एकाँगी उपासना का क्षेत्र विकसित कर अपना अहंकार बढ़ाने वाले व्यक्ति , ईश्वर के सच्चे भक्त नहीं कहे जा सकते। परमात्मा सर्व न्यायकारी है। वह, ऐसे भक्त को जो अपना सुख, अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहता हो, कभी प्यार नहीं कर सकता। संसार के और भी जितने प्राणी हैं वह सब भी उसी परमात्मा के प्यारे बच्चे हैं। किसी के पास शक्ति कम है, किसी के पास गुण कम हैं, तो इससे क्या? अपने सभी बच्चे पिता को समान रूप से प्यारे होते हैं। जो उसके सभी बच्चों को प्यार कर सकता हो परमात्मा का वास्तविक प्यार उसे ही मिल सकता है। केवल अपनी ही बात, अपने ही साधन सिद्ध करने वाले व्यक्ति लाख प्रयत्न करके भी उसे प्राप्त नहीं कर सकते।
प्रेमी भक्तों के लक्षण बताते हुये गीता में भगवान् कृष्ण ने लिखा है—
अद्वेष्टा सर्वभूतानाँ मैत्रः करुणा एवच। निर्ममो निरहंकार, सम दुःख सुखः क्षमी॥ सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़ निश्चय;। मय्यर्पित मनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स में प्रियः॥
(गीता 12। 13-14)
“हे अर्जुन! मैं उन भक्तों को प्यार करता हूँ जो कभी किसी से द्वेष-भाव नहीं रखते, सब जीवों के साथ मित्रता और दयालुता का व्यवहार करते हैं। ममता रहित, अहंकार-शून्य दुःख और सुख में एक-सा रहने वाला, सब जीवों के अपराधों को क्षमा करने वाला, सदैव सन्तुष्ट, मेरा ध्यान करने वाला, विरागी, दृढ़ निश्चयी और जिसने अपना मन तथा बुद्धि मुझे समर्पित कर दी है, ऐसे भक्त मुझे अतिशय प्रिय हैं।”
यहाँ हमें एक बात समझ लेनी चाहिये कि यह सारा संसार भगवान के एक अंश में ही स्थित है। छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे सब उसी के बनाये हुये हैं। उनके हित और कल्याण का भी उसे ध्यान होना चाहिये। केवल अपनी-अपनी इच्छाओं की तृप्ति ढूंढ़ने में यह कहाँ संभव है कि मनुष्य औरों के साथ द्वेष न करे। सुख की इच्छा में प्रतिस्पर्धा आवश्यक है। कामनाग्रस्त मनुष्य किसी की भलाई भी क्या कर सकेगा और ऐसा व्यक्ति परमात्मा की दया का अधिकारी भी क्यों बन सकेगा।
चराचर जगत में एक ईश्वर की सत्ता ही अनेक रूपों में कार्य कर रही है। ईश्वर के एक अंग की उपासना की जाय और अन्यों की बिलकुल उपेक्षा की जाय तो परमात्मा उस भक्त से कैसे सन्तुष्ट हो सकता है। भक्ति का स्वरूप सर्वांगीण होना चाहिये। मुँह से भोजन कराया जाय और पाँवों को बाँधकर एक ओर पटक दिया जाय तो वह परमात्मा अपने उपासक की भावनाओं से कैसे सन्तुष्ट हो सकेगा। ईश्वर के पारलौकिक और अदृश्य जगत को यदि प्राण माना जाय और सम्पूर्ण संसार को उसकी देह, तो देह से भी उतना प्यार होना चाहिये जितना प्राण से। देह की उपेक्षा से प्राणों का अस्तित्व भी भला कहीं सम्भव हो सका है?
ईश्वर के उपासक में श्रद्धा, भक्ति , एकाग्रता, बुद्धि की तीक्ष्णता के साथ-साथ जीव दया और प्रेम का भी समन्वय होना चाहिये क्योंकि प्रेम ही विश्व का आधार है, विश्व की आत्मा है। ईश्वर प्रेम भी विश्व प्रेम के अंतर्गत है। प्राणिमात्र के साथ सद्व्यवहार, आत्मीयता और मैत्री की भावना रखने वाले लोग उसे बिना प्रयास, बिना साधन प्राप्त कर लेते हैं।
चतुर जनों की यह रीति है कि वे किन्हीं महापुरुषों की कृपा प्राप्त करने के लिये उनकी प्रिय सन्तान की सेवा और प्यार करते हैं। अपने आत्मीय जनों को प्यार करता हुआ देखकर बड़े कठोर हृदय के व्यक्तियों को भी पिघलते देखा गया है, फिर परमात्मा जो इतना सहृदय और दयालु है वह अपने बालकों के प्रति कर्त्तव्य-भावना को पूरा हुआ देखकर भला क्यों न प्रसन्न होगा। इससे तो वे भक्त की अन्य कामनायें भी सहर्ष पूरी कर देते हैं।
वेद में कहा गया है कि “जो लोग सम्पूर्ण प्राणियों के हित में संलग्न रहते हैं परमात्मा उनका भार स्वयं वहन करता है।” पर समाज के प्रति अपने कर्त्तव्यों का समुचित रीति से पालन न करने वाले ईश्वर-भक्त आत्म-कल्याण में समर्थ नहीं होते। समाज भी तो मनुष्य का अपना ही स्वरूप है। अपने स्वार्थ की पूर्ति में तो उद्यत रहा जाय पर अपने ही समान अपने समाज के प्रति परमार्थ का ध्यान न रखा जाय तो उस ईश्वर-उपासना से आत्म-सन्तोष होना असम्भव है।
निर्ममता और अहंकार से मुक्ति मिल गई इसका प्रमाण एकात्मवादी होकर नहीं दिया जा सकता। मनुष्य सबके प्रति उदारतापूर्ण व्यवहार करेगा तभी उसकी ममता का भाव नष्ट होगा। अहंकार भी, जब तक अपने आप में औरों के लिये त्यागपूर्वक न घुलाया जायगा तब तक, इससे मुक्त होना सम्भव नहीं। ईश्वर कभी किसी के सामने प्रत्यक्ष प्रकट नहीं हुआ। इसलिये वह प्रत्यक्ष सेवायें भी कभी नहीं ले सकता। उपासना और प्रार्थना से प्रभावित होकर मनुष्य रूप धारण कर कदाचित वह ईश्वर अपनी अनुभूतियों सहित भक्त के समक्ष उपस्थित हो जाता और वह अपना सर्वस्व अर्पण कर देता तो संभव था उस स्थिति से आत्म-सन्तोष हो जाता। पर परमात्मा के संसार में ऐसी व्यवस्था नहीं है। वह यदि अपने आराधक की मनोवृत्ति को देखना चाहेगा तो अपने किसी बालक को ही परीक्षा के लिये भेजेगा। हम अपने बच्चे, धर्म, परिवार, गाँव-मुहल्ले वाले, समाज और राष्ट्र तथा सम्पूर्ण विश्व के लिये आत्म-त्याग की भावना का परिष्कार करके ही तो सर्वात्मा की कृपा का पुण्य फल प्राप्त कर सकते हैं और यह तभी सम्भव है जब हम सबके साथ प्यार से रहें। सबके साथ आत्मीयता रखें, सबके साथ सहानुभूति बरतें, सबकी उन्नति में सहयोग दें। किसी के साथ ईर्ष्या-द्वेष, छल, पाखण्ड, अन्याय, अत्याचार करके परमात्मा की कृपा का अधिकार प्राप्त करने की बात सोचना मिथ्या है।
तब यह आवश्यक है कि उपासना का स्वरूप बहुमुखी हो। आत्मोद्धार के लिये एकान्त में बैठकर करुण-भाव से ईश्वर की उपासना की जाय पर अपने अन्य भाइयों को भी असहाय अवस्था से ऊपर उठाया जाय। भगवान के स्वरूप को याद करते हुये प्रेमपूर्वक उनके नाम का जप और कीर्तन, ध्यान और भजन तो किया जाय, पर उनके समाज शरीर की भी उपेक्षा न की जाय। सम्पूर्ण जीवों में भगवान का अंश विराजमान है, सब लोग उसी की विविध मूर्तियाँ हैं। सब उनके अंग हैं। सब उसके साधन हैं। एक साधन के लिये अन्य साधन क्यों भुलाये जायँ? ईश्वर की एकाँगी उपासना क्यों की जाय?
“परमात्मा केवल एकान्तवासी को मिलते हैं और निर्ममता का अर्थ घर-बार छोड़कर योगी हो जाना है”-यदि ऐसा अर्थ लगाया जाय तो फिर हमारे ऋषियों की सारी व्यवस्था एवं भारतीय दर्शन की सारी मान्यता ही गलत हो जायेगी। जप, ध्यान या साधना की एक निश्चित सीमा होती है उसके बाद की साधना समाज और विश्व के हित साधन तथा लोक-मंगल में जुटने की होती है। ऋषि गृहस्थ थे, गृहस्थ में रहकर उन्होंने साधनायें कीं पर उन्हें कोई स्वार्थवादी नहीं कह सकता। वे समाज के हित के लिये अन्त तक लगे रहे। निर्ममता का अर्थ भी दरअसल “मैं और मेरे” का त्याग है। यह जो कुछ है परमात्मा का अंश है। परमात्मा के प्रत्येक अंश को पूजकर ही उसकी पूर्ण कृपा प्राप्त की जा सकती है।
ईसा, मंसूर, शंकराचार्य, रामकृष्ण तथा दयानन्द आदि अनेकों ईश्वर-परायण देवदूत हुये हैं। ईश्वर की कृपा के फलस्वरूप उन्होंने सामान्य व्यक्तियों से उच्चतर सिद्धियाँ प्राप्त कीं। यदि ईश्वर उपासना का अर्थ एकाँगी लाभ उठाना रहा होता तो इन महापुरुषों ने भी या तो किसी एक स्थान में बैठकर समाधि ले ली होती या भौतिक सुखों के लिये बड़े से बड़े साधन एकत्र कर शेष जीवन सुखोपभोग में बिताते। पर उनमें से किसी ने भी ऐसा नहीं किया। उन्होंने अन्त में महामानव की ही उपासना की। सिद्धि से उन्हें सन्तोष नहीं हुआ तो लौटकर वे फिर समाज में आये और प्राणियों की सेवा को अपनी उपासना का आधार बनाया।
मुक्ति के अधिकारी मनुष्यों को परलोक की ही चिन्ता नहीं करनी चाहिये। यह लोक भी परलोक ही है, यदि हम यहाँ भी उस परमात्मा के स्वरूप का दर्शन करें। जीवमात्र में उसकी आभा देखने वाले के लिए परलोक की कामना क्यों होने लगी? परमात्मा से हम प्यार, स्नेह, दया, ज्ञान, शक्ति , भावनाओं के ऊर्ध्वगामी सुखों की अपेक्षा करते हैं यह सुख हमें मनुष्यों और जीवों की सेवा से भी उपलब्ध हो सकते हैं। इस विश्व में पशु, पक्षी आदि जीवों को जिनको आत्म-ज्ञान की प्राप्ति विधेय नहीं है उनकी रक्षा वृद्धि और उनके हित के लिए भी तो कुछ करना चाहिये अन्यथा परमात्मा के इस सुन्दर बाग की रखवाली और उसको सुसज्जित रखने के अपने उत्तरदायित्व का पालन कैसे हो सकता है?
जिस प्रकार परमात्मा की उपासना में उनके रूप गुण और ऐश्वर्य का कीर्तन करते हैं वैसे ही हमें उसके पुत्रों का भी कीर्तन-भजन करना चाहिये। जो पदार्थ जीवों के लिए उपयोगी हैं और सद्गुणों तथा सत्कर्मों की वृद्धि में सहायक हैं उन पदार्थों की उन्नति, वृद्धि और रक्षा करने की चेष्टा करना भी आवश्यक है। परमात्मा अपनी प्रत्येक सुन्दर वस्तु की साज-सँवार देखकर उतना प्रसन्न होगा जितना शायद वह अपने गुणों की प्रशंसा-मात्र से न होगा।
उपयोगी पदार्थों की रक्षा द्वारा सत्संम्पत्तियों को बढ़ाने की चेष्टा के साथ बुराइयों को रोकना भी ईश्वर की ही उपासना है। इसमें भी परमात्मा के सौंदर्य गुण की ही उपासना का भाव छिपा है। जो पदार्थ जीवों के दुर्गुण और दुष्कर्मों को बढ़ाने वाले हैं उनके घटाने और नष्ट करने के लिए भी हमारे प्रयत्न बिना किसी कामना या द्वेष भावना से चलते रहने चाहिए। हानिकारक पदार्थों के न रहने में जीवों का हित है और विश्व के हित व कल्याण की निष्काम कामना रखना ही विश्व-प्रेम है।
इस प्रकार जो विशुद्ध प्रेम और सेवा भावना से प्राणियों के कल्याण के कार्यों में रत रहते हैं वे बाहर से देखने पर लोगों को कैसे ही दिखाई दें पर ईश्वर की दृष्टि में वही सच्चे प्रेमी भक्त होंगे। समाज की उपेक्षा कर की जाने वाली ईश-आराधना का उतना महत्व नहीं, विश्व-प्रेम ही ईश्वर का सच्चा प्रेम है।
आत्म-दर्शन
जो जगत से दूर होकर, उसकी उपेक्षा करके आत्मा को देखना चाहेगा वह अहंकार के ही दर्शन करेगा। उसे ही आत्मा समझकर भ्रमित हो जायेगा। यदि एक उठी हुई लहर या व्यक्त हुआ बुलबुला समुद्र से भिन्न अपनी सत्ता में विश्वास करता है तो यह उसकी भूल भर होगी।
आत्मा के दर्शन में जगत को बाधक समझने पर उससे द्वेष रहता है। घृणा की अनुभूति होती है। यह दोनों अवस्थायें आत्मदर्शन के मार्ग में पहाड़ जैसे अवरोध हैं।
किन्तु जो जगत में आत्मा, और आत्मा में जगत का विश्वास रखता है उसका द्वन्द्व-द्वेष मिट जाता है और वह आत्मा ही नहीं मूल-आत्मा परमात्मा तक को देख लेता है।
—स्वामी विवेकानन्द
परदुःखानुभूति से दुःख निवृत्ति
दुनिया में सभी दुःखी हैं। कुछ अपने दुःख से और कुछ दूसरों के दुःख से। किन्तु यदि तात्विक दृष्टि से देखा जाये तो अपने अभाव और कष्टों से दुःखी होने वाला ही दुःखी है, दूसरे के दुःख से दुःखी होने वाला नहीं। दूसरे के दुःख से दुःखी होने वाले में एक आत्म-सुख होता है। एक मार्मिक अनुभूति रहती है। उसकी आहों में हरा-भरा सावन और आँसुओं में शीतल गंगा लहराती है। स्वार्थ-जन्य दुःख यदि विषैले काँटे हैं तो परार्थ-जन्य दुःख सुविकसित सुमन।
जिस प्रकार एक छोटी बात से हटकर किसी बड़ी बात की ओर ध्यान चले जाने से छोटी बात विस्मृत हो जाती है उसी प्रकार जब मनुष्य की निजी दुःखानुभूति पर-दुःखानुभाविका बन जाती है तब उसके नारकीय पीड़ा देने वाले सारे दुःखों का तिरोधान हो जाता है। अपने से निकलकर औरों की ओर बढ़ना ही सुख की सबसे सरल एवं सच्ची साधना है। —महर्षि रमण
मृत्यु इस संसार में किसी भी जीव को शायद जितना दुःख देती है उतना अन्य कोई वस्तु नहीं। धन और साधन सम्पन्न मनुष्य, नाग, यक्ष, किन्नर, गंधर्व, भूत और बैताल तक, मृत्यु की कल्पना से काँपते पाये जाते हैं। युग के युग बीते, असंख्यों व्यक्तियों ने असंख्यों तरीकों से अनुसन्धान किये पर इस समस्या का कोई समाधान न निकला। जन्म लेने वाले जीव को मृत्यु से कदापि न बचाया जा सका। आधुनिक विज्ञान का आविर्भाव भी इसी परिकल्पना पर आधारित है। विज्ञान के समुद्र मंथन से अनेक प्रकार के तत्व, रत्न और विविध आश्चर्य आविष्कृत हुये किन्तु अमृतत्व की कहीं से भी उपलब्धि न हो सकी। मृत्यु से छुटकारा पाने का कोई स्थूल साधन आज तक न ढूँढ़ा जा सका। इस दुःख से जीव को किसी भाँति उन्मुक्त न किया जा सका।
तो भी संसार के प्रत्येक धर्म ने एक ऐसे तत्व की बात स्वीकार की है जिसे पाकर मनुष्य अमृत-पद पा लेता है, उसे मृत्यु के भय से छुटकारा मिल जाता है। ऋषियों ने अमृत तत्व को एक दैवी पेय पदार्थ के रूप में माना है। पौराणिक कथा, कहानियों और उद्धरणों के अतिरिक्त वेद और उपनिषदों में भी कई स्थानों में ‘अमृत’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। ऐसे सभी स्थल यह व्यक्त करते हैं कि अमृत कोई ऐसा तत्व है जिसके द्वारा मृत्यु से छुटकारा मिल सकता है। अमृत पान करने की वस्तु है या कोई आध्यात्मिक तत्व है तथा उसके पान करने से मृत्यु से छुटकारा मिल जाता है या नहीं—यह यहाँ विवेचना का विषय है।
पुराणों में एक कथा आती है—एक बार देवताओं तथा असुरों ने समुद्र का मन्थन किया। इस मन्थन से जो चौदह रत्न मिले अमृत भी उनमें एक था। बाद में देवताओं ने उसे पान किया और वे अमर हो गये।
समुद्र का मन्थन किया जाना और उससे कोई अमृत जैसा दृश्य पेय प्राप्त किया जाना—यह बात कुछ अजीब-सी लगती है। इतने बड़े समुद्र को मथा जाना ही असम्भव लगता है फिर उससे जो चौदह रत्न प्राप्त हुये वह भी ऐसे हैं जिन पर कोई सहसा विश्वास नहीं होता। पर उक्त पौराणिक आख्यानों की गहराई में प्रवेश किया जाय तो मालूम पड़ता है कि इन कथानकों के द्वारा शास्त्रकारों ने सूक्ष्म आध्यात्मिक तत्वों का अलंकारिक विश्लेषण किया है। अमृत को जिस रूप में पुराणों में वर्णित किया गया है वह उस तत्व का केवल कवित्वमय चित्रण है पर उसमें जो जीवन दर्शन सन्निहित है वह अवश्य ही बहुत महत्वपूर्ण है। इस अलंकारिक विवेचन की वास्तविकता को जानने के लिये उपनिषदों का अध्ययन आवश्यक है। अमृत की व्याख्या उपनिषदों में जिस रूप में की गई है भारतीय संस्कृति का निरूपण उसी को आधार मान कर किया गया है।
अमृतत्व आध्यात्म-धर्म का प्रमुख आधार है और उसी की प्राप्ति को मनुष्य जीवन का लक्ष्य भी बताया गया है। किन्तु वह किसी तरल पेय पदार्थ के रूप में नहीं है वरन् विशुद्ध आध्यात्मिक तत्व के रूप में हुआ है जिसका अवगाहन कर मनुष्य का स्थूल शरीर भले ही अमर न होता हो किन्तु यह निश्चित है कि वह जिस उद्देश्य को लेकर धरातल में अवतरित होता है उसे अवश्य पूर्ण कर लेता है। इसे ही आत्म-कल्याण, स्वर्ग या मुक्ति की, परमानन्द की प्राप्ति कह सकते हैं। जिस तत्व को प्राप्त कर जीव शाश्वत सुख में लीन हो जाता है उसे ही अमृत-तत्व के नाम से पुकारा जाता है।
वह तत्व क्या है—कठोपनिषद् में इसकी व्याख्या की गई है। शास्त्रकार ने यम के मुख से नचिकेता के लिए जो उपदेश कराया है—उसमें कहा है—
य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं, कामं पुरुषो निर्मिमाणः। तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृत मुच्यते॥
(2। 2। 8)
अर्थात्— यह परमात्मा ही प्रलय काल में भी जागृत रहता है। जीव के लिए कर्मानुसार भोग का निर्माण करने वाला भी वही है। वह शुक्र है, वह ब्रह्म है उसे ही अमृत के नाम से पुकारा जाता है।”
इस श्लोक से यह सिद्ध होता है कि परमात्मा ही वह अविनाशी तत्व है जिसे प्राप्त करने से मनुष्य जीवन का उद्देश्य पूरा किया जा सकता है।
मुण्डकोपनिषद् में इसे और भी स्पष्ट करते हुये बताया है—
यदर्चि मद्यदणुभ्योऽणु च, यस्मँल्लोका निहिता लोकिनश्च। तदेतदक्षरं ब्रह्म स प्राणस्तदु वां्मनः तदेतत्स तयं तदमृतं तद्वेद्धव्यं सौम्य विद्धि॥
(2। 2। 2)
अर्थात्—हे सौम्य! तू उस बेधने के योग्य लक्ष्य को बेध डाल, जो तेजस्वी सूक्ष्मातिसूक्ष्म और लोकों में निवास करने वाले प्राणियों का आश्रय है, वही अविनाशी ब्रह्म है, वही मन, वाणी, प्राण, सत्य और अमरत्व से युक्त है।
यहाँ परमात्मा के “अमृत-तत्व” होने की बात को पुष्ट करते हुये शास्त्रकार ने यह भी सिद्ध किया है कि वह प्राण है, सत्य है, मन और वाणी है। इन सन्दर्भों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वह मनुष्य के भौतिक स्वरूप को अमृत नहीं करता वरन् जीवात्मा की स्थिति को इतना ऊँचे उठा देता है कि जीवन का हलकापन नष्ट हो जाता है और उसे अपने आनन्दमय, अविनाशी स्वरूप का बोध हो जाता है। उपरोक्त सूक्त में शास्त्रकार ने आदेश दिया है कि सौम्य! उस परमात्मा की ही शरणागति प्राप्त करो।
ब्रह्मा मृत की उपलब्धि के साधन पर प्रकाश डालते हुये केनोपनिषद् में विवेचन किया है—
आत्मना विन्दते वीर्य; विद्यया विन्दतेऽमृतम्।
(2। 1। 4)
अर्थात्—”परमात्मा से प्रकट हुआ ज्ञान ही यथार्थ है, क्योंकि इसके द्वारा ही अमृतत्व की प्राप्ति होती है। आत्मा से परमात्मा को जानने की प्रेरणा प्राप्त होती है और ज्ञान से अमृत स्वरूप ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है।”
हमारे महापुरुष सदैव इस बात पर जोर देते आये हैं कि मनुष्य ज्ञानवान बनें। विद्या को मनुष्य का आभूषण बताया और कहा कि ज्ञान ही तुम्हें बन्धन से मुक्त करेगा और अमृतत्व प्रदान करेगा पर उन्होंने यह बात भी स्पष्ट कर दी कि यह विद्या लौकिक नहीं हो सकती। यथार्थ विद्या ब्रह्म विद्या है। उसका मनन करने से आत्मा के रहस्य ज्ञात होते हैं, वास्तविक रूप का ज्ञान होता है और यह ज्ञान ही मनुष्य को सृष्टि के आदि कारण परमात्मा को जानने की प्रेरणा प्रदान करता है।
विद्या के विशुद्ध गृहणीय स्वरूप का और भी विवेचन ईशोपनिषद् में हुआ है—
विद्या चाविद्याँ च यस्तद् वेदो भयं स ह। अविद्यया मृत्यं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते॥
(11 वाँ मन्त्र)
अर्थात्—”जो मनुष्य विद्या रूप ज्ञान तत्व और अविद्या रूप कर्म तत्व को साथ ही साथ जान लेता है, वह कर्मों के अनुष्ठान से मृत्यु को पार कर ज्ञान के अनुष्ठान से अमृतत्व का उपभोग करता है।”
उपनिषद् के यह सभी प्रकरण अमृत-तत्व के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं पर साथ ही मनुष्य को भूल न होने देने के लिये भी आगाह कर देते हैं। अमृत मौलिक अर्थ में मृत्यु से छुड़ाने वाला पदार्थ है पर मृत्यु को आध्यात्मिक रूप में शरीर का बारम्बार विनाश मानकर जीव के अज्ञान को मानना पड़ेगा। क्योंकि जब तक अज्ञान रहता है तब तक मनुष्य के सारे क्रिया कलाप स्थूल भोगों तक ही सीमित रहते हैं। विषय भोगों के प्रति आसक्ति मनुष्य से पाप कराती है और वह बार-बार कर्मानुसार मृत्यु पाता है, पुनर्जन्म लेता है। जब तक यह स्थिति चलती रहती है तब तक उसके दुःख नष्ट नहीं होते।
मनुष्य के शरीर में परमात्मा ने दस इंद्रियां दी हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और पाँच कर्मेन्द्रियाँ। (1) आँख (2) कान (3)जिह्वा (5) त्वचा ये पाँच इन्द्रियाँ विषयों का ज्ञान प्राप्त कराती हैं। आँख से भला-बुरा देखना, कान से कोमल-कठोर शब्द सुनना, नाक से सुगन्ध दुर्गन्ध सूँघना, जिह्वा से खाद्य-अखाद्य का स्वाद जानना, त्वचा से कोमल या कठोरता का अनुभव करना। प्रत्येक इन्द्रिय का एक देवता होता है उसी से विषयों की उत्पत्ति होती है। आँख का विषय रूप है और सूर्य देवता। सूर्य या अग्नि न हो तो आंखें बेकार हैं। कान का विषय शब्द, गुण आकाश है। नाक का विषय गन्ध और गुण पृथ्वी है। जीभ का विषय रस और गुण जल है। त्वचा का विषय स्पर्श और गुण वायु है। इन गुणों और शक्तियों के कारण इन इन्द्रियों का उपयोग बहुत अधिक है।
पाँच कर्मेन्द्रियों में (1) वाणी (2) हाथ (3) पैर (4) जननेन्द्रिय और (5) गुदा हैं। वाणी या मुख से बोलते हैं, स्वाद चखते हैं। हाथ से कार्य करते हैं, पैर से चलते हैं। जननेन्द्रिय से मूत्र त्याग और गुदा से मल निकालते हैं।
यह इन्द्रियाँ आत्मा की सुविधाजनक विकास यात्रा के सहायक उपकरण हैं। यह आत्मा के औजार हैं, सेवक हैं,परमात्मा ने इन्हें इसलिये प्रदान किया है कि इनकी सहायता से आत्मा अपनी आवश्यकतायें पूरी करे और सुख प्राप्त करे। यह सभी इन्द्रियाँ बड़ी उपयोगी हैं। सभी का कार्य जीवन को उत्कर्ष और आनन्द प्राप्त कराना है। यदि उनका सदुपयोग किया जाय तो मनुष्य निरन्तर जीवन का मधुर रस चखता हुआ जन्म को सफल बना सकता है।
ज्ञानेन्द्रियाँ ईश्वर ने शरीर में ऊपर की ओर बनाई हैं और कर्मेंद्रियां नीचे की ओर। इससे परमात्मा ने ज्ञान को प्रधानता दी है और यह संकेत दिया है कि ज्ञान के अनुसार, विवेक के अनुसार ही कर्म करो। इनसे तुम्हें सुख मिलेगा और अधोगामी विषयों में भटके तो यही इन्द्रियाँ तुम्हारे लिये काल रूप और विनाश का कारण बन जायेंगी।
उपनिषद्कार ने बताया है-
आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु। बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥ इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयाँस्तेषु गोचरात्। आत्मेन्द्रिय मनोयुक्तं भोक्तेत्या हुर्मनीषिणाः॥
अर्थात्— यह शरीर एक रथ है, इस पर आरुढ़ होने वाला स्वामी जीवात्मा है। जीवात्मा को यह वाहन मोक्ष प्राप्त करने के लिये मिला है। दसों इन्द्रियाँ इस रथ के घोड़े हैं। मन इन घोड़ों को नियंत्रण में रखने वाली बागडोर है। इन्द्रियों के घोड़े विषयों की सड़क पर चलते हुये मुक्ति यात्रा की ओर बढ़ते हैं। इस वाहन का सारथी है मनुष्य की बुद्धि और उसका विवेक। यदि वह सजग है तो इन्द्रियाँ विषयों में न भटककर कुशलतापूर्वक अपने स्वामी को परमात्मा की समीपता में पहुँचा देती हैं।
इन्द्रिय-संयम का सिर्फ इतना ही मतलब है कि इन्द्रियाँ जब भी विषयों की और दौड़ें तब उन्हें सावधानी से सम्हाला जाय और उस शक्ति को बरबाद न किया जाय जिससे आत्मा की विकास यात्रा पूरी होती है।
इन्द्रियों का उपयोग पाप नहीं है। विषय भी आवश्यक हैं। सच तो यह है कि अन्तःकरण की विविध क्षुधाओं, तृषाओं को तृप्त करने का इन्द्रियाँ एक उत्तम माध्यम हैं। शरीर की इन आवश्यकताओं को समय पर पूरा कर किया जाता रहे तो जीवन का सन्तुलन उसी तरह बिगड़ सकता है जिस तरह पेट को आहार न मिलने से स्वास्थ्य सन्तुलन बिगड़ सकता है।
इन्द्रिय नियंत्रण का मूल मन्त्र है आत्म-संयम। शरीर की शक्तियाँ जीव की विकास यात्रा के लिये उपयोगी ही नहीं आवश्यक भी हैं। शरीर में बल और वीर्य की प्रचुर मात्रा न रहे तो वह आत्मिक आदेशों का पालन भली प्रकार नहीं कर सकेगा इसलिए वीर्य रक्षा आवश्यक है और सम्भोग-क्रिया को नियंत्रित कर दिया जाता है। यह सन्तानोत्पत्ति का साधन है ताकि भावी पीढ़ियाँ चलती रहें पर बेकाम वीर्य-पात का कोई उपयोग नहीं, उल्टे उससे शारीरिक शक्ति का पतन होता है और मनुष्य की बुद्धि विभ्रमित होकर आत्म-कल्याण का मार्ग छोड़ देती है।
आहार शरीर की बहुत बड़ी आवश्यकता है उसे सभी जानते हैं। आहार न मिले तो जीवित रहना मुश्किल हो जाय। यह शरीर के लिये अत्यन्त आवश्यक धर्म है किन्तु शरीर-रक्षा के लिये स्वाद की उपयोगिता समझ में नहीं आती। केवल स्वाद-स्वाद की लालसा से पेट खराब हो जाता है, स्वास्थ्य गिर जाता है। इस तरह आहार जो शरीर की आवश्यकता थी वही विधर्मी बनकर हमारी शक्तियों के पतन का कारण बन जाता है कोई भी इन्द्रिय हो उसके उपभोग की एक सीमा निर्धारित है। उस सीमा के अन्दर बने रहने से ही उनका सच्चा उपयोग किया जा सकता है। पर यदि उसका अतिक्रमण किया गया तो रोग और शोक घेर लेंगे। उपकारी इन्द्रियाँ ही तब बन्धन का कारण बन जायेंगी इसलिये इन्द्रिय निग्रह के लिये आत्म-संयम की बड़ी आवश्यकता है।
इतना जानते, समझते हुये भी लोग विषयासक्त देखे जाते हैं इसका कारण भाँति-भाँति के प्रलोभन होते हैं। लोगों को तरह-तरह के भोग भोगते देखकर, शृंगार, सजावट तथा बनावट करते देखकर, अविवेकी जन खुद भी वैसा ही करने के लिये लालायित होते हैं। इन प्रलोभनों में प्रायः नैतिक दृष्टि से कमजोर व्यक्ति और निर्बन चरित्र वाले ही फँसते हैं। जिनकी आवश्यकतायें विलासी इच्छायें, चटोरपन, अनुचित माँगें, नशे बढ़े हुये हैं वे ही प्रायः प्रलोभनों के सामने घुटने टेकते और उसके दुष्परिणाम भोगते हैं।
