रद्धा ही आत्म-कल्याण नहीं कर देती वह तो अपने जीवन लक्ष्य की ओर उन्मुख करने वाला प्रकाश मात्र है। उनको यात्रा पथ पर चलने की भी आवश्यकता है। शास्त्र इस क्रिया को धर्माचरण बताते हैं। अर्थात् श्रद्धा उदय हो तो मनुष्य को जप, तप, व्रत, यम, नियम आदि साधनों का आश्रय लेकर जीवन और आत्म-शोधन की प्रक्रिया प्रारम्भ कर देनी चाहिये। संसार में जितने भी कर्म हैं वे सब धर्म का आचरण कहलाते हैं इनसे आत्मा का बल बढ़ता है और उसमें निर्मलता आने लगती है।
आत्म-कल्याण की साधनायें भावनाओं का रस पाकर शीघ्र फलदायिनी होती हैं यों इन साधनाओं में उदासीनता हो तो भी प्रगति तो होती ही है किन्तु जब भावनाओं का सम्मिश्रण हो जाता है तो साधना से ही एक अलौकिक आनंद की रसानुभूति होने लगती है और लक्ष्य प्राप्ति के लिए जो समय की दूरी थी वह कम अखरने लगती है। भावना मनुष्य की साधना में सफलता की आशंका को भी कम कर देती है। “मैं तेरा हूँ अब तुझे छोड़कर कहाँ जाऊँ। मुझे अज्ञान से निकाल और मानव-जीवन के उपयुक्त आचरण करने की क्षमता प्रदान कर। अब मेरे जीवन का सर्वस्व तू ही है।” इस प्रकार की भावनायें आत्म-कल्याण के पथिक को बड़ा बल प्रदान करती है। विश्वास बढ़ाती हैं और मन में चढ़े कुसंस्कारों के ढेर को बात की बात में जला कर खाक कर डालती हैं। साधना काल में भावनाओं का होना इसी दृष्टि से बड़ा शुभ और लाभजनक माना जाता है। भावनायें जिसे मिल जायँ उसे अपने आप पर ईश्वरीय विशेष कृपा ही माननी चाहिए।
इस प्रकार भक्त धर्म-कर्म करते हुये मन की कामनाओं को मारता और उसे काम, क्रोध, लोभ मोह, छल, द्वेष, पाखण्ड, झूठ, बेईमानी आदि दुष्प्रवृत्तियों से विमुक्त करता है। वासनायें और साँसारिक प्रलोभन उसे बार-बार अपनी ओर आकर्षित करते हैं वह बार-बार इनसे लड़ता है, इन्हें मारता है, आत्मा के गुणों को बढ़ाता है। दया, क्षमा, करुणा, सन्तोष, समता, धृति आदि सत्गुणों का विकास करता है। इंद्रियों का दमन करता है और जो दोष-दुर्गुण होते हैं उन्हें बार-बार ठीक करता है, सत्य प्रवृत्तियों की शोध और दुष्प्रवृत्तियों के विरोध का विचार कभी भी मन्द नहीं होने देता वरन् वैसा करते हुये वह उत्साह अनुभव करता है। विचार-मन्थन के द्वारा वह सत्य को आग्रहपूर्वक अपने जीवन में धारण करता और दुष्कर्मों, असत् तत्वों का परित्याग करता जाता है।
यह विज्ञानमय बुद्धि अन्तः करण की ममता, मद, मोह आदि को जला डालती है उस अवस्था में केवल ब्रह्म की अखण्ड और दिव्य-ज्योति आत्मा में ही अनुभव होने लगती है। यह प्रकाश मनुष्य के अज्ञान, अविद्या या माया को भस्म कर डालता है मनुष्य जीव-भाव से मुक्त होकर पुनः अपने परमपिता-परमात्मा की गोद में ही समा जाता है यह अवस्था अनन्त सुख,अनन्त आनन्द की अवस्था होती है।
संसार को दूरदर्शी दार्शनिकों ने दुःखालयं की संज्ञा दी है। इस संज्ञा का आधार यही है कि मनुष्य संसार में जन्म लेकर सदा ही किसी न किसी प्रकार के दैहिक, दैविक अथवा मानसिक दुःखों से घिरा रहता है। मनुष्य का सारा परिश्रम, पुरुषार्थ एवं प्रयत्न दुःखों से बचने का ही एक उपक्रम है। किन्तु जीवन भर प्रयत्न करते रहने पर भी मनुष्य का प्रायः छुटकारा नहीं हो पाता और अन्त में वह कष्ट-क्लेशों की मानसिक अथवा शारीरिक स्थिति में ही इस संसार को छोड़ जाता है।
अनेक लोग अभावों को ही दुःख का कारण मानते हैं। संसार में एक से एक बढ़कर साधन सम्पन्न होते हैं? अपने विपुल साधनों के बीच भी वे तरसते-तड़पते और आह-कराह करते नजन आते हैं। जिनको अभाव का दुःख नहीं उन्हें रोग-दोष आदि के शारीरिक दुःख से पीड़ित देखा जाता है, जिन्हें शारीरिक दुःख नहीं वे काम, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, ताप-अनुताप, पश्चाताप, तृष्णा अथवा ऐषणाओं के मानसिक दुःख से घिरे पाये जाते हैं। ऐसे भी अनेक लोग हो सकते हैं जिनको शारीरिक, मानसिक अथवा अभावजन्य दुःख न भी हों तो वे अज्ञान के दुख से पीड़ित पाये जा सकते हैं। यदि एक बार कोई सज्जन अथवा साधु पुरुष इन दुःखों से न भी दुःखी हो तब भी उसके आस-पास रहने वाले दुष्ट लोग अकारण ही उसके लिये अप्रिय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकते हैं। कोई दुर्घटना अथवा आधि-व्याधि ही उनके दुःख का कारण बन सकती है। प्रकृति वाहित न जाने ऐसे कितने दुःख-क्लेश इस संसार में आते रहते हैं जिनसे अमीर, गरीब, साधु और खल सभी एक समान पीड़ित होते हैं। और कोई दुःख न हो तो जन्म, जरा और मृत्यु का दुःख ही क्या कम है?
महात्मा बुद्ध एक राजकुमार थे। उनके जीवन में अभाव का प्रश्न ही नहीं उठता। वे स्वस्थ, सुन्दर और सच्चरित्र भी थे, शारीरिक कष्ट का उन्हें कोई अनुभव न होता था। सावधानीपूर्वक उनकी किसी भी इच्छा की अति पूर्ति की जाती थी। हर प्रकार से हर दशा में उन्हें पूर्ण प्रसन्न एवं सन्तुष्ट रखने का सफल प्रयत्न किया जाता था। ऐसी स्थिति में मानसिक दुःख का उनके जीवन से कोई सम्बन्ध न था। उनकी पत्नी यशोधरा सुन्दर, स्वस्थ, पतिव्रता एवं प्रिया थीं। उनका पुत्र राहुल मनभावन तथा प्यारा था। तात्पर्य यह कि राजकुमार सिद्धार्थ को अपनी प्रिय एवं अनुकूल परिस्थितियों में किसी प्रकार का शारीरिक, बौद्धिक अथवा आकस्मिक कोई दुःख न था। तब भी दुःख की अनुभूति से पीड़ित होकर वे अपनी प्रिय परिस्थितियों को छोड़ कर संसार का दुःख दूर करने का उपाय खोजने के लिये साधु हो गये।
राजकुमार सिद्धार्थ केवल एक बार ही अपनी अनुकूल परिस्थितियों तथा प्रिय वातावरण से निकल कर बाहर फैले हुए संसार में आये और एक रोगी, वृद्ध तथा मुर्दे को देखकर अनुभव कर लिया कि यह संसार दुःख-दर्दों से भरा हुआ दुःखालयं है। उनका यह अनुभव सत्य, यथार्थ एवं वास्तविक था। इसने उन्हें इतना कातर कर दिया कि आखिर वे संसार का दुःख दूर करने का उपाय खोजते-खोजते राजकुमार सिद्धार्थ से वैरागी बुद्ध बन गये।
वैदिक, औपनिषदक, दार्शनिक एवं धार्मिक जितना भी आध्यात्मिक और ज्ञान-विज्ञान आदि का जो भी उच्च साहित्य है वह सब किसी न किसी रूप में उन उपायों एवं सिद्धान्तों का ही विस्तार है जिनके द्वारा मनुष्य दुःख से निवृत्त होकर सुख की ओर अग्रसर हो सके। ऋषियों, मुनियों तथा दार्शनिकों से लेकर जो भी तपस्वी महात्मा एवं मनीषी, चिन्तक तथा विद्वान हुए हैं उन्होंने सारा जीवन मनुष्य के दुःख दूर करने और सुख पाने के उपाय खोजने में ही लगा दिया है। इन पावन प्रयत्नों एवं महान जीवनों को देखते हुए यही मानना पड़ता है कि यह संसार वास्तव में दुःखालयं ही है और दुःख से बचने का प्रयत्न ही मानव जीवन का उपक्रम है।
यह भी माना जा सकता है कि संसार में सुख का भी एक अंश है, जिसका प्रमाण, लोगों के बोलने, गाने-बजाने, खेलने-कूदने तथा आनन्द मनाते हुए लोग हास-विलास तथा भोग-भाग्य पूर्ण जीवन बिताते भी दृष्टिगोचर होते हैं। किन्तु यह सारे सुख क्षणभंगुर, अस्थायी, परिवर्तनशील एवं दुःख के परिणाम वाले ही हैं। न तो इनमें स्थायित्व ही है और न वास्तविकता। सुखों का यह सारा आयोजन भी एक से दुःख से बचने का उपक्रम मात्र ही है। संसार में सुखों की अपेक्षा दुःखों का ही बाहुल्य एवं स्थायित्व अधिक है।
संसार में दुःखों का आधिक्य है और मनुष्य को संसार में रहना ही है, तो क्या दुःखों में उलझ-उलझ कर उसे अपना बहुमूल्य जीवन नष्ट कर देना उसका अटल प्रारब्ध है? नहीं मनुष्य का प्रारब्ध दुःख भोगना नहीं है। उसका लक्ष्य दुःखों पर विजय प्राप्त कर एक स्थायी सुख प्राप्त करना ही है। यही मनुष्य का पुरुषार्थ है और यही उसका श्रेय भी। दुःख से पूर्ण होने के कारण संसार को दुःखालयं मान कर कष्ट एवं क्लेशों के बीच तड़प-तड़प कर मर जाना मनुष्य की लज्जास्पद पराजय है। मनुष्यता की शोभा इसी में है कि दुःख से छूटने और सुख प्राप्त करने के लिये अखण्ड पुरुषार्थ किया जाये। मनुष्य को चाहिये कि वह संसार को परीक्षा स्थल समझे और इस दुःख सागर को संतरण कर सुख-शाँति के सुहावने किनारे पर पहुँच कर अपने को श्रेय का अधिकारी बनाये।
जहाँ रोग हैं वहाँ उपचार भी, उलझनें हैं वहाँ उपाय भी हैं। जहाँ चाह है वहाँ राह भी, जहाँ दुःख हैं वहाँ उनसे छूटने का मार्ग भी है। आवश्यकता केवल इतनी है कि मनुष्य के हृदय में सच्ची जिज्ञासा हो। वह अपने उद्देश्य के प्रति निष्ठावान तथा अखण्ड पुरुषार्थ एवं प्रयत्न करने का साहस रखता हो।
भारतीय मनीषियों ने परोपकारार्थ अपना पूरा जीवन तप कर दुःख निवारण के जो अमोघ उपाय खोज निकाले हैं वे बड़े ही सरल एवं सुकर हैं। उनका अवलम्बन लेकर न जाने कितने लोग इस दुःख सागर से तरे हैं और तरते रहे हैं। उनके द्वारा खोजे हुये दुःख निवारण के उपाय सार्वभौम एवं सर्वमान्य हैं। उन आध्यात्मिक उपायों का अवलम्बन किये बिना न तो आज तक कोई दुःख से निस्तार पा सका है और न पा सकेगा। इसके विपरीत जो बुद्धिमान उन उपायों को काम में लाता है वह अवश्य ही दुःखों पर विजय पाकर सुख पाता है।
अधिकाँश चिन्तकों का मत है कि मनुष्य की विषय तृष्णा ही सारे दुःखों का मूल है। यदि मनुष्य तृष्णा की मरु-मरीचिका में फँसने से अपने को बचा सके तो निश्चय ही दुःखों से उसका निस्तार हो जाये। संसार में जो कुछ देखा उसी को पाने के लिये लालायित हो उठना और पाये हुए से सन्तुष्ट न होकर अधिकाधिक पाने की इच्छा करना ही तृष्णा है जो कभी भी पूरी नहीं होती पाये हुए में सन्तुष्ट रहकर यदि अधिकाधिक पाने की अनावश्यक पिपासा को छोड़ दिया जाये तो मनुष्य अवश्य ही अनेक शारीरिक, सामाजिक तथा मानसिक दुःखों से बच सकता है।
विषयों का अत्यधिक भोग और वस्तुओं में सुख की कल्पना दुःख का एक विशेष हेतु है। यह एक अनुभूत सत्य है कि विषय-भोगों की प्राप्ति अन्य दुःख रूप में सामने आती है। मनुष्य भोगों को कितना ही क्यों न भोगे तृप्ति नहीं हो सकती। शरीर शिथिल होकर नष्ट हो जाता है किन्तु भोग की वासना ज्यों की त्यों बनी रहती है। विषयों का भोग करने में लवलीन मनुष्य समझता तो यह है कि वह विषय का भोग कर रहा है किन्तु वास्तव में होता इसके विपरीत है विषय भोगी को स्वयं ही भोग कर नष्ट कर देते हैं विषय भोग की अतृप्त तृष्णा के रहते हुए मनुष्य दुःख मुक्त हो सके यह सम्भव नहीं। भोगों को मर्यादा की सीमा तक भोग कर जो मनुष्य उनमें लिप्त नहीं होता और उनको दुःखदायी विषय मान कर उनसे विरक्त रहता है उसे सुखी होने से कोई बाधा रोक नहीं सकती।
संसार की प्रत्येक वस्तु नाशवान है। यहाँ तक कि शरीर भी। ऐसा जानकर जो बुद्धिमान उनके प्रति आसक्ति नहीं रखता वह दुःख के विशेष हेतु मोहरूपी कटार से बचा रहता है। अन्यथा इनमें आसक्त इनके क्षीण, क्षय अथवा नाश, वियोग से क्षण-क्षण पर दुःखी होता रहेगा यदि यह वस्तुयें उसके देखते-देखते नष्ट न भी हों तब भी उनके नष्ट हो जाने अथवा बिछुड़ जाने की शंका सताया करती है। संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर एवं क्षयमान है ऐसी बुद्धि रख कर जो मनीषी उनसे आत्मिक संबंध रखकर व्यावहारिक सम्बन्ध रखता हुआ अनासक्ति का आचरण करता है संसार की कोई भी हानि उसे दुःखी अथवा विचलित नहीं कर सकती है। दुःख असल में वस्तु के विनाश अथवा वियोग से नहीं होता। दुःख का कारण वास्तव में उसके प्रति मनुष्य का वह मोह होता है जिसे वह अज्ञानवश वस्तु से स्थापित कर लेता है।
महात्मा बुद्ध की खोज के अनुसार दुःखों की निवृत्ति ‘निर्वाण’ में है। अपने को राग-द्वेष से मुक्त कर लेना ही निर्वाण है, जिसे थोड़े से प्रयत्न द्वारा मनुष्य जीवन काल में ही पर सकता है। बुद्ध प्रतिपादित निर्वाण अवस्था को वैराग्य द्वारा शुद्धाचरण करते हुए, इस नाश शील संसार के चिरन्तर सत्यों में विश्वास रखने से, मनुष्य विषयों की विभीषिका और तृष्णाओं की मरु-मरीचिकाओं से सुरक्षित रह कर दुःखों से निवृत्त हो सकता है।
साँख्य दर्शनकार ने आत्मा एवं अनात्मा के बीच अन्तर न समझने के अज्ञान को दुःखों का कारण बतलाया है। उनका कहना है कि मनुष्य जब अज्ञानवश अपने को शरीर मान लेता है तभी वह दुःखों का अनुभव करता है। दुःखों का अनुभव करना शरीर का धर्म है। शीत, घाम धूप, वर्षा, भूख, प्यास, वियोग, विछोह आदि अप्रिय परिस्थितियाँ शरीर को ही व्यापा करती हैं और वही इनका अनुभव करता है। जब मनुष्य अपनी अनुभूतियों को शरीर तक सीमित कर लेता है अथवा अपने को शरीर मान लेता है तो स्वाभाविक ही है कि शरीर का कष्ट उसे अपना कष्ट अनुभव हो।
मनुष्य वास्तव में शरीर नहीं है। वह अनादि, अनन्त, चैतन्य एवं आनंद स्वरूप आत्मा है। उसमें अज्ञान अथवा दुःखानुभूतियों का कोई विकार नहीं है वह निर्विकार एक रस चेतन तत्व है जिसको न तो शस्त्र काट सकता है, न पानी गीला कर सकता है, न हवा सुखा सकती है और न आग जला सकती है। वह अपनी ज्योति से स्वयं प्रकाशमान ऐसा शिव एवं शाश्वत दीपक है जिसको न तो विपरीतताएं प्रभावित कर सकती हैं और न काल बुझा सकता है। आत्मा, शरीर, मन, इन्द्रियों तथा बुद्धि से भिन्न अविनाशी तत्व है जो कि सदा सर्वदा स्वयं सन्तुष्ट एवं आनन्दमय है, जिसे सुख के लिये न तो किसी वस्तु की आवश्यकता है और न किसी भोग की आवश्यकता। वह स्वयं ही आनन्द स्वरूप एवं शाश्वत है। मनुष्य यही अविचल एवं अविनाशी आत्मा है, शरीर नहीं। अब जो व्यक्ति अज्ञानवश अपने इस परमपद आत्मा से भिन्न होकर शरीर के निम्नपद पर उतार लायेगा वह उसकी विकृतियों से त्रस्त होगा ही। मनुष्य अपने को अविकल आत्मा समझे अपने सत्य स्वरूप में विश्वास करे और शरीर को नश्वर संसार का एक अंश मानकर उसकी उसकी विकल्पनाओं को अप्रभावित रहकर दर्शन के रूप में देखें तो निश्चय ही वह दुःख बन्धनों से मुक्त होकर सुख का अधिकारी बन सकता है।
वेदान्त दर्शन के व्याख्याकार जगद्गुरु शंकर ने दुःखों के निवारण का उपाय मोक्ष बतलाया है। मोक्ष की परिभाषा करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है कि—’इस सत्य ज्ञान की स्थायी अनुभूति ही मोक्षावस्था है कि आत्मा देश से परे, शरीर तथा मन, बुद्धि से विलग स्वभावतः मुक्त, नित्य एवं अविकल्पी है।’ ऐसी अनुभूति का साक्षात्कार कर लेने पर मनुष्य का शरीर अथवा मन के विकारों से प्रभावित होना समाप्त हो जाता है।
एक अज्ञात समय से निरन्तर शरीर एवं संसार के संसर्ग में रहते-रहते मनुष्य अपने सत्य स्वरूप आत्मा को ही नहीं भूल गया बल्कि जगत के परम कारण परमात्मा को भी भूल गया है। संसर्ग जन्य अविद्या के कारण वह परमात्मा के स्थान पर उसकी माया, इस संसार को ही सत्य समझ बैठा है जहाँ दुःख के सिवाय उसे कुछ भी हाथ नहीं लगता।
इस प्रकार यदि मनुष्य अपने सत्य स्वरूप आत्मा में आस्था रख कर संसार में परिव्याप्त कारणभूत परमात्मा को देखे और उसके दिये हुए पदार्थों, विषयों तथा भोग को मर्यादापूर्वक भोगते हुए भी उनसे अप्रभावित रह के अभ्यास के साथ जीवनयापन करे तो निश्चय ही उसके सार बन्धन कट जायें और वह अपने जीवनकाल में ही मुक्ति, मोक्ष एवं निर्वाण की चिदानन्द स्थिति को पा सकता है।
“किसी घटना के प्रति मनुष्य का जैसा दृष्टिकोण होता है वैसा ही उसका भविष्य बनता है” इस एक वाक्य में दार्शनिक मारकस ओरिलियस ने मानव जीवन के उत्कर्ष या अपकर्ष का रहस्य खींच दिया है। यदि हमारा दृष्टिकोण आशावादी है तो यह विश्वास किया जाता है कि हमारी सृजनात्मक शक्तियाँ अभी जीवित और जागृत हैं, वे अन्ततः हमारा कल्याण ही करेंगी, ऊँचे ही उठायेंगी। सुखद कल्पनाओं में प्रेरक मनोबल होता है जो कठिन परिस्थितियों में भी निर्माण की एक दिशा ला देता है और मनुष्य को भय, आशंकाओं से बचाकर उन्नति की ओर अग्रसर किये रहता है।
कदाचित मस्तिष्क में निराशा आ गई तो भविष्य चौपट हुआ जानिये। अब क्या होगा बीमारी नहीं छूट सकती? इस तरह का विचार, दुर्बलता से लड़ने की जो थोड़ी शक्ति रही होगी, उसे भी नष्ट कर देगा तब आपका स्वास्थ्य भी शायद ही अच्छा हो पाये। पुत्री के विवाह के लिये धन मिलना कठिन है इस निराशा में पड़े रहेंगे तो एक पैसा भी इकट्ठा न कर सकेंगे जबकि चाहते तो कोई गरीब घर का ही अच्छा लड़का ढूँढ़ लेते, नौकरी में कुछ पैसे बचा लेते, कुछ मित्र या सम्बन्धी से लेकर अपना काम निकाल लेते। दिवालिया हो जाने, कर्ज बढ़ जाने, नौकरी न मिलने, आग लग जाने, चोरी हो जाने, फसल खराब हो जाने की सैकड़ों घटनायें आये दिन घटती ही रहा करती हैं इनसे निरुत्साहित हो गये तो आगे का काम चलना बन्द हुआ। इस निराशा से बचना, कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, साहस और विवेक से काम लेना सुखी जीवन का प्रमुख रहस्य है कठिन परिस्थितियों में हमें हिटलर के दो शब्द याद रखने चाहिए—’हमें यह मानकर लड़ना चाहिए कि मृत्यु तो सुनिश्चित है पर जीत हमारी ही होगी।” जीवन के प्रति आशा और कठिन-से-कठिन परिस्थिति से भी संघर्ष करने का साहस मनुष्य में आ जाये तो उसकी सफलता के मार्ग को कोई रोक नहीं सकता पर यदि निराशा पल्ले पड़ी तो उसका उत्साह भंग हुआ और सुखद परिस्थितियाँ नष्ट हुईं। सर वाल्टर स्काट ने एक प्रेस चलाया। पर वह 30 वर्ष तक निरन्तर घाटा देता रहा। बेचारों पर कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया कि साधारण मनोबल का कोई दूसरा व्यक्ति होता तो आत्महत्या ही कर बैठता। वाल्टर स्काट हार मानने वाले व्यक्ति न थे, कभी कोई मासिक निकाला, कभी दूसरों की पुस्तकें छापी, अखबार निकाला, असंख्य प्रयोग किये आखिर एक गोली निशाने पर बैठ ही गई। उपन्यासों में उनका नाम चमक उठा। अन्त में यह व्यवसाय इतना चमका कि लाखों रुपयों का कर्ज भुगतान कर वाल्टर स्काट ने असीमित धन पैदा किया। वाल्टर की सफलता का एक ही रहस्य था कि उन्होंने कभी परिस्थितियों से हार नहीं मानी, निराशा को पास नहीं फटकने दिया।
