शास्त्र-चर्चा

यमार्याक्रियमाणं हि शंसन्त्याँगम वेदिनः। सधर्मो यं विगर्हन्ति तमधर्म प्रचक्षते ॥

(कामन्दकीय नीति सार)

शास्त्रज्ञ सदाचारी जिस कार्य की प्रशंसा करें वह धर्म है जिसकी निन्दा करें वह अधर्म है।

आरम्भो न्याययुक्तो यः सहि धर्म इतिस्मृतः। अनाचार स्त्व धर्मेतिह्येतच्छेष्टानुशासनम॥

(महाभारत)

न्याययुक्त कार्य धर्म और अन्याय युक्त कार्य अधर्म है यही श्रेष्ठ पुरुषों का मत है।

येनोपायेन मर्त्यानाँ लोक यात्रा प्रसिध्यति। तदेव कार्य ब्रह्मज्ञैरिदंधर्मः सनातनः॥

जिस उपाय से मनुष्य का जीवन निर्वाह भली प्रकार हो जाय वही करना, यह सनातन धर्म है।

धर्म कार्य यत्नशक्त्या नोचेत्प्राप्नोति मानवः। प्राप्तो भवति तत्पुरुचमत्र नास्तिष संशयः॥

(उद्योग पर्व)

श्री कृष्णचन्द्र विदुर जी से कहते हैं कि—

धर्म के कार्य को सामर्थ्य भर करते हुए यदि सफल न हो सके तो भी उसके पुण्य फल को प्राप्त हो जाता है।

ब्रह्म मुहूर्ते बुध्येतधर्मार्थोचानु चिन्तयेत्। काय क्लेशाँश्च तन्मूलान् वेदतत्वार्थ मेव च॥

(मनुस्मृति)

ब्रह्म मुहूर्त्त (1॥ घंटा रात रहे) में उठे, धर्म और अर्थ जिस प्रकार प्राप्त हो वह विचारे। धर्म और अर्थ के उपार्जन में शरीर के क्लेश का भी विचार करे। यदि धर्म अर्थ अल्प हुआ और शरीर को क्लेश अधिक हुआ तो ऐसे धर्म और अर्थ को न करे। उस समय ईश्वर का चिन्तन करे कारण कि वह समय बुद्धि के विकास का है।

गुणा दश स्नान परस्य साधेरु पंच पुष्टिश्च बलं च तेजः। आरोग्य मायुश्च मनोनुरुद्व दुःस्वप्न घातश्च तपश्चमेधा॥

(दक्षस्मृति)

रूप, पुष्टि, बल, तेज आरोग्यता, आयु, मन का निग्रह, दुःस्वप्न का नाश, तप और बुद्धि का विकास ये दश गुण स्नान करने वाले को प्राप्त होते हैं।

वां् मनोजल शौचानि सदायेषाँ द्विजन्मनाम् त्रिभिः शौचेरुपेतो यः स स्वर्ग्यो नात्र।

(वृद्ध पाराशर स्मृति)

वाणी का शौच, मन का शौच और जल का शौच इन तीन शौच से जो युक्त है वह स्वर्ग का भागी है ही नहीं।

कठोरता, मिथ्या, चुगलखोरी व्यर्थ की बात चार विषयों से बची वाणी शुद्ध है।

ईर्ष्या, द्वेष, छल, कपट से रहित मन शुद्ध है। स्नान करने से शरीर शुद्ध होता है।

सर्वेषा मेव शौचानामर्थ शौच परं स्मृतं। योऽर्थे शुचिर्हि सशुचिर्न मृद् वारि शुचिः शुचिः

(मनुस्मृति)

सारी पवित्रताओं में धर्म संबंधी पवित्रता (ईमानदारी बड़ी है। जो धन के द्वारा पवित्र है वह पवित्र है जल से पवित्रता वास्तविक पवित्रता नहीं। अर्थात् ईमानदारी का पैसा जिसके पास है वास्तव में वही पवित्र है।

शौचाना मर्थ शौचञ्च. (पद्म पु. 5/8/6/66)

पवित्रताओं में ऊँची कोटि की पवित्रता ईमानदारी पैसा है॥

नोच्छिष्ठं कस्यचिद् दद्यान्नद्याश्च्ौव तथत्तरा। नचैवात्यशनं कुर्यान्निचोच्छिष्टः क्वचिद् व्रजेत्॥

(मनुस्मृति)

अपना झूठा किसी को न दें और न किसी का झूठा खायें। दिन और रात्रि के बीच में तीसरी बार भोजन न करें, अधिक पेट भर के न खायें, झूठे मुख कहीं न जायें।

मित भोजन स्वास्थ्यम् ॥ चाणक्य सूत्र 317

मर्यादित भोजन स्वास्थ्यकर है।

अजीर्ण भोजनं विषम ॥ 3/10

अजीर्ण में भोजन करना विष है।

मात्राशी सर्वे कालंस्यान्मात्राह्यग्नेः प्रवर्तिक

सदा मर्यादित भोजन करना चाहिये। ऐसा ही जठराग्नि को बढ़ाता है।

मात्रा प्रमाणं निर्दिष्टं सुखं यावद् विजीयते॥2॥

जो भोजन सहज में पच जाय वही इसकी मात्रा है।


लक्ष्य सिद्धि के लिए धैर्य आवश्यक है।

स्वर्ग या अत्यधिक सुख की प्राप्ति की कामना से संसार के सब प्राणी नाना प्रकार की योजनायें बनाया करते हैं। इस दृष्टि से मनुष्यों को दो श्रेणियों में विभक्त किया जाता है- (1) नास्तिक और (2)आस्तिक। नास्तिक उन्हें कहते हैं— जो “विश्व का संचालन तथा पालन करने वाली भी कोई शक्ति है” इस बात को नहीं मानते। उनकी दृष्टि में संसार एक रसायनशाला है। जहाँ सब कुछ अपने आप बनता, अपने-आप बिगड़ जाता है। नास्तिक व्यक्ति अपनी भौतिकवादी मान्यता तक ही सीमित रहे, तब तक उससे कोई हानि नहीं, किन्तु जब किसी नियन्त्रण करने वाली शक्ति के अस्तित्व को भुला दिया जाता है, तो मनुष्य वैसी ही स्वच्छंदता बरतने लगता है, जैसे अंधेरी रात में चोर। इस स्थिति में मनुष्य की स्वार्थपूर्ण प्रवृत्तियाँ प्रमुख होती हैं। अतः यदि उनकी मान्यता सच भी हो जाय तो भी कष्ट, कलह और विनाश के ही दृश्य उपस्थित करती है, इसलिये नास्तिकता की निन्दा की जाती है, उसे मनुष्य के लिये अहितकर बताया जाता है।

दूसरे व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं। जन्म-मरण को मानते हैं। यह अपेक्षाकृत विवेकी वर्ग है। विज्ञान की कमी ऐसे व्यक्तियों में भले ही हो, पर उनका यह सामान्य ज्ञान भी सापेक्ष है, जिसके द्वारा वे संसार को इसी नियम-व्यवस्था को बनाये रखने में कुछ न कुछ योग करते रहते हैं। यदि वे किसी का भला नहीं कर सकते तो किसी का बुरा भी नहीं करते।

धर्म ऐसे ही व्यक्तियों से किसी तरह की कुछ आशा रखता है। नास्तिकों की वह उपेक्षा करता है और नास्तिक व्यक्तियों का मार्ग-दर्शन करता है। फिर भी धर्म और ईश्वर-विश्वास का जो प्रतिफल मनुष्य को मिलना चाहिये वह नहीं मिलता, उल्टे नास्तिक अपनी चतुराई और धूर्तता के कारण भौतिक सुख अधिक मात्रा में उपलब्ध कर लेते हैं। यह देखकर ऐसा समझ में आता है—धर्म में कहीं कोई भूल है। कोई अंग ऐसा है-जिसे लोग नहीं पा रहे। अन्यथा इसी धर्म-निष्ठा के कारण भारतवर्ष पहले इतना अधिक सुखी और समृद्ध था, पर अब साधन और विकास की अधिक परिस्थितियाँ होते हुए भी धार्मिक व्यक्तियों को असफल ही देखा जाता है। उनके जीवन में परमात्मा का प्रकाश हिलोरें मारता दिखाई नहीं देता। उनके जीवन में वह शक्ति , शौर्य, शान्ति, सुख और सन्तोष दिखाई नहीं देता, जो मिलना ही चाहिए था।

लोगों की मान्यताओं का विकृत होना एक कारण है। किसी भी बात पर मानवीय दृष्टि से विचार किया जाता है। परमात्मा की कल्पना—दो हाथ, दो पाँव, नाक, मुँह, आँख, कान, पेट वाले मनुष्य के रूप में की जाती है। स्वर्ग एक विशेष स्थान माना जाता है, ठीक ऐसा ही जैसी पृथ्वी और वहाँ भी स्थूल भोग होने का मत पुष्ट किया जाता है। स्वर्ग और भगवान् के ऐसे अलंकारिक चित्रों में संभव है—कुछ शिक्षाएं हों, कुछ गूढ़ रहस्य या मनोवैज्ञानिक तथ्य सन्निहित हों, पर वे वास्तविक नहीं है। परमात्मा शरीरधारी मनुष्य नहीं और न उसे इस रूप में देखा ही जा सकता है। यदि कोई ऐसा कहता है तो यह भ्रम है। इसी प्रकार स्वर्ग किसी लोक या स्थान विशेष का नाम नहीं है। स्वर्ग का अर्थ है- सुख का स्थान और नरक का अर्थ है-दुःख का स्थान। जहाँ सुख है, वहीं स्वर्ग है। जहाँ दुःख है, वही नरक है। फिर यह स्थान पृथ्वी भी हो सकती है। सूर्य, चन्द्र, मंगल या कोई अन्य ग्रह भी हो सकते हैं।

सुख की प्राप्ति दरअसल एक साधना है, जो अनवरत श्रम, अटूट लगन, धैर्य और विश्वास से ही मिल सकती है। विद्यार्थी वर्षों तक विद्याध्ययन की साधना करते हैं, तब उन्हें विद्वान् कहलाने का गौरव प्राप्त होता है। पहलवान बहुत दिन तक व्यायाम करने, पौष्टिक आहार जुटाने आदि की साधना के उपरान्त कसदार शरीर प्राप्त करते हैं। सेनाओं के अभ्यास शान्ति काल में भी बराबर चलते रहते है, तब कहीं वे दुश्मनों से लड़ पाते हैं। वास्तव में सुख प्राप्ति के लिये जो शक्ति चाहिए, वह साधना से ही उपलब्ध हो सकती है। इसके अतिरिक्त ओर कोई मार्ग नहीं है।

धन कमाना हो तो धन की साधना की जाती है। कोई रोजगार तलाश कर पूँजी लगाते हैं, माल मँगाते हैं, दिन भर दुकान पर बैठते हैं, किफायत करते हैं, आवश्यकतायें घटाते हैं, तब कहीं धन इकट्ठा हो पाता है। वायुयान चालक अन्तरिक्ष में जाने से पूर्व पृथ्वी पर ऊपर उड़ने की साधना करते हैं। किसान सालभर खेतों में जुटे रहते है, तब कहीं अन्न की पैदाइश होती है। संसार में हर तरह की उपलब्धि के लिये साधना करने का एक निश्चित विधान है। इस विधान से देव, दनुज, मनुज आदि सभी बँधे हैं, इस नियम का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

स्वर्ग और सुख की प्राप्ति के लिये भी यह साधना परमावश्यक है। साधना का अर्थ है-कठिनाइयों से संघर्ष करते हुए प्रयास जारी रखना। उपासना, जप, यज्ञ आदि भी आध्यात्म की मुख्य प्रक्रियाओं में से हैं, किन्तु यह सर्वांगपूर्ण नहीं हैं, यह भी साधन का ही एक अंग है। साधना एक प्रकार की परीक्षा है। यह साधनाशील जीवन का कठोर किंतु कल्याणकारी प्रसंग है। परीक्षा पर परीक्षा ली जाती है, तब कहीं उत्तीर्ण होने का सौभाग्य मिलता है। साधना पथ से विचलित हो जाने वाले इन परीक्षाओं को पार नहीं कर पाते, बीच में ही फेल हो जाते हैं। जो कठिनाइयों, संघर्षों, आपदाओं, मुसीबतों, विपरीत परिस्थितियों से भी नहीं घबड़ाते, अन्ततः साधना की सफलता का सौभाग्य उन्हीं को मिलता है। इस सीढ़ी को वही पार करते हैं-जो “प्रभो! पग-पग मेरी परीक्षा ले” की भावना रखते हैं। ध्रुवता के साथ साधना-पथ पर आरुढ़ रहने वाले ही संसिद्धि प्राप्त करते हैं।

मनुष्य बड़ा उतावला प्राणी है। तत्काल लाभ प्राप्त करने की उसकी बड़ी इच्छा होती है। सफलता के परिपाक के लिये जितने घड़ी-घण्टे अभीष्ट होते हैं, वह उन्हें लाँघना चाहता है, पर ऐसी आशा दुराशा-मात्र है। हथेली में सरसों जमाने की बाल कल्पना कभी फलवती नहीं होती। नौ माह गर्भ में पकने वाला बालक एक-दो माह में पैदा हो जाना कठिन ही नहीं, असम्भव भी है। सफलता की अन्तिम मंजिल तक पहुँचने के लिये प्रतीक्षा करनी ही पड़ती है। इसके लिये धैर्य चाहिए, ध्रुव-धैर्य चाहिए। एक-एक सीढ़ी चढ़ने से सैकड़ों सीढ़ियाँ चढ़ी जा सकती हैं। एक ही छलाँग में कोई 100-200 फुट की ऊँचाई नहीं लाँघ सकता उतावलापन एक कमजोरी है, जल्दबाजी में धोखा होता है। उसमें कभी भी विश्वास नहीं किया जाना चाहिए।

कोई भी कार्य प्रारम्भ करने के पूर्व एक बात मन में बिठा लेनी चाहिए। “हम इसे अन्त तक, सफलता मिल जाने तक पालन करेंगे। मनुष्य जीवन में दृढ़ता और गता की अनिवार्यतः आवश्यकता होती है। अपने को किसी और पर आधारित रखकर स्वयं उसे सँभालना तथा बहुत देर तक प्रतीक्षा करने में अधिक सता है। साधना एक प्रकार का आनन्द है, जिसे थोड़ी भोगने से तृप्ति नहीं होती, वरन् चिरकाल तक उस रस को लूटा जाता है। भार की तरह ढोने के लिये साधना वह तो पुरुषार्थ का आनन्द देने वाली होती है।

अधिक बड़े संघर्ष न पैदा हों, इसके लिये यह आवश्यक है कि आपका साधन छोटा हो। साइकिल साइकिल से टकरोयेगी तो क्षति कम होगी। रेल, रेल टकराएंगी तो बड़ी हानि होगी। छोटे साधन सरल होते हैं बड़ों में असफलता के क्षण अधिक आते हैं। अपनी योजना छोटी हो तो उसमें भी बड़ा लाभ उठाया जा सकता है। धीमी गति में स्थिरता और स्थायित्व होता है।

साधना सिद्धि और लक्ष्य सिद्धि के यह शाश्वत नियम हैं। इन्हें कोई साधारण भले ही समझे पर इसकी वास्तविकता में राई-रत्ती गुँजाइश नहीं। लक्ष्य छोटा हो, चाहे बड़ा- स्वर्ग और मुक्ति की यश, धन अथवा कीर्ति की, मनुष्य को संतुलन मन्द-गति से, लगन के साथ धैर्यपूर्वक साधना है। कहा भी गया है-

धीरे-धीरे रे सना, मेरे सब कुछ होय।

माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय॥

ऐ मेरे मन! धीरे-धीरे चल, इससे तुझे सब कुछ मिल जायेगा। माली चाहे सौ घड़ों से ही वृक्ष को क्यों न सींचे, फल तो मौसम में ही लगते हैं।


मेरा अपना कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर।

एक व्यक्ति शीशे के सामने बैठा हुआ अपनी मुखाकृति पर प्रसन्न हो रहा था। कितना उजला रूप है मेरा, कितनी सुन्दर आँखें हैं, कितने अच्छे घुँघराले बाल, मनमोहक नासिका सुघड़ शरीर देख-देखकर वह फूला नहीं समा रहा था। हर सड़क से गुजरने वाले पर वह दृष्टि दौड़ाता, पर उसे अपनी तुलना में सभी कम सुन्दर दिखाई देते। अपने स्वास्थ्य पर, अपने रूप पर बहुत गर्व हुआ उसे। वह सर्वत्र इतराता घूमा। सब भोंड़ी और कुरूप शक्लें दिखाई दीं। उसकी सुन्दरता का एक भी व्यक्ति उसे न मिला।

अहंकार में डूबे मनुष्य की भेंट एक दिन एक संन्यासी से हुई। सन्त ने उसका घमण्ड तोड़ लिया। बोला-सचमुच तुम बड़े सुन्दर हो, पर क्या अपना स्वरूप मुझे दिखा सकते हो? वह व्यक्ति बड़ा चकराया। हाथ दिखाया, पैर दिखाये, मुख, आँख, नाक, कान, दाँत, पेट, गर्दन सब कुछ दिखाया, पर “मैं कौन हूँ” यह न बता सका।

उसने सोचा-संभव है, मैं शरीर के भीतर घुसा होऊँ। बड़ा विचार किया, पर वहाँ भी उसे रक्त , माँस, मज्जा, तन्तु-अस्थि, वीर्य के अतिरिक्त कुछ न मिला। मनुष्य का सारा अभिमान विगलित हो गया। उसने समझा कि वह शरीर उसका नहीं, वह तो एक संयोग मात्र था, प्रकृति के हाथ का खिलौना मात्र था, जिसे आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों, टूट जाना ही होगा। न उसका शरीर था, न उसका रूप, अस्थि-पिंजर मात्रा था वह, माँस का पिंड मात्र था यह। आज बना, कल बिगड़ गया। जब से उसकी समझ में यह बात आ गई तब से उसका देहाभिमान छूट गया। अब उसे सभी प्राणी एक जैसे दिखते हैं। सब में वह परमात्मा को समाया हुआ देखता है। अब उसका अहंकार हट गया है, क्योंकि वह जान गया है, मैं कुछ नहीं हूँ, यह सब ब्रह्म ही है, जो अनेक रूपों में प्रकट हो रहा है, मुझे उसी की उपासना करनी चाहिए।

एक और व्यक्ति है। वह कहता है- मेरा मकान बड़ा आलीशान है। कई लाख रुपये खर्च कर के मैंने उसे बनाया है। उसमें मेरा सामान, कपड़े, फर्नीचर, बर्तन आदि सब सामान रखा हुआ है। मैं इसका हिस्सा अपने भाई को न दूँगा, क्योंकि यह मेरा घर है। मैं प्रति वर्ष इसकी लिपाई-पुताई, सफाई कराता हूँ, रंगवाता हूँ, टूटे-फूटे स्थानों की मरम्मत करवाता हूँ, वर्षा से उसकी रक्षा करता हूँ। इस घर में किसी को ठहरने न दूँगा, यह मुझे बहुत प्यारा है। इसमें और किसी का अधिकार नहीं।

एक दिन रात में वह अपने छत की मुंडेर पर खड़ा बाहर दुनिया की ओर देख रहा था। पास ही एक खण्डहर था। उससे बहुत हल्की आवाज आ रही थी। स्वर बहुत मीठा लगा, वह व्यक्ति ध्यान पूर्वक उस खण्डहर की बात सुनने लगा।

खण्डहर कह रहा था- मुझे देख, मैं भी किसी दिन तेरे महल की तरह ही ऊँचा था, मेरी साज-सज्जा से लोगों की आँखें चकाचौंध हो जाती थीं, मेरे आँगन में बड़ी चहल-पहल रहती थी। बड़े हास्य-विनोद देखे हैं मैंने। पर जब से मेरा मालिक मर गया, तब से किसी ने मेरी ओर ध्यान न दिया। बेखबरी ने मुझे इस हालत में पहुँचा दिया है।

मृत्यु का नाम सुनते ही मनुष्य की आत्मा काँप गई। वह सोचने लगा- अब तक इस घर को कितने लोग अपना कह चुके होंगे। जिस नींव पर यह खड़ा है, उस पर कितने मकान खड़े हो चुके होंगे? आगे न जाने कौन इसमें रहे या यह भी खंडहर हो जाय? उस दिन से उसने घर का अहंकार छोड़ दिया। अपने घर वालों को भी हिस्सा दे दिया। अब उसने समझ लिया है कि यह मकान कुछ दिन के विश्राम के लिये मिला है, आगे की यात्रा में जाने कौन मकान मिले, कहाँ रहना पड़े?

एक मनुष्य का परिवार बड़ा लम्बा-चौड़ा था। कई बेटे, कई नाती-पोते। सब में प्रेम भाव था। सब मिलकर रहते थे। उस आदमी को अपने परिवार का बड़ा घमण्ड था। इसकी वह अक्सर चर्चा भी करता रहता था। घर वालों की ताकत से उसने जिससे जो चाहा, कराया। किसी की सम्पत्ति छीन ली, किसी को पीटा, किसी से बेगार ली। सब उससे डरते थे। उससे मुकाबला करने की किसी में शक्ति भी तो न थी। आखिर कौन सामना करता? उस व्यक्ति की ताकत के आगे किसी की एक न चलती थी।

एक रात खबर फैली- “चूहे मर रहे हैं, ताऊन आ गया है।” सब लोग गाँव छोड़कर जंगल में झोंपड़े बना कर रहने लगे, पर वह व्यक्ति जो कभी किसी से दब कर नहीं रहा, उस ताऊन से कैसे डर जाता। ऐंठ-ऐंठ में वहीं पड़ा रहा, हटा नहीं। ताऊन की प्रतीक्षा में, उससे लड़ने की तैयारी में कई दिन, कई रातें गुजर गई। एक दिन अचानक उसके घर में ताऊन घुसा। एक-एक कर मरने लगे। चार दिन में मकान अपने आप खाली हो गया। सब मर गये। न भाई रहे, न बेटे। काल की आँधी ने सारी लाशों को उड़ा दिया। जिस मनुष्य को अपने परिवार पर बड़ा घमण्ड था, उसके घर में कोई दीपक जलाने वाला भी शेष न रहा।

वह मनुष्य अंधेरे में बैठा रो रहा था। आज उसका सारा दर्प आँखों के सामने था। अपनी भूल पर पछताता था और आँसू बहाता था। बहुत दिन बाद वह समझ पाया कि मनुष्य के वश में कुछ नहीं, वह तो सब ईश्वर का खेल था।

एक किसान के पास बड़ी अच्छी जमीन थी। सिंचाई के सब साधन थे। स्वस्थ बैल, स्वस्थ बेटे। बड़ी अच्छी खेती होती थी। गाँव का कोई भी किसान उससे अच्छी फसल नहीं कमाता था। उन खेतों में उसने बड़ा परिश्रम किया था। बड़ी सुरक्षा की थी, तब वे इतने उपजाऊ हुये थे।

एक बार उसकी फसल हर वर्ष से अच्छी हुई। बड़े-बड़े पौध, बड़ी-बड़ी बालें। अन्न के बोझ से डालियाँ झुकी जा रही थीं। किसान फसल देख-देखकर अभिमान से चूर हुआ जा रहा था। तरह-तरह के मनसूबे बाँध रहा था वह। करता भी क्यों नहीं, था भी तो वह बड़ा किसान।

एक दिन असमय पुरवैया चली, बादल मँडराने लगे। देखते-देखते आसमान काला पड़ गया। बिजली तड़पने लगी और पानी गिरने लगा। बड़े-बड़े ओले गिरे। सारी फसल देखते-देखते बरबाद हो गई। कुछ टूट गई, कुछ बह गई। जो बची वह भी सड़ गई। किसान का भाग्य फूट गया। अब बादल छट गये थे। किसान अपने खेत के पास खड़ा दुर्भाग्य से कोस रहा था। ऊपर दूर तक आकाश फैला हुआ था, मानो वह किसान को संकेत कर रहा था, अरे- किसान यह धरती, यह खेत सब हमारे हैं। तू तो इसका किरायेदार मात्र है। यह खेत तुझे आजीविका के लिए मिले थे। इसमें तेरा अधिकार क्या? अब तक किसी और के पास थे, आगे किसी दूसरे के पास होंगे। यह क्रम इसी तरह चलता रहेगा, पर यह खेत, ओ किसान! तेरे नहीं, मेरे ही रहेंगे।

एक मनुष्य ने विद्याध्ययन में निपुणता प्राप्त की थी। कई भाषाओं तथा विद्याओं का वह ज्ञाता था। जब तक लिखा-पढ़ी का काम आता तो मुहल्ले वाले उसके पास सहायता के लिए पहुँचते। आदमियों की आवक बढ़ जाने से उसने समझ लिया कि संसार में मुझसे ज्यादा और कोई विद्वान नहीं। मैं सारे संसार का ज्ञान रखता हूँ। जो कुछ भी पूछा जाय, हर बात बता सकता हूँ।

घर में एक बालिका बड़ी वाचाल थी। एक दिन वह एक कीड़ा हाथ में उठाकर पिता के पास गई और उसका नाम पूछने लगी। पंडित ने सारी पुस्तकें खोज डालीं, जन्तु शास्त्र के कई बार पन्ने पलटे, न तो उस आकृति का कोई कीड़ा समझ में आया, न कोई नाम। बालिका बोली- आप तो सब जानते हैं, फिर इस कीड़े का नाम क्यों नहीं बताते? वह व्यक्ति बोला-बेटी? यही तो मेरी भूल थी, जो मैंने अपने को सर्वोपरि ज्ञानी समझा। सत्य तो यह है कि संसार में फैले विस्तृत ज्ञान के एक अंश को भी मैं नहीं जानता।

संसार के सभी व्यक्ति एक प्रकार के अहंकार से ग्रस्त हैं। किसी को अपने रूप और सौंदर्य का अभिमान है, किसी को अपनी सम्पत्ति का। जो इन वस्तुओं का साधनों का, सुन्दरता का अभिमान करते हैं, वे मूढ़ हैं और झंझटों में फँसे रहते हैं। पर ज्ञानी सारे संसार को दिव्य परमात्मा से ओत-प्रोत देखता है, किसी वस्तु से मोह नहीं करता। ईश्वर की इच्छा मान कर वह अपने कर्त्तव्यों का पालन करता है।


अनासक्त जीवन में सुख-शान्ति

मनुष्य का जीवन एक वाटिका है। वाटिका को अच्छी स्थिति में रखने के लिये उस पर चारों ओर की दृष्टि रखनी पड़ती है। किस पौधे को पानी देना है, कहाँ निकाई की जाय, कौन-सी मेंड़ टूट रही है, कौन-सा फूल फूलने लगा, किस वृक्ष में फल लग रहे हैं, किसे खाद दी जाय आदि-आदि— इन सब बातों का ध्यान रखने वाला ही कुशल माली कहा जाता है। उसी का बाग भी सुन्दर, सुरभित और हरा-भरा रहता है। पौधे खूब फूलते-फूलते हैं, आस-पास का वातावरण भी सुवास से भरा रहता है। माली को भी प्रसन्नता होती है और मालिक को भी। पास से आने-जाने वालों को भी उतनी ही प्रसन्नता होती है। पूर्ण विकसित, पुष्पित, पल्लवित और सुरक्षित वाटिका से सभी को प्रेरणा और प्रसन्नता मिलती है।

इतने प्रबन्ध न जुटा कर माली यदि किसी आकर्षक फूल की डाली के पास ही बैठा रहे या केवल फल ही ढूँढ़ता रहे तो सारी वाटिका अव्यवस्थित हो जायगी। पौधे मुरझा जायेंगे। फूल सूख जायेंगे। न हरियाली रहेगी, न सुवास। पतझड़ की तरह सारा वातावरण शुष्क, निष्प्राण और नीरस लगेगा। वहाँ कुछ भी आनन्द दिखाई नहीं देगा।

मनुष्य का जीवन भी ठीक इसी तरह का है। उसमें अनेकों तरह की व्यवस्थायें मनुष्य को करनी पड़ती हैं। परिवार के लिये अन्न और वस्त्र आदि की व्यवस्था, बच्चों की पढ़ाई, रोजी-रोजगार, बीमारियों के चक्कर, शादी-विवाह, मेल-मिलाप आदि तरह-तरह के कर्म उसे करने होते हैं। जहाँ पर जीवन के सम्पूर्ण विधान में ऐसी व्यवस्था होगी, वहाँ जरूर सुख-शान्ति और सन्तोष की परिस्थितियाँ होंगी। प्रत्येक कार्य को चतुराई के साथ पूरा करने से ही यह व्यवस्था ठीक रह सकती है। समय और परिस्थिति के अनुसार सभी पूरे करने पड़ते हैं। यदि किसी ओर ध्यान न दिया जाय तो उधर ही अव्यवस्था फैलेगी, गड़बड़ी उत्पन्न होगी। दिनभर काम तो खूब करें, पर आहार की व्यवस्था न रहे, तो काम न चलेगा। धन खूब कमाया जाय, पर बच्चे सुशिक्षित न हों तो पारिवारिक व्यवस्था ठीक न जमेगी। रोगी को दवा का प्रबन्ध रहने को मकान,खेती के लिये कपड़े, यात्रा के लिये सवारी—प्रत्येक वस्तु का यथास्थान उपयोग है। कोई भी वस्तु उपेक्षणीय नहीं। समय के अनुसार आवश्यकताओं की माँग बदलती रहती है। उन्हें उसी क्रम से पूरा भी किया जाना चाहिए, तभी जीवन में ठीक व्यवस्था रह सकती है।

इस व्यवस्था को चौपट करने वाली स्थिति का नाम है— आसक्ति । किसी खास तरह के सुख या इच्छा पूर्ति के लिये अपने आपको एक ही स्थान पर रोक देना ही आसक्ति कहलाती है। सुख की इच्छा से बँध जाना आसक्ति है। जो वस्तु प्रिय लगे, आकर्षक लगे उसके साथ गठबन्धन बाँध कर लिप्त हो रहना ही उसका प्रधान लक्षण है। दुराव, अव्यवस्था और असंतोष का कारण यह आसक्ति ही है।