इन प्रलोभनों से बचने के लिये प्रतिदिन कुछ समय निकालकर आत्म-चिन्तन करना और आत्म संकेतों द्वारा आत्मा तथा मन को बलवान बनाना आवश्यक है “मेरा मन पर पूर्ण अधिकार है। मैं अपने मन का स्वामी हूँ। वह मेरी आज्ञा से कार्य करता है। प्रचण्ड अग्नि और भंयकर तूफान भी मुझे नष्ट नहीं कर सकते। मैं अमर हूँ, शाश्वत हूँ। शरीर का सम्राट मैं आत्मा असंख्यों सूर्यों की शक्ति रखता हूँ। मैं विश्व को प्रेममय देखता हूँ। मेरा मन से कोई विरोध नहीं, मैं जो कुछ करता हूँ वह सब आत्म-कल्याण की भावना से होता है।” इस प्रकार का संकल्प प्रतिदिन शरीर के तमाम झंझटों से थोड़ा समय निकालकर दुहराते रहना चाहिये। ऐसा करने से विषयों के प्रलोभनों से सावधान बने रहेंगे।
इन दिनों इस देश में दीर्घजीवी पुरुषों की कमी इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि वीर्य-रक्षा पर आवश्यक ध्यान नहीं दिया जाता।
इन्द्रिय-संयम के लिए ब्रह्मचर्य व्रत की महिमा सर्वविदित है। इसकी शक्ति अमोघ मानी गई है और आज संसार में जितने व्यक्तियों ने महान और उपयोगी काम कर दिखाये हैं वे किसी न किसी रूप में ब्रह्मचर्य के अनुगामी थे। आजकल के लोग जब कभी सम्भोग नीति की स्वच्छन्दता का प्रचार करते हैं। तब वे केवल भोग प्रधान पार्थिव अंश को ही ध्यान में लेते हैं जीवन की इतनी क्षुद्र कल्पना वे ले बैठे हैं कि थोड़े ही दिनों में उन्हें यह अनुभव हो जाता है कि ऐसी स्वतन्त्रता में किसी तरह की सिद्धि नहीं है और न सच्ची तृप्ति ही। उन्हें कभी सन्तोष नहीं मिलता।
मनुष्य शरीर में जीवात्मा का अवतरण निःसन्देह उसका बहुत बड़ा सौभाग्य होता है। विचार, विवेक और जीवन मुक्ति के अन्य साधन जितने मनुष्य-योनि में मिले होते हैं वे अन्यत्र उपलब्ध नहीं। मनुष्य चाहे तो अनन्त विभूतियों का स्वामी बन सकता है। मनुष्य देवता बन सकता है मनुष्य भगवान बन सकता है। सारी सम्भावनायें इस शरीर में सन्निहित हैं किन्तु उनका उत्कर्ष और जागरण तभी सम्भव है जब शक्तियों का संयम किया जाय और उनके आवश्यक अपव्यय को रोका जाय। इसके लिये इन्द्रिय-संयम मनुष्य कि प्रमुख आवश्यकता है। बिना इस कक्षा को उत्तीर्ण किये कोई आत्म-कल्याण की उच्च भूमिका प्राप्त नहीं कर सकता।
जिसे अपने जीवन में सुख-शान्ति की आकाँक्षा है, जिसे उन्नति, विकास और सफलता की कामना है, उसे अपने सबसे घातक शत्रु ‘चिन्ता का त्याग कर देना चाहिये।’ मनुष्य की जिस शक्ति पर उन्नति, विकास और सफलता निर्भर रहती है उसे यह चिन्ता की आग जलाकर भस्म कर देती है। निःशक्त व्यक्ति जीवन में किसी प्रकार का श्रेय प्राप्त नहीं कर सकता। चिन्ता के त्याग से मनुष्य की बची हुई शक्ति उसके बड़े काम आ सकती है।
सामान्यतः लोगों की यही धारणा रहती है कि मनुष्य की चिन्ता का कारण उसके जीवन को कोई न कोई अभाव ही होता है। एक प्रकार से अभाव ही चिन्ता का रूप धारण कर लेता है। किन्तु यदि इस विषय पर गहराई से विचार किया जाय तो पता चलेगा कि अभाव और चिन्ता दो भिन्न बातें हैं। अभाव की वेदना जहाँ क्रिया की प्रेरिका है वहाँ चिन्ता मनुष्य को निष्क्रिय बना देती है। जिस अभाव की पूर्ति के बिना मनुष्य को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है उसकी पूर्ति के लिए वह अवश्य प्रयत्नशील होगा। किन्तु चिन्ता एक ऐसा असाध्य रोग है जो मनुष्य के समग्र जीवन को प्रभावित करके किसी काम का नहीं रखती।
जो व्यग्रता अपने कारण को दूर करने के लिये क्रियाशील बनाये, वह उत्तरदायित्व की भावना ही है, चिन्ता नहीं। चिन्ता केवल उसी व्यग्रता को कहा जा सकता है जो मनुष्य को अपने तक सीमित करके केवल सोचने और जलने के लिये मजबूर करे।
मनुष्य ने ज्यों-ज्यों विकास किया है त्यों-त्यों उसकी आवश्यकतायें बढ़ गई हैं, जिसके फलस्वरूप उसकी चिन्तायें भी बढ़ गई हैं। जीवन की आवश्यकतायें पूरी करने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को कुछ न कुछ चिन्ता करनी ही होती है, किन्तु इस चिन्ता को उस प्रकार की चिन्ता नहीं कहा जा सकता जो किसी के जीवन को अभिशाप बनाकर रख देती है। भोजन-वस्त्र, रहन-सहन, शादी ब्याह, हारी-बीमारी, पालन-पोषण आदि जीवन के ऐसे सामान्य, साधारण एवं अनिवार्य कार्यक्रम हैं जिन्हें सबको ही किसी न किसी प्रकार से पूरा करना पड़ता है। यदि यह कार्यक्रम समान रूप से सबकी चिन्ता का विषय बनकर जीवन को आक्रान्त कर लें तो संसार में चारों ओर उदासी, विषाद, व्यग्रता, विकलता आदि के अतिरिक्त और कुछ दिखलाई ही न दे। हर मनुष्य रोता और आहें भरता ही बैठा रहे। पर ऐसा कभी नहीं हो सकता, क्योंकि कोई एक बात समस्त समाज को एक रूप में ही प्रभावित नहीं कर सकती। अपनी-अपनी मनोभूमि के स्तर के अनुरूप ही मनुष्य पर किसी बात का न्यूनाधिक प्रभाव पड़ता है। जहाँ कोई एक व्यक्ति किसी एक बात से दब, कुचलकर निर्जीव हो जाता है वहाँ दूसरा पूरी तरह निश्चिन्त तथा प्रसन्न दीखता है। इसका कारण उन दोनों की अपनी-अपनी मनोभूमि का स्तर ही है।
अभावों में किसी को व्यग्र करने की अपनी शक्ति नहीं होती। यह मनुष्य का चिन्ताशील स्वभाव ही होता है जो एक छोटी-सी बात को भी लेकर मन की मन ‘ईरान से तूरान’ तक समस्याओं का जाल बिछा कर अपने को उनमें फँसाकर और कष्ट पाता हुआ अनुभव किया करता है।
भोजन-वस्त्र आदि यद्यपि रोजमर्रा की बातें हैं। किन्तु किसी-किसी के लिए ये साधारण बातें ही जीवन समस्या बन जाती हैं। इनको लेकर वे इतने चिन्तित रहा करते हैं कि विविध रोगों के शिकार बन जाते हैं, आँख,दाँत,कान आदि कमजोर कर लेते हैं, बाल पका लेते हैं और अकाल में ही बूढ़े हो जाते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति चिन्ताशील स्वभाव के होते हैं। चिन्ता, उनका उत्तरदायित्व नहीं, एक व्यसन, व्याधि, प्यास और आवश्यकता बन जाती है। जब तक वे किसी बात को लेकर व्यग्र नहीं हो लेते उन्हें चैन ही नहीं पड़ती। यदि ऐसे व्यक्तियों को व्यर्थ चिन्ता करने से रोका जाये तो वे एक मानसिक परेशानी अनुभव करते हैं। यही कारण है कि अधिक मना करने पर चिन्ताशील व्यक्ति कभी- कभी बुरा मान जाता है और सोचने लगता है कि अमुक व्यक्ति उसे उसके उत्तरदायित्व की भावना से विरत कर हानि पहुँचाना चाहता है। वास्तव में चिन्ताशील व्यक्ति की मानसिक शिथिलता का सहारा पाकर अत्यधिक एवं अनावश्यक उत्तरदायित्व की भावना भी भयानक चिन्ता रूपी सर्पिणी बन कर उसके मनोमन्दिर में बस कर उसके रक्त, माँस का भोजन किया करती है। चिंता रूपी सर्पिणी का भोजन मनुष्य का रक्त ही है, जो इसको अपने जीवन में पालेगा उसे इसको अपना रक्त पिलाना ही होगा।
चिन्ताशील व्यक्ति बहुत कुछ कल्पनाशील ही होता है। किन्तु उसकी कल्पना का लक्ष्य सृजनात्मक नहीं होता ध्वंसात्मक होता है। जिस प्रकार प्रसन्न चेता व्यक्ति की कल्पनायें कला-कौशल, उन्नति विकास आदि के मधुर स्वप्नों के चित्र बनाया करती हैं, उस प्रकार चिन्ताशील व्यक्ति की कल्पनायें नहीं। ऐसे व्यक्तियों की कल्पनायें ऐसे ही मार्ग से चला करती हैं जिनके बीच में आशंकायें, अमंगल, अनिष्ट, निराशा, असफलता, भय एवं भीरुता के गर्त-गह्वर पड़ा करते हैं।
आजीविका जैसी सहज समस्या को ही ले लिया जाये और एक चिन्ताशील व्यक्ति की तुलना निश्चिन्त प्रवृत्ति के व्यक्ति से की जाये तो एक महान अन्तर सामने आयेगा। निश्चिन्त प्रवृत्ति का व्यक्ति सोचेगा— आज नहीं तो कल जीविका अवश्य प्राप्त होगी। आज कहीं परिश्रम करके रोटी कमा लेंगे, कल किसी अच्छे स्थान पर पहुँच जायेंगे। परिश्रम एवं पुरुषार्थ के बल पर मैं अवश्य ही अच्छे-अच्छे साधन का प्रबन्ध कर लूँगा। मैं जीवन रण में हारने अथवा पीछे हटने वाला नहीं हूँ। इसके विपरीत चिन्ताशील व्यक्ति सोचेगा— जब आज ही जीविका नहीं मिली तो कल कहाँ से आ जायेगी? मेरे पास जो कुछ है उसके खत्म होते ही मरने की नौबत आ जायेगी, मेरे मर जाने पर बीबी-बच्चों को कौन सहारा देगा? कौन उनके दुःख-सुख को पूछेगा? मैं बड़ा निकम्मा हूँ, हाय मेरे कारण ही मेरे बाल-बच्चे दर-दर की ठोकरें खाते फिरेंगे। मुझे कोई सहयोग क्यों देगा? मैं ही किसी के क्या काम आया हूँ? मेरा भाग्य खराब है, मेरा समय विपरीत है, मेरा जीवन व्यर्थ है, आदि-आदि न जाने कितने प्रकार की निराशाजन्य अनिष्टों की कल्पना करता-करता चिन्ताशील व्यक्ति अपने जीवन को अभिशाप बना लेता है और निकम्मा होकर उसी की ज्वाला में जला करता है।
एक छोटी-सी चिंता जब इतने अनिष्टों को जन्म दे सकती है तब उसे एक क्षण के लिये भी अपने पास रखना बुद्धिमानी नहीं है। जो व्यक्ति चिन्ताओं को प्रश्रय देता वह अपने जीवन में अँगार बिखेरने के सिवाय और कुछ नहीं करता। चिन्तित व्यक्ति स्वयं अपने लिये अपना शत्रु होता है।
जिन्हें आत्म-कल्याण की कामना है, जीवन में उन्नति और विकास की आकाँक्षा है उन्हें निरर्थक चिन्ताओं से मुक्त रह कर पुरुषार्थ करना चाहिये। जिस प्रकार हाथ पैर बँधा हुआ व्यक्ति एक छोटी-सी नदी को तैरकर पार नहीं कर सकता उसी प्रकार चिन्ताग्रस्त आदमी छोटी से छोटी समस्या से भी निस्तार नहीं पा सकता।
चिन्ताओं से मुक्ति का एक मात्र उपाय है हर समय काम में लगा रहना। निठल्ले व्यक्ति को ही चिन्ता जैसी पिशाचिनी घेरती है। जो व्यक्ति कर्मरत है प्रगतिशील है चिन्तायें उसे किसी प्रकार भी नहीं घेर सकतीं। चिन्ताओं का जन्म स्थान एवं निवास स्थान दोनों ही में मनुष्य का ‘चित्त’ होता है। यदि मनुष्य का मन किसी कार्य में व्यस्त रहे तो चिन्ताओं का जन्म ही न हो सके।
बहुत से लोग उत्तरदायित्व की तीव्र भावना को ही चिन्ता मान लेते हैं। उनका विश्वास होता है कि चिन्ता उत्तरदायित्व के प्रति वह सजगता है, जिसके बल पर कोई अपने कर्तव्य को निभाने में तत्पर होता है। ठीक उत्तरदायित्व का वहन करना हर मनुष्य का कर्तव्य है किन्तु इसे अपनी निरर्थक भावुकता अथवा चिन्ताशील स्वभाव से दुर्वह बना लेना कोई बुद्धिमानी नहीं है। चिन्ता में लिपटा हुआ उत्तरदायित्व कभी भी ठीक से नहीं पूरा किया जा सकता। मनुष्य का मन मस्तिष्क जितना भारमुक्त होगा वह उतनी ही कुशलता से अपने उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकता है। चिन्ताएँ छोड़िये और मुक्त मन एवं दत्त चित्त होकर कर्त्तव्य का पालन कीजिये आप सफल भी होंगे और प्रसन्न भी।
आज के संसार पर दृष्टिपात करने से पता चलता है कि मनुष्य परेशानियों का भंडार बना हुआ हैं। आज परेशानियों की जितनी बहुतायत है उतनी कदाचित पूर्वकाल में नहीं होगी। इसका मुख्य कारण यही समझ में आता है कि ज्यों-ज्यों संसार की जन-संख्या बढ़ती जाती है त्यों-त्यों नये विचारों, नई भावनाओं, नई इच्छाओं की वृद्धि होती जाती है। विभिन्न प्रकार के रहन-सहन, वेश-भूषा और आहार-विहार विकसित होकर संसार में फैल गये हैं।
किसी एक समुदाय के विचार किसी दूसरे समुदाय के विरुद्ध हो सकते हैं। किसी एक वर्ग का आहार -विहार दूसरे वर्ग के विपरीत पड़ सकता है। एक की भावनायें, मान्यतायें आदि दूसरे से टकरा सकती हैं। इसी विविधता, विभिन्नता और बहुलता के कारण कदम-कदम पर संर्घर्ष पैदा होने लगा है। एक विचार धारा के लोग दूसरे की विचारधारा की आलोचना करते हैं निन्दा करते हैं। हर मनुष्य अपने ही विचारों, विश्वासों एवं मान्यताओं के प्रति भावुक होता है। वह उनके विरोध में कुछ सुनना पसन्द नहीं करता। किन्तु उसे सुनना ही पड़ता है।
साथ ही जब मनुष्य का मन-मस्तिष्क किसी एक मान्यता में केन्द्रित रहता है तब उसे कोई विशेष परेशानी नहीं होती। उसकी मान्यता जैसी भी अच्छी-बुरी होती है वह उस पर विश्वास रखता हुआ संतुष्ट रहता है। उसके मस्तिष्क में कोई तर्क-वितर्क का आन्दोलन नहीं चलता। किन्तु आज के युग में बुद्धिवाद इतना बढ़ गया है कि किसी एक विश्वास को अखण्ड बनाये रखना कठिन हो गया है। संसार में हजारों प्रकार की विचारधारायें विकसित हो गई हैं, तर्क का इतना प्राधान्य हो गया है कि किसी भी मान्यता का आसन हिलते देर नहीं लगती। विश्वासों के बनने बिगड़ने की प्रक्रिया से भी कोई कम परेशानी नहीं होती।
विभिन्न सभ्यताओं का विकास भी संघर्ष एवं अशान्ति का कारण बना हुआ है। हर राष्ट्र हर मानव समुदाय संसार में अपनी सभ्यता का ही प्रसाद देखना चाहता और उसके प्रयत्न में अन्य सभ्यताओं को अपदस्थ तक करने की कोशिश करता है।
वस्तु एवं विषयों का बाहुल्य हो जाने के कारण मनुष्य की आवश्यकतायें एवं इच्छायें बहुत बढ़ गई हैं। समुपस्थित साधनों की अपेक्षा जन-संख्या की अपरिमित वृद्धि से मनुष्यों का स्वार्थ पराकाष्ठा पा कर गया है। वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण संसार की शक्तियों का सन्तुलन बिगड़ गया है, जिससे मनुष्यों के बीच पारस्परिक विश्वास समाप्त हो गया है। आधिक्य तथा अभाव की विषमता के कारण रोग, दोष, शोक, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, लोभ आदि की प्रवृत्तियां बहुत बढ़ गई हैं। जीविका के लिये जीवन में अत्यधिक व्यस्तता बढ़ जाने के कारण मनुष्य एक निर्जीव यंत्र बन गया है, उसके जीवन की सारी प्रसन्नता, उल्लास, हर्ष एवं आशा आदि विशेषतायें समाप्त हो गई हैं। मनुष्य, निष्ठुर, नीरस, अनास्थावान एवं नास्तिक बन गया है। मन में कोई उत्साह न रहने के कारण धर्म उसके लिए ढोंग और संयमशीलता, रूढ़िवादिता के रूप में बदल गई है।
मनुष्य को परेशान करने वाली परिस्थितियों के विकटतम जाल चारों और फैल गये हैं। इन परेशानियों में फँसा-फँसा जब वह ऊब उठत है तो नवीनता तथा ताजगी लाने के लिये निकृष्ट मनोरंजनों तथा मद्यादिक व्यासनों की ओर भाग पड़ता है।
ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट, स्वार्थ एवं संघर्ष आज के समय का वास्तविक जीवन बन गया है। इतनी दुष्ट प्रवृत्तियों एवं परिस्थितियों के रहते हुये मनुष्य परेशान न रहे यह कैसे हो सकता है? क्या अपढ़ और पढ़ा लिखा क्या धनवान और क्या निर्धन, क्या मालिक और क्या मजदूर, बच्चा-बूढ़ा, स्त्री-पुरुष सब समान रूप से अपनी-अपनी तरह परेशान देखे जाते हैं।
ऐसा नहीं कि मनुष्य अपनी इन परेशानियों का इतना अभ्यस्त हो गया हो कि इनकी ओर से उदासीन रह रहा हो, बल्कि वइ इन व्यग्रताओं से इतना दुःखी हो उठा है कि उसे जीवन से कोई विशेष दिलचस्पी नहीं रही, जिससे फलस्वरूप समाज में अपराधों विकृतियों एवं कुरूपताओं की बाढ़ सी आ गई है। मानव-जीवन के लक्ष्य “सत्यं शिवम् सुंदरम्” का पूर्ण रूपेण तिरोधाम हो गया है।
मनुष्य अपनी इन परेशानियों से छूटने का उपाय भी कर रहा है। वस्तुतः उसका सारा उद्योग, परिश्रम और पुरुषार्थ है ही केवल परेशानियां कम करने और कष्टों से छूटने के लिये। किन्तु उसके कष्टों में कमी के कोई लक्षण दृष्टिगोचर नहीं होते। मनुष्य अन्धकार में हाथ-पाँव मारता हुआ सुख की दिशा के बजाय भ्रम की वीथियों में भटकता फिर रहा है। सुख के प्रयास में दुःख ही पाता चला जा रहा। निस्सन्देह मनुष्य की यह दुर्दशा दया की ही पात्र है।
संसार में अशक्त अथवा असाध्य कुछ भी नहीं है उसके लिये प्रबल पुरुषार्थ, दृढ़ निष्ठा, उपयुक्त दृष्टिकोण मानसिक सन्तुलन आत्म-विश्वास और सही दिशा की आवश्यकता है।
तृष्णा भयानक अजगर के समान है। जब यह किसी मनुष्य में अनियन्त्रित हो जाती है तो सम्पूर्ण संसार को निगल जाने की इच्छा किया करती है। अपनी इस अनुचित इच्छा से प्रेरित होकर जब वह अग्रसर होता है तब भयानक संघर्ष, विरोध एवं वैर में फँसकर चोट खाता और तड़पता है। स्वार्थ से ईर्ष्या, द्वेष, लोभ आदि मानसिक विकृतियों का जन्म होता है जो स्वयं ही किसी अन्य साधन के बिना मनुष्य को जलाकर भस्म कर डालने के लिये पर्याप्त होती हैं।
दृष्टिकोण की अव्यापकता भयानक बन्दीगृह है, जिसमें बन्दी बना मनुष्य एकाकीपन और सूनेपन से घिरकर तड़पता कलपता रहता है। संकीर्ण दृष्टिकोण वाला व्यक्ति अपनी मान्यताओं, विश्वासों अथवा भावनाओं से भिन्न किसी भावना, विश्वास अथवा मान्यता को सहन नहीं कर पाता। किसी दूसरी सभ्यता अथवा संस्कृति को फूटी आँख भी फलते-फूलते नहीं देख सकता। जो उससे सम्बन्धित है वही सत्य है शिव है और सुन्दर अन्य सब कुछ अमंगल एवं अशुभ है। इस विविधताओं, विभिन्नताओं एवं अन्यताओं से भरे संसार में भला इस प्रकार के संकुचित दृष्टिकोण वाला व्यक्ति किस प्रकार सुखी रह सकता है? उससे भिन्न मान्यताएं उठेंगी, विविधताएं व्यग्र करेंगी और भ्राँतियाँ उत्पन्न होंगी।
अनास्था, नास्तिकता एवं अविश्वास भी विषैले सर्पों से कम नहीं है जो अपने पालने वाले को डसे बिना नहीं रहते। जो नास्तिक है वह निरावलम्ब है, जो आस्थाहीन है वह नीरस एवं कडुआ है और अविश्वासी है वह बहिष्कृत है। संसार में सहज सम्भाव्य निराशाओं और असफलताओं के आने पर जब मनुष्य का विषाद अपनी सीमा पा कर जाता है तब मात्र आस्तिक भाव ही मनुष्य को सहारा देता है। जन-जन के साथ छोड़ देने, सम्बन्धियों के विमुख हो जाने, शत्रुओं से घिर जाने, आपत्ति के आने पर यदि किसी असहाय को कोई सहायता देता है तो वह उसका आस्तिक भाव ही है। रोग, निराशा अथवा विषाद की चरम सीमा जब मनुष्य के चारों ओर मृत्यु का जाल रचने लगती है तब एक आस्तिक भाव ही है जो उसे मृत्यु के भयानक अन्धकार में दीपक दिखाता है। मृत्यु के महत्वपूर्ण अवसर पर जहाँ नास्तिक असहाय अवस्था में छटपटाता, रोता और भयभीत होता है, निरुपाय बाँधवों की ओर कातर दृष्टि से देखता हुआ सहारे की याचना करता, वहाँ आस्तिक व्यक्ति एक अनन्त सहारे से संतुष्ट शान्तिपूर्वक प्रयाण करता है। आस्तिक हर क्षण एक सबल एवं सच्चे मित्र के समान कदम-कदम पर साथ देती है। आस्तिक सदा निर्भय और निश्चिन्त रहता है। आस्तिकता के अभाव में कोई भी मनुष्य कितना ही बलवान अथवा बुद्धिमान क्यों न हो सदैव ही निःसहाय एवं निरुपाय है। ठोकर लगने, चोट खाने पर वह चीत्कार करता उठता है उसे सहारा देने वाली कोई शक्ति उसके अन्दर नहीं होती।
इसी प्रकार जो आस्थाहीन और अविश्वासी है उसे न तो किसी से स्नेह होता न श्रद्धा स्वयं अविश्वासी होने से किसी का विश्वासपात्र नहीं बन पाता और एक रिक्त एवं बहिष्कृत जीवन बिताता है।
अस्तु, सुखी और सन्तुष्ट रहने का एक ही मूल-मन्त्र है- स्वल्प इच्छाएँ, कम आवश्यकताएँ, निःस्वार्थ जीवन और आस्थापूर्ण आस्तिक दृष्टिकोण का विकास मनुष्य को सर्वसुखी रखने में सदा सफल हो सकते हैं।
आज का मानव-समुदाय देश, धर्म, जाति, वर्ण, पंथ, सम्प्रदाय, भाषा व प्रदेश आदि के आधार पर टुकड़े-टुकड़े होकर बिखरा हुआ है। एक ही परमात्मा के पुत्र और एक ही धरती-माता की सन्तानों के बीच यह बिखराव बड़े खेद का विषय है। किन्तु इससे भी अधिक खेद का विषय यह है कि मानव-समुदाय की यह टूट-फूट भयानक रक्त-पात का कारण बनती है।
पिछले हजारों वर्षों से इसी टूट-फूट के कारण क्या योरूप, क्या एशिया, क्या अमेरिका और क्या अफ्रीका आदि सारे महाद्वीपों की धरती मनुष्य के रक्त से लाल होती चली आ रही है। साम्प्रदायिक संघर्ष और धर्म के नाम पर होने वाले नर-मेघ ने संसार के सम्पूर्ण मानव समुदाय को बुरी तरह त्रस्त कर दिया है।
यह सही है कि कुछ पिछड़े हुये देशों एवं जातियों को छोड़कर प्रगतिशील देशों और जातियों ने धर्म के नाम पर रक्त -पात बन्द कर दिया है, तो भी उनमें वर्ग-वाद और रंग-वाद के आधार पर संघर्ष चलता रहता है। और किसी न किसी बहाने खून बहता ही रहता है। साथ ही संसार में राष्ट्रवाद का एक ऐसा उन्माद फैल गया है जिसने क्या तो प्रगतिशील और क्या पिछड़े सभी देशों को एक-दूसरे का दुश्मन बना रक्खा है।
संसार के सारे नेता, विचारक एवं शासक मानव-समुदाय की इस टूट-फूट से होने वाली अपरिमित हानियों को देख रहे हैं और अनुभव कर रहे हैं कि संसार में स्थायी सुख-शान्ति के लिये एक विश्ववाद एवं एक मानव-समाज की अनिवार्य आवश्यकता है। किन्तु वे कतिपय कमजोरियों के कारण युग की इस आवश्यकता को पूरा करने के लिये एक स्वर से एक विश्ववाद एवं एक मानव-समाज का सन्देश नहीं दे पा रहे हैं।
मानव-समुदाय की एकता प्रतिपादित करने में जो कमजोरी सबसे अधिक आड़े आ रही है वह है मनुष्यों का अपनी-अपनी मान्यताओं के प्रति पक्षपात अथवा दुराग्रह। मनुष्यों के बीच मान्यताओं के प्रति दुराग्रह पूर्ण पक्षपात की यह जहरीली तलवार इस तरह तनी हुई है कि आवश्यकता होते हुये भी वह उनको एक-दूसरे के समीप नहीं आने दे रही है, और जब तक यह तीव्र तलवार तनी रहेगी संसार में यों ही संघर्ष होता रहेगा और सुख-शान्ति के शुभ-दिन कभी न आ सकेंगे।
मान्यताओं के प्रति पक्षपात मनुष्य की बौद्धिक कमजोरी है जो उसे परम्परागत मिलती है। सुविधा पूर्वक जीवन-यापन के लिये व्यक्तियों, परिस्थितियों एवं देश-काल के अनुरूप जीवन को एक क्रम तथा पद्धति प्रदान करने के लिये समय-समय पर जो नियम निर्माण किये जाते हैं वे चलते-चलते कालान्तर में मान्यताओं का रूप धारण कर लेते हैं।
निसर्ग-नियमों की तरह शाश्वत न होते हुये भी उपयोगिता के अनुसार मानवीय मान्यताओं की एक आयु तो होती ही है और युग, समय अथवा परिस्थितियों के सर्वथा बदल जाने तक उनकी कुछ न कुछ उपयोगिता बनी भी रहती है।
परिवर्तन संसार का अनिवार्य नियम है, किन्तु इसकी गति इतनी मन्थर होती है कि नित्यप्रति होने वाला परिवर्तन दृष्टिगोचर नहीं होता है। यदि यह धीरे-धीरे होने वाला परिवर्तन क्रम ठीक से दिखाई देता रहे तो उसी अनुपात से मनुष्य अपनी मान्यताएं भी बदलता चले। स्थूल एवं स्पष्ट रूप से दृश्यमान होने में परिवर्तन एक लम्बा समय लेता है। तब तक मनुष्य की मान्यतायें उसके मस्तिष्क में गहरी जड़ पकड़ लेती हैं और तब अपनी उन चिर संगिनियों को उखाड़ फेंकने में एक मोह, एक ममता और एक पीड़ा-सी होने लगती है। चिर संपर्क से ममत्व हो ही जाता है और ममत्व तोड़ते समय पीड़ा होना स्वाभाविक ही है। किन्तु मनुष्य की विवेकशीलता इसी में है कि वह अपने ऐसे किसी ममत्व पर दया न करे जो उसकी वाँछनीय सुख-शान्ति एवं प्रगति में बाधा बनती हो।
मनुष्य जिस समाज, राष्ट्र, वर्ग अथवा वंश में पैदा होता है, परम्परागत उसकी अपनी कुछ मान्यतायें भी होती हैं, जिनको कि किसी समय सुख-सुविधा के अनुसार परिस्थितियों के अनुकूल बनाया गया होता है। अब चूँकि सामाजिक नियम बच्चों के घरौंदों की तरह न तो रोज-रोज बनाये-बिगाड़े जा सकते हैं और न मानव-जीवन क्रम की परिस्थितियाँ ही जल्दी-जल्दी बदलती रहती हैं जिससे कि आज की मान्यताओं की उपयोगिता कल ही खत्म हो जाये। इसलिये उनको काफी समय तक चलते रहने का अवसर मिल जाता है। इसी बीच, जब तक कि सामाजिक जीवन को उपयोगी मोड़ देने के लिये, उपस्थित परिस्थितियों का, अनुपयोगी मान्यतायें बदलने का, तकाजा तेज होता है, वे मानव-मस्तिष्क को इस सीमा तक प्रभावित कर चुकी होती हैं कि वह उनका दुराग्रहपूर्ण पक्षपाती बन जाता है और यही उसकी बौद्धिक कमजोरी है।
साधारण मानव-मस्तिष्क की यह सहज दुर्बलता है कि वह एक बार जिस विचार चक्र पर चढ़ जाता फिर जल्दी उससे उतरना नहीं चाहता। उसे नवीन विचारधारा में उतरते हुए बड़ा अटपटा लगता है। इसीलिये जन्म से जीवन में समाई हुई मान्यताओं को छोड़ने की उसे हिम्मत नहीं होती, और जब कोई उसे उनकी निरुपयोगिता से होने वाली हानियों की ओर संकेत करता हुआ त्यागने का परामर्श देता है तब वह अपनी इस कमजोरी को छिपाने के लिये उनका पक्षपात करने लगता है।
अपनी-अपनी मान्यताओं के प्रति इसी अन्ध पक्षपात के कारण मनुष्य के बीच रक्तपात पूर्ण संघर्ष को स्थान मिलता है। मात्र-मान्यताओं के खण्डन-मण्डन के आधार पर कट-मरना मनुष्य जैसे विवेकशील प्राणी को किसी प्रकार भी शोभा नहीं देता।
अपनी-अपनी मान्यताओं के प्रति संसार में जब सब को ही समान रूप से मोह है और पक्षपात के कारण कोई किसी की आलोचना परामर्श एवं सुझाव सुनना ही नहीं चाहता बल्कि आत्मप्रतिष्ठा और आत्मगौरव के नाम पर दूसरों की अपेक्षा अपनी मान्यताओं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की जिद पकड़े हुये है, तब इस समस्या का समाधान भी आखिर किस प्रकार हो?