एक युद्ध में थेडरी नामक आइरिश सिपाही घायल हुआ। सारे शरीर में छत्तीस गोलियाँ लगी थीं। डॉक्टर आपरेशन रूम में जाते काँप रहा था। इसी समय स्ट्रक्चर में पड़े थेडरी लाये गये। डॉक्टर की परेशानी भाँप गये। पीठ पर हाथ रखकर कहा- डॉक्टर! जब तक मेरा बिना गोली लगा दिल मौजूद है आपको घबड़ाने की आवश्यकता नहीं। आपरेशन किया गया और थेडरी अच्छा हो गया। डॉक्टर ने बधाई देते हुये कहा—थेडरी, तुम अपने मनोबल के कारण अच्छे हुये, मैं तो आपरेशन करने में ही काँप गया था।”
डाँ. लारसन का मत है कि मनुष्य के शरीर में ऐसी शक्तियाँ होती हैं जिन्हें आशा, उत्साह, प्रमोद और प्रफुल्लता का कम्पन देकर जगा दिया जाये तो शरीर में असाधारण शक्ति भर जाती है जो बड़ी-से-बड़ी कठिनाइयों को भी परास्त कर देती है इसलिये मनुष्य को हर स्थिति में प्रसन्न रहने का मार्ग ढूंढ़ना चाहिए। छोटी बात को लेकर भी मनों-विनोद में डूब जाना चाहिए।
एक मल्लाह का लड़का नाव चला रहा था। एक सौदागर ने पूछा—क्यों जी! तुम्हारे बाबा की मृत्यु कैसे हुई, बाल नाविक ने जवाब दिया—’नाव चलाते समय तूफान आ गया, नाव पलट गई, दरिया में डूब कर बाबा की मृत्यु हो गई।’ सौदागर ने विस्मय किया बोला- ‘और तुम्हारे पिता जी? उनकी भी मृत्यु क्या ऐसे ही हुई,-बच्चे ने जवाब दिया ‘हाँ’। ‘तो फिर तुम यह खतरनाक काम क्यों करते हो?’ सौदागर ने पूछा। बालक ने कहा ‘महाशय! क्या आप बता सकते हैं कि आपके बाबा और पिताजी की मृत्यु कैसे हुई?’ सौदागर बोला—हाँ-हाँ उन्हें तो बीमारी हुई और घर पर पड़े-पड़े मर गये।’ ‘तो फिर आप घर में क्यों रहते हैं?’ ‘सौदागर के पास भला इसका क्या उत्तर हो सकता था? मल्लाह के बेटे ने अपनी बात जारी रखते हुये कहा—’श्रीमान् जी! यहाँ या वहाँ मृत्यु तो सब जगह अपनी ही है फिर हम उससे परेशान क्यों हों? हमें तो सुन्दर भविष्य की कल्पना करनी चाहिए। परेशानी में पड़ने की बात ही हम क्यों सोचें। जैसी स्थिति आयेगी उसका सामना किया जायेगा।’
उत्साहवर्द्धक मनोभूमि मनुष्य के लिये एक प्रकार का दैवी चमत्कार है जो उसे अनेक कठिनाइयों से निकाल कर सुख, सन्तोष, प्रसन्नता और उल्लास प्रदान करती है। इन गुणों से आत्मा का आविर्भाव होता है। डेल कार्नेगी का तो यहाँ तक विचार है कि आशावादी और उत्साहवर्द्धक दृष्टिकोण से मनुष्य चिन्ता, भय और बड़ी-से-बड़ी बीमारियों पर भी विजय प्राप्त कर सकता है। जीवन के प्रति उसे प्रेम करना चाहिये। उसे कोई सहयोगी मिले या न मिले आत्म-सहानुभूति के विचारों में रमण करना चाहिए। यह सर्वोत्तम औषधि है जो मारक विषों को भी प्रभावहीन कर सकती है।
इस संसार की बनावट ही ऐसी है कि यहाँ कि सुख के साथ दुःख भी अवश्य आते हैं। बलवान् व्यक्तियों को रोग, धनी व्यक्तियों को भी ऋण-ग्रस्तता, नेक और ईमानदारों को भी समस्यायें सताती हैं। विपरीत परिस्थितियों का आना जीवन का स्वाभाविक गुण है। दिन के उजाले के बाद रात का अँधेरा आता ही है। हर प्रातः के साथ सन्ध्या का सनातन सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। इनमें जो अच्छी परिस्थितियों का चिन्तन करते रहते हैं वे बुद्धिमान कहे जाते हैं। उनके सामने कठिनाइयाँ आती है तो चुटकी बजाते हल कर ली जाती है। पर जो रात के अंधियारे, दिन की सन्ध्या, बादल, बिजली, कड़क मौत, घाटा, असुरक्षा, चोर, भूत के भय काँपते रहते हैं उनके लिए सुख की वस्तुयें भी धोखा सिद्ध होती हैं इसलिये उनकी कल्पना ही क्यों की जाये? हम शुभ सोंचे और सुखद भविष्य की आशा रखें यह कहीं अधिक उत्तम बात है; उससे कठिनाइयों का आधा हल तत्काल हो जाता है।
मेरा वजन 5 पौण्ड कम हो गया—ऐसा सोचकर मानसिक दबाव न पैदा कीजिये। स्वास्थ्य पर ही विचार करना पड़े तो यों कहिये—वाह! कल्लू 86 पौण्ड का है मेरा तो वजन अभी भी 100 पौण्ड है कल्लू से 14 पाँण्ड अधिक। विद्यासागर को मुझसे कुल 25) रुपये अधिक वेतन मिलता है पर मुझे तो दीनानाथ, शम्भु दयाल इन सबसे 30-30 रु. अधिक मिलते हैं फिर अभी तो विभागीय परीक्षायें दूँगा, शैक्षणिक योग्तायें बढ़ाऊँगा। इससे और भी तरक्की होगी। तात्पर्य यह है कि विचार करने का तरीका ऐसा हो जो अपने को ऊपर उठने का निरन्तर उत्साह दे सकता हो। किसी भी रूप में अपनी मानसिक प्रसन्नता स्थिर रखने का प्रयत्न हर व्यक्ति को करना चाहिए। जिसे इस तरह का जीवन जीने की कला आ गई उसने दीर्घ-जीवन का रहस्य जान लिया। आगे बढ़ने वाले सभी व्यक्ति आशावादी दृष्टिकोण वाले ही रहे हैं।
आशावादी दृष्टिकोण एक दैवी वरदान है। आशा पर पाँव रखकर ही मनुष्य अपने जीवन का सारा ताना-बाना जोड़ता है। आशा ही सुखी रहती है, आशा ही संतुष्ट बनाती है, आशा ही जीवन है। उसे त्याग कर निराशा की मृत्यु का वरण हम क्यों करें? जितने दिन जीना है उतने दिन उत्साहपूर्वक जियें, मन और आत्मा को उन्मुक्त रखकर जियें। हमें सदैव इस बात पर भरोसा होना चाहिये कि हम आज की अपेक्षा कल निश्चित रूप से आगे बढ़े हुये होंगे, ऊँचे चढ़े होंगे। यही मनुष्य की साँसारिक उन्नति का मूल-मन्त्र है और आध्यात्मिक सुखों का साधन भी।
संसार के दुःखियों में पहला दुःखी निर्धन है। उससे अधिक दुःखी वह है जिसे किसी का ऋण चुकाना हो। इन दोनों से अधिक दुःखी है सदा रोगी मनुष्य। सबसे दुःखी वह है जिसकी पत्नी दुष्टा हो।
—तुलसी
मनुष्यता का सबसे बड़ा लक्षण सभ्यता है। असभ्य अथवा अनागरिक व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है। समाज में जो भी कष्ट क्लेश, मार-धाड़, लड़ाई-झगड़ा, वाद-विवाद विरोध एवं संघर्ष दिखाई देता है, उसमें से नब्बे प्रतिशत ऐसे लोगों द्वारा उत्पन्न किया होता है जो नागरिकता की भावना से रहित होते हैं। विश्वविख्यात विचारक एवं पाश्चात्य राजनीति के आदि प्रणेता अरस्तू ने एक स्थान पर कहा है-
“नागरिकता के नियमों और सामाजिक न्याय के अभाव में मनुष्य अन्य सभी जीवों से अधिक भयंकर है।”
इस कथन का तात्पर्य यही है कि यदि मनुष्य को किसी सामाजिक व्यवस्था अथवा नागरिक नियमों में आबद्ध होकर न चलना पड़े तो वह अपने समाज के लिए उससे कहीं अधिक भयानक एवं अहितकर हो जाये जितना सृष्टि का कोई जीव अपने समूह के लिए हो सकता है। जब सरकार संस्था का नियन्त्रण होने और दण्ड की व्यवस्था रहने पर भी अनागरिक प्रवृत्ति के मनुष्य समाज में अशान्ति एवं अव्यवस्था फैलाने का प्रयत्न करते रहते हैं तब व्यवस्था एवं नियंत्रण न रहने पर मनुष्य किस सीमा तक अराजक हो सकता है, इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। मनुष्य संसार के सभी जीवों से श्रेष्ठ बुद्धिमान प्राणी है, शोभा तो उसकी इसी बात में है कि वह बिना किसी नियन्त्रण अथवा दण्ड के ऐसा व्यवहार करे, जिससे सब ओर सब काल सुख-सुविधा एवं शाँति की परिस्थितियाँ बनी रहें। यदि नहीं तो कम-से-कम इतना तो होना ही चाहिये कि सभ्यता, शिष्टता, नागरिकता एवं सामाजिकता के जो सामान्य एवं सार्वजनिक नियम नियत किये गये हैं उनका तो पालन करे ही। किन्तु खेद है उन नागरिक कहलाने वाले व्यक्तियों पर जो शिष्टता एवं सभ्यता के साधारण नियमों की अवहेलना कर उस मनुष्यता के नाम पर बट्टा लगाते हैं जो सृष्टि में सिरमौर मानी जाती है।
आज जिस देश में असभ्यता एवं अशिष्टता की दिन-दिन वृद्धि एक राष्ट्रीय बनती जा रही है वही भारत देश अपनी सभ्यता, संस्कृति एवं शिष्टाचार में कभी संसार का अगुवा रहा है। आज इस देश का शिष्टाचार भले ही पतन की दशा में हो किन्तु यह सत्य है कि इसकी सभ्यता सबसे प्राचीन है। केवल प्राचीनता ही इसकी विशेषता नहीं है । इसकी सभ्यता की विशेषता यह भी है कि इसका स्वरूप सार्वभौमिक होने के साथ-साथ तथ्यपूर्ण मानवीय मूल्यों पर आधारित है। आज जबकि संसार की अधिकाँश सभ्यताओं का तिरोधान कुछ हजार अथवा सौ वर्षों में ही हो गया, यह वैदिक काल से अब तक स्थिर एवं मान्य है।
अपनी उस ऋषि-प्रणीत सभ्यता एवं संस्कृति को भुला देना अथवा उससे विमुख एवं विरत हो जाना भारतीयों के लिए कहाँ तक उचित है जिसे संसार की अन्य सभ्यताओं का मूल-स्रोत माना गया है। संसार की लगभग समग्र सभ्यताओं का आविर्भाव इसी की प्रेरणा अथवा अनुकरण से हुआ है। इसकी पुष्टि में विज्ञ शास्त्रकारों का यह कथन याद रखने योग्य है।
“एतद् देश प्रसूतस्य सकाशदग्र जनमनः। स्वं स्वं चरित्र शिक्षेरन पृथिव्याँ सर्वमानवः॥”
“इसी देश के ऋषि-मुनियों और विद्वानों के संसर्ग से पृथ्वी भर के मानवों ने चरित्र एवं सभ्यता की शिक्षा प्राप्त की है।”
पराधीनता काल में भारत को अपदस्थ करने तथा उसके तेजोबल के मन्तव्य से कुछ समय संकीर्ण मनोवृत्ति के अंग्रेजों ने प्रमादवश अर्ध सभ्य कहकर अपमान करना शुरू किया था किन्तु जब उन्होंने भारतीय साहित्य एवं संस्कृति का अध्ययन किया तो उन्हें महात्मा गाँधी के इस सत्यपूर्ण कथन से सहमत ही होना पड़ा-
“मेरा विश्वास है कि जिस सभ्यता को भारत ने जन्म दिया, संसार की कोई सभ्यता उसकी समानता नहीं कर सकी। हमारे पूर्वज जो बीज बो गये हैं उसकी समता करने वाली कोई वस्तु संसार में नहीं है।”
सभ्यता का मुख्य चिन्ह शिष्टाचार को ही माना गया है। किन्तु आज लोगों ने शिष्टाचार को शिक्षा, वस्त्रों तथा बाहरी दिखावे तक ही सीमित कर दिया है। किन्तु शिष्टाचार का मुख्य तत्व मनुष्य के हृदय में रहने वाले स्नेह, सौहार्द्र, श्रद्धा एवं सद्भावना में ही निहित रहता है। भारतीय मान्यता के अनुसार अन्तर से शून्य रह कर बाहर से विनम्र, विनीत किंतु अश्रद्धालु रहकर स्नेह, स्वागत, सद्भावना, सौहार्द्र अथवा आवभगत का ढंग प्रदर्शन करना अशिष्टाचार ही माना गया है
जहाँ आज के सभ्य कहे जाने वाले अधिकाँश दंशों में शिष्टाचार एवं सभ्यता के नियमों के बाह्य निर्वाह पर बल दिया जाता है, वहाँ भारतीय संस्कृति उसकी आन्तरिक वास्तविकता पर ध्यान देने को कहती है। भारतीय सभ्यता में इसे शिष्टाचार नहीं माना गया है कि कोई किसी के प्रति प्रकट में तो आदर, सत्कार दिखलाता है, सामने स्नेह एवं सौहार्द्र की बातें करता है पर हृदय में असद् भावना रखता और पीछे-पीछे उसकी निन्दा करता है, उपहास, उड़ाता अथवा जड़ खोदने की कोशिश करता है। भारतीय परिभाषा अनुसार किसी के प्रति शिष्टाचार के बाहरी नियमों का पालन करते हुये उसके प्रति हृदय में वैसी भावनायें भी होनी चाहिए जो बाह्य व्यवहार द्वारा घाषित होती है। यही वास्तविक शिष्टाचार है अन्यथा बाह्य प्रदर्शन एक आडंबर एवं विडंबना मात्र है। ऐसा छलपूर्ण व्यवहार शिष्टाचार में नहीं माना जा सकता।
शिष्टाचार का मूल उद्देश्य है अपने युक्त व्यवहार द्वारा अन्य को प्रसन्न, प्रमुदित एवं शीतल करके उसके हृदय में अपने लिए यथायोग्य स्नेह, श्रद्धा एवं सद्भाव उत्पन्न करना। सार्वजनिक आधार पर शिष्टाचार बरतने से समाज से दुर्भावनायें दूर होती हैं और उनके स्थान पर सद्भावनाओं एवं प्रेम के अंकुर उपजते हैं जिनका सुख-शान्ति, सहयोग-सहायता एवं सुविधा साधनों के रूप में फलीभूत होना अवश्यम्भावी है। शिष्टाचार जहाँ मानवीय सभ्यता का द्योतक है वहाँ उसके व्यवहार का उद्देश्य यह भी है कि मानव-मानव के बीच प्रेम का विकास हो और चारों ओर स्वर्गीय परिस्थितियाँ दिखाई देने लगें। मनुष्य ने आज तक जो भी उन्नति की है वह परस्पर के स्नेह सौहार्द्र, सहयोग एवं सहायता के बल पर ही की है। इन गुणों का विकास मात्र शिष्ट व्यवहार पर ही निर्भर है। अशिष्ट व्यवहार पारस्परिक प्रेम के स्थान पर भिन्नता एवं द्वेष दुर्भावनाएँ उत्पन्न करता है। स्वयं अपने साथ समाज को सुखी बनाने के लिए शिष्टाचार का समुचित पालन बहुत आवश्यक है।
अनेक लोग कृत्रिम शिष्टाचार में अपनी बड़ी चतुरता समझते हैं। पीठ पीछे बुराई करने और सम्मुख आवभगत दिखलाने में बड़ा आनन्द लेते हैं। समझते हैं कि संसार इतना मूर्ख है कि उनकी इस द्विविध नीति को समझ नहीं सकता । वे अपने इस दोहरे व्यवहार पर भी समाज में बड़े शिष्ट एवं सभ्य समझे जाते हैं। अपने को इस प्रकार बुद्धिमान समझना बहुत बड़ी मूर्खता है। एक तो दूसरे को प्रवंचित करना स्वयं ही आत्म-प्रवंचना है। फिर वैर-प्रीति की तरह सद् और असद् भावनाएं हृदय से सम्बन्धित वास्तविकता तथा कृत्रिमता छिपी नहीं रह सकती। वह कभी-न-कभी किसी माध्यम से प्रकट हो ही जाती है। तब ऐसा होने पर कृत्रिम शिष्टाचार का बड़ा उपहास होता है। उसके शिष्टाचार के प्रति लोगों का विश्वास उठ जाता है और वह परले सिरे का अशिष्ट समझ लिया जाता है। जहाँ आन्तरिक शिष्टाचार से दूसरों के हृदय में अपने लिए आत्मीयता, सहृदयता एवं आदर को भाव उत्पन्न होता है और वे हर प्रकार से सहायता या सहयोग करने के लिए उद्यत रहते हैं, वहाँ मिथ्या शिष्टाचार दूसरों के हृदय में अविश्वास, सहयोग, अरुचि एवं भिन्नता के भाव पैदा करता है।
समाज में परस्पर सहयोग, सहृदयता एवं संगठन का भाव बढ़ाने के लिए हम सब एक दूसरे के प्रति शिष्ट एवं यथोचित व्यवहार करने के लिए कर्तव्य बद्ध हैं। यदि हम कृत्रिम व्यवहार और दिखावटी शिष्टाचार का बर्ताव करते हैं तो निश्चय ही समाज में विघटन, सन्देह, संशय एवं अमित्रता के बीज बोते हैं जिनके विष-फल अपने साथ पूरे समाज के हित में घातक होंगे। हमारी सभ्यता, हमारी नागरिकता और हमारी मानवता इसी में है कि हम सबसे यथोचित शिष्टता का व्यवहार करें।
शास्त्रों की आज्ञा है कि कोई कितनी ही आवभगत क्यों न करे यदि उसके हृदय में वास्तविक हर्ष एवं अनुराग नहीं है तो उसका स्वागत नहीं करना चाहिये क्योंकि अनात्मिक आदर आत्मा का हनन करता है। इस तथ्य को दृष्टिगोचर रखते हुए भगवान श्रीकृष्ण ने दुर्योधन का राजसी स्वागत ठुकरा कर विदुर का साधारण शाक स्वीकार किया था और इसी सत्य को सम्बोधित करते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है—
आवन सों हर्षे नहीं, नयना नहीं सनेह। तुलसी तहाँ न जाइये कंचन बरसै मेह॥
यों तो देशकाल की भिन्नता से संसार में शिष्टाचार के असंख्यों तौर तरीके प्रचलित हैं पर भारतीय शिष्टाचार के जो मूलभूत नियम शास्त्रों में बतलाये गये हैं वे लगभग सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक ही हैं। स्वागत सत्कार करने के विषय में ‘दक्ष-स्मृति’ का कथन है—
“सुधावस्तूनिवक्ष्यामि विशिष्टे गृहमागते। मनश्चक्षुर्मुखंवाचं सौम्यं दत्वा चतुष्टयम्॥
अभ्युत्थानं ततोगच्छेत पृच्छालाप प्रियान्वितः। उपासन मनुव्रज्या कार्यण्ये तानि नित्यशः॥”
“गृहस्थों का कल्याणकारी नियम यह है कि वे किसी महानुभाव के पधारने पर मन, वचन, मुख और नेत्रों को प्रसन्न रक्खें। अभ्यागत को देखते ही खड़े होकर आने का हेतु पूछें। प्रेमपूर्वक वार्तालाप करें, यथोचित एवं यथासाध्य सेवा करें और चलते समय कुछ दूर पहुँचाने जायँ।”
साधारण रूप में यह नियम घर आये अतिथि का स्वागत करने के लिये गृहस्थ को निर्देश किये गये लगते हैं। किन्तु यदि इन नियमों का पालन किसी से किसी स्थान पर समागम होने पर, परिचित-अपरिचित के साथ यथोचित रूप से किया जाये तो यह सामाजिक एवं सार्वजनिक शिष्टाचार का प्रयोजन पूरा कर सकते हैं।
यों तो कदम-कदम पर देशकाल एवं व्यक्तियों की भिन्नता से शिष्टाचार की अभिव्यक्ति-करण की विधि बदल जायेगी तथापि शिष्टाचार के कुछ ऐसे स्थायी नियम हैं जिनका पालन करते रहने से अशिष्टाचार होने का भय नहीं रहता। उनसे से मोटे-मोटे नियम इस प्रकार हैं—
(1) छोटा हो अथवा बड़ा किसी के साथ पुरुष अथवा तिरस्कार पूर्ण व्यवहार किसी समय भी नहीं करना चाहिये। संसार का प्रत्येक जीव यहाँ तक कि जड़ वस्तुयें भी हमारी अपेक्षा की अधिकारिणी हैं।
(2) देश, धर्म, जाति, विश्वास एवं मान्यताओं की भिन्नता होने पर भी अपनी भावनाओं के समान ही दूसरों की भावनाओं का आदर करना चाहिये।
(3) किसी भी कारण, परिस्थिति अथवा दशा में मुख से अपशब्दों का प्रयोग न करना चाहिये।
(4) हर स्थान एवं परिस्थिति में अपने से अधिक दूसरों की सुख-सुविधा का ध्यान रखना चाहिये।
(5) दूसरे के साथ वह व्यवहार कदापि नहीं करना चाहिये जो स्वयं अपने साथ किये जाने पर अखरे।
(6) बिना प्रयोजन किसी अपरिचित से परिचय का आग्रह करना अशिष्टता है।
(7) किसी के आकार-प्रकार अथवा वेशभूषा पर प्रकट अथवा मन-ही मन हंसना, व्यंग करना अथवा आलोचना करना असभ्यता का चिन्ह है।
(8) किसी को किसी काम में विघ्न उपस्थित करना अशिष्टता है, जब तक कि उसके कर्तृत्व का कुप्रभाव अपने पर न आता हो।
(9) किसी भी निजी अथवा सार्वजनिक स्थान पर कोई भी काचिक, वाचिक अथवा साँकेतिक, ऐसी चेष्टा न करनी चाहिये जो किसी के लिये असुविधा अथवा अप्रसन्नता जनक हो।