यदि शरीर का कोई भी अंग अपने नियत कार्य के करने में प्रमाद करे तो उसका फल सारे शरीर को भुगतना पड़ता है और शारीरिक मशीन के चलने में बाधा आ जाती है। जैसे हाथ यदि भोजन को ग्रहण करके बैठा रहे, उसे मुँह तक न पहुँचावे तो शरीर की दुर्बलता के साथ ही हाथ भी दुर्बल पड़ जायगा। मुँह भोजन का पूरा स्वाद तो ले, पर उसे पेट में न पहुंचावे तो भी यही दशा होगी। पेट उस खाये हुए अन्न को अपने में ही ठुंसे बना रहे, उसका रक्त बना कर शरीर को न दे और मल-विसर्जन की क्रिया का परित्याग कर दे तो सारा शरीर रोग-ग्रस्त हो जायगा। प्रत्येक कार्य को नियत समय, क्रम और आवश्यकता के अनुसार उचित परिणाम में करते रहना ही कर्मयोग या अनासक्ति कहा जाता है। मनुष्य जीवन की सारी सुन्दरता इसी बात पर निर्भर है कि वाटिका की तरह उसके प्रत्येक अंग, प्रत्येक विभाग की समुचित देख-रेख होती रहे। चित्त-वृत्तियाँ तथा इच्छायें एक ही स्थान पर केन्द्रित न होने पायें, अन्यथा गड़बड़ी फैलने की आशंका बनी रहेगी।

अतः यह आवश्यक हो जाता है कि अपनी इच्छाओं को, रोगों की कल्पना को कम करें, पर यह तभी हो सकता है, जब यज्ञीय जीवन की महत्ता का भान हो। सन्तोषी-जीवन, स्वल्प-निर्वाह और निर्लेप आचरण से ही ऐसी सुविधा उत्पन्न हो सकती है। मन शुभ कामनाओं में लगा रहे। बुद्धि के पीछे तर्क जुड़ा हुआ हो। प्रत्येक कर्म विवेक और हित-अहित के विचार पर आधारित हो। हाथ में जो काम लें, उसमें तन्मय हो जायँ, पर जैसे ही वह काम पूरा हो जाय, उसे इस तरह भूल जायँ, जैसे उससे उस कर्म का कोई सम्बन्ध ही न रहा हो। मनुष्य के सामने जो भी कर्त्तव्य आयें, उन्हें निष्काम भावना से पूरा करता रहे।

भारतीय परम्परा सदैव ऐसी ही रही है। यहाँ सदैव प्रवृत्ति में ही निवृत्ति के दर्शन हुए हैं। बलि, दधीचि, कर्ण, हरिश्चन्द्र, रन्तिदेव आदि महापुरुषों के उदाहरण मौजूद हैं, जिनसे जीवन को यज्ञमय बनाकर उदारतापूर्वक जीने, खिलाड़ियों की तरह खेलने की ही प्रेरणा मिलती है। शरीर-सुख और साँसारिक भोग सामयिक है। अतः उनमें आसक्त होकर अजर-अमर जीवन को कष्टमय बना लेना बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती। यह बहुत बड़ा अनुसंधान है, दर्शन है, जिसे ऋषियों ने दीर्घकालीन तप के बाद निर्धारित किया है। वर्णाश्रम धर्म का मूल मन्त्र भी अनासक्ति ही है। लोक-धर्म की मर्यादा के लिये सन्तान उत्पन्न की जाती थी। इससे कुल और संसार भी चलने की बात कही जा सकती है। आज की तरह पुत्र न होना कोई दुर्भाग्य नहीं समझा जाता था।

मातायें अपने बच्चों को छोटी व्यवस्था में ही गुरुकुलों में भेज देती थीं और देव-सेवा में, गृह-कार्यों में लग जाती थीं। प्राकृतिक जीवन में रहकर वह बालक शरीर, मन और बुद्धि-विवेक से पूर्ण परिपक्व होकर निकलते थे। रूप, गुण, यौवन तथा बल सम्पन्न होकर गृहस्थ में प्रवेश करते थे तो एक सुयोग्य नाविक की भाँति गृहस्थी की नाव को ठीक तरह से संचालित रखते थे। जब उनके भी बालक इस योग्य हो जाते थे कि आश्रितों का पालन-पोषण भली भाँति कर सकें, तो धीरे-धीरे उन्हें पारिवारिक उत्तरदायित्व सौंप कर वानप्रस्थ आश्रम के लिये उद्यत हो जाते थे। तीर्थाटन आदि करते हुए मुक्त प्रकृति का ज्ञान लाभ प्राप्त करते थे और अन्तिम अवस्था में घर-परिवार आदि का बिल्कुल मोह त्याग कर केवल ब्रह्मानुभूति में तल्लीन होकर इस मनुष्य जीवन को सार्थक बना जाते थे। जब तक यह व्यवस्था हमारे राष्ट्र में रही तब तक इस देश में किसी तरह के दुःख-दारिद्रय तथा अभाव भी नहीं रहे।

दुःख को दूर करने के लिये अनासक्ति ही सर्वोत्तम उपाय है। आसक्ति सभी प्रकार के दुःखों की जननी है। मोह के कारण ही सम्बन्धियों के बिछुड़ने पर वियोग-जनित दुःख का अनुभव होता है। अतः मोह को नष्ट कर दीजिए। देहाभिमान के कारण ही थोड़ा-सा सम्मान न मिलने या अपमान हो जाने से असह्य दुःख प्राप्त होता है। अतः देहाभिमान का नाश करना चाहिये। जो लोग संसार और उसके सुखोपभोग के साधनों की आशा लगाये बैठे हैं, उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि यह तन्मात्रायें केवल तब तक हैं, जब तक शरीर जीवित है। प्राण निकलते ही इनका कुछ भी मूल्य न रह जायगा। केवल मन में बसा हुआ— मोह, ममत्व और राग ही शेष रह जायगा, इसी के कारण लोग जन्म-मरण के सब-बन्धनों में बँधे हुए साँसारिक कष्ट भोगते रहते हैं।

मनुष्य आनन्द की खोज में है। आनन्द में ही उसे तृप्ति मिलती है, पर यह आनन्द मिलता उन्हीं को है, जिन्होंने सुख और दुःख की वास्तविकता को समझ लिया है अर्थात् जिन्होंने संसार और उसके प्रपंच, आत्मा और उसके स्वरूप को जान लिया है। यह स्थिति बन जाने पर वह मोह ग्रसित नहीं होता, संसार की किसी वस्तु से उसे लगाव नहीं रहता। लोकोपकारी कर्मों का सम्पादन करना ही उसका ध्येय बन जाता है। इस तरह के कर्त्तव्य पालन में ही सर्वांगीण व्यवस्था रहती है और व्यवस्था रहते हुए दुःख का कोई नाम नहीं रहता। कर्मयोग का इतना ही रहस्य है कि मनुष्य कर्म को पा कर्त्तापन का अभिमान न करे। इसमें साँसारिक सुख भी है और पारलौकिक हित भी। अनासक्त जीवन ही शुद्ध और सच्चा जीवन है।


मन को सुधारिए—वह जरूर सुधर जायेगा।

जीवन में सफलता और अभ्युदय पाने की लिये मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह अपने मन को सुसंस्कार युक्त बनाये। अपनी मनोगति को अधोमुखी न होने दे। ऊँचे मनोरथों एवं उदात्त भावनाओं से हृदय को परिपूर्ण रक्खे। मनुष्य का मन जितना विशाल एवं विस्तृत होगा उसका जीवन उतना ही महान और सफल होगा। मानसिक संकीर्णता ही मनुष्य के जीवन को संकुचित तथा असंतोषजनक बना देती है। मनुष्य जीवन का कर्ता-धरता उसका मन ही है। जैसा मन होगा-जीवन का निर्माण भी उसी प्रकार का होगा। मन को मनुष्य जीवन का साँचा ही समझना चाहिये और जीवन को मन का दर्पण। यह साँचा जितना ही सुन्दर, सुधर और पूर्ण होगा मनुष्य का जीवन भी उसमें ढलकर उतना ही सुन्दर, सुधर और पूर्ण बन जायेगा मन की अवस्थायें ही क्रिया रूप में मनुष्य जीवन में प्रतिबिंबित एवं परिलक्षित होती हैं।

सुख-शान्ति की उपलब्धि किन्हीं बाहरी साधनों तथा उपकरणों में नहीं होती। सुख-शान्ति का निवास मनुष्य की मानसिक वृत्तियों में ही होता है। जिसके हृदय की वृत्ति प्रसन्न है, प्रफुल्ल तथा प्रमोदमयी है उसे बात-बात में हर्ष और प्रसन्नता की ही उपलब्धि होगी। जिसका मन विषादि, प्रमादी और असंतुष्ट है उसे जलन-घुटन, असंतोष तथा कुँठाओं की विभीषिका में पड़ना होगा।

जिसने अपने मन का परिष्कार कर लिया है, उसे अपने वश में कर लिया है, उसको संसार में किसी भी सहायक की आवश्यकता नहीं रहती। स्वाधीन मन मनुष्य का सबसे बड़ा और सच्चा सहायक होता है। मन का परिमार्जन स्वयं ही एक बहुत बड़ा तप है।

सामान्यतः मनुष्यों को मन के वश में न रहने की शिकायत रहती है। मन के उच्छृंखल, प्रतिकूल तथा प्रतिगामी होने को वे एक स्वाभाविक वृत्ति मानते हैं। विविध साधनाओं, अनुष्ठानों और उपासनाओं के बावजूद भी जब वे मन को अनुकूल नहीं कर पाते तो हताश होकर यह विश्वास बना लेते हैं कि मनुष्य का मन बहुत प्रबल होता है उसको वश में कर लेना असम्भव नहीं तो दुरूह अवश्य है और कभी-कभी तो मन की प्रतिकूलता को भाग्य का दोष मानकर संतोष कर लेते हैं। यह कहकर बुराइयों एवं असफलताओं के प्रति आत्म-समर्पण कर देते हैं कि अच्छाइयाँ और असफलताएँ उनके भाग्य में ही नहीं हैं।

यह विचार ठीक नहीं। मन की विकृतियों के दोषी वास्तव में हम स्वयं ही होते हैं। मन की स्वाभाविक गति अधोगामिनी नहीं है। उसको गति हम स्वयं देते हैं। मनुष्य का प्रारम्भिक मन बड़ा ही भोला तथा निर्विकार होता है। उसमें किसी प्रकार की दुवृत्तियों का निवास नहीं होता। किसी बच्चे का मन कुटिल,कपटी,स्वार्थी अथवा लोभी कब होता है? वह तो एक भोले-भाले बटुक की तरह ही होता है। जब तक वह अबोध रहता है— अवयस्क रहता है— तब तक किसी प्रकार की विकृति उसमें नहीं आने पाती। बच्चे को यदि कोई बुरी बात बतलाता है तो वह सहम जाता है, डर जाता है, भाग जाता है अथवा क्षोभ से रोने लगता है। किसी अनौचित्य को ग्रहण करने को वह तैयार नहीं होता। भोले बच्चे कटुता, क्रूरता अथवा गन्दा वातावरण देखकर उससे दूर रहने का ही प्रयत्न करते हैं।

मनुष्य स्वयं भी जब कोई बुरी आदत ग्रहण करना शुरू करता है तब उसका मन उसका विरोध करता है, उसको स्वीकार करने में आना-कानी करता है। सिगरेट पीना सीखने वालों को शुरू में घोर अरुचि का सामना करना होता है। उन्हें चक्कर आता है, कै होती है, तबियत घबड़ाती है। यह हमारी अरुचिजन्य प्रतिक्रियाएं मन की ही हुआ करती हैं। बेचारा भोला मन अपनी शक्ति -भर बुराइयों का विरोध करता रहता है, किन्तु जब मनुष्य उसे वैसा करने को बार-बार विवश करता है तो आज्ञाकारी होने के कारण वह धीरे-धीरे उसे ग्रहण भी कर लेता है।

बुराइयों के प्रति इस प्रारम्भिक अरुचि एवं असहयोग से स्पष्ट प्रकट है कि मन की स्वाभाविक गति बुराइयों की ओर नहीं अच्छाइयों की ओर ही है। किन्तु जब उसके असहयोग की अवहेलना करके उसकी अरुचि की उपेक्षा करके उसे किसी विकृति को हठात् ग्रहण करने के लिये बलात्कार किया जाता है तब वह भी उसकी प्रतिक्रिया में विकृतियों की पराकाष्ठा कर देता है। अपने अधीनस्थ सेवक पर जब अनुचित अत्याचार किया जाता है, उसकी हर अच्छी बात और ईमानदारी का तिरस्कार किया जाता है, तो वह अवश्य ही विद्रोही हो जाता है और बलात्कार की प्रतिक्रिया से हुआ विद्रोही जल्दी हाथ नहीं आता और सृजन की ओर से मुड़कर ध्वंस की ओर ही दौड़ पड़ता है। ठीक यही बात मन की भी होती है।

मनुष्य का नाम स्वभावतः प्रतिगामी नहीं होता है। उसे धक्के दे देकर स्वयं मनुष्य ही पतन-पथ पर चलाया करता है। पतन का पथ अधोगामी है, इसलिये उस पर ढकेला हुआ मन बड़े वेग से भागकर चलता है और तब उसका रोका जाना बड़ा कठिन हो जाता है।

बुराइयों का दोष मन के मत्थे मढ़ना ठीक नहीं। मनुष्य स्वयं इसका अपराधी होता है और इसी में उसका कल्याण है कि वह अपना दोष स्वीकार कर ले और उसका परिमार्जन करने का प्रयत्न करे। जिस मन को उसने बलात्कार पूर्वक अधोगामी बनाया है उसी प्रकार उसे प्रयत्नपूर्वक ऊपर लाने का प्रयत्न करे।

मन प्रतिक्रियावादी तो अवश्य होता है किन्तु हठवादी कदापि नहीं होता। जब वह अपने स्वभाव के विरुद्ध अरुचि होने पर भी मनुष्य के बुरे आदेश मान लेता है तब कोई कारण नहीं कि वह उदात्त आदेशों की अवहेलना करे। इतना अवश्य है कि विद्रोही बने हुये अथवा रूठे हुये मन को सुधारने एवं मनाने का नये सिरे से प्रबल प्रयत्न अवश्य करना होगा।

यदि आप अपना कल्याण चाहते हैं तो अपने रूठे मन को मनाइये। यदि एक-दो , दस-बीस बार में न माने तो हजार बार मनाइये जिस दिन आपका मन मानकर पुनः ठीक राह पर आ गया उसी दिन से आपकी जीवन उन्नति के सारे द्वार खुल जायेंगे। आज जो निकृष्ट एवं निम्न-कोटि की परिस्थितियाँ घेरे हुये हैं वे क्रमशः कल्याणकारी अवस्थाओं में बदल जायेंगी।

मन को मनाने का एक ही सहज तरीका है कि उसके सामने जीवन के आशापूर्ण चित्र रखिये कल्याणकारी संकेत से परिपूर्ण बनाइये। पुण्य, परमार्थ एवं परोपकार के विचारों में मन को मनाने की सबसे अधिक सामर्थ्य होती है। जो कुछ सोचिये, ऊँचा सोचिये, जो कुछ करिये, कल्याणकारी करिये, जो भी कल्पना, इच्छा अथवा मनोरथ करिये जनहित एवं आत्म-हित की दृष्टि से करिये।

पवित्र विचारों से मन पर वाँछित संस्कार पड़ते हैं, उसका परिमार्जन होता है और उसमें ऊर्ध्वगामी होने की रुचि पुनः उत्पन्न होती है। मन मनुष्य के मनोरथों को पूरा करने वाला सेवक होता है। मनुष्य जिस प्रकार की इच्छा करता है, मन तुरन्त उसके अनुकूल संचालित हो उठता है और उसी प्रकार की परिस्थितियाँ सृजन करने लगता है। मन आपका सबसे विश्वस्त मित्र और हितकारी बन्धु होता है।

यह सही है कि बुरे विचारों का त्याग श्रमसाध्य अवश्य है किन्तु असाध्य कदापि नहीं। विकृतियों के अनुपात में ही सत्प्रयासों की आवश्यकता है। विकृतियाँ जितनी पुरानी होंगी उतने ही शीघ्र एवं दृढ़ अभ्यास की आवश्यकता होगी। अभ्यास में लगे रहिये एक-दो साल ही नहीं जीवन के अन्तिम क्षण तक लगे रहिये। मानसिक विकृतियों से हार मान कर बैठ रहने वाला व्यक्ति जीवन में किसी प्रकार की सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

मन को परिमार्जित करने,उसे अपने अनुकूल बनाने में केवल विचार शक्ति ही नहीं अपनी कर्मशक्ति भी लगाइये। जिस कल्याणकारी विचार को बनाइये उसे क्रिया रूप में भी परिणित करिये। विचारों द्वारा संकेत पाया हुआ मन जब काम में नियोजित कर दिया जायेगा तो दोहरे प्रयत्न से शीघ्र ही वह आपकी अमोघ-शक्ति बनकर वाँछित सफलताओं को मूर्तिमान कर देगा।


विश्व मानव- श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर

माता शारदा देवी की कुक्षि तथा पूज्य पिता देवेन्द्र नाथ ठाकुर के कुल को गौरव प्रदान करने वाले विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म कलकत्ते में 7 मई मंगलवार सन् 1861 में हुआ।

बाल्यकाल ही में पिता के ध्यान, प्रार्थना तथा एकान्त-प्रवास से प्रभावित रवीन्द्रनाथ का मन पढ़ाई-लिखाई में न लगता था। किताबी पढ़ाई से अधिक आनन्द उन्हें प्राकृतिक दृश्यों को देखकर मिलता था। वह कुछ ऐसा ज्ञान प्राप्त करने को उत्सुक थे, जिससे वे पूर्ण आत्म-शाँति पा सकें और उस शान्ति को दुखी मानवता के बीच बाँट सकें। ऐसा दिव्य ज्ञान आध्यात्मिक मार्ग और उसकी साधना के अतिरिक्त और कहाँ रक्खा था। निदान वे अपनी जिज्ञासा शान्त करने और लक्ष्य प्राप्त करने के लिये आध्यात्मिक चिन्तन की ओर झुक गये।

किन्तु उनका यह झुकाव अन्य जिज्ञासु तथा उन मुमुक्षुओं की तरह का नहीं था जो केवल पुस्तकों में बताये गये आत्मिक सुख-शान्ति के साधनों में जबरदस्ती जुटकर हठ साधन किया करते हैं। वे तो सुख-शान्ति के तीनों स्वरूपों ‘सत्यं—शिवं—सुन्दरं’ को हृदय की सुकुमार वृत्तियों और कोमल भावनाओं के माध्यम से आत्मा में आनन्द की स्थायी पुलक के रूप में अनुभव करना चाहते थे। वे नैसर्गिक प्रकृति के साथ तादात्म्य प्राप्त करके परमात्मा के विराट् स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा रखते थे।

बाल्यकाल ही में ममतामयी माता के अंचल की शीतल छाया उठ जाने से उनके भावुक हृदय में बड़ी वेदना हुई। किन्तु उनकी वेदना ने जिन आँसुओं का रूप धारण किया उनमें एक आध्यात्मिक पुट था, जीवन और मरण के रहस्य को जानने की जिज्ञासा थी। माता के विदा हो जाने से रवीन्द्रनाथ की देख-रेख का भार नौकर-चाकरों पर आ गया। वे यथासाध्य उन्हें बहलाने का प्रयत्न करते किन्तु उनकी मौन गम्भीरता की उदासी दूर न होती।

उनको स्कूल भेजा गया। किन्तु वहाँ उनका मन न लगता था। वे स्कूल से भाग जाते और कोलाहल से दूर किसी निर्जन सरिता-तट पर जा बैठते और घंटों प्रकृति के दृश्यों का निरीक्षण किया करते थे। अतएव पिता ने उनकी पढ़ाई का प्रबन्ध घर पर ही कर दिया।

पिता ने पुत्र की भावनायें पहचानी और उसको उपयुक्त मार्ग तथा वातावरण देने की व्यवस्था की। धीरे-धीरे उनकी भावनायें आध्यात्मिक वेदना लेकर मधुर गीतों के रूप में बह चलीं, ऐसे गीत जो आत्मानुभूति के मानसरोवर में स्नान करके जन-मानस का आध्यात्मिक मंगल करने के लिये वायु मण्डल में गूँज जाते। मानसिक रूप से वे काफी प्रौढ़ हो चुके थे। यह प्रौढ़ता उनकी रचनाओं में भी परिलक्षित होने लगती थी। जिस समय ‘मानसी’ नामक उनकी एक सुन्दर रचना प्रकाशित हुई और पत्र-पत्रिकाओं में उसकी प्रशंसा हुई तब उनके बुद्धिमान पिता ने रवीन्द्रनाथ के भविष्य का आभास पा लिया और उन्हें कलकत्ते के कोलाहलपूर्ण वातावरण से दूर जाकर किसी एकान्त स्थान में अध्ययन एवं काव्य साधना करने का परमार्थ दिया। वे गंगा के किनारे स्यालदा नामक ग्राम में जाकर रहने लगे।

जिस समय ग्राम के शान्त वायुमण्डल और प्रकृति उल्लसित दृश्यों के बीच भाव-विभोर होकर अपने में तन्मय हो जाते थे और कल्पना कुँज में विहार करते-करते कोकिल की तरह गा उठते थे, उस समय वे ग्रामीणों की दीन दशा से उदासीन न रह पाते थे। ग्रामीणों का अशिक्षा पूर्ण जीवन, फटे कपड़े और असभ्य रहन-सहन देखकर उनके हृदय पर इतना आघात लगने लगा कि उन्हें स्वयं ही उस ज्वलन्त यथार्थ को छोड़कर मनोहारी कल्पना-कुँज में विहार करने से ग्लानि होने लगी। जिस जनता के लिये वे आत्मा का प्रकाश अक्षरों में समाहित कर रहे थे उस जनता की वह दयनीय दशा देखकर वे आठ-आठ आँसू रो उठते और काव्य लोक से उतर कर उनके सुधार तथा कल्याण के लिये विचार करने लगे।

स्यालदाह रवीन्द्रनाथ की जमींदारी का गाँव था और वहाँ की जनता उन्हें अपना स्वामी मानकर आदर करती थी। किन्तु फिर भी मानवता के सच्चे पुजारी रवीन्द्रनाथ ने निराभिमान होकर उनकी सेवा तथा सहायता करनी प्रारम्भ कर दी। उनकी सेवाओं में उनका सबसे प्रिय सेवा कार्य था उनके बच्चों को पढ़ाना, उन्हें अच्छी-अच्छी कहानियाँ सुनाना। उन्होंने ग्रामीणों की समस्याओं का गम्भीरता से अध्ययन किया और जमींदार की हैसियत से अनेक सुधार करवाये। स्वच्छता की शिक्षा के साथ-साथ वे अवकाश के समय ग्रामीणों को ऐसी रचनायें सुनाते जिनसे उनका मानसिक स्तर ऊँचा हो, उनमें मानव स्वरूप के ज्ञान का उदय हो।

इस प्रकार उनकी आत्मानुभूति मानवीय वेदना में बदलकर दर्द भरे गीतों में बहने लगी। रचनाओं में मानव मूल्य का अंकन होने लगा और वे धीरे-धीरे “स्वान्तः सुखाय” से हटकर “सब जन हिताय, सब जन सुखाय” के क्षेत्र में आ गये।

लगभग चार वर्ष तक उन्होंने ग्रामीणों के बीच रहकर उनकी सेवा करने के साथ-साथ ‘बलिदान, चित्राँगदा आदि नाटकों तथा ‘चित्रा और उर्वशी’ आदि काव्यों की रचना की।

ग्रामों तथा उनके निवासियों की दशा देखकर जिस पीड़ा पूर्ण अनुभूति का उदय उनमें हुआ था उसने आगे चलकर देश-भक्ति का रूप धारण कर लिया और वे विदेशी शासन के अन्यायपूर्ण शोषण के प्रति क्षुब्ध हो गये। उन्होंने अंग्रेज शासकों का कटु विरोध करने के स्थान पर भारतीय जनता का मानसिक तथा आत्मिक स्वर ऊँचा करने और अपना उद्धार आप कर सकने की सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये महान् संदेश देने शुरू कर दिये। उनके उद्बोधन पूर्ण संदेशों का सार इस प्रकार का होता था—”तुम अपने को पहचानो, अपनी शक्तियों का अनुभव करो, अपना जीवन शुद्ध एवं समृद्ध बनाओ, तपस्या से अपनी शक्ति का अभिवर्धन करो। मनुष्यता का मान समझो और अपना ठीक-ठीक मूल्याँकन करो। और इस प्रकार अपने को सर्वशक्तिमान के अंश के अनुरूप बनाकर संसार में स्वाभिमान के साथ जियो। अपनी शक्ति में आप स्थित मनुष्य को, समाज तथा राष्ट्र को संसार की कोई शक्ति अपमानित नहीं कर सकती। इसके अतिरिक्त उन्होंने जन-जागरण के लिये अपने व्याख्यानों का कार्यक्रम प्रारम्भ किया जिसमें उन्होंने भारतीय उच्चादर्श आर्यों की सभ्यता वेद, उपनिषद् तथा वीरतापूर्ण इतिहास को आधार बनाया। उनकी इच्छ थी कि भारत एक बार पुनः अपने गौरवशाली अतीत के दर्शन कर उसके प्रति आस्थावान बने।

उन्होंने भारतीयों तथा विशेष तौर पर तरुणों को सत्यं-शिवं-सुन्दरम् से परिपूर्ण भावनाओं के साथ ईश्वर की ओर उन्मुख करने और उन्हें भारतीय एवं पाश्चात्य शिक्षा प्रणाली के समन्वय से जीवन के प्रति एक नवीन दृष्टिकोण देने के लिये ‘शाँति-निकेतन’ के नाम से एक ऐसी शिक्षा संस्था की स्थापना की जहाँ विद्यार्थियों में महान् राष्ट्रीय भावनाओं के साथ-साथ साँस्कृतिक चेतना का निर्माण किया जाता था।

इसी बीच एक-दो वर्ष के अन्तर से उनकी पत्नी, पुत्री, पिता तथा पुत्र की मृत्यु हो गई। क्रूर काल के यह क्रमिक आघात किसी भी व्यक्ति का धैर्य हर कर उसे विक्षिप्त कर देने के लिये काफी थे। किन्तु जिन्होंने जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को आध्यात्मिक बनाया हुआ था, धर्म के तत्व को समझा था, आत्मा में दृढ़ आस्था स्थापित कर रक्खी थी और जीवन मृत्यु के परिवर्तन को ठीक-ठीक समझा हुआ था उन रवीन्द्रनाथ पर इसका प्रभाव पड़ा अवश्य किन्तु भिन्न रूप में। वे इन निरन्तर आघातों से इतने करुण हो उठे कि उनका सारा प्रेम विश्व के बीच बिखर गया। उन्होंने अपनी इस वैयक्तिक पीड़ा को विश्व-वेदना में ढाल कर ‘स्मरण’, ‘खेवैय्या’ तथा ‘नौका डूबी’ आदि काव्य रचनाओं का सृजन किया। इनमें मनुष्य की पीड़ा को इतनी सच्चाई के साथ व्यक्त किया गया था कि वे महाकवि के रूप में माने जाने लगे। अपने गीतों का उपभोग विश्व-व्यापक बनाने के लिये उन्होंने अपनी इन्हीं पुस्तकों में से कुछ गीतों को चुनकर गीताँजलि संग्रह किया और स्वयं अँग्रेजी में उसका अनुवाद करके सभी में प्रसारित किया। उनकी इस महान रचना गीतांजलि ने विश्व के विद्वानों को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इस पर ‘नोबल प्राइज’ दिलाकर अपनी आत्मा को संतुष्ट किया।

विश्व का सबसे बड़ा पुरस्कार ‘नोबल प्राइज’ पाने से रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्व-कवि बन गये। वास्तव में वे केवल विश्व कवि ही नहीं अपितु विश्व मानव भी बन गये, और उन्होंने ‘विश्व-भारती’ नाम की एक इतनी बड़ी संस्था की स्थापना की जिसमें समस्त संसार की समग्र संस्कृतियों के समन्वय से एक विश्व-संस्कृति को जन्म दिया जाने का अभूतपूर्व कार्य प्रारम्भ हुआ। ‘विश्व-भारती’ की उन्नति तथा विकास के लिये उन्होंने अपनी समस्त सम्पत्ति तथा पुस्तकों की ‘रायल्टी’ के साथ अपना सम्पूर्ण जीवन ही समर्पित कर दिया। स्थापना के दिन से जीवन के अन्तिम समय तक वे केवल प्रबन्धक ही नहीं एक अध्यापक के रूप में स्वयं भी काम करते रहे। यह गुरुदेव की ही लगन, पुरुषार्थ, त्याग तथा परमार्थ का फल है कि विश्व-भारती शीघ्र ही एक महान विश्व-विद्यालय के रूप में परिणित होकर विश्व की संस्कृति की तथा वैचारिक एकता के साथ-साथ विश्व-शान्ति की स्थापना का प्रयत्न कर रही है।

अँग्रेज सरकार ने गुरुदेव के महान कार्यों को देखकर उन्हें नाइट (सर) का खिताब दिया जिसको उन्होंने बंग-भंग तथा जलियावाला के कुकाण्डों से क्षुब्ध होकर त्याग दिया।

इस प्रकार लगभग अस्सी वर्ष तक लेखनी, वाणी तथा स्थापनाओं से देश और संसार की शान्तिपूर्ण आध्यात्मिक तथा साँस्कृतिक सेवा करने और संसार में भारतीय प्रतिभा का सिक्का जमाने के बाद 8 अगस्त सन् 1941 को उन्होंने कैवल्य पद प्राप्त किया।

इस प्रकार लगभग अस्सी वर्ष तक लेखनी, वाणी तथा स्थापनाओं से देश और संसार की शान्तिपूर्ण आध्यात्मिक तथा साँस्कृतिक सेवा करने और संसार में भारतीय प्रतिभा का सिक्का जमाने के बाद 8 अगस्त सन् 1941 को उन्होंने कैवल्य पद प्राप्त किया।


Quotation

ये युध्यन्ति प्रधनेषु शरासो ये तनूत्यजः। ये वा सहस्त्र दक्षिणास्ताँचिदेवापि गच्छतात्॥

संग्राम में लड़ने वाले वीरों की भाँति आदर्श के लिये प्राण-त्याग करने वाले, अनेक प्रकार के त्याग और दान करने वाले सज्जनों की गति को तू प्राप्त कर।

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लघु-कथा

सारे कार्य पूर्ण हो चुके थे

सागर के तट पर खड़े होकर मनुष्य ने आवाज दी—”ऐ सागर के अन्तराल में निवास करने वाले ज्वार! आओ और मेरे अस्तित्व को समेट कर इस अनन्त सागर में मिला दो।

ज्वार ने उठकर मनुष्य को देखा और चुपचाप फिर सिन्धु-हृदय में शान्त हो गया। मनुष्य ने देखा और निराश होकर वापस चला आया।

कुछ समय बाद मनुष्य सागर-तट पर फिर गया और आवाज दी। ज्वार उठा और उसके चरण पखार कर वापस चला गया। मनुष्य फिर निराश होकर वापस चला आया।