इसका केवल एक ही उपाय है। वह यह कि सारा मानव समाज अपनी-अपनी मान्यताओं को निष्पक्षता की तुला पर तोल कर देखे कि उनमें सत्य के साथ मानव-जीवन के लिये कितना लाभकर अंश है। इस कसौटी पर जो-जो मान्यतायें खोटी सिद्ध हों उन्हें सड़ी-गली चीज की तरह तुरन्त त्याग दे। इस प्रकार के त्याग में राष्ट्रीय प्रतिष्ठा अथवा आत्म-गौरव जैसे भावुकतापूर्ण प्रश्न को जोड़ना बुद्धिमानी नहीं है।
बहुत बार हो सकता है कि मोह के कारण किसी को अपनी मूढ़ से मूढ़ मान्यताओं में दोष न दिखाई दे। इसके लिये दूसरों के विवेचन, आलोचना तथा मूल्याँकन को अपने निर्णय में सहायक समझकर तटस्थता की स्थिति में होकर सुनने का साहस रखना चाहिये।
अब चूँकि संसार का सम्पूर्ण जन-साधारण न तो स्वयं निर्णय कर सकता है और न वह उसका उचित अधिकारी ही है। यह काम है विश्व के विचारकों, समाज को नेतृत्व देने वालों और विवेकशील विद्वानों का, जो कि अपनी मानव-जाति के प्रति शुभेच्छा एवं करुणा रखते हों और उसकी सुख-शान्ति का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर समझते हों। परमात्मा ने उनको विशेष विद्या-बुद्धि देकर इसीलिये आगे बढ़ाया है कि इस सृष्टि को नरक बनने से रोकें, और स्वर्ग बनाने का प्रयत्न करें। और जन-साधारण का कर्तव्य है कि वह उनके निर्णय में विश्वास करे और आस्थापूर्वक उसका पालन करे।
जन-साधारण की भाँति भावुक होकर संसार के उत्तरदायी व्यक्तियों का अपनी मूढ़ एवं हानिकारक मान्यताओं का प्रतिपादन करने में अपनी विद्या-बुद्धि का दुरुपयोग करना उसके व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं है। उन्हें चाहिये कि वे निष्पक्ष रूप से विवेक के प्रकाश में बैठ कर आपस में निर्णय करें कि इस विशाल मानव-समुदाय को एक समाज का रूप देने के लिये किन पुरानी मान्यताओं को निकला फेंकना है और कौन-सी नई मान्यताओं को स्थापित करना है? जिनके आधार पर राष्ट्र, धर्म, सम्प्रदाय, वर्ग, वर्ण वाद अथवा जाति-पांति के नाम पर होने वाला संघर्ष सदा सर्वदा के लिये मुँह काला कर जाय और संसार में स्थायी सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ प्रवेश करें।
पांडिचेरी की विश्व-विख्यात संस्था जो मनुष्य को आत्म-संयम द्वारा आन्तरिक क्रियाओं से ईश्वर के साक्षात्कार का सन्देश तथा प्रेरणा प्रदान करती है उसके जनक श्री अरविन्द घोष थे। वे अरविन्द घोष जिन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन को साधना में लगाकर, संसार के सारे सुख-साधनों को त्यागकर विश्व-मानवता के कल्याण के लिये उत्सर्ग कर दिया।
इनका जन्म 15 अगस्त सन् 1872 ई. को कलकत्ते में श्री कृष्ण धन घोष के आत्मज के रूप में हुआ। श्री कृष्णधन घोष पाश्चात्य सभ्यता के पक्षपाती ही नहीं अन्ध भक्त थे, और उस समय की अपनी परिस्थितियों के अनुसार उन्हें वैसा होना ही चाहिये था। वे सिविल सर्जन थे और अंग्रेज सरकार के एक उच्च पद पर काम करते थे।
अपने परिवार को पूर्णतया साहबी रंग में रंग देने के मन्तव्य से उन्होंने अपने पुत्र अरविन्द घोष को सात साल की अवस्था में इंग्लैंड में पढ़ने तथा रहने के लिये भेज दिया था। जहाँ वह एक अँग्रेज परिवार में रहकर सेंट-पाल स्कूल में ही शिक्षा पाने लगे। कुछ सयाने होने पर बाद में वे सेंटपाल स्कूल के छात्रावास में ही रहने लगे।
प्रारम्भिक शिक्षा से लेकर आई.सी.एस. के प्रथम खंड तक वे इंग्लैंड में ही शिक्षा पाते रहे। उनके पिता को पूरी आशा थी कि उनका पुत्र अवश्य ही आई. सी. एस. पास करके एक प्रसिद्ध कलेक्टर अथवा डिप्टी कलेक्टर बनकर उनकी तरह ही वैभवपूर्ण जीवन में प्रवेश करेगा। किन्तु पिता की यह इच्छा सफल न हो सकी।
श्री अरविन्द घोष जिस समय आई. सी. एस. के दूसरे खण्ड की तैयारी कर रहे थे, उस समय कुछ ऐसा कटु अनुभव हुआ कि उन्होंने उक्त परीक्षा देने का विचार छोड़ दिया, और भारत वापसी की तैयारी कर ली। उसी समय इंग्लैंड में उनका परिचय महाराज बड़ौदा से हुआ। महाराज बड़ौदा ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपने राज्य के एक उच्च पद पर नियुक्त कर लिया और जहाँ से कुछ समय बाद बड़ौदा कालेज के वायस-प्रिंसीपल के पद पर चले गये।
बड़ौदा में रहते हुये उन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया और लगभग समग्र भारतीय साहित्य का अध्ययन किया। अपने इस विशाल अध्ययन ने उनके नेत्र खोल दिये और उन्होंने भारतीय साहित्य के वैभव को पहचाना। जिन अरविन्द घोष को उनके पिता पाश्चात्य रंग में रंग कर साहब बनाना चाहते थे, उन्हें भारत के महान एवं तत्व ज्ञानपूर्ण साहित्य ने प्रभावित कर विशुद्ध भारतीय तथा देशभक्त बना दिया।
जिस समय तक श्री अरविन्द घोष इंग्लैंड में रहकर अँग्रेजी, फ्रेंच तथा लैटिन भाषा के साहित्य का अध्ययन करते रहे तब तक ऐसा अनुभव करते रहे कि संसार में उन साहित्यों से बढ़कर ज्ञानपूर्ण साहित्य कहीं नहीं है, और भारतीय साहित्य को तो वे दिमागी कूड़ा-करकट ही समझते थे और उसके अध्ययन का विचार तक मस्तिष्क में नहीं लाते थे। किन्तु जब पाश्च्त्य साहित्य के पूर्ण पंडित होने पर उन्होंने बड़ौदा में भारतीय साहित्य पढ़ा, उसके शास्त्रों को अध्ययन किया तब तो वे ऐसे प्रसन्न हो उठे मानो अन्धकार में भटकते-भटकते सहसा दिन के प्रकाश में आ गये, और एक बार जो अध्ययन किया तो तब तक न छोड़ा जब तक कि उसकी तह तक पहुँच ईश्वर प्राप्ति के लिये जिज्ञासु नहीं हो उठे।
जिस भारतीय साहित्य को भारत के महान ऋषियों, मुनियों एवं मनीषियों ने जीवन की पराकाष्ठा तक निःस्पृह एवं पवित्र रखकर संसार को कोलाहल से दूर अरण्यों में बैठकर मानव-कल्याण के उत्तम ध्येय से लिखा है, उसका अध्येता यदि इस सीमा तक प्रभावित एवं प्रसन्न हो उठे तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है भारतीय साहित्य किसी मनुष्य को तभी तक दुरूह, दरिद्र, निरर्थक अथवा निरुपयोगी मालूम होता है जब तक वह उसे दूर-दूर रहकर उड़ती नजर से देखता है, पर ज्यों-ज्यों वह उसके निकट आता जाता है वह उत्तरोत्तर आकर्षक और ज्यों-ज्यों वह उसमें डुबकी लगाता जाता है वह उसके लिये जीवन रहस्यों एवं शाश्वत सत्यों का विधान बनता जाता है। जो इसमें जिस सीमा तक डूबता है उसी स्तर के रत्न लेकर निकलता है।
श्री अरविन्द घोष के साथ भी यही बात घटित हुई। उन्होंने भारतीय साहित्य का अध्ययन क्या किया, एक नई और सच्ची जिंदगी पा ली। उनकी इस नई जिंदगी की झलक उनके अनेक उन पत्रों से मिल सकती है जो उन्होंने बड़ौदा से अपनी नव विवाहिता पत्नी को लिखे थे। जिनका आशय प्रायः इसी प्रकार का होता था—’मैं एक पागल हूँ, और मेरी पागलपन की तरंगों में से जो तीन तरंगें मुख्य हैं उनमें से एक यह कि संसार की सारी सम्पत्ति उस परमात्मा की है। दूसरी यह कि मैं परमात्मा का साक्षात्कार करने के लिये व्यग्र हूँ और पूर्ण आशान्वित हूँ कि मैं उसके दर्शन पाकर रहूँगा, और तीसरी यह कि मैं अपने देश की भूमि उसके पहाड़, नदियों तथा वनों को मात्र भौगोलिक सत्ता नहीं मानता बल्कि समस्त जड़-चेतन प्रकृति को माता मानता हूँ और उसी अनुसार उसकी पूजा उपासना करता हूँ।
श्री अरविन्द के यह दार्शनिक विचार स्पष्ट प्रकट करते हैं कि वे प्रोफेसरी के एक सामान्य जीवन क्रम को चलाते हुए आत्मोन्नति के किस स्तर पर पहुँचे हुये थे। किन्तु उस स्तर से उतर कर उन्हें कर्तव्य के कठोर धरातल पर आते देर न लगी, जब माता रूप मातृभूमि बंग के भंग का षड़यन्त्र उनके काम में पड़ा। योग की ओर बढ़ता हुआ माई का लाल कर्तव्य योगी बन गया।
जब मातृ भूमि पर संकट आया हुआ हो, आन पर आ रही हो और गौरव पर प्रतिकूलता के काले बादल छा रहे हों उस समय योग को बलिदान अध्यात्म स्वाभिमान में बदल जाता है। जिस देश के तरुण इस परिवर्तन को ठीक-ठीक समझ लेते हैं और उसी के अनुसार अपनी जीवनधारा मोड़ देते हैं उनका ही मानव-जीवन सार्थक और उनकी ही मातृभूमि मानव-भेड़ियों से निरापद रहा करती है।
बंग-भंग की भेरी बजी और श्री अरविन्द घोष ने बड़ौदा कालेज के वाइस प्रिंसिपल पद से त्याग-पत्र दे दिया। कहाँ महाराज बड़ौदा की कृपापात्रता पूर्ण कालेज की सम्मानित प्रिंसिपली की सुख-सुविधा और कहाँ मातृ भूमि की रक्षा के लिये बलिदान पथ के काँटे, कितना अन्तर है दोनों जीवनों में, किन्तु कौन नहीं जानता कि वास्तविक सुख और आत्मा का आनन्द कहाँ पर है। और कहाँ है जीवन की वह वास्तविकता जिसे पाने के लिये योगी संसार से निस्पृह होकर आत्म-निष्ठ हो जाता है और एक वीर बिजली की तरह चमकती हुई कृपाण को कण्ठ से लगा लेता है। मातृभूमि के विरुद्ध चल रही किसी दुरभिसंधि के मिटाने देने में आत्म लाभ करने की अपेक्षा आत्म-त्याग, आत्मोत्सर्ग तथा आत्म-बलिदान एक बड़ा पुण्य, एक महान उत्कर्ष और एक वास्तविक अध्यात्म है।
बड़ौदा कालेज की भारी वेतन की प्रिंसीपली छोड़कर अरविन्द घोष ने कलकत्ता के नेशनल कालेज में प्रिंसीपली का पद अवैतनिक के तुल्य ही नाम मात्र का वेतन लेकर इसलिये स्वीकार किया कि वे वहाँ से देश की वैज्ञानिक सेवा कर सकेंगे। राष्ट्र रक्षा के लिये दीवानों का, अपना खून-पसीना एक करके निर्माण कर सकेंगे। इस सेवा के अतिरिक्त उन्होंने ब्रिटिश राज्य के लिये दहकते हुये उल्का पिंड की तरह ‘वंदे मातरम्’ नामक एक पत्र भी निकाला जिससे भयभीत होकर विदेशी शासन ने उन्हें कानून का बहाना लेकर एक वर्ष के लिये कारागार भेज दिया। जिसका उस कर्मयोगी ने सीमान्त लाभ उठाया और कारागार की एकान्त साधना में ईश्वरीय अनुभूति प्राप्त कर ली और इस सत्य का अन्वेषण कर लिया कि किसी संघर्ष को लड़ने के लिये बाह्य साधन उतने उपयोगी तथा आवश्यक नहीं है जितना कि आन्तरिक बल। कारागार के दण्ड के कल्याणकारी परिणाम को बतलाते हुए उन्होंने स्वयं एक स्थान पर कहा था। “ब्रिटिश सरकार का कोप भाजन बनकर मैं ईश्वर का अनुग्रह पात्र बन गया जिसके फलस्वरूप मैंने अंतस्थ ईश्वर को प्राप्त कर लिया है। उनके कथन के पीछे निश्चय ही यह तथ्य छिपा हुआ है कि मातृभूमि के प्रति उनकी बलिदान भावना की तीव्रता ही उन्हें अपनी आत्मा में ईश्वर रूप होकर अनुभव हुई थी।
इस एक बड़े तथ्य को पाकर जब वे जेल से बाहर आये तो यह संकल्प लेकर निकले कि वे अपनी समग्र मानवीय शक्तियों को आत्मा में एकीभूत करके अनन्त अन्तःशक्ति को मातृ-भूमि की रक्षा में नियोजित करेंगे और उसी की सहायता से देश के बलिदानी वीरों को शक्ति मत्ता प्रदान करेंगे।
साथ ही उनका विश्वास था कि अँग्रेजों जैसे आधि-भौतिक शत्रुओं से निपटने के लिये भारत माता की गोद में असंख्यों लाल हैं। उसका एक पुत्र भौमिक संघर्ष से विरत होकर शत्रुओं के हृदयस्थ उन असुरों से युद्ध छेड़ेगा जो उन्हें अनुचित करने के लिये न केवल प्रेरित ही करते हैं अपितु शक्ति भी प्रदान करते हैं, और मार भगायेगा राष्ट्र वीरों के हृदय से उन वंचकों को जो स्वार्थ, स्पृहा और भीरुता आदि के कुटुम्बी होते हैं और बलिदानियों के बढ़ते हुये चरणों को मोह की जंजीरों में जकड़कर अवरुद्ध कर सकते हैं।
उनका कहना था कि मैं राष्ट्रीय संघर्ष को केवल राजनीतिक स्वतन्त्रता तक ही नहीं देख रहा हूँ बल्कि देख रहा हूँ उस क्षेत्र तक, जहाँ आचरण के बीज फलने आवश्यक हैं। जहाँ राजनीतिक स्वतन्त्रता के लिये दूसरे प्रयत्न कर रहे असंख्यों संघर्षरत हैं वहाँ मैं वैचारिक मुक्ति के लिये अकेले ही अप्रत्यक्ष युद्ध करूंगा।
निदान वे ब्रिटिश भारत की सीमा से बाहर पांडिचेरी में आकर साधना करने लगे। वे जिस सनातन आध्यात्मिकता को भारत के उज्ज्वल भविष्य का कारणभूत आधार मानते थे उसे ही सिद्ध करने में लग गये। श्री अरविन्द 4 मार्च 1910 को आये तो केवल अकेले ही किन्तु शीघ्र ही एक से अनेक होने लगे और उनका छोटा-सा साधना कुटीर एक बड़े आश्रम के रूप में बदलने लगा। शीघ्र ही पांडिचेरी आध्यात्मिक अस्त्रों की एक यन्त्र शाला बन गई।
इधर भारतीय वीर स्वाधीनता संग्राम में जूझने लगे और उधर पांडिचेरी से उनकी आत्मा में आध्यात्मिक शक्ति की कुमुक आने लगी। इस प्रकार अन्दर और बाहर से एक साथ मार पड़ते ही भारत के कारण उदय-अस्त तक फैला हुआ अँग्रेजी साम्राज्य डगमगाने लगा और शीघ्र ही वह दिन आया कि उस आन्तरिक भार से भयभीत हुए अँग्रेज न केवल भारत से ही भागे बल्कि संसार से अपना माया जाल समेटते नजर आने लगे। कहना न होगा कि प्रत्यक्ष से अप्रत्यक्ष मार अधिक भयानक होती है।
उनकी जन्म तिथि पर भारत स्वतन्त्र हुआ और अब वह सदा स्वतन्त्र ही रहेगा, किन्तु कौन कह सकता है कि भारत की इस सफलता तथा आगे की वहबूदी में श्री अरविन्द घोष का यह गुप्त योगदान हजारों, लाखों सशस्त्र सैनिकों से बढ़कर था।
यद्यपि योगी अरविन्द आज देश में नहीं हैं, किन्तु उनका वह अमर पांडिचेरी आश्रम सदैव ही उनकी याद दिलाता रहेगा जहाँ बैठकर उन्होंने आत्म-कल्याण के लिए नहीं राष्ट्र-कल्याण के लिए तप किया था, योग साधना की थी।
पाप-वासना से बचो!
अपनी सब प्रकार की दुर्बलताओं का परित्याग कर आत्म-रक्षा के लिये खड़े हो। तुम्हारी कोई भी दुर्बलता पराजय का कारण बन सकती है। पाप से बचो वह कभी भी नष्ट करने के लिये उद्यत हो सकता है। वासना की भूमि पर कभी भी स्वतंत्रता का बीज अंकुरित नहीं होता। स्वतन्त्रता ज्ञान के बीच उदित होती है। आत्म-निर्माण के द्वारा उसकी रक्षा होती है। इसलिए तुम अपने गुणों के विकास पर ध्यान दो। साहसी बनो। पराक्रम और पुरुषार्थ धारण करो। प्रेम, विश्वास और एकता पैदा करो। तुम्हें विजय की तलाश न करनी पड़ेगी। तुम्हारे चरित्र की दृढ़ता सौ दुश्मनों को हरा सकती है। तुम्हारी स्वाधीनता को स्थिर रख सकती है।
—टी. एल. वास्वनी
खगपति गरुड़ ने प्रश्न किया—हे कागभुसुण्डि! आप मुझे धर्म का वह सरल स्वरूप समझायें जिसका अवगाहन कर मैं भी जीवन-मुक्ति प्राप्त कर सकूँ। कागभुसुण्डि ने अपनी कथा प्रारम्भ की, अपना सारा जीवन वृत्तान्त सुनाया। उत्तरकाण्ड के यह प्रसंग आध्यात्म-ज्ञान के बीज हैं। उन्हीं में से एक प्रसंग प्रेममार्गी-भक्ति है। प्रेम को ही जीवन की सम्पूर्ण साधनाओं का आधार मानते हुए उन्होंने कहा—
जाने बिनु न होइ परतीती। बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती॥
प्रीति बिना नहिं भगति दिढाई। जिमि खगपति जल कै चिकनाई॥
परमात्मा की महत्ता पर जब तक विचार नहीं किया जाता तब तक “ब्रह्म है” ऐसा विश्वास भी नहीं होता। विश्वास के बिना प्रेम नहीं होता, जब तक प्रेम नहीं, भक्ति ऐसी ही है जैसे जल के ऊपर तेल फिरता तो है पर मिल नहीं पाता।
इस सम्पूर्ण संदर्भ में भक्ति के लिए, ईश्वर प्राप्ति के लिए प्रेम की आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है। मनुष्य की स्थिति ऐसी है कि उसे जहाँ आनन्द मिलता है वहीं उसकी सम्पूर्ण चेष्टायें केन्द्रित रहती हैं। इसी भाव से केन्द्रीकरण का नाम प्रेम है। इस प्रेम का आधार लौकिक भी हो सकता है और पारलौकिक भी। एक का नाम आसक्ति है, दूसरे का नाम मुक्ति। मुक्ति प्रेम ही परमात्मा की प्राप्ति का सबसे सरल उपाय है। रामचरित मानस ने स्थान-स्थान पर इसकी पुष्टि की है और लौकिक प्रेम से, दिव्य प्रेम के स्वरूप को अलग बताकर मनुष्य को अज्ञान से बचाने का प्रयत्न किया है। विरक्ति कवि तुलसी ने प्रेम तत्व की सीधी परिभाषा इस तरह की है—
तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर प्रेम नहिं दुरइ दुराए॥
मुनिगन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं॥
हित अनहित पशु-पच्छिउ जाना। मानुष तनु गनु ग्यान निधाना॥
कोई कितना ही षडयन्त्र करे बैर और प्रेम कभी छिप नहीं सकते। मुनियों के आश्रमों में पक्षी-मृग अभय घूमते हैं पर बधिक को देखते ही भाग खड़े होते हैं। जिस तत्व को पशु-पक्षी समझ सकते हैं मनुष्य जैसा गुणी-ज्ञानी जीव उसे कैसे नहीं जान सकता।
प्रेम मनुष्य की भावनाओं से, उसकी मुखाकृति, प्राण और प्रत्येक हाव-भाव से दिखाई देता है। वह जीवात्माओं को इस तरह जोड़ देता है जैसे जल और दूध मिलकर एक तन हो जाते हैं किन्तु यदि किसी ने केवल प्रेमाडम्बर किया, छल किया, कामना पूर्ति के लिए बहकाना चाहा तो वे ऐसे ही अलग हो जाती है जैसे दूध में खटाई डाल देने पर एकरूपता नष्ट हो जाती है और दोनों न्यारे-न्यारे हो जाते हैं। रामायण में कहा है—
पय जल सरिस बिकायँ, देखहु प्रीति की रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ, कपट खटाई परत पुनि॥
यहाँ प्रेम के दोनों रूपों का दिग्दर्शन है। पहला साँसारिक प्रेम जिसमें स्वार्थ और कामनायें प्रधान रहती हैं। इसे तुलसी दास जी ने छल बताया है और उसकी निन्दा की है। भगवान राम ने अपने पिता को मार्मिक शब्दों में इस गलती का बोध कराया है। श्री दशरथ जी जब राम के वन-गमन के समाचार से अति शोकातुर हो रहे थे तो उन्होंने समझाया—
पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय विसमउ कत कीजै॥
तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू। जसु जग जाइ होइ अपवादु॥
पिता जी! यह मेरे तप, जीवात्मा के उत्थान का पुण्य अवसर है ऐसे हर्ष के समय में दुःख करने की कौन-सी जरूरत है आप तो मुझे वन-गमन की आज्ञा दें। आपका यह प्रेम जो मेरे शरीर तक सीमित है और जिससे मेरे आत्मोत्थान में बाधा पड़ती है वह प्रेम नहीं प्रमाद है। ऐसा न कीजिए, इससे तो आपका अपयश ही होगा। रघुकुल में आप इसके लिए अपवाद ठहराये जायेंगे।
आज के मोहासक्त व्यक्तियों के लिए राम का यह कथन जीवनदायक है। धन, पद, वैभव और ऐश्वर्य के लिए माता-पिता अपने पुत्रों को आध्यात्मिक जीवन से विमुख रखने का प्रयत्न करते हैं यह दोनों ही राम की दृष्टि में प्रेम के अपयशी हैं इसे ही साँसारिक प्रेम कहा गया है। इसे ही बन्धन का कारण बताया गया है।
फिर क्या प्रेमास्पद होना सिद्ध करने के लिए घर, द्वार, धन, वैभव, पुत्र, पिता, पत्नी आदि का परित्याग कर देना चाहिए। या उनसे प्रेम न करना चाहिए? नहीं, नहीं ऐसा कैसे हो सकता है। प्रेम न रहेगा तो संसार कैसे चलेगा, मनुष्य जीवन में आनन्द ही क्या रह जायगा। तो फिर प्रेम का ग्राह्य स्वरूप कौन-सा है। तुलसीदास जी ने अयोध्याकाण्ड में बड़ा सुन्दर रूपक प्रस्तुत कर, इस आशंका को दूर किया है। लिखते हैं—
घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदय परभात पयाना॥
भरत जाई घर कीन्ह विचारु। नगर बाजि गज भवन भँडारु॥
संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तज ताही॥
तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साई दोहाई॥
करई स्वामि हित सेवक सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई॥
अस विचार सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले॥
कहि सब मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहि राखा॥
सब लोगों ने सुना कि प्रातःकाल सारी अयोध्या राम को मिलने जा रही है। सब तैयारियाँ हो चुकीं, सभी प्रसन्न थे। पर भरत उस समय विचार मग्न हो गये। उन्होंने सोचा यह सारा नगर, मकान, घोड़े, हाथी, संपत्ति, खजाना सब उन्हीं भगवान राम का ही तो है, फिर यदि इसे आरक्षित छोड़कर जाता हूँ तो भगवान मुझ पर प्रसन्न कहाँ होंगे? इससे तो उलटा मुझे पाप लगेगा। ऐसा विचार कर उन्होंने धर्मशील सेवकों को बुलाकर उन्हें पहले कर्त्तव्य बोध कराया और इसके बाद जो जिस योग्य था उसे वह काम सौंप दिया।
उपरोक्त कथन में भरत का निष्काम प्रेम स्पष्ट है। उन्हें घर, घोड़े हाथी आदि किसी भी संपत्ति का मोह नहीं है, तो भी उसे अरक्षित रखना वे परमात्मा की अवज्ञा मानते हैं। उन्हें राम से प्रेम था पर उसके साथ ही वे अपना कर्त्तव्य भी नहीं भूले। अर्थात् उस धन सम्पत्ति को न तो यों ही छोड़ा और न उसे अयोग्य व्यक्तियों को सौंपा। परमात्मा की सम्पत्ति उन्हें दी जो धर्मनिष्ठ थे। जिन पर उन्हें विश्वास था कि वे इस ईश्वरीय सम्पत्ति का दुरुपयोग न करेंगे। राम के प्रति यही प्रेम सर्वांगपूर्ण कहा जा सकता है। राम के मोह के साथ, राम के प्रति कर्त्तव्यों का जो सुव्यवस्थित ढंग से पालन कर सकता हो ऐसा भरत के से गुण वाला व्यक्ति ही उनका सच्चा भक्त हो सकता है।
निष्काम प्रेम का एक और सुन्दर उदाहरण अयोध्याकाण्ड में ही प्रस्तुत है। संसार की ऐसी कौन-सी माता होगी जिसे अपने पुत्र पर प्रेम न होगा। कौशल्या का अपने पुत्र राम के प्रति अगाध प्रेम था पर इस प्रेम में उन्होंने स्वार्थ की झलक नहीं आने दी। उन्हें राम और भरत में कोई अन्तर नहीं जान पड़ा। दरअसल सच्चा प्रेम तो यही है। अपने बच्चे की सच्ची स्नेहित वही माता हो सकती है जिसे दूसरे बच्चों से भी समान प्रेम हो। यह संसार परमात्मा का बनाया हुआ है। अपने-पराये सब उसी के पुत्र हैं फिर एक से प्रेम और दूसरे से दुराव कैसे हो सकता है। जो अपनों से प्रेम करता है वह यदि मानव-मात्र से प्रेम करे तो ही उसका प्रेम सच्चा है। ईश्वरीय प्रेम और प्रेममयी भक्ति से जीवन मुक्ति का यही स्वरूप है। यह कथानक राम का माता कौशल्या से वन जाने के आज्ञा माँगने से प्रारम्भ होता है और कौशल्या के सुन्दर उत्तर से समाप्त होता है—
धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदुबानी॥
पिता दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥
आयसु देहि मुदित मन माता। जेहि मुद मंगल कानन जाता॥
जनि सनेह बस डरपसि भोरे। आनँदु अंब अनुग्रह तोरे॥
धरम सनेह उभयँ मति घेरी। भई गति साँप छछूँदर केरी॥
राखऊँ सुतहिं करऊँ अनुरोधू। धरम जाई अरु बन्धु बिरोधू॥
बहुरि समुझि तिय धरम सयानी। राम भरत दोउ सुत सम जानी॥
सरल सुभाल राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी॥
तात जाउँ बलि कीन्हेहूँ नीका। पितु आयसु सब धरमकु टीका॥
इस कथन से यह भी स्पष्ट है कि सच्चा प्रेमी सरल होता है, वह सबके कल्याण की कामना करता है। धर्म करते हुए अपने पराये की भेद वृत्ति जिसमें न हो वही सच्चा प्रेमी है।
इस प्रकार की निष्काम सेवा निस्सन्देह, लौकिक दृष्टि से काफी कष्टदायक होती है पर उससे अपने प्रियतम परमात्मा के प्रति आत्म दान का जो सुख मिलता है वह उस कष्ट की अपेक्षा अधिक सुखकर होता है। लौकिक प्रेम में ही आत्म-त्याग की इतनी भावना होती है कि उसकी रक्षा के लिये अपने प्राण त्याग तक के लिये तैयार रहते हैं इसमें प्रेमी को आन्तरिक सुख मिलता है फिर परमात्मा के प्रति यदि अनन्य भाव से आत्मदान किया जाय और उस पथ का अनुसरण करते हुये आपदायें आयें तो उनसे सन्तोष क्यों न होगा? तुलसीदास जी कहते हैं—
जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ जाचत जल पवि पाहन ठारउ॥
चातकु रटनि घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु सब भाँति भलाई॥
कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद प्रेम निबाहें॥
चातक जन्म-भर स्वाति नक्षत्र की आशा में प्यासा बना रहता है। स्वाति नक्षत्र में दो बूँद जल की आकाँक्षा से वह ऊपर की ओर चोंच फैलाता है पर बादल ऊपर से ओले बरसाते हैं। चातक को कष्ट होता है पर वह अपने नियम से विमुख नहीं होता। सोना जिस प्रकार अग्नि में चढ़कर खरा होता है उसी प्रकार अपने प्रियतम के लिए कर्त्तव्य पालन की उच्चतम कसौटी में खरा उतर कर सच्चा प्रेमी कहलाने का सौभाग्य मिलता है।
अन्त में तुलसीदास जी ने प्रेम के द्वारा सहज ही परमात्मा की प्राप्ति का प्रसंग प्रस्तुत करते हुये लिखा है—
पुर बैकुण्ठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई॥
जाके हृदयँ भगति जस प्रीती। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहि रीती॥
तेहि समाज गिरिजा मैं रहेउँ। अवसर पाय वचन एक कहेउँ॥
हरि व्यापक सर्वत्र समाना। प्रेम ते प्रगट होर्हि मैं जाना॥
देस काल दिसि विदिसहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥
अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम ते प्रभु प्रगटई जिमि आगी॥
देवताओं में चर्चा चल रही थी, परमात्मा से कैसे मिला जाय ताकि असुरों के साथ संग्राम में उनका अनुग्रह प्राप्त किया जा सके। कोई कहता था वे बैकुंठ में हैं वहाँ जाना चाहिये, कोई उन्हें क्षीर-सागर में बताता था। जिसके हृदय में जैसी भक्ति थी वह उसी रीति से ईश्वर से मिलने की बात कर रहा था। उस समाज में भगवान शंकर जी भी उपस्थित थे। उन्होंने कहा—परमात्मा तो सर्व व्यापक है मेरा निश्चित मत है कि वह प्रेम से ही प्रगट होता है। वह देश, काल, दिश-विदिशाओं में सर्वत्र व्याप्त है और प्रेम द्वारा अग्नि के समान प्रगट हो जाता है।
काकभुसुण्डि की इन व्याख्याओं से गरुड़ जी अधिक प्रसन्न हुये। उत्तर काण्ड में बताया है—
सुनि भुसुँडि के वचन सुहाये। हर्षित खगपति पंख फुलाए पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा। जानि राम सम प्रेम बढ़ावा
गरुड़ इस संवाद से अति प्रसन्न हुये। उन्होंने काग को भी परमात्मा का स्वरूप ही मानकर अति प्रेम प्रदर्शित किया। प्रेम का ज्ञान प्राप्त कर उनके सारे संशय दूर हो गये।
मनुष्य के दुर्गुणों में गन्दगी सबसे बुरा दुर्गुण है। यह दुर्गुण मनुष्य को इसी लोक में जीते जी नरक में निवास कराता है। नरक की कल्पना में गन्दगी का मुख्य स्थान है। गन्दगी का दूसरा नाम नरक ही है। जहाँ बदबू आती हो, कुरुचिता एवं जुगुप्सा से भरी स्थिति हो, मन मलीन रहे, आत्मा में प्रसन्नता की प्रतिक्रिया न हो, वह स्थान नरक ही तो कहा जायेगा।
जिसके कपड़े गन्दे हैं, हाथ, पाँव, मुँह, नाक गंदगी से भरे हैं, शरीर से बदबू आ रही है, उस मनुष्य को नारकीय ही कहना पड़ेगा। मनुष्य तो वास्तव में वह है, जो साफ सुथरा रहे। जिसके कपड़े और जिसका शरीर गन्दगी से रहित हो। जिसके संपर्क में किसी को घृणा न हो। जिसे देखकर किसी को कुरुचि उत्पन्न न हो। इसके विपरीत जिसका दर्शन जुगुप्सा और संपर्क अरुचि उत्पन्न करता है, वह मनुष्य होते हुए भी मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है।
बहुत से लोग साफ-सुथरा रहने का अर्थ सजे-बजे रहना समझते हैं। वे समझते हैं कि लक-दक कपड़े, बालों में तेल-फुलेल, मुँह पर क्रीम-स्नो तथा शरीर में इत्र आदि महकता रहना ही सफाई एवं स्वच्छता की निशानी है।
इस प्रकार यह एक भ्रम ही नहीं, बल्कि एक गन्दी आदत भी है। अधिक सजे-धजे अथवा लक-दक रहना स्वच्छता का नहीं, बल्कि प्रदर्शन का चिन्ह है, जो स्वयं ही एक मानसिक गन्दगी है। जिसमें हीन मनोवृत्ति का विकार होता है अथवा जिसमें कुप्रवृत्तियाँ रहा करती हैं, वह अपनी कमजोरी छिपाने के लिये प्रदर्शन का सहारा लिया करते हैं।
जिनका मन ऊँचा है। जिनके विचार निर्मल हैं और जो स्वच्छता के साथ सादगी का शाश्वत सम्बन्ध मानते हैं, वे प्रदर्शन रहित सफाई के ही समर्थक होते हैं। कपड़े साफ-सुथरे और कायदे करीने के हों, शरीर अच्छी प्रकार से साफ और स्वच्छ हो। बाल ठीक तरह से कटे हों, चेहरा सौम्य एवं स्वच्छ हो, दाँतों में गन्दगी न लगी हो, नाखून ठीक तरह से कटे हों आदि सलीके ही वास्तविक स्वच्छता है। किसी प्रकार का अनावश्यक बनाव शृंगार स्वच्छता नहीं, बल्कि एक गन्दगी है।
गन्दगी की मोटी-सी पहचान है कि जिसे देखकर किसी के मन पर अप्रिय प्रतिक्रिया हो। अधिक बनाव शृंगार अथवा साज-पाट को देखकर किसी भी भद्र व्यक्ति के मन पर प्रियता पूर्ण प्रतिक्रिया न होगी, बल्कि उल्टे टीमटाम वाले व्यक्ति की मानसिक हीनता पर तरस ही आयेगा। अधिक टीपटाप से जो प्रभावित, आकर्षित अथवा प्रसन्न होते हैं, वे दर्शक भी वास्तव में प्रदर्शनकारी की तरह ही हीन भावना के होते हैं। स्वच्छता वास्तव में वही है जो स्वभावगत हो, जिसको प्रदर्शन के उद्देश्य से समझ-बूझ कर पैदा न किया गया हो।
स्वच्छता मनुष्यता का और मलीनता पशुता का चिन्ह है। आप मनुष्य हैं, इसलिये गन्दा रहना छोड़िये। गन्दगी जहाँ आपको असुन्दर, अनाकर्षक और घृणास्पद बनाती है, असम्मानित करती है, वहाँ स्वच्छता आपको आकर्षक, प्रियता पूर्ण तथा समाहित बनायेगी।
आप मले-कुचैले कपड़े पहने जहाँ जायेंगे, लोग आप से बात करने, पास बिठलाने और किसी प्रकार का संपर्क रखने में संकोच करेंगे। आपको घृणित और कुरुचिपूर्ण व्यक्ति समझेंगे। किसी की इच्छा आपसे अपना काम कराने, आपका काम करने, सहायता सहयोग लेने अथवा देने की नहीं होगी। इस प्रकार एक गन्दा मात्र रहने से ही आप गुणवान होते हुए भी समाज में सहायता सहयोग के अनधिकारी हो जायेंगे। सामाजिक असहयोग जीवन की स्वाभाविक गति में एक बड़ा अवरोध सिद्ध होगा।
गन्दा रहने से समाज में अन्य लोग ही नापसन्द नहीं करते, बल्कि मनुष्य अपने को स्वयं भी अच्छा नहीं लगता, उसे खुद से ही घृणा होने लगती है। याद करिये उस किसी अवसर को जब आप किसी कारणवश दो-तीन दिन तक न नहा पाये थे और न कपड़े बदल पाये थे। क्या उस गंदी स्थिति में आपको अपने से घृणा नहीं हुई थी अथवा आपका मन ग्लानि से नहीं भरा रहा था?