इन नव नियमों का ध्यान रखने के साथ-साथ जो सहिष्णु, उदार, विनम्र, संकोच शील, स्थिर स्नेही एवं प्रसन्नचेता है और यह विश्वास रखकर आवालबृद्ध स्त्री-पुरुष से यथोचित व्यवहार करता है कि सबमें समान रूप से एक ही परमात्मा का अंश है, सभी अपनी आत्मा के समान ही अनुपेक्षरणीय हैं, उससे अशिष्टाचारी होने का डर नहीं के बराबर ही रहता है। ऐसा सद्शिष्टाचारी संसार में सबकी दृष्टि में अपना स्थान बना कर स्नेह एवं श्रद्धा का भाजन बनता है।
उन निर्बल मना व्यक्तियों को महानता के लक्ष्य प्राप्त कर सकने की आशा नहीं करनी चाहिये जो असफलताओं, बाधाओं, विरोधों एवं कठिनाइयों से डरते घबराते हों। यह स्थितियाँ उस पथ के उपहार हैं जो पथिक को स्वीकार ही करने होते हैं।
महानता इस जीवन में ही मिल जाये यह आवश्यक नहीं प्रायः होता यही है कि महानता के मार्गगामियों को अपने जीवनकाल में तिरस्कार, उपेक्षा, आलोचना और विरोधों को सहन करना पड़ता है किन्तु जब वे अपना कर्तव्य पूरा कर संसार से चले जाते हैं तब लोग उनकी महानता स्वीकार करते, जीवनगाथा कहते, लिखते और पढ़ते हैं। उनकी पूजा करते और उन्हें जीवन का आदर्श बनाते हैं।
ईसामसीह का पूरा जीवन कठिनाइयों, कष्टों, विरोधों, तिरस्कार तथा अत्याचार के बीच बीता। किन्तु वे अपने ध्येय पर डटे रहे। प्राण दे दिए किन्तु व्रत का त्याग नहीं किया। ईसा प्रेम, दया और क्षमा का संदेश संसार को देने चले थे। कितना महान और कल्याणकारी लक्ष्य था। उसमें उनका किसी प्रकार का कोई स्वार्थ नहीं था। वे मनुष्य के बीच फैले द्वेष, घृणा, आक्रोश तथा संघर्ष से द्रवित हो उठे थे। वे नहीं चाहते थे कि मनुष्य जो कि परमपिता परमात्मा के पुत्र हैं इस प्रकार की दूषित प्रवृत्तियों के शिकार बन दुःखी, संतप्त तथा त्रस्त जीवन बितायें। यदि वह अपना अज्ञान दूर कर दें, सद्प्रवृत्तियों का मूल्य एवं महत्व समझें, प्रेम, दया, करुणा और क्षमा के दिव्य गुणों की शीतलता अनुभव करें, तो निश्चय ही अन्त में पिता के स्वर्गीय राज्य में स्थान पायेंगे। जीवन में भी सुख-शाँति के लिये कलपते न होंगे। उन्होंने उस दिव्य अनुभूति को अनुभव किया था इसलिये विश्वास था कि प्रयत्नपूर्वक यदि भ्रम में भटकती मनुष्य जाति का अज्ञान दूर किया जा सके, संदेश दिया जा सके तो सभी मनुष्य स्वर्गीय अनुभूति को प्राप्त करके उसका सुख अनुभव कर सकेंगे।
इसी आशा-विश्वास के साथ वे अपना शीतल संदेश लेकर मानवता की सेवा करने के लिये उतरे थे। उनकी उत्कट इच्छा थी कि हमारे मनुष्य-भाई भी उस स्वर्गीय शाँति को पाए जो उन्हें मिली थी। ईसा का यह विचार कितना महान, निःस्पृह, निर्विकार एवं निःस्वार्थ था। इसमें कितना उपकार और मनुष्यों के प्रति मंगल भावना भरी हुई थी। किन्तु मनुष्यों ने उस आलोक दाता के साथ क्या व्यवहार किया? इतना कष्ट, इतना क्लेश, तिरस्कार एवं त्रास कि उन्हें अनेक बार एकान्त में बैठकर रोना पड़ा—इसलिये नहीं कि उनको कष्ट दिया जा रहा है, बल्कि इसलिये कि आखिर मनुष्य जाति अपना हित सुनना-समझना क्यों नहीं चाहती। यदि ईसा के स्थान पर कोई दुर्बल-मन व्यक्ति होता तो वह यह कह कर अपना रास्ता काट लेता कि जब मूर्ख मनुष्य अपने कल्याण की बात सुनना-समझना ही नहीं चाहते तब मेरी क्या गर्ज पड़ी है जो इन्हें समझाने की कोशिश करूं और बदले में पत्थर खाऊँ।
किन्तु संसार के सच्चे हितैषी इस प्रकार कहाँ सोच पाते हैं। वे एक बार अपने निर्विकार मनोमुकुर में जिस सत्य के दर्शन कर लेते हैं उसका आलोक संसार को देने के लिये आजीवन प्रयत्न करते रहते हैं। वे विरोध अथवा तिरस्कार की परवाह नहीं करते। क्योंकि उन्हें पता रहता है कि लोग जो कुछ प्रतिकूल कर रहे हैं अज्ञानवश ही कर रहे हैं। यदि उनमें यह अज्ञान न होता तो उन्हें आलोक देने की आवश्यकता ही क्यों होती और क्यों मेरी आत्मा मुझे इस कठोर कर्तव्य के लिये कहती। साथ ही यह विश्वास भी होता है कि मनुष्यों का यह अज्ञान आज नहीं तो कल अवश्य दूर हो जायेगा। मुझे ‘आज ही’ की जिद के साथ अपने कर्तव्य को बोझिल नहीं बना लेना चाहिये। मनुष्य, मनुष्य हैं वे एक दिन समझेंगे और सत्य के दर्शन करेंगे।
ईसा को सफलता की कोई जल्दी न थी उन्हें चिन्ता थी अपने कर्तव्य पालन की। वे लगन और धैर्यपूर्वक अपने कर्तव्य में लगे रहे और उसकी पूर्ति में ही अपने प्राणों को उत्सर्ग कर दिया। ईसा जीवन भर अपने ध्येय में असफल रहे। किन्तु एक क्षण को भी विचलित न हुए। आज यह उनके धैर्य एवं निस्वार्थ प्रयास का ही सत्फल है कि आधे से अधिक संसार उनका अनुयायी है। वह ईसा जिन पर जीवन काल में पत्थर मारे गये, बड़े से बड़ा त्रास दिया गया, यहाँ तक की जीवित क्रूस पर लटकाकर मार डाला गया, जीवनोपरान्त ईश्वर के समान पूजे और माने गये। आज उनका नाम संसार के महानत व्यक्तियों में है। महानता कोई सुख नहीं है, जैसा कि लोग समझते हैं। यह मनुष्य की जीवन कालीन सेवाओं, लोकमंगल की कामनाओं, प्रयत्नों, कष्टों, बलिदानों और ध्येय धीरता का प्रमाण-पत्र है जो प्रायः उसके दिवंगत हो जाने के बाद संसार द्वारा घोषित किया जाता है। जीवनकाल में ही सफलता का हठ लेकर चलने वालों को यही उपयुक्त है कि वे या तो अपना कदम पीछे हटा ले अथवा अपनी मनोवृत्ति में सुधार कर लें।
महान उद्देश्यों में सफलता जीवन काल में नहीं मिलती, ऐसा कोई नैसर्गिक नियम नहीं है। वह जीवन काल में भी मिल सकती है। भगवान बुद्ध, महावीर, विवेकानन्द और महात्मा गाँधी प्रभृति सत्पुरुष इसके उदाहरण हैं। किन्तु महान पथ पर चरण रखने वालों को सफलता-असफलता और उसके आगमन की अवधि की चिन्ता से मुक्त रह कर ही अपने कर्तव्य में लगा रहना चाहिये। उसे जब आना है आ जायेगी। उसके विषय में सोचना और चिन्ता करना क्या?
श्रेय-पथ पर आने वाली कठिनाइयों से घबरा कर निराश, हताश, निरुद्योगी हो जाने वाले अपने लक्ष्य को नहीं पा सकते, संसार में ऐसे न जाने कितने कम-हिम्मत व्यक्ति हुए होंगे और आज भी होंगे जो किसी लक्ष्य को पाने का इरादा लेकर चले होंगे किन्तु चार-छह कदम चलने पर कठिनाइयों का सामना होते ही पीछे हट कर बैठ गए होंगे। ऐसे लोगों के उदाहरण तो नहीं बताये जा सकते क्योंकि साहस हीन व्यक्तियों का अंकन न तो समय के स्मरण-पट पर होता है और न वे स्वयं अपना प्रकाश करते हैं महान उद्देश्य को लेकर न चलना उतनी लज्जा की बात नहीं होती जितनी की चलने के बाद कठिनाइयों के भय से रुक जाना अथवा पीछे हट जाना। समय के स्मृति-पट पर वे ही पुरुषार्थी व्यक्ति अंकित होते और लोग प्रेरणा के लिये उदाहरण बनते हैं जो अपने श्रेय-पथ की बाधाओं, विघ्नों तथा कठिनाइयों से तिल-तिल पर जूझते हुए बढ़ते रहते हैं। अपनी इस शक्ति तथा साहस को सुरक्षित रखने के लिये वे इनकी शत्रु निराशा एवं निरुत्साह को स्वप्न में भी पास फटकने नहीं देते। ऐसे ध्येय-धीर मनस्वी वीर पुरुष पहाड़ जैसी असफलता की उपेक्षा कर कण जैसी सफलता पर नजर रखकर उत्साह एवं सक्रियता की जननी प्रसन्नता को विनष्ट नहीं होने देते। उनकी गणना के विषय बढ़े हुए कदम होते हैं रुके अथवा परिस्थितियों द्वारा पकड़ कर पीछे हटाये हुए नहीं। लड़ाई के मैदान में कभी-कभी रुकना और पीछे भी हटना होता है। भय अथवा कायरता के वशीभूत होकर भागने के लिये नहीं बल्कि संभलने, समझने और फिर तेजी से आगे बढ़ने के लिये। अब्राहम लिंकन को एक सौ आठ बार असफलता का मुख देखना पड़ा। हुमायूँ इक्कीस बार लड़ाई में हारा। प्रताप को जीवन भर लड़ना पड़ा और सुभाष की असफलता संसार की बड़ी सफलताओं के साथ लिखी गई किन्तु क्या इन ऐतिहासिक पुरुषों ने कभी निराश अथवा हतोत्साह होकर हार मानी। यदि इनमें यह दुर्बलता रही होती तो आज उनका नाम इतिहास में न होता। सफलता-असफलता की सुखद अथवा दुःखद भावना से परे कर्मवादी कर्तव्यवादी ही महानता के शिखर पर चढ़ कर अपने लक्ष्य की उपलब्धि किया करते हैं।
सफलता के लिये साधनों की नहीं साहस एवं संलग्नता की आवश्यकता होती है। अमेरिका के महान प्रेसीडेन्ट विल्सन को आज कौन नहीं जानता। अमेरिका में गुलामी प्रथा का विरोध करने वाले इस महापुरुष का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उन्होंने अपना जीवन विवरण देते हुए लिखा है—
“मैं एक अत्यन्त गरीब घर में पैदा हुआ था। घर में इतनी गरीबी थी कि दो-दो तीन-तीन दिन भोजन के दर्शन नहीं होते थे। जब कभी अबोधावस्था में भूख से व्याकुल होकर किसी से रोटी माँगता था तो वह भी नहीं मिलती थी। दस वर्ष की आयु में रोटी की तलाश से घर छोड़कर भागना पड़ा। अनेक मासों तक दर-दर की ठोकरें खाने के बाद एक साधारण-सी नौकरी मिली जिसमें वेतन तो बहुत कम था किन्तु वर्ष में एक माह की छुट्टी मिलती थी। ग्यारह वर्ष तक उस नौकरी को करता रहा। वर्ष में एक माह की छुट्टी का अवकाश मैं पढ़ने में लगाया करता था। इस प्रकार ग्यारह वर्ष की नौकरी में मुझे केवल ग्यारह माह पढ़ने के लिये मिले जिनका मैंने परिश्रम पूर्वक इतना उपयोग किया कि अच्छी खासी योग्यता प्राप्त कर ली। अपने कर्तव्य कार्य को मैंने किस तत्परता से किया इसका प्रमाण यह है कि मालिक ने काम खत्म होने पर मुझे दो सौ रुपये मूल्य के जानवर इनाम में दिये जिन्हें बेच कर मैंने वह धनराशि धरोहर के समान आगे के लिये सुरक्षित रख ली। मेरी इच्छा जीवन में तरक्की करने की थी इसलिये मैं जी-तोड़ मेहनत करता और मजदूरी का एक-एक पैसा बचा लेने की कोशिश करता।
“इक्कीस वर्ष की आयु तक मैंने बीस रुपये मासिक पर खेत जोतने, लकड़ी काटने, चीरने और ढोने का काम किया जिसमें मुझे सूर्योदय से एक पहर रात गये तक काम करना पड़ता था किन्तु मैंने निराशा अथवा उत्साह-हीनता को पास न आने दिया। इस बीच अवकाश के समय में मैं बराबर अध्ययन करता और आगे उन्नति की युक्ति पर बराबर सोचता रहा जिससे मैं इस जी-तोड़ मेहनत की नौकरी के समय में भी एक हजार पुस्तकें पढ़ सका। अपने बढ़ाये हुए ज्ञान और बचायी हुई पूँजी को लेकर आगे बढ़ा और कोई स्वतन्त्र काम करने के विचार से सौ मील की दूरी पर नाटिक नामक कस्बे में मोची का काम सीखने गया। वहीं मैंने सीख कर अपना काम जमाया। मेरी उपार्जित दक्षता एवं शिक्षा ने मेरा साथ दिया और मैं शीघ्र अपने ईमानदार इरादों, विचारों तथा कर्मों से इतना लोकप्रिय हो गया कि वहीं विधानसभा के निर्वाचन में बहुमत पा सकने में सफलता प्राप्त की जो कि बढ़ती-बढ़ती अमेरिका के सम्मानित एवं उत्तरदायित्वपूर्ण पद तक जा पहुँची।”
अन्त में उन्होंने अपने जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि जो लोग उन्नति के लिये साधनों की कमी की शिकायत करते हैं वे वास्तव में उन्नति चाहते नहीं और अपनी साहसहीनता के साथ अकर्मण्यता का परिचय देते हैं।
एक नवयुवक महात्मा टालस्टाय के पास आया और बोला-’महोदय मेरे पास एक पैसे की भी सम्पत्ति नहीं है। मैं जीवन में बहुत दुःखी तथा निराश हूँ।
महात्मा टालस्टाय ने उससे सहानुभूति दिखाते हुये कहा—”मेरा एक व्यापारी मित्र है वह आदमी के शरीर के अवयव खरीदता है तुम चाहो तो मैं तुम्हें उससे मिला सकता हूँ! वह तुम्हें तुम्हारी आँखों के लिये बीस हजार, हाथों के लिये पन्द्रह हजार और पैरों के लिये दस हजार की रकम दे सकता है। यदि चाहो तो यह अंग बेच कर आज ही तुम पैंतालीस पचास हजार के स्वामी बन सकते हो। और यदि तुम उसके हाथ अपने शक्ति एवं यौवन से भरे-पूरे शरीर को बेच सको वह तुम्हें खुशी से लाख रुपये दे सकता है। यदि धनवान बनना चाहो तो मेरे साथ चलो मैं तुम्हें आज ही उससे मिला देता हूँ।
युवक भौंचक्का-सा टालस्टाय की ओर देखता हुआ बोला—’आप यह क्या कहते हैं? शरीर सम्पदा की तुलना में रुपया-पैसा क्या मूल्य रखता है? एक लाख क्या मैं इसे एक करोड़ में भी बेचने को तैयार नहीं हो सकता।
महात्मा टाल्स्टाय हँसे और बोले-’जब तुम्हारे पास इतना मूल्यवान शरीर है जब तुम अपने को गरीब किस तरह कहते हो? युवक! मनुष्य का यह शक्तिशाली शरीर साक्षात् कल्पवृक्ष है। इसको ठीक-ठीक उपयोग में लगाओ, श्रम करो और देखोगे कि तुम शीघ्र ही सुख-समृद्धि के स्थायी स्वामी बन जाते हो।
सहानुभूति मनुष्यता का एक विशेष लक्षण है। दूसरे की वेदना को अनुभव कर सकना, दुःख से दयार्द्र हो सकना मनुष्य का ही अधिकार है। यह विशेषता किन्हीं अन्य प्राणियों में नहीं पाई जाती । सहानुभूति से रहित मनुष्य को उसकी संज्ञा के अनुरूप नहीं समझा जा सकता। यह केवल मनुष्य ही है जो किसी प्राणी की पीड़ा देखकर हृदय भर लेता है। एक पशु किसी दूसरे का दर्द कदाचित अथवा दुःख से कराहते दूसरे पशु को देखता हुआ भी यथावत या तो खड़ा रहता है अथवा चराता रहता है।
सहानुभूति मनुष्य के हृदय में निवास करने वाली वह कोमलता है जिसका निर्माण संवेदना, दया, प्रेम तथा करुणा के सम्मिश्रण से होता है। सहानुभूति केवल एक कोमल अनुभव ही नहीं है जिसे कि कोई हृदयवान अपने अन्दर तरंगित होता हुआ पाता है। बल्कि यह आत्मा की निःशब्द भाषा भी है जिसे संसार का प्रत्येक प्राणी सहज ही समझ लेता है। किसी पीड़ित पशु-पक्षी को प्रेम से देखिये, पुकारिए या उस पर हाथ फेरिये वह आपके इस भाव को तत्काल समझ लेगा और आपसे एकात्मकता का अनुभव करने लगेगा सहानुभूति के आधार पर अनजान एवं अबोध प्राणी तक अपने बन जाते हैं।
इस गुण का आधिक्य किसी भी मनुष्य को ऊँचा उठा देता है। उसमें दैवी अनुभूतियों का समावेश होने लगता है। सहानुभूति की अधिकता के कारण कवि और कलाकार अन्य साधारण कोटि के लोगों से अलग और ऊपर माने जाते हैं। उनकी रचनायें सहज ही दूसरों का हृदय हरण कर सकने में समर्थ होती हैं। सहानुभूति रहित रचना प्राण-हीन रहकर किसी को आकर्षित कर सकने में असमर्थ होती है। इस गुण की एक विशेषता यह भी है कि जहाँ सहानुभूति प्रधान हृदय के मूल भावों को कोई दूसरा सहज ही अनुभव कर लेता और समझ लेता है वहाँ सहानुभूति एवं संवेदनशील मनुष्य दूसरे के हृदय की बात अपने हृदय में अनुभव कर लेता है। उसे बिल्कुल वैसा ही अनुभव होता है जैसा कि वह अनुभव करता है जिसके लिए सहानुभूति का भाव जाग्रत हुआ होता है। सहानुभूति की भावात्मकता को व्यक्त करते हुये ह्विटमैन ने एक स्थान पर लिखा है—
“मुझे किसी पीड़ित व्यक्ति से यह पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि वह अपने में कैसा अनुभव कर रहा या उसे कैसा लग रहा है, बल्कि मैं ठीक उसी की भाँति पीड़ित हो उठता हूँ और उसकी वेदना को अपने अन्दर अनुभव करने लगता हूँ।”
कहना न होगा कि इस प्रकार की तद्रूपता, एकात्मकता अथवा संवेदना का भाव ही सच्ची सहानुभूति है। आज की सभ्यता में सहानुभूति प्रदर्शन करने का एक रिवाज चल पड़ा है। लोग पीड़ित अथवा दुःखी व्यक्ति के पास जाकर उसकी वेदना, दुःख अथवा दर्द के विषय में पूछताछ करते हैं। सहानुभूति व्यक्त करने का यह शाब्दिक कर्तव्य वास्तविक सहानुभूति नहीं हैं। सच्चे सहानु भावक को किसी का दुःख-दर्द पूछने की आवश्यकता नहीं होती वह पीड़ित को देखते ही उससे तादात्म्य अनुभव करने लगता है और उसके हृदय से स्नेह का अजस्र स्रोत निकल कर चुपचाप पीड़ित को शान्ति एवं सान्त्वना देने लगता है।
कृत्रिम सहानुभूति का प्रदर्शन करना किसी के प्रति निर्दयता व्यक्त करना ही है। किसी की पीड़ा को स्वयं अनुभूत न करने वाला जब उसकी वेदना के विषय में पूछताछ करता है तब वह यही प्रकट करता है कि सच्चा अनुभावक नहीं है।
आये दिन लोग लेखों, भाषणों तथा समाजों में मानव जाति, देश, राष्ट्र तथा समाज के पीड़ित, दुःखी व्यक्तियों के लिए सहानुभूति का प्रदर्शन करते रहते हैं किन्तु क्या वे वास्तव में सहानुभावक होते भी हैं? इस प्रकार की कृत्रिम सहानुभूति दिखलाने वाले व्यक्ति अन्दर से बड़े ही कठोर तथा चतुर होते हैं। वे अपनी मौखिक सहानुभूति के आधार पर दूसरों की सद्भावना को ठगने का प्रयत्न किया करते हैं।
अनेक लोग बाहर समाज में जन-जन के प्रति सहानुभूति, संवेदना, स्नेह, सौहार्द्र, दया तथा दाक्षिण्य का भाव बात-बात में दिखाया करते हैं। ऐसा मालूम होता है कि इनका हृदय हमेशा दूसरों की पीड़ा से ही भरा रहता है। पर क्या वे वास्तव में वैसे होते हैं? बाहर दया, विनम्रता, सहानुभूति अथवा कोमलता दिखलाने वाले यदि अपने घरों में पत्नी को डांटते, बच्चों को मारते-पीटते, अपने आश्रितों के प्रति आक्रमण भाव दिखाते और कठोर व्यवहार करते हैं तो निश्चय ही वे मिथ्याचारी ही हैं। ऊपर से कितने ही कमल-कोमल क्यों न दीखते हो अंदर पाषाण ही होते हैं। ऐसे लोगों का कोई भी भद्र अथवा आर्द्र भाव विश्वास के योग्य नहीं होता।
इस प्रवृत्ति के नकली अनुभावकों के प्रति विद्वान इमर्सन ने एक स्थान पर लिखा है कि ‘इन बाहरी लोगों के लिए प्रेम करना सीखें, पत्नी से प्रेम का व्यवहार करें, आश्रितों तथा पड़ोसियों को अपनी विनम्रता से शीतल बनाएं, अपने हृदय का परिमार्जन कर मानसिक गरिमा का भाव जगायें। अन्य लोगों के साथ नकली सहानुभूति दिखलाने से कहीं अच्छा है कि वे पहले अपने तथा अपनों के प्रति सहानुभूति का अभ्यास करें और मानवता के उदात्त गुणों को अपने अन्दर विकसित करने का ईमानदारी से प्रयत्न करें। कृत्रिम सहानुभूति न तो किसी का भला कर सकती है और न उनको समाज का विश्वास दिला सकती है।”