कुछ समय बाद मनुष्य पुनः सागर के तट पर गया और चुपचाप किनारे बैठ गया। न उसने ज्वार को आवाज दी और न कोई इच्छा प्रकट की।

ज्वार ने देखा और बड़े वेग से उसे समेटने के लिये बढ़ा, किन्तु सागर के अंतर्तम से उठी सुन्दर स्निग्ध लहरों ने उसे रोक दिया और स्वयं मंथर गति से आकर नाचती और गाती हुई उस मौन मानव को अपनी गोद में उठाकर ले गई।

मनुष्य का सारा प्रयोजन पूर्ण हो गया।


रूस के विचारोद्धारक—महात्मा टॉलस्टाय

जिनकी गणना आज संसार के महानतम महात्माओं, दार्शनिकों तथा साहित्य-सृष्टाओं में होती है, वे 28 अगस्त, 1888 को रूस देश में टूला के निकट भासनाया पोलथाना नामक ग्राम में जन्म लेने वाले टॉलस्टाय जन्मजात महात्मा ही नहीं थे। उन्होंने संसार तथा घटित होने वाली घटनाओं से शिक्षा लेकर अपने को पूर्ण मानव के रूप में निर्माण किया था।

महात्मा टॉलस्टाय ने संसार को बहुत कुछ देने के साथ-साथ जो सबसे मूल्यवान् निधि दी है, वह अपने महान् जीवन के परिवर्तन तथा निर्माण का उदाहरण है। महात्मा टॉलस्टाय रूस के एक सामन्त वंशी राजकुमार थे। वीरता, साहस तथा युद्ध उनके स्वाभाविक गुण थे। अपने पूर्वजों की भाँति वे भी अनेक वर्षों तक रूसी सेना में सेनानायक के पद पर कार्य करते रहे। सामंत- सेनापतियों की सारी बुराइयाँ उनमें भरी पड़ी थीं। उनके जीवन के दो ही काम थे। या तो किसी युद्ध में शामिल होकर लड़ा करते थे अथवा विलासिता में डूबे रहते थे।

महात्मा टॉलस्टाय जिस समय लगभग एक वर्ष के थे, उनकी माता का देहान्त हो गया और नौ वर्ष की अवस्था में पिता चल बसे। निदान उनका पालन-पोषण टटियाना भरगोल्सकी नामक एक महिला ने उनकी बुआ की देख−रेख में किया। टॉलस्टाय कई भाई-बहिन थे, किन्तु उनको सबसे अधिक प्रेम करने वाले उनके बड़े भाई निकोलस ही थे।

जिन टटियाना भरगोल्सकी नामक भद्र महिला ने उनका पालन किया था, वह उनके पिता काउन्ट निकोलस टॉलस्टाय को हृदय से प्रेम करती थी, किन्तु उसने अपने इस प्रेम को कभी प्रकट नहीं किया। उसे टॉलस्टाय से अत्यधिक प्रेम था। वह उन्हें प्राणों से भी ज्यादा प्यार करती थी और उनके हृदय में भी प्रेम की भावना उत्पन्न कराना चाहती थी। अपनी इस धाय के व्यवहार, चरित्र तथा प्रेम का प्रभाव टॉलस्टाय के बाल-हृदय पर इतना पड़ा कि उनका हृदय मानव मात्र के लिए प्रेम से भर गया। जिसके फलस्वरूप उन्होंने बचपन में ही अपने बड़े भाई की सहायता से ‘आँट ब्रदर्श’ नाम की एक ऐसी संस्था की स्थापना की, जिसका उद्देश्य संसार भर के मानवों में एक भ्रातृ-प्रेम की भावना पैदा करना था और जिनके प्रतीक रूप में उन्होंने एक पहाड़ी पर पेड़ की एक हरी डाल भी आरोपित की थी।

जिस समय वे कजान विश्वविद्यालय में अध्ययन कर रहे थे, उनका विचार राजदूत बनने का था और जिसकी तैयारी में उन्होंने पूर्वीय भाषाओं को सीखना प्रारम्भ किया। किन्तु मानसिक संतुलन के अभाव में भाषाओं को छोड़ कर वकालत पढ़ने लगे, किन्तु कुछ समय बाद ही उन्होंने कानून का अध्ययन भी छोड़ दिया। इसी समय उनके हृदय में विचारों का भयंकर द्वन्द्व प्रारम्भ हो गया। वे क्या सत्य है और क्या असत्य? इस विचार में पड़ कर, इतने परेशान हो गये कि कॉलेज ही छोड़ बैठे।

विचारों के असन्तुलन तथा कालेज छोड़ देने से जब महात्मा टॉलस्टाय के पास कोई विशेष काम न रहा, वे दिनभर बेकार तथा निठल्ले बैठे रहने लगे तो धीरे-धीरे दुर्व्यसनों ने इन्हें घेरना प्रारम्भ किया, जिसके फलस्वरूप वे मद्यप बन कर विषय-भोगों में डूब गये। उनकी नैतिकता का पूरी तरह पतन हो गया।

किन्तु महात्मा टॉलस्टाय के जीवन की यह असत्य स्थिति बहुत समय तक न चल सकी। उन्होंने महात्माओं, सन्तों तथा सज्जनों के जीवन से अपनी तुलना की तो ऐसा अनुभव किया कि मानो वे मनुष्य हैं ही नहीं। चारित्रिक तथा पतित-जीवन के दृष्टिकोण से वे एक पशु हैं। कहाँ एक ओर सज्जन संत तथा आचरण शील व्यक्ति प्रसन्न मुद्रा में मानवमात्र की सेवा करते हुए स्वच्छन्द जीवन व्यतीत करते हुए आनन्द ले रहे हैं और कहाँ मैं व्यसनों तथा विलासों का दास बना हुआ एक मृत मनुष्य की तरह सीमित तथा विषैली परिस्थितियों में बन्दी बना विविध रोगों तथा विकारों को भोग रहा हूँ। वे व्यसन मुक्त महात्मा भी मनुष्य हैं और मैं भी मनुष्य हूं, किन्तु आचरण के अन्तर से हम दोनों में आकाश पाताल का अन्तर है। वे स्वर्ग में निवास कर रहे हैं और मैं घोर नरक में। इन विचारों के आते ही टॉलस्टाय को अपने जीवन पर बड़ी आत्म-ग्लानि हुई और उनको विलासितापूर्ण निकम्मे जीवन से विरक्ति हो गई।

महात्मा टॉलस्टाय आखिर एक मनुष्य ही थे। सत्य का प्रकाश आते ही उन्होंने अपने जीवन की धारा बदल ली और सोचने लगे कि मेरी तरह संसार में न जाने कितने मनुष्य विषय-वासना का नारकीय जीवन काट रहे होंगे। उन्हें मानव जाति की इस दुर्दशा की कल्पना से बड़ा दुःख हुआ और उन्होंने आगे से अपना सारा जीवन उनके उद्धार में लगा देने का संकल्प कर लिया। जो मनुष्य ज्ञान पाकर उसका प्रकाश दूसरों को देने का विचार बना लेता है, उसका ज्ञान न केवल स्थायी ही हो जाता है, अपितु दिनों-दिन बढ़ने भी लगता है, जिससे एक दिन उसका जीवन देव तुल्य बन कर धन्य हो जाता है।

विचारों में परिवर्तन तथा परिमार्जन होते ही जीवन के दस वर्ष लूटमार, मद्यपान, क्रूरता , हत्या तथा विषयों में बिताने वाले टॉलस्टाय का पूरा जीवन ही बदल गया। अब वह बुरे से अच्छे बन कर प्रेम, करुणा, सहृदयता, सहानुभूति तथा त्याग-तपस्या की मूर्ति बन गये। वे जब तब बैठे-बैठे रो उठते, उन्हें अपने वे दिन याद आ जाते, जब वे रूसी तोपखाने में थे और युद्ध में जाकर हजारों मनुष्यों का वध किया करते थे, गाँव के गाँव और नगर के नगर वीरान किया करते थे। उस समय अनाथ हुए बच्चों, विधवा हुई वधुओं तथा पुत्र हीन माताओं के क्रन्दन के साथ आहतों की कराह का स्वर बड़ा सुखद लगता था। खेत-खलिहानों को जलाती हुई आग की लपटें बड़ी सुहावनी लगती थीं। किन्तु आज जब उन्होंने अपना जीवन बदल डाला है, तब उन्होंने जो कुछ किया और देखा-सुना उसकी वास्तविकता ठीक-ठीक समझ में आने लगी। अपने विचारों की तीव्रता तथा आत्म-ग्लानि के आघात की वेदना कम करने के लिए उन्होंने कलम का सहारा लिया और ‘बचपन’ नाम का एक उपन्यास जनता के लिए दिया, जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की गई। इस हृदय से निकले प्रथम उपन्यास ने ही उनको काफी लोक-प्रिय बना दिया और जिस समय ‘सेवस्टोपोल’ नामक कहानी संग्रह प्रकाशित होकर जन-साधारण में आया, तब तो रूस के शासक ‘जार’ का ध्यान भी उनकी ओर आकर्षित हो उठा।

इसी बीच 1860 में उनके बड़े भाई का स्वर्गवास हो गया। इसका प्रभाव उनके हृदय पर इतना गहरा पड़ा कि उनके हृदय पर विलासी जीवन, युद्ध की भयानकता तथा विकृत आचरण के दुष्परिणाम अंकित हो गये, और उन्होंने बिलखती हुई मानवता के दुःख दूर करने के अपने संकल्प को पुनः दोहराया।

जीवन की दिशा निश्चित होते ही महात्मा टॉलस्टाय कार्य क्षेत्र में उतर पड़े। सबसे पहले उन्होंने अशिक्षा एवं अज्ञान मिटाने के लिये रूस के किसानों के लिये अनेकों स्कूल खोल दिये, जिनमें अन्य अध्यापकों के साथ टॉलस्टाय स्वयं भी शिक्षा देते थे। किसानों तथा सामन्त सरदारों के बीच जमीन के बंटवारे में उन्होंने किसानों का ही पक्ष लिया और उनके पक्ष में जन-मत बनाने के लिये नगर-नगर तथा गाँव-गाँव घूम कर प्रचार किया। उनके इस कार्य को रोकने के लिये पहले तो उनके सम्बन्धी जमींदारों ने उन्हें यह कहकर समझाना चाहा कि “लियो टॉलस्टाय! तुम स्वयं एक काउंट (सामन्त) होते हुए भी इन जलील किसानों का पक्ष करते हो। यह कार्य तुम्हारे टॉलस्टाय वंश के अनुरूप नहीं है, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।” इस पर महात्मा टॉलस्टाय ने यही उत्तर दिया कि मेरा वंश केवल एक मानवता है, मेरा कार्य उसकी सेवा करना है, इसके अतिरिक्त मेरा अन्य कोई वंश नहीं है और न इसके विरुद्ध कोई काम ही है।

टॉलस्टाय के इस मानवोचित उत्तर से अहंकार के मद में चूर रूसी सामन्त सरदार तथा अधिकारी उनके बुरी तरह विरुद्ध हो गये और उनका विरोध ही नहीं, बल्कि तरह-तरह से त्रास देने का प्रयत्न करने लगे। किन्तु जिसने सारा भोग-विलास छोड़कर धन-दौलत का त्याग करके अपना सम्पूर्ण जीवन किसी ज्वलन्त सत्य के लिये समर्पित कर दिया है, वह भला विरोधों तथा विपत्तियों से क्या डरे?

रूस के निरंकुश तथा अत्याचारी शासक की गोली बन्दूक का मुकाबला उन्होंने लेखनों के सहारे विचारक्राँति का आह्वान करके करना शुरू किया। उन्होंने निराश जनता का मार्ग-प्रदर्शन करते हुए ‘क्या करें?’ नामक एक ऐसी पुस्तक लिखी जिसने जार के निरंकुश शासन के विरुद्ध एक क्राँति उपस्थित कर दी। यद्यपि रूस की सशस्त्र क्राँति उनके जीवन-काल में न हो सकी थी फिर भी उन्होंने अपने जीवन काल में जो विचार-बीज बोये थे, वे ही कुछ समय आगे चल कर जार के विरुद्ध सशस्त्र क्राँति में अंकुरित हुए और जिसका फल स्वतन्त्रता के रूप में गरीब रूसी जनता को मिला।

इसके अतिरिक्त उन्होंने सामाजिक कुरीतियों, कुप्रथाओं तथा जड़ता पूर्ण धार्मिक रूढ़ियों पर इतने गहरे आघात किये कि कट्टरपंथी उन्हें नास्तिक समझने लगे और उनके चर्च जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया।

शहर के जड़ बुद्धि नागरिकों से ऊब कर वे देहातों की ओर चले गये और एकान्त, शान्त स्थान में बैठ कर छोटी-छोटी पुस्तिकाओं द्वारा जन-जीवन में प्राणपूर्ण नवीन चेतना फूँकने लगे। उनकी पुस्तिकायें इतनी पसन्द की गई कि करोड़ों की तादाद में उनकी प्रतियों का प्रकाशन तथा विक्रय हुआ करता था।

महात्मा टॉलस्टाय अपने जीवन के महानतम राजनीतिक तथा धार्मिक नेता थे। वे जनता को सत्य-धर्म का उपदेश दिया करते थे। उनका कहना था कि बिना सत्य-धर्म के जीवन नहीं और बिना त्याग के धर्म का कोई अस्तित्व नहीं। त्याग का अर्थ है—अपनी इन्द्रियों की गुलामी से मुक्त होकर अपनी मानसिक वासनाओं को बुद्धि के अधीन कर देना। जो मनुष्य कामवासना के अधीन रहता है। उसका जीवन सर्वथा असफल ही रहता है। अत्याहार तथा आलस्य, कामवासना को जन्म देने वाले हैं। जो अधिक खाने वाला है, आलसी है, वह अपनी कामवासना पर कदापि विजय नहीं पा सकता। प्रत्येक धर्म के अनुसार त्याग का प्रथम सोपान जिह्वा को वश में रखना है।

महात्मा टॉलस्टाय मद्यपान तथा माँस भोजन मानव जीवन का भयानक अभिशाप मानते थे और इसके विरुद्ध खुल कर प्रचार किया करते थे, उनके एक नवीन तथा क्राँतिकारी विचारों के कारण उन्हें अनीश्वरवादी तथा अधार्मिक समझते थे और इसी कारण जब सन् 1910 में उन्होंने संसार छोड़ा तो पादरी ने उनके अन्तिम संस्कार में प्रार्थना करने से इन्कार कर दिया। किन्तु इससे क्या, उस महान् महात्मा के अन्तिम संस्कार में हजारों किसानों ने भाग लिया और हजारों ही आदमियों ने नत-मस्तक होकर प्रार्थना की।


Quotation

वीर बनो, कायर नहीं!

कायरता मनुष्य का बहुत बड़ा कलंक है। कायर व्यक्ति ही संसार में अन्याय, अत्याचार तथा अनीति को आमंत्रित किया करते हैं।

संसार के समस्त उत्पीड़न का उत्तरदायित्व कायरों पर ही है। किसी भी राष्ट्र में कारयता का समावेश देखकर ही आक्राँता उसे विजय करने के लिये अग्रसर होते हैं। जिन राष्ट्रों के जनगण अपनी सारी दुर्बलताओं को अपने पैरों तले दबा कर वीर भावों से ओत-प्रोत रहते हैं, उस राष्ट्र की ओर संसार का कोई भी आतताई देखने का साहस नहीं करता और यदि कोई दुःसाहस करता भी है, तो वह अपने समग्र अस्तित्व को मिटा कर मिट्टी में मिल जाता है।

अपनी, अपने सम्मान और अपने राष्ट्र की रक्षा के लिये वीर बनो, बलिदानी बनो और बनो उस लौह-पुरुष की भाँति,जिससे टकरा कर आततायी चूर-चूर हो गये।

—जनरल अवारी


मन का भार हल्का रखिये।

कल न जाने क्या होगा? नौकरी मिलेगी या नहीं, कक्षा में उत्तीर्ण होंगे या अनुत्तीर्ण, लड़की के लिये योग्य वर कहाँ मिलेगा, मकान कब तक बन कर पूरा होगा, कहीं वर्षा न हो जाय, जो पकी फसल खराब हो जाय आदि बातों की निराशाजनक कल्पना द्वारा आप मन में घबराहट न पैदा किया करें। जो होना है, वह एक निश्चित क्रम से ही होगा, तो फिर घबराने, व्यर्थ विलाप करने अथवा भविष्य की चिन्ता में पड़े रहने से क्या लाभ? अवाँछित कल्पनाएं करेंगे तो आपका जीवन अस्त-व्यस्त होगा और व्यर्थ की कठिनाई से आप अपने को पीड़ित अनुभव करते रहेंगे।

समय पर कार्य प्रायः सभी के पूरे हो जाते हैं, इसलिये प्रयास तो जारी रखें, पर घबराहट पैदा कर काम को बोझीला न बनायें। आपका मन भार-मुक्त रहेगा, तो काम अधिक रुचि और जागरुकता के साथ कर सकेंगे। यह स्थिति आपको प्रसन्नता भी देगी और सफलता भी ।

घबराने वाले व्यक्ति फूहड़ माने जाते हैं, उनका कोई काम सही नहीं होता। पुस्तकें लिये बैठे हैं, पर फेल हो जाने की घबराहट सता रही है। फलतः पेज तो खुला है, पर मन कहीं और जगह घूम रहा है। एक गलती आप से हो गई है, उसे छिपाने के चक्कर में आपका दिमाग सही नहीं है, कहीं गड्ढे में गिर जाते हैं, कहीं बर्तनों से टकरा कर पाँव फोड़ लेते हैं। सही काम के लिये मन में घबराहट का बोझ न डाला करिये। फल-कुफल की परवाह किये बिना स्वस्थ और पूरे मन से काम किया कीजिए।

स्टेशन की ओर तो जा ही रहे हैं, रेलगाड़ी मिलेगी या नहीं? मस्तिष्क को इस फिसाद में फंसाने का क्या फायदा? यही तो होगा कि गाड़ी स्टेशन पहुँचने के पूर्व छूट जाय और आपको जहाँ जाना है, वहाँ कुछ विलंब से पहुँचना हो। आप जहाँ जा रहे हैं या जो कुछ पूरा कर रहे हैं। उसका भी तो यही लक्ष्य होगा कि वह कार्य पूरा हो प्रसन्नता मिले, पर अगली प्रसन्नता के लिये अब की प्रसन्नता क्यों नष्ट करते हैं? पहले से ही मन को अलमस्त क्यों नहीं रखते, यही तो होगा कि कार्य कुछ थोड़ा विलंब से होगा।

अपना क्रम अपनी व्यवस्थायें ठीक रखिये तो आप पायेंगे कि घबराहट के सारे कारण निराधार हैं। आप अपना काम ठीक रखिये, आपको कोई नौकरी से नहीं निकालेगा। दुकान पर रोज बैठते हैं, तो खाने की क्या चिन्ता? दूसरों की बच्चियों की शादियाँ होती हैं,फिर आप की बच्ची कुमारी थोड़ी ही बैठी रहेगी। लड़का स्वस्थ और सदाचारी मिल जाय तो निर्धनता की घबराहट क्यों हो? आप अपनी व्यवस्था के साथ अपना दृष्टिकोण ठीक रखिये, आपकी सारी कठिनाइयाँ अपने आप हल होती रहेंगी।

घबड़ाना तो उन्हें चाहिए, जो हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं। कर्मशील व्यक्ति के लिये असफलता की आशंका नहीं होनी चाहिए।

कार्य करते हुए मानसिक असंतुलन रखना एक बड़ी कमजोरी है। इसी से सारी परेशानियाँ पैदा होती हैं। मन का झुकाव कभी इस ओर , कभी उस ओर होगा तो आप कभी एक काम हाथ में लेंगे और वह पूरा नहीं हो पायेगा, दूसरे काम की ओर दौड़ेंगे। इस गड़बड़ी में आपका न पहला काम पूरा होगा, न दूसरा। सब अधूरा पड़ा रहेगा। आपका मानसिक असंतुलन सब गड़बड़ करता रहेगा और आपकी परेशानियाँ भी बढ़ती जायेंगी।

विचार लड़खड़ा जाते हैं, तो दिनचर्या और कार्यक्रम भी गड़बड़ हो जाते हैं और उल्टे परिणाम निकलते हैं। सवारी पाने की जल्दी में पीछे सामान छूट जाता है। स्वागत की तैयारी में ध्यान ही नहीं रहता और खाना जल जाता है। स्त्रियाँ इसी झोंक में इतनी बेसुध हो जाती हैं कि चूल्हे या स्टोव की आग से उनके कपड़े जल जाते हैं या मकान में आग लग जाती है। प्रत्येक कार्य को एक व्यवस्था के साथ करने का नियम है। एक काम जब चल रहा है, तो दूसरी तरह के विचार को मस्तिष्क में स्थान मत दीजिये। एक बार में एक ही विचार और एक ही कार्य। हड़बड़ाये नहीं, अन्यथा आपका सारा खेल चौपट हो सकता है।

जीवन में उदासी, खिन्नता एवं अप्रसन्नता के वास्तविक कारण बहुत कम ही होते हैं, अधिकाँश का कारण घबराहट से उत्पन्न भय ही होता है। मनुष्य नहीं जानता कि वह इससे अपनी शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का कितना बड़ा भाग व्यर्थ गँवाता रहता है? जिन्होंने जीवन में बड़ी सफलताएं पाई हैं, उन सबके जीवन बड़े सुचारु, क्रमबद्ध और सुव्यवस्थित रहे हैं। जिनके जीवन में विश्रृंखलता होती है, उनके पास सदैव “समय कम होने” की शिकायत बनी रहती है फिर भी अन्त तक कुल मिलाकर एक-दो काम ही कर पाते हैं, पर जिन लोगों ने विधि-व्यवस्था से, धैर्य से चिन्ता-विमुक्त कार्य सँवारे उन्होंने असंख्य कार्य किये। इतनी सफलतायें अर्जित कीं, जो सामान्य व्यक्ति के लिये चमत्कार जैसी लग सकती हैं।

यह भी संभव है कि आपकी दुर्बलता पैतृक हो। आप यह अनुभव करते हों कि जिस परिवार में पैदा हुए हैं, वहाँ की परिस्थितियाँ उतनी अच्छी नहीं थीं। उस घर के लोग असफल, निराश, निर्धन, अपढ़ या किसी अन्य बुराई से ग्रसित रहे हैं और उनका प्रभाव आपके संस्कारों पर भी पड़ा है। पारिवारिक जीवन का व्यक्ति के जीवन पर निःसंदेह बहुत प्रभाव होता है किन्तु अपने मनोबल को ऊँचा उठाकर गई-गुजरी स्थिति में भी आशातीत सफलतायें प्राप्त की जा सकती हैं।

कदाचित आप में ऐसी कमजोरियाँ हों, जिनके कारण आपको घबड़ाहट आती हो। उन कमियों पर गम्भीरतापूर्वक विचार कीजिये। उन्हें अपने माता-पिता, सहपाठियों मित्रों से प्रकट कीजिये और उनसे सहायता लीजिये। जिन लोगों ने छोटी अवस्थाओं से बढ़कर बड़े कार्य किये हों, उनके जीवन चरित्र पढ़िये। अपनी मानसिक कमजोरियों को दूर करने के लिये अपने सहृदय अभिभावकों और मित्रों के प्रति आपका जीवन एक खुली पुस्तक की तरह होना चाहिए, जिसका हर अच्छा-बुरा अध्याय पाठक आसानी से समझ सकता हो। आप अपनी कमजोरियों का हल औरों से पूछिये और उन्हें दूर करने का प्रयत्न किया कीजिये। अब तक आप आत्म-प्रशंसा के लिये अधीर रहते रहे, अब आप आत्मलोचन से प्रसन्न हुआ करिये, तो आपका जीवन प्रतिदिन निखरता हुआ चला जायगा। उसमें शक्ति , साहस और सफलता की कमी न रहेगी।

काम करते समय आपको जब भी निराशा, बोझ या घबराहट लगा करे, उस समय अपने आत्म-विश्वास को जगाने का प्रयत्न किया कीजिये। आध्यात्मिक चिन्तन किया कीजिये। आप यह सोचा करिये कि आप भी दूसरों की तरह एक बलवान् आत्मा हैं, आपके पास शक्तियों का अभाव नहीं है। अभी तक उनका प्रयोग नहीं किया है इसीलिये भय, संकोच या लज्जा आती है। पर अब आपने जान लिया है कि आपकी भी सामर्थ्य कम नहीं है। आप निर्धन परिवार के सदस्य नहीं, वरन् परमात्मा के वंश में उसकी उत्कृष्ट शक्तियाँ लेकर अवतरित हुए हैं फिर आपको घबराहट किस लिये होनी चाहिये?

जब भी कभी आपको कोई मानसिक भय, उलझन या निराशा उत्पन्न हो, आप कुछ देर के लिये एकान्त में चले जाया कीजिये। कल्पना में शुभ और पौरुष पूर्ण चित्र बनाया कीजिये। असफलता की बात मन से जितनी दूर भगा देंगे, उतनी ही आपके अन्दर रचनात्मक प्रवृत्तियाँ जागृत होंगी और आपका जीवन सुख-सुविधाओं से पूर्ण होता चलेगा।

प्रत्येक कार्य शान्ति और स्थिरतापूर्वक किया कीजिये आप महान् आत्मा हैं, आपका जन्म किन्हीं महान् उद्देश्य की पूर्ति के लिये हुआ है। बड़ी सफलता के लिये बड़ा साहस चाहिये। वह साहस आप में सोया है, उसे जागृत करना आपका काम है। आप इस लक्ष्य को समक्ष रखकर शुभ कल्पनाएं किया कीजिये और मन को भय घबराहट तथा निराशा आदि के बोझ से मुक्त रखा कीजिये आपका मन हल्का रहे तो उसमें से रचनात्मक स्रोत फूट पड़ें और आपको सब तरह की सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण कर दें ऋषि की इस प्रार्थना में बड़ा बल हैः—

अपेहि मनसस्पतेऽप क्राम परश्चर। परो निऋत्या आ चक्ष्व बहुधाजीवनोमनः॥

अर्थात्- “मन को अपवित्र करने वाले बुरे विचारों वाले बोझ मुझसे दूर रहें। मेरा चित्त कभी मलिन न हो। मेरी अन्तरात्मा निर्भय और मेरा मन शुभ विचारों वाला हो।


दान की परम्परा चलती रहे

अपने पास धन हो तो उसमें से किसी निर्धन की सहायता कर देना कोई उदार-हृदय व्यक्ति का ही कार्य हो सकता है। यह भी समाज सेवा का एक रूप है। इसे परोपकार भी कह सकते हैं पर हो वह उदार वृत्ति ही। भिखारी को दरवाजे से एक मुट्ठी अनाज देकर भगा देना महत्वपूर्ण नहीं, पर किसी को ऐसी आर्थिक सहायता कर देना जिससे उसकी आजीविका की समस्या हल हो जाय, यह पुण्य की, परमार्थ की बात है।

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर ने एक भिखारी बालक को एक रुपया देकर रोजगार में लगाया था, कुछ दिन में वही व्यक्ति वर्दवान का एक बड़ा साहूकार बना। भिक्षा-जीवन यापन करने से बचाकर विद्यासागर ने उस व्यक्ति को जो नई राह दी उसके लिये वह जीवन-भर उनका कृतज्ञ बना रहा। साथ ही उसके हृदय में भी परोपकार की भावना क्रियाशील रही।

शीत से सिहरते हुये व्यक्ति को थोड़े से कपड़े देकर कष्ट से बचा देना, भूखे को भोजन करा देना, अन्धे को घर तक पहुँचा आना, रोगी की सेवा यह सब मनुष्यता के परिचायक चिह्न हैं। सहृदय व्यक्तियों द्वारा इस तरह से दान की पुण्य परम्परा चलती रहती है और उससे समाज का कुछ भला हो जाता है। यह क्रम सदैव चलते रहना चाहिये, इससे मनुष्य, मनुष्य के बीच आत्मीयता के बन्धन प्रगाढ़ होते हैं। सत्कर्म की प्रेरणायें जागृत होती हैं।

विक्टर ह्यूगो का कथन है— “धन देकर अपनी थैली खाली कर दीजिये, आपका दिल भर जायगा।” धन उन सब वस्तुओं का बोधक है जिससे किसी के अभावों की पूर्ति हो। जिस वस्तु के न मिलने से एक व्यक्ति दुःख पा रहा है वह वस्तु उसे बिना मूल्य दे देना दान कहलाता है। इससे मनुष्य में विनम्रता आती है, सद्गुणों का विकास होता है। दान कोई विवेक-विहीन क्रिया नहीं है। वेद की आज्ञा है—

“शत हस्त समाहर- सहस्र हस्त संकिर।”

अर्थात् —ऐ मनुष्यों, सैकड़ों हाथों से कमाओ और हजार हाथों से उसे दान कर दो।

“आदानं हि विसर्गाय सताँ वारि मुचामिव।” जिस तरह बादल पृथ्वी से जल लेकर फिर उसी में बरसा देते हैं, सज्जनों को भी उसी तरह दान करते रहना चाहिये। भावनापूर्वक दान की हुई वस्तु यज्ञ के समान होती है, उसका सैकड़ों गुना लाभ कालान्तर में मिलता है और दाता के अन्तःकरण में तृप्ति की वृष्टि करता है।

धार्मिक कृत्यों की पूर्णाहुति पर सत्पात्रों को दक्षिणा देने का विधान है। शास्त्रकार का यहाँ कोई ऐसा भाव नहीं रहा कि दान किसी व्यवसाय का रूप धारण कर ले या वह कोई अन्ध-परम्परा बने वरन् यह क्रिया धर्म की सजावट उसकी पूर्णता की दृष्टि से सम्बद्ध की गई है। लोगों की धार्मिक वृत्तियाँ संकुचित न रहें इस दृष्टि से सब कुछ होम कर देने के बाद भी और त्याग करने की भावना विद्यमान रहनी चाहिये। दान, दक्षिणा इसी भावना का प्रतीक है।

साधनों की बहुतायत का लाभ दूसरों को देना मनुष्य की श्रेष्ठता का लक्षण है। अपने स्वार्थों तक ही सीमित रहने का भाव छोटेपन की निशानी है। सज्जन पुरुष अपनी सुविधाओं का एक अंश उदारतापूर्वक दूसरों को देकर अपना बड़प्पन स्थिर रखते हैं। समाज की सुव्यवस्था और प्रगतिशील साम्यवाद की दृष्टि से ऐसी प्रक्रियायें समाज में चलती रहनी चाहिएं। सन्त कबीर की कहावत प्रसिद्ध है—