स्वाभाविक आनन्द देने वाले सौंदर्य पूर्ण प्राकृतिक दृश्य भी यदि गन्दगी की हालत में देखे जायें तो वे भी अपेक्षित आनन्द नहीं देते हैं। कारण यही हैं कि गन्दगी के बोझ से दबे हुए मन-मस्तिष्क एक रोगी की तरह अनुभूति हीन रहते हैं। मलीनता से प्रभावित मन मस्तिष्क पर प्रसन्नतापूर्ण प्रतिक्रिया हो ही नहीं पाती। इसीलिये गन्दा तथा मैला-कुचैला व्यक्ति जीवन के किसी भी क्षेत्र का वाँछित आनन्द नहीं ले पाता।
जब आप नहाये-धोये और साफ कपड़े पहने स्वच्छता की दशा में होते हैं, तब अपने अन्दर एक स्वर्गीयता का अनुभव करते हैं। ऐसा अनुभव होता है कि जैसे हम साधारण स्थिति से उठे हुए कुछ ऊँचे आदमी हैं। अच्छे विचार और अच्छी भावनायें मस्तिष्क में आती हैं। अच्छे काम और शुभ कामनाओं का उद्रेक होता है। स्वच्छता की स्थिति में हर काम अच्छी प्रकार करीने से करने की उमंग ही नहीं आती, बल्कि उसकी एक नव-चेतना और नवीन बुद्धि भी आ गई सी होती है। अपने में अधिक योग्यता और अधिक शक्ति की अनुभूति होती रहती है।
जिस दिन आप अपना कमरा साफ करके उसकी हर चीज कायदे और तरीके से सुव्यवस्थित करके उसमें बैठते हैं, तब ऐसा लगता है मानो आपका वह कमरा नया-नया बना हो और आप उसमें पहली बार बैठे हों। स्वच्छता में एक चिर नवीनता रहा करती है और नवीनता में एक स्फूर्ति, एक उत्साह जिससे सुरुचि के कारण मनुष्य अपना काम अधिक मात्रा में, अच्छी तरह कर लिया करता है।
जिस प्रकार गन्दगी स्वयं आधा रोग है, उसी प्रकार स्वच्छता आधे से अधिक आरोग्य है। जिन रोगियों के आस-पास स्वच्छता रक्खी जाती है, जिनके कपड़े और बिस्तर जल्दी-जल्दी बदल दिये जाते हैं, वे उतनी जल्दी ही ठीक हो जाते हैं। आस-पास सब तरफ स्वच्छता रहने से उनका मन प्रसन्न रहता है, जोकि उनके स्वास्थ्य लाभ में बहुत सहायक हुआ करता है। यही कारण है कि अच्छे अस्पतालों का वातावरण बहुत ही स्वच्छ एवं सुरुचिपूर्ण रक्खा जाता है। रोगी की परिचर्या करने वाली नर्सें ही नहीं, मेहतर और मेहतरानियों तक को स्वच्छ रहने का निर्देश रहा करता है।
घर की पुरानी और गन्दी चीजें जिनसे मनुष्य का मन ऊब चुका होता है, जब साफ करके करीने से रख दी जाती हैं, तब बड़ी ही प्यारी लगने लगती हैं। गन्दी हालत में अस्त-व्यस्त पड़ी हुई जो वस्तुऐ स्थान को गन्दा और अरुचिपूर्ण बना देती हैं, वे ही जब साफ-सुथरी करके करीने से रख दी जाती हैं घर का शृंगार बनकर न केवल स्वयं ही सुहावनी लगने लगती हैं, बल्कि घर को भी शोभायमान बना देती हैं।
गन्दे और अस्त-व्यस्त कपड़ों में लिपटी हुई स्त्रियाँ व बच्चे स्वाभाविक सुन्दर होने पर भी अच्छे नहीं लगते। उनसे बात करने की भी इच्छा नहीं होती। इसके विपरीत एक बार असुन्दर स्त्री-पुरुष भी यदि साफ-सुथरे और करीने से पहने-ओढ़े होते हैं तो भी आकर्षक लगने लगते हैं।
स्वच्छता जहाँ स्वास्थ्यवर्धक होती है, वहाँ सौंदर्यवर्धक भी। कोई कितना ही दुबला-पतला और कुरूप क्यों न हो, यदि उसकी वेश-भूषा स्वच्छ एवं समीचीन है तो किसी को भी उससे विकर्षण न होगा। जो विकर्षण उसकी कुरूपता अथवा भोंड़ापन पैदा करेगा, उसे उसकी स्वच्छ एवं समीचीन वेश-भूषा दूर कर देगी।
स्वच्छता एवं समीचीनता मनुष्य की सज्जनता तथा भद्रता की परिचायिका भी है। जो गन्दा है, वेश-भूषा में अस्त-व्यस्त है, शरीर से मैला-कुचैला रहता है उसमें उत्तरदायित्व, जागरुकता एवं व्यवस्था बुद्धि की कमी की सम्भावना मानी जा सकती है। मनुष्य के रहन-सहन से उसके स्वभाव का पता लगा लेना कोई कठिन काम नहीं है।
स्वच्छ रहने से मनुष्य के शारीरिक ही नहीं, मानसिक मल भी दूर होते हैं, उसकी बुद्धि निर्मल होती है और आत्मा में तेज आता है। इसलिए आवश्यक है कि मनुष्यता की सिद्धि करने और जीवन में ऋद्धियों को पाने के लिए हम सबको हर तरह से स्थाई रूप से अधिक से अधिक स्वच्छ रहना चाहिए।
आलस्य को एक मात्र हीन प्रवृत्ति ही नहीं, बल्कि असंख्यों पापों का परिणाम समझना चाहिए और यह भी विश्वास कर लेना चाहिए कि जब तक इससे पीछा न छुड़ाया जायेगा जीवन में शोक-संतापों और दुःख दारिद्रय की कमी न रहेगी। पाप तापों के इस जनक से जितनी जल्दी छूटा जा सके उतना ही कल्याणकारी है।
आलस्य का अभिशाप मानव जीवन का भयानक शत्रु है। यह जिसके पीछे लग जाता है, उसे मिटा कर ही छोड़ता है। अफीम के नशे की तरह यह अन्दर ही अन्दर सारी शक्ति का शोषण कर लिया करता है। मानव-मन और मनुष्य शरीर अनन्त शक्तियों का आगार होता है। इससे कुछ करने वालों ने इतना कुछ करके दिखा दिया है कि जिसको देख-सुनकर दंग रह जाना पड़ता है।
महापुरुषों के जीवन पढ़िये, वैज्ञानिकों के कमाल देखिये, नायकों एवं सेना-नायकों की योग्यता पर नजर डालिये, अन्वेषकों, खोजियों, यात्रियों एवं आरोहियों के वृतान्त सुनिये, शिल्प शालियों के चमत्कार देखिये, व्यापारियों, व्यवसायियों तथा उद्योगियों की उपलब्धियों का अन्दाज लगाइये और विद्वानों, कवियों तथा साहित्यकारों के कार्यों का दर्शन कीजिये। आपको पता चल जायेगा कि इन सबों ने ऐसे-ऐसे और इतने अधिक काम कर दिखाये हैं कि उन्हें मानवीय कृत्य मानते इच्छा ही नहीं होती।
बहुत से लोग इन लोगों के विषय में यह कहते सुने जाते हैं कि ऐसे लोगों को परमात्मा की ओर से विशेष प्रतिभा मिली होती है, जिसके बल पर वे इस प्रकार के सराहनीय एवं विस्मयकारक कार्य कर सकने में समर्थ एवं सफल हो सके हैं। किंतु जरा इन कर्तव्यवानों अथवा उनके जानकारों के पास जाइये और पूछिये—महानुभाव, क्या आपको ईश्वर की ओर से कोई विशेष प्रतिभा मिली हुई है? जिससे आप इस प्रकार के विलक्षण एवं विश्वस्त कार्य कर सके हैं तो कदाचित ही कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो इसका उत्तर स्वीकारात्मक भाषा में दे, नहीं तो सभी निषेधात्मक उत्तर देते हुए यही कहेंगे कि मैंने तो अपने अन्दर कभी कोई विशेष प्रतिभा अनुभव नहीं की। हाँ इतना अवश्य है कि मुझे काम करने का शौक अवश्य है। अब इसको आप विशेष प्रतिभा मान लें अथवा मानव पुरुषार्थ।
इस उत्तर के साथ आत्म-श्लाघा से बचने के लिये यदि कोई भद्र पुरुष यह जोड़ दे कि हाँ भगवान की कृपा रही है, जिसके लिये मैं उसका अनुग्रहीत हूँ तो भी इन शब्दों को किसी विशेष प्रतिभा की स्वीकृति न समझ लेना चाहिए। यदि मनुष्य चमत्कार लेकर पैदा हो सकते होते तो संसार में अब तक न जाने कितने इसका प्रमाण दे चुके होते। वे जन्मते ही समझदार हो जाते और समझदार होते ही बिना किसी परिश्रम पुरुषार्थ के जो चाहते, कर दिखाते।
अब यदि एक बार यह भी मान लिया जाये कि अनेक बार लोग विशेष प्रतिभायें लेकर पैदा होते हैं तो भी इस बात का कोई प्रमाण संसार में नहीं मिलता कि पुरुष के बिना परिश्रम किये उस विशेष प्रतिभा ने कुछ कर दिखाया हो। वह प्रतिभा भी तो तभी चमकती और चमत्कृत करती है, जब उसे पुरुषार्थ का सहारा मिलता है। अपनी बात के समर्थन में अनेक अन्ध-विश्वासी, अति आस्तिक, भक्त अथवा श्रद्धालु पौराणिक कथाओं और प्राचीन किंवदन्तियों के आधार पर यह भी कह सकते हैं कि अमुक ऋषि मुनि, तपस्वी, यती, जोगी अथवा करामाती ने बिना कुछ किये अमुक काम कर दिखाया, ऐसी-ऐसी चीजें पैदा कर दीं। किंतु जनश्रुतियों अथवा कथा-कहानियों का प्रमाण देने वाले यह क्यों नहीं देखते कि इस प्रकार की सिद्धि के पीछे उक्त व्यक्तियों का कितना पुरुषार्थ रहा करता है? इस प्रकार की सिद्धियाँ यदि किसी को मिली होंगी तो इनको प्राप्त करने में उसका कितना प्रचण्ड तप त्याग एवं पुरुषार्थ रहा होगा? अलाउद्दीन के चमत्कारी चिरागों जैसी शक्तियाँ पाने के लिये कहानी नायकों ने कितना परिश्रम किया है और कितने खतरे उठाये हैं? बिना पुरुषार्थ के किसी प्रकार की सिद्धि अथवा उपलब्धि की प्राप्ति असम्भव है। इस विश्वास को दृढ़तापूर्वक अपने मस्तिष्क में धारण कर लेना चाहिये।
बात वास्तव में यह है कि इन उपलब्धियों की किंवदन्तियों की ओर ध्यान जाता ही उन लोगों का है जो आलसी और निकम्मे होते हैं। उन्हें कुछ काम तो करना नहीं होता खाली बैठे हुए ख्याली घोड़े दौड़ाया करते हैं। अफीमचियों की तरह प्रमाद की पिनक लिया करते हैं और ख्याली दुनिया में उपलब्धियों के सपने देखा करते हैं। यही सोचा करते हैं कि परमात्मा ने जिस प्रकार उसको वैभव विभूति दे दी है, उसी प्रकार वह दयानिघान हमको भी कृतार्थ कर देगा। किंतु आलसियों के यह ख्याली पुलाव न तो कभी किसी काम आये हैं, न आते हैं और न आयेंगे। उनकी जिंदगी इसी प्रकार के शेखचिल्ली ऊहापोह के लिये बनी होती है, सो उसी में बर्बाद होती रहती है। इसको आलसी मनुष्य के दुर्भाग्य के सिवाय और क्या कहा जा सकता है?
मनुष्य के भीतर अलादीन के हजारों चिरागों से अधिक चमत्कारी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, किंतु वे अपना चमत्कार प्रकट तभी करती हैं, जब उन्हें परिश्रमपूर्ण संघर्ष से जगाया जाता है। आलसी आदमी को यदि एक बार अलादीन का चिराग भी दे दिया जाये तो वह भी उसके लिये व्यर्थ ही सिद्ध होगा। आलस्य के अभिशाप से न तो वह उसको घिसेगा और न उससे उत्पन्न होने वाली शक्ति का उपभोग करने के लिये उसके पास कोई योजना होगी। ऐसी दशा में वह चिरागी देव भी उसकी कुछ सहायता न कर सकेगा।
आलसी अथवा निकम्मे व्यक्ति को यदि एक बार साधन सम्पन्न भी बना दिया जाये तो वे साधन भी उपयोग के अभाव में पड़े-पड़े बर्बाद हो जायेंगे। आलसी जब संसार के सर्वोपरि साधन और ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ देन ‘मानव शरीर’ और उसकी चमत्कारी शक्तियों का ही जब कोई उपभोग नहीं कर पाता तब वह अन्य प्राप्त साधनों का क्या उपभोग कर सकता है?
आलस्य का पाप मनुष्य जीवन को अभिशाप बना देता है। उसका शरीर एक बेकार वस्तु की तरह उसके लिये बोझ बना रहता है। कोई काम न करने से, खाली बैठ-बैठे समय काटते रहने से उसमें निस्तेजता आती है, जिससे जीवन के किसी क्षेत्र में किसी प्रकार की रुचि नहीं रहती और अरुचिपूर्ण जीवन एक बोझ की तरह ही भयावह बन जाता है। आलसी व्यक्ति संसार की सारी विभूतियों से वंचित रहा करता है। वह दूसरों की उन्नति देखकर मन ही मन डाह किया करता है। दूसरों की सफलता से अभागे आलसी को तो जलन होती है, किंतु उसके उस पुरुषार्थ से कभी स्पर्धा नहीं होती, जो उसकी सफलता का मूल हेतु हुआ करता है। यदि कोई आलसी किसी की उपलब्धियों से डाह करने के बजाय उसके परिश्रम के प्रति स्पर्धा करे तो अवश्य ही उस में कुछ करने का उत्साह जाग उठे और वह भी पसीने के बल-बूते पर सब कुछ बदल कर रख दे, किंतु आलसी को तो काम करने और पसीना बहाने की कल्पना मात्र से ही मौत आया करती है।
मानव जीवन का अनमोल अवसर पाकर उसे आलस्य के वशीभूत होकर बेकार गँवा देना बड़ा पाप है। इस पाप से बचना प्रत्येक मनुष्य का पावन कर्तव्य है, जो आलसी है वह केवल आत्म वंचक ही नहीं, दूसरों का चोर भी होता है। भोजन, वस्त्र आदि आवश्यक वस्तुऐ परिश्रम का पुरस्कार हैं। इनको पाने का अधिकारी वही है, जो कुछ काम करता है, किसी प्रकार का उपार्जन करता है। बिना कुछ काम किये जो पड़ा-पड़ा खाता है, वह प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप में किसी परिश्रमी का भाग चुराता है।
पर अकर्मण्य आलसी अपने से पूछे कि इस प्रकार बेकार पड़े-पड़े खाते रहने में उसे कोई सुख है? क्या उसकी आत्मा उसे इस अकर्मण्यता के लिये नहीं धिक्कारती? क्या कभी उसे यह विचार नहीं आता, इस बात की ग्लानि नहीं होती कि जब संसार में और लोग परिश्रम कर रहे हैं, पसीना बहा रहे हैं, तब उसका इस प्रकार पड़ा रहना मूर्खतापूर्ण बेहयायी ही है। बेहयायी की जिन्दगी बिताना मनुष्यता नहीं। हाथ, पाँव और मन, मस्तिष्क के सुरक्षित रहने पर भी जो परिश्रम नहीं करता, उससे अधिक अभागा दूसरा नहीं।
अपने मानव जीवन को दुर्भाग्य के दोष से बचाने और जीवन में मानवीय उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिये आलस्य के पाप को पुरुषार्थ के पुण्य से धो डालना ही मनुष्य को श्रेयस्कर है। आलस्य एक भयानक पाप है, इसको आश्रय देकर पराश्रित रहने वाला अथवा अपनी दयनीय दशा में पड़ा रहने वाला मनुष्य होते हुए भी मनुष्य कहलाने योग्य नहीं है। मनुष्य वह है, जो ईश्वर-प्रदत्त क्षमताओं का उपयोग करके कुछ ऐसा कर दिखाये, जिससे उसका मनुष्य होना सार्थकता का गौरव प्राप्त कर ले।
जीवन में सुख की सृष्टि तब होती है, जब वह सुव्यवस्थित एवं संतुलित हो। सामान्यतः मानव-जीवन की व्यवस्था आर्थिक व्यवस्था की अनुगता रहती है। जिसकी आय व्यय में समुचित संतुलन रहेगा, वह स्वभावतः सुखी और संतुष्ट रहेगा। आय-व्यय का संतुलन बना रहना व्यय पर ही अधिक निर्भर रहा करता है। आय तो प्रायः लोगों की सीमित एवं सुनिश्चित रहा करती है। सामान्यतः उसमें कोई अस्त-व्यस्तता अथवा न्यूनाधिक्य नहीं होता। इस प्रकार की अस्त-व्यस्तता की सम्भावना अधिकतर व्यय में ही रहा करती है, क्योंकि यह आय की तरह सुनिश्चित नहीं रहने पाता। इसलिए अर्थ-व्यवस्था लाने और आय-व्यय को सन्तुलित रखने के लिये व्यय को नियन्त्रित करने की अधिक आवश्यकता है।
जिस मनुष्य की आवश्यकतायें जितनी कम होंगी और जितना अधिक वह मितव्ययी होगा उसकी आर्थिक व्यवस्था उतनी ही सुविधाजनक रहेगी। जिसे पैसे की तंगी रहेगी, जिसे अपना काम चलाने के लिये दूसरों के आगे हाथ फैलाने और दाँत निकालने की आवश्यकता होगी, वह सुख-चैन के दर्शन नहीं कर सकता। जो कर्जदार होता है, वह एक प्रकार से पराधीन ही रहता है। देनदार का दैनिक जीवन एक प्रकार से लेनदार के पास रहन हो जाता है। वह जो कुछ कमाता है, अपने ऋण दाता के लिए ही कमाता है। अपनी आय का अधिकाँश भाग उसे कर्ज का सूद-दर-सूद भरते रहने में ही निकालते रहना पड़ता है। इसी आय के रहते हुए जब उसे किन्हीं खर्चों के लिये कर्ज लेना पड़ता है, तब उसी आय-व्यय के रहते वह कर्ज का पैसा कैसे चुका सकता है? फिर कर्ज में केवल मूलधन ही नहीं, ब्याज भी देना होता है। इस प्रकार स्पष्ट है, उन्हीं खर्चों के रहते और आय के बिना बढ़े जो पैसा वह कर्ज अदा करने में निकालेगा, वह तो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति में और भी कम हो जायेगा। इससे कोई ऋणी उऋण होने की बात तो सोचे ही नहीं, बल्कि नये कर्ज के दुर्भाग्य के लिये आशंका करे। यही कारण है कि एक बार कर्ज के चक्र में फँसा मनुष्य कदाचित ही उससे छुटकारा ले पाता है। वैसे प्राय होता यह है कि वह जीवनभर चिंता की ज्वाला के बीच तन, पेट काटकर कर्ज भरता रहता है, तब भी उससे छुटकारा पाये बिना ही परलोक सिधार जाया करता है। इस प्रकार क्या कोई कर्जदार अपने जीवन में कभी सुख-शाँति पा सकता है? नहीं, कदापि नहीं।
इसके विपरीत जो किसी का कर्जदार नहीं है, जिसको किसी का कुछ देना नहीं है, यहाँ तक कि किसी दैनिक आवश्यकता का भी ऋणी नहीं है, वह निश्चिंत होकर सोयेगा, निर्द्वन्द्व होकर विचरेगा। न कभी उसके कान में तकाजे के गर्म शब्द पड़ेंगे, न उसे अपनी मजबूरी के लिए सफाई देनी पड़ेगी और न किसी बहाने के लिये झूठ बोलना पड़ेगा। जो घोड़े की तरह तेज दौड़ने वाले ब्याज की निःशब्द किंतु निश्चित टापों से रौंदा नहीं जाता, उसकी श्वासों में ही सुख-चैन की शीतलता सम्भव हो सकती है। सुखी रहना हो तो कभी किसी के देनदार न बनिये।
अपने सुख-चैन के रक्षार्थ, आर्थिक असुविधा एवं कर्जदारी से सदा-सर्वदा बचे रहने के लिये अपने पारिवारिक आय-व्ययक (बजट) को उचित रूप से मितव्ययिता के साथ बनाकर एक जिम्मेदार व्यक्ति की तरह जीवन-यापन करना चाहिए। बजट बना लेने पर भी उसके अनुसार चलने में तब तक भी कठिनाई ही बनी रहेगी, जब तक मनुष्य उसके प्रति पूरी तरह ईमानदार नहीं रहेगा।
मानिये, किसी न अपनी सौ रुपये की आमदनी में से दस रुपये बचत की मद में निकाल कर बाकी नब्बे रुपये महीने के शुरू में ही खर्चों की विविध मदों में बाँट कर बजट बना लिया, किंतु उसके अनुसार निष्ठापूर्वक चलता नहीं है, कभी इस मद का खर्च काट कर उस मद में बढ़ा दिया तो कभी उस मद का इस मद में, तो उसका बजट फेल हो जायेगा और पारिवारिक व्यवस्था सुविधा सम्पन्न न रह सकेगी। जिस सरलता एवं स्निग्धता के लिए उसने बजट बनाया था, वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा। इसलिए बनाये हुए बजट के प्रति ईमानदार रहना बहुत आवश्यक है। जब तक बजट बन रहा है, तब तक ही उसमें हस्तक्षेप का अपना अधिकार समझिये। पर ज्यों−ही वह एक बार बनकर अंतिम रूप पा जाये, उसका उसी प्रकार पालन करिये, जिस प्रकार शासन-विधान का पालन किया जाता है। निर्माण-काल में बजट आपके अधीन रहता है, बन जाने के बाद आप स्वयं अपने आप को उसके मातहत समझिये।
बजट एक प्रकार से पारिवारिक विधान ही है। इसका निर्माण यथासंभव परिवार के हर बालिग सदस्य को सम्मिलित करके ही करना चाहिए और सर्वसम्मति से पास होना चाहिए। ऐसा संभव हो सकने पर न तो किसी को असंतोष का कारण ही रहेगा और न तब कोई उसका उल्लंघन करने को उद्यत होगा।
प्रगतिशील एवं सुविचारी परिवार अधिकतर अपने बजट इसी प्रकार सर्व सदस्यता की विधि से ही बनाते हैं। इस व्यवहार से परिवार के सभी छोटे-बड़ों में एक उत्तरदायित्वपूर्ण मितव्ययिता का स्वभाव विकसित होगा। परिवार की आर्थिक अवस्था का स्पष्ट ज्ञान रहने से कोई भी सदस्य किसी खर्च की निश्चित सीमा के बाहर जाने में अपनी हीनता समझेगा। यदि कभी कोई नया प्रलोभन उसे लुभायेगा भी तो भी वह संकोच वश उसका प्रस्ताव किये बिना ही अपने अन्दर ही डुबा लेगा और अगले किन्हीं भी प्रलोभनों के प्रति अधिक से अधिक अनाकर्षित रहने में बड़प्पन समझेगा।
इस प्रकार परिमित एवं सर्वसम्मत बजट बनाने और सुविधापूर्वक चलाने के लिये हर अपेक्षाकृत अधिक सयाने सदस्य को अपने से छोटे की सुख-सुविधा का ध्यान रखते हुए प्रत्येक की परिस्थिति एवं आवश्यकताओं के अनुसार व्यय की व्यवस्था करनी चाहिए। ऐसा करने से परिवार के लोगों में एक दूसरे के लिये निःस्वार्थ पूर्ण त्याग की भावना का विकास होगा और जिसने निःस्वार्थ पूर्ण त्याग भावना का सौभाग्य प्राप्त कर लिया उसके लिये तो सुख-शाँति कौड़ी मोल सस्ती हो जाती है।
किसी भी पारिवारिक बजट में सर्वसम्मतता तो एक बार दबाव अथवा प्रभाव से प्राप्त की जा सकती है, किन्तु उसमें सफलता तभी मिलेगी, जब खर्चे की मदों को आवश्यकताओं की अनिवार्यता के अनुसार क्रमिकता दी जायेगी। यदि भोजन, वस्त्र तथा निवास की निताँत अनिवार्य आवश्यकताओं के स्थान पर अल्पावश्यक स्वाद, सुविधा, आमोद-प्रमोद की मदों को प्राथमिकता देकर आय का अधिक भाग दे दिया गया तो कुछ समय के आमोद-प्रमोद अथवा स्वाद सुविधा के बाद सारा परिवार अधिक समय भूखा, नंगा ही रहेगा और इस प्रकार की असहनीय असुविधा की स्थिति में न तो स्वाद के चटखारे याद आयेंगे और न आमोद-प्रमोद के साधन। तन, पेट के नंगा-भूखा रहने पर न तो स्वादों की याद आती है और न किसी प्रकार का हास-विलास ही भाता है। भोजन, वस्त्र की सुविधा के साथ हास-विलास का अभाव तो सहन किया जा सकता है, किंतु हास-विलास की सुविधा होने पर भी अन्न-वस्त्र का अभाव सहन नहीं किया जा सकता। आमोद-प्रमोद और सुविधा-साधनों का नम्बर अन्न-वस्त्र तथा निवास के बाद है।
केवल इन्हीं के बाद नहीं, विलास वस्तुओं का नम्बर और भी दो आवश्यकताओं के बाद आता है। पौष्टिक पदार्थ और जीवन विकास की शिक्षा आदि साधनों के बाद। इसका ठीक-ठीक अर्थ यही है कि पहले पूरे परिवार के लिए अन्न-वस्त्र एवं निवास की व्यवस्था। उसके बाद जो बचे उससे घी, दूध, शाक-सब्जी, फल,मेवे आदि। वे भी पहले-जीवन विकास, शिक्षा आदि की मद पूरी करने के बाद। इसके बाद यदि न रहा जा सके तो आमोद-प्रमोद, शौक, स्वाद की वस्तु का नम्बर है और यदि इनकी उपेक्षा करके अपने स्वास्थ्य एवं शिक्षा आदि जीवन-विकास की व्यवस्था को ही आमोद-प्रमोद मानकर आनंदित रहा जाये तब तो कहना ही क्या आत्माश्रित, अहैतुकं सुख-शाँति अक्षय ही होती है, वह आमोद प्रमोद अथवा सुख साधन के साथ पुरानी नहीं होती, सदा नवीन रहती है। इस अनावश्यक मद का पैसा आपकी बचत मद में जाकर आय के अनुपात से आपकी मुट्ठियाँ भर सकता है।
इस प्रकार यदि वास्तव में आप अपने परिवार के साथ आजीवन अपनी सीमित आय में सानन्द रहना चाहते हैं तो मितव्ययिता के साथ सर्वसम्मति से बचत-व्यय के साथ यथोचित बजट बनाइये और एक सुनिश्चित विधान के साथ उसका पालन करते हुए जीवन-यापन कीजिए।
भारतीय इतिहास में महाराज पुरु का बहुत सम्मानपूर्ण स्थान है। महाराज पुरु के सम्मान का कारण उसकी कोई दिग्विजय नहीं है। इतिहास में केवल एक यही ऐसा वीर पुरुष है, जिसने पराजित होने पर भी विजयी को पीछे हटने पर विवश कर दिया।
ईसा के पूर्व छठी शताब्दी में यूनान के सम्राट सिकंदर ने सिंहासनारूढ़ होते ही विश्व-विजय करने का विचार बनाया। यद्यपि सिकन्दर के पास अपना देश था और उसके लिये आवश्यक न था कि वह किसी दूसरे देश पर आक्रमण करके उसे जीते, तथापि उसने अहंकार और लोभ के वशीभूत होकर विश्व-विजय की ठान ही ली।
यह दोष सिकन्दर का नहीं, बल्कि उस राजमद का था, जो सम्पूर्ण पृथ्वी को अधिकार में करने पर भी संतुष्ट नहीं होता और अकारण ही शाँतिप्रिय लोगों को सताना शुरू कर देता है। असन्तोष की परिणति अनीतिपूर्ण अत्याचार होना स्वाभाविक है और अत्याचार का अर्थ है विनाश। विश्व-विजयी सिकन्दर इसी क्रम में पड़कर एक दिन नष्ट हुआ और निराश होकर इस संसार से विदा हुआ।
सिकन्दर ने अपने अभिमान पूर्ण अभियान के लिये यूनान से प्रस्थान किया। नया उत्साह, नये साधन, बड़ा विजेता एक विशाल वाहिनी लेकर चला, तो देश के देश उसे आत्म-समर्पण करने लगे। बिना लड़े अथवा थोड़ा लड़कर उसने यूनान से भारतीय सीमान्त तक के सारे देश आन की आन में जीत लिये।
न जाने पराजित देशों के निवासी किस मिट्टी के बने थे कि दुश्मन से दो हाथ किये बिना ही अधीन बन गये। कर्तव्य तो उनका यह था कि जब उनके देश का एक-एक बच्चा कट मर जाता, तब कहीं सिकन्दर की सेना उस दुश्मन से आगे बढ़ पाती, किंतु क्या कहा जाय, उन विजितों की मानसिक दुर्बलताओं को, जो वे भविष्य पर विचार किये बिना विलास और आलस्य की मृत्यु दायिनी गोद में पड़े चलते रहे।