सच्ची सहानुभूति का परिसार सीमित नहीं होता। जो यथार्थ रूप में संवेदनशील है सहानुभावक है वह आत्मीयजनों के प्रति ही भद्र एवं भावपूर्ण न रह कर संसार के प्रत्येक प्राणी के प्रति संवेदनशील रहता है। उसकी करुणा, कोमलता तथा दयार्द्रता स्री, पुरुष, जड़-चेतन, राष्ट्र, धर्म, काले-गोरे, ऊँच-नीच, निर्बल तथा बलवान में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं मानती। समान रूप से सबके लिए प्रवाहित होती रहती है। ऊँचे हृदय और सच्ची सहानुभूति वाले लोग तो शत्रु की विपत्ति से भी विचलित होकर उसकी सहायता करने के लिए उत्सुक हो उठते हैं।
मात्र हृदय की भावुकता तक ही सीमित रहने वाली सहानुभूति भी अधिक सराहनीय नहीं मानी जा सकती। सजीव होते हुए भी वह जड़ प्रतिक्रिया ही मानी जायेगी। सराहनीय सहानुभूति का भाव वही है जो हृदय में उठते ही क्रिया रूप में गतिशील होने लगे। किसी की पीड़ा देखकर यों ही किंकर्तव्यविमूढ़ होकर खड़े-खड़े आहें भरते रहना अथवा आँसू बहाते रहना कोरी भावुकता है सार्थक सहानुभूति नहीं। यह भावुकता तभी सहानुभूति—सच्ची सहानुभूति—अथवा संवेदना की श्रेणी में आ सकती है जब पीड़ित की पीड़ा दूर करने के लिये यथासाध्य कुछ किया भी जाये। निश्चय ही वह व्यक्ति सच्चा सहानुभावक तथा संवेदनशील है जो किसी की चोट देखकर उसी प्रकार तड़प उठे जिस प्रकार वह पीड़ित तड़पा है और उसी प्रकार आप से आप तकलीफ दूर या कम करने का प्रयत्न करने में लग जाये जिस प्रकार चोट खाया व्यक्ति बिना बाह्य प्रेरणा से आप से आप लग जाता है।
मनुष्य में सहानुभूति एक ऐसा गुण है जो विकास एवं सार्थकता पाकर उसे देवत्व के स्तर तक पहुँच सकता है। सहानुभूति की ऊष्मा पत्थर को भी पिघला कर मोम बना देती है और उसकी शीतल तरंगें शोक से जलते हृदयों में जीवन का संचार कर देती है। सहानुभूति एवं संवेदना के बल पर मनुष्य परायों को अपना बना लेता है। कठोर को कोमल और निर्दयी को दयावान बना लेना सहानुभूति-हृदयी व्यक्ति के लिए किसी भी व्यक्ति की अपेक्षा अधिक सरल तथा सुगम है। बहुत बार देखा जा सकता है कि कम योग्यता का संवेदनशील व्यक्ति दूसरों के बीच उस अधिक योग्यता वाले व्यक्ति से अच्छा स्थान बना लेता है जो असंवेदनशील अथवा सहानुभूति से रहित होता है सहानुभूति प्रधान व्यक्तियों के प्रति लोग उसी प्रकार खिंचते चले आते हैं जिस प्रकार चन्द्रमा की किरणों की ओर समुद्र की तरंगें खिंचा करती हैं।
सहानुभूति कोई दुर्लभ गुण नहीं है। यह तो मनुष्य को नैसर्गिक रूप में यों ही मिल जाता है और यदि एक बार इसकी कमी का आभास हो तो विकसित भी किया जा सकता है। स्वार्थ, लोभ तथा दम्भ की भावना त्याग देने और उसके स्थान पर सेवा, सहयोग तथा विनम्रता को स्थान देने से सहानुभूति का गुण अभावुक हृदय में भी उत्पन्न हो सकता है? दूसरे की पीड़ा उसका हर्ष और सुख-दुख को अपना मान कर चलने और व्यवहार करने वाले सहज ही संवेदनशील बन जाया करते हैं। एक बार यदि सहानुभूति का भाव हृदय में जाग गया तो यही समझना चाहिये कि हमारे आत्म-कल्याण का द्वार उन्मुक्त हो गया। इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुये प्रसिद्ध विद्वान बालजक ने एक स्थान पर कहा है—
“सहानुभूति गरीबों तथा पीड़ियों के प्रति खींचती है। उनकी भूख तथा पीड़ा अपनी भूख तथा पीड़ा अनुभव होती है। सहानुभूति का आर्द्र भाव अनुभावक को तद्रुप बना देता है। दीन दुःखी को देख वह उस समय तक स्वयं भी दीन दुःखी बना रहता है जब तक कि उसका दुःख-दर्द दूर करने के लिए कुछ कर नहीं लेता। किसी की सेवा सहायता में किया हुआ अपना काम वह परमात्मा की उपासना में किया कर्तव्य ही मानता और ऐसा ही अनुभव करता है। प्राणीमात्र से इस प्रकार की एकात्मता अध्यात्म योग की वह कोटि है जो बड़े-बड़े जप, तप तथा साधना-उपासना से भी कठिनता पूर्वक पाई जा सकती है।”
साँसारिक सफलता, आत्मा-शान्ति तथा आध्यात्मिक लाभों के लिये सहानुभूति का भाव अमोध उपाय है। इससे अपनी जेब से खर्च तो कुछ भी नहीं होता किन्तु इसके बदले में जो प्रेम, आशीर्वाद तथा आर्द्रता प्राप्त होती है वह कुबेर के कोष से भी बढ़ कर है। सहानुभूति देना और पाना प्राणीमात्र का कर्तव्य तथा अधिकार है। हम अपनी वेदना सहानुभूति पाने के लिए दूसरे के सामने व्यक्त करते हैं। बच्चा सहानुभूति पाने के लिए अपनी चोट दिखलाता है। सहानुभूति पाने के लिए ही लोग अपनी हानियों तथा हृदय की पीड़ाओं को दूसरों के सामने खोलकर रखते हैं। ऐसी दशा में यदि हम परस्पर सहानुभूति का आदान-प्रदान नहीं करते तो सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने के अधिकारी नहीं हैं।
वेषभूषा में मूल्याँकन नहीं-
बंगाल के प्रसिद्ध नेता वायसराय की कौंसिल के सम्मानित सदस्य श्री कृष्णदास पाल बड़े ही सादे व्यक्ति थे। बाहरी आडम्बर उनको छू तक न गया था। किन्तु उनके पिता तो सादगी और सरलता की साक्षात प्रतिमा ही थे।
एक बार एक अंग्रेज किस कार्य से श्री कृष्णदास पाल से मिलने उनके बंगले पर गया। वह घोड़े पर सवार था। लान में जाकर उसने एक साधारण-सी धोती पहने एक वृद्ध को फूल-पौधों की सँभाल करते देखा। अंग्रेज ने समझा कि यह पाल महोदय का नौकर होगा। बूढ़े को घोड़े की लगाम थमा कर उसने पूछा—क्या पाल महोदय अन्दर हैं? इतने में पाल महाशय अन्दर से आये और वृद्ध के हाथ से घोड़े की लगाम लेकर आगन्तुक अंग्रेज से बोले—’इनसे मिलिये, ये हमारे पूज्य पिताजी हैं।’
अंग्रेज को अपने व्यवहार पर बड़ी लज्जा आई। उसने तपाक से श्री कृष्णदास पाल के पिता से हाथ मिलाया और अपने व्यवहार के लिये क्षमा माँगते हुये कहा- ‘आप भारतीय लोग बड़े सरल और सादे होते हैं। मुझे अपने व्यवहार के लिये खेद है। किन्तु मैंने अपनी इस गलती से यह शिक्षा भी ग्रहण कर ली है कि बिना परिचय के किसी की वेशभूषा देखकर ही उसका मूल्याँकन नहीं करना चाहिये’
पूर्ण भौतिकवादी होने का सबसे बड़ा दण्ड यह है कि ईश्वर के प्रति मनुष्य की आस्था शिथिल हो जाती है। भौतिकवाद और ईश्वरवाद में परस्पर विरोध है। निश्चित है कि जो भौतिकवादी होगा उसकी दृष्टि संसार तक ही सीमित रहेगी और जो ईश्वरवादी है उसकी दृष्टि संसार तक ही सीमित न रहकर लोक-परलोक, पाप-पुण्य, आत्मा और परमात्मा तक जायेगी ही।
‘खाओ पियो और मौज करो’ का सिद्धान्त मानने और उस पर आचरण करने वालों को इतना अवकाश ही कब रहता है कि वे आत्मा-परमात्मा के विषय में कुछ सोच सकें। उन्हें तो खाने-पीने मौज करने के साधन-सामग्री जुटाने में ही अपना सारा समय लगाना होगा। उनकी बुद्धि, उनकी विद्या और उनका सारा परिश्रम-पुरुषार्थ उन्हें उपकरणों के संचय में यापन होता रहेगा। क्योंकि भौतिक ही सही कोई भी उपलब्धि शक्तियों को केन्द्रित कर क्रियाशील बनाये बिना नहीं हो सकती। ‘खाओ पियो और मौज करो’ की वृत्ति स्वाभाविक रूप से तृप्त नहीं होती है। भौतिकवादी कितना और कितने कमाये कितनी ही सम्पत्ति क्यों न संचित कर ले और कितने ही साधन क्यों न इकट्ठे कर लें उसे संतोष अथवा तृप्ति हो ही नहीं सकती। इसके दो कारण हैं एक तो यह वृत्ति स्वयं ही असंतोषिनी होती है दूसरे भौतिक भोगों में तृप्ति कहाँ? आज के साधन कल पुराने हो जाते हैं। नये साधनों की लालसा जाग पड़ती है और नये भी जल्दी ही पुराने हो जाते हैं। इस प्रकार यह चक्र निरन्तर रूप से रात-दिन चलता रहता है। ऐसी दशा में मनुष्य का पूरा जीवन खाओ पियो और मौज करो के साधन जुटाने में ही जुटा हुआ समाप्त हो जाता है। भौतिकता की अतिशयता से ग्रसित मनुष्य के पास इतना अवकाश ही नहीं रहता कि वह उस आदि सत्ता और अनादि कारण परमात्मा के विषय में सोच सके।
बहुत मात्रा में भौतिक साधनों ही का संयच करने के लिये मनुष्य जल्दी ही ईमानदारी, नीति, न्याय तथा धर्म की सीमा छोड़ कर अनुचित एवं असत्य की रेखा में चला जाता है और तब त्वरित गति से संचय में बढ़ता हुआ आत्मा−परमात्मा से इतनी दूर चला जाता है जहाँ पर न तो उसकी आवाज सुनाई देती है और न झलक ही दिखाई देती। साथ ही ईर्ष्या-द्वेष, छल-कपट, असत्य एवं अनीति के लौह आवरण उस ज्योति का मार्ग स्वयं ही रुद्ध कर देते हैं।
इस प्रकार भौतिकता की भयानक लिप्साएँ ईश्वरीय निष्ठा को इस सीमा तक नष्ट कर देती हैं कि मनुष्य अनजान में ही पूरा नास्तिक बन जाता है। एक बार यदि वह शाब्दिक रूप में ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार भी करता रहे भले ही इनकार न करे, तब भी वह आस्तिक सर्वशक्तिमत्ता के प्रति विनम्र न होना, उसका सहारा छोड़ देना अथवा उसके निर्दिष्ट गुणों से पराँमुख हो जाना विशुद्ध नास्तिकता ही है। सच्ची आस्तिकता की पहचान गुण-अवगुण ही हैं। ईश्वर के अस्तिव में ‘हाँ’ अथवा ‘ना’ नहीं।
‘खाओ पियो और मौज करो’ का सिद्धान्त हर पदार्थ तथा हर अवसर का रस चखने की प्रेरणा करता है जिससे बहुत बार खाद्य-अखाद्य तथा कार्य-अकार्य की मर्यादा के प्रति आस्था उठ जाती है जिससे मनुष्य न जाने कितने अखाद्यों का भक्षण करने लगता है और न जाने कितने दुर्व्यसन अपने पीछे लगा लेता है। सुरा-सुन्दरी भोगवादियों के दो ऐसे उपकरण हैं जिनसे कदाचित ही कोई भाग्यवान बचा रह सके। अमर्यादित जीवन जीने के जो दुष्परिणाम शोक, संताप, असंतोष एवं अशाँति के रूप में सामने आते हैं उन्हें बहुधा भोगवादियों को भोगना ही पड़ता है।
जो देश जिस अनुपात से भौतिकवादी एवं भोग-परायण है और जिस अनुपात से उसकी साधना-सामग्री की सुविधा है, वे उसी अनुपात में असंतुष्ट एवं अशाँत हैं। आशंका, सन्देह, तनाव, भय तथा युद्धोन्माद उनकी चिन्तन धारा का अंग बन गये हैं। वे जो कुछ सोच पाते हैं विनाश को सामने रख कर और जो कुछ कर पाते हैं स्वार्थ को सामने रखने कर कर पाते हैं। परोपकार के नाम से किया हुआ उनका प्रवर्तन में किसी निहित स्वार्थ से मुक्त नहीं होता। आज जब शाँति तथा निःशस्रीकरण की कल्याणकारी बात उनके सामने आती है तो उनके अस्तित्व सिहर उठता है शाँति अथवा निःशस्री करण की अवस्था में हम कहीं इतने कमजोर न हो जाएं कि कोई दूसरे हमारे भोग-उपभोगों को छीन ले। भौतिक भोगों के रोगियों के पास आत्मबल अथवा आत्मविश्वास कहाँ? और होती है उनके पास वह निःस्पृहता, वह तत्वदृष्टि जिसके आधार पर भोग साधनों की निःसारता को देख समझ सकें। वे भौतिक भोगों की अचिरंतनता को पशु बल से चिरन्तनता में बदलने की कोशिश में लगे रहते हैं और चाहते हैं कि शेष सारा संसार विनष्ट हो जाता तो हमारे भोग साधन निरापद एवं निष्कंटक हो जाते और तब हम उन्हें आँख मूँद कर इस प्रकार भोगते जैसा कि अब तक भोग पाये हैं और इसी निश्चिन्तता अथवा निष्कंटकता को वे विश्व शाँति की संज्ञा देना चाहते हैं। किन्तु अध्यात्मिकता का मीठा फल ‘शाँति’ इन विचारों एवं कार्यों में कहाँ?
आज संसार में अमेरिका भोगवाद तथा भौतिक साधनों का सर्वोच्च निदर्शन बना हुआ है। उस देश में प्रचुर धन-सम्पत्ति है। अगणित उद्योग, विशालकाय कल-कारखाने तथा वैभव की असीम चकाचौंध है। आदमी का सब काम यंत्र करते हैं और हर द्वार पर एक मोटरकार, खड़ी रहती है। होटले, रेस्ट्राँ, सिनेमा, पार्क, नाचघर, नाटकशाला तथा प्रमोद स्थलों की भरमार है। हर व्यक्ति की आय व्यय से कहीं अधिक है। ऐसा लगता है कि संसार के सारे साधन, सारी सामग्री और सारी लक्ष्मी अमेरिका में ही सिमट कर आ गई है। किन्तु इस सम्पन्नता की स्थिति में वहाँ का जन-जीवन कितना अतृप्त, कितना अशाँत, कितना व्यग्र, कितना व्यस्त और कितना बोझिल है, इसका अनुमान वहाँ प्रति वर्ष होने वाली आत्महत्याओं की रोमाँचकारी संख्या से लगाया जा सकता है।
अमेरिका के प्रसिद्ध समाचार पत्र ‘न्यूयार्क टाइम्स’ में प्रकाशित कुछ दिन पहले की एक रिपोर्ट से पता चला है कि अमेरिका में लगभग बीस हजार व्यक्ति प्रति वर्ष आत्महत्या करते हैं। आत्महत्याओं की यह भयानक संख्या ही वहाँ के अशान्त एवं असफल जन-जीवन को स्पष्ट कर देने के लिये पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त न जाने कितने लोग रोग-शोक से पीड़ित होकर, अशाँति एवं असफलता से दुखी होकर अतृप्ति तथा लालसाओं में घुल-घुल कर मरते होंगे और न जाने कितनी आत्महत्यायें ऐसी होती होंगी जिनका या तो पता न चलता होगा अथवा उन पर पर्दा डाल कर स्वाभाविक मृत्यु घोषित कर दिया जाता होगा।
इन आत्महत्याओं के अनेक कारण हो सकते हैं किन्तु विशेष कारणों में—निराशा, पारिवारिक कलह, आर्थिक कठिनाई, शराब तथा अनीश्वरवाद की गणना की जाती है।
कहना न होगा कि यह सब कारण भौतिक भोगवाद की ही देन हैं। इतने कारोबारी तथा शक्ति सम्पन्न देश में का क्या कारण? भोगवाद का अंत निराशा में ही होता है। भोगवादी शीघ्र ही मिथ्या एवं नश्वर सुखों में अपनी सारी शक्तियाँ नष्ट कर डाला करते हैं जिससे अकाल ही में खोखले होकर निर्जीव हो जाते हैं। ऐसी दशा में न तो उनके लिये किसी वस्तु में रस रहता है और न जीवन में अभिरुचि। स्वाभाविक है उन्हें एक ऐसी भयानक निराशा आ घेरे जिसके बीच जी सकना मृत्यु से भी कष्टकर हो जाये। इस पर भी मुसीबत यह कि उनके आस-पास का भोगपूर्ण वातावरण उन्हें अधिकाधिक ईर्ष्यालु, चिन्तित तथा उपेक्षित बना कर जीने योग्य ही नहीं रखता और वे अनीश्वरवादी होने से, आत्मा-परमात्मा को भूले हुए कोई आधार न पाकर आत्महत्या के जघन्य पाप का ही सहारा लेते हैं।
भोगवादी प्रायः स्वार्थी तथा दूसरों के प्रति निरपेक्ष रहा करते हैं। घर में कोई बीमार है, दुःखी अथवा संतप्त है—किन्तु दूसरे लोग उसकी उपेक्षा करके अपने मनोरंजनों में लगे रहते हैं। दूसरे का दुःख बटाना उनके सिद्धान्त में ही नहीं होता। सुना जाता है कि अमेरिका तथा अन्य पाश्चात्य देशों में पति को मृत्यु शैय्या तक पर छोड़कर पत्नी अपने मनोरंजन कार्यक्रमों में चली जाती है। रोगी माता-पिता को कराहता छोड़ कर सन्तानें दोस्तों के साथ संलग्न हो जाती हैं। कोई भी मनोरंजन के एक भी अवसर को किसी के लिये त्याग नहीं कर सकता। पूरा परिवार एक होते हुए भी सब एक-दूसरे से अलग रहा करते हैं। सुख में भले ही साथ दे दें किन्तु दुःख में कोई किसी को पूछता ही नहीं। साथ ही साधनों में किंचित कमी अथवा संपर्क में रंच नीरसता आते ही पति-पत्नी तथा प्रेमी-प्रेमिकायें सम्बन्ध विच्छेद कर लेते हैं। ऐसी दशा में न जाने कितने निराशा एवं मानसिक तनाव से प्रेरित होकर आत्महत्या कर लिया करते हैं।
अमेरिका जैसे सम्पन्न देश की जनता को भला आर्थिक कठिनाई क्या हो सकती है? और वास्तविक कठिनाई होती भी नहीं। किन्तु भोगवाद का प्रदर्शन पूर्ण जीवन, स्पर्धा पूर्ण रहन-सहन और अधिकाधिक की होड़ उनकी आवश्यकताओं को पूरा ही नहीं होने देती। एक कार से दो कार की कामना उन्हें गरीब अनुभव कराती है। कमरे-कमरे में रेडियो और ऊँचे से ऊँचे होटल, नाचघर अथवा मनोरंजन की हिर्स उनकी आर्थिक कठिनाई को इस हद तक बढ़ा देती है कि जिसकी पूर्ति असम्भव हो जाती है और व्यक्ति अपने को असफल कर जीवन से निवृत्त हो जाता है। आस-पास का भोग-वैभव से भरा कृत्रिम वातावरण उसे जीने ही कब देता है।
शराब जहाँ साक्षात विष है वहाँ ‘खाओ पियो और मौज करो’ के सिद्धान्त का एक अनिवार्य अंग है। जीर्ण भोगों को नवीन बनाने, जीवन में रस लाने और असफल प्रेम की पीड़ा भुलाने के लिये भौतिकवादियों के पास शराब के अतिरिक्त अन्य कोई उपाय ही नहीं होता। निदान हर्ष-शोक, जिन्दगी तथा मनोरंजन के लिये शराब को अनिवार्यता देने से शरीर एवं मस्तिष्क की स्थिति इतनी कमजोर हो जाती है कि जीवन बोझ लगने लगता है और तब एक छोटी-सी भी अप्रियता आत्महत्या के लिये प्रेरित कर देती है।
नास्तिकता अथवा ईश्वर के प्रति अनास्था, ऐसा कौन देती। जिसे आत्मा-परमात्मा में विश्वास होता है वह उसके आधार पर संसार में सब ओर से निराधार होकर भी जिन्दगी की नाव पार निकाल ले जाता है। जिन अभागों के पास यह आधार नहीं होता उनकी जिन्दगी टूटी नाव की तरह एक छोटी-सी लहर से ही अतल में बैठ जाती है। अनीश्वरवारी तनिक सी बात पर इतनी बड़ी सीमा तक निराश, निरुत्साह, नीरस तथा निरुपाय हो जाता है कि उसे आत्महत्या ही एकमात्र ऐसा उपाय सूझता है जिसके आधार पर वह शान्ति पा जाने की आशा करता है।
कहना न होगा कि भौतिक भोगवाद मनुष्य-जीवन के लिये बड़ा भयानक विश्वास है। भौतिक आवश्यकताओं के साथ आध्यात्मिक आस्था ही जीवन को सुखी, शान्त तथा सम्पन्न बना सकती है।
मेरा मुख्य काम पीड़ितों की सेवा करना है-
एक बार महात्मा ईसा अपने विचार प्रकट करने और प्रश्नों का उत्तर देने के लिये एक सभा में बुलाये गये। सभा में पहुँचते ही उन्होंने देखा कि वहाँ उपस्थित एक व्यक्ति हाथ की पीड़ा से बहुत कष्ट पाता हुआ कराह रहा है। महात्मा ईसा तुरन्त उसका उपचार करने में लग गये। उनका यह कृत्य देख विरोधियों ने समझा कि वे सभा की कार्यवाही से कतरा रहे हैं। निदान एक ने व्यंग करते हुये कहा—”ईसा, तू तो शास्त्रार्थ करने आया है फिर उस मुख्य कार्य को छोड़कर हकीमी कैसे करने लगा?”