जो जल बाढै़ नाव में घर में बाढ़ै दाम। दोनों हाथ उलीचिये यही सयानो काम॥

“दान से दुर्गति का नाश होता है” यह शब्द यों सार्थक होते हैं कि जब भी किसी को कुछ देने की बात मन में आती है तो उसके साथ ही दया और करुणा के, आत्मीयता और सहानुभूति के भाव भी जागृत होते हैं। भावनाओं का यह परिष्कार आत्म-विकास की आवश्यक शर्त है, जो दान की परम्परा के साथ बड़ी सजीवता से जागृत होती है। दान से दोनों पक्षों को समान सुख मिलता और आत्म-भाव का आदान-प्रदान होता है। सद्भावनायें अन्तःकरण को शीतल रखती हैं और उस पर दुष्प्रवृत्तियों का सहसा आक्रमण नहीं होता। दान देना यह इंगित करता है कि हमारे अन्दर का देव भाग प्रचुर मात्रा में क्रियाशील है, इस स्थिति में पाप और पतन से घबड़ाने की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य निर्भय रहता है।

मनुष्य के जीवन में आत्म-दर्शन का एक पहलू होता है अपनी बुराइयों से संघर्ष करना। यह ध्वंसात्मक स्थिति है इसलिये कुविचारों पर विजय हो जाने पर भी शक्ति का एक अंश अनावश्यक व्यय हो जाता है। प्रायश्चित में शक्ति और चेष्टायें दोनों प्रयुक्त होते हैं। दान इसका रचनात्मक पहलू है और उससे मनोविकारों से सहज ही निवृत्ति हो जाती है।

मनुष्य जीवन को सार्थक करने में दान का असाधारण महत्व है इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। जब तक समाज जीवित है तब तक यह प्रक्रिया किसी न किसी रूप में अवश्य जीवित रहेगी पर अब दान देने और लेने की प्रवृत्तियाँ कुछ दूषित हो चली हैं इसलिये न तो देने वालों को ही कुछ आत्म-सन्तोष होता है और न पाने वालों का उपकार होता है। कारण एक ही है पात्रता का अभाव। न देने वाले ही भावनापूर्वक देते हैं और न पाने वाले ही उसके अधिकारी रह गये हैं। दान का अर्थ अब भावनात्मक परिष्कार न रहकर स्वर्ग और मुक्ति की प्राप्ति अथवा प्रदर्शन की भावना मात्र रह गई है। दान लेने का अधिकार समाज सेवी या अशक्त व्यक्तियों को रहा है पर अब यह क्षेत्र भी पवित्र नहीं रहा। दान ने अब भीख माँगने का रूप ले लिया। शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ, पर अकर्मण्य और आलसी व्यक्ति ही दान ले रहे हैं। इस तरह दुष्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहन मिलता है। तात्पर्य यह है कि दान का सात्विक उद्देश्य इन दिनों किसी भी क्षेत्र में पूरा होता नहीं जान पड़ता। सब तरफ विकृति दिखाई दे रही है।

पूर्वकाल में समाज-सेवी व्यक्ति धर्म शिक्षण का कार्य करते थे। उन्हें ब्राह्मण कहते थे। ये लोग तपश्चर्या की अग्नि में तपकर अनुभव सिद्ध, गुणी, चरित्रवान् और ज्ञानी होते थे। समाज विकारग्रस्त न होने पाये इसलिये सन्मार्ग का उपदेश देना ही उनका लक्ष्य होता था। यह लोग निरन्तर ज्ञान दान करते थे और उसका प्रभाव यह होता था कि समाज बुराइयों से बचा रहता था और उसमें सतोगुणी प्रवृत्तियाँ चलती रहती थीं। यह दान मनुष्य का वास्तविक कल्याण करने वाला होता था इसलिये ऐसे व्यक्तियों को समाज में अधिक सम्मान की दृष्टि से जाता देखा था और उनके जीवनयापन का भार लोग खुशी-खुशी वहन कर लेते थे।

इस युग में ज्ञान की बड़ी आवश्यकता है। स्थूल दान का महत्व अब इसलिये कम हो गया है कि उनमें पात्र-कुपात्र का अन्दाज नहीं होता पर ज्ञान की आवश्यकता अच्छे-बुरे हर व्यक्ति के लिये है। उससे किसी का अहित नहीं हो सकता और न ही उस दान का दुरुपयोग किया जा सकता है।

ज्ञान मनुष्य के सर्वतोमुखी विकास का साधन है। समाज में ज्ञानवान् व्यक्ति अधिक सुखी और सन्तुष्ट समझे जाते हैं। समाज का एक वर्ग इस तरह का हो और दूसरा मूढ़ताग्रस्त हो तो वह समाज दुःखी समाज होगा। ज्ञान का उद्देश्य मानव मात्र को एक स्तर पर लाना है। यह कार्य निःसन्देह कुछ कठिन है पर इसका महत्व अत्यधिक है। आज की स्थिति में सर्वोच्च दान “ज्ञान” का मानें तो वह सर्वथा उपयुक्त ही होगा।

मनुष्यों पर ऋषियों का भी एक ऋण है। ऋषि का अर्थ है वेद। वेद अर्थात् ज्ञान। आज का हमारा जो विकास हुआ है उसका श्रेय ज्ञान को है, ऋषियों को है। जिस तरह हम यह ज्ञान दूसरों से ग्रहण कर विकसित हुये हैं उसी तरह अपने ज्ञान का लाभ औरों को भी देना चाहिये। यह हर विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वे समाज के विकास में अपने ज्ञान का जितना अंश दान कर सकते हों वह अवश्य करना चाहिये।

ज्ञान-दान मनुष्य को सन्मार्ग की ओर ले जाने के लिये किया जाता है इसलिये यह अन्य दानों की अपेक्षा अधिक सार्थक होता है।

जो प्रत्यक्ष या परोक्ष, विचार, वाणी या सत्साहित्य पढ़ाकर दूसरों को ऊँचे उठाने का प्रयत्न करते हैं वे सच्चे अर्थों में ब्राह्मण हैं, उन्हीं के दान को सर्वश्रेष्ठ दान कहेंगे। आज इसी दान की विश्व को आवश्यकता है।


राष्ट्रीयता का उपासक-सम्राट समुद्रगुप्त

गुप्त-वंश एवं गुप्त-साम्राज्य का सूत्रपात सम्राट चन्द्रगुप्त प्रथम ने किया है, तथापि उस वंश का सबसे यशस्वी सम्राट समुद्रगुप्त को ही माना जाता है। इसके एक नहीं, अनेक कारण हैं। एक तो समुद्रगुप्त बहुत वीर था, दूसरे महान् कलाविद्! और इन गुणों से भी ऊपर राष्ट्रीयता का गुण सर्वोपरि था।

भारतीय सम्राटों में से जिन महान् वैदिक परम्पराओं का लोप हो गया था, समुद्रगुप्त ने उनकी पुनर्स्थापना की। उनमें से एक अश्वमेध यज्ञ भी था। सम्राट समुद्रगुप्त ने जिस अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया था, उसमें उसका दृष्टिकोण मात्र भी यश, विजय तथा स्वर्ग न था। समुद्रगुप्त का उद्देश्य उसके राज्य के अतिरिक्त भारत में फैले हुए अनेक छोटे-मोटे राज्यों को एक सूत्र में बाँधकर एक छत्र कर देना था, जिससे भारत एक अजेय शक्ति बन जाये और आये-दिन खड़े आक्राँताओं का भय सदा के लिए दूर हो जाये।

समुद्रगुप्त अच्छी तरह जानता था कि छोटे-छोटे टुकड़ों में विभक्त देश कभी भी एक शक्तिशाली राष्ट्र नहीं बन पाता है और इसीलिए देश सदैव विदेशी आक्राँताओं का शिकार बना रहता है। जिस देश की सम्पूर्ण भूमि एक ही छत्र, एक ही सम्राट अथवा एक ही शासन-विधान के अंतर्गत रहती है, वह न केवल आक्राँताओं से सुरक्षित रहती है, अपितु हर प्रकार से फलती-फूलती भी है। उसमें कृषि, उद्योग तथा कला-कौशल का विकास भी होता है। उसकी आर्थिक उन्नति और सामाजिक सुविधा न केवल दृढ़ ही होती है, बल्कि बढ़ती भी है।

सम्राट समुद्रगुप्त देश-भक्त सम्राट था। वह केवल वैभवपूर्ण राज्य सिंहासन पर बैठ कर ही संतुष्ट नहीं था, वह उन लोलुप एवं विलासी शासकों में से नहीं था, जो अपने एशो-आराम की तुलना में राष्ट्र-रक्षा, जन-सेवा और सामाजिक विकास को गौण समझते हैं। मदिरा पीने और रंग-भवन में पड़े रहने वाले राजाओं की गणना में समुद्रगुप्त का नाम नहीं लिखा जा सकता है। वह एक कर्मठ, कर्तव्य-निष्ठ तथा वीर सम्राट था।

जिस समय पिता की मृत्यु के बाद समुद्रगुप्त ने राज्य-भार सँभाला, भारत में अन्य अनेक राज्य भी थे। जिनका काम था, प्रजा का शोषण करना और भोग-विलास में डूबा रहना। यद्यपि अधिकतर राजाओं की यह नीति रहती थी कि वे किसी अन्य राजा की कर्म-विधि में न कोई हस्तक्षेप करते थे और न कोई अभिरुचि रखते थे। किसी राजा की प्रजा सुखी है अथवा दुःखी, इसकी उन्हें कोई चिन्ता न होती थी और न वे इस बात से कोई सरोकार रखते थे। किन्तु सम्राट समुद्रगुप्त का मानव हृदय यह न देख पाता था। वह सारे संसार के मानवों के प्रति करुणा का भाव रखता था। वह रघु और राम जैसे आदर्श राजाओं की नीति परम्परा का समर्थक और यथासंभव उनके चरण चिन्हों का अनुगमन करने का प्रयास किया करता था।

भारत-भूमि के एकीकरण के मन्तव्य से समुद्रगुप्त ने अपनी दिग्विजय-यात्रा प्रारम्भ की। सबसे पहले उसने दक्षिणापथ की ओर प्रस्थान किया और महानदी की तलहटी में बसे दक्षिण-कौशल महाकान्तार, पिष्टपुर, कोहूर, काँची, अवमुक्त , देव-राष्ट्र तथा कुस्थलपुर के राजा महेन्द्र, व्याघ्रराज महेन्द्र, स्वामिदत्त, विष्णुगोप, कोलराज, कुबेर तथा धनञ्जय को राष्ट्रीय-संघ में सम्मिलित किया। उत्तरापथ की ओर उसने गणपति-नाग, रुद्रदेव, नागदत्त, अच्युत-नन्दिन, चन्द्रबर्मन, नागसेन, बलवर्मन आदि आर्यवर्त के समस्त छोटे-बड़े राजाओं को एक सूत्र में बाँधा। इसी प्रकार उसने मध्य-भारत के जंगली शासकों तथा पूर्व-पश्चिम के समतट, कामरुप, कर्तृपुर, नैपाल, मालव, अर्जुनायन, त्रौधेय, माद्रक, आभीर, प्रार्जुन, सनकानिक, काक और खर्पपरिक आदि राज्यों को एकीभूत किया।

इस दिग्विजय में समुद्रगुप्त ने केवल उन्हीं राजाओं का राज्य गुप्त-साम्राज्य में मिला लिया, जिन्होंने बहुत कुछ समझाने पर भी समुद्रगुप्त के राष्ट्रीय उद्देश्य के प्रति विरोध प्रदर्शित किया था। अन्यथा उसने अधिकतर राजाओं को रणभूमि तथा न्याय-व्यवस्था के आधार पर ही एक छत्र किया था। अपने विजयाभिमान में सम्राट समुद्रगुप्त ने न तो किसी राजा का अपमान किया और न उसकी प्रजा को संत्रस्त। क्योंकि वह जानता था कि शक्ति बल पर किया हुआ संगठन क्षणिक एवं अस्थिर होता है। शक्ति तथा दण्ड के भय से लोग संगठन में शामिल तो हो जाते हैं किन्तु सच्ची सहानुभूति न होने से उनका हृदय विद्रोह से भरा ही रहता है और समय पाकर फिर वे विघटन के रूप में प्रस्फुटित होकर शुभ कार्य में भी अमंगल उत्पन्न कर देता है।

किसी संगठन, विचार अथवा उद्देश्य की स्थापना के लिये शक्ति का सहारा लेना स्वयं उद्देश्य की जड़ में विष बोना है। प्रेम, सौहार्द, सौजन्य तथा सहस्तित्व के आधार पर बनाया हुआ संगठन युग-युग तक न केवल अमर ही रहता है बल्कि वह दिनों-दिन बड़े ही उपयोगी तथा मंगलमय फल उत्पन्न करता है।

साधारणतः मनुष्य अपने संस्कारों के प्रति बड़ा दुराग्रही होता है। बुरे से बुरे अनुपयोगी तथा अहितकर संस्कारों के स्थान पर वह शुभ एवं समय-सम्मत संस्कारों को आसानी से सहन नहीं कर पाता। प्राचीन के प्रति अनुरोध तथा अर्वाचीन के प्रति विरोध उसका सहज स्वभाव बन जाता है। समाज में इस प्रकार के प्राचीन संस्कार रखने वाले लोगों की कमी नहीं होती, और वे उनके प्रति किसी सुधार का सन्देश सुनते ही अनायास ही संगठित होकर नवीनता के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं। ऐसे अवसर पर यदि किसी शक्ति का सहारा लेकर उन्हें नवीन संस्कारों में दीक्षित करने का प्रयत्न किया जाता है तो एक संघर्ष या निरर्थक टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है जिससे समाज अथवा राष्ट्र शक्तिशाली होने के स्थान पर निर्बल ही अधिक बन जाता है।

अतएव समझदार समाज सुधारक, बुद्धिमान राष्ट्रनायक विचार बल से ही किसी परिवर्तन को लाने का प्रयत्न किया करते हैं। हठ से हठ का जन्म होता है। यदि कोई अपने शुभ विचारों को भी हठात किसी अविचारी के मत्थे मढ़ना चाहता है तो उसकी प्रतिक्रिया के फलस्वरूप वह अपने अविचार के प्रति ही दुराग्रही हो जाता है। किसी बाह्य शक्ति का सहारा लेने की अपेक्षा अपने उन विचारों को ही तेजस्वी बनाना ठीक होता है जिनको कोई हितकर समझकर समाज अथवा व्यक्ति में समावेश करना चाहता है। विचारों का समावेश आचरण बल से ही होता है। जिसका आचरण शुद्ध है चरित्र उज्ज्वल और मन्तव्य निःस्वार्थ है उसके विचार तेजस्वी होंगे ही, जिन्हें क्या साधारण और क्या असाधारण कोई भी व्यक्ति स्वीकार करने के लिये सदैव तत्पर रहेगा।

यद्यपि राष्ट्र को एक करने के लिये परम्परा के अनुसार समुद्रगुप्त ने सेना के साथ ही प्रस्थान किया था, किन्तु उसको शायद ही कहीं उसका प्रयोग करना पड़ा हो। नहीं तो अधिकतर राजा लोग उसके महान राष्ट्रीय उद्देश्य से प्रभावित होकर की एक छत्र हो गये थे। कहना न होगा कि जहाँ समुद्रगुप्त ने इस राष्ट्रीय एकता के लिये अथक परिश्रम किया वहाँ उन राजाओं को भी कम श्रेय नहीं दिया जा सकता जिन्होंने निरर्थक राजदर्प का त्याग कर संघबद्ध होने के लिये बुद्धिमानी का परिचय दिया। जिस देश के अमीर-गरीब, छोटे-बड़े तथा उच्च निम्न सब वर्गों के निवासी एक ही उद्देश्य के लिये बिना किसी अन्यथा भाव के प्रसन्नतापूर्वक एक ध्वज के नीचे आ जाते हैं वह राष्ट्र संसार में अपना मस्तक ऊँचा करके खड़ा रहता है। इसके विपरीत राष्ट्रों के पतन होने में कोई विलम्ब नहीं लगता।

सम्राट समुद्रगुप्त ने अपने प्रयास बल पर सैकड़ों भागों में विभक्त भरत भूमि को एक करके वैदिक रीति से अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया जो कि बिना किसी विघ्न के सम्पूर्ण हुआ, और वह भारत के चक्रवर्ती सम्राट के पद पर प्रतिष्ठित हुआ। उस समय भारतीय साम्राज्य का विस्तार ब्रह्मपुत्र से चम्बल और हिमालय से नर्मदा तक था।

भारत की इस राष्ट्रीय एकता का फल यह हुआ कि लंका के राजा मेघवर्मन, उत्तर-पश्चिम के दूरवर्ती शक राजाओं, गाँधार के शाहिकुशन तथा काबुल के आक्सस नदी तक राज्य करने वाले शाहाँशु आदि शासकों ने स्वयं ही अधीनता अथवा मित्रता स्वीकार कर ली।

इस प्रकार सीमाओं सहित भारत की आन्तरिक सुरक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाकर समुद्रगुप्त ने प्रजा रंजन की ओर ध्यान दिया। यह समुद्रगुप्त के संयमपूर्ण चरित्र का ही बल था कि इतने विशाल साम्राज्य का एक छत्र स्वामी होने पर भी उसका ध्यान भोग-विलास की ओर जाने के बजाय प्रजा जन की ओर गया। सत्ता का नशा संसार की सौ मदिराओं से भी अधिक होता है। उसकी बेहोशी सँभालने में एक मात्र आध्यात्मिक दृष्टिकोण ही समर्थ हो सकता है। अन्यथा भौतिक भोग का दृष्टिकोण रखने वाले असंख्यों सत्ताधारी संसार में पानी के बुलबुलों की तरह उठते और मिटते रहे हैं, और इसी प्रकार बनते और मिटते रहेंगे।

चरित्र एवं आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अभाव में ही कोई भी सत्ताधारी फिर चाहे वह राजनीतिक क्षेत्र का हो अथवा धार्मिक क्षेत्र का मदाँध होकर पशु की कोटि से भी उतरकर पिशाचता की कोटि में उतर जाते है।

सम्राट समुद्रगुप्त ने अश्वमेध के समन्वय के बाद जहाँ ब्राह्मणों को स्वर्ण मुद्रायें दक्षिणा में दीं वहाँ प्रजा को भी पुरस्कारों से वंचित न रक्खा। उसने यज्ञ की सफलता की प्रसन्नता एवं स्मृति में अनेकों शासन सुधार किये, असंख्यों वृक्ष लगवाये, कुएँ खुदवाये और शिक्षण संस्थाएँ स्थापित कीं।

एकता एवं संगठन के फलस्वरूप भारत में धन-धान्य की वृद्धि हुई। प्रजा फलने और फूलने लगी। बुद्धिमान समुद्रगुप्त को इससे प्रसन्नता के साथ-साथ चिन्ता भी हुई। उसकी चिन्ता का एक विशेष कारण यह था कि धन-धान्य की बहुतायत के कारण प्रजा आलसी तथा विलासप्रिय हो सकती है। जिससे राष्ट्र में पुनः विघटन तथा निर्बलता आ सकती है। राष्ट्र को आलस्य तथा उसके परिणामस्वरूप जड़ता की सम्भावना के अभिशाप से बचाने के लिये सम्राट ने स्वयं अपने जीवन में संगीत, कला, कौशल तथा काव्य साहित्य की अवतारणा की। क्योंकि वह जानता था कि यदि वह स्वयं इन कलाओं तथा विशेषताओं को अपने जीवन में उतारेगा तो स्वभावतः प्रजा उसका अनुकरण करेगी ही। इसके विपरीत यदि वह विलास की ओर अभिमुख होता है तो प्रजा बिना किसी अवरोध के आलसी तथा विलासिनी बन जायेगी।

प्रजा के कल्याणार्थ सम्राट समुद्रगुप्त ने संगीत, काव्य तथा चित्रकला का स्वयं अभ्यास ही नहीं किया प्रत्युत्तर उसमें निष्णात बना, जिसका फल यह हुआ कि उस समय के भारत में सब से अधिक कवि कलाकार तथा चित्र एवं मूर्तिकार हुये हैं। अपने युगीन भारत की विजयों तथा विशेषताओं की इन कलाओं के स्मृति रूप में समुद्रगुप्त ने समय-समय पर जो सिक्के चलाये उनमें किसी पर स्वयं को वीणा लिये अंकित कराया, किसी पर विजय श्री के रूप में साम्राज्ञी, अश्व तथा कृपाण को अंकित कराया है।

इस केवल एक संयमी सम्राट के हो जाने से भारत का वह काल इतिहास में स्वर्णयुग के नाम से प्रसिद्ध है, तो भला जिस दिन भारत का जन-जन संयमी तथा चरित्रवान बन सकेगा उस दिन यह भारत, यह विशाल भारत उन्नति के किस उच्च शिखर पर नहीं पहुँच जायेगा?


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इन्द्रियाणाँ विचरंता विषयेष्वपहारिषु। संयमे यत्नमातिष्ठे द्विद्वान्यन्तेव वाजिनाम॥

जिस प्रकार सारथी घोड़ों पर नियंत्रण रखता है, उसी प्रकार विद्वान को विषयों की ओर आकर्षित इन्द्रियों पर संयम रखना चाहिये।

इन्द्रियाणाँ प्रसंगेन दोषमृच्छत्य संशयम। संनियम्य तु तान्येव ततः सिद्धिम नियच्छति॥

इन्द्रियों के विषयासक्त होने से मनुष्य में दोष आ जाते हैं और उनके निग्रह से अपने अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है इसमें संशय की बात नहीं।

न जातु कामः कामा ना मुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभि वर्धते॥

इच्छायें, इच्छाओं की पूर्ति से कभी शान्त नहीं होतीं, अपितु वे उल्टे अग्नि में घी डालने की भाँति और बढ़ती हैं।


स्वभाव संशोधन पर एक विचार-दृष्टि

प्रायः लोगों को यह शिकायत रहती है क्या करें, आदत तो बुरी है, पर अभ्यास में आ गई हैं छूटती नहीं। गन्दी और निकम्मी आदतों पर बहुधा लोग ऐसी सफाई दिया करते हैं। पान खाना, बीड़ी पीना, सिनेमा देखना, अश्लील गाने गाना, बुरे लोगों की संगति, कुटिल-कुटेव, कुविचार—इनको अपने स्वभाव की बुराई मानते हुये भी लोग उन्हें छोड़ने से घबराते हैं। उन्हें ऐसा लगता है जैसे यह आदतें छूट जायेंगी तो कोई हानि हो जायगी, अपने मित्र साथ छोड़ देंगे या जीवन का आनन्द जाता रहेगा। इस तरह की विचारणा बिलकुल निम्न स्तर की है। भूल सुधार मनुष्य का सबसे बड़ा विवेक है। बुरे स्वभाव को अच्छे स्वभाव में बदल लेना मनुष्य की सब से बड़ी चतुराई है। स्व-संशोधन इतनी बड़ी समस्या नहीं जिसे पूरा न किया जा सके। मनुष्य अपने आपको बदल भी सकता है।

लोग तरह-तरह की योजनायें बनाते हैं। कल से प्रातःकाल जल्दी उठा करेंगे और टहलने जाया करेंगे, सिगरेट पीना कम करेंगे और धीरे-धीरे उसे छोड़ देंगे। सप्ताह में एक बार ही सिनेमा देखने जायेंगे। चाय के स्थान पर दूध लिया करेंगे। बुरी आदतों को छोड़ने के लिये योजनायें तो बहुत बनती हैं पर चाहकर भी वे ऐसा कर नहीं पाते। मान्यता भले ही अनुकूल हो पर यदि व्यवहारिकता में कोई परिवर्तन नहीं आता तो योजनायें भी किसी काम की नहीं होतीं। तब फिर एक प्रश्न सामने आता है कि क्या इन आदतों से मुक्ति पाने को कोई उपाय नहीं है? मनुष्य का जो अच्छा-बुरा जीवन-क्रम बन गया है क्या उसमें किसी तरह के परिवर्तन की गुँजाइश नहीं? इस तरह के उलझन भरे प्रश्न प्रायः लोग उठाते हैं, अपने मित्रों, अध्यापकों या अभिभावकों से भी समस्या के हल में मदद माँगते हैं।

आदत सुधार का अर्थ सामान्यतया बुरी आदतों के सुधार से लिया जाता है। यहाँ भी इन्हीं पर विचार किया जाना है। मनुष्य में अच्छी-बुरी दोनों ही तरह की आदतें होती हैं वह स्वभाव शून्य रह नहीं सकता। इसलिये विचारणीय प्रश्न यह है कि बुराइयों का सुधार या निष्कासन किस तरह किया जाय। स्वभाव की गहराइयों में प्रविष्ट आदतों का सुधार करना होता भी कठिन है। वैज्ञानिक सत्य है कि मन के अभ्यास में जो आदतें पड़ जाती हैं वे बुरी ही क्यों न हों वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता। पर चूँकि उनसे शारीरिक, आर्थिक या नैतिक हानि होती है, कष्ट मिलता है या लज्जा का अनुभव होता है अतः लोग उनसे बचना भी चाहते हैं। इसके लिये कुछ लोग संकल्प भी लेते हैं, सौगन्ध भी खाते हैं तो भी बात निभती नहीं और इन्द्रियों की अभ्यासगत् उत्तेजना के आगे उन्हें परास्त हो जाना पड़ता है।

साधारण काम-काज की आदतों में जो बुराइयाँ होती हैं उन्हें तो लोग आसानी से सुधार सकते हैं। घर में झाडू लगाना, कपड़े धोना, दातौन करना, प्रातःकाल उठना, मालिश करना, टहलना आदि इनमें कुछ देर के लिये तात्कालिक प्रसन्नता का अनुभव भी होता है अतः ऐसी स्वाभाविक कमजोरियों को ठीक करने में कुछ अधिक श्रम करना नहीं पड़ता। घर का सामान ठीक-व्यवस्थित ढंग से रखना, टाइम से सो जाना, कम बातें करना, यह आदतें ऐसी हैं जिन्हें मामूली सावधानी से भी ठीक किया जा सकता है। शरीर-सम्बन्धी कई छोटी-छोटी आदतें, बच्चों के साथ, धर्म-पत्नी के साथ व्यवहार, बर्ताव में यदि थोड़ी सावधानी ही रखें तो उससे अनेकों कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं।

हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि आदतों का निर्माण मनुष्य स्वयं करता है। अतः आदतों के सुधार में विवशता प्रकट करना उचित नहीं है। अँगरेज कवि ड्राइडेन का कथन है “मनुष्य पहले आदतें बनाता है बाद में आदतें मनुष्य को बनाती हैं।” इस कथन से यही शिक्षा मिलती है कि आदतों के निर्माण में मनुष्य पूर्ण स्वतंत्र है अतः कुछ आदतों का सुधार मनुष्य स्थानापन्न सिद्धान्त से कर सकता है। गिलास में भरी हुई हवा को निकालने का सबसे अच्छा तरीका है उसमें पानी भर दिया जाय। साइकिल का ट्यूब फट रहा होता है तो साइकिल चालक उसकी हवा निकाल देते हैं। बिजली घरों में शक्ति मात्रा से अधिक होकर मशीन पर विपरीत प्रभाव न डाले इसके लिये एक तार जमीन में गाड़ देते हैं। अनावश्यक आदतों के स्थान पर यदि कुछ उपयोगी और मूल्यवान् आदतों को बदला जा सके तो कुछ गन्दी आदतें सुविधापूर्वक छूट सकती हैं। सिनेमा में धन बरबाद करने की अपेक्षा उपयोगी पुस्तकें, चरित्र निर्माण की कहानियाँ, महापुरुषों के जीवन चरित्र, कथानक-काव्य आदि से भी वही आनन्द मिल सकता है जो सिनेमा से मिल सकता था। इतना ही नहीं यह लाभ अधिक ठोस और रचनात्मक होगा। इससे मन और बुद्धि का विकास भी होगा। यदि कोई मनुष्य अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहता है तो उसे चाहिये कि वह अपनी बुरी आदतों से छुटकारा पाने का प्रयत्न करे। उसके लिये यह उपाय कहीं अधिक अच्छा है कि अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिये अच्छी आदतों का अभ्यास करे। स्वाध्याय, सत्संग, भ्रमण, स्वास्थ्य-संवर्द्धन, प्रेमालाप, मैत्री आदि सद्गुणों का विकास करने से कई बुराइयाँ अपने आप छूट जाएंगी, कई दूर बनी रहेंगी।

बुरी आदतों को छोड़ना कठिन भले ही हो पर बिलकुल असंभव नहीं। किसी बुरी आदत से मुक्ति की दिशा में सबसे पहले यह आवश्यक है कि मनुष्य के मन में सुधार की तीव्र आकाँक्षा हो। यह इच्छा जितनी बलवती होगी उतना ही संकल्प दृढ़ होगा, मनोबल बढ़ा हुआ होगा। देखा गया है कि आवेश में आकर लोग सिगरेट आदि पीना छोड़ देते हैं पर उनका मनोबल इतना कमजोर होता है कि इन्द्रियों की हड़क उठते ही वे अपने पुराने ढर्रे में आ जाने के लिये मजबूर हो जाते हैं। हमें यह जानना चाहिये कि किसी भी महत्वपूर्ण कार्य का सम्पादन सच्ची आकाँक्षा से ही होता है। इसके बिना कुछ भी संभव नहीं। आदतों को बदलने के लिये भी दृढ़ मनोबल की आवश्यकता है। संकल्प की अजेय शक्ति से ही दुष्ट आदतों का निवारण हो सकता है। इस बात की गाँठ बाँध लेनी चाहिये।

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर विलियम जेम्स से किसी व्यक्ति ने ऐसी ही शिकायत की और उस बुरी आदत से छूटने का उपाय पूछा तो उन्होंने कहा “किसी आदत को तोड़ने के लिये मनुष्य को पूरे मन से निश्चय करना चाहिये और इस निश्चय को क्रियान्वित करते समय एक भी अपवाद नहीं आने देना चाहिये।”

जो लोग बुराई को धीरे-धीरे खतम करने की बात कहते हैं वे यथार्थतः पूर्ण निश्चय से परे होते हैं। उपरोक्त सिद्धान्त के अनुसार उनके संकल्प में अपवाद बना रहता है। धीरे-धीरे छोड़ेंगे—इसका अर्थ है चित्त अभी दुविधा की स्थिति में है वह छोड़ भी सकता है और नहीं भी। इस स्थिति के रहते हुये कोई महत्वपूर्ण सफलता नहीं मिल सकती। मन बहलाव या बाल-बुद्धि के लोगों को समझाने के लिये कोई ऐसा भले ही कह दे पर सच बात तो यही है कि आदतों का सुधार पूर्ण इच्छा से किया जाना चाहिये।