बिना किसी प्रयास के अनायास ही देश पर देश जीत लेने से सिकन्दर के अहंकार का घट लबालब भर गया और उसे अपने-विश्व-विजेता होने का भ्रामक स्वप्न उज्ज्वल से उज्ज्वल तर दिखाई देने लगा। वह आँधी की तरह बढ़ता आया और भारतीय सरहद पर अपना पड़ाव डाल दिया।
अपने जय अभियान के लिये वह महान् यूनानी जितना लश्कर लेकर चला था, अब इस समय उसके पास उससे कहीं अधिक सेना हो गई थी। इस कारण स्पष्ट है कि जिन-जिन देशों को वह पराजित करता आया अथवा जिन-जिन देशों ने उसे आत्म-समर्पण किया, उनकी सेनाओं तथा साधनों को भी सिकन्दर ने अपने लश्कर में शामिल कर लिया था। इस समय उसे अपनी शक्ति के अभिमान का भरपूर नशा था।
भारतीय सीमाँत के समीप आते-आते सिकन्दर को सिंध और झेलम के पानी से पैनी की गई तलवारों के जौहर आने-जाने वालों से सुनने को मिलने लगे थे। किन्तु सिकन्दर ने उन सत्य समाचारों को लोक-चर्चा से अधिक महत्व नहीं दिया। सिकन्दर बढ़ता रहा और भारतीय वीरता के समाचार भी। किंतु जब उस देश-जयी को भारत की वीर-गाथायें दोस्त और दुश्मन दोनों के मुँह से एक जैसी ही सुनने को मिलीं, तब उसके विजय-विश्वास में दरार पड़े बिना न रह सकी और उसे आक्रमण करने से पूर्व विचार करने पर मजबूर होना पड़ा।
सिकन्दर ने भारत की आँतरिक दशा का पता लगाने के लिये भेदिये भेजे, जिन्होंने आकर समाचार दिया कि इस में कोई संदेह नहीं कि वीरता भारतीयों की बपौती है, साहस उनका सहचर और बलिदान उनका खेल है, किंतु उनकी इन सारी विशेषताओं को एक नागिन घेरे हुए है, जिसे ‘फूट’ कहते हैं। इसी फूट रूपी नागिन के विष से भारतीयों की बुद्धि मूर्छित हो चुकी है, जिससे उनकी अनुशासनहीन शूरता और दम्भपूर्ण स्वाभिमान अभिशाप बन चुका है। यदि सिकन्दर भारत में प्रवेश चाहता है, तो उसे तलवार की अपेक्षा भारतीयों में फैली फूट की विष बेल से लाभ उठाना होगा।
साहस के पीछे हटते ही सिकन्दर की भेद-नीति आगे बढ़ी। उसने और भी गहराई से पता लगाया कि इस समय भारत किसी एक छत्र सत्ता से अनुशासित नहीं है। अकेले पश्चिमोत्तर सीमान्त, सिन्ध और पंजाब में ही सैकड़ों छोटे-छोटे राज्य हैं, जो सदियों से आपस में लड़ते-लड़ते जर्जर हो चुके हैं। इन प्रदेशों के सारे राजा एक दूसरे के प्राणाँत शत्रु बने हुए हैं और एक दूसरे को हर मूल्य पर नीचा दिखाने के लिए कोई भी उपाय एवं अवसर का उपयोग करने को उद्यत बैठे हैं। भारत के सिंहद्वार के प्रहरी राजाओं के बीच शत्रुतापूर्ण अनैक्य के इन समाचारों ने सिकन्दर के साहस को फिर बढ़ावा दिया और उसने अपना काम शुरू किया।
राजनीति के चतुर खिलाड़ी सिकन्दर ने शीघ्र ही उस तक्षक का पता लगा लिया, जो प्रोत्साहन पाकर भारत की स्वतंत्रता पर फन मार सकता है और वह था—तक्षशिलाधीश दम्भी आम्भीक, जो अपने अकारण उपद्रव के कारण पुरुषपुर नरेश ‘महाराज पौरुष’ से बार-बार हारकर विद्वेषविष से अन्धा बन चुका था।
आम्भीक पुरु से लड़ने के लिए फिर सेना तैयार करने में जुटा हुआ था, जिसके लिये वह त्राहि-त्राहि करती हुई प्रजा से बुरी तरह धन शोषण कर रहा था। सिकन्दर ने अवसर से लाभ उठाया और लगभग पच्चास लाख रुपये की भेंट के साथ सन्देश भेजा, यदि महाराज आम्भीक सिकन्दर की मित्रता स्वीकार करें तो वह उन्हें पुरु को जीतने में ही मदद नहीं देगा, बल्कि पूरे भारत में उसकी दुन्दुभी बजवा देगा। सिकन्दर द्वारा भेजी हुई भेंट के साथ सम्मानपूर्ण सन्देश पाकर द्वेषान्ध आम्भीक के होश हर्ष से बेहोश हो गये और वह देश के साथ विश्वासघात करके सिकन्दर का स्वागत करने को तैयार हो गया। भारत के गौरवपूर्ण चन्द्र-बिम्ब में एक कलंक बिंदु लग गया।
आम्भीक का निमंत्रण पाकर सिकन्दर ने भारत पर आक्रमण किया। किंतु भारत का भाग्य केवल आम्भिक पर ही तो निर्भर न था। जहाँ आम्भीक जैसे देशद्रोही थे, वहाँ अनेक देशभक्त राजा भी थे। उन्होंने सिकन्दर का प्रतिरोध किया, किंतु अलग-अलग अकेले जिसके फलस्वरूप मिटते चले गये। जहाँ इन राजाओं में देश-भक्ति की भावनाएं थीं, वहाँ एकता की बुद्धि का अभाव था। सिकन्दर के विरोधी होने पर भी वे अपने आपसी विरोध को न भुला सके। किसी एक राष्ट्र के कर्णधारों में परस्पर प्रेम रहने से ही कल्याण की सम्भावनायें सुरक्षित रहा करती हैं, फिर भी यदि उनमें किसी कारण से मनोमालिन्य रहेगा, तब भी किसी संक्रामक समय में उन्हें आपसी भेदभाव मिटाकर एक संगठित शक्ति से ही संकट का सामना करना श्रेयस्कर होता है। अन्यथा आया हुआ संकट अलग-अलग सबको नष्ट कर देता है। यही बात सिकन्दर के साथ लड़ाई में राजाओं के साथ हुई।
इधर सिकन्दर विजयी हो रहा था और उधर दुष्ट आम्भीक की दुरभिसन्धि से अनेक अन्य राजा देशद्रोही बनते जा रहे थे। काबुल का कोफायस, पुष्कलावती का संजय, शशिगुप्त तथा अश्वजित आदि अनेक अभागे राजा सिकन्दर की सहायता करते हुए उसकी विजयों में अपना भाग देखने लगे थे। जिसके फलस्वरूप पुरु को छोड़कर लगभग सारे राजा या तो हारकर मिट चुके थे अथवा देशद्रोह करके सिकन्दर के झंडे के नीचे आ चुके थे।
अब भारत के प्रवेश द्वार पर एक मात्र प्रहरी के रूप में केवल महाराज पुरु रह गये थे। अब प्रश्न यह उठता है कि महाराज पुरु बुद्धिमान देशभक्त होने पर भी अब तक के सिकन्दरी युद्ध में तटस्थ रहकर लड़ाई क्यों देखते रहे? क्यों नहीं उन्होंने स्वयं ही नेतृत्व करके सारे राजाओं को संगठित करके सिकन्दर का प्रतिरोध किया? महाराज पुरु ने प्रयत्न किया, किंतु हीन राजमद के रोगी राजा पुरु की योजना में शामिल न हुए। कुछ तो स्वार्थ के वशीभूत होकर सिकन्दर से मिल गये और कुछ ने पोरस का नेतृत्व स्वीकार करने की अपेक्षा सिकन्दर से पृथक ही लड़कर मर जाना अच्छा समझा, ताकि श्रेय पुरु को न मिलकर उन्हें ही मिले मनुष्य की यह संकीर्ण स्वार्थपरता, सामूहिक जीवन के लिए सदा ही विघातक रही है।
सिकन्दर कपिशा से तक्षशिला तक के बीच के अनेक स्वतंत्र जातियों की कटीली झाड़ियों से लोहू-लुहान होता हुआ तक्षशिला आ पहुँचा, जहाँ आम्भीक ने उसका बड़ा विशाल स्वागत किया। अभी तक सिकन्दर कपिशा के आस-पास ही रहा। अभिसार देश का राजा महाराज पुरु का मित्र बना रहा। पर ज्यों ही सिकन्दर तक्षशिला पहुँचा अभिसार नरेश को भीरुता का दौरा पड़ गया। कहना न होगा, जब कोई पापी किसी मर्यादा की रेखा उल्लंघन का उदाहरण बन जाता है, तब अनेकों को उसका उल्लंघन करने में अधिक संकोच नहीं रहता। तक्षशिला के राजा आम्भीक की देखा देखी अभिसार नरेश भी सिकन्दर से जा मिला जिससे पोरस को बिल्कुल अकेला रह जाना पड़ा।
अभिसार-नरेश से पोरस के साहस-वीरता तथा गौरवपूर्ण देशभक्ति के विषय में जानकर सिकन्दर ने पुरु को इस आशय का सन्देश भेजा कि यदि वह सिकन्दर को बिना विरोध के आगे बढ़ जाने दे तो वह उसे अपना मित्र मान कर सुरक्षित छोड़ देगा।
सिकन्दर का यह मैत्री सन्देश स्वाभिमानी पुरु के लिए युद्ध की खुली चुनौती थी। उसने सिकन्दर को पंजाब में झेलम के किनारे ललकारा। घमासान युद्ध की सम्भावना से दोनों की सेनायें नदी के आरपार डट गई। झेलम के पूर्वी किनारे पर महाराज पुरु की थोड़ी सी सेना और उसके पश्चिमी तट पर देशद्रोही राजाओं की कुमुक के साथ सिकन्दर का टिड्डी दल।
बरसात के दिन थे, झेलम बाढ़ पर थी, सिकन्दर का साहस नदी पार करते न पड़ा। लगभग एक सप्ताह बाद एक दिन जब कि रात में घनघोर वर्षा हो रही थी और पुरु की सेना बराबर पड़ी हुई थी, झेलम के लगभग अठारह मील उत्तर में बढ़कर सिकन्दर की सेना ने नदी पार करके पुरु की सेना पर आक्रमण कर दिया। सिकन्दर के टिड्डी दल ने यद्यपि पुरु की थोड़ी-सी सेना पर धोखे से आक्रमण किया था, तथापि पुरु के वीर सैनिकों की तलवारों ने उस अँधेरी में बिजली की तरह कौंध कर उसे पीछे हटा दिया।
इस आकस्मिक युद्ध में चार सौ सैनिकों के साथ पुरु का पुत्र मारा गया, किंतु खेत पुरु के हाथ ही रहा। सिकन्दर ने पीछे हटकर सेना बढ़ाई और इधर पुरु ने बेटे का शोक किये बिना ही व्यूह रचना कर दी। हाथियों को आगे रखकर की गई व्यूह-रचना के कारण महाराज पुरु की सीमित सेना भी सिकन्दर की सेना को अजेय एवं दुर्धर्ष दिखाई देने लगी। सिकन्दर के बार-बार प्रेरणा एवं प्रोत्साहन देने से वह बड़ी मुश्किल से आगे बढ़ी और टक्कर होते ही भाग खड़ी हुई। वह क्षण निकट ही था कि महाराज पुरु की विजय हो कि तब तक एक बाहरी विस्फोट होने से पुरु की सेना के हाथी भड़क गये और वे अपने सैनिकों को ही कुचलते हुए पीछे की ओर भाग खड़े हुए। पुरु का अजेय व्यूह अपने ही साधनों से नष्ट हो गया। सारी सेना तीतर-बितर हो गई। अब क्या था? सिकन्दर ने अवसर से लाभ उठाया और संपूर्ण शक्ति के साथ पुरु की अस्त-व्यत सेना पर धावा बोल दिया। शत्रु की ओर से असावधान, अपनी सेना की सँभाल करते हुए पुरु शत्रुओं के तीरों से घायल होकर गिर पड़े।
अचेतनावस्था में गिरफ्तारी के बाद जब महाराज पुरु हो होश आया, तब वे सिकन्दर के सामने थे। सिकन्दर ने हँसते हुए बड़े गर्व के साथ कहा-’पोरस! बतलाओ कि अब तुम्हारे साथ किस प्रकार का व्यवहार किया जाय?’
सिकन्दर को विश्वास था कि इस समय असहाय होने से पुरु गिड़ गिड़ाकर यही कहेगा कि अब तो मैं आपका बंदी हूँ, जिस प्रकार का व्यवहार चाहिए, करिये और तब सिकन्दर उसे प्राणदान देकर आभार-स्वरूप भारत-विजय करने में उसकी वीरता एवं रण-कुशलता का मनमाना उपयोग करेगा, किंतु उसका उत्तर सुनकर वह विश्व-विजय का स्वप्नदर्शी ग्रीक आकाश से जमीन पर गिर पड़ा।
महाराज पुरु ने स्वाभिमान पूर्वक सिर ऊँचा करके उत्तर दिया—सिकन्दर, वह व्यवहार जो ‘एक राजा दूसरे राजा के साथ करता है।
सिकन्दर निर्भीक पुरु का यह वीरो चित उत्तर सुनकर इतना प्रसन्न एवं प्रभावित हुआ कि उठकर उसके गले से लग गया।
भारतीयों की वीरता और महाराज पुरु की विकट मार से सिकंदर की सेना की हिम्मत हवा हो चुकी थी। सिकंदर अच्छी तरह जानता था कि यदि अब वह आगे बढ़ने का आदेश देगा तो उसकी भयभीत सेना अवश्य विद्रोह कर देगी, इसलिये वह महाराज पुरु पर एहसान रखता हुआ चुपचाप भारतीय सीमाओं से बाहर चला गया।
अभागे आम्भीक जैसे अनेक देश-द्रोहियों के लाख कुत्सित प्रयत्नों के बावजूद भी एक अकेले देशभक्त पुरु ने भारतीय गौरव की लाज रखकर संसार को सिकन्दर से पद-दलित होने से बचा लिया।
कहना न होगा कि जब तक पुरु जैसे वीर भारत-भूमि पर पैदा होते रहेंगे इसकी गौरव-पताका युग-युग तक आकाश में उड़ती रहेगी।
जिन भावनात्मक आदर्शों और आस्थाओं पर पारिवारिक व्यवस्था का प्रचलन हुआ है उन्हें सजीव रखने के लिये परिवार की सम्पूर्ण व्यवस्था धार्मिक होनी चाहिए। बड़ों के प्रति छोटों की विनम्रता, छोटों के प्रति बड़ों का स्नेह और कर्त्तव्य भाव, समवयस्कों में आदर और सम्मान की भावना को स्थिर रखना धर्म का उद्देश्य होना चाहिए। इन सभी बातों को लेकर उसे रहन-सहन, आहार-विहार, वेष-भूषा, शिक्षा-दीक्षा, पारस्परिक व्यवहार, व्रत, पर्व और त्योहारों में प्रविष्ट हो जाना चाहिये। परिवार का छोटे से छोटा ओर बड़े से बड़ा कृत्य भी धार्मिक व्यवस्था के अंतर्गत होना चाहिए। साराँश में धर्म पारिवारिक जीवन में प्राण की भाँति घुला होना चाहिए।
घर में लोगों की बैठक का कमरा अलग होता है। रसोई घर, स्नानागार और शयनागार भी विभाजित होते हैं। हर स्थान पर वहाँ को स्थिति के अनुकूल सामान रखा हुआ होता है। किसी स्थान के सामान, क्रम व्यवस्था को देखते ही उस स्थान में क्या होता है इस का पता चल जाता है। इसी क्रम में आपके घर में एक छोटा-सा “साधनाकक्ष” भी होना चाहिए। एक छोटी -सी देव प्रतिमा, नहीं तो किसी चित्र को जो भगवान का, गायत्री या किसी देवता का हो एक सुन्दर वेदी पर स्थापित कर लीजिये। सामने चौकी पर धूप-दान दीपक और जप की मालायें रखी हुई होनी चाहिए। एक छोटा-सा हवन कुण्ड भी हो। सम्पूर्ण कक्ष स्वच्छ, सुन्दर लिप-पुता। ऊपर महापुरुषों के चित्र, प्रेरणाप्रद वाक्य और देव स्थलों, प्राकृतिक दृश्यों वाले चित्र टँगे हों। कागज के फूलों और पताकाओं से कमरा सजा रहे। सम्भव हो तो वहाँ हर समय एक अगरबत्ती जलती रहे। यह स्थान इतना सुन्दर, इतना पवित्र बनाकर रखिये कि वहाँ पहुँचते ही दिव्य भावनायें उठने लगें। मन की मलिनता मिट जाय और विचारों में पवित्रता आ जाय। सुन्दर महकता हुआ साधना स्थान जिसे देखते ही आत्मा पुलकित, प्रफुल्लित हो जाया करे।
प्रातःकाल जल्दी सोकर उठने के लिए सारे सदस्य राजी होने चाहिए। स्नान, शौच आदि से निवृत होकर सामूहिक प्रार्थना को पति-पत्नी साथ-साथ या क्रम बनाकर घर का प्रत्येक सदस्य उस साधना स्थल में प्रवेश करे और परमात्मा की उपासना करे। आज का दिन एक परिपूर्ण जीवन है, यह मानकर परमात्मा से सच्चाई, ईमानदारी और नेक निष्ठा की ओर प्रेरित रखने के लिए बल की माँग की जाय। भावना के अनुसार, धूप, दीप, अक्षत, रोली आदि से देव प्रतिमा का अभिषेक किया जाय। प्रातःकाल का नाश्ता सदस्य इसी स्थान के प्रसाद रूप में ग्रहण करें तो वह और भी मंगल दायक हो सकता है।
प्रातःकालीन उपासना समाप्त करके जिसे जिस कार्य में जाना हो उसमें चले जाना चाहिए। स्त्रियाँ गृह-कार्यों में लग जायँ, विद्यार्थी पाठशाला की ओर चले जायें और पुरुष वर्ग जो जिस कार्य में नियत हो उसमें चला जाय।
काम करते हुए भी मनुष्य को धर्म का पालन करना चाहिए। भावनात्मक उपासना से यह उपासना कहीं अधिक बड़ी है। काम करते हुये छोटे-बड़े काम का ध्यान न कर उसे विशुद्ध कर्त्तव्य पालन की दृष्टि से करना चाहिए। काम की धुन हमारे भीतर होनी चाहिए। आप अध्यापक हैं तो यह समझें कि इस समय आप ब्राह्मणत्व का पालन कर रहे हैं। प्रत्येक विद्यार्थी को आप शिष्य भावना से देखें और यह प्रयत्न करें कि आपका प्रत्येक शिष्य आदर्श चरित्र, अटल निष्ठा लेकर विद्यालय से निकले। व्यवसाय की दृष्टि से नहीं आपका अध्यापन कार्य राष्ट्र को सुशिक्षित, कर्त्तव्यशील नागरिक प्रदान करने की दृष्टि से होना चाहिये।
खेत में कार्य करने से लेकर दुकानदारी करने तक नौकरी पेशे से लेकर किसी औषधालय में काम करने तक सर्वत्र आपको सेवा भावना और कर्त्तव्यनिष्ठा का अभिमान होना चाहिये। आपकी भावनाओं में विशालता हो तो भले ही आप साधारण कर्मचारी हों ईश्वर की दृष्टि में आप अभिनन्दन के पात्र हैं और उसी में आपको आन्तरिक शान्ति मिल सकती है। रोजगार, आफिस की नौकरी, दुकानदारी आदि कोई भी काम हो धर्म भावना नहीं रहती तो लोग स्वार्थवश, लोभवश बेईमानी और भ्रष्ट आजीविका कमाते हैं। आप को यह विश्वास कर लेना चाहिए कि बेईमानी कभी फलती नहीं। वह किसी न किसी रूप में आपके चुगल से निकलेगी जरूर, साथ ही आपकी गाँठ की कमाई भी ले जायेगी।
महात्मा आनन्द स्वामी ने एक मार्मिक घटना का उल्लेख किया है जो बताती है कि अनीति की कमाई मनुष्य को कितना दुःख देती है।
कहानी लाहौर के दो व्यक्तियों की है। उन दोनों में बड़ी मित्रता थी। एक बार दोनों ने आजीविका कमाने के लिए बाहर जाने का निश्चय किया और बम्बई पहुँचे। भाग्य अच्छा था एक छोटे से रोजगार से वे ऊँचे उठे और कुछ ही दिनों में लाखों रुपये कमा लिये। कमाई बहुत हो गई तो दिनों ने घर लौटने की इच्छा की। घर चलने के एक दिन पूर्व एक साथी के मन में लोभ आ गया। सारा धन स्वयं हड़प जाने की इच्छा से उसने रात में अपने मित्र को विष देकर मार डाला। पैसे की कमी न थी रिश्वत दी और बीमारी से मर जाने के डाक्टरी प्रमाण पत्र ले लिये और सारा धन लेकर अपने देश लौट गया। घर पहुँचकर उसने आलीशान मकान बनवाया और शादी कर विलासिता का जीवन बिताने लगा। कुछ दिन में उसे एक पुत्र पैदा हुआ। बड़ा सुन्दर और रूपवान। वह व्यक्ति उसे एक क्षण के लिए भी दूर न करता पर दुर्भाग्य जो न करे सो थोड़ा। बच्चे को कुष्ठ हो गया। सिन्ध के डॉक्टर इलाज न कर सके, बियाना और अमेरिका के डॉक्टर भी उसे अच्छा न कर सके। सारी कमाई उसी में स्वाहा हो गई और बहुत बड़ा कर्ज ऊपर हो गया। एक दिन बच्चा मरने लगा तो वह व्यक्ति पास ही बैठा था। बच्चा जोर से चिल्लाया और बाप से बोला—”मैं तुम्हारा बेटा नहीं हूँ तुमने मेरा धन मुझ से छीना अब वह सारा धन हड़पकर मैं जा रहा हूँ।” यह कहकर वह मर गया।
आनन्द स्वामी लिखते हैं कि इस दुःख से दुःखी होकर वह व्यक्ति संन्यासी हो गया पर उसे वहाँ भी शान्ति व चैन नहीं मिल सकी।
अनीति की कमाई इसी तरह सभी को कष्ट ही देती है भले ही वह आज समझ में न आता हो। इसलिये जीविकोपार्जन भी विशुद्ध धार्मिक दृष्टि से ही होना चाहिए। रूखा-सूखा खा लेना अच्छा पर अधार्मिक कमाई कभी हितकर नहीं होता इस बात को गाँठ बाँध लेना चाहिये।
बच्चों के लिये वेद शास्त्रों की चरित्र निर्माण की कहानियाँ, महापुरुषों के संस्मरण और जीवन चरित्र पढ़ने को दें। स्त्रियों का साहित्य उनके अनुरूप हो। रामायण भागवत, गीता-कथा तथा महाभारत जैसे ग्रन्थों का सामूहिक स्वाध्याय भी किया जा सकता है। इनमें कोई एक व्यक्ति दृष्टान्त और कहानियाँ जोड़कर प्रसंगों को सरल और रोचक करता रहे तो और भी लाभदायक। छोटे या बड़े किसी न किसी रूप में आपके परिवार में स्वाध्याय की व्यवस्था रहनी अवश्य चाहिये, इससे परिजनों का जीवन स्तर विकसित होता है, भावनाओं का परिष्कार होता है और सच्चा ज्ञान उदय होता है।
सायंकाल सामूहिक प्रार्थना आदि की व्यवस्था रहनी चाहिए। साधना स्थल में प्रतिमा की आरती आदि की जाय तो वह भी अच्छा है।
शयन के लिए अपने बिस्तर पर पहुँचिये तो आज के जीवन पर आत्म निरीक्षण कर जाइये। आज के अच्छे कार्यों पर प्रसन्नता अनुभव कीजिए और कल के लिए और भी दृढ़ता उत्पन्न कीजिए। बस इस प्रकार परमात्मा की याद करते हुए निद्रा देवी की गोद में चले जाइए। यह आपकी एक दिन की पारिवारिक धर्म व्यवस्था हुई।
पर्व और त्यौहारों पर घर की सफाई सजावट तथा विशेष हवन, पूजन के कार्यक्रम रहें और उन्हें प्रेरणाप्रद रूप में मनाया जाना चाहिए। घर के सब सदस्य एक दूसरे से गले मिला करें और पहिले हुई भूलों की क्षमा याचना किया करें।
इस प्रकार का वातावरण निःसंदेह परिवार में नया जीवन, नया प्राण और नव उल्लास पैदा करता है। हिन्दुओं का पारिवारिक जीवन इसी तरह का रहा है, बीच में कुछ विकृति आ गई है सो उसे दुरुस्त कर इस नयी व्यवस्था का पुनर्जागरण करना चाहिए।
किसी उत्सव अथवा समारोह का अर्थ होता हैं, अपनी हार्दिक प्रसन्नता को सुन्दरता पूर्वक व्यक्त करना। किन्तु अब कोई समारोह अथवा उत्सव अपनी वाँछित मर्यादा को पार कर जाता है, तब वह न केवल एक बोझ ही हो जाता है, बल्कि एक उपहासास्पद कौतुक बन जाया करता है।
विवाह वास्तव में एक समारोह का विषय है। विवाहोत्सव के अवसर पर सम्बन्धित लोगों का हर्षित एवं प्रसन्न होना स्वाभाविक ही है और प्रसन्नता अपनी अभिव्यक्ति चाहती भी है और उसकी अभिव्यक्त करना भी चाहिए।
किंतु दुर्भाग्यवश हिंदुओं का विवाह समारोह आजकल एक विशुद्ध बाल-कौतुक जैसा बन गया है। समारोह के नाम पर इस अवसर पर ऐसा अनावश्यक आडम्बर किया जाने लगा है, जिसको देखकर किसी भी सभ्य समझदार को मन ही मन शर्म आने लगती हैं।
दूल्हे की वेश रचना से लेकर वधू की विदाई तक जो भी समारोह किये जाते हैं, उनको देखकर सोचना पड़ता है कि यह विवाह हो रहा है अथवा नासमझ गँवारों का कोई स्वाँग।
जिस दिन से विवाह कृत्य का समारम्भ होता है, उसी दिन से वर-वधू के घरों में ढोलक बजने शुरू हो जाते हैं और दिन में समय-असमय इतनी बार बजा करते हैं कि पास-पड़ौस के रहने वाले ऊबने और परेशानी अनुभव करने लगते हैं। ऐसे अवसरों पर फिजूल और निठल्ली स्त्रियों को तो मानो एक मनचाहा मनोरंजन ही मिल जाता है। जब देखो वर-वधू के घर उपस्थित और ढोलक के साथ जुटी पड़ी हैं। ब्याह के माँगलिक गानों से लेकर इश्क की अश्लील गजलों तक का जो सिलसिला प्रारम्भ होता है, वह इतनी देर तक चलता रहता है कि उस पर किसी सभ्य व्यक्ति को घृणा होने लगती है।
ऐसे अवसर पर घर में स्त्रियों का निरंकुश राज हो जाता है और वे अपने गाने की हवस पूरी करने में यह भी भूल जाती हैं कि घर में वह पुरुष वर्ग और वयोवृद्ध लोग भी मौजूद हैं, जिनकी मर्यादा का भी ख्याल रखना है। एक उन्हें यदि उनकी याद भी रहे तो भी वे अपने उन्माद में उनकी पूर्ण उपेक्षा कर देती हैं और निःसंकोच भाव से अपने कार्यक्रम में लगी रहती हैं।
यदि एक पुरुष परेशान होकर किसी गायिका को टोक देता है, तो वह नीरस अथवा चिड़चिड़ा मान लिया जाता है और घर-घर से आई गयिकायें बड़बड़ाती हुई उसकी आलोचना करने लगती हैं। कभी-कभी वे बुरा मान जाती हैं। ऐसे अवसर पर गृह-स्वामिनी को सामाजिकता एवं भद्रता के नाते पुरुषों को कुछ कह सुनकर उन निठल्ली स्त्रियों को मनाना तक पड़ता है और उन्हें मनमाने गाना, गाने और ढोल फोड़ने के लिये और अधिक छूट देनी पड़ती है।
घरों में बेचारे बहुत से विद्यार्थी भी होते हैं। उन्हें पढ़ना होता है, अपना पाठ याद करना अथवा गणित हल करनी होती है, पर उन निठल्ली एवं हर्षोन्मादिनियों को उनकी हानि की कोई चिन्ता नहीं रहती। बहुत बार तो विद्यार्थियों की परीक्षाएं तथा विवाह के अवसर साथ-साथ पड़ जाते हैं। ऐसी स्थिति में बेचारे परीक्षार्थियों को बड़े संकट का सामना करना पड़ता है। यदि वे उन्हें ढोल बजाने अथवा जोर-जोर से गाना, गाने के लिए मना करते हैं तो धृष्ट समझे जाते हैं, साथ ही कहने वाली मूर्खायें यहाँ तक कह देती हैं कि उसे अपनी बहिन अथवा भाई के विवाह समारोह से अरुचि है। ऐसे असमंजस में पड़े उस परीक्षार्थी की क्या दशा होती है? जिसका एक-एक क्षण मूल्यवान होता है। इसकी चिंता करना हर्षान्वितायें अपना कर्तव्य नहीं समझती।
अब विचार करने की बात यह है कि विवाह महोत्सव पर स्त्रियों का हर्षित होना स्वाभाविक ही है और उसकी अभिव्यक्ति भी आवश्यक है। किंतु क्या इस मूर्खतापूर्ण हर्षातिरेक को उत्सव अथवा समारोह कहा जायेगा?