महात्मा ईसा ने बड़े शान्त भाव से उत्तर दिया—क्या तुममें से कोई ऐसा है, जिसके एक ही भेड़ हो और वह कुयें में गिर जाय तो वह सारा काम छोड़ कर उसे निकालने में न लग जाये?
मेरा मुख्य काम तो पीड़ियों की सेवा करना है, लोगों का दुःख-दर्द दूर करने का है। शास्त्रार्थ तथा व्याख्यान तो जीवन के साधारण कार्यक्रम हैं।
संसार में प्रायः लोग विजय-पराजय, सफलता-असफलता को स्थूल उपलब्धियों से ही नापते हैं। जिसने किसी प्रकार से धन-दौलत, मान-सम्मान अथवा नाम-धाम पा लिया है स्थूल बुद्धि वाले उसे सफल ही मान लेते हैं। वे यह नहीं देख पाते कि इसने जो यह वैभव-विभूति प्राप्त की है उसमें उपायों एवं साधनों के औचित्य पर ध्यान नहीं रखा। जब कि उपायों का अनौचित्य उसकी बहुत बड़ी नैतिक पराजय है।
इसके विपरीत जो व्यक्ति ईमानदारी से प्रयत्न करते हुए भी स्थूल उपलब्धियों को संयोग अथवा अन्य हेतुओं वश नहीं पा सकते। उन्हें सामान्य बुद्धि वाले लोग असफल ही मानते हैं, जबकि अनुपलब्धि को स्वीकार करके भी ईमानदार प्रयत्नों में लगे रहने की सफलता उसकी बहुत बड़ी विजय है।
सफलता-असफलता तथा विजय-पराजय के विषय में इस प्रकार की धारणा रखने वाले व्यक्ति स्थूल दृष्टि से स्थूल उपलब्धियों को ही देख पाते हैं और उनसे ही प्रसन्न एवं प्रभावित हुआ करते हैं। ऐसे लोग पुरुषार्थ एवं कर्म-शीलता का मान-सम्मान करना नहीं जानते। निश्चय ही ऐसे लोग भौतिक विभूतियों के अविवेकशील भक्त होते हैं। उनकी दृष्टि में भौतिक उपलब्धियों के सिवाय मनुष्य के प्रयत्न एवं पुरुषार्थ का कोई मूल्य-महत्व नहीं होता।
तत्वदर्शी बुद्धिमानों का दृष्टिकोण इन स्थूल वादियों से सहमत नहीं होता। वे सफलता एवं विजय का मानदण्ड पुरुषार्थ एवं प्रयत्न को ही मानते हैं। बिना परिश्रम अथवा पुरुषार्थ के विरासत, संयोग अथवा प्रारब्धवश नाम-धाम अथवा धन-दौलत पा जाने वालों को वे सफल व्यक्तियों की श्रेणी में नहीं रखते और गर्हित उपायों का अवलम्बन लेकर सफल होने वालों की ओर तो वे उतना भी ध्यान नहीं देते, जितना कि प्रारब्ध-प्रसन्न व्यक्तियों की ओर। उनका विश्वास होता है कि सफलता अथवा विजय का सम्बन्ध मनुष्य के पुरुषार्थ एवं परिश्रम से ही होता है उपलब्धियों से नहीं। जिनको किन्हीं उपलब्धियों के लिये परिश्रम, प्रयत्न, पुरुषार्थ एवं संघर्ष न करना पड़ा हो तो सफलता का श्रेय उनकी किस विशेषता से, किस गुण से जोड़ा जायेगा। उपलब्धियाँ स्वयं में कोई सफलता नहीं हैं। यह तो सफलता के परिचायक प्रतीक मात्र होती हैं। प्रतिद्वन्द्वी के ‘पस्त-हिम्मत’ होने के कारण को पहलवान अखाड़े में उतरे बिना ही विजयी घोषित कर दिये जाने से ही विजयी नहीं माना जा सकता। उसकी विजय की घोषणा तो वास्तव में प्रतिद्वन्द्वी की साहसहीनता की सूचना होती है। इस प्रकार की घटना में यह घोषणा प्रस्तुत पक्ष की विजय की नहीं, निरस्त पक्ष के पराजय की होनी चाहिये।
पुरुषार्थ में विश्वास रखने वाले सच्चे कर्मवीर जीवन में कभी असफल अथवा परास्त नहीं होते। उनकी पराजय तो तब ही कही जा सकती है जब वे एक बार की असफलता से निराश होकर निष्क्रिय हो जायें और प्रयत्न के प्रति उदासीन होकर हथियार डाल दें। सच्चा कर्म योगी एक क्या हजार बार की असफलता से भी पराजय स्वीकार नहीं करता। जीवन के अन्तिम क्षण तक उपलब्धियों का मुख न देख सकने वाले प्रयन्त निरत कर्मवीरों को असफल अथवा पराजित कौन—किस मुँह से —कहने का साहस कर सकता है?
इतिहास ऐसे न जाने कितने कर्मवीरों की गौरव-गाथा से भरा पड़ा है, जो जीवन-संग्राम में अनेक बार हार के भी नहीं हारे, और ऐसे उदाहरणों की भी कमी नहीं कि विजयी होने पर भी जिनका नाम पराजितों की श्रेणी में ही लिखा गया। राणा प्रताप, पोरस तथा पृथ्वी चौहान ऐसे ही कर्मवीरों में से हैं जो स्थूल रूप से हार कर भी नैतिक रूप से पराजित नहीं हुए। शृंखलाओं के संकटों के बीच भी उन्होंने अपने को पराजित स्वीकार नहीं किया। जीवन का अन्तिम अणु-कण संघर्ष के क्षेत्र पर लगा देने के बाद भी विजय न पा सकने वाले वीर आज भी विजयी व्यक्तियों के साथ ही गिने जा सकते हैं। उनकी परिस्थितियां अवश्य हारी किन्तु उनके प्रयत्न पराजित न हुए। यही उनकी विजय है जिसे यशस्वी कर्मवीरों के अतिरिक्त साधन सम्पन्नता के बल पर संयोगिक विजय पाने वाले कर्महीन कायर कभी नहीं पा सकते।
अकबर, अशोक और उलाउद्दीन खिलजी जैसे विजयी उन व्यक्तियों में से हैं जिनकी जीत भी आज तक हार के साथ ही लिखी जाती है। कलिंग का श्मशान बन जाना एक विजय थी और अशोक का नगर पर अधिकार कर लेना एक पराजय। पद्मिनी का जल जाना, भीमसिंह और गोरा बादल का जौहर कर डालना एक विजय थी और चित्तौड़ पर खिलजी का अधिकार एक पराजय थी। वन-वन फिर कर घास की रोटी खाने वाले प्रताप की आपत्ति एक विजय और मेवाड़ पर अकबर का झंडा फहराना एक पराजय। ऐसी पराजय थी जिसे अकबर ने स्वयं स्वीकार किया था। जय-पराजय की इन गाथाओं में हार-जीत का मानदण्ड आदर्श पुरुषार्थ, पराक्रम, साहस, धैर्य एवं प्रयत्न ही रहा है। राज्य अथवा नगरों पर अधिकार नहीं।
परिस्थितियों के सम्मुख घुटने टेकने और असफलता के बाद दूने उत्साह से उठने वाले कभी भी परास्त नहीं कहे जा सकते फिर चाहे वे कभी स्थूल विजय के अधिकारी भले ही न बने हों। हारना वास्तव में वह है, असफल उसे ही कहा जा सकता है, जो एक बार गिर कर उठने की हिम्मत खो देता है। एक बार की असफलता से निराश होकर मैदान से हट जाता है। पिछली पराजय से पस्त हिम्मत न होकर अगली सफलता के लिये प्रयत्न करने वालों की पिछली असफलताओं का सारा अपवाद स्वयं ही मिट जाया करता है। इसीलिये विजय का यशस्वी श्रेय लेने वाले फल के प्रति उत्सुक न रह कर प्रयत्न एवं पुरुषार्थ में ही लगे रहते हैं।
असफलताओं के आघात से निराश होकर बैठ रहना सबसे बड़ी कायरता है। असफलताओं की कसौटी पर ही मनुष्य के धैर्य, साहस तथा लगनशीलता की परख होती है। जो इस कसौटी पर खरा उतरता है वही वास्तव में सच्चा पुरुषार्थी और अपने ध्येय का धनी होता है और ऐसे ही कर्मवीरों को विचारवान लोग असफल होने पर भी सफल ही मानते हैं। जीवन में निर्विरोध अथवा निरन्तर सफलताओं की परम्परा गर्व-गौरव अथवा हर्षातिरेक का विषय नहीं है। असफलता का आघात पाये बिना मनुष्य पूर्ण रूप से परिपक्व नहीं हो पाता। उसके मन, बुद्धि तथा आत्मा में कच्चापन बना रहता है। उसकी एकांगी विजय न तो सरस हो पाती है और न संतोषप्रद। परिश्रम के बाद विश्राम और कष्टों के बाद सुविधा की तरह ही सफलता का आनन्द असफलता के बाद ही आता है। असफलता के अभाव में अनुभवों से रहित व्यक्ति दुनिया को ठीक से नहीं समझ पाता।
मनुष्य का निरन्तर सफल होते जाना बहुत अधिक हितकर नहीं होता। ऐसी ही स्थिति में वह अपने पुरुषार्थ पर भरोसा करने के बजाय प्रारब्ध पर भरोसा करने लगता है। उसे अपने प्रारब्ध पर अन्धविश्वास हो जाता है और अपने को एक चमत्कारी व्यक्ति समझने लगता है। उसे सफलताओं में अति विश्वास हो जाने से अभिमान हो जाता है। प्रयत्न के प्रति उदासीन और अवरोधों के प्रति असावधान हो जाता है। एक साथ सफलताओं को पाते जाने से मनुष्य अन्दर से इतना कमजोर हो जाता है कि जब कभी उसको सहसा असफलता का सामना करना पड़ जाता है तो वह एकदम इतना निराश, निरापद तथा निष्क्रिय होता है कि फिर उठ ही नहीं पाता। निरन्तर सफल होते रहने वाले व्यक्ति कभी ही आई हुई असफलता से इतने घबरा जाते हैं कि आत्महत्या तक कर बैठते हैं। असफलता से शून्य सफलता कभी भी निरापद नहीं होती।
असफलता अथवा पराजय से निराश एवं निष्क्रिय न होना तो एक नैतिक विजय है ही, साथ ही आगे चल कर उसकी असफलता निरन्तर प्रयत्नशीलता एवं एकनिष्ठ लगन के बल पर स्थूल विजय में भी बदल जाती है जो व्यक्ति अपने उद्देश्य के लिये यथासाध्य उद्योग में कमी नहीं रखता वह अवश्य ही अपने ध्येय में सफल हो जाता है। अब्राहम लिंकन अपने जीवन में सैकड़ों बार असफल हुए, महात्मा गाँधी ने सैकड़ों बार असफलताओं का मुँह देखा, वैज्ञानिक अपनी खोजों के प्रयत्नों में न जाने कितनी बार असफल होते रहते हैं किन्तु तब भी वे अपनी एकनिष्ठ लगन एवं अखिल प्रयत्नरत रहने से अन्ततः अपने उद्देश्य में सफल ही हुए और होते जाते हैं। हुमायूँ अपना राज्य वापस लेने के प्रयत्न में इक्कीस बार हारा किन्तु अन्त में अपनी लगनशीलता एवं पुरुषार्थ के पुरस्कार स्वरूप उसने दिल्ली का राज सिंहासन पठानों से छीन ही लिया। सच्ची लगन तथा निर्मल उद्देश्य से किया हुआ प्रयत्न कभी निष्फल नहीं जाता।
मुमुक्षु साधक अपनी आत्मा की मुक्ति के लिये अबाध प्रयत्न ही नहीं तप भी किया करते हैं। वे एक दो वर्ष तक ही नहीं जन्म−जन्मांतरों तक अपने प्रयास में लगे रहते हैं और अन्त में अपने पावन ध्येय को पा ही लेते हैं। जरा-जरा सी असफलताओं से निराश होकर विरत प्रयत्न हो जाने वाले सुकुमार व्यक्तियों को तपस्वी मुमुक्षुओं की दृढ़ता से शिक्षा लेनी चाहिये कि अपनी ध्येय पूर्ति के लिये किये जाने प्रयत्नों में एक क्या अनेक जन्मों की असफलताओं को कोई महत्व नहीं देते।
संसार में ईसा, सुकरात, तुलसी, ज्ञानेश्वर, तुकाराम आदि न जाने कितने महात्मा एवं महापुरुष ऐसे हुए हैं जिनको जीवन भर असफलताओं, संकटों तथा विरोधों का सामना ही करना पड़ा। किन्तु वे एक क्षण को भी न तो अपने ध्येय से विचलित हुए और न निराश ही। वे तन-मन से अपने प्रयत्न में निरन्तर लगे ही रहे जिसका परिणाम यह हुआ कि अपने जीवन के बाद संसार ने उन्हें परमात्मा के रूप में पूजा, उन्हें जीवन का आदर्श बनाया और उनके स्मारक स्थापित किये। उनके जीवन की पराजय जीवनोपरान्त महान विजय में बदल गई।
किन्तु पराजय से विजय और असफलता से सफलता का जन्म होता तभी है जब मनुष्य उनसे नई शिक्षा, नई स्फूर्ति, नया साहस और नया अनुभव लेकर आगे बढ़ता रहता है। जिसने असफलता को केवल असफलता समझ कर छोड़ दिया उसकी उपेक्षा कर दी और उससे किसी शिक्षा का लाभ नहीं उठाया तो उसकी मूल्यवान असफलता मात्र असफलता बन कर ही रह जाती है और तब ऐसी असफलता का सफलता अथवा पराजय का विजय में बदलना कठिन हो जाता है।
कुछ तो कर, यों ही मत मर-
रायगढ़ के राजा धीरज के अनेक शत्रु हो गये। एक रात शत्रुओं ने पहरेदारों को मिला लिया और महल में जाकर राजा को दवा सुँघा कर बेहोश कर दिया। उसके बाद उन्होंने राजा के हाथ-पाँव बाँध कर एक पहाड़ की गुफा में ले जाकर बन्द कर दिया।
राजा को जब होश आया तो अपनी दशा देखकर घबरा उठा। उस अंधेरी गुफा में उसे कुछ करते-धरते न बना। तभी उसे अपनी माता का बताया हुआ मंत्र याद आ गया, “कुछ कर, कुछ कर, कुछ कर”। राजा की निराशा दूर हो गई और उसने पूरी शक्ति लगाकर हाथ-पैरों की डोरी तोड़ डाली। तभी अंधेरे में उसका पैर साँप पर पड़ गया जिसने उसे काट लिया। राजा फिर घबराया, किंतु फिर तत्काल ही उसे वही मंत्र “कुछ कर, कुछ कर, कुछ कर” याद आ गया। उसने तत्काल कमर से कटार निकालकर साँप के काटे स्थान को चीर दिया। खून की धार बह उठने से वह फिर घबरा उठा! लेकिन फिर उसी “कुछ कर, कुछ कर, कुछ कर” के मन्त्र से प्रेरणा पाकर अपना उत्तरीय फाड़कर घाव पर पट्टी बाँध दी जिससे रक्त बहना बन्द हो गया।
इतनी बाधायें पार हो जाने के बाद उसे उस अँधेरी गुफा से निकलने की चिन्ता होने लगी साथ ही भूख-प्यास भी व्याकुल कर ही रही थी। उसने अँधेरे में निकालने का कोई उपाय न देखा तो पुनः निराश होकर सोचने लगा कि अब तो यहीं पर बन्द रहकर भूख-प्यास से तड़प कर मरना होगा। वह उदास होकर बैठा ही था कि पुनः उसे माँ का बताया हुआ मन्त्र ‘कुछ कर, कुछ कर, कुछ कर’ याद आ गया और द्वार के पास आकर गुफा के मुख पर लगे पत्थर को धक्का देने लगा। बहुत बार प्राणपण से जोर लगाने पर अन्ततः पत्थर लुढ़क गया और राजा गुफा से निकलकर अपने महल में वापस आ गया।
समाज में आगे बढ़ने और ऊँचे उठने की एक स्वाभाविक स्पर्धा चला करती है। हर व्यक्ति दूसरे से अच्छा पद पाने, प्रतिष्ठा पा जाने, धनवान बनने तथा शक्तिशाली हो जाने का यथासाध्य प्रयत्न किया करता है। यह स्पर्धा अथवा प्रतियोगिता का भाव अच्छा है। इसी की प्रेरणा से समाज की उन्नति होती है, व्यापार, व्यवसाय तथा धन-दौलत बढ़ी है, कलाकौशल तथा विद्या बल का विकास हुआ है। प्रतियोगिता की भावना हृदय में प्रेरणा, स्फूर्ति तथा उद्योग के गुण उत्पन्न कर देती है।
जिन समाजों से प्रतियोगिता की भावना निकल जाती है, उनका विकास अवरुद्ध हो जाता है। हर आदमी अपनी संकीर्ण सीमा में पड़ा-पड़ा घुटा अथवा घसीटा करता है। उसकी सारी शक्तियाँ अनुद्योग से निष्क्रिय होकर नष्ट हो जाती हैं। जब तक ऊपर उठने और आगे बढ़ने की भावना रहती है, मनुष्य उसके उपाय सोचता है। इससे बुद्धि का उपयोग होता है और उसमें अधिकाधिक तीक्ष्णता तथा सूझ-बूझ का समावेश होता रहता है। बुद्धि ऐसा तत्व है, मस्तिष्क ऐसा यन्त्र है कि जिसका जितना अधिक उपयोग किया जाता है वह उतना ही अधिक सक्षम, शक्तिशाली तथा उपयोगी बनता जाता है।
सुनियोजित योजना बनाना उन्नति के लिए आवश्यक है। ऊँचे उठने के इच्छुक उसे बनाते हैं। उनकी सक्रिय बुद्धि उस दिशा में काम करती है। योजना बना जाने पर उसे कार्यान्वित करने के लिए परिश्रम करना पड़ता है। दौड़-धूप, समझ-बूझ, अध्ययन अध्यवसाय सभी का सहारा लेना पड़ता है। इसके बिना कोई भी काम पूरा नहीं हो सकता। इस प्रकार की सक्रियता से शारीरिक शक्ति का विकास होता है, जो मनुष्य को अधिकाधिक स्वस्थ तथा आगे बढ़ने के योग्य बनाती है।
सुनियोजित क्रम से परिश्रम, पुरुषार्थपूर्वक चलने में सफलता मिलती ही है, जो अगली सफलताओं के लिए उत्साहित तथा योग्य बनाती हैं। आत्म-विश्वास बढ़ाती और अगला कदम उठाने के लिए साहस उत्पन्न करती है। जीवन में प्रसन्नता तथा प्रफुल्लता का समावेश करती है। किन्तु यह सब होता तब है जब मनुष्य में आगे बढ़ने और ऊँचा उठने की भावना रहती है। उन्नतिशील समाजों में यह भावना, यह प्रतियोगिता और यह स्पर्धा होती ही है। जिससे वे सजीव तथा श्रेयवान बने रहते हैं।
स्पर्धा तथा प्रतियोगिता की भावना मनुष्य को उन्नति करने की प्रेरणा देती है, यह बात निश्चित है। किन्तु जब इस सत्वृत्ति की दिशा बदल जाती है अथवा आत्मा विकृत हो जाती है तब यह मनुष्य के पतन का कारण बन जाती है। स्पर्धा अथवा प्रतियोगिता के भाव में जब ईर्ष्या, द्वेष, डाह, जलन अथवा असूया का मिश्रण हो जाता है तब यही गुण दोष बन कर उसी प्रकार हानिकारक बन जाता है जिस प्रकार विष मिला दूध। इसलिए मनुष्य को स्पर्धा अथवा प्रतियोगिता की भावना में ईर्ष्या के दोष से सावधान रहना चाहिए।
हल्की तथा ओछी मनोभूमि के व्यक्तियों की प्रतियोगिता में प्रायः ईर्ष्या की भावना आ जाने का भय रहा करता है। उसका एक मनोवैज्ञानिक कारण है। आगे बढ़ने अथवा उन्नति करने के लिए जिस पथ का अवलम्बन किया जाता है वह सामान्य रूप से सरल तथा सुगम नहीं होता। उसमें कदम-कदम पर विरोध तथा अवरोध आ सकते हैं। असफलता तथा पीछे हटने की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। निराशा तथा अनुत्साह के बादल घिर सकते हैं। लाभ के साथ कभी-कभी हानि भी हो सकती है। वाँछित लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मार्ग में त्याग तथा उत्सर्ग की परीक्षा देनी पड़ सकती है। इस प्रकार के व्यवधान एवं व्याघात हल्की मनोभूमि वाले के लिये सह सकना सरल नहीं है। ध्येय मार्ग पर आई बाधाओं अथवा अवरोधों को दूर करने के लिये जिस धैर्य तथा आत्मशक्ति की आवश्यकता होती है अमनीषी व्यक्ति में उसकी कमी हुआ करती है।