इस सम्बन्ध में एक सुभीता यह हो सकता है कि जिस बुराई को छोड़ना चाहते हैं उसके सम्बन्ध में सदैव उन हानियों पर विचार किया करें जो उस स्वभाव के कारण पैदा होतीं या हो सकती हैं। तम्बाकू-पान खाने वाले यह सोच सकते हैं कि इससे फेफड़े खराब होंगे, रक्त अशुद्ध होगा, पाचन-क्रिया पर दूषित प्रभाव पड़ेगा। इससे मुँह तथा फेफड़े का कैन्सर हो सकता है। मुँह से बदबू आती है इत्यादि। इस तरह के विचार करने लगेंगे तो कितनी ही अव्यक्त हानियाँ भी समझ में आने लगेंगी और उस बुराई से बचना आसान हो जायगा।

जिन नशों की आपको आदत पड़ी हो उनके बारे में ऐसी कल्पना कीजिये कि वह आपके पेट पर बुरा असर डालते हैं, स्नायु-संस्थान को शिथिल करते हैं, आँखों की ज्योति नष्ट करते हैं और वीर्य को निर्बल बनाते हैं, तो आपके अन्तःकरण से उसके प्रति घृणा उत्पन्न होगी। बुराइयों के बुरे पहलू को जब तक नहीं देखते तब तक घृणा उत्पन्न नहीं होती। वासना से उत्पन्न शारीरिक दुर्बलता का ध्यान पहले से हो जाय तो काम-प्रवृत्ति पर अंकुश लगाया जाना संभव हो सकता है। जिस तरह बुरी आदत से उत्पन्न बुरे परिणामों का चिन्तन करने से उसके प्रति घृणा उत्पन्न होती है उसी तरह उससे छुटकारा मिलने पर होने वाले लाभों का चिन्तन करना आनन्द का विषय भी बनाया जा सकता है। सिगरेट पीना छूट जायगा तो प्रतिदिन 40 पैसे बचेंगे। एक महीने में 7॥ रुपये और एक वर्ष 84 रुपये बचेंगे। इस तरह की बचत यदि 10 वर्ष की तो पोस्ट आफिस में 900 रुपये की रकम जमा हो सकती है। इसका ब्याज जो बनेगा सो अलग। इसी तरह शरीर स्वस्थ रहेगा। खाँसी नहीं आयेगी। बीमारी का भय नहीं रहेगा। फेफड़े शुद्ध रहेंगे। इन सारे लाभों पर आप प्रसन्नता व्यक्त करते रहिये तो बुराई छोड़ने से उत्पन्न मानसिक अस्थिरता आपको तंग नहीं करेंगी। वरन् आपको अपने उद्देश्य में सफल हो जाने की प्रसन्नता ही अनुभव होगी।

आदत बदलने की यह क्रियायें पूर्णतया मनोवैज्ञानिक हैं। इनका उपयोग यदि स्व-संशोधन में किया जा सके तो मनुष्य बुराइयों को दूर करने में आशाजनक सफलता प्राप्त कर सकता है। यह कहते रहने से किसी समस्या का हल नहीं निकलता। उसके लिये रचनात्मक कदम भी उठाने पड़ते हैं तभी कुछ लाभ दिखाई दे सकते हैं। अपनी आदतों का सुधार कर जो आत्म-निर्माण के कार्यों में प्रवृत्त होते हैं उनका जीवन सुखी और समुन्नत भी होता है। हमें भी अपने जीवन के पुनर्निर्माण पर सदैव गम्भीर दृष्टि रखनी चाहिये।


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यो यमर्थ प्रार्थयन्ते यदर्थ घटतेऽपि च। अवश्यं तदवाप्नोति न चेच्छ्रन्तो निवर्तते॥

जो जिस लक्ष्य को चाहता है और जिसके लिए प्रयत्न करता है, उसको वह अवश्य पा लेता है, यदि श्रान्त होकर उसको छोड़ नहीं देता है।


मानवता का सच्चा सेवक—लुई पास्ट्युर

मानवता की सेवा करने के लिये किस प्रकार की तत्परता, तन्मयता, त्याग एवं तपस्या की आवश्यकता पड़ती है, यदि कोई यह जानना चाहे तो उन्नीसवीं शताब्दी के महान वैज्ञानिक लुई पास्ट्युर के जीवन पर दृष्टिपात कर ले।

लुई पास्ट्युर का जन्म फ्राँस के डोल नाम स्थान पर 27 दिसम्बर सन् 1822 ई. को हुआ। इनका परिवार वास्तव में एक मजदूर परिवार था। इनके पिता चमड़े का साधारण व्यवसाय किया करते थे।

घर का वातावरण ही कुछ ऐसा था कि लुई पास्ट्युर को पढ़ने-लिखने में कुछ रुचि नहीं थी। किन्तु उनके पिता की हार्दिक इच्छा थी कि उनका पुत्र पढ़-लिखकर एक अच्छा विद्वान बने और संसार में नाम पैदा करे।

लुई पास्ट्युर जब-जब पिता का हाथ बटाने के लिये उनके साथ काम करने बैठता था तब-तब वे उससे कहा करते थे कि—लुई, मेरी बड़ी इच्छा है कि तुम पढ़-लिखकर विद्वान बनो। किन्तु मैं देखता हूँ कि मेरी यह इच्छा पूरी न हो सकेगी। एक तो यों ही मेरी परिस्थिति तुम्हें उच्च शिक्षा दिला सकने योग्य नहीं है, दूसरे यदि मैं अपना सर्वस्व बेचकर, ऋण लेकर अथवा भूखा रहकर तुम्हारा पढ़ाई का प्रबन्ध कर भी दूँ तो तुम्हारा मन पढ़ाई की ओर न देखकर निराश हो जाता हूँ। ऐसा कहते-कहते लुई पास्ट्युर के पिता की आँखें जब-तब गीली हो जातीं।

लुई पास्ट्युर ने पिता की इच्छा की गहराई को अनुभव किया और हर प्रकार से पढ़ने का निश्चय करके प्रारम्भिक शिक्षा के लिये अरवोय की एक पाठशाला में प्रवेश ले लिया। किन्तु संस्कारवश उसकी बुद्धि विद्या प्राप्ति की दिशा में गतिवान नहीं होती थी। उसे कक्षा में पढ़ाया हुआ पाठ न तो ठीक से समझ आता था और न याद होता था। इस कारण वह कक्षा में सबसे अधिक बुद्धू समझा जाता था। पढ़ाई के विषय में उसे मन्द बुद्धि समझ कर शिक्षकों ने उसकी ओर से निराश होकर ध्यान देना छोड़ दिया और राय दी कि वह पढ़ाई छोड़कर कुछ व्यवसाय करना शुरू कर दे, यही उसके जीवन के लिए अधिक हितकर होगा।

लुई पास्ट्युर को अध्यापकों की इस उपेक्षा से अपनी मन्द-बुद्धिता पर घोर खेद हुआ। एक बार पढ़ाई छोड़कर, पुनः पिता के व्यवसाय में पदार्पण करने की सोची। किन्तु पिता के आँसुओं की याद आते ही उसने पुनः अपना साहस संचय किया और पढ़ने में जी जान से जुट गया। उसने अपना अध्ययन किया और अपनी कमी खोज निकाली। उसकी समझ में ठीक-ठीक आ गया कि अध्ययन में उसकी अगति का कारण उसका आत्म-अविश्वास ही है। उसने कुछ ऐसी धारणा बना ली है कि उसे विद्या आ ही नहीं सकती और उसकी यही धारणा उसकी बुद्धि पर मोर्चा बनकर लगी हुई है जिससे वह विद्या में प्रगति नहीं कर रहा है।

लुई पास्ट्युर ने अपना आत्म-विश्वास जगाया, अपनी निराशापूर्ण धारणा को दूर किया और विश्वास पूर्ण अध्ययन में संलग्न हो गया। ऐसा करते ही उसे अपने अन्दर एक ऐसी जीती-जागती प्रखर शक्ति का आभास मिला जो पुकार-पुकार कर कह रही थी—”लुई! संसार का ऐसा कोई भी कार्य नहीं है जो लगन पूर्ण पुरुषार्थ के बल पर न किया जा सके। निरन्तर सच्चे मन से लगे रहने से मनुष्य रेत से तेल प्राप्त कर सकता है तब विद्या प्राप्त करना कौन बड़ी बात है। वह तो अपने जिज्ञासुओं को स्वयं प्राप्त हो जाती है। मनुष्य को न तो कभी हिम्मत हारनी चाहिये और न निराश होकर प्रयत्न से विमुख होना चाहिये। असफलता से हतोत्साह होकर निरुपाय हो जाना पुरुष को शोभा नहीं देता। असफलता मनुष्य की अक्षमता की द्योतक नहीं होती बल्कि यह प्रयत्न की कमी की संबोधक संयोग ही होती है। पूरी लगन से काम में जुट जाओ शीघ्र ही तुम सफलता का वरण करोगे।”

आत्मा का उद्बोधन पाते ही लुई पास्ट्युर ने अपने को प्रयत्न के पारावार में डुबा दिया। अब वह कोई मन्द-बुद्धि लड़का न था बल्कि एक कुशाग्र बुद्धि छात्र था।

अरवोय में प्रारम्भिक शिक्षा समाप्त करते ही लुई के पिता ने उसे उच्च शिक्षा के लिये पेरिस भेज दिया। जहाँ वह इकोल नारमेल नामक एक ऊँचे विद्यालय में प्रवेश कर पढ़ने लगा। किन्तु कुछ ही समय में पेरिस के अनियंत्रित तथा अनवरत कोलाहल तथा शोर-गुल से उसका जी ऊब गया और वह पिता की अनुमति से घर से दूर वेसाको के एक कॉलेज में अध्ययन करने लगा

वेसाको-कॉलेज की शिक्षा पूर्ण करने के बाद लुई पास्ट्युर की इच्छा रसायन-शास्त्र का अध्ययन करने की थी जिसके लिये उसे पुनः पेरिस जाना पड़ा। चूँकि पेरिस के सिवाय रासायनिक अध्ययन के लिये कोई अन्य साधन नहीं था, इसलिये उसने अब की बार नगर के कोलाहल से ऊबने के बजाय उसका अभ्यस्त बनने की कोशिश की। कोलाहल से अप्रभावित रहने के लिये उसने अपनी एकाग्र तन्मयता को और अधिक केन्द्रीभूत कर लिया। जिससे वह एक प्रकार से कोलाहल-शून्यता की स्थिति में रहने लगा। सच्ची लगन से काम करने वाले किसी बाह्य वातावरण अथवा परिस्थिति को काम में विघ्न डालने वाला बताकर कार्य से मुख मोड़ने का बहाना नहीं निकालते बल्कि घोरतम विपरीत परिस्थितियों में भी अंगद के चरण की तरह अपने कर्तव्य पर अटल रहते हैं। उन्हें छोटी-मोटी परिस्थितियाँ काम से उखाड़ नहीं पातीं।

पेरिस में इकोल नारमेल कालेज में भरती होकर लुई पास्ट्युर ने न केवल रसायन-शास्त्र का ही अध्ययन किया बल्कि चिकित्सा शास्त्र में भी पारंगति प्राप्त की। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं कि जीवन के प्रारम्भिक काल में जो लुई पास्ट्युर मन्द-बुद्धि कहा जाकर उपेक्षा का पात्र बना था वह अब परीक्षाओं पर परीक्षायें और विषयों पर विषय पार करता चला जा रहा था। जिसने आत्म-विश्वास के साथ परिश्रमपूर्ण पुरुषार्थ करना सीख लिया है, बुद्धि को निर्णायक गुण से गौरवान्वित कर दिया है और अपने विचारों में सूझ-बूझ का प्रवाह-भर गया है। किसी भी विषय अथवा दिशा में उसकी गति में विरोध होना सम्भव नहीं।

पेरिस के अध्ययन काल में लुई पास्ट्युर का संपर्क विज्ञान के महान विषय से भी हुआ जिससे उसकी रुचि उस ओर हो गई और उसने एक वैज्ञानिक बनकर संसार का हित करने का विचार बना लिया। उसके इस विचार को रसायन-शास्त्र के पारंगत विद्वान श्री जीन वैप्टिस्टे डय़ूमा के ओजस्वी भाषणों ने और भी पक्का कर दिया, जिनके अन्त में वे विज्ञान के विद्यार्थियों से अपील किया करते थे कि वे अपनी योग्यता का उपयोग केवल स्वार्थ साधन के लिये न करके उसका उपयोग रोग पीड़ित मानवता की रक्षा करने के लिये भी करें।

डॉक्टर डय़ूमा की अपीलें लुई पास्ट्युर के हृदय में गूँज बन कर भर गई जिनसे वह एक आविष्कारक की दृष्टि से विज्ञान के अध्ययन में डूब गया।

इकोल नारमेल कॉलेज से उपाधि प्राप्त कर लुई पास्ट्युर ने केवल छब्बीस वर्ष की अवस्था में डिजोन में भौतिक विज्ञान के शिक्षक का पद स्वीकार किया। उन्हें आशा थी कि अध्यापन काल में उनको अन्वेषण करने के लिये पर्याप्त साधन तथा अवकाश मिल सकेगा। किन्तु परिस्थितियाँ उनके अनुमान के विपरित निकलीं। पढ़ाने की तैयारी में सारा समय लग जाने के कारण उन्हें अपने अनुसंधान के लिये समय का अभाव रहने लगा। यद्यपि उन्हें इस पद पर पर्याप्त वेतन तथा रहन-सहन की सुविधायें मिली हुई थीं, तथापि अपने उद्देश्य में उक्त सुविधाओं को बाधक देख कर उन्होंने उनका बिना किसी संकोच के त्याग कर दिया, और स्ट्कास वर्ग में सहायक तथा प्रधान अध्यापक के पद पर कुछ दिन काम करने के बाद लिले में विज्ञान-विभाग के अध्यक्ष का पद स्वीकार किया और अपना अनुसंधान कार्य प्रारम्भ कर दिया।

लुई पास्ट्युर ने जो सबसे पहला अनुसंधान किया वह था इमली के अम्ल से अंगूर का अम्ल बनाना। यद्यपि यह अनुसंधान कोई महत्वपूर्ण खोज नहीं थी तथापि इसका मूल्य इस माने में अवश्य है कि इसी एक खोज में अन्य अनेक वैज्ञानिक लगभग तीस वर्षों से लगे हुये थे। उनकी समस्या का हल करके लुई पास्ट्युर ने उनके मस्तिष्क को मुक्त करके अन्य महत्वपूर्ण कार्यों की ओर मोड़ दिया।

दूसरा महत्वपूर्ण अनुसंधान जो लुई पास्ट्युर ने किया वह था विषैले जन्तुओं द्वारा काटे जाने पर मनुष्यों को मरने से बचाने के उपादानों की खोज। फोड़ों की चीरफाड़ के बाद जख्मों में कीड़े पड़ जाने के कारणों की खोज और उसके उपचार की विधि निकालना। उपचार क्षेत्र में मानवता की सेवा का यह अनुसंधान एक महान देन थी जिससे उस समय से आज तक असंख्यों मनुष्य जख्मों के सड़ने तथा उससे मरने से बचते चले आ रहे हैं।

इसके अनन्तर रेशम के कीड़ों के रोग की रोकथाम करने तथा उनके बीमार होने पर उनका उपचार करने की विधि का अन्वेषण एक बहुत बड़ी खोज थी, इससे रेशम के व्यवसाय में महान लाभ हुआ। रेशम के कीड़ों के रोग तथा मरण के निवारण की खोज करने में लुई पास्ट्युर ने छः वर्ष तक घोर परिश्रम किया, जिससे एक बार वह इतना बीमार हो गये कि मित्रों को उनके बचने की आशा न रही। मरण शैय्या पर पड़े हुए उन्होंने अपने मित्रों से कहा कि—हो सकता है कि आप लोग मेरी बात सुन कर मुझे कायर समझें किन्तु वास्तव में मैं मरना नहीं चाहता। मैं जीवित रहकर देश की अधिकाधिक सेवा करना चाहता हूँ।

सबसे अन्तिम जो दो अनुसन्धान लुई पास्ट्युर ने संसार के लिये दिये उनसे मानवता का महान हित हुआ। वे हैं पागल कुत्तों से काटे मनुष्य के इलाज का टीका तथा हैजा, प्लेग जैसे संक्रामक रोगों की रोक-थाम के लिये टीकों की खोज।

इस प्रकार जीवन-भर बिना किसी वैयक्तिक लाभ के लुई पास्ट्युर निष्काम भाव से मानवता की सेवा में लगे रहे और भयानकतम रोगों से मनुष्यता की रक्षा के साधन प्रदान कर 28 सितम्बर सन् 1895 में स्वर्ग सिधार गये।


आराम नहीं, काम करिये।

बहुत से लोग इस बात का रोना रोते देखे जाते हैं कि उन्हें उन्नति करने और विकसित होने का अवसर ही नहीं दिया गया। यदि उन्हें अवसर दिया जाता तो बहुत कुछ करके दिखला सकते थे। वे एक बड़े व्यापारी, ऊँचे ओहदेदार, परोपकारी, जन-रोचक, प्रकाँड विद्वान, कवि, लेखक अथवा कोई बड़े नेता बन सकते थे। किन्तु परिवार से लेकर समाज तक ने उनका साथ नहीं दिया जिससे वे अपनी विद्यमान स्थिति में घिर कर रह गये। धनवान, विद्वान, परोपकारी, अधिकारी आदि कुछ भी न बन सके।

प्रथम तो उनका यह रोना, यह शिकायत ही इस बात की गवाही देती है कि यह व्यक्ति केवल बातें बनाने वाले और दूसरों पर दोषारोपण करने वाले हैं। यह सब अन्दर से थोथे और अकर्मण्य हैं। न इन्हें कुछ करना था न अब कुछ करना चाहते हैं और न आगे कुछ करेंगे। यह सब मिथ्याचारी एवं मिथ्यावादी हैं। कुछ करने वाले लोग न तो किसी पर अहसान रखते हैं और न किसी पर दोषारोपण किया करते हैं। उन्हें जो कुछ करना होता है किया करते हैं, कहते नहीं। एक बार यदि संयोगवश परिस्थितियाँ उनका साथ न भी दें और स्वयं कुछ न कर पायें तो किसी दूसरे के महान उद्देश्य के प्रति अपनी सेवायें समर्पित कर देते हैं। सब कुछ कर सकने की योग्यता रखते हुए भी यदि किसी अपरिहार्य संयोग से विवश होकर वे अपनी आकाँक्षाओं को मूर्तिमान नहीं भी कर पाते तब भी इस प्रकार निठल्लों की तरह रोते और शिकायत नहीं करते घूमते। या तो वे अपनी सेवायें हस्तान्तरित कर देते हैं अपनी योग्यता, पात्रता एवं शक्ति सामर्थ्य को किसी कर्मशील के कार्यों में लगा देते हैं, या चुपचाप संसार की गतिविधि का अध्ययन करते हुए अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं को बढ़ाते हुए धैर्यपूर्वक समय की प्रतीक्षा करते रहते हैं, यहाँ तक कि आगामी जन्म में अपने ध्येय को पूरा करने की आशा पर भी अधीर नहीं होते, और कुछ न सही वे अपनी वीरता गम्भीरता को खोकर कम से कम विवशताजन्य असफलताओं और दूसरों की अनुदारता की शिकायत का ढोल पीटकर तुच्छता का परिचय तो नहीं ही देते।

करने वाले को आज तक किसने रोका है। रोध, अनुरोध एवं प्रतिरोध जैसे हेय शब्द कर्मवीरों के कोश में नहीं, निकम्मों की जीभ पर ही चढ़े होते हैं। यदि ऐसा होता तो सिकन्दर विश्वविजयी न होता, सीजर रोम साम्राज्य स्थापित न कर पाता चाणक्य का ध्येय सफल न होता और एक लँगोटी-बन्द महात्मा गाँधी भारत में ब्रिटिश हुकूमत का तख्ता न उलट देता। ज्ञान के पिपासु फाहियान एवं ह्वान्साँग का पथ सिन्धु अवश्य रोक लेता और बौद्ध भिक्षुओं को हिमालय आगे न बढ़ने देता। किन्तु अभियान शील को कौन कहाँ रोक पाया है?

अब इन अभियोगियों की शिकायतें भी सुन ली जायें। कुछ कहते हैं कि उनके माता-पिता ने उन्हें समुचित शिक्षा नहीं दिलाई, नहीं तो वे एक अच्छे विद्वान बन कर समाज की महान सेवा करते। इनसे पूछा जाय जब वे शिक्षा के लिये माता-पिता पर निर्भर थे तब उन बेचारों की स्थिति क्या थी—क्या वे उनको ऊँची शिक्षा दिला सकने में समर्थ थे। यदि नहीं तो इस प्रकार की शिकायत करने का क्या लाभ?

अपनी सामर्थ्य-भर शिक्षा दिलाकर माता-पिता ने अपना दायित्व पूरा किया—अब यह उनका कर्तव्य था कि वे अपने अध्ययन एवं अध्यवसाय से अपनी योग्यता का विकास करके अपना ज्ञान बढ़ाते। विद्या की सच्ची लगन वाले बिना किसी का सहारा पाये भी प्रगति के पथ पर स्वयं बढ़ जाते हैं। अब्राहम लिंकन के माता-पिता ने पुत्र के होश सँभालते ही पट्टी देने के स्थान पर हाथ में कुल्हाड़ी दी। ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के माता-पिता ने पुत्र को वर्णमाला का अवसर देने से पहले रोटी की चिन्ता दी और स्वामी रामतीर्थ को तो माता-पिता की पर्याप्त छाया थी न मिल पाई थी। फिर भी इन लगनशीलों ने ज्ञान गरिमा की ऊँची सीमाओं को छुआ और विद्वान बनकर संसार की सेवा की।

संसार के इतिहास में एक-दो नहीं ऐसे असंख्यों उदाहरण पाये जाते हैं जिन्होंने अवसर के अभाव का ही नहीं विद्याध्ययन के विरोध का सामना करते हुये भी विद्या प्राप्त की। बन्दीगृहों में बैठकर ज्ञानोपार्जन किया और मेहनत, मजदूरी करते हुये भी विद्वान बने।

सच्ची लगन पहाड़ फोड़कर भी अपना रास्ता बना लेती है, पानी पर पथ रच लेती है और आकाश के तारे तोड़ लाती है। वह कौन-सी बात थी जिसने उन्हें विद्वान बनने की इच्छा होते हुए भी विद्वान नहीं बनने दिया। वह और कुछ नहीं लगन की कमी, इच्छा की अप्रौढ़ता और ज्ञान-पिपासा की झूठी अनुभूति, जिसने कि उन्हें विद्वता की इच्छा के भ्रम में रखकर हजार प्रकार के बहानों को देकर पढ़ने नहीं दिया। उनकी लगन कच्ची थी, पिपासा झूठी थी।

प्रथम तो धनवान बनने की आकाँक्षा ही तुच्छ है। इसमें न तो कोई महानता है और न विशेषता। धन की आकाँक्षा अन्तर की दरिद्रता ही प्रकट करती है। जो धनवान होते हैं लालायित रहें, नींद में जिसे ऊँची-ऊँची कोठियों और भरी हुई तिजोरियों के स्वप्न आयें, वास्तव में वह दया का पात्र है।

जिनका मन ‘धन-धन-धन’ की माला जपा करता है, उनसे पूछा जाये कि वे इतना धन पाकर क्या करेंगे? तो उनके दो ही उत्तर हो सकते हैं—जो ईमानदार होंगे वह कहेंगे धन होने से वे अधिक से अधिक सुख-सुविधा के साधन जुटा सकेंगे, मनोरंजन के मनमाने उपकरण उनको मिल सकेंगे देश-विदेश की यात्रा और सैर-सपाटे का आनंद ले सकेंगे। आशय यह है कि उनका उत्तर सुख-सुविधा और भोग-विलास के ही आस-पास चक्कर लगाते हुये होगा। जो धूर्त और बेईमान होंगे उनका उत्तर होगा—धन से वे गरीबों की सहायता करेंगे, संस्थाओं को दान देंगे जनता की सेवा करेंगे और परोपकार के कार्य करेंगे।

इस प्रकार के उत्तर इसलिये बेईमान माने जायेंगे-कि धन की आवश्यकता तो किसी को भी हो सकती है, किन्तु धन आकाँक्षा केवल उसकी बन जाती है जो उसके प्रति उपासना भाव रखता होगा। उसको जीवन का ध्येय मानता होगा, और धन जिसका ध्येय है उपास्य देव है वह उसका यापन दिल खोलकर परहित में नहीं कर सकता। अस्तु, इस प्रकार के उत्तर देने वाले धनाकाँक्षी झूठे ही कहे जायेंगे।

जहाँ तक सेवा एवं परोपकार का सम्बन्ध है, धन की सेवा सबसे निकृष्ट और तन-मन की सेवा सबसे उत्कृष्ट मानी जाती है। जो सच्चा सेवा भावी है मन से परोपकारी है, वह धन की माला जपता हुआ उसकी प्रतीक्षा नहीं करेगा बल्कि अपने उपलब्ध साधनों अथवा शरीर द्वारा ही दूसरों की सेवा करने में लग जायेगा। किसी के घर जाकर उसका दुःख-दर्द पूछते और यथा-साध्य सेवा द्वारा उसमें कमी करने का महत्व एवं मूल्य घर बैठे हजार मुद्रायें भेज देने से कहीं अधिक है। अस्तु धन का रोना रोने वाले लोभी मात्र हैं, जन-सेवी भावना वाले नहीं।

महत्वाकाँक्षाओं की आपूर्ति, उद्देश्य की असफलता का दायित्व, फिर वह किसी भी क्षेत्र की क्यों न हो, किसी दूसरे पर नहीं है वह एकमात्र मनुष्य की अपनी कमियों पर है।

जीवन की सफलता एवं सार्थकता के लिये आवश्यक नहीं कि ऊँचे-ऊँचे आयोजन बनाये जायें, बड़े-बड़े साधन तलाश किये जायें। सामान्य स्थिति में, सामान्य साधनों से सामान्य कार्यों को भी यदि पवित्र भावना और सद्बुद्धि से पूर्ण मनोयोग, सम्पूर्ण दक्षता से किया जाये तो वह सामान्य कार्य भी एक महान कार्य का महत्व रखता है। छोटी से छोटी सेवा और साधारण से साधारण परोपकार भी यदि पूर्ण भावना से किया जाए तो अपने में एक महान लक्ष्य की गरिमा रखेगा। खेत निराने के साधारण कार्य से लेकर किसी को बोझ उठवा देने की सेवा तक जीवन में सार्थकता का समावेश कर देगी यदि उसके साथ भावना का समन्वय और आत्मा की अनुभूति हो। वह हर कार्य बड़ा है, वह हर सेवा महान है जिससे उपकारी की आत्मा को प्रसन्नता और उपकृत की आत्मा को संतोष हो।


सेवा के मूर्तिमान प्रतीक—सन्त विनोबा भावे

अपने व्यक्तित्व विकास का रहस्य बतलाते हुए एक बार विनोबा भावे ने कहा कि “मैंने अपने शिक्षा काल में एक क्षण भी खराब नहीं किया और न कभी निरर्थक का निरुपयोगी श्रम किया। जो पूँजी मैंने उस समय जमा की है वह मेरे आज तक काम आ रही है। परिश्रम करने से परिश्रमशीलता का विकास होता है और जीवन की सारी सुख-शान्ति का निवास परिश्रम की गोद में ही होता है।”

सन्त विनोबा का मूल नाम विनायक नरहरि भावे था। इनका जन्म बम्बई प्रान्त के कुलावा जिले में ग्यारह सितम्बर उन्नीस सौ पंचानवे में हुआ। विनायक नरहरि के माता-पिता बहुत ही धर्मात्मा और ईश्वर-भक्त थे। ब्राह्मणोचित गुणों से परिपूर्ण यह मराठा परिवार मध्यवर्ग का था।

विनोबा के जीवन पर माता-पिता के आचरण का इतना गहरा प्रभाव पड़ा कि धार्मिकता उनके रोम-रोम में बस गई। बहुत कुछ धार्मिक होने पर भी इनकी माता के विचार बड़े परिमार्जित एवं प्रगतिशील थे। हानिकर रूढ़ियों तथा निरर्थक परम्पराओं से उन्हें बहुत घृणा थी। जिन रीति-रिवाजों में वे कोई लाभकर तत्व न देखती थीं उनका पालन करना वे आवश्यक नहीं समझती थीं। माता की इस वैचारिक प्रगतिशीलता ने पुत्र की विचारधारा पर बड़ा ही वाँछित प्रभाव डाला जिससे उनमें बाल्यकाल से ही किसी विषय पर मौखिक रूप से विचार करने और उनकी उपयोगिता, अनुपयोगिता की विवेक बुद्धि का विकास हो गया। माता के दिए हुए यह संस्कार आगे चलकर उनके जीवन में ज्योति बनकर चमके, जिससे आज वे धर्म के युगीन व्याख्याकार के रूप में सम्मानित हैं।

आचार्य विनोबा भावे को बाल्यकाल से ही सामूहिकता में बहुत विश्वास रहा है। समय की पाबन्दी उनके माता-पिता की एक विशेष देन थी। प्रारम्भिक शिक्षा घर पर ही पाकर विनोबा ने बड़ौदा हाई स्कूल में कक्षा चार में प्रवेश लिया। घर पर माता-पिता द्वारा पढ़ाई में जगाई रुचि के कारण विनायक-विनोबा कक्षा के पाठ से सदैव आगे-चलते थे। अपनी पाठ्य- पुस्तकों के साथ वे अन्य-ज्ञानवर्धक पुस्तकें भी पढ़ा करते थे जिससे दिनों-दिन उनके ज्ञान की जिज्ञासा बलवती होती गई। मनुष्य जिस विषय के प्रति अपना हृदय समर्पित कर देता है वह समयानुसार उसे अवश्य प्राप्त कर लेता है, फिर वह कितना ही कठिन क्यों न हो।

कठिनता अथवा दुरुहता का अपना कोई मौलिक अस्तित्व नहीं है। ये वास्तव में मनुष्य की अरुचि तथा अलग्नता के ही बदले हुए रूप होते हैं। तन्मयता, लगन, रुचि और परिश्रम किसी भी कठिन कहे जाने वाले कार्य को सरल बना देते हैं। सुरुचिपूर्ण संलग्नता में एक विशेषता है कि वह मनुष्य को कठिन एवं श्रमसाध्य विषयों की ओर ही झुकाती है, उन्हीं में रुचि उत्पन्न करती है। मस्तिष्क की अन्तिम सीमा तक पहुँचकर किसी विषय का निष्कर्ष निकालने पर ही किसी सच्चे अध्यवसायी को सन्तोष होता है। जिन कार्यों अथवा जिन विषयों में मन मस्तिष्क को अपना पूरा कर्तव्य निभाने का अवसर न मिले ऐसे हल्के-फुलके विषयों में ज्ञानान्वेषक की रुचि कम ही रहती है और सुरुचिपूर्ण संलग्नता की प्रवृत्ति ही मनुष्य के व्यक्तित्व को ज्ञान के प्रकाश से जगमगा कर पूर्ण बना देती है।