यदि यही ढोल वादन और गायन का कार्यक्रम किसी उपयुक्त समय पर एक सीमित अवधि के लिए शिष्ट एवं मधुर गानों के साथ मनाया जाये तो निःसन्देह बड़ा ही सुन्दर एवं सुखदायक रहे। किन्तु हिन्दू-समाज में विवाह का अवसर एक मर्यादाहीन उच्छृंखलता का समय माना जाता है। इसलिये उसमें शिष्टता एवं उस भय की सीमा में बँध कर चलना आवश्यक हर्ष की न्यूनता मानी जाती है। साथ ही न जाने कितने पुराने दकियानूसी, अर्थहीन, सारहीन और संगीत हीन रूढ़िवादी गाने भी इस अवसर पर गाने का रिवाज है। किसी दूसरे प्रकार के सार्थक गाने न तो किसी को आते हैं और यदि किसी शिक्षिता लड़की अथवा महिला को आते भी हैं, तो न तो वे पसन्द किये जाते हैं और न उसको अवसर दिया जाता है। अपना स्थान किसी परिमार्जित प्रगतिशीलता को दे देना रुढ़िवादिनी गयिकायें अपना और अपनी गायन-कला का अपमान समझती हैं। इस प्रकार की खुशी, प्रसन्नता अथवा गर्वाभि व्यक्ति को मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं कहा जा सकता।
यह तो रही घर के अन्दर की बात। बाहर किसी देवी-देवता की पूजा करने, कुएँ की परिक्रमा करने अथवा किसी पेड़-पौधे पर सिन्दूर आदि चढ़ाने के लिए जाते समय तो अनियमित ढोल-वादन, अश्लील गायन तथा असंभव स्वर लहरी देखते-सुनते ही बनती है। बेचारे राह चलते सभ्य लोगों को एक बार लज्जा आ जाती है, किन्तु उन्हें तनिक भी इस बात की चिन्ता नहीं होती कि वे किसी भद्र परिवार की महिलायें हैं और उनकी यह सार्वजनिक असभ्यता अशोभनीय है। इस प्रकार सड़कों, बाजारों और गली, कूचों में खुला खेलने को क्या उत्सव अथवा समारोह कहा जायेगा? तब असभ्यता, अश्लीलता अथवा अभद्रता किन क्रियाओं को कहा जायेगा? किन्तु हिन्दू-समाज में उत्सव की अभिव्यक्ति के नाम पर ऐसी अशिष्टताएं अनिवार्य रूप से विवाहों के अवसर पर होती ही हैं और परम्परा के दास इसमें कोई भी सुधार, किसी प्रकार का परिमार्जन करने की आवश्यकता ही नहीं अनुभव करते। यदि कोई विचारशील व्यक्ति परिवार के पुरुष वर्ग को स्त्रियों की यह अभद्रता रोकने के लिये कहता भी है तो वह मजबूरी दिखाता हुआ कह देता है कि क्या किया जाये? यह रिवाज तो बहुत पुराना चला आता है। रोका भी किस प्रकार जा सकता है? वास्तव में किसी का यह उत्तर सुनकर खेद करने के सिवाय किसी प्रगतिशील व्यक्ति के पास कोई उपाय ही नहीं रहता।
यदि एक बार इस बाहरी गाने-बजाने को अनुशासित कर दिया जाये और गन्दे एवं अर्थहीन गानों का स्थान प्रगतिशील सुन्दर तथा भावपूर्ण गीतों को दे दिया जाये, तब भी गनीमत हो, किन्तु न तो लोगों में ऐसा करने का साहस है और न चिन्ता।
कहना न होगा कि इस प्रकार के प्रदर्शनों तथा उत्सव एवं समारोह के हर्ष की अभिव्यक्ति से और तो कुछ नहीं, संसार के सामने हिन्दू समाज की सार्वजनिक सभ्यता का एक कुचित्र अवश्य उपस्थित हो जाता है। देखने वाले अवश्य ही इस गलतफहमी में पड़ जाते होंगे कि हिन्दुओं की आन्तरिक सभ्यता ठीक उस सभ्यता के विपरीत है, जिसकी वह डींग हाँका करते हैं और जिसको कि वे संसार की अन्य सभ्यताओं की तुलना में श्रेष्ठ बतलाते हैं।
निःसन्देह किसी भी व्यक्ति अथवा समाज की सभ्यता की गहराई का इसी प्रकार के उत्सवों, संस्कारों एवं समारोहों के समय ही पता चलता है। जिनके खुशी मनाने के तरीके—सादे, सरल, शिष्ट एवं सुरुचिपूर्ण होते हैं, आज के युग में वे समाज ही सभ्य कहे जा सकते हैं। अन्यथा उत्सवों के नाम पर ऐसी हाय-हाय और हैरत से भरी बेहयायी करने वाले और कुछ भी कहे जायें, सभ्य कदापि नहीं कहे जा सकते। अस्तु अपनी सभ्यता एवं शिष्टता के नाम पर हिन्दुओं को अपने विवाहोत्सवों में उचित सुधार करना अत्यन्त आवश्यक है।
जीवन का सारा रस सोख लेने वाली गरीबी, हृदय को तोड़ देने वाले सामाजिक अत्याचारों और अस्तित्व मिटा देने वाली आपत्तियों के बीच भी जिन्होंने अपने जीवन को सफल कर दिखाया उन पंडिता रमाबाई का जन्म मैसूर राज्य के पश्चिमी घाट के वन प्रान्त में एक कुटिया में अप्रैल 1858 को हुआ।
रमाबाई के पिता का नाम अनन्त शास्त्री डोंगरे था। वह एक विद्वान ब्राह्मण थे, साथ ही स्त्री-शिक्षा के हिमायती और सुदामा की तरह गरीब थे।
पंडित अनन्त शास्त्री अपने विचारों का प्रचार अपने ब्राह्मण समाज में किया करते थे और लोगों को अपनी बहू-बेटियों को पढ़ाने की प्रेरणा देते थे। उनके इस प्रचार से रूढ़िवादी उनके कुटुम्बी उनकी जान को आ गये। विवश होकर अनन्त शास्त्री घर छोड़कर अपनी पत्नी और तीन बच्चों को लेकर मँगलोर से तीस मील दूर गंगा मूल नामक वन में एक कुटिया बनाकर रहने लगे।
अनन्त शास्त्री एक तो यों ही गरीब थे, ऊपर से विद्वानों तथा साधु-सन्तों का आतिथ्य बहुत किया करते थे, जिससे उनकी कमाई और घर की जो थोड़ी-बहुत सम्पत्ति थी तेजी से स्वाहा होती चली गई और एक दिन ऐसा आया कि अन्न के लाले पड़ने लगे। दान अच्छी बात है उदारता दैवी गुण है। पर अपनी सामर्थ्य भर। अन्यथा अपनी सीमा से आगे निकल जाने पर यह जी का जंजाल बन जाता है। घर आये अतिथि की उतनी ही सेवा करनी चाहिये जिसका निर्वाह हर समय किया जा सके। परिवार को भूखा रख कर आतिथ्य पुण्य के स्थान पर पाप सरीखा बन जाता है। हर काम की संसार में एक सीमा है, एक मर्यादा है और उस मर्यादा की रक्षा करना सबसे बड़ी बुद्धिमानी है।
पिता के पास पैसा तो था ही नहीं जो वे रमाबाई को पाठशाला भेजते। निदान उन्होंने उन्हें घर पर ही संस्कृत एवं मराठी की शिक्षा दी। रमाबाई का मन पढ़ाई में इस कदर लगता था कि उन्हें संस्कृत श्लोकों की पुस्तकें की पुस्तकें कंठस्थ हो गई।
परिवार की जीविका चलाने के लिये रमाबाई के पिता ने पुराणों की कथा सुनाने का काम अपनाया। इस काम में उन्हें दूर-दूर तक घूमना पड़ता और भूखा प्यासा रहना पड़ता था। नतीजा यह हुआ कि उनका स्वास्थ्य समाप्त हो गया जिससे वे शीघ्र ही स्वर्ग सिधार गये। इसी बीच भीषण अकाल के प्रकोप से उनकी माता भी उन्हें छोड़कर चली गई और रमाबाई अपने दो भाई बहिनों के साथ पूर्ण रूप से अनाथ हो गई।
एक तो दुर्भिक्ष का प्रकोप दूसरे जीविका का कोई साधन नहीं। भूखों मरने की नौबत आ गई। किन्तु बुद्धिमती रमाबाई ने हिम्मत न हारी और जंगल से कन्दमूल तथा फल ला लाकर अपने भाई बहिनों के प्राण बचाए।
इस आपत्ति की मारी ततारी हुई रमाबाई एक भिखारिणी के रूप में चार सौ मील की पैदल यात्रा करके कलकत्ता आ गई। अपनी इस आपत्ति का वर्णन करते हुये उन्होंने एक स्थान पर स्वयं कहा है कि- “अन्न तो असम्भव था, फिर भी पेट की ज्वाला वनस्पतियों से बुझा लेती थी किन्तु शीत की समस्या हल न होती थी। आखिर अपने भाई बहिनों के प्राण बचाने के लिये किसी गड्ढ़े में बैठकर सूखी रेत, पत्तों और घास-फूस का ओढ़ना बना लेती थी।”
यह थीं आपत्तियाँ जिनको रमाबाई ने सहन किया, और इन्हीं आपत्तियों पर विजय प्राप्त कर समाज की ऐसी सेवा की कि आज उनका नाम इतिहास में अमर है। धैर्य, साहस और सन्तोष रमाबाई के प्रमुख साधन थे और उन्होंने स्वीकार किया है कि इन्हीं गुणों की बदौलत वे आपत्तियों का अथाह सागर पार कर सकी हैं। अपने इस देशाटन में रमाबाई ने हिन्दी, कन्नड़ और बंगला भाषायें और सीख ली थीं, जिनने उन्हें अपनी यात्रा पूरी करने में बहुत सहायता की।
बाल्यकाल में प्राप्त की विद्या कलकत्ता आकर उनके बहुत काम आई। बंगाल में उन दिनों विधवाओं की दशा बहुत शोचनीय थी। माँ-बाप, सास-ससुर और देवर आदि के रहते हुये भी वे एक पति के न रहने से सबके लिये भार स्वरूप बन जाती थीं। उनको अभागा समझकर घर-द्वार से निकाल दिया जाता था। पढ़ी-लिखी न होने से या तो भीख माँगती थीं या किसी गलत रास्ते पर पड़ जातीं अथवा विदेशी मिशिनरियों के हाथ लग जाती थीं।
कलकत्ता पहुँचकर रमाबाई अपना दुख तो भूल गई और इन बेचारी विधवाओं के लिये काम करने लगीं। उन्होंने किसी का सहारा लिये बिना बाल-विवाह और विधवाओं के साथ हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध प्रचार करना शुरू कर दिया। इस समय रमाबाई की आयु केवल बाईस वर्ष की थी। उनके भाषणों में हृदय की पीड़ा समाज का कल्याण तथा हिन्दू शास्त्रों के प्रमाणों का समावेश रहा करता था। जिसका परिणाम यह हुआ कि शीघ्र ही कलकत्ते में वे लोकप्रिय हो गई और उनकी बहुत-सी मुसीबत जन-सहयोग से दूर हो गई।
अभी उनकी कठिनाइयों में नाम मात्र को ही सुविधा का श्रीगणेश हुआ था कि उनके हृदय पर एक गहरा आघात और लग गया। उनके भाई की मृत्यु हो गई। रमाबाई के लिए यह आघात असह्य था। किन्तु उन्होंने समाज के हर बच्चे के लिए ममता का विस्तार कर किसी प्रकार अपनी पीड़ा बहला ली और फिर काम में जुट गई।
रमाबाई संसार में बिल्कुल अकेली रह गई थीं। और इधर तरुणाई आ जाने से उनका रंग-रूप भी पूरी तरह से निखर चुका था। अब उन्हें सामाजिक क्षेत्र में निर्भीकता, स्वतन्त्रता तथा निरापद रूप में कार्य करने में बाधा होने लगी थी। उनके संपर्क में आने वाले बहुत से लोगों ने उनसे अन्तरंगता प्राप्त करने की कोशिश की। इसलिये उन्होंने इच्छा न होते हुए भी विवाह कर लेना आवश्यक समझा।
किन्तु ठीक से ठौर-ठिकाना तथा जाति-पाति में विश्वास न होने से ब्राह्मण तो दूर कोई सवर्ण हिन्दू उनसे विवाह करने को तैयार न हुआ। हिन्दू जाति की इस मूढ़ता पर उन्हें बड़ा क्षोभ हुआ और अन्त में आत्म-मर्यादा की रक्षा के लिये उन्होंने विपिन बिहारी मेधावी नामक एक वकील से अन्तर्जातीय विवाह कर लिया। विपिन बिहारी जी कलकत्ता विश्वविद्यालय के एम.ए. और बड़े योग्य वकील थे। उन्होंने रमाबाई को अंग्रेजी की शिक्षा देनी प्रारम्भ कर दी।
किन्तु रमाबाई की विपत्तियों का सिलसिला अभी खत्म न हुआ था। डेढ़ साल बाद हैजे से उनके पति की भी मृत्यु हो गई और रमाबाई संसार में फिर अकेली रह गई। एक तो रमाबाई यों ही बेसहारा थीं, दूसरे अन्तर्जातीय विवाह कर लेने पर तो उस समाज ने भी उनकी दशा पर दया नहीं की, जो कुछ समय पहले उनकी विद्वता से प्रभावित होकर उन्हें देवी मानता था।
वैधव्य के साथ रमाबाई के साथ एक दिक्कत और थी। उनकी गोद में एक नन्ही-सी बच्ची थी। रमाबाई मुसीबतों से जूझती हुई स्वयं तो प्राण देने में कोई संकोच न करतीं किन्तु उस बच्ची को सर्वथा अनाथ न करना चाहती थीं। विवश होकर उन्होंने आश्रय के लिये अपने सम्बन्धियों का द्वार खटखटाया। वहाँ से भी उन्हें दुत्कार के अतिरिक्त और कुछ न मिला। फिर भी साहस की धनी उन्होंने हिम्मत न छोड़ी और पुनः समाज सेवा के क्षेत्र में उतरने की ठान ली।
उन्होंने रानाडे, केलकर और भंडारकर प्रभृति समाज सुधारक तथा उदार दृष्टिकोण वाले नेताओं से भेंट की और स्त्री-समाज के सुधार तथा उन्नति के लिए काम करने की इच्छा प्रकट की। उक्त नेताओं ने न केवल उनके विचारों का स्वागत ही किया अपितु प्रोत्साहन के साथ सहायता देने का भी वचन दिया।
सेवा का क्षेत्र और नेताओं का प्रोत्साहन पाकर रमाबाई ने जी खोलकर काम करना शुरू किया और शीघ्र ही “महिला-समाज” नामक एक संस्था की स्थापना कर डाली, जिसकी उपयोगिता ने उसकी शाखायें सारे महाराष्ट्र में फैला दीं।
अपने इस कार्य से रमाबाई का प्रभाव इतना बढ़ गया कि उनकी पहुँच सरकार के ऊँचे-ऊँचे अफसरों तक हो गई जिसके फलस्वरूप सन् 1882 के अंग्रेजी-शिक्षा आयोग ने उन्हें अपनी राय देने के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने अवसर का पूरा-पूरा लाभ उठाया और भारतीय नारी के लिए शिक्षा की सुविधाओं के लिए जोरदार सिफारिश की। उनकी वह सिफारिश महारानी विक्टोरिया तक पहुँचाई गई, जिनकी प्रसन्नता ने उन्हें इंग्लैंड पहुँच कर अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर दिया।
इंग्लैंड पहुँचकर उन्होंने सेंटमेरीज होम में रहकर अंग्रेजी की शिक्षा प्राप्त की और चेल्टन्हेम के लेडीज कालेज में दो साल संस्कृत पढ़ाई। तत्पश्चात अमेरिकन शिक्षा प्रणाली का अध्ययन करने के लिये वे अमेरिका चली गई, जहाँ उन्होंने किंडरगारडन शिक्षा प्रणाली का प्रशिक्षण लिया और समय निकाल कर ‘दी हाई कास्ट हिन्दू वोमन’ (सवर्ण हिन्दू नारी) नामक एक पुस्तक भी लिखी। जिसका मुख्य विषय हिन्दू जाति में स्त्रियों पर किये जा रहे अत्याचारों का दिग्दर्शन, आलोचना तथा समीक्षा भी था।
इस पुस्तक का अमेरिकन नारी समाज पर इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि वहाँ ‘रमाबाई एसोसिएशन’ नाम की एक संस्था इस मन्तव्य से स्थापित की गई कि भारतीय विधवाओं को अमेरिका से भरसक सहायता कराई जाये। इस संस्था ने भारत में एक विशाल विधवा-आश्रम खोलने तथा दस साल तक उसे हर प्रकार की मदद देकर चलाने का वचन दिया।
सन् 1889 में रमाबाई भारत लौटी और अमेरिका के ‘रमाबाई एसोसिएशन’ की ओर से भारत में ‘शारदा सदन’ नाम से एक विधवा आश्रम खोला। जिसके उन्होंने चार मुख्य उद्देश्य रक्खे—(1) विधवाओं को शिक्षित करके समाज की सुसंस्कृत सदस्या बनाना। (2) उन्हें पाश्चात्य रंग-ढंग से बचाना। (3) विधवाओं को ईसाइयों के जाल से बचाना। (4) शारदा सदन को सही मानों में विधवाओं का सच्चा घर बनाना।
इन चारों उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उन्होंने विधवाओं को अध्यापकी, धाय तथा नर्सरी की ट्रेनिंग देनी शुरू की तथा साथ ही शिक्षा का पूरा वातावरण विशुद्ध रूप से भारतीय रखने की व्यवस्था की।
सन् 1897 में अमेरिका के रमाबाई एसोसिएशन की सहायता के दस साल समाप्त हो गये और उसने मदद देनी बन्द कर दी। निदान मदद की अवधि बढ़वाने के लिए रमाबाई पुनः अमेरिका गई और जब अपने उद्देश्य में सफल होकर लौटीं तो उन्होंने आश्रम का एक और भवन बनवाया, साथ ही कृपा सदन’ नाम का एक अन्य आश्रम खोला जिसमें न केवल विधवाओं बल्कि समाज की पतिताओं को भी आश्रय तथा काम देने की व्यवस्था की गई।
अनन्तर उन्होंने बम्बई के विश्वविद्यालय से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की और उसका उपयोग शारदा सदन के हाई स्कूल की प्रिंसिपल के रूप में किया और गुल वर्ग में एक नया हाई स्कूल खोला।
किन्तु कुछ ही समय बाद उनकी एकमात्र प्राणाधार पुत्री मनोरमा का देहान्त हो गया जिसका आघात, उसका निरन्तर कार्य एवं आपत्तियों से जर्जर हुआ स्वास्थ्य सँभाल न पाया जिससे वे कुछ समय बीमार रहकर 5 अप्रैल 1902 को इस लोक का परित्याग कर गई।
विवाह के सम्बन्ध में यदि उन्होंने समाज के तिरस्कार को महत्व दिया होता और उसका विरोध निषेधात्मक रूप में किया होता तो अपनी हीनताओं की भेंट चढ़कर एक अज्ञात मृत्यु ही मरी होतीं। आज उनको न तो कोई जानता और न उनका नाम लेता।
इसके विपरीत उन्होंने अपने जीवन को एक आदर्श जीवन बनाया अपने चरित्र की रक्षा की और समय के अनुसार समझ से काम लेकर अपने मानव-जीवन को निर्माण कार्यों में लगाकर उसको सार्थक बना लिया। विपत्तिओं से घबराकर अपने को गिरा देने पर भी वे अमर न हो जातीं बल्कि एक कलंक पूर्ण जीवन काटती हुई अंत में किसी ऐसे ही आश्रम, सदन अथवा अनाथालय में जाकर आश्रय लेतीं जिनकी कि उन्होंने स्वयं स्थापना करके समाज का हित किया, संसार में यश लाभ किया और आत्मा को शान्ति कर अमर बन गई।
जिन भयानक आपत्तियों से घबराकर कोई भी अनाथ लड़की जब अपने भाई-बहिन के साथ भिखारिणी बन सकती थी, उन आपत्तियों को साहस, आत्म-विश्वास, धैर्य तथा सेवा-भाव से विजय कर महामानसी रमाबाई ने हर स्त्री-पुरुष के सम्मुख एक अनुकरणीय उदाहरण उपस्थित किया है। निःसन्देह भारत माता की लाड़ली रमाबाई वन्दना की पात्र है।
शरीर को शक्ति और उष्णता प्रदान करने का मूल संस्थान पेट है। यह शरीर की सम्पूर्ण गतिविधियों के संचालन का केन्द्र है। डाक्टरों का मत है कि यदि स्वस्थ रहना है तो पेट की क्रिया को ठीक रहने दीजिये। पेट की खराबी ही बीमारी की जड़ और शारीरिक दुर्बलता का प्रमुख कारण है। पेट अपना काम कुशलतापूर्वक पूरा करता चले, किसी प्रकार की गड़बड़ उत्पन्न न करे तो स्वास्थ्य गिर जाने का कोई कारण न होना चाहिए।
पेट की खराबी का तात्पर्य पाचन-क्रिया की गड़बड़ी से है। यह सभी जानते हैं कि जो आहार लिया जाता है, वह मुँह से होकर पेट में पहुँचता है। पेट तक पहुँचने में अन्न में केवल रासायनिक परिवर्तन होता है। अन्न से बने हुए रस से रक्त बनाने और मल या विजातीय द्रव्य बाहर निकालने की क्रिया पेट में ही होती है, इसलिये शरीर के इस पुर्जे की खास निगरानी रखी जानी चाहिए। पाचन-क्रिया बलवान और सशक्त बनी रहे तो शरीर के बलवान बने रहने में कोई सन्देह न होना चाहिए।
आहार हलक से नीचे उतर कर एक लम्बी नलिका से गुजरता हुआ पेट में पहुँचता है। इस बीच में पाँच प्रकार के रस उस आहार को तरल रस के रूप में परिवर्तित कर इस योग्य बनाने का प्रयत्न करते हैं कि वह छोटी आँत में पहुँचते ही सुविधापूर्वक रक्त की मात्रा बनाने लगे और अवशेष मल वहाँ धकेल कर मल द्वार की ओर खिसक जाय। सर्वप्रथम मुँह में चबाने की क्रिया के साथ उसमें लार मिलती है और सूखे पदार्थ को रसदार बनाने में सहयोग देती है, इससे अन्न आगे की क्रिया के लिए बढ़ जाता है। आगे पेट के रस, पित्ताशय से पित्त तथा पाचनक्रिया का रस आकर मिलता है। पाँचवाँ रासायनिक अम्ल छोटी आँतों में मिलता है और इस तरह सेवन किया गया अन्न रस से रक्त बनने के लिये तैयार हो जाता है। यही रक्त हृदय चूसता रहता है। हृदय इसे धमनियों द्वारा सारे शरीर को बाँट देता है। इस तरह शरीर और जीवन की रक्षा होती है। यदि इस क्रिया में कोई गड़बड़ी उत्पन्न होती है और पाचन-क्रिया ठीक काम नहीं करती तो मनुष्य दुर्बल और रोगी बन जाता है।
पाचन क्रिया ठीक-ठीक काम करती रहे, इसके लिये आहार, पाचन पद्धति तथा जीवनचर्या पर निगाह रखनी पड़ेगी। इन तीनों बातों पर पाचन क्रिया निर्भर रहती है। इनमें आवश्यक सावधानी रखी जाय तो पेट ठीक काम करने से इन्कार न करेगा।
आहार शरीर को जीवन प्रदान करता है। उसे स्वस्थ और क्रियाशील रखता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर भोजन करना हमारी सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। पर देखा जाता है कि अक्सर लोगों का दृष्टिकोण गलत होता है। वे स्वाद के लिये, जबान को रुचिकर अन्न बनाने के लिये अधिक नमक, मिर्च, मसाले, तेल, खटाइयाँ आदि मिला लेते हैं। तीखे और कडुए आहार में यह दोष होता है कि वह मुँह में पहुँचते ही जीभ को जलाता है। फलस्वरूप मुँह जल्दी से अध-चबाया अन्न निगल जाता है। आहार के बड़े-बड़े टुकड़े पेट में पहुँच जाने और उसमें पर्याप्त लार न मिल पाने से वह रस कठोर और गुत्थियों दार बना रहता है, जिससे आँतों को रक्त बनाने में कठिनाई आती है और दर्द तथा बेचैनी बढ़ती है। कडुए पदार्थों की तेजी के कारण पेट के रसों का अनावश्यक स्राव हो जाता है। अतः आगे के लिए यह क्रिया मन्द पड़ जाती है और मामूली अन्न को पचाने योग्य भी रस नहीं निकल पाता। अजीर्ण, मन्दाग्नि, भूख का न लगना, पेट में ऐंठन, गन्दी अपान वायु आदि का होना, यह सब अवगुणी आहार के कारण होता है। बासी भोजन, मादक पदार्थ, माँस आदि से भी यही कठिनाई उत्पन्न होती है। इस परेशानी से बचने के लिये लोग दवा-इन्जेक्शनों का प्रयोग करते हैं, उनसे भी पेट की गरिष्ठता और सड़न ही बढ़ती है और लाभ कुछ नहीं होता। तीखी दवाओं का जुलाब भी कारगर नहीं है क्योंकि उसमें भी पाचक रसों को भारी मात्रा में गिरा देने का दोष है।
आहार का चुनाव करने में यह ध्यान होना चाहिए कि वह अधिक से अधिक प्राकृतिक अर्थात् कम से कम भुना या तला हो, हल्का और सुपाच्य हो, मिर्च-मसालों का प्रयोग कम से कम हुआ हो। इस तरह का आहार जो पेट आसानी से पचा ले, वही गुणकारी होता है, भले ही वे कम शक्तिदायक हों। गरिष्ठ पदार्थ जितनी शक्ति नहीं देते, उतना विजातीय पदार्थ इकट्ठा कर पेट को खराब कर डालते हैं।
भूलवश यदि आहार में असावधानी कर ही डालें तो दवायें आदि लेने के बजाय ‘उपवास’ पेट-सुधार का उत्तम साधन होता है। इसमें पेट स्वाभाविक तौर पर साफ होकर जठराग्नि तेज पड़ जाती है और जमा हुआ मल निकल जाता है। उपवास के दरम्यान एनीमा का प्रयोग भी लाभदायक होता है।
आहार से भी महत्वपूर्ण उसे ग्रहण करने की पद्धति है। अन्न के छोटे-छोटे टुकड़े लिये जायें और उन्हें तब तक चबाया जाय, जब तक वे स्वतः ही रस बन कर गले से नीचे न उतर जायें। महात्मा गाँधी एक ग्रास को बीस बार चबाते थे। देर तक मुँह में बने रहने से लार की पर्याप्त मात्रा मिलकर उसे तरल बना देती है।
जबान के स्वाद के लिये बार-बार कुछ न कुछ खाते रहना अपच का कारण बनता है। पेट जब तक पहले खाये हुए आहार को साफ न कर ले, तब तक दूसरा न खाना चाहिए अन्यथा दुबारा पहुँचा हुआ आहार पहले को पचा देगा और अधपचे आहार की गर्त जमा हो जायगी। स्वप्नदोष, अनिद्रा आदि की बीमारियाँ प्रायः इसी कारण से होती हैं। पेट में अनावश्यक दबाव पड़ना स्वास्थ्य के लिये बड़ा घातक होता है। इसका दूषित प्रभाव शरीर और मन दोनों पर पड़ता है। कार्यक्षमता घटती और कमजोरी बढ़ती जाती है।
भूख लगने पर थोड़ा खाना बहुत अच्छा होता है। खाने और पचाने की क्रिया में समझौता बना रहे तो कोई गड़बड़ी पैदा न हो। पेट भूख के रूप में अपनी आवश्यकता खुद जाहिर कर देता है। इससे पहले भोजन करना पाचन-क्रिया को कमजोर बनाता है। तीव्र भूख लगने पर रूखा-सूखा भोजन भी स्वादिष्ट लगता है और उससे शरीर की आवश्यकता भी सरलतापूर्वक पूरी होती है।
हमारी दिनचर्या में एक खास तरह की कमी भी पाचन-क्रिया को प्रभावित करती है। वह है—परिश्रम से जी चुराना। पेट की बीमारी प्रायः आलसी लोगों को होती है। जो लोग भरपूर परिश्रम या व्यायाम करते हैं, उनके पेट के सारे अवयव कार्यक्षम बने रहते हैं। श्रम न करने से पाचनशक्ति मंद होती है, इससे भूख खुलकर नहीं लगती। मनुष्य भोजन बराबर करता रहता है और पेट की खराबी को नियन्त्रण दे बैठता है। खेतों पर तथा कल-कारखानों में श्रम करने वाले मजदूर तथा किसान, आफिस में काम करने वाले बाबुओं की अपेक्षा अधिक शारीरिक व्यायाम करते हैं, अधिक भोजन करते हैं और उनका स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है। इसका एक ही कारण है कि श्रम द्वारा माँस-पेशियाँ क्रियाशील रहती हैं, इनका पेट से सम्बन्ध होता है, जिससे पेट की पाचन-क्रिया प्रदीप्त बनी रहती है।
जिन्हें स्वाभाविक श्रम उपलब्ध नहीं होता, उन्हें भी व्यायाम के लिये कुछ न कुछ अवकाश निकालना चाहिए। कसरत-कुश्ती, तैरना, दौड़ना, पेड़ पर चढ़ना, कूदना, टहलना, आसन, प्राणायाम, गायन और वाद्य आदि में से अपनी रुचि तथा अवकाश का कोई कार्यक्रम चुन लेना चाहिए और उसे प्रतिदिन इतने अनुमान से कर लेना चाहिए कि सारे शरीर का व्यायाम हो जाय। व्यायाम से खून में तेजी आती है और उष्णता बढ़ती है। इससे भूख भी कड़ाके की लगती है।