दुर्बल मना व्यक्ति जरा सी असफलता आते ही आगे के लिए निराश एवं हतोत्साह हो जाता है। उसके हाथ पैर फूल जाते हैं और पुनः प्रयत्न करने के बजाय वह बैठ कर अपनी असफलता पर शोक करने लगता है, भाग्य को कोसने और समाज अथवा ईश्वर का दोष देने लगता है। उसके इस विलाप-कलाप में तब तक वह समय, वह अवसर और वे परिस्थितियाँ निकल जाती हैं, निराश होकर न बैठे रहने पर वह जिनका उपयोग अनागत असफलता के लिए कर सकता है। बाधाओं को देखकर डर जाना, अवरोधों से अधीर हो जाना, तुच्छ मनोभूमि वाले व्यक्तियों का स्वभाव बन जाता है। इस प्रकार की दुर्बलताओं का रोगी व्यक्ति स्पर्धा पूर्ण प्रगति के सर्वथा अयोग्य होता है। वह जीवन की उन्नतिशील प्रतियोगिता से खिलाड़ी की भावना रखने में असमर्थ रहता है।
जीवन की प्रतियोगिता में खिलाड़ी की भावना से रहित व्यक्ति में दूसरे के प्रति ईर्ष्या हो ही जाती है। वह अपने से आगे जाने वाले का अशुभ तथा अहित चिन्तन करने लगता है। वह प्रयत्नपूर्वक स्वयं बढ़ने के बजाय आगे बढ़ने वाले उद्योगी को पीछे खींचने, गिराने अथवा हानि पहुँचाने की दूरभिसंधियां किया करता है। अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति अथवा हल्की मनोभूमि के कारण वह अपने को दूसरे से हारा हुआ मान लेता है। इस हीन भावना के कारण उसमें असन्तोष की आग पैदा हो जाती है, जिससे जल-जल कर उसकी न केवल शाँति ही नष्ट होती है बल्कि उन शक्तियों का ही ह्रास होता रहता है जिनके आधार पर वह पुनः उठकर आगे बढ़ सकता है।
ईर्ष्यालु व्यक्ति में डाह की आग के साथ परनिन्दा तथा परदोष दर्शन की दुर्बलता भी आ जाती है। मनुष्य का यह निकृष्ट दोष तो उसके सारे जीवन को ही चौपट कर देता है। डाह के कारण वह दूसरे की उन्नति न देख सकने के कारण उसके पतन की इच्छा किया करता है। वह आगे बढ़कर उसे पीछे कर सकने की हिम्मत तो रखता नहीं, इसलिये उसके पास केवल एक ही उपाय और एक ही साधन रह जाता है कि “इस उन्नतिशील व्यक्ति को समाज में बदनाम किया जाये, दूसरों की दृष्टि में गिराया जाये, उसे दुर्गुणी, दोषी तथा अहितकारी सिद्ध किया जाये। उसकी शक्ति, सामर्थ्य, क्षमता तथा गुणों पर कीचड़ उछाली जाये जिससे कि समाज उसके विरुद्ध हो जाय, उसे सहायता, सहयोग तथा सहानुभूति का अभाव हो जाये। ऐसी अवस्था में स्वाभाविक है कि उसकी प्रगति रुक जायेगी। उसका धैर्य, उसकी सामर्थ्य अपना अपवाद मिटाने और समाज को अनुकूल बनाने में उलझ जायेगी और वह लक्ष्य पथ से भटक कर कटीले झाड़-झंखाड़ों में फँसकर यथास्थान रह जायेगा। लोग उसे घृणा की दृष्टि से देखेंगे उसकी आलोचना तथा भर्त्सना करेंगे जिससे उसका व्यक्तित्व मलीन होगा, उत्साह, साहस एवं आशा की हानि होगी जो कि निश्चय ही उसकी अवनति का हेतु बनेगा।”
अपनी इस निकृष्ट दुरभिसंधि से प्रेरित होकर डाह का दोषी व्यक्ति उन्नतिशील व्यक्तियों की स्थान-स्थान तथा जन-जन से निन्दा करना शुरू कर देता है। वह उनकी उन्नति में दूसरों के शोषण, धोखा देही, बेईमानी, मक्कारी तथा चालाकी को आधार बतलाता है। वह लोगों को समझाने का प्रयत्न किया करता है कि अमुक व्यक्ति का विकास उसकी उन्नति और उसकी बढ़ोतरी साथियों, सहयोगियों, बंधु-बाँधवों और यहाँ तक कि समाज के लिये अहितकर होगी। निन्दक दावा किया करता है कि यदि अमुक व्यक्ति की प्रगति न रोकी गई तो यह अन्य प्रगतिशील तथा उन्नति चाहने वाले व्यक्तियों के लिये अवरोधक चट्टान की तरह बन जायेगा। दूसरों के हितों तथा अधिकारों का हनन एवं हरण करेगा। समाज पर छा कर दूसरों का प्रभाव हटाकर अपना प्रभाव जमा लेगा। इस प्रकार ईर्ष्यालु व्यक्ति उन्नतिशील व्यक्तियों के लिए न जाने कहाँ-कहाँ की ओर किस-किस प्रकार की ऊट-पटाँग बातें किया करते हैं। जिस पर मूर्खता की बात यह है कि यह भी समझते हैं कि वे एक बड़ा काम कर रहे हैं। अपने लिये उन्नति का विकास का मार्ग खोल रहे हैं। दुर्भाग्यवश उन्हें अपनी इस मूर्खतापूर्ण बुद्धिमानी पर बड़ा सन्तोष होता है। खेद है कि ईर्ष्यालु द्वेष के आवेश में वे यह नहीं सोच पाते कि इस प्रकार की अनुचित गतिविधि कर वे अपने पैरों में ही कुल्हाड़ी मार रहे हैं अपने ही भविष्य में काँटे बोते जा रहे हैं।
इस प्रकार परदोष दर्शन तथा निन्दा के कुत्सित व्यवसाय में लगकर ईर्ष्यालु व्यक्ति इसके अतिरिक्त किसी योग्य नहीं रह जाता। दूसरों के दोष देखते-देखते और झूँठी-सच्ची निन्दा करते-करते वह स्वयं उन दोषों का शिकार बन जाता है। जो समय तथा शक्ति उसे अपनी उन्नति में लगाना चाहिए उसे वह इस व्यर्थ तथा भर्त्सना योग्य कार्यवाही में लगाता रहता है। साथ ही बुद्धिमानों को यह समझते देर नहीं लगती कि अमुक व्यक्ति जो कुछ कह रहा है उसका आधार सत्य न होकर उसकी अपनी ईर्ष्या है जो उसे दूसरों से द्वेष करने के लिए प्रेरित कर रही है। इस प्रकार ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की दृष्टि में और भी गिर जाता है। उसे उतना भी सहयोग नहीं मिल पाता जितने का वह सामाजिकता के नाते अधिकारी होता है। उन्नति एवं विकास के लिए स्पर्धा तथा प्रतियोगिता की भावना एक प्रेरक तत्व है। किन्तु तब-जब उसमें ईर्ष्या अथवा द्वेष का दोष न आने दिया जाये और जीवन मंच पर अभिनेता की भावना रक्खी जाये। जलन के वशीभूत होकर दूसरे की टाँग खींचने के लिये उसके दोष देखना अथवा निन्दा करना छोड़कर अपने से आगे बढ़े हुओं के गुणों की खोज करना और उन्हें अपने में विकसित करने का प्रयत्न करना चाहिए जिनके बल पर अगला व्यक्ति आगे बढ़ा है। गुणग्राही तथा दूसरों की सफलताओं को प्रशंसा की दृष्टि से देखने वाले उन हीन भावनाओं के शिकार नहीं बनते जो कि उन्नति-पथ पर अवरोध बनकर खड़ी हो जाती है। दूसरों के गुण देखने, उनकी प्रशंसा तथा चिन्तन करने से वे गुण स्वयं अपने में भी आ जाते हैं तब कोई कारण नहीं कि उन गुणों को पाकर, जिनके बल पर कोई आगे बढ़ा है, कोई दूसरा नहीं बढ़ सकता। अपनी सूझ-बूझ तथा अधिक परिश्रम एवं पुरुषार्थ के बल पर जो हमें पीछे छोड़कर आगे बढ़ गये हैं वे हमारी ईर्ष्या के नहीं, प्रशंसा तथा अनुकरण शीलता के निदर्शन हैं। हमें उनकी सफलता को श्रेय देना ही चाहिये। जीवन क्षेत्र में उदार तथा उदात्त भावना के साथ जो प्रतियोगिता में रहता है वह अवश्य ही आगे बढ़ता है और आगे-पीछे अपने लक्ष्य में सफल होकर ही रहता है।
अब तू मेरी सच्ची बेटी है—
हजरत मोहम्मद एक दिन फातिमा से मिलने उसके घर गये। वहाँ जाकर देखा उनकी बेटी हाथों में चाँदी के मोटे-मोटे कंगन पहने हैं और दरवाजों पर रेशमी परदे लहरा रहे हैं। मोहम्मद साहब बिना कुछ बोले उल्टे पाँव घर से वापस चल दिये और मस्जिद में जाकर रोने लगे।
फातिमा कुछ न समझ सकी। उसने अपने लड़के को दौड़ाया कि देख तो तेरे नाना घर आकर एकाएक वापस क्यों चले गये।
लड़के ने जाकर देखा कि नाना मस्जिद में बैठे रो रहे है। उसने घर से एकाएक वापस चले आने और इस प्रकार रोने का कारण पूछा। मुहम्मद साहब ने कहा—’वहाँ गरीब भूख से परेशान होकर मस्जिद के सामने रो रहे हैं और वहाँ मेरी बेटी रेशमी परदों के बीच चाँदी के कड़े पहने मौज कर रही है—यह देखकर मुझे बड़ी शर्म आई और मैं मस्जिद में वापस चला आया।’
लड़के ने जाकर अपनी माँ को सारी बातें बतलाई। फातिमा ने रेशमी परदों में चाँदी के कड़े बाँधकर पिता के पास भिजवा दिये। मोहम्मद साहब ने उन्हें बेचकर गरीबों को रोटी बाँटी और खुशी से जाकर अपनी बेटी से मिले और बोले—अब तू मेरी सच्ची बेटी है।
गन्दगी मनुष्य के लिये कलंक कही गई है और निःसन्देह वह कलंक है भी। कलंक में काले पन की कल्पना की गई है—मलीनता में भी काले पन का समावेश रहता है। कोई भी चीज ज्यों-ज्यों गन्दी होती जाती है उसका रंग भी काला होता जाता है। जिस प्रकार लोग कलंकी अथवा कलंक के प्रति घृणा का भाव रखते हैं उसी प्रकार गन्दे आदमी के साथ भी । लाँछित व्यक्ति के संपर्क की तरह कोई भी गन्दे आदमी का संपर्क पसन्द नहीं करता। कलंक से निन्दा, अपवाद अथवा अपयश का जन्म होता है जो कि लोक से लेकर परलोक तक नारकीय स्थिति बनाये रहता है। उसी प्रकार गन्दगी के बीच गन्दा मनुष्य जीता-जागता नरक भोगता और उसी मलीन स्थिति में शरीर छोड़ने से तदनुरूप अधम एवं मलिन लोकों का भोक्ता बनता है। जीवन एवं जीवनोपरान्त नरक की व्यवस्था करने वाली गन्दगी निःसन्देह मनुष्य के लिये कलंक ही है, जिसे पास न आने देना मनुष्य का न केवल नैतिक प्रत्युत आध्यात्मिक धर्म भी है।
गन्दे वस्त्र, गन्दा शरीर तथा गन्दे हाथ, पैर, नाक, कान आदि लेकर समाज में आने-जाने वाला व्यक्ति आत्महीनता तथा अप्रसन्नता का दण्ड भोगता है। हर भला आदमी यदि उसको पास से उठा न देगा तो कम से कम परेशानी तो अनुभव करेगा, जिसका भान होते ही जब वह समाज में साफ-सुथरे वस्त्रों एवं शरीर वाले व्यक्तियों के बीच अपनी मलीन एवं दुर्गन्धित दशा पर दृष्टि डालेगा तो तत्काल ही उस पर हीनता की प्रतिक्रिया होगी। तब वह या तो उठ कर चल देगा और या उपस्थित रह कर हीनता की मानसिक यातना सहन करेगा, जो कि उसके मन, मस्तिष्क, आत्मा एवं शरीर के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डालेगी। स्वच्छता के बीच अपनी गन्दगी का भान होने पर मनुष्य जितनी देर उसके बीच बना रहेगा आत्मग्लानि अथवा आत्महीनता का दंश उसके रक्त को जलाता रहेगा।
प्रायः लोग गन्दे आदमी को उसकी इस वृत्ति के लिये टोक भी देते हैं। कभी-कभी कुछ असहनशील व्यक्ति गन्दगी और पसीने से गंधाते व्यक्ति से दूर हट कर बैठने तक को कह बैठते हैं। ऐसे तिरस्कारपूर्ण व्यवहार की स्थिति में शालीन मनुष्य में यदि जरा भी आत्मसम्मान का अंश होगा तो वह लज्जा से जमीन में गड़ जायेगा अथवा असभ्यतामय विवाद करने पर उतर आयेगा। यह दोनों स्थितियाँ पराकाष्ठा तक अप्रसन्नता पूर्ण हैं। गन्दा रह कर तिरस्कार के अवसर की सम्भावना सजग करना बुद्धिमानी नहीं जड़ता है, जो मनुष्य जैसे परिष्कृत प्राणी को जरा भी शोभा नहीं देती। यह बात सही है कि किसी कारण से किसी को दुत्कारना न चाहिये, किसी का तिरस्कार करना अशोभनीय है। सच्चा मानव-धर्म तो इसी में है कि दूरी होने पर भी मलीन मनुष्य की गन्दगी सह लेनी चाहिये। न तो उसको दुत्कारना चाहिये और न तिरस्कार करना चाहिये। ऐसे असहनशील की दूसरे भद्र व्यक्ति भर्त्सना कर सकते हैं किन्तु गन्दे आदमी को चूँ करने तक का अधिकार नहीं है। क्योंकि अपनी मलीनता के कारण उसने स्वयं ही अपने को उसके योग्य बना रखा होता है।
स्वच्छता भगवान की समीपता बतलाई गई है। जो शुद्ध-शुचि और स्वच्छ है वह एक प्रकार से ईश्वर के सन्निकट ही रहता है। गन्दे और मलीन मनुष्य के समीप मनुष्य तक आना पसन्द नहीं करता तब भगवान जो शुद्ध, बुद्ध एवं परम पवित्र है, गन्दे आदमी के समीप आना क्यों पसन्द करेगा। जिस स्थान पर भगवान अथवा उनके प्रतिनिधि देवताओं का आह्वान किया जाता है असस्थान को विशेष रूप से रमणीय, पवित्र तथा स्वच्छ बनाया जाता है। गन्दगी से क्या मनुष्य और क्या परमात्मा सब को घृणा होती है। मनुष्य तो मनुष्य पशु-पक्षी तक गंदगी पसन्द नहीं करते। कुत्ता जहाँ बैठता है पूँछ हिला कर झाड़ लेता है। बिल्ली गन्दे स्थान पर पाँव रखने में झिझकती है। इस प्रकार पशु-पक्षियों तक में स्वच्छता के प्रति प्रेम पाया जाता है तब जो मनुष्य होकर गन्दा रहता है उसे तो पशु-पक्षियों तक से गया-गुजरा समझना चाहिये।
पावन प्रसन्नता परमात्मा की ही अनुभूति होती है। जिसका मन प्रसन्न है, बुद्धि निर्विकार है , शरीर स्वच्छ एवं स्वस्थ है आत्मा निर्मल एवं उज्ज्वल है उसे परमात्म अनुभूति जैसा ही आनन्द आता है। गन्दा और गन्दे स्थान पर रहने वाला मनुष्य उस पावन प्रसन्नता की अनुभूति कदापि नहीं कर सकता । संसार में चारों ओर परमात्मा का प्रकाश बिखरा पड़ा है। स्वच्छ एवं निर्मल व्यक्ति उसे पाते, देखते और अनुभव करते हैं। उस सर्वसुलभ, सर्वव्यापक एवं सर्वकालिक परमात्म प्रकाश को अशुचि व्यक्ति कदापि नहीं पा सकता। जिनका मन और स्थान शुद्ध, स्वच्छ तथा सुन्दर है, वह प्रकाश उनके चारों ओर प्रतिबिम्बित होता है। किन्तु मलीन मनुष्य उससे सर्वथा वंचित ही रहता है। जिस प्रकार गन्दे एवं दोषपूर्ण दर्पण में सूर्य का प्रकाश प्रतिबिम्बित नहीं होता उसी प्रकार परमात्मा का प्रकाश स्वीकार अन्तःकरण वाले व्यक्ति को आलोकित नहीं कर सकता।
शौच के नाम से स्वच्छता एवं पवित्रता को धर्म का प्रधान अंग माना गया है। लोग धर्म-कर्म करते हैं, पूजा-पाठ में लगे रहते हैं और सारे जीवन लगे ही रहते हैं। किन्तु धर्म से प्राप्त होने वाले किसी फल को नहीं पाते। उसका कारण यही रहा होता है कि वे धर्म के प्रधान लक्षण शौच का, शुद्धता एवं स्वच्छता का नियम पूर्ण रूप से पालन नहीं करते। अनेक लोग तो भीतरी सफाई तो दूर बाहरी स्वच्छता तक नहीं रखते। न ठीक से स्नान करेंगे, न हाथ-मुँह, नाक-कान आदि अवयवों को साफ करेंगे। केवल सीधे दो-चार लोटा पानी डाल लेना या धोने के नाम पर अंगों को पानी से चुपड़ लेने भर से सफाई का प्रयोजन सिद्ध नहीं हो पाता। उसके लिये तो परिश्रमपूर्वक ठीक से मल-मल कर नहाना-धोना होगा। इस बात का पूर्ण प्रयत्न करना होगा कि शरीर के किसी भाग अथवा अंग में किसी प्रकार की गन्दगी अथवा मलीनता न रहने पावे। पहनने और ओढ़ने-बिछाने के वस्त्रों का साफ होना ही पर्याप्त नहीं है। रहने का स्थान और भोजन से लेकर उपयोग में आने वाली हर वस्तु को पूर्ण स्वच्छ एवं शुद्ध रखना होगा। तभी उस धार्मिक लक्षण शौच का प्रयोजन सिद्ध हो सकेगा।
स्वच्छता एक आध्यात्मिक गुण है, जिसको प्राप्त करने के लिये बाह्य स्वच्छता से अधिक आन्तरिक स्वच्छता की आवश्यकता है। जिसके विचार गन्दे हैं, भावनायें दूषित हैं, संस्कार अपरिष्कृत हैं वह बाहर वस्त्रादि के साफ-सुथरा होने पर भी स्वच्छ एवं पवित्र नहीं माना जा सकता। अन्तःकरण में ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध और काम का मल मौजूद रहने पर कोई कितना ही क्यों न नहायें, धोये स्वच्छता को प्राप्त नहीं कर सकता। सच्ची सफाई तो तन, मन और काया के साथ एक साथ शुद्ध, स्वच्छ रहने को ही कहा जायेगा। एकांगी अथवा अपूर्ण स्वच्छता से आध्यात्मिक सुफल की आशा नहीं की जा सकती। कागावा, गाँधी, ठक्कर बापा तथा विनोबा प्रभृति सत्पुरुषों ने सफाई के आधार पर अनेक आध्यात्मिक लाभ प्राप्त किये हैं। गन्दा एवं मलीन व्यक्ति क्या आध्यात्मिक और क्या साँसारिक कोई भी लाभ उठा सकने में कृतकृत्य नहीं हो पाता।
सफाई मनुष्य जीवन एवं मानतीय सभ्यता का अविभाज्य अंग मानी गई है। इससे विरत रहने वाला सभ्य तो दूर ठीक से मनुष्य कहलाने योग्य भी नहीं है। जिसका तन-मन गन्दा है, जिसका निवास एवं पास-पड़ोस गन्दा है, जिसके वस्त्र और वस्तुएं स्वच्छ नहीं हैं; जिसके विचार और आचार शुद्ध एवं निर्मल नहीं हैं, जिसे गन्दगी से घृणा और स्वच्छता से प्रेम नहीं है, वह अपने को किस दृष्टिकोण से मनुष्य कहने का अधिकारी हो सकता है? एक हिन्दू धर्म ही नहीं, संसार के प्रत्येक धर्म में स्वच्छता एवं सफाई को महत्व दिया गया है और बतलाया गया है कि हर प्रकार से साफ-सुथरा रहने वाला व्यक्ति इस धरती पर ही स्वर्ग में निवास किया करता है और वास्तव में है भी ऐसा ही।