बालक विनायक-विनोबा को अन्य विषयों की अपेक्षा गणित में अधिक रुचि थी। प्रश्नों के अन्तराल में प्रवेश कर उनका हल निकालने में उसे वैसा ही आनन्द आता था जैसा किसी गोताखोर का समुद्र से मोती पाने में। गणित के विषय में अन्य सारे विद्यार्थी विनायक-विनोबा को अपना नेता मानते थे। दूसरों के दुरूह प्रश्नों को हल करने, उन्हें उसकी रीति बतलाने, नई विधियाँ सिखाने के कारण विनायक-विनोबा में एक उत्तरदायित्वपूर्ण गुरु-भाव का उदय हो जाने से उसमें प्रारम्भ से ही एक अपेक्षित गम्भीरता का समावेश हो गया जिसने उसके आचरण पर बड़ा ही अनुकूल प्रभाव डाला। अब वह प्रयत्न एवं परिश्रमपूर्वक अपनी योग्यता को निरन्तर तरो-ताजा बनाये रखने के लिये अधिकाधिक अध्ययन करते और नये-नये विषयों में अपना पथ प्रशस्त करते। जिसके परिणामस्वरूप उनका मस्तिष्क प्रखर से प्रखर तर होता गया और वे बड़ौदा हाईस्कूल के विशेष विद्यार्थी बन गये।

अपनी लोकप्रियता के कारण हाईस्कूल तक पहुँचते-पहुँचते विनायक विनोबा विद्यार्थियों की एक बड़ी संख्या से घिरे रहने लगे। अपनी लोकप्रियता का उपयोग उन्होंने एक ऐसी मित्र-मंडली बनाकर किया जो अवकाश के समय में दूर-दूर तक भ्रमण करने जाती और देश, राष्ट्र तथा समाज की तात्कालिक समस्याओं के समझने समझाने के लिये विचार विमर्श करती और आगे चलकर उसके समाधान के उपाय सोचती। माता-पिता के दिए संस्कारों के कारण विनायक विनोबा ने अपनी रुचि के अनुसार अपनी मित्र-मंडली में भी आध्यात्मिक रुचि उत्पन्न कर दी जो उनके चरित्र-निर्माण में बहुत दूर तक काम आई।

मैट्रिक के बाद कालिज के प्रथम वर्ष में विनायक-विनोबा ने अपनी मित्र-मंडली को “विद्यार्थी-मंडल” नामक संस्था में बदल दिया और सुव्यवस्थित कार्यक्रम के साथ शिक्षा-प्रसार तथा समाज सेवा का कार्य आरम्भ कर दिया। इसकी बैठकों में सामाजिक कुरीतियों तथा नैतिक पतन की कड़ी आलोचना की जाती। लोगों को सुधार की प्रेरणा दी जाती और प्रगतिशील नये विचारों की प्रतिस्थापना की जाती थी। जन-जागरण के लिये विनायक-विनोबा के इस ‘विद्यार्थी-मंडल’ ने “शिवाजी जयन्ती” ‘हनुमान जयन्ती’ ‘गणपति-उत्सव’ तथा ‘दास नवमी’ जैसे उत्सव इस प्रकार से मनाने आरम्भ किये, जिससे लोगों में धर्म के साथ राष्ट्रीय एवं सामाजिक चेतना भी जागने लगी। इसके अतिरिक्त विनायक-विनोबा के नेतृत्व में इस विद्यार्थी मंडल ने जनता से एक-एक पैसा तथा पुस्तकें माँगकर एक विशाल पुस्तकालय की स्थापना की जिसमें भोलर्स्वथ, क्यान्डी के अप्राप्य कोष भी प्राप्य हो गये।

किन्तु पराधीनता की गन्ध देने वाली स्कूली शिक्षा से विनायक-विनोबा को सन्तोष न हो सका, अस्तु वे दूसरे वर्ष ही कॉलेज छोड़कर सच्चे ज्ञान की तलाश में काशी चले गये और वहाँ से महात्मा गाँधी के साबरमती आश्रम।

महात्मा गाँधी के साबरमती आश्रम के वातावरण तथा गाँधी जी के संपर्क में पहुँचने पर विनायक नरहरी भावे को जिनका कि नाम गाँधी जी ने विनोबा भावे रख दिया था, हार्दिक शान्ति मिली। वहाँ आकर उन्होंने अनुभव किया कि यही वह जगह है जहाँ संयमपूर्ण स्वावलम्बी तथा सच्ची सेवा भावना से ओत-प्रोत जीवन अपनाकर पूर्ण मनुष्य बनने का अवसर मिल सकता है।

मनुष्यता की पूर्णता प्राप्त करने के लिये विनोबा जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन आश्रम की सेवा तथा उसके कार्यक्रमों को समर्पित कर दिया। लोक-कल्याण की भावना से किसी विशेष प्रयास के बिना ही विनोबा जी का आत्मिक स्तर स्वयं ही कुछ ऊँचा उठ गया और उनमें काम करने की एक अद्भुत शक्ति भर गई। कहना न होगा कि मानवता की मंगल कामना करने वाले को अन्य मनुष्यों की शक्ति का एक अंश स्वतः प्राप्त हो जाता है। इस विषय में जिसका दृष्टिकोण जितना व्यापक, जितना निःस्वार्थ और जितना ऊँचा होगा उसे दूसरों की शक्ति का अंश उसी अनुपात में अधिक प्राप्त होगा।

आश्रम में रहकर विनोबा जी सूत कातते, आध्यात्मिक अध्ययन करते, बच्चों को पढ़ाते, उन्हें दैनिक आचरण की शिक्षा देते, स्वावलम्बन, उद्योग तथा शारीरिक श्रम का अभ्यास कराते। उनकी इस परिश्रमपूर्ण शिक्षण कला से प्रभावित होकर आश्रमवासियों ने “वर्धा-शिक्षण-योजना” के नाम पर शिक्षा की एक पद्धति का ही श्रीगणेश कर दिया।

पर्याप्त समय तक आश्रम में रहकर जब प्रयत्नपूर्वक विनोबा जी ने अपने पवित्र आचरण को पूर्ण परिपक्व बना लिया और संयम की आँच में अपने को तपाकर शुद्ध मानवता के दर्शन कर लिये तब वे एक साल की छुट्टी लेकर देशाटन के लिये आश्रम से चल पड़े। जिस अपने पूर्व गीता ज्ञान को उन्होंने गाँधी जी के संपर्क में विस्तृत किया था उसे अब व्यापक बनाने के लिए प्रकाण्ड विद्वान नारायण शास्त्री मराठी के पास गये और पाठशाला में निरन्तर छः माह तक ब्रह्मसूत्र का अध्ययन किया। अन्तर नगर-नगर, ग्राम-ग्राम गीता का ज्ञान वितरित कर देश की सामाजिक अवस्था का अध्ययन करते हुये समय समाप्त हो जाने पर पुनः आश्रम वापस आ गये। अपने अनुभव, अध्यवसाय, अध्ययन, परिश्रम तथा सेवा भाव से विनोबा जी ने जो पात्रता अपने में उत्पन्न की थी उसके सम्मान में गाँधी जी द्वारा ग्राम सेवा मंडल, सेवा ग्राम आश्रम, तालीमी संघ, चरखा संघ, ग्रामोद्योग संघ, गो सेवा संघ, महिला आश्रम आदि संस्थाओं के संचालन एवं प्रबन्ध का दायित्व उन्हें सौंप दिया, जिसे उन्होंने निस्पृह भाव से महात्मा गाँधी की सन्तोष-सीमा तक अदा कर दिखाया।

इसके अतिरिक्त स्वतन्त्रता संघर्ष में वे हर आन्दोलन तथा हर योजना के अंतर्गत जेल गये और अनेकों यातनायें सही। विनोबा जी के जीवन का प्रमुख लक्ष्य दरिद्र नारायण की सेवा करना रहा है। अपने जीवन में उन्हें दो ही बातें पसन्द हैं—आध्यात्मिक चिन्तन और दरिद्र नारायण की सेवा।

यद्यपि राजनैतिक आवश्यकता के समय भी विनोबा जी राजनीतिक व्यक्ति नहीं थे तथापि राजनीतिक स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद से तो वे देहातों तथा गरीबों को आर्थिक स्वतन्त्रता दिलाने के लिए दिन-रात पैदल चलकर गरीबों के लिए भूमि माँगते हैं। उनकी यह सेवा भूदान तथा ग्राम दान के नाम से प्रसिद्ध है, और वे महात्मा गाँधी के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी की भाँति भारत में पूजे जाते हैं।


उदार गोल्डस्मिथ

उदार ओलीवर गोल्डस्मिथ

“ऐसा बुद्धू लड़का मैंने और नहीं देखा।” शिक्षिका अपने विद्यार्थियों से कहा करती। पर वह बालक कभी किसी का प्रतिवाद नहीं करता था। विचारों की दुनिया में अकेला ही भ्रमण किया करता था। लोग उसकी प्रतिभा का कभी अन्दाज नहीं कर सके।

समय बीतने के साथ बालक नवयुवक हुआ। एक दिन परिस्थितिवश उसे अपना एक कविता संग्रह मजबूर होकर प्रकाशक को बेचना पड़ा। पैसे लेकर जब वह घर लौट रहा था रास्ते में पड़ा एक भिखारी भूख और ठण्ड से सिकुड़ता दिखाई दिया। युवक ने प्रकाशक से मिले सारे पैसे उसे दे दिये साथ ही अपने कपड़े भी उतार कर उसे पहना दिये। यह उदार युवक बाद में इंग्लैंड के प्रसिद्ध कवि ओलीवर गोल्डस्मिथ के नाम से विख्यात हुआ।


महान वैज्ञानिक और महान मानव—सर आइजक न्यूटन

विश्व विख्यात वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन का जन्म भी ईसा की जन्मतिथि 25 दिसम्बर 1642 ई. को वल्सथोर्प नामक गाँव में हुआ था।

तीन वर्ष की अवस्था में पिता के देहान्त तथा माता के पुनर्विवाह कर लेने से न्यूटन का लालन-पालन उसकी नानी पर आ पड़ा। आयु के प्रारम्भिक काल में ही अनाथ हो जाने से न्यूटन का मनोविकास रुक गया वह एक दीन-हीन बालक बनकर रह गया।

नानी ने उसे पढ़ने बिठाया जरूर लेकिन उसका मन पढ़ाई-लिखाई में जरा भी नहीं लगता था। वह स्कूल में सारे दिन उदास बैठा रहता था। सारे साथी उसे खिझाया तथा परेशान किया करते थे। इसी तरह सहन करते-करते एक दिन उसकी मुठभेड़ एक शैतान लड़के से हो गई और न्यूटन ने जी-जान से जोर लगाकर उसे पछाड़ दिया। इस संयोग से न्यूटन जी-जान से प्रयत्न करने के महत्व को समझ गया।

उसने बड़े प्रयत्न से मन लगाकर पढ़ना शुरू किया जिससे कुछ ही समय में वह अपनी कक्षा में सबसे तेज विद्यार्थी बन गया। अध्यापक उसकी इस परिश्रमशीलता की प्रशंसा करके उसे प्रोत्साहित करने लगे। अपने पुरुषार्थ के बल पर आगे बढ़ने वालों को अनायास ही चारों ओर से प्रशंसा एवं प्रोत्साहन मिलने ही लगता है।

इस प्रकार जब न्यूटन अपनी योग्यता के विकास में लगा हुआ था तभी सौतेले पिता की मृत्यु हो जाने पर उसकी माता ने उसे स्कूल से उठाकर खेती-बाड़ी तथा जानवरों की देख-भाल में लगा दिया। न्यूटन का स्कूल अवश्य छूट गया किन्तु उसकी अध्ययन की लगन तथा विचारशीलता में किसी प्रकार की कमी नहीं आई। वह चरागाह में अपनी पुस्तकें ले जाता और पढ़ने में लग जाता। जानवर बिखर जाते खेत चर जाते किन्तु न्यूटन को इसकी कोई खबर न रहती। वह अपने पढ़ने अथवा किसी चीज का मॉडल बनाने में इतना तल्लीन हो जाता कि दीन दुनिया को ही भूल बैठता। न्यूटन की यही वह तल्लीनता थी जिसने आगे चलकर उसे एक विश्व विख्यात अन्वेषक बना दिया।

न्यूटन की माता उसकी इस विद्या विषयक तल्लीनता से अप्रसन्न रहती थी। अनेक बार उसने इसके लिये उसे दण्ड भी दिया किन्तु सारे कष्ट सहकर भी वह अपने अध्ययन में लगा ही रहा। माता ने उसकी इस आदत से परेशान होकर उसकी शिकायत अपने भाई से की और उसे सीधे मार्ग पर लाने के लिये कहा। न्यूटन का मामा एक बुद्धिमान व्यक्ति था। उसने न्यूटन की प्रतिभा को पहचाना और बहन को समझाते हुये कहा कि—इसे स्कूल में भरती करा दो यह बड़ा होनहार है। ये खेती-बाड़ी करना इसके वश का काम नहीं है। इसके कार्य का क्षेत्र तो पढ़ना तथा कुछ बड़ा काम करना है।

न्यूटन की माँ ने भाई की बात मानी और उसे पुनः स्कूल भेज दिया। यदि मनुष्य अपने ध्येय का सच्चा धनी है तो संसार का कोई भी अवरोध उसका मार्ग नहीं रोक सकता। लगनशील व्यक्ति का अवरोध यदि जान-बूझ कर भी किया जाता है तब भी वह अपने अनवरत प्रयत्न से विरत नहीं होता और इस प्रकार अपने प्रतिरोधी को थका कर मार्ग से हट जाने के लिये विवश कर देता है।

न्यूटन दुबारा स्कूल पहुँच कर इतना प्रसन्न हुआ मानो उसने पुनर्जीवन पा लिया हो और इस बार वह पहले से भी अधिक तत्परता से अध्ययन में डूब गया। उसे आशंका हर समय बनी रहती थी कि कहीं ऐसा न हो कि उसकी माँ का विचार फिर बदल जाये और वह उसे स्कूल से उठा ले। इसलिये वह मिले हुए अवसर का अधिक से अधिक लाभ उठाकर अपनी शिक्षा पूरी कर लेना चाहता था। स्कूल के बाद वह घर पर भी हर समय अपने अध्ययन तथा प्रयोगों में लगा रहता था। वह एक क्षण भी बेकार रहकर माँ को यह सोचने का अवसर नहीं देना चाहता था कि न्यूटन के पास पढ़ाई के अतिरिक्त समय बचा रहता है। न्यूटन की इस बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोगी चतुरता ने उसे जो कार्य-व्यस्तता का लाभ पहुँचाया वह आगे चलकर उसके बहुत अधिक काम आया। काम करने की उसकी सारी वृत्तियाँ प्रबुद्ध हो उठीं और उसे अपने ज्ञान कर्म का स्वरूप बना दिया।

न्यूटन का स्वभाव था कि वह संसार की हर गतिविधि को बड़े ध्यान से देखा करता था जिससे उसे एक छोटी से छोटी गतिविधि भी एक रहस्य मालूम होती थी और उसमें उसे खोज निकालने की जिज्ञासा जाग उठती थी, जिससे धीरे-धीरे वह वैज्ञानिक अन्वेषणों की ओर प्रवृत्त हो गया।

कोई वैज्ञानिक खोज करने के पहले न्यूटन ने, जिस समय बी. ए. की तैयारी की थी उसने गणित के दो नये सिद्धान्त खोज निकाले थे जिससे विद्वज्जनों के बीच उसकी बड़ी प्रशंसा हुई थी और लोगों ने उसकी ओर ध्यान देना शुरू कर दिया।

अपने अन्वेषणों में न्यूटन ने एक पानी से चलने वाली घड़ी, एक धूप घड़ी तथा एक आटा पीसने वाली पवन चक्की बनाकर छोटी आयु में ही बड़े भविष्य का आभास दे दिया था। अपनी इन प्रारम्भिक सफलताओं से न्यूटन का साहस इतना बढ़ गया कि उसने संसार को उपयोगी खोजें देकर मानवता की सेवा करने का संकल्प कर लिया।

मनुष्य में यदि कुछ करने की इच्छा है और वह उसके लिये ईमानदारी से प्रयत्नशील भी है तो कोई कारण नहीं कि वह अपने संकल्प में कृत-कृत्य न हो सके। सच्ची लगन के लोगों का मस्तिष्क इतना उर्वर हो जाता है कि एक छोटा-सा सूत्र पाकर वह सृष्टि के बड़े से बड़े रहस्यों को बाहर निकाल लाता है।

निरन्तर विचार क्रिया से न्यूटन ने अपने मस्तिष्क को इतना ग्राही बना लिया था कि एक बार बाग में घूमते हुये उसने पेड़ से एक सेब को गिरते देखा। उसके जिज्ञासु मस्तिष्क ने तत्काल प्रश्न किया कि यह सेब टूटकर नीचे जमीन पर ही क्यों गिरा ऊपर आकाश में क्यों नहीं गया? बस फिर क्या था? प्रश्न उठते ही न्यूटन का मस्तिष्क-यन्त्र कारण खोजने की दिशा में गतिशील हो उठा। विचारों के स्तर पर स्तर खुलने लगे। एक के बाद एक रहस्यों के नक्षत्र कल्पना क्षितिज पर उदय और अस्त होने लगे। उधर मस्तिष्क की सूक्ष्म शक्तियों ने रहस्य बिन्दुओं को खोजना शुरू किया और इधर न्यूटन ने भौतिकता की कसौटी पर उनकी परख करने के लिए प्रयोग प्रारम्भ कर दिए। इस प्रकार न्यूटन का अन्तर तथा बाह्य, विचार एवं क्रिया मिलकर प्रकृति का रहस्योद्घाटन करने पर एक मत हो गये। मनुष्य का मन मस्तिष्क तथा इन्द्रियाँ जब एक रूप होकर क्रियाशील होते हैं तब वह देवत्व की एक ऐसी कक्षा में पहुँच जाता है जहाँ पर जीवन और जग के रहस्य उस पर स्वयं प्रकट होने लगते हैं।

न्यूटन सेब के पतन का कारण खोजने से डूब कर संसार को भूल गये और जब वे विचारधारा से निकल कर ऊपर आये तब उनके हाथ में “गुरुत्वाकर्षण” का सिद्धान्त था।

अनेक वर्षों के अनवरत परिश्रम के बाद न्यूटन ने जिस गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त को खोज निकाला था और जिसके कारण उनका नाम संसार में फैल गया था उस पर वे सहर्ष सन्तोष करके ही नहीं बैठे रहे थे। एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी पर आगे बढ़े और इसी सिद्धान्त के बल पर आकाशीय प्रकाश पिंडों की गतिविधि की गणना कर डाली और एक ऐसी दूरबीन का आविष्कार किया जिसकी मदद से दूरस्थ ग्रह-नक्षत्रों को आसानी से देखा जा सकता था। इस प्रकार मानवता के कल्याण कामी न्यूटन ने अपने को तिल-तिल खपाकर व्योमस्थ लोकों के लिए मनुष्य का प्रारम्भिक पथ प्रशस्त कर दिया। आज विज्ञान के बढ़े हुए युग में भले ही हमें न्यूटन की यह खोज साधारण लगे और आधुनिक गृह मंडलीय अभियान की तुलना में न्यूटन के सिद्धान्तों को हेय समझें किन्तु यह मानना ही होगा कि आज की इस वैज्ञानिक उन्नति के शिलान्यास का श्रेय सर आइजक न्यूटन को ही है, जिसके लिए संसार सदैव उनका आभारी रहेगा। किसी क्राँति को मूर्तिमान कर दिखाने वालों की अपेक्षा उसकी चेतना देने वाला भी किसी दशा में कम अभिनन्दनीय नहीं होता।

गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्तदाता न्यूटन की योग्यता और कीर्ति ने उन्हें अनेक शिक्षा संस्थानों द्वारा आमंत्रित कराया। यद्यपि उनकी इच्छा अध्यापन करने की नहीं थी तथापि नये-नये वैज्ञानिक निर्माण करने के मन्तव्य से वे कैम्ब्रिज कॉलेज में गणित के प्रोफेसर हो गये। अध्यापन क्षेत्र में हुए उन्हें अभी दो ही वर्ष हुए थे कि इंग्लैण्ड की महान वैज्ञानिक संस्था राँयल सोसाइटी ने उन्हें अपना सम्मानित सदस्य बना लिया और अपनी सूझ-बूझ तथा योग्यता के बल पर शीघ्र ही वे उसके अध्यक्ष चुन लिये गये। इस पद पर निरन्तर वे पच्चीस साल तक काम करते रहे।

इसके अतिरिक्त वे यूनीवर्सिटी क्षेत्र से पार्लियामेंट के मेम्बर भी चुने गये और इंग्लैण्ड की सरकार ने उनकी खोजों से प्रसन्न होकर टकसाल का अध्यक्ष बना दिया तथा रानी ऐन ने उन्हें “सर” की उपाधि भी दी।

मनुष्य के लगनशील पुरुषार्थ का यह कैसा जीता-जागता चमत्कार है और ज्ञान का कितना बोलता हुआ जादू है कि एक दिन भेड़ें चराने वाला अनाथ बालक न्यूटन आज इंग्लैंड की टकसाल का अध्यक्ष था।

अपने इन सब उत्तरदायित्वों को सँभालते हुये भी सर आइजक न्यूटन अपने खोज सम्बन्धी कार्यों में निरन्तर लगे रहे। गुरुत्वाकर्षण के सिद्धान्त के बाद वे प्रकाश के सिद्धान्त की खोज कर रहे थे इसी बीच 1729 ई. में 85 वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु हो गई।

न्यूटन ने बीस वर्ष के अनवरत परिश्रम के बाद प्रकाश सम्बन्धी अपने सिद्धान्त पूरे कर लिये थे, जिस समय अपना कार्य पूर्ण करने के बाद वे मेज पर सारे कागज रखकर किसी कार्यवश बाहर गये उसी समय कमरे में बैठा हुआ उनका कुत्ता एक चूहे पर इस प्रकार झपटा कि मेज पर रक्खा हुआ लैम्प गिर गया जिससे उनके प्रकाश सम्बन्धी सारे कागज भस्मीभूत हो गये।

जिस समय न्यूटन ने कमरे में आकर उस दृश्य को देखा तो आह करके कुर्सी पर पड़ गये। उनका कुत्ता पास आकर दुम हिलाने लगा। उन्होंने कुत्ते पर क्रोध करने के बजाय उसको थपथपा कर केवल इतना ही कहा—”प्यारे डायमण्ड! तुम्हें पता नहीं कि तुमने मेरा कितना बड़ा नुकसान कर डाला है।”

निःसन्देह न्यूटन का यह धैर्य, वह क्षमाशीलता ऋषित्व के स्तर की थी। उन्होंने वह वज्राघात एक साधारण घटना की भाँति सह लिया किन्तु कुत्ते पर जरा भी क्रोध नहीं किया।

सर आइजक न्यूटन ने अपनी सारी कमाई परोपकार में ही लगाई। न्यूटन अपने पर बहुत ही कम व्यय किया करते थे, अपनी सारी आय वे कुटुम्बियों तथा दीन-जनों की सहायता में ही खर्च किया करते थे।

अपने युग का महानतम व्यक्तित्व होते हुये भी न्यूटन में अभिमान की दुर्बलता नहीं थी। वे अपने विषय में कहा करते थे कि “मैं सत्य के अगाध तथा असीम समुद्र के किनारे केवल सीप और शाखों को बीनने वाला बालक हूँ।”

कहना न होगा इन्हीं महान गुणों ने सर आइजक न्यूटन को संसार का महान पुरुष बना दिया। इन गुणों को धारण किये बिना कोई भी महान नहीं बन सकता और जिसमें इन गुणों का विकास होगा वह महान पुरुष बने बिना रह नहीं सकता।


Quotation

अद्यैव कुरु यच्छ्रेयो वृद्धः सन्किं करिष्यसि। स्वागात्नाण्यपि भाराय भवन्ति हि विषर्यये॥

जो अपने कल्याण की बात है उसे आज ही कर। वृद्ध होकर क्या करेगा? क्योंकि वृद्धावस्था में अपने शरीर भी भारभूत हो जाते हैं।

धनमस्तीति वाणिज्यं किञ्चिदस्तीति कर्षणम्। सेवा न किंचिदस्तीति भिक्षा नैव च नैव च॥

धन होने पर वाणिज्य करना चाहिए। थोड़ा धन हो तो कृषि करनी चाहिए। कुछ भी धन न होने पर सेवा करनी चाहिए। भिक्षा तो कभी भी न करनी चाहिए।


भूख न लगने की शिकायत

मनुष्य स्वस्थ है यह उसकी गतिविधियों को देखकर जाना जा सकता है। यह आवश्यक नहीं कि चिकित्सक प्रमाणित करें तभी यह माना जाय कि अमुक व्यक्ति का स्वास्थ्य चंगा है। कुछ सामान्य नियम हैं जिनके व्यवहृत होने से स्वस्थ होने, न होने का सहज अनुमान किया जा सकता है।

आपको काम करते समय आलस्य और जम्हाई नहीं आती तो समझिये आपका स्वास्थ्य सही है। उल्लास, उत्साह और काम करने की रुचि निरोग आदमी में ही हो सकती है। गिरे हुए शरीर वाला रुक-रुक कर भिंचभिंच कर अरुचिपूर्वक काम की बेगार उठायेगा। इसी प्रकार यदि प्रगाढ़ निद्रा आ जाती है और दुःस्वप्न नहीं आते तो भी यह समझना चाहिए कि स्वास्थ्य ठीक है और शरीर के प्रति कोई चिन्ता करने की जरूरत नहीं है।

तीसरा महत्वपूर्ण नियम यह है कि आपको भूख भी खुलकर लगनी चाहिए। यदि आपको भूख न लगने की शिकायत रहती है तो यह समझना चाहिए कि आपके स्वास्थ्य की दिशा और भविष्य अच्छा नहीं। आजकल यह समस्या बहुसंख्यकों की है। अनेक कारणों से लोगों की स्थिति ऐसी बन गई है कि उन्हें ऐसी तीव्र भूख नहीं लगती जैसी सड़क कूटने वाले मजदूरों की होती है। भोजन में तरह-तरह के स्वाद उत्पन्न करने की आवश्यकता इसी कारण उत्पन्न हुई जान पड़ती है अन्यथा भूखे को रोटी चाहिये, स्वाद नहीं। रोटियों में, रूखी सब्जी में ही वह दम होता है जो शरीर को मजबूत और निरोग बनाये रख सके, पर प्रश्न यह है कि आपको मन्दाग्नि की, अपच की, भूख न लगने की शिकायत न होनी चाहिए।

भूख की तीव्रता जितनी अधिक होगी, पाचन-क्रिया भी उतनी ही सशक्त होगी। पाचन-क्रिया ठीक होगी तो रक्त भी पर्याप्त मात्रा में बनेगा और मल का निष्कासन भी सरलता से होगा। रक्त की पर्याप्त मात्रा बनती रहे और पेट में मल न रुके तो फिर शरीर के बीमार होने का कोई कारण नहीं रह जाता। यह सन्तुलन बना रहे इसके लिए आपको तीव्र भूख लगने की ओर ध्यान रखना चाहिए। भोजन से शक्ति और तृप्ति तो मिलती है। मानसिक समाधान तथा सन्तोष भी होता है पर यह सन्तोष और समाधान तभी संभव है जब भूख का डॉक्टर भी आप से सहमत हो, अन्यथा उदरस्थ आहार पेट से बगावत कर देगा और उसकी चिनगारियाँ रोग शोक की दशा में सारे शरीर में फूट पड़ेंगी। शरीर की विकृत अवस्था का संकेत आहार के प्रति अरुचि से हो जाता है, इसलिए यह बहुत जरूरी है कि आपको भूख ऐसी लगे कि समय पर भोजन न मिलने पर आप तिलमिला उठें और जो कुछ मिल जाय उसे ही प्रेमपूर्वक खा लें।

कोष्ठबद्धता जो स्वास्थ्य का प्रबल शत्रु है, भोजन की अरुचि का परिणाम है। भूख लगे नहीं, खाना खाते जायें तो पेट में मल की दीवारें चढ़ती जायेंगी और आंतें मल के कारण फूलकर कमजोर हो जायेंगी और शक्ति -उत्पादन क्रिया में शिथिलता आ जायेगी।

आइये विचार करें आपको भूख न लगने की शिकायत कैसे पैदा हुई?