व्यायाम के अतिरिक्त अपनी दिनचर्या इस तरह की रखनी चाहिए, जिससे बाहर की खुली हवा तथा सूर्य की पर्याप्त धूप भी शरीर को मिलती रहे। घुटे हुए वातावरण का प्रभाव भी पेट पर पड़ता है, उसकी पाचन-क्रिया को खराब कर डालता है।
बीमारियाँ बहुत हैं। कई कारण हैं, जिनसे शरीर कमजोर पड़ जाता है, पर एक बात नहीं भूलना चाहिए कि सभी रोगों का मूल कारण केवल पेट की खराबी, पाचन-क्रिया की खराबी है। इसी से तरह-2 की शारीरिक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं। अतः स्वास्थ्य रक्षा के लिए पाचन-क्रिया पर ध्यान देना बहुत जरूरी है। पेट ठीक काम करता रहे तो शरीर भी ठीक काम करता रहेगा। कोई रोग या बीमारी पास नहीं आयेगी।
मित्र, सच्चा, सरल और निष्कपट मित्र! ऐसे मित्र की तलाश संसार में किसे न होगी, जिससे अपनी प्रत्येक गुप्त से गुप्त बात प्रकट कर सकें तो भी ऐसी आशंका न रहे कि वह बात कहीं अन्यत्र फैल जायगी। जो इतना सरल हो कि अपनी प्रत्येक त्रुटि को उदारतापूर्वक क्षमा कर सके जो हर कार्य में सच्चा सहयोगी सिद्ध हो सके। अभिन्न हृदय, अभिन्न आत्मा, न कोई छल न कपट। ऐसा मित्र मिल जाय तो पूर्वजन्म का कोई पुण्य, कोई सुकृत ही समझना चाहिए।
पर ऐसी मित्रता इस जगत में अपवाद ही हो सकती है। प्रायः मित्रता किसी लाभ या स्वार्थ की दृष्टि से कायम होती है और जब उन परिस्थितियों में ढीलापन आने लगता है, तो आत्मीयता के बन्धन भी समाप्त होने लगते हैं। अनेक बार यह सम्बन्ध इतने कटु हो जाते हैं कि जिगरी दोस्त भी जानी दुश्मन बन जाते हैं, मित्रता शत्रुता में बदल जाती है।
हमारी दृष्टि में अपने बच्चों की मित्रता अधिक निश्चित उपयोगी हो सकती है। मित्र में जो गुण होने चाहिएं, वे बच्चों में मौलिक रूप में देखे जा सकते हैं। बच्चों के साथ आत्मीयता का विस्तार किया जाय तो वे सबसे प्रिय संगी, स्नेही और सहयोगी सिद्ध हो सकते हैं।
विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर कहा करते थे—”परमात्मा की पवित्रता और निश्छलता यदि कहीं है, तो उसे मैंने बच्चों में पाया। बालकों को में अपने जीवन का प्रेरणास्रोत मानता हूँ।” पं. जवाहरलाल जी की बालकों के साथ घनिष्ठता विश्व-विख्यात है, उन्होंने एक बार कहा था—”मैं इस संसार में अपने मित्रों के कारण बहुत सुखी हूँ यह जो भोले-भाले बच्चे हैं, यही हमारे प्रिय सखा हैं।”
पारिवारिक सोमनस और बालकों के जीवन निर्माण की दृष्टि से भी अपने बच्चों की मैत्री बहुमूल्य होती है। इसके लिये बालक सदैव इच्छुक दिखाई देंगे, किन्तु घरों में बच्चों की अल्प-बुद्धि समझ कर प्रायः उनकी उपेक्षा की जाती रहती है। उनकी सूझ-बूझ कई बार इतनी महत्वपूर्ण होती है कि वयस्कों को आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है। सच तो यह है कि बालकों में सही निर्णय की क्षमता दूसरों की अपेक्षा कहीं अधिक होती है, किन्तु उन्हें ऐसा करने के लिए अवसर नहीं दिया जाता, यह दुःख की बात है।
घर का बजट या किसी काम-काज की योजना बनाते समय लोग बच्चों को यह कहकर भगा देते हैं कि जाओ, खेलो—यहाँ तुम्हारे मतलब की कोई बात नहीं। पर ऐसा करते हुए अभिभावक यह भूल जाते हैं कि ऐसा करने से न केवल बालक की रचनात्मक बुद्धि को आघात पहुँचता है, वरन् वे एक महत्वपूर्ण सहयोग से वंचित रह जाते हैं। बजट बनाते समय बच्चे कई इतनी उपयोगी बातें बता देते हैं, जहाँ हमारी कल्पना भी नहीं पहुँचती। यह तो साधारण बात हुई। बालकों से बड़े व्यक्तियों को कई बार ऐसे सुझाव मिले हैं कि यदि वे न मिलते तो उनके कार्यों या कृतियों में अनेक दोष रह जाते।
जार्ज बर्नाडशा के एक नाटक में किसी पात्र के मुँह से ऐसी बात कहलाई गई थी, जो उसे न कहनी चाहिए थी। उसे एक बालक ने ठीक किया था। “पिताजी, मनुष्य को उद्देश्यहीन उत्सवों में नहीं शामिल होना चाहिए।” यह उपदेश बालक नैपोलियन ने अपने पिता को दिया था। सुभाषचन्द्र बोस अपने घर में नजरबन्द थे, तो वहाँ से मौलवी के वेश में निकल जाने की योजना उनकी छोटी भतीजी ने ही बनाई थी। बच्चों में दरअसल असाधारण सूझ-बूझ होती है, उसे यदि ठुकराया न जाय तो वे ऐसी सुघड़ सलाह देते हैं, जैसी कोई मित्र भी नहीं दे सकता।
बच्चे में पूर्वजन्म की प्रतिभा छिपी होती है। किन्हीं में तो यह मात्रा वयस्कों से भी अधिक होती है। सुयोग्य सहयोग के लिये हर माता-पिता को उस प्रतिभा का लाभ भी लेना चाहिए और उसको विकसित करने का प्रयत्न भी करना चाहिए।
मित्रों से एक अपेक्षा यह की जाती है कि वे सुख-दुःख में सच्चे आत्मीय की तरह हमारे साथ रहें। हम नहीं कह सकते, इस नियम का व्यवहार में कितना पालन होता है। पर बच्चों से अधिक संवेदनशीलता बड़ों में नहीं होती। माता-पिता को दुःखी देखकर बच्चों के चेहरे पहले मुरझा जाते हैं। प्रसन्नता के समय घर को उल्लास से भर देते हैं, आत्म-सन्तोष का अनुभव किया जा सकता है। दुःख के समय बालकों के ममत्व से दुःख कटता है, सुख में उन पर हल्का उत्तरदायित्व छोड़ने से उनका स्वाभिमान, आत्मीयता की भावना और उदारता की वृत्ति का परिष्कार होता है। इन दोनों अवसरों पर अपनी मानसिक स्थिति को बच्चों के सामने खुली हुई रखनी चाहिए।
कभी-कभी मित्रों के गुण-सौंदर्य बहुत प्रभावित करते हैं। किसी में आत्मीयता अधिक होती है, किसी से मनोविनोद होता है, कोई प्राणवान होते हैं, कोई कर्तव्य-पालन और व्यवहार कुशलता में श्रेष्ठ होते हैं। बच्चों में इस प्रकार के अनेक सद्गुणों और सद्भावों का सम्मिलित एकीकरण देखा जा सकता है, पर उसे कृपया पुत्र होने की अधिकार भावना से न देखकर मैत्रीपूर्ण भावनाओं से देखिये। एक दूसरे पर समान अधिकार का आश्वासन देकर ही एक दूसरे के गुणों का लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
सरलता बालकों का स्वाभाविक गुण है। यदि उनके साथ कोई जोर-जबर्दस्ती न की जाय या अनावश्यक दबाव न डाला जाय तो उनमें प्रति क्षण सरलता के भाव देखे जाते हैं। वे प्रतिदिन ऐसे मनमोहक दृश्य उपस्थित करते रहते हैं। कभी बच्चा कपड़ों और देह में मिट्टी लपेट कर आपके समक्ष आ खड़ा होगा। ठीक बाल-शिव की तरह उसे देखकर आप मुस्कराये बिना न रहेंगे, उसे कपड़े पहनने के लिये कहेंगे तो उल्टी कमीज पहनकर आ जायगा, आपकी किताबों को सारे कमरे में बिखेर देगा, उन्हें इस तरह खोलेगा मानों किसी विशेष संदर्भ की तलाश हो। बड़ों को हाथ-मुँह धोता देखकर वह भी वैसा ही अनुकरण करता है, पर हाथ में लिया हुआ पानी कभी एक गाल के लिये ही पर्याप्त होगा, कभी मुँह में उँगली डालकर दाँत साफ करने की सी क्रिया करेगा। यह सब वह अपनी बाल सरलता से करता है। गलत-सही का उसे जरा भी अंदाज नहीं होता। आप की भी उसकी इन क्रियाओं से मनोविनोद करना चाहिए, पर यदि उसे इन कौतुकों के फलस्वरूप आपकी डाँट-डपट, मार-झिड़क मिली तो कुछ ही दिनों में उसकी सारी सरलता—कठोरता में बदलने लगेगी। यदि आप इन आदतों में से किसी को सुधारना ही चाहते हैं तो उसका सही नमूना बार-बार उसके आगे प्रदर्शित कीजिए, बच्चा अपने-आप उसका अनुसरण कर लेगा। समझायें भी तो हँसते हुए, कुछ कहें तो आत्मीयता के साथ। “नहीं, मुन्ने ऐसे नहीं, कंघा यों पकड़ना चाहिए और ऐसे बाल ठीक करना चाहिए।” इस प्रकार कहते हुए आप कोई बात उसे समझाइये। चिल्लाकर, चौंका कर कोई बात कहेंगे, बच्चा डर जायेगा और आपके प्रति उसकी भावनाओं में कठोरता आने लगेगी। यह दबाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में कुटिल परिणाम उपस्थित करने वाला होता है।
बच्चे बड़े निष्कपट होते हैं, पर गलत उदाहरण देकर ही उनकी निष्कपटता नष्ट कर दी जाती है। घर में कुछ आता है, आप उसे छुपाते हैं, झूठ बोलते हैं, एक सा व्यवहार नहीं करते। इन तमाम बातों को आधार मानकर बच्चा भी उन्हें आवश्यक समझने लगता है और खुद भी उसी तरह का छलपूर्ण व्यवहार सीखने लगता है। कोई वस्तु घर में आये तो भले ही वह बच्चे के उपयोग की वस्तु न हो, पर उसे दिखाइये अवश्य। सो रहा हो या विद्यालय गया हो तो उसके घर आते ही आप इन सारी वस्तुओं को बाहर निकालिये और उसे बताइये कि अमुक वस्तु अमुक के लिये है, यह इतने पैसे में आई, वहाँ से खरीदी गई। उसे यथासंभव सारी बातें बता दीजिए, ताकि उसके मन में किसी प्रकार की गलतफहमी पैदा न हो।
आपके बच्चों की सारी जिम्मेदारियाँ आप पर हैं, उनको पूरा करने में निःसन्देह कठिनाइयाँ भी बहुत अधिक आती हैं, पर इससे बालक पर स्वामित्व या अधिकार की भावना प्रकट करना उचित नहीं। आपके घर वह परमात्मा का मेहमान बनकर आता है। आत्मा की दृष्टि से आप में और बच्चों में कोई असमानता नहीं होती। जिम्मेदारियाँ अधिक होने पर आप बड़े अवश्य हैं, पर अपने तमाम कर्तव्यों का भली-भाँति निर्वाह आप बच्चों के साथ मित्रवत् व्यवहार करके ही पूर्ण कर सकते हैं। आप उन्हें इस दृष्टि से देखा करें तो निःसन्देह उनका बड़ा भला कर सकते हैं और स्वयं भी आत्म-बल प्राप्त कर सकते हैं।
युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को नवनिर्माण का उत्तरदायित्व सौंपते हुए हम निरन्तर यह आशा करते रहते हैं कि इस परम पुनीत आध्यात्मिक एवं सामाजिक कर्तव्य की पूर्ति के के लिए भी वे वैसा ही ध्यान देंगे और प्रयत्न करेंगे जैसी कि आजीविका उपार्जन एवं पारिवारिक सुख-सुविधाओं के लिये करते हैं। जो इस ओर उपेक्षा बरतते हैं उनके बारे में हम यही सोचते हैं कि उन्हें अखण्ड-ज्योति बाँचने का शौक भले ही हो, हमसे व्यक्तिगत परिचय, मोह भले ही हो पर वे उस मिशन के लिए कुछ करना नहीं चाहते जो अखण्ड-ज्योति का, हमारा, जीवन-प्राण है। युग की माँग एवं पुकार को पूरा करने के लिए प्रबुद्ध, जागृत आत्माओं को सक्रिय रूप में कुछ कदम उठाने पड़ते हैं, कुछ त्याग तप का परिचय देना पड़ता है। यह सब जिन्हें अरुचिकर, उपेक्षणीय, निरर्थक, भारस्वरुप लगता है, उन्हें उत्कृष्टता के, आदर्शवादिता के पथ का पथिक कैसे माना जाय? और कैसे यह समझा जाय कि अखण्ड-ज्योति की प्रेरणा को सचाई से सुना समझा है। हमारे आत्मीयों को, हमारे मार्ग पर भी चलना चाहिए। कौन कितना हमारे साथ है, उस कसौटी पर परिजनों की आत्मीयता को परखें तो इसमें कुछ भी अनुचित न होगा।
भौतिकवादी दृष्टिकोण को गौण बनाते हुए हम अध्यात्मवादी दृष्टिकोण को प्रमुखता दें और उसी के अनुरूप अपनी गतिविधियों को ढालें, यही समग्र सच्ची आध्यात्मिकता का, ईश्वर एवं स्वर्ग मुक्ति प्राप्त कर सकने का एक सरल मार्ग है। उपासना एक अच्छा अवलम्बन है पर उसके साथ जीवन की दिशा परिवर्तन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसके बिना कोई भी साधना—चाहे वह कितनी भी क्यों न हो, कदापि लक्ष्य प्राप्त करा सकने में समर्थ नहीं हो सकती।
देशकाल पात्र के अनुरूप सामाजिक परिस्थितियों के अनुसार आध्यात्मिक साधनाओं के स्वरूप भी बनते बदलते रहते हैं। आज की परिस्थिति में आत्म-कल्याण का मार्ग ईश्वर उपासना के साथ-साथ जन-जागरण के नव-निर्माण के साधना क्रम को जोड़ देना भी आवश्यक हो गया। इसलिए हर अध्यात्म प्रेमी की यही युग-साधना हो सकती है कि वह अपने भौतिक जीवन में जिस तरह आजीविका उपार्जन को अनिवार्य कर्त्तव्य मानता है, उसी प्रकार साधना क्षेत्र में उपासना के साथ-साथ लोक मंगल की प्रक्रिया को भी अविच्छिन्न रूप में जोड़ ले।
सच्चे लोक मंगल के लिए विचार-क्रान्ति अनिवार्य है। पिछले दो हजार वर्ष के गन्दे और कलुषित भूतकाल के अन्धकारमय अतीत को पार करते हुए हम वर्तमान प्रकाश युग में प्रवेश करने चले हैं। जिस प्रकार कीचड़ भरे नाले को पार करने पर शरीर और वस्त्र सभी गन्दे हो जाते हैं और सब से प्रथम उसे धोने, साफ करने की आवश्यकता पड़ती है, उसी तरह हमें पिछले अन्धकार युग की मानसिक विकृतियों, धारणाओं, कुँठाओं एवं रूढ़ियों से ग्रस्त मस्तिष्कों की भी सफाई करनी पड़ेगी। इसी का नाम विचार क्रान्ति है। यही नव निर्माण की पृष्ठभूमि है। विचार परिष्कार से ही तो कार्यों में उत्कृष्टता का समावेश सम्भव हो सकेगा।
अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को अपने इस अविस्मरणीय कर्त्तव्य को सामने रखना चाहिये कि उसे एक पत्रिका का पाठक मात्र नहीं रहना है वरन् उसे एक युग निर्माता की भूमिका प्रस्तुत करनी है। “एक से दस” हमारी युग साधना का बीज मंत्र है। जिन विचारों को युग निर्माण योजना के प्रकाश से ग्रहण किया जा रहा है, उसे कम से कम दस दूसरों तक तो हमें पहुँचाना ही चाहिए। इसमें जो समय लगता हो उसे नवयुग अरुणोदय की पुण्य बेला में नियोजित ज्ञान-यज्ञ में दी जाने वाली आहुतियों की तरह श्रेयस्कर मानना चाहिये। इस संदर्भ में लगने वाले समय की आवश्यकता उपयोगिता एवं महत्ता हमें समझनी चाहिए। साथ ही आलस्य, प्रमाद या संकीर्णता के कारण जो उपेक्षा रहती है उसे साहसपूर्वक हटा देने के लिए तत्पर होना चाहिए।
हम में से जो भी, जहाँ भी है, वहाँ उसे ‘एक से दस’ का सूत्र याद रखना चाहिए और यह प्रयत्न करना चाहिए कि जो प्रकाश उस तक पहुँच रहा है वह उतने तक ही अवरुद्ध न रहकर दूसरे दसों तक और भी पहुँचे। हर परिवार में कई नर-नारी, बाल-वृद्ध होते हैं, उनमें से जो पढ़े हैं, जिसकी रुचि जागृत है—उन्हें साहित्य पढ़ने को देकर और जो पढ़े नहीं हैं या जिन्हें रुचि नहीं है उन्हें सुना कर जन-जागरण का कर्त्तव्य पालन करना चाहिए। अपने घर का कोई भी सदस्य ऐसा न रहे जिसे अखण्ड-ज्योति के, युग-निर्माण के विचारों का परिचय एवं प्रकाश निरन्तर नियमित रूप में न मिलता हो। जिन परिजनों ने यह व्यवस्था अभी तक नहीं बनाई है, उन्हें अब निश्चित रूप से यह बना लेनी चाहिए। किसी न किसी प्रकार घर के हर सदस्य को इन विचारों को पढ़ने, सुनने के लिए सहमत कर ही लेना चाहिए। यदि इतना हो सका तो समझा जायगा कि उनने लोक मंगल की दिशा में सचाई से एक ठोस कदम उठाया।
इसके अतिरिक्त बाहर के भावनाँवित उन व्यक्तियों को भी प्रभावित करना चाहिए जो अपने प्रभाव क्षेत्र में आते हैं। अपनी अखण्ड-ज्योति, अपनी युग निर्माण पत्रिका अपने जन-जागरण ट्रैक्ट उन्हें नियमित रूप से पढ़ने देने और वापिस लेने का क्रम चलाना चाहिए। एक आना नित्य और एक घंटा समय नित्य देते रहने का संकल्प, हमसे सच्चा सम्बन्ध रखने वाले प्रायः सभी परिजन ले चुके हैं। कोई विरले ही ऐसे होंगे जिनने इतना छोटा त्याग करने में भी कृतज्ञता न दिखाई हो। जिनने अभी वह संकल्प न लिया हो उन्हें अब अविलम्ब ले लेना चाहिये और इस समय तथा धन को अपने समीपवर्ती क्षेत्र में नवयुग का प्रकाश फैलाने के जन-जागरण के पुण्य प्रयोजन में लगाना आरम्भ कर देना चाहिये। एक आना नित्य बचाने से—हर परिजन का अपना अत्यन्त प्रभावशाली प्रेरणा से ओत-प्रोत युग-निर्माण पुस्तकालय, ज्ञान मन्दिर सुसंचालित रह सकता है। इतनी सी छोटी धन राशि में दोनों पत्रिकाएं, तथा हर महीने छपने वाले सर्वांग सुन्दर अत्यन्त सस्ते 5 ट्रैक्टों को पढ़ाने का क्रम जारी रखा जाय, तो थोड़े ही दिनों में उसका आशाजनक परिणाम दृष्टिगोचर होगा। प्रतीत होगा कि अपना संपर्क पाकर सम्पूर्ण परिवार तेजी से उत्कृष्टता की ओर विकसित होता चला जा रहा है। उसमें से पशुता नष्ट होती और मनुष्यता विकसित होती चल रही है। देव समाज की स्थापना—नव युग निर्माण की भूमिका इसी प्रकार तो बनेगी। अगले दिनों युग परिवर्तन के लिए जिन महान कार्यों का आयोजन किया जाना है वह इसी प्रकार की सुविकसित मनोभूमि के लोगों द्वारा होना सम्पन्न होगा।
एक से दस! एक से दस!! एक से दस!!! यह युग निर्माण का मंत्र हमें सौ बार दुहराना और हजार बार हृदयंगम करना चाहिए। यह मानकर चलना चाहिए कि इस महान उत्तरदायित्व को हम जागृत आत्माओं को पूरा करना ही चाहिये। यदि अब तक इस दिशा में उपेक्षा बरती जाती रही है तो आज ही वह शुभ दिन है जिससे उसे त्यागकर प्रबुद्ध परिवार के समर्थ सदस्य बनने के लिये उपयुक्त आवश्यक सक्रियता का परिचय देने के लिये कदम उठाया जाय। किन दस को हमने प्रभावित प्रकाशित किया? इसका उत्साहवर्धक उत्तर हमारे पास होना ही चाहिये। हाथी के बच्चे हाथी ही होते हैं। अखण्ड-ज्योति लाखों को प्रेरणा और प्रकाश देती है तो क्या उसके पुत्र दस-दस का प्रकाश देने का उत्तरदायित्व भी वहन न करेंगे। हाथी की सन्तानों को हाथी जैसी क्षमता ही प्रकट करनी चाहिये।
जहाँ जितने अखण्ड-ज्योति सदस्य हैं, उन्हें एक परिवार जैसा संगठन गठित करना चाहिये। इस युग की सबसे बड़ी सामर्थ्य संघ शक्ति है। संगठन के द्वारा ही भावनात्मक नव निर्माण के स्वप्न सार्थक होंगे। अतएव समस्त राष्ट्र और विश्व को संगठित करने के लिये सबसे पहले हमें अपने परिवार को सुसंगठित कर लेना चाहिये।
इसके लिये एक अत्यन्त ही सरल, सफल एवं अद्भुत परिणाम उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया “जन्म-दिन मनाने की प्रक्रिया है। यों अगले दिनों हमें समाज को सुसंस्कृत बनाने के लिए एक महान उपचार रूप में—षोड्ष संस्कारों का भी व्यापक रूप में प्रचलन करना है,पर अभी तत्काल तो सदस्यों के जन्म दिन मनाने की प्रथा का अविलम्ब प्रचलन आरम्भ कर देना चाहिये। यह प्रयोग जहाँ कहीं भी आरम्भ हुआ है वहाँ जादू जैसा परिणाम निकला है। मृत प्रायः शाखा संगठन नवजीवन लेकर हुँकारते हुये उठ खड़े हुए हैं।
स्थानीय सदस्यों का जन्म दिन नोट कर लिया जाय। जिस दिन जिनका जन्म दिन हो उस दिन उसके यहाँ उत्सव समारोह रहे। गायत्री यज्ञ किया जाय। हवन का खर्च कम करने के लिये ऐसा हो सकता है कि पति-पत्नी या कोई और एक साथ लेकर दो ही व्यक्ति हवन करें। सामूहिक जप, कीर्तन, संकल्प पाठ आदि के अतिरिक्त जीवन की महत्ता एवं सदुपयोग पर प्रवचन हो। ऐसा एक प्रवचन इसी महीने ट्रैक्ट रूप में छप भी रहा है। सभी आगन्तुक शुभ-कामना के रूप में पुष्प भेंट करें। अतिथि सत्कार सुपाड़ी, इलायची, सौंफ, पंचामृत शरबत जैसी सस्ती चीजों से हो। मिठाई आदि खर्चीली चीजों का प्रतिबन्ध रहे। सम्भव हो तो सत्य नारायण कथा भी रखी जाय। इस प्रकार यह दो घंटे का आयोजन दिन छिपे बाद हर जगह आसानी से हो सकता है और जिसका जन्म दिन था उसके स्वजन सम्बन्धी पड़ौसी आदि के नये व्यक्ति भी एकत्रित होने पर अपनी विचारधारा के प्रचार का नया अवसर मिल सकता है। संसार भर में जन्म दिन किसी व्यक्ति के जीवन का सबसे बड़े, सहज महत्व के व्यक्ति गत त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। हम भी इसे मनाएं, केवल खुशी व्यक्त करने के रूप में ही नहीं, उस व्यक्ति को नया प्रकाश देने के लिये, संगठन मजबूत बनाने के लिये और युग-निर्माण का कार्यक्षेत्र बढ़ाने के लिये। इस प्रकार यह छोटी-सी प्रक्रिया यदि कोई उत्साही व्यक्ति अपने क्षेत्र में चलाने लगे तो वे देखेंगे कि इस साधारण से प्रयोग ने उस क्षेत्र में कैसी मंगलमयी हलचल का सृजन कर दिया।
जहाँ भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ उसका पहुँचना सार्थक हुआ या नहीं यह इस कसौटी पर परखा जायगा जब यह प्रतीत हो कि वहाँ कुछ संगठनोत्पादक एवं प्रचारात्मक हलचल भी चल रही है या नहीं? जहाँ जो भी प्रबुद्ध परिजन हों उन्हें यह कसौटी अपने लिए व्यक्तिगत चुनौती के रूप में ग्रहण करनी चाहिए, और कुछ करने के लिये योजना बनानी चाहिये। हिम्मत दिखानी चाहिए। हर शाखा का एक केन्द्र कार्यालय होना ही चाहिए जहाँ सामूहिक पुस्तकालय हो। सदस्य समय-समय पर वहाँ विचार विनिमय के लिए इकट्ठे होते रहा करें और साथ ही जीवन की उत्कृष्टता विवेकशील एवं दूरदर्शिता को प्रेरणा देने वाले साहित्य का भी लाभ उठाते रहा करें।
नव निर्माण की यह प्रारम्भिक प्रक्रिया अखण्ड-ज्योति के हर सदस्य को आरम्भ कर ही देना चाहिए। अखण्ड-ज्योति अपने श्रम की सार्थकता तभी मानेगी जब उसके परिजन उसका प्रकाश इतना हृदयंगम भी करें कि लोकमंगल की दिशा में कुछ करना उनके लिये अनिवार्य हो जाय। इसके बिना उनसे रहा ही न जाय। आशा है परिजन! आप—इस कसौटी पर खोटे नहीं, खरे उतरेंगे।
अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों द्वारा विगत शरद्-पूर्णिमा से राष्ट्र की शक्ति बढ़ाने एवं शत्रुओं का दर्प-मर्दन करने के लिये जो सामूहिक शक्ति -पुरुश्चरण आरम्भ किया गया है, वह आशातीत सफलता के साथ चल रहा है। शक्ति-बीज के साथ गायत्री महामंत्र का हर महीने 24 करोड़ विधिवत् शक्ति-पुरुश्चरण धार्मिक जगत के इतिहास में एक अनुपम आयोजन है। पिछले हजारों वर्षों से इतना बड़ा पुरुश्चरण दूसरा नहीं हुआ।
इन दिनों इस पुरुश्चरण में लगभग 10 हजार व्यक्ति अत्यन्त श्रद्धा एवं निष्ठा के साथ भाग ले रहे हैं। जिन्होंने पुरुश्चरण के समस्त नियमोपनियमों का पालन किया, उनकी इतनी संख्या हो जायगी, इसकी आशा न थी, पर राष्ट्रीय महत्व के प्रश्न पर परिजनों की जागरुकता बहुत ही सराहनीय एवं उत्साहवर्धक निकली। जब राष्ट्र का प्रत्येक भावनाशील नागरिक तन, मन,धन से अपनी-अपनी स्थिति और शक्ति के अनुसार सुरक्षा प्रयत्नों को सफल बनाने में लगा हुआ है तो हम लोग भी चुप नहीं बैठ सकते थे।
सैनिकों की भर्ती, रक्त की माँग, धन की आवश्यकता इन तीनों ही क्षेत्रों में परिवार के सदस्यों ने निर्धारित लक्ष्य से कहीं अधिक कार्य किया है। अभी संकट का समय है, अभी अधिकाधिक परीक्षा की घड़ी आ सकती है और अधिक बलिदान की आवश्यकता पड़ सकती है, इसलिए अभी तो नहीं, पर शान्ति का समय आने पर हम अखंड-ज्योति के एक विशेषाँक के रूप में यह प्रकट करेंगे कि अपने परिवार ने उत्कृष्ट श्रेणी के देशभक्तों की तरह कितना बढ़-चढ़कर त्याग-बलिदान इस राष्ट्रीय संकट के समय में किया है? इसी संदर्भ में एक बहुत बड़ी देन शक्ति-पुरुश्चरण की भी है। अस्त्र-शस्त्र, टैंक, वायुयान आदि विजय के आवश्यक उपकरण जो कार्य कर सकते हैं, उससे कम प्रभावशाली अध्यात्मिक उपचार भी नहीं होते। अपने पथ-प्रदर्शक महाप्रकाश एवं शास्त्र-विवरण के अनुसार हमें सुनिश्चित विश्वास है कि आयोजित पुरश्चरण का प्रभाव ब्रह्मास्त्र जैसा अद्भुत ही होगा।
अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति की वर्तमान दुरभिसन्धियों का जिन्हें ज्ञान है, वे स्थिति की गम्भीरता को समझते हैं। अभिमन्यु की तरह भारत को एक विषम चक्र-व्यूह में फँसाने के लिए दोनों शक्ति गुटों के राजनेता भयानक कुचक्र रचते रहे हैं। इन विभीषिकाओं को पार करते हुए भारत धीरे-धीरे आशाजनक सफलता की ओर ही चल रहा है दुरभिसन्धियाँ टूट रही हैं, संकट के घटाटोप छितराने लगे हैं, एक बार आक्रमणकारियों के दाँत और पंजे टूट चुके हैं। दूसरी बार फिर वे हमला करेंगे तो उनको समुचित शिक्षा देने के लिए फिर करारा प्रत्युत्तर मिलेगा। इस प्रत्युत्तर की तैयारी में जहाँ सैन्य-सज्जा के साधनों की सुव्यवस्था आवश्यक है, वहाँ आध्यात्मिक उपचारों का मूल्य एवं महत्व भी कम नहीं है। अपने परिवार द्वारा आयोजित वर्तमान शक्ति-पुरुश्चरण इस प्रकार के उपचारों में सर्वथा अग्रणी है।