जहाँ देवताओं का निवास माना गया है उस स्थान को स्वर्ग कहा जाता है; स्वर्ग की कल्पना में जिन गुणों एवं विशेषताओं का समावेश किया गया है उनमें शुचिता एवं स्वच्छता प्रमुख है। स्वच्छता, अमलीनता, शुद्धता, पवित्रता, सुरभि, सौंदर्य, सुरुचिता आदि देवताओं के व्यक्तित्व के असंदिग्ध लक्षण हैं। यह गुण जिस आदमी में पूर्ण रूप से पाये जायेंगे उसे देवता ही माना जायेगा और ऐसे सत्पुरुष जहाँ निवास करते होंगे स्वर्ग उसी स्थान को ही कहना होगा। किसी शून्य में अन्यत्र स्थित स्वर्ग की कल्पना करने से पहले अधिक व्यावहारिक तथा समीचीन है कि अपने स्वर्गीय गुणों से धरती पर ही स्वर्ग की रचना की जाये। अपने हाथ की सीमा में रहने वाले स्वर्ग को छोड़ कर अप्रत्यक्ष एवं सुने-सुनाये स्वर्ग की कामना करना बुद्धि संगत नहीं कहा जा सकता। जो व्यक्ति अपने अन्दर-बाहर फैले हुए नरक से घृणा नहीं करता, उसे मिटा कर उसके स्थान पर स्वर्गीयता लाने में आलस्य एवं प्रमाद करता है, वह किसी अभौतिक दिव्य अथवा दूरस्थ परलोक में स्थित किसी स्वर्ग को पाने में सफल हो सकता है ऐसा कहना उपहासास्पद ही होगा।
गन्दगी चाहे तन की हो, मन की हो अथवा वस्तुओं वस्त्र और निवास स्थान की हो, अच्छी नहीं। उससे मनुष्य का सारा जीवन अपवित्र हो जाता है। गन्दगी मनुष्य के कुरुचिपूर्ण स्वभाव की द्योतक है। गन्दे रहने वाले व्यक्ति को सुरुचिपूर्ण व्यक्ति आलसी, गँवार, फूहड़, निर्लज्ज तथा निम्न कोटि का व्यक्ति समझते हैं। बात भी सही है, गन्दा आदमी निश्चय ही गँवार होता है। जो अपना शरीर अपने वस्त्र तथा अपने निवास स्थान को स्वच्छ नहीं रख सकता उससे सभ्य एवं शालीन व्यवहार की आशा भी नहीं की जा सकती। जिसका स्वभाव गन्दा है और वह किसी भय अथवा सतर्कता के कारण कोई बुरा लगने वाला काम कहीं पर नहीं करता है तब भी वह अपने स्वभाववश उस स्थान को किसी न किसी रूप में गन्दा ही कर देगा और कुछ नहीं तो उसके मैल कपड़े अथवा हाथ-पैर उस जगह की सफाई पर मलीनता के चिन्ह डाल देंगे।
गन्दगी और स्वच्छता निकृष्ट एवं उत्कृष्ट दृष्टिकोण का ही फल है। जिसका दृष्टिकोण परिष्कृत एवं सुरुचिपूर्ण है वह किसी स्थान पर किसी प्रकार की मलीनता सहन नहीं कर सकता। वह कहीं पर भी जरा भी गन्दगी देखेगा तत्काल उसे दूर करने में जुट जायेगा। सब ओर हर प्रकार की सफाई रखने के जो भी उपाय सम्भव हो सकते हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण वाला व्यक्ति उन्हें काम में लाने में जरा भी संकोच नहीं करता। जब कि निकृष्ट दृष्टि के स्वभाव वाला व्यक्ति गन्दगी को सहन करता रहता है। ऐसे व्यक्तियों से यदि कहीं फैली हुई गन्दगी, फिर चाहे वह उनके घर पर ही क्यों न हो, दूर करने के लिये कुछ किया जाये तो वे इसमें अपनी हेठी समझते हैं। कितनी विचित्र एवं विलक्षण बात है कि गन्दगी के बीच रहने में उसे संकोच होता नहीं किन्तु सफाई करने में वैसा ही अनुभव करते हैं।
स्वच्छता एवं सफाई एक आध्यात्मिक गुण है। विकसित करने में जो भी श्रम एवं समय खर्च करना पड़े खुशी से करना चाहिये। एक बार पर्यानुष्ठानों को छोड़ कर जो व्यक्ति तन-मन तथा आचार-विचार के साथ निवास व पास-पड़ोस की गन्दगी दूर करने में उत्साहपूर्वक तत्पर रहता है वह एक प्रकार से तपस्वी ही है और उसे वे सारे आध्यात्मिक आप से आप प्राप्त हो जाते हैं जो एक धर्म-कर्म वाले को होते हैं। स्वच्छता एवं शुचिता दैवी गुण हैं जो कि मनुष्य के भौतिक, आत्मिक एवं आध्यात्मिक सब प्रकार की उन्नतियों के आधार हैं। स्वास्थ्य एवं सफाई का अभिन्न सम्बन्ध है यह आज वैज्ञानिक युग में किसी को बतलाने की आवश्यकता है। हर रोग का जन्म किसी न किसी आन्तरिक अथवा बाह्य गन्दगी से ही होता है। गन्दगी मनुष्य की डडडड का ही नहीं व्यक्तित्व का भी पतन कर देती है। गंदगी से बचना, उसे छोड़ना और हर स्थान से उसे दूर करना मनुष्य का सहज धर्म है। क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक किसी प्रकार का भी विकास करने के लिये जिन गुणों की आवश्यकता है, स्वच्छता उनमें सर्वोपरि है। मलीनता में दुःख-दारिद्रय का निवास रहता है वहाँ स्वच्छता में लक्ष्मी तथा स्वर्ग का निवास माना गया है।
अपने समाज में सैकड़ों ऐसी प्रथा-परम्परायें चली आ रही हैं, जिनका आधार अन्धविश्वास के सिवाय और कुछ नहीं है। इन अन्धविश्वासों से लाभ तो क्या होना, हानि अवश्य होती है। किन्तु लोग उन पर विचार किये बिना आँख मूँद कर मानते चले जाते हैं। हानि उठा कर भी अन्धविश्वासों को मानते चले जाने का कारण यही होता है कि लोगों में ठीक से सोच सकने की विवेक बुद्धि और उसको तर्क की कसौटी पर कस कर परखने का साहस नहीं होता। अनेक बार तो लोग किसी अन्धविश्वास की व्यर्थता और उससे होने वाली हानियों को जान कर भी संस्कारों वश उनका त्याग नहीं कर पाते। परम्परागत किसी अन्धविश्वास को अपनाये रहने से वह मनुष्य के संस्कारों के साथ मिल जाता है और तब उसके छोड़ने के विचार से ही अनिष्ट की एक-अव्यक्त आशंका सताने लगती है। अधिकाँश अन्धविश्वासों के साथ किसी देवी-देवता अथवा अव्यक्त सत्ता के प्रति आदर अवज्ञा की भावना जुड़ी रहती है।
किसी दिन को शुभ और किसी दिन को अशुभ माना जाना स्पष्ट रूप से एक अन्धविश्वास है। इसके पीछे किसी प्रकार का विवेकसम्मत तर्क नहीं है। मनुष्य को समझना चाहिये कि सब दिन उस परम पिता परमात्मा के बनाये हुए हैं। परमात्मा शुद्ध-बुद्ध एवं पवित्र है। इसलिये उसकी किसी रचना में दोष निकालना मनुष्य की अपनी विकृत बुद्धि का प्रदर्शन मात्र है।
हर दिन पवित्र तथा शुभ है। यह बात भिन्न है कि परिस्थिति, संयोग अथवा अवसर के कारण कोई वार अथवा तिथि किसी के लिये असुविधाजनक हो जाये। इससे उसकी पवित्रता में किसी प्रकार का अन्तर नहीं पड़ता। विद्वानों का कहना है कि शुभ कार्यों के लिये हर दिन शुभ और अशुभ कामों के लिये मान्यता रखने में हर प्रकार से हित है। शास्त्रों में कहा गया है कि जिस समय दान करने की सद्प्रवृत्ति मन में उठे उस समय बाय हाथ की वस्तु को दाहिने हाथ में लेने जितना भी विलम्ब न करना चाहिये। हो सकता है कि उतनी देर में कोई आसुरी प्रवृत्ति उभर आये जिससे दान की प्रवृत्ति दब जाये और मनुष्य एक पुण्य परमार्थ से वंचित रह जाये।
शुभ-अशुभ दिन का विचार करना ही है तो वह केवल अशुभ कार्यों के लिये ही करना ठीक है। ऐसा करने से उस समय अशुभ कर्म टल जायेगा और मनुष्य पाप से बच जायेगा। चोरी-जारी, जुआ, लड़ाई-झगड़ा आदि अपकर्म करने की प्रवृत्ति जगते ही उसे कार्य रूप में परिणित करने से पूर्व यदि मनुष्य उसके लिये शुभ-अशुभ आवेग अवश्य ही प्रतिबन्धित हो जायेगा और सम्भव है तात्कालिक अक्रिया से अपराध अथवा अशुभ करने का विचार शिथिल हो जाये मनुष्य का शुभ विवेक प्रबुद्ध हो उठे। फिर फलित ज्योतिष की गणना से किसी बाबा के लिये कोई दिन पूरी तरह शुभ नहीं है। हर दिन में कोई न कोई दोष अवश्य निकल आता है। इस प्रकार अशुभ करने के लिये शुभ मुहूर्त की प्रतीक्षा करते-करते उसकी वृत्ति बदल सकती और वह उस पाप तथा उसके भोग से बच सकता है जो तत्काल सक्रिय हो उठने से आ पड़ता और भोग करना होता। इस दृष्टिकोण से तो दिनों का शुभ-अशुभ विचार किसी हद तक समझ में आता है, शुभ कार्यों के लिये नहीं।
परमात्मा के बनाये सभी दिन समान रूप से शुभ एवं पवित्र हैं। इनमें शुभ-अशुभ का आरोप मनुष्य स्वयं अपने विचारों से कर लेता है, जिस दिन, जिस क्षण किसी में बुरा विचार आये अथवा कोई अप कार्य करने की प्रवृत्ति हो, मानना चाहिये कि वह दिन, वह क्षण मनुष्य के लिये अशुभ है। इसके विपरीत जिस दिन, जिस क्षण पर शुभ विचार एवं पवित्र प्रवृत्ति उदय हो मानना चाहिये कि वह दिन, क्षण शुभ तथा कल्याणकारी है। वैसे परमात्मा का बनाया सारा समय शुभाशुभ से परे परम पवित्र एवं दोष-रहित है।
प्रसिद्ध है कि रावण का विचार समुद्र पर पुल बनाने और स्वर्ग तक सीढ़ी लगवाने का था। किन्तु उस शुभ कार्य के लिये वह कोई शुभ मुहूर्त खोजता रहा। बात टलती रही और तिथि-वार के शुभाशुभ ने यहाँ तक बाधा डाली कि रावण का वह शुभ विचार क्रिया रूप में परिणित होकर पूरा न हो सका और वह इस संसार से चला गया। इसके विपरीत जब उसने सीताजी को चुराने का विचार किया तो शुभ-अशुत मुहूर्त की खोज नहीं की और विचार आते ही उसे क्रिया रूप में परिणित कर दिया, एक क्षण का भी विलम्ब नहीं किया। कितना अच्छा होता कि दशानन सेतु बनवाने और सीढ़ी लगवाने के शुभ कार्यों का श्रीगणेश करने में शुभाशुभ मुहूर्त के चक्कर में न पड़ता और सीताहरण करने से पूर्व हजार बार शुभाशुभ मुहूर्त का विचार करता। रावण यदि ऐसा कर सका होता तो उसकी कीर्ति का इतिहास उस अपवाद से भिन्न होता जो आज भी उसके नाम के साथ चला आ रहा है। वह दिन निश्चय ही उसके लिये शुभ था जिस दिन उसने समुद्र पर सेतु बनवाने और स्वर्ग तक सीढ़ी लगवाने का विचार किया था, और वह दिन घड़ी निश्चय ही अशुभ थी जिस समय उसके मस्तिष्क में सीता हरण करने का विचार आया। खेद है कि मनुष्य शुभ कर्मों के लिये तो मुहूर्त की खोज करता हुआ समय टालता रहता है, किन्तु अशुभ कार्य के लिये उसकी खोज नहीं करता। इसे विपरीत बुद्धि अथवा अविवेक के सिवाय और क्या कहा जायेगा?
इस शुभाशुभ मुहूर्तवाद का अविवेक यहाँ तक बढ़ गया है कि लोग अपने आवश्यक कार्यक्रमों तक को स्थगित करते और हानि उठाते रहते हैं। अनेक लोग परदेश जाते समय दिशा शूल का विचार करते हैं, जिसके अनुसार किसी दिशा की यात्रा के लिये कोई दिन अशुभ और कोई दिन शुभ बतलाया जाता है। मुहूर्तवादी लोग दिशा शूल के भय से यात्रा स्थगित कर कार्य की हानि कर लेते हैं। जैसे उन्हें सोमवार को पूर्व दिशा में किसी आवश्यक काम के लिये जाना है और वह दिन उस ओर के लिये दिशाशूल के अंतर्गत आता है तो मुहूर्तवादी यात्रा स्थगित कर देगा जिससे अवश्य ही उसकी काम बिगड़ जायेगा और यदि आवश्यकता का दबाव उसे जाने के लिये विवश ही करता है तो वह रास्ते भर अनिष्ट की आशंका से वस्त्र रहेगा। काम की सफलता में सन्देह के कारण निरुत्साह एवं निराशा की पीड़ा भोगता रहेगा, जिसका भावनात्मक कुप्रभाव उसकी क्रिया एवं कार्य पर पड़ेगा। इस प्रकार न तो उसे यात्रा का आनन्द आयेगा और यदि काम में थोड़ी-बहुत सफलता मिल जाती है, तो इसे या तो संयोग कहना पड़ेगा अथवा उसका सौभाग्य। वैसे उसकी क्रिया एवं भावना दोनों असफलता की द्योतक होती है।
ऐसे मुहुर्तवादी न जाने कितने प्रत्याशी दिशा शूल के भय से अपने इन्टरव्यू तथा नौकरियों के लिये, आवश्यक यात्रायें स्थगित हुए प्रतिदिन अवसर खोते, नौकरी बिगाड़ते अथवा उसके बनाये रखने के लिये बाद में खुशामद करते, नाक रगड़ते, माँगते और दण्ड पाते रहते हैं। यह भले आदमी यह क्यों नहीं सोचते कि यह जो रेल गाड़ियों, मोटरों, बसों, जहाजों और हवाई जहाजों में भरे हुए लोग उसी दिन उसी ओर को जाते रहते हैं, दिशा शूल इनकी कोई हानि नहीं कर पाता तो हमारा ही अनिष्ट किस प्रकार सम्भव है।
बात वास्तव में यह है कि न तो कोई शुभाशुभ दिन मुहूर्त होता है और न अनिष्ट दिशा अथवा दिशा शूल। यह अन्धविश्वास तो अपनी मानसिक दुर्बलता होता है जो उसे भयभीत अथवा शंकाकुल किया करती है। ऐसे शंकाशील अशुभ विश्वासी उन्मुक्त-मानस व्यक्तियों की अपेक्षा उन व्यक्तियों से कहीं अधिक घाटे में रहते हैं जो परमात्मा के बनाये हर दिन, हर घड़ी और हर दिशा को सदा शुभ मान कर निर्धारित समय पर पूरे उत्साह, असन्देह एवं आशा से अपना कर्तव्य करते हैं। वे जीवन में कदाचित ही असफलता का ताप पाते हैं। इसके विपरीत मुहूर्त मान्यता तथा शुभा शुभवादी पग-पग पर असफलता एवं अनिष्ट की शंका से घिरे रहते देखे जाते हैं।
शुभाशुभ मुहूर्तवाद के अभिशाप से व्यक्ति ही नहीं राष्ट्रों तक की हानि होती है। इस दुर्बलता से इतिहास के अक्षर बदल जाते हैं। बड़े-बड़े वीर एवं सम्पन्न राष्ट्र परास्त एवं पराधीन हो जाते हैं। संसार में भारत एक ऐसा देश है जो एक बड़ी सीमा तक इस अन्धविश्वास को पाले चला आ रहा है। जहाँ अन्य राष्ट्र कार्य करने में एक छोटे से क्षण का विलम्ब हानिकारक मानते और साधारण कामों में भी तात्कालिकता वर्तते हैं, वहाँ यह आध्यात्मिक तथा दिव्य ज्ञान की भूमि भारत के निवासी बड़े-बड़े विषय एवं महत्वपूर्ण अवसरों पर मुहूर्त के शुभाशुभ होने की अल्प मान्यता के कारण अपने कार्यक्रमों को स्थगित कर देते हैं। इस अन्धविश्वास ने देश को कितनी हानि पहुँचाई है, कितना संत्रस्त एवं अपमानित कराया है उसका विवरण पढ़ कर दुर्भाग्य पर रोना आता है।
महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर चढ़ाई की। राजपूत राजाओं की अनी-कनी लोह लेने और मन्दिर की रक्षा करने के लिये सन्नद्ध होकर आगे बढ़ने वाली थी तब तक राज-ज्योतिषियों ने गणना करके बताया कि इस समय मुहूर्त शुभ नहीं है यदि प्रतिरोध के लिये आगे बढ़ा गया तो पराजय हो जायेगी। उन दिनों मुहूर्तवाद अपनी चरम सीमा पर था और प्रजा से लेकर राजा तक उस दुर्बलता के शिकार बने हुए थे। निदान सेनाओं के उठे हुए कदम ठिठक गये, निकली हुई तलवारें म्यान में वापस हो गईं और चढ़े हुए तीर तरकश में डाल दिये गये। इस अशुभ हतोत्साह का जो परिणाम होना था वह हुआ। गजनवी ने मन्दिर पर आक्रमण किया। उसे तोड़ा और भगवान शंकर के ज्योति लिंग को अपने गुर्ज से टुकड़े-टुकड़े कर दिया। यह था शुभाशुभ मुहूर्त के अन्धविश्वास का कुफल जिसे अपमान, अवमानना, कलंक और पराजय के रूप में पूरे राष्ट्र को भोगना पड़ा और भारत के इतिहास में एक ऐसा कलंक पृष्ठ जुड़ गया जिसका प्रतिकार सम्भव नहीं। किन्तु फिर भी एक समय की यह हानि सदा सर्वदा के लिये शुभ हो जाती यदि भारतवासियों ने इससे शिक्षा ली होती और शुभाशुभ मुहूर्तवाद का अन्धविश्वास छोड़ दिया होता। किन्तु क्या ऐसा हो सका?
बख्त्यार खिलजी ने बंगाल पर चढ़ाई की। राजा ने लड़ाई की तैयारी की। राज-ज्योतिषी ने पोथी खोली—तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण चन्द्रमा, मुद्रा भरणी आदि के कारण कोई दिन शुभ तो होता ही नहीं निदान पोथी-परायण पंडित ने बतलाया मुहूर्त शुभ नहीं है लड़ाई में हार हो सकती है। अन्धविश्वासी राजा भाग गया और बख्त्यार खिलजी ने बंगाल की मसनद पर बैठ कर बिना लड़े जीत जाने में सहायक भारत के मुहूर्तवाद को धन्यवाद दिया।
मुहूर्तवाद की अन्धमान्यता के कारण होने वाली पराजयों तथा अवमाननाओं से भारत का इतिहास भरा पड़ा है। मुहूर्तवाद और शुभाशुभ तिथि वार की मान्यता समय की सबसे बड़ी दुश्मन और अवसर की घोर शत्रु है। जो इसमें विश्वास करता और पत्रा देख कर पैर उठाता है वह कर्म क्षेत्र में ऐसा कायर ही माना जायेगा जो न तो समय का मूल्य जानता है और न विश्वास-पूर्ण पुरुषार्थ में विश्वास करता है। कोई दिन, वार, घंटिका न शुभ है न अशुभ। यह एक अन्धविश्वास है जो मनुष्य की अपनी भावना के अनुसार फलीभूत होता है।
शरीर ही नहीं अन्तःकरण निरोग रखें-
मनुष्य जितना शरीर का ध्यान रखता है, उसके पालन-पोषण में लगा रहता है, यदि उसका आधा ध्यान अपने अन्तःकरण की ओर दे तो उसका कल्याण होते देर न लगे। मनुष्य-जीवन का सुख शरीर में नहीं अन्तःकरण में है। शरीर के माध्यम से भी जो सुख की अनुभूति होती है वह भी अन्तःकरण से ही उत्पन्न होती है।
शरीर में जरा सी चोट लग जाने पर या कोई रोग हो जाने पर मनुष्य उसके उपचार में दिन-रात लगा रहता है। किन्तु सारी अनुभूतियों के केन्द्र अपने अन्तःकरण की जरा भी परवाह नहीं करता।
अन्तःकरण के रोगी होने अथवा आहत होने पर उसकी उपेक्षा कर देता है। अन्तःकरण का राजरोग उसकी दूषित प्रवृत्तियाँ हैं। इनका निराकरण कर देने से वह निरोग होकर एक स्थायी सुख का कारण बन जाये, ऐसा सुख जिसे किसी बाह्य साधन अथवा उपादान की आवश्यकता नहीं रहती।
—सेनेका
खर्च कर सकना संभव नहीं। जितने में तीन-चार बच्चों का पेट पलता है उतना ही एक बूढ़े बैल को चाहिए। यह साधन कैसे जुटे?