एक बात तो यह है कि असमय भोजन के कारण मन्दाग्नि उत्पन्न होती है। भोजन के उपरान्त पेट के लिए एक निश्चित विश्राम का समय होता है। उतने समय में शक्ति -ग्रहण और मल को मलाधार की ओर धकेल देने की क्रिया आँतें पूरी करती हैं। इसके बाद अगले मोर्चे के लिए उन्हें पर्याप्त विश्राम की भी आवश्यकता होती है। दो क्रियायें करने के बाद पेट आराम करने लगता है पर जो लोग इसमें बाधा उत्पन्न करते हैं और समय के पूर्व आहार लेकर उसे छेड़ते हैं, पेट उनसे रुष्ट हो जाता है। यह नाराजी मन्दाग्नि द्वारा प्रकट होती है और उसका स्वास्थ्य पर तत्काल दूषित प्रभाव पड़ता है।

प्रातःकाल हलका पेय, दोपहर को रोटी-दाल या चावल सब्जी आदि जो रुचि और प्रकृति के अनुकूल पड़े, ग्रहण कर लीजिए। सायंकाल दलिया, दूध, फल या हल्का शाकाहार कर लीजिए। बस, इस नियम को भंग न कीजिए। कभी चाय, कभी बिस्किट, कभी चाट, कभी पकौड़े-यह बुरी आदत है। असमय, बार-बार भोजन करते रहेंगे तो पेट ठीक नहीं रहेगा और आपका स्वास्थ्य भी गिर जायेगा।

भोजन की दिनचर्या भी नियमित होनी चाहिये। ऐसा करने पर पेट का सन्तुलन खराब न होगा। अच्छा तो यह रहे कि जब तक तीव्र भूख नहीं लगती तब तक आप खाइये ही नहीं।

आपके पेट का स्वभाव आप जैसा ही है यह जान लीजिये। सप्ताह में एक दिन रविवार का सरकारी छुट्टी मिलती है। वह आपको न मिले तो आप नाशुख हो जायें। कृपा कर अपने पेट को भी सप्ताह नहीं तो 15 दिन, इतना भी नहीं तो एक माह में एक दिन का अवकाश अवश्य दीजिये।

पेट का अवकाश उपवास है। अभी तक आपने उपवास नहीं किया इसलिये आपको अच्छी भूख नहीं लगती। अब आगे से ऐसा नियम बना लीजिये कि प्रति रविवार, एकादशी या जो दिन उपयुक्त हो उस दिन आप पूरे दिन या एक बार भूखे रहने का अभ्यास किया कीजिये।

पर कहीं ऐसा न करें कि आज एक बार न खाकर पाव-भर अन्न बचाया और दूसरे दिन आज का एक पाव+पिछला एक पाव अर्थात् आधा सेर खाना एक साथ खा लिया। ऐसा करेंगे तो पेट खराब हो जायगा और शेष भूख भी मर-मिट जायेगी।

कहीं आपके आहार में अन्न की मात्रा अधिक और जल की मात्रा कम तो नहीं? पानी आहार से अधिक लिया कीजिये। आहार के एक घण्टे बाद शीतल जल पीने का नियम बड़ा उपयोगी है। इससे पेट साफ रहता है, भूख खुली रहती है।

अपने आहार में गरिष्ठता न बढ़ाइये। मिठाइयाँ, मावे की बनी वस्तुयें कम खाइये। नमक, मिर्च, गुड़, तेल, शकर, खटाई आदि का प्रयोग जितना कम कर सकें अच्छा है। अधिक दूध और घी भी भूख को शिथिल करते हैं। माँस, मद्यपान, बीड़ी, सिगरेट, चाय आदि की गर्मी से भी भूख कमजोर होती है, इनसे जितना बच सकें बचिये। तीखी औषधियों के सेवन से बचना आवश्यक है, यह आपके पेट की क्रिया-शक्ति को नष्ट कर डालती हैं।

आहार लेते समय जलवायु का भी ध्यान रखना चाहिये। गर्मियों के दिन में विचारवान् लोग मोटा आहार कम कर देते हैं और तरल पेय-पदार्थों की मात्रा बढ़ा देते है। यह स्मरण रखिये कि आहार जठराग्नि को मन्द न करे उसी के अनुसार भोजन और पेय की मात्रा ऋतु के अनुकूल कम या अधिक कीजिए।

दो बार खाना खाते हैं तो दो बार शौच भी जाया करें। मल की सड़ती हुई गर्मी भोजन के प्रति अरुचि पैदा करती है। दुबारा भोजन तब करना चाहिए जब पहला शौच हो जाय और आप स्नान कर लें। शौच और स्नान से भूख खुल जाती है।

यह दोनों क्रियायें जल्दबाजी में कभी मत करिये। इनका सम्बन्ध भीतरी और बाहरी सफाई से है। यह सफाई सुव्यवस्थित और पूर्ण हुई तो शरीर निरोग, मन प्रसन्न जठराग्नि प्रदीप्त रहेगी। शौच गन्दे स्थानों में न जाया करें। पाखानों की दुर्गन्ध भी भूख को मारती है। अतः यदि संभव हो तो शौच दूर जंगल की ओर जाना चाहिए।

किन्तु कृपया शक्तियों को अपव्यय भी तो न करें। आहार ठीक किया सही, परिश्रम भी पर्याप्त करते हैं पर यह न भूलें कि ब्रह्मचर्य तोड़ना भी भूख रोकने का बड़ा जबर्दस्त कारण है। अति कामुकता का, भोग का प्रभाव सीधे पेट की क्रियाओं पर पड़ता है। विषयी व्यक्ति का आहार भी ठीक रहना कठिन है। इसलिए इन्द्रिय-सेवन की अधिकता से शक्तियों का तेजी से पतन होता है और एक ऐसी ध्वंसात्मक गर्मी भीतर पैदा होती रहती है जो खून को सुखाती रहती है। इससे उन्हें ठीक भूख लगना बन्द हो जाती है।

यह तीन नियम हैं जिन पर भूख का कम-ज्यादा लगना निर्धारित है। इन्हें ठीक कर लिया जाय तो मन्दाग्नि की शिकायत दूर हो सकती है।

आपका आहार और उससे सम्बन्धित क्रियायें दुरुस्त होनी चाहिए। परिश्रम करने से जी न चुराना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। यह बातें आपको मंजूर हों तो विश्वास कीजिए आपकी मन्दाग्नि ठीक हो जायेगी। इनका उल्लंघन करना ही भूख न लगने का कारण है, और इसी से स्वास्थ्य को जबर्दस्त धक्का लगता है।


बच्चों में सेवा-भाव का विकास कीजिए।

जिन बच्चों में प्रारम्भ से सेवा की भावना का स्वस्थ विकास कर दिया जाता है वे आगे चलकर अपने सेवा-भाव से समाज में प्रतिष्ठा के पात्र बन जाते हैं। सेवा-पथ से चल कर हजारों ऐसे व्यक्ति उन्नति के महान शिखरों पर पहुँचे हैं, जिनके पास साधन नाम की कोई वस्तु ही न थी। उनके परिवार निर्धन और निरक्षर थे।

तन, मन और वाणी से दूसरे की सेवा में तत्पर रहना स्वयं इतना बड़ा साधन है कि उसके सम्मुख किसी अन्य साधन की आवश्यकता ही नहीं रहती। क्योंकि जो व्यक्ति सेवा में सच्चे मन से लग जायेगा उसको सीमा के भीतर के सारे साधन अवश्य ही प्रस्तुत रहते हैं। इस प्रकार प्रत्येक की सेवा में तत्पर रहने से प्रत्येक के साधन सुलभ रहने से साधनों की प्रचुरता हो जायेगी।

किन्तु, जो निःस्वार्थ भाव से सेवा करने के लिए ही करता है वह दूसरे के साधन का अपनी निजी आवश्यकता अथवा उन्नति के लिए उपयोग नहीं करता। और सच बात तो यह है कि उसको किसी के साधनों की आवश्यकता ही नहीं रहती। सच्चा-भाव रखने वाले के लिये पथ के अवरोध स्वयं हटते और सफलताओं के द्वार खुलते चले जाते हैं। हर आदमी उसके सेवा-भाव से प्रसन्न हो, विनिमय रूप में कुछ न कुछ सहायता एवं सहयोग करने के लिए लालायित रहते हैं।

अस्तु, समाज के सुन्दर निर्माण और भविष्य में उन्नति के लिए बच्चे में सेवा-भाव का विकास करना अत्यन्त आवश्यक है। इस सेवा-भाव को विकसित करने के लिए परिवार सबसे सुन्दर संस्था है। धीरे-धीरे गुरुजनों की सेवा से प्रारम्भ करके सारे परिवार की सेवा करने के भाव का जागरण करना चाहिए।

किन्तु यह शिक्षण प्रारम्भ करने से पूर्व सेवा के स्वरूप को भी समझ लेना चाहिए। साधारणतः सेवा के दो स्वरूप होते हैं। एक तो अपनी सुख-सुविधा और आराम के लिए सेवा लेना, दूसरी वह सेवा जो सहायता, सहयोग और सहानुभूति के रूप में की जाती है। जैसे लेट कर थकान दूर करने या नींद लाने के लिए हाथ-पैर दबवाना, शरीर की मालिश करना अथवा नहाने-धोने में उससे सहायता लेना। यह प्रथम प्रकार की सेवा है, जिससे बच्चे में वाँछित सेवा-भाव का उदय न होगा। कदाचित इस प्रकार की सेवा दूसरों को प्रदान करने में उसे संकोच भी होगा और न कोई अन्य व्यक्ति इस प्रकार की सेवा लेने का अधिकारी ही होता है और न वह पसन्द ही करेगा।

विपत्ति के समय सहायता करना किसी काम में सहयोग करना और दुःख में सहानुभूति देना-जैसे असम्भाव्य घटना में दौड़ जाना, ब्याह-शादी आदि उत्सवों में हाथ बटाना, रोगादिक कष्टों में औषधि उपचार आदि का ध्यान रखना और कारुणिक अवसरों पर शान्ति और धैर्य देना दूसरे प्रकार की सेवा है। जिसको प्रदान करने में न तो बच्चे को संकोच होगा और न कोई दूसरा अपने को अनधिकारी समझेगा। इन दोनों प्रकार की सेवाओं में जो एक अन्तर है वह यह है कि प्रथम प्रकार की सेवा में सामान्यतः दास-भाव है और दूसरे प्रकार की सेवा में परोपकार-भाव।

अपनी व्यक्तिगत सेवा लेने का अधिकार होते हुए भी अभिभावकों को बच्चे में परोपकार-भाव ही जाग्रत करने का प्रयत्न करना चाहिए। इसका प्रारम्भ घर की व्यवस्था ठीक करते समय चीजों को उठाने धरने में अपने हाथ बंटवाकर, छोटे भाई-बहिनों को पढ़ाने-लिखाने और पाठशाला जाने-आने में सहयोग करा कर तथा ऐसी सेवायें लेकर किया जा सकता है। जिससे उसे उसका अभ्यास हो और रुचि उत्पन्न हो।

सेवा का अभ्यास कराने के साथ-साथ उसे उसकी प्रेरणा भी देना चाहिए। उसे नित्य-प्रति परोपकार की महत्ता और उससे होने वाले लाभों को बतलाना चाहिए। उसकी असहायों की सहायता और आवश्यकता के समय दूसरों के काम आने के नैतिक कर्तव्य और उसके ढंग का ज्ञान कराना चाहिये।

यद्यपि बच्चों को पाठशाला और अनेक अन्य अवसरों पर परोपकार की शिक्षा दी जाती है, किन्तु उसका कोई यथार्थ लाभ नहीं होता। उसका कारण है कि औपचारिक रूप से कार्यक्रमों के अनुसार उसे मौखिक उपदेश-भर दे दिया जाता है। वास्तविक प्रेरणा नहीं दी जाती। वास्तविक प्रेरणा तो बच्चों को ठीक-ठीक अभिभावकों से ही प्राप्त हो सकती है। क्योंकि ऐसे कामों के लिए अन्यों की अपेक्षा माता-पिता के कथन को अधिक प्रभाव पड़ता है।

सामाजिक प्राणी होने वे कारण बच्चे से लेकर बूढ़े तक प्रत्येक मनुष्य में सेवा और सहयोग के कुछ सहज संस्कार भी होते हैं, किन्तु वे जगाये न जाने के कारण प्रत्यक्ष नहीं हो पाते। माता-पिता की प्रेरणा से वे संस्कार शीघ्र जाग सकते हैं। क्योंकि उनके कथन में बच्चे को अधिक विश्वास रहता है। वह जानता है कि माता-पिता उसे जिस बात के लिए कहेंगे उसमें उसका हित निहित होगा।

बहुत से अभिभावक बच्चों को पैसे का लोभ देकर सेवा करने के लिये प्रेरित करते हैं। जैसे—”तुम मेरे एक घण्टा पैर दबाओ तो मैं तुम्हें दो आने दूँगा” -या- “तुम मेरा अमुक काम कर दो तो मैं तुम्हें अमुक वस्तु दूँगा।” यद्यपि इसमें एक स्नेह और बच्चों को सेवा करने के लिए प्रोत्साहित करने की भावना छिपी रहती है, तथापि इस प्रकार सेवाओं का सौदा करने से बच्चों के लोभी बन जाने का भय रहता है। फिर वे हर जगह और हर व्यक्ति से अपनी सेवा का मूल्य चाहने लगेंगे।

किसी बच्चे द्वारा काम किये जाने पर, सभ्यता के नाते हर व्यक्ति यह प्रयत्न करता है कि उसे इसके बदले में कुछ दिया अवश्य जाये। किन्तु बच्चे में इतनी निःस्वार्थता अवश्य होनी चाहिए कि वह विनम्रतापूर्वक उसे लेने से इनकार कर दे। जो बच्चे अपनी सेवाओं का मूल्य ले लेते हैं वे दूसरों की सहज सद्भावना और स्नेह से वंचित हो जाते हैं।

निःस्वार्थ भाव से सेवा करने वाले बच्चे सबको प्यारे लगते हैं। सबके हृदय में उनके लिए एक आशीर्वाद का भाव रहता है। हर व्यक्ति अपनी आत्मा से उनके कल्याण की कामना करता है। इस प्रकार बच्चे के साथ ज्यों-ज्यों उसका सेवा कार्य बढ़ता जाता है त्यों-त्यों उसी अनुपात से समाज में अधिक से अधिक उसके प्रति सद्भावना को कोष बढ़ता जाता है और एक दिन ऐसा आता है कि उसकी उपयोगिता इतनी बढ़ जाती है कि अधिक से अधिक जन समुदाय उस पर निर्भर रहने लगता है। और तब वह राष्ट्र और समाज का एक स्वस्थ नेतृत्व करने योग्य व्यक्ति मान लिया जाता है।

संसार के इतिहास में एक नहीं हजारों ऐसे उदाहरण हैं कि साधारण से साधारण व्यक्ति सामान्य सेवा मार्ग से चलते हुए राष्ट्रों के महान से महान नेता हुए हैं। किन्तु यह होता तब ही है जब किसी का सेवा -भाव निःस्वार्थता की चरम सीमा पर होता है। बड़ी से बड़ी पदवी पर पहुँच कर भी जहाँ उसके सेवा-भाव में दोष आया नहीं कि वहीं से उसका पतन प्रारम्भ हो जाता है। जहाँ अनन्त उन्नति के उदाहरण इतिहास में मिलते हैं, वहाँ इस प्रकार के पतनों के उदाहरणों की भी कमी नहीं है।

अतएव जहाँ बच्चे में सेवा-भाव का विकास किया जाए वहाँ निःस्वार्थ भावना के संस्कार भी डाले जाएँ। निःस्वार्थ सेवा करने से दिनों-दिन उसके प्रति उत्साह की वृद्धि होती है। इसके विपरीत स्वार्थपूर्ण सेवा-भाव आगे चलकर कुछ समय में अपने पर एक बोझ बन जाता है। जिसको वहन कर सकना सामर्थ्य के बाहर हो जाता है।

सेवा का कोई तात्कालिक मूल्य न लेते हुए भी यदि भविष्य की उन्नति का भी ध्यान रक्खा जायेगा तो यह भी एक प्रकार का स्वार्थ ही होगा। क्योंकि इस प्रकार तो यह भाव अपने सेवा-मूल्यों को समाज में संचित करते रहने और आगे चल के नेतृत्व आदि के रुप में इकट्ठा वसूल कर लेने के समान ही होगा, जो उसकी सहज और सच्ची उन्नति में बाधक होगा।

अस्तु, बच्चों को क्या वर्तमान और क्या भविष्य में होने वाले किसी लाभ की भावना से मुक्त रखते हुए उनमें निःस्वार्थ सेवा का भाव सदा के लिए ही उत्पन्न किया जाना चाहिए।


निष्ठा का पुतला—महान वैज्ञानिक एडीसन

आज जो हमें तार, टेलीफोन, ग्रामोफोन, चलचित्र, प्रोजेक्टर तथा बिजली के चमत्कार दिखाई दे रहे हैं इनमें वास्तव में अमेरिका के एक वैज्ञानिक एडीसन की लगन, यत्न तथा कार्य कुशलता की विशेषतायें मूर्तिमान हो रही हैं। वह एडीसन, जिसे इस समय लोग जादूगर कहा करते हैं और जिसे ठीक से पेट भर भोजन भी न मिला करता था।

एडीसन का जन्म एक बहुत ही साधारण अमेरिकन परिवार में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के ओहिबो प्रान्त के सलान नगर में 11 फरवरी 1847 ई. को हुआ था। एडीसन के माता-पिता की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उसको किसी स्कूल में पढ़ाया जा सके। उसकी माता ने ही अपनी योग्यता के अनुसार उसे घर पर ही कुछ शिक्षा दी थी। किन्तु अत्यधिक कार्य व्यस्तता तथा परिश्रम के कारण जब उसकी माता को पढ़ाने के लिये समय की कमी रहने लगी तब उसने अनेक लोगों से कह सुनकर उसे एक स्थानीय पाठशाला में भरती करा दिया। लेकिन माता का यह सारा प्रयत्न व्यर्थ चला गया। एडीसन का मन पढ़ाई में न लग सका। वह स्कूल जाता और बुत जैसा बैठा रहता और न जाने क्या-क्या सोचता रहता। अध्यापकों ने उसकी शिकायत माँ से की और माँ ने हताश होकर उसे पाठशाला से उठा लिया।

स्कूली शिक्षा से मुक्त होकर एडीसन ने धीरे-धीरे यह सिद्ध करना शुरू कर दिया कि वह संसार में स्कूल की कुछ कक्षायें पास करने के लिये नहीं आया बल्कि अपने पुरुषार्थ, प्रयत्न तथा एकाग्र निष्ठा का सुफल वैज्ञानिक आविष्कारों के रूप में संसार को देने के लिये आया है।

उसने अपने घर से कुछ दूरी पर कुछ झाड़-झंखाड़ जोड़कर अपनी एक छोटी-सी प्रयोगशाला बनाई और अपने वैज्ञानिक कार्यों में लग गया। वह दिन का अधिकाँश समय अपनी प्रयोगशाला में ही लगाता। अपनी लगन की धुन में उसे खाने-पीने की भी सुध नहीं रहती। कभी यदि माँ आ गई तो भोजन खा लिया या किसी दिन समय से घर जा पहुँचा तो माँ ने वहाँ खिला दिया। अन्यथा एडीसन का खाने-पीने से कोई सम्बन्ध नहीं रहा।

ऐसा नहीं कि वह कोई सिद्ध अथवा चमत्कारी पुरुष था जिससे उसे भूख-प्यास लगती ही नहीं थी, बल्कि वास्तविकता यह थी कि वह अपने प्रयोगों में इस सीमा तक डूबा रहता था कि उसे इसका ध्यान ही न रहता था। भूख-प्यास भोजन न मिलने पर शरीर को निर्बल बना देती है किन्तु जब तल्लीनता-वश मनुष्य इनका अनुभव ही नहीं कर पाता तब उसके शरीर पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। सच्चा कर्मयोगी वास्तव में रोटी से नहीं अपने कार्य की बदौलत जीता है। जिसे काम करने को चाव है जिसे परिश्रम से प्रेम तथा कुछ विशेष करने की लगन लगी है, यदि उसे कर्म क्षेत्र से हटा कर भोजन भंडार में रख दिया जाये तो अवश्य ही वह दिन-दिन क्षीण होता हुआ निर्बल हो जायेगा और यदि भोजन की अपेक्षा उसे अधिक से अधिक काम मिलता रहे तो उसका स्वास्थ्य बहुत अंशों तक ठीक रहेगा।

एडीसन की वैज्ञानिक बुद्धि का जागरण जादूगरी दिखाने वाले लोगों के प्रदर्शित अचम्भे से हुआ। उसने जादूगरों के खेल देखे और उनको समझने का प्रयत्न किया। यद्यपि प्रारम्भ में कोई बात उसकी समझ में नहीं आई तो भी वह जादूगरों के कामों को अलौकिकता से न जोड़ सका, उसको सदैव यह विश्वास बना रहा कि अवश्य ही इन चमत्कारों के पीछे इन जादूगरों की कोई चतुरता काम कर रही है। वह निरन्तर उनको जानने के प्रयत्न में लगा रहा और आखिर में बहुत-सा जानकर इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि संसार में चमत्कार नाम की कोई वस्तु नहीं है। यह सब मनुष्य के विवेक तथा बुद्धि की ही विलक्षणता होती है जो अनजान लोगों को चमत्कार जैसी दिखती है। जिनकी बुद्धि सजग है, जो किसी अनजानता को जानने का उत्सुक है और अन्ध-विश्वासों से जड़मति नहीं हो गया है। वह किसी विलक्षणता को देखकर भौंचक्का होने के बजाय उसका रहस्य पता करने का प्रयत्न करता है, और जब तक पता नहीं कर लेता अपने प्रयत्न से विरत नहीं होता। मनुष्य की विवेक बुद्धि में संसार के सारे रहस्य छिपे रहते हैं और जो उनको पता करने में ईमानदारी के साथ लग जाता है वह अपने उद्देश्य में अवश्य कृत-कृत्य हो जाता है।

जिस प्रकार एडीसन की वैज्ञानिक बुद्धि का जागरण जादूगरों के चमत्कार देखने से हुआ उसी प्रकार उसके वैज्ञानिक प्रयोग एक मूर्खता से प्रारम्भ हुये। सिडिलित्स नाम का एक पाउडर होता है जो गरमी पाकर गैस के रूप में बदल जाता है, और गैस का धर्म है ऊपर उठना और साथ में सामर्थ्य भर अपने पात्र को उड़ा ले जाना। एडीसन ने वह पाउडर एक आदमी को यह देखने के लिये खिला दिया कि पेट में गैस बनने से वह आदमी गुब्बारे की तरह ऊपर उड़ता है या नहीं। आखिर अमेरिका का वह भावी वैज्ञानिक उस समय बच्चा ही था। प्रयोगों की सनक में वह मूर्खता क्यों न करता? यह घटना जहाँ एडीसन की मूर्खता व्यक्त करती है वहाँ आत्म-विश्वास पूर्ण आधारित प्रयोग जिज्ञासा को भी प्रकट करती है, जिसने आगे चलकर उसके बड़े-बड़े प्रयोगों की सफलता में बड़ी सहायता की।

समाज तथा सरकार ने उस बाल-वैज्ञानिक की मूर्खता क्षमा नहीं की। उसकी प्रयोगशाला उखाड़कर फेंक दी गई और उसे पर्याप्त दण्ड दिया गया। यही नहीं उसके घर वालों ने भी उसे एक खतरनाक लड़का समझकर घर से निकाल दिया। तो अब क्या ऐसी विषम स्थिति में वह किसी एकान्त कोने में बैठकर रोता। हाँ वह रोता अवश्य यदि उसकी लगन झूठी होती, उसका उत्साह छुई-मुई और उसकी जिज्ञासा आत्म-प्रवंचना होती। जब वह मन प्राण से ईमानदार रहकर संसार को कुछ देना चाहता था तो भला वह इस धक्के से निराश होकर रोता क्यों। ऐसे न जाने कितने धक्के, कितने झटके और कितनी असफलताएँ जीवन में आवेंगी। तब भला यदि वह यों ही रोने के लिए बैठने लगा तब तो वह प्रयोग कर चुका और दे चुका संसार कोई अनुपम उपहार।

प्रयोगशाला उखाड़ फेंकी गई—घर से निकाल दिया गया—न खाने का ठीक और न रहने का ठिकाना —किन्तु उत्साही एडीसन ने जमीन के नीचे एक तहखाने में अपनी प्रयोगशाला बना ली और रेलों पर अखबार बेच कर अपनी जीविका चलाने लगा।

धीरे-धीरे एडीसन ने अपने प्रयोगों के साथ- साथ अपने व्यवसाय का विकास भी करना शुरू कर दिया। अब वह जिस प्रेस से अखबार लाता वहाँ थोड़ी देर ठहर कर कार्य विधि देखता और छपाई की कला सीखता। छपाई कार्य शिल्प सीखने के लिये उसने छापा खाने का बहुत-सा काम बिना कोई पारिश्रमिक लिये किया। एडीसन को अपनी क्षमताओं पर पूर्ण विश्वास था कि कुछ समय परिश्रम का उत्सर्ग करने के बाद वह छपाई का एक ऐसा काम जान जायेगा जो जीवन भर उसको लाभ पहुँचाता रहेगा, और हुआ भी ऐसा ही। उसका त्याग फलीभूत हुआ। उसने उस गाड़ी पर एक छोटा-सा छापाखाना लगा लिया और स्वयं अपना अखबार छापने लगा। उसकी रोटी की समस्या एक अच्छे स्तर पर हल हो गई।

बुद्धिमान एडीसन ने अपनी आय को खाने-उड़ाने में नहीं खोया बल्कि मितव्ययता के साथ बचा-बचाकर अपनी प्रयोगशाला को उन्नत एवं उपकरण पूर्ण बनाना प्रारम्भ कर दिया। एक व्यवस्थित विधि से जीवन में जो क्रमिक विकास होता है वह सदैव ही स्थिर रहता है और उसमें दिन-दिन सफलता के फल लगते रहते हैं।

एडीसन की प्रयोगशाला तहखाने में और छापाखाना रेलगाड़ी में था, इसलिये उन दोनों आवश्यक उद्योगों की व्यवस्था ठीक न हो पाती। अतएव उसने प्रयोगशाला को भी रेल के एक डिब्बे में लाकर समस्या हल कर ली। इस प्रकार श्रम तथा समय का अपव्यय बच जाने से वह निश्चिन्त होकर अपने प्रयोगों में लग गया।

यह निश्चित है कि वैज्ञानिक प्रयोग कभी भी एक बार में सफल नहीं होते। उनमें असफलता तथा त्रुटियाँ होतीं और सुधरती रहती हैं। उसके प्रयोग चलते रहे। किन्तु इसी बीच जब वह फास्फोरस के साथ कुछ प्रयोग कर रहा था तभी गाड़ी के झटके से फास्फोरस की शीशी गिरकर फूट गई जिससे डिब्बे में आग लग गई। बड़ी भाग-दौड़ मची। आग तो कुछ पार्सल जलाकर बुझ गई किन्तु रेलवे अधिकारियों ने एडिसन की पूरी प्रयोगशाला मय छापाखाने को उठाकर बाहर फेंक दिया।

एडिसन की प्रगति पर यह दूसरा आघात था। किन्तु वह फिर भी हताश न हुआ और फिर लौटकर अपने अखबार बेचने के व्यवसाय पर आ गया। प्रगति पथ पर कुछ दूर तक बढ़ जाने के बाद पीछे लौटना एक बहुत दुखद संयोग है जिसके आघात से किसी का चल-विचल होना कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। किन्तु जो प्रगति पथ के सच्चे राही हैं वे एक क्या हजार बार पीछे आकर आगे बढ़ते हैं और ऐसे ही साहसी शूरो को प्रकृति की सहायता भी मिला करती है।

एडीसन प्लेटफार्म पर अखबारों का बंडल लिये खड़ा था और गाड़ी दौड़ती चली आ रही थी। तभी उसकी दृष्टि सामने पटरी पर खेलते हुए स्टेशन मास्टर के बच्चे पर पड़ी। गाड़ी आ ही चुकी थी और बच्चे के बचने की कोई सम्भावना न थी। किन्तु साहसी एडीसन ने तत्काल बंडल फेंका और बालक की प्राण रक्षा में अपने प्राणों को संकट में डालकर बिजली की तरह दौड़कर उसे उठा लाया।

बच्चा स्टेशन मास्टर का था। उस स्टेशन मास्टर का जिसने उसका छापाखाना तथा प्रयोगशाला फिंकवा दी थी। एडीसन यह जानता था, पर क्या वह उसका बदला उस अबोध बच्चे से लेता? अपनी उस मानवता को द्वेष की निकृष्ट वेदी पर बलिदान कर देता जिसने उसे उस बच्चे के प्राण रक्षा के लिये प्रेरित किया था?