जो व्यक्ति या परिवार शक्ति-बीज समेत आठ माला प्रतिदिन करके मास में 24 हजार पुरुश्चरण कर रहे हैं उनका तप-त्याग अभिनन्दनीय है। पर जो उतना नहीं कर सकते, उन्हें भी इससे सर्वथा विलग नहीं रहना चाहिए। उन्हें कम से कम एक माला सबीज गायत्री का जप राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए करते ही रहना चाहिए। अपने परिवार का एक भी सदस्य ऐसा नहीं रहना चाहिए जिसके बारे में यह कहा जाय कि उसने इस सरल से आध्यात्मिक उपचार आयोजन में भी भाग लेकर अपने सामयिक राष्ट्रीय कर्त्तव्य का पालन नहीं किया था।
गत छः मास पूर्व जो घटनाएं गर्जन-तर्जन के साथ आई थीं, वे छितराने तो लगी हैं, पर सर्वथा तिरोहित नहीं हुई हैं। खतरा अभी भी पूर्ववत् ही विद्यमान है। इसलिए हमें अपने प्रयासों में तनिक भी ढील नहीं आने देनी चाहिए। एक वर्ष के लिए अपना जो महापुरुश्चरण चल रहा है, उसे परिपूर्ण श्रद्धा और तत्परता के साथ चलने देना चाहिए। जिन्होंने अभी तक उसमें भाग न लिया हो वे अबिलम्ब कम से कम एक माला मन्त्र नित्य जपने का नियम लेकर उसमें भागीदार अवश्य बन जायें।
इस महान आध्यात्मिक उपचार से राष्ट्र की शक्ति निश्चित रूप से बढ़ेगी, शत्रुओं का दर्प निश्चित रूप से चूर्ण होगा और भविष्य की उज्ज्वल आशाओं की संभावनाएं निश्चित रूप से बढ़ेंगी। ऐसे समर्थ प्रयास में भागीदार होना अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य का राष्ट्रीय एवं धार्मिक कर्तव्य है। हमें आशा है कि परिवार का एक भी सदस्य इस महान् अभियान में सम्मिलित रहने से वंचित न रहेगा।
राष्ट्रीय दृष्टि से जो साधना शक्ति अभिवर्धन करेगी वह शक्ति के लिए, साधना करने वाले के लिए व्यक्तिगत रूप से भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होगी। व्यक्तिगत अशांति एवं शत्रु समाधान में भी इस पुरुश्चरण के भागीदारों को विशेष लाभ मिलेगा। परमार्थ के साथ इस साधना में स्वार्थ सिद्धि का भी अवसर मिलेगा।
इन दिनों शान्ति सुलह की बातें चल रही हैं। परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए वे सफल हों। पर आक्रान्ताओं के मनसूबे और उनकी चालों को देखते हुए यह सोचना ठीक नहीं कि वे रातोंरात दूध के धुले बन जायेंगे और अपना काला हृदय सफेद कर लेंगे। अभी चिन्ता और कठिनाइयों का समय समाप्त हुआ नहीं मान लेना चाहिये। फिर शत्रुओं का आक्रमण ही तो एक मात्र कठिनाई नहीं है। आन्तरिक दुर्बलताएं, कठिनाइयाँ और अस्त-व्यस्तताऐं भी तो कम उलझन भरी नहीं हैं। उन्हें भी किसी घातक शत्रु से कम नहीं मानना चाहिए। इन परिस्थितियों को देखते हुए वर्तमान शक्ति-पुरुश्चरण का महत्व और भी अधिक है। राष्ट्र को हर दृष्टि से इतना समर्थ बनाना होगा, जिसकी शक्ति का मूल्यांकन करते हुए कोई अनिष्ट न भीतर से उठे, न बाहर से और यदि उठे भी तो उसका समर्थ हल तुरन्त निकल आवे।
इसलिए किन्हीं शान्ति-वार्ताओं को देखते हुए भी अपने इस महान् आध्यात्मिक उपचार में किसी भी तरह की शिथिलता न आने देनी चाहिये, वरन् और भी अधिक उत्साह के साथ उसे जारी रखना चाहिए।
हमारा सारा ध्यान और प्रयत्न इस शीत ऋतु में राष्ट्रीय संकट के समाधान में लग रहा है। सुरक्षा प्रयत्नों को भौतिक दृष्टि से सफल बनाने के लिए आशाजनक और उत्साहवर्धक कार्य हुआ है। आध्यात्मिक दृष्टि से शक्ति-पुरुश्चरण की सफलता के लिए तो और भी अधिक तत्परता से प्रयत्न करना पड़ा है। 10 हजार साधकों द्वारा प्रति मास 24 करोड़ शक्ति बीज समेत गायत्री पुरुश्चरण कराने की योजना असाधारण थी। उसे बहुत अधिक प्रयत्न करके सुव्यवस्थित और सुसंचालित किया जा सका है।
आपत्तिकालीन इस स्थिति और व्यवस्था को देखते हुए सामान्य कार्यक्रमों को स्थगित करना पड़ा। गायत्री-तपोभूमि में मास मास में जो शिविर होना था, वह स्थगित हुआ। हमारा देश-व्यापी दौरा इसी शीत ऋतु में होना था, उसकी तारीखें भी नियत हो चुकी थीं और लोग अपने-अपने यहाँ तैयारी भी करने लगे थे, पर विशेष परिस्थितियों ने उसे भी स्थगित करने के लिए विवश कर दिया।
अब आपत्तिकालीन योजना व्यवस्थित हो जाने से जैसे ही थोड़ा अवकाश मिला है, पुनः सम्पन्न कार्यक्रमों की बात सोचने और करने के लिए स्थिति आ गई है।
अब जेष्ठ का शिविर करने की तैयारी आरम्भ कर दी गई है। किसान, अध्यापक एवं अन्य वर्गों की सुविधा का ध्यान रखते हुए इस वर्ष 20 दिन का शिविर किया जायगा। वह जेष्ठ सुदी पंचमी बुधवार—तदनुसार 25 मई से आरम्भ होकर आषाढ़ कृष्णा दशमी सोमवार तदनुसार 13 जून तक चलेगा। गायत्री-जयन्ती का पुनीत पर्व ता. 29 मई को इसी बीच में आ जायगा। जो गायत्री-प्रेमी गायत्री-जयन्ती पर तपोभूमि में रहना चाहते हैं, उनके लिए भी वैसा सुयोग शिविर के साथ-साथ रहेगा ही।
इन बीस दिनों का विभाजन इस प्रकार है—15 दिन प्रशिक्षण, 4 दिन मथुरा, वृन्दावन,गोकुल, गोवर्धन तथा उनके समीपवर्ती तीर्थ स्थानों की यात्रा, 1 दिन अन्तिम दीक्षान्त-संस्कार समारोह=20 दिन।
15 दिन के प्रशिक्षण में जीवन जीने की कला, उत्कृष्ट जीवन जीने की व्यवहारिक विधि व्यवस्था, संजीवन विद्या का स्वरूप समझाया जायगा और व्यक्तिगत परिस्थितियों के बारे में परामर्श करते हुए उन्हें सुलझाने के हल बताते हुए इस प्रकार का मार्ग दर्शन किया जायगा कि इसी जीवन में स्वर्गीय सुख-शान्ति से भरापूरा जीवन जी सकना सम्भव हो सके। प्रगति का रुका हुआ मार्ग प्रशस्त हो सके। अध्यात्म भी एक महत्वपूर्ण विज्ञान है। विज्ञान की अन्य शाखाओं का उपयोग करने से जब तत्काल सुख-सुविधाएं उत्पन्न करने वाले लाभ मिलते हैं तो कोई कारण नहीं कि अध्यात्म तत्वज्ञान का जीवन क्रम में समावेश करने के उपरान्त तत्काल उल्लास, आनन्द एवं प्रगति समृद्धि का लाभ न मिले। अध्यात्म का लाभ प्राप्त करने के लिए किसी को भी मरकर परलोक जाने तक की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती, वह तो नकद धर्म है। ‘इस हाथ दे, उस हाथ ले’ का यहाँ खरा सौदा है। प्राचीन काल में भारत-वासियों ने अध्यात्म का अवलम्बन करके अपना लौकिक एवं पारलौकिक उभय-पक्षीय जीवन सुख-शान्ति एवं समृद्धि से परिपूर्ण किया था। आज हम दिग्भ्रान्त होकर अध्यात्म के नाम पर कूड़ा-कबाड़ जैसी जंजाल भरी मान्यताएं पकड़े बैठे हैं, फलस्वरूप बहुत समय और श्रम लगाने पर भी कुछ हाथ नहीं पड़ता। लौकिक जीवन में भी जब शान्ति प्रगति का चिह्न दृष्टिगोचर न हुआ तो परलोक में स्वर्ग मुक्ति की आशा उस आधार पर की भी कैसे जा सकती है?
अध्यात्म का ऋषि प्रणीत, शास्त्र प्रणीत, सनातन पथ-प्रदर्शन करना इन शिक्षण शिविरों का उद्देश्य है। प्राचीन काल में बचपन से लेकर प्रौढ़ावस्था में प्रवेश करने तक लोग इसी शिक्षा को प्राप्त करने के लिये गुरुकुलों में रहते थे और वहाँ से जो पूँजी कमा कर लाते थे, उसके बल पर वे देवताओं जैसा स्वर्गीय, सुविकसित, सम्पन्न और समृद्ध जीवन जी सकने में सफल होते थे। अब इस अश्रद्धा के युग में न तो वह शिक्षा-प्रणाली रही और न शिक्षार्थियों की अभिरुचि। अतएव लम्बी अवधि तक ऐसी शिक्षा के लिए किसी से कहना तो कठिन है, जिसमें तत्काल आजीविका प्राप्त कर सकने जैसा लाभ न हो, पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि सुविधा के समय अवकाश के थोड़े-से क्षण हमारे पास बिताये जाय और उस जीवन-पथ को सुख-शान्ति की दिशा में प्रशस्त करने वाली शिक्षा की एक झलक, झाँकी का अवलोकन किया जाय।
जेष्ठ का यह बीस दिवसीय शिक्षण शिविर इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए है। इसमें हम उन सभी परिजनों को आमन्त्रित करते हैं, जो संजीवन विद्या की शिक्षा का महत्व समझ सके और उसका लाभ लेने के लिए उतना समय निकाल सके। साल में तीन सौ पैंतालीस दिन अपने आजीविका उपार्जन और शरीर यात्रा के कामों में खर्च किये जाते हैं, तो क्या यह उचित न होगा कि बीस दिन इस प्रयोजन में भी लगाये जायं, जो लोक और परलोक में सुख-शान्ति बढ़ाने की आवश्यकता पूर्ण कर सकता है। फिर हमारा व्यक्तिगत रिश्ता भी तो है। दूर परदेश में रहने वाले व्यक्ति छुट्टियों में अपने कुटुम्ब-परिवार वालों से, सम्बन्धी रिश्तेदारों से मिलने जाते हैं। आखिर अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य हमारे भी तो कुटुम्बी, सम्बन्धी हैं, क्या ऐसी दशा में यह उचित न होगा कि वे बीस दिन हमारे पास रहें, हमारे साथ हंसे, खेलें, अपने मन की बात हमसे कहें और हमारे मन की बात सुनें?
इन शिविरों में महिलाओं को भी पुरुषों की तरह ही सानुरोध आमन्त्रित करते हैं। जो लड़के 10-12 वर्ष के हो चुके हैं, वे भी यहाँ के वातावरण से बहुत प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं। गोदी के दूध पीते बच्चे जरूर यहाँ अव्यवस्था फैलाते हैं। इसलिये जिनकी गोदी में बहुत छोटे बच्चे नहीं हैं, वे भी प्रसन्नतापूर्वक आवें और बीस दिन इस प्रेरणाप्रद वातावरण में रहकर एक नई स्फूर्ति, नई प्रेरणा लेकर लौटें। लड़कियाँ सदा ससुराल में ही नहीं रहतीं, कुछ दिन वे अपने पिता के यहाँ भी रहती हैं। सावन में तो अक्सर स्त्रियाँ अपने पिता के घर चली जाती हैं। जो हमें अपना पिता समझती हैं, उन्हें बच्चों को शिक्षा का अवकाश रहने की दृष्टि से सुविधा के समय जेष्ठ में हमारे पास रहना चाहिए। यद्यपि इन दिनों गर्मी पड़ती और लू चलती है फिर भी यहाँ जो ज्ञान-गंगा और स्नेह-सौजन्य की धारा बहती है, उसमें स्नान करते रहने से यहाँ सावन जैसा शीतलता भरा अनुभव भी होगा।
ठहरने के लिए तपोभूमि में अब धीरे-धीरे काफी स्थान बन चला है। अपना आटा-दाल साथ लाकर अपने हाथ से बनाने-खाने की व्यवस्था में उतना ही खर्च पड़ता है, जितना अपने घर। जो लोग बनाना नहीं जानते, उनका बना सकने वालों के साथ जोड़ कर उस आवश्यक कला की शिक्षा व्यवस्था का भी प्रबन्ध कर दिया जाता है। इस तरह शिविर में आने का वही अतिरिक्त खर्च है, जो आने-जाने के किराये-भाड़े में पड़ता है। उपलब्ध होने वाले लाभ को देखते हुए यह इतना बड़ा भार नहीं है, जिसे घोर अभाव ग्रस्तों को छोड़ कर, मध्यम वृत्ति का व्यक्ति वहन न कर सके। इच्छा होने पर इस प्रकार की सुविधा हर किसी को हो जाती है। इतनी व्यवस्था हर कोई कर सकता है। समय के बारे में भी यही बात है। हारी-बीमारी विवाह-शादी आदि अनेक कार्यों में वर्ष में कितने ही दिन यों ही गँवाने पड़ते हैं। जिन्हें इच्छा होगी, उन्हें इतना अवकाश भी किसी प्रकार मिल ही जायगा।
इस शिविर में व्यक्तिगत जीवन के हर पहलू को सुविकसित करने की शिक्षा एवं प्रेरणा देने का कार्यक्रम है। स्वास्थ्य, मानसिक, संतुलन, पारिवारिक उल्लास, आर्थिक सुव्यवस्था, मित्र परिचितों का स्नेह-सौजन्य, सद्गुणों का अभिवर्धन, आन्तरिक उत्कर्ष, ईश्वर का सान्निध्य आदि जीवन को समुन्नत बनाने वाले मर्म एवं रहस्यों से शिक्षार्थियों को परिचित एवं अभ्यस्त बनाने का प्रयत्न किया जायगा। विश्वास यही करना चाहिए कि किराया-भाड़ा और थोड़ा समय खर्च करने की जो क्षति होगी, उससे अनेक गुना लाभ आगन्तुकों को मिल कर रहेगा।
जिन्हें लोक-सेवा, जन-जागरण, युग-निर्माण के रचनात्मक कार्यों से अभिरुचि है, उनके लिए एक क्लास अतिरिक्त रूप से नित्य लगा करेगा, उसमें गीता-सप्ताह कथा, रामायण-प्रवचन, सत्यनारायण कथा, गायत्री यज्ञ, षोडश-संस्कार, पर्व-त्यौहारों का विधान आदि वे सभी रचनात्मक कार्यक्रम सिखाये जायेंगे, जिनके आधार पर धर्म-मंच के माध्यम से कोई भी भावनाशील व्यक्ति युग-निर्माता की महान् भूमिका अदा कर सके और देश-धर्म, समाज संस्कृति के पुनरुत्थान में महत्वपूर्ण योग दे सके। लोक-नेतृत्व की थोड़ी भी क्षमता जिनमें होगी, वे इस शिक्षा के सहारे अपना व्यक्तित्व उज्ज्वल नक्षत्र की तरह प्रकाशवान कर सकेंगे और युग की माँग पूरी करते हुए मानवता की महती सेवा कर सकने में समर्थ होंगे।
इन पंक्तियों के द्वारा जेष्ठ के उपरोक्त बीस दिवसीय शिविर में उन सभी नर-नारी एवं बालकों को आमंत्रित करते हैं, जिनकी मनोभूमि प्रस्तुत विषय समझ सकने में समर्थ है। जो समझ कुछ नहीं सकते केवल दर्शन करने आते हैं, वे कष्ट न उठावें। थोथे दर्शन से किसी का कोई लाभ नहीं हो सकता।
चूँकि यहाँ स्थान सीमित है और आने के इच्छुकों की संख्या बहुत अधिक होती है, इसलिये स्वीकृति पाकर ही आने का कड़ा प्रतिबंध शिविरों में रहता है। जिन्हें आना हो अभी से स्वीकृति प्राप्त कर ले। निर्धारित संख्या पूरी होते ही स्वीकृति देना बन्द कर दिया जायगा। तब बिना स्वीकृति के न आने का प्रतिबन्ध पालन करने के अतिरिक्त और कोई चारा न रहेगा।
सुसंस्कृत जीवन ही मनुष्य जन्म की सार्थकता है। कुसंस्कारी व्यक्ति तो धरती के लिये भार और अपने आप के लिये अभिशाप ही है। यह संसार तथाकथित स्वर्ग से भी अधिक मनोरम हो उठे, यदि यहाँ लोगों के विचार और कार्य सुसंस्कृत ढाँचे में ढल जायें। यह एक ही आवश्यकता ऐसी है, जिस पर व्यक्ति और समाज की सर्वांगीण सुख-शान्ति निर्भर है।
तत्वदर्शी ऋषियों ने धर्म एवं अध्यात्म का विशालकाय कलेवर एक ही उद्देश्य लेकर खड़ा किया है कि मानव प्राणी के ऊपर जन्म-जन्मान्तरों से चढ़े हुए कुसंस्कार दूर हों और उनके स्थान पर सुसंस्कृत आदर्शों, सिद्धान्तों, मान्यताओं, भावनाओं एवं प्रवृत्तियों का विकास हो सके। पूजा, उपासना, जप, तप, कथा, वार्ता, सत्संग, स्वाध्याय, विधि निषेध एवं कर्म-काण्डों का विस्तृत विधि-विधान केवल इसी प्रयोजन के लिए है कि इस अवलम्बन को अपनाकर व्यक्ति निरन्तर सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनता चला जाय। कषाय-कल्मषों का परिशोधन ही हो। स्वर्ग, मुक्ति एवं ईश्वर-साक्षात्कार का यह एक मात्र साधन हो सकता है। हमारा सारा धार्मिक कलेवर इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए है।
सर्वसाधारण के मानसिक, चारित्रिक एवं भावनात्मक विकास के लिए एक सर्वांग सुन्दर विधान ‘संस्कारों’ का है। हिन्दू-धर्म की यह अनुपम विधि-व्यवस्था उसे लाखों-करोड़ों वर्षों तक विश्व का मुकुट-मणि बनाये रखने में समर्थ रही है। हमारे पूर्वज इस तथ्य को भली-भाँति जानते थे कि जहाँ व्यक्ति के आन्तरिक विकास के लिए शिक्षण चिन्तन, साधन एवं वातावरण की श्रेष्ठता अपेक्षित है, वहाँ यह भी आवश्यक है कि एक भावनात्मक एवं प्रेरणात्मक धर्म-परम्परा का प्रचलन हो। विशेष वातावरण में विशेष उद्देश्य के लिए, विशेष विधि-विधानों का प्रभाव भी विशेष ही पड़ता है। वेद-मन्त्रों की अद्भुत शक्ति, यज्ञ आदि वैज्ञानिक शक्ति सम्पुटों का सान्निध्य एवं धर्मानुष्ठानों का समारोह सम्बन्धित लोगों पर ऐसा अदृश्य प्रभाव छोड़ता है कि व्यक्तियों के अन्तःकरण का विकास स्वल्प प्रयत्न से भी ऊर्ध्वगामी होता चला जाता है। यह संस्कारों की विधिव्यवस्था वैज्ञानिक, भावनात्मक एवं प्रशिक्षण की दृष्टि से इतनी प्रभावशाली है कि उसका सत्य परिणाम लाखों वर्षों तक प्राप्त करते रहने के अनुभव को ध्यान में रखा जाय तो किसी प्रकार के अविश्वास या सन्देह की गुंजाइश ही नहीं रह जाती।
व्यक्ति और परिवार को सुसंस्कृत बनाने के लिए पुँसवन, नामकरण, अन्न-प्राशन, विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, विवाह, वानप्रस्थ आदि का अत्यधिक महत्व है। इसी प्रकार समाज को सामूहिक रूप से सुसंस्कृत बनाने के लिये श्रावणी, पितृ-अमावस्या, विजया-दशमी, दिवाली, बसन्त पंचमी, शिवरात्रि, होली आदि पर्वों की विधि-व्यवस्था ऐसी प्रेरणाप्रद है कि यदि ठीक रीति से मनाया जाय तो नैतिक गुणों का समाज में आशाजनक बाहुल्य बना रहे। व्यक्ति और समाज का सुसंस्कारित होना इतनी महत्वपूर्ण उपलब्धि है कि अन्य समस्त अभावों के रहते हुए भी केवल इसी एक आधार पर, इस धरती पर स्वर्ग का अवतरण दृष्टिगोचर होता रह सकता है।
खेद है कि आज षोडश संस्कार पंडित-पुरोहितों की थोड़ी-बहुत आजीविका के साधन और जन-साधारण की प्रथा-परम्परा की पूर्ति के मात्र साधन बने हुए हैं, उनमें से प्राण-प्रेरणा और प्रशिक्षण का तत्व ही एक प्रकार से चला गया। इसी प्रकार पर्व-त्यौहार भी पकवान-मिष्ठान्न खाने और मकान-कपड़े आदि सजाने की लकीर मात्र पीटने से पूरे हो जाते हैं, कोई ऐसा सामूहिक कार्यक्रम नहीं रहता, जिससे समाज में नई चेतना, स्फूर्ति एवं निष्ठा का प्राणवान संचार हो। अपनी इन संस्कार एवं पर्वों की महान परम्पराओं को खोकर आज हम मणि हीन सर्प की तरह निस्तेज एवं अवसादग्रस्त हो रहे हैं।
नव-निर्माण की इस पुण्य-बेला में हमें जहाँ अन्य अनेक रचनात्मक कार्यक्रम अपनाने हैं, वहाँ संस्कार एवं पर्वों को मनाने की प्रेरणाप्रद पद्धति को भी पुनर्जीवित करना है। इस दिशा में उपेक्षा बरतने से काम न चलेगा। जन-जागरण के लिये यह दोनों ही अवलम्बन अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए ‘अखण्ड-ज्योति परिवार’ के सदस्यों को बार-बार बहुत जोर देकर यह कहा जा रहा है कि वे अपने घर-परिवार में, शाखा समाज में संस्कार एवं पर्वों को प्रेरणाप्रद ढंग से मनाने की प्रथा को पूरे उत्साह एवं मनोयोग के साथ आरम्भ करें।
संस्कार एवं पर्व मनाने की पद्धति अब अपेक्षाकृत और भी अधिक सरल बना दी गई है। इसके लिये सस्ते,छोटे-छोटे ट्रैक्ट प्रत्येक पर्व संस्कार को मनाने के लिये अलग से छाप दिये गये हैं। गायत्री-तपोभूमि में होने वाले शिविरों में यह विधि-विधान हर बार सिखाया जाता है। आगामी जेष्ठ में होने वाले शिविर में भी यह विधान सिखाया जायगा, पर सारे समाज में इन महान् परम्पराओं को पुनः प्रचलित करने के लिये इतना ही पर्याप्त न होगा, वरन् इससे भी अधिक बड़ा काम उठाना होगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अब ऐसा सोचा गया है कि जगह-जगह संस्कार एवं पर्वों को मनाने की विधि-व्यवस्था का प्रशिक्षण देने के लिये जगह-जगह शिविर किये जायें, जिनमें शाखाओं के उत्साही कार्यकर्त्ता एवं उस क्षेत्र के पंडित-पुरोहित का कार्य करने वाले इन विधानों को भली प्रकार सीख सकें। विधानों के साथ-साथ भाषण एवं व्याख्या करते हुए जन-जीवन में नव-चेतना उत्पन्न करने के प्रयोजन को भी पूरा कर सकें।
शिविर चार दिन के लिये रहें। दो दिन में संस्कार और दो दिन में पर्व मनाने का पूरा विधान सिखा दिया जाय। इसके लिये प्रशिक्षण कर्त्ता मथुरा से भेजे जावेंगे। शिविरों की अवस्था शाखाएं स्वयं करेंगी। जिन शाखाओं में ऐसा उत्साह हो उन्हें अपने यहाँ ऐसे शिविरों की व्यवस्था करनी चाहिए। अभी आमंत्रण माँगे जा रहे हैं, माँग इकट्ठी हो जाने पर वह क्रम बिठाया जायगा कि किन तारीखों में कहाँ शिविर रखा जाय। एक क्षेत्र में एक शृंखला से शिक्षण कर्त्ता चलेंगे, तभी सुविधा रहेगी। इसलिये जहाँ आवश्यकता समझी जाय, वहाँ से आमंत्रण अभी से आने चाहियें। जेष्ठ शिविर के बाद तुरन्त ही शिविरों की शृंखला आरंभ हो जायगी, इसलिये कार्यक्रम जल्दी ही बनाये जाने हैं और इसके लिये निमंत्रण भी जल्दी ही आने चाहियें।
1-ईश्वर और उसकी प्राप्ति—1)
2-वेदों का दिव्य सन्देश—1)
3-पन्थ अनेक लक्ष्य एक—1)
4-आप सर्वशक्तिमान है।—1)
5-आत्म-कल्याण का राज मार्ग—1)
6-जिन्दगी कैसे जियें—1)
7-सद्गुणों की सच्ची सम्पत्ति—1)
8-अपना उद्धार आप करें—1)
9-आशा को जीवन-ज्योति—1)
10-विचारों की अलौकिक शक्ति—1)
11-संकल्प शक्ति के अद्भुत चमत्कार—1)
12-प्रगति पथ पर—1)
13-मनुष्य का मूल्याँकन—1)
13-चिंता छोड़िये-प्रसन्न रहिए—1)
14-डडडडणों को छोड़िए—1)
डडडड का दर्शन एवं मार्ग
1-आप बदले तो दुनिया बदले—1)
2-डडडडकी अभिनव रचना—1)
3-समस्त समस्याओं का एक ही हल—1)
4-नए युग की नई प्रेरणा—1)
5-हमारी युग-निर्माण योजना—1)
6-नए युग का सूत्रपात—1)
7-विष से अमृत की ओर—1)
8-शिखा और यज्ञोपवीत का रहस्य—1)
9-मनुष्य में ईश्वर की झाँकी—1)
10-जीवन संग्राम में कैसे जीतें?—1)
11-आप लेखक कैसे बनें?—1)
12-प्रभावशाली वक्ता बनने की कला?—1)
आरोग्य रक्षा और प्राकृतिक चिकित्सा
1-आरोग्य रक्षा के रहस्य—
2-क्या खाएँ? कैसे खायें?1)
3-बलवर्धक व्यायाम—1)
4-शक्ति का स्रोत प्राणायाम—1)
5-कब्ज कैसे दूर हो?1)
6-प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान—1)
7-कल्प चिकित्सा—1)
8-तम्बाकू घातक विष है—1)
9-तुलसी के चमत्कारी गुण—1)
बाल-निर्माण साहित्य
1-शिशु जन्म से पूर्व—1)
2-शिशु और अभिभावक—1)
3-हमारे महान् अत्तराधिकारी—1)
4-बच्चे और उनका मनोविज्ञान—1)
5-बालकों का नव निर्माण—1)
6-बाल विकास की समस्याएं)
7-बच्चों को कैसे सुधारा जाय?1)
8-बच्चों की शिक्षा दीक्षा—1)
9-बालकों को इन दुर्गुणों से बचाइए—1)
10-बच्चे सद्गुणी कैसे बनें?—1)
11-बालकों को इस तरह सुधारिए—1)
पारिवारिक समस्याओं का हल
1-परिवार और उसका निर्माण—1)
2-सुख शान्तिमय गृहस्थ—1)
3-सुसंतुलित परिवार—1)
4-मितव्ययी बनिए-सुखी रहिए—1)
कथा इतिहास और जीवन चरित्र
1-धर्म पुराणों की सत् कथाएँ—1)
2-चरित्र निर्माण की कथाएँ—1)
3-भारत की महान् विभूतियाँ—1)
4-संसार के महापुरुष—1)
5-बड़ों की बड़ी बातें—1)
6-व्रत और त्यौहार—1)
कविता और गायन
1-युग सन्देश—1)
2-युगःगायन—1)
3-उद्बोधन—1)
5-दोहा अन्त्याक्षरी—1)
सब डाक खर्च हर हालत में पुस्तकें मंगाने वालों को ही देना पड़ता है। हाँ, 10 रुपये से अधिक की पुस्तकें मंगाने पर 15 प्रतिशत कमीशन मिलता है।
हैं अँधेरे खेत, जाने किस जनम से सुन रहा हूँ?
पर नहीं होती यहाँ पर-उजाले की वार्तायें।
सूर्य होकर पूछता हूँ ज्योति के अंकुर कहाँ हैं?
बुझ रहीं हैं रोशनी की आज क्यों अंतर कथायें?
कौन है जो सिन्धु में अंगार बोता जा रहा है?
कच्छ की गहराइयों में कौन बौना-पन खड़ा है?
अशुभ है अनुकूल केवल आज इस अन्धी सभा में,
शुभ किसी निर्जीव के हाथों खिलौने सा पड़ा है।
कोटि अमृत अंश है, पर मृत्यु से कतरा रहे हैं,
है नहीं अमरत्व का विश्वास इनकी आत्मा को।
है सुरक्षित मंदिरों में आदि मानवता मनुज की,
किन्तु; युग-अंधा नहीं स्वीकारता परमात्मा को।
झुलसाती हैं क्यारियाँ औ फूल सब काले हुए हैं,
गंध बासी अर्चना सी थाल में मुरझा गई है।
आस्था का शीश कुचले जा रही हैं सभ्यताएँ,
शुभ्र संस्कृति को सिया को सृष्टि ही बिछला रही है।
हो जिन्हें विश्वास अपनी जाति के पुनरुन्नयन का,
देश के उन कर्णधारों को कभी से खोजता हूँ।
इस अँधेरे के नयन में किरण का काजल लगा दें,
मैं उन्हीं शृंगार दारों को कभी से खोजता हूँ।
मौन के स्वर पर मुझे आया रहम अब तक बहुत,
पर पूछता हूँ अब कि वे निर्माण के गुरु-स्वर कहाँ हैं?
जो अँधेरे को मिटाकर ज्योति दें सारे जगत को,
सूर्य होकर पूँछता हूँ-ज्योति के अंकुर कहाँ हैं?
*समाप्त*
(ब्रजेश चंचल)