कसाई के हाथों बूढ़े गाय-बैल बेचने की आवश्यकता नदी की तरह उफनती नहीं वरन् वह अपना रास्ता खार-खंदकों से होकर आप बनाती चलती है। वैसे ही पशु वध और माँस विक्रय के अनेक मार्ग और सरंजाम गुप्त एवं प्रकट रूप से बन कर खड़े हो जाते हैं। जिन प्रान्तों में गौ वध पर प्रतिबन्ध है वहाँ भी कुछ छिप कर खूब गौ हत्या होती है। कानून की खामियां दूर करने बहुत आवश्यकता है। साथ ही यह भी सोचना होगा कि आखिर ऐसा होता क्यों है? हत्यारे काटने के लिए उन पशुओं को ले कहाँ से आते हैं? बात घूम-फिर कर फिर वहीं आ जाती है कि पशु वाले उन्हें अनुपयोगी रहने पर अपने आश्रय में नहीं रख पाते और वे अन्ततः छुरों के नीचे ही जा पहुँचते हैं। समस्या का हल करना उतना ही आवश्यक है जितना सरकार द्वारा गौवध पर प्रतिबन्ध लगाना। दोनों पहलू सँभालने से ही गौ संरक्षण और संवर्धन की समस्या हल होगी।
गाँधी जी ने स्वराज्य आन्दोलन आरम्भ किया था तब अंग्रेजों को हटाने पर उनने जितना जोर दिया था उतना ही जोर इस बात पर दिया था कि वे कारण मिटाये जायँ जिनके कारण सात समुद्र पार करके अंग्रेजों को भारत आने और यहाँ अपना शासन जमाने का अवसर मिला।
भारतीय जनता में प्रचलित अनेक दुष्प्रवृत्तियाँ इसका कारण थीं। उसने उनके विरुद्ध भी जहाद बोली। उन्होंने हरिजन उत्थान, ग्रामोद्योग, सफाई, मद्य निषेध जैसी रचनात्मक प्रवृत्तियों को भी जन्म दिया। वे कहते थे यदि देश आन्तरिक दृष्टि से समर्थ न बन सका तो अंग्रेजों के चले जाने पर भी स्वराज्य का लाभ न मिल पाएगा।
हमें रीति-नीति के साथ हमें गौरक्षा की ओर ध्यान देना होगा। गौ रक्षा पर प्रतिबन्ध ही आवश्यक नहीं वरन् उससे भी अधिक आवश्यक उसकी उपयोगिता की जानकारी को और अधिक बढ़ाया जाय, उसे आर्थिक दृष्टि से भी अधिकाधिक उपयोगी बनाया जाय। विदेशों में यहाँ पर कानूनी प्रतिबन्ध नहीं है वहाँ कोई गाय काटने की कल्पना भी नहीं करता। किसी कसाई की हिम्मत नहीं होती कि वह काटने के लिये गाय खरीदने की बात सोचे। क्योंकि वहाँ आर्थिक दृष्टि से गाएँ इतनी उपयोगी हैं। कि उनको माँस के लिए खरीदा ही नहीं जा सकता। ऐसी स्थिति हमें भी अपने देश में पैदा करनी होगी। अन्यथा कानूनी प्रतिबन्ध भी उसी तरह निरर्थक हो जाएगा जिस प्रकार सभी अपराधों के विरुद्ध कानून रहते हुए भी वे लुक-छिप कर व्यापक रूप से फलते-फूलते रहते हैं।
गौरक्षा आन्दोलन का एक-एक महत्वपूर्ण पहलू रचनात्मक भी होना चाहिये। दस-पाँच लंगड़ी-लूली गायें इकट्ठी करके उनके नाम पर चंदा उगाहने वाली गौशालाएँ खोल देना इसके लिए पर्याप्त न होगा। वरन् इस आन्दोलन को उतना ही व्यापक रूप देना होगा जैसा कि इन दिनों सूखाग्रस्त क्षेत्र में कच्चे कुएं खोदने आदि के तात्कालिक कार्यक्रम सोचे और चलाये जाते हैं। गौ की उपयोगिता बढ़ाना ही गौरक्षा की सबसे बड़ी गारंटी हो सकती है।
इस संदर्भ में एक बड़ा आवश्यक कार्य यह है कि जनसाधारण को गौ दुग्ध की उपयोगिता और महत्ता समझाई जाय। आज लोग गाय के दूध की तुलना में भैंस का दूध पसन्द करते हैं। गाय के दूध में चिकनाई कम होती है, स्वाद कम होता है, इससे मरीजों को छोड़कर न तो पीने वाले उसे खरीदते हैं और न दूध विक्रेता। ग्वाले गाय के बकरी के दूधों को या तो सस्ता बेचते हैं या फिर भैंस के में मिला कर किसी प्रकार उस बला को सिर से उतारते हैं। गाय उन्हें भैंस की तुलना में दूध की दृष्टि से कम उपयोगी सिद्ध होती है। फलस्वरूप वे उसे पालने का झंझट भी छोड़ देते हैं। किसान को भी गौ पालन की तुलना में भैंस पालन लाभदायक दीखता है। अतएव उसके खूँटे पर गाय नहीं भैंस दिखाई देती है।
इस स्थिति को बदलना होगा। अच्छी दुधारु गायें खरीदने और पालने की व्यवस्था बनाने से गौ दूध की मात्रा तो बढ़ सकती है फिर भी यदि उसका उचित मूल्य नहीं मिला उचित खपत न हुई तो समस्या फिर भी बनी ही रहेगी। अतएव जनमानस में बैठी हुई मान्यता को बदलने के लिए व्यापक आन्दोलन किया जाना चाहिए कि ‘गाय के दूध से भैंस का दूध अच्छा होता है।’ सच्चाई यह है कि शरीर पोषण और मानसिक विकास के लिए जिन जीवन तत्वों की नितान्त आवश्यकता है वे गाय के दूध में है, भैंस के में नहीं। चिकनाई के लिए ही दूध नहीं पिया जाता, उसकी वास्तविकता उपयोगिता तो उन तत्वों में है जो चिकनाई के अतिरिक्त अनेक क्षारों और विटामिनों के रूप में पाये जाते हैं। लोग उनकी उपयोगिता समझते ही नहीं। स्वाद और चिकनाई की कसौटी पर ही दूध की परख करते हैं। चिकनाई तो तेलों से भी मिल सकती है। इसके लिऐ जो दूध खरीदते हैं वे भ्रम में हैं। दूध में जो पोषण तत्व हैं, उनका चिकनाई से कोई सम्बन्ध नहीं। यदि शारीरिक और मानसिक लाभ लेना है तो उसकी वास्तविक आवश्यकता गौ दूग्ध से ही पूरी हो सकती है और यदि वह अपनी इस विशेषता के कारण भैंस के दूध से महंगा मिलता है तो भी उसे खरीदा जाना चाहिए। यह मान्यता जिस दिन जनमानस में मजबूती से जड़ जमा लेगी, उस दिन गौ पालन एक उपयोगी धन्धा बन जायगा और लोग उस ओर दिलचस्पी लेंगे और दुधारु गायों का बाहुल्य कुछ ही दिनों में दीखने लगेगा।
गौ पालन का कार्य सुव्यवस्थापूर्वक करने के लिए इसी तरह के कुटीर उद्योग तथा संगठित बड़े उद्योग चलाये जायँ जिस तरह तेल आदि के उत्पादन की छोटी-बड़ी योजनाएँ चलती हैं। गौ दुग्ध और गौ घृत बेचने की ऐसे विश्वस्त दुकानें खुले जहाँ विश्वास की और प्रामाणिक वस्तु मिल सकें। जिस तरह चाय वाले और बीड़ी वाले अपने उत्पादन की खपत बढ़ाने के लिए विविध प्रकार से विज्ञापन करते हैं, गौ रस की महत्ता जन साधारण को समझाने के लिए वे गौ रस उत्पादन केन्द्र प्रयत्न करें। सार्वजनिक संस्थाएँ और गौरक्षा समितियाँ भी इस कार्य को हाथ में लें और लोग-मानस में गौ दुग्ध की उपयोगिता की मान्यता स्तर तक हृदयंगम कराने का पूरा-पूरा प्रयत्न करें।
जिस प्रकार स्वराज्य आन्दोलन के दिनों में सभी काँग्रेस नेता चरखा कातने और खादी पहनने का कार्य इसलिए करते थे कि स्वदेशी को प्रवृत्ति जनमानस में उतरे और उनके अनुयायी अनुकरण करें, उसी प्रकार धार्मिक एवं सामाजिक नेताओं तथा गौरक्षा प्रेमियों को गौ दुग्ध ही सेवन करने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए। इसका प्रभाव उनके अनुयायियों पर पड़ेगा और गौ दुग्ध की खपत के साथ-साथ गौ पालन का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
गौ हत्या के कारणों में एक बड़ा कारण चमड़े का व्यापक उपयोग भी है। चमड़े की खपत दिन-दिन बढ़ती जाती है। फलस्वरूप माँस और चमड़ा दोनों की कीमत मिला कर कसाई काफी नफे में रहते हैं। चमड़े की खपत घट जाय तो वह स्वभावतः सस्ता होगा और तब हत्या व्यवसाय आज का जितना लाभदायक न रहेगा ऐसी दशा में गौवध स्वतः काफी घट जायगा।
वृद्ध गोवंश की रक्षा के लिए गोचर भूमियों की व्यवस्था की जानी चाहिए। उनके गोबर का भी यदि ठीक तरह उपयोग होने लगे तो उस कीमती खाद से उतना मूल्य प्राप्त किया जा सकता है जिससे उनकी जीवन रक्षा का खर्च चलाया जा सके। गोचर के लिए हर गाँव में बड़ी भूमि छोड़ी जा सके तो उस गोबर का जो खाद मिलेगा उससे वहाँ की अन्नोत्पादन क्षमता बढ़ेगी, घटेगी नहीं। यह वृद्ध पशु यदि थोड़ा बहुत शारीरिक श्रम कर सकते हों तो भार ढोने में जैसे गधे थोड़ा-थोड़ा काम कर लेते हैं, वैसा उनसे भी लिया जा सकता है। उसी प्रकार बूढ़े और अनुपयोगी गोवंश को भी एक सीमा तक उपयोगी बनाया जा सकता है। मरने पर चमड़ा, हड्डी, सींग तथा माँस से खाद जैसे जो लाभ मिलते हैं उनको भी जीवन काल में पेशगी खर्च किया जा सकता है। प्रयत्न करने पर वृद्ध पशु भी अपने जीवन के कुछ दिन बिना किसी मुश्किल शाँतिपूर्वक व्यतीत कर सकने की स्थिति प्राप्त कर सकते हैं।
गौरक्षा के लिए रचनात्मक कार्यों के लिए प्रयत्नशील होना चाहिए। गोवध बन्द करवाने का यह दूसरा पहलू भी आँख से ओझल हो जाता है। गौ रक्षण के साथ-साथ गौ प्रबंधन भी आवश्यक है।
अपनों से अपनी बात—
अखण्ड-ज्योति इस अंक के साथ अपने जीवन के 27 वर्ष समाप्त कर 28वें में प्रवेश करेगी। यह संधि वेला उसके पिछले सभी वर्षों की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण एवं मार्मिक है। अब तक इन पंक्तियों में ग्राहक बनाने की अपील की जाती रही थी, इस बार घटाने की—छटनी की अपील की गई है। बात कुछ अटपटी सी लगती है, पर है बड़ी सारगर्भित। लिखने, छपाने, बेचने की एक विडम्बना चलती रहे, उससे वह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता, जिसके लिए इस मिशन का प्रादुर्भाव हुआ है। उस प्रकाश को ज्वलन्त रखने के लिये जलने योग्य साधन सामग्री तेल-बाती मिल सके तो ही उसकी सार्थकता है।
दिवाली पर आमतौर से कूड़ा-करकट झाड़ कर बाहर फेंक दिया जाता है और काम की वस्तुएँ सँभाल कर रख ली जाती हैं। 27 वर्ष बाद हमने भी अपने घर की ऐसी ही सफाई की है। भीड़ घट जाने से हमारा सिर दर्द घटा है। अब जो काम के परिजन साथ रह गये हैं, उनके साथ अगले पाँच वर्ष तक अधिक तत्परता और सद्भावना के साथ हँसने-खेलने का अवसर मिलेगा और जो श्रम किया जायगा उसके सार्थक होने की सम्भावना रहेगी, इस आशा के साथ हमें बड़ा सन्तोष है। 27 वर्षों में जिन्हें हम एक छोटी-सी यह बात न समझा सके कि “व्यक्ति एवं समाज के उत्कर्ष का एकमात्र माध्यम उत्कृष्ट विचारों को क्रमबद्ध रीति से हृदयंगम करते रहना ही है।” उन्हें और कुछ सिखाया जा सकेगा यह सम्भावना कम ही है। जो आशीर्वाद और वरदानों के जंजाल में तो निरन्तर उलझे रहते थे पर जिन्हें आत्म-निर्माण और आत्म-विकास के राजमार्ग पर कदम बढ़ाने में तनिक भी रुचि नहीं, उनकी बीमारी आसाध्य है। इन बेचारों को रचनात्मक प्रेरणा देना परेशान करना ही है। उन्हें तो जादू चाहिये, कृषि कर्म पर उन्हें विश्वास कहाँ है? ऐसे लोगों का साथ छूटना हमारे लिये भी अच्छा है और उनके लिये भी।
अब अपने छोटे से परिवार के साथ हमें कुछ छोटे किन्तु महत्वपूर्ण कदम उठाने हैं। यह प्रक्रिया अब नियमित और व्यवस्थित रूप से चल पड़नी चाहिये। गत जुलाई के अंक में हमने परिजनों से अनुरोध किया था कि—”हम उनके परिवार के एक नियमित अध्यापक के रूप में प्रस्तुत रहना चाहते हैं। हमारी यह सेवा स्वीकार की जाय। जिस प्रकार एक टय़ूटर—अध्यापक अपने छात्रों को नित्य उनके घर पर पढ़ाने जाया करता है—उसी प्रकार हम भी उन्हें उनके घर के अन्य व्यक्तियों को कुछ पढ़ाने-सिखाने आना चाहते हैं। जीवन भर के स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन के द्वारा हमने जो पाया है, उसका सार—शहद हम अपने इस छोटे परिवार को बाँट जाना चाहते हैं। वैसा करने की हमें सुविधा मिलनी चाहिये।”
यह अनुरोध 40 हजार में से जिन 4 हजार ने स्वीकार किया है उनका कर्तव्य है कि वे सचाई और तत्परता से हमें वह सुविधा प्रदान करें। अखण्ड ज्योति और युग निर्माण पत्रिकाओं में प्रायः 90 के लगभग पृष्ठ रहते हैं। 30 दिन में प्रतिदिन 3 पृष्ठों के हिसाब से हमारा प्रवचन अध्यापन सुना और समझा जाय। जिनके नाम पत्रिका पहुँचती है वे स्वयं एक बारगी ही पत्रिकाओं को पूरी पढ़ सकते हैं, पर घर के लोगों को इकट्ठे करके उन्हें प्रतिदिन एक लेख सुनाने और उस सम्बन्ध में विचार-विमर्श करने का क्रम चलाया जाय। इस प्रकार की परिवार गोष्ठियाँ हमारे स्थायी परिवार के 4 हजार घरों में आगामी महीने से नियमित चल पड़नी चाहियें। घर का एक भी शिक्षित व्यक्ति ऐसा न हो जो इन विचारों को पढ़ता न हो। एक भी अशिक्षित ऐसा न हो जो इन्हें सुनता न हो।
इन चार हजार घरों में एक दिव्य देवालय—ज्ञान यज्ञ का पुण्य प्रतिष्ठापन—नव-निर्माण पुस्तकालय स्थापित कर दिया जाना चाहिये। अत्यन्त सस्ते, भावनात्मक नवनिर्माण के अग्रदूत-ट्रैक्ट इसी उद्देश्य के लिये छापे जाते हैं। दस नये पैसे रोज की बचत इकट्ठे करते रहनी चाहिये और उस पैसे से छह-छह महीने बाद एक पार्सल मँगाते रहना चाहिये। 70 ट्रैक्ट अब तक छपे हैं, इनमें लोकनिर्माण की विचारधारा है। अगली मई तक 70 ट्रैक्ट और व्यक्ति निर्माण एवं परिवार निर्माण के अत्यन्त महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डालने वाले छप जायेंगे। अपनी कॉपी में दस पैसे बचत का खाता खोल लेना चाहिये और उससे यह ट्रैक्ट माला समय-समय पर मँगा कर अपना घरेलू पुस्तकालय—सद्ज्ञान भण्डागार समृद्ध करते चलना चाहिए।
एक घंटा समय प्रतिदिन नियत समय पर ही देना पड़े ऐसा नियम नहीं है। महीने में 30 घण्टे जब भी अवकाश मिले थोड़ा-थोड़ा करके भी निकाला जा सकता है और उससे नव-निर्माण विचारधारा की चर्चा की जा सकती है। घर में लोगों की यह विचारधारा सुनाने में जो समय लगे वह भी इसी में गिना जा सकता है। पड़ौसियों को, मित्रों को, अपनी पत्रिकाएं तथा ट्रैक्ट पुस्तकें पढ़ाने-सुनाने में यह एक घण्टा खर्च किया जा सकता है।
इस प्रकार हम जो लोक शिक्षण करना चाहते हैं उसमें अपने 4 हजार परिजन एक सहायक साथी की भूमिका अदा कर सकते हैं। हम विचारों के माध्यम से ही परिजनों के घरों पर जा सकते हैं। शरीर समेत प्रेरणा एवं कथन की जो कमी रह जायगी उसकी पूर्ति परिजनों को करनी चाहिये। प्राण हमारे, शरीर परिजनों का—इस प्रकार दोनों मिल कर अन्धे-पंगों की जोड़ी जैसी आवश्यकता को पूर्ण कर लेंगे और प्रयोजन पूरा हो जायगा।
अभी इस महीने से हमारा यह ब्रह्म-विद्यालय आरम्भ हो जाना चाहिये। मार्गशीर्ष सुदी 21 (23 दिसम्बर शुक्रवार) को गीता जयन्ती है। भगवान कृष्ण ने उसी दिन विश्व कल्याण के लिये गीता का ज्ञान दिया था उसी दिन अर्जुन ने गाण्डीव उठाया और पाञ्चजन्य बजाया था। जीवन संग्राम के मध्यस्थल में आज हम भी खड़े हैं। 5000 वर्ष पूर्व की उसी प्रक्रिया की हमें पुनावृत्ति करनी है। गीता सूत्र रूप तत्वज्ञान को व्यावहारिक जीवन में कैसे उतारा जाय, इसकी सामयिक व्याख्या करते हुए हम लोग उस प्रेरणा को हृदयंगम करें, कार्यरूप में परिणत कर दिखाएँ यही उचित है।
साधना मार्ग पर चलने वालों को गायत्री विद्या का सांगोपांग प्रशिक्षण अगले पाँच वर्ष में पूरा किया जायगा। अखण्ड ज्योति में हर महीने एक अनुपम लेख छपता रहेगा। पाँच वर्ष में इस सम्बन्ध में इतना कुछ कहा समझाया जायगा जो उच्चस्तरीय आध्यात्मिक विकास के लिए पर्याप्त सिद्ध हो सके। इसी प्रकार आत्म-शोध, आत्म-निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के प्रत्येक पहलू पर आधुनिक परिस्थितियों के अनुकूल महत्वपूर्ण मार्गदर्शन इस ब्रह्म-विद्यालय के छात्रों को निरन्तर नियमित रूप से मिलता रहेगा।
4 हजार स्थायी सदस्यों में से प्रत्येक परिजन को हमारे साथी, सहायक अध्यापक का कार्य करना चाहिये। उसके प्रशिक्षण में कम से कम 10 शिक्षार्थी तो होने ही चाहियें। इस प्रकार 40 हजार शिक्षार्थियों और 4 हजार अध्यापकों का यह ब्रह्म-विद्यालय आगामी गीता जयन्ती से आरम्भ होना है। प्रत्येक सदस्य उस दिन जप, हवन, प्रार्थना के साथ इस पुण्य प्रक्रिया को आरम्भ करे। पुस्तकालय का स्थान निर्धारित करे, छात्रों के नाम नोट करे, अपनी कार्य-पद्धति निर्धारित करे और इसकी सूचना मथुरा भेजे। आशा है हमारे सक्रिय साथी यथा-समय इस पुण्य प्रक्रिया को पूरा करेंगे।
भावावेश अथवा कौतूहल में भरे प्रतिज्ञापत्र वापिस लेलें
जिन परिजनों ने पाँच वर्ष तक स्थायी सदस्य बने रहने के लिए जुलाई मास के अंक में संलग्न फार्म भरकर भेजा है, उन्हें अपना कर्तव्य और उत्तरदायित्व भली प्रकार समझ लेना चाहिए। ऐसा न हो कि ऐसे ही भावावेश में आकर बिना समझे-बूझे फार्म भरकर कौतुक कौतूहल की तरह भेज दिये जायें और उन प्रतिज्ञाओं की ओर ध्यान ही नहीं दिया जाय जिनके आधार पर परिवार का परिष्कार एवं पुनर्निर्माण सम्भव है। एक घंटा समय नवनिर्माण की विचारधारा का विस्तार करने के लिए इन कर्मठ सदस्यों को लगाना चाहिए। बाहर के लोगों के साथ संपर्क कम बन सके तो समय अपने परिवार के लोगों, स्त्री, पुत्र, पुत्री, भाई, बहिन आदि के साथ सैद्धान्तिक चर्चा करने में लगाया जा सकता है। मित्र, सम्बन्धी, परिचित लोगों के साथ भी बहुत सा समय गुजारना पड़ता है और तरह-तरह की बातें करनी पड़ती हैं। इसके साथ ही नवनिर्माण विचारधारा की भी चर्चा की जा सकती है। इस प्रकार अलग से एक घंटा न सही, सब मिलाकर आदर्शवादी प्रेरणाओं से अपने घर तथा बाहर के लोगों को प्रकाश दिया जा सकता है। इस प्रकार एक घंटा सैद्धान्तिक चर्चा करते रहने में किसी को कोई कठिनाई नहीं हो सकती।
प्रतिदिन दस नया पैसा की बचत तुरन्त आरम्भ कर दी जानी चाहिए। यह पैसे कहीं किसी के पास दान स्वरूप नहीं भेजे जाने हैं। वरन् अपने घर में इसे “नवनिर्माण पुस्तकालय” स्थापित करने में ही खर्च किया जाना है। ऐसा पुस्तकालय-सच्चे देवालय की आवश्यकता पूर्ण करेगा। ‘अखण्ड ज्योति’ तथा ‘युग निर्माण योजना’ पत्रिकायें उसी पैसे से मँगाई जाती हैं। अब अखण्ड ज्योति को पाक्षिक हो गई समझना चाहिए। पत्रिकाओं के नाम दो हैं पर वस्तुतः एक ही तथ्य के सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पहलुओं को अलग-अलग से समझाने के लिए दो बार उसे निकाला जाता है। इसलिए जिनने फर्म भरे हैं उन्हें दोनों पत्रिकाओं का अनिवार्य रूप से सदस्य रहना चाहिए। जिनने युग निर्माण योजना का चन्दा फार्म भरने के बाद भी अभी न भेजा हो उन्हें अविलम्ब इस कमी को पूरा कर लेना चाहिए।
घरेलू नवनिर्माण पुस्तकालय में सस्ते ट्रैक्टों की भरमार रहेगी, वे ही अपना प्रयोजन पूरा करेंगे। 70 ट्रैक्ट पिछले दिनों छप चुके हैं इन्हें मँगा लेना चाहिए। जो दस पैसे प्रतिदिन बचाये जाते हैं इसी हिसाब को आगे पीछे करके ट्रैक्टों की यह प्रथम किश्त मँगा लेनी चाहिए। प्रस्तुत ट्रैक्ट समाज निर्माण के कार्यक्रमों पर प्रकाश डालते हैं। अगली किश्त मई के आस-पास छपेगी उसमें व्यक्ति तथा परिवार की समस्याओं पर सुलझाव प्रस्तुत किया जायगा। इस प्रकार मानव जीवन के प्रत्येक पहलू पर एक सुव्यवस्थित क्रमबद्ध एवं युग के अनुरूप सांगोपांग विचारधारा इन ट्रैक्टों के द्वारा प्रस्तुत की जायगी। अपने आपमें यह छोटा-सस्ता किन्तु सर्वांगपूर्ण साहित्य इस युग की एक अद्भुत एवं अनोखी चीज होगी। इसलिए इस पुस्तकालय की स्थापना का श्री गणेश इस वर्ष हर सक्रिय कार्यकर्ता को अपने घर में करना चाहिए और अपने प्रभाव परिचय क्षेत्र में लोगों के घरों पर जा-जा कर यह साहित्य पढ़ने देने और वापिस लेने का कार्य आरम्भ कर देना चाहिए। अशिक्षितों को यह साहित्य सुनाये जाने का प्रबन्ध किया जाना चाहिए।
जिन्होंने दोनों प्रतिज्ञाओं का स्वरूप समझ लिया है, जो उनका कर्तव्य और उत्तरदायित्व निर्वाहन को तत्पर हों वे ही वे अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़तापूर्वक आरुढ़ रहने को तत्पर हो जायें। जिनने भावावेश में और कौतूहलवश फार्म भरकर भेज दिया हो और कर्तव्य पालने तथा उत्तरदायित्व निबाहने में असमंजस अनुभव करते हों वे अपने प्रतिज्ञापत्र वापिस मँगवा लें। झूठे प्रतिज्ञापत्र हर दृष्टि से अवाँछनीय एवं अशोभनीय रहेंगे।
*समाप्त*