एडीसन का पुण्य फलीभूत हुआ। बच्चे की प्राण रक्षा करके उसने स्टेशन मास्टर और उसके परिवार को दुखद सम्भावना से बचाकर जो उपकार किया था वह फल दिया। उपकृत स्टेशन मास्टर ने उसे तार की शिक्षा देकर उसी स्टेशन पर सहायक तार बाबू बना लिया।

यहाँ भी एडीसन ने सोचना, समझना और प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया और एक ऐसा यन्त्र तार की क्रिया में जोड़ दिया जो समय पर स्वयं ही तार खटखटा दिया करता था। एडीसन को समय के साथ विश्राम मिलने लगा जिसका सदुपयोग करके उसने उसी तारतम्य से एक ऐसी फीता-मशीन का आविष्कार कर डाला जिससे भेजा हुआ सम्वाद गन्तव्य स्थान पर एक फीता-पट्टी पर स्वयं छप जाया करता था।

यह एक महत्वपूर्ण आविष्कार था। एडीसन ने अपने को पहचाना अपने महान मस्तिष्क का परिचय पाया और नौकरी छोड़ दी।

जिस समय वह आविष्कारों के लिये एक बड़ा क्षेत्र पाने तथा अधिक साधनों के लिये न्यूयार्क आया उस समय उसके पास एक पैसा भी नहीं था। ‘गोल्ड इन्डीकेटर’ कम्पनी का वह तार यन्त्र खराब हो गया जिससे दलाल लोग व्यापारियों को सम्वाद भेजा करते थे। एडीसन ने यन्त्र ठीक किया जिसके फलस्वरूप वह उस कम्पनी के तार घर का मैनेजर बना दिया गया।

कम्पनी का सहारा पाकर एडीसन ने यूनीवर्सल प्रिंटर नामक एक मशीन बनाई जो आगे चलकर उसके नाम पर ‘एडीसन यूनीवर्सल प्रिंटर’ कही जाने लगी। इस आविष्कार पर कम्पनी के अध्यक्ष ने उसे चालीस हजार डालर का पुरस्कार दिया।

धन की प्रचुर सुविधा पाकर एडीसन ने एक साधन सम्पन्न प्रयोगशाला बनाई और उसमें नये-नये प्रयोग करने लगा। उसने बिजली के एक ही तार पर अनेक सम्वादों के जाने-आने की व्यवस्था बनाई, टेलीफोन यन्त्र का सुधार तथा परिष्कार किया, लाउडस्पीकर बनाया और ग्रामोफोन का आविष्कार कर संसार में हलचल पैदा कर दी।

चित्रपट पर दिखाये जाने वाले चल-चित्रों के लिये ‘स्लोलाइट’ की रील तथा चित्र-प्रदर्शन के लिये प्रोजेक्टर का निर्माण किया, एक्सरे का आविष्कार करने के साथ जल युद्ध में काम आने वाले बहुत से उपकरण तथा अन्य यन्त्र बनाये।

इस प्रकार अपनी बुद्धि, लगन तथा निष्ठा के बल पर मानव जाति की सुख-सुविधा की व्यवस्था में जीवन के 84 वर्ष लगाकर महान आविष्कार कर टाँमस अल्वा एडीसन 18 अक्टूबर 1931 ई. को स्वर्ग सिधार गया। एडीसन आज संसार में नहीं है किन्तु बिजली के बल्ब और चलचित्रों का चमत्कार अन्य आविष्कारों के साथ उसकी यश गाथा युग-युग तक गाते रहेंगे।

युग-निर्माण आन्दोलन की प्रगति

पाँच सामाजिक कार्यक्रम

जो इसी मास कार्यान्वित होने चाहिए।

अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को अपने कन्धों पर आये हुए नव निर्माण के उत्तरदायित्वों को अधिक तत्परता एवं श्रद्धा के साथ सँभालना चाहिए। यों स्वभावतः इस संगठन के अंतर्गत वे ही लोग एकत्रित हुए हैं, जिन में पूर्व जन्मों के संचित कुछ विशेष संस्कार विद्यमान हैं और जो अपने इस मानव-जीवन को ईश्वर की महान अनुकम्पा मानकर उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग के लिए प्रयत्नशील हैं।

सामान्य स्तर के लोग वासना और तृष्णा के गोरखधन्धे में उलझे हुए किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। मानव-जीवन के अनुपम सौभाग्य का सदुपयोग कर भविष्य उज्ज्वल बनाने की बात कभी उनके मन में उठती ही नहीं, पाशविक इच्छा आकांक्षाएं ही उनके इस सौभाग्य का अपहरण कर लेती हैं, जैसे खाली हाथ आये थे वैसे ही खाली हाथ चले जाते हैं, वरन् बहुत करके गुनाह और पापों की दुखदायी गठरी ही सिर पर बाँध ले जाते हैं। ऐसे लोगों के साथ रहते हुए भी जिनके अन्तःकरण में आत्म-कल्याण, परमार्थ, लोक मंगल एवं मानवीय कर्तव्यों की पूर्ति की उमंगें उठती रहती हैं उन्हें भाग्यवान ही कहना चाहिए। अखण्ड-ज्योति परिवार ऐसे ही भाग्यवानों का समूह- संगठन है।

निस्संदेह अगला समय बहुत ही प्रकाशवान आ रहा है। अँधियारी रात अब समाप्त होने ही वाली है, ऊषाकाल निकट है। नवयुग का प्रभात उगने ही वाला है। इस अरुणोदय के स्वागत सत्कार का श्रेय जिन्हें मिलने वाला है उनका मानव-जीवन सार्थक ही कहा जायेगा। राम राज्य आने वाला था, उसकी भूमिका सम्पादन में रीछ, वानरों को श्रेय सुयोग मिला उन्हें धन्य ही कहना चाहिए। भारत स्वाधीन होने वाला था, उसकी पूर्व भूमिका बनाने में योगदान दिया वे इतिहास के स्वर्णिम अक्षरों में अंकित रहेंगे। जन-श्रद्धा की पुष्पाञ्जलियाँ सदा उनके चरणों पर बिखरती रहेंगी। उन्हें बेशक कुछ कष्ट उठाने पड़े, त्याग करने पड़े पर जो लोग ऐसे उदार कार्यों से दूर रहते हैं उन्हें ही कौन सदा सुख-समृद्धि का उपयोग मिलता है। स्वार्थी और संकीर्ण जीवन बिताने वाले भी एक से एक बढ़कर कष्ट सहते और हानि उठाते हैं। ऐसे शोक सन्ताप से भरे संसार में जिसने देश-धर्म के लिए कुछ त्याग किया, कष्ट सहा उन्हें दूरदर्शी एवं बुद्धिमान ही कहा जायगा। हमारा परिवार ऐसे ही दूरदर्शियों और उदार चेतना, प्रबुद्ध व्यक्तियों का समुदाय है। ऐसा देव समाज संगठित होना, समस्त मानव समाज के लिये एक आशा, उल्लास एवं सन्तोष का विषय ही माना जायगा।

अखण्ड-ज्योति का 26 वर्ष से पय-पान करते रहने के कारण परिजनों को अपने कर्तव्यों एवं उत्तरदायित्व का समुचित ज्ञान है, और उस ज्ञान को वे कर्म रूप में भी परिणित कर रहे हैं। ज्ञान की महत्ता कर्म की परिणति में ही है। कर्म रहित धर्म तो विडम्बना मात्र है। जिनने धर्म के तत्व को समझा है वे कर्म के महत्व को भुला नहीं सकते। शूरवीर बात कम और काम अधिक करते हैं। हम लोगों के सम्मुख एक विशाल कार्यक्रम है। जिससे आत्म-कल्याण और लोक मंगल के दोनों लक्ष्य पूरे होते हैं। युग निर्माण योजना आज के युग की व्यक्ति और समाज की— आवश्यकताएं पूरी करने वाली एक सर्वोत्तम साधना है। इसमें जहाँ व्यक्ति जीवन में आत्म-सन्तोष, आन्तरिक आह्लाद, शरीर और मन की स्वस्थता चिरस्थायी यश, परमार्थ का पुण्य, परिवार की उत्कृष्टता, स्वर्ग एवं मुक्ति की आशा और ईश्वर के अपार प्यार का सौभाग्य मिलना निश्चित है वहाँ सामाजिक रूप से देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति की सेवा भी कम नहीं। युग निर्माण की साधना करते हुए हम स्वयं ही पार नहीं होते वरन् साथ ही असंख्य लोगों को भी अपने साथ ही पार कराते हैं। ऐसा उभय पक्षीय स्वर्ण सुयोग शायद ही किसी अन्य कार्य-पद्धति को अपना कर कोई प्राप्त कर सके।

सन्तोष की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य अपनी साधना में श्रद्धा एवं निष्ठापूर्वक लगे हुए हैं। युग निर्माण योजना के शतसूत्री कार्यक्रम अपने-अपने ढंग से, अपनी-अपनी जगह चला रहे हैं। फिर भी बार-बार प्रोत्साहन एवं उद्बोधन की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि यदि कहीं कुछ शिथिलता आने लगी हो तो वह दूर हो जाय। कुछ सदस्य ऐसे भी हो सकते हैं जिनने परिवार में अभी नया प्रवेश किया हो और यह अनुभव न किया हो कि अखण्ड-ज्योति के पन्ने पढ़ना ही नहीं, वरन् एक प्रबुद्ध परिवार के सम्मान्य सदस्य होने के नाते कुछ विशेष कर्तव्य पालन करने का उत्तरदायित्व भी उन पर है। ऐसे लोगों के लिए भी सामयिक उद्बोधन की अपेक्षा रहती है। इस स्तंभ के अंतर्गत हर अंक में ऐसा ही प्रेरणा प्रकाश उद्बोधन एवं मार्ग दर्शन प्रस्तुत किया जाता रहता है, और आशा की जाती रहती है कि उसे पढ़ा ही नहीं जायगा वरन् समझा, विचारा, स्वीकारा एवं कार्यान्वित भी किया जायगा।

इस महीने हम में से प्रत्येक को निम्नलिखित पाँच कार्यक्रमों पर विशेष रूप से ध्यान देना चाहिये और जहाँ कहीं इस सम्बन्ध में शिथिलता बढ़ती जा रही हो वहाँ उसे तुरन्त पूरा कर लेना चाहिए।

(1) इस वर्ष की शक्ति साधना— अखण्ड- ज्योति परिवार की ओर से प्रति मास 24 करोड़ गायत्री महापुरश्चरण का एक महान अभियान चल रहा है। देश पर शत्रुओं के आक्रमण को निरस्त करने के लिये जहाँ शस्त्र एवं सुरक्षा साधनों की आवश्यकता है वहाँ इस संदर्भ में किये गये आध्यात्मिक उपचार भी कम महत्वपूर्ण नहीं। ‘क्लीं’ बीज मन्त्र युक्त गायत्री पुरश्चरण जहाँ शत्रुओं की दुष्टता को निरस्त करेगा वहाँ देश में सर्वतोमुखी शक्ति एवं जागृति का भी विकास होगा। हमें एक वर्ष तक इस शक्ति साधना में किसी न किसी प्रकार भाग लेते ही रहना चाहिये। प्रति परिवार पीछे आठ माला प्रतिदिन करने से हर महीने 24 हजार का एक अनुष्ठान हो सकता है। प्रयत्न उसी के लिये किया जाय पर ऐसा न बन पड़े तो भी एक माला तो हम में से हर एक को उपरोक्त प्रयोजन के लिये करनी ही चाहिये। जहाँ अभी वह क्रम न चला हो वहाँ इस अंक के पहुँचते ही आरम्भ कर दिया जाना चाहिये।

(2) आत्म निरीक्षण-जीवन निर्माण —प्रातः उठते समय और रात को सोते समय, आत्म-निरीक्षण करने का क्रम नियमित रूप से चलाना चाहिये। अपने आप से नित्य ही प्रश्न करना चाहिये कि हमारी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियाँ उत्कृष्टता की ओर योजना-बद्ध रूप से बढ़ रही हैं या नहीं? आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। ढीला-पोला स्वभाव अपने भविष्य को ही अन्धकारमय बनाता है। इन दोषों को कड़ाई के साथ हटाना चाहिये और अपनी दिनचर्या इस प्रकार निर्धारित करनी चाहिये जिससे आजीवन उपार्जन ही नहीं, उपासना एवं लोक मंगल के कार्यों के लिये भी समुचित भावना रहे। डायरी लिखना आरम्भ कर दें। प्रातः अपनी शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों की दिनचर्या बनावें। समय और पैसे का बजट बनाकर खर्च करें। अपने भीतर जो दोष-दुर्गुण दिखाई दें, उन्हें क्रमशः घटावें और सद्गुणों का क्रमिक विकास करने के लिये सचेष्ट रहें। जीवन को अस्त-व्यस्त एवं फूहड़ ढंग से न जिएँ वरन् ऐसी गतिविधि अपनावें मानो साधनात्मक जीवन ही जिया जा रहा हो। थोड़ी-सी सतर्कता एवं दृढ़ता बरतने लगा जाए तो कुछ ही दिनों में ऐसा ढर्रा बन जाता है। उपासना का ही एक आवश्यक अंग जीवन साधना भी है। भजन के साथ ही हमें जीवन शोधन की प्रक्रिया भी अनिवार्य रूप से जोड़ लेनी चाहिये। दोनों पहिये की गाड़ी ही आध्यात्मिक प्रगति का प्रयोजन पूरा करेगी। अस्त-व्यस्त जीवन रखते हुये, केवल भजन के सहारे आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकती, इस तथ्य को हमें भली प्रकार हृदयंगम कर लेना चाहिए और आत्म-कल्याण का लक्ष प्राप्त करने के लिए आत्म-निर्माण एवं जीवन-निर्माण की साधना पूरी श्रद्धा एवं तत्परता के साथ चलानी चाहिए। हमारा जीवन क्रम दूसरों के लिए आदर्श एवं अनुकरणीय ही होना चाहिए।

(3) नियमित समय दान-अनुदान —अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रायः सभी प्रबुद्ध सदस्यों ने “एक घंटा समय और एक आना नित्य” नव निर्माण प्रयोजन के लिये नियमित रूप से लगाते रहने की प्रतिज्ञा की है। यह व्रत जिन्होंने अभी न लिया हो उन्हें अब ले लेना चाहिए। वह छोटा त्याग किसी भी भावनाशील व्यक्ति के लिए यह कोई बड़ा काम नहीं है। 23 घंटा अपने निज के काम में लगाते हैं तो एक घंटा परमार्थ प्रयोजन के लिए भी लगाना चाहिए। अपनी आजीविका का सारा उपयोग अपने लिये करते हैं तो एक आना जन-जागरण महान ज्ञान यज्ञ में भी लगाना चाहिये। हमारी भावनाओं की सचाई एवं गहराई की यह जो छोटी परीक्षाएं हैं, उनमें हमें उत्तीर्ण ही होना चाहिये। भावनात्मक उत्कृष्टता का प्रमाण उदार गतिविधियों में ही देना होता है। आज छोटी-सी कसौटी सामने प्रस्तुत होने पर बगलें झाँकना या बहाने बनाना उचित न होगा। इतना साहस तो हम में से हर एक को करना ही चाहिए।

यह समय और धन जिस कार्य के लिये निश्चित निर्धारित है उसे उसी में लगाना चाहिये। गंगा स्नान में लगे समय को और गाय को घास खिलाने के लिये खर्च हुए धन को, अखण्ड-ज्योति परिवार के नव-निर्माण उद्देश्य की पूर्ति के लिये आरम्भ किये गये ज्ञान यज्ञ में सम्मिलित न किया जा सकेगा। अन्य कार्यों के लिये अपना अलग समय या धन लगाया जाय। यह एक घंटा समय और एक आना नित्य का अनुदान तो विशुद्ध रूप से जन-जागरण के लिये, विचार क्रान्ति के लिये है। दो हजार वर्षों के अज्ञान अन्धकार के युग में से गुजरने के कारण आज हमारी विचार-पद्धति बुरी तरह अस्त-व्यस्त, विकृत लगभग उलटी हो गई है। इसे प्राचीनकाल जैसी—भारतीय संस्कृति के अनुरूप —सही किये बिना, प्रगति का एक भी प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। भौतिक प्रगति का तभी कोई लाभ है जब साथ ही आध्यात्मिक सुव्यवस्था भी बनी रहे। हमें लोक मानस के संशोधन एवं परिष्कार में ही अपना यह समय और धन लगाना चाहिये।

अपने परिजनों में से जो भी विचारशील, भावनाशील हों उनसे संपर्क बनाने के लिये यह एक घंटा निर्धारित रहे। भले ही उन्हें अपने पास बुलाये, भले ही स्वयं उनके पास जायें, यह एक घंटा समय ज्ञान-चर्चा के लिये जन संपर्क बनाने में खर्च होना चाहिये। मानव-जीवन में प्रस्तुत वर्तमान कालीन कुँठाओं एवं विकृतियों पर हमें जी खोलकर बातें करनी चाहिए। जन-मानस की उलझी-उलटी विचारणाओं को सही करना चाहिये। चर्चा से जितना बन पड़े वह चर्चा से करना चाहिये। अन्यथा इसी प्रयोजन के लिये प्रस्तुत जन-जागरण साहित्य को पढ़ाने के लिए—सुनाने के लिए—लोगों को विवश कर यह प्रयोजन पूरा करना चाहिए। इस प्रयोजन के लिए 20 न. पै. सीरिज के सर्वांग सुन्दर और लागत से भी कम मूल्य के ट्रेक्ट छापे जा रहे हैं। अब तक 30 छप चुके हैं आगे भी छपने वाले हैं। एक आना प्रतिदिन जमा की जाने वाली धन राशि इन ट्रैक्टों के रूप में अपना घरेलू पुस्तकालय होना चाहिए, और उसका लाभ कम से कम दस व्यक्तियों को तो मिलना ही चाहिये। एक आना अनुदान इस घरेलू पुस्तकालय के लिये ही सुनिश्चित रहना चाहिये। यह और किसी काम में खर्च न किया जाय। अपना परिवार, अपना पड़ौस, अपने रिश्तेदार, अपने परिचित सभी इस एक आना अनुदान से नव जीवन का प्रकाश प्राप्त करें तभी उसकी सार्थकता है। एक घंटा समय दान-अनुदान का क्रम शिथिलता पूर्वक अन्यमनस्क मन से ढीला-पोला नहीं चलना चाहिये वरन् इसके पीछे पूरी प्रखरता श्रद्धा एवं तत्परता जुड़ी रहनी चाहिये।

(4) सुसंस्कृत समाज की अभिनव रचना —समाज को विचारों से ही नहीं, आध्यात्मिक उपचारों से भी सुसंस्कृत बनाया जाना चाहिए। षोडष संस्कारों का प्रचलन, पुनर्जागरण इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए नितान्त आवश्यक है। हम लोग अपने परिवार के सदस्यों के षोडष संस्कार करावें। इसके लिए उनका विधि-विधान जानने वाले लोग हर शाखा से होने चाहिये। इस वर्ष सुरक्षा कार्यों में हमारी व्यस्तता के कारण माघ का शिविर तो स्थगित रखा गया है पर जून का एक महीने का शिविर इन्हीं प्रयोजनों के लिए है, उसमें जन-जागरणों के लिये बहुत कुछ सिखाया जायगा। हर शाखा अपना एक प्रतिनिधि उसमें भेजे। इसके लिए अभी से तैयारी की जाय। वैसे इस प्रयोजन के लिये छोटी-छोटी सस्ती विधान पुस्तकें भी छाप दी गई हैं और हर संस्कार के समय क्या प्रवचन किया जाय, इसके लिए एक-एक ट्रैक्ट अलग से भी लिखा छापा जा रहा है।

संस्कारों का आन्दोलन मजबूती के साथ चलाया जाय ताकि हमारे परिवारों के सदस्य सुसंस्कृत बनें और उनमें से आध्यात्मिक विशेषताएं उत्पन्न हों जो बाह्य जीवन को सुविकसित बनाने के लिए आवश्यक है। यह कार्य संस्कार आन्दोलन के आध्यात्मिक उपचार को सजीव किए बिना और किसी प्रकार संभव न होगा। पर्व और त्यौहार को मनाने की सामूहिक एवं प्रेरणाप्रद व्यवस्था करके भी समाज निर्माण के लिये ठोस कार्य किया जा सकता है।

फिलहाल हमें जन्म दिन मनाने की प्रथा हर जगह अविचल आरम्भ कर देनी चाहिये। इससे परस्पर प्रेम-भाव बढ़ेगा, संगठन मजबूत होगा और युग निर्माण योजना के आगामी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों के लिये पृष्ठभूमि विनिर्मित होगी। जहाँ कहीं भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है, वहाँ के विचारशील परिजन मिलकर एक पाँच या न्यूनाधिक सदस्यों की युग निर्माण शाखा बना लें। एक व्यक्ति इसका संचालक नियुक्त कर दिया जाय। अधिकाँश स्थानों पर तो पहले ही यह शाखाएं बन चुकी हैं। उत्तराधिकारियों और प्रतिनिधियों की नियुक्ति हो चुकी है। इन लोगों का कर्तव्य है कि अपने यहाँ के सभी सदस्यों की जन्म-तिथियाँ नोट कर लें और उस दिन उन्हें अपने-अपने घर एक छोटा हवन उत्सव मनाने के लिये कहें। सामूहिक गायत्री जप, छोटा हवन भजन कीर्तन, सत्संकल्प का दुहराना आदि धार्मिक कृत्यों के अतिरिक्त, कम से कम एक घंटा प्रवचनों के लिये अवश्य रखें। जिससे मानव-जीवन के महत्व एवं उसके सदुपयोग की बात समझाई जा सके। पति-पत्नी दोनों मिलकर हवन करें, शेष आगन्तुक मन्त्रोच्चारण करें तो उससे खर्च और समय की बचत होगी। आगन्तुक उपहार में पुष्प लेकर आवें, और उनका स्वागत सुपाड़ी, इलायची, सौंफ, शरबत जैसी सस्ती चीजों से किया जाय ताकि हर आर्थिक स्थिति के व्यक्ति के लिये वैसी व्यवस्था कर सकना संभव हो सके। यह प्रथम संस्कार—जन्म दिन—मनाया जाना सहज ही आरम्भ हो सकता है। अन्य संस्कारों का प्रचलन भी थोड़े से प्रशिक्षण मिलने पर आरम्भ हो सकता है। शाखाओं को सजीव सक्षम, सक्रिय बनाये रहने के लिये भी संस्कारों का प्रचलन आवश्यक है।

संगठन इस युग की एक मात्र प्रेरक शक्ति है। युग निर्माण जैसे महान प्रयोजन की पूर्ति तो बिना समर्थ संगठन के और किसी प्रकार हो ही नहीं सकती। इसलिए हमें समस्त समाज को धार्मिक आधार पर संगठित करना होगा। इस प्रयोजन की तैयारी के लिये सक्रिय कार्यकर्ताओं की एक सेना के रूप में हमें अखण्ड-ज्योति परिवार को संगठित कर लेना चाहिये। जहाँ जितने सदस्य हैं वे सब एक युग निर्माण शाखा के रूप में संगठित हो जायें। शाखा का एक कार्यालय एक जगह बना लिया जाय, जहाँ से विभिन्न रचनात्मक कार्यों का सृजन होता रहे। इस शाखा कार्यालय में एक केन्द्रीय पुस्तकालय तो अनिवार्य रूप से होना चाहिए जिसका लाभ सदस्यों को ही नहीं, उस सारे क्षेत्र को मिलता रहे।

(5)परिवार बढ़े तो-पर बिखरे नहीं —अखण्ड-ज्योति परिवार के अभी केवल 40 हजार सदस्य हैं। यही वह सेना है, जिसके आधार पर हम 40 करोड़ के भारत का ही नहीं—तीन अरब की आबादी वाले विश्व के नव-निर्माण का युग परिवर्तन का स्वप्न देखते हैं। भौतिक निर्माण, राजनैतिक, इंजीनियर वैज्ञानिक आदि कर सकते हैं, पर आध्यात्मिक आधार पर संसार का भावना स्तर सुविकसित करना केवल वैसे ही लोगों का काम है जैसे कि युग निर्माण योजना के झंडे के अंतर्गत अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य संगठित हो रहे हैं। कार्य की महानता और क्षेत्र की विशालता को देखते हुए अपना परिवार अभी बहुत छोटा है—इसे अभी बहुत बढ़ाया जाना चाहिये।

सदस्यों की अन्तः प्रेरणा को सक्षम एवं गतिशील बने रहने के लिये उनका अखण्ड-ज्योति पढ़ते रहना आवश्यक है। हम अपने हृदय के रक्त से जो कुछ लिखते हैं, उसका कुछ भी असर पाठकों पर न हो ऐसा हो नहीं सकता। इतना विशाल परिवार इन प्रेरणाओं के आधार पर ही विनिर्मित हुआ है, आगे भी इन प्रेरणाओं का प्रवाह जारी रहे और वह वर्तमान सदस्यों तक ही नहीं—नये लोगों तक भी पहुँचे इसके लिये यह आवश्यक है कि अखण्ड-ज्योति के पाठकों की संख्या घटने न पावे वरन् बढ़ती ही रहे। आर्थिक दृष्टि से अखण्ड-ज्योति सदा से घाटे से चलती है, पर उसका सबसे बड़ा लाभ यही है कि जो इसे पढ़ता है, अपने भीतर, एक चेतना, प्रेरणा, स्फूर्ति एवं जागृति अनुभव करता है। ऐसा प्रकाश अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाना ही चाहिये।

कितने ही स्थायी सदस्य अपना चन्दा आलस्य-वश नहीं भेजते। बी.पी. में बारह आना बिलकुल निरर्थक खर्च करने-कराने की बात हमें पसंद नहीं, इसलिए बिना मँगाये बी.पी. किसी को नहीं भेजी जाती। मनीआर्डर भेजने में लोग आलस्य कर जाते हैं। इस प्रकार हर साल कितने ही सदस्य टूट जाते हैं। प्रबुद्ध परिजनों को इसके लिये इस महीने संगठित प्रयास करना चाहिए और जहाँ जितने सदस्य हैं उनके घर जाकर चन्दा वसूल कर लेना चाहिये और इकट्ठा ही मनीआर्डर, पोस्टल आर्डर या बैंक ड्राफ्ट से भेज देना चाहिए। साथ ही वर्तमान सदस्यों को साथ लेकर उनके प्रभाव क्षेत्र के कुछ लोगों को नया ग्राहक भी बनाना चाहिए। यदि एक महीना थोड़ा प्रयत्न कर लिया जाय तो अगले वर्ष सहज ही सदस्य संख्या दूनी हो सकती है और अपना परिवार अपेक्षाकृत नव निर्माण की दिशा में दूनी भूमिका प्रस्तुत कर सकता है।

बसन्त पंचमी अखण्ड-ज्योति का जन्म-तिथि है। सदस्य अपनी माता की तरह ही उसका भी ज्ञान रूपी दूध पीते हैं। वर्ष में एक ही बार इस ज्ञान माला को अखण्ड-ज्योति की—श्रद्धाँजलि अर्पित करने का अवसर आता है। थोड़ा समय लगाकर एक टोली के रूप में यदि चल पड़ने का साहस कर सकें तो इतनी भर चेष्टा अखण्ड-ज्योति के प्रति उसके जन्म-दिन पर समर्पित की गई सर्वश्रेष्ठ श्रद्धाँजलि हो सकती है। पुराने सदस्यों से चन्दा वसूल करने और नये ग्राहक बनाने के लिए रसीद बहियाँ छपा ली गई हैं। आवश्यकतानुसार पृष्ठों की रसीद बहियाँ इस प्रयोजन के लिए मथुरा से मँगाई जा सकती हैं।

इस संदर्भ में एक और बात भली प्रकार ध्यान में रखने की है कि— “युग निर्माण योजना” पाक्षिक अपने नव निर्माण आन्दोलन का प्राण है। आन्दोलन का मार्गदर्शन, प्रेरणा, प्रसार, प्रचार, सभी कुछ तो उसके द्वारा होता है। अखण्ड-ज्योति रूपी कृष्ण के सन्देश को कार्यान्वित करना इसी अर्जुन रूपी पाक्षिक का काम है। दोनों की जोड़ी ही अभीष्ट प्रयोजन पूरा कर पाती है। इसलिए हर अखण्ड-ज्योति सदस्य को ‘युग निर्माण योजना’ पाक्षिक के पढ़ने की आवश्यकता अनुभव करनी चाहिए। उसे भी मिल-जुलकर सब सद


धर्म मंच से युग-निर्माण का प्रेरणाप्रद साहित्य

युग-निर्माण के लिए धर्म मंच से रचनात्मक कार्य करने के लिये निम्न पुस्तकों का प्रकाशन किया गया है इस माध्यम से जन-जागरण के लिए बहुत कुछ कार्य किया जा सकता है तथा जनता को सच्चे अर्थों में धार्मिक बनाया जा सकता है।

1—गीता-कथा

गीता सप्ताह के आधार पर आयोजित धर्मानुष्ठान में प्रवचन करने योग्य 12 प्रसंग। प्रत्येक में पौराणिक, ऐतिहासिक कथाओं एवं दृष्टान्तों का समावेश है। प्रसंग की पुष्टि के लिए श्लोक, दोहे तथा रामायण के प्रसंग भी दिये गये हैं। सजिल्द, 34 पौंड बढ़िया कागज, बड़ा साइज, मूल्य 6) रु॰।

2—गीता पद्यानुवाद

राधेश्याम तर्ज पर गीता के श्लोकों का अनुवाद, मूल श्लोकों सहित। गीता पारायण के लयवाजी के साथ सामूहिक गान के उद्देश्य से इसे बनाया गया है। सजिल्द, 34 पौंड ग्लेज बढ़िया कागज। बड़ा साइज। मूल्य 3)

3—अभिनव संस्कार पद्धति

सभी संस्कारों के मनाने की सरल सुविधाजनक एवं सर्वोपयोगी पद्धति। प्रत्येक संस्कार के महत्व का वर्णन है। जन्म दिन तथा विवाह दिन मनाने की पद्धति का विधि-विधान भी सम्मिलित है। संस्कार कराते समय क्या शिक्षा उस व्यक्ति को तथा उपस्थित लोगों को दी जानी चाहिए और उनका व्यक्तिगत जीवन किस प्रकार समुन्नत बनने की प्रेरणा मिलनी चाहिये इसका समुचित उल्लेख है। बढ़िया मोटा ग्लेज कागज। कार्डबोर्ड की जिल्द मूल्य 2॥)

4—पर्वों की प्रेरणा और पद्धति

प्रमुख त्यौहार पर्वों को सामूहिक रीति से मनाने का सरल विधि विधान। पर्व त्यौहारों में सन्निहित उन सिद्धान्तों की शिक्षाओं तथा प्रेरणाओं का उल्लेख है जिसे उपस्थित लोगों को समझाकर उन्हें सामाजिकता की शिक्षा दी जा सके। समाज निर्माण का धार्मिक मंच से यह एक प्रभावपूर्ण प्रयास है। बढ़िया कागज, कार्डबोर्ड की जिल्द। मूल्य 2)

5—सामूहिक गायत्री हवन

सामूहिक गायत्री यज्ञ करने की आदि से अन्त तक सारी विधि व्यवस्था बहुत सरल और सुबोध ढंग से समझाई गई है। इस विधि से साधारण शिक्षा वाला व्यक्ति भी विधिवत् गायत्री यज्ञ भली प्रकार करा सकता है और जनता में अनेकों बुराइयों को छुड़ाने तथा अनेकों अच्छाइयाँ बढ़ाने की प्रेरणा कर सकता है। बढ़िया कागज कार्डबोर्ड की जिल्द। मूल्य 2)

6—सत्यनारायण कथा

प्रचलित सत्यनारायण कथा का मूल उपाख्यान ज्यों का त्यों रखते हुए भी उनके संवादों में नैतिक धार्मिक एवं बौद्धिक उत्कर्ष की बड़ी ही महत्वपूर्ण विचारधारा का समावेश कर दिया गया है। इसके आधार पर कही हुई कथा को सुनने वालों में जीवन निर्माण का एक नवीन दृष्टिकोण उत्पन्न हो सकता है। मूल्य 75 न. पै.।


जीवन का शृंगार


जीवन का शृंगार (Kavita)

तोड़ अहन्ता की प्राचीरें करो आत्म-विस्तार रे! स्वार्थ मृत्यु, परमार्थ-भाव है जीवन का शृंगार रे!!

ये नन्हें-से फूल मुदित हो निज मकरन्द बनाते फल से बोझिल तरु नत होकर सबकी भूख मिटाते।

कोकिल ने भी खोल दिया गीतों का भदिर खजाना, के की का नर्तन लख जन-जन अतिशय हर्ष मनाते।

धरती निज उर चीर दे रही जग को अन्न अपार रे! स्वार्थ मृत्यु परमार्थ-भाव है जीवन का शृंगार रे!!

देह लुटा जल देते घन, धरती की प्यास बुझाते, सूरज-चन्दा जल - थल - नभ में ज्योतिर्धार बहाते।

पवन अहर्निशि जीवन देता, रुकता कभी न पल भर, पर हित सम्पादन करने को सज्जन प्राण लुटाते।

छोड़ कुटिल व्यवहार, सभी का करो सदा उपकार रे! स्वार्थ मृत्यु परमार्थ-भाव है जीवन का शृंगार रे!!

तुहिनाचल अणु-अणु कर गलता, करता पर जल दान है, पावक जला स्वयं तन, करता मंगल का आह्वान है।

क्षण-क्षण जल लघु दीप तिमिर में भरता नव आलोक है, यद्यपि उसे बुझाने आता शलभ निपट नादान है।

तन-मन-धन-जीवन अर्पण कर भरो रिक्त भण्डार रे! स्वार्थ मृत्यु, परमार्थ-भाव है जीवन का शृंगार रे!!

वह कैसा नर जो न नीर कण पोंछे दुखिया नैन से, वह कैसा नर जो न वेदना मेटे मीठे बैन से।

जब भूखे, असहाय, नग्न नारी-नर हों चिंघारते- मानव नहीं, पिशाचाधम जो सोए फिर भी चैन से।

मानव वह होता है जिसका ममतामय व्यवहार रे! स्वार्थ मृत्यु, परमार्थ-भाव है जीवन का शृंगार रे!!

-भगवान शरण भारद्वाज ‘प्रदीप’

*समाप्त*